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  • लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास

     02.06.2020
    लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास

    लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर नामक गांव में हुआ। उनके जन्म एवं निर्वाण की तिथियों पर इतिहासकार अब तक एक मत नहीं हो सके हैं। माना जाता है कि श्रावण शुक्ला सप्तमी को उनका जन्म हुआ श्रावण शुक्ला सप्तमी को ही उनका शरीर पूरा हुआ। इसलिए गोस्वामीजी की जन्म तिथि और पुण्य तिथि एक ही दिन हैं। कुछ लोगों के अनुसार उनका निधन श्रावण शुक्ला तृतीया को हुआ। उन्होंने राम-राम कहते हुए जन्म लिया और राम-राम कहते हुए ही शरीर छोड़ा। उनके बचपन का नाम रामबोला रखा गया। माता हुलसी और पिता आत्माराम तुलसी के जन्म के बहुत कम समय तक ही जीवित रहे।


    गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म सोलहवीं शताब्दी में ऐसे भारत में हुआ जो अत्यंत निर्धन था। प्रजा विदेशी आक्रांताओं के अत्याचारों और भूख से बिलबिला रही थी। बारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अफगानिस्तान से आए तुर्कों ने भारत पर अधिकार कर लिया था और गोस्वामीजी के जन्म के समय यही तुर्क शासन कर रहेे थे। जब तुलसीदास सक्रिय जीवन में आए तो उत्तर भारत मंगोल जाति के मुसलमान शासकों के अधीन था। उस समय भारत की क्या दशा थी, उसका वर्णन करते हुए तुलसीदासजी ने लिखा है-

    खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

    बनिक को न बनिज न चाकर को चाकरी।

    जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस

    कहै एक-एकन सौं कहां जायं का करी!


    जो कुछ खेतों में उपजता था, उसे मुसलमान शासकों के सिपाही छीनकर ले जाते थे। यदि किसान उनका विरोध करते थे तो सिपाही गांवों को घेरकर आग लगा देते थे। उनके भय से किसान घर छोड़कर जंगलों में चले जाते थे। बहुत सी भूमि बंजर पड़ी रह जाती थी। इन परिस्थितियों के कारण समाज में अनैतिकता का प्रसार हो गया। गोस्वामीजी ने उस काल के समाज का वर्णन करते हुए लिखा है-

    बाढ़े खल बहु चोर जुआरा।

    जे लंपट परधन परदारा।

    मानहिं मातु पिता नहीं देवा।

    साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।


    आगे चलकर रामचरित मानस में गोस्वामीजी ने राक्षसों के अत्याचारों का वर्णन इन्हीं तुर्क सिपाहियों के अत्याचारों को देखकर किया। ऐसी विकट परिस्थितियों में तुलसीदासजी का जन्म हुआ और जन्म के साथ ही माता-पिता की मृत्यु हो गई। अनाथ तुलसीदास भीख मांग कर पेट भरने लगे। अपने बाल्यकाल के सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं लिखा है-

    बारे ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन

    जानत हौ चारि फल, चारि ही चनक को।

    घर-घर मांगे टूक, पुनि भूपति पूजे पांय।

    जे तुलसी तब राम बिनु, ते अब राम सहाय।


    ईश्वरीय विधान से बालक तुलसीदास को संत नरहरिदास का आशीर्वाद मिल गया। वे तुलसीदासजी को सूकरखेत ले गए और वहा( उन्हें रामकथा और उसके रहस्य से परिचय करवाया। अपने इस जीवन खण्ड के बारे में तुलसीदासजी ने लिखा है-

    मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकर खेत।

    समुझी नहिं तसि बालपुन तब अति रहेउं अचेत।


    श्रोता बकता ज्ञाननिधि कथा राम कै गूढ़।

    किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।


    कुछ समय पश्चात् गोस्वामीजी काशी चले गए और पंद्रह वर्ष तक वहां रहकर उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का तथा उपनिषदों-पुराणों का अध्ययन किया। गोस्वामीजी की संस्कृत हिन्दी की तरह सरल है। वह वेदों की संस्कृत, वाल्मीकि रामायण की संस्कृत, श्रीमद्भगवत गीता की संस्कृत तथा उपनिषदों आदि की संस्कृत से बहुत अलग तरह की है उदाहरण के लिए देखें-

    भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ। याभ्यां विना न पश्चन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।

    वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणम् यमाश्रितो हि वक्रोअ्पि चन्द्र सर्वत्र वन्द्यते।


    इन ग्रंथों का अध्ययन करने से गोस्वामीजी को ज्ञान हुआ कि मूलतः भारत निर्धन और दुखी नहीं है। उसकी आत्मा में तो अध्यात्म, दर्शन और तत्व ज्ञान का सागर लहरा है जो प्राणी मात्र के दुखों को दूर करके उन्हें परम् आनंद की ओर ले जाने की शक्ति रखता है किंतु अत्याचारों और अभावों के कारण भारत की यह दुर्दशा हुई है। यदि भारत को उसकी आत्मा के दर्शन करा दिए जाएं तो देश का पुनः उद्धार हो सकता है।

    यह देखकर गुसाईंजी ने लोक भाषा में पुराणों, निगमों और आगमों का ज्ञान आगम आदमी को कराने का निर्णय लिया। उन्होंने सरल भाषा में ऐसी कविताओं का निर्माण किया जो सुनते ही याद हो जाती है और जिस भाषा में ज्ञान के गूढ़ तत्वों को अत्यंत सरल करके लिखा गया है। वे स्वयं राम चरित मानस के आरम्भ में लिखते हैं-

    नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्य तो अ्पि

    स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषा निबंध मति मंजुल मातनोति।


    अर्थात् बहुत से पुराणों, वेदों, तंत्रशास्त्रों, वाल्मीकि रामायण तथा अन्य अनेक ग्रंथों से ज्ञान लेकर मैंने अपने अंतःकरण के सुख के लिए रामचरित मानस की रचना की है जो कि देशज भाषा में निबद्ध है।

    गोस्वामीजी ने बहुत से ग्रंथों का प्रणयन किया जिनमें रामचरित मानस, विनय पत्रिका, हनुमान बाहुक, वरवै रामायण, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, हनुमान चालीसा, कवितावली, दोहावली, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न और श्रीकृष्ण गीतावली सहित लगभग दर्जन रचनाएं लिखीं।

    कहा जाता है कि हनुमानजी की आज्ञा से गोस्वामीजी ने अयोध्या की यात्रा की। वहां उन्हें स्वप्न में शंकरजी ने राम चरित मानस को धरती पर उतारने का आदेश दिया। इसकी रचना शंकरजी ने पहले से ही कर रखी थी। इस सम्बन्ध में गोस्वामीजी ने लिखा है-

    रचि महेस निज मानस राखा।

    पाय सुसमय सिवा सन भाखा।


    रामचरित मानस के रूप में गोस्वामी जी ने ऐसे ग्रंथ की रचना जो भारत की निर्धन, अभावों और अत्याचारों से संत्रस्त प्रजा का न केवल भौतिक लोक में अपितु परलोक में भी कल्याण कर सके। यह सबको सुलभ हो, किसी भी समय इसे पढ़ा जा सके। वे स्वयं इस ग्रंथ के बारे में लिखते हैं-

    सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।

    लोक लाह परलोक निबाहू।।


    तुलसीदासजी अत्यंत विनम्र व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अपने बारे में लिखा है-

    कवित विवेक एक नहीं मोरें।

    सत्य कहउं लिखि कागद कोरे।।

    सो मो सन कहि जात न कैसें।

    साक बनिक मनि गुन गन जैसें।।


    उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरा ग्रंथ ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने लिखा है-

    नाना भांति राम अवतारा।

    रामायन सत कोटि अपारा।


    मनुष्य को सुखी बनाने का सबसे सरल उपाय उन्होंने बताया- राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुं जौ चाहसि उजियार।। भायं कुभायं अनख आलसहूं। नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।। गोस्वामी जी की कविताओं ने देश के करोड़ों लोगों को ईश्वरीय सत्ता में विश्वास दिलाया तथा रामचरित मानस के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का भरोसा दिलाया। वे लिखते हैं-

    जिनह एहिं बारि न मानस धोए।

    ते कायर कलिकाल बिगोए।

    तृषित निरखि कर भव बारी।

    फिरहहिं मृग जिमि जीव दुखारी।


    कहते हैं कि मीरां बाई ने अपनी पारिवारिक स्थितियों का उल्लेख करते हुए एक बार तुलसीदासजी से सलाह मांगी कि मैं क्या करूं! तुलसीदासजी ने उन्हें जो सलाह दी वह एक पद के रूप में थी। यह पद विनय पत्रिका में मिलता है-

    जाके प्रिय न राम वैदेही,

    तजिए ताहि कोटि वैरी सम जदपि परम सनेही।

    तज्यौ पिता प्रहलाद विभीषण बन्धु भरत महतारी।

    बलि गुरु तज्यौ, ब्रज बनितन्हि कंतहिं भए मुद मंगल कारी......।

    उन्होंने संसार में सबसे हिल-मिल कर चलने का उपदेश करते हुए दोहावली में लिखा है-

    तुलसी या संसार में भांति-भांति के लोग

    सब से हिल-मिल चालिए नदी नाव संयोग।


    दुष्ट और संत के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है-

    मिलत एक दारुण दुख देहीं।

    बिछरत एक प्राण हर लेहीं।।

    अर्थात् दुष्ट लोग मिलने पर दुःख देते हैं और संत जब बिछुडते हैं तो ऐसा लगता है मानो हमारे प्राण हमसे दूर चले गए। दुष्टों का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है-

    बचन बज्र जेहि सदा पिआरा।

    सहस नयन पर दोष निहारा।।


    उन्होंने कण-कण में अपने प्रभु की सत्ता के दर्शन किए। वे लिखते हैं-

    सीय राम मय सम जग जानी।

    करहुं प्रनाम जारि जुग पानी।।


    संसार में कीर्ति एवं वैभव की सार्थकता की कसौटी के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है-

    कीरति भनिति भूति भलि सोई।

    सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।


    लालच के वशीभूत होकर किसी अन्य व्यक्ति की चापलूसी करने वाले कवियों के लिए उन्होंने लिखा है-

    कीन्हें प्राकृत जन गुणगाना,

    सिर धुनि गिरा लागि पछिताना।


    जब गोस्वामीजी की ख्याति बढ़ने लगी तो अकबर ने उन्हें अपने दरबार में आने का निमंत्रण दिया। अकबर की येाजना यह थी कि हिन्दुओं के श्रेष्ठ गुरुओं, संतों को अपने नवरत्नों में सम्मिलित किया जाए तथा उनके माध्यम से प्रजा को मुसलमान बनाया जाए। उसने तीन संतों को निमंत्रण भेजा- संत हरिदास, संत कुंभनदास तथा गोस्वामी तुलसीदास। भारत के सौभाग्य से तीनों संतों ने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया। संत कुंभनदास ने अकबर को जवाब लिखा-

    संतन को कहा सीकरी सौं काम।

    आवत जात पनैहा टूटी, बिसरि गयौ हरि नाम।

    जाको मुख देखे दुख उपजत ताकों करन परी परनाम।

    कुंभनदास लाल गिरध बिनु यह सब झूठौ धाम।।


    गोस्वामीजी ने लिखा-

    हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखो दरबार।

    तुलसी भीतर बाहिरौ जो चाहसि उजियार।।


    वृद्धावस्था में वे शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त हो गए। उन्होंने अपनी पीड़ा का वर्णन हनुमान बाहुक में इन शब्दों में किया है-

    घेर लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यों बासर बलद जल घटा धुकि छाई है.....।

    .... पांय पीर, पेट पीर, बांह पीर, मुंह पीर, जरजर सकल सरीर पीर मई है।

    अपने कष्टों के लिए तुलसीदासजी ने स्वयं को ही जिम्मेदार ठहराया। हनुमानबाहुक में वे लिखते हैं-

    असन बसन हीन, बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो, करै न हाय-हाय कौ।

    तुलसी गुसाईं भयो, भौंड़े दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौ।



    बाबा तुलसी दास और फादर कामिल बुल्के

    कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के वेस्ट फ्लैंडर्स में नॉकके-हेइस्ट नगर पालिका के एक गांव रामस्केपेल में हुआ। इनके पिता का नाम अडोल्फ और माता का नाम मारिया बुल्के था। बुल्के ने ल्यूवेन विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में बीएससी डिग्री हासिल कर की। 1930 में ये एक जेसुइट बन गए। नीदरलैंड के वलकनबर्ग, (1932-34) में दार्शनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, ई.1935 में ये भारत आए तथा कुछ समय मुम्बई एवं दार्जिलिंग में रहने के बाद झारखंड चले गए। यहां उन्होंने पांच साल तक गणित का अध्यापन किया। यहीं पर उन्होंने हिंदी, ब्रज एवं अवधी भाषाएं सीखीं तथा ई.1938 में सीतागढ़ी हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखी। भारत के लोगों के बारे में उन्होंने लिखा है- ई.1935 में जब मैं भारत पहुंचा, मुझे यह देखकर आश्चर्य और दुःख हुआ कि शिक्षित भारतीय अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं से अनभिज्ञ थे और इंग्लिश में बोलना गर्व की बात समझते थे। बुल्के ने ‘‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’’ नामक शोध ग्रंथ लिखा जिसमें उन्होंने वैज्ञानिकता एवं तर्क के आधार पर सिद्ध किया कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम वाल्मीकि के कल्पित पात्र नहीं अपितु इतिहास पुरूष थे। कामिल बुल्के के द्वारा प्रस्तुत तिथियों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है। बुल्के के इस शोधग्रंथ के उद्धरणों ने पहली बार सिद्ध किया कि रामकथा भारत की नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय कथा है जो वियतनाम से लेकर इंडोनेशिया तक फैली हुई है। फादर बुल्के अपने मित्र हॉलैन्ड के डॉक्टर होयकास का उदाहरण देते थे जो संस्कृत और इंडोनेशियाई भाषाओं के विद्वान थे। एक दिन वह केंद्रीय इंडोनेशिया में शाम के समय टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक मौलाना जिनके बगल में कुरान रखी है, इंडोनेशियाई रामायण पढ़ रहे थे। होयकास ने उनसे पूछा, मौलाना आप तो मुसलमान हैं, आप रामायण क्यों पढते हैं ? उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिये! रामकथा के इस विस्तार को फादर बुल्के, वाल्मीकि की दिग्विजय कहते थे, भारतीय संस्कृति की दिग्विजय!

    -डॉ. मोहनलला गुप्ता

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