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  • राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी

     07.07.2019
     राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी

     राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी


    राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी ब्रिटिश भारत के स्वतंत्रता संग्राम से बहुत भिन्न है। जहाँ ब्रिटिश भारत को केवल अंग्रेजी शासकों से संघर्ष करना पड़ा, वहीं राजस्थान की रियासतों के निवासियों को जागीरदारों और उनके कारिंदों, राजाओं और राज परिवार के सदस्यों तथा ब्रिटिश हुक्मरानों से चौतरफा संघर्ष करना पड़ा। यही कारण है कि राजस्थान का स्वतंत्रता संग्राम चार आंदोलनों के रूप में चला। पहला किसान आंदोलन दूसरा जनजातीय आंदोलन, तीसरा क्रांतिकारी आंदोलन और चौथा प्रजा मण्डल आंदोलन।

    जागीरदारों के विरुद्ध जो संघर्ष हुआ उसे किसान आंदोलनों के रूप में देखा जाता है। ये आंदोलन जागीरदारों तथा उनके कारिंदों द्वारा किये जा रहे शोषण से मुक्ति पाने तथा करों में कमी करवाने के लिये हुए। इन आंदोलनों की शुरुआत मेवाड़ राज्य के बिजौलिया से ठिकाने से हुई। यह आंदोलन ई.1897 से लेकर ई.1941 तक चला। इस आंदोलन ने राज्य की जनता में स्वतंत्रता का शंख फूंका। माणिक्यलाल वर्मा आरंभ से ही इस आंदोलन से जुड़ गये। ई. 1916 में इस आंदोलन का नेतृत्व गुर्जर नेता विजयसिंह पथिक ने अपने हाथों में ले लिया। पथिक ने किसानों से प्रथम विश्वयुद्ध के लिये बलपूर्वक वसूले जा रहे वारफण्ड के चंदे का विरोध किया।

    उनके सहयोगी माणिक्यलाल वर्मा, साधु सीताराम, सीतारामदास, भंवरलाल सुनार और प्रेमचंद भील आदि ने 
    गाँव-गाँव जाकर किसानों का आह्वान किया कि वे वारफण्ड के लिये चंदा न दें। बिजौलिया किसान आंदोलन के दूसरे चरण में विजयसिंह पथिक ने बारीसल गाँव में किसान पंचायत बोर्ड की स्थापना कर किसानों को शक्तिशाली रूप से संगठित किया। ई. 1921 में बेगूं के किसानों ने अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई। विजयसिंह पथिक ने इस आंदोलन में  भी प्रमुख भूमिका निभाई।

    विजयसिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। वे उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुलावठी गाँव के रहने वाले थे। इनका पूरा परिवार ही क्रांतिकारी था। इनके पिता का देहांत बालक भूपसिंह के बाल्काल में ही हो गया था। इसके बाद वे अपने चाचा बलदेवसिंह के सम्पर्क में आये। वे क्रांतिकारी थे और रासबिहारी बोस के दल से जुड़े हुए थे। भूपसिंह को राजपूताने में गोपालसिंह खरवा, केसरीसिंह बारहठ और प्रतापसिंह बारहठ के सहयोग के लिये भेजा गया। वे अपने बहनोई के साथ राजस्थान के किशन गढ़ आये। गोपालसिंह खरवा के साथ बनायी गयी सशस्त्र क्रांति योनजा की असफलता के बाद अंग्रेज सरकार ने 
    उन्हें बंदी बनाकर टॉडगढ़ में रखा किंतु वे जेल से भाग निकले और अपना नाम बदल कर विजयसिंह पथिक के नाम से मेवाड़ के ठिकानों में घूमते रहे। 

    ई. 1926 में पं. नयनूराम, रामनारायण चौधरी एवं हरिभाई किंकर के नेतृत्व में बूंदी के किसानों ने लाग-बाग व बैठ बेगार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा। शेखावाटी क्षेत्र के जागीरदार भी किसानों पर अत्याचार करने में पीछे नहीं रहे। ई. 1922 में मास्टर प्यारेलाल गुप्ता ने चिड़ावा में अमर सेवा समिति की स्थापना की। मास्टर प्यारेलाल गुप्ता उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले का रहने वाला था तथा चिड़ावा का गांधी कहलाता था। उसी साल खेतड़ी नरेश अमरसिंह ने चिड़ावा का दौरा किया। खेतड़ी नरेश की सेवा के लिये जब अमर सेवा समिति के सदस्यों को बेगार के लिये बुलाया गया तो सदस्यों ने बेगार करने से मना कर दिया। पुलिस ने मास्टर सहित समिति के सात सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें घोड़ों के पीछे बांध कर घसीटा गया तथा खेतड़ी की जेल में ठूंस दिया गया जहाँ वे तीन दिन तक बिना अन्न जल के बेहोश पड़े रहे। चिड़ावा अत्याचार की सूचना पूरे देश में बिजली की तरह फैल गयी। चांदकरण शारदा तत्काल चिड़ावा आये और लोगों को इन अत्याचारों के विरुद्ध तनकर खड़े रहने का आह्वान किया। सेठ जमनालाल बजाज, सेठ घनश्याम दास बिड़ला तथा सेठ वेणी प्रसाद डालमियां आदि नेताओं ने खेतड़ी के राजा को कठोर चिट्ठियां लिखकर विरोध जताया। अंत में सभी कैदियों को छोड़ दिया गया।

    राजस्थान की जनजातियों में भील, मीणा तथा गरासिया प्रमुख रही हैं। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा सिरोही जिलों में भील अधिक संख्या में हैं। जयपुर तथा अलवर क्षेत्र में मीणों की संख्या अधिक है। भीलों में जागृति की विचारधारा फैलाने वालों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नाम गुरु गोविंद का है। इनका जन्म ई.1858 में डूंगरपुर जिले के बांसिया गाँव में एक बणजारे के घर में हुआ था। ई.1883 में गोविंद गिरि ने सम्पसभा की स्थापना की तथा मेवाड़, डूंगरपुर, गुजरात, मालवा आदि क्षेत्रों के भील एवं गरासियों को संगठित करने का प्रयास किया। उन्होंने जन जातियों में व्याप्त बुराईयों एवं कुरीतियों को दूर करने के लिये भरसक प्रयास किये तथा अपने अधिकारों के प्रति भी सजग किया। आश्विन सुदी पूर्णिमा को सम्प सभा का अधिवेशन मेले के रूप में होता था। ई. 1913 में जब इसका सम्मेलन हो रहा था तब अंग्रेजी सेना ने सम्मेलन स्थल को घेर लिया तथा गोलियों की बौछार आरंभ कर दी जिससे 1 हजार 500 आदिवासी घटना स्थल पर ही मारे गये। हजारों आदिवासी घायल हो गये। गोविंदगिरि तथा उनकी पत्नी को बंदी बना लिया गया तथा उन्हें 10 वर्ष तक जेल में ही रखा गया।

    आदिवासी जातियों के दूसरे प्रसिद्ध नेता मोतीलाल तेजावत थे। वे ई. 1886 में कलासिया क्षेत्र के कोलियारी गाँव में ओसवाल परिवार में जन्मे थे। तेजावत के प्रयासों से मेवाड़ के आदिवासियों में जागरूकता आयी और वे बुराईयों को त्याग कर अत्याचारों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। उन्होंने भी लाग-बाग, बैठ-बेगार आदि के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजा दिया। मोतीलाल तेजावत का आंदोलन एकी आंदोलन के रूप में विख्यात हुआ क्योंकि वे एकता पर बहुत अधिक जोर देते थे। 1921 में इस आंदोलन से जुड़े नौ हजार आदिवासियों एवं किसानों ने उदयपुर की बड़ी पाल पर जमावड़ा किया तथा महाराणा को संदेश भिजवाया कि महाराणा बड़ी पाल पर आकर आदिवासियों एवं किसानों कि समस्या सुनें। महाराणा ने आने से मना कर दिया। इस पर आदिवासियों एवं किसानों ने वहाँ से नहीं हटने का निर्णय लिया। अंत में महाराणा को बड़ी पाल पर आकर उनकी समस्याएं सुनीं तथा 21 में से 18 मांगें तत्काल मान लीं। इसके बाद एकी आंदोलन को व्यापक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। यह आंदोलन मेवाड़ से निकल कर राजपूताना एवं गुजरात की अन्य रियासतों तक पहुंच गया।

    ई. 1921 में तेजावत ने विजयनगर रियासत के नीमड़ा गाँव में आदिवासियों का सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में रियासत की सेना ने आदिवासियों पर गोलियां चलायीं तथा 1200 आदिवासियों को मार डाला। तेजावत के पैर में गोली लगी किंतु वे 7 वर्ष तक भूमिगत रहे। मेवाड़ के महाराणा ने तेजावत को जीवित या मृत पकड़ कर लाने वाले को पुरस्कार देने की घोषणा की। तेजावत पकड़ में नहीं आये तथा आंदोलन अपनी गति से चलता रहा। अंत में 1929 में मोहनदास गांधी की अपील पर तेजावत ने ईडर की पुलिस के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया।

    राजस्थान में क्रांतिकारी गतिविधियों के जनक ठाकुर केसरीसिंह बारहठ थे। उनका पूरा परिवार ही देश को आजाद करवाने के लिये बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ गया। रास बिहारी बोस तथा शचीन्द्र सान्याल के सहयोगी विजयसिंह पथिक ने भी उत्तर प्रदेश से राजपूताना में आकर मेवाड़ रियासत को अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का ठिकाना बनाया। अर्जुनलाल सेठी, प्रतापसिंह बारहठ, जोरावरसिंह बारहठ, गोपालसिंह खरवा तथा दामोदर दास राठी भी राजपूताने में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रणेता रहे। राजस्थान में आजादी की असली लड़ाई प्रजामण्डल आंदोलन के रूप में चली।

    ज्वाला प्रसाद : 
    ज्वाला प्रसाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपना अड्डा अजमेर में जमाया। अंग्रेजों ने ज्वाला प्रसाद को बंदी बना लिया गया। ई. 1938 के अंतिम दिनों में वे जेल से मुक्त हुए। नागौर के नरसिंह दास अग्रवाल बाबाजी के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों तथा क्रांतिकारियों के परिवारों एवं उनके बालकों की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा और शादी विवाह करवाने का कार्य हाथ में लिया। आजादी मिलने तक बाबाजी यह कार्य करते रहे। ई. 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने पर बाबाजी को दो साल की कठोर कारावास की सजा मिली। इस पर बाबाजी ने न्यायालय में गरज कर कहा कि मेरा पेशा विदेशी सरकार को नष्ट करना है। इसलिये मुझे फांसी पर चढ़ा दो अन्यथा मैं जेल से बाहर आकर फिर से यही कार्य करूंगा। 

    ठाकुर केसरीसिंह बारहठ : ठाकुर केसरीसिंह बारहठ का जन्म 21 नवम्बर 1872 को भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा कस्बे के पास देवपुरा गाँव में हुआ। वे हिंदी संस्कृत, बंगला, पाली, मराठी, गुजराती, ज्योतिष, दर्शन और राजनीति के उद्भट विद्वान माने जाते थे किंतु उनकी सर्वाधिक प्रसिद्धि एक क्रांतिकारी के रूप में हुई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उदयपुर में हुई। उसके पश्चात् वे मेवाड़ राज्य की सेवा में चले गये। कुछ समय बाद कोटा के महाराव ने उन्हें अपने पास बुला लिया। इस बीच उनका सम्पर्क रास बिहारी बोस व अन्य क्रांतिकारियों से हुआ। उन्होंने कोटा में क्रांतिकारियों के एक दल का गठन किया।

    ई. 1903 में लार्ड कर्जन ने एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर दिल्ली में भारतीय राजाओं का दरबार आयोजित किया तो उसमें उदयपुर के महाराणा फतहसिंह को भी आमंत्रित किया गया। जब महाराणा विशेष ट्रेन से उदयपुर जा रहे थे तब मार्ग में केसरीसिंह ने उन्हें 13 सोरठों की ‘‘चेतावणी के चूंगटिये’’ नामक रचना भेंट की जिसमें महाराणा के पुरखों की प्रशस्ति का गान करते हुए महाराणा को धिक्कारा गया था। इस रचना को पढ़कर महाराणा का स्वाभिमान जाग उठा और उन्होंने दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया। ई. 1914 में केसरीसिंह को दिल्ली षड़यंत्र काण्ड में बंदी बना लिया गया तथा 20 वर्ष के लिये जेल भेज दिया गया। पाँच वर्ष का कारावास भोगने के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

    अर्जुनलाल सेठी : अर्जुनलाल सेठी का संबंध रासबिहारी बोस, शचीन्द्र सान्याल एवं मास्टर अमीचंद जैसे क्रांतिकारियों से था। जब ई. 1915 में देशव्यापी सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी जा रही थी तब राजस्थान में इस क्रांति का जिम्मा केसरीसिंह बारहठ, खरवा ठाकुर गोपालसिंह खरवा, ब्यावर के सेठ दामोदर दास राठी और जयपुर के अर्जुनलाल सेठी को सौंपा गया। सेठी का यह कार्य था कि वे अपने विद्यालय में नवयुवकों को क्रांति के लिये तैयार करें। खरवा के ठाकुर राव गोपालसिंह और विजयसिंह पथिक को राजस्थान से अस्त्र-शस्त्र खरीदकर बंगाल, बिहार, पंजाब तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों में कार्यरत क्रांतिकारियों को भेजने की जिम्मेदारी दी गयी। केसरीसिंह बारहठ, गोपालसिंह खरवा तथा दामोदर दास राठी को नसीराबाद एवं ब्यावर पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गयी। गोपालसिंह दो हजार क्रांतिकारियों के साथ खरवा रेलवे स्टेशन के पास जंगल में जा छिपे। सरकारी गुप्तचर तंत्र को इस योजना का पता लग गया जिससे योजना ध्वस्त हो गयी।

    जयनारायण व्यास : प्रजामण्डल आंदोलन से जुड़े हुए नेताओं में जयनारायण व्यास का जन्म 18 फरवरी 1899 को जोधपुर में एक साधारण पुष्करणा परिवार में हुआ था। वे 1921 से स्वतंत्रता आंदोलन तथा प्रजामंडल आंदोलन से जुड़ गये। जोधपुर रियासत की ओर से उन पर कई अत्याचार किये गये। वे पाँच बार जेल गये। 1939 से 1949 तक वे अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के महामंत्री भी रहे। 1948 में वे जोधपुर रियासत की लोकप्रिय सरकार के मुख्यमंत्री बनाये गये। हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में बनी राजस्थान की पहली लोकप्रिय सरकार के पतन के बाद 26 अप्रेल 1951 को जयनारायण व्यास राजस्थान के दूसरे मुख्यमंत्री बने किंतु 1952 के आम चुनावों में वे चुनाव हार गये। अगस्त 1952 में वे किशनगढ़ से उपचुनाव जीत गये जिससे 1 नवम्बर 1952 को वे फिर से मुख्यमंत्री चुन लिये गये। उन्होंने अखंड भारत, तरुण राजस्थान और अंग्रेजी पत्र ‘‘पीप’’ का संपादन किया। उनका निधन 14 मार्च 1963 को दिल्ली में हुआ।

    जोरावारसिंह बारहठ: भीलवाड़ा के शाहपुरा कस्बे के ठाकुर केसरीसिंह बारहठ के अनुज जोरावरसिंह बारहठ ने 23 दिसम्बर 1912 को भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग्ज पर बम फैंका। वायसराय घायल हो गया तथा उनके हाथी का महावत मारा गया। जोरावरसिंह को पकड़ने के लिये अंग्रेज सरकार ने कई इनामों की घोषणा की किंतु वे आजन्म पकड़ में नहीं आये तथा 27 वर्ष तक गुप्त रहकर देश की आजादी के लिये कार्य करते रहे। सन् 1939 में अज्ञातवास में ही उनका निधन हुआ।

    दिल्ली बम काण्ड में लिप्त मास्टर अमीचंद, अवध बिहारी, बसंत कुमार बिस्वास एवं बाल 
    मुकुंद को 8 मई 1915 को दिल्ली में फांसी की सजा दी गयी।

    प्रतापसिंह बारहठ: भीलवाड़ा के शाहपुरा कस्बे के ठाकुर केसरीसिंह बारहठ के पुत्र प्रतापसिंह बारहठ का जन्म ई. 1893 में हुआ। उन्होंने वयस्क होने से पहले ही मात्र 15 वर्ष की आयु में मास्टर अमीचंद तथा रासबिहारी बोस के साथ क्रांतिकारी गतिविधियां आरंभ कीं। प्रतापसिंह को लार्ड हार्डिंग्ज पर बम फैंकने के आरोप में पकड़ा गया किंतु आरोप सिद्ध नहीं होने से छोड़ दिया गया। 31 मार्च 1914 को केसरी सिंह बारहठ तथा उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम गिरफ्तारी वारंट निकला। गिरफ्तारी से बचने के लिये जब प्रताप रेलमार्ग से जोधपुर आ रहा था तब आसारानाडा के स्टेशन मास्टर ने उन्हें पहचान लिया। यह स्टेशन मास्टर प्रतापसिंह तथा उनके परिवार से भली भांति परिचित था। उसने प्रतापसिंह के प्रति अपनत्व का ढोंग रचा तथा फुसला कर अपने घर ले गया। कपटी स्टेशन मास्टर ने प्रतापसिंह को पुलिस के हवाले कर दिया। बाद में उन्हें बनारस षड़यंत्र केस में पाँच वर्ष की सश्रम कारावास की सजा हुई। जब अंग्रेजों ने रासबिहारी बोस के भेद लेने के लिये उनसे कहा कि उनकी माँ उनके लिये रो रही है तब बालक प्रतापसिंह ने अंग्रेज अधिकारियों को जवाब दिया कि मेरी माँ को रोने दो जिससे किसी अन्य माँ को न रोना पड़े। अपनी माँ को हँसाने के लिये मैं हजारों माताओं को रुलाना नहीं चाहता।

    प्रतापसिंह की विलक्षण प्रतिभा तथा र्धर्य के सामने सी. आई. डी. के डायरेक्टर का मस्तिष्क भी चकरा गया। उसने अपनी डायरी में लिखा है कि मैंने आज तक ऐसा युवक नहीं देखा। जेल में दी गयी यातनाओं के कारण मात्र 25 वर्ष की आयु में वे 27 मई 1918 को जेल में ही चल बसे।

    बाल मुकुंद बिस्सा: बाल मुकुंद  बिस्सा का जन्म 1908 में डीडवाना तहसील के पीलवा गाँव में एक सामान्य पुष्करणा परिवार में हुआ। 1934 में उन्होंने जोधपुर में राजस्थान चर्खा एजेंसी लेकर खादी भंडार आरंभ किया। 1940 में जब जोधपुर के मुख्य क्रांतिकारी जेलों में ठूंस दिये गये तब बिस्साजी को जेल से बाहर रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को जारी रखने का जिम्मा सौंपा गया। 9 जून 1942 को बालमुकुंद बिस्सा को भारत रक्षा कानून के तहत जेल में ठूंस दिया गया। जेल में हुई हड़ताल में बिस्सा ने काफी जोर-शोर से भाग लिया जिसके कारण वे अत्यंत कमजोर हो गये। 19 जून को उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया, उसी दिन अस्पताल में बिस्सा का निधन हो गया। उनके निधन का समाचार बिजली की तरह जोधपुर नगर और आस पास के कस्बों व गाँवों में फैल गया। उनकी शवयात्रा में शामिल होने के लिये मीलों पैदल चल कर एक लाख लोग जोधपुर पहुँचे। उनके भय से जोधपुर नगर के दरवाजे बंद कर दिये गये और भीड़ को तितर-बितर करने के लिये पुलिस ने लाठी चार्ज किया।

    भोगीलाल पंड्या: भोगीलाल पंड्या को राजस्थान में वागड़ का गांधी कहा जाता है। वे डूंगरपुर जिले के सीमलवाड़ा गाँव के रहने वाले थे। उनका जन्म सन् 13 नवम्बर 1904 में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा क्षेत्र के आदिवासियों को आजादी की लड़ाई से जोड़ने तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास के कार्य किये। 1952 और 1957 के विधानसभा चुनावों में वे सागवाड़ा से चुने गये। 31 मार्च 1981 को जयपुर में उनका देहांत हुआ।

    दामोदर दास राठी: इनका जन्म ई. 1861 में मारवाड़ राज्य के पोकरण गाँव में हुआ था। इनके पिता व्यापार करने के लिये पोकरण से ब्यावर आ गये। अतः बालक दामोदर की शिक्षा ब्यावर के मिशन स्कूल में हुई। वे मेधावी छात्र थे। बड़े होकर वे आर्य समाज से जुड़ गये। वैचारिक उग्रता के कारण वे कांग्रेस के गरम दल के समर्थ बन गये। उन्हीं दिनों उनका सम्पर्क बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय आदि से हुआ। श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरा करते थे। जब 21 फरवरी 1915 को राजस्थान में सशस्त्र क्रांति की योजना क्रियान्वयन की तिथि घोषित की गयी। तब श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरे हुए थे। तब राठीजी ने तीन हजार सशस्त्र क्रांतिकारी तैयार करने के लिये आर्थिक सहयोग प्रदान किया। 1916 में ब्यावर में होमरूल लीग की स्थापना की गयी। उसी वर्ष एकता सम्मेलन भी हुआ जिसमें राठीजी ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया। 2 जनवरी 1918 को इस क्रांतिकारी एवं महादानी पुण्यात्मा का निधन हुआ।

    माणिक्यलाल वर्मा: बिजौलिया आंदोलन में भाग लेने के कारण माणिक्यलाल वर्मा को उदयपुर राज्य से निष्कासित कर दिया गया था। वर्मा ने अजमेर में रहते हुए मेवाड़ प्रजा मंडल स्थापित करने की योजना बनायी। उन्होंने कुछ पर्चे, प्रजामण्डल के गीत तथा ‘‘मेवाड़ राज्य का शासन’’ नाम से एक पुस्तिका छपवाई। इस पुस्तिका में मेवाड़ राज्य के प्रत्येक विभाग की आलोचना की गयी और कहा गया कि जब तक उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं होगी तब तक मौजूदा शासन की त्रुटियां समाप्त नहीं हो सकतीं। उन्होंने हर मेवाड़वासी से अपील की कि वह मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये अपना तन-मन-धन अर्पित कर दे। निर्वासन समाप्ति के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने उदयपुर पहुँचकर 24 अप्रेल 1938 को बलवंतसिंह मेहता, भवानीशंकर वैद्य, जमनालाल वैद्य, परसराम तथा दयाशंकर श्रोत्रिय के साथ मिलकर ‘मेवाड़ प्रजा मंडल’ की स्थापना की। इसका प्रथम सभापति बलवंतसिंह मेहता को तथा मंत्री माणिक्यलाल वर्मा को बनाया गया। जनता में अभूतपूर्व उत्साह के साथ प्रजामंडल चर्चा का विषय बन गया।

    सागर मल गोपा: सागर मल गोपा ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत 21 वर्ष की आयु में असहयोग आंदोलन से की। उन्होंने देश भर की पत्रिकाओं और अखबारों में जैसलमेर के महारावल द्वारा प्रजा पर किये जा रहे अत्याचारों के बारे में लेख लिखे तथा ‘‘जैसलमेर का गुण्डा राज’’ शीर्ष से एक पुस्तक भी प्रकाशित करवायी। इस कारण उनका जैसलमेर राज्य में प्रवेश वर्जित कर दिया गया। वे जैसलमेर छोड़कर नागपुर चले गये। पिता की मृत्यु के कारण उन्हें जैसलमेर आना पड़ा। जैसलमेर आने से पहले उन्होंने राजपूताना के पोलिटिकल एजेंट से जैसलमेर में रहने के लिये संरक्षण सर्टिफिकेट ले लिया। जैसे ही जैसलमेर के महारावल जवाहरसिंह को ज्ञात हुआ, उसने सागरमल की गिरफ्तारी के आदेश दे दिये। जैसलमेर पुलिस ने अनैतिक हथकण्डे अपनाये तथा उन पर झूठा मुकदमा दायर किया। 25 मई 1941 को पुलिस अधिकारी गुमानसिंह ने धोखे से सागरमल गोपा को बंदी बना लिया। उन्हें जेल में डालकर मारा-पीटा गया तथा अनेक अमानवीय यातनायें दी गयीं। उन्हें गीली बेंतों से पीटा जाता और उनके घावों पर मिरचें लगायी जातीं। जब समाचार पत्रों में ये समाचार छपे तब राष्ट्रीय नेताओं ने सागरमल गोपा की रिहाई के प्रयास किये किंतु महारावल ने उन्हें छोड़ने से इन्कार कर दिया।

    गोपाजी की रिहाई के लिये जैसलमेर में प्रजामण्डल की स्थापना की गयी। जयनारायण व्यास के नेतृत्व में प्रजामण्डल के माध्यम से गोपाजी की रिहाई के लिये भरपूर अभियान चलाया गया। इस अभियान से घबराकर पोलिटिकल एजेंट ने महारावल की इच्छा के विरुद्ध जैसलमेर जाकर गोपाजी से 
    भेंट करने का कार्यक्रम बनाया। इस पर महारावल ने पुलिस अधिकारी गुमानसिंह के माध्यम से गोपाजी को क्लारोफार्म सुंघा कर उन पर मिट्टी का तेल डलवाया और जीवित ही आग लगाकर जला डाला। जलने के आठ घंटे बाद गोपाजी को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी।

    हरिभाऊ उपाध्याय: इनका जन्म 9 मार्च 1893 को ग्वालियर राज्य के भौंरासा गाँव में हुआ। उन्होंने समाज सेवा और राजनीति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन, शिक्षा प्रसार तथा हरिजन सेवा में उनकी सेवाएं उल्लेखनीय हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के अंतर्गत उन्होंने नमक आंदोलन में भाग लिया। अतः उन्हें जेल जाना पड़ा। हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा 21 पुस्तकों की रचना और लगभग 24 ग्रंथों का अनुवाद किया गया। 1952 ई. में वे अजमेर मेरवाड़ा के मुख्यमंत्री बने और उसके पश्चात् 1956 से राजस्थान मंत्रिमंडल में 10 वर्षों तक मंत्री रहे। साहित्य सेवा के लिये उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए। 25 अगस्त 1972 को उनकी मृत्यु हुई।


    राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में राजस्थान के पाँच प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी-

    जयनाराण व्यास (जोधपुर रियासत), हीरालाल शास्त्री (जयपुर रियासत), रघुबर दयाल गोयल (बीकानेर रियासत), माणिक्यलाल वर्मा (उदयपुर रियासत) तथा बालमुकुंद बिस्सा (जोधपुर रियासत) राष्ट्रीय आंदोलन में राजस्थान की ओर से संघर्ष करने वाले पाँच सर्वप्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं। जोधपुर राज्य में प्रजा मण्डल आंदोलन- ई. 1915 में जोधपुर में मारवाड़ हितकारणी सभा बनी थी जिसने नगर परिषद व पुलिस एक्ट में सुधार करने के लिये हड़ताल की। इसके बाद यह सभा निश्क्रिय हो गयी।

    ई. 1920 में दिल्ली में ‘‘राजस्थान सेवा संघ’’ की तथा जोधपुर में ‘‘मारवाड़ सेवा संघ’’ की स्थापना हुई। ‘‘मारवाड़ सेवा संघ’’ का उद्देश्य भ्रष्ट नौकरशाही के कुशासन का प्रतिरोध करना और अवैधानिक कार्यवाहियों के विरुद्ध आवाज उठाना था जिससे कि मारवाड़ की जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हो सके। इस संगठन का सम्बन्ध राजस्थान सेवा संघ से था। मारवाड़ सेवा संघ के सदस्य जयनारायण व्यास, कानमल, दुर्गाशंकर, भंवरलाल सर्राफ और प्रयागराज भण्डारी थे। जन सामान्य का समर्थन नहीं मिलने के कारण इस संगठन का अंत भी शीघ्र हो गया।

    ई. 1924 में ‘‘मारवाड़ सेवा संघ’’ वालों ने ‘‘मारवाड़ हितकारणी सभा’’ को एक बार फिर से सक्रिय किया। इस बार इस संस्था ने महाराजा उम्मेदसिंह के संरक्षण में मारवाड़ राज्य में जनता की स्थिति में सुधार लाने का संकल्प व्यक्त किया। ऐसा संभवतः इसलिये किया गया क्योंकि उस समय मारवाड़ राज्य में राज्यद्रोह अधिनियम पारित हो जाने से किसी भी संगठन के लिये राजनैतिक गतिविधियां चलाना असंभव हो गया था।

    ई. 1925 में मारवाड़ हितकारिणी सभा के प्रतापचंद सोनी, सेठ चांद मल शर्मा व शिवकरण जोशी को मारवाड़ छोड़कर चले जाने के आदेश दिये गये तथा जयनारायण व्यास, आनंदराज सुराणा, अब्दुल रहमान अंसारी, अमरचंद मूथा, किस्तूरकरण एवं बच्छराज व्यास को बदमाश घोषित करके उनके नाम पुलिस के रजिस्टर संख्या 10 में लिखे गये। उन्हें प्रतिदिन पुलिस केंद्र पर उपस्थित होने तथा प्रति रात्रि पुलिस केंद्र की गार्ड की निगरानी में सोने के आदेश दिये गये। राज्य की ज्यादती से तंग आकर जयनारायण व्यास ने भी जोधपुर छोड़ दिया और ब्यावर जाकर रहने लगे।

    मारवाड़ हितकारणी सभा ने अपने नेताओं की अनुपस्थिति 
    में भी अपना कार्य जारी रखा। सभा ने बढ़ती हुई कीमतों के विरोध में आंदोलन किया तथा सरकार से प्रार्थना की कि राज्य से खाद्य वस्तुओं का निर्गमन बंद कर दिया जाये। सभा ने जोधपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की मांग की और राज्य में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता तथा संस्था बनाने की स्वतंत्रता देने की भी मांग की। ई. 1929 में इस सभा ने जागीरों में बेगार रोकने, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने, धान व चारे के निर्यात पर रोक लगाने, नौकरियों में भर्ती हेतु बोर्ड बनाने आदि मांगों को लेकर आंदोलन किये। 

    ई. 1930 के नमक सत्याग्रह से महिलाओं में राजनीतिक चेतना का आरंभ हुआ। जब राजस्थान में राजनीतिक चेतना और नागरिक अधिकारों के लिये संघर्ष का बिगुल बजा तो महिलायें भी इसमें कूद पड़ीं तथा पुरुषों के साथ वे भी सत्याग्रहों में खुलकर भाग लेने लगीं। अजमेर की प्रकाशवती सिन्हा ने सत्याग्रह आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1930 से 1947 के बीच सैंकड़ों की संख्या में महिला सत्याग्रही जेल गयीं।

    सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामनारायण चौधरी की पत्नी अंजना देवी, माणिक्य लाल वर्मा की पत्नी नारायण देवी तथा हीरालाल शास्त्री की पत्नी रतन शास्त्री भी जेल जाने वाली प्रमुख महिला सत्याग्रही थीं। 1942 की अगस्त क्रांति में छात्राओं ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। रमा देवी पाण्डे, सुमित्रा देवी खेतानी, इन्दिरा देवी शास्त्री, विद्या देवी, गौतमी देवी भार्गव, मनोरमा पण्डित, मनोरमा टण्डन, प्रियंवदा चतुर्वेदी और विजया बाई ने अगस्त क्रांति में खुल कर भाग लिया। भील बाला काली बाई 19 जून 1947 को रास्तापाल सत्याग्रह के दौरान शहीद हुई।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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