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  • सूखी सब्जियों का खजाना है थार का रेगिस्तान

     05.09.2018
    सूखी सब्जियों का खजाना है थार का रेगिस्तान

    सूखी सब्जियों का खजाना है थार का रेगिस्तान


    आज से लगभग 200 साल पहले अंग्रेज सैन्य अधिकारी कर्नल टॉड ने पश्चिमी राजस्थान की यात्रा की। उसने अपने यात्रा संस्मरण में मरुस्थल के खानपान का बहुत रोचक वर्णन किया है। उसने लिखा है कि इस क्षेत्र में खेती की अत्यधिक न्यूनता होने के कारण जंगली वनस्पतियों का समाज एवं संस्कृति पर विशेष प्रभाव पड़ा है।

    खेजड़ी की फलियों अर्थात् ‘सांगरी’ को पीसकर आटा बना लिया जाता है। इसे पानी तथा छाछ में घोलकर पिया जाता है। ‘जाल’ नामक झाड़ियों से चरवाहों की झौंपड़ियां बनती हैं और जेठ-बैसाख में उनमें फल लगते हैं जिन्हें ‘पीलू’ कहा जाता है। यह भी खाने के काम आता है।

    बबूल से गोंद निकलता है जिससे औषधि का निर्माण होता है। जवासे के गोंद से भी दवाई बनती है।

    बेर की झाड़ियां सर्वाधिक पाई जाती हैं और बहु-उपयोगी होती हैं। बेर एक स्वादिष्ट फल होता है। करील अथवा कैर के फलों से सब्जी और अचार बनते हैे। इसकी झाड़ियां 10 से 15 फुट ऊँची होती हैं। इसके फल को नमक के पानी में गलाकर इसे घी और नमक के साथ रोटी से खाते हैं। कई परिवारों के पास इसका बीस मन तक का संचय रहता है।

    राबड़ी जो अफ्रीकी मरुस्थल में बनाये जाने वाले कुसकोस से बहुत साम्य रखता है, अधिकतर ऊँटनी के दूध से बनता है जिससे घी ये लोग पहले ही निकाल लेते हैं।

    सिंध से ऊँटों और घोड़ों पर लद कर सूखी मछलियां आती हैं और सम्पूर्ण मरुस्थल में तथा पूर्व में बाड़मेर तक उनकी खूब बिक्री होती है। ये मछलियां दो डूकरे (ताम्बे के सिक्के) की एक सेर के हिसाब से बिकती हैं।

    कुछ सेर बाजरा, ज्वार, और खेजड़े का आटा छाछ में घोल लेते हैं और फिर उसे आग पर चढ़ाकर गरम कर लेते हैं, उबालते नहीं हैं।

    कर्नल टॉड के इस वर्णन को दो सौ साल से अधिक समय बीत चुका है। इस बीच थार रेगिस्तान में इंदिरा गांधी नहर के आने से परिस्थितियां बदली हैं फिर भी यहां के निवासियों में सब्जियों को सुखाकर संचय करने तथा उन्हें साल के उस भाग में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति है जब वे खेतों में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नहीं होतीं। इनमें से कुछ प्रमुख सब्जियों के बारे में इस आलेख में बताया गया है।

    काचरी

    कार्तिक-मिगसर माह में काचरियां तथा चिमड़ियां मिलती हैं। ये छोटी-छोटी बेलों पर लगने वाले मध्यम आकार के फल हैं जो कच्ची अवस्था में कड़वे तथा पकने पर खट्टे होते हैं। एक काचरा लगभग 20-30 ग्राम का होता है। ये दीवाली के आसपास मीठी कड़वी से खट्टी पड़नी शुरु होती हैं तथा सर्दियों में उपलब्ध रहती हैं। इनकी सब्जी एवं चटनी बनती हैं तथा सुखा कर भी रखी जाती हैं। छोटी काचरियों को सिराडिया अथवा चिराडिया कहते हैं। छीलकर सुखाये हुए काचरियों की माला गोटका कहलाती है। जब काचरियों की फांकें काटकर सुखाई जाती हैं तो उन्हें लोथरे कहते हैं। सुखाकर रखी गई काचरियां 2-3 साल तक प्रयुक्त हो सकती हैं। इन्हें अन्य सब्जियों में खटाई अथवा अमचूर की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है।

    काचरा

    खेतों में फसलों के साथ काचरे की बेलें स्वयं उग आती हैं जिनके फल को मारवाड़ में काचरा तथा पूर्वी राजस्थान में सेंध कहा जाता है। ये काचरियों की तुलना में काफी बड़े होते हैं। एक काचरा पचास ग्राम से लेकर आधा किलो या उससे भी अधिक भार का हो सकता है। ये भी दीपावली के आसपास पकती हैं तथा पूरी सर्दियों में उपलब्ध रहती हैं। इनकी सब्जी बनती है तथा फल एवं सलाद के रूप में कच्ची भी खाई जाती हैं। इन्हें छीलकर तथा इनके गोल-गोल चकरे काटकर छाया में अथवा कम तेज धूप में सुखा लिया जाता है तथा बाद में सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    कैर

    कैर अथवा करील के फलों को मारवाड़ में कैर, पंजाब से लगते जिलों में डेले तथा ब्रजक्षेत्र से लगते जिलों में टेंटी एवं करील कहा जाता है। इसका फूल लाल रंग का तथा फल हरे रंग का होता है। चैत्र-वैशाख में कैर की झाड़ी में कैर लगते हैं। हरे कैर प्राकृतिक रूप से कड़वे होते हैं। इन्हें बारी-बारी से नमक के पानी, खट्टी छाछ तथा सादा पानी में भिगोकर इनकी कड़वाहट दूर की जाती है। अब ये हल्के खट्टे तथा हल्के नमकीन हो जाते हैं। हरी कैर से सब्जी और अचार बनता है। इन्हें सुखाकर दो-चार साल तक काम में लिया जा सकता है। सूखी कैर से भी सब्जी एवं अचार दोनों बनते हैं। गैस, अपच, एसिडिटी आदि में सूखी कैर का पाउडर, मेथी चूर्ण तथा काले नमक के साथ गर्म पानी से लिया जाता है।

    सांगरी

    खेजड़ी से प्राप्त हरी फलियां सांगरी कहलाती हैं। ये वैशाख तथा ज्येष्ठ माह में तोड़ी जाती हैं। हरी फलियों को उबाल कर उनसे सब्जी बनती है। उबली हुई हरी फलियों को सुखाकर भी रखा जाता है। आजकल ये देश-विदेश में निर्यात की जाती हैं तथा सूखी हुई सांगरियां हजार रुपए किलो के आसपास बिकती हैं। अर्थात् इनका भाव काजू एवं बादाम के आसपास रहता है। जब सांगरियां पेड़ पर ही पक जाती हैं और सूख कर पीली पड़ जाती हैं तो उसे खोखा कहते हैं। कर्नल टॉड ने बाजरी के आटे में सांगरी को पीसकर मिलाए जाने का वर्णन किया है, वह सांगरी की यही अवस्था है।

    चापटिया

    कुमट के पेड़ से प्राप्त फल कुमटी और चापटिया कहलाता है। ये मिगसर (अगहन), पौष, माघ तथा फाल्गुन माह में तोड़े जाते हैं। इनकी सब्जी बनती है तथा इन्हें कैर, गूंदा, मेथी, काचरी, सांगरी आदि के साथ मिलाकर इनकी सब्जी बनाई जाती है। सूखी हुई चापटिया दो तीन साल तक चल सकती है। सूखी हुई चापटियों की सब्जी बनती है तथा इसे रेगिस्तान की अन्य सूखी सब्जियों के साथ मिलाकर भी बनाया जाता है जिसे पचकूटे की सब्जी कहा जाता है।

    फोग

    फोग एक रेगिस्तानी झाड़ी है जिसकी टहनियां कुआं खोदने के समय बहुत काम आती हैं। इन झाड़ियों पर छोटा फूल लगता है जो स्वाद में हल्का खट्टा होता है। फोग के फूलों को सुखाकर उनका रायता बनाया जाता है। यह लू लगने पर बहुत उपयोगी होता है तथा शरीर में पानी की कमी नहीं होने देता। पेट की छोटी-मोटी बीमारियों में भी फोग का रायता उपयोगी है।

    टिण्डा

    टिण्डा सामान्यतः सारे देश में पाया जाता है किंतु मारवाड़ में देशी टिण्डे की एक अलग वैराइटी होती है जो बारानी फसलों के बीच स्वतः उगती है। यह हरे रंग में नीले रंग का आभास देती है तथा इसका आकार सामान्य टिण्डे से लगभग दो-तीन गुना होता है। इसके बीज पकने पर काले पड़ जाते हैं। जब देशी टिण्डे में बीज काले पड़ने लगते हैं तब उन्हें काटकर उनके बीज अलग करके फैंक दिए जाते हैं तथा शेष टिण्डे को सुखा लिया जाता है। इस सूखे हुए टिण्डे को वर्ष के अन्य महीनों में सब्जी के रूप में खाया जाता है।

    करेला

    अब तो करेला धरती के किसी न किसी छोर पर उपलब्ध होने से साल भर ही बाजार में आता है किंतु पहले ऐसा नहीं था। यह कुकरबिटेसी जाति की फसल है जो अपने मौसम में ही फलती-फूलती थी। मारवाड़ में करेले को भी काटकर सुखा लिया जाता था तथा इसे साल के अन्य हिस्सों में सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता था।

    मतीरा

    मतीरा एक रेगिस्तानी बेल है। दिखने में यह तरबूज की तरह होता है। यह पीने के पानी, विटामिन तथा मिनरल्स का अच्छा स्रोत होता है। इसका गूदा सफेद, हल्का लाल एवं हल्का पीला होता है। इसे फल की तरह कच्चा खाया जाता है तथा इसके कच्चे गूदे एवं छिलके की सब्जी बनती है। इसके छिलकों को सुखाकर रख जाता है तथा उनकी भी सब्जी बनती है।

    गूंदा

    गूंदा बहुतायत से पाया जाने वाला पेड़ है। इसकी दो प्रमुख वैराइटी होती हैं। छोटी-छोटी गूंदियां पकने पर फल की तरह खाई जाती हैं तथा बड़ी वैराइटी के हरे गूंदे सब्जी एवं अचार के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इस हरे एवं बड़े गूंदे को आधा उबाल कर सुखाया जाता है तथा वर्ष के अन्य हिस्सों में पचकूटे की सब्जी के अन्य अवयवों के साथ मिलाया जाता है। सूखा गूंदा बाजार में भी खूब बिकता है।

    ग्वार फली

    ग्वार पूरे देश में उपलब्ध होने वाली सब्जी है। इसकी बहुत सी वैराटियां मिलती हैं किंतु मारवाड़ में इसकी देशी वैराइटी उगती है जिसे आधा उबालकर सुखा लिया जाता है। सूखी हुई फलियों को अलग से अथवा अन्य सूखी सब्जियों के साथ मिलाकर बनाया जाता है। सूखी ग्वार की फली भी बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाती है।

    सूखी पत्ता मेथी

    मारवाड़ में हरी पत्ता मेथी बहुतायत से प्रयुक्त होती है। इसे अलग से अथवा अन्य पत्तियों के साथ मिलाकर भूजी एवं साग के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। मेथी की पत्तियों को पक जाने पर उन्हें छाया में सुखा लिया जाता है तथा अन्य सब्जियों एवं दालों में मसाले के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। सूखी हुई पत्ता मेथी को आलू के साथ मिलाकर उसकी भूजी भी बनाई जाती है। नागौर की सूखी पत्ता मेथी देश-विदेश में बहुतायत से निर्यात होती है। इसकी महक दूर से ही इसकी उपस्थिति के बारे में बता देती है।

    हरी दाना मेथी

    हरी दाना मेथी को रेगिस्तनी क्षेत्रों में मूंगिया कहा जाता है। मेथी की फलियों को खोलकर उनमें से हरा दाना निकाला जाता है तथा इसकी सब्जी बनाई जाती है। हरे रंग की सूखी हुई दाना मेथी भी बाजार में उपलब्ध होती है। इसे कुछ घण्टों तक पानी में भिगोकर इसकी रसयुक्त तथा सूखी सब्जी बनाई जाती है।


    सूखी हुई हरी दाना मेथी को पानी में भिगोकर इसे आलू के साथ मिलाकर भूजी की तरह भी बनाया जाता है।

    पीली दाना मेथी

    दाना मेथी के पक जाने पर उसका दाना पीला पड़ जाता है। इन दानों को पानी में भिगोकर अथवा उबालकर इन्हें हरी मिर्च, कैरी, ग्वारपाठा आदि के साथ इनकी सब्जी बनाई जाती है। इसे पेट के लिए अत्यंत गुणकारी माना जाता है।

    सूखे हुए आलू

    सर्दियों के दिनों में आलू में सबसे अच्छा स्वाद होता है। उन दिनों यह बाजार में सस्ता भी होता है। उसे उबालकर उसकी बड़ियां बना लेते हैं या कद्दूकस करके लच्छे बना लेते हैं। इन बड़ियों एवं लच्छों को हल्की धूप में सुखा लिया जाता है तथा उन दिनों में सब्जी के रूप में काम लिया जाता है जब ताजे आलू में प्राकृतिक रूप से स्वाद कम हो जाता है।

    सूखे बेर

    रेगिस्तान में बेर की कई प्रकार की किस्में पैदा होती हैं। इनमें से छोटी झाड़ियों पर लगने वाले लाल बेर तथा टीकड़ी बेर सुखा कर रख लिए जाते हैं तथा वर्ष के अन्य हिस्सों में प्रयुक्त किए जाते हैं।

    इनके अलावा मिर्च, पुदीना, धनिया, कैरी आदि भी सुखाकर पूरे वर्ष काम ली जाती हैं।

     

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • मराठा सरदारों के डर से महाराणा अपने दूत अंग्रेजों के पास नहीं भेज पाता था

     09.07.2017
    मराठा सरदारों के डर से महाराणा  अपने दूत अंग्रेजों के पास नहीं भेज पाता था

    मेवाड़ का महाराणा भीमसिंह गुहिल की 67 वीं पीढ़ी तथा सीसोद गाँव से निकली राणा शाखा की 39वीं पीढ़ी का राजा था। उसका जन्म 10 मार्च 1768 को हुआ था। वह अपने बड़े भाई महाराणा हम्मीरसिंह की कम उम्र में मृत्यु हो जाने के कारण मात्र 10 वर्ष की आयु में मेवाड़ का शासक बना। जैसा कि हम पहले की कड़ियों में लिख आये हैं कि वह महान गुणों से युक्त हिन्दू शासक था तथा अपना अपकार करने वालों के प्रति भी उसके हृदय में दया रहती थी। महाराणा के व्यक्तिगत गुणों की चर्चा उस काल में पूरे भारत में थी जिससे प्रभावित होकर महादजी सिंधिया जिसने उत्तर भारत में बड़ी विजयें अर्जित की थी, महाराणा के दर्शन करने के लिये इस कदर आतुर रहता था कि उसने कोटा राज्य के फौजदार झाला जालिमसिंह से अनुरोध किया कि मुझे महाराणा से मिलवाओ।

    जालिमसिंह ने किसी तरह महाराणा को सिंधिया से मिलने के लिये सहमत किया तथा सितम्बर 1791 में नाहर मगरे में महादजी सिंधिया और महाराणा की भेंट का प्रबंध किया। सिंधिया ने महाराणा के दर्शन करके स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया। इतने प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होने के उपरांत भी भीमसिंह का शासन असफलताओं की एक लम्बी कहानी है। मेवाड़ के स्वार्थी सरदारों ने महाराणा जीना हराम कर रखा था। इन सरदारों पर अंकुश लगाने के लिये महाराणा को विदेशी पठानों तथा सिंधी मुसलमानों की सेना रखनी पड़ी थी किंतु राज्य की पतली माली हालत के चलते वह इन सेनाओं को वेतन नहीं चुका पाता था जिससे ये उद्दण्ड सैनिक महाराणा से मुँहजोरी करते थे।

    भीमसिंह के काल में राज्य के शक्तावत तथा चूण्डावत सरदारों के झगड़े चरम पर पहुँच गये जिसके चलते राज्य में कई प्रमुख लोगों की हत्या हो गयी। उन दिनों होलकरों की राजमाता अहल्याबाई ने मेवाड़ में बड़ा उत्पात मचा रखा था किंतु ये सरदार लोग मराठों से लड़ने में महाराणा का साथ देने की बजाय एक-दूसरे के विरुद्ध षड़यंत्र करते रहते थे जिससे महाराणा को उन्हें दबाने के लिये मराठों की सहायता लेनी पड़ती थी।

    ई.1803 में जसवंतराव होलकर ने मेवाड़ को जमकर लूटा। ई.1805 में जसवंतराव होलकर तथा माधवराव सिंधिया दोनों ही एक साथ मेवाड़ पर चढ़ आये। सिंधिया के प्रधानमंत्री अम्बाजी इंगलिया ने इन दोनों मराठा सरदारों को सलाह दी कि मेवाड़ का राज्य आपस में आधा-आधा बांट लिया जाये। इस पर होलकर ने सिंधिया से कहा कि महाराणा हमारे मालिकों के मालिक हैं, उन्हें सताना ठीक नहीं। हमने उनके जो किले दबा लिये हैं, उन्हें वापस लौटा कर महाराणा से मेल कर लेना चाहिये। इस पर सिंधया होलकर से सहमत हो गया।

    किसी जमाने में सिंधिया तथा होलकर, पेशवा के अधीन थे और पेशवा सतारा के राजा के अधीन था। सतारा का राजा, महाराणा के वंश में से ही निकली एक शाखा से था। इस कारण मेवाड़ का महाराणा, होलकर तथा सिंधिया के मालिकों का मालिक था। इतिहास में यह भी मान्यता है कि छत्रपति शिवाजी तथा नेपाल का राजवंश भी मेवाड़ की गुहिल शाखा में से ही निकले हैं।

    अंग्रेजों ने ई.1803 में जयपुर व अलवर से तथा 1805 में भरतपुर से संधियां कर ली थीं जिससे इन राज्यों में मराठों का आतंक समाप्त हो गया था। मेवाड़ के महाराणा ने भी मराठों से मुक्ति पाने के लिये अंग्रेजों से संधि करनी चाही किंतु मेवाड़ में मराठा सरदारों का ऐसा जाल बिछा हुआ था कि महाराणा के लिये अपना दूत अंग्रेजों के पास भेजना असंभव था।

    मई 1805 में महाराणा को सूचना मिली कि सिंधिया और होलकर पुनः मेवाड़ आ रहे हैं तो महाराणा ने जून 1805 में जयपुर के भैराबख्श नाम व्यक्ति को अपना दूत बनाकर अंग्रेजों से संधि करने के लिये लॉर्ड लेक के पास मथुरा भेजा किंतु तब तक सिंधिया और अंग्रेजों के बीच सुर्जी अंजनगांव की संधि हो चुकी थी, जिसके अंतर्गत अंग्रेजों ने मेवाड़ को सिंधिया का रक्षित राज्य स्वीकार कर लिया था। अतः लॉर्ड लेक ने महाराणा के संधि प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। जब होलकर को मालूम हुआ कि महाराणा ने लेक से दोस्ती करने के लिये अपना दूत भेजा है तो वह आग बबूला हुआ और उसने अपने दरबार में रहने वाले महाराणा के राजदूतों को बुलाकर गाली गलौच की। जसवंतराव होलकर के मंत्री अलहकर तांतिया ने भरे दरबार में कहा कि महाराणा के ये दोनों रंगड़ आपको और सिंधिया को लड़वाकर बरबाद कर देंगे।

    इससे पहले कि होलकर मेवाड़ के विरुद्ध कुछ करता, होलकर को उत्तर में जाना पड़ा जहाँ लॉर्ड लेक ने उसे जबर्दस्त पराजय दी। होलकर के मेवाड़ से विदा होते ही सिंधिया ने मेवाड़ से 19 लाख रुपये वसूल किये। इस्वी 1809 में पिण्डारी अमीरखां मेवाड़ पर चढ़ आया। उसने महाराणा से कहा कि या तो मुझे ग्यारह लाख रुपये दो नहीं तो मैं एकलिंगजी के मंदिर को तोड़ दूंगा। महाराणा के पास रुपये नहीं थे इसलिये महाराणा को एकलिंगजी की रक्षा के लिये सेना लेकर जाना पड़ा किंतु थोड़ी ही देर लड़ने के बाद महाराणा हारकर उदयपुर लौट आया। अमीरखां अपने सेनापति जमशेदखां को मेवाड़ से रुपये वसूलने के लिये छोड़कर कहीं और लड़ने के लिये चला गया। जमशेदखां के पठानों ने मेवाड़ की जनता पर कई तरह के जुल्म ढाये। उसके जुल्मों को जमशेदगर्दी कहा जाने लगा।

    इस युग में मेवाड़ इतना कमजोर हो गया था कि ई.1810 में पिण्डारी अमीरखां के कहने पर महाराणा को अपनी राजकुमारी कृष्णाकुमारी को जहर देकर मार डालना पड़ा था। उसी वर्ष बापू सिंधिया मराठों की ओर से मेवाड़ का सूबेदार नियुक्त किया गया। तीन साल तक बापू सिंधिया तथा जमशेद खां मेवाड़ की पूरी की पूरी आय हड़पते रहे। जब बापू सिंधिया, दौलतराव सिंधिया द्वारा नियत की गयी कर की राशि को वसूल नहीं कर सका तो वह मेवाड़ के बहुत से सरदारों, किसानों और महाजनों को कैद करके अजमेर ले गया जहाँ बहुत से सरदार और महाजन मर गये।

    इसी साल कोटा के फौजदार जालिमसिंह ने मेवाड़ पर आक्रमण करके जहाजपुरा को दबा लिया। महाराणा ने माण्डलगढ़ का किला भी जालिमसिंह के नाम लिख दिया। जब महाराणा ने जालिमसिंह को माण्डलगढ़ का किला दिया तब महाराणा ने एक घुड़सवार को तलवार और ढाल देकर माण्डलगढ़ के किलेदार देवीचंद के पास भिजवाया। देवीचंद समझ गया कि किला दबाव में दिया गया है अतः वह लड़ने के लिये तैयार हो गया और जालिमसिंह माण्डलगढ़ को नहीं ले सका।

    जब महाराणा किराये पर रखे गये 500 पठान सिपाहियों को वेतन नहीं चुका सका तो उन्होंने महाराणा के महल की ड्यौढ़ी पर धरना दिया। इस पर चावंड के रावत सरदारसिंह ने पठानों से कहा कि तुम धरना उठा लो। जब तक महाराणा तुम्हारा वेतन नहीं चुकायेंगे, तब तक मैं तुम्हारी कैद में रहूंगा। पठान धरने से उठ गये और सरदारसिंह को पकड़ कर ले गये। उन दिनों साह सतीदास गांधी महाराणा का प्रधान था। कुछ दिन पहले ही सरदारसिंह ने सतीदास के भाई सोमचंद की हत्या की थी। इसलिये सतीदास के भतीजे जयचंद ने पठानों को रुपया देकर सरदारसिंह को हासिल कर लिया तथा आहाड़ नदी के किनारे ले जाकर मार डाला। तीन दिन बाद उसकी लाश जलाई गयी। इस हत्या का बदला लेने के लिये कुछ राजपूत सरदारों ने महाराणा से आज्ञा लेकर साह सतीदास के महल में घुस कर साह सतीदास को उठा लिया और दिल्ली दरवाजे के निकट ले जाकर मार डाला। जयचंद ने भागने का प्रयास किया किंतु वह भी मारा गया।

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  • थार रेगिस्तान के विशिष्ट व्यंजन !

     07.09.2018
    थार रेगिस्तान के विशिष्ट व्यंजन !

    थार रेगिस्तान के विशिष्ट व्यंजन !

    राजस्थान आएं तो क्या जरूर खाएं !


    राजस्थान का लगभग 61 प्रतिशत भूभाग थार रेगिस्तान का हिस्सा है। अरावली पर्वत के पश्चिम का विशाल भूभाग थार रेगिस्तान का निर्माण करता है।

    जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर, पाली, नागौर, बीकानेर, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, गंगानगर, हनुमानगढ़ आदि जिले थार रेगिस्तान में आते हैं।

    यह एक गर्म जलवायु वाला क्षेत्र है जहां गर्मियों में दिन का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक पहुंच जाता है तथा वर्षा बहुत कम होती है। यही कारण है कि थार रेगिस्तान में विशेष प्रकार की वनस्पतियां होती हैं जो पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती।

    थार रेगिस्तान में ऊँट, भेड़ बकरी तथा गाय अधिक संख्या में मिलते हैं जो कम पानी एवं कम वनस्पति में अच्छी तरह से जीवित रहते हैं। इस कारण थार रेगिस्तान में दूध, घी, दही तथा छाछ से कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।

    थार रेगिस्तान के परम्परागत आहार एवं व्यंजन, भारत के शेष हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं।

    यहाँ बाजरे या बाजरी की मोटी रोटी अधिक खाई जाती है जिसे सोगरा कहा जाता है। बाजरा या बाजरी का आटा गूंधते समय उसमें नमक एवं पानी थोड़ा अधिक मिलाया जाता है तथा आटे की लोई को पानी की सहायता से हाथ से थपथपाते हुए रोटी में बदल दिया जाता है। इस रोटी को लोहे एवं मिट्टी के तवे पर चूल्हे या गैस की आंच पर सेका जाता है। सोगरे के साथ घी का प्रयोग अधिक होता है।

    गेंहू की मोटी रोटी को टुक्कड़ अथवा टिक्कड़ कहा जाता है। इसे भी चकले पर बेलन की सहायता से बेला नहीं जाता है अपितु चकले पर लोई रखकर उसे हाथ से थपथपाकर रोटी बनाई जाती है। टुक्कड़ के भीतर घी नहीं भरा होता है जबकि टिक्कड़ के भीतर घी भरा हुआ होता है।

    सोगरे, टुक्कड़ अथवा टिक्क्ड़ का चूरा करके उसमें घी और गुड़ मिलाया जाता है जिससे स्वादिष्ट चूरमा बनता है। इनके साथ पचकूटे की सब्जी भी अधिक प्रयोग होती है। पचकूटे की सब्जी ग्वार की फली, काचरा, कैर, कुमटी, गूंदे, सांगरी आदि में से कोई पांच सूखी सब्जियां मिलाकर बनाते हैं। सोगरे, टुक्कड़ एवं टिक्कड़ को दूध, दही, घी, प्याज, लाल मिर्च, लहसुन की चटनी प्याज के हरे पत्तों की सब्जी, सूखी प्याज की सब्जी आदि के साथ भी खाया जाता है जिसे लगावण कहते हैं।

    गेहूं के आटे की पतली चपातियों को सुखा कर खाखरे बनाये जाते हैं। ये पापड़ की तरह पतले होते हैं तथा कई प्रकार से बनाए जाते हैं। सादा खाखरा केवल गेहूं के आटे से बनाया जाता है। जब इन्हें मूंग की दाल के बारीक चूरे के साथ बनाया जाता है तो इन्हें कोरमे के खाखरे कहा जाता है। आटे में तेज मसाला डालकर मसाले वाला खाखरा बनाया जाता है। नमक एवं अजवायन डालकर बनने वाले खाखरे का अजवायन का खाखरा कहते हैं। खाखरे कई दिन तक चलते हैं तथा लगभग एक माह तक खराब नहीं होते। अतः दोपहर के नाश्ते से लेकर यात्रा, तीर्थाटन एवं विदेश गमन में इनका अधिक महत्व होता है। आजकल खाखरों की पैकिंग बाजार में खूब बिकती है।

    गेहूँ के आटे, चावल के आटे तथा मक्का के आटे को पानी एवं भाप में उबालकर उनसे गेहूँ, चावल एवं मक्का के अलग-अलग प्रकार के खीचिये बनाये जाते हैं। खीचियों को तेल अथवा घी में तलकर अथवा आग पर सीधे ही भूनकर पापड़ की तरह खाया जाता है।

    थार रेगिस्तान में सब्जियों के रूप में काचरे, कंकेड़े, कुमटी, कैर, सांगरी, ग्वारफली, ग्वारपाठा, टिंडे, खींपोली, लहसुन की चटनी, गट्टे, कढ़ी, पित्तौड़ आदि अधिक प्रयुक्त होते हैं। पापड़ों तथा नमकीन मोटे सेब अर्थात् मोटी भुजिया की सब्जी भी बनती है।

    मोटी भुजिया को थार में खोखे भी कहा जाता है। इसे बनाने में तेल का प्रयोग न के बराबर होता है।

    खट्टी छाछ तथा बाजरी के योग से बनी राबड़ी कहलाती है। खट्टी छाछ एवं मक्का के आटे के योग से घाट बनती है। यह दो-तीन दिनों तक खराब नहीं होती। राब अथवा राबड़ी छाछ में बाजरी के आटे के योग से बनायी जाती है। इसे स्वास्थ्य के लिये अच्छा माना जाता है। यह ग्रीष्म ऋतु का भोजन है।

    बाजरी व मोठ की दाल के योग से खीच बनती है। समझने के लिए इसे बाजरी की तिहारी या पुलाव कहा जा सकता है।

    गेंहूं के दलिये, गुड़ एवं घी के योग से मीठी लापसी बनती है। इसमें घी की अधिक मात्रा उपयोग होता है। इसका स्वाद अनूठा होता है।

    आटे व दाल के योग से बने दाल-ढोकले शहरों व गाँवों 
    में चाव से खाये जाते हैं। इसमें दाल के रूप में सामान्यतः मूंग की छिलके वाली दाल का प्रयोग होता है तथा जब यह आधी उबल जाती है तो उसमें गेहूं, मक्का अथवा बेसन से बनी छोटी-छोटी लाइयां डाल दी जाती हैं जिन्हें ढोकले कहा जाता है। इन लोइयों में नमक, मिर्च, हींग एवं अन्य मसाले पहले से ही मिला लिए जाते हैं।

    थार रेगिस्तान के कुछ मीठे व नमकीन व्यंजनों ने देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इनमें बीकानेर के रसगुल्ले, भुजिया तथा पापड़, जोधपुर की मावे की कचौरी, प्याज की कचौरी, माखनिया लस्सी, मिर्ची बड़े, रबड़ी के लड्डू, ब्यावर की तिलपट्टियां तथा मालपुए, जैसलमेर के गोटमां, किशनगढ़ के पेठे, मेड़ता के दूध पेड़े, सांभर की फीणी, लूनी की केशरबाटी, नावां के गोंद के पापड़, खारची की रबड़ी, खुनखुना की जलेबी, पाली के गंूजा, पुष्कर तथा नागौर के मालपुए आदि प्रसिद्ध हैं।

    दाल-बाटी-चूरमा को थार रेगिस्तान में शहरों से लेकर गांवों एवं ढाणियों में विशिष्ट व्यंजन माना जाता है।

    गाय, भैंस एवं बकरी का दूध बड़े पैमाने पर प्रयुक्त होता है। कुछ चरवाहा जातियाँ सांड (मादा ऊंट) व भेड़ का दूध भी पीने के काम में लेती हैं।

    आटे और नमक का काफी पतला हलुआ पटोलिया कहलाता है। सुपाच्य होने के कारण इसे बीमार मनुष्य को खाने के लिये दिया जाता है।

    आदिवासियों में मक्का का दलिया छाछ में उबाल कर बनाया जाता है। इसे कई दिनों तक खाया जा सकता है।

    राजस्थान में साबत गेहूँ को उबाल कर घूघरी बनाने का भी प्रचलन है। यह मांगलिक अवसरों पर प्रसाद के रूप में वितरित होती है तथा किसी मांगलिक अवसर पर एकत्रित हुई महिलाओं में भी बांटी जाती है।



    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • चार्ल्स मेटकाफ ने विनाश के कगार पर पहुंची मेवाड़ रियासत को बचा लिया

     10.07.2017
    चार्ल्स मेटकाफ ने विनाश के कगार पर पहुंची  मेवाड़ रियासत को बचा लिया

    मेवाड़ में जैत्रसिंह से लेकर महाराणा राजसिंह तक लगभग 450 वर्ष के समय में मेवाड़ के राजाओं ने मुसलमानों से अनेक लड़ाईयां लड़ी थीं किंतु मेवाड़ का बल क्षीण नहीं हुआ था। मरहठों ने मात्र 60 वर्ष में मेवाड़ को पूरी तरह उजाड़ कर वीर भूमि से वीरान भूमि बना दिया। उदयपुर में अब 50 हजार घरों के स्थान पर मात्र 3 हजार घर रह गये थे। गाँव के गाँव खाली हो गये थे जिनमें जंगली पशु आकर रहने लगे थे। मेर और भील पहाड़ों से निकल कर राहगीरों को ही नहीं अपितु गाँवों को भी लूट लेते थे। राज्य में रुपये का सात सेर गेहूं बिकता था जबकि राजपूताने के अन्य राज्यों में रुपये का इक्कीस सेर।

    महाराणा बालमुकुंद बख्शी को अपना पत्र देकर दिल्ली में स्थित ब्रिटिश रेजीडेन्ट चार्ल्स मेटकाफ के पास संधि की बातचीत के लिये भेजा। ई.1811 में मेटकाफ ने गवर्नर जनरल लॉर्ड मिण्टो को सुझाव दिया था कि शत्रु शक्तियों (मराठों तथा पिण्डारियों) को लूटमार के स्रोतों से वंचित करने के लिये ब्रिटिश संरक्षण में राजपूत राज्यों का एक संघ बना लिया जाये इसलिये मेटकाफ संधि के पक्ष में था किंतु गवर्नर जनरल अपनी 'घेरा डालने की नीति’ से बाहर निकलने को तैयार नहीं हुआ। अतः मेटकाफ ने बालमुकुन्द बख्शी को कहा कि 'अहस्तक्षेप की नीति’ के अतिरिक्त सिंधिया और होल्कर के साथ ब्रिटिश सरकार की संधियों के कारण उदयपुर के 
    साथ सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता।

    ई.1817 तक मेवाड़ उस मोड़ पर जा पहुँचा था कि यदि तत्काल ही किसी बाह्य शक्ति का सहारा नहीं मिला तो राज्य के पूरी तरह नष्ट हो जाने की आशंका थी। ई.1803 एवं 1805 में असफल रहने के बाद ई.1817 में महाराणा ने अंग्रेजों से संधि करने का एक बार पुनः प्रयास किया तथा जयपुर के वकील चतुर्भुज हलदिया की मार्फत ब्रिटिश रेजीडेन्ट चार्ल्स मेटकाफ से कहलवाया कि मेवाड़ को मरहठों, पठानों तथा पिण्डारियों के चंगुल से छुड़ा लें। मेटकाफ तो तैयार ही बैठा था। उसने जब से दिल्ली के रेजीडेन्ट का पदभार ग्रहण किया था तब से ही वह राजपूत राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति में परिवर्तन करने पर जोर दे रहा था। मेटाकफ ने महाराणा की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

    ई.1817 में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स से अनुमति पाकर चार्ल्स मेटकाफ ने राजपूत राजाओं को अपना प्रतिनिधि भेजने तथा संधि की बातचीत चलाने के लिये लिखा। इस पर महाराणा भीमसिंह ने आसीन्द के ठाकुर अजीतसिंह चूण्डावत को संधि की बातचीत चलाने के लिये दिल्ली भेजा। गवर्नर जनरल ने चार्ल्स मेटकाफ को निर्देशित किया कि उदयपुर के राजस्व का अधिकतम भाग ब्रिटिश सरकार को सहायता के रूप में लेना तय किया जाये तथा खिराज निश्चित करते समय महाराणा द्वारा सिंधिया व होलकर को दिया जाने वाला खिराज एक मानकर ब्रिटिश सरकार का खिराज निश्चित किया जाये। ये बड़ी कठोर शर्तें थीं किंतु महाराणा और मेटकाफ दोनों ही संधि के लिये आतुर थे इसलिये वार्ता टूटी नहीं।

    अन्ततः 13 जनवरी 1818 को दोनों पक्षों के मध्य एक संधि हुई जिस पर महाराणा की ओर से ठाकुर अजीतसिंह ने तथा ब्रिटिश सरकार की ओर से चार्ल्स थियोफिलस मेटकॉफ ने हस्ताक्षर किये। 22 जनवरी 1818 को गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने इसकी पुष्टि कर दी। इस संधि की शर्तें इस प्रकार से थीं-

    दोनों पक्षों के बीच मैत्री, सहकारिता तथा स्वार्थ की एकता सदा पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहेगी और दोनों के मित्र तथा शत्रु एक दूसरे के मित्र तथा शत्रु होंगे। अंग्रेजी सरकार उदयपुर राज्य की रक्षा का वायदा करती है। उदयपुर के महाराणा सदैव अंग्रेजों के अधीन रहते हुए उनका साथ देंगे तथा अन्य राज्यों अथवा उनके शासकों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे।

    उदयपुर महाराणा अंग्रेजों की जानकारी के बिना किसी अन्य राजा के साथ न तो किसी प्रकार की संधि करेगा और न ही पत्र व्यवहार। अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ महाराणा का पत्र व्यवहार चलता रहेगा। महाराणा किसी पर अत्याचार नहीं करेगा। यदि किसी से विवाद हो जाये तो उसे मध्यस्थता के लिये कम्पनी सरकार के सम्मुख पेश करेगा।

    महाराणा आगामी पाँच वर्ष तक उदयपुर की वार्षिक आय का 1/4 भाग कम्पनी सरकार की खिराज में देगा और इस अवधि के पश्चात् रुपये का छः आने खिराज में देगा। उदयपुर महाराणा खिराज अदायगी का सम्बन्ध किसी और शक्ति अथवा राज्य के साथ नहीं रखेगा। यदि कोई और पक्ष खिराज की मांग करता है तो अंग्रेजी सरकार उसके दावे का जवाब देगी।

    संधि की सातवीं शर्त में लिखा गया था कि महाराणा का कथन है कि उदयपुर राज्य के बहुत से जिले दूसरों ने अन्याय पूर्वक दबा लिये हैं, और वे उन स्थानों को वापस दिलाये जाने की प्रार्थना करते हैं। ठीक-ठीक हाल मालूम न होने से अंग्रेजी सरकार इस बात का पक्का कौल-करार करने में असमर्थ है किंतु कम्पनी सरकार उदयपुर राज्य की समृद्धि एवं उन्नति का पूरा ध्यान रखेगी। जब कभी भी भी अंग्रेजी सरकार की सहायता से उदयपुर राज्य को जो भी स्थान वापिस मिलेगा तो उसकी आय में से उदयपुर राज्य रुपये के पीछे छः आने कम्पनी सरकार को देगा।

    आवश्यकता पड़ने पर उदयपुर अपनी सेना को अंग्रेजी सेना की सहायतार्थ भेजेगा। ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी उदयपुर राज्य के आंतरिक प्रशासन एवं सम्प्रभुता में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी। यह अहदनामा एक माह के पश्चात् लागू हो जायेगा।

    इस संधि के अनुसार मेवाड़ के महाराणा ने अंग्रेजों की सर्वाेच्चता को स्वीकार कर लिया तथा अंग्रेजों ने मेवाड़ राज्य को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करने तथा आंतरिक शांति एवं व्यवस्था बनाये रखने में सहायता देने का आश्वासन दिया। महाराणा को अपनी विदेश नीति अंग्रेजों को सौंपनी पड़ी और अपने आपसी विवादों को अंग्रेजों की मध्यस्थता तथा निर्णय हेतु वचन बद्ध होना पड़ा।

    महाराणा ने आवश्यकता के समय अपने राज्य के समस्त सैनिक संसाधन अंग्रेजों को सुपुर्द करने स्वीकार कर लिये। अंग्रेजों को वार्षिक खिराज देने के सम्बन्ध में अजीतसिंह ने राज्य के राजस्व का 1/4 भाग देने की बात कही किंतु मेटकाफ ने 3/8 भाग खिराज में देने की मांग की। अंत में यह तय हुआ कि प्रथम पाँच वर्ष तक तो मेवाड़ के राजस्व में से एक चौथाई भाग खिराज के रूप में लिया जायेगा और इसके बाद 3/8 भाग वसूल किया जायेगा।

    इस संधि के बाद कप्तान टॉड की मेवाड़ राज्य में पोलिटिकल एजेण्ट के पद पर नियुक्ति हुई। फरवरी 1818 में कप्तान टॉड उदयपुर आया। महाराणा ने उसका बड़ा भव्य स्वागत किया। एक दिन महाराणा ने सब सरदारों को बुलाकर बड़ा दरबार किया। इस दरबार में टॉड ने महाराणा से पूछा कि जो सरदार आपके विरोधी हों, उनके नाम बताईये, अंग्रेजी सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये तैयार है। महाराणा भीमसिंह ने यहाँ भी उदारता दिखायी और बोला- ''मैंने अब तक के सारे अपराध क्षमा कर दिये हैं किंतु अब जो लोग भविष्य में कसूर करेंगे, उसकी सूचना आपको दी जायेगी।"

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  • क्या समलैंगिक अब अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे ?

     06.09.2018
    क्या समलैंगिक अब अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे ?

    क्या समलैंगिक अब अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे ? 


    सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितम्बर 2018 को दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है तथा सन् 1860 के कानून का आधा हिस्सा समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही भारतीय कानून की धारा 377 का आधा हिस्सा सदा के लिए इतिहास बनकर रह गया है जिसके अंतर्गत यह प्रावधान था कि दो स्त्रियां या दो पुरुष परस्पर शारीरिक सम्बन्ध बनाने पर अपराधी माने जाते थे।

    इस कानून का आधा हिस्सा अब भी जीवित है जिसके अंतर्गत न तो किसी बच्चे के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए जा सकते हैं, न किसी जानवर के साथ ऐसा किया जा सकता है और न किसी भी व्यक्ति के साथ जबर्दस्ती की जा सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से यह तो स्पष्ट हो गया है कि दो स्त्री, दो पुरुष या दो बाईसैक्सुअल व्यक्ति अब बंद कमरे के भीतर कुछ भी करें, कानून और समाज दोनों को उनके कमरे में झांकने का अधिकार नहीं होगा किंतु अब कानून और समाज को कुछ नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

    इनमें से सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि क्या दो समलैंगिक व्यक्ति एक दूसरे से विवाह करके दाम्पत्य जीवन जी सकते हैं? दूसरी बड़ी समस्या यह होगी कि अब समलैंगिक लोग समाज, सरकार और कानून से यह मांग करेंगे कि उन्हें स्त्री, पुरुष या किन्नर से अलग किसी लिंग के रूप में मान्यता दी जाए।

    प्रकृति का नियम यह है कि दो विपरीत सैक्स वाले प्राणी समागम के द्वारा संतानोत्पत्ति करते हैं। उनमें से एक नर एवं एक मादा होता है। चूंकि समलैंगिकों में स्थिति इसके विपरीत है तथा कानून ने उन्हें वैधानिकता प्रदान कर दी है इसलिए वे स्वयं को स्त्री या पुरुष कहलवाना पसंद नहीं करेंगे।

    सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी भी माइनोरिटी कम्यूनिटी पर मैजोरिटी कम्यूनिटी की मान्यताओं, विचारों एवं परम्पराओं को नहीं लादा जा सकता। यदि समलैंगिकों की संख्या कम है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गलत हैं या वे गैरकानूनी काम कर रहे हैं।

    निकट भविष्य में सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी को आधार बनाकर कुछ लोग जानवरों के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने का अधिकार मांगेंगे। उनका तर्क भी यही होगा कि भले ही बहुसंख्यक समाज जानवरों से सम्बन्ध बनाने की अनुमति नहीं देता हो, लेकिन समाज में बहुत छोटा ही सही किंतु एक ऐसा वर्ग भी है जो पशुओं से सम्बन्ध बनाना चाहता है।

    हो सकता है कि कुछ लोग बच्चों से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने की मांग करें। ऐसीस्थितियों में कानून का रुख क्या होगा, यह तो आने वाला भविष्य ही बताएगा।

    संसार में बहुत से देशों में समलैंगिकता अपराध नहीं है। न तो कानून ही उन्हें ऐसा करने से रोकता है और न समाज। भारत हजारों साल पुरानी मान्यताओं वाला देश है। उसकी सांस्कृतिक जड़ें बहुत पुरानी हैं जिसमें समलैंगिकता को न केवल हेयदृष्टि से देखा जाता है अपितु नैतिकता की दृष्टि से भी बुरा माना जाता रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने देश के इस सांस्कृतिक चिंतन परम्परा को नकारते हुए कहा है कि समय के साथ कानून में बदलाव होना चाहिए।

    भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को चार पुरुषार्थों के रूप में माना गया है जिसका मोटा-मोटा व्यावहारिक अर्थ यह होता है कि धर्म पूर्वक अर्जित किए गए अर्थ और काम से मोक्ष की प्राप्ति होती है किंतु अब समाज को धर्मपूर्वक काम अर्जित करने के अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा। क्योंकि वैसे भी धर्मनिरपेक्ष समाज में धर्म पूरी तरह निजी एवं व्यक्तिगत मान्यताओं का पुलिंदा है, कानून किसी को धर्म की परिभाषा तय करने का अधिकार नहीं देता।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही अब भारत में सामाजिक मान्यता पर धार्मिक आस्था लादे जाने के दिन पूरी तरह लद गए हैं।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • देखते ही बनता था दो रेगिस्तानी रियासतों के राजाओं का वह मिलन

     11.07.2017
    देखते ही बनता था दो रेगिस्तानी रियासतों के  राजाओं का वह मिलन

    सूरतसिंह की मृत्यु के बाद रत्नसिंह बीकानेर का राजा हुआ। वह बीकानेर का 18वां राठौड़ राजा था। उसने 5 अप्रेल 1828 से 7 अगस्त 1851 तक बीकानेर रियासत पर शासन किया। उसके राजा बनते ही बीकानेर रियासत और जैसलमेर रियासत के मध्य झगड़ा हो गया। हुआ यूं कि जैसलमेर राज्य के राजगढ़ के भाटी बीकानेर राज्य के सरकारी सांडों का टोला पकड़ कर ले गये। मारवाड़ में मादा ऊँट को सांड कहा जाता है। शाह मानिकचंद ने उनका पीछा किया तथा राजगढ़ के हाकिम से प्रार्थना की कि वह सांडों को लौटा दे किंतु हाकिम ने उसकी सुनवाई नहीं की।

    इस पर बीकानेर राज्य से महाजन के ठाकुर वैरिशालसिंह, मेहता अभयसिंह तथा सुराणा हुकुमचंद की अध्यक्षता में 3 हजार सैनिकों ने जैसलमेर राज्य पर आक्रमण कर दिया। जैसलमेर की सेना ने वासणपी गाँव के पास बीकानेर की सेना का मार्ग रोका तथा उसमें कसकर मार लगायी। जैसलमेर की सेना ने बीकानेर की सेना का नगाड़ा छीनना चाहा किंतु एक वीर सिक्ख ने अपने प्रणा देकर नगाड़े की रक्षा की। उन दिनों युद्ध के दौरान नगाड़े तथा ध्वज का छिन जाना किसी भी राज्य एवं उसके राजा के लिये अत्यंत अपमान जनक माना जाता था।

    बीकानेर राज्य द्वारा जैसलमेर राज्य पर आक्रमण करना ईस्ट इण्डिया कम्पनी से हुई संधि की धारा 5 का उल्लंघन माना गया। इसलिये ब्रिटिश सरकार ने इस प्रकरण में हस्तक्षेप किया तथा उदयपुर के महाराणा जवानसिंह से प्रार्थना की कि वह इन दोनों राज्यों में मेल करवाये। महाराणा ने अपने विश्वासपात्र सेठ जोरावरमल को यह काम सौंपा। जोरावरमल ने परस्पर हर्जाना दिलवाने की शर्त पर दोनों पक्षों में सुलह करवा दी। इसके बाद 10 मई 1835 को बीकानेर एवं जैसलमेर राज्यों की सीमा पर अंग्रेज अधिकारियों की उपस्थिति में दोनों राजाओं के मिलना का कार्यक्रम निश्चित किया गया। लेफ्टीनेंट बोइलो ने अपनी डायरी में दोनों राजाओं के मिलने की घटना को विस्तार से अंकित किया है। बोइलो लिखता है-

    उस दिन मैं भी घड़ियाला पहुँच गया किंतु वहाँ जाकर ज्ञात हुआ कि अभी बीकानेर महाराजा के आने में एक दिन का विलम्ब है। इस पर मैं जैसलमेर राज्य के गिरिजासर गाँव में चला गया। घड़ियाला बीकानेर की सुदूर पश्चिमी सीमा पर बसा हुआ एक गाँव है जिसमें 130 घरों की बस्ती और एक छोटा सा दुर्ग है। जैसलमेर महारावल के ठहरने के लिये गिरजासर गाँव चुना गया था वह घड़ियाला से बड़ा है तथा वहाँ 300 से अधिक घर और एक दुर्ग है। वहाँ पहुंचने पर मैं लेफ्टीनेंट ट्राविलियन से मिला जो महाराजा को 10 मई को वहाँ लाने में सफल हुआ था। उसी दिन दोनों राजाओं को मिलना था किंतु दोनों राजाओं के थके हुए होने के कारण यह कार्य 12 मई के लिये निश्चत किया गया।

    11 मई को दोनों राज्यों की सीमा पर एक बड़ा सा शामियाना लगाकर दौलतखाना बनाया गया। सौ फुट लम्बी तथा 24 फुट चौड़ी जगह में दोनों ओर बराबर-बराबर भूमि में खेमे खड़े किये गये। भेंट के लिये नियत स्थान के दक्षिणी भाग में लेफ्टीनेंट ट्राविलियन का खेमा था। शामियाने में एक सिंहासन इस प्रकार रखा गया था कि उसका आधा-आधा भाग दोनों राज्यों की सीमा में पड़ता था। अन्य प्रबंध भी इसी भांति निष्पक्षता के साथ किये गये थे। दोनों राजाओं के लिये ऐसा प्रबंध किया गया था कि दौलतखाने में उनका आगमन एक ही समय में हो। दो विभिन्न द्वारों से खेमे में राजाओं का आना निश्चित हुआ था। अतः उनकी पेशवाई के लिये पैदल सेना को दो भागों में विभक्त करके दोनों ओर के दरवाजों पर खड़ा किया गया। दोनों सीमाओं पर खेमे के सामने एक पंक्ति में घुड़सवार खड़े किये गये। उनके पीछें तोपें इस प्रकार रखी गयीं जिससे एक-एक तोप सीमा के दोनों तरफ पड़ती थी। फिर एक तोप दागी गयी।

    12 मई को नियत समय पर एक तोप दागी गयी जिसे सुनकर घड़ियाला से बीकानेर महाराजा एवं गिरिजासर जैसलमेर महारावल अपने-अपने डेरे से रवाना हुए। बीकानेर महाराजा को डेढ़ मील की दूरी तय करनी थी तथा जैसलमेर महारावल को दो मील की। इसलिये बीकानेर महाराजा पहले ही सीमा पर पहुँच गया। जब दोनों राजा सीमा पर पहुँच गये तो दोनों ओर की तोपों से 17-17 तोपों की सलामियां सर की गयीं। इसके बाद वे अपनी अपनी खासों (ढंगकी हुई पालकियों) से नीचे उतरे। यह पूर्व में ही निश्चित कर लिया गया था कि दोनों ओर के महाराजा अपने साथ कम आदमी लायें किंतु मिलन स्थल पर लगभग तीन हजार आदमी एकत्र हो गये थे। सजे हुए हाथी, घोड़े, नक्कारे, निशान आदि से पूरा क्षेत्र गरिमामय हो गया था।

    सामान्यतः जब भी कोई राजा किसी स्थान पर पहुँचता था तो अंग्रेज अधिकारी उनकी पेशवाई करते थे किंतु इस समय पर अंग्रेज अधिकारियों ने उनकी पेशवाई नहीं की। खेमे के निकट पहुँचने पर दोनों ओर के सैनिकों ने अपने-अपने राजाओं का स्वागत किया। दोनों राजाओं के साथ-साथ प्रमुख ठाकुर तथा महाजन आये थे। अपने जीवन में पहली बार दोनों राजा एक ही तम्बू के नीचे एकत्रित हुए। लेफ्टीनेंट ट्राविलियन खेमे के बीच में दोनों राज्यों की सीमा के मध्य में खड़ा हुआ था। जब दोनों राजा खेमे के मध्य में पहुँचे तो लेफ्टीनेंट ट्राविलियन ने दोनों की तरफ अपना एक-एक हाथ बढ़ाया और उनका मिलाप करवा दिया। फिर दोनों राजाओं ने एक दूसरे से जुहार किया। जब दोनों राजा गले लगे तो दोनों ओर के खेमों से 'मुबारक-मुबारक’की ध्वनि आने लगी। दोनों राजा सिंहासन पर बैठे। इस बीच उनके दरबारी भी अंदर आ गये। वे लोग भड़कीली पोशाक और कीमती आभूषण पहने हुए थे। राजाओं ने केवल श्वेत रंग के जामे और मोतियों तथा पन्नों के कंठे पहने थे। दोनों राजाओं की कमर में खंजर लगे हुए थे।

    लेफ्टीनेंट ट्राविलियन महाराजा के दाहिनी तरफ तथा लेफ्टीनेंट बोइलो महारावल के बायीं तरफ नीचे गलीचे पर बैठे। राजाओं के मंत्री तथा सरदार उनके चारों ओर घेरा बनाकर बैठ गये। दरवाजों के सामने के गलीचे पर अन्य सम्मानित सरदार थे और निम्न श्रेणी के सरदार बाहर तक खड़े हुए थे। मेवाड़ का साहूकार जोरावरमल जो कि दोनों ही राजाओं का मित्र था, इस समय जैसलमेर की पंक्ति में बैठा। दोनों राजाओं ने एक दूसरे को अपने सरदारों का परिचय दिया। दोनों ही राजाओं ने अंग्रेज अधिकारियों की प्रशंसा की। इसके बाद इत्र एवं पान की रस्म हुई। लेफ्टीनेंट ट्राविलियन ने अपने दोनों हाथों से दोनों महाराजाओं को एक साथ इत्र लगाया जिससे जैसलमेर के महारावल को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसे भय था कि चूंकि लेफ्टीनेंट ट्राविलियन बीकानेर महाराजा के पास बैठा था अतः वह पहले उसे ही इत्र लगायेगा तथा जिसे पहले इत्र लगाया जायेगा वही राजा शक्तिशाली माना जायेगा।

    दोनों राजा अंग्रेज अधिकारियों एवं एक दूसरे को धन्यवाद देकर सिंहासन से उठ खड़े हुए तथा एक दूसरे को जुहार करके जिस तरह खेमे में आये थे उसी तरह खेमे से बाहर चले गये। इस अवसर पर सलामी की तोपें नहीं दागी गयीं किंतु दोनों शासकों के अपने-अपने खेमे में पहुँचने पर उनकी तरफ के लोगों ने सलामियां सर कीं। इस प्रकार मेल हो जाने पर दोनों राजाओं को बाद में भेंट करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। 16 मई को दोनों राजा एक दूसरे के खेमे में गये। दोनों ने एक दूसरे को बहुत से हाथी घोड़े तथा रत्न आदि के उपहार दिये। लेफ्टीनेंट ट्राविलियन ने दोनों तरफ के तीन-तीन आदमियों की समिति बनाकर समझौते की शर्तें निश्चित कर दीं तथा लिखित समझौता सम्पन्न हो गया। इसके बाद दोनों राजा अपनी-अपनी राजधानी को लौट गये।

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  • महाराजा ने लेडी वायसराय के कुत्ते को अपने डेरे में नहीं घुसने दिया

     10.09.2018
    महाराजा ने लेडी वायसराय के कुत्ते को अपने डेरे में नहीं घुसने दिया

    महाराजा ने लेडी वायसराय के कुत्ते को अपने डेरे में नहीं घुसने दिया


    अलवर के महाराजा जयसिंह की गिनती भारत के इतिहास में बीसवीं सदी के महान व्यक्तियों में होती है। महाराजा स्वतंत्र विचारों के धनी और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। उनकी राष्ट्रभक्ति असंदिग्ध थी। इस कारण अंग्रेज उनकी तरफ से सदैव ही आशंकित रहते थे। महाराजा जयसिंह केवल 10 वर्ष की आयु में राजा बने थे।

    वे स्वयं को भगवान श्रीराम का अवतार समझते थे तथा अपने हाथ की दिव्य अंगुलियों को ढंकने के लिये सिल्क के काले रंग के दस्ताने पहनते थे। यहाँ तक कि एक बार उन्होंने ब्रिटिश सम्राट से हाथ मिलाते समय भी अपने दस्ताने उतारने से मना कर दिया था। भारत में ऐसा करने की हिम्मत केवल दो राजाओं में थी, एक थे उदयपुर के महाराणा फतेहसिंह तथा दूसरे थे अलवर के महाराजा जयसिंह। इन दोनों को ही अंग्रेजों ने राजगद्दी से हटाया। उदयपुर का राज्य तो उनके पुत्र भगवंतसिंह को दे दिया गया तथा महाराणा अपने राज्य में बने रहे किंतु अलवर का राज्य छीनकर महाराजा जयसिंह को अलवर राज्य से निकाल दिया गया।

    अलवर के इस महान राजा के बारे में आज लोग भूल गए हैं किंतु उनका इतिहास भारत के प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी है। युवाओं को उनका जीवन चरित्र अवश्य पढ़ना चाहिए। वे खेलों के मैदान में भवागन नटवर नागर कृष्ण की सी कलाबाजियां दिखाने में कुशल थे। चाहे पोलो हो या क्रिकेट, घुड़सवारी हो या शिकार, इन सब में वे असाधारण थे। ऐसे व्यक्ति के प्रति वीर पूजा के भाव स्वतः ही जागते हैं। अतः जनता उनकी प्रशंसक थी। अंग्रेज उनसे इस कारण दुखी रहते थे कि वह अंग्रेजों को अपने से बड़ा नहीं मानते थे।

    एक बार महाराजा ग्रीष्म प्रवास पर शिमला गए। वहां उन्हें ज्ञात हुआ कि भारत के वायसराय का परिवार भी शिमला आया हुआ है। महाराजा ने सदाशयता के नाते लेडी वायसराय को सायंकालीन भोजन के लिए अपने डेरे पर आमंत्रित किया। लेडी वायसराय संध्या काल में अपने पालतू कुत्ते के साथ महाराजा के डेरे पर पहुंची। महाराजा ने नियम बना रखा था कि उनके डेरे में कोई कुत्ता प्रवेश नहीं कर सकता था। लेडी वायसराय को महाराजा के नियम से अवगत करवाया गया तथा अनुरोध किया कि वह कुत्ता, अपने सेवकों के साथ डेरे के बाहर छोड़ दे किंतु लेडी वायसराय ने जवाब दिया कि वह हिन्दुस्तान के स्वामी की पत्नी है और अपने कुत्ते को जहां चाहे लेजा सकती है।

    महाराजा के अधिकारियों ने महाराजा को लेडी वायसराय के कुत्ते सहित आगमन की सूचना दी। महाराजा ने उन्हें कहा कि लेडी को आदर पूर्वक डेरे में लाया जाए किंतु उनके कुत्ते को डेरे से बाहर रोक लिया जाए। सेवकों ने महाराजा को बताया कि लेडी अपने कुत्ते के साथ ही डेरे के भीतर आने की जिद्द कर रही है। इस पर महाराजा ने अपने अधिकारियों से कहा कि वे लेडी वायसराय से आग्रह करें कि वे अपनी जिद्द छोड़ दें। महाराजा के इस जवाब से लेडी वायसराय नाराज हो गई और डेरे के बाहर से ही बिना भोजन किए लौट गई।

    जब इस घटना की जानकारी देश भर के अंग्रेज अधिकारियों को हुई वे सन्न रह गए किंतु देशवासियों का सीना महाराजा के इस स्वाभिमान पूर्वक आचरण की सूचना पाकर गर्व से फूल गया। महाराजा को बाद में इसकी कीमत अपना राज्य तथा अपने प्राण गंवाकर चुकानी पड़ी।

    महाराजा को उनके राज्य से निष्कासित करने के लिए अंग्रेजों ने कई चालें चलीं। उनके बारे में प्रचारित किया गया कि अलवर नरेश जयसिंह ने एक बार अपने घोड़े को इसलिए पैट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया क्योंकि वह रेस नहीं जीत सका था। कोरफील्ड ने लिखा है कि महाराजा अपनी प्रजा की अपेक्षा अपने कुत्तों का अधिक ध्यान रखते थे। उनके बारे में दुष्प्रचार किया गया कि महाराजा के खर्चे बहुत बढ़े हुए थे जिसके कारण वे ऋण के बोझ से दबे हुए थे।

    एक तत्कालीन इतिहासकार ने महाराजा के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए लिखा है-‘महाराजा जयसिंह अपने समय का बहुत विद्वान और दार्शनिक नरेश था। महाराजा जितनी कुशाग्र बुद्धि रखता था उतना ही निरंकुश था। वह हिन्दी भाषा का प्रेमी था, यों अंग्रेजी और फारसी का भी अच्छा ज्ञान रखता था।’ महाराजा को अंग्रेजी और हिन्दी पर समान अधिकार था और उन्हें संस्कृत का भी ज्ञान था। महाराजा जायसिंह एक योग्य प्रशासक थे जिन्होंने अलवर राज्य का शासन प्रबंध आधुनिक रीति के अनुसार किया। वे पोलो तथा रैकेट के अच्छे खिलाड़ी थे। वे हिन्दू दर्शन के प्रकाण्ड ज्ञाता और उच्च कोटि के वक्ता थे। वे कई मायनों में अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में भाग लिया।

    महाराजा जयसिंह महान क्षमताओं से युक्त थे’। बीसवीं सदी के परतंत्र भारत में बीकानेर नरेश गंगासिंह के साथ अलवर नरेश जयसिंह भी नरेन्द्र मण्डल की राजनीति में अग्रणी रहे थे। जयसिंह ने लंदन में ई.1931 में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भी भाग लिया था। महाराजा की क्षमाशीलता की अनेक कहानियां प्रचलित थीं। राज्य का एक पदाधिकारी को नौकरी से निकाल दिया गया। वह कई दिनों तक हताश होकर इधर-उधर फिरता रहा। एक दिन उसने नीचे लिखा हुआ उर्दू पद्य महाराज की सेवा में डाक से भेजा-

    मेरे गुनाह ज़ियादा हैं, या तेरी रहमत।

    हिसाब करके बतादे, मेरे रहीम मुझे।।


    महाराजा ने उस कर्मचारी को बहाल कर दिया। एक बार एक गरीब बुढ़िया जयसमन्द बान्ध में डूबने लगी। महाराज भी अपने अंगरक्षकों सहित वहीं थे। गहरे पानी में डूबती बुढ़िया की दयनीय दशा देखकर भी किसी का कर्मचारी का साहस उसे बचाने का न हुआ। महाराजा ने स्वयं जल में कूदकर बुढ़िया के प्राणों की प्राण रक्षा की।

    पण्डित मोतीलाल नेहरू ने एक बार शिमला में महाराजा के बारे में कहा था कि यह देश के लिये दुर्भाग्य की बात है कि उनका जनम राजकुमार के रूप में हुआ अन्यथा देश को एक बहुत योग्य और बड़ा नेता मिला होता।

    एडविन मांटेग्यू ने महाराजा जयसिंह के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए अपनी डायरी में लिखा है- ‘महाराजा जयसिंह के समान कोई अन्य भारतीय इतना बुद्धिमान नहीं है।’ 28 फरवरी 1920 के अपने भाषण में मांटेग्यू चैम्सफोर्ड ने कहा था- ‘अलवर का शासन प्रबंध तो उत्तम है, प्रजा की प्रसन्नता तथा सांत्वना और भी बड़ी बात हैं जिन पर अलवर नरेश का पूरा ध्यान है। महाराजा ने बन्धों के निर्माण कार्य द्वारा भूमि को सजला और शस्य श्यामला बनाने का जो प्रयत्न किया है, उनसे अकाल का भय न रहेगा और कृषक प्रजा सुखी रहेगी।’

    इसके बावजूद कुछ अंग्रेज अधिकारी महाराजा जयसिंह से शत्रुता रखते थे और उन्हें पदच्युत करना चाहते थे। मेवों द्वारा राज्य में भयानक विद्रोह करने तथा राज्य के एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी द्वारा किसानों पर अत्याचार किए जाने से मची साम्प्रदायिक मार-काट के बाद अंग्रेजों ने बड़े ही मनमाना ढंग से 16 जून 1934 को महाराजा जयसिंह को उनके राज्य से बाहर निकाल दिया। महाराजा को राज्य छोड़कर विलायत जाना पड़ा।

    19 मई 1937 को पेरिस में टेनिस खेलते हुए रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। कुछ भारतीय इतिहासकारों को महाराजा की मृत्यु के पीछे अंग्रेजों का षड़यंत्र लगता है। शरीर त्याग से 4 घण्टे पूर्व तक महाराजा रघुनाथजी के ध्यान में मग्न रहे।

    महाराजा जयसिंह की मृत्यु पर झालावाड़ नरेश महाराजराणा राजेन्द्रसिंह ने लिखा था-

    कैसो रंग मांहि भंग कियो है कराल काल,

    सूखी फुलवारी आज रम्य काम काज की।

    मिट गयो वीरता के भाल को तिलक लाल,

    टूट गई आज ढाल क्षत्रिय समाज की।

    सूख गयो हाय! आज प्रेम को अगाध सिन्धु,

    कविता मिलेगी कहां रस सिर ताज की।

    उर पर आरी चली काल की कटारी चली,

    स्वर्ग को सवारी चली प्यारे जयराज की।


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  • उदयपुर राज्य में कप्तान टॉड के शासन ने अंग्रेजों की धाक जमा दी

     12.07.2017
    उदयपुर राज्य में कप्तान टॉड के शासन ने  अंग्रेजों की धाक जमा दी

    बीकानेर के महाराजा तथा जैसलमेर के महारावल में सुलह करवाने वाला सेठ जोरावरमल मूलतः जैसलमेर का ही रहने वाला ओसवाल बनिया था किंतु वह होलकर के इंदौर राज्य में जाकर व्यापार करने से खूब उन्नति कर गया था। उसने बड़े-बड़े शहरों में अपनी दूकानें स्थापित कर ली थीं। इंदौर का राजा उसे कई राजकीय दायित्व भी सौंपता रहता था। उसी ने होलकर तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य समझौता करवाया था। इससे प्रसन्न होकर कम्पनी सरकार तथा होलकर ने उसे कई सम्मान दिये थे।

    जब ई.1818 में कप्तान टॉड मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त हुआ तो उसने मेवाड़ की आर्थिक दशा सुधारने के लिये सेठ जोरावरमल को इंदौर से उदयपुर बुलाया। महाराणा ने जोरावरमल से आग्रह किया कि वह उदयपुर में अपनी दूकान स्थापित करे तथा राज्य के कामों में जो रुपये खर्च हों वे तुम्हारी दुकान से दिये जायें और राज्य की सारी आय तुम्हारे यहाँ जमा रहे। जोरावरमल ने टॉड तथा महाराणा का आग्रह स्वीकार करके अपनी दूकान उदयपुर में स्थापित कर ली। उसने नये खेड़े बसाये, किसानों को सहायता दी और चोरों एवं लुटेरों को दण्ड दिलवाकर मेवाड़ राज्य में शांति स्थापित करने में सहायता की। उसका कुशल प्रबंधन देखकर पोलिटिकल एजेण्ट ने अंग्रेजी कोष का प्रबंध भी उसी को सौंप दिया। महाराणा ने उसे पालकी तथा छड़ी का सम्मान, बदनोर परगने का पारसोली गाँव तथा सेठ की उपाधि प्रदान की।

    इसके बाद कर्नल टॉड ने अपना ध्यान मेरवाड़ा क्षेत्र की ओर लगाया। राजपूताने के ठीक मध्य में स्थित इस पहाड़ी प्रदेश में मेर जाति बड़ी संख्या में रहती थी जो जंगली, युद्धप्रिय और बहुत उपद्रवी थी। इस प्रदेश का कुछ भूभाग मेवाड़ रियासत में, कुछ भूभाग मारवाड़ रियासत में तथा कुछ भाग अजमेर जिले के अंग्रेजी शासन वाले क्षेत्र में आता था। 25 जून 1818 को सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंप दिया था। इसलिये अंग्रेजी सरकार ने इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिये उसी साल नसीराबाद में सैन्य छावनी स्थापित की। अक्टूबर 1818 में टॉड ने मेरों को दबाने के लिये रूपाहेली के ठाकुर सालिमसिंह की अध्यक्षता में मेवाड़ के बदनोर, देवगढ़, आमेट तथा बनेड़ा ठिकानों की सेनायें भेजीं। टॉड ने मेवाड़ के पूर्वोत्तर भाग के समस्त छोटे-बड़े सरदारों, जागीरदारों, भोमियों तथा आसियों आदि को भी मेरवाड़े पर भेजा। मेरों ने पहाड़ों के संकरे रास्तों पर नाकाबंदी करली जिससे घबराकर रूपाहेली के ठाकुर ने पहाड़ों पर आक्रमण करने का निश्चय त्याग दिया तथा मैदानी क्षेत्रों में अपने थाने बैठा दिये।

    मार्च 1919 में अंग्रेजी सेना भी सालिमसिंह से आ मिली। इन दोनों सेनाओं ने मिलकर मेरों के मुख्य स्थान बोरवा, झाक और लुलुवा पर अधिकार कर लिया तथा अपने थाने बैठा दिये। इस पर मेरों ने जोधपुर राज्य की तरफ से अंग्रेजी थानों पर हमले करने आरंभ कर दिये। नवम्बर 1819 में टॉड जोधपुर आया तथा उधर से भी थानों का प्रबंध करवा दिया। इस प्रकार मेरवाड़ा चारों ओर से घिर गया। जब सालिमसिंह रूपाहेली को लौट गया तो मेरों ने थानों पर हमला करके अंग्रेजी थानेदारों को मार डाला तथा कई थाने उठा दिये। इस पर सालिमसिंह फिर लौट कर आया। उसने सैंकड़ों मेरों को मार डाला तथा टॉड के निर्देश पर फिर से थाने स्थापित करके उनमें 100-100 सिपाही तैनात कर दिये।

    कर्नल टॉड ने मेरवाड़ा में अंग्रेजी सेनाएं रखने के लिये दो नये दुर्ग बनवाये। एक का नाम टॉडगढ़ तथा दूसरे का नाम महाराणा के नाम पर भीमगढ़ रखा। मेरों को लुटेरों से किसान बनाने के लिये मेवाड़ राज्य की ओर से जमीनें प्रदान की गयीं तथा कुछ मेरों को सेना में भर्ती करने के लिये मेर बटालियन का गठन किया गया। मेरों को दबाने में सफल रहने पर सालिमसिंह को कप्तॉन टॉड की ओर से प्रशंसा पत्र तथा महाराणा की ओर से अमर बेलणा घोड़ा, बाड़ी तथा सीख का सिरोपाव दिया गया। अमर बेलणा घोड़ा उस घोड़े को कहते थे जिसके बूढ़ा होने पर या मरने पर उसके स्थान पर दूसरा घोड़ा भेजा जाता था। सीख का सिरोपाव प्रतिवर्ष दशहरे पर नौकरी समाप्त कर अपने ठिकाने में लौटने वाले सरदार को दिया जाता था।

    मेरवाड़ा पर तीन राज्यों का अधिकार होना ठीक न समझ कर दिल्ली के रेजीडेण्ट जनरल ऑक्रलोनी ने मारवाड़ तथा मेवाड़ के शासकों को लिखा कि वे अपने राज्य में आने वाले मेरवाड़ा प्रदेश के गाँव 10 वर्ष के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंप दे। मारवाड़ तो इस बात को मान गया किंतु मेवाड़ ने इन्कार कर दिया। इस पर कम्पनी ने बलपूर्वक मेवाड़ के हिस्से वाला मेरवाड़ा अपने अधीन कर लिया। इस घटना से महाराणा भीमसिंह बड़ा दुखी हुआ। महाराणा ने इसकी शिकायत गवर्नर जनरल से की। गवर्नर जनरल ने चार्ल्स मेटकाफ के माध्यम से महाराणा को पत्र लिखवाकर इस घटना के लिये खेद व्यक्त किया किंतु मेरवाड़ा के क्षेत्र पर अंग्रजों का अधिकार बना रहा। ई.1847 में यह क्षेत्र सदा के लिये अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

    टॉड ने मेवाड़ की आय बढ़ाने के लिये कई उपाय किये। उसने ई.1819 में झाला जालिमसिंह से जहाजपुरा का परगना फिर से प्राप्त कर मेवाड़ में मिला दिया तथा महाराणा का दैनिक व्यय 1000 रुपये स्थिर किया। ई.1818 में मेवाड़ राज्य की वार्षिक आय 1 लाख 20 हजार रुपये थी किंतु टॉड की व्यवस्था से ई.1821 में यह आय बढ़कर 8 लाख 77 हजार 634 रुपये हो गयी। ई.1822 में यह 11 से 12 लाख रुपये के बीच में अनुमानित की गयी। राज्य की आय में जबर्दस्त वृद्धि के उपरांत भी अंगेजी सरकार का खिराज था महाराणा को 1000 रुपये प्रतिदिन जेबखर्च दिया जाना सरल कार्य नहीं था। इस कारण टॉड ने एक साहूकार से 18 रुपये सैंकड़ा सूद की दर से कर्ज लिया।

    ई.1821 में कप्तान टॉड बीमार पड़ गया और अपने सहायक एजेंट कप्तान वॉग को कार्यभार सौंप कर इंगलैण्ड चला गया। इस पर राज्य का शासन प्रबंध फिर से महाराणा के हाथ में आ गया। वॉग ने महाराणा को 1000 रुपये रोज दिलवाने की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया जिससे महाराणा को निजी व्यय का प्रबंध स्वयं की करना पड़ा। मार्च 1823 में कप्तान स्पीयर्स मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट होकर आया किंतु एक माह बाद ही उसके स्थान पर कप्तान कॉव आ गया। कॉव को ज्ञात हुआ कि महाराणा ने एक वर्ष के भीतर 83 गाँव विभिन्न लोगों को दे दिये हैं जिससे राज्य की आय घट गयी है तथा महाजन का कर्ज 2 लाख रुपये एवं अंग्रेज सरकार का खिराज 8 लाख रुपये चढ़ गया है। कॉव ने महाराणा को एक हजार रुपया प्रतिदिन देकर शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया।

    इस समय मेवाड़ में शासन प्रबंध महाराणा तथा अंग्रेज सरकार दोनों की ओर से होता था। महाराणा की तरफ से प्रत्येक जिले में कामदार और एजेंट की ओर से चपरासी नियुक्त था। दोनों मिलकर आय वसूल करते थे। इस द्वैध शासन से तंग आकर जनता ने अंग्रेज सरकार से शिकायत की। इस पर कॉव ने कुछ सुधार किये। कॉव के प्रबंध से राज्य की आय फिर से सुधर गयी तथा महाराणा का खर्च, अंग्रेजी सरकार का खिराज एवं महासन का सूद एवं असल सभी कुछ चुका दिये गये। ई.1826 में कॉव के स्थान पर कप्तान सदरलैण्ड मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट बना। उसने पहले के एजेंटों द्वारा नियुक्त चपरासियों को थानों और परगनों में से बाहर निकाल दिया


    इस प्रकार कप्तान टॉड तथा कप्तान कॉव ने मेवाड़ राज्य में जो शासन व्यवस्था एवं आर्थिक पबंध लागू किये उनसे मेवाड़ राज्य की आय में तो वृद्धि हुई ही, साथ ही राजपूताना की रियासतों में अंग्रेजी शासन की धाक जम गयी।

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  • क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था?

     23.09.2018
    क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था?

    क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था?


    भारतीय जनमानस में यह प्रबल धारणा है कि आदि जगद्गुरु भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था। क्या परकाया प्रवेश संभव है? क्या आज तक किसी ने भी परकाया प्रवेश किया है? क्या भगवान शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था? इन प्रश्नों के जवाब देश, काल और पात्र के अनुसार अलग-अलग प्राप्त होते हैं।

    श्रद्धा, तर्क, बुद्धि, मन, अनुभव, भक्ति, चित्तवृत्ति एवं अहंकार के कारण इन प्रश्नों के जवाब बदल जाते हैं। कुछ लोग इसे आंखों देखे सत्य की तरह बताएंगे तो कुछ इसे पाखण्ड बताने में भी संकोच नहीं करेंगे।

    शंकराचार्य के साथ हुई परकाया प्रवेश की घटना का इतिहास लगभग हर भारतीय जानता है। जब वे बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को खोखला सिद्ध करने और वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना करने में लगे थे तब उन्होंने अद्वैतवाद के दर्शन का प्रतिपादन किया। इस सिद्धांत के अनुसार ईश्वर और जीव एक ही हैं, ये दो नहीं हैं। ईश्वर ही जीव बनता है और जीव पुनः ईश्वर में लौट जाता है। अर्थात् जीव का क्षरण नहीं होता केवल रूपांतरण होता है। यह सिद्धांत एकोअ्हम् द्वितीयो नास्ति के मूल सिद्धांत पर खड़ा है। वे भारत भर में घूम-घूम इन सिद्धांतों का प्रचार कर रहे थे तथा मनुष्य मात्र को संदेश दे रहे थे कि आप स्वयं ईश्वर ही हैं अतः अपनी आत्मा को ऊपर उठाने का प्रयास 
    करें। इसी में जीवन की सार्थकता है। 

    जब शंकराचार्य ने काशी के समस्त विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया तब वे मिथिला की ओर गए जहां उन दिनों मण्डन मिश्र की बहुत ख्याति थी। उन्होंने मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी। मण्डन की पत्नी भारती अत्यंत विदुषी स्त्री थी। मण्डन और शंकर के बीच हुए शास्त्रार्थ की निर्णायक भारती को ही बनाया गया। क्योंकि उस स्तर का अन्य कोई विद्वान वहां उपलब्ध नहीं था। कई दिनों तक हुए शास्त्रार्थ के बाद शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को परास्त कर दिया।

    यह देखकर मण्डन मिश्र की पत्नी भारती को बहुत दुःख हुआ। अतः उसने शंकर से कहा कि मैं अपने पति का आधा शरीर हूँ। इसलिए आप मुझसे भी शास्त्रार्थ करें। कई दिनों तक शंकराचार्य को सुनने के कारण भारती, शंकराचार्य के ज्ञान की सीमाओं को पहचान गई थीं। अतः उन्होंने शंकराचार्य से कहा कि वे कामशास्त्र पर शास्त्रार्थ करेंगी।

    शंकराचार्य ने भारती की चुनौती तो स्वीकार कर ली किंतु उन्होंने भारती से कहा कि मैं आदि ब्रह्मचारी हूं। मुझे कामशास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है। अतः मुझे छः माह की अनुमति दें ताकि मैं इस शास्त्र का अध्ययन करके स्वयं को शास्त्रार्थ के योग्य बना सकूं। भारती ने शंकर को छः माह की अनुमति दे दी।

    शंकरचार्य ने काम का ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति तो ले ली किंतु उन्हें योग्य गुरु मिलना संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने परकाया प्रवेश करके स्वयं इसका अनुभव करने का निश्चय किया।

    शंकराचार्य को ज्ञात हुआ कि एक राजा की युवा अवस्था में ही मृत्यु हो गई है। शंकराचार्य ने उस राजा के शरीर में प्रवेश करने का निर्णय लिया। शंकर ने एक गोपनीय स्थान पर अपने शिष्यों के संरक्षण में अपनी देह का त्याग किया तथा अपने शरीर की देखभाल करने का निर्देश देकर स्वयं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ राजा के मृत शरीर में प्रवेश कर गए।

    लोगों ने समझा कि राजा पुनर्जीवित हो गया है। इस प्रकार राजा की देह में रहकर शंकर ने कामकला का रहस्य ज्ञात किया तथा छः माह बाद राजा का शरीर छोड़कर पुनः अपनी देह में प्रवेश कर गए। इस बार उन्होंने देवी भारती को कामशास्त्र में परास्त कर दिया। मण्डन तथा भारती ने शंकराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण किया तथा वे भी वैदिक धर्म तथा अद्वैत सिद्धांत के प्रचार में लग गए और इनके माध्यम से मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति का उपदेश करने लगे।

    यह एक बहुश्रुत कथा है किंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था? क्या ऐसा किया जाना संभव है? परकाया प्रवेश का अर्थ है- मनुष्य के किसी अंश का एक शरीर में से निकल कर दूसरे शरीर में प्रवेश करना। इस अंश को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। सूक्ष्म शरीर के भीतर जीवात्मा निवास करता है।

    यदि परकाया प्रवेश की प्रक्रिया संभव है तो इस प्रक्रिया के दौरान मनुष्य की एक अवस्था ऐसी अवश्य आएगी जब वह बिना स्थूल शरीर वाले, अर्थात् सूक्ष्म शरीर वाले अस्तित्व में आएगा। यदि ऐसा किया जाना संभव है, तभी परकाया प्रवेश भी संभव है, अन्यथा नहीं। भारत सहित विश्व भर की संस्कृतियों में बिना शरीर वाली आत्माओं के बारे में विश्वास किया जाता है। हिन्दू उन्हें भूत-प्रेत कहते हैं, ईसाई उन्हें घोस्ट एवं स्पिरिट कहते हैं और मुसलमान उन्हें जिन्न एवं परी कहते हैं।

    सूक्ष्म शरीर धारी जीवात्मा तथा बिना शरीर वाले भूत, प्रेत में अंतर है। विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार ये सभी परकाया प्रवेश कर सकते हैं किंतु इस प्रक्रिया एवं परिणाम दोनों में बहुत अंतर है। जीवित व्यक्ति यदि परकाया प्रवेश करता है तो उसे अपना स्थूल शरीर त्यागकर, अर्थात् सूक्ष्म शरीर के माध्यम से किसी अन्य काया में प्रवेश करना होता है। सूक्ष्म शरीर में भार नहीं होता किंतु उसमें रंग-रूप आकृति अत्यंत सूक्ष्म रूप से विद्यमान होते हैं जिन्हें साधारण मनुष्य की आंखों से नहीं देखा जा सकता। यह प्रायः मनुष्य के अंगूठे के आकार का होता है। जबकि भूत-प्रेत आदि के पास न तो स्थूल शरीर होता है और न सूक्ष्म शरीर ही। इसीलिए उन्हें ऊपरी-हवा भी कहा जाता है। वे अपने होने का अहसास करवाते हैं, उनके पास भौतिक रंग, रूप, शरीर, आकृति, भार जैसी चीजें नहीं होतीं। अतः मनुष्य इन अस्तित्वों को नहीं देख सकते। कई बार भूत-प्रेत अपने आसपास से बहुत थोड़ी मात्रा में भौतिक पदार्थ ग्रहण करके रंग-रूप एवं आकृति का अहसास करवाते हैं किंतु यह रंग-रूप और आकृति वास्तविक नहीं होते। परकाया प्रवेश की घटना को समझने के लिए सूक्ष्म शरीर तथा भूत-प्रेत का अंतर समझना चाहिए।

    शंकराचार्य भूत-प्रेत नहीं थे, उन्होंने परकाया प्रवेश के लिए स्थूल शरीर का त्याग करके, सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरे स्थूल शरीर में प्रवेश किया था। परकाया प्रवेश से पहले आदमी को सूक्ष्म शरीर की अवस्था में आना पड़ता है न कि भूत-प्रेत की। अतः कहा जा सकता है कि परकाया प्रवेश किसी साधना या सिद्धि का परिणाम है जबकि मनुष्य शरीर में भूत-प्रेत का प्रवेश किसी दुर्घटना या आधिभौतिक बाधा का परिणाम है।

    प्राचीन भारतीय ग्रंथ, परकाया प्रवेश की घटनाओं का उल्लेख करते हैं। महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में आई एक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र किसी कारण, ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गया। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात था। उसे योग दृष्टि से ज्ञात हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु-पत्नी से बदला लेने वाला है। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु-पत्नी के शरीर में प्रवेश करके उसे इन्द्र से बचाया।

    महाभारत के शान्ति पर्व में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक नहीं था।

    योग वसिष्ठ नामक ग्रंथ में महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को परकाया प्रवेश की विधि समझाते हुए कहते हैं कि हे राम! जिस तरह वायु पुष्पों से गंध ख्रींचकर उसका सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से करा देती है, उसी तरह योगी रेचक के अभ्यास रूप योग से कुंडलिनी रूपी घर से बाहर निकलकर दूसरे शरीर में जीव का सम्बन्ध कराते हैं।

    ‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेक योग विभूतियों का वर्णन है।

    मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके कर्म भी गमन करते हैं जो उसके अगले जन्म का निर्धारण करते हैं। कई बार मनुष्य के शरीर पर पिछले जन्म की घटनाओं के निशान दिखाई देते हैं। जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि।

    मृत्यु के समय भौतिक देह में से निकल कर जाने वाले सूक्ष्म शरीर को यदि कोई मनुष्य, मृत्यु से पहले ही जाग्रत कर भौतिक शरीर से अलग करने में सफल हो जाए तो वह परकाया प्रवेश की शक्ति को प्राप्त कर सकता है। यह तभी संभव है जब कोई व्यक्ति अपने शरीर, मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार पर अधिकार कर ले। इन चीजों पर कई प्रकार से नियंत्रण पाया जा सकता है। पहला है योग, दूसरा है किसी सिद्ध पुरुष या गुरु की कृपा, तीसरा है भक्ति का बल, चौथा है ईश्वरीय अनुकम्पा, पांचवा है अपने पूर्व जन्मों के संस्कार अथवा उनकी स्मृति। इनके अतिरिक्त भी कुछ अन्य कारणों से भी मनुष्य अपने शरीर, मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार पर नियंत्रण पा सकता है किंतु ऐसा किए बिना न तो स्थूल शरीर छोड़कर सूक्ष्म शरीर में आना संभव है न परकाया प्रवेश करना।

    स्थूल शरीर से बाहर निकलकर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करने की घटनाएं भारतीय संस्कृति में बहुत आम बताई जाती हैं। इसके लिए बहुत से परावैज्ञानिक एक तरीका बताते हैं जिसका उल्लेख यहां करना समीचीन होगा।

    कोई भी मनुष्य सात्विक भोजन, व्यायाम, प्राणायाम एवं अन्य योग अभ्यास से अपने शरीर को ऊर्जावान एवं स्फूर्ति युक्त बना सकता है। ऐसा व्यक्ति धरती या किसी तख्ते पर सीधा लेटकर यदि अपने मन को समस्त चिंतनों से मुक्त करके अपनी आंखें और अपना ध्यान अपने बाएं पैर के अंगूठे पर स्थिर करे और यह देखने का प्रयास करे कि उसका सूक्ष्म शरीर, उसके स्थूल शरीर से बाहर निकल कर ऊपर की ओर तैर रहा है तो कुछ दिनों के अभ्यास के बाद वह अपने स्थूल शरीर से बाहर आकर हवा में तैरने लगता है और स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर की इस क्रिया को होते हुए देखता है।

    थियोसॉफिकल सोसाइटी के अभ्यासकर्ताओं तथा अन्य परावैज्ञानिकों के अनुसार इस अवस्था में एक सिल्वर कॉड के माध्यम से मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध स्थूल शरीर से बना रहता है। अर्थात् इस अवस्था में सूक्ष्म शरीर हवा में वैसे ही विचरण करता है जैसे कि कोई पशु अपने खूंट से बंधा हुआ रहकर घूमता हुआ घास चरता है। अंतर केवल इतना होता है कि पशु खूंटे के चारों ओर उतना ही घूम सकता है जितनी की रस्सी की लम्बाई है जबकि सूक्ष्म शरीर अनंत दूरियों तक विचरण कर सकता है क्योंकि सिल्वर कॉड की लम्बाई सूक्ष्म शरीर की इच्छा के अनुसार अनंत लम्बाई तक बढ़ सकती है।

    तुरीय अवस्था में भी प्रायः मनुष्य का सूक्ष्म शरीर अपने स्थूल शरीर से बाहर निकलकर अनंत ब्रह्माण्ड में विचरण करता है। तुरीय अवस्था क्या है, इसे जान लेना ठीक होगा। मनुष्य की चेतना के चार स्तर हैं - पहली अवस्था में हम जाग्रत अवस्था में होते हैं तथा या तो कुछ देखते हैं या सोचते हैं या कल्पना करते हैं। दूसरी अवस्था में हम आधी नींद में होते हैं तथा स्वप्न देखते हैं। चेतना की तीसरी अवस्था में हम गाढ़ी नींद में होते हैं। इस अवस्था में हम न तो कुछ देखते हैं, न सोचते हैं, न स्वप्न देखते हैं और न कल्पना करते हैं। चेतना की चौथी अवस्था को तुरीय अवस्था कहते हैं। इस चौथी अवस्था में हमें यह भी पता नहीं होता कि हम हैं भी या नहीं। चेतना की इस अवस्था का सबसे पहला उल्लेख माण्डूक्योपनिषद में हुआ है।

    तुरीय अवस्था केवल गाढ़ी नींद में ही प्राप्त नहीं की जा सकती अपितु योग की ध्यान, धारणा समाधि आदि विधियों से भी तुरीय अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

    सूक्ष्म शरीर के स्थूल शरीर से बाहर निकलकर हवा में तैरने तथा स्थूल शरीर द्वारा उसे ऐसा करते हुए देखने की प्रक्रिया परकाया प्रवेश की दिशा में उठाया गया पहला किंतु बहुत छोटा कदम कहा जाना चाहिए। क्योंकि परकाया प्रवेश से पहले, सूक्ष्म शरीर को उस सिल्वर कॉड से मुक्त होना होता है जिसके माध्यम से वह स्थूल शरीर से बंधा हुआ है। यह अवस्था बहुत कठिन साधना एवं अभ्यास करके प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है।

    सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर के बीच से सिल्वर कॉड को हटाने तथा इस प्रक्रिया में सूक्ष्म शरीर की मृत्यु न हो इसकी साधना के लिए रेचक प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वशिष्ठ ऋषि ने भगवान श्रीरामचंद्र को इसी रेचक प्राणायाम का अभ्यास करवाया था। रेचक प्राणायाम से श्ंवास-प्रश्वास प्रक्रिया द्वारा पहले प्राण पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया जाता है। इसके बाद कुंडलिनी अर्थात् मूलाधार स्थान से जीव-आत्मा को बाहर निकालकर योगी मनचाहे शरीर में प्रवेश कर जाता है।

    व्यास भाष्य के अनुसार मनुष्य को परकाया प्रवेश के लिए तीन उपाय करने चाहिए। पहला है- अष्टांग योग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास। दूसरा है- निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और तीसरा है‘ नाड़ियों में सयंम की स्थापना करके चित्त के परिभ्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना। इन तीनों को साधने के बाद ही मनुष्य परकाया प्रवेश की प्रक्रिया में सक्षम हो पाता है।

    वशिष्ठजी के अनुसार यदि योगी अपने पुराने शरीर को सुरक्षित रख सके तो वह उसमें पुनः प्रवेश भी कर सकता है। यहां यह ध्यान देने की बात है कि जिस पेड़ को सींचा नहीं जाता, वह सूख जाता है। परकाया प्रवेश में भी योगी के मूल शरीर के नष्ट होने तथा सड़ने का खतरा रहता है, अतः उसे बचाने के लिए भी विशेष यौगिक क्रियाएं करनी आवश्यक होती हैं। आदि शंकराचार्य निश्चित रूप से इस विद्या में भलीभांति पारंगत रहे होंगे।

    भारत के योगियों एवं सन्यासियों के पास यह विद्या अनंतकाल से है। नाथ संप्रदाय के बहुत से साधक इसकी तकनीक से अवगत थे। नाथ योगी मछन्दरनाथ को भी परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। वे प्रायः अपने स्थूल शरीर से बाहर निकलकर अपनी इच्छानुसार परकाया प्रवेश करते थे और उनमें दीर्घकाल तक निवास भी करते थे।

    आम व्यक्ति को इस तरफ नहीं जाना चाहिए। न तो ऐसा करने की आवश्यकता है और न ऐसा करने में कोई समझदारी है। यह केवल योगियों और सन्यासियों के लिए है। परकाया प्रवेश मोक्ष अथवा मुक्ति का साधन नहीं है। उसके लिए ईश भक्ति एवं निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। (नोट- आप इस ब्लॉग को हमारे यूट्यूब चैनल 
    Glimpse of Indian History by Dr. Mohanlal Gupta पर वीडियो-ब्लॉग के रूप में देख सकते हैं।)

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया

     12.07.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया


    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया

    (जावा एवं बाली द्वीपों के विशेष संदर्भ में)


    प्रस्तावना

    अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय ऋषि-मुनि मानव मात्र को सुखी बनाने के उद्देश्य से धरती के विभिन्न द्वीपों और दूरस्थ देशों की यात्रा करके अहिंसा, प्रेम, सद्भाव एवं शांति का संदेश देते आए हैं जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है। यह भारतीय संस्कृति ईसाई धर्म तथा इस्लाम के प्रादुर्भाव से सैंकड़ों साल पूर्व ही, विश्व के अनेक द्वीपों, प्रायद्वीपों एवं महाद्वीपों में फैल गई थी। भारतीय संस्कृति को दूसरे देशों में ले जाने वाले उपदेशक हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म के प्रचारकों के रूप में नहीं गए थे। वे धरती पर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने तथा मुनष्यों को हिंसा का मार्ग त्यागकर प्रेम से रहने का उपदेश देने के उद्देश्य से गए थे, बाद में इन्हें हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म का प्रचारक कहकर उनके योगदान को कम करके आंकने का प्रयास किया गया। आज से लगभग 2000 साल पहले ईसाई धर्म तथा 1400 साल पहले इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात्, पूरी धरती से हिन्दू धर्म तेजी से समाप्त हुआ है।

    चीन, जापान, वियतनाम, थाइलैण्ड तथा बर्मा आदि अनेकानेक एशियाई देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार हो जाने से बौद्ध धर्म का उतना ह्रास नहीं हुआ जबकि हिन्दू धर्म सैंकड़ों द्वीपों और देशों में दम तोड़ चुका है। भारत के अतिरिक्त केवल नेपाल देश तथा इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में ही हिन्दुओं का बड़ी संख्या में अधिवास है। भारत को आपातकाल में ई.1976 में 42वें संविधान संशोधन से धर्म-निरपेक्ष देश घोषित किया गया। धर्म-निरपेक्ष बनने वाला यह संसार का पहला देश था। हाल ही के दशकों में नेपाल में चीन ने जिस प्रबलता के साथ साम्यवाद का आक्रमण किया, उसके प्रभाव में आकर नेपाल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित हो गया। संसार में इन दो देशों के अतिरिक्त और कहीं भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं पाई जाती। बाली के हिन्दू जिस देश के निवासी हैं, उस देश में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहती है।

    विश्व के मानचित्र पर हिन्दू हर तरह से नष्ट हो रहे हैं, जनसंख्या से लेकर संस्कृति तक सब कुछ समाप्त हो रहा है किंतु हिन्दू जाति मदांध होकर सोई हुई है। ई.1947 में पाकिस्तान में 20 प्रतिशत हिन्दू थे जो आज केवल 2-3 प्रतिशत रह गए हैं। बांगलादेश में भी हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया है, उनकी लड़कियों से बलपूर्वक विवाह किया जा रहा है, उनके घरों को जलाया जा रहा है। यहाँ तक कि पश्चिमी बंगाल में भी ऐसी घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में देखने का मिली हैं। केरल, काश्मीर, आसाम में भी हिन्दू जाति का अस्तित्व मिट रहा है। वोटों की राजनीति के समक्ष सब-कुछ समर्पित किया जा रहा है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिन्दुओं की क्या स्थिति है, इसे देखा और समझा जाना आवश्यक है।

    अप्रेल 2017 के तीसरे एवं चौथे सप्ताह में प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्शनों की लालसा में, हमरे परिवार ने इण्डोनेशिया गणराज्य के दो द्वीपों- बाली तथा जावा की यात्रा की। इस दौरान हमें देनपासार, उबुद, मेंगवी, कुता, जोग्यकार्ता तथा जकार्ता आदि नगरों का भ्रमण करने का अवसर मिला। हमने सुन रखा था कि बाली और जावा द्वीपों पर सैंकड़ों साल पुराने कुछ ऐसे हिन्दू तथा बौद्ध मंदिर स्थित हैं जिनका निर्माण देवताओं द्वारा किया गया। ये देवता किसी अन्य ग्रह से आए हुए परग्रही जीव रहे होंगे जिनकी तकनीक तथा शिल्प उस काल के इंसानों की तकनीक तथा शिल्प की तुलना में अत्यंत उच्च कोटि की रही होगी। तभी वे सैंकड़ों की संख्या वाले हिन्दू मंदिरों के समूह तथा विश्व के सबसे बड़े पिरामिडीय रचना वाले बौद्ध मंदिरों का निर्माण कर पाये। हमने इन मंदिरों को देखने की लालसा में इण्डोनेशिया भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था।

    इण्डोनेशिया निश्चित ही एक सुंदर देश है जो भारतीयों को अपनी वैविध्यपूर्ण हिन्दू संस्कृति तथा सुन्दर समुद्री तटों के कारण आकर्षित करता है। हमने इसे एक धार्मिक यात्रा की तरह आरम्भ किया किंतु शीघ्र ही हमारी यह यात्रा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक तथ्यों की खोजपूर्ण यात्रा में बदल गई तथा एक-एक करके बहुत से रहस्यों पर से आवरण हटाने वाली सिद्ध हुई। जैसे-जैसे हम अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते गये, नए-नए रहस्यों पर से पर्दा उठता गया। कुछ ही दिनों में हमने समझ लिया कि हमने प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्शनों की लालसा में, अनजाने में ही बाली द्वीप के रूप में सात समुद्रों के बीच एक रहस्यमय किंतु निर्धन भारत के अवशेषों को खोज निकाला है। एक ऐसा निर्धन भारत जहाँ गाय नहीं है, गंगाजी नहीं हैं, गेहूं नहीं है। दूध, घी, दही, छाछ, रोटी, सोगरा, ढोकला, दाल-बाटी कुछ भी नहीं है। स्वाभाविक है कि ऐसा देश नितांत निर्धन ही हो सकता है।

    यह सचमुच एक रहस्यमय निर्धन भारत है जो अपने समस्त प्राचीन वैभव को खोकर और अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर सांस्कृतिक प्रदूषण की आंधी के झौंकों में संघर्ष कर रहा है। बाली द्वीप पर भले ही आज भी 85-90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु जावा द्वीप पर 90 प्रतिशत लोग इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं। इण्डोनेशिया के सबसे बड़े द्वीप सुमात्रा में भी मुसलमानों की जनसंख्या की यही स्थिति है जिसका परिणाम यह है कि आज इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथा इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है। हिन्दुओं का छोटा सा दीपक बाली देश के रूप में टिमटिमा रहा है। इस सच्चाई के बीच बाली और जावा द्वीपों के हिन्दू और बौद्ध धर्मस्थलों को देखना कम रोमांचक नहीं है।

    इण्डोनेशिया के मुसलमानों और भारत के मुसलमानों में भी सांस्कृतिक भिन्नता है। इस भिन्नता को देखना और समझना काफी रोचक है। इण्डोनेशिया के मुसलमानों ने यूनेस्को की सहायता से हिन्दू और बौद्ध मंदिरों को धरती में से खोज निकाला है और फिर से खड़ा करके पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। इण्डोनेशिया के नगरों एवं द्वीपों में मुख्य चौराहों पर भवनों के सामने, हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को बड़ी शान से दिखाया जाता है। इण्डोनेशियाई समाज हजारों साल से स्त्री प्रधान रहा है। आज भी इण्डोनेशियाई समाज इस विशेषता से सम्पन्न है। यही कारण है कि वहाँ की औरतें बुरका, हिजाब आदि नहीं पहनतीं। वे आधुनिक संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं और अपनी हजारों साल पुरानी संस्कृति पर गौरव करती हैं। एक ऐसी संस्कृति जो इस्लाम का हिस्सा नहीं है, अपितु इण्डोनेशियाई समाज के इतिहास और गौवमयी अतीत का हिस्सा है।

    हमारे अनुभव, नितान्त हमारे अपने हैं किंतु अपने इन अनुभवों को सार्वजनिक करना इसलिए आवश्यक हो गया ताकि भारत के लोग भी समुद्रों के बीच बसने वाले एक और निर्धन भारत की सच्चाई एवं त्रासदी को जान सकें। इस निर्धन भारत की यात्रा से पहले हमें इसके भौगोलिक एवं ऐतिहासिक तथ्यों को संक्षेप में जान लेना आवश्यक है। इसलिए पुस्तक के आरम्भ में उन्हें भी समुचित स्थान दिय गया है। आशा है, पाठकों को यह पुस्तक पसंद आएगी। शुभम्।

    -  डॉ. मोहनलाल गुप्ता

     





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