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  • महाराणा प्रताप कभी चित्तौड़ के किले में क्यों नहीं गए!

     14.08.2019
    महाराणा प्रताप कभी चित्तौड़ के किले में क्यों नहीं गए!

    महाराणा प्रताप कभी चित्तौड़ के किले में क्यों नहीं गए!


    मेवाड़ का ऐसा कोई चप्पा नहीं था जिस पर वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के घोड़ों की टाप न पड़ी हो। महाराणा प्रताप अपने शत्रुओं के लिए उस भयानक काल के समान था जो मुगलों की सेना को टिड्डी दल की तरह मसल डालता था तथा हजारों मुगल सैनिकों के बीच घुसकर अपने खास दुश्मन का सिर काट देता था।

    यही कारण था कि हिन्दुस्तान का मालिक होने का दंभ रखने वाला अकबर बादशाह कभी गहरी नींद नहीं सोता था। हर समय उसे यह भय सताता था कि कौन जाने कब महाराणा प्रताप कहीं से प्रकट हो जाए और अकबर का गला काट दे!

    महाराणा प्रताप के भय से मुगलों की सेना कभी भी खुले में घेरा नहीं डालती थी। मुगल सेना हर समय पशुओं, छकड़ों और कांटों की बाड़ के पीछे छिपकर रहती थी।

    ऐसा प्रबल प्रतापी एवं यशस्वी महाराणा प्रताप कभी भी मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ के किले में नहीं जा सका। वह किला जो महाराणाओं की आन-बान और शान था, प्रताप के घोड़ों की टापों को सुनने के लिए तरसता ही रह गया। है तो ये हैरान करने वाली बात किंतु इतिहास इस बात का गवाह है।

    यह कहानी खानवा के मैदान से आरम्भ होती है जब ई.1527 में समरकंद और खुरासान से आए बाबर ने चित्तौड़ के महाराणा सांगा को पराजित कर दिया। इस युद्ध में उत्तर भारत के कई राजा-महाराजा एवं राजकुमार रणखेत रहे। इस कारण मेवाड़ की रक्षा पंक्ति कमजोर हो गई।

    सांगा के बाद उसका पुत्र विक्रमसिंह चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा किंतु वह एक अयोग्य और कमजोर राजा सिद्ध हुआ। वह राज्य की खोई हुई शक्ति को पुनः संचित नहीं कर सका। चित्तौड़ की कमजोरी का लाभ उठाकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग को जलाकर राख कर दिया।

    इस प्रकार चित्तौड़ लगभग निष्प्रभ एवं शक्तिहीन हो गया। चित्तौड़ की सेना लगभग नष्ट हो गई। दुर्भाग्य से स्वर्गीय महाराणा सांगा के दासी पुत्र बनवीर ने महाराणा विक्रमसिंह की हत्या कर दी और स्वयं महाराणा की गद्दी पर बैठ गया।

    बनवीर तो स्वर्गीय महाराणा सांगा के छोटे पुत्र उदयसिंह की भी हत्या करना चाहता था किंतु धाय माता पन्ना गूजरी ने राजकुमार उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की तथा उसे 
    कुंभलगढ़ के किले में ले गई।कुंभलगढ़ किले के किलेदार महाजन आशा दे पुरा ने मेवाड़ के विश्वस्त सामंतों को एकत्रित करके उदयसिंह को मेवाड़ का महाराणा बनवाया।

    बनवीर एवं उदयसिंह के बीच हुए संघर्ष में मेवाड़ की शक्ति और भी क्षीण हो गई। अब चित्तौड़ इतना कमजोर हो चुका था कि मुगल बादशाह अकबर चित्तौड़ दुर्ग को हड़पने की नीयत से विशाल सेना लेकर चित्तौड़ आया।

    मेवाड़ के सामंतों ने महाराणा उदयसिंह को मेवाड़ की कठिन घाटियों में भेज दिया और जयमल मेड़तिया तथा फत्ता सिसोदिया के नेतृत्व में दुर्ग की मोर्चा बंदी की। अकबर की विशाल सेना के सामने चित्तौड़ का टिके रहना बहुत कठिन था किंतु हिन्दू वीरों के सामने अकबर की दाल आसानी से गलने वाली नहीं थी। इसलिए अकबर ने अपने सैंकड़ों सैनिकों की बलि देकर दुर्ग की नीवों में बारूद भरवा दी। जब बारूद में विस्फोट किया गया तो किले की दीवार उड़ गई। राजपूत सैनिकों ने इस दीवार की मरम्मत करके मुगलों को किले में घुसने से रोक दिया किंतु इस दौरान दुर्गपति जयमल राठौड़ की टांग में अकबर की बंदूक से निकली गोली लग गई।

    जयमल ने अगले दिन सुबह केसरिया करने का निश्चय किया जिसमें राजपूत सिपाही केसरिया कपड़े पहनकर एवं मुंह में तुलसी दल रखकर किले से बाहर निकलकर युद्ध करते थे। दुर्ग में स्थित रानियों एवं राजकुमारियों ने स्वर्गीय महाराणा सांगा की रानी कर्मवती के नेतृत्व में जौहर किया। अगले दिन किले के दरवाजे खोल दिए गए और समस्त हिन्दू सैनिक लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हो गए। इस प्रकार चित्तौड़ का किला महाराणाओं के हाथों से निकल गया।

    महाराणा उदयसिंह ने बहुत पहले ही भांप लिया था कि अब चित्तौड़ में रहकर मेवाड़ की रक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए उन्होंने दुर्गम पहाड़ों के बीच अपने लिए एक नई राजधानी का निर्माण करवाना आरम्भ किया था जिसे उदयपुर कहा जाता है। चित्तौड़ हाथ से निकल जाने के बाद महाराणा उदयसिंह अपनी इसी नई राजधानी में रहने लगे।

    जब ई.1572 में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपने बड़े पुत्र प्रतापसिंह के स्थान पर अपनी प्रिय रानी भटियाणी के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। मेवाड़ी सरदारों ने स्वर्गीय महाराणा उदयसिंह के इस निर्णय को मानने से मना कर दिया। वे जानते थे कि अकबर जैसे प्रबल शत्रु से युद्ध करने के लिए मेवाड़ को वीर प्रतापसिंह की आवश्यकता है न कि जगमाल जैसे राज्य-लोलुप राजकुमार की। जिस प्रकार मेवाड़ी सरदारों ने एक दिन बनवीर को हटाकर उदयसिंह को महाराणा बनाया था उसी प्रकार उन्होंने जगमाल के स्थान पर प्रतापसिंह को महाराणा बनाया।

    महाराणा प्रताप ने राजसी महलों से युक्त उदयपुर को अपनी राजधानी बनाने के स्थान पर गोगूंदा की पहाड़ियों को अपनी राजधानी बनाया ताकि वे अपने पूर्वजों के बनाए हुए चित्तौड़ दुर्ग को फिर से पाने की तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से उन दिनों आम्बेर के कच्छवाहे, अकबर के सबसे बड़े सहायक बने हुए थे। अकबर की सेवा स्वीकार करने से पहले ये कच्छवाहे चित्तौड़ के महाराणाओं के अधीन हुआ करते थे। अकबर ने आम्बेर के राजकुमार मानसिंह को महाराणा प्रताप पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

    18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ जिसमें महाराणा प्रताप ने मानसिंह की सेना में कसकर मार लगाई। महाराणा ने मानसिंह के ऊपर अपने भाले से वार किया किंतु मानसिंह ने हाथी के हौदे में छिपकर अपनी जान बचाई। मानसिंह परास्त होकर लौट गया।

    इसके 
    बाद महाराणा प्रताप ने मुगलों के विरुद्ध दीर्घकाल तक संघर्ष किया तथा बाबर से लेकर अकबर तक के काल में मुगलों ने मेवाड़ की जितनी भूमि एवं किले छीने थे, वापस हस्तगत कर लिए। इसके बाद अकबर ने अपने सभी सेनापतियों को कभी एक साथ तो कभी अलग-अलग करके मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजता रहा और महाराणा प्रताप उन सेनाओं को नष्ट करता रहा। इस कारण अकबर के बहुत से सेनापति मारे गए। बहुत से नौकरी छोड़कर भाग गए तथा बहुतों ने पराजित होने के बाद कभी भी अकबर को अपना मुंह नहीं दिखाया।

    महाराणा प्रताप किलों पर किले जीतता जा रहा था, मुगलों के थाने उजाड़ता जा रहा था और शाही खजानों को लूटता जा रहा था किंतु अकबर की सेना लुट-पिट कर अपनी जान और इज्जत दोनों को बचाने में असमर्थ थी। महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सभी परम्परागत किले जीत लिए। अब केवल चित्तौड़ का किला ही उनकी पहुंच से बाहर रहा था। इसलिए अकबर ने अपनी पूरी शक्ति चित्तौड़ दुर्ग को बचाने में लगा दी तथा चित्तौड़ के किले में तथा उसके आसपास के इलाकों में कई हजार सैनिक तैनात कर दिए।

    अकबर की अंतिम इच्छा केवल यही थी कि या तो महाराणा प्रताप युद्ध के मैदान में पराजित हो जाए या लड़ाई के मैदान में मार डाला जाए किंतु अकबर की दोनों इच्छाएं कभी पूरी नहीं हुईं। ई.1597 में महाराणा प्रताप ने इस नश्वर देह को छोड़ दिया। इस प्रकार प्रताप अप्रतिम वीर होते हुए भी कभी चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सके।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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