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  • भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक महारानी पद्मिनी

     03.06.2020
    भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक महारानी पद्मिनी

    भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक महारानी पद्मिनी

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    गुहिल वंश की स्थापना गुप्त वंश के ध्वंसावशेषों पर छठी शताब्दी ईस्वी में हुई थी। यह रघुवंशी ईक्ष्वाकुओं की ही एक प्रबल-प्रतापी शाखा थी जो अत्यंत प्राचीन काल से उत्तर भारत में शासन करती आई थी तथा धर्म एवं न्याय आधारित शासन करने के लिये विख्यात थी। विभिन्न कालखण्डों में गुजरात से लेकर आगरा तक इनका राज्य फैलता और सिकुड़ता रहता था।

    गुहिल वंश की रावल शाखा के राजाओं को मेवाड़ पर शासन करते हुए 550 वर्ष से अधिक समय हो गया था जब ई.1302 में रावल समरसिंह का पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का राजा हुआ। उसे शासन करते हुए कुछ ही महीने हुए थे कि दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने ई.1303 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।

    उस समय चित्तौड़, अपने पूर्ववर्ती राजा समरसिंह द्वारा चौहानों, चौलुक्यों एवं परमारों पर विजय प्राप्त कर लेने से उत्साहित था। चित्तौड़ की सेनाओं ने दिल्ली के सुल्तान नासिरुद्दीन तथा गयासुद्दीन बलबन की सेनाओं पर उल्लेखनीय विजयें प्राप्त की थीं इसलिये भी चित्तौड़ का मनोबल अपने चरम पर था। अतः चित्तौड़ ने पूरी शक्ति से अलाउद्दीन खिलजी का प्रतिरोध किया। अलाउद्दीन खिलजी का दरबारी लेखक अमीर खुसरो इस घेरे में खिलजी के साथ था। उसने अपने ग्रंथ तारीखे अलाई में इस युद्ध में चित्तौड़ की पराजय एवं सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की विजय के सम्बन्ध में लिखा है- ‘सुल्तान ने गंभीरी और बेड़च नदी के मध्य अपने शिविर की स्थापना की। उसके पश्चात् सेना ने दायें और बायें पार्श्व से किले को घेर लिया। ऐसा करने से तलहटी की बस्ती भी घिर गई। स्वयं सुल्तान ने अपना ध्वज चित्तौड़ नामक एक छोटी पहाड़ी पर गाढ़ दिया। वह वहीं पर दरबार लगाता था तथा घेरे के सम्बन्ध में दैनिक निर्देश देता था।

    चित्तौड़ दुर्ग अपने अजेय होने के सम्बन्ध में इतना आश्वस्त था कि उसने खिलजी की सेना के आने पर भी दुर्ग के द्वार बंद नहीं किये थे। जब खिलजी का घेरा कठिन होता गया और तुर्की सेना का पड़ाव लम्बी अवधि तक चला तो राजपूतों ने भी किले के फाटक बंद कर लिये और परकोटे पर मोर्चे बांधकर शत्रुदल का संहार करते रहे। सुल्तान की सेना ने मजनिकों से किले की चट्टानों को तोड़ने का लगभग 8 महीने तक अथक प्रयास किया पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

    सीसोदे के सामंत लक्ष्मणसिंह ने किले की रक्षा में अपने सात पुत्रों सहित प्राण गंवाये। चित्तौड़ का दुर्ग जीते बिना अलाउद्दीन खिलजी, दक्षिण भारत की ओर के अभियानों पर नहीं जा सकता था। इसिलये रावल को संधि के बहाने अपने शिविर में बुलाकर बंदी बनाया गया। इसके बाद दुर्ग रक्षकों को मांग भिजवाई गई कि महारानी पद्मिनी को समर्पित किया जाये।

    रावल के सेनापतियों ने महारानी को समर्पित करने के स्थान पर महारावल को मुक्त कराने का उपाय सोचा। महारानी के निकट सम्बन्धी गोरा-बादल नामक दो युवक, महारानी की डोली में बैठकर शत्रु के बीच पहुंचे तथा रावल रत्नसिंह को मुक्त कराया। इसके बाद युद्ध अपने चरम पर पहुंच गया। चित्तौड़ का दुर्ग गर्व से सिर ऊँचा किए हुए खड़ा था। तुर्कों की सेना टिड्डी दलों की तरह पूरे दुर्ग को घेर कर प्रतिदिन मारकाट मचाती थी।

    क्षत्रिय सैनिक दिन प्रतिदिन छीजने लगे और चारों ओर सर्वनाश के चिह्न दिखाई देने लगे। जब शत्रु से बचने का कोई उपाय दिखाई देना बंद हो गया तब महारानी पद्मििनी के नेतृत्व में राजपूत स्त्रियों और बच्चों ने जौहर की धधकती ज्वाला में प्राण उत्सर्ग कर दिये। मेवाड़ के सैनिक, दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सेना पर काल बनकर टूट पड़े किंतु किले का पतन हो गया।

    यह चित्तौड़ दुर्ग का पहला साका था। इस घेरे में चित्तौड़ की रावल शाखा के समस्त वीरों के काम आ जाने से चित्तौड़ की रावल शाखा का अंत हो गया। खिलजी के दरबारी लेखक अमीर खुसरो ने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर लिखा है- ‘26 अगस्त 1303 को किला फतह हुआ और राय (रावल रत्नसिंह) पहले तो भाग गया परंतु पीछ से स्वयं (खिलजी की) शरण में आया और तलवार की बिजली से बच गया। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग में 30 हजार मनुष्यों का कत्ल करने की आज्ञा दी तथा चित्तौड़ का राज्य अपने पुत्र खिजरखां को देकर चित्तौड़ का नाम खिजराबाद रक्खा।

    टॉड ने लिखा है- ‘अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ को अधीन कर लिया परन्तु जिस पद्मिनी के लिये उसने इतना कष्ट उठाया था, उसकी तो चिता की अग्नि ही उसके नजर आई।’ इस युद्ध में महारानी पद्मिनी द्वारा दिखाये गए अदम्य साहस एवं पातिव्रत्य धर्म के कारण वह भारतीय नारियों के लिये सीता और सती सावित्री की तरह आदर्श बन गई। इसी प्रकार गोरा एवं बादल द्वारा दिखाई गई वीरता के कारण, गोरा एवं बादल मिथकीय कथाओं के नायक बन गये।

    पद्मिनी की कथा को आधार बनाकर कई स्वतंत्र ग्रंथों की रचना हुईं छिताई चरित में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ के शासक को बंदी बनाकर जगह-जगह पर घुमाने का उल्लेख है। हेमरतन के गोरा-बादल चौपई में तथा लब्धोदय के पद्मिनी चरित्र में इस कथा को स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।

    मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मिनी के आख्यान को आधार बनाकर ‘पद्मावत’ नामक ग्रंथ की रचना की। इतिहास की दृष्टि से यह ग्रंथ नितांत अनुपयोगी और झूठा है। इस ग्रंथ का साहित्यिक मूल्य भी अधिक नहीं है किंतु सोलहवीं शताब्दी में लिखा हुआ होने के कारण, हिन्दी भाषा के प्रारम्भिक काल की रचना के रूप में इस ग्रंथ का महत्त्व है। वास्तव में इसका कथानक, उपन्यास की भांति कपोल-कल्पित है जिसके पात्रों एवं स्थानों के नाम इतिहास से ग्रहण किए गए हैं। महारानी पद्मिनी की कथा पर आधारित होने के कारण इस ग्रंथ को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुईं पद्मावत की रचना के 70 वर्ष बाद फरिश्ता ने और सोलहवीं शताब्दी में अबुल फजल ने इन तथ्यों को और अधिक तोड़-मरोड़कर इस कथा को विस्तार दे दिया।

    ई.1336 में जैन साधु कक्कड़ सूरि ने ‘नाभिनन्दनो जिनोद्धार प्रबन्ध’ लिखा जिसमें कहा गया है कि चित्रकूट के स्वामी को बन्दी बनाया गया और नगर-नगर बन्दर की तरह घुमाया गया।

    महारानी पद्मिनी एवं महारावल रत्नसिंह के बलिदान के लगभग 20 वर्ष बाद गुहिलों की सिसोदिया शाखा में उत्पन्न राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग पुनः हस्तगत किया तथा शौर्य, पराक्रम, तेज और बलिदान की सुषुप्त होती हुई धारा महाराणाओं के रूप में पुनः वेगवती हो गई और आज यह राजवंश धरती का सबसे प्राचीन राजवंश होने का गौरव रखता है।

    महारानी पद्मिनी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक

    महारानी पद्मिनी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। लगभग सवा सात सौ वर्षों से वह भारतीय महिलाओं को अपने तेज और धर्म पर टिके रहने की प्रेरणा देती है। गीतकार प्रदीप ने महारानी के प्रति अपने उद्गार इन शब्दों में व्यक्त किये थे- ‘कूद पड़ी थीं यहाँ हजारों पद्मनियां अंगारों पे’ यह गीत स्वतंत्र भारत में हर देशवासी की जिह्वा पर चढ़ा।

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