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  • किशनगढ़ राजवंश की हिन्दी साहित्य को देन

     03.06.2020
    किशनगढ़ राजवंश की हिन्दी साहित्य को देन

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

       राजस्थान के ठीक मध्य में किशनगढ़ नामक एक छोटी सी रियासत थी जिसने 1605 ई. के आसपास आकार लेना आरंभ किया और 1611 ई. में वह पूरी तरह से स्थापित हो गई। इस रियासत के लघुकाय होने का अनुमान केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राजस्थान की सबसे बड़ी मारवाड़ रियासत का क्षेत्रफल 34,963 वर्गमील था जबकि किशनगढ़ रियासत का क्षेत्रफल केवल 858 वर्गमील था। इस प्रकार मारवाड़ रियासत में से किशनगढ़ जैसी 41 रियासतें बन सकती थीं। किशनगढ़ रियासत पर 1611 ई. से 1948 ई. तक की 337 वर्ष की अवधि में 19 राजाओं ने शासन किया। इनमें से कई शासक युद्ध के मोर्चे पर वीर गति को प्राप्त हुए। फिर भी इस राजवंश ने हिन्दी साहित्य को इतना विपुल एवं समृद्ध साहित्य प्रदान किया है कि हिन्दी साहित्य इस राजवंश का चिरकाल तक ऋणी रहेगा। इस आलेख में हम उनके योगदान की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

    हिन्दी साहित्य में वि.सं. 1375 (1318 ई.) से वि.सं. 1700 (1643 ई.) तक का काल भक्तिकालीन साहित्य का माना जाता है तथा वि.सं. 1700 (1643 ई.) से वि.सं. 1900 (1843 ई.) तक का काल रीतिकालीन साहित्य का माना जाता है। किशनगढ़ रियासत की स्थापना 1605 ई. से 1612 ई. के बीच हुई। इस समय हिन्दी साहित्य में भक्ति काल और रीति काल का संक्रांति काल था। उत्तर भारत में तुलसीदास जैसे भक्त भी उस युग का सर्वोत्कृष्ट भक्ति काव्य रच रहे थे तो केशव भी रीतिकालीन रचनाओं का सृजन कर रहे थे। उस समय के साहित्यिक परिवेश से प्रभावित होकर किशनगढ़ रियासत के शासकों ने भक्ति रस से परिपूर्ण श्रेष्ठ काव्य रचनाएं लिखीं तो रीति कालीन शृंगारिक रचनाओं का सृजन भी विपुल मात्रा में किया। चूंकि किशनगढ़ रियासत के शासकों ने महाप्रभु वल्लभाचार्य की शिष्य परम्परा को स्वीकार किया था तथा रियासत में सलेमाबाद में निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ स्थापित थी इसलिये स्वाभाविक ही था कि वे श्री राधा-कृष्ण को निमित्त बनाकर भक्ति रचनाओं का प्रतिपादन करते।

    किशनगढ़ रियासत के शासकों में साहित्य, कला एवं संगीत प्रेम की सुदीर्घ परम्परा रही। महाराजा किशनसिंह के पौत्र महाराजा रूपसिंह (1644-1658 ई.) ने वीरत्व और राजनैतिक कौशल के साथ-साथ भावुक हृदय भी पाया था। वह भगवान कृष्ण का अनन्य भक्त एवं उच्च कोटि का कवि था। उसका लिखा 750 दोहों का एक ग्रंथ रूपसतसई उपलब्ध हुआ है जो रीति-काल का श्रेष्ठ ‘भक्ति-ग्रंथ’ है। राजा रूपसिंह के पद बड़े भावपूर्ण और भक्तिरस की अविरल धारा प्रवाहित करने वाले हैं।

    रूपसिंह के पश्चात् उसका पुत्र मानसिंह किशनगढ़ का शासक हुआ। रूपसिंह तथा मानसिंह का समकालीन कवि वृंद मूलतः बीकानेर रियासत का निवासी था। उसका पिता बीकानेर राज्य से मेड़ता आकर रहने लगा। कवि वृंद, शाहजहां के समकालीन किशनगढ़ नरेश महाराजा रूपसिंह का दरबारी कवि था। उसके लिखे ग्रंथ बड़े प्रसिद्ध हैं। वृंद सतसई में उसने नीति का सुंदर विवेचन किया है। किशनगढ़ नरेश मानसिंह (1658-1706 ई.) कवि वृंद को आगरा से किशनगढ़ लाया। महाराजा मानसिंह स्वयं उत्कृष्ट साहित्यकार था उसने ‘‘संत सम्प्रदाय कल्पदु्रम’’ की रचना की जो पुष्टि मार्ग का प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। मानसिंह की बहिन चारूमती इतिहास में अपनी कृष्ण भक्ति के लिए प्रसिद्ध हो गई है। औरंगजेब उससे बलपूर्वक विवाह करना चाहता था किंतु चारुमती ने मेवाड़ नरेश राजसिंह को अपने पति के रूप में स्वीकार किया जो भगवान श्री कृष्ण का अनन्य भक्त था।

    महाराजा मानसिंह का पुत्र महाराजा राजसिंह (1706-1748 ई.) भी हिन्दी का अच्छा कवि था। गोस्वामी रणछोड़ उसका काव्य गुरु था। उसने ही महाराजा राजसिंह को गुरुमंत्र और उपदेश दिये। गोस्वामी रणछोड़ स्वयं भी चित्रकार तथा कवि था। वह कविवंृद का शिष्य था। राजसिंह कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी, संगीत प्रेमी और परम वीर था। राजसिंह द्वारा रचित 24 ग्रंथ उपलब्ध हैं। ये समस्त ग्रंथ वैष्णव मंदिरों मंे मनाये जाने वाले विविध उत्सवों से सम्बधित हैं। महाराजा राजसिंह द्वारा लिखित जन्मोत्सव के विष्णुपद, शरद पून्यो के विष्णु पद, रास के विष्णु पद, होली के विष्णु पद, फूलडोल के विष्णुपद, रथ यात्रा के विष्णु पद, राखी के विष्णु पद, चांदनी के कवित्त, अक्षय तृतीया के कवित्त, कीर्तन कवित्त, पंच कड़ी कवित्त, पवित्रा के कवित्त, राधाष्टमी के पद, बसंत के पद, दीप मालिका के पद, धमार के पद, रामनवमी के पद, वर्षा के पद, दानलीला के पद, खण्डिता के पद, ग्रीष्म ऋतु के पद, रुक्मणि हरण, हिंडोरा के पद, नृसिंह चतुर्दशी के पद आदि ग्रंथों में बृजभाषा की मधुरता तथा पदों की संगीतात्मकता अवलोकनीय है।

    हिन्दी साहित्य में वि.सं. 1700 (1643 ई.) से वि.सं. 1900 (1843 ई.) तक का काल रीतिकालीन साहित्य का माना जाता है। इस युग में वल्लभ सम्प्रदाय के कवियों में सात्विकता का स्थान शृंगार ने ले लिया था। भक्ति में भोग और विलास की प्रधानता हो गई। कृष्ण मंदिर, कृष्ण महल बन गये। राधा और कृष्ण के संयोग और वियोग के चित्र साधारण नायक और नायिकाओं के सांचे में ढालकर उतारे जाने लगे। सूरदास आदि ने कृष्ण भक्ति के जिस विशाल पादप को अपने हृदय की शुद्ध भक्ति के रस से सींचा था, अब इसे आधिकारी पात्रों द्वारा मलिन हृदय के कलुषित वासना जल से सींचा जाने लगा। कुछ तो विद्यापति इसकी राह पहले ही बना चुके थे और कुछ उस समय का वातावरण सामूहिक रूप से इस प्रकार का बन चुका था। पररकीया के उन्मुक्त प्रेम के चित्र उतारने की नैतिक अनुमति कामशास्त्रीय ग्रंथों तथा उज्जवल नीलमणि से मिल ही चुकी थी।

    राजसिंह कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी, संगीत प्रेमी और परम वीर था। उसके पुत्र सावंतसिंह की शिक्षा दीक्षा ऐसे ही अनुपम संस्कारों के बीच हुई थी। ऐसे साहित्यिक वातावरण में 1699 ई. में महाराजा सावंतसिंह का जन्म हुआ। वह नागरीदास के नाम से कवितायें लिखता था। उसने 1725 ई. में मनोरथ मंजरी तथा 1731 ई. में रसिक रत्नावली लिखी। 1748 ई. में वह राजा बना किंतु छोटे भाई के हाथों छले जाने के कारण राज्य से वंचित होकर वृंदावन में रहने लगा। वह 1764 ई. तक जीवित रहा। वह वल्लभाचार्य की पुष्टिमार्गी शाखा की शिष्य परम्परा में था इसलिये स्वाभाविक ही था कि उस पर तत्कालीन आध्यात्मिक एवं साहित्यिक परिवेश का प्रभाव होता। इसीलिये नागरीदास ने अपनी पासवान बनीठनी को राधारानी मानकर उसके रूप की उपासना की तथा नागरीदास के नाम से साहित्यिक रचनाएं कीं। उसकी बहुत सी रचनाएं भक्ति साहित्य के अंतर्गत रखी जाती हैं तो उनके रचे विपुल काव्य को हिन्दी साहित्य का श्रेष्ठ रीति काव्य भी कहा जा सकता है। भक्ति सम्बन्धी उसकी एक रचना इस प्रकार से है-

    बिनु हरि सरन सुख नहीं कहूँ।

    छाड़ि छाया कलपदु्रम जग धूप दुख क्यौं सहूँ

    कलिकाल कलह कलेस सरिता बृथा मा मधि बहूँ।

    दास नागर ठौर निर्भय कृष्ण चरननि रहूँ।

    सावंतसिंह (नागरीदास) ने छोटे-बड़े कुल 265 ग्रंथों की रचना की। उसके 75 ग्रंथों का संकलन नागर समुच्चय के नाम से संवत 1955 में प्रकाशित हुआ था। उसके लिखे प्रसिद्ध ग्रंथों में- रसिक लावनी, विहार चंद्रिका, निकुंज विलास, कवि वैराग्य वल्लरी, भक्ति सार, पारायण विधि प्रकाश, ब्रज सार, गोपी प्रेम प्रकाश, ब्रज बैकुण्ठ तुला, भक्ति मग दीपिका, पद प्रबोध माला, रामचरित माला, जुगल भक्ति विनोद, फाग बिहार, बाल विनोद, बन विनोद, तीर्थानंद, सुजानानंद, तन जन प्रसंग, छूटक पद तथा इश्क चमन सम्मिलित हैं। नागरीदास द्वारा लिखी गई पुस्तक इश्क चमन के उत्तर में मेवाड़ के महाराणा अरिसिंह ने ‘रसिक चमन’ नाम का हिन्दी उर्दू मिश्रित काव्य बनाया।

    नागरीदास रीति काव्य का उत्कृष्ट कवि, कुशल चित्रकार और संगीतज्ञ था। शृंगार और प्रेम उसके काव्य का प्राण है। ब्रज भाषा का माधुर्य, उसकी अनुप्रासिकता तथा गीतात्मकता देखते ही बनती है। उसने शृंगार के क्षेत्र में प्रेम तत्व के विविध विधानों को अत्यंत सरसता और मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है। अलंकार वैभव नायिका भेद चित्रण, नख शिख वर्णन सभी अनूठे बन पड़े हैं। दोहा चौपाई, कवित्त छंदों की प्रधानता है। पद विविध, राग रागिनियों में बंधे हुए हैं। कवि पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के प्रेम काव्यों की गहरी छाप है। नागरीदास का लिखा एक पद इस प्रकार से है-

    फूलनि को गई उत सखी मिली जहां तहां,

    इत कौं रंगीले कुछु औरे ढार में ढरे। रसिक रसाल बाल दयौ चाहे उर माल,

    जब नंद लाल हंसि आगै हाथ लैं करे।

    उरझी चितैं न कम्प स्वेद सुर रंग भये,

    नागरिया नागर अनंग रंग सौं भरे।

    राधे जू दयो है हार मोतिन को मोहन 
    कूं,

    मोहन जू हार होय राधे के गरे परे।

    भक्ति के क्षेत्र में नागरी दास ने दास्य, सख्य, आत्मविनोद, भावों का सुंदर निरूपण किया है। सावंतसिंह की पासवान बनीठनी ने भी कृष्ण भक्ति के पद लिखे जो नागर समुच्चय में समाविष्ट हैं। सांवतसिंह की विमाता महारानी बांकावती ने ब्रजदासी के नाम से श्रीमद्भागवत का ब्रज भाषा में पद्यानुवाद किया जो ब्रजदासी भागवत के नाम से प्रसिद्ध है।

    महारानी बांकावती की पुत्री सुुंदर कुंवरी श्रेष्ठ कवि एवं संगीतकार थी। उसका विवाह 31 साल की आयु में हुआ, उसने 15 वर्ष की आयु से काव्य सृजन आरंभ किया। उसने अपने पदों को संगीत की तकनीक के आधार पर बहुत श्रेष्ठ विधि से व्यवस्थित किया। उसने नेहनिधि, वृंदावन गोपी महात्म्य, संकेत-युगल, रंघर गोपी महात्म्य, रसपुंज, प्रेम सम्पुट, सुर संग्रह, भाव प्रकाश, मित्र शिक्षा, युगल ध्यान तथा राम रहस्य नामक ग्रंथों की रचना की और भक्ति गीत लिखे। सुंदर कुंवरी के साहित्य में कृष्ण की युगल भक्ति प्रकट हुई है। कृष्ण के बाल रूप का भी सुंदर कुंवरी ने बहुत सुंदर वर्णन किया है-

    रज मांहि मगन कैसो खेलत है।

    सुभग चिकुट तन धूरि धूसरित डेलिक किलक सकेलत है।

    चौंकि चकित चहुँ औरनि चितवत छिपि माटी मुख मेलत है।

    सुंदर कुंवरी घुटुरुवनि दौरत कोटिन छवि पग पेलत है।

    महाराजा सरदारसिंह की पुत्री छत्रकुंवरी ने 1788 ई. में प्रेम विनोद नामक प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ लिखा जो 
    शृंगार रस की महत्वपूर्ण रचना है। उसके लिखे एक पद में चौसर खेलने का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-

    बाढ़ी चित चाह दोऊ, खेलत उमाह भरे।

    दसा प्रेम पूर छिल अंग दरसत हैं।

    प्रेम दांव देत प्रिय झूंठे ही रुंगट कहै

    गहै पानि-पानि रिस मिसै परसत हैं।

    किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह ने ‘‘रावत प्रतापसिंघ ने मोहोकमसिंघ हरिसिंघोत देवगढ़ धणी री वार्ता’’ लिखी। इस पुस्तक में महाराजा ने प्रतापगढ़ रियासत के तीसरे नम्बर के राजकुमार मोहकमसिंह की वीरता की बड़ी प्रशंसा की। महाराजा बिड़दसिंह ने जयदेव कृत गीतगोविंद की टीका लिखी। वह फारसी और अरबी भाषाओं का ज्ञाता था। संस्कृत भाषा पर उसे असाधारण अधिकार प्राप्त था।

    किशनगढ़ राजवंश के साथ-साथ किशनगढ़ के जनसामान्य द्वारा भी हिन्दी साहित्य को अनुपम रचनाएं प्रदान की गईं। किशनगढ़ रियासत में निम्बार्क सम्प्रदाय का सर्वप्रथम प्रवर्तन करने वाले परशुराम देव का रचना काल वि. 1550 से 1600 तक का है। उनके द्वारा रचित ग्रंथों में परशुराम सागर सहित कुल 30 ग्रंथ मिलते हैं। उनका साहित्य कबीर, तुलसी, सूर और मीरा के समकक्ष रखा जा सकता है। उन्होंने दोहा, चौपाई, कवित्त, आदि छंदों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। इनकी भाषा मारवाड़ी और ब्रज मिश्रित है। इनके काव्य में राम-कृष्ण की समन्वयात्मक साधना प्रकट हुई है। गेय पदों में दास्य, सख्य, आत्म निवेदन आदि भक्ति भावों की सरस अभिव्यंजना हुई है तथा बड़े आकर्षक ढंग से नीति की शिक्षा देकर खण्डन मण्डन द्वारा सन्तोचित ढंग से सम्यक साधना तथा सरस सामाजिक जीवन की व्याख्या की गई है।

    वि.सं. 1754 से 1797 तक वृंदावन देव सलेमाबाद की निम्बार्काचार्य पीठ के आचार्य रहे। उन्होंने महाराजा राजसिंह, सावंतसिंह, महारानी बांकावती तथा राजकुमारी सुंदर कुंवरी को धार्मिक शिक्षा दी। वृंदावन देव का प्रसिद्ध ग्रंथ गीतामृत गंगा है जिसमें श्रीकृष्ण चरित्र गाया गया है। इसमें गोपी प्रेम की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की गई है। करणीदीन चारण, हरिचरन दास, टीला स्वामी, सुकवि वल्लभ, हीरा लाल सनाढ्य, विजयराम, राय कवि, कनीराम मुंशी, दौलतराम, दयालाल और दामोदर इत्यादि कवि और साहित्यकार भी किशनगढ़ रियासत के प्रमुख साहित्यकारों में से हैं। बहुत से जैन यतियों की रचनाएं भी मिलती हैं जो किशनगढ़ दुर्ग के सरस्वती भण्डार, चिंतामणि मंदिर, जैन उपाश्रयों और महावीर पुस्तकालय में संग्रहीत हैं।

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