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  • राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य - घूमर

     02.06.2020
    राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य - घूमर

    घूमर नृत्य

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    घूमर नृत्य समूचे राजस्थान का लोकप्रिय नृत्य है। इसे राजस्थान के लोकनृत्यों की रानी कहा जा सकता है। यह लोकनृत्य थार के रेगिस्तान से लेकर, डूंगरपुर-बांसवाड़ा के आदिवासी क्षेत्र, अलवर-भरतपुर के मेवात क्षेत्र, कोटा-बूंदी-झालावाड़ के हाड़ौती क्षेत्र एवं धौलपुर-करौली के ब्रज क्षेत्र तक में किया जाता है।

    मारवाड़, मेवाड़ तथा हाड़ौती अंचल के घूमर में थोड़ा अंतर होता है। रेगिस्तानी क्षेत्र की घूमर में शृंगारिकता अधिक होती है जबकि मेवाड़ी अंचल की घूमर गुजरात के गरबा से अधिक मेल खाती है।

    यह नृत्य होली, दीपावली, नवरात्रि, गणगौर जैसे बड़े त्यौहारों एवं विवाह आदि मांगलिक प्रसंगों पर घर, परिवार एवं समाज की महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह विशुद्ध रूप से महिलाओं का नृत्य है। परम्परागत रूप से महिलाएं इस नृत्य को पुरुषों के समक्ष नहीं करती थीं किंतु अब इस परम्परा में शिथिलता आ गई है। इस नृत्य में सैंकड़ों महिलाएं एक साथ भाग ले सकती हैं। राजस्थानी महिलाएं जब घुमावदार घेर का घाघरा पहनकर चक्कर लेकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं तो उनके लहंगों का घेर और हाथों का लचकदार संचालन देखते ही बनता है।

    इस नृत्य में गोल चक्कर बनाने के बाद थोड़ा झुककर ताल ली जाती है। घूमर के साथ अष्टताल कहरवा लगाया जाता है जिसे सवाई कहते हैं। इसे अनेक घूमर गीतों के साथ मंच तथा सरकारी आयोजनों में भी प्रस्तुत किया जाता है।

    घूमर नृत्य के साथ घूमर गीत गाया जाता है-

    म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ।

    घूमर रमवा म्हैं जास्यां।

    सागर पाणीड़ै जाऊं निजर लग जाय।

    कुण जी खुदाया कुवा बावड़ी ए परिणाहरी ए लो।

    सामंती काल में घूमर राजपरिवारों की महिलाओं का सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य था। इसे जनसामान्य द्वारा आज भी चाव से किया जाता है। भील एवं गरासिया आदि जनजातियों की महिलाएं भी घूमर करती हैं। घुड़ला, घूमर एवं पणिहारी नृत्य में महिलाओं द्वारा एक जैसे गोल चक्कर बनाए जाते हैं।

    यह लोकप्रिय लोकनृत्य होने के साथ-साथ आज व्यावसायिक नृत्य का भी रूप ले चुका है। मारवाड़ में राजपरिवारों के मनोरंजन के लिए त्यौहारों एवं शादी-विवाह पर पातरियों और पेशेवर नृत्यांगनाओं की भी घूमर होती थी।

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  • घूमर नृत्य
    घूमर नृत्य
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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-24

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-24

    नगरों एवं गांवों का परम्परागत स्थापत्य


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    नगरों का स्थापत्य


    सभ्यता की पाषाणीय अवस्था में ही मानव ने बस्तियां बसाकर सीख लिया था। जैसे-जैसे कबीलाई संस्कृति का विकास हुआ, बस्तियों की बसावट में जटिलता आती गई ताकि अचानक आने वाले शत्रुओं एवं रात्रि में हमला बोलने वाले वन्य पशुओं से बस्ती की रक्षा की जा सके। जब राज्य अस्तित्त्व में आये तो राजा एवं राज्य परिवार की रक्षा के लिये नगर प्राचीरों एवं दुर्ग जैसी रचनाओं का निर्माण होने लगा। धीरे-धीरे मानव बस्तियों को सामान्यतः किसी बड़े दुर्ग के भीतर बसाया जाने लगा ताकि शत्रु सेनाओं से राजा एवं प्रजा दोनों की रक्षा हो सके। जो नगर किसी दुर्ग में नहीं होते थे, उन्हें भी ऊँची प्राचीर से घेर दिया जाता था। दुर्ग अथवा नगर में खेती, पशुपालन एवं पेयजल के लिये खेत, कुएं, तालाब एवं झीलें बनाई जाती थीं ताकि यदि शत्रु सेना घेर ले तो दुर्ग अथवा नगर के भीतर के प्राणी भूख एवं प्यास से न मरें। राजा एवं उसका परिवार दुर्ग के भीतर सबसे सुरक्षित एवं ऊँचे स्थान पर रहता था तथा उसे घेर कर चारों ओर जन सामान्य की बस्तियां होती थीं। राजस्थान की प्राचीनतम बस्तियों में इसी प्रकार की बसावट दिखाई देती है।

    दसवीं शताब्दी में बसाये गये आमेर की बसावट भी इसी प्रकार की है। दोनों ओर की पहाड़ियों के ढलानों में हवेलियां तथा ऊँचे-ऊँचे भवन बनाये गये थे और नीचे के समतल भाग में पानी के कुण्ड, मंदिर, सड़कें बाजार आदि थे। पहाड़ी नाकों को संकड़ा रखा गया था जिससे सुरक्षा की व्यवस्था समुचित रूप से हो सके। ऊँची पहाड़ियों पर राजभवनों का निर्माण करवाया गया। बूंदी नगर के स्थापत्य में तथा बसावट में पानी के प्राचुर्य का बड़ा हाथ रहा। जोधपुर और बीकानेर की बसावट में गढ़, परकोटा एवं अन्य भवन की रचनाएं भौगोलिक परिस्थितियों से सम्बद्ध थीं। जोधपुर में कहीं-कहीं ऊँचाई तथा ढालों को बस्तियों के बसाने के उपयोग में लाया गया और सड़कों तथा नालियों की योजना उनके अनुकूल की गई। बीकानेर में समतल भूमि में पेशे के अनुसार नगर के भाग बनाये गये तथा हाटों और बाजारों को व्यापारिक सुविधा के अनुसार बनवाया गया। उदयपुर को झील के किनारे स्थित पहाड़ियों की घाटियों तथा पेशे के विचार से मुहल्लों में बांटा गया। बस्ती के बीच-बीच में कहीं-कहीं खेत और बगीचे देकर उसे अधिक आकर्षक बनाया गया। नगर बसाने में प्राकार, खाई तथा पहाड़ी की श्रेणियों का उपयोग किया गया। पहाड़ी ढलान, चढ़ाव एवं उतार को ध्यान में रखते हुए समस्त नगर को टेढ़ा-मेढ़ा इस तरह बसाया गया कि मध्यकालीन उदयपुर की योजना में कहीं चौड़े रास्ते या चौपड़ की व्यवस्था नहीं दीख पड़ती।

    अठारहवीं शताब्दी में जब आमेर के और विस्तार की संभावना नहीं रही तो जयसिंह ने जयपुर नगर बसाया जिसमें समानांतर तथा एक दूसरे को समकोण पर काटने वाली चौड़ी सड़कें बनाई गईं तथा लोगों के पेशे के हिसाब से मौहल्ले बनाये गये। चौपड़ योजना इस नगर की योजना का मुख्य आधार बनी। इसकी रक्षा के लिये इसे चारों ओर विशाल परकोटे से घेरा गया तथा निकट की पहाड़ी पर जयगढ़ का निर्माण किया गया जिसमें विशाल सेना नियुक्त की गई। नगर परकोटे में दरवाजों का तथा चौराहों पर फव्वारों का निर्माण करवाया गया। सड़कों की ही तरह नालियों का भी योजनाबद्ध निर्माण किया गया।

    12वीं सदी में जैसलमेर को भी जंगल की निकटता एवं पानी की सुविधा के अनुसार बनाया गया ताकि दुर्गम मरुस्थल को पार करके शत्रु वहाँ आसानी से नहीं पहुंच सकें तथा जैसलमेर के निवासियों को जल, लकड़ी, ईंधन तथा पशुओं के लिये चारा उपलब्ध हो सके। इस नगर की योजना को भी व्यापारिक सुविधाओं के अनुसार मौहल्लों में बांटा गया था।


    गांवों का स्थापत्य

    नगरों के स्थापत्य से गांवों की वास्तुकला भिन्न है। जो गांव नदी के किनारे बसे हुए हैं, वे लम्बे आकार में खुली बस्ती के रूप में स्थित हैं। पहाड़ी क्षेत्र के गांव पहाड़ी ढलान और कुछ ऊँचाई लिये हुए होते हैं। पहाड़ों और घने जंगलों में आदिवासियों की बस्तियां छोटी-छोटी टेकरियों पर दो-चार झौंपड़ियों के रूप में बसी हुई होती हैं जो चारों ओर से कांटों की बाड़ से घिरे होते हैं ताकि जंगली जानवरों से सुरक्षा बनी रहे तथा एक परिवार दूसरे परिवार से अपनी विलगता भी बनाये रखे। रेगिस्तानी गांवों को पानी की सुविधा के अनुसार बसाया जाता था। इसलिये बीकानेर और जैसलमेर के गांवों के आगे सर अर्थात् जलाशय का प्रयोग बहुधा पाया जाता है। जैसे बीकासर, जैतसर, उदासर, आदि।

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  • अजमेर का इतिहास - 88

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 88

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार में संग्रहीत अजमेर सम्बन्धी अभिलेख


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर में ई.1818 से 1956 तक के अभिलेख संग्रहीत हैं। ये अभिलेख अंग्रेजी भाषा (रोमन लिपि) तथा उर्दू भाषा (अरबी लिपि) में हैं। ये अभिलेख दौलतराव सिंधिया द्वारा अजमेर का शासनाधिकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंपने से प्रारंभ होते हैं।

    कमिश्नर अभिलेख

    अजमेर में प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्यों के लिये ई.1818 में सुपरिण्टेण्डेण्ट का पद सृजित किया गया था। ई.1853 में सुपरिण्टेण्डेण्ट के स्थान पर कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा), ई.1857 में डिप्टी कमिश्नर (अजमेर) तथा ई.1871 में पुनः कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) का पद सृजित किया गया। इस अधिकारी को प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकार प्राप्त थे। उसके अधीन इस्तेमरारदारी, जागीर तथा भूमि विभाग काम करते थे। इन अभिलेखों का आरंभ ई.1818 से आरंभ होता है। इस खण्ड में अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत के समस्त गांवों एवं परगनों के जागीरदारों, भूमियों के उत्तराधिकार सम्बन्धी विवादों, सनदें, नजराने, भूमि सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त आदि के अभिलेख उपलब्ध हैं।

    सुरक्षा अभिलेख

    इस खण्ड में अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत की शांति एवं कानून व्यवस्था, पुलिस, स्वायत्त शासन संस्थायें, अजमेर एवं केकड़ी नगरपालिकाओं द्वारा नगरीय क्षेत्र में सफाई व्यवस्था, कर वसूली तथा छावनी सम्बन्धी अभिलेख उपलब्ध हैं।

    उत्पादन एवं वितरण

    इस खण्ड में अजमेर प्रांत के कृषि, व्यापार, खान, भवन निर्माण, पोस्ट एण्ड टेलिग्राफ, सिंचाई तथा वन आदि विभागों से सम्बन्धित अभिलेख संग्रहीत हैं।

    राजस्व एवं वित्त

    राज्य के आबकारी, आयकर, पेंशन, इम्पीरियल राजस्व, वित्त, ऋण, मुद्राकोष, नमक, क्षति पूर्ति, संधियों के भुगतान, डिस्ट्रिक्ट एण्ड लोकल फण्ड्स आदि विषयों से सम्बन्धित अभिलेख सुरक्षित हैं।

    चिकित्सा एवं स्वास्थ्य

    इस खण्ड में अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्थाओं के लिये चिकित्सालय, टीकाकरण, पशु चिकित्सा सम्बन्धी अभिलेख संग्रहीत हैं।

    शिक्षण एवं जन संस्थायें

    इस खण्ड में शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं व्यवस्था तथा प्रकाशन आदि के विवरण उपलब्ध हैं।

    सामान्य प्रशासन

    इस खण्ड में पुरातत्त्व, ऐतिहासिक, ब्रिटिश स्मारक, प्रकाशन, चर्च के निर्माण एवं जीर्णोद्धार, मेले, सेरीमोनियल, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के भ्रमण सम्बन्धी अभिलेख उपलब्ध हैं।

    वर्नाक्यूलर अभिलेख

    ये अभिलेख उर्दू भाषा में हैं। इन अभिलेखों में ई.1818 से 1900 तक के भूमि एवं भूमि बंदोबस्त के अभिलेख संग्रहीत हैं। ई.1820 में मि. विल्डर द्वारा अजमेर का पहला रेवेन्यू बंदोबस्त किया गया। ई.1822 में मि. विल्डर द्वारा अजमेर का दूसरा सैटलमेंट किया गया। ई.1827 में मि. मिडल्टन ने अजमेर का तीसरा रेवेन्यू सैटलमेंट किया। कर्नल डिक्सन द्वारा ई.1850 में 21 वर्षीय बंदोबस्त किया गया। ला टाउच द्वारा ई.1875 में 20 वर्षीय बंदोबस्त तथा मि. व्हाइट वे द्वारा ई.1886 में 20 वर्षीय बंदोबस्त किया गया।

    रजिस्ट्रेशन

    इन अभिलेखों में ई.1865 से 1900 तक, भूमि के क्रय-विक्रय पंजीकरण के अभिलेख सुरक्षित हैं। इनमें मोरगेज, सेलडीड तथा प्रोपर्टी सम्बधी अभिलेख सम्मिलित हैं।

    दरगाह फाइल्स

    इस खण्ड में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की व्यवस्था, गद्दी नशीनी, दीवान, दरगाह खादिम, विभिन्न कर्मचारी, परम्परागत अधिकार, दरगाह की आय-व्यय, दरगाह के अधीन गांवों की आय, उर्स मेले की व्यवस्था आदि से सम्बन्धित अभिलेख हैं।

    चीफ कमिश्नर रिकॉर्ड्स

    15 जून 1870 को अजमेर के एजीजी को चीफ कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) बनाया गया। इससे पूर्व एजीजी को कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) कहते थे। इस खण्ड में चीफ कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) के कार्यालय के ई.1871 से ई.1951 तक के अभिलेख सुरक्षित हैं। इस खण्ड में ई.1871 से 1926 तक के अभिलेख चीफ कमिश्नर ब्रांच के नाम से अभिहित किये गये हैं जबकि ई.1926 से 1951 तक के अभिलेख प्रशासनिक ब्रांच तथा निर्माण कार्य ब्रांच के रूप में अभिहित किये गये हैं।

    चीफ कमिश्नर ब्रांच: इस ब्रांच में प्रशासनिक नियुक्तियां, पदोन्नतियां, स्थानांतरण, राजस्व एवं वित्त सम्बन्धी स्वीकृतियां, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्थायें, आबकारी, स्वायत्त शासन, नगर पालिका के प्रशासनिक कार्यों की देख-रेख, करों की वसूली, शिक्षण संस्थाओं सम्बन्धी आदेश, टाइटल्स-मेडल्स देने के आदेश, फॉरेन सर्विसेज आदि अभिलेख मिलते हैं।

    प्रशासनिक ब्रांच: इस ब्रांच में समस्त विभागों की नियुक्तियां, पदों का सृजन, पदोन्नतियां, स्थानांतरण, नीति विषयों की स्वीकृति, शिक्षा, जेल, चिकित्सा, ई.1935 को एक्ट, सेरीमोनियल्स, फैक्ट्री, फेमीन, आदि विभागों का अभिलेख है। इस शाखा की अवधि ई.1927 से 1951 तक की है।

    निर्माण कार्य ब्रांच: इस ब्रांच में झीलों, नालों, स्वायत्त संस्थायें, नव निर्माण, पुनर्निर्माण सम्बन्धी अभिलेख हैं। इसकी अविध ई.1927 से 1948 है। सामान्य शाखा के अधीन खाने, आर्म्स एण्ड एम्यूनेशन, मेले, टिड्डी, छात्रवृत्तियाँ, शिक्षा, विश्वविद्यालय, आकाशवाणी, औक्ट्राई आदि विषयों से सम्बन्धित अभिलेख हैं।

    सचिवालय अभिलेख

    इस खण्ड में प्रथम आम चुनाव ई.1952 से लेकर राजस्थान में विलय ई.1956 तक के अभिलेख संग्रहीत किये गये हैं। इस अवधि में अजमेर राज्य में सचिवालय प्रशासन अनुभाग, लेखा अनुभाग, विकास अनुभाग, शिक्षा अनुभाग, गृह सेवा एवं राजस्व अनुभाग, कानून एवं न्याय अनुभाग, श्रम एवं विकास अनुभाग, स्वायत्त शासन संस्थाएं अनुभाग, विधान सभा अनुभाग, चिकित्सा अनुभाग, सार्वजनिक निर्माण एवं आबकारी अनुभाग, आयोजना अनुभाग, पासपोर्ट अनुभाग, राजस्व अनुभाग तथा राहत एवं पुनर्वास अनुभाग के अभिलेख सम्मिलित हैं।

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  • भारत की एक रहस्यमयी लिपि - शंख लिपि

     02.06.2020
     भारत की एक रहस्यमयी लिपि - शंख लिपि

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित बिजार अथवा बीजक की पहाड़ियों में बड़ी संख्या में ऐसी कंदराएं हैं जिनमें एक रहस्यमय लिपि उत्कीर्ण है। इस लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।

    शंखलिपि के नाम से जानी जाने वाली इस लिपि के लेख बड़ी संख्या में बीजक की पहाड़ी, भीम की डूंगरी तथा गणेश डूंगरी में बनी गुफाओं में अंकित हैं। इन लेखों के अक्षर शंख की आकृति के हैं। वैज्ञानिकों को इस लिपि के अभिलेख भारतीय उपमहाद्वीप के भारत, इण्डोनेशिया, जावा तथा बोर्नियो आदि देशों से मिले हैं जिनसे यह धारणा बनती है कि- जिस तरह किसी काल खंड में सिंधु लिपि जानने वाली सभ्यता भारतीय उप महाद्वीप में विकसित हुई थी, उसी तरह शंखलिपि जानने वाली कोई सभ्यता किसी काल खण्ड में भारतीय उपमहाद्वीप में फली-फूली।

    ये लोग कौन थे! इनका कालखंड क्या था! आदि प्रश्नों का उत्तर अभी तक नहीं दिया जा सका है। भारत में शंखलिपि के अभिलेख उत्तर में जम्मू कश्मीर के अखनूर से लेकर दक्षिण में सुदूर कर्नाटक तथा पश्चिमी बंगाल के सुसुनिया से लेकर पश्चिम में गुजरात के जूनागढ़ तक उपलब्ध हैं। ये अभिलेख इस लिपि के अब तक ज्ञात विशालतम भण्डार हैं।

    उत्कीर्ण अभिलेखों में लिपि को अत्यंत सुसज्जित विधि से लिखा गया है। कुछ विद्वान इस लिपि को ब्राह्मी लिपि के निकट मानते हैं। विराट नगर से प्राप्त अभिलेखों की तिथि तीसरी शताब्दी ईस्वी मानी गई है। एक लेख में ‘चैल-चैतरा’ पढ़ा गया है जो संस्कृत का ‘शैल-चैत्य’ माना गया है। इसका अर्थ होता है- ‘पहाड़ी पर स्थित चैत्य।’ इससे अनुमान लगाया जाता है कि ईसा की तीसरी शताब्दी में यहां कोई पहाड़ी बौद्ध चैत्य था। विराट नगर तीसरी शताब्दी के आसपास तक बौद्ध धर्म का बड़ा केन्द्र था। मौर्य सम्राट अशोक के भब्रू तथा विराटनगर अभिलेख इसी स्थान से मिले हैं। इन पहाड़ियों में अनेक चैत्य एवं विहारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

    प्राचीन बौद्ध ग्रंथ ललित विस्तर में उन 64 लिपियों के नाम गिनाए गए हैं जो बुद्ध को सिखाई गई थीं। उनमें नागरी लिपि का नाम नहीं है, ब्राह्मी लिपि का नाम है। ललित विस्तर का चीनी भाषा में अनुवाद ईस्वी 308 में हुआ था। जैनों के पन्नवणा सूत्र और समवायांग सूत्र में 18 लिपियों के नाम दिए गए हैं जिनमें पहला नाम बंभी (ब्राह्मी) लिपि का है। भगवतीसूत्र का आरंभ नमो बंभी लिबिए (ब्राह्मी लिपि को नमस्कार) से होता है।

    यद्यपि इन लिपियों का काल निर्धारण नहीं किया जा सका है किंतु ये लिपियां महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध के युग में प्रचलन में थीं। शंखलिपि भी उनमें से एक है। इस लिपि के लेख आज तक पढ़े नहीं जा सके हैं। इस लिपि के अक्षर ‘शंख’ की आकृति से साम्य रखते हैं। इसलिए इसे शंखलिपि कहा जाता है।

    राजगीर की प्रसिद्ध सोनभंडा की गुफाओं में लगे दरवाजों की प्रस्तर चौखटों पर एवं भित्तियों पर शंख लिपि में कुछ संदेश लिखे हैं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। बिहार में मुण्डेश्वरी मंदिर तथा अन्य कई स्थानों पर यह लिपि देखने को मिलती है। मध्यप्रदेश में उदयागिरि की गुफाओं में, महाराष्ट्र में मनसर से तथा बंगाल एवं कनार्टक से भी इस लिपि के लेख मिले हैं। इस लिपि के लेख मंदिरों एवं चैत्यों के भीतर, शैलगुफाओं में तथा स्वतंत्र रूप से बने स्तम्भों पर उत्कीर्ण मिलते हैं।

    प्राप्त शिलालेखों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि इस लिपि में 12 अक्षर हैं। इस लिपि के लेखों में बहुत छोटे-छोटे संदेश खुदे हुए हैं। अर्थात् इन लेखों में पवित्र शब्द, ईश्वरीय नाम, ‘शुभास्ते पंथानः संतु’ एवं ‘ऑल दी बैस्ट’ जैसे मंगल कामना करने वाले शब्द उत्कीर्ण हो सकते हैं। सोलोमन नामक एक विद्वान ने सिद्ध किया है कि इस लिपि में उतने अक्षर मौजूद हैं जिनमें संस्कृत भाषा के समस्त शब्दों को व्यक्त किया जा सके।

    उत्तर प्रदेश के देवगढ़ में इस लिपि के अक्षरों का आकार ब्राह्मी लिपि के अक्षरों से कुछ ही बड़ा है जबकि उदयगिरि की गुफाओं में शंखलिपि के अक्षरों को कई मीटर की ऊंचाई वाला बनाया गया है। कुछ विद्वान इस लिपि का काल चौथी से नौंवी शताब्दी ईस्वी निर्धारित करते हैं किंतु यह काल निर्धारण सही नहीं लगता। इस लिपि को ब्राह्मी लिपि की समकालीन माना जा सकता है।

    ब्राह्मी लिपि उत्तर भारत में ईसा से चार सौ साल पहले प्रचलन में आई किंतु दक्षिण भारत तथा लंका में यह लिपि ईसा से 600 साल पहले प्रचलन में थी। शंखलिपि का उद्भव भी उसी काल में माना जाना चाहिए। भरहुत स्तम्भों पर मिले इस लिपि के अभिलेख ईसा से 300 वर्ष पुराने हैं।

    उदयगिरि की गुफाओं में शंखलिपि के लेख गुप्त कालीन हैं जिनके पांचवीं शताब्दी ईस्वी का होना अनुमानित है। देवगढ़ के स्तम्भों की तिथि पांचवीं शताब्दी ईस्वी की है। अतः इस पर लेखों के उत्कीर्णन की तिथि पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी की होनी चाहिए। सोलोमन ने गुजरात के पठारी नामक स्थान से शंखलिपि का एक ऐसा शिलालेख ढूंढा जिसे प्रतिहार कालीन माना जाता है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि शंखलिपि प्रतिहार काल में भी मौजूद थी।

    एक आख्यान के अनुसार महात्मा गौतम अपने जीवन काल के प्रारम्भ में जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी के शिष्य थे। जब वे महावीर स्वामी से अलग होकर उदयगिरि आए तो महावीर के लिए शंख लिपी में संदेश छोड़कर आए। यह एक आख्यान है जिसकी विश्वसनीयता अधिक नहीं है। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-25

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-25

    ग्रामीण क्षेत्रों के पर्यावरणीय आवास


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    ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर सहज रूप से उपलब्ध सामग्री से झौंपड़े, झौंपड़ी, झूंपे, गुडालो अथवा पड़वे आदि बनाये जाने की परम्परा है। इनकी निर्माण प्रक्रिया में न तो पर्यावरण को कोई क्षति होती है और न इनके लिये महंगे प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। खेतों एवं जंगलों में उगने वाली वनस्पतियों यथा- घास-फूस, कैर, खींप, मुराली, आक, अरणी, सणिया, रोहिड़ा तथा फोग आदि से इन आवासों की दीवारों एवं छतों का निर्माण होता है। इन आवासों की दीवारों को मजबूत बनाने एवं आंगन को लीपने में पशुओं से प्राप्त गोबर तथा प्राकृतिक रूप से उपलब्ध मिट्टी का उपयोग होता है। पड़वों के निर्माण में मिट्टी से बने केलू, सणिये, रोहिड़ा की लकड़ियां एवं अरणी की टहनियां आदि काम आती हैं।

    इन आवासों के निर्माण में काम आने वाली सम्पूर्ण सामग्री ताप-रोधी होती है इस कारण इनके भीतर रहने वाले मनुष्य को अधिक गर्मी अथवा अधिक सर्दी नहीं लगती। इस सामग्री से किसी तरह का रेडियोधर्मी विकीरण नहीं होता, इस कारण ये आवास, मानव स्वाथ्य के लिये अत्यंत अनुकूल होते हैं। ऊपर से डोम अथवा शंकु आकार में बना होने तथा चारों तरफ से गोलाकार में बना होने के कारण ये आवास आंधी तूफान तथा वर्षा के प्रहार को भी भलीभांति सहन कर लेते हैं। इनके भीतर प्रकाश एवं वायु के संचरण की भी पर्याप्त व्यवस्था होती है इस कारण सामान्यतः इनमें बिजली के कृत्रिम प्रकाश एवं पंखे की आवश्यकता नहीं होती।

    इन आवासों का निर्माण प्रायः वर्ष के उस हिस्से में किया जाता है जिस समय न तो कृषि कार्य चल रहे होते हैं तथा न ही वर्षा आदि का आगमन होता है। अतः होली के बाद से लेकर वर्षा के आगमन से पूर्व की अवधि में इनका निर्माण एवं जीर्णोद्धार किया जाता है। जिस भूमि पर इस प्रकार के आवास का निर्माण करना होता है, उस स्थान के केन्द्र में एक व्यक्ति डोरी का सिरा पकड़कर खड़ा हो जाता है तथा दूसरा व्यक्ति उस डोरी के दूसरे सिरे को लेकर चारों ओर घूम जाता है तथ उस पथ को चिह्नित कर लिया जाता है। इस पथ पर लगभग दो फुट की गहराई में खाई खोदकर उसमें दरवाजे की जगह छोड़कर अरणी की टहनियां अथवा रोहड़े की डालियां लगा दी जाती हैं। इन सीधी खड़ी टहनियों पर आकड़े की टहनियों को आड़ा बुना जाता है तथा डोरियों से कस कर बांध दिया जाता है। इस प्रकार झूंपे की चारों तरफ की दीवार बनाई जाती है। जब यह पर्याप्त ऊंचाई तक पहुंच जाती है तो इसे ऊपर से संकरा करना आरम्भ कर देते हैं। इस गोलाकार दीवार के बाहर की तरफ घास से बनी हुई टाटियां बांधनी आरम्भ कर देते हैं। अरणी तथा आक की टहनियों से छज्जा बनाया जाता है तथा उस पर सिणिये बांधे जाते हैं। सिणियों के ऊपर बाजरी के डोके, खींप एवं मुरठे लगाये जाते हैं। झूंपे के ऊपरी भाग में डोकों की गोलाई में अराई बनाई जाती है। झूंपे की दीवारों को मिट्टी एवं गोबर के मिश्रण से लीप दिया जाता है जिसे निंपाई कहते हैं। झूंपे में रोहिड़े या खेजड़ी का खम्भ लगाया जाता है जो झूंपे के केन्द्र में खड़ा रहकर उसकी छत का भार धरती पर वितरित करता है।

    अतिथियों के लिये झूंपे के बाहर गुडाल, उतारा तथा उताक बनाये जाते हैं। पहाड़ी एवं पथरीले क्षेत्रों में गोबर एवं मिट्टी के आयताकार कमरे बनाये जाते हैं जिन्हें ढालिया कहते हैं। झौंपड़े के भीतर रसोई वाला स्थान सांझाण कहलाता है। मिट्टी के बर्तन रखने के लिये दुखाण बनाया जाता है। कपड़े आदि रखने के लिये ओरा एवं चारपाइयां रखने के लिये कुड बनाया जाता है। बकरियां बांधने के लिये निश्चित स्थान को मडिया कहते हैं। इन आवासों के चारों ओर आहता बनाकर उसमें अरणी, आक, खेजड़ी अथवा रोहिड़ा की टहनियों का दरवाजा लगा दिया जाता है।

    इस प्रकार ये आवास अपने आप में एक पूर्ण इकाई होते हैं। विगत कुछ दशकों में आधुनिकता की दौड़ एवं विकास के नाम पर सरकारों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों एवं ढाणियों में पक्के आवास की योजनाएं आरम्भ की गई हैं जिनके कारण ग्रामीण क्षेत्रों का जन सामान्य, अपने सहज आवासों से विमुख होकर सीमेंट, लोहे एवं पत्थर से आवास बनाने लगा है। इन आवासों में बिजली के प्रकाश एवं विद्युत चालित पंखों की आवश्यकता होना स्वाभाविक है। अच्छा तो यह होता कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में पारम्परिक पर्यावरणीय अवासों के निर्माण को प्रोत्साहन देती।

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  • अजमेर का इतिहास - 89

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 89

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अर्जुन लाल सेठी


    अर्जुनलाल सेठी का जन्म 9 सितम्बर 1880 को जयपुर के जैन परिवार में हुआ। उन्होंने ई. 1905 में जैन शिक्षा प्रचारक समिति तथा उसके उसके अधीन विद्यालय, छात्रावास एवं पुस्कालय का संचालन किया। इन संस्थाओं में सेठीजी ने क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित करने का काम किया। उनका सम्बन्ध रास बिहारी बोस, शचीन्द्र सान्याल एवं मास्टर अमीचंद जैसे क्रांतिकारियों से हो गया। इन क्रांतिकारियों द्वारा भारत भर में सशस्त्र क्रांति की योजनाएँ बनायी जाती थीं।

    राजस्थान में इस क्रांति का जिम्मा केसरीसिंह बारहठ, खरवा ठाकुर गोपालसिंह खरवा, ब्यावर के सेठ दामोदर दास राठी और जयपुर के अर्जुनलाल सेठी को सौंपा गया। सेठी का यह कार्य था कि वे अपने विद्यालय में नवयुवकों को क्रांतिके लिये तैयार करें। प्रतापसिंह बारहठ, माणकचंद (शोलापुर) और विष्णुदत्त (मिर्जापुर) ने वर्द्धमान विद्यालय में ही क्रांति का प्रशिक्षण प्राप्त किया। देश भर में सशस्त्र क्रांति के आयोजन के लिये धन की पूर्ति करने हेतु वर्द्धमान विद्यालय के चार छात्रों ने विष्णुदत्त के नेतृत्व में बिहार के आरा जिले में निमेज के एक जैन महंत पर डाका डाला।

    महंत मारा गया किंतु धन की प्राप्ति नहीं हुई। इस काण्ड के साथ सेठी का नाम भी जुड़ गया। उन्हें जयपुर में ही नजर बंद रखा गया। उसके बाद उन्हें मद्रास प्रेसीडेन्सी की वैलूर जेल भेज दिया गया। सात वर्ष बाद ई. 1920 में उन्हें छोड़ा गया। जब सेठीजी जेल से छूटकर राजस्थान लौट रहे थे तब बालगंगाधर तिलक ने दो हजार लोगों के साथ पूना रेल्वे स्टेशन पर उनका भव्य स्वागत किया।

    छात्रों ने बग्घी के घोड़े खोलकर उनकी बग्घी को हाथों से खींचा। वैलूर से आने के बाद सेठीजी ने अजमेर को अपनी कर्मभूमि बनाया। ई.1920-21 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें सागर जेल भेज दिया गया। डेढ़ वर्ष बाद जेल से रिहाई होने पर वे पुनः अजमेर आ गये। इस बार गांधीजी से उनका गहरा मतभेद हो गया। ई.1934 में गांधीजी अजमेर आये तथा सेठी से गले मिलकर रो पड़े।

    गांधीजी की प्रेरणा से अब उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता का काम आरंभ किया। वे स्वयं मुसलमान हो गये और उन्होंने अपना नाम 27 अक्टूबर 2032 को अर्जुनलाल सेठी ने अपना नाम गाजी अब्दुल रहमान रख लिया। गाजी उसे कहते हैं जो काफिरों अर्थात् हिन्दुओं पर गाज अर्थात् बिजली बनकर गिरे। 23 दिसम्बर 1945 को उनका निधन हो गया। उनका देहांत हो जाने पर उनकी इच्छानुसार उन्हें दफनाया गया।

    कृष्णगोपाल गर्ग

    कृष्णगोपाल गर्ग का जन्म ई.1904 में हुआ। वे छात्र जीवन के दौरान ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। ई.1921 में उन्होंने शराब की दुकानें के समक्ष धरने दिये। 17 वर्ष की आयु में वे अहमदाबास कांग्रेस के लिये अजमेर के प्रतिनिधि चुने गये। ई.1923 में उन्होंने रेलवे के कारखाने में नौकरी की तथा अस्पश्यता निवारण, बाल विवाह निषेध एवं विधवा विवाह के पक्ष में काम करने लगे। इस कारण अग्रवाल समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया।

    ई.1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें नौकरी छोड़कर जेल जाना पड़ा। वे दो साल तक जेल में रहे। कई वर्षों तक हरिजन सेवक संघ के मंत्री रहे। 8 से 16 अप्रेल 1940 तक अजमेर कांग्रेस के राष्ट्रीय सप्ताह में झण्डा फहराने पर कृष्ण गोपाल गर्ग व बालकृष्ण गर्ग को चार-चार माह की कठोर जेल दी गई। कृष्णगोपाल कई वर्ष तक अजमेर नगर परिषद के अध्यक्ष रहे।

    गोपालसिंह खरवा

    गोपालसिंह खरवा का जन्म 19 अक्टूबर 1873 को मेवाड़ रियासत के खरवा ठिकाणे में जागीरदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम माधोसिंह तथा माता का नाम गुलाबकंवर था। गोपालसिंह ने बचपन में ही घुड़सवारी तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास किया। उन्होंने अजमेर के मेयो कॉलेज में छः साल तक शिक्षा ग्रहण की। ई.1903 में जब उदयपुर के महाराणा फतहसिंह दिल्ली दरबार में भाग लेने के लिये जा रहे थे तब प्रसिद्ध क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ ने 13 सोरठों की एक मार्मिक रचना 'चेतावणी के चूंगटिये' शीर्षक से की।

    इस कविता में महाराणा को दिल्ली न जाने के लिये प्रेरित किया गया था। गोपालसिंह खरवा ने यह कविता नसीराबाद रेलवे स्टेशन से पहले सरेरी रेल्वे स्टेशन पर महाराणा को सौंप दी। महाराणा उस कविता को पढ़कर इतने उत्तेजित हुए कि वे दिल्ली पहुँच कर दरबार में भाग लिये बिना ही मेवाड़ लौट आये। गोपालसिंह की मित्रता ब्यावर की श्रीकृष्णा मिल के मालिक दामोदरदास राठी से हो गयी। राठीजी के माध्यम से गोपालसिंह, श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा अरविंद घोष से मिले।

    इसके बाद गोपालसिंह का सम्पर्क बंगाल के क्रांतिकारियों से हो गया। जब ई.1915 में देशव्यापी सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी जा रही थी तब खरवा के ठाकुर राव गोपालसिंह और विजयसिंह पथिक को क्रांति का कार्य सौंपा गया। इन दोनों क्रांतिकारियों ने राजस्थान से अस्त्र-शस्त्र खरीदकर बंगाल, बिहार, पंजाब तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों में कार्यरत क्रांतिकारियों को भेजना आरंभ किया।

    क्रांति के लिये बम तथा बंदूक आदि अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिये इन क्रांतिकारियों ने नसीराबाद, नीमच तथा देवली की छावनियों से सम्पर्क स्थापित किया। इन दोनों क्रांतिकारियों ने देशी राजाओं को भी इस कार्य के लिये तैयार करने का प्रयास किया तथा वीर भारत सभा नामक एक क्रांतिकारी संगठन भी स्थापित किया। केसरीसिंह बारहठ, गोपालसिंह खरवा तथा दामोदरदास राठी को नसीराबाद एवं ब्यावर पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गयी।

    इन्होंने योजना बनायी कि वे जंगल में छिपे सहयोगियों की मदद से ब्यावर रेलवे लाइन उड़ा देंगे जिससे यातायात ठप्प हो जायेगा और स्थिति का लाभ उठाकर क्रांतिकारी नसीराबाद एवं ब्यावर की पुलिस चौकियों एवं शस्त्रागारों पर कब्जा कर लेंगे। गोपालसिंह दो हजार क्रांतिकारियों के साथ खरवा रेलवे स्टेशन के पास जंगल में जा छिपे। सरकारी गुप्तचर तंत्र को इस योजना का पता लग गया जिससे योजना ध्वस्त हो गयी। इस पर गोपालसिंह ने खरवा पहुँच कर कुछ दिनों की रसद सामग्री ली और असला लेकर शिकार बुर्ज पर जा चढ़े।

    अजमेर कमिश्नर सेना लेकर खरवा पहुँचा किंतु इतनी भारी सैन्य तैयारी को देखकर उसने क्रांतिकारियों पर हमला करने के स्थान पर उनसे समझौता कर लिया। इस समझौते के अनुरूप गोपालसिंह तथा उनके साथी टॉडगढ़ में नजरबंद रखा गया। कुछ दिनों बाद गोपालसिंह खरवा तथा विजयसिंह पथिक वहाँ से भाग निकले। कुछ दिन पश्चात ही गोपालसिंह सलेमाबाद में पकड़े गये। उन्हें उत्तर प्रदेश में शाहजहाँपुर के पास तिलहर में नजरबंद किया गया। राहुल सांकृत्यायन ने इसी जेल में राव गोपालसिंह से भेंट की।

    इस भेंट के दौरान गोपालसिंह ने राहुल सांकृत्यायन को कई स्वरचित कविताएँ सुनाईं जिनमें से एक कविता इस प्रकार से थी- गौरांग गण के रक्त से निज पितृ गण तरपण करूंगा। तिलहर में दो वर्ष की नजरबंदी के बाद मार्च 1920 में सार्वजनिक क्षमा का आदेश प्रसारित होने पर उन्हें नजरबंदी से रिहा किया गया। गोपालसिंह ने अपना शेष जीवन रचनात्मक कार्यों में लगाया। ई.1931 में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने कश्मीर का बादशाह बनने का अभियान चलाया। उसने मुसलमानों में धार्मिक उन्माद भड़काकर कश्मीर के राजा के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा उठा लिया।

    देश के अन्य भागों से भी मजहबी जोश में उन्मत्त मुसलमान जिहाद के नाम पर कश्मीर पहुँचने लगे। इस धार्मिक उन्माद की प्रतिक्रिया पूरे देश में हुई। हिन्दुओं के जत्थे भी महाराजा के समर्थन में कश्मीर पहुँचने लगे। हिन्दू राष्ट्रीयता के समर्थक राव गोपालसिंह खरवा भी केशरिया बाना पहनकर और शस्त्रों से सज्जित होकर कश्मीर के लिये रवाना हुए। उस समय वे 60 वर्ष के थे किंतु एक हिन्दू राजा की सहायता के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने का उनका निश्चय अटल था।

    खरवा तथा अजमेर से 32 साथी भी गोपालसिंह के साथ गये। जब राव गोपालसिंह लाहौर पहुँचे तो पंजाब के गवर्नर ने उनके कश्मीर जाने पर रोक लगा दी तथा पंजाब की देशी रियासतों के पोलिटिकल एजेंट फिट्ज पैट्रिक जो पहले अजमेर का पोलिटिकल एजेंट रह चुका था, ने राव गोपालसिंह को सूचित किया कि कश्मीर का आंदोलन दबा दिया गया है अतः अब आप वहाँ न जायें। कांग्रेस के बड़े नेता मौलाना शौकत अली ने लाहौर में आयोजित एक आम सभा में गोपालसिंह पर एक फिकरा कसा कि राव साहब गोपालसिंह राठौड़, राणा प्रताप की जंगभरी तलवार अब भी दिखलाते हैं।

    इस पर राव गोपालसिंह ने अपने भाषण में कहा कि मेरा यह शरीर उसी खून का बना हुआ है जिससे महाराणा प्रताप का बना था। मैं उनकी तलवार दिखाऊँ तो नई बात क्या है? किंतु भाई साहब आप तो बगदाद की तलवार और लंकाशायर के कारखानों का प्रभाव हिन्दुस्तान में दिखाना चाहते हैं। मैं हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता का हामी रहा हूँ परन्तु आप लोगों के जुनून की प्रतिक्रिया तो होगी ही। किसी समय शौकत अली और गोपालसिंह पगड़ी बदल भाई बने थे किंतु दोनों की राजनीतिक दिशाएँ अलग होने के कारण ही दोनों में मन मुटाव हो गया था और गोपालसिंह का मोह कांग्रेस से भंग हो गया था।

    मार्च 1939 में इस महान क्रांतिकारी का निधन हो गया। ठाकुर केसरीसिंह ने राव गोपालसिंह के बारे में लिखा है-


    रह्यो लाल पाँचाल में, महाराष्ट्र में बाल।

    राजत राजस्थान में गौरवमय गोपाल।

    गौरीशंकर हीराचंद ओझा (रायबहादुर)

    महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा का जन्म ई.1863 में सिरोही जिले के रोहिड़ा गाँव में हुआ। ओझाजी ने हिंदी में पहली बार 'भारतीय प्राचीन लिपि माला' ग्रंथ का शास्त्रीय लेखन कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम लिखवाया। इस ग्रंथ में 84 लिपियों का विवेचन है। ओझाजी ने कर्नल टॉड की पुस्तक 'एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान' का हिंदी में अनुवाद किया। 13 वर्ष तक उन्होंने नागरी प्रचारणी पत्रिका का सम्पादन किया। उन्होंने उदयपुर, जोधपुर प्रतापगढ़, सिरोही, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा बीकानेर रियासतों का इतिहास लिखा तथा मुहता नैणसी की ख्यात का संपादन किया।

    ओझाजी ने सोलंकियों का इतिहास तथा कर्नल जेम्स टॉड का जीवन चरित्र भी लिखा। ई.1908 में ओझाजी को अजमेर में स्थापित राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। उदयपुर के महाराणा ने उन्हें कड़क्का चौक में एक बहुत बड़ी हवेली रहने के लिये दी। वे इसी हवेली में पूरी शान के साथ रहते थे। इसे ओझा भवन के नाम से जाना जाता था। आज भी यह हवेली अजमेर में देखी जा सकती है।

    ई.1914 में उन्हें रायबहादुर की पदवी मिली। इन्हें काशी विश्वविद्यालय ने डी लिट. की मानद उपाधि दी। उनका निधन 27 अप्रेल 1947 को रोहिड़ा गांव में हुआ।

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  • अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

     02.06.2020
    अंधेरे में पलते उजाले (कहानी)

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    बबीता स्वप्न बुनती है और स्वप्न के जंजाल में उनींदी सी रहकर स्वेटर बुनती है। स्वप्न और स्वेटर से इतर बबीता और भी बहुत कुछ बुनती है। बबीता जानती है कि जब तक उसमें बुनने की क्षमता है, तब तक ही वह बुन सकती है। बुनना उसके हाथ की बात नहीं है। उसे बुनने की भूमिका मिली है। उसे जीवन भर और सामर्थ्य भर बुनते ही रहना है। ऊन के मुलायम और रंग बिरंगे गोले केवल उसकी गोद में ही नहीं रखे हैं जिनके सिरे उसकी अंगुलियों में पकड़ी हुई सलाईयों से जुड़े हुए हैं, ऊन के गोले उसकी गोद के भीतर भी रखे हैं जिनके सिरे उसके अपने शरीर से जुड़े हुए हैं।


    हाथ की सलाईयां तेज गति से फंदे रचती हैं, नरम मुलायम रंगीन ऊन के गोले गोल-गोल नाचते हैं और स्वेटर का आकार शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। उसका शरीर भी सलाइयों की तरह हिलता है, गोद के भीतर हलचल होती है और अदृश्य दीवारों के पीछे कुछ फंदे रचे जा रहे हैं। कुछ उलटे फंदे और उसके बाद कुछ सीधे फंदे। इन उलटे और सीधे फंदों के मेल से शरीर की अदृश्य दीवारों के पीछे जो कुछ भी बुना जा रहा है, वह शनैः शनैः बड़ा होता जाता है। कौन जाने कि बेटा है या बेटी! एक अनजान भय से कंपित रहकर अंधेरी कोठरी में सुबह का उजाला पालते जाना ही बबीता की क्षमता का चरम है।

    तीन साल की मुनिया ऊन के गोलों को उठाकर बाहर भाग जाना चाहती है किंतु हर बार की तरह बबीता उसे प्यार से झिड़क देती है - ‘भइया के लिये स्वेटर बुन रही हूँ। इन्हें लेकर मत भाग।’

    ‘कहाँ है भइया?’

    ‘अभी आयेगा। तू ऊन छोड़।’

    ‘कब आयेगा?’ मुनिया को भइया से मिलने की जल्दी है।

    ‘जब आयेगा तब अपने आप देख लेना। तू खेलेगी भइया के साथ।’

    ‘हाँ मैं भइया के साथ खेलूंगी।’

    ‘तो फिर ऊन छोड़।’

    मुुनिया अनमने हाथों से ऊन का गोला माँ की गोद में फैंक देती है।

    ‘ऐसे नहीं फैंकते, भइया के लग जायेगी।’

    ‘कहाँ है भइया?’ मुनिया फिर सवाल करती है।

    ‘जा तू बाहर खेल। देख तो गली में सब्जी बेचने वाला आया है क्या?’ ‘नहीं, पहले बताओ भइया कहाँ है। मैं उसके साथ खेलूंगी। मुनिया अड़ जाती है।

    इससे पहले कि बबीता कुछ जवाब सोच पाती, बाहर गली में गुब्बारे बेचने वाले की आवाज आई और मुनिया भइया देखने की जिद छोड़कर बाहर लॉन में दौड़ गई। बबीता हाथ की सलाइयों को समेटकर पलंग के कौने पर रख देती है। वह आहिस्ता से ऊन के मुलायम रंगीन गोलों को हाथ में उठाकर तोलती है, उसे आश्चर्य होता है कितने हलके हैं। उनका कोमल स्पर्श उन्हें और भी हलका बना देता है किंतु यही हलके गोले ठण्ड का गुरूर तोड़ देते हैं।

    सर्दियों के छोटे दिनों में आकाश के अतिथि को भी घर जाने की जल्दी रहती है इसलिये पाँच बजने से पहले ही सांझ होने का आभास होने लगा है। सास मंदिर जाने की तैयारी कर रही हैं और ससुर अंधेरा होने से पहले ही सायंकालीन भ्रमण के लिये चले गये हैं। पति के दफ्तर से लौटने से पहले बबीता को रात के खाने की तैयारी करनी है। वह पलंग का सहारा लेकर खड़ी होती है। भीतर भारीपन का अहसास होता है। उसका ध्यान एक बार फिर भीतर की अदृश्य रचना पर चला जाता है। आजकल उसका ध्यान बाहर की ओर कम और अपने भीतर की ओर अधिक रहता है।

    लोग कहते हैं कि आखिरी महीने में बालक माँ के पेट में उलटा लटक कर रहता है। इस दौरान वह माँ के शरीर से जुड़ी नाल के रास्ते भोजन प्राप्त करता है। उलटे लटकने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठती है बबीता। वह जगह तो एक दम अंधेरी बंद कोठरी जैसी होगी जिसमें हाथ-पाँव तक हिलाने को जगह नहीं। क्या इतनी तंग अंधेरी बंद कोठरी में आँखें बंद करके उलटे लटके रहने में गर्भस्थ शिशु को कोई कष्ट नहीं होता होगा?

    बबीता को याद है, उसकी नानी कहा करती थीं - ‘हर प्राणी अपनी माँ के पेट में नौ महीने की सबसे कठिन सजा भोगता है। इस सजा से घबरा कर वह भगवान के सामने बारबार गिड़गिड़ाता है कि इस बार मुझे इस कष्ट से छुटकारा दिला दो, अब कभी पाप नहीं करूंगा। तब भगवान प्राणी को उसके अपराधों की जानकारी देता है और कहता है कि यह तेरे पिछले पापों की सजा है। जब तक तू पाप करता रहेगा, तब तक तू जन्म मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा और बारम्बार यहाँ आता रहेगा। यह सजा तो तुझे भोगनी ही है।’

    बबीता चक्कर में पड़ जाती है। तो क्या मेरेे अपने भीतर इन दिनों एक न्यायालय चल रहा है जिसमें किसी अज्ञात, अदेखे, अजन्मे प्राणी के पूर्व जन्मों के पाप पुण्य के मुकदमे की सुनवाई हो रही है? क्या जो मासूम अदृश्य रचना मेरे रक्त और मज्जा से शनैः शनैः साकार हो रही है, वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मों की सजा भोगने के लिये मेरे भीतर बनी एक अंधी कोठरी में उलटी लटकी हुई है और भगवान उससे उसके पूर्व जन्मों का लेखा-जोखा पूछ रहा है?

    बबीता का पूरा शरीर सिहर उठता है। भगवान पाप-पुण्य का लेखा-जोखा किससे पूछ रहा है? उलटे लटके हुए निर्माणाधीन शिशु के शरीर से या फिर उसके भीतर उलटी लटकी हुई निर्माणाधीन आत्मा से? क्या जिस तरह शिशु के शरीर का शनैः शनैः निर्माण होता है, उसी तरह आत्मा का भी शनैः शनैः अवतरण होता है? या फिर शरीर तो तिल-तिल कर बनता है और आत्मा एक साथ उसमें प्रवेश करती है? बबीता अपने आप से कई सवाल करती है किंतु कोई उत्तर नहीं सूझता।

    बबीता एक बार फिर अपने आप से पूछती है, पूर्व जन्मों के पापों की सजा किसे मिल रही है? तिल-तिल कर बन रहे उलटे लटके हुए शरीर को? या फिर उसके भीतर धीरे-धीरे अवतरित होती हुई आत्मा को? तो क्या जिस तरह मेरे शरीर में एक और शरीर प्रवेश कर गया है, उसी तरह मेरी आत्मा के भीतर भी एक और आत्मा प्रवेश कर गई है? वह खुद ही उलझ जाती है, उसे समझ नहीं आता, आत्मा के भीतर आत्मा कैसे प्रवेश कर सकती है? उसका ध्यान फिर से सजा वाली बात पर चला जाता है। माँ के पेट मंे सजा किसे मिलती है? शरीर को या आत्मा को?

    यदि सजा शरीर को मिलती है तो वह अन्याय है क्योंकि जिस शरीर ने पाप किये थे वह तो पहले ही कहीं मर चुका है। यह तो मेरे रक्त और मेरी मज्जा से बनने वाला शरीर है जो अभी तक पूरा बना ही नहीं है। फिर इसे सजा किस बात की? तो क्या सजा आत्मा को मिलती है? उस आत्मा को जो अजर है, अमर है, अखण्ड है, शाश्वत है? जो आत्मा अग्नि से नहीं जलती, पानी से नहीं भीगती, शस्त्र से नहीं कटती उस आत्मा को सजा कैसे दी जा सकती है? आत्मा तो कुछ भोगती ही नहीं, भोगता तो शरीर है।

    मुनिया गली में देखकर आ गई है। उसके चेहरे पर निराशा का भाव है। गुब्बारे वाला जा चुका है।

    ‘मम्मी गुब्बारे वाला चला गया।’

    बबीता का ध्यान कहीं और है। वह मुनिया की बात का जवाब नहीं देती।

    ‘मम्मी भइया आ गया?’

    ‘इसे भइया की बड़ी जल्दी पड़ी है।’ सास 
    हँस कर मुनिया के सिर पर हाथ फेरती हैं। वे मंदिर जाने के लिये तैयार हो चुकी हैं।

    ‘देख ध्यान से दरवाजा लगा लेना, मैं जा रही हूँ और तू कुछ खा पी लेना। ऐसे में भूखे नहीं रहते। बालक को कष्ट होता है।’ सास जाते-जाते निर्देश देती हैं।

    सास की बात से बबीता का ध्यान नाल से जुड़े गर्भस्थ शिशु की ओर चला जाता है। क्या गर्भस्थ शिशु की स्थिति चिकित्सालय में अचेत पड़े रोगी के समान है? वह स्वयं से सवाल पूछती है किंतु उत्तर में वह स्वयं ही अपने आप से सहमत नहीं हो पाती। वहाँ तो रोगी पलंग पर सीधा सोया रहता है और ग्लूकोज की बोतल उलटी लटकाई जाती है। जिससे रोगी ग्लूकाज प्राप्त करता रहता है। जबकि इस अंधी कोठरी में स्थिति उलटी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ग्लूकोज की बोतल तो सीधी रहती है किंतु रोगी उलटा लटक कर ग्लूकोज प्राप्त करता है।

    बबीता को ध्यान है कि जब वह स्कूल में पढ़ती थी तब उनके घर में एक सन्यासी आया करते थे। वे बबीता के पिता के पुराने मित्र हुआ करते थे जो गृहस्थी का जंजाल छोड़कर वैरागी हो गये थे। उन्होंने बबीता के पिता से एक दिन कहा था - ‘जब तक प्राणी माता के गर्भ में रहता है तब तक वह ईश्वर से साम्य रखता है तथा निरंतर सोअ्हम-सोअ्हम अर्थात् मैं ही परमात्मा हूँ, मैं ही परमात्मा हूँ, कहता रहता है ताकि भीतर होने वाले सारे कष्टों को भूल जाये किंतु जब वही प्राणी माँ के गर्भ से बाहर आता है तो उसी क्षण सोअह्म-सोअ्हम भूलकर कोअ्हम-कोअ्हम अर्थात् मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ कहने लगता है और फिर से नये कष्ट पाने की भूमिका रचने लगता है।' 

    तो क्या इस समय मेरे भीतर पल-पल बड़ी हो रही रचना स्वयं के परमात्मा होने का दावा कर रही है? बबीता फिर अपने आप से सवाल पूछती है। यदि वह इस समय परमात्मा होने का दावा कर रही है तो फिर संसार में आते ही वह स्वयं को भूल क्यों जाती है? कोअ्हम्-कोअ्हम् क्यों कहने लगती है? वह रोने क्यों लगती है? बबीता को नहीं लगता कि वह अदृश्य मासूम रचना जिस भी अवस्था में उसके गर्भ में है, वह कुछ भी सोच सकने की स्थिति में है। वह तो एक निश्चेष्ट और निष्क्रिय स्थिति है। कोई भी प्राणी अचेत अवस्था में कैसे सोच सकता है? जब वह सोच ही नहीं सकता तो उसे कष्ट कैसे हो सकता है?

    अगले ही क्षण बबीता का ध्यान उचट कर दूसरी ओर चला जाता है। क्या कोई भी विचार शून्य रचना वृद्धि कर सकती है? यदि गर्भस्थ शिशु विचार शून्य होता है तो वह गर्भ से बाहर आते ही रोने क्यों लगता है? वह केवल कष्ट से भरा हुआ विचार ही हो सकता है जो नवजात शिशु को रोने के लिये प्रेरित करता है। विचार शून्य रचना रो नहीं सकती। इसका अर्थ यह हुआ कि गर्भस्थ शिशु कष्ट पूर्ण विचारों से परिपूर्ण है। उसे भूख लगती है, तभी तो वह माँ के गर्भ में रहकर नाल से आहार खींच लेता है और गर्भ से बाहर आकर दूध पीने लगता है। विचार शून्य रचना को भूख की अनुभूति नहीं होती।

    यदि गर्भस्थ रचना विचारों और अनुभूतियों से परिपूर्ण है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अंधेरी बंद कोठरी में कष्टों की अनुभूति होती ही होगी। लम्बे समय तक आँखें बंद करके चौबीसों घण्टे तरल आवरण में उसे घुटन का अहसास होता ही होगा। यदि प्राणी के बारबार जन्म लेने की बात सही है तो उसे यह बात भी अच्छी तरह स्मरण रहती होगी कि वह खुले आकाश में साँस लेने वाला प्राणी है। वह माता के गर्भ में बनी पानी की थैली में कैसे बंद रह पाता होगा? उसका दम तो घुटता ही होगा।

    नहीं-नहीं। एक बार फिर वह स्वयं से असहमत हो जाती है। क्या किसी भी आदमी को माँ के गर्भ में रहने के काल की कोई भी स्मृति होती है? इसका अर्थ यह है कि माँ के गर्भ के भीतर शिशु अपने आस-आस पास हो रही घटनाओं से अनजान होता है। उस समय की कोई स्मृति किसी भी आदमी को नहीं होती।

    लोग पूर्व जन्म के समय की स्मृतियों और घटनाओं की बात करते तो देखे गये हैं किंतु माता के गर्भ में निवास करने के समय की किसी घटना या स्मृति का उल्लेख करते हुए नहीं देखे गये हैं। इसलिये पानी के आवरण में रहने के दौरान शिशु को दम घुटने की अनुभूति बिल्कुल नहीं होती होगी।

    मछलियाँ भी तो पानी में रहती हैं। क्या उनका दम पानी में घुट जाता है? वे तो पूरा जीवन ही पानी में निकाल देती हैं। बबीता इस विचार पर भी स्थिर नहीं रह पाती। वह स्वयं से ही प्रश्न करती है और स्वयं से ही उनके उत्तर भी चाहती है। वह जानती है कि मछलियों का दम पानी के भीतर नहीं घुटता, वे तो बनी ही पानी के भीतर रहने के लिये हैं। यदि उन्हें पानी से बाहर निकाला जायेगा तो उन्हें कष्ट होगा। किंतु गर्भस्थ शिशु तो पानी के भीतर रहने के लिये नहीं बना है, उसे अवश्य नौ मास तक पानी की थैली के भीतर रहने में कष्ट होता होगा।

    एक बार फिर बबीता  के विचारों को झटका लगता है। वह अपने आप से नया प्रश्न करती है, मछलियों का ही उदाहरण क्यों? सृष्टि में मेंढक, सर्प और मगरमच्छ भी तो हैं जो पानी के भीतर और बाहर, दोनों ही स्थितियों में आनंद पूर्वक रह सकते हैं। आदमी भी उन्हीं की तरह का प्राणी हो सकता है जो नौ माह तक पानी की थैली में और उसके बाद हवा में बड़े मजे से रह सकता है। अचानक उसके विचारों का क्रम टूटता है। मुनिया उसे झिंझोड़ रही है।

    ‘मम्मी पापा आ गये।’ ‘

    अरे तेरे पापा आ भी गये। मैंने तो अभी खाना बनाना शुरु ही नहीं किया।’ विचारों को एक तरफ झटककर बबीता शीघ्रता से रसोई में घुस जाती है। सूर्य देवता अपनी प्रकाश शलाकाओं को समेट कर अपने घर चले गये हैं और बाहर काफी अंधेरा हो गया है। बिल्कुल बंद अंधेरी कोठरी जैसा जिसमें पूरी दुनिया सोअ्हम-सोअ्हम के स्थान पर कोअ्हम-कोअ्हम कह रही है।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-26

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-26

    राजस्थान में प्रकृति पूजन परम्परा


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्रकृति के साथ हजारों वर्षों के सान्निध्य ने मनुष्य को यह अनुभव कराया कि मनुष्य को जो कुछ भी मिला है, वह केवल प्रकृति से ही। मनुष्य को प्रकृति की विविध शक्तियाँ एवं उदारताएं, किसी दैवीय कृपा से कम नहीं लगीं। इसलिये धरती की अन्य महान सभ्यताओं की भांति राजस्थान में भी प्रकृति की शक्तियों को पूजने की परम्परा विकसति हुई ताकि प्रकृति की कृपा प्राप्त की जा सके तथा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जा सके। यही परम्परा आगे चलकर प्रकृति एवं पर्यावरण की सुरक्षा का सबसे बड़ा माध्यम बन गई जो आज भी अनवरत प्रवाहमान है।


    जलाशयों की पूजा

    नदियों, सरोवरों एवं जलाशयों की पूजा धार्मिक कृत्य माना जाता है। पुत्र के जन्म एवं विवाह के अवसर पर कुआं पूजन इसी परम्परा का द्योतक है। मृत्यु के बाद शरीर की भस्म एवं अस्थियों को इस कामना से नदियों में प्रवाहित किया जाता है कि मृतक की आत्मा को शांति मिले। धार्मिक पर्वों के अवसर पर नदियों, तालाबों एवं कुओं पर सामूहिक स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है। तालाबों से मिट्टी खोदकर तालाबों को गहरा बनाना, उनके जल को प्रदूषित होने से रोकना, तालाबों पर पक्के घाट बनवाना तथा नये तालाब, बावड़ी, कूप आदि का निर्माण करवाना पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है। वर्षा से पहले, तालाबों एवं टांकों के आगोर को साफ करने के लिये सामूहिक आयोजन किये जाते हैं।

    वृक्षों की पूजा

    राजस्थान में वट, पीपल, तुलसी, खेजड़ी, आम, आंवला तथा नीम आदि वृक्षों की पूजा होती है। पीपल तथा तुलसी को नित्य सींचना अच्छा माना जाता है। बड़ अमावस को वटवृक्ष की पूजा होती है। आंवला ग्यारस को आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पीली कनेर में पार्वती का निवास माना जाता है। आकड़े को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। सफेद आकड़े में विष्णु का निवास माना जाता है। भगवान शिव तथा हनुमानजी पर आकड़े तथा धतूरे के पुष्प चढ़ाये जाते हैं। शिवजी पर भांग तथा बिल्वपत्र के पत्ते भी चढ़ते हैं। कृष्णजी की पूजा तुलसी दल से की जाती है। सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण के समय घर के जलपात्रों तथा खाद्य सामग्री में तुलसी दल तथा दूर्वा डाली जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से ग्रहण के समय धरती तक पहुँचने वाली हानिकारक किरणें खाद्य सामग्री को खराब नहीं कर पातीं। दैनिक पूजन विधान में पीपल एवं तुलसी को जल चढ़ाने की परम्परा इसलिये सम्मिलित की गई ताकि इन्हें लोग अपने घरों एवं मुहल्लों में लगायें।

    पीपल एक मात्र ऐसा ज्ञात वृक्ष है जो दिन और रात में ऑक्सीजन छोड़ता है। तुलसी के पत्तों में औषधीय गुणों के कारण आसपास के वातावरण को भी शुद्ध करने की शक्ति होती है। नीम को नारायण कहा जाता है। अग्नि में हरी वनस्पति अथवा पुष्प जलाना अशुभ समझा जाता है। बृहस्पति की खराब दशा का निवारण करने एवं सरस्वती की कृपा दृष्टि प्राप्त करने के लिये हल्दी की गांठ धारण की जाती है। देवी-देवताओं को समर्पित करके ओरण छोड़े जाते हैं जिनके वृक्ष काटना पाप समझा जाता है। किसी धरती, सामग्री या व्यक्ति को देवता, संत अथवा ईश्वर के लिये अर्पित अथवा सुरक्षित करने को ओल करना कहा जाता है।

    पशु-पक्षियों की पूजा

    विभिन्न पशु-पक्षियों की पूजा का प्रचलन राजस्थान की सांस्कृतिक प्राचीनता की द्योतक है। नाग पंचमी को नागों की पूजा होती है। बंदरों को हनुमानजी की सेना मानकर पूजा जाता है। गाय में सकल तीर्थों का वास माना जाता है। साण्ड को शिवजी का नंदी मानकर उसके लिये मार्ग छोड़ा जाता है तथा उसे अवध्य माना जाता है। बकरों के कानों में मुरकी डालकर उन्हें अमर घोषित किया जाता है। चील में देवी का निवास माना जाता है। बहुत सी देवियों के मुख पशु-पक्षियों के हैं। श्रीमाली ब्राह्मणों की गोधा शाखा की कुल देवी का मुंह गर्दभ की आकृति का है। उसे खरानना माता कहते हैं। तांत्रिक मत में बगुला मुखी देवी की पूजा प्रचलित है। राठौड़ों की कुल देवी नागणेची माता का शरीर नाग योनि का है। तेजा, गोगा आदि देवताओं के प्रतीक के रूप में नाग की मूर्ति, चित्र एवं चिह्नों की पूजा होती है। जोधपुर में एक मंदिर उष्ट्रवाहिनी देवी का भी है। कुत्तों को भैंरूजी का वाहन माना जाता है। चिड़ियों, मोरों तथा कबूतरों को दाना चुगाना, कीड़ी नगरा सींचना, गायों, बंदरों तथा कुत्तों को भोजन देना धार्मिक कृत्य माना जाता है।

    राजस्थान-वासियों में यह विश्वास है कि जो विश्वात्मा सबमें मौजूद है, उसे संतुष्ट करने से ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी। बच्छ बारस के दिन गाय के बछड़ों की पूजा करने का विधान है जो हमारी संस्कृति का विशिष्ट हिस्सा बना हुआ है। अमावस्या के दिन पशु-पालक दूध नहीं बेचते ताकि उस दिन का दूध गाय के बछड़ों एवं घर के बच्चों के लिये उपलब्ध रहे। श्राद्ध पक्ष में कौओं को चुग्गा एवं भोजन अर्पित किया जाता है। संकट निवारण करने तथा विभिन्न ग्रहों के कोप को शांति करने के लिये भी ये उपाय किये जाते हैं। बुध की दशा को अनुकूल बनाने के लिये पशुओं को हरा चारा एवं मोरों को मूंग डाली जाती है।

    सरस्वती को प्रसन्न करने एवं बृहस्पति की दशा सुधारने के लिये पीले कपड़े एवं हल्दी की गांठ धारण की जाती है। किसी भी प्रकार के संकट को दूर करने के लिये गायों को मीठे चावल, गुड़ एवं चुपड़ी रोटी दी जाती है। शीतला सप्तमी को कुत्तों को रोटी खिलाई जाती है। भैंरूजी एवं शनि की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये काले कुत्तों को तेल में तले हुए पुए एवं पकौड़े खिलाये जाते हैं। प्रकृति पूजन, जीव रक्षा एवं पर्यावरण की रक्षा के उच्च आदर्शों एवं महान परम्पराओं के कारण ही राजस्थान को देव-भूमि माना जाता है। कन्हैयालाल सेठिया ने लिखा है-


    आ तो सुरगां ने सरमावै,

    ईं पर देव रमण ने आवै,

    ईं रो जस नर नारी गावै,

    धरती धोरां री।



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  • अजमेर का इतिहास - 90

     02.06.2020
     अजमेर का इतिहास - 90

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (2) 


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    चंद्रगुप्त वार्ष्णेय


    चंद्रगुप्त वार्ष्णेय का जन्म 21 जुलाई 1904 को हुआ। बाबा नृसिंहदास की प्रेरणा से वे राजनीति में आये तथा यूथ लीग की स्थापना की। वे राजपूताना, मध्य भारत व प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय मंत्री रहे। नवम्बर 1930 में वे जेल गये। ई.1939 में अजमेर नगर पालिका का चुनाव जीते। ई.1940-41 में वे सेवाग्राम के सह सम्पादक रहे। ई.1942 में वे पुनः जेल गये। ई.1951 में वे देश के प्रथम दैनिक राष्ट्रदूत के सम्पादक बने। उन्होंने राजस्थान विकास का भी सम्पादन किया। ई.1952 में वे अजमेर राज्य के जनसम्पर्क विभाग के संचालक बने। ई.1956 में वे राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में उपनिदेशक बनाये गये। ई.1959 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजस्थान पत्रिका से जुड़े रहकर उन्होंने सुभाषित प्रदीप तथा शब्द निरुक्ति जैसे गंभीर स्तम्भ लेख लिखे। उन्होंने चाणक्य सूत्र प्रदीप आदि कई उत्कृष्ट रचनाओं का प्रणयन किया।

    जियालाल आर्य (पं.)

    पण्डित जियालाल आर्य का जन्म ई.1889 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ। ई.1908 में वे अजमेर आये। ई.1915 में वे आर्यसमाज से जुड़े। ई.1917 में अजमेर में फैले प्लेग में उन्होंने लोगों की बहुत सेवा की। ई.1926 में वे आर्यसमाज अजमेर के मंत्री बनाये गये। ई.1930 में उन्होंने अंग्रेजी वेषभूषा त्यागकर खादी के वस्त्र पहनने आरंभ कर दिये। दयानंद महाविद्यालय अजमेर की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा। ई.1952 से 1955 तक वे आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान के प्रधान रहे। 19 दिसम्बर 1961 को उनका निधन हुआ।

    जीतमल लूणिया

    जीतमल लूणिया का जन्म 15 नवम्बर 1905 को अजमेर में हुआ। आपने एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की। ई.1914 में उन्होंने इंदौर में हरिभाऊ उपाध्याय के साथ मिलकर मालवा मयूर नामक पत्रिका निकाली। ई.1916 में हिन्दी साहित्य मंदिर की स्थापना की। ई.1925 में उन्होंने अजमेर से सस्ता साहित्य मण्डल का प्रकाशन कार्य आरम्भ किया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया तथा कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गये।

    सरकार ने कांग्रेस कमेटी को असंवैधानिक घोषित करके जीतमल लूणिया को एक साल तक जेल में रखा। अपनी पत्नी सरदार बाई के साथ उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और छः माह का कारावास भोगा। ई.1933 में लूणिया ने अजमेर सेवा भवन की स्थापना की तथा अछूतोद्धार एवं राष्ट्रोत्थान के काम में लग गये। ई.1942 में वे एक बार फिर जेल गये। ई.1947 में वे शहर कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। 15 अगस्त 1947 को उन्होंने मैगजीन पर तिरंगा फहराकर अजमेर की स्वतंत्रता की घोषणा की। ई.1948 में वे अजमेर नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गये। ई.1973 में उन्होंने शराबबंदी सत्याग्रह में भाग लिया तथा जेल गये।

    ज्वाला प्रसाद शर्मा

    ज्वाला प्रसाद शर्मा ई.1930 में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपना अड्डा अजमेर में जमाया। आपने हटूण्डी में बाबा नृसिंहदास को बंदूक चलाना सिखाया। ज्वाला प्रसाद तथा उनके साथियों ने अजमेर के कमिश्नर की हत्या का कार्यक्रम बनाया। रामचंद्र बापट को यह कार्य सौंपा गया किंतु वह सफल नहीं हो सका तथा पकड़ा गया। क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन के लिये धन प्राप्त करने हेतु ज्वाला प्रसाद तथा उनके साथियों ने राजकीय कॉलेज के कर्मचारियों के लिये बैंक से लाये जा रहे धन को लूटने का प्रयास किया किंतु वे भी असफल रहे।

    सन् 1934 में वायसराय की अजमेर में हत्या करने की योजना बनी किंतु वह भी असफल रही। पुलिस अधिकारी डोगरा की हत्या का भी प्रयास किया गया किंतु वह भी सफल नहीं हो सका। इन सब कारणों से ज्वाला प्रसाद को बंदी बना लिया गया। ई.1938 के अंतिम दिनों में वे जेल से मुक्त हुए। भारत छोड़ों आंदोलन में भी वे जेल में थे। वहां से वे भाग निकले तथा अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। वे विधानसभा एवं लोकसभा के सदस्य तथा राजस्थान रोडवेज के अध्यक्ष रहे। 20 मई 1974 को दूदू के निकट सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

    डिक्सन (कर्नल)

    कर्नल डिक्सन स्कॉटलैण्ड का रहने वाला था। ई.1812 में वह बंगाल आर्टीलरी में अधिकारी के पद नियुक्त हुआ। उसने मेरवाड़ा पर अधिकार लेने के लिये किये गये अभियान में भाग लिया था। उसे अजमेर मैगजीन में आयुधागार के डिप्टी कमिश्नर के पद पर नियुक्त किया गया। वह इस पद पर ई.1836 तक कार्य करता रहा। यहाँ से उसे मेरवाड़ा का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनाया गया। ई.1842 में वह अजमेर तथा मेरवाड़ा दोनों जिलों का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनाया गया। ई.1857 तक वह इन दोनों जिलों का प्रशासन करता रहा। उसने भारत में 45 वर्ष सेवा की तथा सेवा के दौरान ही 25 जून 1857 को ब्यावर में उसकी मृत्यु हुई। ब्यावर के कब्रिस्तान में उसे दफनाया गया। वह गर्मी और बरसात में भी ब्यावर में रहता था। दूसरे अधिकारियों की तहर माउण्ट आबू पर जाकर नहीं रहता था।

    मेरवाड़ा के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर कार्य करते हुए कर्नल डिक्सन मेरवाड़ा के लिये भी वरदान साबित हुआ था। उसने मेरवाड़ा क्षेत्र में अनेक कुएं खुदवाये जिससे वहॉं खेती संभव हो सकी और वह लाभकारी भी सिद्ध हुई। उसकी बहुमूल्य सेवाओं का आज अनुमान लगाना संभव नहीं है। लोगों को उद्योग, कृषि और व्यापार की गतिविधियों में रोजगार प्राप्त हो सके इसके लिये उसने नया नगर के नाम से एक विशाल परकोटे युक्त नगर की स्थापना की और महाजनों को लाकर वहॉं बसाया।

    आज वह नगर ब्यावर के नाम से जाना जाता है जो बाद में मेरवाड़ा जिले का प्रशासनिक केन्द्र भी बना। वहाँ बहुत सारे उद्योग धन्धे, व्यापार और बाजार विकसित हो गये। डिक्सन एक मात्र अंग्रेज था जिसने परकोटे युक्त किसी नगर की स्थापना की तथा ब्यावर भारत का वह अन्तिम नगर था जिसकी सुरक्षा के लिये परकोटा खिचंवाया गया।

    जिस दिन से डिक्सन ने अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट पद का कार्यभार ग्रहण किया उस दिन से अजमेर में एक नया युग आरंभ हुआ। उसके समय में पुराने तालाबों की मरम्मत की गई तथा नये तालाब बनाये गये। इन कार्यो पर उसने 4,52,707 रुपये व्यय किये। अजमेर का कमिश्नर सदरलैण्ड तथा अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट कर्नल डिक्सन, दोनों यह चाहते थे कि किसानों का लगान घटाकर एक तिहाई कर दिया जाये किंतु सरकार ने लगान घटाने से मना कर दिया। फिर भी इसे एक बटा दो से घटाकर दो बटा पांच कर दिया गया। ई.1842 में जब उसने तालाबों का निर्माण आरंभ किया तब उसने एक बड़ी जागीर के प्रबंधक की तरह कार्य किया। उसने तालाबों के किनारों पर झौंपड़ियों की स्थापना की।

    जो लोग कुंआ खोदना चाहते थे, उन लोगों को उसने जमीनें बहुत ही कम दरों पर किराये पर दीं। उसने नये तालाबों के आस पास की बंजर जमीनें उन लोगों को वितरित कर दीं जो वहाँ बनाई गई झौंपड़ियों में रहकर खेती करना चाहते थे। कर्नल डिक्सन की पत्नी भारतीय थी जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ था। जब यह पुत्र 6 साल का था तो पढ़ने के लिये लंदन भेजा गया। वह वहीं रहा और वहीं उसकी मृत्यु हुई। डिक्सन के पुत्र के चार पुत्र हुए। ई.1875 तक डिक्सन की पत्नी ब्यावर में रही तथा डिक्सन द्वारा छोड़ी गई सम्पत्ति से पेंशन प्राप्त करती रही।

    कर्नल डिक्सन की छतरी ब्यावर के मुख्य बाजार में बनाई गई। मेर लोग इस छतरी में डिक्सन की पूजा करते थे और उसे डिक्सन बाबा कहते थे। आजादी के बाद इस स्मारक की दुर्दशा हुई। आज से लगभग 20 साल पहले, मेरी बहिन के श्वसुर श्री प्रकाशचंद सिंघल ने मुझे इस छतरी के टूटे हुए टुकड़े अजमेर की नगर पालिका के परिसर में पड़े हुए दिखाये थे। उन्होंने मुझे डिक्सन की मेम का मकबरा भी दिखाया था जो सारी रौनक खोकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा था। सच यही है कि हम भारतीयों ने अंग्रेजों की सारी बुराइयाँ तो अपना लीं किंतु अच्छाई नहीं। अच्छे अंग्रेजों को याद भी नहीं रखा।

    दामोदर दास राठी (सेठ)

    सेठ दामोदर दास राठी का जन्म 8 फरवरी 1884 को मारवाड़ राज्य के पोकरण गाँव में हुआ था। इनके पिता खींवराजजी राठी व्यापार करने के लिये पोकरण से ब्यावर आ गये तथा 1889 में उन्होंने ब्यावर में श्रीकृष्णा मिल की स्थापना की। अतः बालक दामोदर की शिक्षा ब्यावर के मिशन स्कूल में हुई। वे मेधावी छात्र थे। जिस समय पिता खींवराज का निधन हुआ, उस समय दामोदर दास मात्र 16 वर्ष के थे।

    शीघ्र ही वे आर्यसमाज से जुड़ गये। वैचारिक उग्रता के कारण वे कांग्रेस के गरम दल के समर्थ बन गये और उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा को श्रीकृष्णा मिल का मैनेजर नियुक्त किया। उन्हीं दिनों राठीजी का सम्पर्क बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय आदि महान नेताओं से हुआ। राव गोपालसिंह खरवा से भी राठीजी की अच्छी मित्रता हो गयी। जब 21 फरवरी 1915 को राजस्थान में सशस्त्र क्रांतिकी योजना क्रियान्वयन की तिथि घोषित की गयी। तब श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरे हुए थे।

    तब राठीजी ने तीन हजार सशस्त्र क्रांतिकारी तैयार करने के लिये आर्थिक सहयोग प्रदान किया। दुर्भाग्य से क्रांतिकी योजना विफल हो गयी और हथियार टॉडगढ़ की पहाड़ियों में छुपा दिये गये। बाद में यह भारी असला अंग्रेज सरकार के हाथ लग गया जिससे राठीजी को गहरा सदमा लगा। वे ब्यावर छोड़कर हरिद्वार चले गये। कुछ दिन बाद जब लौट कर ब्यावर आये तो वे पूरी तरह ऊर्जावान थे।

    ई.1916 में ब्यावर में होमरूल लीग की स्थापना की गयी। उसी वर्ष एकता सम्मेलन भी हुआ जिसमें राठीजी ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया। ई.1917 में योजना बनायी गयी कि हिन्द गोवा का एक हिस्सा पुर्तगालियों से खरीद लिया जाये और उस पर देश की स्वतंत्रत सरकार की घोषणा कर दी जाये। योजना के अनुसार रूस इस स्वतंत्र सरकार को तुरंत मान्यता प्रदान कर देगा जिससे ब्रिटेन पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। इससे पहले कि यह योजना अमल में आती, 2 जनवरी 1918 को इस क्रांतिकारी एवं महादानी पुण्यात्मा का निधन हो गया।

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  • साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

     02.06.2020
    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद

    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    साहित्य का सामर्थ्य एवं राष्ट्रवाद दो भिन्न बातें हैं किंतु एक बिंदु है जहाँ दोनों आकर मिलते हैं, इस बिंदु पर इनका सम्मिलन औपचारिकता मात्र नहीं रहता अपितु एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित होकर एक-दूसरे का पूरक हो जाता है। यदि साहित्य संस्कृति और समाज को संस्कारित करता है तो साहित्य राष्ट्रवाद के लिए खाद-पानी भी प्रदान करता है।

    ‘‘दिपै वारां देस जारां साहित जगमगै’’ जैसी उक्ति इस बात को पुष्ट करती है कि साहित्य और राष्ट्र में कितना गहरा सम्बन्ध है। आप समाज को खराब साहित्य दीजिए और एक खराब राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए। आप समाज को अच्छा साहित्य दीजिए और अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर लीजिए।

    इस बात को थोड़ा विस्तार देना आवश्यक है।

    किसी भी राष्ट्र के तीन शरीर होते हैं- भौगोलिक शरीर, राजनीतिक शरीर एवं सांस्कृतिक शरीर। ये तीनों ही शरीर एक दूसरे में समाए हुए होते हैं। इनमें से एक के क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट होने पर दूसरा एवं तीसरा शरीर स्वतः क्षीण, नष्ट अथवा पुष्ट हो जाता है।

    राष्ट्र का निर्माण कौन करता है ?

    आप कहेंगे- प्रकृति। प्रकृति राष्ट्र के केवल भौगोलिक शरीर का निर्माण करती है। नदियां, पहाड़, समुद्र और झीलों ने विश्व के बहुत से देशों की सीमाएं बनाई हैं किंतु ये सीमाएं शाश्वत नहीं हैं। कल हिन्दूकुश पर्वत भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा का निर्माण करता था किंतु आज रैडक्लिफ रेखा भारत और पाकिस्तान की सीमा का निर्माण करती है। 

    तो क्या राष्ट्र का निर्माण राजा या सेना करते हैं ?

    निश्चित रूप से करते हैं किंतु वे केवल राष्ट्र के राजनीतिक शरीर का निर्माण करते हैं। राजा या सेना के हारते ही राष्ट्र की भौगोलिक सीमाएं बदल जाती हैं तथा राजनीतिक व्यवस्थाएं भी ध्वस्त हो जाती हैं।

    तो फिर अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत राष्ट्र का निर्माण कौन करता है?

    निःसंदेह किसी भी राष्ट्र के अखण्ड, अक्षय एवं शाश्वत शरीर का निर्माण, उस देश की संस्कृति करती है। आइए इसे इस बात को समझने की चेष्टा करते हैं- मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर दिखाई देता है, सूक्ष्म शरीर अनुभव होता है किंतु कारण शरीर को तो अनुभव नहीं किया जा सकता केवल उसका चिंतन किया जा सकता है। आंखों से जो कपड़ा दिखाई देता है, वह केवल बाह्य स्वरूप है, कपड़ा तो वास्तव में धागे से बनता है। धागा भी केवल एक बीच की अवस्था या व्यवस्था है, वास्तविक इकाई तो वह रुई है जिससे धागा बाना है और जिससे अंत में कपड़ा बना है।

    ठीक इसी प्रकार राष्ट्र का बाह्य स्वरूप उसकी भौगोलिक देह है जिसे हम राष्ट्र कहते हैं- कश्मीर के कन्याकमारी तक की भौगोलिक देह। इस भौगोलिक देह को एक सूत्र अथवा एक व्यवस्था के अंतर्गत नियंत्रित करने वाली, उसे बांध कर रखने वाली देह हमारी राजनीतिक व्यवस्था है किंतु राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्र नहीं है, यह राष्ट्र की स्थूल देह को निर्मित करने का माध्यम भर है। वास्तव में देश की संस्कृति ही उसकी राजनीतिक व्यवस्था का भी निर्माण करती है।

    कहने का अर्थ ये कि राष्ट्र को निर्मित करने वाला बारीक तत्व संस्कृति है। देश की भौगोलिक सीमाएं बदल जाएं, राजनीतिक व्यवस्थाएं बदल जाएं किंतु नागरिक अपनी संस्कृति को पकड़े रहें तो वह राष्ट्र अक्षुण्ण रहता है। यदि भौगोलिक सीमाएं और राजनीतिक व्यवस्थाएं न बदलें और राष्ट्र की संस्कृति को बदल दिया जाए तो राष्ट्र मर जाता है।

    अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं।

    संस्कृति का निर्माण कौन करता है ?

    निःसंदेह मनुष्य करता है।

    संस्कृति का परिष्कार कौन करता है ?

    निःसंदेह साहित्य 
    करता है। 

    राष्ट्र का विचार या मंत्र कौन देता है ?

    निःसंदेह साहित्य करता है।

    यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्ववेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो राष्ट्र के मूल आधार अर्थात् ‘समाज’ के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। समाज ही सभ्यता का विकास करता है, समाज ही संस्कृति को रचता है और समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। समाज, सभ्यता एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने की भावना ही राष्ट्रीय चेतना के रूप में प्रतिफलित होती है।

    यह भावना आती कहां से है ?

    यह भावना आती है साहित्य से। समाज अपनी भूमि से जुड़ा हुआ रहता है। यही कारण है कि राष्ट्र, एक राजा द्वारा शासित एक गांव के संकुचित अर्थ से लेकर भारत, चीन और अमरीका जैसे विराट देशों के लिए प्रयुक्त होता है।

    अथर्ववेद का सूक्तकार ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’ कहकर राष्ट्रवाद का सूत्रपात करता है। यहां देखिए कि अथर्ववेद का सूक्तकार राष्ट्रवाद का बीज वपन कर रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना इसी पृथ्वी-सूक्त से आई है।

    राष्ट्र को कौन जगाता है 
    ?

    यजुर्वेद कहता है- वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः । यजुर्वेद राष्ट्र संरक्षण का दायित्व ब्राह्मणों पर ही डालता है। ये ब्राह्मण कौन हैं! ये ब्राह्मण और कोई नहीं, वेदों के मंत्र देने वाले, रामायण, महाभारत और गीता जैसे लोकोपकारी साहित्य रचने वाले, समाज को मार्ग दिखाने वाले हमारे और आपके जैसे साहित्यकार ही ब्राह्मण हैं। राष्ट्र को जागृत और जीवंत बनाने का भार इन्हीं साहित्यकार रूपी ब्राह्मणों पर है। आप किसी देश के साहित्य को बदल दीजिए, थोड़े ही समय में देश बदल जाएगा।

    साहित्य का सामर्थ्य कहां तक विस्तारित है 


    साहित्य के सामर्थ्य को समझने के लिए हमें मनुष्य जाति के विकास की कहानी पर थोड़ी दृष्टि डालनी चाहिए।

    क्या आप को मालूम है, धरती पर आदमी का पहला संस्करण कब आया ?

    देवताओं ने इस धरती को लगभग 18 लाख साल पहले, मानव का पहला संस्करण प्रदान किया। इसे होमो हैबिलिस कहते थे, वह बंदर से मिलता-जुलता था किंतु यह मानव पत्थर के औजार बनाकर उनसे शिकार करता था। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य उन्नति करेगा तथा एक संस्कृति का विकास करेगा किंतु 8 लाख साल तक भी वह अपनी उस अवस्था से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा।

    इसलिए देवताओं ने आज से 10 लाख साल पहले आदमी का दूसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो इरैक्टस कहते थे। यह दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलता था। उसकी शेष चेष्टाएं पशुओं जैसी थीं। देवताओं को विश्वास था कि यह मनुष्य अवश्य उन्नति करेगा किंतु 5 लाख साल बीत जाने पर भी इस मनुष्य ने अपनी आदतों में कोई परिवर्तन नहीं किया।

    इसलिए देवताओं ने आज से 5 लाख साल पहले आदमी का तीसरा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सेपियन कहते थे। इसका मस्तिष्क, धरती पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों से बहुत तेज बनाया गया। यह शब्दों का निर्माण करके उन्हें बोल भी सकता था। अर्थात् भाषा का निर्माण कर सकता था। देवताओं को इस मानव से बहुत आशाएं थीं कि शायद तेज दिमाग वाला और बोलकर अपनी बात कह सकने वाला यह मानव, अपनी सभ्यता और संस्कृति का विकास करेगा किंतु चार लाख साल बीतने पर भी यह मनुष्य अपनी अवस्था से आगे नहीं बढ़ सका।

    देवताओं ने आज से सवा लाख साल पहले मनुष्य का चौथा संस्करण तैयार किया जिसे होमो सैपियन-सैपियन कहते थे। जब इस आदमी ने भी सभ्यता और संस्कृति का विकास नहीं किया तो आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले आदमी का अब तक का अंतिम प्रारूप आया। इसे क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। जो कि आप और हम हैं।

    इस संस्करण के मनुष्य अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे। वे कपड़ों को सिलकर पहनते थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनके चूल्हे भोजन पकाने में अधिक उपयोगी थे। मनुष्य का यह संस्करण बहुत उन्नत था। देवताओं को इस संस्करण से बहुत आशाएं थीं किंतु देवताओं को इस मनुष्य ने भी पहले के सभी मनुष्यों की तरह निराश किया और यह मनुष्य भी धरती के दूसरे पशुओं की तरह जीवन जीता रहा।

    देवताओं ने विचार किया कि क्या किया जाना चाहिए! उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने आज से लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले मनुष्य को तीन पुस्तकें प्रदान कीं जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद कहा जाता था। देवताओं ने ये पुस्तकें मनुष्यों को बोलकर सुनाईं तथा मनुष्य से कहा कि वह इन पुस्तकों को याद कर ले। मनुष्य ने वैसा ही किया। इस बार वह चमत्कार हो गया जिसकी प्रतीक्षा देवतागण पिछले 18 लाख साल से कर रहे थे।

    मनुष्य ने अपने मस्तिष्क, विचार और भाषा के साथ-साथ मन और इच्छा का विस्तार करना आरम्भ किया। उसने देवताओं को अथर्ववेद बनाकर सुनाया जिसमें मनुष्य ने देवताओं से प्रार्थना की कि आप हमें अच्छे घोड़े, अच्छे हल, अच्छी गाएं, अच्छे बीज, अच्छे मंत्र, अच्छी औषधियां दीजिए। हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए।

    कहने का अर्थ यह कि देवगण 18 लाख सालों तक मनुष्य के संस्करण परिष्कृत करते रहे किंतु वे बुद्धि से परिपूर्ण मनुष्य का निर्माण नहीं कर पाए किंतु जैसे ही उन्होंने मनुष्य को वेदों का ज्ञान दिया अर्थात् साहित्य प्रदान किया तो चमत्कार को घटित होने में समय नहीं लगा। आज आप धरती पर जो भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति देख रहे हैं, यह मनुष्य ने पिछले लगभग साढ़े तीन हजार वर्षों में अर्जित की है।

    अब साहित्य के सामर्थ्य पर दो उदाहरण आज के उन्नत युग से देखते हैं।

    एक जर्मन लेखक हुआ है कार्लमार्क्स। हम सबने उसका नाम सुना है। ई.1867 में उसकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘दास कैपिटल’। यह पुस्तक यह कहती थी कि दुनिया में तो तरह के लोग हैं। पहले वे जो ताकतवर हैं और दुनिया का शोषण करते हैं, दूसरे वे जो कमजोर हैं और शोषित होते हैं। यदि शोषित लोग संगठित हो जाएं तो वे शोषण से मुक्ति पा सकते हैं। इस पुस्तक ने विश्व भर के राष्ट्रों में बेचैनी उत्पन्न की। बहुत से देशों में मजदूरों, किसानों और वंचतों ने संगठित होकर शासन व्यवस्था के विरुद्ध क्रांतियां कीं तथा लगभग आधी दुनिया से सत्ता के तख्ते पलट गए। 1917 में रूस तथा 1947 में चीन भी कम्युनिस्टों के हत्थे चढ़ गए।

    यहां के लोगों ने अपने पुराने शासकों को मार डाला और कम्यूनिस्ट सरकारें बना लीं। लोगों ने क्रांतियां तो कर दीं किंतु उनका परिणाम यह हुआ कि नए विचारों वाले शासक, पुराने शासकों से भी अधिक शोषण करने वाले सिद्ध हुए। मानवता इस भयानक शोषण से सिसक उठी।

    ई.1903 के आसपास भारत के बिहार प्रांत में एक अंग्रेज अधिकारी काम करता था। उसका एक पुत्र था- जॉर्ज ऑरवेल जो अंग्रेजी भाषा में उपन्यास लिखा करता था। उसने एनिमल फार्म नामक एक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास 1945 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में 1917 की रूसी क्रांति पर एक करारा व्यंग्य किया गया।

    इस उपन्यास में रूपक खड़ा किया गया कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक दो सूअर, मेजर नामक एक महान सूअर के विचारों से प्रेरित होकर अपने फार्म के मालिक मिस्टर जोंस के विरुद्ध क्रांति करके उसे फार्म से खदेड़कर भगा देते हैं। इस उपन्यास के क्रांतिकारी सूअर वास्तव में रूसी क्रांति के नाक स्टालिन और ट्रोटस्की के प्रतीक थे। उपन्यासकार लिखता है किस प्रकार नेपोलियन और स्नोबॉल नामक चालाक और धूर्त सूअरों ने खेत की सत्ता हथिया ली और फार्म पर रहने वाले पशु-पक्षियों का जमकर शोषण किया। यह शोषण उनके पुराने मालिक अर्थात् आदमी द्वारा किए जाने वाले शोषण से अधिक भयानक था। वे गायों का दूध पी जाते हैं, मुर्गियों और बत्तखों के अण्डे खा जाते हैं। खेत में काम नहीं करते तथा घोड़ों को पहले की अपेक्षा अधिक घण्टों तक काम करने के लिए मजबूर करते हैं।

    जब यह उपन्यास इंग्लैण्ड से बाहर निकलकर दुनिया के अन्य देशों की जनता के हाथों में पहुंचा तो जनता ने पाया कि कम्युनिस्ट शासकों ने हमारा भी वैसा ही हाल किया है जैसा कि नेपोलियन और स्नोबॉल नामक सूअर, एनीमल फार्म के जानवरों का कर रहे थे।

    इस पुस्तक को पढ़कर दुनिया के बहुत से कम्यूनिस्ट देशों के नागरिकों के सिर से कम्यूनिज्म का भूत उतर गया। इन देशों में फिर से क्रांतियां हुईं और कम्यूनिस्ट सरकारों को उखाड़ फैंका गया। यहां तक कि स्वयं रूस ही बिखर गया। पूरी दुनिया से कम्यूनिज्म की शवयात्रा निकल गई। केवल चीन और इक्का-दुक्का कोई छोटा सा देश बचा है जहां कम्यूनिस्ट सरकारें हैं और वे आज भी अपने नागरिकों को गुलाम जैसी स्थति में रखती हैं।

    हमने राष्ट्र पर बात की, संस्कृति पर बात की, साहित्य की बात की अब थोड़ा विचार राष्ट्रवाद पर करते हैं।

    भारतीय ऋषि प्रार्थना करता है- विश्वानि देव सवितरदुरितानि परा सुवः, यद्भद्रम तन्नासुवः। अर्थात् वह विश्व भर के देवताओं से प्रार्थना कर रहा है कि मेरे भीतर जो भी बुराई है उसे दूर कीजिए और जो कुछ भी अच्छा है, वह मेरे पास लाइए।

    तो क्या यह ऐसी बात हुई कि हम प्रार्थना तो करेंगे विश्व भर में कहीं भी निवास करने वाले देवताओं की और गीत गाएंगे अपने राष्ट्र के। इस वैदिक मंत्र के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र निश्चित रूप से एक संकुचित विचार है।

    एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र से अलग है, प्रत्येक राष्ट्र के नागरिकों कोे अपने राष्ट्र पर गर्व है। गर्व की यह भावना मनुष्य की सोच को विस्तार नहीं देती, संकुचित करती है। यहां तक कि एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके वहां की जनता को आक्रांत करे। राष्ट्रवाद के नाम पर यूरोप में सैंकड़ों वर्षों तक यही हुआ।

    आचार्य चतुरसेन ने राष्ट्रवाद के बारे में लिखा है कि राष्ट्रवाद का दैत्य यूरोप में पैदा हुआ। तो क्या राष्ट्रवाद की भावना एक नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक बात है
    ? 

    प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध इस बात के गवाह हैं कि उपनिवेशवादी शक्तियों ने जनता में राष्ट्रवाद की भावनाएं भड़का कर धरती पर निवास करने वाले करोड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। प्रथम विश्वयुद्ध में लगभग 2 करोड़ लोग मरे और 2 करोड़ से अधिक लोग घायल हुए। द्वितीय विश्व युद्ध में 5 से 8 करोड़ लोग मरे। 50 लाख मनुष्य तो युद्धबंदियों के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुए। घायलों की संख्या अलग है।

    यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि राष्ट्रवाद की भावना, मानव जाति के लिए इतनी भयानक चीज है तो फिर राष्ट्रवाद क्यों ?

    वस्तुतः इस प्रश्न का जवाब कहीं से आ सकता है तो केवल साहित्य की दुनिया से। संस्कृत के एक कवि ने लंका को जीतने वाले राजा रामचंद्र के मुख से यह कहलवाया है- ‘स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ इस श्लोक के माध्यम से साहित्यकार राष्ट्रवाद की भावना को मर्यादा में बांधता है। जैसे ही मनुष्य में इस भावना का उदय होता है, राष्ट्रवाद की भयावहता समाप्त हो जाती है और राष्ट्रवाद की अच्छाई के दर्शन होने लगते हैं।

    जब हम वन्दे मातरम् कहते हैं तो उसका आशय भारत माता से तो होता ही है, वस्तुतः समस्त धरित्री से भी होता है। धरती हम सब की मां है, उसे देशों में हमने बांटा है, परमात्मा ने तो उसे एक इकाई के रूप में बनाया है। धरती के विभिन्न देशों में इसलिए बंटी क्योंकि विभिन्न स्थानों के मनुष्यों द्वारा सर्वे भवंतु सुखिनः जैसे साहित्य को त्यागकर, विकृत साहित्यों का निर्माण किया, जिससे पहले तो लोगों के मन अलग हुए और बाद में देश। बहुत प्राचीन काल में जब धरती पर केवल वैदिक धर्म ही व्याप्त था, दूसरी संस्कृतियां अस्तित्व में नहीं आई थीं, तब पूरी धरती एक देश ही थी।

    साहित्य का काम संस्कृतियों के इस वैमनस्य को दूर करने का है। यही साहित्य का वास्तविक सामर्थ्य है। जब कबीरदास यह कहते हैं कि- साईं इतना दीजियो जामै कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय। तो वे वस्तुतः संतोषी, सुखी और शांत राष्ट्र का निर्माण कर रहे होते हैं। यह साहित्य का ही सामृथ्य है कि वह मनुष्य को केवल इस बात के लिए तैयार करे कि वह परमात्मा से अपने परिवार और अतिथि का पेट भर जाने योग्य अन्न मांगने में ही संतोष का अनुभव करता है।

    मानव जब किन्हीं अन्य भूमियों पर विकसित राजनीतिक शक्तियों के अधीन हो जाता है तो वह अपनी जन्मभूमि से अपने सम्बन्ध का स्मरण करता है। इसी बिंदु पर राष्ट्रवाद का साहित्य जन्म लेता है। संसार की प्रत्येक भाषा के काव्य में, हर युग में राष्ट्रीय भावना का समावेश होता है। किसी भी देश के राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है।

    अच्छे साहित्य से रची गई राष्ट्रीय-भावना ही राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। राष्ट्रीय भावना का सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी होता है। वह न केवल अपने देश को स्वतंत्र देखना चाहता है अपितु समस्त मानवता को स्वाधीन एवं सुखी देखने की कामना रखता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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