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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-29

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-29

    राजस्थान में जल चेतना (3)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कूप निर्माण


    कुंआ खोदकर भू-गर्भ में स्थित जल प्राप्त करने की कला हजारों साल पुरानी है। सदियों के अनुभव से राजस्थान में कूप निर्माण का एक पूरा विज्ञान ही विकसित हो गया। राजस्थान में कूप निर्माण परम्परा की कुछ जानकारी लेना उचित होगा-

    बेरी (कुइयाँ) : भू-गर्भीय जल तीन तरह की गहराइयों में उपलब्ध होता है। वर्षा के बाद होने वाले जल रिसाव से, नदियों एवं नहरों के प्रवाह क्षेत्र में होने वाले जल रिसाव से तथा तालाबों एवं झीलों आदि के किनारे की भूमि में होने वाले जल रिसाव से जल की अल्प मात्रा, भूमि में प्रवेश करती रहती है। यह जल पहले स्तर पर जमा होता है। इस स्तर पर चूना पत्थर अथवा अन्य पत्थरों की कठोर पर्त होती है जिसके कारण यह जल और नीचे नहीं जा पाता। यह जल सीमित मात्रा में होता है। इस जल को प्राप्त करने के लिये बीस से चालीस हाथ गहरे, अर्थात् कम गहराई के कुंए की आवश्यकता होती है। इन्हें बेरी तथा कुइयाँ कहते हैं। बरसाती नदियों के किनारे बनी कुइयों का पानी प्रायः पूरे साल नहीं चल पाता किंतु जैसे ही वर्षा काल में कुछ दिन नदी चलती है तो ये कुइयाँ फिर से जल देने लगती हैं। बेरियों के पानी को 'कच्चा पाणी' कहा जाता है। गंग नहर तथा इंदिरा गांधी नहर के निकट स्थित खेतों में इस प्रकार की कुइयाँ आज भी प्रचलन में हैं। बरसााती नदियों के किनारे भी इस प्रकार की कुइयाँ खोदी जाती थीं किंतु यह प्रथा अब बंद हो गई है क्योंकि बरसाती नदियां अब बहुत ही कम दिनों के लिये प्रवाहित होती हैं।

    बेरा (कुआं) : प्रथम स्तर पर जमा पानी, दीर्घ काल तक पड़े रहने की स्थिति में, चूने पत्थर की पर्त में बने रंध्रों में से होकर, गुरुत्वाकर्षण बल के कारण कुछ और गहराई में चला जाता है। इसे दूसरा स्तर कहते हैं। जब धरती का निर्माण हुआ तब भू-गर्भ में कई स्थानों पर छोटे-छोटे पॉकेट्स में पानी जमा हो गया। वह भी इसी द्वितीय स्तर पर जमा रहता है। भूकम्प आदि के समय भी समुद्रों, नदियों एवं झीलों आदि का जल भू-गर्भ में प्रवेश कर इसी दूसरे स्तर तक पहुंच जाता है। इस जल को प्राप्त करने के लिये मध्यम गहराई के कुंए खोदने पड़ते हैं। प्रायः इस स्तर तक खोदे गये कुएं अपेक्षाकृत लम्बे समय तक चलते हैं किंतु इस स्तर पर उपलब्ध 'पॉकेट' का जल के समाप्त होते ही ये कुएं भी सूख जाते हैं। इन कुओं के पानी को पक्का पाणी या भाकल कहा जाता है।

    पाताल तोड़ कुआं : भू निर्माण की प्रक्रिया में धरती पर भयानक उथल-पुथल हुई जिसके कारण भू-पर्पटी पर स्थित पानी बहुत भारी मात्रा में धरती की काफी गहराई में बंद हो गया। इसे तीसरा स्तर कहते हैं। इस पानी की छोटी-छोटी धाराएं दूर-दूर तक की पॉकेट्स से जुड़ी हुई होती हैं। जब कुओं को इस तीसरे स्तर 'थर्ड एक्वीफर' तक खोदा जाता है तो उसे स्थानीय भाषा में पाताल तोड़ कुआं अथवा सागरी कुआं कहा जाता है। राजस्थान में जो गांव आज से कई सौ साल पुराने बसे हुए हैं, उनमें प्रायः सागरी कुएं अथवा पाताल तोड़ कुएं बने हुए हैं जिनका पानी कभी समाप्त नहीं होता है। अधिकांश गांवों में मान्यता है कि राजा सगर अथवा राजा सागर ने इन कुओं को बनवाया था। इसलिये ये पाताल तोड़कर सागर के तल तक गहरे खुदे हुए हैं। कई गांवों में इन कुओं के बारे में यह भी कहा जाता है कि इन्हें किसी लक्खी बणजारे ने खुदवाया था।

    बावड़ी : सीढ़ीदार कुओं को बावड़ी कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में इसे वापिका, वापी, कर्कन्धु तथा शकन्धु भी कहा गया है। पश्चिमी राजस्थान में इस तरह के कुएं खोदने की परम्परा ईसा की पहली शताब्दी के लगभग, शक जाति अपने साथ लेकर आई थी। मण्डोर एवं भीनमाल में आज भी 700-800 ईस्वी में बनी एक-एक प्राचीन बावड़ी स्थित है। प्राचीन काल में अथवा मध्यकाल में बनी बावड़ियों के चारों ओर, कई मंजिल में कलात्मक पक्का निर्माण देखने को मिलता है। कुछ बावड़ियों में तो बड़ी संख्या में सेना को छिपाने के लिये कक्ष बने होते थे जिनमें सेना कई महीनों तक छिप कर रह सकती थी।


    विभिन्न जलाशयों एवं जल संरचनाओं का निर्माण

    तालाब

    समतल भूमि पर विशाल गड्ढेनुमा स्थल, जिसमें वर्षा का स्वच्छ जल संग्रहीत किया जाता है, तालाब कहलाता है। इसे पक्की बनावट तथा पत्थर की चिनाई से मजबूत किया जाता है तथा तालाब में उतर कर जल भरने के लिये सीढ़ियां, दरवाजे, मेहराबें अथवा चाप बनाये जाते हैं। तालाबों की सुरक्षा के लिये कई तरह के उपाय किये जाते हैं। उनके तट पर पीपल, बरगद एवं गूलर के पेड़ लगाये जाते हैं। इन वृक्षों पर भांति-भांति के पक्षी आकर बैठते हैं जो आस-पास के क्षेत्रों से कीड़े-मकोड़े खाकर क्षेत्र को पूरी तरह साफ कर देते हैं। तालाब के पानी को साफ बनाये रखने के लिये उनमें मछली, कछुए, केकड़े छोड़े जाते हैं। बड़े तालाबों में मगरमच्छ भी छोड़े जाते हैं। तालाब के जल में ऑक्सीजन की मात्रा को बनाये रखने के लिये उसमें कमल, सिंघाड़े, कमलिनी, कुमुदनी, चाक्षुष, निर्मली आदि वनस्पतियां लगाई जाती हैं। जिन दिनों में तालाब में पानी कम होता है, उन दिनों गांव के लोग मिलकर तालाब के तल में जमा हो गई अतिरिक्त मिट्टी को निकालते हैं। इस कार्य को साद निकालना कहते हैं। इस साद को खेतों में खाद की तरह काम लिया जाता है। इसे बेचने से जो धन प्राप्त होता है, उससे तालाब की मरम्मत की जाती है।

    जोहड़

    जोहड़ और तालाब में कोई अंतर नहीं होता। कुछ क्षेत्रों में गांव के बाहर अथवा जंगल में स्थित तालाब को जोहड़ कहते हैं जबकि शेखावाटी क्षेत्र में किसी भी तालाब को जोहड़ कहते हैं।

    नाड़ी (नाडी)

    यह एक प्रकार का छोटा तालाब अथवा तलैया होती है जिसमें वर्षा का जल भर जाता है। यह जल स्थानीय निवासियों एवं पशु-पक्षियों की जल सम्बन्धी आवश्यकताओं की पांच से सात महीने तक पूर्ति करता है। जब यह सूख जाती है तो गांव के लोग मिलकर इसकी सफाई करते हैं तथा इसके चारों ओर की भूमि को समतल बनाकर आगौर की मरम्मत करते हैं।

    तालर

    जिस भूमि पर पानी जमा होता है तथा लम्बे समय तक पड़ा रहता है, उस भूमि को तालर कहते हैं। यह पानी भी पशुओं एवं खेती के काम आता है।

    नेहटा (नेष्टा)

    नाडी अथवा तालाब से अतिरिक्त जल की निकासी के लिये उनके साथ नेहटा बनाया जाता है जिससे होकर अतिरिक्त जल निकट स्थित दूसरी नाडी, तालाब या खेत में चला जाये।

    मदार

    नाडी या तालाब में जल आने के लिये निर्धारित की गई धरती की सीमा को मदार कहते हैं। मदार की सीमा में मल-मूत्र का त्याग वर्जित होता है।

    आगौर

    वर्षा जल को तालाब, नाडी या टांके में उतारने के लिये उसके चारों ओर की मिट्टी को समतल करके आगौर बनाया जाता है। आगौर क्षेत्र में मल-मूत्र का त्यागना, थूकना, जूते पहनकर जाना निषिद्ध होता है। वर्षा आरम्भ होने से पहले, आगौर की सफाई की जाती है। गांव के सामुदायिक तालाबों एवं उनके आगौरों की सफाई सामूहिक रूप से की जाती है जिसमें गांव के हर घर से स्त्री-पुरुष एवं बच्चे आकर आगौर क्षेत्र में पड़े पशुओं के शव, हड्डियां एवं अन्य गंदगी, पत्थर आदि निकालते हैं एवं आगौर क्षेत्र की मरम्मत की जाती है। अब यह परम्परा बंद होती जा रही है तथा यह कार्य अकाल राहत कार्यों एवं नरेगा के तहत किया जाता है।

    टांका

    वर्षा जल एकत्रित करने के लिये बनाये गये पक्के हौद को टांका कहते हैं। खेतों में बनाये टांके में जल एकत्र करने के लिये इनके चारों ओर आगौर बनाया जाता है। वर्षा आने से पहले टांकों की सफाई करके, उनके तल एवं भीतरी दीवारों पर चूना पोता जाता है। पक्के मकानों में टांकों का सम्बन्ध पाइप लाइन के माध्यम से, वर्षा काल में छत से बहकर आने वाले पानी से किया जाता है।

    डिग्गी

    श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, अनूपगढ़ तथा हनुमानगढ़ आदि क्षेत्रों में नहर के पानी का भण्डारण करने के लिये गांवों में में डिग्गी बनाई जाती है। जब नहर चलती है तो डिग्गी को भर लिया जाता है। जिन दिनों में नहर का प्रवाह बंद होता है, उन दिनों में गांव की पानी सम्बन्धी आवश्यकताएं इसी डिग्गी से पूरी होती हैं।

    खेली

    कुओं के निकट पशुओं को जल सुलभ कराने के लिये खेली बनाने का प्रचलन सदियों से रहा है। खेली एक छोटी हौदी होती है। कुएं की जगत पर मटका भरने वाली स्त्रियां प्रायः कुछ पानी खींचकर इस खेली में डाल देती हैं जो पशुओं लिये उपलब्ध रहता है। आज भी गावों में जीएलआर तथा हैण्ड पम्प के पास खेली बनाने की परम्परा है जिनमें, जीएलआर तथा हैण्डपम्प से बहकर आने वाला अतिरिक्त जल पशुओं के निमित्त जमा होता है।


    राजस्थान में जल बचाने की संस्कृति

    राजस्थान की जीवन शैली में जल की बचत अनिवार्य तत्व है। भोजन के समय दायां हाथ ही काम में लेने की परम्परा रही है ताकि बांया हाथ केवल पानी के लोटे के लिये काम में लिया जाये और उसे झूठे हाथ से न छूना पड़े। हर व्यक्ति को अलग गिलास में जल न देकर बाल्टी में लोटा डालकर या रामझारे से जल पिलाया जाता था। बरतन को मुंह से लगाकर पानी नहीं पिया जाता था अपितु ऊपर से पानी पिया जाता था ताकि बरतन को बार-बार न मांजना पड़े। इससे पानी की बचत हेाती है। बरतनों को सूखी एवं साफ रेत या राख से मांजने के बाद कपड़े से पौंछकर साफ करने की परम्परा थी। इससे न केवल पानी अपितु पर्यावरण के लिये हानिकारक साबुन एवं क्लीनिंग पॉउडर की भी बचत होती थी। घर में रोज पानी से धुलाई न करके गीले कपड़े से पौंछा लगाने पर जोर दिया जाता था। मटकियों के नीचे बर्तन रखकर, मटकी में से टपकने वाले जल को एकत्रित किया जाता था। इस जल को बर्तन साफ करने, घर में पौंछा लगाने तथा पेड़-पौधे सींचने में काम लिया जाता था। पानी को व्यर्थ बहने से रोकने के लिये हर संभव उपाय किये जाते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 93

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 93

    उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में अजमेर नगर की जनसंख्या


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    ई.1818 में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर पर अधिकार किया, तब अजमेर नगर की जनसंख्या लगभग 24 हजार थी। अंग्रेजों का शासन हो जाने के बाद अजमेर नगर की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी। ई.1868 से ई.1870 के बीच अजमेर और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा जो 19 माह तक चला। इसे पचीसिया काल कहा जाता है। इस दुर्भिक्ष में अजमेर-मेरवाड़ा की 25 प्रतिशत जनसंख्या कम हो गई।

    यही कारण है कि ई.1837 से ई.1872 की अवधि में अजमेर नगर की जनसंख्या में केवल 3,137 की ही वृद्धि हुई। रेल आने के कारण ई.1875 से ई.1894 के बीच अजमेर की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। ई.1872 की तुलना में ई.1891 में अजमेर की जनसंख्या ढाई गुनी हो गई। बाहर से आने वालों में यूनाइटेड प्रोविंस के आगरा एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों के लोग सबसे अधिक थे।

    ई.1931 में हुई जनगणना के अनुसार अजमेर नगर की जनसंख्या 1,19,524 हो गई। इस जनगणना के समय अजमेर में 62 प्रतिशत हिन्दू, 33 प्रतिशत मुसलमान, 1.5 प्रतिशत यूरोपियन एवं एंगलोइण्डियन, 1.9 प्रतिशत भारतीय ईसाई रहते थे। इनके अतिरिक्त 270 सिक्ख, 240 पारसी तथा 49 अन्य धर्मों के अनुयायी भी रहते थे।

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  • युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - भूमिका

     02.06.2020
    युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - भूमिका

    जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को!

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    श्री भैरोंसिंह शेखावत का नाम मैंने, जीवन में पहली बार पिताजी के मुख से सुना। वे वर्ष 1977 की गर्मियों के दिन थे और लूओं ने पूरे वातावरण को झकझोर रखा था। देश का राजनीतिक वातावरण भी उन दिनों बहुत गर्म था जिसकी चर्चा प्रायः पिताजी घर में किया करते थे। उस समय मैं 15 साल का बालक था। शाम के समय कार्यालय से लौटने के पश्चात् पिताजी ने कहा था कि कल भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। इस पर मैंने बाल सुलभ जिज्ञासा से पूछा था, ये कैसे आदमी हैं? पिताजी ने हँसकर जवाब दिया था- जोरदार। राजस्थान सौभाग्यशाली है कि उसे जुझारू व्यक्ति मुख्यमंत्री के रूप में मिला। उसी दिन मैंने पिताजी के मुँह से भैरोंसिंह शेखावत के संघर्षमय जीवन की कुछ बातें सुनीं।

    श्री भैरोंसिंह शेखावत को निकट से देखने का अवसर वर्ष 1992 में आया जब मेरा चयन राजस्थान सरकार में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में हुआ। उस समय राज्य में श्री भैरोंसिंह शेखावतजी की दूसरी सरकार चल रही थी। मैंने निदेशालय में अपनी ज्यॉइनिंग की तिथि 16 दिसम्बर 1992 चुनी थी, उन दिनों भी देश का राजनीतिक वातावरण हलचलों से भरा हुआ था। मेरे ज्यॉनिंग से ठीक एक दिन पहले भैरोंसिंह शेखावत सरकार बर्खास्त हो गई।

    16 दिसम्बर 1992 को जब मैंने शासन सचिवालय परिसर में स्थित सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में अपनी ज्यॉनिंग दी तो पूरे सचिवालय में एक विचित्र सा भययुक्त वातावरण था। पूरा परिसर सुरक्षाकर्मियों की सीटियों एवं तेजी से आ-जा रही गाड़ियों के साइरनों से गूंज रहा था जिसे सुनकर मन में भय उत्पन्न होता था। बाद में ज्ञात हुआ कि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है इसलिये राज्यपाल डॉ. एम. चेन्नारेड्डी आने वाले हैं। वे अनुशासन पसंद व्यक्ति हैं इसलिये आज चारों ओर सख्ती है। यदि कोई व्यक्ति सचिवालय परिसर की सड़क पर अथवा गलियारे में दिखाई देता है तो उसे हटाने के लिये सुरक्षा कर्मी सीटियां बजा रहे हैं।

    शाम होते-होते ज्ञात हुआ कि सचिवालय में स्थित मंत्रियों के कक्षों से मनों-टनों कागज निकालकर बाहर किये गये हैं। ये वे कागज थे जिनमें प्रदेश के सुदूर अंचलों में निवास करने वाले करोड़ों लोगों की इच्छायें, अभिलाषायें, सपने और मजबूरियां लिखी हुई थीं। इन कागजों पर कार्यवाहियां होनी शेष थीं किंतु सरकार के चले जाने से अब ये कागज किसी काम के नहीं रह गये थे। नई सरकार के समक्ष जनआकांक्षाओं को फिर से अभिव्यक्त होने के लिये नये कागज लिखे जाने होंगे।

    उस दिन पहली बार मुझे आभास हुआ कि एक मुख्यमंत्री जो पूरी सरकार चलाता है, एक व्यक्ति नहीं होता, जन आकांक्षाओं, अभिलाषाओं और करोड़ों लोगों के हृदयों में पलने वाले सपनों का केन्द्र बिंदु होता है। वह चारों ओर से समस्याओं से घिरा हुआ होता है। हजारों व्यक्ति उससे प्रत्यक्षतः जुड़े हुए होते हैं, लाखों हाथ सदैव उसकी तरफ कोई न कोई कागज लेकर मण्डरा रहे होते हैं, करोड़ों आंखें उसे आशा भरी दृष्टि से देख रही होती हैं और उसका अपना निजी जीवन कुछ नहीं होता, कुछ भी नहीं।

    मन में एक पीड़ा सी हुई। मुझे आशा थी कि इस नई नियुक्ति में मुझे श्री भैंरोंसिंह शेखावत को निकट से देखने और संभवतः उनके साथ काम करने का भी अवसर मिलेगा किंतु उनकी सरकार बर्खास्त हो चुकी थी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग चुका था। निदेशालय से मेरी नियुक्ति जालोर जिले में कर दी गई और मैं कुछ दिन बाद जालोर चला गया। ठीक एक साल बाद 4 दिसम्बर 1993 को श्री भैरोंसिंह शेखावत ने राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई। मन में फिर से आस जगी कि अब मैं उन्हें आंखों से देख सकूंगा। हो सकता है कि मुझे उनके पास काम करने का अवसर भी मिले।

    इस प्रकार पहली बार वर्ष 1994 में मुझे श्री भैरोंसिंह शेखावत को अपनी आंखों से देखने का अवसर मिला जब वे जालोर जिले के दौरे पर आये और मुझे जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में उनकी यात्रा की प्रेस कवरेज करने का अवसर मिला। श्री शेखावत को देखकर मेरे मन में सबसे पहले यह विचार आया- ये तो ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि पिताजी ने वर्ष 1997 में इनके बारे में बताया था। एकदम सरल, सहज।

    मैं जून 1997 तक जालोर जिले में पदस्थापति रहा। इस बीच श्री भैरोंसिंह शेखावत ने मुख्यमंत्री के रूप में जालोर जिले की कई यात्राएं कीं और मुझे उनकी मीडिया कवरेज का सौभाग्य मिला। उनकी वक्तृत्व शैली से मैं बहुत प्रभावित हुआ। लगता ही नहीं था कि उनकी बातों को समझने के लिये किसी को अपने दिमाग पर जरा भी जोर देने की आवश्यकता है। सरल शब्द, सुलझी हुई बात, संक्षिप्त वाक्य और चुटीला अंदाज। उनके भाषणों को प्रेस नोट के रूप में लिखने में मुझे कभी कोई कठिनाई या उलझन नहीं हुई।

    इसी दौरान वर्ष 1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के लिये आम चुनाव होने तय हुए। लोकसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने से पहले श्री भैरोंसिंह शेखावत जालोर जिले की यात्रा पर आये। इस दौरान उन्होंने आहोर से लेकर जालोर, बागरा, भीनमाल तथा सांचोर आदि क्षेत्रों का सड़क मार्ग से दौरा किया। मैं, मीडिया कवरेज के लिये मुख्यमंत्री के काफिले में साथ रहा। इस यात्रा में मैंने उनका जो रूप देखा, वह मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को चक्कर में डाल देने के लिये पर्याप्त था। उनकी पूरी यात्रा बिना किसी तड़क-भड़क के, बिना किसी आडम्बर के और बिना किसी शोर-शराबे के रही। पूरी यात्रा के दौरान सड़क के दोनों तरफ सैंकड़ों लोग खड़े हुए दिखाई देते थे। मुख्यमंत्री उन्हें देखकर अपनी गाड़ी रुकवाते, उनसे हाथ मिलाते और यदि कोई माला लेकर खड़ा होता तो उसके हाथ से माला पहनते। शेखावाटी युक्त मारवाड़ी में उससे कुछ बात करते जिसमें प्रायः उस व्यक्ति का नाम भी होता था। मुझे आश्चर्य होता, एक व्यक्ति आखिर कितने नाम स्मरण रख सकता है। कई लोगों से वे गुटखा मांगते, अपने हाथ के गुटखे को दूसरों के साथ बांटकर खाते और आगे चल देते।

    मुझे इस बात पर और भी आश्चर्य होता, जब वे लोगों से उनका नाम लेकर उनकी गाय-भैंस और खेती के बारे में पूछते। उसके लड़के का नाम लेकर उसके रोजगार के बारे में पूछते और बाई ससुराल में कैसी है, की भी जानकारी लेते। इन बातों में कई पुराने संदर्भ भी होते थे। इस यात्रा में पहली बार मेरी समझ में आया कि मुख्यमंत्री के चारों ओर ओर लाखों हाथ कागज लेकर ही नहीं खड़े रहते अपितु पूरे प्रदेश में गांव-गांव में उसके लाखों मित्र भी रहते हैं। उसके चाहने वाले होते हैं और उसके लिये मंगल कामना करने वाले भी होते हैं।

    ई.1997 में जालोर जिले में साक्षरता कार्यक्रम चला। इस मिशन के लिये भैरोंसिंह शेखावत व्यक्तिगत रूप से चिंतित रहते थे। जब जालोर जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के समक्ष अपनी परियोजना प्रस्तुत की तो मैं भी उस दल में सम्मिलित था जिसने इस परियोजना का निर्माण करवाया था और जिस दल ने इसका प्रस्तुतिकरण दिल्ली में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के समक्ष किया था। जब राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने इस परियोजना को स्वीकृति दी तो मुख्यमंत्री की प्रसन्नता का पारावार न था। जालोर जिले में इसकी लांचिंग के लिये मुख्यमंत्री स्वयं आये। जिला कलक्टर राजेश्वरसिंह ने जिला मुख्यालय पर इस कार्यक्रम की लांचिंग के लिये विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया। उस समय तक मेरा स्थानांतरण नागौर हो चुका था। इसलिये जिला कलक्टर ने मुझे कार्यक्रम का संचालन करने के लिये जालोर बुलाया।

    मेरी याददाश्त में श्री भैरोंसिंह शेखावत के लिये संचालित किया गया यह मेरा पहला और अंतिम कार्यक्रम था। कार्यक्रम बहुत भव्य था। पूरा जिला ही जैसे इसमें उमड़ पड़ा था। मेरे और जिला कलक्टर के बीच पहले से ही तय हो गया था कि कार्यक्रम किस तरह संचालित किया जायेगा, कौन-कौन बोलेंगे और कब क्या होगा। सब कुछ उसी अनुरूप चला और अंत में मुख्यमंत्री बोलने के लिये उठ खड़े हुए। वे कोई चार-पांच मिनट बोले होंगे कि उनके माइक ने काम करना बंद कर दिया। बिजली आ रही थी किंतु माइक बंद हो गया था। किसी की कुछ समझ में नहीं आया। अब तक सब कुछ ठीक था और अब सब कुछ गुड़-गोबर होने जा रहा था। मेरा माइक काम कर रहा था। तीन-चार मिनट तो यह देखने में बीत गये कि माइक कहां से खराब हुआ है।

    किसी भी मुख्यमंत्री की आम सभा के संचालन का यह मेरा पहला अवसर था फिर भी मैंने धैर्य से काम लिया और यह सोचकर कि जब तक माइक नहीं आ जाता, मैंने जालोर के साक्षरता मिशन के बारे में बोलना आरंभ किया। अब तक वह हुआ था जो मेरे और जिला कलक्टर के बीच तय हुआ था किंतु अब वह होने जा रहा था जो तय नहीं हुआ था। मुख्यमंत्री के भाषण के बीच में बोलना बहुत ही अशोभनीय और अटपटा लगने वाली बात थी किंतु मैंने परिस्थिति को देखते हुए यह दुस्साहस किया। माइक की व्यवस्था होने में लगभग तेरह-चौदह मिनट लग गये। इस बीच मैं जालोर के साक्षरता मिशन की भावी कार्ययोजना के सम्बन्ध में बोलता रहा। इस बीच जिला कलक्टर से मेरी दृष्टि दो-तीन बार मिली किंतु उन्होंने मेरे लिये कोई संकेत नहीं किया। मैं बोलता रहा और जब माइक ठीक हुआ तो मुख्यमंत्री ने पहला वाक्य इस प्रकार बोला- छोरो घणो जोरदार बोलै। मेरी सांस में सांस आई, अब जाकर मैं आश्वस्त हुआ कि इस दुस्साहस के लिये मुझे कोई कुछ कहने वाला नहीं है।

    1998 के विधानसभा आम चुनावों से पहले मैं नागौर जिले में नियुक्त था। आचार संहिता लगने से पहले श्री भैरोंसिंह शेखावत के जिला मुख्यालय नागौर सहित जिले के कई कस्बों में कई दौरे हुए। इस बार भी मैंने उनकी यात्राओं का मीडिया कवरेज किया।

    1 अक्टूबर 1998 को श्री भैरोंसिंह शेखावत दो दिवसीय यात्रा पर नागौर आये। दिन भर कई कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के बाद शाम के समय वे नागौर में चतुर्मास कर रहे एक जैन साधु के उपासरे पर गये। मैं भी उनके साथ गया। लगभग एक घण्टे वे जैन साधु के सानिध्य में रहे। उस पूरे समय में उस कक्ष में केवल तीन ही व्यक्ति थे- श्री भैरोंसिंह शेखावत, जैन साधु और मैं। इस अवधि में उन दोनों के मध्य जिन विषयों पर वार्तालाप हुआ, उसे सुनकर एक और नई बात समझ में आई। मुख्यमंत्री केवल हजारों लाखों, करोड़ों व्यक्तियों के लिये ही नहीं होता, वह अपने लिये भी होता है, उसे आत्मा, परमात्मा, इहलोक और परलोक की चिंताएं भी सताती हैं।

    अगले दिन 2 अक्टूबर था। मुख्यमंत्री महात्मा गांधी की प्रतिमा को माल्यार्पण करने गांधी चौक गये। मैं, भी जिला प्रशासन के अन्य अधिकारियों के साथ वहां उपस्थित था। तब तक बहुत से लोगों को ज्ञात हो चुका था कि भैरोंसिंहजी रात्रि को नागौर में ही ठहरे हैं और प्रातःकाल गांधी चौक आयेंगे। उस समय प्रातः के सात ही बजे थे। फिर भी पूरा गांधी चौक लोगों से ठसाठस भर गया। यहां भी वही सब हुआ। मुख्यमंत्री ने किसी से लेकर गुटखा खाया, कुछ लोगों के बच्चों के नाम लेकर उनके बारे में पूछा और आठ बजते-बजते उनका काफिला रवाना हो गया।

    वर्ष 2007 में उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए वे महंत किशनारामजी महाराज की बरसी पर राजाराम आश्रम शिकारपुरा आये। उस समय मैं जोधपुर डिस्कॉम में जनसम्पर्क अधिकारी था किंतु उनकी इस यात्रा के कवरेज के लिये मुझे लगाया गया। उस दिन शिकारपुरा में लाखों व्यक्ति उपस्थित थे। जिस तरफ आंखें दौड़ाओ, आदमी ही आदमी, औरतें ही औरतें। आश्रम परिसर में तिल धरने को स्थान नहीं। दिन में लगभग साढ़े दस बजे उपराष्ट्रपति आये। जब वे मुख्यमंदिर में दर्शनों के लिये गये तो चारों ओर का स्थान लकड़ी की बल्लियां लगाकर सुरक्षित कर दिया गया था और उन बल्लियों को घेरकर पुलिसकर्मी खड़े थे। आम आदमी की हिम्मत नहीं होती थी कि उस सुरक्षा घेरे को तोड़कर उन तक पहुंच सके किंतु जब वे आये तो लाखों लोग मुख्यमंदिर की तरफ अनायास ही दौड़ पड़े। वे नजर भरकर अपने नेता को देखना चाहते थे। ऐसा सम्मोहन भरा दृश्य मैंने अपने जीवन में शायद ही कभी देखा होगा। यह सम्मोहन तभी भंग हुआ जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आश्रम में प्रवेश किया।

    मैंने अंतिम बार श्री भैरोंसिंह शेखावत की नागाणा मंदिर की यात्रा का कवरेज वर्ष 2007 में किया। तब मैं बाड़मेर जिले में पदस्थापित था। इस बार वे उपराष्ट्रपति थे। संयोग की बात थी, इस बार भी राज्य का राजनीतिक वातावरण गर्म था। वे उपराष्ट्रपति थे, राजनीतिक बातों से ऊपर उठ चुके थे फिर भी मिट्टी की तासीर नहीं जाती, शब्दभेदी बाण चलाना जानते थे। वे हमेशा ही ऐसा कुछ करते थे जिससे सांप भी मरता था और लाठी भी नहीं टूटती थी। बाड़मेर जिले में भी मंच से उन्होंने ऐसे बहुत से लोगों के नाम लिये जो उनके सामने भीड़ में बैठे हुए थे। कुछ लोगों के नाम लेकर उन्होंने बाड़मेर जिले की अपनी पुरानी यात्राओं में हुई बातों का भी उल्लेख किया। इस भाषण का समां ऐसा था कि सभा समाप्त होने के बाद हर व्यक्ति को यह लगा कि वह श्री भैरोंसिंह शेखावत से व्यक्तिशः बात करके जा रहा है। संतुष्ट और अभिभूत! संभवतः अंतिम बार मैंने उन्हें जयपुर में गोविंददेवजी के मंदिर में देखा। वे पूरे लवाजमे के साथ गोविंददेवजी के मंदिर में आये किंतु बिना कोई सनसनी उत्पन्न किये।

    15 मई 2010 को उनके निधन का दुःखद समाचार मिला। अगले दिन के समाचार पत्रों में बड़े-बड़े समाचार और चित्र प्रकाशित हुए। एक दिन पिताजी ने अखबार उठाकर कहा- भैरोंसिंहजी को श्रद्धांजलि देनी चाहिये। उन दिनों मैं, दैनिक नवज्योति में तीसरी आँख शीर्षक से एक स्तम्भ लिखा करता था पश्चिमी राजस्थान में लोगों की जिह्वा पर चढ़ा हुआ था। उसी स्तम्भ में मैंने 18 मई 2010 को एक लेख लिखा- कहाँ गई दुनिया की वह सादगी, सरलता एवं भोलापन ! यह मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि थी। मैं उन्हें शाब्दिक श्रद्धांजलि के अतिरिक्त और दे ही क्या सकता था!

    मेरा उन्हें शत-शत प्रणाम है। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर के शब्दों में- जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को। वे पुनीत अनल ही तो थे!

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-30

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-30

    पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर (1)


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    ओरण


    ओरण शब्द, अरण्य से बना है जिसका अर्थ होता है, जंगल। प्राचीन काल से यह परम्परा चली आ रही है कि गांव की सीमा से संलग्न कुछ क्षेत्र ओरण के रूप में छोड़ा जाये। राजस्थान में वह परम्परा आज भी चल रही है तथा हर गांव के बाहर ओरण के लिये पर्याप्त क्षेत्र खाली छोड़ा गया है। हिन्दू पुराणों के अनुसार ग्राम्य वन अथवा ओरण किसी स्थानीय वीर अथवा लोक देवता के नाम पर समर्पित होता है। ओरण के भीतर उस वीर अथवा लोक देवता का मंदिर बना होता है। ओरण की रक्षा के लिये समस्त ग्रामवासी एक निश्चित एवं कठिन आचार संहिता का पालन करते हैं। ओरण में रहने वाले वन्य जीवों के साथ किसी तरह की छेड़-छाड़ नहीं की जाती। उन्हें पकड़ा अथवा उनका शिकार नहीं किया जाता। ओरण से हरा पेड़ नहीं काटा जाता। केवल सूखी हुई लकड़ी एकत्रित की जा सकती है। किसी भी स्थानीय व्यक्ति का पशु, ओरण में स्वच्छंद रूप से घूम एवं चर सकता है। यदि कोई व्यक्ति ओरण के नियम तोड़ता है तो उसे पंचायत में जुर्माना भरना होता है। बड़ा अपराध करने वाले व्यक्ति का पूरे गांव द्वारा सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है।

    राजस्थान के मरुस्थलीय जिलों में भी ओरणों के प्रति पर्याप्त चेतना है। यहाँ 50 हैक्टेयर से लेकर 7,000 हैक्टेयर क्षेत्रफल तक के ओरण विद्यमान हैं। मरुस्थलीय जोधपुर संभाग में 1,759 गांवों में ओरण विद्यमान हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 1,34,750 हैक्टेयर है। बाड़मेर जिले में चोहटन के पास ढोक विरारा माता का ओरण 17,947 बीघा क्षेत्र में तथा शिव के पास उणरोद का ओरण 10,463 बीघा में विस्तृत है। जैसलमेर जिले में भादरियाजी का ओरण 42 हजार बीघा में, रामदेवरा का ओरण 35,171 बीघा में तथा पोकरण के पास एटा में 33,124 बीघा में ओरण स्थित है। जोधपुर जिले में फलौदी के पास बरासिंघा का बाड़ा ओरण 55,315 बीघा में तथा कोलू पाबूजी का ओरण 15,845 बीघा में विस्तृत है।

    देवी-देवताओं को समपर्तित ओरण

    राजस्थान में विभिन्न देवी-देवताओं, संतों, वीरों आदि के नाम पर ओरण समपर्पित किये गये हैं। इन देवी-देवताओं, संतों एवं वीरों के नाम छोड़े गये ओरण इस प्रकार से हैं-

    देवियों को समर्पित ओरण : बांकल माता का ओरण, आवड़ माता का ओरण, देवल माता का ओरण, नागणेची माता का ओरण, जगदम्बा माता का ओरण, करणी माता का ओरण, खूबड़ माता का ओरण, कोटड़िया माता का ओरण, गादेश्वरी माता का ओरण, गोमा माता का ओरण, रावतारी माता का ओरण, शीतलामाता माता का ओरण, आशापूर्णा माता का ओरण, हिंगलाज माता का ओरण, चामुण्डा माता का ओरण, अम्बा माता का ओरण, आशा माता का ओरण, आई माता माता का ओरण।

    देवताओं के ओरण : गणेशजी का ओरण, शिवजी का ओरण, हनुमानजी का ओरण, ठाकुरजी का ओरण, नृसिंहजी का ओरण, श्यामजी का ओरण, सांवलजी का ओरण, मालणजी का ओरण, गोगाजी का ओरण, रामदेवजी का ओरण, पाबूजी का ओरण, माण्डनजी का ओरण।

    नाथ धर्म के साधुओं को समर्पित ओरण : भैंरूनाथजी का ओरण, बालकनाथजी का ओरण, धोरानाथ का ओरण, बादलपुरी का ओरण, मेहरनाथ का ओरण, मोडजी का ओरण, गंगापुरी का ओरण, राघवपुरी का ओरण, संतोष भारती का ओरण, बादलपुरी का ओरण आदि।

    क्षेत्रपाल, वीरजी एवं झुंझारजी के ओरण : खेतपालजी का ओरण, मामाजी का ओरण, भोमियाजी का ओरण, झुंझारजी का ओरण, खंगारजी का ओरण, भूरा राठौड़ का ओरण, पीर सरदार का ओरण, केनाजी का ओरण, जेतजी का ओरण आदि।


    गोचर

    गायों के चरने के लिये छोड़ा गया स्थान गोचर कहलाता है। राजस्थान में परम्परागत रूप से हर गांव के निकट गोचर छोड़ा जाता था। इस भूमि पर न तो मकान बनाये जाते थे और न खेती की जाती थी। आज भी यह परम्परा अस्तित्त्व में है। राजस्थान के गांवों के बाहर वर्तमान में एक हैक्टेयर से लेकर 10 हजार हैक्टैयर तक के गोचर उपलब्ध हैं। इनका रख-रखाव ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है। राजस्थान में 88,56,101 हैक्टेयर गोचर भूमि है जो कि कुल उपलब्ध भूमि का 41.8 प्रतिशत है। इसमें से 9,11,233 हैक्टेयर स्थायी गोचर भूमि, 70,50,577 हैक्टेयर ऊसर भूमि तथा 8,93,691 हैक्टेयर सीमांत भूमि है।

    राज्य के मरुस्थलीय जिलों में भी गोचरों का पर्याप्त प्रावधान किया गया है। मरुस्थलीय जोधपुर संभाग में 2,826 गांवों में गोचर विद्यमान हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 3,58,395 हैक्टेयर है। इन भूमियों में सेवण तथा धामण जैसी घासें स्वाभाविक रूप से उगती और पनपती हैं जो पशुओं के लिये उत्तम आहार का काम करती हैं। छोटे गोचरों में तथा मरुस्थलीय गोचरों में वर्षा काल को छोड़कर प्रायः घास का अभाव रहता है तथा झाड़ियों की संख्या कम होने से भी ये पशु चारण की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करते हैं। फिर भी राजस्थान के गोचरों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। ये भी पर्यावरण के मजबूत प्रहरी है। यदि राजस्थान में गोचर छोड़ने की परम्परा नहीं होती तो पर्यावरण को निःसंदेह बहुत बड़ी क्षति पहुंची होती।

    पारिस्थितिकी तंत्र के पहरेदार

    वर्षा की कमी, मरुस्थलीय प्रसार एवं तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा पालतू पशुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण राज्य का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक अवस्था में है। राज्य में बड़ी संख्या मंर उपस्थित ओरणों और गोचरों ने राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र को सफलतापूर्वक थाम रखा है। इस दृष्टि से ओरण एवं गोचर, पर्यावरण की रक्षा के लिये सबसे मजबूत पहरेदार सिद्ध हुए हैं। ओरण और गोचर क्षेत्र की वनस्पतियां पर्यावरण को ऑक्सीजन, कार्बनिक अवशिष्ट तथा पशु-पक्षियों को आश्रय एवं भोजन देकर और मृदा अपरदन को रोककर पास्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाती हैं।

    ग्रामीणों की वानस्पातिक आवश्यकताओं का अक्षय भण्डार

    ओरण एवं गोचरों से स्थानीय लोगों को जलाऊ लकड़ी, पशु चारा, गोंद, कूमट के बीज, खेजड़ी की सांगरियां, गूगल, शहद, विभिन्न प्रकार की औषधियां तथा विविध प्रकार के वानस्पातिक उत्पाद प्राप्त होते हैं। इसलिये इन्हें स्थानीय लोगों के लिये प्राकृतिक सम्पदा का अक्षय गोदाम कहा जा सकता है। ओरण एवं गोचर, ग्रामीण क्षेत्र में उपयोग में ली जाने वाली खाट बुनने के लिये मूंझ, झौंपड़ी बनाने के लिये लकड़ियां, बाड़े की चार दीवारी बनाने के लिये कांटों आदि की आपूर्ति भी करते हैं। ओरणों में पनपने वाला फोग तो ग्रामीण जीवन की धुरी कहा जा सकता है। ओरणों में खड़े देशी बबूल एवं विदेशी बबूल की झाड़ियां जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी एवं पशु चारा तक उपलब्ध कराते हैं। गहरी जड़ों वाली बूई नामक झाड़ी, ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ू की आवश्यकता पूरी करती है।

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  • भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास - प्रस्तावना

     02.06.2020
    भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास - प्रस्तावना

    भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    (भारतीय विश्वविद्यालयों में, सभ्यता एवं संस्कृति विषय के पाठ्यक्रमों पर आधारित सम्पूर्ण पुस्तक )

    लेखक: डॉ. मोहनलाल गुप्ता




    मुद्रित पुस्तक प्राप्त करने का पता


    लिटरेरी सर्किल, सी-13, प्रथम तल, खण्डेलवाल गर्ल्स कॉलेज के सामने,

    संसार चंद्र रोड, 
    जयपुर- 302001, राजस्थान


    फोन- 0141 2376922, 4004330, सैलफोन- 9660660333, 9414054330



    प्रस्तावना


    'भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति' विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृतियों में से एक है। इसके उद्भव के समय दक्षिणी अमरीका की माया सभ्यता, अफ्रीका में नील नदी के किनारे विकसित मिश्र की सभ्यता और एशिया में विकसित सुमेरियन सभ्यताएं ही कर सकती हैं। जिनमें से माया सभ्यता और सुमेरियन सभ्यताएं अब काल के गाल में समा चुकी हैं।

    इस पुस्तक में मनुष्य द्वारा भारत में विकसित प्रस्तर युगीन सभ्यताओं से लेकर वर्तमान काल की सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास लिखा गया है। पुस्तक के प्रारम्भ में सभ्यता एवं संस्कृति की परिभाषाएं, सभ्यता एवं संस्कृति में अंतर, भारतीय संस्कृति की विशेषताएं तथा भारतीय संस्कृति के इतिहास को जानने के साधनों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। भारत में आर्य सभ्यता के प्रसार से पहले पाषाण, ताम्र एवं कांस्य कालीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का विकास हुआ। इन सभ्यताओं के संवाहक सैन्धववासी द्रविड़ एवं वनवासी कोल, किरात मुण्डा आदि जनजातियों के लोग थे। माना जाता है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम परिचय आर्यों से हुआ तथा आर्यों ने ही भारत में कृष्ण-अयस अथवा लोहे की संस्कृति को जन्म दिया।

    सिंधु सभ्यता अत्यंत सुविकसित सभ्यता थी जिसने सुसंस्कृत समाज को जन्म दिया। इस समाज के पास धर्म, अर्थ, युद्धकौशल, धातु-विज्ञान, मूर्ति-कला, नृत्य-कला, लिपि, माप-तोल आदि का ज्ञान था।

    आर्यों ने जिस संस्कृति को जन्म दिया वह वैदिक ज्ञान पर आधारित थी तथा वही ज्ञान विकसित होता हुआ वर्तमान सभ्यता की आत्मा बना हुआ है। आर्यों की सभ्यता यद्यपि धर्म-प्रधान सभ्यता थी तथापि आर्य युद्ध कौशल, शिल्प, कृषि एवं पशुपालन की दृष्टि से भी श्रेष्ठ थे। उन्होंने विपुल धर्म-ग्रंथों की रचना की जो अन्य संस्कृतियों में मिलने दुर्लभ हैं। आर्यों ने वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया जो आगे चलकर जाति व्यवस्था के रूप में विकसित हुई। आर्यों की आश्रम व्यवस्था संसार की सबसे अद्भुत सामाजिक एवं आध्यात्मिक व्यवस्था थी जो मनुष्य को आजीवन सन्मार्ग पर चलने के लिए मार्ग दिखाती थी।

    पुस्तक में सिक्ख धर्म एवं इस्लाम का भी समुचित विवेचन किया गया है। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की मांग के अनुसार पुस्तक के अंत में भारतीय कला, साहित्य, मंदिर, राजनीतिक पुनर्जागरण, भारत के प्रमुख वैज्ञानिक एवं भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव का भी विवेचन किया गया है।

    आशा है यह पुस्तक भारतीय के विश्वविद्यालयों में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति विषयक पाठ्यक्रम की आवश्यकता को पूरा करने वाली सिद्ध होगी।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता




    अनुक्रमणिका

    1. सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

    2. भारतीय संस्कृति के प्रधान तत्त्व एवं विशेषताएँ

    3. भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन

    4. भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

    5. भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

    6. सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज

    7. भारत में लौह युगीन संस्कृतियाँ

    8. दक्षिण भारत में महा-पाषाण संस्कृति

    9. वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

    10. ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

    11. उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म

    12. उपनिषदों का चिंतन

    13. महाकाव्य काल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव

    14. श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

    15. जैन-धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव

    16. बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव

    17. पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास

    18. शैव एवं शाक्त धर्म

    19. संगम युग का साहित्य, समाज एवं संस्कृति

    20. इस्लाम का जन्म एवं प्रसार

    21. भारत में सूफी मत

    22. सिक्ख धर्म एवं उसका इतिहास

    23. प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र

    24. आर्यों की वर्ण व्यवस्था

    25. हिन्दुओं की जाति-प्रथा

    26. भारत में परिवारिक जीवन

    27. संस्कार

    28. पुरुषार्थ-चतुष्टय

    29. आर्यों की आश्रम-व्यवस्था

    30. समाज में नारी की युग-युगीन स्थिति

    31. जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन

    32. भारत का मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन

    33. मध्य-कालीन भारतीय समाज

    34. भारतीय कलाएँ

    35. भारतीय मूर्तिकला

    36. भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

    37. दक्षिण भारत का मंदिर स्थापत्य

    38. भारत की चित्रकला

    39. भारतीय साहित्यिक विरासत ( कालीदास, तुलसीदास मीराबाई, टैगार)

    40. उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज सुधार आंदोलन

    41. राष्ट्रीय आंदोलनों में तिलक, गांधी और सुभाषचंद्र बोस का योगदान

    42. भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव

    43. भारत के प्रमुख वैज्ञानिक (सुश्रुत, चरक, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, जे. सी. बोस, सी. वी. रमन)

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  • युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

     02.06.2020
    युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

    धनतेरस को प्रकट हुई ज्योति

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    श्री भैरोंसिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर 1923 को धनतेरस के दिन, राजपूताने की जयपुर रियासत के सीकर ठिकाणे के खाचरियावास गांव में एक सामान्य राजपूत कृषक परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम देवीसिंह शेखावत तथा माता का नाम बन्नेकंवर था। भैरोंसिंह अपने माता-पिता की प्रथम संतान थे। उनके बाद तीन छोटे भाई तथा चार बहिनों का जन्म हुआ। भैरोंसिंह का ननिहाल चूरू जिले के सहनाली बड़ी गांव में था।

    तीस किलोमीटर पैदल

    भैरोंसिंह के पिता देवीसिंह एक आदर्श अध्यापक थे। रूढ़िवाद के विरोधी और समाज में समता के पक्षधर देवीसिंह ने बुराइयों के समक्ष कभी सिर नहीं झुकाया। इसी आदत के कारण एक बार वे अपना गांव छोड़कर सवाईमाधोपुर जिले के बीछीदाना गांव में रहने लगे। वहीं पर उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। भैरोंसिंह को सुंदर हस्तलेख और अनुशासन पिता से विरासत में मिले। बीछीदाना में पढ़ते हुए जब कुछ साल हो गये तो उन्हें जोबनेर के एंग्लोवैदिक स्कूल में पढ़ने भेजा गया। उस समय मोटरें नहीं थीं। कई बार वे जोबनेर से खाचरियावास तक की 30 किलोमीटर की दूरी वे पैदल ही पार करते थे। हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ई.1941 में उन्हें जयपुर के महाराजा कॉलेज के प्रथम वर्ष में भर्ती करवाया गया। कॉलेज की शिक्षा के दौरान उन्होंने नाटकों में भी भाग लिया।

    पीपल के पेड़ के नीचे बारात

    3 जुलाई 1941 को उनका विवाह जोधपुर रियासत के बुचकला गांव की सूरजकंवर से कर दिया गया। उनकी बारात जोबनेर से पीपाड़रोड तक रेलगाड़ी से पहुंची तथा वहां से बैलगाड़ियों में बैठकर बुचकला पहुंची। बुचकला में उनकी बारात अडूणिया बेरा के पीपल के नीचे दो दिन ठहरी। भैरोंसिंह के ससुराल में ससुर कल्याणसिंह राठौड़, सास सदाकंवर, पांच साले तथा एक साली थी। भैरोंसिंह की पत्नी सूरजकंवर अपने पीहर में सबसे छोटी थीं।

    नाडी का पानी पिया

    भैरोंसिंह अपने विवाह के पश्चात् पीपाड़ रोड से पैदल ही अपने ससुराल बुचकला पहुंचे थे। बीच मार्ग में जब उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने एक नाडी में अपने हाथों से पानी पिया। इससे उन्हें नारू रोग हो गया। इस रोग का निशान जीवन भर उनके शरीर पर बना रहा। ई.2004 में भैरोंसिंह जब उपराष्ट्रपति थे, तब वे पुनः बुचकला गये और वहां आम सभा में उन्होंने स्वयं यह किस्सा सुनाया।

    सिर से पिता का साया उठा

    ई.1942 में देवीसिंह शेखावत का निधन हो गया। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मां बन्ने कंवर ने निभाई। उनकी माँ ने बहुत कठिन परिश्रम करके परिवार को चलाया। भैरोंसिंह स्वयं इस बात को कितनी ही बार दोहराते थे कि उनकी माता किस तरह चक्की चलाती थी। किंतु भैरोंसिंह की पढ़ाई आगे नहीं चल पाई। परिवार के निर्वहन के लिये भैरोंसिंह ने सीकर ठिकाणे के पुलिस विभाग में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर की नौकरी कर ली किंतु पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आई। उनका मन राजनीति की ओर झुकने लगा।

    लगान वसूलने वालों ने बनाया उन्हें भैरोंसिंह

    एक बार उनके गांव में ड्डियों का दल सारे खेतों को चट कर गया। इसके उपरांत भी सरकारी हरकारे लगान लेने पहुंच गये। इस लगान के विरोध की भावना से एक नया भैरोंसिंह निकलकर सामने आया। उनकी मां कहती थी कि एक पण्डित ने उन्हें बताया था कि भैरोंसिंह गांव और परिवार का नाम रोशन करेगा। ई.1952 में विधायक बनने से लेकर अपने अंतिम समय तक उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था।

    बिशनसिंह के कहने से मिला टिकट

    1952 के प्रथम आम चुनावों में जनसंघ को दाता रामगढ़ से कोई उपयुक्त प्रत्याशी नहीं मिल रहा था। तब बिशनसिंह शेखावत ने लालकृष्ण आडवानी को सुझाव दिया कि मेरे एक भाई भैरोंसिंह शेखावत पुलिस में हैं, आप उन्हें टिकट दे दें। इस पर उन्हें विधायक का टिकट दिया गया।

    सूरजकंवर से लिये दस रुपये

    चुनाव लड़ने के लिये सीकर जाना आवश्यक था और सीकर जाने के लिये जेब में रुपये होने आवश्यक थे किंतु मनमौजी भैरोंसिंह की जेब में कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपनी पत्नी से दस रुपये मांगे। उदारमना पत्नी ने उनकी मांग पूरी की और भैरोंसिंह दस रुपये लेकर सीकर आ गये। इसके बाद उनका जनसंघ से जुड़ाव हुआ। उन्हें दीपक चुनाव चिह्न के साथ जनसंघ का टिकट मिला और वे 2,833 वोटों से जीत हासिल करके राजस्थान की प्रथम विधानसभा के सदस्य बन गये।

    जागीरदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन

    सितम्बर 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ की स्थापना कर चुके थे। जनसंघ की शाखाएं गांवों एवं पंचायतों तक स्थापित करने में जागीरदारों ने अच्छा योगदान दिया। उन्हें आशा थी कि जागीरदारी प्रथा जारी रखवाने में जनसंघ से सहायता मिलेगी। राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में जागीदारों की सहायता से जनसंघ ने 50 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। उनमें से 30 की जमानतें जब्त हो गईं। भैरोंसिंह सहित जनसंघ के केवल आठ विधायक जीते जिनमें से अधिकतर जागीरदार ही थे। राजस्थान की प्रथम निर्वाचित सरकार ने जागीरदारी उन्मूलन का कार्य आरंभ किया तो जनसंघ के विधायक इसके विरोध में खड़े हो गये किंतु भैरोंसिंह शेखावत तथा जगतसिंह झाला ने जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का समर्थन किया। पार्टी के छः विधायकों ने जो कि स्वयं जागीरदार थे, भैरोंसिंह को जनसंघ से निकलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। इस पर भैरोंसिंह शेखवात दिल्ली जाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा दीनदयाल उपाध्याय से मिले। दोनों नेता भैरोंसिंह के तर्कों से सहमत हुए और जागीरदार विधायकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई।

    नमस्ते सदा वत्सले

    भारत माता के प्रति उनकी निष्ठा, भक्ति और समर्पण अटूट था। जब 1952 में वे जनसंघ से विधायक बने तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर उनका झुकाव हुआ। वे प्रायः संघ के कार्यक्रमों में संघ का गणवेश धारण करके जाते थे। सदा वत्सला भारत माता के प्रति उनका यह नमन सदैव बना रहा।

    लगातार चार बार विधायक बने

    वर्ष 1952 में दांता रामगढ़ विधान सभा सीट जीतने के बाद भैरोंसिंह शेखावत वर्ष 1957 में श्रीमाधोपुर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। 1962 और 1967 में वे जयुपर की किशनपोल सीट से विधायक चुने गये। इस प्रकार वे अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही चार बार लगातार विधायक बने।

    गांधीनगर सीट से हारे

    1972 के विधानसभा आम चुनावों में भैरोंसिंह शेखावत ने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने कांग्रेस के जनार्दन सिंह गहलोत खड़े हुए। चुनाव प्रचार के दौरा भैरोंसिंह शेखावत वोट मांगने के लिये जनार्दनसिंह के माता-पिता के घर भी गये और उनसे अपने लिये वोट मांगा। एक बार प्रचार के दौरान दोनों प्रत्याशी आमने-सामने हो गये। इस पर भैरोंसिंह शेखावत ने जनार्दनसिंह से सबके सामने कह दिया कि तुम जीत रहे हो। ऐसा ही हुआ। भैरोंसिंह यह चुनाव हार गये।

    बाड़मेर सीट से हारे

    गांधीनगर सीट से चुनाव हारने के बाद भैरोंसिंह शेखावत ने बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा किंतु इस चुनाव में भी उन्हें कांग्रेस के अमृत नाहटा से पराजय का सामना करना पड़ा।

    राज्यसभा में

    दो बार लगातार विधान सभा चुनावों में मिली पराजय किसी के लिये भी बड़ा झटका हो सकती थी किंतु वर्ष 1974 में मध्यप्रदेश जनसंघ ने भैरोंसिंह शेखावत को राज्यसभा में मनोनीत कर दिया और वे 1974 से 1977 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

    पौने दो साल जेल में

    ई.1975 में जब देश में आपात् काल लगा तो जून 1975 से मार्च 1977 तक भैरोंसिंह शेखावत मीसा के अंतर्गत जेल में बंद रहे।

    पहली बार मुख्यमंत्री

    आपात्काल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में देश में जनता पार्टी का गठन हुआ। इस नई पार्टी में जनसंघ का भी विलय हो गया। भैरोंसिंह भी जनता पार्टी में सम्मिलित हो गये। उसी वर्ष राजस्थान में विधानसभा के लिये मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें जनता पार्टी को 200 में से 150 स्थान प्राप्त हुए। उस समय बहुत से सदस्य डूंगरपुर के पूर्व महारावल लक्ष्मणसिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जो कि उच्च कोटि के वक्ता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे किंतु जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व भैरोंसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिये जनता पार्टी के मास्टर आदित्येन्द्र तथा भैरोंसिंह शेखावत के बीच मुकाबला हुआ जिसमें शेखावत की जीत हुई और उन्होंने राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी। शेखावत उस समय मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सदस्य थे। 22 जून 19977 को चौपन वर्ष की आयु में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली इस कारण उन्हें राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देनी पड़ी।

    पहला मंत्रिमण्डल

    27 जून 1977 को शेखावत सरकार में मास्टर आदित्येन्द्र, प्रो. केदार नाथ, ललित किशोर चतुर्वेदी, सम्पत राम तथा त्रिलोकचंद जैन को कैबीनेट मंत्री, कैलाश मेघवाल, विज्ञान मोदी, महबूब अली और विद्या पाठक को राज्य मंत्री बनाया गया।

    छबड़ा से चुने गये

    शेखावत ने राज्य सभा से त्यागपत्र देकर 18 अक्टूबर 1977 को कोटा जिले के छबड़ा विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा तथा विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की।

    पहली सरकार का विस्तार

    7 फरवरी 1978 को शेखावत सरकार का विस्तार किया गया। सूर्यनारायण चौधरी, भंवरलाल शर्मा, जयनारायण पूनिया, दिग्विजय सिंह व पुरुषोत्तम मंत्री को कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। कैलाश मेघवाल को भी कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। लाल चंद डूडी तथा नन्दलाल मीणा को राज्यमंत्री बनाया गया। जुलाई 1978 में केन्द्र में मोरारजी सरकार गिर गयी और चरणसिंह सरकार का जन्म हुआ। इस कारण राजस्थान में लालचंद डूडी तथा विज्ञान मोदी ने 8 जुलाई 1978 को भैरोंसिंह सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 5 नवम्बर 1978 को शेखावत मंत्रिमण्डल का तीसरा विस्तार किया गया। माणकचंद सुराणा, कल्याणसिंह कालवी, डॉ. हरिसिंह और बिरदमल सिंघवी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा हरिसिंह यादव और भैरवलाल काला बादल को राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। 18 मई 1979 को मास्टर आदित्येन्द्र, 21 जुलाई को प्रो. केदार नाथ और 2 अगस्त को डॉ. हरिसिंह ने शेखावत सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 20 दिसम्बर 1979 को शिवचरण सिंह गुर्जर को सरकार में कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया।

    कर्मचारियों को वापस नौकरी में लिया

    आपात्काल में बहुत से कर्मचारियों को राजकीय सेवा से निकला दिया गया था। भैरोंसिंह शेखावत अभावों की मार को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने आपात काल में निकाल गये समस्त कर्मचारियों को फिर से सेवा में रख लिया और जितने समय वे बंदी रहे, उस काल के समस्त वित्तीय लाभ भी उन्हें दे दिये। आपात् काल के बाद प्रमुख लोग तो जेलों से बाहर आ गये किंतु बहुत से सामान्य जन अब भी जेलों में बंद थे। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने उन सबको भी जेल से बाहर निकाला।

    जस्टिस कानसिंह परिहार आयोग का गठन

    आपात् काल में कुछ सरकारी कर्मचारियों ने जनता के साथ ज्यादतियां कीं। उनका प्रतिकार करने के लिये भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कानसिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग के पास शिकायतों के ढेर लग गये। ये आवेदन आपातकाल में जबरन नसबंदी करने, जबरन सेवानिवृत्ति करने, अकारण बंदी बनाने तथा अतिक्रमण नाम देकर वैध निर्माणों को तोड़ने से सम्बन्धित थे। जस्टिस परिहार ने कड़ी मेहनत करके इन शिकायतों का वर्गीकरण किया तथा उनके सम्बन्ध में पांच सौ प्रतिवेदन तैयार किये। इनमें से कुछ प्रतिवेदनों पर ही सरकार कार्यवाही कर सकी। शेष पर कार्यवाही होने से पहले ही राज्य में पुनः राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

    बाण्या की नौकरी कर ले

    मुख्यमंत्री बनने के बाद भैरोंसिंह शेखावत को प्रायः सचिवालय में बैठकर देर रात तक काम करना पड़ता था। उनकी माँ को यह समझ में नहीं आया कि बेटे ने कौनसी नौकरी कर ली है। न तो समय पर घर आता है और न समय पर खाना खाता है। एक दिन मां से रहा नहीं गया और अपने मुख्यमंत्री पुत्र से बोली- बेटा इसी कुण सी नौकरी कर ली, जो खाबा को पतो न सोबा को। तू तो आ नौकरी छोड, कोई बाण्या की नौकरी कर ले।

    अपने विरोध के लिये दी गई पार्टी में पहुंचे

    एक बार जनार्दनसिंह गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के विरोध में कार्यवाही करने के लिये अपने घर पर कुछ नेताओं की पार्टी रखी। इसमें भैरोंसिंह शेखावत मंत्रिमण्डल के कुछ कैबीनेट मंत्री और विधायक भी सम्मिलित हुए। यह बात भैरोंसिंह शेखावत को ज्ञात हो गई। इस पर शेखावत ने उन्हें फोन करके उलाहना दिया कि मुझे भोज में क्यों नहीं बुलाया। मैं आ रहा हूँ। आधे घण्टे में ही शेखावत, जनार्दनसिंह के घर पहुंच गये। जनार्दनसिंह की सारी योजना पर पानी फिर गया।

    उन्होंने निर्धनता का दंश स्वयं झेला था

    भैरोंसिंह शेखावत ने स्वयं निर्धनता का दंश झेला था। निर्धन के उत्थान के प्रति उनके मन में सदैव ललक रहती थी। वे राजस्थान मंक आदर्श गांवों की स्थापना करना चाहते थे। जब वे उपराष्ट्रपति बने तो प्रायः अपने भाषणों में एक बात कहा करते थे कि गरीबों को लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में स्थापित कर, देश के संसाधनों पर उनका सर्वोपरि अधिकार स्थापित किया जाना चाहिये।

    अंत्योदय योजना के जनक

    भैरोंसिंह शेखावत गरीबों के सम्मानपूर्ण जीवन के पक्षधर थे। इसके लिये उन्होंने अंत्योदय योजना बनाई और उसे सर्वप्रथम राजस्थान में ही लागू किया। इस योजना के आरंभिक प्रावधानों में प्रत्येक गांव से सबसे गरीब पांच परिवारों को चयन करना, उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों यथा पशुपालन, कुटीर उद्योग, ऊँटगाड़ा आदि के लिये बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाना आदि सम्मिलित थे। बाद में यह योजना पूरे देश में लागू हुई और आगे चलकर एकीकृत ग्रामीण विकास योजना का मुख्य आधार बनी। इस योजना के सम्बन्ध में उनका कहना था- जैसे शरीर के एक अंग में विकृति आने से पूरे शरीर पर असर पड़ता है, इसी तरह समाज में कहीं भी विकृति आने से लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। इस योजना का अंत्योदय योजना ही सफल प्रयोग है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस योजना की प्रशंसा की। आज भी यह योजना भारत सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में चला रही है।

    भारत के रॉक्फेलर

    अंत्योदय योजना इतनी प्रसिद्ध हुई कि विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैक्नमारा ने इस योजना की सराहना करते हुए भैरोंसिंह को भारत का रॉक्फेलर कहा।

    विश्व बैंक भी सहायता के लिये आगे आया

    राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते भैरोंसिंह शेखावत ने अपना गांव - अपना काम योजना एवं काम के बदले अनाज योजना आरंभ कीं। इन योजनाओं को गरीबी उन्मूलन के लिये अत्यंत उपयोगी माना गया। कुछ समय बाद केन्द्र सरकार के निर्देश पर अन्त्योदय योजना को काम के बदले अनाज योजना में बदल दिया गया। इस योजना में राजस्थान ने अन्य समस्त राज्यों की अपेक्षा सर्वाधिक कार्य किया तथा 1,80,000 टन अनाज उठाया। इस कारण विश्व बैंक भी इन योजनाओं के संचालन के लिये राज्य सरकार की सहायता करने के लिये आगे आया।

    पंचायतों को काम करने के अधिकार दिये

    उस समय तक पंचायतें कवल पांच सौ रुपये तक की योजनाएं ही हाथ में ले सकती थीं किंतु भैरोंसिंह शेखावत की पहली सरकार ने इस सीमा को पाचास हजार रुपये कर दिया तथा प्रत्येक पंचायत समिति के लिये निर्माण कार्यों की सीमा दस लाख रुपये कर दी।

    भारतीय जनता पार्टी में

    वर्ष 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इस प्रकार वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे।

    राज्य में राष्ट्रपति शासन

    जनवरी 1980 में केन्द्र में कांग्रेस (इ) सरकार का निर्माण हुआ जिसने 17 फरवरी 1980 को राज्य की शेखावत सरकार की प्रथम सरकार को बर्खास्त करके विधान सभा को भंग कर दिया। राज्य मं। तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने अपनी पहली पारी में 2 वर्ष 8 महीने कार्य किया।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

    1980 के विधानसभा चुनावों में श्री भैरोंसिंह शेखावत ने छबड़ा से दुबारा चुनाव लड़ा और वे विजयी रहे किंतु उनकी पार्टी चुनाव हार गई तथा कांग्रेस की सरकार बनी। भैरोंसिंह शेखावत भापजा विधायक दल के नेता चुने गये तथा नेता प्रतिपक्ष बने। पूरे पांच साल तक वे इस पद पर बने रहे।

    दुबारा नेता प्रतिपक्ष

    1985 में आठवीं राजस्थान विधान सभा में भी कांग्रेस की सरकार बनी। इस विधानसभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने निंबाहेड़ा तथा अजमेर विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और वे दोनों ही सीटों पर विजयी रहे। इस विधानसभा में भी भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष के पद पर कार्य करते रहे।

    सती प्रथा का प्रबल विरोध

    4 सितम्बर 1987 को सीकर जिले के दिवराला गांव में रूपकंवर सती काण्ड हुआ। देश भर में इसकी तीव्र निंदा हुई। उस समय श्री हरिदेव जोशी राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने के लिये कानून बनाया। 2 नवम्बर 1987 को राजस्थान विधान सभा में भैरोंसिंह शेखावत ने इस प्रथा का प्रबल विरोध किया भैरोंसिंह शेखावत ने विगत 150 वर्षों में राज्य में सती हुई स्त्रियों के आंकड़े एकत्रित किये तथा यह सिद्ध कर दिया कि यह एक भ्रम है कि सती प्रथा राजपूतों में प्रचलित है। विगत 150 वर्षों में अन्य जातियों में राजपूतों की स्त्रियों से भी अधिक स्त्रियां सती हुई हैं। उनका तर्क था कि इस कुरीति को जड़ से नष्ट करने के लिये प्रभावी उपाय होने चाहिये।

    भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार

    वर्ष 1990 में राजस्थान में नवम् विधानसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को 85, जनता दल अविभाजित को 54 तथा कांग्रेस (इ) को 50 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। भाकपा का एक प्रत्याशी जीता। निर्दलियों को 9 स्थानों पर विजय मिली। भाजपा के प्रत्याशी के रूप में भैरोंसिंह शेखावत ने दो सीटों- छबड़ा और धौलपुर से चुनाव लड़ा और दोनों ही स्थानों से विजयी रहे। इस कारण भाजपा की झोली में केवल 84 विधायक रह गये तथा किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। भाजपा ने जनता दल (अविभाजित) से सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया जो कि स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 4 मार्च 1990 को भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनायी।

    शेखावत के साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा व ललित किशोर चतुर्वेदी ने और जनता दल के नत्थीसिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 14 मार्च 1990 को भाजपा के कृष्ण कुमार गोयल, चतुर्भुज वर्मा, विजयसिंह झाला, रामकिशोर मीणा तथा पुष्पा जैन ने और जनता दल के दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान एवं सुमित्रासिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। भाजपा के हरलाल सिंह खर्रा, रमजान खां, कालूलाल गुर्जर, मोहन मेघवाल, जीवराज कटारा, कुंदनलाल मिगलानी, चुन्नीलाल गरासिया तथा जनता दल के फतहसिंह ने राज्यमंत्री पद की शपथ ली। 16 मार्च 1990 को हरिशंकर भाभड़ा को विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। 5 जुलाई 1990 को जनता दल के यदुनाथसिंह सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुने गये। बाद में 19 मार्च 1991 को यदुनाथसिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया एवं भाजपा के हीरासिंह चौहान उपाध्यक्ष बने।

    30 मई 1990 को भाजपा के हरि कुमार औदिच्य तथा विद्या पाठक को एवं जनता दल के प्रो. केदार नाथ, सम्पतराम व मदन कौर को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। उसी दिन भाजपा के जोगेश्वर गर्ग तथा शांतिलाल चपलोत को एवं जनता दल के रामेश्वर दयाल यादव, देवीसिंह भाटी, नफीस अहमदखां व गोपालसिंह खण्डेला को राज्यमंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर 1990 को भाजपा की अयोध्या रथ यात्रा के कारण जनता दल ने भाजपा सरकार से अलग होने का निर्णय लिया। 7 कैबीनेट मंत्रियों- नत्थीसिंह, सम्पतराम, प्रो. केदार, दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान, सुमित्रा सिंह और मदनकौर तथा चार राज्य मंत्रियों- फतहसिंह, गोपालसिंह खण्डेला, रामेश्वर दयाल यादव तथा नफीस अहमद ने सरकार से त्यागपत्र दे दिये जिससे सरकार अल्पमत में आ गयी। 5 नवम्बर 1990 को जनता दल के 22 विधायकों ने नत्थीसिंह के नेतृत्व को अस्वीकार करते हुए भाजपा को समर्थन जारी रखने की घोषणा की।

    8 नवम्बर 1990 को शेखावत सरकार ने विधान सभा में विश्वास का मत अर्जित कर लिया। सरकार के पक्ष में 116 तथा विरोध में 80 मत आये। विधान सभा अध्यक्ष ने मतदान नहीं किया। 24 नवम्बर 1990 को मंत्रिमण्डल का विस्तार किया गया। जनता दल (दिग्विजय) के दिग्विजय सिंह, गंगाराम चौधरी, लालचंद डूडी, भंवरलाल शर्मा, सम्पतसिंह, जगमालसिंह यादव, रामनारायण विश्नोई को कैबीनेट मंत्री, नफीस अहमद खां, उम्मेदसिंह, जगतसिंह दायमा, मान्धातासिंह, बाबूलाला खाण्डा और रतनलाल जाट को राज्य मंत्री तथा मिश्रीलाल चौधरी एवं डूंगरराम पंवार को उपमंत्री बनाया गया। निर्दलीय मदन मोहन सिंहल को राज्य मंत्री एवं रामप्रताप कासनिया को उपमंत्री बनाया गया। 9 जनवरी 1992 को जनता दल (दिग्विजय) के सम्पतसिंह और जगमाल सिंह ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 24 जनवरी 1992 को भाजपा के जोगेश्वर गर्ग और चुन्नीलाल गरासिया ने मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में सम्मिलित होने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। 17 फरवरी 1992 को भाजपा के कैलाश मेघवाल ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 1 दिसम्बर 1992 को भाजपा के कैबीनेट मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने अयोध्या में कारसेवा में भाग लेने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

    तीन जिलों का जन्म

    अपनी दूसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने दौसा, राजसमंद तथा बारां जिलों का गठन किया। इससे राज्य में जिलों की संख्या 27 से बढ़कर 30 हो गई। अपने इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत केन्द्र सरकार की आठवीं पंचवर्षीय योजना में राजस्थान को 11500 करोड़ रुपये स्वीकृत करवाने में सफल रहे। दूसरी सरकार भी राष्ट्रपति शासन की भेंट चढ़ी 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुई गतिविधियों को लेकर केन्द्र सरकार ने शेखावत सरकार को अपदस्थ कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया तथा विधानसभा भंग कर दी गयी। भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार राज्य में दसवीं विधान सभा के लिये 11 नवम्बर 1993 को मतदान हुआ। 27 नवम्बर को मतों की गिनती की गयी एवं चुनाव परिणाम घोषित किये गये। भाजपा को 95 स्थान, कांग्रेस (इ) को 76 स्थान, माकपा को 1 स्थान, जनता दल को 6 स्थान एवं निर्दलीय एवं अन्य को 21 स्थान प्राप्त हुए। भाजपा ने बाड़मेर में गंगाराम चौधरी को, चौहटन में भगवान दास डोसी को एवं डीग क्षेत्र में कुंवर अरुणसिंह को समर्थन प्रदान किया। इन तीनों को ही चुनावों में विजय प्राप्त हुई।

    भैरोंसिंह शेखावत ने दसवीं विधानसभा का चुनाव पाली जिले की बाली सीट से लड़ा थाजिसमें वे विजयी रहे। इस प्रकार 11 दिसम्बर 1993 को भैरोंसिंह शेखावत ने निर्दलियों के सहयोग से राज्य में तीसरी बार अपनी सरकार का गठन किया। जब उन्होंने अपनी तीसरी सरकार का गठन किया तो राष्ट्रपति शासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे 'सरकारी अवकाश' बताया।

    उनके साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा, ललित किशोर चतुर्वेदी, देवीसिंह भाटी, गुलाबचंद कटारिया, एवं निर्दलीय सुजानसिंह यादव एवं गंगाराम चौधरी को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। भाजपा के नाथूसिंह गुर्जर, राजेन्द्रसिंह राठौड़, जसवंतसिंह विश्नोई, श्रीकिशन सोनगरा, नन्दलाल मीणा, रामप्रताप कासनिया, अनंग कुमार जैन, मदन दिलावर, अचलाराम मेघवाल, सांवरलाल जाट, निर्दलीय रोहिताश्व कुमार, ज्ञानसिंह चौधरी, नरेन्द्र कंवर तथा शशि दत्ता को राज्य मंत्री बनाया गया। निर्दलीय गुरजंट सिंह तथा मंगलाराम कोली को उपमंत्री बनाया गया।

    22 दिसम्बर 1993 को भाजपा के अर्जुन सिंह देवड़ा को राज्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। 20 फरवरी 1994 को भाजपा के कैलाश मेघवाल एवं रघुवीरसिंह कौशल को कैबीनेट मंत्री के पद की शपथ दिलवायी गयी। जनता दल के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 6 अक्टूबर 1994 को विधानसभा अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा को कैबीनेट मंत्री, नसरूखां, बृजराजसिंह एवं पूंजालाल गरासिया को राज्यमंत्री बनाया गया। 27 फरवरी 1995 को बृजराजसिंह का निधन हो गया। मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण 17 जनवरी 1997 को शशि दत्ता ने तथा 20 जनवरी 1997 को पूंजालाल गरासिया ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। 7 दिसम्बर 1997 को एक वरिष्ठ अधिकारी से अशोभनीय व्यवहार करने पर देवीसिंह भाटी को भी मुख्यमंत्री के निर्देश पर त्यागपत्र देना पड़ा। 21 मार्च 1998 को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुन लिये जाने के बाद रघुवीरसिंह कौशल ने भी त्यागपत्र दे दिया। 1 जून 1998 को ज्ञानसिंह चौधरी ने निजी कारणों से त्यागपत्र दे दिया।

    2 जुलाई 1998 को भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा राजपाल सिंह शेखावत, कालीचरण सर्राफ, राजेन्द्र गहलोत, कन्हैयालाल मीणा, भंवरसिंह डांगावास, बाबूलाल वर्मा, सुन्दरलाल, अमराराम चौधरी, दलीचंद, शिवदानसिंह, महावीर भगोरा तथा उजला अरोड़ा को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। 8 जुलाई 1998 को विजयेन्द्रपाल सिंह को कैबीनेट मंत्री तथा चुन्नीलाल धाकड़ को राज्यमंत्री बनाया गया। दो उपमंत्रियों गुरजंट सिंह और मंगलाराम कोली को पदोन्नति देकर राज्यमंत्री बनाया गया।

    नये उद्योगों की स्थापना पर जोर

    भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थान में नये उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया और एक लाख तक की जनसंख्या वाले नगरों में नया उद्योग लगाने वालों को राजकीय सहायता देने का निर्णय किया। साक्षरता, वृक्षारोपण, परिवार नियोजन, स्त्री शिक्षा, आदि उनकी प्राथमिकता के मुख्य कार्यक्रम थे। जब 1993 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो परिवार नियोजन उके लिये पंचायती राज कानून में संशोधन करके एक प्रावधान किया गया कि दो से अधिक संतान वाला व्यक्ति पंच-सरपंच का चुना नहीं लड़ सकता। इसी कार्यकाल में शेखावत ने पंचायती राज तथा स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान करके भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में नई मिसाल स्थापित की। यह आरक्षण रोटेशन प्रणाली के आधार पर लागू किया गया।

    केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे

    राजस्थान के विपुल खनिज भण्डार की शक्ति से भैरोंसिंह भलीभांति परिचित थे। इसलिये वे प्रायः कहते थे कि केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे, हमारा राज्य देश भर की सीमेण्ट तथा मार्बल की मांग पूरी करने में सक्षम है।

    चुंगी की समाप्ति

    अपनी तीसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने नगर पालिका नाकों पर चुंगी वसूलने में हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये चुंगी समाप्त कर दी।

    नौवीं पंचवर्षीय योजना के आकार में ऐतिहासिक वृद्धि

    राजस्थान को स्वीकृत नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997 से 2000) के आकार में, आठवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में लगभग ढाई गुना की वृद्धि हुई। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। जहां आठवीं पंचवर्षीय योजना का आकर 11,500 करोड़ रुपये था, वहीं नौंवी पंचवर्षीय योजना का आकार 27,400 करोड़ रुपये हो गया।

    दो जिलों का निर्माण

    इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान में दो नये जिलों का गठन किया। श्रीगंगानगर जिले को विभाजित करके श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले बनाये गये तथा सवाईमाधोपुर जिले को विभाजित करके सवाईमाधोपुर एवं करौली जिले बनाये गये। इस प्रकार राज्य में जिलों की संख्या 32 हो गई।

    साक्षरता अभियान को अभूतपूर्व सफलता

    भैरोंसिंह शेखावत की इस तीसरी सरकार ने राज्य में सघन साक्षरता अभियान चलाया जिसे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। वर्ष 1991 की जनगणना में राज्य की साक्षरता 38 प्रतिशत पाई गई थी जो इस अभियान के कारण वर्ष 2001 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार निरक्षर राजस्थान साक्षर राजस्थान में बदल गया।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष

    भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया किंतु इसके बाद 1998 में ग्यारहवीं विधानसभा के लिये हुए चुनावों में भाजपा परास्त हो गई। उसे केवल 33 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 150 सीटें जीत कर प्रबल बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची। इस विधान सभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने बाली सीट से चुनाव लड़ा था जिसमें वे विजयी रहे तथा तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष बने।

    उपराष्ट्रपति पद पर विजयी

    वर्ष 2002 में भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी श्री सुशील कुमार शिंदे को सीधी टक्कर में परास्त किया। 19 अगस्त 2002 को भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के 11वें उपराष्ट्रपति बने।

    जीवन भर पढ़ते रहे

    भैरोंसिंह शेखावत हाई स्कूल तक पढ़े हुए थे किंतु सीखने, जानने और पढ़ने की ललक उनमें जीवन भर बनी रही। वे अपने सहायकों से विविधि विषयों पर नोट्स तैयार करवाते और उनका अध्ययन करके ही किसी विषय पर अपनी धारणा बनाते थे।

    तीन बार डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर

    आन्ध्र विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी ने भैरोंसिंह शेखावत को डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर की उपाधियाँ दीं। एशियाटिक सोसाइटी मुम्बई ने उन्हें ऑनरेरी फैलोशिप दी। येरेवान स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी आर्मेनिया ने उन्हें डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्रदान किया।

    राष्ट्रपति का चुनाव हारे

    जुलाई 2007 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल पूरा हुआ। भैरोंसिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। वे स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए। एनडीए के समस्त घटक दलों ने उनका समर्थन किया। उनके सामने राजस्थान की राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटील खड़ी हुईं। उन्हें यूपीए के घटक दलों एवं वामपंथी दलों ने समर्थन दिया। इस चुनाव में प्रतिभा देवीसिंह पाटील विजयी रहीं। 21 जुलाई 2007 को भैरोंसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे सदैव के लिये सक्रिय राजनीति से हट गये। इस समय तक उनकी आयु 84 वर्ष हो गई थी।

    कैंसर ने झकझोरा

    84 वर्ष की आयु में भैरोंसिंह शेखावत को कैंसर का दंश झेलना पड़ा। भारत के विभिन्न चिकित्सालयों में उनका उपचार करवाया गया किंतु वे पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो सके।

    जाति एवं समाज से निर्भय रहे

    4 सितम्बर 1987 को रूपकंवर सती हुई। उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी थे। भैरोंसिंह उन दिनों इंगलैण्ड की यात्रा पर थे। उन्होंने लंदन से वक्तव्य जारी करके सती काण्ड के दाषियों को दण्डित करने की मांग की। राजपूत समाज का बड़ा हिस्सा ऐसे किसी कदम के विरुद्ध पहले ही प्रतिबद्धता जता चुका था।

    भैरोंसिंह निर्भय होकर, अपने सिद्धांतों पर चले। वे जाति एवं समाज की नाराजगी से कभी डरे नहीं। जब कांग्रेस सरकार सती प्रथा के विरोध में कानून लाई तो भैरोंसिंह उसके समर्थन में खड़े हुए। शेखावत जब लंदन से लौटे तो उन्हें गद्दार कहा गया किंतु वे निर्भीक होक जनसभाओं में गये और अपने तर्को से सबको निरुत्तर कर दिया।

    रामनिवास मिर्धा से मिलता था चेहरा

    भैरोंसिंह शेखावत का चेहरा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामनिवास मिर्धा से मिलता था। कोई भी आदमी रामनिवास मिर्धा को देखकर उन्हें शेखावत समझने की भूल कर सकता था और कोई भी आदमी शेखावत को देखकर रामनिवास समझने की भूल कर सकता था। रामनिवास मिर्धा की पुत्री के विवाह में भैरोंसिंह साफा पहनकर पहुंचे। दोनों के साफे भी लगभग एक जैसे थे। इस पर रामनिवास मिर्धा ने भैरोंसिंह शेखावत से कहा कि आप तो मेहमानों का स्वागत करो, मैं मण्डप में जा रहा हूँ। इस पर शेखावत, मिर्धा के परिजनों के साथ उनके आगे खड़े हो गये। बहुत से लोग उन्हें मिर्धा समझकर लिफाफे पकड़ा गये। जब मिर्धा मण्डप से बाहर आये तो वे यह देखकर हैरान हो गये कि अतिथि किस तरह शेखावत को मिर्धा समझकर भ्रमित हो रहे हैं। शेखावत ने हँसकर लोगों को अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं रामनिवास मिर्धा हूँ और ये भैरोंसिंह शेखावत हैं।

    जूते खाओ, पर पुष्पचक्र चढ़ाओ

    1996 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भैरोंसिंह ने अपने दो मंत्रियों राजेन्द्रसिंह राठौड़ तथा रोहिताश्व शर्मा को प्रबंधन की जानकारी प्राप्त करने के लिये हैदराबाद भेजा। उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव का निधन हो गया। इस पर भैरोंसिंह ने दोनों मंत्रियों को निर्देश दिये कि वे सरकार की ओर से रामाराव की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करके आयें। जब राजस्थान सरकार के दोनों मंत्री पुष्पचक्र अर्पित करने गये तो लोगों ने उन पर चप्पलें फैंकनी आरंभ कर दीं तथा वापस जाओ-वापस जाओ के नारे लगाने लगे। इससे राजस्थान सरकार के मंत्री रामाराव की पार्थिव देह तक नहीं पहुंच सके। उन्होंने भैरोंसिंह को यह बात बताई तो भैरोंसिंह ने उन्हें निर्देश दिये कि चाहे कितने ही जूते चप्पल खाने पड़ें, पुष्पचक्र अर्पित करके ही आना। दोनों मंत्री पुनः उस स्थान पर गये जहां रामराव की पार्थिव देह दर्शनार्थियों के लिये रखी गई थी। इस बार वे अपने काम में सफल रहे। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि लोग राजेन्द्रसिंह राठौड़ को एन. टी. रामाराव को चंद्रबाबू नायडू समझ रहे थे जिन्होंने कुछ दिन पहले ही अपने श्वसुर की सरकार का तख्ता पलट किया था।

    गुटखा खाने वाले बाबोसा

    अपने गांव खाचरियावास में भैरोंसिंह शेखावत को बाबोसा के नाम से जाना जाता था। वे गुटखा (पान मसाला) खाने के शौकीन थे, राजस्थान का शायद ही ऐसा कोई गांव या नगर हो जिसमें उन्होंने अपने ऐसे मित्र न बना रखे हों जिनसे वे गुटखा मांगकर न खाते हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नवल किशोर शर्मा भी पान मसाला खाते थे। वे दोनों प्रायः परस्पर परिहास किया करते थे कि पान मसाला बनाने वाले हमें ही अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर क्यों नहीं रख लेते।

    दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री

    भैरोंसिंह शेखावत और सूरजकंवर को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम रतनकंवर रखा गया। रतनकंवर का विवाह नरपतसिंह राजवी से हुआ जो वसुंधरा राजे मंत्रिमण्डल में मंत्री रहे। रतनकंवर के दो पुत्र विक्रमादित्यसिंह तथा अभिमन्युसिंह हुए।

    भयभीत सांसद ने पांव पकड़े

    भैरोंसिंह शेखावत जब राज्यसभा के सभापति थे, उन दिनों एक सांसद लगातार तीन बार प्रश्नकाल के दौरान अनुपस्थित रहा। शेखावत राजस्थान विधानसभा के अनुभवों से समृद्ध थे। उन्होंने सांसद की पृष्ठभूमि की जांच करवाई। सांसद को भी जानकारी हो गई कि भैरोंसिंह शेखावत ने उनकी पृष्ठभूमि की जांच करवाई है। जब भैरोंसिंह शेखावत ने उस सांसद को अपने चैम्बर में बुलाया तो उस सांसद ने उनके पांव पकड़कर माफी मांग ली। भैरोंसिंह शेखावत ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया। इसके बाद ऐसे सदस्य या तो प्रश्न पूछते ही नहीं थे, और यदि पूछते थे तो सदन से अनुपस्थित नहीं रहते थे।

    मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ

    भैरोंसिंह शेखावत को जातिवाद से बहुत चिढ़ थी। वे व्यक्तिवाद और जातिवाद के स्थान पर समष्टिवाद में विश्वास रखते थे। वर्ष 2007 में वे चक्रेश्वरी देवी के नागाणा मंदिर में दर्शनों के लिये आये। इस अवसर पर आयोजित सार्वजनिक सभा के मंच से चक्रेश्वरी देवी को बार-बार राठौड़ों की देवी कहकर सम्बोधित किया गया। इससे वे खीझ पड़े और अपने भाषण में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बोले- देवी देवता किसी व्यक्ति या जाति के नहीं होते, वे तो पूरे समाज के होते हैं। यदि यह राठौड़ों की देवी है और मैं शेखावत हूँ, तो मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ!

    अस्पताल पहुंचे अशोक गहलोत

    भैरोंसिंह शेखावत एक वर्ष से बीमार चल रहे थे। 13 मई 2010 को उन्हें 15 मई 2010 की प्रातः मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को ज्ञात हुआ कि भैरोंसिंह शेखावत की हालत चिंता जनक है, उसी समय प्रातः 9 बजे उन्होंने सवाई मानसिंह अस्पताल के आईसीयू में पहुंचकर डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के बारे में जानकारी ली।

    वैशाख की दूज को ज्योति विलीन हुई

    वैशाख की तृतीया को राजस्थान में आखातीज कहा जाता है जो समस्त शुभकार्यों के लिये अबूझ सावे के रूप में विख्यात है। इसी आखातीज से एक दिन पहले, वैशाख माह की द्वितीया अर्थात् 15 मई 2010 को प्रातः 11 बजकर 10 मिनट पर हृदयाघात से उनका निधन हो गया। कार्तिक माह की त्रयोदशी को जो ज्योति प्रकट हुई वह वैशाख माह की द्वितीया को विलीन हो गई।

    सारे काम छोड़कर दौड़े अशोक गहलोत

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भैरोंसिंह के हालचाल पूछकर अभी लौटे ही थे कि उन्हें शेखावत के निधन का सामचार मिला। वे हाथ के सारे काम छोड़कर उसी समय फिर सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंचे। उन्होंने शेखावत के परिजनों को ढाढ़स बंधवाया तथा उनके निधन पर राजस्थान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया।

    शवयात्रा में सम्मिलित हुआ पूरा देश

    उनके निवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि देने वालों में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, गुजरात की राज्यपाल डॉ. कमला भी शामिल थीं। उनकी शवयात्रा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी- एल- जोशी, हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह] उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल, पूर्व उपप्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, केन्द्रीय मंत्री डॉ- सी- पी- जोशी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंह, भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए।

    शेखावत स्मृति संस्थान की घोषणा

    मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की स्मृतियों को बनाये रखने के लिये जयपुर में शेखावत स्मृति संस्थान को राज्य सरकार की ओर से भूमि देने की घोषणा की। सीकर रोड पर विद्याधर नगर स्टेडियम के पास इस संस्थान को भूमि आवंटित की गई।

    उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है

    शेखावत के निधन पर यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने भैरोंसिंह की पत्नी को लिखे एक पत्र में इन शब्दों में शोक प्रकट किया- मुझे भैरोंसिंह शेखावत के देहावसान का बहुत अफसोस हुआ। सार्वजनिक जीवन में उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है। शेखावत साहब के सार्वजनिक व्यवहार, उनकी सूझबूझ, और राजनीतिक प्रतिभा का महत्व सभी लोग स्वीकार करते हैं। सभी पक्षों में संवाद का जैसा गुण उनमें था, वह प्रायः विरल होता है। आपका उनसे जीवन भर का साथ रहा है। उनके गुणों के बारे में आपसे ज्यादा कौन जान सकता है। आपके अभाव और पीड़ा की कल्पना मैं कर सकती हूँ। इसलिये ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि वह आपको यह दुःख सहने की शक्ति दे और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

    उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये

    शेखावत के निधन पर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा- शेखावत उन बिरले नेताओं में से थे जिन्होंने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी विद्वता, वाक्पटुता और मिलनसार व्यवहार की अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने राजनीति में रहकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये। उन्होंने राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर व्यक्तिगत सम्पर्कों को सदा महत्व दिया।

    पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा

    पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उनके निधन पर कहा- शेखावत का निधन पूरे देश के लिये अपूर्ण क्षति है। वे विराट व्यक्तित्व के धनी और जन-जन के नेता थे। उनसे राजनीति में बहुत कुछ सीखा है। राजनीति के एक युग का अंत हो गया। पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा।

    हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा

    उनके निधन के बाद सुप्रसिद्ध पत्रकार चंदन मित्रा ने 17 मई 2010 को राजस्थान पत्रिका में एक लेख लिखा जिसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा था- उन्होंने पूरी शान से जीवन बिताया। भावी पीढ़ियां उन्हें छपे हुए शब्दों व टीवी फुटेज से जानेंगी। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-31

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-31

    पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर (2)


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    ओरणों में पाई जाने वाली बहु-उपयोगी वनस्पतियाँ


    राजस्थान के ओरणों में पेड़-पौघों की 680 प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। इनमें से अधिकांश वनस्पतियां मनुष्य तथा पशुओं के लिये उपयोगी हैं। इनमें से कुछ प्रमुख वनस्पतियों का विवरण इस प्रकार से है-

    अंग्रेजी बबूल : अंग्रेजी बबूल अर्थात् अरेबिया अकेशिया की झाड़ी वर्ष भर हरी रहती है। विगत एक सौ वर्ष में इस झाड़ी का तेजी से प्रसार हुआ है। यह झाड़ी गांवों में जलाऊ लकड़ी का सबसे बड़ा स्रोत है। लोग इन झाड़ियों को जलाकर कच्चा कोयला तैयार करते हैं। इसकी फलियां पशु चारे के रूप में काम आती हैं। जोधपुर स्थित आफरी ने इसके बीजों से बिस्किट एवं कॉफी पाउडर तैयार किया है।

    अरण्ड : इसके पत्ते कंगूरिया, मोटे आकार के कपास के पत्तों जैसे होते हैं। बीजों का रंग सफेद, गुलाबी, कत्थई होता है जिनमें तेल और गूदा होता है।

    अरणा या अरणी : इसके पत्ते गोल, थोड़े नुकीले तथा कोमल होते हैं। फूल सफेद, सुगन्धित होते हैं जिन पर मक्खी एवं कीट मण्डराते हैं। इसकी बालियां नीचे की ओर झुकी हुई होती हैं। अरणी की लकड़ियां, झौंपड़े बनाने में काम आती हैं।

    आक : यह लगभग 5-6 फीट ऊँचा तथा पत्तों से लदा हुआ होता है। पत्ते मोटे तथा दूधवाले होते हैं। जामुनी रंग के फूल पाये जाते हैं। आमी के आकार के फल लगते हैं जिनसे रुई निकलती है। इसे अंकाला कहा जाता है। अंकाला से रस्सियां बनाकर उनसे पीढ़े तथा चारपाइयां बुनी जाती हैं। इससे तकिये और गद्दे में भी भरे जाते हैं।

    इन्द्रायण (तूम्बा) : इससे पशुओं में अजीर्ण तथा आफरे की दवा बनती है। इसके फूल कपूरी एवं फल मौसमी की तरह होते हैं। जब ऊँट चरना बंद कर देता है तो उसे नमक के साथ तूम्बा उबाल कर देते हैं।

    ऊँटगण : इसे ऊँट चाव से खाता है। यह बल एवं वीर्य वर्धक है। रोगी इनके गोटों को दूध में डालकर पीता है। गोटे फूलकर दूध को गाढ़ा कर देते हैं।

    कटेरी (रींगणी) : इसकी बेल कांटों वाली होती है जिस पर पीले फल लगते हैं। गुलाबी फूलों पर तितलियां मण्डराती हैं।

    कुरण्ड : इसे चामघस भी कहते हैं। यह बलवर्धक होती है। इसे पीस कर खाते हैं। इसके बारीक काले बीजों को भी खाते हैं।

    खेजड़ी : खेजड़ी की पत्तियां पशु चारे के रूप में, लकड़ी ईंधन के रूप में, फलियां सब्जी के रूप में तथा सूखी फलियां फल के रूप में काम आती हैं। इसकी उपस्थिति से खेत में नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में अजोटोबेक्टर नामक बैक्टीरिया रहता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करता है।

    गोखरू : इसे भाँखड़ा उकाली भी कहते हैं। यह काढ़ा बनाने के काम आता है। इसे ऊँट चाव से खाते हैं।

    चिड़धणियो : ओरी माता में उकाली देने के काम आता है।

    जवासो या धमासो : यह बड़े कांटों एवं छोटे पत्तों की झाड़ी होती है।

    तालमखाणा : यह जलीय पौधा है।

    तुलसी : इसके पत्ते कोमल, सुगन्धित, चरचरे, कड़वे तथा गुणकारी होते हैं। इसके पत्तों की उकाली लेने से बुखार, मलेरिया, खांसी, जुकाम आदि में लाभ होता है। विष्णु पत्नी मानकर इसे हर घर के आंगन में लगाया जाता है तथा संध्या काल में इसके नीचे दीप जलाया जाता है।

    धतूरा : इसके पत्ते पान जैसे, फूल सफेद घण्टी जैसे, फल गोल, कंटीले तथा अधिक बीज वाले होते हैं। यह मादक तथा विषैली वनस्पति है।

    नागरमोथा : यह सुगन्धित पदार्थों में मिलाने के काम आता है। कपूर, कचरी तथा चंदन के साथ हवन में काम लिया जाता है।

    नीम : इसकी कोंपलें रक्तशोधक होने के कारण कच्ची खाई जाती हैं। इसकी छाल को पानी में पीसकर घावों पर लगाया जाता है। इसका तेल पशुओं के घावों पर लगाया जाता है। इसकी दांतुन भी स्वास्थ्य वर्धक मानी जाती हैं। बवासीर की बीमारी में सूखी हुई निबौलियों का पाउडर शहद में मिलाकर खाते हैं।

    पींप : यह वर्षाकाल में फोग के साथ पैदा होता है। इसकी सब्जी बनती है। फूंबी : इसे खूंबी तथा मशरूम भी कहते हैं जो हृदय रोग में तुरंत प्रभाव डालने वाली दवा है। इसकी सब्जी भी बनती हं। इसकी कुछ प्रजातियां जहरीली होती हैं।

    फोग : यह भीषण गर्मी और लू में बालू के धोरों पर उगता है। इसकी जड़ें धरती में फैलकर गुच्छा बनाती हैं तथा पत्तियां तुरंत झड़ जाती हैं। उसके बाद तना पत्तियों की तरह कार्य करता है। गणगौर पूजन में सुहागनें फोग के फूल और डालियों से गवर और ईसरजी की पूजा करती हैं। किसान हल जोतने के समय इसकी डालियों और फूलों से सुगन मनाते हैं। इसकी ऊँचाई एक-दो मीटर तक होती है। रेगिस्तानी पशु इसे चाव से खाते हैं। यात्री इसे चूसकर गला तर करते हैं। इसकी शाखायें मजबूत होती हैं, उनसे घरों में बाड़ा बनाते हैं। इसकी लकड़ी के कोयले लुहार एवं सुनार घड़ाई के काम में लेते हैं क्योंकि उनमें अधिक ताप उत्पन्न होता है। इसकी लकड़ी से ऊँट की नाक बींधने की कील बनती है। इसकी पत्तियों को सुखाकर फोगलो बनाया जाता है जिससे रायता बनता है। यह रायता गर्मी में अमृत्तुल्य माना गया है।

    बूर : यह इलायची जैसी तेज सुगंध वाला होता है। इससे दवा बनती है। पेट की बीमारी दूर होती है। खेतों में पशु चरते हैं।

    भम्फीड़ : यह बसंत के साथ पेड़ों की जड़ पर कीलों के समान निकलते हैं। बच्चों को ओरी निकलने पर सूखी फली उबाल कर पिलाते हैं।

    भाँगरो : यह चटपटा और रूखा होता है। यह पीलिया तथा नेत्ररोगों के उपचार में काम आता है।

    मरवा : इसके पत्ते और पुष्प तुलसी के पत्तों की तरह सुगन्धित होते हैं। इससे बिच्छू का जहर उतारने तथा वात, पित्त, कफ की औषधि बनती है।

    रतनजोत : इसे साटा भी कहते हैं। यह आंख की दवा में काम आता है। इसके सूखे पत्तों का चूरा सब्जी का रंग लाल करने में काम आता है जिसे खाने से बहुत नुक्सान होता है। इसके बीजों के तेल से बायोडीजल बनता है।

    रोहिड़ा : इसके पुष्प लाल एवं पीले होते हैं जो गंधविहीन होते हैं।

    लोलरू : इस दर्द निवारक औषधि को दर्द वाले स्थान पर घोटकर लगाते हैं।

    शंखपुष्पी : यह दस्तावर, मेधा एवं बल बढ़ाने वाली, मन के रोगों को दूर करने वाली तथा कड़वी होती है। इसके पत्तों में दूध निकलता है। इसे दूधेली भी कहते हैं।

    शिवलिंगी : इसे ऊँट खाते हैं। इस पर शक्ति वर्धक फल लगते हैं।

    सुणिया या चुग : यह कड़ी शाखाओं वाली झाड़ी है। इसके रेशे रस्सी बंटने के काम आते हैं। इसकी लकड़ी ऊँटों की नकेल बनाने के लिये अच्छी होती है।


    रेगिस्तानी घासें

    रेगिस्तान में वर्षा काल में भुट्ट, मुट्ट, भूरट, लाँपड़ी, वोभरियो, बेकरियो, घण्ठील, सेवण, बूर, डचाभ, मण्डूसी आदि घासें उत्पन्न होती हैं। धामण, झींटियो घास तथा बरू के बूटे भी कई स्थानों पर पाये जाते हैं। शरद ऋतु में ल्हारड़ो, लहाठियो तथा हिरण चब्बो आदि घासें होती हैं। दूब की सैंकड़ों किस्में मिलती हैं। इसे लॉन में प्रयुक्त किया जाता है। दूब के रस को सूंघने से नक्सीर रुकती है।

    सेवण : यह अत्यधिक प्राटीन युक्त घास है जो रेतीले टीलों पर उगती है। जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर तथा नागौर आदि जिलों में इसके चारागाह विकसित किये गये हैं। इसका औसत उत्पादन लगभग 36 क्विंटल प्रति हैक्टैयर होता है।

    धामण : यह भी रेगिस्तानी घास है। दुधारू पशुओं की मुक्त चराई के लिये इसके चारागाह विकसित किये गये हैं।

    करड़ : यह पशुओं के लिये उत्तम हरी घास है। इसका औसत उत्पादन लगभग 47 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होता है।

    अंजन : गायों एवं घोड़ों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त यह घास हर मौसम में उगती है। इसका औसत उत्पादन लगभग 76 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।


    रेगिस्तानी फल

    काकड़िया : छोटे काचर जब पूर्ण विकसित होकर काकड़िये बन जाते हैं। यह पतले छिलके वाला रेगिस्तानी फल है तथा सब्जी बनाने के काम आता है।

    गूंदिये : गूंदी वृक्ष के सरबती फल होते हैं। यह रसदार और चिपचिपे होते हैं। होली के आसपास पकते हैं। कच्चे फल हरे रंग के और पके फल नारंगीपन लिये हुए होते हैं।

    जालोटिया : जाल के फल पीलू अथवा जालोटिया कहलाते हैं। कच्चे फल हरे रंग के, रसदार और मीठे होते तथा पके फल केसरिया रंग के होते हैं।

    ढीलू : पके हुए कैर ढीलू कहलाते हैं। ये पाचक और मीठे होते हैं। कच्चे कैर हरे रंग के होते हैं जिनसे सब्जी एवं अचार बनता है। पके हुए फल गुलाबी रंग के होते हैं जिन्हें निर्धन ग्रामीण बच्चे खाते हैं।

    निम्बोली : नीम के पके फल पीले रंग के, रसदार और सुगंधित होते हैं। इनकी गोटों से काजल बनती है। इसकी मंजरी दही-रायते में छोंक के काम आती है।

    फोगला : फोग के फोगले (मंजरी) से ढोकले बनते हैं जो घी में चूरने पर मीठे लगते हैं। फोगले के रायते को विशेष प्रकार का खट्टा खाद्य माना जाता है। चैत्र माह में फोगों पर फोगला लगता है। तब उनपर भंवरे ओर मक्ख्यिां आते हैं।

    बेर : कार्तिक माह में बेर की झाड़ियों पर बेर लगते हैं। पकने पर ये गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। इनका स्वाद खट्टा-मीठा होता है। बेर को सुखाकर उसके छिलके का पाउडर बनाया जाता है तथा उसमें नमक मिलाकर खाया जाता है। बेर की जड़ों का रांग जड़ी मतीरा मीठा होता है और उसकी शराब बनाई जाती है।

    मतीरा : इसका बाहरी रंग हरा और भीतरी रंग लाल होता है। यह गूदेदार एवं रसदार फल है जो तरबूजे की तरह दिखाई देता है। इसके बीज छीलकर मेवा की तरह खाये जाते हैं। इसके बीजों से अखाद्य तेल निकाला जाता है तथा इसके बीजों को भूनकर एवं नमक लगाकर खाया जाता है। इसके छिलकों की सब्जी बनती है। इसमें मिश्री भरकर रात की ओस में रख दिया जाता है तथा प्रातः काल में भूखे पेट खाया जाता है जिससे पेट की बीमारियां ठीक होती हैं। दीपावली पूजन में मतीरे का बड़ा महत्व माना जाता है।

    बाकोली : इससे धागे, चटाइयां तथा टोकरियों बनाई जाती हैं। खाट बुनने तथा झौंपड़ी की छान एवं बाड़े की दीवारों को बनाने के लिये रस्सियों का निर्माण में भी इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

    खींप : इससे भी धागे, चटाइयां तथा टोकरियों बनाई जाती हैं। खाट बुनने तथा झौंपड़ी की छान एवं बाड़े की दीवारों को बनाने के लिये रस्सियों का निर्माण में भी इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

    कूमट : इससे गोंद प्राप्त किया जाता है। इसकी फलियों के बीज सब्जी बनाने के काम आते हैं। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में तथा कांटे, जलाउ ईंधन एवं बाड़ के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

    देशी बबूल : इससे गोंद प्राप्त किया जाता है। इसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाया जाता है। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में तथा कांटे, जलाउ ईंधन एवं बाड़ के रूप में प्रयुक्त होते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके बीज से कॉफी पाउडर एवं बिस्किट बनाने की विधि खोज निकाली है जिसे राजस्थान सरकार आने वाले वर्षों में बाजार में विपणन करने की योजना बना रही है।

    ढाक : इससे प्राकृतिक रंग बनाया जाता है।

    जाल : इसका फल पीलू कहलाता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में खाया जाता है। इसके बीजों से अखाद्य तेल बनाया जाता है।

    मेहंदी : इसकी झाड़ी मध्यम आकार की होती है। सुहागन स्त्रियां तथा कुंआरी कन्याएं, तीज-त्यौहार एवं विवाह आदि अवसरों पर इसकी सूखी पत्तियों को पीसकर हाथों पर रचाती हैं। इससे बाल भी रंगे जाते हैं तथा पैरों में जलन होने पर इसका पेस्ट पैरों पर लगाया जाता है।

    तूम्बा : इसका फल बकरियों का प्रिय भोजन है। इसके बीजों से अखाद्य तेल बनाया जाता है। मधुमेह बीमारी के उपचार में भी इसका फल काम आता है।

    गूगल : मरुस्थलीय क्षेत्रों में स्थित मध्यम एवं छोटी ऊँचाई की पहाड़ियों पर गूगल का पेड़ पाया जाता है। इसका गोंद खुशबूदार होता है जो पूजा तथा औषधि निर्माण में काम आता है।

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  • अध्याय - 1 : सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

     02.06.2020
    अध्याय - 1 : सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

    सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ


    अगर इस धरती पर कोई जगह है जहाँ सभ्यता के आरम्भिक दिनों से ही मनुष्यों के सारे सपने आश्रय पाते रहे हैं, तो वह हिन्दुस्तान है। - रोम्या रोलां।


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    सभ्यता


    'सभ्यता' का शाब्दिक अर्थ 'सभा में बैठने की योग्यता' से होता है- 'सभायाम् अर्हति इति।' भौतिक रूप से सभ्यता, मनुष्यों की एक ऐसी बस्ती है जो प्रकृति की गोद में स्वतः जन्म लेती है। सामाजिक रूप से सभ्यता मनुष्यों की एक ऐसी बस्ती है जिसमें सामूहिक जीवन की भावना होती है। बौद्धिक रूप से सभ्यता विचारवान मनुष्यों की एक ऐसी संरचना है जिसमें समस्त मनुष्यों के विचार एक-दूसरे पर प्रभाव डालकर उस बस्ती अथवा समूह के लोगों की साझा समझ का निर्माण करते हैं। यह साझा समझ ही उस समूह के लोगों के आचरण, व्यवहार एवं आदतों का निर्माण करती है। मनुष्यों की साझा समझ के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले आचरण, व्यवहार एवं आदतों को सम्मिलित रूप से संस्कृति कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक सभ्यता की एक विशिष्ट संस्कृति होती है जो अन्य स्थानों पर विकसित होने वाली संस्कृति से अलग होती है।

    इस प्रकार प्राकृतिक परिवेश, सभ्यता, विचार एवं संस्कृति परस्पर अटूट सम्बन्ध रखते हैं। ये एक दूसरे से असंपृक्त अथवा विरक्त होकर नहीं रह सकते। इनमें मित्रता का भाव होना आवश्यक है। यही भाव मनुष्य सभ्यता को सामूहिक जीवन की ओर अग्रसर करते हैं। एकाकी जीवन जीने वाला व्यक्ति किसी सभ्यता या संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकता।

    सभ्य समाज

    वर्तमान समय में 'सभ्यता' शब्द का प्रयोग मानव समाज के एक सकारात्मक, प्रगतिशील और समावेशी विकास को इंगित करने के लिए किया जाता है। अतः वर्तमान समय में सभ्यता का आशय 'सभ्य समाज' से है। यह सभ्य समाज क्या है? आधुनिक युग में यदि सभ्य समाज को समझने का प्रयास किया जाए तो 'सभ्य समाज उन्नत कृषि, लंबी दूरी के व्यापार, व्यावसायिक विशेषज्ञता, नगरीकरण और वैज्ञानिक प्रगति आदि की उन्नत स्थितियों का द्योतक है।' इन मूल तत्त्वों के साथ-साथ, सभ्यता कुछ माध्यमिक तत्त्वों, जैसे विकसित यातायात व्यवस्था, लेखन, मापन के मानक, संविदा एवं नुकसानी पर आधारित विधि-व्यवस्था, कला शैलियों, स्थापत्य, गणित, उन्नत धातुकर्म एवं खगोलविद्या आदि की स्थिति से भी परिभाषित होती है।

    संस्कृति

    संस्कृति शब्द का निर्माण मूलतः 'कृ' धातु से हुआ है जिसका अर्थ है- 'करना'। इसके पूर्व 'सम्' उपसर्ग तथा 'क्तिन्' प्रत्यय लगने से लगने से 'संस्कार' शब्द बनता है जिसके अर्थ- पूरा करना, सुधारना, सज्जित करना, मांज कर चमकाना, शृंगार, सजावट करना आदि हैं। इसी विशेषण की संज्ञा 'संस्कृति' है। वाजसनेयी संहिता में 'तैयार करना' या 'पूर्णता' के अर्थ में यह शब्द आया है तथा ऐतरेय ब्राह्मण में 'बनावट' या 'संरचना' के अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है। महाभारत में 'श्रीकृष्ण' के एक नाम के रूप में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार संस्कृति शब्द का अर्थ साफ या परिष्कृत करना है। संस्कृति क्या है? इस विषय पर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। वर्तमान में संस्कृति शब्द अंग्रेजी के 'कल्चर' शब्द का पर्याय माना जाता है।

    संस्कृति की परिभाषाएं

    पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- 'संस्कृति, शारीरिक मानसिक शक्तियों के प्रशिक्षण, सुदृढ़़ीकरण या विकास परम्परा और उससे उत्पन्न अवस्था है'

    मैथ्यू आर्नोल्ड ने लिखा है- 'संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गई हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।'

    ई. वी. टॉयलर ने लिखा है- 'संस्कृति एक जटिल सम्पूर्णता है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कलाएँ, नीति, विधि, रीति-रिवाज तथा अन्य योग्यताएँ समाहित हैं जिन्हें मनुष्य किसी समाज का सदस्य होने के नाते अर्जित करता है।'

    अमेरिका के प्रसिद्ध दार्शनिक और शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. व्हाइटहैड के अनुसार 'संस्कृति का अर्थ है- मानसिक प्रयास, सौन्दर्य और मानवता की अनुभूति।'

    बील्स तथा हॉइजर के अनुसार 'मानव समाज के सदस्य व्यवहार करने के जो निश्चित ढंग व तरीकों को अपनाते हैं, वे सम्पूर्ण रूप से संस्कृति का निर्माण करते है।'

    प्रसिद्ध समाजशास्त्री गिलिन के अनुसार 'प्रत्येक समूह तथा समाज में आन्तरिक व बाह्य व्यवहार के ऐसे प्रतिमान होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होते हैं तथा बच्चों को सिखलाए जाते हैं, जिनमें निरन्तर परिवर्तन की सम्भावना रहती है।'

    ग्रीन के अनुसार 'संस्कृति ज्ञान, व्यवहार, विश्वास की उन आदर्श पद्धतियों को तथा ज्ञान एवं व्यवहार से उत्पन्न हुए साधनों की व्यवस्था को, जो कि समय के साथ परिवर्तित होती है, कहते हैं, जो सामाजिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है।'

    एक अन्य विद्वान ने कहा है- 'संस्कृति का उद्गम संस्कार शब्द है। संस्कार का अर्थ है वह क्रिया जिससे वस्तु के मल (दोष) दूर होकर वह शुद्ध बन जाय। मानव के मल-दोषों को दूर कर उसे निर्मल बनाने वाली प्रक्रियाओं का संग्रहीत कोष ही संस्कृति है।'

    एक अन्य परिभाषा में कहा गया है कि 'संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण, दृढ़़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।'

    एक विद्वान की दृष्टि में 'संस्कृति मन, आचार अथवा रुचियों की परिष्कृति या शुद्धि है।'

    इसी प्रकार संस्कृति की एक परिभाषा यह भी है कि 'यह सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है।'

    इस प्रकार संस्कृति शब्द का व्यापक अर्थ, समस्त सीखे हुए व्यवहारों अथवा उस व्यवहार का नाम है जो सामाजिक परम्परा से प्राप्त होता है। इस अर्थ में संस्कृति को सामाजिक प्रथाओं का पर्याय भी कहा जा सकता है। संकीर्ण अर्थ में संस्कृति का आशय 'सभ्य' और 'सुसंस्कृत' होने से है।

    राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है- 'संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं।'

    उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की जीवन शैली, उस क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण करती है। उस क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की आदतें, विचार, स्वभाव, कार्य-कलाप, रीति-रिवाज, परम्पराएं, खान-पान, वस्त्र-विन्यास, तीज-त्यौहार, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, चाक्षुष कलाएं, जन्म-मरण के संस्कार एवं विधान आदि विभिन्न तत्त्व उस क्षेत्र की संस्कृति को आकार देते हैं।

    मानव द्वारा सीखा गया समस्त व्यवहार संस्कृति नहीं

    डॉ. सम्पूर्णानंद ने समस्त सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति का अंग नहीं माना है। उनके अनुसार- 'मानव का प्रत्येक विचार संस्कृति नहीं है। पर जिन कामों से किसी देश विशेष के समस्त समाज पर कोई अमिट छाप पड़े, वही स्थाई प्रभाव ही संस्कृति है।'

    चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य ने भी मानव जाति द्वारा समस्त सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति नहीं माना है। उन्होंने लिखा है- 'किसी भी जाति अथवा राष्ट्र के शिष्ट पुरुषों में विचार, वाणी एवं क्रिया का जो रूप व्याप्त रहता है, उसी का नाम संस्कृति है।'

    संस्कृति का निर्माण

    संस्कृति का निर्माण किसी एक कालखण्ड में अथवा कुछ विशेष लोगों द्वारा अथवा कुछ विशेष घटनाओं द्वारा नहीं होता। यह किसी भी समाज के भीतर घटने वाली बौद्धिक घटनाओं का एक चिंरतन प्रवाह है। यही कारण है कि किसी देश की संस्कृति उसकी सम्पूर्ण मानसिक निधि को सूचित करती है। किसी देश के विभिन्न कालखण्डों में, उस देश के समस्त नागरिकों द्वारा व्यवृहत किए जाने वाले आचार-विचार से संस्कृति रूपी वृक्ष में नित्य नए पत्ते लगते हैं। बौद्धिकता केवल असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तियों में ही नहीं होती अपितु समाज का साधारण से साधारण व्यक्ति और असाधारण से असाधारण व्यक्ति देश की संस्कृति के निर्माण में अपना सहयोग देता है।

    इस प्रकार एक समुदाय में रहने वाले विभिन्न मनुष्य, विभिन्न स्थानों पर रहते हुए, विशेष प्रकार के सामाजिक वातावरण, संस्थाओं, प्रथाओं, व्यवस्थाओं, धर्म, दर्शन, लिपि, भाषा तथा कलाओं का विकास करके अपनी विशिष्ट संस्कृति का निर्माण करते है। संस्कृति किसी भी समाज का समग्र व्यक्तित्त्व है, जिसका निर्माण उस समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विचार, भावना, आचरण तथा कार्यकलाप से होता है।

    एक व्यक्ति या एक युग की कृति नहीं है संस्कृति

    कुछ लोग चाहे कितने ही प्रभावशाली एवं युगांतकारी व्यक्तित्त्व के स्वामी क्यों न हों, वे संस्कृति का परिष्कार तो कर सकते हैं किंतु अकेले ही किसी देश या समाज की संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते। क्योंकि संस्कृति कभी भी किसी एक व्यक्ति के प्रयत्न का परिणाम नहीं होती, अपितु वह 'लोक' अर्थात् समाज के अनगिनत व्यक्तियों के सामूहिक प्रयत्नों एवं व्यवहारों का परिणाम होती है और यह प्रयत्न अथवा व्यवहार भी ऐसा, जिसे भविष्य में आने वाली पीढ़ियां निरन्तर अपनाती रहती हैं अर्थात् व्यवहार में लाती रहती हैं और उसमें कुछ नया जोड़ती जाती हैं।

    यही कारण है कि संस्कृति का विकास धीरे-धीरे होता है। वह किसी एक युग की कृति नहीं होती अपितु विभिन्न युगों के विविध मनुष्यों के सामूहिक एवं अनवरत श्रम का परिणाम होती है। वस्तुतः मनुष्य अपने मन, वचन एवं कर्म द्वारा अपने जीवन को सरस, सुन्दर और कल्याणमय बनाने के लिए जो प्रयत्न करता है, उसका सम्मिलित परिणाम 'संस्कृति' के रूप में प्रकट होता है।

    सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

    सभ्यता और संस्कृति का सम्बन्ध बहुत गहरा है। पहले मानव सभ्यता विकसित होती है और उसके बाद मानव सभ्यता ही संस्कृति को जन्म देती है। आकार की दृष्टि से सभ्यता, किसी भी मानव समूह का स्थूल रूप है जबकि संस्कृति, मानव समूह का सूक्ष्म रूप है। हमारे प्राचीन साहित्य में सभ्यता का अन्तर्भाव 'अर्थ' से लिया गया है जबकि संस्कृति का आशय 'धर्म' से लिया गया है। सभ्यता के बिना कोई संस्कृति जन्म नहीं ले सकती और संस्कृति के बिना कोई सभ्यता जीवित नहीं रह सकती।

    सभ्यता एवं संस्कृति में भेद

    आजकल बहुत से लोग सभ्यता और संस्कृति को पर्याय के रूप में प्रयुक्त करते हैं जबकि इनमें अंतर है। सभ्यता, मानव समाज की बाह्य उन्नति का बोध कराती है जबकि संस्कृति, मानव समाज की आंतरिक उन्नति को इंगित करती है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की और संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। हमने किसी विशेष प्रकार के वस्त्र क्यों धारण किए हैं तो इसका आधा जवाब हमारी सभ्यता से और आधा जवाब हमारी संस्कृति से मिलेगा।

    हमारे कपड़े सस्ते हैं या महंगे, इसे हमारी सभ्यता तय करेगी जबकि हमारे कपड़ों के रंग भड़कीले हैं या शांत, अथवा हमारे कपड़े हमारा कितना शरीर ढकते हैं, इन बातों को हमारी संस्कृति तय करेगी। एक समाज के द्वारा दूसरे समाज की सभ्यता की नकल की जा सकती है किंतु एक समाज के द्वारा दूसरी संस्कृति की नकल नहीं की जा सकती, हाँ एक समाज, दूसरे समाज की संस्कृति की कुछ बातों को अपना सकता है। सभ्यता को मापा जा सकता है और उसका मापदण्ड उपयोगिता है जबकि संस्कृति को मापा नहीं जा सकता।

    संस्कृति का मनुष्य जाति पर प्रभाव

    संस्कृति की शास्त्रीय व्याख्या के अनुसार मनुष्य आज जो कुछ भी है, वह संस्कृति की देन है। यदि मनुष्य से उसकी संस्कृति छीन ली जाए तो मनुष्य श्री-हीन हो जाएगा। विद्वानों का मानना है कि आज 'मनुष्य' इसलिए 'मनुष्य' है क्योंकि उसके पास 'संस्कृति' है। स्वामी ईश्वरानंद गिरि के अनुसार 'संस्कृति मनुष्य की आत्मोन्नति का मापदण्ड भी है और आत्माभिव्यक्ति का साधन भी।' संस्कृति को केवल बाह्य रूप या क्रिया ही नहीं मान लेना चाहिए। उसका आधार 'जीवन के मूल्यों' में है और पदार्थों के साथ 'स्व' को जोड़ने की सूक्ष्म कला में है। श्यामाचरण दुबे ने लिखा है- 'संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की पूर्ण पृष्ठभूमि में अपना स्थान पाता है और संस्कृति के द्वारा उसे जीवन में रचनात्मक संतोष के साधन उपलब्ध होते हैं।'

    कहने का अर्थ यह कि मानव जब जन्म लेता है, तब वह मानव की देह में होते हुए भी पूर्ण अर्थों में मानव नहीं होता। संस्कृति उसका परिष्कार करके उसे वास्तविक मानव बनाती है। संस्कृति, मानव को मानव बना देने वाले विशिष्ट तत्त्वों में सबसे महत्त्वपूर्ण है।

    पर्यावरण, सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

    प्राकृतिक परिवेश को पर्यावरण कहते हैं। चूँकि मनुष्य किसी न किसी विशिष्ट प्रकार के पर्यावरण के भीतर रहता है इसलिए पर्यावरण, सभ्यता एवं संस्कृति अन्योन्याश्रित हैं। अर्थात् ये तीनों तत्त्व एक दूसरे से प्रभावित होते हैं तथा एक दूसरे के आश्रित हो जाते हैं। इनमें से किसी एक के बदलने से दूसरा एवं तीसरा स्वतः बदल जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सृष्टि के आरम्भ में पर्यावरण सभ्यता को जन्म देता है। दूसरे चरण में सभ्यता, संस्कृति को जन्म देती है तथा तीसरे चरण में संस्कृति पर्यावरण को संवारती या विनष्ट करती है।

    पर्यावरण का सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रभाव

    किसी क्षेत्र के पर्यावरण का उस क्षेत्र की सभ्यता एवं संस्कृति पर गहरा प्रभाव होता है। उदाहरण के लिए ठण्डे प्रदेश के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा प्रवेश न हो जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा और निर्बाध प्रवेश हो। ठण्डे प्रदेशों में निवास करने वाले लोग अपने खान-पान में मांस एवं मदिरा को अधिक मात्रा में सम्मिलित करना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के निवासी अपने खान-पान में वनस्पति, दूध-दही एवं छाछ को अधिक सम्मिलित करेंगे।

    ठण्डे प्रदेश के लोग ऊनी, मोटे और चुस्त कपड़े पहना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग सूती, पतले तथा ढीले कपड़े पहनेंगे। ठण्डे प्रदेश के लोग चर्च में जूते पहनकर जाना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने जूते मंदिरों से बाहर उतारना पसंद करेंगे। बाह्य पर्यावरण के कारण अपनाई गई खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों का मनुष्य की कार्य क्षमता एवं उसकी बौद्धिक क्षमता पर गहरा असर होता है। जिन लोगों के भोजन में मदिरा का समावेश होगा तथा जो चुस्त कपड़े पहनेंगे, वे अधिक समय तक काम करेंगे किंतु वे स्वभाव से उग्र होंगे तथा भौतिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे। जबकि जिन लोगों के भोजन में दही एवं छाछ का समावेश होगा तथा कपड़े ढीले होंगे, उनका शरीर तुलनात्मक दृष्टि से कम समय तक काम कर सकेगा किंतु उनकी प्रवृत्ति शांत होगी तथा वे आध्यात्मिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे।

    इस बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानव और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की प्रतिक्रिया केवल भौतिक नहीं होती, अपितु बौद्धिक भी होती है।

    सभ्यता एवं संस्कृति का पर्यावरण पर प्रभाव

    जिस प्रकार पर्यावरण का सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रभाव होता है, उसी प्रकार सभ्यता एवं संस्कृति का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव होता है। किसी भी भू-भाग में रहने वाले मानव समुदाय की आदतें, स्वभाव, प्रवृत्तियाँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, पर्व, अनुष्ठान आदि विभिन्न तत्त्व, सभ्यता एवं संस्कृति के ऐसे अंग हैं जो धरती के पर्यावरण को गहराई तक प्रभावित करते हैं।

    उदाहरण के लिए राजस्थान के सामंती परिवेश में शेरों, शूकरों एवं हरिणों का शिकार एक परम्परा के रूप में प्रचलित रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल असुरक्षित हो गए और भारी मात्रा में इंसान द्वारा सहज रूप से काट कर नष्ट कर दिए गए। आजादी के बाद पनपी उपभोक्तावादी संस्कृति, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी का प्रसार तथा वनों के प्रति आदर के अभाव ने जंगलों को तेजी से गायब किया। आज भारत में 23.28 प्रतिशत जंगल हैं किंतु राजस्थान में केवल 9.54 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल बचे हैं।

    संस्कृति में बदलाव

    ऊपर हम पढ़ आए हैं कि मानव जाति ने जो कुछ भी भूतकाल से परम्पराओं, आदतों और जीवन शैली के रूप में ग्रहण किया है और जिन परम्पराओं तथा आदतों को मानव जाति वर्तमान समय में व्यवहार में ला रही है, वही हमारी संस्कृति है। कुछ समय बाद मनुष्य इनमें से बहुत सी परम्पराओं को भूल जाएगा और अपनी आदतों को बदल लेगा। इस कारण भविष्य काल में संस्कृति का रूप भी बदल जाएगा।

    इस दृष्टि से संस्कृति गतिशील तत्त्व है। यह पल-पल बदलती है किंतु इसके बदलाव की आहट प्रायः तुरन्त सुनाई नहीं देती। वैदिक-काल में हमारी संस्कृति कुछ और तरह की थी। बुद्ध के काल में संस्कृति का रूप अलग हो गया। गुप्त काल में भारतीय संस्कृति में बहुत बड़ा बदलाव आया। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों एवं अंग्रेजों के आगमन आदि से हुए राजनीतिक एवं आर्थिक बदलावों ने हमारी संस्कृति को आमूलचूल बदल दिया।

    प्राकृतिक आपदाओं एवं वैज्ञानिक खोजों सहित विभिन्न कारक, मानव की संस्कृति को प्रभावित करते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है, हमारी संस्कृति में बदलाव आता है फिर भी किसी समाज की संस्कृति अक्षय रहती है।

    अक्षय रहने वाली संस्कृति की तुलना उस स्त्री से की जा सकती है जो हजारों साल की हो जाने पर भी कभी बूढ़ी नहीं होती। वह क्षण-क्षण अपना नया शृंगार करके नवीन रूप धारण करती है। वह ना-ना प्रकार के विचारों और व्यवहारों से स्वयं को सजाती एवं संवारती है। नवीन विचार एवं व्यवहार संस्कृति के लिए नवीन आभूषणों का काम करते हैं।

    संस्कृति सदैव भूतकाल की आदतें छोड़़ती जाती है तथा जीवन जीने के नवीन तरीकों का विकास करती हुई, कभी भी अपनी आकर्षण शक्ति को नहीं खोती। जब किसी काल खण्ड में संस्कृति में एक साथ बड़े परिवर्तन होते हैं तो उन्हें सांस्कृतिक क्रांति कहा जाता है।

    संतुलित सभ्यता एवं संस्कृति

    जिन समुदायों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का चिंतन किया जाता है, उस क्षेत्र की सभ्यता एवं संस्कृति इस प्रकार विकसित होती हैं कि उनसे पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुँचती। अपितु पर्यावरण की सुरक्षा होती है। भारत में वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, गर्मियों में पक्षियों के लिए पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने जैसे धार्मिक विधान बनाए गए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है।

    भारतीय संस्कृति में सादगी पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। सादा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकताओं को इतना नहीं बढ़ायेगा कि पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। संत पीपा का यह दोहा इस मानसिकता को बहुत अच्छी तरह व्याख्यायित करता है-


    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।

    असंतुलित सभ्यता एवं संस्कृति

    जिस सभ्यता अथवा संस्कृति में ऊर्जा की अधिकतम खपत हो, वह संस्कृति धरती के पर्यावरण में गंभीर असंतुलन उत्पन्न करती है। पश्चिमी देशों में विकसित उपभोक्तावादी संस्कृति, ऊर्जा के अधिकतम खपत के सिद्धांत पर खड़ी हुई है। इस संस्कृति ने धरती के पर्यावरण को अत्यधिक क्षति पहुँचाई है। इस संस्कृति का आधार एक ऐसी मानसिकता है जो मनुष्य को व्यक्तिवादी होने तथा अधिकतम वस्तुओं के उपभोग के माध्यम से स्वयं को सुखी एवं भव्यतर बनाने के लिए प्रेरित करती है।

    ऐसी संस्कृति में इस बात पर विचार ही नहीं किया जाता कि व्यक्तिवादी होने एवं अधिकतम सुख अथवा भव्यता प्राप्त करने की होड़़ में प्रकृति एवं पर्यावरण का किस बेरहमी से शोषण किया जा रहा है तथा उसके संतुलन को किस तरह से सदैव के लिए नष्ट किया जा रहा है। पश्चिमी देशों एवं अमरीका में विकसित 'फास्ट फूड कल्चर', 'यूज एण्ड थ्रो कल्चर' तथा 'डिस्पोजेबल कल्चर' पर्यावरण को स्थाई रूप से क्षति पहुँचाते हैं।

    कहा जा सकता है कि उपभोक्तावादी संस्कृति, धरती के पर्यावरण में भयानक असंतुलन उत्पन्न करती है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध में ईसा मसीह द्वारा दो हजार साल पहले कही गई यह बात आज भी सुसंगत है- 'सुईं के छेद में से ऊँट भले ही निकल जाए किंतु एक अमीर आदमी स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकता।'

    असंतुलित एवं संतुलित संस्कृतियों के उदाहरण

    प्रकृति के संसाधनों को क्षति पहुँचाए बिना उनका उपयोग करना, पर्यावरणीय संस्कृति का अंग है जबकि यूज एण्ड थ्रो कल्चर, डिस्पोजेबल कल्चर, उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति है।

    कागज की थैलियों, मिट्टी के सकोरों तथा पत्तों के दोनों का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण हैं तो पॉलिथीन कैरी बैग्ज, प्लास्टिक की तश्तरियां तथा थर्मोकोल के गिलास, यूज एण्ड थ्रो कल्चर का उदाहरण हैं। फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर का उदाहरण है।

    नीम और बबूल की दांतुन पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो टूथपेस्ट का उपयोग उपभोक्तावादी एवं बाजारीकरण की संस्कृति का उदाहरण है। मल त्याग के बाद पानी से प्रक्षालन पर्यावरणीय संस्कृति है तो कागज का प्रयोग यूज एण्ड थ्रो कल्चर है। शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिए कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिए अधिक विनाशकारी है।

    भारत में किसी इंजन या मशीन के खराब हो जाने पर उसे ठीक करवाया जाता है और ऐसा लगातार तब तक किया जाता है जब तक कि उसे ठीक करवाना असंभव अथवा अधिक खर्चीला न हो जाए किंतु अमरीका का आम आदमी, कम्पयूटर खराब होते ही कूड़े के ढेर में, कार खराब होते ही डम्पिंग यार्ड में, घड़ी, कैलकुलेटर, सिलाई मशीन आदि खराब होते ही घर से बाहर फैंक देता है जिन्हें नगरपालिका जैसी संस्थाओं द्वारा गाड़ियों में ढोकर समुद्र तक पहुंचाया जाता है। इससे समुद्र में इतना प्रदूषण होता है कि बड़ी संख्या में समुद्री जीव मर जाते हैं।

    एक आम भारतीय अपनी कार को तब तक ठीक करवाता रहता है जब तक कि उसे बेच देने का कोई बड़ा कारण उत्पन्न नहीं हो जाता किंतु उसे कभी भी कूड़े के ढेर या समुद्र में नहीं फैंका जाता। उसका पुर्जा-पुर्जा अलग करके किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाने लायक बना लिया जाता है या फिर उसके सामान को पुनर्चक्रण (रीसाइकिलिंग) में डाल दिया जाता है।

    भारत में कबाड़ियों द्वारा घर-घर जाकर खरीदी जाने वाली अखबारी रद्दी और खाली बोतलें श्रम आधारित भारतीय संस्कृति के पूँजीवादी अमरीकी कल्चर से अलग होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। भारतीय रोटी को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, उबले हुए आलू तथा छाछ जैसी सस्ती चीजों के साथ खाया जा सकता है जबकि ब्रेड के लिए बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाए पूँजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं। अब भारत में भी इसी पूँजीवादी संस्कृति का प्रसार हो गया है।

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  • पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

     02.06.2020
    पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

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    उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान आदि प्रांतों में बसने वाली बिश्नोई जाति ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर दिल्ली सल्तनत के तुर्की शासकों का शासन था और चारों ओर हिंसा का वातावरण था, तब थार रेगिस्तान में जन्म लेने वाले जाम्भोजी नामक प्रसिद्ध संत ने बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अपने शिष्यों को 29 शिक्षाएं दीं जिनमें धर्म अैर नैतिकता के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा एवं मानवीय मूल्यों के निर्वहन पर जोर दिया गया। उनके द्वारा दिए गए 29 नियमों में से 8 नियम पशु-पक्षियों-वृक्षों एवं पर्यावरण रक्षा से सम्बन्धित हैं।

    भगवान जांभोजी के जीवन काल में ई.1485 में मारवाड़ में भयानक अकाल पड़ा। इस कारण बहुत से लोग अपने परिवारों एवं पशुओं को लेकर मालवा के लिए प्रस्थान करने लगे। मनुष्यों के इस कष्ट को देखकर जांभोजी ने उन लोगों की सहायता की तथा उन्हें पर्यावरण की सुरक्षा करने के लिए प्रेरित किया। उस काल में जब भारतीयों के पास आधुनिक विज्ञान नहीं था, और उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि खेजड़ी की जड़ में वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरिकरण करने वाले बैक्टीरिया निवास करते हैं, जांभोजी ने खेजड़ी के महत्व को पहचाना और उसकी रक्षा का कार्य धार्मिक अनुष्ठान की तरह पवित्र बना दिया। इसी प्रकार घास खाकर जीवित रहने वाले हिरण की महत्ता भी उनकी आंखों से छिपी नहीं रही। हिरणों के मल-मूत्र से धरती स्वतः उर्वरा बनने की प्रक्रिया के अधीन रहती है क्योंकि हिरण दूर-दूर तक छलांगें लगाता रहता है। इसलिए जांभोजी जंगलों में बसने वाले हिरणों को खेतों और गांवों तक ले आए।

    गुरु जांभोजी की शिक्षाओं का सच्चे अर्थों में अनुसरण करते हुए बिश्नाई समाज ने पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का प्रमुख हिस्सा बना लिया। जिस-जिस क्षेत्र में बिश्नोई समुदाय निवास करता है, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में किसी व्यक्ति को हिरण, खरगोश, नीलगाय आदि वन्य-जीवों का शिकार नहीं करने दिया जाता तथा खेजड़ी के हरे वृक्ष को नहीं काटने दिया जाता। वन्यजीवों के शिकार एवं खेजड़ी की कटाई को रोकने के लिए बिश्नोई समाज का प्रत्येक व्यक्ति सजग रहता है तथा इस कार्य को करते हुए अपने प्राण तक न्यौछावर करने की भावना रखता है। सरकार ने इस समुदाय की भावनाओं का आदर करते हुए बिश्नोई बहुल गांवों के आसपास के क्षेत्रों को आखेट निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया है।

    बिश्नोई लोग हिरणों की रक्षा ही नहीं करते, वे हिरणों का उपचार तथा पालन-पोषण भी करते हैं। बिश्नोई माताएं, माताविहीन हिरण शावकों को पुत्रवत् स्तनपान करवाती हैं। इस प्रकार का उदाहरण इस धरती पर निवास करने वाले किसी भी मानव समाज में शायद ही अन्यत्र मिले।

    पश्चिमी राजस्थान में अनेक बार ऐसे प्रसंग हुए जब बिश्नोई समाज के स्त्री-पुरुषों ने वन्यजीवों एवं वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। ई.1730 में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों द्वारा दिया गया बलिदान पूरे विश्व में श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। आज भी इस घटना की स्मृति को ताजा करने एवं उन अमर शहीदों को स्मरण करने के लिए देश के बहुत से हिस्सों से लोग खेजड़ली गांव आते हैं।

    बिश्नोई समाज को खेजड़ी के प्रति श्रद्धा, भगवान जांभोजी के जीवन काल से ही होने लगी थी। जांभोजी ने नागौर जिले की जायल तहसील में स्थित रोटू गांव में तीन हजार सात सौ वृक्ष लगाकर पूरे गांव की सीमा में अलग तरह का बगीचा लगा दिया था। मान्यता है कि उन्होंने खेजड़ी के एक सूखे वृक्ष को अपनी दिव्य शक्ति से पुनः हरा-भरा कर दिया था।

    आज से लगभग 21 वर्ष पहले मैंने रोटू गांव की यात्रा की थी। तब मैंने अपनी आंखों से इस गांव में मोर एवं चिड़ियों को स्थान-स्थान पर इस प्रकार बैठे हुए देखा था मानो वे गांव के पालतू पक्षी हों। इसी प्रकार मैंने हिरणों को निर्भय होकर रोटू गांव में विचरण करते हुए देखा था। मूलतः हिरण वन्यजीव है किंतु यह देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था कि मानव द्वारा दिए जा रहे प्रेम के वशीभूत होकर हिरण जंगल में बसने का अपना स्वभाव भूलकर गांव के बीच घूमते थे।

    जाम्भोजी ने एक नियम बताया था- ‘‘अमर रखावै थाट बैल बंध्यो न करावै’’ मैंने अपनी आंखों से इस गांव में बकरों का एक थाट देखा था। थाट बकरों के उस समूह को कहते हैं जिसमें गांव के समस्त बकरों को रखा जाता है तथा उनका वध नहीं किया जाता, न उन्हें बधिया किया जाता है। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी समस्त गांव द्वारा उठाई जाती है।

    जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर के धोरों में स्थित कांटेदार शुष्क वनों में बिश्नोई समाज ने हिरणों के लिए स्थान-स्थान पर पेयजल की व्यवस्था की है तथा कुत्तों के काटने से घायल एवं बीमार हिरणों के उपचार के लिए रेसक्यू सेंटर बनाए हैं। इन सेंटरों पर हिरणों के साथ-साथ अन्य घायल पशु-पक्षियों का भी उपचार किया जाता है। बरसात के दिनों में जब हिरणों के पांव मिट्टी में धंसने लगते हैं, तब भी बिश्नोई समुदाय के लोग इनकी रक्षा करते हैं। गुढ़ा बिश्नाईयां तथा खेजड़ली क्षेत्र में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को सहज भाव से पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रुषा करते हुए देखा जा सकता है।

    जोधपुर जिले में बिश्नोई धोरां नामक स्थान पर मैंने आज से लगभग 10 वर्ष पहले प्रातः काल की बेला में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को वैदिक मंत्रों के साथ हवन करते हुए तथा शुद्ध घी की आहुतियां देते हुए देखा था। यह हवन एक ऊंचे से टीले पर बने एक छोटे मंदिर के खुले प्रांगण में बने एक झौंपड़ी नुमा शेड के नीचे हो रहा था और यज्ञ-स्थल के चारों ओर मोर तथा हिरण सहज भाव से विचरण कर रहे थे।

    बिश्नोई समाज द्वारा जीवों की रक्षा के लिए बहुत सजगता बरती जाती है, उसके उपरांत भी शिकारियों द्वारा हिरणों के चोरी-छिपे शिकार की घटनाएं हो जाती हैं। कई बार शिकारियों का प्रतिरोध करते हुए बिश्नोई समाज के लोग अपने प्राण तक न्यौछावर कर चुके हैं। इस समाज ने पर्यावरण की सुरक्षा के भाव को धर्म की तरह धारण किया है जिसकी मिसाल अन्यत्र मिलनी अत्यंत कठिन है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-32

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-32

    राज्य-पशु, राज्य-पक्षी एवं राज्य-वृक्ष


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्राकृतिक धरोहर को लुप्त होने से बचाने की दृष्टि से राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक प्रतीक चिह्नों की घोषणा की जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर कमल को राष्ट्रीय पुष्प, बरगद को राष्ट्रीय वृक्ष, मोर को राष्ट्रीय पक्षी तथा बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। उसी प्रकार राजस्थान में रोहिड़ा को राज्य पुष्प, खेजड़ी को राज्य वृक्ष, गोडावण को राज्य पक्षी एवं चिंकारा को राज्य पशु घोषित किया गया है। हाल ही में ऊँट को राज्य पशु घोषित करके उसे राजकीय संरक्षण देने का निर्णय लिया गया है। इस कानून को अभी राष्ट्रपति से स्वीकृति मिलनी शेष है। राज्य-पशु, राज्य-पक्षी एवं राज्य-वृक्ष, राज्य की पर्यावरणीय चेतना के परिचायक हैं।

    राज्य-पुष्प : रोहिड़ा

    यह उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों का वृक्ष है तथा पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में बहुतायत से पाया जाता है। इस वृक्ष पर दो रंगों के पुष्प मिलते हैं। कुछ वृक्षों पर चटक केसरिया तो कुछ वृक्षों पर पीले रंग के फूल लगते हैं। इसके पुष्पों में सुगंध नहीं होती। यह पुष्प मार्च-अप्रेल में खिलता है। जिन दिनों में यह पुष्प खिलता है उन दिनों में पूरा जंगल इसके रंगों की छठा से खिल उठता है। रोहिड़ा वृक्ष को रेगिस्तानी सागवान भी कहा जाता है। इससे कलात्मक खुदाई वाले फर्नीचर बनाये जाते हैं। इसकी लकड़ी बहुत से वाद्ययंत्रों को बनाने में काम आती है। झौंपड़ों को आकार एवं मजबूती देने के लिये अरणी एवं आक की लकड़ी के साथ रोहिड़ा की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।

    राज्य वृक्ष : खेजड़ी

    खेजड़ी को मरुस्थल की रानी तथा मरुस्थल का कल्प वृक्ष भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस सिनेरारिया है। संस्कृत साहित्य में इस वृक्ष को शमी कहकर पुकारा गया है। आज भी विजया दशमी के दिन रावण दहन से पूर्व शमी पूजन किया जाता है। महाभारत काल में भी इस वृक्ष का उल्लेख मिलता है। पाण्डवों ने अपने अज्ञात वास से पहले इसी वृक्ष पर अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाये थे। अकाल के दिनों में भेड़-बकरियों, ऊँटों तथा अन्य पालतू पशुओं को यही पेड़ चारा उपलब्ध कराता है। किसानों द्वारा खेत में खेजड़ी के वृक्ष को नहीं काटा जाता है ताकि उनकी फसल को आवश्यक नाइट्रोजन मिल सके। सदियों के अनुभव ने उन्हें यह बता दिया है कि जिस खेत में खेजड़ी के जितने अधिक पेड़ होंगे, उनकी फसल उतनी ही अधिक अच्छी होगी। इसलिये खेजड़ी को कभी भी पूर्णतः नहीं काटा जाता है अपितु उसकी प्रति वर्ष छंगाई करके उनकी पत्तियां तथा लकड़ी प्राप्त की जाती है। इस पेड़ की फलियां सांगरियां कहलाती हैं जो सब्जी के रूप में खाई जाती हैं। अमृता देवी बिश्नोई तथा उनके साथियों ने इसी वृक्ष की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये थे। कन्हैयालाल सेठिया ने खेजड़लो शीर्षक से लिखी कविता में खेजड़ी को मरुस्थल के सुख-दुःख का साथी बताया है-


    जेठ मास में धरती धोळी, फूस पानड़ो मिलै नहीं,

    भूखां मरता ऊंठ फिरै है, अै तकलीफां झिलै नहीं,

    इण मौके भी उण ऊंठा नै, डील चरावै खेजड़लो,

    अंग-अंग में पीड़ भरी पण, पेट भरावै खेजड़लो।

    म्हारै मुरधर रो है सांचो, सुख दुख साथी खेजड़लो।

    तिसां मरै पण छयां करै है, करड़ी छाती खेजड़लो।

    राज्य पक्षी : गोडावण

    इण्डियन ग्रेट बस्टर्ड (गोडावण सोहन पक्षी) को प्रदेश का राज्य पक्षी घोषित किया गया है। यह धरती पर रहने वाली बड़ी चिड़िया है जो छोटे शुतुरमुर्ग जैसी दिखती है। इसे राजस्थान में मालमोरड़ी भी कहते हैं। भूरे-सफेद रंग का यह पक्षी लगभग 18 किलोग्राम भारी होता है। मादा 90 से.मी. लम्बी होती है जबकि नर 120 से.मी. लम्बा होता है। ऊपरी भाग गहरा पीला होता है जिस पर महीन काली लहरियां बनी होती हैं। निचला भाग सफेद किन्तु वक्ष में नीचे की ओर एक चौड़ी काली पट्टी होती है। सिर पर काली कलंगी वाला मुकुट होता है। उड़ते समय, बाहर निकली हुई सफेद गर्दन और निचले भाग, काला मुकुट, गले की पट्टी एवं पंखों के किनारे बड़ा सफेद धब्बा स्पष्ट रूप से दिखता है। नर गोडावण के सिर पर ब्लैक क्राउन लंबा होता है जबकि मादा में ऐसा नहीं होता। मादा में गले की काली पट्टी या तो होती नहीं है और यदि होती है तो सिर्फ किनारों पर। मादा आकार में थोड़ी छोटी तथा वजन में लगभग आधी होती है।

    गोडावण घास के टुकड़ों एवं झाड-झंखाड़ वाले खुले क्षेत्रों में जहाँ खेत भी हों, में रहना पसन्द करती है। यह साधारणतः दो या तीन बच्चों के साथ टोलियों में रहती है। 20-25 गोडावण पक्षियों की टोलियां भी देखी गई हैं। यह काफी तेज भाग सकती है। इसका प्रजनन काल मार्च से सितम्बर के बीच होता है। नर पोलीगैमस (बहुगामी) होता है। एक नर 3 से 5 मादाओं के साथ संसर्ग करता है। प्रजनन काल में नर के गले के नीचे एक ग्रंथी काफी बड़े आकार की हो जाती है जो धरती तक लटकने लगती है। नर पक्षी, मादा को रिझाने के लिए उसके सामने पंख फैलाकर झूमते हुए नृत्य करता है। यह सेवण घास में सामान्यतः एक किन्तु कभी-कभी दो अण्डे देती है जो बादामी या फीके जैतूनी भूरे रंग के होते हैं और उन पर गहरे भूरे रंग की चित्तियाँ होती हैं। अण्डे झाड़ी के नीचे छिछला सा गड्ढा बनाकर उसमें दिये जाते हैं। मादा पक्षी अण्डे सेती है। लगभग एक शताब्दी पहले तक यह समूचे भारत में एक स्थानीय पक्षी की भांति पाया जाता था। 70 के दशक में जैसलमेर जिले में अरब के शहजादों ने उनका अंधाधुंध शिकार किया। अब यह केवल राजस्थान, गुजरात एवं महाराष्ट्र के कुछ भागों में ही पाया जाता है। दो दशक पहले लगभग 1,260 गोडावण होने का अनुमान था किन्तु अब इनकी संख्या 1,000 से भी कम रह गई है जिसमें से भी अधिकतर राजस्थान के राष्ट्रीय मरु उद्यान (बाड़मेर-जैसलमेर), अजमेर जिले में सोंकलिया क्लोज्ड एरिया एवं बारां जिले के सोरसन क्लोज्ड एरिया में पाई जाती है। गोडावण के संरक्षण के लिये राजस्थान सरकार द्वारा ऑपरेशन बस्टर्ड तथा जीन पूल संरक्षण अभियान चलाया जा रहा है।

    राज्य पशु : चिंकारा

    चिंकारा को एंटीलोप (छोटा हिरण) भी कहते हैं। यह हल्के भूरे अखरोटी रंग का सुन्दर जानवर है। भोले मुँह और सुन्दर चक्राकार सींग वाले इस पशु के पेट के नीचे का भाग सफेद होता है। घास, फल और पेड़-पौधों की पत्तियाँ इसका मुख्य भोजन है। इसकी पूंछ छोटी और काली होती है जिसे यह हर समय हिलाता रहता है। इसे संरक्षण देने की दृष्टि से राजस्थान सरकार ने चिंकारा को राजकीय पशु घोषित किया है। यह लगभग पूरे प्रदेश में पाया जाता है। चिंकारा को राष्ट्रीय उद्यान रणथम्भौर, सरिस्का, कुम्भलगढ़, जयसमन्द (उदयपुर), सीतामाता वन विहार, राष्ट्रीय मरु उद्यान जैसलमेर, कैला देवी एवं जवाहर सागर (कोटा) अभयारण्यों में स्वच्छन्द विचरण करते हुए देखा जा सकता है। राज्य में संरक्षित एवं असंरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों में लगभग 35 हजार चिंकारे होने का अनुमान है।

    राज्य पशु : ऊँट

    राजस्थान के इतिहास, सामाजिक जीवन एवं अर्थव्यवस्था में ऊँट का बड़ा योगदान है। 2007 की पशुगणना में राज्य में 4,21,836 ऊँट पाये गये। प्रति वर्ष ऊँट के राज्य से बाहर भेजे जाने तथा मांस हेतु काट दिये जाने के कारण इनकी संख्या लगातार घट रही है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2014 में इसे राज्य पशु घोषित किया है ताकि इसे भी चिंकारा की तरह संरक्षण मिल सके। ऊँट की जैसलमेरी, बीकानेरी एवं जोधपुर नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। ऊँट को रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। उसके पैरों में खुरों के स्थान पर गद्दियां (पैड) लगी होती हैं जिनके कारण वह बड़े-बड़े रेतीले टीलों में धंसता नहीं है तथा सरपट दौड़ता चला जाता है।

    कंटीली झाड़ियां खाकर जीवित रहने वाले इस पशु के पेट में जल संग्रहण की थैलियां होती हैं जिनके कारण एक बार पानी ली लेने के बाद ऊँट कई दिनों तक बिना पानी पिये रह सकता है। आजादी के पहले रेगिस्तानी डाकू तथा आजादी के बाद रेगिस्तानी तस्कर इस पशु का प्रयोग बड़े पैमाने पर करते रहे हैं। इस क्षेत्र में तैनात बी.एस.एफ. के जवान तथा पुलिस बल भी उँटों का प्रयोग करते हैं। रेगिस्तान की विरल बस्तियों मंम डाक तथा दवा पहुँचाने के लिये उँटों की पीठ पर चलते-फिरते डाकखानों तथा औषधालयों की स्थापना की गयी है। उँटों की पीठ पर चलती-फिरती बैंक शाखायें भी चल रही हैं। राइका जाति के लोग उँटों के विशाल झुण्ड पालते हैं तथा अकाल की स्थिति में मारवाड़ छोड़कर मालवा की ओर चले जाते हैं। मादा ऊँट के दूध में विटामिन, खनिज लवण, पोषक तत्व तथा घावों को भरने की अपार क्षमता है। यह दूध पारम्परिक दूध की तुलना में थोड़ा खारा होता है। गाय के दूध की अपेक्षा इसमें तीन गुना अधिक विटामिन सी और दस गुना अधिक आयरन होता है। विटामिन बी का यह अच्छा स्रोत है। इसमें उच्च स्तरीय पोषक तत्व मौजूद हैं। इस दूध के कुछ तत्व कैंसर, एचआईवी, एड्स अल्जाइमर और हैपेटाइटिस सी से लड़ने में सक्षम हैं। इसके सेवन से मधुमेह तथा हृदय रोग से लड़ने में भी सहायता मिलती है। इस दूध में वसा की मात्रा केवल 1.85 प्रतिशत ही होती है। जबकि गाय के दूध में लगभग 5 प्रतिशत होती है। मादा ऊँट के दूध में मलाई कम पड़ती है तथा इसे 48 घण्टे तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

    बीकानेर स्थित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र बीकानेर द्वारा मादा ऊँट के दूध से आइसक्रीम, पाश्चुराइज्ड दूध, दही और खीर का उत्पादन किया जाता है। मादा ऊँट का दूध शुद्ध तथा पाश्चुराइज्ड रूप में जयपुर, दिल्ली तथा बीकानेर में कैमल मिल्क के नाम से बेचा जा रहा है। यूरोपीय देशों एवं अमरीका में भी मादा ऊँट के दूध की मांग है।

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