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  • अध्याय-3 : अखिल भारतीय संघ के प्रति राजपूताना के सक्षम राज्यों की प्रतिक्रया

     03.06.2020
    अध्याय-3 : अखिल भारतीय संघ के प्रति राजपूताना के सक्षम राज्यों की प्रतिक्रया

    अध्याय-3


    अखिल भारतीय संघ के प्रति सक्षम राज्यों की प्रतिक्रया

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    अब तक मैं इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि जोधपुर को संघ में सम्मिलित होने में कोई संकोच नहीं है........अगर संघ से यह तात्पर्य है कि इस राज्य में कम से कम ब्रिटिश भारत के प्रांतों की तरह उचित शासन हो तो मैं तुलना और कसौटी से भयभीत नहीं हूँ। - महाराजा उम्मेदसिंह।

    अंग्रेजी शासनकाल में भारत दो भागों में विभक्त हो गया। पहला भाग प्रांतों के रूप में था तथा ब्रिटिश भारत कहलाता था जबकि दूसरा भाग देशी राज्यों के रूप में था और रियासती भारत कहलाता था। ब्रिटिश भारत 11 प्रांतों से मिलकर बना था जबकि देशी राज्यों की संख्या 500 से 700 के बीच में घटती बढ़ती रहती थी। ब्रिटिश ताज ने इन दोनों भागों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने के लिये दो प्रारूप अपनाये। उसने ब्रिटिश भारत पर सम्प्रभुता (Sovereignty) तथा रियासती भारत पर परमोच्चता (Paramountcy) स्थापित की। ब्रिटिश भारत पर स्थापित की गयी सम्प्रभुता के कारण ही ब्रिटिश शक्ति को भारत के देशी राज्यों पर परमोच्चता लादने का अवसर प्राप्त हुआ था।

    इन दोनों भागों में रहने वाली जनसंख्या में किसी तरह का सांस्कृतिक भेद नहीं था। दोनों ही भाग एक समान रूप से आक्रांताओं के अत्याचारों से पीड़ित होते रहे थे। यहाँ तक कि दोनों ही भागों में अंग्रेजी शासन का शोषण चक्र भी एक जैसा ही चला था। राज्यों एवं केंद्रीय सरकार के मध्य राजनीतिक विभाग के माध्यम से सम्पर्क था। वायसराय इस विभाग का प्रमुख था। केन्द्र सरकार का कोई भी अन्य विभाग राजनीतिक विभाग की सहमति के बिना, राज्यों से किसी तरह का व्यवहार नहीं कर सकता था।

    भारतीय संघ की अवधारणा का विकास

    ई.1904 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 20वें सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में सर हेनरी कॉटन ने पहली बार कांग्रेस के मंच से संघीय विचार को स्पर्श किया। कॉटन ने भारतीय संघ की स्थापना को भारतीय देशभक्तों का आदर्श बताते हुए कहा कि 'यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ इण्डिया' नामक एक ऐसे संघ की स्थापना हो जो स्वतंत्र और विलग राज्यों का, स्वायत्तशासी उपनिवेशों के साथ मैत्रीपूर्ण स्तर पर गठित संघ (Federation) हो और जो ब्रिटेन की छत्रछाया से परस्पर संयुक्त हो। 1914 में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने इस प्रकार के संयुक्तिकरण की साध्यता को अभिज्ञात किया। विशेष रूप से एक ऐसे तंत्र को विकसित करने की योजना जिसके द्वारा आंग्ल भारत तथा राजसी भारत के बीच सतत एवं सहज सहकारिता स्थापित हो सके जो स्वराज्य प्राप्त करने के लिये नितांत अनिवार्य थी।

    बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने 1914 में वायसराय के समक्ष एक मसविदा प्रस्तुत किया जिसमें सुझाव था कि समस्त देशी राज्यों का प्रतिनिधान करने वाले एक संघीय मंडल का क्रमशः विकास किया जा सकता है तथा यदि आवश्यक हो तो इस मंडल में आंग्ल-भारतीय प्रांतों का भी तत्सम्बन्धी राज्यपालों तथा उपराज्यपालों द्वारा प्रतिनिधान किया जा सकता है। महाराजा के इस सुझाव की चारों ओर प्रशंसा हुई। लगता है कि विदेशी शासकों, भारतीय नेताओं तथा आमजन की सहानुभूति बटोरने के उद्देश्य से ही महाराजा ने यह सुझाव दिया था क्योंकि आगे चलकर जब इसके क्रियान्वयन का वास्तविक अवसर आया तो महाराजा गंगासिंह संघ निर्माण के कार्य के सबसे बड़े विरोधी सिद्ध हुए। महाराजा गंगासिंह की संघ के प्रति अवधारणा को स्पष्टतः दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले हिस्से में वे 1914 से लेकर 1930 (प्रथम गोलमेज सम्मेलन) तक संघ के लिये आवाज उठाते हैं तथा दूसरे हिस्से में वे गोलमेज सम्मेलन के बाद इसके घोर विरोधी हो जाते हैं। 1919 में माण्टेग्यू-चैम्सफोर्ड रिपोर्ट में कहा गया कि केंद्र सरकार भारतीय राज्यों के साथ एक संघ में प्रवेश कर सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि केंद्र सरकार भारतीय राज्यों के साथ तो संघ में प्रवेश कर सकती है किंतु वह ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ इस तरह के सम्बन्ध नहीं बना सकती क्योंकि भारतीय प्रांत तो केंद्र सरकार के ही अभिकरण हैं।

    प्रथम गोलमेज सम्मेलन

    31 अक्टूबर 1929 को लॉर्ड इरविन ने घोषणा की कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद शीघ्र ही ब्रिटिश सरकार एक गोलमेज सम्मेलन का आयोजन करेगी जिसमें ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार से मिलेंगे और भारत के लिये नवीन संविधान के सिद्धांतों पर विचार करेंगे। इस घोषणा से यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय रियासतों को ब्रिटिश प्रांतों के साथ एक समान राजनीतिक व्यवस्था में लाने को उत्सुक थी। प्रत्येक पक्ष द्वारा देशी राज्यों की ब्रिटिश प्रांतों के साथ एकता को प्रसन्नतादायी संवैधानिक प्रगति के रूप में पहचाना गया किंतु ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश प्रांतों के साथ भारतीय रियासतों की एकता संवैधानिक प्रगति की आवश्यकताओं के लिये नहीं करना चाहती थी अपितु भारत में तेजी से बढ़ रहे राष्ट्रवाद को संतुलित करने के लिये ब्रिटिश भारत के साथ अवरोधक भार बांधना चाहती थी। देशी रियासतें ब्रिटिश भारत की तुलना में अधिक संकीर्ण तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति अधिक स्वामिभक्त थीं। यह भी स्पष्ट था कि ब्रिटिश पक्ष के द्वारा संघीय योजना को समर्थन दिये जाने का कारण ब्रिटिश भारत में खतरनाक प्रजातांत्रिक तत्वों के विकास के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये विशुद्ध रूढ़िवाद को पनपाना था। भारत सरकार अधिनियम 1935 में किये गये कई प्रावधानों से भी यह बात स्पष्ट होती है।

    लॉर्ड इरविन की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में ई.1930 में ब्रिटिश सरकार ने लन्दन में पहला गोलमेज सम्मेलन बुलाया। 12 नवम्बर 1930 को ब्रिटिश सम्राट ने इसका उद्घाटन किया। सम्मेलन की वास्तविक कार्यवाही 17 नवम्बर से आरंभ हुई। सम्मेलन का सभापतित्व इंगलैण्ड के प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने किया। सम्मेलन में कुल 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें से 16 प्रतिनिधि भारत की देशी रियासतों से तथा 57 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत से थे जिन्हें गवर्नर जनरल द्वारा मनोनीत किया गया था। शेष 16 प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार तथा इंगलैण्ड के दोनों सदनों में विपक्ष के सदस्य थे। भारतीय प्रतिनिधियों में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, हरिजन, व्यापारी, जमींदार, श्रमिक आदि समस्त वर्गों का प्रतिनिधित्व था किंतु भारत के सर्वप्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया क्योंकि कांग्रेस 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी इसलिये वह ब्रिटिश सरकार द्वारा बुलाये गये ऐसे किसी भी सम्मेलन में भाग कैसे ले सकती थी जिसमें केवल औपनिवेशिक राज्य की बात की जाने वाली हो!

    सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख नेताओं में सर तेजबहादुर सप्रू, एम. ए. जयकर, श्रीनिवास शास्त्री, सी. वाई.चिंतामणि, मुहम्मद अली जिन्ना तथा बी. आर. अम्बेडकर थे। भारतीय रियासतों से 16 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए जिनमें बीकानेर नरेश गंगासिंह तथा अलवर नरेश जयसिंह के साथ-साथ धौलपुर, पटियाला, बड़ौदा, कश्मीर, इंदौर, रीवा, नवानगर, कोड़िया, सांगली तथा सारिली के राजा, भोपाल के नवाब तथा हैदराबाद, ग्वालिअर व मैसूर राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। सम्मेलन 19 जनवरी 1931 तक चला।

    सम्मेलन में सर तेज बहादुर सप्रू ने भारतीय संघ के निर्माण का प्रस्ताव किया। उन्होंने कहा कि राजा लोग पहले देशभक्त हैं और बाद में राजा। सप्रू ने राजाओं से अनुरोध किया कि वे एक ऐसे संयुक्त भारत की रचना करने के लिये प्रस्तुत हो जायें जिसका प्रत्येक भाग आत्मशासित हो, जो अपनी सीमाओं के भीतर निरपेक्ष स्वतंत्रता का उपभोग करता हो, जो शेष भाग के साथ यथोचित सम्बन्धों से विनियमित हो। सप्रू ने कहा कि मैं संघीय प्रकार वाली सरकार में अत्यंत मजबूती से विश्वास करता हूँ। मेरा विश्वास है कि इसमें भारत की समस्याओं का हल तथा भारत की मुक्ति विद्यमान है। उन्होंने ब्रिटिश भारत के साथ भारतीय राज्यों के सहबंधन की वकालात करते हुए कहा कि इससे भारत की एकता तथा स्थायित्व की प्राप्ति होगी। रक्षा के विषय में उन्होंने कहा कि ब्रिटिश भारत में चाहा जा रहा व्यावहारिक अनुभव देशी राज्यों से प्राप्त हो सकेगा।

    मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि मुहम्मद अली जिन्ना तथा मुहम्मद शफी ने सप्रू द्वारा संघीय भारत (Federal India) के निर्माण की मांग का स्वागत किया। बीकानेर नरेश गंगासिंह द्वारा इस प्रस्ताव का बड़े उत्साह से समर्थन किया गया। उन्होंने कहा- 'पूरे भारत की समृद्धि और संतोष के लिये हम भारतीय राजा, अपना पूरा सहयोग देकर कर्त्तव्य पालन करने के लिये तैयार हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि हम अपना सहयोग उस संघीय सरकार द्वारा दे सकते हैं, जो रियासतों और ब्रिटिश भारत से मिलकर बनी हो।'

    गंगासिंह ने कहा कि राजा लोग भारतीय हैं। वे अपने देश की उन्नति के पक्ष में हैं और समस्त भारत की अधिकतम समृद्धि एवं संतुष्टि में भाग लेने की तथा उसमें अपना योगदान करने की इच्छा रखते हैं। उन्होंने मांग की कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासित राज्य का दर्जा दिया जाये तथा ब्रिटिश भारत व भारतीय रियासतों का एक संघ बनाया जाये किंतु उन्होंने कुछ शर्तें भी रखीं। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त यह थी कि सम्राट के साथ राजाओं के समझौते के अधिकारों को माना जाये और उनकी इच्छा के बिना उन्हें बदला न जाये। महाराजा ने मांग की कि ब्रिटिश भारत के साथ संघीय समझौते में प्रवेश से पहले यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि संघ, संवैधानिक प्रावधान तथा आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से देशी राज्यों के लिये संतोषजनक हो।

    भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां तो महाराजा गंगासिंह से भी एक कदम आगे बढ़ गये उन्होंने कहा कि हम केवल स्वयं शासित संघीय ब्रिटिश भारत के साथ संघ बना सकते हैं। नरेशों द्वारा इस प्रकार के मत को ग्रहण किये जाने की प्रत्याशा किसी को नहीं थी। अतः इससे सबको विस्मय हुआ। भारत को हर्ष हुआ तथा इंग्लैण्ड के प्रतिक्रियावादियों को आश्चर्यं इस महत्त्वपूर्ण वक्तव्य ने सम्मेलन के स्वरूप को पूर्णतः बदल दिया। राज्यों के प्रति केन्द्र के उत्तरदायित्वों तथा नरेशों के साथ केन्द्र के सम्बन्धों के प्रश्न को बहाना बना कर अंग्रेज केन्द्र के उत्तरदायित्वपूर्ण शासन स्थापित करने के विषय में टाल-मटोल कर रहे थे किंतु अब उनका यह बहाना असमर्थनीय हो गया.....। रेनॉल्ड्स तथा अन्य लोगों को आश्चर्य हुआ। रेनॉल्ड्स का विचार था कि राजाओं ने सोचा था कि वे ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त हो जायेंगे तथा उन पर संघ का बहुत ही कम नियंत्रण होगा।

    राजाओं की ओर से इस प्रकार का रवैया अपनाये जाने के कई कारण थे। कुछ रियासतों में जनता आंदोलन उत्पन्न कर रही थी तथा राजा के अधिकार को चुनौती दी जा रही थी। कुछ राजाओं को चिंता थी कि यदि उनकी रियासत में नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया गया तो वे क्या करेंगे? कुछ राजाओं को लगता था कि एकीकृत ब्रिटिश भारत में अपने अधिकार सुरक्षित रख पाने की अपेक्षा संघीय भारत अधिक लाभदायक है। कुछ राजाओं का यह भी सोचना था कि संघीय इकाई में सम्मिलित होने से उन्हें आर्थिक सहायता मिल सकेगी। कुछ राजाओं की अभिलाषा थी कि नयी सरकार में उन्हें उच्च पद प्राप्त हो जायेंगे।

    महाराजा पटियाला सर भूपिंदरसिंह तथा उनके समर्थक राजाओं का मत सप्रू से भिन्न था। वे चाहते थे कि 'फेडरल इण्डिया' में सम्मिलित होने से पहले देशी राज्यों का एक संघ बने। इसे उन्होंने 'इण्डियन इण्डिया' कहा।

    छोटे राज्यों ने इस मत का अधिक समर्थन किया क्योंकि इससे वे अपने आंतरिक शासन में फेडरल इण्डिया के नियंत्रण से बच सकते थे। संभवतः ही किसी भी संघीय योजना में अपने निजी अधिकार और हितों की सुरक्षा के लिए राजा लोग उत्सुक रहते थे और आश्वासन चाहते थे कि उनके निजी आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप न करे। बहुत से राजाओं को संघीय विचार पर सन्देह हुआ और वे अन्त में चुप होकर बैठ गये। ब्रिटिश भारत के अधिकतर प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना के उद्देश्य से इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये गये थे किंतु जब उन्होंने भारतीय राजाओं को भी संघीय संविधान में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त करते हुए देखा तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ।

    इससे सम्मेलन में विचार विमर्श का पूरा वातावरण ही बदल गया। राजाओं ने उन्नीसवीं सदी के भारत को विलोपित होते हुए देखा। दूसरे अल्पसंख्यकों की भांति वे भी अपने दांवों को बाजी पर लगाना चाहते थे ताकि वे उसका अधिकतम लाभ उठा सकें। उनमें से कई राजा भारत को ब्रिटिश शिकंजे से मुक्त होते हुए देखना चाहते थे किंतु वे यह नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश भारतीय संविधान के तहत वायसराय की शक्तियां किसी अन्य शक्ति को स्थानांतरित हो जायें।

    संघीय ढांचा उप समिति

    संघीय उत्तरदायित्व को सिद्धांत रूप में विनिश्चत कर लिये जाने के पश्चात इसका विवरण निष्पादित करने के लिये लार्ड सैंकी की अध्यक्षता में संघीय ढांचा उप समिति (Federal Structure Sub Committee) नियुक्त की गयी। इस समिति में भारतीय रियासतों एवं ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि सम्मिलित किये गये। इस समिति में संघीय अवयवों, संघीय विधान के प्रकार, संघ की शक्तियां, संविधान, चरित्र तथा संघीय कार्यकारिणी के उत्तरदायित्व पर हुए विचार विमर्श से स्पष्ट हो गया कि राजा वास्तव में एक संघ (Federation) नहीं चाहते थे, अपितु राज्यों अथवा राज्यसंघों का एक ढुलमुल गठबंधन चाहते थे। वे शक्तियों की एक लम्बी सूची संघीय सरकार के निष्पादन के लिये नहीं छोड़ने पर अड़े गये। यहाँ तक कि वे शक्तियां भी, जिन्हें कि वे संघीय सरकार को स्थानांतरित करने को तैयार थे, कुछ सीमा तक अपनी निजी सत्ता एवं अधिकार क्षेत्र में रखना चाहते थे।

    वे विषय, जो कि स्वाभाविक रूप से संघीय सरकार से सम्बन्धित हैं, जैसे मुद्रा, डाक, टेलिग्राफ तथा रेलवे आदि, उनके विषय में भी बीकानेर राज्य के प्रतिनिधि मनुभाई मेहता ने दलील दी कि राजा लोग स्वाभाविक रूप से अपनी स्वयं की स्वायत्तता के प्रति सजग हैं और जब वे सामान्य जनहित के लिये अपनी स्वयं की सम्प्रभुता में कमी करने को तैयार हैं, तब वे इस बात के लिये भी चिंतित हैं कि उनसे आवश्यकता विहीन बलिदान की मांग न की जाये। यह इस उद्देश्य के लिये है कि जब वे संघीय अधिकारियों, वैधानिक अधिकारों तथा उनके सामान्य संघीय विषयों पर नीति बनाने के अधिकारों को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं, वे रेलवे, वायुसेवा.......आदि सामान्य विषयों पर अपने मालिकाना अधिकारों, अपने अधिकार क्षेत्र और अपने शासन को अलग करने के अनिच्छुक हैं।

    संघीय विधान मण्डल में प्रतिनिधित्व के मामले में भारतीय रियासतों ने जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की किंतु जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व मिलने पर भी अपनी शक्तियों को संघीय सरकार के प्रति समर्पित करने के मामले पर राजाओं का उत्साह शीघ्र ही भंग हो गया। अतः केवल स्थूल सैद्धांतिक बातों पर ही सहमति बन सकी। इस समिति ने 15 जनवरी 1931 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कहा गया कि-

    (1.) भारत के नवीन विधान का निर्माण संघ शासन के आधार पर होगा। ब्रिटिश प्रांत व देशी रियासतें इस संघ में सम्मिलित होंगी।

    (2.) प्रांतीय और केंद्रीय क्षेत्र में उत्तरदायी शासन स्थापित होगा। केन्द्रीय क्षेत्र में सुरक्षा और वैदेशिक विभाग, भारत के गवर्नर जनरल के अधीन रहेंगे।

    (3.) अंतरिम काल में कुछ रक्षात्मक विधान रखे जायेंगे।

    19 जनवरी 1931 को सम्मेलन सितम्बर 1931 तक के लिये स्थगित कर दिया गया। सम्मेलन के समापन भाषणों की भाषा सौहार्दपूर्ण एवं आशापूर्ण थी। अखिल भारतीय संघ के निर्माण की स्वीकृति इस सम्मेलन की उपलब्धि थी।

    द्वितीय गोलमेज सम्मेलन

    ई.1931 में गांधी और लार्ड इरविन के मध्य एक समझौता हुआ तथा 7 सितम्बर 1931 को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। सम्मेलन में सरोजनी नायडू, पं. मदनमोहन मालवीय, सर अली इमाम, सर मुहम्मद इकबाल तथा घनश्यामदास बिड़ला ने भाग लिया। शेष सदस्य लगभग वही थे जो प्रथम सम्मेलन में थे। इस सम्मेलन में बीकानेर नरेश गंगासिंह ने भी भाग लिया किंतु उन्होंने उतना उत्साह नहीं दिखाया जितना प्रथम सम्मेलन में दिखाया था। ऐसा लगता था कि राजाओं के संघ में प्रवेश को लेकर उनका उत्साह काफी मंद हो गया था। सम्मेलन में राजाओं के मध्य तीव्र मतभेद उभर कर सामने आये। ये मतभेद संघीय विधान में राज्यों के प्रतिनिधित्व तथा संघ में सम्मिलित होने वाली रियासतों की वित्तीय जवाबदेही को लेकर थे।

    संघीय विधान में राज्यों के प्रतिनिधित्व के बारे में राजाओं के तीन धड़े बन गये थे। हैदराबाद, मैसूर और बड़ौदा जैसी बड़ी रियासतों ने मांग की कि प्रतिनिधित्व रियासतों की जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिये। महाराजा बीकानेर ने मांग की कि उच्च सदन में 250 सीटें होनी चाहिये जिनमें से 50 प्रतिशत सीटें रियासतों को मिलनी चाहिये ताकि नरेन्द्र मण्डल के प्रत्येक सदस्य को सीट मिल सके। वे बड़े राज्यों को एक-दो सीटें अधिक देने के लिये भी तैयार थे। पटियाला महाराजा की मांग थी कि अखिल भारतीय संघ के निर्माण से पूर्व समस्त रियासतों का एक महासंघ बनना चाहिये।

    राज्यों को संघ से कुछ वित्तीय सुविधाएं मिलने के विषय पर इन्कार करके फेडरल स्ट्रक्चर समिति पहले ही राज्यों की आशा पर तुषारापात कर चुकी थी। अब राज्यों को यह चिंता सताने लगी थी कि संघीय सरकार के खर्चों को राज्यों पर डाला जायेगा तथा संघीय न्यायालय धीरे-धीरे राज्यों में अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करेगा। राजा लोग एक-एक करके अपने-अपने राज्यों से सम्बद्ध विशिष्ट प्रकरणों को भी सम्मेलन में उठाने लगे। इससे किसी भी सहमति पर पहुंचना असंभव हो गया।

    तृतीय गोलमेज सम्मेलन

    ई.1932 में दिल्ली में भारतीय नरेशों तथा मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें उन अनिवार्य सुरक्षणों को निर्धारित कर दिया गया जिनके अंतर्गत नरेश लोग संघ में मिलने के लिये तैयार थे। नरेंद्र मंडल में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि राज्यों की संधियों, सनदों तथा प्रतिज्ञाओं से उद्भूत होने वाले अधिकार अक्षत रहने चाहिये, राज्यों की प्रभुसत्ता अक्षुण्ण् रहनी चाहिये तथा राज्यों के प्रति सर्वोपरि राज्यशक्ति के दायित्व अपरिवर्तित रहने चाहिये। देशी राज्यों के प्रतिनिधि मंडल के कार्य सम्बन्धी प्रस्ताव पर आयोजित नरेंद्र मण्डल की बैठक की कार्यसूची संख्या-10 के द्वारा एक शर्त और जोड़ दी गयी जिसमें कहा गया कि देशी राज्यों के शासकों को भारतीय संघ में सम्मिलित होना तभी स्वीकार्य होगा यदि अंग्रेज सरकार आंतरिक स्वायत्तता और राज्यों की सार्वभौमिकता का आश्वासन दे।

    17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। अवैध संस्था घोषित हो जाने के कारण कांग्रेस इस सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी। सम्मेलन में कुल 46 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। ब्रिटेन के विरोधी मजदूर दल के सदस्यों ने सम्मेलन में भाग लेने से इन्कार कर दिया। राज्यों की ओर से अधिकतर नरेशों के स्थान पर राज्यों के वरिष्ठ मंत्री इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये इंगलैण्ड गये। इस संक्षिप्त सत्र में संघीय संविधान के संगठन तथा संघ में सम्मिलन के लिये राज्यों की ओर से निष्पादित किये जाने वाले प्रविष्ठ संलेख (Instrument Of Accession) पर विचार विमर्श किया गया।

    संघ में राज्यों के सम्मिलन की शर्तों को विनिश्चत किये जाने में हो रहे विलम्ब पर ब्रिटिश भारतीय नेताओं द्वारा चिंता व्यक्त की गयी। सर तेजबहादुर सप्रू ने कहा कि 1930 में संघ निर्माण का निमंत्रण देने के बाद से इस दिशा में राजाओं की ओर से कोई प्रगति नहीं की गयी है। उन्होंने पूछा कि क्या राजा लोग निश्चित हैं कि यदि उनके अधिकारों को सुरक्षित रखा गया तो वे संघ में आने के लिये तैयार होंगे।

    स्पष्ट था कि भारतीय नरेशों और ब्रिटिश भारतीय राजनीतिज्ञों के उद्देश्य एक दूसरे के विपरीत थे। भारतीय नरेश इस बात पर अड़े हुए थे कि संघीय विधान मण्डल में उनके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि रहें जबकि कांग्रेस की मांग थी कि जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को ही मान्यता दी जाये। इसी बात से आधुनिक भारत के इतिहास के एक प्रामाणिक परिच्छेद की समाप्ति हो गयी। प्रतिनिधियों के चुने जाने या मनोनीत होने के विषय में भारतीय नरेशों तथा ब्रिटिश भारत के नेताओं में मतभेद तो एक कारण था ही किंतु नरेशों द्वारा लगायी गयी कई शर्तों ने दोनों पक्षों के बीच एक ऐसी खाई खोद दी जिसे पाटना असंभव हो गया। नरेशों की अनुचित शर्तों ने संघीय विधान मण्डल पर विचार किया जाना बंद कर दिया। भारतीय नरेश, ब्रिटिश नेताओं और सरकारी मंत्रियों से मिलकर यह सोच रहे थे कि ब्रिटिश भारतीय प्रतिनिधियों की आजादी हासिल करने की हर एक कोशिश को किस तरह नाकामयाब कर दिया जाये।

    संघीय निर्माण समिति की बैठकों के पहले तमाम तजवीजों का जाल बिछाया गया और योजनाएं बनायी गयीं कि कांग्रेसी नेताओं का विरोध करके या तो सम्मेलन असफल कर दिया जाये अथवा विधान मण्डल में अपने मनोनीत सदस्यों का अधिक से अधिक अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त किया जाये ताकि देश का शासन एक प्रकार से राजाओं के हाथों में ही रह सके। जब भारतीय नरेशों को अपने उद्देश्यों की पूर्ति में असफलता मिली तब वे संघ को संदेह की दृष्टि से देखने लगे। गोलमेज सम्मेलन की समाप्ति पर उनका दृष्टिकोण निराशा का था और कुछ सदस्य सोच रहे थे कि सम्मेलन की असफलता निश्चित है।

    संयुक्त प्रवर समिति

    तीन गोलमेज सम्मेलनों के बाद 15 मार्च 1933 को ब्रिटिश सरकार द्वारा एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया गया। ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों की एक संयुक्त प्रवर समिति द्वारा इस श्वेतपत्र का अध्ययन किया गया। इसे जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी तथा इण्डियन कंस्टीट्यूशन रिफॉर्म्स कमेटी 1933-34 भी कहते हैं। लार्ड लिनलिथगो इस समिति के अध्यक्ष थे। ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के 27 व्यक्ति इस समिति के साथ जोड़ दिये गये जिनकी कोई संवैधानिक स्थिति नहीं थी। संयुक्त प्रवर समिति ने अप्रेल 1933 से नवम्बर 1934 तक लगातार 159 बैठकें करके अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं। समिति ने भारत सरकार विधेयक पर रिपोर्ट दी कि राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या राज्य परिषद (उच्च सदन) में अधिक से अधिक 104 तथा ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों की संख्या 156 हो। विधानसभा (निम्नसदन) में 250 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत के तथा अधिक से अधिक 125 प्रतिनिधि रियासतों के रहें।

    कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दलों के नेता संयुक्त प्रवर समिति द्वारा की गयी इस सिफारिश से डर गये जिसमें कहा गया था कि संघीय विधानसभा के ऊपरी तथा निम्न सदनों में रियासतों के प्रतिनिधि शासकों द्वारा मनोनीत होंगे, जनता द्वारा नहीं चुने जायेंगे।

    बम्बई सम्मेलन

    फरवरी 1935 में बम्बई में देशी राजाओं और उनके प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया गया। इसमें अनुभव किया गया कि यद्यपि कुछ राजाओं ने भले ही संघ के लिये मुखसेवा (Lip Service) की हो किंतु सामान्यतः राजा लोग अभी तक संघ के मूलभूत सिद्धांत को मानने के लिये तैयार नहीं थे कि संघीय इकाईयों की शक्तियां सीमित हो जायें तथा रजवाड़ों की आंतरिक सम्प्रभुता का कुछ हिस्सा हमेशा के लिये समाप्त हो जाये, इसके बदले में उन्हें सरकार में हिस्सेदारी मिले। भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि मण्डल ने बम्बई सम्मेलन में सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि रियासतों के लिये ऊपरी सदन में कम से कम 125 सीटों की मांग की जाये जिससे नरेन्द्र मण्डल के सारे सदस्यों को व्यक्तिगत और समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। निम्न सदन में 350 में से 40 प्रतिशत के अनुपात से उन्होंने 140 सीटों की मांग करना निश्चित किया। कुछ बड़ी रियासतों ने मैसूर के दीवान सर मिर्जा इस्माइल के नेतृत्व में उस प्रस्ताव का विरोध किया जो उनकी अनुपस्थिति में पारित कर लिया गया था। पाँच बड़ी रियासतों ने जिन्हें 21 तोपों की सलामियां मिलती थीं, संघीय निर्माण विधान मण्डल में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाये जाने की मांग की।

    भारत सरकार अधिनियम 1935

    भारत सरकार विधेयक पर ब्रिटिश संसद के निम्न सदन में 43 दिन तक तथा उच्च सदन में 13 दिन तक बहस चली। कंजरवेटिव पार्टी के नेता विंस्टल चर्चिल ने हाउस ऑफ कामन्स में तथा लॉर्ड सेलिसबरी ने हाउस ऑफ लार्ड्स में इस बिल का कड़ा विरोध किया। ब्रिटिश संसद में विधेयक के द्वितीय एवं तृतीय वाचन में व्यापक स्तर पर सहमति बन गयी। 4 अगस्त 1935 को विधेयक को सम्राट की स्वीकृति प्राप्त हो गयी तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 (Government Of India Act 1935) का निर्माण हुआ। इस अधिनियम के द्वारा निर्धारित किया गया कि एक अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों के अतिरिक्त देशी राज्य भी सम्मिलित होंगे। प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा। शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किये जायेंगे-

    (1) संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे।

    (2) प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा

    (3) समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून ही मान्य होगा।

    संघीय संविधान के तहत दो सदनों की व्यवस्था की गयी जिसमें राज्यों के प्रतिनिधियों को शासकों द्वारा नामित किया जाना था। कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में ब्रिटिश भारत के सदस्यों की संख्या 156 निश्चित की गयी जबकि राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या अधिकतम 104 हो सकती थी। हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में ब्रिटिश भारत के 250 प्रतिनिधि एवं राज्यों के अधिकतम 125 सदस्य होने थे। इस अधिनियम के तहत क्राउन प्रतिनिधि (Crown Representative) का एक नया पद सृजित किया गया। वायसराय को गवर्नर जनरल के साथ-साथ क्राउन प्रतिनिधि का पदभार भी संभालना था। क्राउन प्रतिनिधि को राज्य सचिव के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया था जो कि भविष्य में गवर्नर जनरल पर कम नियंत्रण रखने वाला था।

    राज्यों के सम्बन्ध में क्राउन प्रतिनिधि की सहायता के लिये राजनीतिक सलाहकार (Political Advisor) का पद सृजित किया गया। राजनीतिक सलाहकार को गवर्नर जनरल की परिषद का सदस्य बनाया गया था। राज्यों को संघीय विषयों में संघ के अध्यक्ष के रूप में गवर्नर जनरल से व्यवहार करना था जबकि परमोच्चसत्ता से सम्बद्ध विषयों के लिये क्राउन प्रतिनिधि से व्यवहार करना था। संविधान में प्रावधान किया गया था कि गवर्नर जनरल तथा क्राउन प्रतिनिधि एक व्यक्ति भी हो सकता था किंतु देाहरी जिम्मेदारियों को संभालने के लिये उसके पास दो भिन्न सचिवालय एवं भिन्न अभिकरण होने थे।

    यद्यपि 1935 के अधिनियम में वे विषय स्पष्टतः निश्चित नहीं किये गये थे जो कि रियासत द्वारा संघीय विषय के रूप में स्वीकार किये जायेंगे, तथापि यह आशा की गयी थी कि अधिकांश रियासतों के शासक प्रविष्ठ संलेख में दी गयी महत्त्वपूर्ण संघीय विषयों की सूची में से अधिकांश विषयों को स्वीकार कर लेंगे। संघीय योजना में देशी राज्यों के सम्मिलित होने के सम्बन्ध में ब्रिटिश संसद द्वारा आशा व्यक्त की गयी थी कि देशी राज्यों को संघीय विषयों में से प्रथम 45 मदों को स्वीकार करने के लिये आमंत्रित किया जायेगा तथा वे अपनी इच्छा से अन्य विषयों को चुनने के लिये भी स्वतंत्र होंगे।

    संघ के निर्माण के सम्बन्ध में रियासती प्रजा को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं दिया गया था। यह केवल रियासत के शासक की इच्छा पर छोड़ दिया गया था कि वह संघ में सम्मिलित हो अथवा नहीं। यदि ब्रिटिश प्रांत, संघ बनाने के पक्ष में होते तो भी देशी रियासतों की स्पष्ट सहमति के बिना संघ नहीं बन सकता था। दूसरी ओर यदि देशी रियासतें संघ बनाने के पक्ष में होतीं तो प्रांतों को भी अनिवार्य रूप से संघ में सम्मिलित होना पड़ता। इस प्रकार संघ का आरंभ होना अथवा न होना, केवल रियासतों के ऊपर निर्भर हो कर रह गया था। राजाओं द्वारा नामित प्रतिनिधियों और ब्रिटिश भारत द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को मिलाकर संघ बनाने की योजना पर लॉर्ड मेस्टॅन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि कानून ने तेल और पानी का मिश्रण बनाने की चेष्टा की है।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 में प्रावधान किया गया था कि ब्रिटिश भारत और स्वेच्छा से शामिल होने वाली देशी रियासतों के अखिल भारतीय संघ में पूर्ण उत्तरदायित्व युक्त सरकार का निर्माण हो। इस अधिनियम के प्रावधानों से बड़ी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गयी। एक ओर तो राजा लोग अपनी सम्प्रभुता तथा ब्रिटिश ताज के साथ हुई संधियों को अलंघनीय बताकर, अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखे बिना, संघ में सम्मिलित होने को तैयार नहीं थे तथा दूसरी ओर उनके संघ में सम्मिलित होने से उन्हें संघ के माध्यम से ब्रिटिश भारत के शासन में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलने वाला था। राजाओं को यह आशंका भी थी कि यदि वे अपनी प्रभुसत्ता संघ को समर्पित करेंगे तो उनके राज्यों की प्रजा के ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की प्रजा और उनके नेताओं के संपर्क में आने से राज्यों में भी ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की भांति राजनीतिक प्रदूषण फैल जायेगा। पटियाला के महाराजा भूपिन्दरसिंह ने संघ योजना के विरोध का नेतृत्व किया। 25 फरवरी 1935 को नरेंद्र मण्डल की बैठक में बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने भी महाराजा पटियाला तथा नवाब भोपाल के साथ संघीय योजना में छिद्र ढूंढने का काम किया।

    सक्षम राज्यों के साथ संघीय योजना पर विचार विमर्श

    1936 में लॉर्ड विलिंगडन के बाद मारकीस ऑफ लिनलिथगो को भारत का वायसराय बनाया गया। लिनलिथगो संयुक्त प्रवर समिति के अध्यक्ष भी रह चुके थे। वे अपने कार्यकाल में भारत संघ के उद्घाटन की इच्छा लेकर भारत आये। लिनलिथगो को भारतीय राजाओं से सहानुभूति थी। वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते थे जिससे राजाओं का दिल दुखे। उनकी राय में राजा ही भारत से ब्रिटिश सम्बन्धों का प्रमुख आधार एवं तत्व थे। संघ योजना में राजाओं को अड़ंगा लगाते हुए देखकर वायसराय लिनलिथगो ने संघ निर्माण के लिये देशी राज्यों में अपने तीन विशेष प्रतिनिधियों- सर कोर्टने लेटीमर, सर फ्रांसिस वायली तथा सर आर्थर लोथियान को भेजा। फ्रांसिस वायली को राजपूताना के नरेशों से वार्त्ता करने के लिये भेजा गया। लिनलिथगो का मानना था कि संघ योजना देशी राज्यों के शासकों के हित में थी। इसलिये उसने अपने प्रतिनिधियों को दायित्व सौंपा कि वे राजाओं तथा उनके मंत्रियों को संघ में सम्मिलन की प्रक्रिया तथा उसका अर्थ समझायें।

    जैसे ही शासकों को वायसराय के इस निर्णय की जानकारी हुई, वे चौकन्ने हो गये। वे पहले से ही कांग्रेस द्वारा प्रजा मण्डलों के माध्यम से बनाये जा रहे इस दबाव से त्रस्त थे कि शासक अपने आंतरिक शासन को समर्पित कर दें। शासकों ने समझा कि अब परमोच्चसत्ता राज्यों का आंतरिक शासन भविष्य में बनने वाले संघ को समर्पित कर देने के लिये दबाव बना रही है तथा परमोच्चसत्ता शासकों से सौदा करना चाहती है। इसलिये शासकों ने इन विशेष प्रतिनिधियों से वार्त्ता करने के लिये चालाक मंत्रियों एवं संवैधानिक विशेषज्ञों को नियुक्त किया।

    भारत सचिव वायसराय की इस कार्यवाही को उचित नहीं मानते थे किंतु बाद में वे सहमत हो गये। इन अधिकारियों को प्रविष्ठ संलेख की प्रतियाँ उपलब्ध करवायी गयीं जो कि राज्यों को पहले से ही भेजी जा चुकी थीं। इन अधिकारियों को वायसराय के लिखित आदेश भी दिये गये। वायसराय के इन विशेष अधिकारियों ने 1936-37 की सर्दियों में विभिन्न राज्यों का दौरा किया तथा राज्याधिकारियों एवं शासकों से हुए विचार विमर्श के दौरान पाया कि राज्यों के शासकों का मानस संघ में सम्मिलन का नहीं था। वे प्रस्तावित संघ को अपनी सुरक्षा तथा सम्प्रभुता के लिये सबसे बड़ा खतरा समझते थे।

    इन विचार विमर्शों के दौरान शासकों ने स्पष्ट कर दिया कि शासकों के लिये देश की एकता की प्रेरणा प्रमुख नहीं थी और न ही वे संघ में सम्मिलन के लिये चिरौरी करने की इच्छा रखते थे। उन्हें जिस प्रश्न ने विचलित कर रखा था वह यह नहीं था कि संघ का निर्माण उन्हें सम्पूर्ण भारत के हित के लिये भागीदारी निभाने का अवसर देगा, अपितु उनके समक्ष विचलित करने वाला प्रश्न यह था कि उनकी अपनी स्थिति संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और बेहतर होगी अथवा संघ से बाहर।

    जोधपुर: संघ के प्रति सहमति

    वायसराय द्वारा 18 अगस्त 1936 को जोधपुर नरेश को एक पत्र लिखा गया जिसके जवाब में 26 अगस्त 1936 को जोधपुर महाराजा ने वायसराय को लिखा कि मुझे आपके पत्र का जवाब देने का सम्मान प्राप्त हुआ है जिसमें महामहिम वायसराय द्वारा अपनाई जाने वाली उस विशेष प्रक्रिया के बारे में लिखा गया है जो कि प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना के यथासंभव तुरंत पश्चात पूर्ण भारतीय संघ की स्थापना के दृष्टिकोण से प्रविष्ठ संलेख के प्रारूप पर किये जोन वाले विचार विमर्श को सुविधाजनक एवं त्वरित बनाने तथा विभिन्न राज्यों की सम्बद्ध अनुसूचियों के बारे में है। मैं महामहिम द्वारा इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रकरण में राजाओं के प्रति प्रदर्शित की गयी उत्सुकता तथा प्रवृत्ति की अत्यंत प्रखरता से प्रशंसा करता हूँ तथा उस प्रस्ताव का स्वागत करता हूँ कि महामहिम के व्यक्तिगत प्रतिनिधि मि. वायली नवीन अधिनियम के तहत संघीय राज्यों की वास्तविक स्थिति के बारे में मेरी तथा मेरी सरकार की सहायता के लिये जोधपुर की यात्रा करेंगे तथा तथा भारतीय संघ के साथ मेरे राज्य के भविष्य के सम्बंधों का निर्धारण करने वाले विषयों को स्पष्ट करेंगे। मेरा दृढ़ विश्वास है कि मि. वायली जैसे अनुभवी एवं योग्य अधिकारी से मिलने वाली मदद मेरे लिये अत्यंत मूल्यवान सिद्ध होगी। मेरे मंत्रिगण संघ के प्रश्न की जांच करने में पहले से ही व्यस्त हैं तथा मुझे आशा है कि मैं सावधानी पूर्वक किये गये विचार विमर्श के पश्चात, बिना किसी अनावश्यक विलम्ब के किसी निर्णय पर पहुंचने की स्थिति में होऊंगा।

    अगस्त 1936 में जोधपुर महाराजा को, नवम्बर 1936 में समस्त छोटे बड़े राजाओं के मध्य प्रविष्ठ संलेख के मानक प्रारूप के निर्धारण के लिये होने वाले विचार-विमर्श में भाग लेने के लिये पटियाला महाराजा का एक निमंत्रण मिला। जोधपुर महाराजा को संघ के प्रश्न पर नरेंद्र मण्डल या एकीकृत कार्य की उपयोगिता में अधिक विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने अनुभव किया कि महाराजा पटियाला के सुझाव को अस्वीकृत करना अभद्रता होगी। इसलिये राय बहादुर कंवरसेन जोधपुर राज्य के न्यायिक सदस्य को निर्देशित किया गया कि वह नरेंद्र मण्डल के कार्यकारी चांसलर को इस आशय का तार भेजे कि महाराजा इस प्रस्ताव से सहमत हैं। जोधपुर महाराजा की ओर से नरेंद्र मण्डल के कार्यकारी चांसलर धौलपुर महाराजा को भेजे गये तार में कहा गया कि मैं इस इस सुझाव से सहमत हूँ कि यदि संघ के प्रश्न पर विचार विमर्श किया जाना संभव हो तो नवम्बर 1936 में या तो नरेंद्र मण्डल की बैठक या अनौपचारिक सम्मेलन आयोजित किया जाना चाहिये।

    नवम्बर 1936 में वायसराय का विशेष दूत फ्रांसिस वायली जोधपुर आया। 17 व 18 नवम्बर को वायली ने राज्य के अधिकारियों से संघ योजना पर विचार विमर्श किया। वह महाराजा उम्मेदसिंह से वार्तालाप के पश्चात् संतुष्ट हुआ। उसने वायसराय को भेजी रिपोर्ट में महाराजा के रुख की प्रशंसा की कि किसी भी अन्य राज्य में इस विषय को उस तरह से नहीं उठाया गया जिस तरह से जोधपुर राज्य में उठाया गया। महाराजा तथा उनके अधिकारी इस बात पर सहमत थे कि इस विषय पर समस्त पूर्वाग्रह केवल संदेह के कारण उत्पन्न हुए तथा वे स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने संघ के निर्माण के प्रति पूर्णतः समर्थन व्यक्त किया। मुझे इस बात में तनिक भी संशय नहीं है कि जब जनवरी 1937 में राज्य द्वारा भारत सरकार को इस विषय पर उत्तर दिया जायेगा तो वे उन शर्तों पर संघ में सम्मिलित होने की सहमति प्रदान करेंगे जिन्हें स्वीकार करना कठिन नहीं होगा।

    21 नवम्बर 1936 को बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह को एक तार भेज कर अनुरोध किया कि मैं 25 नवम्बर को दिल्ली जा रहा हूँ अतः यदि आप लाला कंवरसेन को बीकानेर भेज दें ताकि मुझे यह पता लग सके कि जोधपुर में वायली के विचार विमर्श का क्या परिणाम रहा। जोधपुर महाराजा ने बीकानेर महाराजा को जवाब दिया कि कंवरसेन संघीय प्रकरण तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त हैं इसलिये उन्हें तत्काल भेजा जाना संभव नहीं है। फिर भी मैंने कंवरसेन को निर्देशित किया है कि वह आपको वायली के नोट का सारांश भिजवा दे जिसमें जोधपुर राज्य द्वारा उठायी गयी कठिनाईयों तथा वायली द्वारा दिये गये उत्तर की जानकारी हो। आप विश्वास करें कि इससे आपको पूरी जानकारी प्राप्त हो जायेगी। कंवरसेन ने महारजा बीकानेर को ये सूचनायें प्रेषित कीं-

    (1) प्रविष्ठ संलेख का कच्चा प्रारूप,

    (2) प्रविष्ठ संलेख के साथ संलग्न की जाने वाली संभावित प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ अनुसूचियां

    (3) 17 व 18 नवम्बर 1936 को जोधपुर राज्य के साथ हुए विचार-विमर्श के सम्बन्ध में मि. वायली के नोट का सारांश।

    जोधपुर राज्य के मुख्यमंत्री ने 9 अप्रेल 1937 को वेस्टर्न राजपूताना स्टेट्स के रेजीडेण्ट को सूचित किया कि जोधपुर राज्य, संघ में प्रवेश के लिये तैयार है तथा राज्य ने भारत सरकार अधिनियम 1935 की सातवीं अनुसूची में दिये गये 47 मदों पर संघ का निर्माण प्रस्तावित किया है। कृपया आप समुचित ढंग से भारत सरकार को सूचित कर दें कि जोधपुर के महाराजा संघीय नीति के प्रति कृतसंकल्प होने पर सहमत हैं। 19 अप्रेल 1937 को ए.जी.जी. ने इस रिपोर्ट को भारत सरकार को भिजवा दिया। 21 अक्टूबर 1937 को राजपूताना के रेजीडेंट ने क्राउन रिप्रेजेंटेटिव को सूचित किया कि मैं जोधपुर राज्य के मुख्यमंत्री के पत्र संख्या सी/42/सी/38/7-पी-। दिनांक 29 सितम्बर 1937 की एक प्रति प्रेषित कर रहा हूँ। महाराजा बिना किसी शर्त के संघीय विधान की मद संख्या 3, 6, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 16, 17, 18, 21, 22, 23, 27, 33, 37, 38, 40, 42, 43, 48, 49, 52 तथा 59 को स्वीकार करते हैं। महाराजा कतिपय शर्तों के साथ मद संख्या 1, 2, 4, 5, 7, 14, 15, 19, 20, 24, 25, 26, 28, 29, 30, 31, 32, 34, 39, 41, 44, 45, 46, 47, 53 एवं 60 (वायली द्वारा सुझाया गया नया मद) को स्वीकार करते हैं तथा मद संख्या 35, 36, 50, 51, 54, 55, 57 एवं 58 को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं।

    मेवाड़: असंतोषजनक रुख

    अगस्त 1936 में वायसराय लिनलिथगो ने उदयपुर के महाराणा को वायली की नियुक्ति के बारे में सूचित किया जो संघ के प्रभावों को स्पष्ट करने के लिये वायसराय के निजी दूत के रूप में उदयपुर की यात्रा करेगा। 20 नवम्बर 1936 को ऑग्लिवी तथा वायली ने उदयपुर में संघ संबंधी विभिन्न समस्याओं पर विचार विमर्श किया। 21 नवम्बर को ऑग्लिवी ने ग्लांसी को सूचित किया कि कल उदयपुर के हिज हाइनेस तथा उनके मुसाहिबे आला दीवान बहादुर पण्डित धर्मनारायण के साथ संघीय वार्तालाप हुआ जिसका परिणाम संतोष जनक नहीं रहा। महाराणा को संघ के मसले की कोई जानकारी नहीं है तथा मुसाहिबे आला पं. धर्मनारायण ने बहुत बड़ी संख्या में अस्वीकार्य बाधाएं प्रस्तुत की हैं जिनका उद्देश्य स्पष्टतः संघीय मामलों में राज्य की संप्रभुता तथा आंतरिक अधिकार क्षेत्र को किंचित भी चोट नहीं आने देना है। आज प्रातः मैंने पं. धर्मनारायण से लम्बी वार्त्ता की तथा राज्य द्वारा इस प्रकार का रुख अपनाये जाने पर असंतोष तथा आश्चर्य व्यक्त किया। उन्होंने मुझे बताया कि उनके लिये संघ के मार्ग में आने वाली प्रत्येक संभावित कठिनाई को सामने लाना अत्यंत आवश्यक था क्योंकि राज्य के ऐसे कई हित हैं जो हिज हाइनेस के आत्मविश्वास को डगमगाने के लिये अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति बाद में मुझे यह नहीं कहे कि मैंने यह बात हिज हाइनेस को नहीं बताईं हालांकि उन्होंने संघ में शामिल नहीं होने की इच्छा का खण्डन किया है किंतु मेरा विश्वास है कि इतने सारे पूर्वाग्रहों के कारण वे संघ में सम्मिलन के लिये ऐसी शर्तें लगायेंगे जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकेगा।

    मुख्यमंत्री की सलाह पर कुछ समय पहले ही महाराणा ने राजपूताने के समस्त राजाओं को संघ के प्रश्न पर विचार विमर्श करने के लिये दिसम्बर में उदयपुर आने का निमंत्रण दिया है। यदि 6 साल पहले महाराणा ने इस प्रकार का कदम उठाया होता तो उसमें कोई उद्देश्य निहित होता किंतु निर्णय की इस अंतिम घड़ी में राजपूताना के राजाओं को सामूहिक रूप से बुलाने के पीछे मुझे तथा वायली को अत्यंत खराब सलाह जान पड़ती है। मैंने पं. धर्मनारायण से कहा कि क्या इस तरह का कदम उठाने के पीछे तथा कल जो वार्तालाप हुआ है उसके पीछे महाराणा की इच्छा राजपूताने के अन्य राजाओं को यह सलाह देने की है कि वे संघ में सम्मिलित न हों? यदि हिज हाइनेस की इच्छा मशीन में धूल डालने की है तो इसके परिणाम बुरे होंगे। यदि महाराणा स्वयं संघ में सम्मिलित न होना चाहें तो यह उनका अपना मामला है किंतु अन्य छोटे राज्यों को अपने स्वतंत्र चिंतन से रोकने की सलाह नहीं दी जा सकती। उन्हें बिना किसी बाह्य दबाव के, स्वतंत्रता पूर्वक अपने निर्णय पर पहुंचना है। मैंने धर्मनारायण से यह भी कहा कि यदि छोटे राज्यों ने उदयपुर में विचार विमर्श के बाद संघ में न मिलने का निर्णय लिया तो उसका केवल यही अर्थ निकाला जायेगा कि महाराणा ने उन्हें उकसाया है। इस पर धर्मनारायण ने कहा कि यदि यह प्रस्ताव महामहिम वायसराय को पसंद नहीं है तो हिज हाइनेस इस पर आगे नहीं बढ़ेंगे। मैंने धर्मनारायण से कहा कि यही उचित होगा कि इस समय उदयपुर में राजाओं का सम्मेलन न बुलाया जाये।

    जब 28 नवम्बर को वायसराय महाराणा से मिलेंगे तो इस विषय पर बात करने की स्थिति में होंगे। अब तक की स्थिति के अनुसार मैं समझता हूँ कि धौलपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, बंूदी, सिरोही तथा झालावाड़ के शासकों ने निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है जबकि बीकानेर महाराजा ने महाराणा को आगे आने के लिये बधाई का तार भेजा है तथा स्वयं उनकी उपस्थिति अनिश्चित है। जबकि दूसरी तरफ जोधपुर महाराजा ने जवाब दिया है कि इस अंतिम समय में उन्हें संघ पर विचार विमर्श करने में आपत्ति है। मुझे संदेह है कि जयपुर महाराजा, जिन्होंने कि अब तक कोई जवाब नहीं भेजा है, उदयपुर आयेंगे। पं. धर्मनारायण ने मुझे कहा है कि महाराणा यह कहकर इस बैठक को निरस्त कर सकते हैं कि चूंकि जोधपुर के महाराजा इसमें भाग लेने के लिये नहीं आ रहे हैं इसलिये इस बैठक का कोई औचित्य नहीं है।

    22 नवम्बर 1936 को महाराणा ने वायसराय को लिखा कि आपके विशेष दूत तथा राजपूताना के ए.जी.जी. की यात्रा मेरे लिये अत्यंत मूल्यवान रही है। मेरी इच्छा उच्च अभिसंधान व्यक्त करने की है जो महामहिम की संतुष्टि तथा अपनी सहमति के लिये है। 23 नवम्बर 1936 को वायली ने राजनीतिक सचिव को पत्र लिखा कि उदयपुर में संघीय विचार विमर्श कल हुआ तथा उसी दिन समापन भी हो गया.... सिरोही के अतिरिक्त अन्य किसी राज्य ने, जिनमें कि मैं गया हूँ, ने इतनी अधिकता के साथ भारत संघ की योजना के लिये र्पंशसा का अभाव नहीं दिखाया है जितना कि उदयपुर ने दिखाया है। पूरे राज्य का वातावरण इतना संकुचित है....... यदि उदयपुर में राजपूताना के राजाओं का सम्मेलन हो जाता है तो महाराणा तथा उनके सलाहकार राजपूताना के राजाओं को कोई उचित सलाह नहीं दे पायेंगे क्योंकि उन्हें इस योजना का कोई ज्ञान ही नहीं है।

    10 फरवरी 1937 को राजपूताना के ए.जी.जी. ने भारत सरकार को मेवाड़ राज्य से प्राप्त जवाब भिजवाया- राज्य से प्राप्त जवाब मेरी तथा मि. वायली की आशा से कहीं अधिक संतोषजनक है। महाराणा ने सारा मामला भारत सरकार के हाथ में यह कहकर छोड़ दिया है कि जिन मामलों में महाराणा की शर्तें हैं, उन मामलों में भारत सरकार मेवाड़ राज्य के साथ वही बर्ताव करेगी जो वह अन्य प्रमुख राज्यों के साथ किया जाना सुनिश्चित करेगी। महाराणा 47 मदों में से कुल 24 मद, मद संख्या 2, 4, 6, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 16, 18, 21, 22, 23, 25, 27, 28, 37, 38, 40, 41,42,43, तथा 52 बिना किसी शर्त के स्वीकार करते हैं। महाराणा, मद संख्या 1, 3, 5, 7, 17, 19, 20, 24, 26, 29, 30, 31, 32, 33, 34, 35, 39, 44, 45, 46, 47, 53 तथा 59 अर्थात् कुल 20 मद कुछ शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं तथा मद संख्या 15 एवं 36 को स्वीकार नहीं करते हैं तथा उनका मानना है कि शेष मदों पर इस समय प्रवेश करना आवश्यक नहीं है। मद संख्या 45 पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है तथा इसके बारे में बाद में सूचित करने का आश्वासन दिया है।

    जयपुर: सतर्क रवैया

    अगस्त 1936 में महाराजा मानसिंह को वायसराय द्वारा वायली के जयपुर भ्रमण की नियुक्ति की सूचना मिली। 4 सितम्बर 1936 को महाराजा ने वायसराय को पत्र लिखा कि संघ योजना में उठने वाले संभावित बिंदुओं पर मुझे सलाह देने हेतु मि. वायली को भेजने के लिये मैं महामहिम के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ....... मैं महामहिम द्वारा इस महत्त्वपूर्ण एवं कठिन विषय पर प्रदर्शित उनकी व्यक्तिगत राय के लिये भी आभार व्यक्त करता हूँ तथा मुझे आपको आश्वस्त करने की शायद ही आवश्यकता है कि आप द्वारा अपनाये गये मार्ग पर चलने के लिये आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं। मेरे जिम्मे में आये काम को त्वरित गति से निबटाने में मेरा पूरा सहयोग रहेगा ताकि मेरा उत्तर जनवरी 1937 के अंत तक आप तक पहुंच जाये। उदयपुर के पश्चात वायली जयपुर आये तथा राज्य के प्रतिनिधियों के साथ संघ के विषय पर विचार विमर्श किया। राज्य सचिव को भेजी गयी अपनी रिपोर्ट में वायली ने लिखा कि राज्य को बम्बई सामग्री मिल चुकी थी तथा सर तेजबहादुर सप्रू की सलाह भी। इसलिये विचार विमर्श जोधपुर में हुए विचार विमर्श के ही अनुरूप हुआ। यद्यपि जयपुर राज्य के प्रतिनिधि का रुख जोधपुर के प्रतिनिधि की अपेक्षा अधिक संदेहास्पद था तथा मैं अनुभव करता हूँ कि राज्य संघ में मिलने से पहले निश्चित प्रगति चाहेगा। ये दोनों राज्य एक दूसरे के निकट सम्पर्क में हैं तथा इनकी मनोवृत्ति में अंतर रोचक है। जयपुर राज्य के प्रतिनिधि ने उदयपुर के पं. धर्मनारायण से उलट, स्पष्टीकरणों को ध्यान से सुना और स्वीकार किया कि अधिकतर शंकायें विचार विमर्ष के दौरान निबट गयी हैं।

    मई 1937 में राजपूताना के रेजीडेंट ने सरकार को जयपुर राज्य के सम्मिलन के सम्बन्ध में सूचित किया कि कराधान, राज्य में भूमि या सम्पत्ति के अधिग्रहण तथा राज्य में संघीय सरकार द्वारा करारोपण के बारे में महाराजा जयपुर की कुछ शर्तें हैं। उन्होंने संघीय अभिकरणों, अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों पर जबकि वे राज्य में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हों, राज्य के कानून लगाने की इच्छा व्यक्त की है। हिज हाइनेस संघीय सूची के मद संख्या 4, 6, 8, 9, 11, 12, 13, 14, 16, 18, 21, 22, 23, 25, 27, 28, 32, 46 तथा 53 को बिना किसी शर्त के स्वीकार करते हैं, मद संख्या 1, 2, 3, 5, 7, 10, 15, 17, 19, 20, 24, 26, 29, 30, 31, 33, 34, 35, 36, 37, 38, 39, 42, 43, 44, 45, 47 तथा 59 को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं एवं मद संख्या 41 के बारे में जयपुर राज्य इस समय कोई शर्त नहीं रखना चाहता है। मद संख्या 45 के बारे में राज्य ने पूछा है कि इसे किस तरह लागू किया जाये जिससे उनका लक्ष्य प्राप्त हो जाये। हिज हाइनेस मद संख्या 48, 49, 50, 51, 52, 54, 55, 56, 57 तथा 58 पर सम्मिलन करने के इच्छुक नहीं हैं।

    बीकानेर: संघ के विरुद्ध पैंतरा

    अगस्त 1936 में महाराजा बीकानेर को वायसराय द्वारा फ्रांसिस वायली को निजी दूत के रूप में बीकानेर भ्रमण हेतु नियुक्त किये जाने की सूचना मिली। महाराजा ने वायसराय को भेजे उत्तर में अपने सहयोग के प्रति आश्वस्त किया। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में महाराजा और उसके प्रतिनिधियों ने वायली के साथ संघीय विचार विमर्श किया। वायसराय को भेजी गयी रिपोर्ट में वायली ने महाराजा गंगासिंह के रुख को स्पष्ट करते हुए लिखा कि 29 दिसम्बर तथा उसके बाद के दिनों में बीकानेर राज्य के साथ संघीय विचार विमर्श किया गया। बैठक में जो कुछ हुआ उसका सारांश मैंने अलग से एक नोट में लिखा है। जैसा कि पटियाला के प्रकरण में हुआ, मुझे भय है कि आप उसे भयानक दस्तावेज के रूप में पायेंगे। संघीय विचार विमर्श के दौरान मैं अब तक जहाँ कहीं भी गया हूँ मैंने संघीय विचार के प्रति ऐसा दृढ़ विरोध अन्यत्र कहीं नहीं पाया जैसा कि बीकानेर महाराजा ने किया। ऐसा रुग्ण दृष्टिकोण उन्हें अनुकूल कैसे जान पड़ा, इसके बारे में जोर देना अनावश्यक है।

    महाराजा गंगासिंह ने निर्धारित समय सीमा में भारत सरकार को समुचित प्रत्युत्तर भिजवाने में भी यह कहकर अपनी असमर्थता व्यक्त की कि वायली ने विचार विमर्श 31 दिसम्बर 1936 को ही पूर्ण किया है तथा विचार विमर्श का अभिलेख अत्यंत लम्बा है जो कि अगले चार या पाँच दिन में तैयार नहीं हो पायेगा। बीकानेर सरकार विचार विमर्श के आलोक में कुछ बिंदुओं पर नये सिरे से विचार करना चाहती है। इसके अतिरिक्त महाराजा 27 जनवरी तक अवकाश पर रहेंगे इसलिये भारत सरकार को उसके बाद ही उत्तर भेजा जा सकेगा। 7 जनवरी 1937 को राजनीतिक सचिव ने ए.जी.जी. को निर्देशित किया कि वह बीकानेर महाराजा को फरवरी के आरंभ में जवाब भेजने के लिये स्मरण करवाये।

    अप्रेल 1937 में राजपूताना के रेजीडेंट ने भारत सरकार को बीकानेर राज्य द्वारा संघ में सम्मिलन के सम्बन्ध में भिजवाये गये उत्तर की जानकारी भेजी- महाराजा ने कराधान, राज्य के भीतर भूमि या सम्पत्ति के अधिग्रहण तथा राज्य में करारोपण के सम्बन्ध में संघीय विधान की शक्तियों के बारे में कुछ शर्तें रखी हैं। उन्होंने संघीय अभिकरणों, अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों पर जबकि वे राज्य में अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हों, राज्य के कानून लगाने की इच्छा व्यक्त की है। हिज हाइनेस बिना किसी शर्त के संघीय सूची की मद संख्या 6, 9, 13, 18, 21, 22, 23 तथा 28 पर सम्मिलन करना स्वीकार करते हैं, मद संख्या 1, 2, 3, 4, 5, 7, 8, 10, 11, 12, 14, 15, 16, 17, 19, 20, 24, 25, 26, 27, 29, 30, 31, 32, 33, 34, 35, 37, 38, 39, 40, 41, 42, 43, 44, 45, 46, 47, 58 तथा 59 को शर्तों के साथ स्वीकार करते हैं तथा मद संख्या 36, 48, 50, 51, 52, 53, 54, 55, 56 तथा 57 पर सम्मिलन करने के इच्छुक नहीं हैं।

    1937 के आरंभ में वायसराय के विशेष अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट वायसराय को प्रस्तुत कर दी जिसमें कहा गया कि शासक संघ में सम्मिलन के प्रश्न पर सौदेबाजी करने की इच्छा रखते हैं तथा कई तरह की सुविधायें चाहते हैं। सर आर्थर लोथियान ने अपनी रिपोर्ट में मिशन की असफलता के छः कारण बताये-

    (1.) समय का बीत जाना।

    (2.) 1939 में युद्ध का आरंभ हो जाना।

    (3.) भारत सरकार अधिनियम 1935 में आंतरिक व्यवधानों की स्थिति से निबटने के लिये किये गये प्रावधानों की अपर्याप्तता के आधार पर राजाओं का यह मानना कि संघ में भी उनके अधिकारों की सुरक्षा पर्याप्त सिद्ध नहीं होगी।

    (4.) संघीय योजना के लाभों को समझने में राजाओं की अदूरदर्शिता।

    (5.) राजाओं के संघ में मिलने से रोकने के लिये किये जाने वाले प्रयासों के विरुद्ध कार्यवाही का निषेध।

    (6.) अधिनियम में किये गये उन प्रावधानों की प्रवृत्ति जिनमें मोलभाव तथा लगातार विलम्ब की संभावना को बनाये रखा गया है।

    यदि व्हाइट हॉल, समझौता वार्ताओं को सम्पूर्ण ढांचे के बंधन के अवसर के रूप में व्यवहृत नहीं करता तो इतना विलम्ब नहीं हुआ होता। इन सारी बातों के विरुद्ध ब्रिटेन में प्रतिपक्ष के नेता चर्चिल को भी संघीय योजना की असफलता के लिये जिम्मेदार माना जा सकता है जो कि पूरी योजना को ही ध्वस्त करने के लिये कटिबद्ध थे। अधिकतर शासकों (जिनमें बड़ी रियासतें भी सम्मिलित थीं), ने मांग की कि उनके वर्तमान में मौजूद राजस्व के स्रोतों को संघ के समय में भी बने रहने का अधिकार दिया जाये। राज्यों की इस मांग का समर्थन वायसराय लिनलिथगो द्वारा भी किया गया। राज्य सचिव ने वायसराय के इस प्रस्ताव का विरोध किया। उनकी दृष्टि में यह ब्रिटिश भारत की कीमत पर राज्यों के हित में किया गया स्थायी परिवर्तन होगा। यह संघ की मूल भावना के विरुद्ध होगा तथा ब्रिटेन तथा भारत में इसका बड़ा भारी विरोध होगा। जब राजनीतिक विभाग ने देखा कि राज्य सचिव वित्तीय मामलों पर राज्यों की यथापूर्व स्थिति को बनाये रखने के लिये संविधान में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है तो राजनीतिक विभाग ने इस संभावना को तलाषना आरंभ किया कि वर्तमान संविधान के अंतर्गत ही राज्यों की मांगों को कहाँ तक पूरा किया जा सकता है तथा शासकों को कहाँ तक संतुष्ट किया जा सकता है!

    एक ओर तो राजा लोग अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे थे तो दूसरी ओर राष्ट्रीय नेता भी ब्रिटिश प्रांतों के सम्बन्ध में किये गये प्रावधानों से संतुष्ट नहीं थे। संघीय योजना के उन प्रावधानों को देखते हुए जिनके अनुसार प्रान्तीय स्वशासन की स्थापना नाम मात्र के लिये भी नहीं थी, कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने इस व्यवस्था का विरोध किया। जिन्ना ने संघ योजना को अस्वीकार करते हुए कहा कि राजाओं ने संघ योजना को असंभव शर्तों से पूर्णतः खराब कर दिया है। उस समय केवल हिन्दू महासभा ही एक मात्र ऐसा राजनीतिक दल था जो अब भी संघ योजना के समर्थन में था। देशी राज्यों तथा ब्रिटिश भारत, दोनों ही पक्षों की तरफ से हो रहे विरोध के उपरांत भी ब्रिटिश सरकार ने अप्रेल 1937 से भारत सरकार अधिनियम 1935 को लागू कर दिया। अक्टूबर 1937 से संघीय न्यायालय ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    मई 1937 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मारकीस ऑफ जेटलैण्ड ने ब्रिटेन में भारतीय शासकों एवं ब्रिटिश भारतीय नेताओं से वार्तालाप किया तथा पाया कि सामान्यतः राजा लोग संघ में सम्मिलन के इच्छुक नहीं थे तथा वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों के साथ मोल-भाव कर रहा था। वायसराय के प्रस्तावों ने राजाओं की आकांक्षाओं को बढ़ा दिया था। यदि राजाओं को यह अनुभव करवाया जाता कि वे संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और आरामदेह स्थिति में होंगे तो स्थिति कुछ भिन्न होती। इनके अतिरिक्त अलग-अलग राजा से निश्चित मदों पर मोलभाव करने में अधिक खतरा था।

    जून 1937 में अपने जुबली दरबार के आयोजन से पहले गंगासिंह ने लंदन में घोषणा की कि ब्रिटेन के साथ अपने सम्बन्ध तोड़ने की स्वीकृति देने की अपेक्षा वे और उनके आदमी लड़ते हुए मिट जाना पसंद करेंगे। गंगासिंह ने बीकानेर में आयोजित अपने जुबली दरबार के अवसर पर लॉर्ड लिनलिथगो को सम्राट के प्रति अपनी स्वामिभक्ति का विश्वास दिलाते हुए कहा- मैं बुरे समय में राज्य के समस्त स्रोतों, आदमियों और सम्पत्ति को महामना सम्राट के निष्पादन पर समर्पित कर देने को तैयार हूँ। वायसराय ने सम्राट के प्रति महाराजा की स्वामिभक्ति और उनके द्वारा दी गयी अद्भुत सेवाओं की प्रशंसा की।

    1938 में जब जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया की मांग की तो बीकानेर नेरश गंगासिंह ने केबल भेजकर सम्राट जॉर्ज षष्ठम् से अनुरोध किया कि उसकी अपनी तलवार, सेना तथा राज्य के समस्त संसाधन सम्राट के नियंत्रण में रखे जायें। सम्राट ने इन अनुरोधों की सराहना की। नवम्बर 1938 में राज्यों के शासकों ने घोषणा की कि राष्ट्र की बदलती हुई परिस्थितियों में उनके तथा उनके उत्तराधिकारियों के लिये असंभव होगा कि वे विशिष्ट एवं प्रभावी सुरक्षात्मक उपायों की सहायता के बिना ब्रिटिश क्राउन, अपने राज्य तथा अपनी प्रजा के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकें।

    जनवरी 1939 में वायसराय लिनलिथगो ने राज्यों के शासकों को उनकी मांगों, आशंकाओं तथा प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया एक पुनरीक्षित प्रविष्ठ संलेख (Revised Instrument of Accession) भिजवाया। इसे अखिल भारतीय संघ निर्माण की दिशा में वायसराय लिनलिथगो की ओर से किया गया अंतिम प्रयास माना जाता है। वायसराय द्वारा भेजे गये परिपत्र में कहा गया कि शासक वायसराय को छः माह के भीतर सूचित करें कि क्या वे इन नयी शर्तों पर संघ में सम्मिलन के लिये तैयार हैं?

    1939 में जब ये प्रविष्ठ संलेख शासकों को भिजवाये गये, उस समय कोनार्ड कोरफील्ड राजपूताने के रेजीडेंट का कार्य देख रहा था। जब ये संलेख राजाओं को मिले तो उनमें से कईयों ने पोलिटिकल एजेंण्टों से सलाह मांगी। बीकानेर के महाराजा पहले से ही संघ में न मिलने का निश्चय कर चुके थे। यहाँ तक कि वे संघ का विरोध करने वाले शासकों का नेतृत्व भी कर रहे थे किंतु कुछ शासक महाराजा बीकानेर का अनुसरण करने की इच्छा नहीं रखते थे तथा राजनीतिक अधिकारियों की राय जानना चाहते थे। अधिकतर शासक यह जानना चाहते थे कि यदि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो क्या वे राज्य के दीर्घ इतिहास, परम्परा और निष्ठा के प्रति अविश्वसनीय हो जायेंगे? एक शासक जो कई विवादों के बाद राज्य का उत्तराधिकारी बना था, उसने कोरफील्ड से पूछा कि क्या मुझे भी हस्ताक्षर कर देने चाहिये? कोरफील्ड ने उत्तर दिया कि ऐसा करने से क्राउन प्रतिनिधि राजा की शासकीय योग्यता से प्रभावित होगा।

    एक अन्य शासक जो कि एक बार राजपूताना की समस्त रियासतों का नेता स्वीकार किया गया था, वह इस सुझाव से प्रभावित था कि यदि वह सबसे पहले हस्ताक्षर करता है तो ऐसा करके वह अपने अन्य राजपूत शासक भाईयों का नेतृत्व करेगा। एक तीसरे शासक ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि वह अपने (ब्रिटिश मूल के) प्रधानमंत्री की सलाह लेने के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा कर सकता था जिस पर कि वह पूरी तरह विश्वास करता था। लॉर्ड लिनलिथगो ने कोरफील्ड को बताया कि केवल राजपूताना ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ से आवश्यक 50 प्रतिशत शासकों की सहमति प्राप्त हो चुकी है किंतु बडे़ राज्यों की सहमति के बिना, 50 प्रतिशत जनसंख्या वाली शर्त पूरी नहीं हो सकती थी इसलिये इन राज्यों की सहमति का कोई परिणाम नहीं निकलने वाला था।

    बम्बई में आयोजित राजाओं व उनके मंत्रियों के दूसरे सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि पुनरीक्षित प्रविष्ठ संलेख में दी गयी नवीनीकृत शर्तें भी मूल रूप से असंतोषजनक हैं तथा हैदरी समिति के अनुसार नहीं हैं जिन्हें कि ग्वालियर सम्मेलन द्वारा सुनिश्चित किया गया था, इसलिये शासकों को स्वीकार्य नहीं हैं। कुछ राजाओं का व्यवहार देखने वाला था। उन्होंने अनौपचारिक बैठकों में कोई निश्चित रुख नहीं अपनाया अपितु वे बार बार राजनीतिक विभाग के पास भागते और उनसे कुछ छूट देने की प्रार्थना करते। राजनीतिक विभाग के अधिकारी वासयराय से बात करने के लिये जाते। इस प्रकार मेरी गो राउंड जैसी स्थिति बन गयी।

    28 फरवरी 1939 को वायसराय के सम्मान में जयपुर में राज्य की ओर से आयोजित भोज में महाराजा सवाई मानसिंह ने अपने भाषण में वायसराय को आष्वस्त किया कि मैंने सावधानी पूर्वक प्रविष्ठ संलेख के प्रारूप पर विचार किया है, जो कि हाल ही में प्राप्त हुआ है। 1 मार्च 1939 को वायसराय के सम्मान में जोधपुर में राज्य की ओर से आयोजित भोज में महाराजा उम्मेदसिंह ने दोहराया कि जोधपुर को संघ में प्रवेश करने से जी चुराने की कोई आवश्यकता नहीं है। राज्य के कई विभागों में तो हम संघ को पिछले कई वर्षों से अपना भी चुके हैं......संघ का प्रारूप भारत को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अधीन एक मजबूत स्वशासी इकाई बनाने के लिये तैयार किया गया है ताकि भविष्य में हम न केवल अपने मामलों को सुलझा सकें अपितु स्वतंत्रता की रक्षा और स्वतंत्र संविधान के लिये शनैः-शनैः महान ब्रिटिश साम्राज्य के साथ खड़े हो सकें। वायसराय ने जोधपुर नरेश की इस मनोवृत्ति की प्रशंसा की।

    4 मार्च 1939 को वायसराय लिनलिथगो उदयपुर आये। उनके सम्मान में राज्य की ओर से आयोजित भोज के अवसर पर महाराणा ने अपने भाषण में कहा कि चूंकि वे प्रविष्ठ संलेख के प्रारूप पर विचार कर रहे हैं इसलिये उसके बारे में कोई रुख स्पष्ट करना अवधि पूर्व कदम होगा। इस पर लिनलिथगो ने अपने भाषण में महाराणा को जवाब दिया कि मैं केवल यह दोहराना चाहूंगा कि भारतीय राज्यों तथा वस्तुतः संपूर्ण भारत के सम्बन्ध में मूलभूत महत्त्व के इस प्रकरण में निर्णय केवल एक ही है कि उसे सम्बन्धित राजा के व्यक्तिगत निर्धारण के लिये छोड़ दिया गया है।

    वायसराय लिनलिथगो ने महाराजा गंगासिंह को लिखा कि संघ योजना के सम्बन्ध में इस समय घोषित की गयी शर्तों के बारे में वास्तविक रूप से समझ लिया जाना चाहिये कि अब इनमें और अधिक शिथिलिकरण की गुंजाइश नहीं है। क्योंकि ये शर्तें उस दूरतम सीमा का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ तक समस्त वाद विषयों पर जिनमें राज्यों के कल्याण एवं हितों को सुरक्षित करने के विषय को प्रमुख रूप से ध्यान में रखा गया था, अधिकतम गंभीर प्रयास करने के पश्चात् राज्यों द्वारा व्यक्त की गयी आकांक्षाओं एवं आशंकाओं को तुष्ट करने के लिये महामान्य सम्राट की सरकार ने किया जाना सम्भव पाया।

    महाराजा गंगासिंह ने बड़े असंतोष के साथ वायसराय लिनलिथगो को लिखा कि राज्यों को उनकी संधियों तथा समझौतों से उद्भूत होने वाले उनके अधिकारों के सम्बन्ध में पर्याप्त संरक्षण नहीं दिया गया है तथा राज्य इन अधिकारों को त्यागने के लिये उद्यत नहीं हैं। संघीय विषयों की सूची को अत्यंत बढ़ा दिया गया है तथा राज्यों द्वारा संघीय कानूनों की व्यवस्था करने के जो अंतिम प्रस्ताव रखे गये हैं वे न केवल समझौता वार्ताओं की विभिन्न अवस्थाओं में प्रतिपादित किये गये प्रस्तावों से मूल रूप में भिन्न हैं अपितु तत्वतः भी भिन्न हैं। महाराजा ने लिनलिथगो को स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनके लिये इसके सिवाय और कोई चारा नहीं है कि वे संघ में सम्मिलित होने से अलग रहें। महाराजा ने अपने राज्य को भारतीय संघ में सम्मिलित न करने का कारण अंग्रेजी प्रांतों में व्याप्त विध्वंसक प्रवृत्तियों को बताया जिनका प्रभाव समीपवर्ती राज्यों की सत्ता पर क्षति पहुँचाने वाला हो सकता था। उन्होंने इस बात की गारंटी मांगी कि तत्काल या भविष्य में किसी समय मेरे राज्य पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    गंगासिंह ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि यद्यपि संघ के कानूनी ढांचे को ऐसा बनाया गया है कि इकाईयों को पूर्ण आंतरिक स्वायत्तता रहे किंतु यह स्पष्ट है कि जिन राजनैतिक दलों के कार्यक्रम में राजाओं और उनकी रियासतों को कोई स्थान नहीं है, उनके दबाव में आकर कुछ प्रांतीय सरकारों द्वारा यह मूल बात हटाई जा सकती है और बचाव निरर्थक किये जा सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में संघ में सम्मिलित होना उस विनाशकारी आंदोलन को बढ़ावा देने के समान होगा, जिसका उद्देश्य रियासतों के लोगों को अपने शासकों के प्रति जो राजभक्ति है, उससे विमुख करना है। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि अगर उन्हें संघ में सम्मिलित होने का विकल्प मानना पड़े तो इसका मतलब उनको ऐसे लोगों के साथ काम करना होगा जिनका उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता है और जो खुले रूप से साम्राज्य के विरोधी हैं। ऐसा करना उनके दृढ़ विश्वास के विपरीत होगा। अतः इसके सिवाय और कोई चारा नहीं है कि वे संघ में सम्मिलित होने से अलग रहें।

    21 अगस्त 1939 को शिमला में आयोजित नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में वायसराय ने कहा कि मैंने राज्यों को संघ योजना की सिफारिश नहीं की होती यदि मैं स्वयं इससे संतुष्ट नहीं होता कि इस योजना में राजाओं के भविष्य की पूर्ण और प्रभावी सुरक्षा निहित है। उन्होंने घोषणा की कि इस प्रस्ताव में उन सुरक्षात्मक उपायों को साकार किया गया है जिन्हें कि उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु महामना सम्राट की सरकार समुचित एवं पर्याप्त समझती है। संघ में देशी राज्यों के शासकों की आवाज बहुत महत्त्वपूर्ण होगी। उनके लिये निम्न सदन में 125 सीटें अर्थात् 1/3 सीटें तथा उच्च सदन में 104 सीटें अर्थात् 2/5 सीटें निर्धारित की गयी हैं। वायसराय ने कहा कि एक राजा ने यह सुझाव दिया है कि वह संघ के प्रस्ताव का विरोध करके ब्रिटिश क्राउन के प्रति अपनी राज्यभक्ति प्रदर्शित करेगा, इससे अधिक बेतुका अथवा असंगत सुझाव हो ही नहीं सकता। अनुमान होता है कि वायसराय का संकेत महाराजा गंगासिंह की तरफ था।

    गंगासिंह के इस रवैये पर करणीसिंह ने अपनी ओर से सफाई दी है कि महाराजा गंगासिंह में तीन निष्ठायें साथ-साथ काम कर रही थीं। उनकी प्रथम निष्ठा सम्राट की प्रति थी। यह उनमें धार्मिक पवित्रता का रूप ले चुकी थी। वे एक क्षण के लिये भी नहीं सोच सकते थे कि भारत, सम्राट से अपने सम्बन्ध तोड़ ले अथवा साम्राज्य से अलग हो जाये। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत, राष्ट्र मंडल का सदस्य रहकर ही उन्नति कर सकता है और सुरक्षित रह सकता है। उनका मत था कि भारत की सीमायें दूर-दूर तक फैली हुई हैं और वे अंग्रेजी समुद्री बेड़े और सेना की शक्ति से ही सुरक्षित रह सकती हैं। साथ ही भारत का व्यवस्थित और शांतिपूर्ण विकास ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सुविधाओं और साधनों पर काफी निर्भर है। वस्तुतः बीकानेर राज्य परिवार के सदस्य होने के कारण करणीसिंह यह मानने को तैयार नहीं थे कि इन सब बातों की आड़ में महाराजा गंगासिंह अपने अधिकारों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं थे। वे ऊपर से तो संघ के समर्थन का ढिंढोरा पीट रहे थे किंतु अंदर ही अंदर इसके घनघोर विरोधी थे।

    ब्रिटिश भारत के राजनैतिक दलों की प्रतिक्रियावादी और शत्रुतापूर्ण प्रवृत्ति ने राजाओं के मन में एक स्वाभाविक अविश्वास और संदेह उत्पन्न कर दिया। न केवल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये, जो एक मूल प्रवृत्ति है बल्कि संघ की अपनी मूल धारणा को पूर्ण न होते देख कर भी राजा लोग निराश हो गये। जो भी हो, राजाओं के सौभाग्य से 3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। ब्रिटिश सरकार ने प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर भारतीयों से अपील की कि वे साम्राज्य की रक्षा करें। 11 सितम्बर 1939 को वायसराय ने दोनों सदनों में घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण भारत संघ के निर्माण की योजना स्थगित की जा रही है। इस प्रकार संघ योजना असफल हो गयी तथा विगत 12 वर्षों से भी अधिक समय में व्यय किया गया धन, श्रम एवं समय व्यर्थ चला गया।

    देशी राजाओं के अड़ियल रवैये को देखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ई.1938 के हरिपुरा सम्मेलन में और उसके पश्चात ऑल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस ने ई.1939 के लुधियाना सम्मेलन में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प व्यक्त किया। लुधियाना सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि भारतीय राज्यों का अस्तित्व इसलिये बचा रहा क्योंकि अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने उन्हें कृत्रिम समर्थन दिया हुआ था। इनमें आंतरिक जीवन रस सूख चुका था और इनकी शक्ति केवल अंग्रेजी साम्राज्यवाद पर आधारित थी। पं. नेहरू ने इन राज्यों द्वारा अंग्रेजों के साथ स्थापित संधियों को भी मानने से इन्कार कर दिया तथा भारतीय राज्यों की पद्धति को भी अस्वीकार्य घोषित कर दिया।

    गांधीजी ने भी राजाओं के रवैये की आलोचना की- जहाँ तक राजाओं का सम्बन्ध है, वे नेशनल एसेम्बली में भाग लेने के लिये स्वतंत्र हैं। यह सभा कुछ व्यक्तियों के स्थान पर चुने हुए लोगों के अनुसार भारत के भाग्य का निर्माण करेगी। मेरा अनुमान है कि राजा ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे ताज से वरिष्ठ तो हो ही नहीं सकते। यदि ताज जो कि आज पूरे भारत पर शासन कर रहा है, अपनी सत्ता छोड़ने जा रहा है तो राजा भी स्वतः अपनी सत्ता खो देंगे। राजाओं को इस बात पर गर्व होना चाहिये कि ब्रिटिश ताज के उत्तराधिकारी जो कि राजाओं के सम्मान की सुरक्षा करेंगे, भारत के लोग हैं। मैं यह दावा कांग्रेस की ओर से नही, अपितु भारत के लाखों बेजुबान लोगों की ओर से कर रहा हूँ। ब्रिटिश भारत साम्राज्य के निर्माताओं ने इसके चार स्तंभ खड़े किये हैं- यूरोपियन हित, सेना, राजा लोग, सांप्रदायिक विभाजन। आखिरी तीन स्तंभों को पहले स्तंभ की सेवा करनी है। यदि साम्राज्य निर्माताओं को सम्राज्य समाप्त करना है तो उन्हें ये चारों स्तंभ नष्ट करने होंगे किंतु वे राष्ट्रवादी लोगों अथवा साम्राज्यवादी भावना के विध्वंसक लोगों से कहते हैं कि तुम्हें इन चारों स्तंभों से स्वयं निबटना होगा। दूसरे शब्दों में वे ये कह रहे हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की गारण्टी दो, अपनी सेना स्वयं बनाओ तथा राजाओं और अल्पसंख्यक कहे जाने वाले साम्प्रदायिक लोगों से निबटो। साम्राज्य को नष्ट करने को आतुर लोगों का कहना है कि तुमने (अंग्रेजों ने) यूरापीय लोगों के हितों को हम पर लादा, उनकी रक्षा के लिये सेना बनायी और उन हितों की बेहतरी से सुरक्षा की, तुमने अपने उद्देश्यों के लिये तत्कालीन राजाओं का उपयोग किया। तुमने उन्हें बनाया और बिगाड़ा, नये राजाओं का निर्माण किया, तुमने उन्हें शक्तियां दीं, इससे पहले वे सुरक्षा के साथ आनंद नहीं मना सकते थे। वास्तव में तुमने भारत का विभाजन कर दिया ताकि पूरा देश एक साथ तुम्हारे विरुद्ध खड़ा नहीं हो सके।

    राष्ट्रीय नेताओं का यह भी मानना था कि यद्यपि संघ हमारे लिये अपरिहार्य है किंतु इसके लिये हम कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाना चाहते। यदि संघ के निर्माण के लिये हमसे अत्यधिक कीमत मांगी जाती है तो उचित यह होगा कि हम अधिक अनुकूल परिस्थितियों के आने तक प्रतीक्षा करें। इस प्रकार ई.1937-39 के मध्य भारतीय संघ में सम्मिलित होने से इन्कार करके शासकों ने अविश्वसनीय अयोग्यता का परिचय दिया तथा अपने महत्त्व को सदा के लिये कम करवा लिया। उन पर न तो राष्ट्रीय नेता और न ही अंग्रेज किसी तर्क संगत नीति अपनाने के लिये भरोसा कर सकते थे। वे केवल अपने सम्मान, गौरव, प्रतिष्ठा में इतने डूबे रहे कि उन्हें पानी के गहरे होने का अनुभव ही नहीं हुआ। 1939 के पश्चात् उनके प्रभाव के घटने में अधिक समय नहीं लगा।

    संघ योजना की विफलता के लिये ब्रिटिश सरकार जिम्मेदार

    तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं द्वारा ब्रिटिश सरकार पर लगाया गया यह आरोप सत्य जान पड़ता है कि ब्रिटिश सरकार ही राजाओं के माध्यम से संघ निर्माण की योजना में रोड़े अटका रही थी। यदि अधिनियम में संघ निर्माण के लिये रखी गयी केवल इसी शर्त की जाँच की जाये कि देशी राज्यों को संघ में मिलाया जाना केवल उसी स्थिति में संभव था जबकि कम से कम इतने देशी राज्य संघ में सम्मिलित होने की सहमति दें, जिनके द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में कम से कम 52 प्रतिनिधि भेजे जाते हों तथा संघ में सम्मिलित होने की घोषणा करने वाले राज्यों की जनसंख्या देशी राज्यों की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम न हो, तो भी ब्रिटिश सरकार के इरादों की सच्चाई सामने आ जायेगी। उस समय भारत के देशी राज्यों में रहने वाली जनसंख्या 7 करोड़़ 90 लाख थी जिसका 50 प्रतिशत 3 करोड़़ 95 लाख होता है। जबकि भारत की सबसे बड़ी केवल 17 रियासतों की जनसंख्या 5 करोड़़ 3 लाख 77 हजार थी जो कि कुल रियासती जनसंख्या की तीन चौथाई थी किंतु इन रियासतों के संघ में मिलने का निर्णय लेने पर भी संघ का निर्माण किया जाना संभव नहीं था क्योंकि इन रियासतों द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में मात्र 41 सदस्य ही भेजे जाने थे। संघ निर्माण के लिये अधिनियम में यह अत्यंत अव्यवहारिक शर्त रखी गयी थी।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 की प्रथम सूची के अनुभाग XVII में वर्णित लघु राज्यों को संघीय प्रस्ताव नहीं भेजे गये क्योंकि योजना के आरंभिक चरण में यह विचार था कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा सक्षम राज्यों का ही संघ बनाया जाये तथा बाद में लघु राज्यों को इसमें सम्मिलित किया जाये। भारत सचिव का मानना था कि लघु राज्यों को पृथक इकाई के रूप में संघ में सम्मिलित किये जाने में तीन कठिनाइयां थीं-

    (1) इन राज्यों में प्रशासनिक व्यय चलाने के लिये आर्थिक स्रोत पर्याप्त नहीं थे। इन राज्यों की जनता संघ में प्रवेश पाने के बाद इस बात की प्रत्याशा करती कि उन्हें भी वैसा ही प्रशासन मिले जैसा कि बड़े राज्यों में है या ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में है।

    (2) इन राज्यों के कार्मिक बहुत कम वेतन पाते थे तथा उनका प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं था। वे इतने सक्षम सिद्ध होने वाले नहीं थे कि संघीय कानून के अनुसार प्रशासन चला पाते।

    (3) ब्रिटिश भारत के प्रमुख राजनीतिक घटकों की रुचि इस बात में थी कि रियासती प्रजा संवैधानिक संघर्ष में उलझ जाये तथा राज्य के प्रशासन में प्रत्यक्ष तथा निर्णयकारी भागीदारी प्राप्त करे। बड़े राज्यों में तो इस प्रकार के आंदोलनों को समाप्त किया जाना सरल था किंतु लघु राज्यों में राज्यों के प्रशासन के लिये इस प्रकार के आंदोलनों पर नियंत्रण पाने के लिये पर्याप्त साधन नहीं थे।

    संघ योजना के असफल हो जाने के बाद टिप्पणी की गयी कि इसकी जड़ें सड़ी हुई हैं, पूरा ढांचा रद्दी वस्तुओं से बनाया गया है जिसके बाहर की ओर वार्निश, पॉलिश, रंग करके उसे नया रूप दे दिया गया है। इस प्रकार की जड़ों से किसी स्वस्थ विकास की आशा नहीं की जा सकती। इस प्रकार की संरचना में किसी प्रसन्नतादायी जीवन की संभावना नहीं हो सकती।

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     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 45

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    पाकिस्तानी नेताओं का इस्लाम खतरे में !

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    पाकिस्तान के नेताओं के पास पाकिस्तान की जनता कोएक रखने और मुस्लिम लीग के नियंत्रण में बनाए रखने के लिए किसी उत्तेजक एवं सनसनीखेज मुद्दे की आवश्यकता थी जो पाकिस्तान के मुसलमानों के लिए योजक सामग्री का काम कर सके। इसलिए पाकिस्तान के मुस्लिम लीगी नेता, पाकिस्तान की जनता को भारत का नाम लेकर डराने लगे। भारत उनका पानी रोक रहा है, भारत उनका गोला-बारूद रोक रहा है, भारत उनका रुपया रोक रहा है, भारत ने उनका काश्मीर छीन लिया है, भारत ने हैदराबाद, भोपाल और जूनागढ़ पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया है, भारत किसी भी समय पाकिस्तान पर आक्रमण कर सकता है, जैसी बातें पाकिस्तानी नेताओं के भाषणों, प्रेस-सम्बोधनों एवं व्यक्तिगत वार्तालापों में छाई रहतीं। इससे पाकिस्तान की जनता में भारत के प्रति एक विशेष प्रकार का फोबिया उत्पन्न हो गया। पाकिस्तानी नेताओं के भाषणों में यह बात अनिवार्य रूप से होती थी कि जब तक भारत का अस्तित्व है तब तक पाकिस्तान का इस्लाम खतरे में है। यह ठीक ऐसा ही था जैसे भारत में माताएं रोते हुए बच्चों को चुप करने के लिए किसी अनजाने भूत या बाबा का नाम लेकर डराती हैं। भय और आतंक का एक अनजाना साया पाकिस्तानियों के मानस-पटल पर छाता जा रहा था।

    आजादी के सात माह के भीतर ही बंगाली नेता हुसैन सुहरावर्दी ने पाकिस्तान की संसद को चेताया- 'मुल्क एक खतरनाक रास्ते पर निकल चुका है। तुम लोग सिर्फ मुस्लिमों की भावनाओं को भड़काने और उनको एकजुट रखने के लिए पाकिस्तान के खतरे में होने का रोना रो रहे हो, ताकि तुम खुद सत्ता में बने रह सको। ...... पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बन रहा है जिसकी बुनियाद सिर्फ जज्बात रहेंगे, इस्लाम के खतरे में होने के जज्बात या फिर पाकिस्तान के जज्बे के खतरे में होने के।'

    सुहरावर्दी ने भांप लिया था कि मुस्लिम लीग के नेता पाकिस्तान को एक ऐसा राज्य बना रहे हैं जिसे सिर्फ हमले का भूत दिखाकर कब्जे में रखा जा सकेगा और जिसे एक-जुट रखने के लिए पाकिस्तान और भारत के बीच लगातार संघर्ष को भड़काए रखना होगा। ऐसा देश खतरों और शंकाओं से भरा होगा। पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ गुस्से की राष्ट्रीय अवधारणा को बढ़ावा देता है।

    जिन्ना के उत्तराधिकारी निरंकुशता एवं धर्मांधता के मामले में जिन्ना से भी आगे निकलने वाले थे। पाकिस्तानी लेखक एवं सुप्रसिद्ध पत्रकार तारेक फतेह ने लिखा है- 'जिन्ना के निधन के बाद इस्लामवादी पूरे हमलावर मूड में आ गए। ऐसे लोग जिन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया था अब उसके अभिभावक बन गए। आधुनिक संविधान बनाने की सभी आशाएं बिखर गईं, जब पूरी दुनिया के इस्लामवादी पाकिस्तान में इकट्ठा होकर खिलाफत के तहत एक और मुल्क बनाने के सपने देखने लगे। मिस्र के इस्लामपंथी सैद रामादान पाकिस्तान के इस्लामीकरण के लिए कराची आए और पौलेंड के धर्मांतरित मुसलमान मोहम्मद असद ने देश के वजूद से जुड़े प्रमुख सिद्धांतों को लिखने का काम हाथ में लिया। ..... पाकिस्तान की देशी भाषाओं को किनारे लगा दिया गया और एक प्रस्ताव तैयार किया गया जिसके मुताबिक अरबी को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा को बनाने की बात थी ...... एक ऐसी भाषा जिसे पाकिस्तानी नहीं बोलते।'

    1948 में जिन्ना की मृत्यु के बाद पाकिस्तान का अधिनायकवादी मॉडल लगातार मजबूत होता चला गया। मई 1949 में जब पूर्वी पाकिस्तान के तंगेल के उपचुनावों में मुस्लिम लीग का प्रत्याशी एक नई उभरती हुई पार्टी से हार गया तो प्रधानमंत्री लियाकत अली ने इस परिणाम को अस्वीकार करते हुए संविधान सभा के नवनिर्वाचित सदस्य को कई अन्य विपक्षी कार्यकर्ताओं के साथ जेल भेज दिया। इनमें प्रसिद्ध कम्यूनिस्ट नेता मोनी सिंह भी था जो 22 साल जेल में अथवा भूमिगत रहा। उसे दुबारा स्वतंत्रता तभी मिली जब 1971 में पाकिस्तान टूट गया।

    पाकिस्तान के हुक्मरानों की कोशशि यही है कि किस तरह अवाम को भारत के खिलाफ भड़काया जाए। उनका ध्यान हुकूमत की अंधेरगर्दी से हटाकर भारत की तरफ उलझाया जाए। जब भी अपनी हुकूमत खतरे में पाते हैं, 'काश्मीर पाकिस्तान का' नारा लगाते हैं,। यही अयूब खाँ ने किया यही याह्या खाँ ने और शायद हर शासक ऐसा ही करता चला जाएगा....... नफरत को मरने नहीं दिया जाता, उसे और बढ़ाया जाता है। 'हिन्दुस्तान का भेड़िया आया, भेड़िया आया' की गुहारें मचाकर वहां का हर डिक्टेटर और हर मुल्ला जनता को बेवकूफ बनाता है और खुद मलाई-मक्खन उड़ाता है। यही कारण है कि वहाँ के शासक राष्ट्रनिर्माण की बातें कम और इस्लाम के पुनर्जागरण की बातें ज्यादा बोलते हैं। खुद इक्कीसवीं सदी में रहकर जनता को सोलहवीं सदी से आगे नहीं बढ़ने देना चाहते।


    एक दूसरे से दूर होते चले गए भारत-पाकिस्तान

    बंटवारे के लगभग एक दशक तक भारत और पाकिस्तान के बीच आना-जाना सरल था। ब्रिटिश काल में बनी रेल-लाइन के सहारे बड़ी संख्या में लोग इधर से उधर जाते थे। ई.1951 में पाकिस्तान ने अपने लिए नया नागरिकता कानून तैयार किया, इसके बाद जून 1952 में पाकिस्तान से भारत में आने-जाने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य किया गया। यहाँ तक कि तब तक भी एक भारतीय-पाकिस्तानी पासपोर्ट दोनों देशों में आने-जाने के लिए वैध था तथा अंतर्राष्ट्रीय पासपोर्ट 1965 के बाद आवश्यक किया गया। इसके बाद ही वीजा लागू किया गया। विभाजन के बाद दोनों ही देशों में एक दूसरे के लेखकों की पुस्तकें बेची जाती थीं। दोनों देशों के उर्दू शायर बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे देश में जाकर अपनी शायरी पढ़ते थे। व्यापार भी बिना किसी रोक-टोक एवं बिना किसी बाधा के जारी था। दोनों तरफ के राजनेता एवं प्रशासनिक अधिकारी एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। अखबारों के सम्पादक एवं प्रोफेसर भी लगातार एक दूसरे से मिलते रहते थे किंतु धीरे-धीरे यह सब बंद होता चला गया और दोनों देश एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो गए।

    बहुत से मुसलमान तो ऐसे भी थे जो रहते तो भारत में थे किंतु स्वयं को पाकिस्तान का नागरिक समझते रहे। बहुत से मुसलमान पाकिस्तान में जाने के बाद पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से भारत लौट आए। पाकिस्तान ने भारत की इस उदारता का लाभ उठाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। एक बार पाकिस्तान ने भारत के उत्तर प्रदेश के निवासी मुहम्मद इस्माइल को भारत में पाकिस्तान का हाईकमिश्नर घोषित कर दिया जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक था ही नहीं। जब समाचार पत्रों में यह मामला उछला, तब पाकिस्तान को अपना कदम वापिस लेना पड़ा। इस नियुक्ति के माध्यम से पाकिस्तान यह जताना चाहता था कि भारत में रह रहे सभी मुसलमान वास्तव में पाकिस्तानी ही हैं।

    पाकिस्तान चले गए बहुत से मुस्लिम नेता यह मानते रहे कि वे पाकिस्तान में रहते हुए भी भारत में स्थित अपनी सम्पत्तियों के मालिक बने रहेंगे। चौधरी खलीक उज्जमां पाकिस्तान बनने से पहले भारत की केन्द्रीय विधान सभा में विपक्ष का नेता हुआ करता था। वह ई.1947 में पाकिस्तान चला गया तथा कराची में रहने लगा। वह पाकिस्तान मुस्लिम लीग का अध्यक्ष बन गया, फिर भी भारत में अपनी सम्पत्ति की देखभाल करने आता रहा। यही वह व्यक्ति था जिसने ई.1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव रखा था। वह स्वयं को उत्तर प्रदेश का ही नागरिक मानता रहा। जोगिंदर नाथ मण्डल जो मुस्लिम लीग की तरफ से जवाहरलाल नेहरू के अंतरिम मंत्रिमण्डल में मंत्री बना था, दलित कहे जाने वाले समुदाय का बंगाली राजनीतिज्ञ था।

    ई.1947 में वह अपने पुराने दोस्त मुहम्मद अली जिन्ना के निमंत्रण पर पाकिस्तान चला गया क्योंकि जिन्ना का मानना था कि भारत की राजनीति में ऊँची जाति के लोगों का वर्चस्व था। जिन्ना ने उसे पाकिस्तान का कानून मंत्री बनाया। ई.1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दू-मुस्लिम दंगे और जिन्ना के निधन के बाद मंडल को अलग-थलग कर दिया गया तथा कैबीनेट के मंत्री की हैसियत से जो फाइलें मण्डल तक जानी चाहिए थीं, वे भी गोपनीय कहकर रोक दी गईं। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ ने जब इस्लाम को राज्य का आधिकारिक धर्म बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया तो मंडल ने महसूस किया कि अब पाकिस्तान में उसके दिन गिनती के ही बचे हैं। अक्टूबर 1950 में अपने ऊपर हुए मौखिक और शारीरिक हमलों के बाद वह भारत में शरण लेने के लिए कलकत्ता भाग आया। पाकिस्तान सरकार को दिए गए अपने इस्तीफे में उसने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके भविष्य का ख्याल नहीं रखने के लिए जिन्ना के उत्तराधिकारियों की निंदा की।

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  • अजमेर का इतिहास - 19

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 19

    दिल्ली सल्तनत के अधीन अजमेर (3)


    सोलहवीं शताब्दी में अजमेर

    कुंवर रायमल

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    ई.1505 में मेवाड़ के महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज ने बीठली दुर्ग पर अधिकार कर लिया। जब महाराणा रायमल (ई.1473-1509) के तीन पुत्रों- पृथ्वीराज, जयमल तथा संग्रामसिंह के बीच झगड़ा उठ खड़ा हुआ तो कुंवर संग्रामसिंह ने अजमेर के निकट श्रीनगर के परमार जागीरदार, राव करमचन्द के यहाँ शरण ली। ई.1509 में जब संग्रामसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा तो उसने करमचन्द को अजमेर, परबतसर, मांडल, फूलिया तथा बनेड़ा आदि की जागीरें प्रदान की। ई.1509 में सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानकदेव कार्त्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में स्नान करने के लिये पधारे। ई.1515 में करमचंद पंवार की पत्नी रमादेवी ने अजमेर के निकट रामसर गांव की स्थापना की तथा एक पक्की बावड़ी बनवायी। ई.1523 में धार के राजा रामदेव ने रामसर झील का निर्माण करवाया।

    शमशेरुलमुल्क

    ई.1533 में नागौर के शासक दौलतखां ने मालदेव से परास्त होने के बाद अजमेर में शरण ली। उसी वर्ष गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ के विरुद्ध अभियान किया तथा शमशेरुलमुल्क को एक सेना देकर अजमेर दुर्ग का आकार छोटा करने के लिये भेजा। शमशेरुलमुल्क ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। यह अधिकार बहुत थोड़े समय तक ही बना रह सका।

    राव वीरमदेव मेड़तिया

    ई.1535 में मेड़ता के राव वीरमदेव ने शमशेरुलमुल्क से अजमेर छीन लिया। जोधपुर के राव मालदेव ने वीरमदेव से कहा कि वह अजमेर मालदेव को सौंप दे क्योंकि यदि गुजरात के सुल्तान ने अजमेर पर आक्रमण किया तो तुम उसकी रक्षा नहीं कर सकोगे। वीरमदेव ने मालदेव को अजमेर देने से मना कर दिया। इस पर मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण किया। वीरमदेव मेड़ता खाली करके अजमेर चला गया तथा मेड़ता पर मालदेव का अधिकार हो गया। मालदेव ने वरसिंह के पौत्र सहसा को रीयां की जागीर प्रदान की। एक दिन वीरमदेव गढ़ बीठली पर खड़ा होकर चारों ओर का दृश्य निहार रहा था। अचानक उसकी दृष्टि रीयां की पहाड़ी पर पड़ी।

    मेड़ता तथा रीयां को हाथ से निकला हुआ जानकर वीरमदेव के मन में प्रतिशोध की अग्नि भड़क उठी और उसने रियां पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। वीरमदेव के सामंतों ने वीरमदेव को समझाया कि वह रीयां पर आक्रमण नहीं करे किंतु वीरमदेव ने उनकी बात नहीं सुनी तथा रीयां पर आक्रमण कर दिया। इस पर मालदेव ने सेना भेजकर वीरमदेव का मार्ग रोका। वीरमदेव परास्त होकर अजमेर चला गया किंतु सम्मुख युद्ध में रीयां का ठाकुर सहसा मारा गया। इसके बाद मालदेव ने अपने सामंतों- कूंपा तथा जैता को अजमेर पर अधिकार करने के लिये भेजा। वीरमदेव उनके विरुद्ध बहादुरी से लड़ा किंतु परास्त होकर अजमेर खाली करके चला गया।

    राव मालदेव

    इस प्रकार ई.1535 में अजमेर मालदेव के अधीन आ गया। ई.1536 में मालदेव ने अपने सामंत कूंपावत महेश घड़सिंहोत को अजमेर का जागीरदार बनाया। मालदेव ने अजमेर के बीठली गढ़ में महल, प्राचीर तथा बुर्जों का निर्माण करवाया और गढ़ में जलापूर्ति के लिए पहाड़ियों पर चक्र लगवाया। उस समय अजमेर, मारवाड़ राज्य के 38 जिलों (परगनों) में से एक था जिसके अधीन 360 गांव आते थे। जब ई.1540 में हुमायूं, शेरशाह सूरी से परास्त हो गया तो हुमायूं, शेरशाह सूरी से बचने के लिये मारवाड़ की तरफ भागा। शेरशाह सूरी उसके पीछे लगा रहा। इस दौरान हुमायूं अजमेर होकर निकला। कविराजा श्यामलदास ने भी इस मत का समर्थन किया है।

    रूठी रानी उमादे

    ई.1542 में राज्य-विहीन वीरमदेव, शेरशाह सूरी के पास सहायता मांगने गया। शेरशाह सूरी ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उसने जनवरी 1544 में 80 हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ आगरा से मालदेव के विरुद्ध अभियान आरंभ किया। उसने सबसे पहले अजमेर का रुख किया। मालदेव की रानी उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है, उस समय गढ़ बीठली में थी। जब मालेदव को शेरशाह के अभियान के सम्बन्ध में ज्ञात हुआ तो उसने अपने सामंत ईश्वरदास को लिखा कि वह रानी को लेकर जोधपुर चला आये। जब रानी उमादे को यह आदेश ज्ञात हुआ तो उसने ईश्वरदास से कहा कि शत्रु का आगमन जानने के बाद मेरा इस तरह दुर्ग छोड़कर चले जाना उचित नहीं है। इससे मेरे दोनों कुलों पर कलंक लगेगा। इसलिये आप रावजी को लिख दें कि वह यहाँ का सारा प्रबंध मुझ पर छोड़ दें।

    रावजी विश्वास रखें कि शत्रु का आक्रमण होने पर मैं राणा सांगा की रानी हाड़ी कर्मावती के समान अग्नि में प्रवेश न करके, शत्रु को मार भगाऊंगी और यदि इसमें सफल न हुई तो क्षत्रियाणी की तरह सम्मुख रण में प्रवृत्त होकर प्राण त्याग करूंगी। जब राव मालदेव को पत्र द्वारा इस बात की जानकारी हुई तो उसने ईश्वरदास को लिखा कि तुम हमारी तरफ से रानी से कह दो कि अजमेर में हम स्वयं शेरशाह से लड़ेंगे। इसलिये वहाँ का प्रबंध तो हमारे ही हाथ में रहना उचित होगा।

    जोधपुर दुर्ग का प्रबंध हम रानी उमा दे को सौंपते हैं। अतः रानी जोधपुर आ जाये। रानी उमा दे ने अपने पति की इस आज्ञा को मान लिया और वह अजमेर का दुर्ग राव के सेनापतियों को सौंपकर स्वयं जोधपुर के लिये रवाना हो गई। मार्ग में मालदेव की अन्य रानियों ने उमादे को जोधपुर न आने देने का षड़यन्त्र रचा। इससे रानी कोसाना में ही ठहर गई तथा मालदेव से कहलाया कि मैं यहीं रहकर जोधपुर की रक्षा करूंगी। आप मुझे यहीं सेना भिजवा दें। मालदेव ने वैसा ही किया। इसके बाद मालदेव 50 हजार सैनिकों के साथ अजमेर के लिये रवाना हुआ किंतु बाद में गिर्री को लड़ने के लिये अधिक उपयुक्त स्थान मानकर गिर्री चला गया।

    शेरशाह सूरी

    शेरशाह सूरी ने अजमेर से 48 किलोमीटर दूर, सुमेल के मैदान में अपना शिविर लगाया तथा मालदेव की तरफ मुंह करके एक महीने तक बैठा रहा। मालदेव अधिक शक्तिशाली था इस कारण शेरशाह की हिम्मत नहीं हुई कि वह मालदेव के साथ छेड़छाड़ करे। जब शक्ति से काम बनता हुआ दिखाई नहीं दिया तो शेरशाह सूरी ने मालदेव के विरुद्ध षड़यन्त्र रचा तथा झूठे पत्रों का प्रयोग करके राव मालदेव के मन में, उसके अपने सरदारों के प्रति शंका उत्पन्न कर दी जिससे मालदेव अपने सरदारों को रणक्षेत्र में छोड़कर चला गया। बिना राजा की इस सेना को जीतने में भी शेरशाह सूरी के पसीने छूट गये। बड़ी कठिनाई से वह इस जीत में युद्ध हासिल कर सका।

    युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद शेरशाह मैदान में ही नमाज पढ़ने बैठ गया तथा खुदा का धन्यवाद करते हुए बोला कि मुट्ठी भर बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता। सुमेल युद्ध में मिली विजय से अजमेर पर शेरशाह का अधिकार हो गया। शेरशाह ने मालदेव की राजधानी जोधपुर पर भी अधिकार कर लिया और खवास खां को जोधपुर का शासक नियुक्त करके अजमेर आ गया। (तारीखे दाउदी ही एकमात्र स्रोत है जो यह कहता है कि शेरशाह अजमेर आया।)

    अजमेर के आसपास के दृश्य का आनंद लेने के लिये वह तारागढ़ भी गया। उसने मेड़ता तथा नागौर पर भी अधिकार कर लिया किंतु उसका प्रभुत्व स्थाई नहीं रह सका। जब शेरशाह के सेनापति खवासखां ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया तो उसने कोसाने में ठहरी हुई रानी उमादे पर आक्रमण करने का विचार किया तथा अपनी सेना लेकर कोसाने की तरफ रवाना हुआ किंतु कोसाना में रानी की सेनाओं का जमघट देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई और वह कोसाना के पास खवासपुरा गांव बसाकर जोधपुर लौट गया।

    फिर से राठौड़ों के अधिकार में

    सुमेल युद्ध के चार साल बाद ई.1545 में शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई तथा उसकी मृत्यु के साथ ही उसका साम्राज्य छिन्न भिन्न होने लगा। ई.1548 में मालदेव के सेनापति जैतावत राठौड़ पृथ्वीराज ने मुसलमानों को भगाकर फिर से अजमेर पर अधिकार कर लिया। यह देखकर मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने राठौड़ों से अजमेर लेने के लिये अजमेर पर आक्रमण किया किंतु महाराणा की सेनाओं को परास्त होकर भाग जाना पड़ा।

    हाजी खाँ

    ई.1556 में शेरशाह सूरी के पुराने गवर्नर एवं मेवात के शासक हाजी खां ने अवसर पाकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। मालदेव ने पृथ्वीराज जैतावत को अजमेर पर चढ़ाई करने भेजा। हाजी खां ने उदयपुर के राणा उदयसिंह, बून्दी के हाड़ा राव सुर्जन तथा मेड़ता के राव जयमल मेड़तिया को अपनी सहायता के लिये बुलाया। बीकानेर का राव कल्याणमल भी मालदेव के विरुद्ध आ खड़ा हुआ। इतने सारे नरेशों को अपने विरुद्ध खड़ा देखकर मालेदव की हिम्मत पस्त हो गई और उसने अपनी सेनाएं अजमेर से वापिस बुला लीं।

    जब जोधपुर की सेनायें लौट गईं तो महाराणा उदयसिंह ने अपने सामंतों- तेजसिंह तथा बालिसा सूजा को अजमेर भेजकर हाजी खां से चालीस मन सोना तथा रंगराय नामक वेश्या देने की मांग की। हाजी खां ने यह कहते हुए महाराणा की मांग ठुकरा दी कि रंगराय मेरी पत्नी है तथा सोना मेरे पास है नहीं। हाजी खां के इस उत्तर से नाराज होकर उदयसिंह ने हाजीखां पर आक्रमण कर दिया। इस पर हाजी खां ने मालदेव से सहायता मांगी। मालदेव ने 1500 घुड़सवार हाजीखां की सहायता के लिये अजमेर भेजे।

    जनवरी 1557 में अजमेर के पास हरमाड़ा नामक स्थान पर घमासान युद्ध हुआ जिसमें एक पक्ष तो अजमेर के हाजी खां और जोधपुर के मालदेव का था और दूसरा पक्ष उदयपुर, बून्दी, मेड़ता तथा बीकानेर का था। इस युद्ध में मेवाड़, मेड़ता, बीकानेर तथा बून्दी की करारी हार हुई। युद्ध में विजय मिलने पर भी अजमेर पर हाजी खां का अधिकार बना रहा तथा मालदेव को मेड़ता से संतोष करना पड़ा।

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  • अध्याय-4 : युद्ध-काल एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

     03.06.2020
    अध्याय-4 : युद्ध-काल एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

    अध्याय-4


    युद्ध-काल एवं उसके पश्चात् देशी राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

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    क्रिप्स मिशन से देशी नरेशों को यह अप्रिय तथ्य ज्ञात हुआ कि यदि ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के हितों में टकराव हुआ तो ब्रिटिश सरकार निश्चित रूप से देशी राज्यों को नीचा दिखायेगी। -वी. पी. मेनन।


    मार्च 1940 में नयी दिल्ली में अयोजित नरेन्द्र मण्डल की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि भारत के राजा अपने राज्यों की सम्प्रभुता की गारण्टी, संधि में प्रदत्त अधिकारों की सुरक्षा तथा ब्रिटिश प्रभुसत्ता के किसी अन्य भारतीय सत्ता को स्थानांतरण से पूर्व राजाओं की सहमति प्राप्त किये जाने की अनिवार्यता की शर्त पर ही डोमिनियन स्टेटस के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान करेंगे। 'द टाइम्स' ने इस पर टिप्पणी की कि यह प्रस्ताव प्रदर्शित करता है कि भारतीय राजा संवैधानिक प्रगति तथा भारतीय आजादी का विरोध करते हैं। नरेन्द्र मण्डल के प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान बनाये जाने के लिये नरेशगण ऐसे किसी भी विचार विमर्श में सम्मिलित होने के लिये तैयार हैं जो कि वायसराय द्वारा आरंभ किया गया हो किंतु तभी जबकि राजाओं की आवाज को उनकी महत्ता और ऐतिहासिक स्थिति के अनुसार आनुपातिक रूप से प्रमुखता दी जाये। द टाइम्स ने प्रस्ताव के इस बिंदु पर टिप्पणी की कि यह प्रस्ताव उन राजाओं के विरुद्ध है जो समस्त समस्याओं के निवारण के लिये संविधान सभा के निर्माण का विरोध करते हैं।

    सम्मेलन में महाराजा बीकानेर ने कहा कि राजाओं ने विगत 10 वर्षों में अपनी स्थिति बिना किसी त्रुटि के स्पष्ट की है। उन्होंने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया है जो ब्रिटिश ताज के अधीन डोमिनियन स्टेटस की ओर ले जाते हैं और इस समय वे केवल अपनी सम्प्रभुता की गारण्टी और सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहे हैं। गंगासिंह ने कहा कि भारत के समस्त प्रमुख राजनीतिक धड़ों में राजाओं को विश्वास में लिये बिना भारत का भविष्य निर्धारित किये जाने की मनोवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में यह दोहराया जाना उपयुक्त था कि राज्यों की पूर्ण स्वतंत्रता तथा ब्रिटिश सत्ता के साथ चुनौती विहीन समानता को ध्यान में रखे बिना लिया गया कोई भी फैसला राजाओं को स्वीकार्य नहीं होगा। संवैधानिक समझौता दो पक्षों के बीच नहीं अपितु तीन पक्षों- ब्रिटिश ताज, ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के मध्य होना चाहिये। अब तक यह देखा गया है कि भारतीय राजा तस्वीर में ही नहीं लाये गये हैं। इसलिये इंगलैण्ड की प्रमुख राजनैतिक पार्टियों को चाहिये कि वे ब्रिटिश सरकार से प्रत्यक्ष वार्तालाप करें।

    महाराजा गंगासिंह ने कांग्रेस के इस दृष्टिकोण से असहमति जताई कि देशी राज्य अंग्रेजी साम्राज्य की उपज हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय राज्य भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से भी पुराने हैं। देशी राज्य संधियों के माध्यम से व्यावहारिक सम्बन्धों के अंतर्गत आये। राजाओं के दावे हल्के रूप से लेकर खारिज नहीं किये जा सकते। ब्रिटिश भारत ब्रिटिश सरकार की उपज है। इससे पूर्व तो पूरा देश भारतीय राजाओं के अधीन था। देशी राजा कांग्रेस से अमित्रता पूर्वक नहीं थे अपितु कांग्रेस ही लगातार देशी राजाओं के प्रति सक्रिय विरोध का प्रदर्शन करती रही है।

    राजाओं ने ब्रिटिश ताज के प्रति वफादारी निभाने तथा साम्राज्य के प्रति सहयोग करते रहने का प्रस्ताव भी पारित किया। इस पर द टाइम्स ने टिप्पणी की कि ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा, आवश्यकता पड़ने पर देशी राजाओं के इस प्रस्ताव से लाभ उठाने की तैयारियां कर ली गयी हैं तथा भारतीय सैनिक टुकड़ियां ब्रिटिश सेनाओं के साथ मिलकर युद्ध में भाग ले रही हैं। सम्मेलन में वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा कि यद्यपि संघीय योजना स्थगित कर दी गयी है किंतु सरकार विश्वास करती है कि भारतीय एकता केवल संघ के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। संघ को देशी राज्यों की विशेष परिस्थितियों एवं परम्पराओं को अनुमति देनी होगी। देशी राज्यों के बिना अखिल भारतीय संघ वैसा ही अविचारणीय होगा जैसा कि ब्रिटिश भारतीय संघ मुसलमानों के बिना। वायसराय ने बहुसंख्य छोटी रियासतों की समस्याओं की ओर भी राजाओं का ध्यान आकर्षित किया जिनके पास आधुनिक प्रशासन को चलाने के लिये न तो आदमी थे और न धन। सामान्य सेवाओं के निष्पादन के लिये, जहाँ कहीं भी भौगोलिक रूप से संभव हो, इन रियासतों के समूहीकरण द्वारा संघीय इकाईयों के निर्माण की योजना भी वायसराय के मस्तिष्क में थी। इससे इन देशी रियासतों के भारतीय संघ में सम्मिलन का मार्ग सरल हो जाता।

    कांग्रेस द्वारा बीकानेर नरेश के रुख की आलोचना

    गांधीजी के सहयोगी प्यारेलाल ने बीकानेर नरेश द्वारा चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में दिये गये भाषण में कांग्रेस की आलोचना पर तीखी टिप्पणी की- 'नरेंद्र मण्डल की बैठक में बीकानेर महाराजा ने कहा बताते हैं कि 'कांग्रेस की तरफ से यह आरोप लगाया जा रहा है कि राजा लोग साम्राज्य की उपज हैं, यह भी कि राजा लोग ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज से अलग उनका कोई स्थान नहीं है, यह भी कि रियासतों का प्रश्न भारत की साम्राज्यिक प्रगति के उद्देश्य के लिये लटकायी गयी मछली है, यह कि रियासतों की समस्या ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया भूत है, ........मुझे यह कहने की इजाजत होनी चाहिये कि कई छोटी और बड़ी रियासतें अपने अस्तित्व के लिये अपने प्राचीन शासकों की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं तथा भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से कहीं अधिक पुरानी हैं।'' दुर्भाग्य से इस प्रकार की बेतुकी बात हो गयी है किंतु यह बहुत विलम्ब से कही गयी है। परमोच्चसत्ता से राजाओं के सम्बन्धों की संवैधानिक स्थिति चाकर अथवा अधीनस्थ सहयोग की है, कोई भी कह सकता है कि यह कांग्रेस की शब्दावली नहीं है। इसकी नींव उस साम्राज्यवादी शासन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों ने रखी थी जिसके बारे में बीकानेर महाराजा अनेक बार यह कह चुके हैं कि उन्हें इन सम्बन्धों पर गर्व है। महाराजा की इस बात पर उठायी गयी आपत्ति कि राजा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रचना हैं, भारतीय राज्यों की यह परिभाषा भारत सरकार अधिनियम 1935 में देखी जा सकती है। बीकानेर महाराजा का यह बयान सच नहीं है कि राजा लोग साम्राज्यिक सत्ता की रचना नहीं हैं। सच्चाई यह है कि 562 रियासतों में से अधिकांश रियासतों का निर्माण ब्रिटिश सत्ता ने ही किया है। आज भारतीय रियसातों में आंतरिक प्रशासन के लिये अपनायी गयी पद्धति में न तो राजतंत्र के लिये आवश्यक खूबियां मौजूद हैं, न लोकप्रिय सरकारों की संवैधानिक पद्धतियां मौजूद हैं अपितु वह व्यक्तिपरक शासन है जो कि भारत में साम्राज्यिक पद्धति द्वारा प्रदत्त शासन का सहउत्पाद हैं। यह बात ऐतिहासिक तथ्यों से साम्य नहीं रखती कि ब्रिटिश सत्ता के संपर्क में आने से पूर्व भारतीय राज्य पूर्णतः स्वतंत्र थे। उनमें से कुछ का उद्धार किया गया, कुछ का निर्माण ब्रिटिश सत्ता द्वारा किया गया। परमोच्चता परमोच्चता के माध्यम से ही ये सम्बन्ध मजबूत बनाये गये हैं।...... जिनके ऊपर भारतीय राजा अपनी सुरक्षा के लिये पीढ़ियों से विश्वास कर सकते आये हैं। यदि परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये तो रियासतों के नष्ट होने तथा उन्हें संलग्न कर लिये जाने का अत्यधिक खतरा है। '

    देशी रजवाड़ों के फैडरेशन की योजना

    भारत सरकार द्वारा संघ योजना स्थगित किये जाने के बाद महाराजा गंगासिंह ने सम्राट के संरक्षण में एक ऐसे संघ की कल्पना की जिसमें भारतीय रियासतें समान जागीरदार के रूप में मानी जायें और राजाओं को सीधे वायसराय की देख-रेख में रखकर उनके विशेषाधिकार समझौते के अनुसार सुरक्षित रखे जायें। इसे देखते हुए 1941 में वी. पी. मेनन ने रजवाड़ों के संघ की योजना बनायी जिसके अनुसार रजवाड़ों को ब्रिटिश हिंदुस्तान का हिस्सा बन जाना था। इन राज्यों का आंतरिक प्रशासन राजाओं के ही हाथों में रहना था और सुरक्षा, विदेश तथा यातायात केंद्रीय सरकार के हाथों में ले लिया जाना था। इस योजना से केंद्रीय हिंदुस्तान की नींव पड़ सकती थी किंतु लार्ड लिनलिथगो ने उस योजना को उस कूड़े में डाल दिया जिस पर किसी की नजर भी नहीं पड़ सकती थी।

    द्वितीय विश्वयुद्ध में राजाओं द्वारा स्वामिभक्ति का प्रदर्शन द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ होने पर ब्रिटिश सरकार को राजाओं से आदमी, धन तथा सामग्री के रूप में सहायता की आवश्यकता थी। राजपूताने के राजाओं ने ब्रिटिष सरकार की भरपूर सहायता की। जोधपुर महाराजा ने 26 अगस्त 1939 को वायसराय को तार भेजकर अनुरोध किया कि भयानक अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में मैं यह अनुभव करता हूँ कि महामहिम वायसराय से अनुरोध करना मेरा कर्त्तव्य है कि कृपा करके संकट के समय महामना सम्राट के आदमियों तथा उनके सिंहासन के प्रति मेरी अविचल स्वामिभक्ति के बारे में सूचित किया जाये। मेरी प्रार्थना है कि युद्ध आरंभ होने पर मेरे राज्य के समस्त नागरिक एवं सैन्य संसाधन साम्राज्यिक सरकार के निष्पादन पर रखे जायें।

    जोधपुर नरेश भारत भर के राजाओं में सबसे पहले थे जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत सेवाएं तथा अपने राज्य के समस्त संसाधन साम्राज्यिक सरकार को सौंप दिये थे। वायसराय ने जोधपुर महाराजा को धन्यवाद का तार भिजवाया। जोधपुर का सरदार रिसाला प्रथम भारतीय राज्य इकाई थी जिसे भारतीय सेना में लिया गया तथा मोर्चे पर लड़ने के लिये चयनित किया गया। जोधपुर इन्फैण्ट्री युद्ध क्षेत्र में युद्ध के प्रारंभिक चरण में पहुंची। जोधपुर राज्य के सैनिक पांचवी सेना के साथ इटली के सलेरनो में उतरने वाले प्रथम सैनिक थे। जोधपुर वायु प्रशिक्षण केंद्र का भारतीय वायु सेना के पायलटों के प्रशिक्षण के लिये प्रबंधन किया गया। राज्य की ओर से तीन हवाई जहाज एवं एक गल-ग्लाईडर ब्रिटिश सरकार को दिये गये। वायसराय युद्ध कोष के लिये राज्य की ओर से 3 लाख रुपये तथा जनता की ओर से 20 हजार रुपये दिये गये। राज्य की ओर से 25 हजार रुपये रैडक्रॉस फंड में दिये गये। युद्ध विभाग के लिये जोधपुर रेलवे वैगन निर्माण कारखाने में मीटर गेज के डिब्बे बनाये गये। जोधपुर रेलवे ने फाइटर एयर क्राफ्ट के लिये 4 लाख रुपये दिये। जोधपुर राज्य की जनता की ओर से जोधपुर बॉम्बर के लिये 2 लाख 30 हजार रुपये लंदन भिजवाये गये। राज्य की ओर से 4,71,200 रुपये का सोडियम सल्फेट युद्ध कार्य के लिये उपलब्ध करवाया गया। 1942-43 में जोधपुर की ओर से वायसराय युद्ध कोष के लिये 4 लाख रुपये और भिजवाये गये। इसके अलावा भी बहुत से संसाधन भेजे गये। महाराजा उम्मेदसिंह अपने छोटे भाई के साथ स्वयं युद्ध के मोर्चे पर गये। जब मित्र राष्ट्रों की सेनाएं विजयी हुई तो जोधपुर में विजय समारोह आयोजित किये गये।

    युद्ध आरंभ के अगले दिन अर्थात् 4 सितम्बर 1939 को बीकानेर महाराजा ने युद्ध क्षेत्र में जाने के सम्बन्ध में पूर्व में किये गये अपने अनुरोधों को दोहराया तथा डेढ़ लाख रुपये ब्रिटेन के सम्राट को भिजवाये और एक हजार पाउंड युद्ध कार्यों के लिये दिये। बीकानेर राज्य के गंगा रिसाला को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। गंगासिंह स्वंय रशिया तथा अदन के मोर्चे पर गये। सादुल लाइट इन्फैंट्री को ईराक तथा पर्शिया में लड़ने के लिये भेजा गया। बीकानेर विजय बैटरी ने भी विदेश में जाकर सम्राट की सेनाओं के साथ युद्ध सेवाएं दीं। इस सेना ने अराकान तथा मनिपुर में इन्फैन्ट्री की महत्त्वपूर्ण सहायता की।

    जयपुर नरेश मानसिंह भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सम्राट को अपनी निजी सेवाएं तथा अपनी सैनिक सेवाएं अर्पित करने वाले प्रथम राजाओं में से थे। उन्हें विश्वास था कि ब्रिटेन नाजी जर्मनी से अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिये नहीं अपितु विश्वशांति तथा सभ्यता के संरक्षण के लिये लड़ रहा था। उनका दृढ़ विश्वास था कि इंगलैण्ड विश्व के नागरिकों के प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये लड़ रहा था। युद्ध आरंभ होने पर जयपुर की प्रथम बैटेलियन मध्य पूर्व में भेजी गयी जहाँ उसे मिश्र, साइप्रस, लीबिया, सीरिया तथा फिलिस्तीन में विभिन्न कामों पर लगाया गया। इसके बाद यह सेना इटली गयी जहाँ उसने जर्मनों के विरुद्ध लड़ते हुए अत्यंत कठिन बिंदु माउंट बफैलो पर अधिकार किया। युद्ध के दौरान प्रदत्त सेवाओं के लिये इस सेना को कई अलंकरण एवं पुरस्कार दिये गये।

    जयपुर नरेश मानसिंह को अपनी सेनाएं मोर्चे पर भेज कर ही संतोष नहीं हुआ। जिस दिन युद्ध आरंभ हुआ, उसी दिन महाराजा ने वायसराय को केबल भेजकर अनुरोध किया कि वह सम्र्राट से प्रार्थना करके मुझे अपने जीवन रक्षकों के साथ युद्ध के मोर्चे पर भिजवाये। वायसराय ने उत्तर भिजवाया कि अच्छा होगा कि वह भारत में ही रहे तथा अपने राज्य में कर्त्तव्य का निर्वहन करे। 12 सितम्बर को मानसिंह ने बकिंघम पैलेस को केबल किया कि मेरी व्यक्तिगत सेवाएं मेरे प्रिय संप्रभु के निष्पादन पर रखी जायें। बकिंघम पैलेस ने भी वही उत्तर दिया जो वायसराय ने दिया था। 1940 के पूरे वर्ष में राजा इस अनुरोध को दोहराता रहा। वह ब्रिटिश सम्राट को उसी प्रकार की सेवाएं देना चाहता था जैसी कि उसके पूर्वज मुगलों को देते आये थे। अंत में उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी और अप्रेल 1941 में वह मध्यपूर्व के मोर्चे पर गया जहाँ कि उसकी अपनी रेजीमेण्ट तैनात थी। मानसिंह ने सम्राट जॉर्ज षष्ठम् का आभार व्यक्त करते हुए केबल के माध्यम से विश्वास दिलाया कि मेरी तथा मेरे परिवार की अविचलित स्वामिभक्ति तथा शाश्वत निष्ठा महामना सम्राट तथा उनके सिंहासन के प्रति सदैव बनी रहेगी। मानसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही वायसराय युद्ध कोष में 3 लाख रुपये भिजवाये। 10 लाख रुपये युद्ध ऋण के लिये दिये। जयपुर राज्य ने द्वितीय विश्वयुद्ध पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च किये।

    मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही 75 हजार रुपये युद्धकोष में भिजवाये तथा युद्ध चलने तक प्रतिवर्ष 50 हजार रुपये भिजवाने का वचन दिया। ई.1940 में मेवाड़ लांसर्स तथा मेवाड़ इन्फेंट्री को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। युद्धकाल में राजसमंद झील का उपयोग नौसैनिक वायुयानों के लिये लैंण्डिंग बेस के रूप में किया गया। ब्रिटिश आर्मी के लिये मेवाड़ी नौजवान भर्ती किये गये तथा युद्ध सामग्री भी प्रदान की गयी।

    भारत की आजादी के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव

    दिसम्बर 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका का प्रवेश हुआ जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारत प्रकरण को सुलझाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अमरीकी राष्ट्रपति इलियट रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिये ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। ब्रिटिश सरकार अमरीकी सरकार की सलाह की अनदेखी नहीं कर सकी क्योंकि अमरीकी सहायता के कारण ही युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति में सुधार आया था तथा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था स्थिर रह पायी थी। दूसरी तरफ मार्च 1942 में जापान की शाही फौज भारत के इतने नजदीक आ गयी कि उसका आक्रमण कभी भी आरंभ हो सकता था। यह आक्रमण भारत पर नहीं, भारत में डटे अंग्रेजों पर होना था। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत में स्वयं भारतीयों का सहयोग नहीं मिला तो जापानियों के सामने टिकना असंभव हो जायेगा। बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने नरम रुख अपनाया। इस प्रकार भारत संघ योजना को फिर से आरंभ करना पड़ा।

    क्रिप्स योजना

    11 मार्च 1942 को हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रधानमंत्री चर्चिल के बयान में कहा गया कि युद्ध मंत्रिमंडल, सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेज रहा है ताकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की इच्छाओं के अनुसार जिन सुधारों का प्रस्ताव किया है उनके बारे में भारतीयों के भय और शंकाओं का निवारण किया जाये। क्रिप्स को राजतंत्रीय सरकार का पूरा विश्वास प्राप्त है। क्रिप्स अपने साथ जो प्रस्ताव ला रहे हैं, वह या तो पूर्णतः स्वीकृत किया जाना चाहिये या फिर पूर्णतः अस्वीकृत। भारतीय रियासतों के सम्बन्ध में इस प्रस्ताव में पहले के समझौते के पुनर्परीक्षण की बात कही गयी थी। भारत पहुँचने से पहले क्रिप्स ने वायसराय को लिखा कि वे भारत में समस्त प्रमुख दलों के नेताओं से मिलना चाहेंगे। 22 मार्च 1942 को क्रिप्स दिल्ली पहुंचे।

    28 मार्च 1942 को क्रिप्स ने नरेंद्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से वार्त्ता की। इनमें नवानगर के जामसाहब, बीकानेर महाराजा, पटियाला महाराजा, भोपाल नवाब, सर वी.टी. कृष्णामाचारी, सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर, नवाब छतारी, सर एम. एन. मेहता तथा मीर मकबूल मुहम्मद शामिल थे। राजाओं ने क्रिप्स से पूछा कि इस योजना के लागू होने के बाद देशी राज्यों के सम्बन्ध ब्रिटिश क्राउन तथा भारत संघ के साथ किस प्रकार के होंगे। क्रिप्स ने बताया कि ब्रिटिश क्राउन द्वारा राज्यों के साथ दो प्रकार की संधियां की गयी थीं, पहली परमोच्चता सम्बन्धी संधियां थीं तथा दूसरी व्यापार, अर्थ तथा वित्तीय मामलों के सम्बन्ध में की गयी संधियां। यदि भारत संघ अस्तित्व में आता है तो राज्यों को बाद वाली संधियों में समायोजन की आवश्यकता होगी क्योंकि तब उनके सम्बन्ध स्वतंत्र उपनिवेश से होंगे न कि ब्रिटिश क्राउन से। जहाँ तक परमोच्चता वाली संधियों का सम्बन्ध है, ये तब तक अपरिवर्तित रहेंगी जब तक कि कोई राज्य नवीन परिस्थतियों में अपने आप को समायोजित करने के लिये इसे समाप्त करने की इच्छा प्रकट न करे। राजाओं ने पूछा कि नवीन व्यवस्था के तहत क्या गवर्नर जनरल एवं वायसराय एक ही व्यक्ति होगा?

    क्रिप्स का उत्तर था कि वे दो व्यक्ति भी हो सकते हैं। वायसराय के लिये किसी रियासत के भीतर अपरिदेशीय क्षेत्र (Extra Teritorial Area) की व्यवस्था करनी होगी। संघ के साथ की जाने वाली संधि में सेना के लिये गलियारे का प्रावधान करना होगा जो कि राज्यों के साथ हमारी संधियों के क्रियान्वयन के लिये आवश्यक होगा। राज्यों की सुरक्षा से संबंधित ब्रिटिश दायित्व उन राज्यों की संख्या एवं स्थिति पर निर्भर करेगा जो प्रस्तावित संघ से बाहर रहेंगी लेकिन नौसेना के मामले में किसी तरह की कठिनाई नहीं होगी क्योंकि सीलोन हमारे अधिकार में है। वायुसेना के मामले में विभिन्न राज्यों में हवाई अड्डों की व्यवस्था करनी पड़ेगी लेकिन संभावित परिस्थितियों की परिकल्पना करना असंभव है क्योंकि उनकी संख्या अनंत होगी।

    नरेंद्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से हुई इस वार्त्ता के सम्बन्ध में मीर मकबूल द्वारा पूछे गये एक प्रश्न के जवाब में र्लार्ड प्रिवीसील मि. टर्नबुल ने स्पष्ट किया कि सर क्रिप्स का यह आशय कतई नहीं है कि जो रियासतें नये संघ में सम्मिलित नहीं होंगी, वे भारत संघ के बराबर के स्तर पर अपना अलग से संघ बना सकेंगी । उनका आशय यह था कि यदि रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं होती हैं और वे परस्पर किसी प्रकार का संयोजन करती हैं तो उसमें आपत्ति नहीं होगी किंतु इस प्रकार के संयोजन में, संलग्न राज्यों की स्थिति में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होगा।

    29 मार्च 1942 को क्रिप्स ने एक पत्रकार वार्त्ता में विभिन्न पक्षों के मध्य समझौते के लिये एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि भारत में प्रकट की गयी चिंता पर, महामना सम्राट की सरकार द्वारा भारत के भविष्य के सम्बन्ध में किये गये वायदों पर, भारत में स्वायत्त सरकार के निर्माण के लिये तत्काल संभावित कदम उठाने हेतु निम्न लिखित प्रस्ताव देने का निर्णय किया है -

    (अ.) प्रतिकूलताओं की समाप्ति के बाद, भारतीय संघ की स्थापना के उद्देश्य से नया संविधान बनाने हेतु एक निर्वाचित संविधान निर्मात्री निकाय का गठन किया जायेगा।

    (ब.) संविधान निर्मात्री निकाय में भारतीय राज्यों की भागीदारी का प्रावधान किया जायेगा।

    (स.) सम्राट की सरकार निम्नलिखित प्रकार से बनाये गये संविधान को कार्यान्वित करने की स्वीकृति का वचन देती है-

          (i) यदि ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत उसे स्वीकार न करे तो वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता है पर उसे ब्रिटिश सरकार से संधि करनी होगी। अर्थात् यदि कोई प्रांत स्वयं का संविधान अलग से बनाना चाहेगा तो उसे ऐसा करने की छूट होगी तथा उसे भारत संघ के बराबर का दर्जा दिया जायेगा।   

          (ii) ब्रिटिश सरकार और संविधान निर्मात्री सभा के मध्य एक संधि होगी जिसमें महामना सम्राट की सरकार द्वारा प्रदत्त वचन के अनुसार ब्रिटिश हाथों से भारतीयों को उत्तरदायित्व के पूर्ण हस्तांतरण की बात होगी। इसमें जातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात भी होगी किंतु भारत संघ पर ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के अन्य सदस्यों के साथ भविष्य के सम्बन्धों की कोई शर्त नहीं थोपी जायेगी। कोई राज्य, संविधान को स्वीकारने या न स्वीकारने का चयन करता है, उसके लिये संधि व्यस्थाओं के पुनरीक्षण करने की आवश्यकता होगी क्योंकि नवीन परिस्थिति के अंतर्गत ऐसा करना आवश्यक होगा।

    (द) संविधानसभा का निर्माण युद्ध के पश्चात विभिन्न प्रांतों की विधान सभाओं (व्यवस्थापिका सभाओं) के निम्न सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से किया जायेगा। इस हेतु नये चुनाव करवाये जायेंगे। समस्त निम्न सदनों में जितने सदस्य होंगे उनकी दशांश संख्या, संविधान निर्मात्री सभा की होगी। संविधान निर्मात्री सभा में भारतीय रियासतें को अपनी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधि भेजने के लिये आमंत्रित किया जायेगा। रियासतों के प्रतिनिधियों के अधिकार ब्रिटिश भारतीय प्रतिनिधियों के समान ही होंगे। रियासतों को यह छूट होगी कि वे नया संविधान स्वीकार करें या न करें। (प्रो. कूपलैण्ड के अनुसार इस विधान परिषद में कुल 207 सदस्य होने थे जिनमें से 158 ब्रिटिश भारत के तथा 49 रियासतों के। )

    (य) संक्रांतिक काल में और जब तक कि नवीन संविधान का निर्माण न हो जाये, सम्राट की सरकार, भारत के विश्वयुद्ध उपक्रम का हिस्सा होने के कारण, भारत की रक्षा का भार अपने हाथ में रखेगी परंतु सेना, साहस तथा सामग्री संसधान उपलब्ध करवाने का दायित्व भारत के नागरिकों के सहयोग से भारत सरकार पर होगा। सरकार की इच्छा है कि प्रमुख भारतीय दलों के नेताओं को अपने देश की कौंसिलों, कॉमनवेल्थ तथा यूनाईटेड नेशन्स में परामर्श के लिए तुरन्त और प्रभावोत्पादक ढंग से भाग लेने के लिये आमंत्रित किया जाये जिससे वे भारत की स्वतत्रंता के लिये आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण सक्रिय तथा निर्माणकारी सहयोग देने में समर्थ हो सकें।

    इस प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत की स्वाधीनता के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दे दिया जायेगा। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना उसकी इच्छा पर निर्भर करेगा। योजना का सबसे विवादित बिंदु यह था कि भारत का कोई भी प्रांत अपना संविधान बनाकर स्वतंत्र हो सकता था। ऐसा पाकिस्तान की मांग को ध्यान में रखकर किया गया था।

    योजना प्रस्तुत किये जोन के बाद पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब देते हुए क्रिप्स ने कहा कि भारत संघ के निर्माण के लिये तत्काल प्रयास किये जायेंगे। युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं की जायेगी। विभिन्न पक्षों में सहमति बनते ही प्रांतीय चुनाव करवाये जायेगें। चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही संविधान निर्माण सभा स्थापित की जायेगी। हम भारत पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते यहाँ तक कि समय सीमा भी नहीं। पत्रकारों ने पूछा कि क्या आपको पता है कि इंगलैण्ड का इतिहास अपने वायदों से मुकर जाने का रहा है। क्या आप इन प्रस्तावों की प्रत्याभूति (guarantee) प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट से दिलवा सकते हैं?

    क्रिप्स का उत्तर था कि यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो किसी चीज की कोई प्रत्याभूति नहीं है। इसके लिये प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट उपलब्ध नहीं होंगे। क्रिप्स से पूछा गया कि इन प्रस्तावों के तहत संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों की जनता की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। इस पर क्रिप्स ने कहा कि यदि किसी राज्य में निर्वाचन का कोई तरीका है तो उनका उपयोग किया जायेगा किंतु यदि किसी राज्य में चुनी हुई संस्थायें नहीं हैं तो वहाँ यह कार्य नामित प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा। यह पूछे जाने पर कि आप कैसे पता लगायेंगे कि राज्य भारत संघ में शामिल होने जा रहे हैं, क्रिप्स ने कहा कि राज्यों से यह पूछकर कि क्या उनकी इच्छा संघ में मिलने की है! जब यह पूछा गया कि क्या राज्यों के नागरिकों की कोई आवाज होगी, क्रिप्स ने कहा कि इसका निर्णय उन राज्यों की वर्तमान सरकारों द्वारा किया जायेगा। हम किसी प्रकार की नयी सरकारों का निर्माण नहीं करेंगे। राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार के सम्बन्ध संधियों के माध्यम से हैं, वे संधियां तब तक बनी रहेंगी जब तक कि राज्य उन्हें बदलने की इच्छा प्रकट न करें। यदि भारतीय राज्य, संघ में सम्मिलित होते हैं तो वे ठीक उसी परिस्थिति में रहेंगे जिसमें कि वे आज हैं।

    जब उनसे यह पूछा गया कि यदि कोई प्रांत या राज्य सम्मिलित न होना चाहे तो क्या उनके साथ समायोजन की कोई विधि होगी, तो क्रिप्स ने कहा कि वे दूसरे राज्यों के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करेंगे जैसा कि वे अन्य शक्तियों यथा जापान, स्याम, चायना, बर्मा अथवा अन्य किसी देश के साथ करते हैं। एक प्रश्न के उत्तर में क्रिप्स ने कहा कि संघ में सम्मिलित होने के लिये राज्यों की कोई संख्या निश्चित नहीं की गयी है। क्रिप्स से पूछा गया कि यदि भारतीय राज्य, भारत संघ में सम्मिलित नहीं होते और परमोच्च सत्ता के सहयोगी बने रहते हैं तो क्या परमोच्च सत्ता इन संधि दायित्वों के निर्वहन के लिये भारत में इम्पीरियल ट्रूप्स की व्यवस्था करेगी, इस पर क्रिप्स ने जवाब दिया कि ऐसा होने पर ब्रिटिश सरकार किसी एक राज्य में इम्पीरियल ट्रूप्स रख सकती है लेकिन उन्हें भारत संघ में नहीं रखा जायेगा। संधि में इन समस्त बातों को रखा जायेगा जैसे कि सत्ता का हस्तांतरण दो या तीन माह में होगा तथा उसके हस्तांतरण का तरीका क्या होगा।

    क्रिप्स से पूछा गया कि ब्रिटिश सरकार राज्यों को अनिवार्य रूप से भारत संघ में सम्मिलित होने के लिये क्यों नहीं कहती, इस पर क्रिप्स ने कहा कि ब्रिटिश सरकार की यह इच्छा है कि समस्त राज्य भारत संघ में सम्मिलित हों किंतु ब्रिटिश सरकार संधि दायित्वों को भंग करके उनसे जबर्दस्ती ऐसा करने को नहीं कहेगी। क्रिप्स ने कहा कि मेरा यह विश्वास है कि यह भारतीय समस्या का सबसे उत्तम समाधान है और मैं इस योजना से पूरी तरह सहमत हूँ। संविधान निर्माण सभा में भाग लेने के लिये भारतीय राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर ब्रिटिश प्रतिनिधियों के समान अधिकारों के साथ आमंत्रित किया जायेगा। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि यदि कोई राज्य संविधान निर्मात्री निकाय में भाग लेता है किंतु संविधान निर्माण के पश्चात संघ में सम्मिलित नहीं होता है तो वह राज्य फिर से अपनी वर्तमान स्थिति को प्राप्त कर लेगा किंतु उसे नवीन संघ के साथ रेलवे, डाक और तार जैसे आर्थिक विषयों पर समायोजन करने पड़ेंगे।

    2 अप्रेल 1942 को राज्यों के शासक फिर क्रिप्स से मिले। इनमें बीकानेर नरेश सादूलसिंह, नवानगर के जाम साहब और पटियाला के महाराजा यदुवेंद्रसिंह शामिल थे। भोपाल नवाब की ओर से नवाब छतारी ने भेंट की। राजाओं ने कई बिंदुओं पर स्पष्टीकरण चाहा। पहला बिंदु यह था कि यदि कुछ रियासतें संघ में शामिल होना उचित नहीं समझें तो क्या ऐसी रियासतों अथवा रियासतों के समूहों को अपना अलग से पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न संघ बनाने का अधिकार होगा? रियासतों के प्रतिनिधि मण्डल द्वारा सर स्टैफर्ड क्रिप्स को जो स्मृतिपत्र दिया गया, उसमें अनुरोध किया गया कि यदि क्रिप्स चाहें तो रियासतों को अपना एक निजी संगठन बनाने का अधिकार प्रदान कर दें। साथ ही, यह भी कहा गया कि इसका मतलब अलग संगठन वास्तविक रूप में बनाना नहीं अपितु भारतीय संघ में रियासतों की मर्यादा को बढ़ाना है। क्रिप्स द्वारा कहा गया कि वैयक्तिक स्तर पर कमीशन को इस सुझाव में कोई आधारभूत कठिनाई दिखायी नहीं देती किंतु चूंकि इस परिस्थिति पर विचार नहीं किया गया है इसलिये कमीशन इस सम्बन्ध में निश्चित उत्तर देने की स्थिति में नहीं है। ब्रिटिश सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार कर सकती है।

    कुछ प्रश्न संघ निर्मित होने के बाद की स्थिति के सम्बन्ध में पूछे गये। क्या संघ बनने के बाद राज्यों की जनता, संघ की जनता हो जायेगी? क्या संघ राज्यों के ऊपर परमोच्च सत्ता प्राप्त कर लेगा? क्या किसी राज्य के लिये यह संभव होगा कि वह संघ में मिलने के बाद भी शासक के वंशानुगत अधिकारों एवं व्यक्तिगत मामलों को केवल ब्रिटिश क्राउन के अधिकार क्षेत्र में बना रहने दे? इन सब प्रश्नों का यह जवाब दिया गया कि सब कुछ आगे चलकर वास्तव में की जाने वाली व्यवस्था पर आधारित होगा जो कि संविधान निर्मात्री निकाय तथा राज्यों के मध्य होने वाले समझौते पर निर्भर करेगा किंतु किसी भी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने परमोच्चसत्ता किसी अन्य संस्था को देने का निर्णय नहीं किया था। संघ में राज्य के सम्मिलन का प्रभाव ब्रिटिश क्राउन के दायित्व का संघ में स्वतः विलय के रूप में होगा। दूसरी ओर परमोच्चता उन राज्यों के मामले में बनी रहेगी जो राज्य संघ में मिलना स्वीकार नहीं करते हैं।

    दूसरा बिंदु यह उठाया गया कि राज्यों द्वारा संघ में मिलने से मना करने पर क्या क्राउन राज्यों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करता रहेगा? क्रिप्स का उत्तर था कि जो राज्य, संघ में मिलने से इन्कार कर देंगे, ब्रिटिश सरकार उन राज्यों के प्रति, संधि के तहत स्थापित दायित्वों का निर्वहन करती रहेगी। ब्रिटिश सरकार संघ में सम्मिलित न होने वाले राज्यों के प्रति अपने संधि दायित्वों का निर्वहन करने के लिये सब कुछ उपलब्ध करवायेगी। इसमें अंतिम उपाय के रुप में सेना का प्रयोग भी शामिल होगा।

    यद्यपि क्रिप्स स्वयं कोई वचन नहीं देना चाहते थे कि सरकार द्वारा इन उपायों को किन शर्तों के अधीन किया जायेगा। कुछ राज्य इस बात को लेकर संशय में थे कि क्रिप्श मिशन द्वारा यह क्यों कहा जा रहा है कि राज्य चाहे संघ में सम्मिलित हों अथवा नहीं, ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी उनकी संपूर्ण संधियों को पुनरीक्षित किया जाना आवश्यक होगा? क्रिप्स द्वारा इस प्रश्न का स्पष्टीकरण इस प्रकार दिया गया कि संधियों को पुनरीक्षित करने की बात इसलिये कही जा रही है क्योंकि नवीन परिस्थितियों में ऐसा किया जाना अत्यंत आवश्यक होगा तथा इसका प्रावधान इसलिये रखा जा रहा है क्योंकि ब्रिटिश भारत को सत्ता हस्तांतरित किये जाने के बाद राज्यों एवं ब्रिटिश भारत के मध्य आर्थिक हितों के लिये नये समझौते करने पड़ेंगे। क्रिप्स ने कहा कि परमोच्चता एवं राज्यों के संरक्षण से सम्बन्धित संधियां सम्बन्धित राज्यों की सहमति के बिना पुनरीक्षित नहीं की जायेंगी।

    राजाओं द्वारा पूछा गया कि क्या प्रस्तावित संघ भौगोलिक निरंतरता तक सीमित रहेगा। क्रिप्स का उत्तर था कि सामान्यतः ऐसा ही होगा जब तक कि मध्यवर्ती राज्यों अथवा इकाईयों के बीच कुछ व्यवहारिक प्रबंध न कर लिये जायें। इन विवादों को सुलझाने के लिये ब्रिटिश सरकार के कार्यालय मौजूद रहेंगे। राज्यों तथा प्रांतों को संघ में सम्मिलित होने या न होने की पूरी छूट दी गयी है। वे चाहें तो नये प्रस्तावित संघ से बाहर रहें और चाहें तो उसमें शामिल हों। क्रिप्स द्वारा कहा गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की इच्छा के बिना भारत में बने रहना नहीं चाहती। जब तक कि भारतवासी अपने हित के लिये ब्रिटिश सरकार को भारत में बने न रहने देना चाहें, ब्रिटिश सरकार भारत में बनी नहीं रहेगी किंतु संघ में शामिल न होने वाले राज्यों के प्रति संधि दायित्वों का निर्वहन करने की सीमा तक वह भारत में बनी रहेगी।

    क्रिप्स ने आशा व्यक्त की कि समस्त भारतीय समझदार हैं और वे एक संघ के नीचे आने में सक्षम होंगे। अन्यथा उन्हें कई संघ बनाने होंगे और कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। क्रिप्स ने राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को पहला कदम यह उठाना चाहिये कि वे अपने समूह बनायें अथवा संघीय सम्बन्ध स्थापित करें ताकि सहकारिता पर आधारित समूहों की भावना को बड़ी इकाईयों तक विस्तारित किया जा सके। विशेषकर साझा औद्योगिक एवं आर्थिक हितों के मामलों में, ताकि राज्य ब्रिटिश भारत से पीछे न रह जायें और संपूर्ण भारत के एक साथ विकास पर जोर दिया जा सके। राजाओं को चाहिये कि वे इस मुद्दे पर वायसराय से बात करें।

    एक राजा ने क्रिप्स से पूछा कि क्या नवीन परिस्थितियों में राजाओं को ब्रिटिश भारत के राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना चाहिये? इस सवाल के जवाब में क्रिप्स ने कहा कि यह प्रश्न वायसराय के लिये है किंतु मेरी सलाह है कि राज्यों के शासक ब्रिटिश भारत के राजनीतिक दलों के नेताओं से सम्पर्क स्थापित करें ताकि भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान राजाओं को सुविधा रहे।

    उन दिनों भारतीय प्रेस में इस तरह की कटु आलोचनाएं छप रही थीं कि राजाओं ने अपना अलग संघ बनाने की छूट देने की मांग राजनीतिक विभाग के उकसाने पर की। अखिल भारतीय प्रजा परिषद के एक सम्मेलन में नेहरू ने राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को अपने निकटतम प्रांत में मिल जाना चाहिये न कि किसी अन्य राज्य में। 2 अप्रेल को क्रिप्स ने तीन नरेशों को, जो उनसे मिलने आये थे, गुस्से में आकर कहा कि उन्हें अपना फैसला कांग्रेस या गांधीजी से करना होगा क्योंकि हम तो अब बिस्तर बोरिया बांधकर भारत से कूच करने वाले हैं। इस प्रकार क्रिप्स ने राजाओं को स्पष्ट किया कि वे अपने भविष्य के लिये भारत सरकार की तरफ देखें न कि ब्रिटिश सरकार की तरफ। क्रिप्स मिशन के इस रवैये से राजाओं को यह अप्रिय तथ्य स्पष्ट हो गया कि यदि ब्रिटिश भारत और राजसी भारत के हितों के बीच किसी तरह का विवाद हुआ तो महामना सम्राट की सरकार देशी राज्यों को नीचा दिखायेगी।

    क्रिप्स प्रस्ताव में प्रांतों को तो अपना पृथक संघ बनाने की आजादी थी परंतु रियासतों के लिये ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी। क्या ब्रिटिश सरकार अपनी बरसों पुरानी भेदनीति को फिर से कार्यान्वित करने जा रही थी? इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्हें ऐसा करने का अधिकार दे दिया जाता तो भारत में पूरी तरह से बाल्कन राष्ट्र जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती। पूरा देश अनुभव कर रहा था कि राजाओं के इस प्रस्ताव में व्यवहारिकता का अभाव था क्योंकि देश के समस्त रजवाड़ों की सीमा ब्रिटिश भारत के क्षेत्र से संलग्न थी। अतः इस तरह का कोई संघ कैसे काम कर सकता था!

    क्रिप्स प्रस्ताव पर अपना निर्णय सुनाने से पहले राजन्य वर्ग ब्रिटिश भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा। 9 अप्रेल 1942 तक यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ही दल इस प्रस्ताव को स्वीकार करने वाले नहीं हैं। राजाओं ने इस परिस्थिति से लाभ उठाने का मानस बनाया। 10 अप्रेल को रियासतों के प्रतिनिधि मंडल ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि भारत के लिये एक संविधान बनाने में अपनी मातृभूमि के हित में भारतीय रियासतों को, रियासतों की अखण्डता और प्रभुसत्ता के अनुरूप प्रत्येक उचित तरीके से अपना योग देने में हमेशा की तरह प्रसन्नता होगी पर रियासतों को इस बात का विश्वास दिलाया जाये कि जिन रियासतों के लिये अलग रहना संभव न होगा तो वे रियासतें या रियासतों के समूह अपनी इच्छा के अनुसार अपना एक संघ बना सकेंगे जिसे इस उद्देश्य के लिये बनाये गये उपयुक्त और स्वीकृत तरीके के अनुसार पूर्ण प्रभुसत्ता का दर्जा प्राप्त होगा।

    11 अप्रेल को कांग्रेस तथा मुस्लिमलीग ने क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। 22 अप्रेल को क्रिप्स लंदन चले गये। उनका मिशन असफल हो गया जिससे राजाओं ने चैन की सांस ली। राजाओं की इस दोहरी चाल से कांग्रेस को खासी निराशा हुई। उन्होंने राजाओं के विरुद्ध वक्तव्य दिये। इन्हीं दिनों जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि राजाओं से की गयी संधियां समाप्त कर दी जानी चाहिये परंतु भारत सचिव एमरी ने दोहराया कि संधियां ज्यों की त्यों बनी रहेंगी। नेहरू ने उन लोगों की पीठ थपथपायी जो राजाओं को धूर्त, झक्की अथवा मूर्ख कहते थे।

    क्रिप्स मिशन की असफलता पर यह शक किया जाने लगा कि या तो क्रिप्स की पीठ में ब्रिटिश सरकार ने छुरा भौंक दिया है अथवा डीक्वेंस के शब्दों में चालाक क्रिप्स महज धोखेबाजी, छल कपट, विश्वासघात और दुहरी चालों से काम ले रहे थे और उन्हें इस पर जरा भी पश्चाताप नहीं था! गांधीजी के अनुसार क्रिप्स योजना आगे की तारीख का चैक था जिसका बैंक खत्म होने वाला था। मिशन के असफल हो जाने पर चर्चिल ने मित्र राष्ट्रों को सूचित किया कि कांग्रेस की मांगों को मानने का एक ही अर्थ होता कि हरिजनों तथा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाता। अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को उसने समझा दिया कि भारतीय नेता परस्पर एकमत नहीं हैं।

    क्रिप्स योजना के कुछ बिंदुओं पर भारत सचिव मि. एमेरी ने असंतोष व्यक्त किया। उनके अनुसार ब्रिटिश सरकार भारतीय राज्यों में प्रजातंत्र का विकास होते हुए देखना चाहती है जबकि क्रिप्स प्रस्तावों में राज्यों में योग्य प्रतिनिधि संस्थाओं के विकास का उल्लेख किया गया है। प्रस्तावों में कहा गया कि जो राज्य प्रस्तावित संघ में सम्मिलित हो जायेंगे उन पर से परमोच्च्ता समाप्त हो जायेगी क्योंकि स्वतंत्र राज्यों में खराब प्रशासन की स्थिति में ब्रिटिश सरकार के लिये उन राज्यों को संरक्षण प्रदान करना संभव नहीं होगा। एमेरी का विचार था कि राजाओं को अपने भविष्य के लिये अधिकतम संभावित स्तर तक मिलजुल कर काम करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये तथा राजपूताना खण्ड का राज्य संघ तथा उनके जैसे अन्य संघों के अस्तित्व में आने को गंभीरता से लेना चाहिये। क्रिप्स योजना पर राजपूताना के राज्यों में बीकानेर के अतिरिक्त अन्य किसी राज्य की पृथक प्रतिक्रिया या भूमिका देखने देखने को नहीं मिलती। इस समय तक समस्त राजा नरेंद्र मण्डल के माध्यम से ही ब्रिटिश सरकार के साथ मोलभाव करते हुए दिखायी देते हैं।

    भारत छोड़ो आंदोलन

    क्र्रिप्स मिशन के लौट जाने पर अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया। गांधीजी ने इस बात को आधार बनाया कि जब तक अंग्रेज भारत में बने रहेंगे, तब तक भारत पर जापान के आक्रमण का खतरा बना रहेगा। गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्र भारत ही जापानियों का सक्षमता से मुकाबला कर पायेगा।

    लॉर्ड वेवेल की नियुक्ति

    क्रिप्स के लौट जाने के बाद कांग्रेस तथा राजाओं के मध्य रस्साकशी होने लगी। कांग्रेस चाहती थी कि देशी राज्य भारत संघ में मिलें और राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि विधान निर्मात्री समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व करें। राजा मानते थे कि संघ में मिलना या न मिलना, संविधान निर्मात्री सभा में सम्मिलित होना या न होना, उनका विशेषाधिकार है। वे ये भी चाहते थे कि उनका प्रतिनिधित्व उनके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि करें। सरकार दोनों पक्षों को संतुष्ट करना चाहती थी। उसने कांग्रेस को संतुष्ट करने के लिये राज्यों पर जोर डाला कि वे प्रशासन को आधुनिक रूप दें और लोकप्रिय सरकारें स्थापित करें। राज्यों को आश्वासन दिया गया कि परमोच्च सत्ता उत्तराधिकारी राज्यों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। विश्वयुद्ध में इंगलैण्ड की लगातार पतली हो रही हालत, क्रिप्स मिशन की असफलता तथा भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठ भूमि में अक्टूबर 1943 में लॉर्ड वेवेल भारत के नये वायसराय नियुक्त किये गये। उन्होंने घोषणा की कि मैं अपने थैले में बहुत सी चीजें ला रहा हूँ।

    ढुलमुल केन्द्र की मांग

    जिस समय वेवेल भारत के गवर्नर जनरल बनकर आये उस समय कांग्रेस अखण्ड भारत के लिये लड़ रही थी जबकि मुस्लिम लीग भारत का एक खण्ड हथियाना चाहती थी। इस संघर्ष में तृतीय पक्ष राजाओं का था जिन्हें भय था, कहीं कांग्रेस राज्यों की प्रभुसत्ता भी न हथिया ले। वे नरेंद्र मण्डल के चांसलर के नेतृत्व में अपनी लड़ाई लड़ रहे थे। इन तीनों पक्षों के संघर्ष के कारण ही भारत की स्वतंत्रता लम्बे समय से टलती आ रही थी। नरेंद्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल एक ढुलमुल केंद्र के पक्षधर थे जिसमें अवशिष्ट शक्तियां राज्यों में निहित हों। नरेंद्र मण्डल का चांसलर बनने के बाद एक वक्तव्य में नवाब ने कहा था कि अनुदार व्यक्तियों ने हमें अभी से धमकाना आरंभ कर दिया है कि जब समय आयेगा, इंगलैण्ड परेशानी पैदा करने में सक्षम शत्रुओं को गले लगाने के लिये, हमें नीचा दिखायेगा। कृपया इंगलैण्ड को बता दें कि भारतीय राज्य इस लांछन को कपटपूर्ण मानते हुए इसका खण्डन करते हैं। हमें इंण्लैण्ड द्वारा इन कठिन परिस्थितियों में दिये गये वचन का पूरा विश्वास है।

    18 सितम्बर 1944 को नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में चांसलर ने अपने निश्चय की सूचना दी कि दिसम्बर 1944 में होने वाले अधिवेशन में वे निम्नलिखित प्रस्ताव रखेंगे-

    ब्रिटिश सत्ता के साथ राज्यों के जो सम्बन्ध रहे हैं तथा हैं, और ब्रिटिश सत्ता को राज्यों में जो अधिकार प्राप्त हैं, सम्बन्धित राज्यों से विचार विमर्श के बिना किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित नहीं कर सकते। ब्रिटिश सत्ता के प्रतिनिधि सम्राट की सरकार को सूचित करें कि शाही घोषणाओं द्वारा तथा हाल ही में जब सरकार द्वारा दिये गये आश्वासनों में यह कहा गया है कि राज्यों के साथ की हुई संधियां, सनदें, अधिकार पत्र तथा आंतरिक स्वतंत्रता सम्बन्धी समझौते स्थापित रखना और उनके स्थायी रहने की व्यवस्था करना सरकार की निश्चित नीति है, तब ऐसी दशा में सम्राट और राज्यों के सम्बन्धों में परिवर्तन करने तथा सम्राट के अन्य पक्षों के साथ किये गये समझौतों को, बिना राज्यों की पूर्व स्वीकृति लिये राज्यों पर लागू करने की प्रवृत्ति ने राज्यों में गंभीर आशंका और चिंता की स्थिति उत्पन्न कर दी है जिसका शीघ्र निराकरण आवश्यक है। सरकार की यह इच्छा कभी नहीं रही होगी कि राज्यों को लावारिस जमीन की तरह छोड़ दे। अगर कांग्रेस हमें नीचा दिखाना और लूटना चाहती है तो हम लड़ेंगे। 26 नवम्बर 1944 को वायसराय वेवेल ने चासंलर द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव को यह कह कर निषिद्ध कर दिया कि जब इस विषय पर वायसराय और राजाओं के मध्य विचार-विमर्श चल रहा है तब इस प्रकार का प्रस्ताव पारित करने से जनता में मिथ्या संदेश जायेगा।

    नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति ने मांग की कि ब्रिटिश भारत को सत्ता का हस्तांतरण किये जाने से पूर्व राज्यों के आंतरिक प्रशासन में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाना चाहिये ताकि प्रत्येक प्रकार के भय को समाप्त किया जा सके। राजाओं का मानना था कि संधि अधिकारों के अंतर्गत ऐसी मांग करना उनका कर्त्तव्य था और ऐसा किये बिना वे भविष्य की व्यवस्था में अपना समुचित स्थान पाने के लिये ब्रिटिश भारतीय राजनीतिज्ञों से सफलता पूर्वक समझौता नहीं कर सकेंगे। राजनीतिक विभाग नरेंद्र मण्डल के इस विचार से सहमत नहीं हुआ तथा इस सम्बन्ध में उसने कड़ा रुख अपनाया। राजनीतिक विभाग से प्राप्त हुए पत्रों के कारण स्थायी समिति ने अपने आपको अपमानित अनुभव किया और राज्यों की स्थिति के लगातार क्षय के विरोध में दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में सामूहिक त्यागपत्र दे दिया।

    संघ निर्माण हेतु सप्रू समिति एवं अन्य व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत योजनाएं

    दिसम्बर 1944 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। प्रांतों एवं राज्यों के प्रस्तावित भारतीय संघ में सम्मिलित होने अथवा अलग रहने के प्रश्न पर समिति ने सिफारिश की कि ब्रिटिश भारत के किसी भी प्रांत को संघ में शामिल नहीं होने का विकल्प नहीं होगा। ब्रिटिश भारत का प्रांत हो या देशी राज्य, एक बार सम्मिलित होने के बाद उसे संघ से अलग होने का अधिकार नहीं होगा। ब्रिटिश भारत, जिस तरह से किसी भी ब्रिटिश भारतीय प्रांत को अलग होने की आज्ञा देना स्वीकार नहीं कर सकता उसी तरह देशी राज्यों को भी इसकी अनुमति नहीं दे सकता। सप्रू समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं था, इसलिये समिति ने अपनी इच्छा से संघ में शामिल होने के अतिरिक्त रियासतों के विषय में कोई और सिफारिश नहीं की। समिति द्वारा यह सिफारिश भी की गई कि जहाँ तक हो सके राज्य प्रमुख, राज्यों के शासकों में से ही चुना जाना चाहिए। साथ ही उसमें राज्यों के मंत्री पद की भी व्यवस्था हो जिसकी सहायता के लिए राज्यों की सलाहकार समिति हो। सप्रू समिति की अवधारणा के अनुसार भारतीय संघ केवल एक राज्य होगा जिसमें संघीय इकाइयां होंगी चाहे वह प्रांतों की हों या राज्यों की। संघ से असंबद्ध राज्य भी होंगे। किसी भी विदेशी शक्ति का इन इकाइयों पर कोई अधिकार नहीं होगा चाहे वे संघ में शामिल हों या न हों।

    रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से एम. एन. राय द्वारा स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया। 6 जनवरी 1945 को ऑल इण्डिया कान्फ्रेन्स ऑफ दी रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के द्वारा इस प्रारूप को पृष्ठांकित किया गया जिसमें कहा गया कि अंतरिम सरकार को संपूर्ण भारत के लिये संविधान की घोषणा करनी चाहिये तथा उसे भारतीय रियासतों पर भी लागू किया जाना चाहिये। इसे पूर्व में ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राजाओं के मध्य हुए द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से किया जाना चाहिये जिसके माध्यम से भारतीय राजाओं को कुछ वित्तीय अनुदानों के बदले अपने अधिकार भारत सरकार के समक्ष समर्पित करने होंगे।

    प्रो. कूपलैण्ड ने नदियों को आधार बनाकर जनसंख्या के अनुसार उनके क्षेत्रीय विभाजन की योजना प्रस्तुत की। सर सुल्तान अहमद ने भारत तथा यूनाइटेड किंगडम के मध्य संधि के माध्यम से भारत पाक विभाजन की योजना प्रस्तुत की इनमें देशी राज्यों के बारे में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी। 1943 में अर्देशिर दलाल, डा. राधा कुमुद मुखर्जी तथा डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं जिनमें भारत की सांप्रदायिक समस्या का समाधान ढूंढने की चेष्टा की गयी किंतु देशी राज्यों की समस्या को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

    वेवेल योजना

    25 जून 1945 को लार्ड वेवेल ने शिमला में समस्त सम्बद्ध पक्षों का एक सम्मेलन बुलाया जो 18 दिन तक चला। वेवेल द्वारा कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौता करवाने तथा अंतरिम सरकार गठित करने का प्रयास किया गया। वायसराय ने राजाओं को आश्वासन दिया कि राज्यों के साथ ब्रिटिश ताज के सम्बन्धों को राज्यों की सहमति प्राप्त किये बिना किसी अन्य अभिकरण को स्थानांतरित नहीं किया जायेगा यदि शासकगण यह आश्वासन दें कि भविष्य में किसी समझौते के परिणाम स्वरूप ऐसे किसी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता हो तो शासकगण अयुक्तियुक्त रूप से इन्कार नहीं करेंगे। नरेंद्र मण्डल के चांसलर ने घोषणा की कि राजाओं का अभिप्राय भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तन के तहत भारत के भविष्य के लिये आवश्यक व्यवस्था हेतु किये गये ऐसे किसी फैसले को मानने से मना करने का नहीं है जिसे हम भारत के व्यापक हित में युक्तियुक्त समझें। स्थायी समिति ने अपने त्यागपत्र भी वापस ले लिये।

    जुलाई 1945 में लेबर पार्टी ने ब्रिटेन में सरकार बनायी। मि. क्लेमेंट एटली इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री बने। भारतीय स्वाधीनता के कट्टर शत्रु और भारत विरोधियों को उकसाने वाले एल. एस. एमरी को भारत कार्यालय से हटा दिया गया। उनका स्थान लॉर्ड पैथिक लारेन्स ने लिया। क्लेमेंट एटली भारतीय स्वतंत्रता के उत्साही समर्थक तो नहीं थे किंतु वह महान यथार्थवादी थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि चकनाचूर हुआ ब्रिटेन, भारत में रक्षक सेना का उत्तरदायित्व नहीं उठा सकेगा। नये मंत्रिमंडल से सलाह करके वायसराय ने 19 सितम्बर 1945 को घोषणा की कि सम्राट की सरकार भारत को शीघ्र स्वशासन सौंपने के लिये एक संविधान परिषद का निर्माण करेगी ताकि भारतीय अपना संविधान खुद बना सकें। सर्दी में देश में चुनाव कराये जायेंगे ताकि संविधान परिषद बन सके। राज्यों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श करके निश्चित किया जायेगा कि किस प्रकार से वे संविधान निर्मात्री निकाय में सर्वोत्तम विधि से भाग ले सकते हैं। कांग्रेस ने जोर दिया कि संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वे प्रतिनिधि ही कर सकते हैं जिनका निर्वाचन व्यापक स्तर पर हुए चुनावों में हुआ हो। इस घोषणा से राजाओं को भय हुआ कि ब्रिटिश सरकार राज्यों के सम्बन्ध में भी परमोच्चता को स्थानांतरित कर सकती है।

    जल-वायु सेनाओं में विद्रोह

    20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक हड़ताल पर चले गये। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गयी। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किये। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक हड़ताल पर चले गये। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गये। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी। उसने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिये उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की। तीन कैबीनेट मंत्री एक नये प्रस्ताव के साथ भारत भेजे गये।

    मंत्रिमण्डल योजना (कैबीनेट मिशन प्लान)

    19 फरवरी 1946 को ब्रिटिश सरकार ने भारत सचिव लार्ड पैथिक लारेन्स, व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर की एक समिति बनाई जिसे कैबिनेट मिशन कहा जाता है। 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री मि. एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि लेबर सरकार ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिये एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है। मुझे आशा है कि ब्रिटिश भारत तथा रियासती भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि भारतीय राज्य अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिये भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।

    इस ऐतिहासिक घोषणा ने राजाओं की भूमिका एवं भारतीय राजनीतिक प्रगति के लिये एक नवीन ध्वनि तथा रेखा निश्चित की। भूतकाल से बिल्कुल उलट, इस बार ब्रिटिश सरकार राजाओं से अपेक्षा कर रही थी कि वे भारत की स्वतंत्रता की प्राप्ति में बाधा न बनें अपितु भागीदारी निभायें। वायसराय के नाम भेजे एक तार में प्रधानमंत्री एटली ने लिखा कि 'लेबर गवर्नमेंट' वायसराय को नजर अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलायेगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।

    सरकार को राजाओं की ओर से आशंका थी कि वे अपनी संप्रभुता की दुहाई देकर एक बार फिर योजना के मार्ग में आ खड़े होंगे। इसलिये उन्होंने राजाओं को पहले ही आश्वासन दे दिया कि सम्राट के साथ उनके सम्बन्धों या उनके साथ की गयी संधियों और समझौतों में दिये गये अधिकारों में उनकी सहमति के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। 12 मार्च 1946 के पत्र में लार्ड वेवेल ने इस आश्वासन को दोहराया। इस पत्र में कहा गया कि बातचीत के अतिरिक्त और किसी आधार पर रियासतों को भारतीय ढांचे में मिलाने की योजना बनाने की कोई इच्छा नहीं है। इस प्रकार सत्ता के संवैधानिक हस्तांतरण के विकास क्रम में अंतिम, गंभीरतम और अपेक्षाकृत अधिक विमलमति युक्त परिणाम देने के लिये सम्राट की सरकार के तीन मंत्रियों का मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया।

    इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिये एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सके। उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे।

    प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड लॉरेंस से पूछा गया कि राज्यों का सहयोग आवश्यक होगा या अनिवार्य? इस पर लॉरेंस ने जवाब दिया कि हमने संवैधानिक संरचना की स्थापना करने वाले तंत्र को बनाने के लिये विचार-विमर्श करने हेतु राज्यों को आमंत्रित करने की योजना बनायी है। यदि मैं आपको रात्रि के भोजन पर आमंत्रित करता हूँ तो आपके लिये वहाँ आना अनिवार्य नहीं है। यह निश्चय किया गया कि मिशन रियासती भारत के निम्नलिखित प्रतिनिधियों से साक्षात्कार करेगा-

    (1.) नरेंद्र मण्डल के चांसलर से।

    (2.) मध्यम आकार की रियासतों के प्रतिनिधि के रूप में पटियाला, बीकानेर तथा नवानगर के शासकों से संयुक्त रूप से।

    (3.) लघु राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में डूंगरपुर तथा बिलासपुर के शासकों से संयुक्त रूप से तथा

    (4.) हैदराबाद के प्रतिनिधि के रूप में नवाब छतारी, त्रावणकोर के प्रतिनिधि सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर एवं जयपुर के प्रतिनिधि मिर्जा इस्माइल से अलग-अलग। इस सुझाव पर कि मिशन को राज्यों की जनता के प्रतिनिधियों से भी साक्षात्कार करना चाहिये, न तो राजनीतिक विभाग ने सहमति दी, न ही नरेंद्र मण्डल के चांसलर सहमत हुए, न ही मिशन ने इस प्रश्न पर जोर दिया।

    भारतीय राजाओं के साथ विचार विमर्श

    2 अप्रेल 1946 को कैबिनेट मिशन तथा वायसराय के साथ साक्षात्कार के दौरान नरेंद्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य अपनी अधिकतम प्रभुसत्ता के साथ अपने अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। वे अपने आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत का कोई हस्तक्षेप नहीं चाहते। उन्होंने सलाह दी कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय राज्यों तथा ब्रिटिश भारत प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो राज्यों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो कि राज्यों से मिलकर बना हो?

    कोई भी भारतीय राजा भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गयी संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जायेगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जायेगा।

    मिशन ने इस स्थिति को शासकों के समक्ष स्पष्ट कर देना आवश्यक समझा किंतु शासकों ने इस पर कोई जोर नहीं दिया न ही इस विषय पर ब्रिटिश भारतीय नेताओं से बात की क्योंकि उन्हें लगता था कि इसके समर्थन में कोई भी सकारात्मक बयान देने से ब्रिटिश भारतीय नेताओं के साथ किसी भी मंच पर होने वाली उनकी बातचीत में शासकों की स्थिति कमजोर हो जायेगी। अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाये रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल संघ के माध्यम से ही हो सकते थे। राज्यों के महासंघ के निर्माण के प्रश्न पर लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि मिशन के लिये यह नया विचार है इसलिये वे इस पर विशद गहराई के साथ विचार नहीं कर सकते। यह सुझाव उन्हें रोचक और अच्छा लगा था इसलिये उन्होंने इस सुझाव को पूरी तरह रद्द नहीं किया। क्रिप्स का मानना था कि इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी।

    नवाब भोपाल ने पूछा कि क्या अंतरिम काल में संधियां बनी रहेंगी? राज्य सचिव ने जवाब दिया कि वे बनी रहेंगी किंतु उनका विचार था कि आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्रों में की गयी संधियां एवं व्यवस्थाएं तथा संचार व्यवस्थाएं आगे तक भी चल सकती हैं तथा बाद में उनका पुनरीक्षण किया जा सकता है। भोपाल नवाब का विचार था कि इस सम्बन्ध में अलग से कोई समझौता नहीं था तथा न ही अलग से ऐसा कोई मुद्दा था इसलिये संधियों को विभाजित नहीं किया जा सकता। क्रिप्स का मानना था कि तकनीकी रूप से कैसी भी स्थिति हो किंतु जिस दिन नयी सरकार को सत्ता का हस्तांतरण किया जाये उससे पहले, वर्तमान आर्थिक व्यवस्थाओं को यकायक भंग हो जाने से बचाने के लिये कुछ न कुछ व्यवस्था की जानी चाहिये। ऐसा व्यवधान राज्यों और ब्रिटिश भारत दोनों के लिये हानिकारक होगा तथा इसे राज्यों के विरुद्ध लीवर के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। यह वार्तालाप मिशन द्वारा जाम साहब की इस प्रार्थना की स्वीकृति के साथ समाप्त हुआ कि जब ब्रिटिश भारत के भविष्य का प्रारूप निर्धारित हो जाये तब राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ एक बार फिर से विचार विमर्श किया जाये।

    छोटे राज्यों के प्रतिनिधि डूंगरपुर एवं बिलासपुर के शासकों के साथ 4 अप्रेल को साक्षात्कार किया गया। 
    डूंगरपुर के शासक ने कहा कि केवल आधा दर्जन राज्य ही ऐसे हैं जो ब्रिटिश भारत के प्रांतों की तुलना के समक्ष खड़े रह सकते हैं इसलिये यह आवश्यक है कि छोटे राज्यों को अपनी प्रभुसत्ता बचाने के लिये क्षेत्रीयता एवं भाषा के आधार पर मिलकर बड़ी इकाई का निर्माण कर लेना चाहिये। छोटे राज्यों को भय है कि बड़े राज्य उन्हें निगल जाना चाहते हैं। छोटे राज्य संतोषजनक गारंटी चाहते हैं। यह सुझाव गलत है कि छोटे राज्यों का कोई भविष्य नहीं है। वे बड़े राज्यों से भी अधिक बलिदान देने को तैयार हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हैदराबाद, कश्मीर तथा मैसूर को छोड़कर शेष राज्यों को 9 क्षेत्रीय इकाईयों में विभक्त किया जाना चाहिये। बिलासपुर के राजा ने कहा कि प्रत्येक राज्य को उसकी पुरानी आजादी पुनः लौटा दी जानी चाहिये तथा उसे अपनी मनमर्जी के अनुसार कार्य करने के लिये छोड़ दिया जाना चाहिये।

    त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी से 9 अप्रेल को साक्षात्कार किया गया। उन्होंने कहा कि परमोच्चसत्ता किसी उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। अंतरिम काल में परमोच्चता का संरक्षण किया जाना चाहिये किंतु यदि कोई विवाद न हो तो राजनीतिक विभाग के तंत्र को पुनरीक्षित किया जाना चाहिये। सर सी. पी. रामास्वामी का विश्वास था कि 601 राज्य भविष्य के भारत में प्रभावी इकाई नहीं हो सकेंगे। छोटे राज्यों को बता दिया जाना चाहिये कि या तो वे स्वयं अपने आप समूह बना लें या फिर उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया जायेगा। हैदराबाद के प्रतिनिधि ने मांग की कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा छीनी गयी सीमाओं को फिर से हैदराबाद को लौटा दिया जाना चाहिये तथा उसे समुद्र तक का स्वतंत्र मार्ग दिया जाना चाहिये।

    जयपुर के दीवान मिर्जा इस्माइल ने अपने साक्षात्कार का बड़ा भाग इस विषय पर खर्च किया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के भेद कैसे दूर हो सकते हैं! उन्होंने जोर दिया कि भारतीय शासक परिवारों को बनाये रखना चाहिये क्योंकि वे भारत की संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा हैं। ब्रिटिश सरकार को भारत की समस्त समस्याओं को सुलझाये बिना ही भारत छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार राज्यों के प्रतिनिधियों से वार्त्ता के उपरांत यह बात सामने आयी कि परमोच्चसत्ता उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित न करके उसे समाप्त किया जाये। राज्यों पर संघ अथवा संघों में से किसी एक में मिलने के लिये दबाव नहीं डाला जाये। राज्यों के शासक चाहें तो राज्यों का महासंघ बनाये जाने पर कोई आपत्ति नहीं की जानी चाहिये। राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये।

    संधियों एवं परमोच्चता पर स्मरण पत्र

    कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से बात की तथा उनके द्वारा सुझाये गये बिंदुओं पर विचार करने के लिये ने 9 मई 1946 को भोपाल नवाब को फिर से बुलाया। नवाब ने असंतोष व्यक्त किया कि अन्य दलों के सुझावों पर बात करने के लिये तो उन्हें बुलाया गया है किंतु राज्यों ने जो सुझाव दिये थे उन पर विचार नहीं किया गया है। इस पर मिशन ने नवाब की शंकाओं का समाधान किया। मिशन ने राज्यों के सम्बन्ध में अपनी नीति स्पष्ट करते हुए 12 मई 1946 को भोपाल नवाब को एक स्मरणपत्र- 'संधियां एवं परमोच्चता' दिया। यद्यपि समाचार पत्रों में इसका प्रकाशन 22 मई को करवाया गया किंतु इसे '12 मई 1946 का स्मरण पत्र' कहा जाता है।

    इसमें कहा गया कि नरेंद्र मंडल ने पुष्टि कर दी है कि भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति की अभिलाषा में भारतीय रियासतें देश के साथ हैं। परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा नयी बनने वाली सरकार या सरकारों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। सम्राट के साथ अपने सम्बन्धों द्वारा रियासतों ने जो अधिकार प्राप्त कर रखे हैं वे आगे नहीं रहेंगे तथा रियासतों ने सम्राट को जो अधिकार सौंप रखे हैं वे उन्हें वापस मिल जायेंगे। भारत से ब्रिटिश सत्ता के हट जाने पर जो रिक्तता होगी उसकी पूर्ति रियासतों को नये सम्बन्ध जोड़कर करनी होगी। भारतीय व्यवस्था में पारस्परिक समझौते के अतिरिक्त किसी भी बुनियाद पर रियासतों के प्रवेश का प्रावधान किये जाने का मंतव्य नहीं है। भारतीय रियासतें उपयुक्त मामलों में बड़ी प्रशासनिक इकाईयां बनाने या उनमें शामिल होने की इच्छा रखती हैं ताकि संवैधानिक योजना में वे उपयुक्त बन सकें और आंग्ल भारत के साथ बातचीत कर सकें। राजा लोग यह जानकर प्रसन्न हुए कि परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा किसी अन्य सत्ता को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। समस्त अधिकार राज्यों को मिल जायेंगे किंतु वे इस प्रस्ताव की प्रशंसा नहीं कर सके क्योंकि परमोच्चता की समाप्ति के बाद राज्यों को अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर ही निर्भर रहना था। लोकतांत्रिक पद्धति से निर्मित शक्तिशाली भारत सरकार उनके व्यक्तिगत शासन को बनाये रखने में क्यों रुचि लेगी? कांग्रेस ने इस स्मरण पत्र तथा उसके प्रभावों पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

    संयुक्त भारत योजना

    मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रकाशित की। इसे कैबीनेट मिशन प्लान तथा संयुक्त भारत योजना भी कहते हैं। इसके द्वारा संघीय संविधान (Federal Constitution) का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भारत संघ की व्यवस्था जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे गये थे। प्रस्तावित संघ में ब्रिटिश भारत के 11 प्रांत और समस्त देशी रियासतें शामिल होंगी। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होगा। शेष समस्त विषय और अधिकार रियासतों के पास ही रहेंगे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होगी जो बातचीत के द्वारा तय की जायेगी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जायेगा। शेष समस्त विषयों पर राज्यों का अधिकार होगा।

    योजना में प्रांतों को 'ए', 'बी' और 'सी' श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहली श्रेणी में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्यप्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, व बिहार थे। दूसरी श्रेणी में पंजाब, सिंध बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरी श्रेणी में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था। ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिये संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गयी व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया।

    राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश भारत के ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अंतर्गत अथवा उससे बाहर स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जायेंगे। ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिये जायेंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिये कि वे अपने भविष्य की स्थिति में उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि एक सत्तात्मक भारत बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जायेंगे। मिशन ने कहा कि शासकों ने भारत 
    में होने वाले नवीन संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान अपना पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया है किंतु यह सहयोग नवीन संवैधानिक ढांचे के निर्माण के दौरान समझौता वार्त्ता (Negotiation) के द्वारा ही प्राप्त हो सकेगा तथा यह समस्त राज्यों के मामले में एक जैसा नहीं होगा। प्रारंभिक अवस्था में संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वार्त्ता समिति (Negotiation Committee) द्वारा किया जायेगा। विचार-विमर्श के अंतिम चरण में राज्यों के वास्तविक प्रतिनिधि भाग लेंगे जिनकी संख्या 93 से अधिक नहीं होगी। राज्यों के प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया सम्बद्ध पक्षों के आपसी विचार-विमर्श से निश्चित की जायेगी। परमोच्च सत्ता की समाप्ति के बाद रियासतों को पूर्ण अधिकार होगा कि वे अपना भविष्य निश्चत करें परंतु उनसे यह आशा की जाती है कि वे संघीय सरकार के साथ कुछ समझौता अवश्य कर लेंगी।

    17 मई को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने स्वीकार किया कि राज्यों के साथ महामना सम्राट की सरकार के सम्बन्ध, ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ सम्बन्धों से नितांत भिन्न थे। उन्होंने योजना के प्रस्तावों के बाहर जाने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्यों के प्रति सख्त रवैया अपनाने से न तो राज्यों की जनता का भला होगा और न ही ब्रिटिश प्रांतों की जनता का। उन्होंने कहा कि अंतरिम काल में राज्यों के साथ ब्रिटिश सम्बन्ध वैसे ही बने रहेंगे जैसे कि वे वर्तमान में हैं।

    भोपाल नवाब की आपत्ति

    17 मई 1946 को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वेवेल को एक पत्र लिखकर कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा कि रक्षा मामलों में, प्रस्तावित संघीय सरकार एवं संविधान के अधिकार का प्रावधान, राज्यों की अपनी सशस्त्र सेनाओं को तो प्रभावित नहीं करेगा? वित्त के मामले में भी संघ का अधिकार केवल उन्हीं राजस्व स्रोतों तक सीमित होना चाहिये जिन पर सहमति बनती है। किसी अन्य माध्यम से कर उगाहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। संचार के सम्बन्ध में वर्तमान में राज्यों को प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिये। संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व का तरीका राज्यों की सरकारों या समूहों के अधीन होना चाहये। संविधान सभा में सांप्रदायिकता का बड़ा प्रकरण, सभा में राज्यों के प्रतिनिधियों की बहुसंख्य उपस्थिति के दौरान मतदान से निर्धारित किया जाना चाहिये। नवाब ने मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिये कह सकेंगे। संविधान निर्मात्री निकाय को यह अधिकार नहीं होना चाहिये कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान निर्मात्री निकाय में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

    29 मई को लॉर्ड वेवेल ने एक पत्र भोपाल नवाब को भिजवाया जिसमें उन्होंने कहा कि नवाब द्वारा उठायी गयी अधिकतर बातें संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों और ब्रिटिश भारत के सदस्यों के मध्य होने वाले विचार-विमर्श (Negotiation) के मुद्दे हैं। नवाब का यह तर्क काफी वजन रखता है कि संविधान सभा में प्रतिनिधि का चुनाव केवल शासकों के विवेकाधीन होना चाहिये किंतु मिशन का उद्देश्य ब्रिटिश भारत और रियासती भारत के मध्य स्वतंत्र सहलग्नता को बढ़ावा देने का है। नवाब को वेवेल का पत्र निराश करने वाला प्रतीत हुआ। उन्होंने 2 जून 1946 को फिर से वायसराय को पत्र लिखा- राज्यों को यह अधिकार है कि वे इस बात की मांग करें कि ब्रिटिश ताज राज्यों को ब्रिटिश भारत की दया पर न छोड़ दे, कम से कम राज्यों को संविधान सभा या संघीय संविधान में खराब स्थिति में तो न छोड़ें। नवाब विशेषतः इस मुद्दे पर परेशान थे कि कम से कम संघीय संविधान सभा में राज्यों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को सांप्रदायिक मुद्दों के समकक्ष रखा जाये तथा संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधि का चुनाव पूर्णतः राज्यों पर छोड़ा जाये।

    नवाब ने विश्वास व्यक्त किया कि सम्राट की सरकार की यह इच्छा तो कभी नहीं रही होगी कि राज्यों को उनकी वैधानिक एवं उचित मांगों तथा प्रभुसत्ता पूर्ण निकायों के रूप में उनके स्थापित और स्वीकृत अधिकारों को संरक्षित करने के लिये ताज की तरफ से कोई प्रयास किये बिना लावारिस बालक की भांति छोड़ दिया जाये। उन्होंने वायसराय से अपील की कि अपने उन मित्रों के विरुद्ध पक्ष न बनें जिन मित्रों ने अच्छे और बुरे समय में आपका साथ निभाया है तथा जो अपने शब्दों एवं आश्वासनों के प्रति वफादार रहे हैं। 4 जून 1946 को वायसराय ने नवाब के पत्र का जवाब दिया तथा शासकों की ओर से प्रकट की गयी उनकी चिंता की प्रशंसा की तथा लिखा कि नवाब राजनीतिक सलाहकार कोरफील्ड से इस पृष्ठभूमि पर किये गये विचार विमर्श के उपरांत दूसरा दृष्टिकोण अपना सकते थे। ये बातें बम्बई में होने वाली स्थायी समिति की बैठक में रखनी चाहिये।

    कोनार्ड कोरफील्ड द्वारा शासकों को सलाह

    8 जून 1946 को बम्बई में आयोजित नरेंद्र मण्डल की संवैधानिक सलाहकार समिति, 9 जून को आयोजित रियासती मंत्रियों की समिति तथा 10 जून को नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में कोनार्ड कोरफील्ड ने कहा कि अंतरिम काल के पश्चात् परमोच्चता की समाप्ति का निर्णय राज्यों को भविष्य की संवैधानिक संरचना में समुचित स्थान दिलाने हेतु मोलभाव करने के लिये सर्वाधिक संभव अच्छी स्थिति में रख देगा। उन्होंने राज्यों को सलाह दी कि वे एक संविधान वार्त्ता समिति (Constitutional Negotiating Commiittee) का निर्माण करें जो संविधान सभा में किये जाने वाले विचार-विमर्श के लिये शर्तें तय करे। उन्होंने राज्यों को आश्वस्त किया कि परमोच्चता की समाप्ति के बाद के अंतरिम काल में राजनीतिक विभाग, राज्यों के हितों की सुरक्षा करने, संविधान सभा में विचार-विमर्श करने, समूहीकरण एवं सहबद्धता की व्यवहारिक योजनाएं बनाने, प्रत्येक राज्य की व्यक्तिगत संधियों के पुनरीक्षण करने, उनके आर्थिक हितों को सुरक्षित बनाने तथा अल्पसंख्यकों के प्रशासन हेतु की जानी वाली व्यवस्थाओं में राज्यों की सहायता करेगा। यदि शासक राज्यों की जनता से व्यक्तिगत संपर्क रखेंगे तो उन्हें आंतरिक समर्थन प्राप्त होगा।

    स्थायी समिति का प्रस्ताव

    कोरफील्ड द्वारा सुझाये गये बिंदुओं ने नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति द्वारा 10 जून 1946 को पारित किये गये प्रस्ताव के लिये प्रचुर सामग्री प्रदान की। इस प्रस्ताव में कहा गया कि कैबीनेट मिशन योजना ने भारत की स्वतंत्रता के लिये आवश्यक तंत्र प्रदान किया है तथा भविष्य में होने वाले विचार-विमर्श के लिये भी समुचित आधार प्रदान किया है। इस प्रस्ताव में मिशन द्वारा परमोच्चता के सम्बन्ध में की गयी घोषणा का भी स्वागत किया गया किंतु अंतरिम काल में की जाने वाली व्यवस्थाओं के लिये आवश्यक समायोजनों की आवश्यकता भी जताईं प्रस्ताव में कहा गया कि कैबीनेट योजना में उल्लेख किये गये आधारभूत महत्त्व के अनेक मामलों की व्याख्या की जानी आवश्यक है जिन्हें कि भविष्य के विचार-विमर्श के लिये छोड़ दिया गया है। नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति ने कोरफील्ड की सलाह पर एक समझौता समिति (Negotiating Commiittee) का निर्माण किया तथा चांसलर को अधिकृत किया कि वह कैबिनेट योजना में सुझाये गये प्रावधान के अनुसार संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय समिति से विचार विमर्श करे।

    समझौता समिति के गठन पर प्रजा परिषद की आपत्ति

    अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद ने नरेंद्र मण्डल के चांसलर के अधिकारों को चुनौती दी। परिषद पूर्व में ही 21-23 अक्टूबर 1945 को जयपुर में आयोजित बैठक में मांग कर चुकी थी कि संभावित भारतीय संविधान निर्मात्री समिति में राज्यों के प्रतिनिधियों को जनता द्वारा चुनकर भेजा जाना चाहिये। परिषद का यह भी कहना था कि नरेंद्र मंडल को देशी राज्यों का अधिवक्ता कैसे माना जा सकता है जबकि देश की सात बड़ी रियासतें- हैदराबाद, कश्मीर, बड़ौदा, मैसूर, ट्रावनकोर, कोचीन और इन्दौर नरेंद्र मण्डल की सदस्य कभी नहीं रहीं। कैबीनेट योजना के अंतर्गत इन सात राज्यों को जनसंख्या के आधार पर संविधान निर्मात्री सभा में 40 प्रतिशत से भी अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार था। वार्त्ता समिति में जनता के प्रतिनिधियों को सम्मिलित नहीं किया गया था। अतः समिति को किसी प्रकार का निर्णय लेने का वैध अधिकार नहीं है।

    कांग्रेस द्वारा कैबीनेट मिशन को स्वीकृति

    ब्रिटिश भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता व अखंडता के लिये अत्यधिक घातक व खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी। इस घोषणा ने देशी शासकों को अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है। देश को ए, बी एवं सी क्षेत्रों में बांटकर मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गयी सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है। कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिये उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिये निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा। इस प्रकार कांग्रेस ने कई आपत्तियां उठाईं और कई बातों पर स्पष्टीकरण चाहा। उसकी मांग यह भी थी कि प्रतिनिधि चाहे प्रांतों के हों अथवा रियासतों के, विधान सभा के लिये एक जैसी चुनाव प्रक्रिया होनी चाहिये।

    कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि दुःख दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे। स्वयं कैबीनेट मिशन ने इस योजना के बारे में घोषणा की थी कि यह भारतीयों को शीघ्रातिशीघ्र आजादी देने का एक मार्ग है जिसमें आंतरिक उपद्रव एवं झगड़े की संभावनायें न्यूनतम हैं। 6-7 जुलाई 1946 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में नेहरू ने कैबीनेट योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा जो 51 के मुकाबले 205 मतों से स्वीकृत हो गया। नेहरू को विश्वास था कि प्रांतों का कोई समूह बनेगा ही नहीं। क्योंकि संविभाग ए के समस्त और बी तथा सी के कुछ राज्य समूहीकरण के विरुद्ध रहेंगे।

    नरेन्द्र मण्डल का ऐतिहासिक प्रस्ताव

    17 जुलाई 1946 को आयोजित नरेंद्र मण्डल के सम्मेलन में ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें घोषणा की गयी कि नरेंद्र मण्डल देश की इस इच्छा से पूर्ण सहमति रखता है कि भारत को तत्काल राजनीतिक महिमा प्राप्त हो। राजाओं की इच्छा संवैधानिक समास्यों के निस्तारण के कार्य में प्रत्येक संभावित योगदान देने की है। ब्रिटिश सरकार पहले ही यह कह चुकी थी कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्रता चाहता है तो उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं आयेगी। अब राजाओं ने भी घोषणा कर दी कि वे भी बाधा नहीं बनना चाहते तथा किसी भी आवश्यक परिवर्तन के लिये दी गयी उनकी सहमति अनावश्यक रूप से वापस नहीं ली जायेगी।

    बीकानेर महाराजा द्वारा कैबीनेट योजना के प्रस्तावों का स्वागत

    बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने कैबीनेट मिशन की घोषणा को भारत की स्वतंत्रता के लिये सबसे महान कदम बताते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत में राजाओं को अपने पद की चिंता नहीं करनी चाहिये। उन्हें परिवर्तन का महत्त्व अनुभव करना चाहिये और उसी के अनुसार अपने को ढालना चाहिये। 27 जुलाई 1946 को बीकानेर नरेश ने एक बार फिर कहा कि 16 मई की योजना, जिसमें रियासतों और प्रांतों दोनों को मिलाकर संघ बनाने का प्रस्ताव है, की स्वीकृति भारत की स्वतंत्रता के लिये उठाया गया सबसे महान कदम है। मैंने यह सदा अनुभव किया है कि यदि राजा और रियासतें इस समय भारत में होने वाले परिवर्तनों की महत्ता को पूरी तरह ध्यान में रखें और अपने मन और नीति को उसके अनुसार बनायें तो स्वतंत्र भारत में अपने उपयुक्त स्थान के बारे में उन्हें कोई डर नहीं होना चाहिये। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिये कि जो कुछ हो रहा है, वह बहुत गम्भीर है। करणीसिंह ने देशी राज्यों द्वारा इस योजना को स्वीकार कर लिये जाने का श्रेय बीकानेर महाराजा सादूलसिंह को दिया है। रियासतों ने सर्वसम्मति से योजना को स्वीकार कर लिया लेकिन इसमें आंतरिक कठिनाइयां थीं। महाराजा सादूलसिंह के प्रयत्नों के फलस्वरूप ही ये कठिनाइयां दूर हुई और एक सर्व-सम्मत निर्णय हो सका। यह नहीं सोचना चाहिये कि यह निर्णय बिना किसी आंतरिक कठिनाई के लिया गया। राजाओं और मन्त्रियों का एक ऐसा प्रभावशाली समूह था जो भारतीय संघ के प्रश्न को इसी रूप में नहीं देखता था। उसका विचार भारतीय रियासतों का अलग संघ बनाने का था। यह भारत का तीसरा विभाजन होता। इससे हिन्दुस्तान के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और वह कमजोर तथा असमर्थ होता। इस खतरनाक विचार को महाराजा सादूलसिंह और उनके मित्रों की दृढ़ता ने आरंभ में ही खत्म कर दिया।

    कैबीनेट मिशन की मौत

    कैबीनेट मिशन योजना में एक अंतरिम सरकार के गठन का भी प्रस्ताव किया गया था। वायसराय को छोड़कर शेष समस्त पदों को भारतीयों से भरा जाना था। जातीय-दलीय कोटे से 14 सदस्यों की सम्मिलित सरकार बननी थी जिसमें कांग्रेस के 5 सवर्ण हिंदू सदस्य, मुस्लिम लीग के 5 सदस्य, परिगणित हिंदू जाति का 1 सदस्य और अन्यान्य अल्पसंख्यकों के 3 सदस्य होने थे। गांधीजी ने कांग्रेस के 5 सदस्यों में 1 राष्ट्रवादी मुसलमान को शामिल करने पर जोर दिया। इस पर जिन्ना पूर्व की भांति फिर अड़ गये कि कि मुस्लिम लीग ही एकमात्र संस्था है जो मुसलमानों का नेतृत्व कर सकती है। कांग्रेस को इसका अधिकार नहीं। जिन्ना के इस दावे के सामने वायसराय वेवेल, कैबिनेट मिशन तथा कांग्रेस ने आत्मसमर्पण कर दिया।

    10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा कि कांग्रेस पर समझौतों का कोई बंधन नहीं है और वह हर स्थिति का सामना करने के लिये उसी तरह तैयार है जैसे कि अब तक करती आयी है। मुस्लिम लीग ने नेहरू के वक्तव्य का अर्थ यह लगाया कि एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद कांग्रेस इस योजना में संशोधन कर देगी। अतः जिन्ना ने 27 जुलाई को ही मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई और कैबीनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति रद्द करके पाकिस्तान प्राप्त करने के लिये सीधी कार्यवाही की घोषणा कर दी। इस घोषणा में कहा गया कि आज से हम वैधानिक तरीकों से अलग होते हैं। मुस्लिम लीग के साथ-साथ अन्य राजनीतिक तत्वों ने भी इस योजना को अस्वीकार कर दिया। नेहरू की घोषणा पर मौलाना अबुल कलाम आजाद ने टिप्पणी की कि 1946 की गलती बड़ी महंगी साबित हुई।

    मंत्रिमण्डल योजना में राज्यों की जनता का उल्लेख नहीं किया गया था, उसमें केवल नरेशों को प्रधानता दी गयी थी। जयनारायण व्यास ने इसका विरोध किया और दिल्ली में एक विराट सम्मेलन का आयोजन कर ऐसा वातावरण पैदा कर दिया कि नेहरू और पटेल को भी उसमें उपस्थित होकर आश्वासन देना पड़ा कि ऐसी कोई योजना स्वीकार नहीं की जायेगी जिसमें देशी राज्यों की जनता की उपेक्षा हो। अंत में गांधी के यह विश्वास दिलाने पर कि देशी राज्यों की जनता के हितों की उपेक्षा नहीं की जायेगी, व्यास चुप हुए।

    इस प्रकार चारों ओर कैबीनेट मिशन योजना के विरुद्ध घनघोर वातावरण बन गया तथापि कांग्रेस इस बात पर सहमत थी कि कैबीनेट योजना के तहत देश में एक अंतरिम सरकार का तत्काल गठन किया जाना चाहिये। 29 जून 1946 को कैबीनेट मिशन इस आशा के साथ भारत छोड़ चुका था कि और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान सभा का गठन तो होगा ही। क्रिप्स तथा पैथिक लारेंस ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि मिशन अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा। 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना यद्यपि एक अभिशंषा के रूप में प्रस्तुत की गयी थी किंतु फिर भी यह किसी पंचनिर्णय (Award) से कम नहीं थी क्योंकि मिशन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य सहमति के निर्माण में असफल रहा था। कैबिनेट मिशन योजना और उसके अनंतर गतिविधियों के सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं होगा कि क्रिप्स मिशन की ही भांति मौत कैबीनेट मिशन की भी लिखी थी। 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही दिवस मनाया जिसके कारण कलकत्ता में हजारों हिन्दुओं की जानें गयीं।

    अंतरिम सरकार का गठन

    वायसराय चाहता था कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों दलों के सहमत होने पर अंतरिम सरकार का गठन हो किंतु मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हाने के लिये सहमत नहीं हुई। अगस्त 1946 के अंत में र्पंधानमंत्री एटली ने वायसराय लॉर्ड वेवेल को व्यक्तिगत तार भेजकर निर्देशित किया कि मुस्लिम लीग के बिना ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाये। वेवेल ने कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुसार 2 सितम्बर 1946 को दिल्ली में अंतरिम सरकार का गठन किया। इसमें केवल कांग्रेसी नेता शामिल हुए। इसलिये पाँच पद स्थानापन्न रखे गये जो कि मुस्लिम लीग के लिये थे। 15 अक्टूबर 1946 को मुस्लिम लीग भी अंतरिम सरकार में शामिल हो गयी।

    विधान निर्मात्री सभा का गठन

    कैबीनेट मिशन योजना के प्रस्तावों के तहत कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने संविधान निर्मात्री सभा में भाग लेने पर अपनी सहमति दी थी किंतु बाद में कुछ बिंदुओं की व्याख्या पर दोनों दलों में विवाद हो गया तथा मुस्लिम लीग ने अपनी सहमति वापिस ले ली। जुलाई 1946 में संविधान निर्मात्री समिति के सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस के 212 सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम लीग के मात्र 73 सदस्य ही हो पाये। इसलिये मुस्लिम लीग संविधान सभा के जाल में फंसना नहीं चाहती थी। मुस्लिम लीग ने अपने आप को इससे अलग कर लिया। गांधीजी की टिप्पणी थी कि हो सकता है कि केवल कांग्रेस प्रांत और देशी नरेश ही इसमें सम्मिलित हों। मेरे विचार से यह शोभनीय और पूर्णतः तथ्यसंगत होगा। 9 दिसम्बर 1946 को तनाव, निराशा एवं अनिश्चितता के वातावरण में विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    21 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा ने नरेंद्र मण्डल द्वारा गठित राज्य संविधान वार्त्ता समिति से वार्त्ता करने के लिये संविधान वार्त्ता समिति नियुक्त की। इसके प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे खेद है कि हमें राजाओं की समिति से वार्त्ता करनी पड़ेगी। मैं सोचता हूँ कि राज्यों की तरफ से हमें राज्यों के लोगों से बात करनी चाहिये थी। मैं अब भी यह सोचता हूँ कि यदि वार्त्ता समिति सही कार्य करना चाहती है तो उसे समिति में ऐसे प्रतिनिधि सम्मिलित करने चाहिये किंतु मैं अनुभव करता हूँ कि इस स्तर पर आकर हम इसके लिये जोर नहीं डाल सकते।

    इस प्रकार 1940 से लेकर 1946 तक के काल में राजपूताना के राज्यों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये अपने राज्य के संसधान ब्रिटिश सरकार को सौंपकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन किया किंतु संघ के निर्माण की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत क्रिप्स प्रस्ताव तथा कैबिनेट मिशन प्रस्ताव में रुचि का प्रदर्शन नहीं किया। जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर के प्रतिनिधि नरेंद्र मण्डल के माध्यम से क्रिप्स एवं कैबीनेट मिशन के साथ हुई वार्ताओं में भाग लिया किंतु उदयपुर लगभग अनुपस्थित दिखायी दिया। जयपुर एवं जोधपुर राज्य ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों एवं पुलिस अधिकारियों के माध्यम से प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में थे तो उदयपुर राज्य भी ब्रिटिश साम्राज्य के हाथों की कठपुतली बना रहा।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 46

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 46

    पाकिस्तान का पानी खतरे में


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अविभाजित भारत में हुई 1941 की जनगणना रिपोर्ट में कहा गया था कि सिंधु नदी जल प्रणाली पर 4.60 करोड़ जनसंख्या निर्भर करती है। रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हुए विभाजन के बाद इसमें से 2.50 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान में चली गई तथा 2.10 करोड़ जनसंख्या भारत में रह गई। ...... इस विभाजन के बाद सतलज, रावी और व्यास नदियों से निकलने वाली नहरों के हैडवर्क्स तथा इन नदियों से निकलने वाली 25 में से 20 नहरें भारत में रहीं। एक नहर भारत और पाकिस्तान दोनों के क्षेत्रों में बहती है। भारत चाहता तो पाकिस्तान को जाने वाली समस्त नहरों का पानी रोक सकता था किंतु भारत ने ऐसा नहीं किया। 20 दिसम्बर 1947 को पाकिस्तान एवं भारत के अभियंताओं के बीच इन नहरों के सम्बन्ध में एक यथास्थिति समझौता हुआ जिसकी अवधि 31 मार्च 1948 को समाप्त होनी थी। इसके बाद नया समझौता किया जाना था किंतु वह नहीं हुआ।

    जिस दिन समझौता समाप्त हुआ, भारत ने उसी दिन दो महत्वपूर्ण नहरों में पानी की आपूर्ति बंद कर दी और एक नया स्थाई समझौता किए जाने की मांग की। पानी की आपूर्ति पुनः एक माह बाद आरम्भ हुई जब दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति हुई कि पाकिस्तान को दूसरे विकल्प का समय दिए बिना पानी की आपूर्ति बंद नहीं की जाएगी। भारत के नेता इसे एक तकनीकी समस्या मानते थे किंतु पाकिस्तान के नेताओं ने इसे पाकिस्तान की कृषि बर्बाद करने की भारतीय साजिश माना। भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार पुनः यथास्थिति बनाए रखने का अस्थाई समझौता हो गया किंतु स्थाई समझौता होना आवश्यक था। इसलिए विश्व बैंक के अध्यक्ष की मध्यस्थता स्वीकार की गई।

    विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने इस समस्या के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया जिसमें भारत, पाकिस्तान एवं विश्वबैंक के अभियंता सम्मिलित किए गए। इस समिति ने 5 जून 1954 को भारत एवं पाकिस्तान को निम्नलिखित सुझाव दिए-

    (1) सिंधु, झेलम और चिनाव के सारे जल का उपयोग पाकिस्तान को करने दिया जाए तथा झेलम नदी के उस जल को जो काश्मीर में उपयोग में लाया जाता है, उसे भारत को उपयोग में लेने दिया जाए।

    (2) सतलज, रावी और व्यास का समस्त जल भारत को उपयोग में लेने दिया जाए। उसमें से कुछ जल भारत 5 वर्ष तक पाकिस्तान को दे।

    (3) प्रत्येक देश अपनी भूमि में बांध इत्यादि बनाएगा परंतु योजक नहरों का खर्च भारत उस सीमा तक सहन करेगा, जहाँ तक उसका लाभ भारत को मिलेगा। यह खर्च 40 से 60 लाख के बीच आता है।

    (4) विश्व-बैंक की समिति के अनुसार भारत को अपनी 2 लाख एकड़ भूमि के लिए सिंधु नदी जलक्षेत्र का 20 प्रतिशत जल मिलना था।

    पाकिस्तान को अपनी 4 लाख एकड़ भूमि के लिए 80 प्रतिशत जल मिलना था। इस समिति की सिफारिशों को मानने से भारत को बहुत हानि होने वाली थी तथा पाकिस्तान को बहुत लाभ होने वाला था क्योंकि योजक नहरों का निर्माण भारत को करना था और उसे केवल 20 प्रतिशत जल मिलना था साथ ही भारत को चिनाव नदी के जल से सदा के लिए वंचित कर दिया गया था। इसके बावजूद भारत ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया जबकि पाकिस्तान ने बहुत सारी ना-नुकर एवं शर्तों के साथ 5 अगस्त 1954 को इन प्रस्तावों को स्वीकार किया।

    विश्व-बैंक समिति द्वारा प्रस्तावित इस समझौते को स्वीकार करने के बाद पाकिस्तान ने भारत में सतलुज नदी पर बन रहे भाखड़ा बांध पर आपत्ति खड़ी कर दी एवं विश्व-बैंक से भारत द्वारा समझौते के उल्लंघन की शिकायत की। विश्व-बैंक ने इस शिकायत की जांच की तो पाया कि इस बांध की योजना ई.1920 में बनी थी तथा ई.1946 से इस बांध पर काम चल रहा था। ई.1952 में गठित विश्व-बैंक समिति को भी इस बांध के बारे में बताया गया था तथा इसका निर्माण समझौते के अंतर्गत ही हो रहा है। ई.1957 में जब सुहरावर्दी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री था, उसने नहरों के जल-बंटवारे को लेकर एक बार फिर से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

    1 जून 1957 को सुहरावर्दी ने एसोसिएटेड प्रेस को दिए गए साक्षात्कार में कहा- 'हम पर भारत की पकड़ के दो शिकंजे नहरी जल एवं काश्मीर हैं। ...... भारत ने बांध बना लिए हैं तथा सतलुज एवं दो अन्य नदियों जो पाकिस्तान के पश्चिमी भाग में सिंचाई हेतु जल की आपूर्ति करती हैं, को काट देने का भारत का इरादा है। ऐसा करने के लिए वे अगले वर्ष तैयार रहेंगे। काश्मीर से निकलने वाली तीन नदियों के जल को भी वे नियंत्रित कर सकते हैं। भारत दावा करता है कि उसे राजस्थान के रेगिस्तान को सिंचित करने के लिए पानी चाहिए। वे पाकिस्तान से कहते हैं कि जल में आने वाली कमी की पूर्ति काश्मीर से निकलने वाली तीनों नदियों के पानी की आवक से कर लें। इसके लिए खर्चीले बांधों एवं नहरों की आवश्यकता होगी, परन्तु मैं नहीं सोचता कि इस योजना के लिए वे हमें कुछ भी चुकाने का सच्चा इरादा रखते हैं।'

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री सुहरावर्दी बड़ी बेशर्मी के साथ भारत से निकलने वाली नदियों के पानी को पाकिस्तान में काम लेने के लिए, न केवल भारत में बनने वाली योजक नहरों एवं बांधों के लिए पैसा मांग रहा था अपितु बड़ी बेशर्मी और ढिठाई के साथ उसे पाकिस्तान में बनने वाले बांधों एवं नहरों के लिए भी भारत से पैसा चाहिए था। इस पर टिप्पणी करते हुए भारतीय सिंचाई मंत्री एस. के. पाटिल ने एक वक्तव्य दिया- 'सुहरावर्दी ने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है कि वे नहरी जल-विवाद के बारे में सभी तथ्य एवं सत्य को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करेंगे।'

    30 अक्टूबर 1958 को कराची में एक समाचारपत्र सम्मेलन में पाकिस्तान के नए सैनिक शासक जनरल अयूब खाँ ने काश्मीर एवं नहरी जल मसलों पर भारत के साथ युद्ध छेड़ने की धमकी दी। उसने यह भी कहा कि- 'पाकिस्तान की जल समस्या के निपटारे के लिए बनी परियोजनाओं को पूरा होने के लिए 10 से 15 वर्ष लगेंगे। अतः इस अवधि में भारत को उसे जल देना चाहिए तथा इन योजनाओं का व्यय भी वहन करना चाहिए। पानी की जो मात्रा हमें अब तक मिलती रही है, वह मिलती रहनी चाहिए अन्यथा हमारी भूमि बंजर हो जाएगी। हमारे पास जो भी संभव है, उसके लिए अन्य रास्ता अपनाने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं रहेगा।'

    बेशर्मी के मामले में पाकिस्तानी सैनिक शासक अयूब खाँ प्रधानमंत्री सुहरावर्दी से भी मीलों आगे निकल गया था। वह न केवल पाकिस्तान में बनने वाली नहरों एवं बांधों के लिए भारत से धनराशि मांग रहा था अपितु उसके लिए युद्ध छेड़ने की धमकी भी दे रहा था। यह तो पिण्डारियों की भाषा थी जिन्हें ई.1818 में अंग्रेजों ने कुचलकर पूरे भारत से मिटा दिया था। लगता था अब वही भाषा एक बार फिर से, पाकिस्तान में प्रकट हो रही थी।

    भारत के अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बनाए गए दबाव के बाद 17 अप्रेल 1959 को वाशिंगटन में नहरी जल के सम्बन्ध में एक नए अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। 6 एवं 7 मई 1959 को भारतीय संसद में इस समझौते की जानकारी देते हुए भारत के सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्री एम. एम. इब्राहीम ने कहा कि दोनों देशों की सरकारों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया है तथा यह विश्वास दिलाया है कि इस समझौते से राजस्थान नहर का कार्य प्रभावित नहीं होगा। 19 सितम्बर 1960 को कराची में जनरल अयूब एवं भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मध्य सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

    1. भारत को तीन पूर्वी नदियों- सतलुज, रावी और व्यास के पानी का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार होगा।

    2. पाकिस्तान को पश्चिम की तीन नदियों- झेलम, चिनाव एवं सिन्धु के पानी के पूर्ण प्रयोग का अधिकार होगा।

    3. विश्व बैंक और 6 मित्र राष्ट्र अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और पश्चिमी जर्मनी, भारत एवं पाकिस्तान दोनों के योजक नहरों के निर्माण हेतु 1977 तक धन देंगे। तब तक के लिए भारत पाकिस्तान को यथावत् पानी देना जारी रखेगा।

    4. भारत ने पाकिस्तान को नई नहरें एवं बांध निर्माण हेतु 100 करोड़ रुपया देना स्वीकार किया।

    5. पाकिस्तान को जो पानी मिलेगा, उसकी अवधि पाकिस्तान की प्रार्थना पर बढ़ाई भी जा सकती है परन्तु उसी अनुपात में दी जाने वाली धनराशि की मात्रा में कमी हो सकती है। भारत-विभाजन के साथ ही पाकिस्तान से चल रहे गम्भीर जल-विवाद के उपरांत भी भारत सरकार की ढिलाई के कारण पिछले बहत्तर सालों से भारत के हिस्से का पानी पाकिस्तान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में बहता रहा है जिसके कारण भारत के पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली आदि राज्यों की जनता प्रादेशिक नदी-जल समझौतों के अनुसार जल की मात्रा प्राप्त करने में असमर्थ है एवं दिल्ली सरकार पर दबाव बनाकर अधिक जल प्राप्त करने तथा दूसरे प्रांत को जल न देने के लिए संघर्षरत है।

    भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान की ओर से हुए उरीएवं पुलमावा आतंकवादी हमलों के बाद भारत की पुरानी नीति में बदलाव करते हुए भारत की जनता से वायदा किया है कि वे भारत की नदियों से पाकिस्तान को जा रहे जल में से भारतीयों के हिस्से के जल को पाकिस्तान की ओर बहने से रोकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो पंजाब, दिल्ली, हरियाणा एवं राजस्थान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में पर्याप्त जल बहने लगेगा तथा उत्तर-पश्चिमी भारत की जनता को सिंचाई एवं पेयजल के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सकेगा।

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  • अजमेर का इतिहास - 20

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 20

    मुहम्मद जलादुद्दीन अकबर (1)


    अजमेर के इतिहास का तीसरा चरण


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    ई.1526 में बाबर आगरा तथा दिल्ली पर अधिकार करके भारत में मुगलिया सल्तनत की नींव डाल चुका था किंतु अगले 52 साल तक अजमेर पर मुगलिया सल्तनत का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ई.1558 में पहली बार मुगलों की दृष्टि अजमेर पर पड़ी। यहीं से अजमेर के इतिहास का तीसरा चरण आरंभ होता है जो ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु तक चलता है। इस पूरी अवधि में अजमेर; आगरा तथा दिल्ली के बाद, मुगलों की तीसरी राजधानी के रूप उभरा।

    मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर

    ई.1556 में मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर, आगरा के तख्त पर बैठा। उसकी पैनी नजरों से अजमेर की केन्द्रीय स्थिति छिपी न रह सकी। उस समय अजमेर हाजीखां के अधीन था किंतु आईन ए अकबरी ने अजमेर को मालदेव के अधिकार में माना है। आईन ए अकबरी कहती है- मालदेव जो 16वीं पुश्त में है, बहुत बढ़ा-चढ़ा है। करीब था शेरखां का भी उसके मुकाबले में काम तमाम हो जाता। वैसे तो इस मुल्क में बहुत से किले हैं लेकिन उनमें अजमेर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, उमरकोट, आबूगढ़ और जालौर के किले खास हैं। मआसिरुल उमरा ने अजमेर, जोधपुर, सिरोही, नागौर और बीकानेर को मारवाड़ का हिस्सा बताया है। अजमेर को मालदेव के अधीन बताने का कारण संभवतः यह रहा कि हाजीखां, मालदेव के अधीनस्थ स्थिति में था।

    ई.1558 में अकबर की सेना ने अजमेर दुर्ग एवं नगर पर अधिकार कर लिया। हाजी खां, मुगल बादशाह अकबर के सेनापति सैयद मुहम्मद कासिम खां निशापुरी के डर से अजमेर खाली करके मारवाड़ भाग गया। कासिम खां ने बिना लड़े ही, अजमेर पर अधिकार कर लिया। एल्फिंस्टन के अनुसार कासिम खां ने अकबर के शासन के तीसरे वर्ष में तथा अकबरनामा के अनुसार अकबर के शासन के पहले वर्ष में अजमेर पर अधिकार किया।

    इस समय तक मालदेव काफी वृद्ध हो चुका था। इसलिये उसने मुगलों की ताकत को समझते हुए अजमेर के विषय पर शांति धारण कर ली। ई.1558 में अजमेर जिले में मसूदा ठिकाणे की स्थापना हुई तथा सलेमाबाद में वैष्णवों की निम्बार्क शाखा की पीठ स्थापित हुई। ई.1560 में पंवार शार्दुलसिंह ने मालपुरा से आकर श्रीनगर में एक पक्का दुर्ग बनवाया। ई.1561 में अकबर अजमेर आया और उसने मिर्जा शर्फुद्दीन को मेड़ता पर चढ़ाई करने भेजा।

    अजमेर सूबा

    अकबर ने अजमेर को मुगल साम्राज्य के 10 सूबों में सम्मिलित किया। इस सूबे की लम्बाई 336 मील तथा चौड़ाई 300 मील थी। इस सूबे की सीमायें दिल्ली, आगरा, गुजरात, दिपालपुर और मुल्तान से छूती थीं तथा अजमेर इसकी राजधानी थी। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर तथा सिरोही के करद राज्य (कर देने वाले राज्य।) इस सूबे के अधीन रखे गये। इस सूबे में 7 सरकारें तथा 197 परगने थे। अबुल फजल ने इस सूबे का क्षेत्रफल 2,14,35,941 बीघा तथा 7 बिस्वा बताया है।

    सूबेदार, दीवान, मुख्य काजी, सदर तथा फौजदार अजमेर सूबे के उच्च अधिकारी थे जिनका मुख्यालय अजमेर में था। अजमेर सूबे का राजस्व 28,84,01,557 दम्म (लगभग 72,10,308 रुपये, 14 आने 9 पाई) था। इसमें से 28,26,366 दम्म (57,158 रुपये 6 आने 5 पाई) सूयूरगाल की आय थी। अजमेर सूबे के अधीन 86,500 घुड़सवार तथा 3,47,000 पैदल सैनिक थे। अकबर के समय अजमेर में ताम्बे के सिक्के ढालने की टकसाल थी। इन सिक्कों को दम्म कहा जाता था। अकबर के शासनकाल में अजमेर की टकसाल से सोने के सिक्के भी जारी किये गये जिन्हें मुहर कहा जाता था।

    अजमेर सूबे की सात सरकारें

    अन्य सूबों की भांति अजमेर सूबा भी सरकारों और परगनों अथवा महलों में विभक्त किया गया। प्रारंभ में अजमेर सूबे में सात सरकारें- अजमेर, चित्तौड़, रणथंभौर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर और सिरोही थीं। उस समय परगनों की संख्या 197 थी। यह स्थिति 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में फर्रूखसीयर के शासन काल तक थोड़े से परिवर्तन के साथ चलती रही। बाद में जैसलमेर को बीकानेर सरकार से निकालकर एक पृथक् सरकार का गठन किया गया। तब से अजमेर सूबे में आठ सरकारें हो गईं। उस समय अजमेर सूबे के परगनों की संख्या 123 रह गई। अजमेर सूबे में करद राज्यों का जमघट था।

    सूबे की सात सरकारों में से केवल अजमेर और नागौर सरकारें ही परोक्ष रूप से शाही प्रशासन के अधीन थीं। करद राज्यों का शासन वहाँ के वंशानुगत राजाओं द्वारा संचालित होता था। मुगल दस्तावेजों में इन राजाओं को सामान्यतः जमींदार शब्द से ही सम्बोधित किया जाता था, परन्तु व्यावहारिकता में इन्हें कई विशेष अधिकार प्राप्त थे। ये करद राज्य एक निश्चित राशि, कर के रूप में शाही खजाने में जमा करवाते थे और निर्धारित संख्या में सैनिक एवं घुड़सवार शाही सेवा में प्रस्तुत करते थे। इन राज्यों में मालगुजारी की वसूली राजा अपने कर्मचारियों से करवाता था। करद राज्यों की प्रजा को अपने धर्म को मानने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। करद राज्यों की सीमा में किसी विदेशी को पशु-पक्षी मारने का अधिकार नहीं था। सम्राट इन करद राज्यों के क्षेत्र में सुयूरगाल के रूप में भूमि आवंटित नहीं करता था। यहाँ के शासक यदा-कदा अपने क्षेत्र में राहदारी तथा चुंगी की वसूली करते थे।

    अजमेर के सूबेदार

    अजमेर के सूबेदार का सामान्य रूप से सम्पूर्ण सूबे पर नियन्त्रण रहता था परन्तु वह करद राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था। बैराठ आदि कुछ महत्त्वपूर्ण स्थानों पर शाही फौजदार नियुक्त थे। रणथंभौर किले पर शाही फौज का जमाव रहता था। इन्हीं की सहायता से अजमेर का सूबेदार, सूबे में शांति बनाये रखने का कार्य करता था। अजमेर सूबे में सर्वत्र शाही सिक्कों का प्रचलन था।

    मुगल काल में अजमेर के सूबेदारों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था। अकबर के समय उसे नाजिम तथा जहाँगीर के समय में फौजदार कहा जाता था। शाहजहाँ के समय में महाबत खां को अजमेर का साहिब-ए-सूबा नियुक्त किया गया। शेष समस्त सूबेदारों को फौजदार कहा गया। औरंगजेब के समय में इस पद को सूबेदार कहा जाता था। सूबेदार की ही तरह सूबे में दीवान का पद होता था जो राजस्व के मामले में स्वतंत्र अधिकारी था तथा प्रत्यक्ष रूप से केन्द्रीय दीवान के नीचे काम करता था। दीवान किसी भी मामले में सूबेदार के नियंत्रण में नहीं होता था। दीवान के नीचे करोड़ीस तथा तहसीलदार होते थे। इनके नीचे कानूनगो, चौधरी तथा अमीन होते थे।

    अकबरनामा के अनुसार सूबे में बख्शी, मीर अदल, सद्र, कोतवाल, मीर बहर, एव वक़ई नवीस आदि के पद होते थे। बख्शी के पास सूबे की सेनाओं की स्थापना का काम था। वही सेना को वेतन देता था। मीर अदल सूबे का न्यायिक अधिकारी था। उसकी सहायता के लिये काजी नियुक्त होता था। सद्र, सूबे में माफी की भूमि का प्रबंधन करता था तथा विद्यार्थियों एवं विद्वानों को वजीफा देता था। कोतवाल, सूबे की राजधानी में कानून एवं शांति व्यवस्था बनाने के लिये उत्तरदायी होता था। नगरीय सेवाओं की देखभाल भी वही करता था।

    मीर बहर, सूबे में बंदरगाह, चुंगी, नाव, यातायात कर आदि लेता था। अजमेर में मीर बहर का काम सार्वजनिक निर्माण के कार्य करना था। वह चित्तौड़ तथा रणथम्भौर के दुर्गों की मरम्मत और रखरखाव का काम भी देखता था। राजस्व विभाग के कामों के लिये अमीन महत्त्वपूर्ण अधिकारी था। वह भूमि के सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त का काम करता था। वह राजस्व विवादों का निर्णय भी करता था। कुछ मामलों में प्रांतीय दीवान, बादशाह के आदेश से, सूबे के चीफ अमीन की तरह काम करता था

    अकबर द्वारा अजमेर में नियुक्त किये गये नाजिमों (सूबेदारों) की सूची बनाना अत्यंत कठिन कार्य है क्योंकि किसी भी समकालीन लेखक ने नाजिमों (सूबेदारों) के बारे में नियमित रूप से नहीं लिखा है। हरबिलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा ने अजमेर के नाजिमों (सूबेदारों) की सूची बनाने के प्रयास किये हैं किंतु ये सूचियां अशुद्ध एवं अधूरी हैं। डॉ. जगतनारायण ने भी अबुल फजल के हवाले से इनकी सूची दी है। यह भी आधी-अधूरी है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि अकबर ने ई.1558-1560 में मोहम्मद कासिम खां निशापुरी (ईरानी) को, ई.1561-1563 में शर्फुद्दीन हुसैन मिर्जा (तूरानी) को, ई.1563 में काजी माड को अजमेर का नाजिम बनाया।

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  • अध्याय- 5 : देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन

     03.06.2020
    अध्याय- 5 : देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन

    अध्याय- 5

    देशी राज्यों का संविधान सभा में प्रवेश एवं परमोच्चता का विलोपन

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    हम इस समय भारत के इतिहास की महत्त्वपूर्ण अवस्था में हैं। अपने सप्रयत्न से हम देश को एक नई ऊँचाई तक पहुंचा सकते हैं जबकि एकता में कमी से हमें नये संकटों का सामना करना पड़ सकता है। मुझे आशा है कि भारतीय राज्य यह तथ्य ध्यान में रखेंगे कि व्यापक हित में सहयोग का विकल्प अराजकता और विप्लव है जिससे बड़े और छोटे समान रूप से नष्ट हो जायेंगे। - सरदार पटेल।


    29 जनवरी 1947 को बंबई के ताजमहल होटल में नरेंद्र मण्डल की बैठक हुई जिसमें चांसलर भोपाल नवाब ने कुछ व्यक्तियों द्वारा शासकों की बदनामी करने और उनकी बातों की गलत व्याख्या करने हेतु चलाये जा रहे सुनियोजित षड़यंत्र की शिकायत की। इस बैठक में 60 राजा और 100 राज्यों के मंत्री उपस्थित थे। नवाब ने कहा कि हमें कहा जा रहा है कि या तो हम हट जायें या फिर हाशिये पर जियें। हमारे लिये इन धमकियों के आगे घुटने टेक देना अशोभनीय होगा। नवाब ने वे आधारभूत सिद्धांत भी गिनाये जिन पर राज्य समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने मांग की कि कैबीनेट मिशन योजना का पूर्ण अनुसरण किया जाये। त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी ने संविधान सभा पर आरोप लगाया कि वह राज्यों में सरकार का प्रारूप निश्चित करने की चेष्टा कर रही है। सम्मेलन में पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से राजाओं ने इच्छा प्रकट की कि कैबीनेट मिशन योजना के तहत प्रस्तावित भारत संघ में संविधान के निर्माण के लिये शासकगण अपना हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं। इस प्रस्ताव में राज्यों द्वारा कैबीनेट मिशन योजना को स्वीकृत करने के लिये पाँच आधारभूत विचार दिये गये-

    1. भारत संघ में राज्यों का प्रवेश बातचीत के अतिरिक्त और किसी प्रकार से नहीं होना चाहिये। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार प्रत्येक राज्य के पास होना चाहिये। संवैधानिक विचार विमर्श में राज्यों की भागीदारी राज्य के अंतिम निर्णय की वचनबद्धता नहीं है। ऐसा निर्णय केवल संविधान की पूर्ण तस्वीर सामने आने पर ही किया जा सकेगा।

    2. संघ को समर्पित विषयों को छोड़कर राज्यों के पास शेष समस्त विषय एवं शक्तियां बनी रहेंगी। अंतरिम काल की समाप्ति पर परमोच्चता (Paramountcy) समाप्त हो जायेगी वह न तो भारत सरकार में निहित होगी और न भारत सरकार को स्थानांतरित होगी। राज्यों द्वारा परमोच्च सत्ता को समर्पित किये गये अधिकार पुनः राज्यों को प्राप्त हो जायेंगे। प्रस्तावित भारत संघ राज्यों के मामले में केवल उन्हीं विषयों पर अपने अधिकार काम में लेगा जो कि संघ के विषय के रूप में संघ को प्राप्त होंगे। प्रत्येक राज्य की सम्प्रभुता, समस्त अधिकार व शक्तियां उस सीमा तक बने रहेंगे जिस सीमा तक कि उन्हें संघ को समर्पित न कर दिया गया हो। संघ के पास उन शक्तियों को धारण करने का कोई निहित अधिकार नहीं होगा जिन्हें कि राज्यों द्वारा विशेष रूप से समर्पित करने की विशिष्टि सहमति न दे दी गयी हो।

    3. प्रत्येक राज्य का संविधान, उसकी क्षेत्रीय एकता तथा शासकीय वंश का उत्तराधिकार राज्य की परम्परा, कानून एवं रीतिरिवाज के अनुसार होना चाहिये तथा उसमें संघ अथवा उसकी किसी इकाई को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। न ही उसकी वर्तमान सीमाओं में तब तक कोई परिवर्तन किया जाना चाहिये जब तक कि राज्य द्वारा ऐसा किये जाने की स्वतंत्र सहमति न दे दी गयी हो।

    4. संविधान सभा केवल संघ के लिये कैबीनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान बनाने के लिये अधिकृत है। यह सभा राज्यों के आंतरिक प्रशासन अथवा प्रत्येक राज्य अथवा राज्य के समूहों के लिये संविधान बनाने हेतु अधिकृत नहीं है।

    5. सरकार ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि यह राज्यों पर है कि वे संघ में आयें अथवा न आयें। संधियों एवं परमोच्चता पर कैबीनेट योजना के 12 मई 1946 के स्मरणपत्र के अनुसार भी एक तरफ राज्य तथा दूसरी तरफ ब्रिटिश ताज एवं ब्रिटिश सरकार के मध्य चल रहीं मौजूदा राजनीतिक व्यवस्थायें अंतरिम काल के पश्चात समाप्त हो जायेंगी। अंतराल भरने के लिये राज्यों को भारत में बनने वाली उत्तराधिकारी सरकार के साथ संघीय सम्बन्ध बनाने होंगे अथवा विशेष राजनीतिक व्यवस्थाएं करनी पड़ेंगी।

    प्रस्ताव में कहा गया कि नरेंद्र मण्डल द्वारा बनायी गयी राज्य संविधान वार्त्ता समिति कैबीनेट मिशन योजना के अंतर्गत राज्यों की तरफ से केवल नये भारतीय संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत राज्यों की स्थिति के सम्बन्ध में प्रारंभिक वार्त्ता करने के लिये ही अधिकृत है। राज्यों के कोटे की सीटों का आवंटन केवल राज्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना है। राज्यों के प्रतिनिधियों के चयन की विधि राज्य संविधान वार्त्ता समिति तथा ब्रिटिश भारत की संविधान वार्त्ता समिति के मध्य विचार-विमर्श का विषय है। इसका अंतिम निर्णय सम्बद्ध राज्यों के द्वारा लिया जायेगा। इस प्रस्ताव में राज्य संविधान वार्त्ता समिति को दो बातों के लिये अधिकृत किया गया-

    (1.) केबीनेट मिशन योजना के प्रस्ताव के अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत संविधान सभा में राज्यों की भागीदारी की शर्तों पर वार्त्ता करना।

    (2.) अखिल भारतीय संघ में राज्यों की अंतिम स्थिति के संदर्भ में वार्त्ता करना।

    प्रस्ताव में कहा गया कि इन वार्ताओं में लिये गये निर्णयों की पुष्टि राज्यों द्वारा की जानी आवश्यक होगी। इस प्रस्ताव की प्रत्येक पंक्ति में अविश्वास भरा हुआ था जिसने देश में उत्तेजक विवाद को जन्म दिया। राजाओं द्वारा दी गयी इस धमकी पर कि यदि कांग्रेस आधारभूत विषयों को स्वीकार नहीं करती है तो शासकगण संविधान सभा का बहिष्कार करेंगे, लोगों में राजाओं के प्रति गुस्सा एवं विरोध था। कैबीनेट मिशन योजना में प्रस्तावित था कि प्रारंभिक अवस्था में संविधान निर्मात्री सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व एक वार्त्ता समिति (Negotiation Committee) द्वारा किया जायेगा। विचार-विमर्श के अंतिम चरण में राज्यों के वास्तविक प्रतिनिधि भाग लेंगे। योजना के इसी भाग को आधार बनाकर 29 जनवरी के प्रस्ताव में घोषणा की गयी कि शासकगण संगठित रूप से विधान निर्मात्री परिषद में उस समय तक शामिल नहीं होंगे जब तक कि भारतीय विधान निर्मात्री परिषद् संविधान का पूरा ढांचा प्रस्तुत न कर दे और उसमें यह स्पष्ट न हो जाये कि रियासतों के राजाओं की प्रभुसत्ता को आँच नहीं आयेगी, तत्पश्चात शासकगण उचित समझेंगे तो अपने आपको संविधान निर्मात्री परिषद् में शामिल करेंगे।

    संविधान वार्त्ता समिति को लेकर राजाओं में मतभेद

    7 फरवरी 1947 को राज्य संविधान सभा वार्त्ता समिति की बैठक में बड़ौदा के दीवान सर बी. एल. मित्तर ने नरेंद्र मण्डल द्वारा संविधान वार्त्ता समिति नियुक्त किये जाने के अधिकार को चुनौती देते हुए कहा कि यह राजाओं की तरफ से वार्त्ता करने वाली एकमात्र संस्था नहीं है। संविधान सभा में बड़ौदा इस समिति के माध्यम से नहीं अपितु प्रत्यक्षतः स्वयं वार्त्ता करेगा। संविधान समिति द्वारा राजाओं के सिद्धांतों को न माने जाने की स्थिति में राजाओं द्वारा उसके बहिष्कार की घोषणा के सम्बन्ध में मित्तर ने कहा कि बड़ौदा के नेतृत्व में राजाओं का एक छोटा समूह संविधान सभा से वार्त्ता करेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें न केवल बड़ौदा महाराजा की ओर से ऐसा कहने का अधिकार है अपितु बड़ौदा के प्रजा मंडल की ओर से भी ऐसा कहने का पूरा अधिकार प्राप्त है।

    अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की 1947 की दिल्ली बैठक में आशा व्यक्त की गयी कि संविधान निर्माण के कार्य में अधिक से अधिक रियासतों को जोड़ा जाना चाहिये। कांग्रेस के इन प्रयासों को आधार बनाकर कोरफील्ड ने नेहरू पर स्टेट्स नेगोशियेटिंग कमेटी को तोड़ने के आरोप लगाये- ब्रिटिश राज पर 'तोड़ो और राज करो' के आरोप लगते रहे हैं किंतु अब नेहरू ने उसे अपनी नीति के लिये उपयोगी समझा। नेहरू ने राज्यों के दीवानों को उकसाया ताकि वे कमेटी से बाहर रहकर व्यक्तिशः वार्त्ता करने की घोषणा करें। कुछ दीवान भविष्य के शासकों को संतुष्ट रखना चाहते थे। कुछ शासकों को एक मुस्लिम की अध्यक्षता वाली समिति में कोई रुचि नहीं थी। इस प्रकार राज्य संविधान वार्त्ता समिति कमजोर होती चली गयी। भोपाल नवाब तथा कोनार्ड कोरफील्ड को इससे बड़ी निराशा हुई।

    प्रजा मण्डल द्वारा संविधान सभा वार्त्ता समिति की नियुक्ति

    अखिल भारतीय राज्य प्रजा मंडल ने भी अपनी ओर से एक राज्य संविधान सभा वार्त्ता समिति नियुक्त कर दी तथा राजाओं द्वारा संविधान सभा में राज्य के प्रतिनिधि के चयन के अधिकार को चुनौती दी। प्रजा मंडल के अध्यक्ष डा. पट्टाभि सीतारमैया ने घोषणा की कि संविधान सभा में राजाओं का कोई स्थान नहीं है।

    शासकों द्वारा चांसलर का विरोध

    नरेन्द्र मण्डल का चांसलर भोपाल नवाब चाहता था कि रियासतें अलग-अलग कोई कार्यवाही न करें अपितु सब सामूहिक रूप से एवं अध्यक्ष की सहमति से ही कार्यवाही करें। चांसलर का यह तर्क बहुत से राजाओं के गले नहीं उतरा। कुछ सक्षम रियासतों ने भोपाल नवाब के विरुद्ध एक गुट बना लिया। इसमें बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, पटियाला एवं ग्वालियर राज्य सम्मिलित थे। कोचीन महाराजा ने 30 जुलाई 1946 को ही घोषणा कर दी थी कि वे विधान निर्मात्री परिषद में भाग लेंगे। बड़ौदा के महाराजा ने भी 8 फरवरी 1947 को घोषणा की कि वे 29 जनवरी 1947 के नरेंद्र मण्डल के बम्बई प्रस्ताव से बंधे हुए नहीं हैं। वे भी विधान निर्मात्री परिषद में भाग लेंगे। इस पर भी चांसलर डटा रहा कि वह 29 जनवरी वाले प्रस्ताव के अनुसार कार्यवाही करेगा। इस प्रकार राजाओं के दोनों समूह अपनी-अपनी जिद्द पर अड़ गये। बातचीत ठप्प होने की स्थिति आ गयी तो पटियाला महाराजा ने फिर बातचीत शुरू करने का प्रयास किया किंतु शासकों में परस्पर विरोध काफी आगे बढ़ गया था।

    संविधान वार्त्ता समितियों की संयुक्त बैठक 8 फरवरी 1947 को नरेंद्र मण्डल द्वारा नियुक्त संविधान वार्त्ता समिति तथा संविधान सभा द्वारा नियुक्त वार्त्ता समिति की संयुक्त बैठक हुई। इस प्रकार संविधान सभा ने ब्रिटिश भारत के नेताओं और राजाओं को पहली बार एक दूसरे के ठीक सामने ला खड़ा किया। ब्रिटिश भारतीय नेताओं- जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, पट्टाभि सीतारमैया तथा राज्य संविधान सभा वार्त्ता समिति के सदस्यों- भोपाल नवाब एवं सर सी. पी. रामास्वामी के मध्य प्रांरभ में ही तीखी नोंक झौंक हुई किंतु बाद में नेहरू तथा भोपाल नवाब ने बैठक के वातावरण को ठण्डा किया। अगले दिन नेहरू ने राज्य प्रतिनिधियों की मांगों के संदर्भ में कुछ अनुकूल घोषणायें कीं -

    1. संविधान सभा कैबीनेट मिशन योजना के प्रस्तावों की पूर्ण स्वीकृति के आधार पर कार्य करेगी। यह योजना पूर्णतः स्वैच्छिक है। शासक अकेले अथवा समूह के रूप में अथवा अन्य किसी प्रकार से संघ में प्रवेश कर सकते हैं। यदि कोई राज्य संघ में प्रवेश नहीं करना चाहता है तो हम उस पर संघ में सम्मिलित होने के लिये दबाव नहीं डालेंगे। यह अंत तक वार्त्ता का विषय होगा।

    2. संविधान सभा की ओर से तथा उसके बाहर से भी कई बार कहा जा चुका है कि हम राज्यों में राजवंशीय सरकार के विरुद्ध नहीं हैं। यह पूर्णतः स्पष्ट है।

    3. राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन नहीं किया जायेगा। केवल आर्थिक कारणों तथा सरकार की सुविधा के उद्देश्य से क्षेत्रीय सीमाओं में परिवर्तन किया जायेगा किंतु क्षेत्रीय पुनर्व्यवस्था सम्बद्ध राज्यों की सहमति से ही की जायेगी, बलपूर्वक नहीं।

    4. संविधान सभा में भाग लेना किसी तरह की अनिवार्यता नहीं है। राज्य अपनी इच्छा से किसी भी समय संविधान सभा में भाग लेने से मना कर सकते हैं।

    5. संघ के पास कैबीनेट मिशन योजना में प्रस्तावित विषय ही रहेंगे।

    भोपाल नवाब के द्वारा यह पूछा गया कि क्या परमोच्चता राज्यों को फिर से प्राप्त हो जायेगी जैसा कि कैबीनेट योजना के अंतर्गत प्रस्तावित किया गया है? इस पर नेहरू ने उत्तर दिया कि मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि परमोच्चता का प्रश्न कहाँ आड़े आता है! यह समान अधिकारों एवं हैसियत वाली स्वायत्तशासी इकाईयों का संघ होगा। केंद्रीय परमोच्चता में प्रत्येक इकाई की भागीदारी होगी। राज्य भी उसी स्तर पर रहेंगे जिस स्तर पर कि अन्य इकाईयां रहेंगी। इस पर नवाब भोपाल ने पूछा कि क्या परमोच्चता समाप्त हो जायेगी? इस पर नेहरू ने कहा कि हाँ वह समाप्त हो जायेगी।

    एटली की घोषणा

    20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में घोषणा की कि जून 1948 तक भारत की एक उत्तरदायी सरकार को सत्ता हस्तांतरित कर दी जायेगी। इस घोषणा में स्पष्ट कहा गया कि सरकार भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान जिसमें समस्त भारतीयों की सहमति हो, भारत में लागू करने की संसद में संस्तुति करेगी। यदि जून 1948 तक इस प्रकार का संविधान, संविधान सभा द्वारा नहीं बनाया गया तो ब्रिटिश सरकार यह सोचने के लिये विवश होगी कि ब्रिटिश भारत में केंद्र की सत्ता किसको सौंपी जाये? नयी केंद्रीय सरकार को या कुछ क्षेत्रों में प्रांतीय सरकारों को? या फिर किसी अन्य उचित माध्यम को भारतीय जनता के सर्वोच्च हित के लिये दी जाये......। राज्यों के सम्बन्ध में कहा गया कि सरकार की यह मंशा नहीं है कि परमोच्चता के अधीन राज्यों की शक्तियां तथा दायित्व ब्रिटिश भारत में किसी अन्य सरकार को सौंपी जायें। यह मंतव्य भी नहीं है कि सत्ता के अंतिम हस्तांतरण की तिथि के पूर्व परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये। अपितु यह विचार किया गया है कि अंतरिम काल के लिये राज्यों के साथ ब्रिटिश ताज के सम्बन्ध किसी समझौते के द्वारा समायोजित किये जा सकते हैं।

    राजाओं की प्रतिक्रिया

    प्रधानमंत्री एटली की घोषणा का राजाओं द्वारा एक स्वर से स्वागत किया गया। नवाब भोपाल ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि जब ब्रिटिश चले जायेंगे तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा राज्य स्वतंत्र हो जायेंगे। सर सी. पी. रामास्वामी का मानना था कि प्रधानमंत्री एटली के वक्तव्य ने कैबीनेट मिशन योजना को आच्छादित (Supersede) कर लिया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की इस घोषणा ने देश में राजनीतिक वातावरण को गर्मा दिया तथा उसमें तात्कालिकता का तत्व भी जोड़ दिया। इससे कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा राजाओं को भी भागम-भाग मचानी पड़ी।

    संविधान वार्त्ता समितियों पर एटली की घोषणा का प्रभाव संविधान निर्मात्री सभा की समझौता समितियों पर एटली की घोषणा का अच्छा प्रभाव पड़ा। 1 मार्च 1947 को दोनों समझौता समितियों की संयुक्त बैठक में नेहरू ने कहा कि ब्रिटिश सरकार की घोषणा ने तत्काल कार्यवाही करने की आवश्यकता उत्पन्न कर दी है। न केवल ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों अपितु राज्यों के प्रतिनिधियों को भी संविधान सभा में तुरंत भाग लेने से अपार लाभ होगा यदि राज्यों के प्रतिनिधि अप्रेल सत्र से संविधान सभा की कार्यवाही में भाग लें। नरेंद्र मण्डल के चांसलर ने कहा कि इस विषय में समय की महत्त्वपूर्ण भूमिका है किंतु राज्यों में सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद हैं। सीटों के निर्धारण के लिये एक उपसमिति का गठन किया गया। उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट दी कि संविधान सभा में मनोनीत किये जाने वाले राज्य प्रतिनिधियों में से कम से कम 50 प्रतिशत चुने हुए हों तथा जहाँ तक संभव हो चुने हुए प्रतिनिधियों का कोटा बढ़ाया जाये। नेहरू ने संविधान सभा द्वारा बनायी गई समितियों में भाग लेने के लिये राज्यों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया, विशेषकर संघ शक्ति समिति तथा मौलिक अधिकार समिति में किंतु चांसलर ने विरोधी प्रवृत्ति दर्शाते हुए कहा कि ऐसा करने से पूर्व उसे नरेंद्र मण्डल की अनुमति लेनी होगी और वे विश्वास दिलाते हैं कि नरेंद्र मण्डल की बैठक शीघ्र बुलायी जायेगी।

    हिन्दू महासभा का प्रस्ताव

    9 मार्च 1947 को अखिल भारतीय हिंदू महासभा की कार्यकारिणी में नयी दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें उन हिन्दू राज्यों के राजाओं की दूरदर्शिता की प्रशंसा की गयी जिन्होंने समस्त तरह के विरोधों के उपरांत भी संविधान सभा में भाग लेने के लिये अपनी सहमति प्रदान कर दी है।

    माउंटबेटन की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार ने भारत की आजादी को कार्यरूप देने के लिये लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउन्टबेटन को भारत का वायसराय नियुक्त किया। माउंटबेटन भारत में ब्रिटिश क्राउन के बीसवें और अंतिम प्रतिनिधि थे। उनका पूरा नाम लुई फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकॉलस माउंटबेटन था। वे इंगलैण्ड की उसी महारानी विक्टोरिया के प्रपौत्र थे जिसने कैसरे हिंद की उपाधि धारण करके भारत को अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने का उद्घोष किया था। माउंटबेटन में भारतीय रजवाड़ों के लिये न तो प्रशंसा का भाव था न धैर्यं जो सबसे अच्छे राजा थे उन्हें वह अर्धविकसित तानाशाह समझते थे और जो सबसे खराब थे उन्हें गया-बीता और चरित्रहीन! उनका मानना था कि कांग्रेस की बढ़ती हुई ताकत को देखकर भी रजवाड़ों ने अपने प्रशासन में किसी तरह की प्रजातांत्रिक प्रणाली शुरू नहीं की। 1935 में अवसर था किंतु वे भारत संघ में सम्मिलित नहीं हुए। इन क्रियाकलापों के कारण माउंटबेटन उन्हें मूर्खों की जमात कहते थे।

    प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय को पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार की नीति स्पष्ट की कि सम्राट की सरकार का यह एक निश्चित उद्देश्य है कि भारत में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के दायरे में संविधान सभा की सहायता से एक सरकार केबीनेट मिशन की योजना के आधार पर बने और काम करे। अपनी पूरी ताकत लगाकर आपको समस्त दलों को इस लक्ष्य की ओर ले जाना चाहिये। चूंकि यह योजना प्रमुख दलों की सहमति से ही बन सकती है इसलिये किसी दल को विवश न किया जाये। यदि आप समझते हों कि भारतीय राज्यों की सहायता के साथ या उनके बिना भारत में एक सरकार बनाने की कोई संभावना नहीं है तो आपको इसकी सूचना सरकार को देनी चाहिये और सलाह भेजनी चाहिये कि किस तरह निश्चित तिथि तक सत्ता हस्तांतरित की जा सकती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय राज्य ब्रिटिश भारत में बनने वाली नयी सरकार से अपने सम्बन्धों का समायोजन करें किंतु सरकार का मंतव्य यह नहीं है कि परमोच्चता के अधीनस्थ शक्तियों एवं दायित्वों का स्थानांतरण नयी उत्तराधिकारी सरकार को कर दिया जाये। यह मंशा नहीं है कि सत्ता के स्थानांतरण से पूर्व परमोच्चता को एक निर्णायक पद्धति के तौर पर लिया जाये अपितु आवश्यकता पड़ने पर वायसराय प्रत्येक राज्य के साथ अलग से ब्रिटिश क्राउन के सम्बन्धों के साथ समायोजन पर वार्त्ता कर सकते हैं। वायसराय देशी राज्यों की सहायता करेंगे ताकि राज्य ब्रिटिश भारत के नेताओं के साथ भविष्य के लिये उचित एवं न्यायपूर्ण सम्बन्ध बना सकें।

    राज्यों के सम्बन्ध में चिंता

    जब ब्रिटेन ने भारत छोड़ने का निर्णय लिया तथा सत्ता हस्तांतरण की तिथि निश्चित की तो आश्चर्यजनक रूप से न तो व्हाइट हॉल ने और न ही राजाओं ने संधियों का उल्लेख किया। जिस समय माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भेजा गया उस समय ब्रिटिश सम्राट जार्ज षष्ठम् ने माउंटबेटन से कहा कि मुझे भारतीय राज्यों की स्थिति के बारे में चिंता है क्योंकि उनका ब्रिटेन से सीधा संधि मूलक सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध भारत की स्वतंत्रता के साथ समाप्त हो जायेगा। स्वतंत्रता के बाद जो देश बनेंगे उनसे जब तक राज्य सम्बन्ध न जोड़ लें, अपने को एक खतरनाक स्थिति में पायेंगे। इसलिये माउंटबेटन, राजाओं को होनी पर संतोष करने के लिये समझायें और जो नई सरकार या सरकारें बनें, उनसे किसी न किसी तरह का समझौता कर लेने की सलाह दें। माउंटबेटन ने सम्राट के कथन का अर्थ लगाया कि राज्यों को भारत या पाकिस्तान में से किसी न किसी देश के साथ मिल जाना चाहिये। वास्तव में उस समय राजा का क्या मंतव्य था, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था।

    ब्रिटिश भारत विभाजन की ओर

    24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय का कार्यभार संभाला। उस समय देश विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी जिसमें से 10 करोड़ मुस्लिम एवं 25 करोड़ हिन्दू तथा अन्य मतावलम्बी थे। कांग्रेस देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल था जिसे विश्वास था कि उसे 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतावलम्बियों का तथा 90 प्रतिशत मुसलमानों का नेतृत्व प्राप्त था। जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था। माउंटबेटन ने भारत में अपने प्रथम भाषण में कहा कि उनका कार्यालय सामान्य वायसराय का नहीं रहेगा। वे ब्रिटिश सरकार की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण करने तथा कुछ ही माह में भारत की समस्या का समाधान ढूंढने के लिये आये हैं। माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि देश का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है।

    प्रधानमंत्री की घोषणा तथा वायसराय के वक्तव्यों से राजाओं को अच्छी तरह समझ में आ गया कि अब देश आजाद होने वाला है। इसलिये टालमटोल की नीति आगे चलने वाली नहीं है और उन्हें अपने भवितव्य के निर्धारण के लिये कोई न कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा। 24 मार्च 1947 को, जिस दिन माउंटबेटन ने वायसराय एवं गवर्नर जनरल के पद की शपथ ली, बीकानेर महाराजा ने माउंटबेटन को अवगत कराया कि बीकानेर महाराजा तथा उनका गुट विधान निर्मात्री सभा में सम्मिलित होंगे जिससे नया शासन काफी मजबूत हो जायेगा।

    नरेंद्र मण्डल के मंत्रियों की समिति की बैठक

    30 मार्च 1947 को बम्बई में चैम्बर ऑफ प्रिसेंज के मंत्रियों की समिति की बैठक हुई। दीर्घ विचार-विमर्श के पश्चात् समिति ने निम्नलिखित संभावनायें व्यक्त कीं-

    (1.) कुछ राज्य अथवा राज्यों के समूह भारत में बनने वाली उत्तराधिकारी सरकारों में से किसी एक के साथ संघीय सम्बन्ध बनाकर संघ में प्रवेश कर सकते हैं या एक अथवा एक से अधिक सरकारों के साथ किसी विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश को प्राथमिकता दे सकते हैं। राज्यों को यह राय कैबीनेट मिशन की 12 मई की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में दी गयी है।

    (2.) कुछ राज्य अथवा उनके समूह ब्रिटिश भारत के विवाद से बाहर रहने को प्राथमिकता दे सकते हैं तथा स्वतंत्र इकाई के रूप में ब्रिटिश भारत में बनने वाली किसी एक अथवा एक से अधिक उत्तराधिकारी सरकारों के साथ किसी विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर सकते हैं।

    (3.) कुछ राज्य अथवा उनके समूह राज्यसंघों का निर्माण कर सकते हैं और उनके माध्यम से ब्रिटिश भारत के प्रांतों की सरकारों के साथ विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर सकते हैं।

    (4.) कुछ राज्य अथवा उनके समूहों की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार की है कि यदि बिटिश भारत में एक अखिल भारतीय सरकार की स्थापना न हो सकती हो तो वे राज्य अथवा उनके समूह एक से अधिक सरकारों के साथ किसी राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर सकते हैं। कुछ रियासतें अथवा उनके समूह किसी एक क्षेत्र में स्थित हो सकते हैं किंतु सिंचाई परियोजनाएं, रेलवे लाइनें तथा अन्य आम सेवाओं के रूप में उनके बड़े आर्थिक हित दूसरे क्षेत्रों से जुड़े हुए हो सकते हैं।

    (5.) भारत में एक उत्तराधिकारी सरकार बने अथवा एक से अधिक, यह स्पष्ट है कि रक्षा, संचार तथा विदेश मामलों के सम्बन्ध में इन इकाईयों के मध्य सहयोग के कुछ उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। राजनीतिक दलों के मध्य इस बात पर असहमति हो सकती है कि सहयोग का स्वीकृत आधार संविधान अथवा बहुपक्षीय संधि अथवा किसी तरह का समझौता होना चाहिये। इस प्रकार के सहयोग के समुचित आधार के निर्धारण के लिये भारत की मुख्य राजनीतिक पार्टियों एवं रियासतों के बीच एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाना चाहिये।

    समिति में हुए निर्णय को स्टेडिंग कमेटी ऑफ प्रिंसेज तथा 1 व 2 अप्रेल को होने वाले राजाओं के सम्मेलन के सम्मुख रखने का निर्णय लिया गया। 31 मार्च 1947 को बम्बई में आयोजित राज्य संविधान वार्त्ता समिति की बैठक में नरेंद्र मण्डल के चांसलर ने फिर दोहराया कि भारतीय राज्यों के प्रतिनिधियों को संविधान निर्मात्री सभा के अंतिम चरण में सम्मिलित होना चाहिये। इस पर महाराजा बीकानेर ने कहा कि संविधान निर्मात्री सभा के अंतिम चरण में सम्मिलित होने का निर्णय संपूर्ण विश्व एवं भारतीय राज्यों में संदेह से देखा जायेगा।

    राजाओं में मतभेद

    अप्रेल 1947 में संविधान सभा की वार्त्ता समिति तथा नरेंद्र मण्डल की संविधान वार्त्ता समिति में राज्यों के प्रतिनिधित्व एवं उनके संविधान सभा में सम्मिलित होने के सम्बन्ध में समझौता हो गया। समाजवादी पार्टी के महासचिव जयप्रकाश नारायण ने इस समझौते पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राज्यों से आने वाले कुल प्रतिनिधियों में विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिये। जब यह समझौता नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति में अनुमोदनार्थ रखा गया तो स्थायी समिति में मतभेद उत्पन्न हो गये। चांसलर के नेतृत्व में राजाओं का एक शक्तिशाली गुट यह चाहता था कि देशी राज्यों के प्रतिनिधि संविधान सभा में तभी भेजे जायें जबकि संविधान सभा संघीय सरकार के संविधान पर चर्चा शुरू करे। राजाओं का एक गुट भोपाल नवाब की नीति से सहमत नहीं था। यह गुट बीकानेर नरेश के नेतृत्व में यह चाहता था कि अविलम्ब ही संविधान सभा में सम्मिलित हुआ जाये।

    अप्रेल 1947 के प्रथम सप्ताह में नरेंद्र मण्डल की सामान्य बैठक आयोजित की गयी। बीकानेर महाराजा ने चांसलर द्वारा घोषित नीति का विरोध किया तथा चांसलर की 'वेट एण्ड सी' की नीति पर प्रश्न चिह्न लगाया। उन्होंने कहा कि केबिनेट मिशन योजना को कांग्रेस ने मूल रूप में स्वीकार कर लिया था और मुस्लिम लीग ने भी उस पर अपनी स्वीकृति दे दी थी किंतु बाद में मुस्लिम लीग मुकर गयी। अब राजाओं का उससे मुकर जाना यह छवि देगा कि राजा लोग ब्रिटिश भारत की किन्हीं पार्टियों के हाथों में खेल रहे हैं। रियासतों के हित में भी यही ठीक होगा कि जून 1948 में सत्ता परिवर्तन के समय भारत में एक मजबूत केन्द्रीय सत्ता की स्थापना हो। इसलिये राजाओं का हित इसमें है कि मजबूत केन्द्र के निर्माण में जी जान से सहयोग करें। राज्यों की जनता के हित में मजबूत केंद्र की स्थापना के लिये, राज्यों को ब्रिटिश भारत से हाथ मिला लेना चाहिये। यदि राजा इस लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता करते हैं तो लोगों तथा राजाओं के हित एक जैसे बने रहेंगे किंतु यदि राजा किसी भी कारण से दूसरे प्रकार का निर्णय लेते हैं तो वे अपनी प्रजा की इच्छाओं और उनके हितों के विरोध का कड़ा सामना करेंगे।

    बीकानेर महाराजा को महाराजा पटियाला का पूरा सहयोग मिला और उन्होंने चांसलर हमीदुल्लाखां द्वारा अपनायी गयी 'बाड़ पर बैठने की नीति' की भर्त्सना की। बीकानेर महाराजा की धारणा के विपरीत कुछ राज्यों का यह विचार था कि उन्हें संविधान सभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेना चाहिये अपितु संविधान बन जाने के बाद उन्हें अलग से एक समझौते के द्वारा केंद्र में प्रवेश करना चाहिये जिससे उनकी स्थिति भारत सरकार के समक्ष उतनी ही मजबूत बनी रहेगी जितनी कि आज है।

    बीकानेर के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर ने कहा कि इस दृष्टिकोण पर राज्यों के बीच मतभेद नहीं हो सकता कि संविधान निर्मात्री सभा में भागीदारी इस शर्त पर आधारित है कि इसे स्वीकार करने के लिये दोनों समितियां सहमत होनी चाहिये। उदयपुर के प्रधानमंत्री सर टी. विजयराघवाचारी ने कहा कि संविधान सभा में सहमति के विषय पर सशर्त प्रवेश बड़ी गलती होगी तथा राजाओं पर भारत की प्रगति का शत्रु होने का आरोप लगेगा। डूंगरपुर के महाराजा ने कहा कि भारतीय राजा भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में हैं किंतु सहयोग का अर्थ समर्पण नहीं होता। भारत की स्वतंत्रता का अर्थ भारतीय जीवन के समस्त अंगों की स्वतंत्रता से है जिनमें भारतीय नरेश भी सम्मिलित हैं।

    महाराजा बीकानेर का नरेंद्र मण्डल से बहिर्गमन

    धौलपुर महाराजा ने शासकों से अपील की कि वे जल्दबाजी में कोई कदम न उठायें। अलवर महाराजा ने भी शासक बंधुओं का आह्वान किया कि वे इस घड़ी में चांसलर का साथ दें। इसके बाद स्थायी समिति ने बीकानेर महाराजा का सुझाव अस्वीकार कर दिया। नरेन्द्र मण्डल को प्रभावित करने में बीकानेर महाराजा के सारे प्रयत्न विफल हो चुके थे इसलिये उन्होंने नरेन्द्र मण्डल की बहुमत की नीति के विरुद्ध स्पष्ट घोषणा की कि वे संविधान निर्मात्री सभा में भाग लेने जा रहे हैं। उन्होंने 1 अप्रेल 1947 को नरेंद्र मण्डल की बैठक का बहिष्कार कर दिया और वक्तव्य देकर बहिर्गमन कर गये। सादूलसिंह ने स्थायी समिति के अध्यक्ष के नाम एक टिप्पणी लिखी कि स्थायी समिति में और अधिक न रहने के लिये मुझे क्षमा किया जाये क्योंकि इसमें मेरी स्थिति बड़ी कठिन हो जायेगी। इस समय राजाओं और देश के सामने जो समस्याएं हैं, उनके बारे में मेरे विचार स्थायी समिति और अध्यक्ष से बिल्कुल भिन्न हैं। न तो मैं चुप रह सकता हूँ और न अपने दृष्टिकोण के बारे में, जिसे मैं श्रीमानों के समक्ष अनेक बार स्पष्ट कर चुका हूँ, और अधिक कहना चाहता हूँ। सादूलसिंह ने राजाओं से अपील की कि अविलम्ब ही संविधान सभा में अपने प्रतिनिधि भेजें। सादूलसिंह की इस कार्यवाही से राजाओं में खलबली मच गयी।

    पटियाला महाराजा ने बीकानेर महाराजा का पक्ष लिया। इसके बाद अन्य नरेश भी धीरे-धीरे इसी मत का समर्थन करने लगे और एक-एक करके संविधान सभा में भाग लेने लगे। अंत में स्थायी समिति ने एक नया प्रस्ताव पारित करके राजाओं को छूट दी कि वे जब चाहें तब संविधान सभा में अपने प्रतिनिधि भेजें। चांसलर तथा स्थायी समिति को सत्ता के हस्तांतरण तथा परमोच्चता की समाप्ति के विषय पर क्राउन प्रतिनिधि से वार्त्ता करने हेतु अधिकृत किया गया। सादूलसिंह के बहिर्गमन की देश भर के समाचार पत्रों में प्रशंसा हुई। उन्हें राष्ट्रभक्त राजा घोषित किया गया। सरदार पटेल तथा अनेक कांग्रेसी नेताओं ने भी उनकी देशभक्ति की प्रशंसा की। लियाकतअली खां ने आरोप लगाया कि महाराजा ने बहिर्गमन का निर्णय कांग्रेस के दबाव में आकर लिया। सादूलसिंह ने इसका खण्डन किया।

    भोपाल नवाब द्वारा शासकों का आह्वान

    भोपाल नवाब ने राजाओं को संविधान सभा में भाग लेने से रोकने के लिये अंतिम प्रयास किया तथा राजाओं से अपील की कि वे नरेंद्र मण्डल की सामान्य सभा में पारित किये गये प्रस्ताव पर दृढ़ रहें। नवाब ने पटियाला महाराजा से अपील की कि नरेंद्र मण्डल के सदस्यों को व्यक्तिगत भेद भुलाकर, नरेंद्र मण्डल में पारित किये गये प्रस्तावों पर कार्यवाही करनी चाहिये। इस पर पटियाला नरेश ने कहा कि किसी भी सदस्य शासक के लिये नरेंद्र मण्डल के निर्णयों को मानना बाध्यकारी नहीं है। सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के विरुद्ध हैदराबाद, मैसूर, कश्मीर, बड़ौदा, त्रावणकोर, कोचीन, पटियाला, जोधपुर तथा जयपुर ने घोषणा की कि वे इस सम्मेलन में आगे भाग नहीं लेंगे।

    राजाओं द्वारा संविधान सभा में भाग लिये जाने की घोषणा

    10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा की। 18 अप्रेल 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद के आठवें अधिवेशन में राजाओं को चेतावनी दी कि जो राजा इस समय संविधान सभा में सम्मिलित नहीं होंगे उन्हें देश का शत्रु समझा जायेगा और उन्हें इसके दुष्परिणाम भोगने होंगे। लियाकत अली ने राजाओं का आह्वान किया कि वे नेहरू की धमकियों में न आयें।

    28 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, कोचीन, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर तथा बीकानेर के प्रतिनिधियों ने संविधान सभा में अपना स्थान ग्रहण कर लिया। बीकानेर राज्य के प्रतिनिधि के रूप में के. एम. पन्निकर ने विधान निर्मात्री समिति में अपना स्थान ग्रहण किया। जयपुर की ओर से 3 सदस्य नियुक्त किये गये जिनमें से एक हीरालाल शास्त्री थे। यह नरेंद्र मण्डल द्वारा बनाये गये यूनाईटेड फ्रंट की समाप्ति की शुरुआत थी। इसके बाद एक-एक करके राज्यों ने संविधान सभा में प्रवेश कर लिया। जुलाई 1947 में अन्य 37 रियासतों के प्रतिनिधि भी संविधान सभा में सम्मिलित हो गये।

    वायसराय द्वारा राज्यों की स्थिति पर विचार

    नेहरू तथा कांग्रेस का मानना था कि भारतीय रियासतें केवल मध्यकालीन सामंतवाद के ऐतिहासिक चिह्न हैं। इनकी वर्तमान परिस्थिति से संगति नहीं होती। समाज और राजनीति की वर्तमान स्थिति में इनका कोई स्थान नहीं है। इसलिये कांग्रेस रजवाड़ों को समाप्त करने के पक्ष में थी किंतु अंग्रेजों ने रजवाड़ों के माध्यम से ही देश में लगभग 200 वर्षों तक अपनी राजसत्ता को बनाये रखा था इसलिये वे रजवाड़ों के साथ किसी तरह का धोखा नहीं करना चाहते थे। वे देश छोड़ने से पहले रजवाड़ों को अधिकतम संभव स्तर तक संतुष्ट करना चाहते थे। इसलिये वायसराय द्वारा रजवाड़ों की स्थिति को लेकर कई तरह के प्रस्तावों पर विचार किया गया। उनमें से एक यह भी था कि ब्रिटिश सरकार सत्ता के हस्तांतरण के बाद भी कुछ निश्चित रियासतों पर अपनी परमोच्चता बनाये रखे किंतु ऐसा करना असंभव प्रायः ही था। ऐसा करने से यही प्रतीत होता कि ब्रिटेन भारत में अपनी टांग अड़ाये रखना चाहता है तथा ऐसा करके वह एक कमजोर एवं खण्ड-खण्ड भारत का निर्माण करना चाहता है। ऐसी स्थिति में यह भी संभव था कि आगे चलकर ब्रिटिश संरक्षित रजवाड़ों तथा भारत एवं पाकिस्तान की सरकारों के मध्य युद्ध हों।

    ब्रिटिश सरकार इतना ही कर सकती थी कि रजवाड़ों को मजबूत बनाये ताकि जब उत्तराधिकारी सरकार के साथ रजवाड़ों के समझौते हों तो रजवाड़े अपने लिये अधिक से अधिक सुविधायें ले सकें। ऐसा करने के लिये एक ही उपाय दिखाई पड़ता था कि रजवाड़ों पर से परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये, उसे किसी अन्य सरकार को नहीं सौंपा जाये। जब स्वतंत्रता पर विचार-विमर्श चल रहे थे, तब ब्रिटिश शासकों के पास इस बात पर विस्तार से विचार करने के लिये वास्तव में कोई समय नहीं था कि जब सत्ता का अंतिम रूप से स्थानांतरण हो जाये तब राजाओं को किस तरह से कार्य करना चाहिये किंतु पूरी ब्रिटिश सरकार इस बात पर सुस्पष्ट थी कि देशी रजवाड़ों पर से परमोच्चता का हस्तांतरण किसी अन्य सरकार को नहीं किया जाना चाहिये क्येांकि 1946 में कैबिनेट मिशन यह आशा एवं अपेक्षा प्रकट कर चुका था कि समस्त राज्य प्रस्तावित भारत संघ के साथ मिल जायेंगे।

    परमोच्चता के विलोपन की तैयारियां

    अप्रेल 1947 के द्वितीय सप्ताह में राजनीतिक अधिकारियों एवं रेजीडेंटों की एक बैठक बुलाई गयी ताकि परमोच्चता की समाप्ति के सम्बन्ध में की जाने वाली कार्यवाही पर विचार किया जा सके। राज्य सचिव ने वायसराय को परमोच्चता में ढील देने की नीति को इस शर्त के साथ कार्यान्वित करने के अधिकतम विवेकाधिकार प्रदान कर दिये थे कि संचार तथा प्रतिरक्षा के मामले में भारत की एकता खतरे में न पड़े तथा 1947 के अंत तक परमोच्चता का अधिकतम संभावित विलोपन किया जा सके। बैठक को बुलाने का उद्देश्य यह भी था कि राज्यों को अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम बनाया जा सके, उन्हें एक साथ रहने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके तथा वे ब्रिटिश सरकार के साथ पूर्ण सहयोग करें। राजनीतिक अधिकारियों एवं रेजीडेंटों की बैठक में प्राप्त सुझावों के आधार पर राजनीतिक विभाग ने 10 बिंदु तैयार किये जिन पर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड लिस्टोवल से विचार विमर्श किया गया।

    ये बिंदु मुख्यतः प्रशासनिक विषयों से सम्बद्ध थे जो कि परमोच्चता की समाप्ति, राजनीतिक अधिकारियों तथा उनके कार्मिकों की निकासी, रेजीडेंसियों के हस्तांतरण, दस्तावेजों के निस्तारण, नई बनने वाली औपनिवेशिक सरकारों से संपर्क बनाने के लिये किये जाने वाले अंतरिम प्रबंध तथा रेलवे, डाक सेवा, टेलिग्राफ सेवा एवं मुद्रा आदि के सम्बन्ध में यथास्थिति समझौतों (Standstill Agreements) से सम्बन्धित थे। पोलिटिकल एजेंटों को शरद काल तक एवं रेजीडेंटों को 1947 के अंत तक राज्यों से हटाने तथा राजनीतिक विभाग के कर्त्तव्यों को मार्च 1948 तक पूरा कर लेने का कार्यक्रम बनाया गया। राजनीतिक विभाग द्वारा यह कदम उठाया जाना भी प्रस्तावित किया गया कि क्राउन रिप्रजेंटेटिव पुलिस फोर्स (सी. आर. पी. एफ.) को विभिन्न राज्यों को सौंप दिया जाना चाहिये। इस बल का रख रखाव भारत सरकार के राजस्व से राजनीतिक विभाग द्वारा किया जाता था। बैठक राज्यों और ब्रिटिश भारत के मध्य चुंगी, नमक, अफीम, कर, डाक, तार तथा ऐसे ही अन्य आर्थिक महत्त्व के मुद्दों पर किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकी।

    माउंटबेटन योजना को स्वीकृति

    माउंटबेटन ने सत्ता के हस्तांतरण के लिये अपने चीफ ऑफ स्टाफ लॉर्ड इस्मे तथा जॉर्ज एबेल से भारत विभाजन पर आधारित एक योजना तैयार करवानी आरंभ की। इसे माउंटबेटन योजना तथा इस्मे योजना भी कहा जाता है। इस योजना को बनाने में अंग्रेज अधिकारियों को लगाया गया। भारतीयों को यहाँ तक कि मेनन को भी इससे पूरी तरह अलग रखा गया। वायसराय को आशंका थी कि मेनन के हिंदू होने के कारण मुसलमान आपत्ति करेंगे। नीति विषयक प्रश्न पहले से ही कैबीनेट मिशन द्वारा निर्धारित कर दिया गया था जो कि योजना में जोड़ा जाना था। भारत की आजादी की योजना के सम्बन्ध में माउंटबेटन व उनके सलाहकार पहले से ही निश्चित थे जो वे अपने साथ लेकर आये थे।

    2 मई 1947 को लॉर्ड इस्मे तथा जार्ज एबेल भारत विभाजन का प्रस्ताव लेकर वायसराय के विशेष विमान से लंदन गये ताकि उस प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल की सहमति प्राप्त की जा सके। इंगलैण्ड भेजने से पहले यह योजना किसी भी भारतीय नेता अथवा अधिकारी को नहीं दिखायी गयी। उन्हें योजना का केवल ढांचा ही बताया गया। माउंटबेटन का विश्वास था कि योजना में वे सब बातें सम्मिलित कर ली गयी हैं जो नेताओं से हुए विचार विमर्श के दौरान सामने आयीं थीं। माउंटबेटन ने एटली सरकार को विश्वास दिलाया कि जब योजना भारतीय नेताओं के समक्ष रखी जायेगी, वे इसे स्वीकार कर लेंगे।

    इस्मे के साथ इंग्लैण्ड भेजी गयी योजना कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों पर ही आधारित थी जिसमें कहा गया था कि पार्टी के नेताओं की सहमति के बिना ही प्रांतों को सत्ता हस्तांतरित कर देनी चाहिये और केन्द्र में मजबूत केंद्रीय सरकार के स्थान पर एक संघ होना चाहिये। यदि किसी प्रांत की जनता चाहे तो भारत और पाकिस्तान में से किसी के भी साथ मिलने से इंकार करके अपने प्रांत को स्वतंत्र राज्य बना सकती है। माउंटबेटन का तर्क था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान। प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये स्वतंत्र रहे। जो पाकिस्तान में मिलना चाहे, पाकिस्तान में मिले। जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। ऐसा बंगाल की स्थिति को देखते हुए किया गया था क्योंकि आबादी के अनुसार पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में तथा पश्चिमी बंगाल को भारत में सम्मिलित होना था।

    नेहरू द्वारा आपत्ति

    7 मई 1947 को वायसराय ने योजना वी. पी. मेनन को दिखायी। मेनन ने योजना को देख कर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की क्योंकि इससे भारत के छिन्न भिन्न हो जाने की पूरी संभावना थी। 10 मई 1947 को लंदन से इस्मे योजना मंत्रिमंडल की स्वीकृति के साथ तार से वापस आ गयी। एटली और उनके मंत्रिमंडल की सलाह पर उसमें कई संशोधन किये गये थे किंतु मूल योजना ज्यों की त्यों थी। वायसराय ने अपने प्रेस सलाहकार कैम्पबेल जॉनसन से अखबारों में विज्ञप्ति प्रकाशित करवायी कि 17 मई को दिल्ली में एक महत्त्वपूर्ण बैठक होगी जिसमें भारतीय नेताओं को बुलाया जायेगा और वायसराय नेताओं के सामने भारतीयों को सत्ता सौंपने की योजना प्रस्तुत करेंगे जिसे ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति मिल चुकी है।

    10 मई को वायसराय ने मंत्रिमंडल से स्वीकृत योजना नेहरू को दिखाईं नहेरू इस योजना को पढ़कर गुस्से से भर गये और यह कहते हुए उन्होंने योजना मेज पर रख दी कि इससे काम नहीं चलेगा। इस तरह की योजना को मैं नहीं मान सकता, इस तरह की योजना कांग्रेस नहीं मान सकती और इस तरह की योजना को भारत भी नहीं मान सकता। योजना में एक ओर तो देशी रियासतों को अपनी मर्जी से भारत या पाकिस्तान में मिलने अथवा स्वतंत्र रहने की छूट दे दी गयी थी तो दूसरी ओर ब्रिटिश प्रांतों को भी इन दोनों देशों से अलग रहकर कोई स्वतंत्र देश बना लेने की छूट दे दी गयी थी। नेहरू तुरंत समझ गये कि जो सुविधा केवल बंगाल की प्रजा को ध्यान में रखकर प्रस्ताव में सम्मिलित की गयी है, उसका लाभ देश के समस्त रजवाड़े उठाना चाहेंगे। देश की एकता में अनेकानेक छिद्र पड़ जायेंगे उनमें से भारत का रक्त रिस-रिस कर बहेगा।

    योजना का पुनर्निर्माण

    माउंटबेटन ने वी. पी. मेनन से इस योजना को नये सांचे में ढालने को कहा। मेनन को निर्देश दिये गये कि विभाजन का मुद्दा ज्यों का त्यों रहेगा। शेष मुद्दों को चाहे जिस रूप में बदल दिया जाये किंतु सर्वोपरि भावना यह रहे कि प्रांतों को भारत अथवा पाकिस्तान किसके साथ जुड़ना है, इसका फैसला जनता के हाथ में हो। प्रांतीय विधान सभाओं के माध्यम से जनता अपना फैसला सामने रख सकती है। मेनन ने देश के विभाजन पर एक वैकल्पिक योजना प्रस्तुत की और इस पर पटेल का समर्थन प्राप्त किया। वायसराय ने कैम्पबेल जॉनसन से अखबारों में विज्ञप्ति दिलवाई कि चूंकि लंदन में संसद की बैठक समाप्त होने वाली है इसलिये बैठक की तिथि 17 मई से बढ़ाकर 2 जून कर दी गयी है। वायसराय ने लंदन तार भिजवाया जिसमें प्रधानमंत्री मि. एटली से कहा गया कि आपके द्वारा स्वीकृत योजना को रद्द समझा जाये। संशोधित योजना भिजवायी जा रही है।

    माउंटबेटन की भारत विभाजन योजना पर लंदन की प्रथम प्रतिक्रिया विपरीत थी। इसलिये माउंटबेटन से कहा गया कि वे लंदन आयें। इसलिये वे 14 मई को इंगलैण्ड गये। 15 मई को भारतीय पत्रकार कातियाल ने हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक दुर्गादास को केबल से सूचित किया कि लेबर सरकार को भारत विभाजन की योजना स्वीकार नहीं है इसलिये माउंटबेटन को लंदन बुलाया गया है तथा कोरफील्ड, जैन्किंस एवं एबेल को हटाये जाने पर भी जोर दिया जा रहा है। माउंटबेटन ने इंगलैण्ड पहुंचकर संशोधित योजना प्रधानमंत्री एटली के सामने रखी और कहा कि संशोधित योजना को कांग्रेस अवश्य स्वीकार कर लेगी। प्रधानमंत्री एटली ने इस नयी योजना को केवल पाँच मिनट की बहस के बाद स्वीकार कर लिया। धैर्य, विलक्षण योजना और असाधारण लचीलेपन के कारण मेनन अपनी योजना स्वीकृत करवा सके। सरदार पटेल तो हमेशा परदे के पीछे थे ही। प्रधानमंत्री की सलाह पर माउंटबेटन ने योजना चर्चिल के समक्ष रखी और बताया कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को कॉमनवैल्थ की सदस्यता ग्रहण करने के लिये सहमत कर लिया गया है। चर्चिल चाहते थे कि कॉमनवैल्थ के माध्यम से ही सही किंतु इंगलैण्ड और भारत के सम्बन्ध बने रहने चाहिये। उन्होंने योजना को स्वीकृति दे दी।

    2 जून की बैठक

    2 जून 1947 को माउंटबेटन ने भारतीय नेताओं को अपने निवास पर आमंत्रित किया और उन्हें योजना की प्रतिलिपियां सौंप दीं। उसी दिन वायसराय ने इस योजना पर भोपाल नवाब तथा बीकानेर महाराजा की प्रतिक्रयाओं को जांचा। बीकानेर महाराजा ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि योजना में दोनों देशों को उपनिवेश का दर्जा दिया जायेगा जिससे ब्रिटिश ताज से सतत सम्बन्ध बना रहेगा। इस प्रावधान के कारण राजाओं पर संविधान सभा में सम्मिलित होने के लिये अच्छा प्रभाव पड़ेगा। नवाब की प्रतिक्रिया थी कि सरकार ने शासकों को मंझधार में छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि हम कैबीनेट योजना के तहत कमजोर केंद्र में सम्मिलित हो सकते थे किंतु इस योजना के तहत हमें मजबूत केंद्र में सम्मिलित होना पड़ेगा। चाहे हम किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित हों, वह हमें बुरी तरह नष्ट कर देगा।

    2 जून की प्रातः ए. पी. आई.द्वारा एक प्रमुख कांग्रेसी नेता के हवाले से समाचार पत्रों में टिप्पणी प्रकाशित हुई कि एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने राजाओं को चेतावनी दी है कि वे भारत की स्वतंत्रता के विरुद्ध न जायें। यह उनके लिये खतरनाक होगा। उन्हें कुछ ही महीनों में बिना कोई गोली चलाये नष्ट कर दिया जायेगा। इस नेता के हवाले से कह गया कि राज्यों में लोकप्रिय आंदोलन एवं आर्थिक दबाव राज्यों के अलगाव को नष्ट कर देंगे। उसी शाम महात्मा गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में राजाओं का आह्वान किया कि वे और अधिक विभाजन उत्पन्न न करें तथा संविधान सभा में भाग लें। उन्होंने त्रावणकोर द्वारा स्वतंत्रता दिवस के दिन हड़ताल रखने की घोषणा पर खेद व्यक्त किया।

    संविधान वार्त्ता समिति के सदस्यों के साथ बैठक

    3 जून को वायसराय ने राज्य संविधान वार्त्ता समिति के सदस्यों से वार्त्ता की तथा योजना का खुलासा किया। बैठक में राजनीतिक सलाहकार सर कोनार्ड कोरफील्ड, लॉर्ड इस्मे तथा सर एरिक मेविली भी उपस्थित थे। वायसराय ने सदस्यों को देश के विभाजन पर हुई वार्ताओं का ब्यौरा बताया तथा स्पष्ट किया कि राज्यों पर इस नवीन योजना का प्रभाव दो तरफा होगा। पहला तो यह कि दो नये बनने वाले उपनिवेशों में पूर्व में प्रस्तावित ढुलमुल केंद्र के बनने की संभावना नहीं है तथा दूसरा यह कि दो विलग उपनिवेश ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के सदस्य होंगे, जिनके माध्यम से कॉमनवैल्थ में राज्यों का प्रतिनिधित्व होगा जो कि ब्रिटेन के पुराने सहयोगी एवं मित्र हैं। योजना की प्रतियाँ सदस्यों में बांट दी गयीं तथा सामान्य विचार विमर्श आरंभ हुआ। कोरफील्ड ने कहा कि कई राज्य परमोच्चता को सत्ता हस्तांतरण के समय तक बने रहना देखना चाहते हैं। नवाब भोपाल ने भी इस शर्त के साथ कोरफील्ड के विचार से सहमति दर्शायी कि नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति इस विषय पर कोई भी रुख अपना सकती है। कोरफील्ड ने कहा कि परमोच्चता पहले से ही संकुचन की प्रक्रिया में है।

    बड़ौदा के दीवान बी. एल. मित्तर ने पूछा कि परमोच्चता की समाप्ति के बाद आर्थिक एवं वाणिज्यिक समझौतों का क्या होगा? वायसराय ने उत्तर दिया कि परमोच्चता की समाप्ति तथा नवीन समझौतों के निष्पादन के मध्य के अंतराल के लिये अंतरिम समझौते किये जाने की आवश्यकता होगी तथा किसी तरह की प्रशासनिक रिक्तता नहीं होगी। ये अंतरिम समझौते यथास्थिति के आधार पर होंगे तथा ब्रिटिश ताज के द्वारा राज्यों को पूर्ण अधिकार लौटा दिये जाने के कारण उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन किये जायेंगे। वायसराय तथा पोलिटिकल विभाग शेष संक्षिप्त काल के लिये राज्यों की सहायता करेंगे।

    बैठक में कोरफील्ड ने कुछ उदाहरण दिये कि यथास्थिति के आधार पर किस प्रकार के अंतरिम प्रबंधन किये जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब केंद्र सरकार नमक कर समाप्त करने का निर्णय करेगी तो वह इस बात का भी ध्यान रखेगी कि वर्तमान समझौते की शर्तों के अनुसार उस समय तक के लिये राज्यों को कितना भुगतान किया जाना है जब तक कि नयी अंतरिम व्यवस्था लागू नहीं हो जाती है। यह यथास्थिति के आधार पर की जाने वाली व्यवस्था का एक उदाहरण था। इसी प्रकार उन्होंने डाक व तार की व्यवस्थाओं के उदाहरण भी दिये। उन्होंने कहा कि जब परमोच्चता की समाप्ति हो जायेगी तो राज्य साम्राज्यिक डाक घर के पोस्टमास्टर को बंदी बनाने के लिये भी स्वतंत्र होंगे। यद्यपि ऐसा करके वे शेष भारत के संचार से कट जायेंगे। अतः उन्हें इस बात पर सहमत होना चाहिये कि वे पोस्ट ऑफिस को निरंतर काम करने दें। अगला उदाहरण रेलवे तथा सैनिक छावनियों का था जहाँ क्राउन प्रतिनिधि का कार्यक्षेत्र अभी भी बना हुआ था। परमोच्चता की समाप्ति के बाद ये राज्यों को लौटा दी जायेंगी किंतु अंतरिम सरकार से कहा जायेगा कि वे रेलवे तथा सैनिक छावनियों को बने रहने देने के लिये राज्यों के साथ नये समझौते करें।

    जयपुर के दीवान सर वी. टी. कृष्णामाचारी ने वर्तमान समझौतों के बारे में संयुक्त विचार विमर्श करने के लिये एक तंत्र स्थापित किये जाने की वकालात की। कोरफील्ड ने कहा कि एक सूत्र (formula) ढूंढने के प्रयास किये गये हैं जो यथास्थिति समझौते में समाविष्ट किया जायेगा। यदि ये प्रयास सफल रहते हैं तो नये समझौतों के लिये संयुक्त विचार विमर्श की या तो प्रत्येक संविधान सभा में व्यवस्था की जायेगी या फिर एक तदर्थ समझौता वार्त्ता समिति की व्यवस्था की जायेगी। बिलासपुर के राजा ने पूछा कि क्या किसी भी उपनिवेश में प्रवेश करने के लिये राज्यों को पूर्ण छूट होगी? इस पर वायसराय ने कहा कि हाँ।

    बिलासपुर के राजा ने पूछा कि उन राज्यों का क्या होगा जो दोनों में से किसी भी संविधान सभा में भाग नहीं लेंगे? क्या सरकार उन राज्यों से आगे भी सम्बन्ध बनाये रखेगी? इस पर वायसराय ने कहा कि जब तक यह निश्चित नहीं हो जाता कि दोनों उपनिवेशों की वास्तविक आकृति क्या होगी, तब तक यह एक काल्पनिक प्रश्न है तथा इस समय वे इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं हैं किंतु इतना निश्चित है कि राज्यों को प्रशासनिक व्यवस्थाओं के सम्बन्ध में ब्रिटिश भारत में बनने वाली किसी एक अथवा दूसरी अथवा दोनों उत्तराधिकारी सरकारों के साथ समझौता वार्त्ता करने के लिये कदम उठाना ही होगा। कोई राज्य किसी एक उपनिवेश में सम्मिलित हो अथवा नहीं किंतु भौगोलिक एवं आर्थिक कारणों से नये प्रबंध करने आवश्यक होंगे। वायसराय ने शासकों को स्पष्ट किया कि जो राज्य स्वतंत्र रहने का निर्णय लेंगे, उन्हें उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जायेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्यों की समझौता वार्त्ता समिति को अगले दो या तीन माह तक समस्याओं के मुख्य सिद्धांतों पर निरंतर विचार विमर्श करते रहना चाहिये। सर सी. पी. रामास्वामी ने आपत्ति की कि समझौता वार्त्ता समिति में राज्यों के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं है, इसलिये यह समिति इस कार्य को नहीं कर सकती।

    माउंटबेटन ने सुझाव दिया कि दोनों संविधान सभाओं से समझौता वार्त्ता करने के लिये दो अलग-अलग समझौता वार्त्ता समितियां होनी चाहिये। इस पर भोपाल नवाब ने कहा कि वे इस प्रस्ताव को नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति के समक्ष रखेंगे तथा वहाँ हुए निर्णय से वायसराय को अवगत करा देंगे। वायसराय ने कहा कि जिन राजाओं को किसी भी संविधान सभा में सम्मिलित होने अथवा न होने के विषय में संदेह है उन्हें वे आधिकारिक रूप से कोई सलाह नहीं देना चाहते कि उन्हें क्या कदम उठाने चाहिये किंतु यदि कोई शासक व्यक्तिगत रूप से उनकी राय जानना चाहे तो वह पूछ सकता है। बैठक के अंत में वायसराय ने राजाओं के मंतव्य की दुबारा जांच की। इसमें यह बात उभर कर आयी कि राजाओं को सर्वाधिक चिंता इस बात की थी कि क्या इस बात की कोई संभावना है कि परमोच्चता की समाप्ति, वास्तविक सत्ता के हस्तांतरण से पूर्व कर दी जाये ताकि वे उत्तराधिकारी सरकारों के साथ बरबारी के स्तर पर समझौता वार्ताएं कर सकें।

    रेडियो पर घोषणा

    3 जून 1947 को शाम सात बजे वायसराय तथा भारतीय नेताओं ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिये जाने तथा अंग्रेजों द्वारा भारत को शीघ्र ही दो नये देशों के रूप में स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा की। इस रेडियो प्रसारण में सरकार की ओर से जो वक्तव्य दिया गया उसमें 20 बिंदु सम्मिलित किये गये। इनमें से केवल एक बिंदु राज्यों के सम्बन्ध में था जिसमें कहा गया कि इस प्रसारण में घोषित निर्णय ब्रिटिश भारत के सम्बन्ध में हैं। भारतीय राज्यों के बारे में सरकार की नीति कैबीनेट मिशन के 12 मई 1946 के मैमोरेण्डम के अनुसार ही रहेगी, उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया गया है।

    स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा

    4 जून को भारत विभाजन की योजना पर विस्तार से जानकारी देने के लिये लॉर्ड माउंटबेटन ने एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया और उसमें भारतीय स्वतंत्रता की तिथि 15 अगस्त घोषित कर दी। 15 अगस्त की तिथि को इसलिये चुना गया क्योंकि उस दिन मित्रराष्ट्रों के समक्ष जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ थी। अनेक ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि यदि भारत को आजादी 15 अगस्त को मिली तो देश में बाढ़, तूफान, दंगे सूखे तथा अकाल का प्रकोप बड़े पैमाने पर होगा। अतः देश अंग्रेजों की गुलामी एक दो दिन और सह ले। इस कारण देश की आजादी की तिथि 15 अगस्त रखते हुए उसे 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्रि कर दिया गया।

    नरेंद्र मण्डल के भंग होने की घोषणा

    जैसे ही वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता की योजना घोषित की, नवाब भोपाल ने चांसलर के पद से त्यागपत्र दे दिया तथा वायसराय को सूचित किया कि भोपाल राज्य अब नरेंद्र मण्डल तथा उसकी किसी भी अधीनस्थ संस्था से कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा। इस पर प्रो-चांसलर पटियाला महाराजा को नरेंद्र मण्डल का नया चांसलर बनाया गया। वास्तविकता यह थी कि भारत की स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा के साथ ही नरेंद्र मण्डल बिखर चुका था। वास्तविकता को पहचानते हुए नरेंद्र मण्डल की स्थायी समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि परमोच्चता की समाप्ति के साथ ही नरेंद्र मण्डल भी स्वतः भंग हो जायेगा।

    कांग्रेस अधिवेशन में भारत विभाजन प्रस्ताव को स्वीकृति

    14 जून 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन में देश के विभाजन का प्रस्ताव रखा गया। कांग्रेस के कई नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया किंतु नेहरू, पटेल, गोविंदवल्लभ पंत तथा गांधीजी ने विभाजन के पक्ष में भाषण दिये। जब प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो प्रस्ताव के पक्ष में 29 तथा विरोध में 157 मत आये, 32 मतदाता तटस्थ रहे।

    माउंटबेटन योजना पर प्रतिक्रियाएं

    नेहरू का यह विचार था कि यदि उन परिस्थितियों में मुस्लिम लीग भारत में रहने का फैसला करती तो वह एक बहुत कमजोर भारत होता। उसमें विखण्डन के कई तत्व मौजूद होते। हमारे पास शीघ्र स्वतंत्रता प्राप्त करने का और कोई रास्ता भी मौजूद नहीं था। हमें एक मजबूत भारत बनाना था। यदि दूसरे उसमें नहीं रहना चाहते थे तो हम कैसे और क्यों किसी को उसमें बने रहने के लिये दबाव डाल सकते थे? बहुत से लोगों का आरोप है कि कांग्रेसी नेताओं को आजादी का फल प्राप्त करने की शीघ्रता थी। जब कांग्रेसी नेताओं ने तीस वर्ष के संघर्ष के साथ प्रतीक्षा की थी तो क्या वे माउंटबेटन योजना को अस्वीकार करके कुछ दिन और भारत की आजादी की प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे ताकि आजादी और देश की एकता दोनों को हासिल किया जा सके? जैसा कि गांधीजी ने सुझाव दिया था।

    उन दिनों जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में थे। एक संध्या को उन्होंने कर्नल महाराज प्रेमसिंह जो रिश्ते में जोधपुर नरेश के चाचा थे, से पूछा कि गांधी, पटेल और नेहरू ने यह क्या किया? क्या उनकी बुद्धि उन्हें तलाक दे गयी? इस पर प्रेमसिंह ने जवाब दिया कि अन्नदाता! नेताओं की बुद्धि कहीं नहीं गयी है। वे बहुत चालाक हैं। नेहरू व पटेल ने सोचा कि कुर्सी हाथ से नहीं चली जाये और गांधीजी ने सोचा कि चेले हाथ से नहीं निकल जायें। प्रेमसिंह की सही व रोचक समीक्षा से महाराजा हँस पड़े।

    कांग्रेस द्वारा परमोच्चता की नयी परिभाषा

    कांग्रेस परमोच्चता को राजाओं पर शासन करने के लिये ब्रिटिश सत्ता द्वारा सृजित उपकरण मानती थी तथा उसने परमोच्चता के मामले पर कभी भी ब्रिटिश दृष्टिकोण से सहमति नहीं दिखायी। इतिहासकारों की दृष्टि में परमोच्चता का विचार ब्रिटिशों द्वारा अनुभव की फैक्ट्री में गढ़ा गया एक मौलिक राजनीतिक विचार था। जब कांग्रेस ने भारत की आजादी की मांग की तो ब्रिटिश अधिकारियों ने परमोच्चता के अधिकार को कांग्रेस के विरुद्ध प्रयुक्त किया। 14 जून 1947 को दिल्ली में कांग्रेस कमेटी की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि कांग्रेस, परमोच्चता के अर्थ पर ब्रिटिश सरकार से सहमत नहीं। परमोच्चता के समाप्त हो जाने पर भी रजवाड़ों और हिंदुस्तान के सम्बन्ध में कोई अंतर नहीं पड़ता। किसी भी राज्य को अपनी स्वतंत्रता घोषित करने का अधिकार नहीं है। न अपने आप को शेष भारत से अलग रखने का। ऐसा करना देश के इतिहास तथा भारतीय जनता के उद्देश्यों के विपरीत होगा। परमोच्चता के समाप्त हो जाने से राज्यों की सुविधायें, अधिकार तथा आभारों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही भारत सरकार तथा राज्यों के सम्बन्ध समाप्त होंगे।

    जिन्ना ने परमोच्चता के सम्बन्ध में कांग्रेस द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत का विरोध किया तथा घोषणा की कि न तो ब्रिटिश सरकार, न ब्रिटिश संसद, न कोई अन्य शक्ति राज्यों को उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर सकती है और न उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार है। कोरफील्ड भी कांग्रेस के तर्क से सहमत नहीं थे।

    भारतीय स्वतंत्रता विधेयक में भारतीय रियासतों हेतु किये गये प्रावधान

    वायसराय के सलाहकारों की एक बैठक में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक की धारा 7 में भारतीय रियासतों के सम्बन्ध में किये गये प्रावधानों पर विचार विमर्श किया गया। इस धारा में कहा गया था कि राज्यों के भारत में सम्मिलन के ठीक पहले, किसी क्षेत्र में शांति अथवा अच्छे शासन की, सम्राट की सरकार की कोई जवाबदेही नहीं होगी। भारतीय राज्यों पर सम्राट की संप्रभुता समाप्त हो जायेगी तथा जिस दिन यह अधिनियम पारित होगा उसी दिन सम्राट तथा विभिन्न राज्यों के मध्य की गयी समस्त संधियां एवं व्यवस्थायें, सम्राट द्वारा भारतीय रियासतों में किये जाने वाले कार्य, सम्राट के समस्त दायित्व तथा शक्तियां, प्राधिकार या अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जायेंगे।

    आदिवासी क्षेत्र में कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ सम्राट द्वारा अनुदान, अनुग्रह तथा अनुकंपा के सम्बन्ध में की गयी संधियां, सम्राट की कोई भी शक्ति, प्राधिकार या अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जायेंगे। कांग्रेसी नेताओं ने अनुभव किया कि विधेयक में राज्यों के सम्मिलन के सम्बन्ध में कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं किये गये हैं। वे चाहते थे कि धारा 2 में इस आशय का प्रावधान किया जाये। समझा जाता है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा यह मान लिया गया था कि राज्यों के सम्मिलन के लिये भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत कार्यवाही कर ली जायेगी तथा नये अधिनियम में इसके लिये किसी तरह का प्रावधान करने की आवश्यकता नहीं है। अनुच्छेद 5 में परमोच्च्ता की समाप्ति के संदर्भ में कहा गया था कि इससे जो अधिकार तथा दायित्व पुनः राज्यों को प्राप्त हो जायेंगे, उनसे उत्पन्न अंतराल को भरने के लिये राज्यों को उत्तराधिकारी सरकारों के साथ संघीय समझौते अथवा नवीन राजनीतिक व्यवस्थायें करनी पड़ेगी किंतु परमोच्चता की तिथि जून 1948 से खिसककर अगस्त 1947 हो जाने से नवीन समझौते किये जाने संभव नहीं हैं। नवीन समझौतों में वैयक्तिक विचार विमर्श में कई पक्ष होंगे। राज्यों की संख्या अधिक होने के कारण यह काफी लम्बा एवं परिश्रम वाला कार्य होगा। इसलिये कांग्रेस ने प्रस्ताव किया कि जब तक नयी व्यवस्थाएं न हो जायें, यथास्थिति बने रहने का प्रावधान विधेयक में होना चाहिये जिसके अनुसार ब्रिटिश ताज तथा विभिन्न राज्यों के मध्य समान हितों वाले जो समझौते तथा प्रबंध किये गये थे वे नयी सरकारों तथा राज्यों के मध्य बने रहेंगे। मुस्लिम लीग को धारा 7 के विषय में कोई आपत्ति नहीं थी।

    राज्य सचिव ने कांग्रेस से असहमति जताते हुए कहा कि इस नये प्रस्तावित प्रावधान का अर्थ होगा राज्यों में संसदीय विधान को कुछ और समय तक बनाये रखना। इस प्रस्ताव पर विकट आपत्तियां व्यक्त की गयीं। पहली आपत्ति यह कि भारतीय राज्य ब्रिटिश राज्यक्षेत्र में नहीं थे तथा उनकी प्रजा संसदीय विधान के अंतर्गत नहीं थी जिनपर उनकी सहमति के बिना दायित्व लादे जा सकें तथा इस प्रकार की सहमति को स्वतः प्रदत्त नहीं माना जा सकता था। दूसरी आपत्ति यह थी कि राज्य सचिव ब्रिटिश भारत में सत्ता हस्तांतरण की एक तिथि तथा रियासती भारत में परमोच्चता समाप्ति की दूसरी तिथि नहीं दे सकते थे। इसके अतिरिक्त राज्यों ने कैबीनेट मिशन प्रस्तावों को स्वीकार करते समय यह स्पष्ट कर दिया था कि उन्होंने परमोच्चता की समाप्ति की घोषणा के आधार पर योजना के सामान्य सिद्धांत को स्वीकार किया है जिसका अनुसरण ब्रिटिश सरकार की 3 जून की घोषणा में किया गया है।

    राज्य सचिव का मानना था कि कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित प्रावधान से इस वचन का उल्लंघन होगा। वायसराय का मानना था कि बिना शर्त संधियों एवं समझौतों की समाप्ति भी राज्यों को बुरी चोट पहुँचायेगी। राज्य सचिव, राज्यों के सम्मिलन के सम्बन्ध में विशेष प्रावधान रखने के लिये तैयार हो गये। धारा 2 के अंत में एक नवीन उपधारा जोड़ी गयी- इस अनुच्छेद की उपधारा 3 की सामान्य स्थिति को अप्रभावित रखते हुए, यह अनुच्छेद भारतीय राज्यों के नवीन उपनिवेशों में सम्मिलन को बाधित नहीं करेगा। धारा 7 के अंत में राज्य सचिव एक महत्त्वहीन सा प्रावधान जोड़ने को तैयार हो गये किंतु कांग्रेसी नेता इससे संतुष्ट नहीं हुए।

    सर बी. एन. राव ने माउंटबेटन के माध्यम से प्रयास किया कि विधेयक में यह प्रावधान किया जाये कि उन 327 शासकों को जिनके कि राज्यों का औसत क्षेत्रफल 20 वर्ग मील जितना था तथा जिनकी जनसंख्या 3,000 के लगभग थी, उन्हें अपनी प्रजा को मृत्युदण्ड देने का अधिकार न मिले तथा यह अधिकार सम्बद्ध उपनिवेश के पास रहे। वायसराय ने स्थिति की गंभीरता का आकलन करते हुए भारत सचिव को सूचित किया कि मैं स्वयं यह अनुभव नहीं कर सका कि जो राजा इस समय केवल तीन माह तक की कैद की सजा दे सकते हैं वे परमोच्चता हट जाने के बाद मृत्युदण्ड भी दे सकेंगे। अतः विधेयक में से परमोच्चता की समाप्ति का प्रावधान हटा दिया जाये। भारत सचिव ने जवाब दिया कि यह संभव नहीं है क्योंकि इससे राज्यों के प्रति विधेयक की जो मंशा थी वह पूरी तरह बदल जायेगी।

    मेनन का विचार था कि कुछ महत्त्वपूर्ण समझौते ऐसे हैं जो राज्य तथा ब्रिटिश भारत के समान हितों वाले हैं तथा उन समझौतों का आधार परमोच्चता नहीं है। उदाहरण के लिये 1920 में बहावलपुर तथा बीकानेर राज्यों से सतलुज नहर परियोजना के सम्बन्ध में किया गया समझौता, जयपुर तथा जोधपुर से भारत सरकार द्वारा नमक के सम्बन्ध में किये गये समझौते। परमोच्चता की समाप्ति के बाद भी ये समझौते निरस्त नहीं होंगे। कोरफील्ड का मानना था कि भारत सरकार द्वारा राज्यों के साथ जो समझौते किये गये थे, वे ब्रिटिश ताज की तरफ से ही थे। वायसराय ने न तो मेनन के विचार का समर्थन किया और न कोरफील्ड के विचार का, उन्होंने दोनों अधिकारियों के विचार भारत कार्यालय को भेज दिये। भारत कार्यालय ने कोरफील्ड के विचार का समर्थन किया।

    कोरफील्ड का षड़यंत्र

    वायसराय के राजनीतिक सलाहकार तथा राजनीतिक विभाग के सचिव सर कोनार्ड कोरफील्ड रजवाड़ों से इस कदर प्रेम करते थे कि रजवाड़ों के हित को ही वे भारत का हित समझते थे। नेहरू और कांग्रेस के नाम से वे उतना ही खार खाते थे जितने कि स्वयं राजे-महाराजे। कोनार्ड ने स्वीकार किया है कि मुझे रियासती भारत उस दो तिहाई भारत से अधिक वास्तविक भारत दिखाई देता था जो इण्डियन सिविल सर्विस के अधीन था। कोरफील्ड ने रजवाड़ों में मची भगदड़ को रोकने के लिये रजवाड़ों को दो सलाहें दीं- एक तो यह कि वे अपने प्रशासन को उदार बनायें तथा दूसरी यह कि वे अपना संगठन मजबूत बनायें ताकि उनके राज्यों में कांग्रेस के हस्तक्षेप को रोका जा सके।

    नरेंद्र मण्डल दो धड़ों में बंट गया था इनमें से पहला धड़ा- 'राजाओं का एकीकृत मोर्चा' (UNNITED FRONT OF PRINCES) नवाब भोपाल के नेतृत्व में काम कर रहा था। इस धड़े को प्रोत्साहन देने का काम कोरफील्ड कर रहे थे। कोरफील्ड ने लंदन जाकर अपने प्रिय रजवाड़ों के हितों की रक्षा का अभियान चलाया। कोरफील्ड ने तर्क दिया कि रजवाड़ों ने अपनी शक्तियां केवल सम्राट के आगे समर्पित की हैं किसी भी अन्य व्यक्ति के आगे नहीं। फलस्वरूप सम्राट का शासन जब हटेगा तो समस्त रजवाड़ों को उनकी शक्तियां अपने आप वापस मिल जायेंगी। यह पूर्णतः रजवाड़ों पर आधारित रहना चाहिये कि वे भारत के साथ जायें या पाकिस्तान के साथ, अथवा स्वतंत्र बने रहना चाहें। भारत सचिव लिस्टोवेल ने कोरफील्ड की मान्यता को समर्थन दिया और भारत की स्वतंत्रता के विधेयक में यह प्रावधान कर दिया गया। माउंटबेटन तथा भारतीय नेताओं के लाख जोर लगाने पर भी इस प्रावधान को हटाया नहीं जा सका।

    जब माउंटबेटन भारत विभाजन की योजना मंत्रिमंडल से स्वीकृत कराने के लिये लंदन गये तो कोरफील्ड ने अपने विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिये कि वे रियासतों से सेनायें हटाने, रेल बंद करने, डाक व तार की व्यवस्था समाप्त करने आदि की कार्यवाही करें। वह देशी राज्यों और भारतीय संघ के सम्बन्धों में रिक्तता एवं व्यवधान उत्पन्न करने हेतु प्रयत्नरत थे। उन्होंने देशी राज्यों से सम्बन्धित पत्रों व फाइलों को नष्ट करने के आदेश दिये। परिणामस्वरूप बहुत सा महत्त्वपूर्ण अभिलेख जला दिया गया। कुल मिलाकर चार टन कागज नष्ट किये गये।

    कोरफील्ड के आदेश पर गोरे अधिकारियों ने आनन-फानन में उन फाइलों, रिपोर्टों, फोटोग्राफों और दस्तावेजों का लगभग चार टन वजनी ढेर जलाया जिनमें पूरे विस्तार के साथ वह ब्यौरा अंकित था जो राजा, महाराजा और नवाबों आदि की पिछली पाँच पीढ़ियों की सनकों, विलासिताओं, मक्कारियों, क्रूरताओं और यौन आनंद कार्यक्रमों इत्यादि को समेटे हुए था। देशी शासकों के रोमांचक कारनामों की अनेक सचित्र और अचित्र गाथायें विदेशी शासकों ने रस ले-लेकर गुप्त फाइलों में अंकित की थीं, न जाने इनका कब कैसा काम पड़ जाये।...........मनमौजी और मसखरे, क्रूर और कामी, न जाने कितने देशी राजाओं की कैसी-कैसी कहानियां, उन चिताओं में भस्म होकर आकाश में जा रही थीं। ऐसे अवसर कई बार आये जब देशी राजाओं और विदेशी शासकों के आपसी सम्बन्ध टूट जाने की सीमा तक तनावपूर्ण हो गये। ऐसे भी कई किस्से उन चिताओं में भस्म हुए होंगे।

    कोरफील्ड ने एटली सरकार से यह काम करने की अनुमति इस तर्क के आधार पर ली थी कि यदि हम राजाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं बना सकते तो कम से कम उनका भूतकाल तो सुरक्षित बना ही दें ताकि स्वतंत्र भारत में कोई व्यक्ति राजाओं को ब्लैकमेल न कर सके। नेहरू और पटेल तक ये समाचार पहुँचे कि राजनीतिक विभाग संपूर्ण अभिलेखों को नष्ट कर रहा है, रेजीडेंसियों को बंद किया जा रहा है तथा क्राउन फोर्सेज एवं सैन्य छावनियों को विभिन्न राज्यों को सौंपा जा रहा है। नेहरू ने इन अग्निकाण्डों पर तत्काल रोक लगाने की चेष्टा की क्योंकि इस बहाने न जाने क्या-क्या ऐतिहासिक और कीमती चीजें जलाकर खाक कर दिये जाने का खतरा था किंतु देर हो चुकी थी। पटियाला, हैदराबाद, इंदौर, मैसूर, बड़ौदा, पोरबंदर, कोचीन और नयी दिल्ली आदि अनेक स्थानों पर फाइलें जलाई जा चुकी थीं।

    ऑल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेन्स ने एक प्रस्ताव पारित करके मांग की कि राजनीतिक विभाग तथा उसके समस्त अभिकरणों को तुरंत नवीन भारत सरकार को स्थानांतरित किया जाये या राजनीतिक विभाग के कार्यों को सम्पादित करने के लिये केंद्र सरकार के अधीन एक नये विभाग की स्थापना की जाये। 13 जून को वायसराय की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें नेहरू, पटेल, कृपलानी, जिन्ना, लियाकत अली, अब्दुर राब निश्तर, सरदार बलदेवसिंह तथा कोरफील्ड उपस्थित थे। नेहरू ने इस काण्ड के लिये सीधे तौर पर कोरफील्ड को जिम्मेदार ठहरया। नेहरू ने कोरफील्ड पर देश को कलंकित करने का आरोप लगाया।

    जिन्ना ने कोरफील्ड का पक्ष लिया और नेहरू से कहा कि यदि बिना सबूत के आरोप लगाने हैं तो इस बैठक का कोई अर्थ नहीं है। कोरफील्ड के अनुसार वेकफील्ड ने योजना बनायी थी कि ऐतिहासिक महत्त्व के अभिलेखों को दिल्ली स्थिति ब्रिटिश हाईकमिश्नर के माध्यम से लंदन स्थित भारत कार्यालय को भिजवा दिया जाये तथा शासकों के व्यक्तिगत महत्त्व के प्रकरणों से सम्बन्धित अभिलेखों को नष्ट कर दिया जाये। बैठक में तय किया गया कि वे कागज जिन्हें ब्रिटिश सरकार भारत सरकार को सौंपना नहीं चाहती उन्हें जलाया नहीं जायेगा बल्कि ब्रिटिश उच्चायुक्त को सौंपा जायेगा। रजवाड़ों के सम्बन्ध में विचार करने हेतु राजनीतिक विभाग का गठन किया जायेगा।

    जिन्ना ने कहा कि मुस्लिम लीग भी एक राजनीतिक विभाग का गठन करेगी। कोरफील्ड ने आपत्ति की कि भारत की स्वतंत्रता से पहले न तो कांग्रेस और न मुस्लिम लीग ऐसा कर सकती है। क्योंकि इससे लगेगा कि आजादी से पहले की परमोच्चता राजनीतिक विभाग से नये राजनीतिक विभागों को प्राप्त हो गयी है। वायसराय ने कहा कि दो नये विभाग गठित होने चाहिये किंतु इनका नाम राजनीतिक विभाग (Political Department) न होकर रियासती विभाग (States Department) होना चाहिये। यह पूर्णतः राज्यों के ऊपर छोड़ दिया जाना चाहिये कि वे अपने प्रतिनिधि को दिल्ली भेजते हैं या कराची या फिर वे उत्तराधिकारी सरकारों के प्रतिनिधियों को अपने यहाँ बुलाते हैं।

    भारत स्वतंत्रता अधिनियम

    18 जून 1947 को भारत स्वतंत्रता विधेयक ने कानून का रूप ले लिया। इस अधिनियिम में प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार द्वारा सत्ता हस्तांतरित करने के बाद दो उपनिवेश भारत तथा पाकिस्तान अस्तित्व में आयेंगे। सत्ता हस्तांतरण की तिथि को राज्यों पर से परमोच्चता विलोपित हो जायेगी तथा राज्यों एवं ब्रिटिश ताज के मध्य समस्त संधियां एवं व्यवस्थायें भी समाप्त हो जायेंगी।

    शासकों की सरदार पटेल से भेंट

    10 जुलाई 1947 को कुछ शासकों और राज्यों के मंत्रियों ने सरदार पटेल से उनके निवास पर भेंट की। इनमें पटियाला तथा ग्वालियर के महाराजा और बीकानेर, बड़ौदा एवं पटियाला के दीवान सम्मिलित थे। पटेल ने कहा कि जो राज्य, संविधान सभा में भाग ले रहे हैं उन्हें तीन विषयों पर भारत सरकार के साथ मिल जाना चाहिये इससे वे केंद्र सरकार द्वारा बनायी जा रही नीतियों के निर्माण में प्रत्यक्षतः जुड़ जायेंगे। राजाओं और उनके मंत्रियों ने इस सुझाव का स्वागत किया। बैठक में निर्धारित किया गया कि रियासती विभाग नीति निर्धारक मामलों पर कार्य करेगा। जैसे ही केंद्रीय संविधान लागू होगा वैसे ही रियासती विभाग काम करना बंद कर देगा। तब तक यह राज्यों के मंत्रियों की सलाहकार समिति के परामर्श से कार्य करे।

    इस बैठक ने भारत सरकार एवं राज्यों के मध्य चले आ रहे गतिरोध को समाप्त कर दिया। शासकों के मन में रियासती विभाग को लेकर जो संदेह थे उनका भी समाधान हो गया। 24 जुलाई को कुछ शासकों तथा मंत्रियों ने फिर से पटेल तथा मेनन से भेंट की। इनमें पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक एवं मैसूर, जोधपुर बीकानेर के दीवान सम्मिलित थे। यह बैठक इस बात का परिचायक थी कि भारत सरकार के प्रयासों को सफलता मिलनी आरंभ हो गयी थी और शासक नवाब भोपाल के नेतृत्व को छोड़ कर पटेल तथा मेनन के साथ आ रहे थे।

    भारत विभाजन की तैयारियां

    विभाजन का काम दक्षता से निबटाने के लिये वायसराय की अध्यक्षता में विभाजन कौंसिल का गठन किया गया जिसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में एच. एम. पटेल तथा पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी मोहम्मद अली को रखा गया। उनकी सहायता के लिये बीस समितियां और उपसमितियां गठित की गयीं जिनमें लगभग सौ उच्च अधिकारियों की सेवाएं ली गयीं। इन समितियों का काम विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव तैयार करके अनुमोदन के लिये विभाजन कौंसिल के पास भेजना था। उस समय तक भारत में चुनी हुई वैधानिक संसद के अस्तित्व में नहीं होने से संविधान सभा को ही संसद तथा संविधान सभा का दोहरा दर्जा दिया गया। विभाजन से पहले भारत में जो अंतरिम सरकार चल रही थी उसमें से लॉर्ड माउंटबेटन ने दो वैकल्पिक सरकारों का निर्माण किया जो 15 अगस्त को अस्तित्व में आने वाले दोनों देशों के प्रशासन को संभाल सकें। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में सुविधापूर्ण सुधार करके भारत में ई.1947 से 1950 तक तथा पाकिस्तान में ई.1947 से 1956 तक संविधान का काम लिया गया।

    पंजाब में शांति बनाये रखने के लिये गोरखाओं की एक फौज बनायी गई जिसका नाम पंजाब बाउंड्री फोर्स रखा गया। इसमें 55 हजार सैनिकों की नियुक्ति की गयी तथा उसे पंजाब में उन स्थानों पर लगाया गया जहाँ कत्लेआम होने की सर्वाधिक संभावना थी। इस सेना ने 1 अगस्त 1947 से अपना कार्य करना आरंभ कर दिया। भारत व पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारण करने के लिये 27 जून 1947 को रैडक्लिफ आयोग का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ इंगलैण्ड के जाने माने वकील थे।

    रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुँचे। उनकी सहायता के लिये प्रत्येक प्रांत में चार-चार न्यायाधीशों के एक बोर्ड की नियुक्ति की गयी थी। इन न्यायाधीशों में से आधे कांग्रेस द्वारा व आधे मस्लिम लीग द्वारा नियुक्त किये गये थे। पंजाब के गवर्नर जैन्किन्स ने माउंटबेटन को पत्र लिखकर मांग की कि रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त से पूर्व अवश्य ही प्रकाशित कर देनी चाहिये ताकि लोगों की भगदड़ खत्म हो। भारत विभाजन समिति ने भी वायसराय से यही अपील की। आयोग की रिपोर्ट 9 अगस्त 1947 को तैयार हो गयी किंतु लॉर्ड माउंटबेटन ने उसे एक सप्ताह तक प्रकाशित नहीं करने का निर्णय लिया ताकि स्वतंत्रता दिवस के आनंद में रसभंग की स्थिति न बने। इस कारण पंजाब और बंगाल में असमंजस की स्थिति बनी रही।

    सत्ता का हस्तान्तरण

    7 अगस्त 1947 को जिन्ना ने सदा-सदा के लिये भारत छोड़ दिया और वे कराची चले गये। जिन्ना के जाने के अगले दिन सरदार पटेल ने वक्तव्य दिया कि भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र यहाँ हैं मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे। 14 अगस्त को हिन्दू एवं मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर दो देश अस्तित्व में आये। ब्रिटिश शासन के अधीन हिन्दू बहुल क्षेत्र 'भारत संघ' के रूप में तथा मुस्लिम बहुल क्षेत्र 'पाकिस्तान' के रूप में अस्तित्व में आया।

    14 अगस्त को वायसराय ने पाकिस्तान की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण दिया और पाकिस्तान के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की घोषणा की। वायसराय उसी दिन वायुयान से दिल्ली आये और मध्यरात्रि को भारत की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण देकर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की। ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त होने के तुरंत बाद भारत और पाकिस्तान के लिये एक-एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया जाना था। भारत स्वतंत्रता अधिनियम में प्रावधान किया गया था कि दोनों देश चाहें तो एक ही व्यक्ति को दोनों देशों का गवर्नर जनरल बना सकते थे।

    ऐसा माना जा रहा था कि माउंटबेटन दोनों देशों के लिये विश्वसनीय होंगे तथा दोनों देश कुछ समय के लिये उन्हें ही अपना गवर्नर जनरल बनायेंगे। भारत ने माउंटबेटन को स्वाधीन भारत का प्रथम गवर्नर जनरल नियुक्त किया किंतु पाकिस्तान में जिन्ना गवर्नर जनरल बने।

    उपरोक्त तथ्यों से स्प्ष्ट है कि भोपाल नवाब नरेंद्र मण्डल के चांसलर पद का दुरुपयोग करते हुए केन्द्र में एक मजबूत संघ का निर्माण नहीं होने देना चाहते थे। ऐसी परिस्थति में बीकानेर नरेश सादूलसिंह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर देश के राजाओं का नेतृत्व करने के लिये आगे आये और उन्होंने नवाब द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को भेद डाला। 10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां जैसे महत्त्वपूर्ण राज्यों ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा करके नवाब के मंसूबों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। शासकगण चाहते थे कि परमोच्चता की समाप्ति तुरंत हो ताकि वे अपने अधिकारों के लिये अधिक मजबूती से मोल भाव कर सकें किंतु ब्रिटिश सरकार का मानना था कि ब्रिटिश भारत के लिये सम्प्रभुता की समाप्ति तथा रियासती भारत के लिये परमोच्चता की समाप्ति की अलग-अलग तिथियां नहीं हो सकतीं। राजपूताना के राज्यों ने आजादी के द्वार पर खड़े देश के इतिहास के रुख को सदा-सदा के लिये सही दिशा में मोड़ दिया। राजपूताना के राजाओं ने इस समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उन पर भारत की संवैधानिक प्रगति का शत्रु होने का आरोप न लगे।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 47

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 47

    पाकिस्तान की सेना ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा शत्रु


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    विभाजन के समय पाकिस्तान को भारत के 17.5 प्रतिशत राजस्व स्रोत मिले जबकि सेना का 33 प्रतिशत हिस्सा मिला। अखण्ड भारत की थलसेना का 33 प्रतिशत, नौसेना का 40 प्रतिशत और हवाई सेवा का 20 प्रतिशत मिला। इस कारण ई.1948 में पाकिस्तान के पहले बजट में विशालाकाय सेना के रख-रखाव एवं वेतन-भत्तों के लिए 75 प्रतिशत हिस्सा समर्पित करना पड़ा। ....... इस विशाल सेना को नियंत्रण में रखने के लिए किसी बड़े खतरे का भय दिखाना और सेना को उस खतरे में उलझाये रखना आवश्यक था, अन्यथा यह सेना अपने ही देश के नेताओं और जनता पर कब्जा कर लेती। जबकि दूसरी ओर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष इस बड़ी सेना के बल पर पाकिस्तान पर शासन करने का सपना देखने लगे। यही कारण था कि पाकिस्तानी सेना के पहले कमाण्डर इन चीफ अय्यूब खाँ ने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत की ब्राह्मणवादी राष्ट्रीयता और अहंकार के कारण पाकिस्तान के निर्माण की जरूरत पड़ी। इसलिए पाकिस्तान की रक्षा के लिए पाकिस्तान को एक बड़ी सेना की आवश्यकता है। इस प्रकार वह पाकिस्तान की गैर-आनुपातिक सेना को कम करने की बजाए, और अधिक बढ़ाने में जुट गया।


    तख्ता पलट से बनती हैं पाकिस्तान में सरकारें

    अंतराष्ट्रीय पत्रकारिता जगत में पाकिस्तान के लिए विख्यात है कि पाकिस्तान को अल्लाह, आर्मी और अमेरिका चलाते हैं। आर्मी के वर्चस्व के कारण पाकिस्तान में सरकारों के तख्ता-पलट का लम्बा इतिहास रहा है। ई.1951 में भारत का पूर्व नौकरशाह सर गुलाम मुहम्मद पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बना। उसके कार्यकाल में ई.1954 में पाकिस्तान में प्रांतीय विधान सभाओं के लिए चुनाव हुए जिनमें सत्तारूढ़ दल बुरी तरह हार गया। इस कारण 25 दिसम्बर 1954 को गुलाम मुहम्मद ने संविधान सभा को भंग कर दिया। उसका तर्क था कि जब गवर्नर जनरल जिन्ना सूबे की विधानसभाओं को भंग कर सकते थे तो निश्चित रूप से उनके उत्तराधिकारी भी संघीय संरचनाओं को भंग कर सकते हैं। सत्ता के इस संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने मार्शल लॉ का स्वाद पहली बार तब चखा जब एक व्यापक नरसंहार के बाद देश के अहमदिया समुदाय के लोगों को खदेड़ने का अभियान शुरू हुआ।

    23 मार्च 1956 से देश में नया संविधान लागू हुआ जिसके माध्यम से पाकिस्तान ने स्वयं को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अंतर्गत मिले डोमिनियन स्टेटस से मुक्त करके इस्लामिक रिपब्लिक स्टेट घोषित कर लिया। इस संविाधान में देश के लिए संसदीय प्रणाली स्वीकार की गई तथा प्रावधान किया गया कि ई.1959 के आरम्भ में पाकिस्तानी संसद के लिए पहले आम चुनाव करवाए जाएंगे। गवर्नर जनरल का पद समाप्त करके राष्ट्रपति का पद सृजित किया गया। संसद के नेता को प्रधानमंत्री बनाना प्रस्तावित किया गया जिसे राष्ट्रपति के नीचे रहकर देश का शासन चलाना था। इससे पहले कि पाकिस्तान में आम चुनाव हों, सितम्बर 1958 में सरकार के तख्ता पलट का इतिहास तब एक बार पुनः दोहराया गया जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने पाकिस्तान के तत्कालीन संविधान को स्थगित करके प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को गद्दी से उतार दिया तथा देश में मिलिट्री शासन की घोषणा कर दी। मिर्जा द्वारा नियुक्त मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर अय्यूब खान ने 13 दिन बाद अर्थात् 7 अक्टूबर 1958 को राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा का तख्ता पलट दिया और स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। जनरल अयूब खान ने पूरे 9 साल पाकिस्तान पर शासन किया।

    1 मार्च 1962 से देश में नए संविधान की घोषणा की गई तथा पाकिस्तान को रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान घोषित किया गया। देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली स्वीकार की गई तथा मतदान के लिए अप्रत्यक्ष प्रणाली का प्रावधान किया गया। नए संविधान के तहत 2 फरवरी 1965 को पाकिस्तान में राष्ट्रपति के चुनाव करवाए गए। इन चुनावों में हुई धांधली के बाद राष्ट्रपति अयूब खान को ही फिर से राष्ट्रपति घोषित किया गया। इस प्रकार देश का शासन हमेशा के लिए सेना की छत्रछाया में चला गया। आज भी पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ही देश पर शासन करती हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जज, सेना के हाथों की कठपुतली होते हैं।

    ई.1969 में जनरल याह्या खाँ ने अयूब खाँ का तख्ता पलट दिया तथा स्वयं राष्ट्रपति बन गया। उसने ई.1970 में देश में पहले आम चुनाव करवाए किंतु चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार बनवाने में आनाकानी करता रहा। अंत में 7 दिसम्बर 1971 को नूरूल अमीन की सरकार बनी किंतु यह सरकार केवल 13 दिन ही शासन कर सकी। ई.1973 में जुल्फिकार अली भुट्टो को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई। उसने यूएनओ में वक्तव्य दिया कि वे भारत से एक हजार साल तक लड़ने के लिए तैयार हैं। भुट्टो ने अपने विश्वस्त सैनिक अधिकारी जनरल जियाउल हक को पाकिस्तानी सेना का प्रमुख बनाया किंतु उसने भुट्टो के साथ गद्दारी करके 4 जुलाई 1977 को भुट्टो को उसकी पार्टी के सदस्यों सहित गिरफ्तार करके नेशनल एसेंबली भंग कर दी और स्वयं राष्ट्रपति बन गया। यह पाकिस्तान के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाला मार्शल लॉ था। जियाउल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया। ई.1988 में जियाउल हक की एक विमान हादसे में मौत हो गई।

    इसके बाद ई.1988 में मरहूम जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा स्थापित पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी दुबारा सत्ता में आई और जुल्फिकार अली भुट्टो की पुत्री बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी। दो साल बाद 1990 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ग़ुलाम इशाक ख़ान ने भुट्टो सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया। उसके बाद 1 नवम्बर 1990 से 18 जुलाई 1993 तक नवाज शरीफ की सरकार अस्तित्व में रही। यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। ई.1993 से ई.1996 तक बेनजीर भुट्टो दूसरी बार देश की प्रधानमंत्री रही किंतु वह इस बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। ई.1997 के आम चुनावों में पुनः नवाज शरीफ की जीत हुई और 17 फरवरी 1997 से 12 अक्टूबर 1999 तक वह दूसरी बार प्रधानमंत्री के पद पर रहा। नवाज शरीफ ने जनरल परवेज मुशर्रफ को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया।

    अक्टूबर 1999 में जब परवेज मुशर्रफ श्रीलंका यात्रा पर गया हुआ था, नवाज शरीफ ने उसे अपदस्थ करके जनरल अजीज को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ नियुक्त किया। नवाज शरीफ यह नहीं जानता था कि जनरल अजीज परवेज मुशर्रफ का विश्वस्त है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने श्रीलंका से लौटकर नवाज शरीफ और उसके मंत्रियों को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया और स्वयं राष्ट्रपति बन गया। उसी वर्ष अर्थात् ई.1999 में भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो ने भी पाकिस्तान छोड़ दिया और संयुक्त अरब इमारात के नगर दुबई में जाकर रहने लगी। पाकिस्तान की सैनिक सरकार ने भुट्टो पर लगे भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों की जाँच की और बेनजीर भुट्टो को दोष मुक्त कर दिया । 18 अक्टूबर 2007 को बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान लौटी। उसी दिन कराची में एक रैली के दौरान बेनजीर भुट्टो पर दो आत्मघाती हमले हुए जिनमें 140 लोग मारे गए किंतु बेनज़ीर बच गई किंतु 27 दिसम्बर 2007 को एक चुनाव रैली में बेनजीर की हत्या कर दी गई।

    ई.2000 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी घोषित किया। इस आधार पर परवेज मुशर्रफ नवाज शरीफ को भुट्टो की तरह फांसी पर चढ़ाना चाहता था किंतु सऊदी अरब और अमेरिका ने हस्तक्षेप करके नवाज शरीफ को फांसी पर चढ़ने से बचाया। इस पर मुशर्रफ ने शरीफ को पाकिस्तान से बाहर निकाल दिया। नवाज शरीफ लगभग सात साल तक जेद्दा में रहा। 10 सितम्बर 2007 को नवाज शरीफ पुनः पाकिस्तान लौटा किंतु उसे हवाई-अड्डे से ही तुरन्त जेद्दा वापस भेज दिया गया। वर्ष 2011 में नवाज शरीफ को पाकिस्तान आने की अनुमति मिली और 5 जून 2013 को वह तीसरी बार पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना। ई.2016 में पानमा पेपर लीक में नाम आने के बाद पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री के पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इस कारण 28 जुलाई 2017 को नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटाना पड़ा। तब से नवाज शरीफ पुनः जेल में दिन बिता रहा है। उस पर पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। 18 अगस्त 2018 को इमरान खाँ पाकिस्तान का बाईसवां प्रधानमंत्री बना। वह भी सेना के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं है।


    राजनीतिक हत्याओं की स्थली पाकिस्तान

    पाकिस्तान राजनीतिक हत्याओं एवं संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु की स्थली है। पाकिस्तान बनने के कुछ माह बाद प्रथम गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु उपेक्षा एवं टीबी से हुई। ई.1951 में पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ की हत्या हुई। उसके बाद याह्या खाँ, जुल्फिकार अली भुट्टो, जनरल मुहम्मद जियाउल हक तथा बेनजीर भुट्टो आदि पाकिस्तानी राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री आतंकवादी गतिविधियों, राजनीतिक हत्याओं एवं फांसी आदि के माध्यम से मारे गए। पुस्तक लिखे जाते समय पूर्व-प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तथा सैनिक तानाशाह से राष्ट्रपति बना परवेज मुशर्रफ पाकिस्तानी जेलों में बंद हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 21

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 21

    मुहम्मद जलादुद्दीन अकबर (2)


    अकबर और उसका हरम

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    अजमेर को अधिकार में लेने के बाद अकबर ने अजमेर को मुगलिया सल्तनत की सांस्कृतिक राजधानी बनाने के प्रयास आरंभ किये। ई.1464 तक अजमेर में ख्वाजा की कोई समाधि बनी हुई नहीं थी। ई.1562 में अकबर आगरा के जंगलों में शिकार करने के लिये गया। शिकार से लौटते समय मिढुकर गांव में अकबर ने ख्वाजा की प्रशस्ति के गीत सुने। उसी समय उसने अजमेर जाने का निर्णय लिया। 14 जनवरी 1562 को वह आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ। पूरे मार्ग में वह शिकार खेलता हुआ आया। अजमेर पहुँचकर उसने खवाजा की दरगाह के दर्शन किये तथा वहीं से माहम अनगा को निर्देश भिजवाये कि वह हरम की औरतों को लेकर अजमेर आ जाये। कुछ ही दिनों में माहम अनगा, अकबर के हरम को लेकर अजमेर पहुँच गई। अकबर के हरम ने ख्वाजा की दरगाह के दर्शन किये।

    मुगलिया हरम की एक झलक इससे पहले भी अजमेर नगर देख चुका था किंतु उस समय हुमायूं अपने हरम के साथ भारत छोड़कर ईरान की तरफ भाग रहा था। इसलिये उसके हरम के साथ वह मुगलिया शानोशौकत नहीं थी जो अकबर के हरम के साथ थी। इतनी सारी औरतें, इतना भारी लवाजमा, भारी-भरकम भाले और नंगी तलवारें उठाये हुए पर्दाधारी स्त्री सिपाही! अजमेर समझ गया कि आने वाले डेढ़ सौ साल तक इसी हरम से निकली औलादें अजमेर की मालिक होने वाली हैं। कुछ दिनों तक अजमेर में रहने के बाद अकबर अपने हरम को लेकर आगरा लौट गया।

    शर्फुद्दीन हुसैन का विद्रोह

    अजमेर से ही अकबर ने अजमेर के सूबेदार शर्फुद्दीन हुसैन को मेड़ता के विरुद्ध सैन्य अभियान पर भेजा। शर्फुद्दीन ने मेड़ता के शासक जयमल को मेड़ता से निकाल दिया। इस विजय के बाद अकबर ने शर्फुद्दीन को अमीर उल उमरा बना दिया। इस कारण शर्फुद्दीन दिल्ली में रहने लगा। कुछ समय बाद शर्फुद्दीन अकबर की मां के साथ मक्का की यात्रा को गया। वहां एक विदेशी पीर था जिसके दर्शन केवल सुहागन स्त्री ही कर सकती थी। इसलिये अकबर की माँ ने शर्फुद्दीन के दुपट्टे से अपने आंचल का छोर बांधकर विदेशी पीर के दर्शन किये।

    यह बात अकबर को पता चल गई तथा उसने शर्फुद्दीन को खत्म करने की आज्ञा दी। शर्फुद्दीन को अकबर के क्रोध के बारे में ज्ञात हो गया। इसलिये शर्फुद्दीन 5 अक्टूबर 1562 को दिल्ली छोड़कर अजमेर आ गया तथा अजमेर पर अधिकार करके बैठ गया। अकबर ने हुसैन कुली बेग को उसके पीछे भेजा ताकि वह शर्फुद्दीन को समझाकर फिर से दिल्ली ले आये और यदि वह न समझे तो उसे दण्डित करे। शर्फुद्दीन किसी भी स्थिति में दिल्ली जाने को तैयार नहीं था। इसलिये वह अजमेर का प्रभार अपने विश्वस्त अधिकारी तारखां दीवान को देकर जालोर भाग गया। हुसैन कुली बेग ने तारागढ़ को घेर लिया। तारखां ने उसे तारागढ़ समर्पित कर दिया। हुसैन कुली बेग ने अपने विश्वस्त अधिकारी को तारागढ़ का प्रभार सौंप दिया और स्वयं आगरा लौट गया।

    अकबर की पैदल यात्राएँ

    ई.1564 में अकबर ने हुसैन कुली बेग को अजमेर का नाजिम बनाया। ई.1567 में अकबर ने मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिये 17 गॉंव प्रदान किये तथा सांभर झील के नमक से होने वाली आय का एक प्रतिशत भाग दरगाह को दिया जाना निश्चित किया।

    ई.1568 में अकबर ने जब चितौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया तो उसने मनौती मांगी कि यदि दुर्ग फतह हो जाये तो वह ख्वाजा की दरगाह पर जायेगा। चितौड़ विजय के बाद 28 फरवरी 1568 को वह आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ। उसने काफी रास्ता पैदल ही तय किया। उसने अपने अमीरों तथा हरम की औरतों को निर्देश दिया कि वे अपनी सवारी पर बैठकर यात्रा करें किंतु जब बादशाह पैदल चल रहा था तो उसके अमीर और हरम की औरतें कैसे सवारियों पर सवार होकर चल सकती थीं। इसलिये जब तक अकबर पैदल चलता तब तक लगभग हर व्यक्ति पैदल ही चतला।

      अकबर प्रतिदिन 12 से 14 मील चला। जब दरगाह के खादिमों ने अकबर की पैदल यात्रा के बारे में सुना तो वे घोड़ों पर चढ़कर अकबर के पास पहुंचे तथा उससे प्रार्थना की कि ख्वाजा ने स्वप्न में दर्शन देकर उनसे कहा है कि अकबर घोड़े पर चढ़कर अजमेर आ सकता है, उसे पैदल चलने की आवश्यकता नहीं है। अकबर ने खादिमों की बात अस्वीकार कर दी और पैदल चलता हुआ 6 मार्च 1568 को अजमेर पहुंचा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार खादिमों के इस स्वप्न पर विश्वास कर लिया गया। कोई भी इस सूचना की तार्किक समीक्षा करने को तैयार नहीं था। इसलिये सब अपनी-अपनी सवारियों पर चढ़ गये। यात्रा का अंतिम हिस्सा फिर से पैदल तय किया गया।

    अजमेर पहुँचकर अकबर बिना कोई क्षण गंवाये ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ। उसने दरगाह के बुलंद दरवाजे के दक्षिण-पश्चिम में विशाल कढ़ाव बनवाया तथा खादिमों को उदारता पूर्वक उपहार दिये। अजमेर में ही नये साल का उत्सव मनाने तथा नौ दिन तक अजमेर में रुकने के बाद 14 मार्च 1568 को अकबर पुनः आगरा के लिये रवाना हो गया तथा 13 अप्रैल 1568 को आगरा पहुँच गया।

    ई.1569 में रणथंभौर को परास्त करने के बाद अकबर अजमेर आया। वह एक सप्ताह तक अजमेर रहा और लगभग प्रतिदिन दरगाह गया। 30 अगस्त 1569 को अकबर के पुत्र सलीम का जन्म हुआ। अकबर एक बार पुनः ख्वाजा को धन्यवाद देने के लिये 20 जनवरी 1570 को आगरा से पैदल ही चल पड़ा। वह अपनी यात्रा के 16वें दिन 5 फरवरी 1570 को अजमेर पहुँचा। उसे अजमेर पहुँचने की शीघ्रता इसलिये भी थी क्योंकि वह ख्वाजा के वार्षिक समारोह में सम्मिलित होना चाहता था। अकबर 10 से 12 मील प्रतिदिन पैदल चला।

    इस बार उसने खादिमों को इतने पुरस्कार दिये कि खादिमों में पुरस्कारों पर अधिकार को लेकर झगड़ा हो गया। एक तरफ वे लोग थे जो स्वयं को ख्वाजा का निकटतम वंशज बताते थे तथा दूसरी ओर वे लोग थे जो ख्वाजा की दरगाह में खिदमत करते थे। दरगाह के प्रभारी शेख हुसैन ने समस्त पुरस्कारों पर अधिकार कर लिया। उसने इन पुरस्कारों को अपना बताया। उसके इस दावे को दरगाह के अन्य खादिमों ने चुनौती दी। उनका यह भी कहना था कि शेख ने न केवल वास्तविक राशि छिपा ली है अपितु बंटवारा भी नहीं किया है।

    इस पर अकबर ने कुछ विश्वस्त लोगों को इन दावों और आरोपों की जांच करने के आदेश दिये। इस जांच में पाया गया कि शेख का दावा सही नहीं है। अकबर ने, शेख हुसैन के ख्वाजा का वंशज होने के दावे को खारिज कर दिया तथा शेख मुहम्मद बोखारी को दरगाह का मुतवल्ली नियुक्त किया जो कि शिक्षित सैयद था। अकबर ने कुछ और लोगों को भी दरगाह पर नियुक्त किया तथा अजमेर में एक सराय बनाने के निर्देश दिये। जब यह सराय बनकर तैयार हुई तो इसे इसे अकबरी सराय कहा जाने लगा। बाद में इस सराय के प्रवेश द्वार के ऊपर गणपति की मूर्ति लगा दी गई जिससे यह स्थान गणपतपुरा के नाम से जाना गया। कुछ दिन अजमेर में रहने के बाद अकबर 2 मई 1570 को आगरा लौट गया। ई.1570 से 1579 तक अकबर प्रतिवर्ष अजमेर आया।

    जून 1570 में अकबर का दूसरा पुत्र मुराद उत्पन्न हुआ। सितम्बर 1570 में अकबर पुनः ख्वाजा को धन्यवाद देने अजमेर आया। अब उसने राजस्थान के उन भागों पर अधिकार करने का निर्णय लिया जो अब तक उसके अधिकार में नहीं आ पाये थे। इसलिये उसने अजमेर में अपनी स्थिति मजबूत करने का निर्णय लिया। अकबर को तारागढ़ पसंद नहीं था। तारागढ़ तक पहुँचने के लिये उपलब्ध पहाड़ी दुर्गम पथ को भी वह पसंद नहीं करता था। वह फतहपुर सीकरी की भांति मैदानी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त था। इसलिये उसने अजमेर में एक मैदानी दुर्ग बनाने का निर्णय लिया। साथ ही उसने ख्वाजा की दरगाह में एक मस्जिद बनाने का भी निर्णय लिया।

    जिस स्थान पर अकबर ने अपने लिये नया दुर्ग बनवाने का निर्णय लिया, उस स्थान पर पहले से एक प्राचीन दुर्ग बना हुआ था। यह दुर्ग किसने और कब बनवाया था, कोई जानकारी नहीं मिलती।

    अकबर ने इसी दुर्ग को एक नये दुर्ग में बदल दिया। यह कार्य तीन साल में पूरा हुआ। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया। आज भी इस दुर्ग को अकबर के महल के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें बनी हुई हैं। नगर की तरफ मुंह किये हुए इसका द्वार बना हुआ है तथा केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी हुई है। ब्रिटिश काल में यह मैगजीन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अकबर ने अपने अमीर-उमरावों को भी आदेश दिया कि वे यहाँ अच्छे भवन बनवायें तथा उद्यान लगवायें। अमीरों ने आस पास के हिन्दू भवनों में कुछ परिवर्तन करके उन्हें नये भवनों का रूप दिया। इस प्रकार के भवनों का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य शैली का है जबकि उनके बाहरी भाग को मुस्लिम स्थापत्य शैली में ढाल दिया गया है। नया बाजार में बना हुआ बादशाही भवन इसी प्रकार का है। अकबर के किले में स्थित दरबारे आम भी इसी शैली का गवाह है। जब अकबर ने अजमेर में अपने लिये दुर्ग बनवाया तो उसके चारों ओर एक नया अजमेर शहर खड़ा हो गया।

    अकबर ने दरगाह में एक मस्जिद बनवाई जो अकबरी मस्जिद कहलाती है। 3 नवम्बर 1570 को अकबर अजमेर से नागौर के लिये रवाना हो गया। ई.1571 में भारी वर्षा के उपरांत भी अकबर अजमेर आया। इस बार उसने अजमेर की शहर पनाह बनवाई। इस शहर पनाह की लम्बाई चारों ओर से केवल 4,045 गज थी। 4 जुलाई 1572 को वह पुनः आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ। इस यात्रा में वह तारागढ़ में स्थित हुसैन खनग सवार की दरगाह पर भी गया। इस यात्रा के दौरान अकबर की एक बेगम गर्भवती थी। अकबर को यहाँ से गुजरात अभियान पर जाना था इसलिये बेगम उसके साथ यात्रा में नहीं चल सकती थी।

    अकबर का किला अब तक बनकर तैयार नहीं हुआ था इसिलये अकबर ने ख्वाजा की दरगाह के एक खादिम शेख दानियाल से अनुरोध किया कि वह बेगम की जचगी (प्रसव) के लिये सुरक्षित स्थान उपलब्ध करवाये। शेख दानियाल ने अपना मकान खाली करके बेगम को दे दिया। उसी मकान में 9 सितम्बर 1572 को एक शहजादे का जन्म हुआ जिसका नाम शेख दानियाल के नाम पर दानियाल रखा गया। गुजरात विजय के पश्चात् अकबर फिर से 13 मई 1573 को अजमेर आया। तब तक बेगम, शहजादे को लेकर आम्बेर जा चुकी थी। अकबर ने बेगम को आम्बेर से पुनः अजमेर बुलवाया।

    ई.1573 में अकबर ने पुनः गुजरात अभियान किया। आगरा से गुजरात जाते समय 25 अगस्त 1573 को तथा गुजरात से लौटते समय 27 सितम्बर 1573 को अकबर अजमेर आया। ई.1574 में गुजरात से बंगाल जाते समय 8 फरवरी 1574 को अकबर फिर से अजमेर आया। वह अजमेर से सात कोस पहले सवारी से उतर गया तथा वहाँ से पैदल ही ख्वाजा की दरगाह पर पहुँचा। दरगाह से सीधा वह अपने नये किले के लिये रवाना हुआ जो अब लगभग पूरा हो चुका था। यहीं पर उसकी भेंट राय रामदास से हुई। अकबर ने रामदास को अजमेर सूबे का दीवान नियुक्त किया। 11 मार्च 1574 को अपने शासन के उन्नीसवें वर्ष के आरंभ होने पर अकबर ने ख्वाजा की दरगाह पर अमीरों एवं गरीबों को एक बड़ा भोज दिया। इस भोज में जो लोग सम्मिलित हुए उन्हें अकबर ने कुल मिलाकर एक लाख रुपये के पुरस्कार बांटे। इसी वर्ष अकबर पहली बार सलीम को ख्वाजा की दरगाह में लेकर आया। 17 मार्च 1574 को वह आगरा लौट गया। बंगाल विजय के बाद दिसम्बर 1574 में अकबर फिर से अजमेर आकर ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ। वह तब तक अजमेर में ही रहा जब तक कि जोधपुर के राव चंद्रसेन को परास्त नहीं कर दिया गया।

    ई.1574 में अकबर ने आगरा से अजमेर के रास्ते में प्रत्येक पड़ाव पर पक्के विश्राम गृहों का निर्माण करवाया ताकि वह प्रति वर्ष बिना किसी बाधा के अजमेर आ-जा सके। प्रत्येक एक कोस की दूरी पर एक मीनार खड़ी की गई जिस पर उन हजारों हरिणों के सींग लगवाये गये जो अकबर तथा उसके सैनिकों ने मारे थे। इन मीनारों के पास कुएं भी खुदवाये गये। बाद में इन मीनारों के पास उद्यान लगाने एवं यात्रियों के लिये सराय बनाने के भी निर्देश दिये गये। अकबर ने ई.1573-1574 में जुलाल बू केसै को को अजमेर का नाजिम नियुक्त किया।

    ई.1575 में अकबर ने अपने खानखाना मुनीम खां द्वारा फिर से गुजरात विजय करने पर आगरा से अजमेर तक की यात्रा की। इस बार भी वह हर बार की तरह सात कोस पहले ही घोड़े से उतरकर पैदल चलकर दरगाह तक आया। उसने हर बार की तरह रात्रि में विद्वानों और दार्शनिकों को विचार विमर्श के लिये अपने निवास पर बुलाया। नृत्य एवं संगीत के कार्यक्रम भी हर रात्रि में हुए। उसके दरबार में आये हुए लोगों पर दीनारों एवं दिरहमों की बरसात की गई। 9 मार्च 1576 को अकबर फिर अजमेर आया। यहीं से उसने आमेर के कुंअर मानसिंह को महाराणा प्रताप के विरुद्ध अभियान पर भेजा जिसमें मानसिंह की जान बड़ी कठिनाई से बच सकी। इस सम्बन्ध में कहावत इस प्रकार से है- बाही राण प्रतापसी बखतर में बरछी। जाणै झींगर जाल में मुंह काडे मच्छी। अर्थात् महाराणा ने मानसिंह के बख्तर में अपनी बरछी ऐसे घुसा दी जैसे मछली पकड़ने के जाल में से मछली ने मुंह बाहर निकाल लिया हो।

    15 सितम्बर 1576 को अकबर पुनः आगरा से अजमेर के लिये रवाना हुआ तथा 26 सितम्बर को अजमेर पहुँचा। ई.1577 में अकबर ने ख्वाजा की दरगाह के साथ-साथ सयैद हुसैन खनग सवार की दरगाह की भी यात्रा की तथा तारागढ़ की दुर्दशा देखकर, उसकी मरम्मत करने के निर्देश दिये। अकबर ने ई.1577-80 की अवधि के लिये दुस्तम खां को अजमेर का नाजिम बनाया।

    ई.1578 में अकबर फिर अजमेर आया। इस बार उसने अनुभव किया कि उसे ख्वाजा की जियारत करने के लिये किसी स्थान विशेष पर आने की आवश्यकता नहीं है। इस यात्रा में वह चार दिन में सौ कोस चला। लौटते समय वह 2 दिनों में 120 कोस चला। संभवतः इसी यात्रा के लिये अधिकांश इतिहासकारों ने लिखा है- अजमेर से आगरा जो 240 मील दूर है, अकबर केवल 24 घण्टे में घोड़े से गया था।

    ई.1579 में अकबर ने राजा माधोसिंह को अजमेर का दीवान बनाया। 14 अक्टूबर 1579 को अकबर पुनः ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ। यह अकबर की अंतिम अजमेर यात्रा थी। इस यात्रा का विवरण लिखते समय अब्दुल कदिर बदायुनीं ने लिखा है कि जब अकबर ख्वाजा की दरगाह में पहुंचा तो कुछ समझदार लोग उसे देखकर मुस्कुराये और बोले कितने आश्चर्य की बात है कि बादशाह अजमेर के ख्वाजा में इतना विश्वास रखता है और उसने हमारे पैगम्बर के प्रत्येक आधार को ठुकरा दिया है, जबकि हमारे पैगम्बर पर विश्वास करने वाले उच्च कोटि के सैंकड़ों हजार संत हुए हैं।

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  • डिकी गधे से दुम रखवा सकता था तो राजाओं से ताज भी!

     03.06.2020
    डिकी गधे से दुम रखवा सकता था  तो राजाओं से ताज भी!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    माउण्टबेटन के भारत में आने के ठीक पहले रावलपिंडी में सिक्खों का कत्ल हो चुका था। मुसलमानों के प्रति अपनी घृणा को न तो सिक्ख छिपाते थे और न मुसलमान सिक्खों को सहन करने को तैयार थे। सिक्खों की दलील थी, जब आजादी आयेगी तो हम लोगों का क्या होगा?

    लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है कि जनवरी 1947 से पूरे पंजाब में मुस्लिम लीग द्वारा गुप्त रैलियां आयोजित हो रही थीं जिनमें हिन्दुओं की मक्कारी और निर्दयता के शिकार लोगों की खोपड़ियां और तस्वीरें प्रदर्शित होती थीं। जिन्दा और घायल मनुष्यों को एक रैली से दूसरी रैली में घुमाया जाता जो सबके सामने अपने घाव दिखाते और बयान करते कि वे घाव किस प्रकार मक्कार और निर्दय हिंदुओं के कारण लगे।

    मार्च 1947 में मास्टर तारासिंह ने मुस्लिमलीग के झण्डे को पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाते हुए नीचे गिरा दिया। लीग के अपमान का बदला लेने के लिये हथियार उठाकर निकलने में मुसलमानों ने कोई देरी नहीं की। इसके तुरंत बाद ही दंगे भड़क उठे। लाहौर, पेशावर, रावलपिण्डी आदि शहरों में तीन हजार लोग मारे गये जिनमें अधिकांश सिक्ख थे।

    यही कारण थे कि माउंटबेटन से पहले वाले वायसराय लार्ड वेवेल ने भारत को स्वतंत्रता देने सम्बन्धी दस्तावेजों की जो पत्रावली माउंटबेटन को सौंपी, उस पर ''ऑपरेशन मैड हाउस" अंकित किया था। देश की इस स्थिति ने माउंटबेटन को निर्णायक और तुरंत कदम उठाने के लिये विवश किया, क्योंकि इसी से भारतीय उपमहाद्धीप भयानक अराजकता से बच सकता था। माउंटबेटन की नियुक्ति पर लॉर्ड इस्मे ने टिप्पणी की कि माउंटबेटन ऐसे समय में जहाज का संचालन संभाल रहे हैं जबकि जहाज समुद्र के बीच में है, उसमें बारूद भरा हुआ है और उसके ऊपरी भाग में आग लगी हुई है। देखना इतना भर है कि आग पहले बारूद तक पहुंचती है या फिर आग पर काबू पहले पाया जाता है।

    स्वयं माउंटबेटन ने अपनी नियुक्ति के बारे में लिखा है- वह एक ऐसा कमाण्ड था जिसमें किसी भी प्रकार की सुविधा अथवा विजय की संभावना नहीं थी। आत्मबल डूब रहा था। भयानक मौसम, भयानक दुश्मन, भयानक पराजयों का सिलसिला.........। माउंटबेटन की नियुक्ति पर एन. बी. गाडगिल ने टिप्पणी की है कि ऐटली का अनुमान ठीक था कि हिन्दू नेतागण किसी भी दृढ़ निश्चय को लेने के लिये तैयार नहीं थे। ऐटली समझता था कि यदि एक युक्तियुक्त निर्णय इन पर थोप दिया जायेगा तो वे किसी न किसी तरह मान जायेंगे। उसने यही किया और माउंटबेटन योजना हिंदुस्तान में भेज दी। नोएल कावर्ड ने माउंटबेटन के बारे में लिखा था- जब कोई काम असंभव मालूम हो तो डिकी अर्थात् माउंटबेटन को बुलाओ।

    इन्हीं गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए माउंटबेटन का चयन भारत के उस वायसराय के रूप में किया गया था जिसे भारत से 200 वर्ष पुराना राज्य हटा लेना था। उन दिनों किसी ने माउंटबेटन के बारे में टिप्प्णी की थी कि माउंटबेटन बातों का इतना उस्ताद था कि वह गधे से उसकी दुम ही नहीं उतरवा सकता था बल्कि राजाओं से ताज भी रखवा सकता था।

    माउंटबेटन के आने से पहले मुस्लिम लीग ने भारत की अंतरिम सरकार में शामिल होना स्वीकार कर लिया था। जिन्ना स्वयं सरकार में शामिल नहीं हुआ था लेकिन उसकी तरफ से उसके प्रमुख विश्वासपात्र लियाकत अली खां ने मोर्चा संभाला हुआ था। हालांकि लॉर्ड वेवेल ने लियाकतअली खां को गृहमंत्री बनाने का तथा सरदार पटेल को वित्तमंत्री बनाने का सुझाव दिया था किंतु पटेल ने इसे अस्वीकार करके मोहम्मद अली को वित्तमंत्री का पद दे दिया था। चौधरी मोहम्मद अली ने, लियाकत अली को समझाया कि यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह ऐसा बजट बनाये कि कांग्रेस की सहायता करने वाले करोड़पतियों का दम निकल जाये। चौधरी मोहम्मद अली भारतीय अंकेक्षण और लेखा सेवा का अधिकारी था। उसने लंदन से अर्थशास्त्र तथा विधि में शिक्षा प्राप्त की थी। चौधरी के सुझाव पर लियाकत अली ने वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वित्त मंत्री के रूप में बात-बात में खर्चे के मदों पर आपत्ति उठाने लगा। ऐसा करके मुस्लिम लीग, सरकार में होते हुए भी सरकार को ठप्प कर देना चाहती थी।

    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा है- ''मंत्रीमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्यों में बाधा डालते थे। वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के खिलाफ थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि हमारे प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकतअली खां ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिये नया झटका था। कांग्रेस कीघोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाये और पूंजीवादी समाज के स्थान पर शनैः शनैः समाजवादी पद्धति अपनायी जाये। जवाहरलाल नेहरू और मैं भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था। आयकर वसूली के लिये भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता थी। लियाकतअली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाये कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे। इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थायी रूप से भारी क्षति पहुंचती। लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। लियाकत अली ने यह भी घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किये गये हैं। कांग्रेसी नेता उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उन्होंने मंत्रीमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उन्होंने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी। जब उन्होंने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गये। राजगोपालाचारी और सरदार पटेल ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया।

    वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अलीखां को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। उसने अपने कार्यकलापों से मंत्रिमण्डल को पंगु बना दिया। मंत्रिगण लियाकत अलीखां की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे। लियाकत अलीखां ने कांग्रेसी मंत्रियों को ऐसी उलझन में डाला कि वे कर्तव्यविमूढ़ हो गये। गांधीजी और जिन्ना के बीच खाई पाटने के उद्देश्य से घनश्यामदास ने लियाकत अली खां को समझाने की बहुत चेष्टा की किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर लार्ड माउंटबेटन ने लियाकत अली खां से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।

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