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  • पाकिस्तान का संक्षिप्त इतिहास . 6

     03.06.2020
    पाकिस्तान का संक्षिप्त इतिहास . 6

    असंभव सपना करार दिया जिन्ना ने-

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    रहमत अली के इस प्रस्ताव पर जिन्ना की प्रतिक्रिया के बारे में लैरी कांलिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है कि जिस व्यक्ति को एक दिन पाकिस्तान के पिता की संज्ञा से विभूषित किया जाने वाला था, उसी मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को एक "असंभव सपना" कह कर ई.1933 में रहमत अली का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। वस्तुतः रहमत अली जीवन भर लंदन में रहकर पाकिस्तान के लिये संघर्ष करता रहा किंतु जिन्ना ने कभी भी रहमत अली को महत्व नहीं दिया। जिन्ना को भय था कि कहीं रहमत अली, जिन्ना का स्थान न छीन ले।

    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया विरोध-

    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के नाम का विरोध करते हुए 15 अप्रेल 1946 को एक वक्तव्य प्रकाशित करवाया कि यह नाम मेरी तबियत के खिलाफ है। इसका आशय है कि दुनिया का कुछ हिस्सा पाक है और बाकी नापाक।

    हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता था-

    जिन्ना मुहम्मद अली जिन्ना के पूर्वज हिन्दू थे। यह परिवार सांप्रदायिकता की सोच से बिलकुल अलग रहता था। यही कारण है कि मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजी माहौल में पला और बढ़ा। उसने बैरिस्ट्री की पढ़ाई की तथा बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में उसने दादा भाई नौरोजी की अंगुली पकड़कर भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। ई.1904 में वह कांग्रेस के बीसवें बम्बई अधिवेशन में फिरोजशाह मेहता के साथ सम्मिलित हुआ। ई.1913 में उसने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली।

    वह हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रबल समर्थक था। इस विषय पर जोरदार भाषण देने का एक भी मौका वह हाथ से नहीं जाने देता था। ई.1916 में वह मुस्लिम लीग का अध्यक्ष हुआ। कांग्रेस और मुस्लिम लीग की एक साथ सदस्यता लेने के कारण वह विवादों में आ गया। फिर भी उसे हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता रहा। दिसम्बर 1920 के नागपुर अधिवेशन के पश्चात् वह कांग्रेस से दूर होता चला गया और अंत में कांग्रेस को छोड़कर केवल मुस्लिम लीग का सदस्य बन गया।

    जिन्ना के प्रेम में पागल थी  सरोजनी नायडू 

    मोसले ने लिखा है कि ई.1920 तक वह वैधानिक तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिये प्रचार करता था। ई.1928 तक वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बातें करता रहा। मोसले ने लिखा है कि कुछ दिनों तक मुहम्मद अली जिन्ना का नाम भारतीय कवयित्री सरोजनी नायडू के साथ लिया जाता था। वह जिन्ना के प्रेम में पागल थी और उसे प्रेम की कवितायें लिखकर भेजती थी। माना जाता है कि सरोजनी नायडू से पीछा छुड़ाने के लिये ही वह भारत छोड़कर लंदन चला गया और वहां उसने अपनी वकालात जमा ली। ई.1934 तक जिन्ना लंदन में बैरिस्ट्री करता रहा।

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