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  • प्राचीन पाण्डुलिपियों का महान संग्रहालय - राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान

     06.06.2017
     प्राचीन पाण्डुलिपियों का महान संग्रहालय - राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान

     प्राचीन पाण्डुलिपियों का महान संग्रहालय - राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान


    राजस्थान की 19 रियासतों एवं विभिन्न ठिकाणों में में संस्कृत, प्राकृत, डिंगल, पिंगल, अपभ्रंश, राजस्थानी तथा हिन्दी आदि भाषाओं में साहित्यकारों द्वारा साहित्य एवं इतिहास सम्बन्धी विविध रचनाएं लिखी गईं एवं चित्रों का निर्माण किया गया। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा, झालावाड़ आदि रियासतों द्वारा पोथीखानों एवं सूरतखानों की स्थापना की गई जिनमें इनके लेखन, चित्रांकन एवं प्रतिलिपिकरण का कार्य होता था। मेवाड़ नरेश महाराणा कुम्भा, बीकानेर नरेश महाराजा अनूपसिंह तथा जोधपुर नरेश महाराजा मानसिंह आदि राजाओं ने अपनी रियासतों में पुस्तकालयों की स्थापना करके पाण्डुलिपियों एवं चित्रों को संरक्षित किया। उदयपुर का सरस्वती भण्डार पुस्तकालय भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा था। अलवर तथा कोटा भी इस दिशा में पीछे नहीं थे। फिर भी लाखों पाण्डुलिपियां एवं चित्र मालाएं पूरे प्रदेश में बिखरे पड़े थे। इनके सहेजने का कार्य आवश्यक था। अनेक जैन पोथी भण्डारों एवं निजी संग्रहालयों में भी हजारों पाण्डुलिपियां उपलब्ध थीं जो राजस्थान के राजनीतिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के निर्माण में विश्वसनीय स्रोत बन सकती थीं।

    ई.1950 में इस बिखरी हुई हस्तलिखित सामग्री के एकत्रीकरण एवं प्रकाशन के लिए राजस्थान सरकार ने जयपुर में संस्कृत मण्डलान्तर्गत पुरातत्व मन्दिर की स्थापना की और तत्कालीन पुरातत्वाचार्य मुनि श्री जिनविजय को इसके संचालन का दायित्व दिया। मुनि जिनविजय के निर्देशन में अल्पावधि में हजारों की संख्या में ग्रन्थ संग्रहण, सम्पादन, सूचिकरण एवं प्रकाशन का कार्य हुआ। ई.1954 में राज्य सरकार ने संस्कृत मण्डल को भंग करके जनवरी 1956 में इसका पुनर्गठन किया तथा प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान अभिधान से एक नवीन स्थाई विभाग की स्थापना की। ई.1958 में इसका मुख्यालय जयपुर से जोधपुर स्थानान्तरित किया गया। इस संस्था के लिए निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये गये थे-

    1. राजस्थान के भीतर एवं राजस्थान से बाहर उपलब्ध, भारतीय संस्कृति के आधारभूत संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी राजस्थानी एवं अन्य भाषाओं के प्राचीन ग्रन्थों की खोज करना तथा उन्हें प्रकाश में लाना।

    2. प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थों के संग्रह तथा संरक्षण की व्यवस्था करना एवं उपयोगी ग्रन्थों का सम्पादन एवं प्रकाशन करवाना।

    3. भारतीय भाषाओं एवं मुख्यतः संस्कृत एवं प्राचीन राजस्थानी के अध्ययन, अन्वेषण तथा संशोधन हेतु देश-विदेश में मुद्रित विविध विषयक अलभ्य एवं दुर्लभ सभी प्रकार के ग्रन्थों का संग्रहण करके सन्दर्भ पुस्तकालय स्थापित करना।

    4. संगृहित सामग्री से शोधकर्त्ता एवं विद्वानों को उनके अध्ययन एवं शोध में सहायता प्रदान करना।

    5. राजस्थान के लोक-जीवन पर प्रकाश डालने वाले विविध विषयक लोकगीत, भक्ति-साहित्य आदि से संबंधित सभी प्रकार की सामग्री का शोध, संग्रह, संरक्षण एवं प्रकाशन की व्यवस्था करना।

    अधीनस्थ शाखाएं

    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान का मुख्यालय जोधपुर में तथा इसके अधीनस्थ छः शाखाएं जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, उदयपुर एवं बीकानेर में स्थापित की गईं। जोधपुर स्थित मुख्यालय में शैक्षणिक, तकनीकी, प्रशासनिक एवं अन्य विविध गतिविधियों के संचालन हेतु 10 अनुभाग कार्यरत हैं- 1. पाण्डुलिपि संग्रह, 2. विभागीय प्रकाशन, 3. सन्दर्भ पुस्तकालय, 4. प्राच्य कला वीथि, 5. अणुचित्रण एवं ग्रन्थ डिजिटाईजेशन, 6. ग्रन्थ-संरक्षण प्रकोष्ठ, 7. स्टोर एवं बिक्री, 8. बाईण्डिंग, 9. स्थापना शाखा, 10. लेखा शाखा।

    पाण्डुलिपि संग्रह अनुभाग

    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की सर्वप्रमुख प्रवृत्ति हस्तलिखित ग्रन्थ संग्रह ही है। इसलिए यह अपने स्थापनाकाल से हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज एवं संग्रह में संलग्न है। प्रतिष्ठान की स्थापना के बाद राज्य सरकार ने राज्य के समस्त राजकीय पुस्तकालयों में विद्यमान हस्तलिखित ग्रन्थों को प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर में स्थानान्तरित कर दिया। इस समय जोधपुर मुख्यालय में लगभग 42 हजार हस्तलिखित ग्रन्थ है। यहां उपलब्ध हजारों हस्तलिखित ग्रन्थ, ताड़पत्र, भोजपत्र, चर्मपत्र, काष्ठफलक, कपड़ा एवं कागज पर विद्यमान है। भोजपत्रीय दुर्गा सप्तशती (17वीं शताब्दी) एक महत्वपूर्ण रचना है। ताड़पत्रों पर भागवतादि कई ग्रन्थ, चर्मपत्री आर्य महाविद्या 15वीं शताब्दी का एक बौद्ध धार्मिक ग्रन्थ है जिसका लेखन स्वर्णाक्षर में किया गया है। कागदीय आधार पर प्राचीनतम ध्वन्यावलोकलोचन वि.सं. 1204 में प्रतिलिपित हेाने से अत्यंत महत्वपूर्ण है। काव्यशास्त्र विषयक इस ग्रन्थ के प्रणेता आनन्दवर्धन हैं जिसकी लोचन-टीका अभिनवगुप्त ने की। सैंकड़ों ग्रन्थ चित्रित उपलब्ध हैं, जिनमें राजपूत, कांगड़ा, जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी भारतीय शैली एवं राजस्थान की विभिन्न चित्र शैलियों का स्वरूप उपलब्ध हैं। पश्चिमी भारतीय शैली के अनेक विशिष्ठ कल्पसूत्र इस संग्रह की एक विशिष्ठ उपलब्धि हैं। बीकानेर शाखा में भी जैन चित्रित ग्रन्थों का विशाल संग्रह है। उदयपुर शाखा में भी मेवाड़ लघुचित्र शैली पर आधारित कई चित्रित पाण्डुलिपियां हैं, जिनमें विश्वविख्यात आर्षरामायण एवं गीतगोविन्द की सचित्र प्रतियां सम्मिलित हैं।

    विभागीय प्रकाशन

    महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सम्पादन एवं प्रकाशन इस विभाग की विशिष्ठ प्रवृत्ति है। मुनि जिन विजय ने अप्रकाशित अथवा अल्पज्ञात ग्रन्थों के साधु-सम्पादनार्थ ’राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला’ का प्रारम्भ किया। पुरातन ग्रन्थमाला का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है और इसमें प्रायः सभी विषयों से संबंधित सामग्री है। प्रतिष्ठान द्वारा मुद्रित प्रकाशनों में वैदिक ऋषियों पर महर्षिकुलवैभवम्, वैदिक व्याकरण एवं स्वरों पर विशिष्ठ ग्रन्थ पथ्यास्वस्ति, तंत्र मंत्र एवं आगम साहित्य पर आगमरहस्य, सिंहसिद्धान्तसिन्धु, भुवनेश्वरी महास्तोत्र आदि विशिष्ट हैं। बालचिकित्सा के क्षेत्र में बालतंत्र, जयपुर की वेधशाला एवं खगोलशास्त्र पर यंत्रराजरचना, साहित्यशास्त्र एवं काव्य के क्षेत्र में काव्यप्रकाश की संकेत टीका, चक्रपाणिविजय महाकाव्य, हम्मीर महाकाव्य आदि कई महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। ई.1996 में शत्रुशल्यचरित महाकाव्य का प्रकाशन किया जो उस समय तक अज्ञात एवं अप्रकाशित था। मध्यकालीन मारवाड़ के आर्थिक एवं सामाजिक इतिहास के अध्ययन की प्रचुर सामग्री प्रकाशित की गई है। मुंहता नैणसी री ख्यात राजस्थानी के ऐतिहासिक गद्य का प्रथम उदाहरण माना जाता है। मारवाड़ रा परगना री विगत मध्यकालीन अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मारवाड़ के ख्यात साहित्य में नैणसी री ख्यात के अलावा महाराजा मानसिंह री ख्यात, महाराजा विजयसिंह री ख्यात, बांकीदास री ख्यात आदि कई महत्वपूर्ण ख्यातें इस विभाग से प्रकाशित हुई हैं। प्रतिष्ठान की इस ग्रन्थमाला के अधीन 213 ग्रन्थों का प्रकाशन किया गया है। यह कार्य निरंतर जारी है। त्रैमासिक शोध पत्रिका में भी काफी ज्ञानवर्धक सामग्री प्रकाशित की गई है। डॉ. फतेहसिंह ने अपने निदेशकीय काल में सिन्धुघाटी लिपि का ’ब्राह्मण एवं उपनिषद् साहित्य’ के आधार पर पढ़ने का सफल प्रयास किया। आधुनिक विश्व को इस सांकेतिक लिपि का वैदिक दृष्टि से परिचय कराने का श्रेय इसी विभाग को है।

    16वीं शताब्दी के विख्यात वांग्गेयकार पुण्डरीक विट्ठल के सद्राग चन्द्रोदय, नर्तन निर्णय, रागमाला, रागमंजरी आदि 6 ग्रन्थों का मूलपाठ विस्तृत भूमिका के साथ प्रकाशित किया गया जो संगीत एवं कला के क्षेत्र की महान् उपलब्धि है। चौहान शासकों पर विभाग द्वारा हमीर महाकाव्य वर्षों पूर्व से प्रकाशित है। इस दुरूह काव्य का हिन्दी अनुवाद विभाग द्वारा वर्ष 1997 में प्रकाशित होने से सामान्यजनों हेतु यह ऐतिहासिक काव्य सुगम हो सका है। इसी क्रम में खेम कवि रचित हमीरायण तथा शत्रुशल्यचरित का प्रकाशन भी उल्लेखनीय योगदान कहे जा सकते हैं क्योंकि शत्रुशल्यचरित में बूंदी के चौहान शासक राव रतन एवं शत्रुशल्य द्वारा बुरहानपुर, बलोचपुर एवं दौलताबाद आदि स्थानों पर लड़े गये युद्धों का वर्णन है। मेवाड़ के अप्रकाशित ऐतिहासिक काव्य राजरत्नाकर को प्रकाशित करवाया गया है। इस ग्रन्थ में महाराणा राजसिंह के काल की अनेक घटनाओं एवं राजसमुद्र झील के निर्माण का ऐतिहासिक वर्णन उपलब्ध है।

    17वीं शताब्दी के शेखावटी के नवाब जान न्यामत खां, हिन्दी एवं ब्रज के उत्कृष्ट कवि थे। उन्होंने 78 रचनाएं लिखीं। ई.2003 में इस कवि की तीन रचनायें कथा रूपमंजरी, कथा कामरानी एवं कथा तमीम अंसारी हिन्दी अनुवाद एवं आलोचनात्मक अध्ययन के साथ प्रतिष्ठान पत्रिका विशेषांक में प्रकाशित की गईं। हिन्दी साहित्य के इस उपेक्षित कवि की एक रचना क्याम खां रासा वर्ष 1954 में इसी विभाग द्वारा प्रकाशित करवाई गई थी। ई.2004 में जान ग्रन्थावली प्रेमाख्यान के अन्तर्गत कथा कनकावती, कथा कौतूहली एवं कथा मधुकर मालती का प्रकाशन हिन्दी अनुवाद सहित करवाया गया। ई.2005 में कथा सीलवंती, कथा अरदेसर पातिसाह, बलूकिया विरही, लैलै मजंनू, कथा कंवलावती, पुहपवरिखा, कथा संतवती तथा कथा कामलता जान ग्रन्थावली भाग-4 प्रकाशित हुए। ई.2010 में आयुर्वेद पर एक विशेषांक प्रकाशित करवाया गया।

    सन्दर्भ पुस्तकालय

    शोधार्थियों को शोध कार्य एवं अध्ययन हेतु हस्तलिखित एवं मुद्रित ग्रन्थ उपलब्ध हो सकें इसके लिए इतिहास और भाषा विषयक सन्दर्भ पुस्तकालय स्थापित किया गया है। विभिन्न विषयों की शोध पत्रिकाएं तथा अनेक दुर्लभ पुस्तकें इस पुस्तकालय में उपलब्ध कराई गई हैं। वर्तमान में यहां लगभग 29 हजार मुद्रित पुस्तकें संग्रहीत हैं।

    ग्रन्थ सर्वेक्षण योजना

    राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन नई दिल्ली के आर्थिक सहयोग से विभाग में ई.2003 से ग्रन्थ सर्वेक्षण योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के अन्तर्गत जोधपुर, बीकानेर, डीडवाना, उदयपुर, कानोड़, राजसमन्द, कु्रम्भलगढ़, शिवगंज, चित्तौड़गढ़, शाहपुरा, भीलवाड़ा, कपासन, कोटा, बूंदी, बारां, करवड़, सवाईमाधोपुर, करौली, अजमेर, जयपुर, सीकर, फतेहपुर, अलवर, तिजारा, कुम्हेर, धौलपुर, भरतपुर, डीग, कामां, चूरू, धौलपुर, हिण्डौन, सिरोही, साबला, आऊआ, शेषपुर आदि स्थानों के हस्तलिखित ग्रन्थ भण्डारों में एक लाख नवीन ग्रन्थों का पता लगाया गया राज्य के अन्य स्थानों पर भी सर्वेक्षण कर नवीन ग्रन्थों का पता लगाया जा रहा है।

    राष्ट्रीय संगोष्ठियां, लघु चित्रित ग्रन्थों की प्रदर्शनी तथा व्याख्यानमालाओं का आयोजन

    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान द्वारा शैक्षिक महत्व के विषयों पर राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं लघुचित्रित ग्रन्थों की प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। विभाग द्वारा पण्डित मधुसूदन ओझा की सारस्वत साधना, राजस्थान का संत साहित्य, राजस्थान का नाथ साहित्य, राजस्थान का ऐतिहासिक संस्कृत साहित्य, राजस्थान के ऐतिहासिक भाषा काव्य तथा राजस्थान का ऐतिहासिक गद्य साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन कर उनकी कार्यवाहियों को पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन नई दिल्ली के सौजन्य से वर्ष 2003 से वर्ष 2012 तक जोधपुर, उदयपुर, अलवर, बीकानेर, भरतपुर, जयपुर, कामां, चितौड़गढ़ एवं कोटा में लघुचित्रित ग्रन्थों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। जनवरी 2012 में पाण्डुलिपि पठन एवं परिरक्षण पर दस दिवसीय कार्यशाला आयोजित कर शोधार्थियों को ग्रन्थ सामग्री से अवगत करया गया।

    ग्रन्थ-संरक्षण प्रकोष्ठ

    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान द्वारा जीर्ण-शीर्ण हस्तलिखित ग्रन्थों का वैज्ञानिक दृष्टि से जीर्णाेद्धार एवं संरक्षण करने के लिए कन्जर्वेशन लेबोरेट्री बनाई गई है। हस्तलिखित ग्रन्थों का वैज्ञानिक विधि से संग्रहण कर पुरा धरोहर को संरक्षित करना प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की मुख्य गतिविधि है। इस हेतु संरक्षण प्रयोगशाला के माध्यम से जीर्ण-शीर्ण पत्रों की मरम्मत, डीएसिडिफिकेशन आदि माध्यमों से ग्रन्थ उपचारित किये जाते है। वर्ष 2003 से राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की योजना में निरोधात्मक एवं क्रियात्मक संरक्षण के अन्तर्गत जीर्ण पत्रों का उपचार किया जा रहा हैै। ग्रन्थों के सरंक्षण की प्राचीन एवं अभिनव विधियों पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित करवाई गई जिसमें प्रतिभागियों को ग्रन्थ संरक्षण की नवीन विधियों की सैद्धान्तिक एवं प्रायोगिक जानकारी दी गई। हस्तलिखित ग्रन्थों को लाल बस्तों से आवेष्टित किया गया है।

    डिजिटाईजेशन

    हस्तलिखित ग्रन्थों एवं सन्दर्भित पुस्तकों के डिजिटल फोटो देने की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है। जुलाई 2008 में विभाग के हस्तलिखित ग्रन्थों के डिजिटाईजेशन की योजना में 68 लाख रुपए की लागत से एवं राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, नई दिल्ली के सौजन्य से डिजिटाईजेशन कार्य प्रारम्भ किया गया। जिसके अन्तर्गत निदेशालय जोधपुर के लगभग 45000 ग्रन्थों के 37 लाख पत्रों का डिजिटाईजेशन कार्य किया जा चुका है। ग्रन्थों के डिजिटाईज्ड होने के बाद शोध अध्येताओं को कम्प्यूटर पर ग्रन्थों के पठन की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही है।

    जयपुर शाखा

    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के जोधपुर मुख्यालय की स्थापना से पहले, जयपुर में ही इस संस्थान का मुख्य कार्यालय कार्यरत था। पं. पुरोहित हरिनारायण विद्याभूषण ने इस संस्था को 829 हस्तलिखित ग्रन्थ भेंट दिए। स्थानीय पब्लिक लाइब्रेरी, पं. लक्ष्मीनारायण दाधीच आदि अनेक विद्वानों ने भी ग्रंथ भेंट करके इस संग्रह को आगे बढ़ाया। वर्तमान में इस संग्रह में 13 हजार 47 हस्तलिखित ग्रन्थ हैं तथा यह संग्रह, सन्त साहित्य की दृष्टि से समृद्ध है।

    अलवर शाखा

    प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान की अलवर शाखा के इस संग्रह का मूल नाम पुस्तकशाला था जो महाराजा विनयसिंह (1815-1857 ई.) द्वारा 1040 हस्त लिखित ग्रन्थों के संग्रह के साथ आरम्भ की गई थी। अलवर शाखा धर्मशास्त्र एवं वेदान्त-साहित्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। तर्कशास्त्र, मंत्रशास्त्र, ज्योतिष एवं साहित्य ग्रंथ उपलब्ध हैं। वैदिक शांखायन एवं आश्वलायन संहिता इस संग्रह के गौरव ग्रन्थ हैं। इस संग्रह में वर्तमान में 7 हजार 559 हस्तलिखित ग्रन्थों का संग्रह है।

    उदयपुर शाखा

    यह संग्रहालय मेवाड़ रियासत के अंतर्गत सज्जन वाणी-विलास के नाम से संचालित होता था। इस संग्रहालय के विकास में चित्तौड़गढ़ के महाराणा कुम्भा, महाराणा जगत्सिंह (प्रथम), महाराणा स्वरूपसिंह तथा महाराणा सज्जनसिंह का बड़ा योगदान है। ई.1950-51 में विक्टोरिया हॉल पुस्तकालय की उपलब्ध सामग्री को भी इसमें सम्मिलित कर इसे सरस्वती भवन पुस्तकालय नाम दिया गया। ई.1961 में इस पुस्तकालय की हस्तलिखित सामग्री से राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, उदयपुर शाखा की स्थापना की गई। इस शाखा कार्यालय के संस्कृत, प्राकृत एवं हिन्दी राजस्थानी के सभी सूची पत्र प्रकाशित किये जा चुके हैं। उदयपुर शाखा में 6 हजार 910 ग्रन्थों का संग्रह है।

    चितौड़गढ़ ग्रन्थ संग्रह

    मुनि जिनविजय के प्रयत्नों से इस शाखा की स्थापना ई. 1962-63 में हुई। इस शाखा के समस्त हस्तलिखित ग्रन्थ दान में प्राप्त है। समग्र ग्रन्थों की कुल संख्या 5 हजार 456 है। साथ ही 1 हजार 886 मुद्रित पुस्तकें एवं 425 पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। चितौड़गढ़ शाखा के ग्रन्थ भी उदयपुर प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान ले जाए गए हैं।

    बीकानेर शाखा

    बीकानेर शाखा में संग्रह किए गए सम्स्त ग्रंथ भेंट से प्राप्त हैं। इस संग्रह में 29 हजार 429 हस्तलिखित ग्रन्थों एवं कृतियों का संग्रह है। पश्चिमी भारतीय शैली में चित्रित जैन कल्पसूत्र एवं जैन लघु चित्रशैली के कई महत्वपूर्ण ग्रन्थ इस शाखा में उपलब्ध हैं।

    कोटा शाखा

    राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की कोटा शाखा को सरस्वती भण्डार के नाम से जाना जाता था। कोटा महाराव दुर्जनशाल ( ई.1723-56) संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने वल्लभ सम्प्रदाय के अनेक ग्रन्थों की रचनाएं करवाई। महाराव उम्मेदसिंह (ई.1771-1819) के काल में भी सरस्वती भण्डार को काफी प्रोत्साहन मिला। प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की शाखा स्थापना के समय सरस्वती भण्डार के 6 हजार हस्तलिखित ग्रन्थों में से 4 हजार 834 ग्रन्थ स्थानान्तरित कर दिये गये। शेष आज भी माधोसिंह म्यूजियम एवं कोटा म्यूजियम में उपलब्ध हैं। वर्तमान में कोटा शाखा में 9 हजार 966 ग्रन्थ उपलब्ध हैं।

    भरतपुर शाखा

    राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की भरतपुर शाखा में भरतपुर, कामां, डीग, करौली एवं अन्य स्थानों के विभिन्न ग्रंथ-संग्रहकर्ताओं एवं विद्वानों से भेंट में प्राप्त किए गए हैं। इस शाखा की स्थापना ई. 1985 में की गई। वर्तमान में यहाँ 10 हजार से अधिक ग्रन्थों का संग्रह है। इस संग्रह के हिन्दी-राजस्थानी तथा संस्कत-प्राकृत ग्रन्थों के तीन सूचीपत्र प्रकाशित किए गए हैं। ब्रज साहित्य का संग्रह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

    मुख्यालय आर्ट गैलेरी

    जोधपुर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को अमूल्य साहित्यिक धरोहर से परिचित कराने के उद्देश्य से मुख्यालय जोधपुर में अभिनव आर्ट गैलेरी स्थापित की गई है। इसमें प्रदर्शित निम्नलिखित सामग्री विशेष रूप से उल्लेखनीय है-

    1. पाल, राजपूत, कांगड़ा, पश्चिमी भारतीय, जम्मू कश्मीर, दक्षिण भारतीय तथा राजपूताना के शासकों शासकों के संरक्षण में पल्लवित लघुचित्र शैलियों के ग्रन्थ।

    2. पन्चपाठ, द्विपाठ एवं त्रिपाठ (ग्रन्थ लेख शैली के निदर्शन) के हस्तलिखित ग्रन्थ।

    3. विश्व विख्यात आर्ष रामायण एवं गीतगोविन्द सचित्र।

    4. वि.सं. 1485 का कागदीय आधार पर सोमसुन्दर सूरि के आदेश से प्रतिलिपित स्वर्णमसि का चित्रित कल्पसूत्र।

    5. पाल शैली का उत्कृष्ठ निदर्शन चर्मपत्रीय आर्य महाविद्या।

    6. सूक्ष्माक्षरीय भागवत गीता आदि कई ग्रन्थ जिन्हें लेंस की सहायता से ही पढ़ा जा सकता है।

    7. अगणित भुजाओं में सहस्रों मंत्र-यंत्रों से सुसज्जित देवी चण्डिका का वृहद् चित्र।

    8. ब्रह्माण्ड वर्णन का वृह्दाकार पट चित्र।

    9. दुर्लभ जैन क्षमापना पत्र (विज्ञप्ति पत्र) एवं सचित्र 314 फुट लम्बी जन्म-पत्रियां।

    10. विद्या, यश, अर्थ एवं आरोग्य प्रदान करने वाले सर्वतोभद्र, मणिभद्र, सूर्यप्रताप, गायत्री कामधेनु, गोपाल पूजन, कर्पूरचक्रादि एवं पीरनामा आदि हिन्दू एवं परशियन यन्त्र।

    11. विशाल रंगीन पेनल्स में विभिन्न ग्रन्थों के आधार, प्रकार, विभिन्न लिपियां एवम् चित्र शैलियों के निदर्शन एवं विभागीय प्रकाशन।

    राजस्थान के प्राचीन साहित्य, इतिहास, चित्रकला, आयुर्वेद, शिल्पशास्त्र, धर्म, दर्शन, रियासती रीति-रिवाज आदि के प्राचीन ग्रंथों एवं पाण्डुलिपियों का अवलोकन एवं अध्ययन के लिए राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की प्रमुख शाखा एवं अन्य शाखाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये विश्वस्तरीय पाण्डुलिपि संग्रहालयों की प्रतिस्पर्द्धा में भी अग्रणी हैं। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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