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  • 'वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...'

     03.06.2020
    'वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...'

    वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    दीप्ति कुलश्रेष्ठ के सद्यप्रकाशित औपन्यासिक स्मृति-आख्यान की अंतर्ज्ञानानुशासनिक प्रासंगिकता 'वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...' –- यह शीर्षक सीधे तौर पर सुराग देता है कि इसके केन्द्रीय पात्र से संबंधित उपलब्ध विस्तृत आख्यान के हवाले से हमारे लिये उसकी शख्सियत का मनोमितीय अध्ययन कर पाना संभव हो । शख्सियत के मापन के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिये विख्यात रेमंड कैत्टेल ने अपने अध्ययन हेतु तीन स्रोतों से जुटायी गयी सामग्री को आधार बनाया था — एक, दूसरों द्वारा किया गया अध्ययन के केंद्र शख्स के जीवन का अवलोकन; दो, उस शख्स द्वारा खुद ही के बारे में दिए गए उसके स्वयं के बयानात और; तीन, वस्तुनिष्ठ परीक्षण जिनसे कि उस शख्स की बुद्धिमत्ता, उसकी संवेद्य होने की गति और अन्य ऐसी ही बातों का व्यावहारिक रूप में पता चलता हो । ज्ञातव्य है कि यह ग्रंथ ये तीनों ही प्रकार की सामग्री अपने में समेटे है । अतः शख्सियत के मापन से जुड़े अंतरज्ञानानुशासनिक शोध के लिये बेहतरीन मौका यह अपने पाठक को देता है । अगर हम कोस्टा और म्क्क्राए द्वारा विकसित किये गए व्यक्तित्व के पंचकारकीय प्रतिरूप को अपनावें तो पायेंगे कि प्रत्येक कारक को उद्घाटित करने वाले बहुतेरे दिलचस्प किस्से और बातें इस ग्रंथ में मौजूद हैं । जैसे कि इस प्रतिरूप में व्यक्तित्व का एक मूलभूत आयाम है— कर्त्तव्य-निष्ठा । इस व्यक्तित्वीय आयाम का बेहतरीन उदाहरण ग्रंथ में बतलाया गया १९४२ के देश-व्यापी स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ा वह वाकया है जिसमें अंग्रेज़ सिपाही की गोली से शहीद हुए अपने मित्र का पार्थिव बिजली की फुर्ती से अपने कंधे पर लादकर जीवनी-नायक तेज़ी से गंगा-घाट की तरफ भाग निकलता है, भागते हुए खुद की पिंडली में गोली लगने पर भी वह किसी तरह अपना दर्द ज़ब्त करके पार्थिव को उठाये रखता है और आखिर में अंग्रेज़ सिपाहियों की आँखों में धूल झोंकता हुआ चोटिल हालत में गंगा में तैरकर अमर शहीद के पार्थिव को गंगा-पार ले जाकर उसका दाह-संस्कार करके, मित्र के पार्थिव को अंग्रेजों के हाथों में न पड़ने देकर मृत्यूपरांत भी, उसके आत्म-सम्मान की रक्षा करने के दायित्व में सफल होता है । लेकिन यह दायित्व-निर्वाह यहीं पर बस नहीं होता; अगले ही दिन से वह छद्मनाम से छिपते-छिपाते गुप्त नेताओं और खुले क्रांतिकारियों के बीच संदेशवाहक का कार्य करने लगता है ।

    इन क्रान्तिकारी गतिविधियों के दरमियान एक बार जब फोन पर बात होने पर ग्रंथ-नायक के पिता जीवन को जोखिम में डालने के प्रति अधिक नाराज़गी जतलाते हुए उसे लौट आने के लिये कहते हैं तो वह उनसे कहता तो कुछ नहीं है, चुपचाप उनकी नाराज़गी को सहन कर लेता है... लेकिन, अपनी रक्त-रंजित कमीज़ जिस पर उसके उसी शहीद मित्र का रक्त था, जो उसके मित्र के रक्त से पूरी तरह रंजित थी जिसे उसने अब तक अपने ब्रीफ़केस में संभालकर रखे हुए था, जिस रक्त के निशान को उसने साफ़ नहीं किया था, अपनी वही कमीज़ पार्सल द्वारा घर भेज देता है । और, जैसा कि लेखिका बतलाती हैं, यह पार्सल पाने के बाद उससे 'लौट आओ' कहने की हिम्मत परिवार में किसी की नहीं हुयी ।

    लोगोथेरेपी के प्रवर्तक विक्टर फ्रान्क्ल ने अपने संस्मरणों में एक जगह लिखा है कि बौद्धिक अथवा मानसिक सम्पदा से संपन्न व्यक्तियों को अपनी संवेदनशीलता की वजह से जीवन की दुर्भाग्यपूर्ण विषम परिस्थितियों में भले ही अधिक तकलीफ और वेदना के अहसास से गुज़रना पड़ता हो लेकिन उन्हें भीतरी क्षति अपेक्षाकृत कम पहुँचती है । उनके अनुसार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे बाहरी वैषम्यपूर्ण परिस्थितियों की परिधि लांघकर अपने भीतरी वैभव और आध्यात्मिक स्वतंत्रता में विचरण कर पाते हैं । इस ग्रंथ का नायक हमें इस तरह विचरण करता हुआ कई जगह नज़र आता है; उसकी संगीत- विशेषज्ञता, भाषिक क्षमता व साहित्यिक प्रतिभा उस मानसिक सम्पदा का हिस्सा मालूम होते हैं जिसकी बदौलत वह भीतरी क्षति से खुद को बचाता है । इसका एक दृष्टान्त हमें उसकी उस कविता में सहज ही देखने को मिलता है जिसका प्रारंभिक परिच्छेद तो कुछ इस तरह है कि, “मैं गिर पड़ा, सिर फट गया / हा ! रक्त झरझर बह रहा है । / देखना अब तुम न आना ! / मैं भयानक हो उठा हूँ-- / वेदना की आत्म-विस्मृति में-- / न जाने क्या कहूँ मैं । / भूलकर कुछ कटु कहूँ मैं- / और तुम को ठेस पहुंचे...” । और इस कविता का अंतिम परिच्छेद अब देखिये, “मैं हंसा उस पीर में भी, / आह ! यदि मैं देख पाता ! / क्यों भला उपहास जग का / और मन कि ग्लानि सहता / मैं स्वयं ही गिर पड़ा, / इसमें किसी का दोष क्या है ? / सत्य जो तुमने कहा-- / “कोई किसी का क्या बिगाड़े ?” ” । इस कविता में कोई अलंकार प्रयुक्त नहीं हुआ है किन्तु उन्नीस वर्ष के युवा ने अपनी अंतर्मुखी चेतना में अंतर्वैयक्तिक बहिर्मुखी संवाद साधते हुए अपने भीतर सुलगी हिंसा के शमन का महान सांस्कृतिक कार्य अवश्य सम्पादित किया है । व्यक्ति-केन्द्रित चिकित्सा के प्रवर्तक कार्ल रोजर्स का मत है कि अपनी भावनाओं को शिद्दत से महसूस कर पाना, भावनात्मक अनुभव के प्रति खुले होना और उसमें ज़िन्दगी के मानी का स्रोत देखना— ये ज़ेहनी तंदुरुस्ती के निर्णायक-तत्त्व हैं । मेरी समझ में लेखिका ने ग्रंथ के नायक श्री सुधीन्द्र कुमार का जो साहित्य-कर्म उनकी लाल-ज़िल्द वाली डायरी से उद्धृत किया है उसे इस व्यक्तित्वीय आयाम की नज़र से भी देखा जाना चाहिये न कि इस सीमित दृष्टि भर से कि उनकी रचनाओं पर तात्कालिक छायावादी प्रभाव है।

    लगाव-सिद्धांत की नींव रखने वाले जॉन बोल्बी का कहना है कि, सरपरस्त, जो कि बालक के लगाव का मरकज़ होता है, उसके साथ होने वाले अंतर्व्यवहार नींव बनाते हैं उसकी स्वयं और दूसरे से जुड़ी उन धारणाओं की जो बाद में बनने वाले रिश्तों में उसके आंकलनों, अपेक्षाओं, और बरतावों को निर्देशित करती हैं । इस तरह, दीर्घकालिक वयस्क द्वय-बंधों में भूमिका निभाने वाला लगाव-तंत्र, दरअसल, पालने से लेकर कब्र तक सक्रिय रहता है । यहाँ उल्लेखनीय है कि अपनी एक कविता में ग्रंथ-नायक ने अपने जीवन में अनुराग के बंधनों के आत्यंतिक महत्त्व को, अपनी स्वयं के मुत्तलिक इस धारणा को कि वह अनुराग का प्रबल दावेदार होने के साथ-साथ उसे बांटने का भी सक्षम अधिकारी है और जिससे लगाव है उसकी अपने लिये उपलब्धता और अनुक्रियाशीलता की धारणा को— लगाव-मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से सर्वथा प्रासंगिक इन सभी चीज़ों को— काव्यानूदित किया है । यह अनूठी कविता जिसका शीर्षक है, “कौन लेगा प्यार मेरा?”, पृष्ठ २७ पर है । इस कविता से सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ग्रंथ-नायक यानी लेखिका के पिता की लगाव-शैली लगाव-सैद्धांतिक ज़ुबान में 'सुरक्षित महसूस करने वाली' किस्म की थी ।

    खैर, अब ज़रा बात की जाये आज़ादी के बाद के परिदृश्य की । बहिर्मुखता के व्यक्तित्वीय आयाम के वृक्ष की एक शाखा समझी जाने वाली जो साहसिक वृत्ति, १९४७ से पूर्व देश के स्वतंत्रता-संग्राम में इस ग्रंथ के नायक को प्रवृत्त रखती है, वही आधार बनती है १९४७ के बाद में आज़ाद भारत के नवनिर्माण में उसके विरले और करिश्माई योगदान की । १९५३ में आर.पी.एस.सी. से चयनित होने के बाद लगभग पांच वर्ष की अल्पावधि में प्रिंसिपल के पद पर कार्य करते हुए इस शख्स के तकरीबन इतनी ही संख्या में मुख्तलिफ़ इंटरमीडिएट कोलेजों में तबादले हुये । पहली नियुक्ति हुयी— नहीं, हुयी नहीं— बल्कि प्रस्तावित होने पर उसने सहर्ष स्वीकार की वह भी उस कोलेज में जिसके उद्दंड छात्रों ने उससे पूर्व के किसी प्रिंसिपल की अंगुलियाँ सिर्फ़ इसलिए काट डालीं कि उसने उनकी अंकतालिका में उनके मनोनुकूल संशोधन करने से इनकार कर दिया था; अपने प्राण जोखिम में डालकर वहाँ जाने के लिये कोई तैयार नहीं था । इन अक्खड़ चाकूबाज़ छात्रों बनाम ज़हीन लेकिन मिलिट्री की आधिकारिक ट्रेनिंग प्राप्त कर चुके प्रिंसिपल का जो रोचक मुकाबला हुआ होगा उसके परिणाम की एक झलक पेश करने के लिये वह वाकया काबिल-ए-ज़िक्र है जो इस कालेज का कार्य-काल समाप्त होने के चौदह वर्ष बाद घटता है और जिसे लेखिका ने इस ग्रंथ के मरकज़-ए-दास्ताँ हुए शख्स यानी अपने पिता की 'अप्रतिम उपलब्धि' के शीर्षक से लिखा है, पृष्ठ २९७ पर । होता यूँ है कि एक दीपावली की सुबह, नायक के घर अप्रत्याशित रूप से मिलिट्री के दो नौजवान ऑफिसर्स आते हैं । नायक का विस्मयपूर्ण अपरिचय भाव देखकर उन ऑफिसर्स में से एक कहता है,

    “सर...आप तो हमें नहीं पहचाने होंगे और पहचानने का सवाल ही नहीं उठता । कई साल हो गए और इस बीच हम लोगों का कायाकल्प भी हो गया...लेकिन सर सिर्फ़ आपकी बदौलत !.... “सर ...यह हरपाल सिंह ...जिसने आप पर सुबह ही सुबह पूजा करते वक़्त चाकू ताना था ....। और सर मैं वही गुरमीत सिंह हूँ....जो मिठाई के टोकरे में रूपये रखकर लाया था और उसे न लेने पर सर ....आपको चाकू मारना चाहता था ....! सर आपने ही तो हम जाहिलों को इंसान बनाया है.... । हम आपको तो कभी भूल ही नहीं पाए और न कभी जीवन में भूलेंगे । इसलिए हमें जैसे ही मालूम पड़ा कि आप आजकल यहीं हैं.... हम आपसे मिलने आ गए |”

    पहली छाप ही अंतिम हुयी और इस तरह इसके बाद की लगभग हर नियुक्ति एक अभियान के तहत होने लगी जिसे चुनौतियों के लिये खुले होने के अपने स्वभाव की वजह से ही वह स्वीकारता चला गया; एक कोलेज के अपसांस्कृतिक और अराजक माहौल को सुधारने के अभियान के सफल होते ही, इस शख्स को दूसरे के लिये स्थानांतरित कर दिया जाता । १९५३ से लेकर १९५८ के काल-खंड में उसके पांच इंटरमीडिएट कोलेजों के कार्यकाल का जो आख्यान लेखिका ने प्रस्तुत किया है वह इसलिये भी बेशकीमती है कि इसमें दरअसल पांच तरह के अपसांस्कृतिक विद्यालयी परिवेशों की मरम्मत करने के लिये पांच ही तरह के मुख्तलिफ़ और शानदार औज़ार-बंद या औज़ार-बक्से पाठक को मिलते हैं; हर औज़ार-बंद का हरेक औज़ार गढ़ा गया है शख्स-ए-मरकज़-ए-दास्ताँ के नेतृत्वपूर्ण प्रबंधकीय कौशल, अंतर्वैयक्तिक मनोवैज्ञानिक पकड़, सांस्कृतिक सूझ और कदाचित्, उनसे भी बढ़ कर के उस शख्स की न्याय, सत्य, व्यवस्था, सौंदर्य और सृजनात्मकता के मूल्यों के लिये प्रतिबद्धता से । उदाहरण के लिये यहाँ एक दिलचस्प गैर-पारंपरिक औज़ार का ज़िक्र मुनासिब होगा— हमने आमतौर पर जैसे कि देखा और सुना है, विद्यालयी प्रबंधन के लिये नवयुवाओं का विपरीत-लैंगिक आकर्षण एक सिरदर्द, एक बड़ी अनुशासनिक चुनौती रहता है... लेकिन, ग्रंथ का नायक, इसके उलटे, इस आकर्षण का प्रयोग एक कोलेज में अनुशासन कायम करने के लिये सफलतापूर्वक करके दिखलाता है । यह कैसे किया होगा, उत्तर है इस ग्रंथ में । कहना होगा कि लेखिका के तात्त्विक निरूपण-कौशल की वजह से ही प्रबंधन और संस्कृतिशास्त्र के अन्तरज्ञानानुशासनिक विषयों से जुड़ी संगठन के सांस्कृतिक नियमन की कम-से-कम पांच तफ़सीली केस-स्टडीज़ पाठक को मिलती हैं । व्यावहारिक जगत में अचूक साबित होने वाले सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक औज़ारों को गढ़ने की प्रतिभा का गहरा रिश्ता अवश्य होना चाहिए कारीगर की भाषिक क्षमताओं के साथ, इस परिकल्पना की बहुत दृढ़ प्रतीति काफ़ी सहजता से उभर आती है इस ग्रंथ को पढ़ते वक्त । संज्ञानात्मक लक्षण वैज्ञानिक जॉर्डन ज्लातेव के २०१४ में प्रकाशित शोध-पत्र में उन्होंने यह निष्पादित किया है कि मनुष्य की भाषिक क्षमताओं के उद्विकास की गुत्थी जिसे सुलझाने के लिये जैविक आनुवांशिक चयन का सिद्धांत पर्याप्त नहीं है, इस क्रम-वैकासिक पहेली का हल छुपा है अंतर्वैयाक्तिकता और नैतिकता के उद्विकास के साथ भाषिक उद्विकास के सह-सम्बन्ध में । तो, यह एक और अन्तरज्ञानानुशासनिक विषय है जिसके लिये यह ग्रंथ एक महत्त्वपूर्ण केस-स्टडी की सामग्री पाठक को देता है ।

    बहरहाल, १९५३-१९५८ के बीच के कार्यकाल के दौरान इस शख्स द्वारा किये गए सांस्कृतिक सर्जनात्मकता के बेहतरीन मुज़ाहरा को पढ़ते हुए पाठक के मन में अगर यह ख्याल उठे कि शायद इतनी मशक्कत और जांबाज़ी उसने अपनी आत्म-सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये करी हो तो अगले ही अध्याय में १९५९ का एक ऐसा वाकया पेश किया गया है जो यह भ्रम तोड़ देता है । होता कुछ यूँ है कि उसके काम की प्रशंसा करने वाले मुख्यमंत्री महोदय के स्वयं द्वारा दबाव बनाने के उपरांत भी हमारा नायक छोटी कक्षा के बच्चों के लिये अपनी परवाह और राजनैतिक स्वार्थ के लिये उन बच्चों का दुरुपयोग न होने देने के अपने फैसले, दोनों से डिगता नहीं है, फिर चाहे उसकी नौकरी पर ही क्यों न बन आये । अभी हाल ही में ग्रेगोरी बर्न्स आदि ने मानव-मस्तिष्क की 'न्युरोइमेगिंग' की मदद से की गयी शोध द्वारा यह निष्पादित किया है कि हम अपने उन मूल्यों और रवैयों में, सामाजिक दबावों अथवा प्रलोभनों के रहते भी, फेरबदल नहीं कर पाते हैं जो हमारी अपनी आत्म-अवधारणा के लिये प्रासंगिक होते हैं । यानी कि, नन्हें विद्यार्थियों को धूप, प्यास व शारीरिक थकान से बचाने की परवाह और न्याय-निष्ठा इस शख्स की अपनी आत्म-अवधारणा के लिये प्रासंगिक थे— ये महज़ उसके पेशे से जुड़े उसके रोज़मर्रा के कामों का हिस्सा नहीं थे ! इंसानी ज़रूरतों और अभिप्रेरणाओं पर महत्त्वपूर्ण शोध करने वाले अब्राहम मैस्लो ने ऐसी शख्सियत को 'self-actualizing person' अर्थात् 'आत्म-चरितार्थी व्यक्ति' के नाम से पुकारा है और कहते हैं कि शोध के जुनून में 'सेल्फ-एक्चुअलाइज़िन्ग' व्यक्ति की तलाश में उसने कई सारे उपन्यास और जीवनियाँ पढ़ डाले थे; उसे मिला था या नहीं, पता नहीं, पर इस ग्रंथ के पाठक को बड़ी सजीवता के साथ मिलेगा, यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है । इस वाकये से पहले हमने एक अन्य की चर्चा की थी जिसमें अपने पिता के घर लौट आने का दबाव बनाने के बावजूद युवा नायक नहीं सुनता और रक्त-रंजित कमीज़ घर भेज देता है । ये दोनों वाकये मूल्य-निर्वाह के पथ में पारिवारिक या सामाजिक दबाव के आगे न झुकने के उम्दा उदहारण हैं । साथ ही, फलनिरपेक्षतावादी नैतिकता-शास्त्र के लिये इनकी दृष्टान्तिक प्रासंगिकता की ओर तथा इन दृष्टान्तों के हवाले से फलनिरपेक्षतावादी नैतिकता-शास्त्र की सामाजिक प्रासंगिकता की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं ।

    भारतीय मनोविज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय 'जर्नल' में २०१५ के प्रथम तिमाही अंक में, 'पिता-पुत्री के लगाव की शैली और उसका पुत्री के विकास पर प्रभाव', इस शीर्षक से छपे अपने शोध-पत्र में नैना जैन बतलाती हैं कि मानवीय संबंधों के क्षेत्र में पिता-पुत्री द्वय पर लगाव की शैली के नज़रिए से काफी कम शोध हुयी है । ऐसे में यह ग्रंथ, जिसमें पुत्री ने अपने लगाव के केंद्र, पिता, की जीवनी के साथ-साथ उनके सान्निध्य में जिए खुद के जीवन की स्मृति का आख्यान भी प्रस्तुत किया है, एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है लगाव-मनोवैज्ञानिक अध्ययन का । लेखिका ने जो भाव-गहनतापूर्ण शब्द-चित्र जीवनी के नायक के अपने छात्रों से मुखातिब होने के, उनसे जुड़ने के उकेरे हैं, उस प्रचुर सामग्री के आधार पर और उस जुड़ने के अंदाज़ की अप्रतिम सफलता की गारंटी द्वारा शिक्षक-छात्र द्वय पर भी बोनस विषय के रूप में यह ग्रंथ लगाव-मनोवैज्ञानिक शोध का विरल व रोचक आमंत्रण देता है ।

    एक बिंदु जो लगाव-मनोविज्ञान के अन्तरज्ञानानुशासनिक नज़रिए से उभर कर आता है वह यह है कि लेखिका ने जो शीर्षक रखा है ग्रंथ का, “वो कौन शख्स था जो भर गया मुझ में... ”, यह शीर्षक कम-से-कम लगाव-मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से तो अपने लगाव को ज़ाहिर करने का एक शायराना अंदाज़ भर नहीं है । लगाव-मनोवैज्ञानिक साहित्य में इस बात के अच्छे-खासे प्रयोगसिद्ध साक्ष्य हैं कि सरपरस्त के साथ होने वाले शुरूआती वर्षों के तालुकात के दौरान ही नन्हें बालक या बालिका में सरपरस्त ही की लगाव-शैली का हस्तांतरण हो जाता है; और, इस हस्तांतरण में अनुवांशिकी की भूमिका गौण मानी गयी है । आपको याद होगा, एक कविता के लगाव-मनोवैज्ञानिक चारित्रिक विश्लेषण द्वारा हमने यह स्थापित किया था कि लेखिका के पिता की जुड़ने की शैली सुरक्षित महसूस करवाने वाली किस्म की है । तो, यही किस्म फिर हस्तांतरण वाली बात के हिसाब से लेखिका की भी होनी चाहिए (और लेखिका की दादी की भी !) । इस किस्म की व्यक्तिगत में निहित सामजिक उपादेयता के उदहारण के तौर पर ध्यातव्य है कि मात्र इक्कीस वर्ष की उम्र में ही अपने पिता को खो देने के बाद भी लेखिका अपने लेखकीय में यह कह पाती हैं, “ असीम की सत्ता में समाहित उस ज्योतिपुत्र को भले ही बरसों पहले अपने मोह के बंधनों से मुक्त कर दिया किन्तु हर कदम पर यह महसूस किया है कि वह अदृश्य रूप से मेरे साथ हैं । मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरे पास उनकी ऐसी वात्सल्यमयी स्मृतियों की अमूल्य निधि है । ” ज़ाहिर है, दृश्य रूप में साथ महसूस करने की पर्याप्त पुनरावृत्ति के उपरांत ही अदृश्य रूप में भी अपने पिता का साथ महसूस किया जा सका होगा । साथ ही, अकेला छूटने के बाद भी अपने भाग्य का सकारात्मक मूल्यांकन निश्चित रूप से सुरक्षित महसूस करने वाली लगाव-शैली का सूचक है । इस उद्धरण में यह महत्त्वपूर्ण सूत्र छुपा है कि एक सीमा तक ही लगाव के पात्र व्यक्ति की भौतिक निकटता अनिवार्य रहती है, उसके बाद केवल सुरक्षित महसूस करने का भाव काफ़ी होता है । अपने २००५ के शोधपत्र में ली कर्कपैट्रिक ने प्रस्तावित किया है कि प्रायः व्यक्ति अपनी शुश्रूषा करने वाले अभिभावक से जुड़ने की लगाव-शैली में ही ईश्वर, प्रकृति या अस्तित्व से भी जुड़ते हैं । यह बात सुरक्षित महसूस करने वाली किस्म की आध्यात्मिक उपादेयता बतलाती है। उल्लेखनीय है कि इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण ग्रंथ में पृष्ठ ४६ के प्रथम परिच्छेद में नायक द्वारा अपने अज्ञातवास में लिखे गए पत्रों में से एक की इन पंक्तियों में है— “वहाँ बहुत तेज़ शहद जैसी गंध फ़ैली हुई थी । घने जंगल के बीच एक तरफ कुछ ढलान पर उतरती हुई पगडण्डी थी जिस पर छितरी हुई हरी-हरी घास थी । सोचा कि अगर उस पगडण्डी पर चलूँ तो जाने कहाँ ले जाएगी वह, सबसे दूर .....! शायद किसी ऐसी दुनिया में जहाँ क्रूर हिंसा न होगी । और मैं ऐसा ही कुछ सोचते हुए उस हरी-भरी पगडण्डी पर चल दिया । ऐसी जगह से अकेले गुज़रते हुए सुकून मिल रहा था । अंधकार मे पेड़ो के हिलते साये जैसे मुझ से बातें कर रहे थे । 'अंधकार के नीरव प्राणी करते मुझसे बात ....' । ” तो जो सुकून बचपन में बातें करके माँ देती थी, वह यहाँ घर से दूर युवा नायक को प्रकृति दे रही है । साथ ही, खुलेपन, खासकर दिवास्वप्न या फंतासी के प्रति वह खुलापन जिसे सौंदर्यशास्त्र में कला और सुंदरता के प्रति संवेदनशीलता के रूप में देखा जाता है, उसके उदहारण के तौर पर भी इस उद्धरण को देखा जा सकता है ।

    बहरहाल, संकट की घड़ी में जो शख्स सुरक्षित महसूस करने का सबब बनता है अगर उसी का साथ छूटने का संकट आ पड़े तो? उस वक्त, लगाव से अर्जित ऊर्जा का संचय किस तरह से काम आता है, इस ग्रंथ में मृत्यु के रूप में सामने आ पड़ने वाले दुर्निवार बिछोह की तकलीफ से गुज़रते और गुज़र कर उबरते असली पात्रों के यह बतलाने वाले कई मार्मिक आत्मकथात्मक आख्यान हैं जो इसे लगाव-मनोविज्ञान के नज़रिए से अतिविशिष्ट बनाता है ।

    हमारी स्मृति-आख्यान करने की और अहसासों के बारे में सोचने की क्षमताओं से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण सूत्र लगाव-सिद्धांत देता है जो साहित्यिक सृजन के लिये भी प्रासंगिक है । १९९१ में, मेरी मेन ने १०-११ वर्ष की उम्र के बच्चों से उनकी आत्मकथा ज़ुबानी बयान करने के लिये कहा; निष्कर्ष यह निकला कि जिन बच्चों की लगाव-शैली सुरक्षित महसूस करवाने वाली किस्म की थी, उनके आख्यान के सभी हिस्से, अन्यथा किस्म की लगाव-शैली में वर्गीकृत बच्चों के मुकाबले, अधिक सुसंगतिपूर्ण थे, अपनी पुरानी यादों तक उनकी पहुँच ज्यादा थी, अपने प्रति जागरूकता और अपने अहसासों पर ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता भी उनमें अधिक थी । पृष्ठ ८८ पर लेखिका ने लिखा है कि अपनी साढ़े-तीन साल की आयु की स्मृतियाँ, उनके शब्दों में, “कुछ धुंधली, कुछ बहुत स्पष्ट झलकियाँ”, उनके ज़ेहन में आज भी उम्र के इस दौर में भी उतनी ही साफ़ कैसे हैं, इस पर खुद उन्हें भी आश्चर्य है । मेरी मेन के प्रायोगिक निष्कर्ष जानने के बाद 'आश्चर्य' की जगह सहज ही वैज्ञानिक पुष्टि का सुखद बोध ले लेता है । जहाँ तक सुसंगतिपूर्णता और अधिक आत्म-सजगता वाली बात है, इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि मेरी मेन शायद बतलाना चूक गयीं कि लगाव की स्वस्थ शैली से गुजरने वाले बच्चों के आख्यान में इनके अलावा अंतरंगता और रागात्मकता की भी बहुत गुंजाइश होती है ।

    पिछली सदी में जो साहित्य-साधना लेखिका ने करी, उसे राजस्थान के मूर्धन्य साहित्यकारों में से एक डॉ. विशम्भरनाथ उपाध्याय ने 'अलगाव के विरुद्ध लेखन' कह कर पुकारा था । कुछ उन्हीं की तर्ज़ पर कह सकते हैं कि इस सदी में और आगे बढ़ते हुए इस ग्रंथ की शक्ल में लेखिका ने 'लगाव के लिये लेखन' का बेशकीमती तोहफा अपने पाठकों को दिया है ।

    - मोहित कुलश्रेष्ठ,

    ईमेल : sdejdp123@gmail.com

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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