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  • महाराणा भीमसिंह ने सोने का छल्ला चुराने वाले को धन दिया!

     07.10.2019
    महाराणा भीमसिंह ने सोने का छल्ला चुराने वाले को धन दिया!

    उदयपुर के इतिहास में उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में महाराणा भीमसिंह नामक एक महान शासक हो गए हैं। वे भारतीय राजाओं के उच्च आदर्श दान, धर्म, क्षमा तथा दया जैसे महान गुणों से सम्पन्न थे। महाराणा की दानवीरता एवं क्षमाशीलता के अनेक किस्से प्रचलित हैं।

    एक दिन एक सेवक महाराणा के पैर दबा रहा था। उसने महाराणा को मदिरा के प्रभाव में जानकर महाराणा के पैर में से सोने का छल्ला निकालने का प्रयास किया किंतु छल्ला कुछ छोटा होने से पैर के अंगूठे से निकल नहीं सका। इस पर उस सेवक ने ने महाराणा के पैर के अंगूठे में थूक लगाकर छल्ला निकाल लिया। सेवक ने समझा कि महाराणा मदिरा के प्रभाव में बेसुध हैं किंतु महाराणा सचेत थे।

    जब सेवक छल्ला निकाल चुका तो महाराणा ने अपनी आखं खोली तथा सेवक से कहा कि तुझे छल्ला चाहिए था तो मुझसे ही मांग लेता, मेरे शरीर पर थूक लगा कर मुझे अपवित्र क्यों किया? महाराणा ने उठकर स्नान किया और सेवक की निर्धन अवस्था देखकर उसे पर्याप्त धन प्रदान किया।

    महाराणा अपने दरबार में आने वाले कवियों और गुणियों को भी विपुल दान-दक्षिणा एवं पुरस्कार देकर प्रसन्न रखते थे। उस काल में जोधपुर नरेश मानसिंह तथा मेवाड़ नरेश भीमसिंह हिन्दू नरेशों के गौरव थे किंतु विधि का विधान ऐसा था कि ये महान राजा भी पिण्डारियों से अपने राज्यों की रक्षा न कर सके तथा इन दोनों ही नरेशों ने अपने-अपने राज्य ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सरंक्षण में दे दिए और कम्पनी से अधीनस्थ सहायता की संधियां कर लीं।

    अत्यधिक दान देने के कारण महाराणा भीमसिंह की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। ई.1818 में मेवाड़ राज्य की आमदनी 1 लाख 20 हजार रुपए वार्षिक थी किंतु जब कर्नल टॉड ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से उदयपुर राज्य का शासन प्रबंध संभाला तो 10 वर्ष के भीतर राज्य की आय 11 से 12 लाख रुपए सालाना हो गई।

    कर्नल टॉड महाराणा भीमसिंह को दैनिक व्यय एवं दान-धर्म के लिए प्रतिदिन 1000 रुपए दिया करता था। कुछ ही दिनों में अंग्रेजों को समझ में आ गया कि महाराणा को 1000 रुपया प्रतिदिन नहीं दिया जा सकता। इसलिए राज्य ने एक सेठ से 18 प्रतिशत वार्षिक की दर से कर्ज लिया। इसके बाद अंग्रेजों ने उदयपुर के शासन से अपने हाथ खींचने आरम्भ कर दिए।

    जब ई.1822 में कर्नल टॉड वापस इंग्लैण्ड चला गया तो महाराणा को अपने दैनिक खर्च का प्रबंध स्वयं ही करना पड़ा। ई.1823 में राज्य पर महाजन का कर्ज दो लाख रुपए तथा कम्पनी सरकार का बकाया 8 लाख रुपए हो गया। इस पर कम्पनी ने राज्य के प्रबंध के लिए पुनः एक अंग्रेज अधिकारी को नियुक्त किया तथा महाराजा को फिर से प्रतिदिन 1000 रुपए दिए जाने लगे।

    महाराणा भीमसिंह द्वारा अत्यधिक दान दिए जाने की ख्याति इतनी दूर-दूर तक फैल गई थी कि उनके शत्रु भी उनकी प्रशंसा करते थे।

    महाराणा भीमसिंह की मृत्यु पर जोधपुर नरेश मानसिंह ने यह पद लिखा-

    राणे भीम न राखियो, दत्त बिन दिहाड़ोह। हय गंद देता हयां, मुओ न मेवाड़ोह।।

    अर्थात्- मेवाड़ का राणा भीमसिंह, जो दान दिए बिना एक भी दिन खाली नहीं जाने देता था और हाथी-घोड़े दान किया करता था, मरा नहीं है। वह यश रूपी शरीर से जीवित है!

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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