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  • देश की वर्तमान चुनौतियाँ और उनके समाधान में साहित्य की भूमिका

     03.06.2020
    देश की वर्तमान चुनौतियाँ और उनके समाधान में साहित्य की भूमिका

    साहित्य का सामर्थ्य देखना है तो हमें रामचरित मानस की ओर देखना चाहिए। साढ़े चार शताब्दियों से यह ग्रंथ करोड़ों भारतीयों को जीवन जीने की दिशा एवं जीवन जीने का सम्बल देता आया है। कदाचित ही कोई भारतीय होगा जिसे राम-चरित मानस की दो-चार चौपाइयाँ याद नहीं हों।


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    सहितस्य भावः साहित्यम्। जिसमें ‘‘सहित’’ अर्थात ‘‘जुड़े हुए’’ का भाव हो, उसे साहित्य कहते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है साहित्य किसे जोड़ता है ? इसका व्यावहारिक उत्तर यह है कि साहित्य शब्दों और भावों को साथ लेकर, समाज को जोड़ता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि साहित्य, समाज की टूटन को दूर करने, मनोमालिन्य को दूर करने, मनुष्य का बुद्धि विवेक जाग्रत करके मनुष्यों को एक दूसरे के निकट लाने के लिए रचा जाता है। निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जो समाज या देश, साहित्य से वंचित होता है, वहाँ के नागरिक एक दूसरे से जुड़े हुए नहीं होते हैं। वहाँ के नागरिकों में विद्वेष एवं विच्छिन्नता का भाव होता है, वहाँ के लोग एक दूसरे के हित की कामना से इकट्ठे नहीं होते हैं।


    निःसंदेह भारत भूमि सभ्यता के उषा काल से ही ऐसे साहित्य से समृद्ध रही है जो समाज के लिए योजक ऋज्जु का कार्य करता आया है। ‘‘सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।’’ जैसी प्रार्थनाओं के माध्यम से हमने साथ-साथ पोषण, संरक्षण एवं ज्ञान प्राप्त करने की कामना की। इस प्रकार साहित्य ने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की भावना का प्रसार किया। जिस समय देश मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा पीड़ित था, उस समय भी देश की निर्धन और वंचित जनता, भारतीय संतों द्वारा रचे गए विपुल सद्-साहित्य का अवलम्बन लेकर ना-ना प्रकार के संकटों को सहन करती रही और अपनी जीवन नैया को मजबूती से खेती रही। इसी सद्-साहित्य से प्रेरणा लेकर लोग सिर कटवाते रहे किंतु मानवीय मूल्यों को मजबूती से पकड़े रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय ‘‘वन्दे मातरम्‘‘ तथा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’’ जैसे गीत कोटि-कोटि भारतीयों को विदेशी सत्ता से संघर्ष की प्रेरणा देते रहे।

    दुर्भाग्य से लोकतंत्र के 70 वर्षों की लघु अवधि में ही भारत की धर्म प्राण जनता सद्-साहित्य से वंचित होकर विभ्रम की स्थिति में पहुंच गई दिखाई देती है। चूंकि प्रत्येक समय के साहित्य में उस काल के परिवर्तनों और संस्कारों का चिह्न उपस्थित रहता है, इसलिए वर्तमान समय के साहित्य में भी ऐसा ही दिखाई दे रहा है। समय का परिवर्तन चिर शाश्वत है, इसे रोका नहीं जा सकता। इसी प्रकार समय की छाया साहित्य में दिखाई देगी ही, इसे भी रोका नहीं जा सकता। इसी को साहित्य का विकास एवं परिवर्तन कहा जा सकता है। आज कतिपय राजनीतिक दलों के बीच चल रहा सत्ता का संघर्ष, लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्द्धा के स्थान पर वैचारिक एवं व्यक्तिगत विद्वेष का रूप लेकर जनता में कुटता का वातावरण बना रहा है। इसलिए स्वाभाविक है कि साहित्य में भी वह कड़वाहट पूरे जोश के साथ उतर आई है।

    इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमें कुछ समस्याएं विरासत में मिलीं जिनमें जनसंख्या की अधिकता, समाज की निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी और साम्प्रदायिक विद्वेष प्रमुख हैं। ये समस्याएं आज भी न केवल ज्यों की त्यों बनी हुई हैं, अपितु विकराल रूप धारण करके गंभीर चुनौतियां बन गई हैं। भारत की स्वतंत्रता के साथ ही भारत की पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर एक साथ दो मुस्लिम राष्ट्रों का उदय होना भारत के लिए नई समस्याएं लाने का कारक बना। धर्म के आधार पर देश के तीन टुकड़े हुए। देश की धरती और संसाधन बंट गए किंतु देश के दोनों तरफ से भारत में जनसंख्या की घुसपैठ रुकने का नाम नहीं ले रही। फलतः देश के आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता ही चला गया तथा जनता में बेरोजगारी दिन प्रति दिन बढ़ती चली गई। बेरोजगारी के कारण समाज में हताशा, अपराध, हिंसा तथा लूट की प्रवृत्ति भी बढ़ी। हाल ही में रोहिंग्या मुसलमानों के भारत में बड़ी संख्या में आगमन से भारत की बढ़ती हुई चिंताएं इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिस राजनीतिक दल को सत्ता मिली उसने इन समस्याओं की जड़ों पर प्रहार नहीं किया। अपितु अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण के नाम पर तुष्टिकरण की नीति अपनाई और मतों का संतुलन अपने पक्ष में करके येन-केन-प्रकरेण स्वयं को सत्ता में बनाए रखा। तुष्टिकरण की नीति के कारण भारत की धर्म प्राण बहुसंख्यक प्रजा का वैचारिक दमन किया गया। मूल संविधान में परिवर्तन करके हिन्दुओं पर धर्म निरपेक्षता का भाव थोपा गया। इसकी आड़ में भारत के सद्-साहित्य को विलुप्त किया गया। संविधान से रामायण तथा महाभारत के दृश्यों वाले चित्र हटाए गए। स्कूली पाठ्यक्रमों से नैतिक शिक्षा देने वाले नायकों को हटाया गया, उनका चरित्र-हनन किया गया। अकबर को महानायक एवं विजेता तथा महाराणा प्रताप को पराजित स्थानीय राजा बताया गया। छत्रपति शिवाजी को लुटेरा तथा गुरु तेग बहादुर को डाकू सिद्ध करने के कुत्सित प्रयास किये गए। यहाँ तक कि भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों का मार्ग भी गलत बताया गया। इसी प्रकार सती, सावित्री, सीता, अनुसुइया जैसी नारी चरित्र जो समाज में नैतिकता का संचार करते थे, वे हमारी पीढ़ियों से दूर कर दिए गए।

    आज देश के समक्ष मुंह बाए खड़ी चुनौतियों का यदि सबसे बड़ा कोई कारण है तो वह है- सद्साहित्य से दूर हो जाने के कारण नीति, धर्म और त्याग की भावना से लगभग वंचित हो चुकी हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी उदर-पूर्ति को ही एक मात्र समस्या मानकर उसी में उलझ कर रह गई है। एक ओर बेरोजगारी तथा दूसरी तरफ सद्साहित्य, धर्म और नीति से दूरी। यह कोढ़ में खाज उत्पन्न हो जाने जैसी स्थिति है। रामचरित मानस, श्रीमद्भगवत गीता जैसा विपुल एवं श्रेष्ठ साहित्य समाज से छिन सा गया है। सूर, कबीर और मीरां के पद अब नई पीढ़ी की जिह्वा पर नहीं हैं जो कदम-कदम पर मनुष्य का पथ-प्रदर्शन करते थे। सद्साहित्य से दूरी का प्रभाव हम आए दिन देश की सड़कों से लेकर घरों, स्कूलों, सरकारी संस्थानों एवं हर स्थान पर देख रहे हैं। समाज में हत्यारे, लुटेरे, बलात्कारी लोग बढ़ रहे हैं। वे लोग छोटे-छोटे बच्चों, वृद्धों और स्त्रियों के विरुद्ध जघन्य अपराध करने में किंचित भी नहीं हिचकते। जीवन के कष्टों की इस तपती लू से भारत की प्रजा झुलस रही है तथा शीतलता प्राप्त करने के लिए ढोंगी साधुओं के चंगुल में जाकर फंस रही है। देश में ढोंगी साधुओं की एक पूरी जमात पैदा हो गई है जो धर्म और अध्यात्म के मूल तत्व से अपरिचित आम भारतीय को अपने भौण्डे संगीत, मादक नृत्य और मीठी बातों से बहला-फुसला कर उनका शोषण कर रही है।

    देश का साहित्य राष्ट्रीय गौरव से अनुप्राणित होना चाहिए तथा उसके केन्द्र में हमारे वास्तविक नायक होने चाहिए। साहित्य नीति और धर्म के सिद्धांतों को सरल करके समझाने वाला होना चाहिए जिसके मूल में मानव मात्र एवं प्राणी मात्र के प्रति संवेदना का भाव होना चाहिए। साहित्य मनुष्य को निश्छल, कपट रहित, सरल एवं संतुलित बनाने वाला होना चाहिए जिसके मूल में त्याग, वीतराग और सम्पूर्ण सृष्टि की मंगल कामना का भाव होना चाहिए। ऐसा साहित्य पढ़ने वाले लोग ही देश के समक्ष मुंह बाए खड़ी चुनौतियों का सही ढंग से सामना कर सकेंगे और उनका ऐसा समाधान ढूंढ सकेंगे जो अधिक से अधिक लोगों के लिए सुख का कारक बन सके।

    दुर्भाग्य से आजादी के बाद हमारे देश में साहित्य के नाम पर कुण्ठाएं परोसने वाला साहित्य वृद्धि को प्राप्त हुआ। क्रिकेट, सिनेमा, बाजार के हितों का पोषण करने वाले साहित्य की बाढ़ आई हुई है। भौण्डा काव्य चुटुकलों के रूप में परोसा जा रहा है। सोशियल मीडिया ने कोढ़ में खाज का काम मरते हुए भ्रामक, गलत एवं दिग्भ्रमित करने वाले साहित्य का तेजी से प्रसार किया है। युवा पीढ़ी अपना अधिक समय फेसबुक, व्हाटसैप, लिंकडन, ट्विटर तथा इंस्टाग्राम आदि सोशियल साइट्स पर व्यतीत करती है जिन पर अच्छा साहित्य बहुत कम उपलब्ध है किंतु ये साइट्स हल्के-फुल्के मनोरंजन से आप्लावित हैं। पोर्नोग्राफी की बहुत सी साइट्स हैं जिन पर बहुत से युवा अपना समय व्यर्थ करते हैं और विकृत मनोवृत्ति में पहुंचकर छोटे-मोटे अपराधों की तरफ मुड़ते हैं। बचपन से ही दी गई सद्साहित्य अध्ययन की प्रेरणा युवाओं को इस स्थिति से बचा सकती है।

    आज पूरी दुनिया में हथियारों की होड़ मची हुई है तथा पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया जैसे देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं। दुर्भाग्य से परमाणु शक्ति से सम्पन्न चीन, साम्राज्य विस्तार की लिप्सा से ग्रस्त होने के कारण भारत से शत्रुवत् व्यवहार करता आया है। रूस और अमरीका जैसी महाशक्तियां भी अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत के राजनीतिक दलों को प्रशासनिक परिपक्वता, धैर्य, धर्म तथा युद्धनीति की जानकारी होने की आवश्यकता है किंतु दुर्भाग्य से संसद में विपक्ष में बैठे बहुत से राजनीतिक दल इस परिपक्वता से वंचित हैं। वे क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के वशीभूत होकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देश की सरकार के विरुद्ध विष वमन करते हैं। यदि इन राजनीतिक दलों के नेताओं ने बचपन से ही सद्साहित्य एवं राष्ट्रीय चिंतन से प्रेरित साहित्य का अनुशीलन किया होता तो निःसंदेह उनमें परिपक्वा होती और वे देश को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बदनाम करने का दुःसाहस नहीं करते तथा देश के भीतर जिस अशांति का वातावरण वे मचाए रखते हैं, उसके स्थान पर परिपक्व राजनीति करते। इससे देश का अधिक हित होता।

    सार रूप में कहा जा सकता है कि यदि देश के पास अच्छा साहित्य होगा तथा जनता उस साहित्य का अनुशीलन करेगी तो देश की बहुत से समस्याओं का समाधान सरलता से करना संभव होगा।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    (अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 15वें त्रैवार्षिक सम्मेलन के अवसर पर प्रकाशित हिन्दी पत्रिका साहित्य परिक्रमा के ‘‘साहित्य का सामर्थय’’ विशेषांक में प्रकाशित आलेख )



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