Blogs Home / Blogs / आलेख-राजस्थान / मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4
  • मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

     06.06.2017
    मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

    मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

    बीकानेर राज्य


    भारतवर्ष के बीकानेर, किशनगढ़, ईडर, विजयनगर, झाबुआ, अमझेरा, रतलाम, सीतामऊ तथा सैलाना राज्यों के शासक, जोधपुर के राठौड़ वंश में से ही निकले थे। जोधपुर नरेश राव जोधा के 20 पुत्र थे जिनमें से पांचवे पुत्र बीका का जन्म 14 जुलाई 1440 को हुआ था। बीका ने ई.1485 में बीकानेर राज्य की स्थापना की। यह एक रेगिस्तानी राज्य था। ई.1526 में जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय बीका का छोटा पुत्र लूणकर्ण बीकानेर का राजा था। बाबर के भारत पर आक्रमण के दिनों में ही लूणकर्ण की मृत्यु हुई। लूणकर्ण के 12 पुत्र थे जिनमें सबसे ज्येष्ठ जैतसिंह लूणकर्ण की मृत्यु के बाद बीकानेर की गद्दी पर बैठा। बीकानेर के इतिहास में उसे जैतसी कहा जाता है।

    बाबर के पुत्र कामरान का आक्रमण

    ई.1534 में बाबर के पुत्र कामरान ने भटनेर (हनुमानगढ़) पर आक्रमण करके उस पर अधिकार जमा लिया तथा बीकानेर को घेर लिया। कामरान ने जैतसी को कहलवाया कि वह मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ले। इस पर जैतसी ने कहलावाया कि ‘‘जाओ कामरान से कह देना कि जिस प्रकार मेरे वंश के मल्लीनाथ, सातल, रणमल, जोधा, बीका, दूदा, लूणकर्ण तथा गांगा ने मुसलमानों का गर्व भंजन किया था, उसी प्रकार मैं भी तेरा नाश करूंगा। कामरान की विशाल एवं क्रूर सेना के भय से बीकानेर नगर में दहशत फैल गयी किंतु जैतसी ने बुद्धिमानी से काम लिया और राजधानी से दूर जाकर ऐसे स्थान से कामरान की सेना पर आक्रमण किया कि कामरान की सेना को सिर पर पैर रखकर भागना पड़ा। यह एक हिन्दू राजा की मुगलों पर बड़ी विजय थी।

    मालदेव द्वारा बीकानेर पर अधिकार

    ई.1542 में जोधपुर नरेश मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया। राव जैतसी अपने साथियों सहित युद्ध के मैदान में ही मारा गया। जैतसी को मारने के बाद मालदेव जांगल देश पर अधिकार करके जोधपुर लौट गया। जैतसी के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र राव कल्याणमल बीकानेर की गद्दी का अधिकारी हुआ किंतु बीकानेर राज्य पर मालदेव ने अधिकार जमा लिया और अपनी ओर से कूंपा महराजोत तथा पंचायण करमसियोत को बीकानेर राज्य का प्रबंधक नियुक्त किया।

    शेरशाह सूरी द्वारा बीकानेर राज्य की सहायता

    जैतसिंह के मारे जाने पर उसके मंत्री नगराज ने जैतसिंह के परिवार की सुरक्षा का प्रबंध किया तथा दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी की सेवा में उपस्थित होकर मालदेव के विरुद्ध सैनिक सहायता की याचना की। उन्हीं दिनों मेड़ता का राजा वीरमदेव भी मालदेव से नाराज होकर शेरशाह सूरी के पास पहुंचा। इन सबने मिलकर राव मालदेव के विरुद्ध सैनिक अभियान किया। शेरशाह अस्सी हजार सैनिक लेकर सुमेल में आ धमका। जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल भी अपनी सेना के साथ मालदेव के विरुद्ध आया। मालदेव भी पचास हजार सैनिक लेकर गिर्री के रण क्षेत्र में आया। शेरशाह ने मालदेव के विरुद्ध षड़यंत्र रचा जिससे मालदेव को अपने सेनानायकों जैता और कूंपा पर संदेह हो गया तथा मालदेव युद्ध का मैदान छोड़कर जोधपुर लौट आया। जैता और कूंपा लगभग आधी हिन्दू सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में डटे रहे। दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। शेरशाह अब भी हिन्दू सेना से घबराता रहा और युद्ध में भाग न लेकर नमाज पढ़ने बैठ गया। अन्त में मुस्लिम सेना की विजय हुई। युद्ध की समाप्ति पर शेरशाह ने अल्लाह को धन्यवाद देते हुए कहा- एक मुट्ठी बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता’। इधर जब मालदेव शेरशाह से उलझा हुआ था तब कल्याणमल के विश्वस्त रावत किशनसिंह ने बीकानेर राज्य में जोधपुर राज्य द्वारा स्थापित थानों को लूटना आरंभ कर दिया। वह लूणकरणसर, गारबदेसर तथा भीनासर थानों को उजाड़कर बीकानेर जा पहुंचा। उसने बीकानेर के दुर्ग पर अधिकार करके कल्याणमल की दुहाई फेर दी। प्रमोद माणिक्य गणि के शिष्य जयसोम ने कर्मचन्द्र वंशो कीर्तनकं काव्यम् नामक ग्रंथ में लिखा है कि मंत्री नगराज ने शेरशाह के हाथ से ही कल्याणमल को टीका दिलवाकर बीकानेर भेजा और आप बादशाह के साथ गया। बाद में बादशाह की आज्ञा लेकर नगराज बीकानेर लौटा किंतु मार्ग में अजमेर में उसका देहांत हो गया।

    मुगल सेनापति बैरामखां को शरण

    ई.1556 में अकबर आगरा की गद्दी पर बैठा। उस समय वह 14 वर्ष का बालक था। अकबर का पिता हुमायूं जब फारस से हिन्दुस्तान लौटा तो वहां से बैराम खां नामक सरदार को लेकर आया। बैराम खां ने 14 वर्ष के बालक अकबर को हिन्दुस्तान की गद्दी पर बैठाया और हुमायूं के भाइयों, लोदी शासकों, पठानों, शेरशाह सूरी के सरदारों तथा हेमू जैसे प्रबल शत्रुओं से अकबर की रक्षा की। अकबर ने उसे खानखाना की उपाधि देकर अपना प्रधान मंत्री नियुक्त किया किंतु ऐसे स्वामिभक्त और ताकतवर अनुचर (बैरामखां) को अकबर अधिक दिन तक नहीं देख सका और चार वर्ष बाद ही उसने बैराम खां को राजकीय सेवा से मुक्त करके मक्का चले जाने का आदेश दे दिया। बैरामखां बीकानेर आया और राव कल्याणमल तथा उसके कुंवर रायसिंह के आश्रय में रहा। अंत में बैरामखां बीकानेर से भी विदा लेकर पाटन (गुजरात) पहुंचा। एक दिन एक अफगान सरदार के पुत्र मुबारकखां लोहानी ने बैराम खां की हत्या कर दी।

    रायसिंह द्वारा अकबर की अधीनता स्वीकार करना

    ई.1570 में जब अकबर अजमेर जियारत से लौटते हुए मार्ग में नागौर ठहरा तब राव बीकानेर का राव कल्याणमल कुंवर रायसिंह को लेकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। इस प्रकार बीकानेर राज्य अकबर के अधीन हो गया। अकबर नागौर में पूरे साठ दिन रहा। अकबर के समय में राजपूताना में 11 राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, आम्बेर, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ एवं करौली। इनमें से मेवाड़ को छोड़कर लगभग पूरा राजपूताना मुगलों के अधीन हो गया।

    बीकानेर का राजकुमार पीथल

    कल्याणमल का पुत्र पृथ्वीराज इतिहास में पीथल के नाम से भी जाना जाता है। वह बड़ा वीर, विष्णु भक्त तथा श्रेष्ठ कोटि का कवि था। संस्कृत और डिंगल साहित्य का उसे अच्छा ज्ञान था। कर्नल टॉड, मूथा नैणसी तथा पण्डित गौरीशंकर ओझा ने उसकी बहुत प्रशंसा की है। कहा जाता है कि एक बार अकबर ने पृथ्वीराज से कहा कि मेवाड़ का महाराणा प्रताप भी अब उसे बादशाह कहने लगा है। पृथ्वीराज अकबर की बात पर विश्वास नहीं कर सका। उसने प्रताप को एक चिट्ठी लिखकर इसकी सच्चाई के बारे में पूछा। इस पत्र को पाकर महाराणा का स्वाभिमान जाग गया और उसने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। पृथ्वीराज विष्णु का परम भक्त था। उसने ‘वेलि क्रिसन रुक्मणि री’ की रचना की जो एक उत्कृष्ट कोटि की रचना है। इस ग्रंथ को पूरा करके पृथ्वीराज जब भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करने जा रहा था। तब मार्ग में श्रीकृष्ण सेठ का वेश बनाकर आये और उससे पूरा ग्रंथ सुना। पृथ्वीराज ने अपनी मृत्यु के बारे में 6 माह पहले ही अकबर को बता दिया था कि मेरी मृत्यु अमुक तिथि को मथुरा में होगी।

    महाराजा रायसिंह का जोधपुर पर राज्य

    ई.1574 में कल्याणमल की मृत्यु हो गयी। उसके 10 पुत्र थे जिनमें से रायसिंह सबसे बड़ा था। कल्याणमल की मृत्यु के बाद रायसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। अकबर ने जोधपुर का राज्य रायसिंह को प्रदान कर दिया। जोधपुर नरेश चंद्रसेन भद्राजून की पहाड़ियों में भाग गया। लगभग 10 साल तक जोधपुर रायसिंह के अधिकार में रहा।

    रायसिंह द्वारा उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनवाना

    बाद में ई.1582 में रायसिंह ने अकबर के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि जोधपुर का दुर्ग उदयसिंह को दे दिया जाये। इस प्रकार जोधपुर का दुर्ग पुनः जोधपुर के राठौड़ों के पास चला गया। रायसिंह ने अकबर की सेना का कई युद्धों में नेतृत्व किया और बड़ी-बड़ी विजयें हासिल कीं। उसने अकबर के लिये गुजरात का भयानक युद्ध जीता जिसमें रायसिंह के 33 बड़े ठिकाणेदार मारे गये ओर उसे बड़ा नुक्सान उठाना पड़ा किंतु अंत में उसने गुजरात के सुल्तान मुहम्मद हुसैन को मार डाला। रायसिंह ने सिरोही के वीर राजा सुरताण को पकड़ कर दिल्ली भेज दिया। इस युद्ध में भी रायसिंह ने बड़ा नुक्सान उठाया। उसने काबुल में मुगलों की सेना का नेतृत्व किया तथा बलोचों को परास्त किया। उसने सिंध, बंगाल तथा दक्षिण में भी अकबर के लिये लड़ाइयां लड़ीं। ई.1589 में उसने बीकानेर के वर्तमान दुर्ग की नींव रखी जो ई.1594 में बनकर तैयार हुआ। ई.1612 में रायसिंह की मृत्यु हो गयी।

    दलपतसिंह के साथ छल

    महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र दलपतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा किंतु अपने प्रखर स्वभाव के कारण वह बादशाह जहांगीर को प्रसन्न नहीं रख सका। अतः बादशाह ने रायसिंह के दूसरे पुत्र सूरसिंह को सैनिक सहायता भिजवाई। सूरसिंह ने छल करके बीकानेर के सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया। जब दलपतसिंह हाथी पर बैठकर युद्ध के मैदान में आया तो उसके साथ चूरू का ठाकुर भीमसिंह बलभद्रोत बैठा हुआ था। उसने दलपतसिंह के दोनों हाथ पीछे से पकड़ लिये। शत्रुओं ने दलपतसिंह को जीवित ही पकड़ कर बंदी बना लिया और अजमेर भेज दिया। 25 जनवरी 1614 को दलपतसिंह वीरता पूर्वक शत्रुओं से मुकाबला करता हुआ अजमेर में मारा गया। बड़े भाई दलपतसिंह को गिरफ्तार करवाने के बाद नवम्बर 1613 में सूरसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। वह कपटी तथा धोखा देने वाला इंसान था। उसने छल से अपने मंत्रियों को मारा तथा पुरोहितों को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। मुगलों की उसने जी भर कर सेवा की।

    मतीरे की राड़

    13 अक्टूबर 1631 को सूरसिंह का पुत्र कर्णसिंह बीकानेर का स्वामी हुआ। कर्णसिंह का जन्म 10 जुलाई 1616 को हुआ था। अपने पिता के चरित्र के विपरीत वह एक अच्छा इंसान था तथा भारत के महान राजाओं में गिने जाने योग्य था। भारत का इतिहास इस राजा का अत्यधिक ऋणी है। परिस्थतियों से विवश होकर कर्णसिंह को जीवन भर मुगल बादशाहों की सेवा करनी पड़ी और पूरा जीवन युद्ध के मैदान में व्यतीत करना पड़ा। कर्णसिंह के शासन काल में ई.1644 में बीकानेर राज्य के सीमावर्ती गांव जाखणिया के एक किसान के खेत में लगी मतीरे की बेल फैलकर नागौर राज्य की सीमा में चली गयी और फल भी उधर ही लगे। फल पर अधिकार को लेकर किसानों में झगड़ा हो गया। बात राज्याधिकारियों तक पहुंची और दोनों राज्यों के अधिकारियों में भी झगड़ा हो गया जिससे नागौर के कई सिपाही मारे गये। उन दिनों अमरसिंह राठौड़ नागौर का स्वामी था तथा मुगल बादशाह शाहजहां के दरबार में था। अमरसिंह के सिपाहियों ने बीकानेर राज्य के जाखणिया गांव पर अधिकार कर लिया। बीकानेर नरेश कर्णसिंह भी उन दिनों आगरा में था। उसने अपने दीवान मुहता जसवंत को नागौर पर हमला करने के लिये भेजा। इस समय अमरसिंह दिल्ली में था अतः उसकी ओर से केसरीसिंह ने मुहता जसवंत सिंह का सामना किया किंतु नागौर की तरफ के कई सिपाही मारे गये तथा नागौर की पराजय हो गयी। इस पर अमरसिंह ने शाहजहां से बीकानेर जाने की अनुमति चाही किंतु बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने शाहजहां को जाखणिया युद्ध की सारी बात कह दी। इस पर बादशाह ने अमरसिंह को आगरा में ही रोक लिया। जब कई दिनों तक बादशाह के बख्शी सलावतखां ने अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दिया तो एक दिन अमरसिंह ने बख्शी की अनुमति के बिना ही बादशाह को मुजरा कर दिया। इस पर बख्शी ने अमरसिंह को गंवार कहकर उसकी भर्त्सना की। अमरसिंह ने क्रुद्ध होकर उसी समय अपनी कटार निकाली और बख्शी को बादशाह के सामने ही मार डाला। शाही सिपाहियों ने उसी समय अमरसिंह और उसके आदमियों को घेर कर मार डाला।

    जंगलधर पादशाह

    ई.1657 में जब शाहजहां बीमार पड़ा तो उसके चार पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ और शाहजहां को कैद कर लिया गया। तब कर्णसिंह आगरा छोड़कर बीकानेर चला आया। दिल्ली के तख्त पर बैठने के तीन साल बाद औरंगजेब ने बीकानेर के विरुद्ध सेना भेजी किंतु कर्णसिंह लड़ने के स्थान पर औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हो गया। औरंगजेब ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसकी नियुक्ति दक्खिन में करके उसे नये सिरे से युद्धों में झौंक दिया किंतु शीघ्र ही कर्णसिंह और औरंगजेब के बीच भयानक विद्वेष उत्पन्न हो गया।

    बाबर से लेकर औरंगजेब तक सारे मुगल बादशाहों की यह इच्छा रही कि पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में परिवर्तित कर लिया जाये किंतु हिन्दुओं के प्रबल संस्कारों और हिन्दू धर्म गुरुओं के प्रयत्नों के कारण ऐसा संभव न हो सका। इस पर औरंगजेब ने एक भयानक षड़यंत्र रचा। उसने सारे हिन्दू राजाओं और मुस्लिम अमीरों को इकट्ठा करके ईरान की ओर प्रस्थान किया। साहबे के सैयद फकीर को औरंगजेब के असी मंसूबे का पता चल गया कि वह ईरान ले जाकर सारे हिन्दू राजाओं को मुसलमान बनावेगा। फकीर ने यह बात हिन्दू राजाओं से कह दी। इस पर हिन्दू राजाओं ने एक बैठक की कि अब क्या करना चाहिये। उस समय वे लोग अटक में डेरा डाले हुए थे। बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने धर्म की रक्षा के लिये अपना सिर कटवाने का निश्चय करके योजना निर्धारित की कि जब बादशाह अटक नदी पार करे तब सारे हिन्दू सरदार नदी पार न करें तथा वापस अपने-अपने राज्य को लौट जायें। ऐसा ही किया गया। बादशाह के नदी पार होते ही हिन्दू नरेशों ने नावें इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी। सारे राजाओं ने कर्णसिंह का बड़ा सम्मान किया और उसे जंगलधर पादशाह की उपाधि दी।

    जैसे ही औरंगजेब को हिन्दू राजाओं के निश्चय का पता लगा तो वह कुरान हाथ में लेकर राजाओं के पास आया और ऐसा करने का कारण पूछा। तब राजाओं ने जवाब दिया कि- ‘‘तुमने तो हमें मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रच लिया इसलिये तुम हमारे बादशाह नहीं। हमारा बादशाह तो बीकानेर का राजा है। जो वह कहेगा वही करेंगे, धर्म छोड़कर जीवित नहीं रहेंगे।’’ तब औरंगजेब ने सबके बीच में कुरान रखकर कसम खाई कि- ‘‘अब ऐसा नहीं होगा, जैसा तुम लोग कहोगे, वैसा ही करूंगा। आप लोग मेरे साथ दिल्ली चलो। आप लोगों ने कर्णसिंह को जंगल का बादशाह कहा है तो वह जंगल का ही बादशाह रहेगा।’’ हिन्दू नरेशों की एकता व दृढ़ता को देखकर औरंगजेब की हिम्मत नहीं हुई कि उनके साथ कोई जबर्दस्ती की जाये किंतु कर्णसिंह के विरुद्ध उसने मन में गांठ बांध ली और उसका राज्य पाट सब छीनकर औरंगाबाद भेज दिया। वहां कुछ ही समय बाद 22 जून 1669 को हिन्दू जाति के तेजस्वी सूर्य महाराजा कर्णसिंह ने अस्ताचल की ओर गमन किया।

    छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध मोर्चा

    महाराजा कर्णसिंह के आठ पुत्र थे जिनमें अनूपसिंह सबसे बड़ा था। जब महाराजा कर्णसिंह से राजपाट छीना गया तब औरंगजेब ने अनूपसिंह को दो हजार जात तथा डेढ़ हजार सवार का मनसब देकर बीकानेर का राज्याधिकार सौंप दिया। महाराजा कर्णसिंह की मृत्यु होने के बाद 4 जुलाई 1669 को अनूपसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उसे छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध लड़ने के लिये भेजा गया जहां उसने बड़ी वीरता से मुस्लिम फौज का नेतृत्व किया तथा महाराज शिवाजी को बड़ी क्षति पहुंचायी। ई.1676 में उदयपुर के महाराणा राजसिंह ने राजसमंद नामक विशाल झील बनवाकर उसकी प्रतिष्ठा करवाई। इस अवसर पर उसने अपने बहनोई बीकानेर नरेश अनूपसिंह को साढ़े सात हजार रुपये मूल्य का मनमुक्ति नामक हाथी, पन्द्रह सौ रुपये मूल्य का सहणसिंगार घोड़ा, साढ़े सात हजार रुपये मूल्य का तेजनिधान नामक दूसरा घोड़ा तथा वस्त्राभूषण भेजे।

    महाराजा कर्णसिंह के पुत्र केसरीसिंह, पदमसिंह और मोहनसिंह भी बड़े पराक्रमी क्षत्रिय थे किंतु उनकी वीरता से प्रभावित होकर औरंगजेब ने उन्हें अपनी चतुराई, कपट और कृत्रिम विनय का प्रदर्शन कर उन्हें पूर्णतः कब्जे में कर रखा था। जब केसरीसिंह और पद्मसिंह दाराशिकोह को खजुराहो के मैदान में परास्त कर औरंगजेब के पास ले आये तो औरंगजेब ने अपने रूमाल से उनके बख्तरों की धूल साफ की। ये दोनों औरंगजेब के लिये लड़ाइयां लड़ते हुए मारे गये। पद्मसिंह को तो बीकानेर राजपरिवार का सबसे वीर पुरुष माना जाता है। उसकी तलवार का वजन आठ पौण्ड तथा खाण्डे का वजन पच्चीस पौण्ड था। वह घोड़े पर बैठकर बल्लम से शेर का शिकार करता था।

    अनूपसिंह संस्कृत भाषा का अधिकारी विद्वान था उसने अनूप विवेक (तंत्रशास्त्र), काम प्रबोध (कामशास्त्र), श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि और गीत गोविंद की अनूपोदय नामक टीका की रचना की। उसके दरबार में संस्कृत के अनेक विद्वान रहते थे। अनूपसिंह संगीत विद्या में भी निष्णात था। उसने संगीत सम्बन्धी अनेक गं्रथों की रचना की थी। उसे औरंगजेब ने हिन्दू नरेशों को मिलने वाला सर्वोच्च सम्मान माही मरातिब प्रदान किया। अनूपसिंह ने अनूपगढ़ नामक दुर्ग का निर्माण करवाया। उसने देश भर के संस्कृत के दुलर्भ ग्रंथों को खरीद कर बीकानेर के पुस्तकालय में सुरक्षित करवाया ताकि उन्हें औरंगजेब नष्ट न कर सके। पुस्तकों की ही भांति मूर्तियों को भी उसने हिन्दुस्तान भर से खरीदकर बीकानेर में संग्रहीत करवाया ताकि उन्हें मुसलमानों के हाथों नष्ट होने से बचाया जा सके। मूर्तियों का यह विशाल भण्डार 33 करोड़ देवताओं का मंदिर कहलाता है।

    जोधपुर नरेश अजीतसिंह का आक्रमण

    8 मई 1698 को महाराजा अनूपसिंह का देहांत हो गया और स्वरूपसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उस समय उसकी आयु मात्र 9 वर्ष ही थी। राज्य कार्य स्वरूपसिंह की माता सीसोदणी चलाने लगी। दो वर्ष बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में 15 दिसम्बर 1700 को शीतला से स्वरूपसिंह की मृत्यु हो गयी और उसका छोटा भाई सुजानसिंह 10 वर्ष की आयु में बीकानेर का राजा हुआ। सुजानसिंह के गद्दी पर बैठते ही औरंगजेब ने उसे दक्षिण के मोर्चे पर बुला लिया। सुजानसिंह 10 वर्ष तक दक्षिण के मोर्चे पर रहा। ई.1707 में दक्षिण में ही औरंगजेब की मृत्यु हो गयी। इससे जोधपुर नरेश अजीतसिंह ने अपने राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया। सुजानसिंह की बीकानेर से अनुपस्थिति का लाभ उठाकार अजीतसिंह ने बीकानेर नगर पर भी अधिकार कर लिया और नगर में अपने नाम की दुहाई फेर दी। भूकरका का सरदार पृथ्वीराज तथा मलसीसर का हिन्दूसिंह जोधपुर की सेना से लड़ने के लिये आगे आये। सरदारों का विरोध देखकर अजीतसिंह ने बीकानेर खाली कर दिया। औरंगजेब के बाद बहादुरशाह, जहांदारशाह, फर्रूखसीयर, रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला तथा मुहम्मदशाह दिल्ली के तख्त पर बैठे। ये बादशाह स्वयं ही चारों ओर षड़यंत्र से घिरे रहे अतः हिन्दू राजाओं पर मुगल बादशाहों की पकड़ ढीली हो गयी। ई.1720 में मुहम्मदशाह ने बीकानेर नरेश सुजानसिंह को दिल्ली दरबार में पेश होने के आदेश दिये किंतु मुगलों की चला चली के दौर का आकलन कर सुजानसिंह बादशाह की सेवा में नहीं गया तथा अपने कुछ सेवकों को दिल्ली तथा अजमेर भिजवा दिया।

    अभयसिंह के आक्रमण

    अपने पिता जोधपुर नरेश अजीतसिंह की हत्या कर राजकुमार अभयसिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठा तथा पितृहंता बख्तसिंह नागौर का स्वामी हुआ। इन दोनों भाइयों ने ई.1737 में बीकानेर पर हमला कर दिया। उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) ने दोनों पक्षों में समझौता करवा दिया। ई.1734 में बख्तसिंह ने एक बार फिर बीकानेर पर अधिकार करने का षड़यंत्र रचा। उसने बीकानेर के किलेदार तथा कई आदमियों को अपनी ओर मिला लिया। उन दिनों सुजानसिंह ने अधिकांश राज्यकार्य राजकुमार जोरावरसिंह को सौंप रखा था।

    जब जोरावरसिंह ऊदासर गया हुआ था तब षड़यंत्रकारियों ने किले के सब दरवाजों पर से ताले हटा लिये तथा बख्तसिंह के आदमियों को सूचना करने के लिये आदमी भेजा। बख्तसिंह अपने आदमियों के साथ किले के पास ही छिपा हुआ था किंतु इसी बीच ऊदासर में षड़यंत्रकारियों के एक साथ उदयसिंह परिहार ने शराब के नशे में अपने सम्बन्धी जैतसी परिहार को यह भेद बता दिया कि किले का पतन होने वाला है। जैतसी ऊँट पर सवार होकर भागा-भागा बीकानेर आया तथा किले के उस हिस्से में पहुंचा जहां पड़िहारों का पहरा था। उनसे रस्सी गिरवाकर वह गढ़ में दाखिल हो गया और महाराजा सुजानसिंह को षड़यंत्र की सूचना दी। सुजानसिंह जैतसिंह को लेकर सूरजपोल पहुंचा तो उसने वहां के ताले खुले हुए पाये। गढ़ के अन्य दरवाजों के ताले भी खुले हुए पाये गये। उसी समय गढ़ के सारे द्वारों पर ताले जड़वाये गये तथा किले की तोपें दागी गयीं। तोपों की आवज सुनकर षड़यंत्रकारी समझ गये कि भेद खुल गया है अतः वे वहां से भाग लिये। किले के भीतर स्थित सांखला राजपूत मार दिये गये और किले की सुरक्षा धाय भाई को सौंप दी गयी। इससे पूर्व बीकानेर के किलेदार वंश परम्परा से नापा सांखला के वंशज होते आये थे, जो अपनी राजभक्ति के लिये प्रसिद्ध थे।

    ई.1735 में सुजानसिंह की मृत्यु हो गयी तथा जोरावरसिंह राजा हुआ। उसके शासन काल में जोधपुर नरेश अभयसिंह ने फिर बीकानेर पर आक्रमण किया किंतु इस बार बख्तसिंह ने बीकानेर का साथ दिया। अभयसिंह वापस जोधपुर लौट गया। एक साल बाद ई.1740 में अभयसिंह ने फिर बीकानेर पर आक्रमण किया। अभयसिंह बीकानेर नगर में घुस गया और वहां खूब लूटपाट मचाई तथा बीकानेर का दुर्ग घेर कर उस पर तोपों से गोलों की बरसात कर दी। जोरावरसिंह दुर्ग में घिर गया। उसने अपने आदमी नागौर तथा जयपुर भेजे। बख्तसिंह सेना लेकर बीकानेर आ गया तथा उधर जयपुर नरेश जयसिंह ने जोधपुर जाकर मेहरानगढ़ को घेर लिया। अभयसिंह को बीकानेर से हटना पड़ा। ई.1746 में जोरावरसिंह की मृत्यु हो गयी। वह वीर, कुशल राजनीतिज्ञ, प्रतिभा सम्पन्न तथा काव्य मर्मज्ञ था। वह संस्कृत और डिंगल का विद्वान था। उसकी लिखी हुई दो पुस्तकों- ‘वैद्यकसार’ तथा ‘पूजा पद्धति’ बीकानेर के पुस्तकालय में हैं।

    महाराजा गजसिंह

    जोरावरसिंह के कोई संतान नहीं थी अतः उसके मरते ही राज्य का सारा प्रबंध भूकरका ठाकुर कुशलसिंह तथा मेहता बख्तावरसिंह ने अपने हाथ में ले लिया तथा बाद में जोरावरसिंह के चचेरे भाई गजसिंह से यह वचन लेकर कि वह उस समय तक के राज्यकोष का हिसाब नहीं मांगेगा, उसे गद्दी पर बैठा दिया। जोरावरसिंह के चचेरे भाइयों में अमरसिंह सबसे बड़ा था किंतु उसे राजा नहीं बनाया गया इसलिये वह नाराज होकर जोधपुर चला गया और वहां से विशाल सेना लेकर बीकानेर पर चढ़ आया। रामसर कुंएँ पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ जिसमें जोधपुर की सेना परास्त हो गई। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह का वजीर मंसूर अली खां (सफदरजंग) बागी हो गया तब बादशाह ने बीकानेर एवं जोधपुर से सहायता मांगी। बीकानेर नरेश ने सैनिक सहायता देकर बख्तावरसिंह को बादशाह की सेवा में भेजा। सेना के समय पर पहुँच जाने से बादशाह की बादशाही बच गयी। इस पर बादशाह ने गजसिंह को सात हजारी मनसब देकर सिरोपाव भिजवाया तथा उसे श्री राज राजेश्वर महाराजाधिराज महाराज शिरोमणि श्री गजसिंह की उपाधि दी। साथ ही माही मरातिब भी प्रदान किया। जोधपुर नरेश विजयसिंह को बीकानेर नरेश गजसिंह पर बड़ा भरोसा था।

    सूरतसिंह का खूनी खेल

    राजसिंह के दो पुत्र थे, प्रतापसिंह तथा जयसिंह। दोनों ही उस समय बालक थे। अतः सूरतसिंह को संरक्षक बना कर प्रतापसिंह को बीकानेर का राजा बना दिया गया। कुछ ही दिनों बाद सूरतसिंह ने स्वयं राजा बनना चाहा किंतु राजसिंह की पुत्री ने सूरतसिंह का कड़ा विरोध किया। उस समय वह कुंआरी थी। अतः सूरतसिंह ने राजकुमारी का विवाह नरवर के कछवाहों से कर दिया उसने अपने हाथों से राजा प्रतापसिंह का गला घोंट दिया और ई.1787 में सूरतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठ गया।

    रियासतों की खूनी होली

    भारत में मुगलों का राज्य प्रथम बार 1526 से 1540 ई.तक चला तथा दूसरा राज्य 1555 ई.में स्थापित होकर 1857 ई.तक चला किंतु वास्तवितकता यह थी कि फर्रूखसीयर की मृत्यु के साथ ही मुगलों का प्रभाव राजपूत रियासतों पर नहीं के बराबर रह गया था। फिर भी मुहम्मदशाह रंगीला (1719-48 ई.) तक राजपूत राजा, मुगलों की प्रतीकात्मक अधीनता स्वीकार किए रहे। ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाहआलम से इलाहाबाद की संधि की तथा उसे पेंशन देकर राज्यकार्य से अलग कर दिया। 1765 से 1818 ई.तक राजपूत रियासतें किसी भी शक्ति के अधीन नहीं थीं। भारत के केन्द्रीय शासन में राजनैतिक शक्ति का अभाव उत्पन्न हो गया था। मराठों ने राजपूत रियासतों को लूटना आरम्भ कर दिया। मुगलों की सेना भंग हो जाने से लाखों सैनिक बेरोजगार होकर पिण्डारी बन गए। मराठों और पिण्डारियों के निरंतर आक्रमणों ने राजपूताना की राजनैतिक शक्ति को तोड़कर रख दिया था जिससे त्रस्त होकर राजपूताने की रियासतों ने सिंधियों तथा पठानों को अपनी सेनाओं में जगह दी। ये नितांत अनुशासनहीन सिपाही थे जो किसी विधि-विधान को नहीं मानते थे।

    इस काल में अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों तथा डच सेनाओं के खूनी पंजे भी भारत पर अपना कब्जा जमाने के लिये जोर आजमाइश कर रहे थे। इन सब खतरों से बेपरवाह राजपूताना के बड़े रजवाड़ों के मध्य छोटी-छोटी बातों को लेकर मन-मुटाव और संघर्ष चलता रहा। इस काल मंे राजपूताना की चारों बड़ी रियासतें- जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर तथा जयपुर परस्पर खून की होली खेल रही थीं।


  • Share On Social Media:
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×