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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 2 शिवाजी के पूर्वज एवं शिवाजी का बाल्यकाल

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 2  शिवाजी के पूर्वज एवं शिवाजी का बाल्यकाल

    शिवाजी के पूर्वज

    ई.1303 में अल्लाऊद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग तोड़ा और रावल रत्नसिंह को मार डाला। उसकी मृत्यु के साथ ही मेवाड़ के गुहिलों की रावल शाखा का अंत हो गया। तब बहुत से राजपूत परिवार चित्तौड़ दुर्ग छोड़कर देश के अन्य भागों में चले गए। तब गुहिल वंश का एक क्षत्रिय राजकुमार सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह चित्तौड़ छोड़कर दक्षिण भारत को चला आया तथा अपने परिवार के साथ यहीं रहने लगा। दक्षिण भारत में ही उसका निधन हुआ। उसके कुछ वंशज खेती-बाड़ी करके उदरपूर्ति करने लगे तथा कुछ वंशज, दक्षिण के शासकों के लिए लड़ाइयां लड़ते हुए अपनी आजीविका अर्जित करने लगे। सज्जनसिंह की पांचवी पीढ़ी में अग्रसेन नामक एक वीर पुरुष हुआ जिसके दो पुत्र- कर्णसिंह तथा शुभकृष्ण हुए। कर्णसिंह के पुत्र भीमसिंह को बहमनी राज्य के सुल्तान ने राजा घोरपड़े की उपाधि एवं मुधौल में 84 गांवों की जागीर प्रदान की। इस कारण भीमसिंह के वंशज घोरपड़े कहलाए।

    दूसरे पुत्र शुभकृष्ण के वंशज भौंसले कहलाए। शुभकृष्ण का पौत्र बापूजी भौंसले हुआ। बापूजी भौंसले का परिवार बेरूल (एलोरा) गांव में काश्तकारी एवं पटेली का काम करता था। पटेल का काम कृषकों से भूमि का लगान वसूल करके उसे शाही खजाने में जमा करवाने का होता था। इन लोगों को महाराष्ट्र में पाटिल भी कहते थे। बापूजी भौंसले ई.1597 में वैकुण्ठवासी हुआ। बापूजी भौंसले के दो पुत्र थे जिनके नाम मालोजी और बिठोजी थे। शरीर से हृष्ट-पुष्ट होने के कारण इन दोनों भाइयों ने सिन्दखेड़ के सामन्त लुकाजी यादव अथवा जाधवराय के यहाँ सैनिक की नौकरी प्राप्त कर ली। जाधवराय, अहमदनगर के बादशाह निजामशाह की सेवा में था तथा निजाम से उसका बहुत नैकट्य भी था। कुछ दिनों बाद मालोजी एवं बिठोजी को जाधवराय के महल का मुख्य रक्षक नियुक्त किया गया।

    जाधवराय का परिहास

    मालोजी का विवाह पल्टनपुर के देशमुख बंगोजी अथवा जगपाल राव नायक निम्बालकर की बहिन दीपाबाई से हुआ। मालोजी को लम्बे समय तक कोई संतान प्राप्ति नहीं हुई। अंत में एक मुस्लिम फकीर के आशीर्वाद से ई.1594 में मालोजी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। फकीर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उस बालक का नाम शाहजी रखा गया। शाहजी अत्यंत रूपवान एवं प्रभावशाली चेहरे का बालक था। कुछ समय पश्चात् मालोजी को एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम शरीफजी रखा गया। एक बार होली के त्यौहार पर मालोजी अपने बड़े पुत्र शाहजी को जाधवराय के महल में ले गया। वहाँ जाधवराय के बहुत से सामंत-सरदार एवं मित्र आए हुए थे। जाधवराय ने रूपवान बालक शाहजी को बड़े प्रेम से अपने पास बैठाया। वहीं पर जाधवराय की पुत्री जीजाबाई बैठी हुई थी। जब सब लोग होली खेल रहे थे, तब इन दोनों बालकों ने भी एक दूसरे पर रंग डाला। इसे देखकर अचानक जाधवराय के मुख से निकला कि कितनी सुंदर जोड़ी है। उसने अपनी पुत्री जीजा से पूछा कि क्या तुम इस लड़के से विवाह करोगी?

    इतना सुनते ही मालोजी उत्साह से भर गया और खड़े होकर बोला, सुना आप सबने, जाधवराय ने अपनी पुत्री का सम्बन्ध मेरे पुत्र से कर दिया है। जाधवराय तो बच्चों से परिहास मात्र कर रहा था। अतः मालोजी का यह दुःसाहस देखकर क्रोधित हो गया और तुरन्त प्रतिकार करते हुए मालोजी और बिठोजी को अपनी सेवा से च्युत कर दिया।

    मालोजी का उत्कर्ष

    मालोजी एवं बिठूजी, दोनों भाई वहाँ से उठ गए और अगले ही दिन सिन्दखेड़ छोड़कर अपने पैतृक गांव चले गए। वहाँ वे फिर से खेतीबाड़ी करने लगे। एक दिन मालोजी को कहीं से अचानक प्रचुर खजाना हाथ लगा। उस धन से उसने एक हजार सैनिकों की वेतन-भोगी सेना तैयार की और अहमदनगर के शासक निजामशाह की सेवा में भर्ती हो गया।

    शाहजी का संघर्ष एवं उत्कर्ष

    ई.1619 में मालोजी का निधन हो गया और उसकी समस्त जागीरें शाहजी को प्राप्त हो गईं। शाहजी ने अपने चचेरे भाइयों के साथ मिलकर अहमदनगर के निजाम के लिए, मुगलों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े और जीते। ई.1624 में खुर्रम 1,20,000 सैनिक लेकर अहमदनगर पर चढ़ आया। बीजापुर का आदिलशाह भी 80,000 सैनिक लेकर खुर्रम की सहायता करने आया। ये दोनों सेनाएं मेहकार नदी के तट पर शिविर लगाकर बैठ गईं। इस समय अहमदनगर के पास केवल 20 हजार सैनिक थे जिनमें से 10 हजार सैनिक नगर की सुरक्षा के लिए लगाए गए और 10 हजार सैनिक मुगलों से लड़ने के लिए शाहजी को दिए गए। शाहजी के 10 हजार सैनिक मुगलों का कुछ भी नहीं कर सकते थे। फिर भी शाहजी ने नदी भटवाड़ी के निकट अपना शिविर लगाया। एक रात जब काफी तेज बरसात हुई तो शाहजी ने नदी पर बने विशाल बांध में छेद करवा दिए। बांध टूट गया तथा उसका पानी तेजी से बहता हुआ मुगलों और बीजापुर की सेना की तरफ आया। इस कारण मुगलों के शिविर में बाढ़ आ गई। शाहजी अपने सैनिकों के साथ तैयार था। वह बिजली बनकर शत्रुओं पर टूट पड़ा। बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मारे गए। शाहजी ने मुगलों के पांच बड़े सेनापतियों को जीवित ही पकड़ लिया। इस प्रकार भटवाड़ी के युद्ध में मिली विजय के बाद शाहजी का कद भारत की राजनीति में बहुत बड़ा हो गया। अहमदनगर की ओर से उसे पूना और सूपा की जागीरें प्राप्त हुईं।

    शाहजी का बीजापुर की सेवा में जाना

    मुगलों की सेवा त्यागने के बाद से शाहजी भौंसले का जीवन भी बहुत कठिन हो गया। शाहजहाँ किसी भी तरह शाहजी को पुनः अपनी सेवा में लेना चाहता था क्योंकि अहमदनगर की वास्तविक शक्ति शाहजी ही था किंतु शाहजी ने मना कर दिया। शाहजहां ने निजाम के वजीर जहाँ खाँ को रिश्वत देकर अपनी तरफ कर लिया। जहाँ खाँ ने निजाम तथा उसके सम्पूर्ण परिवार की हत्या कर दी। यहाँ तक कि निजाम परिवार की दो गर्भवती महिलाओं को भी मार दिया। शाहजी ने हार नहीं मानी, उसने मृतक निजाम के निकट सम्बन्धी के बालक मुर्तजा को अहमदनगर का निजाम घोषित कर दिया तथा मुगलों को कड़ी टक्कर देता हुआ, ''निजाम मुर्तजा'' को लेकर एक के बाद दूसरे किले में भटकने लगा।

    ई.1635 में मिर्जा राजा जयसिंह ने शाहजी भौंसले के 3 हजार आदमी और 8 हजार बैल पकड़ लिए। इन बैलों पर तोपखाना और बारूद लदा हुआ था। इस भारी जीत के उपलक्ष्य में जयसिंह को अपने राज्य जयपुर में लगभग दो वर्ष तक छुट्टियां मनाने की अनुमति मिली तथा मुगल सेनापति खानेजमाँ महाबत खाँ को शिवाजी के विरुद्ध लगाया गया। महाबतखाँ, शाहजी के विरुद्ध लड़ता हुआ पूरी तरह बर्बाद हो गया तथा ई.1634 में उसकी मृत्यु हो गई। ई.1636 के आरम्भ में शाहजहाँ स्वयं सेना लेकर अहमदनगर के विरुद्ध लड़ाई करने आया। मुगल साम्राज्य की पूरी शक्ति शाहजी के विरुद्ध झौंक दी गई। शाहजहां ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर दबाव बनाकर, उनकी सेनाएं भी शाहजी के विरुद्ध लगा दीं। इस प्रकार शाहजी चारों ओर से घिर गया। अंत में उसके पास केवल पांच दुर्ग रह गए।

    एक दिन मुगलों ने मुर्तजा को अगवा कर लिया। मुर्तजा का जीवन बचाने के लिए शाहजी को मुगलों से समझौता करना पड़ा। शाहजहाँ मुर्तजा को दिल्ली ले गया तथा अहमदनगर के निजामशाही राज्य को पूरी तरह समाप्त कर दिया। बीजापुर का शासक आदिलशाह, शाहजी की वीरता से बहुत प्रभावित था। उसने शाहजी के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि शाहजी, बीजापुर की सेवा ग्रहण कर ले। शाहजी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शाहजहाँ से अनुमति लेकर आदिलशाह ने शाहजी को बीजापुर की सेवा में रख लिया। शाहजहाँ ने बीजापुर को यह अनुमति इस शर्त पर दी कि शाहजी की ओर जागीर नहीं दी जाए। शाहजी को बीजापुर राज्य की ओर से 92 हजार सवारों का सेनापति नियुक्त किया गया। उसे कर्नाटक की तरफ एक बड़ी जागीर दी गई। पूना तथा सूपा भी की जागीरें भी पूर्ववत् उसके पास बनी रहीं।

    उन दिनों बीजापुर का सेनापति रनदुल्ला खाँ, विजयनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर खड़े हुए छोटे-छोटे हिन्दू राज्यों को नष्ट कर रहा था। ई.1637-40 के बीच हुए इन अभियानों में शाहजी को रनदुल्ला खाँ का साथ देना पड़ा। इन हिन्दू राज्यों को नष्ट-भ्रष्ट करके बीजापुर के शाह तथा सेनापति ने अकूत सम्पदा एकत्रित कर ली। इस सम्पदा से बीजापुर के शाह ने अपने लिए विशाल महलों का निर्माण करवाया। इनमें दाद महल एवं गोलगुम्बद भी सम्मिलित हैं। इन अभियानों में हिन्दू जनता पर भयानक अत्याचार किए गए जिन्हें देखकर शाहजी की आत्मा हा-हाकार करती थी। कुछ समय पश्चात् शाहजी ने बीजापुर के शाह से ये क्षेत्र जागीर के रूप में अपने अधिकार में ले लिए ताकि हिन्दू प्रजा को मुस्लिम अत्याचारों से बचाया जा सके।


    शिवाजी का बाल्यकाल

    शाहजी एवं जीजाबाई का विवाह

    मालोजी अभी तक जाधवराय द्वारा किए गए अपमान को भूला नहीं था। मालोजी भी अभी तक अहमदनगर की सेवा में था तथा उसकी पुत्री जीजाबाई भी अब तक अविवाहित थी। इसलिए मालोजी ने निजामशाह से प्रार्थना की कि वह जाधवराय से कहकर जीजाबाई का विवाह मेरे पुत्र शाहजी से करवाए। निजामशाह ने जाधवराय को इस विवाह के लिए सहमत किया तथा ई.1605 में जीजाबाई और शाहजी का विवाह हो गया।

    जीजाबाई एवं शाहजी का दाम्पत्य जीवन

    जीजाबाई एवं शाहजी के दाम्पत्य से पहले सम्भाजी का और बाद में शिवाजी का जन्म हुआ। शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी के निजामशाही किले में हुआ। यह दुर्ग पूना जिले के धुर उत्तर में जुन्नार नगर के निकट शिवनेर में स्थित था। जीजाबाई ने शिवाई नामक स्थानीय देवी से अपने पुत्र के लिए मनौती मांगी थी। इसलिए बालक का जन्म होने पर उसका नाम शिवाजी रखा गया। कुछ समय पश्चात् जाधवराय, निजाम से नाराज होकर मुगलों की सेवा में चला गया। इससे मालोजी को कठिनाई हुई क्योंकि वह (मालोजी) अब भी निजाम की सेवा में था। अतः मालोजी ने अपने पुत्र शाहजी की पत्नी जीजाबाई तथा उसके पुत्र शिवाजी को शिवनेर के दुर्ग में रख दिया। जीजाबाई का बड़ा पुत्र सम्भाजी अपने पिता शाहजी के पास रहा। जाधवराय से सम्बन्ध तोड़ लेने के कारण निजाम के राज्य में मालोजी और बिठोजी का कद बहुत बढ़ गया और वे निजाम के प्रधानमंत्री मलिक अम्बर के अत्यंत विश्वासपात्र बन गए। उन्हें निजामशाही में अच्छी जागीरें प्राप्त हो गईं।

    शाहजी के अन्य विवाह

    कुछ समय पश्चात् शाहजी ने तुकाबाई मोहिते नामक एक सुंदर युवती से विवाह कर लिया। इस दाम्पत्य से शाहजी को एकोजी अथवा व्यंकोजी नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। कुछ समय पश्चात् शाहजी ने नरसाबाई नामक एक मराठा कन्या से विवाह किया। शाहजी को सांताजी नामक एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जो मराठों के इतिहास में सांताजी घोरपड़े के नाम से प्रसिद्ध है। वह शिवाजी के द्वितीय पुत्र राजाराम के समय मराठों का बहुत प्रसिद्ध योद्धा माना जाता था।

    जीजाबाई की कठिनाइयाँ

    अहमदनगर के निजाम को यह सहन नहीं था कि जाधवराय उसकी सेवा त्यागकर मुगलों की सेवा करे। एक दिन उसने जाधवराय तथा उसके परिवार को अपने दुर्ग में आमंत्रित किया तथा छल से जाधवराय तथा उसके परिवार के तीन प्रमुख सदस्यों की हत्या करवा दी। पति द्वारा अलग कर दिए जाने के पश्चात् जीजाबाई किसी तरह अपने पिता के सहारे जीवन व्यतीत कर रही थी किंतु अब पिता का आश्रय भी छिन जाने के कारण जीजा और उसके पुत्र शिवाजी का जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया। जीजा ने अपना समय धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में लगाना आरम्भ किया। उसने रामायण, महाभारत तथा भगवद्गीता आदि ग्रंथों का अच्छा अध्ययन किया तथा इन ग्रंथों के नायकों एवं वीर पुरुषों की गाथाएं अपने पुत्र शिवाजी को भी सुनाईं। जीजाबाई ने शिवाजी को भारत राष्ट्र के उत्थान के लिए, मुगलों के चंगुल से स्वतंत्र कराने की आवश्यकता से परिचित करवाया तथा उच्च जीवन आदर्श अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने शिवाजी को शक्ति का संचय करने की आवश्यकता का भी ज्ञान करवाया। माता जीजाबाई के उपदेशों से बालक शिवा, साधु-संतों, विद्वानों और ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखने लगा।

    कुछ समय बाद शाहजी भी निजामशाह की सेवा छोड़कर मुगलों की सेवा में चला गया। शाहजी को 7000 का मनसब दिया गया किंतु वहाँ उसका मन नहीं लगा और डेढ़ साल बाद वह पुनः निजाम की सेवा में आ गया। अब मुगलों ने अहमदनगर के विरुद्ध अभियान चलाया। शाहजी अहमदनगर की ढाल बनकर खड़ा हो गया। जब शाहजी मुगलों की सेवा छोड़कर पुनः निजाम की सेवा में आया, तब मुगलों का कोप शाहजी की पत्नी जीजाबाई और उसके पुत्र शिवाजी पर कहर बनकर टूटा। उन्हें मुगलों द्वारा प्रताड़ित किया जाने लगा। इस पर जीजाबाई, शिवाजी को लेकर एक किले से दूसरे किले में निरंतर यात्रा करती रही। एक बार जब मुगलों ने इन्हें बुरी तरह घेर लिया तो जीजा ने शिवाजी को एक पहाड़ी दुर्ग में अपने समर्थकों के बीच इस तरह छिपा दिया कि मुगल उसे ढूंढ नहीं सकें।

    जीजाबाई एवं शिवाजी को पुनः संरक्षण

    जब शाहजी की स्थिति सुधर गई तो उसने दादा कोणदेव को अपनी पूना एवं सूपा की जागीरों का संरक्षक नियुक्त किया तथा उसे आदेश दिया कि वह जीजाबाई एवं शिवाजी को शिवनेर के दुर्ग से लाकर पूना में रखे और उनकी देखभाल करे। दादा कोणदेव बुद्धिमान, स्वामिभक्त, दृढ़प्रतिज्ञ और धर्म एवं राजनीति की गहरी समझ रखने वाला व्यक्ति था। वह जीजाबाई तथा उसके पुत्र शिवाजी को शिवनेर के दुर्गम दुर्ग से पूना ले आया। उसने पूना में लाल-महल नामक भव्य आवास का निर्माण करवाया तथा जीजा एवं उसके पुत्र को इसी महल में रखा। कोणदेव का मानना था कि प्रजा पर अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए शासक को भव्य महल में रहना चाहिए।

    शाहजी द्वारा पुत्रों में जागीरों का वितरण

    शाहजी ने अपने बड़े पुत्र सम्भाजी को कर्नाटक में बैंगलोर की जागीर दी। दूसरे पुत्र शिवाजी को पूना तथा सूपा की जागीरें दीं तथा तीसरे पुत्र एकोजी अथवा व्यंकोजी को तंजावुर की जागीर दी। कुछ समय पश्चात अफजल खाँ ने शाहजी के बड़े पुत्र सम्भाजी की हत्या कर दी। इस पर बैंगलोर की जागीर का प्रबन्ध शाहजी स्वयं करने लगा।

    दादा कोणदेव द्वारा बालक शिवाजी का प्रशिक्षण

    बालक शिवाजी एक ओर, अपनी माँ से रामायण एवं महाभारत के उच्च आदर्श सम्पन्न वीर पुरुषों एवं नारियों की गाथाएं सुन रहा था तथा दूसरी ओर, दादा कोणदेव द्वारा प्रजा की समृद्धि के लिए किए जा रहे कार्यों को अपनी आंखों से देख रहा था। उसने शाहजी की जागीरों को सम्पन्न बनाने के लिए अनेक उपाय किए तथा उनकी काया पलट कर रख दी। उसने जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए कदम उठाए तथा प्रजा को डाकुओं के भय से मुक्त करने के लिए डाकुओं के विरुद्ध सैनिक अभियान किये। मानव बस्तियों में घुसकर मनुष्यों को मार डालने वाले वन्य-पशुओं को रोकने के लिए उसने मावल युवकों की एक सेना तैयार की। दादा कोणदेव ने एक और अद्भुत काम किया। यह कार्य उस काल में और कोई जागीरदार या शासक नहीं कर रहा था। वह बालक शिवाजी को अपने साथ लेकर शाहजी की जागीर के हर गांव में जाता तथा वहाँ के लोगों की समस्याओं और झगड़ों के बारे में पूछता। समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता तथा झगड़ों को दोनों पक्षों के साथ बैठकर सुनता। वह दोनों पक्षों को समझाता तथा अंत में अपना निर्णय सुनाता। इस निर्णय प्रक्रिया में वह बालक शिवाजी को भी सम्मिलित करता।

    यह क्षेत्र मावल कहलाता था तथा इसके निवासियों को मावली कहते थे जो अशिक्षित होने के कारण खेती के सही तरीकों से अनजान थे। दादा कोणदेव उन्हें खेती करने के सही तरीके बताता था जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो। कोणदेव ने शिवाजी को अश्व संचालन, धनुष विद्या, नेजा तथा तलवार चालन, मल्ल युद्ध आदि का प्रशिक्षण दिलवाया।

    मित्र-मण्डलियों की स्थापना

    मेधा और प्रतिभा सम्पन्न शिवाजी, कोणदेव के कार्य में रुचि लेने लगा। उसकी इस प्रवृत्ति को देखकर बहुत से किसान और आमजन शिवाजी को अपना हितैषी और शासक मानने लगे। इससे पहले कभी किसी शासक ने निर्धन प्रजा से इतना निकट सम्बन्ध नहीं रखा था। धीरे-धीरे शिवाजी पूना और सूपा, दोनों जागीरों में लोकप्रिय हो गया। शिवाजी ने अपने पिता की जागीर के हर गांव का भ्रमण करके अपनी मित्र मण्डलियां स्थापित कीं। शिवाजी ने इन युवकों को राष्ट्रभक्ति और धर्म का पाठ पढ़ाया। उनके साथ खेलकूद कर उनसे निकटता स्थापित की। धीरे-धीरे हजारों युवक, शिवाजी के मित्र बन गए जो अपने राजा की एक आवाज पर प्राण न्यौछावर करने को तैयार थे।

    शिवाजी का प्रथम विवाह एवं बैंगलोर की यात्रा

    ई.1640 में माता जीजा ने, दादा कोणदेव से परामर्श करके शिवाजी का विवाह निम्बालकर परिवार की कन्या सईबाई से कर दिया। जब शाहजी को इस विवाह के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने कोणदेव को आदेश भिजवाया कि वह जीजाबाई, शिवाजी और उसकी पत्नी सईबाई को लेकर बैंगलोर आए ताकि वह (शाहजी) अपने परिवार से मिल सके और पुत्रवधू को आशीर्वाद दे सके। दादा कोणदेव इस परिवार को पूना (महाराष्ट्र) से लेकर बैंगलोर (कर्नाटक) गया जहाँ उन सबका यथोचित सत्कार किया गया। इस यात्रा में शिवाजी ने माता एवं पत्नी के साथ उस क्षेत्र के हिन्दू तीर्थों एवं मंदिरों के दर्शन किये। जीजाबाई तीन वर्ष तक अपने पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ बीजापुर में रही।

    एक दिन शाहजी, शिवाजी को अपने साथ लेकर आदिलशाह के दरबार में गया। वहाँ शिवाजी ने आदिलशाह को झुककर सलाम करने की बजाय सीधे खड़े रहकर अभिवादन किया। इस पर आदिलशाह ने चकित होकर पूछा कि इसने ऐसा क्यों किया? इस पर शाहजी ने आदिलशाह से क्षमा मांगते हुए कहा कि यह निरा बालक है इसे शाही रीति-रिवाजों की जानकारी नहीं है।

    गौ-मांस बेचने वाले कसाई का वध

    एक दिन शिवाजी ने एक कसाई को मार्ग में गौ-मांस बेचते हुए देखा तो उसने आदिलशाह से कहा कि हम गाय को माता के समान पूजते हैं और कसाई उसे सड़क पर काटते हैं। इसलिए आप अपने राज्य में गौ-हत्या पर रोक लगाएं। आदिलशाह ने शिवाजी की बात सुनकर आदेश दिए कि कोई भी व्यक्ति सड़क पर न तो गाय काटेगा और न सड़क पर गौ-मांस बेचेगा क्योंकि वहाँ से हिन्दू भी निकलते हैं। इस आज्ञा के जारी होने के कुछ दिनों बाद एक कसाई गाय को लेकर जा रहा था। शिवाजी ने रस्सी काटकर गाय को मुक्त कर दिया तथा कसाई द्वारा विरोध किए जाने पर कसाई के पेट में कटार भौंक दी जिससे कसाई मर गया। जब यह बात आदिलशाह तक पहुंची तो उसने शिवाजी की कार्यवाही का समर्थन किया क्योंकि शाही आज्ञा के अनुसार, सड़क पर गौहत्या तथा गौ-मांस की बिक्री नहीं हो सकती थी तो फिर हत्या करने के लिए गाय को सरेआम सड़क पर लेकर कैसे चला जा सकता था!

    शिवाजी का दूसरा विवाह

    आदिलशाह शिवाजी के साहस एवं स्वातंत्र्य भाव से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने शाहजी से कहकर शिवाजी का एक और विवाह करवाया। यह विवाह शिरके घराने की कन्या सोयराबाई से हुआ। आदिलशाह स्वयं भी इस विवाह में अपने अमीरों सहित उपस्थित हुआ और शिवाजी तथा उसकी नई पत्नी को आशीर्वाद दिया।

    शिवाजी की बीजापुर से विदाई

    जब से शिवाजी, बैंगलोर आया था, शाहजी उसे बीजापुर राज्य के प्रशासन, सेना के प्रबन्धन, दरबारी रीति-रिवाज, अमीरों के षड़यंत्र, अश्वशाला की व्यवस्था, शस्त्रों के संचालन एवं रख-रखाव आदि का प्रशिक्षण दे रहा था। जब शाहजी से मिलने के लिए कोई अमीर-उमराव आता, तो शाहजी, शिवाजी को अपने पास बैठा लेता ताकि वह राज्यकाज सम्बन्धी बातों को सुने और समझे। सब-कुछ ठीक ही चल रहा था और शाहजी के साथ-साथ आदिलशाह भी शिवाजी पर प्रेम लुटा रहा था किंतु ई.1643 में शिवाजी द्वारा कसाई का वध किए जाने के बाद, शाहजी अपने पुत्र की तरफ से आशंकित रहने लगा कि जाने कब यह कौनसी मुसीबत खड़ी कर दे और आदिलशाह इसे हानि पहुंचा दे। इसलिए शाहजी ने दादा कोणदेव से कहा कि वह जीजाबाई तथा उसके पुत्र एवं पुत्र-वधुओं को लेकर पुनः पूना चला जाए। इस समय शिवाजी की आयु लगभग 13 वर्ष हो गई थी।

    शिवाजी के मन में शाहजी के कामों से विरक्ति

    शाहजी बीजापुर के सुल्तान की सेवा में था। इस नाते उसने बीजापुर द्वारा हिन्दू राज्यों पर किए गए आक्रमणों में मुख्य भूमिका निभाई थी। बीजापुर राज्य द्वारा हजारों हिन्दू परिवार उजाड़ दिए गए थे और उन्हें बलपूर्वक मुस्लिम बनने पर बाध्य किया था। हिन्दुओं की सम्पत्तियां छीनकर उन्हें भिखारी बनाकर छोड़ दिया गया था। सैंकड़ों भव्य हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया गया था। शाहजी को इन सब कामों में बीजापुर की सेना का नेतृत्व करना पड़ता था। बैंगलोर यात्रा में शिवाजी को ये सब बातें विस्तार से ज्ञात हुईं। शिवाजी को अपने पिता के इस कार्य से विरक्ति हुई और उसके मन में मुस्लिम शासन के प्रति विद्रोह के अंकुर ने जन्म लिया।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 3 शिवाजी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 3 शिवाजी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 3


    शिवाजी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश


    जागीर के बेहतर प्रबन्धन के प्रयास

    शाहजी ने शिवाजी को पूना की जागीर की देखभाल का जिम्मा सौंपा तथा शर्त रखी कि शाहजी के जीवित रहने तक शिवाजी, जागीर में अपने पिता का प्रतिनिधि मात्र होगा तथा शाहजी की मृत्यु के बाद वह इस जागीर का वास्तविक स्वामी बन जाएगा। अब शिवाजी दुगुने उत्साह से जागीर का प्रबन्ध करने लगा। उसका अधिक ध्यान कृषि की दशा सुधारने पर था ताकि प्रजा की आय बढ़े और उनके बीच के झगड़े कम हों।

    शिवाजी द्वारा गांवों में गुप्तचरों की नियुक्ति

    शिवाजी ने प्रत्येक ग्राम में कोटवारों के साथ-साथ ग्रामीणों को भी रात में जागकर गांव की रक्षा करने की व्यवस्था आरम्भ की। नए उद्यान लगाए तथा परस्पर विवादों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था भी की। जनता में नैतिकता एवं उत्साह की वृद्धि के लिए धार्मिक आयोजनों को समारोह पूर्वक मनाने के लिए प्रेरित किया गया। शिवाजी ने प्रत्येक गांव में अपने गुप्तचर नियुक्त किए जो गांव में घटने वाली प्रत्येक घटना की सूचना शिवाजी तक पहुंचाते थे।

    हिन्दू स्वातंत्र्य के लिए छपटाहट

    माता जीजाबाई ने अपने परिवार के समस्त दुर्दिनों के लिए मुस्लिम शासकों को जिम्मेदार माना था। उसने शिवाजी को भी यही समझाया था कि न केवल हमारी अपितु समस्त हिन्दुओं की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण मुस्लिम शासकों का कुशासन है। जब तक मुसलमान शासकों का अंत नहीं होगा, हिन्दू प्रजा सुखी नहीं होगी। शिवाजी जैसे-जैसे बड़ा होता जा रहा था, स्वयं भी स्पष्ट रूप से देख पा रहा था कि हर ओर हिन्दू प्रजा को मुस्लिम शासकों के अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा था। शिवाजी ने देखा कि हिन्दू प्रजा अपनी तरफ से जितना अधिक मुस्लिम धर्म का सम्मान करती थी, मुसलमानों द्वारा उन्हें उतना ही अधिक प्रताड़ित किया जाता था। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचने लगा था कि यदि प्रजा को सुखी बनाना है तो मुसलमानों का राज्य नष्ट करके, धर्मनिष्ठ एवं प्रजा-वत्सल हिन्दू राजाओं का राज्य स्थापित करना होगा। यदि मुसलमान शासक और अधिक लम्बे समय तक बने रहे तो हिन्दू धर्म, हिन्दू जाति, हिन्दू ग्रंथ, हिन्दू तीर्थ, हिन्दू संस्कृति सभी कुछ नष्ट हो जाएंगे। जीजाबाई प्रायः उसे चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और महाराणा प्रताप की कहानियां सुनाती। इन राजाओं ने विदेशी शासकों को परास्त करके अपनी हिन्दू प्रजा के गौरव को जीवित रखा था। शिवाजी भी ऐसा ही राजा बनने के स्वप्न देखने लगा।

    वह जब भी अपनी जागीर में भ्रमण पर जाता तो युवकों को एकत्रित करके हिन्दू संस्कृति के उन्नयन एवं हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए ओजस्वी भाषण देता था। वह अपनी प्रजा को हिन्दू राज्य की स्थापना के लाभों के बारे में समझाता। वह प्रत्येक हिन्दू युवक को शास्त्रों के अध्ययन के साथ-साथ शस्त्र संचालन की शिक्षा लेने के लिए प्रेरित करता। शिवाजी उनसे कहता कि हम महान राष्ट्र की वीर संतानें हैं। हम संस्कारी पुरुष हैं और हम धर्म, प्रजा एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए शस्त्रों का सहारा लेंगे। यदि हम इस पवित्र एवं पुण्य कार्य को प्रारम्भ करते हैं तो ईश्वर भी अवश्य ही हमारी सहायता करेंगे। हम सफल होंगे और हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करेंगे। शिवाजी के भाषणों को सुनकर शिवाजी की प्रजा स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए दीवानी हो उठती। शिवाजी प्रायः अपने ग्रामीण मित्रों के बीच जाकर तलवार चालन, घुड़सवारी और अन्य शस्त्रों के संचालन का अभ्यास करता। शिवाजी के मार्गदर्शन में मावली युवकों को अपने जीवन का उद्देश्य मिल गया था। उनके मन से दासता का भाव जा रहा था और अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का भाव जाग्रत हो रहा था।

    कोंकण के चप्पे-चप्पे से परिचय

    कोंकण की जागीर ई.1632 से शाहजी के अधिकार में चली आती थी। यह जागीर उसे बीजापुर की ओर से, मुगलों के विरुद्ध युद्ध करने के भुगतान के रूप में मिली थी। अब शाहजी की ओर से शिवाजी इस जागीर का प्रबन्ध करता था। शिवाजी प्रायः अपनी जागीर में भ्रमण पर रहता। वह मावली युवकों के साथ आसपास के पहाड़ों, नदियों एवं जंगलों को भी देखने जाता। पांच वर्ष तक लगातार घूमते रहने के कारण शिवाजी कोंकण प्रदेश के एक-एक पहाड़, एक-एक जंगल, नदी-नालों-मुहानों और पर्वतीय उपत्यकाओं से परिचित हो गया। इस पूरे क्षेत्र में कई दुर्ग थे जिनमें मुस्लिम दुर्गपति नियुक्त थे। शिवाजी भी ऐसे ही दुर्ग अपने लिए बनवाने के स्वप्न देखने लगा। उसे यह भी लगने लगा था कि वे प्रयास करें तो मुस्लिम दुर्गपतियों से उनके दुर्ग आसानी से छीन सकते हैं।

    दादा कोणदेव की चेतावनी

    शिवाजी अपनी पत्नी एवं माता को बताए बिना घर से कई-कई दिनों तक के लिए अनुपस्थित रहने लगा। इस बीच वह अपने मावली साथियों के बीच जंगलों में जाकर युद्धाभ्यास करता था और किस दुर्ग को कैसे छीना जाएगा, इसकी योजना बनाता था। एक दिन यह बात कोणदेव तक पहुंच गई। उसने शिवाजी को बुलाकर सावधान किया कि वह पूना में आदिलशाह के जागीरदार का प्रतिनिधि मात्र है। अतः आदिलशाह के विरुद्ध किसी भी तरह का कार्य करने के बारे में नहीं सोचे अन्यथा वह और उसका पूरा परिवार किसी बड़े संकट में फंस सकता है। शिवाजी ने दादा कोणदेव की बात को ध्यान से सुना किंतु ये बातें उसे निश्चय से डिगाने के लिए पर्याप्त नहीं थीं।

    तोरण दुर्ग पर धावा

    अंततः शिवाजी ने वह कर दिखाया जिसके बारे में वह पिछले कुछ वर्षों से सोच रहा था और इसकी तैयारी भी कर रहा था। एक दिन उसने अपने साथियों सहित, तोरण दुर्ग पर आक्रमण किया और उसे अपने अधिकार में ले लिया। जब यह सूचना बीजापुर पहुंची तो शिवाजी से उत्तर मांगा गया। शिवाजी ने अपने उत्तर में आदिलशाह से कहलवाया कि उसने यह कदम बीजापुर राज्य की सुरक्षा के लिए उठाया है तथा तोरण दुर्ग को डाकुओं से मुक्त कराया है। वह इस दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर रहा है ताकि मुगलों से राज्य की रक्षा की जा सके। शाहजी के आश्वासन देने पर आदिलशाह ने शिवाजी के तर्क को स्वीकार कर लिया।

    खजाने की प्राप्ति

    एक दिन शिवाजी तोरण दुर्ग की मरम्मत करवा रहा था कि एक दीवार से उसे विशाल खजाने की प्राप्ति हुई। इसमें बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं थीं। शिवाजी ने अपने साथियों से सच ही कहा था कि यदि वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के कार्य को आरम्भ करेंगे तो उन्हें ईश्वरीय सहायता प्राप्त होगी। ईश्वरीय कृपा स्वतः उपस्थित हो गई थी। इस खजाने का उपयोग एक विशाल सेना को तैयार करने में किया जा सकता था। शिवाजी अब दुगुने उत्साह से अपने कार्य में जुट गया। उसने वेतनभोगी सैनिकों की भर्ती करनी आरम्भ कर दी। उनके लिए अस्त्र-शस्त्र खरीदे तथा अश्वों का प्रबन्ध किया।

    रायगढ़ का निर्माण

    शिवाजी ने अब अपने दूसरे स्वप्न अर्थात् अपनी इच्छानुसार दुर्ग निर्माण करने पर ध्यान केन्द्रित किया। शिवाजी ने एक ऊंचे पहाड़ पर नया दुर्ग बनवाना आरम्भ किया तथा उसका नाम रायगढ़ रखा। यह सूचना भी बीजापुर में आदिलशाह तक शीघ्र ही पहुंच गई। आदिलशाह ने शाहजी को बुलाया और उसे निर्देश दिए कि वह इस दुर्ग का निर्माण रुकवाए। शाहजी ने कोणदेव को पत्र लिखकर निर्देशित किया कि नए दुर्ग का निर्माण तत्काल रोक दिया जाए। कोणदेव ने शाहजी के पत्र के साथ अपनी ओर से भी एक पत्र शिवाजी को भिजवाया कि वह दुर्ग का निर्माण रोक दे। शिवाजी ने अपने दोनों अभिाभावकों के आदेश का पालन नहीं किया और दुर्ग का निर्माण यथावत् जारी रखा।

    आदिलशाह की बीमारी

    ई.1646 में बीजापुर का सुल्तान आदिलशाह बीमार पड़ गया। लगभग 10 वर्ष तक वह लाचार होकर खाट में पड़ा रहा। उसकी बीमारी के कारण राज्य का प्रबन्धन शिथिल हो गया और शत्रु सिर उठाने लगे। उसके अमीरों में वर्चस्व को लेकर षड़यंत्र होने लगे। बीजापुर की राजनीतिक परिस्थितियां शिवाजी के लिए अनुकूल सिद्ध हुईं। उसने बीजापुर के किलों पर तेजी से अधिकार करने की योजना बनाई।

    सूपा दुर्ग पर दृष्टि

    पूना की जागीर के निकट सूपा की जागीर थी जिस पर शिवाजी का अधिकार था। इस जागीर के निकट सूपा का दुर्ग था जिसमें आदिलशाह की तरफ से सम्भाजी मोहिते दुर्गपति था। शाहजी की द्वितीय पत्नी इसी सम्भाजी मोहिते की बहिन थी। इस तरह सूपा का दुर्गपति शिवाजी का सौतेला मामा था। शिवाजी ने सम्भाजी से आग्रह किया कि वह शिवाजी के अभियान में सहयोग करे तथा दुर्ग शिवाजी को सौंप दे किंतु सम्भाजी, बीजापुर के प्रति वफादार बना रहा। उसने शिवाजी का साथ देने से मना कर दिया तथा सम्पूर्ण जानकारी आदिलशाह को भिजवा दी। जब शिवाजी को ज्ञात हुआ कि मोहिते ने शिवाजी की गतिविधियों की समस्त सूचनाएं बीजापुर भिजवा दी हैं तो एक रात्रि में शिवाजी ने अपने साथियों को लेकर सूपा दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। मोहिते के पास लगभग 400 सिपाही थे, किंतु वे दुर्ग की रक्षा नहीं कर सके। शिवाजी ने मोहिते परिवार को बंदी बना लिया और दुर्ग में स्थित समस्त खजाने पर अधिकार कर लिया।

    शिवाजी ने मोहिते को समझाने का भरसक प्रयास किया कि वह शिवाजी द्वारा आरम्भ किए गए स्वातंत्र्य संग्राम में सम्मिलित हो जाए। उसे उसका दुर्ग तथा खजाना पुनः लौटा दिया जाएगा किंतु मोहिते अपनी जिद पर अड़ा रहा कि वह आदिलशाह के प्रति वफादारी को नहीं त्यागेगा। इस पर शिवाजी ने मोहिते को बंदी अवस्था में ही अपने पिता शाहजी के पास बैंगलोर भिजवा दिया क्योंकि रिश्तेदारी होने के कारण शिवाजी मोहिते को कोई कष्ट नहीं देना चाहता था।

    कोणदेव की मृत्यु

    सूपा के दुर्ग पर अधिकार हो जाने के बाद शिवाजी के पास तीन दुर्ग हो गए थे जो कि एक बड़ी बात थी किंतु शिवाजी अब कुछ समय के लिए चुप होकर बैठ गया ताकि आदिलशाह की प्रतिक्रिया का सामना कर सके। दारा कोणदेव, शिवाजी के प्रयासों का प्रशंसक बन गया। उसे लगने लगा कि शिवाजी के पास वह मेधा और त्वरा है जिसके बल पर वह अपने उद्देश्यों में सफल हो सकता है। कोणदेव अब काफी वृद्ध हो गया था तथा रुग्ण रहने लगा था। इसलिए एक दिन उसने शिवाजी को अपने पास बुलाया और उससे कहा कि तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो, वही सही है। मैं ही गलत था जो तुम्हारे प्रयासों का विरोध करता रहा। राष्ट्रहित में विदेशियों के शासन को समाप्त करने के लिए किसी को तो आगे आना ही पड़ेगा, वह तुम हो। कोणदेव ने शिवाजी की सफलता की कामना की और उसे आशीर्वाद दिया। मार्च 1647 में एक दिन कोणदेव ने अंतिम श्वांस ली। शिवाजी को शिवाजी बनाने वाले दो व्यक्तियों में से एक, इस धरती से विदा हो गया था। अब आगे का पथ शिवाजी को जीजाबाई के मार्गदर्शन में तय करना था।

    बीजापुर राज्य के अनेक दुर्गों पर अधिकार

    कोणदेव के आशीर्वाद से शिवाजी ने अपने भीतर नई ऊर्जा का अनुभव किया। उसका आत्मबल और भी बढ़ गया। उसने बीजापुर राज्य के कुछ अन्य दुर्गों पर धावा बोला और बिना अधिक रक्तपात किये, कई दुर्ग हस्तगत कर लिए। शिवाजी ने यह संकल्प धारण कर रखा था कि चूंकि अधिकांश दुर्गपति हिन्दू वीर हैं, अतः उनका रक्त नहीं बहाया जाए। उन्हें अपने अधीन करके प्रेम पूर्वक अपनी सेवा में नियुक्त किया जाए।

    पुरन्दर दुर्ग पर अधिकार

    अब शिवाजी किसी के लिए भी उपेक्षित किए जाने की स्थिति में नहीं रहा था। वह अपने शत्रुओं की आंखों में खटक चुका था। उस पर किसी भी समय आक्रमण हो सकता था। इसलिए आवश्यक था कि वह जागीर एवं अपने विजित क्षेत्र की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबन्ध करे। उसके राज्य की सीमा पर पुरन्दर दुर्ग स्थित था। यदि वह इस दुर्ग पर अधिकार लेता तो उसे, शत्रु का मार्ग जागीर में प्रवेश करने से पहले ही रोकने की क्षमता प्राप्त हो जाती। यह दुर्ग भी बीजापुर राज्य के अधिकार में था तथा वहाँ नीलो नीलकंठ सरनायक नामक दुर्गपति नियुक्त था। यह एक ब्राह्मण परिवार था तथा इसके सम्बन्ध शिवाजी के परिवार से बहुत अच्छे चले आ रहे थे। इन्हीं सम्बन्धों के कारण शिवाजी इस दुर्ग पर आक्रमण करने से बच रहा था। शिवाजी ने अपनी एक सेना इस दुर्ग के पास नियुक्त कर रखी थी ताकि उपद्रवी तत्वों एवं दस्युओं से शिवाजी की जागीर की रक्षा हो सके। इसके लिए उसने नीलकंठ परिवार से अनुमति भी प्राप्त कर रखी थी।

    अचानक ही सरनायक परिवार में भाइयों के बीच एक विवाद खड़ा हो गया। नीलकंठ सरनायक ने शिवाजी से आग्रह किया कि वह पुरन्दर दुर्ग में आकर इस विवाद को सुलझाए और भाइयों में सुलह करवाए। दीपावली के दिन शिवाजी अपने सहायकों के साथ दुर्ग में पहुंचा। उसके आदमियों ने सरनायक परिवार के भाइयों को उनके पलंगों एवं खाटों पर ही बांधकर बंदी बना लिया। शिवाजी ने उन भाइयों से कहा कि वे बीजापुर की नौकरी त्यागकर शिवाजी की नौकरी स्वीकार कर लें तथा शिवाजी के प्रति निष्ठावान रहने का वचन दें। इससे यह दुर्ग सरनायक परिवार के पास बना रहेगा। सरनायक भाइयों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। शिवाजी ने उन्हें बंदीगृहों में बंद कर दिया तथा लगातार 2-3 माह तक प्रेमपूर्वक अपनी बात समझाते रहे। अंत में सरनायक बंधुओं ने शिवाजी के प्रति निष्ठा ग्रहण करने का संकल्प लिया। शिवाजी ने उन सभी भाइयों को मुक्त करके दुर्ग सौंप दिया। सरनायक परिवार सदैव शिवाजी के प्रति निष्ठावान बना रहा।

    कल्याण के दुर्ग एवं खजाने पर अधिकार

    शिवाजी को अपने गुप्तचरों से सूचना मिली कि बीजापुर के शाह आदिलशाह ने कल्याण के दुर्गपति को निर्देश दिए हैं कि दुर्ग में स्थित समस्त कोष बीजापुर भेज दिया जाए। कल्याण के निकटवर्ती दुर्गपतियों एवं जागीरदारों को निर्देश दिए गए कि वे इस खजाने को मार्ग में सुरक्षा प्रदान करें। जब दुर्गपति मुल्ला अहमद, कल्याण दुर्ग से खजाना लेकर निकला तो शिवाजी ने अपनी सेना को दो दलों में विभक्त किया। उन्होंने एक सैन्य-दल को मुल्ला अहमद को लूटने के लिए रवाना किया तथा दूसरे सैन्य-दल को कल्याण दुर्ग पर अधिकार करने भेजा। जब मुल्ला खजाना लेकर पुरन्दर दुर्ग के निकट से निकल रहा था, शिवाजी की टुकड़ी ने उस पर धावा बोल दिया। मुल्ला कुछ भी नहीं कर सका। शिवाजी के आदमी खजाना लेकर रायगढ़ दुर्ग पहुंच गए। दूसरे दल ने भी तेजी से काम किया तथा मुल्ला के वापस लौट आने से पहले ही कल्याण दुर्ग पर धावा बोल दिया तथा दुर्ग पर अधिकार करके मुल्ला के परिवार को बंदी बना लिया।

    शिवाजी द्वारा मुस्लिम स्त्री पर दया

    इस परिवार में मुल्ला की एक पुत्रवधू भी थी जो अत्यंत सुंदर थी। शिवाजी के सेनापति आवाजी सोनदेव ने इस स्त्री को पालकी में बैठाकर शिवाजी के पास पूना भेज दिया। सोनदेव को आशा थी कि युवक शिवाजी इस अनिंद्य सुंदरी को उपहार के रूप में पाकर अत्यंत प्रसन्न होगा। शिवाजी ने उसे देखा तो उसके रूप की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका। उसने कहा- 'हे ईश्वर! तुझे धन्यवाद जो तूने इतनी सुन्दर सूरत बनाई है। कितना अच्छा होता यदि मेरी माता भी तेरे समान सुन्दर होती तो मैं भी इतना सुन्दर होता।' शिवाजी ने उस स्त्री को मुल्ला के पास भेज दिया तथा सोनदेव को फटकार भिजवाई कि फिर कभी किसी स्त्री को बंदी नहीं बनाए। इस घटना के बाद शिवाजी की सेना में अनुशासन और भी गंभीर हो गया। शिवाजी के जीवित रहते, किसी मराठा सेनापति या सैनिक ने कभी अनुशासन भंग नहीं किया।

    प्रबलगढ़ पर अधिकार

    अब शिवाजी का राज्य पूना और सूपा से बढ़कर समुद्र के किनारे तक आ पहुंचा। पनवेल के निकट प्रबलगढ़ नामक दुर्ग था। यह भी बीजापुर राज्य के अधीन था। यहाँ केशरीसिंह नामक दुर्गपति नियुक्त था। शिवाजी ने इस दुर्ग को भी बिना रक्तपात किये, अपने अधिकार में लेने के प्रयास किए किंतु जब ये प्रयास सफल नहीं हुए तो शिवाजी ने युद्ध करने का निर्णय लिया। भीषण युद्ध में केशरीसिंह अपने आदमियों सहित मारा गया। इस दुर्ग में शिवाजी को सोने की मुहरें, सोने की छड़ें तथा होन का विशाल खजाना प्राप्त हुआ। यह समस्त स्वर्ण, एक गुप्त स्थान पर कुछ बर्तनों में रखा हुआ था। (होन शब्द का निर्माण स्वर्ण से हुआ है। इसे हूण भी कहते थे, एक होन की कीमत चार रुपए के बराबर थी)

    शत्रु की माता को सष्टांग प्रणाम

    शिवाजी के भय से केशरीसिंह की माता तथा दो बच्चे किले में ही एक स्थान पर छिप गए थे। शिवाजी के सैनिकों ने उन्हें पकड़कर शिवाजी के समक्ष प्रस्तुत किया। शिवाजी ने इस वृद्धा को देखते ही धरती पर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया तथा सवारी के लिए पालकी देकर अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसके जन्मस्थान देवल गांव भेज दिया। इसके बाद शिवाजी ने केशरीसिंह तथा उसके आदमियों का हिन्दू विधि विधान से अंतिम संस्कार करवाया। शिवाजी के इस आचरण का शिवाजी की सेना पर गहरा प्रभाव पड़ा। शिवाजी के निकट सम्पर्क में आने वाला ऐसा कोई प्राणी नहीं था जिसके हृदय में शिवाजी के प्रति आदर और प्रेम न उपजा हो।

    ताश के पत्तों की तरह झोली में आ गिरे दुर्ग

    शिवाजी तलवार चलाता जा रहा था और बड़े-बड़े दुर्गम दुर्ग शिवाजी की झोली में बरसाती भुनगों की तरह आ-आ कर गिर रहे थे। सिंहगढ़, तोरण, चाकण, कोण्डाना, पुरन्दर, कुम्भलगढ़, पन्हाला, कंगूरी, तुंग, तिकोना, भूरप, कौंडी, लोगहर, राजमण्डी तथा कल्याणी के दुर्ग और चाकण से लेकर नीरा नदी तक का क्षेत्र शिवाजी के अधिकार में आ गए। शिवाजी ने वीरवारी तथा लिंगनाथगढ़ नामक नए दुर्गों का निर्माण करवाया। भूषण कवि ने लिखा है-

    दुग्ग पर दुग्ग जीते, सरजा सिवाजी गाजी, डग्ग नाचे डग्ग पर शण्ड मुण्ड परके।

    आदिलशाह द्वारा शाहजी को बंदी बनाया जाना

    ई.1645 में जब शिवाजी की गतिविधियों के समाचार बीजापुर के शाह को मिले तो उसने शिवाजी के पिता शाहजी को बंदी बनाने का निश्चय किया। आदिलशाह को लगा कि शाहजी की शह पर ही शिवाजी यह सब कार्यवाही कर रहा है। उसने शाहजी को बंदी बनाने का कार्य अपने विश्वस्त व्यक्ति, मुधौल के उपसेनापति बाजी घोरपड़े को सौंपा। बाजी घोरपड़े और शाहजी भौंसले एक ही वंश से थे। बाजी ने शाहजी को अपने निवास पर भोजन हेतु आमंत्रित किया तथा छल से बंदी बनाकर आदिलशाह के पास भेज दिया। बीजापुर में शाहजी को कठोर कारावास में रखा गया तथा उससे कहा गया कि वह शिवाजी की गतिविधियों को रुकवाए। शाहजी ने स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अपनी ओर से भरसक प्रयास किया किंतु कुतुबशाह ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।

    आदिलशाह की कैद से शाहजी की मुक्ति

    जब शिवाजी को अपने पिता के बंदी होने का समाचार मिला तो उसने अपनी समस्त गतिविधियां बंद कर दीं तथा अपने पिता को बंदीगृह से छुड़ाने के लिए स्वयं आत्म-समर्पण करने का निश्चय किया। शिवाजी की पत्नी सईबाई ने शिवाजी को यह आत्मघाती कदम उठाने से रोका। सईबाई ने शिवाजी को समझाया कि पिता और पुत्र यदि दोनों ही आदिलशाह के हाथ लग गए तो वह एक को भी जीवित नहीं छोड़ेगा। इस पर शिवाजी ने मुगल बादशाह शाहजहाँ से सहायता मांगने के लिए अपने वकील के हाथों एक पत्र भिजवाया। शाहजहाँ ने आदिलशाह को लिखा कि वह शाहजी को बंदीगृह से मुक्त करे किंतु आदिलशाह अपनी जिद पर अड़ा रहा।

    इस अवधि में शाहजहाँ की तरफ से औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर नियुक्त था। औरंगजेब ने आदिलशाह पर दबाव बनाया कि वह शाहजी को मुक्त करे। शाहजी का मित्र मुरारपंत, आदिलशाह को समझाने में सफल हुआ कि शिवाजी द्वारा की जा रही कार्यवाहियों में शाहजी का हाथ नहीं है। शिवाजी ने बीजापुर के शाह को प्रस्ताव भिजवाया कि यदि शाहजी को मुक्त कर दिया जाए तो वह सिंहगढ़ (पुराना नाम कोंडाणा दुर्ग) बीजापुर को समपर्पित कर देगा। अंततः चार साल तक बंदीगृह में रहने के बाद 16 मई 1649 को शाहजी को बंदीगृह से मुक्ति मिली। चार साल की अवधि में कनार्टक में व्यवस्थाएं बिगड़ने लगी थीं। इसलिए आदिलशाह ने शाहजी को उसका पुराना पद और कर्नाटक की जागीर लौटा दी एवं जागीर का प्रबन्ध करने भेज दिया।

    शाहजहाँ की तरफ से शाहजी एवं शिवाजी को निमंत्रण

    शाहजी किसी समय मुगलों की सेवा में भर्ती हुआ था किंतु उसने मुगलों को छोड़कर अहमदनगर की तथा अहमदनगर राज्य के समाप्त होने पर बीजापुर राज्य की नौकरी की। बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को चार साल तक बंदीगृह में रखा। इसलिए 14 अगस्त 1649 को शाहजहाँ के पुत्र मुराद ने शाहजी एवं शिवाजी को पत्र लिखकर मुगलों की सेवा के लिए आमंत्रित किया ताकि शाहजी और शिवाजी मिलकर मुगलों के लिए बीजापुर राज्य का नाश कर सकें। शिवाजी को लिखे गए पत्र का मजमून इस प्रकार से था-

    ''हमारी कभी न खत्म होने वाली शाही मेहरबानियों से निहाल हों और समझें कि अत्यंत मेहरबानी के साथ आपके पिता के अपराधों पर हमने अपनी कलम से माफी की लकीर खींची है और वफादारी और निष्ठा के लिए कृपा और क्षमा के द्वार खोल दिए गए हैं। यही समय है कि आप अपने पिता और अन्य कुलजनों के साथ बादशाह की चौखट पर सलाम करने के लिए हमारे सामने हाजिर हों, ताकि वो खुशी हासिल करने के लिए आपको 5 हजार सवारों के साथ पांच हजारी जात की मनसब और बाकी मुनासिब इनामात देकर आपके साथियों से ऊंचा उठाया जा सके और शाही सेवा में आपके पिता के पुराने मनसब बहाल किए जा सकें।''

    शिवाजी ने बीजापुर को अपने पिता की मुक्ति के एवज में सिंहगढ़ समर्पित किया था। इसलिए शाहजी या शिवाजी पर मुगलों का कोई अहसान नहीं था। अतः शिवाजी और शाहजी ने मुराद के पत्रों का कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया।

    मुगलों से दूरी

    उत्तर भारत के मुगलों एवं दक्षिण भारत के शिया मुसलमानों की राजनीति के बीच शिवाजी सम्भल कर चल रहा था। वह दोनों को अपना शत्रु मानता था और नित्य नवीन क्षेत्र अपने राज्य में सम्मिलित कर रहा था। जीत के उत्साह में उसने कभी आपा नहीं खोया। वह जानता था कि एक बार में एक ही शत्रु से बैर मोल लेना चाहिए। इसलिए उसने अब तक जितनी कार्यवाहियां की थीं, बीजापुर राज्य के क्षेत्र में की थीं। बीजापुर के शाह से उसे इसलिए घृणा थी क्योंकि उसने विजयनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर उत्पन्न हुए छोटे-छोटे हिन्दू राज्यों एवं उनकी प्रजाओं पर भयानक अत्याचार किए थे तथा शाहजी को अकारण चार साल तक बंदीगृह में रखा था। ई.1653 में शाहजहाँ ने औरंगजेब को दक्षिण का सूबेदार बनाया। औरंगजेब अच्छी तरह समझता था कि यदि दक्खिन में शांति से रहना है तो शिवाजी से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखने होंगे। उसने शिवाजी को पत्र लिखकर मिलने के लिए बुलाया किंतु शिवाजी ने अपनी व्यस्तताओं का हवाला देकर औरंगजेब से भेंट नहीं की।

    जावली पर अधिकार

    शिवाजी की बढ़ती हुई कार्यवाहियाँ, बीजापुर के शाह की बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थीं। एक दिन आदिलशाह ने अपने सेनापति श्यामराज को आदेश दिया कि वह या तो शिवाजी का वध करे या पकड़कर लाए। श्यामराज अपनी विशाल सेना लेकर शिवाजी को खोजता हुआ जावली की ओर आया। जावली क्षेत्र उन दिनों आदिलशाह के विश्वस्त एवं प्रबल जागीरदार चन्द्रराव मोरे के अधिकार में था। वह भी चाहता था कि शिवाजी की गतिविधियों पर विराम लगे। अतः उसने श्यामराज के साथ सहयोग किया। शिवाजी के गुप्तचर इन दोनों जागीरदारों की कार्यवाहियों की सूचना निरंतर शिवाजी तक पहुंचा रहे थे। इसलिए शिवाजी भी पूरी तैयारी कर रहा था। श्यामराज अपने साथ एक विशाल सेना लेकर, शिवाजी के डेरों के आसपास के जंगल में जा छिपा। उसकी योजना थी कि जब कभी शिवाजी यहाँ से होकर निकले, उसे घेर कर मार डाला जाए। शिवाजी, श्यामराज द्वारा बिछाए गए मौत के जाल को अच्छी तरह समझ गया तथा उसने इस जाल को अपने हाथों से काटने का निर्णय लिया। एक रात जब श्यामराज की सेना गहरी निद्रा में सो रही थी, शिवाजी अपनी सेना लेकर श्यामराज के शिविर पर टूट पड़ा। अचानक हुए इस धावे के लिए श्यामराज तैयार नहीं था। उसके अधिकांश सैनिक या तो मारे गए या प्राण बचाकर जंगलों में भाग गए। श्यामराज भी सिर पर पैर धरकर भागा। शिवाजी ने शिकारी बनकर आए श्यामराज को उसके ही बनाए हुए मौत के जाल में फांस लिया था।

    जावली की जागीर पर अधिकार

    जावली का जागीरदार चन्द्रराव मोरे, अपना सम्बन्ध प्राचीन मौर्य वंश से बताता था। शिवाजी चाहता था कि इस हिन्दू राजपरिवार से उसकी मित्रता हो जाए ताकि एक हिन्दू को दूसरे हिन्दू का रक्त न बहाना पड़े। शिवाजी ने इसके लिए प्रयास भी किए किंतु शक्ति के मद में चूर, चन्द्रराव मोरे हर समय शिवाजी की हँसी उड़ाया करता था। फिर भी शिवाजी ने उसे स्वजातीय हिन्दू जानकर कभी शत्रुता वाली कार्यवाही नहीं की। अब जबकि चन्द्रराव मोरे ने श्यामराज के साथ मिलकर शिवाजी के लिए मौत का जाल बिछाने में सहयोग किया था, शिवाजी ने मोरे को समाप्त करने का निर्णय लिया। शिवाजी शक्ति का प्रयोग करके भी मोरे से निबट सकता था किंतु शिवाजी ने यह नियम बना रखा था कि शक्ति को बचाकर रखा जाए तथा शत्रु पक्ष के हिन्दू वीरों के प्राण नहीं लिए जाएं। इसलिए शिवाजी ने एक कूटजाल बुना। उसने अपने वेतन अधिकारी रघुनाथ बल्लाल को मोरे के पास एक वैवाहिक प्रस्ताव लेकर भेजा तथा स्वयं सेना सहित जावली के जंगलों में जा छिपा।

    26 जनवरी 1656 को रघुनाथ बल्लाल चुने हुए 25 तलवारबाजों को लेकर मोरे के पास जावली गया और वहाँ कुछ औपचारिक वार्तालाप करके कुछ विशेष बातें करने के लिए अगले दिन का समय ले लिया। अगले दिन के वार्तालाप के लिए जावली के महलों में एक अलग कक्ष नियत किया गया। यहाँ चन्द्रराव मोरे तथा उसके भाई सूर्यराव मोरे के अतिरिक्त और कोई नहीं था। रघुनाथ भी अपने एक सहायक को लेकर मोरे से मिलने पहुंचा। थोड़ी देर के वार्तालाप के पश्चात् रघुनाथ तथा उसके सहायक ने अपने कपड़ों से कटारें निकालकर मोरे बंधुओं का वध कर दिया। मोरे के अंगरक्षक कक्ष के बाहर मौजूद थे किंतु वे निश्चिंत एवं असावधान थे। इसलिए रघुनाथ और उसका साथी उन्हें भ्रम में डालकर महलों से बाहर निकल आए और सीधे जंगल की ओर भागे। शिवाजी को जैसे ही इसकी सूचना मिली, वह जंगल से निकलकर जावली के महल पर टूट पड़ा। देखते ही देखते जावली की सेना के पांव उखड़ गए और चन्द्रराव मोरे के दो पुत्र बंदी बना लिए गए। इस प्रकार 27 जनवरी 1656 को जावली दुर्ग पर शिवाजी का अधिकार हो गया। जावली की विजय से शिवाजी को बहुत बड़ा भू-भाग, कोष और राजगढ़ का दुर्ग हाथ लगा जो बाद में शिवाजी की राजधानी बना।

    आदिलशाह की मृत्यु

    ई.1657 में बीजापुर के शाह आदिलशाह की मृत्यु हो गई। वह दस साल से बीमार चल रहा था तथा शासन व्यवस्था उसके मंत्री एवं सेनापति संभालते थे। आदिलशाह के बाद उसका 18 साल का पुत्र अली आदिलशाह (द्वितीय) बीजापुर का नया सुल्तान हुआ।

    औरंगजेब की नाराजगी

    जिस समय औरंगजेब अहमदनगर राज्य के किलों को एक-एक करके निगल रहा था, उस समय शिवाजी, बीजापुर राज्य के किलों केे लिए काल बना हुआ था। दोनों अपने-अपने उद्देश्यों में लगे हुए थे किंतु दोनों ही जानते थे कि शीघ्र ही वे एक दूसरे के लिए चुनौती बन जाएंगे। राजनीति का शातिर खिलाड़ी औरंगजेब इस समय शिवाजी को शांत रखना चाहता था इसलिए उसने 22 अप्रेल 1657 को शिवाजी को एक पत्र भेजा जिसमें उसने अपना बड़प्पन प्रदर्शित करते हुए लिखा- ''वास्तव में बीजापुर के जितने किले और महल पहले से आपके कब्जे में हैं, हम उन्हें आपको स्थायी तौर पर सौंपते हैं। आपकी इच्छा के अनुसार दाभोल के किले और उसके अधीन क्षेत्रों से प्राप्त आय भी हम आपके लिए छोड़ते हैं- आपके बाकी अनुरोध स्वीकार किए जाएंगे ओर आप अपनी कल्पना से कहीं अधिक हमारे अनुग्रह और कृपा के पात्र बनेंगे।''

    औरंगजेब का पत्र पाकर शिवाजी चिढ़ गया। उसने औरंगजेब को करारा जवाब देने के लिए मुगलों के अधिकार वाले जुन्नार नगर पर चढ़ाई करके शहर को लूट लिया। इसके बाद शिवाजी ने अहमदनगर पर आक्रमण किया। औरंगजेब इस कार्यवाही से गुस्से से पागल हो गया। उसने दक्षिण में नियुक्त समस्त मुगल सेनापतियों को लिखित निर्देश भिजवाए- ''शिवाजी के इलाकों में घुस जाओ, तमाम गांव बर्बाद कर दो, बेरहमी से लोगों की हत्या करो ओर उन्हें बुरी तरह लूट लो। शिवाजी की पूना और चाकण की जागीरें पूरी तरह नष्ट कर दी जाएं और लोगों की हत्या और उन्हें गुलाम बनाने में जरा भी ढील न दी जाए।''

    औरंगजेब का आदेश जारी होते ही मुगल सेनाएं शिवाजी की जागीरों में घुस गईं और उन्हें बुरी तरह नष्ट करने लगीं। शिवाजी ने यह सारा हाल शाहजहाँ को लिख भेजा तथा अपनी जागीरों में मुगलों के हस्तक्षेप एवं उनके द्वारा किए जा रहे विध्वंस पर नाराजगी जताई। शाहजहाँ, औरंगजेब द्वारा दक्षिण में दिखाई जा रही अति-सक्रियता से प्रसन्न नहीं था। उसने औरंगजेब को आदेश भिजवाए कि दक्षिण में शांति बनाए रखी जाए तथा बीजापुर रियासत अथवा उसके किसी जागीरदार के विरुद्ध विध्वंस की कार्यवाही नहीं की जाए।

    सितम्बर 1657 में शाहजहाँ की बीमारी की सूचना पूरे देश में फैल गई और औरंगजेब का ध्यान मुगलों के तख्त पर कब्जा करने में लग गया। इसका लाभ उठाकर शिवाजी ने 24 अक्टूबर 1657 को कल्याण और भिवण्डी पर अधिकार कर लिया। जनवरी 1658 में उसने माहुली का दुर्ग जीत लिया। इस प्रकार शिवाजी, समुद्र तट से लेकर पर्वतीय प्रदेश तक के पुराने निजामशाही कोंकण का स्वामी बन गया। कल्याण तथा भिवण्डी को औरंगजेब ने मुगल राज्य में सम्मिलित कर लिया था, शिवाजी की इस कार्यवाही से औरंगजेब ने स्वयं को अत्यधिक अपमानित अनुभव किया किंतु वह मुगलिया राजनीति के ऐसे झंझावात में फंस चुका था कि अगले कई वर्षों तक उसे शिवाजी की तरफ देखने का समय नहीं मिलने वाला था। दक्षिण से आगरा की ओर भागते हुए उसने बीजापुर के शासक अली आलिशाह (द्वितीय) को एक पत्र लिखकर अपनी बौखलाहट व्यक्त की- ''इस देश की रक्षा करो। शिवाजी को, जिसने यहाँ कुछ किलों पर चोरी से कब्जा जमा लिया है, बाहर निकालो। यदि तुम उनकी सेवाएं स्वीकार करना चाहते हो तो उसे कर्नाटक में साम्राज्य के क्षेत्रों से दूर की जागीरें दो, ताकि वह यहाँ की शांति न भंग कर सके।''


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 4 अफजल खाँ का वध

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 4  अफजल खाँ का वध

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 4  

    अफजल खाँ का वध

    शिवाजी मुगलों के आंतरिक क्लेश को ध्यान से देख रहा था। जब मुगल शहजादे उत्तराधिकार के युद्ध में व्यस्त हो गए तो शिवाजी बीजापुर की आदिलशाही पर बिजली बनकर टूट पड़ा और उसके बहुत सारे क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिए। इस समय बीजापुर की गद्दी पर आदिलशाह (द्वितीय) आसीन था। यह वही आदिलशाही थी जो वियजनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर खड़े छोटे हिन्दू राज्यों को निगल गई थी तथा जिसने शाहजी को चार साल तक अपने बंदीगृह में रखा था।

    अफजल खाँ का अभियान

    बीजापुर का सुल्तान समझ गया कि यदि शिवाजी के विरुद्ध कठोर कार्यवाही नहीं की गई तो शिवाजी, सम्पूर्ण आदिलशाही को निगल जाएगा। इसलिए ई.1659 में अफजलखाँ को विशाल सेना के साथ शिवाजी कि विरुद्ध अभियान पर भेजा गया। उससे कहा गया कि शिवाजी से किसी तरह की संधि नहीं की जाए, उसे या तो बंदी बनाया जाए या फिर उसका वध किए जाए। अफजल खाँ लम्बे-चौड़े डील और दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति था। वह अपने वचनों का कभी पालन नहीं करता था, शरण में आए हुए शत्रु को भी निर्ममता से मार डालता था। उसे अनेक युद्धों का अनुभव था। उसने दरबार में घोषणा की कि वह घोड़े से उतरे बिना ही धूर्त शिवाजी को बंदी बनाकर सिंहासन के पायों से बांध देगा।

    शिवाजी का प्रण

    इधर शिवाजी भी अफजल खाँ को जान से मारना चाहता था क्योंकि अफजल खाँ ने धोखे से बहुत से हिन्दुओं की हत्या की थी और उनका सर्वनाश किया था। शिरा का हिन्दू शासक कस्तूरी रंगन युद्ध का त्याग करके अफजल खाँ की शरण में आया था तथा अफजल खाँ ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था। उसके उपरांत भी अफजल खाँ ने बड़ी क्रूरता से कस्तूरी रंगन की उसके परिवार सहित हत्या की थी। यहाँ तक कि अफजल खाँ ने शिवाजी के बड़े भाई सम्भाजी की भी हत्या की थी। शिवाजी, हिन्दुओं के इस शत्रु को किसी भी कीमत पर जीवित नहीं छोड़ना चाहता था।

    अफजल खाँ, शिवाजी की सेना में भय एवं आतंक फैलाने के लिए मार्ग के समस्त हिन्दू मंदिरों और देव विग्रहों को तोड़ता हुआ और गांवों को उजाड़ता हुआ आगे बढ़ा। उसने बाई के निकट डेरा डाला। अफजल खाँ की तैयारियों को देखते हुए शिवाजी प्रतापगढ़ दुर्ग में चला गया। यह दुर्ग पहाड़ की एक पतली चोटी पर स्थित था। इस पर न तो चढ़ाई करके शिवाजी को बाहर निकाला जा सकता था और न ही घेरा डालकर बैठा जा सकता था। इसलिए अफजल खाँ ने एक कपट जाल बुना। उसने कुलकर्णी ब्राह्मण कृष्णजी भास्कर को शिवाजी के पास भेजकर कहलवाया कि अफजल खाँ, शिवाजी के पिता शाहजी का मित्र है। यदि शिवाजी अफजल के पास चलकर संधि कर ले तो शिवाजी को सुल्तान से क्षमादान दिलवा दिया जाएगा।

    शिवाजी ने बड़ी आत्मीयता से कृष्णजी भास्कर और उसके साथियों का स्वागत-सत्कार किया तथा उनके ठहरने का प्रबन्ध इस प्रकार किया कि शिवाजी, कृष्णजी के साथियों की दृष्टि में आए बिना, कृष्णजी भास्कर से एकांत में भेंट कर सके। शिवाजी ने कृष्णजी तथा उसके साथियों से कहा- "मैंने अपनी मूर्खताओं के कारण बहुत ही गंभीर अपराध किए हैं जिनके लिए मैं लज्जित हूँ। यदि अफजल खाँ मुझे शाह से क्षमादान दिलवा चाहें तो मैं आत्मसमर्पण के लिए तैयार हूँ और समस्त दुर्ग वापस करने की इच्छा रखता हूँ।" कृष्णजी और उनके साथी, शिवाजी के इस उत्तर से संतुष्ट हो गए।

    रात्रि में एकांत पाकर शिवाजी, कृष्णजी से मिलने के लिए पहुंचा और ब्राह्मण के पैर पकड़कर बोला- ''मैंने आज तक जो कुछ भी किया है वह हिन्दू धर्म एवं हिन्दुत्व की भलाई के लिए किया है। मुझे तुलजा भवानी ने स्वप्न में आदेश दिया है कि मैं गौ, ब्राह्मण और हिन्दू मंदिरों में विराजित देव विग्रहों की रक्षा करूं। जो धर्मविरोधी लोग देवालयों को तोड़कर नष्ट कर रहे हैं, मैं उन्हीं को समाप्त करने एवं दण्डित करने का कार्य कर रहा हूँ। ब्राह्मण होने के नाते आपका भी यह कर्त्तव्य है कि इस पुनीत कार्य में मेरी सहायता करें। इसके लिए आपको पुण्य और पारितोषिक दोनों प्राप्त होंगे।''  ऐसा कहकर शिवाजी ने कृष्णजी को बहुमूल्य उपहार दिए तथा दीपरा नामक गांव इनाम में देने का वचन दिया। यह गांव पीढ़ी-दर पीढ़ी कृष्णजी के परिवार के पास ही रहने देने का वचन भी दिया।

    कृष्णजी इस समय दुष्ट अफजल खाँ का दूत बनकर आया था किंतु वह भी मुसलमानों द्वारा हिन्दू प्रजा पर किए जा रहे अत्याचारों से बहुत दुःखी था। इसलिए उसने हिन्दू धर्म के रक्षक और प्रजा वत्सल राजा शिवाजी की सहायता करने का निर्णय लिया। उसने शिवाजी को बता दिया कि अफजल खाँ का प्रण है कि वह शिवाजी को बंदी बनाकर सुल्तान के समक्ष प्रस्तुत करेगा। कृष्णजी ने शिवाजी को सलाह दी कि किसी भी तरह सुल्तान से संधि करने में ही भलाई है क्योंकि तुम किसी भी प्रकार विजयी नहीं हो सकते। शिवाजी ने कृष्णजी की बातों से सहमति जताई तथा अपने दूत गोपीनाथ पंतोजी को अफजल खाँ के पास संधि की शर्तें तय करने के लिए नियुक्त किया। कृष्णाजी भास्कर, पन्तोजी को अपने साथ लेकर अफजल खाँ के शिविर में गया।

    कृष्णाजी ने अफजल खाँ को समझाया कि शिवाजी संधि करने को तत्पर है क्योंकि वह जानता है कि वह अफजल खाँ से लड़कर जीत नहीं सकता। गोपीनाथ पंतोजी चतुर राजनीतिज्ञ था। उसने अफजल खाँ को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वह अपने एक अंगरक्षक की उपस्थिति में शिवाजी से मिले तथा शिवाजी भी अपने एक अंगरक्षक के साथ मिलने के लिए आए। यदि अफजल खाँ शिवाजी की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले तो शिवाजी, सुल्तान के समक्ष समर्पण कर देगा। अफजल खाँ को अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा था। वह यह सोचकर प्रसन्न था कि शिवा, अफजल खाँ द्वारा बुने हुए जाल में स्वयं ही फंसने के लिए आ रहा है इसलिए वह प्रतापगढ़ दुर्ग के नीचे शिवाजी से मिलने को तैयार हो गया।

    अफजल खाँ को मारने की तैयारी

    10 नवम्बर 1659 को मध्याह्न पश्चात् 3 से 4 बजे के बीच दोनों के बीच भेंट होनी निश्चित हुई। शिवाजी ने अफजल खाँ से निबटने की हर संभव तैयारी की। उसने प्रतापगढ़ दुर्ग के नीचे की ढालू धरती पर एक शामियाना लगवाया जो चारों तरफ से खुला हुआ था। वहाँ तक जाने के लिए नीचे से ऊपर तक के वृक्ष एवं झाड़ियां काटकर एक मार्ग बनाया गया तथा अन्य सभी मार्गों को कांटेदार झाड़ियों से अच्छी तरह बंद कर दिया गया। शिवाजी ने नेताजी पाल्कर तथा पेशवा मोरोपंत के नेतृत्व में अपनी मावली सेना को पर्वतीय गुफाओं और झाड़ियों में छिपा दिया जो किसी भी संकट के समय शिवाजी के पास पहुंच कर सहायता कर सके। उन्हें यह भी निर्देश दिए कि जैसे ही दुर्ग से तोप चलने की आवाज हो, मावली सेना तत्काल अफजल खाँ की सेना पर धावा बोल दे।

    निर्धारित समय पर अफजल खाँ अपने साथ लगभग डेढ़ हजार सैनिक लेकर प्रतापगढ़ दुर्ग की तरफ रवाना हुआ। गोपीनाथ पंतो ने उससे कहा कि वह अपने अंगरक्षकों को यहीं छोड़ दे अन्यथा शिवाजी मिलने के लिए नहीं आएगा। इस पर अफजल खाँ ने सेना को दुर्ग की तलहटी में ही छोड़ दिया तथा अपने अंगरक्षक सैयद बंदा और मध्यस्थ कृष्णजी भास्कर को लेकर दुर्ग की पहाड़ी पर चढ़ने लगा। उधर शिवाजी ने प्रातःकाल से ही इस भेंट की तैयारी करने लगा। उसने तुलजा भवानी की पूजा की। शरीर पर लोहे की जाली की पोषाक पहनी तथा उसके ऊपर ढीले-ढाले वस्त्र धारण किये। सिर पर साफे के नीचे इस्पात की टोपी पहनी तथा अपने बाएं हाथ में बघनखा और दाएं हाथ के नीचे बिछुवा छिपा लिया। समस्त तैयारियां पूरी होने पर शिवाजी ने माता जीजाबाई के चरण पकड़ कर आशीर्वाद मांगा और गंतव्य के लिए रवाना हो गया। तानाजी मलसुरे तथा जीवमहला नामक दो अंगरक्षक शिवाजी के साथ चले।

    अफजल खाँ, शिवाजी से पहले ही शामियाने में पहुंच गया। शामियाने में शानदार बहुमूल्य कालीन बिछे हुए थे। उन्हें देखकर अफजल खाँ ने कटाक्ष किया कि एक जागीरदार के लड़के को इतनी शानो-शौकत शोभा नहीं देती। तब गोपीनाथ पन्तो ने जवाब दिया- 'हुजूर यह समस्त सामान, शिवाजी के आत्म समर्पण के साथ ही बीजापुर सुल्तान की सेवा में प्रस्तुत कर दिया जाएगा।' अब तक शिवाजी आया नहीं आया था, इसलिए संदेशवाहकों को उसे लाने भेजा गया। अफजल खाँ, शिवाजी की इस उद्दण्डता पर झल्लाने लगा। कुछ समय पश्चात् शिवाजी ने तानाजी मालसुरे तथा जीवमहला के साथ शामियाने के निकट आत हुआ दिखाई दिया। अफजल खाँ का अंगरक्षक सैयद बंदा भी अफजल खाँ की तरह अत्यंत हृष्ट-पुष्ट तथा भारी डील-डौल वाला व्यक्ति था। शिवाजी उसे देखकर शामियाने के बाहर ही ठिठकर खड़ा हो गया। नाटे कद के साधारण शरीर वाले शिवाजी को देखकर अफजल खाँ ने उसकी समस्या को समझ लिया और सैयद बंदा को पीछे हटने को कहा। शिवाजी ने शामियाने के भीतर आकर अफजल खाँ का अभिवादन किया। अफजल खाँ ने कृष्णजी भास्कर से पूछा कि क्या यही शिवाजी है? कृष्णजी भास्कर के हाँ कहने पर अफजल खाँ ने शिवाजी से पूछा- ''तुमने क्यों हमारे किलों को लूटा और उनको उजाड़ बना दिया?''

    शिवाजी ने उत्तर दिया- ''मैंने राज्य की सेवा की है, मैंने डाकू-लुटेरों को किलों से भगाकर शाह का कब्जा करा दिया है। मुझे इनाम मिलना चाहिए, न कि दण्ड।''

    अफजल खाँ ने नाराज होकर कहा- ''तुम अब इतने बेखौफ हो गए हो कि तुम्हें शाह का खौफ भी नहीं रहा।''

    शिवाजी ने कहा- ''नहीं खाँ साहब, मैं तो शाह की खिदमत कर रहा हूँ और हमेशा उनका खिदमतगार रहूंगा।''

    अफजल खाँ ने कहा- ''खैर जो हुआ सो हुआ, अब तुम सारे किले मुझे वापस कर दो और मेरे साथ शाह से अपने इन अपराधों की माफी मांगने बीजापुर चलो।''

    शिवाजी ने कहा- ''यदि मैं शाह का इस प्रकार का फरमान पा लूं तो उसे सिर पर रखकर पालन करूंगा।''

    तभी कृष्णजी भास्कर ने कहा- ''अभी तुम खान की सुरक्षा में हो, झुककर सलाम करो और माफी मांगो, खान तुम्हें माफ कर देंगे।''

    शिवाजी ने जवाब दिया- ''खान और मैं सुल्तान के सेवक हैं, फिर खान कैसे मेरे अपराधों को क्षमा कर सकते हैं? फिर भी यदि आप मुझसे कहते हैं तो मैं आपकी आज्ञा का उल्लघंन नहीं कर सकता और खान की गोद में अपना सिर रखता हूँ।''  इतना कहकर शिवाजी और खान गले मिलने के लिए आगे बढ़े।

    अफजल खाँ ने गले मिलते समय शिवाजी की गर्दन को जोर से अपनी बांहों में जकड़ लिया और गला घोंटकर मारने की कोशिश की। शारीरिक शक्ति के मामले में शिवाजी, अफजल खाँ की तुलना में कुछ भी नहीं था, वह अफजल खाँ के कंधों तक कठिनाई से आ पाया था। शिवाजी ने अफजल खाँ की पकड़ से मुक्त होने के लिए अपने बाएं हाथ में बंधे बघनखे से उसके पेट पर प्रहार करके उसकी अंतड़ियों को बाहर निकाल लिया जिससे अफजल खाँ की पकड़ ढीली पड़ गई। अवसर मिलते ही शिवाजी ने अपने दाएं हाथ में फंसे बिछुए से खाँ के पेट पर और भी जबर्दस्त प्रहार किये। अफजल खाँ जोर से चीखा। इन दोनों को गुत्थमगुत्था देखकर उनके अनुचर भी शामियाने में चले आए।

    सैयद बंदा ने अपनी तलवार से शिवाजी के सिर पर भयानक प्रहार किया। इससे शिवाजी की पगड़ी के नीचे रखी इस्पात की टोपी कट गई और शिवाजी के सिर पर भी चोट लगी। जीवमहला भी दौड़कर आया और उसने सैयद बंदा के हाथ पर तलवार से वार करके उसका हाथ काट डाला। सैयद बंदा दूसरे हाथ से युद्ध करता रहा। इसी बीच अफजल खाँ के कहारों ने अफजल खाँ को उठाकर पालकी में डाल लिया और उसे लेकर भागने लगे। तभी निकट छिपे हुए शिवाजी के सिपाहियों ने बाहर आकर अफजल खाँ का सिर काट लिया तथा उसे लेकर प्रतापगढ़ दुर्ग की ओर भाग लिए। वहाँ उसे ऊंचे बांस में लटकाकर दुर्ग की बुर्ज से उसका प्रदर्शन किया और गगन भेदी जयघोष किया। कस्तूरी रंगन और उसके निर्दोष परिवार की हत्या का बदला भलीभांति ले लिया गया था। जिन हिन्दुओं को अफजल खाँ ने अत्यंत ही क्रूरता-पूर्वक एवं छल-पूर्वक मारा था, उन्हीं हिन्दुओं के नायक ने अफजल खाँ का हिसाब चुकता कर दिया था।

    शिवाजी सकुशल दुर्ग में पहुंच गया तो दुर्ग से तोप छोड़ी गई। नेताजी पाल्कर और उसकी मावली सेना जंगल से निकलकर बीजापुरी सेना पर टूट पड़ी। बीजापुरी सेना बहुत बड़ी थी किंतु अचानक आक्रमण होने से तथा अफजल खाँ के लौटकर न आने से हतप्रभ एवं किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गई और इधर-उधर भागने लगी। मावली सेना बहुत तेज गति से मुस्लिम सैनिकों को काट रही थी इसलिए बहुत से मुसलमानों ने हथियार रखकर आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें शरणागत जानकर उनकी जान बख्श दी गई।

    विशाल युद्ध सामग्री एवं धन की प्राप्ति

    अफजल खाँ के डेरों से शिवाजी को भारी मात्रा में हथियार, तम्बू, तोपें, हाथी-घोड़े तथा दस लाख रुपये नगद प्राप्त हुए। शिवाजी ने अपने सैनिकों को एकत्रित करके उन्हें धनराशि पुरस्कार में वितरित कर दी। घायलों एवं मृतकों को धन एवं पेंशन देकर सहायता की गई। शिवाजी की इस विजय का समाचार आग की तरह दूर-दूर तक फैल गया। उसके चमात्कारिक किस्से हिन्दू प्रजा में व्याप्त होने लगे। प्रजा को लगने लगा कि यह राजा, हिन्दुओं की रक्षा के लिए ही ईश्वरीय सहायता के रूप में भेजा गया है।

    खन्दूजी का वध

    शिवाजी की सेना में खन्दूजी काकरे नामक एक सेनापति था। बीजापुरी डेरों से जान बचाकर भागता हुआ अफजल खाँ का परिवार उसके हाथ लग गया। अफजल खाँ के परिवार ने खन्दूजी को घूस देकर अपने प्राणों की भीख मांगी। खन्दूजी ने रुपयों के लालच में इस परिवार को कुयाना नदी के किनारे-किनारे कुरात तक सुरक्षित निकाल दिया। यह बात शिवाजी को ज्ञात हो गई। शिवाजी की आज्ञा से, विश्वासघाती खन्दूजी का सिर काट दिया गया।

    फजल खाँ और रुस्तम-ए-जहाँ की पराजय

    अफजल खाँ के वध के कुछ समय पश्चात् जनवरी 1660 में आदिलशाह ने अफजल खाँ के पुत्र फजल खाँ को शिवाजी को दण्डित करने भेजा। रुस्तम-ए-जहां नामक अमीर भी अपनी सेना लेकर फजल खाँ के साथ हो गया। मलिक इतबार, अजीज खान के पुत्र फतेह खाँ, सरजेराव घाटगे और अन्य सरदारों को भी फजल खाँ के साथ रवाना किया गया। शिवाजी ने बीजापुर की इस विशाल सेना को जबर्दस्त धूल चटाई। मुस्लिम सेना के 12 हाथी और 200 घोड़े छीन लिए।

    शिवाजी और शाहजी में संधि

    अफजल खाँ, फजल खाँ तथा रुस्तम-ए-जहां के असफल हो जाने पर अली आदिलशाह (द्वितीय) ने शिवाजी के पिता शाहजी को जिम्मेदारी सौंपी कि वह बीजापुर राज्य की तरफ से अपने पुत्र शिवाजी से संधि करे। शिवाजी को शाहजी के आगमन का समाचार मिला तो वह कई मील पैदल चलकर अपने पिता की अगवानी करने पहुंचा। एक मंदिर में पिता-पुत्र का मिलन हुआ। शिवाजी ने शाहजी को आदर सहित पालकी में बैठाया तथा स्वयं पालकी के साथ नंगे पांव पैदल चलकर अपने निवास तक लेकर आया। शाहजी अपनी इस यात्रा में लगभग डेढ़ माह तक जीजाबाई तथा शिवाजी के पास रहा।

    शिवाजी ने अपने पिता को वचन दिया कि अब वह अकारण बीजापुर राज्य पर आक्रमण नहीं करेगा। उसने शाहजी को सुझाव दिया कि मुगल फिर से दक्खिन को रौंदने के लिए आ रहे हैं इसलिए शिवाजी, बीजापुर तथा गोलकुण्डा, तीनों मिलकर एक संघ बनाएं और मुगलों का सामना करें। डेढ़ माह बाद शाहजी, शिवाजी से विदा लेकर पुनः आदिलशाह के पास लौट गया।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 5 सिद्दी जौहर तथा अंग्रेजों को दण्ड - शाइस्ता खाँ को शिकस्त

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 5 सिद्दी जौहर तथा अंग्रेजों को दण्ड - शाइस्ता खाँ को शिकस्त

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 5

    सिद्दी जौहर तथा अंग्रेजों को दण्ड

    शिवाजी द्वारा अंग्रेज व्यापारियों को बंदी बनाना

    जिस समय शिवाजी ने अफजल खाँ का वध किया, उस समय अफजल खाँ के 2-3 जहाज दभोल के बंदरगाह पर चलते थे। अफजल खाँ के पुत्र फजल खाँ ने इन जहाजों को अंग्रेजों की फैक्ट्री को सौंप दिया। शिवाजी ने अपने प्रतिनिधि को इन जहाजों पर अधिकार करने भेजा। अंग्रेजों ने मराठा प्रतिनिधियों से कहा कि इन जहाजों पर अंग्रेजों का बहुत सा कर्ज बाकी है, इसलिए अंग्रेज इन जहाजों को बेचकर अपना कर्ज वसूलेंगे। शिवाजी का प्रतिनिधि असफल होकर लौट आया। अतः शिवाजी अपनी सेना लेकर स्वयं राजापुर गया। उसके भय से अंग्रेजी फैक्ट्री का प्रधान, समुद्र के रास्ते भाग गया। 20 जनवरी 1660 को शिवाजी ने वहाँ स्थित अंग्रेजों की फैक्ट्री तथा समस्त सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के द्वितीय अधिकारी गिफ्फर्ड को बंदी बना लिया। शिवाजी की यह कार्यवाही देखकर फजल खाँ के प्रतिनिधि रुस्तम-ए-जहां तथा अंग्रेज अधिकारियों ने शिवाजी से क्षमा याचना की तथा भविष्य में शिवाजी पर आक्रमण नहीं देने का वचन दिया। शिवाजी ने अंग्रेजों की समस्त सम्पत्ति लौटा दी तथा गिफ्फर्ड को मुक्त कर दिया।

    सिद्दी जौहर का अभियान

    बीजापुर राज्य की सेवा में एक अबिसीनियाई गुलाम सिद्दी रहता था। वह बीजापुर राज्य में उन्नति करते हुए सूबेदार के पद तक पहुंच गया था। एक बार उसने कुर्नूल की जागीर हड़प ली जिससे अली आदिलशाह नाराज हो गया। सिद्दी जौहर चाहता था कि किसी तरह शाह से संधि हो जाए और कुर्नूल की जागीर उसी के पास बनी रहे। इसलिए उसने शाह के पास प्रस्ताव भिजवाया कि वह शिवाजी का सफाया करेगा। सुल्तान ने सिद्दी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। सिद्दी अपनी सेना लेकर शिवाजी पर चढ़ दौड़ा। उसका वेग इतना प्रबल था कि शिवाजी को भागकर पन्हाला दुर्ग में शरण लेनी पड़ी। सिद्दी ने 15 हजार सैनिकों के साथ, पन्हाला दुर्ग का घेरा डाल दिया।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शिवाजी पर आक्रमण

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कई अधिकारी रेविंग्टन, गिफ्फर्ड, मिडंम आदि भी इस अभियान में शिवाजी के विरुद्ध सिद्दी की सहायता के लिए तोपखाना लेकर आ गए। वे राजापुर की पराजय का बदला लेना चाहते थे। अंग्रेजों की तोपों से बरस रहे गोलों के कारण पन्हाला दुर्ग कभी भी टूट सकता था। इसलिए शिवाजी ने अंग्रेजों के पास संदेश भेजा कि हमारी लड़ाई सिद्दी जौहर से है, आपको इस युद्ध से दूर रहना चाहिए अन्यथा इसके परिणाम बुरे हो सकते हैं किंतु अंग्रेजों ने शिवाजी की बात नहीं मानी तथा पन्हाला दुर्ग पर तोपों से गोले बरसाते रहे।

    बाजी प्रभु देशपांडे का बलिदान

    शिवाजी ने पन्हाला दुर्ग से सुरक्षित निकलने की योजना बनाई और सिद्दी जौहर से संधि की बात चलाई। सिद्दी जौहर इस संधि के लिए तैयार हो गया। इस पर शिवाजी स्वयं सिद्दी जौहर के शिविर में जाकर मिला तथा संधि की शर्तें तय करने के लिए अगले दिन की भेंट का समय मांगा। शिवाजी के इस तरह संधि करने के लिए आने का समाचार सुनकर सिद्दी जौहर की सेनाओं का पहरा शिथिल हो गया। 13 जुलाई 1660 को शिवाजी अपने विश्वस्त सेनानायकों को साथ लेकर पन्हाला दुर्ग से निकल गए। उनका लक्ष्य अंधेरे एवं वर्षा का लाभ उठाते हुए 64 किलोमीटर दूर स्थित विशालगढ़ तक पहुंचना था। उसके साथ केवल 600 सैनिकों की टुकड़ी थी। जौहर सिद्दी को शिवाजी के पलायन की सूचना मिली तो उसके सैनिकों ने शिवाजी का पीछा किया। अंग्रेजों का तोपखाना सेना के पीछे विकट जंगल एवं पथरीले मार्गों पर नहीं चल सकता था। अतः अंग्रेज वहीं रह गए। शिवाजी की मावली सेना ने बाजी प्रभु के नेतृत्व में सिद्दी की सेना का मार्ग रोका। एक तंग घाटी में बाजी प्रभु देशपांडे मोर्चा बांधकर बैठ गया। जैसे ही सिद्दी की सेना ने उस घाटी में प्रवेश किया, बाजी की सेना ने उसका संहार करना आरंभ कर दिया। बाजी प्रभु तब तक सिद्दी के मार्ग में डटा रहा जब तक कि शिवाजी विशालगढ़ नहीं पहुंच गया। जब विशालगढ़ से तोप चलने की आवाज सुनाई दी तो शिवाजी के सैनिक समझ गए कि शिवाजी सुरक्षित पहुंच गया है। बाजी प्रभु ने उसी स्थान पर अपने प्राण न्यौछावर किये। उसके सिपाही उसका शव उठाकर जंगलों में भाग गए ताकि शत्रु उसकी देह को अपमानित नहीं कर सकें।

    सिद्दी जौहर की विफलता

    विशालगढ़ दुर्ग एक घने जंगल में स्थित था। इस दुर्ग पर घेरा डालना सिद्दी जौहर के लिए संभव नहीं था, इसलिए वह अपनी सेना सहित वापस लौट गया। जब ये समाचार आदिलशाह (द्वितीय) को प्राप्त हुए तब उसने क्रोधित होकर सिद्दी जौहर को दण्डित करने का निर्णय लिया। सिद्दी जौहर ने सुल्तान को प्रसन्न करने के लिए पन्हाला दुर्ग को खाली करवाया तथा उसे सुल्तान के आदमियों को सौंप दिया। इसके बाद सिद्दी ने सुल्तान से अपनी असफलता के लिए क्षमा याचना की। पन्हाला दुर्ग पर अधिकार हो जाने से आदिलशाल (द्वितीय) ने सिद्दी जौहर को क्षमा कर दिया।

    दुष्ट अंग्रेजों को दण्ड

    पन्हाला दुर्ग हाथ से निकलने में अंग्रेजों का बहुत बड़ा हाथ था। शिवाजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के इन दुष्ट सौदागरों को दण्ड देना चाहता था। मार्च 1661 में शिवाजी बड़ी सेना लेकर पुनः राजापुर पहुंचा। उसने समस्त अंग्रेज अधिकारियों को मिलने के लिए बुलाया। अंग्रेज अधिकारी नितांत निर्भय थे, इसलिए वे निःसंकोच, शिवाजी से मिलने के लिए आए। उन्हें पन्हाला दुर्ग पर किए गए आक्रमण के लिए किसी तरह का भय या पश्चाताप नहीं था। शिवाजी ने गिफ्फड, फेरण्ड, रिचर्ड नैपियर, सैमुअल बर्नाड, रैफण्ड टेलर ओर रिचर्ड टेलर नामक उन अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया जिन्होंने पन्हाला दुर्ग पर आक्रमण में व्यक्तिगत रूप से भाग लिया था तथा सिद्दी जौहर की सहायता की थी। शिवाजी के आदेश से अंग्रेज अधिकारियों को अलग-अलग दुर्गों में रखा गया तथा उनके भोजन-पानी की उचित व्यवस्था की गई।

    कुछ दिनों पश्चात् जब शिवाजी ने जंजीरा के सिद्दियों के विरुद्ध अभियान किया तो उसने अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि वे इस अभियान में शिवाजी का साथ दें तो उन्हें बंदीगृह से मुक्त कर दिया जाएगा अन्यथा उनके द्वारा शिवाजी को मुक्ति-दण्ड चुकाए जाने के बाद ही मुक्ति मिलेगी। इन अंग्रेजों ने अपने उच्च अधिकारी को इस अभियान की गुप्त सूचना भिजवाई तथा कहा कि वह शिवाजी को मुक्तिधन देकर हमें छुड़वा ले तथा शिवाजी को दण्डित करके उससे हरजाना वसूल करे।

    अंग्रेजों के उच्च अधिकारी ने शिवाजी के विरुद्ध किसी तरह की कार्यवाही करने से मना कर दिया। उसने बंदीगृह में पड़े अंग्रेजों को संदेश भिजवाया कि वे अपनी दुर्दशा के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं। वे कम्पनी के माल की रक्षा करते हुए बंदी नहीं बनाए गए हैं, अपितु पन्हाला दुर्ग में तोपों से गोलीबारी करने के लिए बंदी बनाए गए हैं। अब शिवाजी तुम्हारे माध्यम से अपनी क्षति की भरपाई करना चाहता है, तो इसमें गलत क्या है! अपने उच्च अधिकारी का ऐसा रुख देखकर दुष्ट श्वेत सौदागरों के प्राण सूख गए। इसी बीच मि. रेविंग्टन बीमार पड़ गया। शिवाजी ने उसे मुक्त कर दिया। 17 अक्टूबर 1662 को वह सूरत पहुंचा, लगभग 1 वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। जब मुक्ति का कोई उपाय नहीं बचा तो बंदीगृह में बंद अंग्रेज अधिकारियों ने शिवाजी के सामंत राव सोमनाथ से अपनी रिहाई के लिए प्रार्थना की। राव सोमनाथ की अनुशंसा पर 17 जनवरी 1663 को शिवाजी ने समस्त अंग्रेज बंदियों को मुक्त कर दिया तथा भविष्य में उन्हें किसी तरह का कष्ट न पहुंचाने तथा मित्रता रखने का आश्वासन भी दिया।

    शाइस्ता खाँ को शिकस्त

    औरंगजेब स्वयं दक्खिन के मोर्चे पर रहकर और दक्खिन की सूबेदारी करके दक्खिन की राजनीतिक परिस्थितियों को अपनी आंखों से अच्छी तरह देख आया था। उसके दक्खिन से चले आने के बाद से शिवाजी की गतिविधियों में जो तेजी आई थी, औरंगजेब उससे भी अपरिचित नहीं था। औरंगजेब अनुभव करता था कि शिवाजी, मुगल साम्राज्य के लिए भविष्य का संकट है। इसलिए औरंगजेब जब मुगलों के तख्त पर बैठा, उसने अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्खिन का सूबेदार नियत किया तथा उसे निर्देश दिए कि वह दक्खिन में जाकर शिवाजी का सफाया करे।

    औरंगजेब की आधिकारिक जीवनी आलमगीरनामा में इस आदेश के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ''शक्तिशाली बनकर शिवाजी ने बीजापुरी राज्य के प्रति सभी तरह का भय और लिहाज छोड़ दिया। उसने कोंकण क्षेत्र को रौंदना और तहस-नहस करना आरम्भ कर दिया। यदा-कदा अवसर का लाभ उठाकर उसने बादशाह के महलों पर हमले किए। तब बादशाह ने दक्कन के सूबेदार अमीर-उल-अमरा (शाइस्ता खाँ) को हुक्म दिया कि वह शक्तिशाली सेना के साथ कूच करे, नीच का दमन करने का प्रयास करे, उसके इलाकों और किलों को हथिया ले और क्षेत्र को तमाम अशांति से मुक्त करे।''

    शाइस्ता खाँ मक्कार व्यक्ति था। उसे कई युद्ध करने का अनुभव था। ई.1660 के आरंभ में वह विशाल सेना लेकर औरंगाबाद के लिए रवाना हुआ तथा 11 फरवरी 1660 को अहमदनगर जा पहुंचा। 25 फरवरी 1660 को वह अहमदनगर से दक्खिन के लिए रवाना हुआ। अभी शाइस्ता खाँ मार्ग में ही था कि उसे अफजल खाँ का वध हो जाने के समाचार मिले। उसने अपनी सेना को तेजी से आगे बढ़ने के लिए कहा। दक्खिन तक पहुंचने से पहले ही उसे फजल खाँ, रूस्तमेजा तथा सिद्दी जौहर की विफलताओं के समाचार भी मिले। जब तक शाइस्ता खाँ, दक्खिन पहुंचता, पन्हाला दुर्ग शिवाजी के हाथ से निकल चुका था। 9 मई 1660 को शाइस्ता खाँ पूना पहुंच गया। मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह को भी शिवाजी के विरुद्ध लड़ने के लिए दक्खिन पहुंचने के निर्देश दिए गए। वे भी अपनी विशाल सेना के साथ पूना की तरफ बढ़ने लगे। शाइस्ता खाँ तथा जसवंतसिंह को इतने बड़े सैन्य दलों के साथ आया देखकर शिवाजी संकट में पड़ गया।

    कर्तलब अली खाँ को शिकस्त

    शाइस्ता खाँ स्वयं तो पूना पर अधिकार करके शिवाजी के निवास स्थान अर्थात् लालमहल में डेरा जमाकर बैठ गया और अपने सिपहसालार कर्तलब अली खाँ की कमान में एक सेना शिवाजी के कोंकण क्षेत्र वाले दुर्गों पर अधिकार करने भेजी। ई.1660 के अंत में कर्तलब खाँ भारी फौज के साथ लोणावाला के समीप घाटों से नीचे उतर गया। शिवाजी कोंकण के चप्पे-चप्पे से परिचित थे इसलिए उन्होंने कर्तलब अली खाँ को भारी जंगल में प्रवेश करने दिया। शिवाजी ने उसे उम्बर खिन्ड नामक ऐसे दर्रे में घेरने की योजना बनाई जहाँ से कर्तलब का बचकर निकलना बहुत कठिन था। यह दर्रा 20-22 किलोमीटर लम्बे-चौड़े जलविहीन क्षेत्र के निकट स्थित निर्जन पहाड़ी में बना हुआ है जिसमें से एक साथ दो आदमी भी नहीं निकल सकते। दर्रे के दोनों तरफ ऊंची पहाड़ियां हैं। शिवाजी ने अपनी सेना को इन्हीं पहाड़ियों में छिपा दिया।

    फरवरी 1661 में मुगल सेना अपनी तोपें और रसद लेकर खिन्ड दर्रे तक पहुंची। शिवाजी की सेना ने उसके आगे और पीछे दोनों तरफ के मार्ग बंद कर दिए। मुगल सेना एक सीमित क्षेत्र में घेर ली गई। अब शिवाजी के आदमी पहाड़ियों के ऊपर से मुगलों पर पत्थरों, लकड़ियों तथा गोलियों से हमला करने लगे। मुगल सेना पिंजरे में बंद चूहे की तरह फंस गई। कुछ ही समय में उसके पास पानी समाप्त हो गया। सैंकड़ों मुगल सिपाही इस घेरे में मारे गए। कर्तलब अली खाँ के स्वयं के प्राण संकट में आ गए। उसने शिवाजी के पास, युद्ध बंद करने का अनुरोध भिजवाया। शिवाजी ने उससे भारी जुर्माना वसूल किया तथा उसकी सारी सैन्य-सामग्री छीन ली। कर्तलब अली खाँ अपने बचे हुए सिपाहियों को लेकर शाइस्ता खाँ के पास लौट गया।

    कोंकण प्रदेश की छोटी रियासतों पर अधिकार

    कर्तलब खाँ को परास्त करने के बाद शिवाजी ने कोंकण प्रदेश में स्थित बीजापुर राज्य के दाभोल, संगमेश्वर, चिपलूण तथा राजापुर आदि कस्बों तथा पाली एवं शृंगार पुर आदि छोटी रियासतों को अपने राज्य में मिलाने का निर्णय लिया। उन्होंने एक सेना नेताजी पाल्कर के नेतृत्व में रखी जो मुगलों को उलझाए रखे और स्वयं एक सेना लेकर कोंकण का बचा हुआ प्रदेश जीतने लगा। 19 अप्रेल 1661 को उसने शृंगार पुर पर अधिकार कर लिया। ई.1661 का ग्रीष्मकाल शिवाजी ने कोंकण प्रदेश के वर्द्धनगढ़ में व्यतीत किया।

    शाइस्ता खाँ का मान-मर्दन

    शिवाजी शाइस्ता खाँ को कोंकण के पहाड़ों में खींचना चाहता था इसलिए वह कोंकण के किलों की विजय में संलग्न था किंतु शाइस्ता खाँ समझ गया था कि शिवाजी के पीछे जाना, साक्षात मृत्यु को आमंत्रण देना है। अतः वह पूना में बैठा रहा। उसने शिवाजी के पूना, पन्हाला, चाकन आदि कई महत्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार कर लिया। मई 1661 में शाइस्ता खाँ ने कल्याण तथा भिवण्डी के किलों पर भी अधिकार कर लिया। ई.1662 में शिवाजी के राज्य की मैदानी भूमि भी मुगलों के अधिकार में चली गई किंतु अब भी बहुत बड़ी संख्या में किले शिवाजी के अधिकार में थे जिन्हें शाइस्ता खाँ छीन नहीं पा रहा था। शिवाजी की सेनाओं ने शाइस्ता खाँ को कई मोर्चों पर परास्त कर पीछे धकेला किंतु इस अभियान में शिवाजी के सैनिक भी मारे जा रहे थे। ऐसा समझा जाता है कि शाइस्ता खाँ जानबूझ कर अभियान को लम्बा करना चाहता था ताकि उसे औरंगजेब द्वारा चलाए जा रहे कंधार अभियान में न जाना पड़े। इसलिए वह थोड़ी-बहुत कार्यवाही करके औरंगजेब को यह दिखाता रहा कि शिवाजी के विरुद्ध अभियान लगातार चल रहा है। जनवरी 1662 में शाइस्ता खाँ ने शिवाजी के 80 गांवों में आग लगा दी। शिवाजी ने इस कार्यवाही का बदला लेने का निर्णय लिया। शाइस्ता खाँ, शिवाजी के पूना स्थित लालमहल में रह रहा था, यह भी शिवाजी के लिए असह्य बात थी। इसलिए शिवाजी ने शाइस्ता खाँ का नाश करने के लिए दुस्साहसपूर्ण योजना बनाई। अप्रेल 1663 के आरम्भ में शिवाजी पूना के निकट स्थित सिंहगढ़ में जाकर जम गया।

    5 अप्रेल 1663 को शिवाजी ने अपने 1000 चुने हुए सिपाहियों को बारातियों के रूप में सजाया तथा उन्हें लेकर रात्रि के समय सिंहगढ़ से नीचे उतर आया। दिन के उजाले में इस अनोखी बारात ने गाजे-बाजे के साथ पूना नगर में प्रवेश किया। यह बारात संध्या होने तक शहर की गलियों में नाचती-गाती और घूमती रही। संध्या होते ही शिवाजी के 200 सैनिक बारातियों वाले कपड़े उतारकर साधारण सिपाही जैसे कपड़ों में, मुगल सैन्य शिविर की ओर बढ़ने लगे। जब उन्हें मुगल रक्षकों द्वारा रोका गया तो उन्होंने कहा कि वे शाइस्ता खाँ की सेना के सिपाही हैं। चूंकि मुगल सेना में हिन्दू सैनिकों की भर्ती होती रहती थी तथा शाइस्ता खाँ ने शिवाजी के विरुद्ध लड़ाई के लिए हजारों हिन्दू सैनिकों को भरती किया था, इसलिए किसी ने इन सिपाहियों पर संदेह नहीं किया। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी लेखक भीमसेन ने लिखा है कि शिवाजी अपने 200 सैनिकों के साथ 40 मील पैदल चलकर आए तथा रात्रि के समय शिविर के निकट पहुंचे। शिवाजी एवं उसके सैनिक, लालमहल के पीछे की तरफ जाकर रुक गए और रात्रि होने की प्रतीक्षा करने लगे।

    अर्द्धरात्रि में उन्होंने महल के एक कक्ष की दीवार में छेद किया। शिवाजी इस महल के चप्पे-चप्पे से परिचित था। जब शिवाजी इस महल में रहता था, तब यहाँ खिड़की थी किंतु इस समय उस स्थान पर दीवार चिनी हुई थी। इससे शिवाजी को अनुमान हो गया कि इसी कक्ष में शाइस्ता खाँ अपने परिवार सहित मिलेगा। उसका अनुमान ठीक निकला। शिवाजी अपने 200 सिपाहियों सहित इसी खिड़की से महल में घुसा और ताबड़तोड़ तलवार चलाता हुआ शाइस्ता खाँ के पलंग के निकट पहुंच गया। आवाज होने से शाइस्ता खाँ की आंख खुल गई। उसी समय शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर तलवार से भरपूर वार किया। एक दासी ने शत्रु सैनिकों को देखकर महल की बत्ती बुझा दी। शाइस्ता खाँ के पलट जाने के कारण शिवाजी की तलवार का वार लगभग खाली चला गया किंतु फिर भी उसकी अंगुली कट गई। ठीक इसी समय शिवाजी की बारात के सिपाहियों ने जोर-जोर से बाजे बजाने आरम्भ कर दिए जिससे महल के चारों ओर पहरा दे रहे सिपाहियों को महल के भीतर चल रही गतिविधि का पता नहीं चला और मराठा सिपाहियों ने पूरे महल में मारकाट मचा दी।

    शाइस्ता खाँ, अंधेरे का लाभ उठाकर भागने में सफल हो गया। शिवाजी के सैनिकों ने शाइस्ता खाँ के पुत्र अबुल फतह को शाइस्ता खाँ समझकर उसका सिर काट लिया तथा अपने साथ लेकर भाग गए। शाइस्ता खाँ का एक सेनानायक भी मारा गया। इस कार्यवाही में शाइस्ता खाँ के 50 से 60 लोग घायल हुए। धीरे-धीरे मुगल सिपाहियों को सारी बात समझ में आ गई कि हुआ क्या है, वे महल के बाहर एकत्रित होने लगे। शिवाजी भी चौकन्ना था, उसने तेज ध्वनि बजाकर संकेत किया और उसके सैनिक, शिवाजी को लेकर महल तथा मुगल शिविर से बाहर निकल गए। मुगल सिपाही, आक्रमणकारियों को महल के भीतर ढूंढते रहे और शिवाजी पूना से बाहर सुरक्षित निकलने में सफल रहा। मार्ग में मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह का सैन्य शिविर था किंतु वहाँ किसी को कुछ पता नहीं चल सका था, इसलिए शिवाजी को पूना से निकल भागने में किसी तरह की कठिनाई नहीं हुई।

    शाइस्ता खाँ की बदली

    अफजल खाँ की हत्या जिस प्रकार हुई और पूना के लाल महल में रात भर जो कुछ हुआ, उससे मुगलों की नींद हराम हो गई। उनके लिए शिवाजी किसी रहस्यमयी शक्ति से कम नहीं रह गया था जो कहीं भी, कभी भी पहुंच कर कुछ भी कर सकता था। औरंगजेब शाइस्ता खाँ की इस असफलता पर बहुत क्रोधित हुआ और उसे अपने डेरे डण्डे उठाकर बंगाल जाने के निर्देश दिए। शाइस्ता खाँ भी यहाँ रुकना मुनासिब न समझकर, चुपचाप रवाना हो गया।

    जसवंतसिंह की भूमिका

    जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह के शिविर के सामने से, शाइस्ता खाँ के पुत्र का कटा हुआ सिर लेकर, मराठा सैनिकों का भाग निकलना एक संदेहास्पद घटना थी। इससे पूरे देश में यह प्रचलित हो गया कि शिवाजी के इस कार्य में महाराजा जसवंतसिंह की प्रेरणा काम कर रही थी क्योंकि शाइस्ता खाँ ने औरंगजेब से शिकायत करके धरमत के युद्ध के बाद महाराजा जसवंतसिंह को पदच्युत करवाया था। समकालीन लेखक भीमसेन कहता है- ''केवल ईश्वर जानता है कि सत्य क्या है!''

    जसवंतसिंह की वापसी

    महाराजा जसवंतसिंह को शाइस्ता खाँ के साथ दक्षिण के अभियान पर भेजा गया था किंतु वह शिवाजी के विरुद्ध किए जा रहे अभियान से सहमत नहीं था। इसलिए उसे कोई सफलता नहीं मिली। नवम्बर 1663 में जसवंतसिंह के नेतृत्व में शिवाजी के प्रसिद्ध दुर्ग सिंहगढ़ पर आक्रमण हुआ। समकालीन लेखक भीमसेन ने लिखा है- ''जसवंतसिंह ने कोंडाणा दुर्ग (सिंहगढ़ का पुराना नाम) की घेराबंदी की। मुगलों ने किले की दीवारों पर चढ़ने का प्रयास किया। इस आक्रमण में अनेक मुगलों और राजपूतों की जानें गईं। बारूदी विस्फोट से भी बहुत से लोग मारे गए। किले को जीतना असंभव हो गया। असफलता से निराश महाराजा जसवंतसिंह और राव भाऊसिंह हाड़ा ने 28 मई 1664 को किले पर से घेरा उठा लिया और औरंगाबाद लौट गए। आलमगीरनामा में बड़े खेद के साथ टिप्पणी की गई है- ''एक भी किले पर कब्जा नहीं हो पाया। शिवाजी के विरुद्ध अभियान कठिनाई में पड़ गया और क्षीण हो गया।''

    शिवाजी द्वारा औरंगजेब को पत्र

    शाइस्ता खाँ और महाराजा जसवंतसिंह के लौट जाने पर शिवाजी ने औरंगजेब को एक कठोर पत्र लिखा- ''दूरदर्शी पुरुष जानते हैं कि पिछले तीन वर्षों में सम्राट के प्रख्यात सेनापति और अनुभवी अधिकारी इस क्षेत्र में आते रहे हैं। सम्राट ने उन्हें मेरे किलों और इलाकों पर कब्जा करने की आज्ञा दी थी। सम्राट को प्रेषित अपने संवादों में वे लिखते हैं कि इलाकों और किलों पर शीघ्र ही कब्जा कर लिया जाएगा। यदि कल्पना घोड़े के समान होती तो भी इन इलाकों में उसका आना असंभव होता। इस इलाके पर विजय हासिल करना अति कठिन है। यह वे जानते नहीं हैं! सम्राट को झूठे संदेश भेजने में उन्हें शर्म नहीं आती है। मेरे देश में कल्याणी और बीदर जैसे स्थान नहीं हैं, जो मैदानों में स्थित हैं और हमला कर हथियाए जा सकते हैं। यह इलाका पर्वत श्रेणियों से भरा हुआ है। इस क्षेत्र में 60 किले हैं। उनमें से कुछ समुद्र तट पर स्थित हैं। अफजल खाँ तगड़ी सेना लेकर आया, परंतु वह निरुपाय हो गया और अंततः नष्ट हो गया। अफजल खाँ की मृत्यु के बाद अमीर-उल-अमरा शाइस्ता खाँ ने ऊँचे पहाड़ों और गहरी घाटियों से भरी मेरी भूमि में प्रवेश किया। तीन वर्षों तक वह अनथक जूझता रहा। उसने सम्राट को लिखा कि वह शीघ्र ही मेरे इलाके पर जीत हासिल कर लेगा। ऐसी यथार्थ अभिवृत्ति का अंत अपेक्षित ही था। वह अपमानित हुआ और उसे मजबूरन लौटना पड़ा। अपनी मातृभूमि की रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य है। अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए आप सम्राट को झूठे संदेश भेजते हैं। परंतु मैं दैव-कृपा से अभिमंत्रित हूँ। इन इलाकों में कोई भी हमलावर सफल नहीं हुआ है।''


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 6 सूरत की लूट तथा मिर्जा राजा जयसिंह का अभियान

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 6  सूरत की लूट तथा मिर्जा राजा जयसिंह का अभियान

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 6


    सूरत की लूट तथा मिर्जा राजा जयसिंह का अभियान


    शाइस्ता खाँ के अभियान में शिवाजी को विपुल धन की हानि हुई थी। शिवाजी ने इस धन की भरपाई करने के लिए मुगलों के क्षेत्र लूटने की योजना बनाई। उन दिनों सूरत मुगल साम्राज्य का सर्वाधिक धनी नगर तथा भारत का प्रमुख बंदरगाह था। यहाँ से दुनिया भर के देशों के व्यापारिक जहाज आते-जाते थे। मक्का जाने के लिए भी मुसलमानों द्वारा इसी बंदरगाह का उपयोग किया जाता था। मुगल बादशाह को इस बंदरगाह से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त होता था। इस धन के बल पर मुगल सेनाएं पूरे देश में संचालित की जाती थीं। सूरत में उस समय लगभग 20-25 व्यापारी ऐसे भी थे जिनके पास करोड़ों की सम्पत्ति एकत्र हो गई थी। शिवाजी ने सूरत को लूटने का निश्चय किया। चूंकि सूरत तक पहुंचने के लिए शिवाजी को बुरहानपुर होकर जाना पड़ता जहाँ मुगलों की बड़ी छावनी थी, इसलिए उन्होंने अपनी सेना के 4000 चुने हुए योद्धओं को छोटे-छोटे दलों में विभक्त किया तथा उन्हें बुरहानपुर से दूर हटकर चलते हुए सूरत से 29 किलोमीटर दूर गनदेवी नामक स्थान पर पहुंचने के निर्देश दिए। स्वयं शिवाजी भी 1 जनवरी 1664 को सूरत के लिए चल दिया। 6 जनवरी को ये टोलियां गनदेवी पहुंचकर आपस में मिल गईं।

    सूरत का मुगल गवर्नर इनायत खाँ बेईमान आदमी था। उसे सूरत शहर की रक्षा के लिए जितने सिपाही रखने का वेतन बादशाह से मिलता था, उसकी तुलना में वह बहुत कम सिपाही रखता था तथा सारा वेतन अपने पास रख लेता था। सूरत के चारों ओर किसी तरह का परकोटा भी नहीं था। इसलिए सूरत का लुट जाना अवश्यम्भावी था। शिवाजी ने इनायत खाँ को तथा सूरत के बड़े सेठों को पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरा उद्देश्य किसी को हानि पहुंचाने का नहीं है किंतु बादशाह ने जबर्दस्ती मुझ पर युद्ध थोप दिया है तथा मेरा कोष भी जब्त कर लिया है। यहाँ तक कि मेरा घर लालमहल भी छीन लिया है और मुझे दर-दर की ठोकरें खाने पर विवश कर दिया है। इसलिए इन सब बातों की क्षतिपूर्ति बादशाह की छत्रछाया में व्यापार करने वाले व्यापारियों तथा सरकारी खजाने से करेंगे। या तो आप लोग शांतिपूर्वक मुक्ति-धन दे दें या कठोर कार्यवाही के लिए तैयार रहें। शिवाजी चाहता था कि सूरत के 20-25 धनी व्यापारी आपस में चंदा करके केवल 50 लाख रुपए दे दें। यह राशि इन व्यापारियों के लिए बहुत छोटी थी।

    इन पत्रों के मिलने के बाद मुगल सूबेदार ने शिवाजी को सलाह भरा पत्र भेजा कि वह शक्तिशाली मुगलों से शत्रुता न करे और स्वयं भागकर एक किले में छिप गया। सूरत के व्यापारी, मुगलों के भरोसे अपने घरों से नहीं निकले। सूरत में अनेक अंग्रेज एवं डच व्यापारी भी रहते थे। वे शिवाजी की शक्ति से परिचित थे। उन्होंने अपनी कोठियों पर सुरक्षा प्रबन्ध किए। अंग्रेजों ने एक ईसाई पादरी को शिवाजी के पास भेजकर अनुरोध किया कि वह हमारी निर्धन ईसाई बस्ती पर दया करे। शिवाजी ने पादरी को वचन दिया कि वह निर्धन लोगों पर आक्रमण नहीं करेगा। वैसे भी शिवाजी को अंग्रेजों से नहीं उलझना था क्योंकि उनके पास व्यापारिक सामान तो था किंतु सोना चांदी नहीं था।

    पहले दिन जब कोई व्यापारी मिलने नहीं आया तो शिवाजी ने अपने सैनिकों को सूरत शहर के व्यापारियों के घर लूटने के निर्देश दिए। शिवाजी के सिपाही सूरत नगर में घुसकर व्यापारियों का धन छीनने लगे और शिवाजी के डेरे में लाकर ढेर लगाने लगे। इसी बीच सूरत के मुगल गवर्नर इनायत खाँ ने एक सिपाही के हाथों कपट-युक्त सुलहनामा भेजा। इस सिपाही ने शिवाजी को गुप्त संदेश देने का बहाना किया तथा शिवाजी के बिल्कुल निकट पहुंच गया। उसने अचानक अपने कपड़ों में से कटार निकाली तथा शिवाजी के शरीर में घोंपने का प्रयास किया। शिवाजी का अंगरक्षक सतर्क था। उसने तत्काल उस सिपाही का हाथ काट दिया। इस कृत्य के बाद मराठों ने सख्ती बढ़ा दी। मकानों, दुकानों, संदूकों और अलमारियों के किवाड़ तोड़कर धन निकाला जाने लगा। धनी व्यापारियों के मकान खोदकर सम्पदा निकाल ली गई। कई मुहल्ले अग्नि की भेंट कर दिए गए। शिवाजी के पास लगभग 2 करोड़ रुपयों की सम्पत्ति आ गई तथा सूरत, पूरी तरह से बेसूरत हो गया। मुगलों की प्रजा को कोई बचाने वाला नहीं था। इनायत खाँ के सिपाही किले की दीवार से शिवाजी के सिपाहियों पर तोप के गोले बनसाने लगे। इससे सूरत नगर में कई स्थानों पर आग लग गई।

    इसी बीच शिवाजी को समाचार मिला कि मुगलों की बहुत बड़ी सेना सूरत की तरफ बढ़ रही है। अतः उसने लूट में प्राप्त महंगे कपड़े, बर्तन एवं अन्य सामग्री सूरत की गरीब जनता में बांट दी और सोना-चांदी तथा रुपए लेकर 10 जनवरी को अचानक सूरत छोड़ दिया। इसके बाद भी लोगों में धीरज उत्पन्न नहीं हुआ और व्यापारियों का सूरत से पलायन जारी रहा। शिवाजी के जाने के बाद मुगलों की सेना सूरत पहुंची। जिस सूरत के चर्चे पूरी दुनिया में शान से होते थे अब वहाँ एक वीरान और बदसूरत नगर बचा था। जिस समय शिवाजी सूरत को लूटने पहुंचे, उस समय अरब के कुछ अश्व-व्यापारी अपने घोड़े बेचने सूरत में आए हुए थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि शिवाजी अपनी सेना सहित आया है तो वे अपने घोड़े लेकर शिवाजी के पास पहुंचे। शिवाजी ने उनसे घोड़े ले लिए तथा व्यापारियों को पकड़कर बंदी बना लिया। जब शिवाजी लूट का धन लेकर सूरत से जाने लगा तो उसने अश्व-व्यापारियों को घोड़ों के मूल्य का भुगतान करके रिहा कर दिया। शिवाजी के इन्हीं गुणों के कारण शत्रु भी शिवाजी की प्रशंसा करते थे।


    मिर्जा राजा जयसिंह का अभियान

    सूरत से लौटने के एक सप्ताह बाद रायगढ़ दुर्ग में शिवाजी को अपने पिता शाहजी के निधन का समाचार मिला। शाहजी 23 जनवरी 1664 को शिकार खेलते हुए आकस्मिक दुर्घटना में मृत्यु को प्राप्त हुआ था। शाहजी के निधन का समाचार सुनकर जीजाबाई ने सती होने का निर्णय लिया किंतु शिवाजी और समर्थ गुरु रामदास ने बड़ी कठिनाई से जीजा को सती होने से रोका। स्वर्गीय पिता की अंतिम क्रियाओं से निवृत्त होकर शिवाजी ने फिर से मुगलों पर धावा बोल दिया। सूरत के बाद शिवाजी ने औरंगाबाद तथा अहमदनगर के बीच स्थित मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण किए तथा अपने कई दुर्ग मुगलों से वापस छीन लिए। दक्षिण का मुगल सूबेदार मुअज्जम, औरंगजेब का पुत्र था किंतु वह शिवाजी के विरुद्ध कुछ नहीं कर पा रहा था। शिवाजी के जहाजी बेड़े ने सूरत से मक्का जाने वाले यात्री जहाजों से भी छेड़छाड़ आरम्भ कर दी तथा मुगलों के क्षेत्र उजाड़ने आरम्भ कर दिए क्योंकि पूना का लालमहल अब भी मुगलों के अधिकार में था। अक्टूबर 1664 में शिवाजी ने बीजापुर के अधीन वेंगुर्ला नगर को लूट लिया।

    इसके बाद उसने खवास खाँ पर हमला किया तथा उसे भी क्षति पहुंचाई। मुधौल का जागीरदार बाजी घोरपड़े सेना और धन लेकर खवास खाँ की सहायता के लिए आया। शिवाजी ने प्रत्यक्ष युद्ध में घोरपड़े को मार डाला। यह वही बाजी घोरपड़े था जिसने ई.1648 में शिवाजी के पिता शाहजी को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करके शाहजी को बंदी बनाया था और आदिलशाह को सौंप दिया था। ज्ञातव्य है कि शिवाजी का पूर्वज सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह चौदहवीं शताब्दी में मेवाड़ से चलकर दक्षिण में आया था, उसकी सातवीं पीढ़ी के वंशज भीमसिंह को बहमनी राज्य के सुल्तान ने राजा घोरपड़े की उपाधि एवं मुधौल में 84 गांवों की जागीर प्रदान की थी। शाहजी एवं मुधौल का वर्तमान जागीरदार बाजी, उसी घोरपड़े जागीरदार के वंशज थे किंतु राजनीति की टेढ़ी चाल ने दोनों को एक दूसरे का घोर शत्रु बना दिया था। बाजी घोरपड़े जो धन खवास खाँ को देने लाया था, वह धन शिवाजी ने छीन लिया।

    मुगलों को अपनी शक्ति का अनुमान कराने के पश्चात् ई.1664 में शिवाजी ने औरंगजेब को पत्र लिखा- ''बादशाह ने अकारण ही अपने सेनापतियों को मेरा देश उजाड़ने के लिए भेजा और मेरे दुर्ग तथा महलों पर अधिकार कर लिया। आपके सेनापति अफजल खाँ को नष्ट कर दिया गया है तथा शाइस्ता खाँ को अपमनाति करके लौटा दिया गया है। मैं अपने देश की रक्षा कर रहा हूँ जो कि मेरा धर्म है। मेरे देश के आक्रांताओं को सदैव ही पराजय का मुख देखना पड़ा है। इसके लिए ईश्वर का धन्यवाद है। मैं आपका सूचित करना चाहूंगा कि मेरा घर (राज्य) पहले जैसा असुरक्षित नहीं है, जब आपकी सेनाओं ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था। आज मेरे देश (राज्य) में 600 मील लम्बी और 120 मील चौड़ी, ऊंची पर्वतमाला है तथा 60 अेजय दुर्ग इसकी रक्षा करते हैं। मेरा सुझाव है कि आप मुझे या किसी अन्य को अकारण ही युद्ध में न घसीटें। आपका हितैषी- शिवाजी।''

    औंरंगजेब ने मुस्लिम सूबेदारों के विफल हो जाने पर, एक हिन्दू राजा को, दूसरे हिन्दू राजा के विरुद्ध कार्यवाही करने के उद्देश्य से दक्षिण के सूबेदार मुअज्जम के स्थान पर आम्बेर नरेश जयसिंह को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया तथा दिलेर खाँ को उसका सहायक बनाकर भेजा। जयसिंह के साथ बुंदेला राजाओं को भी दक्षिण में भेजा गया। मार्च 1664 में महाराजा जयसिंह ने पूना पहुंचकर अपना शिविर लगाया तथा शिवाजी पर शिकंजा कसना आरम्भ किया। 30 मार्च 1665 को जयसिंह ने पुरंदर का दुर्ग सहित अनेक दुर्ग घेर लिए। जयसिंह ने शिवाजी के पास संदेश भिजवाया कि वह मुगलों से संधि कर ले। इससे शिवाजी के रुतबे में भारी वृद्धि होगी। इस समय पुरंदर के दुर्ग में 4000 सैनिक और 3000 किसान शरण लिए हुए थे। 27 अप्रेल 1665 को मुगल सेना ने रोहिड़ा दुर्ग के आस पास के लगभग 50 गांवों में आग लगा दी। पहाड़ों में स्थित चार गांवों को मिट्टी में मिला दिया तथा बहुत से निरीह लोगों को बंदी बना लिया। जयसिंह की सेनाओं ने 2 मई 1665 को कोंडाणा दुर्ग के निकटवर्ती गांवों को जला दिया। 5 मई 1665 को कुतुबुद्दीन खां ने किमवारी दुर्ग के निकटवर्ती गांवों को जलाकर राख कर दिया। उसी दिन मुगलों ने लौहगढ़ के नीचे बसी घनी बस्ती वाले गांवों में भी आग लगा दी। मुगलों ने रुद्रमल पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार शिवाजी की प्रजा में चारों ओर हा-हाकार मच गया। शिवाजी का विश्वस्त सेनानायक मुरार बाजी, मुगलों से लड़ता हुआ काम आया।

    एक तरफ से मुगल सेनाएं प्रजा पर कहर बरपा रही थीं और दूसरी ओर जयसिंह ने शिवाजी के कुछ सहायकों को धन देकर अपनी तरफ मिला लिया। इससे पुरंदर दुर्ग में रह रहे लोगों के भीषण रक्तपात की आशंका उत्पन्न हो गई। शिवाजी ने जयसिंह को कई बार पत्र लिखकर संधि के प्रस्ताव भिजवाए किंतु जयसिंह, शिवाजी के पूर्ण समर्पण से कम पर बात नहीं करना चाहता था। जयसिंह की कूटनीतिक चालों और सैन्य दबाव के चलते 11 मई 1665 को शिवाजी पांच-छः ब्राह्मण मंत्रियों को लेकर अचानक निहत्था ही जयसिंह के सैन्य शिविर के निकट प्रकट हुआ। उसके आने की सूचना मिलते ही मुगलों में बेचैनी छा गई और वे किसी अनहोनी के घटने की प्रतीक्षा करने लगे। शिवाजी ने अपने मंत्रियों के हाथों, जयसिंह से मिलने का अनुरोध भिजवाया। जयसिंह ने दिलेर खाँ के भय से शिवाजी से भेंट नहीं की तथा उसे अपने पुत्र के साथ, दिलेर खाँ के पास भेज दिया। यद्यपि दिलेर खाँ, महाराजा के अधीन काम कर रहा था किंतु यह चुगलखोर कभी भी कोई झूठी सूचना भेजकर महाराजा की तरफ से बादशाह का दिल फेर सकता था। दिलेर खाँ जयसिंह के इस कार्य से प्रसन्न हुआ तथा स्वयं ही शिवाजी को लेकर जयसिंह के डेरे पर पहुंचा। जयसिंह के कहने पर दिलेर खाँ ने शिवाजी को जयसिंह की सुरक्षा में सौंप दिया।

    एकांत होने पर शिवाजी ने जयसिंह से कहा- ''मैं ये समस्त कार्यवाहियां हिन्दुत्व की रक्षा के लिए कर रहा हूँ तथा महाराजा जयसिंह को चाहिए कि राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य में वह भी मेरा साथ दे। बादशाह की सेनाओं ने प्राचीन हिंदू मंदिरों को तोड़ डाला है तथा देव मूर्तियों को अपमानित एवं खण्डित करके हिन्दू जाति पर जजिया लाद दिया है। तीर्थ यात्राओं को तंग किया जाता है।''

    जयसिंह ने कहा कि कुछ भी हो बादशाह हमारा स्वामी है, हमें उसकी अधीनता स्वीकार करनी चाहिए। इस पर शिवाजी ने जयसिंह से कहा- ''क्या शाहजहाँ और उसका पुत्र दारा शिकोह आपके स्वामी नहीं थे! क्या उनकी रक्षा करना आपका धर्म नहीं था! उन दोनों ने सारी उम्र आपसे प्रेम किया था किंतु आप उन्हें त्यागकर औरंगजेब के पक्ष में क्यों हो गए! आज मुगलों का राज्य, राजपूतों के भरोसे ही चल रहा है। आप हिन्दुओं का उत्पीड़न करने वाले बादशाह का साथ छोड़ दें। इससे देश का भला होगा।''

    इन बातों का जयसिंह पर कोई प्रभाव नहीं हुआ तथा वह शिवाजी पर संधि करने के लिए दबाव डालता रहा। उसने शिवाजी को मराठों के रक्तपात से बचाने का यही एकमात्र उपाय बताया। शिवाजी के बहुत से दुर्ग इस समय मुगलों के घेरे में थे। स्वयं शिवाजी निहत्थे मुगलों के शिविर में थे। एक तरह से इस समय वे जयसिंह के बंदी थी। इसलिए शिवाजी को अपमानजनक शर्तों पर संधि करने के लिए तैयार होना पड़ा। भारत के इतिहास में इसे पुरन्दर की संधि कहा जाता है। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

    1. शिवाजी अपने 23 प्रसिद्ध दुर्ग बादशाह को समर्पित करेगा जिनका राजस्व लगभग 4 लाख होन अर्थात् 16 लाख रुपए था।

    2. शिवाजी का पुत्र सम्भाजी, बादशाह की सेवा में उपस्थिति देगा तथा नियमित सेवा करेगा। इसके बदले में उसे पांच हजारी मनसब प्राप्त होगा।

    3. शिवाजी मुगलों को बीजापुर से युद्ध करने में अपनी सेना सहित पूर्ण सहयोग करेगा।

    4. बादशाह की सेवा और वफादारी की शर्त पर शिवाजी राजगढ़ सहित केवल 12 दुर्ग और एक लाख रुपए का राजस्व अपने पास रखेगा

    5. शिवाजी को बादशाह की खिदमत एवं मनसब से छूट होगी।

    यह संधि पत्र औरंगजेब को स्वीकृति के लिए भिजवा दिया गया। औरंगजेब इस संधि से प्रसन्न नहीं हुआ। वह शिवाजी के समस्त दुर्गों का प्रत्यर्पण चाहता था किंतु जयसिंह ने इसके लिए मना कर दिया। अतः औरंगजेब ने स्वीकृति भिजवा दी। शिवाजी उस स्वीकृति पत्र को लेने के लिए अपने डेरे से 6 मील दूर तक पैदल चलकर गया तथा संधि पत्र लेकर 23 किलों की चाबियां जयसिंह को सौंप दीं। जयसिंह ने वे चाबियां औरंगजेब को भेज दीं। इस प्रकार दोनों पक्षों ने चैन की सांस ली किंतु कुछ समय बाद ही औरंगजेब, जयसिंह पर दबाव बनाने लगा कि वह शिवाजी को लेकर दिल्ली आए। जयसिंह ने शिवाजी को दिल्ली चलकर बादशाह से व्यक्तिगत भेंट करने के लिए कहा किंतु शिवाजी ने हर बार मना कर दिया।

    स्टोरिआ द मोगोर के लेखक मनूची ने जयसिंह के शिविर में ही शिवाजी से भेंट की तथा उसके साथ कुछ समय व्यतीत किया। मनूची ने लिखा है कि जब शिवाजी जयसिंह के शिविर में था, तब दिलेर खाँ ने कई बार जयसिंह से अनुरोध किया कि वह दिलेर खाँ को शिवाजी की हत्या करने दे या फिर जयसिंह ही उसकी हत्या कर दे किंतु जयसिंह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। दिलेर खाँ बार-बार कहता रहा कि शिवाजी की हत्या करने से बादशाह औरंगजेब बहुत प्रसन्न होगा किंतु जयसिंह ने शिवाजी को वचन दिया था कि शिवाजी की सुरक्षा की जाएगी तथा बादशाह की तरफ से उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाएगा।

    कुछ समय पश्चात् जयसिंह ने बीजापुर राज्य पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में शिवाजी को अपनी सेना लेकर जयसिंह के साथ जाना पड़ा। शिवाजी का सहयोगी नेताजी पाल्कर भी इस युद्ध में शिवाजी के साथ गया। नेताजी पाल्कर को द्वितीय शिवाजी कहा जाता था। जयसिंह तथा शिवाजी की सेनाओं ने मिलकर बीजापुर पर प्रबल आक्रमण किया जिससे बीजापुर की सेना अपनी सीमा से पीछे हटती हुई बीजापुर के दरवाजे तक सिमट गई। जयसिंह की जीत स्पष्ट दिखाई दे रही थी किंतु शिवाजी और नेताजी पाल्कर में मतभेद हो गया और नेताजी, शिवाजी का साथ छोड़कर बीजापुर की तरफ हो गया। इसी समय जयसिंह तथा दिलेर खाँ में भी मतभेद हो गया। इस कारण जयसिंह की कार्यवाही कमजोर पड़ गई। उधर गोलकुण्डा की सेनाएं, बीजापुर की सहायता के लिए आ गईं। इस कारण जयसिंह को पीछे हटना पड़ा और इस आक्रमण का कोई परिणाम नहीं निकला। जयसिंह, नेताजी पाल्कर की वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने बहुत सारा धन देकर नेताजी पाल्कर को अपने पक्ष में मिला लिया। अब वह शिवाजी का सहायक न रहकर मुगलों का सेनापति हो गया।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 7 शिवाजी की आगरा यात्रा

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 7 शिवाजी की आगरा यात्रा

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 7


    शिवाजी की आगरा यात्रा

    22 जनवरी 1666 को आगरा के लाल किले में औरंगजेब के पिता शाहजहाँ की मृत्यु हो गई। औरंगजेब अब तक अपने राज्यारोहण का उत्सव दिल्ली में मनाता आया था किंतु इस बार उसने यह उत्सव आगरा में मनाने का निश्चय किया। बीजापुर की पराजय के बाद जयसिंह के लिए आवश्यक हो गया कि वह औरंगजेब को प्रसन्न करने का दूसरा उपाय ढूंढे। इसलिए उसने शिवाजी को, औरंगजेब के राज्यारोहण के अवसर पर आगरा ले चलने के लिए दबाव बनाना आरम्भ किया तथा उसकी सुरक्षा की गारण्टी ली। जीजाबाई से विचार-विमर्श करके शिवाजी ने अपने 8 वर्षीय पुत्र सम्भाजी के साथ आगरा जाने का निर्णय लिया।

    5 मार्च 1666 को शिवाजी ने अपने 200 चुने हुए अंगरक्षक तथा 4000 सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ रायगढ़ से आगरा के लिए प्रस्थान किया। उनकी इस याात्रा के लिए मुगलों के खजाने से एक लाख रुपया दिया गया तथा पूरे देश में मुगल सूबेदारों को आज्ञा दी गई कि वे मार्ग में स्थान-स्थान पर शिवाजी का स्वागत करें। जब शिवाजी महाराष्ट्र से रवाना होकर आगरा जा रहा था तो हिन्दू जनता में शिवाजी को देखने की होड़ मच गई। उसके बारे में कई रहस्य और रोमांच भरे किस्से जनता में विख्यात हो चुके थे। हिन्दू जनता को अपने उद्देश्य एवं शक्ति का दर्शन कराने के लिए शिवाजी ने अपने दल को व्यवस्थित रूप से जमाया। शिवाजी के दल में सबसे आगे एक हाथी होता था जिस पर गेरुआ रंग का एक ध्वज फहराता था। हाथी के पीछे शिवाजी के अंगरक्षकों की टुकड़ी होती थी जो शिवाजी की पालकी को चारों ओर से घेरे रहती थी। शिवाजी की भव्य पालकी पर सोने-चांदी के पतरे चढ़े हुए थे। इस अंगरक्षक दल के चारों ओर शिवाजी के सिपाही रहते थे और अंत में बची हुई सेना चलती थी। हर थाने एवं मुकाम पर मुगल थानेदार, सूबेदार और सरकारी कर्मचारी शिवाजी की सेवा में उपस्थित होते थे इस प्रकार शान से चलता हुआ, हिन्दू प्रजा के हृदयों को जीतता हुआ और मुगलों में भय उत्पन्न करता हुआ शिवाजी 12 मई 1666 को आगरा पहुंच गया।

    जयसिंह का पुत्र रामसिंह कच्छवाहा, शिवाजी को दरबारे आम में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता था किंतु आगरा में प्रवेश के समय शिवाजी के स्वागत-सत्कार में काफी समय लग गया, तब तक औरंगजेब दरबारे आम से उठकर, दरबारे खास में जाकर बैठ गया। असद खाँ बख्शी ने शिवाजी को वहीं बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया।

    शिवाजी का किसी भी तरह आगरा चले आना, औरंगजेब की बहुत बड़ी विजय थी। उस कुटिल अभिमानी बादशाह को एक हिन्दू राजा का अपमान करने के सौ तरीके आते थे तथा वह दुष्टता का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता था। शिवाजी ने बादशाह को एक हजार मोहरें तथा दो हजार रुपए नजर किए तथा 5000 रुपए निसार के तौर पर भेंट किए। उनके नौ वर्षीय पुत्र सम्भाजी ने औरंगजेब को पांच हजार मोहरें और एक हजार रुपए नजर किए एवं 2 हजार रुपए निसार के तौर पर प्रस्तुत किए। औरंगजेब ने शिवाजी एवं सम्भाजी से एक भी शब्द नहीं कहा तथा न ही शिवाजी की कुशल-क्षेम पूछी। बख्शी ने शिवाजी को ले जाकर पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में महाराजा जसवंतसिंह के पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया।

    इस अपमान से शिवाजी बहुत आहत हुआ, वह क्रोध के कारण कांपने लगा तथा उसके नेत्र लाल हो गए। यह वही जसवंतसिंह था जिसे शिवाजी ने कई बार पराजित किया था। जब औरंगजेब ने सरदारों को खलअतें बांटी तो शिवाजी ने खिलअत पहनने से मना कर दिया। इस पर औरंगजेब ने रामसिंह को कहा कि वह शिवाजी की तबियत के बारे में पूछे और उसे खिलअत पहनने के लिए समझाए। जब रामसिंह शिवाजी के पास गया तो शिवाजी ने जोर से चिल्ला कर कहा- आपने और आपके पिता ने देखा कि मैं किस तरह का इंसान हूँ फिर भी मुझे अपमानित करके इतनी देर तक खड़ा रखा गया। इसलिए मैं यह खिलअत अस्वीकार करता हूँ। जब रामसिंह ने शिवाजी को शांत करने के लिए उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो शिवाजी ने उसका हाथ झटक दिया और औरंगजेब की तरफ पीठ करके चलते हुए एक कौने में जाकर बैठ गया तथा जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि मेरी मृत्यु ही मुझे इस स्थान पर खींच लाई है।

    शिवाजी के इस तरह विक्षुब्ध हो जाने और इतनी कठोर प्रतिक्रिया देने के कारण औरंगजेब सहम गया। वह समझ चुका था कि उसने किस आदमी को नाराज कर दिया है। इसलिए उसने अपने कुछ मंत्रियों को संकेत किया कि वे शिवाजी को समझाएं तथा खिलअत पहनाकर बादशाह के समक्ष लाएं। उन मंत्रियों ने बहुत प्रयास किए किंतु शिवाजी ने खिलअत पहनने तथा औरंगजेब के सम्मुख जाने से मना कर दिया। वह बार-बार चिल्लाता रहा कि बादशाह मुझे मार डाले या फिर मैं ही आत्मघात कर लूंगा किंतु बादशाह के समक्ष दुबारा नहीं जाऊंगा। मुझे मुसलमान बादशाह की सेवा नहीं करनी है। औरंगजेब अपनी कपट चाल के कारण, जीती हुई बाजी हार चुका था।

    औरंगजेब के मंत्रियों ने औरंगजेब को सूचित कर दिया कि शिवाजी नहीं मानने वाला। इस पर औरंगजेब ने रामसिंह से कहा कि वह शिवाजी को अपने डेरे पर ले जाकर शांत करे। रामसिंह शिवाजी को लेकर चला गया।

    दूसरे दिन रामसिंह, शिवाजी को समझा-बुझाकर औरंगजेब के दरबार में लाया। शिवाजी, औरंगजेब को देखते ही उखड़ गया और उसके सम्मुख प्रस्तुत होने से मना करके वहाँ से चला गया। शिवाजी, औरंगजेब के वजीर जाफर खान के घर गया और उसे बहुमूल्य उपहार देकर अनुरोध किया कि वह शिवाजी के, आगरा से वापस जाने का प्रबन्ध करे। जफर खाँ की पत्नी, औरंगजेब की मौसी थी। उसने जाफर खाँ को अंदर बुलाकर कहा कि इस व्यक्ति को यहाँ से तुरंत भगा दो जिसने औरंगजेब के मामा शाइस्ताखाँ पर जानलेवा हमला किया था। पत्नी के चीखने-चिल्लाने पर जाफर खाँ ने शिवाजी को अपने घर से जाने के लिए कह दिया।

    उधर औरंगजेब के हरम की औरतों को शिवाजी द्वारा बादशाह का अपमान किए जाने और जाफर खाँ के घर जाकर भेंट करने के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बादशाह को संदेश भिजवाया कि इस उद्दण्ड को दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इन औरतों की अगुवाई औरंगजेब की बहिन जहाँआरा कर रही थी क्योंकि शिवाजी ने जिस सूतर शहर को लूटा और जलाया था, वह जहाँआरा की व्यक्तिगत जागीर में था। शाइस्ता खाँ की पत्नी जो कि औरंगजेब की मामी थी, भी चाहती थी कि हाथ आए हुए शिवाजी को प्राणदण्ड मिलना चाहिए। वह भी हाय-तौबा मचाने लगी।

    औरतों की चीख-पुकार से तंग आकर औरंगजेब ने शिवाजी तथा उसके पुत्र सम्भाजी को रामसिंह के सरंक्षण में बंदी बनाने के निर्देश दिए। अब शिवाजी, रामसिंह के सख्त पहरे में था। औरंगजेब के हरम की औरतें चाहती थीं कि शिवाजी को जान से मार डाला जाए क्योंकि शिवाजी ने शाइस्ताखाँ को घायल किया था और उसके पुत्र को मार डाला था किंतु औरंगजेब इस सम्बन्ध में जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। शिवाजी ने अपनी रिहाई के लिए अनेक प्रयास किए किंतु उनका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में उसने औरंगजेब के समक्ष तीन प्रस्ताव भिजवाए-

    1. बादशाह मुझे क्षमादान दे और मेरे समस्त दुर्ग वापस लौटा दे। इसके बदले में मैं औरंगजेब को दो करोड़ रुपए दूंगा तथा दक्षिण के युद्धों में सदैव मुगलों का साथ दूंगा।

    2. बादशाह मेरी जान बख्श दे और मुझे सन्यासी होकर काशी में अपना जीवन व्यतीत करने दे।

    3. बादशाह मुझे सकुशल घर जाने की अनुमति दे इसके बदले में मेरे समस्त दुर्ग, बादशाह को सौंप दिए जाएंगे।

    औरंगजेब ने इनमें से एक भी बात मानने से इन्कार कर दिया। शिवाजी समझ गया कि उसे मृत्यु दण्ड दिया जाएगा। इसलिए उसने बादशाह को एक और पत्र भिजवाया जिसमें कहा गया कि शिवाजी के साथियों को आगरा से महाराष्ट्र लौटने की अनुमति दी जाए। यह प्रस्ताव बादशाह के काम को सरल बनाने वाला था, इसलिए इसकी तुरंत स्वीकृति मिल गई। अब शिवाजी को आसानी से मारा जा सकता था। जब शिवाजी के सिपाही लौट गए तो शिवाजी ने अपने हाथी-घोड़े, सोना, चांदी, कपड़े आदि बांटने आरम्भ कर दिए। उधर जब दक्षिण के मोर्चे पर बैठे कच्छवाहा राजा जयसिंह को आगरा की घटनाओं के बारे में ज्ञात हुआ तो उसे शिवाजी के प्राणों की चिंता हुई। उसने बादशाह को पत्र लिखा कि शिवाजी मेरी जमानत पर आपके सम्मुख आया था, इसलिए उसके प्राण नहीं लिए जाएं।

    शिवाजी का आगरा से पलायन

    अंत में औरंगजेब ने शिवाजी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह अफगानिस्तान जाकर मुगल सेना की तरफ से लड़ाई करे। उस सेना का सेनापति रदान्द खाँ नामक एक दुष्ट व्यक्ति था। औरंगजेब की योजना थी कि शिवाजी को रदान्द खाँ के हाथों मरवाया जाए ताकि सबको लगे कि यह एक हादसा था। शिवाजी इस प्रस्ताव को सुनते ही बीमार पड़ गया और प्रतिदिन सायंकाल भिखारियों एवं ब्राह्मणों को फल और मिठाइयां बांटकर उनसे आशीर्वाद लेने लगा। प्रतिदिन संध्याकाल में कहार, बांस की बड़ी-बड़ी टोकरियों में फल और मिठाइयां लाते और शिवाजी उन्हें स्पर्श करके, दान करने के लिए बाहर भेज देता। यह सिलसिला कई दिन तक चलता रहा। उन टोकरियों की गहराई से छान-बीन होती थी। धीरे-धीरे इस जांच में ढिलाई होने लगी।

    17 अगस्त 1666 को बादशाह ने आदेश दिया कि शिवाजी तथा उसके पुत्र को रामसिंह के सरंक्षण से हटाकर एक मुस्लिम व्यक्ति की कैद में रखा जाए। उसी दिन संध्याकाल में शिवाजी तथा सम्भाजी, फलों की अलग-अलग टोकरियों में बैठ गए। इन टोकरियों को उनके आदमियों ने उठाया तथा ब्राह्मणों को वितरित किए जाने वाले फलों की टोकरियों के साथ-साथ लेकर महल से निकल गए। शिवाजी और सम्भाजी, यमुनाजी के किनारे-किनारे चलते हुए निर्जन स्थान पर पहुंच गए। यहाँ रात के अंधेरे में उन्होंने नदी पार की। पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार उनके आदमी घोड़े लेकर तैयार खड़े थे। शिवाजी और सम्भाजी उन घोड़ों पर बैठकर मथुरा की ओर निकल गए। उधर हीरोजी फरजंद नामक सेवक शिवाजी के कपड़े पहनकर शिवाजी के पलंग पर सो गया। उसके हाथ में पड़ा शिवाजी का कड़ा दूर से ही चमक रहा था। इसलिए पहरेदार भ्रम में रहे कि यह बीमार शिवाजी सो रहा है। प्रातः होने पर हीरोजी ने पहरेदारों से कहा कि शिवाजी बहुत बीमार हैं अतः बाहर किसी तरह का शोर नहीं किया जाए। थोड़ी देर में वह भी महल से निकलकर भाग गया। किसी को कुछ भी भनक नहीं लग सकी। दोपहर में शहर कोतवाल शिवाजी के कमरे की जांच करने गया तो उसे शिवाजी के भाग जाने का पता लगा।

    बादशाह को शिवाजी के निकल भागने की सूचना दी गई। पूरे आगरा में सूचना फैल गई कि शिवाजी अपनी जादुई शक्ति के कारण महल से अदृश्य हो गया। मुगल सिपाही और जासूस चप्पे-चप्पे पर थे किंतु किसी भी व्यक्ति या पहरेदार ने उसे भागते हुए नहीं देखा। शिवाजी को जोर-शोर से ढूंढा जाने लगा किंतु तब तक 18 घण्टे बीत चुके थे और शिवाजी मथुर पहुंचकर अदृश्य हो गए थे। शिवाजी ने अपने पुत्र सम्भाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के घर रख दिया तथा स्वयं बुंदेलखण्ड होते हुए गौंडवाना प्रदेश की तरफ रवाना हो गए। जब वे गौंडवाना से कर्नाटक जा रहे थे, तब मार्ग में एक किसान, कुछ साधुओं को भोजन करवा रहा था। शिवाजी को भी सन्यासी समझकर भोजन के लिए आमंत्रित किया गया। जब शिवाजी भोजन कर रहे थे तब अचानक उस किसान की औरत यह कहकर क्षमा मांगने लगी कि उसके घर में कुछ भी नहीं है इसलिए साधुओं को इतना साधारण भोजन करवाया जा रहा है। यदि मराठे उसके परिवार का धन लूट कर नहीं ले गए होते तो हम साधुओं को अच्छा भोजन करवाते। शिवाजी भी वहीं बैठे भोजन कर रहे थे। उन्हें यह सुनकर अपार कष्ट का अनुभव हुआ और उनका सामना एक कड़वी सच्चाई से हुआ।

    रायगढ़ आगमन

    रामसिंह के पहरे से निकलने के पच्चीसवें दिन वे सन्यासी के वेश में अपनी माता जीजाबाई के समक्ष राजगढ़ में उपस्थित हुए। उन्होंने सबसे पहले उसी किसान परिवार को अपने महल में आमंत्रित किया। उसे बहुत सारा धन दिया तथा मराठों द्वारा की गई लूटपाट के लिए उनसे क्षमा-याचना की। शिवाजी ने रायगढ़ में प्रचारित कर दिया कि मार्ग में सम्भाजी की मृत्यु हो गई है। शिवाजी ने राजगढ़ में सम्भाजी के समस्त संस्कार एवं क्रियाकर्म विधि पूर्वक सम्पन्न कराए ताकि मुगलों को भ्रम में डाला जा सके और वे सम्भाजी को ढूंढने का प्रयास नहीं करें। कुछ दिनों बाद मथुरा का ब्राह्मण परिवार स्वयं ही 8 वर्ष के बालक सम्भाजी को लेकर रायगढ़ आ गया। शिवाजी एवं सम्भाजी के सकुशल रायगढ़ पहुंचने का समाचार पूरे देश में फैल गया। जनता के बीच उनकी रहस्यमयी शक्तियों के बारे में और अधिक विस्तार से प्रचार हो गया। उनके सकुशल वापसी पर देश के अनेक हिस्सों में हर्ष मनाया गया और मिठाइयां वितरित की गईं।

    नेताजी पाल्कर को मुसलमान बनाया जाना

    शिवाजी के इस तरह निकल भागने की खीझ मिटाने तथा शिवाजी का मनोबल तोड़ने के लिए औरंगजेब ने एक खतरनाक योजना बनाई। उसने महाराजा जयसिंह को लिखा कि वह शिवाजी के पूर्व साथी नेताजी पाल्कर को बंदी बनाकर दिल्ली भेजे। नेताजी पाल्कर को महाराष्ट्र में द्वितीय शिवाजी कहा जाता था तथा इस समय वह जयसिंह की सेवा में था। औरंगजेब का आदेश मिलने पर जयसिंह ने नेताजी पाल्कर को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया। औरंगजेब ने पाल्कर से कहा कि या तो वह मुसलमान बनकर मुगल साम्राज्य की सेवा करे या फिर मृत्यु का वरण करे।

    नेताजी पाल्कर ने मुसलमान होना स्वीकार किया। औरंगजेब ने एक मुस्लिम युवती का पाल्कर से विवाह करा दिया तथा पाल्कर को अफगानिस्तान युद्ध में भेज दिया। पाल्कर 8 साल तक मुगलों के लिए लड़ता रहा और औरंगजेब की कृपा प्राप्त करता रहा। औरंगजेब, शिवाजी के आगरा से निकल भागने के लिए जयसिंह के पुत्र रामसिंह को जिम्मेदार मानता था। इसलिए रामसिंह को दरबार में आने से मनाही कर दी गई तथा उसका पद भी छीन लिया। इसलिए महाराजा जयसिंह दक्षिण में बैठकर औरंगजेब के अगले आदेश की प्रतीक्षा करता रहा। शिवाजी इस दौरान पूरी तरह शांत बना रहा। अंततः औरंगजेब ने जयसिंह को दक्षिण से हटा दिया तथा आगरा आकर दरबार में उपस्थित होने के आदेश दिए। मुअज्जम को पुनः दक्षिण का सूबेदार बनाया गया तथा महाराजा जसवंतसिंह को मुअज्जम के साथ दक्षिण जाने का आदेश दिया गया। दिलेर खाँ को भी दक्षिण में बने रहने का आदेश दिया गया। इस अपमान से जयसिंह बुरी तरह आहत हो गया तथा आगरा पहुंचने से पहले बुरहानपुर में ही 28 अगस्त 1667 को उसका देहांत हो गया।

    संधि भंग

    सम्भाजी के रायगढ़ पहुँच जाने के बाद, शिवाजी ने औरंगजेब को पत्र लिखकर सूचित किया कि वह अब भी बादशाह के प्रति स्वामि-भक्त है तथा भविष्य में उनकी आज्ञाओं का पालन करता रहेगा। केवल अपने प्राणों के भय से बादशाह की आज्ञा प्राप्त किए बिना, अपने देश चला आया है। शिवाजी ने औरंगजेब को पत्र इसलिए लिखा था ताकि दक्षिण में शांति बनी रहे और जयसिंह फिर से आक्रमणकारी गतिविधियां आरम्भ न कर दे। औरंगजेब भी इस वास्तविकता को समझता था कि शिवाजी अब पूर्णतः स्वतंत्र था तथा जयसिंह के साथ की गई पूर्व की संधि का अब कोई अर्थ नहीं रह गया था। फिर भी उसने शिवाजी को एक बार पुनः आगरा आने का आदेश भिजवाया। 6 मई 1667 के पर्शियन न्यूजलैटर में लिखा है- ''बादशाह ने वजीरे आजम को हुक्म दिया कि शिवा के वकील को बुलाए, उसे आश्वस्त करे और दो महीने में लौटने की शर्त पर शिवा को सूचित करे कि हुजूरे अनवर ने उसके गुनाहों को माफ कर दिया है। उसके पुत्र सम्भाजी को 5000 का मनसब बहाल किया गया है। वह अपनी शक्ति के अनुसार बीजापुर का जितना इलाका छीन सकता है, छीन ले। अन्यथा अपने स्थान पर डटा रहे और बादशाह के बेटे का हुक्म माने।''

    सम्भाजी की मुगल सेवा में हाजिरी

    4 नवम्बर 1667 से सम्भाजी नियमित रूप से मुअज्जम के दरबार में हाजिरी देने लगा, उसे नागपुर के क्षेत्र में एक जागीर दी गई। सम्भाजी ने मुअज्जम से अच्छी दोस्ती कर ली। वे दोनों एक साथ शिकार पर जाने लगे तथा नृत्य एवं आमोद-प्रमोद के अवसर पर भी साथ रहने लगे।

    औरंगजेब द्वारा शिवाजी को राजा की मान्यता

    9 मार्च 1668 को मुअज्जम ने शिवाजी को पत्र लिखकर सूचित किया कि जहांपनाह ने राजा की उपाधि देकर जो कि आपकी उच्चतम अभिलाषा है, आपका सिर ऊंचा किया है। औरंगजेब द्वारा शिवाजी को स्वतंत्र राजा स्वीकार कर लिए जाने के बाद से शिवाजी की दक्षिण भारत की राजनीति में स्थिति बहुत बदल गई। बीजापुर एवं गोलकुण्डा के सुल्तान भी शिवाजी को स्वतंत्र शासक मानने लगे। अंग्रेज और फ्रांसिसी भी अब शिवाजी को लुटेरा या जागीरदार मानने की बजाय राजा मानकर उससे मित्रता पूर्ण व्यवहार करने लगे। मुअज्जम के माध्यम से सम्भाजी को पांच हजारी मनसब मिलने के कारण मुगलों और शिवाजी के बीच झगड़े पूरी तरह बंद हो गए थे। शिवाजी इस समय का उपयोग अपने राज्य के प्रशासन तथा जनता की दशा सुधारने एवं सेना का विस्तार करने में करने किया।

    शांति में विघ्न

    दिलेर खाँ को शहजादा मुअज्जम तथा सम्भाजी की दोस्ती अच्छी नहीं लगी। उसने औरंगजेब को पत्र लिखकर सूचित किया कि शहजादा मुअज्जम, मराठों के साथ मिलकर स्वयं बादशाह बनने का षड़यंत्र रच रहा है। दिलेर खाँ का पत्र पाकर औरंगजेब ने मुअज्जम को आदेश भिजवाया कि सम्भाजी को अपने दो सहायकों- प्रतापराव गूजर तथा नीराजी राव के साथ दिल्ली भेज दे। मुअज्जम को दिलेर खाँ के षड़यंत्र के बारे में पता लग गया और उसने सम्भाजी को सावधान कर दिया। सम्भाजी अपने साथियों सहित मुगल शिविर से भागकर पूना चला गया। औरंगजेब को विश्वास हो गया कि दिलेर खाँ की बात सही है। मुअज्जम ने दिखावा करने के लिए सम्भाजी को पकड़ने के प्रयास आरम्भ किए तथा एक टुकड़ी उसके पीछे भेजी जो कुछ दिन बाद असफल होकर लौट आई। इस प्रकार दक्षिण भारत में कुछ दिनों के लिए हुई शांति में एक बार फिर से विघ्न पड़ गया।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 8 शिवाजी द्वारा औरंगजेब का विरोध

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 8 शिवाजी द्वारा औरंगजेब का विरोध

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 8


    शिवाजी द्वारा औरंगजेब का विरोध


    9 अप्रेल 1669 को औरंगजेब ने हिन्दू प्रजा के लिए एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि मुगल साम्राज्य में समस्त हिन्दू मंदिर और विद्यालय गिरा दिए जाएं, हिन्दू त्यौहार न मनाए जाएं तथा हिन्दू तीर्थयात्रा पर न जाएं। नए हिन्दू मंदिर एवं विद्यालय बनाने पर रोक लगा दी गई। हिन्दू मंदिर और विद्यालय ध्वस्त करने के लिए औरंगजेब ने हजारों मुस्लिम दलों का गठन किया तथा मुगल अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे अपने क्षेत्र में किए गए विध्वंस की जानकारी भेजें।

    उत्तर भारत में इन आदेशों की अनुपालना तत्काल आरम्भ हो गई। 4 सितम्बर 1669 को काशी विश्वनाथ का मंदिर गिराकर वहाँ मस्जिद बना दी गई। मथुरा में केशवराज मंदिर, उज्जैन, अहमदाबाद इत्यादि स्थानों के प्रसिद्ध मंदिरों को भूमिसात कर दिया गया। सोमनाथ का दूसरा मन्दिर भी ध्वस्त कर दिया गया। असम, उड़ीसा, बंगाल आदि प्रांतों में भी यही किया गया। बादशाह के अधीन हिन्दू शासकों द्वारा हिन्दू मठों, धार्मिक संस्थाओं एवं विद्यालयों को दी जाने वाली सहायता राशि बंद कर दी गई और पुजारियों तथा मंदिरों की जमीनें एवं जागीरें जब्त कर ली गईं। लाखों देव मूर्तियां तोड़कर फैंक दी गईं और मंदिरों को आग के हवाले कर दिया गया।

    शिवाजी द्वारा औरंगजेब की कार्यवाहियों का विरोध

    जब औरंगजेब द्वारा पूरे देश में देवालयों एवं देवविग्रहों का विध्वंस आरम्भ किया गया तो शिवाजी ने शांति की नीति का परित्याग कर दिया। 14 दिसम्बर 1669 से 11 जनवरी 1670 के बीच शिवाजी ने अपनी सेनाओं को मुगल शिविरों से वापस बुला लिया। शहजादे मुअज्जम के साथ औरंगाबाद में नियुक्त प्रतापराव और आनंदराव अपनी सेनाओं के साथ वापस राजगढ़ लौट आए। इसके बाद शिवाजी ने मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण आरम्भ कर दिए। उसने महाराजा जयसिंह द्वारा छीने गए अपने पुराने दुर्गों को फिर से हस्तगत करना आरम्भ कर दिया। शिवाजी की माता जीजाबाई ने भी शिवाजी को प्रेरित किया कि वे दुष्ट बादशाह का दमन करें जो हिन्दू प्रजा का उत्पीड़न कर रहा है और हिन्दू देव विग्रहों का अपमान कर रहा है।

    सूरत के इंग्लिश प्रेसीडेंट गैरी ने 23 जनवरी 1670 को अपनी कम्पनी के उच्चाधिकारियों को पत्र लिखकर सूचित किया- ''महाविद्रोही शिवाजी फिर से औरंगजेब के खिलाफ लड़ाई में लगा है जिसने धर्म सुधार की भावना से उत्साहित होकर बहुत से गैर-ईसाई मंदिरों को गिरा दिया है और बहुतों को मुसलमान बनने को मजबूर किया है।''

    औरंगजेब का मान मर्दन करके उसकी गतिविधियों को बाधित करने में शिवाजी की सफलता को रेखांकित करते हुए शिवाजी के समकालीन कवि भूषण ने लिखा है-

    कुम्भकर्न असुर औतारी औरंगजेब कीन्हीं कत्ल मथुरा दोहाई फेरी रब की।

    खोदि डारे देवी देव सहर-मुहल्ला बाके, लाखन तुरुक कीन्हें छूटि गई तब की।

    भूषण भनत भाग्यों कासीपति विस्वनाथ, और कौन गिनती में भूली गति भव की।

    चारौं वर्ण धर्म छोड़ि कमला नेवाज पढ़ि, शिवजी न होतो तौ सुनति होत सब की।।


    सिंहगढ़ पर अधिकार

    एक दिन जीजाबाई ने इच्छा व्यक्त की कि शिवाजी, सिंहगढ़ पर फिर से अधिकार करे। यह दुर्ग पहले बीजापुर के अधिकार में था तथा इसे शिवाजी ने अपने अधीन कर लिया था। बाद में जयसिंह के साथ हुई पुरंदर की संधि में सिंहगढ़, औरंगजेब को समर्पित कर दिया गया था और इस समय भी यह मुगलों के अधीन था। सिंहगढ़ के मुगल किलेदार उदयभान राठौड़ के पास काफी संख्या में सैनिक थे। इसलिए सिंहगढ़ को जीतना दुष्कर कार्य था। फिर भी शिवाजी ने माता के आदेश की पालना करने का निश्चय किया तथा तानाजी मलसुरे को इसका दायित्व सौंपा। तानाजी ने 4 फरवरी 1670 को आधी रात के समय 300 मावली सिपाही लेकर सिंहगढ़ पर आक्रमण किया। उसने अपने भाई सूर्याजी के साथ 250 सिपाही दुर्ग के मुख्य द्वार पर छिपा दिए। तानाजी अपने कुछ सिपाही लेकर गोह की सहायता से दुर्ग के ऊपर चढ़ गया तथा दुर्ग के भीतर उतरकर दुर्ग के द्वार खोल दिए तथा सूर्याजी को संकेत किया। सूर्याजी अपने सैनिकों के साथ तैयार खड़ा था, उसने तुरंत ही दुर्ग पर धावा बोल दिया। मुगल दुर्गपति उदयभान राठौड़ भी अपने सिपाहियों को लेकर मोर्चे पर आ गया जिससे भयंकर मारकाट मच गई और तानाजी मलसुरे काम आया।

    तानाजी के गिरते ही मावली सेना भागने लगी। इस पर सूर्याजी ने चिल्लाकर कहा कि यदि भागने का प्रयास किया तो सभी मार दिए जाएंगे क्योंकि बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया है। इसलिए प्राण रहने तक लड़ो और जीत प्राप्त करो। मावली सैनिक फिर से लड़ने लगे और थोड़ी देर के संघर्ष के बाद उन्होंने उदयभान को उसके सैनिकों सहित मार डाला। प्रातः होने तक दुर्ग मराठियों के अधिकार में आ चुका था। सूर्याजी ने दुर्ग के एक मकान में आग लगाकर शिवाजी को दुर्ग हस्तगत किए जाने की सूचना दी। तानाजी मलसुरे का शव शिवाजी तथा जीजाबाई के सामने लाया गया। शिवाजी ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि गढ़ तो आया किंतु सिंह चला गया। सूर्याजी मलसुरे को सिंहगढ़ का दुर्गपति नियुक्त किया गया। इस दिन की स्मृति में सिंहगढ़ में शौर्य दिवस मनाने की परम्परा आरम्भ हुई जो आज तक प्रचलित है।

    पुरंदर, माहुली तथा चांदवाड़ा पर अधिकार

    सिंहगढ़ जीतने के बाद शिवाजी ने मुगलों से दुर्ग छीनने का काम तेज कर दिया। 8 मार्च 1670 को मराठों ने पुरंदर दुर्ग पर आक्रमण करके उसे फिर से अपने अधिकार में ले लिया तथा मुगल सेनापति रजीउद्दीन को पकड़ लिया। शिवाजी के मराठे लौहगढ़ तथा रोहीड़ा दुर्ग पर चढ़ गए। मुगलों में अव्यवस्था फैल गई। मराठे दक्कन के प्रत्येक भाग में लड़ रहे थे। 24 जनवरी 1670 के एक मुगल सूचना पत्र में कहा गया है- ''शिवाजी की फौजें बरार प्रांत को लूट रही हैं। उन्होंने शाही इलाकों से 20 लाख रुपए इकट्ठे किए हैं।''

    मराठवाड़ा के उस्मानाबाद जिले में स्थित औशा नामक दुर्ग के दुर्गपति, बरखुरदार खाँ ने बादशाह को सूचित किया- ''बीस हजार सैनिकों की शिवाजी की फौजें इस क्षेत्र में आ चुकी हैं। मराठा, प्रांत में लूटमार कर रहे हैं और माल इकट्ठा कर रहे हैं। किले से दो कोस दूर उनका पड़ाव है। शिवाजी ने मेरी जागीर लूट ली है। मेरे पास जीवन निर्वाह का कोई जरिया नहीं बचा है। मुझे कुछ धन देने का अनुग्रह किया जाए।''

    शिवाजी ने माहुली पर आक्रमण किया गया। भयभीत मुगल किलेदार मनोहरदास गौड़ ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। मुगल सेनापति दाऊद खाँ बड़ी सेना लेकर आया और दूसरा दुर्गपति नियुक्त कर दिया। जब, दाऊद खाँ अपनी कुछ सेना वहीं छोड़कर वापस जुन्नार के लिए रवाना हुआ तो मार्ग में, शिवाजी ने उसकी गर्दन काट ली और माहुली पर अधिकार कर लिया। चांदवाड़ के दुर्ग में मुगलों का बहुत बड़ा कोष रहता था। शिवाजी ने दुर्ग पर आक्रमण करके वह समस्त कोष छीन लिया। शिवाजी ने उजबेक खाँ को मारकर कल्याण एवं भिवंडी पर भी अधिकार कर लिया। मुगल सेनापति लोधी खाँ बुरी तरह घायल होकर इलाके से भाग गया। शिवाजी ने माथेरान तथा करनाला के दुर्ग भी छीन लिए। इस प्रकार शिवाजी ने कोंकण प्रदेश सहित मुगल राज्य के वे समस्त किले छीन लिए जो जयसिंह के साथ हुई संधि के बाद औरंगजेब के पास चले गए थे।

    सूरत की दूसरी लूट

    शिवाजी औरंगजेब को चैन से नहीं बैठने देना चाहता था। उसने सूरत पर पुनः आक्रमण करने का निश्चय किया। शिवाजी को सूचना मिली कि सूरत का सूबेदार मर गया है तथा इस समय वहाँ सैनिक भी कम संख्या में हैं। 3 अक्टूबर 1770 को शिवाजी 15 हजार घुड़सवारों को लेकर सूरत पहुंच गया। उसने फिर सूरत के व्यापारियों को संदेश भिजवाया किंतु कोई भी व्यापारी उससे मिलने नहीं आया। इस पर शिवाजी के सिपाही शहर में घुसकर लूटपाट करने लगे। तीन दिन तक सूरत को लूटा गया। अंग्रेजों ने अपनी सम्पत्ति पहले ही स्वालि बंदरगाह पर पहुंचा दी थी। जब शिवाजी आया तो अंग्रेजों ने उसे उपहार आदि देकर प्रसन्न किया। पुर्तगालियों ने भी शिवाजी को प्रसन्न रखने का मार्ग अपनाया।

    उन्हीं दिनों भारत के किसी मुस्लिम राज्य का सुल्तान मक्का से यात्रा करके लौटा था और सूरत बंदरगाह पर ही था। शिवाजी ने उसे भी लूट लिया। उससे सोने का एक पलंग सहित, लाखों रुपयों का धन प्राप्त हुआ। शिवाजी की सेना ने सूरत से इस बार 66 लाख रुपए लूटे तथा आधा शहर जलाकर राख कर दिया। इसी बीच सूचना मिली कि बुरहानपुर से एक बड़ी मुगल सेना तेज गति से सूरत की ओर बढ़ रही है। इसलिए शिवाजी लूट का धन लेकर रवाना हो गया। सूरत की इस लूट के बाद बहुत बड़ी संख्या में व्यापारी सूरत छोड़कर बम्बई आदि शहरों को चले गए और मुगल उनकी रक्षा नहीं कर पाए। मुगलों का यह बंदरगाह उजड़ जाने से मुगल सल्तनत की बहुत बड़ी आय का माध्यम समाप्त हो गया।

    दाऊद खाँ कुरैशी से सामना

    जब शिवाजी सूरत से अपने राज्य के लिए लौट रहा था, तब उसे सूचना मिली कि मुगल सेनापति दाऊद खाँ कुरैशी एक बड़ी सेना लेकर उसके मार्ग में आ डटा है। शिवाजी ने अपनी सेना के 4-5 भाग किए तथा प्रत्येक टुकड़ी को एक होशियार सेनानायक के नेतृत्व में मुगल सेना पर अलग-अलग दिशाओं से आक्रमण करके युद्ध में उलझाने के निर्देश दिये। इसके बाद शिवाजी की एक सेना लूट के माल को लेकर एक दर्रे के रास्ते राजगढ़ की तरफ चली गई। जब यह सब चल ही रहा था, शिवाजी ने मुगलों के चार हजार घोड़े पकड़ लिए। इस कारण मुगल सेनापति ने शिवाजी के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि घोड़े लौटा दिए जाएं तो शिवाजी बिना युद्ध किए जा सकता है। शिवाजी ने यह शर्त स्वीकार कर ली। मुगलों की सेना में रायबग्गा नामक एक महिला सेनानायक थी जो पहले भी शिवाजी और कर्तलब अली खाँ से हुए युद्ध में मुगलों की तरफ से शिवाजी से लड़ चुकी थी। उसने इस समझौते को मानने से इन्कार कर दिया तथा शिवाजी पर हमला बोल दिया। शिवाजी ने रायबग्गा की सेना को बुरी तरह परास्त कर दिया तथा उसे औरत जानकर जीवित लौट जाने का अवसर दिया। मुगल सेना पस्त होकर चुपचाप बैठ गई और शिवाजी शान से राजगढ़ चला गया।

    बरार तथा खानदेश पर आक्रमण

    सूरत की लूट के बाद शिवाजी ने बरार, बागलान तथा खानदेश पर भी आक्रमण किए और बहुत से दुर्ग अपने अधिकार में ले लिए। शिवाजी के सेनापति प्रतापराव गूजर ने मुगलों के विख्यात दुर्ग बुरहानपुर के निकट बहादुरपुर को लूटा और बरार प्रांत में प्रवेश करके समृद्धशाली नगर करंजा में लूट मचाई। यहाँ से शिवाजी को लगभग 1 करोड़ रुपए की सम्पत्ति प्राप्त हुई जो पूना एवं रायगढ़ के लिए रवाना कर दी गई। प्रतापराव ने करंजा के बड़े व्यापारियों को बंधक बना लिया और उन्हें बड़ी-बड़ी राशि लेकर छोड़ा। शिवाजी ने उन समस्त मुगल क्षेत्रों से चौथ वसूल की जहाँ से होकर शिवाजी की सेनाएं गुजरीं। इस प्रकार शिवाजी ने दक्षिण में मुगलों का शक्ति संतुलन बिगाड़ दिया।

    छत्रसाल द्वारा शिवाजी से भेंट

    बुंदेलखण्ड के राजा चम्पतराय ने आजीवन औरंगजेब की सेवा की किंतु औरंगजेब ने चम्पतराय को मरवा दिया। चम्पतराय के पुत्र छत्रसाल ने भी औरंगजेब की बड़ी सेवा की तथा जयसिंह की सेना के साथ रहकर शिवाजी के विरुद्ध कई युद्ध लड़े। वह शिवाजी की वीरता से बहुत प्रभावित था। एक दिन छत्रसाल अपनी पत्नी और मित्रों के साथ शिकार खेलने के बहाने से मुगल खेमे से निकला और चुपचाप पूना जा पहुंचा। शिवाजी नेे उसका स्वागत किया और उसे राजनीति, छद्मनीति एवं छापामार युद्ध के बारे में जानकारी दी। छत्रसाल ने शिवाजी के साथ मिलकर औरंगजेब की सेना से युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की। इस पर शिवाजी ने उसे सलाह दी कि वह अपनी मातृभूमि बुंदेलखण्ड लौट जाए और अपनी मातृभूमि को मुगलों से मुक्त कराए। वहाँ उसे अपने ही देश के बहुत से साथी मिल जाएंगे। छत्रसाल को यह सलाह उचित लगी। शिवाजी ने उसकी कमर में तलवार बांधी तथा अपने हाथों से उसका तिलक किया। छत्रसाल, मुगलों की नौकरी छोड़कर अपने पैतृक राज्य महोबा चला गया और औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की घोषणा कर दी।

    संत तुकाराम से भेंट

    शिवाजी ने महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध संत तुकाराम से भेंट की। तुकाराम ने उसे सलाह दी कि वह समर्थ गुरु रामदास की शरण में जाए और उन्हें अपना गुरु स्वीकार करे। रामदास का जन्म आपके मार्ग दर्शन के लिए ही हुआ है। शिवाजी ने संत तुकाराम के आदेश का पालन किया तथा समर्थ गुरु रामदास से भेंट करके उन्हें अपना गुरु बनाया। रामदास ने भी शिवाजी को सहर्ष अपना शिष्य स्वीकार कर लिया। रामदास ने नागपुर के निकट रामटेक में भगवान रामचन्द्र के मंदिरों का निर्माण करवाया जो हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र बन गए।

    महावत खाँ का दक्षिण में आगमन

    सूरत की दूसरी लूट ने औरंगजेब के लिए कड़ी चुनौती खड़ी कर दी। उसने महावत खाँ को दक्षिण में शिवाजी के विरुद्ध अभियान करने के लिए भेजा। गुजरात के सूबेदार बहादुर खाँ को उसका सहायक सेनापति बनाकर भेजा गया। 10 जनवरी 1671 को महावत खाँ ने औरंगाबाद में शहजादा मुअज्जम से भेंट की। महाराजा जसवंतसिंह, दिलेर खाँ तथा दाऊद खाँ भी अभी तक दक्षिण में थे। ये सब सेनापति, सूबेदार और राजा एक-दूसरे से ईर्ष्या एवं शत्रु भाव रखते थे। इसलिए सभी लोग नाच-गाने एवं शिकार में व्यस्त रहते थे। औरंगजेब के अभियान को आगे बढ़ाने में इनकी बहुत कम रुचि थी। इसी बीच दक्षिण में कोई बीमारी फैल गई जिसने हजारों मनुष्यों और पशुओं को चपेट में ले लिया। इस कारण मुगल सेनाओं के बहुत से सिपाही एवं बोझ खींचने वाले पशु मर गए।


    साल्हेर-मुल्हेर का युद्ध

    ई.1672 के आरंभ में दिलेर खाँ के सेनानायक इखलास खाँ ने साल्हेर गढ़ पर घेरा डाला तथा दिलेर खाँ और बहादुर खाँ ने पूना पर आक्रमण किया। उन्होंने पूना में कत्ले आम करने का आदेश दिया। शिवाजी ने उन्हें पूना से बाहर निकालने के लिए एक चाल चली। उसने अपने सेनापति प्रतापराव गूजर को साल्हेर पर आक्रमण करने भेजा। प्रतापराव, इखलास खाँ में कसकर मार लगाने लगा। ऐसा लगने लगा कि इखलास खाँ की पराजय हो जाएगी। इसलिए दिलेर खाँ और बहादुर खाँ पूना छोड़कर साल्हेर की ओर भागे। उन्होंने साल्हेर के साथ-साथ मुल्हेर दुर्ग को भी घेर लिया। अब शिवाजी ने दिलेर खाँ और बहादुर खाँ की सेनाओं पर बाहर से आक्रमण करने की नीति अपनाई तथा पेशवा मोरोपंत और प्रतापराव गूजर ने इन दोनों के विरुद्ध जी-जान लगा दी। इस कारण यह संघर्ष भयानक हो गया और रक्त की नदियां बह निकलीं। अंत में मराठों ने मुगलों की सेनाओं को बुरी तरह नष्ट कर दिया। कई हजार मुगलों को मार डाला तथा कई हजार मुगलों को बंदी बना लिया। हजारों सैनिक घायल होकर मैदान छोड़ गए। युद्ध स्थल पर ऊँट, हाथी, घोड़े, गधे, खच्चर भी बड़ी संख्या में मारे गए। मुगलों का बड़ा खजाना, युद्ध सामग्री और हजारों हाथी, घोड़े, गधे, खच्चर शिवाजी के हाथ लगे।

    इस युद्ध में शिवाजी को भी बहुत क्षति हुई। उसका बचपन का मित्र सूर्यराव कांकड़े काम आया। उसकी सेना भी नष्ट हो गई। इस युद्ध में दोनों पक्षों के लगभग 10 हजार मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हुए तथा लगभग 10 हजार मनुष्य घायल हुए। यह पहला युद्ध था जो शिवाजी ने आरपार की लड़ाई में जीता था। सुल्हेर तथा मुल्हेर दोनों ही किलों पर से मुगलों को खदेड़ दिया गया। दिलेर खाँ, युद्ध के मैदान से भागकर बहुत दूर चला गया। शिवाजी द्वारा इस जीत की प्रसन्नता में जनता में मिठाइयां तथा सिपाहियों में इनाम बांटे गए। शिवाजी ने युद्ध के मैदान में घायल पड़े दोनों तरफ के सिपाहियों की मरहम पट्टी करवाई तथा उन्हें घर जाने की छूट दी। बहुत से मुगल सैनिक, शिवाजी का यह व्यवहार देखकर मुगलों की नौकरी छोड़कर शिवाजी की सेना में भर्ती हो गए।

    औरंगजेब को झटका

    जब साल्हेर और मुल्हेर की पराजय का समाचार औरंगजेब को सुनाया गया तो वह तीन दिन तक दरबार में नहीं गया और कहता रहा कि लगता है कि परवरदिगार मुसलमानों से उनका राज्य छीनकर एक काफिर को देना चाहता है। इस समाचार को सुनने से पहले मैं मर क्यों नहीं गया! औरंगजेब के धायभाई बहादुर खाँ कोका ने औरंगजेब को ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि मैं मुगल सम्मान की स्थापना के लिए सदैव तत्पर हूँ। मैं दक्कन में जाकर शिवाजी पर आक्रमण करूंगा और उसका मान-मर्दन करूंगा। औरंगजेब ने धायभाई बहादुर खाँ कोका को दक्षिण का सूबेदार बना दिया।

    महावत खाँ की मृत्यु

    औरंगजेब ने सुल्हेर की भयानक पराजय के लिए महावत खाँ को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे फटकार भरा पत्र लिखा और तुरंत अफगानिस्तान चले जाने के निर्देश दिए। महावत खाँ जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के समय से मुगलों की सेवा करता आया था। उसके बच्चे बादशाही खानदान के शहजादों को ब्याहे गए थे। वह बड़ा शातिर और दुष्ट दिमाग वाला व्यक्ति था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह पहाड़ी चूहे कहे जाने वाले शिवाजी के हाथों इतनी बुरी तरह परास्त होगा। इसकी तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि औरंगजेब उसका इतना अपमान करेगा। महावत खाँ का दिल टूट गया और वह अफगानिस्तान पहुंचने से पहले ही मर गया।

    दिलेर खाँ और बहादुर खाँ द्वारा औरंगजेब को करारा जवाब

    औरंगजेब ने दिलेर खाँ तथा बहादुर खाँ को भी कड़े पत्र लिखे कि अपने मुख पर पराजय की कालिख पोतने से पहले तुम्हें युद्ध के मैदान में ही मर जाना चाहिए था किंतु तुम लोगों ने कायरों की तरह युद्ध के मैदान से भागकर अपने प्राण बचाए। अब कभी मुझे अपना मुख मत दिखाना। तुम्हें अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, अबीसीनियों और गोलकुंडा तथा बीजापुर की सेनाओं को भी अपने साथ लेना चाहिए था तथा चारों ओर से घेरकर शिवाजी को मारना चाहिए था। इस पर दिलेर खाँ तथा बहादुर खाँ ने औरंगजेब को पत्र लिखा कि यदि बादशाह को स्मरण हो कि यह वही शिवाजी है जो आगरा की कठोर शाही कैद से अपनी चतुराई से भाग चुका है तो आपको हमारा यह अपराध इतना निन्दनीय नहीं दिखेगा। औरंगजेब इस जवाब से और अधिक चिढ़ गया।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 9 सेनापति प्रताप राव का बलिदान

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 9 सेनापति प्रताप राव का बलिदान

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 9


    सेनापति प्रताप राव का बलिदान


    गोलकुण्डा के शासक की मृत्यु 21 अप्रेल 1672 को गोलकुण्डा के शासक अब्दुल्लाह कुतुबशाह की मृत्यु हो गई एवं उसके स्थान पर अबुल हसन कुतुबशाह गोलकुण्डा का सुल्तान हुआ। उस पर सूफियों का प्रभाव था और वह सुन्नी मुसलमानों की कट्टरता को उचित नहीं मानता था। उसने अपने राज्य में हिन्दू मंत्रियों एवं अधिकारियों को समान रूप से नियुक्त किया। उसका प्रधानमंत्री अदन्ना, ब्राह्मण था।

    बीजापुर के शासक की मृत्यु

    24 नवम्बर 1672 को बीजापुर के शासक अली आदिलशाह की मृत्यु हो गई तथा 4 साल का बालक सिकंदर आदिल शाह बीजापुर का नया सुल्तान बना। इससे बीजापुर के अमीर एवं सूबेदार परस्पर कलह में उलझ गए।

    शिवाजी का काम आसान

    गोलकुण्डा और बीजापुर में पुराने शासकों के मर जाने से शिवाजी का काम सरल हो गया। कुतुबशाह द्वारा हिन्दुओं के प्रति अच्छा बर्ताव किए जाने से शिवाजी ने कुतुबशाह के साथ जीवन भर मित्रता पूर्ण व्यवहार किया।

    पन्हाला दुर्ग पर शिवाजी का अधिकार

    जब जयसिंह शिवाजी के विरुद्ध कार्यवाही करने आया था तब सिद्दी जौहर ने पन्हाला दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। तब से यह दुर्ग बीजापुर के अधिकार में था। शिवाजी ने पन्हाला दुर्ग को पुनः अधिकार में लेने का निर्णय किया तथा राजापुर में एक नई सेना तैयार करके अन्नाजी दत्तो को यह काम सौंपा। कौंडाजी रावलेकर को उसका सहायक नियुक्त किया। इन दोनों सेनापतियों ने पन्हाला दुर्ग पर गुरिल्ला पद्धति से छापा मारा। कौंडाजी वेश बदलकर रात के समय दुर्ग में प्रवेश कर गया तथा बीजापुर के कुछ सैनिकों को रुपया देकर अपने पक्ष में कर लिया। रात्रि में ही अन्नाजी दत्तो अपने चुने हुए 50-60 सैनिकों के साथ रस्सी के सहारे दुर्ग पर चढ़ गया। कोंडाजी के आदमियों ने दुर्ग का फाटक खोल दिया जिससे पास में छिपी हुई मराठा सेना प्रवेश कर गई। इस सेना ने दुर्ग के मुख्य रक्षक तथा उसके बहुत से सैनिकों को नींद में ही काट डाला। बचे हुए सिपाही भाग खड़े हुए। दुर्ग पर मराठों का अधिकार हो गया। कुछ सिपाही भी उनके हाथ लगे जिन्हें पकड़कर दुर्ग में छिपे हुए कोष का पता लगाया गया। शिवाजी ने दुर्ग में पहुंचकर कोष अपने अधिकार में लिया तथा दुर्ग पर अपने सिपाही नियुक्त कर दिए।

    बहलोल खाँ द्वारा प्रतापराव गूजर से धोखा

    बीजापुर के वजीर खवास खाँ को जब पन्हाला दुर्ग हाथ से निकलने का समाचार मिला तो उसने बहलोल खाँ के नेतृत्व में एक बड़ी सेना शिवाजी के विरुद्ध भेजी। इस पर शिवाजी ने अपने सेनापति प्रतापराव गूजर को निर्देश दिए कि वह बहलोल खाँ को मार्ग में ही रास्ता रोककर समाप्त करे। प्रतापराव मराठों की बड़ी सेना लेकर बहलोल खाँ के सामने चला और छापामार पद्धति का प्रयोग करते हुए बहलोल खाँ की सेना को चारों तरफ से घेरकर मारना शुरु कर दिया। बीजापुरियों की जान पर बन आई तथा सैंकड़ों सैनिक मार डाले गए। उनकी रसद काट दी गई जिससे सैनिक तथा घोड़े भूखे मरने लगे। इस पर बहलोल खाँ ने प्रतापराव के समक्ष करुण पुकार लगाई कि उसकी जान बख्शी जाए तथा बीजापुर के सैनिकों को जीवित लौटने की अनुमति दी जाए। प्रतापराव पिघल गया और उसने बीजापुर की सेना को लौटने की अनुमति दे दी। जब बीजापुर की सेना लौट गई तो मराठे अपने शिविर में आराम करने लगे। बहलोल खाँ धोखेबाज निकला। वह कुछ दूर जाकर रास्ते से ही लौट आया तथा सोती हुई मराठा सेना पर धावा बोल दिया। बहुत सारे मराठा सैनिक मार डाले गए तथा शेष को भागकर जान बचानी पड़ी।

    प्रतापराव का बलिदान

    जब शिवाजी को इस घटना का पता चला तो उन्होंने प्रतापराव को पत्र लिखकर फटकार लगाई कि जब तक बहलोल खाँ परास्त नहीं हो, तब तक लौटकर मुंह दिखाने की आवश्यकता नहीं है। प्रतापराव ने बहलोल के पीछे जाने की बजाय बीजापुर के समृद्ध नगर हुबली पर धावा बोलने की योजना बनाई ताकि बहलोल खाँ स्वयं ही लौट कर आ जाए। जब बहलोल खाँ को यह समाचार मिला तो वह बीजापुर जाने की बजाय हुबली की तरफ मुड़ गया। मार्ग में शर्जा खाँ भी अपनी सेना लेकर आ मिला। प्रतापराव, शत्रु द्वारा किए गए धोखे और स्वामी द्वारा किए गए अपमान की आग में जल रहा था। वह किसी भी तरह से बदला लेना चाहता था।

    24 फरवरी 1674 को उसे गुप्तचरों ने एक स्थान पर बहलोल खाँ के होने की सूचना दी। प्रतापराव आगा-पीछा सोचे बिना ही अपने 7-8 अंगरक्षकों को साथ लेकर बहलोल खाँ को मारने चल दिया। बहलोल खाँ के साथ उस समय पूरी सेना थी। उन्होंने प्रतापराव तथा उसके अंगरक्षकों को गाजर-मूली की तरह काट दिया। प्रतापराव का सहायक आनंदराव मराठा सेना लेकर कुछ ही पीछे चल रहा था। उसे प्रतापराव के बलिदान के बारे में ज्ञात हुआ तो वह सेना लेकर बहलोल खाँ को मारने के लिए दौड़ा किंतु बहलोल खाँ जान बचाकर भाग गया। आनंदराव ने बहलोल खाँ के गृहनगर सम्पगांव को लूट लिया तथा डेढ़ लाख होन लेकर लौट आया।

    शिवाजी को प्रतापराव के बलिदान के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने स्वयं को इसके लिए दोषी ठहराया तथा उसके परिवार को सांत्वना देने के लिए प्रतापराव की पुत्री का विवाह अपने पुत्र राजाराम के साथ करवाया।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 10 शिवाजी का राज्याभिषेक

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 10  शिवाजी का राज्याभिषेक

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 10


    शिवाजी का राज्याभिषेक


    शिवाजी का राज्य अब काफी बड़ा हो गया था। शिवाजी की तलवार के घाव खा-खाकर मुगल सेनाएं दक्षिण भारत में पूरी तरह जर्जर हो चुकी थीं। बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पुराने सुल्तान मर चुके थे और नए सुल्तानों में प्रतिरोध की शक्ति शेष नहीं बची थी। इसलिए शिवाजी अब अपने राज्य का प्रभुत्व-सम्पन्न स्वामी था। जन सामान्य भी शिवाजी को मराठों का राजा मानता था किंतु शिवाजी का राज्याभिषेक नहीं हुआ था। इसलिए माता जीजाबाई ने शिवाजी से राज्याभिषेक करवाने के लिए कहा। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक राजा ही प्रजा पर कर लगा सकता है और अपनी प्रजा को न्याय तथा दण्ड दे सकता है। राजा को ही भूमि दान करने का अधिकार प्राप्त है। शिवाजी ने भी राजनीतिक दृष्टि से ऐसा करना उचित समझा ताकि वे अन्य राजाओं के समक्ष स्वतंत्र राजा का सम्मान और अधिकार पा सकें। ई.1674 में शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण करने का निर्णय किया।

    कुछ भौंसले परिवार जो कभी शिवाजी के ही समकक्ष अथवा उससे अच्छी स्थिति में थे, शिवाजी की सफलता के कारण ईर्ष्या करते थे तथा शिवाजी को लुटेरा कहते थे जिसने बलपूर्वक बीजापुर तथा मुगल राज्य के इलाके छीन लिए थे। बीजापुर राज्य शिवाजी को एक जागीरदार के विद्रोही पुत्र से अधिक नहीं समझता था। ब्राह्मणों की मान्यता थी कि शिवाजी किसान का पुत्र है इसलिए उसका राज्याभिषेक नहीं हो सकता। इसलिए शिवाजी ने अपने मंत्री बालाजी अम्बाजी तथा अन्य सलाहकारों को काशी भेजा ताकि इस समस्या का समाधान किया जा सके। इन लोगों ने काशी के पण्डित विश्वेश्वर से सम्पर्क किया तथा जिसे गागा भट्ट भी कहा जाता था। वह राजपूताने के कई राजाओं के राज्याभिषेक करवा चुका था। शिवाजी के मंत्रियों ने गागा को शिवाजी की वंशावली दिखाई। गागा ने शिवाजी की वंशावली देखने से मना कर दिया। शिवाजी के मंत्री कई दिनों तक उसके समक्ष प्रार्थना करते रहे। एक दिन गागा, शिवाजी की वंशावली देखने को तैयार हुआ। उसने पाया कि शिवाजी का कुल मेवाड़ के सिसोदिया वंश से निकला है तथा विशुद्ध क्षत्रिय है। उसने शिवाजी के राज्याभिषेक की अनुमति प्रदान कर दी। इसके बाद यह प्रतिनिधि मण्डल राजपूताने के आमेर तथा जोधपुर आदि राज्यों में गया तथा वहाँ जाकर राज्याभिषेक के अवसर पर होने वाली प्रथाओं तथा रीति-रिवाजों की जानकारी ली।

    गागा भट्ट की अनुमति मिलते ही पूना में राज्याभिषेक की तैयारियां होने लगीं। बड़ी संख्या में सुंदर एवं विशाल अतिथि-गृह एवं विश्राम-भवन बनवाने आरम्भ किए गए ताकि देश भर से आने वाले सम्माननीय अतिथि उनमें ठहर सकें। नए सरोवर, मार्ग, उद्यान आदि भी बनाए गए ताकि शिवाजी की राजधानी सुंदर दिखे। गागा से प्रार्थना की गई कि वह स्वयं पूना आकर राज्याभिषेक सम्पन्न कराए। गागा ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। काशी से महाराष्ट्र तक की यात्रा में गागा का महाराजाओं जैसा सत्कार किया गया। उसकी अगवानी के लिए शिवाजी अपने मंत्रियों सहित सतारा से कई मील आगे चलकर आया तथा उसका भव्य स्वागत किया। भारत भर से विद्वानों एवं ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। 11 हजार ब्राह्मण शिवाजी की राजधानी में आए। स्त्री तथा बच्चों सहित उनकी संख्या 50 हजार हो गई। लाखों नर-नारी इस आयोजन को देखने राजधानी पहुंचे। सेनाओं के सरदार, राज्य भर के सेठ, रईस, दूसरे राज्यों के प्रतिनिधि, विदेशी व्यापारी भी राजधानी पहुंचने लगे। चार माह तक राजा की ओर से अतिथियों को फल, पकवान एवं मिठाइयां खिलाई गईं तथा उन लोगों के राजधानी में ठहरने का प्रबन्ध किया गया।

    ब्रिटिश राजदूत आक्सिनडन ने लिखा है कि प्रतिदिन के धार्मिक संस्कारों और ब्राह्मणों से परामर्श के कारण शिवाजी राजे को अन्य कार्यों की देखभाल के लिए समय नहीं मिल पाता था। जीजाबाई इस समय 80 वर्ष की हो चुकी थी। शिवाजी के राज्याभिषेक से वही सबसे अधिक प्रसन्न थी। उसका पुत्र शिवा आज धर्म का रक्षक, युद्धों का अजेय विजेता तथा प्रजा पालक था। जिस दिन राज्याभिषेक के समारोह आरम्भ हुए, उस दिन शिवाजी ने अपने गुरु रामदास तथा माता जीजाबाई की चरण वंदना की तथा चिपलूण के परशुराम मंदिर के दर्शनों के लिए रवाना हो गया। वहाँ शिवाजी ने अपनी कुल देवी तुलजा भवानी की प्रतिमा को सवा मन सोने का छत्र भेंट किया जिसका मूल्य उस समय लगभग 56 हजार रुपए था। वापस लौटकर शिवाजी ने अपने कुल पुरोहित के निर्देशन में महादेव, भवानी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा की। 28 मई को शिवाजी से उपवास एवं प्रायश्चित करवाया गया क्योंकि इतनी आयु हो जाने पर भी उसका जनेऊ संस्कार नहीं हुआ था। इसके बाद शिवाजी की दोनों जीवित पत्नियों से शिवाजी का फिर से विवाह करके उन्हें शुद्ध किया गया ताकि वे राज्याभिषेक में सम्मिलित होने की अधिकारिणी हो सकें। ब्राह्मणों तथा निर्धनों को विपुल दान दक्षिणा दी गई। मुख्य पुरोहित गागा भट्ट को 7000 होन तथा अन्य ब्राह्मणों को 1700-1700 होन दिए गए।

    शिवाजी द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पापों एवं अपराधों के प्रायश्चित के लिए उसके हाथों से सोना, चांदी, तांबा, पीतल, शीशा आदि समस्त धातुओं, अनाजों, फलों, मसालों आदि से तुलादान करवाया गया। इस तुलादान में शिवाजी ने एक लाख होन भी मिलाए ताकि ब्राह्मणों में वितरित किए जा सकें। धन के लोभी कुछ ब्राह्मण इससे भी संतुष्ट नहीं हुए उन्होंने शिवाजी पर 8 हजार होन का अतिरिक्त जुर्माना लगाया क्योंकि शिवाजी ने अनेक नगर जलाए थे तथा लोगों को लूटा था। शिवाजी के लिए यह राशि बहुत छोटी थी इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों की यह बात मान ली। इस प्रकार भारी मात्रा में स्वर्ण दान लेकर ब्राह्मणों ने शिवाजी को पाप-मुक्त, दोष-मुक्त एवं पवित्र घोषित कर दिया। अब शिवाजी का राज्याभिषेक हो सकता था। 5 जून का दिन शिवाजी ने आत्म-संयम और इंद्रिय-दमन में व्यतीत किया। उसने गंगाजल से स्नान करके, गागा भट्ट को 5000 होन दान दिए तथा अन्य प्रसिद्ध ब्राह्मणों को सोने की 2-2 मोहरें दान में दीं और दिन भर उपवास किया।

    6 जून 1674 को शिवाजी का राज्याभिषेक कार्यक्रम आयोजित किया गया। शिवाजी ने मुंह अंधेरे उठकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गंगाजल से स्नान किया। कुल देवताओं की पूजा की तथा अपने कुलपुरोहित बालम भट्ट, राज्याभिषेक के मुख्य पुरोहित गागा भट्ट तथा अन्य प्रसिद्ध ब्राह्मणों के पैर छूकर उन्हें दान दिए तथा उनके आशीर्वाद लिए। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके फूलों की माला पहनी तथा इत्र लगाकर एक ऊंची चौकी पर बैठा। उसके बाईं ओर राजमहिषी सोयरा बाई ने आसन ग्रहण किया। उसकी साड़ी का एक छोर राजा के दुपट्टे से बांधा गया। युवराज सम्भाजी इन दोनों के पीछे बैठा। शिवाजी के अष्ट प्रधान अर्थात् आठ मंत्रियों ने देश की प्रसिद्ध नदियों के जल से भरे हुए कलश लेकर राजपरिवार का जलाभिषेक किया। इस पूरे समय वैदिक मंत्रोच्चार होता रहा तथा मंगल वाद्य बजते रहे। इसके बाद छः सधवा ब्राह्मणियों ने स्वच्छ वस्त्र धारण करके, स्वर्ण थालों में पांच-पांच दिए रखकर राजपरिवार की आरती उतारी।

    जलाभिषेक के बाद शिवाजी ने लाल रंग के जरीदार वस्त्र पहने, रत्नाभूषण एवं स्वर्णाभूषण धारण किए, गले में हार एवं फूलों की माला पहनी और एक राजमुकुट पहना जिसमें मोती जड़े हुए थे तथा मोती की लड़ियां लटक रही थीं। शिवाजी ने अपनी तलवार, तीर कमान तथा ढाल की पूजा की और पुनः ब्राह्मणों एवं वयोवृद्ध लोगों के समक्ष सिर झुकाकर उनका आशीर्वाद लिया। ज्योतिषियों द्वारा सुझाए गए शुभ-मुहूर्त पर शिवाजी ने राजसिंहासन के कक्ष में प्रवेश किया। यह कक्ष 32 शुभ चिह्नों तथा विभिन्न प्रकार के शुभदायी पौधों से सजा हुआ था। मोतियों की वंदनवार से युक्त इस कक्ष की सजावट बहुत ही भव्य विधि से की गई थी जिसके केन्द्र में एक भव्य राजसिंहासन रखा था।

    हेनरी आक्सिनडन ने लिखा है कि सिंहासन बहुत मूल्यवान और शानदार था। उस पर सोने का पत्तर मंढा हुआ था तथा उसके आठ स्तम्भों पर बहुमूल्य रत्न तथा हीरे जड़े हुए थे। स्तम्भ के ऊपर मण्डल था जिसमें सोने की कारबोची का काम किया गया था तथा मोतियों की वंदनवारें लटक रही थीं। सिंहासन पर व्याघ्रचर्म बिछाया गया था जिसके ऊपर मखमल पड़ा हुआ था। जैसे ही शिवाजी उस सिंहासन पर बैठे वहाँ उपस्थित प्रजा पर रत्नजड़ित कमल-पुष्प तथा सोने-चांदी के पुष्प बरसाए गए। सोलह सधवा स्त्रियों ने राजा की आरती उतारी। ब्राह्मणों ने उच्च स्वर से मंत्रोच्चार किए तथा राजा को आशीर्वाद दिया। प्रजा ने शिवाजी की जय-जयकार की। मंगल वाद्य बजने लगे, गवैये गाने लगे। ठीक इसी समय राज्य के प्रत्येक किले से एक-एक तोप दागी गई। मुख्य पुरोहित गागा भट्ट ने आगे बढ़कर शिवाजी के ऊपर सोने के काम और मोतियों की झालर वाला छत्र ताना तथा 'शिवा छत्रपति' कहकर उसका आह्वान किया।

    ब्राह्मणों ने शिवाजी राजे को आर्शीवाद दिया। राजा ने ब्राह्मणों को, गरीबों को तथा भिखारियों को दान, सम्मान एवं उपहार दिए। सोलह प्रकार के महादान भी दिए। इसके पश्चात् मंत्रियों ने सिंहासन के समक्ष उपस्थित होकर राजा का अभिवादन किया। शिवाजी ने उन्हें भी हाथी, घोड़े, रत्न, परिधान, हथियार आदि उपहार में दिए। शिवाजी ने आदेश दिया कि भविष्य में मंत्रियों की पदवी के लिए फारसी शब्दों का प्रयोग न करके संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया जाए। युवराज सम्भाजी, मुख्य पुरोहित गागा भट्ट तथा प्रधानमंत्री पिंघले को भी उच्च आसानों पर विराजमान करवाया गया जो राजा के सिंहासन से थोड़े नीचे थे। अन्य मंत्री राजा के दायीं तथा बाईं ओर दो-दो पंक्तियों में खड़े हुए। अन्य सब दरबारी तथा आगंतुक अपनी-अपनी सामाजिक स्थिति के अनुसार आसनों पर बैठे।

    प्रातः 8 बजे नीराजी पंत ने अंग्रेजों के दूत हेनरी आक्सिनडन को शिवाजी के सम्मुख प्रस्तुत किया। उसने पर्याप्त दूरी से राजा का अभिवान किया तथा दुभाषिए की सहायता से अंग्रेजों की तरफ से हीरे की एक अंगूठी भेंट की। दरबार में कई और विदेशी भी उपस्थित थे, उन्हें भी राजा ने अपने निकट बुलाया तथा उनका यथोचित सम्मान किया और परिधान भेंट किए। इसके साथ ही दरबार की कार्यवाही पूरी हो गई तथा छत्रपति शिवाजी सिंहासन से उतर कर एक शानदार एवं सुसज्जित अश्व पर सवार हुआ और जगदीश्वर के मंदिर में भगवान के दर्शनों के लिए गया। वहाँ से आकर उसने वस्त्र बदले और एक उत्तम हाथी पर सवार होकर जुलूस के साथ राजमार्ग पर निकलने वाली शोभायात्रा में सम्मिलित हुआ। राजमार्ग से निकलकर वह राजधानी की गलियों में होता हुआ प्रजा के बीच से निकला। स्थान-स्थान पर गृहस्वामिनियों ने शिवाजी की आरती उतारी तथा उस पर धान की खील, फल, कुश आदि न्यौछावर किए। इस यात्रा में वह राजगढ़ की पहाड़ी पर स्थित मंदिरों के दर्शन करने भी गया और वहाँ भेंट आदि अपर्ति करके पुनः अपने महलों को लौट आया।

    अगले दिन अर्थात् 7 जून को वह पुनः दरबार में उपस्थित हुआ तथा वहाँ बधाई देने आए देशी-विदेशी अतिथियों एवं भिखारियों को दान देता रहा। दरबार में आने वाले प्रत्येक साधारण जन को 3 रुपए से 5 रुपए तथा स्त्रियों एवं बच्चों को 1 से 2 रुपए दिए गए। पूरे बारह दिन तक दान-पुण्य का यह क्रम चलता रहा। 8 जून को राजा ने बिना कोई अतिरिक्त धूमधाम किए अपना चौथा विवाह किया। 18 जून को अचानक जीजाबाई का निधन हो गया। इस कारण राज्य दरबार में शोक रखा गया। अतः शिवाजी छः दिन बाद, 24 जून को पुनः अपने दरबार में उपस्थित हुआ।

    इसके कुछ दिन बाद, शिवाजी की एक पत्नी का निधन हो गया। इस प्रकार राज्याभिषेक के कुछ दिनों में ही राजपरिवार के दो महत्वपूर्ण सदस्यों का निधन हो गया। इसलिए तांत्रिकों को पण्डितों की चुगली करने का अवसर मिल गया। निश्चल पुरी नामक एक तांत्रिक ने शिवाजी से कहा कि गागा भट्ट ने अभिषेक के विधि-विधान में कई कमियां छोड़ दी हैं, इसीलिए राजमाता का निधन हुआ है तथा इस दौरान होने वाली छोटी-मोटी अशुभ घटनाएं घटित हुई हैं। उसने शिवाजी को सुझाव दिया कि इन कमियों की पूर्ति के लिए एक बार पुनः तांत्रिक विधि-विधान से राज्याभिषेक होना चाहिए। शिवाजी ने इसकी अनुमति दे दी। 24 सितम्बर 1674 को पुनः एक लघु राज्याभिषेक का आयोजन किया गया जिसमें ब्राह्मणों के साथ-साथ तांत्रिकों को भी दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न किया गया। दूसरे राज्याभिषेक के ठीक एक वर्ष पश्चात् प्रतापगढ़ के मंदिर पर बिजली गिरी। इस कारण कई मूल्यवान हाथी और घोड़े मर गए तथा अन्य हानि भी हुई।

    यह एक शानदार राज्याभिषेक था। तब तक इस तरह के भव्य आयोजन भारत में कम ही हुए थे। शिवाजी के राज्याभिषेक समारोह पर 1 करोड़ 42 लाख रुपए व्यय हुए थे। जिनकी तुलना आज की किसी भी धन राशि से करना कठिन है। इस व्यय में वे पक्के भवन, मार्ग, सरोवर, उद्यान आदि भी सम्मिलित हैं जो राज्याभिषेक के लिए ही विशेष रूप से करवाए गए थे।

    मुद्रा एवं संवत का प्रचलन

    अपने राज्याभिषेक के पश्चात् शिवाजी ने अपने नाम से सिक्के ढलवाए तथा नए संवत का भी प्रचलन किया। भारतीय आर्य राजाओं में यह परम्परा थी कि जब कोई राजा अपने को स्वतंत्र सम्राट या चक्रवर्ती सम्राट घोषित करता था तो उसके प्रतीक के रूप में नवीन मुद्रा तथा संवत् का प्रचलन करता था। शक संवत, गुप्त संवत तथा विक्रम संवत इसी प्रकार की घटनाओं के प्रतीक हैं।

    युगांतरकारी घटना

    शिवाजी का राज्याभिषेक एक युगांतरकारी घटना थी। औरंगजेब के जीवित रहते यह संभव नहीं था किंतु शिवाजी ने औरंगजेब सहित तीन मुसलमान बादशाहों और सुल्तानों से लड़कर अपने राज्य का निर्माण किया तथा स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित किया। उस समय उत्तर भारत में केवल महाराणा राजसिंह तथा दक्षिण भारत में छत्रपति शिवाजी ही ऐसे राजा थे जिनकी मुगलों से किसी तरह की अधीनता, मित्रता या संधि नहीं थी।


    शिवाजी के राज्य की शासन व्यवस्था

    शिवाजी द्वारा अपने राज्य की शासन व्यवस्था प्राचीन क्षत्रिय राज्यों के अनुसार की गई। राज्य कार्य संचालन के लिए अष्ट-प्रधान की नियुक्ति की गई। राज्य का समस्त कार्य इन आठ प्रधानों में बांट दिया गया-

    (1.) पेशवा : राज्य का प्रधान व्यवस्थापक पेशवा कहलाता था। शिवाजी ने इस पद पर मोरोपंत पिंघले को नियुक्त किया।

    (2.) मजीमदार : इस मंत्री पर राज्य की अर्थव्यवस्था तथा आय-व्यय की जांच आदि का दायित्व था। इस पर पर आवाजी सोनदेव को नियुक्त किया गया।

    (3.) सुरनीस : इस मंत्री पर राजकीय पत्र व्यवहार एवं संधिपत्रों का प्रबन्ध करने का दायित्व था। इस पर पर अन्नाजी दत्तो को नियुक्त किया गया।

    (4.) वाकनिस : इस मंत्री पर राज्य के लेखों, अभिलेखों आदि की सुरक्षा करने का दायित्व था।

    (5.) सरनावत : राज्य में पैदल सेना तथा घुड़सवार सेना के लिए एक-एक अलग सरनावत नियुक्त किए गया था। यशजी कंक को पैदल सेना का सरनावत एवं प्रतापराव गूजर को घुड़सवार सेना का सरनावत नियुक्त किया गया।

    (6.) दर्बार या विदेश मंत्री : इस मंत्री पर अन्य राज्यों के राजाओं, मंत्रियों एवं अधिकारियों आदि से मित्रता तथा व्यवहार आदि का दायित्व था। सोमनाथ पंत को यह दायित्व दिया गया।

    (7.) न्यायाधीश : इस मंत्री पर राज्य की जनता के झगड़ों एवं विवादों को सुलझाने का दायित्व था। इस पर पर नीराजी राव तथा गोमाजी नायक को नियुक्त किया गया।

    (8.) न्यायशास्त्री : इस अधिकारी पर राज्य की न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी थी। इस पद पर पहले सिम्भा को और बाद में रघुनाथ पंत को नियुक्त किया गया।

    जिलों एवं विभागों का प्रबन्ध

    प्रत्येक जिले एवं प्रत्येक विभाग के प्रशासन के लिए आठ पदाधिकारी नियुक्त किए गए-

    (1.) कारवारी दीवान या मुत्तालिक (2.) मजिमदार (लेखाकार) (3.) फर्नीस या फरनवीस (सहायक लेखाधिकारी) (4.) सवनीस (क्लर्क) (5.) कारकानिस (अन्न भण्डार का निरीक्षक) (6.) चिटनिस (पत्र लेखक) (7.) जमादार ( भुगतान करने वाला खजांची) (8.) पोतनीज (नगदी जमा करने वाला खजांची)

    शिवाजी ने चमारगुंडा के पुंडे परिवार के सदस्य को अपना खजांची नियुक्त किया। इसके पितामह मालोजी ने शिवाजी के पिता शाहजी के विवाह के पूर्व, शाहजी की ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति जमा कर रखी थी।

    किलों की व्यवस्था

    अपराधियों को उनके अपराध के अनुसार दण्डित करने की व्यवस्था की गई। मंदिरों, निर्धनों, विधवाओं एवं बेसहारा लोगों के लिए राज्य की ओर से अनुदान की व्यवस्था की गई। शासन व्यवस्था में अनुशासन पर अत्यधिक बल दिया गया था। प्रत्येक अधीनस्थ कर्मचारी के लिए, अपने उच्चस्थ अधिकारी की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य था। प्रत्येक दुर्ग में एक किलेदार, एक मुंशी, एक भण्डार पालक, निरीक्षक एवं सेवक नियुक्त रहते थे। प्रधान मुंशी के पद पर प्रायः ब्राह्मणों को नियुक्त किया जाता था।

    भू-राजस्व अर्थात् लगान

    शिवाजी ने अपने राज्य में कृषि की उन्नति के लिए कई कदम उठाए तथा ग्राम पंचायतों के लिए निश्चित नियम बनाए। किसानों तथा राजा के बीच कोई जागीरदार नहीं होता था। वे सीधे ही राजकीय कारिंदों को लगान देते थे। लगान व्यवस्था दादा कोणदेव के समय निर्धारित की गई थी। सरकारी लगान कुल उपज का 40 प्रतिशत था। कृषकों की सुरक्षा के लिए देशमुख, देशपाण्डे, पटेल, खोट और कुलकर्णी नियुक्त किए गए थे। शिवाजी स्वयं इन अधिकारियों पर कड़ी दृष्टि रखते थे ताकि ये किसानों को तंग न करें।

    राज्य की गुप्तचर व्यवस्था

    शिवाजी की सैन्य सफलताओं में गुप्तचरों का बहुत बड़ा योगादान था। इसलिए शिवाजी ने राज्य की गुप्तचर व्यवस्था पर पूरा घ्यान दिया। शिवाजी का व्यक्तिगत गुप्तचर बीहरजी, गुप्त सूचनाएं एकत्रित करने में प्रवीण था। सेना के अधिकारियों के पास भी गुप्तचर रहते थे जो सैनिक अभियान को सफल बनाने के लिए गुप्त सूचनाएं एकत्रित करते थे।


    शिवाजी की सेना

    शिवाजी की सेना में दो तरह के सिपाही थे- पैदल तथा घुड़सवार। अधिकांश पैदल सैनिक घाटमाथा क्षेत्र से तथा कोंकण क्षेत्र से आते थे। घाटमाथा के सैनिकों को मावली तथा कोंकण के सैनिकों को हथकुरी कहा जाता था। ये सैनिक अपने साथ तलवार, ढाल तथा तीर कमान लाते थे। इन्हें गोला, बारूद तथा बंदूक राज्य की ओर से दी जाती थी। प्रत्येक 10 सैनिकों पर एक नायक होता था। प्रत्येक 5 नायकों के ऊपर एक हवालदार होता था। प्रत्येक 2 हवालदार पर एक जुमलदार होता था। प्रत्येक 10 जुमलदारों को हजारी कहा जाता था। सेनापति को छोड़कर कोई भी अधिकारी पांच-हजारी से ऊपर नहीं होता था। शिवाजी की सेना में दो सेनापति होते थे- एक घुड़सवार सेना के लिए और दूसर पैदल सेना के लिए। सेनापति के नीचे पांच हजारी से लेकर नीचे तक का सिपाही होता था।

    जुमला अर्थात् 100 सिपाहियों की टोली के अधिकारी से लेकर सेनापति और सूबेदार तक के पास एक समाचार लेखक, एक भेदिया और एक गुप्त सूचना देने वाला अनिवार्य रूप से होता था। सैनिक चुस्त पायजामा, कच्छा, पगड़ी और कमर में एक कपड़ा धारण करते थे। ये कपड़े चुस्त हुआ करते थे तथा सूती छींट के बने होते थे।

    सेना तथा सैनिकों के लिए नियम

    शिवाजी की सेना द्वारा किए जाने वाले युद्ध अभियानों में लूट के दौरान औरतों, गायों, किसानों, बच्चों तथा निर्धन मुसलमानों को लूटने एवं सताने पर पूर्ण पाबंदी थी। लूट की सामग्री राजकीय कोष में जमा करवाने का नियम था। यदि कोई सैनिक, लूट का सामान अपने पास रख लेता था तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही होती थी। शिवाजी ने सेना को समय पर वेतन देने की व्यवस्था लागू की तथा पदोन्नति एवं पुरस्कार के नियम बनाए। राज्य में दशहरे का त्यौहार उत्साह एवं धूम-धाम से आयोजित किया जाने लगा। इस अवसर पर सेना तथा घोड़ों का निरीक्षण किया जाता था। अच्छे सैनिकों को बिना कर की कृषि भूमि दी जाती थी।

    सैनिकों को वेतन

    शिवाजी ने सेना के लिए वेतन सम्बन्धी नियम बनाए। मावली सैनिक केवल भोजन प्राप्ति के लिए ही सेना में भर्ती हो जाते थे परंतु साधारणतः पैदल सैनिक को 1 से 3 पगौड़ा, वारगीर सैनिकों को 2 से 5 पगौड़ा तथा सेलेदार सैनिकों को 6 से 12 पगौड़ा वेतन मिलता था। पगौड़ा का मूल्य एक रुपए के बराबर होता था। पैदल सेना के जुमलदार से 7 पगौड़ा तथा घुड़सवार सेना के जुमलदार को लगभग 20 पगौड़ा, सवार सेना के सूबेदार को 50 पगौड़ा तथा पंच हजारी को 200 पगौड़ा, एक पालकी और खिदमतदार दिया जाता था।

    समुद्री बेड़े की स्थापना

    शिवाजी ने कोंकण में अपने बंदरगाहों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत समुद्री जहाजी बेड़ा बनाया तथा शक्तिशाली नौ सेना का गठन किया। उसने पांच सौ समुद्री जहाजों को शस्त्रों तथा सैनिकों से सुसज्जित किया तथा दयासागर एवं मायानाक भण्डारी नामक दो नौ-सेनाध्यक्षों को नियुक्त किया। शिवाजी ने अपनी जलसेना को कुलबा नामक बंदरगाह में रखा। सुवर्ण दुर्ग तथा विजय दुर्ग में भी कुछ जहाज रखे। इस सेना से शिवाजी को कई मोर्चों पर लाभ हुआ। इसी सेना के बल पर वह फ्रांसीसियों, अंग्रेजों, पुर्तगालियों तथा अबीसीनियाई लोगों की नौ-सेनाओं पर अंकुश रखता था। इस काल में मुगलों के पास भी इतनी बड़ी नौ-सेना नहीं थी, जितनी शिवाजी के पास थी। शिवाजी के अधिकार वाले बंदरगाहों से मसाले, अनाज, कपास, चंदन आदि बहुमूल्य सामग्री का व्यापार दूरस्थ देशों को होता था जिससे शिवाजी को अच्छी आय होती थी। पुर्तगालियों ने शिवाजी से संधि कर ली जिसके अनुसार शिवाजी को कभी भी पुर्तगालियों के क्षेत्र में लूट नहीं करना थी। इसके बदले में पुर्तगालियों ने शिवाजी की नौसेना को तोपें एवं बारूद उपलब्ध कराए।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 11 मुगलों पर पुनः आक्रमण

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 11  मुगलों पर पुनः आक्रमण

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 11


    मुगलों पर पुनः आक्रमण


    राज्याभिषेक के कार्यक्रमों तथा राजमाता एवं राजमहिषी की मृत्यु के लोकाचार के कार्यक्रमों से निवृत्त होने के पश्चात् शिवाजी का ध्यान मुगल सूबेदार बहादुर खाँ की ओर गया जो इन दिनों भीमा नदी के पास पेंदगांव में डेरा डाले हुए था। ओरंगजेब ने दिलेर खाँ को पुनः दिल्ली बुलवा लिया था। इस कारण सूबेदार बहादुर खाँ ही दक्षिण में मुगल सत्ता का अकेला प्रतिनिधि था। शिवाजी के राज्याभिषेक के कार्यक्रम के तुरंत बाद, राज्य में भारी वर्षा हुई थी किंतु शिवाजी ने वर्षा की परवाह किए बिना ही अपने 2,000 घुड़सवार सैनिकों को मुगलों पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

    योजना यह थी कि मराठे, मुगलों को ललकारते हुए शिविर से काफी दूर ले जाएंगे तथा पीछे से शिवाजी 7,000 घुड़सवारों के साथ मुगल शिविर पर आक्रमण करके उसे बर्बाद करेगा। यह योजना सफल रही। शिवाजी ने मुगलों के शिविर में आग लगा दी तथा वहाँ से 2 करोड़ रुपए का कोष, 200 घोड़े और बहुमूल्य सामान लूट लिया। यह कीमती सामग्री एवं घोड़े बादशाह को भेंट देने के लिए एकत्रित किए गए थे। अक्टूबर के मध्य में शिवाजी की एक सेना ने फिर से बहादुर खाँ के शिविर को घेर लिया। शिवाजी की एक सेना ने औरंगाबाद के पास के कई नगरों को लूटा तथा वहीं से बगलाना और खानदेश में प्रवेश करके लगभग एक माह तक मुगलों के प्रदेश को लूटती रही।

    एक तरफ से शिवाजी बहादुर खाँ के विरुद्ध कार्यवाहियाँ करता रहा और दूसरी ओर उसने बहादुर खाँ के माध्यम से ही औरंगजेब के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया। इसमें शिवाजी ने अपनी ओर से लिखा कि उसके पुत्र सम्भाजी को औरंगजेब सात हजारी मनसब पर नियुक्त करे। इसके बदले में शिवाजी अपने 17 दुर्ग समर्पित करेगा। बहादुर खाँ ने इस प्रस्ताव को अपनी संतुस्ति के साथ औरंगजेब को भेज दिया। औरंगजेब ने इस संधि को स्वीकार कर लिया किंतु जैसे ही बादशाह की स्वीकृति प्राप्त हुई शिवाजी ने इसकी तरफ से मुंह मोड़ लिया।

    औरंगजेब ने खीझकर बहादुर खाँ को बहुत बुरा-भला लिखकर भेजा। इस पर बहादुर खाँ ने योजना बनाई कि मुगल बादशाह को बीजापुर तथा गोलकुण्डा के साथ संधि करके तीनों शक्तियों को एक साथ शिवाजी पर आक्रमण करना चाहिए। औरंगजेब ने इस प्रस्ताव को भी स्वीकृत कर दिया। औरंगजेब किसी भी प्रकार से शिवाजी से छुटकारा चाहता था क्योंकि शिवाजी के राज्याभिषेक के किस्से पूरे भारत में बढ़ा-चढ़ा कर कहे जा रहे थे और ऐसा लगता था मानो भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना होने ही वाली है।

    वेदनूर अभियान

    उन्हीं दिनों शिवाजी ने कनारा की तरफ अभियान किया। वेदनूर की रानी तिमन्ना ने शिवाजी को संदेश भेजा कि वे वेदनूर की रानी की सहायता करें क्योंकि वेदनूर का सेनापति रानी तिमन्ना का अनादर कर रहा है। शिवाजी ने रानी की सहायता करने का वचन दिया तथा इसके बदले में वेदनूर पर चौथ आरोपित करने का प्रस्ताव रखा। रानी तिमन्ना ने शिवाजी का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शिवाजी ने सेनापति पर अंकुश लगाकर, रानी तिमनना की सहायता की तथा वेदनूर राज्य से चौथ वसूल की।

    शिवाजी की बीमारी

    सम्भाजी लम्बे समय तक औरंगजेब के पुत्र मुअज्जम के सम्पर्क में रहकर दूषित विचारों का हो गया था। इस कारण उसे युद्ध एवं प्रजापालन से बहुत कम सरोकार रह गया था। वह हर समय मदिरा पान करके स्त्रियों की संगत में रहता था। मराठों के भावी राजा का यह चरित्र देखकर शिवाजी बहुत चिंतित रहा करते थे। इसी चिंता में घुलते रहने के कारण ई.1675 के अंत में शिवाजी गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसकी बीमारी की सूचना हवा की तरह दूर-दूर तक फैलने लगी और शीघ्र ही अफवाह उड़ गई कि शिवाजी का निधन हो गया है किंतु वैद्यों के उपचार से शिवाजी धीरे-धीरे ठीक हो गया और फिर से हिन्दू साम्राज्य की स्थापना के काम में जुट गया।

    मुहम्मद कुली खाँ को दक्षिण की कमान

    किसी समय शिवाजी का दायां हाथ कहे जाने वाले और द्वितीय शिवाजी के नाम से विख्यात नेताजी पाल्कर को औरंगजेब ने जयसिंह के माध्यम से मुगल सेवा में भरती करके मुसलमान बना लिया था और आठ सालों से अफगानिस्तान के मोर्चे पर नियुक्त कर रखा था। उसे अब मुहम्मद कुली खाँ के नाम से जाना जाता था। औरंगजेब ने अब शिवाजी के विरुद्ध मुहम्मद कुली खाँ को झौंकने का निर्णय लिया। मुहम्मद कुली खाँ को शिवाजी के राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों की पूरी जानकारी थी। औंरगजेब ने दिलेर खाँ को भी मुहम्मद कुली खाँ के साथ दक्षिण भेजने का निर्णय लिया। दिलेर खाँ भी बरसों तक दक्षिण में सेवाएं दे चुका था तथा उसे शिवाजी से लड़ने का लम्बा अनुभव था। इन दोनों मुगल सेनापतियों ने शिवाजी की राजधानी सतारा के निकट अपना डेरा जमाया। एक दिन मुहम्मद कुली खाँ अचानक मुगल डेरे से भाग निकला और सीधा शिवाजी की शरण में पहुँचा। उसने शिवाजी से अनुरोध किया कि मेरी शुद्धि करवाकर मुझे फिर से हिन्दू बनाया जाए। शिवाजी ने अपने पुराने साथी को फिर से हिन्दू धर्म में लेने की व्यवस्थाएं कीं। 19 जून 1676 को नेताजी पाल्कर फिर से हिन्दू धर्म में प्रविष्ट हो गया। इसके बाद वह आजीवन शिवाजी की सेवा करता रहा। जब शिवाजी का निधन हुआ तब भी नेताजी पाल्कर, सम्भाजी के प्रति निष्ठावान बना रहा। इस प्रकार औरंगजेब का यह वार भी खाली चला गया।


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