Blogs Home / Blogs / /
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 48

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 48

    पूर्वी-पाकिस्तान में धर्म के नाम पर हिन्दुओं की और भाषा के नाम पर मुसलमानों की हत्या


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1947 में जिस समय उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से लेकर पंजाब एवं सिन्ध तक के भू-भाग में मारकाट मची, उस समय भारत की पूर्वी सीमा अर्थात् बंगाल अपेक्षाकृत शांत रहा था। बहुत से इतिहासकार इस शांति का श्रेय गांधीजी को देते हैं किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बंगाल ई.1946 के उत्तरार्ध में सीधी कार्यवाही एवं उसके बाद हुए रक्तपात में खून की होली खेलकर निबटा ही था इसलिए बंगाल के हिन्दू और मुसलमान 1947 के विभाजन के समय एक-दूसरे के विरुद्ध हथियार उठाने की स्थिति में नहीं आ पाए थे और जिन्हें पश्चिमी बंगाल से पूर्वी-पाकिस्तान में जाना था या पूर्वी-पाकिस्तान से पश्चिमी बंागल में आना था, सामान्यतः बिना रक्तपात करे हुए आ गए किंतु जैसे ही एक-दो वर्ष का समय व्यतीत हुआ, पूर्वी-पाकिस्तान में असंतोष एवं हिंसा की लहर फूट पड़ी।

    जहाँ विभाजन के समय पंजाब एवं सिंध में धर्म के आधार पर भगदड़ एवं मारकाट मची थी, वहीं बंगाल में मारकाट का आधार धर्म के साथ-साथ भाषाई भी था। इस कारण पूर्वी-पाकिस्तान में रह रहे बिहारी मुसलमानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी। जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो वे भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तान के उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भाग कर आए थे। इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई। बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। पूरा पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।


    श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बांग्लादेश से भूमि की मांग

    8 अप्रेल 1950 को शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। इसे दिल्ली समझौता भी कहते हैं। इस समझौते के अनुसार दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अल्पसंख्यकों की रक्षा करने एवं साम्प्रदायिक उपद्रवों को रोकने की जिम्मेदारी ली। दोनों ने ऐसा वातातरण तैयार करने की जिम्मेदारी भी ली जिससे अल्पसंख्यकों को अपना देश छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़े। इसी के साथ उन्होंने विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की भी जिम्मेदारी ली। भारत के पुनर्वास मंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मांग की कि या तो बंगाल के विभाजन को अस्वीकार कर दिया जाए या पाकिस्तान से विस्थापितों को बसाने हेतु अतिरिक्त भूमि मांगी जाए। भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पुनर्वास एवं आपूर्तिमंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रस्तावों को अव्यावहारिक बताया। इससे नाराज होकर 8 अप्रेल 1950 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा क्षितीश चन्द्र न्योगी ने नेहरू मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।


    बांग्लादेश से शरणार्थियों के जत्थे

    ई.1954 में पूर्वी-पाकिस्तान से पुनः बड़ी संख्या में हिन्दू विस्थापित होकर भारत आने लगे। वे आज तक भी आ रहे हैं। ई.1954 में औसतन प्रति माह 6,600 विस्थापित-हिन्दू भारत आए। ई.1955 में इस औसत में वृद्धि हुई तथा 13,500 विस्थापित प्रतिमाह भारत आने लगे। अगले वर्ष इनका औसत बढ़कर 20,003 प्रतिमाह से ऊपर हो गया। पूर्वी-पाकिस्तान से जनवरी 1956 में 19,206 हिन्दू तथा फरवरी 1956 में 43,534 हिन्दू भारत आए। ई.1956 के अंत तक कुल मिलाकर 3.2 लाख हिन्दू भारत आए। इस पर भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वक्तव्य दिया- 'यह समस्या काश्मीर समस्या भी अधिक भयंकर एवं जटिल है।'

    अप्रेल 1956 में भारत सरकार ने पूर्वी-पाकिस्तान से भारत आने के इच्छुक विस्थापितों के लिए पारगमन नियमों को कठोर बना दिया गया। इससे विस्थापितों के भारत आगमन की प्रक्रिया कुछ मंदी पड़ी किंतु वह लगातार जारी रही। भारत सरकार के पुनर्वास मंत्री एम. सी. खन्ना ने विस्थापितों के लगातार भारत आने के कारण बताते हुए कहा- 'इन लोगों को घर त्यागने के लिए बाध्य किया जाता है एवं इन्हें दैनिक जीवन में असुरक्षा तथा भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए ये लोग भारत आते हैं। वर्ष 1957 में 10,920 तथा 1958 में 4,898 हिन्दू भारत आए।' ई.1958 में अयूब खाँ द्वारा पाकिस्तान पर सैनिक शासन लादे जाने के बाद पूर्वी-बंगाल, पश्चिमी पाकिस्तान से आए सैनिकों की संगीनों के साए में जीने लगा।


    पश्चिमी-पाकिस्तान की सेना ने तीस लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया

    पाकिस्तान के निर्माण के साथ मुस्लिम लीग के नेतृत्व में जो सरकार अस्तित्व में आई उसमें पंजाबी तत्व का बाहुल्य था तथा सिंधी, पख्तूनी, बलोच एवं बंगाली तत्वों की उपेक्षा की गई थी। इस कारण पूरे देश में केन्द्र सरकार के विरुद्ध अंसतोष का वातावरण शुरू से ही बनने लगा। चूंकि पुरानी राजधानी कराची और नई राजधानी इस्लमाबाद दोनों ही पश्चिमी-पाकिस्तान में बनीं तथा पूर्वी-पाकिस्तान इन राजधानियों से 1600 किलोमीटर दूर था इसलिए शासन में सभी महत्वपूर्ण पद पंजाब के मुसलमानों द्वारा हथिया लिए गए थे। यद्यपि पूर्वी पाकिस्तान का निवासी सुहरावर्दी कुछ समय के लिए पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भी रहा तथापि पाकिस्तान की सत्ता में पूर्वी-पाकिस्तान की कोई आवाज नहीं थी। ई.1966 में पूर्वी-पाकिस्तान के अवामी लीग नामक राजनीतिक दल के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने राष्ट्रपति अयूब के सैनिक शासन का विरोध करते हुए पूर्वी-पाकिस्तान के नागरिकों के लिए स्वायत्त शासन के अधिकारों की मांग की। इस पर पाकिस्तान की सरकार शेख मुजीब-उर-रहमान की शत्रु हो गई।

    पाकिस्तान की सरकार ने ई.1968 में मुजीब-उर-रहमान पर पाकिस्तान सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र करने का आरोप लगाया जिसमें कहा गया कि मुजीब ने ई.1962 के भारत-चीन युद्ध में एवं ई.1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत के सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर पाकिस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र किया। अयूब खाँ के इन मिथ्या आरोपों के कारण पूरे पूर्वी-बंगाल में अयूब खाँ की सरकार के विरुद्ध घृणा फैल गई। पूर्वी पाकिस्तान में चल रही राजनीतिक गतिविधियों का असर पश्चिमी-पाकिस्तान के गैर-पंजाबी मुसलमानों पर पड़े बिना भी नहीं रहा।

    ई.1967 में अयूब खाँ की सरकार के विदेश मंत्री एवं सिन्धी नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने सरकार से त्याग-पत्र देकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी बनाई। इसी बीच पाकिस्तान के अन्य प्रांतों द्वारा भी स्वायत्तता की मांग की जाने लगी और अयूब खाँ के लिए देश का शासन चलाना असम्भव हो गया। 26 मार्च 1969 को जनरल मुहम्मद याह्या खाँ ने अयूब खाँ की सरकार का तख्ता पलट दिया तथा स्वयं राष्ट्रपति बन गया। इस प्रकार पाकिस्तान में एक सैनिक शासन हटकर दूसरा सैनिक शासन आ गया। 31 मार्च 1970 को पाकिस्तान का संविधान फिर से स्थगित कर दिया गया। याह्या खाँ ने एक लीगल फ्रेमवर्क ऑर्डर जारी करके देश में एक-सदन वाली संसदीय पद्धति ;न्दपबंउमतंस स्महपेसंजनतमद्ध के लिए चुनाव करवाने का निर्णय लिया जबकि सामान्यतः विश्व के समस्त लोकतांत्रिक देशों में दो सदन होते हैं जिन्हें लोकसभा एवं राज्यसभा अथवा कॉमन हाउस एवं अपर हाउस आदि कहा जाता है। याह्या खाँ ने आदेश जारी किए कि जनरल इलैक्शन्स के बाद ही देश का नया संविधान लिखा जाएगा।

    22 नवम्बर 1954 को पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान एवं नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटीयर प्रोविंसेज को मिलाकर 'इण्टिीग्रेटेड प्रोविंस ऑफ वेस्ट पाकिस्तान' का गठन किया गया था किंतु याह्या खाँ की सरकार ने 'इण्टिीग्रेटेड प्रोविंस ऑफ वेस्ट पाकिस्तान' का विघटन करके फिर से पुरानी वाली स्थिति बहाल कर दी। इस कारण पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान एवं नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटीयर प्रोविंसेज नामक प्रांत फिर से अस्तित्व में आ गए।

    7 दिसम्बर 1970 को नए विधिक नियमों के तहत पाकिस्तान में केन्द्रीय सरकार के गठन के लिए एकल सदन हेतु चुनाव करवाए गए। चुनावों से ठीक एक माह पहले पूर्वी-पाकिस्तान में 'भोला-चक्रवात' ने कहर बरपाया। यह संसार में अब तक आए चक्रवाती तूफानों में सर्वाधिक भयावह सिद्ध हुआ। इसमें 5 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। पाकिस्तान की याह्या खाँ सरकार ने चक्रवात से प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए कोई कदम नहीं उठाए। इससे पूर्वी-पाकिस्तान में पश्चिमी-पाकिस्तान के नेतृत्व में चल रही सरकार के विरुद्ध पहले से ही व्याप्त घृणा अपने चरम पर पहुंच गई। इस समय तक पूर्वी-पाकिस्तान की जनसंख्या पश्चिमी-पाकिस्तान से अधिक हो चुकी थी। क्योंकि पश्चिमी पाकिस्तान के लाखों हिन्दू या तो मार डाले गए थे, या फिर वे भारत भाग गए थे। यही हाल पश्चिमी पाकिस्तान में भारत से आए मुसलमानों का किया गया था। इसलिए इन चुनावों में पूर्वी-पाकिस्तान की शेख मुजीबुररहमान की पार्टी अवामी लीग को अभूतपूर्व विजय प्राप्त हुई। केन्द्रीय सदन अर्थात् नेशनल एसेम्बली में कुल 313 सीटों का प्रावधान किया गया था जिनमें से 169 सीटों पर पूर्वी-पाकिस्तान के नेता मुजीबुररहमान की अवामी लीग पार्टी ने जीत प्राप्त कर ली। इसी प्रकार प्रांतीय विधान सभा में 310 सीटों में से शेख मुजीब की पार्टी ने 298 सीटें प्राप्त कर लीं।

    नेशनल एसेम्बली में जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को 81 सीटें मिलीं और वह मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। जिस मुस्लिम लीग ने भारत से लड़कर पाकिस्तान लिया था, उसका इन चुनावों में तिनका-तिनका बिखर गया। इन चुनावों में मुस्लिम लीग के नाम से दो पार्टियों ने चुनाव लड़ा। इनमें से कौंसिल मुस्लिम लीग को केवल 7 सीटें, तथा मुस्लिम लीग (कय्यूम) को 9 सीटें मिलीं। बाकी सीटें विभिन्न छोटी-छोटी पार्टियों में बिखर गईं। नेशनल एसेम्बली में अवामी लीग को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद याह्या खाँ ने अवामी लीग को सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं दिया। जब अवामी पार्टी ने विरोध प्रदर्शन किए तो शेख मुजीबुररहमान को बंदी बना लिया गया। इस पर पूर्वी-बंगाल की जनता ने अवामी लीग के नेतृत्व में पश्चिमी-पाकिस्तान से अलग होने के लिए बांग्ला मुक्ति आंदोलन शुरू कर दिया। जब पाकिस्तान ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए पूर्वी-पाकिस्तान में सेना तैनात की तो पूर्वी-पाकिस्तान से बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे।

    बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम के दौरान भयानक हिंसा हुई। इस आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तान की सेना द्वारा 26 मार्च 1971 को पूर्वी-पाकिस्तान में ऑपरेशन सर्चलाइट आरम्भ किया गया। इस ऑपरेशन की आड़ में पाकिस्तान की सेना ने बंगाली मुसलमानों का जमकर नरसंहार किया। जमात-ए-इस्लाम नामक संगठन के लड़ाकों ने इस युद्ध में पाकिस्तान की सेना का साथ दिया। नौ माह तक चले इस मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की सेना और जमात-ए-इस्लाम के लड़ाकों ने पूर्वी-पाकिस्तान में कई लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया। यह संख्या 3 लाख से 30 लाख के बीच बताई जाती है। इस दौरान 2 लाख से 4 लाख बंगाली औरतों से बलात्कार किए जिनमें हिन्दू एवं मुस्लिम औरतें बिना किसी भेद के बलात्कार की शिकार हुईं।

    दिसम्बर 2011 में बीबीसी न्यूज रिपोर्ट में एक रिसर्च के हवाले से दावा किया गया कि बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम में तीन लाख से पांच लाख लोग मारे गए। इस दौरान कुछ कट्टर धार्मिक लोगों ने नारा दिया कि बंगाली महिलाएं पब्लिक प्रोपर्टी हैं। इस नरसंहार एवं बलात्कारों के कारण अस्सी लाख से एक करोड़ हिन्दुओं ने पूर्वी-पाकिस्तान छोड़ दिया और वे भारत आ गए। लगभग 3 करोड़ लोग पूर्वी-पाकिस्तान से विस्थापित हुए। इस दौरान उर्दू-भाषी बिहारियों एवं बंाग्ला-भाषी बंगालियों के बीच भी हिंसक झड़पें हुईं। इन झड़पों में लगभग डेढ़ लाख उर्दू-भाषी बिहारी मारे गए। एक अन्य अनुमान के अनुसार मरने वाले उर्दू-भाषी बिहारियों की संख्या पांच लाख थी।

    सुप्रसिद्ध पत्रकार तारेक फतह ने 1970 के बांगलादेश नरसंहार में मारे गए लोगों की संख्या 10 लाख बताई है। बांग्लादेश के नरसंहार पर टिप्पणी करते हुए तारेक फतेह ने लिखा है- 'बंगाल जो नवजागरण का पालना था, हत्यारों के हत्थे चढ़ गया था।' याह्या खाँ एवं उसके साथियों ने पूर्वी-पाकिस्तान के मुक्ति-आंदोलन को भारत-समर्थित युद्ध माना एवं उसका बदला लेने के लिए भारत पर आक्रमण कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ और पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश नाम से अलग राष्ट्र बना।


    शेख हसीना का संयुक्त राष्ट्र महासभा में वक्तव्य

    22 सितम्बर 2017 को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक वक्तव्य दिया कि पाकिस्तान की सेना ने वर्ष 1971 में जघन्य सैन्य अभियान चलाकर मुक्ति संग्राम के दौरान 30 लाख निर्दाेष लोगों का भयानक नरसंहार किया। उन्होंने कहा कि बांग्ला देश की संसद ने नरसंहार के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए 25 मार्च 2017 को नरसंहार दिवस घोषित किया। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी-पाकिस्तान पर 25 मार्च 1971 की आधी रात को हमला किया जिसके बाद आधिकारिक तौर पर 9 महीने चले युद्ध में 30 लाख लोग मारे गए। तथा 20,000 से ज्यादा महिलाओं का शोषण किया गया।

    बांगलादेश भले ही पाकिस्तान से अलग हो गया हो किंतु वहाँ की परिस्थितियाँ भी पाकिस्तान से कुछ कम बुरी नहीं हैं। बांग्लादेश बनने के केवल चार साल बाद ई.1975 में शेख मुजीब-उर-रहमान की सरकार को सैनिक-तख्ता-पलट के माध्यम से हटा दिया गया। इस दौरान शेख मुजीब, उसकी पत्नी तथा तीन पुत्र मौत के घाट उतार दिए गए। लम्बी राजनीतिक लड़ाई के बाद शेख मुजीब की पुत्री शेख हसीना ने ई.1996 में बांग्लादेश में सरकार बनाई किंतु उसे भी सैनिक-तख्ता-पलट के माध्यम से हटाकर जेल में डाल दिया गया। इस पुस्तक के लिखे जाने के समय यही शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं, वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बनी हैं। बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकारें बहुत कम रही हैं जबकि जनता को सैनिक शासन और आपतकाल अधिक झेलना पड़ा है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 22

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 22

    मुहम्मद जलादुद्दीन अकबर (3)


    मुल्लाओं की नाराजगी से पैदल यात्राएं बंद

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    इस यात्रा के बाद अकबर कभी अजमेर नहीं आया। इसका कोई स्पष्ट कारण तो नहीं है किंतु माना जाता है कि उसके द्वारा हर साल ख्वाजा की दरगाह पर की जा रही यात्राओं के कारण मुल्ला लोग नाराज हो गये थे क्योंकि अकबर पैगम्बर के स्थान पर ख्वाजा को मानने लगा था। इसलिये मुल्लों ने अकबर के विरुद्ध फतवे जारी कर दिये। हजारों प्रभावशाली लोग अकबर के दुश्मन हो गये तथा मुल्लों ने अकबर के भाई हकीम मिर्जा को आगरा का बादशाह बनने के लिये आमंत्रित किया। यह भी कहा जाता है कि इस उम्र तक आते-आते मजहब के सम्बन्ध में अकबर का दृष्टिकोण बदलने लगा था।

    इन सब कारणों से अकबर ने अजमेर आना बंद कर दिया। एक कारण यह भी बताया जाता है कि अब तक अजमेर के चारों ओर की समस्त रियासतें अकबर के अधीन आ चुकी थीं, इसलिये अब उसे अजमेर जाने की आवश्यकता नहीं रह गई थी। यद्यपि अकबर ई.1605 तक जीवित रहा किंतु ई.1579 के बाद कभी अजमेर नहीं आया। अकबर की अजमेर यात्राओं ने अजमेर को प्रांतीय राजधानी का स्तर प्रदान किया जो दीर्घकाल तक अक्षुण्ण बना रहा।

    गुलबदन बेगम अजमेर में

    अकबर ने ई.1580 में अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का नाजिम बनाया ई.1580 में अकबर ने शहजादे दानियाल को अजमेर भेजा। दानियाल रहीमखां का जंवाई था। दानियाल ने ख्वाजा की दरगाह के पास रहने वाले फकीरों में 25 हजार रुपये वितरित किये। ई.1582 में हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम तथा अकबर की पत्नी सलीमा बेगम हिजाज (मक्का तथा मदीना के क्षेत्र को हिजाज कहा जाता है।) की यात्रा से लौटते हुए अजमेर पहुँची। अकबर ने शहजादे सलीम को निर्देश दिये कि वह इन दोनों बेगमों को सुरक्षा के साथ आगरा ले आये। सलीम अजमेर आया तथा इन दोनों शाही महिलाओं को अपने साथ आगरा ले गया।

    मुगलिया प्रांतों का पुनर्गठन

    अकबर ने ई.1581 में राजा मानसिंह को तथा ई.1586 में जगन्नाथ को अजमेर का नाजिम बनाया। उसके साथ राय दुर्गा को अजमेर का दीवान तथा सुल्तान कुली को अजमेर सूबे का बख्शी नियुक्त किया गया। जगन्नाथ के बाद राय दुर्गा को अजमेर का नाजिम बनाया गया। यह 1589 तक अजमेर का नाजिम रहा। ई.1589 में गोपाल जाधव को अजमेर का नाजिम बनाया गया। यह उसी वर्ष अजमेर में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। ई.1591-92 में माधोसिंह को अजमेर का नाजिम बनाया गया। ई.1592 में अकबर ने अपने पूरे साम्राज्य को चार क्षेत्रों में बांटा। अजमेर, गुजरात तथा मालवा को मिलाकर एक क्षेत्र बनाया गया।

    महाराजा सूरसिंह को अजमेर के परगने

    ई.1594 में शेरुया खां को अजमेर का पेशबां नियुक्त किया गया। ई.1595 में राठौड़ राजकुमार सूरसिंह को जोधपुर का राजा बनने पर अकबर की ओर से अजमेर सूबे के कई परगने दिये गये जिनका विवरण इस प्रकार है- पीसांगन परगना (मूल्य 20 हजार रुपये), समेल परगना (मूल्य 4 हजार रुपये), नारू (मूल्य 800 रुपये), भदसूरिया (मूल्य 800 रुपये), मेरवाड़ा (मूल्य 87 हजार 631 रुपये; 12 गांव), तेरवाड़ा (मूल्य 54 हजार 524 रुपये; 14 गांव), झारवासा एंव अधवासा (मूल्य 1 लाख रुपये)। ई.1597 में सुल्तान सालिम को अजमेर का नाजिम नियुक्त किया गया।

    शहजादे सलीम को अजमेर की सूबेदारी

    ई.1598 में शहजादे सलीम (जहाँगीर) का नायब शहबाजखां मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिये अजमेर आया। अगले ही वर्ष अजमेर में उसकी मृत्यु हो गयी। इस पर ई.1599 में अकबर ने शहजादे सलीम को अजमेर का सूबेदार बनाया ताकि वह अजमेर में रहकर मेवाड़ के राणा अमरसिंह के विरुद्ध लड़ाई जारी रख सके। उसके साथ राजा मानसिंह को भी भेजा गया। अजमेर पहुँचकर सलीम तो कुसंगति में पड़कर दुव्यर्सनों में व्यस्त हो गया और मानसिंह ने अमरसिंह के विरुद्ध कड़ी मोर्चा बन्दी की। उन्हीं दिनों बंगाल में विद्रोह हुआ। अकबर अपनी सेना के साथ खानदेश में था। इसलिये अकबर ने बंगाल के विद्रोह को दबाने के लिये राजा मानसिंह तथा शहजादा सलीम को बंगाल जाने के आदेश भिजवाये।

    मानसिंह तो अपनी सेनाएं लेकर उसी समय बंगाल के लिये रवाना हो गया किंतु सलीम ने बंगाल जाने से मना कर दिया। सलीम के लिये यह बादशाह बनने का अच्छा अवसर था। अकबर मुगलों की विशाल सेना के साथ दक्षिण में था। अकबर का प्रमुख सेनापति राजा मानसिंह अपनी सेना के साथ बंगाल को कूच कर गया था, तथा सलीम अपनी सेनाओं के साथ राजपूताने में मौजूद था। अतः सलीम ने आगरा पर कब्जा करने और बादशाह बनने की योजना बनाई।

    संयोग से उन्हीं दिनों सलीम के सहायक शहबाज खां कम्बू की मृत्यु हो गई तथा उसके एक करोड़ रुपये सलीम के हाथ लग गये। उन दिनों आगरा में 20 करोड़ रुपये का खजाना मौजूद था। अब सलीम ने आगरा के खजाने को लूटने की योजना बनाई तथा अपनी सेनाओं को मेवाड़ से अजमेर बुला लिया। जब सेनाएं अजमेर पहुँच गईं तो सलीम पूरी तैयारी के साथ आगरा के लिये रवाना हो गया। उसने आगरा के किलेदार कुलीच खां से आगरा लेने के प्रयास किये किंतु कुलीच खां ने सलीम को आगरा देने से मना कर दिया। इस पर सलीम इलाहाबाद चला गया। अंत में सलीमा बेगम की मध्यस्थता से पिता-पुत्र में समझौता हुआ तथा उसके बाद ई.1599-1600 में अकबर ने मीर कालान को अजमेर का सूबेदार बनाया।

    अकबर के समय का अजमेर

    अकबर के समय अजमेर की विचित्र सी शक्ल थी। इधर दिल्ली दरवाजा तक और उधर लाखन कोठरी तक, पश्चिम में अंदर कोट तक, ऊसरी दरवाजा की तरफ डिग्गी तक और आगरा दरवाजा की तरफ नया बाजार की पश्चिमी सीमा चौक कड़कशाह की पूर्वी सीमा तक और मदार दरवाजे से 70 कदम पश्चिम की तरफ तक अजमेर शहर आबाद था। कड़क नामक फकीर के नाम पर इसे चौक कड़कशाह कहते थे। दरगाह के मशरिकों में खादिमों की आबादी थी। बाजार और दरगाह कुछ रौनक पर था। बाकी सन्नाटे का आलम था। तारागढ़ के नीचे का पुराना शहर उजड़कर यहाँ आ बसा था।

    अकबर के आदेश से ख्वाजा की दरगाह के सामने एक बाजार की नींव डाली गई तथा इसके चारों ओर लोगों को आबाद होने का आदेश दिया गया। इसे दरगाह बाजार कहते थे। ख्वाजा साहब की दरगाह के चारों तरफ जहाँ झाड़ियां और थोहर के बेशुमार पेड़ और वीराना था, अकबर के आदेश से कुछ ही दिनों में वहाँ बहुत से सुंदर भवन बन गये। अकबर ने अजमेर नगर के पूर्वी भाग में दौलतखाना बनवाया जिसमें अकबर की बेगमें और अकबर रह सके। जब अंग्रेजों का शासन हुआ तो यह भवन मैगजीन कहलाने लगा।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • एडविना ने माउंटबेटन को भारत विभाजन के लिये तैयार किया!

     03.06.2020
    एडविना ने माउंटबेटन को भारत विभाजन के लिये तैयार किया!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि भारत का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है।

    अधिकतर कांग्रेसी नेता भारत विभाजन के विरुद्ध थे किंतु वे मुस्लिम लीग के कठोर रवैये से तंग आ चुके थे। कांग्रेस इस बात के लिये उत्सुक थी कि देश शीघ्र स्वाधीन हो। गांधीजी 1942 से लगातार मांग करते आ रहे थे कि भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दो। जबकि मुस्लिम लीग देश की स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन भी चाहती थी। राजाजी राजगोपालाचारी जैसे कुछ लोग बेकार के पचड़े में पड़कर भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा यह समझते थे कि भारत का युक्तियुक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये।

    घनश्यामदास बिड़ला भी राजाजी के विचारों से सहमत थे। उन्होंने नेहरूजी को पत्र लिख कर अनुरोध किया कि साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्तियुक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का विरोध कैसे किया जा सकता है........। अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत (अर्थात् पाकिस्तान) बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा, न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर आप पाकिस्तान देने को तैयार हो जायें तो मुसलमान उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उनका स्वीकार करना या न करना बाद की बात है फिलहाल हमारा पाकिस्तान की मांग का विरोध करना मुसलमानों के मन में पाकिस्तान की प्यास ही बढ़ायेगा।

    लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है कि वल्लभभाई पटेल तो माउंटबेटन के आगमन से पहले ही विभाजन स्वीकारने के लिये तैयार बैठे थे। ........उनका सीधा सा तर्क था, जिन्ना को दे दो पाकिस्तान! फर्क क्या पड़ेगा? पाँच साल से ज्यादा यह पाकिस्तान टिकने वाला नहीं। मुस्लिमलीग खुद ब खुद भारत के दरवाजे पर आ कर खटखटाहट करेगी कि शासन की डोर आप लोग ही संभालिये।

    पटेल के बारे में वायसराय माउंटबेटन की धारणा थी कि केवल वही एक व्यक्ति था जिसे ठीक-ठीक पता था कि वह (पटेल) क्या कर रहा है! पटेल ने मार्च 1947 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में एक प्रस्ताव पारित करवाया था कि पंजाब को दो टुकड़ों में बांट दिया जाये। एक टुकड़ा हिंदुओं का, दूसरा मुसलमानों का। सिखों को आजादी रहेगी कि वे कहाँ रहेंगे? वायसराय ने इस फैसले में छिपे उद्देश्य को समझ लिया। बिल्कुल साफ था कि पटेल, पाकिस्तान चाहने वाले मुसलमानों से मुक्ति चाहते थे। पटेल महसूस करते थे कि आजाद हिंदुस्तान में विरोधी दल के रूप में मुस्लिम लीग का मतलब है मुसीबत, उसकी योजनाओं का अंत, कानूनों पर रोकथाम।

    पटेल ने किंचित चतुराई से काम लिया। उन्होंने एक ओर तो भारत विभाजन के लिये कार्य करना आरंभ कर दिया और दूसरी ओर वर्किंग कमेटी के एक सदस्य को लिखकर कहा कि जिन्ना इस घुन लगे पाकिस्तान को कभी नहीं मानेगा जिसमें पंजाब और बंगाल का बंटवारा होता हो। अतः अंग्रेज पूरा देश सबसे बड़ी पार्टी के हवाले कर देंगे। इस प्रकार देश बंटवारे से बच जायेगा। नेहरू, पटेल की इस चाल में फंस गये। मोसले ने लिखा है कि यह दलील पं. नेहरू को खास तौर पर पसंद आयी।

    माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है कि पटेल ने पहले तो पंजाब और बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव कांग्रेस कार्यकारिणी में पारित करवाया और उसके बाद वे भारत विभाजन के लिये आगे आये, इसलिये नहीं कि जिन्ना को संतुष्ट करें अपितु इसलिये कि कांग्रेस को नष्ट होने से बचाया जा सके। पटेल ने मेनन के माध्यम से वायसराय को संदेश भिजवाया कि पटेल विभाजन पर बात करने के लिये तैयार हैं।

    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी आत्मकथा में पटेल और नेहरू के रवैये पर खेद जताया है। वे लिखते हैं- जिस कांग्रेसी नेता ने माउंटबेटन के प्रस्ताव को सबसे पहले स्वीकार किया, वे थे पटेल। मंत्रिमंडल में मुस्लिम लीगी मंत्रियों के नकारात्मक एवं अड़ियल रुख से परेशान होकर सरदार पटेल ने देश के विभाजन की बात मान ली। उन्होंने खुले आम कहा कि मुस्लिम लीग से पीछा छुड़ाने के लिये उसे भारत का एक हिस्सा दे देना चाहिये। इसके बाद माउंटबेटन ने नेहरू को मनाने का प्रयास किया। पहले तो नेहरू ने देश के विभाजन का घोर विरोध किया किंतु माउंटबेटन के लगातार प्रयास से वे ढीले पड़ गये। जब समाचार पत्रों में पंजाब बंटवारे के सम्बन्ध में पटेल के विचारों पर आधारित कांग्रेस कमेटी के प्रस्ताव के समाचार छपे तो गांधी ने पटेल को फटकार भरा पत्र लिखकर अपना विरोध जताया।

    इसी बीच लेडी एडविना माउंटबेटन ने पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का व्यापक दौरा किया। उसने इतने बड़े पैमाने पर घायल एवं अंग-भंग लोगों को एक साथ देखकर मन बनाया कि हिन्दुओं और मुसलमानों का बंटवारा हो ही जाना चाहिये। उसने अपने पति को इस कार्य के लिये सहमत किया। वायसराय ने कांग्रेस कार्यकारिणी में पंजाब बंटवारे को लेकर पारित किये गये प्रस्ताव को आधार बना कर तर्क दिया कि जब पंजाब के दो टुकड़े किये जा सकते हैं तो भारत के क्यों नहीं? नेहरू और पटेल की सहमति पाने के बाद कांग्रेस हाई कमान को अपनी ओर मिलाने में माउंटबेटन को भला क्या दिक्कत होनी थी! कार्यकारिणी द्वारा नेहरू को यह अधिकार सौंपा गया कि वह वायसराय को सूचित करें कि कांग्रेस देश के विभाजन को स्वीकार कर लेगी बशर्ते पंजाब और बंगाल के गौरवमय प्रांत किसी एक देश को समूचे न मिलकर दोनों देशों को आधे-आधे मिलें।

    जिन्ना इस खबर को सुनकर प्रसन्नता के मारे उछल पड़ा कि कांग्रेस तथा अंग्रेज किसी भी तरह सही, पाकिस्तान देने को तैयार हैं जबकि इस समय तक भी नेहरू को विश्वास था कि जिन्ना इस घुन लगे पाकिस्तान को नहीं मानेगा। क्योंकि वह पूरा पंजाब और पूरा बंगाल पाकिस्तान में देखना चाहता था। इस स्थिति का लाभ उठाकर माउण्टबेटन ने देश के विभाजन की बात मनवाने का प्रयास किया। मोसले ने लिखा है कि सार्वजनिक रूप से जिन्ना ने शांत और संयत रुख अख्तियार किया लेकिन दोस्तों के बीच वह खुशी से फटा पड़ता था। उसने कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि कांग्रेस इतनी जल्दी पाकिस्तान मान लेगी।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 49

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 49

    दूसरे धर्म वालों के लिए पाकिस्तान में जगह नहीं


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    पाकिस्तान में हिन्दू, सिख, बौद्ध एवं ईसाई ही नहीं, मुहाजिरों, शियाओं, अहमदियों और सूफियों का अस्तित्व भी खतरे में है। भारत से पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर अलग हुआ किंतु पाकिस्तान से बांग्लादेश केवल इस कारण अलग हुआ कि पाकिस्तान के मुसलमान अपने आप को बांग्लादेश के मुसलमानों से अधिक श्रेष्ठ मानते थे तथा वे पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल की राजनीतिक पार्टी की सरकार नहीं बनने देना चाहते थे। भारत-पाकिस्तान के विभाजन ने तो 5 से 10 लाख मानवों के प्राण लिए थे किंतु पाकिस्तान-बांग्लादेश के विभाजन ने 30 लाख लोगों के प्राण लिए। घृणा का यह चक्र अभी थमा नहीं है। पाकिस्तान में आज भी पंजाबी मुसलमान, सिंधी मुसलमान, बिलोचिस्तानी मुसलमान, खैबर-पख्तूनी मुसलमान तथा पाक अधिकृत काश्मीर के मुसलमान एक-दूसरे को नीचा समझते हैं। भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों को मुहाजिर कहा जाता है तथा उन्हें नीची दृष्टि से देखा जाता है। पाकिस्तान के विगत 72 साल के इतिहास को देखकर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के लोग तब तक लड़ते रहेंगे जब तक कि पाकिस्तान के कुछ विभाजन और नहीं हो जाएंगे। क्योंकि घृणा से घृणा ही जन्म लेती है।


    पैंसठ के युद्धकाल में हिन्दुओं का दमन

    ई.1965 के युद्धकाल में पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दुओं को पाकिस्तानी मुसलमानों द्वारा जासूस और देशद्रोही घोषित किया गया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसलिए वे भागकर चोरी-छिपे भारत आने लगे। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते में अल्पसंख्यकों की रक्षा पर भी बल दिया गया किंतु पाकिस्तान ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। आज भी वहाँ हिन्दुओं को द्वितीय स्तर का नागरिक समझा जाता है।


    इकहत्तर के युद्धकाल में कई लाख हिन्दू शरणार्थियों का भारत आगमन

    ई.1947 के बाद सिंध से हिंदुस्तान की तरफ हिंदुओं का एक बड़ा पलायन 1971 की लड़ाई के समय हुआ और 90,000 सिंधी-हिंदू पाकिस्तान से भारत आ गए। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि उस समय भारत की सेना पाकिस्तान के सिंध प्रांत के थारपारकार जिले में घुस गई थी जिसके संरक्षण के कारण सिंधी-हिन्दू रातों-रात पाकिस्तान छोड़कर भारत में प्रवेश करने में सफल हुए। 1971 के पलायन के समय देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी। वह इन हिन्दुओं को भारत में लेने के लिए तैयार नहीं हुई तथा सरकार ने इन हिंदुओं को भारत से पुनः पाकिस्तान की सीमा में धकेलने का प्रयास किया। सरकार ने इन शरणार्थियों पर गोली चलाने तक की धमकी दी किंतु ये शरणार्थी भारत की भूमि पर ही जीने-मरने को अटल थे, वे किसी भी सूरत में वापस पाकिस्तान लौटने को तैयार नहीं थे। अंत में भारत सरकार ने इन्हें स्वीकार किया तथा इन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की।

    28 हजार से अधिक हिन्दू, पाकिस्तान से भारत के बाड़मेर जिले में आए। इन हिन्दुओं में गुरड़ा, लोहार, सिन्धी, पुरोहित, देशान्तरी, नाई, सुथार, बजीर, राजपूत, ग्वारिया, जाट, स्वामी, माहेश्वरी, दर्जी, ब्राह्मण, चारण, भील, मेघवाल, सुनार, लखवारा, भाट, ढोली, खत्री, कलबी आदि विभिन्न जातियों के लोग थे। इनमें से अधिकांश शरणार्थी बाड़मेर जिले में रहे और शेष भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बस गए।


    स्थिर हो गई है पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या

    ई.1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान की जनसंख्या 33.7 मिलियन थी जो वर्ष 2017 में बढ़कर 207.77 मिलियन हो गई। 1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में 1.6 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या थी, सैंतालिस वर्षों के पश्चात् 1997 में भी पाकिस्तान की हिन्दू जनसंख्या 1.6 प्रतिशत ही पाई गई। 1998 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में 2.1 लाख हिन्दू जनसंख्या बची है। अधिकतर हिंदू पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहते हैं। पाकिस्तान में रहने वाले कुल हिन्दुओं में से सिंध में 93 प्रतिशत, पंजाब में 5 प्रतिशत तथा ब्लूचिस्तान में 2 प्रतिशत रहते हैं।

    वर्ष 1998 के बाद से पाकिस्तान में हिन्दुओं के आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। यदि 1950 से 1998 की अवधि को ही लिया जाए तो इस अवधि में हिन्दुओं की जनसंख्या स्थिर रही जबकि पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 6 गुने से अधिक हो गई। पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या में इसलिए वृद्धि नहीं हुई क्योंकि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू या तो मुसलमान बन गए हैं या फिर पाकिस्तान से हिन्दुओं की जनसंख्या प्रकट एवं परोक्ष रूप से भारत में आई है जिसका अधिकांश हिस्सा सीमावर्ती रेगिस्तानी जिलों बाड़मेर, जैसलमेर तथा जोधपुर में निवास करता है। पाकिस्तान से आज भी हिन्दुओं का पलायन जारी है। वे अपनी तथा अपने बच्चों की सुरक्षा की आशा में भारत आते हैं तथा भारत सरकार उन्हें नागरिकता से लेकर आवास, पेयजल, रोजगार, शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराने का प्रयास करती है। पाकिस्तान में मुस्लिम लड़कों द्वारा जिस बड़ी तादाद में हिन्दू लड़कियों का बलपूर्वक अपहरण एवं बलात्कार करके उन्हें मुसलमानों से निकाह करने के लिए विवश किया जा रहा है तथा उनका धर्म-परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बनाया जा रहा है, इसको देखते हुए लगता है कि आने वाले कुछ दशकों में पाकिस्तान हिन्दू-विहीन देश हो जाएगा। पाकिस्तान के निर्माताओं ने ऐसे ही पाकिस्तान की कल्पना तो की थी!


    सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल

    भारत विभाजन के समय उत्तर प्रदेश एवं बिहार से पाकिस्तान गए मुहाजिर मुसलमानों के नेता अल्ताफ हुसैन ने सितम्बर 2000 में लंदन में सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया कि पाकिस्तान का निर्माण सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल थी।


    पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से आए शरणार्थियों के कारण भारत में जनसंख्या विस्फोट हो गया

    ई.1947 में अखण्ड भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39.5 करोड़ थी। भारत विभाजन के समय 23.85 प्रतिशत भूमि तथा 16 प्रतिशत जनसंख्या पाकिस्तान को मिली। अर्थात् 33 करोड़ जनसंख्या भारत को एवं 6.5 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान को मिली। आजादी के बाद भारत में जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चलाया गया जबकि पाकिस्तान में इस्लामिक मान्यताओं के कारण जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम नहीं चलाया गया। किंतु पाकिस्तान से भारत की ओर हुए जनसंख्या पलायन के कारण भारत की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई तथा 1947 से 2019 के बीच भारत की जनसंख्या 33 करोड़ से बढ़कर 135 करोड़ हो गई तथा भारत में न केवल जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम विफल हो गया अपितु जनसंख्या विस्फोट भी हो गया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 23

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 23

    नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर


    सत्रहवीं शताब्दी में अजमेर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अकबर ने ई.1602 में अमानत खां को अजमेर का बख्शी तथा इतिहास लेखक नियुक्त किया। ई.1603-1604 में शहबाज खां को अजमेर का सूबेदार बनाया। ई.1603 में शहजादे सलीम को माफी मिल गई और उसे दुबारा अजमेर का सूबेदार बनाया गया। जब उसे अजमेर रवाना किया गया तो उसने आगरा से बाहर आकर, शहंशाह अकबर को बड़ी-भारी मांगें भिजवाईं तथा अजमेर जाने से मना कर दिया। अकबर ने उसे अयोग्य समझकर अजमेर न जाकर इलाहाबाद जाने की छूट दे दी ताकि वह अपने दुव्यर्सनों में व्यस्त रह सके।

    जहाँगीर का अजमेर में प्रवास

    ई.1605 में अकबर की मृत्यु हो गई तथा उसका बड़ा पुत्र सलीम, अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा की गद्दी पर बैठा। उसने अपने हाथों से ही अपने सिर पर ताज रखा तथा बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। ई.1605 में जहाँगीर ने गोकलदास को अजमेर सूबे की सावर जागीर प्रदान की। जहाँगीर ने ई.1608-1609 में मिर्जा मसूद को, ई.1609-1610 में सयैद अली को अजमेर का फौजदार (सूबेदार) नियुक्त किया। ई.1610 में मुगल सेनापति महावत खां ने मेवाड़ के विरुद्ध अभियान किया किन्तु महाराणा अमरसिंह ने उसे परास्त कर दिया। जहाँगीर ने ई.1611-1612 में सफदर खान को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया। ई.1611 में जहाँगीर ने मारवाड़ रियासत के राठौड़ राजकुमार किशनसिंह को अजमेर के निकट सेठोलाव जागीर प्रदान की जहाँ किशनसिंह ने किशनगढ़ रियासत की स्थापना की।

    ई.1613 में जहाँगीर ने मेवाड़ महाराणा अमरसिंह के विरुद्ध युद्ध अभियान चलाया। उसने भी अकबर की तरह मेवाड़ के विरुद्ध अभियान चलाने के लिये, अजमेर को अपना मुख्यालय बनाया। 18 नवम्बर 1613 को जहाँगीर आगरा से अजमेर आया तथा ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ।

    जब मारवाड़ नरेश महाराजा सूरसिंह को ज्ञात हुआ कि जहाँगीर अजमेर में है तो वह अपने कुंवर गजसिंह को लेकर अजमेर आया और जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ।

    किशनगढ़ का राजा किशनसिंह जो कि महाराजा सूरसिंह का छोटा भाई था, भी अजमेर आकर जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ। उसी वर्ष जहाँगीर ने शहजादे शाहजहाँ को मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा। इस सन् का एक शिलालेख हाथीभाटा में मिला है जिसमें कहा गया है कि भयानक दुर्भिक्ष के कारण इस वर्ष एक रुपये का एक सेर गेहूं बिका।

    जहाँगीर पूरे तीन साल अजमेर में रहा। यहाँ रहकर उसने मेवाड़ के विरुद्ध पूरी शक्ति झौंक दी। परिणाम स्वरूप मेवाड़ का महाराणा अमरसिंह मुगलों से सन्धि करने को विवश हो गया। यह सन्धि सिसोदिया कुल की मर्यादाओं के अनुरूप हुई। अजमेर में ही जहाँगीर की पौत्री-जहॉंआरा तथा दो पौत्रों- दारा एवम शुजा का जन्म हुआ। जहाँगीर ने अजमेर में महल, मकबरे एवं बाग बनवाये। जहाँगीर के शासन-काल में आठवें वर्ष में उसी की आज्ञा से पुष्कर के निकट हिन्दू मन्दिरों को विनष्ट किया गया।

    जहाँगीर के काल में अजमेर टकसाल

    जहाँगीर के शासन काल में अजमेर की टकसाल में सोने, चांदी एवं ताम्बे के सिक्के ढाले गये। हिजरी 1023 में (ई.1618) में उसने ऐसी दो मुहरें अजमेर टकसाल से ढलवाईं जिनपर जहाँगीर का आवक्ष चित्र बना हुआ है। इन चित्रों में वह पालथी मारे बैठा है तथा उसके दाहिने हाथ में एक चषक है। इन मुद्राओं पर फारसी में शबीह हजरत शाह जहाँगीर तथा पृष्ठ भाग पर सूर्य का चिह्न बना हुआ है। इसके चारों ओर फारसी में अल्लाहु अकबर ज़रब अजमेर लिखा हुआ है। अब यह सिक्का लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित है।

    जहाँगीर ने अजमेर की टकसालों से राशिबोधक सिक्के जारी करवाये। इन सिक्कों को जिस माह में जारी किया जाता था, उस माह में सूर्य जिस राशि में होता था, उस राशि की सूचना अंकित की जाती थी। हिज्री 1034 में उसने अजमेर से एक कर्क राशि की मुहर जारी की जिस पर साम्राज्ञी नूरजहाँ बेगम का नाम अंकित है। जहाँगीर के शासन काल में अजमेर टकसाल से सोने की ऐसी मुहरें जारी की गईं जिन पर कई सूचनाएं अंकित हैं। ये सिक्के बहुत कम संख्या में ढाले गये थे इस कारण ये अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं। जहाँगीर के शासन काल में भी इन सिक्कों का सैट एकत्रित कर पाना अत्यंत कठिन था। जहाँगीर के राशिबोधक सिक्कों का पूरा सैट ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में सुरक्षित है। पूरा सैट अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं है।

    अजमेर में ब्रिटिश अधिकारियों का आगमन

    ई.1614 में अंग्रेज यात्री जॉन मिडन हॉल अजमेर आया। जून 1614 में अजमेर में ही उसकी मृत्यु हुई। वह अजमेर में मरने वाला पहला यूरोपियन था। उसकी मृत्यु के दिन थॉमस कैरिज भी अजमेर पहुँचा। थॉमस कैरिज आगे चलकर सूरत की व्यापारिक कोठी का प्रेसीडेंट बना। ई.1614 में ही अंग्रेजों ने सूरत कारखाने के अधीन अजमेर में एक कारखाना स्थापित किया। मिडनहॉल रोमन कैथोलिक था, उसे आगरा में दफनाया गया। ई.1614 में जहाँगीर ने जोधपुर के राजा सूरसिंह को अजमेर से मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए भेजा। सूरसिंह ने मेवाड़ को जाने वाले समस्त पहाड़ी रास्ते बंद कर दिये।

    जून 1615 में अंग्रेज यात्री टॉम कोर्याट अजमेर आया। उसने एक पर्चा प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था- 'टॉम कोरयार्ट, ट्रैवलर फॉर द इंगलिश विट्स; ग्रीटिंग, फ्रॉम दी कोर्ट ऑफ दी ग्रेट मुगल एट अजमेर।' जुलाई 1615 में एक अन्य अंग्रेज यात्री मि. विलिंगडन अजमेर आया।

    दारा शिकोह का जन्म

    शहजादा खुर्रम को अजमेर में ही शाहजहाँ की उपाधि दी गई। इस अवसर पर खुर्रम ने अपनी सेना की परेड का प्रदर्शन आम जनता के सामने करवाया। पर्सियन राजदूत मुहम्मद रिजि अजमेर में ही जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। अजमेर में ही जहाँगीर ने अपनी चहेती बेगम नूरमहल को नूरजहाँ की उपाधि दी। खुर्रम (शाहजहाँ) के बड़े पुत्र दारा शिकोह का जन्म भी दिसम्बर 1615 में अजमेर में हुआ।

    जहाँगीर द्वारा अजमेर में निर्माण कार्य

    18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1613 तक की अवधि के अपने तीन साल के अजमेर प्रवास में जहाँगीर नौ बार मोइनुद्दीन की दरगाह पर गया, पन्द्रह बार पुष्कर झील देखने गया तथा अड़तीस बार चश्मा-ए-नूर देखने गया। आनासागर झील पर उसने दौलत बाग बनवाया। दौलत बाग से कैसर बाग जाने वाले मार्ग पर उसने कुछ महल बनवाये जिनके कुछ खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। तारागढ़ की पश्चिमी घाटी में उसने सुन्दर और विशाल महल का निर्माण करवाया जो ई.1615 में बनकर तैयार हुआ। अपने अजमेर प्रवास का अधिकतर समय जहाँगीर ने अकबर के महल में व्यतीत किया जहाँ वह नियमित रूप से झरोखे में न्याय करने के लिये बैठता तथा उसके नीचे के मैदान में जहाँ अपराधियों को सजा दी जाती थी, वह हाथियों की लड़ाई देखा करता था।

    महाराजा किशनसिंह की हत्या

    ई.1615 में महाराजा किशनसिंह के भाई जोधपुर नरेश सूरसिंह के आदमियों ने महाराजा किशनसिंह की हत्या कर दी। किशनसिंह की मृत्यु के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलता है। कर्नल टॉड ने लिखा है कि खुर्रम के कहने पर किशनसिंह ने जोधपुर नरेश गजसिंह के भाटी सरदार गोविन्ददास को मार डाला। इससे गजसिंह अत्यंत दुखी हुआ। (टॉड ने यहाँ भारी चूक की है। इस समय तक गजसिंह गद्दी पर नहीं बैठा था।) बलदेव प्रसाद मिश्र ने इस पर टिप्पणी की है कि किशनसिंह ने खुर्रम के कहने पर गोविंददास को नहीं मारा था। गोविंददास ने सरवनसिंह के भतीजे गोपालदास को अजमेर में महाराजा शूरसिंह के डेरे पर जाकर रात्रि के समय जेठ सुदी 8 संवत 1771 अर्थात् 1615 ई. को मारा था जिसके बदले में तड़के ही कुंवर गजसिंह ने अपने पिता के आदेश से पीछा करके अपने काका किशनसिंह को किशनगढ़ जाते हुए मार्ग में मार डाला। (पं. बलदेव प्रसाद ने भी यहाँ चूक की है। कुं. गजसिंह, गोपालदास की हत्या का बदला लेने नहीं गया होगा अपितु किशनसिंह द्वारा गोविंददास की हत्या किये जाने पर गजसिंह ने किशनसिंह का पीछा किया होगा।)

    इस हत्या के सम्बन्ध में जहाँगीर ने लिखा है कि 26 मई 1615 को एक अजीब बात हुई। मैं उस रात दैवयोग से पुष्कर में ही था। राजा सूरसिंह का भाई किशनसिंह, सूरसिंह के वकील गोविंददास पर जिसने कुछ समय पूर्व किशनसिंह के भतीजे गोपालदास को मारा था, अप्रसन्न था। किशनसिंह को आशा थी कि इस अपराध के लिये सूरसिंह गोविंददास को मरवा देगा परंतु सूरसिंह ने गोविंददास की योग्यता का विचार करके ऐसा न किया। किशनसिंह ने ऐसी दशा में स्वयं अपने भतीजे की हत्या का बदला लेने का निश्चय किया। जब किशनसिंह के भतीजे की मृत्यु को काफी दिन बीत गये तो उसने अपने अनुचरों को बुलाकर कहा कि आज रात को मैं गोविंददास को मार डालूंगा।

    सवेरा होने से कुछ समय पहले किशनसिंह अपने साथियों सहित राजा सूरसिंह के डेरे पर पहुँचा, जहाँ से उसने कुछ आदमियों को पहले गोविंददास के डेरे पर भेजा, जो निकट ही था। उन्होंने भीतर प्रवेश कर गोविंददास को उसके कई अनुचरों सहित मारा डाला। जब ये समाचार किशनसिंह को मिले तब वह भी उतावला होकर अश्वारूढ़ हो, साथियों के मना करने पर भी गोविंददास के डेरे में घुस गया। इस कोलाहल में सूरसिंह की नींद खुल गई और वह नंगी तलवार लेकर बाहर निकल आया। उसके अनुचर भी जागकर चारों तरफ से दौड़े। किशनसिंह और उसके साथियों के अंदर पहुँचते ही वे उन पर टूट पड़े।

    फलस्वरूप किशनसिंह और उसका भतीजा करण वहीं मारे गये। सूरसिंह के 30 आदमी और किशनसिंह की तरफ के 36 आदमी मारे गये। दिन निकलने पर इस बात का पता चला और राजा सूरसिंह ने अपने भाई, भतीजे एवं कई प्रिय अनुचरों को मरा हुआ पाया। इस घटना के बाद जहाँगीर ने सूरसिंह को खुर्रम की सहायता के लिये मेवाड़ भेज दिया। मेवाड़ में कार्य पूर्ण हो जाने के बाद सूरसिंह पुनः अजमेर आया। उसने जहाँगीर को दो हाथी, 100 मोहरें तथा तेतालीस हजार रुपये भेंट किये।

    टॉमस रो अजमेर में

    10 जनवरी 1616 को ब्रिटिश सम्राट चार्ल्स प्रथम का राजदूत सर टॉमस रो जहाँगीर की सेवा में अजमेर में उपस्थित हुआ। (हर बिलास शारदा ने यह तिथि 23 दिसम्बर 1615 बताई है।) टॉमस रो ने अपनी डायरी में लिखा है कि बादशाह पुराने शहर में रहता था। केवल उसी का मकान पक्का था, अजमेर में कच्चे घरों की संख्या बहुत ज्यादा थी जो बरसात में गिर जाया करते थे। उसने ख्वाजा की दरगाह, अढाई दिन का झौंपड़ा, दरगाह बाजार तथा शहर परकोटे का उल्लेख तक नहीं किया है। जब टॉमस रो अजमेर पहुँचा तो सूरत में ब्रिटिश कम्पनी के ऐजेन्ट मि. एडवर्ड ने टॉमस रो का अजमेर में स्वागत किया।

    टॉमस रो लिखता है- उस समय कुछ क्रिश्चियन परिवार अजमेर में रहते थे जो सूरत कम्पनी के हितों की रक्षा के लिये मुगल दरबार से निरन्तर सम्पर्क बनाये रहते थे। अंग्रेज कम्पनी के ये अधिकारी फ्रेंच, पोर्चुगीज, डच तथा अन्य विदेशी व्यापारियों से स्पर्धा में आगे रहने के लिये मुगलों की हाजरी बजाया करते थे। टॉमस रो ने कुछ स्थानीय क्रिश्चियन परिवारों का भी उल्लेख किया है जो संभवतः पहले हिन्दू या मुसलमान थे और अंग्रेजों के रहन-सहन से प्रभावित होकर क्रिश्चियन बन गये थे।

    जिस समय टॉमस रो भारत आया, उस समय अजमेर में मास्टर एडवर्ड्स के अधीन एक कारखाना चलता था जो सूरत के कारखाने के अधीन था। टॉमस रो एक साल तक अजमेर में रहा। वह जहाँगीर से, भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त करना चाहता था। जहाँगीर के साथ उसका पहला साक्षात्कार 19 जनवरी 1616 को हुआ। जहाँगीर ने उसे कोई महत्त्व नहीं दिया। यहाँ तक कि जहाँगीर ने अपनी पुस्तक में टॉमस रो का उल्लेख तक नहीं किया है। जहाँगीर की आज्ञा से भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को व्यापार करने की अनुमति मिली। 19 अगस्त 1616 को सर टॉमस रो का सचिव सम्मानित जॉन हॉल, अजमेर में मृत्यु को प्राप्त हो गया। यह अजमेर में मरने वाला दूसरा यूरोपियन था। टॉमस रो के अजमेर प्रवास की पूर्ण जानकारी दी एम्बेसी ऑफ सर टॉमस रो नामक पुस्तक में दी गई है।

    कुंवर कर्णसिंह अजमेर में

    16 फरवरी 1616 को उदयपुर का राजकुमार कर्णसिंह जहाँगीर के अजमेर दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने उसे 2 लाख रुपये, पांच हाथी और 110 घोड़े देकर 5 जून को पुनः विदा कर दिया। इसी वर्ष जहाँगीर ने अजमेर में वीसल झील की मरम्मत करवाई। इसी वर्ष जहाँगीर ने पुष्कर में दो घाटों का निर्माण करवाया। इस आशय के शिलालेख आज भी इन घाटों पर लगे हुए हैं।

    ब्राह्मणों को पुष्कर का पट्टा

    24 जून 1616 को अजमेर में शाहजहाँ के पुत्र शुजा का जन्म हुआ। ई.1616 में जहाँगीर ने अजमेर दरबार में राठौड़ राजकुमार कुंवर गजसिंह को जालोर का परगना दिया जो अब तक बिहारी मुसलमानों के अधीन था। गजसिंह ने बिहारी पठानों को परास्त कर जालोर पर अधिकार कर लिया। पठान भागकर पालनपुर चले गये जिन्होंने पालनपुर में मुस्लिम रियासत स्थापित की जो भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही। इसी वर्ष जहाँगीर ने ब्राह्मणों को पुष्कर की जागीर का पट्टा प्रदान किया।

    मेरों ने जहाँगीर का डेरा लूटा

    10 नवम्बर 1616 को जहाँगीर अजमेर से माण्डू के लिये रवाना हुआ। जहाँगीर के शासन काल में अजमेर के दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व में 650 वर्ग मील क्षेत्र की लम्बी पट्टी के रूप में स्थित मेरवाड़ा मुगलों के अधीन नहीं था। इस अनुपजाऊ पहाड़ी क्षेत्र में मेर जाति निवास करती थी जो मुख्यतः डाके डाल कर जीवन यापन करती थी। ई.1616 में जब जहाँगीर अजमेर से दक्षिण की ओर रवाना हुआ तो उसको अपना शिविर मेर क्षेत्र में लगाना पड़ा। मेरों ने इस शिविर पर डाका डाला और उसे लूट लिया। मेरों को मेवाड़, मारवाड़, जयपुर तथा अजमेर के शासक भी नियन्त्रित नहीं कर पाये। कई बार मेरों के गांव जलाये गये और उनके सरदारों को पकड़कर कत्ल किया गया। 19 दिसम्बर 1616 को पर्सिया का राजदूत मुहम्मद राजबेग अजमेर में जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। इसी वर्ष 1 दिसम्बर को सर टॉमस रो इंग्लैण्ड वापिस लौट गया। उसने रामसर में विश्राम किया।

    जहाँगीर ने अजमेर नगर की बसावट में कोई परिवर्तन नहीं किया। उसने आनासागर के बांध को मजबूत बंधवाकर उस पर संगमरमर के भवन बनवाए और इसके पूर्व में एक उद्यान लगवाया जिसे अकबर द्वारा निर्मित दौलतखाना के नाम पर दौलत बाग कहा गया। आजादी के बाद से इसे सुभाष बाग कहते हैं। ई.1618 में जहाँगीर ने करीमदाद खां को अजमेर का फौजदार बनाया। ई.1623 में जहाँगीर ने मुहम्मद मुराद को अजमेर का फौजदार बनाया। ई.1624-25 में उसने अजमेर की फौजदारी सार्दुलसिंह को सौंपी। ई.1626 में मिर्जा अब्दुर्रहीम खानखाना को तथा ई.1627 में मिर्जा मुन्नू को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • गोरे हमेशा के लिये देश छोड़ कर चले गये

     03.06.2020
    गोरे हमेशा के लिये देश छोड़ कर चले गये

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लॉर्ड माउण्टबेटन ने चीफ ऑफ दी स्टाफ लॉर्ड इस्मे तथा जार्ज एबेल से कैबीनेट योजना के अंतर्गत भारत विभाजन पर आधारित एक योजना बनवायी जिसमें प्रस्ताव किया गया कि हिन्दू एवं मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माण हो। यदि किसी ब्रिटिश भारतीय प्रांत की जनता चाहे तो भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी के भी साथ मिलने से इंकार कर अपने प्रदेश को स्वतंत्र राज्य भी बना सकती है।

    ऐसा करने के पीछे माउंटबेटन का तर्क यह था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान। प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये पूर्ण स्वतंत्र रहे। जो प्रजा पाकिस्तान में मिलना चाहे, वह पाकिस्तान में मिले, जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। ऐसा बंगाल की स्थिति को देखते हुए किया गया था। क्योंकि आबादी के अनुसार पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में तथा पश्चिमी बंगाल को भारत में शामिल होना था किंतु इस प्रावधान से पूर्वी बंगाल चाहता तो पाकिस्तान में न मिलकर अलग देश बन सकता था।

    2 मई 1947 को लार्ड इस्मे तथा जार्ज एबेल भारत विभाजन की योजना लेकर मंत्रिमंडल की सहमति प्राप्त करने वायसराय के विशेष विमान से लंदन गये। इसी के साथ माउंटबेटन ने एटली सरकार को अपना पांचवा प्रतिवेदन भेजा जिसमें लिखा था- विभाजन केवल पागलपन है। अगर इन अविश्वसनीय कौमी दंगों ने एक-एक व्यक्ति को वहशी न बना दिया होता, अगर विभाजन का एक भी विकल्प ढूंढ सकने की स्थिति होती तो दुनिया का कोई व्यक्ति मुझे इस पागलपन को स्वीकार करने के लिये बहका न सकता। विश्व के सामने स्पष्ट रहना चाहिये कि ऐसे दीवानगी भरे फैसले की पूरी जिम्मेदारी भारतीय कंधों पर है, क्योंकि एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब स्वयं भारतीय अपने इस फैसले पर बुरी तरह पछतायेंगे। बड़ी विचित्र बात थी कि जिन भारतीय नेताओं को माउंटबेटन ने भारत विभाजन के लिये बड़ी मुश्किल से तैयार किया था, उन्हीं भारतीय नेताओं पर माउंटबेटन ने भारत विभाजन का आरोप रख दिया। माउंटबेटन को अपने प्रतिवेदन में ''भारतीयों" शब्द का प्रयोग न करके ''लीगी नेता" शब्द प्रयुक्त करने चाहिये थे।

    यह भी विचित्र बात थी कि इंगलैण्ड भेजने से पहले यह योजना किसी भी हिंदुस्तानी नेता अथवा हिंदुस्तानी अधिकारी को नहीं दिखायी गयी थी क्योंकि माउंटबेटन का विश्वास था कि उसने इस योजना में उन सब बातों को शामिल कर लिया है जो बातें नेताओं से हुए विचार विमर्श के दौरान सामने आयीं थीं। योजना को स्वीकृति के लिये लंदन भेज दिये जाने के बाद माउंटबेटन जिन्ना की तरफ से आशंकित हो गया। उसे लगा कि जिन्ना छंटे हुए पाकिस्तान का विरोध करेगा। उसने जिन्ना से निबटने के लिये एक आपात योजना तैयार की कि यदि जिन्ना एन वक्त पर मुकर गया तो उस समय क्या किया जायेगा! इस आपात् योजना में मुख्यतः यह प्रावधान किया गया था कि चूंकि जिन्ना ने योजना को अस्वीकार कर दिया है इसलिये सत्ता वर्तमान सरकार को ही सौंपी जा रही है।

    वायसराय के प्रयास से 6 मई 1947 को नई दिल्ली में जिन्ना के निवास पर गांधीजी ने भेंट की। उन दोनों के बीच भारत का वह नक्शा रखा गया जिसमें पाकिस्तान हरे रंग से दिखाया गया था। इस भेंट के बाद जिन्ना ने एक परिपत्र जारी किया जिसमें कहा गया कि मि. गांधी बंटवारे के सिद्धांत को नहीं मानते हैं, उनके लिये बंटवारा अनिवार्य नहीं है जबकि मेरी दृष्टि में वह अनिवार्य है।

    10 मई 1947 को लंदन से इस्मे योजना मंत्रिमंडल की स्वीकृति के साथ तार से वापस आ गयी। वायसराय ने यह योजना जवाहरलाल नेहरू को दिखायी। नेहरू ने इस योजना को मानने से इन्कार कर दिया। माउंटबेटन योजना में देशी रियासतों के साथ-साथ ब्रिटिश भारतीय प्रांतों कों भी अपनी मर्जी से भारत या पाक में मिलने अथवा स्वतंत्र रहने की छूट दे दी गयी थी। यदि इस प्रस्ताव को मान लिया जाता तो भारत की दशा योरोप के बलकान प्रदेशों से भी अधिक गई गुजरी हो जाती। नेहरू के नाराज हो जाने पर वायसराय की हालत खराब हो गयी। वायसराय ने वी. पी. मेनन से एक ऐसी योजना बनाने को कहा जिसे इंगलैण्ड सरकार सहित सभी पक्ष स्वीकार कर लें।

    वायसराय के अनुरोध पर मेनन ने एक नयी योजना बनायी। मोसले ने लिखा है कि उस समय तक दिन के दो बज चुके थे। मेनन नयी योजना बनाने के लिये बैठ गया। उसने शाम छः बजे तक अर्थात् चार घंटे में पूरी योजना को नये सिरे से तैयार कर दिया। मोसले ने लिखा है कि जिस योजना से हिंदुस्तान और दुनिया की शक्ल बदल जाने वाली थी उसे एक आदमी ने मात्र चार घण्टे में तैयार किया। इस योजना में कहा गया था कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों को अनिवार्यतः भारत या पाकिस्तान में मिलना पड़ेगा। देशी राज्य चाहें तो इनमें से किसी भी देश के साथ मिल जायें या फिर अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर लें। देशी राज्यों को किसी भी संघ में मिलने पर केवल तीन विषय रक्षा, संचार एवं विदेशी मामले संघीय सरकार को सौंपने होंगे, शेष मामलों में देशी राज्य स्वतंत्र होंगे।

    इस योजना को नेहरू तथा माउंटबेटन दोनों ने स्वीकार कर लिया। माउंटबेटन इस योजना को लेकर स्वयं लंदन गये और न केवल प्रधानमंत्री एटली से अपितु विपक्ष के नेता चर्चिल से भी योजना की स्वीकृति ले आये। 3 जून 1947 को माउंटबेटन ने यह योजना कांग्रेसी नेताओं, मुस्लिम लीगी नेताओं तथा देशी राज्यों के राजाओं को दिखायी तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त कर उसी दिन रेडियो से भारत विभाजन की योजना स्वीकार कर लिये जाने की घोषणा कर दी। अगले दिन एक प्रेस कान्फ्रेंस में माउंटबेटन ने 15 अगस्त को सत्ता हस्तांतरण किये जाने की तिथि घोषित की।

    माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है कि जब स्वतंत्रता पर विचार-विमर्श चल रहे थे, तब ब्रिटिश शासकों के पास इस बात पर विचार करने के लिये कोई समय नहीं था कि जब सत्ता का अंतिम रूप से स्थानांतरण हो जाये तब राजाओं को किस तरह से कार्य करना चाहिये! गोरी सरकार इस बात पर सुस्पष्ट थी कि देशी रजवाड़ों पर से परमसत्ता का हस्तांतरण किसी अन्य सरकार को नहीं किया जाना चाहिये क्येांकि कैबिनेट मिशन यह आशा एवं अपेक्षा प्रकट कर चुका था कि सभी रियासतें प्रस्तावित भारत संघ के साथ मिल जायेंगी।

    14 अगस्त के सूर्य अवसान के बाद रात्रि में 12 बजे अर्थात् 15 अगस्त को ठीक शून्य बजकर शून्य मिनट और शून्य सैकेण्ड पर भारत वर्ष आजाद हो गया। गोरे सदा से इस देश के लिये चले गये। उन्हें विश्वास नहीं था कि वे चले जायेंगे किंतु उन्हें जाना पड़ा। जाने से पहले उन्होंने भारत में रह गये अपने पाँच सौ छांसठ मित्रों के लिये एक सुरक्षित व्यवस्था स्थापित की। वे राजाओं के साथ धोखा नहीं कर सकते थे जिनके सहारे उन्होंने भारत में दो 
    सौ साल राज्य किया था। क्या थी यह व्यवस्था! क्या हुआ भारत की आजादी के बाद उन पाँच सौ छांसठ मित्रों का! कहाँ गये उनके ताज! क्या हुआ उनके तख्तों का! इन सब की कहानी जानने के लिए पढ़िये हमारी अगली पुस्तक राजशाही का अंत।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 50

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 50

    अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अहमदिया सम्प्रदाय एक धार्मिक आंदोलन है, जो अविभाजित भारत में 23 मार्च 1889 को आरम्भ हुआ। इस सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक मिर्जा गुलाम अहमद (ई.1835-1908) थे। उनके अनुयाई गुलाम अहमद को मुहम्मद के बाद एक और पैगम्बर एवं नबी मानते हैं जबकि इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार 'पैगम्बर मोहम्मद' ख़ुदा के भेजे हुए अन्तिम पैगम्बर हैं। पाकिस्तान में अहमदियाओं को मुसलमान नहीं, अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। इन्हें मिरजई मुसलमान भी कहा जाता है। अहमदिया समुदाय अल्लाह, कुरान शरीफ ,नमाज़, दाढ़ी, टोपी, बातचीत एवं जीवन-शैली आदि में मुसलमान प्रतीत होते हैं किंतु वे हज़रत मोहम्मद को अपना अंतिम पैगम्बर स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि नबुअत (पैगम्बरी ) की परंपरा अब भी जारी है। इस कारण अन्य मुस्लिम समुदायों के लोग सामूहिक रूप से इस समुदाय का घोर विरोध करते हैं। अहमदिया मुसलमानों को कादियानी भी कहा जाता है क्योंकि इनका आरम्भ पंजाब के गुरदासपुर जिले के कादियान कस्बे में हुआ था।

    भारत की आजादी से पहले अहमदिया नेता चौधरी जफरुल्ला खाँ द्वारा दो-राष्ट्र के सिद्धांत के पक्ष में दी गई सशक्त दलीलों के कारण मुहम्मद अली जिन्ना उससे अत्यंत प्रभावित था। जिन्ना ने चौधरी जफरुल्ला खाँ को 1947 में पाकिस्तान का पहला विदेश मंत्री बनाया। भारत विभाजन के बाद अधिकतर अहमदिया पाकिस्तान चले गए, लेकिन विभाजन के बाद से ही वहाँ उन पर अत्याचार होने लगे, जो धीरे-धीरे चरम पर पहुंच गए। पाकिस्तान में अब इन लोगों का अस्तित्व खतरे में है। अहमदिया खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन पाकिस्तान का कानून उन्हें मुसलमान नहीं मानता। पाकिस्तान में ई.1953 में पहली बार अहमदियों के खिलाफ दंगे हुए जिनमें सैकड़ों अहमदिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया।

    ई.1974 में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में पाकिस्तानी संसद ने अहमदियों को गैरमुस्लिम घोषित किया। इसके बाद पूरे पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ दंगे हुए। तब से यह समुदाय इस्लामिक देश पाकिस्तान में कानूनी और सामाजिक भेदभाव का शिकार है। उन्हें काफिर कहा जाता है। जब अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान पहुंचे तो उन्होंने पाकिस्तान के पंजाब सूबे में अपने लिए रबवा नामक अलग शहर बसाया। रबवा में 50 लाख से अधिक अहमदी रहते थे। ई.1974 में सुन्नी कट्टरपंथियों ने अहमदियों की दुकानें और घर लूट लिए और उनमें आग लगा दी। इस हिंसा में हजारों अहमदी मारे गए और कई हजार घायल हुए।

    पाकिस्तानी सरकार, पाकिस्तानी मुस्लिम समाज एवं आतंकवादी संगठनों द्वारा जुल्म ढाए जाने पर बहुत से अहमदिया पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैण्ड चले गए। अहमदियों का बहुत बड़ा समूह रबवा से पलायन करके चीन की सीमा पर शरणार्थी बनकर रहने लगा, शेष अहमदिया पाकिस्तान के भीतर ही रहकर अपने अस्तित्व को समाप्त होते हुए देख रहे हैं। 1980 के दशक में पाकिस्तान के सैनिक शासक जियाउल हक ने पाकिस्तान को पूरी तरह इस्लामिक मुल्क बनाया तब सरकार द्वारा अहमदियों के उपासना स्थल बंद कर दिए गए या ढहा दिए गए। अब वे अपनी इबादतगाहों को मस्जिद नहीं कह सकते। ई.1982 में राष्ट्रपति जिया उल हक ने पाकिस्तान के संविधान में फिर से संशोधन किया। इसके तहत अहमदियों पर पाबंदी लगा दी गई कि वे खुद को मुसलमान नहीं कह सकते और पैगंबर मुहम्मद की तौहीन करने पर मौत की सजा तय कर दी गई। उनके कब्रिस्तान अलग कर दिए गए। सरकारी आदेश पर अहमदियों की मस्जिदों को ढहा दिया गया। उनके कब्रिस्तान की कब्रों पर लिखी आयतें हटा दी गईं। इस कारण भारी संख्या में अहमदियों का पलायन हुआ। हजारों अहमदियों ने अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में शरण ली।

    28 मई 2010 में तालिबानी आतंकियों ने पाकिस्तान में 2 अहमदी मस्जिदों को निशाना बनाया। लाहौर की बैतुल नूर मस्जिद पर फायरिंग की गई, ग्रेनेड फेंके गए और कुछ आतंकी अपने शरीर पर बम बांधकर मस्जिद में घुस गए। इस हमले में 94 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। दूसरी मस्जिद दारुल जिक्र भी लाहौर की ही थी। यहाँ 67 अहमदी मारे गए। इसके बाद उन पर लगातार हमले होते रहे हैं। आज विश्व के 206 देशों में कई करोड़ अहमदी निवास करते हैं किंतु उनके अपने देश पाकिस्तान में अहमदियों की संख्या केवल 30 लाख बची है। भारत में 10 लाख, नाइजीरिया में 25 लाख और इंडोनेशिया में लगभग 4 लाख अहमदिया मुसलमान रहते हैं। अहमदिया मुसलमान सर्वाधिक संख्या में इंग्लैड में निवास करते हैं। यदि पाकिस्तान में किसी अहमदिया मुसमान को चोरी-छिपे सुन्नी कब्रिस्तान में दफना दिया जाता है तो उसके शव को कब्र एवं कब्रिस्तान दोनों से बाहर निकाल दिया जाता है। वर्ष 2000 के दशक में चंदासिंह गांव की शिक्षिका नादिया हनीफ के शव को इसी कारण से कब्र से बाहर निकाल दिया गया। इसी प्रकार यदि किसी स्कूल में चोरी-छिपे किसी अहमदिया बालक का नाम लिखवा दिया जाता है तो उसकी पहचान होते ही उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है और उसे किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में प्रवेश नहीं दिया जाता।कुछ साल पहले मानसेरा नामक गांव के हाईस्कूल में एक अहमदी छात्र रहील अहमद के नाम में कादियानी जोड़ दिया गया इस कारण उसे पाकिस्तान की किसी भी यूनिवर्सिटी ने आगे पढ़ने के लिए प्रवेश नहीं दिया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 24

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 24

    शाहजहाँ


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1627 में राजौरी में जहाँगीर की मृत्यु हो गई। उस समय खुर्रम दक्षिण में था। जहाँगीर की मृत्यु का समाचार मिलते ही वह अहमदाबाद तथा गोगून्दा होता हुआ अजमेर आया तथा आनासागर झील के किनारे ठहरा। अजमेर में ही उसे समाचार मिला कि उसका भाई शहरयार गिरफ्तार कर लिया गया है जिसे नूरजहाँ बेगम आगरा के तख्त पर बैठाना चाहती थी। इस समाचार से खुर्रम का बादशाह बनना निश्चित हो गया। अतः खुर्रम ख्वाजा मोइनुद्दीन की दरगाह पर उपस्थित हुआ। वहाँ उसने संगमरमर की विशाल मस्जिद बनाने का आदेश दिया। उसने महाबत खां को अजमेर का साहिब-ए-सूबा (सूबेदार) नियुक्त किया व स्वयं आगरा जाकर शाहजहाँ के नाम से तख्त पर बैठ गया।

    ई.1628 में शाहजहाँ ने महाबतखां को तथा ई.1629 में हासुबखां को अजमेर का फौजदार (सूबेदार) नियुक्त किया। ई.1629-30 में मुताकब खां अजमेर का फौजदार नियुक्त हुआ। ई.1630 में इखलास खां हुसैनबेग को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया गया। ई.1631 में मिर्जा मुजफ्फर किरमानी को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया गया।

    बिट्ठलदास गौड़ को अजमेर की फौजदारी

    ई.1632 में श्रीनगर (अजमेर के निकट) के राजा बिट्ठलदास गौड़ को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया तथा उसे अजमेर से लेकर रणथंभौर के मध्य स्थित समस्त दुर्ग प्रदान किये। बिट्ठलदास ई.1637 तक अजमेर का फौजदार रहा। उसके पुत्र को अजमेर का नायब फौजदार बनाया गया। शाहजहाँ के काल में अजमेर सूबे में पर्याप्त शांति रही। शाहजहाँ ने उपद्रव करने वालों के विरुद्ध सख्ती से काम लिया। शाहजहाँ ने आमेर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह को चाटसू तथा अजमेर के परगने प्रदान किये। 4 नवम्बर 1632 को शाहजहाँ ने मिर्जा राजा जयसिंह को निर्देश दिये कि माघ पुत्र कंकार कच्छवाहा के भतीजे रतनसिंह ने अनुरोध किया है कि वह परगना रोशनपुर व नारायणा सूबा अजमेर में जागीरदार है जिसमें केसरीसिंह एवं कल्याणदास राजपूत जमींदार, आतंकित करके उक्त परगनों में अकारण हस्तक्षेप करते हैं और वादी के कुछ व्यक्तियों को बिना त्रुटि के मार दिया है। अतः राजा जयसिंह उपद्रवियों को उद्दण्डता करने से रोकें और वतन से बाहर निकाल दें। ई.1636 में शाहजहाँ ने अकबर की दरगाह में जामा मस्जिद का निर्माण किया। ख्वाजा की दरगाह का वर्तमान गुम्बद, सफेद संगमरमर से, शाहजहाँ ने ही बनवाया।

    आनासागर पर निर्माण कार्य

    ई.1636-37 में राजा भीमसिंह सियोदिया अजमेर का फौजदार हुआ तथा अगले ही वर्ष ई.1637-38 में सयैद बाघा को अजमेर की फौजदारी मिली। शाहजहाँ ने कई बार अजमेर की यात्रा की। उसके आदेश पर आनासागर झील के किनारे 1240 फुट लम्बी दीवार बनवाई गई तथा संगमरमर के पांच मण्डप तथा तुर्की शैली के स्नानागार बनाये गये जो ई.1637 में बनकर तैयार हुए। इनमें से तीसरे नम्बर का मण्डप दिल्ली किले के दीवाने खास की अनुकृति है। मुआसिरउलउमरा के अनुसार जहाँगीर ने अजमेर तथा अहमदाबाद में भवन निर्माण पर 10 लाख रुपये व्यय किये जबकि ताजमहल के निर्माण पर 50 लाख रुपये व्यय हुए थे। शाहजहाँ अजमेर में आनासागर के किनारों पर बने महलों में रहा करता था। शाहजहाँ के शासन काल में अजमेर में कुछ सिक्के ढाले गये।

    शाहजहाँ की अंतिम अजमेर यात्रा

    ई.1638-47 की अवधि में शाह अली अजमेर का फौजदार रहा। ई.1640 में मीरक मुइनुद्दीन अहमद को अजमेर का बक्शी नियुक्त किया गया। उसे अजमेर सूबे का समाचार लेखक भी बनाया गया। ई.1648 में नूरजहाँ के भाई के पुत्र मिर्जा अबू सईद को अजमेर का फौजदार बनाया गया किन्तु बीमार होने के कारण वह कुछ ही दिन अजमेर में रुक कर आगरा चल गया। फिर भी वह ई.1651 तक इस पद पर बना रहा। ई.1653 में पृथ्वीसिंह राठौड़ को तथा ई.1654 में बहादुर को अजमेर का फौजदार बनाया गया। ई.1654 में शाहजहाँ ने असद उल्लाह खां के नेतृत्व में एक सेना भेजकर चित्तौड़ दुर्ग में हुए नव निर्माण को नष्ट करने के आदेश दिये। अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिये शाहजहाँ स्वयं भी अजमेर आ गया। यह उसकी आखिरी अजमेर यात्रा थी। शाहजहाँ के समय में अजमेर सूबे का राजस्व डेढ़ करोड़ रुपये हो गया। ई.1655-1656 में पहले राजा रूपसिंह को और बाद में रामसिंह को फौजदार बनाया गया। ई.1657-58 में मिर्जाजार अस्तराबदी को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया गया।

    शाहजहाँ कालीन अजमेर

    शाहजहाँ ने अजमेर नगर के चारों ओर के परकोटे का जीर्णोद्धार करवाया तथा इसका विस्तार भी करवाया। उसने परकोटे में स्थित चांदपोल दरवाजा, देहली दरवाजा, कड़क्का चौक के पूर्वी सीमा वाला दरवाजा, मदार दरवाजा और डिग्गी से पचास कदम उत्तर की तरफ का दरवाजा बनवाया। (यह दरवाजा ई.1885 में तोड़ गया।) अब यह नया परकोटा ही नगर की सीमा बन गया। इस परकोटे के बनने से अजमेर नगर की सूरत बदल गई किंतु इस नगर में न तो सड़कें थीं न कोई नगर पालिका थी।

    मल-मूत्र से भरे हुए पीपे और कनस्तर गली कूंचों में दिखाई देते थे। न पत्थरों का फर्श था, न कोई पुलिस वाला गलियों में फिरता हुआ दिखाई देता था। न इक्के चलते थे न किराये की सेज गाड़ियां थीं। शहर में सड़कों की जगह मनों रेता पड़ा हुआ था जिसमें पेशाब और पानी शोषित हो जाता था। रात को खबरदार-खबरदार की आवाज शहर की सफीलों (परकोटे) से सुनाई देती थी। दरगाह के नौबतखाने के अलावा शाही सूबेदार के दरवाजे पर नौबतें कड़कती थीं। शहर परकोटे के अंदर खंदकें थीं। इन खंदकों में शहर के लोग पाखाना फिरते थे। (ये खाइयां ई.1894 में पाट दी गईं।) उस समय नया बाजार, पुरानी मण्डी और डिग्गी के निकट ऊसरी दरवाजे का भीतरी भाग पूरी तरह वीरान था।

    मदार के पेड़ बहुत अधिक थे, जिन्हें गधे चरा करते थे। शहर के बाहर किसी फकीर की कुटी के अतिरिक्त और कोई मकान न था। अब्दुल्लाहपुरा की सराय सूनी पड़ी रहती थी। (उन्नीसवीं शताब्दी में इस सराय के निकट मदार दरवाजे के अंदर महाजनों की बस्ती हो गई थी।)शहर की सराय मुसाफिरों के लिये थी। अजमेर नगर की यह स्थिति ब्रिटिश शासन आरंभ होने तक रही।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अध्याय- 6 : बीकानेर, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर राज्यों का भारतीय संघ में विलय

     03.06.2020
    अध्याय- 6 : बीकानेर, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर राज्यों का भारतीय संघ में विलय

    अध्याय- 6


    बीकानेर, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर राज्यों का भारतीय संघ में विलय

    मेरी इच्छा मेरे पूर्वजों ने निश्चित कर दी थी। यदि वे थोड़े भी डगमगाये होते तो वे हमारे लिये हैदराबाद जितनी ही रियासत छोड़ जाते। उन्होंने ऐसा नहीं किया और न मैं करूंगा। मैं हिन्दुस्तान के साथ हूँ। - महाराणा भूपालसिंह।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 8 के अनुसार देशी राज्यों पर से 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जानी थी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जानी थी। इस कारण देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिये स्वतंत्र थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अधिकांश राज्य, हिंदू राज्य थे। राजपूताना में भी यही स्थिति थी। केवल टोंक राज्य में मुस्लिम शासक का शासन था किंतु वहाँ भी जनसंख्या हिन्दू बहुल थी। अतः जातीय आधार पर भारत तथा राजपूताना के राज्य और उनकी जनता ब्रिटिश भारत के हिंदू बहुल क्षेत्र से जुड़े हुए थे।

    कांग्रेस का मानना था कि जब ब्रिटिश सरकार सत्ता का हस्तांतरण भारत सरकार को कर रही है तब देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता स्वतः ही भारत सरकार को स्थानांतरित हो जायेगी। यद्यपि छोटे राज्यों के पास भारत संघ में मिल जाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था तथापि बड़े एवं सक्षम राज्यों की स्थित अलग थी। त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं कश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। अलवर नरेश ने 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में आयोजित नरेंद्रमंडल की बैठक में कहा कि देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये। 5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने के निर्णय की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। जम्मू एवं कश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूह के द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किये जाने की संभावना थी।

    भारत के विभाजन के पश्चात् देश में रह गयीं 562 छोटी बड़ी रियासतों के शासकों की महत्त्वाकांक्षायें देश की अखण्डता के लिये खतरा बन गयीं। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर तथा बाद में स्वतंत्र भारत में ब्रिटेन के प्रथम हाई कमिश्नर सर आर्चिबाल्ड नेई को रजवाड़ों के साथ किसी प्रकार की संधि होने में संदेह था। माउंटबेटन ने सरदार पटेल से कहा कि यदि राजाओं से उनकी पदवियां न छीनी जायें, महल उन्हीं के पास बने रहें, उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त रखा जाये, प्रिवीपर्स की सुविधा जारी रहे तथा अंग्रेजों द्वारा दिये गये किसी भी सम्मान को स्वीकारने से न रोका जाये तो वायसराय राजाओं को इस बात पर राजी कर लेंगे कि वे अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलीन करें और स्वतंत्र होने का विचार त्याग दें। पटेल ने माउंटबेटन के सामने शर्त रखी कि वे माउंटबेटन की शर्त को स्वीकार कर लेंगे यदि माउंटबेटन सारे रजवाड़ों को भारत की झोली में डाल दें। तेजबहादुर सप्रू का कहना था कि मुझे उन राज्यों पर, चाहे वह छोटे हों अथवा बड़े, आश्चर्य होता है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे समझते हैं कि वे इस तरह से स्वतंत्र हो जायेंगे और फिर अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखेंगे। दुर्दिन के मसीहाओं ने भविष्यवाणी की थी कि हिंदुस्तान की आजादी की नाव रजवाड़ों की चट्टान से टकरायेगी।

    भारत को स्वतंत्र किये जाने की घोषणा के बाद लंदन इवनिंग स्टैण्डर्ड में कार्टूनिस्ट डेविड लॉ का एक कार्टून श्ल्वनत ठंइपमे छवूश् शीर्षक से छपा था जिसमें भारत के राष्ट्रीय नेताओं के समक्ष भारतीय राजाओं की समस्या का सटीक चित्रण किया गया था। इस कार्टून में नेहरू तथा जिन्ना को अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे हुए दिखाया गया था जिनकी गोद में कुछ बच्चे बैठे थे। ब्रिटेन को एक नर्स के रूप में दिखाया गया था जो यूनियन जैक लेकर दूर जा रही थी। नेहरू की गोद में बैठे हुए बच्चों को राजाओं की समस्या के रूप में दिखाया गया था जो नेहरू के घुटनों पर लातें मार कर चिल्ला रहे थे।

    जिन्ना का षड़यंत्र

    एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिये ऐसा करना सुविधाजनक था क्योंकि प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में देशी राज्यों की संख्या केवल 3 थी। जबकि 562 रियासतें प्रस्तावित भारत संघ की सीमा के भीतर स्थित थीं। जिन्ना यह प्रयास कर रहे थे कि अधिक से अधिक संख्या में देशी रियासतें अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दें अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायें ताकि भारतीय संघ स्थायी रूप से दुर्बल बन सके। जिन्ना राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहते थे कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है।

    जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उन्होंने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया जा रहा था कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं।

    निजाम हैदराबाद के प्रति माउंटबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने कोरफील्ड और भोपाल नवाब का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे। महाराजा बड़ौदा ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा कि जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे। इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को महाराजा बड़ौदा स्वीकार किया।

    भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर राजा विनम्र देश सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये बनाया था, उसे भंग कर दिया गया। उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा।

    भोपाल नवाब का षड़यंत्र

    भोपाल नवाब हमीदुल्लाखां छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहे थे किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो तीसरे मोर्चे के नेता भोपाल नवाब ने अपनी मुट्ठी खोल दी और प्रत्यक्षतः विभाजनकारी मुस्लिम लीग के समर्थन में चले गये तथा जिन्ना के निकट सलाहकार बन गये। वे जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गये जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। रियासती मंत्रालय के सचिव ए. एस. पई ने पटेल को एक नोटशीट भिजवायी कि भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहे हैं।

    नवाब चाहते थे कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये। इसलिये उन्होंने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनायी कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य पाकिस्तान का अंग बन जाये। इस योजना में सबसे बड़ी बाधा उदयपुर और बड़ौदा की ओर से उपस्थित हो सकती थी। महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया।

    धौलपुर के राजराणा षड़यंत्र में सम्मिलित

    हमीदुल्लाखां ने धौलपुर महाराजराणा उदयभानसिंह को भी इस योजना में सम्मिलित कर लिया। उदयभानसिंह जाटों की प्रमुख रियासत के बहुपठित, बुद्धिमान एवं कुशल राजा माने जाते थे किंतु वे किसी भी कीमत पर धौलपुर को भारत संघ में मिलाने को तैयार नहीं थे। जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा महाराजराणा ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिये आमंत्रित किया। नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे।

    कोरफील्ड के दुष्प्रयास

    कोरफील्ड ने रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। कोरफील्ड चाहते थे कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें। बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना जितना मुश्किल हो सके बना दिया जाये। कोरफील्ड ने रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं तीन रास्ते हैं, वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। कोरफील्ड के प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे।

    रियासती विभाग का गठन

    5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग अस्तित्व में आया। कांग्रेस को आशा थी कि पार्टी का यह लौह पुरुष अपनी धोती समेट कर इनके पीछे पड़ जायेगा। हमीदुल्लाखां, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे। वी. पी. मेनन को पटेल का सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया। वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे। पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर और भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुआ। नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ जैसे सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी तथा भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरी शर्मा आदि अनुभवी लोग कार्य कर रहे थे। पटेल ने मेनन से कहा कि पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को वह अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनायें लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है।

    केवल तीन विषयों पर विलय

    आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। एक ओर कोरफील्ड अंग्रेजों की सत्ता समाप्ति से पहले रजवाड़ों से केंद्रीय सत्ता का विलोपन करने के काम में लगे हुए थे जिससे एक-एक करके सारी व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं। दूसरी ओर सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जिन्हें अंग्रेजों ने रद्द करना आरंभ कर दिया था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में कैसे बात की जाये? मेनन ने सरदार को सुझाव दिया कि राजाओं से केवल तीन विषयों में विलय के लिये कहा जाये। ये तीन विषय रक्षा, विदेशी मामले और संचार से सम्बन्धित थे। पटेल से अनुमति लेकर मेनन ने माउंटबेटन से इस कार्य में सहयोग मांगा। मेनन ने वायसराय से कहा कि यदि सारे रजवाड़े भारत में मिल जाते हैं तो विभाजन का घाव काफी कम हो जायेगा तथा यदि इस काम में माउंटबेटन ने सहयोग दिया तो भारत की जनता सदियों तक उनकी ऋणी रहेगी। माउंटबेटन ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

    5 जुलाई 1947 को पटेल ने राजाओं से अपील की कि वे 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। देशी राज्यों को सार्वजनिक हित के तीन विषय- रक्षा, विदेशी मामले और संचार संघ को सुपुर्द करने होंगे जिसकी स्वीकृति उन्होंने पूर्व में केबीनेट मिशन योजना के समय दे दी थी। भारतीय संघ इससे अधिक उनसे और कुछ नहीं मांग रहा। संघ देशी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं रखता। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता उसको हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उसकी भूल होगी। परमोच्चता तो जनता में निहित है। एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित हो जाने का निमंत्रण था। सरदार के शब्दों में यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधि से बेहतर था।

    इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय के लिये पहला पांसा फैंका गया जिसका परिणाम यह हुआ कि बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का एक बार फिर तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और कांग्रेस को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

    सम्मिलन प्रपत्र

    रियासती विभाग ने देशी राज्यों के भारत अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के लिये दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये- प्रविष्ठ संलेख (Instrument of Accession) तथा यथास्थिति समझौता पत्र ( Standstill Agreement) प्रविष्ठ संलेख एक प्रकार का मिलाप पत्र (Joining Letter) था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में प्रवेश कर सकता था और अपना आधिपत्य केंद्र सरकार को समर्पित कर सकता था। यह प्रविष्ठ संलेख उन बड़ी रियासतों के लिये तैयार किया गया था जिनके शासकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। इन रियासतों की संख्या 140 थी। इन रियासतों के अतिरिक्त गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 300 रियासतें ऐसी थीं जिन्हें जागीर (Estates) अथवा तालुका कहा जाता था। इनमें से कुछ जागीरों व तालुकों को 1943 में संलग्नता योजना (Attachment Scheme) के तहत निकटवर्ती बड़े राज्यों के साथ जोड़ दिया गया था किंतु परमोच्चता की समाप्ति के साथ ही यह योजना भी समाप्त हो जानी थी। अतः इन ठिकानों एवं तालुकों के ठिकानेदारों एवं तालुकदारों ने मांग की कि उन्हें वर्ष 1943 वाली स्थिति में ले आया जाये तथा उनकी देखभाल भारत सरकार द्वारा की जाये जैसी कि राजनीतिक विभाग द्वारा की जाती रही थी। इन ठिकानों एवं तालुकों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया। काठियावाड़, मध्य भारत तथा शिमला हिल्स में 70 से अधिक राज्य ऐसे थे जिनका पद ठिकानेदारों और तालुकदारों से बड़ा था किंतु उन्हें पूर्ण शासक का दर्जा प्राप्त नहीं था। ऐसे राज्यों के लिये अलग से प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया।

    स्टैण्डस्टिल एग्रीमेण्ट प्रशासनिक एवं आर्थिक सम्बन्धों की यथास्थिति बनाये रखने के लिये सहमति पत्र था। भारत सरकार ने निर्णय किया कि वह उसी राज्य के साथ यथास्थिति समझौता करेगी जो राज्य, प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करेगा। इन दोनों प्रकार के प्रपत्रों को वायसराय ने 25 जुलाई 1947 की बैठक में उन देशी राज्यों के शासकों को दे दिया जो भारत की सीमा में पड़ने वाले थे क्योंकि जिन्ना ने वायसराय को कह दिया था कि पाकिस्तान की सीमा में आने वाले राज्यों से वे स्वयं बात करेंगे।

    राजाओं का वास्तविकता से साक्षात्कार

    25 जुलाई 1947 को वायसराय ने दिल्ली में नरेंद्र मण्डल का पूर्ण अधिवेशन बुलाया। माउंटबेटन द्वारा क्राउन रिप्रजेण्टेटिव के अधिकार से बुलाया जाने वाला यह पहला और अंतिम सम्मेलन था। सम्मेलन में उपस्थित लगभग 75 बड़े राजाओं अथवा उनके प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए माउंटबेटन ने कहा कि भारत स्वतंत्रता अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 से राज्यों को ताज के प्रति उनके दायित्वों से स्वतंत्र कर दिया है। राज्यों को तकनीकी एवं कानूनी रूप से पूरी संपूर्ण स्वतंत्रता होगी....किंतु ब्रिटिश राज के दौरान साझा हित के विषयों के संबध में एक समन्वित प्रशासन पद्धति का विकास हुआ है जिसके कारण भारत उपमहाद्वीप ने एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य किया। वह सम्पर्क अब टूटने को है। यदि इसके स्थान पर कुछ भी नहीं रखा गया तो उसका परिणाम अस्तव्यस्त्ता ही होगा। उसकी पहली चोट राज्यों पर होगी। उपनिवेश सरकार से आप उसी प्रकार नाता नहीं तोड़ सकते जिस प्रकार कि आप जनता से नाता नहीं तोड़ सकते, जिसके कल्याण के लिये आप उत्तरदायी हैं।

    राज्य तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार पर भारत या पाकिस्तान, जो उनके लिये उपयुक्त हो, के साथ अपना विलय कर लें। राज्यों पर कोई वित्तीय जवाबदेही नहीं डाली जायेगी तथा उनकी संप्रभुता का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। उन्होंने हिन्दू बहुल क्षेत्रों के राजाओं को सलाह दी कि वे अपने राज्यों का विलय भारत में करें।

    प्रविष्ठ संलेख प्रारूप को स्वीकृति

    वायसराय ने एक वार्त्ता समिति का गठन किया जिसमें 10 राज्यों के शासक तथा 12 राज्यों के दीवान सम्मिलित किये गये। यह समिति दो उपसमितियों में विभक्त हो गयी। एक उपसमिति को प्रविष्ठ संलेख पर तथा दूसरी उपसमिति को यथास्थिति समझौता पत्र पर विचार विमर्श करना था। इन दोनों उपसमितियों ने 25 जुलाई से 31 जुलाई तक प्रतिदिन दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में अलग-अलग बैठकें कीं। लगातार छः दिन एवं रात्रियों तक परिश्रम करने के बाद दोनों दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा सका। 31 जुलाई 1947 को दोनों प्रारूप स्वीकार कर लिये गये।

    राजाओं के विशेषाधिकारों की संवैधानिक गारण्टी

    अधिकांश राजाओं को डर था कि आजादी के बाद या तो उनकी जनता ही उनकी संपत्तियों को लूट लेगी अथवा कांग्रेस सरकार उसे जब्त कर लेगी। ब्रिटिश सत्ता आजादी के बाद किसी भी तरह राजाओं की रक्षा नहीं कर सकती थी। उनमें से अधिकांश को समझ में आने लगा था कि या तो अत्यंत असम्मानजनक तरीके से हमेशा के लिये मिट जाओ या फिर किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पत्तित तथा कुछ अधिकारों को बचा लो। 31 जुलाई 1947 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासती मंत्रालय के सचिव को एक पत्र लिखकर विशेषाधिकारों की मांग की। रियासती मंत्रालय के सचिव ने महाराजा को लिखा कि नेरशों के व्यक्तिगत विशेषाधिकारों के विषय में हमने केन्द्र सरकार के समस्त सम्बंधित विभागों से राय ली है और मुझे यह आश्वासन देने का निर्देश हुआ है कि नरेशगण व उनके परिवार जिन विशेषाधिकारों का उपयोग करते आये हैं, वह भविष्य में भी करते रहेंगे। बीकानेर महाराजा ने इस पत्र की प्रतियां बहुत से राजाओं को भिजवायीं। जोधपुर महाराजा इस पत्र से आश्वस्त नहीं हुए किंतु उन्होंने केन्द्र सरकार से किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं की। उनका मानना था कि प्रजा के साथ पीढ़ियों पुराने व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होने तथा अपने पूर्वजों द्वारा प्रजा की भलाई के लिये किये गये असंख्य कार्यों के कारण उन्हें प्रजा का सौहार्द्र मिलता रहेगा और यही उनका सबसे बड़ा विशेषाधिकार होगा।

    शासकों द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

    सरदार पटेल की अपील, माउंटबेटन द्वारा नरेंद्रमंडल में दिये गये उद्बोधन, कोरफील्ड की रवानगी, रियासतों में चल रहे जन आंदोलन तथा बीकानेर नरेश को रियासती मंत्रालय के पत्र आदि परिस्थितियों के वशीभूत होकर राजपूताने के अधिकांश राजाओं ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। बीकानेर नरेश सादूलसिंह हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे। अधिकतर राज्यों, विशेषकर छोटे राज्यों, जिन्हें अपनी सीमाओं का पता था तथा वे ये भी जानते थे कि रोटी के किस तरफ मक्खन लगा हुआ है, स्वेच्छा से भारतीय संघ के अंतर्गत आ गये। न तो वे अर्थिक रूप से सक्षम थे और न ही आंतरिक अथवा बाह्य दबावों का विरोध करने की उनमें क्षमता थी। कई बुद्धिमान तथा यथार्थवादी राजाओं ने विरोध की व्यर्थता तथा शक्तिशाली भारत संघ की संविधान सभा की सदस्यता की सार्थकता को अनुभव किया तथा शालीनता पूर्वक भारत संघ में सम्मिलित हो गये। कुछ हंसोड़ एंव मजाकिया स्वभाव के थे वे भी संघ में धकेल दिये गये। कुछ राजा अपने घोटालों और कारनामों से डरे हुए थे, उन्हें भी बलपूर्वक संघ में धकेल दिया गया। राजनीतिक विभाग के मखमली दस्ताने युक्त हाथ, राजाओं की भुजाओं पर काम करते रहे।

    एक एक कर रजवाड़ों ने दस्तखत करने के लिये कतार लगा दी। कुछ रजवाड़ों ने अपना विलय स्वीकार तो किया किंतु बेहद रंजिश के साथ। मध्य भारत का एक राजा विलय के कागजात पर हस्ताक्षर करने के साथ लड़खड़ा कर गिरा और हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गयी। बड़ौदा का महाराजा दस्तखत करने के बाद मेनन के गले में हाथ डालकर बच्चों की तरह रोया। भोपाल ने सेंट्रल इण्डियन स्टेट्स का एक फेडरेशन बनाने का प्रयास किया किंतु वह असफल हो गया। राजपूत राजाओं ने भारतीय सेना के राजपूत सिपाहियों को आकर्षित करके रजवाड़ों की सेना में सम्मिलित कर लेने की आशा की थी किंतु यह आशा फलीभूत नहीं हुई।

    जब त्रावणकोर ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो स्टेट्स कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी ने महाराजा के खिलाफ आंदोलन किया। त्रावणकोर की पुलिस के साथ सड़कों पर मुठभेड़ हुई। 29 जुलाई को एक अनजान हमलावर ने सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर को छुरा मारकर बुरी तरह घायल कर दिया। रामास्वामी के चेहरे पर गहरी चोट आयी। हमलावर भागने में सफल रहा। इस हमले ने निर्णय कर दिया। महाराजा ने वायसराय को तार दिया कि वह दस्तखत करने को तैयार है। सरदार पटेल ने स्थानीय कांग्रेस कमेटी को तुरंत प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। इसका जादू का सा प्रभाव हुआ। राज्यों को सबक मिला। वे और अधिक संख्या में हस्ताक्षर करने लगे। इस हमले ने निजाम को हिला दिया। राजा लोगों के नष्ट होने के तीन कारण थे- एक तो वे राष्ट्रवादी थे, दूसरे वे कायर थे तथा तीसरा कारण यह था कि उनमें से अधिकांश मूर्ख थे और अपने ही पापाचार में नष्ट हो गये थे।

    हैदराबाद, त्रावणकोर, भोपाल, जोधपुर व इंदौर दस्तखत करने वालों में सम्मिलित नहीं हुए। वायसराय ने हैदराबाद के अतिरिक्त शेष समस्त रियासतों के शासक अथवा दीवान को वार्त्ता के लिये बुलाया।


    बीकानेर राज्य का भारत में विलय

    बीकानेर राज्य संविधान सभा में अपना प्रतिनिधि भेजने से लेकर भारत संघ में विलय की घोषणा के मामले में देश के समस्त देशी राज्यों में अग्रणी रहा किंतु महाराजा स्वतंत्र भारत में अपने अधिकारों को लेकर अत्यंत सतर्क थे।

    फिरोजपुर वाटर हैड वर्क्स का मामला

    ब्रिटिश सरकार की घोषणा के अनुसार भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित किये जाने वाले क्षेत्रों का निर्णय हिन्दू अथवा मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर किया जाना था। इस आधार पर पाकिस्तान ने पंजाब के फिरोजपुर स्थित 'वाटर हैड वर्क्स' पर भी अपना दावा जताया। इस नहर से बीकानेर राज्य की एक हजार वर्ग मील से अधिक भूमि सिंचित होती थी। महाराजा सादूलसिंह ने प्रधानमंत्री के. एम. पन्निकर, जस्टिस टेकचंद बक्षी और मुख्य अभियंता कंवरसेन को बीकानेर राज्य का पक्ष रखने के लिये नियुक्त किया। पन्निकर ने रियासती विभाग के मंत्री तथा विभाजन हेतु गठित उच्चस्तरीय परिषद के सदस्य सरदार पटेल पर इस बात के लिये दबाव डाला कि वे सुनिश्चत कर लें कि फिरोजपुर हैड वर्क्स पूर्णतः भारत सरकार द्वारा नियंत्रित रहेगा। महाराजा ने माउंटबेटन तथा पटेल को संदेश भिजवाया कि यदि फिरोजपुर हैड वर्क्स और गंगनहर का एक भाग पाकिस्तान में जाता है तो हमारे लिये पाकिस्तान में सम्मिलित होने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। 17 अगस्त 1947 को रेडक्लिफ ने फिरोजपुर हैड वर्क्स को भारत में बने रहने का निर्णय दिया।

    स्वतंत्र भारत में बीकानेर राज्य द्वारा अलग इकाई बने रहने के लिये प्रयास

    15 जुलाई 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने नेहरू को एक पत्र लिखा जिसमें 110 पैरागा्रफ थे। महाराजा ने लिखा कि प्रजा परिषद वाले राज्य में इस प्रकार का प्रचार कर रहे हैं कि निकट भविष्य में समस्त भारत में गांधी राज हो जायेगा और भारतीय राज्य भी उन में मिला लिये जायेंगे। तिरंगा ही एकमात्र झण्डा होगा। जबकि वास्तविकता तो यह है कि न तो गांधीजी के ऐसे विचार हैं और न ही भारतीय राज्य भारत में अपने अस्तित्व को सम्मिलित करने जा रहे हैं। इस पत्र से यह आभास होता है कि बीकानेर नरेश भले ही जोर-शोर से भारत संघ में मिलने की घोषणा कर रहे थे किंतु वे यह आश्वासन भी चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में उनकी रियासत पूरी तरह स्वतंत्र बनी रहेगी।

    बीकानेर द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

    6 अगस्त 1947 को सादूलसिंह ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये। यथास्थिति समझौता पत्र पर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्न्किर द्वारा हस्ताक्षर किये गये। रियासती विभाग ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वायसराय और सरदार पटेल ने महाराजा द्वारा निर्वहन की गयी भूमिका के प्रति आभार व्यक्त किया है। संक्षिप्त अवधि में ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करके महाराजा ने भारत तथा राज्यों के समान हित के लिये त्याग किया है। वायसराय तथा सरदार ने आशा व्यक्त की है कि इस विलय पत्र के माध्यम से प्रस्तुत उदाहरण से, आने वाले समय में भारत तथा राज्यों के मध्य सहयोग का एक नया युग आरंभ होगा जो संपूर्ण देश को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से मजबूत बनायेगा। बाद में ऐसे ही पत्र प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य समस्त राज्यों के शासकों को भी भिजवाये गये। इस प्रविष्ठ संलेख के द्वारा महाराजा ने रक्षा, संचार और विदेश मामलों पर अपनी सारी सत्ता केंद्र सरकार को सौंप दी और शेष विषयों में महाराजा ने अपने आप को स्वतंत्र मान लिया। अधिकांश रियासतों ने भवितव्य के आगे सिर झुका कर प्रविष्ठ संलेख पर दस्तखत कर दिये। इनमें सबसे पहला बीकानेर का महाराजा था, जो वायसराय का पुराना दोस्त था। बड़े नाटकीय अंदाज में उसने हस्ताक्षर किये।

    15 अगस्त 1947 को महाराजा ने एक भाषण में कहा कि ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के साथ भारतीय रियासतों को यह छूट थी कि वे अलग रहें और नये राष्ट्र के साथ सम्बन्धित होने से मना कर दें। कानूनी दृष्टि से आज हम समस्त स्वतंत्र हो सकते हैं क्योंकि हमने ब्रिटिश साम्राज्य को आधिपत्य का जो अधिकार सौंपा था, वह भारतीय स्वतंत्रता कानून के अंतर्गत हमें वापिस मिल गया। हम अलग रह सकते थे और भारतीय राष्ट्र में विलय नहीं करते। एक क्षण के विचार से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि इसका परिणाम कितना विनाशकारी होता। शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात आ गयी थी कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जायेगा। इसके परिणाम का पूर्व ज्ञान रखते हुए मैंने बिना हिचकिचाहट के भारत के उन तत्वों के साथ सहयोग करने का निश्चय किया जो एक मजबूत केन्द्रीय सरकार की स्थापना के लिये कार्य कर रहे थे।

    बीकानेर राज्य में शराणार्थियों की समस्या

    पाकिस्तान के साथ बीकानेर राज्य की लगभग 200 मील लम्बी सीमा थी। बीकानेर द्वारा भारत संघ में सम्मिलित होने का निर्णय लेने पर इस सीमा को पार करके लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आये तथा भारत से पाकिस्तान गये। लगभग 7-8 लाख लोग भारत से निकाल कर सुरक्षित रूप से पाकिस्तान पहुंचाये गये। बीकानेर राज्य की सीमा पर बहावलपुर राज्य था जिसमें 1.90 लाख हिन्दू तथा 50 हजार सिक्ख रहते थे। बहावलपुर राज्य के हासिलपुर में 350 सिक्ख एवं हिन्दू मार डाले गये। इससे बहावलपुर राज्य के अन्य कस्बों में गाँवों में में भगदड़ मच गयी। 15 अगस्त 1947 के बाद बीकानेर राज्य में लगभग 75 हजार शरणार्थी आये जिनके लिये शरणार्थी शिविरों की स्थापना की गयी। बहुत से लोगों को बीकानेर से 40 किलोमीटर दूर कोलायत में भेजा गया।

    इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से राज्य की व्यवस्थायें गड़बड़ा गयीं। राज्य की ओर से शरणार्थियों के ठहरने व भोजन-पानी की व्यवस्था की गयी। कोलायत तथा सुजानगढ़ आदि कस्बों में शरणार्थियों को ठहराया गया। गंगानगर क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में शरणार्थी आये। इन शरणार्थियों पर पाकिस्तान में बहुत अत्याचार हुए थे इसलिये वे मुसलमानों से बदला लेने पर उतारू थे। उन्हें शांत रखने तथा मुसलमानों पर आक्रमण न करने देने के लिये राज्य की ओर से सेना लगायी गयी। सेना ने बहुत से मुसलमानों को बहावलपुर राज्य में सुरक्षित पहुंचाया। जब चूरू के महाजनों ने अपने मुसलमान नौकरों को नौकरी से निकाल दिया तो वे मुसलमान, महाराजा सादूलसिंह के पास बीकानेर आ गये। महाराजा ने विशेष रेलगाड़ी से नौकरों को वापस चूरू भिजवाया तथा महाजनों को कहकर वापस नौकरी में रखवाया।

    जो लोग बीकानेर राज्य छोड़कर पाकिस्तान चले गये थे उन्हें महाराजा ने फिर से बीकानेर राज्य में आकर बसने का न्यौता दिया तथा जो हिंदू शरणार्थी पाकिस्तान से बीकानेर राज्य में आ गये थे उन्हें ब्रिटिश भारत में भेजने के लिये महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया। पाकिस्तान से आये कुल 50,746 शरणार्थियों को बीकानेर राज्य द्वारा 2,58,516 बीघा जमीन आवंटित की गयी। बहुत से सिक्ख पास्तिान के रहीमयार खान नामक जिले में घेर कर रोक लिये गये। बीकानेर राज्य के अधिकारियों ने बहावलपुर के राज्याधिकारियों से बात करके इन शरणार्थियों को निकलवाया।

    बीकानेर नरेश की प्रशंसा

    सरदार पटेल ने देशी राज्यों के भारत में विलय के पश्चात महाराजा सादूलसिंह का धन्यवाद करते हुए उन्हें लिखा कि राजाओं को गलत राह पर ले जाने के लिये जान-बूझकर जो संदेह और भ्रम उत्पन्न किये गये उन्हें मिटाने में महाराजा ने जो कष्ट किया, उससे मैं भलीभांति परिचित हूँ। महाराजा का नेतृत्व निश्चय ही समयानुकूल और प्रभावशाली रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ माह बाद जनवरी 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन बीकानेर राज्य के दौरे पर आये। उन्होंने अपने भाषण में सादूलसिंह की बड़ी प्रशंसा की और कहा कि महाराजा प्रथम शासक थे जिन्होंने भारत का नया संविधान बनाने में मदद देने के लिये संविधान निर्मात्री सभा में प्रतिनिधि भेजकर यह अनुभव कर लिया कि भविष्य में राजा लोगों को क्या करना है। महाराजा पहले शासक थे जिन्होंने रियासतों के अपने पास के संघ में सम्मिलित होने के मेरे प्रस्तावों का समर्थन किया। 2 सितम्बर 1954 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने बीकानेर में महाराजा सादूलसिंह की मूर्ति का अनावरण करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा की कि जब एक ओर भारत के बंटवारे की विपत्ति आ रही थी और दूसरी ओर भारतवर्ष के टुकड़े किये जाने के लिये द्वार खोला जा रहा था, उन्होंने जवांमर्दी, देशप्रेम तथा दूरदर्शिता से अपने आप को खड़ा करके उस दरवाजे का मुँह बंद कर दिया।

    बीकानेर महाराजा का पाकिस्तान की ओर झुकाव

    बीकानेर के अधिकारियों तथा बहावलपुर राज्य के प्रधानमंत्री नवाब मुश्ताक अहमद गुरमानी के मध्य भारत सरकार के सैन्य अधिकारी मेजर शॉर्ट की अध्यक्षता में बीकानेर में एक बैठक रखी गयी। 7 नवम्बर 1947 को मेजर शार्ट की मध्यस्थता में दोनों रियासतों के मध्य शरणार्थियों एवं सीमा सम्बन्धी विवादों पर चर्चा हुई तथा एक समझौता भी हुआ। इसके बाद उसी दिन शाम की ट्रेन से मेजर शॉर्ट दिल्ली चला गया और गुरमानी को भी सरकारी रिकॉर्ड में बहावलपुर जाना अंकित कर दिया गया जबकि महाराजा ने गुरमानी को गुप्त मंत्रणा के लिये लालगढ़ में ही रोक लिया। तीन दिन तक गुरमानी लालगढ़ में रहा। इस दौरान राजमहल का सारा स्टाफ मुसलमानों का रहा। अपवाद स्वरूप कुछ ही हिन्दू कर्मचारियों को महल में प्रवेश दिया गया। इनमें से राज्य के जनसम्पर्क अधिकारी बृजराज कुमार भटनागर भी थे। उन्हें इसलिये प्रवेश दिया गया कि वे महाराजा के अत्यंत विश्वस्त थे तथा उर्दू के जानकार भी थे। 10 नवम्बर तक गुरमानी और सादूलसिंह के बीच गुप्त मंत्रणा चलती रही। इस दौरान सादूलसिंह का झुकाव पाकिस्तान की ओर हो गया। यह निर्णय लिया गया कि प्रायोगिक तौर पर छः माह के लिये बीकानेर और बहावलपुर राज्यों के मध्य एक व्यापारिक समझौता हो। समझौता लिखित में हुआ तथा दोनों ओर से हस्ताक्षर करके एक दूसरे को सौंप दिया गया।

    बृजराज कुमार भटनागर ने यह बात बीकानेर में हिन्दुस्तान टाइम्स के संवाददाता दाऊलाल आचार्य को बता दी। यह समाचार 17 नवम्बर 1947 को हिन्दुस्तान टाइम्स के दिल्ली संस्करण में तथा 18 नवम्बर को डाक संस्करण में प्रकाशित हुआ जिससे दिल्ली और बीकानेर में हड़कम्प मच गया। बीकानेर प्रजा परिषद के नेताओं ने इस संधि का विरोध करने का निर्णय लिया और दिल्ली जाकर भारत सरकार को ज्ञापन देने की घोषणा की। यह रक्षा से सम्बद्ध मामला था तथा संघ सरकार के अधीन आता था इसलिये पटेल ने तुरंत एक सैन्य सम्पर्क अधिकारी को बीकानेर तथा बहावलपुर की सीमा पर नियुक्त किया और बीकानेर महाराजा को लिखा कि वे इस अधिकारी के साथ पूरा सहयोग करें। बीकानेर के गृह मंत्रालय द्वारा समाचार पत्र के संवाददाता को समाचार का स्रोत बताने के लिये कहा गया। उन्हीं दिनों बीकानेर सचिवालय की ओर से रायसिंहनगर के नाजिम को एक तार भेजा गया। इस तार में रायसिंहनगर के नाजिम को सूचित किया गया था कि बहावलपुर रियासत से हमारा व्यापार यथावत चल रहा है। रायसिंहनगर में रेवेन्यू विभाग के भूतपूर्व पेशकार मेघराज पारीक ने वह तार नाजिम के कार्यालय से चुरा लिया और दाऊलाल आचार्य को सौंप दिया। इस तार के प्रकाश में आने के बाद बीकानेर राज्य का गृह विभाग शांत होकर बैठ गया।

    बीकानेर महाराजा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचारों का विरोध करते हुए भारत सरकार को लिखा कि बीकानेर प्रजा परिषद और बीकानेर राज्य के सम्बन्ध ठीक नहीं हैं इसलिये प्रजा परिषद के एक कार्यकर्ता ने जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स का संवाददाता भी है, इस खबर को प्रकाशित करवाया है ताकि बीकानेर राज्य पर दबाव बनाकर उसे उपनिवेश सरकार द्वारा अधिग्रहीत कर लिया जाये। क्या प्रजा परिषद बीकानेर राज्य को जूनागढ़ तथा हैदराबाद के समकक्ष रखना चाहती है? महाराजा ने पटेल से अनुरोध किया कि वह इस सम्बन्ध में दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही में सहायता करें तथा एक आधिकारिक बयान जारी करके इस आरोप को निरस्त करें।

    इस पर रियासती विभाग ने एक वक्तव्य जारी किया कि कुछ समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार प्रकाशित किये गये हैं कि बीकानेर, पाकिस्तान एवं बहावलपुर के मध्य एक व्यापारिक संधि हुई है। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यह समचार पूर्णतः आधारहीन है। ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है। बहावलपुर के मुख्यमंत्री सीमा के दोनों तरफ रह रहे शरणार्थियों में भय फैलने से रोकने के लिये किये जा रहे प्रयासों के लिये मैत्री यात्रा पर आये थे। बीकानेर के अंतिम महाराजा सादूलसिंह ने अंतरिम सरकार बनाकर आंशिक मात्रा में सत्ता जनता को सौंपी अवश्य पर रियासत को अलग इकाई रखने हेतु जो पापड़ बेले गये और दुरभिसंधियां की, उनकी सूचना दाऊलाल आचार्य एवं मूलचंद पारीक ने यथासमय उच्चस्थ विभागों को पहुंचायी, वह तो देशभक्ति की अनोखी मिसाल है। उसी के कारण बीकानेर रियासत भारत में रह पायी।


    जोधपुर राज्य का भारत में विलय

    8 जून 1947 को जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह का आकस्मिक बीमारी से देहांत हो गया। 21 जून 1947 को दिवंगत नरेश के 25 वर्षीय पुत्र हनवंतसिंह का राज्यारोहण हुआ। वे जोधपुर राज्य के अड़तीसवें राठौड़ राजा थे। राज्यारोहण के अवसर पर हनवंतसिंह ने घोषणा की कि स्वर्गवासी महाराजा ने जिन वैधानिक सुधारों का श्रीगणेश किया था उनमें वृद्धि करते हुए, हनवंतसिंह वैधानिक शासक के रूप में शासन करेंगे। उन्होंने दिवंगत महाराजा द्वारा राज्य को संविधान सभा में सम्मिलित करने की जो घोषणा की थी उसकी भी पुष्टि की। स्थापित परम्परा के अनुसार नये महाराजा के राज्यारोहण के समय ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का राजनीतिक एजेंट एक खरीता भेंट करता था जिसमें नये महाराजा के राज्यारोहण की पुष्टि की जाती थी। चंूकि स्वतंत्रता की तिथि अत्यंत निकट आ गयी थी इसलिये निर्णय किया गया कि महाराजा को ब्रिटिश क्राउन रिप्रजेण्टेटिव की ओर से दिया जाने वाला खरीता डाक से भेजा जाये।

    जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र

    16 जुलाई 1947 को वी. पी. मेनन ने इंगलैण्ड में भारत उपसचिव सर पैट्रिक को एक तार दिया कि वायसराय ने मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर के प्रतिनिधियों से भारत में विलय के विषय में बातचीत की। उन सबकी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। 2 अगस्त 1947 को मेनन ने पैट्रिक को सूचित किया कि भारत के लगभग समस्त राजा अपने राज्यों का भारतीय संघ में विलय करने के लिये तैयार हो गये हैं। केवल हैदराबाद, भोपाल और इंदौर हिचकिचा रहे हैं। वायसराय ने देशी नरेशों से बात की है और इन राज्यों के नरेशों ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने पर सहमति दर्शायी है- ग्वालियर, पटियाला, कोटा, जोधपुर, जयपुर, रामपुर, नवानगर, झालावाड़, पन्ना, टेहरी गढ़वाल, फरीदकोट, सांगली, सीतामऊ, पालीताना, फाल्टन, खैरागढ़, सांदूर।

    यद्यपि जोधपुर राज्य 28 अप्रेल 1947 से संविधान सभा में भाग ले रहा था तथा जोधपुर के युवा महाराजा हनवंतसिंह दो बार भारत में मिलने की घोषणा कर चुके थे किंतु वे देश को स्वतंत्रता मिलने से ठीक 10 दिन पहले पाकिस्तान का निर्माण करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उनका साथ देने वाले नवाब भोपाल एवं धौलपुर के महाराजराणा के चक्कर में आ गये। जब राजपूताना के राज्यों का स्वतंत्र समूह गठित करने की योजना विफल हो गयी तो राजनीतिक विभाग के सदस्यों ने राजपूताना के राज्यों को सलाह दी कि वे पाकिस्तान में मिल जायें क्योंकि भारत पाकिस्तान की सीमा पर स्थित होने के कारण कानूनन वे ऐसा कर सकते थे। इनमें से जोधपुर राज्य एक था।

    महाराजा हनवंतसिंह कांग्रेस से घृणा करते थे तथा जोधपुर की रियासत पाकिस्तान से लगी हुई थी। इसलिये हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट करने की सोची। जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं की जोधपुर नरेश से कई बार भेंट हुई थी और अंतिम भेंट में वे जैसलमेर के महाराजकुमार को भी साथ ले गये थे। बीकानेर नरेश ने उनके साथ जाने से मना कर दिया था और हनवंतसिंह जिन्ना के पास अकेले जाने में हिचकिचा रहे थे। उन लोगों को देखकर जिन्ना की बांछें खिल गयीं। जिन्ना जानते थे कि अगर ये दोनों रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गयीं तो अन्य राजपूत रियासतें भी पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायेंगी। इससे पंजाब और बंगाल के बंटवारे की कमी भी पूरी हो जायेगी तथा समस्त प्रमुख रजवाड़ों को हड़पने की कांग्रेसी योजना भी विफल हो जायेगी। जिन्ना ने एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करके अपनी कलम के साथ जोधपुर नरेश को दे दिया और कहा कि आप इसमें जो भी शर्तें चाहें भर सकते हैं। इसके बाद कुछ विचार विमर्श हुआ। इस पर हनवंतसिंह पाकिस्तान में मिलने को तैयार हो गये। फिर वे जैसलमेर के महाराजकुमार की ओर मुड़े और उनसे पूछा कि क्या वे भी हस्ताक्षर करेंगे? महाराजकुमार ने कहा कि वे एक शर्त पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं कि यदि कभी हिंदू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ तो जिन्ना हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों का पक्ष नहीं लेंगे। यह एक बम के फटने जैसा था जिसने महाराजा हनवंतसिंह को अचंभे में डाल दिया। जिन्ना ने हनवंतसिंह पर बहुत दबाव डाला कि वे दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दें। जब महाराजकुमार जैसलमेर ने पाकिस्तान में विलय से मना कर दिया तो महाराजा डांवाडोल हो गये। इस अवसर का लाभ उठाकर महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने महाराजा को सलाह दी कि वे अंतिम निर्णय लेने से पहले अपनी माताजी से भी सलाह ले लें। महाराजा को यह बहाना मिल गया और उन्होंने यह कह कर जिन्ना से विदा ली कि वे इस विषय में सोच समझ कर अपने निर्णय से एक-दो दिन में अवगत करायेंगे।

    कर्नल केसरीसिंह ने जोधपुर लौटकर प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को तथ्यों से अवगत करवाया। षड़यंत्र की गंभीरता को देखकर वेंकटाचार ने 6 अगस्त 1947 को बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर के पास पत्र भिजवाया। पत्र में लिखा था कि भोपाल नवाब महाराजा जोधपुर को जिन्ना से मिलाने ले गये थे। जिन्ना ने पेशकश की थी कि वे जोधपुर को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देकर संधि करने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी पेशकश की कि जोधपुर राज्य को जो हथियार चाहिये वे पाकिस्तान के बंदरगाह से बिना सीमांत कर दिये, लाये जा सकते हैं। जिन्ना ने महाराजा जोधपुर को राजस्थान का सर्वेसर्वा बनाने की पेशकश की जिससे जोधपुर महाराजा चकित रह गये और उनके मन में इच्छा जागी कि वे राजस्थान के सम्राट बन जायेंगे। महाराजा के सेक्रेटरी कर्नल केसरीसिंह जिन्ना के निवास पर महाराजा के साथ गये थे किंतु उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। अतः उन्हें पूरी शर्तों के बारे में पता नहीं था। जब महाराजा दूसरे दिन भोपाल नवाब के साथ जिन्ना से मिलने गये तो संधि का प्रारूप हस्ताक्षरों के लिये तैयार था। उस समय महाराजा ने केसरीसिंह से कहा कि मैं संधि पर हस्ताक्षर करके राजस्थान का बादशाह हो जाउंगा। केसरीसिंह ने उन्हें समझाया कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये और ऐसा करने से पहले अपनी माता व अन्य सम्बन्धियों से विचार विमर्श करना चाहिये। इस पर महाराजा ने यह आश्वासन देकर जिन्ना से विदा ली कि वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों से सलाह करके 8 अगस्त को संधि पर हस्ताक्षर करेंगे। केसरीसिंह ने भी इस आश्वासन को दोहराया।

    जोधपुर लौटकर हनवंतसिंह ने सरदार समंद पैलेस में राज्य के जागीरदारों की एक बैठक बुलायी तथा उनकी राय जाननी चाही। दामली ठाकुर के अतिरिक्त और कोई जागीरदार भारत सरकार से संघर्ष करने के लिये तैयार नहीं हुआ। महाराजा तीन दिन जोधपुर में रहे। पाकिस्तान में मिलने के प्रश्न पर जोधपुर के वातावरण में काफी क्षोभ था। जब हनवंतसिंह तीन दिन बाद दिल्ली लौटे तो मेनन को बताया गया कि यदि मेनन ने महाराजा को शीघ्र नहीं संभाला तो वे पाकिस्तान में मिल सकते हैं। मेनन ने माउंटबेटन से निवेदन किया कि वे जोधपुर महाराजा को भारत में सम्मिलित होने के लिये सहमत करें। मेनन इंपीरियल होटल गये और महाराजा से कहा कि लॉर्ड माउंटबेटन उनसे बातचीत करना चाहते हैं। मेनन तथा हनवंतसिंह कार में वायसराय भवन गये। वायसराय ने अपने आकर्षक व्यक्त्त्वि एवं दृढ़ निश्चय से महाराजा से इस प्रकार बात की जैसे कोई अध्यापक अपने अनुशासनहीन छात्र को समझाता है। उन्होंने महाराजा से कहा कि उन्हें अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का पूरा अधिकार है किंतु उन्हें इसके परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये। वे स्वयं हिन्दू हैं व उनकी अधिकांश प्रजा हिन्दू है। महाराजा का यह कदम इस सिद्धांत के विरुद्ध होगा कि भारत के टुकड़े केवल दो भागों में होंगे जिनमें से एक मुस्लिम देश होगा और दूसरा गैर मुस्लिम देश। उनके पास्तिान में विलय से जोधपुर में सांप्रदायिक दंगे होंगे। कांग्रेस के भी आंदोलन करने की संभावना है।

    महाराजा ने माउंटबेटन को बताया कि जिन्ना ने खाली कागज पर अपनी शर्तें लिखने के लिये कहा है जिन पर जिन्ना हस्ताक्षर कर देंगे। इस पर मेनन ने कहा कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ किंतु उससे महाराजा को ठीक उसी तरह कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जिस तरह जिन्ना के हस्ताक्षरों के बावजूद महाराजा को पाकिस्तान से कुछ नहीं मिलेगा। इस पर माउंटबेटन ने मेनन से कहा कि मेनन भी जिन्ना की तरह महाराजा को कुछ विशेष रियायतें दें। महाराजा ने अपने राज्य का विलय भारत में करने की बात मान ली और प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये। महाराजा तथा मेनन के बीच कुछ विशेषाधिकारों पर सहमति हुई जिन्हें लिखित रूप में आ जाने पर मेनन स्वयं जोधपुर लेकर गये।

    8 अगस्त 1947 को माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को भेजे गये प्रतिवेदन में कहा गया कि जोधपुर के प्रधानमंत्री वेंकटाचार ने सूचित किया है कि जोधपुर के युवक महाराजा ने दिल्ली में वायसराय के साथ दोपहर का खाना खाने के पश्चात् यह कहा था कि वे भारतीय संघ में मिलना चाहते हैं परंतु इसके तुरंत बाद ही धौलपुर महाराजा ने जोधपुर महाराजा को दबाया कि वे भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं हों। जोधपुर महाराजा को जिन्ना के पास ले जाया गया और नवाब भोपाल तथा उनके वैधानिक सलाहकार जफरुल्ला खां की उपस्थिति में जिन्ना ने यह पेशकश की कि यदि महाराजा 15 अगस्त को अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दें तो उन्हें ये रियायतें दे दी जायेंगी- (1.)कराची के बंदरगाह की समस्त सुविधाएं जोधपुर राज्य को दी जायेंगी। (2.) जोधपुर राज्य को शस्त्रों का आयात करने दिया जायेगा। (3.) जोधपुर हैदराबाद (सिंध) रेलवे पर जोधपुर का अधिकार होगा। (4.) जोधपुर राज्य के अकाल ग्रस्त जिलों के लिये पूरा अनाज उपलब्ध करवाया जायेगा।

    वायसराय ने लिखा कि महाराजा अब भी यह सोचते हैं कि जिन्ना द्वारा की गयी पेशकश सर्वोत्तम है और उन्होंने भोपाल नवाब को तार द्वारा सूचित किया है कि उनकी स्थिति अनिश्चित है और वे उनसे 11 अगस्त को मिलेंगे। 7 अगस्त को हनवंतसिंह बड़ौदा गये जहाँ उन्होंने महाराजा गायकवाड़ को समझाया कि प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। भोपाल नवाब भी प्रयास कर रहे हैं कि जोधपुर, कच्छ व उदयपुर के नरेश भी प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। मैंने जोधपुर के महाराजा को इस विषय पर तार भेजा है कि वे शीघ्रातिशीघ्र आकर मुझसे मिलें। मुझे सबसे अधिक दुःख इस बात का है कि भोपाल नवाब मेरे मुँह पर तो मित्र की भांति व्यवहार करते हैं परंतु पीठ पीछे मेरी योजना को विफल करने का षड़यंत्र करते हैं। मैं उनकी चालाकियों के विषय में उनके दिल्ली आने पर स्पष्ट बात करूंगा।

    11 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने देशी राज्यों के नरेशों से वार्तालाप किया तथा नवाब भोपाल से उस सूचना पर स्पष्टीकरण मांगा जो सरदार पटेल को प्राप्त हुई थी, जिसके अनुसार नवाब ने जोधपुर महाराजा पर दबाव डाला था कि वे उनके साथ चलकर जिन्ना से मिलें।

    भोपाल नवाब ने अपने उत्तर में वायसराय को सूचित किया- '6 अगस्त को महाराजा धौलपुर व दो अन्य राजाओं ने मुझे सूचना दी कि महाराजा जोधपुर मुझसे (भोपाल नवाब से) मिलना चाहते हैं। मैंने (नवाब ने) उन्हें उत्तर दिया कि मुझे उनसे मिलकर प्रसन्नता होगी। जब महाराजा मेरे पास आये तो उन्होंने कहा कि वे जिन्ना से शीघ्र मिलकर उनकी शर्तों का ब्यौरा जानना चाहते हैं। जिन्ना दिल्ली छोड़कर हमेशा के लिये कराची जाने वाले थे। इस कारण अत्यंत व्यस्त थे। फिर भी मैंने महाराजा के लिये साक्षात्कार का समय ले लिया। हमें दोपहर बाद का समय दिया गया जिसकी सूचना महाराजा को भिजवा दी गयी। महाराजा मेरे निवास स्थान पर तीसरे पहर आये और हम दोनों जिन्ना से मिलने गये। महाराजा ने जिन्ना से पूछा कि जो राजा पाकिस्तान से सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं, उनको वे क्या रियायत देंगे? जिन्ना ने उत्तर दिया कि मैं पहले ही यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि हम राज्यों से संधि करेंगे और उन्हें अच्छी शर्तें देकर स्वतंत्र राज्य की मान्यता देंगे। फिर महाराजा ने बंदरगाह की सुविधा, रेलवे का अधिकार, अनाज तथा शस्त्रों के आयात के विषय में वार्त्ता की। वार्त्ता के दौरान इस बात की कोई चर्चा नहीं हुई कि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करें या न करें। मैं इस साक्षात्कार के बाद भोपाल लौट गया जहाँ मुझे महाराजा धौलपुर का टेलिफोन पर संदेश मिला कि महाराजा जोधपुर शनिवार (9 अगस्त) को दिल्ली लौट रहे हैं अतः मुझे (नवाब को) दिल्ली पहुँच जाना चाहिये। मैं शनिवार को दिल्ली पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे महाराजा का संदेश मिला कि मैं सीधे महाराजा जोधपुर के निवास स्थान पर पहुँचूं। वहाँ पहुँचने पर महाराजा धौलपुर ने कहा कि मुझे कुछ प्रतीक्षा और करनी पड़ेगी क्योंकि जोधपुर महाराजा वायसराय से मिलने गये हुए हैं और कुछ ही देर में लौटने वाले हैं परंतु महाराजा वायसराय के पास अधिक समय तक ठहर गये और हमारे पास आने का समय नहीं मिला। उन्होंने टेलिफोन द्वारा यह संदेश भिजवाया कि वे जोधपुर जा रहे हैं और संध्या को वापस लौटेंगे....शनिवार संध्या को महाराजा धौलपुर आये और कहा कि जोधपुर महाराजा अभी तक नहीं लौटे हैं, प्रतीत होता है कि वे रविवार सवेरे लौटेंगे। रविवार (10 अगस्त) को लगभग डेढ़ बजे मुझे धौलपुर नरेश का निमंत्रण मिला कि मैं उनके साथ दोपहर के खाने पर सम्मिलित होऊं। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जोधपुर नरेश भी वहाँ थे। वे अपने गुरु को साथ लेकर आये थे। महाराजा ने मुझसे उनका परिचय करवाते हुए कहा कि ये मेरे दार्शनिक व मार्गदृष्टा हैं। जिन्ना से भेंट के बाद मैं उसी दिन जोधपुर महाराजा से मिला था। महाराजा ने कहा कि हम लोग उनके गुरु से बातचीत करें। धौलपुर व अन्य राजाओं ने गुरु से विस्तृत वार्तालाप किया जिसमें मैंने बहुत कम भाग लिया। जब मैं विदा लेने लगा तो महाराजा जोधपुर ने कहा कि वे सोमवार (11 अगस्त) को सवेरे मुझसे मिलने आयेंगे। अपने निश्चय के अनुसार वे सोमवार 10 बजे मुझसे मिलने आये तथा कहा कि उनके गुरु अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं परंतु स्वयं उन्होंने निर्णय कर लिया है कि वे भारतीय संघ में ही रहेंगे। मैने महाराजा से कहा कि आप अपने राज्य के मालिक हैं और कुछ भी निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र हैं।'

    वायसराय ने भोपाल नवाब द्वारा भेजे गये तथ्यों को सही माना है। ओंकारसिंह ने इस विवरण के आधार पर यह माना है कि जिन्ना और जोधपुर नरेश की भेंट के समय कर्नल केसरीसिंह महाराजा के साथ नहीं थे अन्यथा नवाब ने उनका उल्लेख अवश्य किया होता। ओंकारसिंह के अनुसार अवश्य ही केसरीसिंह ने यह मिथ्या भ्रम फैलाया था कि इस भेंट के दौरान केसरीसिंह भी उपस्थित थे और इसी भ्रम के कारण मानकेकर और पन्निकर आदि ने तथ्यों को विकृत कर दिया है।

    16 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को अपना अंतिम प्रतिवेदन भेजा गया जिसके अनुच्छेद 41 में कहा गया- '8 अगस्त को मैंने महाराजा जोधपुर को बुलाया तो वे उसी रात्रि को विलम्ब से जोधपुर से दिल्ली पहुँचे और अगले दिन सेवेरे (9 अगस्त को) मुझसे मिले। महाराजा ने निःसंकोच स्वीकार किया कि वे जिन्ना से मिले थे और नवाब भोपाल का विवरण सही है। पटेल को जब जोधपुर महाराजा की चाल का पता चला तो वे महाराजा को मनाने के लिये किसी भी सीमा तक जाने के लिये तैयार हो गये। पटेल ने यह बात मान ली कि महाराजा जोधपुर राज्य में बिना किसी रुकावट के शस्त्रों का आयात कर सकेंगे। राज्य के अकालग्रस्त जिलों को पूरे खाद्यान्न की आपूर्ति की जायेगी और इस हेतु भारत के अन्य क्षेत्रों की अवहेलना की जायेगी। महाराजा द्वारा जोधपुर रेलवे की लाईन कच्छ राज्य के बंदरगाह तक मिलाने में कोई रुकावट नहीं की जायेगी। पटेल की इस स्वीकृति से महाराजा संतुष्ट हो गये और उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत के साथ रहेंगे।'

    ओंकारसिंह का मानना है कि महाराजा हनवंतसिंह न तो पाकिस्तान में मिलना चाहते थे और न ही राजस्थान के सम्राट बनना चाहते थे अपितु वे तो अपने राज्य के लिये अधिकतम सुविधायें प्राप्त करने के लिये सरदार पटेल पर दबाव बनाना चाहते थे। प्राप्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जोधपुर नरेश अवश्य ही भोपाल नवाब और महाराजराणा धौलपुर की चाल में फँस कर उन संभावनाओं का पता लगाने के लिये जिन्ना तक पहुँच गये थे कि उनका अधिक लाभ किसमें है, भारत संघ में मिलने में, पाकिस्तान में मिलने में अथवा इन दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर अलग अस्तित्व बनाये रखने में? जोधपुर और त्रावणकोर के हिन्दू राजाओं ने कुछ अलगाववादी चालाकियां करनी चाहीं किंतु पटेल की सजगता ने उन्हें पानी-पानी कर दिया।

    सबसे पहले सुमनेश जोशी ने जोधपुर से प्रकाशित समाचार पत्र 'रियासती' में जोधपुर नरेश के पाकिस्तान में मिलने के इरादे का भण्डाफोड़ किया। 20 अगस्त 1947 के अंक में 'राजपूताने के जागीरदारों और नवाब भोपाल के मंसूबे पूरे नहीं हुए' शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जोधपुर राज्य के संघ प्रवेश से जो प्रसन्नता यहाँ के राजनैतिक क्षेत्र में हुई है उसके पीछे आश्चर्य भी है कि नये महाराजा ने बावजूद अपने तिलकोत्सव के भाषण के, संघ प्रवेश में क्यों हिचकिचाहट दिखायी? भोपाल नवाब ने हवाई जहाजों के जरिये 16 रियासतों के साथ सम्पर्क कायम करने का प्रयास किया। उन्होंने जोधपुर के मामले में इसलिये कामयाबी हासिल कर ली क्योंकि उनके चारों तरफ जागीरदार थे जो रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के पक्ष में थे। जैसा कि महाराजा साहब के ननिहाल ठिकाने के प्रेस से प्रकाशित क्षत्रिय वीर के एक लेख में इशारा था, पाकिस्तान जागीरी प्रथा के प्रति उदार है जबकि हिन्दुस्तान इस प्रथा को उठाना चाहता है। अतः पैलेस के जागीरदार स्वाभवतः हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को ज्यादा पंसद करते हैं। इससे जोधपुर रियासत की काफी बदनामी हुई है। हिन्दुस्तान यूनियन से दूर रहने का जो षड़यंत्र किया गया था उसमें यह भी प्रचारित किया गया था कि सर स्टैफर्ड क्रिप्स हिन्दुस्तान आयेंगे तथा उनसे बातचीत करके रियासतों का सम्बन्ध सीधा इंगलैण्ड से करवा दिया जायेगा। इस नाम पर बहुत लोग बेवकूफ बनने वाले थे। अतः और लोगों को भी पाकिस्तान की तरफ से स्वतंत्र रहने का लोभ दिया गया। जोधपुर की अस्थायी हिच, इन समस्त बातों का सामूहिक परिणाम था। जाम साहब के पास भी भोपाल का संदेश गया था पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उदयपुर महाराजा के पास जोधपुर का संदेश गया जिसका महाराणा ने कड़ा उत्तर दिया। ऐसेम्बली लॉबी में भी जोधपुर का यूनियन में प्रवेश अत्यंत चर्चा का विषय है।

    रियासती विभाग के सचिव की कनपटी पर पिस्तौल

    जब 9 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन महाराजा हनवंतसिंह को लेकर वायसराय के पास गये तथा वायसराय के कहने पर मेनन ने महाराजा को विशेष रियायतें देने की बात मान ली तब वायसराय ने मेनन से कहा कि वे महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लें और वायसराय हैदराबाद के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने अंदर चले गये। वायसराय की अनुपस्थिति में महाराजा ने एक रिवॉल्वर निकाली और मेनन से कहा कि यदि तुमने जोधपुर की जनता को भूखों मारा तो मैं तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा परंतु महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये।

    मेनन के अनुसार हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देने के बाद माउंटबेटन दूसरे कमरे से चले गये और महाराजा ने अपना रिवॉल्वर निकालकर मेनन की तरफ करके कहा- 'मैं तुम्हारे संकेत पर नहीं नाचूंगा।' मेनन ने कहा कि 'यदि आप सोचते हैं कि मुझे मारकर या मारने की धमकी देकर प्रविष्ठ संलेख को समाप्त कर सकते हैं तो यह आपकी गंभीर भूल है। बच्चों जैसा नाटकर बंद कर दें। इतने में ही माउंटबेटन लौट आये। मेनन ने उन्हें पूरी बात बतायी। माउंटबेटन ने इस गंभीर बात को हलका करने का प्रयत्न किया और हँसी मजाक करने लगे। जब तक जोधपुर नरेश की मनोदशा सामान्य हो गयी। मैं उन्हें छोड़ने के लिये उनके निवास तक गया।'

    मोसले के अनुसार जब वायसराय के समझाने पर जोधपुर महाराजा अपने राज्य को भारत संघ में मिलाने पर सहमत हो गये तो वायसराय ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए महाराजा व मेनन की पीठ थपथपायी। इस प्रकार सारे मामले का अंत प्रसन्नता पूर्वक हुआ। उसी क्षण वायसराय को किसी काम से भीतर जाना पड़ा। उनके जाते ही महाराजा मेनन की ओर लपके और उनकी ओर रिवॉल्वर तानते हुए कहा- 'तुम चालाकी और बहाना बनाकर मुझे यहाँ लाये हो, मैं तुम्हें मार डालूंगा । मैं तुम्हारी बात बिल्कुल नहीं मानूंगा।'

    मेनन ने साहस बटोरकर उत्तर दिया- 'यदि आप यह समझते हैं कि मुझे मारने से आपको अधिक रियायतें मिलेंगी तो आपका अनुमान गलत है। आपको इस तरह के बचकाने नाटक नहीं करने चाहिये।'

    इस पर महाराजा जोधपुर जोर से हँसे और अपनी रिवॉल्वर एक तरफ रख दी। जब माउंटबेटन आये तो मेनन ने उन्हें बताया कि महाराजा ने मुझे रिवॉल्वर से मारने की धमकी दी है। इस पर वायसराय ने महाराजा से नम्रता पूर्वक कहा कि- 'यह समय हँसी मजाक का नहीं है। आप प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कब करेंगे?'

    कॉलिंस तथा लैपियरे का वर्णन भी मोसले के वर्णन से मिलता जुलता है। उनके अनुसार वायसराय ने महाराजा से कहा कि मैं और मेनन, पटेल से आग्रह करेंगे कि आपकी सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाये किंतु आप पाकिस्तान में जाने की न सोंचें। वायसराय तो यह कहकर चले गये और जोधपुर महाराजा ने जेब से एक ऐसा फाउंटेन पैन निकाला जिसे उन्होंने खास अपने लिये तैयार करवाया था। विलय के कागजात पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्होंने फाउंटेन पैन का ढक्कन खोला जिससे एक नन्हीं सी टू टू पिस्तौल नंगी होकर मेनन की खोपड़ी पर तन गयी- सब तुम्हारे कारण हुआ! अपने को क्या समझते हो? महाराजा ने चिल्लाकर कहा। सौभाग्यवश खटके का आभास पाकर माउण्टबेटन वहाँ आ गये। उन्होंने महाराजा से पिस्तौल छीन ली। ओंकारसिंह के अनुसार महाराजा के पास रिवॉल्वर नहीं, एक छोटा पैन पिस्तौल था जिसे उन्होंने स्वयं ही बनाया था। इसी पैन पिस्तौल से उन्होंने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किये थे। हस्ताक्षर करने के पश्चात् महाराजा ने मजाक में मेनन से कहा था कि मैंने जिस पैन से हस्ताक्षर किये हैं, उसी से तुम्हें भी मार सकता हूँ। मेनन भयभीत हो गये। इस पर महाराजा खूब हँसे। जब महाराजा ने पैन का एक हिस्सा खोलकर बताया कि वह पैन, पिस्तौल का भी काम कर सकता है तो मेनन भौंचक्के रह गये। उसी समय लॉर्ड माउंटबेटन कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने सारे प्रकरण को परिहास के रूप में लिया। महाराजा हनवंतसिंह ने ये तथ्य नवम्बर 1947 में ओंकारसिंह को बताये थे। महाराजा ने यह पैन पिस्तौल लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। माउंटबेटन उसे लंदन ले गये तथा लंदन के मैजिक सर्कल के संग्रहालय में रखने हेतु भेंट कर दिया। यह पैन-पिस्तौल आज भी लंदन में सुरक्षित है।

    वी. पी. मेनन घुटनों पर

    मोसले के अनुसार महाराजा हनवंतसिंह की माउंटबेटन से भेंट के तीन दिन बाद महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवाने के लिये वी. पी. मेनन जोधपुर आये। हनवंतसिंह ने मेनन को खूब शराब पिलाई तथा स्वयं भी पी। महाराजा ने मेनन के लिये नर्तकियों का नृत्य दिखाने का प्रबंध किया किंतु मेनन ने नृत्यांगनाओं की तरफ देखा भी नहीं। महाराजा नशे में धुत्त हो गये और उन्होंने अपना साफा जमीन पर फैंक कर कहा कि मैं पराजित हुआ और तुम जीत गये। मेनन भी नशे में धुत्त हो गये किंतु उन्होंने महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लिये। महाराजा मेनन को अपने वायुयान में पहुँचाने के लिये दिल्ली तक गये। मेनन दिल्ली में लड़खड़ाते हुए हवाई जहाज से उतरे किंतु उनके हाथ में वह प्रविष्ठ संलेख सुरक्षित था जिसके कारण उन्होंने जोधपुर को पाकिस्तान में विलय होने से बचा लिया था। मेनन जब दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे तो लड़खड़ा रहे थे। वे घुटनों के बल रेंगते हुए वायुयान से उतरे परंतु उन्होंने अपनी अंगुलियों के बीच वे दस्तावेज दबा रखे थे जिनके द्वारा उन्होंने जोधपुर राज्य का विलय भारत में करवाया। मेनन अपनी जिंदगी में केवल एक बार 28 फरवरी 1948 को जोधपुर आये थे और वह भी लोक परिषद और महाराजा के बीच उत्तरदायी सरकार के निर्माण को लेकर हुए विवाद के सिलसिले में। मेनन अपनी पत्नी को साथ लेकर आये थे और उस रात्रि में वे जोधपुर में ही ठहरे थे। महाराजा ने उनके स्वागत के लिये शराब और संगीत का प्रबंध किया था। राज्य के अधिकारियों ने उस दौरान शराब पी किंतु मेनन और महाराजा ने शराब नहीं पी। मेनन को शास्त्रीय संगीत का शौक नहीं था अतः महाराजा ने थोड़ी देर बाद संगीत बंद करवा दिया। महाराजा को अगले दिन मौलासर गांव के गजाधर सोमानी परिवार के प्रमुख व्यक्तियों को सोना, पालकी तथा सिरोपाव देने के लिये मौलासर जाना था अतः महाराजा मेनन को छोड़ने के लिये दिल्ली नहीं गये।

    महाराजा द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

    महाराजा हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर अंकित करने की जो तिथि प्रविष्ठ संलेख पर दर्शायी गयी है वह मेनन तथा वायसराय दोनों के दावों से मेल नहीं खाती। वायसराय द्वारा भारत सचिव को भेजी गयी विभिन्न रिपोर्टों तथा मेनन द्वारा लिखित विवरण के अनुसार हनवंतसिंह 9 अगस्त को वायसराय से मिले एवं उसी भेंट के दौरान प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर हुए जबकि प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर अंकित करने की तिथि 11 अगस्त लिखी हुई है। इसके साथ जो यथास्थिति समझौता पत्र लगा हुआ है उस पर जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार के हस्ताक्षर हैं जो कि 9 अगस्त को महाराजा तथा वायसराय की भेंट के समय दिल्ली में उपस्थित नहीं थे। 11 अगस्त की तिथि सही प्रतीत होती है क्योंकि इस बात का कोई कारण दिखायी नहीं देता कि 9 अगस्त को हस्ताक्षर करते समय 11 अगस्त की तिथि लिखी जाये। 11 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन ने महाराजा जोधपुर को पत्र लिखकर सूचित किया कि महाराजा ने सरदार पटेल के साथ हुई वार्त्ता के दौरान जो मुद्दे उठाये थे उनका जवाब भिजवाया जा रहा है।

    थारपारकर का प्रकरण

    सिंध में सोढ़ा राजपूतों का सदियों पुराना ऊमरकोट नामक राज्य था। मुगलों के भारत आगमन से पूर्व से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता होने तक ऊमरकोट क्षेत्र जोधपुर राज्य का भाग था और एक संधि के अंतर्गत भारत की आजादी से लगभग एक शताब्दी पूर्व ब्रिटिश सरकार को दिया गया था। जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह इसे फिर से प्राप्त करने के लिये प्रयत्नरत रहे थे किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। जब भारत विभाजन योजना स्वीकार कर ली गयी तो सिंध के सोढ़ा राजपूतों के एक शिष्टमंडल ने जोधपुर आकर महाराजा हनवंतसिंह से प्रार्थना की कि सिंध प्रांत के थारपारकर जिले को भारत व जोधपुर राज्य में मिलाने का प्रयत्न करें। हनवंतसिंह ने वायसराय को लिखा कि ऊमरकोट को फिर से जोधपुर राज्य को लौटाया जाये परंतु वायसराय ने यह कहकर इस विषय पर विचार करने से इन्कार कर दिया कि देश के विभाजन व स्वतंत्रता के दिन निकट हैं और सीमा के सारे विवाद रैडक्लिफ आयोग के विचाराधीन हैं अतः अब इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।

    सोढ़ा राजपूतों ने इस विषय पर एक पत्र केंद्र सरकार को लिखा और उसकी प्रतिलिपियां नेहरू को भी दीं कि उनकी भाषा व संस्कृति मारवाड़ राज्य की भाषा और संस्कृति से काफी मिलती है। उनके अधिकांश विवाह सम्बन्ध भी इस राज्य में होते रहे हैं। अतः उनके क्षेत्र को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सोढ़ों की इस मांग का समर्थन अखिल भारतीय हिन्दू धर्मसंघ ने भी किया। धर्मसंघ की मांग थी कि हिन्दू बहुलता के आधार पर सिंध प्रांत के दो टुकड़े कर दिये जायें एवं नवाबशाह, हैदराबाद, थारपारकर तथा कराची जिले के एक भाग को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सिंध की प्रांतीय कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया। सिंध प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष डा. चौइथराम गिडवाणी ने भारत सरकार से अपील की कि थारपारकर जिले में हिन्दुओं का स्पष्ट बहुमत है अतः उसे जोधपुर राज्य में मिलाना न्यायसंगत होगा। महाराजा हनवंतसिंह ने दिल्ली में अनेक नेताओं से बातचीत की किंतु इस विषय पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अतिरिक्त किसी अन्य नेता ने रुचि नहीं ली। मुखर्जी केंन्द्रीय मंत्रिमण्डल में अल्पमत में थे अतः उनके प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला।

    बी. बी. एण्ड सी. आई.रेलवे की भूमि का जोधपुर राज्य द्वारा पुनः अधिग्रहण

    13 अगस्त 1947 को महाराजा हनवंतसिंह ने आदेश जारी किये कि मारवाड़ में बी. बी. एण्ड सी. आई.रेलवे द्वारा अधिकृत भूमियों पर जिस प्रत्येक प्रकार की सत्ता (दीवानी तथा फौजदारी सत्ता सहित) का क्राउन प्रतिनिधि द्वारा उपयोग किया जाता है वह सत्ता 15 अगस्त 1947 को समाप्त हो जायेगी और उस तारीख को जोधपुर सरकार के पास लौट आयेगी तथा इस जमीन पर वे कानून लागू होंगे जो इस राज्य में वर्तमान में लागू हैं अथवा आगे लागू होंगे। फिलहाल विद्यमान रेलवे पुलिस कर्मचारी वर्ग बना रहेगा और वह मारवाड़ पुलिस एक्ट के अधीन भर्ती किये हुए कर्मचारी के अधिकार काम में लेंगे।

    जोधपुर में स्वतंत्रता दिवस समारोह

    15 अगस्त 1947 को जोधपुर में दो स्थानों पर समारोह मनाया गया। एक समारोह गिरदीकोट में मनाया गया जिसमें 40 हजार व्यक्ति एकत्रित हुए। म्युनिसीपलैटी के चेयरमेन द्वारकादास पुरोहित ने झण्डारोहण किया। दूसरा समारोह राज्य सरकार की ओर से महाराजा हनवंतसिंह के नेतृत्व में मनाया गया। महाराजा ने तिरंगे को फौजी सलामी दी तथा परेड का निरीक्षण किया। इस अवसर पर महाराजा को 51 तोपों की सलामी दी गयी। महाराजा ने इस अवसर पर कोई भाषण नहीं दिया। स्टेडियम ग्राउण्ड में तिरंगे झण्डे को सलामी के वक्त उनके मौन और चुप्पी को उचित नहीं माना गया।

    महाराजा ने बादलिये (हलके नीले) रंग का साफा पहन कर परेड की सलामी ली। मारवाड़ में इस रंग को शोक के समय धारण किया जाता है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं चम्पालाल जोशी तथा जसवंतराज ने महाराजा को टोका कि आज तो केसरिया साफा पहनना चाहिये था। इस पर पर महाराजा ने बताया कि म्हारो तो आज 36 पीढ़ियां रो राज्य खत्म हुओ है। म्हारे तो आज शोक है।

    बाली में स्वतंत्रता दिवस पर स्कूल के बच्चों को लड्डू बांटने के लिये हाकिम से शक्कर का कोटा मांगा गया लेकिन उसने देने से इन्कार कर दिया। परगने के हाकम और उसके कर्मचारियों ने स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग नहीं लिया। केवल जनता ने स्वतंत्रता दिवस मनाया। मारवाड़ परिषद के वे सदस्य जिन्होंने मारवाड़ सोशलिस्ट पार्टी का निर्माण किया था, 15 अगस्त के स्वाधीनता दिवस समारोह में सम्मिलित नहीं हुए। इन सदस्यों ने 'ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है' जैसे नारे लगाकर विरोध प्रकट किया।

    केसरीसिंह तथा वेंकटाचार को हटाया जाना

    महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने राज्य के प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को महाराजा और जिन्ना की भेंट की सूचना दी थी तथा वेंकटाचार ने इसकी सूचना वायसराय को भिजवायी थी। इस घटना के दो माह बाद ही महाराजा ने केसरीसिंह को उसके पद से हटा दिया। राज्य में असंतोष न फैले इसलिये महाराजा ने कर्नल को अच्छे कार्य का प्रमाण पत्र तथा नयी ब्यूक गाड़ी भी दी। वेंकटाचार संयुक्त प्रांत के रहने वाले थे तथा वरिष्ठ आई.सी. एस. अधिकारी थे। वे भारत सरकार से प्रतिनियुक्त होकर जोधपुर आये थे। जिन्ना से हुई भेंट के बाद जोधपुर राज्य में घटित गतिविधियों से अप्रसन्न होकर हनवंतसिंह ने वेंकटाचार को पुनः भारत सरकार में लौट जाने की अनुमति दे दी तथा 17 नवम्बर 1947 को कार्यमुक्त कर दिया। वेंकटाचार की नियुक्ति महाराजा उम्मेदसिंह द्वारा पं. नेहरू की अनुशंसा पर की गयी थी। वेंकटाचार को इस प्रकार कार्यमुक्त करके दिल्ली भेजा जाना नेहरू को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने पटेल को पत्र लिखकर अप्रसन्नता व्यक्त की- 'जैसा कि आपको ज्ञात है कि अलवर, भरतपुर और जोधपुर के शासक अपने राज्य में जुल्म ढा रहे हैं। जोधपुर ने तो एक 18 वर्ष के विवेकहीन युवक को अपना गृहमंत्री बनाया है। वेंकटाचार को इसी कारण से जोधपुर छोड़ना पड़ा। ये राजा लोग बड़े बुद्धिहीन हैं और स्वयं को हानि पहुँचा रहे हैं।'

    जोधपुर राज्य में शरणार्थियों की समस्या

    जोधपुर राज्य में हिन्दू मुसलमानों के छुटपुट झगड़ों को छोड़ दिया जाये तो आमतौर पर सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित था। मुसलमानों के झगड़ालूपन को उनका अशिक्षाजन्य कृत्य माना जाता था। इससे उबरने के लिये महाराजा उम्मेदसिंह ने जोधपुर में मुस्लिम बालकों की शिक्षा हेतु दरबार हाईस्कूल की स्थापना की थी। दिल्ली, संयुक्त प्रांत तथा राजपूताना के अलवर एवं भरतपुर आदि राज्यों में में हो रहे सांप्रदायिक दंगों के समाचार भी जोधपुर में आने वाले समाचार पत्रों में निरंतर छप रहे थे। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान से लगने वाली 325 किलोमीटर लम्बी सीमा पर भी दोनों तरफ के शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। 28 अगस्त 1947 को मारवाड़ जंक्शन में एस. के. मुखर्जी की अध्यक्षता में एक शरणार्थी शिविर खोला गया जिसमें 2 लाख शरणार्थियों के अस्थायी निवास, भोजन, आश्रय तथा चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिविर में कई महिलों ने बच्चों को भी जन्म दिया जिन्हें पूर्ण स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिशुओं के लिये दोनों समय दूध की व्यवस्था की गयी। बहुत सी संस्थाओं तथा दानी लोगों ने इस शिविर को धन, दवायें, कपड़े तथा भोजन प्रदान किया। बहुत से लोगों ने शिविर में उपस्थित होकर निशुल्क सेवायें प्रदान कीं। महाराजा जोधपुर के अतिरिक्त बी. डी. एण्ड सी. आई.रेलवे, श्री उम्मेदमिल्स पाली तथा सोजत रोड प्रजा मण्डल ने भी शिविर को महत्त्वपूर्ण सहायता उपलब्ध करवायी।

    सितम्बर 1947 में सिंध प्रांत के प्रधानमंत्री एम. ए. खुसरो ने अपने सलाहकार व सिंध के बड़े नेता मोहम्मद हसीम गजदर को इस आशय से जोधपुर भेजा कि वे जोधपुर के मुसलमानों को समझायें कि वे जोधपुर के सुशासित व शांतिपूर्ण राज्य को छोड़कर पाकिस्तान नहीं आयें। जोधपुर राज्य में आये हुए शरणार्थियों को सुविधायें देने के लिये मारवाड़ शरणार्थी एक्ट 1948 बनाया गया तथा इस एक्ट के तहत पंजीकृत हुए शरणार्थियों को मारवाड़ राज्य में मारवाड़ियों के समान अधिकारों के आधार पर नौकरियां दी गयीं। जोधपुर राज्य में लगभग 46 हजार शरणार्थी पाकिस्तान से आये जिन्हें राज्य की ओर से मकान, भूखण्ड एवं कर्ज उपलब्ध करवाये गये। शरणार्थियों के लिये राज्य की ओर से विद्यालय तथा नारीशालायें बनायी गयीं। सिंध से आने वाले अधिकांश शरणार्थी जोधपुर नगर में ही बस गये।

    उमरकोट में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों ने महाराजा से प्रार्थना की कि महाराजा इस क्षेत्र के पुष्करणा परिवारों को पाकिस्तान से निकालने की व्यवस्था करें क्योंकि इस क्षेत्र से बाहर निकलने के लिये केवल उँट ही एकमात्र सवारी है तथा बड़े आकार वाले गरीब पुष्करणा ब्राह्मण परिवारों के लिये उँट की पीठ पर इतना लम्बा मार्ग पार करके निकल पाना संभव नहीं है। इन परिवारों ने स्वयं को मूलतः जोधपुर राज्य के शिव एवं पोकरण क्षेत्र की प्रजा बताते हुए महाराजा से रोजगार, काश्त हेतु भूमि एवं आवास की भी मांग की। मीरपुरखास के डिप्टी कलक्टर कार्यालय के हैडक्लर्क शामदास ताराचंद ने महाराजा को पत्र लिखकर मांग की कि इस क्षेत्र में पुष्करणा ब्राह्मणों के परिवारों से कुल 50 व्यक्ति राजकीय सेवा में हैं उन्हें जोधपुर राज्य की सेवा में नौकरी दी जाये। इनमें से 1 डिप्टी सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ पुलिस, 1 मैडिकल ऑफीसर, 1 नायब तहसीलदार एवं सैकेण्ड क्लास मजिस्ट्रेट, 1 सबइंसपेक्टर ऑफ पुलिस, 5 अंग्रेजी के अध्यापक, 15 हिन्दी के अध्यापक, 10 महिला अध्यापक, 4 कम्पाउण्डर, 5 पुलिस हैडकांस्टेबल तथा 5 राजस्व विभाग के लिपिक हैं।

    जोधपुर से हज यात्रा पर गये हुए कुछ मुस्लिम परिवारों ने 2 अक्टूबर 1947 को मक्का से महाराजा हनवंतसिंह को लिखा कि हम अपने परिवारों को खुदा के भरोसे पर जोधपुर में छोड़कर आये थे किंतु यहाँ हमें अपने बच्चों तथा परिवारों से लगातार सूचना मिल रही है कि जोधपुर राज्य में उनकी जान को खतरा है। यद्यपि हमें विश्वास है कि जोधपुर राज्य के हिन्दू, मुसलमानों से झगड़ा नहीं करेंगे किंतु जोधपुर राज्य में बाहर से आने वाले सिक्खों के दबाव में वे ऐसा कर सकते हैं। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उनके जीवन की रक्षा करें। इस पत्र की प्रति राजमाता को भी भेजी गयी। पाकिस्तानी नेता एच. एस. सुहरावर्दी ने 18 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा को पत्र लिखकर जोधपुर राज्य में सांप्रदायिक स्थितियों पर कड़ी आपत्ति जताईं उसने लिखा कि मुझे शिकायत प्राप्त हुई है कि अहमदाबाद-कराची के बीच यात्रा करने वाले मुस्लिम यात्रियों को लूनी व हैदराबाद सिंध के बीच स्थित बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर लूटा जा रहा है जो कि आपके क्षेत्राधिकार में है। राजस्थान की रियासतों में शरणार्थियों की समस्याओं पर विचार करने के लिये 6 नवम्बर 1947 को गृहमंत्रालय ने अलवर, भरतपुर, बीकानेर, जयपुर तथा जोधपुर राज्य के राजाओं की एक बैठक बुलाईंI

    टाण्डो मुहम्मद खान से महाराज किशनचंद्र शर्मा ने 29 अक्टूबर 1947 को पत्र लिखकर जोधपुर महाराजा से मांग की कि सिंध हैदराबाद जिले के टाण्डो डिवीजन में 5-6 गौशालायें हैं जिनमें 1000-1500 गायें हैं। चूंकि इस क्षेत्र के सम्पन्न परिवार मारवाड़ को पलायन कर गये हैं इसलिये इन गौशालाओं की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है तथा गायों की स्थिति करुणा जनक है। उनके लिये 20-25 गरीब ब्राह्मण परिवार ही शेष बचे हैं। अतः आप इम्पीरियल बैंक के माध्यम से गौशालाओं के लिये धन भिजवायें। सिंध से आये कई पुष्करणा ब्राह्मणों ने जो कि ज्योतिष का काम करते थे, हनवंतसिंह को अलग-अलग पत्र लिखकर अनुरोध किया कि हमें राजज्योतिषी नियुक्त किया जाये। इन पत्रों में इच्छा व्यक्त की गयी कि महाराजा हमसे आशीर्वाद लेने के लिये हमें बुलाये।

    जोधपुर महाराजा की फाइल में एक गुमनाम पत्र लगा हुआ है। यह पत्र महाराजा के निजी सचिव के कार्यालय में 18 नवम्बर 1947 को प्राप्त हुआ था। इस पत्र में किसी व्यक्ति ने महाराजा से शिकायत की है कि जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आ रहे हैं उन्हें रेलवे कर्मचारियों एवं कस्टम वालों द्वारा तंग किया जा रहा है और रिश्वत मांगी जा रही है। शरणार्थियों द्वारा लाये गये सामान की मात्रा अधिक बताकर उसका किराया मांगा जा रहा है तथा पैसा न होने पर सामान छीन लिया जाता है। उधर तो हिन्दुओं को पाकिस्तान ने लूट लिया और इधर हिन्दूओं को हिन्दू ही लूट रहे हैं। महाराजा अपने गुप्तचरों के माध्यम से पता लगवायें तथा शरणार्थियों की रक्षा करें। शरणार्थियों के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो रहा। कल की ही बात है कि जो मुसलमान हज करके लौटे हैं उनके पास बहुत सामान था किंतु न तो कस्टम वालों ने चैक किया और न रेलवे वालों ने सामान तोल कर देखा। ऐसे ही एक टंकित गुमनाम पत्र में महाराजा को शिकायत की गयी है कि सिंध से आये शरणार्थियों को राशन एवं आवास के स्थान पर लातें और मुक्के मिल रहे हैं जबकि पाकिस्तान पहुंचने वाले शरणार्थियों को पाकिस्तान में पूरा राशन, रोजगार और सुविधायें मिल रही हैं। जो हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भारत भाग आये हैं, पाकिस्तानी अधिकारी उन हिन्दुओं के घरों के ताले तोड़कर उन्हें उन मकानों में घुसा रहे हैं। इसके विपरीत जोधपुर राज्य के मकान मालिक हिन्दू शरणार्थियों से 10-15-20 गुना किराया मांग रहे हैं। 6 से 12 माह तक का किराया एक साथ लिया जा रहा है। शरणार्थियों को अपने आभूषण बेचने पड़ रहे हैं। शरणार्थियों के लिये अलग से कॉलोनी बनायी जाये।

    कर्मचारियों की समस्या

    देश के विभाजन के समय सांप्रदायिक समस्या उठ खड़ी होने से जोधपुर रेलवे के कुछ कर्मचारियों को अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान से निकल पाना कठिन हो गया। ऐसे 600 हिन्दू कर्मचारी जो सिंध प्रांत में नियुक्त थे, पाकिस्तान से निकलने में आई कठिनाई के कारण कुछ दिनों तक अपने काम पर नहीं आ सके। जब वे भारत लौटे तो रेलवे प्रशासन द्वारा उन्हें काम पर नहीं लिया गया तथा 3 माह तक निलम्बित रखने के पश्चात सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया। इस पर जोधपुर के रेलवे स्टाफ ने 28 नवम्बर 1947 को प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भिजवाया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह ज्ञापन रेलवे मंत्रालय को भिजवा दिया। रेल मंत्रालय ने रियासती विभाग को सूचित किया कि वह इस प्रकरण में कुछ भी करने में समर्थ नहीं है।

    रियासती मंत्रालय ने रेलवे मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश दे रखे थे कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर राज्यों को रेलवे मंत्रालय द्वारा सीधा पत्राचार नहीं किया जाना चाहिये। इसी प्रकार जोधपुर कर्मचारी संघ ने रियासती विभाग के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत कर मांग की कि इस कर्मचारी संघ को सरकार द्वारा मान्यता दी जानी चाहिये। कर्मचारियों के वेतन एवं भत्ते वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ाये जाने चाहिये। महंगाई भत्ता बढ़ाया जाना चाहिये। श्रमिकों के लिये पुस्तकालय एवं क्लब की सुविधा होनी चाहिये। श्रमिकों एवं उनके परिवारों के लिये निशुल्क चिकित्सालय होना चाहिये। रियासती विभाग द्वारा इस प्रकरण को राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को आबू भिजवा दिया गया।

    जोधपुर रेलवे की सम्पत्ति की निकासी

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सिंध क्षेत्र ब्रिटिश भारत की बम्बई प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था। ई.1900 में जोधपुर रेलवे ने 133.40 मील लम्बी रेल लाइन बालोतरा से पश्चिमी सीमा में ब्रिटिश राज्य की सीमा में बनायी थी। भारत सरकार ने 1 जनवरी 1929 को मीरपुर खास से जुडे़ खण्डों को सिंध लाइट रेल्वे कम्पनी लिमिटेड से खरीद कर जोधपुर रेलवे को प्रबंधन हेतु सौंप दिया। ई.1939 में जोधपुर रेलवे द्वारा खाडरू से नवाबशाह तक 30.72 मील लम्बा रेलमार्ग बिछाया गया। इसे 29 नवम्बर 1939 को आरंभ किया गया। 31 दिसम्बर 1942 को पुनः भारत सरकार ने सिंध लाइट रेलवे से मीरपुर खास से खाडरू तक का 49.50 मील लम्बा रेलमार्ग भी खरीद कर जोधपुर रेलवे को सौंप दिया जिससे जोधपुर रेलवे के ब्रिटिश खण्ड की लम्बाई 318.74 मील हो गयी। इस पथ पर रेल संचालन जोधपुर रेलवे द्वारा किया जाता था तथा सारा रॉलिंग स्टॉक जोधपुर रेलवे का था। जब सिंध क्षेत्र के पाकिस्तान में जाने के संकेत मिलने लगे तो उस समय जोधपुर रेलवे के मुख्य अभियंता सी. एल. कुमार ने सिंध क्षेत्र में स्थित रेलवे स्टेशनों एवं वहाँ कार्यरत निर्माण निरीक्षक एवं रेलपथ निरीक्षक कार्यालयों के भण्डारगृहों में पड़ी रेल-सम्पत्ति को जोधपुर में लाने का कार्य अत्यंत दक्षता एवं बुद्धिमत्ता से किया। यदि समय पर यह कदम नहीं उठाया गया होता तो लाखों रुपये की सामग्री पाकिस्तान में रह गयी होती।

    जोधपुर रेलवे के रॉलिंग स्टॉक के हस्तांतरण की तिथि 31.7.1947 निश्चित की गयी थी किंतु पाकिस्तान सरकार ने इस तिथि से कुछ दिन पूर्व ही 6 इंजन, 75 कोच, 4 ऑफीसर्स कैरिज तथा 300 से अधिक वैगन बलपूर्वक रोक लिये। इसका मूल्य 17 लाख रुपये आंका गया। इससे जोधपुर एवं पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेल सेवा ठप्प हो गयी। जोधपुर सरकार ने पाकिस्तान सरकार से मांग की कि वह रोके गये रॉलिंग स्टॉक तथा पाकिस्तान में निकलने वाले जोधपुर राज्य के 50 लाख रुपये के राजस्व का भुगतान करे तथा अपना प्रतिनिधि जोधपुर भेजकर मामले का निस्तारण करे किंतु पाकिस्तान सरकार ने जोधपुर सरकार की कोई बात नहीं सुनी। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास ने पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त श्रीप्रकाश से बात की। अंत में पं. जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से पाकिस्तान सरकार ने 50 लाख रुपये जोधपुर सरकार को देने तय किये।


    उदयपुर राज्य का विलय

    महाराजाधिराज महाराणा सर भूपालसिंह बहादुर 24 मई 1930 को उदयपुर राज्य की गद्दी पर बैठे। उदयपुर राज्य आरंभ से राष्ट्रीय विचारधारा पर चल रहा था तथा अपनी स्वतंत्र प्रकृति के कारण कई बार अपने गौरांग प्रभुओं को नाराज कर चुका था। जब भारत की स्वतंत्रता का समय आया तब भी उदयपुर महाराणा ने स्वयं को राष्ट्र के साथ खड़े हुए दिखाया किंतु वे भारत संघ में प्रत्यक्ष विलय की अपेक्षा किसी संघ अथवा उपसंघ के रूप में सम्मिलित होना चाहते थे। मई 1946 में महाराणा भूपालसिंह ने राजस्थान, गुजरात और मालवा के शासकों व उनके प्रतिनिधियों का उदयपुर में एक सम्मेलन आयोजित किया।

    महाराणा ने इसकी एक कार्यकारिणी सभा भी बनायी जिसमें समस्त राज्यों के शासकों को समान स्तर प्रदान किया गया। उन्हें अपने में से किसी एक को तीन वर्षों के लिये अध्यक्ष चुनने का भी अधिकार दिया गया। द्विसदनीय व्यवस्थापिका का भी प्रस्ताव किया गया जिसके एक सदन में तो राज्यों से समान संख्या में प्रतिनिधि होंगे तथा दूसरे सदन में राज्यों की जनसंख्या के आधार पर निर्वाचित सदस्य होंगे। छोटे से छोटे राज्य को भी एक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार होगा। निर्वाचन में अधिक से अधिक लोगों को मताधिकार प्रदान किया जायेगा तथा मंत्रिमण्डल की भी व्यवस्था थी यद्यपि इसके कार्यों, अधिकारों अथवा इसके गठन के सम्बन्ध में कुछ स्पष्ट व्याख्या नहीं थी।

    जब भारत की स्वतंत्रता की तिथि घोषित हो गयी तो महाराणा ने 25-26 जून 1947 को उदयपुर में राजस्थान के शासकों का एक सम्मेलन पुनः आयोजित किया जिसमें 22 राजाओं ने भाग लिया। महाराणा ने उपस्थित नरेशों से अपील की कि वे सब मिलकर राजस्थान यूनियन का गठन करें ताकि भावी भारतीय संघ में वे एक सबल इकाई के रूप में काम कर सकें। महाराणा का सुझाव था कि प्रस्तावित यूनियन भारतीय संघ से सम्बद्ध उपसंघ के रूप में रहे। राजाओं ने महाराणा की योजना पर विचार करने का आश्वासन दिया।

    महाराणा ने सम्मेलन में उपस्थित शासकों को चुनौती देते हुए कहा- 'हम लोगों ने मिलकर अपनी रियासतों की यूनियन नहीं बनायी तो समस्त रियासतें जो प्रांतों के समकक्ष नहीं हैं, निश्चित रूप से समाप्त हो जायेंगी।' के. एम. मुंशी ने भी इस योजना का समर्थन किया। जयपुर, जोधपुर और बीकानेर रियासतों को छोड़कर शेष रियासतों ने सिद्धांततः यूनियन बनाने का सिद्धांत स्वीकार कर लिया। संविधान निर्माण के लिये एक समिति गठित की गयी।

    उदयपुर रियासत को पाकिस्तान में मिलाने का प्रयास

    धौलपुर नरेश महाराजराणा उदयभानसिंह ने जोधपुर नरेश हनवंतसिंह, उदयपुर नरेश भूपालसिंह तथा जयपुर नरेश जयसिंह से सम्पर्क किया ताकि इन राजाओं को पाकिस्तान में मिलाने के लिये सहमत किया जा सके। उदयपुर नरेश और जयपुर नरेश तो उदयभानसिंह की चाल में नहीं आये किंतु वह जोधपुर नरेश हनवंतसिंह को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो गये। महाराजा हनवंतसिंह इस बात को जानते थे कि यदि राजपूताना की सर्वाधिक प्रतिष्ठित रियासत मेवाड़, भोपाल के नवाब की योजना में सम्मिलित हो जाती है तो यह योजना अच्छी तरह से कार्यान्वित की जा सकती है। अपने दीवान सी. एस. वेंकटाचार की सलाह के विरुद्ध महाराजा जोधपुर ने अपने साथ उदयपुर के महाराणा को पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रेरित किया।

    महाराणा ने इसका प्रत्युत्तर देते हुए लिखा- 'मेरी इच्छा तो मेरे पूर्वजों ने निश्चित कर दी थी। यदि वे थोड़े भी डगमगाये होते तो वे हमारे लिये हैदराबाद जितनी ही रियासत छोड़ जाते। उन्होंने ऐसा नहीं किया और न मैं करूंगा। मैं तो हिन्दुस्तान के साथ हूँ।'

    दुर्गादास ने महाराणा के कथन को उद्धृत करते समय हैदराबाद के स्थान पर जयपुर और जोधपुर रियासतों का उल्लेख किया है। इस प्रकार महाराणा ने देशभक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए स्वेच्छा से भारतीय संघ में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। जोधपुर राज्य पश्चिम की तरफ पाकिस्तान तथा पूर्व की तरफ मेवाड़, इंदौर तथा भोपाल के मध्य योजक कड़ी था। महाराजा इंदौर पहले से ही भोपाल नवाब के साथ था, यदि उदयपुर, जोधपुर राज्य के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता तो भोपाल भी पाकिस्तान से जुड़ सकता था तथा नवाब की पाकिस्तान में मिलने की इच्छा पूरी हो सकती थी।........किंतु महाराणा ने जोधपुर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महाराणा भूपालसिंह भारत में सम्मिलित होने वाले सर्वप्रथम राजाओं में से थे। बाद में वे स्वेच्छा से राजस्थान संघ में सम्मिलित हो गये। महाराणा ने 7 अगस्त 1947 को प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किये। यथास्थिति समझौता पत्र पर कार्यकारी प्रधानमंत्री मनोहरसिंह ने हस्ताक्षर किये। इस प्रकार उदयपुर राज्य भी प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने वाले सर्वप्रथम राज्यों में शामिल था। इस दौरान राज्य में पूरी तरह शांति रही। सीमा पर स्थित न होने के कारण राज्य में किसी तरह के सांप्रदायित तनाव की स्थिति भी नहीं बनी।


    जयपुर राज्य का विलय

    ई.1922 में सवाई माधोसिंह (द्वितीय) की निःसंतान मृत्यु हो जाने पर ईसरदा ठिकाणे के 11 वर्षीय बालक मोरमुकुट सिंह को मानसिंह (द्वितीय) के नाम से जयपुर का राजा बनाया गया। भारत को आजादी मिलने के समय यही सवाई सर मानसिंह जयपुर के शासक थे। जब ब्रिटिश सरकार ने भारत की आजादी की घोषणा की तो जयपुर उन राज्यों में से था जो सबसे पहले भारतीय संघ में सम्मिलित हुए। महारानी गायत्री देवी के अनुसार यद्यपि मैंने इस विचार को स्वीकार किया था कि हम किसी न किसी रूप में भारत का अंग होंगे किंतु मुझे यह कभी नहीं लगा कि जब हमारे राज्यों की पहचान समाप्त हो जायेगी, तब हमारा जीवन इतना बदल जायेगा। मेरी कल्पना थी कि हम सदैव अपनी राज्य की जनता से अपना सम्बन्ध बनाये रखेंगे तथा सार्वजनिक जीवन में हमारी भूमिका बनी रहेगी।

    महाराजा द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करना स्वीकार कर लिये जाने के बाद भी महाराजा समय पर हस्ताक्षरों के लिये उपलब्ध नहीं हुए। रियासती विभाग द्वारा 1 अगस्त 1947 को समस्त राज्यों को प्रविष्ठ संलेख तथा यथा स्थिति समझौता पत्र की दो-दो प्रतियाँ भिजवायी गयी थीं। प्रविष्ठ संलेख की प्रतियों पर राज्य के शासक द्वारा तथा यथास्थिति समझौता पत्र की प्रतियों पर राज्य के प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षर करके रियासती विभाग को लौटाने थे।

    रियासती विभाग की योजना यह थी कि जब शासक द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये जायेंगे तब वायसराय ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में इस सम्मिलन को स्वीकार करेगा तथा प्रविष्ठ संलेख की एक प्रति पर हस्ताक्षर करके राज्य के शासक को लौटा देगा। इसी प्रकार राज्य के प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षरित यथा स्थिति समझौता पत्र को रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन द्वारा स्वीकार किया जाना था तथा मेनन के हस्ताक्षरों के बाद यथास्थिति समझौता पत्र की एक प्रति को राज्य को लौटाया जाना था।

    महाराजा जयपुर को भी सम्मिलिन पत्र तथा यथास्थिति समझौता पत्र की दो-दो प्रतियाँ यथा समय भिजवा दी गयी थीं किंतु महाराजा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने के लिये उपलब्ध नहीं हुए। इस पर जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री वी. टी. कृष्णामाचारी ने रियासती विभाग से अनुरोध किया कि महाराजा संभवतः लंदन में होंगे इसलिये समझौता पत्र की दोनों प्रतियाँ लंदन स्थित भारत सचिव कार्यालय के लिये जाने वाली वायसराय की डाक में भेज दिया जाये। रियासती विभाग ने ऐसा ही किया किंतु महाराजा की ओर से इस सम्बन्ध में कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने की अंतिम तिथि को निकट आता देखकर प्रधानमंत्री वी. टी. कृष्णामाचारी ने फिर से रियासती विभाग को सूचित किया कि महाराजा की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं आया है अतः संभव है कि महाराजा लंदन में न हों, वे स्विट्जरलैण्ड जाने की बात कर रहे थे। अतः संभव है कि उन्हें वह पत्र नहीं मिला। महाराजा को 8 अगस्त को एक केबल भी किया गया है किंतु उसका भी जवाब नहीं आया है। अतः रियासती विभाग लंदन स्थित भारत सचिव कार्यालय को केबल के माध्यम से अनुरोध करे कि विशेष संदेशवाहक के माध्यम से वह डाक, महाराजा जहाँ कहीं भी हों, उन्हें भिजवा दी जाये। इस सम्बन्ध में किया गया व्यय जयपुर राज्य द्वारा वहन किया जायेगा।

    इस पर मेनन ने भारत सचिव को तार भेजा कि कृष्णामाचारी के अनुरोध पर 1 अगस्त 1947 को महाराजा जयपुर को देने के लिये प्रविष्ठ संलेख वायसराय की डाक के साथ लंदन भिजवाया गया था किंतु महाराजा की ओर से कोई उत्तर नहीं आया है अतः विशेष संदेशवाहक के द्वारा यह प्रविष्ठ संलेख महाराजा जहाँ कहीं भी हों उन्हें भिजवायें। इसका व्यय जयपुर राज्य वहन करेगा। महाराजा की स्विट्जरलैण्ड में तलाश करवायी गयी किंतु वे फ्रांस में थे। किसी तरह महाराजा से सम्पर्क किया गया तथा उनसे अनुरोध किया गया कि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करें। इस पर महाराजा ने सूचित किया कि वे स्वयं लंदन आकर प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देंगे।

    12 अगस्त को भारत सचिव ने तार के द्वारा रियासती विभाग को सूचित किया कि महाराजा लंदन आ रहे हैं। भारत सचिव द्वारा वी. पी. मेनन को जो तार किया गया उसमें कहा गया कि महाराजा स्विट्जरलैण्ड से लौट रहे हैं तथा वायसराय को जो तार किया गया उसमें कहा गया कि महाराजा फ्रांस से लौट रहे हैं तथा वे 13 अगस्त को लौटेंगे। उनके द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिये जाने के बाद प्रविष्ठ संलेख तीव्र वायुडाक सेवा से भेज दिया जायेगा। महाराजा मानसिंह ने 12 अगस्त 1947 को प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किये। 14 अगस्त को भारत सचिव ने गोपनीय तार द्वारा वी. पी. मेनन को सूचित किया कि महाराजा द्वारा हस्ताक्षरित दस्तावेज आज वायु सेवा द्वारा भेजा गया है।

    14 अगस्त को ही जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री वी. टी. कृष्णामाचारी ने वी. पी. मेनन को सूचित किया कि महाराजा जयपुर ने केबल से सूचना भेजी है कि महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख मुझे (कृष्णामाचारी को) देने के लिये वायसराय की डाक में दिल्ली भिजवायें हैं अतः आप (मेनन) उस डाक को संभाल कर रख लें। जब मैं 20 अगस्त को दिल्ली आऊंगा तो मैं ये कागज आप को दे दूंगा। 20 अगस्त को कृष्णामाचारी दिल्ली गये तथा उन्होंने मेनन से डाक प्राप्त करके 21 अगस्त को प्रविष्ठ संलेख की दो प्रतियाँ तथा यथास्थिति समझौता पत्र की एक प्रति मेनन को दी। राष्ट्रीय अभिलेखागार में इस विलय पत्र को सुरक्षित रखा गया है इस पर मेजर जनरल महाराजा सर सवाई मानसिंह जी. सी. आई.ई.की ओर से 12 अगस्त 1947 की तिथि में हस्ताक्षर अंकित हैं तथा इसे भारत के गवर्नर जनरल अर्ल माउंटबेटन ऑफ बर्मा की ओर से 16 अगस्त 1947 को स्वीकार किया गया है।

    15 अगस्त 1947 को भी महाराजा भारत में नहीं थे। वे अपने बच्चों को हैरो में उनके विद्यालय में छोड़ने के लिये गये हुए थे। वहाँ से उन्होंने जयपुर राज्य की जनता के नाम संदेश भिजवाया, जो इस प्रकार से था- स्वतंत्र भारत हमारे कंधों पर महान जिम्मेदारी लायेगा और मुझे पूरा विश्वास है कि हम जयपुर में प्रसन्नता पूर्वक अपनी जिम्मेदारियों को ग्रहण करेंगे तथा विश्व के स्वतंत्र देशों में भारत के उचित स्थान दिलाने के लिये भारत के निर्माण में अपनी पूरी क्षमता के साथ सहायता करेंगे।

    जयपुर राज्य में शरणार्थियों की समस्या

    जयपुर राज्य में बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या रहती थी। जयपुर शहर में ही कुल आबादी की एक तिहाई आबादी मुसलमानों की थी। जयपुर राज्य में सांप्रदायिक दंगे कभी भी भड़क सकते थे किंतु महाराजा अपनी मुसलमान प्रजा की रक्षा करने के लिये दृढ़ था तथा उसने व्यतिगत रूप से उनकी सुरक्षा की देखभाल की। प्रत्येक रात्रि में खाना खाने के बाद महाराजा अपने महल से बाहर निकल जाता था तथा अपनी सेना के एक मुस्लिम कर्नल के साथ खुली जीप में बैठकर नगर की गलियों में चक्कर लगाता था। वह मुसलमानों को उनकी सुरक्षा के बारे में आश्वस्त करता था। शीघ्र ही पाकिस्तान की सीमा पार करके सिंध एवं पंजाब से आने वाले हिन्दू शरणार्थियों की बाढ़ से सामना हुआ। जयपुर सरकार ने इन शरणार्थियों के रहने के लिये योजनाएं बनायीं।

    जार्ज षष्ठम् द्वारा संतोष की अभिव्यक्ति

    भारत के एकीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए जॉर्ज षष्ठम् ने लिखा है- मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि लगभग समस्त भारतीय राज्यों ने किसी न किसी उपनिवेश में सम्मिलित होने का निर्णय कर लिया है। वे संसार में कभी भी अकेले खड़े नहीं हो सकते थे।

    दक्षिणात्य प्रधानमंत्रियों की भूमिका

    भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राजपूताना के चारों बड़े राज्यों के प्रधानमंत्री दक्षिण भारतीय थे। वे देश की राजनीति में एक शक्तिशाली समूह के रूप में कार्य करने में सक्षम रहे। उदयपुर में सर टी. विजयराघवाचारी, जयपुर में सर वी. टी. कृष्णामाचारी, जोधपुर में सी. एस. वेंकटाचार एवं बीकानेर में सरदार के. एम. पनिक्कर दीवान के पद पर कार्यरत थे। वे चारों ही अच्छे मित्र थे तथा उन्हें एक दूसरे का विश्वास प्राप्त था इसलिये उन्होंने निकट संगति के साथ कार्य किया इसलिये इन चारों राज्यों ने भारत की राजनीति में सम्मिलित प्रभाव बनाया। राज्यों के भारत में विलय तथा बाद में राजस्थान में सम्मिलन में भी इन दक्षिणात्य प्रधानमंत्रियों की भूमिका प्रभावी एवं सकारात्मक रही। सर वी. टी. कृष्णामाचारी (जयपुर), सरदार के. एम. पनिक्कर (बीकानेर), एम. ए. श्रीनिवासन (ग्वालियर), सर बी. एल. मित्रा (बड़ौदा) एवं सी. एस. वेंकटाचार (जोधपुर) ने इस महान उद्देश्य के लिये दोनों पक्षों को एक साथ लाने तथा देश को बलकान प्रांतों की तरह बिखरने से बचाने के लिये कठोर परिश्रम से कार्य किया। उनके महान प्रयासों के बिना 2 जून से 15 अगस्त 1947 तक की मात्र 11 सप्ताह की अवधि में इस कार्य को नहीं किया जा सकता था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 51

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 51

    शियाओं का सफाया


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    पाकिस्तान निर्माण के समय पाकिस्तान में शियाओं की जनसंख्या लगभग 35 प्रतिशत थी किंतु 2019 में यह 10 से 15 प्रतिशत अनुमानित की गई। शिया-मुसलमान पाकिस्तान का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। शिया मुसलमान भी अलग-अलग समूहों में विभक्त हैं। अधिकतर शिया तवेलवर समुदाय के हैं। इनके अलावा इस्माइली, खोजा और बोहरा समुदायों की भी अच्छी संख्या है। तवेलवर शियाओं में सबसे ज्यादा हाजरा जनजाति के शिया हैं। ये क्वेटा और आसपास के इलाकों में केन्द्रित हैं तथा क्वेटा में इनकी संख्या लगभग 7 लाख है। आतंकी हमलों में मारे जाने वाले हर 10 शिया मुसलमानों में से 5 हाजरा समुदाय के होते हैं। पाकिस्तान में शिया विरोधी आंदोलन लगभग 34 साल पहले ईरान की क्रांति के बाद आरम्भ हुआ। सुन्नी कट्टरपंथियों की मांग है कि शियाओं को भी काफिर घोषित किया जाए। अलगाववादियों के खूनी संघर्ष के कारण कुर्रम, पराचिनार और हंगू आदि क्षेत्र शियाओं की कब्रगाह बन चुके हैं।

    कराची के शिया मोहल्लों को लगभग किलों में बदल दिया गया है। आत्मघाती हमलावर बारूद से भरी कारें लेकर अब्बास टाउन तथा अन्य शिया बहुल नगरों में घुस जाते हैं और बड़ी संख्या में शियाओं की लाशें दिखाई देने लगती हैं। ई.1980 से 1985 के बीच जनरल जिया उल हक की सरकार के समय पाकिस्तान का नए सिरे से इस्लामीकरण हुआ और सिपाह-ए-साहबा जैसे कट्टारपंथी संगठनों को फैलने का अवसर मिला। सिपाह-ए-साहबा ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही शिया संप्रदाय के लोगों पर हमले आरम्भ कर दिए। सुन्नी चरमपंथियों से मुकाबला करने के लिए शियाओं ने तहरीक-ए-निफाज़-ए-फिकाह-जाफरिया नामक संगठन खड़ा किया लेकिन इसके बाद से ही शियाओं पर खूनी हमले आरम्भ हो गए, जो अब तक जारी हैं। पाकिस्तान के अधिकतर आतंकवादी संगठन सुन्नी मुसलमानों के हैं। ये सभी संगठन शियाओं के खिलाफ कुछ न कुछ हिंसक कार्यवाही करते रहते हैं।

    तालिबान, अलकायदा और लश्कर-ए-झांगवी 'देवबंदी मुसलमान' हैं, जो शियाओं का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं। लश्कर-ए-झांगवी नामक आतंकवादी संगठन ने ई.2011 में पाकिस्तान के शिया मुसलमानों को धमकी दी कि पाकिस्तान के समस्त शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा जाएगा और पाकिस्तान उनकी कब्रगाह बनेगा। तब से लश्कर-ए-झांगवी लगातार शियाओं के धार्मिक स्थानों पर हिंसक कार्यवाहियां कर रहा है। हर साल शियाओं पर बड़े हमले करके दहशत फैलाई जाती है ताकि शिया भयभीत होकर अपने घरों को छोड़ दें और एक जगह इकट्ठे हो जाएं। ई.2012 में 125 से अधिक शियाओं की हत्या की गई। ई.2013 में बलूचिस्तान में शिया-हज़ारा-समुदाय के लगभग 200 लोगों को मारा गया।

    10 जनवरी 2013 को क्वेटा में हुए 2 धमाकों में 115 लोगों की मौत हो गई जिनमें से अधिकतर 'हजारा शिया' थे। इस घटना के एक माह के भीतर ही कैरानी रोड धमाके में 89 शिया मारे गए। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2013 से 2016 तक हुए बम धमाकों में 2,000 से अधिक शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया और लाखों शियाओं को सुन्नी बहुल इलाकों से पलायन करने के लिए विवश किया गया। पाकिस्तान में शियाओं के लिए सरकारी नौकरी और सुविधाएं भी धीरे-धीरे घटा दी गई हैं। वर्ष 2018 में सैनिक वर्दी पहने कुछ आतंकियों ने रावलपिंडी से गिलगित जा रही चार बसें रुकवाकर अब्बास या जाफरी जैसे शिया नाम वाले 46 लोगों को उतार कर मार डाला। मस्तुंग और क्वेटा में हजारा शियाओं का किया गया नरसंहार पाकिस्तान में अनेक स्थानों पर बार-बार दोहराया गया है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×