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  • जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

     04.01.2020
    जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

    विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च 2017 पर विशेष जनसंचार में वे सब विधाएं, संसाधन, उपकरण और तरीके आ जाते हैं जो निर्जन स्थान में सुईं गिरने की आवाज से लेकर शेर की दहाड़ तक को, देखते ही देखते विशाल जनसमूह तक पहुंचा सकें और जन-समुदाय, यह जानते हुए भी कि जो कुछ भी वह सुन, देख या पढ़ रहा है, वह उससे बहुत दूर कहीं घटित हुआ है किंतु

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  • 'वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...'

     04.01.2020
    'वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...'

    वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...

    दीप्ति कुलश्रेष्ठ के सद्यप्रकाशित औपन्यासिक स्मृति-आख्यान की अंतर्ज्ञानानुशासनिक प्रासंगिकता 'वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें...' –- यह शीर्षक सीधे तौर पर सुराग देता है कि इसके केन्द्रीय पात्र से संबंधित उपलब

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  • लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास

     04.01.2020
    लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास

    लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास


    गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर नामक गांव में हुआ। उनके जन्म एवं निर्वाण की तिथियों पर इति

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  • देश की वर्तमान चुनौतियाँ और उनके समाधान में साहित्य की भूमिका

     04.01.2020
    देश की वर्तमान चुनौतियाँ और उनके समाधान में साहित्य की भूमिका

    साहित्य का सामर्थ्य देखना है तो हमें रामचरित मानस की ओर देखना चाहिए। साढ़े चार शताब्दियों से यह ग्रंथ करोड़ों भारतीयों को जीवन जीने की दिशा एवं जीवन जीने का सम्बल देता आया है। कदाचित ही कोई भारतीय होगा जिसे राम-चरित मानस की दो-चार चौपाइयाँ याद नहीं हों।
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  • क्या सती, सावित्री एवं सीता कमजोर स्त्रियों की प्रतीक हैं ?

     04.01.2020
    क्या सती, सावित्री एवं सीता कमजोर स्त्रियों की प्रतीक हैं ?

    ‘‘सती, सावित्री, सीता और अनुसुइया भारतीय नारियों का गौरव हैं, जिनसे प्रेरणा लेकर भारतीय नारियां हजारों वर्षों से एक सहज-सुलभ जीवन-पथ का अनुसरण करती आई हैं, इन पौराणिक नारी चरित्रों पर आघात करके देश की नारियों को दिग्भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास भारतीय नारिय

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  • किशनगढ़ राजवंश की हिन्दी साहित्य को देन

     04.01.2020
    किशनगढ़ राजवंश की हिन्दी साहित्य को देन

       राजस्थान के ठीक मध्य में किशनगढ़ नामक एक छोटी सी रियासत थी जिसने 1605 ई. के आसपास आकार लेना आरंभ किया और 1611 ई. में वह पूरी तरह से स्थापित हो गई। इस रियासत के लघुकाय होने का अनुमान केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राजस्थान की सबसे बड़ी मारवाड़ रियासत का क्षेत्रफल 34,963 वर्गमील था जबकि

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  • हिन्दी साहित्य की कथेतर विधाएं

     04.01.2020
    हिन्दी साहित्य की कथेतर विधाएं

    हिन्दी साहित्य की दो शैलियाँ हैं- पद्य साहित्य और गद्य साहित्य। गद्य साहित्य के दो रूप हैं- कथात्मक गद्य और कथेतर गद्य। कथा गद्य की पांच प्रमुख विधाएं हैं- (1.) कहानी, (2.) उपन्यास, (3.) नाटक (4.) एकांकी तथा (5.) लघुकथा। कथेतर गद्य की दस प्रमुख शैलियां हैं- (1.) निबंध, (2.) रेखाचित्र, (3.) संस्मरण, (4.) यात्र

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  • किशनगढ़ की चित्रकला पर वल्लभ एवं निम्बार्क मतों का प्रभाव

     04.01.2020
    किशनगढ़ की चित्रकला पर वल्लभ एवं निम्बार्क मतों का प्रभाव

    किशनगढ़ की चित्रकला शैली विश्व भर में अपने अनूठेपन के लिये जानी जाती है। न केवल जनसमान्य में अपितु किशनगढ़ के राजवंश में भी चित्रकला के प्रति दृढ़ अनुराग रहा। यही कारण है कि जोधपुर एवं जयपुर जैसी बड़ी रियासतों के बीच में स्थित होते हुए भी किशनगढ़ जैसी अत्यंत छोटी रियासत में स्वतंत्र च

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  • संत-साहित्य में ईश्वरीय विषम व्यवहार का कारण

     04.01.2020
    संत-साहित्य में ईश्वरीय विषम व्यवहार का कारण

    ईश्वर में ना-ना प्रकार के गुण हैं, यदि वे गुण नहीं होते तो इस सृष्टि की रचना संभव नहीं हुई होती। ईश्वर में सृष्टि को उत्पन्न करने, पालन करने तथा उसका संहार करने की जो क्षमता है, उसे भी ईश्वर का गुण समझना चाहिए। इस बात में किसी को शंका नहीं होनी चाहिए कि ईश्वर नाम, रूप, उपाधियों के साथ-सा

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  • स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

     04.01.2020
    स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

    किसी भी राष्ट्र के तीन शरीर आवश्यक रूप से होते हैं- भौगोलिक शरीर, राजनीतिक शरीर एवं सांस्कृतिक शरीर। ये तीनों ही शरीर एक दूसरे में समाए हुए, एक दूसरे के पूरक और एक दूसरे के अन्योन्याश्रित हैं। इनमें से एक के क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट होने पर दूसरा एवं तीसरा शरीर स्वतः क्षीण, नष्ट अथवा प

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