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  • मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

     21.08.2017
    मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

    मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

    मारवाड़ राज्य

    मारवाड़ राज्य की स्थापना का कार्य बदायूं के राठौड़ों के वंशज सीहाजी द्वारा थार रेगिस्तान में आकर बसने के बाद आरम्भ हुई। सीहा की मृत्यु 1273 ई. में हुई। उसके वंशज पाली तथा बाड़मेर के आसपास राज्य करते रहे। 1394 ई. में राव चूण्डा ने मण्डोर पर अधिकार किया तथा 1459 ई. में जोधा ने मेहरानगढ़ दुर्ग बनाया और वहां अपनी नई राजधानी स्थापित की। जिस समय बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय मारवाड़ पर राव गांगा (1515-1532 ई.) का शासन था। जब सांगा खानुआ के मैदान में बाबर से लड़ने गया तो गांगा ने भी अपने 4000 सैनिक सांगा की सहायता के लिए भेजे। इस सेना का नेतृत्व मेड़ता से वीरमदेव (राव जोधा का पौत्र और राव दूदा का पुत्र) ने किया। वह अपने भाइयों रत्नसिंह तथा रायमल के साथ युद्ध के मैदान में गया। महाराणा सांगा, राव गांगा का बहनोई था। रायमल और रत्नसिंह इस युद्ध में खेत रहे। (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2008, सामान्य ज्ञान, खानवा में बाबर के विरुद्ध सांगा की सहायता के लिए किसके नेतृत्व में मारवाड़ी सेना भेजी गई थी-राव गांगा/मालदेव/बीरमदेव/सूजा?)

    राव गांगा और मेड़ता के राजा वीरम में राज्याधिकार को लेकर झगड़ा चलता था। गांगा ने वीरम को सोजत की जागीर दी किन्तु वह सन्तुष्ट नहीं हुआ और दोनों के बीच कई बार युद्ध हुआ। गांगा के पुत्र मालदेव ने इन युद्धों में अपने पिता की सहायता की। गांगा ने मुसलमानों के विरुद्ध भी अनेक लड़ाइयां लड़ीं। उसने जोधपुर में गांगेलाव का तालाब, गंागा की बावड़ी और गंगश्यामजी का मन्दिर बनवाया। उसकी बड़ी रानी सिरोही के राव जगमाल के पुत्री पद्मावती (ससुराल का नाम मणिक देवी) से हुआ था जिससे मालदेव, मानसी, बैरीसाल और एक पुत्री सोनबाई का जन्म हुआ। इस विवाह के अवसर पर गांगा, सिरोही से एक विष्णु प्रतिमा लाया और उसे गंगश्यामजी के मन्दिर में स्थापित करवाया। इसी रानी के साथ पहले-पहले सिंघी (सिंघवी) खांप के कुछ ओसवाल महाजन जोधपुर आए थे। इन सिंघी लोगो के पूर्वज कुलीन नन्दवाने बोहरे (पल्लीवाल ब्राह्ममण) थे किन्तु बाद में वे जैन धर्म को स्वीकार करके ओसवाल कहलाने लगे तथा वैश्य जाति में मिल गये। गांगा की एक रानी मेवाड़ के राणा सांगा की पुत्री थी। इसका नाम भी पद्मावती था। इसने जोधपुर में पद्मसर तालाब बनवाया।

    गांगा का पुत्र मालदेव अत्यंत महत्वाकांक्षी, वीर और धूर्त था। उसने एक दिन गांगा को महल के झरोखे से धक्का दे दिया। उस समय गांगा अफीम की पिनक में था। गांगा की मृत्यु हो गई और मलदेव जोधपुर की गद्दी पर बैठा। उस समय जोधपुर राज्य में जोधपुर तथा सोजत के ही क्षेत्र थे। जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा और मेड़ता आदि के जागीरदार जोधपुर के नरेश को आवश्यकतानुसार सैनिक सहायता देते थे। मालदेव (1532-1562 ई.) ने जेतमालोत राठौड़ों से सिवाना, खाबड़ पंवारों से चौहटन, पारकर तथा राधनुपर, सिंधल राठौड़ों से रायपुर तथा भादªाजून, बिहरी पठानों से जालोर, मल्लीनाथ के वंशजों से मालानी, वीरमदेव से मेड़ता, मेवाड़ के राणा से गोडवाड़, बदनोर, मदारिया और कोसीथल, बीका राठौड़ों से बीकानेर, चौहानों से सांचोर, देवड़ों से सिरोही तथा मुसलमानों से नागौर, सांभर, डीडवाना तथा अजमेर छीन लिए जिससे उसके राज्य की सीमाएं गुजरात से लेकर आगरा और दिल्ली तक पहुंच गईं। सिरोही का राव, मालदेव का नाना था, अतः मालदेव ने उसी को अपनी ओर से सिरोही का शासक नियुक्त कर दिया।

    जब मुगल बादशाह हुमायूं शेरशाह सूरी से चौसा की लड़ाई में हारकर पश्चिम के रेगिस्तान की ओर भाग आया तो मालदेव ने हुमायूं को शरण देने का विचार किया और उसे बुलावा भेजा। हुमायूँ ने मालदेव के निमंत्रण पर कोई ध्यान नहीं दिया और थट्टा के शासक शाह हुसैन के भरोसे लगभग एक साल गंवा दिया। बाद में वह मारवाड़ की ओर आया तथा मालदेव से शरण एवं सहायता मांगी किंतु अब मालदेव ने उसकी कोई सहायता नहीं की। अतः हुमायूं डरकर अमरकोट होता हुआ फारस भाग गया। मालदेव के सैनिकों ने भागती हुई मुगल टुकड़ी का पीछा किया किंतु हुमायूँ अमरकोट के हिन्दू राजा की शरण में पहुंच गया।

    अब भारत में शेरशाह सूरी का कोई प्रबल विरोधी था तो वह मालदेव था। जब मालदेव ने वीरमदेव को मेड़ता से निकाल दिया तो वीरम सहायता मांगने के लिए शेरशाह सूरी के पास गया। 1544 ई. में शेरशाह 80 हजार सैनिकों के साथ आया और सुमेल-गिर्री के मैदान में मोर्चा बांधकर बैठ गया। राठौड़ों का बल देखकर शेरशाह की हिम्मत पस्त हो गई किंतु जब मालदेव विजय के निकट था तब शेरशाह ने षड़यंत्र रचकर मालदेव के मन में सरदारों के विरुद्ध संदेह उत्पन्न कर दिया। मालदेव बिना लड़े ही युद्ध का मैदान छोड़कर जोधपुर आ गया। जब मालदेव के सरदारों जैता तथा कूंपा को ज्ञात हुआ कि मालदेव ने हम पर संदेह किया है तो वे शेरशाह की सेना पर टूट पड़े। शेरशाह अब भी हिन्दू सेना से घबराता रहा और युद्ध में भाग न लेकर नमाज पढ़ने बैठ गया। इस भयानक युद्ध में अंततः राठौड़ परास्त हुए तथा विजयश्री शेरशाह के हाथ लगी। युद्ध की समाप्ति पर शेरशाह ने अल्लाह को धन्यवाद देते हुए कहा- ‘एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाहत खो बैठता।’

    शेरशाह ने अपनी सेना के दो भाग किये। एक भाग खवास खां और ईसा खंा के नेतृत्व में जोधपुर आया और दूसरा भाग वह स्वयं लेकर अजमेर पहुंचा। अजमेर पर अधिकार करके शेरशाह भी जोधपुर आ गया। मालदेव सिवाना के पहाड़ों में भाग गया। जोधपुर पर शेरशाह का अधिकार हो गया। उसने फलौदी, पोकरन, सोजत, पाली, जालोर तथा नागोर में अपने थाने बैठा दिये। इसके बाद वह वीरम को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर सौंपकर अपनी राजधानी लौट गया। उसने जोधपुर के किले का मन्दिर तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई तथा किले में पूर्व की तरफ एक रास्ता निकाला, जो अब गोल घाटी कहलाता है। मालदेव लगभग दो वर्ष तक छप्पन के पहाड़ों में छिपा रहा। जब 1546 ई. में शेरशाह की मृत्यु हो गयी तो मण्डोर के राजपूत मालियों ने शेरशाह के थानों को उठा दिया और मालदेव को इसकी सूचना भेजी। मालदेव ने भी अपनी सेना भेजी। इस सेना की सोजत के पास शेरशाह के सैनिकों से मुठभेड़़ हुई। मालदेव की सेना विजयी रही। मालदेव ने पुनः मारवाड़ पर अधिकार कर लिया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992- इतिहास द्वितीय प्रश्न पत्र, शेरशाह-मालदेव सम्बन्धों की संक्षेप में चर्चा कीजिये।)

    मालदेव का विवाह जैसलमेर के राव लूणकर्ण की कन्या उमादे से हुआ। विवाह के बाद राजकुमारी तो अपने महल में चली गई और मालदेव गाने वालियों के साथ बैठकर शराब पीने लगा। राजकुमारी ने काफी देर तक उसकी प्रतीक्षा की और फिर अपनी दासी को मालदेव को बुलाने भेजा। मालदेव ने उसे भी शराब पिलाने में लगा लिया। तब राजकुमारी ने अपनी दूसरी दासी भारमली को भेजा। मालदेव भारमली के रूप और यौवन पर रीझ गया और उसी के घर चला गया। राजकुमारी ने जब यह सुना तो उसने मालदेव की आरती के लिए सजाया थाल उलट दिया। उमादे रूठ कर अपने ननिहाल चित्तौड़ चली गई और जीवन भर वहीं रही। चित्तौड़ के इतिहास में इसे रूठी रानी कहते हैं। जब मालदेव की मृत्यु हुई तो यह स्वाभिमानी और धर्मपरायण रानी भी सती हो गई।

    मालदेव की सेना में अस्सी हजार सवार थे अैर उसकी सेना राणा सांगा की सेना से भी बड़ी थी। उसने जोधपुर दुर्ग में अनेक महल बनवाये और नगर का परकोटा बनवाया। मेड़ता में मालकोट और परकोटा बनाने पर उसने 2 लाख 40 हजार रुपए खर्च किए। अजमेर के बीठली के किले की बुर्जें और तारागढ़ पर पश्चिम के झरने में से पानी पहुंचाने के लिए तीन बुर्ज भी मालदेव के बनाये हुए हैं।

    मालदेव साहसी और वीर व्यक्ति था किंतु उसमें चारित्रिक दृढ़ता और दूरदृष्टि का अभाव था। उस पर अपने पिता की हत्या का आरोप था। अपने शंकालु स्वभाव के कारण उसने जैता और कूंपा जैसे वीर पुगंवों को खोया। महाराणा उदयसिंह (मेवाड़) के विरुद्ध उसने शेरशाह के सेनापति हाजीखां को सहायता दी। मालदेव ने मेड़ता के वीरमदेव को अपना शत्रु बना लिया तथा अपनी दूसरी रानी के प्रभाव में आकर उसने अपने सुयोग्य पुत्र 
    चन्द्रसेन को उत्तराधिकार से वंचित कर राज्य अन्य पुत्र को दे दिया जिससे भाइयों में वैमनस्य बढ़ा। इसका लाभ अकबर ने उठाया।

    मालदेव ने अपने दूसरे नम्बर के पुत्र को जोधपुर का राजा बनाया था किंतु चन्द्रसेन (1562-1581 ई.) ने राज्य पर अधिकार कर लिया। अकबर के समय, यही चन्द्रसेन मारवाड़ का राजा था। अकबर ने जोधपुर पर आक्रमण करके मेहरानगढ़ छीन लिया। चन्द्रसेन को जंगलों में भाग जाना पड़ा। अकबर के सेनापति हसनकुली खां ने जोधपुर दुर्ग में मस्जिद बनवाई। अकबर ने बीकानेर राव रायसिंह को जोधपुर का सूबेदार बना दिया। 15 साल तक चन्द्रसेन पहाड़ों और जंगलों की खाक छानता हुआ अपना राज्य स्वतंत्र कराने में लगा रहा। 11 जनवरी 1581 को उसकी मृत्यु हो गई। मेवाड़ के महाराणा प्रताप के समान ही आन-बान का धनी वीर चन्द्रसेन हिन्दू वीरों के गौरव का प्रतीक बना रहा। (आर.ए.एस. प्रारम्भिक 2012, किस राजपूत शासक ने मुगलों के विरुद्ध निरंतर स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रखा और समर्पण नहीं किया- 1. बीकानेर के राजा रायसिंह, 2. मारवाड़ के राव चंद्रसेन, 3. आमेर के राजा भारमल, 4. मेवाड़ के महाराजा अमरसिंह?)

    चन्द्रसेन के तीन पुत्र थे जिनमें अपने पिता जैसा गौरव नहीं था। उसका ज्येष्ठ पुत्र रायसिंह अपने पिता के जीवन काल में ही अकबर की शरण में चला गया था। उसके दोनों छोटे पुत्र, चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद आधा-आधा राज्य बांटकर राज्य करने लगे। यह राज्य सोजत तथा उसके आस-पास का एक छोटा सा क्षेत्र था। दोनों भाई एक दिन चौसर खेलते हुए आपस में कट मरे। तब हिन्दू सरदारों ने रायसिंह को बुलाकर सोजत की गद्दी पर बैठाया। अकबर ने इसे राव की अपाधि दी। अकबर ने रायसिंह को सिरोही के राव सुरताण पर आक्रमण करने भेजा। सुरताण ने रायसिंह को मार डाला।

    दस साल तक जोधपुर, बीकानेर नरेश रायसिंह के पास सूबे के रूप में रहा। 1583 ई. में रायसिंह के कहने पर अकबर ने चंद्रसेन के छोटे भाई उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनाया जो इतिहास में मोटाराजा कहलाता है। उदयसिंह को अपनी पुत्री जगत गुसाइन का विवाह अकबर से करना पड़ा। उसके काल में जोधपुर राज्य में मुगलों का खूब प्रभाव बढ़ा। कल्ला रायमलोत इस बात पर उदयसिंह से नाराज हो गया और उसने विदªोह कर दिया। उदयसिंह ने कल्ला रायमलोत को प्राण त्यागने पर विवश कर दिया। उदयसिंह ने 1593 ई. में बालोतरा गांव के पास राव मल्लीनाथ के नाम पर पशु मेला आरंभ करवाया जो अब भी प्रतिवर्ष चैत्र माह में आयोजित होता है। इस मेले में आने वाले मालानी घोड़े, सांचोरी गाय, बैल, तथा मारवाड़ी नस्ल के ऊँट प्रसिद्ध हैं। 1595 ई. में लाहौर में मोटाराजा उदयसिंह की मृत्यु हो गई। वहीं पर रावी नदी के किनारे उसका अंतिम संस्कार किया गया। उसकी रानियों के सती होते समय उनकी दृढ़ता देखने के लिए अकबर स्वयं नाव में बैठकर आया।

    उदयसिंह के 17 पुत्र थे। इनमें से छठा पुत्र सूरसिंह (1595-1619 ई.) जोधपुर की गद्दी पर बैठा। सूरसिंह की राज्य सेवा से प्रसन्न होकर अकबर ने उसे 16 परगने दिये। 9 परगने मारवाड़ में, 5 गुजरात में, 1 मालवा में तथा 1 दक्षिण में। मारवाड़ राज्य के अलावा उसे गुजरात की सूबेदारी, दो हजारी जात तथा सवा हजारी मनसब एवं सवाई की उपाधि भी दी। अकबर की मृत्यु के बाद गुजरात के बहादुरशाह ने अहमदाबाद पर चढ़ाई की। तब सूरसिंह ने बहादुरशाह को पराजित कर जहांगीर की अमलदारी गुजरात तक बढ़ा दी। इससे प्रसन्न होकर जहांगीर ने सूरसिंह का दर्जा 5 हजारी जात और 3 हजारी सवार का कर दिया। उसने जीवन भर अकबर और जहांगीर की चाकरी की तथा 24 वर्ष के अपने शासनकाल में मात्र 9 माह अपनी राजधानी जोधपुर में रहा। मुगलों की ही पद्धति पर उसने अपने राज्य का प्रबन्ध किया। उससे पहले राव रणमल, राव जोधा, सूजा, गांगा, मालदेव तथा उदयसिंह के वंशज राजा के साथ भाईचारे अर्थात् बराबरी का अधिकार रखते थे किन्तु सूरसिंह ने उन्हें अपना मातहत घोषित किया तथा दरबार में दाएं-बाएं बैठने का नियम बनाया। दाहिनी तरफ राव रणमल की सन्तान में से आउवा के चम्पावतों को और बाई तरफ राव जोधाजी के वंशजों में से रीयां के मेड़तियों को प्रथम स्थान दिया गया। राजा की तलवार और ढाल रखने का काम खींची चौहानों को और चंवर करने का काम धांधल राठौड़ों को सौंपा। यह व्यवस्था देश की स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही। वह मात्र नौ महीने जोधपुर रहा तथा कुछ समय और जोधपुर रहने की चेष्टा में दो बार उसकी जागीर में कमी की गई।

    मुगलों की चाकरी में रहते हुए भी सूरसिंह संस्कृत का अच्छा ज्ञाता और पण्डित था। उपने पुत्रों को संस्कृत पढ़ाता था। एक बार उसने एक ही दिन में चार कवियों को एक लाख रूपये का दान दिया। जोधपुर नगर की तहलटी के महल, सूरजकुण्ड, सूरसागर तालाब तथा सूरसागर स्थित महल सूरसिंह ने बनवाये। सूरसिंह के प्रधान भाटी गोविन्ददास ने प्राचीन परम्पराओं को समाप्त किया। मारवाड़ राज्य परिवार में यदि विवाह या मृत्यु का अवसर होता तो अन्तःपुर में ठकुरानियों को उपस्थित होना पड़ता था। इस प्रथा को उसने समाप्त कर दिया। उसने राज्य में भूमि की पैमाइश करवायी तथा राजस्व विभाग की ओर ध्यान दिया।

    सूरसिंह की मृत्यु के बाद 18 अक्टूबर 1619 को गजसिंह (1619-1638 ई.) जोधपुर का राजा हुआ। उसने भी मुगलों की खूब सेवा की और मलिक अम्बर से हुए युद्ध में उसका लाल झण्डा छीन लिया। तब से जोधपुर राज्य के ध्वज में लाल रंग की पट्टी जुड़ी। गजसिंह ने भी अनेक लड़ाईयां लड़ीं और मुगलों के राज्य में वृद्धि की। विद्वानों, ब्राह्ममणों और चारणों का सम्मान करने वाला यह राजा भी अपने पिता की ही भांति विद्वान एवं दानशील था। जहाँगीर ने उसका मनसब बढ़ाकर चार हजारी जात और तीन हजार सवार कर दिया और उसे ’दलथंभन’ (फौज को रोकने वाला) की उपाधि प्रदान की। गजसिंह ने 16 कवियों को लाख पसाव दिए।

    गजसिंह के तीन पुत्र थे। सबसे बड़ा कुंअर अमरसिंह स्वाभिमानी और स्वातन्त्रय प्रिय था। उसकी उद्दण्ड प्रवृत्ति के कारण गजसिंह उससे नाराज रहता था तथा उसने अपने दूसरे पुत्र जसवन्तसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस घटना से अप्रसन्न होकर अमरसिंह शाहजहां के दरबार में चला गया। शाहजहां ने उसे बड़ौदा, सांगोद, झलान आदि की जागीरें देकर मनसबदार बना दिया। बाद में नागौर का स्वतंत्र राज्य भी दे दिया।

    अमरसिंह ने मुगलों की तरफ से कई लड़ाइयां लड़ीं। 1644 ई. में उसकी बीकानेर राज्य के खीलवा और नागौर के सम्बन्ध में लड़ाई हुई जो मतीरे की राड़ के नाम से प्रसिद्ध है। अमरसिंह इस लड़ाई कि सिलसिले में नागौर जाना चाहता था किंतु बीकानेर नरेश कर्णसिंह के दबाव में शाहजहां का बख्शी अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दे रहा था। एक दिन अमरसिंह ने बख्शी से पूछे बिना शाहजहां को सलाम किया। इस पर बख्शी ने अमरसिंह को गंवार कह दिया। अमरसिंह ने उसी क्षण तलवार निकालकर बख्शी सलावत खां को मार डाला। शाहजहां के सिपाही, अमरसिंह को मारने के लिए लपके जिनमें विट्ठलदास गौड़ का पुत्र अर्जुन सबसे आगे था। अमरसिंह वहां से भाग छूटा और घोड़े सहित किले की दीवार से कूद गया। नीचे पहुंचते-पहुंचते उसे शाहजहां के सैनिकों और दरबारियों ने घेरकर मार डाला। अमरसिंह के इस अद्भुत पराक्रम की कथा को ‘ख्याल’ बनाकर पिछली तीन शताब्दियों से मारवाड़ के गांव-गांव में गाया जाता है। कठपुतली के खेलों में अमरसिंह राठौड़ आज भी सर्वप्रमुख पात्र होता है जो अपनी आन-बान और शान की रक्षा के लिए शहीद होता हुआ दिखाया जाता है।

    गजसिंह की मृत्यु के बाद उसका 11 वर्षीय पुत्र जसवन्तसिंह (1638-1678 ई.) जोधपुर की गद्दी पर बैठा। वह भी शाहजहां के लिए लड़ाईयां लड़ता हुआ अधिकांशतः युद्ध के मैदान में रहा। उसके जीवनकाल में शाहजहां के पुत्रों में उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ। जसवन्तसिंह ने धर्मपरायण शहजादे दाराशिकोह का पक्ष लिया और धर्मत के मैदान में औरंगजेब से घमासान युद्ध किया। दारा के पक्ष के कुछ मुसलमान धोखा देकर औरंगजेब के पक्ष में जा मिले जिससे जसवन्तसिंह को पराजित होकर युद्ध का मैदान छोड़ना पड़ा। युद्धस्थल से अपने बचे हुए साथियों को लेकर जसवन्तसिंह सोजत पहुंचा और पांच दिन वहां ठहरकर जोधपुर पहुंचा। उसकी उदयपुरी राणी ने किले के द्वार बन्द करवा लिए और अपने सेवक से संदेश भिजवाया- राजपूत युद्ध से या तो विजयी होकर लौटते हैं या वहीं मर मिटते हैं। युद्ध क्षेत्र से पराजित होकर लौटने वाला व्यक्ति मेरा पति नहीं हो सकता।’ रानी सती होने की तैयारी करने लगी। तब रानी की माँ ने रानी को समझाया-बुझाया, राजा ने भी उस पराजय का बदला लेने का वचन दिया तब कहीं जाकर उसने महल के द्वार खुलवाए।

    जसवन्तसिंह धर्मप्राण नरेश था। उसके दरबार में बड़े-बड़े पण्डित, विद्वान एवं कवि रहते थे। उसने स्वयं कई ग्रन्थ लिखे जिनमें आनन्द विलास, अनुभव प्रकाश, अपरोक्ष अंग सिद्धात, सिद्धान्त बोध, सिद्धान्त सार, प्रबोध चन्द्रोदय तथा भाषा भूषण प्रसिद्ध हैं। भाषा भूषण हिन्दी में अलंकारों का उत्तम ग्रंथ है। जसवन्तसिंह अहमदाबाद, बुरहानपुर, औरंगाबाद और काबुल का सूबेदार रहा। उसके अधीन जोधपुर राज्य में मेड़ता, जैतारण, सोजत, जालोर, भीनमाल, सिवाणा, फलोदी, पोकरण, परगनों के अलावा बदनोर, केकड़ी, नारनोल, रोहतक आदि भी शामिल थे। उसके जीवनकाल में औरंगजेब मारवाड़ में न तो मन्दिर तोड़ सका और न मारवाड़ में जजिया लगा सका।

    सुप्रसिद्ध इतिहासकार मुहणोत नैणसी, जसवन्तसिंह का मंत्री था। मुहणोत नैणसी और उसके भाई सुन्दरदास पर गबन का आरोप लगा। जसवन्तसिंह ने उन दोनों को कैद कर उन पर एक-एक लाख रुपया जुर्माना कर दिया। वे दोनों भाई भी स्वाभिमानी थे। उन्होंने दण्ड का एक पैसा देना स्वीकार नहीं किया और पेट में कटार मारकर आत्महत्या कर ली। महाराज जसवन्तसिंह ने औरगांबाद के बाहर जसवन्तपुरा आबाद किया जिसमें एक सुन्दर बाग और संगमरमर का भवन बनवाया। आगरा के निकट राजपूत मुगल-शैली पर आधारित कचहरी भवन बनवाया। उसकी रानी अतिरंग दे ने जान सागर बनवाया जिसे शेखावतजी का तालाब कहते हैं। उसकी रानी जसवन्तदे (जिसने राजा के पराजित होकर लौटने पर महल के द्वार बन्द कर दिये थे) ने 1663 ई. में राईकाबाग, उसका कोट तथा कल्याण सागर तालाब बनवाया। इस तालाब को अब रातानाडा कहते हैं। जसवंतसिंह ने काबुल से अनार लाकर कागा के बाग में लगवाये।

    औरंगजेब जब दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसने जसवंतसिंह को कुचलने की बड़ी चालें चलीं किन्तु वह जसवन्तसिंह को नहीं दबा सका। अन्त में औरंगजेब ने उससे समझौता कर लिया और उसे गुजरात का सूबेदार बनाकर छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध सैन्य अभियान पर औरंगाबाद भेज दिया। जसवंतसिंह ने औरंगजेब और छत्रपति के बीच मध्यस्थता कर सुलह का प्रयास किया। औरंगजेब ने शिवाजी को दबाने के लिए शाइस्ता खाँ को भेजा तथा जसवंतसिंह को लिखा कि वह अपनी सेना लेकर गुजरात से दक्षिण में पहुंचे और शिवाजी के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता करे। महाराजा जूनागढ़ के फौजदार कुतुबखाँ को गुजरात में अपना प्रतिनिधि (नायब) नियत कर गुजरात से दक्षिण चले गए। महाराजा ने मराठों के अनेक किले छीन लिए। बादशाह की इच्छा थी कि जल्दी ही शिवाजी का सारा बल नष्ट कर दिया जाए। यह बात महाराजा को पसंद नहीं थी क्योंकि वह शिवाजी जैसे पराक्रमी हिंदू-महाराजा का बल नष्ट कर औरंगजेब जैसे धर्मान्ध नरेश को और अधिक उत्पात करने का मौका नहीं देना चाहता था। इस पर औरंगजेब ने जसवन्तसिंह को पठानों के विरुद्ध लड़ने के लिए काबुल भेज दिया और पीछे से उसके पुत्र पृथ्वीसिंह की हत्या करवा दी।

    28 नवम्बर 1678 को काबुल के मोर्चे पर जसवंतसिंह की मृत्यु हो गई। उसकी मौत का समाचार पाकर औरंगजेब ने कहा- ‘कुफ्र (पाप) का दरवाजा टूट गया। औरंगजेब की बेगम ने शोक व्यक्त करते हुए कहा- ‘आज शोक का दिन है क्योंकि साम्राज्य का दृढ़ स्तंभ टूट गया।’ इन दोनों ही उद्गारों में जसवन्तसिंह के विराट व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।

    महाराजा जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य को खालसा कर लिया। जब यह समाचार जमरूद (काबुल) पहुंचा तो मारवाड़ के सरदार जसवंतसिंह की रानियों को लेकर मारवाड़ की ओर चल दिये। मार्ग में उसकी दोनों रानियों ने एक-एक पुत्र दलथंभन और अजीतसिंह को जन्म दिया। दलथंभन की मृत्यु मार्ग में ही हो गई। औरंगजेब ने सरदारों को झांसा देकर रानियों को दिल्ली बुलवा लिया। वह बालक को मार डालना चाहता था। इसलिए राठौड़ दुर्गादास तथा खींची मुकन्ददास आदि सरदार, जसवन्तसिंह की रानियों और राजकुमार अजीतसिंह को वहां से निकालकर मारवाड़ ले आए और सिरोही जिले के कालन्द्री गांव में छिपाकर रखा। इस पर औरंगजेब ने अमरसिंह के पौत्र इन्द्रसिंह को खिअलत, निशान, हाथी और घोड़ा आदि देकर जोधपुर राज्य का राजा बना दिया।

    वीर दुर्गादास जीवन भर मुसलमानों से मोर्चा लेता रहा और अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा बनाने का प्रयास करता रहा। किसी कवि ने दुर्गादास की प्रशंसा इन शब्दों में की है-

    डंबक डंबल ढोल बाजै, दै दै ठोर नगारा की

    आसे घर दुर्गो नहीं होतो, सुन्नत होती सारां की।


    1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हुई तब अजीतसिंह ने जोधपुर राज्य पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद अजीतसिंह दुर्गादास से नाराज हो गया और उसे मारवाड़ से निकाल दिया। दुर्गादास कुछ दिन मेवाड़ में रहा और बाद में उज्जैन चला गया। 16 मई 1718 को दुर्गादास ने क्षिप्रा नदी के तट पर प्राण त्यागे। वहीं उसका अन्तिम संस्कार हुआ तथा ‘राठौड़ की छतरी’ के नाम से एक छतरी बनाई गई।

    अजीतसिंह (1707-1724 ई.) ने मण्डोर में एक थंभिया महल, जसवंतसिंह का स्मारक (जसवंतथड़ा), काला गौरा भैंरव, हड़बूजी पाबूजी तथा रामदेवजी की बड़ी-बड़ी मूर्तियां से युक्त वीरों की साल बनवाई। मेहरानगढ़ में दौलत खाना, फतह महल, जनाना महल बनवाए तथा देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनवाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कीं, जिनमें मुरली मनोहर, शिव-पार्वती, चतुर्भुज विष्णु और हिंगलाज देवी प्रमुख हैं। उसने जोधपुर परकोटे के भीतर घनश्यामजी का मंदिर तथा मूलनायक मंदिर का निर्माण करवाया। उसकी रानी राणावती ने झालरे के निकट शिखरबन्द मन्दिर और जाड़ेची ने चान्दपोल के बाहर एक बावड़ी बनवाई।

    अजीतसिंह को अपनी पुत्री का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखसीयर से करना पड़ा। बाद में अवसर पाकर अजीतसिंह ने फर्रूखसीयर की उसके ही महल में हत्या कर दी और अपनी बेटी को विधवा बनाकर जोधपुर ले आया। वह अप्रतिम विद्वान था। उसके लिखे ग्रंथों में गुणसागर, दुर्गापाठ भाषा, निर्वाण दूहा, अजीतसिंहजी रा कह्या दूहा एवं महाराजा अजीतसिंह जी रा गीत आदि प्रसिद्ध हैं। 23 जुलाई 1724 को जब महाराजा अजीतसिंह अपने महल में सो रहा था तब उसके दूसरे नम्बर के पुत्र बखतसिंह ने तलवार से उसकी हत्या कर दी। इस हत्या में जयपुर नरेश जयसिंह तथा अजीतसिंह के बड़े पुत्र अभयसिंह का भी हाथ था। अजीतसिंह के साथ 6 रानियां, 20 दासियां, 9 उड़दा बेगणियां, 20 गायनें तथा 2 हजूरी बेगमें सती हुईं। गंगा नाम की पड़दायत (उपपत्नी) भी राजा के साथ जलाई गई। अजीतसिंह के साथ उसकी भी हत्या हुई थी। कई बन्दर और मोर भी अपनी इच्छा से चिता में गिर-गिर कर जल गये जो राजा से विशेष स्नेह रखते थे। वह दिन जोधपुर में बड़े शोक, सन्ताप और हाहाकर का था।

    अजीतसिंह के ज्येष्ठ पुत्र अभयसिंह (1724-1749 ई.) को मुगल बादशाह ने ’राजराजेश्वर’ उपाधि से विभूषित किया। 1730 ई. में बादशाह, गुजरात के सुबेदार सरबुलंदखाँ से नाराज हो गया। उसने अजमेर तथा गुजरात के सूबा महाराजा अभयसिंह को दे दिये तथा उसे खिलअत, 18 लाख रुपए नगद और मय गोला-बारूद के 50 तोपें भी दीं। महाराजा अलवर होते हुए अजमेर पहुँचा और वहाँ पर अधिकार कर मेड़ता होता हुआ जोधपुर आया। कुछ दिनों बाद जब 20 हजार सवारों का रिसाला तैयार हो गया, तब वह सरबुलंद खाँ के विरुद्ध रवाना हुआ। बखतसिंह भी अपनी सेना लेकर अभयसिंह की सहायता के लिए आ गया। कुछ समय तक युद्ध होने के पश्चात् नींबाज ठाकुर ऊदावत अमरसिंह के माध्यम से महाराजा और सरबुलंद खाँ के बीच संधि हुई। उसने गुजरात का सूबा महाराजा को सौंप दिया और महाराजा ने उसे उसकी सेना के वेतन आदि के लिए एक लाख रुपए नगद और वहाँ से जाने के समय भार ढोने की गाड़ियाँ और ऊँट देने का वायदा किया। सरबुलंद खाँ, महाराजा के कैम्प में आकर मिला तथा महाराज की पगड़ी से अपनी पगड़ी बदली।

    अभयसिंह ने अपने भाई बखतसिंह को नागौर की जागीर दी तथा जोधपुर में अभय सागर तालाब, चौखा गांव का बगीचा, अजीतसिंह का देवल और मण्डोर का दरवाजा बनवाया। अहमदाबाद पर विजय प्राप्त होने पर उसने मेहरानगढ़ में फतहपोल का निर्माण करवाया। अभयसिंह के बाद उसका पुत्र रामसिंह राजा हुआ किंतु उसे बखतसिंह (1751-1752 ई.) ने जोधपुर से बाहर निकाल दिया। बखतसिंह ने जोधपुर शहर में नौचौकिया एवं मंडी बनवाई तथा दौलतखाना, लोहापोल और सूरजपोल की मरम्मत करवाई। कर्नल टॉड के अनुसार यदि बखतसिंह कुछ और वर्ष जीवित रहता तो सारे हिन्दूस्तान में राजपूत छा जाते किंतु दुर्भाग्यवश जयपुर नरेश ने उसकी हत्या करवा दी। इस काल तक मुगलों की पकड़ पूरी तरह ढीली पड़ गई थी।


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