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  • अखिल भारतीय गर्दभ संघ का भारतीय नेताओं के नाम खुला ज्ञापन -

     03.06.2020
    अखिल भारतीय गर्दभ संघ का भारतीय नेताओं के नाम खुला ज्ञापन -

    बुरा न मानो होली है!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com



    गर्दभ जाति का ये अपमान ! नहीं सहेगा हिन्दुस्तान !!



    सारे देश के गधे गुस्से से तमतमाये हुए हैं। यूपी के चुनावी संग्राम में जिस प्रकार गुजरात के गधों की असम्मानपूर्ण चर्चा की गई है यह पूरी वैशाखनंदन जाति का घनघोर अपमान है। जातीय अपमान के इस मुद्दे पर सम्पूर्ण गर्दभ जाति एक है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के गधे उद्वेलित हैं, विचलित हैं, अपमानित हैं। सौराष्ट्र से लेकर असम तक के गधे एक स्वर में अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं और प्रतिशोध लेने को आतुर हैं।

    यदि किसी नेता को यह गुमान हो कि गुजरात के गधों का अपमान करके वह किसी अन्य राज्य के गधों से अपने सम्बन्ध अच्छे बनाये रख सकेगा तो हम उसकी यह गलतफहमी शीघ्र ही दूर कर देंगे। हम राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलायेंगे और शीघ्र ही संसद का घेराव करेंगे। धोबी के गधे, कुम्हार के गधे, पहाड़ी खच्चर, मैदानी टट्टू और यहाँ तक कि हमारे ही बड़े भाई अर्थात् घोड़े भी हमारे साथ आने को तैयार हैं।

    जब गिर के शेरों की चर्चा होती है तो नेताओं के पेट में दर्द नहीं होता। जब रणथंभौर के बाघों की चर्चा होती है तो भी किसी के पेट में मरोड़ नहीं उठते। जब काजीरंगा के हाथियों के फोटो छपते हैं तब भी किसी नेता की आंख में सूअर का बाल नहीं उगता। कौन बनेगा करोड़पति में अपने एक-एक सवाल से लोगों को लखपति और खुद को दो हजार करोड़ का मालिक बनाने वाले अमिताभ बच्चन ने हमारा विज्ञापन क्या कर दिया, नेताओं के सीने में जलन हो गई। अब इन तोता-चश्म नेताओं की आंखों में तूफान न ला दिया तो हमें गधा मत कहना!

    जिन जंगली जानवरों का नाम लेकर तुम नेता लोग अपने आप को गौरव भरी निगाहों से देखते हो, उन्हें तो तुम पिंजरे में बंद करके दूर से देखते हो और हम जो पूरी निष्ठा से पीढ़ी दर पीढ़ी तुम्हारे गांवों और शहरों में खुले घूमकर मानव जाति की सेवा कर रहे हैं उन पर तुम फिकरे कसते हो !

    होली के पावन पर्व पर हम भारत के सभी गधे एक स्वर से मांग करते हैं कि वे सारे नेता हमसे माफी मांगें जिन्होंने हम पर व्यंग्य कसकर चुनावी वैतरणी पार करने की सोची है। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो वे कभी भी इस वैतरणी को पार नहीं कर सकेंगे। हम इन्हें बीच मंझधार डुबो देंगे। यदि विश्वास नहीं हो तो ग्यारह मार्च का टीवी देख लेना।

    हमारा दावा है और हम छाती ठोक कर कहते हैं कि हम गधों की जमात, तुम नेताओं की जमात से कहीं अधिक श्रेष्ठ, अधिक पवित्र, अधिक राष्ट्रभक्त और सांस्कृतिक मर्यादाओं का अधिक सम्मान करने वाली है।

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ का ये दावा है कि भारत के तमाम नेताओं ने देश की जितनी सेवा की है, उससे कई लाख गुना सेवा हम कर चुके हैं और इस मुद्दे पर हम, नेताओं से खुली बहस करने को तैयार हैं। देश सेवा के माामले में नेता तो क्या, सम्पूर्ण मानव जाति भी हमारे सामने कहीं टिकी नहीं रह सकती।

    मैली हो चुकी नेताओं की सफेद खद्दर, तभी उजली दिखाई देती है जब हम उसे अपनी पीठ पर लादकर तालाब तक ले जाते हैं। नेताओं के घरों में मटके का शुद्ध जल भी तभी नसीब होता है जब हम जंगल से मिट्टी खोदकर कुम्हार के घर तक पहुंचाते हैं। जब कभी भारत ने पाकिस्तान या चीन से युद्ध किया, टैंकों से पहले हम युद्ध सामग्री लेकर सीमा की तरफ रवाना होते हैं। जब नेता युद्ध से डरकर अपने घरों में दुबक जाते हैं तब हम और हमारे भाईबंद अपनी पीठ पर बारूद लादकर पहाड़ों पर चढ़ते हैं।

    अरे हम तो वो हैं जिन्हें लंकाधिपति रावण ने अपने सिर का मुकुट बनाया तब भी हम घमण्ड से नहीं भरे। सोने की लंका में रहकर भी हम दिल और दिमाग से इतने शीतल बने रहे कि शीतला माता हम पर सवारी करके गौरवान्वित होती हैं। हम 1823 एडी से अमरीका की डैमोक्रेटिक पार्टी का सिम्बल बने हुए हैं। प्रेमचंद ने हम पर कलम चलाई, तब कहीं जाकर वे उपन्यास सम्राट कहलाये। किसी नेता के पास ऐसी शानदार उपलब्धियां हों तो खुले मंच पर आकर हमसे बहस करे।

    हमने कभी नोटबंदी का विरोध नहीं किया, कभी आरक्षण की मांग नहीं की, कभी संसद का घेराव नहीं किया। कभी अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा नहीं मांगा। कभी संसद और विधानसभा में जाकर कर एक दूसरे को लातों से नहीं मारा। कभी अपने कम योग्य पुत्रों के लिये किसी धोबी या कुम्हार के यहाँ नौकरी की अर्जी नहीं लगाई। हमने कभी कालाधन इकट्ठा नहीं किया न कभी विदेशी बैंकों में पैसा छिपाया। हमने कभी धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा के नाम पर भाई को भाई से नहीं लड़ाया। हमने ऐसा कभी कुछ नहीं किया जो भारत के नेता लोग आये दिन करते हैं।

    इतना सब काला-पीला होने पर भी हमने आंख मूंदकर नेताओं पर विश्वास किया और कोयले की खानों से कोयला ढोते रहे लेकिन नेताओं ने कोयले की दलाली करके अपनी खादी पर कालिख पोत ली। किसी गधे ने कभी भी ऐसा किया हो तो बता दो। अरे ये नेता तो गायों का चारा भी खा गये। क्या कभी किसी गधे ने गायों का चारा खाया, यदि खाया हो तो बता दो, हम अपना आंदोलन वापस ले लेंगे।

    काले धंधे करने वाले नेता बुद्धिमान कहलायें और मेहनत-मजदूरी करने वाले गधे व्यंग्य बाण सहें!! नहीं-नहीं, ई ना चोलबे! बहुत सह लिया, अब नहीं सहेंगे। गर्दभ जाति का ये अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। जो हमसे टकरायेगा, दो दुलत्ती खायेगा। अब भी नेताओं के पास समय है, सुधर जायें, हमसे माफी मांगें। मुकुट पहनने के जमाने तो गये लेकिन नेता लोग अपने कुर्ते पर हमारे चित्र सजायें। वरना, हम क्या कर सकते हैं, यह हम करके ही बतायेंगे। हम नेताओं की तरह कारनामे करने में विश्वास नहीं करते। काम करने में विश्वास करते हैं। हम हॉवर्ड से पढ़े हुए नहीं हैं किंतु हार्डवर्क करते हैं।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • अखिल भारतीय गर्दभ संघ आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता है

     03.06.2020
    अखिल भारतीय गर्दभ संघ आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता है

    रिवर्स पोलराइजेशन का ये कमाल, देख ले सारा हिन्दुस्तान !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    यूपी चुनावों में जो ऐतिहासिक परिणाम आये, निःसंदेह इसका सारा श्रेय अखिल भारतीय गर्दभ संघ को जाता है। यदि हम बीच में न आये होते तो यह निर्वाचन इतना रोचक, इतना पवित्र और इतना ऐतिहासिक नहीं हुआ होता। चुनाव तो केवल पांच राज्यों में लड़े जा रहे थे जिनमें गुजरात सम्मिलित नहीं था किंतु जैसे ही यूपी में चुनावों की रणभेरी बजी, हमें याद कर लिया गया और हमने वो कर दिखाया जो आज से पहले कोई नहीं कर सकता था। यह अखिल भारतीय गर्दभ संघ ही था जिसने यूपी में हाथी को उठाकर पटक दिया, साइकिल को पंचर कर दिया और साइकिल के पीछे बैठे हाथ को टाटा कह दिया।

    सबसे पहले तो यूपी की उन मुस्लिम माताओं का आभार जिन्होंने धरती के इतिहास में पहली बार अपने पतियों की दकियानूसी सोच को उठाकर धरती पर पटक दिया और तीन तलाक से मुक्ति पाने की चाहत में, ईवीएम नामक मतपेटी में देश के नवसृजन का बीज बो आईं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि महिलाएं चाहें तो क्या नहीं कर सकतीं! इसमें कोई संदेह नहीं कि चुनाव तो कमल अपने ही बल पर जीता है किंतु जीत के इस पुण्य यज्ञ में मुस्लिम माताओं ने अपने मत की आहुति राष्ट्रीयता के पक्ष में देकर देश में एक नये वातावरण का सृजन किया है। उन्होंने अपने शौहरों को बता दिया है कि उन्हें खतरा राष्ट्रीयता की विचारधारा से नहीं, अपतिु अपने शौहरों की तलाकवादी मानसिकता से है। उन्हें खतरा तारिक फतह से नहीं है अपित उन मुल्ला-मौलवियों से है जो मस्लिम माताओं और बहनों को बुरके में बंद करके रखना चाहते हैं।

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ, यूपी के दलित मतदाताओं का भी आभार प्रकट करता है जिन्होंने दलित की बेटी के नाम से राजनीति करने वाली और अरबों-खरबों की सम्पत्ति खड़ी करने वाली बहिनजी की वास्तविकता को समझ लिया और यूपी को एक बार फिर से लूटने के उनके खेल को बिगाड़ दिया। अखिल भारतीय गर्दभ संघ साधना गुप्ता के पति से सहानुभूति जताने की कोई इच्छा नहीं रखता जिन्होंने एम-वाई का समीकरण बनाकर जनता को खूब बेवकूफ बनाया।

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ उत्तराखण्ड के मतदाताओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करता है कि उन्होंने एक भ्रष्ट, अवसरवादी और अल्पसंख्यक-केन्द्रित-साम्प्रदायिकतावादी रावत सरकार को उखाड़ फैंका। सत्ता के लालच में आकण्ठ डूब रावत को राज्य की बहुसंख्यक जनता की अपेक्षा अल्पसंख्यक मतदाताओं को ही लुभाना अच्छा लगा था। वे समझ ही नहीं पाये कि देश में रिवर्स पोलराइजेशन की बयार चल रही है। भारत को रिवर्स पोलराइजेशन अखिल भारतीय गर्दभ संघ की ही देन है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि आजादी के बाद से राजनीतिक पार्टियां बहुसंख्यक जनता के हितों को अल्पसंख्यक जनता के वोटों पर कुर्बान करती आई थीं, अब हमने राजनीतिक पर्टियों को इस पैटर्न में सुधार लाने के लिये प्रेरित किया है। अल्पसंख्यक मतदाता भी समझ रहे हैं कि उन्हें केवल वोट बैंक बनाकर रख दिया गया है। वे भी इस देश के बराबर के नागरिक हैं न कि विशेष सुविधओं की वैशाखियों पर पलने वाले बेचारे!

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ मणिपुर की माताओं और मतदाताओं का भी अभिनंदन करता है जिन्होंने शर्मिला इरोम के खतरनाक इरादों को इतनी बुरी तरह से नष्ट कर दिया। इरोम ने अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, असम, नगालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा में 1958 से लागू और जम्मू-कश्मीर में 1990 से लागू आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) को हटवाने के लिये 16 साल तक अनशन किया था। इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को इन राज्यों में किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है। यह कानून उन लोगों के विरुद्ध है जो देशद्रोही गतिविधियों के माध्यम से भारत को तोड़ने की साजिश रचते हैं। इरोम इस कानून को हटाकर भारत की सुरक्षा बलों का मनोबल तोड़ना चाहती थीं और स्वयं मणिपुर की मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रही थीं किंतु मणिपुर की जनता ने बता दिया कि वे पूरी तरह से भारत की मुख्यधारा के साथ हैं तथा देशद्रोहियों को गोली मार दी जानी चाहिये।

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ पंजाब के मतदाताओं का भी आभार व्यक्त करता है जिन्होंने एण्टी इन्कबेंसी फैक्टर के चलते दस साल पुरानी सरकार को तो उखाड़ फैंका किंतु अराजकतावादी राजनीति के जन्मदाता अरविन्द केजरीवाल के खतरनाक इरादों को सफल नहीं होने दिया। उन्होंने क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर एक राष्ट्रीय पार्टी को चुना, इसके लिये उनका धन्यवाद। हालांकि पंजाब की जनता के लिये इंदिरा गांधी के हाथ चुनाव चिह्न वाली कांग्रेस को चुनने का फैसला किसी कड़वे घूंट को पीने से कम नहीं है। कारण स्वतः समझे जा सकते हैं।

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ गोआ के मतदाताओं की भी प्रशंसा करता है जिन्होंने त्रिशंकु विधान सभा बनाकर यह जता दिया कि वे एण्टी इन्कम्बेंसी फैक्टर से संत्रस्त तो हैं किंतु वे साम्प्रदायिक राजनीतिक करने वाली हाथ के निशान वाली उसी पार्टी को फिर से सत्ता की चाबी सौंपने को तैयार नहीं हैं जिसने कभी भी गोआ का भला नहीं किया।

    अखिल भारतीय गर्दभ संघ देश के लोगों से यह अपील करता है कि हिन्दू, मुसलमान, दलित, राष्ट्रवादी, समाजवादी, साम्यवादी आदि सभी लोग इस देश के बराबर के नागरिक हैं। वेएक-दूसरे के खिलाफ नहीं सोचें। देश को सच्चे मन से सुखी और सम्पन्न बनाने के लिये प्रेम और परिश्रम में विश्वास रखें। हम एक रहेंगे तो नेक रहेंगे।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • पांच किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है!

     03.06.2020
    पांच किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है!

    पांच किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है!

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    सत्ताधारी दल की लॉलीपॉप छाप राजनीति ? या राजनीतिक दलों की गलाकाट प्रतियोगिता ? या असामाजिक तत्वों के बढ़ते हौंसले ? कौन है जिम्मेदार किसानों की मौत का ? मंदसौर में पांच किसान बंदूक की गोली से मारे गए। इस बात पर अनंत काल तक बहस की जा सकती है कि इन किसानों की हत्या का जिम्मेदार कौन है! कांग्रेस, कम्यूनिस्ट और समाजवादी तबका जिसमें राजनेता से लेकर उनके पिछलग्गू मीडिया घराने तक सब शामिल हैं, एक स्वर से चिल्लाएंगे कि इसके लिए मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार जिम्मेदार है। मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री इस गोलीकाण्ड के कुछ ही देर बाद वक्तव्य दे चुके हैं कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। मंदसौर के कलक्टर कह चुके हैं कि मैंने गोली चलाने के आदेश नहीं दिए। पुलिस अधिकारी कह चुके हैं कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। किसानों ने पहले तो कहा कि गोली पुलिस ने चलाई और अब कह रहे हैं कि गोली सीआरपीएफ ने चलाई। सीआरपीएफ भी मना कर चुकी। टीवी पर चल रहे वीडियो बता रहे हैं कि आंदोलनकारी किसानों को समझाने गए मंदसौर के जिला कलक्टर स्वतंत्र कुमार से किसानों ने मारपीट की। राज्य सरकार ने गोली चलने के कुछ घण्टे के भीतर ही इस गोलीकाण्ड की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए जिससे अनुमान होता है कि राज्य सरकार इस आकस्मिक गोलीकाण्ड से घबराई हुई है और इस मामले में लीपापोती नहीं कर रही।

    भारतीय लोकतंत्र में इस तरह की घटनाएं दुखद और शर्मनाक तो हैं किंतु भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी को भी स्पष्ट करती हैं। भारतीय लोकतंत्र में लचीलापन जरूरत से ज्यादा है इसलिए सरकारें सामान्यतः तब तक गोली नहीं चलातीं जब तक कि स्थितियां बिल्कुल ही हाथ से नहीं निकल जाएं। मध्य प्रदेश के किसान आंदोलन की आग महाराष्ट्र के किसान आंदोलन के बाद भड़की। महाराष्ट्र के किसान अपनी फसलों, अपने दूध तथा अपनी सब्जियों को सड़क पर फैंक रहे थे (हालांकि ऐसा करके वे कोई लोकतांत्रिक आदर्श स्थापित नहीं कर रहे थे), जबकि मध्य प्रदेश के किसानों ने बाजारों में सजी दुकानों का सामान लूटना और फैंकना शुरू कर दिया था। पर्याप्त संभव है कि यह काम भी किसानों की आड़ में असामाजिक तत्वों ने किया और भड़के हुए किसानों पर गोली चलाने का काम भी उन्हीं असाजिक तत्वों ने किया। नवम्बर 2018 में मध्यप्रदेश में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। यह संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि क्या कुछ असमाजिक तत्व मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगाड़कर शिवराजसिंह सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं! मृत किसानों के शरीर में वे गोलियां निश्चित रूप से मिल जाएंगी जिन्होंने इन किसानों के प्राण लिए हैं। इन गोलियों के सहारे उन बंदूकों को ढूंढा जा सकता है जिनसे ये चली हैं तथा उन अपराधियों को भी पकड़ा जा सकता है जिनके कंधों पर ये बंदूकें रखी हुई थीं।

    दिल्ली में आप पार्टी के उत्थान के बाद से, भारतीय राजनीति में रातों रात सफल होने के फार्मूले तलाशे जाने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में जिस प्रकार किसानों को ऋण माफी का लालच देकर उनसे वोट लिए गए, बहुत स्वाभाविक था कि इससे दूसरे प्रदेशों के किसानों में भी बेचैनी उत्पन्न होती। असामाजिक तत्वों ने इसी बेचैनी का लाभ उठाया लगता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलताओं हेतु अपनाए जाने वाले शॉर्टकट्स और भी अधिक खतरनाक और शर्मनाक हैं। इन्हें वे राजनीतिक दल अपनाते हैं जो जनता के दुख-दर्द दूर करने के लिए जनता के हितैषी बनकर घड़ियाली आंसू ढारते हैं तथा वोट हथिया लेते हैं। यदि ऐसा है तो भारत की जनता को अधिक समझदारी से काम लेना होगा। किसानों, उद्योगपतियों, व्यवसाइयों और अन्य लोग, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, कब तक सरकारें उनके ऋण माफ कर सकती हैं!

    हमारी शक्ति इस बात पर व्यय नहीं होनी चाहिए कि किनके ऋण माफ किए जाएं और किनके नहीं, अपितु इस बात पर लगनी चाहिए कि कृषि को अधिक लाभकारी कैसे बनाया जाए! किसानों को सस्ता पानी, सस्ती बिजली और सस्ता खाद कैसे मिले! उनकी फसल का सही मूल्य कैसे मिले! देश में अन्य वस्तुए महंगी न हों तो किसानों को भी अधिक मूल्य पर फसलें बेचने की आवश्यकता नहीं होगी। क्या केन्द्र की सरकार और राज्य सरकारें इस दिशा में ईमानदारी से कार्य कर रही हैं! या वे लोक-लुभावन बातों के जरिए जनता को मूर्ख बनाकर वोट बटोरने में ही अपने आप को अधिक लोक हितकारी बता रही हैं! धरती गर्म हो रही है, पानी खतम हो रहा है, खेती सिमट रही है, काम-धंधे मंद पड़ रहे हैं। देश महंगाई से त्रस्त है किंतु किसानों को उनकी फसलों का पूरा मूल्य नहीं मिल रहा। ललित मोदी और विजय माल्या जैसे बड़े लुटेरे, नेताओं, मंत्रियों और अफसरों की सहायता से देश का पैसा लूटकर बाहर भाग जाते हैं। सुब्रत जैसे लोग बेशर्म होकर जेलों में पड़े रहते हैं और चारा घोटाले के आरोपी, पूरी जिंदगी बेल पर काट देते हैं। आम आदमी के मन से सरकारी व्यवस्था के साथ-साथ धर्म और आस्था भी रीत रही है। बलात्कार और अपराध बढ़ रहे हैं। राजनेताओं में सत्ता छीनने की गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। इन विषैली परिस्थितियों में रहने वाली जनता को सरकारें अंततः कितने दिनों तक शांत रख पाएंगी! ये स्थितियां तो दिनों दिन बढ़ती हुई ही प्रतीत होंगी। मंदसौर के पांच किसानों की मौत का जिम्मेदार तय करते समय हमें देश की इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार लोगों को भी चिह्नित करना होगा।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • क्या भारत तुष्टिकरण को नकार कर व्यापक देशहित की राजनीति की ओर बढ़ रहा है !

     03.06.2020
    क्या भारत तुष्टिकरण को नकार कर व्यापक देशहित की राजनीति की ओर बढ़ रहा है !

    क्या भारत तुष्टिकरण को नकार कर व्यापक देशहित की राजनीति की ओर बढ़ रहा है !


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    ऐसा पहली बार हुआ जब देश में तीन तलाक का मुद्दा विचार-विमर्श और बहस का विषय बना। पर्सनल लॉ के तीन तलाक सम्बन्धी प्रावधानों को कोर्ट के सामने सुना गया। टीव चैनलों पर बुर्के 
    की प्रासंगिकता एवं अप्रासंगिकता पर भी खुली बहसें हुई। ऐसा भी पहली बार हुआ जब भारत सरकार ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के घरों, दुकानों और अड्डों पर छापे मारकर उन्हें पाकिस्तान से मिलने वाले धन का पता लगाने का काम शुरु किया। यह काम डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पहली सरकार के समय में आरम्भ हो जाना चाहिए था किंतु तुष्टिकरण की राजनीति के चलते ऐसा नहीं किया गया। इस दृष्टि से वर्ष 2017, देश के इतिहास में एक ऐसे निर्णायक बिंदु के रूप में स्मरण किया जायेगा जहाँ से भारत, इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद आरम्भ हुई तुष्टिकरण की राजनीति को नकार कर सर्वस्पर्शी, समावेशी एवं व्यापक देशहित की राजनीति की ओर कदम बढ़ाता हुआ दिखाई देता है और नये भारत की रचना का रोडमैप साफ दिखाई देने लगता है।

    तुष्टिकरण की नीति से देश का विकास अवरुद्ध

    भारत 1206 ईस्वी से 1526 तक अफगानिस्तान से आए तुर्की सुल्तानों का, 1526 से 1765 तक समरकंद से आए मुगल बादशाहों का, 1765 से 1857 तक सात समंदर पार से आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी का और 1858 से लेकर 1947 तक सात समंदर पार बैठने वाले ब्रिटिश क्राउन का गुलाम रहा। साढ़े सात सौ वर्षों की गुलामी के बाद जैसा निर्धन और शोषित भारत हमें विरासत में मिला, उसका नवनिर्माण सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के मंत्र पर आधिारित होना चाहिये था, जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के समय तक इस नीति का बहुत अंशों में पालन भी हुआ किंतु राजीव गांधी के समय शाहबानो प्रकरण से देश में अल्पसंख्यकों के प्रति तुष्टिकरण की नीति का नया अध्ययाय आरम्भ हुआ। जिसका अनुसरण गैर-कांग्रेसी सरकारों ने भी किया। विश्वनाथ प्रतापसिंह की सरकार ने तुष्टिकरण की राजनीति को चरम पर पहुंचाया तथा मण्डल कमीशन की रिपोर्ट लागू करके, पहले से ही बंटे हुए भारतीय समाज को कई नए टुकड़ों में बांट दिया। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी पहली भाजपा सरकार भी तुष्टिकरण की राजनीति से अछूती नहीं थी। भाजपा की वादा खिलाफी के कारण देश की जनता ने भाजपा को दस साल तक सत्ता से बाहर रखा किंतु मनमोहनसिंह सरकार की विनाशकारी तुष्टिकरण नीति ने देश के स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध करके अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया।

    धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश के सांस्कृतिक ढांचे पर हमला

    भारत के मूल संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द का उल्लेख नहीं था इंदिरा गांधी ने इसे जबर्दस्ती जुड़वाया तथा संविधान की मूल प्रति में रखे गए भगवान राम, देवी सीता तथा श्रीकृष्ण आदि देवी-देवताओं के चित्र हटा दिए। तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत यहँं से मानी जा सकती है किंतु संजय गांधी ने चांदनी चौक खाली करवाकर तथा परिवार नियोजन लागू कर, यह सिद्ध कर दिया कि हाथी के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं। इंदिरा गांधी के बाद धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता के नाम पर कांग्रेस तथा क्षेत्रीय दलों ने देश के स्थापित मूल्यों को ढहा दिया। भारतीय संस्कृति के मूल आधार तथा जन-जन के मन में विराजित भगवान राम और कृष्ण को भी इन्होंने घोर साम्प्रदायिक बनाकर प्रस्तुत किया। जय श्री राम कहने वालों को देशद्रोही की दृष्टि से देखा जाने लगा। भारत माता की वंदना करने वाले राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् को भी तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने साम्प्रदायिक बना दिया। हिन्दी भाषा को क्षेत्रीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी भाषा के रूप में खड़ा किया गया। प्रगतिशील विचारों के नाम पर भारतीय संस्कृति की अच्छी बातों को सम्प्रदायवादी और रुढ़िवादी कहकर उन्हें स्कूली पाठ्यक्रमों से निकाल दिया। महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी और सिख गुरुओं तक को इन्होंने विवादित बना दिया।

    तुष्टिकरण एवं मण्डल कमीशन द्वारा क्षेत्रवाद और जातिवाद को बढ़ावा

    धर्मनिरपेक्षता, तुष्टिकरण तथा मण्डल कमीशन का मिला-जुला दुष्परिणाम ये हुआ कि देश के बहुत से प्रांतों में क्षेत्रीय पार्टियां कुकुरमुत्तों की तरह उग आईं। इन क्षेत्रीय दलों ने हर प्रान्त में क्षेत्रवाद और जातिवाद के किलों को मजबूत बनाया। क्षेत्रीय दलों ने कभी कांग्रेस के साथ तो कभी भाजपा के साथ मिलकर सरकारें बनाईं तथा सत्ता को जनता की सेवा का माध्यम न रहने देकर, निजी स्वार्थों की पूर्ति का जरिया मान लिया। लोगों को आपस में लड़ाते रहने के लिए क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने तरीके से भारत के गौवरमयी सांस्कृतिक ढांचे को तोड़ने का काम किया।

    जनता ने पृथकतावादी शक्तियों को दिया मुँहतोड़ जवाब

    2014 में केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने से लेकर वर्ष 2017 में हुए यूपी और उत्तराखण्ड आदि राज्यों के चुनावों में देश की जनता ने सकारात्मक सोच के साथ एवं देशहित के चिंतन के साथ मतदान किया जिसके कारण भारतीय जनता पाटी भारी बहुमत से सत्ता में लौटी एवं देश की जनता ने पृथकतावादी शक्तियों को मुँहतोड़ जवाब दिया।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तुष्टिकरण की राजनीति का अंत

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश की आम जनता तक यह संदेश सफलता पूर्वक पहुंचाने का कार्य किया है कि यह देश उन सब के लिए बराबर-बराबर है जो सदियों से इस देश में रहते आये हैं, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों, बौद्ध हों या किसी और धर्म और पंथ को मानने वाले। सबके लिए देश के संविधान में बराबर के अधिकार का प्रावधान किया गया है। फिर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की राजनीति क्यों और कब तक ? प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तीन साल के कार्यकाल में सिद्ध करके दिखाया है कि देश की आम जनता जातिवादी, सम्प्रदायवादी और क्षेत्रवादी राजनीति से तंग आ गई है। भारत की श्रमशील जनता, राजनीतिक दलों की कुटिल चालों से मुक्ति चाहती है तथा धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर धार्मिक सद्भाव वाली पंथ निरपेक्ष राजनीति चाहती है। धर्म नामक महान तत्व तो भारत की धर्म-प्राण जनता की आत्मा में बसता है, धर्म को खोकर हम किस तरह के धर्म-विहीन समाज और देश की रचना करना चाहते हैं?

    आतंकवाद पर करारी चोट

    स्वतंत्र भारत में तुष्टिकरण और राजनीतिक शिथिलता के कारण आतंकवाद ने तेजी से मुंह पसारा किंतु नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने आतंकवाद के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर घेरकर उसकी काली करतूतों को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। उसी का परिणाम है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से लेकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी तथा ईरान के राष्ट्रपति हसन रौहानी तक आज वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को खुलकर आतंकवादी देश बता रहे हैं और दुनिया भर के देशों में पाकिस्तान के प्रति नीतियों में बदलाव आ रहा है। इतना ही नहीं, सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से पाकिस्तान को जिस सख्त लहजे में चेतावनी दी गई, वह भी भारत की राजनीति में किसे बड़ी परिवर्तन की आहट से कम नहीं है। इसकी धमक पूरी दुनिया में सुनाई दी।

    प्रेम और विश्वास की राजनीति से होगा देश का विकास

    हिन्दू, मुसलमान, दलित, राष्ट्रवादी, समाजवादी, साम्यवादी आदि सभी लोग इस देश के बराबर के नागरिक हैं। वे एक-दूसरे के शत्रु या प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, एक दूसरे के पूरक हैं। सभी धर्मों, प्रांतों, भाषाओं और विचारधाराओं के लोग देश को सच्चे मन से सुखी और सम्पन्न बनाने के लिए प्रेम और परिश्रम में विश्वास रखें। अपने-अपने ढंग से देश को प्रगति की राह पर ले जायें। आने वाली राजनीति का रोडमैप यही है। हम एक रहेंगे तो नेक रहेंगे। भारतीय राजनीति में सब का साथ, सब का विकास तथा सम्पूर्ण जन एक राष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले प्रधानमंत्री बार-बार दोहरा रहे हैं कि केंद्र में गरीबों की सरकार है और सरकार पर जनता को विश्वास है। इस बात का सीधा सा अर्थ है कि गरीब तो किसी भी धर्म का हो सकता है। कौनसा धर्म है जिसमें गरीब नहीं हैं ! सब धर्मों में गरीब हैं और सबको शिक्षा, रोजगार तथा चिकत्सा प्राप्त करने का अधिकार है। सबको आगे बढ़ने और उन्नति करने का अधिकार है।

    सकारात्मक चिंतन से बढ़ेगा देश आगे

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की सकारात्मक राजनीति सर्वजन हित की दिशा में इतनी आगे बढ़ गई है कि अब विरोधी दल, चाहकर भी इसकी धुरी को विचलित नहीं कर सकते। अब बहुसंख्यकों के हितों के बलिदान की कीमत पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने की राजनीति के दिन बीत चुके हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड आदि प्रांतों के चुनावों में मिली भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री ने भारतीय राजनीति का स्पष्ट निर्देशन किया है कि ये चुनाव परिणाम हमारे लिए भावनात्मक हैं, हम देश की उम्मीदों के प्रतीक बनें। श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा यह कहा जाना कि लोकतंत्र में सरकार बहुमत से बनती है लेकिन सर्वमत से चलती है, पण्डित दीनदयाल के एकात्म राष्ट्रवाद के सिद्धांत की ओर बढ़ाया गया एक ठोस कदम है।

    श्री नरेन्द मोदी ने जन-जन की भावना को समझते हुए देश में विनम्रता की राजनीति की नींव रखी है। उन्होंने बार-बार दोहराया है कि फल लगते ही पेड़ झुकने लगता है बीजेपी के पेड़ पर सबसे ज्यादा फल हैं, अब झुकने का जिम्मा बनता है। उनका स्पष्ट संदेश है कि भारतीय राजनीति समस्त संकीर्णताओं को त्यागकर सर्वजन के हित के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाये, सब को फलने-फूलने के बराबर अवसर प्राप्त हों।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • लोकतंत्र में चतुर बनिया शब्द का पदार्पण और ममता बनर्जी की अमित शाह को शिक्षा!

     03.06.2020
    लोकतंत्र में चतुर बनिया शब्द का पदार्पण और ममता बनर्जी की अमित शाह को शिक्षा!

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    जिस ममता बनर्जी ने 2014 के आम चुनावों से पहले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के लिए वक्तव्य दिया कि वे मोदी की कमर में रस्सी बांध कर उसे बांगला देश भेज देंगी, आज वही ममता बनर्जी भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह को सीख दे रही हैं कि सार्वजनिक जीवन में बोलते समय महापुरुषों के लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। अमित शाह ने जिस संदर्भ में और जिस शालीनता से गांधीजी के लिए चतुर बनिया शब्द का प्रयोग किया, उससे स्वतः ही स्पष्ट है कि अमित शाह ने गांधीजी का कोई अपमान नहीं किया। फिर ममता बनर्जी द्वारा यह असामयिक शिक्षा क्यों?

    क्या गांधीजी का जन्म एक बनिया परिवार में नहीं हुआ! क्या किसी को बनिया कहने से किसी का अपमान हो जाता है! भारत में बहुत सारे लोग अपने नाम के साथ अपनी जाति या काम लिखते हैं। गांधी शब्द भी गुजरात और राजस्थान में पाई जाने वाली एक जाति को ही इंगित करता है जो कि बनिया वर्ग की जाति है। क्या गांधीजी चतुर नहीं थे ! क्या चतुर नकारात्मक शब्द है!

    भारत में परम्परा से कही जाने वाली बहुत सी कहानियां इस तरह आरम्भ होती हैं- एक गांव में एक चतुर बनिया रहता था,,,,,,,,,, एक गांव में एक चतुर किसान रहता था...........। एक बार की बात है एक गांव में एक चालाक देहाती रहता था........... इन कहानियों पर आज तक किसी बनिये या किसान या देहाती ने कभी बुरा नहीं माना। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि ममता बनर्जी उपदेश और सीख देने लगीं!

    क्या गांधीजी ने भारत की आजादी के बाद यह नहीं का था कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य पूरा हो गया है, अतः इसे भंग करके नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया जाना चाहिए! क्या गांधीजी के शिष्यों ने गांधीजी के इस सुझाव को ठुकरा कर अनन्त काल तक देश की आजादी के मुद्दे पर भारत की भोली-भाली जनता से वोट बटोरने का सपना नहीं संजोया था! गांधीजी के इस सुझाव में यह भय भी छिपा हुआ था कि जब कांग्रेस विरोधी दलों की सरकारें आएंगी तो वे संभवतः आजादी के लिए संघर्ष करने वालों को कांग्रेसी होने की वजह से वह इज्जत न दें जो उन्हें आजाद भारत में हर सरकार के समय मिलनी चाहिए।

    ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने 2012 में भारत में बढ़ते हुए बलात्कार प्रकरणों पर कहा था- भारत में बलात्कार खुले विकल्पों वाले खुले बाजार के समान है।

    ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने एक बार नहीं, कई बार नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध इतनी गंदी भाषा का प्रयोग किया है जिसे किसी भी तरह सभ्य नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी को सार्वजनिक रैली में गधा कहा। इन्हीं चुनवाों के दौरान एक रैली में ममता ने कहा कि मोदी हनुमान हैं जो अपनी पूंछ में आग लगाकर हर जगह आग लगा देते हैं। हम मोदी को बंगाल में प्रचार करने दे रहे हैं, यह हमारी उदारता है। हम उन्हें एयरपोर्ट से ही पैक करके वापस भेज सकते हैं। उन्होंने अपने भाषणों में नरेन्द्र मोदी को दानव और खतरनाक इंसान भी कहा।

    ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल के सांसद कल्याण बनर्जी ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर एक सार्वजनिक मंच से वक्तव्य दिया था कि मोदी को जल्दी ही चूहे के बेटे की तरह फिर से अपने छेद अर्थात् गुजरात में घुसना पड़ेगा। तब तो ममता बनर्जी ने अपने सांसद को शालीन रहने की कोई सीख नहीं दी थी बल्कि यह कहकर कल्याण बनर्जी की बात को आगे बढ़ाया था कि वे गुजराती चूहे सोचते हैं कि वे पश्चिमी बंगाल की धरती बहुत पोली है इसलिए वे तृणमूल को आसानी से जड़ों से उखाड़ देंगे लेकिन मैं उन्हें कहना चाहूंगी कि हम बहुत उपजाऊ जमीन पर खड़े हैं, चूहे तो चीज ही क्या हैं, हमें टाइगरों से लड़ना आता है।

    ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने वर्ष 2016 में पश्चिम बंगाल में सेना की सुरक्षा ड्रिल पर बिफरते हुए कहा था कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे (भारतीय सैनिक) यहां हैं और मैं सविचालय में बैठकर उन्हें लोकतंत्र की पहरेदारी करते हुए देखने की प्रतीक्षा कर रही हूँ। उनका आशय यह था कि मिलिट्री उनकी तथा उनके ऑफिस की जासूसी कर रही है और उनका तख्ता पलटने की साजिश की जा रही है। ममता बनर्जी ने यह कभी नहीं बताया कि भारत में विगत 70 साल में किस प्रांत में सेना ने किसी मुख्यमंत्री के तख्ता पलट का प्रयास किया!

    ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने लखनऊ में नोटबंदी के खिलाफ आयोजित रैली को सम्बोधित करते हुए कहा था कि नरेन्द्र मोदी दंगा करवाते हैं। वह हिटलर से भी बड़े तानाशाह हैं। मोदी ने छुपे रुस्तम बनकर देश को लूटा है। हिटलर से भी बड़े हैं प्रधानमंत्री मोदी। बच्चों की रोटी छीन ली और बात-बात पर दंगा करवाते हो। हिम्मत हो तो मुझे जेल में भेजो मोदी।

    अच्छा होता कि ममता बनर्जी अमित शाह को सलाह देने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेतीं। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • भारत के किसान आंदोलन कितने उचित कितने अनुचित!

     03.06.2020
    भारत के किसान आंदोलन कितने उचित कितने अनुचित!

    भारत के किसान आंदोलन कितने उचित कितने अनुचित!

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    जब से केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली नरेन्द्र मोदी सरकार बनी है तब से देश में आंदोलनों की बाढ़ आ गई है तथा यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी से देश संभल नहीं रहा। महाराष्ट्र तथा मध्यप्रदेश का किसान आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में पैदा हुआ है और यह भस्मासुर की तरह बढ़कर पूरे देश को अपनी चपेट में लेने की तैयारी में है। लोकतंत्र में आंदोलन करना जनता का अधिकार है किंतु राजनीतिक पार्टियों द्वारा जनआंदोलनों को षड़यंत्र के रूप में खड़ा करना, देश के लोकतंत्र का अपहरण करने जैसा है। वर्तमान किसान आंदोलन के विविध आयाम हैं, यह किसान की गरीबी, कर्ज की स्थिति और बढ़ती हुई आत्महत्याओं तक सीमित नहीं हैं। देश में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, रातों-रात बड़ा नेता बनने की लालसा, चुनावी समर में जीत प्राप्त करने की ललक, शहरों में खड़ी हो रही कोठियों का चमचमाता जंगल, नेताओं, व्यापारियों, ठेकेदारों, पूंजीपतियों के मोटे-मोटे बैंक बैलेंस, सड़कों पर दौड़ती महंगी गाड़ियों के काफिले, सरकारी नौकरों के काले कारनामे और ऐसे ही सैंकड़ों कारणों का मिलाजुला परिणाम है आज के किसान आंदोलन!

    जब किसी रोग का उपचार किया जाता है तो पहला चरण उस रोग को ढंग से पहचानने का होता है। किसान आंदोलनों को भी ढंग से समझना होगा। रोग के उपचार का दूसरा चरण रोग के विषाणुओं, पीप-मवाद, कील-कांटे आदि को शरीर से निकालने के लिए ऑपरेशन करना, दवा देना, इंजेक्शन लगाना आदि उपायों का होता है। किसान आंदोलनों में भी जो विषाणु, पीप और मवाद हैं उन्हें निकालकर दूर करने की आवश्यकता है। रोग उपचार का तीसर चरण सुपथ्य तथा पौष्टिक आहार होता है। किसान आंदोलनों का अंतिम चरण भी किसानों को हर तरह से मजबूत बनाने का होना चाहिए।

    क्या इस देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी में इतना साहस है जो किसान आंदोलन की वास्तविकता को पहचानकर, उसका इलाज कर सके! जब तक पहले दो चरण नहीं होंगे, तब तक तीसरा चरण नहीं आएगा। अर्थात् जिस प्रकार रोगी के घाव में मवाद पड़ा हो तो उसकी चमड़ी की प्लास्टिक थेरेपी करने से या प्लास्टर से ढंक देने से जो परिणाम आएंगे, वैसे ही परिणाम किसान आंदोलनों को शांत करने के प्रयासों के आएंगे। सबसे पहले तो किसानों की ही बात करें कि सरकारें उनके लिए क्या करती रही हैं! मैं यहा कुछ उदाहरण दे रहा हूँ।

    फसल बीमा योजना

    खेती का नष्ट हो जाना किसानों की सबसे बड़ी समस्या है। सरकार फसल बीमा योजना के माध्यम से किसानों को सुरक्षा कवर उपलब्ध कराती है। किसान को रबी की फसल के लिए 1.5 प्रतिशत तथा खरीफ की फसल के लिए 2 प्रतिशम प्रीमियम देना होता है। महाराष्ट्र में 2015-16 की रबी फसल के लिए मार्च 2017 में 26.88 लाख किसानों को फसल खराबे की क्षतिपूर्ति के लिए 893.83 करोड़ रुपया स्वीकृत किया गया। मध्य प्रदेश में 2015 की खरीफ के फसल बीमा मुआवजे के लिए 9000 करोड़ रुपए वितरित किए गए। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने 10 दिसम्बर 2016 को 2015 की खरीफ फसलों के खराबे के लिए 20.46 लाख किसानों को 4416 करोड़ रुपए का मुअवजा एक ही दिन में वितरित किया। दूसरे राज्यों के उदाहरण भी इसी प्रकार के हैं।

    किसान दुर्घटना बीमा

    किसानों को खेतों में काम करते हुए घायल हो जाने या मृत्यु हो जाने पर अलग से बीमा योजनाएं हैं जिनमें राज्य सरकारें किसान परिवारों को समुचित मुआवजा देती हैं।

    शून्य ब्याज दर पर किसानों को ऋण

    पिछले लगभग एक दशक से विभिन्न राज्यों के किसानों को सहकारी समितियों के माध्यम से ब्याज-मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। यदि कोई किसान ऋण लेकर समय पर चुका देता है तो उसे ब्याज नहीं देना होता है।

    मनरेगा

    किसान जिन दिनों में खाली होता है, उसके परिवार को मनरेगा योजना में प्रति वर्ष 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। कोई भी किसान परिवार इस योजना में रोजगार मांग सकता है। यदि सरकार रोजगार नहीं दे पाती है तो उसे घर बैठे भुगतान किया जाता है। यह कानूनन अनिवार्य है।

    अपना खेत अपना काम योजना

    इस योजना में सरकार सीमांत एवं लघु कृषकों के खेतों पर साढ़े तीन लाख रुपए तक के कार्य अपनी लागत पर करवाती है। किसान अपने खेत पर मेंढबंदी, भूमि सुधार, टांका निर्माण आदि कार्य करवा सकते हैं। तीन-चार किसान मिलकर अपने लिए अलग से कुंआ खुदवा सकते हैं।

    अन्य योजनाएं

    जब किसान अपना माल लेकर मण्डी में जाता है तो उसके लिए कृषि मण्डी एवं कृषि विभाग के माध्यम से कलेवा योजना, अक्षत योजना, किसान हॉस्टल आदि योजनाएं चलाई जा रही हैं जिनका लाभ देश के करोड़ों किसान उठाते रहे हैं। किसानों को भी आम नागरिक की तरह सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपचार एवं दवाएं मिलती हैं। उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में निःशुल्क पढ़ते हैं। उनके बच्चों को भी मिड डे मील के तहत एक समय का भोजन निःशुल्क मिलता है। सामाजिक पेंशन योजनाओं के तहत निर्धन परिवारों को जिनमें वृद्ध, विधवा, विकलांग, बेसहारा, परित्यक्ता शामिल हैं, प्रतिमाह पेंशन मिलती हैं। अनुसूचित जाति-जन जाति के किसानों को हॉस्टलों में निशुल्क अधिवास, भोजन, चिकित्सा, वस्त्र, शिक्षण सामग्री आदि मिलती है। प्रसव की स्थिति में निशुल्क प्रसव एवं दवाएं मिलती हैं। झौंपड़ी में आग लग जाए, प्राकृतिक आपदा या अग्निकाण्ड में जानवर मर जाएं तो उनके लिए भी मुआवजा मिलता है। सड़क दुर्घटना में मरे व्यक्तियों के परिवारों को अलग से मुआवजा मिलता है। सब योजनाओं का उल्लेख यहां नहीं किया जा सकता।

    समस्या क्या है !

    इन सब योजनाओं के बावजूद यदि देश का किसाना भूखा है, गरीब है, आत्महत्या कर रहा है, तो उसका इलाज कृषि ऋण माफ करना नहीं है, अपितु जो नेता, पूंजीपति, व्यापारी, सरकारी नौकरशाह सरकार के लाखों करोड़ रुपए हर साल डकार रहे हैं, उस रुपए को सरकारी खजाने में वापस लाने की जरूरत है ताकि किसानों एवं आम आदमी के लिए चल रही योजनाओं को और अधिक सशक्त बनाया जा सके। वर्ष 1947 से लेकर 2010 तक भारत में 910 लाख करोड़ रुपये के घोटाले हुए। वर्ष 2010 से 2013 के बीच देश में हुए कुछ प्रमुख घोटालों में 1.86 लाख करोड़ रुपए का कोल स्कैम, 1.76 लाख करोड़ रुपए का टूजी स्कैम, 70 हजार करोड़ रुपए का कॉमनवैल्थ गेम्स स्कैम, 80 हजार करोड़ रुपए का सैन्य-शस्त्र खरीद घोटाला, 1.5 लाख करोड़ रुपए का महाराष्ट्र का वक्फ बोर्ड लैण्ड स्कैम, 40 हजार करोड़ रुपए का पश्चिम बंगाल का शारदा चिटफण्ड घोटाला, 14 हजार करोड़ रुपए का सत्यम स्कैम, 18 हजार करोड़ रुपए का नेवी वार रूम लीक स्कैण्डल, 10 हजार करोड़ रुपए का यूपी का एनआरएचएम घोटाला सहिल कई लाख करोड़ रुपए के घोटाले हुए जिनकी सही-सही गिनती करनी मुश्किल है। नेशनल हेराल्ड प्रकरण में 2000 करोड़ रुपए का घोटाला करने का सीधा आरोप सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर है।

    समाधान क्या होना चाहिए !

    देश की सरकार को चाहिए कि इन घोटालों की राशि या सम्पत्ति जिन लोगों के पास पड़ी है, उस सम्पत्ति को उनसे छीनकर देश की जनता को लौटाए। विजय माल्या, सुब्रत रॉय और ललित मोदी जैसे लोगों की सम्पत्तियों को नीलाम करके उसका पैसा किसानों के खेतों तक पहुंचाए। देश के बैंक ऋण का एनपीए 6.15 लाख करोड़ रुपए हो गया, जिन लोगों के पास बैंक का पैसा पड़ा है, उसे वापस बैंकों तक लाया जाए। बैंक के 6 लाख करोड़ रुपए के ऋण डूब जाना, देश के आम आदमी के लिए बहुत बड़ा धक्का है। यदि हालात इसी तरह जारी रहे तो भारतीय बैंक भी एक दिन अमीरीकी बैंकों की तरह लुढ़कते हुए दिखाई देंगे और इन्हें संभालने वाला कोई नहीं मिलेगा।

    भारत के सांसदों एवं पूर्व सांसदों, विधायकों एवं पूर्व विधायकों, आईएएस अधिकारियों, आईपीएस अधिकारियों तथा सभी सेवाओं के प्रथम श्रेणी अधिकारियों के पास कितनी सम्पत्ति है, इसकी जांच करवाई जाए। सिनेमा में नाचने वालों, क्रिकेट का बल्ला बजाने वालों के पास कितनी सम्पत्ति है, जांच कराई जाए। कई पत्रकारों ने दिल्ली में अशोका रोड और पृथ्वीराज रोड जैसी महंगी सड़कों पर सैंकड़ों करोड़ रुपयों के बंगले बनाए हैं, पत्रकार इतना पैसा कैसे कमा सकता है! सरकार इनके नाम जानती है, इनकी सम्पत्ति की भी उसी तरह जांच होनी चाहिए जिस तरह से प्रणव रॉय के घोटालों की हुई है।

    यह तय है कि भारत की सरकारों ने भारतीय खेती को जीवित रखने वाले किसानों के लिए कम प्रबंध नहीं कर रखे हैं किंतु दूसरे रास्ते से जो देश में चोरी हो रही है, उसने किसान के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा किया है। उस चोरी को यदि रोक दिया जाए तो भारत का किसान संभल जाएगा। लेकिन ऐसा होगा नहीं।

    वास्तव में क्या होगा ?

    देश में हर साल कुछ राज्यों में चुनाव होते हैं, 2017 के होकर चुके हैं, 2018 में भी होंगे और 2019 में तो केन्द्र में भी होने हैं। अनुमान है कि 2019 के चुनवों से पहले भारत में 2.19 लाख करोड़ रुपए के कृषि ऋण माफ किए जायेंगे। जब योगी आदित्यनाथ ने यूपी में 36 हजार करोड़ रुपए के ऋण माफ कर दिए तो नरेन्द्र मोदी दूसरे राज्यों के किसानों से कैसे कहेंगे कि आपके ऋण माफ नहीं होंगे! डॉ. मनमोहनसिंह ने भी अपने कार्यकाल में 52 हजार करोड़ रुपए के कृषि ऋण माफ किए थे। यह सिलसिला चलता रहेगा। क्योंकि इस देश में भारतीस सेना के अध्यक्ष के लिए तो सड़क का गुण्डा कहकर भी सड़कों पर शांति देखी जा सकती है किंतु अपने वोट बैंकों को नाराज करके सड़कों पर शांति बनाए नहीं रखी जा सकती।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • लालकृष्ण आडवानी भारतीय राजनीति में असफल क्यों हुए!

     03.06.2020
    लालकृष्ण आडवानी भारतीय राजनीति में असफल क्यों हुए!

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    भारत के राजनीतिक गगन पर विगत तीन दशकों से सितारे की तरह चमकते हुए लालकृष्ण आडवानी वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी प्राप्त नहीं कर सके तथा 2017 में राष्ट्रपति की कुर्सी भी उनकी पहुंच से बहुत दूर सिद्ध हुई। ये वही लालकृष्ण आडवानी हैं जिन्हें भाजपा का लौहपुरुष कहा जाता था। ये वही लालकृष्ण आडवानी हैं जिन्होंने 1984 के आमसभा चुनावों में भाजपा को केवल 2 सीटें प्राप्त होने के बाद अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाली और 1989 के आम चुनावों में बीजेपी को लोकसभा में 86 सीटें दिलवाने में सफल रहे। 1984 की 2 सीटों वाली पार्टी 1989 में वीपी सिंह की सरकार को समर्थन देकर केन्द्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनवाने में सफल रही। 1990 में आडवानी ने रामरथ यात्रा का आयोजन करके बीजेपी को आम हिन्दू की पार्टी बनाया और वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस खींच लिया। 1990 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 120 सीटें जीतीं और उत्तर प्रदेश की विधान सभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया।

    आडवानी का रामरथ और आगे बढ़ा तथा 1992 में लालकृष्ण आडवाणी की उपस्थिति में बाबरी मस्जिद ढहने के बाद 1996 में हुए आम चुनावों में बीजेपी 161 सीटें लेकर लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। पहली बार भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने क्योंकि भाजपा को समर्थन देने वाली अन्य पार्टियों ने वाजपेयी को हिन्दुत्व का मुलायम चेहरा और आडवानी को हिन्दुत्व का सख्त चेहरा माना। यह सरकार केवल 16 दिन चली। बीजेपी ने 1998 का मध्यावधि चुनाव एनडीए के बैनर तले लड़ा और फिर से अटलबिहारी 
    वाजपेयी के नेतृत्व में बीजीपी की सरकार बनी क्योंकि एनडीए के घटकों को हार्ड लाइनर आडवानी की जगह सॉफ्ट लाइनर वाजपेयी अधिक अनुकूल जान पड़े। मई 1999 में जयललिता के समर्थन वापस लेने से बीजेपी की यह सरकार भी गिर गई। अक्टूबर 1999 के लोकसभा चुनावों में एनडीए ने जयललिता के बिना ही 303 सीटें जीतीं जिनमें से बीजेपी की 183 सीटें थीं। एनडीए के घटकों ने एक बार फिर अटलबिहारी वाजपेयी का नेतृत्व स्वीकार किया और आडवानी प्रधानमंत्री की कुर्सी से वंचित रह गए। उन्हें उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री पद से संतोष करना पड़ा।

    लालकृष्ण आडवानी का रामरथ केन्द्र में तीन बार भाजपा की सरकार बनाने में सफल रहा किंतु आडवानी को प्रधानमंत्री नहीं बना सका। एनडीए के घटक भले ही वाजपेयी को पसंद करते रहे किंतु जनता, अटल बिहारी वाजपेयी की सॉफ्ट लाइनर छवि से शीघ्र ही ऊब गई और 2004 में भाजपा को 10 साल के लिए सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। लालकृष्ण आडवानी के सख्त हिन्दुत्व चेहरे की वजह से पार्टी तो आगे बढ़ी किंतु आडवानी को उसका लाभ मिलने की बजाय नुक्सान हुआ। वाजपेयी के सॉफ्ट लाइनर चेहरे की वजह से उन्हें खुद को तो लाभ हुआ किंतु पार्टी को नुक्सान हुआ।

    2009 का लोकसभा चुनाव लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में हुआ तथा पार्टी द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बताया गया किंतु भाजपा एक बार फिर चुनाव हार गई। वाजपेयी सरकार में रहते हुए ही आडवानी ने अपनी लौह पुरुष वाली छवि को तोड़ने वाले उपाय आरम्भ कर दिए ताकि एनडीए के घटक वाजपेयी की जगह आडवाणी को पसंद करने लगें।

    उन्होंने वक्तव्य दिया कि धर्म के आधार पर जम्मू-कश्मीर के टुकड़े नहीं होंगे। जबकि हिन्दुत्ववादियों का आरम्भ से यही दृष्टिकोण रहा है कि घाटी को लद्दाख और जम्मू से अलग किया जाए। कश्मीरी पण्डितों के मुद्दे पर भी गृहमंत्री आडवाणी के रुख को कभी पसंद नहीं किया गया। जम्मू में उनका इतना विरोध हुआ कि उनके समर्थकों ने ही आडवाणी को धक्का देकर नीचे गिरा दिया।

    वर्ष 2005 में आडवानी पाकिस्तान गए और जिन्ना की मजार पर जाकर जिन्ना के गुणगान करते हुए उसे धर्म निरपेक्ष बता आए। इस वक्त्वय से भाजपा के भीतर हाय-तौबा मच गई। मदनलाल खुराना सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने आडवाणी के वक्तव्य का विरोध करते हुए उनसे लोकसभा में नेता विपक्ष का पद एवं पार्टी के अध्यक्ष का पद छोड़ने की मांग की। मुरली मनोहर जोशी एवं उमा भारती भी उनके विरोध में आ गए। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि भारत की आजादी के समय से ही हिन्दुत्ववादियों ने भारत की साम्प्रदायिक समस्याओं के लिए कांग्रेस तथा जिन्ना दोनों को बराबर का जिम्मेदार ठहराया है। इस प्रकरण में आडवाणी ने त्यागपत्र नहीं दिया तथा आगे की तिथियां देते रहे।

    आडवाणी के जिन्ना प्रकरण का हिन्दुत्वावादी जनता पर बहुत बुरा असर हुआ किंतु आडवाणी ने इससे कोई सीख नहीं ली तथा अपनी छवि को सॉफ्ट बनाने की तरफ आगे बढ़ते रहे। आडवाणी ने अल्पसंख्यक मतदाताओं को खुश करने के लिए वक्तव्य दिया कि जब पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी एक हो सकते हैं तो भारत और पाकिस्तान एक क्यों नहीं हो सकते! यह तर्क आम हिन्दू के गले नहीं उतरा क्योंकि पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के नागरिक एक नस्ल, एक जाति और एक ही धर्म के थे जिन्हें एक ओर इंग्लैण्ड और उसके मित्रों ने तथा दूसरी ओर रूस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बलपूर्वक बन्दर-बांट करके अलग किया था जबकि भारत और पाकिस्तान की जनता धर्म के नाम पर पांच लाख लोगों को खून बहाकर और पांच करोड़ लोगों को बेघर करके अलग हुई थी।

    बाबरी मस्जिद ध्वंस मुकदमे में आडवाणी ने न्यायालय में वक्तव्य दिया कि मैं बाबरी मस्जिद को तोड़ने नहीं अपितु बचाने गया था। वे स्वयं उपप्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री रहते हुए इस मुकदमे से साफ बाहर निकल आए किंतु उनके साथी मुरली मनोहर जोशी आदि इसमें फंसे रह गए। इस घटना से हिन्दुत्वादियों की दृष्टि में आडवाणी की छवि और ज्यादा खराब हुई। जब हिन्दुत्ववादी चिंतकों ने देश में बढ़ते हुए आतंकवादी हमलों के प्ररिप्रेक्ष्य में इस्लामिक आतंकवाद की बात कही तो आडवाणी ने वक्तव्य दिया कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता। हिन्दुत्ववादियों ने आडवाणी की इस बात को भी पसंद नहीं किया। क्योंकि कांग्रेस ने मालेगांव बम विस्फोट तथा अजमेर दरगाह बम विस्फोट के बाद हिन्दुत्वादियों पर भगवा आतंकवाद का आरोप लगाया था किंतु चौतरफा विरोध होने पर कांग्रेस ने बयान बदलते हुए कहा था कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता। जब यही बात आडवाणी ने दोहराई तो हिन्दुत्वादियों को पसंद नहीं आई।

    मनमोहनसिंह सरकार के समय आडवाणी ने मांग की कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए क्योंकि उन्हें लगता था कि दिल्ली से भाजपा का राज्य कभी जा ही नहीं सकता। इसलिए भले ही केन्द्र में कांग्रेस की सरकार रहे किंतु दिल्ली की राज्य सरकार भाजपा के पास रहेगी जबकि भारत की जनता अच्छी तरह जानती थी कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना देश के लिए बहुत घातक सिद्ध हो सकता है। जिस नगर में देश क राजधानी हो, उस नगर की पुलिस दूसरे दल की सरकार के हाथों में होने से कई तरह की गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती है!

    आडवाणी ने अपनी पुस्तक माई कण्ट्री माई लाइफ तथा अपने ब्लॉग लेखन से भी हिन्दुत्ववादियों को नाराज किया और पार्टी के भीतर आडवाणी की खुलकर आलोचना होने लगी। आडवाणी ने नाराज होकर 11 जून 2013 को पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया किंतु पार्टी ने यह कहकर उन्हें पार्टी के समस्त पदों पर बने रहने के लिए सहमत कर लिया कि पार्टी में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

    2014 के लोकसभा चुनावों के आते-आते आम जन में कांग्रेस की नीतियों का विरोध चरम पर पहुंच गया और मोदी का हिन्दुत्व आम जन के सिर चढ़कर बोलने लगा तब भी आडवाणी जनता की नब्ज नहीं पकड़ पाए। उन्होंने हार्ड लाइनर माने वाले नरेन्द्र मोदी का इतना विरोध किया कि आडवाणी, पार्टी के भीतर ही नकार दिए गए। उन्हें न केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी से वंचित रहना पड़ा अपितु 2017 में पार्टी ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तक घोषित नहीं किया। इस प्रकार आडवाणी को अटलबिहारी वाजपेयी के समय में हार्ड लाइनर होने का और मोदी के समय में सॉफ्टलाइनर होने का नुक्सान हुआ और वे प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति की कुर्सियों के बहुत नजदीक पहुंचकर भी उनसे वंचित रह गए।

    यद्यपि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की कुर्सियां सफलता का पैमाना नहीं हैं तथापि जब राजनीतिक व्यक्ति को उसके विचारों के लिए उसके ही अनुयाइयों, समर्थकों एवं मित्रों द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाए तो उसे राजनीतिक विफलता माना जाना चाहिए। आडवाणी के पास आज अनुयाई, समर्थक और मित्र, तीनों का ही लगभग अभाव है। यही उनकी राजनीतिक विफलता है। 

    आडवाणी यह बात समझने में विफल रहे कि देश को उनकी आवश्यकता एक दृढ़ हिन्दू नेता के रूप में थी न कि धर्मनिरपेक्ष वादी हिन्दू नेता के रूप में। उनकी राजनीतिक विफलता का सबसे बड़ा कारण भी यही प्रतीत होता है।

     -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • उच्च कोटि की साहित्यिक रचनाओं से समृद्ध है राजस्थानी भाषा का अलंकृत गद्य

     03.06.2020
    उच्च कोटि की साहित्यिक रचनाओं से  समृद्ध है राजस्थानी भाषा का अलंकृत गद्य

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    किसी भी भाषा में साहित्य की रचना प्रायः पद्य विधा से आरम्भ होती है तथा बाद में गद्य विधा को अपनाया जाता है। यही कारण है कि राजस्थानी भाषा में ई.788 में जालोर में उद्योतन सूरि द्वारा रचित ‘कुवलयमाला’ (प्राकृत ग्रंथ) से लेकर, 12वीं शताब्दी ईस्वी में सिरोही में सिंह कवि द्वारा रचित ‘पज्जुन्न कहा’ (अपभ्रंश गं्रथ), 15वीं शताब्दी में श्रीधर व्यास द्वारा रचित ‘रणमल्ल छंद’ (प्राचीन राजस्थानी ग्रंथ) आदि समस्त महत्वपूर्ण रचनाएं पद्य विद्या में हैं। ये रचनाएं मुख्यतः ब्राह्मण एवं जैन कवियों द्वारा लिखी गई थीं। गद्य साहित्य की रचना परम्परा संस्कृत भाषा एवं उससे निःसृत समस्त भाषाओं में पद्य के बाद ही गद्य आया। यह एक सुखद घटना थी कि भारतीय साहित्य में गद्य लेखन का प्रस्फुटन वैदिक संहिताओं में ही हो गया था। संस्कृत में गद्य साहित्य के शीघ्र अवतरण का एक बड़ा कारण यह प्रतीत होता है कि संस्कृत भााषा का पद्य अतुकांत है। यजुर्वेद में गद्य संहिताएं पर्याप्त संख्या में देखने को मिलती हैं। ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं उपनिषदों ने गद्य लेखन परम्परा को आगे बढ़ाया। महाभारत, विष्णु पुराण एवं भागवत पुराण में भी गद्य का यत्र-तत्र प्रयोग हुआ है। बौद्धों एवं जैनों ने भी गद्य परम्परा को स्वीकार किया और पालि, प्राकृत, शौरशैनी, महाराष्ट्रीय तथा मागधी आदि भाषाओं में भी गद्य लेखन प्रचुर मात्रा में हुआ। राजस्थानी गद्य विधा का अवतरण इस प्रकार यद्यपि राजस्थानी भाषा का विकास होने से पहले ही भारत में गद्य लेखन विधा पर्याप्त परिपक्व हो चुकी थी तथापि पद्य लेखन से आप्लावित राजस्थानी साहित्य में 13वीं शताब्दी में गद्य का विकास एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह इसलिये महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि अपभ्रंश में गद्य का प्रायः अभाव है जबकि राजस्थानी भाषा को अपभ्रंश की जेठी बेटी (बड़ी पुत्री) कहा जाता है। ई.1273 में राजस्थानी गद्य की एक छोटी सी टिप्पणी मूलक रचना ‘आराधना’ शीर्षक से मिलती है तथा इसके बाद संग्रामसिंह रचित बालशिक्षा, जैन लेखकों की नवकार व्याख्यान, सर्वतीर्थ नमस्कार स्तवन, अतिचार आदि छोटी-छोटी गद्य रचनाएं मिलती हैं किंतु इनमें राजस्थानी गद्य के प्रांजल और प्रौढ़ रूप के दर्शन नहीं होते। कुछ विद्वानों का मत है कि आचार्य तरुणप्रभ सूरि रचित ‘षड़ावकबाळावबोध’ राजस्थानी भाषा की पहली प्रौढ़ गद्य रचना है। चारण परम्परा की प्रथम राजस्थानी गद्य रचना किसी चारण कवि की पहली स्वतंत्र राजस्थानी गद्य-पद्य रचना ‘अचलदास खीची री वचनिका’ के रूप में प्रकट हुई। इसे चारण कवि शिवदास गाडण ने ई.1415 के लगभग लिखा था और यह गद्य-पद्य मिश्रित रचना थी। इसके प्राकट्य से राजस्थानी साहित्य में गद्य साहित्य की धमाकेदार स्थापना हो गई। राजस्थानी गद्य साहित्य के विविध रूप राजस्थानी गद्य साहित्य बात, ख्यात, वचनिका एवं दवावैत आदि विविध रूपों में रचा गया। विगत, विलास, पीढि़यावली (वंशावली), हाल, अहवाल, हगीगत (हकीकत), गुर्वविलियां, औक्तिक, प्रश्नोत्तरी, विहारपत्री, समाचारी के लेखन में गद्य विधा अत्यंत सहायक सिद्ध हुई। परवाने, पट्टावली तथा दफ्तर बही आदि के लेखन में भी गद्य विधा को सुगमता से अपनाया गया। प्रकीर्णक साहित्य यथा शिलालेख, ताम्रपत्र, प्रशस्ति एवं पत्र में भी गद्य का प्रयोग ही अधिक सुगम माना गया। बौद्धों ने सूक्त साहित्य तथा जैनियों ने बाळावबोध एवं टब्बा लेखन करके राजस्थानी गद्य परम्परा को आगे बढ़ाया। अलंकृत गद्य साहित्य गद्य विधा में अलंकृत गद्य का विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो लगभग सभी भाषाओं में देखने को मिलता है। इसे ललित गद्य अथवा कलात्मक गद्य भी कहा जाता है। सामान्य गद्य से अलग करने के लिये इसे गद्य काव्य भी कह देते हैं, हालांकि यह काव्य नहीं होता। संस्कृत के महान आचार्य वामन ने गद्य के तीन प्रकार बताये हैं- (1.) वृत्तिगंधि गद्य- जिस गद्य में किसी छन्द के पाद एव पादार्थ मिलते हैं, (2.) उत्कलिकाप्राय गद्य- जिस गद्य में लम्बे-लम्बे समास मिलते हैं और (3.) पूर्णक गद्य- छोटे-छोटे समास-पद युक्त गद्य को पूर्णक गद्य कहते हैं। बाद में मिश्र काव्य को भी चौथा प्रकार मान लिया गया जिसे ‘चम्पू’ कहा गया। अतः कहा जा सकता है कि अलंकत गद्य का शब्द-संयोजन एवं वाक्य-रचना विशिष्ट, रसात्मक, संवेगात्मक, चमत्कृत करने वाली तथा रससिक्त होती है। इस बात को सरल शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि अलंकृत गद्य छन्द-मुक्त होकर भी साहित्य-लय की सृष्टि करता है। और भी सरल करके कहें तो तुकांत-गद्य को अलंकृत गद्य कह सकते हैं। राजस्थानी भाषा के अलंकृत गद्य साहित्य को मुख्यतः छः भागों में रखा जा सकता है- (1.) वात साहित्य: कलात्मक गद्य साहित्य की रसानुभूति वात साहित्य में ही अधिक दिखाई देती है। राजस्थानी भाषा में हजारों वातों की रचना हुई। नरोत्तमदास स्वामी ने लिखा है कि यदि राजस्थान के वात साहित्य का संकलन किया जाये तो न जाने कितने ‘कथा सरित्सागर’ एवं ‘सहस्र रजनी’ चरित्र तैयार हो जायें। ‘केहर प्रकाश’ तथा ‘सिखर वंशोत्पत्ति काव्य’ में तुकांत गद्य का प्रयोग किया गया है। (2.) वर्णक साहित्य: राजस्थानी भाषा में नाना प्रकार के वर्णन ग्रंथों की रचना हुई, यथा- नगर वर्णन, विवाह वर्णन, भोज वर्णन, ऋतु वर्णन, युद्ध वर्णन, आखेट वर्णन, राजान राउत रो वात-बणाव, खींची गंगेव नीबांवत रो दो-पहरो, मुत्कलानुप्रास, कूतुहल, सभा-शृंगार आदि इसी प्रकार के ग्रंथ हैं। (3.) दवावैत एवं वचनिका: राजस्थानी साहित्य की प्रसिद्ध लक्षण कृति ‘रघुनाथ रूपक’ में महाकवि मंछ ने राजस्थानी गद्य के दो प्रमुख भेदों दवावैत एवं वचनिका का उल्लेख किया है। रघुनाथ रूपक के टीकाकार महताबचन्द खारेड़ ने इनका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ये कोई काव्य छन्द नहीं हैं जिनमें मात्राओं, वर्णों अथवा गणों का विचार हुआ हो। ये दोनों गद्य शैलियां हैं जिनमें अंत्यानुप्रास, मध्यानुप्रास या यमक की भरमार होती है। (4.) सिलोका साहित्य: सिलोका भी राजस्थानी साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है जिसमें देवी-देवताओं तथा प्रसिद्ध वीर पुरुषों का गुण-वर्णन अत्यंत अलंकृत शैली में हुआ है जैसे- बभूतासिद्ध रो सिलोको, राम-लक्ष्मण रो सिलोको, सूरजजी रो सिलोको, राव अमरसिंघ रो सिलोको, आदि। (5.) वैज्ञानिक साहित्य: यह साहित्य अनुवाद, टीका एवं स्वतंत्र लेखन के रूप में मिलता है। संस्कृत भाषा में आयुर्वेद, ज्योतिष, शकुनावली, सामुद्रिक शास्त्र, तंत्र-मंत्र आदि अनेक विषयों पर लिखे गये ग्रंथों का बड़े स्तर पर राजस्थानी भाषा में अनुवाद हुआ तथा उनके आधार पर कतिपय स्वतंत्र राजस्थानी ग्रंथों की भी रचना हुई। (6.) प्रकीर्णक साहित्य: इसके अंतर्गत पत्रों और अभिलेखों में प्रयुक्त गद्य को रखा जाता है। राजकीय एवं निजी पत्र व्यवहार में पद्य का प्रयोग नहीं होकर, गद्य का प्रयोग हुआ। इसी प्रकार शिलालेख, ताम्रपत्र, दानपत्र, प्रशस्ति-लेख आदि के लेखन के लिये भी गद्य विधा अधिक अनुकूल जान पड़ी। अलंकृत गद्य साहित्य की प्रसिद्ध रचनाएं ‘पृथ्वीचन्द चरित्र’ राजस्थानी भाषा की प्रसिद्ध अलंकृत गद्य कृति है। इसे ‘वाग्विलास’ भी कहते हैं। इसकी रचना ई.1421 के लगभग जैनाचार्य माणक्यसुंदर ने की थी। ई.1455 में भीनमाल में रचित ‘कान्हड़देव प्रबंध’ भी अलंकृत गद्य की महत्वपूर्ण रचना है। इसे गुजरात में प्राचीन गुजराती भाषा का तथा राजस्थान में प्राचीन राजस्थानी भाषा का ग्रंथ माना जाता है। मुत्कलानुप्रास, समयसुन्दर रचित भोजन विच्छित; सभा शृंगार, राज रूपक, तपोगच्छ गुर्वावली, अचलदास खीची री वचनिका, भोजन विच्छति, खींची गंगेव नीबांवत रो दो-पहरो, लावा रासा, वचनिका राठौड़ रतनसिंहजी री, बैताल पच्चीसी, ढोला मारू री बात, एकलगिढ डाढ़ाला सूर री बात (वीररस प्रधान हास्य-व्यंग्य रचना), करणीदान कृत सूरज प्रकाश, रूपक दीवाण भीमसिंहजी रा आदि अलंकृत गद्य साहित्य की प्रसिद्ध रचनाएं हैं। ऐसी हजारों रचनाएं आज भी प्राचीन पोथी भण्डारों में भरी पड़ी हैं जिन्हें प्रकाश में आना अभी शेष है। अलंकृत गद्य के उदाहरण लावा रासा: पुत्री जिणरे कंवलप्रसण रूपरी निधान। सुकेशियासूं सवाई साव रम्भारे समान। साहित्या शृंगार काव्य जबानी पर कहे। रमाताल परिजंत संगीत में रहे। वीणांधर सहजांई गावे किण भांत। तराज पर नहं आवे नारद वीणारी तांत। जिणने सुण्यां कोकिला मयूर लाज भाग जावे। कुंरग औ भमंग वन पातालसूं आवे। खींची गंगेव नीबांवत रो दो-पहरो: वरखा रितु लागी, विरहणी जागी। आभा झर हरै, वीजां आवास करै। नदी ठेबा खावै, समुद्रे न समावै। पाहाड़ां पाखर पड़ी, घटा ऊपड़ी। मोर सोर मंडै, इन्द्र धार न खंडै। आभो गाजै, सारंग वाजै। द्वादश मेघनै दुवो हुवौ, सु दुखियारी आंख हुवौ। झड़ लागौ, प्रथीरो दलद्र भागौ। दादुरा डहिडहै, सावण आणवैरी सिध कहै। इसौ समइयौ वण रह्यौ छै, बादलां झड़ लायौ छै। सेहरां-सेहरां बीज चम नै रही छै। तपोगच्छ गुर्वावली: जिम देव माहि इन्द्र, जिम ज्योतिश्चक्र माहि चन्द्र, जिम वृक्ष माहि कल्पदु्रम, जिम रक्त वस्तु माहि विद्रुम, जिम नरेन्द्र माहे राम, जिम रूपवंइ माहे काम, जिम स्त्री माहे रम्भा, जिम वादि माहे भंभा, जिम सती माहि सीता, जिम स्त्री माहि गीता, जिम साहसीक माहि विक्रमादित्य, जिम ग्रहगण माहि आदित्य, जिम रत्न माहि चिंतामणि, जिम आभरण माहि चूड़ामणि, जिम पर्वत माहि मेरू भूधर, जिम गजेन्द्र माहि ऐरावण सिन्धु, जिम रस माहि घृत, जिम मधुर वस्तु माहि अमृत, तिम मांप्रति कालि सकल गच्छन्तरालि, ज्ञानि विज्ञानि तपि, जपि, शमि, दमि, संयमि करि अतुच्छ, ए श्री तपोगच्छ, आचान्द्रार्क जयवंतउ वर्त्तइ। राज रूपक: औरंगसा पातसा आसुर अवतार, तपस्या के तेज पुंज एक से विस्तार। मापका मिहाई सा प्रताप का निदांन, मारतंड आगे जिसी जोतसी जिहांन। जापका पैगंबर आपका दरियाव, तापका सेस ज्वाल दापका कुरराव। सकसेका जैतवार अकसेका वाई। अरिदल समुद्र आए कुंभज के भाई। रहणी में जोगेश्वर वहणी में जगदीस, ग्रहणी में सिवनेत्र सहणी में अहीस। जाके जप तप आगे ईश्वर आधीन, ताकूं छल बांह बल कुण करै हीन। कान्हड़दे प्रबंध: वाघवालिया च्यारि विलगा छइ। किरि जाणीइ आकासि तणा गमन करसि। अथवा पाताल तणां पाणी प्रगटावसि। ते घोड़ा गंगोद कि स्नान कराव्या। तेह तणि सिरि श्री कमलि पूजा कीधी। तेह तणि पूठि बावनो चंदन तणा हाथो दीधा। तेह तणि पूठि पंच वर्ण पाखर ढाळी। किसी पखर- रणपखर, जीणपखर, गुडिपखर, लोहपखर, कातलीयालीपखर। -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • किसकी अंतर-आत्मा को पुकार रही हैं मीरा कुमार!

     03.06.2020
    किसकी अंतर-आत्मा को पुकार रही हैं मीरा कुमार!

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    विपक्ष द्वारा 2017 के राष्ट्रपति चुनावों में प्रत्याशी बनाए जाने के बाद मीरा कुमार ने अंतर-आत्मा की पुकार पर मतदान करने की अपील की है। यह अपील 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनावों की याद दिलाती है जब ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया तथा विपक्ष ने सर चिंतामन द्वारकानाथ देशमुख को अपना प्रत्याशी बनाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ये दोनों ही प्रत्याशी पसंद नहीं आए। उस समय वी. वी. गिरि उपराष्ट्रपति थे, उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र देकर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। इंदिरा गांधी ने वी. वी. गिरी को समर्थन दे दिया और कांग्रेसियों से अपनी अंतर-आत्मा की आवाज पर मतदान करने की अपील की। कांग्रेसियों की अंतर-आत्मा जाग उठी और उन्होंने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी को हराकर निर्दलीय प्रत्याशी को राष्ट्रपति बना दिया। वी. वी. गिरि पर अनैतिक साधनों से चुनाव जीतने की रिट दायर हुई। वी. वी. गिरि भारत के राष्ट्रपति रहते हुए भी न्यायालय का सम्मान करते हुए व्यक्तिगतशः न्यायालय में उपस्थित हुए तथा न्यायालय में रिट खारिज हुई।

    1969 के बाद 2017 में एक बार फिर से नेताओं की अंतर-आत्मा को जगाने के लिए पुकार लगाई गई है। समझ में नहीं आया कि मीरा कुमार किस की अंतर-आत्मा को जगा रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि 1969 की तरह कांग्रेसियों की अंतर-आत्मा जाग पड़े और चौबेजी, छब्बेजी बनने की बजाय दुब्बेजी ही रह जाएं। कांग्रेस तो वैसे ही आपताकाल के दौरान 1976 में 42वें संविधान संशोधन के बाद भारत को धर्म-निरपेक्ष देश घोषित कर चुकी है। धर्म-निरपेक्ष लोग आत्मा-परमात्मा जैसी चीजों से काफी ऊपर उठे हुए होते हैं इसलिए वे किसी की अंतर-आत्मा को कैसे पुकार सकते हैं! यह अंतर-आत्मा क्या होती है, और कहाँ रहती है। धर्म से पूरी तरह निरपेक्ष मीरा कुमार को अंतर-आत्मा का एड्रेस किसने दिया !

    यदि मीरा कुमार भारतीय जनता पार्टी के सांसदों एवं विधायकों की अंतर-आत्मा को पुकार रही हैं तो भी यह बात समझ में नहीं आती है। कांग्रेस जिन भाजपाइयों के नेता नरेन्द्र मोदी पर मौत का सौदागर होने का आरोप लगाती रही है (सोनिया गांधी का 2007 के चुनावों में वक्तव्य), जिन भाजपाइयों और संघियों पर कांग्रेस, गांधी की हत्या का आरोप लगाती रही है (राहुल गांधी का 2014 के चुनावों में आरएसएस पर वक्तव्य), जिन भाजपाइयों पर कांग्रेस असहिष्णुता का आरोप लगाती रही है (2015 में कांग्रेस समर्थित साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा पुरस्कार लौटाने का अभियान) जिन भाजपाइयों पर कांग्रेस, साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाती रही है (दिग्विजय सिंह, राजीव शुक्ला सहित तमाम नेताओं के वक्तव्य), ऐसे भाजपाइयों से मीरा कुमार कैसे अंतर-आत्मा पर मतदान करने की अपील कर सकती हैं!

    जिन भाजपाइयों को मीरा कुमार ने लोकसभा में बोलने तक का मौका देने में कंजूसी की (सुषमा स्वराज का नवीनतम वक्तव्य) उन्हीं भाजपाइयों को अपनी चुनावी नौका के तारणहार के रूप में मीराकुमार कैसे देख सकती हैं! जो कांग्रेस, भाजपाइयों के नेता नरेन्द्र मोदी पर सहारा गु्रप से 9 बार धन लेने का आरोप लगाकर कोर्ट में मुंह की खा चुकी है। (राहुल गांधी का दिसम्बर 2016 का वक्तव्य), अब उसी कांग्रेस की जीवन भर सदस्य रही कांग्रेसी प्रत्याशी मीरा कुमार किस अंतर-आत्मा के जागने की आशा कर रही हैं! क्या वे कांग्रेस द्वारा घोषित साम्प्रदायिक शक्तियों (भाजपाइयों एवं संघियों) के बल पर राष्ट्रपति बनने का सपना संजोए बैठी हैं।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • घमण्ड और व्यापार ले डूबेंगे चीनी बौनों को!

     03.06.2020
    घमण्ड और व्यापार ले डूबेंगे चीनी बौनों को!


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    चीन जिस तरह से विश्व भर के देशों के साथ घमण्ड भरा व्यवहार कर रहा है, वह चीनी बौनों के लिए तो घातक सिद्ध होने वाला है ही, साथ ही पूरी दुनिया को तबाही की ओर ले जाने वाला है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हिटलर का घमण्ड जर्मनी को तथा नेपोलियन बोनापार्ट का घमण्ड फ्रांस को ले डूबा था किंतु उनके आचरण से केवल उनके देश बर्बाद नहीं हुए, पूरी दुनिया में बहुत बड़ी संख्या में मनुष्यों को मौत के मुंह में समा जाना पड़ा।

    चीन 1959 में तिब्बत को हड़प चुकने के बाद से नेपाल, लद्दाख, सिक्किम, भूटान तथा अरुणाचल प्रदेश को अपनी पांच अंगुलियां बताता रहा है। इन अंगुलियों को लेकर भारत से उसका सीमा विवाद है जो कभी न सुलझने वाली समस्या का रूप ले चुका है। 1962 में वह अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को लेकर भारत से दो-दो हाथ कर चुका है। 1975 में जब से सिक्किम, भारत में सम्मिलित हुआ है, चीन, सिक्किम की सीमा को लेकर आए दिन भारत से माथाफोड़ी करता रहता है। वह नेपाल में भारत के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न करके, नेपाल के हिन्दू राष्ट्र को समाप्त करवाकर, वहाँ धर्मनिरपेक्ष कम्युनिस्ट शासन स्थापित करवा चुका है। ताइवान को चीन कभी फूटी आंखों से नहीं देख पाया। भूटान में वह डोकलाम क्षेत्र में अवैध घुसपैठ कर रहा है तथा वहां सड़क बनाने का प्रयास कर रहा है।

    श्रीलंका के कोलम्बो बंदरगाह में दो पनडुब्बियों को तैनात करने के विषय पर 2014 में हुए समझौते को श्रीलंका द्वारा हाल ही में समाप्त कर दिए जाने के बाद, श्रीलंका के साथ भी चीन के सम्बन्ध खराब हो गए हैं। दक्षिण चीन सागर में अपनी धौंस धुपट्टी जमाने के लिए तैनात किए गये चीनी युद्धपोतों ने अमरीका को अपने समुद्री लड़ाकू पोत दक्षिण चीन सागर में भेजने के लिए उकसाया है। विएतनाम और ऑस्ट्रेलिया, चीनी व्यवहार से बुरी तरह से चिढ़े हुए हैं।

    चीन सिल्क रूट निर्माण के नाम पर ‘वन बेल्ट वन रोड’ के फार्मूले पर काम कर रहा है। इसके माध्यम से चीन, एशिया और यूरोप होते हुए अफ्रीकी तटों तक स्थित लगभग 60 देशों में अपना व्यापार फैलाने के बड़े एजेण्डे पर कार्य कर रहा है। स्पेन के मैड्रिड शहर के लिए चीन ने वर्ष 2014 में मालगाड़ी आरम्भ कर दी थी जिसके माध्यम से उसका सामान यूरोपीय देशों को पहुंचाया जा रहा है।

    चीनी अधिकृत काश्मीर के जरिए चीन, पाकिस्तान तक सड़क बना चुका है ताकि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक उसे सीधा सड़क मार्ग उपलब्ध हो सके। घोषित रूप में चीन ने ग्वादर बंदरगाह का विकास व्यापारिक उद्देश्यों के लिए किया है जिसके माध्यम से वह विश्व भर के बाजारों में अपना माल थोपना चाहता है किंतु आवश्यकता पड़ने पर वह ग्वादर बंदरगाह में चीनी युद्धपोत तैनात करके हिन्द महासागर, फारस की खाड़ी, मध्य-पूर्व के देशों तथा हॉर्न ऑफ अफ्रीकी रीजन्स तक दबाव बना सकता है। यह स्थिति भारत की सुरक्षा के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होने वाली है। इसलिए भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास करके समुद्र में बढ़ती हुई चीनी प्रगति को अवरुद्ध करने का प्रयास किया है।

    हाल ही में भूटान के डोकलाम क्षेत्र में चीनी बौनों और भारतीय सैनिकों के बीच हुई हाथापाई में ऊपरी तौर पर भले ही सीमा विवाद दिखाई देता है किंतु इसका असली कारण भारत में 1 जुलाई से लागू किया गया जीएसटी जान पड़ता है। चीन, भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उठाए गए अनेक कदमों से तिलमिलाया हुआ है। जापान, अमरीका और इजराइल के साथ बढ़ती हुई भारतीय दोस्ती, भारत द्वारा भारी मात्रा में खरीदी गई युद्ध सामग्री, मिसाइलें एवं युद्ध विमान, मेक इन इण्डिया अभियान तथा श्रीलंका पर प्रभाव डालकर चीनी युद्ध-पोतों की कोलम्बो में तैनाती पर रोक से तो चीन, भारत से नाराज था ही, जीएसटी के माध्यम से चीनी सामग्री पर 38 प्रतिशत कर लगाए जाने से चीन बुरी तरह झल्ला गया है।

    आज चीन की हालत ऐसी है कि उसे युद्ध के मैदानों में हराने की आवश्यकता नहीं है, उसके व्यापारिक हितों को नुक्सान पहुंचाकर उसकी कमर तोड़ी जा सकती है। चीन ने अपने विशालतम मानव संसाधन को काम दिया, नदियों को रोककर विश्व के सबसे बड़े बांध बनाए, बांधों से बिजली बनाई, बिजली से हजारों कारखाने खोले तथा बड़ी मात्रा में सैंकड़ों प्रकार के उत्पाद तैयार किए। यहां तक तो सब ठीक रहा किंतु आगे की डगर बहुत कठिन है। इस माल को खपाने के लिए पूरे संसार को चीन, बाजार के रूप में देख रहा है। इस बाजार पर कब्जा करने के लिए वह हर हथकण्डा अपना रहा है। नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी के माध्यम से चीन की इसी नस को दबाया है। अब चीन अपना माल चोरी-छिपे भारत को नहीं भेज सकेगा क्योंकि प्रत्येक भारतीय व्यापारी के लिए उस माल को जीएसटी के माध्यम से बेचना अनिवार्य हो गया है। इस माल पर अनिवार्य रूप से 38 प्रतिशत का कर लगेगा। इस कारण भारतीय कारखानों में तैयार उत्पादों के मुकाबले चीनी माल अधिक सस्ता नहीं रह जाएगा और वह भारतीय बाजार में टिक नहीं पाएगा।

    इसी बौखलाहट में चीन, भारत को 1962 की याद दिला रहा है। हालांकि चीन को यह समझ में नहीं आता कि यदि 1962 में जवाहरलाल नेहरू की जगह लालबहादुर शास्त्री या इंदिरा गांधी होती तो चीन सपने में भी 1962 को याद नहीं करता। भारत 1962 भूला नहीं है किंतु चीन को भी 1967 नहीं भूलना चाहिए जब इंदिरा गांधी के समय चीनी चूहों को भारतीय शेरों ने दूर तक खदेड़ दिया था। अपने देश की सीमाओं और व्यापार को फैलाने के लिए चीनी बौने पूरी दुनिया में घमण्ड भरा व्यवहार कर रहे हैं, यही घमण्ड और व्यापार चीन को ले डूबे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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