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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-27

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-27

    राजस्थान में जल चेतना (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    वर्षा की कम उपलब्धता तथा अनिश्चितता के कारण राजस्थान का पारिस्थितिकी तंत्र स्वाभाविक रूप से अत्यंत कमजोर है। यही कारण है कि लोक मानस में जल की उपलब्धता, महत्ता एवं श्रेष्ठता के सम्बन्ध में सदियों से चेतना का भाव रहा है। यदि यहाँ के निवासियों ने सदियों के अनुभव से विकसित उपायों को अपनी जीवन शैली में ढालकर अपनी संस्कृति का अंग न बनाया होता तो इस प्रदेश का पारिस्थितिकी तंत्र कभी का दम तोड़ चुका होता तथा यह क्षेत्र विश्व के अन्य कई मरुस्थलों की भांति कभी का जन-शून्य हो चुका होता। राजस्थान की संस्कृति में पानी की एक-एक बूंद को कीमती माना गया है। कन्हैयालाल सेठिया की ये पंक्तियां राजस्थान वासियों की इसी चेतना की ओर संकेत करती हैं-


    हिम गळ गळ गंगा बणी

    गंगा बणी समंद,

    समंद फेर बण बादळो

    रच्या बूंद रा छन्द।

    1908 ई. में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर में अर्सकाइन ने लिखा है- '1830 ई. तक जैसलमेर रियासत में खेती के लिये पानी का प्रयोग करना अपराध माना जाता था।' इस तथ्य से स्पष्ट है कि प्रजा से लेकर राजा तक, सभी जल को सुरक्षित रखने के लिये सजग थे। यह जानना रोचक होगा कि जिस राज्य में खेती के लिये जल के उपयोग पर रोक लगी हुई थी, वहाँ के राजा को राजस्व कैसे प्राप्त होता होगा! इतिहास बताता है कि जैसलमेर का शासक अपनी प्रजा से कृषि पर लगाये जाने वाले राजस्व कर की अपेक्षा पशुओं के घी की बिक्री से होने वाली आय पर कई गुना राजस्व संग्रहण करता था। यह आय इतनी अधिक होती थी कि जैसलमेर का राजा दूसरे राज्यों के राजाओं की अपेक्षा अधिक विलासिता पूर्ण जीवन व्ययतीत कर पाता था। स्पष्ट है कि जिस राज्य में खेती के लिये जल उपलब्ध नहीं था, वहाँ पशुपालन को अर्थव्यवस्था का आधार बना लिया गया था।


    जल की महत्ता सम्बन्धी चेतना का भाव

    राजस्थान में जल की महत्ता को गहराई से समझा गया है। एक कहावत में कहा गया है- 'जठै जल है, उठै जगदीश है।' अर्थात् जहाँ जल है, वहाँ ईश्वर का वास है। गांवों में यह कहावत बार-बार सुनने को मिलती है- 'आ सब पाणी री माया है।' अर्थात् यह सम्पूर्ण विश्व पानी के बल पर ही चल रहा है। यहाँ के साहित्य में भी विगत सैंकड़ों वर्षों से इस आशय के भाव व्यक्त किये जाते रहे हैं- 'अठै रगत सस्तो है अर पाणी मूंगो।' अर्थात् यहाँ वीर पुरुषों के लिये रक्त बहाना सामान्य बात है किंतु पानी की कीमत बहुत है। एक दोहे में कहा गया है-


    पांणी रौ कांई पिवै,

    (आ) रगत पीवणी रज्ज।

    संकै मन में आ समझ,

    घण नह बरसै गज्ज।।

    जल की श्रेष्ठता सम्बन्धी चेतना का भाव

    राजस्थान में जल की श्रेष्ठता पर गहनता से विचार किया गया है। गांव-गांव में एक कहावत कही जाती है- 'पाणी पियो छाणकर और गुरु बनाओ जाणकर।'अर्थात् स्वच्छ पानी पियो तथा समर्थ व्यक्ति को गुरु बनाओ। लोक साहित्य में नदी के जल को तथा कराख के जल को उसी प्रकार श्रेष्ठ माना गया है जिस प्रकार सूरज का तप, अथवा गाय और माँ का दूध श्रेष्ठ होता है-


    सूरज रो तो तप भलो, नदी रो तो जल भलो

    भाई रो तो बल भलो, गाय रो तो दूध भलो

    चारों बातों भले भाई, चारों बातों भले भाई।

    आंख रो तो तप भलो, कराख रो तो जल भलो

    बाहु रो तो बल भलो, मां रो तो दूध भलो

    चारों बातों भले, भाई चारों बातों भले भाई।।

    बादल एवं वर्षा सम्बन्धी चेतना

    बादल एवं वर्षा के बारे में राजस्थान के निवासियों का परम्परागत ज्ञान किसी आश्चर्य से कम नहीं। राजस्थानी लोक साहित्य में बादल के अनगिनत नाम मिलते हैं। इनके लिये जलहर, जीमूत, जलधर, जलवाह, जलधरण, जलद, घटा, क्षर, सारंग, व्योम, व्योमचर, मेघ, मेघाडम्बर, मेघमाला, मुदिर, महीमण्डल, भरणनद, पाथोद, धरमण्डल, दादर, डंबर, दलवादल, घन, घणमण्ड, जलजाल, काली कांठल, कालाहण, कारायण, कंद, हब्र, मैंमट, मेहाजल, मेघाण, महाघण, राइयो और सेहर आदि प्रमुख हैं।

    बड़े बादलों को सिखर कहते हैं। छितराए हुए बादलों के झुण्ड में अलग पड़ गया छोटा बादल चूंखो कहलाता है। ठण्डी हवा के साथ दूर से उड़ कर आये बादल कोलायण कहलाते हैं। काले बादलों के आगे चलायमान श्वेत बादलों को कोरण अथवा कागोलड़ कहते हैं। श्वेत बादलों के बिना आने वाले काले बादल कांठल या कलायण कहलाते हैं। पहले और ऊँचे बादल कस तथा कसवाड़ कहलाते हैं। नैऋत्य कोण से ईशान कोण की ओर थोड़े नीचे तेज बहने वाले बादल ऊंब कहलाते हैं। घटा का दिन भर छाए रहना तथा थोड़ा-थोड़ा बरसना सहाड़ कहलाता है। पश्चिम में तेज दौड़ने वाले बादलों की घटा लोरां कहलाती है और उससे लगातार होने वाली वर्षा लोरांझड़ कहलाती है। वर्षा कर चुके बादल जब किसी पहाड़ी पर विश्राम करते हुए प्रतीत होते हैं, तब उन्हें रींछी कहा जाता है।

    बादल के रंग, वर्षा के वेग तथा मेह की दिशा के आधार पर राजस्थान में वर्षा को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। वर्षा की बूंदों को हरि तथा मेघ-पुहुप कहा जाता है। वर्षा की बूंदों के गिरने पर उनकी सघनता के आधार पर उन्हें छांटो, छांटा, टपको, और टोपा कहते हैं। बूंदा-बांदी को झरमर, पुणंग तथा जीखा कहते हैं। जब वर्षा की झड़ी लग जाये तो उसे झंझमंडण तथा वरखावल कहते हैं। जब बूंदों की गति तथा अवधि बढ़ जाये तो उसे मेहांझड़ कहते हैं। जब तेज गति से कम समय में बरसात होती है तो उसे झपटो कहते हैं। उभ, बहादल, एहलूर, गोगभीण, कांठल, बावल, मदरी, एलूर, लाड़ी, भुर्ज, गूंगी, जीखां, ककर, लूरी, झुड़, काराण, शीडमी, सुआ, लड़, धराऊ; ये सब वर्षा के प्रकार हैं। सावन भादों में लगने वाली वर्षा की झड़ी को हूलर कहा जाता है। ठण्ड में होने वाली छुटपुट वर्षा को रोहड़ कहते हैं। वर्षा के साथ गिरने वाले ओलों को गड़ा कहा जाता है। नाडी या टांके में जमा वर्षा का जल पालर पाणी कहलाता है। यह स्वास्थ्य के लिये निरापद होता है। बहते हुए वर्षा जल को उसकी चाल के अनुसार बाला, आड या रेला कहते हैं।

    नौतपा का वर्षा से सम्बन्ध

    जेठ मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी से नौतपा प्रारम्भ होते हैं। नौतपा का अर्थ होता है, नौ दिन तक धरती का तेज गर्मी से तपना। यदि नौतपा में दिन खूब तपते हैं तो वर्षा अच्छी होती है। वर्षा से पहले की तपन को ओघमो कहा जाता है। जेठ माह के निकलते ही आषाढ़ के बादल आने आरम्भ हो जाते हैं, इसलिये चरवाहे जेठ के स्वागत में गीत गाते हैं-


    जेठ महीनो भलां आयो, दक्खन बाजे बा

    कानों रे तो कांकड़ बाजे, वा रे साईं वा।

    इस सम्बन्ध में एक कहावत भी कही जाती है- जेठ मास जो तपे निरासा तो जाणो बिरखा की आसां। अर्थात् यदि पूरे ज्येष्ठ मास में गर्मी हो तो आगे अच्छी वर्षा होगी।

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  • अजमेर का इतिहास - 91

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 91

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (3)


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    दीनबंधु चौधरी


    दीनबंधु चौधरी का जन्म 19 दिसम्बर 1936 को डूंगरपुर जिले के खड़लाई गांव में हुआ। उनके पिता कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी अजमेर के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। दीनबंधु ने गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर से बीएससी गणित की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा पूर्ण होने पर उन्होंने दैनिक नवज्योति के सम्पादन का काम संभाला। वर्तमान में यह समाचार पत्र अजमेर, जयपुर, कोटा तथा जोधपुर से प्रकाशित होता है तथा दीनबंधु इसके प्रबंध सम्पादक हैं। उन्होंने अजमेर के विकास के लिये कई जनआंदोलनों का नेतृत्व किया है।

    वे सिटीजन्स कौंसिल अजमेर के महासचिव हैं। उनके प्रयासों से इस संस्था ने आना सागर झील का उद्धार किया तथा इसमें से 85 लाख क्यूबिक फुट मिट्टी निकलवाई। ई.1977 में राष्ट्रपति डॉ. के. आर. नारायण ने उन्हें राष्ट्र स्तरीय मातुश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्होंने पत्रकारिता के लिये देश के कई प्रधानमंत्रियों यथा राजीव गांधी, पी. वी. नरसिंहाराव, वी. पी. सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहनसिंह कि साथ कई देशों की यात्रा की है।

    यूएसएसआर के निमंत्रण पर वे विशिष्ट अतिथि के रूप में रूस की 13 दिन की यात्रा कर चुके हैं। कुवैत सरकार के निमंत्रण पर वहां भी पाँच दिन की यात्रा कर चुके हैं। वे अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सदस्य हैं। वे अजमेर जिला स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष हैं। वे बैडमिण्टन के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी रहे हैं।

    दुर्गा प्रसाद चौधरी (कप्तान)

    कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी का जन्म 18 दिसम्बर 1906 को नीम का थाना के प्रसिद्ध अग्रवाल परिवार में हुआ। दुर्गा प्रसाद चौधरी स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार एवं समाजसेवी थे। उनके चार भाई और तीन बहिनें थीं। बड़े भाई रामनारायण चौधरी प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी थे। ई.1921 से 1947 के मध्य दुर्गा प्रसाद स्वाधीनता आंदोलन में संलग्न रहे। ई.1930 से 1945 तक वे कांग्रेस सेवादल के कप्तान रहे। इसलिये उन्हें कप्तान साहब के नाम से जाना गया। ई.1936 में उन्होंने अजमेर से साप्ताहिक समाचार पत्र नवज्योति का प्रकाशन एवं सम्पादन आरंभ किया।

    इस अखबार ने आजादी की लड़ाई में मशाल का काम किया। देशी रियासतों के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले अखबारों में यह एक अग्रणी अखबार था। अब वह समाचार पत्र दैनिक नवज्योति के नाम से निकलता है। ई.1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण कप्तान साहब को जेल में बंद कर दिया गया। वे तीन वर्ष तक जेल में बंद रहे। इससे पूर्व भी वे एक बार तीन माह के लिये, दूसरी बार 6 माह के लिये तथा तीसरी बार 1 वर्ष के लिये जेल में रहे थे। ई.1962 के चीन युद्ध के दौरान वे युद्ध की रिपोर्टिंग के लिये असम में मैकमोहन रेखा पर स्थित युद्ध के मोर्चों पर भी गये। ई.1992 में उनका निधन हुआ।

    नृसिंहदास (बाबाजी)

    नृसिंह दास का जन्म 31 जुलाई 1890 को नागौर के प्रतिष्ठित अग्रवाल परिवार में हुआ। उन्होंने नागौर, बीकानेर तथा हैदराबाद में महाजनी पढ़ी। जब देश में स्वतंत्रता संग्राम की चिन्गारियां स्फुरित हुईं तो नृसिंहदास ने अपने लाखों रुपये के कारोबार को तिलांजलि दे दी तथा अपनी और अपनी पत्नी के विदेशी कपड़ों की होली जलाकर बाबाजी बन गये। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों तथा क्रांतिकारियों के परिवारों एवं उनके बालकों की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा और शादी विवाह करवाने का कार्य हाथ में लिया। बाबाजी ने कई बार बम्बई से हथियार खरीद कर क्रांतिकारियों तक पहुँचाये। मोहनदास गांधी से उनका वैचारिक मतभेद रहता था। 22 जुलाई 1957 को बाबाजी का अजमेर में निधन हुआ।

    बालकृष्ण कौल

    बालकृष्ण कौल का जन्म 18 जून 1903 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद कस्बे में हुआ। आपने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। केवल 17 वर्ष की आयु में ई.1920 से वे सक्रिय राजनीति से जुड़ गये। ई.1921 में असहयोग आंदोलन, 1930-31 में नमक सत्याग्रह एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन, ई.1940-41 में व्यक्तिगत सत्याग्रह और ई.1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। वे छः साल तक जेल में रहे। ई.1952 से 1957 तक वे अजमेर विधानसभा के सदस्य रहे। इस दौरान वे ई. 1952 से 56 तक अजमेर प्रांत के गृह एवं वित्त मंत्री रहे। ई.1962 से 1967 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। ई.1968 में वे राज्यसभा के लिये चुने गये। वे संसद की लोकलेखा समिति के सदस्य भी रहे।

    बालकृष्ण गर्ग

    बालकृष्ण गर्ग का जन्म 9 दिसम्बर 1908 को अजमेर में हुआ। ई.1930 में वे कांग्रेस से जुड़े। ई.1942 तक उन्होंने अनेक आंदोलनों में भाग लिया तथा कई बार जेल गये। 8 से 16 अप्रेल 1940 तक अजमेर कांग्रेस के राष्ट्रीय सप्ताह में झण्डा फहराने पर बालकृष्ण गर्ग को चार माह की कठोर जेल दी गई। वे अजमेर राज्य के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। अजमेर-मेरवाड़ा सम्मिलित कांग्रेस के उपाध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री रहे। वे हरिजन सेवक संघ तथा भारत सेवक समाज के अध्यक्ष रहे। ई.1937 में उन्होंने अजमेर-मेरवाड़ा ग्राम सेवा मण्डल की स्थापना की। वे अजमेर नगर परिषद के सदस्य भी रहे।

    रवीन्द्र कृष्ण मजबूर

    रवीन्द्र कृष्ण मजबूर का जन्म अविभाजित भारत के उस हिस्से में हुआ था जो भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया। भारत विभाजन के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया। बाद में रवीन्द्र कृष्ण अजमेर आ गये। वे इस युग के प्रमुख शायरों में से हैं। उनकी शायरी में गंभीर दर्शन एवं अध्यात्म देखने को मिलता है। उन्होंने हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेजी में पुस्तकें लिखीं। उनकी लिखी पुस्तकों में इन साइड दी पेन, तुम्हारी तुम जानो, सब सहना है मजबूर आदि प्रसिद्ध हैं। संत मुरारी बापू उनकी शायरी से बहुत प्रभावित हुए तथा उनसे मिलने के लिये उनके निवास पर आये। मजबूर की पत्नी सत्यकृष्णा का परिवार भी पाकिस्तान के सियालकोट से आया था। वे सेंट्रल गर्ल्स स्कूल में हिन्दी की वरिष्ठ अध्यापिका रहीं और अध्यापन एवं लोक सेवा के लिये कई बार सम्मानित हुईं।

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  • घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     02.06.2020
     घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     घर चलो माँ!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    बबलू बेचैन है। क्या कहे माँ से! कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं होती। वह कनखियों से माँ की ओर देखता है, माँ का चेहरा पूरी तहर निर्विकार है। बबलू को इस चेहरे को पढ़ने का अभ्यास तब से है जब वह बोल भी नहीं पाता था। तब वह केवल रो कर माँ को बता देता था कि वह क्या चाहता है! थोड़ा सा रोने के बाद बबलू चुप हो जाता था और माँ का चेहरा देखकर आश्वस्त होने का प्रयास करता था कि माँ ने उसकी आवश्यकता को ठीक से समझ लिया है या नहीं। माँ हर बार ठीक से जान जाती थी कि इस बार बबलू दूध के लिये रोया है, या उसने लंगोटी गीली कर ली है, या उसे गर्मी लग रही है। उन दिनों से लेकर इन दिनों तक उसकी हर मांग माँ ही पूरी करती आई है। आज वही माँ बबलू को माँ के अपने बनाये मकान में छोड़कर भावशून्य चेहरा लिये किराये के मकान में रहने चली आई है।

    माँ का भावशून्य चेहरा देखकर बबलू भीतर ही भीतर काँप जाता है। उसे लगता है कि वह एक ऐसी इमारत के सामने खड़ा है जिसमें प्रवेश करने के सारे दरवाजे पूरी मजबूती के साथ भीतर से बंद कर लिये गये हैं। बाहर से कितनी भी आवाज दो, भीतर न तो आवाज पहुँचने वाली है और न अनायास ही दरवाजा खुलने वाला है। कौन जाने दरवाजा खोलने के लिये इमारत के भीतर कोई है भी कि नहीं!

    बबलू फिर से कनखियों से माँ की ओर देखता है। माँ मौन है। पिछले कई सालों से उसकी आँखों में हर पल दिखाई देने वाली कठिनाई, खीझ, गुस्सा और असमंजस का भाव आज नहीं है। माँ की आँखों में पल-पल दिखाई देने वाले भाव बबलू के लिये खिड़की का कार्य करते थे जिनके माध्यम से वह माँ के भीतर पहुँच जाया करता था और नाराज माँ को किसी तरह मना लिया करता था किंतु आज सारी खिड़कियाँ बंद हैं। माँ का चेहरा कपूर की तरह सफेद, बर्फ की तरह ठण्डा और सर्दियों में ठहरे हुए झील के पानी की तरह शांत है। छोटे से घर में पसरा हुआ मौन बबलू को काटता हुआ सा प्रतीत होता है। माँ कभी इतनी तंग गली के इतने छोटे मकान में नहीं रही। कैसे माँ ने इस मकान में रहने का मन बनाया होगा! उसे आश्चर्य होता है।

    माँ का मोबाइल बजने से बबलू को राहत मिलती है। वह आया तो था माँ को मनाकर पुनः घर ले चलने के लिये किंतु माँ का नितांत ठण्डा स्वर और भावशून्य चेहरा देखकर उसकी हिम्मत ही नहीं हुई। माँ को मोबाइल में व्यस्त जानकर बबलू कमरे से बाहर आ गया है। यह कहना गलत है कि वह कमरे से बाहर आ गया है।

    वास्तविकता यह है कि एक कमरे के घर में कमरे से बाहर आने का अर्थ होता है घर से भी बाहर आ जाना। सड़क पर आकर बबलू गाड़ी स्टार्ट करता है। कहाँ जाये! ऑफिस या घर! ऑफिस में मन नहीं लगेगा और घर में विनीता के सवालों की झड़ी लग जायेगी। वे सवाल जिनकी वजह बबलू नहीं है, स्वयं विनीता है, या फिर पापा हैं किंतु विनीता उन सवालों के उत्तर बबलू से लेना चाहेगी। यह कैसी विडम्बना है, प्रायः वह उन सवालों से घिर जाता है जिनके उत्तर उसे स्वयं चाहिये। कल तक वह भी माँ पर खूब चीखता चिल्लाता था। उन्हीं सवालों के जवाब वह माँ से मांगता रहा था जिन सवालों के जवाब आज उसे पूरी दुनिया को देने पड़ेंगे।

    जिन सवालों ने आज माँ को घर से निकाल कर किराये के मकान में पहुंचा दिया है, जिन सवालों ने आज उसके और माँ के बीच में एक ऐसी मोटी दीवार चिन दी है जिसके आर-पार आवाज जाने की संभावना तक दिखाई नहीं देती, उन सवालों के जवाब कहाँ से लाये बबलू! उसे स्वयं अपनी स्थिति पर तरस आ जाता है। अगले ही क्षण उसे माँ का ध्यान आता है। निश्चय ही आज उसने माँ का जो चेहरा देखा है, वह चेहरा उसके हृदय की वास्तविक स्थिति का द्योतक नहीं है। भीतर ही भीतर वह अवश्य ही बहुत दुःखी है।

    जरा सी बात पिछले नौ सालों में बढ़कर यहाँ तक पहुँच गई थी। न तो पापा विनीता को सहन करने को तैयार हुए थे और न विनीता ने पापा की किसी बात को सुनने का प्रयास किया था। इस पूरे प्रकरण में बबलू की क्या गलती थी? और माँ? माँ की भी तो कोई गलती नहीं थी। उन्हें भी तो सजा मिल रही है। जब माँ औरत होकर इतना सहन कर सकती है तो फिर बबलू क्यों नहीं। क्यों वह अपने भीतर की पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा!

    उसे आज भी याद है कि अंतिम वर्ष में उसके पास कॉलेज की फीस भरने लायक रुपये नहीं थे, पापा सदैव की तरह अपने सुनहरे अतीत का गुणगान करते हुए किंकर्त्तव्य विमूढ़ की तरह घर में बैठे थे और बबलू रिश्तेदारों और परिचितों के यहाँ दो सौ रुपये के लिये याचक बना घूम रहा था, पूरे शहर में वह चक्करघिन्नी की तरह घूम गया था किंतु किसी उसे दो सौ रुपये नहीं दिये थे। हार थक कर बबलू घर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। उसका दिल रोने को हो रहा था किंतु माँ को हॉस्पीटल गये काफी देर हो गई थी इसलिये मकान की सीढ़ियों पर बैठकर रोने से अधिक जरूरी माँ को ढूंढने के लिये हॉस्पीटल जाना हो गया था।

    आंसुओं को आँखों में ही रोककर वह सीढ़ियों से उतर कर घर से बाहर निकला ही था कि दरवाजे पर थकी हारी माँ दिखाई दी थी। माँ ने स्कूल फीस जमा कराने की पर्ची चुपचाप उसकी हथेली पर रख दी थी और स्वयं सीढ़ियों पर बैठकर हांफने सी लगी थीं। उन्होंने अपनी एक महीने की दवाईयाँ न खरीदकर उन रुपयों से उसकी फीस भरवा दी थी।

    उन दिनों बीमारी के कारण माँ को नौकरी पर जाना बंद किये हुए पूरा एक साल होने आया था और जो कुछ भी घर में पिछले दिनों का बचा हुआ था, वह माँ के इलाज पर शनैः शनैः चुक रहा था। यह तो ठीक था कि सरकारी नौकरी थी इसलिये वह छूटी नहीं, अन्यथा माँ के लिये आगे की नौकरी का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता।

    उपचार से माँ लगातार ठीक होती जा रही थी और यह आशा बंधती जा रही थी कि कुछ महीनों बाद वह फिर से नौकरी पर जाने लगेगी और घर फिर से पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। माँ का सारा गहना भी उन्हीं दिनों बिका। बबलू और उससे भी चार साल छोटी बबीता ने उन दिनों क्या कुछ नहीं सहा! अच्छे कपड़ों में तो वे समझते ही नहीं थे किंतु साबुत निक्कर कमीज के लिये भी तरस गये थे वे। आखिर कुछ महीने और बीते, माँ नौकरी पर जाने लायक हो गई। जीवन धीरे-धीरे सामान्य होता चला गया था। बबलू ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली किंतु पढ़ाई पूरी करते-करते उसके मन में गरीबी और लाचारी ने ऐसी जिद भर दी कि अब वह कोई छोटी-मोटी नौकरी तलाशने के स्थान पर व्यापार में हाथ आजमाना चाहता था। वह कोई ऐसा व्यापार चाहता था जो उसे कुछ ही समय में करोड़पति बना दे ताकि फिर कभी गरीबी और बेचारगी मुड़कर इस घर को न देखें।

    उसने अपने लिये इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस चुना। माँ ने सुना तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतना पैसा कहाँ से आयेगा! यह ऐसा बिजनिस था जिसे आरंभ करने के लिये कम से कम पाँच-सात लाख रुपये तो जेब में चाहिये ही। माँ ने बबलू को इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनिस करने से लाख मना किया और कहा कि वह कोई नौकरी कर ले किंतु बबलू को तो एक ही धुन सवार थी - इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस।

    बबलू को आज भी याद है कि उसने माँ से कुछ नहीं मांगा था किंतु जब उसे परेशान होते हुए कई दिन बीत गये थे तब एक दिन स्वयं माँ ने उसके हाथ में तीन लाख रुपये का चैक रख दिया था - 'ये ले! अपना बिजनिस शुरु कर।'

    बुरी तरह चौंका था बबलू - 'इतने रुपये कहाँ से आये?'

    - 'तुझे ज्यादा पूछताछ करने की जरूरत नहीं।' माँ ने हर बार की तरह उसे निरुत्तर कर दिया था।

    कई महीने बाद बबलू को पता चल पाया कि जिस मकान को बनाने में माँ ने अपनी आधी जिंदगी की कमाई झौंक दी थी, उसी को गिरवी रखकर माँ ने बैंक से यह पैसा लिया था। उसके बाद से तो जैसे एक नया सिलसिला चल पड़ा। इस बिजनिस की अपनी परेशानियाँ थीं जिन्हें सुलझा पाना बबलू के अकेले के बूते की बात ही नहीं थी लेकिन जब भी बबलू ने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की तो उसे माँ अपने ठीक पीछे खड़ी हुई मिली।

    कई बार उसका कन्साइनमैण्ट फेल हो जाता था। कई बार उसका माल कस्टम में रोक लिया जाता था। कई बार फॉरेन वाली पार्टी वायदा करके मुकर जाती थी। जब भी ऐसा होता था बबलू को तत्काल दो तीन लाख रुपयों की जरूरत होती थी और हर बार बबलू की जेब खाली होती थी। पता नहीं कैसे बबलू इतना बड़ा बिजनिस संभाल पाता था, उसे पैसों का हिसाब रखने को तो कोई होश ही नहीं था। वह तो केवल इतना जानता था कि जितना पैसा हो सब बिजनिस में लगा दो। पैसा कम पड़े तो माँ को बताओ। यह सही था कि बबलू को इस बिजनिस में अच्छा लाभ हो रहा था किंतु वह पूरी आय को बिजनिस में झौंकता जा रहा था जिससे बिजनिस का आकार और मुनाफा दोनों बढ़ रहे थे किंतु बबलू का हाथ सदैव तंग ही रहता था।

    बबलू को मुँह से बोलकर कुछ भी मांगना नहीं पड़ता था। माँ सब जानती थी, सब सहती थी और सब करती थी। रसोई का खर्च, बबलू के पापा का इलाज, अपनी दवाईयाँ, बबीता के विवाह का खर्च, बबलू के विदेश आने-जाने के टिकट, सारा प्रबंध माँ ही करती रही थी और बबलू बेतहाशा पैसा कमाता रहा था। इस बीच में बबीता अपने ससुराल चली गई थी किंतु घर में विनीता आ गई थी। बबलू को लगा था कि बहू के आ जाने के बाद माँ को कुछ आराम मिलेगा किंतु हुआ ठीक उलटा। पापा के और विनीता के गण पहले दिन से ही नहीं मिले। विनीता के आने से पहले पापा कभी इतने रूखे नहीं थे। यह ठीक है कि पापा ने जीवन भर कभी ढंग से कमाया नहीं किंतु वे स्वभाव के अच्छे ही थे। जाने ऐसी क्या बात थी कि विनीता को देखते ही उनके स्वभाव ने पलटी मार ली थी।

    सरल स्वभाव की विनीता, जाने क्यों पापा की इच्छानुसार काम नहीं कर पाती थी। पापा की एक न एक शिकायत बनी ही रहती - रोटियाँ कच्ची हैं। सब्जी बेस्वाद है। चाय को ढंग से उबाला नहीं। पापड़ ढंग से नहीं सेके। बरतन मांजने में इतनी आवाज करती है। धूप में पड़े-पड़े कपड़ों का रंग खराब हो रहा है। इसे कपड़े भीतर लाने का होश नहीं है। विनीता सिर झुका कर पापा के सब आरोपों और उलाहनों को चुपचाप सब सुनती। पापा के मन को अच्छा लगे, ऐसा कुछ करने का भरसक प्रयास करती किंतु पापा अपने अतीत की गौरव गाथाओं का गायन करते-करते विनीता के हर काम में दोष निकालते ही गये थी। जाने पापा विनीता से क्या चाहते थे?

    जब घर में नई पीढ़ी के बच्चे आ गये तो बबलू को लगा कि पापा अब बच्चों के साथ समय निकाल लिया करेंगे किंतु उनका पूरा ध्यान विनीता की ओर ही लगा रहा। कैसी फूहड़ है? कितना पैसा खर्च करती है? बच्चों के इतने महंगे कपड़े खरीद कर क्यों लाई? कपड़ों पर ढंग से इस्तरी तक नहीं कर सकती। कपड़ों में नील लगाने तक की तमीज नहीं। पूरी बनियान पर धब्बे लगा देती है। झाडू. बुहारने तक का शउर नहीं। बरतनों की आवाज करती है।

    माँ ने पापा को समझाने का लाख प्रयास किया कि वे विनीता से प्यार से बोलें किंतु पापा को माँ की कोई बात समझ में नहीं आई थी। बबलू ने स्वयं को पापा और विनीता के प्रकरण से कभी जोड़ा ही नहीं। माँ जाने और उसका काम जाने। माँ के रहते बबलू को घर के मामलों में बोलने की जरूरत ही नहीं थी लेकिन वह लगातार अनुभव करता रहा था कि पापा और विनीता के मामले में माँ बिल्कुल असफल सिद्ध होती जा रही थी।

    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जाता था, पापा की शिकायतों की सूची बढ़ती जाती थी। नित नई शिकायतों की मार से विनीता का धैर्य चुकता चला गया था। पहले तो वह पापा के सामने जाने से बचने लगी। बाद में वह उन्हें जानबूझ कर अनसुना करने लगी। पापा फिर भी नहीं माने तो वह जानबूझ कर चाय खराब बनाने लगी। जानबूझ कर कच्ची रोटियाँ पापा की थाली में परोसने लगी और पापा की बनियान पर जान बूझ कर नील के धब्बे लगाने लगी। पापा में कोई सुधार नहीं हुआ। वे विनीता में आते जा रहे परिवर्तन को भी लक्ष्य नहीं कर पाये।

    धीरे-धीरे विनीता पापा के सामने बोलने भी लगी थी। उन्हें तमक कर जवाब भी देने लगी थी लेकिन ऐसा वह तभी करती थी जब उसे यह पूरा विश्वास हो कि माँ या बबलू में से कोई देख नहीं रहा है। बहू के तीखे जवाबों को सुनकर पापा और भी बौखला जाते। उनका गुस्सा आसमान पर जा चढ़ता। वे जोर-जोर से चीखने चिल्लाने लगते और घर में बवण्डर जैसा ही आ जाता।

    कई बार बबलू ने और कई बार माँ ने भी विनीता को पापा से मुँहजोरी करते हुए सुन लिया था। अब स्थिति उस बिंदु तक जा पहुँची थी कि दोनों में किसी को नहीं समझाया जा सकता था। न तो बबलू को और न माँ को ऐसा आभास हो पाया था कि विनीत आजकल पापा को गुस्सा करने के लिये क्यों उकसाती है। बहुत दिनों बाद उन्हें मालूम हुआ था कि विनीता पापा को गुस्सा करने के लिये उकसा कर अपने मोबाइल को ऑन करके पापा की सारी चीखें और गुस्से में बकी गई गालियां वह अपने पीहर वालों से लेकर ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों को सुनाती थी। इस प्रकार पापा गुस्से में आग बबूला होकर जो कुछ भी अनाप-शनाप बकते थे, उसे सब रिश्तेदारों ने अपने-अपने घर में बैठकर ही सुन लिया था और पापा सब रिश्तेदारों की दृष्टि में गिर गये थे।

    आखिर वह दिन भी आ ही गया था जिसके भय से बबलू और माँ दोनों ही भीतर ही भीतर आशंकित थे। पापा और विनीता, दोनों ने घोषणा कर दी थी कि इस घर में वे दोनों साथ नहीं रह सकते। दोनों में से किसी एक को घर छोड़कर जाना ही पड़ेगा। माँ एक ओर पापा से बंधी हुई थी तो दूसरी ओर बबलू से। बबलू भी एक ओर माँ से बंधा हुआ था तो दूसरी ओर विनीता से किंतु पापा और विनीता एक घर में रहने को तैयार नहीं थे। अतः स्वाभाविक ही था कि या तो माँ पापा को लेकर घर से चली जाती या फिर बबलू विनीता और बच्चों को लेकर घर छोड़ देता।

    आखिर इस बार भी बबलू को कुछ नहीं करना पड़ा था। माँ चुपचाप पापा को लेकर इस किराये के मकान में चली आई थीं और बबलू लाख चाह कर भी उनसे यह नहीं कह पाया था - घर चलो माँ।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-28

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-28

    राजस्थान में जल चेतना (2)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ


    राजस्थानी कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियों का भण्डार भरा पड़ा है। यह भण्डार लोक द्वारा अर्जित अनुभव द्वारा रचा गया है-

    काल केरड़ा सुगाळै बोर : अर्थात् कैर के वृक्ष पर अत्यधिक फल लगें तो वर्षा नहीं होगी, अकाल पड़ेगा एवं बेरियों के अधिक बेर लगे तो यह अच्छी वर्षा होने का संकेत है। सुकाल होगा।

    काती रो मेह कटक बराबर : अर्थात् कार्तिक की वर्षा फसल के लिये बहुत हानिकारक है।

    आसोजां में मोती बरसे : अर्थात् आश्विन मास में होने वाली थोड़ी वर्षा भी खेती के लिये मूल्यवान होती है।

    ईसानी बिसानी : ईशान कोण में बिजली चमके तो खेती अच्छी होगी।

    चांद छोड़े हिरणी तो लोग छोड़े परणी : अर्थात् अक्षय तृतीया को यदि चांद मृगशिरा से पूर्व अस्त हो जाये तो भीषण अकाल पड़ेगा, जिसमें लोगों को अपनी स्त्रियों को घर पर छोड़कर जीवन निर्वाह के लिये अन्यत्र जाना पड़ेगा।

    बरसे भरणी, छोड़े परणी : अर्थात् यदि भरणी नक्षत्र में वर्षा होवे तो पति अपनी पत्नी को छोड़ भागे अर्थात् उसे कमाने के लिये विदेश जाना पड़ेगा।

    जे बरसे मघा तो धान रा ढगा : यदि मघा नक्षत्र में वर्षा हो तो अनाज अत्यधिक उत्पन्न होगा।

    जे बरसे उतरा तो धान न खावे कुतरा : यदि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वर्षा हो तो इतना धान होगा कि उसे कुत्ते भी नहीं खायेंगे।

    रोहण रेली तो रुपये की अधेली : अर्थात् यदि रोहिणी नक्षत्र में वर्षा हो तो रुपये की अधेली मिलेगी अर्थात् अकाल पड़ेगा।

    न भीज्यो काकड़ो, तो क्यूं टेरै हाळी लाकड़ो? : अर्थात् हे किसान यदि कर्क संक्रांति के दिन वर्षा न हो तो तुम व्यर्थ ही हल चलाते हो क्योंके कर्क संक्रांति के दिन वर्षा न होने से अकाल पड़ेगा।

    भादरवो गाज्यौ, काळ भाज्यौ : अर्थात् भादों में वर्षा होने पर अकाल भाग जाता है।

    भडली पुराण में वर्षा सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ

    वर्षा के समय पर आने, पर्याप्त मात्रा में आने तथा निश्चित अंतराल पर आने पर ही अच्छी फसल ली जा सकती है। अच्छी फसल होने पर पशु-पालन, व्यापार-वाणिज्य एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है। इसलिये समाज का हर व्यक्ति जानना चाहता है कि वर्षा कब तथा कितनी होगी! जन मानस की इस उत्सुकता का निवारण करने के लिये डंक नामक ज्योतिषी ने भडली पुराण नामक ग्रंथ की रचना की। डंक की पत्नी का नाम भडली था। भडली को सम्बोधित करके डंक ने अपना ग्रंथ लिखा तथा उसी के नाम पर इस ग्रंथ का नाम भडली पुराण रखा। इस पुराण में, निश्चित दिन को होने वाली प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर, आने वाले दिनों में वर्षा की भविष्यवाणी जानने के सूत्र दिये गये हैं-


    मंगसर तणी जे अष्टमी, बादली बीज होय।

    सांवण बरसै भडली, साख सवाई जोय।।

    अर्थात् यदि मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को बादल दिखाई दें और बिजली चमके (दोनों घटनाएं हों) तो श्रावण मास में वर्षा होगी और फसल सवाई होगी।


    मिंगसर बद वा सुद मंही, आधै पोह उरे।

    धंवरा धुंध मचाय दे, तौ समियो होय सिरे।

    अर्थात् यदि मार्गशीर्ष के पहले या दूसरे पक्ष में अथवा पौष के प्रथम पक्ष में, प्रातः काल के समय धुंध (कोहरा) हो जाये तो फसल अच्छी होगी।


    पोष अंधारी दसमी, चमकै बादल बीज।

    तौ भर बरसै भादवौ, सायधण खेलै तीज।।

    अर्थात् यदि पौष कृष्ण दसमी को बादलों में बिजली चमके तो पूरे भादों में वर्षा होगी और स्त्रियां तीज का त्यौहार अच्छी तरह मनायेंगी।


    पोह सबिभल पेखजै, चैत निरमल चंद।

    डंक कहै हे भड्ड, मण हूंता अन चंद।

    अर्थात् यदि पौष में बादल दिखाई दें और चैत्र के शुक्ल पक्ष में चंद्रमा स्वच्छ दिखाई पड़े अर्थात् कोई बादल दिखाई न दे तो डंक भडली से कहता है कि अनाज मन से भी सस्ता होगा।


    फागण वदी सु दूज दिन, बादल होए न बीज।

    बरसै सांवण भादवौ, साजन खेलौ तीज।।

    अर्थात् यदि फाल्गुन कृष्ण द्वितीया के दिन बादल या बिजली नहीं हो तो श्रावण व भादों में अच्छी वर्षा होगी, अतः हे पति तीज अच्छी तरह मनायेंगे।

    भडली पुराण के जल-कूण्डो तथा माछली

    भडली पुराण जलकूण्डो तथा माछली के रूपकों से भरा पड़ा है। आषाढ़ के प्रारंभ में सूरज के चारों ओर दिखने वाला एक विशेष प्रभा-मण्डल, जल-कूण्डो कहलाता है। यह जल-कूण्डो वर्षा का सूचक माना जाता है। इन्हीं दिनों उदित होते सूर्य में माछली, यानी मछली के आकार की एक विशेष किरण दिख जाए तो तत्काल वर्षा की संभावना होती है। इसी प्रकार आषाढ़ में चंद्रमा की कला हल की तरह खड़ी रहे और श्रावण में यह विश्राम की मुद्रा में लेटी दिखे तो वर्षा ठीक होती है- 'ऊभो भलो अषाढ़, सूतो भलो सरावण।'

    कुल्हड़ गलाने की परम्परा

    आगामी चौमासे में वर्षा की मात्रा जानने के लिये आखा तीज पर मिट्टी के चार कुल्हड़ रखे जाते हैं जो जेठ, आषाढ़, सावन तथा भादों के प्रतीक माने जाते हैं। इनमें पानी भरकर रख दिया जाता है तथा यह देखा जाता है कि कौनसा कुल्हड़ पहले गलता है। जेठ का कुल्हड़ गल जाये तो वर्षा स्थिर मानी जाती है। आषाढ़ का गले तो वर्षा खण्डित होगी, सावन या भादों वाला कुल्हड़ पहले फूटता है तो माना जाता है कि वर्षा प्रचुर मात्रा में होगी।

    वर्षा का स्वागत

    जब बादल आते हैं तो पश्चिमी राजस्थान में बच्चे, वर्षा का स्वागत करने के लिये डेडरिया गाते हैं-


    डेडरियो करे डरूं, डरूं,

    पालर पानी भरूं, भरूं।

    आधी रात की तलाई

    नेष्टई नेष्टे।

    अर्थात् डेडरिया (मेंढक) वर्षा को देख कर डरूं-डरूं (टर्र-टर्र) करता है और कहता है कि मैं तो वर्षा का पानी भर रहा हूँ ताकि आधी रात तक तलैया नेष्टे (अपरा) तक भर जाये।

    कन्हैयालाल सेठिया ने बादलों के आगमन का इस प्रकार वर्णन किया है-


    आया बादळ बींद बण

    धरती हुई सुरंग

    गगन बखेर्या पंथ में

    रामधणख रा रंग।

    अरूठ मनाने की परम्परा

     बादल तो आ गये हैं किंतु ऐसा न हो कि किसी कारण से वर्षा न हो पाए। इस शंका का निवारण करने के लिये गांव-गांव में छोटे-मोटे अनुष्ठान किये जाते हैं। मिट्टी के बरतनों में साबत गेहूँ अर्थात् गूगरिये बनाये जाते हैं। अनुष्ठानकर्त्ता, अपने सिर से पगड़ी उतार लेता है तथा इन गूगरियों को चारों दिशाओं में उछालकर जल एवं वायु को अर्पित करता है। इसे अरूठ मनाना कहते हैं। अर्थात् वर्षा यदि रूठ गई हो तो वह प्रसन्न हो जाये। पगड़ी उतार कर अरूठ मनाने का आशय इस भाव से है कि हम वर्षा के अभाव में शोक संतप्त हैं।

    मरुभूमि में वर्षा का दृश्य

    मरुभूमि में वर्षा का दृश्य अनूठा होता है। इस दृश्य को कन्हैयालाल सेठिया ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-


    काळा बादळिया घहरावै

    बिरखा घूघरिया घमकावै,

    बिजळी डरती ओला खावै

    धरती धोरां री।

    एक लोक गीत में, जल बरसाती हुई बदली का चित्रण इन शब्दों में किया गया है-


    काळी रे कळायण ऊपड़ी ए पणिहारी ऐले

    गुडला सा बरसे मेह सेणों लो।

    जल स्रोतों के निर्माण की परम्परा

    राजस्थान में वर्षा से प्राप्त जल को सहेजने एवं भू-गर्भ में स्थित जल को प्राप्त करने के लिये सदियों से उपाय किये जा रहे हैं। सदियों से सेठ-साहूकार, राजा-रानी, राजकुमारियां, धर्मात्मा पुरुष, लक्खी बणजारे एवं धनी-मानी लोग जन सामान्य को जल उपलब्ध करवाने के लिये कुएं, नाडी, तालाब आदि का निर्माण करवाते रहे हैं। आजादी प्राप्त होने से कुछ समय पहले तक समाज में कुओं, तालाबों एवं जलाशयों का निर्माण करवाना परम पुनीत कर्त्तव्य माना जाता था। इनका निर्माण संसार में सदियों तक अमर करने का साधन माना जाता था।

    सिरभाव परम्परा

    राजस्थान में ऐसे लोगों की एक सुविकसित परम्परा रही है जो बिना किसी औजार की सहायता से, केवल भूमि को देखकर यह बता देते थे कि इस भूमि में जल निकलेगा या नहीं। इन लोगों के भरोसे पर कूप खनन का काम किया जाता था। माना जाता है कि वे सिद्ध होते थे और उन्हें भाव आता थाा। ये लोग किसी विशेष जाति के नहीं होते थे। किसी को भी यह सिद्धि प्राप्त हो सकती थी। सिरभाव की तरह ही जलसूंघा लोग होते थे। वे भूजल की तरंगों के संकेत को आम की लकड़ी की सहायता से पकड़कर पानी का पता बताते थे। यह कार्य आज भी जारी है। ट्यूबवैल खोलने वाली बहुत सी कम्पनियां पहले अपने यंत्रों से भूजल का पता लगाती हैं, उसके बाद जलसुंघों को बुलाकर उनकी राय भी जानने का प्रयास करती हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 92

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 92

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (4)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    विजयसिंह पथिक


    विजयसिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। उनका जन्म 24 मार्च 1882 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुलावठी गाँव में एक गुर्जर परिवार में हुआ था। वे क्रांतिकारी, कवि, लेखक, पत्रकार तथा राजनेता थे। उनका पूरा परिवार क्रांतिकारी था। ई.1914 में देश के बड़े क्रांतिकारियों- योगीराज अरविंद, श्यामजी कृष्ण वर्मा, शचीन्द्र सान्याल आदि ने सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत भूमि को स्वतंत्र करवाने की योजना बनायी। यह निश्चय किया गया था कि लाहौर, रावलपिण्डी और फिरोजपुर में विद्रोह करके वहाँ के शस्त्रागारों पर अधिकार कर लिया जाये।

    इस सफलता के बाद अन्य स्थानों पर भी विद्रोह करके अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया जाये। राजपूताने में इस क्रांति का जिम्मा खरवा के राव गोपालसिंह तथा दामोदर दास राठी को सौंपा गया था। इन लोगों के सहयोग के लिये भूपसिंह को राजपूताने में भेजा गया। वे अपने बहनोई के साथ राजस्थान के किशन गढ़ आये। गोपालसिंह खरवा तथा विजयसिंह ने 2000 लोगों की सशस्त्र सेना खड़ी कर ली। क्रांति आरंभ करने की तिथि 21 फरवरी 1915 रखी गयी किंतु इस योजना की सूचना अंग्रेजों को मिल गयी। इसलिये राजपूताने में दो दिन पहले ही सशस्त्र क्रांति करने का निर्णय लिया गया।

    क्रांति आरंभ होने की सूचना देने के लिये खरवा रेलवे स्टेशन के पास बम विस्फोट करने की योजना बनायी गयी। अंग्रेजों ने बहुत से लोगों को पकड़ लिया जिससे बम विस्फोट नहीं हो सका और क्रांति आरंभ नहीं हो सकी। इसलिये क्रांतिकारियों ने अस्त्र-शस्त्र छिपा दिये और दो हजार लोगों को इधर उधर बिखेर दिया। अंग्रेजों ने जंगल में भाग रहे गोपालसिंह और भूपसिंह को पकड़ कर टॉडगढ़ में नजरबंद कर दिया। कुछ दिन बाद दोनों ही व्यक्ति जेल से भाग निकले। गोपालसिंह तो कुछ दिन बाद फिर से पकड़ लिये गये किंतु भूपसिंह अपना नाम बदल कर विजयसिंह पथिक के नाम से मेवाड़ के ठिकानों में घूमते रहे।

    विजयसिंह पथिक ने मेवाड़ के गाँवों में सामाजिक उत्थान के कार्य किये तथा विद्या प्रचारणी सभा की स्थापना करके उसके माध्यम से गाँवों में शिक्षा का प्रचार करने लगे। वे शीघ्र ही मेवाड़ के ग्रामीण अंचल में लोकप्रिय हो गये। मेवाड़ रियासत के बिजौलिया ठिकाने में जागीरदार के अत्याचारों के विरोध में ई. 1897 से लेकर 1947 तक 50 वर्ष लम्बा किसान आंदोलन चला। बिजौलिया के किसानों ने विजयसिंह को इस आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण करने के लिये आमंत्रित किया।

    1916 के अंतिम दिनों में विजयसिंह बिजौलिया पहुँचे तथा वहाँ उन्होंने सेवा समिति स्कूल, पुस्तकालय और अखाड़े की स्थापना की। विजयसिंह के अनुरोध पर माणिक्यलाल वर्मा ने ठिकाने की नौकरी को त्याग दिया और किसानों के लिये काम करना आरंभ किया। पथिक जी ने पत्रकारिता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्होंने 1921 में वर्धा से राजस्थान संघ के माध्यम से 'राजस्थान केसरी' और 1922 में अजमेर से राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से 'राजस्थान' निकालना आरंभ किया।

    1928 में जेल से छूटने के बाद पथिकजी ने 'राजस्थान संदेश' निकाला। 1939-40 में पथिकजी ने आगरा से 'नव संदेश' निकाला। राजपूताना, गुजरात तथा मध्य भारत की देशी रियासतों में इन समाचार पत्रों का ग्राहक बनने वालों को एक साल की सजा दी जाती थी। पथिकजी द्वारा लिखित लगभग 30 पुस्तकें अब तक प्रकाश में आ चुकी हैं। आजादी के साथ ही पथिकजी का कांग्रेस से मोह भंग हो गया। 1952 में पथिकजी ने माण्डलगढ़ विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। बिजौलिया क्षेत्र इसी विधानसभा क्षेत्र में आता था जहाँ पथिकजी ने अपना अधिकांश जीवन व्यतीत किया था।

    कांग्रेस ने माणिक्यलाल वर्मा के साले गणपति लाल वर्मा को खड़ा किया। इन दोनों के सामने जागीरदारों ने भी अपना प्रत्याशी खड़ा किया। किसानों के वोट वर्माजी के साले एवं पथिकजी में विभक्त हो गये और जागीरदारों का प्रत्याशी जीत गया। 28 मई 1954 को लू लगने से पथिकजी का निधन हो गया। उन्होंने 1930 के आसपास एक विधवा शिक्षिका जानकी देवी से विवाह किया था जो 10 फरवरी 1994 को मथुरा में स्वर्गवासी हुई। विजयसिंह पथिक अच्छे कवि और गीतकार थे। तिरंगे झण्डे के बारे में लिखा गया उनका एक गीत इस प्रकार से है- झण्डा यह हर किले पर चढ़ेगा, इसका बल रोज दूना बढ़ेगा। तोप तलवार बेकार होंगे, सोने वाले भी बेदार होंगे। सब कहेंगे कि सर है कटाना, पर न झण्डा यह नीचे झुकाना। शांत हथियार होंगे हमारे, पर ये तोड़ेंगे आरे दुधारे।

    हरविलास शारदा (राय बहादुर)

    हर बिलास शारदा का जन्म 8 जून 1867 को अजमेर में हुआ। उनके पिता हरनारायण शारदा गर्वनमेंट कॉलेज अजमेर में पुस्तकालय अध्यक्ष थे। ई.1875 में जब स्वामी दयानंद सरस्वती अजमेर आये तब हरविलास अपने पिता के साथ स्वामीजी से मिला। पिता के प्रभाव से ही हर बिलास में पुस्तकों तथा आर्यसमाज के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ। इस लगाव के कारण वे अपने जीवनकाल में अजमेर के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के गणमान्य व्यक्तियों में स्थान पा गये।

    हरविलास ने अजमेर में डीएवी स्कूल की स्थापना की। ई.1921 में जब अजमेर-मेरवाड़ा में प्रशासनिक सुधार के लिये अश्वर्थ समिति का गठन हुआ तो हरविलास शारदा ने अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में सुधार लाने के लिये इस समिति को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया तथा उन्होंने अजमेर को फिर से यूनाइटेड प्रोविंस में सम्मिलित करने की मांग की। ई.1924 में जब अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा का सदस्य बनाया गया। इस पद के लिये पहले प्रतिनिधि के रूप में हर बिलास शारदा को चुना गया।

    ई.1924 से 1930 के मध्य वे तीन बार अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में कुल ग्यारह वर्ष तक केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य रहे। ई.1925 में उन्होंने केन्द्रीय विधान सभा में भाषण देकर मांग की कि अजमेर-मेरवाड़ा के लिये विधान परिषद गठित की जाये। ई.1925 में उन्होंने बरेली में आयोजित अखिल भारतीय वैश्य सम्मेलन की अध्यक्षता की। ई.1927 में उन्होंने केन्द्रीय विधान सभा में बालविवाह निरोधक बिल प्रस्तुत किया।

    इस विधेयक के समर्थन में शारदा ने 15 सितम्ब्र 1927 को भावोत्पादक तथ्यांे सहित एक ओजपूर्ण भाषण दिया। इस एक्ट ने पूरे देश के स्त्री समाज में हलचल पैदा कर दी थी। देश के लगभग हर कौने में इस एक्ट के समर्थन में स्त्रियों ने प्रदर्शन किये। 28 सितम्बर 1929 को यह विधेयक पारित हुआ। इस विधेयक को आज तक शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है। महादेव गोविंद रानाडे ने द्वारा स्थापित राष्ट्रीय समाज सुधार समिति के ई.1929 के लाहौर सम्मेलन की अध्यक्षता हरविलास शारदा ने की।

    ई.1930 में भारत सरकार ने शारदा को प्राथमिक शिक्षा समिति का सदस्य मनोनीत किया। ई.1930 में जब साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो हर बिलास बहुत खिन्न हुए। इस आयोग द्वारा सिफारिश की गई थी कि अब तक अजमेर-मेरवाड़ा से केन्द्रीय विधान सभा में जो प्रतिनिधि चुनकर जाता था, आगे से वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जायेगा। शारदा ने साइमन आयोग की सिफारिशों की तीव्र भर्त्सना की। वे राष्ट्रवादी दल के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। ई.1932 में वे उसके उपनेता बन गये। हर बिलास शारदा केन्द्र सरकार तथा अजमेर सरकार द्वारा समय-समय पर गठित की गई बहुत सी समितियों के सदस्य रहे। वे आजीवन अजमेर-मेरवाड़ा में प्रशासनिक सुधारों के लिये काम करते रहे।

    ई.1932 में भारत सरकार के सचिव लतीफ के अनुरोध पर हर बिलास शारदा ने एक नोट तैया किया तथा 12 मई 1932 को वह नोट भारत सरकार की सलाहकार समिति के सम्मुख रखा। जमनालाल बजाज, हर विलास शारदा के अच्छे मित्रों में थे। बजाज जब भी अजमेर आते तो शारदा के घर ही भोजन करते थे। शारदा से उनका नियमित पत्राचार भी था। शारदा ने इतिहास पर कई पुस्तकें लिखीं जिनमें हिन्दू सुपीरियोरिटी, अजमेर हिस्टॉरिकल एण्ड डिस्क्रिप्टिव, महाराणा सांगा, हमीर ऑफ रणथंभौर, वर्क्स ऑफ महर्षि दयानंद सरस्वती एण्ड परोपकारिणी सभा, महाराणा कुंभा, शंकराचार्य एण्ड दयानंद, लाइफ ऑफ विरजानंद सरस्वती आदि अधिक प्रसिद्ध है। 20 जून 1955 को अजमेर में अनका निधन हुआ।

    हरिभाऊ उपाध्याय (पद्मविभूषण)

    हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म 9 मार्च 1892 को ग्वालियर राज्य के भौंरासा गाँव में हुआ था। उनके पिता पटवारी थे। हरिभाऊ ने वाराणसी के कामाख्या हिन्दू कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। ई.1911-12 में वे पत्रकारिता से जुडे। ई.1923 में वे गांधीजी के सचिव बने। गांधीजी के बंदी बनाये जाने पर हरिभाऊ ने नवजीवन का सम्पादन किया। ई.1926 में हरिभाऊ अजमेर आ गये। अजमेर में गांधी युग का सूत्रपात करने का श्रेय हरिभाऊ को ही प्राप्त है।

    1 अप्रेल 1927 को हरिभाऊ ने हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना की। हरिभाऊ ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल का काम आरम्भ किया। इस संस्था की स्थापना घनश्यामदास बिड़ला एवं जमनालाल बजाज के सहयोग से हुई थी। इस संस्था के माध्यम से हिन्दी भाषा में अनके श्रेष्ठ ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। मण्डल की ओर से त्यागभूमि नामक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया गया। अजमेर में आने के बाद उपाध्यायजी का कार्यक्षेत्र साहित्य सृजन एवं पत्रकारिता से हटकर राजनीति अधिक हो गया।

    ई.1930 में नमक आंदोलन में भाग लेने के कारण वे पहली बार जेल गये। इसके बाद उन्हें जेल जाना पड़ा। जेल में निवास करने के दौरान आपका साहित्य सृजन चलता रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ई.1952 में हरिभाऊ उपाध्याय अजमेर राज्य के मुख्यमंत्री बने। जब अजमेर का राजस्थान में विलय हो गया तब भी वे ई.1956 से लगभग 10 वर्ष तक मंत्रिमण्डल के सदस्य बने रहे। वे राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के कुलपति भी रहे। उन्होंने महिला शिक्षा सदन हटूण्डी, गांधी आश्रम हटूंडी तथा गांधी सेवा संघ की स्थापना की।

    हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा 21 पुस्तकों की रचना और लगभग 24 ग्रंथों का अनुवाद किया गया। साहित्य सेवा के लिये उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए। केन्द्र सरकार ने हरिभाऊ को पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 25 अगस्त 1972 को अजमेर में उनका निधन हुआ।

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  • सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

     02.06.2020
     सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

    सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी) 

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    कमल बाबू ने लोहे का गेट खोलकर घर में प्रवेश करते हुए देखा, सेमल का पेड़ आज भी कौने में प्रहरी की तरह खड़ा हुआ है, ठीक उसी तरह जिस तरह आज से चौबीस साल पहले कमल बाबू ने आखिरी बार उसे यहाँ खड़े हुए देखा था। प्रहरी शब्द कमल बाबू को दुविधा में डाल देता है। किसका प्रहरी है यह! घर का! या उसमें रहने वालों का! संभवतः दोनों का ही नहीं। वह तो समय का प्रहरी है। बीतने वाले एक-एक पल का प्रहरी। जब भी एक प्रहर बीतता है सेमल का वृक्ष आकाश रूपी चौड़े थाल पर अपनी टहनियों से आघात करता है। हवा का एक झौंका उद्वेलित होता है और उसी के साथ पूरा वृक्ष सम्पूर्ण शक्ति से झूमने लगता है मानो किसी हठी योगी के योगासन की एक मुद्रा पूरी हो गयी हो और अब दूसरी मुद्रा में जाने का समय हो गया हो।

    घर के किसी सदस्य को पता तक नहीं चलता कि समय बीत रहा है और बाहर खड़ा हुआ सेमल का पेड़ बीतते हुए हर पल की घोषणा कर रहा है। जाने क्यों सेमल का पेड़ घर के सदस्यों की अनवरत उदासीनता से अप्रभावित रहकर मौन योगी की तरह साधना में संलग्न है! वह अकेला ही समय की उस उदास गूंज को अनुभव करता है जिसने पिछले पिचहत्तर सालों में इस घर को इतना बदल दिया है कि घर का हर हिस्सा बदला हुआ दिखाई देने लगा है।

    समय की गति है भी तो कितनी मंथर! कभी लगता ही नहीं कि समय चल रहा है किंतु इस मंथर गति की मार कितनी तेज है! जिसके चलते सभी कुछ तेजी से बदल जाता है। लगता है मानो पलक झपकी और दृश्य गायब। प्रायः हर बदलाव की कसक भी सेमल के पेड़ को बरसों तक बनी रहती है किंतु बदलाव से बेपरवाह घर के सदस्य सेमल के पेड़ की इस कसक को अनुभव तक नहीं कर पाते।

    कमल बाबू को आज भी अच्छी तरह याद है कि सर्दियां आने से ठीक पहले कैसे पूरा पेड़ अपने पत्तों को त्याग कर नागा साधु का रूप धारण कर लेता। सुबह उठने पर पूरा लॉन पीले कत्थई पत्तों से भरा हुआ मिलता। नानी जब जिंदा थीं तो उनका दिन इन्हीं पत्तों को बुहारने से आरंभ होता था। कमल बाबू जब नानी को पेड़ के नीचे पत्ते बुहारते देखते तो वे स्वयं भी नानी का हाथ बंटाने लगते।

    जब तक तेज सर्दियां शुरू होतीं तब तक सारे पत्ते झर जाते और पूरा पेड़ लाल अंगारों जैसे दिखने वाले बड़े-बड़े फूलों से भर जाता। मानो किसी हठी नागा साधु ने वस्त्र त्यागकर गांजे की चिलम के अंगारों को पूरे दम से फूंका हो। कुछ दिन और बीतते तो अमिया जैसी छोटी-छोटी फलियां शाखाओं पर दिखने लगतीं। होली के आने तक फूल पूरी तरह बुझ गयी चिलम के अंगारों की तरह अदृश्य हो जाते और अप्रेल की हलकी गर्मी में रुई की फलियां पूरे वैभव के साथ शाखाओं पर बैठकर चहकने लगतीं।

    ठीक ये ही वो दिन होते थे जब छोटी नानी सेमल के पेड़ के आस पास दिखायी देने लगती थीं। तेज गर्मियों के साथ रुई की फलियां फटने को होतीं और उनमें से नागा साधु के चिलम की ठण्डी हो चुकी राख जैसी सफेद रुई बाहर झांकने लगती। अब तो छोटी नानी की उपस्थिति सेमल के पास और अधिक बढ़ जाती। बड़ी जल्दी उठकर लम्बे बांस की सहायता से वे रुई की फलियांे को नीचे गिरातीं और टोकरी में जमा कर लेतीं। इतने भर से उन्हें संतोष न होता। पूरी दुपहरी वे सेमल के पेड़ के नीचे थोड़ी-थोड़ी देर में चक्कर लगाती रहतीं ताकि तेज हवा के चलने से नीचे टपकी रुई की फलियों को टोकरी में डाला जा सके।

    छोटी नानी अर्थात् नानी की विधवा देवरानी का मानना था कि इस घर में उनका आधा हिस्सा था। छोटी नानी की दृष्टि में वैसे तो उनका हिस्सा आधे से अधिक बनता था क्योंकि वे अपनी इस जेठानी से भी पहले इस घर में आयी थीं और इस नाते जेठानी के अधिकार, जेठ की पत्नी के नहीं बल्कि उनके अपने पास होने चाहिये थे।

    सेमल का यह पेड़ गवाह है कि समय भी कितना क्रूर होता है। वह आदमी के साथ कैसी निर्ममता से व्यवहार करता है। कमल बाबू की मां के बाबा अर्थात् सुखानंद ने इस पेड़ को एक नन्हे से पौधे के रूप में यहां लाकर लगाया था। उस दिन से वह इस घर में घटने वाली हर घटना का मूक साक्षी हो गया था। सुखानंद वास्तव में सुखानंद थे। उनके चारों ओर हर समय आनंद बरसा करता था। लगता था दुःख तो जैसे सदासुखी सुखानंद के निकट नहीं फटक सकता था।

    कहते हैं कि समय को आँख बदलते समय नहीं लगता। समय ने सुखानंद के साथ भी क्रूर खेल खेला। उनके दो पुत्रों में से बड़े पुत्र की पत्नी दो बच्चों को जन्म देकर काल के गाल में समा गयी तो छोटा पुत्र भी दो बच्चों के जन्म के बाद परमात्मा को प्राप्त हुआ। सुखानंद ने समय के इस क्रूर दण्ड को बड़े धैर्य से अपने सीने पर झेला था। किसी तरह भाग दौड़ करके बड़े बेटे का तो उन्होंने दूसरा विवाह करवा दिया किंतु आर्य समाजी विचारों का होने के बावजूद अपनी छोटी बहू के लिये वे कुछ प्रबंध नहीं कर सके। उसे पूरा जीवन इसी घर में विधवा औरत के रूप में व्यतीत करना था।

    'छोटी बहू' अर्थात् दुनिया भर की कर्कशा, कुरूपा, निरक्षरा, हठी और दो बच्चों की विधवा मां का संसार में किसी चीज से कोई साम्य नहीं था। पता नहीं पूर्व जन्मों के किन संस्कारों के कारण वह इस घर की बहू बनकर आ गयी थी और भाग्य की किस विडम्बना के कारण वैधव्य ने असमय ही उसका वरण कर लिया था! सुखानंद ने अपने जीवन भर की कमाई झौंककर अपने दोनों लड़कों के लिये दो भव्य मकान बनवाये थे किंतु जब छोटे पुत्र की असमय मृत्यु हो गयी तो उन्होंने छोटी बहू को भी उसी मकान में रहने के लिये बुला लिया था जिसमें वे अपने बड़े पुत्र के साथ रहते थे। समय पाकर सुखानंद तो दुनिया से चले गये किंतु छोटी बहू अपने दोनों बच्चों के साथ जेठ के ही मकान में रहती रही। वही छोटी बहू कमल बाबू की पीढ़ी के बच्चों के लिये छोटी दादी और छोटी नानी के रूप में जानी जाती थी।

    चूंकि सेमल का पेड़ सुखानंद ने लगाया था इस नाते सेमल के पेड़ पर भी नानी की विधवा देवरानी अर्थात् छोटी नानी का आधे का अधिकार था। इसी अधिकार से छोटी नानी पूरी गर्मियों में रूई इकट्ठी करतीं और आधी रुई साधिकार अपने पास रखकर, आधी रुई बड़ी नानी को दे देतीं। सहज संतोषी नानी उस रुई से तकिये भरतीं और गर्मी में आने वाली बहन बेटियों के लिये तकिये भर कर उन्हें भेंट कर देतीं। जब नानी किसी बहन बेटी को सेमल की रुई का नरम मुलायम तकिया भेंट करतीं तो उनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक होती। उनका संतोषी मन इस घर की बहन बेटियों को साड़ियां, स्वेटर, लड्डू, मठरियां और अचार के डिब्बे देने में जितने आनंद का अनुभव करता था उससे अधिक आनंद उन्हें सेमल के तकिये देते समय होता था।

    नानी इसे छोटी नानी का बड़प्पन मानती थीं कि उनकी कर्कशा, कुरूपा और मुंहफट देवरानी ने सेमल की रुई पर आधे का ही अधिकार मान रखा था अन्यथा घर के पिछवाड़े में छोटी नानी ने जो करौंदे, अमरूद और केले के पेड़ लगाये थे, उन पर छोटी नानी का ही स्वघोषित एकछत्र अधिकार था। इस नाते करौंदों को तोड़कर उनकी सॉस बनाने का अधिकार भी केवल छोटी नानी को था। यह अलग बात थी कि वे उस सॉस को अपनी जेठानी की बेटियों को उदारता पूर्वक भेंट किया करती थीं क्योंकि गर्मियों में पीहर आने वाली उनकी अपनी कोई बेटी नहीं थी। छोटी नानी के जीवन में केवल एक यही उदारता देखी थी कमल बाबू ने।

    उन दिनों घर कितनी चहल पहल से भरा हुआ रहता था। सारी बहन-बेटियां बच्चों को लेकर अपने पीहर आ जाती थीं। कमल बाबू भी उन्हीं दिनों अपनी मां के साथ ननिहाल आया करते थे। टिक्का मौसी अर्थात बड़ी मौसी, झब्बा मौसी अर्थात् मंझली मौसी और संतरा मौसी अर्थात् छोटी मौसी, उन सबके बच्चे, फिर मामाओं के बच्चे, पूरे घर में धमाल रहती। नानी दोपहरी में जलेबी और समोसे मंगवातीं तो पूरा घर बच्चों के झगड़े से गूंज उठता। शोर घर से बाहर निकल कर सेमल के पेड़ तक जा पहुंचता। नानी बड़ी तसल्ली से उनके झगड़े सुलझातीं। वे हर बच्चे की शिकायत को धैर्य पूर्वक सुनतीं और उसे तब तक मिठाई देती रहतीं जब तक कि वह बच्चा संतुष्ट नहीं हो जाता किंतु छोटी नानी इन झगड़ों में अम्पायर की भूमिका निभातीं। कभी इस बच्चे को लाल कार्ड दिखाकर मैदान से बाहर किया तो कभी उस बच्चे पर पैनल्टी ठोकी। बच्चे भी जलेबी देने वाली नानी के स्थान पर अम्पायर की भूमिका निभाने वाली छोटी नानी का रौब अधिक मानते।

    टिक्का मौसी, झब्बा मौसी और संतरा मौसी भी जलेबी और समोसों के लिये होने वाले इन झगड़ों में बराबर की भागीदारी निभातीं। सबसे छोटे दोनों मामा अर्थात् किन्नू मामा और गब्बू मामा भी इन झगड़ों में पूरा कौशल दिखाते किंतु कमल बाबू की माँ जिन्हें दूसरी मौसियों के बच्चे गुल्ला मौसी कहते थे, घर की सबसे बड़ी सदस्य होने के कारण इस झगड़े से दूर खड़ी रहकर तमाशा देखतीं। संभवतः कमल को भी जलेबियों के लिये झगड़ने की बजाय शांत खड़े रहकर तमाशा देखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली थी।

    क्यों रे कमल, तू कभी जलेबी के लिये झगड़ा नहीं करता। तू दूसरे बच्चों से अलग है क्या! छोटी नानी, दूसरे बच्चों से अलग खड़े कमल को उलाहना देतीं। देख तो यह निरमल लड़-झगड़ कर अपनी नानी से कितनी सारी जलेबी ले गया! जवाब में कमल बाबू मुस्कुराते भर। छोटी नानी को इस बात पर बड़ी नाराजगी थी कि छोटे से कमल ने कभी उनसे दूसरे बच्चों की शिकायत नहीं की और न ही अपने लिये अधिक मिठाई की मांग रखी।

    कमल बाबू का ध्यान अपने लिये अधिक मिठाई झपटने में नहीं बल्कि अपनी ही उम्र के दूसरे बच्चों द्वारा अधिक मिठाई पाने के लिये अपनाई गयी तरकीबों को देखने में अधिक रहता था। उन्हें आश्चर्य होता कि सबसे छोटा नीटू कैसे दूसरे बच्चों की बजाय हर बार नानी को चकमा देकर दो बार जलेबी पाने में सफल हो जाता था और कैसे फिर छोटी नानी उसकी चोरी पकड़ कर उससे जलेबियां छीनने के लिये उसके पीछे दौड़ती थी ताकि दूसरे बच्चों की शिकायत दूर की जा सके।

    गर्मियां आतीं और चली जातीं। उनके साथ ही खत्म हो जातीं गर्मियों की छुट्टियां। सारी बहन-बेटियां भी एक-एक करके घर से विदा लेतीं। हर बहन-बेटी के सामान में लड्डू, मठरी और अचार के साथ-साथ सेमल का एक तकिया अवश्य बढ़ जाता था।

    उधर सेमल का पेड़ प्रहर पर प्रहर बदलने की सूचना देता रहा और इधर नानी के बालों की सफेदी और चेहरे की झुर्रियां बढ़ती रहीं। धीरे-धीरे मौसियों के बाल भी पकने लगे थे। कुछ मौसियां तो हर साल आने की बजाय दो साल में आने लगी थीं। उनके साथ आने वाले बच्चों की संख्या भी घटने लगी थी। कुछ बच्चे बड़ी कक्षाओं में आने के कारण और कुछ अपने काम धंधों में लग जाने के कारण ननिहाल कम ही आ पाते थे। बाद के बरसों में स्वयं कमल बाबू भी तो कितना कम आ पाते थे। हां इतना अंतर अवश्य आ गया था कि घर में मामाओं के बच्चों की संख्या बढ़ गयी थी।

    कमल बाबू उन दिनों नौकरी के सिलसिले में शिमला में थे जब उन्हें तार मिला कि नाना नहीं रहे। तार पढ़ते ही कमल बाबू की आंखों के सामने नाना के स्थान पर सेमल का पेड़ तैर गया था। वे बार-बार मन को स्थिर करते कि नाना नहीं रहे किंतु जाने क्यों हर बार उन्हें यही लगता कि सेमल का पेड़ नहीं रहा। कमल बाबू एक दिन के लिये ननिहाल आये थे। सेमल का पेड़ उसी तरह मौन योगी की तरह खड़ा था। पूरी तरह रुई से लदा हुआ। छोटी नानी की टोकरी तब भी पेड़ के नीचे रखी थी।

    नानी के बाल और सफेद हो गये थे। मानो सेमल की रुई ने उन्हें अपना रंग दे दिया हो। घर में सारी मौसियां दिखायी दी थीं कमल बाबू को किंतु उनके बच्चों में से कोई नहीं था। कोई अपने पोते के साथ आयी थी तो कोई बूढ़े हो चले मौसा के साथ। कुल एक दिन रुके थे कमल बाबू। वापसी के समय उन्होंने क्षण भर के लिये ठहर कर सेमल के पेड़ को देखा था। अब उसकी ऊँचाई और अधिक हो चली थी। लगता था जैसे आकाश में कहीं गहरे तक जा धंसा है।

    सात आठ साल तक कमल बाबू का ननिहाल आना नहीं हुआ। एक दिन अचानक उन्हें फोन से सूचना मिली कि नानी नहीं रहीं। कमल बाबू को लगा कि धड़ाम की आवाज हुई और सेमल का पेड़ नीचे गिर पड़ा। उन्होंने चौंक कर अपने आस पास देखा। कहीं कुछ नहीं गिरा था। किसी चीज के गिरने की आवाज नहीं हुई थी। कमल बाबू का जाना नहीं हो सका। नानी को उन्होंने मन ही मन वहीं श्रद्धांजलि दी और फिर से नौकरी में रम गये। कमल बाबू की मां अपने बड़े पोते को लेकर अपने पीहर गयीं। उसके बाद कमल बाबू का ननिहाल जाना हुआ ही नहीं। बरसों बीत गये। जाने सेमल का पेड़ रहा भी होगा कि नहीं, कमल बाबू प्रायः सोचते।

    आज पूरे चौबीस साल बाद जब इस शहर में किसी काम से आना हुआ तो कमल बाबू की इच्छा हुई कि ननिहाल का चक्कर लगाया जाये। नाना तो नहीं रहे। नानी भी नहीं रहीं। मौसियों का आना तो नाना-नानी के समय ही कम हो गया था। फिर भी कोई न कोई मामा, कोई न कोई मामी अवश्य मिल जायेंगे।

    संध्या के झुरमुटे में गेट खोलते ही उनकी दृष्टि सेमल के पेड़ पर गयी। वह आज भी हठी योगी की तरह उसी तरह प्रहरी के रूप में विद्यमान था। नीचे लॉन में पत्तों की रेलमपेल मची हुई थी। निश्चित ही था कि नानी का स्थान घर की किसी औरत ने नहीं लिया था जिसके दिन की शुरूआत इन पत्तों को बुहारने से हो। अंधेरे में कमल बाबू यह तो नहीं देख पाये कि लाल अंगारों वाले फूल शाखाओं पर आ बैठे हैं कि नहीं किंतु उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि वे अवश्य ही वहां उपस्थित हैं। उन्हें लगा कि घर के भीतर जाने से कोई लाभ नहीं, जिस काम के लिये आये थे वह तो हो गया है।

    लौट जाने के लिये उन्होंने गेट बंद करना चाहा, ठीक उसी समय किसी ने अंदर से आवाज लगायी- ''कौन है।''

    कमल बाबू की जीभ मानो तालु से चिपक गयी। क्या जवाब दें वे! क्या सवाल करने वाला जान जायेगा कि गेट पर कौन है!

    - ''कौन है गेट पर!'' फिर से आवाज आयी।

    - ''मैं कोई नहीं।'' कमल बाबू के मुंह से बरबस निकला और वे सेमल के पेड़ की तरफ पीठ करके आगे बढ़ गये।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-29

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-29

    राजस्थान में जल चेतना (3)


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    कूप निर्माण


    कुंआ खोदकर भू-गर्भ में स्थित जल प्राप्त करने की कला हजारों साल पुरानी है। सदियों के अनुभव से राजस्थान में कूप निर्माण का एक पूरा विज्ञान ही विकसित हो गया। राजस्थान में कूप निर्माण परम्परा की कुछ जानकारी लेना उचित होगा-

    बेरी (कुइयाँ) : भू-गर्भीय जल तीन तरह की गहराइयों में उपलब्ध होता है। वर्षा के बाद होने वाले जल रिसाव से, नदियों एवं नहरों के प्रवाह क्षेत्र में होने वाले जल रिसाव से तथा तालाबों एवं झीलों आदि के किनारे की भूमि में होने वाले जल रिसाव से जल की अल्प मात्रा, भूमि में प्रवेश करती रहती है। यह जल पहले स्तर पर जमा होता है। इस स्तर पर चूना पत्थर अथवा अन्य पत्थरों की कठोर पर्त होती है जिसके कारण यह जल और नीचे नहीं जा पाता। यह जल सीमित मात्रा में होता है। इस जल को प्राप्त करने के लिये बीस से चालीस हाथ गहरे, अर्थात् कम गहराई के कुंए की आवश्यकता होती है। इन्हें बेरी तथा कुइयाँ कहते हैं। बरसाती नदियों के किनारे बनी कुइयों का पानी प्रायः पूरे साल नहीं चल पाता किंतु जैसे ही वर्षा काल में कुछ दिन नदी चलती है तो ये कुइयाँ फिर से जल देने लगती हैं। बेरियों के पानी को 'कच्चा पाणी' कहा जाता है। गंग नहर तथा इंदिरा गांधी नहर के निकट स्थित खेतों में इस प्रकार की कुइयाँ आज भी प्रचलन में हैं। बरसााती नदियों के किनारे भी इस प्रकार की कुइयाँ खोदी जाती थीं किंतु यह प्रथा अब बंद हो गई है क्योंकि बरसाती नदियां अब बहुत ही कम दिनों के लिये प्रवाहित होती हैं।

    बेरा (कुआं) : प्रथम स्तर पर जमा पानी, दीर्घ काल तक पड़े रहने की स्थिति में, चूने पत्थर की पर्त में बने रंध्रों में से होकर, गुरुत्वाकर्षण बल के कारण कुछ और गहराई में चला जाता है। इसे दूसरा स्तर कहते हैं। जब धरती का निर्माण हुआ तब भू-गर्भ में कई स्थानों पर छोटे-छोटे पॉकेट्स में पानी जमा हो गया। वह भी इसी द्वितीय स्तर पर जमा रहता है। भूकम्प आदि के समय भी समुद्रों, नदियों एवं झीलों आदि का जल भू-गर्भ में प्रवेश कर इसी दूसरे स्तर तक पहुंच जाता है। इस जल को प्राप्त करने के लिये मध्यम गहराई के कुंए खोदने पड़ते हैं। प्रायः इस स्तर तक खोदे गये कुएं अपेक्षाकृत लम्बे समय तक चलते हैं किंतु इस स्तर पर उपलब्ध 'पॉकेट' का जल के समाप्त होते ही ये कुएं भी सूख जाते हैं। इन कुओं के पानी को पक्का पाणी या भाकल कहा जाता है।

    पाताल तोड़ कुआं : भू निर्माण की प्रक्रिया में धरती पर भयानक उथल-पुथल हुई जिसके कारण भू-पर्पटी पर स्थित पानी बहुत भारी मात्रा में धरती की काफी गहराई में बंद हो गया। इसे तीसरा स्तर कहते हैं। इस पानी की छोटी-छोटी धाराएं दूर-दूर तक की पॉकेट्स से जुड़ी हुई होती हैं। जब कुओं को इस तीसरे स्तर 'थर्ड एक्वीफर' तक खोदा जाता है तो उसे स्थानीय भाषा में पाताल तोड़ कुआं अथवा सागरी कुआं कहा जाता है। राजस्थान में जो गांव आज से कई सौ साल पुराने बसे हुए हैं, उनमें प्रायः सागरी कुएं अथवा पाताल तोड़ कुएं बने हुए हैं जिनका पानी कभी समाप्त नहीं होता है। अधिकांश गांवों में मान्यता है कि राजा सगर अथवा राजा सागर ने इन कुओं को बनवाया था। इसलिये ये पाताल तोड़कर सागर के तल तक गहरे खुदे हुए हैं। कई गांवों में इन कुओं के बारे में यह भी कहा जाता है कि इन्हें किसी लक्खी बणजारे ने खुदवाया था।

    बावड़ी : सीढ़ीदार कुओं को बावड़ी कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में इसे वापिका, वापी, कर्कन्धु तथा शकन्धु भी कहा गया है। पश्चिमी राजस्थान में इस तरह के कुएं खोदने की परम्परा ईसा की पहली शताब्दी के लगभग, शक जाति अपने साथ लेकर आई थी। मण्डोर एवं भीनमाल में आज भी 700-800 ईस्वी में बनी एक-एक प्राचीन बावड़ी स्थित है। प्राचीन काल में अथवा मध्यकाल में बनी बावड़ियों के चारों ओर, कई मंजिल में कलात्मक पक्का निर्माण देखने को मिलता है। कुछ बावड़ियों में तो बड़ी संख्या में सेना को छिपाने के लिये कक्ष बने होते थे जिनमें सेना कई महीनों तक छिप कर रह सकती थी।


    विभिन्न जलाशयों एवं जल संरचनाओं का निर्माण

    तालाब

    समतल भूमि पर विशाल गड्ढेनुमा स्थल, जिसमें वर्षा का स्वच्छ जल संग्रहीत किया जाता है, तालाब कहलाता है। इसे पक्की बनावट तथा पत्थर की चिनाई से मजबूत किया जाता है तथा तालाब में उतर कर जल भरने के लिये सीढ़ियां, दरवाजे, मेहराबें अथवा चाप बनाये जाते हैं। तालाबों की सुरक्षा के लिये कई तरह के उपाय किये जाते हैं। उनके तट पर पीपल, बरगद एवं गूलर के पेड़ लगाये जाते हैं। इन वृक्षों पर भांति-भांति के पक्षी आकर बैठते हैं जो आस-पास के क्षेत्रों से कीड़े-मकोड़े खाकर क्षेत्र को पूरी तरह साफ कर देते हैं। तालाब के पानी को साफ बनाये रखने के लिये उनमें मछली, कछुए, केकड़े छोड़े जाते हैं। बड़े तालाबों में मगरमच्छ भी छोड़े जाते हैं। तालाब के जल में ऑक्सीजन की मात्रा को बनाये रखने के लिये उसमें कमल, सिंघाड़े, कमलिनी, कुमुदनी, चाक्षुष, निर्मली आदि वनस्पतियां लगाई जाती हैं। जिन दिनों में तालाब में पानी कम होता है, उन दिनों गांव के लोग मिलकर तालाब के तल में जमा हो गई अतिरिक्त मिट्टी को निकालते हैं। इस कार्य को साद निकालना कहते हैं। इस साद को खेतों में खाद की तरह काम लिया जाता है। इसे बेचने से जो धन प्राप्त होता है, उससे तालाब की मरम्मत की जाती है।

    जोहड़

    जोहड़ और तालाब में कोई अंतर नहीं होता। कुछ क्षेत्रों में गांव के बाहर अथवा जंगल में स्थित तालाब को जोहड़ कहते हैं जबकि शेखावाटी क्षेत्र में किसी भी तालाब को जोहड़ कहते हैं।

    नाड़ी (नाडी)

    यह एक प्रकार का छोटा तालाब अथवा तलैया होती है जिसमें वर्षा का जल भर जाता है। यह जल स्थानीय निवासियों एवं पशु-पक्षियों की जल सम्बन्धी आवश्यकताओं की पांच से सात महीने तक पूर्ति करता है। जब यह सूख जाती है तो गांव के लोग मिलकर इसकी सफाई करते हैं तथा इसके चारों ओर की भूमि को समतल बनाकर आगौर की मरम्मत करते हैं।

    तालर

    जिस भूमि पर पानी जमा होता है तथा लम्बे समय तक पड़ा रहता है, उस भूमि को तालर कहते हैं। यह पानी भी पशुओं एवं खेती के काम आता है।

    नेहटा (नेष्टा)

    नाडी अथवा तालाब से अतिरिक्त जल की निकासी के लिये उनके साथ नेहटा बनाया जाता है जिससे होकर अतिरिक्त जल निकट स्थित दूसरी नाडी, तालाब या खेत में चला जाये।

    मदार

    नाडी या तालाब में जल आने के लिये निर्धारित की गई धरती की सीमा को मदार कहते हैं। मदार की सीमा में मल-मूत्र का त्याग वर्जित होता है।

    आगौर

    वर्षा जल को तालाब, नाडी या टांके में उतारने के लिये उसके चारों ओर की मिट्टी को समतल करके आगौर बनाया जाता है। आगौर क्षेत्र में मल-मूत्र का त्यागना, थूकना, जूते पहनकर जाना निषिद्ध होता है। वर्षा आरम्भ होने से पहले, आगौर की सफाई की जाती है। गांव के सामुदायिक तालाबों एवं उनके आगौरों की सफाई सामूहिक रूप से की जाती है जिसमें गांव के हर घर से स्त्री-पुरुष एवं बच्चे आकर आगौर क्षेत्र में पड़े पशुओं के शव, हड्डियां एवं अन्य गंदगी, पत्थर आदि निकालते हैं एवं आगौर क्षेत्र की मरम्मत की जाती है। अब यह परम्परा बंद होती जा रही है तथा यह कार्य अकाल राहत कार्यों एवं नरेगा के तहत किया जाता है।

    टांका

    वर्षा जल एकत्रित करने के लिये बनाये गये पक्के हौद को टांका कहते हैं। खेतों में बनाये टांके में जल एकत्र करने के लिये इनके चारों ओर आगौर बनाया जाता है। वर्षा आने से पहले टांकों की सफाई करके, उनके तल एवं भीतरी दीवारों पर चूना पोता जाता है। पक्के मकानों में टांकों का सम्बन्ध पाइप लाइन के माध्यम से, वर्षा काल में छत से बहकर आने वाले पानी से किया जाता है।

    डिग्गी

    श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, अनूपगढ़ तथा हनुमानगढ़ आदि क्षेत्रों में नहर के पानी का भण्डारण करने के लिये गांवों में में डिग्गी बनाई जाती है। जब नहर चलती है तो डिग्गी को भर लिया जाता है। जिन दिनों में नहर का प्रवाह बंद होता है, उन दिनों में गांव की पानी सम्बन्धी आवश्यकताएं इसी डिग्गी से पूरी होती हैं।

    खेली

    कुओं के निकट पशुओं को जल सुलभ कराने के लिये खेली बनाने का प्रचलन सदियों से रहा है। खेली एक छोटी हौदी होती है। कुएं की जगत पर मटका भरने वाली स्त्रियां प्रायः कुछ पानी खींचकर इस खेली में डाल देती हैं जो पशुओं लिये उपलब्ध रहता है। आज भी गावों में जीएलआर तथा हैण्ड पम्प के पास खेली बनाने की परम्परा है जिनमें, जीएलआर तथा हैण्डपम्प से बहकर आने वाला अतिरिक्त जल पशुओं के निमित्त जमा होता है।


    राजस्थान में जल बचाने की संस्कृति

    राजस्थान की जीवन शैली में जल की बचत अनिवार्य तत्व है। भोजन के समय दायां हाथ ही काम में लेने की परम्परा रही है ताकि बांया हाथ केवल पानी के लोटे के लिये काम में लिया जाये और उसे झूठे हाथ से न छूना पड़े। हर व्यक्ति को अलग गिलास में जल न देकर बाल्टी में लोटा डालकर या रामझारे से जल पिलाया जाता था। बरतन को मुंह से लगाकर पानी नहीं पिया जाता था अपितु ऊपर से पानी पिया जाता था ताकि बरतन को बार-बार न मांजना पड़े। इससे पानी की बचत हेाती है। बरतनों को सूखी एवं साफ रेत या राख से मांजने के बाद कपड़े से पौंछकर साफ करने की परम्परा थी। इससे न केवल पानी अपितु पर्यावरण के लिये हानिकारक साबुन एवं क्लीनिंग पॉउडर की भी बचत होती थी। घर में रोज पानी से धुलाई न करके गीले कपड़े से पौंछा लगाने पर जोर दिया जाता था। मटकियों के नीचे बर्तन रखकर, मटकी में से टपकने वाले जल को एकत्रित किया जाता था। इस जल को बर्तन साफ करने, घर में पौंछा लगाने तथा पेड़-पौधे सींचने में काम लिया जाता था। पानी को व्यर्थ बहने से रोकने के लिये हर संभव उपाय किये जाते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 93

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 93

    उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में अजमेर नगर की जनसंख्या


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1818 में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर पर अधिकार किया, तब अजमेर नगर की जनसंख्या लगभग 24 हजार थी। अंग्रेजों का शासन हो जाने के बाद अजमेर नगर की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी। ई.1868 से ई.1870 के बीच अजमेर और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा जो 19 माह तक चला। इसे पचीसिया काल कहा जाता है। इस दुर्भिक्ष में अजमेर-मेरवाड़ा की 25 प्रतिशत जनसंख्या कम हो गई।

    यही कारण है कि ई.1837 से ई.1872 की अवधि में अजमेर नगर की जनसंख्या में केवल 3,137 की ही वृद्धि हुई। रेल आने के कारण ई.1875 से ई.1894 के बीच अजमेर की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। ई.1872 की तुलना में ई.1891 में अजमेर की जनसंख्या ढाई गुनी हो गई। बाहर से आने वालों में यूनाइटेड प्रोविंस के आगरा एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों के लोग सबसे अधिक थे।

    ई.1931 में हुई जनगणना के अनुसार अजमेर नगर की जनसंख्या 1,19,524 हो गई। इस जनगणना के समय अजमेर में 62 प्रतिशत हिन्दू, 33 प्रतिशत मुसलमान, 1.5 प्रतिशत यूरोपियन एवं एंगलोइण्डियन, 1.9 प्रतिशत भारतीय ईसाई रहते थे। इनके अतिरिक्त 270 सिक्ख, 240 पारसी तथा 49 अन्य धर्मों के अनुयायी भी रहते थे।

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  • युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - भूमिका

     02.06.2020
    युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - भूमिका

    जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    श्री भैरोंसिंह शेखावत का नाम मैंने, जीवन में पहली बार पिताजी के मुख से सुना। वे वर्ष 1977 की गर्मियों के दिन थे और लूओं ने पूरे वातावरण को झकझोर रखा था। देश का राजनीतिक वातावरण भी उन दिनों बहुत गर्म था जिसकी चर्चा प्रायः पिताजी घर में किया करते थे। उस समय मैं 15 साल का बालक था। शाम के समय कार्यालय से लौटने के पश्चात् पिताजी ने कहा था कि कल भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। इस पर मैंने बाल सुलभ जिज्ञासा से पूछा था, ये कैसे आदमी हैं? पिताजी ने हँसकर जवाब दिया था- जोरदार। राजस्थान सौभाग्यशाली है कि उसे जुझारू व्यक्ति मुख्यमंत्री के रूप में मिला। उसी दिन मैंने पिताजी के मुँह से भैरोंसिंह शेखावत के संघर्षमय जीवन की कुछ बातें सुनीं।

    श्री भैरोंसिंह शेखावत को निकट से देखने का अवसर वर्ष 1992 में आया जब मेरा चयन राजस्थान सरकार में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में हुआ। उस समय राज्य में श्री भैरोंसिंह शेखावतजी की दूसरी सरकार चल रही थी। मैंने निदेशालय में अपनी ज्यॉइनिंग की तिथि 16 दिसम्बर 1992 चुनी थी, उन दिनों भी देश का राजनीतिक वातावरण हलचलों से भरा हुआ था। मेरे ज्यॉनिंग से ठीक एक दिन पहले भैरोंसिंह शेखावत सरकार बर्खास्त हो गई।

    16 दिसम्बर 1992 को जब मैंने शासन सचिवालय परिसर में स्थित सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में अपनी ज्यॉनिंग दी तो पूरे सचिवालय में एक विचित्र सा भययुक्त वातावरण था। पूरा परिसर सुरक्षाकर्मियों की सीटियों एवं तेजी से आ-जा रही गाड़ियों के साइरनों से गूंज रहा था जिसे सुनकर मन में भय उत्पन्न होता था। बाद में ज्ञात हुआ कि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है इसलिये राज्यपाल डॉ. एम. चेन्नारेड्डी आने वाले हैं। वे अनुशासन पसंद व्यक्ति हैं इसलिये आज चारों ओर सख्ती है। यदि कोई व्यक्ति सचिवालय परिसर की सड़क पर अथवा गलियारे में दिखाई देता है तो उसे हटाने के लिये सुरक्षा कर्मी सीटियां बजा रहे हैं।

    शाम होते-होते ज्ञात हुआ कि सचिवालय में स्थित मंत्रियों के कक्षों से मनों-टनों कागज निकालकर बाहर किये गये हैं। ये वे कागज थे जिनमें प्रदेश के सुदूर अंचलों में निवास करने वाले करोड़ों लोगों की इच्छायें, अभिलाषायें, सपने और मजबूरियां लिखी हुई थीं। इन कागजों पर कार्यवाहियां होनी शेष थीं किंतु सरकार के चले जाने से अब ये कागज किसी काम के नहीं रह गये थे। नई सरकार के समक्ष जनआकांक्षाओं को फिर से अभिव्यक्त होने के लिये नये कागज लिखे जाने होंगे।

    उस दिन पहली बार मुझे आभास हुआ कि एक मुख्यमंत्री जो पूरी सरकार चलाता है, एक व्यक्ति नहीं होता, जन आकांक्षाओं, अभिलाषाओं और करोड़ों लोगों के हृदयों में पलने वाले सपनों का केन्द्र बिंदु होता है। वह चारों ओर से समस्याओं से घिरा हुआ होता है। हजारों व्यक्ति उससे प्रत्यक्षतः जुड़े हुए होते हैं, लाखों हाथ सदैव उसकी तरफ कोई न कोई कागज लेकर मण्डरा रहे होते हैं, करोड़ों आंखें उसे आशा भरी दृष्टि से देख रही होती हैं और उसका अपना निजी जीवन कुछ नहीं होता, कुछ भी नहीं।

    मन में एक पीड़ा सी हुई। मुझे आशा थी कि इस नई नियुक्ति में मुझे श्री भैंरोंसिंह शेखावत को निकट से देखने और संभवतः उनके साथ काम करने का भी अवसर मिलेगा किंतु उनकी सरकार बर्खास्त हो चुकी थी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग चुका था। निदेशालय से मेरी नियुक्ति जालोर जिले में कर दी गई और मैं कुछ दिन बाद जालोर चला गया। ठीक एक साल बाद 4 दिसम्बर 1993 को श्री भैरोंसिंह शेखावत ने राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई। मन में फिर से आस जगी कि अब मैं उन्हें आंखों से देख सकूंगा। हो सकता है कि मुझे उनके पास काम करने का अवसर भी मिले।

    इस प्रकार पहली बार वर्ष 1994 में मुझे श्री भैरोंसिंह शेखावत को अपनी आंखों से देखने का अवसर मिला जब वे जालोर जिले के दौरे पर आये और मुझे जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में उनकी यात्रा की प्रेस कवरेज करने का अवसर मिला। श्री शेखावत को देखकर मेरे मन में सबसे पहले यह विचार आया- ये तो ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि पिताजी ने वर्ष 1997 में इनके बारे में बताया था। एकदम सरल, सहज।

    मैं जून 1997 तक जालोर जिले में पदस्थापति रहा। इस बीच श्री भैरोंसिंह शेखावत ने मुख्यमंत्री के रूप में जालोर जिले की कई यात्राएं कीं और मुझे उनकी मीडिया कवरेज का सौभाग्य मिला। उनकी वक्तृत्व शैली से मैं बहुत प्रभावित हुआ। लगता ही नहीं था कि उनकी बातों को समझने के लिये किसी को अपने दिमाग पर जरा भी जोर देने की आवश्यकता है। सरल शब्द, सुलझी हुई बात, संक्षिप्त वाक्य और चुटीला अंदाज। उनके भाषणों को प्रेस नोट के रूप में लिखने में मुझे कभी कोई कठिनाई या उलझन नहीं हुई।

    इसी दौरान वर्ष 1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के लिये आम चुनाव होने तय हुए। लोकसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने से पहले श्री भैरोंसिंह शेखावत जालोर जिले की यात्रा पर आये। इस दौरान उन्होंने आहोर से लेकर जालोर, बागरा, भीनमाल तथा सांचोर आदि क्षेत्रों का सड़क मार्ग से दौरा किया। मैं, मीडिया कवरेज के लिये मुख्यमंत्री के काफिले में साथ रहा। इस यात्रा में मैंने उनका जो रूप देखा, वह मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को चक्कर में डाल देने के लिये पर्याप्त था। उनकी पूरी यात्रा बिना किसी तड़क-भड़क के, बिना किसी आडम्बर के और बिना किसी शोर-शराबे के रही। पूरी यात्रा के दौरान सड़क के दोनों तरफ सैंकड़ों लोग खड़े हुए दिखाई देते थे। मुख्यमंत्री उन्हें देखकर अपनी गाड़ी रुकवाते, उनसे हाथ मिलाते और यदि कोई माला लेकर खड़ा होता तो उसके हाथ से माला पहनते। शेखावाटी युक्त मारवाड़ी में उससे कुछ बात करते जिसमें प्रायः उस व्यक्ति का नाम भी होता था। मुझे आश्चर्य होता, एक व्यक्ति आखिर कितने नाम स्मरण रख सकता है। कई लोगों से वे गुटखा मांगते, अपने हाथ के गुटखे को दूसरों के साथ बांटकर खाते और आगे चल देते।

    मुझे इस बात पर और भी आश्चर्य होता, जब वे लोगों से उनका नाम लेकर उनकी गाय-भैंस और खेती के बारे में पूछते। उसके लड़के का नाम लेकर उसके रोजगार के बारे में पूछते और बाई ससुराल में कैसी है, की भी जानकारी लेते। इन बातों में कई पुराने संदर्भ भी होते थे। इस यात्रा में पहली बार मेरी समझ में आया कि मुख्यमंत्री के चारों ओर ओर लाखों हाथ कागज लेकर ही नहीं खड़े रहते अपितु पूरे प्रदेश में गांव-गांव में उसके लाखों मित्र भी रहते हैं। उसके चाहने वाले होते हैं और उसके लिये मंगल कामना करने वाले भी होते हैं।

    ई.1997 में जालोर जिले में साक्षरता कार्यक्रम चला। इस मिशन के लिये भैरोंसिंह शेखावत व्यक्तिगत रूप से चिंतित रहते थे। जब जालोर जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के समक्ष अपनी परियोजना प्रस्तुत की तो मैं भी उस दल में सम्मिलित था जिसने इस परियोजना का निर्माण करवाया था और जिस दल ने इसका प्रस्तुतिकरण दिल्ली में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के समक्ष किया था। जब राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने इस परियोजना को स्वीकृति दी तो मुख्यमंत्री की प्रसन्नता का पारावार न था। जालोर जिले में इसकी लांचिंग के लिये मुख्यमंत्री स्वयं आये। जिला कलक्टर राजेश्वरसिंह ने जिला मुख्यालय पर इस कार्यक्रम की लांचिंग के लिये विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया। उस समय तक मेरा स्थानांतरण नागौर हो चुका था। इसलिये जिला कलक्टर ने मुझे कार्यक्रम का संचालन करने के लिये जालोर बुलाया।

    मेरी याददाश्त में श्री भैरोंसिंह शेखावत के लिये संचालित किया गया यह मेरा पहला और अंतिम कार्यक्रम था। कार्यक्रम बहुत भव्य था। पूरा जिला ही जैसे इसमें उमड़ पड़ा था। मेरे और जिला कलक्टर के बीच पहले से ही तय हो गया था कि कार्यक्रम किस तरह संचालित किया जायेगा, कौन-कौन बोलेंगे और कब क्या होगा। सब कुछ उसी अनुरूप चला और अंत में मुख्यमंत्री बोलने के लिये उठ खड़े हुए। वे कोई चार-पांच मिनट बोले होंगे कि उनके माइक ने काम करना बंद कर दिया। बिजली आ रही थी किंतु माइक बंद हो गया था। किसी की कुछ समझ में नहीं आया। अब तक सब कुछ ठीक था और अब सब कुछ गुड़-गोबर होने जा रहा था। मेरा माइक काम कर रहा था। तीन-चार मिनट तो यह देखने में बीत गये कि माइक कहां से खराब हुआ है।

    किसी भी मुख्यमंत्री की आम सभा के संचालन का यह मेरा पहला अवसर था फिर भी मैंने धैर्य से काम लिया और यह सोचकर कि जब तक माइक नहीं आ जाता, मैंने जालोर के साक्षरता मिशन के बारे में बोलना आरंभ किया। अब तक वह हुआ था जो मेरे और जिला कलक्टर के बीच तय हुआ था किंतु अब वह होने जा रहा था जो तय नहीं हुआ था। मुख्यमंत्री के भाषण के बीच में बोलना बहुत ही अशोभनीय और अटपटा लगने वाली बात थी किंतु मैंने परिस्थिति को देखते हुए यह दुस्साहस किया। माइक की व्यवस्था होने में लगभग तेरह-चौदह मिनट लग गये। इस बीच मैं जालोर के साक्षरता मिशन की भावी कार्ययोजना के सम्बन्ध में बोलता रहा। इस बीच जिला कलक्टर से मेरी दृष्टि दो-तीन बार मिली किंतु उन्होंने मेरे लिये कोई संकेत नहीं किया। मैं बोलता रहा और जब माइक ठीक हुआ तो मुख्यमंत्री ने पहला वाक्य इस प्रकार बोला- छोरो घणो जोरदार बोलै। मेरी सांस में सांस आई, अब जाकर मैं आश्वस्त हुआ कि इस दुस्साहस के लिये मुझे कोई कुछ कहने वाला नहीं है।

    1998 के विधानसभा आम चुनावों से पहले मैं नागौर जिले में नियुक्त था। आचार संहिता लगने से पहले श्री भैरोंसिंह शेखावत के जिला मुख्यालय नागौर सहित जिले के कई कस्बों में कई दौरे हुए। इस बार भी मैंने उनकी यात्राओं का मीडिया कवरेज किया।

    1 अक्टूबर 1998 को श्री भैरोंसिंह शेखावत दो दिवसीय यात्रा पर नागौर आये। दिन भर कई कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के बाद शाम के समय वे नागौर में चतुर्मास कर रहे एक जैन साधु के उपासरे पर गये। मैं भी उनके साथ गया। लगभग एक घण्टे वे जैन साधु के सानिध्य में रहे। उस पूरे समय में उस कक्ष में केवल तीन ही व्यक्ति थे- श्री भैरोंसिंह शेखावत, जैन साधु और मैं। इस अवधि में उन दोनों के मध्य जिन विषयों पर वार्तालाप हुआ, उसे सुनकर एक और नई बात समझ में आई। मुख्यमंत्री केवल हजारों लाखों, करोड़ों व्यक्तियों के लिये ही नहीं होता, वह अपने लिये भी होता है, उसे आत्मा, परमात्मा, इहलोक और परलोक की चिंताएं भी सताती हैं।

    अगले दिन 2 अक्टूबर था। मुख्यमंत्री महात्मा गांधी की प्रतिमा को माल्यार्पण करने गांधी चौक गये। मैं, भी जिला प्रशासन के अन्य अधिकारियों के साथ वहां उपस्थित था। तब तक बहुत से लोगों को ज्ञात हो चुका था कि भैरोंसिंहजी रात्रि को नागौर में ही ठहरे हैं और प्रातःकाल गांधी चौक आयेंगे। उस समय प्रातः के सात ही बजे थे। फिर भी पूरा गांधी चौक लोगों से ठसाठस भर गया। यहां भी वही सब हुआ। मुख्यमंत्री ने किसी से लेकर गुटखा खाया, कुछ लोगों के बच्चों के नाम लेकर उनके बारे में पूछा और आठ बजते-बजते उनका काफिला रवाना हो गया।

    वर्ष 2007 में उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए वे महंत किशनारामजी महाराज की बरसी पर राजाराम आश्रम शिकारपुरा आये। उस समय मैं जोधपुर डिस्कॉम में जनसम्पर्क अधिकारी था किंतु उनकी इस यात्रा के कवरेज के लिये मुझे लगाया गया। उस दिन शिकारपुरा में लाखों व्यक्ति उपस्थित थे। जिस तरफ आंखें दौड़ाओ, आदमी ही आदमी, औरतें ही औरतें। आश्रम परिसर में तिल धरने को स्थान नहीं। दिन में लगभग साढ़े दस बजे उपराष्ट्रपति आये। जब वे मुख्यमंदिर में दर्शनों के लिये गये तो चारों ओर का स्थान लकड़ी की बल्लियां लगाकर सुरक्षित कर दिया गया था और उन बल्लियों को घेरकर पुलिसकर्मी खड़े थे। आम आदमी की हिम्मत नहीं होती थी कि उस सुरक्षा घेरे को तोड़कर उन तक पहुंच सके किंतु जब वे आये तो लाखों लोग मुख्यमंदिर की तरफ अनायास ही दौड़ पड़े। वे नजर भरकर अपने नेता को देखना चाहते थे। ऐसा सम्मोहन भरा दृश्य मैंने अपने जीवन में शायद ही कभी देखा होगा। यह सम्मोहन तभी भंग हुआ जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आश्रम में प्रवेश किया।

    मैंने अंतिम बार श्री भैरोंसिंह शेखावत की नागाणा मंदिर की यात्रा का कवरेज वर्ष 2007 में किया। तब मैं बाड़मेर जिले में पदस्थापित था। इस बार वे उपराष्ट्रपति थे। संयोग की बात थी, इस बार भी राज्य का राजनीतिक वातावरण गर्म था। वे उपराष्ट्रपति थे, राजनीतिक बातों से ऊपर उठ चुके थे फिर भी मिट्टी की तासीर नहीं जाती, शब्दभेदी बाण चलाना जानते थे। वे हमेशा ही ऐसा कुछ करते थे जिससे सांप भी मरता था और लाठी भी नहीं टूटती थी। बाड़मेर जिले में भी मंच से उन्होंने ऐसे बहुत से लोगों के नाम लिये जो उनके सामने भीड़ में बैठे हुए थे। कुछ लोगों के नाम लेकर उन्होंने बाड़मेर जिले की अपनी पुरानी यात्राओं में हुई बातों का भी उल्लेख किया। इस भाषण का समां ऐसा था कि सभा समाप्त होने के बाद हर व्यक्ति को यह लगा कि वह श्री भैरोंसिंह शेखावत से व्यक्तिशः बात करके जा रहा है। संतुष्ट और अभिभूत! संभवतः अंतिम बार मैंने उन्हें जयपुर में गोविंददेवजी के मंदिर में देखा। वे पूरे लवाजमे के साथ गोविंददेवजी के मंदिर में आये किंतु बिना कोई सनसनी उत्पन्न किये।

    15 मई 2010 को उनके निधन का दुःखद समाचार मिला। अगले दिन के समाचार पत्रों में बड़े-बड़े समाचार और चित्र प्रकाशित हुए। एक दिन पिताजी ने अखबार उठाकर कहा- भैरोंसिंहजी को श्रद्धांजलि देनी चाहिये। उन दिनों मैं, दैनिक नवज्योति में तीसरी आँख शीर्षक से एक स्तम्भ लिखा करता था पश्चिमी राजस्थान में लोगों की जिह्वा पर चढ़ा हुआ था। उसी स्तम्भ में मैंने 18 मई 2010 को एक लेख लिखा- कहाँ गई दुनिया की वह सादगी, सरलता एवं भोलापन ! यह मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि थी। मैं उन्हें शाब्दिक श्रद्धांजलि के अतिरिक्त और दे ही क्या सकता था!

    मेरा उन्हें शत-शत प्रणाम है। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर के शब्दों में- जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को। वे पुनीत अनल ही तो थे!

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-30

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-30

    पर्यावरण के पहरेदार ओरण और गोचर (1)


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    ओरण


    ओरण शब्द, अरण्य से बना है जिसका अर्थ होता है, जंगल। प्राचीन काल से यह परम्परा चली आ रही है कि गांव की सीमा से संलग्न कुछ क्षेत्र ओरण के रूप में छोड़ा जाये। राजस्थान में वह परम्परा आज भी चल रही है तथा हर गांव के बाहर ओरण के लिये पर्याप्त क्षेत्र खाली छोड़ा गया है। हिन्दू पुराणों के अनुसार ग्राम्य वन अथवा ओरण किसी स्थानीय वीर अथवा लोक देवता के नाम पर समर्पित होता है। ओरण के भीतर उस वीर अथवा लोक देवता का मंदिर बना होता है। ओरण की रक्षा के लिये समस्त ग्रामवासी एक निश्चित एवं कठिन आचार संहिता का पालन करते हैं। ओरण में रहने वाले वन्य जीवों के साथ किसी तरह की छेड़-छाड़ नहीं की जाती। उन्हें पकड़ा अथवा उनका शिकार नहीं किया जाता। ओरण से हरा पेड़ नहीं काटा जाता। केवल सूखी हुई लकड़ी एकत्रित की जा सकती है। किसी भी स्थानीय व्यक्ति का पशु, ओरण में स्वच्छंद रूप से घूम एवं चर सकता है। यदि कोई व्यक्ति ओरण के नियम तोड़ता है तो उसे पंचायत में जुर्माना भरना होता है। बड़ा अपराध करने वाले व्यक्ति का पूरे गांव द्वारा सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है।

    राजस्थान के मरुस्थलीय जिलों में भी ओरणों के प्रति पर्याप्त चेतना है। यहाँ 50 हैक्टेयर से लेकर 7,000 हैक्टेयर क्षेत्रफल तक के ओरण विद्यमान हैं। मरुस्थलीय जोधपुर संभाग में 1,759 गांवों में ओरण विद्यमान हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 1,34,750 हैक्टेयर है। बाड़मेर जिले में चोहटन के पास ढोक विरारा माता का ओरण 17,947 बीघा क्षेत्र में तथा शिव के पास उणरोद का ओरण 10,463 बीघा में विस्तृत है। जैसलमेर जिले में भादरियाजी का ओरण 42 हजार बीघा में, रामदेवरा का ओरण 35,171 बीघा में तथा पोकरण के पास एटा में 33,124 बीघा में ओरण स्थित है। जोधपुर जिले में फलौदी के पास बरासिंघा का बाड़ा ओरण 55,315 बीघा में तथा कोलू पाबूजी का ओरण 15,845 बीघा में विस्तृत है।

    देवी-देवताओं को समपर्तित ओरण

    राजस्थान में विभिन्न देवी-देवताओं, संतों, वीरों आदि के नाम पर ओरण समपर्पित किये गये हैं। इन देवी-देवताओं, संतों एवं वीरों के नाम छोड़े गये ओरण इस प्रकार से हैं-

    देवियों को समर्पित ओरण : बांकल माता का ओरण, आवड़ माता का ओरण, देवल माता का ओरण, नागणेची माता का ओरण, जगदम्बा माता का ओरण, करणी माता का ओरण, खूबड़ माता का ओरण, कोटड़िया माता का ओरण, गादेश्वरी माता का ओरण, गोमा माता का ओरण, रावतारी माता का ओरण, शीतलामाता माता का ओरण, आशापूर्णा माता का ओरण, हिंगलाज माता का ओरण, चामुण्डा माता का ओरण, अम्बा माता का ओरण, आशा माता का ओरण, आई माता माता का ओरण।

    देवताओं के ओरण : गणेशजी का ओरण, शिवजी का ओरण, हनुमानजी का ओरण, ठाकुरजी का ओरण, नृसिंहजी का ओरण, श्यामजी का ओरण, सांवलजी का ओरण, मालणजी का ओरण, गोगाजी का ओरण, रामदेवजी का ओरण, पाबूजी का ओरण, माण्डनजी का ओरण।

    नाथ धर्म के साधुओं को समर्पित ओरण : भैंरूनाथजी का ओरण, बालकनाथजी का ओरण, धोरानाथ का ओरण, बादलपुरी का ओरण, मेहरनाथ का ओरण, मोडजी का ओरण, गंगापुरी का ओरण, राघवपुरी का ओरण, संतोष भारती का ओरण, बादलपुरी का ओरण आदि।

    क्षेत्रपाल, वीरजी एवं झुंझारजी के ओरण : खेतपालजी का ओरण, मामाजी का ओरण, भोमियाजी का ओरण, झुंझारजी का ओरण, खंगारजी का ओरण, भूरा राठौड़ का ओरण, पीर सरदार का ओरण, केनाजी का ओरण, जेतजी का ओरण आदि।


    गोचर

    गायों के चरने के लिये छोड़ा गया स्थान गोचर कहलाता है। राजस्थान में परम्परागत रूप से हर गांव के निकट गोचर छोड़ा जाता था। इस भूमि पर न तो मकान बनाये जाते थे और न खेती की जाती थी। आज भी यह परम्परा अस्तित्त्व में है। राजस्थान के गांवों के बाहर वर्तमान में एक हैक्टेयर से लेकर 10 हजार हैक्टैयर तक के गोचर उपलब्ध हैं। इनका रख-रखाव ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है। राजस्थान में 88,56,101 हैक्टेयर गोचर भूमि है जो कि कुल उपलब्ध भूमि का 41.8 प्रतिशत है। इसमें से 9,11,233 हैक्टेयर स्थायी गोचर भूमि, 70,50,577 हैक्टेयर ऊसर भूमि तथा 8,93,691 हैक्टेयर सीमांत भूमि है।

    राज्य के मरुस्थलीय जिलों में भी गोचरों का पर्याप्त प्रावधान किया गया है। मरुस्थलीय जोधपुर संभाग में 2,826 गांवों में गोचर विद्यमान हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 3,58,395 हैक्टेयर है। इन भूमियों में सेवण तथा धामण जैसी घासें स्वाभाविक रूप से उगती और पनपती हैं जो पशुओं के लिये उत्तम आहार का काम करती हैं। छोटे गोचरों में तथा मरुस्थलीय गोचरों में वर्षा काल को छोड़कर प्रायः घास का अभाव रहता है तथा झाड़ियों की संख्या कम होने से भी ये पशु चारण की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करते हैं। फिर भी राजस्थान के गोचरों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। ये भी पर्यावरण के मजबूत प्रहरी है। यदि राजस्थान में गोचर छोड़ने की परम्परा नहीं होती तो पर्यावरण को निःसंदेह बहुत बड़ी क्षति पहुंची होती।

    पारिस्थितिकी तंत्र के पहरेदार

    वर्षा की कमी, मरुस्थलीय प्रसार एवं तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा पालतू पशुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण राज्य का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक अवस्था में है। राज्य में बड़ी संख्या मंर उपस्थित ओरणों और गोचरों ने राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र को सफलतापूर्वक थाम रखा है। इस दृष्टि से ओरण एवं गोचर, पर्यावरण की रक्षा के लिये सबसे मजबूत पहरेदार सिद्ध हुए हैं। ओरण और गोचर क्षेत्र की वनस्पतियां पर्यावरण को ऑक्सीजन, कार्बनिक अवशिष्ट तथा पशु-पक्षियों को आश्रय एवं भोजन देकर और मृदा अपरदन को रोककर पास्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाती हैं।

    ग्रामीणों की वानस्पातिक आवश्यकताओं का अक्षय भण्डार

    ओरण एवं गोचरों से स्थानीय लोगों को जलाऊ लकड़ी, पशु चारा, गोंद, कूमट के बीज, खेजड़ी की सांगरियां, गूगल, शहद, विभिन्न प्रकार की औषधियां तथा विविध प्रकार के वानस्पातिक उत्पाद प्राप्त होते हैं। इसलिये इन्हें स्थानीय लोगों के लिये प्राकृतिक सम्पदा का अक्षय गोदाम कहा जा सकता है। ओरण एवं गोचर, ग्रामीण क्षेत्र में उपयोग में ली जाने वाली खाट बुनने के लिये मूंझ, झौंपड़ी बनाने के लिये लकड़ियां, बाड़े की चार दीवारी बनाने के लिये कांटों आदि की आपूर्ति भी करते हैं। ओरणों में पनपने वाला फोग तो ग्रामीण जीवन की धुरी कहा जा सकता है। ओरणों में खड़े देशी बबूल एवं विदेशी बबूल की झाड़ियां जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी एवं पशु चारा तक उपलब्ध कराते हैं। गहरी जड़ों वाली बूई नामक झाड़ी, ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ू की आवश्यकता पूरी करती है।

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