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  • रणथंभौर की रानियां

     06.06.2017
    रणथंभौर की रानियां

    रणथम्भौर के बाघ राजस्थान में प्रथम बाघ परियोजना सवाईमाधोपुर जिले के रणथम्भौर क्षेत्र में वर्ष 1973 में हुई थी। बाघ इससे पहले भी अनादि काल से इस क्षेत्र में रहते आये हैं। जब दुनिया से बाघ समाप्त होने लगे तो विश्व भर के पर्यटक बाघों को देखने के लिये भारत आने लगे। भारत में बाघों को मुख्य रूप से पूर्वी भारत के सुंदर वन में, दक्षिण भारत के जंगलों में तथ पश्चिमी भारत के रणथंभौर तथा सरिस्का टाइगर रिजर्वों में देखा जा सकता है। जब रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में पर्यटकों का आवागमन बढ़ गया तो बाघों के स्वभाव में भी परिवर्तन आया तथा उन्होंने पर्यटकों के वाहनों को देखकर विचलित होना छोड़ दिया तथा वे सहज रूप से मुक्त विरण करते हुए पर्यटकों के समक्ष आने लगे। विगत शताब्दी के नब्बे के दशक में कुछ बाघों ने पर्यटकों का ध्यान विशेष रूप से अपनी ओर खींचना आरम्भ किया। पर्यटकों ने उनके फोटो अपने कैमरे में कैद करके इण्टरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किये। इन फोटोग्राफ के साथ उन बाघों के काल्पनिक नाम, उनकी आदतें तथा उनकी विशेषताएं भी लिखी जाने लगीं। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में एक मादा बाघ ने अनायास ही पर्यटकों का ध्यान तब खींच लिया जब उसने झील में उतरकर 10 फुट से भी लम्बे एक विशाल मगरमच्छ का शिकार किया और उसे मार डाला। यह रणथम्भौर की पहली रानी थी जिसे मछली के नाम से जाना जाता है किंतु रणथंभौर की रानियों की कहानी मछली की माँ से शुरु होती है जिसे मछली सीनियर के नाम से जाना जाता था। रणथम्भौर की रानी मछली सीनियर मछली सीनियर आज दुनिया में नहीं है किंतु उसे रथंभौर टाइगर रिजर्व की प्रथम ज्ञात रानी कहा जा सकता है। इस बाघिन को उसके माथे पर बने मछली जैसे निशान से पहचाना जाता था इसलिये इसका नाम बाघिन पड़ गया। बाघों की औसत आयु के आधार पर कहा जा सकता है कि उसका जन्म 1992 के बाद हुआ होगा। यद्यपि उसके बारे में अधिक तथ्य ज्ञात नहीं है किंतु यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आज रणथंभौर टाईगर रिजर्व में जितने बाघ हैं उनमें से 80 प्रतिशत टाइगर इसी मछली सीनियर की बेटी मछली जूनियर की संतानें हैं। मछली सीनियर एवं चंगेज खां नामक नर बाघ के संसर्ग से मछली जूनियर का जन्म हुआ था। रणथम्भौर की रहस्यमयी रानी मछली मछली की बेटी टी-16 का जन्म ई.1997 में हुआ था। टी-16 ने वयस्क होने पर अपनी माँ को उसके अधिकार वाले क्षेत्र से खदेड़ दिया। इस बाघिन का आरम्भिक नाम श्श्झालराश्श् था क्योंकि वह झालरा क्षेत्र में रहती रहती थी। यह बाघिन अक्सर झीलों के आसपास चक्कर लगाती हुई देखी जाने लगी इसलिये इसे लेडी ऑफ लेक्स भी कहा जाने लगा। मछली जूनियर के माथे पर मछली खाने के कांटे जैसा निशान है। धीरे-धीरे लोग मछली सीनियर को भूल गये ओर मछली जूनियर को ही मछली के नाम से जानने लगे। इसके पिता का नाम चंगेज खां था। वह रणथम्भौर परियोजना का पहला बाघ था जो पानी में उतर कर शिकार करता था। एक बार मछली ने 10 फुट लम्बे मगरमच्छ से संघर्ष करके उसे मार डाला। इस संघर्ष में उसके एक जोड़ी कैनाइन टूट गये किंतु उसकी शक्ति और शिकार करने की क्षमता में कमी नहीं आई। जब बाघिन द्वारा मगरमच्छ का शिकार करने के फोटोग्राफ दुनिया भर की मैगजीनों, ब्लॉग्स और फेसबुक पेजों में छपे तो उसे देखने के लिये पूरी दुनिया के वन्यजीव प्रेमी एवं पर्यटक भारत में उमड़ पड़े। इस घटना के बाद मछली का नाम क्रोकोडायल किलर पड़ गया। इस बाघिन को देखने के लिये विश्व पर्यटकों में ऐसा क्रेज उत्पन्न हुआ कि पिछले 10 साल से उसे देखने आने वाले अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों से भारत को प्रतिवर्ष 10 मिलियन अमरीकी डॉलर की आय होती है। मछली के फेसबुक पेज पर डेढ़ लाख से अधिक फैन हैं। इस बाघिन का कोड नाम टी-16 है। यह रणथम्भौर बाघ परियोजना की सर्वाधिक प्रसिद्ध बाघिन है। इसे रणथम्भौर की रानी भी कहा जाता है। मछली पर 15 अंतर्राष्ट्रीय फिल्में बन चुकी हैं। रणथम्भौर में यदि नौ बार बाघ दिखाई देता है तो उनमें से पांच बार मछली दिखाई देती है। टी-16 ने वर्ष 1999 से 2006 की अवधि में कुल 11 बाघ शावकों को जन्म दिया जिनमें से 7 मादा एवं 4 नर शावक हैं। उसने मेल-एक्स से मैटिंग करके एसटी-2 (मादा शावक) और एसटी-3 (मादा शावक) को जन्म दिया। इसके बाद बम्बूराम नामक बाघ से मैटिंग करके स्लाण्ट ईयर टी-0 (नर शावक) तथा ब्रोकन टेल (नर शावक) को जन्म दिया। पुनः बम्बूराम नामक बाघ से मैटिंग करके झूमरी (मादा शावक) तथा झुमरू (नर शावक) को जन्म दिया। इसके बाद उसने पुनः मेल-एक्स से मैटिंग करके बंटी टी-3 (नर शावक) और बबली टी- 1 आर (मादा शावक) को जन्म दिया। सबसे अंत में एक बार पुनः उसने मेल-एक्स से मैटिंग की तथा सुंदरी टी-17 (मादा शावक), टी-18 (मादा शावक) और कृष्णा टी-19 (मादा शावक) को जन्म दिया। मछली ने प्रतिद्वन्द्वी बाघिनों एवं नर बाघों से अपने शावकों के प्राणों की जी-जान से रक्षा की। अपने शावकों की रक्षा के लिये वह किसी भी बाघ या बाघिन से बिना किसी भय के भिड़ जाती थी। इस कारण मछली (टी-16) के लगभग सभी शावक जीवित रहे। आज रणथम्भौर बाघ परियेाजना में लगभग 80 प्रतिशत बाघ-बाघिन इसी मछली (टी-16) की संतान हैं। मछली अपने शिकार करने के तरीके को लेकर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के बीच चर्चा में आयी और इसने अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल कर ली। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में विश्व भर से प्रतिवर्ष लगभग 10 मिलियन पर्यटक मछली बाघिन को देखने के लिये भारत आये। मछली को ट्रैवल ऑपरेटर्स द्वारा दिये जाने वाले श्श्लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड फॉर टाइगर्सश्श् से पुरस्कृत किया गया। यह पुरस्कार उस बाघ को दिया जाता है जो जंगल के सरंक्षण एवं राजस्व अर्जन में सर्वाधिक योगदान देता है। मछली पर अब तक 15 अंतर्राष्ट्रीय फिल्में बन चुकी हैं। नेशनल ज्यौग्राफी चौनल तथा एनीमल प्लैनेट चौनल ने मछली पर 50 मिनट की डॉक्यूमेंटरी श्श्टाइगर क्वीनश्श् बनाई। 19 अक्टूबर 2012 को मछली की फिल्म नेचुरल वर्ल्ड पर दिखाई गई। इस फिल्म का शीर्षक बाघिनों की रानी था। भारत सरकार ने मछली के पर्यावरणीय एवं आर्थिक योगदान के लिये मछली पर एक स्मारक डाक टिकट एवं पोस्टल कवर जारी किया। मछली को विश्व की सर्वाधिक फोटो खिंचवाने वाली बाघिन माना जाता है। सामान्यतः बाघ 10 से 12 साल जीते हैं किंतु मछली लगभग 19 वर्ष की हो चुकी है तथा उसे विश्व की सर्वाधिक वृद्ध बाधिन होने का गौरव प्राप्त है। इस बीच उसके समस्त दांत गिर चुके हैं। वह स्वतंत्र रूप से शिकार करने में असक्षम हो गई है। सामान्यतः बूढ़ी बाघिनें, अन्य बाघिनों द्वारा उसके इलाके पर अधिकार जमाने के लिये मार देती हैं। मछली के बूढ़ी हो जाने पर यह खतरा उस पर भी मण्डराने लगा। 11 जनवरी 2014 को मछली अचानक गायब हो गई तथा लगभग एक माह तक दिखाई नहीं दी। इस कारण पूरी दुनिया के वन्यजीव प्रेमियों में मछली को लेकर चिंता उत्पन्न हो गई। लगभग साल भर पहले इसी स्थान से उसकी बेटी टी-17 भी गायब हो गई थी जो फिर लौट कर नहीं। सम्भवतः वह अवैध रूप से शिकार करने वाले शिकारियों का निशाना बन गई। एक माह तक आंखों से ओझल होने के बाद मछली अचानक 4 फरवरी 2014 को भूतखोरा क्षेत्र में दिखाई दी। इससे वन्यप्रेमियों में फिर से आशा की किरण जगी। अनुमान है कि 11 जनवरी 2014 को मछली (टी-16) तथा उसकी बेटी कृष्णा (टी-19) के बीच मछली के इलाके पर अधिकार को लेकर झगड़ा हुआ जिसमें कृष्णा ने अपनी माँ मछली को परास्त कर दिया। इस कारण मछली लगभग 26 दिन तक एकांतवास करती रही और इस बीच वह घने कोहरे में छिपी रही। बाघ दो ही कारणों से मरते हैं या तो क्षेत्र पर दबदबे को लेकर हुए दूसरे बाघ के हमले से या फिर वृद्धावस्था में शिकार न कर पाने के कारण भूख से। मछली दूसरे बाघों के हमलों में तो नहीं मरी। न ही उसे उसकी बेटी ने क्षेत्र पर दबदबे को लेकर हुए झगड़े में मारा किंतु बिना दांतों की मछली अब किसी भी जानवर का शिकार नहीं कर पाती। इस कारण रणथम्भौर बाघ परियोजना के अधिकारी मछली को लाइफ सपोर्ट उपलब्ध करा रहे हैं और उसे नियमित रूप से भोजन उपलब्ध करा रहे हैं ताकि मछली भूख से न मरे। विश्व भर के पर्यटक एवं मीडिया के लोग प्रतिदिन मछली का पीछा करते हैं। इस कारण मछली को शांति नहीं मिल पाती। इसलिये मछली के लिये एक अलग कृत्रिम इलाके का निर्माण किया गया है जहां वह कैनाइन्स (शिकार करने वाले दांतों) के बिना भी जीवित रह सके। पर्यावरणविद् मछली को इस प्रकार कृत्रिम रूप से भोजन उपलब्ध कराये जाने को प्रकृति के काम में छेड़छाड़ मानते हैं। जो भी हो मछली आज भी जीवित है किंतु अब वह रणथम्भौर टाइगर प्रोजेक्ट पर राज करने वाली रणथम्भौर की रानी नहीं है। हां उसे राजमाता अवश्य कहा जा सकता है। रणथम्भौर की सुंदर रानी सुंदरी (टी-17) सुंदरी अपनी माँ मछली (टी-16 ) तथा पिता एक्स की संतान है। उसका जन्म अपनी अन्य दो बहिनों टी-18 तथा टी-19 के साथ हुआ। टी-17 को जंगल में इंसान द्वारा पहली बार अक्टूबर 2006 मंे देखा गया। अनुमान है कि इन तीनों बहिनों का जन्म वर्ष 2006 के मानसूनी महीनों (जुलाई से सितम्बर) में हुआ होगा। सुंदरी जन्म से ही अधिक चपल थी। दिसम्बर 2007 में ही उसने अपने लिये अलग टेरिटरी का निर्माण करना आरम्भ कर दिया। वह अकेली ही शिकार पर जाने लगी। जबकि टी-18 और टी-16 अभी भी शांतिपूर्वक अपनी मां मछली (टी-16) के साथ रह रही थीं। उसने रणथंभौर फोर्ट को अपनी राजधानी बनाया तथा उसके चारों ओर ही अपनी टेरिटरी स्थापित की। अक्टूबर 2008 तक उसने अपने लिये निश्चित टेरिटरी स्थापित कर ली। अब वह अपने क्षेत्र की स्वतंत्र महारानी थी। अपनी स्वतंत्र टेरिटरी बनाने के बाद भी उसने कभी-कभी अपनी माँ मछली तथा बहिनों टी-18 एवं टी-19 से मिलने के लिये मछली की टेरीटरी में जाना जारी रखा। अपनी माँ मछली की तरह वह भी अपनी इस छोटी टेरिटरी से संतुष्ट नहीं हुई और लगातार अपनी टेरिटरी में वृद्धि करती रही। जब आसपास का सारा इलाका सुंदरी के अधिकार क्षेत्र में सम्मिलित हो गया तब उसने अपनी माँ से निबटने का निर्णय लिया और एक दिन वह अपनी माँ मछली से जा भिड़ी। मछली सम्भवः इसके लिये तैयार ही थी। उसे अपनी बेटी के इरादों का पता बहुत पहले ही लग चुका था। जिस बेटी के प्राणों की रक्षा करने के लिये मछली ने जाने कितने बाघों को मारपीट कर और घायल करके भगा दिया था, आज वही प्यारी बेटी अपनी माँ को निबटाने आई थी। मछली ने थोड़ी देर के लिये तो सुंदरी का विरोध किया किंतु जब वह समझ गई कि सुंदरी किसी कीमत पर समझौता करने के लिये तैयार नहीं है, तो मछली संघर्ष छोड़कर अलग खड़ी हो गई और अपनी टेरिटरी त्याग कर नई टेरिटरी के निर्माण के लिये चल पड़ी। अब मछली लक्करड़ा क्षेत्र में आकर रहने लगी। अब मछली झीलों की रानी न रही। उसकी जगह सुंदरी ने ले ली थी। आश्चर्य जनक रूप से मछली की दो बेटियां टी-18 एवं टी-19 अब भी अपनी माँ के साथ रह रही थीं। टी-17 अपनी इस विजय पर इठला पड़ी। उसने मछली को भगाकर उसकी लगभग समस्त टेरीटरी पर अधिकार कर लिया किंतु अपनी माँ और बहिनों के लिये लक्करड़ा तथा माण्डूप का छोटा सा क्षेत्र अपनी टेरिटरी में शामिल नहीं किया। जब सुंदरी अर्थात् टी-19 ने अपनी बहिन टी-17 को अलग टेरिटरी का निर्माण करते देखा तो उसके मन में भी अपनी टेरिटरी बनाने की इच्छा हुई और उसने मण्डूपा के क्षेत्र में अपनी छोटी सी अलग टेरिटरी बना ली। टी-18 को भी कोई निर्णय लेना ही था। इसलिये उसने फूट कोट के पास अपनी छोटी टेरिटरी बना ली और उसी में संतुष्ट होकर रहने लगी। अपनी माँ मछली की तरह सुंदरी (टी-17) रणथम्भौर टाइगर रिजर्व की झीलों पर राज करने लगी। वह भी अपनी माँ की तरह पर्यटकों तथा उनके वाहनों और कैमरों के सामने आने से नहीं हिचकिचाती थी। अब सुंदरी ने अपना परिवार बनाने का निर्णय लिया तथा आसपास के कई बाघों को संसर्ग के लिये आमंत्रित किया। सुंदरी ने अलग-अलग समय पर टी-12, टी-25 तथा सितारा नामक तीन बाघों के साथ भाग्य आजमाया किंतु वह गर्भ धारण करने में असफल रही। यह उसके लिये बहुत शर्म की बात थी। अपनी मां के जिस परिवार को उसने अपनी स्वतंत्र टेरिटरी बनाने के लिये मारकर भगा दिया था, खुद अपना परिवार न बना पाने के कारण वह अपनी मां तथा बहिनों से नजर मिलाने लायक नहीं रह गई थी। इसलिये निराश होकर एक दिन वह टी-12 नामक नर बाघ के पीछे-पीछे रणथंभौर की टेरीटरी छोड़कर सरिस्का अभयारण्य में चली गई। वर्ष 2011 की गर्मियों में सुंदरी (टी-17) ने अपने लिये कचीड़ा वैली में स्वतंत्र टैरीटरी का निर्माण किया। जब सुंदरी इस क्षेत्र में पहुंची थी तब इस क्षेत्र पर टी-5 नामक एक बाघिन शासन कर रही थी। सुंदरी के भाग्य से अचानक ही टी-5 की मृत्यु हो गई और सुंदरी ने उसकी टेरिटरी पर अधिकार कर लिया। यह एक विशाल टैरीटरी है तथा आकार में उतनी ही बड़ी है जितनी बड़ी टैरिटरी पर सुंदरी (टी-17) की बहिन कृष्णा (टी-19) राज करती है। अपनी नई राजधानी मंे सुंदरी की किस्मत ने पलटा खाया तथा मई 2012 में उसने डॉलर (टी-25) नामक एक बाघ से संसर्ग करके तीन शावकों को जन्म दिया। अब वह अपनी माँ तथा बहिनों से फिर से नजर ऊँची करके बात कर सकती है। टी-18 टी-18 अपनी माँ मछली के साथ 2008 की गर्मियों तक रही। इसके बाद वह नालघाटी-फूटा बंधा- फूटा कोट एरिया में चली गई और वहीं उसने अपने लिये नई टेरिटरी का निर्माण किया। उसने अपनी टेरिटरी के लिये अपनी माँ मछली अथवा अपनी बहिन सुंदरी और कृष्णा से झगड़ा नहीं किया। कुछ समय बाद वनकर्मियों ने निकट भविष्य में बाघों के बीच संघर्ष की संभावनाओं को देखते हुए टी-18 को सरिस्का अभयारण्य में भेज दिया। रणथम्भौर की आलसी रानी कृष्णा सुंदरी (टी-17) की अपेक्षा कृष्णा (टी-19) अपनी माँ के साथ अधिक समय तक रही। उसे अभयारण्य की सबसे शर्मीली और आलसी बाघिन माना जाता था। वर्ष 2008 से 2011 के बीच वह पर्यटकों को बहुत कम अवसरों पर ही दिखाई दी। उसने अपने आप को मण्डूप प्लेट्यू की सूखी धाराओं तक सीमित कर लिया। वर्ष 2011 में उसने सितारा अर्थात् टी-28 से मैटिंग करके तीन शवकों को जन्म दिया जिनमें से दो नर तथा एक मादा शावक था। इस दौरान वह लाहपुर वैली में रही। वर्ष 2014 आरम्भ होने पर जब सुंदरी रणथंभौर टाइगर रिजर्व छोड़कर सरिस्का अभयारण्य में चली गई तो कृष्णा के व्यवहार में परिवर्तन आने लगा और अचानक ही वह सक्रिय होने लगी। 11 जनवरी 2014 को कृष्णा ने कठोर निर्णय लिया। उस दिन कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी और पूरे अभयारण्य में घना कोहरा छाया हुआ था। कृष्णा ने इसी दिन को अपने राजतिलक के लिये उपयुक्त समझा। शीतकाल में बाघ अधिक शक्तिशाली और सक्रिय होते हैं इस दृष्टि से भी कृष्णा के लिये यह दिन अधिक अनुकूल था। घने कोहरे के कारण टाइगर रिजर्व में पर्यटकों का आवागमन भी बहुत कम था। अंततः कृष्णा उठी और कड़कड़ाती हुई ठण्ड में स्थिर कदम धरती हुई मछली की ओर बढ़ने लगी। बाघ अपने शरीर को धरती की तरफ झुकाकर दबे हुए पांवों से तभी चलते हैं जब वे किसी पर छिपकर आक्रमण करना चाहते हैं। कृष्णा की इस चाल से पूरी तरह अनजान मछली आराम से एक पेड़ के नीचे लेटी थी। अचानक कृष्णा ने अपनी माँ मछली पर आक्रमण कर दिया। मछली के लिये कृष्णा का यह व्यवहार बहुत अप्रत्याशित नहीं था। वह कई दिनों से कृष्णा के बदले हुए व्यवहार को नोट कर रही थी और मन ही मन कृष्णा द्वारा आक्रमण किये जाने की प्रतीक्षा कर रही थी। बाघों की दुनिया का यही नियम है। इसलिये बहुत सी बाघिनें तो अपनी बेटी के लिये अपनी टेरिटरी छोड़कर स्वयं ही कहीं दूर जाकर नई टेरिटरी बना लेती हैं ताकि अपनी ही संतति से खूनी संघर्ष न करना पड़े। दुनिया की सबसे बूढ़ी मछली अच्छी तरह से यह समझती थी कि समझदारी दिखाने में ही समझदारी है। एक-डेढ़ साल पहले जब कृष्णा की बहिन सुंदरी ने मछली को चुनौती दी थी तब भी मछली ने इसी प्रकार समझदारी दिखाई थी। उसने कृष्णा के हमले का समझदारी से सामना किया और इससे पहले कि यह संघर्ष, खूनी संघर्ष में बदले, मछली ने पीछे हटकर अपनी हार स्वीकार कर ली। रणथम्भौर की नई रानी कृष्णा (टी-19) ने अपनी माँ मछली (टी-16) के साथ वही व्यवहार किया जो मछली (टी-16) ने अपनी माँ अर्थात् श्श्मछली सीनियरश्श् के साथ किया था। इस प्रकार मछली की बेटी कृष्णा (टी-19) ने अपनी माँ टी-16 को पराजित करके उसके दबदबे वाले वनक्षेत्र पर अधिकार कर लिया। वह रणथंभौर की नई रानी थी। कृष्णा यहीं पर नहीं रुकी। यहां रुकने का मतलब था अपनी शीघ्र मौत को बुलावा देना। उसकी बहिन सुंदरी (टी-17) झालरा और रणथंभौर फोर्ट के आसपास का जो विशाल इलाका खाली छोड़कर गई थी उसमें किसी दूसरे बाघ या बाघिन के प्रवेश करके टेरिटरी बनाने का खतरा था। कृष्णा इस खतरे को नहीं उठाना चाहती थी। उसने तेजी दिखाते हुए उस सम्पूर्ण खाली इलाके पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार कृष्णा उस पूरी टेरिटरी की स्वामिनी बन गई जिस पर कभी उसकी माँ मछली का अधिकार था। रणथंभौर के वनरक्षकों ने जंगल का यह बदला हुआ दृश्य देखकर समझ लिया कि अब मछली के दिन गिनती के ही बचे हैं। बिना दबदबे वाले क्षेत्र में बिना दांतों की बूढ़ी बाघिन अधिक दिन तक अपने बल पर जीवित नहीं रह सकती। जंगल का यही नियम है। इसलिये वनरक्षकों ने इस बाघिन के लिये छोटी और कृत्रिम टेरीटरी का निर्माण किया जहां उसे कृत्रिम रूप से शिकार उपलब्ध करवाया जा सके और जहां दूसरे बाघ प्रवेश करके उसे मार न सकें। इस प्रकार मछली सदैव के लिये कृष्णा की जिंदगी से दूर चली गई। टेरिटरी बनाने के बाद कृष्णा के लिये अब बारी थी परिवार बनाने की। किसी भी बाघिन के लिये किसी क्षेत्र पर अपना दबदबा बनाये रखने के लिये परिवार का होना अत्यंत आवश्यक है। शीघ्र ही वह नर बाघ सितारा के साथ मैटिंग करती हुई देखी जाने लगी जो कि उस समय रणथम्भौर टाइगर रिजर्व का सबसे तेज और शक्तिशाली नर बाघ था। कृष्णा ने वर्ष 2014 की जाती हुई सर्दियों अर्थात् फरवरी-मार्च में तीन शावकों को जन्म दिया। अपनी माँ मछली की तहर कृष्णा ने भी पर्यटकों बहुत स्नेह प्राप्त किया है। वह पूरे क्षेत्र में चक्कर लगाती हुई कभी भी कहीं भी दिखाई दे सकती है। रणथम्भौर का नूर - रानी माला (टी-39) माला की माँ सुल्तानपुर फीमेल (टी-13 उर्फ छोटी) नाम से जानी जाती थी जो कि मछली (टी-16) की बहिन थी। सुल्तानपुर फीमेल की बेटी टी-39 को माला, नूर तथा सुल्तानपुर फीमेल आदि नामों से भी जाना जाता है। यह शक्त सूरत में अपनी मौसेरी बहिन सुंदरी अर्थात् टी-17 जैसी दिखाई देती है। माला का बांया कान टूटा हुआ है। इसकी बांई आंख पर त्रिशूल जैसा चिह्न बना हुआ है। उसके दायें पिछले पैर पर अंग्रेजी के अक्षर जैसे दो वाई बने हुए हैं। चूंकि माला की माँ भी सुल्तानपुर क्षेत्र को टेरीटरी बनाकर रहती थी और माला भी सुल्तानपुर क्षेत्र को टेरीटरी बनाकर रहती है। इसलिये पहले मां को और बाद में बेटी को सुल्तानपुर फीमेल के नाम से जाना गया। सुल्तानपुर क्षेत्र रणथंभौर के धुर दक्षिणी भाग में है तथा गुढा नाम से भी जाना जाता है। मछली, सुंदरी तथा कृष्णा की तरह माला भी रणथंभौर टाईगर रिजर्व की सेलिब्रिटी बाधिन है। यह बाघिन अपने चेहरे की सुंदरता तथा शरीर पर लहरदार धारियों के पैटर्न के कारण जानी जाती है। इसके पुटठों पर माला के मोतियों की तरह डिजाइन बनी हुई है। माला ( टी-39 ) भी अपनी मौसी मछली (टी-16) की तरह बाह्योन्मुखी है अर्थात् उसे पार्क में बाहर से आने वाले मनुष्यों के सामने आने में कभी परहेज नहीं रहा। माला का एक अति महत्वाकांक्षी भाई टी-38 अपनी टेरीटरी बनाने के लिये राजस्थान छोड़कर मध्य प्रदेश के जंगलों में चला गया। दो वर्ष की आयु में माला ( टी-39 ) अपनी मां टी-13 से अलग हो गई। इसके बाद टी-13 ने टी-12 नामक नर बाघ के साथ मैटिंग करके उसे शावकों को जन्म दिया। इसके तुरन्त बाद वर्ष 2010 में टी-12 को सरिस्का में स्थानांतरित कर दिया गया। यह टी-12 माला का भी पिता था। टी-12 के चले जाने के बाद सुल्तानपुर मेल (टी-24) नामक बाघ ने टी-12 की टेरिटरी पर अधिकार कर लिया। इस कारण माला तथा उसके शावकों की जिंदगी के लिये बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया। नये बाघ के आ जाने के कारण माला की माँ सुल्तानपुर फीमेल, सुल्तानपुर की टेरिटरी को छोड़कर चली गई। इस कारण माला अपने बच्चों के साथ सुल्तानपुर क्षेत्र में अकेली रह गई। अब उसे सुल्तानपुर नर बाघ की अधीनता में रहना था। इन्हीं दिनों माला ( टी-39 ) का भाई टी-38 मध्य प्रदेश सेंचुरी में कुनो पालपुर नामक क्षेत्र में पकड़ा गया। उसकी पहचान माला के शरीर की धारियों के पैटर्न से की गई। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि टी-38 चम्बल नदी को पार करके लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित जंगलों तक पहुंच गया। उसने वहां अपने लिये नई टेरिटरी बना ली। माला की माँ तथा भाई के सुल्तानपुर क्षेत्र से चले जाने के कुद समय बाद माला तीन शावकों के साथ दिखाई दी। वह अक्सर पर्यटकों के मार्ग में अपने शावकों के साथ आकर बैठ जाती। पर्यटक माला द्वारा अपने शावकों को प्रशिक्षण दिये जाने को देखने का आनंद लेते। माला अथ्सर सिंहद्वार, सुल्तानपुर काला पीला, पानी-खेमचा कुण्ड, फूटा बांध किशनी का डेह, सोलेश्वर आदि क्षेत्रों में दिखाई देती थी। इसका अर्थ था कि यह पूरा क्षेत्र उसकी टेरीटरी में आ गया था। माला ( टी-39 ) ने वर्ष 2014 की शुरुआती गमियों अर्थात् अप्रेल माह में दो शावकों को जन्म दिया। यह समय रणथंभौर टाइगर रिजर्व के लिये एक अनूठे उत्साह से भरा हुआ था क्योंकि ठीक एक माह पहले ही टी-19 के भी तीन शावक जंगल में मस्ती से खेलते हुए देखे गये थे। जब इन पांच बाघ शावकों के चित्र दुनिया भर के पत्र-पत्रिकाओं और फेसबुक आदि पर प्रकाशित हुए तो पूरी दुनिया के वन्यजीव प्रेमियों में इस समाचार की धूम मच गई और विश्व भर से पर्यटक इन शावकों को देखने के लिये आने लगे। जब विश्व पर्यटक रणथंभौर पहुंचने लगे तो उनके लिये यह चुनाव करना कठिन हो जाता था कि वे टी-19 की टेरिटरी में प्रवेश करके उसके शावकों को ढूंढें या फिर टी-39 की टेरिटरी में प्रवेश करके उसके शावकों की अठखेलियों का आनंद लें! ऐरो हैड (टी-84) बाघिन ऐरो हैड (टी-84), अपनी माँ कृष्णा (टी-19) के दूसरे लिटर में जन्मी तीन संतानों में से एक है। इसने अपनी बहिन लाइटनिंग और माँ कृष्णा (टी-19) को लेक एरिया से दूर खदेड़ दिया। वर्ष 2016 के मानसून के दौरान तीन माह तक लेक एरिया सहित मुख्य जंगल बंद रहा। इसी अवधि में रणथंभौर में तख्ता पलट हुआ और ऐरो हैड ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। अब रणथंभौर टाइगर प्रोजेक्ट की तीनों मुख्य झीलों के क्षेत्र में ऐरो हैड को मुक्त विचरण करते हुए देखा जा सकता है। इस घटना के घटित होने से पहले कृष्णा (टी-19) अपनी दो बेटियों लाइटनिंग तथा ऐरो हैड के साथ मुक्त विचरण करती हुई देखी जा रही थी। ऐरोहैड ने अपनी मां कृष्णा को मलिक तालाब और लकड़दा एरिया में तथा अपनी बहिन लाइटनिंग को मंडूक-नाल घाटी ऐरिया में धकेल दिया है। कृष्णा को शुरु से ही आलसी रानी कहा जाता था। इसलिये उसकी दूसरी लिटर में उत्पन्न बेटियों में अपने जन्म के दो साल बाद ही कृष्णा के क्षेत्र पर अधिकार जमाने के लिये संघर्ष आरम्भ हो गया था जो लगभग एक साल बाद चला। जैसे ही ऐरोहैड (टी-84) तीन साल की हुई, उसने स्वयं को रानी घोषित कर दिया। यह एक संयोग ही था कि ऐरोहैड ने ऐसा तब किया जब उसकी नानी मछली (टी-16) अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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