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  • अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

     10.05.2018
    अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

    बबीता स्वप्न बुनती है और स्वप्न के जंजाल में उनींदी सी रहकर स्वेटर बुनती है। स्वप्न और स्वेटर से इतर बबीता और भी बहुत कुछ बुनती है। बबीता जानती है कि जब तक उसमें बुनने की क्षमता है, तब तक ही वह बुन सकती है। बुनना उसके हाथ की बात नहीं है। उसे बुनने की भूमिका मिली है। उसे जीवन भर और सामर्थ्य भर बुनते ही रहना है। ऊन के मुलायम और रंग बिरंगे गोले केवल उसकी गोद में ही नहीं रखे हैं जिनके सिरे उसकी अंगुलियों में पकड़ी हुई सलाईयों से जुड़े हुए हैं, ऊन के गोले उसकी गोद के भीतर भी रखे हैं जिनके सिरे उसके अपने शरीर से जुड़े हुए हैं।

    हाथ की सलाईयां तेज गति से फंदे रचती हैं, नरम मुलायम रंगीन ऊन के गोले गोल-गोल नाचते हैं और स्वेटर का आकार शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। उसका शरीर भी सलाइयों की तरह हिलता है, गोद के भीतर हलचल होती है और अदृश्य दीवारों के पीछे कुछ फंदे रचे जा रहे हैं। कुछ उलटे फंदे और उसके बाद कुछ सीधे फंदे। इन उलटे और सीधे फंदों के मेल से शरीर की अदृश्य दीवारों के पीछे जो कुछ भी बुना जा रहा है, वह शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। कौन जाने कि बेटा है या बेटी! एक अनजान भय से कंपित रहकर अंधेरी कोठरी में सुबह का उजाला पालते जाना ही बबीता की क्षमता का चरम है।

    तीन साल की मुनिया ऊन के गोलों को उठाकर बाहर भाग जाना चाहती है किंतु हर बार की तरह बबीता उसे प्यार से झिड़क देती है - ‘भइया के लिये स्वेटर बुन रही हूँ। इन्हें लेकर मत भाग।’

    ‘कहाँ है भइया?’

    ‘अभी आयेगा। तू ऊन छोड़।’

    ‘कब आयेगा?’ मुनिया को भइया से मिलने की जल्दी है।

    ‘जब आयेगा तब अपने आप देख लेना। तू खेलेगी भइया के साथ।’

    ‘हाँ मैं भइया के साथ खेलूंगी।’

    ‘तो फिर ऊन छोड़।’

    मुुनिया अनमने हाथों से ऊन का गोला माँ की गोद में फैंक देती है।

    ‘ऐसे नहीं फैंकते, भइया के लग जायेगी।’

    ‘कहाँ है भइया?’ मुनिया फिर सवाल करती है।

    ‘जा तू बाहर खेल। देख तो गली में सब्जी बेचने वाला आया है क्या?’ ‘नहीं, पहले बताओ भइया कहाँ है। मैं उसके साथ खेलूंगी। मुनिया अड़ जाती है।

    इससे पहले कि बबीता कुछ जवाब सोच पाती, बाहर गली में गुब्बारे बेचने वाले की आवाज आई और मुनिया भइया देखने की जिद छोड़कर बाहर लॉन में दौड़ गई। बबीता हाथ की सलाइयों को समेटकर पलंग के कौने पर रख देती है। वह आहिस्ता से ऊन के मुलायम रंगीन गोलों को हाथ में उठाकर तोलती है, उसे आश्चर्य होता है कितने हलके हैं। उनका कोमल स्पर्श उन्हें और भी हलका बना देता है किंतु यही हलके गोले ठण्ड का गुरूर तोड़ देते हैं।

    सर्दियों के छोटे दिनों में आकाश के अतिथि को भी घर जाने की जल्दी रहती है इसलिये पाँच बजने से पहले ही सांझ होने का आभास होने लगा है। सास मंदिर जाने की तैयारी कर रही हैं और ससुर अंधेरा होने से पहले ही सायंकालीन भ्रमण के लिये चले गये हैं। पति के दफ्तर से लौटने से पहले बबीता को रात के खाने की तैयारी करनी है। वह पलंग का सहारा लेकर खड़ी होती है। भीतर भारीपन का अहसास होता है। उसका ध्यान एक बार फिर भीतर की अदृश्य रचना पर चला जाता है। आजकल उसका ध्यान बाहर की ओर कम और अपने भीतर की ओर अधिक रहता है।

    लोग कहते हैं कि आखिरी महीने में बालक माँ के पेट में उलटा लटक कर रहता है। इस दौरान वह माँ के शरीर से जुड़ी नाल के रास्ते भोजन प्राप्त करता है। उलटे लटकने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठती है बबीता। वह जगह तो एक दम अंधेरी बंद कोठरी जैसी होगी जिसमें हाथ-पाँव तक हिलाने को जगह नहीं। क्या इतनी तंग अंधेरी बंद कोठरी में आँखें बंद करके उलटे लटके रहने में गर्भस्थ शिशु को कोई कष्ट नहीं होता होगा?

    बबीता को याद है, उसकी नानी कहा करती थीं - ‘हर प्राणी अपनी माँ के पेट में नौ महीने की सबसे कठिन सजा भोगता है। इस सजा से घबरा कर वह भगवान के सामने बारबार गिड़गिड़ाता है कि इस बार मुझे इस कष्ट से छुटकारा दिला दो, अब कभी पाप नहीं करूंगा। तब भगवान प्राणी को उसके अपराधों की जानकारी देता है और कहता है कि यह तेरे पिछले पापों की सजा है। जब तक तू पाप करता रहेगा, तब तक तू जन्म मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा और बारम्बार यहाँ आता रहेगा। यह सजा तो तुझे भोगनी ही है।’

    बबीता चक्कर में पड़ जाती है। तो क्या मेरेे अपने भीतर इन दिनों एक न्यायालय चल रहा है जिसमें किसी अज्ञात, अदेखे, अजन्मे प्राणी के पूर्व जन्मों के पाप पुण्य के मुकदमे की सुनवाई हो रही है? क्या जो मासूम अदृश्य रचना मेरे रक्त और मज्जा से शनैः शनैः साकार हो रही है, वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मों की सजा भोगने के लिये मेरे भीतर बनी एक अंधी कोठरी में उलटी लटकी हुई है और भगवान उससे उसके पूर्व जन्मों का लेखा-जोखा पूछ रहा है?

    बबीता का पूरा शरीर सिहर उठता है। भगवान पाप-पुण्य का लेखा-जोखा किससे पूछ रहा है? उलटे लटके हुए निर्माणाधीन शिशु के शरीर से या फिर उसके भीतर उलटी लटकी हुई निर्माणाधीन आत्मा से? क्या जिस तरह शिशु के शरीर का शनैः शनैः निर्माण होता है, उसी तरह आत्मा का भी शनैः शनैः अवतरण होता है? या फिर शरीर तो तिल-तिल कर बनता है और आत्मा एक साथ उसमें प्रवेश करती है? बबीता अपने आप से कई सवाल करती है किंतु कोई उत्तर नहीं सूझता।

    बबीता एक बार फिर अपने आप से पूछती है, पूर्व जन्मों के पापों की सजा किसे मिल रही है? तिल-तिल कर बन रहे उलटे लटके हुए शरीर को? या फिर उसके भीतर धीरे-धीरे अवतरित होती हुई आत्मा को? तो क्या जिस तरह मेरे शरीर में एक और शरीर प्रवेश कर गया है, उसी तरह मेरी आत्मा के भीतर भी एक और आत्मा प्रवेश कर गई है? वह खुद ही उलझ जाती है, उसे समझ नहीं आता, आत्मा के भीतर आत्मा कैसे प्रवेश कर सकती है? उसका ध्यान फिर से सजा वाली बात पर चला जाता है। माँ के पेट मंे सजा किसे मिलती है? शरीर को या आत्मा को?

    यदि सजा शरीर को मिलती है तो वह अन्याय है क्योंकि जिस शरीर ने पाप किये थे वह तो पहले ही कहीं मर चुका है। यह तो मेरे रक्त और मेरी मज्जा से बनने वाला शरीर है जो अभी तक पूरा बना ही नहीं है। फिर इसे सजा किस बात की? तो क्या सजा आत्मा को मिलती है? उस आत्मा को जो अजर है, अमर है, अखण्ड है, शाश्वत है? जो आत्मा अग्नि से नहीं जलती, पानी से नहीं भीगती, शस्त्र से नहीं कटती उस आत्मा को सजा कैसे दी जा सकती है? आत्मा तो कुछ भोगती ही नहीं, भोगता तो शरीर है।

    मुनिया गली में देखकर आ गई है। उसके चेहरे पर निराशा का भाव है। गुब्बारे वाला जा चुका है।

    ‘मम्मी गुब्बारे वाला चला गया।’

    बबीता का ध्यान कहीं और है। वह मुनिया की बात का जवाब नहीं देती।

    ‘मम्मी भइया आ गया?’

    ‘इसे भइया की बड़ी जल्दी पड़ी है।’ सास 
    हँस कर मुनिया के सिर पर हाथ फेरती हैं। वे मंदिर जाने के लिये तैयार हो चुकी हैं।

    ‘देख ध्यान से दरवाजा लगा लेना, मैं जा रही हूँ और तू कुछ खा पी लेना। ऐसे में भूखे नहीं रहते। बालक को कष्ट होता है।’ सास जाते-जाते निर्देश देती हैं।

    सास की बात से बबीता का ध्यान नाल से जुड़े गर्भस्थ शिशु की ओर चला जाता है। क्या गर्भस्थ शिशु की स्थिति चिकित्सालय में अचेत पड़े रोगी के समान है? वह स्वयं से सवाल पूछती है किंतु उत्तर में वह स्वयं ही अपने आप से सहमत नहीं हो पाती। वहाँ तो रोगी पलंग पर सीधा सोया रहता है और ग्लूकोज की बोतल उलटी लटकाई जाती है। जिससे रोगी ग्लूकाज प्राप्त करता रहता है। जबकि इस अंधी कोठरी में स्थिति उलटी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ग्लूकोज की बोतल तो सीधी रहती है किंतु रोगी उलटा लटक कर ग्लूकोज प्राप्त करता है।

    बबीता को ध्यान है कि जब वह स्कूल में पढ़ती थी तब उनके घर में एक सन्यासी आया करते थे। वे बबीता के पिता के पुराने मित्र हुआ करते थे जो गृहस्थी का जंजाल छोड़कर वैरागी हो गये थे। उन्होंने बबीता के पिता से एक दिन कहा था - ‘जब तक प्राणी माता के गर्भ में रहता है तब तक वह ईश्वर से साम्य रखता है तथा निरंतर सोअ्हम-सोअ्हम अर्थात् मैं ही परमात्मा हूँ, मैं ही परमात्मा हूँ, कहता रहता है ताकि भीतर होने वाले सारे कष्टों को भूल जाये किंतु जब वही प्राणी माँ के गर्भ से बाहर आता है तो उसी क्षण सोअह्म-सोअ्हम भूलकर कोअ्हम-कोअ्हम अर्थात् मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ कहने लगता है और फिर से नये कष्ट पाने की भूमिका रचने लगता है।' 

    तो क्या इस समय मेरे भीतर पल-पल बड़ी हो रही रचना स्वयं के परमात्मा होने का दावा कर रही है? बबीता फिर अपने आप से सवाल पूछती है। यदि वह इस समय परमात्मा होने का दावा कर रही है तो फिर संसार में आते ही वह स्वयं को भूल क्यों जाती है? कोअ्हम्-कोअ्हम् क्यों कहने लगती है? वह रोने क्यों लगती है? बबीता को नहीं लगता कि वह अदृश्य मासूम रचना जिस भी अवस्था में उसके गर्भ में है, वह कुछ भी सोच सकने की स्थिति में है। वह तो एक निश्चेष्ट और निष्क्रिय स्थिति है। कोई भी प्राणी अचेत अवस्था में कैसे सोच सकता है? जब वह सोच ही नहीं सकता तो उसे कष्ट कैसे हो सकता है?

    अगले ही क्षण बबीता का ध्यान उचट कर दूसरी ओर चला जाता है। क्या कोई भी विचार शून्य रचना वृद्धि कर सकती है? यदि गर्भस्थ शिशु विचार शून्य होता है तो वह गर्भ से बाहर आते ही रोने क्यों लगता है? वह केवल कष्ट से भरा हुआ विचार ही हो सकता है जो नवजात शिशु को रोने के लिये प्रेरित करता है। विचार शून्य रचना रो नहीं सकती। इसका अर्थ यह हुआ कि गर्भस्थ शिशु कष्ट पूर्ण विचारों से परिपूर्ण है। उसे भूख लगती है, तभी तो वह माँ के गर्भ में रहकर नाल से आहार खींच लेता है और गर्भ से बाहर आकर दूध पीने लगता है। विचार शून्य रचना को भूख की अनुभूति नहीं होती।

    यदि गर्भस्थ रचना विचारों और अनुभूतियों से परिपूर्ण है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अंधेरी बंद कोठरी में कष्टों की अनुभूति होती ही होगी। लम्बे समय तक आँखें बंद करके चौबीसों घण्टे तरल आवरण में उसे घुटन का अहसास होता ही होगा। यदि प्राणी के बारबार जन्म लेने की बात सही है तो उसे यह बात भी अच्छी तरह स्मरण रहती होगी कि वह खुले आकाश में साँस लेने वाला प्राणी है। वह माता के गर्भ में बनी पानी की थैली में कैसे बंद रह पाता होगा? उसका दम तो घुटता ही होगा।

    नहीं-नहीं। एक बार फिर वह स्वयं से असहमत हो जाती है। क्या किसी भी आदमी को माँ के गर्भ में रहने के काल की कोई भी स्मृति होती है? इसका अर्थ यह है कि माँ के गर्भ के भीतर शिशु अपने आस-आस पास हो रही घटनाओं से अनजान होता है। उस समय की कोई स्मृति किसी भी आदमी को नहीं होती।

    लोग पूर्व जन्म के समय की स्मृतियों और घटनाओं की बात करते तो देखे गये हैं किंतु माता के गर्भ में निवास करने के समय की किसी घटना या स्मृति का उल्लेख करते हुए नहीं देखे गये हैं। इसलिये पानी के आवरण में रहने के दौरान शिशु को दम घुटने की अनुभूति बिल्कुल नहीं होती होगी।

    मछलियाँ भी तो पानी में रहती हैं। क्या उनका दम पानी में घुट जाता है? वे तो पूरा जीवन ही पानी में निकाल देती हैं। बबीता इस विचार पर भी स्थिर नहीं रह पाती। वह स्वयं से ही प्रश्न करती है और स्वयं से ही उनके उत्तर भी चाहती है। वह जानती है कि मछलियों का दम पानी के भीतर नहीं घुटता, वे तो बनी ही पानी के भीतर रहने के लिये हैं। यदि उन्हें पानी से बाहर निकाला जायेगा तो उन्हें कष्ट होगा। किंतु गर्भस्थ शिशु तो पानी के भीतर रहने के लिये नहीं बना है, उसे अवश्य नौ मास तक पानी की थैली के भीतर रहने में कष्ट होता होगा।

    एक बार फिर बबीता  के विचारों को झटका लगता है। वह अपने आप से नया प्रश्न करती है, मछलियों का ही उदाहरण क्यों? सृष्टि में मेंढक, सर्प और मगरमच्छ भी तो हैं जो पानी के भीतर और बाहर, दोनों ही स्थितियों में आनंद पूर्वक रह सकते हैं। आदमी भी उन्हीं की तरह का प्राणी हो सकता है जो नौ माह तक पानी की थैली में और उसके बाद हवा में बड़े मजे से रह सकता है। अचानक उसके विचारों का क्रम टूटता है। मुनिया उसे झिंझोड़ रही है।

    ‘मम्मी पापा आ गये।’ ‘

    अरे तेरे पापा आ भी गये। मैंने तो अभी खाना बनाना शुरु ही नहीं किया।’ विचारों को एक तरफ झटककर बबीता शीघ्रता से रसोई में घुस जाती है। सूर्य देवता अपनी प्रकाश शलाकाओं को समेट कर अपने घर चले गये हैं और बाहर काफी अंधेरा हो गया है। बिल्कुल बंद अंधेरी कोठरी जैसा जिसमें पूरी दुनिया सोअ्हम-सोअ्हम के स्थान पर कोअ्हम-कोअ्हम कह रही है।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-26

     01.01.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-26

    राजस्थान में प्रकृति पूजन परम्परा


    प्रकृति के साथ हजारों वर्षों के सान्निध्य ने मनुष्य को यह अनुभव कराया कि मनुष्य को जो कुछ भी मिला है, वह केवल प्रकृति से ही। मनुष्य को प्रकृति की विविध शक्तियाँ एवं उदारताएं, किसी दैवीय कृपा से कम नहीं लगीं। इसलिये धरती की अन्य महान सभ्यताओं की भांति राजस्थान में भी प्रकृति की शक्तियों को पूजने की परम्परा विकसति हुई ताकि प्रकृति की कृपा प्राप्त की जा सके तथा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जा सके। यही परम्परा आगे चलकर प्रकृति एवं पर्यावरण की सुरक्षा का सबसे बड़ा माध्यम बन गई जो आज भी अनवरत प्रवाहमान है।


    जलाशयों की पूजा

    नदियों, सरोवरों एवं जलाशयों की पूजा धार्मिक कृत्य माना जाता है। पुत्र के जन्म एवं विवाह के अवसर पर कुआं पूजन इसी परम्परा का द्योतक है। मृत्यु के बाद शरीर की भस्म एवं अस्थियों को इस कामना से नदियों में प्रवाहित किया जाता है कि मृतक की आत्मा को शांति मिले। धार्मिक पर्वों के अवसर पर नदियों, तालाबों एवं कुओं पर सामूहिक स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है। तालाबों से मिट्टी खोदकर तालाबों को गहरा बनाना, उनके जल को प्रदूषित होने से रोकना, तालाबों पर पक्के घाट बनवाना तथा नये तालाब, बावड़ी, कूप आदि का निर्माण करवाना पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है। वर्षा से पहले, तालाबों एवं टांकों के आगोर को साफ करने के लिये सामूहिक आयोजन किये जाते हैं।

    वृक्षों की पूजा

    राजस्थान में वट, पीपल, तुलसी, खेजड़ी, आम, आंवला तथा नीम आदि वृक्षों की पूजा होती है। पीपल तथा तुलसी को नित्य सींचना अच्छा माना जाता है। बड़ अमावस को वटवृक्ष की पूजा होती है। आंवला ग्यारस को आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पीली कनेर में पार्वती का निवास माना जाता है। आकड़े को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। सफेद आकड़े में विष्णु का निवास माना जाता है। भगवान शिव तथा हनुमानजी पर आकड़े तथा धतूरे के पुष्प चढ़ाये जाते हैं। शिवजी पर भांग तथा बिल्वपत्र के पत्ते भी चढ़ते हैं। कृष्णजी की पूजा तुलसी दल से की जाती है। सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण के समय घर के जलपात्रों तथा खाद्य सामग्री में तुलसी दल तथा दूर्वा डाली जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से ग्रहण के समय धरती तक पहुँचने वाली हानिकारक किरणें खाद्य सामग्री को खराब नहीं कर पातीं। दैनिक पूजन विधान में पीपल एवं तुलसी को जल चढ़ाने की परम्परा इसलिये सम्मिलित की गई ताकि इन्हें लोग अपने घरों एवं मुहल्लों में लगायें।

    पीपल एक मात्र ऐसा ज्ञात वृक्ष है जो दिन और रात में ऑक्सीजन छोड़ता है। तुलसी के पत्तों में औषधीय गुणों के कारण आसपास के वातावरण को भी शुद्ध करने की शक्ति होती है। नीम को नारायण कहा जाता है। अग्नि में हरी वनस्पति अथवा पुष्प जलाना अशुभ समझा जाता है। बृहस्पति की खराब दशा का निवारण करने एवं सरस्वती की कृपा दृष्टि प्राप्त करने के लिये हल्दी की गांठ धारण की जाती है। देवी-देवताओं को समर्पित करके ओरण छोड़े जाते हैं जिनके वृक्ष काटना पाप समझा जाता है। किसी धरती, सामग्री या व्यक्ति को देवता, संत अथवा ईश्वर के लिये अर्पित अथवा सुरक्षित करने को ओल करना कहा जाता है।

    पशु-पक्षियों की पूजा

    विभिन्न पशु-पक्षियों की पूजा का प्रचलन राजस्थान की सांस्कृतिक प्राचीनता की द्योतक है। नाग पंचमी को नागों की पूजा होती है। बंदरों को हनुमानजी की सेना मानकर पूजा जाता है। गाय में सकल तीर्थों का वास माना जाता है। साण्ड को शिवजी का नंदी मानकर उसके लिये मार्ग छोड़ा जाता है तथा उसे अवध्य माना जाता है। बकरों के कानों में मुरकी डालकर उन्हें अमर घोषित किया जाता है। चील में देवी का निवास माना जाता है। बहुत सी देवियों के मुख पशु-पक्षियों के हैं। श्रीमाली ब्राह्मणों की गोधा शाखा की कुल देवी का मुंह गर्दभ की आकृति का है। उसे खरानना माता कहते हैं। तांत्रिक मत में बगुला मुखी देवी की पूजा प्रचलित है। राठौड़ों की कुल देवी नागणेची माता का शरीर नाग योनि का है। तेजा, गोगा आदि देवताओं के प्रतीक के रूप में नाग की मूर्ति, चित्र एवं चिह्नों की पूजा होती है। जोधपुर में एक मंदिर उष्ट्रवाहिनी देवी का भी है। कुत्तों को भैंरूजी का वाहन माना जाता है। चिड़ियों, मोरों तथा कबूतरों को दाना चुगाना, कीड़ी नगरा सींचना, गायों, बंदरों तथा कुत्तों को भोजन देना धार्मिक कृत्य माना जाता है।

    राजस्थान-वासियों में यह विश्वास है कि जो विश्वात्मा सबमें मौजूद है, उसे संतुष्ट करने से ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी। बच्छ बारस के दिन गाय के बछड़ों की पूजा करने का विधान है जो हमारी संस्कृति का विशिष्ट हिस्सा बना हुआ है। अमावस्या के दिन पशु-पालक दूध नहीं बेचते ताकि उस दिन का दूध गाय के बछड़ों एवं घर के बच्चों के लिये उपलब्ध रहे। श्राद्ध पक्ष में कौओं को चुग्गा एवं भोजन अर्पित किया जाता है। संकट निवारण करने तथा विभिन्न ग्रहों के कोप को शांति करने के लिये भी ये उपाय किये जाते हैं। बुध की दशा को अनुकूल बनाने के लिये पशुओं को हरा चारा एवं मोरों को मूंग डाली जाती है।

    सरस्वती को प्रसन्न करने एवं बृहस्पति की दशा सुधारने के लिये पीले कपड़े एवं हल्दी की गांठ धारण की जाती है। किसी भी प्रकार के संकट को दूर करने के लिये गायों को मीठे चावल, गुड़ एवं चुपड़ी रोटी दी जाती है। शीतला सप्तमी को कुत्तों को रोटी खिलाई जाती है। भैंरूजी एवं शनि की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये काले कुत्तों को तेल में तले हुए पुए एवं पकौड़े खिलाये जाते हैं। प्रकृति पूजन, जीव रक्षा एवं पर्यावरण की रक्षा के उच्च आदर्शों एवं महान परम्पराओं के कारण ही राजस्थान को देव-भूमि माना जाता है। कन्हैयालाल सेठिया ने लिखा है-


    आ तो सुरगां ने सरमावै,

    ईं पर देव रमण ने आवै,

    ईं रो जस नर नारी गावै,

    धरती धोरां री।


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  • अजमेर का इतिहास - 90

     06.01.2020
     अजमेर का इतिहास - 90

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (2) 


    चंद्रगुप्त वार्ष्णेय

    चंद्रगुप्त वार्ष्णेय का जन्म 21 जुलाई 1904 को हुआ। बाबा नृसिंहदास की प्रेरणा से वे राजनीति में आये तथा यूथ लीग की स्थापना की। वे राजपूताना, मध्य भारत व प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय मंत्री रहे। नवम्बर 1930 में वे जेल गये। ई.1939 में अजमेर नगर पालिका का चुनाव जीते। ई.1940-41 में वे सेवाग्राम के सह सम्पादक रहे। ई.1942 में वे पुनः जेल गये। ई.1951 में वे देश के प्रथम दैनिक राष्ट्रदूत के सम्पादक बने। उन्होंने राजस्थान विकास का भी सम्पादन किया। ई.1952 में वे अजमेर राज्य के जनसम्पर्क विभाग के संचालक बने। ई.1956 में वे राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में उपनिदेशक बनाये गये। ई.1959 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजस्थान पत्रिका से जुड़े रहकर उन्होंने सुभाषित प्रदीप तथा शब्द निरुक्ति जैसे गंभीर स्तम्भ लेख लिखे। उन्होंने चाणक्य सूत्र प्रदीप आदि कई उत्कृष्ट रचनाओं का प्रणयन किया।

    जियालाल आर्य (पं.)

    पण्डित जियालाल आर्य का जन्म ई.1889 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ। ई.1908 में वे अजमेर आये। ई.1915 में वे आर्यसमाज से जुड़े। ई.1917 में अजमेर में फैले प्लेग में उन्होंने लोगों की बहुत सेवा की। ई.1926 में वे आर्यसमाज अजमेर के मंत्री बनाये गये। ई.1930 में उन्होंने अंग्रेजी वेषभूषा त्यागकर खादी के वस्त्र पहनने आरंभ कर दिये। दयानंद महाविद्यालय अजमेर की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा। ई.1952 से 1955 तक वे आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान के प्रधान रहे। 19 दिसम्बर 1961 को उनका निधन हुआ।

    जीतमल लूणिया

    जीतमल लूणिया का जन्म 15 नवम्बर 1905 को अजमेर में हुआ। आपने एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की। ई.1914 में उन्होंने इंदौर में हरिभाऊ उपाध्याय के साथ मिलकर मालवा मयूर नामक पत्रिका निकाली। ई.1916 में हिन्दी साहित्य मंदिर की स्थापना की। ई.1925 में उन्होंने अजमेर से सस्ता साहित्य मण्डल का प्रकाशन कार्य आरम्भ किया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया तथा कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गये।

    सरकार ने कांग्रेस कमेटी को असंवैधानिक घोषित करके जीतमल लूणिया को एक साल तक जेल में रखा। अपनी पत्नी सरदार बाई के साथ उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और छः माह का कारावास भोगा। ई.1933 में लूणिया ने अजमेर सेवा भवन की स्थापना की तथा अछूतोद्धार एवं राष्ट्रोत्थान के काम में लग गये। ई.1942 में वे एक बार फिर जेल गये। ई.1947 में वे शहर कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। 15 अगस्त 1947 को उन्होंने मैगजीन पर तिरंगा फहराकर अजमेर की स्वतंत्रता की घोषणा की। ई.1948 में वे अजमेर नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गये। ई.1973 में उन्होंने शराबबंदी सत्याग्रह में भाग लिया तथा जेल गये।

    ज्वाला प्रसाद शर्मा

    ज्वाला प्रसाद शर्मा ई.1930 में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपना अड्डा अजमेर में जमाया। आपने हटूण्डी में बाबा नृसिंहदास को बंदूक चलाना सिखाया। ज्वाला प्रसाद तथा उनके साथियों ने अजमेर के कमिश्नर की हत्या का कार्यक्रम बनाया। रामचंद्र बापट को यह कार्य सौंपा गया किंतु वह सफल नहीं हो सका तथा पकड़ा गया। क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन के लिये धन प्राप्त करने हेतु ज्वाला प्रसाद तथा उनके साथियों ने राजकीय कॉलेज के कर्मचारियों के लिये बैंक से लाये जा रहे धन को लूटने का प्रयास किया किंतु वे भी असफल रहे।

    सन् 1934 में वायसराय की अजमेर में हत्या करने की योजना बनी किंतु वह भी असफल रही। पुलिस अधिकारी डोगरा की हत्या का भी प्रयास किया गया किंतु वह भी सफल नहीं हो सका। इन सब कारणों से ज्वाला प्रसाद को बंदी बना लिया गया। ई.1938 के अंतिम दिनों में वे जेल से मुक्त हुए। भारत छोड़ों आंदोलन में भी वे जेल में थे। वहां से वे भाग निकले तथा अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। वे विधानसभा एवं लोकसभा के सदस्य तथा राजस्थान रोडवेज के अध्यक्ष रहे। 20 मई 1974 को दूदू के निकट सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

    डिक्सन (कर्नल)

    कर्नल डिक्सन स्कॉटलैण्ड का रहने वाला था। ई.1812 में वह बंगाल आर्टीलरी में अधिकारी के पद नियुक्त हुआ। उसने मेरवाड़ा पर अधिकार लेने के लिये किये गये अभियान में भाग लिया था। उसे अजमेर मैगजीन में आयुधागार के डिप्टी कमिश्नर के पद पर नियुक्त किया गया। वह इस पद पर ई.1836 तक कार्य करता रहा। यहाँ से उसे मेरवाड़ा का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनाया गया। ई.1842 में वह अजमेर तथा मेरवाड़ा दोनों जिलों का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनाया गया। ई.1857 तक वह इन दोनों जिलों का प्रशासन करता रहा। उसने भारत में 45 वर्ष सेवा की तथा सेवा के दौरान ही 25 जून 1857 को ब्यावर में उसकी मृत्यु हुई। ब्यावर के कब्रिस्तान में उसे दफनाया गया। वह गर्मी और बरसात में भी ब्यावर में रहता था। दूसरे अधिकारियों की तहर माउण्ट आबू पर जाकर नहीं रहता था।

    मेरवाड़ा के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर कार्य करते हुए कर्नल डिक्सन मेरवाड़ा के लिये भी वरदान साबित हुआ था। उसने मेरवाड़ा क्षेत्र में अनेक कुएं खुदवाये जिससे वहॉं खेती संभव हो सकी और वह लाभकारी भी सिद्ध हुई। उसकी बहुमूल्य सेवाओं का आज अनुमान लगाना संभव नहीं है। लोगों को उद्योग, कृषि और व्यापार की गतिविधियों में रोजगार प्राप्त हो सके इसके लिये उसने नया नगर के नाम से एक विशाल परकोटे युक्त नगर की स्थापना की और महाजनों को लाकर वहॉं बसाया।

    आज वह नगर ब्यावर के नाम से जाना जाता है जो बाद में मेरवाड़ा जिले का प्रशासनिक केन्द्र भी बना। वहाँ बहुत सारे उद्योग धन्धे, व्यापार और बाजार विकसित हो गये। डिक्सन एक मात्र अंग्रेज था जिसने परकोटे युक्त किसी नगर की स्थापना की तथा ब्यावर भारत का वह अन्तिम नगर था जिसकी सुरक्षा के लिये परकोटा खिचंवाया गया।

    जिस दिन से डिक्सन ने अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट पद का कार्यभार ग्रहण किया उस दिन से अजमेर में एक नया युग आरंभ हुआ। उसके समय में पुराने तालाबों की मरम्मत की गई तथा नये तालाब बनाये गये। इन कार्यो पर उसने 4,52,707 रुपये व्यय किये। अजमेर का कमिश्नर सदरलैण्ड तथा अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट कर्नल डिक्सन, दोनों यह चाहते थे कि किसानों का लगान घटाकर एक तिहाई कर दिया जाये किंतु सरकार ने लगान घटाने से मना कर दिया। फिर भी इसे एक बटा दो से घटाकर दो बटा पांच कर दिया गया। ई.1842 में जब उसने तालाबों का निर्माण आरंभ किया तब उसने एक बड़ी जागीर के प्रबंधक की तरह कार्य किया। उसने तालाबों के किनारों पर झौंपड़ियों की स्थापना की।

    जो लोग कुंआ खोदना चाहते थे, उन लोगों को उसने जमीनें बहुत ही कम दरों पर किराये पर दीं। उसने नये तालाबों के आस पास की बंजर जमीनें उन लोगों को वितरित कर दीं जो वहाँ बनाई गई झौंपड़ियों में रहकर खेती करना चाहते थे। कर्नल डिक्सन की पत्नी भारतीय थी जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ था। जब यह पुत्र 6 साल का था तो पढ़ने के लिये लंदन भेजा गया। वह वहीं रहा और वहीं उसकी मृत्यु हुई। डिक्सन के पुत्र के चार पुत्र हुए। ई.1875 तक डिक्सन की पत्नी ब्यावर में रही तथा डिक्सन द्वारा छोड़ी गई सम्पत्ति से पेंशन प्राप्त करती रही।

    कर्नल डिक्सन की छतरी ब्यावर के मुख्य बाजार में बनाई गई। मेर लोग इस छतरी में डिक्सन की पूजा करते थे और उसे डिक्सन बाबा कहते थे। आजादी के बाद इस स्मारक की दुर्दशा हुई। आज से लगभग 20 साल पहले, मेरी बहिन के श्वसुर श्री प्रकाशचंद सिंघल ने मुझे इस छतरी के टूटे हुए टुकड़े अजमेर की नगर पालिका के परिसर में पड़े हुए दिखाये थे। उन्होंने मुझे डिक्सन की मेम का मकबरा भी दिखाया था जो सारी रौनक खोकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा था। सच यही है कि हम भारतीयों ने अंग्रेजों की सारी बुराइयाँ तो अपना लीं किंतु अच्छाई नहीं। अच्छे अंग्रेजों को याद भी नहीं रखा।

    दामोदर दास राठी (सेठ)

    सेठ दामोदर दास राठी का जन्म 8 फरवरी 1884 को मारवाड़ राज्य के पोकरण गाँव में हुआ था। इनके पिता खींवराजजी राठी व्यापार करने के लिये पोकरण से ब्यावर आ गये तथा 1889 में उन्होंने ब्यावर में श्रीकृष्णा मिल की स्थापना की। अतः बालक दामोदर की शिक्षा ब्यावर के मिशन स्कूल में हुई। वे मेधावी छात्र थे। जिस समय पिता खींवराज का निधन हुआ, उस समय दामोदर दास मात्र 16 वर्ष के थे।

    शीघ्र ही वे आर्यसमाज से जुड़ गये। वैचारिक उग्रता के कारण वे कांग्रेस के गरम दल के समर्थ बन गये और उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा को श्रीकृष्णा मिल का मैनेजर नियुक्त किया। उन्हीं दिनों राठीजी का सम्पर्क बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय आदि महान नेताओं से हुआ। राव गोपालसिंह खरवा से भी राठीजी की अच्छी मित्रता हो गयी। जब 21 फरवरी 1915 को राजस्थान में सशस्त्र क्रांतिकी योजना क्रियान्वयन की तिथि घोषित की गयी। तब श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरे हुए थे।

    तब राठीजी ने तीन हजार सशस्त्र क्रांतिकारी तैयार करने के लिये आर्थिक सहयोग प्रदान किया। दुर्भाग्य से क्रांतिकी योजना विफल हो गयी और हथियार टॉडगढ़ की पहाड़ियों में छुपा दिये गये। बाद में यह भारी असला अंग्रेज सरकार के हाथ लग गया जिससे राठीजी को गहरा सदमा लगा। वे ब्यावर छोड़कर हरिद्वार चले गये। कुछ दिन बाद जब लौट कर ब्यावर आये तो वे पूरी तरह ऊर्जावान थे।

    ई.1916 में ब्यावर में होमरूल लीग की स्थापना की गयी। उसी वर्ष एकता सम्मेलन भी हुआ जिसमें राठीजी ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया। ई.1917 में योजना बनायी गयी कि हिन्द गोवा का एक हिस्सा पुर्तगालियों से खरीद लिया जाये और उस पर देश की स्वतंत्रत सरकार की घोषणा कर दी जाये। योजना के अनुसार रूस इस स्वतंत्र सरकार को तुरंत मान्यता प्रदान कर देगा जिससे ब्रिटेन पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। इससे पहले कि यह योजना अमल में आती, 2 जनवरी 1918 को इस क्रांतिकारी एवं महादानी पुण्यात्मा का निधन हो गया।


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  • साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

     04.01.2020
    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद


    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद दो भिन्न बातें हैं किंतु एक बिंदु है जहाँ दोनों आकर मिलते हैं, इस बिंदु पर इनका सम्मिलन औपचारिकता मात्र नहीं रहता अपितु एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित होकर एक-दूसरे का पूरक हो जाता है। यदि साहित्य संस्कृति और समाज को संस्कारित करता है तो साहित्य राष्ट्रवाद के लिए खाद-पानी भी प्रदान करता है।

    ‘‘दिपै वारां देस जारां साहित जगमगै’’ जैसी उक्ति इस बात को पुष्ट करती है कि साहित्य और राष्ट्र में कितना गहरा सम्बन्ध है। आप समाज को खराब साहित्य दीजिए और एक खराब राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए। आप समाज को अच्छा साहित्य दीजिए और अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए।

    इस बात को थोड़ा विस्तार देना आवश्यक है।

    किसी भी राष्ट्र के तीन शरीर होते हैं- भौगोलिक शरीर, राजनीतिक शरीर एवं सांस्कृतिक शरीर। ये तीनों ही शरीर एक दूसरे में समाए हुए होते हैं। इनमें से एक के क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट होने पर दूसरा एवं तीसरा शरीर स्वतः क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट हो जाता है।

    राष्ट्र का निर्माण कौन करता है ?

    आप कहेंगे- प्रकृति। प्रकृति राष्ट्र के केवल भौगोलिक शरीर का निर्माण करती है। नदियां, पहाड़, समुद्र और झीलों ने विश्व के बहुत से देशों की सीमाएं बनाई हैं किंतु ये सीमाएं शाश्वत नहीं हैं। कल हिन्दूकुश पर्वत भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा का निर्माण करता था किंतु आज रैडक्लिफ रेखा भारत और पाकिस्तान की सीमा का निर्माण करती है। 

    तो क्या राष्ट्र का निर्माण राजा या सेना करते हैं ?

    निश्चित रूप से करते हैं किंतु वे केवल राष्ट्र के राजनीतिक शरीर का निर्माण करते हैं। राजा या सेना के हारते ही राष्ट्र की भौगोलिक सीमाएं बदल जाती हैं तथा राजनीतिक व्यवस्थाएं भी ध्वस्त हो जाती हैं।

    तो फिर अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत राष्ट्र का निर्माण कौन करता है?

    निःसंदेह किसी भी राष्ट्र के अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत शरीर का निर्माण, उस देश की संस्कृति करती है। आइए इसे इस बात को समझने की चेष्टा करते हैं- मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर दिखाई देता है, सूक्ष्म शरीर अनुभव होता है किंतु कारण शरीर को तो अनुभव नहीं किया जा सकता केवल उसका चिंतन किया जा सकता है। आंखों से जो कपड़ा दिखाई देता है, वह केवल बाह्य स्वरूप है, कपड़ा तो वास्तव में धागे से बनता है। धागा भी केवल एक बीच की अवस्था या व्यवस्था है, वास्तविक इकाई तो वह रुई है जिससे धागा बाना है और जिससे अंत में कपड़ा बना है।

    ठीक इसी प्रकार राष्ट्र का बाह्य स्वरूप उसकी भौगोलिक देह है जिसे हम राष्ट्र कहते हैं- कश्मीर के कन्याकमारी तक की भौगोलिक देह। इस भौगोलिक देह को एक सूत्र अथवा एक व्यवस्था के अंतर्गत नियंत्रित करने वाली, उसे बांध कर रखने वाली देह हमारी राजनीतिक व्यवस्था है किंतु राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्र नहीं है, यह राष्ट्र की स्थूल देह को निर्मित करने का माध्यम भर है। वास्तव में देश की संस्कृति ही उसकी राजनीतिक व्यवस्था का भी निर्माण करती है।

    कहने का अर्थ ये कि राष्ट्र को निर्मित करने वाला बारीक तत्व संस्कृति है। देश की भौगोलिक सीमाएं बदल जाएं, राजनीतिक व्यवस्थाएं बदल जाएं किंतु नागरिक अपनी संस्कृति को पकड़े रहें तो वह राष्ट्र अक्षुण्ण रहता है। यदि भौगोलिक सीमाएं और राजनीतिक व्यवस्थाएं न बदलें और राष्ट्र की संस्कृति को बदल दिया जाए तो राष्ट्र मर जाता है।

    अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं।

    संस्कृति का निर्माण कौन करता है ?

    निःसंदेह मनुष्य करता है।

    संस्कृति का परिष्कार कौन करता है ?

    निःसंदेह साहित्य 
    करता है। 

    राष्ट्र का विचार या मंत्र कौन देता है ?

    निःसंदेह साहित्य करता है।

    यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्ववेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो राष्ट्र के मूल आधार अर्थात् ‘समाज’ के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। समाज ही सभ्यता का विकास करता है, समाज ही संस्कृति को रचता है और समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। समाज, सभ्यता एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने की भावना ही राष्ट्रीय चेतना के रूप में प्रतिफलित होती है।

    यह भावना आती कहां से है ?

    यह भावना आती है साहित्य से। समाज अपनी भूमि से जुड़ा हुआ रहता है। यही कारण है कि राष्ट्र, एक राजा द्वारा शासित एक गांव के संकुचित अर्थ से लेकर भारत, चीन और अमरीका जैसे विराट देशों के लिए प्रयुक्त होता है।

    अथर्ववेद का सूक्तकार ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’ कहकर राष्ट्रवाद का सूत्रपात करता है। यहां देखिए कि अथर्ववेद का सूक्तकार राष्ट्रवाद का बीज वपन कर रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना इसी पृथ्वी-सूक्त से आई है।

    राष्ट्र को कौन जगाता है 
    ?

    यजुर्वेद कहता है- वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः । यजुर्वेद राष्ट्र संरक्षण का दायित्व ब्राह्मणों पर ही डालता है। ये ब्राह्मण कौन हैं! ये ब्राह्मण और कोई नहीं, वेदों के मंत्र देने वाले, रामायण, महाभारत और गीता जैसे लोकोपकारी साहित्य रचने वाले, समाज को मार्ग दिखाने वाले हमारे और आपके जैसे साहित्यकार ही ब्राह्मण हैं। राष्ट्र को जागृत और जीवंत बनाने का भार इन्हीं साहित्यकार रूपी ब्राह्मणों पर है। आप किसी देश के साहित्य को बदल दीजिए, थोड़े ही समय में देश बदल जाएगा।

    साहित्य का सामर्थ्य कहां तक विस्तारित है 


    साहित्य के सामर्थ्य को समझने के लिए हमें मनुष्य जाति के विकास की कहानी पर थोड़ी दृष्टि डालनी चाहिए।

    क्या आप को मालूम है, धरती पर आदमी का पहला संस्करण कब आया ?

    देवताओं ने इस धरती को लगभग 18 लाख साल पहले, मानव का पहला संस्करण प्रदान किया। इसे होमो हैबिलिस कहते थे, वह बंदर से मिलता-जुलता था किंतु यह मानव पत्थर के औजार बनाकर उनसे शिकार करता था। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य उन्नति करेगा तथा एक संस्कृति का विकास करेगा किंतु 8 लाख साल तक भी वह अपनी उस अवस्था से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा।

    इसलिए देवताओं ने आज से 10 लाख साल पहले आदमी का दूसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो इरैक्टस कहते थे। यह दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलता था। उसकी शेष चेष्टाएं पशुओं जैसी थीं। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य अवश्य उन्नति करेगा किंतु 5 लाख साल बीत जाने पर भी इस मनुष्य ने अपनी आदतों में कोई परिवर्तन नहीं किया।

    इसलिए देवताओं ने आज से 5 लाख साल पहले आदमी का तीसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सेपियन कहते थे। इसका मस्तिष्क, धरती पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों से बहुत तेज बनाया गया। यह शब्दों का निर्माण करके उन्हें बोल भी सकता था। अर्थात् भाषा का निर्माण कर सकता था। देवताओं को इस मानव से बहुत आशाएं थीं कि शायद तेज दिमाग वाला और बोलकर अपनी बात कह सकने वाला यह मानव, अपनी सभ्यता और संस्कृति का विकास करेगा किंतु चार लाख साल बीतने पर भी यह मनुष्य अपनी अवस्था से आगे नहीं बढ़ सका।

    देवताओं ने आज से सवा लाख साल पहले मनुष्य का चौथा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सैपियन-सैपियन कहते थे। जब इस आदमी ने भी सभ्यता और संस्कृति का विकास नहीं किया तो आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले आदमी का अब तक का अंतिम प्रारूप आया। इसे क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। जो कि आप और हम हैं।

    इस संस्करण के मनुष्य अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे। वे कपड़ों को सिलकर पहनते थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनके चूल्हे भोजन पकाने में अधिक उपयोगी थे। मनुष्य का यह संस्करण बहुत उन्नत था। देवताओं को इस संस्करण से बहुत आशाएं थीं किंतु देवताओं को इस मनुष्य ने भी पहले के सभी मनुष्यों की तरह निराश किया और यह मनुष्य भी धरती के दूसरे पशुओं की तरह जीवन जीता रहा।

    देवताओं ने विचार किया कि क्या किया जाना चाहिए! उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने आज से लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले मनुष्य को तीन पुस्तकें प्रदान कीं जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद कहा जाता था। देवताओं ने ये पुस्तकें मनुष्यों को बोलकर सुनाईं तथा मनुष्य से कहा कि वह इन पुस्तकों को याद कर ले। मनुष्य ने वैसा ही किया। इस बार वह चमत्कार हो गया जिसकी प्रतीक्षा देवतागण पिछले 18 लाख साल से कर रहे थे।

    मनुष्य ने अपने मस्तिष्क, विचार और भाषा के साथ-साथ मन और इच्छा का विस्तार करना आरम्भ किया। उसने देवताओं को अथर्ववेद बनाकर सुनाया जिसमें मनुष्य ने देवताओं से प्रार्थना की कि आप हमें अच्छे घोड़े, अच्छे हल, अच्छी गाएं, अच्छे बीज, अच्छे मंत्र, अच्छी औषधियां दीजिए। हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए।

    कहने का अर्थ यह कि देवगण 18 लाख सालों तक मनुष्य के संस्करण परिष्कृत करते रहे किंतु वे बुद्धि से परिपूर्ण मनुष्य का निर्माण नहीं कर पाए किंतु जैसे ही उन्होंने मनुष्य को वेदों का ज्ञान दिया अर्थात् साहित्य प्रदान किया तो चमत्कार को घटित होने में समय नहीं लगा। आज आप धरती पर जो भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति देख रहे हैं, यह मनुष्य ने पिछले लगभग साढ़े तीन हजार वर्षों में अर्जित की है।

    अब साहित्य के सामर्थ्य पर दो उदाहरण आज के उन्नत युग से देखते हैं।

    एक जर्मन लेखक हुआ है कार्लमार्क्स। हम सबने उसका नाम सुना है। ई.1867 में उसकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘दास कैपिटल’। यह पुस्तक यह कहती थी कि दुनिया में तो तरह के लोग हैं। पहले वे जो ताकतवर हैं और दुनिया का शोषण करते हैं, दूसरे वे जो कमजोर हैं और शोषित होते हैं। यदि शोषित लोग संगठित हो जाएं तो वे शोषण से मुक्ति पा सकते हैं। इस पुस्तक ने विश्व भर के राष्ट्रों में बेचैनी उत्पन्न की। बहुत से देशों में मजदूरों, किसानों और वंचतों ने संगठित होकर शासन व्यवस्था के विरुद्ध क्रांतियां कीं तथा लगभग आधी दुनिया से सत्ता के तख्ते पलट गए। 1917 में रूस तथा 1947 में चीन भी कम्युनिस्टों के हत्थे चढ़ गए।

    यहां के लोगों ने अपने पुराने शासकों को मार डाला और कम्यूनिस्ट सरकारें बना लीं। लोगों ने क्रांतियां तो कर दीं किंतु उनका परिणाम यह हुआ कि नए विचारों वाले शासक, पुराने शासकों से भी अधिक शोषण करने वाले सिद्ध हुए। मानवता इस भयानक शोषण से सिसक उठी।

    ई.1903 के आसपास भारत के बिहार प्रांत में एक अंग्रेज अधिकारी काम करता था। उसका एक पुत्र था- जॉर्ज ऑरवेल जो अंग्रेजी भाषा में उपन्यास लिखा करता था। उसने एनिमल फार्म नामक एक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास 1945 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में 1917 की रूसी क्रांति पर एक करारा व्यंग्य किया गया।

    इस उपन्यास में रूपक खड़ा किया गया कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक दो सूअर, मेजर नामक एक महान सूअर के विचारों से प्रेरित होकर अपने फार्म के मालिक मिस्टर जोंस के विरुद्ध क्रांति करके उसे फार्म से खदेड़कर भगा देते हैं। इस उपन्यास के क्रांतिकारी सूअर वास्तव में रूसी क्रांति के नाक स्टालिन और ट्रोटस्की के प्रतीक थे। उपन्यासकार लिखता है किस प्रकार नेपोलियन और स्नोबॉल नामक चालाक और धूर्त सूअरों ने खेत की सत्ता हथिया ली और फार्म पर रहने वाले पशु-पक्षियों का जमकर शोषण किया। यह शोषण उनके पुराने मालिक अर्थात् आदमी द्वारा किए जाने वाले शोषण से अधिक भयानक था। वे गायों का दूध पी जाते हैं, मुर्गियों और बत्तखों के अण्डे खा जाते हैं। खेत में काम नहीं करते तथा घोड़ों को पहले की अपेक्षा अधिक घण्टों तक काम करने के लिए मजबूर करते हैं।

    जब यह उपन्यास इंग्लैण्ड से बाहर निकलकर दुनिया के अन्य देशों की जनता के हाथों में पहुंचा तो जनता ने पाया कि कम्युनिस्ट शासकों ने हमारा भी वैसा ही हाल किया है जैसा कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक सूअर, एनीमल फार्म के जानवरों का कर रहे थे।

    इस पुस्तक को पढ़कर दुनिया के बहुत से कम्यूनिस्ट देशों के नागरिकों के सिर से कम्यूनिज्म का भूत उतर गया। इन देशों में फिर से क्रांतियां हुईं और कम्यूनिस्ट सरकारों को उखाड़ फैंका गया। यहां तक कि स्वयं रूस ही बिखर गया। पूरी दुनिया से कम्यूनिज्म की शवयात्रा निकल गई। केवल चीन और इक्का-दुक्का कोई छोटा सा देश बचा है जहां कम्यूनिस्ट सरकारें हैं और वे आज भी अपने नागरिकों को गुलाम जैसी स्थति में रखती हैं।

    हमने राष्ट्र पर बात की, संस्कृति पर बात की, साहित्य की बात की अब थोड़ा विचार राष्ट्रवाद पर करते हैं।

    भारतीय ऋषि प्रार्थना करता है- विश्वानि देव सवितरदुरितानि परा सुवः, यद्भद्रम तन्नासुवः। अर्थात् वह विश्व भर के देवताओं से प्रार्थना कर रहा है कि मेरे भीतर जो भी बुराई है उसे दूर कीजिए और जो कुछ भी अच्छा है, वह मेरे पास लाइए।

    तो क्या यह ऐसी बात हुई कि हम प्रार्थना तो करेंगे विश्व भर में कहीं भी निवास करने वाले देवताओं की और गीत गाएंगे अपने राष्ट्र के। इस वैदिक मंत्र के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र निश्चित रूप से एक संकुचित विचार है।

    एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र से अलग है, प्रत्येक राष्ट्र के नागरिकों कोे अपने राष्ट्र पर गर्व है। गर्व की यह भावना मनुष्य की सोच को विस्तार नहीं देती, संकुचित करती है। यहां तक कि एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके वहां की जनता को आक्रांत करे। राष्ट्रवाद के नाम पर यूरोप में सैंकड़ों वर्षों तक यही हुआ।

    आचार्य चतुरसेन ने राष्ट्रवाद के बारे में लिखा है कि राष्ट्रवाद का दैत्य यूरोप में पैदा हुआ। तो क्या राष्ट्रवाद की भावना एक नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक बात है
    ? 

    प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध इस बात के गवाह हैं कि उपनिवेशवादी शक्तियों ने जनता में राष्ट्रवाद की भावनाएं भड़का कर धरती पर निवास करने वाले करोड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। प्रथम विश्वयुद्ध में लगभग 2 करोड़ लोग मरे और 2 करोड़ से अधिक लोग घायल हुए। द्वितीय विश्व युद्ध में 5 से 8 करोड़ लोग मरे। 50 लाख मनुष्य तो युद्धबंदियों के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुए। घायलों की संख्या अलग है।

    यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि राष्ट्रवाद की भावना, मानव जाति के लिए इतनी भयानक चीज है तो फिर राष्ट्रवाद क्यों ?

    वस्तुतः इस प्रश्न का जवाब कहीं से आ सकता है तो केवल साहित्य की दुनिया से। संस्कृत के एक कवि ने लंका को जीतने वाले राजा रामचंद्र के मुख से यह कहलवाया है- ‘स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ इस श्लोक के माध्यम से साहित्यकार राष्ट्रवाद की भावना को मर्यादा में बांधता है। जैसे ही मनुष्य में इस भावना का उदय होता है, राष्ट्रवाद की भयावहता समाप्त हो जाती है और राष्ट्रवाद की अच्छाई के दर्शन होने लगते हैं।

    जब हम वन्दे मातरम् कहते हैं तो उसका आशय भारत माता से तो होता ही है, वस्तुतः समस्त धरित्री से भी होता है। धरती हम सब की मां है, उसे देशों में हमने बांटा है, परमात्मा ने तो उसे एक इकाई के रूप में बनाया है। धरती के विभिन्न देशों में इसलिए बंटी क्योंकि विभिन्न स्थानों के मनुष्यों द्वारा सर्वे भवंतु सुखिनः जैसे साहित्य को त्यागकर, विकृत साहित्यों का निर्माण किया, जिससे पहले तो लोगों के मन अलग हुए और बाद में देश। बहुत प्राचीन काल में जब धरती पर केवल वैदिक धर्म ही व्याप्त था, दूसरी संस्कृतियां अस्तित्व में नहीं आई थीं, तब पूरी धरती एक देश ही थी।

    साहित्य का काम संस्कृतियों के इस वैमनस्य को दूर करने का है। यही साहित्य का वास्तविक सामर्थ्य है। जब कबीरदास यह कहते हैं कि- साईं इतना दीजियो जामै कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय। तो वे वस्तुतः संतोषी, सुखी और शांत राष्ट्र का निर्माण कर रहे होते हैं। यह साहित्य का ही सामृथ्य है कि वह मनुष्य को केवल इस बात के लिए तैयार करे कि वह परमात्मा से अपने परिवार और अतिथि का पेट भर जाने योग्य अन्न मांगने में ही संतोष का अनुभव करता है।

    मानव जब किन्हीं अन्य भूमियों पर विकसित राजनीतिक शक्तियों के अधीन हो जाता है तो वह अपनी जन्मभूमि से अपने सम्बन्ध का स्मरण करता है। इसी बिंदु पर राष्ट्रवाद का साहित्य जन्म लेता है। संसार की प्रत्येक भाषा के काव्य में, हर युग में राष्ट्रीय भावना का समावेश होता है। किसी भी देश के राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है।

    अच्छे साहित्य से रची गई राष्ट्रीय-भावना ही राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। राष्ट्रीय भावना का सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी होता है। वह न केवल अपने देश को स्वतंत्र देखना चाहता है अपितु समस्त मानवता को स्वाधीन एवं सुखी देखने की कामना रखता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-27

     01.01.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-27

    राजस्थान में जल चेतना (1)


    वर्षा की कम उपलब्धता तथा अनिश्चितता के कारण राजस्थान का पारिस्थितिकी तंत्र स्वाभाविक रूप से अत्यंत कमजोर है। यही कारण है कि लोक मानस में जल की उपलब्धता, महत्ता एवं श्रेष्ठता के सम्बन्ध में सदियों से चेतना का भाव रहा है। यदि यहाँ के निवासियों ने सदियों के अनुभव से विकसित उपायों को अपनी जीवन शैली में ढालकर अपनी संस्कृति का अंग न बनाया होता तो इस प्रदेश का पारिस्थितिकी तंत्र कभी का दम तोड़ चुका होता तथा यह क्षेत्र विश्व के अन्य कई मरुस्थलों की भांति कभी का जन-शून्य हो चुका होता। राजस्थान की संस्कृति में पानी की एक-एक बूंद को कीमती माना गया है। कन्हैयालाल सेठिया की ये पंक्तियां राजस्थान वासियों की इसी चेतना की ओर संकेत करती हैं-


    हिम गळ गळ गंगा बणी

    गंगा बणी समंद,

    समंद फेर बण बादळो

    रच्या बूंद रा छन्द।

    1908 ई. में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर में अर्सकाइन ने लिखा है- '1830 ई. तक जैसलमेर रियासत में खेती के लिये पानी का प्रयोग करना अपराध माना जाता था।' इस तथ्य से स्पष्ट है कि प्रजा से लेकर राजा तक, सभी जल को सुरक्षित रखने के लिये सजग थे। यह जानना रोचक होगा कि जिस राज्य में खेती के लिये जल के उपयोग पर रोक लगी हुई थी, वहाँ के राजा को राजस्व कैसे प्राप्त होता होगा! इतिहास बताता है कि जैसलमेर का शासक अपनी प्रजा से कृषि पर लगाये जाने वाले राजस्व कर की अपेक्षा पशुओं के घी की बिक्री से होने वाली आय पर कई गुना राजस्व संग्रहण करता था। यह आय इतनी अधिक होती थी कि जैसलमेर का राजा दूसरे राज्यों के राजाओं की अपेक्षा अधिक विलासिता पूर्ण जीवन व्ययतीत कर पाता था। स्पष्ट है कि जिस राज्य में खेती के लिये जल उपलब्ध नहीं था, वहाँ पशुपालन को अर्थव्यवस्था का आधार बना लिया गया था।


    जल की महत्ता सम्बन्धी चेतना का भाव

    राजस्थान में जल की महत्ता को गहराई से समझा गया है। एक कहावत में कहा गया है- 'जठै जल है, उठै जगदीश है।' अर्थात् जहाँ जल है, वहाँ ईश्वर का वास है। गांवों में यह कहावत बार-बार सुनने को मिलती है- 'आ सब पाणी री माया है।' अर्थात् यह सम्पूर्ण विश्व पानी के बल पर ही चल रहा है। यहाँ के साहित्य में भी विगत सैंकड़ों वर्षों से इस आशय के भाव व्यक्त किये जाते रहे हैं- 'अठै रगत सस्तो है अर पाणी मूंगो।' अर्थात् यहाँ वीर पुरुषों के लिये रक्त बहाना सामान्य बात है किंतु पानी की कीमत बहुत है। एक दोहे में कहा गया है-


    पांणी रौ कांई पिवै,

    (आ) रगत पीवणी रज्ज।

    संकै मन में आ समझ,

    घण नह बरसै गज्ज।।

    जल की श्रेष्ठता सम्बन्धी चेतना का भाव

    राजस्थान में जल की श्रेष्ठता पर गहनता से विचार किया गया है। गांव-गांव में एक कहावत कही जाती है- 'पाणी पियो छाणकर और गुरु बनाओ जाणकर।'अर्थात् स्वच्छ पानी पियो तथा समर्थ व्यक्ति को गुरु बनाओ। लोक साहित्य में नदी के जल को तथा कराख के जल को उसी प्रकार श्रेष्ठ माना गया है जिस प्रकार सूरज का तप, अथवा गाय और माँ का दूध श्रेष्ठ होता है-


    सूरज रो तो तप भलो, नदी रो तो जल भलो

    भाई रो तो बल भलो, गाय रो तो दूध भलो

    चारों बातों भले भाई, चारों बातों भले भाई।

    आंख रो तो तप भलो, कराख रो तो जल भलो

    बाहु रो तो बल भलो, मां रो तो दूध भलो

    चारों बातों भले, भाई चारों बातों भले भाई।।

    बादल एवं वर्षा सम्बन्धी चेतना

    बादल एवं वर्षा के बारे में राजस्थान के निवासियों का परम्परागत ज्ञान किसी आश्चर्य से कम नहीं। राजस्थानी लोक साहित्य में बादल के अनगिनत नाम मिलते हैं। इनके लिये जलहर, जीमूत, जलधर, जलवाह, जलधरण, जलद, घटा, क्षर, सारंग, व्योम, व्योमचर, मेघ, मेघाडम्बर, मेघमाला, मुदिर, महीमण्डल, भरणनद, पाथोद, धरमण्डल, दादर, डंबर, दलवादल, घन, घणमण्ड, जलजाल, काली कांठल, कालाहण, कारायण, कंद, हब्र, मैंमट, मेहाजल, मेघाण, महाघण, राइयो और सेहर आदि प्रमुख हैं।

    बड़े बादलों को सिखर कहते हैं। छितराए हुए बादलों के झुण्ड में अलग पड़ गया छोटा बादल चूंखो कहलाता है। ठण्डी हवा के साथ दूर से उड़ कर आये बादल कोलायण कहलाते हैं। काले बादलों के आगे चलायमान श्वेत बादलों को कोरण अथवा कागोलड़ कहते हैं। श्वेत बादलों के बिना आने वाले काले बादल कांठल या कलायण कहलाते हैं। पहले और ऊँचे बादल कस तथा कसवाड़ कहलाते हैं। नैऋत्य कोण से ईशान कोण की ओर थोड़े नीचे तेज बहने वाले बादल ऊंब कहलाते हैं। घटा का दिन भर छाए रहना तथा थोड़ा-थोड़ा बरसना सहाड़ कहलाता है। पश्चिम में तेज दौड़ने वाले बादलों की घटा लोरां कहलाती है और उससे लगातार होने वाली वर्षा लोरांझड़ कहलाती है। वर्षा कर चुके बादल जब किसी पहाड़ी पर विश्राम करते हुए प्रतीत होते हैं, तब उन्हें रींछी कहा जाता है।

    बादल के रंग, वर्षा के वेग तथा मेह की दिशा के आधार पर राजस्थान में वर्षा को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। वर्षा की बूंदों को हरि तथा मेघ-पुहुप कहा जाता है। वर्षा की बूंदों के गिरने पर उनकी सघनता के आधार पर उन्हें छांटो, छांटा, टपको, और टोपा कहते हैं। बूंदा-बांदी को झरमर, पुणंग तथा जीखा कहते हैं। जब वर्षा की झड़ी लग जाये तो उसे झंझमंडण तथा वरखावल कहते हैं। जब बूंदों की गति तथा अवधि बढ़ जाये तो उसे मेहांझड़ कहते हैं। जब तेज गति से कम समय में बरसात होती है तो उसे झपटो कहते हैं। उभ, बहादल, एहलूर, गोगभीण, कांठल, बावल, मदरी, एलूर, लाड़ी, भुर्ज, गूंगी, जीखां, ककर, लूरी, झुड़, काराण, शीडमी, सुआ, लड़, धराऊ; ये सब वर्षा के प्रकार हैं। सावन भादों में लगने वाली वर्षा की झड़ी को हूलर कहा जाता है। ठण्ड में होने वाली छुटपुट वर्षा को रोहड़ कहते हैं। वर्षा के साथ गिरने वाले ओलों को गड़ा कहा जाता है। नाडी या टांके में जमा वर्षा का जल पालर पाणी कहलाता है। यह स्वास्थ्य के लिये निरापद होता है। बहते हुए वर्षा जल को उसकी चाल के अनुसार बाला, आड या रेला कहते हैं।

    नौतपा का वर्षा से सम्बन्ध

    जेठ मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी से नौतपा प्रारम्भ होते हैं। नौतपा का अर्थ होता है, नौ दिन तक धरती का तेज गर्मी से तपना। यदि नौतपा में दिन खूब तपते हैं तो वर्षा अच्छी होती है। वर्षा से पहले की तपन को ओघमो कहा जाता है। जेठ माह के निकलते ही आषाढ़ के बादल आने आरम्भ हो जाते हैं, इसलिये चरवाहे जेठ के स्वागत में गीत गाते हैं-


    जेठ महीनो भलां आयो, दक्खन बाजे बा

    कानों रे तो कांकड़ बाजे, वा रे साईं वा।

    इस सम्बन्ध में एक कहावत भी कही जाती है- जेठ मास जो तपे निरासा तो जाणो बिरखा की आसां। अर्थात् यदि पूरे ज्येष्ठ मास में गर्मी हो तो आगे अच्छी वर्षा होगी।


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  • अजमेर का इतिहास - 91

     06.01.2020
    अजमेर का इतिहास - 91

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (3)


    दीनबंधु चौधरी

    दीनबंधु चौधरी का जन्म 19 दिसम्बर 1936 को डूंगरपुर जिले के खड़लाई गांव में हुआ। उनके पिता कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी अजमेर के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। दीनबंधु ने गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर से बीएससी गणित की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा पूर्ण होने पर उन्होंने दैनिक नवज्योति के सम्पादन का काम संभाला। वर्तमान में यह समाचार पत्र अजमेर, जयपुर, कोटा तथा जोधपुर से प्रकाशित होता है तथा दीनबंधु इसके प्रबंध सम्पादक हैं। उन्होंने अजमेर के विकास के लिये कई जनआंदोलनों का नेतृत्व किया है।

    वे सिटीजन्स कौंसिल अजमेर के महासचिव हैं। उनके प्रयासों से इस संस्था ने आना सागर झील का उद्धार किया तथा इसमें से 85 लाख क्यूबिक फुट मिट्टी निकलवाई। ई.1977 में राष्ट्रपति डॉ. के. आर. नारायण ने उन्हें राष्ट्र स्तरीय मातुश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्होंने पत्रकारिता के लिये देश के कई प्रधानमंत्रियों यथा राजीव गांधी, पी. वी. नरसिंहाराव, वी. पी. सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहनसिंह कि साथ कई देशों की यात्रा की है।

    यूएसएसआर के निमंत्रण पर वे विशिष्ट अतिथि के रूप में रूस की 13 दिन की यात्रा कर चुके हैं। कुवैत सरकार के निमंत्रण पर वहां भी पाँच दिन की यात्रा कर चुके हैं। वे अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सदस्य हैं। वे अजमेर जिला स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष हैं। वे बैडमिण्टन के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी रहे हैं।

    दुर्गा प्रसाद चौधरी (कप्तान)

    कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी का जन्म 18 दिसम्बर 1906 को नीम का थाना के प्रसिद्ध अग्रवाल परिवार में हुआ। दुर्गा प्रसाद चौधरी स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार एवं समाजसेवी थे। उनके चार भाई और तीन बहिनें थीं। बड़े भाई रामनारायण चौधरी प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी थे। ई.1921 से 1947 के मध्य दुर्गा प्रसाद स्वाधीनता आंदोलन में संलग्न रहे। ई.1930 से 1945 तक वे कांग्रेस सेवादल के कप्तान रहे। इसलिये उन्हें कप्तान साहब के नाम से जाना गया। ई.1936 में उन्होंने अजमेर से साप्ताहिक समाचार पत्र नवज्योति का प्रकाशन एवं सम्पादन आरंभ किया।

    इस अखबार ने आजादी की लड़ाई में मशाल का काम किया। देशी रियासतों के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले अखबारों में यह एक अग्रणी अखबार था। अब वह समाचार पत्र दैनिक नवज्योति के नाम से निकलता है। ई.1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण कप्तान साहब को जेल में बंद कर दिया गया। वे तीन वर्ष तक जेल में बंद रहे। इससे पूर्व भी वे एक बार तीन माह के लिये, दूसरी बार 6 माह के लिये तथा तीसरी बार 1 वर्ष के लिये जेल में रहे थे। ई.1962 के चीन युद्ध के दौरान वे युद्ध की रिपोर्टिंग के लिये असम में मैकमोहन रेखा पर स्थित युद्ध के मोर्चों पर भी गये। ई.1992 में उनका निधन हुआ।

    नृसिंहदास (बाबाजी)

    नृसिंह दास का जन्म 31 जुलाई 1890 को नागौर के प्रतिष्ठित अग्रवाल परिवार में हुआ। उन्होंने नागौर, बीकानेर तथा हैदराबाद में महाजनी पढ़ी। जब देश में स्वतंत्रता संग्राम की चिन्गारियां स्फुरित हुईं तो नृसिंहदास ने अपने लाखों रुपये के कारोबार को तिलांजलि दे दी तथा अपनी और अपनी पत्नी के विदेशी कपड़ों की होली जलाकर बाबाजी बन गये। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों तथा क्रांतिकारियों के परिवारों एवं उनके बालकों की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा और शादी विवाह करवाने का कार्य हाथ में लिया। बाबाजी ने कई बार बम्बई से हथियार खरीद कर क्रांतिकारियों तक पहुँचाये। मोहनदास गांधी से उनका वैचारिक मतभेद रहता था। 22 जुलाई 1957 को बाबाजी का अजमेर में निधन हुआ।

    बालकृष्ण कौल

    बालकृष्ण कौल का जन्म 18 जून 1903 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद कस्बे में हुआ। आपने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। केवल 17 वर्ष की आयु में ई.1920 से वे सक्रिय राजनीति से जुड़ गये। ई.1921 में असहयोग आंदोलन, 1930-31 में नमक सत्याग्रह एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन, ई.1940-41 में व्यक्तिगत सत्याग्रह और ई.1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। वे छः साल तक जेल में रहे। ई.1952 से 1957 तक वे अजमेर विधानसभा के सदस्य रहे। इस दौरान वे ई. 1952 से 56 तक अजमेर प्रांत के गृह एवं वित्त मंत्री रहे। ई.1962 से 1967 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। ई.1968 में वे राज्यसभा के लिये चुने गये। वे संसद की लोकलेखा समिति के सदस्य भी रहे।

    बालकृष्ण गर्ग

    बालकृष्ण गर्ग का जन्म 9 दिसम्बर 1908 को अजमेर में हुआ। ई.1930 में वे कांग्रेस से जुड़े। ई.1942 तक उन्होंने अनेक आंदोलनों में भाग लिया तथा कई बार जेल गये। 8 से 16 अप्रेल 1940 तक अजमेर कांग्रेस के राष्ट्रीय सप्ताह में झण्डा फहराने पर बालकृष्ण गर्ग को चार माह की कठोर जेल दी गई। वे अजमेर राज्य के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। अजमेर-मेरवाड़ा सम्मिलित कांग्रेस के उपाध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री रहे। वे हरिजन सेवक संघ तथा भारत सेवक समाज के अध्यक्ष रहे। ई.1937 में उन्होंने अजमेर-मेरवाड़ा ग्राम सेवा मण्डल की स्थापना की। वे अजमेर नगर परिषद के सदस्य भी रहे।

    रवीन्द्र कृष्ण मजबूर

    रवीन्द्र कृष्ण मजबूर का जन्म अविभाजित भारत के उस हिस्से में हुआ था जो भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया। भारत विभाजन के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया। बाद में रवीन्द्र कृष्ण अजमेर आ गये। वे इस युग के प्रमुख शायरों में से हैं। उनकी शायरी में गंभीर दर्शन एवं अध्यात्म देखने को मिलता है। उन्होंने हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेजी में पुस्तकें लिखीं। उनकी लिखी पुस्तकों में इन साइड दी पेन, तुम्हारी तुम जानो, सब सहना है मजबूर आदि प्रसिद्ध हैं। संत मुरारी बापू उनकी शायरी से बहुत प्रभावित हुए तथा उनसे मिलने के लिये उनके निवास पर आये। मजबूर की पत्नी सत्यकृष्णा का परिवार भी पाकिस्तान के सियालकोट से आया था। वे सेंट्रल गर्ल्स स्कूल में हिन्दी की वरिष्ठ अध्यापिका रहीं और अध्यापन एवं लोक सेवा के लिये कई बार सम्मानित हुईं।


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  • घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     20.05.2018
     घर चलो माँ! (हिन्दी कहानी)

     घर चलो माँ!

    बबलू बेचैन है। क्या कहे माँ से! कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं होती। वह कनखियों से माँ की ओर देखता है, माँ का चेहरा पूरी तहर निर्विकार है। बबलू को इस चेहरे को पढ़ने का अभ्यास तब से है जब वह बोल भी नहीं पाता था। तब वह केवल रो कर माँ को बता देता था कि वह क्या चाहता है! थोड़ा सा रोने के बाद बबलू चुप हो जाता था और माँ का चेहरा देखकर आश्वस्त होने का प्रयास करता था कि माँ ने उसकी आवश्यकता को ठीक से समझ लिया है या नहीं। माँ हर बार ठीक से जान जाती थी कि इस बार बबलू दूध के लिये रोया है, या उसने लंगोटी गीली कर ली है, या उसे गर्मी लग रही है। उन दिनों से लेकर इन दिनों तक उसकी हर मांग माँ ही पूरी करती आई है। आज वही माँ बबलू को माँ के अपने बनाये मकान में छोड़कर भावशून्य चेहरा लिये किराये के मकान में रहने चली आई है।

    माँ का भावशून्य चेहरा देखकर बबलू भीतर ही भीतर काँप जाता है। उसे लगता है कि वह एक ऐसी इमारत के सामने खड़ा है जिसमें प्रवेश करने के सारे दरवाजे पूरी मजबूती के साथ भीतर से बंद कर लिये गये हैं। बाहर से कितनी भी आवाज दो, भीतर न तो आवाज पहुँचने वाली है और न अनायास ही दरवाजा खुलने वाला है। कौन जाने दरवाजा खोलने के लिये इमारत के भीतर कोई है भी कि नहीं!

    बबलू फिर से कनखियों से माँ की ओर देखता है। माँ मौन है। पिछले कई सालों से उसकी आँखों में हर पल दिखाई देने वाली कठिनाई, खीझ, गुस्सा और असमंजस का भाव आज नहीं है। माँ की आँखों में पल-पल दिखाई देने वाले भाव बबलू के लिये खिड़की का कार्य करते थे जिनके माध्यम से वह माँ के भीतर पहुँच जाया करता था और नाराज माँ को किसी तरह मना लिया करता था किंतु आज सारी खिड़कियाँ बंद हैं। माँ का चेहरा कपूर की तरह सफेद, बर्फ की तरह ठण्डा और सर्दियों में ठहरे हुए झील के पानी की तरह शांत है। छोटे से घर में पसरा हुआ मौन बबलू को काटता हुआ सा प्रतीत होता है। माँ कभी इतनी तंग गली के इतने छोटे मकान में नहीं रही। कैसे माँ ने इस मकान में रहने का मन बनाया होगा! उसे आश्चर्य होता है।

    माँ का मोबाइल बजने से बबलू को राहत मिलती है। वह आया तो था माँ को मनाकर पुनः घर ले चलने के लिये किंतु माँ का नितांत ठण्डा स्वर और भावशून्य चेहरा देखकर उसकी हिम्मत ही नहीं हुई। माँ को मोबाइल में व्यस्त जानकर बबलू कमरे से बाहर आ गया है। यह कहना गलत है कि वह कमरे से बाहर आ गया है।

    वास्तविकता यह है कि एक कमरे के घर में कमरे से बाहर आने का अर्थ होता है घर से भी बाहर आ जाना। सड़क पर आकर बबलू गाड़ी स्टार्ट करता है। कहाँ जाये! ऑफिस या घर! ऑफिस में मन नहीं लगेगा और घर में विनीता के सवालों की झड़ी लग जायेगी। वे सवाल जिनकी वजह बबलू नहीं है, स्वयं विनीता है, या फिर पापा हैं किंतु विनीता उन सवालों के उत्तर बबलू से लेना चाहेगी। यह कैसी विडम्बना है, प्रायः वह उन सवालों से घिर जाता है जिनके उत्तर उसे स्वयं चाहिये। कल तक वह भी माँ पर खूब चीखता चिल्लाता था। उन्हीं सवालों के जवाब वह माँ से मांगता रहा था जिन सवालों के जवाब आज उसे पूरी दुनिया को देने पड़ेंगे।

    जिन सवालों ने आज माँ को घर से निकाल कर किराये के मकान में पहुंचा दिया है, जिन सवालों ने आज उसके और माँ के बीच में एक ऐसी मोटी दीवार चिन दी है जिसके आर-पार आवाज जाने की संभावना तक दिखाई नहीं देती, उन सवालों के जवाब कहाँ से लाये बबलू! उसे स्वयं अपनी स्थिति पर तरस आ जाता है। अगले ही क्षण उसे माँ का ध्यान आता है। निश्चय ही आज उसने माँ का जो चेहरा देखा है, वह चेहरा उसके हृदय की वास्तविक स्थिति का द्योतक नहीं है। भीतर ही भीतर वह अवश्य ही बहुत दुःखी है।

    जरा सी बात पिछले नौ सालों में बढ़कर यहाँ तक पहुँच गई थी। न तो पापा विनीता को सहन करने को तैयार हुए थे और न विनीता ने पापा की किसी बात को सुनने का प्रयास किया था। इस पूरे प्रकरण में बबलू की क्या गलती थी? और माँ? माँ की भी तो कोई गलती नहीं थी। उन्हें भी तो सजा मिल रही है। जब माँ औरत होकर इतना सहन कर सकती है तो फिर बबलू क्यों नहीं। क्यों वह अपने भीतर की पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा!

    उसे आज भी याद है कि अंतिम वर्ष में उसके पास कॉलेज की फीस भरने लायक रुपये नहीं थे, पापा सदैव की तरह अपने सुनहरे अतीत का गुणगान करते हुए किंकर्त्तव्य विमूढ़ की तरह घर में बैठे थे और बबलू रिश्तेदारों और परिचितों के यहाँ दो सौ रुपये के लिये याचक बना घूम रहा था, पूरे शहर में वह चक्करघिन्नी की तरह घूम गया था किंतु किसी उसे दो सौ रुपये नहीं दिये थे। हार थक कर बबलू घर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। उसका दिल रोने को हो रहा था किंतु माँ को हॉस्पीटल गये काफी देर हो गई थी इसलिये मकान की सीढ़ियों पर बैठकर रोने से अधिक जरूरी माँ को ढूंढने के लिये हॉस्पीटल जाना हो गया था।

    आंसुओं को आँखों में ही रोककर वह सीढ़ियों से उतर कर घर से बाहर निकला ही था कि दरवाजे पर थकी हारी माँ दिखाई दी थी। माँ ने स्कूल फीस जमा कराने की पर्ची चुपचाप उसकी हथेली पर रख दी थी और स्वयं सीढ़ियों पर बैठकर हांफने सी लगी थीं। उन्होंने अपनी एक महीने की दवाईयाँ न खरीदकर उन रुपयों से उसकी फीस भरवा दी थी।

    उन दिनों बीमारी के कारण माँ को नौकरी पर जाना बंद किये हुए पूरा एक साल होने आया था और जो कुछ भी घर में पिछले दिनों का बचा हुआ था, वह माँ के इलाज पर शनैः शनैः चुक रहा था। यह तो ठीक था कि सरकारी नौकरी थी इसलिये वह छूटी नहीं, अन्यथा माँ के लिये आगे की नौकरी का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता।

    उपचार से माँ लगातार ठीक होती जा रही थी और यह आशा बंधती जा रही थी कि कुछ महीनों बाद वह फिर से नौकरी पर जाने लगेगी और घर फिर से पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। माँ का सारा गहना भी उन्हीं दिनों बिका। बबलू और उससे भी चार साल छोटी बबीता ने उन दिनों क्या कुछ नहीं सहा! अच्छे कपड़ों में तो वे समझते ही नहीं थे किंतु साबुत निक्कर कमीज के लिये भी तरस गये थे वे। आखिर कुछ महीने और बीते, माँ नौकरी पर जाने लायक हो गई। जीवन धीरे-धीरे सामान्य होता चला गया था। बबलू ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली किंतु पढ़ाई पूरी करते-करते उसके मन में गरीबी और लाचारी ने ऐसी जिद भर दी कि अब वह कोई छोटी-मोटी नौकरी तलाशने के स्थान पर व्यापार में हाथ आजमाना चाहता था। वह कोई ऐसा व्यापार चाहता था जो उसे कुछ ही समय में करोड़पति बना दे ताकि फिर कभी गरीबी और बेचारगी मुड़कर इस घर को न देखें।

    उसने अपने लिये इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस चुना। माँ ने सुना तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतना पैसा कहाँ से आयेगा! यह ऐसा बिजनिस था जिसे आरंभ करने के लिये कम से कम पाँच-सात लाख रुपये तो जेब में चाहिये ही। माँ ने बबलू को इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनिस करने से लाख मना किया और कहा कि वह कोई नौकरी कर ले किंतु बबलू को तो एक ही धुन सवार थी - इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनिस।

    बबलू को आज भी याद है कि उसने माँ से कुछ नहीं मांगा था किंतु जब उसे परेशान होते हुए कई दिन बीत गये थे तब एक दिन स्वयं माँ ने उसके हाथ में तीन लाख रुपये का चैक रख दिया था - 'ये ले! अपना बिजनिस शुरु कर।'

    बुरी तरह चौंका था बबलू - 'इतने रुपये कहाँ से आये?'

    - 'तुझे ज्यादा पूछताछ करने की जरूरत नहीं।' माँ ने हर बार की तरह उसे निरुत्तर कर दिया था।

    कई महीने बाद बबलू को पता चल पाया कि जिस मकान को बनाने में माँ ने अपनी आधी जिंदगी की कमाई झौंक दी थी, उसी को गिरवी रखकर माँ ने बैंक से यह पैसा लिया था। उसके बाद से तो जैसे एक नया सिलसिला चल पड़ा। इस बिजनिस की अपनी परेशानियाँ थीं जिन्हें सुलझा पाना बबलू के अकेले के बूते की बात ही नहीं थी लेकिन जब भी बबलू ने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की तो उसे माँ अपने ठीक पीछे खड़ी हुई मिली।

    कई बार उसका कन्साइनमैण्ट फेल हो जाता था। कई बार उसका माल कस्टम में रोक लिया जाता था। कई बार फॉरेन वाली पार्टी वायदा करके मुकर जाती थी। जब भी ऐसा होता था बबलू को तत्काल दो तीन लाख रुपयों की जरूरत होती थी और हर बार बबलू की जेब खाली होती थी। पता नहीं कैसे बबलू इतना बड़ा बिजनिस संभाल पाता था, उसे पैसों का हिसाब रखने को तो कोई होश ही नहीं था। वह तो केवल इतना जानता था कि जितना पैसा हो सब बिजनिस में लगा दो। पैसा कम पड़े तो माँ को बताओ। यह सही था कि बबलू को इस बिजनिस में अच्छा लाभ हो रहा था किंतु वह पूरी आय को बिजनिस में झौंकता जा रहा था जिससे बिजनिस का आकार और मुनाफा दोनों बढ़ रहे थे किंतु बबलू का हाथ सदैव तंग ही रहता था।

    बबलू को मुँह से बोलकर कुछ भी मांगना नहीं पड़ता था। माँ सब जानती थी, सब सहती थी और सब करती थी। रसोई का खर्च, बबलू के पापा का इलाज, अपनी दवाईयाँ, बबीता के विवाह का खर्च, बबलू के विदेश आने-जाने के टिकट, सारा प्रबंध माँ ही करती रही थी और बबलू बेतहाशा पैसा कमाता रहा था। इस बीच में बबीता अपने ससुराल चली गई थी किंतु घर में विनीता आ गई थी। बबलू को लगा था कि बहू के आ जाने के बाद माँ को कुछ आराम मिलेगा किंतु हुआ ठीक उलटा। पापा के और विनीता के गण पहले दिन से ही नहीं मिले। विनीता के आने से पहले पापा कभी इतने रूखे नहीं थे। यह ठीक है कि पापा ने जीवन भर कभी ढंग से कमाया नहीं किंतु वे स्वभाव के अच्छे ही थे। जाने ऐसी क्या बात थी कि विनीता को देखते ही उनके स्वभाव ने पलटी मार ली थी।

    सरल स्वभाव की विनीता, जाने क्यों पापा की इच्छानुसार काम नहीं कर पाती थी। पापा की एक न एक शिकायत बनी ही रहती - रोटियाँ कच्ची हैं। सब्जी बेस्वाद है। चाय को ढंग से उबाला नहीं। पापड़ ढंग से नहीं सेके। बरतन मांजने में इतनी आवाज करती है। धूप में पड़े-पड़े कपड़ों का रंग खराब हो रहा है। इसे कपड़े भीतर लाने का होश नहीं है। विनीता सिर झुका कर पापा के सब आरोपों और उलाहनों को चुपचाप सब सुनती। पापा के मन को अच्छा लगे, ऐसा कुछ करने का भरसक प्रयास करती किंतु पापा अपने अतीत की गौरव गाथाओं का गायन करते-करते विनीता के हर काम में दोष निकालते ही गये थी। जाने पापा विनीता से क्या चाहते थे?

    जब घर में नई पीढ़ी के बच्चे आ गये तो बबलू को लगा कि पापा अब बच्चों के साथ समय निकाल लिया करेंगे किंतु उनका पूरा ध्यान विनीता की ओर ही लगा रहा। कैसी फूहड़ है? कितना पैसा खर्च करती है? बच्चों के इतने महंगे कपड़े खरीद कर क्यों लाई? कपड़ों पर ढंग से इस्तरी तक नहीं कर सकती। कपड़ों में नील लगाने तक की तमीज नहीं। पूरी बनियान पर धब्बे लगा देती है। झाडू. बुहारने तक का शउर नहीं। बरतनों की आवाज करती है।

    माँ ने पापा को समझाने का लाख प्रयास किया कि वे विनीता से प्यार से बोलें किंतु पापा को माँ की कोई बात समझ में नहीं आई थी। बबलू ने स्वयं को पापा और विनीता के प्रकरण से कभी जोड़ा ही नहीं। माँ जाने और उसका काम जाने। माँ के रहते बबलू को घर के मामलों में बोलने की जरूरत ही नहीं थी लेकिन वह लगातार अनुभव करता रहा था कि पापा और विनीता के मामले में माँ बिल्कुल असफल सिद्ध होती जा रही थी।

    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जाता था, पापा की शिकायतों की सूची बढ़ती जाती थी। नित नई शिकायतों की मार से विनीता का धैर्य चुकता चला गया था। पहले तो वह पापा के सामने जाने से बचने लगी। बाद में वह उन्हें जानबूझ कर अनसुना करने लगी। पापा फिर भी नहीं माने तो वह जानबूझ कर चाय खराब बनाने लगी। जानबूझ कर कच्ची रोटियाँ पापा की थाली में परोसने लगी और पापा की बनियान पर जान बूझ कर नील के धब्बे लगाने लगी। पापा में कोई सुधार नहीं हुआ। वे विनीता में आते जा रहे परिवर्तन को भी लक्ष्य नहीं कर पाये।

    धीरे-धीरे विनीता पापा के सामने बोलने भी लगी थी। उन्हें तमक कर जवाब भी देने लगी थी लेकिन ऐसा वह तभी करती थी जब उसे यह पूरा विश्वास हो कि माँ या बबलू में से कोई देख नहीं रहा है। बहू के तीखे जवाबों को सुनकर पापा और भी बौखला जाते। उनका गुस्सा आसमान पर जा चढ़ता। वे जोर-जोर से चीखने चिल्लाने लगते और घर में बवण्डर जैसा ही आ जाता।

    कई बार बबलू ने और कई बार माँ ने भी विनीता को पापा से मुँहजोरी करते हुए सुन लिया था। अब स्थिति उस बिंदु तक जा पहुँची थी कि दोनों में किसी को नहीं समझाया जा सकता था। न तो बबलू को और न माँ को ऐसा आभास हो पाया था कि विनीत आजकल पापा को गुस्सा करने के लिये क्यों उकसाती है। बहुत दिनों बाद उन्हें मालूम हुआ था कि विनीता पापा को गुस्सा करने के लिये उकसा कर अपने मोबाइल को ऑन करके पापा की सारी चीखें और गुस्से में बकी गई गालियां वह अपने पीहर वालों से लेकर ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों को सुनाती थी। इस प्रकार पापा गुस्से में आग बबूला होकर जो कुछ भी अनाप-शनाप बकते थे, उसे सब रिश्तेदारों ने अपने-अपने घर में बैठकर ही सुन लिया था और पापा सब रिश्तेदारों की दृष्टि में गिर गये थे।

    आखिर वह दिन भी आ ही गया था जिसके भय से बबलू और माँ दोनों ही भीतर ही भीतर आशंकित थे। पापा और विनीता, दोनों ने घोषणा कर दी थी कि इस घर में वे दोनों साथ नहीं रह सकते। दोनों में से किसी एक को घर छोड़कर जाना ही पड़ेगा। माँ एक ओर पापा से बंधी हुई थी तो दूसरी ओर बबलू से। बबलू भी एक ओर माँ से बंधा हुआ था तो दूसरी ओर विनीता से किंतु पापा और विनीता एक घर में रहने को तैयार नहीं थे। अतः स्वाभाविक ही था कि या तो माँ पापा को लेकर घर से चली जाती या फिर बबलू विनीता और बच्चों को लेकर घर छोड़ देता।

    आखिर इस बार भी बबलू को कुछ नहीं करना पड़ा था। माँ चुपचाप पापा को लेकर इस किराये के मकान में चली आई थीं और बबलू लाख चाह कर भी उनसे यह नहीं कह पाया था - घर चलो माँ।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-28

     01.01.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-28

    राजस्थान में जल चेतना (2)


    कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ

    राजस्थानी कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियों का भण्डार भरा पड़ा है। यह भण्डार लोक द्वारा अर्जित अनुभव द्वारा रचा गया है-

    काल केरड़ा सुगाळै बोर : अर्थात् कैर के वृक्ष पर अत्यधिक फल लगें तो वर्षा नहीं होगी, अकाल पड़ेगा एवं बेरियों के अधिक बेर लगे तो यह अच्छी वर्षा होने का संकेत है। सुकाल होगा।

    काती रो मेह कटक बराबर : अर्थात् कार्तिक की वर्षा फसल के लिये बहुत हानिकारक है।

    आसोजां में मोती बरसे : अर्थात् आश्विन मास में होने वाली थोड़ी वर्षा भी खेती के लिये मूल्यवान होती है।

    ईसानी बिसानी : ईशान कोण में बिजली चमके तो खेती अच्छी होगी।

    चांद छोड़े हिरणी तो लोग छोड़े परणी : अर्थात् अक्षय तृतीया को यदि चांद मृगशिरा से पूर्व अस्त हो जाये तो भीषण अकाल पड़ेगा, जिसमें लोगों को अपनी स्त्रियों को घर पर छोड़कर जीवन निर्वाह के लिये अन्यत्र जाना पड़ेगा।

    बरसे भरणी, छोड़े परणी : अर्थात् यदि भरणी नक्षत्र में वर्षा होवे तो पति अपनी पत्नी को छोड़ भागे अर्थात् उसे कमाने के लिये विदेश जाना पड़ेगा।

    जे बरसे मघा तो धान रा ढगा : यदि मघा नक्षत्र में वर्षा हो तो अनाज अत्यधिक उत्पन्न होगा।

    जे बरसे उतरा तो धान न खावे कुतरा : यदि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वर्षा हो तो इतना धान होगा कि उसे कुत्ते भी नहीं खायेंगे।

    रोहण रेली तो रुपये की अधेली : अर्थात् यदि रोहिणी नक्षत्र में वर्षा हो तो रुपये की अधेली मिलेगी अर्थात् अकाल पड़ेगा।

    न भीज्यो काकड़ो, तो क्यूं टेरै हाळी लाकड़ो? : अर्थात् हे किसान यदि कर्क संक्रांति के दिन वर्षा न हो तो तुम व्यर्थ ही हल चलाते हो क्योंके कर्क संक्रांति के दिन वर्षा न होने से अकाल पड़ेगा।

    भादरवो गाज्यौ, काळ भाज्यौ : अर्थात् भादों में वर्षा होने पर अकाल भाग जाता है।

    भडली पुराण में वर्षा सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ

    वर्षा के समय पर आने, पर्याप्त मात्रा में आने तथा निश्चित अंतराल पर आने पर ही अच्छी फसल ली जा सकती है। अच्छी फसल होने पर पशु-पालन, व्यापार-वाणिज्य एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है। इसलिये समाज का हर व्यक्ति जानना चाहता है कि वर्षा कब तथा कितनी होगी! जन मानस की इस उत्सुकता का निवारण करने के लिये डंक नामक ज्योतिषी ने भडली पुराण नामक ग्रंथ की रचना की। डंक की पत्नी का नाम भडली था। भडली को सम्बोधित करके डंक ने अपना ग्रंथ लिखा तथा उसी के नाम पर इस ग्रंथ का नाम भडली पुराण रखा। इस पुराण में, निश्चित दिन को होने वाली प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर, आने वाले दिनों में वर्षा की भविष्यवाणी जानने के सूत्र दिये गये हैं-


    मंगसर तणी जे अष्टमी, बादली बीज होय।

    सांवण बरसै भडली, साख सवाई जोय।।

    अर्थात् यदि मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को बादल दिखाई दें और बिजली चमके (दोनों घटनाएं हों) तो श्रावण मास में वर्षा होगी और फसल सवाई होगी।


    मिंगसर बद वा सुद मंही, आधै पोह उरे।

    धंवरा धुंध मचाय दे, तौ समियो होय सिरे।

    अर्थात् यदि मार्गशीर्ष के पहले या दूसरे पक्ष में अथवा पौष के प्रथम पक्ष में, प्रातः काल के समय धुंध (कोहरा) हो जाये तो फसल अच्छी होगी।


    पोष अंधारी दसमी, चमकै बादल बीज।

    तौ भर बरसै भादवौ, सायधण खेलै तीज।।

    अर्थात् यदि पौष कृष्ण दसमी को बादलों में बिजली चमके तो पूरे भादों में वर्षा होगी और स्त्रियां तीज का त्यौहार अच्छी तरह मनायेंगी।


    पोह सबिभल पेखजै, चैत निरमल चंद।

    डंक कहै हे भड्ड, मण हूंता अन चंद।

    अर्थात् यदि पौष में बादल दिखाई दें और चैत्र के शुक्ल पक्ष में चंद्रमा स्वच्छ दिखाई पड़े अर्थात् कोई बादल दिखाई न दे तो डंक भडली से कहता है कि अनाज मन से भी सस्ता होगा।


    फागण वदी सु दूज दिन, बादल होए न बीज।

    बरसै सांवण भादवौ, साजन खेलौ तीज।।

    अर्थात् यदि फाल्गुन कृष्ण द्वितीया के दिन बादल या बिजली नहीं हो तो श्रावण व भादों में अच्छी वर्षा होगी, अतः हे पति तीज अच्छी तरह मनायेंगे।

    भडली पुराण के जल-कूण्डो तथा माछली

    भडली पुराण जलकूण्डो तथा माछली के रूपकों से भरा पड़ा है। आषाढ़ के प्रारंभ में सूरज के चारों ओर दिखने वाला एक विशेष प्रभा-मण्डल, जल-कूण्डो कहलाता है। यह जल-कूण्डो वर्षा का सूचक माना जाता है। इन्हीं दिनों उदित होते सूर्य में माछली, यानी मछली के आकार की एक विशेष किरण दिख जाए तो तत्काल वर्षा की संभावना होती है। इसी प्रकार आषाढ़ में चंद्रमा की कला हल की तरह खड़ी रहे और श्रावण में यह विश्राम की मुद्रा में लेटी दिखे तो वर्षा ठीक होती है- 'ऊभो भलो अषाढ़, सूतो भलो सरावण।'

    कुल्हड़ गलाने की परम्परा

    आगामी चौमासे में वर्षा की मात्रा जानने के लिये आखा तीज पर मिट्टी के चार कुल्हड़ रखे जाते हैं जो जेठ, आषाढ़, सावन तथा भादों के प्रतीक माने जाते हैं। इनमें पानी भरकर रख दिया जाता है तथा यह देखा जाता है कि कौनसा कुल्हड़ पहले गलता है। जेठ का कुल्हड़ गल जाये तो वर्षा स्थिर मानी जाती है। आषाढ़ का गले तो वर्षा खण्डित होगी, सावन या भादों वाला कुल्हड़ पहले फूटता है तो माना जाता है कि वर्षा प्रचुर मात्रा में होगी।

    वर्षा का स्वागत

    जब बादल आते हैं तो पश्चिमी राजस्थान में बच्चे, वर्षा का स्वागत करने के लिये डेडरिया गाते हैं-


    डेडरियो करे डरूं, डरूं,

    पालर पानी भरूं, भरूं।

    आधी रात की तलाई

    नेष्टई नेष्टे।

    अर्थात् डेडरिया (मेंढक) वर्षा को देख कर डरूं-डरूं (टर्र-टर्र) करता है और कहता है कि मैं तो वर्षा का पानी भर रहा हूँ ताकि आधी रात तक तलैया नेष्टे (अपरा) तक भर जाये।

    कन्हैयालाल सेठिया ने बादलों के आगमन का इस प्रकार वर्णन किया है-


    आया बादळ बींद बण

    धरती हुई सुरंग

    गगन बखेर्या पंथ में

    रामधणख रा रंग।

    अरूठ मनाने की परम्परा

     बादल तो आ गये हैं किंतु ऐसा न हो कि किसी कारण से वर्षा न हो पाए। इस शंका का निवारण करने के लिये गांव-गांव में छोटे-मोटे अनुष्ठान किये जाते हैं। मिट्टी के बरतनों में साबत गेहूँ अर्थात् गूगरिये बनाये जाते हैं। अनुष्ठानकर्त्ता, अपने सिर से पगड़ी उतार लेता है तथा इन गूगरियों को चारों दिशाओं में उछालकर जल एवं वायु को अर्पित करता है। इसे अरूठ मनाना कहते हैं। अर्थात् वर्षा यदि रूठ गई हो तो वह प्रसन्न हो जाये। पगड़ी उतार कर अरूठ मनाने का आशय इस भाव से है कि हम वर्षा के अभाव में शोक संतप्त हैं।

    मरुभूमि में वर्षा का दृश्य

    मरुभूमि में वर्षा का दृश्य अनूठा होता है। इस दृश्य को कन्हैयालाल सेठिया ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-


    काळा बादळिया घहरावै

    बिरखा घूघरिया घमकावै,

    बिजळी डरती ओला खावै

    धरती धोरां री।

    एक लोक गीत में, जल बरसाती हुई बदली का चित्रण इन शब्दों में किया गया है-


    काळी रे कळायण ऊपड़ी ए पणिहारी ऐले

    गुडला सा बरसे मेह सेणों लो।

    जल स्रोतों के निर्माण की परम्परा

    राजस्थान में वर्षा से प्राप्त जल को सहेजने एवं भू-गर्भ में स्थित जल को प्राप्त करने के लिये सदियों से उपाय किये जा रहे हैं। सदियों से सेठ-साहूकार, राजा-रानी, राजकुमारियां, धर्मात्मा पुरुष, लक्खी बणजारे एवं धनी-मानी लोग जन सामान्य को जल उपलब्ध करवाने के लिये कुएं, नाडी, तालाब आदि का निर्माण करवाते रहे हैं। आजादी प्राप्त होने से कुछ समय पहले तक समाज में कुओं, तालाबों एवं जलाशयों का निर्माण करवाना परम पुनीत कर्त्तव्य माना जाता था। इनका निर्माण संसार में सदियों तक अमर करने का साधन माना जाता था।

    सिरभाव परम्परा

    राजस्थान में ऐसे लोगों की एक सुविकसित परम्परा रही है जो बिना किसी औजार की सहायता से, केवल भूमि को देखकर यह बता देते थे कि इस भूमि में जल निकलेगा या नहीं। इन लोगों के भरोसे पर कूप खनन का काम किया जाता था। माना जाता है कि वे सिद्ध होते थे और उन्हें भाव आता थाा। ये लोग किसी विशेष जाति के नहीं होते थे। किसी को भी यह सिद्धि प्राप्त हो सकती थी। सिरभाव की तरह ही जलसूंघा लोग होते थे। वे भूजल की तरंगों के संकेत को आम की लकड़ी की सहायता से पकड़कर पानी का पता बताते थे। यह कार्य आज भी जारी है। ट्यूबवैल खोलने वाली बहुत सी कम्पनियां पहले अपने यंत्रों से भूजल का पता लगाती हैं, उसके बाद जलसुंघों को बुलाकर उनकी राय भी जानने का प्रयास करती हैं।


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  • अजमेर का इतिहास - 92

     06.01.2020
    अजमेर का इतिहास - 92

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (4)


    विजयसिंह पथिक

    विजयसिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। उनका जन्म 24 मार्च 1882 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुलावठी गाँव में एक गुर्जर परिवार में हुआ था। वे क्रांतिकारी, कवि, लेखक, पत्रकार तथा राजनेता थे। उनका पूरा परिवार क्रांतिकारी था। ई.1914 में देश के बड़े क्रांतिकारियों- योगीराज अरविंद, श्यामजी कृष्ण वर्मा, शचीन्द्र सान्याल आदि ने सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत भूमि को स्वतंत्र करवाने की योजना बनायी। यह निश्चय किया गया था कि लाहौर, रावलपिण्डी और फिरोजपुर में विद्रोह करके वहाँ के शस्त्रागारों पर अधिकार कर लिया जाये।

    इस सफलता के बाद अन्य स्थानों पर भी विद्रोह करके अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया जाये। राजपूताने में इस क्रांति का जिम्मा खरवा के राव गोपालसिंह तथा दामोदर दास राठी को सौंपा गया था। इन लोगों के सहयोग के लिये भूपसिंह को राजपूताने में भेजा गया। वे अपने बहनोई के साथ राजस्थान के किशन गढ़ आये। गोपालसिंह खरवा तथा विजयसिंह ने 2000 लोगों की सशस्त्र सेना खड़ी कर ली। क्रांति आरंभ करने की तिथि 21 फरवरी 1915 रखी गयी किंतु इस योजना की सूचना अंग्रेजों को मिल गयी। इसलिये राजपूताने में दो दिन पहले ही सशस्त्र क्रांति करने का निर्णय लिया गया।

    क्रांति आरंभ होने की सूचना देने के लिये खरवा रेलवे स्टेशन के पास बम विस्फोट करने की योजना बनायी गयी। अंग्रेजों ने बहुत से लोगों को पकड़ लिया जिससे बम विस्फोट नहीं हो सका और क्रांति आरंभ नहीं हो सकी। इसलिये क्रांतिकारियों ने अस्त्र-शस्त्र छिपा दिये और दो हजार लोगों को इधर उधर बिखेर दिया। अंग्रेजों ने जंगल में भाग रहे गोपालसिंह और भूपसिंह को पकड़ कर टॉडगढ़ में नजरबंद कर दिया। कुछ दिन बाद दोनों ही व्यक्ति जेल से भाग निकले। गोपालसिंह तो कुछ दिन बाद फिर से पकड़ लिये गये किंतु भूपसिंह अपना नाम बदल कर विजयसिंह पथिक के नाम से मेवाड़ के ठिकानों में घूमते रहे।

    विजयसिंह पथिक ने मेवाड़ के गाँवों में सामाजिक उत्थान के कार्य किये तथा विद्या प्रचारणी सभा की स्थापना करके उसके माध्यम से गाँवों में शिक्षा का प्रचार करने लगे। वे शीघ्र ही मेवाड़ के ग्रामीण अंचल में लोकप्रिय हो गये। मेवाड़ रियासत के बिजौलिया ठिकाने में जागीरदार के अत्याचारों के विरोध में ई. 1897 से लेकर 1947 तक 50 वर्ष लम्बा किसान आंदोलन चला। बिजौलिया के किसानों ने विजयसिंह को इस आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण करने के लिये आमंत्रित किया।

    1916 के अंतिम दिनों में विजयसिंह बिजौलिया पहुँचे तथा वहाँ उन्होंने सेवा समिति स्कूल, पुस्तकालय और अखाड़े की स्थापना की। विजयसिंह के अनुरोध पर माणिक्यलाल वर्मा ने ठिकाने की नौकरी को त्याग दिया और किसानों के लिये काम करना आरंभ किया। पथिक जी ने पत्रकारिता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्होंने 1921 में वर्धा से राजस्थान संघ के माध्यम से 'राजस्थान केसरी' और 1922 में अजमेर से राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से 'राजस्थान' निकालना आरंभ किया।

    1928 में जेल से छूटने के बाद पथिकजी ने 'राजस्थान संदेश' निकाला। 1939-40 में पथिकजी ने आगरा से 'नव संदेश' निकाला। राजपूताना, गुजरात तथा मध्य भारत की देशी रियासतों में इन समाचार पत्रों का ग्राहक बनने वालों को एक साल की सजा दी जाती थी। पथिकजी द्वारा लिखित लगभग 30 पुस्तकें अब तक प्रकाश में आ चुकी हैं। आजादी के साथ ही पथिकजी का कांग्रेस से मोह भंग हो गया। 1952 में पथिकजी ने माण्डलगढ़ विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। बिजौलिया क्षेत्र इसी विधानसभा क्षेत्र में आता था जहाँ पथिकजी ने अपना अधिकांश जीवन व्यतीत किया था।

    कांग्रेस ने माणिक्यलाल वर्मा के साले गणपति लाल वर्मा को खड़ा किया। इन दोनों के सामने जागीरदारों ने भी अपना प्रत्याशी खड़ा किया। किसानों के वोट वर्माजी के साले एवं पथिकजी में विभक्त हो गये और जागीरदारों का प्रत्याशी जीत गया। 28 मई 1954 को लू लगने से पथिकजी का निधन हो गया। उन्होंने 1930 के आसपास एक विधवा शिक्षिका जानकी देवी से विवाह किया था जो 10 फरवरी 1994 को मथुरा में स्वर्गवासी हुई। विजयसिंह पथिक अच्छे कवि और गीतकार थे। तिरंगे झण्डे के बारे में लिखा गया उनका एक गीत इस प्रकार से है- झण्डा यह हर किले पर चढ़ेगा, इसका बल रोज दूना बढ़ेगा। तोप तलवार बेकार होंगे, सोने वाले भी बेदार होंगे। सब कहेंगे कि सर है कटाना, पर न झण्डा यह नीचे झुकाना। शांत हथियार होंगे हमारे, पर ये तोड़ेंगे आरे दुधारे।

    हरविलास शारदा (राय बहादुर)

    हर बिलास शारदा का जन्म 8 जून 1867 को अजमेर में हुआ। उनके पिता हरनारायण शारदा गर्वनमेंट कॉलेज अजमेर में पुस्तकालय अध्यक्ष थे। ई.1875 में जब स्वामी दयानंद सरस्वती अजमेर आये तब हरविलास अपने पिता के साथ स्वामीजी से मिला। पिता के प्रभाव से ही हर बिलास में पुस्तकों तथा आर्यसमाज के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ। इस लगाव के कारण वे अपने जीवनकाल में अजमेर के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के गणमान्य व्यक्तियों में स्थान पा गये।

    हरविलास ने अजमेर में डीएवी स्कूल की स्थापना की। ई.1921 में जब अजमेर-मेरवाड़ा में प्रशासनिक सुधार के लिये अश्वर्थ समिति का गठन हुआ तो हरविलास शारदा ने अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में सुधार लाने के लिये इस समिति को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया तथा उन्होंने अजमेर को फिर से यूनाइटेड प्रोविंस में सम्मिलित करने की मांग की। ई.1924 में जब अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा का सदस्य बनाया गया। इस पद के लिये पहले प्रतिनिधि के रूप में हर बिलास शारदा को चुना गया।

    ई.1924 से 1930 के मध्य वे तीन बार अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में कुल ग्यारह वर्ष तक केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य रहे। ई.1925 में उन्होंने केन्द्रीय विधान सभा में भाषण देकर मांग की कि अजमेर-मेरवाड़ा के लिये विधान परिषद गठित की जाये। ई.1925 में उन्होंने बरेली में आयोजित अखिल भारतीय वैश्य सम्मेलन की अध्यक्षता की। ई.1927 में उन्होंने केन्द्रीय विधान सभा में बालविवाह निरोधक बिल प्रस्तुत किया।

    इस विधेयक के समर्थन में शारदा ने 15 सितम्ब्र 1927 को भावोत्पादक तथ्यांे सहित एक ओजपूर्ण भाषण दिया। इस एक्ट ने पूरे देश के स्त्री समाज में हलचल पैदा कर दी थी। देश के लगभग हर कौने में इस एक्ट के समर्थन में स्त्रियों ने प्रदर्शन किये। 28 सितम्बर 1929 को यह विधेयक पारित हुआ। इस विधेयक को आज तक शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है। महादेव गोविंद रानाडे ने द्वारा स्थापित राष्ट्रीय समाज सुधार समिति के ई.1929 के लाहौर सम्मेलन की अध्यक्षता हरविलास शारदा ने की।

    ई.1930 में भारत सरकार ने शारदा को प्राथमिक शिक्षा समिति का सदस्य मनोनीत किया। ई.1930 में जब साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो हर बिलास बहुत खिन्न हुए। इस आयोग द्वारा सिफारिश की गई थी कि अब तक अजमेर-मेरवाड़ा से केन्द्रीय विधान सभा में जो प्रतिनिधि चुनकर जाता था, आगे से वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जायेगा। शारदा ने साइमन आयोग की सिफारिशों की तीव्र भर्त्सना की। वे राष्ट्रवादी दल के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। ई.1932 में वे उसके उपनेता बन गये। हर बिलास शारदा केन्द्र सरकार तथा अजमेर सरकार द्वारा समय-समय पर गठित की गई बहुत सी समितियों के सदस्य रहे। वे आजीवन अजमेर-मेरवाड़ा में प्रशासनिक सुधारों के लिये काम करते रहे।

    ई.1932 में भारत सरकार के सचिव लतीफ के अनुरोध पर हर बिलास शारदा ने एक नोट तैया किया तथा 12 मई 1932 को वह नोट भारत सरकार की सलाहकार समिति के सम्मुख रखा। जमनालाल बजाज, हर विलास शारदा के अच्छे मित्रों में थे। बजाज जब भी अजमेर आते तो शारदा के घर ही भोजन करते थे। शारदा से उनका नियमित पत्राचार भी था। शारदा ने इतिहास पर कई पुस्तकें लिखीं जिनमें हिन्दू सुपीरियोरिटी, अजमेर हिस्टॉरिकल एण्ड डिस्क्रिप्टिव, महाराणा सांगा, हमीर ऑफ रणथंभौर, वर्क्स ऑफ महर्षि दयानंद सरस्वती एण्ड परोपकारिणी सभा, महाराणा कुंभा, शंकराचार्य एण्ड दयानंद, लाइफ ऑफ विरजानंद सरस्वती आदि अधिक प्रसिद्ध है। 20 जून 1955 को अजमेर में अनका निधन हुआ।

    हरिभाऊ उपाध्याय (पद्मविभूषण)

    हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म 9 मार्च 1892 को ग्वालियर राज्य के भौंरासा गाँव में हुआ था। उनके पिता पटवारी थे। हरिभाऊ ने वाराणसी के कामाख्या हिन्दू कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। ई.1911-12 में वे पत्रकारिता से जुडे। ई.1923 में वे गांधीजी के सचिव बने। गांधीजी के बंदी बनाये जाने पर हरिभाऊ ने नवजीवन का सम्पादन किया। ई.1926 में हरिभाऊ अजमेर आ गये। अजमेर में गांधी युग का सूत्रपात करने का श्रेय हरिभाऊ को ही प्राप्त है।

    1 अप्रेल 1927 को हरिभाऊ ने हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना की। हरिभाऊ ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल का काम आरम्भ किया। इस संस्था की स्थापना घनश्यामदास बिड़ला एवं जमनालाल बजाज के सहयोग से हुई थी। इस संस्था के माध्यम से हिन्दी भाषा में अनके श्रेष्ठ ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। मण्डल की ओर से त्यागभूमि नामक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया गया। अजमेर में आने के बाद उपाध्यायजी का कार्यक्षेत्र साहित्य सृजन एवं पत्रकारिता से हटकर राजनीति अधिक हो गया।

    ई.1930 में नमक आंदोलन में भाग लेने के कारण वे पहली बार जेल गये। इसके बाद उन्हें जेल जाना पड़ा। जेल में निवास करने के दौरान आपका साहित्य सृजन चलता रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ई.1952 में हरिभाऊ उपाध्याय अजमेर राज्य के मुख्यमंत्री बने। जब अजमेर का राजस्थान में विलय हो गया तब भी वे ई.1956 से लगभग 10 वर्ष तक मंत्रिमण्डल के सदस्य बने रहे। वे राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के कुलपति भी रहे। उन्होंने महिला शिक्षा सदन हटूण्डी, गांधी आश्रम हटूंडी तथा गांधी सेवा संघ की स्थापना की।

    हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा 21 पुस्तकों की रचना और लगभग 24 ग्रंथों का अनुवाद किया गया। साहित्य सेवा के लिये उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए। केन्द्र सरकार ने हरिभाऊ को पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 25 अगस्त 1972 को अजमेर में उनका निधन हुआ।


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  • सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

     20.05.2018
     सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी)

    सेमल का पेड़ (हिन्दी कहानी) 

    कमल बाबू ने लोहे का गेट खोलकर घर में प्रवेश करते हुए देखा, सेमल का पेड़ आज भी कौने में प्रहरी की तरह खड़ा हुआ है, ठीक उसी तरह जिस तरह आज से चौबीस साल पहले कमल बाबू ने आखिरी बार उसे यहाँ खड़े हुए देखा था। प्रहरी शब्द कमल बाबू को दुविधा में डाल देता है। किसका प्रहरी है यह! घर का! या उसमें रहने वालों का! संभवतः दोनों का ही नहीं। वह तो समय का प्रहरी है। बीतने वाले एक-एक पल का प्रहरी। जब भी एक प्रहर बीतता है सेमल का वृक्ष आकाश रूपी चौड़े थाल पर अपनी टहनियों से आघात करता है। हवा का एक झौंका उद्वेलित होता है और उसी के साथ पूरा वृक्ष सम्पूर्ण शक्ति से झूमने लगता है मानो किसी हठी योगी के योगासन की एक मुद्रा पूरी हो गयी हो और अब दूसरी मुद्रा में जाने का समय हो गया हो।

    घर के किसी सदस्य को पता तक नहीं चलता कि समय बीत रहा है और बाहर खड़ा हुआ सेमल का पेड़ बीतते हुए हर पल की घोषणा कर रहा है। जाने क्यों सेमल का पेड़ घर के सदस्यों की अनवरत उदासीनता से अप्रभावित रहकर मौन योगी की तरह साधना में संलग्न है! वह अकेला ही समय की उस उदास गूंज को अनुभव करता है जिसने पिछले पिचहत्तर सालों में इस घर को इतना बदल दिया है कि घर का हर हिस्सा बदला हुआ दिखाई देने लगा है।

    समय की गति है भी तो कितनी मंथर! कभी लगता ही नहीं कि समय चल रहा है किंतु इस मंथर गति की मार कितनी तेज है! जिसके चलते सभी कुछ तेजी से बदल जाता है। लगता है मानो पलक झपकी और दृश्य गायब। प्रायः हर बदलाव की कसक भी सेमल के पेड़ को बरसों तक बनी रहती है किंतु बदलाव से बेपरवाह घर के सदस्य सेमल के पेड़ की इस कसक को अनुभव तक नहीं कर पाते।

    कमल बाबू को आज भी अच्छी तरह याद है कि सर्दियां आने से ठीक पहले कैसे पूरा पेड़ अपने पत्तों को त्याग कर नागा साधु का रूप धारण कर लेता। सुबह उठने पर पूरा लॉन पीले कत्थई पत्तों से भरा हुआ मिलता। नानी जब जिंदा थीं तो उनका दिन इन्हीं पत्तों को बुहारने से आरंभ होता था। कमल बाबू जब नानी को पेड़ के नीचे पत्ते बुहारते देखते तो वे स्वयं भी नानी का हाथ बंटाने लगते।

    जब तक तेज सर्दियां शुरू होतीं तब तक सारे पत्ते झर जाते और पूरा पेड़ लाल अंगारों जैसे दिखने वाले बड़े-बड़े फूलों से भर जाता। मानो किसी हठी नागा साधु ने वस्त्र त्यागकर गांजे की चिलम के अंगारों को पूरे दम से फूंका हो। कुछ दिन और बीतते तो अमिया जैसी छोटी-छोटी फलियां शाखाओं पर दिखने लगतीं। होली के आने तक फूल पूरी तरह बुझ गयी चिलम के अंगारों की तरह अदृश्य हो जाते और अप्रेल की हलकी गर्मी में रुई की फलियां पूरे वैभव के साथ शाखाओं पर बैठकर चहकने लगतीं।

    ठीक ये ही वो दिन होते थे जब छोटी नानी सेमल के पेड़ के आस पास दिखायी देने लगती थीं। तेज गर्मियों के साथ रुई की फलियां फटने को होतीं और उनमें से नागा साधु के चिलम की ठण्डी हो चुकी राख जैसी सफेद रुई बाहर झांकने लगती। अब तो छोटी नानी की उपस्थिति सेमल के पास और अधिक बढ़ जाती। बड़ी जल्दी उठकर लम्बे बांस की सहायता से वे रुई की फलियांे को नीचे गिरातीं और टोकरी में जमा कर लेतीं। इतने भर से उन्हें संतोष न होता। पूरी दुपहरी वे सेमल के पेड़ के नीचे थोड़ी-थोड़ी देर में चक्कर लगाती रहतीं ताकि तेज हवा के चलने से नीचे टपकी रुई की फलियों को टोकरी में डाला जा सके।

    छोटी नानी अर्थात् नानी की विधवा देवरानी का मानना था कि इस घर में उनका आधा हिस्सा था। छोटी नानी की दृष्टि में वैसे तो उनका हिस्सा आधे से अधिक बनता था क्योंकि वे अपनी इस जेठानी से भी पहले इस घर में आयी थीं और इस नाते जेठानी के अधिकार, जेठ की पत्नी के नहीं बल्कि उनके अपने पास होने चाहिये थे।

    सेमल का यह पेड़ गवाह है कि समय भी कितना क्रूर होता है। वह आदमी के साथ कैसी निर्ममता से व्यवहार करता है। कमल बाबू की मां के बाबा अर्थात् सुखानंद ने इस पेड़ को एक नन्हे से पौधे के रूप में यहां लाकर लगाया था। उस दिन से वह इस घर में घटने वाली हर घटना का मूक साक्षी हो गया था। सुखानंद वास्तव में सुखानंद थे। उनके चारों ओर हर समय आनंद बरसा करता था। लगता था दुःख तो जैसे सदासुखी सुखानंद के निकट नहीं फटक सकता था।

    कहते हैं कि समय को आँख बदलते समय नहीं लगता। समय ने सुखानंद के साथ भी क्रूर खेल खेला। उनके दो पुत्रों में से बड़े पुत्र की पत्नी दो बच्चों को जन्म देकर काल के गाल में समा गयी तो छोटा पुत्र भी दो बच्चों के जन्म के बाद परमात्मा को प्राप्त हुआ। सुखानंद ने समय के इस क्रूर दण्ड को बड़े धैर्य से अपने सीने पर झेला था। किसी तरह भाग दौड़ करके बड़े बेटे का तो उन्होंने दूसरा विवाह करवा दिया किंतु आर्य समाजी विचारों का होने के बावजूद अपनी छोटी बहू के लिये वे कुछ प्रबंध नहीं कर सके। उसे पूरा जीवन इसी घर में विधवा औरत के रूप में व्यतीत करना था।

    'छोटी बहू' अर्थात् दुनिया भर की कर्कशा, कुरूपा, निरक्षरा, हठी और दो बच्चों की विधवा मां का संसार में किसी चीज से कोई साम्य नहीं था। पता नहीं पूर्व जन्मों के किन संस्कारों के कारण वह इस घर की बहू बनकर आ गयी थी और भाग्य की किस विडम्बना के कारण वैधव्य ने असमय ही उसका वरण कर लिया था! सुखानंद ने अपने जीवन भर की कमाई झौंककर अपने दोनों लड़कों के लिये दो भव्य मकान बनवाये थे किंतु जब छोटे पुत्र की असमय मृत्यु हो गयी तो उन्होंने छोटी बहू को भी उसी मकान में रहने के लिये बुला लिया था जिसमें वे अपने बड़े पुत्र के साथ रहते थे। समय पाकर सुखानंद तो दुनिया से चले गये किंतु छोटी बहू अपने दोनों बच्चों के साथ जेठ के ही मकान में रहती रही। वही छोटी बहू कमल बाबू की पीढ़ी के बच्चों के लिये छोटी दादी और छोटी नानी के रूप में जानी जाती थी।

    चूंकि सेमल का पेड़ सुखानंद ने लगाया था इस नाते सेमल के पेड़ पर भी नानी की विधवा देवरानी अर्थात् छोटी नानी का आधे का अधिकार था। इसी अधिकार से छोटी नानी पूरी गर्मियों में रूई इकट्ठी करतीं और आधी रुई साधिकार अपने पास रखकर, आधी रुई बड़ी नानी को दे देतीं। सहज संतोषी नानी उस रुई से तकिये भरतीं और गर्मी में आने वाली बहन बेटियों के लिये तकिये भर कर उन्हें भेंट कर देतीं। जब नानी किसी बहन बेटी को सेमल की रुई का नरम मुलायम तकिया भेंट करतीं तो उनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक होती। उनका संतोषी मन इस घर की बहन बेटियों को साड़ियां, स्वेटर, लड्डू, मठरियां और अचार के डिब्बे देने में जितने आनंद का अनुभव करता था उससे अधिक आनंद उन्हें सेमल के तकिये देते समय होता था।

    नानी इसे छोटी नानी का बड़प्पन मानती थीं कि उनकी कर्कशा, कुरूपा और मुंहफट देवरानी ने सेमल की रुई पर आधे का ही अधिकार मान रखा था अन्यथा घर के पिछवाड़े में छोटी नानी ने जो करौंदे, अमरूद और केले के पेड़ लगाये थे, उन पर छोटी नानी का ही स्वघोषित एकछत्र अधिकार था। इस नाते करौंदों को तोड़कर उनकी सॉस बनाने का अधिकार भी केवल छोटी नानी को था। यह अलग बात थी कि वे उस सॉस को अपनी जेठानी की बेटियों को उदारता पूर्वक भेंट किया करती थीं क्योंकि गर्मियों में पीहर आने वाली उनकी अपनी कोई बेटी नहीं थी। छोटी नानी के जीवन में केवल एक यही उदारता देखी थी कमल बाबू ने।

    उन दिनों घर कितनी चहल पहल से भरा हुआ रहता था। सारी बहन-बेटियां बच्चों को लेकर अपने पीहर आ जाती थीं। कमल बाबू भी उन्हीं दिनों अपनी मां के साथ ननिहाल आया करते थे। टिक्का मौसी अर्थात बड़ी मौसी, झब्बा मौसी अर्थात् मंझली मौसी और संतरा मौसी अर्थात् छोटी मौसी, उन सबके बच्चे, फिर मामाओं के बच्चे, पूरे घर में धमाल रहती। नानी दोपहरी में जलेबी और समोसे मंगवातीं तो पूरा घर बच्चों के झगड़े से गूंज उठता। शोर घर से बाहर निकल कर सेमल के पेड़ तक जा पहुंचता। नानी बड़ी तसल्ली से उनके झगड़े सुलझातीं। वे हर बच्चे की शिकायत को धैर्य पूर्वक सुनतीं और उसे तब तक मिठाई देती रहतीं जब तक कि वह बच्चा संतुष्ट नहीं हो जाता किंतु छोटी नानी इन झगड़ों में अम्पायर की भूमिका निभातीं। कभी इस बच्चे को लाल कार्ड दिखाकर मैदान से बाहर किया तो कभी उस बच्चे पर पैनल्टी ठोकी। बच्चे भी जलेबी देने वाली नानी के स्थान पर अम्पायर की भूमिका निभाने वाली छोटी नानी का रौब अधिक मानते।

    टिक्का मौसी, झब्बा मौसी और संतरा मौसी भी जलेबी और समोसों के लिये होने वाले इन झगड़ों में बराबर की भागीदारी निभातीं। सबसे छोटे दोनों मामा अर्थात् किन्नू मामा और गब्बू मामा भी इन झगड़ों में पूरा कौशल दिखाते किंतु कमल बाबू की माँ जिन्हें दूसरी मौसियों के बच्चे गुल्ला मौसी कहते थे, घर की सबसे बड़ी सदस्य होने के कारण इस झगड़े से दूर खड़ी रहकर तमाशा देखतीं। संभवतः कमल को भी जलेबियों के लिये झगड़ने की बजाय शांत खड़े रहकर तमाशा देखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली थी।

    क्यों रे कमल, तू कभी जलेबी के लिये झगड़ा नहीं करता। तू दूसरे बच्चों से अलग है क्या! छोटी नानी, दूसरे बच्चों से अलग खड़े कमल को उलाहना देतीं। देख तो यह निरमल लड़-झगड़ कर अपनी नानी से कितनी सारी जलेबी ले गया! जवाब में कमल बाबू मुस्कुराते भर। छोटी नानी को इस बात पर बड़ी नाराजगी थी कि छोटे से कमल ने कभी उनसे दूसरे बच्चों की शिकायत नहीं की और न ही अपने लिये अधिक मिठाई की मांग रखी।

    कमल बाबू का ध्यान अपने लिये अधिक मिठाई झपटने में नहीं बल्कि अपनी ही उम्र के दूसरे बच्चों द्वारा अधिक मिठाई पाने के लिये अपनाई गयी तरकीबों को देखने में अधिक रहता था। उन्हें आश्चर्य होता कि सबसे छोटा नीटू कैसे दूसरे बच्चों की बजाय हर बार नानी को चकमा देकर दो बार जलेबी पाने में सफल हो जाता था और कैसे फिर छोटी नानी उसकी चोरी पकड़ कर उससे जलेबियां छीनने के लिये उसके पीछे दौड़ती थी ताकि दूसरे बच्चों की शिकायत दूर की जा सके।

    गर्मियां आतीं और चली जातीं। उनके साथ ही खत्म हो जातीं गर्मियों की छुट्टियां। सारी बहन-बेटियां भी एक-एक करके घर से विदा लेतीं। हर बहन-बेटी के सामान में लड्डू, मठरी और अचार के साथ-साथ सेमल का एक तकिया अवश्य बढ़ जाता था।

    उधर सेमल का पेड़ प्रहर पर प्रहर बदलने की सूचना देता रहा और इधर नानी के बालों की सफेदी और चेहरे की झुर्रियां बढ़ती रहीं। धीरे-धीरे मौसियों के बाल भी पकने लगे थे। कुछ मौसियां तो हर साल आने की बजाय दो साल में आने लगी थीं। उनके साथ आने वाले बच्चों की संख्या भी घटने लगी थी। कुछ बच्चे बड़ी कक्षाओं में आने के कारण और कुछ अपने काम धंधों में लग जाने के कारण ननिहाल कम ही आ पाते थे। बाद के बरसों में स्वयं कमल बाबू भी तो कितना कम आ पाते थे। हां इतना अंतर अवश्य आ गया था कि घर में मामाओं के बच्चों की संख्या बढ़ गयी थी।

    कमल बाबू उन दिनों नौकरी के सिलसिले में शिमला में थे जब उन्हें तार मिला कि नाना नहीं रहे। तार पढ़ते ही कमल बाबू की आंखों के सामने नाना के स्थान पर सेमल का पेड़ तैर गया था। वे बार-बार मन को स्थिर करते कि नाना नहीं रहे किंतु जाने क्यों हर बार उन्हें यही लगता कि सेमल का पेड़ नहीं रहा। कमल बाबू एक दिन के लिये ननिहाल आये थे। सेमल का पेड़ उसी तरह मौन योगी की तरह खड़ा था। पूरी तरह रुई से लदा हुआ। छोटी नानी की टोकरी तब भी पेड़ के नीचे रखी थी।

    नानी के बाल और सफेद हो गये थे। मानो सेमल की रुई ने उन्हें अपना रंग दे दिया हो। घर में सारी मौसियां दिखायी दी थीं कमल बाबू को किंतु उनके बच्चों में से कोई नहीं था। कोई अपने पोते के साथ आयी थी तो कोई बूढ़े हो चले मौसा के साथ। कुल एक दिन रुके थे कमल बाबू। वापसी के समय उन्होंने क्षण भर के लिये ठहर कर सेमल के पेड़ को देखा था। अब उसकी ऊँचाई और अधिक हो चली थी। लगता था जैसे आकाश में कहीं गहरे तक जा धंसा है।

    सात आठ साल तक कमल बाबू का ननिहाल आना नहीं हुआ। एक दिन अचानक उन्हें फोन से सूचना मिली कि नानी नहीं रहीं। कमल बाबू को लगा कि धड़ाम की आवाज हुई और सेमल का पेड़ नीचे गिर पड़ा। उन्होंने चौंक कर अपने आस पास देखा। कहीं कुछ नहीं गिरा था। किसी चीज के गिरने की आवाज नहीं हुई थी। कमल बाबू का जाना नहीं हो सका। नानी को उन्होंने मन ही मन वहीं श्रद्धांजलि दी और फिर से नौकरी में रम गये। कमल बाबू की मां अपने बड़े पोते को लेकर अपने पीहर गयीं। उसके बाद कमल बाबू का ननिहाल जाना हुआ ही नहीं। बरसों बीत गये। जाने सेमल का पेड़ रहा भी होगा कि नहीं, कमल बाबू प्रायः सोचते।

    आज पूरे चौबीस साल बाद जब इस शहर में किसी काम से आना हुआ तो कमल बाबू की इच्छा हुई कि ननिहाल का चक्कर लगाया जाये। नाना तो नहीं रहे। नानी भी नहीं रहीं। मौसियों का आना तो नाना-नानी के समय ही कम हो गया था। फिर भी कोई न कोई मामा, कोई न कोई मामी अवश्य मिल जायेंगे।

    संध्या के झुरमुटे में गेट खोलते ही उनकी दृष्टि सेमल के पेड़ पर गयी। वह आज भी हठी योगी की तरह उसी तरह प्रहरी के रूप में विद्यमान था। नीचे लॉन में पत्तों की रेलमपेल मची हुई थी। निश्चित ही था कि नानी का स्थान घर की किसी औरत ने नहीं लिया था जिसके दिन की शुरूआत इन पत्तों को बुहारने से हो। अंधेरे में कमल बाबू यह तो नहीं देख पाये कि लाल अंगारों वाले फूल शाखाओं पर आ बैठे हैं कि नहीं किंतु उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि वे अवश्य ही वहां उपस्थित हैं। उन्हें लगा कि घर के भीतर जाने से कोई लाभ नहीं, जिस काम के लिये आये थे वह तो हो गया है।

    लौट जाने के लिये उन्होंने गेट बंद करना चाहा, ठीक उसी समय किसी ने अंदर से आवाज लगायी- ''कौन है।''

    कमल बाबू की जीभ मानो तालु से चिपक गयी। क्या जवाब दें वे! क्या सवाल करने वाला जान जायेगा कि गेट पर कौन है!

    - ''कौन है गेट पर!'' फिर से आवाज आयी।

    - ''मैं कोई नहीं।'' कमल बाबू के मुंह से बरबस निकला और वे सेमल के पेड़ की तरफ पीठ करके आगे बढ़ गये।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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