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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 51

     28.12.2019
    कैसे बना था पाकिस्तान - 51

    शियाओं का सफाया


    पाकिस्तान निर्माण के समय पाकिस्तान में शियाओं की जनसंख्या लगभग 35 प्रतिशत थी किंतु 2019 में यह 10 से 15 प्रतिशत अनुमानित की गई। शिया-मुसलमान पाकिस्तान का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। शिया मुसलमान भी अलग-अलग समूहों में विभक्त हैं। अधिकतर शिया तवेलवर समुदाय के हैं। इनके अलावा इस्माइली, खोजा और बोहरा समुदायों की भी अच्छी संख्या है। तवेलवर शियाओं में सबसे ज्यादा हाजरा जनजाति के शिया हैं। ये क्वेटा और आसपास के इलाकों में केन्द्रित हैं तथा क्वेटा में इनकी संख्या लगभग 7 लाख है। आतंकी हमलों में मारे जाने वाले हर 10 शिया मुसलमानों में से 5 हाजरा समुदाय के होते हैं। पाकिस्तान में शिया विरोधी आंदोलन लगभग 34 साल पहले ईरान की क्रांति के बाद आरम्भ हुआ। सुन्नी कट्टरपंथियों की मांग है कि शियाओं को भी काफिर घोषित किया जाए। अलगाववादियों के खूनी संघर्ष के कारण कुर्रम, पराचिनार और हंगू आदि क्षेत्र शियाओं की कब्रगाह बन चुके हैं।

    कराची के शिया मोहल्लों को लगभग किलों में बदल दिया गया है। आत्मघाती हमलावर बारूद से भरी कारें लेकर अब्बास टाउन तथा अन्य शिया बहुल नगरों में घुस जाते हैं और बड़ी संख्या में शियाओं की लाशें दिखाई देने लगती हैं। ई.1980 से 1985 के बीच जनरल जिया उल हक की सरकार के समय पाकिस्तान का नए सिरे से इस्लामीकरण हुआ और सिपाह-ए-साहबा जैसे कट्टारपंथी संगठनों को फैलने का अवसर मिला। सिपाह-ए-साहबा ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही शिया संप्रदाय के लोगों पर हमले आरम्भ कर दिए। सुन्नी चरमपंथियों से मुकाबला करने के लिए शियाओं ने तहरीक-ए-निफाज़-ए-फिकाह-जाफरिया नामक संगठन खड़ा किया लेकिन इसके बाद से ही शियाओं पर खूनी हमले आरम्भ हो गए, जो अब तक जारी हैं। पाकिस्तान के अधिकतर आतंकवादी संगठन सुन्नी मुसलमानों के हैं। ये सभी संगठन शियाओं के खिलाफ कुछ न कुछ हिंसक कार्यवाही करते रहते हैं।

    तालिबान, अलकायदा और लश्कर-ए-झांगवी 'देवबंदी मुसलमान' हैं, जो शियाओं का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं। लश्कर-ए-झांगवी नामक आतंकवादी संगठन ने ई.2011 में पाकिस्तान के शिया मुसलमानों को धमकी दी कि पाकिस्तान के समस्त शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा जाएगा और पाकिस्तान उनकी कब्रगाह बनेगा। तब से लश्कर-ए-झांगवी लगातार शियाओं के धार्मिक स्थानों पर हिंसक कार्यवाहियां कर रहा है। हर साल शियाओं पर बड़े हमले करके दहशत फैलाई जाती है ताकि शिया भयभीत होकर अपने घरों को छोड़ दें और एक जगह इकट्ठे हो जाएं। ई.2012 में 125 से अधिक शियाओं की हत्या की गई। ई.2013 में बलूचिस्तान में शिया-हज़ारा-समुदाय के लगभग 200 लोगों को मारा गया।

    10 जनवरी 2013 को क्वेटा में हुए 2 धमाकों में 115 लोगों की मौत हो गई जिनमें से अधिकतर 'हजारा शिया' थे। इस घटना के एक माह के भीतर ही कैरानी रोड धमाके में 89 शिया मारे गए। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2013 से 2016 तक हुए बम धमाकों में 2,000 से अधिक शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया और लाखों शियाओं को सुन्नी बहुल इलाकों से पलायन करने के लिए विवश किया गया। पाकिस्तान में शियाओं के लिए सरकारी नौकरी और सुविधाएं भी धीरे-धीरे घटा दी गई हैं। वर्ष 2018 में सैनिक वर्दी पहने कुछ आतंकियों ने रावलपिंडी से गिलगित जा रही चार बसें रुकवाकर अब्बास या जाफरी जैसे शिया नाम वाले 46 लोगों को उतार कर मार डाला। मस्तुंग और क्वेटा में हजारा शियाओं का किया गया नरसंहार पाकिस्तान में अनेक स्थानों पर बार-बार दोहराया गया है।


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  • अजमेर का इतिहास - 25

     05.01.2020
    अजमेर का इतिहास - 25

    दारा शिकोह एवं औरंगजेब युद्ध (1)


    शाहजहाँ ने ई.1657 में तरबियात खां बरलस को 4 हजारी मनसब, 4 हजार घुड़सवार एवं 3 हजार घोड़े देकर अजमेर का गर्वनर नियुक्त किया। उसी वर्ष शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसके पुत्रों में उत्तराधिकार की लड़ाई छिड़ी। धरमत और सामूगढ़ की पराजय के बाद शाहजहाँ के प्रिय शहजादे दारा शिकोह ने मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह से सम्पर्क किया। जसवंतसिंह ने उसे सलाह दी कि वह सेना लेकर अजमेर पहुँचे ताकि चारों तरफ से उसे राजपूत राज्यों से सहायता मिल सके। महाराजा जसवंतसिंह की सलाह पर दारा अजमेर आ गया। जसवंतसिंह स्वयं भी जोधपुर से रवाना होकर रूडियावास पहुँच गया। अजमेर का नाजिम तरबियात खां, दारा का मुकाबला करने में असमर्थ था। इसलिये उसने दारा के अजमेर पहुँचने से पहले ही अजमेर खाली कर दिया और औरंगजेब के पास आगरा चला गया। जब औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि महाराजा जसवंतसिंह ने दारा को सहयोग करने का आश्वासन दिया है तो उसने जयपुर नरेश जयसिंह से कहा कि वह जसवंतसिंह को दारा से अलग करे।

    जब दारा को यह ज्ञात हुआ तो उसने फिर जसंवतसिंह से सहायता का अनुरोध दोहराया। उस समय फ्रैंच लेखक बर्नियर भारत में ही था। उसने लिखा है कि महाराजा जयसिंह ने महाराजा जसवंतसिंह को पत्र लिखकर सूचित किया कि यदि जसवंतसिंह दारा का साथ छोड़ दे तो बादशाह, महाराजा जसवंतसिंह के अब तक के अपराध क्षमा कर देगा तथा आपने खजुआ (इलाहाबाद के पास) से जो धन प्राप्त किया है, उसकी भी मांग नहीं करेगा तथा आपको गुजरात का सूबेदार नियुक्त कर देगा जहाँ आप पूरे स्वाभिमान के साथ शासन करेंगे तथा शांति एवं सुरक्षा के साथ रह सकेंगे।

    इस पर जसवंतसिंह ने अपने विश्वस्त अनुचर आसा माधावत को महाराजा जयसिंह के पास भेजा। जयसिंह, आसा को बादशाह के पास लेकर गया। बादशाह ने अपने पंजे का निशान लगाकर एक फरमान जसवंतसिंह के नाम जारी किया जिसके अनुसार जसवंतसिंह को उसका राज्य लौटा दिया गया तथा उसका पुराना मनसब बहाल कर दिया गया। जब यह फरमान जसवंतसिंह के पास पहुँचा तो वह रूडियावास से पुनः जोधपुर लौट आया।

    इस पर दारा ने एक संदेशवाहक जसवंतसिंह के पास भेजा। उस समय जसवंतसिंह जोधपुर से 40 मील दूर रह गया था। जसवंतसिंह ने संदेशवाहक से मना कर दिया। जब संदेशवाहक ने अजमेर लौटकर इसकी सूचना दी तो दारा ने शहजादे सिपहर शिकोह को एक सौ आदमियों के साथ महाराजा की सेवा में भेजकर सहायता का अनुरोध दोहराया किंतु वह भी बेकार गया। शहजादा खाली हाथ अजमेर लौट आया।

    निराश होकर दारा ने अपनी सेना के भरोसे ही युद्ध लड़ने का निर्णय लिया। उधर जयपुर तथा जम्मू की सेनायें औरंगजेब की सहायता के लिये पहुँच चुकी थीं। दारा ने तारागढ़ दुर्ग की तलहटी में अपनी सेना की व्यूह रचना की। उसने अजमेर की तरफ आने वाले रास्तों को पत्थरों और मिट्टी की दीवारों से बंद कर दिया तथा स्थान-स्थान पर मोर्चे खड़े कर लिये। हर मोर्चे पर उसने एक प्रमुख व्यक्ति को तैनात किया। दारा के दाहिनी ओर पहला मोर्चा सयैद इब्राहीम, अस्कर खान, जान बेग तथा उसके पुत्र के अधीन था।

    यह मोर्चा तारागढ़ के ठीक निकट था। इस मोर्चे से अगला मोर्चा फिरोज मेवाती के अधीन था जो दारा के सर्वाधिक योग्यतम एवं विश्वस्त सेनापतियों में से था। इसके आगे के मार्ग पर बड़े अवरोध खड़े किये गये तथा इसी के निकट दारा ने अपना निवास नियत किया। दारा के बाईं ओर एक और बड़ा मोर्चा स्थापित किया गया जिसमें दारा के शहजादे का भृत्य शाह नवाज खान जो कि उसका सम्बन्धी भी था, मुहम्मद शरीफ जिसे किलीज खान का खिताब प्राप्त था और जिसे मुख्य खजांची तथा बरकंदाज नियुक्त किया गया था एवं अन्य प्रमुख लोग रखे गये। इस मोर्चे के पीछे शहजादे सिपहर शिकोह को रखा गया जिसके पास में पहाड़ी थी।

    अजमेर से चार मील दक्षिण में तारागढ़ की पहाड़ियाँ एक तंग घाटी में बदल जाती हैं, इसे नूर चश्मा कहते हैं। यहाँ से एक मार्ग इंदरकोट की घाटी होता हुआ अजमेर नगर की ओर जाता था। तारागढ़ के पश्चिम में देवराई गांव था। दारा की सेना ने इस चश्मे के मुख के दोनों ओर फैलकर तंग घाटी का रास्ता रोक लिया। उसका बायां पार्श्व गढ़ बीठली की पहाड़ी पर टिका था। उसका दाहिना पार्श्व कोकला नामक दुर्गम पहाड़ी पर टिका हुआ था। उसके सामने पत्थरों की एक विशाल एवं मजबूत दीवार थी जो संभवतः प्राचीन इंदरकोट दुर्ग का बचा हुआ अवशेष थी। इस दीवार के क्षतिग्रस्त हिस्से को मजबूत चट्टानों से भर दिया गया। (यह दीवार बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक मौजूद थी तथा युद्ध के दिनों की याद दिलाती थी।) इस प्रकार की मोर्चाबंदी से दारा तक पहुँचने के लिये केवल चश्मे की तंग घाटी वाला मार्ग ही शेष रह गया। आसपास की गढ़ियों पर तोपें चढ़ा दी गईं तथा उनके चारों ओर खाइयां खुदवा दी गईं। समस्त गढ़ियों को अजमेर से आवागमन करने के लिये जोड़ दिया गया ताकि अजमेर में स्थित रसद सामग्री तक उसकी सेनाओं का संचार बना रहे। दारा ने अजमेर नगर के कमजोर स्थानों को भी सुरक्षित बनाया तथा अपने सैनिकों को चेताया कि औरंगजेब इंदरकोट की तरफ से नगर के पिछवाड़े से अजमेर में घुसने का प्रयास करेगा।

    प्राकृतिक दृष्टि से यह एक मजूबत मोर्चा था किंतु व्यवहारिक दृष्टि से, चश्मे के मुंह के दोनों तरफ फैले हुए होने से, दोनों तरफ के योद्धाओं का एक दूसरे तक पहुँचना अत्यंत कठिन था। ऐसी स्थिति में चश्मे के एक तरफ की सेना के कमजोर पड़ जाने पर दूसरी ओर से सहायता नहीं पहुँचाई जा सकती थी।

    इधर दारा मोर्चा जमाने में व्यस्त था और उधर औरंगजेब, अजमेर की ओर तेजी से बढ़ा चला आ रहा था। औरंगजेब अब तक की विजयों से इतना उत्साहित था तथा सेना, सामग्री और उत्साह की दृष्टि से इतना समृद्ध था कि उसे अपनी स्थिति की कमजोरी और शक्ति पर ध्यान दने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। वह विजय के प्रति इतना आश्वस्त था कि उसकी सेना ने रामसर से दौराई तक की 22 मील की दूरी दो दिन में पूरी कर ली। दौराई में उसने अपना डेरा लगाया जहाँ से अब वह दारा से केवल दो मील दूर रह गया। राजा जयसिंह ने औरंगजेब के दाहिनी ओर मोर्चा जमाया। पुर्दिल खां को 150 आदमियों की एक टुकड़ी के साथ, रात्रि में ही शत्रु से सम्पर्क करने के लिये भेजा गया। उसने एक मील आगे चलकर रात्रि में एक नीची पहाड़ी पर अपना मोर्चा जमाया। यहाँ से दारा भी एक मील रह गया।

    जब प्रातः होने पर दारा के आदमियों ने पुर्दिल खां को पहाड़ी पर मोर्चा जमाये हुए देखा तो उन्होंने पुर्दिल खां पर आक्रमण किया। इस पर औरंगजेब ने शफ्शकिन खां को पुर्दिल खां की सहायता के लिये भेजा। शफ्शकिन खां ने पुर्दिल खां के पास पहुँचकर दारा के आदमियों पर फायरिंग आरंभ कर दी। दारा के आदमी मुड़कर पीछे चले गये। इस पर शफ्शकिन खां ने तेजी से पहाड़ियों पर अपने आदमी फैला कर जमा दिये। इसके बाद उन्होंने दारा के मोर्चों की तरफ लम्बी दूरी की फायरिंग आरंभ कर दी। शफ्शकिन खां ने अपने मोर्चे की रक्षा के लिये शेख मीर तथा दिलेरखां के नेतृत्व में रक्षा टुकड़ियां तैनात कीं जो इन्हें आकस्मिक हमलों से बचा सके।

    अब औरंगजेब की सेना ने सामान्य आक्रमणों के लिये स्वयं को व्यवस्थित कर लिया। अमीर उल उमरा तथा राजा जयसिंह को औरंगजेब के वाम पार्श्व पर नियुक्त किया गया, उनका मुख कोकला पहाड़ी की तरफ था। दाहिनी ओर नियुक्त असद खां तथा होशदाद खां को घाटी के बाईं ओर आक्रमण करने के निर्देश दिये गये जो बीठली गढ़ की तरफ की एक खड़ी चट्टान से लगी हुई थी। इसके बाद शफ्शकिन खां अपनी तोपों को तीन सौ गज और आगे ले गया।

    11 मार्च 1659 की शाम के समय दोनों तरफ से भारी बमबारी आरंभ हुई जो पूरी रात चलती रही। अगले दिन का काफी हिस्सा भी इसी बमबारी में गुजर गया। वातावरण में धुंए का गुब्बार आंधी की तरह छा गया। इसके बीच में से तोपों से निकले गोलों की चिंगारियां बिजली की तरह चमकती थीं। पूरी धरती पर गंधक, आग और लपटें फैल गईं। इस धुंए की ओट में छिपकर दोनों ओर के सिपाही, शत्रु तोपों तक पहंुचे और उन्होंने द्वंद्व युद्ध करके तोपचियों को काबू कर लिया। इस कारण तोपें कुछ देर के लिये बंद हो गईं किंतु शीघ्र ही इन सिपाहियों को पीछे से आये प्रतिद्वंद्वियों की बंदूकों की गोलियों, तलवारों तथा बर्छियों ने वापस धकेल दिया। औरंगजेब की सेना की तरफ से फायरिंग जारी रही।


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  • अध्याय-7 : स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

     07.12.2017
    अध्याय-7 : स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

    अध्याय-7


    स्वाधीनता के पश्चात् सक्षम राज्यों में उत्तरदायी सरकारों का गठन

    राजाओं को चाहिये कि वे जनता के सेवक बन जायें। वे जिस ऊंचे पायदान पर खड़े हैं, वहाँ से उन्हें नीचे उतर आना चाहिये। - महात्मा गांधी।

    महारानी विक्टोरिया द्वारा 1 नवम्बर 1858 की घोषणा में कहा गया था कि अच्छी सरकार तथा आंतरिक शांति की शर्त पर रियासतों को पूर्ण संरक्षण दिया जायेगा किंतु अधिकांश राजाओं ने अच्छी सरकार देने के लिये कोई प्रयास नहीं किये। ई.1903 में लॉर्ड कर्जन ने कहा कि राजाओं को अपनी प्रजा का स्वामी होने के साथ-साथ अपनी प्रजा का सेवक भी होना चाहिये। राज्य का राजस्व शासक के आमोद प्रमोद के लिये सुरक्षित नहीं है अपिुत प्रजा के कल्याण के लिये भी है। अगस्त 1917 में भारत सचिव ने घोषणा की कि प्रशासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों का अधिकतम सहयोग प्राप्त करने और भारत में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के उद्देश्य से स्वयं शासित संस्थाओं का क्रमिक विकास किया जायेगा।

    नागरिक अधिकारों की मांग के लिये गठित आरंभिक संस्थाएं

    29 दिसम्बर 1919 को राजपूताना एवं मध्यभारत के कुछ जागरूक लोगों ने 'राजपूताना मध्य भारत सभा' की स्थापना की। इस संस्था का प्रथम अधिवेशन मारवाड़ी पुस्तकालय, चांदनी चौक नई दिल्ली में आयोजित हुआ। 1 फरवरी 1921 को विजयसिंह पथिक ने 'राजस्थान सेवा संघ' की स्थापना की। उसी वर्ष 'मारवाड़ सेवा संघ' की भी स्थापना हुई। अजमेर पुलिस अधीक्षक की सूचना के अनुसार 'राजस्थान सेवा संघ' के 4004 सदस्य थे। राजस्थान सेवासंघ के नेतृत्व में रियासती प्रजा का आंदोलन जोर पकड़ने लगा। अखिल भारतीय देशी राज्य लोकपरिषद की स्थापना

    ई.1927 में दक्षिणात्य दीवान बहादुर रामचंद्र राव, सी. वाई. चिंतामणि तथा एन. सी. केलकर आदि ने राज्यों की प्रजा के अधिकारों की रक्षार्थ संघर्ष करने के लिये 'इण्डियन स्टेट्स पीपुल्स कांफ्रेंस' नाम से एक संगठन खड़ा किया जिसे 'अखिल भारतीय देशी राज्य लोकपरिषद' भी कहा जाता है। नरेन्द्र मण्डल ने इस संगठन को अपने प्रतिद्वंद्वी शत्रु के रूप में देखा। अखिल भारतीय देशी राज्य लोकपरिषद ने 1927 में गठित बटलर समिति के समक्ष एक माँगपत्र प्रस्तुत कर देशी राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना की मांग की। बटलर समिति ने इस मांगपत्र को स्वीकार कर लिया।

    राज्यों में आंदोलन के प्रति कांग्रेस का बदलता हुआ दृष्टिकोण

    1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि कांग्रेस देशी राज्यों में अहस्तक्षेप की नीति अपनायेगी। 1925 में गांधीजी ने दोहराया कि यदि ब्रिटिश भारत में स्वशासन के अधिकार प्राप्त हो जायेंगे तो देशी राज्यों में भी स्वतः ही सब ठीक हो जायेगा। दिसम्बर 1928 में कांग्रेस ने कलकत्ता अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके भारतीय राज्यों के शासकों से राज्यों में उत्तरदायी शासन स्थापित करने का अनुरोध किया और राज्यों की जनता के उत्तरदायी शासन के लिये किये जा रहे शांतिपूर्ण और उचित संघर्ष के प्रति सहानुभूति प्रकट की। कांग्रेस सवंधिान से वह धारा जो राज्यों में हस्तक्षेप के विरुद्ध थी, निकाल दी गयी। मई 1929 में अ. भा. देशी राज्य लोकपरिषद ने बम्बई अधिवेशन में राज्यों के लिये पृथक स्वतंत्र न्यायपालिका बनाने, राजाओं के व्यक्तिगत व्यय को प्रशासनिक व्यय से पृथक करने और प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना करने पर अधिक बल दिया।

    19-31 दिसम्बर 1929 तक कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने देशी नरेशों से मांग की कि वे प्रजा को उत्तरदायी शासन प्रदान करें और जनता के आवागमन, भाषण, सम्मेलन व नागरिक अधिकारों के बारे में कानून बनायें। जयनारायण व्यास चाहते थे कि कांग्रेस देशी राज्यों को ब्रिटिश प्रांतों की तरह माने लेकिन गांधीजी के निकट सहयोगी मणिभाई इस विचार से सहमत नहीं थे। व्यास ने नाराज होकर ई.1934 में तरुण राजस्थान के संपादन का काम छोड़ दिया। ई.1933 में अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद के चौथे अधिवेशन के अध्यक्ष एन. सी. केलकर ने आशा व्यक्त की कि कांग्रेस राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना को अपने कार्यक्रम में सम्मिलित करे। कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि इससे कांग्रेस की समस्त शक्तियां विभिन्न राज्यों के राजाओं से उलझने में लग जाती। ई.1934 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही।

    फरवरी 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में भारतीय राज्यों के सम्बन्ध में एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया कि राज्यों की जनता के लिये सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी वैसी ही स्वतंत्रता होनी चाहिये जैसी अंग्रेजी भारत में है। इस सम्मेलन में कांग्रेस ने देशी राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित करने और नागरिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा करने के अपने लक्ष्य को भी स्पष्ट किया। कांग्रेस ने देशी राज्यों में स्वतंत्र संगठन बनाकर उत्तरदायी शासन स्थापित करने एवं काम करने की सलाह भी दी तथा उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये कार्य करना अपना कार्य क्षेत्र मान लिया परंतु इस बात पर जोर दिया गया कि राज्यों में जो संघर्ष का अभियान चलाया जाये, वह कांग्रेस की ओर से न हो अपितु स्वतंत्र लोकप्रिय समुदायों की ओर से हो जिससे विभिन्न राज्यों में 1938 के पश्चात् प्रजा मण्डलों अथवा प्रजा परिषदों की स्थापना हुई तथा स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक होने में बड़ी सहायता मिली।

    जवाहरलाल नेहरू के सभापतित्व में आयोजित लुधियाना की रियासती प्रजा कान्फ्रेन्स में स्थिति और स्पष्ट हो गयी। उसमें मुख्य प्रस्ताव यह था- समय आ गया है जब यह संघर्ष, भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ मिल कर चलाया जाये और यह उसी का एक अभिन्न अंग बना दिया जाये। ऐसा संपूर्ण अखिल भारतीय संघर्ष कांग्रेस के निर्देशन में चलाया जाना आवश्यक है। मार्च 1939 में कांग्रेस ने त्रिपुरी अधिवेशन में अनुभव किया कि अनेक भारतीय राजाओं ने यूरोप में चल रहे युद्ध में अपनी सेवायें और संसाधन यह कहकर प्रदान किये हैं कि यूरोप में लोकतंत्र की रक्षा के लिये युद्ध लड़ा जा रहा है। अतः राजाओं को सर्वप्रथम अपने राज्यों में लोकतंत्र लागू करना चाहिये जहाँ अत्यंत घनी राजशाही लागू है। 1940 में गांधीजी ने राजाओं को सलाह दी कि वे जनता के सेवक बन जायें। वे जिस ऊंचे पायदान पर खड़े हैं, वहाँ से उन्हें नीचे उतर आना चाहिये। विभिन्न स्तरों से उठ रही मांगों और अपीलों का राजाओं पर कोई असर नहीं हुआ। अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद ने 6 से 8 अगस्त 1945 तक श्रीनगर में हुई स्थायी समिति की बैठक में निर्णय लिया कि राज्यों के जन आंदोलन का लक्ष्य भारत के अभिन्न अंग के रूप में राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है।

    ई.1945-46 में अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद के उदयपुर अधिवेशन में, लोकपरिषद के लक्ष्य की व्याख्या इस प्रकार की गयी- 'रियासतों को स्वतंत्र भारतीय संघ का एक अभिन्न अंग मानते हुए वहाँ की जनता द्वारा शांतिपूर्ण न्यायोचित उपायों से पूर्ण उत्तरदायी सरकार की प्राप्ति।' लोकपरिषद की विशेषज्ञ समिति ने 31 दिसम्बर 1947 को देशी राज्यों में उत्तरदायी सरकार के गठन के लिये 10 सिद्धांत प्रतिपादित किये।

    देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन के प्रति ब्रिटिश शासन की नीति

    ई.1937 में राजनीतिक विभाग ने राजाओं को प्रेरित किया कि वे अपनी रियासतों में प्रशासनिक सुधार करें और प्रशासन में लोकप्रिय सरकार के तत्वों को शामिल करें किंतु इस सलाह पर ध्यान नहीं दिया गया। मार्च 1940 में दिल्ली में आयोजित नरेन्द्र मण्डल की बैठक में वायसराय लिनलिथगो ने राजाओं को सलाह दी कि वे अपने राज्यों में आंतरिक प्रशासन की स्थिति में सुधार लायें। 17 जनवरी 1946 को दिल्ली में अयोजित नरेंद्र मण्डल की बैठक में वायसराय वैवेल ने जोर दिया कि राज्यों के शासक अपने राज्यों में अच्छी सरकार की स्थापना करें तथा प्रशासन की व्यवस्था आधुनिक पद्धति से करें। उन्होंने अच्छी सरकार के तीन आधारभूत मानक बताये- राजनीतिक स्थायित्व, पर्याप्त वित्तीय संसाधन तथा प्रशासन में लोगों की प्रभावी भागीदारी। मार्च 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा वायसराय को लिखे गये नीति निर्देशक पत्र में कहा गया कि वायसराय अपने स्तर पर सर्वोच्च प्रयास करेंगे कि जिन भारतीय रियासतों में राजनीतिक प्रगति धीमी रही है, उनमें किसी प्रकार की अधिक लोकतांत्रिक सरकार के गठन की प्रक्रिया त्वरित गति से हो।

    बिल ऑफ पीपल्स राइट्स

    कैबीनेट मिशन योजना की घोषणा के पश्चात नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब ने एक घोषणा की कि समस्त देशी राज्यों में विधान को स्थापित करने की राजाओं की तीव्र इच्छा है। निर्वाचित प्रतिनिधियों वाली लोकप्रिय संस्थायें स्थापित की जावेंगी जिससे राज्य के शासन में जनता का निकट तथा प्रभावकारी सम्बन्ध रहे। सुधारों की जो बहुसूत्री घोषणा की गयी थी उसमें सर्वप्रथम यह कहा गया था कि गैर कानूनी तरीके से किसी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जायेगा और न उसकी संपत्ति या निवास को जब्त या उससे पृथक किया जायेगा। इसे अखबारों में 'राजाओं की ओर से प्रजा को प्रदान किया हुआ अधिकार पत्र' (बिल ऑफ पीपल्स राइट्स) कहा गया।


    बीकानेर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    बीकानेर राज्य में ई.1907 में चूरू में सर्वप्रथम सर्वहितकारिणी सभा की स्थापना की गयी थी। यह एक सामाजिक, शैक्षणिक तथा अर्द्ध राजनैतिक संस्था थी। ई.1920 में बीकानेर में सद्विद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस संस्था का उद्देश्य रिश्वतखोरी और अन्याय के विरुद्ध अभियान चलाना था। संस्था ने 'धर्मविजय' तथा 'सत्यविजय' नामक दो नाटक मंचित किये जिनसे सरकारी क्षेत्र में हलचल मच गयी। बीकानेर सरकार ने सभायें आयोजित करने, भाषण करने तथा बाहरी व्यक्ति के रियासत में प्रवेश करने पर रोक लगा दी। सरकार ने लगभग 100 पुस्तकें जब्त कर लीं। ई.1931 में जयनारायण व्यास ने बीकानेर और चूरू के कार्यकर्ताओं से बीकानेर नरेश के निरंकुशतापूर्ण आचरण, दमन, आतंक तथा मनमानी पर 18 पृष्ठों की एक पुस्तिका तैयार करवाकर द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के सदस्यों में बंटवायी। लॉर्ड सेंकी ने वह पुस्तिका गंगासिंह के सामने ठीक उस समय रखी जिस समय वे देशी राज्यों के भारतीय संघ में शामिल होने की ब्रिटिश सरकार की योजना के समर्थन और निजाम हैदराबाद के विरोध में भाषण दे रहे थे। अपने प्रशासन का पोस्टमार्टम देखकर महाराजा आपे से बाहर हो गये और तबीयत खराब हो जाने के बहाने भाषण वहीं खत्म करके भारत के लिये रवाना हो गये। भारत पहुँचते-पहुँचते उन्होंने गुस्ताखी करने वालों को कठोर दण्ड देने का मानस बना लिया। स्वदेश लौटकर उन्होंने ऐसा किया भी।

    बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना

    4 अक्टूबर 1936 को बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना हुई। मघाराम वैद्य को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इस संस्था ने किसानों पर होने वाले अत्याचार, लाग-बाग, हरिजन समस्यायें तथा पुलिस द्वारा जनता पर किये जाने वाले अत्याचार के विरुद्ध अपने कार्यक्रम चलाये। राज्य में प्रजामण्डल की लोकप्रियता बढ़ने लगी तथा गाँव-गाँव से लोग समस्यायें लेकर प्रजामण्डल के कार्यालय पहुँचने लगे। मार्च 1937 में सरकार ने प्रजामण्डल के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्हें रिहा करके आदेश दिया गया कि वे राज्य की सीमा से बाहर चले जायें तथा बिना राज्यादेश के राज्य में प्रवेश न करें। इस निर्वासन की कड़ी प्रतिक्रया हुई। जनता ने निर्वासित नेताओं को जयघोष के बीच दिल्ली के लिये विदा किया। ये नेता दिल्ली में चल रही कांग्रेस समिति की बैठक में नेहरू, पटेल और सीतारमैया के समक्ष उपस्थित हुए तथा अपने निर्वासन के कारणों की जानकारी दी। 22 मार्च 1937 को अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद की दिल्ली में आयोजित सभा में बीकानेर राज्य की निष्कासन नीति की निंदा की गई। बीकानेर से निष्कासित लोगों ने कलकत्ता के प्रवासी राजस्थानियों के सहयोग से कलकत्ता में बीकानेर राज्य प्रजामंडल की स्थापना की तथा 'बीकानेर की थोथी पोथी' नामक पुस्तिका प्रकाशित करवायी। प्रजामंडल की शाखायें चूरू, राजगढ़, सुजानगढ़ तथा रतनगढ़ में भी खोली गयीं।

    उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये आंदोलन

    22 जुलाई 1942 को रघुवरदयाल गोयल के नेतृत्व में व्यापक जनाधार वाली 'प्रजा परिषद्' की स्थापना हुई। प्रजा परिषद ने अपनी स्थापना के सात दिन बाद उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये आंदोलन चलाने का निर्णय लिया। उसी दिन रघुवरदयाल गोयल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया। 3 फरवरी 1943 को महाराजा गंगासिंह का निधन हो गया। महाराजा सादूलसिंह ने भी दमन की नीति जारी रखी तथा घोषित किया कि बीकानेर के लाखों लोगों का बहुमत अपने महाराजा का सम्मान करता है और महाराजा से प्रेम करता है। महाराजा की उदार और आधुनिक नीतियों के कारण जब प्रजा परिषद वाले कुछ नहीं कर सकते तो उनका कार्य राजा और जागीरदारों को 'अन्नदाता' के स्थान पर 'अन्नखोस' कहना रह गया है। वे भारतीय नेताओं को अमृत दे रहे हैं और राज्य की प्रजा को विष।

    चार वर्ष तक प्रजा परिषद का आंदोलन चलता रहा जिससे राज्य के अधिकारी तथा महाराजा सख्ती से पेश आये किंतु जब आंदोलन को राज्य के किसानों का भी समर्थन प्राप्त होने लगा तो महाराजा के रुख में बदलाव आया। राजगढ़ कस्बे में किसानों के जुलूस में पुलिस अधिकारी ठाकुरसिंह ने कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की। महाराजा ने ठाकुरसिंह को मुअत्तल करके नेहरू को इसकी सूचना भिजवायी तथा राज्य की ओर से इस घटना के लिये खेद प्रकट किया। राज्य में तेजी से चल रहे किसान आंदोलन से महाराजा की सरकार घबरा गयी और वह आंदोलनकारियों की मांगे मानने के लिये विवश हो गयी।

    उत्तरदायी शासन की घोषणा

    21 जून 1946 को महाराजा ने घोषणा की कि राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना की जायेगी इसका विधिवत् प्रकाशन 31 अगस्त 1946 को किया जायेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये संविधान समिति और मताधिकार निर्वाचन क्षेत्र समिति की नियुक्ति की घोषणा की गयी। इन्हें क्रमशः संविधान का मसविदा बना कर पेश करने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करने का काम सौंपा गया। प्रजा परिषद ने घोषित किया कि प्रजा परिषद् की कार्य समिति और कार्यकर्ता सम्मेलन ने संविधान और मताधिकार समितियों में बीकानेर सरकार से सहयोग करने का निर्णय किया है और वे घोषणा पत्र को सीधे अस्वीकार नहीं करेंगे। किसानों के आंदोलन से आशंकित होकर महाराजा को अपनी, अपनी रियासत की और अपने राजघराने की सुरक्षा के लिये उत्तरदायी शासन की घोषणा करनी पड़ी। महाराजा ने ख्यालीराम नाम के एक जाट को जो कि प्रजापरिषद का सदस्य था, लोकप्रिय मिनिस्टर के पद का प्रलोभन देकर ग्राम सुधार मंत्री मनोनीत किया जो किसान आंदोलन की पीठ में छुरा भौंक सके। लोगों ने ख्यालीराम को कठपुतली मिनिस्टर के नाम से पुकारा। साथ ही सरकार ने व्यापारी व बनिया वर्ग को खुश करने के लिये संतोषचन्द बरड़िया नाम के एक व्यापारी व पूंजीपति को कठपुतली स्वायत्त शासन मंत्री बना दिया।

    प्रजा परिषद ने इस मंत्रिमण्डल को जनता के साथ धोखा बताते हुए 9 अगस्त 1946 को बलिदान दिवस मनाया। परिषद द्वारा कहा गया कि 21 जून को महाराजा की घोषणा के बाद हमारे पास नागरिक स्वतंत्रता की पार्सल कई रूपों में भेजी गयी है। मसलन रायसिंहनगर में गोली चलाकर, राजगढ़ में फौज भेजकर, गंगानगर के मौहल्लों में फौजी परेड करवाकर, सारी रियासत में धारा 144 लगाकर, जनसेवकों के मुँह पर ताले लगाकर हमें सरकार द्वारा क्या ही सुंदर नागरिक अधिकारों का पार्सल भेजा गया है। चौ. ख्यालीराम की निंदा की गयी और बीकानेर सेफ्टी एक्ट, प्रेस रूल्स आदि दमनकारी कानूनों को रद्द करने की मांग की गयी। विधान निर्मात्री परिषद में राज्य का प्रतिनिधित्व राजा के मनोनीत प्रतिनिधि की बजाय किसी जननेता द्वारा करवाने की मांग की गयी। गोयल ने जनता को सचेत किया कि उत्तरदायी शासन की बातचीत के भुलावे में कहीं हमारी संघर्ष की बारूद गीली न हो जाये।

    एक तरफ महाराजा उत्तरदायी शासन की घोषणा कर रहे थे तो दूसरी तरफ नित्य ही लाठी-गोली और धारा 144 की खबरें आ रही थीं। अतः बीकानेर में नागरिक अधिकारों की सही स्थिति जांचने के लिये अ.भा. देशीराज्य लोकपरिषद की राजपूताना इकाई के अध्यक्ष गोकुलभाई भट्ट एवं मंत्री हीरालाल शास्त्री बीकानेर भेजे गये। 19 अगस्त 1946 को शास्त्री ने बीकानेर में आयोजित जनसभा में महाराजा को बधाई दी कि उन्होंने बीकानेर में उत्तरदायी शासन लागू करने की घोषणा कर दी है किंतु सावधान किया कि पूर्ण नागरिक अधिकारों के अभाव में उत्तरदायी शासन की सारी बातें बेमेल हो जाती हैं। इसलिए पब्लिक सेफ्टी एक्ट, कठोर प्रेस नियम और जूलूसों पर पाबंदी के नियम अतिशीघ्र हटा लेने की वृत्ति को राजा गंभीरता से अनुभव करें तो सामयिक होगा।

    वैधानिक सुधारों की घोषणा

    31 अगस्त 1946 को बीकानेर नरेश ने उत्तरदायी शासन की विधिवत् घोषणा की। घोषणा में कहा गया कि एक विधान समिति विधानसभा का प्रारूप तैयार करेगी और दूसरी मताधिकार समिति मताधिकार की शर्तें और निर्वाचन क्षेत्रों का निर्णय करेगी। ये समितियां अपना कार्य 1 मार्च 1947 तक पूरा करेंगी। नवम्बर 1947 से पहले-पहले अंतरिम सरकार बना दी जायेगी और नया संविधान तैयार हो जाने पर चुनाव से बनी असेम्बली में बहुमत के आधार पर शासन चलेगा। परिषद् वाले इन वैधानिक सुधारों की घोषणाओं में सहयोग करने का निश्चय कर ही रहे थे कि सरकार का दमन चक्र फिर आरंभ हो गया। राज्य भर में जगह-जगह नागरिकों व कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गयीं। न तो मार्च तक रिपोर्ट तैयार हुई और न नवम्बर 1947 तक अंतरिम सरकार बनी। महाराजा ने पूरा वर्ष उत्तरदायी शासन के लिये गठित समितियों की रिपोर्ट की प्रतीक्षा में निकाल दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया किंतु बीकानेर नरेश बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पाया। उसने अपनी ठसक बरकरार रखते हुए, बीकानेर में स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजकों को सूचना भेजी कि वे सभा स्थल पर तिरंगा फहरा सकते हैं। वहाँ बीकानेर राज्य का सरकारी झण्डा भी फहराया जायेगा। सरकार की ओर से ऐसा आग्रह, महाराजा सादूलसिंह और हीरालाल शास्त्री के मध्य हुए झण्डा विवाद समझौते के फलस्वरूप किया गया था। आयोजकों ने इसकी परवाह नहीं की और केवल तिरंगा झण्डा ही फहराया।

    बीकानेर संविधान एक्ट

    दिसम्बर 1947 में 'बीकानेर संविधान एक्ट 1947' प्रकाशित किया गया। इसके अनुसार महाराजा के संरक्षण में कार्य करते हुए जनता के प्रति उत्तरदायी सरकार बननी थी। उसी क्रम में व्यापक मताधिकार पर आधारित दो सदनों वाली व्यवस्थापिका अस्तित्व में आईं कुछ बातों को छोड़कर सारा शासन एक परिषद को सौंप दिया गया जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था। महाराजा ने यह भी घोषणा की कि दो वर्षों के भीतर ही महाराजा के संरक्षण में एक पूर्ण उत्तरदायी सरकार बनायी जायेगी। महाराजा ने 2 फरवरी 1948 को घोषणा की कि अप्रेल 1948 तक पूर्ण उत्तरदायी सरकार अस्तित्व में आ जायेगी। इससे पूर्व 3 जनवरी 1948 को महाराजा ने सद्भावना के नाम पर हीरालाल शर्मा, रामलाल, बालचंद ब्राह्मण व मोहरसिंह को बीकानेर सेंट्रल जेल से तथा माणकचंद्र सुराणा, गिरीशचंद्र शर्मा, गणपत लाल, फूलचंद, नथमल व बेगाराम को ज्यूडिशियल लॉकअप से छोड़ने के आदेश दिये। मार्च 1948 में महाराजा ने दोहराया कि चुनावों के बाद नई व्यवस्थापिका संविधान एक्ट में संशोधन कर सकेगी।

    अंतरिम मंत्रिमण्डल

    18 मार्च 1948 को बीकानेर शासक ने अपनी मंत्रिपरिषद् के स्थान पर एक मिला-जुला अंतरिम मंत्रिमण्डल बनाने की घोषणा की जिसका कार्य राज्य के दैनिक शासन को चालू रखना था। उक्त मंत्रिमण्डल 16 जनवरी 1948 को राज्य के प्रधानमंत्री और राज्य प्रजा परिषद के कतिपय कार्यकर्ताओं के बीच एक समझौते का परिणाम था। समझौते की मुख्य धारायें इस प्रकार से थीं-

    (1.) अपने स्वाधिकार से बीकानेर राज्य भारतीय संघ की अलग इकाई के रूप में रहे।

    (2.) धारा सभा के चुनावों के लिये मतदाताओं की योग्यता में आवश्यक सुधार किये जाये।

    (3.) राजसभा के अधिकारों में कमी की जाये।

    (4.) दस सदस्यीय मंत्रिमण्डल में प्रधानमंत्री कुं. जसवंतसिंह होंगे, प्रजा परिषद के हरदत्तसिंह चौधरी, गौरीशंकर आर्य, सरदार मस्तानसिंह और चौ. कुंभाराम आर्य शामिल होंगे।

    महाराजा द्वारा मनोनीत चार और मंत्रियों- खुशालचंद डागा, पं. सूर्यकरण आचार्य, ठाकुर कुम्हेर सिंह व अहमदबख्श सिंधी को भी शपथ दिलवाई गयी। चौ. हरदत्तसिंह को उप प्रधान मंत्री बनाया गया तथा गृह मंत्रालय भी दिया गया। चौ. कुंभाराम राजस्व मंत्री एवं पं. गौरी शंकर आचार्य को शिक्षा मंत्री बनाया गया। प्रजा परिषद के कोटे का एक स्थान रिक्त रखा गया जिसे बाद में भरने की व्यवस्था थी। इस मिले जुले मंत्रिमण्डल में कांग्रेस के प्रतिनिधियों और महाराजा द्वारा मनोनीत राज्य के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों की संख्या बराबर-बराबर रखी गयी थी।

    इस मंत्रिमण्डल ने 18 मार्च 1948 को पद ग्रहण किया। महाराजा ने जिस द्विसदनीय व्यवस्थापिका, राजसभा और धारासभा का ऐलान किया था, उसका कांग्रेसी क्षेत्रों में पहले ही विरोध होना आरंभ हो गया था। इन दोनों सदनों में कुल 88 स्थान थे जिनमें से 46 स्थान राज्य के जमींदार वर्ग के लिये सुरक्षित रखे गये थे। रिजर्व सीटों की संख्या और व्यवस्था को अपरिवर्तनीय घोषित किया गया था। प्रीवीपर्स, बीकानेर फौज, जागीरें और जागीरदार, हाईकोर्ट जज, व महाराजा के आपात्कालीन अधिकारों आदि के बारे में न तो कोई विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता था, न कोई प्रस्ताव ही लाया जा सकता था तथा न ही उपरोक्त मामलों के सम्बंन्ध में कोई प्रश्न ही पूछा जा सकता था। परिषद के अनेक कार्यकर्ताओं का कहना था कि उपरोक्त व्यवस्था में वांछित मताधिकार की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है, अतः इस व्यवस्था के अंतर्गत अगर चुनाव होता है तो उसका कोई मतलब नहीं होगा। इसके अतिरिक्त जो परिषद जागीरदारों द्वारा किसानों पर किये जाने वाले जुल्मों को लेकर बराबर लड़ती रही, वह ऐसी व्यवस्था कैसे स्वीकार कर सकती है जिसमें जागीरदारों को विशेषाधिकार प्राप्त हों तथा सदन में उनके बारे में प्रश्न तक न पूछा जा सकता हो?

    मंत्रिमण्डल का विरोध

    बीकानेर राज्य प्रजापरिषद के मंत्री की ओर से इस संविधान के विरोध में 'बीकानेर का खोखला संविधान' शीर्षक से एक लेख छपवाया गया। बीकानेर राज्य प्रजा परिषद के अध्यक्ष चौ. हरदत्तसिंह, रघुवरदयाल गोयल, चौ. कुंभाराम, सरदार गुरदयालसिंह संधु व स्वामी कर्मानंद ने इस संविधान का भारी विरोध किया। हरदत्तसिंह ने 9 जनवरी 1948 को गंगानगर की एक विशाल जनसभा में कहा- वह विधान हमें अमान्य है जिसमें पूर्ण उत्तरदायित्व शासन का ढोल पीटा गया है। सारे विधान को देखने से मालूम होता है कि मध्यकालीन धार्मिक शक्तियों तथा सामंतवाद को पनपाने के लिये ही प्रगतिशीलता और जनतंत्र की आड़ में यह शिकार खेला गया है।

    नये संविधान से असहमत होने के बावजूद प्रजा परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष हरदत्तसिंह और मंत्री केदारनाथ शर्मा आदि ने इस मिले-जुले मंत्रिमण्डल के निर्माण के समय यह मान लिया था कि कांग्रेस 23 सितम्बर 1948 और उसके बाद के दिनों में होने वाले आम चुनावों में भाग लेगी और इस बीच यह मंत्रिमण्डल चालू नियम पद्धति से काम करता रहेगा। कुछ समय तो कार्य ठीक चलता रहा किंतु कुछ समय बाद बीकानेर प्रजा परिषद के असंतुष्ट दल के लोग मंत्रिमण्डल के विरुद्ध आंदोलनरत हो गये और सरकार पर कई तरह के आरोप लगाने लगे। प्रजा परिषद के असंतुष्ट कार्यकर्ताओं के सरकार के विरुद्ध लगाये गये आरोपों का खण्डन करने के लिये बीकानेर नगर में सुनारों की गुवाड़ में एक सभा बुलाई गयी। किंतु प्रजा परिषद के विरोध के कारण सभा शोर-गुल में समाप्त हो गयी। इसके पश्चात् प्रजा परिषद के असंतुष्ट सदस्यों ने राज्य के एकीकरण की आवाज उठानी आरंभ कर दी।

    प्रजा परिषद का आंदोलन रुकवाने के लिये सरदार पटेल से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया जिससे यह आंदोलन समाप्त हो गया। इसी समय राज्य की ओर से घोषणा की गयी कि बीकानेर राज्य में पूर्व निर्धारित आम चुनाव 23 सितम्बर 1948 व उसके बाद के दिनों में होंगे परंतु बीकानेर राज्य प्रजा परिषद ने अगस्त माह में इन चुनावों को स्थगित करने की मांग की।

    इन दिनों महाराजा अपने उपचार के लिये इंगलैण्ड गये हुए थे तथा उनके पुत्र करणीसिंह अपनी माता सुदर्शना कुमारी के सहयोग से राजकार्य देख रहे थे। चुनाव की इस गुत्थी को सुलझाने के लिये राजस्थान कांग्रेस के प्रांतीय नेता हीरालाल शास्त्री और गोकुल भाई भट्ट पुनः बीकानेर आये और करणीसिंह से बात की। इससे पूर्व राजपूताना प्रांतीय कौंसिल अप्रेल में एक प्रस्ताव पारित करके बालिग मताधिकार के अभाव में चुनाव में भाग लेने से राज्य प्रजा परिषद को मना कर चुकी थी।

    22 जुलाई 1948 से राज्य प्रजा परिषद को कांग्रेस कहा जाने लगा था। उसने 28 अगस्त 1948 को एक प्रस्ताव पारित करके कहा कि कांग्रेस आम चुनावों में भाग न ले तथा मिले-जुले अंतरिम मंत्रिमंण्डल से अपने प्रतिनिधियों को त्यागपत्र दिलवाकर वापिस बुलवाये। 31 अगस्त 1948 को महाराजा इंग्लैण्ड से लौटे। उन्होंने चुनावों में आये गतिरोध को दूर करने के लिये कांग्रेस को एक पत्र लिखकर उससे स्पष्टीकरण मांगा तथा उसका जवाब 4 सितम्बर तक भिजवाने के लिये कहा। इस बीच महाराजा ने दिल्ली में सरदार पटेल से भेंट की तथा उनसे राज्य में आम चुनावों में कांग्रेस द्वारा बाधा पहुंचाने के प्रयास पर विचार-विमर्श किया। पटेल ने महाराजा को सलाह दी कि वे इस विषय पर वी. पी. मेनन, हीरालाल शास्त्री, गोकुलभाई भट्ट व जयनारायण व्यास से बात करें। ये समस्त लोग उस समय दिल्ली में ही थे। मेनन, शास्त्री, भट्ट व व्यास ने महाराजा को सलाह दी कि चुनाव स्थगित कर दिये जायें। महाराजा ने उनकी बात मान ली और 7 सितम्बर 1948 को कांग्रेसी मंत्रियों के त्यागपत्र स्वीकार करके अंतरिम मंत्रिमण्डल को भंग कर दिया। चुनाव भी स्थगित कर दिये। महाराजा ने जोधपुर राज्य के भूतपूर्व दीवान सी. एस. वेंकटाचार (आई.सी.एस.) को जसवंतसिंह के स्थान पर नया प्रधानमंत्री बनाया।


    जयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    जयपुर रियासत में सवाई मानसिंह द्वितीय के शासन काल में जनता द्वारा उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन चलाया गया। ई.1931 में जमनालाल बजाज तथा कर्पूरचंद्र पाटनी के प्रयास से प्रजामण्डल की स्थापना की गयी किंतु अपनी स्थापना के पाँच वर्षों तक यह संगठन निष्क्रिय बना रहा तथा इसकी संपूर्ण गतिविधियाँ खादी उत्पादन तक सीमित रहीं। ई.1936 में हीरालाल शास्त्री द्वारा इस संस्था का पुनर्गठन किया गया तथा वकील चिरंजीलाल मिश्र को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इसकी शाखायें तहसीलों तक बढ़ा दी गयीं। रियासत के इंस्पेक्टर जनरल पुलिस मि. एफ. एस. यंग को आशंका हुई कि कहीं प्रजा मण्डल जयपुर महाराजा को हटाने के लिये तो कार्य नहीं कर रहा है? प्रजामंडल का उद्देश्य जानने के लिये मि. यंग ने 24 जुलाई 1937 को हीरालाल शास्त्री को एक पत्र लिखा। इस पर हीरालाल शास्त्री ने मि. यंग को पत्र लिखकर सूचित किया कि प्रजामंडल का उद्देश्य महाराजा को हटाना नहीं है।

    उत्तरदायी शासन की मांग

    1938 में जमनालाल बजाज जयपुर प्रजामण्डल के सभापति बनाये गये। उनकी अध्यक्षता में आयोजित प्रजामण्डल के पहले सम्मेलन में जयपुर महाराजा से उत्तरदायी शासन की मांग की गयी। इस सम्मेलन में लगभग 10 हजार स्त्री-पुरुष सम्मिलित हुए। अपने भाषण में बजाज ने कहा कि उत्तरदायी शासन की जो मांग की जाती है, उससे कुछ राजा लोग यह समझ लेते हैं कि ऐसी मांग करने वाले उनके दुश्मन हैं, यह ठीक नहीं है। राजा भले ही राजा बने रहें, मगर वे जो राजकाज करें, वह जनता के महज नाम पर नहीं बल्कि उसकी इच्छा, सलाह और स्वीकृति से करें।

    30 मार्च 1938 को राज्य सरकार ने आदेश जारी किया कि राज्य में कोई भी संस्था बिना पंजीकरण करवाये किसी तरह की गतिविधि नहीं चला सकती। संस्था के पंजीकरण के लिये ऐसी शर्तें लाद दी गयीं जिससे प्रजामण्डल अपनी गतिविधियाँ चला ही नहीं सके। प्रजामंडल ने इस आदेश का विरोध किया। 29 दिसम्बर 1938 को बजाज को जयपुर राज्य में प्रवेश नहीं करने दिया। राज्य के प्रधानमंत्री सर बीचम ने प्रजामण्डल आंदोलन को सख्ती से कुचलने की धमकी दी।

    महात्मा गांधी ने कहा- 'कांग्रेस ताकत में होते हुए भी इंतजार करती रहे और चुपचाप देखती रहे तथा जयपुर की जनता को मानसिक और नैतिक रूप से मरने दे, विशेषकर जबकि एक प्राकृतिक अधिकार पर लगाई गयी ऐसी पाबंदी के पीछे बिटिश साम्राज्य का पंजा हो, ऐसा कांग्रेस के लिये संभव नहीं है। जयपुर के प्रधानमंत्री अगर कोरी सत्ता के बल पर यह सब कर रहे हैं तो कम से कम उनको इस पद से ही हटा देना चाहिये। ' 

    जमनालाल बजाज और उनके साथियों को दुबारा जयपुर में प्रवेश करने पर गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर राज्य में सत्याग्रह किया गया। राज्य की ओर से अत्यधिक दमन किये जाने तथा 500 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किये जाने पर गांधीजी के आदेश पर 19 मार्च 1939 को यह सत्याग्रह बंद कर दिया गया। स्थिति इतनी खराब हो गयी कि गांधीजी ने समाचार पत्रों को एक बयान जारी करके कहा कि 'यदि जयपुर राज्य ने जमनालाल और उनके साथियों को मुक्त नहीं किया तो कांग्रेस के पास जयपुर को अखिल भारतीय मुद्दा बनाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रहेगा।' 

    संवैधानिक सुधारों की शुरुआत

    प्रजामंडल की मांग सर बीचम के स्थान पर किसी भारतीय व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किये जाने को लेकर थी। जयपुर नरेश ने राजा ज्ञाननाथ को जयपुर राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया। हीरालाल शास्त्री के अनुसार यह व्यक्ति अंग्रेजों का हुक्मी बंदा था। इस व्यक्ति से प्रजामंडल वालों का विरोध ही रहा तथा उत्तरदायी शासन की मांग बनी रही। कुछ दिनों बाद मिर्जा इस्माइल को जयपुर राज्य का प्रधानमंत्री बनाया गया। 1942 में मिर्जा इस्माइल तथा प्रजामण्डल के बीच समझौता हुआ जिसमें यह स्वीकार किया गया कि जयपुर महाराजा की ओर से जनता को उत्तरदायी शासन देने की दृष्टि से कार्यवाही जल्दी शुरू की जायेगी।

    विधान सभा का गठन

    26 अक्टूबर 1942 को जयपुर नरेश ने राज्य में संवैधानिक सुधारों के लिये एक विशेष समिति नियुक्त की। इस समिति ने राज्य में प्रतिनिधि सभा तथा लेजिस्लेटिव एसेम्बली के गठन का सुझाव दिया। ई.1944 में राज्य में कुछ संवैधानिक सुधार किये गये तथा सरदारों की काउंसिल को समाप्त कर दिया गया। 1 जून 1944 को जयपुर राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिये 'जयपुर राज्य अधिनियम' पारित किया गया। ई.1945 में राज्य सरकार ने प्रतिनिधि सभा तथा लेजिस्लेटिव एसेम्बली बनाने का निर्णय लिया। प्रजामण्डल को प्रतिनिधि सभा की 27 सीटों पर तथा लेजिस्लेटिव एसेम्बली की 3 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। सितम्बर 1945 में नये व्यवस्थापक मण्डल का गठन हुआ और उत्तरदायी सरकार के लक्ष्य की नीति के अनुसरण में मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री सहित पाँच सदस्यों में एक-एक मंत्री की नियुक्ति धारा सभा में बहुमत प्राप्त दल में से की गयी। विधानसभा के दोनों सदनों में धर्म, व्यवसाय और जागीरदारों को इस ढंग से प्रतिनिधित्व प्राप्त था कि सत्ता जनप्रतिनिधियों को दी जानी संभव नहीं थी।

    उत्तरदायी शासन की स्थापना

    मार्च 1946 में टीकाराम पालीवाल ने विधानसभा में राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना सम्बन्धी प्रस्ताव प्रस्तुत किया जो स्वीकृत हो गया। 15 मई 1946 को प्रजामंडल के अध्यक्ष देवीशंकर तिवाड़ी को राज्य मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किया गया। इस प्रकार जयपुर राज्य राजस्थान का पहला राज्य बना जिसने अपने मंत्रिमंडल में गैर सरकारी मंत्री की नियुक्ति की। अक्टूबर 1946 में जयपुर राज्य प्रजामंडल ने एक प्रस्ताव पारित करके देश में हो रहे बड़े परिवर्तनों के मुकाबले जयपुर सरकार की ओर से शासन सुधार मामले में चल रही निष्क्रियता पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा मांग की कि जयपुर राज्य की विधान समिति जयपुर के लिये जून 1948 से पहले ऐसे विधान की रचना करे जिसमें शासनतंत्र पूर्ण रूप से जयपुर की जनता के प्रति उत्तरदायी हो। 10 मई 1947 को दौलतमल भण्डारी को प्रजामंडल के दूसरे प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया। जागीरदारों में से डॉ. खुशालसिंह गीजगढ़ और राव अमरसिंह अजयराजपुरा भी मंत्री बनाये गये।

    मार्च 1946 में जयपुर धारासभा में स्वीकृत उत्तरदायी शासन सम्बन्धी प्रस्ताव को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से 14 मई 1947 को एक समिति गठित की गयी। इस बीच राज्य सरकार तथा प्रजामंडल के बीच वार्त्ता चलती रही। तीन माह तक वार्त्ता चलने के बाद राज्य में संवैधानिक सुधारों को लेकर एक समझौता हो गया। राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना का निश्चय किया गया। राज्य के प्रधानमंत्री वी.टी. कृष्णामाचारी ने महाराजा की ओर से 1 मार्च 1948 को संवैधानिक सुधारों की घोषणा की। इस घोषणा का सर्वत्र स्वागत किया गया। यह निश्चय किया गया कि मंत्रिमण्डल को विकसित किया जाये और प्रधानमंत्री को छोड़कर शेष समस्त मंत्री धारासभा के समस्त दलों में से लिये जायें। प्रधानमंत्री को दीवान, मुख्यमंत्री को मुख्य सचिव और मंत्रियों को सचिव कहा जाये। इस प्रकार नये मंत्रिमंडल में एक दीवान, एक मुख्य सचिव तथा पाँच सचिव लिये जाने थे। ये सब वर्तमान विधान के अधीन एक उत्तरदायी मंत्रिमंडल की भांति मिलकर कार्य करेंगे।

    28 मार्च 1948 को महाराजा ने वी.टी. कृष्णामाचारी को दीवान नियुक्त किया तथा हीरालाल शास्त्री को मुख्य सचिव बनाया। देवीशंकर तिवाड़ी, दौलतमल भंडारी और टीकाराम पालीवाल प्रजामंडल की ओर से सचिव बनाये गये। गीजगढ़ के ठाकुर कुशलसिंह और अजयराजपुरा के मेजर जनरल रावल अमरसिंह, जागीरदारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सचिव थे। हीरालाल शास्त्री ने सचिव के स्थान पर मंत्री शब्द प्रयुक्त किया है- 'ई.1948 में राज्य में मैसूर मॉडल पर मंत्रिमण्डल का गठन किया गया जिसमें एक दीवान, एक मुख्यमंत्री तथा शेष मंत्री होते थे। राज्य के प्राइम मिनिस्टर वी. टी. कृष्णामाचारी को दीवान बनाया गया। कुछ ऐसा सोचा गया कि सर वी. टी. जैसे दीवान के मुकाबले में किसी मजबूत आदमी को मुख्यमंत्री बनना चाहिये। एसी हालत में जयपुर का मुख्यमंत्री बनने का भार मुझ पर आ पड़ा। मेरे साथ प्रजामंडल से देवीशंकर तिवारी, दौलतमल भंडारी तथा टीकाराम पालीवाल को भी मिनिस्टर बनाया गया। इनके अतिरिक्त ठाकुर कुशालसिंह गीजगढ़ तथा रावल अमरसिंह अजयराजपुरा को भी जागीरदारों की ओर से मिनिस्टर बनाया गया।'

    इस समय तक राजपूताना के राजा कांग्रेस से सहयोग के लिये तैयार हो गये थे। अब वह अपने राज्यों में पहले की तरह इसके अधिवेशन पर रोक लगाने की स्थिति में नहीं रहे थे। 18 दिसम्बर 1948 को जयपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस पर 55 लाख रुपया खर्च हुआ। इस सम्मेलन के लिये जयपुर राज्य की विशेष मदद रही। जोधपुर, बीकानेर व सिरोही रियासतों एवं राजस्थान संघ ने भी मदद की। सरदार वल्लभ भाई की सहायता से जयपुर, जोधपुर, उदयपुर तथा बीकानेर के महाराजाओं से चंदा लेकर कांग्रेस अधिवेशन का हिसाब साफ किया गया। वृहद राजस्थान का निर्माण होने तक यही लोकप्रिय मंत्रिमण्डल रहा। इस प्रकार जयपुर राज्य में प्रजामंडल द्वारा उत्तरदायी शासन के लिये चलाया गया संघर्ष सफल हुआ।


    जोधपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    ई.1917 में जोधपुर में मारवाड़ हितकारणी सभा बनी जिसका संविधान 1924 में प्रकाशित हुआ। इस संस्था ने नगर परिषद व पुलिस एक्ट में सुधार करने के लिये हड़ताल की। ई.1920 में दिल्ली में 'राजस्थान सेवा संघ' की स्थापना के समय जोधपुर में 'मारवाड़ सेवा संघ' की स्थापना हुई। 'मारवाड़ सेवा संघ' का उद्देश्य भ्रष्ट नौकरशाही के कुशासन का प्रतिरोध करना और अवैधानिक कार्यवाहियों के विरुद्ध आवाज उठाना था जिससे कि मारवाड़ की जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हो सके। इस संगठन का सम्बन्ध राजस्थान सेवा संघ से था। मारवाड़ सेवा संघ के सदस्य जयनारायण व्यास, कानमल, दुर्गाशंकर श्रीमाली, भंवरलाल सर्राफ और प्रयागराज भण्डारी थे।

    ई.1924 में 'मारवाड़ सेवा संघ' वालों ने 'मारवाड़ हितकारणी सभा' को एक बार फिर से सक्रिय किया। इस बार संस्था ने महाराजा उम्मेदसिंह के संरक्षण में मारवाड़ राज्य में जनता की स्थिति में सुधार लाने का संकल्प व्यक्त किया। ई.1925 में मारवाड़ हितकारिणी सभा के प्रतापचंद सोनी, चांदमल शर्मा व शिवकरण जोशी को मारवाड़ छोड़कर जाने के आदेश दिये गये तथा जयनारायण व्यास, आनंदराज सुराणा, अब्दुल रहमान अंसारी, अमरचंद मूथा, किस्तूरकरण एवं बच्छराज व्यास को बदमाश घोषित करके उनके नाम पुलिस के रजिस्टर संख्या 10 में लिखे गये। उन्हें प्रति दिन पुलिस केंद्र पर उपस्थित होने तथा प्रति रात्रि पुलिस केंद्र की गार्ड की निगरानी में सोने के आदेश दिये गये। राज्याधिकारियों की ज्यादती से तंग आकर व्यास ने जोधपुर छोड़ दिया और ब्यावर जाकर रहने लगे।

    लोकमान्य तिलक द्वारा आरंभ किये गये गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव की राजनीतिक जागृति में प्रभावी भूमिका को देखते हुए वैद्य हेमचन्द्र छंगाणी ने जुलाई 1928 में जोधपुर में दुर्गादास जयंती के आयोजन की योजना तैयार की। उन्होंने दुर्गादास जयंती उत्सव समिति की ओर से राजकीय प्रेस के अधीक्षक को इस जयन्ती के आयोजन का दो पृष्ठों को एक नोटिस छपने के लिये भेजा जिसमें मारवाड़ की जनता से दुर्गादास जयन्ती मनाने का अनुरोध किया गया। इस अनुरोध को एक असाधारण बात समझा गया। प्रेस अधीक्षक ने इस नोटिस को स्टेट कौंसिल के उपाध्यक्ष विंडम को भेज दिया।

    विंडम ने पुलिस प्रमुख कोठावाला को लिखा- 'दुर्गादास राठौड़ों के इतिहास में अमर है किंतु 200 वर्षों की दीर्घ अवधि में यह प्रथम अवसर है कि कोई व्यक्ति उसकी जयंती के लिये आगे आया है । यदि कोई राठौड़ राजपूत आगे बढ़कर ऐसा अनुरोध करता तो वह अधिक तर्क संगत लगता। हेमचंद छंगाणी एक पुष्करणा ब्राह्मण है और असहयोग आंदोलन के काल से उसकी गतिविधियां संदेहास्पद रही हैं। और मैं यह नहीं समझ पाता कि अगर वह वास्तव में दुर्गादास जयंती मानने के लिये आतुर है तो वह इस सूचना को राज्य के गजट में छपवाने के लिये इतना व्याकुल क्यों है? इस तरह वह प्रशासन से अर्द्धशासकीय अनुमति प्राप्त करना चाहता है। इस पर विंडम ने प्रेस अधीक्षक को आदेश दिया कि यह सामग्री राजकीय गजट में नहीं छापी जाये और नोटिस को गोपनीय फाइल में रखा जाये।' 

    राजकीय प्रेस में प्रकाशित न होने पर वैद्य हेमचन्द्र ने अपने एक अन्य नोटिस को निजी प्रेस में छपवाया तथा 29-31 अगस्त 1928 को जयंती का आयोजन करवाया। राज्य सरकार की ओर से इस जयंती को मनाने में बाधा उत्पन्न की गयी काफी तर्क वितर्क के बाद इसे मनाने की अनुमति दी गयी। इस उत्सव की सफलता से अप्रसन्न होकर राज्य कौंसिल ने निर्णय लिया कि अब किसी भी वक्ता को सार्वजनिक भाषण देने के लिये कौंसिल के उपाध्यक्ष से अनुमति लेनी होगी। 11-12 मई 1929 को जोधपुर में हितकारणी सभा के तत्वावधान में सभायें आयोजित की गयीं। इनमें हेमचन्द्र छंगाणी, जयनारायण व्यास, प्रयाग राज भण्डारी आदि के भाषण हुए। लोगों से बम्बई में आयोजित होने वाले देशी राज्य परिषद के सम्मेलन में भाग लेने की अपील की गयी।

    मारवाड़ हितकारणी सभा ने जोधपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की मांग की और राज्य में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता तथा संस्था बनाने की स्वतंत्रता की भी मांग की। ई.1929 में इस सभा ने जागीरों में बेगार रोकने, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने, धान व चारे के निर्यात पर रोक लगाने, नौकरियों में भर्ती हेतु बोर्ड बनाने आदि मांगों को लेकर आंदोलन किये।

    1929 में अ. भा. देशी राज्य लोक परिषद के बम्बई अधिवेशन में जोधपुर राज्य के जयनारायण व्यास, हेमचंद्र छंगाणी, बद्रीप्रसाद, वेदांत भूषण, जयनारायण तापड़िया, कन्हैयालाल कलयंत्री, भंवरलाल सर्राफ और जयनारायण गज्जा ने भाग लिया। इन नेताओं ने अ. भा. देशीराज्य लोकपरिषद का अगला अधिवेशन जोधपुर में आयोजित करने की योजना बनायी जिसमें गांधी, नेहरू, सप्रू और मालवीय आदि नेताओं को आमंत्रित किया जाना था। सितम्बर 1929 में सम्मेलन के आयोजन पर रोक लगा दी गयी। 22 नवम्बर 1929 को हेमचन्द्र छंगाणी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को खुला पत्र भेजकर मारवाड़ के कुशासन की कटु आलोचना की। पत्र में भ्रष्टाचार और विलासिता का वर्णन करते हुए राज्य कौंसिल को एक स्वांग बताया गया जिसमें विंडम के अलावा समस्त सदस्य अनुभवहीन तथा बौने थे। ई.1934 में मारवाड़ पब्लिक सेफ्टी ऑर्डीनेंस लागू किया गया जिससे मारवाड़ की जनता के नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों को धक्का लगा। महाराजा चाहते थे कि जनता ब्रिटिश ताज के संरक्षण में उत्तरदायी शासन के लिये शांति और सहयोग से कार्य करे।

    मारवाड़ प्रजा मण्डल

    ई.1934 में मारवाड़ प्रजामंडल अस्तित्व में आया। इसका मुख्य उद्देश्य सामंतों के अन्याय से पीड़ित किसानों की समस्याओं का निराकरण करवाना तथा राज्य में उत्तरदायी शासन एवं नागरिक स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु आंदोलन चलाना था। ई.1935 में डोनाल्डफील्ड राज्य के मुख्यमंत्री बने। ई.1936 में जोधपुर में भी 'नागरिक स्वतंत्रता संघ' बनाने की चेष्टा की गयी किंतु उस पर तत्काल रोक लगा दी गयी।

    मारवाड़ लोकपरिषद

    ई.1938 में मारवाड़ लोकपरिषद की स्थापना हुई। इस संस्था का उद्देश्य महाराजा की छत्रछाया में मारवाड़ में उत्तरदायी शासन स्थापित करना था। चूंकि जयनारायण व्यास निर्वासन में चल रहे थे इसलिये रणछोड़दास गट्टानी को इसका सभापति बनाया गया। महाराजा उम्मेदसिंह ने मारवाड़ लोकपरिषद में फूट डालने की कोशिश की थी। जब जयनारायण व्यास के पिता सेवाराम मृत्यु शैय्या पर थे तो उन्होंने व्यास को संदेश भिजवाया कि वे चाहें तो अपने पिता को देखने आ सकते हैं। इस पर व्यास ने महाराजा को सूचित किया कि वे आ रहे हैं। आप यदि गिरफ्तार करना चाहें तो कर लें। उनके पिता 12 दिन जिंदा रहे किंतु व्यास को कैद नहीं किया गया। इसके बाद महाराजा ने व्यास को आमंत्रित किया कि आप एडवाइजरी एसेम्बली के सदस्य हो जायें। व्यास ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन दिनों भींवराज पुरोहित मारवाड़ लोकपरिषद के अक्ष्यक्ष थे। उन्होंने इस मुद्दे पर कार्यकारिणी की बैठक बुलाईं रणछोड़दास गट्टानी ने मारवाड़ लोकपरिषद की कार्यकारिणी में आपत्ति की कि मारवाड़ लोकपरिषद को विश्वास में लिये बिना व्यास यह प्रस्ताव कैसे स्वीकार कर सकते हैं? इस पर महाराजा समर्थित एक साप्ताहिक समाचार पत्र मारवाड़ समाचार में एक गुमनाम लेख 'गट्टानी का गरल' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। ऐसा माना गया कि यह लेख व्यास ने ही लिखा है। गट्टानी ने समाचार पत्र पर मुकदमा कर दिया। इस पर समाचार पत्र ने गट्टानी से माफी मांग ली।

    1940 में जोधपुर के स्वतंत्रता सेनानी गणेशलाल व्यास 'उस्ताद' ने 'बेकसों की आवाज' नामक पुस्तक का सम्पादन किया। इसे मारवाड़ लोकपरिषद के नेता भंवरलाल सर्राफ ने कामर्शियल प्रेस नयी दिल्ली से छपवाया। 9 अप्रेल 1940 को जोधपुर राज्य ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। 1940 में ही योगीराज ब्रह्मचारी की पुस्तक 'अमानत का हिसाब' को भंवरलाल सर्राफ ने ब्यावर के रामनिवास शर्मा के माध्यम से प्रकाशित करवाया। इस पुस्तक में जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री डोनाल्ड फील्ड के निरंकुश प्रशासन के विरुद्ध अभियान प्रारंभ करने की प्रार्थना जनता से की गयी थी। इस पुस्तक को भी जब्त कर लिया गया।

    मार्च 1940 में मारवाड़ लोकपरिषद को अवैध घोषित कर दिया गया। अप्रेल 1940 में महाराजा उम्मेदसिंह ने अपने एक भाषण में लोकपरिषद के आंदोलन को आधारहीन राजनीतिक आंदोलन बताया तथा चेतावनी दी कि मैं अपने युवा वर्ग को भ्रष्ट बनाने तथा किसानों को विद्रोह के लिये उकसाने हेतु डिजाइन किये गये इस तरह के खुले विध्वंसात्मक आंदोलन को सहन करने के लिये तैयार नहीं हूँ। लोकपरिषद में कई अनुभवहीन युवक हैं जिन्होंने अपने जीवन में कोई सफलता अर्जित नहीं की है। यह परिषद उन्हें नये स्वर्ग तथा नयी धरती के निर्माण का स्वप्न दिखाने की विधि अपना रही है। लोकपरिषद को अवैध घोषित किये जाने तथा महाराजा द्वारा परिषद के कार्यकर्ताओं पर अत्याचार किये जाने के सम्बन्ध में गांधीजी ने हरिजन में चिंता व्यक्त की। गांधीजी का कहना था कि लोकपरिषद की 30 शाखाएं हैं तथा उसमें अनेक अनुभवी सदस्य हैं। लोकपरिषद प्रशासन को सहयोग करने को तैयार है किंतु उसका लक्ष्य राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है।

    जून 1940 में मारवाड़ लोकपरिषद पुनः वैध संस्था घोषित हुई किंतु जोधपुर नरेश ने राजनीतिक गतिविधियों को रोकने के लिये हर संभव अत्याचार एवं दबाव की नीति अपनायी। हुक्मराज मेहता राजनीतिक गतिविधयों में सक्रिय भाग लेते थे इसलिये मुख्यमंत्री ने बदले की भावना से 25 दिसम्बर 1941 को उनकी विधवा माँ को धमकी भरा पत्र भेजा कि हुक्मराज मेहता राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेता है, ये राज्य के विरुद्ध है, क्यों नहीं तुम्हारा स्टाईपेण्ड जो 35 रुपये मिलता है, बंद कर दिया जाये? समाचार पत्रों में इसकी भर्त्सना हुई। मारवाड़ लोकपरिषद ने भी सरकार की इस अमानवीय कार्यवाही की निन्दा की जिससे घबराकर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। मेहता जो कि उम्मेद कृषि फार्म के विद्यार्थी थे, उन्हें कोई कारण बताये बिना प्रतिबंधित कर दिया गया।

    8 फरवरी 1942 को रणछोड़दास गट्टानी की अध्यक्षता में लाडनूं में मारवाड़ लोकपरिषद का तृतीय सत्र आयोजित किया गया। उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री डी. एम. फील्ड पर वचनभंग का आरोप लगाते हुए कहा कि हमारे राज्य का मुख्यमंत्री ब्रिटिश है। उसने अपने वायदों को गंभीरता से नहीं निभाया है। उसने 22 एडवाइजरी बोर्ड्स से ताश के पत्तों का घर बनाया और तोड़ दिया। उसने पंचायतें बनायीं तथा अब प्रतिनिधि सलहाकार सभा भी बनायी है किंतु इन संस्थाओं ने अपने निर्माण के बाद क्या भलाई की है? जनता तीन दारों- थानेदारों, हवलदारों तथा जागीरदारों की निरंकुशता से त्रस्त है।

    आंदोलन के दौरान जून 1942 में जेल में बंद लोकपरिषद के कार्यकर्ता बालमुकुंद बिस्सा की मृत्यु हो गयी। इस पर गांधीजी ने कांग्रेस के कार्यकर्ता श्रीप्रकाश को जोधपुर राज्य के अधिकारियों से वार्त्ता करने के लिये भेजा। श्रीप्रकाश ने रिपोर्ट दी कि जोधपुर राज्य के अधिकारियों ने लोगों को कुचलने के लिये मुक्त लाठी चार्ज के आदेश दिये। लोकपरिषद के कुछ नेता अपनी भाषा में संयमित नहीं रहे हैं। यदि लोकपरिषद के नेता अपनी भाषा सीमा के अंदर रखें तो राज्याधिकारियों को लोकपरिषद द्वारा बैठकें आयोजित करने तथा उत्तरदायी शासन की मांग करने में भी कोई आपत्ति नहीं है। 14 नवम्बर 1942 को डी. एम. फील्ड ने आदेश जारी किये कि चूंकि श्रीवल्लभ पुष्करणा जो कि कोर्ट ऑफ वार्ड्स विभाग का पूर्व कार्मिक है, उसने खुले रूप से लोकपरिषद के आंदोलन के प्रति सहानुभूति प्रकट की है इसलिये उसे किसी भी सरकारी विभाग में नौकरी न दी जाये। ई.1942 में जयनारायण व्यास ने एक पुस्तिका लिखी- 'उत्तरदायी शासन के लिये आंदोलन।' रणछोड़दास गट्टानी ने एक और पुस्तिका लिखी- 'आंदोलन क्यों?' सरकार ने व्यास की पुस्तिका के वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया और व्यास को गिरफ्तार कर लिया।

    विधान सभा का गठन

    ई.1944 में राज्य में संवैधानिक सुधारों को लेकर बड़ौदा राज्य के मुख्य न्यायाधीश राजरत्न एम. ए. सुधालकर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसने अपनी रिपोर्ट नवम्बर 1944 में राज्य सरकार को सौंपी। इस समिति की सिफारिश के आधार पर 24 जुलाई 1945 को महाराजा उम्मेदसिंह ने अपने जन्म दिवस पर जोधपुर राज्य में विधानसभा के गठन की घोषणा की। 28 मार्च 1947 को महाराजा ने दी जोधपुर लेजिस्लेटिव एसेम्बली रूल्स का अनुमोदन किया। राज्य सरकार इस समिति की सिफारिशों के आधार पर राज्य में संवैधानिक सुधार करना चाहती थी किंतु मारवाड़ लोकपरिषद् ने इस समिति की सिफारिशों को यह कह कर मानने से इन्कार कर दिया कि ये सुधार अपर्याप्त ही नहीं थे अपितु वे राज्यों में उत्तरदायी शासन प्राप्त करने की वैध जन आकांक्षा को भी पूरा नहीं करते थे। परिषद् ने सुधालकर समिति की पूरी रिपोर्ट को प्रकाशित करने की मांग की किंतु राज्य सरकार ऐसा करने के लिये तैयार नहीं थी।

    इसी बीच महाराजा उम्मेदसिंह की मृत्यु हो गयी तथा 21 जून 1947 को हनवंतसिंह को जोधपुर का महाराजा बनाया गया। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हो गया। स्वतंत्रता दिवस की प्रसन्नता में जोधपुर नगर में स्थित पीपलिया महादेव मंदिर के द्वार हरिजनों तथा अन्य अछूतों के लिये खोल दिये गये।

    लोकपरिषद द्वारा विधानसभा तथा मंत्रिमण्डल का विरोध जारी रहा। यह आरोप लगाया गया कि जोधपुर की मौजूदा मिनिस्ट्री जागीरदारों का अखाड़ा बना हुआ है। मौजूदा ऐसेम्बली अधिकार शून्य, थोथी और खोखली है जिसे कोई भी जनतंत्रवादी बर्दाश्त नहीं कर सकता। मारवाड़ की तमाम जनवादी संस्थाओं ने सुधालकर योजना पर किये गये सुधारों का डट कर विरोध किया था लेकिन उस सबके बावजूद थोथी और अधिकारहीन धारा सभा स्थापित कर दी गयी। लोकपरिषद्, किसान सभा, महिला परिषद और मजदूर सभाओं के बहिष्कार करने के परिणाम स्वरूप धारा सभा में जागीरदार, जातीय विद्वेष के हिमायती, या देहातों में जागीरदारों अथवा सरकारी हुक्कामों के कृपापात्र ही पहुँचाये गये हैं।

    नया मंत्रिमण्डल

    महाराजा हनवंतसिंह ने 24 अक्टूबर 1947 को राज्य में नये मंत्रिमण्डल के गठन की घोषणा की तथा कहा कि नये मंत्रिमण्डल में केवल मारवाड़ी लोग लिये गये हैं। उन्होंने अपने काका महाराजधिराज अजीतसिंह को राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा दूसरे छोटे भाई 22 वर्षीय महाराज हिम्मतसिंह को राज्य का गृहमंत्री बनाया। संखवास के ठाकुर माधोसिंह को राजस्व मंत्री, लाला हरिश्चंद्र माथुर को न्यायमंत्री, ठाकुर भैंरूसिंह को जनस्वास्थ्य मंत्री तथा मेहता जसवंतराज को स्थानीय निकाय मंत्री नियुक्त किया।

    महाराजा ने उसी दिन यह घोषणा भी की कि 17 नवम्बर 1947 को विधान सभा का अधिवेशन बुलाया जायेगा। इस मंत्रिमण्डल के गठन से नेहरू और पटेल बहुत नाराज हो गये। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शीघ्रातिशीघ्र जनतंत्रवादी मंत्रिमण्डल बनना चाहिये तथा महाराजा को जयनारायण व्यास का विश्वास प्राप्त करना चाहिये और वैधानिक समस्या को जल्द सुलझा देना चाहिये। राष्ट्रपताका ने जातीयता के आधार पर बने इस मंत्रिमण्डल की कटु आलोचना की अपने पिता उम्मेदसिंह की तरह महाराजा हनवंतसिंह ने भी मारवाड़ लोकपरषिद में फूट डालने का प्रयास किया। रणछोड़दास गट्टानी के छोटे भाई मोहन गट्टानी महाराजा के सहपाठी थे। उनके माध्यम से हनवंतसिंह ने रणछोड़दास गट्टानी को मंत्रिपरिषद की सदस्यता के लिये आमंत्रित किया किंतु गट्टानी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

    विधान सभा का विरोध

    महाराजा की घोषणा को देखते हुए मारवाड़ लोकपरिषद ने 14 नवम्बर 1947 को एसेम्बली विरोधी दिवस मनाने का निर्णय लिया। अतः पूरे राज्य में विरोध सभायें आयोजित की गयीं। 16 नवम्बर 1947 को जोधपुर में आयोजित एसेम्बली विरोधी सभा में मारवाड़ लोकपरिषद के साथ-साथ किसान सभा, विद्यार्थी संघ, रेलवे यूनियन एवं महिला परिषद् के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सभा में जागीरदारों के प्रभुत्ववाली विधान सभा की समाप्ति तथा वयस्क मताधिकार के आधार पर राज्य में निर्वाचित संविधान निर्मात्री संस्था एवं जनता की अंतरिम सरकार की स्थापना की मांगें रखी गयीं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये राज्य में विरोध सभायें आयोजित करने एवं आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया। साथ ही नेहरू ब्रिगेड की स्थापना की गयी जो राज्य में होने वाली जन सभाओं को हुल्लड़ करने वाले गुण्डा तत्वों से बचाये।

    हनवंतसिंह अपनी घोषणा पर डटे रहे। उन्होंने 17 नवम्बर 1947 को राइकाबाग राजमहल के कैबिनेट हॉल में राज्य की विधान सभा का उद्घाटन किया। महाराजा ने अपने उद्बोधन में कहा कि जोधपुर राज्य अधिनियम 1947 मारवाड़ के वैधानिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। राज्य शासन के साथ जनता का संपर्क स्थापित करने के अभिलिषित उद्देश्य की ओर यह पहला कदम है। मेरे जीवन में वह दिन सबसे अधिक आनंददायक होगा जब मैं अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह विधान के अनुरूप कर सकूंगा। राज्य के प्रथम सेवक के नाते मरुधर प्रदेश को यथासामर्थ्य सुखी तथा समृद्धिशाली बनाने की मेरी तीव्र आकांक्षा है।

    धारा सभा में मारवाड़ सेवा मण्डल के सदस्यों ने इन्द्रनाथ मोदी की अध्यक्षता में स्वतंत्र पार्टी का निर्माण किया। मदनगोपाल काबरा को इस पार्टी का मंत्री बनाया गया। इस पार्टी की तरफ से धारा सभा के मंत्री को 30 नवम्बर 47 को आगामी अधिवेशन के लिये प्रस्ताव भेजा गया कि राज्य की शासन व्यवस्था में आवश्यक वैधानिक सुधार प्रस्तुत करने हेतु एक विधान सुधार समिति शीघ्र स्थापित की जावे जिसका उद्देश्य महाराजा की छत्रछाया में जिम्मेवार हुकूमत कायम करने का हो। इस समिति के सदस्य केवल वर्तमान धारा सभा के सदस्यों में से ही न चुने जायें बल्कि उन वर्गों व राजनैतिक संस्थाओं में से भी शरीक किये जायें जिनका प्रतिनिधित्व धारा सभा में नहीं हो सका है। यह समिति तीन माह में नये विधान का मसविदा पेश करे ताकि उसे अति शीघ्र क्रियात्मक रूप दिया जा सके।

    7 दिसम्बर 1947 को जोधपुर में राजपूताना प्रांतीय परिषद का सम्मेलन हुआ। राजस्थान की विभिन्न रियासतों में बने लोकप्रिय मंत्रिमण्डलों में लोकपरिषद तथा प्रजापरिषद के जो नेता लिये गये थे, उन्होंने भी इस सम्मेलन में भाग लिया। महाराजा समर्थकों ने इस अधिवेशन का विरोध किया तथा कहा कि केवल बालिग मताधिकार के आधार पर बनने वाले मंत्रिमण्डल के मंत्री ही वास्तविक जनप्रतिनिधि होने का दावा कर सकते हैं। ऊपर से थोपकर बनाये गये मंत्री जनप्रतिनिधि नहीं माने जा सकते। जयनारायण व्यास द्वारा इस सम्मेलन में दिये गये भाषण की भी महाराजा समर्थकों द्वारा आलोचना की गयी। उन्होंने आरोप लगाया कि व्यास ने राजाओं से मोर्चा लेने के लिये रियासतों में सैनिक जन-संगठन बनाने की ओर इशारा किया है। भाषण के जोशीले शब्दों से आभास होता है कि रियासती जनता में क्रांति की भयानक आग धधक उठी है। ऐसा प्रतीत होता है कि आगामी कुछ ही महीनों में शायद राजपूताने के सामंतवादी ढांचे को चेतन जनता सशस्त्र विद्रोह के जरिये एक ही झटके में समाप्त कर देगी।......आज नेतागण लोकप्रिय मंत्रियों की नियुक्ति मात्र से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने खुली चुनौती दी है कि या तो उनकी संस्था को सरकार सौंप दी जाये अथवा उन्हें समाप्त होने पर मजबूर होना पड़ेगा।

    जनवरी 1948 में लोकपरिषद ने घोषित किया कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यदि कोई महत्त्वपूर्ण समस्या रह गयी है तो वह है देशी राज्यों में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने की। अतः अब उत्तरदायी शासन प्राप्त करने के लिये सीधी कार्यवाही की जाये। महाराजा समर्थकों के अनुसार जिन्होंने आंदोलन के बल पर ही देश के शासन को हथियाना अपना ध्येय बना रखा है, वे किसी बात की परवाह क्यों करने लगे? मारवाड़ लोकपरिषद ने अविलम्ब लोकप्रिय अन्तर्कालीन सरकार की स्थापना के लिये संघर्ष छेड़ने का निश्चय किया और व्यास को इसके संचालन के अधिकार सौंप दिये। महाराजा समर्थकों ने लोकपरिषद के इस कदम की आलोचना की।

    विधान निर्मात्री परिषद का गठन

    तो 4 फरवरी 1948 को हनवंतसिंह ने घोषणा की कि राज्य में काम कर रहे मंत्रिमण्डल में लोकप्रिय मंत्रियों की संख्या 2 से बढ़ाकर 4 की जायेगी। इनमें से एक मंत्री किसान प्रतिनिधियों में से होगा। महाराजा ने यह भी घोषणा की कि शीघ्र ही राज्य में विधान निर्मात्री परिषद् का गठन किया जायेगा जिसमें अल्पसंख्यकों के लिये पद सुरक्षित रहेंगे। परिषद के चुनाव में महिलायें भी भाग ले सकेंगी। परिषद् के विधान निर्माण सम्बन्धी अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होगा। परिषद का निर्माण मेरे प्रजाजनों में से, मेरी छत्रछाया में होगा इसलिये यह परिषद मारवाड़ के शासन संचालन हेतु जो विधान बनायेगी उसको स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।

    महाराजा ने राज्य के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनायी जिसमें निम्नलिखित सदस्य रखे गये- वर्तमान धारा सभा द्वारा मनोनीत दो जागीरदार, चार गैर सरकारी सदस्य जिनका मनोनयन विधान निर्मात्री परिषद द्वारा अपने सदस्यों में से किया जायेगा। इनमें से एक परिषद् के बाहर से भी लिया जा सकेगा। इन चार सदस्यों में से एक सदस्य विधान परिषद के मुस्लिम सदस्यों में से होगा। एक महिला सदस्य होगी जिसका मनोनयन विधान परिषद् द्वारा किया जायेगा। यह महिला परिषद् के बाहर से भी ली जा सकेगी। राज्य के विधि सलाहकार भी इसके सदस्य होंगे। राज्य के विधि सचिव इस समिति के मंत्री होंगे। जयनारायण व्यास ने महाराजा हनवंतसिंह की इस घोषणा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि महाराजा ने जिन सुधारों व जिस प्रक्रिया की घोषणा की है उससे उत्तरदायी शासन के आरंभ होने में विलम्ब होगा। किसानों को अलग से प्रतिनिधित्व देकर महाराजा ने राज्य की जनता में फूट डालने का भी प्रयास किया है।

    व्यास ने महाराजा को चेतावनी दी कि यदि तुरंत प्रजातांत्रिक सरकार का निर्माण नहीं किया गया तो वे एक माह पश्चात् अर्थात 8 मार्च 1948 से आंदोलन आरंभ करेंगे। व्यास के इस वक्तव्य पर महाराजा समर्थकों की प्रतिक्रिया थी कि 'राज्य का शासन राजपूत जाति के हाथ में होने तथा राजपूतों पर ही सैनिक संरक्षण का भार होने पर भी क्या उचित होगा कि लोकपरिषद् जिसने इस जाति को भड़का रखा है, को शासन अधिकार देकर अव्यवस्था उत्पन्न की जावे?' 

    जब महाराजा ने देखा कि उनको छोड़कर सारे राजा केन्द्र के सामने समर्पण कर चुके हैं तो उन्होंने राज्य में उत्तरदायी सरकार के गठन करवाने के लिये वी. पी. मेनन को जोधपुर बुलाया। मेनन 28 फरवरी 1948 को जोधपुर आये। स्थानीय नेताओं में से उन्होंने केवल जयनारायण व्यास को ही बातचीत के लिये बुलाया। मेनन के समक्ष हजारों लोगों ने लोकपरिषद के विरुद्ध प्रदर्शन किया तथा नारे लगाये कि लोकपरिषद के नेता स्वार्थी और चोर हैं। उनमें कोई योग्यता नहीं है। जनता का भाग्य उनके हाथ में नहीं सौंपा जाना चाहिये।

    जागीरदारों के लोगों द्वारा मेनन के समक्ष किये जा रहे प्रदर्शन को देखकर लोकपरिषद के नेताओं ने भी मेनन के समक्ष अपने पक्ष में प्रदर्शन किया और पर्चे फैंके किंतु उनकी संख्या बहुत कम थी इसलिये मेनन का ध्यान उन तक नहीं पहुंचा। कुछ लोगों ने लोकपरिषद वालों की पिटाई कर दी। जब मेनन ने इस प्रदर्शन का जिक्र जयनारायण व्यास से किया तो व्यास ने कहा कि यह लोकपरिषद के विरोधियों का षड़यंत्र था।

    उत्तरदायी शासन की स्थापना

    1 मार्च को मेनन ने संवाददाता सम्मेलन में बयान दिया कि सम्बन्धित पक्षों में समझौता हो चुका है। जयनारायण व्यास राज्य प्रशासन के अध्यक्ष होंगे। 3 मार्च 1948 को एक संयुक्त मंत्रिमण्डल का गठन किया गया। संखवास के ठाकुर माधोसिंह को दीवान बनाया गया। जयनारायण व्यास को प्रधानमंत्री बनाया गया। ठाकुर भैरोंसिंह खेजड़ला को स्वास्थ्य मंत्री, चौधरी नाथूराम को कृषि पंचायत मंत्री तथा बरकत्तुल्ला खां को विशेष मंत्री बनाया गया। मंत्रिमण्डल में ठाकुर भैंरोसिंह जागीरदारों के, चौधरी नाथूराम किसानों के तथा बरकत्तुल्ला खां मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। इस मंत्रिमण्डल से आशा की जाती थी कि राज्य की जनता के समस्त वर्ग इससे संतुष्ट हो जायेंगे किंतु लोकपरिषद के नेता इससे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बरकतुल्ला खां को राज्य का जागीरदार होने के कारण नापसंद कर दिया। उस समय तक बरकतुल्ला खां अल्पज्ञात थे अतः लोगों के बीच लोकप्रिय भी नहीं थे। नाथूराम तथा बरकतुल्ला खां ने कभी भी लोकपरिषद द्वारा उत्तरदायी शासन के लिये चलाये गये आंदोलनों मे भाग नहीं लिया था। नाथूराम को मंत्रिमण्डल में लेने से जाटों के वरिष्ठ नेता बलदेवराम मिर्धा भी असंतुष्ट थे। उन्होंने महाराजा को संदेश भिजवाया कि किसानों के प्रतिनिधि के रूप में नाथूराम के स्थान पर मुझे मंत्री बनाया जाये। इस पर महाराजा ने व्यास से बात की किंतु व्यास ने बलदेवराम के स्थान पर नाथूराम को प्राथमिकता दी। व्यास ने यह कह कर मिर्धा का विरोध किया कि मिर्धा संकीर्ण विचारों के व्यक्ति हैं और वे जाटों के अतिरिक्त और किसी को किसान ही नहीं मानते।

    मंत्रमण्डल के गठन पर रियासती ने टिप्पणी की कि मारवाड़ में आज से हरिश्चंद्रशाही खत्म कर दी गयी.....उन्हें सपने में भी यह ख्याल न था कि उनकी सत्ता का पटाक्षेप इतनी जल्दी और अचानक हो जायेगा, स्वामी माधवानंदजी भी उन्हें नहीं बचा सकेंगे। माथुर ने अपने कई दोस्तों से एक पेशेवर कूटनीतिज्ञ की तरह गर्व और गुरूर की बोली में कहा था कि हमारी मिनिस्ट्री कोई हलवा नहीं है जिसे आसानी से चुपके से आकर कोई निगल जाये। यही हाल जसवंतराज मेहता का था। उन्हें पता नहीं था कि सामंती हुकूमत में मि. चौबेजी को छब्बे बनने के बदले इतनी जल्दी दुब्बे बनकर निकलना पड़ेगा। महाराज अजीतसिंह और महाराज हिम्मतसिंह मिनिस्ट्रियों से त्यागपत्र देकर अपनी जागीरों को संभालने के नाम पर चुपके से राजमहलों को लौट गये।

    जयनारायण व्यास की टिप्पणी थी कि यथार्थ संवैधानिक अभिव्यक्ति के अनुसार वह पूर्ण उत्तरदायी सरकार नहीं थी परंतु निश्चित रूप से उसे प्राप्त करने का वह सही कदम था। मंत्रिमण्डल के गठन के बाद महाराजा हनवंतसिंह से हुई बातचीत के बाद व्यास ने कहा कि महाराजा ने बड़ी ही उदारता और न्यायोचित तरीकों से हमारी सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अपने पास कुछ भी अधिकार सुरक्षित नहीं रखकर अपने व्यक्तिगत खर्च तक के सवाल को भी जनता के मत द्वारा तय करवाना मंजूर कर लिया है।

    नये मंत्रिमण्डल के बनने पर लोकपरिषद के असंतुष्ट नेताओं ने स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से महाराजा के विरुद्ध प्रचार करना आरंभ कर दिया। सरदार पटेल तथा जयनारायण व्यास पर दबाव डाला गया कि वे लोकपरिषद के अन्य नेताओं को भी मंत्रिमण्डल में शामिल करवायें। व्यास ने पटेल से आग्रह किया कि वे महाराजा को मंत्रिमंडल में लोकपरिषद को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिये बाध्य करें। सरदार पटेल के प्रयास से मंत्रिमण्डल का तीसरी बार पुनर्गठन किया गया। 17 जून 1948 को फिर से महाराज अजीतसिंह को दीवान बनाया गया। जयनारायण व्यास को प्रधानमंत्री, राज्यरत्न लाला हरिश्चंद्र को गृहमंत्री, ठाकुर भैंरोसिंह को स्वास्थ्य मंत्री, नाथूराम मिर्धा को कृषि मंत्री, मथुरादास माथुर (लोकपरिषद) को शिक्षा मंत्री, द्वारिकादास पुरोहित (लोकपरिषद) को अर्थ मंत्री तथा रावराजा नरपतसिंह को मिनिस्टर इन वेटिंग (महाराजा की सेवार्थ मंत्री) बनाया गया। दीवान अजीतसिंह को मंत्रिमण्डल का अध्यक्ष घोषित किया गया।

    शीघ्र ही नये मंत्रिमण्डल में मतभेद उभर आये। महाराजा भी मंत्रिमण्डल के कामकाज से असंतुष्ट थे। जनता में भी मंत्रिमण्डल के विरुद्ध असंतोष फैलने लगा। मंत्रियों के विरुद्ध खुले आम जातिवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। इस पर महाराजा ने वी. पी. मेनन तथा गोपालस्वामी आयंगर से सहयोग मांगा। परिणामस्वरूप मध्यभारत के एक वरिष्ठ आई.सी. एस. अधिकारी पी. एस. राव को दीवान के पद पर नियुक्त करने पर विचार हुआ। 14 अगस्त 1948 को महाराजा ने पटेल से इस विषय पर विचार विमर्श किया तथा उनकी सलाह पर चौथी बार मंत्रिमण्डल का पुनर्गठन किया। 31 अगस्त 1948 को बने चौथे मंत्रिमण्डल में पी. एस. राव (आई.सी.एस.) को राज्य का दीवान, जयनारायण व्यास को प्रधानमंत्री, द्वारकादास पुरोहित को अर्थ मंत्री, नाथूराम मिर्धा को कृषि मंत्री तथा मथुरादास माथुर को शिक्षामंत्री बनाया गया। कर्नल महाराज प्रेमसिंह तथा ठाकुर भैंरोसिंह खेजड़ला को मंत्री बनाया गया। एक स्थान रिक्त रखा गया जिसकी घोषणा बाद में होनी थी।

    मंत्रिमण्डल में चार सदस्य लोकपरिषद से, एक जागीरदारों से, एक राजपूतों से तथा एक सदस्य किसान प्रतिनिधियों से लेना तय हुआ था। जागीरदारों के प्रतिनिधि के रूप में ठाकुर भैंरोंसिंह व राजपूतों के प्रतिनिधि के रूप में प्रेमसिंह को लिया गया। मारवाड़ राजपूत सभा ने इन दोनों को मंत्रिमण्डल से बाहर रहने के निर्देश दिये जिससे वे मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं हुए। सरकार ने 6 सितम्बर 1948 को एक विज्ञप्ति जारी करके इस बात पर दुख प्रकट किया कि मंत्रिमण्डल में समस्त वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास इन प्रतिनिधियों के मना कर देने से असफल हो गया है। सरकार ने दोनों पदों को रिक्त घोषित किया और कहा कि इन पदों को निकट भविष्य में जागीरदारों और राजपूतों के प्रतिनिधियों से विचार करके भरा जायेगा।

    मारवाड़़ राजपूत सभा ने प्रस्ताव पारित किया कि कोई भी राजपूत इस मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं हो। इससे महाराजा तथा लोकपरिषद वालों को चिंता हुई कि यदि राजपूत शामिल नहीं हुए तो वे मंत्रिमण्डल के विरुद्ध आंदोलन चलायेंगे जिससे राज्य का शासन ठप्प हो जायेगा। इस पर लोकपरिषद ने किसी तरह प्रयास करके ब्रिगेडियर रायबहादुर रावराजा हणूतसिंह तथा बाघावास के सेवानिवृत्त ले. कर्नल बहादुरसिंह को मंत्री बनवा दिया। राजपूत सभा ने इन दोनों को अपना प्रतिनिधि मानने से इन्कार कर दिया। जोधपुर राज्य का यह चौथा मंत्रिमण्डल वास्तविक अर्थों में लोकप्रिय मंत्रिमण्डल था। इसकी स्थापना के साथ ही राज्य में उत्तरदायी शासन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया किंतु इस समय तक देशी राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना का अधिक महत्त्व नहीं रह गया था। राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया काफी तेजी से चल रही थी। अतः यह मंत्रिमण्डल जोधपुर राज्य के राजस्थान में एकीकरण सम्बन्घी कार्यवाही में ही अधिक व्यस्त रहा। परिणामस्वरूप 30 मार्च 1949 को जोधपुर राज्य राजस्थान में मिल गया।


    उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना

    महाराणा भूपालसिंह (1929-1949) के शासन काल में उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन के लिये राज्य की प्रजा के द्वारा आंदोलन चलाया गया। उदयपुर रियासत में भी राजपूताना की अन्य रियासतों की भांति नागरिक अधिकारों की स्थिति अत्यंत शौचनीय थी।

    मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधियां

    उदयपुर राज्य में बिजौलिया आंदोलन के कारण सरकार का दमन चक्र अपने जोरों पर था। बिजौलिया आंदोलन में भाग लेने के कारण माणिक्यलाल वर्मा को उदयपुर राज्य से निष्कासित कर दिया गया था। वर्मा ने अजमेर में रहते हुए मेवाड़ प्रजामंडल स्थापित करने की योजना बनायी। उन्होंने कुछ पर्चे, प्रजामण्डल के गीत तथा 'मेवाड़ राज्य का शासन' नाम से एक पुस्तिका छपवाईं इस पुस्तिका में मेवाड़ राज्य के प्रत्येक विभाग की आलोचना की गयी और कहा गया कि जब तक उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं होगी तब तक मौजूदा शासन की त्रुटियां समाप्त नहीं हो सकतीं। उन्होंने हर मेवाड़वासी से अपील की कि वह मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये अपना तन-मन-धन अर्पित कर दे।

    निर्वासन समाप्ति के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने उदयपुर पहुँचकर 24 अप्रेल 1938 को बलवंतसिंह मेहता, भवानीशंकर वैद्य, जमनालाल वैद्य, परसराम तथा दयाशंकर श्रोत्रिय के साथ मिलकर 'मेवाड़ प्रजामंडल' की स्थापना की। इसका प्रथम सभापति बलवंतसिंह मेहता को तथा मंत्री माणिक्यलाल वर्मा को बनाया गया। जनता में अभूतपूर्व उत्साह के साथ प्रजामंडल चर्चा का विषय बन गया। 6 मई 1938 से प्रजामंडल ने सदस्यता अभियान चलाया। एक सप्ताह से भी कम समय में इसके एक हजार सदस्य बन गये। इससे राज्य सरकार के कान खड़े हो गये। अतः राज्य सरकार ने 11 मई 1938 को एक राजाज्ञा प्रसारित करके महकमा खास को अधिकार दिया गया कि वह किसी भी समाचार पत्र के मेवाड़ में प्रवेश को रोक सकता है। नौ साल पहले के उस परिपत्र को फिर से लागू कर दिया गया जिसके अनुसार राज्य में बिना अधिकारियों की आज्ञा लिये सभा, कथा, रास, धार्मिक समारोह करने, संस्थायें बनाने और जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा हुआ था।

    24 सितम्बर 1938 को राज्य सरकार ने मेवाड़ प्रजा मण्डल को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। समस्त पटेलों और पटवारियों को आदेश दिये गये कि यदि कोई व्यक्ति प्रजामंडल की गतिविधियों का प्रचार करता हुआ पाया जाये तो उसकी सूचना थानों में लिखवायें। पुलिस ने प्रजामंडल के कार्यालय पर ताले लगवा दिये तथा माणिक्यलाल वर्मा और रमेश व्यास को मेवाड़ से निष्कासित कर दिया।

    प्रजामंडल ने राज्य सरकार को अल्टीमेटम दिया कि यदि 4 अक्टूबर तक राज्य सरकार ने प्रजामंडल से प्रतिबंध नहीं हटाया तो आंदोलन चलाया जायेगा। माणिक्यलाल वर्मा को उस आंदोलन का डिक्टेटर बनाया गया। इस पर राज्य सरकार द्वारा प्रजामंडल के नेताओं का उत्पीड़न किया जाने लगा। अनेक लोगों को बंदी बना लिया गया। इस पर प्रजामंडल द्वारा एक और पर्चा 'मेवाड़ का बोपारी और कसान सू अरज' प्रकाशित किया गया। माणिक्यलाल वर्मा लगातार प्रजामंडल से प्रतिबंध हटाने की अपील करते रहे। जमनालाल बजाज ने भी मेवाड़ के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर प्रतिबंध हटाने की मांग की किंतु मेवाड़ सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। पूरे राज्य में सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया जिसका सरकार द्वारा बुरी तरह से दमन किया गया। राज्य के समस्त मुद्रणालयों पर छापे मारे गये तथा बाहर से आने वाले पार्सलों को पोस्ट ऑफिस के निकटतम पुलिस थाने में जमा करवाने के आदेश दिये गये। वर्मा अजमेर में रहकर प्रजामंडल का संचालन कर रहे थे। 2 फरवरी 1939 को जब वर्मा देवली में प्रजामंडल के गीत गा रहे थे तब मेवाड़ राज्य की पुलिस ने सादे कपड़ों में अजमेर कमिश्नरी के क्षेत्र में प्रवेश किया और वर्मा को घसीटकर मेवाड़ की सीमा में ले आये। उन्हें जबर्दस्त पीटा गया जिससे काफी रक्त बहा। जब मेवाड़ के इस अमानुषिक व्यवहार की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने 18 फरवरी 1938 के हरिजन में एक वक्तव्य दिया कि प्रजामण्डल को इस अमानुषिक कार्यवाही के विरोध में कानूनी कार्यवाही करनी चाहिये। गांधीजी द्वारा की गयी इस आलोचना से भारत सरकार का विदेश विभाग सक्रिय हुआ और मेवाड़ रेजीडेंट से रिपोर्ट मांगी गयी।

    मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की मांग

    जब राज्य का दमन बढ़ गया तो गांधीजी के आदेश से 3 मार्च 1939 को आंदोलन समाप्त कर दिया गया। दीवान धर्मनाराण के स्थान पर सर टी. विजयराघवाचारी उदयपुर राज्य के नये दीवान बने। उन्होंने 22 फरवरी 1941 को महाराणा के जन्म दिन पर प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटा लिया। प्रतिबंध हटते ही प्रजामंडल ने अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं। नवम्बर 1941 में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन हुआ जिसका उद्घाटन आचार्य कृपलानी ने किया। सम्मेलन में मांग की गयी कि मेवाड़ में तुरंत उत्तरदायी शासन लागू किया जाये। निर्वाचित विधान सभा बनायी जाये। लोक सेवकों का निष्कासन रद्द किया जाये। किसान, व्यापारी, अल्प वेतन भोगियों को विशेष सुविधायें दी जायें। फरवरी 1942 में राज्य में उत्तरदायी शासन दिवस मनाने की घोषणा की गयी। 20 अगस्त 1942 को मेवाड़ प्रजामंडल ने माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में महाराणा से मांग की कि वह 24 घण्टे के भीतर-भीतर अंग्रेज सरकार से समस्त प्रकार के सम्बन्ध तोड़ ले तथा राज्य में शीघ्र ही उत्तरदायी शासन लागू करने की घोषणा करे।

    21 अगस्त 1942 को फिर से प्रजामंडल को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया और माणिक्यलाल वर्मा सहित 15 प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर छात्र भी आंदोलन में कूद पड़े। राज्य की शिक्षण संस्थायें कई दिनों तक बंद रहीं। सरकार ने लगभग 600 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। दो छात्रों ने हाईकोर्ट भवन पर चढ़ कर तिरंगा लगा दिया। उन्हें उसी समय गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। 25 जनवरी 1943 को उदयपुर में विक्टोरिया चबूतरे पर चढ़कर महारानी विक्टोरिया की मूर्ति पर काला रंग पोत दिया गया। राज्य की स्थिति बिगड़ती देखकर राज्य सरकार ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के माध्यम से प्रजामंडल से समझौता करने का प्रयास किया किंतु माणिक्यलाल वर्मा ने झुकने से इन्कार कर दिया। राजगोपालाचारी ने वर्माजी से अनुरोध किया कि वे अपना आंदोलन वापस ले लें तो राज्य सरकार राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये कदम उठायेगी। वर्माजी ने उत्तर दिया कि हमारे नेता महात्मा गांधी हैं। उन्हीं के आदेश पर हमने आंदोलन छेड़ा है। हम एक सच्चे सिपाही की भांति सेनापति की आज्ञा के आदेश के बिना आंदोलन वापस नहीं ले सकते। राजाजी वर्माजी का उत्तर सुनकर हतप्रभ रह गये। राजाजी प्रजामंडल के अन्य नेताओं से भी मिले पर उनसे भी उन्हें निराशा हुई।

    इस पर राज्य सरकार ने फरवरी 1944 में समस्त बंदियों को रिहा कर दिया तथा 6 सितम्बर 1944 को प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटा लिया। 31 दिसम्बर 1945 तथा 1 जनवरी 1946 को उदयपुर में अखिल भारतीय देशी राज्य परिषद का सातवां अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर देशी राज्यों के शासकों से अपील की गयी कि वे अपनी रियासतों में अविलम्ब उत्तरदायी शासन स्थापित करें। इस अधिवेशन से राज्यों में अभूतपूर्व जागृति आयी। यहाँ तक कि जनवरी 1946 में राज्य कर्मचारियों ने भी सरकारी नीतियों के विरुद्ध हड़ताल कर दी। पुलिस ने हड़ताली कर्मचारियों पर लाठी चार्ज किया तथा अनेक कर्मचारियों को बंदी बना लिया। अंत में कर्मचारियों को यह आश्वासन देने पर कि उनकी समस्याओं का शीघ्र ही समाधान किया जायेगा, हड़ताल समाप्त की गयी।

    संवैधानिक सुधारों की शुरुआत

    भारत में तेजी से हो रहे राजनीतिक परिवर्तनों को देखते हुए 8 मई 1946 को महाराणा ने ठाकुर राव गोपालसिंह की अध्यक्षता में एक सुधार समिति की नियुक्ति की जिसमें प्रजामण्डल द्वारा मनोनीत पाँच सदस्य भी शामिल किये गये। इस समिति ने 29 सितम्बर 1946 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति ने राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना करने तथा शासन जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को सौंपने की सिफारिश की। उसने एक संविधान सभा की स्थापना की भी सिफारिश की। संविधान सभा में पचास सदस्य होने थे जिनका निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाना था। राज्य सरकार ने इस समिति की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें कार्यकारिणी को व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी बनाया गया था। बदलती हुई परिस्थितियों को देखते हुए महाराणा ने अक्टूबर 1946 में मेवाड़ प्रजामंडल के सदस्य मोहनलाल सुखाड़िया और हीरालाल कोठारी को कार्यकारी परिषद का सदस्य नियुक्त किया।

    16 फरवरी 1947 को महाराणा ने अपने जन्म दिन पर घोषणा की कि वे शीघ्र ही राज्य में विधान सभा की स्थापना करेंगे और जनता के प्रतिनिधियों को सरकार में शामिल करेंगे। 2 मार्च 1947 को महाराणा ने मेवाड़ के नये विधान की घोषणा की। इसके अनुसार 46 सदस्यों की धारा सभा में 18 स्थान जागीरदार, उपजागीरदार, माफीदार, श्रमिक, उद्योगपति, व्यापारी और जनजातियों के लिये आरक्षित रखे गये। शेष 28 स्थान वयस्क मताधिकार एवं संयुक्त चुनाव प्रणाली के आधार पर भरे जाने थे। इसमें छः निर्वाचित एवं कुछ गैरसरकारी सदस्यों की विधानसभा स्थापित की जानी थी। इसे राज्य से सम्बन्धित समस्त विषयों पर कानूनों का निर्माण करना था। कुछ प्रतिबंधों के साथ यह राज्य के बजट पर बहस एवं मतदान कर सकती थी।

    मंत्रियों को विधानसभा द्वारा किये गये निर्णयों को लागू करना था। दोनों में मतभेद होने पर महाराणा का निर्णय अंतिम माना जाना था। महाराणा ने अपनी घोषणा में विश्वास दिलाया कि विधानसभा के चुनाव हो जाने के बाद धीरे-धीरे जनप्रतिनिधियों को मंत्रिमण्डल में शामिल किया जायेगा किंतु जागीरदारों को अन्य वर्गों से अधिक प्रतिनिधित्व देने, अध्यक्ष का मनोनयन करने तथा कार्यपालिका को विधानसभा के प्रति उत्तरदायित्व नहीं बनाने के प्रश्नों पर प्रजामण्डल ने यह कह कर इस घोषणा को मानने से अस्वीकार कर दिया कि यह विधान जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं है।

    ई.1947 में महाराणा ने के. एम. मुंशी को अपना संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया। मुंशी ने राज्य के लिये नया संविधान बनाया जिसे 23 मई 1947 को प्रताप जयंती के अवसर पर लागू कर दिया गया। इस संविधान की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित थीं-

    (1.) विधि के शासन की स्थापना,

    (2.) प्रताप विश्वविद्यालय की स्थापना,

    (3.) लोकसेवा आयोग की स्थापना,

    (4.) नागरिकों के मौलिक अधिकारों की स्थापना

    (5.) वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित विधान सभा की स्थापना।

    इस विधानसभा में कुल 56 सदस्य होने थे तथा विधानसभा को राज्य के समस्त लोगों के लिये समस्त विषयों पर कानून बनाने का अधिकार था किंतु निम्नलिखित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार इस विधानसभा को नहीं था-

    (1.) महाराणा के विशेष कर्त्तव्य तथा महाराणा का राज्य में स्थान,

    (2.) उत्तराधिकार तथा गोद का प्रश्न,

    (3.) महाराणा के जागीरदारों और उमरावों से सम्बन्ध,

    (4.) प्रताप विश्वविद्यालय,

    (5.) उच्च न्यायालय का व्यवहार,

    (6.) देवस्थान विधि,

    (7.) विदेशी मामले, राज्य के विकास तथा योजना।

    प्रजामण्डल ने मुंशी द्वारा प्रस्तुत विधान को सर्वथा अप्रगतिशील और अस्पष्ट बताया क्योंकि इसमें जागीरदारों को अपेक्षाकृत अधिक अधिकार दे दिये गये थे। प्रजामण्डल ने संविधान को दोष पूर्ण मानते हुए भी निर्वाचन में भाग लेना स्वीकार किया। एक ओर तो प्रजा मण्डल इससे अप्रसन्न था तो दूसरी ओर मेवाड़ क्षत्रिय परिषद ने इसे प्रजामण्डल के समक्ष समर्पण बताया। इसी बीच एस. बी. राममूर्ति मेवाड़ के दीवान नियुक्त हुए। उन्होंने जन आंदोलन के संदर्भ में महाराणा को परामर्श दिया कि वे संविधान में संशोधन करें। महाराणा ने डॉ. मोहनसिंह मेहता को मुंशी द्वारा प्रस्तुत संविधान में संशोधन करने के लिये नियुक्त किया। उनके सुझाव पर 11 अक्टूबर 1947 को महाराणा ने मुंशी द्वारा निर्मित संविधान में निम्नलिखित संशोधन करने की घोषणा की-

    (1.) ग्रामीण प्रत्यक्ष निर्वाचन,

    (2.) 90 हजार के स्थान पर 60 हजार लोगों पर एक प्रतिनिधि का चयन,

    (3.) संविधान में संशोधन प्रक्रिया का सरलीकरण।

    इन सुधारों से भी प्रजा मण्डल की मुख्य मांग पूरी नहीं हुई जिसके अनुसार कार्यकारिणी को व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी बनाया जाना था। प्रजा मण्डल की साधारण सभा की बैठक नाथद्वारा में हुई जिसमें संविधान को दोषपूर्ण मानते हुए भी नये संविधान के अनुसार निर्वाचनों में भाग लेना स्वीकार कर लिया। राजपूत सभा ने प्रजामंडल के विरुद्ध अपने उम्मीदवार चुनाव में उतारे। मोहनलाल सुखाड़िया सहित मेवाड़ प्रजा मण्डल के 4 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गये। 6 मार्च 1948 को महाराणा ने अपने जन्मदिन पर कुछ और सुधारों की घोषणा की तदनुसार महाराणा ने अपने दीवान के पद को छोड़कर शेष मंत्रिमण्डल को विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी बनाना स्वीकार कर लिया। महाराणा ने अंतरिम सरकार के गठन के लिये प्रजा मण्डल के चार प्रतिनिधि तथा क्षत्रिय परिषद के दो प्रतिनिधि को मंत्रिमण्डल में लेने की घोषणा की। एक मंत्री महाराणा द्वारा नामांकित किया जाना था। इस योजना को दोनों ही पक्षों ने स्वीकार कर लिया।

    4 अप्रेल 1948 को उदयपुर में विधान सभा के दो स्थानों के लिये चुनाव होने थे। एक स्थान पर प्रजामंडल के अध्यक्ष भूरेलाल बयां उम्मीदवार थे। उनके विरुद्ध क्षत्रिय परिषद का उम्मीदवार गुमानसिंह चुनाव लड़ रहा था। उस मतदान केंद्र पर क्षत्रिय परिषद के कार्यकर्ता ने अपना झण्डा लगा दिया। इस पर प्रजामंडल वालों ने भी अपना झंडा उस भवन पर लगा दिया। क्षत्रिय परिषद वालों ने प्रजामंडल का झंडा उखाड़ कर कुएं में फैंक दिया। इस घटना ने खतरनाक झगड़े का रूप ले लिया। प्रजामंडल ने तत्काल ही चुनावों के बहिष्कार का निर्णय लिया तथा दूसरे दिन पूरे शहर में पूर्ण हड़ताल रखी। भूरेलाल बया तुरंत महाराणा से मिले। बया ने महाराणा से कहा- 'आपका निकम्मा शासन राष्ट्रीय ध्वज की रक्षा करने में समर्थ नहीं है।अतः आपको चाहिये कि आप अविलम्ब ही सत्ता जन-प्रतिनिधियों को सौंप दें। महाराणा भूरेलाल बया की यह बात सुनकर हक्के-बक्के रह गये। उनसे कोई जवाब नहीं बन पड़ा।

    जागीरदारों के लोगों ने शहर में बंद असफल करवाने का प्रयास किया जिससे शहर में दंगा हो गया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिये गोलियां चलाई गयीं जिससे दो विद्यार्थी मारे गये तथा अनेक व्यक्ति घायल हुए। इस गोली काण्ड के विरोध में प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने मेवाड़ कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र दे दिये। अतः चुनाव स्थगित कर दिये गये। प्रजा मण्डल के मुखपत्र 'मेवाड़ प्रजा मण्डल पत्रिका' के 8 मार्च और 15 मार्च 1948 के सम्पादकीय में मेवाड़ को राजस्थान संघ में विलय करने की मांग का जबर्दस्त समर्थन किया गया था किंतु महाराणा ने यह मांग स्वीकार नहीं की थी किंतु अब मेवाड़ की परिस्थितियां पलटा खा रही थीं। राज्य में मंत्रिमण्डल के गठन को लेकर प्रजामण्डल और राज्य सरकार के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया। अंत में प्रजामण्डल की बात स्वीकार करके गतिरोध समाप्त किया गया।

    महाराणा ने प्रजामण्डल के प्रस्तावित उम्मीदवार को मंत्री बनाना स्वीकार कर लिया। राज्य का मुत्सद्दी वर्ग और सामंती वर्ग, प्रजामण्डल की जीत को सहन नहीं कर सका। उन्होंने महाराणा को परामर्श दिया कि मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में शामिल कर लिया जाये क्योंकि यदि मेवाड़ संयुक्त राजस्थान में शामिल हो जाता है तो प्रशासन में प्रजामण्डल के प्रतिनिधियों के स्थान पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों का वर्चस्व रहेगा तथा संयुक्त राजस्थान में शामिल होते समय समस्त शर्तें रियासती सचिवालय द्वारा निश्चित की जायेंगी। महाराणा को यह परामर्श उचित लगा। अतः संयुक्त राजस्थान राज्य के उद्घाटन से दो दिन पूर्व 23 मार्च 1948 को महाराणा ने मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में शामिल करने के अपने निश्चय की सूचना भारत सरकार को भेज दी। 18 अप्रेल 1948 को उदयपुर राज्य का राजस्थान संघ में विलय हो गया। अतः उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की योजना लागू करने से पहले ही राज्य राजस्थान संघ में विलीन हो गया। अतः उदयपुर राज्य में उत्तरदायी शासन लागू करने की योजना लागू होने से पूर्व ही रियासत राजस्थान में विलीन हो गयी।


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    कैसे बना था पाकिस्तान - 52

    सूफी दरगाहों पर खूनी हमले


    सदियों से पाकिस्तान सूफी संतों की जमीन रहा है किंतु आज का पाकिस्तान दुनियाभर के आतंकवादियों की शरणगाह बन चुका है। वहाँ मुहाजिरों, शियाओं और अहमदियों के साथ-साथ सूफी समुदाय भी सुन्नी आतंकी संगठनों के निशाने पर है। सूफियों को पाकिस्तान में काफिर और मूर्तिपूजक माना जाता है। पाकिस्तान में सूफियों की सभी दरगाहें आतंकवादियों के निशाने पर हैं। अहमदियों की तरह सूफियों को भी नागरिक अधिकार और सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन तहरीके तालिबान ने 2005 से वर्ष 2017 तक 30 सूफी दरगाहों को निशाना बनाया जिनमें से कई दरगाहें 100 साल से अधिक पुरानी हैं। इस्लामाबाद में बड़ी इमाम दरगाह, मोहम्मद एजेंसी में हाजी साहब तुरंगजई की दरगाह, पेशावर के चमखानी में अब्दुल शकूर बाबा की दरगाह समेत कई मकबरों, पेशावर में 17वीं सदी के सूफी कवि अब्दुल रहमान बाबा, डेरा गाजी खान में साखी सरवर दरगाह, पाकपत्तन शहर की सूफी दरगाह, चमकानी में फंडू बाबा की दरगाह, सूफी हजरत बाबा फरीद, सूफी अब्दुल्लाह शाह गाजी की दरगाह सहित अनेक दरगाहों पर आतंकी हमले हो चुके हैं। इन हमलों में बड़ी संख्या में सूफी मत में विश्वास रखने वाले मुसलमान मारे गए।

    कभी अफगानिस्तान भी सूफी पीर औलिया और दरवेशों का केंद्र था लेकिन तालिबानियों ने उन सब को मिटा दिया। फरवरी 2017 में पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हुए आतंकी हमले में 100 से अधिक लोग मारे गए और 250 लोग घायल हुए थे। इससे पहले बलूचिस्तान प्रांत की मशहूर सूफी दरगाह शाह नूरानी पर आतंकी हमले में 52 लोगों की मौत हुई थी। वास्तव में ये आतंकी हमले वहाबी संप्रदाय की सूफियों के खिलाफ चल रही जंग का हिस्सा हैं। भारत में भी पाकिस्तानी आतंकवादियों ने चरारे शरीफ मजार तथा हजरत बल दरगाह सहित अनेक स्थानों पर बड़े हमले किए हैं।


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  • अजमेर का इतिहास - 26

     05.01.2020
    अजमेर का इतिहास - 26

    दारा शिकोह एवं औरंगजेब युद्ध (2)


    औरंगजेब की सेनाएं, दारा के मोर्चे की तरफ पहाड़ी पर बनी इंदरकोट की जिस प्राचीन, विशाल एवं सृदुढ़ दीवार को गिराने के लिये तोप के गोले दाग रही थी, वह अब भी उसी तरह मजबूती से खड़ी हुई थी। इस पर औरंगजेब ने अपनी सेनाओं को आगे बढ़कर हमला करने को कहा किंतु औरंगजेब के सेनापतियों ने ऐसा करने के प्रति यह कहकर अनिच्छा व्यक्त की कि जब तक तोपें अपना काम पूरा नहीं कर लेतीं, तब तक हमें आगे नहीं बढ़ना चाहिये। दारा की सेना इस दीवार की आड़ में से औरंगजेब की सेना पर आग बरसाती रही। दारा के सिपाही ऊँचाई पर थे तथा मोर्चों एवं दीवार की आड़ में थे इसलिये उन्हें कम हानि पहुँच रही थी जबकि औरंगजेब की सेना निचाई पर होने तथा खुले मैदान में होने से अधिक हानि उठा रही थी। इस प्रकार दूसरा दिन बीत जाने पर भी युद्ध में कोई प्रगति नहीं हो सकी। औरंगजेब की सेना को यह विश्वास हो गया कि दारा के शिविर में घुस पाना असंभव है। औरंगजेब के सिपाही डगमगाने लगे थे।

    औरंगजेब के सेनापति भी अब दूसरी तरह सोचने लगे थे। उनमें से बहुत से तो औरंगजेब के साथ केवल इसलिये हुए थे क्योंकि उन्हें विश्वास था कि युद्ध में जीत औरंगजेब की ही होगी। उन्हें लगता था कि दारा दुर्भाग्यशाली है और वह कभी जीत नहीं सकता किंतु भीतर से वे दारा के सद्गुणों के प्रशसंक थे। अब जब दारा औरंगजेब पर भारी पड़ रहा था, उन्हें भीतर ही भीतर पछतावा होने लगा था। तीसरे दिन की प्रातः औरंगजेब ने एक गंभीर प्रयास करने का निश्चय किया। उसने अपने सेनापतियों को एकत्रित किया, उन्हें जोशीला भाषण देकर उनमें नई ऊर्जा का संचार किया तथा उन्हें बिना कोई क्षण गंवाये सम्मिलित होकर लड़ने के लिये प्रेरित किया।

    उसी समय जम्मू के राजा रामरूप ने औरंगजेब को सूचित किया कि उसके पहाड़ी लड़ाकों ने, तारागढ़ की पहाड़ी में एक गुप्त मार्ग ढूंढ निकाला है। इस मार्ग पर वे दक्षिण-पश्चिम दिशा से घुसकर कोकला पहाड़ी पर ठीक दारा के पीछे पहुँच सकते हैं तथा इस प्रकार वे दारा के दाहिने पार्श्व को तोड़ सकते हैं। औरंगजेब ने बिना कोई समय गंवाये, शाही सेना के खास बंदूकची तथा सिपाही उस मार्ग से कोकला पहाड़ी के पीछे भेज दिये तथा जम्मू का राजा रामरूप, दारा का ध्यान बंटाने के लिये कोकला पहाड़ी के सामने जा धमका। रामरूप का यह कदम औरंगजेब के लिये तो विजयकारी सिद्ध हुआ किंतु वह स्वयं, अपने पूरे सैनिक दल के साथ रणक्षेत्र में ही काट दिया गया। जब तक दारा के सिपाहियों ने रामरूप का खात्मा किया, तब तक औरंगजेब के खास बंदूकची तथा हजारों सिपाही कोकला पहाड़ी पर से नीचे उतरने लगे।

    अब दृश्य उलट चुका था। औरंगजेब के बंदूकची तथा पैदल सिपाही ऊँचाई पर थे जबकि दारा के सिपाही नीचे की ढलान पर थे। औरंगजेब के बंदूकचियों ने दारा के सिपाहियों को तड़ातड़ गोलियों की बरसात करके मार डाला। दारा के खेमे में अफरा तफरी मच गई। ठीक उसी समय दिलेर खां तथा शेख मीर ने सामने से दारा के खेमे पर धावा बोला। दिलेर खां चश्मे की दक्षिणी दिशा से तथा शेख मीर उत्तरी दिशा से आगे बढ़े ताकि वे दारा की तोपों की मार से बच सकें। ठीक उसी समय बाईं ओर से महाराजा जयसिंह तथा अमीर उल उमरा तथा दाईं ओर से असद खां एवं होशाबाद सामान्य धावे के लिये आगे बढ़े।

    दिलेर खां तथा शेख मीर आगे बढ़ते हुए दारा की मोर्चाबंदी के सबसे कमजोर बिंदु पर पहुँच गये जहाँ औरंगजेब का श्वसुर शाहनवाज खां मोर्चा संभाले हुए था। इस बिंदु से झरने का एक रास्ता उन्हें दीवार के ऊपरी हिस्से तक ले गया। शाही सिपाही इंदरकोट की सुदृढ़ दीवार पर चढ़ गये। दारा के सिपाहियों को शाही सिपाहियों तक पहुँचने से रोकने के लिये शाहनवाज खां के सिपाही तोपों से गोले बरसाने लगे। दारा के आदमियों ने भी अपनी तोपों के मुंह उनकी तरफ मोड़ दिये। इस अस्तव्यस्त गोलाबारी के बीच शाहनवाज खां तोप के गोले से मारा गया। उसे ख्वाजा की दरगाह में दफनाया गया। उसका पुत्र सयैद खां भी घायल हो गया।

    शेख मीर औरंगजेब की ओर से लड़ रहा था। वह हाथी पर सवार होकर अपनी सेना का नेतृत्व कर रहा था। पहाड़ी के ऊपर से आई तोपों की वर्षा से वह भी मारा गया। हाथी के हौदे में सवार महावत ने शेख मीर के मृत शरीर को हौदे में इस तरह बिठा दिया मानो वह जीवित हो। शेख मीर के मारे जाने की बात युद्ध की समाप्ति के बाद ही प्रकट हो सकी। दारा अपने पुत्र सिपहर शिकोह के साथ एक ऊँचे स्थान पर खड़े होकर युद्ध देख रहा था। उसने देखा कि उसके दाहिने पार्श्व पर दिलेर खां ने सफलता प्राप्त कर ली है और राजा जयसिंह भी उसकी सहायता के लिये आगे बढ़ रहा है। दारा ने तेजी से निर्णय लिया कि युद्ध का परिणाम उसके विरुद्ध जा रहा है। स्थिति वास्तव में नाजुक तो थी किंतु चिंताजनक नहीं थी। उसकी सेना का मध्य भाग तथा उत्तरी भाग अब भी पूरी तरह सुरक्षित था। उसके पास सात हजार सिपाही अब भी सुरक्षित खड़े थे। एक तीव्र प्रत्याक्रमण दिलेर खां को उसके स्थान से पीछे धकेल सकता था। यहाँ तक कि राजा जयसिंह की आगे बढ़ने की गति इतनी धीमी थी कि वह शीघ्रता से दिलेरखां को सहायता नहीं पहुँचा सकता था।

    अभी दारा विचार कर ही रहा था कि कोकला पहाड़ी पर कोलाहल हुआ तथा वहाँ से घोषणा की गई कि शत्रु ने पहाड़ी के सबसे सुरक्षित स्थान को छीन लिया है। इस नये संकट ने दारा को तत्काल निर्णय लेने पर विवश कर दिया। औरंगजेब की तरह उसमें सर्वोच्च प्रयास करने का हौंसला नहीं था जो हारी हुई बाजी को पलट सके। तीन दिन की लगातार लड़ाई के दबाव ने उसे हतोत्साहित कर दिया था। वह अपनी सेना को उसके भाग्य पर छोड़कर युद्ध के मैदान से निकल गया। सत्य तो यह है कि जिस दिन से जसवंतसिंह ने दारा की सहायता करने से मना कर दिया था, उस दिन से दारा ने मन ही मन अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी।

    दारा इतना भयभीत हुआ कि वह युद्ध के मैदान से भागकर अजमेर नगर में नहीं गया जहाँ उसका हरम तथा उसका खजाना किसी भी बुरी परिस्थिति में पलायन के लिये हाथियों पर लदा हुआ तैयार खड़ा था। दारा पश्चिम दिशा में मेड़ता की पहाड़ियों की तरफ भाग गया। उसका हरम उसके पीछे गया। इसी बीच रात हो गई। औरंगजेब के सेनापतियों को अपनी जीत पर विश्वास नहीं हुआ। दिलेर खान यद्यपि शत्रु सेना की घेराबंदी को तोड़ चुका था तथापि उसकी स्थिति नाजुक थी। शेख मीर के सिपाहियों को भी शेख मीर की मृत्यु के बारे में ज्ञात हो चुका था। वे सारा अनुशासन भंग करके लूटपाट में लग गये। जयसिंह की आगे बढ़ने की गति अब भी धीमी थी। उसके दाहिनी तरफ असद खान एवं होशदाद खां अब भी कुछ नहीं कर पाये थे। उसकी टुकड़ियां दर्शक बनकर व्यर्थ खड़ी थीं किंतु दारा के भाग जाने से अब उनके पास कुछ काम नहीं बचा था। जैसे ही औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि दारा भाग गया तो युद्ध रुक गया। राजा जयसिंह ने आगे बढ़कर तंग घाटी का रास्ता रोक लिया ताकि दारा के सिपाही जान बचाकर न भाग सकें। देखते ही देखते दारा के सिपाहियों का कत्लेआम मच गया। यह कत्लेआम देर रात तक चलता रहा। इस प्रकार 11 मार्च की शाम को आरंभ हुआ युद्ध 13 मार्च की रात में थम गया।

    दारा की सेना किसी भी तरह से औरंगजेब की सेना से कम नहीं थी किन्तु दारा का मनोबल बढ़ाने वाला कोई मित्र उसके साथ न था जबकि औरंगजेब को नित नई सहायता प्राप्त हो रही थी। दुर्भाग्य से हिन्दू राजाओं ने गलत निर्णय लिये। उन्होंने अच्छे दारा को छोड़कर बुरे औरंगजेब का साथ दिया। जम्मू नरेश रूपराय स्वयं भी नष्ट हो गया और उसने दारा को भी नष्ट कर दिया। यदि जयपुर नरेश जयसिंह औरंगजेब का साथ न देता तो दारा परास्त न हुआ होता। यदि जोधपुर नरेश जसवंतसिंह दारा के पक्ष में लड़ने के लिये आ गया होता, तो भी दारा परास्त न होता। मध्यकाल के हिन्दू नरेश लगभग हर मोर्चे पर इतने ही अदूरदर्शी सिद्ध हुए जितने वे अजमेर युद्ध के दौरान थे। इस युद्ध में अजमेर की वीसल झील नष्ट हो गई तथा तारागढ़ एवं अजमेर नगर के परकोटों को गंभीर क्षति हुई।

    जब दारा मेड़ता होता हुआ अहमदाबाद की ओर भाग रहा था तब फ्रैंच यात्री मॉन्शियर बर्नियर दारा से मिलने के लिये आगरा जा रहा था। उन दिनों दारा की एक बेगम के पैर में विसर्प लगने से वह बीमार थी तथा दारा उसकी सेवा कर रहा था। जब दारा को ज्ञात हुआ कि बर्नियर नामक एक चिकित्सक पास में ही है तो दारा ने बर्नियर को बुलवाया। बर्नियर दारा के तम्बू में गया और वहाँ उसने उसकी बेगम की चिकित्सा की। बर्नियर तीन दिन तक दारा के साथ यात्रा करता रहा ताकि उसकी बेगम की देखभाल की जा सके।

    कुछ समय बाद दारा औरंगजेब द्वारा पकड़ा जाकर अपमानजनक मृत्यु को प्राप्त हुआ। औरंगजेब की अपेक्षा दारा एक नेक दिल इन्सान था और ईश्वर पर उसे बड़ा भरोसा था किन्तु विधि का विधान कुछ ऐसा ही बन गया कि नेक दिल दारा के स्थान पर धूर्त औरंगजेब जीत गया। औरंगजेब मुगलिया सल्तनत का आखिरी प्रभावशाली शासक था। उसके अत्याचारों ने मुगल सल्तनत का सूरज इतिहास के नेपथ्य की ओर धकेल दिया।


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  • अध्याय - 8 : सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय

     09.12.2017
    अध्याय - 8 : सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय

    अध्याय - 8


    सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय


    बीकानेर राज्य को अलग रहने योग्य इकाईयों में सम्मिलित किया गया है। अब तक यह इकाई ऐसी ही मानी जाती रही है। एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया? यह बल पूर्वक नियंत्रण क्यों ? - महाराजा सादुलसिंह।

    अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की राजस्थान कार्यकारिणी ने 9 सितम्बर 1946 को प्रस्ताव पारित किया कि राजस्थान का कोई भी राज्य आधुनिक प्रगतिशील राज्य की सुविधा उपलब्ध करवाने की स्थिति में नहीं है। इसलिये राजस्थान के समस्त राज्यों और अजमेर मेरवाड़ा प्रांत को मिला कर एक इकाई बनाना चाहिये। इस प्रस्ताव से प्रदेश की विभिन्न रियासतों की सीमाएं समाप्त करके संयुक्त राज्य बनाने की कल्पना सामने आयी। 18-19 सितम्बर 1946 की दिल्ली बैठक में लोक परिषद की स्थायी समिति ने राज्यों के अलग रहने योग्य सक्षमता की सीमा को 50 लाख जनसंख्या और 3 करोड़ वार्षिक आय मानने की अनुशंसा को स्वीकार कर लिया। 16-17 नवम्बर 1946 को लोक परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह राजस्थान राज्य के किसी भी संघ को उन राज्यों के लोकप्रिय प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त करने के पश्चात ही मान्यता प्रदान करें।

    देशी राज्यों को आश्वासन

    बीकानेर नरेश तथा उनके समर्थक राजाओं का मनोबल बढ़ाने के लिये राष्ट्रीय नेता अनेक प्रकार के आश्वासन देते रहे थे। इन आश्वासनों में भविष्य में देशी राज्यों को स्वतंत्र इकाई के रूप में बने रहने देने का भी आश्वासन भी था। स्वयं गांधीजी ने कहा कि स्वराज्य आने पर ब्रिटिश भारत भारतीय रियासतों को मिटाना नहीं चाहेगा बल्कि उनका सहायक होगा। गांधीजी तो राजाओं से केवल यही चाहते हैं के वे अपनी रियासतों के वैधानिक प्रधान बन जाएं और उनकी देखरेख में जनता अपना शासन चलाये। दिसम्बर 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने विधान निर्मात्री सभा में कहा कि यदि किसी विशेष रियासत की जनता अपने यहाँ के राजा को प्रधान स्वीकार करती है तो मैं निश्चय ही उसमें हस्तक्षेप नहीं करूंगा। अप्रेल 1947 में नेहरू ने पुनः कहा कि किसी रियासत में राजतंत्र की सरकार चालू रहने में कोई रुकावट नहीं पड़ेगी यदि रियासतें स्वतंत्रता के व्यापक चित्र में उचित लगें और वहाँ पर उतनी ही आजादी तथा उत्तरदायी सरकार हो। 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल ने राजाओं का आह्वान किया कि रियासतें सुरक्षा, विदेशी मामले और संचार के विषय में भारतीय संघ में सम्मिलित हों। देश के सामान्य हितों से सम्बन्धित इन तीन विषयों में सम्मिलित होने के अलावा हम उनसे और कुछ नहीं चाहते। अन्य मामलों में हम उनके स्वायत्त अस्तित्व का निःसंदेह सम्मान करेंगे।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्थिति में परिवर्तन

    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देशी राज्यों में राजनीतिक आंदोलन तीव्रता से फैलने लगे तथा जनता द्वारा उत्तरदायी शासन की मांग होने लगी। इन आंदोलनों पर टिप्पणी करते हुए सरदार पटेल ने 16 दिसम्बर 1947 को कहा कि जब तक छोटी रियासतों के स्वतंत्र अस्तित्व को मिटा नहीं दिया जाता तब तक उनमें जनतंत्रीय शासन की स्थापना असंभव होगी। एक प्रकार से यह भारत के गणतंत्रीय शासन का छोटे नरेशों के प्रति आदेश था जिसके सामने अपने अस्तित्व को विवश हो खो देने और जनतंत्रीय संस्थाओं का निर्माण करने के अतिरिक्त उनके समक्ष और कोई रास्ता नहीं रह गया था। इस पर कई राजाओं ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा। सरदार पटेल द्वारा 5 जनवरी 1948 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह को एक पत्र में सूचित किया गया कि मैं श्रीमान् को यह बात साफ बता देना चाहता हूँ कि हम स्वयं एकीकरण के किसी प्रस्ताव को प्रेरणा या बढ़ावा नहीं देते। हम ऐसे किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे जब तक हमें संतोष न हो जाये कि इसे सम्बन्धित जनता और शासक दोनों का समर्थन प्राप्त है।

    7 जनवरी 1948 को लॉर्ड माउंटबेटन ने दिल्ली में राजाओं का एक सम्मेलन बुलाया जिसमें जोधपुर, बीकानेर, भोपाल, रीवा, कोटा तथा अलवर के शासक एवं कश्मीर, इंदौर, कोल्हापुर, उदयपुर, बीकानेर, जयपुर, कोटा, अलवर तथा रीवा के दीवान एवं त्रावणकोर, कोचीन, पटियाला एवं जोधपुर के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। माउंटबेटन ने राजाओं को सलाह दी कि छोटे राज्यों को आपस में विलय करके संघ बना लेने चाहिये। केन्द्र सरकार बड़े राज्यों के विलय के पक्ष में नहीं हैं। मेनन ने कहा कि एकीकरण का सिद्धांत उन रियासतों पर लागू नहीं किया जायेगा जिनके संविधान निर्मात्री समिति में अलग प्रतिनिधि हैं। प्रत्येक रियासत के लिये एक कसौटी बनायी गयी है जिसमें उसकी आय, जनसंख्या और विकास की संभावनाओं को ध्यान में रखा जायेगा। 20 फरवरी 1948 को पटेल ने पुनः बीकानेर नरेश को लिखा कि मैं इस बात को एक बार से अधिक बार स्पष्ट कर चुका हूँ कि रियासती मंत्रालय एकीकरण की योजना का तभी समर्थन करेगा जब इस विषय पर जनता और राजा दोनों सहमत हों। हमने इस स्थिति को लगातार बनाये रखा है।

    15 मार्च 1948 को एन. बी. गाडगिल ने एकीकरण के मामले में पटेल द्वारा दिये गये आश्वासन को पुनः दोहराया। उन्होंने कहा कि विधान निर्मात्री सभा में जिन रियासतों के अलग प्रतिनिधि हैं, उन्हें समय-समय पर भारत सरकार ने आश्वासन दिया है कि वे अलग रहने योग्य इकाईयां मानी जायेंगी। विलय या एकीकरण के लिये अपनी ओर से किसी प्रकार का दबाव डालने या डराने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।

    29 मार्च 1948 को मेनन ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कोचीन, त्रावणकोर, मैसूर, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर और भोपाल जैसी बड़ी रियासतें स्वतंत्र इकाइयों के रूप में रहेंगी और ऐसे संघों और इकाइयों की संख्या 25 होगी। सरकार रियासती मंत्रालय द्वारा दिये गये इस वचन को मानती है कि अलग रहने योग्य इकाइयों को तब तक अलग रहने दिया जायेगा जब तक कि वे स्वेच्छा से शामिल न हों। भारत सरकार की घोषणा यह थी कि स्वतंत्र भारत में 1 करोड़ वार्षिक आय और 10 लाख जनसंख्या वाली रियासत पृथक अस्तित्व रखने योग्य समझी जायेगी। आरंभ में भारत सरकार ने घोषणा की थी कि 18 रियासतें ऐसी हैं कि वे भारतीय संघ की पूर्ण इकाई की शर्तों को पूरा करती हैं। विधान निर्मात्री सभा के समक्ष रखे गये संविधान के मसौदे के सम्बन्धित भाग में इन 18 रियासतों के नाम भी दिये गये थे।

    रियासती विभाग के मंत्री और सचिव के वक्तव्यों से सक्षम राज्यों के शासकों को लगा कि उनके राज्य स्वतंत्र रह सकेंगे जिससे उन्होंने जन आकांक्षाओं की अवहेलना आरंभ कर दी। वहीं कांग्रेस के प्रांतीय एवं स्थानीय नेताओं में राजस्थान के शीघ्र एकीकरण की मांग ने जोर पकड़ लिया। इस पर राजाओं ने राज्यों में प्रजा मंडलों तथा प्रजा परिषदों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलनों को मजबूती से कुचलने का प्रयास किये गये वहीं झण्डा विवाद भी बड़े पैमाने पर मुखर हुए।

    बड़े राज्यों द्वारा छोटे राज्यों को मिलाने का प्रयास

    कैबीनेट मिशन ने 22 मई 1946 को घोषित किया था कि छोटी-छोटी रियासतों को चाहिये कि वे आपस में मिलकर बड़ी इकाईयों का गठन कर लें। इस से प्रेरित होकर मई 1946 में मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह ने राजस्थान, गुजरात व मालवा के शासकों व प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन उदयपुर में आयोजित किया। 25-26 जून 1947 को महाराणा ने उदयपुर में पुनः राजपूताना के शासकों का सम्मेलन आयोजित किया। 14 फरवरी 1948 को राजाओं एवं उनके प्रतिनिधियों की सभा में यूनियन के विधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गयी। महाराणा भूपालसिंह ने 6 मार्च 1948 को एक बार पुनः राजस्थान और गुजरात के शासकों से अपील की कि राजपूताना के चार बड़े राज्यों को छोड़कर शेष समस्त राज्य संघ में संगठित हो जायें। महाराणा के इस आग्रह का भी राजाओं पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। वस्तुतः राजपूताना के शासकों में अविश्वास की भावना व्याप्त थी। महाराणा ने अलवर महाराजा को लिखे एक पत्र में उल्लेख किया कि जब भी कार्य करने की बात आती है तो परस्पर संदेह के फलस्वरूप शासक कुछ नहीं कर पाते।

    महाराणा द्वारा किये जा रहे प्रयासों को छोटे राज्यों ने इस रूप में लिया कि बड़े राज्य छोटे राज्यों को निगल जाना चाहते हैं। महाराणा ने एकीकरण की चर्चा के दौरान जाने-अनजाने में ऐसे संकेत भी दिये थे। महाराणा छोटी रियासतों का मेवाड़ में विलय करके वृहत्तर मेवाड़ बनाना चाहते थे किंतु वे यह भी चाहते थे कि बाद में वृहत्तर मेवाड़ में जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के साथ मिलकर ऐसा संघ बनाया जाये जो भारतीय संघ में महत्त्वपूर्ण इकाई के रूप में भूमिका निभा सके। प्रस्तावित संघ के बारे में जनता से कोई राय नहीं ली गयी थी अतः जनता तथा मेवाड़ प्रजा मण्डल ने इसका विरोध किया। अ. भा. राज्य परिषद की राजपूताना इकाई के अध्यक्ष जयनारायण व्यास ने 29 जून 1947 को महाराणा को एक पत्र लिखा कि प्रस्तावित योजना जनता के लिये वरदान के स्थान पर अभिशाप प्रमाणित होगी। इस प्रकार की योजना में जनता का सहयोग लेना अपेक्षित है। व्यास ने सरदार पटेल को लिखा कि प्रस्तावित संघ को मान्यता न दें। के. एम. मुंशी ने सरदार पटेल से शिकायत की कि मेवाड़ प्रजा मंडल राजस्थान संघ निर्माण कार्य में साथ नहीं दे रहा। इस पर पटेल ने व्यास को सलाह दी कि जननेताओं को प्रजातांत्रिक संघ बनाना चाहिये। के. एम. मुंशी के उदयपुर से चले जाने के बाद यह योजना स्वतः समाप्त हो गयी।

    जयपुर के महाराजा मानसिंह, कोटा के महाराव भीमसिंह व बीकानेर के महाराजा सार्दूलसिंह ने भी अपने स्तर पर पड़ौसी राज्यों को अपने राज्यों में मिलाने के असफल प्रयास किये। कोटा महाराव भीमसिंह ने प्रयास किया कि कोटा, बूंदी और झालावाड़ राज्यों को मिलाकर एक संयुक्त राज्य स्थापित किया जाये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली।

    जयपुर के दीवान वी. टी. कृष्णामाचारी ने महाराजा मानसिंह की अनुमति से राजपूताना के शासकों व प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया। महाराजा ने शासकों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि राज्यों का ऐसा संघ बने जिसमें उच्च न्यायालय, उच्च शिक्षा, पुलिस आदि विषय संघ के नियंत्रण में रहें और शेष विषयों पर सदस्य राज्यों का अधिकार रहे। यदि ऐसा संभव न हो तो छोटे राज्यों को अपने पड़ौसी राज्य में मिल जाना चाहिये। सम्मेलन में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। जयपुर के प्रधानमंत्री कृष्णामूर्ति का सुझाव था कि राजपूताना के राज्यों को तीन चार इकाइयों में विभक्त कर दिया जाये और अलवर व करौली राज्यों को जयपुर राज्य में मिला दिया जाये। दिसम्बर 1947 में बीकानेर शासक ने लुहारू राज्य को बीकानेर राज्य में शामिल करने के प्रयास किये परंतु भारत सरकार ने लुहारू राज्य को बीकानेर राज्य में विलय न कर इसका शासन अपने हाथ में ले लिया जिससे बीकानेर महाराजा को बड़ी निराशा हुई। डूंगरपुर और कोटा के शासक क्रमशः वृहत्तर डूंगरपुर और वृहत्तर कोटा के निर्माण में लगे हुए थे। छोटी रियासतें अपनी वंश परम्परा और प्राचीन प्रतिष्ठा के कारण बड़ी रियासतों में विलय होने से हिचकिचा रही थीं। अतः राजाओं द्वारा किये गये समस्त प्रयास विफल हो गये। उनके विलय के लिये प्रबल जनमत व केंद्रीय सत्ता के हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।

    राजाओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव

    भारत सरकार द्वारा किशनगढ़ तथा शाहपुरा रियासतों को केंद्र शासित प्रदेश अजमेर मेरवाड़ा में मिलाने का निर्णय लिया गया। किशनगढ़ के महाराजा सुमेरसिंह ने रियासती मंत्रालय के आदेश से 26 सितम्बर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। उसी दिन शाहपुरा के राजाधिराज सुदर्शनदेव को भी रियासती विभाग में बुलाया गया। सुदर्शनदेव ने कहा कि वह वैधानिक शासक है अतः अकेला कोई निर्णय नहीं ले सकता। रियासती विभाग के अधिकारी ने धमकी भरे शब्दों में सुदर्शनदेव से कहा कि ऐसा न करने पर आपको दुष्परिणाम भुगतने होंगे, उसने अलवर नरेश के विरुद्ध की गयी कार्यवाही का उदाहरण प्रस्तुत किया। इस पर महाराजाधिराज ने कहा कि अलवर नरेश के विरुद्ध गंभीर आरोप थे, मेरे विरुद्ध कोई आरोप नहीं है। सुदर्शनदेव ने अपने राज्य के मुख्यमंत्री गोकुललाल असावा को इन तथ्यों से अवगत करवाया। असावा ने राजपूताने के गणमान्य नेताओं को साथ लेकर मेनन तथा पटेल से कहा कि महाराजाधिराज की मंशा भारत सरकार की योजना का विरोध करने की नहीं है। जनप्रतिनिधियों की आम राय यह है कि राजपूताने की समस्त छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाया जाये। किशनगढ़ तथा शाहपुरा को भी उसमें सम्मिलित किया जाये। जनभावनाओं को देखते हुए पटेल ने अपना निर्णय बदल लिया।

    के. एम. मुंशी व गुजरात के अन्य नेता महागुजरात संघ के निर्माण के लिये प्रयत्नशील थे। इसी क्रम में नवम्बर 1947 में सरदार पटेल को बताया गया कि पालनपुर, सिरोही, दांता, ईडर, विजयनगर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और झाबुआ ऐसे राज्य हैं जहाँ अधिकांश लोग गुजराती भाषी हैं। अतः इन रियासतों को राजपूताना एजेंसी से हटाकर पश्चिमी भारत और गुजरात एजेंसी के नियंत्रण में रख दिया जाये। राजपूताने के राजाओं और स्थानीय प्रजामंडलों ने इस योजना का विरोध किया जिसके फलस्वरूप डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा को यथास्थिति में रखा गया किंतु 1 फरवरी 1948 को पालनपुर, ईडर, दांता एवं विजयनगर को राजपूताना एजेंसी से हटाकर गुजरात एजेंसी के अतंर्गत रख दिया गया। कुछ समय बाद सिरोही राज्य को भी गुजरात एजेंसी के सुपुर्द कर दिया गया।

    रियासती मंत्रालय की एकीकरण नीति की अखबारों में कटु आलोचना हुई तो सरदार पटेल ने मेनन को गांधीजी और पं. नेहरू के पास भेजा ताकि उन्हें इस कार्यवाही के औचित्य में विश्वास करा दिया जाये। मेनन के अनुसार गांधीजी को इस काम से पूरी तरह संतोष था। भारत सरकार की इस कार्यवाही से राजाओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। भारत विभाजन के अवसर पर भड़के दंगों ने एकीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया। अलवर एवं भरतपुर में मेव जाति ने आतंक फैला दिया था जिसके परिणामस्वरूप हिन्दुओं ने भी मेवों पर आक्रमण किये। दंगों में भरतपुर रियासत में 209 गाँव पूर्णतः नष्ट हो गये। मेव, भरतपुर रियासत का उत्तरी भाग, गुड़गांव और अलवर रियासत के दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर मेवस्तान बनाने का स्वप्न देख रहे थे। अलवर राज्य के दीवान एन. बी. खरे ने मेवों को सख्ती से कुचला। खरे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे इसलिये कांग्रेसी नेताओं ने खरे पर कट्टर हिन्दूवादी होने के आरोप लगाये। कांग्रेसियों का मानना था कि खरे ने हिन्दुओं को मेवों के विरुद्ध भड़का कर दंगा करवाया। अक्टूबर 1947 में सरदार पटेल ने रियासती प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाईं
     सभा में पटेल ने भरतपुर के राजा तथा अलवर के दीवान से कहा कि जो लोग सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं वे देश के शत्रु हैं। खरे ने पटेल की इस कार्यवाही को राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप माना।

    30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हुई जिसमें अलवर नरेश और उनके प्रधानमंत्री एन. बी. खरे का हाथ होने का संदेह किया गया। भारत सरकार ने 7 फरवरी 1948 को अलवर नरेश तेजसिंह को दिल्ली बुलाकर कनाट प्लेस पर स्थित मरीना होटल में नरजबंद कर दिया तथा अलवर राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। खरे को पदच्युत करके दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया। अलवर नरेश की नजरबंदी से राजपूताना के राजाओं में भय व्याप्त हो गया और वे राष्ट्रीय नेताओं के दबाव में आ गये। अब वे अपने राज्यों को राजस्थान में मिलाने के लिये प्रस्तुत हो गये। अलवर तथा भरतपुर राज्यों की ही तरह धौलपुर तथा करौली राज्यों में भी सांप्रदायिक दंगों की आशंका दिखाई देने लगी। अतः रियासती मंत्रालय ने इन चारों राज्यों के राजाओं को हटाकर इन राज्यों का एक संघ बनाने का निर्णय लिया।


    मत्स्य संघ का निर्माण

    रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से बड़ा खिन्न था। भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध भारत सरकार ने एक आरोप सूची तैयार की-

    (1.) भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया। उसने खुले तौर पर भारतीय नेताओं को भारत विभाजन के लिये उत्तरदायी बताया।

    (2.) महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था।

    (3.) भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन को सुरक्षा प्रदान करने के लिये महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये।

    (4.) महाराजा की सेना में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं रह गयी थी।

    (5.) महाराजा ने राज्य में जाटवाद को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं रखी थी।

    (6.) भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया था। राज्य में जाटों व राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे जा रहे थे।

    (7.) महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था।

    (8.) नेहरू ने अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

    भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किये गये आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिये कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किये जा चुके थे। इसलिये भरतपुर महाराजा अत्यंत दबाव में थे। उन्होंने अत्यंत अनिच्छा से सम्मति प्रदान की। 14 फरवरी 1948 को रियासती विभाग द्वारा एस. एन. सप्रू को भरतपुर राज्य का प्रशासक नियुक्त किया गया। कर्नल ढिल्लों को राज्य की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। माउंटबेटन महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की।

    अलवर तथा भरतपुर राज्यों से सटे धौलपुर और करौली राज्यों के राजाओं को भी 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाया गया और सलाह दी गयी कि अलवर और भरतपुर राज्य के साथ संघ में शामिल हो जायें। इन्हें यह भी स्पष्ट किया गया कि बाद में आवश्यकता हुई तो इन चारों राज्यों के संघ को राजस्थान अथवा यूनाइटेड प्रोविंस में सम्मिलित कर दिया जायेगा क्योंकि मत्स्य यूनियन आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगी। इस प्रस्ताव को चारों ही राजाओं ने मान लिया तथा 28 फरवरी 1948 को चारों राज्यों के राजाओं ने एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये। के. एम. मुंशी की सलाह पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया। चूंकि महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर के विरुद्ध जांच चल रही थी इसलिये धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख तथा करौली महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया। 18 मार्च 1948 को इसका विधिवत् उद्घाटन होना निश्चित किया गया।

    सरदार पटेल को अलवर में कुछ कठिनाई होने की आशंका थी। इसलिये शासकों द्वारा प्रसंविदा पर हस्ताक्षर किये जाने से एक दिन पूर्व वे अलवर आये तथा एक आम सभा में उन्होंने राजपूतों तथा राजपूत शासकों को उनके कर्त्तव्य का स्मरण करवाया- 'छोटे राज्य अब बने नहीं रह सकते। उनके सामने एक ही विकल्प है कि वे बड़ी तथा समुचित आकार की इकाईयों में सम्मिलित हो जायें। जो अब भी राजपूत आधिपत्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वे आधुनिक संसार से बाहर हैं। अब शक्ति, प्रतिष्ठा या वर्ग का चिंतन उचित नहीं होगा। आज हरिजन की झाड़ू राजपूतों की तलवार से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। जैसे माँ का झुकाव बच्चे की ओर होता है वैसे ही जो लोग देश के हितों की देखभाल कर रहे हैं वे सबसे ऊपर हैं। वे भी समान समर्पण तथा बराबर आदर सम्मान के अधिकारी हैं।'  सरदार ने लोगों का आह्वान किया के वे सांप्रदायिक सद्भाव, एकता तथा शांति बनाये रखें।

    जैसे ही भरतपुर महाराजा के भाई मानसिंह को इस बात का पता लगा कि भारत सरकार भरतपुर राज्य को मत्स्य संघ में विलय करने जा रही है, उसने जाट झण्डा खतरे में है, का आह्वान करके पूरे देश के जाटों को सशस्त्र होकर भरतपुर पहुँचने को कहा। उसका निश्चय था कि वह भरतपुर राज्य पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में ले लेगा। उसने समस्त सरकारी इमारतों पर भरतपुर राज्य का झण्डा लगाने का आह्वान किया। किसान नेता देशराज ने भी इसमें सहयोग दिया। मानसिंह और देशराज गिरफ्तार कर लिये गये। जब 18 मार्च 1948 को संघ का उद्घाटन होने लगा तो उद्घाटन स्थल पर सशस्त्र भीड़ घुस गयी। पुलिस उसे नियंत्रित नहीं कर सकी। इस पर देशराज को उद्घाटन स्थल पर लाया गया। देशराज की इस बात को मान लिया गया कि मत्स्य संघ में किसान नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा। देशराज की अपील पर भीड़ शांत हो गयी। निर्धारित समय से दो घण्टे बाद मत्स्य संघ का उद्घाटन संभव हो सका। इस प्रकार 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ अस्तित्व में आया। इसके साथ ही राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। इस संघ का क्षेत्रफल 7,589 वर्ग मील था तथा जनसंख्या 18,37,994 तथा वार्षिक राजस्व 183 लाख था। माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने के लिये बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया। इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिये नियुक्त किया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गये अपितु एन. बी. खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ।


    संयुक्त राजस्थान

    जिस समय मत्स्य संघ के निर्माण के लिये वार्त्ता चल रही थी, तब रियासती सचिवालय ने राजस्थान के राज्यों का मध्यभारत और गुजरात के राज्यों के साथ एकीकरण का प्रस्ताव रखा किंतु राज्यों के प्रजामण्डलों एवं शासकों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। 3 मार्च 1948 को कोटा, डूंगरपुर और झालावाड़ के शासकों ने रियासती विभाग के समक्ष प्रस्ताव रखा कि बांसवाड़ा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, किशनगढ़, कोटा, प्रतापगढ़, शाहपुरा, टोंक, लावा और कुशलगढ़ को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का निर्माण किया जाये। प्रस्तावित संघ के क्षेत्र के बीच में मेवाड़ राज्य था जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकता था। कुछ शासकों के आग्रह पर रियासती विभाग ने मेवाड़ को नये संघ में शामिल होने का निमंत्रण दिया किंतु महाराणा भूपालसिंह तथा दीवान राममूर्ति ने कहा कि मेवाड़ का 1300 वर्ष पुराना राजवंश अपनी गौरवशाली परंपरा को तिलांजलि देकर भारत के मानचित्र पर अपना अस्तित्व समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की रियासतें चाहें तो वे मेवाड़ में अपना विलय कर सकती हैं।

    रियासती सचिवालय ने मेवाड़ को छोड़कर दक्षिणी पूर्वी राजस्थान की रियासतों को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का निर्माण करने का निश्चय किया। मेनन की इच्छा थी कि किशनगढ़ तथा शाहपुरा को अजमेर मेरवाड़ा से जोड़ दिया जाये किंतु इन राज्यों के शासकों तथा स्थानीय नेताओं ने इस विचार का विरोध किया। अतः इस विचार को त्याग दिया गया था। इन समस्त राज्यों के नरेशों ने विलय के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिये। कुछ राजाओं ने यह कार्य प्रसन्नता पूर्वक किया तो कुछ ने अत्यंत निराश होकर। बांसवाड़ा महारावल चन्द्रवीर सिंह ने हस्ताक्षर करते हुए कहा- 'मैं अपने मृत्यु दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ।' टोंक रियसात का भी इस संघ में विलय किया गया किंतु यह निश्चय किया गया कि जब मध्यभारत संघ का निर्माण होगा तब इसे मध्यभारत संध में मिला दिया जायेगा किंतु बाद में इस रियासत के केवल कुछ क्षेत्र ही मध्य भारत संघ में जोड़े गये। यह निश्चय किया गया कि संविधान सभा में इस संघ से एक लाख प्रति सदस्य की गणना से कुल 24 प्रतिनिधि चुने जायेंगे तथा जागीरदारों का प्रतिनिधित्व करने के लिये राजप्रमुख द्वारा 4 प्रतिनिधि नामित किये जायेंगे।

    वरिष्ठता, क्षेत्रफल तथा महत्त्व के आधार पर कोटा के शासक को राजप्रमुख का पद दिया गया किंतु कुलीय परम्परा में बूंदी का शासक कोटा के शासक से उच्चतर था। इसलिये बूंदी के शासक को यह बात सहन नहीं हो सकी कि उस संघ में कोटा शासक राजप्रमुख हो। अतः बूंदी के शासक महाराव बहादुरसिंह ने मेवाड़ के महाराणा भूपालसिंह से प्रस्तावित संघ में शामिल होने का अनुरोध किया ताकि उसके (बूंदी के) कुलीय गौरव की रक्षा हो सके क्योंकि मेवाड़ के शामिल होने पर मेवाड़ के महाराणा ही राजप्रमुख होंगे किंतु महाराणा ने बूंदी के शासक को भी वही उत्तर दिया जो उन्होंने रियासती विभाग को दिया था। मेवाड़ महाराणा द्वारा प्रस्तावित संघ में मिलने से मना कर देने के बाद राजस्थान की दक्षिण पूर्वी रियासतों को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का निर्माण कर लिया गया और 25 मार्च 1948 को बी. एन. गाडगिल द्वारा इसका विधिवत् उद्घाटन किया गया। कोटा नरेश को राजप्रमुख, बूंदी नरेश को वरिष्ठ उपराजप्रमुख और डूंगरपुर नरेश को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया गया। गोकुललाल असावा को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस संघ का क्षेत्रफल 17,000 वर्ग मील, जनसंख्या 24 लाख तथा कुल राजस्व लगभग 2 करोड़़ था।


    552 राज्यों का एकीकरण सम्पन्न

    संपूर्ण भारत में इस समय तक 216 राज्य जिनका कुल क्षेत्रफल 1,08,739 वर्ग मील तथा जनसंख्या 19.158 मिलियन थी, प्रांतों में मिला दिये गये। 61 राज्य जिनका कुल क्षेत्रफल 63,704 वर्ग मील तथा जनसंख्या 6.925 मिलियन थी, केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में अधिग्रहीत कर लिये गये। 275 राज्य जिनका कुल क्षेत्रफल 2,15,450 वर्ग मील तथा जनसंख्या 34.7 मिलियन थी, राज्य संघों में मिला दिये गये। इस प्रकार कुल 552 राज्यों का एकीकरण संपन्न हो गया जिनका क्षेत्रफल 3,87,893 वर्ग मील था तथा जनसंख्या 60.783 मिलियन थी। शेष बची रियासतों को वैसे ही बना रहने दिया गया तथा वे भारत संघ के भीतर सक्षम प्रशासनिक इकाईयों के रूप में कार्य करने लगीं।

    एकीककरण के अगले दौर में शेष बचे उन सक्षम राज्यों की बारी थी जो सक्षमता के आधार पर अब तक अपना पृथक अस्तित्व बनाये हुए थीं। रियासती विभाग अब भी यही कह रहा था कि केवल छोटे राज्यों को ही 7 बड़ी संघ इकाईयों- सौराष्ट्र, मत्स्य, मालवा, राजस्थान, विंध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा फुल्कियान में मिलाया जायेगा तथा 19 सक्षम राज्यों- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर, कोचीन, मैसूर, बड़ौदा, कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, बीकानेर, जोधपुर, कूच बिहार, त्रिपुरा, मनिपुर, जयपुर, उदयपुर, मयूरभंज तथा कोल्हापुर को अलग राज्य बने रहने दिया जायेगा।


    उदयपुर राज्य का संयुक्त राजस्थान में विलय

    राजपूताना के राज्यों के संघ के प्रति महाराणा की बेरुखी की मेवाड़ में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। मेवाड़ प्रजा मण्डल के प्रमुख नेता माणिक्यलाल वर्मा, जो उस समय भारतीय संविधान सभा में मेवाड़ के प्रतिनिधि थे, ने दिल्ली से जारी एक वक्तव्य में कहा कि मेवाड़ की 20 लाख जनता के भाग्य का फैसला अकेले महाराणा और उनके दीवान सर राममूर्ति नहीं कर सकते। प्रजामण्डल की यह स्पष्ट नीति है कि मेवाड़ अपना अस्तित्व समाप्त कर राजपूताना प्रांत का एक अंग बन जाये। प्रजा मण्डल के मुखपत्र 'मेवाड़ प्रजा मण्डल पत्रिका' के 8 मार्च और 15 मार्च 1948 के सम्पादकीय में भी मेवाड़ को प्रस्तावित संघ में विलय करने की मांग का जबर्दस्त समर्थन किया गया किंतु महाराणा अपने निश्चय पर अटल रहे। शीघ्र ही मेवाड़ की परिस्थितियों ने पलटा खाया। मेवाड़ में मंत्रिमण्डल के गठन को लेकर प्रजामण्डल और मेवाड़ सरकार के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया। अंत में प्रजामण्डल की बात स्वीकार करके यह गतिरोध समाप्त किया गया तथा यह निश्चित किया गया कि मंत्रिमंडल में दीवान के अतिरिक्त 7 मंत्री होंगे जिनमें से 4 प्रजामंडल द्वारा मनोनीत होंगे, 2 मंत्री क्षत्रिय परिषद से होंगे तथा एक का नामांकन महाराणा द्वारा किया जायेगा।

    प्रजामंडल की तरफ से प्रेमनारायण, बलवंतसिंह, मोहनलाल सुखाड़िया और हीरालाल कोठारी को नामजद किया गया। निर्दलीय सदस्य के लिये महाराणा की तरफ से मोहनसिंह मेहता को नामजद किया गया। मेहता उस समय भी वित्तमंत्री का काम देख रहे थे। प्रजामंडल को यह नाम स्वीकार नहीं हुआ क्योंकि मेहता ने 1942 में शिक्षामंत्री रहते हुए प्रजामंडल के आंदोलन को कुचलने में अहम भूमिका निभाई थी। इस बात को लेकर महाराणा और प्रजामंडल में फिर से गतिरोध उत्पन्न हो गया। 14 मार्च 1948 को प्रजामंडल ने एक आवश्यक बैठक बुलाई और उसमें निर्णय लिया कि मौजूदा मंत्रिमंडल से सुखाड़िया व कोठारी को त्यागपत्र दे देना चाहिये तथा शीघ्र ही प्रजामंडल की महासमिति की असाधारण बैठक बुलाकर राज्य सरकार के विरुद्ध कार्यवाही करने पर विचार विमर्श किया जाना चाहिये।

    राज्य सरकार प्रजामंडल के इस निर्णय से घबरा गयी। उसने प्रजामंडल के नेताओं को बातचीत करने के लिये आमंत्रित किया। प्रजामंडल ने मेहता के स्थान पर एडवोकेट जीवनसिंह चौरड़िया का नाम सुझाया। महाराणा ने प्रजामण्डल के प्रस्तावित उम्मीदवार को मंत्री बनाना स्वीकार कर लिया। राज्य का मुत्सद्दी वर्ग और सामंती वर्ग, प्रजामण्डल की जीत को सहन नहीं कर सका। उन्होंने महाराणा को परामर्श दिया कि मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में सम्मिलित कर लिया जाये क्योंकि यदि मेवाड़ बड़े राज्य में शामिल हो जाता है तो प्रशासन में मत्स्य संघ की भांति प्रजामण्डल के प्रतिनिधियों के स्थान पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों का वर्चस्व रहेगा तथा बड़े राज्य में सम्मिलित होते समय समस्त शर्तें रियासती सचिवालय द्वारा निश्चित की जायेंगी। महाराणा को यह परामर्श उचित लगा। अतः संयुक्त राजस्थान राज्य के उद्घाटन से दो दिन पूर्व महाराणा ने 23 मार्च 1948 को एक विशेष गजट के द्वारा प्रेमनारायण माथुर को राज्य के प्रधानमंत्री के पद पर पदस्थापित कर दिया तथा उनके साथी मंत्रियों के नाम की भी घोषणा कर दी किंतु उनके शपथ ग्रहण समारोह को कुछ दिन के लिये टाले रखा।

    महाराणा ने मेवाड़ प्रजामंडल को अंधेरे में रखकर उसी दिन (23 मार्च 1948 को) मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में शामिल करने के अपने निश्चय की सूचना भारत सरकार को भेज दी। चूंकि ऐन वक्त पर उद्घाटन के कार्यक्रम में परिवर्तन संभव नहीं था, अतः पूर्व निर्णय के अनुसार 25 मार्च 1948 को संयुक्त राजस्थान का विधिवत् उद्घाटन किया गया। मेवाड़ को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया। भारत सरकार की सलाह पर मंत्रिमंडल का गठन कुछ दिन के लिये स्थगित कर दिया।

    एम. एस. जैन ने बी. एल. पानगड़िया के इस तर्क से असहमति दर्शायी है कि जागीरदारों और प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं में झगड़ा हो जाने के कारण महाराणा ने उदयपुर राज्य को संयुक्त राजस्थान में विलय की स्वीकृति दी।

    संयुक्त राजस्थान के उद्घाटन के तीन दिन बाद संयुक्त राजस्थान में मेवाड़ के विलय पर वार्त्ता आरंभ हुई। मेवाड़ के दीवान रामामूर्ति दिल्ली गये और भारत सरकार को महाराणा की तीन प्रमुख मांगों से अवगत करवाया। पहली यह कि महाराणा को संयुक्त राजस्थान का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाये, दूसरी यह कि उन्हें 20 लाख रुपया प्रिवीपर्स दिया जाये, तीसरी यह कि उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बनाया जाये। भारत सरकार ने महाराणा की मांगों के सम्बन्ध में कोटा, डूंगरपुर व झालावाड़ के शासकों से विचार विमर्श कर मेवाड़ को संयुक्त राजस्थान में विलय करने का निश्चय किया। यद्यपि प्रत्येक राज्य का भारत सरकार के साथ अलग समझौता हुआ किंतु सामान्यतः छोटे राज्यों के मामले में राज्य के कुल राजस्व का 10 प्रतिशत तथा बड़े राज्यों के मामले में राज्य के कुल राजस्व का 8 प्रतिशत प्रिवीपर्स देना निश्चित किया गया था। रियासती सचिवालय ने यह नीति निश्चित कर ली थी कि किसी भी रियासत के शासक को 10 लाख रुपये से अधिक प्रिवीपर्स नहीं दिया जायेगा किंतु महाराणा की मांग पूरी करने के लिये निश्चय किया गया कि महाराणा को 10 लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स, 5 लाख रुपये राजप्रमुख पद का वार्षिक भत्ता और शेष 5 लाख रुपये मेवाड़ के राजवंश की परंपरा के अनुसार धार्मिक कृत्यों में खर्च के लिये दिया जायेगा।

    महाराणा को संयुक्त राजस्थान का आजीवन राजप्रमुख बनाना स्वीकार कर लिया गया किंतु यह पद उन्हें वंशानुगत नहीं दिया गया। मेवाड़ के महाराणा को संतुष्ट करने के लिये संयुक्त राज्य के संविधान में संशोधन किया गया और नये संघ को 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान' कहा गया। इसे द्वितीय राजस्थान भी कहते हैं। उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बानाना भी स्वीकार कर लिया गया किंतु संविधान में तय किया गया कि विधान सभा का प्रतिवर्ष एक अधिवेशन कोटा में भी होगा। कोटा में कमिश्नरी कार्यालय रखा गया। फॉरेस्ट स्कूल, पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज, हवाई प्रशिक्षण कॉलेज आदि संस्थायें कोटा का महत्त्व बनाये रखने के लिये कोटा में ही रखे गये।

    रियासती विभाग ने महाराणा की निजी संपत्ति के प्रश्न पर उदारतापूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया तथा उदयपुर में चुनावों के दौरान पुलिस द्वारा की गयी गोलीबारी की जाँच नहीं करवाने की मांग भी मान ली। रियासती विभाग ने महाराणा की मनचाही शर्तें स्वीकार कर लीं। उस समय तक संघ में विलय होने वाली किसी भी रियासत के शासक को इतनी रियायतें नहीं दी गयी थीं। भारत सरकार के लिये उदयुपर राज्य द्वारा किसी संघ में विलय हो जाने का बहुत बड़ा महत्त्व था क्योंकि इससे बड़े राज्यों के भी संघों में मिल जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया।


    संयुक्त राजस्थान की प्रसंविदा का निर्माण

    10 अप्रेल 1948 को प्रस्तावित संघ की प्रसंविदा (Covenant) बनाने के लिये नई दिल्ली में बैठक बुलाई गयी। इसमें कोटा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, प्रतापगढ़ तथा टोंक राज्यों के शासक, उदयपुर की ओर से दीवान एस. वी. राममूर्ति तथा राजस्थान संघ के मुख्यमंत्री गोकुललाल असावा उपस्थित हुए। यह प्रसंविदा सौराष्ट्र, मत्स्य, तथा विंध्यप्रदेश संघ के लिये तैयार की गयी प्रसंविदाओं से भिन्न था। इससे पूर्व की प्रसंविदाओं में राज्यों में से केवल तीन विषयों- रक्षा, विदेश मामले तथा संचार के सम्बन्ध में ही उपाय किये गये थे किंतु संयुक्त राजस्थान के गठन के लिये बनायी गयी प्रसंविदा में राजप्रमुख को शक्तियां दी गयीं कि वह संयुक्त राजस्थान के लिये (कर तथा शुल्क के अतिरिक्त) संघीय तथा समवर्ती सूची के किसी भी विषय को कानून बनाने के लिये डोमिनियन संविधान को समर्पित कर सकता था। 11 अप्रेल 1948 को प्रसंविदा को अंतिम रूप दे दिया गया तथा उपस्थित शासकों द्वारा इस पर हस्ताक्षर कर दिये गये। इस संघ का कुल क्षेत्रफल 29,977 वर्ग मील, जनसंख्या 42,60,918 तथा वार्षिक राजस्व 316 लाख था।

    मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह को राजप्रमुख, कोटा के महाराव भीमसिंह को वरिष्ठ उप राजप्रमुख, बूंदी एवं डूंगरपुर के राजाओं को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया गया। मेवाड़ प्रजामण्डल के प्रमुख नेता माणिक्यलाल वर्मा को राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। माणिक्यलाल वर्मा ने महाराणा भूपालसिंह से मंत्रिमण्डल निर्माण के सम्बन्ध में चर्चा की। महाराणा ने वर्मा से आग्रह किया कि वे मंत्रिमण्डल में जागीरदारों को भी प्रतिनिधित्व दें। वर्मा ने महाराणा का सुझाव मानने से मना कर दिया। 18 अप्रेल 1948 को पं. नेहरू संयुक्त राजस्थान का विधिवत् उद्घाटन करने के लिये पहुँचे तो वर्मा ने नेहरू से कहा कि वे ऐसे किसी मंत्रिमण्डल का निर्माण नहीं करेंगे जिसमें जागीरदारों का प्रतिनिधित्व हो। नेहरू ने निर्णय दिया कि प्रधानमंत्री को इस सम्बन्ध में महाराणा तथा अन्य व्यक्तियों से विचार विमर्श करना चाहिये किंतु अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री को ही लेना है। नेहरू ने वर्मा को सलाह दी कि इस समय तो प्रधानमंत्री तथा राजप्रमुख अपने पदों की शपथ ले लें तथा यदि मंत्रिमण्डल बनने में कठिनाई हो तो वे तथा राममूर्ति दिल्ली आकर रियासती विभाग से सलाह कर लें। नेहरू की सलाह पर वर्मा ने प्रधानमंत्री पद की तथा महाराणा ने राजप्रमुख के पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद वर्मा दिल्ली जाकर सरदार पटेल से मिले। पटेल ने महाराणा को पत्र लिखकर सलाह दी कि वे वर्मा की बात मान लें। इस पर महाराणा ने वर्मा मंत्रिमण्डल को स्वीकृति दे दी तथा मंत्रिमंडल में जागीरदारों के प्रतिनिधित्व पर जोर नहीं दिया। मंत्रिमण्डल में गोकुललाल असावा (शाहपुरा), प्रेमनारायण माथुर, भूरेलाल बया और मोहनलाल सुखाड़िया (उदयपुर), भोगीलाल पांड्या (डूंगरपुर), अभिन्न हरि (कोटा) और बृजसुंदर शर्मा (बूंदी) सम्मिलित किये गये। मंत्रिमण्डल ने 28 अप्रेल 1948 को शपथ ली।

    बीकानेर महाराजा द्वारा उदयपुर को राजस्थान में विलय से रोकने का प्रयास

    उदयपुर राज्य अलग रह सकने योग्य इकाई अर्थात् सक्षम राज्य की श्रेणी में आता था किंतु उसके संयुक्त राजस्थान संघ में मिलने के निर्णय से जोधपुर, बीकानेर तथा जयपुर को बड़ा धक्का लगा। बीकानेर महाराजा सादूलसिंह ने मेवाड़ महाराणा को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि मेवाड़ राजस्थान यूनियन में नहीं मिले। सादूलसिंह ने बीकानेर रियासत की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री कुंवर जसवंतसिंह दाउदसर को उदयपुर भेजा ताकि वह महाराणा से व्यक्तिगत भेंट करके महाराणा को राजस्थान में मिलने से रोके। जसवंतसिंह ने महाराणा से कहा कि मेवाड़ एक ऐसी रियासत थी जो मुगलों के सामने नहीं झुकी, आज वही रियासत कांग्रेस सरकार के सामने कैसे झुक रही है? महाराणा ने महाराजा सादूलसिंह के इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और सादूलसिंह को कहलवाया कि वह तो अपनी रियासत कांग्रेस को समर्पित कर चुके हैं, अन्य राज्यों का समर्पण भी अवश्यंभावी है। महाराणा के इस जवाब से बीकानेर नरेश के मनोबल में काफी गिरावट आईं


    राममूर्ति विवाद

    राजस्थान का उद्घाटन होने के बाद 29 अप्रेल 1948 को वी. पी. मेनन उदयपुर आये। महाराणा ने मेनन से अनुरोध किया मेवाड़ के पूर्व प्रधानमंत्री सर राममूर्ति को संयुक्त राजस्थान सरकार का सलाहकार नियुक्त किया जाये। मेनन ने माणिक्यलाल वर्मा से पूछे बिना ही यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। महाराणा ने भी वर्मा को बताये बिना राममूर्ति की नियुक्ति के आदेश जारी कर दिये। इस पर राममूर्ति ने यह कहना आरंभ कर दिया कि राजप्रमुख के सलाहकार होने के नाते वे मंत्रिमण्डल से ऊपर हैं। प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा ने 13 मई 1948 को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि जो अधिकारी सरकार का सलाहकार होगा, वह मंत्रिमण्डल के अधीन रहकर कार्य करेगा। राजप्रमुख को राज्य सम्बन्धी सलाह देने की जिम्मेदारी मंत्रिमण्डल की है। यदि सलाहकार जैसी एक और एजेंसी राजप्रमुख को सलाह देना आरंभ कर देगी तो राज्य में दोहरा शासन आरंभ हो जायेगा जो जनतंत्र के सर्वसम्मत सिद्धांतों के विपरीत होगा। वर्मा ने राममूर्ति से कहा कि वे प्रधानमंत्री के लिये आवंटित आवास खाली कर दें क्योंकि राममूर्ति को दूसरा आवास आवंटित कर दिया गया है।

    राममूर्ति ने वर्मा का पत्र राजप्रमुख के सम्मुख रखा तो राजप्रमुख बड़े खिन्न हुए। उन्होंने उसे अपना अपमान समझा। राजप्रमुख ने 15 मई 1948 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा कि आप से अधिक कोई नहीं जानता कि मैंने अपनी रियासत का संयुक्त राजस्थान में विलय अपनी स्वयं की तरफ से पहल कर पूरी तरह स्वेच्छा से किया है। मुझे विश्वास है कि आप सहमत होंगे कि मेरे साथ जो व्यवहार किया जा रहा है वह मेरे द्वारा प्रदर्शित सद्भावना और सहयोग के अनुरूप नहीं है।.........मैं आपसे हृदय से निवेदन करूंगा कि सर राममूर्ति की सलाहकार के पद पर की गयी नियुक्ति में किसी तरह दखल नहीं होना चाहिये। पटेल ने वर्मा को दिल्ली बुलाकर कहा कि सर राममूर्ति को लिखे गये पत्र को वापस ले लें। वर्मा ने सरदार के आदेशानुसार अपना पत्र वापस ले लिया। सरदार ने महाराणा को लिखा कि वर्मा ने मेरी सलाह पर 15 मई का पत्र वापस ले लिया है। मेरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री के निवास स्थान को लेकर राममूर्ति अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बना सकते। आप उन्हें इस सम्बन्ध में मंत्रिमण्डल के निर्णय को स्वीकार कर लेने की सलाह दें। बार-बार इस प्रकार की घटनायें होना बताता है कि सर राममूर्ति अपने आपको देश के बदले हुए हालात में ढाल नहीं पाये हैं। राममूर्ति को बता दें कि अपने तौर तरीकों में परिवर्तन करें अन्यथा यह संभावना है कि उनकी गलतियों के कारण आपके और मंत्रिमण्डल के सम्बन्ध बिगड़ जायें और बेकार में ही आपकी प्रतिष्ठा और पद को आंच पहुँचे।

    एल. सी. जैन की नियुक्ति को लेकर विवाद

    रियासती विभाग रियासतों के विलय से बने हर नये राज्य संघ में एक या दो आई.सी. एस. अधिकारी मुख्य सचिव या सलाहकार के रूप में नियुक्त करता था। माणिक्यलाल वर्मा ने एक स्थानीय अधिकारी बी. एस. मेहता को संयुक्त राजस्थान सरकार का मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया। रियासती विभाग ने वर्मा की इस कार्यवाही को पसंद नहीं किया तथा एक वरिष्ठ आई.सी. एस. अधिकारी एल. सी. जैन को संयुक्त राजस्थान का मुख्य सचिव नियुक्त करके उदयपुर भेज दिया। वह अधिकारी कई दिनों तक अपने सैलून में उदयपुर के रेलवे स्टेशन पर ही रुका रहा। उसे मुख्य सचिव के पद का कार्यभार नहीं दिया गया। पटेल ने वर्मा को दिल्ली बुलवाया। वर्मा ने सरदार से कहा कि यदि उनकी इच्छा के विपरीत आई.सी. एस. अधिकारी थोपा गया तो रियासती विभाग को किसी अन्य प्रधानमंत्री की तलाश करनी होगी। सरदार ने वर्मा की बात मान ली और जैन को अन्यत्र भेज दिया।


    वृहद राजस्थान की ओर

    एकीकरण के लिये जन आंदोलन

    देशी राज्य प्रजा परिषद की राजस्थान इकाई राजपूताना के समस्त राज्यों को एक इकाई के रूप में संगठित करने के पक्ष में थी। इसके समर्थन में मार्च 1948 में उसने मांग की कि अजमेर मेरवाड़ा सहित प्रदेश की समस्त रियासतों को मिलाकर वृहत् राजस्थान गठित किया जाये। मई 1948 में मध्यभारत संघ का निर्माण होने पर समाजवादी दल ने वृहत् राजस्थान के निर्माण की मांग की तथा अखिल भारतीय स्तर पर 'राजस्थान आंदोलन समिति' का गठन किया। समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने 9 नवम्बर 1948 को उदयपुर में आयोजित एक आमसभा में वृहत राजस्थान के निर्माण की मांग की। आंदोलन समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि राजपूताने की समस्त रियासतों और केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर मेरवाड़ा को मिलाकर अविलम्ब वृहत राजस्थान का निर्माण किया जाये। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने भी जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और मत्स्य संघ को संयुक्त राजस्थान में मिलाकर वृहत राजस्थान का निर्माण करने की मांग की।

    राजाओं की विचारधारा में बदलाव

    पूरे देश में तेजी से चले घटनाचक्र में बड़ी बड़ी रियासतें एकीकरण के दायरे में ली जा चुकी थीं, साथ ही देशी राज्यों में जनता द्वारा राज्यों के एकीकरण की मांग जिस बड़े स्तर पर उठने लगी थी, उससे जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के राजा भी अपने आप को इस बात के लिये मानसिक स्तर पर तैयार कर चुके थे कि उनके राज्य राजस्थान में मिला दिये जायें। अब देश उस दौर में प्रवेश कर चुका था जहाँ या तो राजा लोग अपनी रियासतों को एकीकरण के लिये प्रस्तुत कर दें या फिर सत्ता से वंचित हो जायें। यहाँ तक कि यदि वे अपने राज्यों को राजस्थान में विलीन होने की सहमति न भी दें तो भी उन्हें अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ सकता था। संयुक्त राजस्थान में सत्ता विहीन होकर रहना कम अपमानजनक था बजाय इसके कि वे अपने ही राज्य में सत्ता विहीन होकर रहें।

    यदि ये शासक अपने व्यक्तिगत अधिकार एवं प्रयास से विलयन की प्रक्रिया को कुछ समय के लिये टाल भी देते तो भी उन्हें वह सम्मान और अधिकार उतनी सरलता से नहीं मिलते और उस सीमा तक नहीं मिलते जितने कि उन्हें विलयन के लिये तैयार होने पर मिलते। दिल्ली, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर में मेनन और इन राज्यों के शासकों के बीच अलग-अलग और साथ साथ कई बैठकें हुईं। यह बात शीघ्र ही स्पष्ट हो गयी कि इन राज्यों का मिलन अवश्यंभावी है और इस आशा से कि यह रियासती जनता तथा देश के व्यापक हित में होगा, चारों शासक वृहद राजस्थान संघ बनाने में सहमत हो गये।

    सक्षम राज्यों का राजस्थान में विलय

    18 अप्रेल 1948 को संयुक्त राजस्थान का उद्घाटन करने के बाद दिल्ली लौटकर नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा कि मेरे उदयपुर प्रवास के दौरान प्रजामण्डल के कई नेताओं ने प्रबल इच्छा प्रकट की है कि जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर को यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान में मिलाया जाये। नेहरू ने अपने पत्र में राजस्थान के लोगों की उस मांग का भी उल्लेख किया जो सिरोही राज्य को राजस्थान में मिलाये जाने के सम्बन्ध में थी। जवाब में सरदार पटेल ने नेहरू को लिखा कि जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर का राजस्थान में विलयन निःसंदेह एक आदर्श स्थिति है किंतु यह तभी संभव है जब इन राज्यों के लोग स्वयं इस कार्य के लिये आगे आयें। तेजी से बदलते राष्ट्रीय परिदृश्य एवं पाकिस्तान के शत्रुवत् व्यवहार के कारण इन राज्यों को स्वाधीन भारत के अंतर्गत स्वतंत्र रखा जाना संभव नहीं रह गया था। जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर की सीमायें पाकिस्तान के साथ लगती थीं। इस सीमा से भविष्य में किसी भी समय आक्रमण होने का खतरा बना हुआ था।यह समस्त क्षेत्र रेगिस्तानी था। आर्थिक संसाधनों की दृष्टि से भी इस क्षेत्र में विपन्नता थी। संचार के साधन भी पर्याप्त नहीं थे। इस कारण भारत सरकार ने एकीकरण से शेष बचे तीन सक्षम राज्यों- जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर एवं चौथे छोटे राज्य जैसलमेर को संयुक्त राजस्थान में मिलाकर वहत् राजस्थान के निर्माण करने का निर्णय लिया।

    इन राज्यों के शासकों को पूर्व में दिये गये वचनों के कारण ऐसा करना सरल नहीं था फिर भी मेनन को विश्वास था कि कोई हल निकल ही आयेगा। मेनन का विचार था कि इन तीनों सीमावर्ती राज्यों को कच्छ के साथ जोड़कर केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया जाये जिस पर चीफ कमिश्नर का नियंत्रण हो। ऐसा करने से पाकिस्तान की सीमाओं से लगने वाला पूरा क्षेत्र केन्द्रीय शासन के अधीन हो जायेगा। यदि इन राज्यों को राजस्थान में मिलाया गया तो सीमाओं की रक्षा का विशाल व्यय प्रदेश पर आ पडे़गा तथा यह राजस्थान पर बड़ा भारी दबाव होगा। इन राज्यों का विशाल क्षेत्र अविकसित था अतः इन राज्यों को राजस्थान को न दिया जाकर भारत सरकार अपने पास रखे और इन राज्यों की विकास परियोजनाओं के लिये सहायता करे।

    नेहरू ने भी इस सम्बन्ध में पटेल को लिखा कि पनिक्कर ने सुझाव दिया है कि इस सीमावर्ती पट्टी को केन्द्र सरकार अथवा हमारे रक्षा मंत्रालय के अधीन रखा जा सकता है तथा यह सुझाव मानने योग्य है। राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक विकास, दोनों ही दृष्टि से इन राज्यों को एक केंद्र शासित क्षेत्र के अधीन रखा जाना उचित जान पड़ता था किंतु मेनन की इस योजना को जयनारायण व्यास व अन्य नेताओं ने स्वीकार नहीं किया। इस योजना के मित्र कम थे और शत्रु अधिक। अतः इस विचार को छोड़ देना पड़ा। मेनन ने पटेल को सुझाव दिया कि इन चारों राज्यों को राजस्थान में मिला दिया जाये। पटेल ने इस विचार का स्वागत किया। पटेल 14 जनवरी 1949 को उदयपुर जाने वाले थे। उन्होंने मेनन से कहा कि मैं इस यात्रा के दौरान ही वृहद राजस्थान के निर्माण की घोषणा करना चाहूंगा, अतः मेनन राज्यों के राजाओं से बात करके उन्हें इस कार्य के लिये तैयार करें।


    जयपुर राज्य का विलय

    जयपुर के महाराजा मानसिंह विलय के प्रस्ताव से प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी राजकुमार भवानीसिंह को अपने एक पत्र में लिखा कि मुझे डर है कि यदि राजपूताना का कोई राजा त्याग और बलिदान करने के लिये नेतृत्व करने आगे नहीं आया तो प्रदेश का भविष्य अंधकार में है। इस पत्र में उन्होंने उदयपुर, जोधपुर और बीकानेर के राजाओं की कमजारियों पर भी प्रकाश डाला। पर महाराजा स्वयं आगे आने से झिझके। महारानी गायत्री देवी के अनुसार यद्यपि जय ने मुझे यह समझाने का प्रयास किया था कि वृहत्तर राजस्थान में मिलना क्यों आवश्यक है किंतु मुझे उनका जयपुर राज्य का शासक न रहने का विचार अच्छा नहीं लगा। वृहत्तर राजस्थान में जयपुर राज्य का विलय जय के लिये राजनीतिक एवं ऐतिहासिक रूप से अपरिहार्य था। वह केवल अकेले ही राजपूत रियासत के शासक नहीं बने रह सकते थे। उन्हें जयपुर का शासन छोड़ने तथा अपनी प्रजा के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी त्याग देने से घृणा थी किंतु उन्हें पता था कि देश का हित उनकी व्यक्तिगत भावना से ऊपर है।

    11 जनवरी 1949 को वी. पी. मेनन ने जयपुर राज्य के महाराजा तथा दीवान सर वी. टी. कृष्णामाचारी से राज्य के विलय पर वार्त्ता की। कृष्णामाचारी बड़े राज्यों के विलय के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि ऐसा करने से राजस्थान राज्य में राजपूतों की प्रधानता बनी रहेगी जैसे पूर्वी पंजाब में सिक्खों की प्रधानता थी। ऐसा करना देश के लिये हितकर प्रमाणित नहीं होगा। कृष्णामाचारी राजस्थान को तीन इकाइयों में विभाजित रखने के पक्ष में थे। उनके अनुसार संयुक्त राजस्थान यथा स्थिति में रहे। दूसरी इकाई में जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर राज्यों को रखा जाये और इसे पश्चिमी राजस्थान संघ का नाम दिया जाये। राजस्थान की तीसरी इकाई जयपुर, अलवर और करौली रियासतों को मिलाकर बनाई जाये। भरतपुर और धौलपुर राज्यों को उत्तरप्रदेश में सम्मिलित कर दिया जाये। कृष्णामाचारी का अनुमान था कि भरतपुर और धौलपुर के शासक जाट होने के कारण संयुक्त प्रांत में मिलना चाहेंगे।

    मेनन इस सुझाव से सहमत नहीं हुए। इस समय तक समाजवादी दल द्वारा राजस्थान के निर्माण के लिये आंदोलन आरंभ करने की घोषणा की जा चुकी थी। मेनन राजस्थान के निर्माण का श्रेय उन्हें नहीं देना चाहते थे तथा उनका आंदोलन आरंभ होने से पहले ही राजस्थान के निर्माण की गुत्थी सुलझा लेना चाहते थे। विचार विमर्श के दौरान महाराजा जयपुर ने शर्त रखी कि उन्हें इस नये राज्य का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाये व जयपुर नये राज्य की राजधानी हो। मेनन ने महाराजा को जवाब दिया कि इन बातों पर तब विचार किया जा सकता है जब इन मुद्दों पर विस्तार से वार्त्ता की जायेगी। मेनन का तात्कालिक उद्देश्य राजाओं को उनके राज्य के राजस्थान संघ में विलय के लिये सैद्धांतिक तौर पर सहमत करने का था। इससे सरदार 14 जनवरी को वृहद राजस्थान के निर्माण की योजना की घोषणा कर सकते थे। मेनन ने एक प्रारूप तैयार किया जिसे महाराजा और उनके दीवान, दोनों ने स्वीकार कर लिया। इसका मसौदा तार द्वारा जोधपुर और बीकानेर के महाराजाओं को भेज दिया गया। उसी शाम जोधपुर के महाराजा ने इस घोषणा की सहमति के बारे में मेनन को सूचित किया। बीकानेर के महाराजा ने भी उस प्रारूप पर अपनी सहमति जताते हुए मेनन को वापस तार भिजवाया।

    12 जनवरी 1949 को मेनन ने उदयपुर जाकर महाराणा से बात की। महाराणा ने स्वीकृति दे दी। 14 जनवरी 1949 को पटेल ने उदयपुर में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए वृहत् राजस्थान के निर्माण की घोषणा कर दी। सरदार पटेल ने अपने भाषण में कहा कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं जैसलमेर के राजा सैद्धांतिक रूप से राजस्थान संघ में एकीकरण के लिये सहमति दे चुके हैं। अतः वृहद राजस्थान का निर्माण शीघ्र ही सच्चाई में बदल जायेगा। यद्यपि इस योजना के विस्तार में जाना अभी शेष है। इस घोषणा का पूरे देश में स्वागत किया गया। इस घोषणा के बाद रियासती मंत्रालय ने वृहद राजस्थान के निर्माण पर कार्य करना आरंभ किया। इस कार्य से सम्बद्ध तीन पक्षों से अलग-अलग तथा साथ बुलाकर बात की गयी। पहला पक्ष जयपुर, जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर राज्यों के राजाओं तथा उनके सलाहकारों का था। दूसरा पक्ष संयुक्त राजस्थान संघ में पहले से ही सम्मिलित राज्यों के राजाओं का था तथा तीसरा पक्ष हीरालाल शास्त्री, जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा और गोकुलभाई भट्ट आदि लोकप्रिय नेताओं का था।

    वृहत राजस्थान का राजप्रमुख, मंत्रिमण्डल, प्रशासकीय स्वरूप तथा राजधानी आदि विषयों पर विचार करने हेतु 3 फरवरी 1949 को रियासती विभाग के तत्वावधान में दिल्ली में एक बैठक आयोजित की गयी जिसमें रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन, प्र्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोकुलभाई भट्ट, संयुक्त राजस्थान के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा, जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास तथा जयपुर राज्य के मुख्य सचिव (मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री) हीरालाल शास्त्री ने भाग लिया।

    बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह को जीवन पर्यन्त राजप्रमुख बनाया जाये। जोधपुर और बीकानेर के शासक इसके पक्ष में नहीं थे किंतु वे भारत सरकार के दबाव का सामना नहीं कर सके किंतु महाराणा भूपालसिंह ने इसे स्वीकार नहीं किया। महाराणा ने स्वयं को राजप्रमुख बनाये जाने का दावा किया। राजपूताना के अन्य शासकों, जननेताओं और भारत सरकार को महाराणा को राजप्रमुख बनाने में कोई आपत्ति नहीं थी किंतु महाराणा शारीरिक दृष्टि से अपाहिज थे और स्वतंत्रता पूर्वक बाहर आ-जा नहीं सकते थे। भावनात्मक आधार पर लोकप्रिय नेताओं ने सुझाव दिया कि महाराणा को संघ के सामान्य प्रशासन से अलग कोई अलंकृत स्थिति प्रदान कर दी जाये तथा उन्हें महाराज शिरोमणि की उपाधि दी जाये। महाराणा ने इसे स्वीकार नहीं किया और जोर डाला कि उन्हें महाराज प्रमुख कहा जाये। तब यह निश्चय किया गया कि महाराणा को महाराज प्रमुख बनाया जाये किंतु यह पद तथा उन्हें दिये जाने वाले भत्ते उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जायेंगे। महाराणा को आश्वस्त किया गया कि उन्हें समारोहों और उत्सवों पर 21 तोपों की सलामी वाले राजाओं की श्रेणी में शामिल किया जायेगा। जयपुर के महाराजा भी महाराणा के सम्मान को देखते हुए स्वेच्छा से इस पर सहमत हो गये। महाराणा भूपालसिंह ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया कि उनका पद तथा उनको दिये जाने वाले भत्ते उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जायेंगे। उन्हें महाराज प्रमुख बना दिया गया। करणीसिंह ने भारत सरकार के इस काम की तुलना अंग्रेजों द्वारा राजाओं को तोपों की सलामी के रूप में दिये जाने वाले लालच से की है- बहुत से मामलों में आजीवन राजप्रमुख का पद देना एक शासक के लिये विलय स्वीकार करने का बहुत बड़ा प्रलोभन था। कुछ राजाओं को जिनका स्वास्थ्य खराब था, विशेष प्रिवीपर्स दी गयी।

    शासकों के प्रिवीपर्स का निर्धारण

    शासकों के प्रिवीपर्स का निर्धारण करते समय लोकप्रिय नेताओं द्वारा सुझाव दिया गया कि जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर के राज्य इंदौर के समान ही स्थिति रखते थे जिसके महाराजा को 15 लाख रुपये प्रिवीपर्स तथा 2.5 लाख रुपये उपराजप्रमुख के पद के भत्ते के रूप में दिये गये थे। अतः जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर के शासकों को 17.5 लाख रुपये दिये जायें तथा जयपुर के महाराजा को 5.5 लाख रुपये राजप्रमुख पद के भत्ते के रूप में दिये जायें। अंत में बीकानेर को 17 लाख रुपये, जोधपुर को 17.5 लाख रुपये तथा जयपुर को 18 लाख रुपये प्रिवीपर्स देना निश्चित हुआ। राजप्रमुख को 5.5 लाख रुपये वार्षिक भत्ता दिया जाना निश्चित किया गया।

    सलाहकारों की नियुक्ति

    3 फरवरी की बैठक में निश्चित किया गया कि मंत्रिमंडल को सलाह देने के लिये केन्द्र सरकार से दो या तीन सलाहकार नियुक्त किये जायें तथा भावी वृहद राजस्थान राज्य की राजधानी का मसला सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा सुलझाया जाये। बैठक में यह भी तय किया गया कि राज्य के मंत्रिमण्डल में नौ से अधिक मंत्री नहीं होंगे, उनमें एक जागीरदारों का प्रतिनिधि होगा। नये चुनाव होने तक राजस्थान सरकार पर भारत सरकार का नियंत्रण रहना निश्चित किया गया। राजाओं ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया किंतु जन नेताओं ने पहले इसका विरोध किया पर समय रहते वे भी इससे समहत हो गये। मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखने के लिये राज्य सरकार के कतिपय महत्त्वपूर्ण विभागों में दो या तीन आई.सी. एस. अधिकारियों को परामर्शदाता के रूप में नियुक्त किया जाना निश्चित किया गया। यदि किसी विषय पर मंत्रिमंडल और सलाहकारों के मध्य मतभेद हो जाये तो इसका अंतिम निर्णय भारत सरकार द्वारा करवाया जाना था।

    उपराज प्रमुखों की नियुक्ति

    3 फरवरी की बैठक में निश्चित किया गया कि प्रस्तावित संघ में जोधपुर तथा कोटा के शासकों को वरिष्ठ उपराजप्रमुख और बूंदी तथा डंूगरपुर के शासकों को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाये जाये। उपराजप्रमुखों का कार्यकाल पाँच वर्ष निश्चित किया जाये किंतु जयुपर के शासक को आजीवन राजप्रमुख बनाया जाये।

    जयपुर नरेश द्वारा प्रसंविदा पर हस्ताक्षर

    इन समस्त विषयों के निर्धारण के पश्चात् जयपुर राज्य ने प्रस्तावित वृहत राजस्थान में विलय की अनुमति प्रदान कर दी तथा प्रसंविदा पर हस्ताक्षर कर दिये। वृहत राजस्थान में विलय के समय जयपुर राज्य ने राजस्थान सरकार को 4 करोड़ 58 लाख रुपये की पोते-बाकी संभालाई।


    बीकानेर राज्य का राजस्थान में विलय

    बीकानेर नरेश को पूरा विश्वास था कि वह स्वतंत्र भारत में बीकानेर रियासत का अलग अस्तित्व बनाये रखने में सफल हो जायेंगे किंतु जब उदयपुर, जयपुर और जोधपुर नरेशों ने राजस्थान में विलय की स्वीकृति दे दी तो स्थिति पलट गयी। बीकानेर नरेश ने अपनी रियासत को विलय से बचाने के लिये खजाने की थैलियों के मुँह खोल दिये। पैसा पानी की तरह बह चला। परिणामतः बीकानेर में 'विलीनीकरण विरोधी मोर्चा' खड़ा हो गया। अनेक डॉक्टर, प्रोफेसर, वकील, भूतपूर्व न्यायाधीश व अवकाश प्राप्त उच्चाधिकारी इस मोर्चे में शामिल हो गये। इस मोर्चे द्वारा कई अजीबोगरीब कदम उठाये गये। उनकी मान्यता थी कि युद्ध एवं प्यार में उचित और अनुचित नहीं देखा जाता।

    इस मोर्चे द्वारा राजपूत सभा के नाम से जागीरदारों का एक संगठन खड़ा किया। इस समय प्रदेश के अन्य राज्यों 
    में भी जागीरदार वर्ग राजपूत समाज के माध्यम से अपने आप को संगठित करने का प्रयास कर रहा था। अतः देश में यह धारणा बनती जा रही थी कि इससे एकीकरण में रुकावट खड़ी हो सकती है। मोर्चे ने मुसलमानों को अपने राजा के प्रति वफादारी प्रदर्शित करने का आह्वान किया और इस कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिये मुस्लिम लीग के मुखपत्र डॉन के संपादक को बीकानेर राज्य में आमंत्रित किया। उसने मुस्लिम क्षेत्रों और मस्जिदों में लीगी प्रचार किया। इस संपादक को बीकानेर रियासत में लीग की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का सुंदर अवसर मिला जिसका लाभ उठाकर उसने मुसलमानों को इस बात के लिये प्रेरित किया कि वे अपने हितों की सुरक्षा के लिये पृथक निर्वाचन क्षेत्र और पृथक मताधिकार की मांग को बुलंद करें।

    मोर्चे ने बाकी बचे तबकों के लिये राजकीय डूंगर कॉलेज के प्रोफेसर श्री विद्याधर शास्त्री के नेतृत्व में प्रजा सेवक संघ नामक संस्था का निर्माण करवाया तथा बीकानेर लोकसेवक संघ खड़ा किया जिसके सर्वेसर्वा रियासत के भूतपूर्व न्यायाधीश बद्रीप्रसाद व्यास थे। राजपूत सभा का मोर्चा कोई बहुत बड़ी सफलता अर्जित नहीं कर सका क्योंकि इसमें जागीरदारों का वर्चस्व था, ग्रामीण जनता इनसे त्रस्त एवं आतंकित रहती थी। मुस्लिम मोर्चा भी महाराजा के लिये विशेष कुछ नहीं कर सका क्योंकि डॉन के संपादक ने इस अवसर का लाभ महाराजा के पक्ष में प्रचार करने की बजाय लीगी विचारधारा के प्रचार में किया और पृथक निर्वाचन क्षेत्र व पृथक मताधिकार की मांग करवाई जो महाराजा के खिलाफ पड़ती थी। ऐसा कर पाना इसलिये भी संभव नहीं था क्योंकि अत्यंत निकट भविष्य में ही उत्तरदायी सरकार के लिये चुनाव होने वाले थे।

    प्रजा सेवक संघ का मोर्चा इसलिये विफल हो गया क्योंकि इसके संचालक प्रोफेसर साहब केवल विद्यार्थियों में अपनी छाप छोड़ पाये थे किंतु इन विद्यार्थियों को मतदान का अधिकार ही प्राप्त नहीं था। लोक सेवक मोर्चे ने अपने आप को अछूतोद्धार विरोधी गतिविधियों से जोड़ लिया जिससे लोगों में उसकी दाल गली नहीं और जनता में महाराजा के प्रति आस्था का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सका।

    नवम्बर 1948 में रियासती मंत्रालय और इसके प्रतिनिधि वी. पी. मेनन द्वारा बातचीत चालू की गयी। 6 दिसम्बर 1948 को मेनन बीकानेर आये। उन्होंने राज्य के मुख्य नागरिकों से मिलकर बीकानेर के राजस्थान में एकीकरण के सम्बन्ध में उनकी इच्छा मालूम की। बीकानेर के लालगढ़ महल के दरबार हॉल में यह बैठक हुई। बैठक में बीकानेर के प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार भी उपस्थित थे। वी. पी. मेनन ने बैठक में उपस्थिति लोगों को राज्य के एकीकरण से होने वाले लाभों से परिचित करवाया। उन्होंने कहा कि इससे प्रशासन के व्यय में कमी आयेगी। पं. नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेता ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं कि लोगों की भलाई किसमें है। जब ये नेता कहते हैं कि रियासत का एकीकरण यहाँ के लोगों के हित में है तो वह वास्तव में हित में ही है और यहाँ के लोगों को उनके कथन का विश्वास करना चाहिये।

    बीकानेर राज्य के वकील पं. लक्ष्मीनारायण ने इस बैठक में यह मुद्दा उठाया कि एकीकरण के सम्बन्ध में राज्य में जनमत संग्रह करके जनता की राय मालूम करना उचित होगा। इस पर मेनन ने यह कहकर इसका विरोध किया कि किसी भी अन्य राज्य में ऐसी मांग नहीं की गयी है। एक अन्य वकील पं. सूरजकरण आचार्य ने मेनन से पूछा कि क्या एकीकरण का मामला पहले ही तय किया जा चुका है या अभी सलाह लेनी बाकी है? इस पर मेनन ने जवाब दिया कि यह मामला पहले ही तय किया जा चुका है और भारत सरकार एकीकरण की योजना को पूरा करेगी। श्री मेनन ने यह भी कहा कि सुविधा के लिये ही आरंभ में भारत सरकार राज्यों का भारतीय संघ में सम्मिलन करना चाहती थी।

    भारत सरकार 560 रियासतों को स्वतंत्र छोड़ना नहीं चाहती थी। भारतीय संघ में सम्मिलित होने के समझौतों का उल्लेख करते हुए वी. पी. मेनन ने कहा कि कोई भी जनतांत्रिक सरकार इस प्रकार के आश्वासनों से देश का भविष्य नहीं बंाध सकती। जब यह प्रश्न किया गया कि जब इस मामले में एकतरफा फैसला किया जा चुका है तो इस पर महाराजा के हस्ताक्षर कराने क्यों जरूरी हैं? मेनन ने बताया कि कानूनी दृष्टि से हस्ताक्षर कराने जरूरी हैं।

    बैठक के पश्चात् मेनन ने महाराजा से बीकानेर राज्य के राजस्थान में एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने का निवेदन किया तो महाराजा ने हस्ताक्षर करने से स्पष्ट मना कर दिया। महाराजा ने मेनन को शर्तों की एक सांकेतिक सूची दी और कहा कि यदि ये राजा एकीकरण के लिये सहमत हो जायें तो आप इन शर्तों को मान लें। मेनन सहमत हो गये। मेनन ने महाराजा से दिल्ली चलने का आग्रह किया। दिल्ली में भी महाराजा ने पटेल के समक्ष दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने में अपनी अनिच्छा प्रकट की।

    कहा जाता है कि सरदार पटेल ने महाराजा को बहावलपुर-बीकानेर व्यापार संधि और चने की निकासी के परमिट जारी करने के घोटालों की जांच करने वाली महाजन कमेटी की रिपोर्ट की अदालती जांच करवाने की बात कही तो महाराजा एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने को सहमत हो गये।

    महाराजा द्वारा तैयार की गयी एक गोपनीय सूची में महाराजा ने लिखा है कि बीकानेर को अलग रहने योग्य इकाइयों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है। अब तक यह ऐसा ही माना जाता रहा है। एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया है? यह बलपूर्वक नियंत्रण क्यों?

    सूची से पता चलता है कि कि अखिल भारतीय रियासती जनता की राजपूताना प्रादेशिक परिषद ने एकीकरण की मांग पर बल दिया था। संयोग से उसमें बीकानेर का एक ही प्रतिनिधि रघुबर दयाल गोयल था और वह भी बीकानेरी नहीं था। समाजवादी पार्टी, जिसका कोई महत्त्व नहीं था, ने बीकानेर राज्य को पूर्वी पंजाब में मिलाने की मांग की। लोक परिषद, राज्य प्रजा सेवक संघ, करणीपुत्र संघ, अकाली जत्था तथा ऐसी ही अन्य अल्प संख्यक जातियों के संगठन बीकानेर राज्य के राजस्थान में विलय से सहमत नहीं थे केवल रघुवरदयाल गोयल ही बीकानेर के विलय के पक्ष में थे किंतु वे बाहर के आदमी थे। प्रजा परिषद की जाट लॉबी भी बीकानेर राज्य को अलग इकाई बनाये रखने के पक्ष में थी। बीकानेर रियासत को अलग इकाई बनाए रखने के महाराजा सादूलसिंह के तमाम प्रयत्न नाकामयाब होते जा रहे थे। ऐसे समय में जयपुर और जोधपुर नरेशों की अपने-अपने राज्यों को नए 'राजस्थान' राज्य में विलीन करने की स्वीकृति की घोषणा के बाद बीकानेर नरेश एकदम अलग-थलग पड़ गये थे।

    बीकानेर का राजस्थान में विलय

    5 दिसम्बर 1948 और 21 दिसम्बर 1948 को सरदार पटेल एवं मेनन के साथ बीकानेर महाराजा की आगे की बातचीत हुई। फरवरी 1949 में एक बैठक के में महाराजा ने रियासती मंत्रालय के समक्ष कुछ मांगें रखीं। उच्च न्यायालय, रेलवे तथा सेना के प्रशासनिक मुख्यालय बीकानेर में रखे जायें। बीकानेर में आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, सिविल अभियांत्रिकी महाविद्यालय तथा कृषि महाविद्यालय खोले जायें। महाराजा द्वारा बीकानेर राज्य के लिये अगले 20 साल हेतु बनाये गये विकास कार्यक्रम जिसमें चिकित्सा संस्थाएं, शैक्षणिक संस्थाएं, ग्रामीण विकास आदि सम्मिलित हैं, को छोटा न किया जाये। बीकानेर राज्य द्वारा एकीकरण से पहले जो कोष संचित किया गया है उसे बीकानेर राज्य की जनता पर व्यय किया जाये। एकीकरण से पूर्व जिन रियासती कर्मचारियों को पेंशन स्वीकृत की गयी हैं, उन्हें बनाये रखा जाये। बीकानेर राज्य के लोगों को राजस्थान राज्य की सेवाओं में समुचित भागीदारी दी जाये। मेनन ने इनमें से अधिकतर मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया।

    17 फरवरी 1949 को आयोजित इस बैठक में महाराजा सादुलसिंह ने मेनन से यह मांग भी की कि सादुलनगर के बाजार में उनकी (सादुलसिंह की) मूर्ति लगायी जाये। मेनन ने इन मांगों को सैद्धांतिक रूप से मान लिया। मेनन द्वारा लगभग समस्त शर्तें मान लिये जाने पर महाराजा सादुलसिंह ने वृहत्तर राजस्थान के निर्माण के लिये तैयार की गयी प्रसंविदा (Covenant) पर हस्ताक्षर कर दिये। वृहत राजस्थान के उद्घाटन समारोह से ठीक एक दिन पहले महाराजा ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरा परिवार विगत पाँच शताब्दियों से बीकानेर से अपने रक्त सम्बन्ध से जुड़ा रहा है। मेरे लिये यह दिन प्रसन्नता मनाने का नहीं है अपितु यह अवसर मेरे लिये अत्यंत अवसाद और दुख का दिन है। विलय के समय बीकानेर रियासत द्वारा संयुक्त राजस्थान को 4 करोड़ 87 लाख रुपये की नगद पोते-बीकी सम्भलाई गयी। यह रकम राजस्थान की समस्त रियासतों द्वारा दी गयी रकमों में सर्वाधिक थी। इसके अतिरिक्त बीकानेर स्टेट की सारी सम्पत्ति भी सरकार को सौंपी गयी। केंद्रीय सरकार को सौंपी गयी लगभग एक करोड़ की इस सम्पत्ति में रेलवे लाइन, रेल के डिब्बे, इंजन आदि थे।


    जोधपुर राज्य का राजस्थान में विलय

    जोधपुर नरेश हनवंतसिंह को आशंका थी कि राजाओं से जो भी वायदे केंद्र सरकार कर रही है, उन वायदों से वह समयांतर में मुकर जायेगी। महाराजा को आशंका थी कि कालांतर में सक्षम इकाईयों को भी समाप्त कर दिया जायेगा। इन आशंकाओं के कारण ही वे अंगीकार पत्र पर हस्ताक्षर करने में अंतिम समय तक झिझकते रहे। जब परिस्थितियों का दबाव बढ़ने लगा तो उन्होंने यह मानस बनाया कि अपने राज्य व प्रजा के हितार्थ केन्द्र सरकार से जितनी भी सुविधायें प्राप्त की जा सकें, कर ली जायें। महाराजा जानते थे कि केंद्रीय नेता देशी राज्यों में अपने स्थानीय पिछलग्गुओं द्वारा आंदोलन व दंगे करवाकर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं जिससे केन्द्र सरकार को हस्तक्षेप करके शासन अपने हाथ में लेने का औचित्य व अवसर प्राप्त हो जाये। उदयपुर, ग्वालियर व इंदौर जैसे सम्पन्न राज्यों के राजाओं द्वारा आत्मसमर्पण किये जाने के उपरांत भी महाराजा हनवंतसिंह ने अपने मनोबल को बनाये रखा। ध्रांग्धरा के राजा मयूरध्वजसिंह, जयपुर नरेश मानसिंह एवं बीकनेर नरेश सादूलसिंह ने हनवंतसिंह को समझाया कि माउंटबेटन, पटेल तथा रियासती मंत्रालय ने जब लिखकर दे दिया है तो किसी भी राजा को अपने राज्य, उसकी प्रजा व स्वयं अपने हितों के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहिये परंतु हनवंतसिंह का कथन था कि नेताओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वे अपने वायदों से कभी भी मुकर सकते हैं।

    जोधपुर राज्य का सेंदड़ा सम्मेलन

    जेाधपुर महाराजा ने 30 अक्टूबर 1947 को सेंदड़ा में रावत एवं मेर जातियों का सम्मेलन आयोजित किया। महाराजा पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने राज्य को राजस्थान से अलग इकाई बनाये रखने के लिये अपना समर्थन बढ़ाने व शक्ति जुटाने के उद्देश्य से इस सम्मेलन का आयोजन किया था। जोधपुर राज्य के उच्च रक्तवर्णी राजपूतों को महाराजा का यह कदम पसंद नहीं आया। महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश एवं शोध संस्थान जोधपुर में महाराजा के निजी सविच की एक फाइल में गुप्त पत्र रखा हुआ जो महाराजा के किसी निकटवर्ती राजपूत सरदार द्वारा लिखा गया प्रतीत होता है। इस पत्र में महाराजा को उलाहना दिया गया है कि जोधपुर राज्य में तमाम क्षुद्र जातियां राजपूतों में से ही निकली हुई हैं। यदि महाराजा उनके साथ बैठकर भोजन कर लें तो उनका राजस्थान पक्का हो जायेगा लेकिन आपकी प्रजा को यह मंजूर नहीं है। यदि आप प्रजा के विपरीत आचरण करेंगे तो आपका भी वही हाल होगा जो लोहारू, जूनागढ़ तथा कश्मीर के शासकों का हुआ। महाराजा को चाहिये कि वे अपने सलाहकारों को बदलें। अपने भाई हिम्मतसिंह को सरदार पटेल व नेहरू को सौंप दें तथा अपने भाई हरिसिंह को कोटवाली से काम सिखाना आरंभ करें ताकि वे राजकाज के कामों को अच्छी तरह समझ लें।

    जोधपुर राज्य का विलय

    14 जनवरी 1949 को उदयपुर में वृहत राजस्थान की घोषणा करने के बाद 25 जनवरी 1949 को सरदार पटेल ने जोधपुर में आयोजित एक आम सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया अभी चल रही है। हमें आशा है कि यह प्रक्रिया शीघ्र ही पूर्ण कर ली जायेगी तथा अति शीघ्र हम उस एकता को प्राप्त कर लेंगे जिसे इतिहास में शायद ही कभी प्राप्त किया गया हो। एक संघ बनाया गया है किंतु बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर तथा जयपुर अभी इससे बाहर हैं। यद्यपि अभी इन राज्यों से समझौता वार्त्ता चल रही है किंतु यह निर्णय कर लिया गया है कि यूनाईटेड राजस्थान जितनी शीघ्र संभव हो सके, अस्तित्व में आयेगा। राजस्थान के राजाओं ने एकता के लिये बहुत कुछ किया है तथा इस कार्य में हमारी सहायता की है कि हम स्वतंत्रता को फिर से न खो दें तथा हम अपनी कमजोरी से विदेशी सत्ता की गुलामी को फिर से न ले आयें।

    7 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने राजस्थान के महाराज प्रमुख को दिल्ली से तार किया कि मैं हनुवंतसिंह, जोधपुर का महाराजा, हस्ताक्षरित प्रसंविदा के अनुसार मारवाड़ रियासत आपके सुपुर्द कर रहा हूँ। राजस्थान के राजप्रमुख ने पी. एस. राउ को तार भेजकर निर्देशित किया कि आप जोधपुर रियासत का प्रशासन तत्काल प्रभाव से ग्रहण कर लें। पी. एस. राउ ने 7 अप्रेल 1949 को जोधपुर राज्य के प्रशासन का कार्यभार संभाल लिया। विलय के समय जोधपुर राज्य ने राजस्थान सरकार को 4 करोड़ 75 लाख रुपये की पोते-बाकी संभालाई।


    वृहत् राजस्थान का निर्माण

    मुख्यमंत्री के पद को लेकर विवाद

    14 फरवरी 1949 को गोकुलभाई भट्ट और माणिक्यलाल वर्मा ने सरदार पटेल से भेंट की। हीरालाल शास्त्री को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाने का निश्चय किया गया। 15 फरवरी 1949 को दिल्ली में राजपूताना कांग्रेस की बैठक में शास्त्री को सर्वसम्मति से पार्टी का नेता चुना गया। इस निर्णय पर सर्वत्र आश्चर्य व्यक्त किया गया क्योंकि राजनैतिक क्षेत्रों में ऐसी आशा थी कि नये राज्य के मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास होंगे। व्यास उस समय तक राजस्थान में सबसे प्रसिद्ध नेता थे, जिन्हें सब लोग जानते थे और जिनका प्रांत में आदर था। वे अ.भा. देशी राज्य लोकपरिषद के वर्षों तक महासचिव रहे थे जिसके अध्यक्ष नेहरू थे, अतः व्यास नेहरू के निकटतम सहयोगी माने जाते थे।

    जयनारायण व्यास को नहीं चुने जाने का कारण यह बताया जाता है कि नयी व्यवस्था में पटेल राजाओं के साथ संघर्ष के पक्ष में नहीं थे जबकि व्यास का राजाओं के साथ निरंतर संघर्ष रहा था। स्वाधीनता के पश्चात् भी व्यास के क्रिया कलापों से राजा लोग खुश नहीं थे। पटेल भी व्यास के बारे में ठीक राय नहीं रखते थे। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में व्यास का केंद्र से भेजे गये सलाहकारों से सदैव मतभेद रहा। दूसरी ओर महाराजा जयपुर तथा घनश्यामदास बिड़ला, हीरालाल शास्त्री के पक्ष में थे और बिड़ला का पटेल पर प्रभाव था।

    1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जयपुर के प्रजामंडल को अलग रखने एवं सिरोही के सम्बन्ध में गोकुलभाई भट्ट के साथ तुष्टिकरण का रवैया अख्तियार करने के कारण जयपुर सहित प्रदेश के प्रायः समस्त कांग्रेस कार्यकर्ता हीरालाल शास्त्री से नाराज थे। कांग्रेसजनों में जयनारायण व्यास सर्वाधिक लोकप्रिय थे। अतः कांग्रेसजन चाहते थे कि जयनारायण व्यास ही प्रधानमंत्री बनें पर सरदार पटेल के दबाव से प्रदेश कांग्रेस ने दिल्ली में चली कई दिनों की बैठक के बाद 'अगर-मगर' के साथ शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव पर सहमति दे दी। शास्त्री के नेता पद पर चुने जाने के ढंग पर प्रांत भर में आलोचना हुई। इसे एक फासिस्टी चुनाव कहा गया, जिससे लोकतंत्र की हत्या हुई। कांग्रेसी सदस्यों को राय दी गई कि यदि वे चाहें तो अब भी भूल सुधार कर सकते हैं। शास्त्री का विरोध उस समय और भी बढ़ गया जब 19 फरवरी 1949 को गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी ने जयपुर में यह घोषणा की कि राजस्थान की राजधानी जयपुर बनेगी।

    अन्य राज्यों में इस निर्णय पर बड़ा रोष था कि जयपुर ने समस्त कुछ हथिया लिया है। इस अनिश्चय को दूर करने के लिये राजपूताना कांग्रेस कमेटी के 43 सदस्यों ने प्रदेश कांग्रेस की बैठक बुलाने की मांग की। 28 और 29 मार्च 1949 को किशनगढ़ में यह बैठक हुई। इसमें अजमेर और राजधानी के प्रश्न को लेकर बहुत वाद विवाद हुआ। अंत में एक प्रस्ताव द्वारा शास्त्री को मंत्रिमंडल बनाने की अनुमति दी गयी।

    राजधानी को लेकर विवाद

    राजधानी को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर राजधानी का निर्णय सरदार पटेल पर छोड़ा गया। पटेल ने राजधानी निर्धारित करने हेतु एक विशेष समिति का गठन किया। मार्च 1949 में आई.सी. एस. अधिकारी बी. आर. पटेल की अध्यक्षता में कैपीटल कमेटी गठित की गयी। इस समिति में उप महानिदशेक स्वास्थ्य सेवाएं ले. कर्नल टी. सी. पुरी तथा केन्द्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता श्री बी. एस. पुरी सम्मिलित किये गये। समिति को राजस्थान के नगरों में से किसी एक नगर का चुनाव प्रांतीय राजधानी के लिये करना था तथा अपनी रिपोर्ट 1 अप्रेल 1949 तक भारत सरकार को सौंप देनी थी। रियासती विभाग ने समिति के अध्ययन के लिये पाँच विषय सुझाये-

    (1.) प्रशासकीय सुविधाएं,

    (2.) भवनों की उपलब्धता,

    (3.) जलवायुवीय परिस्थितियां,

    (4.) उपलब्ध पेयजल एवं विद्युत की उपलब्धता,

    (5.) अन्य सम्बद्ध विषय जिसे समिति उचित समझे।

    इस समिति ने 17 व 18 मार्च 1949 को जयपुर का, 19 व 20 मार्च को अजमेर का, 21 व 22 मार्च को उदयपुर का तथा 23 व 24 मार्च 1949 को जोधपुर का दौरा किया। समिति ने 5 प्रमुख विषयों पर आधारित 13 बिंदुओं की विस्तृत प्रश्नावली तैयार की तथा उसे रीजनल कमिश्नर उदयपुर को भिजवा दिया।

    समिति ने जयपुर को राजधानी बनाये जाने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त माना तथा बड़े नगरों के महत्त्व को बनाये रखने हेतु उच्च न्यायालय जोधपुर में, शिक्षा विभाग बीकानेर में, खनिज विभाग उदयपुर में तथा कृषि विभाग भरतपुर में रखने की अनुशंसा की जिसे स्वीकार कर लिया गया। हीरालाल शास्त्री ने लिखा है- 'मेरे एक दूसरे बड़े साथी ने यह प्रस्ताव भी मेरे सामने रखा कि मुख्यमंत्री भले ही मैं बना रहूं पर राजधानी जयपुर के अलावा किसी दूसरे शहर में बनवा दूं। किसी समय साथियों की यह कोशिश हुई कि राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से दूसरी जगह ले जाया जाये। हाई कोर्ट का जोधपुर में और उसकी एक बैंच का जयपुर में रखा जाना तय हो गया। बाकी विभागों का बंटवारा मैंने राजस्थान के मुख्य शहरों में जैसा हो सकता था कर दिया।'

    22 फरवरी 1949 को एक पत्रकार सम्मेलन में जयनारायण व्यास ने कहा- 'ऐसा सोचना ठीक नहीं कि जयपुर ने समस्त कुछ ले लिया है। हमें अपने आप को एक वृहद् इकाई का नागरिक मानना है। राजधानी के बारे में व्यास ने कहा कि अभी इसका निश्चय नहीं हुआ है, अजमेर के राजस्थान में विलय पर ही राजधानी की स्थायी समस्या का समाधान होगा।' उन्होंने कार्यकर्ताओं और समाचार पत्रों से संयम रखने की अपील की। जयपुर को राजधानी बनाने के लिये अजमेर का राजस्थान में विलय नहीं किया गया।

    जयपुर के राजधानी बनने की घोषणा होने के बाद अन्य नगरों की प्रजा एवं नेताओं को संतुष्ट रखने के लिये सरदार पटेल ने वक्तव्य दिया- 'राज्य के कई महत्त्वपूर्ण विभाग जयपुर से बाहर अन्य प्रमुख नगरों में स्थापित किये जायेंगे। इस बारे में पहले से ही निर्णय लिया जा चुका है कि इस सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय समस्त पक्षों को मान्य होगा। '

    जागीरदारों को मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किये जाने का विरोध

    वृहद राजस्थान के मंत्रिमण्डल में अपने प्रतिनिधित्व को लेकर जागीरदार लोग रियासती मंत्रालय को ज्ञापन देने लगे। इस पर राजपूताना प्रोविंसियल किसान सभा के अध्यक्ष चौधरी बलदेवराम मिर्धा ने 10 जनवरी 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति व्यक्त की कि राजपूताना स्टेट्स यूनियन के लिये बनने वाली अंतरिम सरकार का कार्य निर्माणाधीन है जिसमें जागीरदारों द्वारा अपने प्रतिनिधित्व के लिये दिये जा रहे ज्ञापनों ने किसानों को उद्वेलित कर दिया है। जागीरदार लोग राजपूताना राज्यों में दमनात्मक कार्यवाहियाँ करने तथा काश्तकारों का शोषण करने के लिये जाने जाते रहे हैं। इनमें से कुछ लोग अब भी राजपूत आधिपत्य की शैली में सोचते हैं। सरकार में उन्हें सम्मिलित किये जाने का परिणाम भावी दमन तथा शोषण के लिये उनके हाथों को सशक्त करना होगा। इसलिये किसान इसका प्रबल विरोध करते हैं। 13 फरवरी 1949 को राजस्थान जागीरदार सभा ने उदयपुर में एक प्रस्ताव पारित किया कि चूंकि निकट भविष्य में वृहद राजस्थान का निर्माण होने वाला है जिसमें जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर आदि रियासतें भी सम्मिलित की जायेंगी अतः अंतरिम सरकार बनायी जायेगी। उसके बाद चुनावों का कार्य आरंभ होगा। यह सभा महसूस करती है कि वृहद राजस्थान में यदि किसी एक दल की सरकार बनायी गयी तो चुनावों का कार्य निष्पक्ष नहीं हो सकेगा। इसलिये सर्वदलीय सरकार बनायी जाये अथवा नये चुनाव होने तक नयी सरकार न बनाकर राजप्रमुख अपने हाथ में ही शासनाधिकार रखें।

    एकीकरण समिति का गठन

    14 जनवरी 1949 को पटेल द्वारा राजस्थान के एकीकरण की योजना घोषित कर देने के बाद एककीकरण समिति का गठन किया गया। रियासती विभाग के अधिकारी के. बी. लाल को इसका सचिव बनाया गया। जोधपुर राज्य के दीवान पी. एस. राउ, बीकानेर राज्य के मुख्यमंत्री सी. एस. वेंकटाचार तथा राजपूताना के रीजनल कमिश्नर वी. के. बी. पिल्लई को इस समिति का सदस्य बनाया गया। इस समिति को वृहद राजस्थान में मुख्य न्यायाधीश, मुख्य सचिव, अध्यक्ष राज्य लोकसेवा आयोग, वित्त सचिव, पुलिस महानिरीक्षक, महालेखाकार आदि पदों पर नियुक्त किये जाने के लिये अधिकारियों के नाम सुझाने थे।

    वायुयान दुर्घटनाओं से तनाव

    वृहत् राजस्थान के अस्तित्व में आने से पहले दो वायुयान दुर्घटनायें हुईं जिन्होंने कुछ समय के लिये राजस्थान के राजनैतिक वातावरण में तनाव उत्पन्न कर दिया। पहली दुर्घटना जयपुर नरेश के साथ हुई। इसमें महाराजा का वायुयान जलकर नष्ट हो गया पर महाराजा बाल-बाल बच गये। उनके पैर में गंभीर चोट आयी। दूसरी दुर्घटना तब हुई जब सरदार पटेल वृहत् राजस्थान का उद्घाटन करने आ रहे थे। वे भी बाल-बाल बचे।


    राजस्थान का उद्घाटन

    30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने राजस्थान राज्य का उद्घाटन किया। उद्घाटन स्थल पर जयपुर प्रशासन की ओर से सामंतों और अधिकारियों को अगली पंक्ति में बैठने की व्यवस्था की गयी। जबकि जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास तथा उदयपुर राज्य के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा को पीछे की पंक्ति में बैठाया गया। इसे इन नेताओं ने अपना अपमान समझा और उन्होंने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार कर दिया। समारोह में पटेल ने स्वतंत्र भारत की एकता सुदृढ़ करने में राजाओं के योगदान और त्याग की प्रशंसा करते हुए कहा कि 'राजस्थान का निर्माण कर हमने आज राणा प्रताप का स्वप्न साकार किया है। '

    उन्होंने जनता से अपील की कि अब उन्हें जयपुर, जोधपुर बीकानेर आदि के बारे में न सोचकर संपूर्ण राजस्थान के बारे में सोचना चाहिये। पटेल ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि उन्हें सद्भाव दिखाना चाहिये और सत्ता की अपेक्षा सेवा के बारे में सोचना चाहिये। मंत्री कौन बने और राजधानी कहाँ हो, यह छोटे लोगों की बातें हैं। अगर कांग्रेसी वास्तव में सच्चे हैं तो उन्हें जबर्दस्ती सत्ता सौंपी जायेगी। उन्होंने बैठने की व्यवस्था को लेकर समारोह का बहिष्कार करने की प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की भर्त्सना भी की।

    राजस्थान में पहले ही सम्मिलित हो चुके 19 राज्यों के शासकों में से केवल 8 ही इस समारोह में उपस्थित हुए। कुछ लोगों ने जयपुर की महारानी गायत्री देवी से इस समारोह में बाधा उत्पन्न करने की अनुमति मांगी किंतु महारानी ने उन्हें ऐसा करने से मना किया।

    यह तय किया गया था कि जोधपुर तथा कोटा के महाराजाओं को वरिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया जायेगा तथा बूंदी और डूंगरपुर के राजाओं को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया जायेगा जो पाँच साल के लिये अपने पदों पर रहेंगे। जब 30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने वृहत् राजस्थान का विधिवत् उद्घाटन किया तो बूंदी और डूंगरपुर के राजाओं ने कनिष्ठ उपराजप्रमुख के पद की शपथ नहीं ली।

    पटेल द्वारा दिये गये उद्घाटन भाषण में राजस्थान में सम्मिलित होने वाले चारों राज्यों के राजाओं की र्पंशसा की गयी तथा कांग्रेस के नेताओं द्वारा की जा रही अप्रजातांत्रिक कार्यवाहियों की आलोचना की गयी। इस पर जयनारायण व्यास ने 2 अप्रेल 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर अप्रसन्नता व्यक्त की कि- 'आपके द्वारा जयपुर में जो भाषण दिया गया उसमें आपने कांग्रेस जनों के बारे में जो कहा है उससे तो राजस्थान में कांग्रेस कमजोर ही होगी। आपने कांग्रेसी नेताओं के अच्छे कार्यों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। इसके विपरीत आपने उन्हें बदनाम किया। आपका भाषण गैर कांग्रेसी तत्वों का समर्थक है। आपने महाराजा जयपुर को प्रसन्न करने के लिये कांग्रेसियों की आलोचना की है।' 

    संयुक्त राजस्थान के साथ जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं जैसलमेर राज्यों के विलय के बाद जब 24 जनवरी 1950 को सिरोही राज्य (माउण्टआबू एवं देलवाड़ा तहसीलों को छोड़कर) का विलय भी वृहत् राजस्थान में कर दिया गया तब राजस्थान संघ का कुल क्षेत्रफल 1,28,424 वर्गमील, जनसंख्या लगभग 153 लाख तथा वार्षिक राजस्व 18 करोड़़ था।


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    कैसे बना था पाकिस्तान - 53

    दीनदारों तथा सयैदों की जिंदगियों का अंतर


    मुस्लिम समाज में सभी मुसलमानों को बराबर समझा जाता है तथा जाति-प्रथा का प्रचलन नहीं है किंतु पाकिस्तान का पूरा मुस्लिम समाज शिया, सुन्नी, अहमदिया, मुहाजिर, सूफी, शेख, सैयद तथा दीनदार आदि कई वर्गों में बंट गया है जो उनकी सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत का आधार है। पाकिस्तान में इंसानों का मैला ढोने वाले, मृत पशुओं की खाल उतारने वाले एवं भिश्तियों आदि को दीनदार मुसलमान कहा जाता है। एक तो ये वैसे ही कमतरी के शिकार हैं, और उनकी औलाद अपना पैतृक पेशा अपनाने को मजबूर हैं, दूसरे पाकिस्तान में इन्हें वे सुविधाएं हासिल नहीं हैं जो भारत में हरिजनों को मिलती हैं। इनकी जुर्रत नहीं होती, अपने से ऊँची जात के मुसलमानों के बराबर बैठने की। अधिकतर इन लोगों का काम अपना पैतृक पेशा करना, मजदूरी करना, मरे हुए जानवरों की खाल उतारना और हड्डियों का व्यापार करना है। कोई इक्का-दुक्का दीनदार ही किसी इज्जतदार जगह को हासिल कर पाता है। वरना अधिकतर दीनदारों की जिंदगी शेखों के तलवे चाटते गुजरती है।

    इसके विपरीत सैयदों को आले रसूल हजरत मुहम्मद का वंशज कहा जाता है। उनको हक हासिल है दूसरों की बहू-बेटी हथियाने का, लेकिन किसी दूसरे की मजाल नहीं कि वह सयैदानी की तरफ आंख उठाकर भी देख सके। सैयद चाहे चोर, बदमाश या लफंगा ही क्यों न हो, लोग फिर भी उसकी कदम-बोसी ही करते हैं। उससे ताबीज बनवाते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। उनकी शान के खिलाफ गलती से भी अगर कोई लफ्ज निकल जाए तो अस्तफिगार पढ़ते हैं। उसकी हुक्म अदूली करना गुनाह समझते हैं। उसके खिलाफ आवाज उठाने को आले रसूल के खिलाफ बगावत समझा जाता है, जिसके कारण मरने के बाद दोजख में जाना होता है।


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  • अजमेर का इतिहास - 27

     05.01.2020
    अजमेर का इतिहास - 27

    औरंगजेब द्वारा अजमेर की उपेक्षा


    अकबर से लेकर शाहजहाँ तक के शासन काल में अजमेर को आगरा, दिल्ली तथा लाहौर के समान ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी किन्तु औरंगजेब के काल में अजमेर को कोई महत्त्व नहीं मिला। उसके शासन काल में अजमेर की टकसाल से केवल रुपया ढाला गया तथा अन्य मुद्राएं ढालनी बंद कर दी गईं। औरंगजेब ने लगभग हर वर्ष अजमेर का सूबेदार बदला। कई बार तो एक साल में दो बार सूबेदार बदला गया। उसने ई.1657-58 में हाफिज नाजिर शाह को, ई.1658-59 में कुंवर रामसिंह को, ई.1659-60 में तरबियात खां को, ई.1660-62 में मरहमत खां को, ई.1662-63 में पहले मुरावत खां और फिर उसमान को अजमेर की सूबेदारी दी। ई.1664-65 में हाफिज नाजिर, ई.1665-66 में पहले राशिद अहमद और फिर महाराजा उदयभान अजमेर के सूबेदार रहे। उनके बाद महाराजा राजसिंह तथा राजसिंह के बाद मीर सयैद उमैद भी अजमेर के सूबेदार हुए।

    ई.1667 में सूरजमल द्वारा बांदनवाड़ा जागीर की स्थापना की गयी। इसी वर्ष ख्वाजा कुलीखान को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया गया। ई.1667-68 में आबिदखां, ई.1668-69 में मीर सयैद उमैद, ई.1669-70 में पहले नवाब सुरतखां तथा उसके बाद जफीर खां, ई.1670-71 में पहले नवाब इज़ात खां तथा उसके बाद महाराजा राजसिंह को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया गया। ई.1670 में किशनसिंह द्वारा मेहरून तथा जूनिया की जागीरें स्थापित की गयीं। ई.1671-72 में रूपसिंह को, ई.1675 में पहले दाराब खां को, उसके बाद अमानत खां को और फिर सैयद अहमद को अजमेर का सूबेदार बनाया गया। ई.1676 में पहले खान खट्टब को तथा बाद में सैयद हामिद खां के पुत्र मुर्तिजा खां को अजमेर का सूबेदार नियक्त किया गया। ई.1677 में इफ्तिखार खां सुल्तान हुसैन को तथा ई.1678 में औरंगजेब ने पादशाह कुली खान को तहव्वर खान का खिताब देकर अजमेर का फौजदार नियुक्त किया।

    महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु

    22 जनवरी 1678 को जमरूद के मोर्चे पर मारवाड़ के शासक जसवंतसिंह का निधन हो गया। उस समय उसकी दो रानियां गर्भवती थीं। महाराजा के अंतिम संस्कार के बाद मारवाड़ के सरदार गर्भवती रानियों को लेकर मारवाड़ के लिये रवाना हुए। मार्ग में दोनों रानियों ने एक-एक शिशु को जन्म दिया। एक शिशु का नाम दलथंभन तथा दूसरे का नाम अजीतसिंह रखा गया। औरंगजेब ने रानियों एवं शिशुओं को दिल्ली बुलवा लिया। दलथंभन की मार्ग में ही मृत्यु हो गई। रानियां अजीतसिंह को लेकर दिल्ली पहुँचीं। औरंगजेब ने विधवा रानियों एवं शिशु अजीतसिंह को बंदी बना लिया किंतु राठौड़ सरदार शिशु अजीतसिंह को दिल्ली से निकाल लाये और उसे सिरोही राज्य की पहाड़ियों में छिपा दिया।

    औरंगजेब अजमेर में

    औरंगजेब ई.1658 में आगरा के तख्त पर बैठा था किंतु पूरे 10 वर्ष तक वह अजमेर से दूर रहा। जब अजीतसिंह उसके हाथों से निकल गया तो औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य खालसा कर लिया। उसने अपने अधिकारियों को मारवाड़ राज्य पर अधिकार करने के आदेश दिये। मारवाड़ की गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिये औरंगजेब स्वयं भी 1 जनवरी 1679 को दिल्ली से चलकर 2 फरवरी 1679 को अजमेर आ गया। वह आनासागर के निकट एक महल में ठहरा। औरंगजेब ने अपने समस्त सेनापतियों को विभिन्न स्थानों और मोर्चों से अजमेर बुलवाया ताकि मारवाड़ पर अधिकार जमाया जा सके। उस समय तैबरखां अजमेर का सूबेदार था। औरंगजेब ने हसन अलीखां तथा बहादुरखां के अधीन 10 हजार सैनिक जोधपुर पर अधिकार करने के लिए भेजे। जोधपुर की तरफ से राठौड़ रूपसिंह, राम कुमावत भाटी तथा नरसिंहदास राठौड़ ने मोर्चा संभाला। गुढ़ा के पास भारी लड़ाई हुई। जब मारवाड़ पर शाही अधिकार हो गया तो 7 मार्च 1679 को औरंगजेब अजमेर से दिल्ली लौट गया।

    औरंगजेब ने बहादुरखां को अजमेर का सूबेदार बनाया तथा रहीमखां को जोधपुर में नियुक्त किया। जब औरंगजेब अजमेर से किशनगढ़ पहुंचा तो बहादुर खां ने उसे प्रार्थना भिजवाई कि वह शिशु अजीतसिंह को राठौड़ों का राजा स्वीकार कर ले किंतु औरंगजेब ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया तथा बहादुर खां को निर्देश दिये कि वह अजमेर में ही रहे। कुछ समय बाद जोधपुर से राठौड़ों का एक प्रतिनिधि मण्डल बादशाह से मिलने अजमेर आया। तब तक बादशाह दिल्ली के लिये जा चुका था। इस पर बहादुरखां ने अपने पुत्र को इस प्रतिनिधि मण्डल के साथ दिल्ली भेज दिया। यह प्रतिनिधि मण्डल अप्रेल 1679 में दिल्ली पहुँचा किंतु बादशाह ने जोधपुर के सरदारों का अनुरोध ठुकराकर नागौर के राव इंदरसिंह को जोधपुर का राज्य दे दिया।

    राठौड़ों का अजमेर पर आक्रमण

    इसी वर्ष राठौड़ों ने जोधपुर दुर्ग पर आक्रमण करके रहीम खां से दुर्ग छीन लिया। रहीम खां भागकर अजमेर आया। इस पर राठौड़ों ने अजमेर पर आक्रमण कर दिया। मुगलों के समय में राठौड़ों का अजमेर पर यह पहला आक्रमण था। जब राठौड़ों ने अजमेर पर आक्रमण किया तब तहव्वरखां पुष्कर में था। पुष्कर में ही 19 अगस्त 1679 को दोनों पक्षों में युद्ध आरंभ हुआ जो 21 अगस्त 1679 तक चला। तहव्वरखां परास्त होकर भाग खड़ा हुआ। उसकी सेना नष्ट हो गई। राठौड़ों का नेतृत्व राजसिंह कर रहा था। वह भी भटककर आई हुई गोली से मारा गया।

    शहजादे अकबर का विद्रोह

    राठौड़ राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर का राजा बनाये जाने के मुद्दे को लेकर मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूतों ने एकजुट होकर, औरंगजेब से तीस साल लम्बी लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई ई.1679 में आरम्भ हुई। राजपूतों की सम्मिलित शक्ति का मुकाबला करने के लिये नवम्बर 1679 में औरंगजेब फिर अजमेर आया और उसे अपनी सैनिक छावनी बना लिया। उसने अपने पुत्र अकबर को राजपूतों से लड़ने के लिये भेजा किन्तु राजपूतों ने अकबर से मेल करके उसे औरंगजेब की गलत नीतियों के बारे में समझाया। अकबर को मुगल साम्राज्य के पूर्ववर्ती बादशाहों- अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ की नीतियों के मुकाबले अपने पिता औरंगजेब की नीतियां गलत जान पड़ीं। वह अपने पिता का विरोधी हो गया तथा 70 हजार सैनिक लेकर अजमेर की ओर मुड़ा जहाँ उसका पिता औरंगजेब ठहरा हुआ था। यह खबर सुनकर औरंगजेब की स्थिति दयनीय हो गई। उस समय उसके पास खानसामों, बावर्चियों, भिश्तियों और अन्य असैनिक कर्मचारियों को मिलाकर दस हजार आदमी थे क्योंकि सेना तो वह अकबर के साथ भेज चुका था फिर भी औरंगजेब ने हिम्मत नहीं हारी।

    ई.1680 के आरंभिक महीनों में औरंगजेब ने इनायत खां को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया। बहरमंद खां को सैन्य अभियान का कमाण्डर बनाया तथा उसे निर्देश दिये कि शाही सैनिकों के चारों ओर किलेबंदी की जाये तथा अजमेर की तरफ आने वाले मार्गों की रक्षा की जाये। असदखां बटलाया को पुष्कर मार्ग तथा झील पर नियुक्त किया गया। अबू नासरखां को असद खां का नायब नियुक्त करके अजमेर के पश्चिम की ओर दृष्टि रखने का काम दिया गया। अकबरी महल के निकट अजमेर की गलियों में तोपें लगा दी गईं। अहमदाबाद के नाजिम हाफिज मोहम्मद अमीन तथा अन्य अधिकारियों को निर्देश दिये गये कि वे हर समय शस्त्र लेकर तैयार रहें तथा अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहें। उम्दतुलमुल को किलेबंदी की निगरानी रखने का काम दिया गया। शहजादे के वकीलों शुजात खां तथा बादशाह खां को गढ़ बीठली में बंदी बना लिया गया। हिम्मतखां को गढ़ बीठली का कमाण्डर नियुक्त किया गया।

    अनुभवहीन अकबर, औरंगजेब की दयनीय स्थिति का आकलन नहीं कर सका और कदम-कदम सूंघता हुआ बहुत धीमी गति से अजमेर की ओर बढ़ा। 15 दिन में उसने 120 मील दूरी तय की। ये 15 दिन औरंगजेब जैसे अनुभवी सेनापति के लिए पर्याप्त थे। उसने आस-पास के सरदारों को बुलाकर काफी सेना एकत्रित कर ली। 17 जनवरी 1681 को शहजादा अकबर अपने राठौड़ साथियों के अजमेर से 22 मील दक्षिण में बुधवाड़ा पहुँच गया। औरंगजेब भी अजमेर से निकलकर दोराई पहुँच गया परंतु यहाँ से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। यहाँ से अकबर तथा औरंगजेब की सेनाओं के बीच की दूरी 3 मील रह गई थी। जैसे-जैसे दोनों सेनाओं के बीच की दूरी घटती जाती थी, वैसे-वैसे बादशाही अमीर अकबर की सेना से निकलकर औरंगजेब के लश्कर में मिलते जाते थे। शहजादा मुअज्जम भी यहीं आकर औरंगजेब से मिल गया।

    औरंगजेब का सेनापति तहव्वर खां अब भी अकबर के साथ था। जबकि उसका श्वसुर इनायत खां औरंगजेब के साथ था। औरंगजेब ने इनायत खां को आदेश दिये कि वह तहव्वखां को बुला ले और यदि वह नहीं आये तो तहव्वर खां के परिवार को नष्ट कर दे। इस पर इनायतखां ने तहव्वर खां को बादशाह के आदेशों की सूचना भिजवाई। यह सूचना मिलने पर तहव्वर खां, एक पहर रात गये अकबर का शिविर छोड़कर औरंगजेब के लश्कर में चला गया। रात्रि में ही वह औरंगजेब से मिलने उसकी डेवढ़ी पर गया। तहव्वर खां से कहा गया कि वह शस्त्र बाहर रखकर बादशाह से मिलने भीतर जाये किंतु तहव्वर खां ने शस्त्र बाहर रखने से मना कर दिया। इसलिये बादशाह के सिपाहियों ने उसे उसी स्थान पर मार दिया।

    जिस रात तहव्वर खां, अकबर को छोड़कर औरंगजेब के पास गया, उसी रात औरंगजेब ने एक षड़यन्त्र रचा। यह वही षड़यन्त्र था जो किसी समय शेरशाह सूरी ने राव मालदेव के विरुद्ध रचा था। औरंगजेब ने राजपूतों को धोखा देने के लिये अकबर के नाम एक झूठा पत्र लिखकर दुर्गादास के हाथ में पहुँचवा दिया। यह पत्र इस प्रकार से था- मैं तेरे द्वारा राठौड़ों को धोखा देकर फँसा लाने से बहुत प्रसन्न हूँ। कल प्रातःकाल युद्ध में, मैं आगे से उन पर आक्रमण करूंगा और तू पीछे से हमला कर देना। इससे वे आसानी से नष्ट हो जायेंगे।

    जब यह पत्र दुर्गादास को मिला तो वह इसके सम्बन्ध में अपना संदेह मिटाने के लिये अकबर के शिविर में पहुँचा परंतु उस समय अर्द्धरात्रि से भी अधिक समय बीत चुका था तथा अकबर गहरी नींद में सोया हुआ था। दुर्गादास ने अकबर के अंगरक्षकों से अकबर को जगाने के लिये कहा किंतु ऐसा करने की आज्ञा न होने के कारण अंगरक्षकों ने इस बात को मानने से मना कर दिया। इससे दुर्गादास क्रुद्ध होकर लौट गया। इसके बाद राठौड़ों ने तहव्वरखां की तलाश की परंतु उसके भी शाही सेना में चले जाने का समाचार मिला तब राठौड़ों का संदेह दृढ़ हो गया और वे प्रातःकाल होने के तीन घण्टे पूर्व ही अकबर के शिविर को लूटकर मारवाड़ की तरफ लौट गये। यह देखकर अन्य शाही सेना नायक भी बादशाह से जा मिले।

    राजरूपक में लिखा है कि जब तहव्वरखां बादशाह के पास जाने लगा, तब उसने राठौड़ों से भी कहलवाया कि मैंने आपके और शहजादे के बीच पड़कर संधि करवाई थी किंतु मुझे शहजादे के बादशाह से मिल जाने का संदेह है। अतः अब मैं इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं रख सकता। आप लोगों को भी सावधान होकर लौट जाना चाहिये।

    प्रातःकाल होने पर इस घटना की सूचना अकबर को मिली तो वह बहुत घबराया। अब उसके पास केवल 350 सवार ही रह गये थे। इसलिये वह बादशाह के कोप से बचने के लिये अपनी एक बेगम, 25 दासियां तथा जवाहरातों से भरा हुआ बक्सा लेकर 10 कोस के अंतर पर ठहरे हुए राठौड़ों की तरफ रवाना हुआ। जब मेरों को यह ज्ञात हुआ कि अकबर बहुत थोड़े आदमियों के साथ राठौड़ों की तरफ जा रहा है तो वे तीर कमान लेकर उसका मार्ग रोककर खड़े हो गये। इस पर अकबर के साथ के स्त्री पुरुषों ने मेरों पर तीर बरसाये किंतु मेर उन पर भारी पड़े। यह देखकर अकबर ने मेरों को जवाहरातों से भरा बक्सा देकर उनसे सुरक्षित मार्ग खरीद लिया। रबड़िया गांव के पास अकबर ने दुर्गादास से भेंट की। तब जाकर दुर्गादास को सारी सच्चाई का पता लगा। उसने अपने आदमी मेरों के पीछे भेजे। दुर्गादास के आदमी जवाहरातों से भरा हुआ बक्सा मेरों से वापस छीनने में सफल रहे।

    यह घटना 16 जनवरी 1681 की है। अब औरंगजेब से लड़ना संभव नहीं रहा था। इसलिये दुर्गादास अकबर को अपने साथ लेकर जालोर की तरफ रवाना हो गया। औरंगजेब ने शहजादा आलम को अकबर को वापस लाने के लिये उसके पीछे भेजा किंतु अकबर को अपने बाप पर कतई विश्वास नहीं था इसलिये वह जालोर से शंभाजी के पास होता हुआ अरब चला गया। वह अपने एक पुत्र तथा एक पुत्री को दुर्गादास के पास छोड़ गया। दुर्गादास ने अजमेर से एक मुस्लिम शिक्षिका बुलाकर शहजादे तथा शहजादी को कुरान की शिक्षा दिलवाने का प्रबंध किया।

    औरंगजेब का दक्षिण के लिये प्रस्थान

    अकबर के चले जाने से बादशाही शिविर में बड़ा आनंद मनाया गया। इसके बाद औरंगजेब अपने सेनापतियों- शाहबुद्दीनखां, शाह आलम, कुलीखां, इंद्रसिंह आदि को बागियों का पीछा करने की आज्ञा देकर स्वयं अजमेर लौट आया। इस समय तक राठौड़ों तथा मेवाड़ियों के नित्य नये आक्रमणों से उकताये हुए औरंगजेब को मराठों के द्वारा तगड़ी चेतावनी मिलने लगी थी। इसलिये वह 8 सितम्बर 1681 को शहजादे शाह आलम के पुत्र अजीमुद्दीन तथा वजीर जुमलात उल मुल्क असदखां को राजपूतों से अजमेर की रक्षा करने के लिये अजमेर में छोड़कर, शंभाजी पर आक्रमण करने दक्खिन के लिये चल दिया। जहाँ से वह कभी वापस लौटकर नहीं आया। औरंगजेब ने ई.1681 में असदखां, ई.1682 में महाराजा माधोसिंह तथा ई.1685-86 में राजा पृथ्वीसिंह को अजमेर का सूबदेदार बनाया। ई.1685 में नाहरसिंह ने देवगांव बघेड़ा में ठिकाणे की स्थापना की।


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  • अध्याय-9 एकीकरण के पश्चात् की समस्याएं

     09.12.2017
    अध्याय-9 एकीकरण के पश्चात् की समस्याएं

    अध्याय-9


    एकीकरण के पश्चात् की समस्याएं

    (प्रशासनिक, राजनैतिक, नेतृत्व एवं वित्तीय मामले)

    जयपुर महाराजा राजप्रमुख, जयपुर का ही मुख्यमंत्री और जयपुर ही राजधानी, यह सब कुछ कई लोगों को हजम होने वाला नहीं था। - हीरालाल शास्त्री।

    राजस्थान संघ के अस्तित्व में आने के समय विभिन्न राज्यों के आकार, जनसंख्या, आर्थिक स्थिति, प्रशासनिक एवं न्यायिक प्रशासन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति तथा विभिन्न राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं में काफी अंतर था। यदि कोई समानता थी तो यही कि समस्त राज्यों में समस्त शक्तियां राजाओं के हाथों में थी। एकीकरण से पूर्व कुछ राज्यों में पड़ौसी अंग्रेजी प्रांतों के आधार पर आधुनिक सरकारों की स्थापना हो चुकी थी। कुछ राज्यों में मंत्री परिषद कार्यरत थी जिनमें लोकप्रिय मंत्री कार्य कर रहे थे। कुछ राज्यों में लोक सेवा आयोग के माध्यम से नियुक्तियां होती थीं तथा सुस्पष्ट नियमों एवं योग्यता के आधार पर पदोन्नतियां दी जाती थीं। कुछ राज्यों में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग किया जा चुका था। कुछ राज्यों में भ्रष्टाचार से निबटने के लिये भ्रष्टचार निरोधक विभाग बन चुके थे। राजकीय खातों के अंकेक्षण की भी व्यवस्था थी।

    राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ प्रारंभिक वर्ष राज्य की अर्थव्यवस्था को स्थायित्व देने तथा समुचित कोष जुटाने में लगाये गये। इसके साथ ही राज्य के प्रशासनिक ढांचे को विकसित एवं सुदृढ़ करने के लिये नियमों व कानूनों को बनाने का काम आरंभ हुआ। नयी सेवाओं की स्थापना करना, लेखा नियम बनाना तथा विभिन्न राज्यों की सेवाओं का एकीकरण करना एक कठिन कार्य था। 30 मार्च 1949 को राजस्थान का विविधवत् उद्घाटन हो जाने के बाद मुख्यमंत्री का सबसे पहला कार्य था मंत्रिमण्डल की नियुक्ति करना। 4 अप्रेल 1949 को हीरालाल शास्त्री ने नये राज्य का कार्यभार संभाला। 7 अप्रेल 1949 को मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया। सिद्धराज ढड्ढा (जयपुर), प्रेमनारायण माथुर और भूरेलाल बयां (उदयपुर), फूलचंद बाफना, नरसिंह कच्छवाहा और रावराजा हनुवंतसिंह (जोधपुर), रघुवरदयाल गोयल (बीकानेर) और वेदपाल त्यागी (कोटा) को मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किया गया। जिस दिन मंत्रिमण्डल ने शपथ ली, उसी दिन अर्थात् 7 अप्रेल 1949 को राजस्थान सरकार ने जोधपुर, जयपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर राज्यों का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।


    प्रशासनिक समस्याएं

    राजधानी का बार-बार बदला जाना

    प्रथम राजस्थान संघ की राजधानी कोटा में रखी गयी थी। इसके बाद जब द्वितीय राजस्थान अर्थात् संयुक्त राजस्थान बना तो उसकी राजधानी उदयपुर में रखी गयी। तृतीय राजस्थान अर्थात वृहत् राजस्थान की राजधानी जयपुर में रखी गयी। वृहत् राजस्थान में मत्स्य संघ का विलय होने पर मत्स्य संघ की राजधानी जयपुर लायी गयी। राजधानी के बार-बार बदले से हर बार सरकारी तंत्र तथा अभिलेख एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ा किंतु इस समस्या को धैर्य पूर्वक सुलझा लिया गया तथा जयपुर के राजधानी बनने के बाद यह समस्या स्वतः समाप्त हो गयी।

    रियासती कस्टम सीमाओं की समाप्ति

    मंत्रिमंडल का विस्तार होने के दिन अर्थात् 7 अप्रेल 1949 को राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अंतर रियासती कस्टम सीमाओं को समाप्त किया। इस प्रकार अब तक चली आ रही रियासत कालीन व्यवस्थाएं 7 अप्रेल 1949 से पूर्णतः समाप्त हो गयीं।

    पाकिस्तान से लगी सीमा की सुरक्षा

    वृहत् राजस्थान में सम्मिलित बीकानेर, जैसलमेर तथा जोधपुर रियासतों की सीमाएं पाकिस्तान से लगती थीं। राजस्थान बनने से पूर्व सीमा की रक्षा का कार्य भारतीय सेना तथा सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस के द्वारा किया जाता था। राजस्थान बनने के बाद इस सीमा की सुरक्षा के लिये राजस्थान सरकार पर जिम्मेदारी आ गयी कि वह इस कार्य के लिये पुलिस बल की भर्ती एवं प्रशिक्षण करे तथा उसे सुसज्जित करे। यह कार्य अत्यंत शीघ्रता के साथ किया जाना था ताकि इसे नये संविधान से पूर्व ही कर लिया जाये। इस कार्य में विपुल धन राशि की आवश्यकता थी। राजस्थान संघ के वित्तीय संसाधनों के अंतर्गत यह कार्य किया जाना संभव नहीं था। अंत में यह कार्य केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया।

    संघीय इकाई का प्रशासन केन्द्र के हाथों में

    देश के रियासती विभाग का ध्यान इस ओर गया कि देश के भीतर बनने वाले संघों की सरकारों पर भारत सरकार का नियंत्रण किस प्रकार रहे! ये संघ भारत सरकार की पहल पर बन रहे थे और इनमें अच्छी सरकार प्रदान करने की जिम्मेदारी भारत सरकार पर आ पड़ी थी। भारत सरकार का इन संघों पर कोई संवैधानिक नियंत्रण नहीं था। अप्रिय घटित होने पर भारत सरकार कानूनी रूप से कुछ नहीं कर सकती थी। अब तक जो नियंत्रण बनाया गया था वह कांग्रेस पार्टी के तंत्र तथा सरदार पटेल के व्यक्तित्व के द्वारा बनाया गया था किंतु यह कोई संतोषजनक व्यवस्था नहीं थी। इन संघों में मिलने वाले अधिकतर राज्यों में राज्य प्रशासन राजा के व्यक्तिगत एवं वंशानुगत तरीकों से चल रहा था। राजाओं को उस प्रकार की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता था जिस प्रकार की कठिनाईयां संघीय सरकारों के सामने आ रही थीं अथवा आने की संभावना थी। इन कठिनाईयों से निबटने के लिये संघीय सरकारों के पास किसी तरह के उपकरण नहीं थे। राजनैतिक संगठनों के पास भी प्रशासन चलाने के लिये अनुभवी एवं योग्य नेता नहीं थे।

    राजपूत राजाओं के राज्य संघ में मिल तो गये थे किंतु इन राज्यों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की निष्ठायें रातों-रात नहीं बदली जा सकती थीं। अनुभवहीन नेताओं तथा राजनैतिक अधिकारों से अनभिज्ञ जनता के भरोसे प्रशासन नहीं छोड़ा जा सकता था। विशेषज्ञ मार्गदर्शन दिया जाना आवश्यक था। यह भी देखना था कि राज्यों के एकीकरण एवं उनके प्रजातंत्रीकरण की प्रक्रिया पूर्ण गति एवं दक्षता से पूरी हो। मेनन ने सुझाव दिया कि जब तक राजस्थान की स्थानीय विधान सभा अपने लिये संविधान का निर्माण नहीं कर लेती तब तक राजप्रमुख तथा मंत्रिमण्डल भारत सरकार के सामान्य नियंत्रण में रहें तथा भारत सरकार द्वारा समय-समय पर दिये जाने वाले निर्देशों की पालना करें।

    प्रशासनिक अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को तुरंत मान लिया किंतु लोकप्रिय नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। लम्बे चौड़े बहस-मुसाहबे के बाद नेताओं ने भी इस प्रस्ताव को मान लिया। बाद में राजस्थान प्रसंविदा (Rajasthan Covenant) का यह प्रावधान अन्य राज्यों के लिये भी कर दिया गया। राजस्थान प्रसंविदा में अनिवार्य रूप से यह प्रावधान भी किया गया था कि राजप्रमुख एक नवीन विलय पत्र (Fresh Instrument Of Accession) अमल में लायेंगे जिसके अनुसार भारत की संविधान सभा द्वारा कर एवं शुल्क को छोड़कर, संघीय एवं राज्य की विधान सभा के विधान की समवर्ती सूची में शामिल किये जाने वाले समस्त विषयों को स्वीकार किया जाना आवश्यक था।

    सरकार पर आई.सी. एस. अधिकारियों का नियंत्रण

    भारत सरकार द्वारा राजस्थान सरकार में सलाहकार के रूप में नियुक्त आई.सी. एस. अधिकारियों को अधिकार दिया गया कि वे मंत्रिमंडल, मुख्यमंत्री एवं मंत्री के किसी भी निर्णय पर वीटो कर सकते हैं। इन अधिकारियों की सहमति के बिना मुख्यमंत्री अथवा मंत्री एक चपरासी तक की भी नियुक्ति अथवा स्थानांतरण नहीं कर सकते थे। अतः ये सलाहकार ही राज्य के सर्वेसर्वा बन गये। हीरालाल शास्त्री के अनुसार राजस्थान के एकीकरण की जिम्मेदारी निभाने के लिये तीन अनुभवी आई.सी. एस. अफसर केन्द्र से दिये गये थे। शास्त्री का उनसे कभी झगड़ा नहीं हुआ। शास्त्री ने आग्रह किया कि वित्त सचिव बाहर से नहीं आयेगा, अमुक स्थानीय व्यक्ति को वित्त सचिव बनाया जायेगा। वह झगड़ा दिल्ली तक पंहुचा। बड़ी बदमजगी भी हुई पर उसमें हार जीत नहीं हुई। अंत में पटेल ने मेनन की बात न मानकर शास्त्री की बात मानी। शास्त्री ने इन सलाहकारों तथा मेनन की राय के विरुद्ध एक कांग्रेसी कार्यकर्ता को लोक सेवा आयोग का सदस्य बनाया।

    रियासती सेनाओं का राष्ट्रीयकरण

    ई.1939 में इण्डियन स्टेट्स फोर्सेज स्कीम के तहत रियासतीं सेनाओं में तीन प्रकार की इकाईयां रखी गयीं थीं- फील्ड सर्विस यूनिट्स, जनरल सर्विस यूनिट्स तथा स्टेट सर्विस यूनिट्स। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के 44 राज्यों की सेनाएं इण्डियन स्टेट्स फोर्सेज स्कीम के तहत थीं जिनमें 75,311 अधिकारी थे। शेष राज्यों में इस योजना से बाहर की सेनाएं थीं जिनमें अधिकतर पुलिस तथा अंलकरण इकाईयां थीं। आजादी के बाद कश्मीर अभियान तथा अन्य कठिन परिस्थितियों में भारत सरकार को जब सेनाओं की आवश्यकता हुई तो भारतीय सेनाओं की कई टुकड़ियां नियत स्थानों पर नहीं पहुँचीं। इस पर भारत सरकार ने राज्यों से अनुरोध किया कि वे अपनी सेनाऐं भेजें। अगस्त 1947 के प्रविष्ठ संलेख में राज्य की सुरक्षा का विषय केंद्र सरकार को दिया गया था। इसलिये राज्यों की सेनाओं को भारत सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। जो सेना जहाँ नियत थी उसे वहीं रखा गया, उनके कार्य की शर्तों तथा परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके बाद योग्य सैनिकों को सेना में ग्रहण करने का कार्य शनैः-शनैः किया गया। जो सैनिक भारतीय सेना के मानकों के अनुरूप नहीं पाये गये, उन्हें समुचित रियायत देकर सेना से मुक्त कर दिया गया।

    राज्यों की सेनाओं पर नियंत्रण स्थापित करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये गये-

    (1.) इन बलों का नियंत्रण राजप्रमुख के अधीन भारतीय सेना के किसी अधिकारी द्वारा किया जाये।

    (2.) इन बलों की संख्या तथा संगठन भारतीय प्रतिरक्षा के संदर्भ में निश्चित किया जाये।

    (3.) इन बलों का पुनर्गठन भारतीय सेना के मानकों के अनुसार किया जाये।

    (4.) अधिकारियों का चयन भारतीय सेना की चयन प्रक्रिया के अनुसार ही किया जाये। उनकी पदोन्नति आदि भी उसी तरह नियंत्रित की जाये।

    (5.) भारतीय सेनाओं तथा इन बलों के अधिकारियों की निश्चित संख्या में अदला-बदली की जाये। राज्यों का वित्तीय एकीकरण किये जाने के बाद इन बलों का व्यय केन्द्र सरकार द्वारा उठाया जाने लगा तथा 1 अप्रेल 1951 को ये सेनाएं पूरी तरह भारतीय सेना का हिस्सा बन गयीं।

    राजस्थान के राजप्रमुख को रियासती सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति बनाया गया। राजप्रमुख के नीचे बीकानेर रियासत के प्रधान सेनापति जनरल जयदेवसिंह को रखा गया। राजपूताने की रियासतों की सेनाओं के एकीकरण के मामले में काफी असंतोष उभर कर सामने आया। रियासती सेनाओं के शानदार लड़ाकों के साथ अशोभनीय व्यवहार हुआ। कई लोगों को शारीरिक योग्यता (में कमी) के कारण नौकरी से छुट्टी दे दी गयी। ट्रेकोमा, आंखों में दाने पड़ जाना, राजस्थान में एक आम नेत्र रोग है। यह सेना के लोगों के लिये अयोग्यता का एक कारण माना गया और इसके आधार पर छुट्टी दे दी गयी। भारतीय सेना ने निर्णय किया कि वरिष्ठता निश्चित करने या भारतीय सेना में पदोन्नति के लिये रियासती सेना के अधिकारियों की नौकरी की अवधि घटा दी जाये। यह बात उन छोटी रियासतों के लिये तो तर्कपूर्ण हो सकती थी जहाँ की सेनाएं भारतीय सेना के बराबर नहीं रखी गयीं लेकिन यह नियम बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, हैदराबाद, पटियाला, कोटा और उदयपुर जैसी रियासतों के लिये दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि इन रियासतों में प्रथम श्रेणी की सेना थी। भारतीय सेना में रियासती सेनाओं के जो अधिकारी लिये गये उनमें से बहुतों की बाद में पदावनति कर दी गयी तथा उन्हें आर्थिक हानि उठानी पड़ी। राजस्थान की सेनाओं के भारतीय सेना में मिलने से राजप्रमुख भी राजस्थान की सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति न रहा।

    राज्य अधिकारियों का एकीकरण

    विभिन्न राज्यों के अधिकारियों की सेवाओं का राजस्थान सरकार द्वारा एकीकरण किया गया। विभिन्न राज्यों में अधिकारियों के पदनाम तथा उनके वेतनमान के अंतर के कारण भारी विसंगतियां उत्पन्न हो गयीं। कुछ बड़े राज्यों में राजस्थान बनने से पहले कर्मचारियों एवं अफसरों के वेतन मनचाही रीति से बढ़ा दिये गये। शास्त्री ने ऐसा नहीं किया इससे जयपुर के अफसर घाटे में रह गये। जोधपुर राज्य के क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी गणेशदत्त छंगाणी, जो उन दिनों राज्य के पैट्रोल राशनिंग ऑथर्टी तथा जोधपुर राज्य के लोक सेवा आयोग के सचिव भी थे, ने अन्य राज्यों द्वारा कर्मचारियों के वेतनमानों में की गई वृद्धि का तुलनात्मक चार्ट बनाकर जोधपुर राज्य के मुख्यमंत्री जयनाराण व्यास के सम्मुख प्रस्तुत किया किंतु व्यास ऐसा नहीं कर सके जिससे जोधपुर राज्य के कर्मचारी अन्य राज्यों की तुलना में पिछड़ गये। आई.सी.एस. अधिकारियों ने राज्य सेवाओं में ऐसी धांधली मचायी कि तहसीलदार राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आ गये और रियासतों में रहे विभागाध्यक्ष तहसीलदार बना दिये गये। एक बड़ी इकाई का चीफ इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर बना दिया गया, जबकि उसके अधीन रहे असिस्टेंट इंजीनियर को एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया। कुछ लिपिकों को सहायक सचिव एवं सहायक सचिवों को लिपिक बना दिया गया। सचिवालय में सचिवों, उपसचिवों एवं विभागाध्यक्षों के प्रायः समस्त स्थानों पर केंद्र अथवा अन्य राज्यों के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाकर नियुक्त कर दिया गया। फलस्वरूप विभिन्न रियासतों से आये हुए अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भयंकर असंतोष फैल गया। समस्त स्तरों पर राज्यकार्य ठप्प सा हो गया।

    कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा सरकारी नौकरी की मांग

    कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ता स्वतंत्रता आंदोलन में दिये गये सहयोग के बदले में सरकारी नौकरियां मांगने लगे। मेवाड़ राज्य की स्टेट गैरेज का एक मैकेनिक नौकरी छोड़कर प्रजामण्डल में सम्मिलित हो गया था। जब राजस्थान बना तो उसने प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा से मांग की कि उसे राजस्थान स्टेट गैरेज का अधीक्षक बना दिया जाये। स्थानीय कांग्रेस सेवा दल के एक कमाण्डेण्ट ने मांग की कि उसे पुलिस अधीक्षक बनाया जाये। जिला कांग्रेस समिति के सचिव ने मांग की कि उसे जिले का कलक्टर बनाया जाये। इनमें से किसी को नौकरी पर नहीं लिया गया। टोंक रियासत के माली को नवाब से अलग होने के उपहार के रूप में तहसीलदार बनाया गया। उसके उच्च वेतनमान को देखते हुए ऐसा किया गया। वह पूर्णतः अशिक्षित था। माली ने तहसीलदार की नौकरी छोड़ दी तथा सरकार से मांग की कि उसे माली ही रहने दिया जाये। उसे फिर से माली बना दिया गया किंतु टोंक नवाब के वायदे का सम्मान करने के लिये उसका वेतनमान तहसीलदार वाला रखा गया।

    वित्तीय एकीकरण

    संविधान सभा द्वारा राज्यों के वित्तीय एकीकरण के उपाय सुझाने के लिये नलिनी रंजन सरकार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने दिसम्बर 1947 में अपनी रिपोर्ट दी। समिति द्वारा अनुभव किया गया कि राज्यों के वित्तीय एकीकरण की सबसे बड़ी बाधा वित्तीय आंकड़ों की अनुपलब्धता है। इस समिति ने सुझाव दिया कि समस्त राज्यों में संपूर्ण देश के समान कर व्यवस्था लागू होनी चाहिये। यह व्यवस्था 15 वर्ष के लिये लागू की जानी चाहिये। समस्त राज्यों को निर्देशित किया जाना चाहिये कि वे राज्य के बजट का निर्माण आवश्यक रूप से करें तथा खातों व लेखों की अंकेक्षण व्यवस्था करें। 22 अक्टूबर 1948 को वी. टी. कृष्णामाचारी की अध्यक्षता में 'इण्डियन स्टेट्स फाइनेंसेज इंक्वायरी कमेटी' का गठन किया गया। विभिन्न राज्यों तथा संघ राज्यों ने इस समिति का विरोध किया क्योंकि राज्य तथा राज्य संघ वित्तीय मामालों में केंद्र का हस्तक्षेप नहीं चाहते थे। 1 अप्रेल 1950 को राज्य का वित्तीय एकीकरण हुआ। इसके अनुसार राज्य सरकार द्वारा रेलवे, सेना और ऑडिट विभाग तथा उससे सम्बन्धित स्थावर और जंगम संपत्ति भारत सरकार को बिना किसी मुआवजे के सौंप दी गयी। राज्य पर बाह्य आक्रमणों से निबटने का उत्तरदायित्व केन्द्र सरकार पर चला गया।


    कानून व्यवस्था की समस्याएं

    राजस्थान के अस्तित्व में आने के समय अधिकांश राज्यों में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी हुई थी तथा प्रशासन अत्यंत बदतर अवस्था में था। कानून सतही तथा अपर्याप्त थे। प्रशासनिक प्रक्रियाएं सुस्पष्ट नहीं थीं। बड़ी सीमा तक प्रशासन व्यक्तिगत प्रकृति का था तथा राजा और उसके सलाहकारों की मर्जी से चलता था। नवनिर्मित राजस्थान में इन राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था को एक स्तर पर लाना सबसे बड़ी चुनौती थी। सबसे पहला कार्य डकैतों और लुटेरों पर काबू पाकर कानून की पुनर्स्थापना का था जो कि गाँवों और दूर दराज के क्षेत्रों में आतंक मचाये हुए थे। यह कार्य बहुत शीघ्रता और अत्यंत दक्षता से किया गया।

    जागीरदारों में बेचैनी

    राजस्थान की रियासतों में राजस्व संग्रहण की दृष्टि से दो प्रकार की भूमि थी, खालसा भूमि तथा जागीरी भूमि। खालसा भूमि के अंतर्गत 50,126 वर्गमील तथा जागीरी भूमि के अंतर्गत 77,110 वर्गमील क्षेत्रफल था। राजस्थान के 16,638 गाँव खालसा के अंतर्गत तथा 16,780 गाँव जागीरों के अंतर्गत आते थे। राजस्थान संघ के बनने से चूंकि रियासतें ही नहीं रह गयीं थीं इसलिये जागीरी प्रथा नितांत अप्रासंगिक हो गयी थी। विभिन्न राज्यों के प्रजामण्डलों एवं प्रजा परिषदों जैसी लोकप्रिय संस्थाओं ने जागीरों को समाप्त करने की मांग की। 25 जनवरी 1949 को सरदार पटेल ने जोधपुर में आयोजित एक आम सभा में कहा कि जागीरदार बदले हुए समय को पहचानें। जो लोग गलत काम करते हुए पाये जायेंगे उनसे दूसरी तरह का व्यवहार किया जायेगा। जागीरदारों को समझना चाहिये कि गलत क्या है उन्हें यह भी समझना चाहिये कि आज के युग में बड़े और छोटे का भेद तथा स्वामी और सामान्य आदमी का भेद समाप्त हो गया है तथा यह प्रचलन से बाहर हो गया है। उन्हें उन लोगों के भाग्य से सबक लेना चाहिये जो प्रजातंत्र के साथ नहीं चले या एकीकरण की प्रक्रिया के साथ नहीं चले। हमने एकीकरण की दिशा में जो कुछ भी प्राप्त किया है वह राजाओं की साख और सहयोग से प्राप्त किया है। कोई भी जागीरदार बलपूर्वक, डकैती से या बदला लेने की विधि से कुछ भी हासिल नहीं कर सकेगा। यह एक परिणामहीन व्यापार है। भारत उपनिवेश शांति तथा सुरक्षा के लिये उत्तरदायी है। सरदार ने मारवाड़ प्रजा परिषद के नेताओं तथा स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को सलाह दी कि वे जागीरदारों का अपमान करने वाली टिप्पणियां न करें। उन्हें जागीरदारों की समस्या को समाप्त करने के लिये समझाईश से काम लेना चाहिये तथा जागीरदारों के हृदय में स्थान बनाना चाहिये।

    14 फरवरी 1949 को जोधपुर महाराजा ने अधिसूचना जारी की कि जागीरदारों से मालगुजारी की वसूली के अधिकार वापिस लिये जाते हैं। इस पर जागीरदारों का असंतोष चरम पर पहुँच गया। 16 फरवरी को महाराजा ने इस आदेश को वापिस ले लिया। वापसी के आदेश में कहा गया कि 14 फरवरी की अधिसूचना से लोगों में गलतफहमी पैदा हुई है। वास्तव में यह अधिसूचना भविष्य के लिये थी। जब तक इस सम्बन्ध में कोई कानून पास न हो जाये, तब तक जागीरदार प्रचलित स्थानीय रिवाज या प्रथा के अनुसार रोकड़ या किस्म में लगान वसूली करते रहेंगे। वृहद राजस्थान बनने के बाद जागीरदारी अधिकार लोप अध्यादेश जारी किया गया जिसे लेकर जागीरदारों में बेचैनी उत्पन्न हो गयी। 8 मई 1949 को राजस्थान क्षत्रिय महासभा के जयपुर अधिवेशन में कई प्रस्ताव पारित किये गये। सभापति ठाकुर माधोसिंह संखवास ने कहा कि राजस्थान संघ के निर्माण के समय जब राजस्थान क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी रियासती विभाग के अधिकारियों से मिले थे तब हमें आश्वासन दिया गया था कि हमारी मुख्य मांगों को स्वीकार किया जायेगा। जब जागीरदारी अधिकार लोप अध्यादेश जारी हुआ तब भी हमने अपनी आपत्तियां रियासती विभाग को प्रस्तुत की थीं किंतु उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। हमारे सामने इस समय तीन प्रश्न विचाराधीन हैं- राजस्व अधिकारी का आदेश, मंत्रिमण्डल का उचित निर्माण तथा क्षत्रिय समाज के विरुद्ध पक्षपात एवं अन्याय पूर्ण कानून। कांग्रेस जागीरदारी प्रथा का नाश चाहती है किंतु मैं इस अन्याय पूर्ण सिद्धांत के विरुद्ध हूँ.......आज हमारे सामने जीवन मरण का प्रश्न है।

    सभा में पारित एक प्रस्ताव में कहा गया कि राजस्थान क्षत्रिय महासभा पहले वाली राजस्थान सरकार (संयुक्त राजस्थान) के राजस्व सम्बन्धी उस आदेश पर खेद व्यक्त करती है कि इस आदेश ने निश्चित वर्ग के जागीरदारों की राजस्व शक्ति समाप्त कर दी तथा समस्त जागीरदारों द्वारा अपने क्षेत्र के भूस्वामियों से राजस्व वसूलने के अधिकारों को भी समाप्त कर दिया। काश्तकारों से भूमि का किराया वसूल करना जागीरदारी प्रथा का मूलभूत अधिकार है। इसे समाप्त करना जागीर प्रथा को जड़ से काट फैंकने जैसा है जो इसे पूरी तरह समाप्त कर देगा। क्षत्रिय महासभा, सरकार के इस कृत्य को गैरकानूनी तथा अन्यायपूर्ण मानते हुए इसका विरोध करती है। उस समय राजप्रमु,ख महाराणा उदयपुर ने आश्वासन दिया था कि वे इस आदेश को रद्द कर देंगे किंतु इस दिशा में कुछ नहीं किया गया। इसलिये यह सभा वर्तमान सरकार से अनुरोध करती है कि इस आदेश को रद्द कर दे। सभा में पारित एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि भू काश्तकारी प्रथा के सम्बन्ध में वर्तमान सरकार द्वारा हाल ही में गठित समिति के बारे में सभा का मानना है कि यह समिति एक आम नीति तैयार करने के लिये बनायी गयी है। राजस्थान सरकार को सर्वेक्षण एवं चकबंदी के सम्बन्ध में यथा स्थिति बनाये जाने के लिये कहा जाना चाहिये तथा आम नीति का निर्माण होने तक राजस्थान सरकार द्वारा वर्तमान में की जा रही कार्यवाही को रोक दिया जाना चाहिये। चकबंदी विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न आधार पर की जाती है जिससे संदेह एवं अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। यह आवश्यक है कि चकबंदी समान आधार पर की जानी चाहिये। जागीरदारों एवं भूस्वामियों के लिये खुदकाश्त का विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सर्वेक्षण तथा चकबंदी का काम आगे बढ़ाने से पहले इस प्रश्न को सुलझाया जाना चाहिये अन्यथा शेखावाटी के उदयपुरवाटी तथा तोरावाटी क्षेत्रों की तरह बड़ा असंतोष उत्पन्न हो जायेगा। इस विषय को आवश्यक कार्यवाही के लिये जागीर उपसमिति को सौंप दिया जाना चाहिये। आजकल कुछ व्यक्ति देश में होने वाले दंगों एवं गैर कानूनी डकैती आदि कुकृत्यों को केवल क्षत्रियों का कर्त्तव्य बताकर क्षत्रिय समाज के प्रति दूषित वातावरण उत्पन्न करते हैं। क्षत्रिय महासभा उनकी इस नीति का तीव्र विरोध करती है और इसे असत्य एवं निराधार ठहराती है।

    भारत सरकार के प्रस्ताव संख्या आर (61)-पी/49 दिनांक 30 अगस्त 1949 को यह प्रस्ताव किया गया कि राजस्थान तथा मध्यभारत की जागीरों के सम्बन्ध में एक समिति बनायी जाये जो इन जागीरों का भविष्य तय करने के लिये अपनी रिपोर्ट प्रदान करे। इस क्रम में सी. एस. वेंकटाचार की अध्यक्षता में एक समिति बनायी गयी जिसमें राजस्थान से गोकुलभाई भट्ट एवं सीताराम जाजू को तथा मध्य भारत से ब्रजचंद शर्मा एवं वी. विश्वनाथन को लिया गया। इस समिति ने 18 दिसम्बर 1949 को अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि जागीरदारी प्रथा समाप्त होनी चाहिये तथा राजस्व संग्रहण का कार्य सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में होना चाहिये। जागीरदारी अधिकार सम्पत्ति के अधिकार नहीं हैं अतः जागीरदारों को कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जानी चाहिये। जिन जागीरदारों के नियंत्रण में पूरा गाँव है, उन्हें पुनर्वास सहायता दी जानी चाहिये। जागीर के लिये वार्षिक मूल्य दिया जाना चाहिये। जागीरदारों, माफीदारों इत्यादि को उनके अधिकार वाली कृषि जोत तथा भूखण्डों की पूर्ण वार्षिक आय अगले 12 वर्षों तक दी जानी चाहिये। काश्तकारों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिये ताकि जागीरदार उनकी भूमि को हड़प न सकें।

    अकाल की समस्या

    जिस समय वृहद राजस्थान अस्तित्व में आया उस समय पश्चिमी राजस्थान में भयानक अकाल एवं सूखे की स्थिति थी। बाड़मेर क्षेत्र के पशुपालकों एवं किसानों ने एक ज्ञापन रीजनल कमिश्नर को भिजवाया। इस पत्र में वृहद राजस्थान सरकार से अपील की गयी कि विगत 45 वर्षों से इस क्षेत्र के गाँवों में सूखा पड़ रहा है। हमारे पास न तो बीज हैं न बैल हैं। अतः सरकार हमारी मदद के लिये आगे आये ताकि हमारे बच्चे जीवित रह सकें। पहले हम लोग सिंध क्षेत्र में पलायन कर जाते थे किंतु अब देश के विभाजन के कारण वहाँ जाना संभव नहीं रह गया है। पहले सूद पर पैसा देने वाले लोग हमें प्रसन्नता पूर्वक ऋण दे देते थे किंतु अब उन्हें भय है कि सरकार हमें कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवायेगी इसलिये वे हमें ऋण नहीं दे रहे।

    पाकिस्तान जा चुके कर्मचारियों से ऋण वूसली की समस्या

    विभिन्न रियासतों में कार्यरत कुछ मुस्लिम राजकीय कर्मचारी पाकिस्तान चले गये। उनमें से कई कर्मचारियों ने राज्यकोष से ऋण ले रखे थे जिनकी उनसे वसूली की जानी थी। निम्बाहेड़ा के मजिस्ट्रेट अजीमुद्दीन खान ने टोंक रियासत से ऋण लेकर अपने भाई को डॉक्टरी की पढ़ाई करवायी थी। जब देश का विभाजन हुआ तो अजीमुद्दीन खान ने अपने भाई को लाहौर भेज दिया तथा स्वयं भी अपने मकान का सौदा करके लाहौर चला गया। पाकिस्तान जाने से पहले उसने यह टिप्प्णी भी कि चूंकि अब राजस्थान में हिन्दुओं की सरकार बनेगी इसलिये मुसलमानों को यहाँ नहीं रहना चाहिये। अजीमुद्दीन खान द्वारा टोंक रियासत के समय में लिये गये ऋण की वसूली करने तथा एक मजिस्ट्रेट द्वारा इस प्रकार की अनर्गल टिप्पणी करने के लिये उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के लिये टोंक से रामरख पटेल ने राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को एक पत्र लिखा।

    सुवाणा गोली काण्ड

    21 जुलाई 1949 को भीलवाड़ा जिले के सुवाणा गांव में लेवी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने फायरिंग की जिससे 21 से अधिक किसान मारे गये और अनेक घायल हो गये। मुख्यमंत्री ने इस कांड के लिये कांग्रेसी नेताओं को दोषी ठहराया। न तो मुख्यमंत्री स्वयं और न मंत्रिमण्डल का कोई सदस्य घटना स्थल पर पहुँचा। इससे क्षुब्ध होकर जयप्रकाश नारायण ने 29 जुलाई 1949 को सुवाणा दिवस मनाने का आह्वान किया। समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण ने इस काण्ड की तुलना जलियांवाला कांड से की।


    राजनैतिक समस्याएँ


    राजप्रमुख एवं उपराजप्रमुख के पद की नियुक्ति

    द्वितीय राजस्थान संघ की राजस्थान प्रसंविदा (Rajasthan Covenant) में राजस्थान संघ में सम्मिलित राज्यों के राजाओं को राजप्रमुख एवं उप-राजप्रमुख चुनने के लिये एक एक मत का अधिकार दिया गया। बाद में अनुभव किया गया कि राजस्थान संघ में प्रवेश करने वाली बड़ी रियासतों- जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर को कुछ अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिये। अतः राजाओं की परिषद के प्रत्येक सदस्य के पास उस राज्य की प्रति लाख जनसंख्या के अनुसार मतदान का अधिकार दिया गया।

    राजाओं के विशेषाधिकार

    राज्यों के राजस्थान में विलय के पश्चात ही राजाओं के शासनाधिकार समाप्त हो गये किंतु उनके कुछ विशेषाधिकार और प्रिवीपर्स बने रहने दिये गये। बहुत से लोगों का मानना था कि अब राजाओं को विशेषाधिकार किस बात के मिलने चाहिये? राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री का मानना था कि राजाओं ने अपने राज्य छोड़ दिये तो उनके साथ मिठास का व्यवहार होना चाहिये। छोटी-छोटी बातों में उनको नाराज या उदास नहीं करना चाहिये। अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा है- किसी भी राजा या रानी ने मुझसे कुछ चाहा तो मैंने तत्परता के साथ वह कर दिया।

    जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह का मानना था- 'नरेशों को उन्हें दिये गये विशेषाधिकारों की रक्षा के लिये हाय-तौबा करने की क्या आवश्यकता है? जब रियासतें ही भारत के मानचित्र से मिटा दी गयीं तो थोथे विशेषाधिकार केवल बच्चों के खिलौनों का सा दिखावा हैं। सामंती शासन का युग समाप्त हो जाने के बाद भूतपूर्व नरेशों के सामने एक ही रास्ता है कि वे जनसाधारण की कोटि तक उठने की कोशिश करें। एक निरर्थक आभूषण के रूप में जीवन बिताने की अपेक्षा कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि वे राष्ट्र की जीवनधारा के साथ चलते हुए सच्चे अर्थ में जनसेवक बनें और उसी आधार पर अपने बल की नींव डालें।' 

    जयपुर राज्य के सीकर, खेतड़ी व उणियारा ठिकानों के ठिकानेदारों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् उन्हें वापस लेने की बात उठी। मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने तीनों ठिकानेदारों को बुलाकर कहा कि आपके ये विशेषाधिकार वापस लिये जा रहे हैं। इनमें से एक ठिकाणेदार बहुत राजी से, दूसरा तटस्थ भाव से और तीसरा कुछ हुज्जत के बाद अपने विशेषाधिकार छोड़ने के लिये मान गया।

    मत्स्य संघ का विलय

    18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ अस्तित्व में आया था और उसे काम करते हुए कुछ माह ही हुए थे किंतु इस संघ में चारों ओर असंतोष व्याप्त हो गया। संघ में जाटवाद बनाम समाजवाद का झगड़ा फैल गया। समाजवादी दल, जनाधिकार समिति तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सरकार की नीतियों का विरोध किया। भरतपुर में किसान सभा और नागरिक सभा भी विरोध पर उतर आयी। सरकार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में गिरफ्तार कर लिया। जनता इन सब बातों के कारण मत्स्य संघ की सरकार से तंग आ गयी और इस संघ का कोई विकल्प ढूंढने लगी। कांग्रेसी कार्यकर्ता चाहते थे कि मत्स्य संघ को या तो संयुक्त प्रांत में मिला दिया जाये या फिर दिल्ली के साथ जोड़ दिया जाये। जागीरदार वर्ग इस संघ को राजस्थान में मिलाने के लिये उत्सुक था। किसान चाहते थे कि भरतपुर और धौलपुर क्षेत्र को एक पृथक इकाई बनाया जाये और इसका नाम बृजप्रदेश रखा जाये। मेव लोग अब भी मेवस्तान की स्थापना का स्वप्न देख रहे थे। इन आंदोलनों के चलते भारत सरकार को भय हुआ कि कहीं संघ का विघटन न हो जाये।

    13 फरवरी 1949 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर तथा करौली के शासकों व मत्स्य संघ के मंत्रियों को दिल्ली बुलवाया गया। अलवर और करौली ने संघ को राजस्थान में मिलाने की स्वीकृति प्रदान की किंतु भरतपुर नरेश तथा धौलपुर नरेश इसपर सहमत नहीं हुए। इन दोनों राज्यों के नेताओं में भी विवाद हो गया। उनमें से कुछ राजस्थान में तो कुछ उत्तर प्रदेश में मिलना चाहते थे। 23 मार्च 1949 को पुनः एक बैठक हुई जिसमें भरतपुर तथा धौलपुर नरेशों ने राजस्थान में मिलने की इच्छा व्यक्त की। धौलपुर नरेश ने शर्त रखी कि यदि बाद में धौलपुर, उत्तर प्रदेश में मिलना चाहे तो उसका प्रावधान रखा जाये।

    मत्स्य संघ के निर्माण के समय भी भरतपुर एवं धौलपुर राज्यों की जनता यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान तथा यूनाईटेड प्रोविंसेज (उत्तर प्रदेश) में सम्मिलित होने को लेकर दो भागों में बंट गयी थी। अतः जब मत्स्य संघ के वृहद राजस्थान में विलय की योजना सामने आयी तो रियासती विभाग ने दोनों राज्यों की जनता की राय जानने के लिये आई.सी.एस. अधिकारी शंकरराव देव की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। आर. के. सिधवा एवं प्रभुदयाल हिम्मतसिंहका को समिति का सदस्य नियुक्त किया गया। 4 अप्रेल 1949 को इस सम्बन्ध में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गयी। समिति ने भरतपुर एवं धौलपुर राज्यों में विभिन्न समुदायों से बात करके अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि मत्स्य संघ को वृहत् राजस्थान में मिलाया जाना उचित रहेगा किंतु एक निश्चित समय के बाद लोगों की राय को दुबारा से जाना जाये। भारत सरकार ने यह अनुशंसा स्वीकार कर ली तथा 1 मई 1949 को समाचार पत्रों के माध्यम से इसकी सूचना प्रकाशित करवायी।

    10 मई 1949 को पुनः चारों राजाओं तथा राजस्थान संघ के राजप्रमुख को दिल्ली बुलाया गया। चारों राजाओं ने मत्स्य संघ के राजस्थान में विलय के लिये तैयार की गयी प्रसंविदा (Covenant) पर हस्ताक्षर कर दिये। राजस्थान संघ की ओर से राजप्रमुख ने हस्ताक्षर किये। प्रसंविदा में प्रवाधान किया गया कि जब भारत सरकार अनुभव करे तब भरतपुर तथा धौलपुर की जनता की इच्छा का पता लगाया जाये कि वह राजस्थान के साथ ही रहना चाहती है या यूनाईटेड प्रोविंसेज में सम्मिलित होने की इच्छा रखती है। 15 मई 1949 को मत्स्य संघ का प्रशासन वृहत् राजस्थान को स्थानांतरित हो गया। मत्स्य संघ के मुख्यमंत्री शोभाराम को हीरालाल शास्त्री मंत्रिमंडल में सम्मिलित कर लिया गया।

    सिरोही राज्य के उत्तराधिकारी की समस्या

    23 जनवरी 1946 को सिरोही महाराजा सरोपरामसिंह का निधन हो गया। उनके कोई पुत्र नहीं था। इसलिये तेजसिंह, अभयसिंह तथा लखपतसिंह ने सिरोही राज्य की गद्दी पर दावा किया। तेजसिंह शासक परिवार की मण्डार शाखा से था, अभयसिंह महाराव उम्मेदसिंह के भाई का पौत्र था तथा लखपतसिंह महाराव सरोपरामसिंह की एक राजपूत स्त्री से उत्पन्न पुत्र था। क्राउन प्रतिनिधि ने तेजसिंह को सिरोही का शासक स्वीकार कर लिया। इस पर शेष दावेदारों ने क्राउन प्रतिनिधि के समक्ष पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत की। यह विवाद आजादी के बाद तथा राजस्थान के निर्माण के बाद भी चलता रहा। 10 मार्च 1949 को भारत सरकार द्वारा सौराष्ट्र उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सर एच. वी. देवतिया, महाराजा जयपुर तथा महाराजा कोटा की सदस्यता वाली समिति का गठन किया गया। समिति की अनुशंसा पर अभयसिंह को सिरोही का वास्तविक अधिकारी मान लिया गया।

    सिरोही राज्य का विलय

    15 अगस्त 1947 से माउण्ट आबू का प्रशासन केन्द्र सरकार द्वारा चलाया जा रहा था। 1 फरवरी 1948 को सिरोही राज्य राजपूताना एजेंसी से हटाकर बंबई प्रांत के वेस्टर्न इण्डियन स्टेट्स एजेंसी के अंतर्गत रख दिया गया था। सिरोही राज्य की जनता ने मांग की कि सिरोही राज्य को बम्बई में न मिलाया जाकर संयुक्त राजस्थान में मिलाया जाये। जब उदयपुर राज्य ने संयुक्त राजस्थान में मिलने का निर्णय लिया तो यह मांग और अधिक प्रबल हो गयी। अ.भा.दे.रा. लोक परिषद् की राजपूताना प्रांतीय सभा के महामंत्री हीरालाल शास्त्री ने 10 अप्रेल 1948 को सरदार पटेल को लिखा कि उदयपुर संयुक्त राजस्थान में सम्मिलित हो रहा है इससे सिरोही का राजस्थान में सम्मिलित होना और भी अवश्यंभावी हो गया है। फिर हमारे लिये सिरोही का अर्थ है गोकुलभाईं बिना गोकुल भाई के हम राजस्थान नहीं चला सकते। शास्त्री को इस तार का कोई उत्तर नहीं मिला। इस पर शास्त्री ने 14 अप्रेल 1948 को दूसरा तार भेजा- हम लोग कोई कारण नहीं देखते कि क्षण मात्र के लिये भी सिरोही को राजस्थान की बजाय रियासतों के अन्य किसी समूह में मिलाने की दिशा में सोचा जा सकता है।.....इस प्रश्न पर मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि आप राजस्थान की जनता की भावना की अनदेखी न करें।........मुझे विश्वास है कि आप हमारी सर्वसम्मत प्रार्थना को स्वीकार कर हमारी सहायता करेंगे।

    18 अप्रेल 1948 को जब जवाहरलाल नेहरू संयुक्त राजस्थान के उद्घाटन के लिये उदयपुर आये तो राजस्थान के कार्यकर्ताओं ने नेहरू को जनभावनाओं से अवगत करवाया। नेहरू ने दिल्ली लौटते ही सरदार पटेल को पत्र लिखकर सूचित किया कि राजस्थान भर में कार्यकर्ताओं में जिस सवाल पर सबसे अधिक रोष था, वह था सिरोही के बारे में। ....... मुझे बार-बार कहा गया कि सिरोही गत 300 वर्षों से भाषा और अन्य प्रकार से राजस्थान प्रदेश का अंग रहा है। अतः उसे राजस्थान से मिलना चाहिये। मैंने उनसे कहा कि मुझे इस विषय के विभिन्न पहलुओं की जानकारी नहीं है, अतः मैं इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ। पर साधारणतः जहाँ मतभेद हो, वहाँ जनता की राय ही मान्य होनी चाहिये। पटेल ने नेहरू को लिखा कि सिरोही के सम्बन्ध में मेरी इन लोगों से कई बार बात हुई है। समस्त सम्बन्धित मुद्दों पर विचार करने के बाद ही हम इस निर्णय पर पहुँचे कि सिरोही गुजरात को जाना चाहिये। राजस्थान वालों को सिरोही नहीं गोकुलभाई भट्ट चाहिये। उनकी यह मांग सिरोही को राजस्थान को दिये बिना ही पूरी की जा सकती है।

    इस समय सिरोही राज्य का शासक अल्पवयस्क था तथा शासन प्रबंध राजमाता के नेतृत्व में रीजेंसी कौंसिल द्वारा किया जाता था। राज्य के उत्तराधिकार के प्रश्न पर भी विवाद चल रहा था। वी. पी. मेनन ने राजमाता के सलाहकार गोकुलभाई भट्ट से विचार विमर्श किया जो उस समय राजस्थान प्रोविंशियल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी थे। 8 नवम्बर 1948 को भारत सरकार ने सिरोही रीजेंसी कौंसिल से समझौता किया जिसके अनुसार 5 जनवरी 1949 को सिरोही का शासन प्रबंध बम्बई सरकार को दे दिया गया। गुजरातियों का दावा था कि माउण्ट आबू परम्परा से तथा ऐतिहासिक रूप से गुजरात से जुड़ा हुआ रहा था एवं आबू पर्वत पर स्थित जैन मंदिरों के दर्शनार्थ गुजरात तथा काठियावाड़ के जैन परिवार पूरे वर्ष बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। सिरोही के राजपरिवार का काठियावाड़ और कच्छ के राजपरिवार से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। राजस्थान के नेताओं का तर्क था कि सिरोही कई वर्षों से राजपूताना का भाग रहा है। सिरोही राज्य में गुजराती बोलने वालों का बहुमत नहीं है। भाषा और संस्कृति की दृष्टि से सिरोही को राजस्थान में मिलना चाहिये। ग्रीष्म काल में राजपूताना के रईसों का आवास आबू पर्वत रहता था। आबू पर्वत पर उनकी कोठियां बनी हुई हैं। आबू के अतिरिक्त राजस्थान में और कोई पर्वतीय स्थल नहीं है।

    सिरोही राज्य के लोकप्रिय नेता भी इस विषय पर दो भागों में विभक्त थे। समस्त पक्षों को सुनने के बाद वी. पी. मेनन ने निर्णय दिया कि संपूर्ण सिरोही राज्य को बम्बई प्रांत में मिलाया जाना उचित नहीं होगा राज्य का विभाजन किया जाना ही इस समस्या का एकमात्र हल है। सरदार पटेल से विचार विमर्श के बाद गोकुलभाई भट्ट तथा सिरोही राज्य के अन्य लोकप्रिय नेताओं को दिल्ली बुलाया गया। मेनन ने इन नेताओं के समक्ष अपना और सरदार पटेल का दृष्टिकोण स्पष्ट किया। इस पर हीरालाल शास्त्री और गोकुल भाई भट्ट ने माणिक्यलाल वर्मा को बताया कि सरदार पटेल सिरोही को गुजरात में मिलाना चाहते हैं किंतु यदि राजस्थान वाले आबू पर अपना अधिकार छोड़ दें तो पटेल शेष सिरोही को राजस्थान में मिला देंगे। माणिक्यलाल वर्मा ने इस प्रस्ताव को यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि आबू राजस्थान की नाक है। हम आबू पर अपना हक नहीं छोड़ेंगे। जब मेनन ने गोकुल भाई भट्ट आदि नेताओं को सरदार पटेल के सिरोही विभाजन के फैसले की जानकारी दी तो इन नेताओं ने फैसले के प्रति उत्साह तो नहीं दिखाया किंतु अवश्यंभावी कहकर इसे स्वीकार कर लिया। यह निश्चित किया गया कि आबूरोड तथा देलवाड़ा तहसीलों को बम्बई प्रांत में तथा शेष राज्य को राजस्थान में मिलाया जाना चाहिये। 24 जनवरी 1950 को पटेल ने लोकसभा में माउंट आबू और देलवाड़ा तहसील जिसमें 89 गांव थे, तत्कालीन बंबई राज्य में और शेष सिरोही को राजस्थान में मिलाने की घोषणा की। इस निर्णय के विरोध में सिरोही की जनता ने आंदोलन आरंभ किया। लगभग पौने सात साल तक यह आंदोलन चलता रहा। अंत में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1 नवम्बर 1956 को आबूरोड और देलवाड़ा तहसील जिसमें आबूपर्वत भी शामिल था, को राजस्थान में मिला दिया गया।

    कच्छ के राजस्थान में विलय की मांग

    कुछ संस्थाओं एवं व्यक्तियों द्वारा कच्छ क्षेत्र को काठियावाड़ अथवा बम्बई प्रांत में सम्मिलित न करके राजस्थान में सम्मिलित करने की मांग की गयी। इन लोगों का तर्क था कि राजस्थान का विशाल क्षेत्र कच्छ से जुड़ा हुआ है तथा इस क्षेत्र को राजस्थान में सम्मिलित करने से राजस्थान को बंदरगाह की सुविधा मिल जायेगी जिससे राजस्थान में औद्योगिक एवं व्यापारिक विकास की गति को बढ़ाने में सहायता मिलेगी। कच्छ को काठियावाड़ या बम्बई में मिलने से कोई महत्ता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि उन प्रदेशों में पहले से ही कई बंदरगाह स्थित हैं जबकि राजस्थान में मिलने से कच्छ को महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त हो जायेगी। कच्छ को राजस्थान में मिलाने की मांग करने वालों का तर्क यह भी था कि कच्छ के राजाओं के वैवाहिक सम्बन्ध राजपूताने की रियासतों के शासकों से हैं इससे भी कच्छ को राजस्थान में मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी। इसके अतिरिक्त अभी भी कच्छ का एक सौ मील से भी अधिक क्षेत्र राजस्थान में सम्मिलित किया गया है अतः पूरे कच्छ को राजस्थान में मिलाना अधिक उचति रहेगा। भारत सरकार ने यह मांग नहीं मानी।

    राजस्थानी भाषा को मान्यता देने की मांग

    राजस्थानी भाषा को स्थापित करने के उद्देश्य से राजस्थानी भाषा के विद्वान चालीस के दशक से ही प्रयत्नशील थे। 1942 में ठाकुर रामसिंह ने प्रयास किया कि हिन्दू विश्व विद्यालय में राजस्थानी विभाग स्थापित हो। 5 अक्टूबर 1947 को जोधपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'मारवाड़ी' के सम्पादक श्रीमंत कुमार व्यास ने महाराजा जोधपुर को लिखा कि राजस्थानी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलवाने के लिये एक आंदोलन चलाया गया है जिसके लिये समाचार पत्र को जोधपुर नरेश से सहयोग, सुविधा तथा उत्साह पाने की पूरी आशा है। राजस्थान के गठन के साथ ही राजस्थानी भाषा को संविधान में मान्यता देने तथा इसे राजभाषा घोषित करने की मांग उठी। राष्ट्रीय नेता इस मांग को उचित नहीं समझते थे इसलिये इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। कन्हैयालाल सेठिया के एक पत्र के उत्तर में भारत सरकार के कृषि मंत्री के. एम. मुंशी ने लिखा- 'राजस्थान में तो सवर्तः हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जाता है फिर राजस्थानी भाषा को स्वीकार कराने से क्या लाभ है?' 

    गोकुलभाई भट्ट ने 14 नवम्बर 1949 को कन्हैयालाल सेठिया को लिखा कि अगर राजस्थान की किसी रियासत ने राजस्थानी को पहले से स्थान दिया होता तो राजस्थानी को समर्थन होता। सब रियासतों ने हिन्दी को ही राजभाषा माना था, इसलिये मुझे (राजस्थानी को राजभाषा के रूप में स्वीकृत करवाने का) खास मौका नहीं मिला है। जयनारायण व्यास ने सेठिया को लिखा कि अभी तक सिरोही के प्रश्न की अंत्येष्टि नहीं हुई है। अतः सिरोही दिवस मनाना मरने के पहिले मरसिया गाना है। राजस्थानी भाषा है और उसका प्रचार-प्रसार होना चाहिये। यह मेरी राय पहिले थी और अब भी है पर एक खानगी सी मीटिंग में मैंने अपने समाज को अवश्य कोसा कि उसने इस भाषा को जीवित और प्रचलित रखने के लिये कुछ नहीं किया जिससे लोगों को हमारी भाषा को मान्यता नहीं देने का साहस और उत्साह हो जाता है। मैंने यातियों की पौशालों का कभी जिक्र किया था जिसके द्वारा भाषा जीवित थी पर हमारी उपेक्षा से वे भी समाप्त हो गयीं।

    नरोत्तम स्वामी ने 1949 में कन्हैयालाल सेठिया को लिखा कि राजस्थानी आंदोलन का नेतृत्व करना मेरे वश की बात नहीं। दौड़ना-भागना, लोगों से मिलना-मिलाना, उन्हें कायल करना, भाषणों या लेखों द्वारा धुंआँधार प्रचार करके एक आंदोलन खड़ा कर देना ये कार्य मेरे लिये संभव नहीं। उन्होंने सुझाव दिया कि हिन्दी भले ही राजभाषा के रूप में सरकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में बनी रहे किंतु लोगों को यह अधिकार दिया जाये कि वे राजस्थानी में अर्जियां दे सकें।


    नेतृत्व की समस्याएं

    कांग्रेस की राजस्थान इकाई में शास्त्री का विरोध

    राजस्थान के एकीकरण के बाद प्रदेश में जो पहली लोकप्रिय सरकार बनी, उसे लेकर कांग्रेस के भीतर सरदार पटेल का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। शास्त्री के नेता पद पर चुने जाने के ढंग पर प्रांत भर में आलोचना हुई। इसे एक फासिस्टी चुनाव कहा गया, जिससे लोकतंत्र की हत्या हुई है। 7 अप्रेल 1949 को जयपुर के सिद्धराज ढड्ढा, उदयपुर के प्रेमनारायण माथुर और भूरेलाल बया तथा बीकानेर के रघुबरदयाल गोयल ने मंत्री पद की शपथ ली। बाद में कोटा के वेदपाल त्यागी, जोधपुर के फूलचंद बाफणा, नृसिंह कच्छवाहा और रावराजा हणूंतसिंह ने शपथ ली। मत्स्य राज्य का वृहत् राजस्थान में विलय होने पर मई 1949 में मत्स्य राज्य के मुख्यमंत्री शोभाराम ने भी शास्त्री मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में शपथ ली। शास्त्री, व्यास को गृहमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन व्यास की सलाह पर उनके दो सहयोगियों को मंत्री बनाने को नहीं माने, अतः व्यास गृहमंत्री बनने को तैयार नहीं हुए। जयपुर और बीकानेर से भी शास्त्री ने अपनी पसंद के मंत्री लिये। मुख्यमंत्री पर दबाव डाला गया कि वे जोधपुर से दो, उदयपुर से एक, जयपुर से एक तथा बीकानेर से एक और व्यक्ति को मंत्रिमण्डल में लें किंतु हीरालाल शास्त्री ने यह कहकर कि मंत्रिमण्डल छोटा ही होना चाहिये। उन्होंने अधिक लोगों को मंत्री बनाना अस्वीकार कर दिया।

    व्यास को आशा थी कि शास्त्री उनकी सलाह से काम करेंगे किंतु शास्त्री ने अपने मंत्रिमंडल के निर्माण में न तो जयनारायण व्यास और माणिक्यलाल वर्मा को ही विश्वास में लिया और न ही अपने संभाग के सरदार हरलालसिंह और टीकाराम पालीवाल जैसे लोकप्रिय नेताओं का सहयोग लिया।........प्रतिभा की दृष्टि से यह एक अच्छा मंत्रिमंडल था किंतु दुर्भाग्य से उनमें से अधिकतर सदस्यों का जनाधार नहीं था, न ही उन्हें अपने क्षेत्र के नेताओं का आशीर्वाद प्राप्त था। ये समस्त ऐसे व्यक्ति थे जिनका कांग्रेस संगठन में कोई प्रभाव नहीं था और न ही इन्हें कार्य का अनुभव था। प्रसिद्ध नेता बाहर रखे गये थे। प्रांत में इसका विरोध हुआ और प्रांतीय कार्यसमिति के चार सदस्यों- जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा, गोकुललाल असावा तथा मीठालाल त्रिवेदी ने त्यागपत्र दे दिया।

    गोकुलभाई भट्ट के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव

    शास्त्री को अपना मंत्रिमंडल बनाये हुए दो सप्ताह भी नहीं हुए कि प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष गोकुलभाई भट्ट एवं मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के विरुद्ध अभियान आरंभ कर दिया। जोधपुर में मारवाड़ कांग्रेस कमेटी की बैठक में मथुरादास माथुर ने शास्त्री को पटेल की फासिस्टी विचारधारा का प्रतीक बताया जो व्यास और वर्मा को कमजोर करना चाहते हैं क्योंकि वे नेहरू की प्रगतिशील विचारधारा को मानते हैं। व्यास ने आरोप लगाया कि राजस्थान के निर्माण के बाद की कार्यवाही उनसे छिपायी गयी है। बैठक में पारति एक प्रस्ताव द्वारा मंत्रिमंडल निर्माण, राजधानी और राज्य कर्मचारियों की अनिश्चितता पर असंतोष प्रकट किया गया। बीकानेर, जयपुर और उदयपुर के कांग्रेसियों में भी मंत्रिमंडल के गठन पर रोष था। यह निश्चय हुआ कि प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष भट्ट के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखा जाये। गोकुलभाई भट्ट हीरालाल शास्त्री के समर्थक थे, असंतुष्ट कांग्रेसियों को यह आशा थी कि भट्ट के हटते ही शास्त्री भी हट जायेंगे।

    25 अप्रेल 1949 को सरदार पटेल ने जयनारायण व्यास को चेतावनी दी कि वे उनकी गतिविधियों को देख रहे हैं और व्यास को यह समझ लेना चाहिये कि वे गलत रास्ते पर हैं। 30 अप्रेल 1949 को प्रदेश कांग्रेस समिति ने गोकुल भाई भट्ट तथा हीरालाल शास्त्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर विचार करने के लिये 9 जून को एक बैठक बुलायी। इस पर पटेल ने कांग्रेसी नेताओं को पुनः चेतावनी दी कि यदि उन्होंने मंत्री बनने के लोभवश की जा रही हरकतों को बंद नहीं किया तो केन्द्रीय सरकार शासन अपने हाथ में ले लेगी। भट्ट ने प्रांत के कांग्रेसी नेताओं को लिखा कि अखिल भारतीय कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने यह मामला पटेल पर छोड़ दिया है, अतः मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास के पूर्व प्रांतीय नेता, पटेल से बात करें। 9 जून 1949 को प्रांतीय कमेटी में दोनों प्रस्ताव प्रचंड बहुमत से पारित हो गये। प्रांतीय कार्यकारिणी के 80 सदस्यों ने गोकुलभाई भट्ट के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित किया। 11 जून को समिति ने जयनारायण व्यास को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया। गोकुलभाई भट्ट ने 11 जून 1949 को प्रांतीय कमेटी की बैठक बुलाई और कहा कि यदि एक भी सदस्य उन्हें नहीं चाहेगा तो वे पद से हट जायेंगे।

    सरकार विरोधियों के प्रति सरदार पटेल की नाराजगी

    11 जून को ही जयनारायण व्यास ने तार द्वारा रियासती मंत्रालय के प्रभारी मंत्री सरदार पटेल को राजस्थान के प्रधानमंत्री के विरुद्ध प्रदेश कांग्रेस कमेटी में अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की सूचना दी। इस तार में कहा गया कि- आज राजस्थान कांग्रेस की विशेष बैठक में गोकुलभाई भट्ट के त्यागपत्र को स्वीकार करके मुझे अध्यक्ष चुना गया है। कमेटी ने एक प्रस्ताव द्वारा हीरालाल शास्त्री और कांग्रेसी मंत्रियों से त्यागपत्र की मांग की है। 88 सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, 1 ने विरोध, कुछ तटस्थ थे, जबकि भट्ट और उनके साथी मतदान के समय चले गये।

    सरदार पटेल द्वारा 12 जून को इस तार का उत्तर दिया गया जिसमें कहा गया- 'आपका तार दो बातों को सूचित करता है- प्रथम, भट्ट का त्यागपत्र और उनकी जगह आपका चयन, जो स्थानीय कांग्रेस का मामला है जिससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। द्वितीय, शास्त्री और मंत्रियों से त्यागपत्र की मांग। मैं नहीं जानता कि वैधानिक रूप से यह कार्यवाही ठीक है लेकिन आपको समझना चाहिये कि राजस्थान के प्रधानमंत्री शास्त्री, प्रदेश कांग्रेस के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं। प्रदेश कांग्रेस विधान सभा का स्थान नहीं ले सकती। शास्त्री प्रधानमंत्री इसलिये नहीं बने कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस ने चुना है, वरन् आप सबकी प्रार्थना पर मैंने चुना है। चुनाव होने तक वे अपने पद पर बने रहेंगे यदि इस बीच वे हमारा विश्वास न खो दें। इस स्थिति को जानते हुए आपका सतत् अनुचित और घातक गतिविधियों में लगे रहना आपके स्वयं के लिये नुक्सान देय होगा।'

    हीरालाल शास्त्री का कहना है कि- 'मैंने व्यासजी, वर्माजी और जयपुर के कुछ साथियों के आग्रह करने पर भी कुछ भाइयों को मंत्रिमण्डल में नहीं लिया। मेरे कुछ कहने सुनने पर भी खुद व्यासजी ने भी मंत्रिमण्डल में आना मंजूर नहीं किया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से मंत्रिमण्डल का बाकायदा विरोध शुरू हो गया। सरदार ने मुझसे कह दिया कि आप तो अपना काम किये जाओ। जब प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने मेरे विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके सरदार को तार दिया तो उन्होंने बड़ा सख्त तार जवाब में दिया कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी को इस काम में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी का निर्णय भी यही हुआ। गोकुलभाई भट्ट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, उन्होंने त्यागपत्र दे दिया तब भी उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास किया गया।'

    पं. नेहरू ने व्यासजी को पत्र लिखा कि उनकी ओर से जो कुछ किया जा रहा है सो अनुचित और हानिकारक है।

    केन्द्रीय संचार मंत्री रफी अहमद किदवई ने पटेल को पत्र लिखकर उनके द्वारा व्यास को भेजे गये तार पर आश्चर्य और दुख प्रकट किया और कहा कि- 'कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र बाबू और पट्टाभि सीतारमैया अपने निर्देंशों में बार-बार यह कह चुके हैं कि कांग्रेसी सरकारों और संगठनों में सहयोग रखा जाये। जब मंत्रिमंडल में ऐसे व्यक्ति हों जिनमें संगठन का विश्वास न हो तब यह कैसे संभव है। जब विख्यात नेता यह घोषणा करते हैं कि प्रांतीय मंत्रिमंडल के निर्माण में कांग्रेस का हाथ नहीं है तो संस्था को समाप्त करने के समान ही है।'

    रफी ने पटेल के तार के प्रचार पर कड़ी आपत्तिा की। जवाब में पटेल ने लिखा कि- 'वह समझ नहीं सके कि रफी की शिकायत क्या है? शास्त्री को सर्वसम्मति से नेता चुना गया, जब व्यास और वर्मा के प्रतिनिधियों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया गया तो हर प्रकार के उपाय काम में लिये गये। क्या कोई ऐसे संगठन को विश्वास से देख सकता है? क्या ऐसा संगठन कांग्रेस को शक्तिशाली बना सकता है?' पटेल ने लिखा कि-समझौते के अनुसार रियासती मंत्रालय को नियंत्रण और निर्देशन का अधिकार है।' 

    असंतुष्ट नेताओं की कार्यकारिणी

    जयनारायण व्यास ने राज्य कांग्रेस कार्यकारिणी में प्रांत के प्रसिद्ध नेताओं को लिया। उदयपुर से माणिक्यलाल वर्मा और मोहनलाल सुखाड़िया, बीकानेर से कुंभाराम आर्य, अलवर से मास्टर भोलानाथ, भरतपुर से आदित्येन्द्र, जयपुर से टीकाराम पालीवाल, डूंगरपुर से भोगीलाल पंड्या, झुंझुनूं से चौधरी हरलालसिंह, शाहपुरा से गोकुललाल असावा, जोधपुर से मीठालाल त्रिवेदी और कोटा से अभिन्न हरी। इस कार्यकारिणी ने पटेल द्वारा व्यास को दिये गये तार की शैली पर आपत्ति की तथा इस बात को जनतंत्रीय सिद्धांतों तथा परम्पराओं के विरुद्ध बताया कि पटेल का विश्वास न खो देने तक शास्त्री बने रहेंगे। कार्यकारिणी ने यह भी कहा कि शास्त्री का चयन सर्वसम्मति से न होकर बिना किसी विरोध के हुआ था। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस कमेटी को प्रतिनिधि सभा माना गया था। पटेल ने यह भी माना है कि यह समस्त की प्रार्थना पर किया गया था। यह तर्क ठीक नहीं कि प्रदेश कांग्रस कमेटी विधान सभा का कार्य नहीं कर सकती क्योंकि कमेटी ने नेता का चुनाव किया था और मंत्रिमंडल के निर्माण के बारे में निर्देश दिये थे।

    जन समर्थन की रस्साकशी

    हीरालाल शास्त्री ने इस आरोप का खंडन किया कि उन्होंने संगठन की उपेक्षा की है। वे कांग्रेस की नीतियों और कार्यक्रम को मानने के लिये बाध्य हैं, उनका दोष यही है कि वे अपने उन मित्रों को संतुष्ट नहीं कर सके हैं जो कुछ व्यक्तियों को मंत्रिमंडल में लेने पर जोर दे रहे थे। राजस्थान के दौरे से यह स्पष्ट हो गया है कि जनता उनके साथ है। वे कुर्सी पर चिपके रहना नहीं चाहते लेकिन वे इसे छोड़ने के लिये स्वतंत्र नहीं हैं। जयनारायण व्यास ने शास्त्री के इस दावे का खंडन किया कि जनसमर्थन उनके साथ है। उनका कहना था कि राजस्थान तो दूर जयपुर के कांग्रेसी नेता भी उनके साथ नहीं हैं। जोधपुर नगर परिषद् द्वारा शास्त्री के अभिनंदन के प्रस्ताव का समर्थन करने वाले 15 सदस्यों में से केवल 5 निर्वाचित थे जबकि विरोध में 11 सदस्य थे। बीकानेर नगर परिषद् के 40 सदस्यों में से केवल 4 ने ऐसे प्रस्ताव का समर्थन किया और 3 ने विरोध, शेष ने बहिष्कार किया। 1 जुलाई 1949 को जयनारायण व्यास ने समस्त कांग्रेसियों से मंत्रियों का बहिष्कार करने की अपील की। इस बीच राजस्थान के व्यास समर्थक समाचार पत्रों में लगातार यह प्रचार किया जा रहा था कि नेहरू और पटेल के सम्बन्ध ठीक नहीं हैं और नेहरू स्वयं रियासती मंत्रालय संभाल रहे हैं। यह भी समाचार था कि रफी अहमद किदवई, सुचेता कृपलानी और निजलिंगप्पा ने पटेल को राजस्थान के बारे में पत्र लिखे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया राजस्थान आ रहे हैं।

    नेहरू की आपत्ति

    16 जुलाई 1949 को नेहरू ने जयनारायण व्यास को एक पत्र लिखकर आपत्ति की कि उन्हें इस विवाद में खींचा जा रहा है। नेहरू ने स्पष्ट किया कि इस तरह के प्रचार से व्यास, राजस्थान तथा कांग्रेस का नुक्सान कर रहे हैं। 18 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी ने समस्त प्रांतीय समितियों को निर्देश दिये कि वे किसी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित न करें। शिकायतें कार्यसमिति और संसदीय बोर्ड के समक्ष रखी जायें। कार्यसमिति ने ध्यान दिलाया कि दिल्ली में हुए समझौते के अनुसार राजस्थान का मंत्रिमंडल केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में कार्य कर रहा है। इस समझौते पर व्यास और वर्मा ने भी हस्ताक्षर किये थे। इस पर राजस्थान कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर अखिल भारतीय कांग्रेस को सूचित किया कि स्वयं पट्टाभि ने अपने पत्र में व्यास को लिखा था कि अगर नेता पं्रातीय कांग्रेस द्वारा चुना जायें तो प्रांतीय कमेटी को अधिकार है कि वह अपना निर्णय बदल सके। अतः कमेटी यह मानती है कि वह अविश्वास प्रकट कर सकती है।

    असंतुष्ट नेताओं पर मुकदमे

    जब व्यास तथा उनके साथियों की कार्यवाही बंद नहीं हुई तो दिसम्बर 1949 में राजप्रमुख ने अध्यादेश जारी करके एक विशेष अदालत नियुक्त की और इसमें जोधपुर राज्य के तीन भूतपूर्व मंत्रियों जयनारायण व्यास, द्वारकादास पुरोहित और मथुरादास माथुर पर भोजन, यातायात के झूठे बिलों और कीमती कारों को लेने के बारे में मुकदमे चलाये गये। उदयपुर के भूतपूर्व मंत्रियों पर ऐसे मुकदमे नहीं चले क्योंकि माणिक्यलाल वर्मा ने हरिभाऊ उपाध्याय को साथ लेकर सरदार पटेल को 50 हजार रुपये का हिसाब देकर अपनी सफाई दे दी थी। हीरालाल शास्त्री के अनुसार मुकदमे चलाने का फैसला करने से पहले पटेल को जितना सोच विचार करना चाहिये था उतना शायद उन्होंने नहीं किया और शास्त्री को भी जितना ध्यान इस तरफ देना चाहिये था, नहीं दिया। शास्त्री को इस बात का बड़ा भारी खेद था कि उन्होंने दूसरे साथियों के खिलाफ मुकदमे चलाने का इल्जाम अपने ऊपर ख्वामखा आने दिया।

    जनवरी 1950 में संविधान लागू होने पर भूतपूर्व मंत्रियों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जिससे मुकदमे की कार्यवाही रोक दी गयी। जयनारायण व्यास ने अपना विरोध जारी रखते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्यों के नाम एक पत्र में केन्द्रीय करण की प्रवृत्ति की निंदा की और कहा कि इन नये राजाओं से पुराने राजा ही अच्छे थे। शास्त्री ने इसके जवाब में व्यास को चुनौती दी कि वे उनके विरुद्ध शिकायतें प्रकाशित करें। शास्त्री ने आरोप लगाया कि व्यास दिल से राजस्थान का निर्माण नहीं चाहते थे। मुकदमे चलाने के साथ-साथ व्यास पर मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिये भी दबाव डाला जा रहा था। डा. राजेंद्र प्रसाद, वी. पी. मेनन आदि अनेक व्यक्ति व्यास और उनके साथियों पर चलाये जा रहे मुकदमों को ठीक नहीं मानते थे। पटेल के निजी सचिव शंकर और कुछ अन्य व्यक्तियों के कारण व्यास और उनके साथी पटेल को समझाने में सफल हुए।

    शास्त्री सरकार का पतन

    रियासती मंत्रालय द्वारा बदले की भावना से की गयी इस कार्यवाही से प्रदेश कांग्रेस में शास्त्री का विरोध और भी बढ़ गया। शास्त्री ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अपनी ओर मिलाने के लिये आदिवासी मंडल, हरिजन मंडल, गृह उद्योग मंडल आदि कुल 12 मंडलों का गठन किया तथा उनमें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को शामिल किया। इन कार्यकर्ताओं ने सरकार से वेतन और भत्ते तो उठाये किंतु शास्त्री के विरुद्ध प्रचार जारी रखा। 14 दिसम्बर 1950 को सत्यदेव विद्यालंकार ने कन्हैयालाल सेठिया को लिखा कि राजस्थान की स्थिति फिर बिगड़ रही है। दलबंदी का नया दौर शुरू है। सरदार की बीमारी के कारण ढील पड़ गयी और मामला बीच में लटक गया। इसमें भी भला इतना ही है कि शास्त्रीजी अपने असली रूप में प्रकट हो रहे हैं। इसी बीच जुलाई 1950 में आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच राजस्थान कांग्रेस कमेटी के सदस्यों का चुनाव हुआ जिसमें व्यास समर्थकों ने 131 में से 103 स्थान प्राप्त किये। सरदार पटेल पर इसका प्रभाव पड़ा।

    सितम्बर 1950 में नासिक में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता के लिये सरदार पटेल पुरुषोत्तम दास टंडन का समर्थन कर रहे थे जबकि जवाहरलाल नेहरू आचार्य जे. बी. कृपलानी के साथ थे। जयनारायण व्यास इस समय राजस्थान कांग्रेस के एकछत्र नेता थे, वे कृपलानी को चाहते थे किंतु पटेल चाहते थे कि व्यास टंडन का समर्थन करें। व्यास समझ चुके थे कि नेहरू उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते और नेहरू के साथ रहने में वे घाटे में रहेंगे । जबकि दूसरी ओर पटेल कह चुके थे कि वे राजस्थान की परिस्थितियों को समझ चुके हैं। हीरालाल शास्त्री भी त्यागपत्र के लिये तैयार थे। राजस्थान के कांग्रेसियों का भारी बहुमत टंडन के पक्ष में गया और वही निर्णायक रहा। 5 जनवरी 1951 को एक आई.ए. एस. अधिकारी को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया। इस सरकार ने व्यास तथा उनके साथियों के विरुद्ध चल रहे मुकदमे वापिस ले लिये। राजस्थान उच्च न्यायालय में सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध एक याचिका प्रस्तुत की गयी लेकिन न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जब व्यास जैसे नेता यह कहते हैं कि भूलवश यात्रा बिलों पर हस्ताक्षर कर दिये गये तो हमें मान लेना चाहिये।

    टंडन की जीत से पटेल का शास्त्री पर से भरोसा उठ गया। उन्होंने शास्त्री को उनके पद से हटाने का निर्णय लिया पर इस निर्णय पर कोई कार्यवाही हो पाती इससे पहले ही 15 दिसम्बर 1950 को सरदार पटेल का देहांत हो गया। पटेल की मृत्यु के बाद हीरालाल शास्त्री जवाहरलाल नेहरू से मिले और उन्हें कहा कि मेरे द्वारा कृपलानी को समर्थन दिये जाने के कारण पटेल ने मुझे हटाने का निर्णय लिया था। अतः इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिये। नेहरू शास्त्री की बात से प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने शास्त्री को सलाह दी कि राज्य में उनका बहुमत नहीं है अतः वे त्यागपत्र दे दें साथ ही नेहरू ने रियासती सचिवालय को शास्त्री मंत्रिमंडल का इस्तीफा लेने के लिये कह दिया। नेहरू के कहने के उपरांत शास्त्री ने त्यागपत्र नहीं दिया। एक ज्योतिषी की सलाह पर शास्त्री भूमिगत हो गये। खोज के बाद पता चला कि वे इंदौर में हैं। उनसे कहा गया कि वे अविलंब त्यागपत्र दें अन्यथा उन्हें अपदस्थ कर दिया जायेगा। अतः विवश होकर 3 जनवरी 1951 को शास्त्री ने राजप्रमुख को अपना त्यागपत्र दे दिया। इस प्रकार 21 माह तक अधरझूल में झूलती रही सरकार का बिना किसी उपलब्धि के पतन हो गया। शास्त्री सरकार आम जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति करने में असफल रही।

    वित्तीय समस्याएं

    राजाओं तथा उनके उत्तराधिकारियों के प्रिवीपर्स

    एकीकरण के समझौते में यह कहा गया राजा लोग अपनी निजी सम्पत्ति रख सकेंगे, उनकी गद्दी का उत्तराधिकार बना रहेगा, उनके अधिकार और विशेषाधिकार बने रहेंगे तथा उन्हें व उनके उत्तराधिकारियों को एक निश्चित प्रिवीपर्स मिलती रहेगी। राजाओं की प्रिवीपर्स निश्चित करने और उनकी निजी सम्पत्ति को रियासत से स्पष्टतः अलग करने के लिये आवश्यक कदम उठाये गये। निजी सम्पत्ति का निपटारा करते समय यह सिद्धांत अपनाया गया कि राजा द्वारा तैयार की गयी निजी संपत्ति की सूची पर वह, राजप्रमुख (संघ में मिलने वाली वाली रियासतों के लिये) अथवा प्रांतीय सरकार का एक प्रतिनिधि (प्रांतों में मिलने वाली रियासतों के लिये) और रियासती मंत्रालय का एक प्रतिनिधि मिलकर विचार करें। सार्वजनिक हितों का पूर्ण ध्यान रखते हुए मेल की भावना से समझौता किया जाये।

    शासनाधिकार छोड़ने के एवज में राजाओं को राज्य की औसत वार्षिक आय के प्रथम एक लाख का पंद्रह प्रतिशत, बाद के चार लाख का दस प्रतिशत और पाँच लाख से ऊपर साढ़े सात प्रतिशत प्रिवीपर्स निश्चित किया गया किंतु यह राशि दस लाख रुपये वार्षिक से अधिक नहीं हो सकती थी। कुछ बड़ी और अलग रहने वाली रियासतें इसका अपवाद थीं। उनका प्रिवीपर्स 10 लाख से अधिक स्वीकृत किया गया था और वह भी समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले शासक के जीवन काल तक ही था। उसके उत्तराधिकारी को प्रिवीपर्स कम करके 10 लाख रुपया वार्षिक दिया जाना था। वृहत राजस्थान के निर्माण के समय लोकप्रिय नेताओं द्वारा यह सुझाव दिया गया था कि जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर रियासतें इंदौर रियासत के लगभग बराबर ही हैं जिसके (इंदौर के) महाराजा को पन्द्रह लाख रुपये का प्रिवीपर्स दिया गया है तथा उपराज्य प्रमुख के भत्ते के रूप में ढाई लाख रुपये दिये गये हैं। अतः जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर के राजाओं को साढ़े सतरह लाख रुपये का वार्षिक प्रिवीपर्स निश्चित कर दिया जाये। यह भी सुझाव दिया गया कि जयपुर के महाराजा को राजप्रमुख के नाते साढ़े पाँच लाख रुपये दिये जायें। अंत में बीकानेर नरेश को सत्रह लाख, जोधपुर नरेश को साढ़े सत्रह लाख तथा जयपुर नरेश को अठारह लाख रुपये का प्रिवीपर्स दिया जाना निश्चित किया गया। राजप्रमुख को साढ़े पाँच लाख रुपये का वार्षिक भत्ता दिया जाना निश्चित किया गया।

    बीकानेर के महाराजा सादूलसिंह ने रियासती विभाग से मांग की कि चूंकि उन्होंने वृहद राजस्थान में अपनी रियासत का विलय 7 अप्रेल 1949 को किया है। इसलिये 1 अप्रेल से 6 अप्रेल 1949 तक कुल 6 दिन की अविध के लिये उन्हें बीकानेर अधिनियम 1947 के अनुसार ही प्रिवीपर्स का भुगतान किया जाये। रियासत विभाग ने महाराजा की यह मांग मान ली। 25 सितम्बर 1950 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह की मृत्यु होने पर उनके उत्तराधिकारी करणीसिंह को 10 लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स स्वीकार किया गया। अन्य रियासतों के शासकों की मृत्यु होने पर प्रिवीपर्स के मामले में यही सिद्धांत अपनाया गया केवल हैदराबाद के निजाम की मृत्यु होने पर उसके पोते को 20 लाख रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स स्वीकृत किया गया।

    कुशलगढ़ के शासक ने राजस्थान के राजप्रमुख को पत्र लिखकर मांग की कि मुझे जो प्रिवीपर्स स्वीकृत किया गया है उसमें बच्चों की पढ़ाई का व्यय उठाना संभव नहीं है। अतः उनके लिये अलग से भत्ता दिया जाये। कुशलगढ़ के शासक ने एक अन्य पत्र के माध्यम से राजप्रमुख से अनुरोध किया कि मेरी दो बुआऐं अविवाहित हैं जिनके विवाह के लिये पर्याप्त धन राशि राज्यकोष से प्रदान की जाये।

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व कई रियासतों में वित्तीय वर्ष अलग-अलग माह से आरंभ होते थे । जबकि संघ इकाईयों द्वारा निर्धारित कलैण्डर के अनुसार वित्तीय वर्ष का निर्धारण 1 अप्रेल से 31 मार्च तक किया गया था। इस कारण कुछ रियासतों के शासकों ने अपनी रियासत के शासनाधिकार संघ इकाई को सौंपने से पहले ही राज्य कोष से प्रिवीपर्स की राशि उठा ली और जब संघ इकाई अस्तित्व में आयीं तो उन्होंने नये कलैण्डर के अनुसार दुबारा प्रिवीपर्स की मांग की। ग्वालियर रियासत के महाराजा द्वारा यही किया गया। इस पर रियासती विभाग ने कड़ी आपत्ति की तथा इसे वित्तीय अनियमितता माना। ग्वालियर राज्य में वित्तीय वर्ष 1 अक्टूबर से आरंभ होता था जबकि मध्यभारत संघ इकाई का वित्तीय वर्ष 1 जुलाई से आरंभ होता था। रियासती विभाग द्वारा समस्त संघ इकाईयों को यही नीति अपनाने के निर्देश जारी किये गये।

    प्रतापगढ़ रियासत के शासक द्वारा वित्तीय वर्ष 1947-48 में स्वीकृत बजट से 68,816 रुपये अधिक व्यय कर दिये जाने पर तथा उसके अतिरिक्त राज्य कोष से 26,608 रुपये अधिक निकाल लिये जाने पर, राजस्थान संघ के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा ने प्रतापगढ़ शासक का प्रिवीपर्स बंद कर दिया। इस कार्यवाही को रियासती विभाग ने बड़ी गंभीरता से लिया। वी. पी. मेनन ने राजस्थान यूनियन के प्रधानमंत्री माणिक्यलाल वर्मा को पत्र लिखकर नाराजगी व्यक्त की कि इस तरह की कार्यवाही करने से पहले राजस्थान सरकार को रियासती विभाग से विचार विमर्श अवश्य करना चाहिये। रियासती विभाग ने राजस्थान यूनियन के प्रधानमंत्री को निर्देशित किया कि महारावत का प्रिवीपर्स निलंबित न किया जाये। इस पर माणिक्यलाल वर्मा ने उत्तर दिया कि महारावत का प्रिवीपर्स निलंबित नहीं किया गया है। महारावल ने राज्यकोष से 68,816 रुपये अधिक ले लिये हैं उनके समायोजन की कार्यवाही की जा रही है। यह पद्धति अन्य शासकों के मामले में भी अपनायी गयी है।

    शासकों की निजी सम्पत्तियों का निर्धारण

    3 जून 1948 को राजप्रमुख महाराणा भूपालसिंह, मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री व उप मुख्यमंत्री के बीच राजाओं की निजी सम्पत्तियों के निर्धारण के लिये वार्त्ता हुई। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि सम्बन्धित राज्य के भीतर मूलतः शासकों तथा शासकों के परिवारों के लिये निर्मित भवन, जो उनके द्वारा प्रयुक्त हैं, शासकों की निजी सम्पत्ति माने जाने चाहिये। जो भवन एक पर्याप्त अवधि में उनके द्वारा प्रयुक्त किये गये हैं वे भी शासकों की निजी सम्पत्ति माने जाने चाहिये। उक्त सिद्धांत के अनुसार शासक की निजी सम्पत्ति का निर्धारण करते समय राजा के द्वारा रखी जा रही कुल सम्पत्ति, राज्य के स्रोतों के अनुपात में होनी चाहिये। शासकों के अधिकार में आयी हुई भूमि का आकलन किया जाना चाहिये। शासकों से अनुरोध किया जाना चाहिये कि वे भू-राजस्व का भुगतान करें। शासकों को उतनी ही भूमि रखनी चाहिये जितना कि उनका स्तर है तथा जितनी उनकी निजी आवश्यकताएं हैं। कृषि भूमि के सम्बन्ध में मंत्रिपरिषद ने सलाह दी कि यह राजाओं की गरिमा के अनुकूल नहीं होगा कि वे काश्तकार बनें। शासकों को सहमति के आधार पर समुचित मूल्य चुकाकर उन आवासीय सम्पत्तियों को खरीदने का अधिकार होगा जिन्हें राज्य सम्पत्ति घोषित किया गया है। इन सिद्धांतों के अनुसरण में सरकार प्रत्येक सम्पत्ति के निरीक्षण के लिये एक अधिकारी नियुक्त करेगी, इस अधिकारी के साथ राजप्रमुख का प्रतिनिधि भी रहेगा। शासकों द्वारा राजप्रमुख को निजी सम्पत्ति की सूचियां उपलब्ध करवायी गयीं किंतु उन पर शीघ्र निर्णय नहीं किया जा सका जिससे राजाओं में बेचैनी बनी रही और शासक रियासती विभाग को बार-बार पत्र लिखकर इन सूचियों को अंतिम रूप देने का निवेदन करते रहे।

    शासकों की निजी सम्पत्तियों को नुक्सान पहुँचाये जाने की समस्या

    बांसवाड़ा के महारावल ने मांग की कि शासकों की व्यक्तिगत सम्पत्ति की जो सूचियां सरकार को उपलब्ध करवायी गयी थी उनके सम्बन्ध में शीघ्र निर्णय लिया जाये। जो आदिवासी लोग जंगलों को काटते हैं, वे राजाओं की निजी सम्पत्ति में आने वाले जंगलों को भी काट रहे हैं तथा उनके बीच में स्थित भवनों में तोड़-फोड़ कर रहे हैं एवं कृषि क्षेत्र को हानि पहुंचा रहे हैं। जब तक निजी सम्पत्तियों का निर्धारण न हो जाये तब तक राजाओं द्वारा इन सम्पत्तियों की रक्षा की जानी संभव नहीं है। अतः अनुरोध है कि इस ओर व्यक्तिगत ध्यान देकर इस प्रकरण का निस्तारण करें।

    रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन ने राजस्थान के राजप्रमुख महाराणा भूपालसिंह को पत्र लिख कर अनुरोध किया कि राजाओं ने निजी सम्पत्तियों की जो सूचियां भेजी थीं, उनके सम्बन्ध में समस्त शासकों को समुचित उत्तर दे दिये गये हैं। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान के उद्घाटन के समय यह निश्चित किया गया था कि राजाओं की निजी सम्पत्तियों के सम्बन्ध में निर्णय शीघ्र लिया जायेगा। महाराणा इस सम्बन्ध में अपने स्तर पर शीघ्र निर्णय लें तथा इस सम्बन्ध में उठाये गये कदमों की जानकारी बांसवाड़ा के शासक को भी दें ताकि वे सुनिश्चित हो सकें कि इस मामले की उपेक्षा नहीं की जा रही है। अप्रेल 1949 के अंतिम सप्ताह में माउंट आबू मे पूर्वं रियासतों के शासकों तथा संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख के बीच एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें समस्त शासकों की निजी सम्पत्तियों का निर्धारण किया गया तथा अधिकांश मामलों में शासकों द्वारा प्रस्तुत सूचियों में वर्णित सम्पत्तियों को ही उनकी निजी सम्पत्ति मान लिया गया।

    शासकों के निजी भवनों के रख-रखाव की समस्या

    शासकों के जिन आवासीय महलों एवं भवनों को भारत सरकार द्वारा शासकों की निजी सम्पत्ति मान लिया गया था उनके रख रखाव, बिजली, पानी आदि के व्यय के पुनर्भरण के लिये कई शासकों द्वारा राज्य सरकार से मांग की गयी। महाराजा जयपुर ने मांग की कि उनके दिल्ली स्थित जयपुर भवन तथा उसमें स्थित साजोसामान, पशुधन एवं आदमी की आवश्यकता महाराजा को उत्सवों के दौरान होती है, उनका रख रखाव राजस्थान सरकार के द्वारा किया जाये। इस पर ने महाराजा को लिखा कि दिल्ली स्थित जयपुर हाउस के बारे में आपके साथ हुए विचार-विमर्श के दौरान आम सहमति से यह निर्णय लिया गया था कि इस भवन की यथा पूर्व स्थिति बनाये रखी जाये। महाराजा के व्यक्तिगत सामान की जो सूची महाराजा द्वारा सरकार को उपलब्ध करवायी गयी थी, वह महाराजा की व्यक्तिगत सम्पत्ति मानी जायेगी। इसलिये हम यह नहीं सोचते कि राजस्थान सरकार को यह उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है कि वह महाराजा के समारोहों में प्रयुक्त होने वाले पशुधन तथा आदमियों का रखरखाव करे। राजस्थान सरकार को केवल यह अनुमति देने के लिये तैयार रहना चाहिये कि वह परिस्थितियों के अनुसार, अपने उपलब्ध स्रोतों को महाराजा के समारोहों में प्रयुक्त होने दे। कई भवन जनानी ड्यौढ़ी के निस्तारण पर छोड़े गये हैं। उन भवनों का प्रयोग इनमें रहने वाले लोगों के द्वारा अपने जीवन काल में और किसी उद्देश्य के लिये नहीं किया जाना चाहिये। महाराजा साहब इस बात से सहमत होंगे कि राजस्थान सरकार को इन भवनों के रखरखाव और मरम्मत का व्यय वहन करने के लिये नहीं कहा जाना चाहिये।

    झालावाड़ के महाराजराणा ने अपने महलों के बिजली व्यय के पुनर्भरण की मांग की तो रियासती विभाग ने महाराजराणा को लिखा कि जिन महलों/भवनों को राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है उनके विद्युत व्यय एवं विद्युत संस्थापन आदि का व्यय राजाओं के प्रिवीपर्स में से किया जाये न कि राज्य व्यय से।

    सरदारों तथा राजमाताओं के भत्तों के भुगतान की समस्या

    संयुक्त राजस्थान सरकार ने नवम्बर 1948 में कुछ शासकों के सम्बन्धियों को निश्चित भत्ते देने का निर्णय लिया था। इस निर्णय के क्रियान्वयन पर पूर्व शासकों तथा राजस्थान सरकार के मध्य कई बार तनाव की स्थितियां बनीं। राजमाताओं के भत्तों तथा राजपरिवारों के अन्य सदस्यों के भत्तों के निर्धारण के लिये 17 सितम्बर 1948 को रियासती विभाग द्वारा नयी दिल्ली में एक बैठक आयोजित की गयी। इस बैठक में समस्त संघ इकाईयों के सलाहकार उपस्थित थे। बैठक में निश्चित किया गया कि राजमाताओं को निर्वहन भत्ते दिये जाने के लिये राज्य सरकार वचनबद्ध है। राजमाताओं को निर्वहन भत्ते की राशि के निर्धारण के सम्बन्ध में सामान्य सिद्धांत यह रहेगा कि शासकों ने अपने शासनाधिकार राजस्थान सरकार को सौंपने से पहले राजमाताओं को जो भत्ते स्वीकृत कर रखे थे, वे उन्हें उनके जीवन काल के लिये जारी रखे जायें। अन्य भत्तों का निर्धारण पूरी जांच के बाद किया जाये। टोंक तथा किशनगढ़ आदि कुछ रियासतों ने राजस्थान में अपने विलय से ठीक पहले ही राजमाताओं (शासक की माता अथवा दादी) को जागीरें प्रदान कीं ताकि राजमाताओं को अधिक से अधिक भत्ते प्राप्त हो सकें। जब इनकी शिकायत रियासती विभाग को की गयी तो रियासती विभाग ने इन प्रकरणों की जांच करवाने के आदेश जारी किये।

    टोंक रियासत की राजमाताओं को भुगतान में विलम्ब

    टोंक रियासत में सरदारों तथा राजमाताओं को बख्शीगिरि कार्यालय के माध्यम से प्रतिमाह भत्तों का भुगतान किया जाता था। जब टोंक में कलक्टर मुख्यालय स्थापित कर दिया गया तो यह कार्य कलक्टर को दे दिया गया। बख्शीगिरि कार्यालय के जो कर्मचारी इस कार्य को करते थे उनका स्थान नये कर्मचारियों ने ले लिया। इससे भुगतान में विलम्ब होने लगा। टोंक जिला मुख्यालय पर उपकोषालय बनाये जाने से वहाँ कम राशि रखी जाती थी जो सरदारों तथा राजमाताओं को भत्तों का भुगतान करने के लिये अपर्याप्त थी। इससे टोंक कलक्टर द्वारा सरदारों तथा राजमाताओं को समय पर भुगतान नहीं किया जा सका। यूनाईटेड स्टेट ऑफ राजस्थान सरकार ने व्यवस्था की कि इन भत्तों का भुगतान महालेखाकार द्वारा जारी चैक के माध्यम से हो। इस व्यवस्था पर पूर्व टोंक रियासत के नवाब के मिनिस्टर इन वेटिंग ने यूनाईटेड स्टेट ऑफ राजस्थान के मुख्य सचिव तथा वित्त सचिव को कड़ा पत्र लिखकर रोष व्यक्त किया कि यह जानबूझ कर तंग किये जाने का मामला है। अतः टोंक जिला मुख्यालय पर जिला कोषालय स्थापित किया जाये तथा बख्शीगिरि कार्यालय के उन्हीं कर्मचारियों को कलक्टर कार्यालय में इस कार्य पर नियुक्त किया जाये जो कर्मचारी इस कार्य को वर्षों से करते रहे हैं।

    3 अक्टूबर 1948 को रियासती विभाग ने एक पत्र जारी कर समस्त प्रांतों के मुख्य सचिवों को निर्देशित किया कि कई पूर्व रियासतों की राजमाताओं से शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि उन्हें भत्तों का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। इस सम्बन्ध में समस्त शंकाओं का निवारण 17 सितम्बर 1948 को दिल्ली में आयोजित बैठक में किया जा चुका है जिसमें समस्त प्रांतों के सलाहकार उपस्थित थे। अतः शासकों तथा राजमाताओं को इस सम्बन्ध में सूचना भिजवायी जाये कि इस विषय पर कार्यवाही की जा रही है। ताकि उन्हें यह न लगे कि इस विषय की उपेक्षा की जा रही है।

    विभिन्न संघ इकाईयों में सम्मिलित पूर्व रियासतों के शासकों ने रियासती विभाग को सूचित किया कि जिन राजमाताओं को पूर्व में राज्यकोष से भत्ते मिलते रहे थे, उनके बंद हो जाने के कारण शासकों द्वारा अपने प्रिवीपर्स में से भुगतान किया जा रहा है। यह भुगतान अधिक समय तक नहीं किया जा सकता। इसलिये राजपरिवारों के सदस्यों, विशेषतः राजमाताओं को भत्तों का भुगतान अलग से किया जाये। इस पर रियासती विभाग ने निर्णय लिया कि राजाओं की यह मांग सही है कि जिन सदस्यों को पहले से ही अलग से भत्ते मिल रहे थे, उन्हें राज्य के राजस्व से भत्तों का भुगतान किया जाना चाहिये न कि शासकों के प्रिवीपर्स से। शासक के प्रिवीपर्स में केवल शासक के बच्चे व पत्नियां ही सम्मिलित की गयी हैं। ये भत्ते जीवन भर के लिये दिये जाने चाहिये।

    जयपुर महाराजा द्वारा स्वर्ण के लिये झगड़ा

    जयपुर महाराजा ने राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ स्वर्ण पर अपना दावा किया जिसका मूल्य एक करोड़ रुपये था। मुख्यमंत्री ने उसे राज्य का बताते हुए देने से मना कर दिया। बात सरदार पटेल तक गयी। सरदार पटेल ने मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री से पूछा कि सोना किसका है? इस पर शास्त्री ने जवाब दिया कि सोना पहले तो राजा का ही रहा होगा, पर बाद में राज्य के बजट में दर्ज हो गया। अतः अब राज्य का मानना पड़ेगा। सरदार ने पूछा कि आपकी राय क्या है? शास्त्री ने कहा कि मेरी राय में सोना महाराजा को दे देना चाहिये। सरदार बोले क्यों? शास्त्री ने कहा इतना बड़ा राज्य किसी का आपने ले लिया है सा इतना सा सोना उसे दे देने में क्या संकोच करना चाहिये। सरदार ने सोना महाराजा को देने की अनुमति दे दी।

    जैसलमेर महारावल द्वारा 1,06,900 रुपये के पुनर्भुगतान की मांग

    जैसलमेर के महारावल ने वर्ष 1927-28 में अपने निजी धन से 1 लाख 10 हजार रुपये राज्य कोष में जमा करवाये। यह राशि एक विद्यालय एवं एक पुस्तकालय भवन बनाने के लिये दी गयी थी। इसी प्रकार महारावल द्वारा एक अस्पताल बनाने के लिये भी 40 हजार रुपये दिये गये। जैसलमेर रियासत के वृहद राजस्थान में सम्मिलित हो जाने के बाद महारावल ने रियासती विभाग को एक पत्र लिखकर मांग की कि विद्यालय भवन तथा चिकित्सालय भवन का उपयोग उन्हीं कार्यों के लिये हो रहा है जिन कार्यों के लिये महारावल ने धन दिया था किंतु चूंकि पुस्तकालय भवन का उपयोग महकमा खास के कार्यालयों के लिये हो रहा है इसलिये महारावल द्वारा इस भवन को बनाने के लिये दी गयी राशि, ब्याज सहित (कुल 1,06,900 रुपये) फिर से महाराजा को लौटा दिये जाने चाहिये।

    राजस्थान के रीजनल कमिश्नर वी. के. बी. पिल्लई ने रियासती विभाग से अनुशंसा की कि शासकों की निजी सम्पत्ति के निर्धारण के लिये माउण्ट आबू में जो बैठक हुई थी उसके आधार पर यह समझ लिया गया था कि शासक द्वारा कोई अन्य दावा नहीं किया जायेगा। यह उस समय का प्रकरण है जब शासक के प्रिवीपर्स तथा रियासत के राजस्व का कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था। न ही यह प्रावधान किया गया था कि यदि इस भवन का उपयोग पुस्तकालय के रूप में नहीं किया गया तो यह राशि महारावल को पुनः लौटायी जायेगी। केवल इस आधार पर इस दावे का भुगतान नहीं किया जा सकता क्योंकि पुस्तकालय के लिये निर्मित भवन का उपयोग पुस्तकालय के लिये नहीं किया गया। यदि इस तरह के दावों को स्वीकार कर लिया गया तो रियासती विभाग में शासकों की ओर से धन राशि की मांग के दावों की बाढ़ आ जायेगी। जैसलमेर के शासक को राज्य के राजस्व से निर्मित कई भवन दिये गये हैं। उसे राज्य कोष से 14 लाख रुपये भी दिये गये हैं। अतः महाराजा का यह दावा निरस्त किये जाने के योग्य है। रीजनल कमिश्नर की अनुशंसा पर रियासती विभाग ने महारावल के दावे को अस्वीकार कर दिया।

    झालावाड़ शासक द्वारा बिजलीघर पर दावा

    राजस्थान में सम्मिलित हो जाने के बाद झालावाड़ के शासक द्वारा दावा किया गया कि महल परिसर में विद्युत आपूर्ति के बिलों का भुगतान नहीं किया जायेगा क्योंकि महल परिसर में स्थित बिजलीघर शासक की स्वयं की निजी सम्पत्ति है। साथ ही राजस्थान सरकार द्वारा इस महल के बिजलीघर में स्थित पुरानी मशीनों की नीलामी भी नहीं की जा सकती क्योंकि यह महाराजा की निजी सम्पत्ति में आती हैं। शासक ने दावा किया कि राजस्थान में सम्मिलन के प्रसंविदा समझौते में यह प्रावधान किया गया था कि शासकों द्वारा 15 अगस्त 1947 से पूर्व उठाई जा रही सुविधाओं को बने रहने दिया जायेगा, चाहे वे प्रादेशिक सीमाओं से बाहर की प्रकृति की हों अथवा स्थानीय प्रकृति की। निशुल्क विद्युत आपूर्ति प्राप्त करना शासकों की स्थानीय प्रकृति की सुविधाओं में आता है। राज्य में इस बिजलीघर की स्थापना पहले बिजलीघर के रूप में हुई थी तथा शासक द्वारा इस बिजलीघर की सुविधा का उपयोग तब से किया जाता रहा है। झालावाड़ राज्य में दो बिजलीघर हैं। पहला बिजलीघर पृथ्वीविलास पैलेस में है जिससे शासक के महल को विद्युत आपूर्ति होती है तथा दूसरा बिजलघर शहर की विद्युत आपूर्ति के काम आता है। जब राजस्थान का निर्माण हुआ तब शासक ने यह बिजलीघर राजस्थान सरकार को समर्पित कर दिया क्योंकि उसे विश्वास था कि राजस्थान सरकार द्वारा शासकों की उन सुविधाओं को जारी रखा जायेगा जिन सुविधाओं का उपभोग शासक करते आये हैं। अब शासक को ज्ञात हुआ है कि राजस्थान सरकार बिजली आपूर्ति जैसी सुविधाओं को जारी नहीं रखेगी। अतः रियासती विभाग राजस्थान सरकार को निर्देश दे कि वह बिजलीघर शासक को वापस लौटा दे तथा वह इस बिजलीघर के पुराने प्लाण्ट को नीलाम न करे। इस पर रियासती विभाग ने राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को सूचित किया कि इस प्रकरण को तब तक लम्बित रखा जाये तथा इस पर कोई कार्यवाही न की जाये जब तक कि स्वयं वी. पी. मेनन राजस्थान की यात्रा के दौरान इस प्रकरण का निस्तारण न कर दें।

    टोंक रियासत की सम्पत्ति को नीलाम किये जाने का मामला

    टोंक कलक्टर ने पूर्व टोंक रियासत की कुछ सम्पत्ति जिसमें घोड़े, बग्घियां, कार, अस्तबल आदि सम्मिलित थे, को सरकारी सम्पत्ति मानकर नीलाम करने का निर्णय लिया। इस पर टोंक नवाब ने रीजनल कमिश्नर आबू को तार भेज कर अनुरोध किया कि जब तक टोंक नवाब की निजी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय न हो जाये तब तक उक्त नीलामी रोकी जाये। टोंक कलक्टर ने पूर्व रियासत के बंगला संख्या 1,2,3 एवं 4 के फर्नीचर, क्रॉकरी तथा कटलरी आदि को हटा लिया। टोंक नवाब ने इस पर भी आपत्ति की। इस पर मुख्य सचिव ने टोंक कलक्टर को आदेश दिये कि इन वस्तुओं को इन बंगलों से न हटाया जाये। राजस्थान सरकार ने उक्त नीलामी को रोक दिया।

    शासकों द्वारा सरकार को समर्पित भूमि पर कृषि किये जाने की समस्या

    राजस्थान सरकार तथा शासकों के मध्य हुए समझौते की शर्तों के अनुसार शासकों के निजी अधिकार में चल रही जो भूमि रियासत की सम्पत्ति मानी जाये वह भूमि राज्य सरकार को समर्पित की जानी थी किंतु कई शासकों ने अच्छी एवं उपजाऊ भूमि पर काश्त करने के अपने अधिकार को छोड़ना नहीं चाहा था। इसलिये यह तय किया गया था कि सहमति के आधार पर उचित मूल्य चुकाकर शासक उस भूमि पर काश्त कर सकते हैं। डूंगरपुर महारावल के अधिकार में माही नदी के बीच में स्थित एक टापू पर ऐसी ही भूमि थी जो बेंका (सोहन बीड) के नाम से जानी जाती थी। यह एक विशाल भूमि थी जिसमें सिंचाई के लिये माही नदी का जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। महारावल ने रियासती विभाग को पत्र लिखकर यह भूमि महारावल को ही काश्त के लिये दिये जाने की मांग की। रियासती विभाग ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सिफारिश की कि उक्त भूमि समुचित आकलन के आधार पर महारावल को काश्त के लिये दे दी जाये।

    राजाओं द्वारा जारी वित्तीय आदेशों की मान्यता की समस्या

    रियासती विभाग ने 11 फरवरी 1949 को जयपुर, जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर के प्रधानमंत्रियों तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री माणिक्यलाल वर्मा को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि चूंकि वृहद राजस्थान के निर्माण का कार्य चल रहा है इसलिये इसमें सम्मिलित होने वाली किसी भी इकाई द्वारा न तो नीति निर्धारण के सम्बन्ध में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये जायें और न ही कोई नवीन संविधान लागू किये जायें। इन इकाईयों को कोई भी नवीन वित्तीय प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं करनी चाहिये। विविध विषयों पर नयी सरकार द्वारा ही नीति सम्बन्धी निर्णय लिये जायेंगे। इस आदेश की अवहेलना करके कुछ शासकों द्वारा प्रशासनिक आदेश जारी किये गये किंतु राजस्थान सरकार ने उन आदेशों को मान्यता देने से मना कर दिया। इस सम्बन्ध में रियासती मंत्रालय ने निर्णय दिया कि केवल वही आदेश मान्य होंगे जो कि महाराजा द्वारा अपने प्रधानमंत्री की सहमति से जारी किये गये होंगे। ऐसा एक प्रकरण बीकानेर के मामले में हुआ। महाराजा सादुलसिंह ने 6 अप्रेल 1949 को आदेश जारी किया कि राजवियों के घर निर्माण के लिये राज्य की ओर से 80 हजार रुपये दिये जायेंगे। राजस्थान सरकार ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। महाराजा ने इसकी शिकायत रियासती मंत्रालय को की। इस पर रियासती मंत्रालय ने बीकानेर राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री आई.सी. एस. अधिकारी वेंकटाचार से पूछा किंतु वेंकटाचार ने इस निर्णय को अपनी सहमति से होना नहीं बताया। इस पर रियासती मंत्रालय ने महाराजा को सूचित किया कि उनके इस आदेश को नहीं माना जा सकता। इसलिये राजस्थान सरकार राजवियों को 80 हजार रुपये नहीं देगी।


    शासकों द्वारा की गयी वित्तीय अनियमितताओं की समस्या

    कुछ शासकों द्वारा अपनी रियासतों के राज्य इकाईयों में विलय से पूर्व कुछ वित्तीय अनियमिततायें की गयीं। प्रसंविदा समझौते की शर्तों के अनुसार शासकों द्वारा अपनी रियासतों के प्रशासन के हस्तांतरण से पूर्व अपने विवेकाधिकार के तहत किये गये कार्यों के लिये उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकती थी। जब कुछ शासकों द्वारा जानबूझ कर की गयी वित्तीय अनियमितताएं सामने आयीं तो रियासती विभाग ने स्पष्टीकरण दिया कि यह प्रावधान शासकों द्वारा निष्ठापूर्वक की गयी कार्यवाही के सम्बन्ध में था न कि जानबूझ कर की गयी अनियमितता के सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही के सम्बन्ध में। ऐसे प्रकरणों की जांच की जाये तथा उनके निष्कर्षों से रियासती विभाग को सूचित किया जाये।

    इस प्रकार वृहत् राजस्थान के गठन के समय एवं उसके बाद उभर कर आई विभिन्न समस्याओं को प्रांतीय नेताओं द्वारा राष्ट्रीय नेताओं के सहयोग से सुलझा लिया गया। पूर्व रियासतों के शासकों की समस्याओं को सहानुभूति पूर्वक किंतु दृढ़ता के साथ निबटाया गया। सेनाओं के एकीकरण, विभिन्न रियासतों के कर्मचारियों की सेवाओं के एकीकरण तथा नेतृत्व सम्बन्धी विवादों के कारण काफी कटुता का वातावरण बना किंतु समय के साथ वे समस्याएं भी दूर हो गयीं।


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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 54

     28.12.2019
    कैसे बना था पाकिस्तान - 54

    ये कैसा पाकिस्तान!


    नोबेल विजेताओं के लिए जगह नहीं

    पाकिस्तान निर्माण के बाद से लेकर यह पुस्तक लिखे जाने तक अर्थात् ई.1947 से 2019 तक पाकिस्तान में केवल दो पाकिस्तानी नागरिकों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं। पहले हैं- भौतिकी के वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस सलाम और दूसरी हैं स्वात क्षेत्र के मिंगोरा शहर की रहने वाली मलाला युसुफ़ज़ई। डॉक्टर अब्दुस सलाम अहमदिया मुसलमान हैं। इस कारण पाकिस्तान उन्हें अपना नागरिक ही स्वीकार नहीं करता जबकि मलाला युसुफ़ज़ई को तालिबानी आतंकी मार डालना चाहते हैं।


    ओसामा बिन लादेन को शरण

    पाकिस्तान आतंकियों के शरणस्थली के तौर पर बदनाम हो चुका है। उसने अमीरका पर नौ ग्यारह का आतंकवादी हमला करने के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को एबोटाबाद में शरण दी और जब पाकिस्तान पर ओसामा को शरण देने के आरोप लगे तो पाकिस्तान ने आसोमा बिन लादेन के पाकिस्तान में होने से इन्कार कर दिया। 2 मई 2011 की रात्रि में अमरीकी वायुसेना ने अचानक पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार डाला तथा उसका शव समुद्र में अज्ञात स्थान पर लेजाकर गाढ़ दिया। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में दरार आ गई और अमेरिका की जगह चीन ने ले ली।


    मेमोगेट प्रकरण से पाकिस्तान की बदनामी

    ओसामा बिन लादेन के मारे जाते ही पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी नेताओं के बीच अविश्वास बढ़ गया जिसकी पुष्टि मेमोगेट प्रकरण से हुई। अमेरिका द्वारा ओसामा बिन लादेन को मार गिराए जाने के बाद राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को पाकिस्तान में सैन्य-तख्ता-पलट का डर सताने लगा। जरदारी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा से अनुरोध किया कि वे पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी को ऐसी किसी भी कार्यवाही करने से रोकें। इस प्रकरण के उजागर होने के बाद अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी को इस्तीफा देना पड़ा।


    प्रधानमंत्री गिलानी बेईमान घोषित

    पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी एवं प्रधानमंत्री सयैद यूसुफ रजा गिलानी सहित सहित अनेक पाकिस्तानी नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों पर पाकिस्तान के न्यायालयों में भ्रष्टाचार के मामले लम्बित थे। वर्ष 2011 में पाकिस्तान सरकार ने नेशनल रिकॉन्सिलिएशन ऑर्डिनेंस (एनआरओ) लागू करके भ्रष्टाचार के लगभग आठ हजार मामलों को समाप्त कर दिया। इस पर पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) को आदेश दिया कि भ्रष्टाचार के इन प्रकरणों को दुबारा खोला जाए। सर्वोच्च न्यायालय के पांच सदस्यों की बेंच ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि गिलानी की ईमानदारी संदेहास्पद है और उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ की मर्यादा नहीं रखी।

    कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद पाकिस्तान की सेना एवं आईएसआई ने गिलानी और जरदारी पर दबाव बनाना आरम्भ किया। पाकिस्तानी सेना के प्रमुख अशफाक परवेज कयानी ने सरकार को चेतावनी दी कि मेमोगेट प्रकरण पर प्रधानमंत्री द्वारा उनके और आईएसआई प्रमुख के खिलाफ की गई गंभीर टिप्पणी देश के लिए बेहद गंभीर है। सरकार ने सेना प्रमुख के करीबी समझे जाने वाले रक्षा सचिव लेफ्टिनेंट जनरल खालिद नईम लोधी को बर्खास्त कर दिया। 26 अप्रेल 2012 को पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री गिलानी को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को फिर से खोलने के लिए स्विस अधिकारियों को पत्र लिखने के आदेश का पालन न करने के कारण अवमानना का दोषी करार दिया। 19 जून 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। पाकिस्तान की इमरान खाँ सरकार ने गिलानी पर देश से बाहर जाने से रोक लगा दी है।


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