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  • किस गद्दार ने जलाया था चित्तौड़ का किला!

     14.08.2019
    किस गद्दार ने जलाया था चित्तौड़ का किला!

    किस गद्दार ने जलाया था चित्तौड़ का किला! 


    गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह का पुत्र बहादुरशाह अपने दो भाइयों चांद खां तथा इब्राहीम खां के साथ चित्तौड़ के महाराणा सांगा की शरण में आया। महाराणा ने उसे आदरपूर्वक अपने पास रखा। सांगा की माता जो हलवद के राजा की पुत्री थी, बहादुरशाह को बेटा कहा करती थी। एक बार बहादुरशाह तथा राणा सांगा के भतीजे के बीच झगड़ा हो गया जिसमें सांगा का भतीजा मारा गया। जब राणा के राजपूत, बहादुरशाह को मारने लगे तब राजमाता ने बहादुरशाह की रक्षा की।

    जब गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह मर गया तब उसका पुत्र सिकंदरशाह गुजरात का सुल्तान हुआ। उसने अपने सेनापति मलिक लतीफ को बहादुरशाह का दमन करने के लिये भेजा। मलिक लतीफ ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया जहाँ वह बुरी तरह से हारा और उसके 1700 सिपाही मारे गये।

    जब खानवा के युद्ध के बाद महाराणा संग्रामसिंह की मृत्यु हो गई तो राजकुमार रत्नसिंह ई.1528 में मेवाड़ का महाराणा हुआ। उन्हीं दिनों गुजरात के सुल्तान सिकंदरशाह की भी मृत्यु हो गई तथा बहादुरशाह चित्तौड़ से गुजरात चला गया और गुजरात का सुल्तान बन गया।

    कुछ समय बाद बहादुरशाह ने मालवा पर चढ़ाई की तथा मेवाड़ी सेनाओं से सहायता मांगने के लिए वह, महाराणा रत्नसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ। बहादुरशाह ने महाराणा रत्नसिंह को प्रसन्न करने के लिये उसे 30 हाथी एवं बहुत से घोड़े भेंट किये तथा महाराणा के सामंतों को डेढ़ हजार जरदोरी खिलअतें प्रदान की।

    महाराणा ने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह को अपना अनुगत हुआ जानकर उस पर विश्वास कर लिया तथा अपने कुछ सरदार एवं उनकी सेनाएं, बहादुर शाह के साथ भेज दिये और स्वयं चित्तौड़ लौट आया। बहादुरशाह ने माण्डू जाकर, महमूद का मालवा राज्य जीत लिया तथा मालवा राज्य को गुजरात राज्य मंे मिला लिया। युद्ध के दौरान महमूद पकड़ा गया।

    बहादुरशाह उसे कैद करके गुजरात ले गया। इस प्रकार गुजरात और मालवा मिलकर एक बड़ा राज्य बन गया। इससे बहादुरशाह की ताकत बहुत अधिक बढ़ गई जबकि महाराणा रत्नसिंह का मेवाड़ राज्य खानवा के युद्ध के बाद से ही कमजोर हो गया था।

    दुर्भाग्य से महाराणा रत्नसिंह केवल आठ साल शासन करके मृत्यु को प्राप्त हुआ और उसका सौतेला भाई विक्रमादित्य (ई.1531-36) मेवाड़ का महाराणा हुआ। वह सांगा की हाड़ी रानी कर्मवती का बड़ा पुत्र था तथा शासन करने, सेनाओं का नेतृत्व करने एवं युद्ध का संचालन करने जैसे गुणों से रहित था। उसने अपने दरबार में सात हजार पहलवानों को रख लिया। इन पहलवानों पर महाराणा विक्रमसिंह को अपने सामंतों से भी अधिक विश्वास था। विक्रमसिंह ने अपने दरबार में कई सामंतों एवं मेवाड़ी सरदारों की हँसी उड़ाई जिसके कारण ये सामंत एवं सरदार महाराणा से अप्रसन्न होकर अपने-अपने ठिकानों में चले गए।

    इससे महाराणा की शक्ति और राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था दोनों ही बिगड़ गईं। गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के अधिकारी मेवाड़ महाराणा के दरबार में उपस्थित रहते थे। इसलिए उन्हें राज्य के बारे में पल-पल की खबर रहती थी। वे महाराणा के दरबार में होने वाली घटनाओं की जानकारी बहादुरशाह को भिजवाते रहते थे। इससे बहादुरशाह को मेवाड़ की आंतरिक स्थिति की वास्तविक जानकारी मिलती रहती थी।

    बहादुरशाह ने महाराणा तथा सरदारों के खराब सम्बन्धों का लाभ उठाने के लिए मेवाड़ पर दो अभियान किये। ई.1532 के आरम्भ में बहादुरशाह अपनी सेना लेकर चित्तौड़ आया किंतु महाराणा पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। इसलिए कुछ माह बाद वापस लौट गया। कुछ दिन बाद उसे फिर समाचार मिले कि महाराणा का कोई भी सामंत महाराणा से प्रसन्न नहीं है।

    नवम्बर 1532 में बहादुरशाह ने फिर से मेवाड़ पर अभियान किया। महाराणा विक्रमादित्य अब भी वक्त की सच्चाई को नहीं पहचान पा रहा था। एक भी मेवाड़ी सरदार महाराणा की सहायता के लिए आगे नहीं आया। बात ही बात में बहादुरशाह ने चित्तौड़ का दुर्ग चारों ओर से घेर लिया तथा उसके कई दरवाजों पर अधिकार कर लिया।

    इस पर राजमाता कर्मवती ने बहादुरशाह के वकील से संधि की बात चलाई तथा मालवा के वे जिले जो पूर्ववर्ती महाराणाओं के समय जीते गए थे, बहादुरशाह को देने की बात कही। इसके साथ ही मालवा के पूर्व सुल्तान महमूद का वह जड़ाऊ मुकुट तथा सोने की कमरपेटी भी देने की बात कही जो किसी समय महाराणा सांगा ने महमूद से जब्त की थी। राजमाता ने 10 हाथी, 100 घोड़े और नगद राशि भी बहादुरशाह को देना स्वीकार किया। बहादुरशाह ने इस संधि को स्वीकार कर लिया।

    24 मार्च 1533 को बहादुरशाह ये सब वस्तुएं लेकर चित्तौड़ से लौट गया। बहादुरशाह से जो संधि हुई उसमें महाराणा विक्रमसिंह ने अपने छोटे भाई राजकुमार उदयसिंह को सुल्तान की सेवा में भेजना स्वीकार कर लिया था। इसलिए सुल्तान उसे भी साथ ले गया। सुल्तान बहाुदरशाह के कोई शहजादा नहीं था इसलिये वजीरों ने सुल्तान से कहा कि वे किसी भाई-भतीजे को गोद ले-ले तो अच्छा होगा। इस पर सुल्तान ने कहा कि राणा का भाई ठीक है। वह बड़े घराने का है, मुसलमान बनाकर वह गोद रख लिया जायेगा। उदयसिंह के राजपूतों ने जब यह बात सुनी तो वे राजकुमार को गुजरात से ले भागे।

    इससे नाराज होकर बादशाह ने फिर से चित्तौड़ को आ घेरा। उधर हुमायूं भी चित्तौड़ को लेने की नीयत से आगरा से ग्वालियर आ गया। राजमाता कर्मवती ने हुमायूं से सहायता पाने के लिये उसे राखी भेजी इस पर बहादुरशाह ने हुमायूं को पत्र लिखा कि ‘इस समय मैं जेहाद पर हूँ। इसलिए तुम्हें हिन्दुओं की सहायता नहीं करनी चाहिए।’ यह पत्र पढ़कर हमायूं 
    रास्ते में ही ठहर गया और चित्तौड़ के युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा। 

    इस पर कर्मवती ने मेवाड़ के सरदारों को पत्र लिखे- ‘अब तक तो चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उसके हाथ से निकलने का समय आ गया है। मैं किला तुम्हें सौंपती हूँ। चाहे तुम रखो चाहे शत्रु को दे दो। मान लो तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है। तो भी जो राज्य वंश परम्परा से तुम्हारा है, वह शत्रु के हाथ में  ले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी।’

    यह पत्र पाकर मेवाड़ के सरदार अपनी-अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ आ गये। महाराणा विक्रमादित्य तथा उसके छोटे भाई कुंवर उदयसिंह को दुर्ग से बाहर भेज दिया गया। दोनों पक्षों में हुए युद्ध में मेवाड़ की पराजय हो गई तथा कई हजार राजपूत सैनिक मारे गये।

    दुर्ग में स्थित हिन्दू स्त्रियों ने राजमाता कर्मवती के नेतृत्व में जौहर किया। इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार तेरह हजार स्त्रियों ने जौहर किया, तीन हजार बच्चे कुएं में फैंक दिए गए ताकि वे शत्रुओं के हाथों में न पड़ें। इसके बाद राजपूतों ने केसरिया किया जिसे साका करना भी कहते हैं। यह चित्तौड़ दुर्ग का दूसरा साका था। इस युद्ध में कुल 32 हजार मनुष्यों का विनाश हुआ।

    इस विजय के बाद बहादुरशाह के सैनिकों ने दुर्ग में कई स्थानों पर आग लगा दी। इस प्रकार जिस बहादुर शाह को एक दिन महाराणा सांगा ने चित्तौड़ दुर्ग में शरण दी थी, उसी बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग को आग के हवाले करके अपने ऊपर किए गए उपकारों का बदला कृतघ्ना से चुकाया।

    अब हुमायूं, बहादुरशाह के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये आगे बढ़ा। हुमायूं के भय से बहादुरशाह दीव के टापू में पुर्तगालियों के पास भाग गया किंतु इसी दौरान नाव उलट जाने से वह समुद्र में ही डूबकर मर गया। बहादुरशाह के मरने पर उसके सैनिक भी चित्तौड़ का दुर्ग खाली करके भाग गए। जला हुआ चित्तौड़ का दुर्ग हुमायूं के किसी काम का नहीं था, इसलिए वह भी आगरा चला गया।

    मेवाड़ के सरदारों ने पांच-सात हजार सैनिकों को एकत्रित करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह भी दुर्ग में आ गये।  

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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