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  • अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)

     01.07.2018
    अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)

    अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)


    केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर को अल्बर्ट म्यूजियम भी कहा जाता है। संग्रहालय भवन का शिलान्यास ब्रिटिश राजकुमार प्रिन्स ऑफ वेल्स प्रिंस अल्बर्ट द्वारा जयपुर नरेश रामसिंह (द्वितीय) के शासनकाल में 6 फरवरी 1876 को किया गया। उसी के नाम से इस संग्रहालय का नाम एल्बर्ट म्यूजियम रखा गया।

    इस संग्रहालय का कला संग्रह ई.1881 में अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित वर्तमान स्कूल ऑफ आटर््स के भवन में रखा गया। संग्रहालय हेतु पुरा एवं कला सामग्री का संकलन जयपुर राज्य के अंग्रेज चिकित्सा अधिकारी कर्नल हैण्डले की देख-रेख में आरम्भ हुआ जो कला विशेषज्ञ भी था। अल्बर्ट हॉल भवन का निर्माण अंग्रेज इन्जीनियर सर सैम्युअल स्विंटन जैकब की देखरेख में जयपुर के राजमिóियों चन्दर और तारा ने किया। स्थापत्य की दृष्टि से यह भवन महत्वपूर्ण है। इसमें हिन्दू, इस्लामी और ईसाई स्थापत्य शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है। भवन निर्माण में पांच लाख एक हजार छत्तीस रुपये व्यय हुए।

    महाराजा माधोसिंह (द्वितीय) (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में संग्रहालय, अल्बर्ट हॉल में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड ब्रेडफोर्ड ने इसका विधिवत उद्घाटन किया। अल्बर्ट म्यूजियम को शैक्षणिक संस्था का रूप दिया गया। इसमें इतिहास, भू-गर्भ 
    शास्त्र, अर्थ शास्त्र, विज्ञान और कला आदि विषयों पर आधारित सामग्री भारत, ब्रिटेन, ईरान, मिश्र, बर्मा, लंका, जापान, तिब्बत, नेपाल आदि देशों से एकत्रित की गई।

    कर्नल हैण्डले के पश्चात् कर्नल पैक, रॉबिन्सन पिशर आदि चिकित्सा अधिकारी इस संग्रहालय के अधिष्ठाता रहे किंतु वे संग्रहालय विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं रख्ते थे। कर्नल हैण्डले ने इस संग्रहालय में जिस सामग्री का संयोजन किया, वही संयोजन देश की आजादी तक चलता रहा। डॉक्टर दलजन सिंह प्रथम भारतीय अधिकारी थे जो 1920 के लगभग इस पद पर रहे। राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् ई.1950 में डॉ. सत्यप्रकाश श्रीवास्तव के नेतृत्व में राजस्थान राज्य के सभी संग्रहालयों को रखा गया। उसी समय अल्बर्ट म्यूजियम को राज्य स्तरीय केन्द्रीय संग्रहालय का रूप दिया गया।

    देशी राज्यों में संग्रहालयों की छवि अजायबघर वाली थी। स्वतंत्र भारत में उस छवि को मिटाकर इन्हें शैक्षणिक संस्थाओं का स्वरूप प्रदान किया गया तथा राज्य के संग्रहालयों को शिक्षा विभाग के अधीन किया गया। संग्रहालयों के पुनर्गठन, परिवर्तन और साज सज्जा सम्बन्धी महत्वपूर्ण कार्य किए गए तथा संगृहीत सामग्री का विधिवित वर्गीकरण किया गया।

    ई.1959 में राज्य के संग्रहालय विभाग के अधिकारी डा. सत्य प्रकाश जनसामान्य को संग्रहालयों की ओर आकृष्ट करने हेतु अमेरिका से नवीन दृष्टिकोण लेकर आए। उनके निर्देशन में संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जातियों एवं जनजातियों के मॉडल प्रदर्शित किए गए। इनमें राजपूत, मीणा, वणिक, भील, गाड़िया लुहार आदि जातियों के व्यक्तियों की रूपाकृति, वेशभूषा, आभूषण, उनके परिवेश आदि का प्रदर्शन किया गया तथा उन्हें आधुनिक प्रकार के ‘शोकेस’ में रखा गया। देश में पहली बार जयपुर संग्रहालय में सांस्कृतिक कक्ष का निर्माण किया गया जिसमें विभिन्न प्रकार के शासकीय और लोक वाद्यों का प्रदर्शन किया गया। साथ ही होली, गणगौर तथा विवाह आदि के अवसर पर किए जाने वाले नृत्य तथा कत्थक आदि शास्त्रीय नृत्य एवं घूमर तथा डांडिया आदि लोक नृत्यों के दृश्य एवं ‘मॉडल’ प्रदर्शित किए गए। दर्शकों को नृत्यों से सम्बन्धित गीत एवं संगीत सुनाने के लिए स्वचालित ध्वनियंत्र लगाए गए। यह प्रयोग अपने आप में अनूठा था तथा उस समय तक किसी अन्य संग्रहालय में उपलब्ध नहीं था।

    ‘मॉडलों’ के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटक राजस्थान की जनजातियों तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त करने लगे। संग्रहालय में राजस्थान की हस्तकलाओं, पत्थर की कुराई, सोने एवं मीना का काम, हाथी दांत की कुराई, सुनहरी बर्तन, ऊँट के चमड़े के बर्तनों पर सुनहरी काम, पीतल की चिताई, थलाई एवं कुराई का काम, प्राचीन प्रतिमाओं, आयुधों एवं प्राचीन चित्रों के क्रमिक विकास को भी प्रदर्शित किया गया। प्रकाश व्यवस्था और शो केसों के नवीनीकरण एवं लेबलिंग की नवीन पद्धतियां प्रयोग में लाई गईं।

    संग्रहालय में अस्थाई प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाने लगीं जिनसे देशी-विदेशी पर्यटकों को राजस्थान के कला-कौशल के बारे में जानने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, उप राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, इन्दिरा गांधी, अरब के राष्ट्रपति कर्नल नासिर, नेपाल नरेश, ईरान के शाह, बंगलादेश के सांस्कृतिक मंत्री तथा अनेक देशी-विदेशी अतिविशिष्ट व्यक्तियों ने अल्बर्ट संग्रहालय का भ्रमण किया और संग्रहालय के नवीन रूप की प्रशंसा की।

    संग्रहालय की नीचे की मंजिल में राजस्थान की सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत की गई तथा ऊपर की दीर्घा में दाईं तरफ देश के विभिन्न प्रान्तों का कला-कौशल प्रदर्शित किया गया। बीच के तीन बड़े हॉल में प्राचीन लघु चित्रों को प्रदर्शित किया गया जिनमें विभिन्न प्रकार की चित्र-शैलियों के चित्र उपलब्ध हैं। ऊपर की मंजिल में बाईं ओर की दीर्घा में भू-गर्भशाó, प्राणीशाó विज्ञान एवं शरीर विज्ञान सम्बन्धी मॉडल प्रदर्शित किए गए।

    वर्तमान में इस संग्रहालय में 24,930 कला एवं पुरा वस्तुएं प्रदर्शित हैं जिनमें से मिस्र की ममी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुओं में से है। अल्बर्ट हॉल में देश-विदेश के महंगे एवं कलात्मक गलीचों का प्रदर्शन किया गया है। इस विशाल हॉल में सोलहवीं शताब्दी ईस्वी का ईरान का एक बहुमूल्य गलीचा भी प्रदर्शित है जिसमें ईरान के शाह अब्बास के उद्यान का दृश्य बुना गया है। यह गलीचा 28 फुट गुणा 12 फुट आकार का है तथा इसमें एक इंच में 250 गाठें हैं। दुनिया में ऐसे कुल छः गलीचे हैं। यह गलीचा मिर्जा राजा जयसिंह को ईरान के शाह द्वारा ई.1640 में भेंट किया गया था जो विश्व की अप्रतिम बहुमूल्य कला वस्तुओं में से एक है।

    संग्रहालय में तिब्बत एवं नेपाल से प्राप्त ताम्र सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। राजस्थान के अनेक स्थलों से प्राप्त प्रतिमाएँ, इंग्लैण्ड के राजा-रानी के चित्र, जयपुर महाराजाओं के चित्र, मुगल पेंटिंग्स, कलात्मक हुक्का, ब्लू पॉटरी, सुराहियां, ढालें, विभिन्न प्रकार की हस्तकला सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, तीर-कमान-भाले, बग्घियां, कठपुतलियां, लोकवाद्य, धातु पात्र, मृदभाण्ड, रियासत कालीन पोषाकें, मॉडल्स एवं सिक्के आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय में प्रदर्शित ममी मिस्र के राजपरिवार के पुजारी परिवार की महिला तुतु की है। इसे 19वीं सदी के अंतिम दशक में मिस्र की राजधानी काहिरा से जयपुर लाया गया था। यह ममी मिस्र के प्राचीन नगर पैनोपोलिस में अखमीन से प्राप्त हुई थी। यह ई.पू.322 से ई.पू.200 के बीच की अवधि की है तथा टौलोमाइक युग की बताई जाती है। यह महिला ‘खेम’ नामक देव के उपासक पुरोहितों के परिवार की सदस्य थी। देह के ऊपरी आवरण पर प्राचीन मिस्र का पंखयुक्त पवित्र भृंग (गुबरैला) का प्रतीक अंकित है जो मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है। पवित्र भृंग के दोनों ओर प्रमुख देव का शीर्ष तथा सूर्य के गोले को पकड़े श्येन पक्षी (बाज) अंकित है। यह बाज होरस देवता का प्रतीक है। तुतु ने गर्दन से कमर तक चौड़े मोतियों से सज्जित परिधान कॉलर के रूप में पहन रखा है। तुतु की मृत देह की सुरक्षा के लिए पंखदार देवी का अंकन किया गया है।

    ममी के नीचे के तीन हिस्सों में से पहले में मृतदेह के दोनों ओर महिलाएं बनाई गई हैं। दूसरे हिस्से में पाताल लोक के निर्णायकों की तीन बैठी हुई छवियां हैं और तीसरे हिस्से में होरस देव के चार बेटे अंकित हैं जो चारों दिशाओं के रक्षक अर्थात् दिक्पाल हैं। इनके मुंह क्रमशः मानव, सियार, बंदर और बाज पक्षी के रूप में दर्शाए गए हैं। रक्षित मृतदेह के पार्श्व भाग में एक अभिलेख लिखा है जिसके अनुसार अनुबिस नेक्रोपोलिस के अधिष्ठाता देव हैं और ओसिरिस तुतु को पुनर्जन्म हेतु संरक्षण प्रदान करते हैं। अंतिम फलक में मृत आत्माओं के देवता ओसिरिस का शीर्ष अंकित है जिसके दोनों और दो विषधर नाग हैं। ओसिरिस स्थिरता और सुदृढ़ता का प्रतीक है और दोनों सांप आईसिस और नेफ्टीज नामक देवियों के प्रतीक हैं। यह फलक मृतदेह के संरक्षण एवं मृत्यु के बाद आत्माओं के पुनर्जीवन के लिए न्याय विधान का चित्रण करता है। ओसिरिस वाले फलक के नीचे का फलक पांवों के ऊपरी आवरण पर बना है। इस फलक में अनुबिस देवता मृतदेह को पकड़े हुए हैं तथा मृतदेह को औषधि के माध्यम से सुरक्षित रखने में सहायता करते हुए दिखाया गया है अनुबिस देवता की पहचान उसके सियार वाले मुंह से की जाती है यह श्मशान भूमि के देवता है जो मृतदेह का संरक्षण करता है और मृत आत्माओं को अपने पिता ओसिरिस के पास ले जाता है जो पाताल लोक का देवता है। इस लोक में मृत्यु के बाद जीवन के बारे में निर्णय होता है। मृत्यु शैय्या के नीचे पांच कुंडीय पात्र आंतों को एकत्रित करने के लिए अंकित है। यहीं चार प्रेतात्माओं की आकृतियां भी दिखाई गई हैं।


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  • अध्याय - 26 वैक्स म्यूजियम जयपुर

     01.07.2018
    अध्याय - 26 वैक्स म्यूजियम जयपुर

    अध्याय - 26 वैक्स म्यूजियम जयपुर


    राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा जयपुर के नाहरगढ़ में जयपुर वैक्स म्यूजियम की स्थापना की गई है। इस दुर्ग का निर्माण अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में जयपुर के कच्छवाहा राजाओं द्वारा किया गया था। इस संग्रहालय में इतिहास, कला, संस्कृति, सिनेमा, खेल, विज्ञान आदि क्षेत्रों के प्रसिद्ध व्यक्तियों के मोम एवं सिलिकॉन के पुतले रखे गए हैं।

    इस संग्रह के पुतलों का निर्माण प्रसिद्ध मोमशिल्पी सुशांत रे द्वारा किया गया है। संग्रहालय के रॉयल खण्ड में जयपुर एवं राजस्थान के अन्य रजवाड़ों के प्रसिद्ध राजाओं एवं रानियों के मोम के पुलते रखे गए हैं। ये पुतले इतने सजीव जान पड़ते हैं मानो अभी बोल पड़ेंगे। प्रत्येक पुतले के साथ उस व्यक्ति के युग का परिवेश जीवित करने का प्रयास किया गया है।

    इस संग्रहालय की सजावट अंतर्राष्ट्रीय मानदण्डों के अनुसार की गई है। इस संग्रहालय की संकल्पना वर्ष 2006 में पिंकसिटी फिल्म फैस्टीवल के दौरान अनूप श्रीवास्तव द्वारा की गई। उस समय फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के पुतले का अनावरण किया गया। इस प्रकार के पुतलों का संग्रह बनाने के लिए सुशांत रॉय आदि अन्य कलाकारोें को इस परियोजना से जोड़ा गया। शीघ्र ही इस संग्रह के लिए 32 पुतले बना लिए गए। संग्रहालय में एक रॉयल दरबार का निर्माण किया गया है।

    इसमें प्रसिद्ध महाराजाओं एवं महारानियों के मोम के पुतले प्रदर्शित किए गए हैं। महाराजाओं एवं महारानियों के पुतलों की स्थापना के लिए कक्ष बनाने हेतु नाहरगढ़ में स्थित शीश महल की दीवारों एवं स्तम्भों का जीर्णोद्धार किया गया तथा उनमें पुनः अच्छी गुणवत्ता के शीशे जड़े गए ताकि मध्यकालीन रियासती ठाठ का पुननिर्माण किया जा सके ताकि इसे देखकर दर्शक को उसी युग का आभास हो सके। इस कक्ष में एक ऐसा दर्पण रखा गया है जिसमें देखने पर ऐसा आभास होता है मानो राजसी वस्त्र धारण कर लिए हैं। इस दर्पण को इसी वैक्स म्यूजियम के कलाकारों ने तैयार किया है।

    एक अन्य कक्ष जिसमें पहले योद्धा विश्राम किया करते थे, उसे भी शीशमहल में परिवर्तित किया गया है। उसमें श्वेत, नीले, लाल, पीले, हरे कांच के 25 लाख टुकड़े लगाए गए हैं। इसे लगाने में 80 दक्ष कलाकारों ने 180 दिन तक काम किया। इस कक्ष में प्रवेश करते ही 23 कैरेट स्वर्ण मिश्रित जवाहरातों से बनी पट्टियों की रंगोली बनाई गई है। इस कक्ष में पेंटिंग्स, पालकी, झूमर, तथा अन्य कलाकृतियां रखी गई हैं।

    टीकड़ी कांच के टुकड़ों का प्रयोग करके सुंदर पुष्पाकृतियों का निर्माण किया गया है। संग्रहालय में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, जयपुर की महारानी गायत्री देवी, फिल्म अभिनेता गोविंदा, तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा, भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, भारत के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, नर्तक माइकल जैक्सन आदि विश्व प्रसिद्ध व्यक्तियों एवं स्पाईडरमैन जैसे फैंटेसी पात्रों के मोम के पुतले रखे गए हैं।


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  • संधि की शर्तों से बचने के लिए जोधपुर के राजा मानसिंह ने पागल होने का नाटक किया

     05.07.2017
    संधि की शर्तों से बचने के लिए जोधपुर के राजा मानसिंह ने पागल होने का नाटक किया

    क्षेत्रफल की दृष्टि से मारवाड़ रियासत राजपूताने की सबसे बड़ी रियासत थी तथा भारत वर्ष की देशी रियासतों में इसका तीसरा स्थान था। भारत भर में केवल हैदराबाद एवं जम्मू-कश्मीर ही इससे बड़ी रियासतें थीं। जब मारवाड़ में राठौड़ों की तीसवीं पीढ़ी के राजा विजयसिंह (1752-1793) की पासवान गुलाबराय का पुत्र तेजसिंह मर गया तो गुलाबराय ने राजकुमार मानसिंह जो कि विजयसिंह के पुत्र गुमानसिंह का पुत्र था, को अपने पास रख लिया। ई.1793 में विजयसिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसके पौत्र भीमसिंह, जो कि स्वर्गीय राजकुमार फतैसिंह का दत्तक पुत्र था, ने जोधपुर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

    राज्यासीन होते ही उसने अपने भाई-भतीजों को मरवाना आरंभ कर दिया। राजकुमार मानसिंह ने अपने प्राणों की रक्षा के लिये जालोर के दुर्ग में शरण ली। और स्वयं को मारवाड़ का शासक घोषित कर दिया। भीमसिंह की सेना ने 10 वर्ष तक जालोर दुर्ग को घेरे रखा किंतु मानसिंह पकड़ा नहीं जा सका। जब मानसिंह को जोधपुर की सेना से बचने का कोई उपाय न दिखा तो उसने 15 अक्टूबर 1803 को जालोर दुर्ग छोड़ने का विचार किया। जलन्धरनाथ पीठ के योगी आयस देवनाथ ने यह सुना तो उसने मानसिंह से केवल 4-5 दिन और जालोर का किला न छोड़ने का आग्रह किया और कहा कि यदि 21 अक्टूबर तक किला नहीं छोड़ोगे तो मारवाड़ का राज्य तुम्हें मिल जायेगा।

    आयसदेव नाथ की बात सही निकली, 20 अक्टूबर 1803 को जोधपुर नरेश भीमसिंह की मृत्यु हो गई। राजधानी जोधपुर से शिवचंद भण्डारी, ज्ञानमल मुहणोत तथा शंभुदान आदि ने इन्द्रसिंह को संदेश भिजवाया कि घेरा जारी रखा जाये तथा पोकरण ठाकुर सवाईसिंह के आदेश की प्रतीक्षा की जाये किंतु चतुर इन्द्रराज समझ चुका था कि भाग्य को संवारने का यही सबसे अधिक उचित समय है। यदि जोधपुर में प्रवास कर रहे राज्याधिकारी मारवाड़ के राजा का मनोनयन करेंगे तो राजा उनके प्रति समर्पित रहेगा। अतः बेहतर यही है कि मानसिंह को जोधपुर का राजा बना दिया जाये। उसने उसी समय मानसिंह को सब समाचार कह भिजवाये तथा तथा मानसिंह को आदर सहित जोधपुर लाकर मारवाड़ की गद्दी पर बैठा दिया। इसके बाद इन्द्रराज सिंघवी मारवाड़ राज्य का प्रमुख कर्ता धर्ता बन गया। आयस देवनाथ के प्रति श्रद्धानत होकर राजा मानसिंह ने उसे अपना गुरु बनाया और जोधपुर नगर से बहर मेड़ती दरवाजे से कुछ दूरी पर ईशान कोण में एक विशाल भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया जो अपने आकार और महत्ता के कारण महामन्दिर कहलाया।

    मन्दिर परिसर में दो सुन्दर महल भी बनाये गये जिनकी छत पर एक छतरी का निर्माण करवाया गया जहाँ खड़े होकर आयस देवनाथ राजा मानसिंह को प्रातः काल में दर्शन देते थे। राजा दुर्ग में स्थित महलों से ही गुरु के दर्शन करता और उसी के बाद अन्न-जल ग्रहण करता तथा प्रत्येक सोमवार को महामन्दिर में उपस्थित होकर गुरु को प्रणाम करता। महामन्दिर के पास ही मानसागर तालाब बनाया गया जिसमें राजा मानसिंह और आयस देवनाथ नौका विहार किया करते थे।

    राज्य को स्थायित्व देने के लिये महाराजा मानसिंह ने दिसम्बर 1803 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता किया किंतु वह अमल में नहीं लाया जा सका। जोधपुर राज्य में सामंतों का षड़यंत्र चलता रहता था। राजा मानसिंह के समय में भी कई सामंतों की हत्या हो गयी थी। 10 अक्टूबर 1815 को पिण्डारी अमीरखां ने जोधपुर के दुर्ग में घुसकर दिन दहाड़े महाराजा के गुरु आयस देवनाथ तथा राज्य के प्रधानमंत्री इंद्रराज सिंघवी को मार डाला।

    इस हत्याकाण्ड के समय महाराजा मोतीमहल में था, वह तुरंत ही तलवार लेकर दुष्टों का सिर काटने के लिये चल पड़ा किंतु सरदारों ने राजा को वहीं रोक लिया ताकि कोई अनहोनी नहीं हो जाये। इन्द्रराज सिंघवी की सेवाओं को देखते हुए राजा ने उसकी शवयात्रा दुर्ग के मुख्य मार्ग से ले जाने की आज्ञा दी। यह अधिकार केवल राजा, रानी एवं राजकुमारों को ही मिलता था।

    इन्द्रराज की मृत्यु के बाद मानसिंह राज्यकार्य से उदासीन हो गया। उसने इन्द्रराज के भाई गुलराज को दीवान बनाया किंतु 4 अप्रेल 1817 को उसकी भी हत्या हो गयी। इस पर 19 अप्रेल 1817 को भीमनाथ के कहने पर महाराजा मानसिंह ने राज्यकार्य अपने 17 वर्ष के राजकुमार छत्रसालसिंह को सौंप दिया किंतु राजकुमार से राज्य की रक्षा होना संभव न जानकर ई.1818 में महाराजा मानसिंह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से दूसरा समझौता किया जिसके अनुसार जोधपुर रियासत अंग्रेजी शासन के संरक्षण में चली गयी। इस संधि की शर्तें इस प्रकार से थीं-

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महाराजा मानसिंह तथा उसके वंशजों के बीच मैत्री, सहकारिता तथा स्वार्थ की एकता सदा पुश्त दर पुश्त कायम रहेगी और एक के मित्र तथा शत्रु दोनों के मित्र एवं शत्रु होंगे। अंग्रेज सरकार जोधपुर राज्य और मुल्क की रक्षा करने का जिम्मा लेती है। महाराजा मानसिंह तथा उसके उत्तराधिकारी अंग्रेज सरकार का बड़प्पन स्वीकार करते हुए उसके अधीन रहकर उसका साथ देंगे और दूसरे राजाओं अथवा रियासतों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे।

    अंग्रेजी सरकार को बताये बिना और उसकी स्वीकृति प्राप्त किये बिना महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी किसी अन्य राजा अथवा रियासत से कोई अहदनामा नहीं करेंगे परंतु अपने मित्रों एवं सम्बंधियों के साथ उनका मित्रतापूर्ण पत्रव्यवहार पूर्ववत् जारी रहेगा।

    महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी किसी पर ज्यादती नहीं करेंगे। यदि दैवयोग से किसी से कोई झगड़ा खड़ा हो जायेगा तो वह मध्यस्थता तथा निर्णय के लिये अंग्रेज सरकार के सम्मुख पेश किया जायेगा। जोधपुर राज्य की तरफ से सिंधिया को प्रतिवर्ष दिया जाने वाला 1 लाख 8 हजार रुपये खिराज अब सदा अंग्रेज सरकार को दिया जायेगा। अंग्रेजी सरकार इकरार करती है कि सिंधिया अथवा अन्य कोई खिराज का दावा करेगा तो अंग्रेज सरकार उसके दावे का जवाब देगी।

    जोधपुर राज्य को अंग्रेजी सरकार की सहायता के लिये 1500 सवार देने होंगे। जब भी आवश्यकता पड़ेगी राज्य के भीतरी प्रबंध के लिये सेना के कुछ भाग के अतिरिक्त शेष सब सेना महाराजा को अंग्रेजी सेना का साथ देने के लिये भेजनी होगी। महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी अपने राज्य के खुदमुख्तार रईस रहेंगे और उनके राज्य में अंग्रेजी हुकूमत का दखल न होगा।

    ये शर्तें व संधि दिल्ली में लिखी गयी और इस पर चार्ल्स मेटकाफ, व्यास बिशनराम और व्यास अभयराम ने हस्ताक्षर किये। संधि में प्रावधान किया गया कि जोधपुर के युवराज महाराजकुमार छत्रसिंह व महाराजा मानसिंह तथा गवर्नर जनरल की स्वीकृति के पश्चात् 6 माह के भीतर संधि लागू हो जायेगी। हालांकि महाराजा मानसिंह लगातार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पास विगत 13 वर्षों से संधि के लिये निवेदन करता रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि महाराजा को संधि से कुछ लेना देना नहीं था। वह तो उन दुष्ट ठाकुरों और पिण्डारियों से छुटकारा पाने के लिये कम्पनी की सहायता प्राप्त करना चाहता था जो उसे दुःख देते थे। बाद में सन्धि की शर्तों की पालना करने से बचने के लिये महाराजा ने पागल होने का नाटक कर लिया।

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  • चीन की दीवार की याद दिलाता है कुम्भलगढ़ का दुर्ग

     15.08.2018
    चीन की दीवार की याद दिलाता है कुम्भलगढ़ का दुर्ग

    मौर्य सम्राटों ने बनाया और गुहिलों ने संवारा कुम्भलगढ़ दुर्ग


    कुम्भलगढ़ दुर्ग उदयपुर से लगभग 90 किलोमीटर तथा नाथद्वारा से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में, समुद्र सतह से लगभग 1082 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और नीचे की नाल से लगभग 250 मीटर ऊँचा है।

    दुर्ग के निर्माता

    मौर्य सम्राट अशोक के दूसरे पुत्र ‘सम्प्रति’ ने ईसा से लगभग 200 वर्ष पहले ठीक उसी स्थान पर एक दुर्ग बनवाया था, जहाँ आज कुम्भलगढ़ का दुर्ग स्थित है। ‘सम्प्रति’ जैन धर्म का अनुयायी था उसके समय में बने कुछ प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेष आज भी कुम्भलगढ़ में मौजूद हैं। महाराणा कुंभा (ई. 14-1468) के समय यह दुर्ग खण्डहर के रूप में मौजूद था। कुंभा ने अपने प्रसिद्ध शिल्पी मंडन के निर्देशन में उन्हीं खण्डहरों पर एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया जिसके कुंभलगढ़ कहा जाता है।

    दुर्ग की श्रेणी

    यह पार्वत्य दुर्ग तथा ऐरण दुर्ग की श्रेणी में आता है। इसे कुंभलमेर या कुंभलमेरु भी कहते हैं। यह छोटी-छोटी कई पहाड़ियों को मिलाकर बनाया गया है। कुंभलगढ़ प्रशस्ति में इन पहाड़ियों के नाम नील, श्वेत, हेमकूट, निषाद, हिमवत्, गन्दमदन आदि दिये गये हैं। इस दुर्ग के चारों ओर स्थित पहाड़ियों के कारण यह दुर्ग दूर से दिखाई नहीं देता है।

    नवीन दुर्ग की प्रतिष्ठा

    महाराणा कुंभा ने वि.सं.1515 चैत्र वदि 13 (ई.1458) को कुंभलगढ़ दुर्ग की प्रतिष्ठा की। दुर्ग बनने की स्मृति में कुंभा ने विशेष सिक्के ढलवाये जिन पर कुंभलगढ़ का नाम अंकित है। उसने दुर्ग में चार दरवाजे बनवाये तथा मण्डोर से लाकर हनुमानजी की मूर्ति स्थापित करवाई। साथ ही अपने किसी अन्य शत्रु के यहाँ से लायी हुई गणपति की मूर्ति भी स्थापित करवायी। वहीं उसने कुंभस्वामी का मंदिर, जलाशय तथा एक बाग का निर्माण भी करवाया।

    दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था

    कुंभलगढ़ अनियमित आकार की कई पहाड़ियों से घिरा हुआ है और इन्हें लगभग 35 किलोमीटर लम्बी तथा सात मीटर चौड़ी दीवार से जोड़ दिया गया है। दुर्ग की प्राचीर पर तीन-चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। दुर्ग की प्राचीर में स्थान-स्थान पर बुर्ज बनी हुई हैं जिनकी बाहरी आकृति बड़े आकार के आधे-कुंभों (मटकों) के समान है। इस कारण कोई शत्रु इस प्राचीर पर सीढ़ी टिकाकर नहीं चढ़ सकता। कुंभलगढ़ की लम्बी-चौड़ी दीवार चीन की दीवार का स्मरण कराती है।

    कुंभलगढ़ दुर्ग का मार्ग

    दुर्ग से पहले केलवाड़ा नामक एक प्राचीन कस्बा बसा हुआ है जहाँ स्थित एक गढ़ी में बाणमाता का प्रसिद्ध मंदिर है। दुर्ग में स्थित महलों तक पहुंचने के लिये गोल घुमावदार रास्ता पार करना पड़ता है तथा एक-एक करके ओरठ पोल, हल्ला पोल, हनुमान पोल, विजय पोल, भैरव पोल, नींबू पोल, चौगान पोल, पागड़ा पोल और गणेश पोल नामक कुल नौ द्वार पार करने पड़ते हैं। केलवाड़ा से चलने के बाद ओरठ पोल और हल्ला पोल पार करने के बाद दुर्ग का मुख्य द्वार आता है जिसे हनुमान पोल कहते हैं। यहाँ हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। यह माण्डव्यपुर (मण्डोर) से लाई गई थी। इसका उल्लेख कीर्ति स्तंभ की प्रशस्ति में भी है। यह मूर्ति महाराणा कुंभा द्वारा माण्डव्यपुर (मण्डोर) पर प्राप्त की गई विजय की प्रतीक है। इसकी चरण चौकी पर वि.सं. 1515 फाल्गुन मास का लेख खुदा हुआ है। हनुमानपोल के बाद विजयपोल आता है जिसमें प्रवेश करने पर मध्यकालीन मंदिर, मण्डप, स्मारक दिखाई देते हैं।

    कटारगढ़

    कुंभलगढ़ के भीतर एक पहाड़ी के शिखर पर एक और दुर्ग स्थित है जिसे कटारगढ़ कहते हैं। यह गढ़ भी द्वारों एवं प्राचीरों से सुरक्षित है। भीतरी दुर्ग में प्रवेश करने से पहले देवी का मंदिर आता है। महाराणा, युद्ध अभियान पर जाते समय देवी की आज्ञा लेकर जाते थे और लौटकर सबसे पहले देवी को प्रणाम करते थे। कटारगढ़ में झाली महल, बादल महल (कुंभा महल), तालाब, तोपखाना, बंदीगृह, अन्नागार, अस्तबल और कुछ मंदिर स्थित हैं। बादल महल की छत पर भित्तिचित्र बने हुए हैं। महल के द्वार तथा झरोखे आनुपातिक रूप से छोटे हैं। यहाँ के महलों की छत से पूरे दुर्ग का विहंगम दृृश्य दिखाई देता है। साथ ही मेवाड़ राज्य की सीमा पर स्थित मारवाड़ राज्य दिखाई देता है।

    गोदाम एवं अस्तबल

    महाराणा कुंभा ने दुर्ग के भीतर युद्धोपयोगी सामग्री एवं खाद्यान्न एकत्रित करने के लिये बड़े-बड़े गोदाम बना रखे थे। उनके घोड़ों के अस्तबल तथा हाथियों के बाड़े भी राजप्रासाद की सीमा में स्थित थे।

    झाली रानी की कहानी

    मान्यता है कि महाराणा कुंभा, झालों की एक राजकुमारी को बलपूर्वक ब्याह लाया जो कि मण्डोर के राठौड़ राजकुमार की मंगेतर थी। राठौड़ राजकुमार ने झाली को प्राप्त करने के बहुत प्रयास किए किंतु उसे सफलता नहीं मिली। कुंभा ने झाली के लिये एक मालिया (महल) बनवाया जहाँ से वर्षा काल में आकाश साफ होने पर मण्डोर का दुर्ग भी दिखाई पड़ता था। दुर्ग में झाली बाव नामक एक बावड़ी भी स्थित है। झाली रानी के सम्बन्ध में एक दोहा कहा जाता है-

    झाल कटायां झाली मिले न रंक कटायां राव।

    कुंभलगढ़ रै कांगरे, माछर हो तो आव।।


    दुर्ग में स्थित मंदिर

    मान्यता है कि किसी समय दुर्ग में 365 मंदिर थे जिनमें से अब बहुत से नष्ट हो गए हैं। दुर्ग परिसर में स्थित मंदिरों में मामादेव (कुंभा स्वामी) का मंदिर, विष्णु मंदिर और नीलकण्ठ का मंदिर प्रमुख हैं। नीलकण्ठ मंदिर के निकट कुंभा द्वारा निर्मित विशाल यज्ञदेवी का दो-मंजिला भवन है। इसका निर्माण शास्त्रोक्त विधि से किया गया था। कुंभलगढ़ दुर्ग की प्रतिष्ठा का यज्ञ भी इसी वेदी में हुआ था। यज्ञ से निकलने वाले धूम्र की निकासी के लिये छत में सुंदर जालियां बनी हुई हैं। इनके ऊपर सुंदर शिखर बना हुआ है। राजस्थान में इस प्रकार की प्राचीन यज्ञ वेदी कुंभलगढ़ में ही बची है। अब यज्ञ-स्थान के खम्भों को दीवार से बंद कर दिया गया है। कटारगढ़ के उत्तर में नीची भूमि पर मामादेव (कुंभा स्वामी) का मंदिर है। इस मंदिर के खण्डहर के बाहरी भाग से कई प्रतिमाएं उपलब्ध हुई हैं जिनमें से अधिकांश मूर्तियां उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई हैं। 
    मंदिर में 30 गुणा 30 फुट का खुला बारामदा है। इसमें 16 खम्भे लगे थे। इसके भीतरी भाग के चबूतरे पर प्रतिमा रखी है तथा मध्यवर्ती भाग पर लघु वेदी बनी हुई है।

    इससे थोड़ी दूरी पर एक कुण्ड है जहाँ कुंभा के पुत्र उदयसिंह (ऊदा) ने कुंभा की हत्या की थी। कुण्ड की सीढ़ियों पर बने झरोखों में देवी-देवताओं की कई मूर्तियां बनी हुई हैं। कुंभलगढ़ प्रशस्ति कुंभा स्वामी मंदिर के प्रांगण के बाहर महाराणा कुंभा ने ई.1460 में पत्थर की शिलाओं पर संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में एक प्रशस्ति उत्कीर्ण करवाई थी। अब यह शिलालेख एवं कुंभलगढ़ के कई पुरावशेष उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इस शिलालेख में मेवाड़ नरेशों की वंशावली, महाराणा 
    कुंभा की उपलब्धियाँ, कुंभा के समय के बाजार, मंदिर, राजमहल तथा युद्धों आदि की जानकारी दी गई है।

    कुंभलगढ़ पर शत्रुओं के आक्रमण

    इस दुर्ग पर पहला आक्रमण महाराणा कुंभा के समय में माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने किया। उस समय महाराणा दुर्ग में नहीं था। सामंत दीपसिंह, दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। महमूद कुंभलगढ़ पर अधिकार करने में सफल नहीं हुआ। अंत में निराश होकर, केलवाड़ा गांव की गढ़ी में तोड़-फोड़ करके वापस लौट गया। ई.1457 में गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने कुंभलगढ़ पर घेरा डाला। वह भी असफल होकर लौट गया।

    महारणा कुंभा की हत्या

    ई.1468 में महाराणा कुंभा के बड़े पुत्र उदयसिंह (ऊदा) ने कुंभा की छल से हत्या कर दी तथा स्वयं महाराणा बन गया किंतु मेवाड़ के सामंतों ने ऊदा को अपना महाराणा स्वीकार नहीं किया। उन्होंने पांच वर्ष तक चले संघर्ष के बाद ऊदा को गद्दी से उतारकर उसकी जगह कुंभा के दूसरे पुत्र रायमल को महाराणा बनाया। रायमल के कुंवरों- पृथ्वीराज तथा महाराणा सांगा का बचपन कुंभलगढ़ दुर्ग में बीता था।

    उडणा पृथ्वीराज

    रायमल का ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज अपनी धावक गति के कारण उडणा पृथ्वीराज के नाम से विख्यात था। उसकी हत्या उसके बहनोई सिरोही नरेश जगमाल ने विष देकर की। विष का सेवन करने के बाद पृथ्वीराज कुंभलगढ़ की ओर आया तथा यहीं पहाड़ियों में उसका दम निकला।

    उसकी एक छतरी दुर्ग की तलहटी में है, जहाँ उसका निधन हुआ था तथा दूसरी छतरी किले में मामादेव कुण्ड के पास स्थित है, जहाँ उसका दाह संस्कार हुआ था। यह छतरी भारतीय पद्धति से बने 12 खंभों पर आधारित है। छतरी के बाहरी भाग में सीधी रेखा के पत्थर लगे हुए हैं। भीतर अष्टकोण बनाते हुए किनारे पर पत्थर लगे हैं। चारों ओर लगभग तीन फुट की ऊंचाई पर खुले बरामदे बने हैं जिनमें आराम से बैठा जा सकता है। इनके चारों ओर पंखुड़ी के घुमाव के ढंग के पत्थर लगे हैं। भीतर वृत्ताकार शिखर, बड़े आकार से छोटा होता चला गया है। छतरी के बीच में लगभग तीन फुट ऊँचा, डेढ़ फुट चौड़ा और ऊपर से नुकीला एक स्मारक स्तम्भ लगा है, जिसमें चारों ओर 17 स्त्रियों की मूर्तियां तथा उनके बीच में पृथ्वीराज की मूर्ति स्तंभ के बीच वाले भाग में खोदी गई है।

    यह स्मारक स्तम्भ 15वीं शताब्दी ईस्वी की वेशभूषा एवं सामाजिक व्यवस्था पर अच्छा प्रकाश डालता है। प्रवेश द्वार के सामने वाले स्मारक स्तम्भ की पहलू पर चार स्त्रियों की मूर्तियां एवं बीच में पृथ्वीराज की घोड़े पर सशस्त्र मूर्ति बनी है। पृथ्वीराज के लम्बी दाढ़ी एवं मूंछें हैं जो तिकाने आकार में नीचे तक चली गई हैं। पृथ्वीराज के आभूषणों में सादी कण्ठी, भुजबंद और कड़े प्रमुख हैं। हाथ में लम्बी तलवार दिखाई गई है। सिर पर गोल आकार की पगड़ी है जैसी बीकानेर तथा मारवाड़ में बांधा करते हैं। अधोवस्त्र में धोती और उसके साथ अंगोछा कमर में बंधा है, जिसके पल्ले नीचे तक लटकते हैं। ऊपरी शरीर पर वस्त्रों का अभाव है। स्त्री वेश में कण्ठी, कड़े, लंगर एवं चूड़ा प्रमुख हैं। तीन लड़ी का कन्दोरा बड़ा ही भव्य दिखाई देता है। अधोवस्त्र जंघा तक बनाया गया है परन्तु साड़ी का पूरा अभाव है। स्त्रियों के वस्त्र सादे ढंग से बनाये गये हैं।

    स्तंभ के दूसरे पहलू में चार रानियां और बीच में पृथ्वीराज बताया गया है। पृथ्वीराज को जटाजूटधारी शिवलिंग की पूजा करते हुए दिखा गया है जिससे स्पष्ट है कि प्राचीन गुहिलवंशी राजाओं की तरह वह भी शैव मतावलम्बी था। ये मूर्तियां आकार-प्रकार में वैसी ही हैं जैसी कुंभलगढ़ में विद्यमान नीलकण्ठ की मूर्ति है। तीसरे पहलू में पांच रानियां और पलंग पर लेटे हुए पृथ्वीराज को दिखाया गया है। यहाँ कुंवर के मस्तक पर नुकीला टोप एवं अधोवस्त्र बताये गये हैं जो एक योद्धा के द्योतक हैं।

    पलंग के पाये तिरछे हैं और इन पायों से पलंग के ऊपरी भाग आगे बढ़े हुए दिखाई देते हैं। आहड़ की छतरियों एवं मंदिरों के पलंगों से इसकी आकृति अलग है। दो स्त्रियों के हाथों में चौरस आकार के पंखे दिखाये गये हैं। इन स्त्रियों के चेहरे से भक्ति-भाव टपकता है। पलंग के नीचे जलपात्र रखा हुआ है जिसे देखने से उस समय के पात्रों के आकार का अनुमान लगाया जा सकता है। चित्तौड़ के विजय स्तंभ के पलंगों के नीचे भी इसी प्रकार के जलपात्र दिखाये गये हैं।

    स्मारक स्तंभ के चौथे पहलू में पृथ्वीराज फिर चार स्त्रियों के साथ छोटी तलवार एवं ढाल लिये बताया गया है। कुंवर के सिर पर गोल आकार की लहरदार पगड़ी बनायी गई है। कुंवर कच्छ पहने हुए है। रानियां हाथ जोड़े हुए शांतभाव से दिखाई देती हैं जो सतीत्व एवं भक्ति-भाव की प्रतिमाएं हैं। इसी छतरी में दाहिनी बाजू वाले खंभे पर अस्पष्ट लेख खुदा हुआ है परन्तु लिपि से स्पष्ट है कि यह लेख नकली है। बायीं ओर के दूसरे खंभे पर तत्कालीन लिपि में ‘श्री घणष पना’ खुदा हुआ है। यह किसी शिल्पी या सूत्रधार का नाम हो सकता है।

    छतरी पर एक गोलाकार गुम्बज है जो प्रारंभ में लगभग दो फुट ऊँचे गोल आधार पर बनाया गया है। यह गुम्बज 15वीं शताब्दी ईस्वी के राजपूत शैली के गुम्बजों की शैली का है। गुम्बज अर्द्ध-भाग समाप्त करने पर नुकीला होता हुआ दिखाई देता है। इसके शिखर पर गोलाकार एवं बिना अलंकरण वाला एक पत्थर लगा हुआ है। आकार-प्रकार से गुम्बज की बनावट कुंभा कालीन गुम्बजों जैसी है। ये गुम्बज कुंभा के राजप्रासादों के गवाक्षों और मंदिरों के शिखरों पर अब भी चित्तौड़ तथा कुंभलगढ़ में देखे जा सकते हैं। इस गुम्बज को बनाने में ईंट तथा पत्थर के टुकड़े काम में लिये गये हैं जिस पर चूने का प्लास्टर कर दिया गया है। यह प्लास्टर काई जमने से काला हो गया है। भीतरी भाग में लाल रंग स्पष्ट झलकता है।

    महाराणा उदयसिंह का राजतिलक

    जब दासी पुत्र बनवीर ने महाराणा सांगा के पौत्र महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी और उसके छोटे भाई उदयसिंह को भी मारना चाहा, तब पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर उदयसिंह को बचा लिया। राजकुमार उदयसिंह को किसी तरह कुंभलगढ़ दुर्ग लाया गया और वहीं पर उसका पालन-पोषण किया गया। जब उदयसिंह वयस्क हो गया तब कुंभलगढ़ दुर्ग में ही उसका राज्यतिलक हुआ। महाराणा प्रताप का जन्म महाराणा उदयसिंह के बड़े पुत्र प्रतापसिंह का जन्म भी कुंभलगढ़ में ही हुआ। कुंभलगढ़ से ही उदयसिंह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की और अपने पूर्वजों का दुर्ग पुनः हस्तगत किया। बाद में जब अकबर ने उदयसिंह से चित्तौड़ छीन लिया तब उदयसिंह उदयपुर चला गया।

    महाराणा प्रताप की अस्थाई राजधानी

    जब ई.1572 में महाराणा उदयसिंह का निधन हो गया, तब महाराणा प्रतापसिंह गोगून्दा में अपना राज्यतिलक करवाकर कुंभलगढ़ चला आया और यहीं से मेवाड़ का शासन चलाने लगा। ई.1576 में हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप सीधा इसी दुर्ग में आया था।

    कुंभलगढ़ पर शाहबाज खां का अधिकार

    अकबर ने शाहबाज खां को कुंभलगढ़ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा ताकि महाराणा प्रताप को पकड़ा या मारा जा सके। शाहबाज खां कुंभलगढ़ दुर्ग पर घेरा डालकर बैठ गया। कुछ समय बाद, दुर्ग में रसद की कमी हो गई। दो साल बाद, ई.1578 में महाराणा प्रताप दुर्ग से निकल कर दुर्गम पहाड़ों में चला गया। उसने सोनगरा भाण को दुर्ग की रक्षा का भार सौंपा। सोनगरा भाण, सींधल सूजा तथा अन्य योद्धा दुर्ग की रक्षा करते हुए काम आये। कुंभलगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया। इस सम्बन्ध में एक दोहा इस प्रकार से कहा जाता है-

    कुंभलगढ़ रा कांगरां, रहि कुण कुण राण।

    इक सिंहावत सूजड़ो इक सोनगरो भाण।


    कुछ दिनों बाद प्रताप पुनः पहाड़ियों से निकला तथा उसने फिर से मुगलों को कुंभलगढ़ दुर्ग से मार भगाया। इसके बाद यह दुर्ग राणाओं के अधिकार में ही रहा।

    इतिहासकारों की दृष्टि में कुंभलगढ़

    कुंभलगढ़ मेवाड़ राज्य का नैसर्गिक सुरक्षा कवच था तथा इसे राजस्थान के सर्वाधिक सुरक्षित किलों में से माना जाता था। अबुल फजल ने लिखा है कि यह दुर्ग इतनी ऊंचाई पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है। कर्नल टॉड ने इसे चित्तौड़ के बाद दूसरे नम्बर का दुर्ग बताया है तथा दुर्ग की सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जों एवं कंगूरों के कारण कुंभलगढ़ की तुलना एट्रस्कन से की है।

    वर्तमान स्थिति

    दुर्ग परिसर में आज भी कुछ परिवार निवास करते हैं। दुर्ग परिसर में खेती भी होती है। अब यह दुर्ग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देख-रेख में है। जिस महल में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था, अब वहाँ चमगादड़ों का बसेरा है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • कबूतर पर गोली चलाने वाले हमारे राज्य में नहीं रह सकते

     06.07.2017
    कबूतर पर गोली चलाने वाले  हमारे राज्य में नहीं रह सकते

    जोधपुर नरेश मानसिंह ने अंग्रेजों से संधि तो कर ली थी किंतु वह संधि की शर्तों का पालन नहीं करता था। वह मारवाड़ में उत्पात मचा रहे नाथों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करना चाहता था। नाथों के कहने पर वह नित्य ही राज्य के दीवान को बदल देता था जिससे राज्यकार्य शिथिल हो गया तथा मेरवाड़ा की ओर से मेर और मीणे मारवाड़ में घुस कर लूटमार मचाने लगे। मेर और मीणों पर लगाम कसने के लिये ई.1824 में ब्रिटिश सरकार ने जोधपुर महाराजा से चांग और कोट किराना परगनों के 21 गाँव ले लिये।

    ई.1827 में नागपुर का राजा मधुराजदेव भोंसले, अंग्रेजों से हारकर जोधपुर राज्य में भाग आया। महाराजा ने उसे महामंदिर में ठहरा दिया। महाराजा मानसिंह ने महामंदिर में एक शिलालेख लगवा रखा था कि इस मंदिर में शरण लेने वालों की प्राण रक्षा करने का दायित्व मंदिर का है। इसलिये महाराजा जिस किसी को अंग्रेजों से बचाना चाहता था उसे यहाँ भेज देता था। जब ब्रिटिश सरकार ने मानसिंह से मांग की कि मधुराजदेव भोंसले ब्रिटिश सरकार को सौंपा जाये तो महाराजा ने जवाब भिजवाया कि यदि आप हमें मित्र मानते हैं तो भौंसले आपकी निगरानी में रहे या हमारी में, क्या अंतर पड़ता है? इस पर अंग्रेज चुप होकर बैठ गये। भौंसले आजीवन जेधपुर में ही रहा और कई वर्ष बाद यहीं उसकी मृत्यु हुई।

    महाराजा मानसिंह स्वतंत्र विचारों का शासक था। ई.1831 में राजपूताने के ए.जी.जी. (एजेण्ट टू द गवर्नर जनरल) ने अजमेर में दरबार का आयोजन किया तथा उसमें राजपूताने की समस्त रियासतों के शासकों को बुलवाया। जोधपुर नेरश मानसिंह ने इस दरबार में भाग लेने से मना कर दिया। ब्रिटिश सरकार को बुरा तो लगा किंतु वह महाराजा के विरुद्ध कुछ कर नहीं सकी क्योंकि संधि की शर्तों में कहीं नहीं लिखा था कि महाराजा को इस तरह के दरबारों में सम्मिलित होना पड़ेगा।

    महाराजा मानसिंह ईस्ट इण्डिया कम्पनी को समय पर खिराज नहीं चुका पाता था इसलिये ए.जी.जी. बारबार जोधपुर पर आक्रमण करने की धमकी दिया करता था। इस पर ई.1833 में सांभर तथा नांवा में नमक से होने वाली आमदनी कम्पनी सरकार को सौंप दी गयी।

    संधि के बाद की 15 वर्ष की अवधि में अंग्रेज समझ गये कि महाराजा किसी तरह संधि को भंग करना चाहता है इसलिये उन्होंने मानसिंह को शक्तिहीन बनाने तथा उसे बदनाम करने की नीति अपना ली। इस समय तक अफगानिस्तान में अंग्रेजों के स्वार्थ रूसियों से टकराने लगे थे इसलिये वे पश्चिमी राजस्थान को मुक्त नहीं छोड़ सकते थे। उन्होंने मारवाड़ में अपना सैनिक अड्डा स्थापित करने का निर्णय लिया जिससे कम्पनी सरकार के लिये सिंध एवं उससे आगे उत्तरी पश्चिमी सीमाक्षत्र पर तत्काल सेना भेजी जा सके। इसलिये अंग्रेजों ने अब जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखने के लिये एक पृथक् ऐजेंसी की स्थापना करने की योजना बनायी।

    जोधपुर राज्य में मालानी और बाड़मेर की तरफ के जागीरदार और भोमिये सिंध, गुजरात, कच्छ और भुज आदि क्षेत्रों में घुसकर चोरी और डकैती किया करते थे। ब्रिटिश सरकार ने महाराजा को लिखा कि वह जागीरदारों पर अंकुश लगाये किंतु महाराजा ने कोई कार्यवाही नहीं की। इस पर ई.1834 में ब्रिटिश सरकार ने बाड़मेर में फौज भेजकर इन जागीरदारों को बुलवाया। जब ये जागीरदार अंग्रेज अधिकारियों से मिलने के लिये आये तो पोलिटिकल एजेण्ट ने उनमें से 29 जागीरदारों को पकड़ कर कच्छ भुज की ओर भेज दिया तथा मालानी परगने का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया।

    सिरोही राज्य की सीमा पर से भी मीणे मारवाड़ राज्य पर आक्रमण करने लगे। इस पर ब्रिटिश सरकार ने महाराजा को लिखा कि मीणों से राज्य की रक्षा करने के लिये मारवाड़ तथा सिरोही राज्य की सीमा पर 600 घुड़सवार नियुक्त करे किंतु मारवाड़ राज्य की आय का अधिकांश पैसा भीमनाथ ने दबा लिया था इसलिये महाराजा इस आदेश की पालना नहीं कर सका।

    ई.1818 में दोनों पक्षों के बीच जो संधि हुई थी उसके अनुसार जोधपुर राज्य 1500 घुड़सवार ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिये रखे जाते थे किंतु ये घुड़सवार निकम्मे थे और ब्रिटिश सरकार की मंशा के अनुसार काम करने में सक्षम नहीं थे इसलिये ई.1935 में व्यवस्था की गयी कि इन घुड़सवारों के स्थान पर जोधपुर राज्य ब्रिटिश सरकार को 1 लाख 15 हजार रुपये सालाना देगा। इस रुपये से ब्रिटिश सरकार ने ऐरनपुरा में जोधपुर लीजियन नामक सेना तैयार की।

    संधि की शर्तों के अनुरूप जोधपुर नरेश द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को प्रतिवर्ष एक लाख आठ हजार रुपया खिराज दिया जाना था किंतु महाराजा मानसिंह ने इसे भिजवाने में कई बार कोताही बरती जिससे कम्पनी सरकार उससे रुष्ट रहा करती थी। मानसिंह ने कुछ सामंतों की जागीरें भी जब्त कर लीं जो महाराजा के विरुद्ध चला करते थे। इन सामंतों ने ए.जी.जी. कर्नल सदरलैण्ड से महाराजा के विरुद्ध शिकायत की। सदरलैण्ड ने 28 जुलाई 1839 को अजमेर में दरबार आयोजित करके मारवाड़ के सरदारों से पूछा कि यदि हम मारवाड़ पर चढ़ाई करेंगे तो आप हमारा साथ देंगे या महाराजा का? इस पर साथीन के ठाकुर शक्तिदान भाटी ने जवाब दिया कि यद्यपि हम जानते हैं कि महाराजा आपसे युद्ध नहीं करेगा तथापि यदि आप दोनों के बीच युद्ध ठना तो हम महाराजा का ही साथ देंगे।

    कर्नल सदरलैण्ड ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वह कम्पनी सरकार को विगत पाँच साल का खिराज तुरंत चुकाये तथा राज्य में कुप्रबंधन के कारण जो राजस्व वसूली नहीं हो पा रही है उसे वसूलने का प्रबंध करे। महाराजा के पास रुपये नहीं थे इसलिये महाराजा ने रुपयों के बदल में कुछ गहने सदरलैण्ड को भिजवा दिये किंतु मारवाड़ के सरदारों के कहने पर सदरलैण्ड ने वे गहने नहीं लिये।

    महाराजा के अत्याचारों से तंग आकर कुछ सरदार अंग्रेजों के पोलिटिकल एजेण्ट एफ. विल्डर से मिले। महाराजा ने अंग्रेजों की बात मान ली और जिन जागीरदारों की जागीरें जब्त की थीं, वापस लौटा दीं। कुछ समय बाद फिर महाराजा और अंग्रेजो में फिर लड़ाई हो गई और अंग्रज सेना ने कर्नल सदरलैण्ड के नेतृत्व में जोधपुर राज्य पर चढ़ाई कर दी। मानसिंह को अपनी जनता और राज्य की सुरक्षा का कोई उपाय नहीं दिखा तो वह जोधपुर से 8 मील पूर्व में बनाड़ तक गया और किले की चाबियां कर्नल सदरलैण्ड को सौंप दी। लगभग 5 माह तक अंग्रेजी सेना जोधपुर दुर्ग में रही।

    राजा ने अंग्रेजी सेना की कोई विशेष आवभगत तो नहीं की किन्तु उसकी उद्दण्डता को तो सहन करना ही पड़ता था। इतना होने पर भी राजा की आत्मा मरी नहीं थी। उसने हिन्दुत्व के जो प्रबल शाश्वत भाव बचपन से पाये थे, वे उसके मन में अब भी दृढ़ता पूर्वक जड़ें जमाये बैठे थे। एक दिन एक अंग्रेज सिपाही ने एक कबूतर पर गोली चलाई। राजा मानसिंह ने इसका बड़ा विरोध किया और कहा कि हमने आपको दुर्ग इसलिये नहीं सौंपा है कि हम हार गये हैं अपितु आपके मित्र हैं, केवल यही विश्वास दिलाने के लिये किले की चाबियां सौंपी हैं। राजा के तेवर देखकर अंग्रेजो को राजा से माफी मांगनी पड़ी। कबूतर चलाने वाले अंग्रेज सैनिक ने अपने हथियार राजा के सामने रख दिये।

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  • भगवद्गीता किसने लिखी ?

     03.09.2018
    भगवद्गीता किसने लिखी ?

    भगवद्गीता किसने लिखी ?


    महाभारत के भीष्मपर्व में 23 से 40वें अध्याय तक गीता के अट्ठारह अध्याय वर्णित हैं। भारतीय जनमानस इस बात को मानता है कि भगवद्गीता मूलतः भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, उपदेश के रूप में कही।

    संजय ने अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्ध का आंखों-देखा विवरण राजा धृतराष्ट्र को सुनाया। इस प्रकार भगवद्गीता भी संजय तथा धृतराष्ट्र तक पहुंची। जब भगवान वेदव्यास ने महाभारत को संहिताबद्ध किया तब उन्होंने पूरी कथा भगवान श्री गणेशजी को बोलकर सुनाई और भगवान गणेशजी ने इसे लिपिबद्ध किया।

    स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देने से पहले, अर्जुन से कहते हैं कि तुझसे पहले मैं गीता का पावन ज्ञान सूर्यदेव को सुना चुका हूँ।

    इस प्रकार गीता के मूल रचयिता श्रीकृष्ण ही माने जाते हैं किंतु साहित्यिक, पुरातात्विक, भाषा वैज्ञानिक एवं अन्य साक्ष्य इन प्रश्नों के जवाब कुछ अलग तरह से देते हैं कि भगवद्गीता की रचना किसने एवं कब की ?

    अधिकांश हिन्दू इन तर्कों को स्वाीकार नहीं करते। आधुनिक विद्वानों के अनुसार, श्रीमद्भगवद् गीता को किसने लिखा, यह बात प्रमाणिक रूप से स्पष्ट नहीं हुई है।

    बहुत से पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों ने इस बात पर विचार किया है कि भगवद्गीता का वास्तविक लेखक कौन था।

    भगवद्गीता के सबसे बड़े टीकाकारों में से एक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने लिखा है कि जिस प्रकार हमें भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लखकों के नाम ज्ञात नहीं हैं, उसी प्रकार हमें गीता के रचयिता का नाम भी ज्ञात नहीं है। सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार, गीता की रचना का श्रेय, भगवान वेदव्यास को दिया जाता है जो महाभारत के पौराणिक संकलनकर्ता हैं।

    आधुनिक काल के विद्वानों का मानना है कि युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 700 श्लोक बोलकर सुनाना संभव नहीं हुआ होगा। उन्होंने कुछ महत्वूपर्ण बातें कही होंगी जिन्हें बाद में किसी लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया होगा।

    पाश्चात्य विद्वान गर्बे के अनुसार भगवद्गीता पहले, सांख्य-योग सम्बन्धी एक ग्रंथ था जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव की पूजा पद्धति आ मिली और ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर, इसका मेल, वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। भारत में गर्बे का सिद्धांत सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है।

    डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू. 200 में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।

    होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।

    हाल्ट्ज्मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णु-प्रधान बनाया गया स्वरूप मानते हैं। कीथ का विश्वास है कि मूलतः गीता, श्वेताश्वतर के ढंग की एक उपनिषद् थी परंतु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। बार्नेट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्ड हो गईं। फर्कुहार लिखता है कि यह एक पुरानी पद्य-उपनिषद् है जो संभवतः श्वेताश्वतर के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद का समर्थन करने के लिए ईसा के बाद के किसी सन् में भगवद्गीता के वर्तमान स्वरूप में ढाल दिया है। रूडोल्फ ओटो का कथन है कि मूल गीता, किसी महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धांतिक साहित्य नहीं था।

    कृष्ण का उद्देश्य, मुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान की सर्वशक्तिशाली इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।

    ओटो का विश्वास है कि सैद्धांतिक अंश प्रक्षिप्त है। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है।

    इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचारों की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिरा कर एक जगह मिलाई गई हैं।

    पुराने आचार्यों ने भगवद्गीता को, भक्त को सुनाई गई देववाणी की बजाय एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकालीन कवि कालिदास के ग्रंथों रघुवंश एवं कुमारसंभव में गीता का उल्लेख हुआ है। सातवीं शताब्दी के हर्षकालीन कवि बाणभट्ट के ग्रंथ ‘कादंबरी’ में भी गीता का उल्लेख मिलता है।

    पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया। उसने लिखा है कि भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों भारतवासी चर्चा किया करते थे। अर्थात् फाह्यान यह कहता है कि उसके भारत में आने से कुछ समय पहले महाभारत में गीता का समावेश किया गया था। इससे पहले ‘गीता’ एक स्वतंत्र ग्रंथ था। यह बात फाह्यान को किसी भारतीय ने बताई होगी।

    प्रोफेसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता, गुप्तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता के प्रसंग से मिलती-जुलती है।

    कहा जा सकता है कि गीता के विधिवत् और नियमित अध्ययन एवं टीका लिखने का काम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। शंकराचार्य इस ग्रंथ के पहले टीकाकार माने जाते हैं।

    प्रोफेसर मेघनाद देसाई मानते हैं कि आदि शंकराचार्य के पूर्व, भारतीय ग्रंथों में गीता का उल्लेख बहुत कम हुआ है। आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में माना जाता है। अर्थात् आठवीं शताब्दी के बाद ही भारत के साहित्य में गीता का उल्लेख होने लगा।

    प्रो. देसाई विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि गीता के लिखने वाले कम से कम तीन लेखक थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी।

    प्रो. देसाई के अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता- पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता- चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे। इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं जिन्होंने मराठी में ‘मूल गीता’ की खोज नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।

    डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनकी मान्यता है कि बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया।

    स्वामी स्वामी विवेकानंद ने लिखा है कि गीता एक ऐसा सुंदर गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं।

    गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव किया और गीता की माला में पिरो दिया।

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि गीता किसी एक लेखक की लिखी हुई नहीं है, उसे बहुत लम्बे कालखण्ड में बार-बार परिवर्द्धित करके वर्तमान स्वरूप तक लाया गया।

    गीता का विचार निश्चित रूप से भगवान श्रीकृष्ण से पहले भी मौजूद था। इसलिए कहा भी जाता है-

    सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल नंदनः

    पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता, दुग्धम् गीतामृतम् महत्।


    अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीतामृत रूपी दुग्ध प्राप्त किया तथा पृथा के पुत्र अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उसका सेवन किया।


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  • महाराजा मानसिंह ने शरीर पर राख लपेट ली

     07.07.2017
    महाराजा मानसिंह ने शरीर पर राख लपेट ली

    अक्टूबर 1839 से ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने जोधपुर दुर्ग पर अधिकार कर रखा था। 29 फरवरी 1840 को कर्नल सदरलैण्ड जोधपुर आया तथा उसने अगले ही दिन अर्थात् 1 मार्च 1840 को जोधपुर का दुर्ग फिर से महाराजा को सौंप दिया। इस प्रकार पाँच महीने रहकर अंग्रेजी सेना चली गई। कर्नल सदरलैण्ड ने अजमेर जाने से पहले प्रशासन में कई परिवर्तन किये। उसने महाराजा की अध्यक्षता में एक रीजेंसी कौंसिल का गठन किया जिसमें राज्य के प्रमुख ठाकुरों तथा मुत्सद्दियों को रखा गया। इस कौंसिल की मदद से पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान जान लुडलो ने जोधपुर राज्य का प्रशासनिक कार्य संभाला। लुडलो ने सूरसागर में अपना दफ्तर लगाया।

    पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान जान लुडलो के हस्तक्षेप से मारवाड़ राज्य के प्रशासन में काफी सुधार आया। जब ब्रिटिश सेना ने जोधपुर राज्य पर अभियान किया था तब उसके डर से बहुत से नाथ राज्य छोड़कर भाग गये थे किंतु महाराजा की सहानुभूति के कारण वे लोग फिर से राज्य में प्रविष्ट हो गये। इनमें महाराजा के धर्मगुरु लक्ष्मीनाथ तथा उसका विश्वसनीय सेवक जसरूप भी सम्मिलित थे। राज्य प्रशासन में इनका हस्तक्षेप फिर से आरंभ हो गया तथा राज्य की आय का अधिकांश भाग इन्हीं के ऊपर व्यय होने लगा।

    पोलिटिकल एजेण्ट लुडलो ने नाथों को दबाने के लिये जोधपुर लीजन की एक सैनिक टुकड़ी जोधपुर में नियुक्त कर दी। उसने कौंसिल के माध्यम से नाथों की महामन्दिर और उदयमन्दिर की जागीरें छीन लीं। इसके उपरांत भी महाराजा की आज्ञा से उन जागीरों की आय गुप्त रूप से नाथों को भेजी जाने लगी। इससे लुडलो बड़ा खिन्न हुआ। उसने महाराजा पर दबाव डालकर लक्ष्मीनाथ और उसके सहयोगियों को जोधपुर से 40-50 कोस दूर भिन्न स्थानों पर भिजवा दिया। श्रवणनाथ को भी देश निकाला दे दिया। इतना करने पर भी जब नाथों के अत्याचार समाप्त नहीं हुए तब उसने अप्रेल 1943 में नाथों के दो उपद्रवी नेताओं को गिरफ्तार करके अजमेर भिजवा दिया। इससे सारे नाथ तितर-बितर हो गये।

    उस घटना से मानसिंह को जबर्दस्त मानसिक ठेस पहुँची। उसने दो दिन तक भोजन नहीं किया। 23 अप्रेल 1843 को राजा ने राज्य कार्य त्याग कर गेरूए वस्त्र धारण कर लिये तथा शरीर पर राख लपेट कर दुर्ग का भी त्याग कर दिया। महाराजा पहले तो मेड़तिया दरवाजे के बाहर बावड़ी के निकट जाकर बैठा फिर वहाँ से पाल गाँव चला गया। वह जलंधरनाथ के दर्शन करने के लिये जालोर जाना चाहता था वहाँ से उसका कार्यक्रम गिरनार जाने का था किंतु पोलिटिकल एजेण्ट ने महाराजा को धमकी दी कि यदि आपने राज्य का त्याग अपनी इच्छा से किया तो हम धोकलसिंह को जोधपुर का राजा बनायेंगे और यदि राज्य का त्याग नहीं किया तो जिसे आप कहेंगे उसे राजा बनायेंगे। लुडलो की धमकी से राजा जोधपुर तो आ गया किंतु वह दुर्ग में जाने के स्थान पर राईका बाग में ठहरा।

    महाराजा के कई पुत्र हुए थे किंतु सभी महाराजा के जीवन काल में ही काल कवलित हो गये थे। ई.1818 में कुंवर छत्रसिंह की मृत्यु हो जाने के बाद राजा मानसिंह के कोई पुत्र जीवित नहीं रह गया था इसलिये राजा ने पोलिटिकल एजेण्ट से अनुरोध किया कि मेरी मृत्यु के बाद अहमदनगर से तख्तसिंह को लाकर जोधपुर राज्य का राजा बनाया जाये। पोलिटिकल एजेण्ट ने उसकी बात मान ली।

    कहा जाता है कि जब महाराज कुमार छत्रसिंह के मर जाने पर जोधपुर राज्य के सरदारों ने ईडर के राजा को महाराजा मानसिंह का दत्तक पुत्र बनाने का षड़यंत्र रचा तो राजा मानसिंह ईडर नरेश से नाराज रहने लगा था। जबकि दूसरी ओर जब महाराजा मानसिंह ने आपत्तिकाल में भीमसिंह की सेना से घबरारकर जालोर का दुर्ग छोड़ने का मन बनाया था तब मोडास के ठाकुर जालिमसिंह ने महाराज केा के कुटुम्ब को अपने यहाँ रखने और उनके जीवन की रक्षा करने का वचन दिया था। इसलिये महाराजा इस परिवार से प्रसन्न था। अहमदनगर का राठौड़ राजा तख्तसिंह इसी परिवार की शाखा से था। इसलिये मानसिंह ने तख्तसिंह को जोधपुर का राजा बनाने का प्रस्ताव रखा था।

    जुलाई 1843 में महाराजा राइका बाग से मण्डोर चला गया। 3 सितम्बर 1843 को महाराजा एक श्वेत वस्त्र ओढ़कर लेट गया तथा अपने कक्ष से उसने समस्त लोगों को बाहर निकाल दिया। उसने ब्राह्मणों से अनुरोध किया कि अगले दिन प्रातः काल में आकर हमारे शरीर को संभालें उससे पहले भीतर न आयें। अगले दिन अर्थात् 4 सितम्बर 1843 को महाराजा का पार्थिव शरीर ही प्राप्त हुआ। महाराजा के साथ एक रानी, 4 परदायतें और एक दासी सती हुई।

    इतिहासकारों के लिये महाराजा मानसिंह अपने आप में एक पहेली है। जब उसे आवश्यकता पड़ी उसने मौन धारण कर लिया। जब आवश्यकता पड़ी तो पागल होने का नाटक कर लिया। कभी शरीर पर राख लपेट कर दुर्ग का त्याग करके बावड़ी के किनारे जा बैठा। उसके बारे में उसके जीवन काल में ही तरह-तरह की बातें की जाती थीं किंतु बुद्धिमान अंग्रेज उसकी हर बात को समझते थे। 1822 में मि. विल्डर ने ब्रिटिश सरकार को संबोधित एक पत्र में लिखा- महाराजा मानसिंह निश्चय ही बड़े बुद्धिमान और समझदार हैं।

    महाराजा ने नाथों के साथ-साथ चारणों को भी प्रश्रय दिया क्योंकि मारवाड़ के चारणों ने महाराजा के दुर्दिनों में महाराजा का साथ दिया था। इससे महाराजा भीमसिंह चारणों से कुपित रहा करता था तथा कई चारण मारवाड़ राज्य को छोड़कर चले गये थे किंतु जब मानसिंह जोधपुर का राजा हुआ तो वे पुनः मारवाड़ में लौट आये। मानसिंह बुद्धिमान, गुणी और विद्वान राजा था। महाराजा की सभा में अनके गुणी, कवि, गायक, योगी और पण्डित रहा करते थे। उसकी बनायी हुई पुस्तकों में कृष्णविलास बड़ी प्रसिद्ध है जिसमें उसने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के प्रथम 32 अध्यायों का भाषा में पद्यानुवाद है। उसने पुस्तक प्रकाश के नाम से एक विशाल ग्रन्थालय स्थापित किया जिसमें वेद, पुराण, स्मृति आदि अनके दुर्लभ ग्रन्थ संग्रहीत किये। महाराजा ने रामायण, दुर्गाचरित्र, शिवपुराण, शिव रहस्य, नाथ चरित्र आदि अनके धार्मिक ग्रंथों के आधार पर बड़े बड़े चित्रों का निर्माण करवाया। इन चित्रों का एक अच्छा संग्रह तैयार हो गया था।

    महाराजा ने नियम बना रखा था कि जो भी उससे मिलने के लिये आता था, उसे वह कुछ न कुछ अवश्य दिया करता था। उसका कहना था कि जो कोई भी किसी के पास जाता है, लाभ की आशा में जाता है। इसलिये उसे खाली हाथ लौटा दिया जाये तो एक राजा और साधारण पुरुष में क्या अंतर रह जाता है? महाराजा मानसिंह के बारे में कहा जाता है कि उसने मारवाड़ को विद्वानों की भूमि बना दिया। किसी कवि ने कहा है -

    जोध बसायो जोधपुर, ब्रज कीन्हीं ब्रिजपाल

    लखनऊ काशी दिल्ली मान कियो नेपाल।


    अर्थात् जोधा ने जोधपुर बसाया और विजयसिंह ने (वैष्णव सम्प्रदाय के मन्दिर बनवाकर) इसे ब्रजभूमि बना दिया। महाराज मानसिंह ने (गवैयों, पण्डितों और योगियों को बुलाकर) उसे लखनऊ, काशी, दिल्ली और नेपाल बना दिया।

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  • क्या वह एकलिंगजी का मंदिर तोड़ना चाहता था ?

     03.09.2018
    क्या वह एकलिंगजी का मंदिर तोड़ना चाहता था ?

    क्या वह एकलिंगजी का मंदिर तोड़ना चाहता था ?


    मेवाड़ रियासत संसार की सबसे गौरवशाली और सदा स्वतंत्र रहने वाली रियासत थी किंतु इस रियासत को अठारहवीं सदी के अंत एवं उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में नर्मदा पार से आए मराठों ने घुन की तरह खाकर खोखला कर दिया तथा उन्नीसवीं शताब्दी में पिण्डारियों ने लूटमार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

    यहां तक कि पिण्डारियों का एक नेता अमीर खाँ मेवाड़ के इष्टदेव एकलिंगजी के मंदिर पर चढ़ आया और महाराणा को धमकी दी कि उसे ग्यारह लाख रुपए दिए जाएं अन्यथा वह एकलिंगजी का मंदिर तोड़ डालेगा।

    बहुत ही संकट भरे दिन थे वे मेवाड़ के लिए।

    पूरा किस्सा जानने से पहले हमें पिण्डारियों के बारे में जानना होगा।

    उन्नीसवीं सदी समस्त राजपूत रियातसों के लिए एक बुरे स्वप्न की तरह शुरु हुई थी। इस काल में मध्य भारत में पिण्डारियों के अनेक खूंखार दल पनप गए थे जो राजपूत रियासतों का खून चूसकर ताकतवर हो रहे थे।

    ये पिण्डारी कौन थे और देश में अचानक कहाँ से प्रकट हुए थे इनके सम्बन्ध में कई बातें कही जाती थीं।

    जब औरंगजेब के अत्याचारों के कारण पूरा देश मुगलों का दुश्मन हो गया और अठारहवीं शताब्दी के मध्य में मुगल राज्य अस्ताचल को लुढ़क गया तो मुगल सैनिक बेरोजगार होकर लुटेरों के रूप में संगठित हो गए और उत्तर भारत के मैदानों में लूटमार करने लगे।

    अठारहवीं सदी के अंत में जब अंग्रेजों ने मराठा सरदारों की कमर तोड़ी तो हजारों मराठा सैनिक भी बेरोजगार होकर मारे-मारे फिरने लगे। धीरे-धीरे ये मराठा सैनिक मुगल लुटेरे सैनिकों के गुटों में शामिल होने लगे। इन्हीं को सम्मलित रूप से पिण्डारी कहा गया।

    पिण्डारी मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है लुटेरे सैनिक।

    ये पिंडारी इतने शक्तिशाली हो गए कि वे देशी रियासातें के साथ-साथ अंग्रेजी इलाकों पर भी धावे मारने लगे। पिण्डारियों के दल टिड्डी दल की भांति अचानक गाँव में घुस आते और लूटमार मचाकर भाग जाते। कोई गाँव, कोई व्यक्ति, कोई जागीरदार तथा कोई राजा उनसे सुरक्षित नहीं था।

    अतः प्रत्येक गाँव में ऊँचे मचान बनाए जाने लगे। लोग उन पर बैठकर पिण्डारियों की गतिविधियों पर नजर रखते थे। घोड़ों की टापों से उड़े धूल के गुब्बार को देखकर पिण्डारियों के आगमन का अनुमान लगाया जाता था और ढोल-नगाड़े बजाकर गांव वालों को पिण्डारियों के हमले की सूचना दी जाती थी। पिण्डारियों के आने की सूचना मिलते ही लोग स्त्री, बच्चे, धन, जेवर तथा रुपये आदि लेकर इधर-उधर छिप जाया करते थे। जागीरी गाँवों की जनता, निकटवर्ती किलों में घुस जाती थी ताकि किसी तरह प्राणों की रक्षा हो सके। कई बार लोगों ने पिण्डारियों के हाथों में पड़ने से बचाने के लिए अपने परिवारों को आग में झौंक दिया। बहुत से लोग कुओं में कूदकर अपने प्राण देते थे।

    पिण्डारी किसी भी गाँव में अधिक समय तक नहीं ठहरते थे। वे आंधी की तरह आते और लूटमार मचाकर तूफान की तरह निकल जाते। पिण्डारियों के कारण मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़ तथा हाड़ौती जैसे समृद्ध क्षेत्र उजड़ने लगे। भीलवाड़ा जैसे कई कस्बे तो पूरी तरह वीरान हो गए। पिण्डारियों ने कोटा राज्य को खूब रौंदा। झाला जालिमसिंह ने पिण्डारियों के विरुद्ध विशेष सैन्य दल गठित किए।

    इक्का दुक्का आदमियों को मार्ग में पाकर ये पिण्डारी अपने रूमाल से उनका गला घोंट देते थे। उनके रूमाल में कांच की एक गोली होती थी जो सांस की नली पर दबाव डालकर शिकार का शीघ्र ही दम घोट देती थी। पिण्डारी अपने शिकार का सर्वस्व लूट लेते थे।

    इस समय पिण्डारियों के चार प्रमुख नेता थे- करीम खाँ, वसील मुहम्मद, चीतू खाँ और अमीर खाँ। अमीर खाँ के नेतृत्व में लगभग 60 हजार पिण्डारी राजपूताना में लूटमार किया करते थे। अमीर खाँ का दादा तालेब खाँ, अफगान काली खाँ का पुत्र था। तालेब खाँ मुहम्मदशाह गाजी के काल में बोनेमर से भारत आया था। तालेब खाँ का लड़का हयात खाँ था जो मौलवी बन गया था। हयात खाँ का लड़का अमीर खाँ भारत में ही पैदा हुआ था जो 20 बरस का होने पर रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकल गया। उन दिनों मराठा सरदार सिंधिया का फ्रांसिसी सेनापति डीबोग्ले सेना की भर्ती कर रहा था। अमीर खाँ ने भी इस सेना में भर्ती होना चाहा किंतु डीबोग्ले ने उस अनुशासनहीन लड़के को अपनी सेना में नहीं लिया। इस पर अमीर खाँ इधर-उधर आवारागर्दी करने लगा तथा कुछ समय बाद जोधपुर के महाराजा विजयसिंह की सेना में भर्ती हो गया। उसने बहुत से मुसलमान सिपाहियों को अपना दोस्त बना लिया।

    कुछ समय बाद वह अपने साथ तीन-चार सौ आदमियों को लेकर बड़ौदा चला गया और गायकवाड़ की सेना में भर्ती हो गया। वहाँ से भी निकाले जाने पर अमीर खाँ और उसके आदमी भोपाल नवाब की सेवा में चले गए। ई.1794 में अमीर खाँ और उसके आदमियों ने भोपाल नवाब चट्टा खाँ के मरने के बाद हुए उत्तराधिकार के युद्ध में भाग लिया और वहाँ से भागकर रायोगढ़ में आ गए। यहाँ उसके आदमियों की संख्या 500 तक जा पहुंची।

    कुछ समय बाद अमीर खाँ का राजपूतों से झगड़ा हो गया। राजपूतों ने उसे पत्थरों से मार-मार कर अधमरा कर दिया। कई महीनों तक अमीर खाँ सिरोंज में पड़ा रहकर अपना उपचार करवाता रहा। ठीक होने पर वह भोपाल के मराठा सेनापति बालाराम इंगलिया की सेना में भर्ती हो गया। वहाँ उसे 1500 सैनिकों के ऊपर नियुक्त किया गया। कुछ दिन बाद अमीर खाँ जसवंतराव होलकर की सेवा में चला गया।

    ई.1806 में अमीर खाँ ने अपनी सेना में 35 हजार पिण्डारियों को भर्ती किया। उसके पास 115 तोपें भी हो गईं। यह संख्या बढ़ती ही चली गई। अब मराठा सरदार, अमीर खाँ की सेवाएं बड़े कामों में भी प्राप्त करने लगे। अमीर खाँ के पिण्डारियों की संख्या 1 लाख 35 हजार के आसपास पहुँच गई। अमीर खाँ ने जयपुर, जोधपुर और मेवाड़ राज्यों की आपसी शत्रुता में रुचि दिखाई तथा इन राज्यों का जीना हराम कर दिया। उसके पिण्डारियों ने तीनों ही राज्यों की प्रजा तथा राजाओं को जी भर कर लूटा।

    ई.1809 में पिण्डारी अमीर खाँ मेवाड़ पर चढ़ आया। उसने महाराणा से कहलवाया कि या तो मुझे ग्यारह लाख रुपये दो नहीं तो मैं एकलिंगजी के मंदिर को तोड़ दूंगा। मराठे पहले ही मेवाड़ राज्य को खोखला कर चुके थे इसलिए महाराणा के पास अमीर खाँ को देने के लिए रुपये नहीं थे। महाराणा भीमसिंह एकलिंगजी की रक्षा के लिए सेना लेकर आया किंतु थोड़ी ही देर लड़ने के बाद महाराणा हारकर उदयपुर लौट आया।

    विचित्र स्थिति थी। अमीर खाँ की सेना एकलिंगजी को घेरकर बैठी थी और महाराणा असहाय था। अमीर खाँ को मराठों की तरफ से अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए जाना था इसलिए वह अपने सेनापति जमशेद खाँ को मेवाड़ की जनता से रुपये वसूलने के लिए छोड़कर दूसरे मोर्चे पर चला गया। जमशेद खाँ के पठान सैनिकों ने मेवाड़ की जनता पर कई तरह के जुल्म ढाए। उसके जुल्मों को मेवाड़ में जमशेदगर्दी कहा गया।

    जब जमशेद खाँ ने जनता से 11 लाख रुपए वसूल कर लिए तो वह भी एकलिंगजी का मंदिर छोड़कर अमीर खाँ के पास चला गया। इस प्रकार एकलिंगजी का मंदिर बच गया। मेवाड़ के महाराणा एकलिंजी को मेवाड़ का वास्तविक शासक मानते थे और स्वयं को राज्य का दीवान कहते थे। एकलिंगजी की यह गरिमा सदैव बनी रही और एकलिंगजी का मंदिर आज भी पूरी भव्यता और शान से खड़ा हुआ है।

    ई.1817-18 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पिण्डारियों के विरुद्ध गंगा-यमुना और चम्बल के मैदानों में विराट सैनिक अभियान चलाया और लाखों पिण्डारियों को मार गिराया तब कहीं जाकर देश को पिण्डारियों के आतंक से मुक्ति मिली। अंग्रेजों ने अमीर खाँ के लिए टौंक रियासत का निर्माण किया और उसे नवाब की पदवी दी।


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  • क्या दो रेडियो संदेशों ने गांधीजी को भारत का राष्ट्रपिता बनाया ?

     03.09.2018
    क्या दो रेडियो संदेशों ने गांधीजी को भारत का राष्ट्रपिता बनाया ?

    क्या दो रेडियो संदेशों ने गांधीजी को भारत का राष्ट्रपिता बनाया ?


    मोहनदास करमचंद गांधी निश्चित रूप से भारत की आजादी की लड़ाई का एक बड़ा चेहरा थे। वे बीसवीं सदी में दुनिया भर में जननेता और राजनीतिज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे कुछ समय के लिए लंदन तथा दक्षिण अफ्रीका में बैरिस्टर रहे किंतु प्रिटोरिया सरकार के कर्मचारियों ने उन्हें चलती ट्रेन से फैंक दिया और वे भारत आ गए।

    भारत में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन नामक कई आंदोलनों की शुरुआत की किंतु उनके द्वारा चलाए गए ये आंदोलन या तो बीच में ही बंद कर दिए गए या स्वयं असफल हो गए।

    गांधीजी को कुशल वक्ता, लेखक और पत्रकार के रूप में भी जाना जाता है किंतु जब देश को आजादी मिली तो उनकी बात सुनने और मानने वाला कोई नहीं था। इसलिए वे 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में नहीं थे, कलकत्ता के मियांबाग में उपवास कर रहे थे।

    गांधीजी बड़े अर्थशास्त्री भी थे। उन्होंने भारत के लिए जो आर्थिक नीतियां सुझाईं थीं, उनकी प्रशंसा हर भारतीय करता है किंतु उन सिद्धांतों पर अमल कोई नहीं करता।

    उन्हें महात्मा तथा राष्ट्रपिता जैसे महान शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। इस बात पर भी कई लोगों को ऐतराज है।

    हमारा ये 
    आलेख इसी बात की सत्यता जानने के लिए है कि क्या गांधीजी, वास्तव में भारत के राष्ट्रपिता हैं ? क्या दो रेडियो संदेशों ने उन्हें राष्ट्रपिता बनाया ? गाँधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी ? इसकी कोई वैधानिकता है भी अथवा नहीं ?

    वर्ष 2005 में केन्द्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद कुछ नागरिकों ने भारत सरकार से उन दस्तावेजों की मांग की जिनके आधार पर गांधीजी को राष्ट्रपिता घोषित किया गया या उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई!

    भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस प्रार्थना पत्र के जवाब में संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत सरकार ने गांधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि नहीं दी। अर्थात् भारत सरकार ने उन्हें कभी भी राष्ट्रपिता घोषित नहीं किया।

    प्रश्न उठता है कि जब उन्हें सरकार द्वारा जारी लाखों दस्तावेजों में राष्ट्रपिता कहा जाता रहा है तो उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि क्यों नहीं दी गई ? इस प्रश्न का जवाब यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 8 (1) में सरकार को शैक्षिक और सैन्य खिताब के अतिरक्ति और कोई उपाधि देने की अनुमति नहीं है। राष्ट्रपिता न तो शैक्षिक उपाधि है और न सैनिक।

    जब कानून गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता नहीं हैं तो फिर किस अधिकार से हैं? इस प्रश्न का जवाब यह है कि यह केवल एक राजनीतिक बयान है जो दो बड़े नेताओं द्वारा केवल दो बार रेडियो पर दोहराया गया और गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता कहलाने लगे।

    4 जून 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश में गांधीजी को ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया। इस वक्तव्य में राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था। उन्हें ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया गया था। 6 जुलाई 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से गांधीजी के लिए पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ शब्द का प्रयोग किया। दूसरी बार 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या होने के बाद देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत की जनता के नाम रेडियो पर दिए गए संदेश में कहा कि राष्ट्रपिता अब नहीं रहे।

    बस इन दो रेडियो संदेशों ने गांधीजी को भारत का राष्ट्रपिता बना दिया। लगे हाथों गांधीजी के नाम के साथ जुड़े महात्मा शब्द पर भी विचार कर लिया जाए। सबसे पहले 12 अप्रैल 1919 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को लिखे एक पत्र में उन्हें ‘महात्मा’ शब्द से सम्बोधित किया। बस तभी से गांधीजी महात्मा हो गए।

    इस प्रकार गांधीजी के नाम के साथ जुड़े ये दोनों विशेषण संवैधानिक स्थिति का नहीं अपितु भावनात्मक स्थिति का प्रदर्शन करते हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • एल्फिंस्टन ने बीकानेर दुर्ग की चाबियां स्वीकार नहीं कीं

     08.07.2017
    एल्फिंस्टन ने बीकानेर दुर्ग की चाबियां स्वीकार नहीं कीं

    बीकानेर के महाराजा जसवंतसिंह ने अपने बड़े पुत्र राजसिंह को राजद्रोह के अपराध में जेल में डाल रखा था। जब ई.1787 में जसवंतसिंह मरने लगा तो उसने राजसिंह को जेल से निकाल कर बीकानेर राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया। राजसिंह केवल 30 दिन तक राज्य करके मृत्यु को प्राप्त हुआ। राजसिंह का बड़ा पुत्र प्रतापसिंह उस समय नाबालिग था अतः बालक प्रतापसिंह को बीकानेर का राजा बनाया गया तथा सूरतसिंह को राज्य का संरक्षक नियुक्त किया गया। कुछ दिन बाद सूरतसिंह ने अपने हाथों से प्रतापसिंह का गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी और स्वयं राजा बन गया । इससे राज्य के सारे सरदार सूरतसिंह के शत्रु हो गये और उसे उखाड़ फैंकने का उपक्रम करने लगे।

    ई.1808 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकारी एल्फिंस्टन काबुल जाते हुए बीकानेर में ठहरा। उस समय महाराजा सूरतसिंह अपने जागीरदारों के साथ कलह में उलझा हुआ था। महाराजा ने एल्फिंस्टन का समुचित सत्कार किया और अंग्रेजों से मित्रता के चिन्ह स्वरूप बीकानेर दुर्ग की चाबियां उसे देनी चाहीं किंतु एल्फिंस्टन ने चाबियां स्वीकार नहीं कीं। उसने कोई वचन भी नहीं दिया।

    बीकानेर की स्थिति और भी खराब हो जाने पर महाराजा ने काशीनाथ ओझा को ई.1817 में अंग्रेजों की सेवा में भेजा और पुनः संधि का प्रस्ताव किया। उस समय अंग्रेज पिण्डारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये सशक्त प्रतिरोध खड़ा करना चाह रहे थे इसलिये 9 मार्च 1818 को दोनों पक्षों में संधि पर हस्ताक्षर हुए और मुहर लगी। अंग्रेजों की ओर से चार्ल्स थियोफिलस मेटकाफ ने तथा महाराजा सूरतसिंह की ओर से काशीनाथ ने हस्ताक्षर किये। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 21 मार्च 1818 को घाघरा नदी पर स्थित पतरास के घाट पर इसकी पुष्टि की। इस समय अंग्रेज राजाओं के केवल बाह्य सम्बन्धों को वशीभूत करने के लिये लालायित थे और वे राज्यों के आन्तरिक प्रशासन में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं लेना चाहते थे। इस संधि की शर्तें निम्नलिखित थीं-

    कम्पनी तथा महाराजा सूरतसिंह उनके वंशजों एवं उत्तराधिकारियों के बीच में पारस्परिक मेल और स्वार्थों की एकता रहेगी। एक पक्ष के मित्र एवं शत्रु दोनों पक्षों के मित्र एवं शत्रु समझे जायेंगे। अंग्रेजी सरकार बीकानेर राज्य तथा उसके अधीन प्रदेश की रक्षा का वचन देती है। महाराजा और उसके उत्तराधिकारी अंग्रेज सरकार के साथ अधीनतापूर्ण सहयोग का व्यवहार करेंगे। किसी दूसरे राज्य अथवा राजा के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे।

    महाराजा और उसके उत्तराधिकारी अंग्रेजी सरकार की जानकारी और अनुमति के बिना किसी अन्य राजा अथवा राज्य के साथ अहदनामा नहीं करेंगे लेकिन अपने मित्रों व सम्बंधियों से साधारण मैत्री का व्यवहार पूर्ववत् जारी रखेंगे। महाराजा और उसके उत्तराधिकारी किसी के साथ ज्यादती नहीं करेंगे। यदि कोई विवाद हो जाता है तो उसे पंच फैसले तथा निर्णय के लिये कम्पनी सरकार के सम्मुख पेश करेंगे। बीकानेर राज्य के जिन व्यक्तियों ने अंग्रेजी राज्य की सीमा के अंतर्गत लूटमार करते हैं, उनका पूर्णतया दमन करने का इकरार महाराजा करते हैं, यदि महाराजा दमन करने में सफल नहीं होते हैं तो मांगने पर अंग्रेजी सरकार उन्हें सहायता देगी, परंतु ऐसी दशा में महाराजा को फौज खर्च देना पड़ेगा। यदि खर्च चुकाने के लिये साधन नहीं होंगे तो महाराजा को अपने राज्य का कुछ भाग ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पास गिरवी रखना पड़ेगा।

    महाराजा के विरुद्ध विद्रोह करने वालों के दमन के लिये महाराजा के मांगने पर अंग्रेज सरकार बागियों को उसके अधीन करेगी। सैन्य व्यय महाराजा को देना पड़ेगा। सैन्य व्यय न चुका पाने की स्थिति में राज्य के साधन अंग्रेजों के पास तब तक गिरवी रखने पड़ेंगे जब तक कि सैन्य व्यय का भुगतान नहीं कर दिया जाता। कम्पनी सरकार के मांगने पर बीकानेर के महाराजा को अपनी शक्ति के अनुसार सेना देनी होगी। महाराजा, उनके वंशज एवं उत्तराधिकारी राज्य के खुदमुख्तार राजा रहेंगे तथा राज्य में अंग्रेजी हुकूमत का प्रवेश नहीं होगा।

    चूंकि अंग्रेज सरकार की यह इच्छा और अभिलाषा है कि बीकानेर और भटनेर का मार्ग काबुल और खुरासान आदि से व्यापार आदि के लिये सुरक्षित और आने जाने योग्य कर दिया जाये अतः महाराजा अपने राज्य के भीतर ऐसा करने का इकरार करते हैं ताकि व्यापारी सकुशल और बिना किसी बाधा के आया जाया करें। राहकारी की जो दर निश्चित है, उसे बढ़ाया नहीं जायेगा। अहदनामे की नकलें सम्बन्धित पक्षों को 9 मार्च 1818 के दिन के बाद में ही दी जायेंगी।

    इस संधि के अमल में आने के साथ ही बीकानेर महाराजा ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ समानता के भावी दावों को त्याग दिया और ब्रिटिश सरकार के प्रति अधीनस्थता की संधि कर ली। आवश्यकता के समय उन्हें अपने राज्य के समस्त सैनिक साधन अंग्रेज सरकार के सुपुर्द करना स्वीकार करना पड़ा। बीकानेर से अंग्रेजों ने वार्षिक खिराज नहीं लिया क्योंकि मराठे भी नियमित रूप से खिराज नहीं लेते थे। इस संधि में निरंतर मैत्री और पारस्परिक मेल की अपेक्षा अधीन सहायता पर अधिक जोर दिया गया था। बाद में सूरतसिंह के उत्तराधिकारियों के समय में सन्धि की धाराओं का अर्थ केन्द्रीय सत्ता के हितों को ध्यान में रखकर किया जाने लगा। इस संधि के बदले में अंग्रेजों ने बीकानेर के शासकों को राज्य की आंतरिक सुरक्षा, विशेष रूप से विद्रोही सामंतों को दबाने में अंग्रेजी सहायता का आश्वासन दिया। इसके तहत ब्रिटिश सेनापति आलनेर ने अपनी सेना सहित रियासत में प्रवेश करके विद्रोहियों को ठंडा कर दिया।

    महाराजा सूरतसिंह अंग्रेजों को प्रसन्न रखने का हर संभव प्रयास करता था। ई.1827 में महाराजा सूरतसिंह ने अपने वकील मेहता अबीचंद गवर्नर जनरल लॉर्ड एम्हर्स्ट की सेवा में मेरठ में उपस्थित हुआ और उसे महाराजा की ओर से कई मूल्यवान उपहार भेंट किये। 24 मार्च 1828 को महाराजा सूरतसिंह की मृत्यु हो गयी। उसने ई.1787 से 1828 तक कुल 41 वर्ष शासन किया। उसने राज्य पर अनाधिकार एवं बलपूर्वक कब्जा किया था। वह एक अदूरदर्शी राजा था। उसने अपना पूरा समय सामंतों से लड़ने में बिताया। उसने जयपुर के महाराजा जगतसिंह के साथ मिलकर जोधपुर राज्य की जनता पर अत्याचार किये। अपने विश्वस्त सामंत सुराणा अमरचंद को उसने केवल संदेह के आरोप में मरवा डाला। वह युग ऐसा ही था जिसमें विश्वास के लिये कोई स्थान नहीं रह गया था।

    अंग्रेजों से संधि करने के बाद बीकानेर राज्य की स्थिति संतोषजनक नहीं रही। शासन की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिये जनता पर करों का भार बढ़ाया गया। ई.1884-1885 में राज्य में भू बंदोबस्त किया गया। इसका उद्देश्य राज्य की आय में वृद्धि करना था। इस भू बंदोबस्त से पूर्व भूमि कर के मद में राज्य की आय 4,05,916 रुपये थी जो भू-बंदोबस्त के बाद बढ़कर 9,04,455 रुपये हो गयी।

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