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  • महाराजा अजीतसिंह के समय बना था मण्डोर का काला गोरा भैंरू

     01.09.2019
    महाराजा अजीतसिंह के समय बना था मण्डोर का काला गोरा भैंरू

     मंदिर भारतीय संस्कृति में देवी-देवताओं के दो तरह के स्वरूप मिलते हैं जिन्हें शास्त्रीय स्वरूप और लोक स्वरूप कहा जाता है।

    देवी-देवताओं के शास्त्रीय रूपों और लोकरूपों को पुनः दो प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है- सात्विक स्वरूप एवं तांत्रिक स्वरूप। इन दोनों रूपों में पर्याप्त अंतर होता है।

    सम्पूर्ण भारत में बड़ी श्रद्धा से पूजे जाने वाले देवता ‘भैरव’ के साथ ही ऐसा ही है जिनके दोनों रूपों अर्थात् सात्विक स्वरूप एवं तामसिक स्वरूप की पूजा होती है।

    भैरव का शास्त्रीय अर्थ होता है- भय का हरण करके जगत का भरण करने वाला।

    हिंदू धर्म में भैरव पूजा का प्रचलन आदिकाल से है। नाथ सम्प्रदाय में इन्हें भगवान शिव का पांचवां अवतार माना जाता है तथा भैरवनाथ कहा जाता है। कालिका पुराण में भैरव को नंदी, भृंगी, महाकाल तथा वेताल की तरह शिवजी का एक गण बताया गया है जिसका वाहन कुत्ता है।

    देवी-देवताओं के सात्विक एवं तामसिक स्वरूपों के मंदिर प्रायः अलग-अलग होते हैं किंतु भैरव के दोनों स्वरूपों की सबसे बड़ी रोचक बात यह है कि ये प्रायः एक साथ मिलते हैं।

    भैरव के सात्विक स्वरूप में भैरव की प्रतिमा शांत भाव की होती है। इन पर सिंदूर का आलेपन रहता है। इनके सिर पर मुकुट और हाथ में दण्ड होता है। भैरव के सात्विक स्वरूप को सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाला माना जाता है।

    भैरव के सात्विक स्वरूप को बटुक भैरव तथा आनंद भैरव भी कहा जाता है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। यह अपने भक्तों को अभय देने वाले सौम्य स्वरूप में विख्यात है।

    भैरव का तांत्रिक स्वरूप विकराल भाव का होता है। यह कोलतार जैसा काला, विशाल प्रलंब, स्थूल शरीर, अंगारकाय त्रिनेत्र, नग्न देह या काला चोगा धारण किए हुए, कण्ठ में मोटे रूद्राक्षों की माला, हाथों में लोहे का भयानक दण्ड और काले कुत्ते की सवारी करने वाला रूप है। भैरव के इस विकराल स्वरूप को मृत्यु भय से छुटकारा दिलाने वाला माना जाता है। इसे काल भैरव भी कहा जाता है तथा यह आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

    जोधपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 
    11 किलोमीटर दूर मण्डोर उद्यान में स्थित काला-गोरा भैंरू का मंदिर देवताओं की साल के पास ही स्थित है। काला-गोरा भैंरू की विशाल प्रतिमाएं एक चट्टान पर उत्कीर्ण की गई हैं जिनके बीच में भगवान विनायक की मूर्ति उत्कीर्ण है।

    ये प्रतिमाएं जोधपुर नरेश अजीतसिंह के समय की हैं जिन्होंने ई.1707 से ई.1724 तक मारवाड़ राज्य पर राज्य किया। बाईं ओर की प्रतिमा काला भैंरु की है तथा दाहिनी ओर गोरा भैंरू विराजमान हैं जिन पर चंवर ढुलाती सेविकाएं उत्कीर्ण की गई हैं। दोनों भैंरू प्रतिमायें चुतुर्भुजी हैं। इनके हाथों में कटार, त्रिशूल, डमरू तथा खप्पर हैं। दोनों स्वरूपों के शीश पर छत्र बने हुए हैं तथा पैरों के निकट भैंरूजी का वाहन श्वान भी उपस्थित है। गोरे भैरू के सिर पर सामान्य मुकुट है जबकि काला भैंरू का मुकुट शेषनाग आकृति में है।

    भैंरूजी के दोनों स्वरूपों के बीच में गणेशजी एक हाथ में लड्डू, दूसरे में कमल, तीसरे में तलवार तथा चौथे में परशु लिये हुए हैं। उनके दोनों तरफ रिद्धि-सिद्धि बैठी हैं। गणेशजी के गले में विषधर लिपटे हैं किन्तु पैरों के पास वाहन मूषक निर्भय होकर बैठे हैं।

    इस मंदिर के पास ही भैरव बावड़ी है। आगे चलने पर मण्डोर संग्रहालय आता है जिसमें अनेक शिलालेख, मूर्तियाँ, पोट्रेट, मिनिएचर्स, मानव अंगों के नमूने, शृंगारदान, काठ के बर्तन आदि रखे गये हैं। भैरव के सात्विक पूजन में नारियल, फूल, बताशे, मावा और गेहूं की घूघरी चढ़ाई जाती है।

    भैरव की सात्विक आराधना के लिए रविवार और मंगलवार के दिन अच्छे माने जाते हैं। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। इस माह के प्रत्येक रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। बहुत से तांत्रिक, भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण करते हैं तथा उन्हें प्रसन्न करने के लिए घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं करते हैं।

    तांत्रिक उपासना की दृष्टि से भैरव तामसिक देवता हैं। उनको पशुओं की बलि दी जाती है। भैरव उग्र कापालिक सम्प्रदाय के देवता हैं और तंत्रशास्त्र में उनकी आराधना ही प्रधान है। तंत्र साधक का मुख्य लक्ष्य भैरव भाव से अपने को आत्मसात करना होता है। किसी समय इस मंदिर में भी काला भैंरू को तामसिक प्रसाद चढ़ाया जाता था किंतु अब केवल सात्विक प्रसाद ही चढ़ाया जाता है।

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