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  • पन्ना धाय की ऐतिहासिकता

     07.07.2019
    पन्ना धाय की ऐतिहासिकता

    पन्ना धाय की ऐतिहासिकता

    मेवाड़ राजवंश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    मेवाड़ का गुहिल राजवंश भारत की आजादी के समय धरती का सबसे प्राचीन राजवंश था। यह ईक्ष्वाकुओं के रघुवंशियों की प्राचीन परम्परा से निकला था तथा इसकी स्थापना छठी शताब्दी में गुहिल नामक राजा ने की थी। आठवीं शताब्दी ईस्वी में इस वंश के राजकुमार बापा रावल ने मौर्यों से चित्तौड़ का दुर्ग प्राप्त किया। तब से चित्तौड़ और गुहिल एक-दूसरे के पर्यायवाची हो गए।

    मेवाड़ का गुहिल राजवंश अपनी आन, बान एवं शान के लिए धरती भर में प्रसिद्ध था। इसी वंश के राजा खुमांण ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में अरब से आई खलीफा अलमामूं की सेनाओं को मार भगाया था। पंद्रहवीं शताब्दी में महाराणा कुंभा ने लगभग आधा उत्तरी भारत जीतकर शिल्प-कला एवं संगीत-कला की अभूतपूर्व सेवा की थी। मेवाड़ के राजवंश में सोलहवीं शताब्दी में महाराणा सांगा का जन्म हुआ जिसने ई.1528 में बाबर से मोर्चा लिया। मीरांबाई इसी सांगा के बड़े पुत्र भोजराज की पत्नी थी।

    इसी राजवंश में महाराणा प्रताप जैसा वीर राजा हुआ जो जीवन भर अकबर से लड़ता रहा किंतु उसने भारतीय स्वाभिमान का सिर नहीं झुकने दिया। हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप ने अकबर को मेवाड़ी तलवार का पानी चखाया। मेवाड़ के इसी कुल में सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में महाराणा राजसिंह नामक अद्भुत राजा हुआ जिसने औरंगजेब से कड़ी टक्कर ली तथा कभी भी हार नहीं मानी।

    पन्ना धाय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    पन्ना धाय मेवाड़ राजकुल की राजधात्री थी और उसका वास्तविक नाम पन्ना गूजरी था। उस काल में गूजर जाति की स्वस्थ, सुंदर एवं युवा माताओं को राजधात्री बनाया जाता था। पन्ना का जन्म चित्तौड़गढ़ के निकट ‘माताजी की पांडोली’ नामक गांव में हुआ था। उसके पिता का नाम ‘हरचंद हांकला तथा पति का नाम ‘सूरजमल चौहान’ था जो कि ‘कमेरी’ गांव का रहने वाला था। पन्ना को महाराणा सांगा के पुत्र उदयसिंह की धाय नियुक्त किया गया था।

    मेवाड़ की शक्ति का चरम

    जब ईस्वी 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने समरकंद से आकर भारत पर आक्रमण किया तब उत्तरी भारत में महाराणा सांगा सबसे बड़ी हिन्दू शक्ति थी। सांगा ने दिल्ली के लोदी सुल्तानों तथा मालवा, गुजरात एवं नागौर के मुस्लिम सुल्तानों को परास्त करके अपनी शक्ति बढ़ा ली थी। उसके अधीन चित्तौड़, रणथंभौर तथा कुंभलगढ़ जैसे लगभग 100 अजेय दुर्ग थे। सांगा की सेना में 1 लाख सैनिक थे तथा सांगा के राज्य की वार्षिक आय 10 करोड़ रुपए थी। 7 बड़े हिन्दू राजा, 9 राव और 104 सामंत सांगा की सेवा में रहा करते थे। बहुत से मुसलमान अमीर तथा शहजादे सांगा की शरण में रहते थे। महाराणा सांगा मुस्लिम राज्यों का उच्छेदन करके भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता था। इस कार्य में वह सफलता के काफी निकट पहुंच चुका था किंतु इसी बीच बाबर ने भारत पर आक्रमण किया और उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियां एकदम से बदल गईं।

    मेवाड़ की शक्ति का ह्रास

    ई.1528 में जब बाबर ने महाराणा सांगा को ललकारा तो सांगा उत्तरी भारत के लगभग समस्त हिन्दू राजाओं को एकत्रित करके सांगा से लड़ने के लिए पहुंचा। खानवा के मैदान में दोनों पक्षों में भीषण लड़ाई हुई किंतु दुर्भाग्यवश महाराणा सांगा घायल होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। मेवाड़ के हजारों वीर योद्धा इस युद्ध में मारे गए जिससे मेवाड़ बुरी तरह कमजोर हो गया। महाराणा सांगा की 28 पत्नियां थीं जिनमें से पहली पत्नी धनकंवर जोधा का पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का नया महाराणा बना। उसमें अपने पिता सांगा जैसी दूरदृष्टि नहीं थी।

    महारानी कर्मवती की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    महाराणा सांगा की दूसरी रानी कर्मवती बूंदी के राव सूरजमल हाड़ा की बहिन थी। उसे हाड़ी रानी भी कहा जाता था। वह महाराणा सांगा को अत्यंत प्रिय थी। कर्मवती के दो पुत्र थे- विक्रमादित्य तथा उदयसिंह। महाराणा सांगा ने हाड़ी रानी के पुत्रों को मेवाड़ राज्य की सबसे बड़ी एवं सबसे उपजाऊ जागीर प्रदान की थी। इस जागीर में रणथंभौर नामक विश्व-प्रसिद्ध दुर्ग था तथा इस जागीर की आय 60 लाख रुपए वार्षिक थी। महाराणा सांगा ने रानी कर्मवती के भाई सूरजमल हाड़ा को रणथंभौर का दुर्गपति बनाया जो कि उस काल का प्रख्यात योद्धा एवं शूरवीर था। सूरजमल हाड़ा बूंदी राज्य का भी राजा था। सूरजमल के पिता ने महाराणा सांगा के साथ खानवा के मैदान में बाबर से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी।

    जब खानवा की लड़ाई के बाद महाराणा सांगा की मृत्यु हो गई तो कर्मवती अपने 11 वर्षीय पुत्र विक्रमादित्य और 6 वर्षीय पुत्र उदयसिंह को लेकर रणथंभौर चली गई जो कि 60 लाख रुपये वार्षिक आय की विशाल जागीर थी।

    रानी कर्मवती के पुत्रों को चित्तौड़ की गद्दी की प्राप्ति

    महाराणा रत्नसिंह से यह सहन नहीं होता था कि उसके सौतेले भाइयों विक्रमादित्य एवं उदयसिंह के पास 60 लाख रुपए की विशाल जागीर और रणथंभौर जैसा अभेद्य दुर्ग रहे। रणथंभौर की जागीर एवं दुर्ग को छीनने के लिए राव सूरजमल को रास्ते से हटाना आवश्यक था। इसलिए रत्नसिंह ने राणा बनने के तीन साल बाद अर्थात् ई.1531 में राव सूरजमल को मारने का षड़यंत्र रचा और शिकार खेलता हुआ बूंदी राज्य की सीमा पर पहुंच गया तथा सूरजमल को भी शिकार खेलने के लिए बुलाया। सूरजमल ने महाराणा का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। एक दिन महाराणा रत्नसिंह अपने विश्वस्त सामंत पूरणमल तथा सूरजमल को लेकर घने जगंल में गया। जंगल में एकांत पाकर महाराणा रत्नसिंह तथा पूरणमल ने राव सूरजमल को घेरकर उस पर प्राण घातक हमला किया। राव सूरजमल ने भी अपनी तलवार निकाल कर उनका सामना किया। इस युद्ध में महाराणा रत्नसिंह और सूरजमल दोनों ही मृत्यु को प्राप्त हुए।

    विक्रमादित्य की ऐतिहासिक पृष्ष्ठभूमि

    चित्तौड़ की राजगद्दी रिक्त हो जाने से महाराणा सांगा की विधवा रानी कर्मवती अपने 14 वर्षीय पुत्र विक्रमादित्य तथा 9 वर्षीय पुत्र उदयसिंह को लेकर चित्तौड़ आई तथा कर्मवती का बड़ा पुत्र विक्रमादित्य मेवाड़ का महाराणा बना। विक्रमादित्य एक अयोग्य राजा सिद्ध हुआ। बचपन की बुरी आदतों के कारण उसने बहुत से पहलवान अपनी सेवा में रख लिए तथा उनके माध्यम से मेवाड़ के सरदारों को अपमानित करने लगा। इस कारण मेवाड़ के बहुत से सरदार नए महाराणा का साथ छोड़कर अपनी जागीरों में चले गए।

    बहादुरशाह का चित्तौड़ पर भीषण आक्रमण

    मेवाड़ की सैनिक शक्ति बाबर से हुई खानवा की लड़ाई में ही क्षीण हो चुकी थी तथा सांगा के बाद लगातार दो कमजोर राणा (रत्नसिंह एवं विक्रमादित्य) मेवाड़ को फिर से खड़ा नहीं कर पाए थे इसलिए अवसर पाकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया। वह सांगा के समय हुई अपनी भयानक पराजय का बदला लेना चाहता था तथा सांगा द्वारा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी से छीनी गई रत्नजड़ित कमरपेटी एवं रत्नजड़ित मुकुट छीनना चाहता था।

    राजमाता कर्मवती जानती थी के इस समय चित्तौड़ बहुत कमजोर हो चुका है और वह गुजरात के सुल्तान का सामना नहीं कर पाएगा। इसलिए कर्मवती ने अपने दोनों पुत्रों- महाराणा विक्रमादित्य एवं राजकुमार उदयसिंह को को फिर से रणथंभौर दुर्ग में भेज दिया तथा मेवाड़ के मुट्ठीभर विश्वस्त सरदारों के सहारे बहादुरशाह का रास्ता रोका। कमजोर मेवाड़ी सरदार, सुल्तान से परास्त हो गए। राजमाता कर्मवती ने सैंकड़ों हिन्दू नारियों के साथ जौहर किया तथा बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग को आग के हवाले कर दिया। मालवा के सुल्तान की रत्नजड़ित कमरपेटी एवं रत्नजड़ित मुकुट भी बहादुरशाह को मिल गए।

    कुछ दिन बाद बाबर के पुत्र एवं मुगल बादशाह हुमायूं ने बहादुरशाह पर आक्रमण किया। इससे बहादुरशाह अपने कुछ सिपाहियों को चित्तौड़ में छोड़कर, पुर्तगालियों से सहायता प्राप्त करने के लिए दीव गया। जब बहादुरशाह नाव से समुद्र में यात्रा कर रहा था, तब समुद्र में तूफान आ जाने से उसकी नाव उलट गई और वह डूब कर मर गया। इस पर विक्रमादित्य अपने छोटे भाई उदयसिंह को लेकर वापिस चित्तौड़ आया और थोड़े से मेवाड़ी सैनिकों के बल पर बहादुरशाह के सैनिकों को मार डाला और फिर से चित्तौड़ के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार सात-आठ साल के अंतराल में शक्तिशाली चित्तौड़ अत्यंत निर्बल हो गया। महाराणा विक्रमादित्य मुट्ठी भर सैनिकों और सामंतों के सहारे निर्बल चित्तौड़ पर शासन करता था।

    बनवीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    महाराणा सांगा का एक बड़ा भाई था- पृथ्वीराज। वह अत्यंत वीर, साहसी एवं योग्य राजकुमार था, उसी को मेवाड़ का अगला महाराणा बनना था किंतु दुर्भाग्य से उसे सिरोही के राजा जगमाल ने विष खिला कर मार डाला। इस कारण पृथ्वीराज के छोटे भाई महाराणा सांगा को अपने पिता का राज्य प्राप्त हुआ। इस पृथ्वीराज की एक मुंह लगी दासी थी जिससे एक पुत्र भी था। इस पुत्र का नाम बनवीर था।

    दासी पुत्र बनवीर अत्यंत महत्वाकांक्षी और बुरे स्वभाव का व्यक्ति था। उसने चित्तौड़ एवं महाराणा को निर्बल जानकर ई.1536 में महाराणा विक्रमादित्य को मारने एवं स्वयं चित्तौड़ का स्वामी बनने का षड़यंत्र किया। एक रात को बनवीर खुली तलवार लेकर महाराणा विक्रमादित्य के महल में घुस गया और उसने महाराणा की हत्या कर दी।

    उदयसिंह के प्राणों की रक्षा

    जिस समय महाराणा विक्रमादित्य की हत्या हुई उस समय महाराणा का छोटा भाई उदयसिंह लगभग 14 साल का था तथा अपनी माता कर्मवती के जीवित नहीं होने के कारण पन्ना धाय के संरक्षण में रहा करता था। बनवीर नंगी तलवार लेकर महाराणा के महल में घुस रहा था तब किसी ने दौड़कर पन्ना धाय को सूचना दी कि बनवीर यहाँ भी आ सकता है। तब आसन्न खतरे को भांपकर पन्ना ने राजकुमार उदयसिंह को एक विश्वस्त सेवक के साथ महल से बाहर भेज दिया और अपने पुत्र चंदन को राजकुमार के पलंग पर सुला दिया। महाराणा की हत्या करने के बाद बनवीर राजकुमार उदयसिंह के महल की तरफ आया। उसने पन्ना से पूछा कि उदयसिंह कहां है? पन्ना ने राजकुमार के पलंग पर सोए अपने पुत्र की ओर संकेत किया। बनवीर ने उसे ही राजकुमार समझ कर मार डाला और स्वयं मेवाड़ का महाराणा बनकर शासन करने लगा।

    उदयसिंह को राज्य की प्राप्ति

    बनवीर के जाने के बाद पन्ना भी चित्तौड़ के महलों से निकल गई और राजकुमार उदयसिंह को लेकर देवलिया के रावत रायसिंह के पास पहुंची। देवलिया के रावत ने पन्ना धाय एवं उदयसिंह का बड़ा सत्कार किया किंतु स्वयं को राजकुमार की रक्षा करने में असमर्थ जानकर उन्हें डूंगरपुर भिजवा दिया। डूंगरपुर के रावल आसकरण ने बनवीर के डर से उदयसिंह को रखने से मना कर दिया। इस पर पन्ना, राजकुमार उदयसिंह को लेकर कुंभलगढ़ पहुंची। कुंभलगढ़ का किलेदार आशा देपुरा नामक एक महाजन था। वह भी बनवीर के भय से भ्रमित होने लगा।

    जब आशा देपुरा की माँ को ज्ञात हुआ कि पन्ना, उदयसिंह को लेकर आई है तब उसने अपने पुत्र को समझाया कि तुम पर स्वर्गीय महाराणा सांगा के बहुत से उपकार हैं, उनका राज्य एक दासीपुत्र ने हथिया लिया है इसलिए तुम अपने कर्त्तव्य का पालन करो, अपने स्वामी के पुत्र की प्राणरक्षा करके अपने स्वामी के उपकारों का बदला चुकाओ।

    इस पर आशा देपुरा सिर पर कफन बांधकर मेवाड़ राजवंश के टिमटिमाते हुए कुलदीपक उदयसिंह की रक्षा करने के लिए तैयार हो गया। उसने पन्ना को वचन दिया कि वह देह में प्राण रहने तक राजकुमार की रक्षा करेगा। आशा देपुरा ने कोठरिया के सामंत रावत खान को राजकुमार के कुंभलगढ़ पहुंचने की सूचना भिजवाई।

    रावत खान तत्काल कुंभलगढ़ पहुंचा। उसने राजकुमार को पहचान लिया तथा मेवाड़ के समस्त सरदारों को कुंभलगढ़ आने के लिए आमंत्रित किया। समस्त सरदारों ने मिलकर उदयसिंह को मेवाड़ का नया महाराणा स्वीकार कर लिया और उसे राजगद्दी पर बैठाकर उसका तिलक किया। इसके बाद मेवाड़ के समस्त सरदारों ने अपनी-अपनी सेना लेकर चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया और चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। बनवीर मारा गया।

    इस प्रकार पन्ना धाय के अदम्य साहस, स्वामिभक्ति एवं पुत्र बलिदान के कारण ही मेवाड़ राजवंश की रक्षा हुई। जिसमें आगे चलकर महाराणा प्रताप और महाराणा राजसिंह जैसे पराक्रमी महाराणा हुए जिन्होंने अकबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल बादशाहों से भीषण टक्कर ली और यह कुल फिर से राष्ट्र की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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