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  • संत-साहित्य में ईश्वरीय विषम व्यवहार का कारण

     03.06.2020
    संत-साहित्य में ईश्वरीय विषम व्यवहार का कारण

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    ईश्वर में ना-ना प्रकार के गुण हैं, यदि वे गुण नहीं होते तो इस सृष्टि की रचना संभव नहीं हुई होती। ईश्वर में सृष्टि को उत्पन्न करने, पालन करने तथा उसका संहार करने की जो क्षमता है, उसे भी ईश्वर का गुण समझना चाहिए। इस बात में किसी को शंका नहीं होनी चाहिए कि ईश्वर नाम, रूप, उपाधियों के साथ-साथ गुणों को भी धारण करते हैं। नाम, रूप उपाधियां भी ईश्वर के गुण ही हैं। धरती में गुरुत्वाकर्षण का जो गुण है, वह ईश्वर के महान गुणों में से एक है। यह आकर्षण का गुण है जिसके कारण प्रत्येक वस्तु धरती की ओर आकर्षित होती है। ईश्वर भी सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जिस प्रकार हम ना-ना उपाय करके वस्तुओं को धरती की तरफ खिंचने से रोकते हैं, उसी प्रकार हमारा अहंकार ना-ना उपाय करके हमें ईश्वर की तरफ खिंचने से रोकता है। जिस प्रकार धरती उन वस्तुओं को कोई नुक्सान पहुंचाए बिना, धैर्यपूर्वक गुरुत्व के गुण को धारण किए रहती है, उसी प्रकार ईश्वर भी हमें चोट पहुंचाए बिना, आकर्षण के गुण को धारण किए रहते हैं। अंततः ईश्वरीय आकर्षण जीतता है और प्रत्येक जीव को एक न एक दिन ईश्वर में लीन होना ही पड़ता है। ईश्वरीय आकर्षण, जीव एवं ब्रह्म के बीच का द्वंद्व नहीं है, ईश्वरीय कृपा है।

    ईश्वर के बड़े गुणों में से उनका एक गुण क्षमा करना भी है। यदि वे क्षमा का गुण धारण नहीं करें तो आकर्षण के गुण का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। मनुष्य इस जगत में मनसा, वाचा तथा कर्मणा किसी न किसी प्रकार से हर क्षण अपराध करता है। यदि ईश्वर हमारे अपराधों को क्षमा न करें तो यह सृष्टि नहीं चल सकेगी और यह सारा संसार एक यातनागृह में बदल जाएगा। इसीलिए संतों ने ईश्वर के गुणों का निरूपण करते हुए बार-बार कहा है कि ईश्वर कारण रहित दयालु है। अर्थात् उसकी दया, बिना किसी कारण के हैं। संसार का सामान्य नियम लेन-देन पर आधारित है किंतु ईश्वर लेन-देन नहीं करते। जब कारण हट जाता है तो मात्रा भी हट जाती है। अर्थात् किस व्यक्ति को कितनी क्षमा मिलती है, या उस पर कितनी दया होती है, यह हर मामले में अलग-अलग हो सकती है। ईश्वर के इस गुण के कारण मनुष्य को संसार में कभी-कभी अव्यवस्था दिखाई देने लगती है और हम ईश्वर पर विषम व्यवहार करने का आक्षेप लगाने लगते हैं।

    गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड में एक पद लिखा है जिसमें ईश्वर द्वारा किए जाने विषम व्यवहार की ओर संकेत किया गया है-

    आंधरो अधम जड़ जाजरो जराँ जवनु

    सूकरकें सावक ढकाँ ढकेल्यो मगमें।

    गिरो हिएँ हहरि 'हराम हो, हराम हन्यो'

    हाय! हाय! करत परीगो कालफगमें।

    तुलसी बिसोक ह्वै त्रिलोकपति लोक गयो

    नामकें प्रताप, बात बिदित है जगमें।

    सोई रामनामु जो सनेहसों जपत जनु

    ताकी महिमा क्यों कही है जाति अगमें।।


    कहने का आशय यह कि एक सूअर के बच्चे ने किसी अंधे, अधम, मूर्ख और बुढ़ापे से जर्जर यवन को राह में धक्का दे दिया। इससे वह गिर गया और हृदय में भयभीत होकर 'हराम ने मार डाला' कहते हुए हाय-हाय करने लगा और काल के फंदे में फंस गया। चूंकि 'हराम' बोलते हुए 'राम' नाम का जाप हो गया, इसलिए वह वैकुण्ठ धाम में प्रवेश पा गया।

    किसी अनाम कवि ने भगवान के इसी विषम व्यवहार को लक्ष्य करके कहा है-

    'जाट जुलाह जुरे दरजी, मरजी में रहै रैदास चमारौ,

    ऐते बड़े करुणा निधि को इन पाजिन ने, दरबार बिगारौ।'


    कहने का आशय यह कि जिस ईश्वर को प्राप्त करने के लिए बड़े-बड़े योगी, मुनि, पण्डित और साधक जन्म-जन्म से प्रयास कर रहे हैं, उनका तो कुछ पता ही नहीं है और धन्ना जाट, कबीर जुलाहा तथा रैदास जैसे अनाधिकारियों ने करुणानिधि के दरबार में प्रवेश पाकर ईश्वरीय दरबार की शोभा बिगाड़ दी है।

    ब्रज भाषा के किसी अनाम कवि ने भगवान के इस विषम व्यवहार पर चुटकी लेते हुए कहा है-

    ब्रजरज दुर्लभ देवन कू।

    कछु जाटन कू कछु मेवन कू।


    कवि कहता है कि ब्रजभूमि की जिस धूलि के लिए देवगण तरसते हैं, ब्रज की वही धूलि, भगवान ने जाटों और मेवों को रहने के लिए दे दी है।

    भक्त शिरोमणि सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण पर गोपियों के माध्यम से चुटकी लेते हुए लिखा है-

    'घर घर माखन चोरत डोलत, तिनके सखा तुम ऊधौ,

    सूर परेखो काकौ कीजे बाप कियो जिन दूजौ।'


    कहने का आशय यह कि उस श्रीकृष्ण का कैसे विश्वास करें जिसे कृपा तो वसुदेव पर करनी थी और कर दी नंद बाबा पर।

    शिव पुराण में एक कथा आती है जिसमें एक चोर, शिवालय का घण्टा चुराने की नीयत से भगवान भोलेनाथ की पिण्डी पर पैर रखकर खड़ा हो गया, भोलेनाथ प्रसन्न होकर प्रकट हो गए। चोर ने भगवान की प्रसन्नता का कारण पूछा तो भोलेनाथ ने बताया कि लोग तो मुझ पर पुष्प, फल एवं दूध ही चढ़ाते हैं, तू तो पूरा ही मुझ पर चढ़ गया। इसी प्रकार शिव पुराण में एक कथा और आती है जिसमें एक बहेलिया शिकार करने के लिए बिल्वपत्र के वृक्ष पर चढ़ा। उस दिन शिवरात्रि थी और बिल्वपत्र के पत्ते टूटकर शिवलिंग पर गिर गए। केवल इसी सेवा से भगवान प्रसन्न हो गए।

    जो बात भगवान के असमान व्यवहार के रूप में दिखाई देती हैं, वास्तव में वह भगवान द्वारा अकारण दया किए जाने का गुण है। संत जन, ईश्वर के 'अकारण दयालु' होने के गुण में अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढते हैं। ईश्वर के इस गुण को संत-साहित्य में प्रचुरता से स्थान दिया गया है। रसखान ने लिखा है-

    द्रौपदी अरु गनिका गज गीध अजामिल सौं कियो सो न निहारो।

    गौतम-गोहिनी कैसी तरी, प्रहलाद को कैसे हर्यो दुख भारो।

    काहे कौं सोच करै रसखानि कहा करि है रविनंद विचारो।

    ताखन जाखन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो।।


    अर्थात्- द्रौपदी, गणिका गज, गीध और अजामिल ने क्या किया है, यह उन्होंने नहीं देखा। यह भी नहीं सोचा कि क्या इनका उद्धार करना चाहिए, इस योग्य ये हैं? परम दयालु श्री कृष्ण ने तो कुछ भी नहीं सोचा और पलक झपकते ही उनकी सारी पीड़ाएं दूर कर उनका उद्धार कर दिया। क्या यह किसी को बताना पड़ेगा कि गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को कितनी सहजता से तार दिया और प्रहलाद का दुःख पलक झपकते ही कैसे दूर कर दिया! श्रीकृष्ण तो परम दयालु हैं और दुःखहर्ता हैं। चिंता करने की क्या आवश्यकता है, जिसके रक्षक श्रीकृष्ण हैं, उसका यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

    रसखान ने एक और पद में लिखा है-

    नारद से सुक व्यास रहैं, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।

    ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।'


    जिस त्रिलोकीनाथ के बारे में कुछ जानने के लिए नारद, शुकदेव तथा वेदव्यास भी श्रम करते रहते हैं फिर भी उनका पार नहीं पाते हैं, वही त्रिलोकीनाथ एक कुल्हड़िया छाछ के लिए अहीर की लड़कियों के सामने नृत्य करके दिखाते हैं। यह भगवान का कैसा व्यवहार है!

    बिहारी ने ईश्वर के इसी गुण को अपनी मुक्ति का आधार बताते हुए ईश्वर को अपना (कवि का) मोक्ष करने की भावयुक्त चुनौती दी-

    कौन भांति रहि है विरदु अब देखिबी मुरारि।

    बीधे मो सौं आइ के गीधे गीधहिं तारि।


    अर्थात्- हे ईश्वर! तुमने अब तक गीध जैसे छोटे-छोटे पापियों को तारकर बड़ा यश अर्जित किया है, अब आपका पाला वास्तविक पापी से पड़ा है, अब आपके यश का बचे रहना कठिन है। अर्थात् मुझ जैसे पापी को तारना असंभव को संभव करने जैसा है।

    सूरदास ने ईश्वर के पतित-पावन गुण को अपनी मुक्ति का हथियार बनाते हुए लिखा है-

    आजु हौं एक-एक करि टरिहौं ।

    कै तुमहीं, कै हमहीं माधौ, अपने भरोसैं लरिहौं ।

    हौं पतित सात पीढ़नि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं ।

    अब हौं उघरि नच्यौ चाहत हौं, तुम्हैं बिरद बिन करिहौं ।

    कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा ।

    सूर पतित तबहीं उठहै, प्रभु जब हँसि दैहौ बीरा।।


    कहने का आशय यह कि सूरदास अपनी पतितता के बल पर मोक्ष पाने के लिए तैयार हुए हैं। वे कहते हैं- हे ईश्वर आज मैं आपसे भली-भांति लड़ूंगा। आज निर्णय हो जाएगा, मैं अपने भरोसे लड़ूंगा। मैं सात जन्मों का पतित हूँ, अपनी इसी पतितता के कारण मेरा निस्तार होगा। आज मैं सारी लोक-लाज त्यागकर आपके समक्ष नाचूंगा और आपकी मर्यादा को खतरे में डाल दूंगा। हे ईश्वर! क्यों संसार में अपने विश्वास को समाप्त करते हो, मैंने हरि के रूप में हीरा प्राप्त किया है। आज यह पापी सूरदास तभी उठेगा जब हंस कर मुझ पर कृपा करेंगे।

    नरोत्तम स्वामी ने सुदाम चरित में भगवान के इसी गुण को लक्ष्य करके लिखा है-

    भौन भरो पकवान मिठाइन, लोग कहैं निधि हैं सुखमा के।

    साँझ सबेरे पिता अभिलाखत, दाखन चाखत सिन्धु छमा के।।

    बाभन एक कोउ दुखिया सेर- पावक चाउर लायो समा के।

    प्रीति की रीति कहा कहिए, तेहि बैठि चबात है कन्त रमा के।



    मुठी तीसरी भरत ही, रुकमिनि पकरि बांह।

    ऐसी तुम्हें कहा भई, सम्पति की अनचाह।।

    कही रुकमिनि कान में, यह धौं कौन मिलाप।

    करत सुदामा आपु सों, होत सुदामा आपु।।


    कहने का आशय यह कि भगवान रुक्मणि के द्राक्ष छोड़कर सुदामा के लाए समां के चावलों को खाते हैं जिसके बदले में भगवान अपनी सम्पूर्ण सम्पदा सुदामा को दे देंगे और स्वयं सुदामा जैसे निर्धन हो जाएंगे।

    गोस्वामी तुलसीदासजी ने ईश्वर द्वारा किए जाने वाले विषम व्यवहार को स्वीकार करते हुए इसे उनका बहुत बड़ा गुण बताया है-

    करम प्रधान बिस्व करि राखा।

    जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

    तदपि करहिं सम बिषम बिहारा।

    भगत अभगत हृदय अनुसारा।।


    कहने का आशय यह कि यद्यपि ईश्वर ने इस संसार में कर्म को ही प्रधान कर रखा है और जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है तथापि भक्त और अभक्त के हृदय की स्थिति के अनुसार ईश्वर सम-विषम व्यवहार करते हैं। हिन्दी संत साहित्य में ऐसे काव्य की कमी नहीं है जिसमें ईश्वर द्वारा पतितों पर कृपा करने के लिए भगवान अच्छे-बुरे में भेद नहीं करते तथा सामान्य व्यवहार से हटकर विषम व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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