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     03.06.2020
     राजस्थान का प्राचीन इतिहास

    जनपदकाल

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के तीन सौ वर्ष पूर्व तक का समय जनपद काल कहलाता है। यहाँ से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के काल में और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, राजस्थान में प्राचीन जनपदों के नाम लिखिये।)

    मौर्यकाल

    मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गयी। कोटा जिले के कणसवा गाँव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहाँ मौर्य वंश के राजा ‘धवल’ का राज्य था। ई. 733 के लगभग जब बप्पा रावल ने चित्तौड़ विजय किया तब वहाँ मौर्य राजा ‘मान’ का राज्य था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास पूठोली गाँव में मानसरोवर नामक तालाब के किनारे राजा मान का ई. 713 का एक शिलालेख मिला है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, उन दो साक्ष्यों का उल्लेख कीजिये जिनसे पता चलता है कि मौर्यों का राजस्थान से भी सम्बन्ध था।) मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    विदेशी जातियों के आक्रमण

    मौर्यों का पतन हो जाने के बाद राजस्थान छोटे-छोटे गणों में बंट गया। इस कारण भारत भूमि पर विदेशी जातियों के आक्रमण बढ़ गये। यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई. पू. 150 में मध्यमिका नगरी को अपने अधिकार में लेकर अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई. पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये।

    सौराष्ट्र से प्राप्त उषवदात के लेख के अनुसार शकों का राजा पुष्कर होता हुआ मथुरा तक पहुँचा। ये लोग ई. पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल 95 ई. से 127 ई. के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार 83 ई. से 119 ई. तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। 150 ई. के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आस पास था।

    विदेशी जातियों का पतन

    ई. 130 से 150 के मध्य शक शासक रुद्रदामन तथा यौधेयों के मध्य घनघोर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में यौधेय पराजित हो गये। ई. 150 के लगभग नागों की भारशिव शाखा ने अपनी शक्ति बढ़ानी आरंभ की तथा विदेशी शासकों को भारत से बाहर निकालने का काम आरंभ किया। इन नागों ने यौधेय, मालव, अर्जुनायन, वाकटाक, कुणिंद, मघ आदि जातियों की सहायता से पंजाब, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश को कुषाणों से मुक्त करवा लिया। नागों ने कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजयों के उपलक्ष्य में वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। वह स्थान आज भी दशाश्वमेध घाट कहलाता है।

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर ‘मालवानाम् जयः’ अंकित है।

    शक, कुषाण और हूण आदि जातियाँ केवल सामरिक उद्देश्य एवं सत्ता के विस्तार के लिये भारत में आयीं थीं। उन्होंने बौद्ध धर्म को चोट तो पहुचांई किंतु उनके अपने पास ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं था जिसके प्रसार के लिये वे किसी अन्य तरह का प्रयास करतीं। इसलिये जैसे ही उनकी सत्ता समाप्त हुई, वे भारतीय संस्कृति में रच बस गये और वे भारत की मूल राष्ट्रीय धारा में पूरी तरह घुल मिल गये।

    इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष हैं। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गये। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी सत्ता गणतंत्रात्मक बनाये रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्व रखते थे।

    गुप्तकाल

    भारतीय इतिहास में 320 ईस्वी से 495 ईस्वी तक का काल गुप्तकाल के नाम से जाना जाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्व हमेशा के लिये नष्ट हो गया। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जालोर जिले के भीनमाल तथा अन्य स्थानों पर देखे जा सकते हैं। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गये।

    हूणों का आक्रमण

    हूणों के आक्रमण गुप्त काल में आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने सभी गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्यों को छिन्न भिन्न कर दिया तथा उस काल तक विकसित हुए सभ्यता के सभी केंद्र नष्ट कर दिये। इनमें वैराट, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। (ये नाम बाद के हैं, तब इन स्थानों के नाम कुछ और रहे होंगे।) मालवा के राजा यशोवर्मन (अथवा यशोधर्मन) ने 532 ई. में हूणों को परास्त कर राजस्थान में शांति स्थापित की किंतु उसके मरते ही राजस्थान में पुनः अशांति हो गयी।

    हर्षवर्धन

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। पुष्यभूति वंश को वर्धन वंश भी कहते हैं। हर्ष के बारे में हमें दो गं्रथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। चीनी लेखक मा-त्वान-लिन ने भी हर्ष की विजयों का वर्णन किया है। नौसारी दानपत्र, खेड़ा से प्राप्त दद्द के दानपत्र में भी हर्ष के वलभी युद्ध का उल्लेख है। कल्हण की राजतरंगिणी हर्ष के कश्मीर का राजा होने की पुष्टि करती है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, हर्ष के समय के इतिहास के प्रमुख स्रोतों का उल्लेख कीजिये।)

    चीनी लेखकों ने हर्ष को शीलादित्य कहकर पुकारा है। ई. 606 में वह थानेश्वर का राजा हुआ किंतु कुछ ही समय बाद अपने बहनोई ग्रहवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज भी उसके अधीन हो गया। उसने कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनाया तथा सम्पूर्ण भारत में एकछत्र शासन स्थापित करने के उद्देश्य से विशाल सेना का निर्माण किया। हर्षचरित के अनुसार सेनापति सिंहनाद ने हर्ष को सलाह दी कि वह अन्य राजाओं का दमन करे। ह्वेनसांग ने हर्ष की दिग्विजय यात्रा का विस्तार से उल्लेख किया है। उसके अनुसार हर्ष ने गद्दी पर बैठने के बाद 6 वर्ष तक युद्ध किये तथा उसके बाद 30 साल तक निर्भय होकर शासन किया किंतु यह वर्णन सही नहीं है क्योंकि कई साक्ष्य बताते हैं कि उसने 612 ई. के पश्चात् भी अनेक युद्ध किये।

    चीनी लेखक मा-त्वान-लिन लिखता है कि उसके सैनिकों ने 618 से 627 ई. के बीच अपने कवच शरीर पर से नहीं उतारे। ई. 620 में हर्ष ने दक्षिण भारत पर अधिकार करने का प्रयास किया किंतु चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने उसे नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया। हर्षचरित के अनुसार हर्षदेव ने 643 ई. में कांगोद पर आक्रमण किया। 708 ई. के नौसारी दानपत्र से ज्ञात होता है कि हर्षदेव ने वल्लभी नरेश धु्रवसेन द्वितीय को पराजित किया। यह युद्ध 629 ई. में हुआ। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1999- इतिहास, हर्ष के सैनिक अभियानों के तिथिक्रम की समीक्षा कीजिये।)

    जब हर्ष ने दक्षिणी भारत पर आक्रमण किया तो चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय ने हर्ष का मार्ग रोका। इस अभियान का नेतृत्व स्वयं हर्ष ने किया। कुछ विद्वान इस युद्ध का समय 612 ई. मानते हैं तो कुछ 630 से 640 ई. के बीच। 630 ई. का लोनेरा का अभिलेख पुलकेशी की सफलताओं का वर्णन करता है किंतु इसमें हर्ष की पराजय का उल्लेख नहीं है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि यह संघर्ष 630 ई. के पश्चात हुआ होगा। पुलकेशिन ने हर्ष को परास्त करके परमेश्वर की उपाधि धारण की तथा उसे नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया। 643 ई. में हर्ष ने पुनः पुलकेशिन के राज्य पर आक्रमण किया तथा उससे कांगोद छीन कर अपनी पूर्व पराजय का बदला लिया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, हर्ष पुलकेशिन संघर्ष पर एक टिप्पणी लिखिये।)

    सी-यू-की का कथन है कि शीलादित्य (हर्षवर्धन) ने पूर्व से लेकर पश्चिम तक के समस्त राजाओं को जीत लिया तथा वह दक्षिण की ओर आगे बढ़ा। राजतरंगिणी का कथन है कि कश्मीर कुछ समय तक हर्ष के अधीन रहा। चालुक्य अभिलेख उसे ‘सकलोत्तरापथनाथ’ कहते हैं। इनसे अनुमान होता है कि उसका राज्य नेपाल से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक फैल गया। थानेश्वर, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, सिंध तथा उत्तरप्रदेश भी उसके अधीन थे।

    हर्ष ने वल्लभी के शासक धु्रवसेन द्वितीय को परास्त किया तथा संधि करके उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय ने गुर्जर नरेश दद्द की सहायता से हर्ष को नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया इस कारण दक्षिण भारत में वह अपना शासन नहीं फैला सका किंतु हर्ष ने कांगोद पर अधिकार कर लिया था। हर्ष चरित के अनुसार सम्पूर्ण उत्तर भारत हर्ष के अधीन था।

    पूर्व में मगध, कामरूप (असम तथा बंगाल) भी हर्ष के अधीन हो गये थे। कुछ विद्वानों ने हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और उड़ीसा को उसके राज्य में माना है जिन्हें ह्वेनसांग ने पंचभारत कहकर पुकारा है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हर्ष का राज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में आसाम तक फैला हुआ था। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1996, हर्ष की राज्य सीमा निर्धारित कीजिये। दक्षिण भारत में उसके समसामयिक शासक कौन थे?)

    बांसखेड़ा से प्राप्त ताम्रपत्र एवं नालंदा तथा सोनीपत की राजमुद्राओं पर हर्ष को परम माहेश्वर कहा गया है। वह हर पाँच वर्ष में प्रयाग में धर्म सम्मेलन किया करता था जिसमें वह प्रथम दिन बुद्ध की, दूसरे दिन सूर्य की और तीसरे दिन भगवान शिव की पूजा किया करता था। वह सभी धर्मावलंबियों को दान देता था किंतु बौद्ध भिक्षुओं को अधिक मात्रा में धन प्रदान करता था। उसने ह्वेनसांग के आगमन पर महायान धर्म का विशेष सम्मेलन बुलाया जिसमें 18 देशों के राजा, महायान व हीनयान धर्म के 3000 भिक्षु, 300 ब्राह्मण, जैनाचार्य तथा नालंदा विहार के 1000 भिक्षुओं को बुलाया। इस सम्मेलन में भगवान बुद्ध की मूर्ति को सबसे आगे रखा गया तथा उसके पीछे भास्कर वर्मा ब्रह्मा की वेशभूषा में तथा हर्षवर्धन शक्र (इंद्र)की वेशभूषा बनाकर चले। हर्ष ने उड़ीसा में महायान धर्म के प्रचार के लिये 4 धर्म प्रचारक भी भेजे। इन तथ्यों से ज्ञात होता है कि वह शैव होते हुए भी बौद्ध धर्म का बड़ा आदर करता था। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1994- इतिहास अभिलेखीय साक्ष्य के अनुसार हर्ष की धार्मिक आस्था क्या थी? वही जो उसके पूर्वजों की थी अथवा उससे भिन्न?)

    हर्ष ने शैव धर्म तथा बौद्ध धर्म के साथ-साथ संस्कृत साहित्य के उत्कर्ष के लिये भी काम किया। उसके दरबार में रहने वाले राजकवि बाणभट्ट ने कादम्बरी तथा हर्ष चरित की रचना की। हर्ष के दरबार में रहने वाले मतंग नामक कवि ने सूर्यशतक की रचना की। स्वयं हर्ष ने संस्कृत में तीन नाटक नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। बाणभट्ट लिखता है कि हर्ष की संस्कृत भाषा की कविताओं में अमृत की वर्षा होती थी। हर्ष की यह धार्मिक नीति तथा संस्कृत भाषा के संरक्षण की नीति उससे पूर्व मौर्य सम्राट अशोक ने भी अपनायी थी। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, हर्ष का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था। उसके साथ ही उसने संस्कृत साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। पूर्व इतिहास से सम्बन्धित इस प्रकार के किसी शासक का उदाहरण दीजिये।)

    हर्ष न केवल महान विजेता तथा साम्राज्य निर्माता था अपितु वह एक कुशल शासक भी था। उसका शासन बड़ा ही उदार, दयालु तथा प्रजाहितकारी था। उसने बहुत हल्के तथा कम संख्या में कर लगाये जिसे देने में प्रजा को कष्ट न हो। देश में शांति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिये उसने कठोर दण्ड विधान बनाया। इस कारण अपराधों की संख्या कम हो गयी। हर्ष स्वयं अपने राज्य में घूम-घूम कर अपनी प्रजा के हाल जानता रहता था। प्रजा की कठिनाइयां ज्ञात होने पर वह उन कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास करता था। वह अपने कर्मचारियों पर निर्भर न रहकर राज्यकार्य स्वयं ही करने को प्राथमिकता देता था। वह धर्मनिष्ठ, विद्यानुरागी एवं विद्वानों का आश्रयदाता था।

    हर्ष ने तिब्बत, चीन तथा मध्य एशिया के साथ सांस्कृतिक सम्पर्क स्थापित किये तथा चीन में अपने दूत भिजवाये। वह सूर्य एवं शिव का उपासक था फिर भी उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये प्रयास किया। प्रयाग की पंचवर्षीय धर्मसभा में वह सभी धर्मावलंबियों को दान देता था। उसके लिये कहा जाता है कि उसमें समुद्रगुप्त था अशोक दोनों ही महान शासकों के गुण थे। उसके बाद भारत वर्ष में इतना महान हिंदू शासक नहीं हुआ जिसका इतने बड़े क्षेत्र पर अधिकार हो। इस कारण उसे भारत का अंतिम महान शासक माना जाता है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1996-इतिहास, हर्षवर्धन को प्राचीन भारत का अंतिम महान शासक क्यों माना जाता है?)

    हर्ष के काल में राजपूताना चार भागों में विभक्त था- 1. गुर्जर, 2. बघारी, 3. बैराठ तथा 4. मथुरा। बयालीस वर्ष तक सफलता पूर्वक शासन करने के बाद 648 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। उसके बाद देश में पुनः अव्यवस्था फैल गयी।

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