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  • मारवाड़ में स्त्री रक्षा के लिये प्राणोत्सर्ग की घटनाएं

     06.06.2017
     मारवाड़ में स्त्री रक्षा के लिये प्राणोत्सर्ग की घटनाएं

    राजस्थान के वीरों ने स्त्रियों की रक्षा के लिये अपने प्राण गंवाने में कभी संकोच नहीं किया। इस सम्बन्ध में मारवाड़ में अनेक प्रसिद्ध घटनायें हुईं। इतिहास इन घटनाओं से भरा पड़ा है। कुछ उदाहरण अपने पाठकों के लिये प्रस्तुत हैं-

    महेवे की कन्याओं के लिये राव जगमाल का पराक्रम

    ई.1399 में मालानी के राव मल्लीनाथ का देहांत हुआ और उनका पुत्र राव जगमाल मालानी का राजा हुआ। जगमाल बड़ा ही पराक्रमी था। एक बार गुजरात का शहजादा महेवे की उन कन्याओं को उठाकर ले गया जो सावन में झूला झूलने नगर से बाहर एकत्र हुई थीं। जगमाल व्यापारी का वेश बनाकर गुजरात पहुँचा तथा कन्याओं को छुड़ाकर मारवाड़ ले आया। इतना ही नहीं जब गुजरात के सुल्तान ने महेवे पर आक्रमण किया तो उसे उल्टे पैरों भाग जाना पड़ा। इस युद्ध में जगमाल ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। इस प्रसंग में एक दोहा कहा जाता है-

    पग पग नेजा पाडि़या, पग पग पाड़ी ढाल

    बीबी पूछे खान ने, जग केता जगमाल।


    अर्थात् कदम-कदम पर तलवार और ढालें बिछी हुई हैं। सुल्तान की पत्नी सुल्तान से पूछती है कि जग में कितने जगमाल हैं?

    पीपाड़ गांव की स्त्रियों के लिये राव सातल का बलिदान

    ई.1492 में अजमेर का सूबेदार मल्लूखां, अपने सहायकों- सिरिया खां तथा घुड़ले खां के साथ मेड़ता पर आक्रमण कर उसे लूटता हुआ पीपाड़ गाँव से हिंदू स्त्रियों को पकड़ कर ले गया। उस समय हिन्दू स्त्रियां माता गौरी की पूजा करने गाँव से बाहर आयी हुई थीं। जब यह समाचार जोधपुर के राजा राव सातल (ई.1489-92) के पास पहुँचा तो सातल ने अपनी सेना लेकर म्लेच्छों का पीछा किया। मल्लूखां पीपाड़ से कोसाणा तक ही पहुँचा था कि सातल ने उसे जा घेरा। मल्लूखां और उसके साथी भाग छूटे किंतु मल्लूखां का सेनापति घुड़ले खां इस युद्ध में मारा गया। हिन्दू स्त्रियां मुक्त करवा ली गयीं। घायल राव सातल और उसके कुछ साथी सरदारों का उसी रात अपने डेरे में प्राणांत हो गया। इस घटना की स्मृति में आज भी मारवाड़ में घुड़ले का त्यौहार मनाया जाता है। इस अवसर पर गाँव-गाँव में मेला लगता है तथा घुड़ले खां को चेतावनी दी जाती है कि सुहागिनें पार्वती की पूजा करने जा रही हैं, घुड़ले खां में दम हो तो रोक ले। इस दौरान लड़कियां एक मटकी में छेद करके उसमें दीपक जलाती हैं। यह फूटा हुआ मटका घुड़ले खां के सिर का प्रतीक है।

    बूंदी की राजकुमारी के लिये कल्ला रायमलोत का बलिदान

    मुगल बादशाह अकबर (ई.1556-1605) ने बूंदी के हाड़ा शासक से कहा कि हमारी इच्छा है कि आपकी पुत्री का विवाह शहजादे सलीम से हो। भरे दरबार में इस तरह का प्रस्ताव सुनकर हाड़ा हतप्रभ हो गया। भरे दरबार में बादशाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना उसके बूते की बात नहीं थी। उसने सहायता के लिये दरबार में दृष्टि दौड़ाई। सिवाना का कल्ला रायमलोत निर्भीकता से मूंछों पर ताव देते हुए हाड़ा की तरफ देख रहा था। कल्ला से दृष्टि मिलते ही हाड़ा को बचाव का रास्ता मिल गया। हाड़ा ने कहा- ‘मेरी बेटी की सगाई हो चुकी है।’ बादशाह ने पूछा कि किसके साथ आपकी बेटी की सगाई हुई? इससे पहले कि हाड़ा कुछ बोले, कल्ला ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा- ‘मेरे साथ जहाँपनाह।’ समस्त दरबारियों सहित बादशाह भी समझ गया कि इस बात में सच्चाई नहीं है किंतु स्वाभिमान की चौखट पर खड़े वीर कल्ला की बात को अभिमानी बादशाह नहीं काट सका। अकबर के दरबार में दिखाये गये इस साहस का भुगतान आगे चलकर कल्ला रायमलोत को अपनी जान चुका कर करना पड़ा।

    राजकुमारी चारुमति के लिये महाराणा राजसिंह का पराक्रम

    ई.1658 में औरंगजेब ने किशनगढ़ की राठौड़ राजकुमारी चारूमती से विवाह करने के लिये डोला भिजवाया। चारूमती अपने समय की परम रूपवती एवं भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त थी। उसे जब ज्ञात हुआ कि औरंगजेब ने उसके लिये डोला भिजवाया है तो उसने उदयपुर के महाराणा राजसिंह को संदेश भेजा कि मैं विधर्मी बादशाह के साथ विवाह नहीं करना चाहती। आप मुझसे विवाह करके मेरे धर्म की रक्षा करें। महाराणा राजसिंह तुरंत सेना लेकर किशनगढ़ आया और राजकुमारी चारूमती से विवाह करके उसे मेवाड़ ले गया। औरंगजेब हाथ मलता ही रह गया। इस तरह के अगणित उदाहरण राजस्थान के चप्पे-चप्पे पर बिखरे पड़े हैं।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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