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     03.06.2020
    पाकिस्तान का संक्षिप्त इतिहास . 7

    जिन्ना के प्रेम में पागल थी सरोजनी नायडू

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मोसले ने लिखा है कि ई.1920 तक मुहम्मद अली जिन्ना वैधानिक तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिये प्रचार करता था। ई.1928 तक वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बातें करता रहा। मोसले ने लिखा है कि कुछ दिनों तक मुहम्मद अली जिन्ना का नाम भारतीय कवयित्री सरोजनी नायडू के साथ लिया जाता था। वह जिन्ना के प्रेम में पागल थी और उसे प्रेम की कवितायें लिखकर भेजती थी। माना जाता है कि सरोजनी नायडू से पीछा छुड़ाने के लिये ही वह भारत छोड़कर लंदन चला गया और वहां उसने अपनी वकालात जमा ली। ई.1934 तक जिन्ना लंदन में बैरिस्ट्री करता रहा।

    मुस्लिम लीग उसे फिर से भारत ले आई

    जैसे ही ई.1933 में रहमत अली ने पाकिस्तान नामक राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत की, वह अवधारणा रातों रात लंदन में रहने वाले मुस्लिम युवाओं के बीच प्रसिद्धि पा गयी। दुनिया भर के अखबार इसका हल्ला मचाने लगे तो मुस्लिम लीग की हवाई कल्पनाओं को मानो नये पंख मिल गये। अब उसे एक ऐसे लीडर की तलाश थी जिसने भारत से बाहर निकलकर दुनिया को देखा हो, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को जानता हो और अंग्रेजों से उन्हीं की भाषा में पूरे फर्राटे के साथ बात कर सके, जो नेहरू, पटेल और गांधी जैसा बड़ा वकील हो और जो नेहरू, गांधी और पटेल से भारत का एक बड़ा हिस्सा छीन सके।

    उनकी नजर फिर से अपने पुराने अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना पर टिक गयी और वे उसे ई.1934 में लंदन से बैरिस्टरी का काम छुड़वाकर फिर से भारत ले आये। यह पहली बार हो रहा था कि भविष्य में बनने वाले एक देश के लिये एक नेता लंदन से आयात किया जा रहा था। उसी साल जिन्ना केंद्रीय धारा सभा के लिये चुना गया और उसी साल वह अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का अध्यक्ष भी हुआ।

    पूरी तरह अंग्रेजी रंग में रंगा था पाकिस्तान का भावी जनक

    ई.1934 से ई.1947 तक की संक्षिप्त अवधि में भारतीय राजनीति के आकाश पर जिन्ना और गांधीजी एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन माने जाते थे। गांधीजी पूरी तरह भारतीय रंग में रंगे हुए, राजनीति के ऐसे धूमकेतु थे जिनका मुकाबला दुनिया का कोई दूसरा आदमी नहीं कर सकता था तो जिन्ना पूरी तरह से अंग्रेजियत के रंग में रंगा हुआ था। गांधी को जिन्ना की तुलना में कुरान की ज्यादा ही आयतें याद रही होंगी।

    इसके बावजूद जिन्ना की सफलता बेमिसाल थी क्योंकि उसने जिन मुसलमानों का दिल जीत कर दिखा दिया था, जिन्ना उनकी परम्परागत मातृभाषा उर्दू ठीक से बोल भी नहीं सकता था। उसके उच्चारण का हाल यह था कि एक बार उसने अपने भाषण के अंत में "पैकिस्टैन जिंण्डैबैड" कहा। कुछ पत्रकारों ने इन शब्दों का अर्थ "पाकिस्तान इज इन बैग" लगाया जबकि वह तो पाकिस्तान जिंदाबाद कहना चाहता था।

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