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  • अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों को बारूद से उड़ा दिया!

     15.08.2019
     अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों को बारूद से उड़ा दिया!

     अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों को बारूद से उड़ा दिया!

    ई.1556 में तीसरा मुगल बादशाह अकबर मुगलों के तख्त पर बैठा। वह मुगल सल्तनत का सर्वाधिक शक्तिशाली बादशाह सिद्ध हुआ। उसकी ताकत का विस्तार तब हुआ जब ई.1562 में आम्बेर के कच्छवाहों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा मेवाड़ के गुहिलों की सेवा त्याग दी। आम्बेर कच्छवाहों के अनुकरण में जोधपुर, जैसलमेर एवं बीकानेर के राजाओं ने भी, गुहिलों की मित्रता छोड़कर, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने-अपने राज्यों को सुरक्षित बनाने का प्रयास करने लगे।

    हिन्दू राजाओं की इस कार्यवाही से मेवाड़ के गुहिलों की शक्ति को बहुत नुक्सान हुआ। अब अकबर मेवाड़ के गुहिलों को भी अपने अधीन करने की फिराक में रहने लगा। शीघ्र ही उसे इसका अवसर मिल गया।

    ई.1567 में मालवा का सुल्तान बाजबहादुर जिसे इतिहास में बायजीद भी कहा जाता है, अकबर के भय से चित्तौड़ के महाराणा उदयसिंह की शरण में आया। महाराण उदयसिंह ने उसे अपने पास रख लिया। इस पर अकबर बहुत नाराज हुआ और एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ा। अकबर के सेनापतियों ने सिवीसपुर अर्थात् शिवपुर, कोटा, गागरौन एवं माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया तथा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता हुआ चित्तौड़ के निकट जा पहुंचा।

    महाराणा उदयसिंह ने अपने सरदारों को चित्तौड़ की रक्षा के लिये बुलाया। इन सरदारों ने महाराणा को सलाह दी कि मेवाड़ पहले से ही आगरा, मालवा एवं गुजरात के शासकों से लड़ते-लड़ते अपने हजारों वीर सिपाहियों को खो चुका है जबकि अकबर की सेना बहुत विशाल है तथा आम्बेर, मारवाड़ और बीकानेर राजयों की सेनाएं भी अकबर की सहायता के लिए आ रही हैं। इसलिए चित्तौड़ अकबर से लड़कर जीतने की स्थिति में नहीं है। अच्छा यही होगा कि महाराणा राजपरिवार को लेकर घने पहाड़ों में चले जाएं ताकि राजवंश की रक्षा हो सके। 

    महाराणा ने यह सलाह मान ली तथा वह राजपरिवार को लेकर पहाड़ों में चला गया तथा उसने मेड़तिया राठौड़ जयमल और सिसोदिया पत्ता को चित्तौड़ का दुर्ग सौंप दिया। मेवाड़ की एक सेना महाराणा के साथ जंगलों में चली गई तथा चित्तौड़ की रक्षा के लिए 8000 राजपूत सिपाही नियुक्त किए गए। अकबर की सेनाएं चित्तौड़ तक आ धमकीं। विचित्र दृश्य था, महाराणा सांगा के समय तक जो आम्बेर जोधपुर और बीकानेर राज्य, चित्तौड़ की रक्षा करने में अपना गर्व समझते थे, आज वे अकबर की तरफ से चित्तौड़ का मानभंजन करने को तलवारें निकालकर खड़े थे।

    दूसरी ओर मेड़ता के राठौड़, ग्वालियर के तंवर, समदड़ी के झाले तथा मेवाड़ के गुहिल; चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा में सन्नद्ध थे। चौहान, सोलंकी और डोडिया परमार भी चित्तौड़ के लिये मरने-मारने को तैयार थे। भले ही चित्तौड़ के रक्षक थोड़े से थे किंतु इनके सामने ‘अकबर’ की दाल गलनी कठिन थी। अक्टूबर 1567 में अकबर चित्तौड़ दुर्ग के निकट पहुंचा। उसने सेनापति बख्शीस को दुर्ग पर घेरा डालने का काम सौंपा।

    जब अकबर को ज्ञात हुआ कि महाराणा दुर्ग में नहीं है तथा वह कुम्भलगढ़ या उदयपुर चला गया है तो उसने अपने अन्य सेनापति हुसैन कुली खाँ को एक बड़ी सेना देकर पहले कुंभलगढ़ तथा फिर उदयपुर की ओर भेजा किंतु हुसैन कुली खाँ महाराणा को नहीं ढूंढ सका और निराश होकर लौट आया। अब अकबर ने अपना पूरा ध्यान चित्तौड़ पर केन्द्रित किया।

    कई महीने तक घेराबंदी चलती रही किंतु अकबर चित्तौड़ी वीरों का बाल भी बांका नहीं कर सका। कई महीनों तक चले इस घेरे में सेना के आवागमन, रसद और गोला-बारूद पर करोड़ों रुपए खर्च हो गए किंतु चित्तौड़ का दुर्ग अविचल भाव से खड़ा रहा। इस पर अकबर ने दुर्ग की नीवों में बारूद भरने के आदेश दिए किंतु दुर्ग की दीवारों पर खड़े राजपूत सिपाही अकबर के सैनिकों पर तीरों, जलते हुए कपड़ों और खौलते हुए तेल की बरसात करते थे जिसके कारण किसी भी मुगल सैनिक का दुर्ग की दीवार तक पहुंच पाना संभव नहीं था।

    इसलिए धरती के भीतर सुरंग बनाने का विचार किया गया किंतु पहाड़ी क्षेत्र में लम्बी सुरंग बनाना संभव नहीं था। अतः अकबर ने मुगल सेना के शिविर से लेकर दुर्ग की दीवार तक कई साबात बनाने के आदेश दिए। भैंसे की मोटी चमड़ी की कई पर्तों को जोड़कर बनाई गई छत साबात कहलाती थी। इसके नीचे सिपाही हथियार लेकर छिपे रहते थे। किले की दीवारों से इस साबात पर पत्थर के गोले बरसाए जाने लगे जिससे साबात बार-बार टूट जाती थी तथा उसके नीचे छिपे मुगल सैनिक मर जाते थे।

    साबात बनाने वाले मजदूर भी बड़ी संख्या में मारे जा रहे थे किंतु साबात बनाने का काम जारी रखा गया। जगह-जगह तापें लगाकर साबात की रक्षा की गई। अब अकबर ने अपने सेनापतियों को दुर्ग के चारों ओर फैला दिया तथा प्रत्येक दरवाजे एवं बारी के सामने एक-एक मोर्चो बांधा।

    लाखोटा बारी के सामने अकबर ने स्वयं मोर्चा लगाया तथा हसन खाँ, चगताई खाँ, राय पतरदास और इख्तियार खाँ को अपने साथ रखा। यहां पर अकबर ने एक सुरंग खुदवाई ताकि आपात काल में अकबर के प्राण बचाए जा सकें। अकबर का मुकाबला करने के लिए स्वयं जयमल राठौड़ अपने कुछ हजार सिपाहियों के साथ दरवाजे के दूसरी तरफ आकर बैठ गया।

    दूसरा मोर्चा किले के पूर्व की तरफ सूरजपोल दरवाजे के सामने लगाया गया। यहाँ शुजात खाँ, राजा टोडरमल और कासिम खाँ को नियुक्त किया गया तथा एक बड़ा तोपखाना स्थापित किया गया। इस दरवाजे के दूसरी तरफ रावत साईंदास चूण्डावत अपनी सेना लेकर डट गया। मुगल सेना द्वारा यहाँ से एक साबात पहाड़ी के बीच तक बनाई गई।

    तीसरे मोर्चे पर जो किले के दक्षिण की तरफ की चित्तौड़ी बुर्ज के सामने था, ख्वाजा अब्दुल मजीद, आसफ खाँ आदि कई सेनापतियों सहित मुगल सेना खड़ी की गई। इनका मुकाबला करने के लिए दरवाजे के दूसरी तरफ बल्लू सोलंकी ने अपने आदमियों के साथ मोर्चा बांधा।

    जिस प्रकार अकबर के साथ बड़ी संख्या में तोपची थे, उसी प्रकार चित्तौड़ दुर्ग में भी कुछ तोपची थे जो सुरंग खोदने एवं साबात बनाने वालों को नष्ट कर रहे थे। साबात की रक्षा में अकबर के प्रतिदिन 200 आदमी मारे जाते थे। जब साबात बन रहे थे, उस समय राणा के सात-आठ हजार सवारों और कई गोलंदाजों ने साबात बनाने वालों पर हमला किया। कारीगरों के बचाव के लिए गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन थी तो भी इतने कारीगर मरे कि लाशों के ढेर लग गए।

    बादशाह ने सुरंग और साबात बनाने वालों को जी खोलकर रुपया दिया। किसी तरह से दो सुरंगें किले की तलहटी तक पहुंचाई गईं। एक में 120 मन और दूसरी में 80 मन बारूद भरी गई। 17 दिसम्बर 1567 को लाखोटा बारी की तरफ एक सुरंग उड़ाई गई। विस्फोट इतना भयंकर था कि किले की एक बुर्ज उड़ गई। इस बुर्ज में 50 राजपूत सिपाही तैनात थे, वे भी मारे गए। यहां तक कि लाखोटा बारी दरवाजा भी नींव से उखड़ गया।

    यहां से होकर शाही फौज किले में घुसने लगी। इतने में अचानक दूसरी सुरंग भी उड़ गई जिससे शाही फौज के 200 सिपाही मर गए। सुरंग के इस विस्फोट का धड़ाका 50 कोस तक सुनाई दिया। इस धमाके के कारण मुगलों में दहशत फैल गई तथा वे थोड़े से पीछे हटे। इसी दौरान राजपूतों ने आनन-फानन में ध्वस्त बुर्ज को फिर से बना लिया।

    उसी दिन बीकाखोह एवं मोर मगरी की तरफ से आसफ खाँ ने तीसरी सुरंग उड़ाई। मुगलों के दुर्भाग्य ने यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा तथा मुगलों के 30 सिपाही मारे गए। इस दौरान अकबर स्वयं भी बारूद के धमाके की चपेट में आ गया और मरते-मरते बचा। ठीक उसी समय राजपूतों द्वारा किले के भीतर से गोलियां दागी गईं। एक गोली अकबर के पास तक पहुंची जिसके कारण अकबर के पास खड़ा आदमी मर गया किंतु अकबर बच गया। अकबर के सेनापतियों ने उसे मोर्चे से दूर भेज दिया।

    अंत में राजा टोडरमल और कासिम खाँ मीर की देख-रेख में साबात बनकर तैयार हो गया। दो रात और एक दिन तक दोनों सेनाएं लड़ाई में इस तरह उलझ गईं कि खाना-पीना भी भूल गईं। मुगल फौज ने कई जगह से किले की दीवार तोड़ डाली परन्तु राजपूत सिपाहियों ने उन स्थानों पर तेल, रुई, कपड़ा, बारूद आदि जलाकर शत्रु को भीतर आने से रोका।

    एक रात अकबर ने देखा कि एक राजपूत सरदार दीवार की मरम्मत कराने के लिए हाथ में मशाल लेकर इधर-उधर घूम रहा है। अकबर ने उस पर अपनी संग्राम नामक बंदूक से गोली चलाई जिससे वह राजपूत सरदार घायल हो गया। बाद में ज्ञात हुआ कि वह व्यक्ति स्वयं मुख्य सेनापति मेड़तिया जयमल राठौड़ था जो अकबर के बंदूक से निकली गोली के लगने से लंगड़ा हो गया। इस पर भी चित्तौड़ के रक्षकों ने हार नहीं मानी और युद्ध जारी रहा।

    दीर्घकाल के अनंतर दुर्ग में भोजन सामग्री समाप्त होने पर राठौड़ जयमल मेड़तिया ने सरदारों को एकत्रित करके कहा कि अब किले में भोजन का सामान नहीं रहा है, इसलिए जौहर करके दुर्ग के द्वार खोल दिए जाएं। सब राजपूतों को बहादुरी से लड़कर वीर गति को पहुंचना चाहिए। किलेदार की यह सलाह सब राजपूत सरदारों को पसंद आई और उन्होंने अपनी स्त्रियों तथा बच्चों को जौहर करने की अनुमति दे दी। उसी रात किले में पत्ता सिसोदिया, राठौड़ साहिबखान और ईसरदास चौहान की हवेलियों में जौहर की ज्वाला धधकने लगी। यह चित्तौड़ दुर्ग का तीसरा साका था।

    रात के समय आकाश में ऊँची उठती अग्नि की लपटों को देखकर अकबर बहुत आश्चर्य चकित हुआ। उसने अपने मंत्रियों से किले में आग लगने का कारण पूछा। इस पर आम्बेर के राजा भगवानदास ने कहा कि जब हिन्दू युद्धक्षेत्र में मरने का निश्चय कर लेते हैं तो अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में जलाकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं। इसलिए सावधान हो जाना चाहिए, कल किले के दरवाजे खुलेंगे। अकबर के समकालीन इतिहासकार मौलाना अहमद ने तारीख ए अल्फी में लिखा है- ‘किले में कई स्थानों पर जौहर की ज्वालाएं धधकती हुई दिखाई दीं।’

    दूसरे दिन हिन्दुओं ने दुर्ग के द्वार खोल दिए। राजपूत सिपाही साक्षात् काल बनकर अकबर के सिपाहियों को गाजर-मूली की तरह काटने लगे। अकबर की सेना में हाहाकार मच गया। इस युद्ध की तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

    किलेदार जयमल ने अपने साथियों से कहा कि मैं पैर टूट जाने के कारण घोड़े पर नहीं चढ़ सकता परन्तु लड़ने की बड़ी इच्छा है। इस पर उसके कुटुम्बी कल्ला राठौड़ ने उसे अपने कंधों पर बैठा लिया और उससे कहा कि अब लड़ने की आकांक्षा पूरी कर लीजिये। फिर वे दोनों वीर, दोनों हाथों में नंगी तलवारें लेकर लड़ते हुए हनुमान पोल और भैरव पोल के बीच में काम आये। इस घटना को देखने वालों ने कहा कि इस युद्ध में कल्ला राठौड़ ने चतुर्भुज अवतार लिया। दो भुजाएं कल्ला की और दो जयमल की।

    डोडिया परमारों ने भी इस युद्ध में वीरता का प्रदर्शन किया। सांडा डोडिया अपने द्रुतगामी घोड़े पर सवार होकर शत्रु सेना को काटता हुआ गंभीरी नदी के पश्चिमी तट पर काम आया।

    इसी बीच आसपास के गांवों से हजारों आदमी हथियार लेकर रणक्षेत्र में आ गए और मुगलों को काटने लगे। इस दो-तरफा प्रचण्ड आक्रमण से अकबर तिलमिला गया। अकबर ने कई सौ प्रशिक्षित हाथियों की सूण्डों में खाण्डे पकड़ाकर उन्हें आगे बढ़ाया। इन हाथियों के बीच में अकबर भी एक हाथी पर सवार होकर किले के भीतर घुसा। परिस्थितियां इतनी विकट हो गई थीं कि अब युद्ध क्षेत्र में स्थित कोई भी व्यक्ति मारने अथवा मरने के लिए विवश था। युद्ध से कोई बच नहीं सकता था।

    इसी दौरान अकबर का सामना ईसरदास चौहान से हो गया। ईसरदास अपने घोड़े से कूद कर धरती पर आ गया और उसने एक हाथ से अकबर के हाथी का दांत पकड़ लिया तथा दूसरे हाथ से उसकी सूण्ड पर खंजर का वार किया। हाथी की सूंड कटकर दूर जा गिरी। अब ईसरदास ने चिल्लाकर कहा ‘गुणग्राहक बादशाह को मेरा मुजरा पहुंचे।’ युद्ध के भयानक शोर में भी अकबर को ईसरदास के ये शब्द पिघले हुए शीशे के समान लगे। कुछ दिन पहले ही अकबर ने ईसरदास को अपने शिविर में बुलाया था ताकि ईसरदास मेवाड़ी सेना का पक्ष त्यागकर अकबर की तरफ हो जाए किंतु तब ईसरदास ने अकबर से कहलाया था कि मैं फिर किसी दिन आकर बादशाह को मुजरा करूंगा। ईसरदास ने अकबर के हाथी की सूंड काटकर उसी मुजरे का ताना दिया था। अकबर के सिपाही ईसरदास पर टूट पड़े और रणक्षेत्र में अट्टहास करता हुआ ईसरदास उसी क्षण वीर गति को प्राप्त हुआ।

    ईसरदास की ही तरह बहुत से हिन्दू सैनिकों ने मुगल सेनापतियों के कई हाथियों के दांत तोड़ डाले और कइयों की सूण्डें काट डालीं जिससे कई हाथी वहीं मर गए और बहुत से हाथी दोनों तरफ के सैनिकों को कुचलते हुए भाग निकले। 

    पत्ता चूण्डावत बड़ी बहादुरी से लड़ा कोई नहीं जानता कि उसने मुगलों के कितने सिपाहियों के सिर काटे किंतु इसी दौरान एक हाथी ने उसे सूण्ड से पकड़कर पटक दिया जिससे पत्ता चूण्डावत सूरजपोल के भीतर काम आया। रावत साईंदास, राजराणा जैता, राजराणा सुलतान आसावत, सज्जावत, राव संग्रामसिंह, रावत साहिबखान, राठौड़ नेतसी आदि अनेक प्रसिद्ध हिन्दू सरदार उसी दिन वीर गति को प्राप्त हुए।

    इस प्रकार चित्तौड़ का दुर्ग अकबर के अधीन हो गया। हमारी अगली वीडियो में देखिए चित्तौड़ दुर्ग को जीतने के बाद अकबर ने क्या किया?

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    इस आलेख को आप हमारे यूट्यूब चैनल Glimpse of Indian History By Dr. Mohanlal Gupta पर भी देख सकते हैं।


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