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  • बारह शताब्दियों में तीन बार अफगानी और खुरासानी चित्तौड़ दुर्ग में घुसे

     14.08.2019
     बारह शताब्दियों में तीन बार अफगानी और खुरासानी चित्तौड़ दुर्ग में घुसे

    बारह शताब्दियों में तीन बार अफगानी और खुरासानी चित्तौड़ दुर्ग में घुसे


    पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार चित्तौड़ दुर्ग का निर्माण महाभारत काल में हुआ था। यद्यपि महाभारत कालीन चित्तौड़ अब अस्तित्व में नहीं है तथापि वही दुर्ग जीर्णाेद्धार एवं पुनर्निर्माण होता हुआ वर्तमान रूप में हमारे सामने है। मौर्य सम्राट अशोक के समय चित्तौड़ दुर्ग पर मौर्यों का अधिकार हुआ।

    जब ईसा से लगभग 184 साल पहले मगध के मौर्यों का साम्राज्य नष्ट हुआ तो उनके वंशज उत्तर एवं पश्चिम भारत के विभिन्न हिस्सों में छोटे-छोटे राज्यों पर शासन करने लगे। ई.734 में चित्तौड़ दुर्ग पर मान मोरी नामक राजा राज्य करता था।

    मान मोरी का दौहित्र बप्पा एक वीर राजकुमार था जिसने अपने नाना मान मोरी के प्राणों की रक्षा करके पुरस्कार स्वरूप चित्तौड़ का दुर्ग प्राप्त किया। बप्पा रावल ने चित्तौड़ राज्य का इतना विस्तार किया कि इसकी ख्याति भारत से बाहर निकल कर अफगानिस्तान, ईरान और अरब देशों में भी फैल गई।

    ई.813 से 833 के बीच बगदाद में अलमा
    मूं नामक खलीफा हुआ। उसने अपनी सेनाओं को निर्देश दिया कि वे भारत जाकर चित्तौड़ का दुर्ग छीन लें। 

    उस काल में चित्तौड़ दुर्ग पर बप्पा रावल के वंशज खुमांण (द्वितीय) का अधिकार था। वह भारत के हिन्दू राजाओं का शिरोमणि था। इसलिए भारत के लगभग सभी छोटे-बड़े हिन्दू राजा, रावल खुंमाण की सहायता के लिए अपनी सेनाएं लेकर आए। इस कारण यह लड़ाई बहुत विशाल और भयानक हो गई जिसमें दोनों पक्षों के हजारों सैनिक मारे गए।

    खुंमाण रासो नामक ग्रंथ में इस भयानक युद्ध के परिणाम की जानकारी मिलती है जिसके अनुसार इस युद्ध में गुहिलों की भारी विजय हुई। इस विजय से खुमांण को इतनी अधिक प्रसिद्धि मिली कि मेवाड़ के गुहिलों को 
    खुंमाण कहा जाने लगा। ठीक उसी तरह जिस तरह ईक्ष्वाकुओं को महाराज रघु के नाम पर रघुवंशी कहा गया था।

    खलीफा की सेनाओं के पराजय के बाद लगभग पौने चार सौ वर्ष तक अरब आक्रांता चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सके। अब उनका लक्ष्य, अजमेर का तारागढ़ हो गया। ई.1192 में अफागानी आक्रांताओं ने अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान को मार डाला। वे जीत के जोश में इतने पागल हो गए कि उन्होंने एक बार फिर चित्तौड़ दुर्ग पर हाथ डाल दिया।

    इस बार जो लड़ाई हुई उसे इतिहास में भूताला का युद्ध कहा जाता है। इस लड़ाई में मुस्लिम सेना का सेनापति इल्तुतमिश था जो आगे चलकर दिल्ली का सुल्तान हुआ। हंमीर-मद-मर्दन नामक नाटक में इस लड़ाई का विस्तृत विवरण मिलता है। उस समय के शिलालेखों एवं इतिहास की पुस्तकों में राव जैत्रसिंह को तुर्क रूपी समुद्र का पान करने वाला अगस्त्य कहा है।

    इसके बाद सिंध की तरफ से खलीफा की सेना आई। चित्तौड़ के रावल जैत्रसिंह ने इस सेना को भी बुरी तरह नष्ट किया। यह सेना सिंध के सेनापति खवास खां के नेतृत्व में आई थी। रावल समरसिंह के आबू पर्वत शिलालेख में लिखा है- सिंधवालों की सेना का रुधिर पीकर मत्त बनी हुई पिशाचियों के आलिंगन के आनन्द से मग्न होकर पिशाच लोग रणखेत में अब तक श्री जैत्रसिंह के भुजबल की प्रशंसा करते हैं।

    ई.1248 में दिल्ली का सुल्तान नासिरुद्दीन एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ आया। उस समय तक चित्तौड़ का रावल जैत्रसिंह बहुत बूढ़ा हो चुका था किंतु उसने नासिरुद्दीन की विशाल सेना का सामना किया। सुल्तान की सेना आठ माह तक चित्तौड़ दुर्ग को घेरे रही तथा अंत में निराश होकर दिल्ली लौट गई।

    जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह तथा उसके बाद के राजाओं को भी निरंतर दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों से युद्ध करने पड़े जिनके फलस्वरूप, चौदहवीं शताब्दी के आगमन तक चित्तौड़ के गुहिल, मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने में सफल रहे।

    तेरहवीं शताब्दी के मध्य में दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन की सेना ने गुजरात पर आक्रमण किया। उस समय गुजरात प्रदेश का बहुत बड़ा भूभाग, चित्तौड़ के राजा समरसिंह के अधीन था। रावल समरसिंह ने बलबन की सेना को परास्त करके भगा दिया। आबू शिलालेख में कहा गया है कि समरसिंह ने तुर्क रूपी समुद्र में गहरे डूबे हुए गुजरात देश का उद्धार किया। समरसिंह के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरि ने तीर्थकल्प में लिखा है कि अलाउद्दीन खिलजी का छोटा भाई उलूग खां ई.1299 में गुजरात विजय के लिये निकला। चित्तौड़ के स्वामी समरसिंह ने उसे दण्ड देकर मेवाड़ देश की रक्षा की।

    जब गुहिल वंश के राजाओं को मेवाड़ पर शासन करते हुए 550 वर्ष से अधिक समय हो गया तब ई.1302 में रावल समरसिंह का पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का राजा हुआ। उसे शासन करते हुए कुछ ही महीने हुए थे कि दिल्ली सल्तनत के सबसे शक्तिशाली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने ई.1303 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।

    चित्तौड़ की सेनाओं ने अब तक कई बार दिल्ली के सुल्तानों को मारकर भगाया था। इसलिये चित्तौड़ का मनोबल अपने चरम पर था। अतः चित्तौड़ ने पूरी शक्ति से अलाउद्दीन खिलजी का प्रतिरोध किया। चित्तौड़ का दुर्ग जीते बिना अलाउद्दीन खिलजी, दक्षिण भारत के अभियानों पर नहीं जा सकता था। इसिलये संधि की आड़ में छल करके राजा रत्नसिंह को बंदी बनाया गया। जब राजा काबू में आ गया तो महारानी पद्मिनी को समर्पित करने की मांग की गई। महारानी के स्थान पर गोरा-बादल ने, शत्रु के बीच पहुंचकर अपने राजा को मुक्त कराया। कुछ महीनों बाद अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना ने किले की दीवारों को तोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली। इस पर महारानी 
    पद्मिनी के नेतृत्व में राजपूत स्त्रियों और बच्चों ने जौहर की धधकती ज्वाला में प्राण उत्सर्ग कर दिये। मेवाड़ के सैनिक दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सेना पर टूट पड़े तथा वीर गति को प्राप्त हुए। इस प्रकार चित्तौड़ दुर्ग का पतन हो गया।

    पिछले पांच सौ साल से समय-समय पर हो रही लड़ाइयों के बाद पहली बार चित्तौड़ दुर्ग का पतन हुआ था किंतु चित्तौड़ दुर्ग को जीतना जितना कठिन था उससे कहीं अधिक कठिन उस पर नियंत्रण रख पाना था। चित्तौड़ की लड़ाई में गुहिल वंश के अधिकांश वयस्क पुरुष वीर गति को प्राप्त हो गए थे किंतु अगले बीस साल में गुहिलों की एक नई पीढ़ी लड़ने योग्य हो गई। अतः चित्तौड़ के पतन के बीस साल बाद गुहिलों की सिसोदिया शाखा के राणा हमीर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया। हमीर के सैनिकों ने, 
    मुस्लिम सैनिकों को पत्थरों से बांध-बांधकर दुर्ग की दीवारों से नीचे गिरा दिया और दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

    जब दिल्ली से मुस्लिम सुल्तान की विशाल सेना आई तो राणा हमीर ने उस सेना को नष्ट कर दिया। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में इसी हम्मीर का वंशज, महाराणा कुंभा, चित्तौड़ का स्वामी हुआ। उसके समय में मालवा के सुल्तान महमूद ने बड़ा आतंक मचाया। महमूद की सेना में 1 लाख घुड़सवार तथा 1400 हाथी थे। महाराणा कुम्भा, घमण्डी महमूद को लोहे की जंजीरों से बांधकर चित्तौड़ ले आया और छः माह तक कैद में रखकर बिना कुछ लिये, उसे मुक्त कर दिया।

    महाराणा कुम्भा के लिए उस समय के शिलालेखों में कहा गया है कि कुंभा ने सारंगपुर में असंख्य मुसलमान स्त्रियों को कैद किया, महम्मद का महामद छुड़वाया, उसकी राजधानी सारंगपुर को जलाया और अगस्त्य के समान अपने खंग रूपी चुल्लू से वह मालव समुद्र को पी गया।

    ई.1527 में खुरासान से आए बाबर ने खानवा के मैदान में चित्तौड़ के महाराणा सांगा को परास्त कर दिया, घायल महाराणा की मृत्यु हो गई किंतु बाबर चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सका। सांगा की तरफ से बाबर से युद्ध करते हुए अनेक हिन्दू राजा मारे गए थे इसलिए चित्तौड़ की रक्षा करने वाले वीरों का अभाव हो गया। चित्तौड़ की कमजोरी का लाभ उठाकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण कर दिया।

    महाराणा विक्रमादित्य तथा उसके छोटे भाई उदयसिंह को दुर्ग छोड़कर जंगलों में चले जाना पड़ा। स्वर्गीय राणा सांगा की रानी तथा तत्कालीन महाराणा विक्रमादित्य की माता कर्मवती ने जौहर का आयोजन किया। दुर्ग पर बहादुरशाह का अधिकार हो गया और उसने चित्तौड़ का दुर्ग आग के हवाले कर दिया। विगत सात सौ सालों से अरब और खुरासान के खलीफओं, सुल्तानों एवं बादशाहों से लड़ रहे चित्तौड़ का यह दूसरी बार पतन था।

    ई.1537 में महाराणा सांगा का छोटा पुत्र उदयसिंह, चित्तौड़ का महाराणा हुआ। ई.1567 में मालवा का सुल्तान बाजबहादुर, मुगल बादशाह अकबर के भय से, मालवा छोड़कर, चित्तौड़ आया। महाराणा उदयसिंह ने उसे अपनी शरण में रख लिया। इस पर अकबर बहुत क्रुद्ध हुआ और स्वयं सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ा।

    महाराणा को एक बार फिर दुर्ग छोड़कर जाना पड़ा। मेड़तिया राठौड़ों एवं चित्तौड़ के सिसोदियों ने जयमल और फत्ता के नेतृत्व में दुर्ग में मोर्चा संभाला किंतु अंत में जब वे दुर्ग की रक्षा करने में असमर्थ रहे तो दुर्ग में स्थित रानियों एवं समस्त महिलाओं ने जौहर का आयोजन किया तथा दुर्ग पर अकबर का अधिकार हो गया। विगत आठ सौ सालों में यह तीसरा अवसर था जब किले में अरब या खुरासान से आए आक्रांताओं ने प्रवेश किया। इसके बाद चित्तौड़ दुर्ग को मेवाड़ के स्वामी कभी भी लड़कर अपने अधीन नहीं कर सके।

    कुछ वर्षों बाद अकबर के पुत्र जहांगीर ने उदयसिंह के एक असंतुष्ट पुत्र सगर को चित्तौड़ का किला दिया किंतु राजपूतों ने उसे अपना महाराणा स्वीकार नहीं किया और उसे चित्तौड़ से भगा दिया। ई.1615 में जहांगीर ने महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह के साथ हुई एक संधि के तहत चित्तौड़ का किला महाराणा को पुनः लौटा दिया। उसके बाद भारत की आजादी तक यह किला महाराणाओं के हाथों में रहा।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ई.734 से लेकर ई.1947 तक के 1200 वर्षों की दीर्घ अवधि में मुस्लिम शासक केवल तीन बार चित्तौड़ दुर्ग में घुसने में सफल रहे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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