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     03.06.2020
    जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

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    विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च 2017 पर विशेष जनसंचार में वे सब विधाएं, संसाधन, उपकरण और तरीके आ जाते हैं जो निर्जन स्थान में सुईं गिरने की आवाज से लेकर शेर की दहाड़ तक को, देखते ही देखते विशाल जनसमूह तक पहुंचा सकें और जन-समुदाय, यह जानते हुए भी कि जो कुछ भी वह सुन, देख या पढ़ रहा है, वह उससे बहुत दूर कहीं घटित हुआ है किंतु समाज का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं को उस घटना से प्रभावित कर लेता है। समाज में मीडिया की भूमिका संवाद-वहन की होती है। वह समाज के विभिन्न वर्गों, सत्ता-केंद्रों, व्यक्तियों एवं संस्थाओं के बीच बातचीत ओर विचारों के आदान-प्रदान के लिये पुल का कार्य करता है। यही कारण है कि आज समस्त विश्व की सरकारें, राजनीतिक पार्टियां, व्यावसायिक प्रतिष्ठन, श्रमिक संगठन, साहित्यिक संस्थाएं आदि विभिन्न प्रकार के न्यास, अपनी योजनाओं, कार्यक्रमों, उपलब्धियों तथा उत्पादों को जनसंचार के किसी न किसी तरीके को अपनाकर जन-समूह अथवा अपने टारगेट ग्रुप के बीच लाते हैं। जनसंचार, एक ओर तो, इन न्यासों की विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों की चर्चा करता है तो दूसरी ओर वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, बेचैनियों, और विभ्रमों को दूसरे पक्ष तक पहुंचाने का प्रयास करता है। संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी ही उस, न्यास अथवा संस्था अथवा व्यक्ति की नैतिकता अथवा अनैतिकता को रेखांकित करती है। लोकतांत्रिक समाज में जनसंचार अर्थात् मीडिया का दायित्व इसलिये और भी बढ़ जाता है क्योंकि जनसंचार को अपना कार्य करने की पूरी छूट होती है और जनसामान्य द्वारा यह विश्वास किया जाता है कि जनसंचार ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया वाली स्टाइल में कार्य करेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मीडिया को चौथे स्तंभ का सम्मान केवल इसीलिये दिया जाता है क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह भी सरकार, विधायिका और न्यायपालिका की तरह अपनी जिम्मेदारी स्वयं अपनी प्रेरणा और विवेक के बल पर निष्पक्ष रहकर निभायेगा। कुशल नेतृत्व मिलने पर मीडिया, समाज को वांछित परिवर्तनों की दिशा में ले जाने में सहायक होता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है। साहित्य और जनसंचार का चोली-दामन का साथ है। साहित्य को यदि मनुष्य की वैचारिक सम्पदा की आत्मा मान लिया जाये तो जनसंचार अथवा मीडिया उसका शरीर है। जैसे शरीर के बिना आत्मा कोई कार्य नहीं कर सकती, उसी प्रकार जनसंचार के बिना साहित्य भी आगे नहीं बढ़ सकता। यदि इसे उलटा कर दें तो भी परिणाम यही निकलेगा अर्थात् साहित्य के बिना संचार के समस्त संसाधन, उसकी समस्त शक्ति और ऊर्जा, पूर्णतः निर्जीव और निष्प्रभावी है। साहित्य का अर्थ है सबका कल्याण। जनसंचार का ध्येय है जनकल्याण। अर्थात् जनकल्याण वह बिंदु है जहां साहित्य और जनसंचार अपने रूढ़ अर्थ खोकर एकाकार हो जाते हैं। दोनों के पास अपनी अंतर्चेतना होती है। दोनों के पास कल्पनाशीलता होती है। दोनों का एक ही प्रयोजन होता है। यदि हम रंगमंच, जनसंचार और साहित्य के सम्बन्धों पर एक साथ विचार करने का प्रयास करें तो पायेंगे कि रंगमंच और जनसंचार दोनों का पिता साहित्य है। यदि यह कहा जाये कि साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति रंगमंच है, तो इसमें कोई अश्यिोक्ति नहीं होगी। ऐसा इसलिये भी कि जब हम नाटक पर विचार करते हैं तो हम यह पाते हैं कि नाटक एक ऐसी साहित्यिक रचना है जो श्रवण एवं दृष्टि द्वारा दर्शक के हृदय को रसानुभूति कराती है। इसलिये कई बार नाटक को दृश्य-काव्य भी कहते हैं। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है। आधुनिक काल में जनसंचार के विभिन्न ससांधन हैं यदि उनके रंगमंच के साथ सम्बन्धों की व्याख्या की जाये तो यहां मामला कुछ प्रतिद्वद्विता से भरा हुआ दिखाई देता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कि पुत्र अपने पिता के राज्य पर अपने नैसर्गिक अधिकार का दावा तो करे किंतु उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन नहीं करे। जनसंचार का सामान्य अभिप्राय- समाचार पत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है। ये आधुनिक जनसंचार के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण की मजदूरी करते हैं लेकिन जिसे हम मीडिया यानी संवादवहन की युक्ति मानते आए हैं, उसकी हदें इससे कहीं अधिक व्यापक और समाज में विभिन्न रूपों में घुसी हुई हैं। पुराने जमाने के नौटंकी, स्वांग, नाटक, सभा तथा चित्रकला से लेकर आधुनकि युग के बैनर, पोस्टर, पंपलेट्स, भाषण, लोकगायन, विज्ञापन, सेमीनार, आदि जनसंचार की प्रचलित परिभाषा से किंचित भिन्न होने के बावजूद जनंसचार के ही भाई-बहिन हैं। आधुनिक स्मार्ट फोन का प्रारंभिक उद्देश्य भले ही टेलिफोन वाली भूमिका निभाना हो किंतु उन्नत तकनीक, बाजार की जरूरतों तथा गला-काट विज्ञापन-स्पर्धा ने उसे भी जनसंचार के आधुनिक और शक्तिशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। वाट्सएप तथा फेसबुक जैसे सॉफ्टवेयर्स ने ये सिद्ध कर दिया है कि स्मार्ट फोन नामक दैत्य को आने वाले कई दशकों तक परास्त नहीं किया जा सकेगा। जहां घरों में सास-बहू के रसीले-चुटीले तथा नाटकीयता से परिपूर्ण संवाद, आम घरों की आम दिनचर्या का हिस्सा हुआ करते थे, वहीं अब सास बहू के नाटक केवल टीवी के पर्दे पर सिमट गये हैं और वास्तविक जिंदगी की सास तथा बहुएं अपने-अपने कमरों में बैठकर अपने र्स्माट-फोन पर आंखें गढ़ाये हुए, वाट्सएप और फेसबुक पर व्यवस्त हैं। सभ्यता के आगे बढ़ने के साथ, जनसंचार के जिस माध्यम का सबसे पहले जन्म हुआ, मेरी दृष्टि में वह रंगमंच ही था। रंगमंच ने कई तरह के रूप धरे। यदि वह राजा, राजपरिवार और राजपण्डितों के मनोरंजन के लिये अपने सम्पूर्ण शास्त्रीय स्वरूप के साथ प्रकट हुआ तो जन सामान्य के लिये वह नौटंकी का आश्रयदाता बन गया। राज महलों के विशाल दालानों से लेकर राजा के दरबार तक पर रंगमंच हावी हो गया जहां विदूषकों ने कड़वी से कड़वी बातें राजाओं और रानियों को सुनाईं। यह रंगमंच की ही शक्ति थी कि कड़वी से कड़ी बात भी राजा ने हंसकर सुनी। रंगमंच कभी घबराया नहीं, पूरे जोश और शक्ति के साथ जनता की आवाज को राजमहलों और राजदरबारों तक पहुंचाता रहा। दूसरी ओर इस उदार हृदय रंगमंच ने गांवों की गलियों में जाकर नौटंकियों और नुक्कड़ नाटकों का रूप धर लिया ताकि कठोर परिश्रम और संघर्षपूर्ण नीरस जीवन के थपेड़ों से थके हुए किसानों, श्रमिकों और आम आदमी को मदभरी फुहारों से तृप्त किया जा सके। इस कारण नाटक राजा और राजपण्डित से लेकर आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बन गया। रंगमंच की शक्ति का अनुभव करते हुए, बड़े-बड़े पण्डितों ने एक से बढ़कर एक नाटक लिखे जो आज इस देश की बौद्धिक सम्पदा में सम्मिलित हैं। मैं संस्कृत भाषा के अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम् और मृच्छकटिका आदि उन शास्त्रीय नाटकों की सूची में नहीं जाउंगा अपितु केवल संकेत भर करूंगा जो केवल रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गये थे। इन नाटकों ने रंगमंच को उसकी ऊंचाइयां प्रदान कीं। जब कागज सरलता से उपलब्ध होने लगा, छापाखाना विस्तार पा गया और पत्र-पत्रिकाओं का प्रसार हुआ तो रंगमंच ने अपने नाटक पुस्तकों, पत्रिकाओं और समाचार पत्रों को दे दिये। अब नाटक छपने लगे। लोग उन्हें बड़े चाव से पढ़ते थे। उदाहरण के लिये जयशंकर प्रसाद और रामकुमार वर्मा के नाटक मूल रूप में पढ़े जाने के लिये ही लिखे गये। फिर भी रंगमंच ने उद्दात्त भाव दिखाते हुए उन नाटकों को थोड़ा परिमार्जित करके मंचित किया। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब आम आदमी की पहुंच रेडियो तक होने लगी तो नाटक, देखे या पढ़े जाने की बजाय, सुनने के लिये लिखा जाने लगा। रंगमंच अब केवल इफैक्ट्स के रूप में रह गया था जहां, पात्रों के संवादों के साथ-साथ ट्रेन की सीटी, चिडि़यों की चहचहाट या बाजार का शोर सुनाई देता था। यह रंगमंच के लिये अशुभ संकेत था। यही वह बिंदु था जहां से नाटक तो आगे बढ़ा किंतु रंगमंच का विकास रुक गया। अब दर्शकों की भीड़ रंगमंच की ओर उमड़ने की बजाय रेडियो से चिपक गई। विविध भारती ने हवामहल के रूप में छोटी-छोटी नाटिकाएं लाखों लोगों तक पहुंचाई। हममें से बहुत से लोगों ने हवामहल के लिये नाटिकांए बनाई हैं जिन्हें रेडियो ने झलकी का नाम दिया। फुल लेंथ रेडियो ड्रामा और स्पॉन्सर्ड सीरियल भी बनाये गये। जब बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से थोड़ा पहले, सिनेमा का प्रचलन हुआ तो रंगमंच के लिये सचमुच के खतरे की घण्टी बज गई। यहां नाटक भी था, पात्र भी थे, अभिनय भी था, कथा भी थी, संगीत भी था अर्थात् नाटक अपने समस्त अवयवों के साथ पूरे वैभव को लेकर उपस्थित था, यदि कुछ नहीं था तो केवल रंगमंच। फिर भी बुद्धिजीवी वर्ग के लिये रंगमंच काम करता रहा। भले ही दर्शकों की भीड़ नहीं थी किंतु रंगमंच बना रहा। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में जब टेलिविजन घर-घर आ गया तब तो रंगमंच केवल प्रतिबद्ध लोगों के लिये रह गया जहां, नाटक को देखने के लिये साहित्य प्रेमियों एवं बुद्धिजीवियों को आग्रह-पूर्वक रंगमंच के सामने लाया जाने लगा। आम आदमी, जिसमें किसान, श्रमिक या छोटा करोबारी एवं विविध प्रकार के कर्मचारी आदि गिने जा सकते हैं, लगभग पूरी तरह से रंगमंच से विमुख हो गया। आज के हालात ये हैं कि यदि यह यह कहा जाये कि जनसंचार ने नाटक से रंगमंच छीनकर, उसे सिनेमा का बड़ा पर्दा या टीवी का छोटा पर्दा या एफएम रेडियो का भौंपू पकड़ा दिया, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज टीवी पर जो कुछ भी चलता है, उसमें अधिकांशतः नाटक ही भरा हुआ है। यहां तक कि सिने तारिकाओं को मात करने वाली समाचार वाचिकाएं भी समाचार को नाटक के लहजे में प्रस्तुत करती हैं। विज्ञापनों को तैयार करने एवं प्रभावी बनाने में भी नाटक या नौटंकी का ही सहारा लिया जाता है, किंतु रंगमंच अनुपस्थित है। नाटक सब जगह मौजूद है, घर से लेकर संसद तक, किंतु रंगमंच गायब है। आज सिनेमा और टीवी के नाटक के लिये फ्लोर मैनेजर है, फ्लोर डायरेक्टर है, लाइटमैन है किंतु यह सब कैमेरे के लिये है। नट द्वारा प्रस्तुत नाटक को अब जनसंचार ने हड़प लिया है और रंगमंच को वीरान बना दिया है। हो सकता है कि आप लोग मेरे इस वक्व्य से सहमत नहीं हों किंतु कम से कम मुझे तो यही लगता है। जब वर्ष 2015 में मेरी पोस्टिंग झालावाड़ में हुई तो मेरे मन में उत्साह था कि इसी बहाने सही, उस ऐतिहासिक भवानी नाट्यशाला को मैं अपनी आंखों से देख सकूंगा जिसे देखने की साध वर्षों से मन में दबी हुई है। यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध रंगमंच है, उत्तर भारत में इसके जैसा भव्य रंगमंच न तो पहले बना न बाद में। एक शाम मैं वहां गया, वहां का हाल देखकर सन्न रह गया। इस भवन को लम्बे समय से बंद कर दिया गया था। मैंने किसी तरह ताला खुलवाया, भवानी नाट्शाला के भीतर कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहटें, बीटों की बदबू, तेज सन्नाटा और घनघोर अंधेरा मिलकर ऐसा शोककारी वातावरण बनाये हुए थे मानो इस रंगमंच पर नाटक खेलने वाले कलाकारों की आत्माएं सिसकियां भर रही हों। इस रंगमंच पर बड़े-बड़े नाटक खेले गये। एक-एक नाटक कई-कई महीनों तक चलता था। आज वह सब वैभव बिखर गया है। रंगमंच का लगभग यही हाल पूरे देश का है। रंगमंच से जुड़े हुए कुछ लोग जिद्दी बंजारों की तरह रंगमंच की यात्रा को जारी रखे हुए हैं। कुछ पढ़े लिखे लोग आ जाते हैं नाटक देखने किंतु वास्तविकता क्या है....... किससे छिपी है! -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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