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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति

     06.06.2017
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति

    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति पर्यावरणीय संस्कृति से आशय एक ऐसी सरल जीवन शैली से है जो मानव जीवन को सुखद एवं आराम दायक बनाती है तथा पर्यावरण को भी नष्ट नहीं होने देती। राजस्थान में विगत हजारों वर्षों से निवास कर रही मानव जाति द्वारा स्थापित परम्पराएं, सिद्धांत एवं व्यवहार में लाई जाने वाली ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है। मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है तथा उसे जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण मानव को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। दुर्भाग्य से आधुनिक समय में हम ऐसी संस्कृति की ओर अग्रसर हो रहे हैं जो प्रकृति एवं पर्यावरण के संतुलन को तेजी से समाप्त कर रही है। अतः यह उचित समय है जब हम अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटें जो प्रकृति को माता और पर्यावरण को अपना सुरक्षा चक्र मानती है। पर्यावरण का निर्माण करने वाले मूल तत्त्व पृथ्वी के धरातल पर तथा धरातल के चारों ओर जो भी दृश्य एवं अदृश्य शक्ति अथवा वस्तु उपस्थित है, उस सबसे मिलकर धरती के पर्यावरण बनता है। प्राकृतिक शक्तियाँ- आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि हमारे पर्यावरण की प्राथमिक निर्माता हैं, यहाँ तक कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी और दूसरे ग्रहों एवं उपग्रहों द्वारा धरती के प्रति लगाये जाने वाले आकर्षण एवं विकर्षण बल भी। ये प्राकृतिक शक्तियाँ एक दूसरे को गति, स्वरूप एवं संतुलन प्रदान करती हैं जिनके कारण वायु मण्डल, भू-मण्डल तथा जल मण्डल बनते हैं। इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों के समन्वय से सर्दी, गर्मी, वर्षा, वायु संचरण, वायु में आर्द्रता एवं ताप का संचरण, आंधी, चक्रवात, मानसून तथा बिजली चमकने जैसी प्राकृतिक घटनाएं जन्म लेती हैं। ये प्राकृतिक शक्तियाँ ही परस्पर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करके वनस्पति जगत एवं जीव जगत का निर्माण करती हैं। धरती पर पाया जाने वाला वनस्पति जगत- यथा पेड़-पौधे, घासें, वल्लरियां, फंगस, कवक; नदियों, तालाबों एवं समुद्रों में मिलने वाली काई एवं विविध प्रकार की जलीय वनस्पतियां; पहाड़ों एवं मरुस्थलों में मिलने वाली वनस्पतियां, हमारे पर्यावरण की द्वितीयक निर्माता हैं जो सम्पूर्ण जीव जगत का पोषण करती हैं। उसे ऑक्सीजन, भोजन, लकड़ी, ईंधन आदि प्रदान करती हैं यहाँ तक कि जलीय चक्र का निर्माण करके जीव जगत के लिये जल की उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं। भूमि को ऊर्वरा शक्ति प्रदान करती हैं तथा धरातल पर बहने वाले जल को अनुशासन में बांधती हैं। जीव जगत यथा- मत्स्य, उभयचर, कीट, सरीसृप, पक्षी, पशु एवं मनुष्य जो कि इस पर्यावरण का निर्माण करने वाले आवश्यक तत्त्व तो हैं ही, साथ ही ये पर्यावरण के उपभोक्ता भी हैं। जो कुछ भी प्राकृतिक शक्तियांे द्वारा निर्मित किया जाता है तथा वनस्पति जगत द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत ही है। जीव जगत में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो जीव जगत द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है। यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है। संस्कृति का निर्माण करने वाले मूल तत्त्व किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की जीवन शैली, उस क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण करती है। उस क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की आदतें, विचार, स्वभाव, कार्य-कलाप, रीति रिवाज, परम्पराएं, खान-पान, वस्त्र-विन्यास, तीज-त्यौहार, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, चाक्षुष कलाएं, जन्म-मरण के संस्कार एवं विधान आदि विभिन्न तत्त्व उस क्षेत्र की संस्कृति को आकार देते हैं। विद्वानों का मानना है कि आज मनुष्य इसलिये मनुष्य है क्योंकि उसके पास संस्कृति है। भारतीय दर्शन के अनुसार संस्कृति मनुष्य की आत्मोन्नति का मापदण्ड भी है और आत्माभिव्यक्ति का साधन भी। संस्कृति चेतन धर्म है। संस्कृति को केवल बाह्य रूप या क्रिया ही नहीं मान लेना चाहिये। उसका आधार जीवन के मूल्यों में है और पदार्थों के साथ स्व को जोड़ने की सूक्ष्म कला में है। पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध पर्यावरण एवं संस्कृति का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। अर्थात् दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बदलने से दूसरा स्वतः बदल जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सृष्टि के आरम्भ में पर्यावरण, सभ्यता को जन्म देता है। दूसरे चरण में सभ्यता, संस्कृति को जन्म देती है तथा तीसरे चरण में संस्कृति पर्यावरण को संवारती या विनष्ट करती है। शारीरिक श्रम पर आधारित राजस्थानी संस्कृति राजस्थान की संस्कृति शारीरिक श्रम पर आधारित है। गांवों में आज भी महिलाएं प्रातःकाल में चक्की चलाकर अनाज पीसती हैं। घरों में ही पापड़, बडि़यां, राबोड़ी, खीचिये, खीच, राबड़ी, आदि विविधि व्यंजन बनाये जाते हैं। बाजरे, ज्वार तथा गेहूं की रोटियां, टुक्कड़ अथवा सोगरे को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, घी तथा छाछ जैसी घरेलू लगावण के साथ खाया जा सकता है जबकि पश्चिम की संस्कृति से आई ब्रेड के लिये महंगे बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं। ऐसी संस्कृति जिसमें शारीरिक श्रम का अभाव हो, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, को बढ़ावा देती है। उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है। कागज की थैलियों, मिट्टी के सकोरांे तथा पत्तों के दोनों का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण हैं। ये तीनों ही, नष्ट होने के बाद फिर से उसी रूप में धरती को प्राप्त हो जाते हैं। जबकि पॉलिथीन कैरी बैग्ज, प्लास्टिक की तश्तरियां तथा थर्मोकोल के गिलास, यूज एण्ड थ्रो कल्चर का उदाहरण हैं क्योंकि इन वस्तुओं की सामग्री फिर कभी भी अपने मूल रूप में प्राप्त नहीं की जा सकती। फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर है। नीम और बबूल की दांतुन पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो टूथपेस्ट और माउथवॉश का उपयोग उपभोक्तावादी एवं बाजारीकरण की संस्कृति हैं। मल त्याग के बाद जल प्रक्षालन पर्यावरणीय संस्कृति है तो कागज का प्रयोग यूज एण्ड थ्रो कल्चर है। शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है। प्रकृति की पूजा करने वाली संस्कृति राजस्थान में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का चिंतन किया जाता है, इस कारण दीर्घकाल तक मानव सभ्यता द्वारा पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचती। वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिडि़यों को दाना डालने, कीड़ीनगरा सींचने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने, प्रतिदिन पीपल तथा तुलसी सींचने, सूर्यदेव को अर्घ्य देने एवं विशिष्ट पर्वों एवं व्रतों पर चंद्रदेव को अर्घ्यदेने, द्वितीया को चंद्र दर्शन करने जैसे धार्मिक विधान बनाये गये जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है। राजस्थान की संस्कृति में सादगी एवं उल्लास पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। सादा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकताओं को इतना नहीं बढ़ायेगा कि पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। संत पीपा का यह दोहा इस मानसिकता को बहुत अच्छी तरह व्याख्यायित करता है- स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास। पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।। जलाशयों की पूजा राजस्थान में नदियों, सरोवरों एवं जलाशयों की पूजा धार्मिक कृत्य माना जाता है। पुत्र के जन्म एवं विवाह के अवसर पर कुआं पूजन इसी परम्परा का द्योतक है। मृत्यु के बाद शरीर की भस्म एवं अस्थियों को इस कामना से नदियों में प्रवाहित किया जाता है कि मृतक की आत्मा को शांति मिले। धार्मिक पर्वों के अवसर पर नदियों, तालाबों एवं कुओं पर सामूहिक स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है। तालाबों से मिट्टी खोदकर उन्हें गहरा बनाना, उनके जल को प्रदूषित होने से रोकना, तालाबों पर पक्के घाट बनवाना तथा नये तालाब, बावड़ी, कूप आदि का निर्माण करवाना पुण्यदायी माना जाता है। वर्षा से पहले, तालाबों एवं टांकों के आगोर को साफ करने के लिये सामूहिक आयोजन किये जाते हैं। वृक्षों की पूजा राजस्थान में वट, पीपल, तुलसी, खेजड़ी, आम, आंवला तथा नीम आदि वृक्षों की पूजा होती है। पीपल तथा तुलसी को नित्य सींचना अच्छा माना जाता है। बड़ अमावस को वटवृक्ष की पूजा होती है। आंवला ग्यारस को आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पीली कनेर में पार्वती का निवास माना जाता है। आकड़े को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। सफेद आकड़े में विष्णु का निवास माना जाता है। भगवान शिव तथा हनुमानजी पर आकड़े तथा धतूरे के पुष्प चढ़ाये जाते हैं। शिवजी पर भांग तथा बिल्वपत्र के पत्ते भी चढ़ते हैं। कृष्णजी की पूजा तुलसी दल से की जाती है। सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण के समय घर के जलपात्रों तथा खाद्य सामग्री में तुलसी दल तथा दूर्वा डाली जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से ग्रहण के समय धरती तक पहुँचने वाली हानिकारक किरणें खाद्य सामग्री को खराब नहीं कर पातीं। दैनिक पूजन विधान में पीपल एवं तुलसी को जल चढ़ाने की परम्परा इसलिये सम्मिलित की गई ताकि इन्हें लोग अपने घरों एवं मुहल्लों में लगायें। पीपल एक मात्र ऐसा ज्ञात वृक्ष है जो दिन और रात में ऑक्सीजन छोड़ता है। तुलसी के पत्तों मंे औषधीय गुणों के कारण आसपास के वातावरण को भी शुद्ध करने की शक्ति होती है। नीम को नारायण कहा जाता है। अग्नि में हरी वनस्पति अथवा पुष्प जलाना अशुभ समझा जाता है। बृहस्पति की खराब दशा का निवारण करने एवं सरस्वती की कृपा दृष्टि प्राप्त करने के लिये हल्दी की गांठ धारण की जाती है। देवी-देवताओं को समर्पित करके ओरण छोड़े जाते हैं जिनके वृक्ष काटना पाप समझा जाता है। किसी धरती, सामग्री या व्यक्ति को देवता, संत अथवा ईश्वर के लिये अर्पित अथवा सुरक्षित करने को ओल करना कहते हैं। पशु-पक्षियों की पूजा विभिन्न पशु-पक्षियों की पूजा का प्रचलन राजस्थान की सांस्कृतिक प्राचीनता की द्योतक है। नाग पंचमी को नागों की पूजा होती है। बंदरों को हनुमानजी की सेना मानकर पूजा जाता है। गाय में सकल तीर्थों का वास माना जाता है। साण्ड को शिवजी का नंदी मानकर उसके लिये मार्ग छोड़ा जाता है तथाा उसे अवध्य माना जाता है। बकरों के कानों में मुरकी डालकर उन्हें अमर घोषित किया जाता है। चील में देवी का निवास माना जाता है। बहुत सी देवियों के मुख पशु-पक्षियों के हैं। श्रीमाली ब्राह्मणों की गोधा शाखा की कुल देवी का मुंह गर्दभ की आकृति का है। उसे खरानना माता कहते हैं। तांत्रिक मत में बगुला मुखी देवी की पूजा प्रचलित है। राठौड़ों की कुल देवी नागणेची माता का शरीर नाग योनि का है। तेजा, गोगा आदि देवताओं के प्रतीक के रूप में नाग की मूर्ति, चित्र एवं चिह्नों की पूजा होती है। जोधपुर में एक मंदिर उष्ट्रवाहिनी देवी का भी है। कुत्तों को भैंरूजी का वाहन माना जाता है। चिडि़यों, मोरों तथा कबूतरों को दाना चुगाना, कीड़ी नगरा सींचना, गायों, बंदरों तथा कुत्तों को भोजन देना धार्मिक कृत्य माना जाता है। राजस्थान-वासियों में यह विश्वास है कि जो विश्वात्मा सबमें मौजूद है, उसे संतुष्ट करने से ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी। बच्छ बारस के दिन गाय के बछड़ों की पूजा करने का विधान है जो हमारी संस्कृति का विशिष्ट हिस्सा बना हुआ है। अमावस्या के दिन पशु-पालक दूध नहीं बेचते ताकि उस दिन का दूध गाय के बछड़ों एवं घर के बच्चों के लिये उपलब्ध रहे। श्राद्ध पक्ष में कौओं को चुग्गा एवं भोजन अर्पित किया जाता है। संकट निवारण करने तथा विभिन्न ग्रहों के कोप को शांति करने के लिये भी ये उपाय किये जाते हैं। बुध की दशा को अनुकूल बनाने के लिये पशुओं को हरा चारा एवं मोरों को मूंग डाली जाती है। सरस्वती को प्रसन्न करने एवं बृहस्पति की दशा सुधारने के लिये पीले कपड़े एवं हल्दी की गांठ धारण की जाती है। किसी भी प्रकार के संकट को दूर करने के लिये गायों को मीठे चावल, गुड़ एवं चुपड़ी रोटी दी जाती है। शीतला सप्तमी को कुत्तों को रोटी खिलाई जाती है। भैंरूजी एवं शनि की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये काले कुत्तों को तेल में तले हुए पुए एवं पकौड़े खिलाये जाते हैं। राजस्थान के पर्यावरणीय आवास नगरीकरण के साथ पक्के मकानों की आवश्यकता बढ़ती चली गई जिसके कारण मकान का निर्माण बहुत ही महंगा उपक्रम हो गया किंतु ग्राम्य आधारित राजस्थानी संस्कृति में कच्चे मकानों को बनाने के लिये बहुत ही कम संसाधनों की आवश्यकता होती है। दुर्भाग्य से कच्चे मकानों को निर्धनता का पर्याय मान लिया गया है जिसके कारण इनका प्रचलन समाप्त होता जा रहा है। कच्चे मकान न तो भूकम्प में गिरते हैं, न उनके निर्माण, मरम्मत एवं रंग रोगन में अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है। इनमें वातानुकूलन के कृत्रिम उपायों एवं ऊर्जा की खपत की भी आवश्यकता नहीं होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर सहज रूप से उपलब्ध सामग्री से झौंपड़े, झौंपड़ी, झूंपे, गुडालो अथवा पड़वे आदि बनाये जाने की परम्परा है। इनकी निर्माण प्रक्रिया में न तो पर्यावरण को कोई क्षति होती है और न इनके लिये महंगे प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। खेतों एवं जंगलों में उगने वाली वनस्पतियों यथा- घास-फूस, कैर, खींप, मुराली, आक, अरणी, सणिया, रोहिड़ा तथा फोग आदि से इन आवासों की दीवारों एवं छतों का निर्माण होता है। इन आवासों की दीवारों को मजबूत बनाने एवं आंगन को लीपने में पशुओं से प्राप्त गोबर तथा प्राकृतिक रूप से उपलब्ध मिट्टी का उपयोग होता है। पड़वों के निर्माण में मिट्टी से बने केलू, सणिये, रोहिड़ा की लकडि़यां एवं अरणी की टहनियां आदि काम आती हैं। इन आवासों के निर्माण में काम आने वाली सम्पूर्ण सामग्री ताप-रोधी होती है इस कारण इनके भीतर रहने वाले मनुष्य को अधिक गर्मी अथवा अधिक सर्दी नहीं लगती। इस सामग्री से किसी तरह का रेडियोधर्मी विकीरण नहीं होता, इस कारण ये आवास, मानव स्वाथ्य के लिये अत्यंत अनुकूल होते हैं। ऊपर से डोम अथवा शंकु आकार में बना होने तथा चारों तरफ से गोलाकार में बना होने के कारण ये आवास आंधी तूफान तथा वर्षा के प्रहार को भी भलीभांति सहन कर लेते हैं। इनके भीतर प्रकाश एवं वायु के संचरण की भी पर्याप्त व्यवस्था होती है इस कारण सामान्यतः इनमें बिजली के कृत्रिम प्रकाश एवं पंखे की आवश्यकता नहीं होती। इन आवासों का निर्माण प्रायः वर्ष के उस हिस्से में किया जाता है जिस समय न तो कृषि कार्य चल रहे होते हैं तथा न ही वर्षा आदि का आगमन होता है। अतः होली के बाद से लेकर वर्षा के आगमन से पूर्व की अवधि में इनका निर्माण एवं जीर्णोद्धार किया जाता है। जिस भूमि पर इस प्रकार के आवास का निर्माण करना होता है, उस स्थान के केन्द्र में एक व्यक्ति डोरी का सिरा पकड़कर खड़ा हो जाता है तथा दूसरा व्यक्ति उस डोरी के दूसरे सिरे को लेकर चारों ओर घूम जाता है तथ उस पथ को चिह्नित कर लिया जाता है। इस पथ पर लगभग दो फुट की गहराई में खाई खोदकर उसमें दरवाजे की जगह छोड़कर अरणी की टहनियां अथवा रोहड़े की डालियां लगा दी जाती हैं। इन सीधी खड़ी टहनियों पर आकड़े की टहनियों को आड़ा बुना जाता है तथा डोरियों से कस कर बांध दिया जाता है। इस प्रकार झूंपे की चारों तरफ की दीवार बनाई जाती है। जब यह पर्याप्त ऊंचाई तक पहुंच जाती है तो इसे ऊपर से संकरा करना आरम्भ कर देते हैं। इस गोलाकार दीवार के बाहर की तरफ घास से बनी हुई टाटियां बांधनी आरम्भ कर देते हैं। अरणी तथा आक की टहनियों से छज्जा बनाया जाता है तथा उस पर सिणिये बांधे जाते हैं। सिणियों के ऊपर बाजरी के डोके, खींप एवं मुरठे लगाये जाते हैं। झूंपे के ऊपरी भाग में डोकों की गोलाई में अराई बनाई जाती है। झूंपे की दीवारों को मिट्टी एवं गोबर के मिश्रण से लीप दिया जाता है जिसे निंपाई कहते हैं। झूंपे में रोहिड़े या खेजड़ी का खम्भ लगाया जाता है जो झूंपे के केन्द्र में खड़ा रहकर उसकी छत का भार धरती पर वितरित करता है। अतिथियों के लिये झूंपे के बाहर गुडाल, उतारा तथा उताक बनाये जाते हैं। पहाड़ी एवं पथरीले क्षेत्रों में गोबर एवं मिट्टी के आयताकार कमरे बनाये जाते हैं जिन्हें ढालिया कहते हैं। झौंपड़े के भीतर रसोई वाला स्थान सांझाण कहलाता है। मिट्टी के बर्तन रखने के लिये दुखाण बनाया जाता है। कपड़े आदि रखने के लिये ओरा एवं चारपाइयां रखने के लिये कुड बनाया जाता है। बकरियां बांधने के लिये निश्चित स्थान को मडिया कहते हैं। इन आवासों के चारों ओर आहता बनाकर उसमें अरणी, आक, खेजड़ी अथवा रोहिड़ा की टहनियों का दरवाजा लगा दिया जाता है। राजस्थान में जल बचाने की संस्कृति राजस्थान की जीवन शैली में जल की बचत एक अनिवार्य तत्त्व है। भोजन करते समय दायां हाथ ही काम में लेने की परम्परा रही है ताकि बांया हाथ केवल पानी के लोटे के लिये काम में लिया जाये और उसे झूठे हाथ से न छूना पड़े। हर व्यक्ति को अलग गिलास में जल न देकर बाल्टी में लोटा डालकर या रामझारे से जल पिलाया जाता था। बरतन को मुंह से लगाकर पानी नहीं पिया जाता था अपितु ऊपर से पानी पिया जाता था ताकि बरतन को बार-बार न मांजना पड़े। इससे पानी की बचत हेाती है। बरतनों को सूखी एवं साफ रेत या राख से मांजने के बाद कपड़े से पौंछकर साफ करने की परम्परा थी। इससे न केवल पानी अपितु पर्यावरण के लिये हानिकारक साबुन एवं क्लीनिंग पॉउडर की भी बचत होती थी। घर में रोज पानी से धुलाई न करके गीले कपड़े से पौंछा लगाने पर जोर दिया जाता था। मटकियों के नीचे बर्तन रखकर, मटकी में से टपकने वाले जल को एकत्रित किया जाता था। इस जल को बर्तन साफ करने, घर में पौंछा लगाने तथा पेड़-पौधे सींचने में काम लिया जाता था। पानी को व्यर्थ बहने से रोकने के लिये हर संभव उपाय किये जाते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं। पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर प्राचीन काल से यह परम्परा चली आ रही है कि गांव की सीमा से संलग्न कुछ क्षेत्र ओरण के रूप में छोड़ा जाये। राजस्थान मंे वह परम्परा आज भी चल रही है तथा हर गांव के बाहर ओरण के लिये पर्याप्त क्षेत्र खाली छोड़ा गया है। हिन्दू पुराणों के अनुसार ग्राम्य वन अथवा ओरण किसी स्थानीय वीर अथवा लोक देवता के नाम पर समर्पित होता है। ओरण के भीतर उस वीर अथवा लोक देवता का मंदिर बना होता है। ओरण की रक्षा के लिये समस्त ग्रामवासी एक निश्चित एवं कठिन आचार संहिता का पालन करते हैं। ओरण में रहने वाले वन्य जीवों के साथ किसी तरह की छेड़-छाड़ नहीं की जाती। उन्हें पकड़ा अथवा उनका शिकार नहीं किया जाता। ओरण से हरा पेड़ नहीं काटा जाता। केवल सूखी हुई लकड़ी एकत्रित की जा सकती है। किसी भी स्थानीय व्यक्ति का पशु, ओरण में स्वच्छंद रूप से घूम एवं चर सकता है। यदि कोई व्यक्ति ओरण के नियम तोड़ता है तो उसे पंचायत में जुर्माना भरना होता है। बड़ा अपराध करने वाले व्यक्ति का पूरे गांव द्वारा सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है। गायों के चरने के लिये छोड़ा गया स्थान गोचर कहलाता है। राजस्थान में परम्परागत रूप से हर गांव के निकट गोचर छोड़ा जाता था। इस भूमि पर न तो मकान बनाये जाते थे और न खेती की जाती थी। आज भी यह परम्परा अस्तित्त्व में है। राजस्थान के गांवों के बाहर वर्तमान में एक हैक्टेयर से लेकर 10 हजार हैक्टैयर तक के गोचर उपलब्ध हैं। इनका रख-रखाव ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है। इन भूमियों में सेवण तथा धामण जैसी घासें स्वाभाविक रूप से उगती और पनपती हैं जो पशुओं के लिये उत्तम आहार का काम करती हैं। छोटे गोचरों में तथा मरुस्थलीय गोचरों में वर्षा काल को छोड़कर प्रायः घास का अभाव रहता है तथा झाडि़यों की संख्या कम होने से भी ये पशु चारण की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करते हैं। फिर भी राजस्थान के गोचरों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। ये भी पर्यावरण के मजबूत प्रहरी है। यदि राजस्थान में गोचर छोड़ने की परम्परा नहीं होती तो पर्यावरण को निःसंदेह बहुत बड़ी क्षति पहुंची होती। पारिस्थितिकी तंत्र के पहरेदार वर्षा की कमी, मरुस्थलीय प्रसार एवं तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा पालतू पशुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण राज्य का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक अवस्था में है। राज्य में बड़ी संख्या में उपस्थित ओरणों और गोचरों ने राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र को सफलतापूर्वक थाम रखा है। इस दृष्टि से ओरण एवं गोचर, पर्यावरण की रक्षा के लिये सबसे मजबूत पहरेदार सिद्ध हुए हैं। ओरण और गोचर क्षेत्र की वनस्पतियां पर्यावरण को ऑक्सीजन, कार्बनिक अवशिष्ट तथा पशु-पक्षियों को आश्रय एवं भोजन देकर और मृदा अपरदन को रोककर पास्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाती हैं। ग्रामीणों की वानस्पातिक आवश्यकताओं का अक्षय भण्डार राजस्थान के ओरणों में पेड़-पौघों की 680 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से अधिकांश वनस्पतियां मनुष्य तथा पशुओं के लिये उपयोगी हैं। ओरण एवं गोचरों से स्थानीय लोगों को जलाऊ लकड़ी, पशु चारा, गोंद, कूमट के बीज, खेजड़ी की सांगरियां, गूगल, शहद, विभिन्न प्रकार की औषधियां तथा विविध प्रकार के वानस्पातिक उत्पाद प्राप्त होते हैं। इसलिये इन्हें स्थानीय लोगों के लिये प्राकृतिक सम्पदा का अक्षय गोदाम कहा जा सकता है। ओरण एवं गोचर, ग्रामीण क्षेत्र में उपयोग में ली जाने वाली खाट बुनने के लिये मूंझ, झौंपड़ी बनाने के लिये लकडि़यां, बाड़े की चार दीवारी बनाने के लिये कांटों आदि की आपूर्ति भी करते हैं। ओरणों में पनपने वाला फोग तो ग्रामीण जीवन की धुरी कहा जा सकता है। ओरणों में खड़े देशी बबूल एवं विदेशी बबूल की झाडि़यां जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी एवं पशु चारा तक उपलब्ध कराते हैं। गहरी जड़ों वाली बूई नामक झाड़ी, ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ू की आवश्यकता पूरी करती है। अंग्रेजी बबूल से कच्चा कोयला तैयार किया जाता है। इसकी फलियां पशु चारे के रूप में काम आती हैं। अरण्ड के बीजों से तेल निकाला जाता है। अरणा या अरणी की लकडि़यां झौंपड़े बनाने में काम आती हैं। आक के फलों निकलने वाला आंकला अर्थात् रुई से रस्सियां बनाकर उनसे पीढ़े तथा चारपाइयां बुनी जाती हैं। इससे तकिये और गद्दे में भी भरे जाते हैं। इन्द्रायण (तूम्बा) से पशुओं के लिये अजीर्ण तथा आफरे की दवा बनती है। जब ऊँट चरना बंद कर देता है तो उसे नमक के साथ तूम्बा उबाल कर देते हैं। ऊँटगण को ऊँट चाव से खाता है। यह बल एवं वीर्य वर्धक है। रोगी इनके गोटों को दूध में डालकर पीता है। गोटे फूलकर दूध को गाढ़ा कर देते हैं। कटेरी (रींगणी) की बेल कांटों वाली होती है जिस पर पीले फल लगते हैं। गुलाबी फूलों पर तितलियां मण्डराती हैं। कुरण्ड अर्थात् चामघस को पीस कर खाते हैं। । यह बलवर्धक होती है। इसे इसके बारीक काले बीजों को भी खाये जाते हैं। खेजड़ी की पत्तियां पशु चारे के रूप में, लकड़ी ईंधन के रूप में, फलियां सब्जी के रूप में तथा सूखी फलियां फल के रूप मंे काम आती हैं। इसकी उपस्थिति से खेत में नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में अजोटोबेक्टर नामक बैक्टीरिया रहता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करता है। गोखरू अर्थात् भाँखड़ा उकाली काढ़ा बनाने के काम आता है। इसे ऊँट चाव से खाते हैं। चिड़धणियो नामक वनस्पति ओरी माता में उकाली देने के काम आता है। तुलसी के पत्तों की उकाली लेने से बुखार, मलेरिया, खांसी, जुकाम आदि में लाभ होता है। इसे हर घर के आंगन में लगाया जाता है तथा संध्या काल में इसके नीचे दीप जलाया जाता है। नागरमोथा सुगन्धित पदार्थों में मिलाने के काम आता है और कपूर, कचरी तथा चंदन के साथ हवन में काम लिया जाता है। नीम की कोंपलें रक्तशोधक होने के कारण कच्ची खाई जाती हैं। इसकी छाल को पानी में पीसकर घावों पर लगाया जाता है। इसका तेल पशुओं के घावों पर लगाया जाता है। इसकी दांतुन भी स्वास्थ्य वर्धक मानी जाती हैं। बवासीर की बीमारी में सूखी हुई निबौलियों का पाउडर शहद में मिलाकर खाते हैं। पींप वर्षाकाल में फोग के साथ पैदा होता है। इसकी सब्जी बनती है। फूंबी को खूंबी तथा मशरूम भी कहते हैं जो हृदय रोग में तुरंत प्रभाव डालने वाली दवा है। इसकी सब्जी भी बनती है। इसकी कुछ प्रजातियां जहरीली होती हैं। फोग भीषण गर्मी और लू मंे बालू के धोरों पर उगता है। इसकी जड़ें धरती में फैलकर गुच्छा बनाती हैं तथा पत्तियां तुरंत झड़ जाती हैं। उसके बाद तना पत्तियों की तरह कार्य करता है। गणगौर पूजन में सुहागनें फोग के फूल और डालियों से गवर और ईसरजी की पूजा करती हैं। किसान हल जोतने के समय इसकी डालियों और फूलों से सुगन मनाते हैं। इसकी ऊँचाई एक-दो मीटर तक होती है। रेगिस्तानी पशु इसे चाव से खाते हैं। यात्री इसे चूसकर गला तर करते हैं। इसकी शाखायें मजबूत होती हैं, उनसे घरों में बाड़ा बनाते हैं। इसकी लकड़ी के कोयले लुहार एवं सुनार घड़ाई के काम में लेते हैं क्योंकि उनमें अधिक ताप उत्पन्न होता है। इसकी लकड़ी से ऊँट की नाक बींधने की कील बनती है। इसकी पत्तियों को सुखाकर फोगलो बनाया जाता है जिससे रायता बनता है। यह रायता गर्मी में अमृत्तुल्य माना गया है। बूर इलायची जैसी तेज सुगंध वाला होता है। इससे दवा बनती है। पेट की बीमारी दूर होती है। खेतों में पशु चरते हैं। बच्चों को ओरी निकलने पर भम्फीड़ की सूखी फली उबाल कर पिलाते हैं। भाँगरो चटपटा और रूखा होता है। यह पीलिया तथा नेत्ररोगों के उपचार में काम आता है। मरवा के पत्ते और पुष्प तुलसी के पत्तों की तरह सुगन्धित होते हैं। इससे बिच्छू का जहर उतारने तथा वात, पित्त, कफ की औषधि बनती है। रतनजोत अथवा साटा आंख की दवा में काम आता है। इसके सूखे पत्तों का चूरा सब्जी का रंग लाल करने में काम आता है जिसे खाने से बहुत नुक्सान होता है। इसके बीजों का तेल बायो डीजल बनाने में प्रयुक्त हो रहा है। रोहिड़ा की लकड़ी कलात्मक फर्नीचर बनाने के लिये अच्छी होती है। लोलरू दर्द निवारक औषधि है। इसे दर्द वाले स्थान पर घोटकर लगाते हैं। कैर के कच्चे फल हरे रंग के होते हैं। ये पाचक और मीठे होते हैं। कच्चे कैर हरे रंग के होते हैं जिनसे सब्जी एवं अचार बनता है। पके हुए कैर ढीलू कहलाते हैं। पके हुए फल गुलाबी रंग के होते हैं जिन्हें निर्धन ग्रामीण बच्चे खाते हैं। शंखपुष्पी अथवा दूधेली दस्तावर, मेधा एवं बल बढ़ाने वाली, मन के रोगों को दूर करने वाली तथा कड़वी होती है। इसके पत्तों में दूध निकलता है। शिवलिंगी को ऊँट खाते हैं। इस पर शक्तिवर्धक फल लगते हैं। सुणिया या चुग कड़ी शाखाओं वाली झाड़ी है। इसके रेशे रस्सी बंटने के काम आते हैं। इसकी लकड़ी ऊँटों की नकेल बनाने के लिये अच्छी होती है। रेगिस्तान में वर्षा काल में भुट्ट, मुट्ट, भूरट, लाँपड़ी, वोभरियो, बेकरियो, घण्ठील, सेवण, बूर, डचाभ, मण्डूसी आदि घासें उत्पन्न होती हैं। धामण, झींटियो घास तथा बरू के बूटे भी कई स्थानों पर पाये जाते हैं। शरद ऋतु मंे ल्हारड़ो, लहाठियो तथा हिरण चब्बो आदि घासें होती हैं। दूब की सैंकड़ों किस्में मिलती हैं। इसे लॉन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। दूब के रस को सूंघने से नक्सीर रुकती है। सेवण अत्यधिक प्राटीन युक्त घास है जो रेतीले टीलों पर उगती है। जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर तथा नागौर आदि जिलों में इसके चारागाह विकसित किये गये हैं। धामण भी रेगिस्तानी घास है। दुधारू पशुओं की मुक्त चराई के लिये इसके चारागाह विकसित किये गये हैं। करड़ तथा अंजन घासे भी पशुओं के लिये उत्तम होती है। पर्यावरण की रक्षक राजस्थान की विशिष्ट जातियाँ जातियों की विविधता की दृष्टि से राजस्थान समृद्ध प्रदेश है। जातियों का निर्माण, उनकी सामाजिक प्रथाएं तथा उनके आर्थिक क्रिया कलाप इतिहास में गहराई तक जड़ें जमाये हुए हैं। रेबारी, गाडि़या लुहार, कालबेलिया, कठपुतली नट, लखारा तथा भाट आदि जातियों की जीवन शैली बहुत कुछ एक जैसी होते हुए भी काफी अंतर लिये हुए है। इन जातियों के रीति-रिवाजों में भिन्नता है तथा उनके खान-पान, वेश-भूषा एवं लोकाचार आदि में भी विविधता पायी जाती है। इनमें से बहुत सी जातियों ने कला एवं संस्कृति को अपने जीवन यापन के साधन के रूप में अपनाया। इस कारण राजस्थान में लोकनृत्य, लोक संगीत, तथा लोक कलाओं की जितनी विविधता देखने को मिलती है, उतनी विविधता बहुत कम प्रदेशों में देखने को मिलती है। चारणों, भाटों एवं रावों ने अपनी बहियों के माध्यम से प्रदेश के इतिहास और रीति रिवाजों को लेखनीबद्ध करके उसे सदियों तक जीवित रखा है। चारणों एवं भाटों ने डिंगल भाषा में तथा रावों ने पिंगल भाषा में काव्य की रचना करके प्रदेश के शासक एवं जन सामान्य वर्ग की तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति की। लखारा, सुनार, मणिहार आदि बहुत सी जातियों ने आभूषणों के निर्माण एवं उनके व्यवसाय का विकास किया। आदिवासी जातियों में भील, मीणा, कथोड़ी, सहरिया आदि प्रमुख हैं। इनकी जीवन शैली, शेष समाज से काफी अंतर लिये हुए है। ये समस्त जातियाँ पर्यावरण के प्रति अत्यंत जागरूक हैं क्योंकि इनमें प्राकृतिक शक्तियों के प्रति आदर भाव है तथा बहुत सीमा तक वे प्रकृति के पुजारी हैं। राजस्थान एवं गुजरात में पाई जाने वाली रेबारी नामक जाति ने पशुपालन के क्षेत्र में अद्भुत सेवाएं दी हैं। यदि यह जाति इस क्षेत्र में उपस्थित नहीं होती तो राजस्थान में भेड़ें एवं ऊँट संभवतः इतनी बड़ी संख्या में देखने को नहीं मिलते। गेरुए वस्त्रधारी, यायावर जिंदगी जीने वाले, कांवड़नुमा झोलों में सांप, बिच्छू, गोहरे, नेवले आदि विषैले जीव-जंतुओं को रखे हुए, लोगों का भरपूर मनोरंजन करने की कला में निष्णात कालबेलिये, राजस्थान में अलग पहचान रखते हैं। ये नाथ मतावलम्बी एवं आदिनाथ शिव के उपासक होते हैं। चूंकि ‘शिव’ को ‘नाग’ प्रिय होते हैं, इसलिये कालबेलिये भी सांप की आराधना करते हैं। जब कालबेलिये किसी सांप को पकड़ते हैं, तो उसी समय सांप से एक मांत्रिक वायदा करते हैं कि इतने वर्षों बाद उसे मुक्त कर दिया जायेगा। ये लोग ‘सांप’ को दिये गये वचन का अनिवार्यतः पालन करते हैं। संभवतः इसीलिये इन्हें कालबेलिये (काल अर्थात् सांप, बेली अर्थात् मित्र) ‘स


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