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  • राजस्थान में चौहान, परमार, कच्छवाहा एवं अन्य राजपूत वंशों का उदय

     03.06.2020
    राजस्थान में चौहान, परमार, कच्छवाहा एवं अन्य राजपूत वंशों का उदय

    चौहान

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    कवि चंद बरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो के अनुसार एक बार ऋषियों ने आबू पर्वत पर यज्ञ करना आरंभ किया तो राक्षसों ने मल-मूत्र तथा हड्डियां आदि अपवित्र वस्तुएं डालकर यज्ञ को भ्रष्ट करने की चेष्टा की। वसिष्ठ ऋषि ने यज्ञ की रक्षा के लिये मंत्र सिद्धि से चार पुरुषों को उत्पन्न किया जो प्रतिहार, परमार, चौलुक्य और चौहान कहलाये। नैणसी तथा सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी कुछ हेर-फेर के साथ इस कथानक को अपने
    ग्रंथों में लिखा है। इस आधार पर चारण तथा भाट इन चारों को अग्निवंशीय मानते हैं। पृथ्वीराज विजय, हम्मीर रासो, हम्मीर महाकाव्य आदि ग्रंथों में चौहान सूर्यवंशीय बताये गये हैं। डॉ. ओझा के अनुसार भी चौहान सूर्यवंशीय क्षत्रिय थे जिन्हें गोत्रोच्चार में चंद्रवंशीय माना जाता है। डॉ. दशरथ शर्मा चौहानों को ब्राह्मणों से उत्पन्न हुआ मानते हैं। (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 1999, हमीर महाकाव्य में चौहानों को किस वंश से बताया गया है?)

    कुछ प्रमाणों के आधार पर चौहानों का सम्बन्ध मोरी वंश से जोड़ा जाता है जो चित्तौड़गढ़ के आसपास शासन करते थे परंतु सर्वाधिक विश्वस्त मान्यता के अनुसार चाहमान अथवा चौहान सपादलक्ष झील (सांभर झील) के आसपास रहते थे। उनका प्रारंभिक राज्य जांगल देश (बीकानेर, जयपुर तथा उत्तरी मारवाड़) था। उनके राज्य का प्रमुख भाग सपादलक्ष (सांभर) था तथा अहिछत्रपुर (नागौर) उनकी राजधानी थी। सपादलक्ष के चाहमानों का आदि पुरुष वासुदेव था जो सांभर झील का प्रवर्तक था। इसका समय 551 ई. के आसपास माना जाता है। नवीं शताब्दी ईस्वी में इसका वंशज गूवक सांभर का शासक था जो प्रतिहार राजा नागभट्ट का सामंत था। गूवक ने हर्षनाथ मंदिर बनवाया। इसके वंशज चंदनराज ने दिल्ली के तोमरों को परास्त कर ख्याति प्राप्त की। हर्षनाथ लेख के अनुसार चंदनराज की रानी रुद्राणी जिसे आत्मप्रभा भी कहते हैं, यौगिक क्रिया में निपुण थी और बड़ी शिवभक्त थी। वह पुष्कर में प्रतिदिन एक हजार दीपक अपने इष्ट महादेव को अर्पित करती थी।

    चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज प्रथम हुआ। हर्षनाथ लेख में उसे महाराज उपाधि से संबोधित किया गया है जो उसकी राजनीतिक स्थिति का सूचक है। जब राष्ट्रकूटों ने प्रतिहारों को जर्जर कर दिया तो वाक्पतिराज ने प्रतिहारों को परास्त कर उनके कई क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिये। उसके बाद विंध्यराज, सिंहराज तथा विग्रहराज द्वितीय चौहानों की गद्दी पर बैठे। विग्रहराज द्वितीय प्रतापी शासक हुआ। शक्राई लेख में इसे महाराजाधिराज लिखा गया है। इसका उत्तराधिकारी गोविंद तृतीय था जिसे पृथ्वीराज विजय में वैरीघट्ट की उपाधि दी गयी है। गोविंद तृतीय के बाद वाक्पतिराज द्वितीय तथा वीर्यराम सांभर के शासक हुए। वीर्यराम के समय सांभर चौहानों के हाथ से निकल गया किंतु उसके उत्तराधिकारी चामुण्डराय ने फिर से अपना पैतृक राज्य प्राप्त कर लिया। उसके बाद सिंहट और फिर दुर्लभराज तृतीय शासक हुए।

    दुर्लभ राज तृतीय का उत्तराधिकारी विग्रहराज तृतीय था जिसे वीसल भी कहते हैं। वीसल के पुत्र पृथ्वीराज प्रथम ने ई.1105 में 700 चौलुक्यों को मौत के घाट उतारा जो पुष्कर के ब्राह्मणों को लूटने आये थे। जिस चौहान शक्ति का उदय छठी शताब्दी के आसपास वासुदेव के काल से आंरभ हुआ, वह शक्ति बारहवीं शताब्दी में पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज के समय में सुदृढ़ हो गयी। अजयराज का काल चौहान साम्राज्य का निर्माण काल माना जाता है। उसने उज्जैन पर आक्रमण कर मालवा के परमार शासक नरवर्मन को परास्त किया तथा उसके सेनापति सुलहाणा को बंदी बनाया। इस अवसर पर उसने तीन राजाओं चाचिग, सिंधुल तथा यशोराज का वध किया। मालवा परमारों को दबाये रखने तथा अन्य शत्रुओं से राज्य की रक्षा करने के लिये उसने ई.1113 में अजमेर नगर की स्थापना की। ई.1130 के आसपास वह अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य भार सौंप कर पुष्करारण्य में जा रहा।

    अर्णोराज ने अपनी विजय पताका सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक ले जाकर अपनी वंश परम्परा को और अधिक समृद्ध किया। उसने अजमेर पर चढ़ आये तुर्कों को परास्त किया। उसके काल में चाहमान-चौलुक्य संघर्ष चरम पर जा पहुँचा। उसके काल में चौलुक्य राजाओं-जयसिंह सिद्धराज तथा कुमार पाल ने राजस्थान में अपने पांव पसारने चाहे जबकि स्वयं अर्णोराज मालवा को हड़पना चाहता था। अतः उनके बीच संघर्ष छिड़ जाना स्वाभाविक था।

    जयसिंह सिद्धराज ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया और दोनों राज्यों के बीच कुछ समय के लिये सुलह हो गयी किंतु 1142 ई. में जब कुमारपाल चौलुक्यों का राजा हुआ तब यह युद्ध पुनः आरंभ हो गया। कुमारपाल ने दो बार अर्णोराज को परास्त किया। अर्णोराज को अपनी बहन, हाथी, घोड़े आदि उपहार में देकर अपना राज्य बचाना पड़ा। अर्णोराज ने गजनवियों को परास्त कर खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त की। वह धर्मप्रिय, विद्वानों का सम्मान करने वाला तथा प्रजापालक राजा था। उसके बड़े पुत्र जग्गदेव ने उसकी हत्या कर दी। चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने भारत पर चढ़कर आये मुहम्मद गौरी को कई बार छोटे-बड़े युद्धों में परास्त किया। पृथ्वीराज वीर तो था किंतु अदूरदर्शी भी था। उसने हाथ में आये शत्रु को कई बार जीवित छोड़ दिया। वह इस्माली आक्रमणों की शक्ति एवं उनकी गंभीरता को नहीं समझ सका। उसने अपने स्वजातीय बंधु कन्नौज नरेश जयचंद को अपना शत्रु बना लिया। वह संयोगिता के प्रेमपाश में बंध कर राज्यकार्य से दूर रहने लगा। इन सब कारणों से ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी के हाथों परास्त हुआ और मारा गया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1996- इतिहास, कोई दो ऐसे कारण बताइये जिनके परिणाम स्वरूप आपके विचार में तराईन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई थी।)

    इसके बाद दिल्ली पर तुर्कों का शासन हो गया और दिल्ली सल्तनत का शासन आरंभ हुआ। अजमेर तो कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से ही दिल्ली सल्तनत के अधीन था। अल्ततमिश ने जालोर, मण्डोर तथा नाडोल पर भी अधिकार कर लिया। बलबन ने रणथंभौर एवं नागौर पर अधिकार करके लाहौर से रणथंभौर तक का भाग अपने अधीन कर लिया जिसकी राजधानी नागौर में रखी। अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर, चित्तौड़, सिवाना एवं जालौर पर अधिकार कर लिया।

    परमार

    परमार का शाब्दिक अर्थ शत्रु को मारने वाला होता है। प्रारंभ में ये आबू के आसपास के प्रदेशों में रहते थे। ज्यों-ज्यों प्रतिहार कमजोर होते गये, परमार अपना प्रभाव बढ़ाते गये। धीरे-धीरे इन्होंने मारवाड़, सिंध, गुजरात, वागड़ तथा मालवा आदि प्रदेशों पर अपने राज्य स्थापित कर लिये। परमारों में आबू, जालोर, किराडू, मालवा तथा वागड़ के परमार अधिक प्रसिद्ध हैं।

    आबू के परमार: आबू के परमारों का कुल पुरुष धूमराज के नाम से विख्यात है परंतु इनकी वंशावली उत्पलराज से आरंभ होती है। इन्हें अपनी सत्ता स्थापित करने के लिये अपने पड़ौसी चौलुक्यों से संघर्ष करना पड़ा। इस शाखा के चौथे राजा धरणीवराह पर चौलुक्य शासक मूलराज ने दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आक्रमण किया। धरणीवराह को हथकुण्डी के राष्ट्रकूट धवल की शरण लेनी पड़ी। बाद में धरणीवराह ने पुनः आबू पर अधिकार कर लिया।

    धरणीवराह के बाद महीपाल तथा महीपाल के बाद धुंधक आबू की गद्दी पर बैठा। धुंधक पर चौलुक्य राजा भीमदेव ने आक्रमण किया। धुंधक को धार के राजा भोज के यहाँ शरण लेनी पड़ी। भीमदेव ने पोरवाड़ महाजन विमलशाह को आबू का दण्डपति नियुक्त किया। विमलशाह ने भीमदेव तथा धुंधक में मेल करवाया और आबू में ई. 1031 में करोड़ों रुपयों की लागत से आदिनाथ का भव्य मंदिर बनवाया। धुंधक की विधवा पुत्री ने बसंतगढ़ में सूर्यमंदिर और सरस्वती वापी का जीर्णोद्धार करवाया।

    1060 ई. में परमार कृष्ण्देव के सम्बन्ध चौलुक्य भीमदेव से बिगड़ गये। भीमदेव ने उसे कैद कर लिया किंतु नाडौल के चौहान शासक बालाप्रसाद की सहायता से कृष्णदेव को मुक्ति मिली। कृष्णदेव के समय के दो शिलालेख 1060 ई. एवं 1066 ई. के भीनमाल से प्राप्त हुए हैं। कृष्णदेव के बाद उसका पौत्र विक्रमसिंह गद्दी पर बैठा जिसने महामण्डलेश्वर की उपाधि धारण की। विक्रमसिंह का प्रपौत्र धारावर्ष आबू के परमारों में बड़ा प्रसिद्ध हुआ। उसने 60 वर्ष तक शासन किया। उसने 1206 ई. में मुहम्मद गौरी के विरुद्ध उस प्रसिद्ध लड़ाई का सेनापतित्व किया था जो मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा अन्हिलवाड़ा आक्रमण के समय हुई थी। यह लड़ाई आबू के पास कायंद्रा गाँव में हुई थी जिसमें गुजरात की पराजय हुई। इसके बाद हुई दूसरी लड़ाई का नेतृत्व भी धारावर्ष ने किया। इस लड़ाई में मुहम्मद गौरी बुरी तरह जख्मी हुआ तथा युद्ध मैदान से भाग खड़ा हुआ। धारावर्ष चार चौलुक्य शासकों कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज तथा भीमदेव द्वितीय का समकालीन था। भीमदेव के अल्पवयस्क होने के कारण उसके कई सामंत स्वतंत्र हो गये जिनमें से धारावर्ष भी एक था। जब अल्तमश ने गुजरात पर आक्रमण किया तो चीर धवल, वास्तुपाल तथा तेजपाल के कहने पर धारावर्ष ने भीमदेव की सहायता की।

    आबू पर्वत पर अचलेश्वर के मंदाकिनी कुण्ड पर धारावर्ष की एक मूर्ति बनी हुई है जिसके सामने समान रेखा में आर-पार छिद्रित तीन भैंसे हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि धारावर्ष एक ही बाण से तीन-तीन भैंसों को बेध डालता था। धारावर्ष के छोटे भाई प्रह्लादन ने पालनपुर नामक नगर बसाया तथा ‘पार्थ पराक्रम व्यायोग’ नामक नाटक की रचना की। धारावर्ष के कवि सोमेश्वर ने कीर्ति कौमुदी पुस्तक की रचना की। उसके मंत्री तेजपाल ने लूणवसाही मंदिर में धारावर्ष की प्रशस्ति लिखवायी। धारावर्ष के पुत्र सोमसिंह के काल में तेजपाल ने देलवाड़ा गाँव में नेमिनाथ का मंदिर बनवाया। सोमसिंह के उत्तराधिकारी प्रतापसिंह ने मेवाड़ के शासक जैत्रकर्ण को परास्त कर चंद्रावती पर अधिकार कर लिया। उसके बाद से आबू के परमार मेवाड़ के शासकों की भांति अपने आप को रावल तथा महारावल लिखने लगे। जालोर के चौहानों ने परमार राजा विक्रमसिंह से आबू का पश्चिमी भाग छीन लिया तथा बाद में उसके किसी वंशज से ई. 1311 के आसपास राव लूम्बा ने परमारों से चंद्रावती छीन ली। यहीं से आबू में परमार शासन का अंत हुआ तथा चौहानों के शासन की स्थापना हुई।

    मालवा के परमार: मालवा के परमारों का मूल स्थान भी आबू था। इनकी राजधानी या तो उज्जैन रही या धारा नगरी रही। राजस्थान में इनके अधिकार क्षेत्र में कोटा राज्य का दक्षिणी भाग, झालावाड़, वागड़, प्रतापगढ़ का पूर्वी भाग आदि थे। आबू के परमारों में मुंज प्रतापी राजकुमार हुआ। इतिहास में उसे वाक्पति राज तथा उत्पलराज नामों से भी जाना जाता है। उसने अमोघवर्ष, पृथ्वीवल्लभ तथा श्रीवल्लभ की उपाधियां धारण कीं।

    प्रबंध चिंतामणि के अनुसार परमार राजा सीयक द्वितीय के कोई पुत्र न था। एक दिन उसे एक बालक मुंज घास पर पड़ा हुआ मिला। राजा बालक को महल ले आया तथा उसका लालन-पालन पुत्र की भांति किया। मुंज घास पर मिलने से उसका नाम मुंज रखा गया। मुंज को गोद लिये जाने के बाद राजा सीयक की रानी ने सिंधुराज नामक पुत्र को जन्म दिया किंतु सीयक मुंज को इतना प्रेम करता था कि उसने मुंज को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। 
    मुंज ने हूण मण्डल, मेवाड़ के गुहिल शासक शक्तिकुमार, कलचुरि वंश के राजा युवराज द्वितीय, नाडौल के चौहान शासक बलिराज, लाट के शासक वारप्प तथा चौलुक्य राजा तैल द्वितीय पर आक्रमण कर उन्हें परास्त किया।

    मुंज ने तैलप द्वितीय पर सात बार आक्रमण किया। वह छः बार चौलुक्यों को परास्त करने में सफल रहा तथा सातवीं बार तैल के राज्य को जीतता हुआ काफी अंदर तक चला गया। मुंज के मंत्री रुद्रादित्य ने मुंज को आगे बढ़ने से मना किया किंतु मुंज नहीं माना। रुद्रादित्य ने अग्नि में जलकर आत्म हत्या कर ली। उधर मुंज को तैलप द्वितीय ने घेर कर बंदी बना लिया और बुरी तरह अपमानित कर मार डाला। मुंज अपने समय का पराक्रमी राजा था। उसने परमार राज्य को संगठित किया। उसका राज्य पूर्व में भिलसा से लेकर पश्चिम में साबरमती तक था। उत्तर में झालावाड़ से लेकर दक्षिण में ताप्ति नदी तक विस्तृत था। मुंज की ख्याति विद्वान और विद्वानों के आश्रयदाता के रूप में है।

    मुंज के बाद सिंधुराज तथा उसके बाद भोज परमार राजा हुए। इनमें भोज अपनी विजयों तथा विद्यानुराग के लिये प्रसिद्ध है। भोज ने राजमृगांक, विद्वज्जन मण्डल, समरांगण, श्ृंगारमंजरी तथा कूर्मशतक आदि ग्रंथ लिखे। उसने धारा नगरी में सरस्वती कण्ठाभरण नामक पाठशाला बनवायी। उसकी बनवाई हुई एक संस्कृत पाठशाला जालोर में भी मिलती है। बल्लल, मेरुतुंग, वररुचि, सुबंधु, अमर, माघ, धनपाल, मानतुंग आदि अनेक विद्वान भोज के दरबार की शोभा थे। भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण का विशाल शिव मंदिर बनवाया। भोज के बाद जयसिंह भी प्रतापी राजा हुआ। विक्रम 1192 (ई.1135) के आसपास मालवा परमारों के हाथ से जाता रहा किंतु 13वीं शताब्दी के आसपास अर्जुन वर्मा नामक परमार ने सोलंकियों की निर्बलता से लाभ उठाकर मालवा को पुनः अपने अधीन किया किंतु मेवाड़ के गुहिल वंश और खलजियों के आतंक से मालवा का वैभव नष्ट हो गया और यहाँ के परमार भाग कर अजमेर चले गये। इन्हीं के वंश में महापा पंवार कुंभा का समकालीन था तथा कर्मचन्द्र पंवार राणा सांगा का समकालीन था जो अजमेर के आसपास छोटे से सामंत के रूप में रहते थे।

    वागड़ के परमार : मालवा के परमार कृष्णराज के द्वितीय पुत्र डम्बरसिंह से वागड़ के परमार हुए। इनका राज्य डूंगरपुर-बांसवाड़ा का भाग था जिसे वागड़ कहते हैं। इस शाखा के दूसरे राजा धनिक ने महाकाल के मंदिर के निकट धनेश्वर का मंदिर बनवाया था। इसका पोता कंकदेव मालवा के राजा श्री हर्ष के शत्रु कर्णण से नर्मदा के तट पर लड़ता हुआ मारा गया था।

    कंकदेव का पोता सत्यराज गुजरात के शासकों से लड़ा। सत्यराज के पुत्र मण्डलीक ने ई.1059 में पाणाहेड़ा में मण्डलेश्वर का मंदिर बनवाया। ई.1179 के आसपास गुहिलों ने परमारों से यह इलाका छीन लिया। इसके साथ ही वागड़ के परमार इतिहास के नेपथ्य में चले गये किंतु इनकी राजधानी उत्थूणक (अर्थूणा) आज भी वागड़ के परमारों के समृद्ध इतिहास की कहानी कहती है जिसमें अनेक शिव, विष्णु तथा शक्ति के मंदिर स्थित हैं। यहाँ से प्राप्त मूर्तियों, तोरणों तथा स्तंभों के अवशेष तत्कालीन कला वैभव एवं समृद्धि के बचे-खुचे चिह्म हैं।

    जालोर के परमार : जालोर से प्राप्त ई.1087 के एक शिलालेख से सात परमार शासकों के नाम प्राप्त हुए हैं। ये हैं- वाक्पतिराज, चंदन, देवराज, अपराजित, विज्जल, धारावर्ष तथा विसल। यह वाक्पतिराज मालवा का राजा मुंज है। इससे अनुमान होता है कि ई.973 (मुंज के शासन के आरंभ) से लेकर 1087 ईस्वी (शिलालेख की तिथि तक) जालोर के ये परमार शासक मालवा के परमारों के वंशज थे तथा उनके अधीन सामंत रहे होंगे।

    मुंज आबू के परमारों का वंशज था। अतः जालोर के परमार आबू के परमारों में से ही थे। जालोर के परमारों को आबू के परमार शासक धरणीवराह का वंशज भी माना जाता है (मुंज धरणी वराह की तीसरी पीढ़ी में था)। मालवा के राजा भोज की मृत्यु के पश्चात् परमारों की शक्ति कम होने लगी तथा चौलुक्यों ने उनके क्षेत्रों पर अधिकार करना आरंभ कर दिया।

    इसी कारण जालोर के परमार बाद में चौलुक्यों के अधीन हो गये। ई. 1181 में जब चौहान कीर्तिपाल ने जालोर पर अधिकार किया तब जालोर पर जो परमार शासक (कुंभटपाल) राज्य कर रहा था, वह गुजरात के चौलुक्यों के अधीन था। कीर्तिपाल के जालोर पर अधिकार करने के साथ ही जालोर की परमार शाखा का अंत हो गया।

    परमार नरेश महान कला प्रेमी, विद्वान तथा भवन निर्माता थे। उनके काल में बने अनेक शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, मातृदेवी, गणेश, कार्तिकेय, कुबेर, दुर्गा आदि देवी-देवताओं के मंदिर एवं मूर्तियां प्राप्त होती हैं। उस काल में अनेक जैन मंदिरों का भी निर्माण हुआ। परमार राजा मुंज को कवि वृष की उपाधि दी गयी थी। उसकी सभा में हलायुध नामक विद्वान रहता था जिसने अभिदान रत्नमाला लिखी। उसकी राज्यसभा में सर्वाधिक विद्वान पड्डगुप्त था जिसने नवसाहसंक लिखी। मुंज ने स्वयं भी कुछ ग्रंथ लिखे जो अब प्राप्त नहीं होते। परमार राजाओं 
    में भोज सबसे प्रसिद्ध राजा हुआ। कहा जाता है कि उसने काव्य, व्याकरण, ज्योतिष, योग, चिकित्सा एवं नाट्य आदि पर 84 ग्रंथ लिखे। उसके द्वारा रचित सरस्वती कण्ठाभरण एक विशाल ग्रंथ है। उसकी सभा में अनेक विद्वान रहते थे।

    कछवाहा

    राजस्थान के इतिहास में कछवाहों ने बारहवीं शताब्दी के आसपास महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। ये अपने आपको रघुवंशी बताते हैं तथा भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज मानते हैं। राजस्थान में ढूंढार प्रदेश की स्थापना से पूर्व इनका शासन मध्यप्रदेश के नरवर तथा ग्वालियर में स्थापित था। इन्हें ढूंढार प्रदेश में अपना राज्य स्थापित करने के लिये मीणों तथा बड़गूजरों से भारी टक्क र लेनी पड़ी। इनकी प्रथम राजधानी दौसा रही। जमवारामगढ़ को इन्होंने अपनी दूसरी राजधानी बनाया। आमेर तीसरी व जयपुर चौथी तथा अंतिम राजधानी थी।

    कछवाहों को कुछ समय के लिये चौहानों का सामंत रहना पड़ा। बारहवीं शताब्दी में कच्छवाहा दूल्हेराव ने दौसा में अपना किला बनवाया। बाद में दूल्हेराव ने जमवारामगढ़ के मीणों को परास्त कर अपना दूसरा किला व राजधानी बनाया। ई.1207 में दूल्हेराव के पुत्र कोकिलदेव ने आमेर राज्य की स्थापना की। उसने मत्स्य संघ के केन्द्र तथा महाभारत कालीन मत्स्य संघ की राजधानी विराटनगर पर भी धावा बोल दिया। वहाँ के यादव राजा को परास्त होना पड़ा। कोकिलदेव ने मैड पर अधिकार कर लिया तथा अमरसर और नायन के मीणों को परास्त कर अपने राज्य का काफी विस्तार कर लिया। पराजित मीणे कछवाहों से निरंतर युद्ध करते रहे और चोरी, लूटपाट एवं छापामार युद्ध कर आतंक फैलाते रहे। यह संघर्ष परवर्ती राजाओं पृथ्वीराज तथा हणुदेव को भी करना पड़ा। अंतिम रूप से जानड़देव ने मीणों के आतंक को समाप्त करने में सफलता प्राप्त की।

    पंचवनदेव कछवाहा वंश का शक्तिशाली शासक था। उसकी मृत्यु के बाद मालसी, बीजलदेव, रामदेव, किल्हण देव, कुंतल, जूणखी, उदयकरण, नरसिंह, उदरण तथा चंद्रसेन शासक बने। चंद्रसेन का पुत्र पृथ्वीराज महाराणा सांगा का सामंत था तथा सांगा की ओर से खानवा की लड़ाई में बाबर के विरुद्ध लड़ा था। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद उसका छोटा लड़का पूर्णमल आमेर का शासक बना किंतु पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद भीमदेव ने उसे गद्दी से उतार दिया जिससे कच्छवाहों में गृहयुद्ध आरंभ हो गया। इससे कछवाहों के राज्य में पहले अफगानों का और फिर मुगलों का प्रभाव बढ़ा। भीमदेव के बाद उसका पुत्र रत्नसिंह गद्दी पर बैठा। रत्नसिंह को उसके छोटे भाई भारमल ने जहर पिलवाकर मार डाला और स्वयं राजा बन गया।

    भाटी

    दंतकथाओं, ख्यातों तथा वंशावलियों में भट्टि वंश के मुख्य प्रवर्तकों रज तथा गज का नाम आता है जो छठी शताब्दी में पंजाब के शासक थे। भट्टी अथवा भाटी राजपूतों की चंद्रवंशीय यादवों की शाखा में है जिनका मूल पुरुष भट्टी अथवा भाटी नाम से था। सातवीं शताब्दी में इस वंश के शासक शालिवाहन तथा बलंद थे। उनके बाद भाटी, मंगलराव, मंजसराव, केहरजी तथा तन्नूजी शासक हुए। मंजसराव वि. सं. 800 के लगभग रेगिस्तान में चला आया। उसके पुत्र केहर ने तन्नोट किले का निर्माण करवाया जो जैसलमेर से 75 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। भाटियों का व्यवस्थित इतिहास विजयराज से आरंभ होता है। इसका समय 1165 ईस्वी के आसपास का है। ई. 1176 के धनावा लेख में उसे महाराजा की उपाधि से संबोधित किया गया है। उसने परमभट्टारक महाराधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की। इससे अनुमान होता है कि उसने प्रतिहारों के किसी राजा को परास्त किया था क्योंकि यह उपाधि प्रतिहार शासक धारण करते थे। जब कोई राजा किसी दूसरे राजा को जीत लेता था तो वह पराजित राजा की उपाधि भी धारण कर लेता था। विजयराज के बाद उसका पुत्र भोज शासक बना। भोज की मृत्यु गोरियों से युद्ध करने में हुई। भोज के बाद जैसल राजा बना जिसने जैसलमेर की स्थापना की तथा लोद्रवा के स्थान पर जैसलमेर को अपनी राजधानी बनाया। मात्र पाँच वर्ष राज्य करके ही उसकी मृत्यु हो गयी। वह नयी राजधानी का प्राकार तथा कुछ द्वारों का ही निर्माण करवा पाया। उसके उत्तराधिकारी शालिवाहन ने ई. 1187 के आसपास राजधानी का निर्माण कार्य पूरा करवाया। शालिवाहन के बाद वैजल गद्दी पर बैठा जो दुश्चरित्र व्यक्ति था। नैणसी लिखता है कि उसका सम्बन्ध उसकी विमाता से संशयात्मक था। वैजल को या तो आत्महत्या करनी पड़ी या उसकी हत्या हो गयी। उसके बाद केल्हण गद्दी पर बैठा। केल्हण के बाद चाचकदेव, कर्णसिंह, लाखनसेन, पुण्यपाल तथा जैतसिंह आदि जैसलमेर की गद्दी पर बैठे। इन राजाओं ने बिलोचियों, मुलतानियों तथा गुलामवंश के शासकों से कई बार भिड़ंत की।

    चावड़ा

    चावड़ों का सबसे प्राचीन राज्य भीनमाल था। इनके अन्य दो राज्य काठियावाड़ में वढवाण तथा पाटन में अन्हिलवाड़ा थे। प्राचीन संस्कृत लेखों में इन्हें चाप, चापोत्कट या चावोटक कहा गया है। काठियावाड़ जिले के हड्डाला से प्राप्त 914 ईस्वी के चावड़ा राजा धरणी वराह के दान पात्र के अनुसार जब पृथ्वी ने भगवान शंकर से प्रार्थना की कि हे प्रभु! आप जब ध्यान मग्न होते हैं तब असुर मुझे दुख देते हैं जो मुझसे सहन नहीं होता। तब शंकर ने अपने चाप (धनुष) से पृथ्वी की रक्षा के लिये चाप नामक वीर उत्पन्न किया जिसका वंश चाप अथवा चावड़ा कहलाया। ऐसा माना जाता है कि भीनमाल के चावड़ों ने गुर्जरों से राज्य छीना। चीनी यात्री ह्वेनसांग ई. 641 में भीनमाल आया। (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2007, किस चीनी यात्री ने भीनमाल की यात्रा की थी?) उसने भीनमाल के तत्कालीन शासक को क्षत्रिय बताया है तथा भीनमाल को गुर्जरात्रा की राजधानी बताया है। उस समय भीनमाल पर चावड़ा शासन कर रहे थे। भीनमाल के चावड़ों का श्ृंखलाबद्ध इतिहास प्राप्त नहीं होता। सिरोही जिले के बसंतगढ़ शिलालेख के अनुसार 625 ईस्वी में वर्मलात का सामंत राज्जिल आबू और उसके आसपास के प्रदेश का स्वामी था। लाट देश के चौलुक्य सामंत पुलकेशी के ई. 739 के दानपत्र के अनुसार अरबों ने आक्रमण करके चावड़ों का राज्य नष्ट कर दिया। बाद में प्रतिहारों ने उस पर अधिकार जमा लिया।

    नागवंश

    यह एक प्राचीन क्षत्रिय जाति थी जिनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। कोटा जिले के शेरगढ़ द्वार से 791 ई. के शिलालेख मेें नागवंशियों के चार नाम उपलब्ध होते हैं जो बिंदुनाग, पड्डनाग, सर्वसार तथा देवदत्त हैं। इनमें सर्वनाग की रानी का नाम श्री बताया गया है तथा देवदत्त को सामंत बताया गया है। ये संभवतः कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहारों के सामंत थे।

    यौधेय

    ये भी प्राचीन क्षत्रिय हैं। ईसा से चौथी शताब्दी पूर्व में पाणिनी ने अष्टाध्यायी नामक व्याकरण ग्रंथ की रचना की थी। (आर. ए. एस. प्रारंभिक परीक्षा 2008, सामान्य ज्ञान, अष्टाध्यायी का लेखक था- वराहमिहिर/कालीदास/पाणिनी/बलराम?) उन्होंने यौधेयों के जांगल प्रदेश (बीकानेर, गंगानगर, चूरू और उसके आसपास) में निवास करने का उल्लेख किया है। इनमें गणतंत्रात्मक सत्ता की परंपरा थी। बाद में इन्हें मुस्लिम धर्म स्वीकार करना पड़ा। आजकल के जोहिये मुसलमान तथा दहिया राजपूत इन्हीं यौधेयों की संतान हैं।

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