Blogs Home / Blogs / /
  • युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

     02.06.2020
    युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

    धनतेरस को प्रकट हुई ज्योति

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    श्री भैरोंसिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर 1923 को धनतेरस के दिन, राजपूताने की जयपुर रियासत के सीकर ठिकाणे के खाचरियावास गांव में एक सामान्य राजपूत कृषक परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम देवीसिंह शेखावत तथा माता का नाम बन्नेकंवर था। भैरोंसिंह अपने माता-पिता की प्रथम संतान थे। उनके बाद तीन छोटे भाई तथा चार बहिनों का जन्म हुआ। भैरोंसिंह का ननिहाल चूरू जिले के सहनाली बड़ी गांव में था।

    तीस किलोमीटर पैदल

    भैरोंसिंह के पिता देवीसिंह एक आदर्श अध्यापक थे। रूढ़िवाद के विरोधी और समाज में समता के पक्षधर देवीसिंह ने बुराइयों के समक्ष कभी सिर नहीं झुकाया। इसी आदत के कारण एक बार वे अपना गांव छोड़कर सवाईमाधोपुर जिले के बीछीदाना गांव में रहने लगे। वहीं पर उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। भैरोंसिंह को सुंदर हस्तलेख और अनुशासन पिता से विरासत में मिले। बीछीदाना में पढ़ते हुए जब कुछ साल हो गये तो उन्हें जोबनेर के एंग्लोवैदिक स्कूल में पढ़ने भेजा गया। उस समय मोटरें नहीं थीं। कई बार वे जोबनेर से खाचरियावास तक की 30 किलोमीटर की दूरी वे पैदल ही पार करते थे। हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ई.1941 में उन्हें जयपुर के महाराजा कॉलेज के प्रथम वर्ष में भर्ती करवाया गया। कॉलेज की शिक्षा के दौरान उन्होंने नाटकों में भी भाग लिया।

    पीपल के पेड़ के नीचे बारात

    3 जुलाई 1941 को उनका विवाह जोधपुर रियासत के बुचकला गांव की सूरजकंवर से कर दिया गया। उनकी बारात जोबनेर से पीपाड़रोड तक रेलगाड़ी से पहुंची तथा वहां से बैलगाड़ियों में बैठकर बुचकला पहुंची। बुचकला में उनकी बारात अडूणिया बेरा के पीपल के नीचे दो दिन ठहरी। भैरोंसिंह के ससुराल में ससुर कल्याणसिंह राठौड़, सास सदाकंवर, पांच साले तथा एक साली थी। भैरोंसिंह की पत्नी सूरजकंवर अपने पीहर में सबसे छोटी थीं।

    नाडी का पानी पिया

    भैरोंसिंह अपने विवाह के पश्चात् पीपाड़ रोड से पैदल ही अपने ससुराल बुचकला पहुंचे थे। बीच मार्ग में जब उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने एक नाडी में अपने हाथों से पानी पिया। इससे उन्हें नारू रोग हो गया। इस रोग का निशान जीवन भर उनके शरीर पर बना रहा। ई.2004 में भैरोंसिंह जब उपराष्ट्रपति थे, तब वे पुनः बुचकला गये और वहां आम सभा में उन्होंने स्वयं यह किस्सा सुनाया।

    सिर से पिता का साया उठा

    ई.1942 में देवीसिंह शेखावत का निधन हो गया। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मां बन्ने कंवर ने निभाई। उनकी माँ ने बहुत कठिन परिश्रम करके परिवार को चलाया। भैरोंसिंह स्वयं इस बात को कितनी ही बार दोहराते थे कि उनकी माता किस तरह चक्की चलाती थी। किंतु भैरोंसिंह की पढ़ाई आगे नहीं चल पाई। परिवार के निर्वहन के लिये भैरोंसिंह ने सीकर ठिकाणे के पुलिस विभाग में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर की नौकरी कर ली किंतु पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आई। उनका मन राजनीति की ओर झुकने लगा।

    लगान वसूलने वालों ने बनाया उन्हें भैरोंसिंह

    एक बार उनके गांव में ड्डियों का दल सारे खेतों को चट कर गया। इसके उपरांत भी सरकारी हरकारे लगान लेने पहुंच गये। इस लगान के विरोध की भावना से एक नया भैरोंसिंह निकलकर सामने आया। उनकी मां कहती थी कि एक पण्डित ने उन्हें बताया था कि भैरोंसिंह गांव और परिवार का नाम रोशन करेगा। ई.1952 में विधायक बनने से लेकर अपने अंतिम समय तक उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था।

    बिशनसिंह के कहने से मिला टिकट

    1952 के प्रथम आम चुनावों में जनसंघ को दाता रामगढ़ से कोई उपयुक्त प्रत्याशी नहीं मिल रहा था। तब बिशनसिंह शेखावत ने लालकृष्ण आडवानी को सुझाव दिया कि मेरे एक भाई भैरोंसिंह शेखावत पुलिस में हैं, आप उन्हें टिकट दे दें। इस पर उन्हें विधायक का टिकट दिया गया।

    सूरजकंवर से लिये दस रुपये

    चुनाव लड़ने के लिये सीकर जाना आवश्यक था और सीकर जाने के लिये जेब में रुपये होने आवश्यक थे किंतु मनमौजी भैरोंसिंह की जेब में कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपनी पत्नी से दस रुपये मांगे। उदारमना पत्नी ने उनकी मांग पूरी की और भैरोंसिंह दस रुपये लेकर सीकर आ गये। इसके बाद उनका जनसंघ से जुड़ाव हुआ। उन्हें दीपक चुनाव चिह्न के साथ जनसंघ का टिकट मिला और वे 2,833 वोटों से जीत हासिल करके राजस्थान की प्रथम विधानसभा के सदस्य बन गये।

    जागीरदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन

    सितम्बर 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ की स्थापना कर चुके थे। जनसंघ की शाखाएं गांवों एवं पंचायतों तक स्थापित करने में जागीरदारों ने अच्छा योगदान दिया। उन्हें आशा थी कि जागीरदारी प्रथा जारी रखवाने में जनसंघ से सहायता मिलेगी। राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में जागीदारों की सहायता से जनसंघ ने 50 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। उनमें से 30 की जमानतें जब्त हो गईं। भैरोंसिंह सहित जनसंघ के केवल आठ विधायक जीते जिनमें से अधिकतर जागीरदार ही थे। राजस्थान की प्रथम निर्वाचित सरकार ने जागीरदारी उन्मूलन का कार्य आरंभ किया तो जनसंघ के विधायक इसके विरोध में खड़े हो गये किंतु भैरोंसिंह शेखावत तथा जगतसिंह झाला ने जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का समर्थन किया। पार्टी के छः विधायकों ने जो कि स्वयं जागीरदार थे, भैरोंसिंह को जनसंघ से निकलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। इस पर भैरोंसिंह शेखवात दिल्ली जाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा दीनदयाल उपाध्याय से मिले। दोनों नेता भैरोंसिंह के तर्कों से सहमत हुए और जागीरदार विधायकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई।

    नमस्ते सदा वत्सले

    भारत माता के प्रति उनकी निष्ठा, भक्ति और समर्पण अटूट था। जब 1952 में वे जनसंघ से विधायक बने तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर उनका झुकाव हुआ। वे प्रायः संघ के कार्यक्रमों में संघ का गणवेश धारण करके जाते थे। सदा वत्सला भारत माता के प्रति उनका यह नमन सदैव बना रहा।

    लगातार चार बार विधायक बने

    वर्ष 1952 में दांता रामगढ़ विधान सभा सीट जीतने के बाद भैरोंसिंह शेखावत वर्ष 1957 में श्रीमाधोपुर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। 1962 और 1967 में वे जयुपर की किशनपोल सीट से विधायक चुने गये। इस प्रकार वे अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही चार बार लगातार विधायक बने।

    गांधीनगर सीट से हारे

    1972 के विधानसभा आम चुनावों में भैरोंसिंह शेखावत ने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने कांग्रेस के जनार्दन सिंह गहलोत खड़े हुए। चुनाव प्रचार के दौरा भैरोंसिंह शेखावत वोट मांगने के लिये जनार्दनसिंह के माता-पिता के घर भी गये और उनसे अपने लिये वोट मांगा। एक बार प्रचार के दौरान दोनों प्रत्याशी आमने-सामने हो गये। इस पर भैरोंसिंह शेखावत ने जनार्दनसिंह से सबके सामने कह दिया कि तुम जीत रहे हो। ऐसा ही हुआ। भैरोंसिंह यह चुनाव हार गये।

    बाड़मेर सीट से हारे

    गांधीनगर सीट से चुनाव हारने के बाद भैरोंसिंह शेखावत ने बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा किंतु इस चुनाव में भी उन्हें कांग्रेस के अमृत नाहटा से पराजय का सामना करना पड़ा।

    राज्यसभा में

    दो बार लगातार विधान सभा चुनावों में मिली पराजय किसी के लिये भी बड़ा झटका हो सकती थी किंतु वर्ष 1974 में मध्यप्रदेश जनसंघ ने भैरोंसिंह शेखावत को राज्यसभा में मनोनीत कर दिया और वे 1974 से 1977 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

    पौने दो साल जेल में

    ई.1975 में जब देश में आपात् काल लगा तो जून 1975 से मार्च 1977 तक भैरोंसिंह शेखावत मीसा के अंतर्गत जेल में बंद रहे।

    पहली बार मुख्यमंत्री

    आपात्काल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में देश में जनता पार्टी का गठन हुआ। इस नई पार्टी में जनसंघ का भी विलय हो गया। भैरोंसिंह भी जनता पार्टी में सम्मिलित हो गये। उसी वर्ष राजस्थान में विधानसभा के लिये मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें जनता पार्टी को 200 में से 150 स्थान प्राप्त हुए। उस समय बहुत से सदस्य डूंगरपुर के पूर्व महारावल लक्ष्मणसिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जो कि उच्च कोटि के वक्ता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे किंतु जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व भैरोंसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिये जनता पार्टी के मास्टर आदित्येन्द्र तथा भैरोंसिंह शेखावत के बीच मुकाबला हुआ जिसमें शेखावत की जीत हुई और उन्होंने राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी। शेखावत उस समय मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सदस्य थे। 22 जून 19977 को चौपन वर्ष की आयु में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली इस कारण उन्हें राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देनी पड़ी।

    पहला मंत्रिमण्डल

    27 जून 1977 को शेखावत सरकार में मास्टर आदित्येन्द्र, प्रो. केदार नाथ, ललित किशोर चतुर्वेदी, सम्पत राम तथा त्रिलोकचंद जैन को कैबीनेट मंत्री, कैलाश मेघवाल, विज्ञान मोदी, महबूब अली और विद्या पाठक को राज्य मंत्री बनाया गया।

    छबड़ा से चुने गये

    शेखावत ने राज्य सभा से त्यागपत्र देकर 18 अक्टूबर 1977 को कोटा जिले के छबड़ा विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा तथा विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की।

    पहली सरकार का विस्तार

    7 फरवरी 1978 को शेखावत सरकार का विस्तार किया गया। सूर्यनारायण चौधरी, भंवरलाल शर्मा, जयनारायण पूनिया, दिग्विजय सिंह व पुरुषोत्तम मंत्री को कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। कैलाश मेघवाल को भी कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। लाल चंद डूडी तथा नन्दलाल मीणा को राज्यमंत्री बनाया गया। जुलाई 1978 में केन्द्र में मोरारजी सरकार गिर गयी और चरणसिंह सरकार का जन्म हुआ। इस कारण राजस्थान में लालचंद डूडी तथा विज्ञान मोदी ने 8 जुलाई 1978 को भैरोंसिंह सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 5 नवम्बर 1978 को शेखावत मंत्रिमण्डल का तीसरा विस्तार किया गया। माणकचंद सुराणा, कल्याणसिंह कालवी, डॉ. हरिसिंह और बिरदमल सिंघवी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा हरिसिंह यादव और भैरवलाल काला बादल को राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। 18 मई 1979 को मास्टर आदित्येन्द्र, 21 जुलाई को प्रो. केदार नाथ और 2 अगस्त को डॉ. हरिसिंह ने शेखावत सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 20 दिसम्बर 1979 को शिवचरण सिंह गुर्जर को सरकार में कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया।

    कर्मचारियों को वापस नौकरी में लिया

    आपात्काल में बहुत से कर्मचारियों को राजकीय सेवा से निकला दिया गया था। भैरोंसिंह शेखावत अभावों की मार को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने आपात काल में निकाल गये समस्त कर्मचारियों को फिर से सेवा में रख लिया और जितने समय वे बंदी रहे, उस काल के समस्त वित्तीय लाभ भी उन्हें दे दिये। आपात् काल के बाद प्रमुख लोग तो जेलों से बाहर आ गये किंतु बहुत से सामान्य जन अब भी जेलों में बंद थे। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने उन सबको भी जेल से बाहर निकाला।

    जस्टिस कानसिंह परिहार आयोग का गठन

    आपात् काल में कुछ सरकारी कर्मचारियों ने जनता के साथ ज्यादतियां कीं। उनका प्रतिकार करने के लिये भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कानसिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग के पास शिकायतों के ढेर लग गये। ये आवेदन आपातकाल में जबरन नसबंदी करने, जबरन सेवानिवृत्ति करने, अकारण बंदी बनाने तथा अतिक्रमण नाम देकर वैध निर्माणों को तोड़ने से सम्बन्धित थे। जस्टिस परिहार ने कड़ी मेहनत करके इन शिकायतों का वर्गीकरण किया तथा उनके सम्बन्ध में पांच सौ प्रतिवेदन तैयार किये। इनमें से कुछ प्रतिवेदनों पर ही सरकार कार्यवाही कर सकी। शेष पर कार्यवाही होने से पहले ही राज्य में पुनः राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

    बाण्या की नौकरी कर ले

    मुख्यमंत्री बनने के बाद भैरोंसिंह शेखावत को प्रायः सचिवालय में बैठकर देर रात तक काम करना पड़ता था। उनकी माँ को यह समझ में नहीं आया कि बेटे ने कौनसी नौकरी कर ली है। न तो समय पर घर आता है और न समय पर खाना खाता है। एक दिन मां से रहा नहीं गया और अपने मुख्यमंत्री पुत्र से बोली- बेटा इसी कुण सी नौकरी कर ली, जो खाबा को पतो न सोबा को। तू तो आ नौकरी छोड, कोई बाण्या की नौकरी कर ले।

    अपने विरोध के लिये दी गई पार्टी में पहुंचे

    एक बार जनार्दनसिंह गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के विरोध में कार्यवाही करने के लिये अपने घर पर कुछ नेताओं की पार्टी रखी। इसमें भैरोंसिंह शेखावत मंत्रिमण्डल के कुछ कैबीनेट मंत्री और विधायक भी सम्मिलित हुए। यह बात भैरोंसिंह शेखावत को ज्ञात हो गई। इस पर शेखावत ने उन्हें फोन करके उलाहना दिया कि मुझे भोज में क्यों नहीं बुलाया। मैं आ रहा हूँ। आधे घण्टे में ही शेखावत, जनार्दनसिंह के घर पहुंच गये। जनार्दनसिंह की सारी योजना पर पानी फिर गया।

    उन्होंने निर्धनता का दंश स्वयं झेला था

    भैरोंसिंह शेखावत ने स्वयं निर्धनता का दंश झेला था। निर्धन के उत्थान के प्रति उनके मन में सदैव ललक रहती थी। वे राजस्थान मंक आदर्श गांवों की स्थापना करना चाहते थे। जब वे उपराष्ट्रपति बने तो प्रायः अपने भाषणों में एक बात कहा करते थे कि गरीबों को लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में स्थापित कर, देश के संसाधनों पर उनका सर्वोपरि अधिकार स्थापित किया जाना चाहिये।

    अंत्योदय योजना के जनक

    भैरोंसिंह शेखावत गरीबों के सम्मानपूर्ण जीवन के पक्षधर थे। इसके लिये उन्होंने अंत्योदय योजना बनाई और उसे सर्वप्रथम राजस्थान में ही लागू किया। इस योजना के आरंभिक प्रावधानों में प्रत्येक गांव से सबसे गरीब पांच परिवारों को चयन करना, उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों यथा पशुपालन, कुटीर उद्योग, ऊँटगाड़ा आदि के लिये बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाना आदि सम्मिलित थे। बाद में यह योजना पूरे देश में लागू हुई और आगे चलकर एकीकृत ग्रामीण विकास योजना का मुख्य आधार बनी। इस योजना के सम्बन्ध में उनका कहना था- जैसे शरीर के एक अंग में विकृति आने से पूरे शरीर पर असर पड़ता है, इसी तरह समाज में कहीं भी विकृति आने से लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। इस योजना का अंत्योदय योजना ही सफल प्रयोग है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस योजना की प्रशंसा की। आज भी यह योजना भारत सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में चला रही है।

    भारत के रॉक्फेलर

    अंत्योदय योजना इतनी प्रसिद्ध हुई कि विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैक्नमारा ने इस योजना की सराहना करते हुए भैरोंसिंह को भारत का रॉक्फेलर कहा।

    विश्व बैंक भी सहायता के लिये आगे आया

    राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते भैरोंसिंह शेखावत ने अपना गांव - अपना काम योजना एवं काम के बदले अनाज योजना आरंभ कीं। इन योजनाओं को गरीबी उन्मूलन के लिये अत्यंत उपयोगी माना गया। कुछ समय बाद केन्द्र सरकार के निर्देश पर अन्त्योदय योजना को काम के बदले अनाज योजना में बदल दिया गया। इस योजना में राजस्थान ने अन्य समस्त राज्यों की अपेक्षा सर्वाधिक कार्य किया तथा 1,80,000 टन अनाज उठाया। इस कारण विश्व बैंक भी इन योजनाओं के संचालन के लिये राज्य सरकार की सहायता करने के लिये आगे आया।

    पंचायतों को काम करने के अधिकार दिये

    उस समय तक पंचायतें कवल पांच सौ रुपये तक की योजनाएं ही हाथ में ले सकती थीं किंतु भैरोंसिंह शेखावत की पहली सरकार ने इस सीमा को पाचास हजार रुपये कर दिया तथा प्रत्येक पंचायत समिति के लिये निर्माण कार्यों की सीमा दस लाख रुपये कर दी।

    भारतीय जनता पार्टी में

    वर्ष 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इस प्रकार वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे।

    राज्य में राष्ट्रपति शासन

    जनवरी 1980 में केन्द्र में कांग्रेस (इ) सरकार का निर्माण हुआ जिसने 17 फरवरी 1980 को राज्य की शेखावत सरकार की प्रथम सरकार को बर्खास्त करके विधान सभा को भंग कर दिया। राज्य मं। तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने अपनी पहली पारी में 2 वर्ष 8 महीने कार्य किया।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

    1980 के विधानसभा चुनावों में श्री भैरोंसिंह शेखावत ने छबड़ा से दुबारा चुनाव लड़ा और वे विजयी रहे किंतु उनकी पार्टी चुनाव हार गई तथा कांग्रेस की सरकार बनी। भैरोंसिंह शेखावत भापजा विधायक दल के नेता चुने गये तथा नेता प्रतिपक्ष बने। पूरे पांच साल तक वे इस पद पर बने रहे।

    दुबारा नेता प्रतिपक्ष

    1985 में आठवीं राजस्थान विधान सभा में भी कांग्रेस की सरकार बनी। इस विधानसभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने निंबाहेड़ा तथा अजमेर विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और वे दोनों ही सीटों पर विजयी रहे। इस विधानसभा में भी भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष के पद पर कार्य करते रहे।

    सती प्रथा का प्रबल विरोध

    4 सितम्बर 1987 को सीकर जिले के दिवराला गांव में रूपकंवर सती काण्ड हुआ। देश भर में इसकी तीव्र निंदा हुई। उस समय श्री हरिदेव जोशी राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने के लिये कानून बनाया। 2 नवम्बर 1987 को राजस्थान विधान सभा में भैरोंसिंह शेखावत ने इस प्रथा का प्रबल विरोध किया भैरोंसिंह शेखावत ने विगत 150 वर्षों में राज्य में सती हुई स्त्रियों के आंकड़े एकत्रित किये तथा यह सिद्ध कर दिया कि यह एक भ्रम है कि सती प्रथा राजपूतों में प्रचलित है। विगत 150 वर्षों में अन्य जातियों में राजपूतों की स्त्रियों से भी अधिक स्त्रियां सती हुई हैं। उनका तर्क था कि इस कुरीति को जड़ से नष्ट करने के लिये प्रभावी उपाय होने चाहिये।

    भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार

    वर्ष 1990 में राजस्थान में नवम् विधानसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को 85, जनता दल अविभाजित को 54 तथा कांग्रेस (इ) को 50 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। भाकपा का एक प्रत्याशी जीता। निर्दलियों को 9 स्थानों पर विजय मिली। भाजपा के प्रत्याशी के रूप में भैरोंसिंह शेखावत ने दो सीटों- छबड़ा और धौलपुर से चुनाव लड़ा और दोनों ही स्थानों से विजयी रहे। इस कारण भाजपा की झोली में केवल 84 विधायक रह गये तथा किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। भाजपा ने जनता दल (अविभाजित) से सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया जो कि स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 4 मार्च 1990 को भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनायी।

    शेखावत के साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा व ललित किशोर चतुर्वेदी ने और जनता दल के नत्थीसिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 14 मार्च 1990 को भाजपा के कृष्ण कुमार गोयल, चतुर्भुज वर्मा, विजयसिंह झाला, रामकिशोर मीणा तथा पुष्पा जैन ने और जनता दल के दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान एवं सुमित्रासिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। भाजपा के हरलाल सिंह खर्रा, रमजान खां, कालूलाल गुर्जर, मोहन मेघवाल, जीवराज कटारा, कुंदनलाल मिगलानी, चुन्नीलाल गरासिया तथा जनता दल के फतहसिंह ने राज्यमंत्री पद की शपथ ली। 16 मार्च 1990 को हरिशंकर भाभड़ा को विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। 5 जुलाई 1990 को जनता दल के यदुनाथसिंह सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुने गये। बाद में 19 मार्च 1991 को यदुनाथसिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया एवं भाजपा के हीरासिंह चौहान उपाध्यक्ष बने।

    30 मई 1990 को भाजपा के हरि कुमार औदिच्य तथा विद्या पाठक को एवं जनता दल के प्रो. केदार नाथ, सम्पतराम व मदन कौर को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। उसी दिन भाजपा के जोगेश्वर गर्ग तथा शांतिलाल चपलोत को एवं जनता दल के रामेश्वर दयाल यादव, देवीसिंह भाटी, नफीस अहमदखां व गोपालसिंह खण्डेला को राज्यमंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर 1990 को भाजपा की अयोध्या रथ यात्रा के कारण जनता दल ने भाजपा सरकार से अलग होने का निर्णय लिया। 7 कैबीनेट मंत्रियों- नत्थीसिंह, सम्पतराम, प्रो. केदार, दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान, सुमित्रा सिंह और मदनकौर तथा चार राज्य मंत्रियों- फतहसिंह, गोपालसिंह खण्डेला, रामेश्वर दयाल यादव तथा नफीस अहमद ने सरकार से त्यागपत्र दे दिये जिससे सरकार अल्पमत में आ गयी। 5 नवम्बर 1990 को जनता दल के 22 विधायकों ने नत्थीसिंह के नेतृत्व को अस्वीकार करते हुए भाजपा को समर्थन जारी रखने की घोषणा की।

    8 नवम्बर 1990 को शेखावत सरकार ने विधान सभा में विश्वास का मत अर्जित कर लिया। सरकार के पक्ष में 116 तथा विरोध में 80 मत आये। विधान सभा अध्यक्ष ने मतदान नहीं किया। 24 नवम्बर 1990 को मंत्रिमण्डल का विस्तार किया गया। जनता दल (दिग्विजय) के दिग्विजय सिंह, गंगाराम चौधरी, लालचंद डूडी, भंवरलाल शर्मा, सम्पतसिंह, जगमालसिंह यादव, रामनारायण विश्नोई को कैबीनेट मंत्री, नफीस अहमद खां, उम्मेदसिंह, जगतसिंह दायमा, मान्धातासिंह, बाबूलाला खाण्डा और रतनलाल जाट को राज्य मंत्री तथा मिश्रीलाल चौधरी एवं डूंगरराम पंवार को उपमंत्री बनाया गया। निर्दलीय मदन मोहन सिंहल को राज्य मंत्री एवं रामप्रताप कासनिया को उपमंत्री बनाया गया। 9 जनवरी 1992 को जनता दल (दिग्विजय) के सम्पतसिंह और जगमाल सिंह ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 24 जनवरी 1992 को भाजपा के जोगेश्वर गर्ग और चुन्नीलाल गरासिया ने मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में सम्मिलित होने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। 17 फरवरी 1992 को भाजपा के कैलाश मेघवाल ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 1 दिसम्बर 1992 को भाजपा के कैबीनेट मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने अयोध्या में कारसेवा में भाग लेने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

    तीन जिलों का जन्म

    अपनी दूसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने दौसा, राजसमंद तथा बारां जिलों का गठन किया। इससे राज्य में जिलों की संख्या 27 से बढ़कर 30 हो गई। अपने इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत केन्द्र सरकार की आठवीं पंचवर्षीय योजना में राजस्थान को 11500 करोड़ रुपये स्वीकृत करवाने में सफल रहे। दूसरी सरकार भी राष्ट्रपति शासन की भेंट चढ़ी 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुई गतिविधियों को लेकर केन्द्र सरकार ने शेखावत सरकार को अपदस्थ कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया तथा विधानसभा भंग कर दी गयी। भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार राज्य में दसवीं विधान सभा के लिये 11 नवम्बर 1993 को मतदान हुआ। 27 नवम्बर को मतों की गिनती की गयी एवं चुनाव परिणाम घोषित किये गये। भाजपा को 95 स्थान, कांग्रेस (इ) को 76 स्थान, माकपा को 1 स्थान, जनता दल को 6 स्थान एवं निर्दलीय एवं अन्य को 21 स्थान प्राप्त हुए। भाजपा ने बाड़मेर में गंगाराम चौधरी को, चौहटन में भगवान दास डोसी को एवं डीग क्षेत्र में कुंवर अरुणसिंह को समर्थन प्रदान किया। इन तीनों को ही चुनावों में विजय प्राप्त हुई।

    भैरोंसिंह शेखावत ने दसवीं विधानसभा का चुनाव पाली जिले की बाली सीट से लड़ा थाजिसमें वे विजयी रहे। इस प्रकार 11 दिसम्बर 1993 को भैरोंसिंह शेखावत ने निर्दलियों के सहयोग से राज्य में तीसरी बार अपनी सरकार का गठन किया। जब उन्होंने अपनी तीसरी सरकार का गठन किया तो राष्ट्रपति शासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे 'सरकारी अवकाश' बताया।

    उनके साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा, ललित किशोर चतुर्वेदी, देवीसिंह भाटी, गुलाबचंद कटारिया, एवं निर्दलीय सुजानसिंह यादव एवं गंगाराम चौधरी को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। भाजपा के नाथूसिंह गुर्जर, राजेन्द्रसिंह राठौड़, जसवंतसिंह विश्नोई, श्रीकिशन सोनगरा, नन्दलाल मीणा, रामप्रताप कासनिया, अनंग कुमार जैन, मदन दिलावर, अचलाराम मेघवाल, सांवरलाल जाट, निर्दलीय रोहिताश्व कुमार, ज्ञानसिंह चौधरी, नरेन्द्र कंवर तथा शशि दत्ता को राज्य मंत्री बनाया गया। निर्दलीय गुरजंट सिंह तथा मंगलाराम कोली को उपमंत्री बनाया गया।

    22 दिसम्बर 1993 को भाजपा के अर्जुन सिंह देवड़ा को राज्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। 20 फरवरी 1994 को भाजपा के कैलाश मेघवाल एवं रघुवीरसिंह कौशल को कैबीनेट मंत्री के पद की शपथ दिलवायी गयी। जनता दल के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 6 अक्टूबर 1994 को विधानसभा अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा को कैबीनेट मंत्री, नसरूखां, बृजराजसिंह एवं पूंजालाल गरासिया को राज्यमंत्री बनाया गया। 27 फरवरी 1995 को बृजराजसिंह का निधन हो गया। मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण 17 जनवरी 1997 को शशि दत्ता ने तथा 20 जनवरी 1997 को पूंजालाल गरासिया ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। 7 दिसम्बर 1997 को एक वरिष्ठ अधिकारी से अशोभनीय व्यवहार करने पर देवीसिंह भाटी को भी मुख्यमंत्री के निर्देश पर त्यागपत्र देना पड़ा। 21 मार्च 1998 को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुन लिये जाने के बाद रघुवीरसिंह कौशल ने भी त्यागपत्र दे दिया। 1 जून 1998 को ज्ञानसिंह चौधरी ने निजी कारणों से त्यागपत्र दे दिया।

    2 जुलाई 1998 को भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा राजपाल सिंह शेखावत, कालीचरण सर्राफ, राजेन्द्र गहलोत, कन्हैयालाल मीणा, भंवरसिंह डांगावास, बाबूलाल वर्मा, सुन्दरलाल, अमराराम चौधरी, दलीचंद, शिवदानसिंह, महावीर भगोरा तथा उजला अरोड़ा को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। 8 जुलाई 1998 को विजयेन्द्रपाल सिंह को कैबीनेट मंत्री तथा चुन्नीलाल धाकड़ को राज्यमंत्री बनाया गया। दो उपमंत्रियों गुरजंट सिंह और मंगलाराम कोली को पदोन्नति देकर राज्यमंत्री बनाया गया।

    नये उद्योगों की स्थापना पर जोर

    भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थान में नये उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया और एक लाख तक की जनसंख्या वाले नगरों में नया उद्योग लगाने वालों को राजकीय सहायता देने का निर्णय किया। साक्षरता, वृक्षारोपण, परिवार नियोजन, स्त्री शिक्षा, आदि उनकी प्राथमिकता के मुख्य कार्यक्रम थे। जब 1993 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो परिवार नियोजन उके लिये पंचायती राज कानून में संशोधन करके एक प्रावधान किया गया कि दो से अधिक संतान वाला व्यक्ति पंच-सरपंच का चुना नहीं लड़ सकता। इसी कार्यकाल में शेखावत ने पंचायती राज तथा स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान करके भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में नई मिसाल स्थापित की। यह आरक्षण रोटेशन प्रणाली के आधार पर लागू किया गया।

    केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे

    राजस्थान के विपुल खनिज भण्डार की शक्ति से भैरोंसिंह भलीभांति परिचित थे। इसलिये वे प्रायः कहते थे कि केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे, हमारा राज्य देश भर की सीमेण्ट तथा मार्बल की मांग पूरी करने में सक्षम है।

    चुंगी की समाप्ति

    अपनी तीसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने नगर पालिका नाकों पर चुंगी वसूलने में हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये चुंगी समाप्त कर दी।

    नौवीं पंचवर्षीय योजना के आकार में ऐतिहासिक वृद्धि

    राजस्थान को स्वीकृत नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997 से 2000) के आकार में, आठवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में लगभग ढाई गुना की वृद्धि हुई। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। जहां आठवीं पंचवर्षीय योजना का आकर 11,500 करोड़ रुपये था, वहीं नौंवी पंचवर्षीय योजना का आकार 27,400 करोड़ रुपये हो गया।

    दो जिलों का निर्माण

    इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान में दो नये जिलों का गठन किया। श्रीगंगानगर जिले को विभाजित करके श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले बनाये गये तथा सवाईमाधोपुर जिले को विभाजित करके सवाईमाधोपुर एवं करौली जिले बनाये गये। इस प्रकार राज्य में जिलों की संख्या 32 हो गई।

    साक्षरता अभियान को अभूतपूर्व सफलता

    भैरोंसिंह शेखावत की इस तीसरी सरकार ने राज्य में सघन साक्षरता अभियान चलाया जिसे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। वर्ष 1991 की जनगणना में राज्य की साक्षरता 38 प्रतिशत पाई गई थी जो इस अभियान के कारण वर्ष 2001 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार निरक्षर राजस्थान साक्षर राजस्थान में बदल गया।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष

    भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया किंतु इसके बाद 1998 में ग्यारहवीं विधानसभा के लिये हुए चुनावों में भाजपा परास्त हो गई। उसे केवल 33 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 150 सीटें जीत कर प्रबल बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची। इस विधान सभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने बाली सीट से चुनाव लड़ा था जिसमें वे विजयी रहे तथा तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष बने।

    उपराष्ट्रपति पद पर विजयी

    वर्ष 2002 में भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी श्री सुशील कुमार शिंदे को सीधी टक्कर में परास्त किया। 19 अगस्त 2002 को भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के 11वें उपराष्ट्रपति बने।

    जीवन भर पढ़ते रहे

    भैरोंसिंह शेखावत हाई स्कूल तक पढ़े हुए थे किंतु सीखने, जानने और पढ़ने की ललक उनमें जीवन भर बनी रही। वे अपने सहायकों से विविधि विषयों पर नोट्स तैयार करवाते और उनका अध्ययन करके ही किसी विषय पर अपनी धारणा बनाते थे।

    तीन बार डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर

    आन्ध्र विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी ने भैरोंसिंह शेखावत को डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर की उपाधियाँ दीं। एशियाटिक सोसाइटी मुम्बई ने उन्हें ऑनरेरी फैलोशिप दी। येरेवान स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी आर्मेनिया ने उन्हें डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्रदान किया।

    राष्ट्रपति का चुनाव हारे

    जुलाई 2007 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल पूरा हुआ। भैरोंसिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। वे स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए। एनडीए के समस्त घटक दलों ने उनका समर्थन किया। उनके सामने राजस्थान की राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटील खड़ी हुईं। उन्हें यूपीए के घटक दलों एवं वामपंथी दलों ने समर्थन दिया। इस चुनाव में प्रतिभा देवीसिंह पाटील विजयी रहीं। 21 जुलाई 2007 को भैरोंसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे सदैव के लिये सक्रिय राजनीति से हट गये। इस समय तक उनकी आयु 84 वर्ष हो गई थी।

    कैंसर ने झकझोरा

    84 वर्ष की आयु में भैरोंसिंह शेखावत को कैंसर का दंश झेलना पड़ा। भारत के विभिन्न चिकित्सालयों में उनका उपचार करवाया गया किंतु वे पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो सके।

    जाति एवं समाज से निर्भय रहे

    4 सितम्बर 1987 को रूपकंवर सती हुई। उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी थे। भैरोंसिंह उन दिनों इंगलैण्ड की यात्रा पर थे। उन्होंने लंदन से वक्तव्य जारी करके सती काण्ड के दाषियों को दण्डित करने की मांग की। राजपूत समाज का बड़ा हिस्सा ऐसे किसी कदम के विरुद्ध पहले ही प्रतिबद्धता जता चुका था।

    भैरोंसिंह निर्भय होकर, अपने सिद्धांतों पर चले। वे जाति एवं समाज की नाराजगी से कभी डरे नहीं। जब कांग्रेस सरकार सती प्रथा के विरोध में कानून लाई तो भैरोंसिंह उसके समर्थन में खड़े हुए। शेखावत जब लंदन से लौटे तो उन्हें गद्दार कहा गया किंतु वे निर्भीक होक जनसभाओं में गये और अपने तर्को से सबको निरुत्तर कर दिया।

    रामनिवास मिर्धा से मिलता था चेहरा

    भैरोंसिंह शेखावत का चेहरा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामनिवास मिर्धा से मिलता था। कोई भी आदमी रामनिवास मिर्धा को देखकर उन्हें शेखावत समझने की भूल कर सकता था और कोई भी आदमी शेखावत को देखकर रामनिवास समझने की भूल कर सकता था। रामनिवास मिर्धा की पुत्री के विवाह में भैरोंसिंह साफा पहनकर पहुंचे। दोनों के साफे भी लगभग एक जैसे थे। इस पर रामनिवास मिर्धा ने भैरोंसिंह शेखावत से कहा कि आप तो मेहमानों का स्वागत करो, मैं मण्डप में जा रहा हूँ। इस पर शेखावत, मिर्धा के परिजनों के साथ उनके आगे खड़े हो गये। बहुत से लोग उन्हें मिर्धा समझकर लिफाफे पकड़ा गये। जब मिर्धा मण्डप से बाहर आये तो वे यह देखकर हैरान हो गये कि अतिथि किस तरह शेखावत को मिर्धा समझकर भ्रमित हो रहे हैं। शेखावत ने हँसकर लोगों को अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं रामनिवास मिर्धा हूँ और ये भैरोंसिंह शेखावत हैं।

    जूते खाओ, पर पुष्पचक्र चढ़ाओ

    1996 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भैरोंसिंह ने अपने दो मंत्रियों राजेन्द्रसिंह राठौड़ तथा रोहिताश्व शर्मा को प्रबंधन की जानकारी प्राप्त करने के लिये हैदराबाद भेजा। उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव का निधन हो गया। इस पर भैरोंसिंह ने दोनों मंत्रियों को निर्देश दिये कि वे सरकार की ओर से रामाराव की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करके आयें। जब राजस्थान सरकार के दोनों मंत्री पुष्पचक्र अर्पित करने गये तो लोगों ने उन पर चप्पलें फैंकनी आरंभ कर दीं तथा वापस जाओ-वापस जाओ के नारे लगाने लगे। इससे राजस्थान सरकार के मंत्री रामाराव की पार्थिव देह तक नहीं पहुंच सके। उन्होंने भैरोंसिंह को यह बात बताई तो भैरोंसिंह ने उन्हें निर्देश दिये कि चाहे कितने ही जूते चप्पल खाने पड़ें, पुष्पचक्र अर्पित करके ही आना। दोनों मंत्री पुनः उस स्थान पर गये जहां रामराव की पार्थिव देह दर्शनार्थियों के लिये रखी गई थी। इस बार वे अपने काम में सफल रहे। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि लोग राजेन्द्रसिंह राठौड़ को एन. टी. रामाराव को चंद्रबाबू नायडू समझ रहे थे जिन्होंने कुछ दिन पहले ही अपने श्वसुर की सरकार का तख्ता पलट किया था।

    गुटखा खाने वाले बाबोसा

    अपने गांव खाचरियावास में भैरोंसिंह शेखावत को बाबोसा के नाम से जाना जाता था। वे गुटखा (पान मसाला) खाने के शौकीन थे, राजस्थान का शायद ही ऐसा कोई गांव या नगर हो जिसमें उन्होंने अपने ऐसे मित्र न बना रखे हों जिनसे वे गुटखा मांगकर न खाते हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नवल किशोर शर्मा भी पान मसाला खाते थे। वे दोनों प्रायः परस्पर परिहास किया करते थे कि पान मसाला बनाने वाले हमें ही अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर क्यों नहीं रख लेते।

    दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री

    भैरोंसिंह शेखावत और सूरजकंवर को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम रतनकंवर रखा गया। रतनकंवर का विवाह नरपतसिंह राजवी से हुआ जो वसुंधरा राजे मंत्रिमण्डल में मंत्री रहे। रतनकंवर के दो पुत्र विक्रमादित्यसिंह तथा अभिमन्युसिंह हुए।

    भयभीत सांसद ने पांव पकड़े

    भैरोंसिंह शेखावत जब राज्यसभा के सभापति थे, उन दिनों एक सांसद लगातार तीन बार प्रश्नकाल के दौरान अनुपस्थित रहा। शेखावत राजस्थान विधानसभा के अनुभवों से समृद्ध थे। उन्होंने सांसद की पृष्ठभूमि की जांच करवाई। सांसद को भी जानकारी हो गई कि भैरोंसिंह शेखावत ने उनकी पृष्ठभूमि की जांच करवाई है। जब भैरोंसिंह शेखावत ने उस सांसद को अपने चैम्बर में बुलाया तो उस सांसद ने उनके पांव पकड़कर माफी मांग ली। भैरोंसिंह शेखावत ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया। इसके बाद ऐसे सदस्य या तो प्रश्न पूछते ही नहीं थे, और यदि पूछते थे तो सदन से अनुपस्थित नहीं रहते थे।

    मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ

    भैरोंसिंह शेखावत को जातिवाद से बहुत चिढ़ थी। वे व्यक्तिवाद और जातिवाद के स्थान पर समष्टिवाद में विश्वास रखते थे। वर्ष 2007 में वे चक्रेश्वरी देवी के नागाणा मंदिर में दर्शनों के लिये आये। इस अवसर पर आयोजित सार्वजनिक सभा के मंच से चक्रेश्वरी देवी को बार-बार राठौड़ों की देवी कहकर सम्बोधित किया गया। इससे वे खीझ पड़े और अपने भाषण में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बोले- देवी देवता किसी व्यक्ति या जाति के नहीं होते, वे तो पूरे समाज के होते हैं। यदि यह राठौड़ों की देवी है और मैं शेखावत हूँ, तो मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ!

    अस्पताल पहुंचे अशोक गहलोत

    भैरोंसिंह शेखावत एक वर्ष से बीमार चल रहे थे। 13 मई 2010 को उन्हें 15 मई 2010 की प्रातः मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को ज्ञात हुआ कि भैरोंसिंह शेखावत की हालत चिंता जनक है, उसी समय प्रातः 9 बजे उन्होंने सवाई मानसिंह अस्पताल के आईसीयू में पहुंचकर डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के बारे में जानकारी ली।

    वैशाख की दूज को ज्योति विलीन हुई

    वैशाख की तृतीया को राजस्थान में आखातीज कहा जाता है जो समस्त शुभकार्यों के लिये अबूझ सावे के रूप में विख्यात है। इसी आखातीज से एक दिन पहले, वैशाख माह की द्वितीया अर्थात् 15 मई 2010 को प्रातः 11 बजकर 10 मिनट पर हृदयाघात से उनका निधन हो गया। कार्तिक माह की त्रयोदशी को जो ज्योति प्रकट हुई वह वैशाख माह की द्वितीया को विलीन हो गई।

    सारे काम छोड़कर दौड़े अशोक गहलोत

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भैरोंसिंह के हालचाल पूछकर अभी लौटे ही थे कि उन्हें शेखावत के निधन का सामचार मिला। वे हाथ के सारे काम छोड़कर उसी समय फिर सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंचे। उन्होंने शेखावत के परिजनों को ढाढ़स बंधवाया तथा उनके निधन पर राजस्थान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया।

    शवयात्रा में सम्मिलित हुआ पूरा देश

    उनके निवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि देने वालों में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, गुजरात की राज्यपाल डॉ. कमला भी शामिल थीं। उनकी शवयात्रा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी- एल- जोशी, हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह] उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल, पूर्व उपप्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, केन्द्रीय मंत्री डॉ- सी- पी- जोशी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंह, भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए।

    शेखावत स्मृति संस्थान की घोषणा

    मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की स्मृतियों को बनाये रखने के लिये जयपुर में शेखावत स्मृति संस्थान को राज्य सरकार की ओर से भूमि देने की घोषणा की। सीकर रोड पर विद्याधर नगर स्टेडियम के पास इस संस्थान को भूमि आवंटित की गई।

    उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है

    शेखावत के निधन पर यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने भैरोंसिंह की पत्नी को लिखे एक पत्र में इन शब्दों में शोक प्रकट किया- मुझे भैरोंसिंह शेखावत के देहावसान का बहुत अफसोस हुआ। सार्वजनिक जीवन में उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है। शेखावत साहब के सार्वजनिक व्यवहार, उनकी सूझबूझ, और राजनीतिक प्रतिभा का महत्व सभी लोग स्वीकार करते हैं। सभी पक्षों में संवाद का जैसा गुण उनमें था, वह प्रायः विरल होता है। आपका उनसे जीवन भर का साथ रहा है। उनके गुणों के बारे में आपसे ज्यादा कौन जान सकता है। आपके अभाव और पीड़ा की कल्पना मैं कर सकती हूँ। इसलिये ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि वह आपको यह दुःख सहने की शक्ति दे और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

    उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये

    शेखावत के निधन पर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा- शेखावत उन बिरले नेताओं में से थे जिन्होंने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी विद्वता, वाक्पटुता और मिलनसार व्यवहार की अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने राजनीति में रहकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये। उन्होंने राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर व्यक्तिगत सम्पर्कों को सदा महत्व दिया।

    पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा

    पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उनके निधन पर कहा- शेखावत का निधन पूरे देश के लिये अपूर्ण क्षति है। वे विराट व्यक्तित्व के धनी और जन-जन के नेता थे। उनसे राजनीति में बहुत कुछ सीखा है। राजनीति के एक युग का अंत हो गया। पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा।

    हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा

    उनके निधन के बाद सुप्रसिद्ध पत्रकार चंदन मित्रा ने 17 मई 2010 को राजस्थान पत्रिका में एक लेख लिखा जिसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा था- उन्होंने पूरी शान से जीवन बिताया। भावी पीढ़ियां उन्हें छपे हुए शब्दों व टीवी फुटेज से जानेंगी। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-31

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-31

    पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर (2)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ओरणों में पाई जाने वाली बहु-उपयोगी वनस्पतियाँ


    राजस्थान के ओरणों में पेड़-पौघों की 680 प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। इनमें से अधिकांश वनस्पतियां मनुष्य तथा पशुओं के लिये उपयोगी हैं। इनमें से कुछ प्रमुख वनस्पतियों का विवरण इस प्रकार से है-

    अंग्रेजी बबूल : अंग्रेजी बबूल अर्थात् अरेबिया अकेशिया की झाड़ी वर्ष भर हरी रहती है। विगत एक सौ वर्ष में इस झाड़ी का तेजी से प्रसार हुआ है। यह झाड़ी गांवों में जलाऊ लकड़ी का सबसे बड़ा स्रोत है। लोग इन झाड़ियों को जलाकर कच्चा कोयला तैयार करते हैं। इसकी फलियां पशु चारे के रूप में काम आती हैं। जोधपुर स्थित आफरी ने इसके बीजों से बिस्किट एवं कॉफी पाउडर तैयार किया है।

    अरण्ड : इसके पत्ते कंगूरिया, मोटे आकार के कपास के पत्तों जैसे होते हैं। बीजों का रंग सफेद, गुलाबी, कत्थई होता है जिनमें तेल और गूदा होता है।

    अरणा या अरणी : इसके पत्ते गोल, थोड़े नुकीले तथा कोमल होते हैं। फूल सफेद, सुगन्धित होते हैं जिन पर मक्खी एवं कीट मण्डराते हैं। इसकी बालियां नीचे की ओर झुकी हुई होती हैं। अरणी की लकड़ियां, झौंपड़े बनाने में काम आती हैं।

    आक : यह लगभग 5-6 फीट ऊँचा तथा पत्तों से लदा हुआ होता है। पत्ते मोटे तथा दूधवाले होते हैं। जामुनी रंग के फूल पाये जाते हैं। आमी के आकार के फल लगते हैं जिनसे रुई निकलती है। इसे अंकाला कहा जाता है। अंकाला से रस्सियां बनाकर उनसे पीढ़े तथा चारपाइयां बुनी जाती हैं। इससे तकिये और गद्दे में भी भरे जाते हैं।

    इन्द्रायण (तूम्बा) : इससे पशुओं में अजीर्ण तथा आफरे की दवा बनती है। इसके फूल कपूरी एवं फल मौसमी की तरह होते हैं। जब ऊँट चरना बंद कर देता है तो उसे नमक के साथ तूम्बा उबाल कर देते हैं।

    ऊँटगण : इसे ऊँट चाव से खाता है। यह बल एवं वीर्य वर्धक है। रोगी इनके गोटों को दूध में डालकर पीता है। गोटे फूलकर दूध को गाढ़ा कर देते हैं।

    कटेरी (रींगणी) : इसकी बेल कांटों वाली होती है जिस पर पीले फल लगते हैं। गुलाबी फूलों पर तितलियां मण्डराती हैं।

    कुरण्ड : इसे चामघस भी कहते हैं। यह बलवर्धक होती है। इसे पीस कर खाते हैं। इसके बारीक काले बीजों को भी खाते हैं।

    खेजड़ी : खेजड़ी की पत्तियां पशु चारे के रूप में, लकड़ी ईंधन के रूप में, फलियां सब्जी के रूप में तथा सूखी फलियां फल के रूप में काम आती हैं। इसकी उपस्थिति से खेत में नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में अजोटोबेक्टर नामक बैक्टीरिया रहता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करता है।

    गोखरू : इसे भाँखड़ा उकाली भी कहते हैं। यह काढ़ा बनाने के काम आता है। इसे ऊँट चाव से खाते हैं।

    चिड़धणियो : ओरी माता में उकाली देने के काम आता है।

    जवासो या धमासो : यह बड़े कांटों एवं छोटे पत्तों की झाड़ी होती है।

    तालमखाणा : यह जलीय पौधा है।

    तुलसी : इसके पत्ते कोमल, सुगन्धित, चरचरे, कड़वे तथा गुणकारी होते हैं। इसके पत्तों की उकाली लेने से बुखार, मलेरिया, खांसी, जुकाम आदि में लाभ होता है। विष्णु पत्नी मानकर इसे हर घर के आंगन में लगाया जाता है तथा संध्या काल में इसके नीचे दीप जलाया जाता है।

    धतूरा : इसके पत्ते पान जैसे, फूल सफेद घण्टी जैसे, फल गोल, कंटीले तथा अधिक बीज वाले होते हैं। यह मादक तथा विषैली वनस्पति है।

    नागरमोथा : यह सुगन्धित पदार्थों में मिलाने के काम आता है। कपूर, कचरी तथा चंदन के साथ हवन में काम लिया जाता है।

    नीम : इसकी कोंपलें रक्तशोधक होने के कारण कच्ची खाई जाती हैं। इसकी छाल को पानी में पीसकर घावों पर लगाया जाता है। इसका तेल पशुओं के घावों पर लगाया जाता है। इसकी दांतुन भी स्वास्थ्य वर्धक मानी जाती हैं। बवासीर की बीमारी में सूखी हुई निबौलियों का पाउडर शहद में मिलाकर खाते हैं।

    पींप : यह वर्षाकाल में फोग के साथ पैदा होता है। इसकी सब्जी बनती है। फूंबी : इसे खूंबी तथा मशरूम भी कहते हैं जो हृदय रोग में तुरंत प्रभाव डालने वाली दवा है। इसकी सब्जी भी बनती हं। इसकी कुछ प्रजातियां जहरीली होती हैं।

    फोग : यह भीषण गर्मी और लू में बालू के धोरों पर उगता है। इसकी जड़ें धरती में फैलकर गुच्छा बनाती हैं तथा पत्तियां तुरंत झड़ जाती हैं। उसके बाद तना पत्तियों की तरह कार्य करता है। गणगौर पूजन में सुहागनें फोग के फूल और डालियों से गवर और ईसरजी की पूजा करती हैं। किसान हल जोतने के समय इसकी डालियों और फूलों से सुगन मनाते हैं। इसकी ऊँचाई एक-दो मीटर तक होती है। रेगिस्तानी पशु इसे चाव से खाते हैं। यात्री इसे चूसकर गला तर करते हैं। इसकी शाखायें मजबूत होती हैं, उनसे घरों में बाड़ा बनाते हैं। इसकी लकड़ी के कोयले लुहार एवं सुनार घड़ाई के काम में लेते हैं क्योंकि उनमें अधिक ताप उत्पन्न होता है। इसकी लकड़ी से ऊँट की नाक बींधने की कील बनती है। इसकी पत्तियों को सुखाकर फोगलो बनाया जाता है जिससे रायता बनता है। यह रायता गर्मी में अमृत्तुल्य माना गया है।

    बूर : यह इलायची जैसी तेज सुगंध वाला होता है। इससे दवा बनती है। पेट की बीमारी दूर होती है। खेतों में पशु चरते हैं।

    भम्फीड़ : यह बसंत के साथ पेड़ों की जड़ पर कीलों के समान निकलते हैं। बच्चों को ओरी निकलने पर सूखी फली उबाल कर पिलाते हैं।

    भाँगरो : यह चटपटा और रूखा होता है। यह पीलिया तथा नेत्ररोगों के उपचार में काम आता है।

    मरवा : इसके पत्ते और पुष्प तुलसी के पत्तों की तरह सुगन्धित होते हैं। इससे बिच्छू का जहर उतारने तथा वात, पित्त, कफ की औषधि बनती है।

    रतनजोत : इसे साटा भी कहते हैं। यह आंख की दवा में काम आता है। इसके सूखे पत्तों का चूरा सब्जी का रंग लाल करने में काम आता है जिसे खाने से बहुत नुक्सान होता है। इसके बीजों के तेल से बायोडीजल बनता है।

    रोहिड़ा : इसके पुष्प लाल एवं पीले होते हैं जो गंधविहीन होते हैं।

    लोलरू : इस दर्द निवारक औषधि को दर्द वाले स्थान पर घोटकर लगाते हैं।

    शंखपुष्पी : यह दस्तावर, मेधा एवं बल बढ़ाने वाली, मन के रोगों को दूर करने वाली तथा कड़वी होती है। इसके पत्तों में दूध निकलता है। इसे दूधेली भी कहते हैं।

    शिवलिंगी : इसे ऊँट खाते हैं। इस पर शक्ति वर्धक फल लगते हैं।

    सुणिया या चुग : यह कड़ी शाखाओं वाली झाड़ी है। इसके रेशे रस्सी बंटने के काम आते हैं। इसकी लकड़ी ऊँटों की नकेल बनाने के लिये अच्छी होती है।


    रेगिस्तानी घासें

    रेगिस्तान में वर्षा काल में भुट्ट, मुट्ट, भूरट, लाँपड़ी, वोभरियो, बेकरियो, घण्ठील, सेवण, बूर, डचाभ, मण्डूसी आदि घासें उत्पन्न होती हैं। धामण, झींटियो घास तथा बरू के बूटे भी कई स्थानों पर पाये जाते हैं। शरद ऋतु में ल्हारड़ो, लहाठियो तथा हिरण चब्बो आदि घासें होती हैं। दूब की सैंकड़ों किस्में मिलती हैं। इसे लॉन में प्रयुक्त किया जाता है। दूब के रस को सूंघने से नक्सीर रुकती है।

    सेवण : यह अत्यधिक प्राटीन युक्त घास है जो रेतीले टीलों पर उगती है। जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर तथा नागौर आदि जिलों में इसके चारागाह विकसित किये गये हैं। इसका औसत उत्पादन लगभग 36 क्विंटल प्रति हैक्टैयर होता है।

    धामण : यह भी रेगिस्तानी घास है। दुधारू पशुओं की मुक्त चराई के लिये इसके चारागाह विकसित किये गये हैं।

    करड़ : यह पशुओं के लिये उत्तम हरी घास है। इसका औसत उत्पादन लगभग 47 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होता है।

    अंजन : गायों एवं घोड़ों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त यह घास हर मौसम में उगती है। इसका औसत उत्पादन लगभग 76 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।


    रेगिस्तानी फल

    काकड़िया : छोटे काचर जब पूर्ण विकसित होकर काकड़िये बन जाते हैं। यह पतले छिलके वाला रेगिस्तानी फल है तथा सब्जी बनाने के काम आता है।

    गूंदिये : गूंदी वृक्ष के सरबती फल होते हैं। यह रसदार और चिपचिपे होते हैं। होली के आसपास पकते हैं। कच्चे फल हरे रंग के और पके फल नारंगीपन लिये हुए होते हैं।

    जालोटिया : जाल के फल पीलू अथवा जालोटिया कहलाते हैं। कच्चे फल हरे रंग के, रसदार और मीठे होते तथा पके फल केसरिया रंग के होते हैं।

    ढीलू : पके हुए कैर ढीलू कहलाते हैं। ये पाचक और मीठे होते हैं। कच्चे कैर हरे रंग के होते हैं जिनसे सब्जी एवं अचार बनता है। पके हुए फल गुलाबी रंग के होते हैं जिन्हें निर्धन ग्रामीण बच्चे खाते हैं।

    निम्बोली : नीम के पके फल पीले रंग के, रसदार और सुगंधित होते हैं। इनकी गोटों से काजल बनती है। इसकी मंजरी दही-रायते में छोंक के काम आती है।

    फोगला : फोग के फोगले (मंजरी) से ढोकले बनते हैं जो घी में चूरने पर मीठे लगते हैं। फोगले के रायते को विशेष प्रकार का खट्टा खाद्य माना जाता है। चैत्र माह में फोगों पर फोगला लगता है। तब उनपर भंवरे ओर मक्ख्यिां आते हैं।

    बेर : कार्तिक माह में बेर की झाड़ियों पर बेर लगते हैं। पकने पर ये गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। इनका स्वाद खट्टा-मीठा होता है। बेर को सुखाकर उसके छिलके का पाउडर बनाया जाता है तथा उसमें नमक मिलाकर खाया जाता है। बेर की जड़ों का रांग जड़ी मतीरा मीठा होता है और उसकी शराब बनाई जाती है।

    मतीरा : इसका बाहरी रंग हरा और भीतरी रंग लाल होता है। यह गूदेदार एवं रसदार फल है जो तरबूजे की तरह दिखाई देता है। इसके बीज छीलकर मेवा की तरह खाये जाते हैं। इसके बीजों से अखाद्य तेल निकाला जाता है तथा इसके बीजों को भूनकर एवं नमक लगाकर खाया जाता है। इसके छिलकों की सब्जी बनती है। इसमें मिश्री भरकर रात की ओस में रख दिया जाता है तथा प्रातः काल में भूखे पेट खाया जाता है जिससे पेट की बीमारियां ठीक होती हैं। दीपावली पूजन में मतीरे का बड़ा महत्व माना जाता है।

    बाकोली : इससे धागे, चटाइयां तथा टोकरियों बनाई जाती हैं। खाट बुनने तथा झौंपड़ी की छान एवं बाड़े की दीवारों को बनाने के लिये रस्सियों का निर्माण में भी इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

    खींप : इससे भी धागे, चटाइयां तथा टोकरियों बनाई जाती हैं। खाट बुनने तथा झौंपड़ी की छान एवं बाड़े की दीवारों को बनाने के लिये रस्सियों का निर्माण में भी इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

    कूमट : इससे गोंद प्राप्त किया जाता है। इसकी फलियों के बीज सब्जी बनाने के काम आते हैं। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में तथा कांटे, जलाउ ईंधन एवं बाड़ के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

    देशी बबूल : इससे गोंद प्राप्त किया जाता है। इसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाया जाता है। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में तथा कांटे, जलाउ ईंधन एवं बाड़ के रूप में प्रयुक्त होते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके बीज से कॉफी पाउडर एवं बिस्किट बनाने की विधि खोज निकाली है जिसे राजस्थान सरकार आने वाले वर्षों में बाजार में विपणन करने की योजना बना रही है।

    ढाक : इससे प्राकृतिक रंग बनाया जाता है।

    जाल : इसका फल पीलू कहलाता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में खाया जाता है। इसके बीजों से अखाद्य तेल बनाया जाता है।

    मेहंदी : इसकी झाड़ी मध्यम आकार की होती है। सुहागन स्त्रियां तथा कुंआरी कन्याएं, तीज-त्यौहार एवं विवाह आदि अवसरों पर इसकी सूखी पत्तियों को पीसकर हाथों पर रचाती हैं। इससे बाल भी रंगे जाते हैं तथा पैरों में जलन होने पर इसका पेस्ट पैरों पर लगाया जाता है।

    तूम्बा : इसका फल बकरियों का प्रिय भोजन है। इसके बीजों से अखाद्य तेल बनाया जाता है। मधुमेह बीमारी के उपचार में भी इसका फल काम आता है।

    गूगल : मरुस्थलीय क्षेत्रों में स्थित मध्यम एवं छोटी ऊँचाई की पहाड़ियों पर गूगल का पेड़ पाया जाता है। इसका गोंद खुशबूदार होता है जो पूजा तथा औषधि निर्माण में काम आता है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

     02.06.2020
    पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान आदि प्रांतों में बसने वाली बिश्नोई जाति ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर दिल्ली सल्तनत के तुर्की शासकों का शासन था और चारों ओर हिंसा का वातावरण था, तब थार रेगिस्तान में जन्म लेने वाले जाम्भोजी नामक प्रसिद्ध संत ने बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अपने शिष्यों को 29 शिक्षाएं दीं जिनमें धर्म अैर नैतिकता के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा एवं मानवीय मूल्यों के निर्वहन पर जोर दिया गया। उनके द्वारा दिए गए 29 नियमों में से 8 नियम पशु-पक्षियों-वृक्षों एवं पर्यावरण रक्षा से सम्बन्धित हैं।

    भगवान जांभोजी के जीवन काल में ई.1485 में मारवाड़ में भयानक अकाल पड़ा। इस कारण बहुत से लोग अपने परिवारों एवं पशुओं को लेकर मालवा के लिए प्रस्थान करने लगे। मनुष्यों के इस कष्ट को देखकर जांभोजी ने उन लोगों की सहायता की तथा उन्हें पर्यावरण की सुरक्षा करने के लिए प्रेरित किया। उस काल में जब भारतीयों के पास आधुनिक विज्ञान नहीं था, और उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि खेजड़ी की जड़ में वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरिकरण करने वाले बैक्टीरिया निवास करते हैं, जांभोजी ने खेजड़ी के महत्व को पहचाना और उसकी रक्षा का कार्य धार्मिक अनुष्ठान की तरह पवित्र बना दिया। इसी प्रकार घास खाकर जीवित रहने वाले हिरण की महत्ता भी उनकी आंखों से छिपी नहीं रही। हिरणों के मल-मूत्र से धरती स्वतः उर्वरा बनने की प्रक्रिया के अधीन रहती है क्योंकि हिरण दूर-दूर तक छलांगें लगाता रहता है। इसलिए जांभोजी जंगलों में बसने वाले हिरणों को खेतों और गांवों तक ले आए।

    गुरु जांभोजी की शिक्षाओं का सच्चे अर्थों में अनुसरण करते हुए बिश्नाई समाज ने पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का प्रमुख हिस्सा बना लिया। जिस-जिस क्षेत्र में बिश्नोई समुदाय निवास करता है, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में किसी व्यक्ति को हिरण, खरगोश, नीलगाय आदि वन्य-जीवों का शिकार नहीं करने दिया जाता तथा खेजड़ी के हरे वृक्ष को नहीं काटने दिया जाता। वन्यजीवों के शिकार एवं खेजड़ी की कटाई को रोकने के लिए बिश्नोई समाज का प्रत्येक व्यक्ति सजग रहता है तथा इस कार्य को करते हुए अपने प्राण तक न्यौछावर करने की भावना रखता है। सरकार ने इस समुदाय की भावनाओं का आदर करते हुए बिश्नोई बहुल गांवों के आसपास के क्षेत्रों को आखेट निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया है।

    बिश्नोई लोग हिरणों की रक्षा ही नहीं करते, वे हिरणों का उपचार तथा पालन-पोषण भी करते हैं। बिश्नोई माताएं, माताविहीन हिरण शावकों को पुत्रवत् स्तनपान करवाती हैं। इस प्रकार का उदाहरण इस धरती पर निवास करने वाले किसी भी मानव समाज में शायद ही अन्यत्र मिले।

    पश्चिमी राजस्थान में अनेक बार ऐसे प्रसंग हुए जब बिश्नोई समाज के स्त्री-पुरुषों ने वन्यजीवों एवं वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। ई.1730 में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों द्वारा दिया गया बलिदान पूरे विश्व में श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। आज भी इस घटना की स्मृति को ताजा करने एवं उन अमर शहीदों को स्मरण करने के लिए देश के बहुत से हिस्सों से लोग खेजड़ली गांव आते हैं।

    बिश्नोई समाज को खेजड़ी के प्रति श्रद्धा, भगवान जांभोजी के जीवन काल से ही होने लगी थी। जांभोजी ने नागौर जिले की जायल तहसील में स्थित रोटू गांव में तीन हजार सात सौ वृक्ष लगाकर पूरे गांव की सीमा में अलग तरह का बगीचा लगा दिया था। मान्यता है कि उन्होंने खेजड़ी के एक सूखे वृक्ष को अपनी दिव्य शक्ति से पुनः हरा-भरा कर दिया था।

    आज से लगभग 21 वर्ष पहले मैंने रोटू गांव की यात्रा की थी। तब मैंने अपनी आंखों से इस गांव में मोर एवं चिड़ियों को स्थान-स्थान पर इस प्रकार बैठे हुए देखा था मानो वे गांव के पालतू पक्षी हों। इसी प्रकार मैंने हिरणों को निर्भय होकर रोटू गांव में विचरण करते हुए देखा था। मूलतः हिरण वन्यजीव है किंतु यह देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था कि मानव द्वारा दिए जा रहे प्रेम के वशीभूत होकर हिरण जंगल में बसने का अपना स्वभाव भूलकर गांव के बीच घूमते थे।

    जाम्भोजी ने एक नियम बताया था- ‘‘अमर रखावै थाट बैल बंध्यो न करावै’’ मैंने अपनी आंखों से इस गांव में बकरों का एक थाट देखा था। थाट बकरों के उस समूह को कहते हैं जिसमें गांव के समस्त बकरों को रखा जाता है तथा उनका वध नहीं किया जाता, न उन्हें बधिया किया जाता है। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी समस्त गांव द्वारा उठाई जाती है।

    जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर के धोरों में स्थित कांटेदार शुष्क वनों में बिश्नोई समाज ने हिरणों के लिए स्थान-स्थान पर पेयजल की व्यवस्था की है तथा कुत्तों के काटने से घायल एवं बीमार हिरणों के उपचार के लिए रेसक्यू सेंटर बनाए हैं। इन सेंटरों पर हिरणों के साथ-साथ अन्य घायल पशु-पक्षियों का भी उपचार किया जाता है। बरसात के दिनों में जब हिरणों के पांव मिट्टी में धंसने लगते हैं, तब भी बिश्नोई समुदाय के लोग इनकी रक्षा करते हैं। गुढ़ा बिश्नाईयां तथा खेजड़ली क्षेत्र में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को सहज भाव से पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रुषा करते हुए देखा जा सकता है।

    जोधपुर जिले में बिश्नोई धोरां नामक स्थान पर मैंने आज से लगभग 10 वर्ष पहले प्रातः काल की बेला में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को वैदिक मंत्रों के साथ हवन करते हुए तथा शुद्ध घी की आहुतियां देते हुए देखा था। यह हवन एक ऊंचे से टीले पर बने एक छोटे मंदिर के खुले प्रांगण में बने एक झौंपड़ी नुमा शेड के नीचे हो रहा था और यज्ञ-स्थल के चारों ओर मोर तथा हिरण सहज भाव से विचरण कर रहे थे।

    बिश्नोई समाज द्वारा जीवों की रक्षा के लिए बहुत सजगता बरती जाती है, उसके उपरांत भी शिकारियों द्वारा हिरणों के चोरी-छिपे शिकार की घटनाएं हो जाती हैं। कई बार शिकारियों का प्रतिरोध करते हुए बिश्नोई समाज के लोग अपने प्राण तक न्यौछावर कर चुके हैं। इस समाज ने पर्यावरण की सुरक्षा के भाव को धर्म की तरह धारण किया है जिसकी मिसाल अन्यत्र मिलनी अत्यंत कठिन है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-32

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-32

    राज्य-पशु, राज्य-पक्षी एवं राज्य-वृक्ष


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्राकृतिक धरोहर को लुप्त होने से बचाने की दृष्टि से राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक प्रतीक चिह्नों की घोषणा की जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर कमल को राष्ट्रीय पुष्प, बरगद को राष्ट्रीय वृक्ष, मोर को राष्ट्रीय पक्षी तथा बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। उसी प्रकार राजस्थान में रोहिड़ा को राज्य पुष्प, खेजड़ी को राज्य वृक्ष, गोडावण को राज्य पक्षी एवं चिंकारा को राज्य पशु घोषित किया गया है। हाल ही में ऊँट को राज्य पशु घोषित करके उसे राजकीय संरक्षण देने का निर्णय लिया गया है। इस कानून को अभी राष्ट्रपति से स्वीकृति मिलनी शेष है। राज्य-पशु, राज्य-पक्षी एवं राज्य-वृक्ष, राज्य की पर्यावरणीय चेतना के परिचायक हैं।

    राज्य-पुष्प : रोहिड़ा

    यह उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों का वृक्ष है तथा पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में बहुतायत से पाया जाता है। इस वृक्ष पर दो रंगों के पुष्प मिलते हैं। कुछ वृक्षों पर चटक केसरिया तो कुछ वृक्षों पर पीले रंग के फूल लगते हैं। इसके पुष्पों में सुगंध नहीं होती। यह पुष्प मार्च-अप्रेल में खिलता है। जिन दिनों में यह पुष्प खिलता है उन दिनों में पूरा जंगल इसके रंगों की छठा से खिल उठता है। रोहिड़ा वृक्ष को रेगिस्तानी सागवान भी कहा जाता है। इससे कलात्मक खुदाई वाले फर्नीचर बनाये जाते हैं। इसकी लकड़ी बहुत से वाद्ययंत्रों को बनाने में काम आती है। झौंपड़ों को आकार एवं मजबूती देने के लिये अरणी एवं आक की लकड़ी के साथ रोहिड़ा की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।

    राज्य वृक्ष : खेजड़ी

    खेजड़ी को मरुस्थल की रानी तथा मरुस्थल का कल्प वृक्ष भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस सिनेरारिया है। संस्कृत साहित्य में इस वृक्ष को शमी कहकर पुकारा गया है। आज भी विजया दशमी के दिन रावण दहन से पूर्व शमी पूजन किया जाता है। महाभारत काल में भी इस वृक्ष का उल्लेख मिलता है। पाण्डवों ने अपने अज्ञात वास से पहले इसी वृक्ष पर अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाये थे। अकाल के दिनों में भेड़-बकरियों, ऊँटों तथा अन्य पालतू पशुओं को यही पेड़ चारा उपलब्ध कराता है। किसानों द्वारा खेत में खेजड़ी के वृक्ष को नहीं काटा जाता है ताकि उनकी फसल को आवश्यक नाइट्रोजन मिल सके। सदियों के अनुभव ने उन्हें यह बता दिया है कि जिस खेत में खेजड़ी के जितने अधिक पेड़ होंगे, उनकी फसल उतनी ही अधिक अच्छी होगी। इसलिये खेजड़ी को कभी भी पूर्णतः नहीं काटा जाता है अपितु उसकी प्रति वर्ष छंगाई करके उनकी पत्तियां तथा लकड़ी प्राप्त की जाती है। इस पेड़ की फलियां सांगरियां कहलाती हैं जो सब्जी के रूप में खाई जाती हैं। अमृता देवी बिश्नोई तथा उनके साथियों ने इसी वृक्ष की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये थे। कन्हैयालाल सेठिया ने खेजड़लो शीर्षक से लिखी कविता में खेजड़ी को मरुस्थल के सुख-दुःख का साथी बताया है-


    जेठ मास में धरती धोळी, फूस पानड़ो मिलै नहीं,

    भूखां मरता ऊंठ फिरै है, अै तकलीफां झिलै नहीं,

    इण मौके भी उण ऊंठा नै, डील चरावै खेजड़लो,

    अंग-अंग में पीड़ भरी पण, पेट भरावै खेजड़लो।

    म्हारै मुरधर रो है सांचो, सुख दुख साथी खेजड़लो।

    तिसां मरै पण छयां करै है, करड़ी छाती खेजड़लो।

    राज्य पक्षी : गोडावण

    इण्डियन ग्रेट बस्टर्ड (गोडावण सोहन पक्षी) को प्रदेश का राज्य पक्षी घोषित किया गया है। यह धरती पर रहने वाली बड़ी चिड़िया है जो छोटे शुतुरमुर्ग जैसी दिखती है। इसे राजस्थान में मालमोरड़ी भी कहते हैं। भूरे-सफेद रंग का यह पक्षी लगभग 18 किलोग्राम भारी होता है। मादा 90 से.मी. लम्बी होती है जबकि नर 120 से.मी. लम्बा होता है। ऊपरी भाग गहरा पीला होता है जिस पर महीन काली लहरियां बनी होती हैं। निचला भाग सफेद किन्तु वक्ष में नीचे की ओर एक चौड़ी काली पट्टी होती है। सिर पर काली कलंगी वाला मुकुट होता है। उड़ते समय, बाहर निकली हुई सफेद गर्दन और निचले भाग, काला मुकुट, गले की पट्टी एवं पंखों के किनारे बड़ा सफेद धब्बा स्पष्ट रूप से दिखता है। नर गोडावण के सिर पर ब्लैक क्राउन लंबा होता है जबकि मादा में ऐसा नहीं होता। मादा में गले की काली पट्टी या तो होती नहीं है और यदि होती है तो सिर्फ किनारों पर। मादा आकार में थोड़ी छोटी तथा वजन में लगभग आधी होती है।

    गोडावण घास के टुकड़ों एवं झाड-झंखाड़ वाले खुले क्षेत्रों में जहाँ खेत भी हों, में रहना पसन्द करती है। यह साधारणतः दो या तीन बच्चों के साथ टोलियों में रहती है। 20-25 गोडावण पक्षियों की टोलियां भी देखी गई हैं। यह काफी तेज भाग सकती है। इसका प्रजनन काल मार्च से सितम्बर के बीच होता है। नर पोलीगैमस (बहुगामी) होता है। एक नर 3 से 5 मादाओं के साथ संसर्ग करता है। प्रजनन काल में नर के गले के नीचे एक ग्रंथी काफी बड़े आकार की हो जाती है जो धरती तक लटकने लगती है। नर पक्षी, मादा को रिझाने के लिए उसके सामने पंख फैलाकर झूमते हुए नृत्य करता है। यह सेवण घास में सामान्यतः एक किन्तु कभी-कभी दो अण्डे देती है जो बादामी या फीके जैतूनी भूरे रंग के होते हैं और उन पर गहरे भूरे रंग की चित्तियाँ होती हैं। अण्डे झाड़ी के नीचे छिछला सा गड्ढा बनाकर उसमें दिये जाते हैं। मादा पक्षी अण्डे सेती है। लगभग एक शताब्दी पहले तक यह समूचे भारत में एक स्थानीय पक्षी की भांति पाया जाता था। 70 के दशक में जैसलमेर जिले में अरब के शहजादों ने उनका अंधाधुंध शिकार किया। अब यह केवल राजस्थान, गुजरात एवं महाराष्ट्र के कुछ भागों में ही पाया जाता है। दो दशक पहले लगभग 1,260 गोडावण होने का अनुमान था किन्तु अब इनकी संख्या 1,000 से भी कम रह गई है जिसमें से भी अधिकतर राजस्थान के राष्ट्रीय मरु उद्यान (बाड़मेर-जैसलमेर), अजमेर जिले में सोंकलिया क्लोज्ड एरिया एवं बारां जिले के सोरसन क्लोज्ड एरिया में पाई जाती है। गोडावण के संरक्षण के लिये राजस्थान सरकार द्वारा ऑपरेशन बस्टर्ड तथा जीन पूल संरक्षण अभियान चलाया जा रहा है।

    राज्य पशु : चिंकारा

    चिंकारा को एंटीलोप (छोटा हिरण) भी कहते हैं। यह हल्के भूरे अखरोटी रंग का सुन्दर जानवर है। भोले मुँह और सुन्दर चक्राकार सींग वाले इस पशु के पेट के नीचे का भाग सफेद होता है। घास, फल और पेड़-पौधों की पत्तियाँ इसका मुख्य भोजन है। इसकी पूंछ छोटी और काली होती है जिसे यह हर समय हिलाता रहता है। इसे संरक्षण देने की दृष्टि से राजस्थान सरकार ने चिंकारा को राजकीय पशु घोषित किया है। यह लगभग पूरे प्रदेश में पाया जाता है। चिंकारा को राष्ट्रीय उद्यान रणथम्भौर, सरिस्का, कुम्भलगढ़, जयसमन्द (उदयपुर), सीतामाता वन विहार, राष्ट्रीय मरु उद्यान जैसलमेर, कैला देवी एवं जवाहर सागर (कोटा) अभयारण्यों में स्वच्छन्द विचरण करते हुए देखा जा सकता है। राज्य में संरक्षित एवं असंरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों में लगभग 35 हजार चिंकारे होने का अनुमान है।

    राज्य पशु : ऊँट

    राजस्थान के इतिहास, सामाजिक जीवन एवं अर्थव्यवस्था में ऊँट का बड़ा योगदान है। 2007 की पशुगणना में राज्य में 4,21,836 ऊँट पाये गये। प्रति वर्ष ऊँट के राज्य से बाहर भेजे जाने तथा मांस हेतु काट दिये जाने के कारण इनकी संख्या लगातार घट रही है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2014 में इसे राज्य पशु घोषित किया है ताकि इसे भी चिंकारा की तरह संरक्षण मिल सके। ऊँट की जैसलमेरी, बीकानेरी एवं जोधपुर नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। ऊँट को रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। उसके पैरों में खुरों के स्थान पर गद्दियां (पैड) लगी होती हैं जिनके कारण वह बड़े-बड़े रेतीले टीलों में धंसता नहीं है तथा सरपट दौड़ता चला जाता है।

    कंटीली झाड़ियां खाकर जीवित रहने वाले इस पशु के पेट में जल संग्रहण की थैलियां होती हैं जिनके कारण एक बार पानी ली लेने के बाद ऊँट कई दिनों तक बिना पानी पिये रह सकता है। आजादी के पहले रेगिस्तानी डाकू तथा आजादी के बाद रेगिस्तानी तस्कर इस पशु का प्रयोग बड़े पैमाने पर करते रहे हैं। इस क्षेत्र में तैनात बी.एस.एफ. के जवान तथा पुलिस बल भी उँटों का प्रयोग करते हैं। रेगिस्तान की विरल बस्तियों मंम डाक तथा दवा पहुँचाने के लिये उँटों की पीठ पर चलते-फिरते डाकखानों तथा औषधालयों की स्थापना की गयी है। उँटों की पीठ पर चलती-फिरती बैंक शाखायें भी चल रही हैं। राइका जाति के लोग उँटों के विशाल झुण्ड पालते हैं तथा अकाल की स्थिति में मारवाड़ छोड़कर मालवा की ओर चले जाते हैं। मादा ऊँट के दूध में विटामिन, खनिज लवण, पोषक तत्व तथा घावों को भरने की अपार क्षमता है। यह दूध पारम्परिक दूध की तुलना में थोड़ा खारा होता है। गाय के दूध की अपेक्षा इसमें तीन गुना अधिक विटामिन सी और दस गुना अधिक आयरन होता है। विटामिन बी का यह अच्छा स्रोत है। इसमें उच्च स्तरीय पोषक तत्व मौजूद हैं। इस दूध के कुछ तत्व कैंसर, एचआईवी, एड्स अल्जाइमर और हैपेटाइटिस सी से लड़ने में सक्षम हैं। इसके सेवन से मधुमेह तथा हृदय रोग से लड़ने में भी सहायता मिलती है। इस दूध में वसा की मात्रा केवल 1.85 प्रतिशत ही होती है। जबकि गाय के दूध में लगभग 5 प्रतिशत होती है। मादा ऊँट के दूध में मलाई कम पड़ती है तथा इसे 48 घण्टे तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

    बीकानेर स्थित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र बीकानेर द्वारा मादा ऊँट के दूध से आइसक्रीम, पाश्चुराइज्ड दूध, दही और खीर का उत्पादन किया जाता है। मादा ऊँट का दूध शुद्ध तथा पाश्चुराइज्ड रूप में जयपुर, दिल्ली तथा बीकानेर में कैमल मिल्क के नाम से बेचा जा रहा है। यूरोपीय देशों एवं अमरीका में भी मादा ऊँट के दूध की मांग है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

     02.06.2020
    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत 

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    नाम
    - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    जन्म - 23 अक्टूबर 1923

    पिता का नाम - श्री देवीसिंह शेखावत

    माता का नाम - श्रीमती बन्नेकंवर

    गांव - खाचरियावास (सीकर जिला)

    ननिहाल - सहनाली बड़ी गांव (चूरू जिला)

    प्रारंभिक शिक्षा - बीछीदाना गांव में (सीकर जिला)

    हाईस्कूल शिक्षा - एंग्लोवैदिक स्कूल जोबनेर

    विवाह - 3 जुलाई 1941

    पत्नी का नाम - श्रीमती सूरजकंवर

    ससुराल - बुचकला (जोधपुर जिला)

    पिता का निधन - ई.1942

    नौकरी - ई.1942 से 1952

    पद - सीकर ठिकाणे की पुलिस में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर

    राजनीति में प्रवेश - ई.1952

    पहली बार विधायक - ई.1952 में जनसंघ के टिकट पर दांतारामगढ़ सीट से।

    दूसरी बार विधायक - ई.1957 में जनसंघ के टिकट पर श्रीमाधोपुर सीट से।

    तीसरी बार विधयक - ई.1962 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    चौथी बार विधायक - ई.1967 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    राज्यसभा सदस्य - ई.1974 से 1977 तक जनसंघ के टिकट पर मध्यप्रदेश

    पांचवीं बार विधायक - ई.1977 में जनता पार्टी के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार मुख्यमंत्री - 22 जून 1977 से 15 फरवरी 1980

    छठी बार विधायक - ई.1980 में भाजपा के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार नेता प्रतिपक्ष - 15 जुलाई 1980 से 10 मार्च 1985

    सातवीं बार विधायक - ई.1985 में भाजपा के टिकट पर निंबाहेड़ा तथा अजमेर

    दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 28 मार्च 1985 से 30 दिसम्बर 1989

    आठवीं बार विधायक -  ई.1990 में भाजपा के टिकट पर धौलपुर तथा छबड़ा 
    सीट से। बाद में अजमेर सीट छोड़ दी।

    दूसरी बार मुख्यमंत्री - 4 मार्च 1990 से 15 दिसम्बर 1992

    नौवीं बार विधायक - ई.1993 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार मुख्यमंत्री - 4 दिसम्बर 1993 से 31 दिसम्बर 1998

    दसवीं बार विधायक - ई.1998 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 8 जनवरी 1999 से 18 अगस्त 2002

    भारत के 11वें उपराष्ट्रपति -19 अगस्त 2002 से 21 जुलाई 2007

    निधन - 15 मई 2010, जयपुर।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-33

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-33

    पक्षी प्रेम की मिसाल है खीचण


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जोधपुर जिले में फलौदी के निकट खीचण गांव में कुरजां (कुरजां) पक्षियों के झुण्ड प्रति वर्ष प्रवास करने आते हैं। यहाँ नदी, झील अथवा चारागाह जैसी कोई सुविधा नहीं है। प्राकृतिक आवास के नाम पर केवल एक छोटा तालाब, रेत के धोरे और कंकरीला मैदान स्थित हैं। फिर भी ये पक्षी सदियों से इस गांव में आ रहे हैं। कुरजां पक्षी, सारस प्रजाति का सदस्य है जिसे अंग्रेजी में 'डेमोजल क्रेन' कहते हैं। शीतकाल में जब उत्तरी रूस, उक्रेन तथा कजाकिस्तान में बर्फ जमने लगती है तो वहाँ निवास करने वाले हजारों-लाखों कुरजां पक्षी पश्चिमी भारत में स्थित राजस्थान तथा गुजरात राज्यों के लिये उड़ जाते हैं।

    सितम्बर-अक्टूबर में कुरजां पक्षियों के झुण्ड पश्चिमी राजस्थान के छह जिलों के सत्रह स्थानों पर पड़ाव डालते हैं। इनमें से पन्द्रह से बीस हजार कुरजां खीचण गांव में आकर बसेरा करते हैं। इन पक्षियों के झुण्ड गांव के पूर्व की तरफ बने तालाब के पेटे में उतरते रहते हैं। ग्रामीणों द्वारा गांव के पश्चिम में बनाये गये चुग्गाघर का गोदाम अनाज से भर दिया जाता है। कुरजां को हिंसक पशुओं से बचाने के लिये ग्रामीणों ने तारबंदी युक्त बाड़ा बनाया है। इस गांव में कुरजां को नवम्बर से फरवरी के बीच 90 मैट्रिक टन अनाज चुग्गे के रूप में डाला जाता है।

    खींचन गांव में आने वाली कुरजांओं से खींचन के निवासियों ने काव्यमय संवाद स्थापित कर लिये हैं-


    भर मुट्ठी दूं रोज कै, कुरजां थानैं जवार।

    चुगनैं मती विसारजै, ओ खींचन को प्यार।।

    आती संदेसो देसस्यूं, जाती थकै ले जाऊँ।

    बाट जोइजै गोरड़ी, पर बरस पाछी आऊँ।

    उड़ती कठां सूं आई तूं, अर उड़र जावै कठै।

    बारों मास लड़ावस्यां, रेहजा कुरजां अठै।

    आ निरख्योड़ी कांकरी, वा धोरां री रेत।

    पाछी बेगी आवस्यूं, थांसूं पड़ग्यो हेत।

    सूती थी रंग महल में, सूतोड़ी नै आयो रे जंजाल।

    कुरजां ए म्हारो भंवर मिला दीजौ ऐ।

    खींचन में आई कुरजाओं का विवरण

    वर्ष 1983 से 1999 की अवधि में खींचन में आने वाली कुरजाओं का अभिलेख रखा गया। वर्तमान में खींचन में प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार कुरजाएं आती हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

     02.06.2020
    सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

    ई.1107 का शिलालेख

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के पाली जिले में सेवाड़ी नामक एक अत्यंत प्राचीन गांव स्थित है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में इस गांव को शमीपाटी कहा जाता था। इस गांव में स्थित महावीर स्वामी के मंदिर से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के दो शिलालेख मिले हैं। इनमें से पहला शिलालेख तीन पंक्तियों का है। इस शिलालेख को 3‘ 6‘‘ गुणा 2‘ 3/4‘‘ के पत्थर पर उत्कीर्ण किया गया है। लेख संस्कृृृृत भाषा तथा देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण है। लेख का मूल पाठ इस प्रकार है-

    ‘‘सं.1164 चै. सु 6 महाराजाधिराज श्री अश्वराज राज्य श्री कटुकराज युवराज्ये समीपाठीय चैत्ये श्री धर्म्मनाथ देवसां नित्य पूज्यार्थ महसाहणिय पूअविपौत्रेण उत्तिम राजपुत्रैण उप्पल राईन मा गढ आंवल। वि. सलखण जोगादि कुटुंब सम। पद्राडा ग्रामो मेद्रचा ग्रामे तथा छेडड़िया मद्दवडी ग्रामे।। अरहर्ट प्रतिदत्तः जवाहरर्कः ’’

    इस लेख में कहा गया है कि विक्रम संवत् 1164 की चैत्र शुक्ला 6 (ईस्वी 1107) का महाराजाधिराज अश्वराज चौहान जिसका कि युवराज कटुकराज था, ने महावीरजी के चैत्य को पद्राड़ा, मेद्रचा, छेछड़िया तथा महड़ी गांवों से प्रत्येक रहट से एक हारक (एक डलिया की नाप) यव (जौ) प्रदान करने का आदेश दिया गया है। इस दान की वैधानिक व्यवस्था महासाणिय उप्पलराक के द्वारा की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को रोकेगा तो वह गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा के तुल्य पाप होगा। उस काल में साहणिय, अस्तबल का अधिकारी होता था। इस शिलालेख से ज्ञात होता हे कि महासाणिय अर्थात् मुख्य अस्तबल अधिकारी को दान आदि की व्यस्थाएं सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दी जाती थी।

    ई.1115 का शिलालेख

    सेवाड़ी के महावीर मंदिर का दूसरा शिलालेख वि.सं. 1172 (ईस्वी 1115) का है। यह आठ पंक्तियों का लेख है जिसे 2‘ 1.25‘‘ गुणा 4.5‘‘ क्षेत्र में उत्कीर्ण किया गया है। शिलालेख की मुख्य पंक्तियां इस प्रकार हैं-

    पंक्ति 4: इतश्चासीत् वि (शु) द्वात्मा यशोदेवो बलाधिपः। राज्ञं महाजनस्यापि सभायामग्रणी स्थितः।

    पंक्ति 7: पिता महे (न) तस्येदं समीपाट्यां जिनालये। कारितं शांतिनाथस्य बिंबं जन मनोहरं।।

    इस शिलालेख में अणहिल, जिंदराज, अश्वराज और कटुकराज आदि चौहान शासकों, यशोदेव नामक सेनाध्यक्ष (बलाधिप), बाहड़ नामक शिल्पी तथा उसके पुत्र थल्लक के नाम का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख में सेवाड़ी गांव का नाम शमीपाटी लिखा गया है। इस शिलालेख में बलाधिप के गुणों का उल्लेख किया गया है जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को बलाधिप नियुक्त किया जाता था। इस शिलालेख से अनुमान होता है कि थल्लक का पितामह भी चौहान शासकों का विश्वासप्राप्त शिल्पी था जिसने शांतिनाथ की प्रतिमा का निर्माण किया था।

    इस शिलालेख में कहा गया है कि शमीपत्तन नामक नगर में महाराजा कटुकराज ने मंदिर के निमित्त जो दान दिया है उसकी अवहेना करने वाला पाप का भागी होगा तथा कामना की गई है कि इस दान को स्थायित्व प्राप्त हो।

    सेवाड़ी के शिलालेखों में ऐतिहासिक तत्व

    ये दोनों शिलालेख देखने में भले ही बहुत छोटे लगें किंतु इतिहास निर्माण की दृष्टि से अत्यंत महत्व के हैं। इन शिलालेखों से कई बातों की पुष्टि होती है। ये इस बात की पुष्टि करते हैं कि 12वीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर चौहानों का शासक था। ये चौहान शासक जैन धर्म के मंदिरों को भी दान देते थे। उस काल में राजदरबार की भाषा संस्कृत थी और लेखन के लिए देवनागरी लिपि प्रयुक्त होती थी। इन शिलालेखों से इस बात की भी पुष्टि होती थी कि राज्य के सेनाधिकारी यथा सेनापति, अश्वशाला का मुख्य अधिकारी आदि भी दान व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते थे। राजा की कामना होती थी कि जो दान वह दे रहा है, वह चिरकाल तक चलता रहे। उस युग में पाली क्षेत्र के किसान अरहट से सिंचाई करते थे। गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा को सर्वाधिक गर्हित पाप समझा जाता था। सेनापतियों की नियुक्ति उनके गुणों के आधार पर होती थी। शिल्पियों के परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी राजवंश से जुड़े हुए रहते थे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-34

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-34

    राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कृषि कार्य के दौरान पर्यावरण को सर्वाधिक क्षति पहुंचती है। खेत में बार-बार हल चलाने से मृदा संरचना खराब होती है तथा मिट्टी को बार-बार पलटने से भूमि से जल वाष्पन की गति तेज हो जाती है। खेत में सिंचाई करने से मिट्टी के पोषक तत्व पानी में घुलकर मिट्टी के नीचे की परतों में चले जाते हैं। फसल को कीट-पतंगों से बचाने के लिये कीटनाशकों का तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिये खरपतवार नाशकों का छिड़काव किया जाता है जिनका सम्पूर्ण पर्यावरण पर अत्यंत घातक प्रभाव होता है। अतः कृषि क्रियाओं के दौरान ऐसी विधियों को अपनाने की आवश्यकता होती है जिनसे पर्यावरण को हानि न पहुंचे। लगभग सम्पूर्ण राजस्थान में जल की सीमित मात्रा तथा जलवायु की शुष्कता फसल उत्पादन के लिये बड़ी चुनौती है। अतः भूमि की ऊर्वरा शक्ति की रक्षा करते हुए, फसल उत्पादन को बढ़ाने के विविध उपाय किये जा रहे हैं जिनमें परम्परागत ज्ञान से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक शोधों का सहारा लिया जा रहा है। वर्तमान युग में यांत्रिक खेती, रासायानिक ऊर्वरकों के उपयोग तथा कीट-नाशकों के छिड़काव पर अधिक जोर है। कम परिश्रम एवं कम समय में अधिकतम उपज प्राप्त करने की अनिवार्यता है किंतु साथ ही साथ किसानों द्वारा पर्यावरण सुरक्षा के विविध उपाय किये जा रहे हैं जो कि राजस्थान की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।


    पर्यावरण संरक्षण हेतु की जाने वाली कृषि-क्रियाएं

    पड़ती खेती

    यदि किसी भूमि पर बरसों तक लगातार खेती की जायेगी तो उसकी मिट्टी में से पोषक तत्त्वों की कमी हो जायेगी तथा फसल की अच्छी पैदावाार लेना संभव नहीं रहेगा। इसलिये भूमि पर वर्ष प्रति वर्ष लगातार फसल न लेकर उसे कुछ समय के लिये खाली छोड़ दिया जाता है। इसे पड़ती छोड़ना कहते हैं। इससे मृदा को अपनी खोई हुई ऊर्वरा शक्ति फिर से प्राप्त करने का समय मिल जाता है।

    सूड़

    जब खेत खाली पड़ा रहता है तो उसमें कई प्रकार की खरपतवारें एवं झाड़ियां उग आती हैं। खेत को बोने से पहले इन खरपतवारों एवं झाड़ियों को काटकर खेत की सफाई की जाती है, उसे खेत को सूड़ना कहते हैं। इस विधि से खेत की मिट्टी से होने वाला वाष्पीकरण रुकता है।

    खड़ाई

    जब वर्षा होती है तो पानी रिसकर भूमि में जाता है। इस कारण पूरे खेत में महीन केशिकाएं (कैपीलरी) बन जाती हैं। इन केशिकाओं से तेज गर्मी के समय मिट्टी में दबा हुआ पानी वाष्प बनकर उड़ता रहता है। वाष्पन की इस क्रिया को तोड़ने के लिये केशिकीय संरचनाओं को नष्ट करना आवश्यक होता है। इसलिये खेत को बोने से पहले उसमें देशी हल से जुताई कर दी जाती है, इसे खड़ाई करना कहते हैं। खड़ाई करने से खरपतवार के साथ-साथ केशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं तथा भूमि का जल भूमि में ही संरक्षित रहता है।

    निदाण

    पशु-पक्षियों के गोबर, मींगनी, बीट तथा हवाओं के द्वारा खेत में खरपतवारों के बीज आ जाते हैं। खरपतवारों के पौधे, मुख्य फसल के साथ उगकर उनसे पानी, प्रकाश, पोषक तत्व एवं स्थान के लिये संघर्ष करते हैं। इस कारण फसल की उपज कम हो जाती है। इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिये यूरोप एवं अमरीका आदि विकसित देशों में रासायनिक खरपतवार नाशकों का प्रयोग किया जाता है। जबकि भारत में खड़ी फसल के बीच से खरपतवार को खोदकर हटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को निदाण कहते हैं। राजस्थान के किसान भी रासायनिक खरपतवार नाशकों के स्थान पर निदाण प्रक्रिया पर ही जोर देते हैं।

    कणाबंदी

    मिट्टी की सबसे ऊपरी परत में पोषक तत्व तथा ह्यूमस होती है। तेज हवाओं के चलने पर इस परत के उड़कर नष्ट हो जाने का खतरा रहता है। इसलिये मिट्टी को उड़ने से बचाने के लिये खेत में 50 से 250 फीट की दूरी पर, सिणिया, कैर, आक, बुआड़ी तथा फोग की कटी हुई झाड़ियों से 1.5-2 फुट ऊँची कतारें बनाई जाती हैं, इसे कणाबंदी कहते हैं। कणा का अर्थ किनारा होता है।

    फसल चक्र

    एक ही प्रकार की फसलों को लगातार बोते रहने से भूमि की संरचना खराब हो जाती है तथा उसमें आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है। इसलिये किसानों द्वारा फसल चक्र अपनाया जाता है। इस विधि में अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलें अथवा हरी खाद की फसलें बोई जाती हैं। अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलों को उगाने से मृदा में नाईट्रोजन की मात्रा बनी रहती है। इसी प्रकार अनाज की फसलों के बाद हरी खाद की फसलें अर्थात् सन, सनई, ढंेचा आदि बोने से मृदा में जीवांश की पर्याप्त मात्रा बनी रहती है तथा मृदा अपरदन कम होता है। हरी खाद की खेती को लक्ष्य करके कन्हैयालाल सेठिया ने लिखा है-


    दाणां नहीं तो तूंतड़ा ही बा,

    उगो'र मत उगो, भौम तो दबा।

    शुष्क खेती

    राज्य में कृषि योग्य भूमि का लगभग तीन चौथाई भाग बारानी एवं असिंचित है। वर्षा का वार्षिक औसत भी मात्र 60 से.मी. अथवा उससे कम ही है। इस कारण राज्य में सूखा रोधी किस्मों को उन्नत कृषि विधियों से उगाया जाता है। इसे शुष्क खेती कहते हैं।

    जल बजट योजना

    राज्य में जल की कमी को देखते हुए जल बजट आधारित कृषि का प्रसार किया जा रहा है जिसमें बूंद-बूंद सिंचाई योजना, फव्वारा सिंचाई योजना, पक्की नालियों एवं पाइपों के माध्यम से जल का वितरण, सामुदायिक नल कूपों की स्थापना आदि उपाय अपनाये जाते हैं।

    राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन

    फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति (ड्रिप एवं फव्वारा सिंचाई पद्धति) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन क्रियान्वित किया जा रहा है जिसमें लघु एवं सीमान्त कृषकों को 60 प्रतिशत व अन्य कृषकों को 50 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है। राज्य सरकार द्वारा ड्रिप इरिगेशन तंत्र को स्थापित करने हेतु अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाती है।

    विशेष खाद्यान्न उत्पादन कार्यक्रम

    सातवीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा के दौरान देश के 14 राज्यों के 169 जिलों में यह कार्यक्रम चलाया गया। इस योजना के तहत गेहूँ, चना, मक्का एवं बाजरा के उत्पादन में वृद्धि के उपाय किये गये हैं।

    तिलहन विकास कार्यक्रम

    राजस्थान में वर्ष 1979-80 में तिलहनों का उत्पादन केवल 2.51 लाख टन था जो राज्य में तिलहन उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए काफी कम था। इसलिये राज्य सरकार द्वारा तिलहन विकास कार्यक्रम चलाया गया। इसके परिणाम स्वरूप राज्य में 1989-90 में तिलहन उत्पादन सात गुना बढ़कर 18.45 लाख टन पहुंच गया। आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक राज्य में 35.29 लाख टन तिलहन उत्पादन रिकॉर्ड किया गया। वर्ष 2012-13 में राज्य में कुल 63.31 लाख टन तिलहन उत्पादन अनुमानित था जिसमें से 24.45 लाख टन खरीफ में तथा 38.36 लाख टन तिलहन रबी में पैदा होना अुमानित किया गया। तिलहन उत्पादन में वृद्धि के लिये खरीफ के दौरान सोयाबीन, अरण्डी, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली तथा रबी के दौरान रायड़ा एवं सरसों की खेती के प्रसार पर अधिक ध्यान दिया गया है। राजस्थान की तिलहनों में सरसों तथा राई का उत्पादन सर्वाधिक होता है।

    दलहन विकास कार्यक्रम

    राज्य में दलहनी फसलों की खेती 35 से 40 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जबकि इन फसलों का उत्पादन 10 से 20 लाख टन रहता है। राज्य के कुल दलहनी क्षेत्र के 40 प्रतिशत हिस्से में मोठ बोयी जाती है। राजस्थान की दलहनों में चने का उत्पादन सर्वाधिक होता है। इसके अतिरिक्त उड़द, मूंग, मोठ, अरहर, मसूर तथा मटर भी उत्पन्न होता है। दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये ई.1998-90 से जैसलमेर, जालोर, पाली व सिरोही जिलों को छोड़कर शेष राज्य में दलहन विकास योजना चलाई जा रही है।

    यांत्रिक कृषि

    जिन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम है, वहाँ कृषि यंत्रों की सहायता से विस्तृत खेती कर भूमि का उचित उपयोग किया जा रहा है। राज्य में इस कृषि का विकास गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में अधिक हुआ है। तत्कालीन सोवियत रूस सरकार के सहयोग से सूरतगढ़ में 15 अगस्त 1956 को 12,410 हैक्टेयर क्षेत्रफल में सूरतगढ़ यांत्रिक कृषि फार्म की स्थापना की गयी। श्रीगंगानगर जिले के जैतसर में भी सोवियत रूस के सहयोग से 30 हजार एकड़ भूमि में यांत्रिक कृषि फार्म की स्थापना की गयी।

    मिश्रित कृषि

    कृषि कार्य के साथ-साथ पशुपालन व्यवसाय को अपनाना मिश्रित कृषि कहलाता है। राजस्थान में कृषि कार्यों में संलग्न 70 प्रतिशत जनसंख्या मिश्रित कृषि करती है।

    झूमिंग कृषि

    इस कृषि में वृक्षों को काटकर सुखाया जाता है तथा वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व उन्हें जलाकर उनकी राख खेतों में बिखेर दी जाती है। वर्षा होने पर उस खेत में बीज डाल दिये जाते हैं। यह कृषि पर्यावरण के लिये अत्यंत हानिकारक है। यह पद्धति आदिवासियों द्वारा अपनायी जाती है। झूमिंग प्रणाली की वालरा कृषि भीलों द्वारा उदयपुर, डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा जिलों में की जाती है।

    राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई.)

    कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में लगातार गिरते हुए निवेश को देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना प्रारम्भ की गई है जिसमें कृषि जलवायु स्थितियां, प्राकृतिक संसाधन से सम्बन्धित मुद्दों एवं तकनीक को दृष्टिगत रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिए विस्तृत योजना बनाने का कार्य किया जाएगा।

    कृषि उपज विपणन

    राजस्थान में कृषि उपज को नष्ट होने से बचाने के लिये सशक्त विपणन व्यवस्था की गई है। 6 जून 1974 को राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड का गठन किया गया और 1980 में कृषि विपणन निदेशालय की स्थापना की गयी। राजस्थान में 129 कृषि उपज मण्डियां तथा 302 गौण मण्डियां हैं जिन्हें चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

    कृषि वानिकी एवं चारा उत्पादन

    राज्य में एक ओर तो वर्षा की कमी है तथा दूसरी ओर पशुओं की बहुलता है। इसलिये राज्य को अपने पड़ौसी राज्यों से चारा मंगावाना पड़ता है। पशु चारे की आपूर्ति एवं ग्रामीण ईंधन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कृषि वानिकी एवं चारा उत्पादन के उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों को भागीरथ योजना में सम्मिलित किया गया है। राजस्थान राज्य बीज निगम द्वारा किसानों को 50 प्रतिशत अनुदानित दर पर चारे वाली फसलों के प्रमाणित बीज दिये जाते हैं। छोटे पत्तों वाले वृक्षों को उगाने के लिये 20 पैसे की दर से पौध उपलब्ध करवायी जाती है। किसानों को 25,000 पौधों की पौधशाला के विकास के लिये 50 पैसे प्रति पौध की दर से आर्थिक सहायता दी जाती है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

     02.06.2020
    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का विचार जीवन के हर अंग पर रहा है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण चाहिए तो केवल ये दो कहावतें देख लेनी पर्याप्त होंगी-


    संतोषी सदा सुखी।

    सादा जीवन उच्च विचार।


    जब मनुष्य संतोष से जीना सीख जाएगा और जीवन में सादगी को धारण करने का अभ्यास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण के लिए उसे अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। किंतु आज हमने ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में, चक दे इण्डिया और तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे ? जैसी बातों के बहकावे में आकर संतोष और सादा जीवन पर आधारित जीवन शैली त्याग दी है।

    यदि संस्कृत वांगमय में झांक कर देखे तो ऐसी उक्तियां भरी पड़ी हैं जिन्हें अपने जीवन में ढालें तो पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य स्वतः सिद्ध हो जाएगा- अथर्ववेद का सूक्तकार कहता है-

    ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः।’

    जब व्यक्ति पृथ्वी को अपनी माता समझ लेता है, तो उसे वह नुक्सान कैसे पहुंचा सकता है। उपनिषद कहता है-

    ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः।

    अर्थात् ज्ञान प्राप्त किए बिना मुक्ति नहीं होती। यह ज्ञान कौनसा है ? यह प्रकृति की व्यवस्था का ज्ञान है। इसके बिना किसी मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। प्रकृति क्या है? इसे कौन चलाता है? उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? आदि बातों को जानना ही तो वास्तविक ज्ञान है। मानव द्वारा आज तक संचित समस्त ज्ञान तथा आने वाले युगों में अर्जित किया जाने वाला ज्ञान प्रकृति और उसके रहस्यों को जानने तक ही तो सीमित है।

    जब कोई मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण उसके जीवन का ध्येय बन जाएगा। पर्यावरण केवल वनस्पतियों और वायुमण्डल में उपस्थित गैसों को ही नहीं कहते। पर्यावरण में वे पांचों तत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश भी आते हैं जिनसे यह प्रकृति बनी है।

    पर्यावरण में वनस्पति जगत, जीव जगत, वायुमण्डल, धरती तक पहुंचने वाली सूर्य किरणें, अंतरिक्ष से आने वाले विकीरण आदि विभिन्न तत्व भी आते हैं। ये एक दूसरे से सम्बद्ध हैं, ये एक दूसरे को सहारा देते हैं और नियंत्रित करते हैं।

    जब हम किसी जीव-जंतु को मारते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि हम उस समय केवल एक जीव को नहीं मार रहे होते अपितु ऐसा करके हम जीव जगत के साथ-साथ वायुमण्डल, वनस्पति मण्डल और अंतरिक्षीय शक्तियों पर भी प्रहार कर रहे होते हैं, प्रकृति के मूलाधार पांचों तत्वों को भी कुपित कर रहे होते हैं।

    केवल पेड़ को मारने से ही जीव नहीं मरता, जीव को मारने से पेड़ भी मरता है, यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, किंतु यह सच्चाई है जिसे विज्ञान से लेकर हमारा अध्यात्म तक मानता है।

    यहां मैं यह कह रहा हूं कि केवल पेड़ को मारने से हिरण नहीं मरता, हिरण को मारने से पेड़ भी मरता है।

    क्योंकि केवल वृक्ष जीव का सहारा नहीं है, जीव और वृक्ष दोनों एक दूसरे का सहारा हैं। जब हम किसी पहाड़ को काटते हैं तो भी प्रकृति में ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी कि जंगल में आग लगाने पर होती है। यह ठीक वैसा ही है कि जंगल से शेर को समाप्त कर देने से पूरे जंगल के ही सूख जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

    मुगल एवं ब्रिटिश काल में पूरे भारत में शेरों का बड़ी संख्या में शिकार हुआ, आज जंगलों की क्या हालत है, हमारे सामने है।

    ऐसा कैसे होता है, इस बात को समझने के लिए हमें कोशिका का उदाहरण लेना होगा। यह सम्पूर्ण सृष्टि एक जीवित कोशिका की तरह कार्य करती है। जिस प्रकार एक कोशिका के किसी भी अवयव को भंग करने पर पूरी कोशिका को क्षति पहुंचती है, ठीक वैसा ही धरती या सृष्टि के बारे में है।

    जब उपनिषदों ने आज से हजार साल पहले ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की घोषणा की तो यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक उद्घोष नहीं था, मनुष्य को इस धरती पर कैसे व्यवहार करना चाहिए, कैसा जीवन जीना चाहिए, उसकी गाइड लाइन थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार अहिंसा का विचार ही रहा है। जब जीवों के प्राण नहीं लिए जाएंगे तो प्रकृति में एक संतुलन स्थापित होगा।

    भारतीय संस्कृति में विगत हजारों वर्षों से स्थापित परम्पराएं, सिद्धांत एवं व्यवहार में लाई जाने वाली ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है।

    मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है। उसे जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण मानव को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। हमारे ऋषियों ने भारतीय संस्कृति का निर्माण इस प्रकार किया कि प्रकृति के मूल कोश को भंग नहीं किया जाए। पेड़, नदी, पर्वत और जंगल; प्रकृति के मूल कोश हैं। उन्हें नष्ट करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

    मनुष्य धरती पर आया है तो उसे अपना जीवन जीने के लिए प्रकृति के संसाधन काम में लेने ही होंगे। फिर क्या किया जाए ?

    इसका एक मात्र उपाय है कि प्रकृति के किसी भी संसाधन को इस प्रकार काम में लिया जाए कि उसकी रीसाइक्लिंग हो सके। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल को प्लास्टिक और पॉलिथीन ने रिप्लेस किया। प्लास्टिक या पॉलिथीन का प्रयोग प्रकृति के मूल कोश को खर्च करने जैसा है जबकि मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    बहुत से लोग कहेंगे कि आज के युग मेें मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग अव्यावहारिक है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हवाई जहाज की जगह बैलगाड़ी को अपनाया जाए। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग इसलिए अव्यावहारिक है, क्योंकि ऐसा हम सोचते हैं। जिस दिन हम सोचेंगे कि यह किया जा सकता है, उस दिन यह व्यावहारिक हो जाएगा। दक्षिण भारत में आज भी केले के पत्ते का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है।

    मेरी उम्र कोई बहुत अधिक नहीं हुई है किंतु मैने अपनी आंखों से उस परम्परा को देखा है, जिसमें शादी-विवाह में जीमण के लिए गांव के लोग अपने घरों से बर्तन लेकर जाते थे। मैंने अपनी आंखों से मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग ठीक उसी रूप में देखा है, जिस रूप में आज प्लास्टिक और पॉलिथीन हो रहा है।

    मैंने अपनी आंखों से उस संस्कृति को देखा है जब निमंत्रण देने के लिए पीले चावल दिए जाते थे। और आज............। आज किसी परिवार में विवाह होता है तो हजार-हजार की संख्या में निमंत्रण पत्र छपते हैं। क्या हजार-हजार की संख्या में छपने वाला निमंत्रण पत्र, कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण की हत्या करने जैसा नहीं है !

    हमारे सामने दो रास्ते हैं, या तो प्रकृति के संसाधनों को बचाएं या फिर उन्हें आज ही उपभोग करके नष्ट कर दें और अपने बच्चों को कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण से वंचित करके चले जाएं। उनके लिए एक ऐसी दुनिया छोड़ जाएं जो सूरज की गर्मी से झुलस रही होगी, जिसमें पानी नहीं होगा, जिसमें कचरे और प्लास्टिक के ढेर होंगे। जहां गायें घास नहीं, प्लास्टिक खा रही होंगी। वो दुनिया कितनी वीरान होगी जिसमें लिखने पढ़ने के लिए कागज नहीं होगा! केवल इण्टरनेट और इलेक्ट्रोनिक गेजेट्स होंगे।

    बात यहाँ समाप्त नहीं होती। यहां से शुरु होती है। प्लास्टिक खाकर गाय जीवित नहीं रहेगी, बिना गाय के दूध नहीं मिलेगा, बिना दूध के बच्चे कैसे बनेंगे ! ये दुनिया कैसी होगी! मैं आपको अपना आंखों देखा अनुभव बताता हूँ कि बिना गाय के दुनिया कैसी होगी !

    इण्डोनेशिया का नाम हमने सुना है। आज से पांच सौ साल पहले इण्डोनेशिया में केवल हिन्दू और बौद्ध निवास करते थे। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इसके उपरांत भी इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में आज भी 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी निवास करती है। मैंने पिछले वर्ष अपने परिवार के साथ इण्डोनेशिया के कुछ द्वीपों की यात्रा की। हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां सड़कों पर गायें नहीं हैं। हमें यह सोचकर दुःख हुआ कि भारत में गाएं सड़कों पर मारी-मारी फिरती हैं।

    हमने जावा, जकार्ता और बाली में अपने 11 दिन के प्रवास के लिए होटल बुक नहीं कराए थे अपितु सर्विस अपार्टमेंट्स बुक करवाए थे ताकि वहाँ हम अपना भोजन स्वयं बना सकें। इसके लिए कच्ची रसोई अपने साथ ले गए थे। जब हमने चाय बनाने के लिए बाजार से दूध खरीदना चाहा तो वहाँ दूध की थैलियां नहीं मिलीं। मालूम हुआ कि यहाँ गायें नहीं हैं इसलिए बाजार में दूध नहीं बिकता। ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैण्ड आदि देशों से लिक्विड वैजीटेबल दूध के डिब्बे आते हैं जो मक्का, सोयाबीन, तेलों और कुछ घासों से बनाए जाते हैं। इस दूध पर लिखा रहता है, बच्चों के लिए हानिकारक। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस दूध का स्वाद और गुण कैसा होगा !

    हमारे जैसे शुद्ध शाकाहारी भारतीय परिवार को दिन में चार-पांच बार चाय चाहिए और सोने से पहले दूध का एक गिलास चाहिए। बाद में पता चला कि सड़कों पर गायें और बाजार में दूध आएंगे कहां से! गायें तो बूचड़ खानों में ले जाई जाकर लोगों के पेट में पहुंच चुकी हैं।

    हमने पूछा इण्डोनेशिया के एक हिन्दू परिवार से पूछा- आपके बच्चे क्या पीते है !

    उन्होंने कहा- मां का दूध। हमने पूछा- और मां का दूध छूटने पर।

    इस सवाल के जवाब में जो कुछ हमें सुनने का मिला वह बेहद चौंकाने वाला था।

    उन्होंने जवाब दिया कि मां का दूध छोड़ने पर बच्चे चिकन, फिश, पोर्क और राइस खाते हैं।

    जब हमने पूछा कि आप लोग चाय नहीं पीते, इस पर उन्होंने कहा कि हम ब्लैक कॉफी पीते हैं, वह भी केवल गेस्ट के आने पर।

    मेरे पिता केन्द्र सरकार में अच्छे पद पर थे किंतु मुझे याद है कि गर्मियों में स्कूलों की छुट्टियां होने पर हमसे अपनी पिछले साल की कॉपियों से कागज की थैलियां बनवाती थीं और कुछ कॉपियों को पानी में गलाकर उन्हें कूटकर और मुल्तानी मिट्टी मिलाकर छोटी-छोटी टोकरियां बनवाती थी जिन्हें मारवाड़ में ठाठिए कहते थे।

    मां दीपावली आने पर हमें घर में ही रंगीन कागज से कंदील बनाना सिखाती थीं। वे हम भाई-बहिनों को घर में सूत से दरियां बनाना सिखाती थीं। गेहूं के सूखे तनों को पानी में भिगोकर उनसे हाथ के पंखे बनाना सिखाती थीं।

    उन्होंने एक और अद्भुत काम हमें सिखाया। मेरा अनुमान है कि यह कार्य बहुत कम बच्चों को उनकी माताओं ने सिखाया होगा। उन दिनों गैस नहीं थी, गांवों में तो चूल्हे होते थे जिनमें लकड़ी जलती थी और शहरों में अंगीठियां होती थीं जिनमें कोयला जलाया जाता था। मेरी मां बाजार से कोयले की चूरी मंगवाती थीं और उसमें काली मिट्टी तथा गोबर मिलाकर हमसे उनके लड्डू बनवाती थीं। जब ये लड्डू कोयले की अंगीठी में डाले जाते थे तो वे घण्टों तक दहकते रहते थे। इससे कोयले की बचत होती थी और अंगीठी में से धुंआ कम निकलता था।

    जब हम पूछते थे कि आप हमसे गर्मियों की छुट्टियों में इतना काम क्यों करवाती हैं तो वे हंसकर जवाब देतीं कि मैं चाहती हूं कि तुम मेलों में जाने के लिए जेबखर्ची मुझसे नहीं मांगो, स्वयं अपने पैसे से मेला देखकर आओ।

    आज सोचता हूं तो लगता है कि मां भले ही अपनी ओर से हमें स्वावलम्बी होने का मंत्र सिखाती थीं किंतु इस कार्य में पर्यावरण संरक्षण का कितना बड़ा संदेश छिपा हुआ था।

    दुर्भाग्य से आधुनिक समय में हम रेडीमेड संस्कृति की ओर अग्रसर हो गए हैं। हाथ से बने हुए सामान की जगह केवल मशीनों द्वारा किए गए उत्पादन ही हमें स्वीकार्य हैं। हमारी यही प्रवृत्ति प्रकृति एवं पर्यावरण के संतुलन को तेजी से समाप्त कर रही है।

    समय की आवश्यकता है जब हम अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटें जो प्रकृति को माता और पर्यावरण को अपना सुरक्षा चक्र मानती है। जो उदाहरण मैंने दिए हैं, वे हो सकता है आज की तरीख में आउट डेटेड बातें हों किंतु जो विषय आज के लिए प्रासंगिक हैं, उन्हें तो हम कर ही सकते हैं।

    एक उदाहरण लेते हैं। बाजार में बिकने वाली मिठाइयों एवं पान पर चांदी का बर्क लगाया जाता है। वास्तव में यह चांदी का बर्क नहीं है, एल्यूमिनियम का है। जब यह मिठाई और पान के साथ हमारे शरीर में पहुंचता है। इसे बकरे की खाल में रखकर कूटा जाता है। मनुष्य की आंते इस बर्क को अवशोषित करने का प्रयास करती हैं और लीवर से निकला जूस इसे पचाने का प्रयास करता है। जब आंतें और लीवर इस काम को नहीं कर पाते तो यह बर्क किडनी तक पहुंचता है। किडनी इसे छानने का प्रयास करती है किंतु यह छनता नहीं है इससे किडनी पर जोर पड़ता है किडनी को अधिक काम करना पड़ता है। अंत में हमारे मल-मूत्र के साथ निकला हुआ बर्क सीवरेज चैनल के माध्यम से भूमि में प्रवेश करता है और मिट्टी को खराब करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब मिट्टी खराब होती है तो पूरे पर्यावरण चक्र में विक्षोभ होता है।

    क्या हम बर्क को खाना छोड़ सकते हैं। यदि समस्त मनुष्य बर्क खाना छोड़ दें तो देश की मिट्टी पर इसका कितना सकारात्मक प्रभाव होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यदि यह बर्क सोने या चांदी का भी होता तो भी यह मनुष्य की आंतों, लीवर और किडनी को इसी तरह नुक्सान पहुंचाता। हमारे केवल इस एक छोटे से कदम से पर्यावरण का संरक्षण होगा।

    भारतीय संस्कृति शारीरिक श्रम पर आधारित है। गांवों में आज भी महिलाएं प्रातःकाल में चक्की चलाकर अनाज पीसती हैं। घरों में ही पापड़, बड़ियां, राबोड़ी, खीचिये, खीच, राबड़ी, आदि विविधि व्यंजन बनाती हैं। बाजरे, ज्वार तथा गेहूं की रोटियां, टुक्कड़ अथवा सोगरे को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, घी तथा छाछ जैसी घरेलू लगावण के साथ खाया जाता है जबकि पश्चिम की संस्कृति से आई ब्रेड के लिये महंगे बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं।

    ऐसी संस्कृति जिसमें शारीरिक श्रम का अभाव हो, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, को बढ़ावा देती है। उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है।

    शादी विवाह में पहले मिट्टी के सकोरों और रामझारों का प्रयोग होता था। आज प्लास्टिक तथा थर्मोकोल के गिलास प्रयुक्त होते हैं। ये गिलास मिट्टी में गलकर नष्ट नहीं होते। एक-एक शादी में पांच-दस हजार गिलासों का ढेर लगना मामूली बात है।

    हमें एक शादी में इतने लोग क्यों बुलाने चाहिए। यह हम केवल इतना समझ लें कि विवाह एक पारिवारिक उत्सव है न कि सामाजिक फंक्शन न कि दशहरे का मेला, तो हमराी तरफ से यह, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा योगदान होगा।

    फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर है।

    शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है।

    उत्तर भारत में कुछ स्थानों पर यह परम्परा थी कि जब लड़की के पीहर वाले अपनी बहन के ससुराल मायरा भरने जाते थे तो वहाँ तालाब से मिट्टी खोदकर बाहर निकालते थे। अब यह काम सरकार करवाती है। पंजाब में यह परम्परा थी कि लड़की जब विवाह के पश्चात् ससुराल जाती थी तो उससे एक पेड़ लगवाते थे। लड़की जब ससुराल से अपने पीहर आती थी और इस पेड़ को देखती थी, पेड़ हरा-भरा मिलता था तो लड़की समझ जाती थी कि उसके पीहर में आज भी उससे प्रेम किया जाता है, उसके लगाए बिरवे को भाई और भाभियां स्नेह जल से सींच कर पाल रही हैं।

    हमारे पुरखों ने वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, कीड़ीनगरा सींचने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने, प्रतिदिन पीपल तथा तुलसी सींचने, सूर्यदेव को अर्घ्य देने एवं विशिष्ट पर्वों एवं व्रतों पर चंद्रदेव को अर्घ्य देने, द्वितीया को चंद्र दर्शन करने जैसे धार्मिक विधान बनाए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न हो।

    प्राकृतिक शक्तियों द्वारा जो कुछ भी निर्मित किया जाता है एवं वनस्पति जगत द्वारा जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत है। जीव जगत में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है।

    यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है या नेचुरल रिसोर्सेज नामक कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर होल्डर है। स्वाभाविक है कि मालिक या सबसे बड़े शेयर होल्डर को अधिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन करना होता है। व्यवहार रूप में उसे प्राकृतिक संसाधनों का मालिक बनकर नहीं अपितु सेवक बनकर रहना होगा, तभी हम पर्यावरण का सच्चे अर्थों में संरक्षण कर सकते हैं।

    संत पीपा के इस दोहे पर अपनी मानसिकता को जांचकर देखें जो मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है-

    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।


    हम प्रकृति के सेवक होकर रहें न कि स्वामी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-35

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-35

    राज्य में अधिक अन्न उत्पादन के पर्यावरणीय उपाय (2)


    अन्न एवं चारा संरक्षण के ग्रामीण उपाय

    कराई

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    चारा भण्डारण के लिये खुले स्थान में कराई बनाई जाती है। इसके लिये 8 से 15 फीट के व्यास के घेरे में 50-60 तगारी राख बिछाकर थळा बनाते हैं। कराई के चारों ओर अंदर की तरफ एक-एक फुट पाई का बाटा लगाते हैं। बोरड़ी के कांटों की बींट गुंथली को गोल घेरे में रखकर बेवली चौकनी से कूटते हैं। जब यह बींट 3-4 फुट की बन जाती है, इसमें बोरड़ी के पत्ते अलग कर देते हैं। बींटे को आधा काटा जाता है, चंद्राकार बींटे के राख वाले गोल घेरे के चारों ओर भीतर की तरफ एक-एक फुट में लगाते हैं। इसे पाई का बाटा लगाना कहते हैं। बाटे के अंदर खाली जगह में बाजरे का डूर भर दिया जाता है। इसके ऊपर धामण, भूरट, बेकरिया, मूंग और ग्वार का गुणा के बाटे बनाते हैं। एक-एक फुट का बाटा लगाते हैं तथा बीच के रिक्त स्थान में बाजरे के डोकों को काटकर डालते जाते हैं। मूंग-मोठ की पानड़ी(पत्ते), ग्वार की ग्वारटी या फलगटी डालकर खूंदते जाते हैं। दस फुट बाद कांकड़ी बनाई जाती है। इसे पेट निकालना भी कहते हैं। अंत में कराई को छाजते हैं। कराई की ऊँचाई 12 से 25 फीट होती है।

    पचावा

    पचावा में डोकों को बिना कुतर के रखा जाता है। इसमें मिट्टी या ईंटों की थर पंक्तिबद्ध तरीके में दी जाती है। दो पंक्तियों के बीच स्थान छोड़ा जाता है। थर के ऊपर अरणी के डोकों की नाथ देकर इसे मिट्टी से भर दिया जाता है। उसके बाद डोकों की थई दी जाती है। कराई झौंपड़ी के आकार में होती है जबकि पचावा चौकोर आकार में होता है।

    कणारा

    फसल को चूहों, कीट-पतंगों एवं फफूंदियों द्वारा नष्ट कर दिये जाने की आशंका रहती है। इसलिये धान के कणों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से गांवों में कणारे बनाये जाते हैं। ये मिट्टी और गोबर से बनाये जाने वाली बड़ी कोठियां होती हैं। कोठियां कणारा से छोटी होती हैं। चोकोर आकार की कोठी को कोठलिया कहते हैं। जब किसी वर्ष अनाज अत्यधिक पैदा होता है तो उसे कणारा या कोठी में नहीं रखा जा सकता। ऐसी स्थिति में चारे की कराई में, चारे के साथ सिट्टे भी रख दिये जाते हैं।


    कृषि के संदर्भ में जिलेवार महत्वपूर्ण तथ्य

    अजमेर : राज्य में गुलाब के फूल तथा अमरूद का सर्वाधिक उत्पादन अजमेर जिले में होता है। पुष्कर क्षेत्र में गुलाब की रोज इण्डिया किस्म का सर्वाधिक उत्पादन होता है। अजमेर में फूलों की आधुनिक मण्डी विकसित की गई है।

    अलवर : राज्य में तम्बाखू का सर्वाधिक उत्पादन अलवर जिले में होता है। जिले के तिन कारुड़ी में बीज फार्म स्थापित किया गया है। जिले के नौगावां नामक स्थान पर सरसों अनुसंधान का अग्रणी कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित किया गया है। अलवर में राज्य की प्रमुख प्याज मण्डी है। जिले का शाहजहाँपुर कस्बा फूड प्रोसेसिंग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

    उदयपुर : राज्य में मशरूम, हल्दी, पपीता तथा ककड़ी का सर्वाधिक उत्पादन उदयपुर जिले में होता है।

    कोटा : राज्य में सर्वाधिक ज्वार, अलसी, सोयाबीन तथा मसालों का उत्पादन कोटा जिले में होता है। यहाँ समन्वित सोयाबीन परियोजना स्थापित की गई है। कोटा में राज्य का पहला एग्रो फूड पार्क स्थापित किया गया। कोटा जिले के बोरखेड़ा में सोयाबीन शोध संस्थान खोला गया है।

    चित्तौड़गढ़ : राज्य में मूंगफली, अफीम, सिंघाड़ा, सीताफल, लहसुन अजवायन एवं बेर का सर्वाधिक उत्पादन चित्तौड़गढ़ जिले में होता है।

    चूरू : जैसलमेर तथा चूरू जिलों में कपास का उत्पादन बिलकुल नहीं होता।

    जयपुर : राज्य में सर्वाधिक जौ, आम तथा नाशपति का उत्पादन जयपुर जिले में होता है। जयपुर में राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान स्थापित किया गया है। जयपुर में सब्जी सुधार की अखिल भारतीय समन्वित परियोजना का उपकेन्द्र स्थापित किया गया है।

    जालोर : राज्य में जीरा, ईसबगोल, अरण्डी, बेदाना अनार तथा भांग-गांजा का सर्वाधिक उत्पादन जालोर जिले में होता है। यह जिला उच्च कोटि के टमाटरों के उत्पादन के लिये भी प्रसिद्ध है।

    जैसलमेर : जैसलमेर जिले में शुष्क वन अनुसंधान संस्थान द्वारा बांस की खेती की जा रही है। राज्य में कार्यशील जोतों का सबसे बड़ा औसत आकार (16.99 हैक्टेयर) जैसलमेर जिले में है।

    जोधपुर : राज्य में मिर्च, अनार, दालों तथा जोजोबा का सर्वाधिक उत्पादन जोधपुर जिले में होता है। जोधपुर से औषधीय महत्व की सोनामुखी की पत्तियों का निर्यात होता है। मण्डोर में ईसबगोल अनुसंधान केन्द्र खोला गया है।

    झालावाड़ : सर्वाधिक संतरा उत्पादन के कारण झालावाड़ को राजस्थान का नागपुर कहते हैं।

    टोंक : राज्य में मतीरा (तरबूज) का सर्वाधिक उत्पादन टोंक जिले में होता है। टोंक के खरबूजे भी प्रसिद्ध हैं।

    डूंगरपुर : राज्य में कार्यशील जोतों का सबसे छोटा औसत आकार (1.47 हैक्टेयर) डूंगरपुर जिले में है।

    धौलपुर : राज्य में नींबू का सर्वाधिक उत्पादन धौलपुर तथा भरतपुर जिलों में होता है।

    नागौर : राज्य में सर्वाधिक तिल उत्पादन नागौर जिले में होता है। नागौर जिले में खुशबूदार मेथी का उत्पादन होता है जिसे देश विदेश में निर्यात किया जाता है।

    पाली : राज्य में खरबूजा का सर्वाधिक उत्पादन पाली जिले में होता है। टोंक के खरबूजे भी प्रसिद्ध हैं।

    बाड़मेर : राज्य में बाजरा तथा सिनकोना का सर्वाधिक उत्पादन बाड़मेर जिले में होता है। इस जिले में मोठ तथा खरीफ की दालें सर्वाधिक पैदा होती हैं।

    बारां : राज्य में धनिया का सर्वाधिक उत्पादन बारां जिले में होता है।

    बांसवाड़ा : राज्य में केले का सर्वाधिक उत्पादन बांसवाड़ा जिले में होता है। बांसवाड़ा जिले के बोखर गाँव में मक्का शोध संस्थान खोला गया है।

    बीकानेर : राज्य में खजूर तथा अंजीर का सर्वाधिक उत्पादन बीकानेर जिले में होता है। जिले के लूणकरणसर क्षेत्र को मूंगफली उत्पादन के लिये राजस्थान का राजकोट कहा जाता है। बीकानेर में खजूर एवं बेर अनुसंधान केन्द्र खोले गये हैं।

    बूंदी : राज्य में सर्वाधिक चावल उत्पादन बूंदी जिले में होता है। यहाँ सैला बासती चावल उगाया जाता है।

    भरतपुर : राज्य में सर्वाधिक सरसों उत्पादन भरतपुर जिले में होता है। राज्य में नींबू का सर्वाधिक उत्पादन धौलपुर तथा भरतपुर जिलों में होता है। जिले के सेवर नामक स्थान पर सरसों शोध संस्थान खोला गया है।

    राजसमंद : राज्य में अदरक का सर्वाधिक उत्पादन राजसमंद जिले में होता है। जिले के खमनौर नामक स्थान पर दश्मक गुलाब (चैती गुलाब) उगाया जाता है।

    सवाईमाधोपुर : सवाईमाधोपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित किया है।

    सिरोही : राज्य में सौंफ तथा चीकू का सर्वाधिक उत्पादन सिरोही जिले में होता है। जिले के माउण्ट आबू में सेब का उत्पादन सर्वप्रथम आरंभ हुआ। सिरोही एवं बांसवाड़ा जिलों में लीची एवं बादाम की खेती की संभावनाएं मौजूद हैं। जिले में मॉलवी किस्म की कपास की खेती होती है।

    सीकर : राज्य का पहला कृषि विज्ञान केन्द्र फतहपुर शेखावाटी में स्थापित किया गया।

    श्रीगंगानगर : राजस्थान में जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से शुद्ध बोया गया सर्वाधिक क्षेत्रफल श्रीगंगानगर जिले में है। एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्रफल के मामले में भी यह अन्य जिलों से आगे है। यह जिला गेहूँ, गन्ना, कपास, चुकंदर, किन्नू तथा मालटा उत्पादन में सब जिलों से आगे है। इसे राजस्थान का अन्न भण्डार भी कहते हैं। समस्त जिलों में सर्वाधिक फल उत्पादन के कारण श्रीगंगानगर को बागानों की भूमि कहा जाता है। राज्य में चुकंदर आधारित मिल केवल इस जिले में है। राजस्थान में हरित क्रांति इस जिले से आरंभ हुई। इस जिले में नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग अन्य जिलों से अधिक होता है। राज्य में सर्वाधिक कृषि मण्डियां तथा स्टेट वेयर हाउस इस जिले में हैं। एशिया का सबसे बड़ा कृषि केन्द्र- सूरतगढ़ यांत्रिक फार्म इस जिले के सूरतगढ़ कस्बे में है। इसकी स्थापना रूस के सहयोग से 15 अगस्त 1956 को हुई थी। चारे के प्रमाणिक बीजों के उत्पादन और प्रचार-प्रसार का कार्य इसी केन्द्र में किया जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय बीज केन्द्र है। राजस्थान की प्रमुख कपास मण्डी तथा कपास शोध संस्थान भी श्रीगंगानगर में है। कपास को सफेद सोना भी कहा जाता है। राज्य में किन्नू की मण्डी केवल श्रीगंगानगर में है। इस जिले के जैतसर नामक स्थान पर कनाडा के सहयोग से जैतसर यांत्रिक फार्म स्थापित किया गया है। गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में अमरीकन कपास का नगदी फसल के रूप में बड़ी मात्रा में उत्पादन होता है।

    हनुमानगढ़ : राज्य में चने तथा ग्वार का सर्वाधिक उत्पादन हनुमानगढ़ जिले में होता है।


    राजस्थान में बागवानी

    बागवानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कृषि प्रसंस्करण एवं अन्य गौण गतिविधियों में परिवर्तित कर ग्रामीण लोगों को अतिरिक्त रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है। बागवानी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित योजनाएं संचालित की जा रही हैं-

    राष्ट्रीय बागवानी मिशन : राज्य के चयनित 24 जिले क्रमशः जयपुर, अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, कोटा,बारां, झालावाड,जोधुपर, पाली, जालौर, बाड़मेर, नागौर, बांसवाड़ा, टोंक, करौली, सवाईमाधोपुर, उदयपुर,डूंगरपुर, भीलवाड़ा, बून्दी, झुंझुनूं, सिरोही, जैसलमेर एवं श्रीगंगानगर में विभिन्न उद्यानिकी फसलों यथा- फल, मसाला, फूल एवं औषधीय फसलों के क्षेत्रफल, उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन चलाया जा रहा है।

    राष्ट्रीय बम्बू मिशन : योजनान्तर्गत बाँस की खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य के करौली, सवाईमाधोपुर, उदयपुर, चितौड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही, बांरा, झालावाड़, भीलवाड़ा, राजसमन्द एवं प्रतापगढ़ जिलों को सम्मिलित किया गया है।

    राष्ट्रीय कृषि विकास योजना : कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र में लगातार गिरते हुए निवेश को देखते हुए केन्द्र सरकार ने यह योजना आरम्भ की है जिसमें कृषि जलवायु स्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों से सम्बद्ध विषयों एवं तकनीक को दृष्टिगत रखते हुए कृषि क्षेत्र के लिये विस्तृत योजना बनाई गई है। इसके अंतर्गत राज्य में उद्यानिकी विकास परियोजना के लिये वर्ष 2012-13 में खजूर की खेती, अनार का उत्पादन, अंगूर पौधारोपण, खजूर टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला, गैर राष्ट्रीय बागवानी मिशन वाले जिलों में उद्यानिकी विकास कार्यक्रम, ग्रीन हाउस पौधारोपण सामग्री, शेड व नेट हाउस में में सब्जी उत्पादन, सब्जी मिनी किट्स वितरण, ढिढोल नर्सरी विकास, सोलर पम्पसैट पर सहायता आदि कार्यों हेतु 123.15 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये हैं।


    राजस्थान में औषधि सम्पदा

    हिमालय पर्वत के बाद राजस्थान ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जिसे सृष्टिकर्ता ने सर्वाधिक औषधियां प्रदान की हैं। यहाँ की साधारण तथा घास-फूस समझी जाने वाली वनस्पतियां भी मनुष्य एवं पशुओं के आरोग्य हेतु बड़ी चमत्कारी औषधियां हैं। मरू प्रदेश में कैर, कुमटी, खेजड़ी, धतूरा, आसलिया, जीरा, ईसबगोल, शंखपुष्पी, रोहिषतृण (देशी बूर), गांगेरुकी, कर्पूरगंधा, महाबला, हरमल, इंद्रायण, लाल व सफेद आकड़ा, भूरांगणी, ऊँटकटो, खारी, बेर, भाऊ, फोग, धव, खींप, नागबेल, कनेर, थूहर, सर्पगंधा, अश्वगंधा, गोंद तथा गूगल आदि अनेक बहुमूल्य औषधियां पायी जाती हैं। अरावली के पर्वतीय वन-क्षेत्र में बाय हाकल, काली हाकल, चित्राल, बरकड़ा, गारह गोटा, बिदार कंद, तोलिया कन्द, सफेद मूसली, बिल्व, गंेगची, अपामार्ग, शालपर्णी, शैफाली, नागरमोथा, घातकी पाठा, कम्पलीक, मिर्चीकन्द, सूरवाल घास, खाट खटूम्बर, बटेड़ा, पलाश, हस्तकर्ण, ट्रायडक्स आदि दुर्लभ औषधियों का भण्डार है।

    राष्ट्रीय औषधीय पादप मिशन (एन.एम.एम.पी.) : राज्य में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने एवं फार्मा सेक्टर को आसानी से कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2009-10 से यह कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया है।

    औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्र : राज्य में औषधीय प्रजातियों के संरक्षण हेतु 9 औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्र की स्थापना की जा रही है जिनमें से 7 क्षेत्र स्थापित किये जा चुके हैं।

    ईसबगोल की खेती : मरुस्थलीय क्षत्रों में जहाँ थोड़ी बहुत वर्षा होती है तथा सिंचाई के कृत्रिम साधन उपलब्ध हैं, ईसबगोल की खेती सफलता से की जाती है। इसके बीजों में सफेद रंग की भूसी पाई जाती है जिसे औषधि के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×