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  • परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता और उसके पौराणिक संदर्भ

     23.09.2018
    परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता और उसके पौराणिक संदर्भ

    परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता और उसके पौराणिक संदर्भ

    भगवान शंकराचार्य के परकाया प्रवेश पर हमारे पिछले ब्लॉग के बाद यह आवश्यकता अनुभव हुई कि परकाया प्रवेश की वैज्ञानिकता तथा उसके पौराणिक संदर्भों पर थोड़ी चर्चा और की जाना चाहिए ताकि इस परम्परा के बारे में और अधिक विश्वसनीयता से जाना जा सके।

    परकाया प्रवेश को प्रायः अस्वाभाविक घटना समझा जाता है किंतु यह प्राणियों का स्वाभाविक धर्म है। परकाया प्रवेश का अर्थ है एक देह को छोड़कर दूसरी देह में प्रवेश करना।

    माँ के गर्भ में संतान का शरीर बनता है, वहाँ नवीन आत्मा का निर्माण नहीं होता। माँ के गर्भ में बनने वाली शिशु देह में हँसने-रोने एवं बोलने वाला जीवात्मा कहाँ से आता है? निश्चित रूप से वह किसी अन्य देह को छोड़कर आता है जिसे इसी प्रकृति प्रदत्त एवं स्वाभाविक प्रक्रिया के द्वारा नवीन शरीर की प्राप्ति हाती है।

    परमात्मा, देवगण, योगीजन, सिद्धजन और कुछ अन्य प्रकार के दैवीय अस्तित्वों को मां के गर्भ में बन रहे शिशु-शरीर में प्रवेश करने की अनिवार्यता नहीं है। वे स्वयं अपनी शक्तियों के बल पर इच्छानुसार शरीर का निर्माण कर सकते हैं जिसे योगज शरीर कहा जाता है।

    माँ के पेट में बन रहे शिशु में आत्मा प्रवेश नहीं करता, जीवात्मा प्रवेश करता है। वह किसी अन्य स्थान से आकर उस निर्माणाधीन शरीर का स्वामी बनता है। आत्मा और जीवात्मा में अंतर है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है जिसे सुख, दुःख, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, नींद एवं थकान का अनुभव नहीं होता किंतु जीवात्मा को होता है।

    आत्मा की मृत्यु नहीं होती किंतु जीवात्मा की होती है। जीवात्मा की मृत्यु और जीवित मनुष्य की मृत्यु में अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए जीवात्मा के स्वरूप को समझना जरूरी हो जाता है। आत्मा से ही जीवात्मा बनता है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है किंतु जब आत्मा कर्मों के बंधन से संस्कारित हो जाता है तो वह जीवात्मा का रूप ले-लेता है।

    आत्मा एवं जीवात्मा का कोई लिंग नहीं है इसलिए उन्हें स्त्री-लिंग या पुल्लिंग दोनों से सम्बोधित किया जा सकता है। स्त्री देह और पुरुष देह में आकर बैठने वाला जीवात्मा एक ही होता है। वह अपने संस्कारों के आवरण के कारण मोहयुक्त होकर स्त्री-देह या पुरुष-देह का चयन करता है। जीवात्मा अपने जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों के कारण काले, गोरे, अमीर, गरीब, स्वस्थ, रुग्ण आदि प्रकार की देह का चयन करता है। जीवात्मा के ये संस्कार उसके द्वारा किए गए कर्मों से उत्पन्न होते हैं।

    यदि पुनर्जन्म संभव है और शाश्वत सत्य है तो परकाया प्रवेश की घटनाएं भी संभव हैं और शाश्वत सत्य हैं। परकाया प्रवेश की थोड़ी बहुत शक्ति प्रत्येक प्राणी में होती है। यदि हम चींटी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते तो इसका अर्थ है कि चींटी ने किसी न किसी रूप में हमारे भीतर प्रवेश कर लिया है। यह परकाया प्रवेश का सबसे छोटा रूप है जिसमें एक प्राणी केवल संवेदना या भावना बनकर दूसरे प्राणी के मन, बुद्धि एवं हृदय में प्रवेश कर जाता है।

    जब यह संवेदना या भावना विराट रूप धर लेती है तो एक प्राणी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ दूसरे प्राणी की देह में प्रवेश कर लेता है। यहां प्रत्येक शब्द पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण अस्तित्व का अर्थ है संस्कारों से युक्त आत्मा अर्थात् जीवात्मा। इसमें शरीर शामिल नहीं है।

    एक जीवात्मा किसी अन्य जीवात्मा में प्रवेश नहीं कर सकता है, केवल दूसरी काया अथवा किसी दूसरे प्राणी की काया में प्रवेश कर सकता है।

    हमारे इस  ब्लॉग में परकाया प्रवेश की जिस संदर्भ में चर्चा की जानी है वह आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा किए गए परकाया प्रवेश की है। अर्थात् एक जीवात्मा द्वारा एक शरीर में निवास करते हुए ही, अपना शरीर छोडकर, दूसरे जीवित या मृत शरीर में प्रवेश कर जाना।

    ‘तंत्र सार’, ‘मंत्र महार्णव’, ‘मंत्र महोदधि’ आदि तंत्र सम्बधी प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है।

    ‘व्यास भाष्य’ के अनुसार अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास; निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और नाड़ियों में संयम स्थापित करके चित्त के उनमें आवागमन के मार्ग का आभास किया जाता है। चित्त के परिर्भ्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद साधक, योगी, तपस्वी अथवा संत पुरूष अपनी समस्त इन्द्रियों सहित चित्त को निकालकर परकाया प्रवेश कर जाते हैं।

    ‘भोजवृत्ति’ के अनुसार भौतिक बन्धनों के कारणों को समाधि द्वारा शिथिल किया जाता है। नाड़ियों में इन बन्धनों के कारण ही चित्त अस्थिर रहता है। नाड़ियों की शिथिलता से चित्त को अपने लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद योगी अथवा साधक अपने चित्त को इन्द्रियों सहित दूसरे अन्य किसी शरीर में प्रविष्ट करवा सकता है।

    जैन धर्म में सूक्ष्मतर शरीर अर्थात् आत्मा को अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, अशब्द, अरस, चैतन्य स्वरूप और इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य कहा गया है। स्थूल और सूक्ष्म के अतिरिक्त आत्मा को धर्म में संसारी और मुक्त रूप से जाना गया है।

    यूनानी पद्धति में परकाया प्रवेश को छाया पुरूष से जोड़ा गया है।

    विभिन्न त्राटक क्रियाओं द्वारा परकाया प्रवेश के रहस्य को सिद्ध किया जा सकता है। हठ योगी परकाया प्रवेश सिद्धि में त्राटक क्रियाओं द्वारा मन की गति को स्थिर और नियंत्रित करने के बाद परकाया प्रवेश में सिद्ध होते हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथ परकाया प्रवेश की घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनमें महाभारत तथा योग वसिष्ठ आदि भी सम्मिलित हैं।

    महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में आई एक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र किसी कारण, ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गया। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा के शिष्य ‘विपुल’ को योग दृष्टि से ज्ञात हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु-पत्नी से बदला लेने वाला है। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु-पत्नी के शरीर में प्रवेश करके उसे इन्द्र से बचाया।

    महाभारत के शान्ति पर्व में वर्णन है कि सुलभा नामक एक विदुषी महिला, अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट होकर, अन्य विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक नहीं था।

    योग वसिष्ठ नामक ग्रंथ में महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को परकाया प्रवेश की विधि समझाते हुए कहते हैं कि जिस तरह वायु पुष्पों से गंध ख्रींचकर उसका सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से करा देती है, उसी तरह योगी, रेचक के अभ्यास से कुंडलिनी रूपी घर से बाहर निकलकर दूसरे शरीर में जीव का सम्बन्ध कराते हैं।

    ‘पातंजलि योगसूत्र’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में कई शरीर धारण तथा परकाया प्रवेश जैसी अनेक योग विभूतियों का वर्णन है। बहुत से नाथ योगियों को भी परकाया प्रवेश की विद्या प्राप्त थी। नाथ साहित्य में योगी मछन्दनाथ का

    बड़ा आदर है। नाथ साहित्य में उल्लेख मिलता है कि योगी मछन्दरनाथ ने एक बार एक बकरे के शरीर में परकाया प्रवेश किया। एक योगिनी को इस बात का पता चल गया। उसने मछंदरनाथ को उस बकरे के शरीर में ही सीमित कर दिया तथा अपने घर में बांध लिया। जब कई दिनों तक गुरु वापस नहीं लौटे तो उनके शिष्य गोरखनाथ, मछंदरनाथ को ढूंढने निकले। बहुत से स्थानों का भ्रमण करते हुए गोरखनाथ कामरूप नामक देश में पहुंचे। आज का आसाम एवं बंगाल ही उस काल का कामरूप है। कामरूप में एक रूपसी तांत्रिक युवती के घर में गोरखनाथ को अपने गुरु, बकरे के रूप में बंधे हुए मिले। गोरखनाथ ने जोर से आवाज लगाई- जाग मछंदर गोरख आया। गोरख की आवाज सुनकर मछंदर को अपनी सिद्धियां पुनः स्मरण हो गईं और वे संकलप मात्र से बकरे का शरीर त्याग कर फिर से अपने मूल शरीर में आ गए।

    ‘भगवान् शंकराचार्य के अनुसार यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्र बार जप कर लिया जाए तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

    रानी चूड़ाला द्वारा अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश की घटना बहुत प्रसिद्ध है। इस आख्यान के अनुसार शिखिध्वज नामक एक राजा समाधि में बैठ गए। उनकी रानी चूड़ाला पर उनके शरीर की रक्षा की जिम्मेदारी थी। चूड़ाला दिन में कुंभ नामक एक व्यक्ति के मृत शरीर में परकाया प्रवेश करके अपने पति के शरीर की रक्षा करती थी और रात्रि में वह मदनिका नामक एक मृत स्त्री के शरीर में प्रवेश करके जीवन-संगिनी के रूप में अपने पति की सेवा करती थी। ऐसा करते हुए बहुत दिन बीत गए किंतु राजा शिखिध्वज की समाधि नहीं टूटी। एक दिन चूड़ाला ने अपने पति की नाड़ी परीक्षा की तथा उनके जीव की सही स्थिति का पता लगाया। वह समझ गई कि उसके पति जीवित तो हैं किंतु समाधि की जिस अवस्था में पहुंच गए हैं, वहां से उन्हें जगाया जाना संभव नहीं है। अतः देवी चूड़ाला ने अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश करने का निर्णय लिया। यह एक अनोखी घटना होने वाली थी। ठीक उसी प्रकार की जिस प्रकार देवी सुलभा ने राजा जनक के जीवित रहते ही उनके शरीर में प्रवेश कर लिया था। चूड़ाला ने शिखिध्वज के शरीर में प्रवेश करके उनकी चेतना को स्पंदित किया और स्वयं बाहर आकर अपने शरीर में प्रवेश कर गई। जैसे कोई चिड़िया अपने घोंसले में घुस जाती है। बाहर आकर चूड़ाला एक पुष्पाच्छादित वृक्ष के नीचे बैठकर सामगायन करने लगी। चेतना के स्पंदित होते ही शिखिध्वज की समाधि भंग हो गई और सामगायन सुनकर वे जागृत अवस्था में आ गए। 

    अभी हाल ही की एक घटना देश भर में चर्चित रही है। जालंधर के नूरमहल के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान में आशुतोष महाराज के शिष्य उनके शरीर की रक्षा कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी क्लिनीकल डेथ हो चुकी है जबकि शिष्यों का मानना है कि महाराज समाधि अवस्था में हैं तथा एक दिन वे अपने शरीर में फिर से लौटेंगे। कोर्ट ने शिष्यों की भावना को स्वीकार करते हुए महाराज का शरीर सुरक्षित रखने की अनुमति दे दी है।

    हम अपने पिछले ब्लॉग में भी यह कह चुके हैं कि परकाया प्रवेश गृहस्थों के लिए नहीं है, केवल सिद्धों और योगियों के लिए है। यह योगियों का कौतुक मात्र है। परकाया प्रवेश का कोई लाभ नहीं है। न इसकी आवश्यकता है। न इससे मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मा की उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए निष्काम कर्म एवं नवधा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।  

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • महाराणा को पिता का श्राद्ध करने के लिये अंग्रेजों की मदद चाहिये थी

     13.07.2017
    महाराणा को पिता का श्राद्ध करने के लिये  अंग्रेजों की मदद चाहिये थी

    ई.1828 में महाराणा भीमसिंह के पौत्र का बहुत कम आयु में निधन हो गया। उसके सदमें से मात्र 14 दिन बाद महाराणा भी चल बसा। उसके 17 रानियां थीं जिनसे उसे कई पुत्र हुए थे किंतु महाराणा की मृत्यु के समय केवल अकेला जवानसिंह ही जीवित बचा था जिसकी आयु 28 वर्ष थी। वही मेवाड़ का 40वां महाराणा हुआ। वह कुंवर पदे में बड़ा मितव्ययी और वचन का पक्का था।

    उसके कहने पर सेठ साहूकार तथा अंग्रेज उसके पिता को रुपये उधार दिया करते थे किंतु गद्दी पर बैठने के बाद जवानसिंह शराब पीने लगा और अपव्ययी हो गया। वचन का भी पक्का न रहा। मुँह लगे नौकरों ने चिकनी चुपड़ी बातों से उसे अपने वश में कर लिया। इन नौकरों ने राज्य को जम कर लूटा जिससे विश्वस्त सेवक राज्य छोड़कर चले गये। महाराणा जवानसिंह के समय में उसके मुँह लगे नौकरों का अन्य राजकीय कर्मचारियों पर बड़ा आतंक रहा। यदि कोई व्यक्ति इन नौकरों की इच्छा के प्रतिकूल आचरण करता तो वह भयानक विपत्ति में फंस जाता था। ईमानदार लोगों को हर समय कैद हो जाने का भय रहता था। ये नौकर राज्य का पैसा हड़प गये जिससे राज्य पर अंग्रेजी खिराज की सात लाख रुपये की रकम चढ़ गयी।

    जवानसिंह की इच्छा थी कि वह अपने पिता महाराणा भीमसिंह का श्राद्ध करने के लिये गया जाये किंतु गयाजी तक जाने के लिये उसके पास साधन और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। ई.1831 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक अजमेर आया। उसने पोलिटिकल एजेण्ट से कहा कि महाराणा को मुझसे मिलने के लिये अजमेर भेजे। महाराणा ने एजेण्ट से कहा कि मुसलमान बादशाहों के समय में भी मुलाकात के लिये हमारा कोई पूर्वज अजमेर या दिल्ली नहीं गया तब मैं अजमेर कैसे जा सकता हूँ?

    इस पर एजेण्ट ने जवाब दिया कि मुगल बादशाह आपके दुश्मन थे, हम आपके मित्र हैं। मित्र से मिलने जाने में कोई बुराई नहीं। मुगल बादशाह अपने दरबार में हाजिर होने वाले राजा को अपना नौकर समझते थे तथा नौकरों जैसा बर्ताव करते थे किंतु गवर्नर जनरल आपसे दोस्ती का व्यवहार करेंगे।

    महाराणा ने अपने सरदारों से विचार विमर्श किया। कुछ सरदारों ने महाराणा के अजमेर जाने पर आपत्ति की किंतु अधिकतर सरदार महाराणा के जाने में कोई बुराई नहीं समझते थे। महाराणा ने सरदारों से कहा कि अंग्रेजो के कारण ही मेवाड़ की मराठों से रक्षा हुई है। शाहपुरे के फूलिया परगने पर जो अंग्रेजी पुलिस बैठी है, वह बैंटिक की दोस्ती के बिना उठाई नहीं जा सकती। मुझे अपने पिता का श्राद्ध करने के लिये गयाजी जाना है जिसके लिये मुझे अंग्रेजी राज्य से होकर गुजरना पड़ेगा। अतः अंग्रेजों की मित्रता की आवश्यकता है। इस पर सरदार संतुष्ट हो गया और महाराणा अजमेर के लिये रवाना हो गया।

    फरवरी 1832 में जवानसिंह अजमेर पहुँचा । वहाँ पहुँच कर उसे ज्ञात हुआ कि अगले दिन बूंदी का राव रामसिंह अजमेर आने वाला है और वह मेवाड़ की सेना के बीच से होकर गुजरेगा। राव रामसिंह के दादा ने महाराणा जवानसिंह के दादा की हत्या की थी इसलिये जवानसिंह की भंवें तन गयीं। उसके आदमियों ने महाराणा को सलाह दी कि बूंदी राव पर आक्रमण कर दें किंतु जवानसिंह ने गवर्नर जनरल को कह भिजवाया कि मेरे दादा का हत्यारा रामसिंह मेरी सेना के बीच से होकर न निकले। गवर्नर जनरल ने बूंदी के राव का मार्ग बदलवाया और झगड़ा होने से बच गया।

    बैंटिक ने महाराणा का भव्य स्वागत किया तथा स्वयं महाराणा के डेरे पर मिलने के लिये आया। इस भेंट में महाराणा ने जो कुछ भी प्रस्ताव बैंटिक के सामने रखा, बैंटिक ने उसे मान लिया। बैंटिक ने महाराणा की तीर्थयात्रा का प्रबंध अंग्रेजी सेना की सुरक्षा में कर दिया। बैंटिक ने महाराणा से प्रार्थना की कि वह बूंदी के राव के साथ मित्रता कर ले। इस पर जवानसिंह ने उत्तर दिया कि बूंदी के राव के दादा ने मेरे दादा की हत्या की थी अतः मैं उससे मित्रता नहीं कर सकता। उससे तो मेरी शत्रुता ही रहेगी।

    ई.1833 में महाराणा 10 हजार सैनिक लेकर अपने पिता का श्राद्ध करने के लिये गयाजी गया। वह वृंदावन, मथुरा, प्रयाग होता हुआ अयोध्या पहुंचा जहाँ लखनऊ के नवाब नासिरूद्दीन हैदर ने उसकी बड़ी खातिरदारी की। वहाँ से बनारस होता हुआ महाराणा गया पहुंचा और अपने तीर्थ गुरु को 10 हजार रुपये, सोना, चांदी आदि दान करके महाराणा भीमसिंह का श्राद्ध किया। इस यात्रा में अंग्रेज सरकार ने महाराणा की बड़ी खातिरदारी की। तीर्थयात्रा के बाद 18 जून 1834 को महाराणा फिर से उदयपुर लौट आया। ई.1837 में नेपाल के महाराजा राजेन्द्र विक्रम शाह ने अपने पूर्वजों की प्राचीन राजधानी के रीति रिवाज देखने के लिये अपने यहाँ से कुछ प्रतिष्ठित पुरुषों एवं स्त्रियों को भेजा। इसके बाद से मेवाड़ तथा नेपाल राज्यों का सम्बन्ध फिर से जुड़ गया।

    30 अगस्त 1838 को सिर दर्द से महाराणा जवानसिंह की मृत्यु हुई। उसके कोई संतान नहीं थी इसलिये बागोर के महाराज शिवदानसिंह के ज्येष्ठ पुत्र सरदारसिंह को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। इसके समय में ई.1839 में भोमट के भीलों ने विद्रोह किया। भीलों पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिये खेरवाड़ा में भील कोर स्थापित की गयी। सरदार सिंह महाराणा जवानसिंह का श्राद्ध करने के लिये गयाजी गया। सरदार सिंह के भी कोई संतान नहीं थी इस पर उसने अपने छोटे भाई सरूपसिंह को गोद लिया। ई.1842 में सरदारसिंह बीमार पड़ा और मृत्यु को प्राप्त हुआ।

    सरूपसिंह के काल में बहुत कम चांदी वाले चित्तौड़ी और उदयपुरी रुपये नकली बनकर बाहर से मेवाड़ में आने लगे। अतः उसने नया सिक्का जारी करने के लिये अंग्रजों से अनुमति मांगी। अंग्रेजी सरकार ने महाराणा को सूचित किया कि राज्य हित में कोई भी कार्य करना आपके अधिकार में है। आपके द्वारा नये सिक्के जारी करने से अंग्रेज सरकार को प्रसन्नता होगी। जब नये सिक्के बनकर तैयार हो जायें तब एक दो सिक्के हमारे देखने के लिये भी भेजें। महाराणा सरूपसिंह ने चांदी की बढ़िया मुद्रा ढलवाई जिस पर उसने नेपाल तथा बजरंगगढ़ (मालवे में राधोगढ़) के अनुकरण पर देवनागरी लिपि अंकित करवायी। इस सिक्के पर महाराणा ने अपना नाम नहीं लिखकर एक तरफ चित्रकूट-उदयपुर लिखवाया तथा दूसरी तरफ 'दोस्ति लंधन’ लिखवाया और नमूने के दो रुपये कर्नल रॉबिन्सन को भिजवाये। अंग्रेजों को यह सिक्का पसंद आया। अतः काफी बड़ी संख्या में ये सिक्के ढाले गये जो सरूपसाही रुपयों के नाम से प्रसिद्ध हैं। चित्रकूट उदयपुर के नीचे चित्तौड़ का दुर्ग बनया गया है तथा दोस्ति लंधन के नीचे छोटी-छोटी लहरें बनायी गयी हैं जो इंगलैण्ड के चारों ओर के समुद्र की लहरों की सूचक हैं। इस नये सिक्के पर महाराणा ने मुसलमान बादशाहों के नाम तथा फारसी लेख नहीं खुदवाये क्योंकि मुसलमानी भाषा वाले सिक्कों को दान पुण्य में देना उसे धर्म विरुद्ध लगता था।

    महाराणा सरूपसिंह का अपने सरदारों से बहुत झगड़ा रहता था। जिस झगड़े से बचने के लिये मेवाड़ ने अपनी स्वतंत्रता का त्याग किया था, वह झगड़ा कभी समाप्त नहीं हुआ। मेवाड़ वीर भूमि है। वहाँ के लोगों में स्वतंत्रता की भावना अधिक है इसलिये प्रत्येक सरदार को लगता था कि उसके ठिकाणे में महाराणा द्वारा किया जाने वाला हस्तक्षेप अनुचित है। इस असंतोष ने मेवाड़ में अंग्रेजों के विरुद्ध भी हवा खराब की। जब 1857 में गदर के बादल उमड़-घुमड़ कर मेवाड़ की भूमि पर से गुजरे तो इन सरदारों में से कइयों ने विद्रोही तेवर अपना लिये।

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  • सोलहवीं शताब्दी की अद्भुत घटना का नायक है ध्यानू भगत

     23.09.2018
    सोलहवीं शताब्दी की अद्भुत घटना का नायक है ध्यानू भगत

    सोलहवीं शताब्दी की अद्भुत घटना का नायक है ध्यानू भगत


    हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक प्राचीन पहाड़ी नगर स्थित है जिसे नगरकोट कहा जाता है। इस नगर में देवी दुर्गा के 51 सिद्धपीठों में से एक सिद्धपीठ स्थित है जिसे बज्रेश्वरी सिद्ध पीठ कहा जाता है। मान्यता है कि पाण्डवों ने इस स्थान पर एक मंदिर बनवाया। तब से यह मंदिर कई बार टूटा एवं कई बार बना।

    इस मंदिर में हजारों वर्षों से पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। हिन्दुओं में मान्यता है कि देवी माता, अपने भक्तों की प्रार्थना सुनती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती है।

    मुख्य मंदिर के सभामण्डप के समक्ष दीवार में लगा पत्थर का एक पैनल बरबस ही सबका ध्यान खींचता है। इस पैनल में एक मनुष्य के मुंह की प्रतिमा लगी हुई है जिसके ऊपर ध्यानू भगत लिखा हुआ है। मंदिर के दाहिनी भाग में एक बरामदे में भी ध्यानू भगत की एक प्रतिमा बनी हुई है जिसमें मनुष्य के एक धड़ ने अपना सिर अपने हाथों में ले रखा है। इस प्रतिमा की भाव भंगमिा से ऐसा प्रतीत होता है कि इस व्यक्ति ने अपना सिर स्वयं ही काटकर किसी को अर्पित किया।

    मंदिर में भ्रमण करते हुए स्त्री-पुरुषों के कुछ छोटे समूह भी श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इनसे बात करने पर ज्ञात होता है कि ये ध्यानू भगत के वंशज हैं जो आज भी अपने पूर्वज की याद में इस मंदिर की यात्रा करते हैं। ये लोग अपने कंधे पर मोर के पंखों का एक गुच्छा धारण करते हैं तथा इनके शरीर पर लोहे की एक जंजीर भी पड़ी होती है। लोहे की जंजीर इस बात की द्योतक है कि किसी समय उनके किसी पूर्वज को लोहे की जंजीरों से बांधकर इस मंदिर तक लाया गया था।

    ध्यानू भगत की कथा इस प्रकार से बताई जाती है- सोलहवीं शताब्दी में जब भारत पर मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था, उन्ही दिनों की यह घटना है। ब्रज प्रदेश में स्थित नदौन ग्राम निवासी ध्यानू, अपने एक हज़ार यात्रियों सहित माता के दर्शनों के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानू भक्त को प्रस्तुत किया।

    अकबर ने पूछा- तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहाँ जा रहे हो! ध्यानू भक्त ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया मैं ज्वाला माई के दर्शनों के लिए जा रहा हूँ मेरे साथ जो लोग हैं वे भी माता के भक्त हैं और यात्रा पर जा रहे हैं । अकबर ने यह सुनकर कहा- ज्वाला माई कौन हैं और वहाँ जाने से क्या होगा!

    ध्यानू भक्त ने उत्तर दिया- ज्वाला माई संसार की रचना एवं पालन करने वाली माता हैं। वे भक्तों द्वारा सच्चे हृदय से की गई प्राथनाएं स्वीकार करती हैं तथा उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है कि उनके स्थान पर बिना तेलबत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन करने जाते हैं।

    अकबर बोला- तुम्हारी ज्वाला माई इतनी ताकतवर है, कि तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूरी कर सकती है, इस बात का विश्वास हमें कैसे होगा? यदि कोई चमत्कार दिखाओ तो हम भी मान लेंगे।

    ध्यानू ने विनम्रता से उत्तर दिया- मैं तो माता का एक तुच्छ सेवक हूँ, मैं भला क्या चमत्कार दिखा सकता हूँ।

    अकबर ने कहा कि तुम्हें इम्तिहान तो देना ही पड़ेगा। हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग किये देते हैं। तुम अपनी देवी से कहकर उसे दुबारा ज़िंदा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गयी।

    ध्यानू भक्त ने मुक्ति का कोई उपाय न देखकर बादशाह से कहा कि वह देवी मां के पास जाकर अपनी प्रार्थना करेगा कि घोड़े को जीवित कर दें। आप एक माह की अवधि तक मेरे घोड़े के सिर एवं धड़ को सुरक्षित रखने की व्यवस्था करें। अकबर ने ध्यानू भक्त की बात मान ली और उसे यात्रा जारी रखने की अनुमति दे दी।

    बादशाह से विदा लेकर ध्यानू भक्त अपने साथियों सहित माता के दरबार में उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि के बाद उसने रात भर जागरण किया। प्रातः काल आरती के समय ध्यानू ने हाथ जोड़कर देवी से प्रार्थना की कि बादशाह मेरी भक्ति की परीक्षा ले रहा है। मेरी लाज रखो। मेरे घोड़े को अपनी कृपा से जीवित करो। अन्यथा मैं भी अपना सर काटकर आपके चरणो में अर्पित कर दूंगा।

    जब देवी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो ध्यानू ने अपनी तलवार से अपना शीश काट कर देवी को भेंट कर दिया। उसी समय साक्षात ज्वाला माई प्रकट हुई और ध्यानू भक्त का सिर पुनः उसके धड़ से जुड़ गया। और वह जीवित हो गया।

    माता ने भक्त से कहा कि तेरे घोड़े का सिर भी धड़ से जुड़ गया है। तू कोई और वर मांग।

    ध्यानू भक्त ने माता के चरणों में शीश झुकाकर कहा कि हे जगदम्बे! आप सर्व शक्तिमान हैं किंतु अपने भक्तों की इतनी कठिन परीक्षा न लिया करें। सारे संसारी मनुष्य आपको शीश काटकर भेंट नहीं चढ़ा सकते। कृपा करके साधारण भेंट से ही अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण किया करें।

    तब देवी माता ने कहा कि अब से मैं केवल नारियल की भेंट एवं सच्चे ह्रदय से की गयी प्रार्थना से ही मनोकामना पूर्ण करुँगी। यह कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयी।

    उधर अकबर के सेवकों ने उसे बताया कि ध्यानू का घोड़ा अचानक ही फिर से जीवित हो उठा है किंतु अकबर को अब भी उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वे माता ज्वालादेवी के मंदिर में निकल रही ज्योति पर लोहे के तवे रखवा दें।

    ऐसा ही किया गया किंतु जब इस पर भी अग्नि नहीं बुझी तो अकबर ने पहाड़ों से निकल रहे एक झरने के पानी को एक नहर के माध्यम से मंदिर पर डलवाया। इस पर भी मंदिर की ज्योति नहीं बुझी। तब अकबर ने स्वयं ज्वाला देवी के मंदिर जाने का निर्णय लिया। वह सोने का छत्र बनवाकर देवी के लिए ले गया।

    जब अकबर ने यह छत्र देवी को अर्पित करना चाहा तो वह अकबर के हाथों से गिरकर टूट गया तथा सोने की बजाय किसी और धातु का बन गया। यह धातु न तो पीतल थी, न सोना थी, न चांदी थी, न ताम्बा थी और न लोहा। यह पता नहीं लगाया जा सका कि छत्र के टुकड़े किस धातु में बदल गए।

    अकबर समझ गया कि देवी ने उसकी भेंट अस्वीकार कर दी है। इसलिए वह चुपचाप लौट गया। अकबर द्वारा चढ़ाया गया खंडित छत्र माता के दरबार में आज भी पड़ा हुआ है। यह घटना ज्वालादेवी के मंदिर की बताई जाती है जो नगर कोट के मंदिर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है किंतु ध्यानू भगत की प्रतिमाएं नगर कोट के मंदिर में लगी हुई हैं।

    कुछ स्थानों पर नगरकोट मंदिर और ज्वाला देवी के मंदिर को एक ही माना जाता है। अतः हो सकता है कि ध्यानू द्वारा देवी को शीश अर्पित करने की घटना नगरकोट वाले मंदिर में ही हुई हो। बाद में इस मंदिर से ज्वाला देवी की ज्योति विलीन हो गई हो और यहां से 35 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी के मंदिर में प्रकट हुई हो।

    यह भी संभव है कि ये दोनों पौराणिक काल के मंदिर आरम्भ से ही अलग रहे हों और ध्यानू भक्त की घटना नगरकोट के मंदिर में घटित हुई हो और उसकी कथा के साथ अकबर के साथ ज्वालादेवी के मंदिर में हुई किसी घटना को जोड़ दिया गया हो। पिछले पांच सौ सालों से ध्यानू भगत के वंशज अपने शरीर पर लोहे की जंजीरें बांध कर अपने कुनबे-गोटे के साथ इस मंदिर की परिक्रमा करने आते हैं।

    उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे ध्यानू भगत की परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। सच क्या है, यह तो काल के गाल में समा गया है किंतु ध्यानू भक्त आज भी मंदिर की प्रतिमाओं में तथा ध्यानू के वंशजों में पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • किसका रक्त निर्दोष है आतंकवादियों का या पत्थरबाजों का !

     14.07.2017
    किसका रक्त निर्दोष है आतंकवादियों का या पत्थरबाजों का !

    राजनीति बुरी चीज नहीं है। युगों-युगों से समाज और राष्ट्र, राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत रहते आए हैं। हर युग में महापुरुष, राजनीति का अवलम्बन लेकर, मानवता के कल्याण के लिए प्रयासरत रहते हैं। राजनीति करने वाले लोग देश को जागृत रखने वाले मंत्रदृष्टा एवं पुरोहित होते हैं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है- वयं राष्ट्रे पुरोहितं जागृयाम्। राजनीति से अपेक्षा की जाती है कि वह मानवता और समाज के व्यापक हित में काम करे। यदि क्षुद्र युग-बोध के कारण राजनीति का इतना बड़ा उद्देश्य बनाए न रखा जा सके, तो भी राष्ट्रहित की अपेक्षा तो इससे की ही जाती है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि हर युग में कुछ लोग राजनीति को इतना उथला और गिरा हुआ बना देते हैं कि राजनीति पर अंगुली उठने लगती है, कोई इसे वेश्या कहता है तो कोई इसे त्याज्य बताकर आजीवन इससे दूर रहता है। यह देखना चिंता-जनक है कि भारतीय राजनीति में आज उन लोगों की संख्या बढ़ गई है जो इसे समाज को सुखी बनाने का माध्यम न मानकर सत्ता हड़पने और स्वार्थ सिद्धि का माध्यम मानते हैं।

    राजनीति भले ही कितनी ही गिर जाए, हर युग की तरह आज भी राष्ट्र, समाज एवं व्यक्ति की समस्याओं का हल, देश की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत होना है। यदि आज के राजनीतिज्ञ इस बात को नहीं समझेंगे तो वे राजनीति के परिदृश्य से एकाएक ही विलुप्त हो जाएंगे। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय राजनीति को देखकर दुख होता है। एक ओर चीन भारत की सीमाओं पर गरज रहा है, दूसरी ओर पाकिस्तान भयानक खूनी खेल में संलग्न है और तीसरी ओर कश्मीर के युवक अपने ही देश की सेना के विरुद्ध घोषित युद्ध छेड़े हुए है। ऐसी विकट परिस्थितियों में भी देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस जिसके नेतृत्व में देश का स्वतंत्रता संग्राम सफल हुआ, देश की वर्तमान सरकार को बदनाम करने और जनमानस में उसके विरुद्ध उद्वेलन उत्पन्न करने में दिन-रात लगी हुई है। क्या देश को केवल इसीलिए स्वतंत्र कराया गया था कि अनंतकाल तक केवल कांग्रेस ही देश की सत्ता में बनी रहे! क्या वह शांति और सकारात्मकता के साथ विपक्ष में बैठकर जनता की सेवा नहीं कर सकती!

    क्यों कांग्रेस यह नहीं स्वीकार कर पा रही कि देश की जनता ने उन्हें अब विपक्ष में बैठने के लिए कहा है तथा जो पार्टी सरकार चला रही है उसे पूरे देश की जनता ने प्रबल बहुमत से चुना है! एक समय था जब कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने प्रतिद्वंद्वी को चुनावों के समय मौत का सौदागर कहा और उसका खामियाजा भुगता किंतु अब तो ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस ने देश की सत्ता को येन-केन प्रकरेण छीनने के लिए सरकार से युद्ध छेड़ रखा है! कांग्रेसी नेताओं द्वारा हर समय देश की सत्तारूढ़ पार्टी को गरिआया जा रहा है। यहाँ तक कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के लिए लिखा गया है कि कश्मीर में गिरने वाला निर्दोष रक्त, नरेन्द्र मोदी का व्यक्तिगत लाभ है तथा भारत का नुक्सान है। क्या ऐसा लिखते समय, उनकी अंर्तआत्मा ने एक बार भी चेताया नहीं कि विरोधी पर आक्रमण करने के लिए इतना नीचे मत गिरो! देश के प्रधानमंत्री पर ऐसा मिथ्या एवं घिनौना आरोप मत लगाओ!

    देश के भीतर ही जब ऐसा नारकीय दृश्य बनाने का प्रयास किया जाएगा कि देश का प्रधानमंत्री अपने स्वार्थ के लिए देश के निर्दोष नागरिकों का रक्त बहा रहा है, तो देश के शत्रुओं का कार्य कितना आसान हो जाएगा! क्या विपक्षी पार्टी के उपाध्यक्ष अपने द्वारा लिखे गए शब्दों का अर्थ भी समझते हैं! वे किसे निर्दोष रक्त बता रहे हैं, आतंकवादियों को, अलगाववादियों को या पत्थरबाजों को! नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर कहकर जिस पार्टी ने देश की सत्ता गंवा दी, जिस पार्टी के नेता मणिशंकर अय्यर देश के दुश्मनों से गले मिलते हुए पकड़े गए और पाकिस्तान में जाकर भीख मांगते हुए दिखाई दिए कि नरेन्द्र मोदी को हटाकर हमारी पार्टी की सरकार लाओ, किस नैतिक साहस के सहारे जनता को नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ उकसाने का षड़यंत्र रच रहे हैं! क्या उन्हें अब भी समझ में नहीं आया कि भारत की जनता को घिनौनी बातें अच्छी नहीं लगतीं। यह देश गद्दारों को पसंद नहीं करता। गालियों की भाषा, चुनावी रैलियों में तालियां पिटवा लेती है किंतु मतपेटी में वोट नहीं डलवा पाती।

    कांग्रेस उपाध्यक्ष ने यहाँ तक विष वमन किया है कि नरेन्द्र मोदी सरकार की नीतियों ने काश्मीर को आतंकवादियों की भूमि बना दिया है! हैरानी होती है, कौन देता है विपक्षी उपाध्यक्ष को ऐसे घटिया शब्दों का प्रयोग करने की सलाह! क्या पार्टी के भीतर कोई देखता भी है कि उनके उपाध्यक्ष मीडिया में क्या कह अथवा लिख रहे हैं! जब श्रीमती इंदिरा गांधी के समय देश पर शत्रु ने आक्रमण किया था, तब के विपक्षी दल जनसंघ ने महाभारत के श्लोक को उद्धृत करते हुए कहा था- वयं पंचाधिकम् शतम्। अर्थात् राष्ट्र पर आई विपत्ति में आप सौ भाई ही नहीं हैं, हम पांच भाई भी आपके साथ हैं। क्या आज की कांग्रेस में इतना भी नैतिक साहस नहीं है कि काश्मीर समस्या पर वह देश की सरकार का साथ दे!

    क्या कांग्रेस यह समझती है कि देश की जनता को काश्मीर समस्या का इतिहास ज्ञात नहीं है! देश अच्छी तरह जानता है कि 1947 में काश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत की अन्य 562 रियासतों की तरह भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त की थी किंतु जवाहरलाल नेहरू ने काश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या का हवाला देते हुए हरिसिंह का प्रस्ताव यह कहकर नकार दिया था कि इस प्रस्ताव में शेख अब्दुल्ला की सहमति आवश्यक है। इसके बाद नेहरू और अब्दुल्ला की बैठक हुई जिसमें काश्मीर में धारा 307 तथा अन्य प्रावधान हुए जिन्होंने काश्मीर को भारत के लिए नासूर बना दिया। ये प्रावधान कितने विषैले थे, यह बात भी किससे छिपी है!

    भारत की जनता देश के भीतर और देश की सीमाओं पर शांति चाहती है। कांग्रेस को यह समय धैर्य पूर्वक जनता की सेवा करने में व्यतीत करना चाहिए। राजनीति का लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना नहीं होना चाहिए अपितु जन-मन की सेवा करके उसे शांति और समृद्धि देने का होना चाहिए। जनता कभी भी नहीं चाहेगी कि कोई भी राजनीतिक दल सत्ता पाने की अंधी दौड़ में देश की शांति भंग करे!

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • पराली आफत नहीं, लक्ष्मीजी का वरदान है!

     16.10.2018
    पराली आफत नहीं, लक्ष्मीजी का वरदान है!

    पराली आफत नहीं, लक्ष्मीजी का वरदान है!

    आइए! अपनी किस्मत आज ही बदलें।

    सर्दियां आते ही पंजाब के खेत धुआं-धुआं होने लगते हैं, हरियाणा के खेत भी सीओटू तथा कार्बनमोनो ऑक्साइड उगलना शुरु कर देते हैं। यूपी के खेतों से भी निकलने लगती हैं दम घोटूं गैसें। दीवाली आने से पहले-पहले दिल्ली का दम घुटने लगता है।

    अनाज की बालियां काट लेने के बाद खेतों में बचे फसलों के अवशेष पराली कहलाते हैं। इन्हें धरती में से खोदकर नहीं हटाया जाता अपितु खेतों में ही जला दिया जाता है। पंजाब सरकार ने किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए दण्ड के प्रावधान किए हैं किंतु किसानों के पास पराली को जलाने के अलावा कोई चारा नहीं है। इसलिए वे पराली भी जला रहे हैं और सरकार के विरुद्ध आंदोलन भी कर रहे हैं।

    पराली आफत नहीं है। सरकारी उदासीनता तथा हमारी स्वयं की अकर्मण्यता ने घर आई इस लक्ष्मी को आफत बना दिया है। केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें, बड़े उद्योगपति, वैज्ञानिक और स्वयंसेवी संगठन यदि किसानों की सहायता करें तो पराली धुआं उगलने की बजाय सोना उगल सकती हैं। आईये जानते हैं कि पराली कैसे है लक्ष्मीजी का वरदान!

    पराली एक बायो वेस्ट अर्थात् बायोमास है। बायोमास जलने पर ऊर्जा देता है तथा फर्मेण्ट होकर एथनॉल देता है। यह ऊर्जा हमारे पॉवर ग्रिड में पहुंचकर तथा एथनॉल हमारे पैट्रोल पम्पों पर पहुंचकर सोना बरसा सकते हैं। बायोमास आधारित विद्युत कारखाने में जलने के बाद, पराली की राख बचती है जिससे ईंटें बनाई जा सकती हैं। पूरे भारत में बायोवेस्ट आधारित बिजली व एथनॉल बनाने के छोटे-छोटे कारखाने लगाए जा सकते हैं। इन्हें सरकारी, अर्द्धसरकारी, सहकारी, निजी एवं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अर्थात् पीपीपी मोड पर लगाया जा सकता है। विभिन्न सरकारों में काम कर रहे कृषि विभाग, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड तथा पॉवर कम्पनियां सम्मिलित रूप से ये कदम उठा सकते हैं।

    वैज्ञानिकों के अनुसार 9 लाख टन कृषि अवशेष से 4 हजार मेगावाट बिजली और 10 टन कृषि अवशेष से 3,000 लीटर एथनॉल बनाया जा सकता है। इससे निकलने वाली राख से ईंटें और सीमेंट बनाई जा सकती हैं। पंजाब में हर साल लगभग 90 लाख टन कृषि अवशेष जलाया जाता है इसमें से 25 लाख टन फाने और 65 लाख टन पराली है। यानी हर साल जलाए जा रहे कृषि अवेशष से पंजाब में 40 हजार मेगावाट बिजली बनाई जा सकती है। यूपी, हरियाणा, राजस्थान एवं अन्य राज्यों में भी कुल मिलाकर इससे अधिक बिजली बनाई जा सकती है।

    पराली का सबसे अच्छा और सुगम उपयोग है बायोमास पावर प्लांट अथवा बायोमास इलेक्ट्रिक जेनरेशन यूनिट लगाना। 200 से 250 आबादी वाले प्रत्येक गांव के लिए एक छोटा बायोमास पावर प्लांट लगाया जा सकता है जिस पर लगभग 10 लाख रुपए की कीमत आती है। इतना खर्चा गांव के किसान तथा सहकारी समितियां मिलकर ही कर सकती हैं।

    आठ से दस गांवों के क्लस्टर के लिए बड़ा पावर प्लांट लगाया जा सकता है जिस पर लगभग एक करोड़ रुपए की लागत आती है। इन बड़े प्लांट्स को सरकारी स्तर पर या विद्युत कम्पनियों के स्तर पर लगाया जा सकता है। इन प्लांट्स से बनने वाली बिजली को उन्हीं गांवों में सप्लाई किया जा सकता है। प्रत्येक किसान से निःशुल्क पराली लेकर, पराली की मात्रा के अनुसार निःशुल्क बिजली दी जा सकती है। बची हुई बिजली किसानों तथा सरकार को बेची जा सकती है। इस प्रकार एक कारखाने को लगाने के सम्पूर्ण व्यय से लेकर उत्पादन लागत को कुछ ही वर्षों में वसूल किया जा सकता है तथा उसके बाद ये कारखाने लाभ दे सकते हैं।

    कुछ राज्यों में निजी कंपनियों ने इस प्रकार के प्लांट लगाए हैं। उत्तराखंड के काशीपुर जिले में इंडिया ग्लाइकोल्स लिमिटेड अर्थात् (आईजीएल) कंपनी ने 35 करोड़ रुपए की लागत से गेहूं और धान के डंठल से एथनॉल बनाने का प्लांट लगाया है। बिहार में हस्क पॉवर नामक कंपनी बायोमास गैसिफ़िकेशन से एक हजार गांवों में 5000 रुपए सालाना प्रति परिवार की दर पर दस हजार परिवारों को बिजली दे रही है। कंपनी ने तीन-तीन गांवों के क्लस्टर बनाकर बायोमास इलेक्ट्रिक पावर प्लांट लगाए।

    राजस्थान के गंगानगर, जयपुर एवं कोटा जिलों में बायोमास पावर प्लांट्स से विद्युत उत्पादन शुरू किया गया है। पंजाब में भी धान तथा गेहूं के डंठलों से नकोदर और मोरिंडा में बिजली बनाई जा रही है। यह बिजली कोयले से बनने वाली बिजली से सस्ती पड़ती है तथा पर्यावरण भी अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1,000 मेगावॉट बायोमास ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। साथ ही सरकार ने बायोमास संयंत्र की स्थापना के लिए 100 प्रतिशत स्टांप ड्यूटी छूट दी है।

    हरियाणा में नहरी पानी के संसाधन अच्छे हैं। इसलिए क्लस्टर बनाकर छोटे-छोटे बायोमास पावर प्लांट अर्थात् बायोमास इलेक्ट्रिक जेनरेशन यूनिट लगाए जा सकते हैं। जीटी रोड से लगी धान-बेल्ट इसके लिए पूरी तरह सुविधाजनक है। हरियाणा में 8 लाख ट्यूबवेल बिजली से चलते हैं, इन ट्यूबवैलों तक छोटे-छोटे बायोमास इलेक्ट्रिक जेनरेशन यूनिट की बिजली दी जा सकती है।

    आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने फाने तथा पराली से कागज की शीट्स, यूज एण्ड थ्रो कप-प्लेट तथा फर्नीचर की लकड़ी बनाने की तकनीक विकसित की है। यदि किसान इस तकनीक को अपना कर गांव के बेरोजगार युवकों की सहायता से ग्रामोद्योग विकसित करें तो प्रत्येक एकड़ धान के खेत से निकलने वाली दो टन पराली से किसान 3 से 5 हज़ार रुपए तक कमा सकते हैं। दो टन पराली से एक टन रॉ मेटिरियल तैयार होता है जो बाज़ार में 45 से 50 रुपए प्रति किलो की दर पर आसानी से बिक सकता है। इसका उपयोग कागज की शीट्स, यूज एण्ड थ्रो कप-प्लेट तथा कलात्मक फर्नीचर की लकड़ी बनाने में किया जा सकता है।

    हरियाणा के मैना और पहरवार गांवों के किसानों ने पराली जलाना बंद कर दिया है। इन गावों के पंचायत सदस्यों का एक समूह ट्रैक्टर-ट्रॉली और मजदूरों की सहायता से खेतों से पराली इकट्ठी करके स्थानीय गौशालाओं को बेचता है। गौशालाएं इसका भूसा बनकर मवेशियें को खिलाती हैं। सिरसा जिले के चक्रियान गांव के भूमिहीन मजदूर अमरीक सिंह तथा हरिराम खेत-खेत घूमकर सूखी पराली खरीदते हैं तथा इस पराली से रस्सियां बनाते हैं। यह रस्सी फिर से किसान खरीद लेते हैं जिसका उपयोग गेहूं के गांठ बांधने में होता है।

    नाबार्ड हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के बर्ना क्लस्टर में जेबीएनआर ट्रस्ट के सहयोग किसान प्रशिक्षण पायलट परियोजना का परीक्षण किया तथा बाद में अपने कार्यक्रम को हरियाणा के नौ अन्य जिलों- सोनीपत, पानीपत, यमुना नगर, अंबाला, करनाल, कैथल, सिरसा, जींद और फतेहाबाद में विस्तारित कर दिया। इस प्रशिक्षण के तहत, खेती के उपकरण जैसे हैप्पी सीडर, मल्चर, रिवर्सिबल प्लो, रैक और बेलर्स आदि गांव स्तर पर उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि किसानों को पराली स्थानांतरित करने के विकल्प मिल सकें।

    कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसे अपनाकर, किसान अपने खेतों में खड़ी पराली के बीच ही गेहूं की सफलता पूर्वक बुवाई कर सकते हैं। इससे खेतों की मिट्टी में जीवांश अर्थात् कार्बन की मात्रा बढ़ती है तथा यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरक कम मात्रा में प्रयुक्त करने पड़ते हैं। एक अनुमान के अनुसार आने वाले कुछ सालों में भारत में पराली इतनी कीमती हो जाएगी कि किसान अपने खेतों में इसे जलाने की बजाय ऊंचे दाम पर बेचेंगे।

    ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानंद सरस्वती ने पराली के इस्तेमाल से ऐसे ब्लॉक बनाने का तरीका खोज निकाला है जिनसे कच्ची झोपड़ियों को पक्के मकानों में बदला जा सकता है। ये मकान दो से सात दिनों में बनकर तैयार हो जाते हैं तथा 50 साल की गारंटी के साथ पूरी तरह ईको फ्रेंडली होते हैं। इन मकानों में 1100 सेल्सियस तक तापमान सहन करने की क्षमता होती है। पराली के ब्लॉक से बनी दीवारों और छत को पानी गीला नहीं कर पाएगा। इनमें न तो दीमक लगगी और न ही भूकंप से गिरेंगे। आगामी कुंभ मेले में स्वामी चिदानंद एक फिल्म के माध्यम से यह तकनीक लोगों के सामने रखेंगे। पराली से ब्लॉक बनाने की मशीनें भारत में तैयार हो रही हैं। इन ब्लॉक के जरिये तीन लाख रुपये में 300 वर्गफीट का मकान तैयार किया जा सकेगा। इन ब्लॉकों के इस्तेमाल से, पराली की समस्या से छुटकारा पाने के साथ-साथ झुग्गी-झोंपड़ी वाले स्लम्स को भी पक्के हवादार मोहल्लों में बदला जा सकेगा। पराली से बनने वाले मकानों के भीतर का तापमान, बाहर के मुकाबले 10 डिग्री कम होगा।

    इस पराली से ऐसी सस्ती दीवार बनाई जा सकती है जिससे लखनऊ शहर में गोमती नदी के दोनों तरफ फेंसिंग लगाकर गोमती में गंदगी और कूड़ा पहुंचने से रोका जा सकता है। इस फेंसिंग के प्रत्येक पोल पर सोलर लाइट लगाकर गोमती के तटों पर रात में प्रकाश किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार संभवतः शीघ्र ही इस दिशा में कदम उठाएगी।

    महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की लैब में सूक्ष्म जीव विशेषज्ञों ने पराली एवं फाने से इथेनॉल नामक बॉयोफ्यूल तैयार किया है। लैब में 10 ग्राम एग्रो वेस्ट से चार ग्राम इथेनॉल बनाया गया है। इस मात्रा को बेहतर सुविधाओं से और बढ़ाया जा सकता है। इस इथनॉल को वाहनों के पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक मिक्स किया जा सकता है। इससे पेट्रो पदार्थों पर हमारी 10 प्रतिशत निर्भर्ता कम होगी। यह पेट्रोल से सस्ता है तथा पूरी तरह ईको फ्रेंडली है। इस ईंधन के जलने से किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता।

    इस विधि में पराली पर फंगस उगाई जाती है जिससे एक एंजाइम तैयार होता है। यह एंजाइम पराली को एक्सोज एवं पैंटोज शुगर में बदल देता है। इस शुगर से तरल रूप में बायो इथेनॉल प्राप्त होती है। वर्तमान में ब्राजील में गन्ने से तथा अमरीका में मक्का से इस प्रकार का इथेनॉल बन रहा है। भारत में भी रतनजोत आदि से थोड़ी बहुत मात्रा में ईथनॉल बनाया जाता है।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि पराली खेतों के लिए आफत नहीं है अपितु किसानों के लिए तथा पूरी मानव जाति के लिए लक्ष्मीजी का वरदान है। हम घर चलकर आई इस लक्ष्मी को जलाकर अपने घर, परिवार एवं देश को निर्धन एवं बीमार बना रहे हैं।

    आवश्यकता है ऐसे पढ़े-लिखे, हिम्मती एवं बेरोजगार नौजवानों की जो जिंदगी में कुछ करने का हौंसला रखते हैं। वे छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर पराली से ईथनॉल, बिजली, ईंट, लकड़ी के ब्लॉक, कागज आदि बनाने के छोटे-छोटे कारखाने लगाकर न केवल अपनी और अपने परिवार की अपितु पूरे देश की तकदीर बदल सकते हैं।


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  • पोलिटिकल एजेण्ट मेजर रॉस से प्रसन्न नहीं थीं जयपुर की राजमाता चन्द्रावती

     14.07.2017
    पोलिटिकल एजेण्ट मेजर रॉस से प्रसन्न नहीं थीं जयपुर की राजमाता चन्द्रावती

    राजमाता भटियानी की मृत्यु (ई.1833) के बाद जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री झूथाराम की मुश्किलें और बढ़ गयीं। जोधपुर राज्य ने अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष आरोप लगाया कि शेखावाटी के डाकू जोधपुर राज्य में घुसकर लूटपाट करते हैं। जब झूथाराम डाकुओं पर काबू नहीं पा सका तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शेखावाटी तथा तोरावाटी पर अधिकार कर लिया। इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने शेखावाटी ब्रिगेड का गठन किया जिसका सारा व्यय जयपुर राज्य के सिर डाला गया। जयपुर राज्य से तुरंत धन न मिलने पर 27 जनवरी 1835 को ब्रिटिश सरकार द्वारा सांभर झील तथा उससे संलग्न गाँवों पर अधिकार कर लिया गया।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा की गयी इस लूट खसोट थी के कारण राज्य की आय और गिर गयी तथा राज्य पर 13 लाख रुपये का कर्ज हो गया। उधर जयपुर का महाराजा समय की गति के साथ बड़ा हो रहा था किंतु इससे पहले कि उसे राज्याधिकार मिल पाते, 4 फरवरी 1835 को उसका निधन हो गया। राज्य में अफवाह फैल गयी कि झूथाराम ने महाराजा को जहर दे दिया। जिस समय अवयस्क महाराजा जयसिंह तृतीय मृत्यु को प्राप्त हुआ उस समय उसका पुत्र रामसिंह मात्र 16 महीने का था। उसका जन्म 28 सितम्बर 1833 को हुआ था। जयपुर राज्य में नयी प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिये मेजर अवेल्स अजमेर से जयपुर आया। उसने रामसिंह को जयपुर का महाराजा घोषित किया तथा झूथाराम को जयपुर से बाहर निकालकर बैरीसाल को फिर से जयपुर का मुख्तार (प्रधानमंत्री) बना दिया।

    इससे पहले कि झूथाराम को जयपुर से बाहर निकाला जाता, 4 जून 1835 को मेजर एवेल्स, अपने साथियों- लूडलो, मेक नाकटन तथा कैप्टेन ब्लैक को लेकर राजमाता चंद्रावती के साथ विचार विमर्श करने के लिये जयपुर के महलों में आया। जब वह विचार विमर्श करके जयपुर के राजमहल से निकला तो उसने महल के बाहर हजारों आदमियों को खड़े हुए पाया। इस भीड़ ने अचानक ही अंग्रेज अधिकारियों पर हमला बोल दिया। फतहसिंह नामक एक व्यक्ति ने मेजर एवेल्स को घायल कर दिया। एवेल्स बच गया तथा फतहसिंह पकड़ा गया। लुडलो तथा मेक नागटन भी बचकर भाग गये। कैप्टेन ब्लैक मारा गया।

    इस घटना की जांच करवाने के लिये पाँच अधिकारियों की एक समिति बनायी गयी। इस समिति में बीकानेर का वकील हिन्दूमल, जैसलमेर का वकील सरदारमल तथा जयपुर राज्य के तीन ठाकुर लिये गये। समिति ने रिपोर्ट दी कि यह एक पूर्व नियोजित षड़यंत्र था जिसमें झूथाराम और उसके आदमियों का हाथ था। समिति की रिपोर्ट के आधार पर दीवान अमरचंद और हिदायतुल्ला को फांसी पर लटका दिया गया। शिवलाल, मानिकचंद, झूथाराम तथा उसके भाई हुकमचंद को आजीवन कारावास में रखा गया। इसी के साथ झूथाराम की कहानी का पटाक्षेप हो जाता है।

    इस घटना के बाद फिर से बैरीसाल को राज्य का मुख्तार बनाया गया। बैरीसाल को लोकप्रिय बनाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शेखावाटी तथा तोरावाटी फिर से जयपुर को लौटा दिये। कुछ समय बाद बैरीसाल मर गया तथा उसका पुत्र शिवसिंह मुख्तार बनाया गया। ई.1838 में मेजर रॉस जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बना। राजमाता चंद्रावती मेजर रॉस की नियुक्ति से अप्रसन्न थीं किंतु शिवसिंह ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये मेजर रॉस का विश्वास अर्जित किया। राजमाता चंद्रावती शिवसिंह को हटाने की जुगत भिड़ाने लगी।

    जयपुर राज्य के सेनापति मुन्नालाल ने रानी का पक्ष मजबूत करने के लिये रामगढ़ में स्थिति बटालियन को विद्रोह करने के लिये उकसाया। ये बटालियनें अपने चढ़े हुए वेतन की मांग करने लगीं। 2000 नागा सिपाही भी विद्रोहियों के साथ हो गये। इस पर ए.जी.जी. मेजर एवेल्स जयपुर आया तथा उसने मुन्नालाल को हटाकर चौमूं के ठाकुर लक्ष्मणसिंह को जयपुर सेना का कमाण्डर नियुक्त किया जिससे विद्रोह शांत हो गया।

    अवेल्स के बाद सरदलैण्ड राजपूताने का ए. जी. जी. होकर आया। उसका मानना था कि पर्दानशीन रानी के द्वारा राज्य का शासन चलाना संभव नहीं है। अतः उसने पोलिटिकल एजेण्ट की अध्यक्षता में पाँच सदस्यों वाली रीजेंसी कौंसिल का गठन करके शासन अधिकार रीजेंसी कौसिंल को सौंप दिये। अब तक चली आ रही रीजेंट राजमाता चंद्रावती का प्रशासन में कुछ भी हस्तक्षेप नहीं रह गया। शेखावाटी ब्रिगेड को रीजेंसी कौंसिल के सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद 11 साल तक रीजेंसी कौंसिल ने ही जयपुर रियासत का प्रशासन किया।

    निरंतर अकाल चलने के कारण तथा ब्रिटिश सरकार द्वारा सांभर झील तथा उससे संलग्न गाँवों पर अधिकार कर लिये जाने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गयी और राज्य पर साहूकारों का 13 लाख रुपये का कर्ज हो गया। ई.1842 में एजीजी थोरसेबी ने ब्रिटिश सरकार से सिफारिश की कि राज्य का खिराज 8 लाख प्रतिवर्ष से घटाकर 4 लाख कर दिया जाये। यह सिफारिश मान ली गयी जिससे जयपुर को चैन की सांस आयी। अगले ही वर्ष शेखावाटी ब्रिगेड को ब्रिटिश फौज में मिला दिया गया जिससे जयपुर राज्य को ढाई लाख रुपये प्रतिवर्ष की बचत हुई। सांभर झील फिर से जयपुर राज्य को लौटा दी गयी।

    थोरसेबी के सुधारों से जयपुर राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरी तथा जयपुर रियासत एवं ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सम्बन्धों में सुधार आया जो कि ई.1818 की संधि के बाद से ही खराब चल रहे थे। 24 जनवरी 1824 को लुडलो रीजेंसी कौंसिल का अध्यक्ष बना। उसके शासन काल में झूथाराम के समय विभिन्न स्थानों पर जमा करवायी गयी धनराशि प्राप्त हो गयी जिससे जयपुर राज्य पर चढ़े ऋण का दो तिहाई हिस्सा चुका दिया गया।

    लुडलो का शासनकाल जयपुर राज्य में सामाजिक सुधारों तथा जनकल्याण के कार्यों के लिये जाना जाता है। उसके काल में सती प्रथा पर रोक लगी। गुलामों के क्रय विक्रय पर रोक लगी। कन्या वध पर रोक लगी। शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्नति हुई। राज्य में सड़कों व बांधों का निर्माण करवाया गया। लुडलो ने युवा महाराजा रामसिंह की शिक्षा का समुचित प्रबंध किया। महाराजा को अंग्रेजी, हिन्दी उर्दू, संस्कृत एवं फारसी भाषाओं का ज्ञान करवाया गया। इतिहास, दर्शन और विज्ञान विषयों की जानकारी करवायी गई। जब महाराजा वयस्क हो गया तो ई.1854 में उसे शासन के समस्त अधिकार सौंप दिये गये एवं रीजेंसी कौंसिल को भंग कर दिया गया। इस कार्य से जयपुर राज्य में ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। महाराजा को शासन के कार्य में सहयोग देने के लिये एक कौंसिल का गठन किया गया।

    उन्नीसवीं सदी के मध्य तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपने शत्रुओं से निबट चुकी थी तथा प्रशासन पर पकड़ बनाने के लिये देशी राज्यों में आधारभूत ढांचा खड़ा करने का प्रयास करने लगी। वह राज्यों को ब्रिटिश प्रशासित क्षेत्रों से रेल तथा सड़क यातायात से जोड़ने लगी। ई.1856 में ब्रिटिश फौज के आवागमन के लिये जयपुर से भरतपुर राज्य की सीमा तक सड़क बनायी गयी। उसी वर्ष जयपुर राज्य में हैजे का प्रकोप हो गया। इस संकट में ब्रिटिश सरकार की तरफ से लोगों को निशुल्क दवायें उपलब्ध करवायी गयीं। इतना सब होने पर भी देशी रियासतों में अंग्रेजों के विरुद्ध हवा खराब हो चली थी।

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  • परिवार का कोई सदस्य प्रेम नहीं करता था लाल किले के निर्माता से

     16.10.2018
    परिवार का कोई सदस्य प्रेम नहीं करता था लाल किले के निर्माता से

    दिल्ली के लाल किले की दर्दभरी दास्तान-1

    ई.1526 में बाबर ने अपने पूर्ववर्ती अफगानों को हराकर उनसे उत्तरी भारत के हरे-भरे मैदान छीने थे। गंगा-यमुना के किनारों पर स्थित इन मैदानों के खेत, धान के कटोरे कहलाते थे तथा इन मैदानों में हरी घास चरने वाले दुधारू पशु, गंगा-यमुना में बहने वाले पवित्र जल के बराबर ही अपरिमित दूध देते थे। ऊपर आसमान में रंग-बिरंगे पंछी उड़ते थे और सूर्य-चंद्र बारी-बारी से आकर इस शस्य-शामला धरती को मुग्ध भाव से निहारते थे।

    इन्हीं मैदानों में हजारों साल से सुख-पूर्वक निवास करने वाले हिन्दुओं की प्राचीन राजधानी थी दिल्ली। जब यह दिल्ली ई.1193 में तुर्कों के अधीन हो गई तो उन्होंने अपने लिए एक किला बनवाया जिसे सीरी का दुर्ग कहते थे। जब सूर वंश का शासक सलीमशाह दिल्ली का बादशाह हुआ तो उसने दिल्ली में अपने लिए एक नया दुर्ग बनवाया जिसे सलीमगढ़ कहा जाता था। फरगना एवं समरकंद से आए मुगलों ने दिल्ली को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया तथा फतहपुर सीकरी में एक छोटा सा बदसूरत किला बनवाया।

    जब बाबर की पीढ़ियों को भारत पर शासन करते हुए सौ साल से अधिक हो गए तब ई.1628 में मुगल शहजादा खुर्रम अपने 18 भाईयों और चाचाओं की हत्या करके भारत के हरे-भरे मैदानों, अविरल बहने वाली नदियों और गगनचुम्बी पहाड़ों का स्वामी हुआ। वह बाबर का चौथा वंशज था, उसे भारत के इतिहास में शाहजहाँ के नाम से जाना गया। शाहजहां को अपने बाप-दादाओं का जमा-जमाया साम्राज्य मिला था। इसलिए उसके सामने चुनौतियां बहुत कम थीं। सल्तनत की विशाल सेनाएं अफगानिस्तान, चीन, बंगाल तथा दक्षिण भारत के मोर्चों पर लड़ती थीं और सल्तनत की सीमाओं में नित नई वृद्धि करती थीं।

    इस कारण सल्तनत के खजाने में सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात के ढेर लग गए थे। इस धन का उपयोग करके शाहजहां ने अपने लिए एक विशाल सिंहासन बनवाया जिसे तख़्त-ए-ताऊस कहते थे जिसका अर्थ होता है मयूर सिंहासन। इस सिंहासन को नाचते हुए मोर की आकृति में बनाया गया था। तख्तेताउस 3.5 गज़ लम्बा, 2 गज़ चौड़ा और 5 गज़ ऊँचा था। पूरा सिंहासन ठोस सोने से बना था जिसमें 454 सेर भार के बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। इन रत्नों की मीनाकरी एवं पच्चीकारी में कई सौ कारीगरों ने 7 वर्ष तक निरंतर कार्य किया था। तख्ते ताउस की लागत 2 करोड़ 14 लाख 50 हज़ार रुपये आई थी। यूरोपियन इतिहासकार टैवर्नियर ने लिखा है कि कोहिनूर भी इसी सिंहासन में जड़वाया गया था।

    तख्तेताउस पर बैठने के बाद शाहजहां का मन अकबर द्वारा आगरा और फतहपुर सीकरी में बनाए गए पुरानी डिजाइन के भद्दे से किलों में नहीं लगता था। उसने यमुना के किनारे पर बसी तथा हिन्दुओं की हजारों सालों तक राजधानी रही दिल्ली में अपने लिए एक नया किला बनवाने का निर्णय लिया। शाहजहां से पहले भी दिल्ली लगभग सवा तीन सौ साल तक तुर्की और अफगानी मुसलमानों की राजधानी रह चुकी थी।

    शाहजहां ने उस्ताद अहमद लाहौरी नामक एक होशियार इंजीनियर को लाल किला बनाने का काम सौंपा जिसे मुगल स्थापत्य के भवन बनाने में महारत हासिल थी। इसी अहमद लाहौरी ने आगे चलकर आगरा का ताजमहल भी बनाया। 12 मई 1638 को दिल्ली में यमुना के किनारे लाल किले की नींव डाली गई। जब तक लाल किला बनकर तैयार हो, शाहजहां, इसके निकट स्थित सौ साल पुराने सलीमगढ़ नामक किले में रहा जिसका निर्माण ई.1546 में सलीमशाह सूरी ने करवाया था।

    शाहजहां घण्टों यमुना के किनारे खड़ा रहकर इस नवीन किले का निर्माण कार्य देखता और तेजी से ऊंची हो रही किले की दीवारों की परछाइयों को यमुना की श्यामवर्णी लहरों में हिलते-डुलते देखता रहता। शाहजहां ने अपनी पसंद के लाल और सफेद रंग के पत्थरों से इस किले का निर्माण करवाया। ये दोनों रंग शाहजहां को बहुत प्रिय थे। तब शाहजहां यह नहीं जानता था कि लाल किले की ये दीवारें तब तक लाल रंग के इंसानी खून से धोई जाती रहेंगी जब तक कि बाबर का अंतिम वंशज जंजीरों से बांधकर रंगून नहीं भेज दिया जाएगा।

    लाल किले के ठीक बीच में शाहजहांनाबाद नामक नगर बसाया गया तथा इसके ठीक मध्य में शाही महल बनाया गया जहाँ खुद शाहजहां और उसकी भावी पीढ़ियां रहने वाली थीं। यमुना नदी से लाल किले तक कई छोटी-छोटी नहरें बनाई गईं जिनके माध्यम से यमुना का पवित्र जल खींचकर लाल किले के महलों तक लाया गया।

    ये नहरें इतनी सुंदर थीं कि इन्हें नहर-ए-बहिश्त कहा जाता था। इन नहरों का जल पीकर लाल किले में दूर-दूर तक फैले बागीचों में इतने सुंदर फूल खिले, जो स्वर्ग के फूलों से होड़ करते थे। हालांकि लाल किले की दीवारों ने समय बदल जाने पर इन्हीं नहरों में शाहजहां के वंशजों के खून को भी बहते हुए देखा।

    हिन्दू मानते हैं कि शाहजहां ने लालकिले के रूप में किसी नए किले का निर्माण नहीं करवाया था। यहां पहले से ही एक पुराना किला मौजूद था जिसमें सैंकड़ों साल तक हिन्दू शासकों ने निवास किया था। शाहजहां ने उसी किले का नए सिरे से निर्माण करवाया।

    आखिर पूरे नौ साल के जी-तोड़ निर्माण के बाद, 6 अप्रेल 1648 को लाल किला बनकर पूरा हुआ और शाहजहाँ ने अपने विशाल हरम सहित किले में प्रवेश किया। बस उसी दिन से लाल किले की दीवारें इंसानी लाल खून से भीगनी शुरु हो गईं। लाल किले में प्रवेश करते समय शाहजहां 56 साल का प्रौढ़ हो चुका था लेकिन उसके शरीर में अब भी बहुत जान थी।

    वह अय्याश किस्म का इंसान था इसलिए उसके हरम में नित नई औरतों का आना-जाना लगा रहता था। शाहजहां ने अपने कई अमीर-उमरावों और सेनानायकों के परिवारों की औरतों को अपने हरम में बुलाकर उन्हें खराब किया था। इस कारण कुछ औरतों ने तो आत्म-हत्याएं यही कारण था कि शाहजहां के अपने परिवार में कोई उससे प्रेम नहीं करता था। उसका हरम षड़यंत्रों से भरा हुआ था। सल्तनत के बहुत से अमीर बादशाह के खून के प्यासे थे।

    तेजी से बूढ़ा होता जा रहा शाहजहां, अपनी औलाद की आखों में लाल किले का तख्त प्राप्त करने की चाहत में उतर रहे खून की ललाई को साफ देख सकता था। जिसके कारण उसके चेहरे की झुरियां तेजी से गहरी होती जा रही थीं।

    घोषित रूप से शाहजहाँ की नौ बेगमें थीं जिनमें मुमताज महल तीसरे नम्बर की थी। वह केवल 10 साल की आयु में शाहजहां से ब्याही गई। मुमताज महल के पेट से 13 संतानों ने जन्म लिया तथा 14वें प्रसव के दौरान उसकी मृत्यु हुई। शाहजहां की अन्य बेगमों से भी शाहजहाँ को ढेर सारी संतानें हुईं जिनमें से अधिकांश संतानें शाहजहां के जीवन काल में ही मर गईं।

    जब शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब ने गिरफ्तार किया था, तब शाहजहां की आठ संतानें जीवित थीं जिनमें से चार पुत्र- दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब और मुराद बख्श थे तथा चार शहजादियां- पुरहुनार बेगम, जहांआरा बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम थीं । शाहजहां की इन आठों संतानों की आंखों में लाल किले की दीवारों का रतनार रंग, ललाई बनकर छाया रहता था। शाहजहां के चारों शहजादे और चारों शहजादियां एक दूसरे के खून के प्यासे थे। प्रत्येक शहजादी ने अपने एक भाई को बादशाह बनाने के लिए शतरंज की गोटियां बिछानी आरम्भ कर दीं।

    इस कारण शाहजहां ने अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह के अतिक्ति और किसी को भी अपनी राजधानी दिल्ली में नहीं रहने दिया। फिर भी एक दिन उसके एक पुत्र औरंगजेब ने शाहजहां को पकड़कर बंदी बना लिया। आधुनिक इतिहासकारों ने भले ही शाहजहां को ताजमहल के निर्माण के कारण प्रेम का देवता बताया हो किंतु इतिहास की कड़वी सच्चाई यह है कि उसका व्यक्तिगत आचरण इतना खराब था कि जब उसके पुत्र औरंगजेब ने उसे कैद किया तो न तो हरम का कोई सदस्य और न सल्तनत का कोई अमीर या सेनापति ही, बादशाह की सहायता के लिए आगे आया।

    लाल किले की दीवारें अपने निर्माता और स्वामी की यह दुर्दशा देखकर हैरान थीं। वे तब और भी निराश हुईं जब बूढ़े शाहजहां को दिल्ली के लाल किले से बाहर निकालकर आगरा के लाल किले में बंद कर दिया गया।

    शाहजहां के पुत्रों ने शाहजहां को बंदी क्यों और कैसे बनाया, इसकी दर्दभरी दास्तान पढ़िए अगली कड़ी में।


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  • झाला मदनसिंह को काले कपड़े पहनाकर कोटा राज्य से विदा किया गया

     15.07.2017
    झाला मदनसिंह को काले कपड़े पहनाकर  कोटा राज्य से विदा किया गया

    ई.1824 में कोटा राज्य के प्रतापी फौजदार झाला जालिमसिंह की मृत्यु हो गयी। उसका पुत्र झाला माधोसिंह पहले से ही कोटा राज्य का दीवान था। ई.1828 में महाराव किशोरसिंह की भी मृत्यु हो गयी तथा उसका भतीजा रामसिंह कोटा का राजा बना। जब ई.1831 में रामसिंह, भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के दरबार में भाग लेने के लिये अजमेर गया तो माधोसिंह भी उसके साथ गया। गवर्नर जनरल ने माधोसिंह को चंवर प्रदान किये। ई.1833 में झाला माधोसिंह मर गया तथा उसका पुत्र झाला मदनसिंह कोटा राज्य का दीवान बना।

    माधोसिंह ने शासन की समस्त शक्तियां अपने हाथ में रखते हुए भी अपने पिता जालिमसिंह के कहने पर सदैव महाराव का सम्मान किया तथा यह कभी अनुभव नहीं होने दिया कि महाराव स्वामी नहीं है या माधोसिंह सेवक नहीं है किंतु माधोसिंह के पुत्र मदनसिंह में अपने पितामह एवं पिता जैसी विनम्रता नहीं थी। उसने समस्त राजकीय चिह्न धारण कर लिये। जब वह नगर में प्रवेश करता अथवा बाहर निकलता तो राजा की तरह तोपों की सलामी लेता। उसका जन्मदिन पूरे राज्य में समारोह पूर्वक मनाया जाता। राजकीय आदेशों में उसका नाम राजाओं की तरह लिखा जाने लगा। धीरे-धीरे वह महाराव की आज्ञा का उल्लंघन करने लगा। इस पर ई.1834 में कोटा नरेश रामसिंह ने कम्पनी सरकार से दीवान मदनसिंह की शिकायत की।

    1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कोटा नरेश के साथ जो संधि की थी उसके अनुसार कोटा नरेश और उनके अधिकारी कोटा के महाराव बने रहने थे तथा इस संधि की गुप्त शर्तों के अनुसार झाला जालिमसिंह के वंशज कोटा राज्य के दीवान बने रहने थे। कोटा नरेश को यह अधिकार नहीं था कि वह अपनी मर्जी से किसी को कोटा राज्य का दीवान बना सके। संधि की गुप्त शर्त यह कहती थी कि कोटा नरेश तो राज्य के नाम मात्र के अथवा दिखावे के ही शासक हैं, राज्य के असली स्वामी झाला जालिमसिंह तथा उसके उत्तराधिकारी हैं।

    महाराव रामसिंह जैसे भी हो सके, अब झालों से पीछा छुड़ाना चाहता था। जब पोलिटिकल एजेण्ट तथा ए.जी.जी. ने उसकी बात नहीं सुनी तो वह मामले को गवर्नर जनरल की कौंसिल तक ले गया। अंग्रेजों ने इस शर्त पर मदनसिंह को कोटा राज्य के दीवान के पद से हटाना स्वीकार किया कि झाला जालिमसिंह के शासनाधिकार वाले क्षेत्रों को कोटा राज्य से काटकर एक नया राज्य बनाया जाये और मदनसिंह को उस राज्य का राजा बनाया जाये। रामसिंह ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

    अंग्रेजों ने मदनसिंह के लिये जो राज्य प्रस्तावित किया उसकी आय 5-6 लाख रुपये वार्षिक थी किंतु मदनसिंह इस राज्य से संतुष्ट नहीं हुआ। उसने एक जाली पत्र तैयार करके पोलिटिकल एजेण्ट लडलू को दिखाया। इस पत्र में महारावल उम्मेदसिंह द्वारा झाला जालिमसिंह के नाम से यह लिखा हुआ था कि गद्दी हमारे हाथ में रहेगी और शासन तुम्हारे हाथ में। यदि हमारे वंशज कभी अलग होना चाहेंगे तो तुमको राज्य का इतना बड़ा हिस्सा दिया जायेगा जिससे आय 12 लाख रुपये सालाना हो। यह जानते हुए कि पत्र नकली है, लडलू ने उसे स्वीकार कर लिया। रामसिंह भी मान गया। शासन के सारे सूत्र मदनसिंह के हाथ में थे ही, उसने कागजों में हेरा फेरी करके 15 लाख की आय वाले परगने अपने हिस्से में कर लिये।

    जब मदनसिंह अंतिम बार महाराव को प्रणाम करने आया तो क्रुद्ध रामसिंह ने उसे काला घोड़ा और काले कपड़े प्रदान किये। मदनसिंह ने बिना कोई उत्तेजना दिखाये उन काली वस्तुओं को स्वीकार कर लिया जो कि राज्य से निष्कासित किये जाने वाले राजपुरुषों को सजा के रूप में प्रदान की जाती थीं। उन काली वस्तुओं को धारण करके तथा तथा महाराव को अभिवादन करके मदनसिंह काले घोड़े पर सवार होकर सूरजपोल से बाहर निकला। कोटा नगर से एक मील दूर उसके सैनिक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वहाँ से वह नये वस्त्र धारण करके हाथी पर बैठा चंवर होने लगे। चौबदार नकीब बोलने लगे और वह नरेश की भांति छत्र तथा चंवर धारण करके अपने पाटन स्थित महलों में चला गया।

    इस प्रकार मदनसिंह के पितामह के समय से कोटा राज्य के साथ झालों का जो सम्बन्ध चला आ रहा था वह अपने अंत को प्राप्त हुआ। झालों का एक स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में आ गया जिसका नाम झालावाड रखा गया। झालरापाटन को इस नये राज्य की राजधानी बनाया गया। इस राज्य में 17 परगने थे। बहुत से जागीरदार जिनकी जागीरें झालावाड़ राज्य में चली गयीं वे कोटा राज्य की सेवा में चले आये तथा नयी जागीरें मांगने लगे। इस पर कोटा महाराव ने उन्हें तीन लाख रुपये की जागीरें प्रदान कीं।

    8 अप्रेल 1838 को झालावाड़ नरेश मदनसिंह तथा अंग्रेज सरकार के बीच एक संधि हुई जिसके अनुसार मदनसिंह की राजराणा की उपाधि स्वीकार कर ली गयी। उसका दर्जा राजपूताने के दूसरे राजाओं के समक्ष माना गया। उसके वंशजों को झालावाड़ राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी माना गया। इस सबके बदले में मदनसिंह ने अंग्रेज सरकार को अपने राज्य का संरक्षक स्वीकार कर लिया तथा उनसे पूछे बिना किसी अन्य राज्य से शत्रुता अथवा मित्रता न करने का वचन दिया।

    झालावाड़ राज्य द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 80 हजार रुपये वार्षिक खिराज दिया जाना निश्चित हुआ। आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता देने का भी वचन दिया गया। ई.1845 में मदनसिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसका पुत्र झाला पृथ्वीसिंह झालावाड़ राज्य का राजराणा बना। ई.1818 से 1857 तक राजपूताना के राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के संरक्षण में रहे। इस काल में राजपूताना में दो नये राज्य अस्तित्व में आये- टोंक तथा झालावाड़। इनमें से टोंक राज्य के अस्तित्व में आने की कहानी पहले की कड़ियों में लिखी जा चुकी है।

    ई.1870 में गवर्नर जनरल लार्ड मेयो अजमेर आया। उसने राजपूताने के समस्त राजाओं को अजमेर दरबार में आमंत्रित किया। झालावाड का राजराणा झाला पृथ्वीसिंह को भी इस दरबार में आमंत्रित किया गया। राजपूताने का कोई भी राजा पृथ्वीसिंह को राजा मानने के लिये तैयार नहीं था। न ही उसे कोई अपने पास बैठाने को तैयार था। झाला पृथ्वीसिंह ने हाड़ौती के पोलिटिकल एजेण्ट से कहा कि आप महाराणा से मेरी भेंट करवा दें। मैं उन्हें प्रसन्न कर लूंगा। यदि उन्होंने मुझे राजा स्वीकार कर लिया तो फिर हिन्दुस्थान के किसी राजा की हिम्मत नहीं है जो मेरी उपेक्षा कर सके। जब हाड़ौती के पोलिटिकल एजेण्ट ने महाराणा शंभुसिंह के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो मेवाड़ के सरदारों ने इस बात पर आपत्ति व्यक्त की कि झाला पृथ्वीसिंह महाराणा से राजाओं की तरह मिलेगा। इस पर महाराणा ने पृथ्वीसिंह से भेंट करने से मना कर दिया।

    पृथ्वीसिंह अंग्रेजों के पीछे लगा रहा। अंत में सारे अंग्रेज अधिकारी महाराणा के समक्ष एकत्र हुए और विनती की कि आप झाला पृथ्वीसिंह से भेंट करके अंग्रेजों की इज्जत बचायें तथा हमारे बनाये हुए राजा को राज स्वीकार करें। महाराणा ने अजमेर से रवाना होने वाले दिन पृथ्वीसिंह को बुलवाया और उसे कोटा के राजा के समान आदर देते हुए अपनी बाईं तरफ की गद्दी पर बैठाया। महाराणा ने पृथ्वीसिंह को यह छूट भी दी कि वह मोरछल, चंवर तथ अन्य लवाजमे के साथ दरबार आये। महाराणा ने पृथ्वीसिंह को हाथी, घोड़े खिलअत तथा जेवर भी प्रदान किये। इसके बाद झालावाड़ के राजराणा को राजपूताने के समस्त शासकों ने राजा स्वीकार कर लिया।

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  • मुगल शहजादियां लाल किले की दीवारों से बाहर अफवाहें फैलाने लगीं

     16.10.2018
    मुगल शहजादियां लाल किले की दीवारों से बाहर अफवाहें फैलाने लगीं

    लाल किले की दर्दभरी दास्तान-2

    अकबर के समय से ही मुगल दरबार एवं हरम की गुटबंदी मुगल सल्तनत की राजनीति में दखल करती आई थी। जहाँगीर के समय में यह गुटबंदी और बढ़ गई थी। जब अय्याश शाहजहां अपने हरम को लाल किले में ले आया तो लाल किले की रंगीनियों ने हरम की औरतों को और भी उन्मुक्त कर दिया।

    चूंकि हुमायूं के समय में ही मुगल शहजादियों के विवाह करने की परम्परा समाप्त कर दी गई थी, इसलिए मुगल शहजादियां लाल किले की मजबूत दीवारों के बीच बने हरम में छिपकर रहती थीं तथा अपने-अपने ढंग से लाल किले की राजनीतिक बिसातें बिछाकर अपने आप को व्यस्त रखती थीं। इस कारण शाहजहां के काल में मुगल दरबार एवं हरम, गुटबन्दियों एवं षड्यन्त्रों का बड़ा अखाड़ा बन गया।

    सत्ता और शक्ति की लूट खसोट के कारण बादशाह के अतिरिक्त और किसी को सल्तनत की दुर्दशा की चिंता नहीं थी। अधिकांश लोग स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे। अमीर, शहजादे एवं बेगमें अपने-अपने गुट को शक्तिशाली बनाने के लिये एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र करते थे तथा एक दूसरे के विरुद्ध बादशाह के कान भरते थे। यहाँ तक कि विरोधी गुट पर सशस्त्र आक्रमण कर देते थे। इस अव्यवस्था ने शाही-परिवार की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि सल्तनत की शक्ति का असली आधार खिसकने लगा।

    लाल किले का निर्माता शाहजहाँ सितम्बर 1657 में बीमार पड़ा। अब वह 65 वर्ष का हो चुका था। काम वासना की दलदल में अत्यधिक डूबे रहने के कारण उसे कई प्रकार के रोगों ने घेर लिया था और आए दिन उसकी मृत्यु की अफवाहें उड़ा करती थीं। अधिकतर अफवाहें हरम की बेगमें, शहजादियां, नौकर तथा हिंजड़े उड़ाया करते थे। जब बढ़ती हुई बीमारी के कारण शाहजहां के लिए दरबार में जाकर बैठना कठिन हो गया तो वह झरोखा दर्शन देकर जनता को विश्वास दिलाने लगा कि वह अब भी जिंदा है।

    यूं तो शाहजहाँ की नौ बेगमें थीं जिनसे उसे ढेरों औलादें हुई थीं, अकेली मुमताज के पेट से चौदह औलादें जन्मी थीं किंतु इनमें से अधिकांश औलादें शाहजहां के जीवन काल में ही मर गई थीं। जब शाहजहां ईस्वी 1657 में बीमार पड़ा तब उसकी केवल आठ संतानें जीवित थीं। इनमें से चार पुत्र थे- दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब और मुराद बख्श। शाहजहाँ की चार शहजादियां भी थीं- पुर-हुनार बेगम, जहांआरा बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम।

    इन सभी की आंखों में शाहजहां का तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा तथा दिल्ली का लाल किला दिन-रात किसी परी-स्वप्न की भांति घूमा करते थे। प्रत्येक शहजादा चाहता था कि जिस प्रकार उसके पिता शाहजहाँ ने अपने 18 चाचाओं और भाइयों का कत्ल करके मुगलों का राज्य हथियाया था, उसी प्रकार वह भी अपने शेष भाइयों को मारकर तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा तथा लाल किले को हथिया ले। इस कार्य में चारों शहजादियां भी शामिल हो गई थीं। प्रत्येक शहजादी ने अपना एक भाई चुन लिया था जिसे वह शाहजहां के बाद बादशाह बनाना चाहती थी ताकि लाल किले के हरम पर उसी शहजादी का हुक्म चले तथा महल की समस्त बेगमें उसकी लौण्डियाएं बनकर रहें।

    इन षड़यंत्रों से घबराकर ही शाहजहां अपने तीन पुत्रों को सदैव अपनी राजधानी से दूर रखा करता था। केवल सबसे बड़ा शहजादा दारा शिकोह अपने पिता की सेवा में दिल्ली में रहा करता था। वह शाहजहां की ओर से साम्राज्य की रीति-नीति तय करता, मुस्लिम अमीरों और हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण रखता तथा उन्हें लड़ने के लिए विभिन्न मोर्चों पर भेजता।

    मुगलों द्वारा इकट्ठे किए गए हीरे-पन्ने, माणक-मोती, पुखराज, गोमेद, याकूत, लाल तथा सोने-चांदी के भारी-भरकम जेवरातों सहित सारे खजाने का मालिक भी वही था। लाल किले में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास इस अपार धन-सम्पदा की कोई न कोई सूची अवश्य थी किंतु इस विशाल खजाने की वास्तविक सूची के बारे में स्वयं शाहजहां भी पूरी तरह परिचित नहीं था।

    लाल किले में बैठी शहजादियां किसी चतुर राजनीतिज्ञ से कम नहीं थीं। वे लाल किले की दीवारों के भीतर चल रही छोटी-से छोटी गतिविधि की जानकारी अपने गुप्तचरों के माध्यम से अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजती थीं। इनमें अधिकांश सूचनाएं बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखी जाती थीं। इस कारण प्रत्येक शहजादा राजधानी से सैंकड़ों कोस दूर किसी मोर्चे पर होेने पर भी वह शाही दरबार और शाही हरम की प्रत्येक गतिविधि से वाकिफ था किंतु अफवाहों के चलते सही-गलत का फैसला करने में असक्षम था।

    जब शाहजहां के लिए झरोखा दर्शन देना भी कठिन हो गया तो उसने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा अपने अमीरों, सूबेदारों और हिन्दू राजाओं से कहा कि वे केवल दाराशिकोह का आदेश मानें। जैसे ही शाहजहाँ ने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। लाल किले में उसके शेष तीनों शहजादे और उनके पक्ष की शहजादियां दारा शिकोह के खून के प्यासे हो गए।

    जिस प्रकार दारा शिकोह अपने पिता शाहजहां से थोड़ा-बहुत प्रेम करता था, उसी प्रकार शहजादी जहाँआरा भी अपने पिता शाहजहां से सहानुभूति रखती थी और केवल वही थी जो अपने पिता की मुश्किलों को समझती थी तथा उन्हें सुलझाने में अपने भाई दारा शिकोह की मदद करती थी।

    दारा शिकोह अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु स्वभाव का स्वामी था। शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। दिल्ली की रियाया भी दाराशिकोह को चाहती थी। हालांकि उस काल में मुगल सल्तनत में 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 5 प्रतिशत मुसलमान थे तो भी प्रजा से आशय केवल मुस्लिम प्रजा से होता था।

    यह बात मुस्लिम अमीरों को बहुत अखरती थी कि दारा शिकोह, मुस्लिम रियाया के साथ-साथ हिन्दुओं में भी बहुत लोकप्रिय था। राजधानी में रहने के कारण दारा, सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा की कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था।

    दारा के तीनों छोटे भाई, एक दूसरे के खून के प्यासे होने के बाद भी वे दारा शिकोह को अपना पहला शत्रु मानते थे तथा वह तीनों शहजादों का सम्मिलत शत्रु था। उनमें से प्रत्येक यह चाहता था कि किसी तरह दारा शिकोह मर जाए, शेष दो भाइयों को तो वह आसानी से निबटा देगा।

    शाहजहाँ का दूसरा पुत्र शाहशुजा बंगाल का शासक था। वह बुद्धिमान, साहसी तथा कुशल सैनिक था परन्तु विलासी और अयोग्य था। उसमें इतने विशाल मुगल साम्राज्य को सँभालने की योग्यता नहीं थी। इसलिए दारा उससे कम आशंकित रहता था।

    शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब, कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह अत्यंत असहिष्णु तथा संकीर्ण विचारों का स्वामी था इस कारण उसे सल्तनत के कट्टर मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था जिनकी संख्या, सहिष्णु मुसलमानों से बहुत अधिक थी। राजधानी से दूर रहने के कारण तथा हर समय युद्ध में व्यस्त रहने के कारण औरंगजेब को प्रान्तीय शासन तथा युद्धों का अच्छा अनुभव था। धूर्त तथा कुटिल होने के कारण वह अपनी पराजय को विजय में बदलना जानता था।

    दारा शिकोह अपने तीनों भाइयों तथा उनके पक्ष की शहजादियों के नापाक इरादों को जानते हुए भी औरंगजेब की तरफ से सर्वाधिक भयभीत रहता था। इसलिए वह औरंगजेब को किसी एक स्थान अथवा किसी एक मोर्चे पर टिके नहीं रहने देता था। वह औरंगजेब को कभी अफगानिस्तान के मोर्चे पर, कभी दक्षिण के मोर्चे पर तो कभी बंगाल के मोर्चे पर उलझाए रखता था। औरंगजेब भी इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझता था इसलिए वह दारा शिकोह से बेइंतहा नफरत करता था। इसी नफरत का परिणाम था कि औरंगजेब को दारा का पक्ष लेने वाले अपने बाप शाहजहां से भी गहरी नफरत हो गई थी।

    जिस समय शाहजहां बीमार पड़ा, औरंगजेब, राजधानी दिल्ली से लगभग 2000 किलोमीटर दूर स्थित दक्षिण का सूबेदार था। औरंगजेब की दृष्टि में उसका बड़ा भाई दाराशिकोह एक काफिर था जो इस्लाम के काम को आगे बढ़ाने की बजाय काफिर हिन्दुओं को बढ़ावा देता था तथा हिन्दू ग्रंथों का अरबी एवं फारसी में अनुवाद करवाता था।

    शाहजहाँ का चौथा तथा सबसे छोटा पुत्र मुराद, गुजरात तथा मालवा का शासक था। वह भावुक तथा जल्दबाज युवक था। विलासी प्रवृत्ति का होने से उसमें दूरदृष्टि का अभाव था। वह जिद्दी तथा झगड़ालू प्रवृति का व्यक्ति था। उसमें प्रशासकीय प्रतिभा और सैनिक प्रतिभा की कमी होने पर भी बादशाह बनने की इच्छा अत्यधिक थी।

    शाहजहाँ की लड़कियाँ भी उत्तराधिकार के इस युद्ध में भाग लेने लगीं। जहाँआरा, दारा का; रोशनआरा, औरंगजेब का; और गौहरआरा, मुराद का पक्ष ले रही थी। इस कारण राजधानी की समस्त खबरें गुप्त रूप से इन शहजादों के पास पहुँचती थीं। इनमें से कई खबरें अतिरंजित होती थीं। शाहजहाँ तथा दाराशिकोह ने निराधार खबरों को रोकने का प्रयत्न किया परन्तु इस कार्य में सफलता नहीं मिली। तब बादशाह ने अपनी मुहर तथा अपने हस्ताक्षर से शाहजादों के पास पत्र भेजना आरम्भ किया और उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि वह जीवित तथा स्वस्थ है परन्तु कोई भी शाहजादा इन पत्रों पर विश्वास करने के लिये तैयार नहीं था। वे इन पत्रों को दारा शिकोह की चाल समझते थे।

    हर शहजादा बादशाह को अपनी आँखों से देखना चाहता था परन्तु कोई भी शाहजादा अकेले अथवा थोड़े से अनुचरों के साथ राजधानी आने को तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हें दारा से भय था। किसी भी शहजादे को अपनी समस्त सेना के साथ राजधानी में आने की अनुमति नहीं थी। इसलिये विभिन्न पक्षों में संदेह और वैमनस्य बढ़ने लगा और उत्तराधिकार के लिये होने वाले युद्ध की भूमिका तैयार हो गई।

    सद्भावना, विश्वास तथा धैर्य से ही उत्तराधिकार के संभावित युद्ध को रोका जा सकता था परन्तु दुर्भाग्यवश शाहजादों में इन गुणों का नितांत अभाव था। लाल किले की दीवारों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे शुजा, औरंगजेब तथा मुराद पत्र-व्यवहार द्वारा एक दूसरे के सम्पर्क में थे। उनमें सल्तनत के विभाजन के लिये समझौता हो गया। इन तीनों शाहजादों ने दारा की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने का निश्चय किया।

    हमारी अगली कड़ी में पढ़िए लाल किले के भावी स्वामी दारा शिकोह की दर्द भरी दास्तान।


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  • अंग्रेजों ने डूंगरपुर के महारावल को वृंदावन भेज दिया

     16.07.2017
    अंग्रेजों ने डूंगरपुर के महारावल को वृंदावन भेज दिया

    ई.1808 में जसवंतसिंह डूंगरपुर राज्य का महारावल हुआ। वह एक अयोग्य शासक था। ई.1812 में खुदादाद नाम के एक पिण्डारी ने अपने आप को सिंध का शहजादा घोषित करके डूंगरपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। महारावल अपनी रानियों सहित डूंगरपुर छोड़कर भाग गया। सिंधियों ने डूंगरपुर पर अधिकार कर लिया तथा उसे नष्ट भ्रष्ट कर दिया। सरकारी कार्यालय जलाकर राख कर दिये। जब महारावल किसी तरह सेना एकत्र करके सिंधियों से युद्ध करने के लिये आया तो सिंधियों ने उसे कैद कर लिया। महारावल के अनेक सरदार मारे गये। बाद में बड़ी कठिनाई से सूरजमल ने खुदादाद खां को मार कर महारावल को मुक्त करवाया।

    महारावल ने मराठों, भीलों तथा अपने सरदारों से तंग आकर ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अधीनस्थ संधि की। इस संधि की शर्तें लगभग वही थीं जो अन्य राज्यों के साथ हुई संधि में रखी गयी थीं। इस संधि के तुरंत बाद भीलों ने बहुत लूटमार मचाई जिसे महारावल जसवंतसिंह काबू न कर सका। इस पर कम्पनी सरकार ने अपनी सेना भेजी। इस सेना को देखकर भीलों ने लड़ना बंद करके कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली।

    ईस्वी 1825 में कम्पनी ने भीलों से एक लिखित समझौता किया जिसमें भीलों ने लिखकर दिया कि वे अपने समस्त तीन कमान और अन्य हथियार कम्पनी बहादुर को सौंप देंगे तथा हाल ही के दंगों में जो कुछ लूट में प्राप्त हुआ है, उसका भी एवज देंगे। भविष्य में कभी कसबों, गाँवों अथवा सड़कों पर लूट मार न करेंगे तथा सदैव कम्पनी की आज्ञा का पालन करेंगे। इस संधि पर 22 भील मुखियाओं ने हस्ताक्षर किये।

    भीलों की समस्या पर काबू न पा सकने के कारण कम्पनी द्वारा महारावल जसवंतसिंह को अयोग्य शासक माना गया तथा उससे राज्य कार्य छीन लिये गये। पोलिटिकल एजेण्ट ने पण्डित नारायण को डूंगरपुर का प्रबंधक नियुक्त किया तथा दो सामंतों को उसका सहायक नियुक्त किया। पण्डित तो दो साल बाद ही मर गया जिससे सामंतों की बन आयी और उन्होंने महारावल को आतंकित करके राज्य में पूरी तरह धांधली मचा दी। उन दोनों सामंतों के भी मर जाने पर जो नये सामंत राज्यकार्य के लिये नियुक्त किये गये वे भी पूरे बेईमान थे जिनसे तंग आकर अंग्रेजों ने प्रतापगढ़ देवलिया के महारावल सावंतसिंह के छोटे पौत्र दलपतसिंह को जसवंतसिंह का उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

    दलपतसिंह का न तो डूंगरपुर न बांसवाड़ तथा न रावल शाखा से कोई सम्बन्ध था। इसलिये सरदारों ने उसे गोद लिये जाने पर आपत्ति की किंतु अंग्रेजों ने दलपतसिंह को बलपूर्वक महारावल का दत्तक पुत्र घोषित कर उसे समस्त राज्यकार्य सौंप दिये। जब महारावल तथा सरदारों ने अंग्रेज सरकार से विरोध जताया तो अंग्रेज सरकार ने जवाब दिया कि अंग्रेज सरकार प्रत्येक रईस को अपना शासन बनाये रखने के लिये और अपने राज्य में शांति स्थापित कर देश को आपत्तियों से बचाने का उत्तरदायित्व समझती है। उधर जब कुछ साल बाद प्रतापगढ़ का कोई वारिस जीवित न रहा तो दलपतसिंह ने प्रतापगढ़ का भी शासन अधिकार संभाल लिया तथा उसने प्रतापगढ़ तथा डूंगरपुर को एक ही राज्य में सम्मिलित करने की योजना बनायी।

    डूंगरपुर के महारावल के यहाँ गोद चले जाने के कारण दलपतसिंह का प्रतापगढ़ पर कोई अधिकार नहीं रहा था तथा उधर डूंगरपुर का वास्तविक शासक जसवंतसिंह अंग्रेजों से अपना राज्य वापस मांग रहा था इसलिये ई.1845 में उसने एक चाल चली। महारावल जसवंतसिंह ने नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेने के लिये मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह से लिखा पढ़त की। अंग्रेज सरकार से स्वीकृति लिये बिना इस प्रकार की कार्यवाही किया जाना पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान हंटर को उचित नहीं जान पड़ा। जब कुछ लोगों को मालूम हुआ कि महारावल हिम्मतसिंह को गोद लेने के लिये सिरोपाव भेज चुका है तो उन्होंने धन्नामाता की डूंगरी पर चढ़कर राजमहल पर गोलियां दागी। महारावल जसवंतसिंह उन गोलियों की चपेट में आने से बाल-बाल बचा। कुंवर दलपतसिंह ने प्रतापगढ़ से आकर हिम्मतसिंह को गिरफ्तार कर लिया।

    अंग्रेजों ने महारावल जसवंतसिंह को इस सारे बखेड़े का जिम्मेदार ठहराया तथा उसे पदच्युत करके वृंदावन भेज दिया। दलपतसिंह को डूंगरपुर का शासक बना दिया। महारावल जसवंतसिंह को 1000 रुपये की मासिक पेंशन दी गयी। कुछ दिन बाद वृंदावन में ही उसकी मृत्यु हुई। दलपतसिंह डूंगरपुर राज्य का महारावल बन गया।

    राज्य के वास्तविक स्वामि की इस प्रकार दुर्गति होने से महारावल की रानियों ने दलपतसिंह के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया तथा वे बार-बार अंग्रेज सरकार को लिखने लगीं कि दलपत सिंह की जगह किसी अन्य व्यक्ति को डूंगरपुर का राजा बनाया जाये। इस समस्या का कोई अंत आता न देखकर अंग्रेजों ने दलपतसिंह को फिर से प्रतापगढ़ भेज दिया तथा साबली के ठाकुर जसवंतसिंह के चार पुत्रों में से किसी को डूंगरपुर का महारावल बनाने का विचार किया। साबली का राजपरिवार डूंगरपुर के राजपरिवार की ही एक शाखा से था।

    जसवंतसिंह के चार बालकों में से किसे डूंगरपुर का राजा बनाया जाये इस प्रश्न को हल करने के लिये डूंगरपुर के सरदारों ने उन बालकों की एक परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने मिठाई मंगवाकर उन बालकों में बंटवा दी। पहले, दूसरे तथा चौथे नम्बर के बालकों ने तो मिठाई अपने हाथ में ले ली तथा तीसरे नम्बर के बालक उदयसिंह ने हाथ में मिठाई नहीं ली तथा थाली में लाकर देने को कहा। आठ वर्ष के बालक की इस बुद्धि को देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद कुछ रुपये मंगवाकर उन चारों लड़कों को दिये गये। तीन बालकों ने तो रुपये अपने पास रख लिये किंतु उदयसिंह ने कुछ रुपये तो ब्राह्मणों को दे दिये तथा शेष रुपयों से शस्त्र मंगवाने की इच्छा व्यक्त की।

    सरदारों ने इसी बालक को डूंगरपुर का स्वामी स्वीकार कर लिया। उनके निर्णय को रानियों ने भी स्वीकार कर लिया तथा दलपतसिंह भी राजी हो गया। इस प्रकार 28 सितम्बर 1846 को उदयसिंह डूंगरपुर का शासक बन गया। उसकी शिक्षा दीक्षा का अच्छा प्रबंध किया गया। कुछ समय बाद उदयसिंह ने राजपूताने की विभिन्न रियासतों का दौरा किया। दिसम्बर 1855 में वह मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह से मिलने के लिये उदयपुर गया। महाराणा ने उदयपुर नगर से बाहर दक्षिण दिशा में स्थित नागों के अखाड़े तक आकर उसका स्वागत किया। युवक उदयसिंह ने भी महाराणा के गौरव के अनुसार शिष्टाचार प्रकट किया।

    महारावल उदयसिंह नाबालिग था इसलिये डूंगरपुर राज्य का शासन अब भी महारावल दलपतसिंह ही चलाता था। इस प्रकार महारावल उदयसिंह धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था ई.1858 में उसे शासन के पूर्ण अधिकार सौंपे जाने थे किंतु उससे पूर्व ही भारत में 1857 का प्रसिद्ध गदर प्रारंभ हो गया और महारावल को अपनी वफादारी दिखाने का अवसर प्राप्त हुआ।

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