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  • पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिताः आजादी के पहले और आजादी के बाद

     06.07.2019
    पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिताः आजादी के पहले और आजादी के बाद

    पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिताः आजादी के पहले और आजादी के बाद 

    भारत में पत्रकारिता का आरंभ 1780 ईस्वी में अंग्रेजी समाचार पत्र बंगाल गजट अथवा कलकत्ता एडवर्टाइजर के साथ होता है। इस समाचार पत्र का आरंभ अंग्रेजी विद्वान जेम्स हिक्की ने इस घोषणा के साथ किया था कि वह-‘मस्तिष्क और आत्मा की स्वाधीनता के लिए अपनी देह को कठोर श्रम करने के लिए दास्य भाव से समर्पित करने में आनन्द का अनुभव कर रहा है।’ यह पत्र तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के साथ मुठभेड़ हो जाने के कारण मात्र 10 माह बाद बंद हो गया किन्तु इस पत्र ने यह निर्धारित कर दिया कि भविष्य के लिये भारत में पत्रकारिता की क्या दिशा होगी? इस पत्र के सम्पादक पर अस्सी हजार रूपये का जुर्माना धरा गया। हिक्की ने जुर्माना देने से मना कर दिया तो उसे जेल में डाल दिया गया। इस पर भी न तो कम्पनी सरकार और न बाद में ब्रिटिश सरकार पत्रों का प्रकाशित होना रोक पाई।

    अखबारों ने अपने जन्म के साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी की मांग की। शीघ्र ही यह मांग हिन्दुस्थान की आजादी की मांग में बदल गई। 1826 ईस्वी में हिन्दी का पहला समाचार पत्र उदन्त्त मार्तण्ड प्रकाशित हुआ। इस अखबार के संदपादक पंण्डित जुगल किशोर ने अपने पहले अंक में घोषणा की कि ‘यह हिंदुस्तानियों के हित के हेत चलाया गया है।’ इसके बाद बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी और हिन्दी के समाचार पत्रों की संख्या बढ़ती चली गई।

    राजस्थान में पत्रकारिता का प्रवेश-

    राजस्थान में पहला पत्र 1849 ईस्वी में भरतपुर से मजहरूल सरूर के नाम से प्रकाशित हुआ। यह द्विभाषी पत्र था तथा उर्दू और हिन्दी में छपता था। 1856 ईस्वी में जयपुर से हैडमास्टर कन्हैयालाल के सम्पादन में एक द्विभाषी पत्र रोजतुल तालीम अथवा राजपूताना अखबार प्रकाशित हुआ। इस पत्र के सम्पादक ने इसका उद्देश्य बताते समय यह लिखा कि इसमें राजपूताने की प्रमुख रियासतों के समाचार प्रकाशित किये जायेंगे। इन रियासतों में जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर के नाम भी लिखे थे। इस पत्र ने अपने संवाददाता भी नियुक्त किये थे। इस प्रकार इस अखबार के साथ ही पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिता का प्रवेश हो जाता है।

    पश्चिमी राजस्थान का पहला समाचार पत्र-

    पश्चिमी राजस्थान से प्रकाशित होने वाला पहला समाचार पत्र मारवाड़ गजट था। यह 1866 ईस्वी में जोधपुर से प्रकाशित हुआ। यह भी द्विभाषी समाचार पत्र था तथा आधा उर्दू में और आधा हिन्दी में प्रकाशित होता था। इसके पहले सम्पादक बाबू हीरालाल और दूसरे सम्पादक दरबार स्कूल के हैडमास्टर बाबू डोरीलाल उर्फ कृष्णानन्द थे। इस पत्र में मुख्यतः सरकारी आज्ञायें, विज्ञप्तियां और इश्तहार प्रकाशित होते थे। इसी वर्ष जोधपुर से मुहब-ए-मारवाड़ का राजकीय संरक्षण में प्रकाशन आरंभ हुआ। इस पत्र का हिन्दी अंश मरूधर मित्र के नाम से प्रकाशित होता था और इसमें दो कॉलमों में लेख, समाचार तथा सूचनायें प्रकाशित की जाती थीं।

    बाबू बालमुकुन्द गुप्त के अनुसार महाराजा तख्तसिंह के शासनकाल में मुसाहिब रावराजा मोतीसिंह की स्वीकृति से 1866 में जोधपुर से दो पत्र प्रकाशित किये गये। इनमें से पहले अखबार का नाम उर्दू में मुहिबे मारवाड़ और हिन्दी में मरूधर मित्र था। दूसरे अखबार का नाम मारवाड़ गजट था। मारवाड़ गजट में सरकारी सूचनाओं के साथ-साथ कांग्रेस की गतिविधियों पर टीका टिप्पणियां और राजनीतिक विषयों पर आलेख होते थे। इस पत्र के संपादक बाबू डोरी लाल के बारे में बालमुकुंद गुप्त ने लिखा है कि वे बरेली के कायस्थ थे और योग्य तथा स्वाभिमानी पुरुष थे। उनके रियासत छोड़कर जाने के बाद बाबू रामस्वरूप शमीम दरबार स्कूल के हैडमास्टर हुए तथा मारवाड़ गजट का प्रभार भी उन्हीं के हाथों में आ गया। उन दिनों रियासत का ध्यान अखबार की ओर विशेष न था। रियासत के सामान्य कामों की तरह ही इसे भी किया जाता था। इसमें रियासत के हाकिमों की बदली, तैनाती आदि की खबरें छपती थीं। बाकी अंश में कभी कोई एक आध लेख छप जाता था और रहे सहे हिन्दी उर्दू पत्रों से छांट कर खबरें भर दी जाती थीं।

    बाबू रामस्वरूपजी भी कायस्थ थे। वे अच्छे लिखने वाले और स्वाधीन प्रकृति के आदमी थे। एक संवाददाता ने रामस्वरूपजी को खबर भेजी कि रास के ठाकुर ने एक स्त्री को डाइन होने के संदेह में मार डाला। रामस्वरूपजी ने यह खबर मारवाड़ गजट में छाप दी। जब यह अखबार अंग्रेज अधिकारियों के हाथों में पहुंचा तो उन्होंने इस घटना की जांच करवाई। राज्य के अधिकारियों ने इस घटना के घटने से इंकार कर दिया लेकिन रामस्वरूपजी ने इसे सच प्रमाणित कर दिया। इससे रियासत की बड़ी बदनामी हुई और रामस्वरूपजी को निर्देश दिये गये कि आगे से ऐसी कोई खबर न छापें जिससे कोई विवाद उत्पन्न हो। इस पर नाराज होकर रामस्वरूपजी नौकरी और रियासत छोड़कर चले गये।

    इसके बाद भी दरबार सकूल के हैडमास्टर तथा शिक्षा विभाग के सुपरिन्टंेडेंट ही मारवाड़ गजट के प्रबंधक और संपादक होते रहे। दरबारी आज्ञाओं के सिवा महकमें खास जो बातें लिखने के लिये आज्ञा होती वह पिछले पन्ने पर लिख दी जाती थीं।


    1884 ईस्वी में जब राय बहादुर मुंशी हरदयाल सिंह मारवाड़ राज्य के सेक्रेटरी और मुसाहिब आला हुए तो उन्होंने मारवाड़ गजट को महकमें खास के अधीन करके पत्र की बहुत उन्नति की तथा उसे गवर्नमेंट गजट का नमूना बना दिया। हिन्दी काल में अंग्रजी दाखिल हुई तब तक पत्थर के छापे से काम चलता था। हरदयालसिंह के समय में हिन्दी और अंग्रेजी का टाइप मंगवाया गया।

    कई साल तक मारवाड़ गजट इतनी उत्तमता से निकला कि उसके कुछ लेख अंग्रेजी अखबारों में भी नकल होने लगे और कभी-कभी अवध अखबार में भी अनुवादित होकर छपने लगे। सैक्रेटरी कार्यालय के हैडक्लर्क बाबू हरिश्चन्द्र इसके प्रबंधकर्ता थे। 1894 ईस्वी में मुंशी हरदयाल सिंह के स्वर्गवास होने पर मारवाड़ गजट राव बहादुर पण्डित सुखदेव प्रसाद सीनियर मेम्बर महकमे खास के नियंत्रण में चला गया और उनके बहनोई पण्डित निरंजननाथ गजट के प्रबंधकर्ता बने। उन्हें कोई सम्पादकीय स्वाधीनता नहीं थी। जो भी सामग्री सम्पादकीय कालम के लिये महाराजा की ओर से मिलती उसे छाप दिया जाता।

    अब मारवाड़ गजट का पहला पृष्ठ अंग्रेजी में और शेष तीन पृष्ठ हिन्दी में होते थे। एक कालम उर्दू में और एक हिन्दी में छापने की सामग्री की व्यवस्था अब बन्द कर दी गई थी। गजट सरकारी अधिकारियों और विभागों को निःशुल्क और बाहर के लोगों को समूल्य दिया जाता था।


    बीकानेर से 1887 ईस्वी में बीकानेर राजपत्र का प्रकाशन हुआ। इस पत्र में उर्दू तथा हिन्दी में राज्य के संवाद, सूचनाएं, विज्ञप्तियां तथा विज्ञापन प्रकाशित होते थे।

    लोकधर्मी पत्रकारिता-

    1880 ईस्वी से 1890 ईस्वी के बीच पूरे राजस्थान में स्वामी दयानंदजी द्वारा चलाये गये आर्य समाज की शाखायें स्थापित हुईं। उनके आंदोलन में राजस्थान में वैचारिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। उन्होंने राजनीतिक चेतना के लिये धर्म और समाज सुधार को अस्त्र के रूप में काम लिया। उन्होंने स्वधर्म, स्वदेशी, स्वराज्य और स्वभाषा के चार सूत्र जनता को प्रदान किये। उनकी ख्याति सुनकर ईस्वी 1883 में जोधपुर नरेश जसवंत सिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री सर प्रताप ने स्वामी दयानंदजी को जोधपुर बुलाया। इस निस्पृही सन्यासी ने जोधपुर की जनता को झकझोर कर रख दिया। इस दौरान पूरे देश में चेतना का बिगुल बज चुका था। बंकिमचंद्र चटर्जी का आनन्दमठ प्रकाशित हो चुका था, वंदे मातरम् रचा जा चुका था और पूरे राष्ट्र में स्वतंत्रता प्राप्त करने की भावना जोर पकड़ती जा रही थी।

    वारेन हेस्टिंग्स के समय में सन्यासियों के आंदोलन ने पूरे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था और उन घटनाओं के समाचार भी अखबारों में छपने लगे थे। रेलगाड़ी के आगमन से लोगों का परस्पर मिलना-जुलना तीव्र गति से होने लगा था। तेजी से बदलते हुए राष्ट्रीय परिदृश्य का प्रभाव पत्रकारिता पर भी पड़ा और वह राजकीय नियंत्रण से मुक्ति पाकर जन-जन का स्वर बनने को आतुर होने लगी।


    आश्चर्य की बात यह थी कि प्रत्यक्ष रूप से जो क्षेत्र अंग्रेजों के संरक्षण में थे वहां के पत्र अपनी बात कहने के लिये अधिक स्वतंत्र थे जबकि देशी रजवाड़ों विशेषकर राजपूताना की रियासतों में अखबारों को अपनी बात कहने की जरा भी स्वतंत्रता नहीं थी। ब्रिटिश शासित प्रदेशों में समाचार पत्रों की शक्ति और प्रभाव ने राजस्थान में भी समाचार पत्रों की स्वाधीनता के लिये ललक पैदा कर दी। इसका शुभारंभ उदयपुर से 1881 में प्रकाशित विद्यार्थी सम्मिलित- ‘हश्चिन्द्र चन्द्रिका-मोहन चन्द्रिका’ में ‘‘स्वतन्त्रता तंत्र तंतु’’ शीर्षक से एक बड़ा प्रखर सम्पादकीय लिखने के साथ हुआ।

    इस सम्पादकीय में लिखा गया कि
    अंग्रेजी राज्यों के अखबारों को जितनी स्वतंत्रता प्राप्त है उतनी स्वतंत्रता देशी राजाओं के राज्य में प्राप्त नहीं है।

    बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने मारवाड़ गजट का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा- ‘‘समाचार पत्रों की स्वाधीनता न देने में पुराने विचार के उच्च कर्मचारी अवश्य ही कुछ भलाई समझते होंगे। अब वह समय नहीं है कि रियासतों के लोग पुराने विचारों पर अड़े बैठे रहें। अब समय आ गया है कि देशी रईस भी अपने अखबारों को स्वाधीनता दें और उनसे लाभ उठायें। देशी रियासतों में जो यह शिकायत सुनी जाती है कि जबर्दस्त मारे रोने न दे। इसको दूर कर देना चाहिये। अखबार कोई गनीम नहीं है कि स्वाधीन हेाकर रियासतों को हानि पहुंचाये वरंच यदि उसकी ठीक-ठीक सहायता की जाये और उसे उन्नत होने के लिये अवसर दिया जाये तो वह राज्य के एक बहुत ही काम की वस्तु बन सकता है। जब विदेशी सरकार इस देश की प्रजा को प्रेस की स्वाधीनता देती है तब देशी राजा-महाराजा अपनी देशी प्रजा को स्वाधीनता न दें यह कैसे दुःख की बात है? देशी रियासतों में कठिनाई यह है कि यदि साधारण प्रजा में से कोई प्रेस या अखबार जारी करना चाहे तो उसे आज्ञा नहीं मिलती। बहुत तरह के संदेह किये जाते हैं। जो लोग अखबार या प्रेस जारी करना चाहते हैं उन बेचारों की कभी यह इच्छा नहीं होती कि वह ऐसे काम करें जिनसे उन पर संदेह किया जाये। तथापि कोई उनकी इस इच्छा की ओर ध्यान नहीं देता। भगवान् जाने देशी रजवाड़ों की कब तक यह दशा रहेगी?

    राजस्थान के यशस्वी पत्रकार और भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जयनारायण व्यास के अनुसार इस धारा का सबसे पहला समाचारपत्र राजनूताना हैराल्ड था। यह अंग्रेजी भाषा में था और 1885 में अजमेर से प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक हनुमानसिंह थे जिन्होंने ए0जी0जी0 कर्नल पोलेट और जोधपुर के महाराजा सर प्रताप के विरुद्ध काफी आन्दोलन किया। प्रकटतः जागीरदारों द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त इस समाचार पत्र के 30 मार्च 1885 केे अंक में कर्नल पोलेट, तथा कुछ जागीरदारों के अत्याचारों और रिश्वत प्रकरण छापे गये। इसके बाद आजादी की मांग उत्तरोत्तर गति पकड़ती गयी। राजस्थान में बिजौलिया कृषक आंदोलन चला। मारवाड़ हितकारिणी सभा का गठन हुआ और उसके आंदोलन चले। 1923 ईस्वी में ब्यावर से ऋषि दत्त मेहता ने राजस्थान नाम से समाचार पत्र आरंभ किया। इसमें जयपुर, जोधपुर, मेवाड़, और बीकानेर रियासतों में संचालित जन आंदोलनों के बारे में प्रचुर सामग्री छपती थी।

    1928-29 ईस्वी में जब मारवाड़ हितकारिणी सभा की गतिविधियां जोरों पर थीं, सभा ने मारवाड़ राज्य लोक परिषद् का आयोजन करने का निश्चय किया किंतु सभा पर पाबंदी लगा दी गई। सभा ने 28 सितम्बर 1929 को राज्य व्यापी विरोधी दिवस मनाया गया। व्यासजी ने ‘तरूण राजस्थान’ में एक लेख लिखकर राज्य की आलोचना करते हुए लिखा कि जोधपुर के महाराजा उस सफेद बोतल की तरह हैं जिसमें असली सस्तु के रंग का पता चल जाता है। सर सुखदेव के दिनों में सुखदेव शाही के रंग दीखते थे और अब जो राव राजा नरपत हैं तो उसे नरपतशाही के रंग सामने आ रहे हैं। इस लेख के कारण व्यासजी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें 6 वर्ष की सजा हुई। तरूण राजस्थान के अनेक संपादकों को जेल जाना पड़ा किंतु इस समाचार पत्र ने अपनी आवाज को कभी न दबने दिया।

    जयनारायण व्यास ने तरूण राजस्थान के अनुभव के आधार पर 1935 ईस्वी में बम्बई से ‘अखंड भारत’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ किया। यद्यपि इसका प्रकाशन स्थल राजस्थान से बाहर था फिर भी इस पत्र ने मध्यभारत आर संपूर्ण राजस्थान की जनता पर बड़ा असर डाला। इस पत्र का उद्देश्य मध्यभारत और राजस्थान की जनता पर राजाओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों का भण्डाफोड़ कर उत्तरदायी शासन की दिशा में विभिन्न जन आंदोलनों को शक्ति प्रदान करना था।इस युग में दैनिक का संचालन करना लोहे के चने चबाने के समान था।अतः आर्थिक संकट के कारण शीघ्र ही इसका प्रकाशन बंद हो गया। व्यासजी ने 1937 ईस्वी में ब्यावर से ‘आगीवाण’ नामक पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ किया। यह राजस्थानी भाषा का प्रथम पाक्षिक था। इसके संपादक के रूप में बालकृष्ण उपाध्याय का नाम छपता था किन्तु व्यासजी ही इसके वास्तविक संपादक थे। इस पत्र में राजस्थान के विभिन्न भागों में हो रहे जन आंदोलनों की खबरें निडर होकर छापी जाती थीं।जागीरदारों के जुल्म, सामन्तों के दमन और अत्याचार तथा समाज में व्याप्त दुराचारों पर प्रचुर सामग्री होती थी। इसमें कहानियां, लेख तथा कविताओं को भी पर्याप्त स्थान दिया जाता था।इन रचनाओं की विषय वस्तु युग की मांग के अनुरूप समाज-सुधारों राष्ट्रीय विचारों और भावों से ओतप्रोत होती थी। आगीवाण के संपादकीय बड़े प्रखर होते थे।उनमें देशी रियासतों के शासकों को खुले आम चुनौती होती थी कि वे समय की गति को पहचानें और अपने आचरण में परिवर्तन करें। व्यासजी अधिकतर समय आंदोलन की गतिविधियों और जेलों में बिताते थे। इस उन्होंने 1939 ईस्वी में इस कार्य से मुक्ति ले ली। यह पत्र भी शीघ्र बंद हो गया।

    1890 ईस्वी में ‘प्रसिद्ध चित्रावली’ नामक समाचार पत्र जोधपुर से प्रकाशित हुआ। यह जीवनी साहित्य का अपने ढंग का अनूठा पत्र था।इसके मुख पृष्ठ पर इसका उद्देश्य इस प्रकार लिखा रहता था- ‘प्रसिद्ध चित्रावली, जिसमें जगद्विख्यात् महत्पुरुषों के चित्र और जीवन चरित्र प्रकाशित किये जायेंगे और जो महीने के महीने राजस्थान जोधपुर से प्रकट होगा।’

    यह पत्र दो कॉलम में छपता था। एक तरफ हिन्दी में और दूसरी तरफ उर्दू में सामग्री होती थी। इसका वार्षिक मूल्य डाक व्यय सहित अंग्रेजी सरकार और राजा-महाराजाओं से चार रुपये छै आने, हाकिमों, रईसों और अमीरों से तीन रुपये छै आने और विद्यार्थियों से दो रुपये लिया जाता था। इसमें विज्ञापनों की छपाई का शुल्क एक आना प्रति पंक्ति था। चन्दे आदि की सूचना के नीचे मुख पृष्ठ पर देवीप्रसाद का नाम छपा होता था। यद्यपि संपादक के नाम का कोई उल्लेख नहीं है तथापि अनुमान होता है कि इसके संपादक प्रसिद्ध इतिहासज्ञ मुंशी देवीप्रसादजी थे जो उस समय जोधपुर राज्य की सेवा में थे। उदयपुर के राजकीय संग्राहलय में ‘प्रसिद्ध चित्रावली’ के छठे अंक और उसके बाद के अंक उपलब्ध हुए हैं। छठे अंक पर जून अंकित है। इसमें राव बीकाजी के जीवन चरित्र की कुछ घटनाएं और बादशाह शेरशाह का सचित्र जीवन वृत्त प्रकाशित हुए हैं। शेरशाह का पूरे एक पृष्ठ का रेखा चित्र बनाया गया है। सितम्बर 1891 के अंक में अब्दुल रहीम खानखाना का जीवन वृत्त मय रेखाचित्र छपा है। इसमें कुछ ऐसी घटनायें भी वर्णित हैं जिनका सम्बंध राजस्थान से है। खानखाना की उदारता का वर्णन करते हुए मारवाड़ के जाडा मेहू चारण और उसकी काव्य प्रतिभा का उल्लेख किया गया है। जिस पर रीझ कर खानखाना ने तीन लाख रुपये दिये थे।

    इस पत्र की भाषा में उर्दू की प्रधानता थी। ऐतिहासिक विभूतियों के सचित्र जीवन चरित्रों के साथ-साथ राजनीति से दूर जन-सामान्य की रुचि के अनुकूल रोचक समाचार भी छपते थे। यह असंदिग्ध है कि इस पत्र को राजकीय संरक्षण पूरी तरह प्राप्त था। पत्र के फरवरी 1891 के अंक में प्रकाशित महाराव बूंदी का विवाह के लिए जोधपुर आगमन का समाचार बड़े विस्तार से प्रकाशित किया गया है। इसी अंक में रूस के राजकुमार की जोधपुर यात्रा का समाचार भी बड़े विस्तार और चित्रात्मक वर्णन के साथ प्रकाशित हुआ है।

    मिशनरी पत्रकारिता-

    स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये चलाये जा रहे आंदोलन में जनभागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से जो अखबार निकाले गये उन्हें मिशनरी पत्रकारिता के अंतर्गत लिया जाता है। यह समझ लेना आवश्यक है कि पश्चिमी राजस्थान की जनता ने न केवल अंग्रेजी राज्य से अपितु देशी राजाओं और जागाीरदारों से भी अपनी मुक्ति का आंदोलन चलाया। इस कारण देशी रियासतों में अखबार निकालने की अनुमति किसी निजी व्यक्ति को नहीं दी गई। अखबार केवल राजकीय नियंत्रण में और राज्य द्वारा ही निकाले गये। जबकि देसी रियासतों के मुकाबले में ब्रिटिश शासित क्षत्रों में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। अतः स्वतंत्रता सेनानियों ने अजमेर केा अपना केन्द्र बनाया और सर्वाधिक पत्र वहीं से निकाले।

    पश्चिमी राजस्थान के यशस्वी पत्रकारों ने भी अजमेर और ब्यावर से निकलने वाले अखबारों के माध्यम से ही मिशनरी पत्रकारिता का कार्य किया। 1920 ईस्वी में विजयसिंह पथिक के संपादकत्व में राजस्थान केसरी नामक पत्र निकला। पहले यह पत्र वर्धा से और बाद में अजमेर से निकला। इसके यशस्वी संपादकों में जैसलमेर के सागरमल गोपा भी रहे। इस पत्र ने अर्जुनलाल सेठी, विजयसिंह पथिक तथा केसरीसिंह बारहठ के संघर्षों को प्रमुखता से छापा।

    अंग्रेजी राज्य में अखबार निकालने की स्वतंत्रता होते हुए भी एक अखबार कुछ दिन ही एक नाम से चलाया जा सकता था और शीघ्र ही उस पर प्रतिबंध लग जाता था। इस कारण राजस्थान केसरी के बंद होने पर पथिक जी ने ‘राजस्थान संदेश’ निकाला। यह भी शीघ्र ही दमन का शिकार हो गया। 1921 ईस्वी में 
    कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन के बाद राजस्थान सेवा संघ की स्थापना हुई। 

    1922 ईस्वी में नवीन राजस्थान का प्रकाशन आरंभ हुआ। चूंकि नवीन राजस्थान ऐसी संस्था का मुखपत्र था जो अनेक रियासतों में अनेक सामूहिक आंदोलन चलाती थी, अतः राजस्थान में उसका प्रसार तेजी से हुआ। बिजोलिया आंदोलन को इस अखबार से बहुत ताकत मिली। नवीन राजस्थान में बेगूं के किसानों के आंदोलन और सिरोही के भीलों के आंदोलन को भी प्रमुखता दी गई।

    मेवाड़ में प्रताप, राजस्थान केसरी और नवीन राजस्थान पत्रों के आगमन पर रोक लगा दी गई। इस कारण इसके संचालकों ने इसी पत्र को नया नाम देकर तरुण राजस्थान के नाम से निकाला किंतु सरकारी दमन चलता रहा। संपादक शोभालाल गुप्त को सजा होने पर रामनारायण चौधरी और उनके बाद जयनारायण व्यास इसके संपादक बने और इसे ब्यावर से निकाला गया। उन्होंने अपने सहयोगी के रूप में जोधपुर के अचलेश्वर प्रसाद शर्मा को नियुक्त किया।

    1929 ईस्वी में तरुण राजस्थान में ‘सिरोही में रावण राज्य’ शीर्षक से एक ऐसा लेख छपा जिससे तूफान खड़ा हो गया। सिरोही का राजा इस लेख को पढ़ कर तिलमिला गया और उसने अपने निजी सचिव को बीमा का ऐजेण्ट बनाकर ब्यावर भेजा।निजी सचिव ने लेखक का नाम जानने के लिये कई हजार रुपये देने का प्रलोभन दिया किंतु व्यासजी ने उसके लेखक का नाम नहीं बताया। 1938 ईस्वी में अजमेर से नवजीवन नामक समाचार पत्र प्रकाशित होना आरंभ हुआ। इस पत्र ने भी राजस्थान के विभिन्न भागों 
    में राजाओं महाराजाओं और जागीरदारों के खिलाफ जन आंदोलनों का समर्थन किया तथा राष्ट्रीय विचारधारा के सृजनात्मक साहित्य केा प्रकाशित किया। इसके प्रवेशांक में मेवाड़ के प्रधानमन्त्री अलविदा, सिरोही जेल में राजबन्दियों के साथ दुर्व्यवहार कोटा में हाहाकार आदि शीर्षकों से समाचार प्रकाशित हुए। 6 जनवरी 1940 के अंक में प्रकाशित हुए ‘बीकानेर में अग्निकाण्ड’; ‘मेवाड़ के रिश्वतखोरों का भंडाफोड़’; ‘जोधपुर में सभाओं में पाबन्दी’ आदि समाचार भी विशेष उल्लेखनीय हैं।

    प्रजासेवक-

    प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी और अनुभवी पत्रकार अचलेश्वर प्रसाद शर्मा ने प्रजासेवक नामक साप्ताहिक का प्रकाशन आरंभ किया। इसका प्रारंभ जयनारायण व्यास की प्रेरणा से किया गया था। इसको निकालने का उद्देश्य मारवाड़ राज्य लोक परिषदृ के आन्दोलन को समर्थन देना था।कुछ ही समय में यह प्रांत का लोकप्रिय साप्ताहिक हो गया। निष्पक्ष समाचारों, बेबाक टिप्पणियों, तथा प्रामाणिक लेखों के बल पर इसने शीघ्र ही विशिष्ट पहचान बना ली।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यहां तक कि राजस्थान के निर्माण के बाद भी यह साप्ताहिक अन्य साप्ताहिकों की तुलना में अग्रणी बना रहा।

    अन्य पत्र-पत्रिकायें-

    1940 में जोधपुर से प्रकाशित गणेशचन्द्र जोशी मन्वन्तर का कल की दुनिया, 1944 ईस्वी में जोधपुर से प्रकाशित हरीश मन्नावत का नवयुग साप्ताहिक, आजादी के बाद जोधपुर से प्रकाशित रियासती, बीकानेर से प्रकाशित ललकार, बीकानेर से ही प्रकाशित लोकजीवन ने भी मिशनरी पत्रकारिता में अच्छी भूमिका निभाई।

    बीकानेर से श्री शम्भुदयाल सक्सेना के संपादन में प्रकाशित सेनानी श्री अम्बालाल माथुर के संपादकत्व में प्रकाशित गणराज्य, जोधपुर से बंशीधर पुरोहित के संपादकत्व में प्रकाशित ‘आग’ और ‘ज्वाला’ जयनाराण व्यास के सम्पादन में प्रकाशित लोकराज और उगमसी मोदी के ललकार के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही मिशनरी पत्रकारिता के उद्देश्य की प्राप्ति हो गई। इस युग की पत्रकारिता पर विचार करने से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिमी राजस्थान की भूमि से भले ही गिने चुने अखबार प्रकाशित हो सके किंतु पश्चिमी राजस्थान ने जयनारायण व्यास (जोधपुर), सागरमल गोपा, (जैसलमेर) अचलेश्वर प्रसाद शर्मा (जोधपुर) तथा बाबा नरसिंह दास (नागौर) जैसे यशस्वी पत्रकार प्रदान किये। इन्होंने न केवल हाथ में कलम पकड़ी अपितु देश की स्वतंत्रता के लिये स्वयं आंदोलन चलाये और जेल गये। यहां तक कि सागरमल गोपा को तो जैसलमेर का गुण्डा राज्य लिखने के लिये जेल में जिन्दा जला दिया गया। इस काल के अखबार निर्धन लोगों ने चलाये, राज्य का विरोध करने वालों ने चलाये इस कारण लगभग सभी अखबार अल्पायु सिद्ध हुए।

    बाबा नरसिंह दास ने प्रभात के 15 अंक के संपादकीय में लिखा- ‘जैसे सूर्य कभी कभी बादलों में छिप जाने के कारण दिखाई नहीं देता, उसी तरह प्रभात भी आपके सम्मुख नहीं रहा है और अपना कर्तव्य उसने नहीं निभाया है। ‘ . . . . . प्रभात सदा से ही स्वतन्त्र रहना चाहता रहा है और किसी का न बन कर रहना उसका निश्चय था। इससे वह आर्थिक क्षति का भार सहन नहीं सह सकता था। वह अर्थ का दास बनने से इन्कार करता रहा है। यही कारण है कि कभी-कभी उसका प्रकाशन बन्द हो जाया करता था। भूचाल के थपेड़ों से वह लड़खड़ा जाया करता था। आप जानते हैं कि प्रभात धन उपार्जन के लिये नहीं, बल्कि विपत्ति में आपकी सेवा करने के उद्देश्य से आया है। प्रभात का लक्ष्य राजस्थान की शक्तियों को एक सूत्र में बांध कर राजस्थानी जनता में फैले हुए अंधकार को दूर कर यहां के जनजीवन में जागृति, जीवन और स्वाभिमान की भावना विकसित करना था।’

    साहित्यिक पत्रकारिता-

    भारत में साहित्यक पत्रकारिता का शुभारंभ भारेतुन्दु बाबू हश्चिन्द्र के समय से हुआ लेकिन भारतेन्दु मात्र 35 वर्ष की आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हुए अतः उनके द्वारा आरंभ की गई चन्द्रिका शीघ्र ही बंद होगई। इस पत्रिका को राजस्थान में पुनः प्रारंभ किया गया। पश्चिमी राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता की पहली पत्रिका ‘हिन्दी साहित्य ग्रंथावली’ के नाम से 1910 ईस्वी में आबूरोड से आरंभ हुई।

    1938 में मारवाड़ निवासी ठाकुर ईश्वरदान आशिया और शुभकरण कविया ने गुजरात निवासी जेठी भाई देथा के सहयोग से काठियावाड़ रियासत के लीबड़ी गांव से चारण नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया।‘चारण’ त्रैमासिक पत्रिका थी तथा इसे अखिल भारतीय चारण सम्मेलन के तत्वावधान में निकाला गया था। यह जाति विशेष के सामाजिक समाचारों को प्रमुखता देने के उद्देश्य से निकाला गया था तथापि इसने स्तरीय साहित्यिक पत्र का रूप ले लिया और प्राचीन राजस्थानी के उन्नयन में इसने प्रमुख भूमिका निभाई।इस पत्र में कुछ अंश गुजराती में भी छपते थे। मध्ययुगीन ऐतिहासिक चारण साहित्य पर इसने विपुल सामग्री प्रकाशित की।इसने चारण समाज में व्याप्त अंधविश्वासों कुरीतियों और रूढ़ियों को भी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पश्चिमी राजस्थान से जो साहित्यिक पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हुए उनमें बीकानेर से नई चेतना, वातायन, जोधपुर से प्रेरणा, परम्परा, चर्चा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

    त्रैमासिक पत्रिका ‘वातायन’ 1961 ईस्वी में बीकानेर से हरीश भादानी और विश्वनाथ ने आरंभ की। इस पत्र के रंगमंचीय एकांकी नाटक विशेषंाक, गीत विशेषांक, उपन्यास विशेषांक और राजस्थान कथा यात्रा के बीस वर्ष विशेषांक साहित्य जगत् में काफी चर्चित रहे। 1974 में यह पत्रिका बंद हो गई। 1961 से ही ‘कवितायें’ नामक साहित्यिक पत्रिका आरंभ हुई। इसका संपादकीय कार्यालय जयपुर में तथा प्रबंधकीय कार्यालय जोधपुर में थे। इसके सम्पादक श्रीकृष्ण शर्मा तथा प्रबंध संपादक प्रेम भण्डारी थे। इस पत्रिका ने नई कविता और उसके कवियों को प्रकाश में लाने का कार्य किया। यह पत्रिका मात्र दो वर्ष चली।

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के पश्चिमी राजस्थान के मूर्धन्य पत्रकार-

    स्वाधीनता प्राप्ति से पहले के मूर्धन्य पत्रकारों में जयनारायण व्यास, अचलेश्वरप्रसाद मामा, सागरमल गोपा, बाबा नरसिंह प्रसाद आदि का उल्लेख इस पत्र में कई स्थान पर आया है किंतु पश्चिमी राजस्थान के कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जिन्होंने राजस्थान से बाहर रहकर राष्ट्रीय पत्रकारिता में उल्लेखनीय कार्य किया। इनमें बीकानेर के चिम्मनलाल गोस्वामी तथा सिरोही रियासत के रोहिड़ा गांव के गौरीशंकर हीरा चंद ओझा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चिम्मनलाल गोस्वामी ने गीताप्रेस गोरखपुर की पत्रिका कल्याण(हिन्दी) तथा कल्याण कल्पतरू(अंग्रेजी) के संपादन में विशेष योगदान किया।रामचति मानस, श्रीमद् भागवत पुराण और बाल्मिीकि रामायण आदि ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। गौरीशंकर ओझा ने नागरी प्रचारिणी सभा काशी की शोध पत्रिका नागरी-प्रचारिणी त्रैमासिकी का तेरह वर्ष तक संपादन किया।आपके लेख वीणा, माधुरी, सुधा, सरस्वती और त्याग भूमि आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुख स्थान पाते थे। ओझााजी ने प्राचीन भारतीय लिपिमाला तथा इतिहास की अनेक पुस्तकें लिखीं।

    व्यावसायिक पत्रकारिता-

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मिशनरी पत्रकारिता के स्थान पर व्यावसायिक पत्रकारिता की शुरूआत हुई किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं समझना चाहिये कि अब पत्रकारिता का उद्देश्य मात्र धन अर्जित करना अथवा जीविकोपार्जन का साधन बन कर रह जाना था। वस्तुतः मिशनरी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता रूपी जिस अमृत कलश की प्राप्ति की थी, उसकी सुरक्षा का भार इसी व्यावसायिक पत्रकारिता ने उठाया। राजनीतिक भ्रष्टाचार को नंगा करने, प्रशासकीय अहम को ललकार कर खण्डित करने और प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं का दुरुपयोग रोकने में इस काल की पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे इतनी लोकप्रियता और सम्मान प्राप्त हुआ कि इसे लोकतंत्र का चौथा पाया कहा जाने लगा। वस्तुतः इस युग की पत्रकारिता को 1952 के आम चुनावों के बाद से व्यावसायिक पत्रकारिता कहा जाने लगा।

    इन चुनावों में और इसके बाद वाले चुनावों में पत्रों ने राजनैतिक दलों के पक्ष अथवा विरोध में अपनी पसंद अथवा नापसंदगी को खुलकर व्यक्त किया। इस कारण इस युग की पत्रकारिता पर व्यावसायिक होने का आरोप लग गया और यह आरोप गलत भी नहीं है क्योंकि इस युग की पत्रकारिता या तो राजनेताओं के संरक्षण में पली-बढ़ी या फिर बड़े-बड़े व्यवसायियों ने बड़े-बड़े अखबार या तो स्थापित किये या खरीद लिये। जब-जब चुनाव आये तब-तब अखबारों की संख्या में वृद्धि हुई। श्रमजीवी पत्रकारिता का जन्म भी इसी व्यावसायिक पत्रकारिता में से हुआ है।

    पश्चिमी राजस्थान में आजादी के बाद भी कोई बड़ा समाचार पत्र स्थापित नहीं हो सका। दिल्ली, बम्बई, जयपुर तथा देश के अन्य नगरों से प्रकाशित होने वाले पत्रों ने इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ बनाई तथा इस क्षेत्र के समाचारों के संकलन के लिये अपने संवाददाता नियुक्त किये। इस बीच समाचार ऐजेंसियों ने भी अपने स्ट्रिंगरों तथा संवाददाताओं की नियुक्ति की। उससे भी इस क्षेत्र में पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। पश्चिमी राजथान से छोटे-छोटे दैनिक, साप्ताहिक और मासिक निकाले गये, इनमें से अधिकांश बंद भी होते चले गये।

    1950 में शंभूदयाल सक्सेना ने बीकानेर से साप्ताहिक समाचार पत्र सेनानी प्रकाशित किया। इसने पश्चिमी राजस्थान के साप्ताहिकों में अग्रणी स्थान प्राप्त किया। बीकानेर से ही 1952 में रामरतन कोचर ने गणराज्य नामक अखबार निकाला। चिरंजीव जोशी ‘सरोज’ के संपादकत्व में इस पत्र ने बहुत ख्याति अर्जित की। पांडेय बेचन शर्मा उग्र जैसे धुरन्धर पत्रकार इसके नियमित स्तंभ लेखकों में से थे। 1962 से यह पत्र जयपुर से निकलने लगा और बाद में बंद हो गया।

    1956 में जब कर्पूरचन्द्र कुलिश ने जयपुर से सांध्यकालीन दैनिक राजस्थान पत्रिका आरंभ किया तो जोधपुर के यशस्वी पत्रकार हरमलसिंह ने इस पत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में इस पत्र ने राजस्थान के अन्य बड़े नगरों की तरह जोधपुर और बीकानेर से भी अपने संस्करण आरंभ किये। इस पत्र ने बड़ी संख्या में पूरे राजस्थान में संवाददाता नियुक्त किये। अपने कार्यालय को जोधपुर तथा बीकानेर आदि से टेलिप्रिण्टर से जोड़ा।

    1966 में जयनारायण के पुत्र देवनारायण व्यास ने जोधपुर से तरुण राजस्थान का प्रकाशन आरंभ किया। उनके देहावसान के बाद उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी व्यास ने इसका संपादन और संचालन किया। चार पृष्ठों में प्रकाशित सामग्री में जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर, पाली आदि जिलों के समाचारों को प्रमुखता से छापा जाता था। इन्हीं जिलों में इसका प्रसार अधिक था। बाद में इस पत्र को जलते दीप वालों ने खरीद लिया।

    1966 में ही जोधपुर से माणक मेहता ने ‘जलते दीप’ का प्रकाशन आरंभ किया। 1967 से माणक चौपड़ा ने जोधपुर से ही ‘जनगण’ प्रारंभ किया। इन दोनों पत्रों ने पश्चिमी राजस्थान की राजनीतिक सामाजिक, साहित्यिक एवं सास्ंकृतिक गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। जलते दीप ने हाल ही में जयपुर से भी अपना प्रकाशन आरंभ किया है। इनके अलावा जोधपुर से प्रकाशित मारवाड़ टाइम्स, जोधपुर टाइम्स; बीकानेर से प्रकाशित लोकमत, कलम, तथा थार ज्योति आदि के नाम भी लिये जा सकते हैं।

    शोध पत्रिकायें-

    1961 में राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी (जोधपुर) से ‘परम्परा’ नामक त्रैमासिकी का प्रकाशन आरंभ हुआ। इस पत्रिका ने प्राचीन राजस्थानी साहित्य को प्रकाश में लाने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। इसका प्रत्येक अंक किसी न किसी विषय पर विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ। परम्परा के विशेषांकों में गोरा हटजा, राजस्थानी साहित्य का मध्यकाल, डिंगल कोष, जेठवा ऊजली, सूर्यमल मिश्रण आदि विशेष चर्चित रहे। बीकानेर से प्रकाशित राजस्थान भारती ने प्राचीन राजस्थानी के साहित्यिक वैभव को अन्वेषण और गंभीर अध्ययन में लगे विद्वानों के लिए सुलभ करने का सराहनीय कार्य किया है। इस पत्रिका के पृथ्वीराज राठौड़ अंक और लुई पी टैसीटोरी अंक बेहद चर्चित रहे। बोरूंदा से प्रकाशित वाणी औरा लोक संस्कृति और जोधपुर से प्रकाशित लोक साहित्य के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

    विविध विषयों का समावेश-

    व्यावसायिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता जगत के लिये विविध विषय प्रस्तुत किये। राजनैतिक समाचारों को प्रमुखता देने के साथ-साथ अपराध समाचारों पर भी विशेष ध्यान दिया गया। आजादी के बाद स्थापित किये गये जिला कार्यालयों द्वारा संचालित की जाने वाली प्रशासनिक गतिविध्यियों के समाचार भी अखबारों में सुर्खियां पाने लगे। सामाजिक पर्वों यथा गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस आदि भी समाचार पत्रों में विशेष स्थान लेने लगे।इस काल की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब शासकों के पारिवारिक समारोहों पर विशेष रिपोर्टें अथवा आंखों देखा हाल का विवरण छपने के स्थान पर उन समारोहों अथवा घटनाओं पर टिप्पणियां ही स्थान पाने लगीं। स्तुति का स्थान कटाक्षों और यहां तक कि निन्दाओं ने ले लिया।

    खेल समाचार, व्यापारिक गतिविधियों के समाचार, बाजार भाव, विभिन्न मण्डियों के समाचार, कृषि समाचार, स्वास्थ्य शिक्षा, सिने जगत आदि के समाचार भी अखबारों में निर्धारित स्तंभों अथवा पृष्ठों में नियमित सामग्री के रूप में छपने लगे। कुछ छोटी पत्रिकायें तो गौपालन, कृषि, ,व्यापार आयुर्वेद तथा अन्य विविध विषयों पर पश्चिमी राजस्थान के बड़े नगरों से लेकर छोटे कस्बों यहां तक कि गांवों तक से प्रकाशित हो रही हैं। पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद से पंचायती राज की गतिविधियों पर भी समाचार प्रकाशित होने लगे।

    कुछ अखबारों ने अपनी प्रसिद्धि और प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये चटपटी खबरों, प्रेमी युगलों के घर से भाग जाने की खबरों यौन अपराधों आदि को खूब बढ़ा-चढ़ा कर छापना शुरू किया। इस दौर के अखबारों में यह प्रवृत्ति भी पनपी कि ‘अखबार नहीं, अखबार के शीर्षक बिकते हैं।’ अतः चटपटे शीर्षक लिखे जाने लगे। भाषाई चमत्कार पर भी ध्यान दिया जाने लगा। समाचारों के साथ घटनाओं के फोटो भी विस्तार के साथ दिये जाने लगे। सिने तारिकाओं और सौंदर्य प्रतियोगिताओं के चित्रों से पाठकों को लुभाने की प्रवृत्ति भी इसी काल में पनपी।सामाजिक विद्रूपताओं प्रशासनिक असफलताओं और अव्यवस्थाओं के समाचारों को भी खूब चटपटा बनाया जाने लगा।

    बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिये विविध सामग्री के रूप में परिशिष्ट निकाले जाने लगे। हास्य, व्यंग्य, कविता, चुटुकले, महिलाओं के लिये विविध व्यंजन बनाने की जानकारी, सौंदर्य बढ़ाने स्वस्थ्य रहने, घर को सलीके से रखने, मेहमानों का स्वागत कैसे करें, बच्चों को स्कूल के लिये कैसे तैयार करें, अपने व्यक्तित्व को शालीन कैसे बनायें, घर को कैसे सजायें, चद्दर-मेजपोश कैसे काढें तथा उनके डिजायन आदि भी पत्रकारिता का विषय बन गये। रिपोर्टिंग के लिये सामान्य ढंग से घटनाओं का विवरण देने के अतिरिक्त, फीचर, सम्पादकीय, नियमित व्यंग्य स्तंभ आदि भी पत्रकारिता की विशिष्ट विधा के रूप में प्रतिष्ठि हो गये। महत्वपूर्ण खबरों को अलग से दिखाने के लिये बॉक्स बनाये जाने लगे तथा उनके नीचे शेडेड क्षेत्र बनाया जाने लगा।

    सामग्री संकलन की विधियां और तकनीकी क्रांति का उपयोग-

    व्यावसायिक पत्रकारिता में जैसे जैसे अखबारों की संख्या बढ़ती चली गई वैसे-वैसे समाचार सामग्री के संकलन के लिये भी नयी नयी विधियां अपनाई जाने लगीं। महत्वपूर्ण घटनाओं, दुर्घटनाओं व समारोहों आदि के कवरेज के लिये जीप, कार आदि निजी साधनों से अखबारों के संवाददाता व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर कवरेज करके उसे अपने कार्यालय तक पंहुचाने लगे। छोटी व अत्यंत महत्वपूर्ण खबरों को भेजने के लिये टेलिफोन सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरा।

    दैनिक अखबारों की मांग पूरी करने के लिये टेलिप्रिण्टरों का युग आया। जिनके माध्यम से समाचार एजेंसियां व संवाददाता अपने सदस्य अखबारों को कुछ ही घण्टों में समाचार भिजवाने लगे। जोधपुर, बीकानेर आदि नगरों में समाचार ऐजेंसियों ने अपने ब्यूरो प्रमुख तथा संवाददाता नियुक्त किये जो टेलिफोन, तार तथा टेलिप्रिण्टरों के माध्यम से अपने कार्यालयों तथा अखबारों को समाचार भिजवाते थे। वर्तमान में फैक्स तथा कम्प्यूटर चालित मॉर्डम से समाचार तथा चित्र प्रेषण का कार्य बहुत तीव्र गति से भेजना संभव हो गया है। इसके कारण सूचना क्षेेत्र में क्रांति ही आ गई है। हजारों किलोमीटर दूर बैठा हुआ संवाददाता अपना समाचार और घटना का चित्र कुछ ही मिनटों में अखबार के कार्यालय को भिजावा देता है।

    समाज अथवा जाति की पत्रिकाओं का विकास-

    वर्तमान युग की पत्रकारिता में जातीय आधारित सामाजिक पत्रिकायें भी बड़ी संख्या में निकलती हैं। जाट समाज, माली समाज, कायस्थ समाज, पुष्करणा ब्राम्हण समाज, राजपूत समाज, रावणा राजपूत समाज द्वारा पश्चिमी राजस्थान में बड़ी संख्या में मासिक आवृति से लेकर त्रैमासिक आवृति की पत्रिकायें निकाली जाती हैं।

    स्मारिकायें एवं अभिनंदन ग्रंथ-

    वर्तमान काल में स्मारिकाओं और अभिनंदन ग्रंथों का प्रकाशन भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण विधा है। महत्वपूर्ण समारोहों तथा आयोजनों के अवसर पर स्मारिकाओं का प्रकाशन किया जाता है। इसी प्रकार समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों पर अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित किये जाते हैं। इन दोनों ही प्रकार के ग्रंथों के माध्यम से अच्छी और विपुल सामग्री जनता के सामने आती है।

    टैक्नो हाउस मैगजीन-

    अस्सी के दशक में राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का प्रसार करने के लिये आंचलिक ग्रामीण बैकों की स्थापना की गई। प्रत्येक एक अथवा दो जिलों में एक आंचलिक बैंक खोला गया और उनके नीचे ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखायें खोली गईं। चूंकि ग्रामीण बैंकिंग एक नई अवधारणा थी और यह वाणिज्यिक बैंकों से काफी कुछ भिन्न थी इसलिये शाखा प्रबंधकों तथा अधीनस्थ कर्मचारियों तक ग्रामीण बैंकिंग की वास्तविक कार्य प्रणाली समझाने के लिये केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा गया और पत्रकारिता का सहारा लिया गया। लगभग सभी बैंकों ने टैक्नो हाउस मैगजीन प्रकाशित कीं।

    साक्षरता समाचार पत्र-

    राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा राज्य में सम्पूर्ण साक्षरता कार्यक्रम अलग-अलग जिलों को इकाई मान कर चलाया गया।चूंकि यह एक आंदोलन के रूप में चलाया गया जिसे निर्धारित अवधि में पूरा होजाना था इस कारण जनता में इस कार्यक्रम को आंदोलन का रूप देने के लिये पत्रकारिता का सहारा लेना अत्यंत आवश्यक समझा गया और प्रत्येक जिला मुख्यालय से साक्षराता समाचार पत्र विविध नामों से प्रकाशित किये गये। सामान्यतः इनकी प्रकाशन आवृति मासिक रखी गई।

    कर्मचारी रिपोर्टर-

    आजाद भारत में सरकारी कर्मचारियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। सरकारी नियमों को कर्मचारियों के अनुकूल बनाने तथा राज्य से अधिक वेतन, भत्ते और सुविधायें प्राप्त करने के उद्देश्य से कर्मचारियों के संगठन को मजबूत करने के लिये विगत पांच वर्षों से जालोर जिला मुख्यालय से कर्मचारी रिपोर्टर नामक द्वैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है। पश्चिमी राजस्थान की अपनी तरह की यह अकेली पत्रिका है।

    विद्यालय पत्रिकायें-

    अपने विद्यार्थियों में रचनात्मक चिंतन और क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से आजादी के बाद से विद्यालय पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ किया गया। आज भी बड़ी संख्या में विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों द्वारा वार्षिक अन्तराल पर पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित किये जा रहे हैं।

    प्रसारण पत्रकारिता-

    पश्चिमी राजस्थान में प्रसारण पत्रकारिता का आरंभ आकाशवाणी जोधपुर की स्थापना के साथ हुआ। बाद में बीकानेर, सूरतगढ़ और नागौर के केन्द्र भी खुले। आकाशवाणी जोधपुर ने प्रत्येक जिले में अपने संवाददाता नियुक्त कर रखे हैं ये संवाददाता आकाशवाणी के समाचार बुलेटिनों के लिये नियमित रूप से टैलिफोन और तार के माध्यम से अपनी रिपोटें भेजते हैं। जिले की चिठ्ठी भी इन्हीं संवाददाताओं के द्वारा भेजी जाती है जो आकाशवाणी जयपुर से हर माह प्रसारित की जाती है।

    सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की भागीदारी-

    अपने अस्तित्व में आने के बाद ही राजस्थान सरकार ने जनसम्पर्क विभाग की स्थापना की जो अब सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के नाम से जाना जाता है। इस विभाग ने जोधपुर, बीकानेर, नागौर, जालोर, सिरोही, बाड़मेर, जैसलमेर तथा पाली जिला मुख्यालयों पर सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय स्थापित किये। ये कार्यालय समाचार पत्रों को सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी विभागों की नीतियों और उनके द्वारा जनता के लिये किये जा रहे कार्यों तथा अर्जित उपलब्धियों के समाचार प्रेसविज्ञप्ति के रूप में उपलब्ध करवाते हैं। वर्तमान समय में इन कार्यालयों ने बहुत ही मजबूत भूमिका प्राप्त कर ली है। इन कार्यालयों द्वारा पत्रकारों को सरकारी प्रेसविज्ञप्ति उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त अन्य सुविधायें भी उपलब्ध करवाई जाती हैं।जब भी कोई मंत्री,राजकीय अतिथि अथवा विशिष्ट व्यक्ति जिले में आते हैं तो पत्रकारों को समारोह स्थ्ल तक लाने-लेजाने की व्यवस्था भी जनसम्पर्क कार्यालयों द्वारा की जाती है। आज के अखबारों में न्यूनाधिक पचास प्रतिशत प्रेस सामग्री जनसम्पर्क कार्यालयों द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। प्रेस का सम्बंध शासन के साथ बना रहे इस दिशा में भी जनसम्पर्क कार्यालय विशेष प्रयास करते हैं। सघन सुरक्षा प्राप्त विशिष्ट व्यक्तियों के कार्यक्रमें सुरक्षा पास भी इन्हीं कार्यालयों के माध्यम से उपलब्ध करवाये जाते हैं। समाचार पत्रों को इस विभाग द्वारा सरकारी विज्ञापन भी उपलब्ध करवाये जाते हैं। सरकारी विज्ञापन चाहने वाले समाचार पत्रों की नियमितता की जांच करना तथा उनकी प्रसार संख्या की जांच करने का कार्य भी सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालयों द्वारा किया जाता है।

    पत्र सूचना कार्यालय-

    राज्य सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय की ही भांति केन्द्र सरकार ने जोधपुर में पत्रपेटी कार्यालय खोल रखा है। यह कार्यालय केन्द्र सरकार के कार्यक्रमों और सूचनाओं को अखबारों के कार्यालयों में प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से उपलब्ध करवाता है।

    वर्तमान परिदृश्य-

    वर्तमान में पचिमी राजस्थान से लगभग दैनिक समाचारपत्र, साप्ताहिक समचार पत्र, तथा मासिक पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित होते हैं। बड़े समाचार पत्रों में जोधपुर तथा बीकानेर से दैनिक राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर के जोधपुर व बीकानेर संस्करण निकलते हैं। इन पत्रों के विशेष परिशिष्ट जयपुर से छपकर आते हैं तथा स्थानीय समाचारों के पृष्ठ जयपुर तथा बीकानेर में ही छपते हैं। दैनिक जलतेदीप जोधपुर से प्रकाशित होने वाला महत्वपूर्ण प्रकाशन है। बीकानेर से निकलने वाले लोकमत तथा युगपक्ष भी अच्छे समाचारों में गिने जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान से हिन्दी तथा राजस्थानी भाषाओं में ही पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित होते हैं। अंग्रेजी भाषा का एक भी पत्र-प्रकाशित नहीं होता। हिन्दी अखबारों में दैनिक नवज्योति, पंजाब केसरी, राष्ट्रदूत तथा अंग्रेजी अखबारों में इण्डियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इण्डिया, फाइनेंसियल एक्सप्रेस तथा इकॉनोमिक टाइम्स प्रमुख हैं। 

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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