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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - शिलालेख

     15.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - शिलालेख

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 108

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - शिलालेख

    राजस्थान में प्रागैतिक इतिहास के स्रोत के रूप में आदिम युग के मानवों के अस्थि अवशेष, उनके द्वारा बनाये गये पाषाण उपकरण, गुफाओं से मिली सामग्री, शैल चित्र आदि प्रमुख हैं। जबकि धातु युग आरम्भ होने के बाद धातु गलाने की भट्टियां, ताम्बे, कांसे और लोहे के बर्तन, मछली पकड़ने के कांटे, भालों की नोक, पशु-पक्षियों की हड्डियों के ढेर आदि से धातु युग के प्रारम्भिक चरण का इतिहास बनाया गया है। राजस्थान में लिखित इतिहास का सबसे पहला प्रमाण वेदों के रूप में मिलता है। वेदों की बहुत सी ऋचाओं का निर्माण सरस्वती और दृषद्वती के किनारों पर हुआ जो राजस्थान से होकर बहती थीं तथा अनेक महत्वपूर्ण ऋषियों के आश्रम इन नदियों के किनारे आज के राजस्थान में स्थित थे। महाभारत काल की भी बहुत सी घटनाएं आज के राजस्थान में घटित हुईं। राजस्थान के इतिहास के निर्माण में शिलालेखों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। अशोक द्वारा बैराठ में अंकित करवाये गये शिलालेख राजस्थान में मिले प्राचीनतम शिलालेख हैं। ये शिलालेख चट्टानों एवं उनके अवशेषों पर अंकित हैं। गुप्त संवत् का एक शिलालेख नागौर जिले के गोठ-मांगलोद गांव में स्थित दधिमाता मंदिर से प्राप्त किया गया है जिसे राजस्थान में मौर्य काल के बाद का अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन शिलालेख कहा गया है।

    1. प्रश्नः राजस्थान में मिले अशोक के शिलालेख किस लिपि एवं भाषा में हैं?

    उतरः खरोष्ठी लिपि एवं ब्राह्मी भाषा में।

    2. प्रश्नः अशोक के बाद के शिलालेख किस लिपि एवं भाषा में मिलते हैं?

    उतरः देवनागरी लिपि तथा संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में।

    3. प्रश्नः मुस्लिम शासकों के शिलालेख किस लिपि एवं भाषा में मिलते हैं?

    उतरः अरबी लिपि एवं फारसी भाषा में।

    4. प्रश्नः राजस्थान में अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन शिलालेख कौनसा है?

    उतरः नागौर जिले के गोठ मांगलोद गाँव में दधिमती माता मंदिर में उत्कीर्ण अभिलेख 608 ई. का माना जाता है। पं. रामकरण आसोपा के अनुसार इस शिलालेख पर गुप्त संवत् की तिथि संवत्सर सतेषु 289 श्रावण बदि 13 अंकित है। यदि यह गुप्त संवत् है तो यह राजस्थान में मौर्य काल के बाद का अब तक प्राप्त सबसे पुराना शिलालेख है। विजयशंकर श्रीवास्तव ने इसे हर्ष संवत् की तिथि माना है। यदि यह हर्ष संवत् है तो यह शिलालेख का ई.895 है।

    5. प्रश्नः अपराजित के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 661 ई. का यह शिलालेख नागदे गाँव के निकट कुडेश्वर के मंदिर की दीवार पर अंकित है। इससे सातवीं शती के मेवाड़ की धार्मिक स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। इस युग में विष्णु मंदिरों का निर्माण काफी प्रचलित था।

    6. प्रश्नः मण्डोर शिलालेख का क्या महत्व है? उतरः 685 ई. का यह शिलालेख मण्डोर के पहाड़ी ढाल में एक बावड़ी में खुदा हुआ है। इस लेख से ज्ञात होता है कि उस समय विष्णु तथा शिव की उपासना प्रचलित थी।

    7. प्रश्नः मान मोरी के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 8वीं ई. का यह शिलालेख चित्तौड़ के निकट मानसरोवर झील के तट पर एक स्तंभ पर उत्कीर्ण था। इस लेख से उस समय के राजाओं द्वारा लिये जाने वाले करों, युद्ध में हाथियों के प्रयोग, शत्रुओं को बंदी बनाये जाने, उनकी स्त्रियों की देखभाल की उचित व्यवस्था किये जाने एवं सामाजिक स्थिति की जानकारी मिलती है। उस समय तालाब बनवाना धार्मिक कार्य माना जाता था।

    8. प्रश्नः मान मोरी के शिलालेख की खोज किसने की?

    उतरः कर्नल टॉड ने।

    9. प्रश्नः घटियाला के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 861 ई. के इन शिलालेखों में मग जाति के ब्राह्मणों का वर्णन है। इन्हें शाकद्वीपीय ब्राह्मण भी कहा जाता है जो ओसवालों के आश्रित रहकर जीवन यापन करते थे। इन लेखों से तत्कालीन वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।

    10. प्रश्नः ओसियां के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 956 ई. के इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि उस समय समाज चार प्रमुख वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभाजित था।

    11. प्रश्नः बिजोलिया के बारहवीं शताब्दी के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1170 ई. का यह शिलालेख बिजोलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के निकट एक चट्टान पर उत्कीर्ण है। इस पर संस्कृत भाषा में 32 श्लोक उत्कीर्ण हैं। इसमें सांभर एवं अजमेर के चौहान शासकों की वंशावली तथा उनके द्वारा शासित प्रमुख नगरों के प्राचीन नाम दिये गये हैं।

    12. प्रश्नः चौखा शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1273 ई. का यह शिलालेख उदयपुर के निकट चौखा गाँव के एक मंदिर पर उत्कीर्ण है। इस पर संस्कृत भाषा में 51 श्लोक उत्कीर्ण हैं। इसमें गुहिल वंशीय शासकों की वंशावली तथा उस समय के धार्मिक रीति-रिवाजों की जानकारी है।

    13. प्रश्नः रसिया की छतरी के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1274 ई. का यह शिलालेख चित्तौड़ के राजमहलों के द्वार पर उत्कीर्ण है। इसमें गुहिल शासकों की वंशावली तथा तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों की जानकारी दी गई है।

    14. प्रश्नः कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति का क्या महत्व है?

    उतरः 1460 ई. की कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति चित्तौड़ दुर्ग में निर्मित कीर्ति स्तंभ के निकट उत्कीर्ण है। इसमें मेवाड़ के शासक बापा से कुंभा तक की उपलब्धियों, कुंभा द्वारा निर्मित भवनो, दुर्गों, मंदिरों, जलाशयों तथा कुंभा के समय में रचित ग्रंथों की जानकारी है। 15. प्रश्नः आबू पर्वत के तेरहवीं शताब्दी के शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः आबू पर्वत पर लगे 1285 ई. के इस शिलालेख में बापा रावल से लेकर समरसिंह तक के मेवाड़ शासकों, आबू की वनस्पति और उस समय के धार्मिक रीति रिवाजों की जानकारी दी गई है।

    16. प्रश्नः देलवाड़ा का शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1434 ई. का यह शिलालेख संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में है। इसमें 14वीं शताब्दी की राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति, तत्कालीन भाषा, कर एवं मुद्रा (टंक) की जानकारी दी गई है।

    17. प्रश्नः शृगी ऋषि का शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1428 ई. का यह शिलालेख उदयपुर जिले में एकलिंगजी से 6 मील दूर शृगी ऋषि स्थान पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसमें हम्मीर से मोकल तक के मेवाड़ शासकों की उपलब्धियां दी गई हैं तथा राणा हम्मीर के युद्धों, मंदिरों के निर्माण, दानशीलता, भीलों की तत्कालीन स्थिति, मेवाड़-गुजरात तथा मेवाड़-मालवा के राजनीतिक सम्बन्धों की जानकारी दी गई है।

    18. प्रश्नः समिधेश्वर के मंदिर का शिलालेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1428 ई. का यह शिलालेख चित्तौड़ के समिधेश्वर मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण है। इस अभिलेख में तत्कालीन शिल्पियों, सामाजिक रीति रिवाजों तथा महाराणा मोकल द्वारा विष्णु मंदिर के निर्माण आदि की जानकारी है।

    19. प्रश्नः रणकपुर प्रशस्ति का क्या महत्व है?

    उतरः 1439 ई. का यह शिलालेख रणकपुर के चौमुखा जैन मंदिर में एक लाल पत्थर पर उत्कीर्ण है। इसमें बापा से कुंभा तक की वंशावली तथा तत्कालीन मुद्रा (नाणक) की जानकारी दी गई है।

    20. प्रश्नः नाणक क्या थी?

    उतरः नाणक एक मुद्रा थी जो पंद्रहवीं शताब्दी में मेवाड़ में प्रचलित थी।

    21. प्रश्नः कुंभलगढ़ की पंद्रहवीं शताब्दी की प्रशस्ति का क्या महत्व है?

    उतरः 1460 ई. का यह शिलालेख कुंभलगढ़ दुर्ग में उत्कीर्ण है। इसमें मेवाड़ नरेशों की वंशावली, महाराणा कुंभा की उपलब्धियों, कंुभा के समय के बाजारों, मंदिरों, राजमहलों तथा युद्धों की जानकारी दी गई है।

    22. प्रश्नः जमवा रामगढ़ का प्रस्तर लेख का क्या महत्व है?

    उतरः 1613 ई. के इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि राजा मान सिंह अपने पिता भगवानदास का दत्तक पुत्र था।

    23. प्रश्नः रायसिंह की बीकानेर प्रशस्ति का क्या महत्व है?

    उतरः 1594 ई. का यह शिलालेख बीकानेर दुर्ग के मुख्य द्वार पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसमें बीका से लेकर रायसिंह तक के बीकानेर शासकों की उपलब्धियों, रायसिंह के कार्यों एवं भवन निर्माण आदि की जानकारी दी गई है।

    24. प्रश्नः जगन्नाथ राय की प्रशस्ति का क्या महत्व है?

    उतरः 1652 ई. का यह शिलालेख उदयपुर के जगदीश मंदिर के प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण है। इसमें मेवाड़ के इतिहास, मेवाड़ के शासक बप्पा से लेकर महाराणा जगतसिंह तक की उपलब्धियों, राणा प्रताप एवं अकबर के संघर्ष, जगतसिंह की दान प्रवृत्ति तथा तत्कालीन आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का ज्ञान होता है।

    25. प्रश्नः राजप्रशस्ति महाकाव्य का क्या महत्व है?

    उतरः 1676 ई. का यह शिलालेख राजसमंद जिले में राजसमुद्र झील की पाल पर 25 काले पत्थर की शिलाओं पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसमें महाराणा राजसिंह की उपलब्धियों और तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति की विस्तृत जानकारी दी गई है।

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  • गोरे भारत से सम्मानजनक पलायन का रास्ता ढूंढने लगे!

     03.06.2020
    गोरे भारत से सम्मानजनक पलायन का  रास्ता ढूंढने लगे!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली द्वारा कैबीनेट मिशन को भारत भेजने की ऐतिहासिक घोषणा की गयी जिसने भारत के 565 राजाओं की भूमिका एवं भारतीय राजनीतिक प्रगति के लिये एक नवीन ध्वनि तथा रेखा निश्चित की। भूतकाल से बिल्कुल उलट, इस बार ब्रिटिश सरकार राजाओं से अपेक्षा कर रही थी कि वे भारत की स्वतंत्रता की प्राप्ति में बाधा न बनें अपितु भागीदारी निभायें। भारत के वायसराय लॉर्ड वेवेल के नाम भेजे एक तार में प्रधानमंत्री एटली ने लिखा कि 'लेबर गवर्नमेंट' वायसराय को नजर अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलायेगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।

    सरकार को राजाओं की ओर से आशंका थी कि वे अपनी संप्रभुता की दुहाई देकर एक बार फिर योजना के मार्ग में आ खड़े होंगे। इसलिये उन्होंने राजाओं को पहले ही आश्वासन दे दिया कि सम्राट के साथ उनके सम्बन्धों या उनके साथ की गयी संधियों और समझौतों में दिये गये अधिकारों में उनकी सहमति के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। 12 मार्च 1946 के पत्र में लार्ड वेवेल ने इस आश्वासन को दोहराया। इस पत्र में कहा गया कि बातचीत के अतिरिक्त और किसी आधार पर रियासतों को भारतीय ढांचे में मिलाने की योजना बनाने की कोई इच्छा नहीं है। इस प्रकार सत्ता के संवैधानिक हस्तांतरण के विकास क्रम में अंतिम, गंभीरतम और अपेक्षाकृत अधिक विमलमति युक्त परिणाम देने के लिये सम्राट की सरकार के तीन मंत्रियों का मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया।

    इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिये एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सकें। उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे।

    प्रेस वार्ता के दौरान लॉर्ड लॉरेंस से पूछा गया कि राज्यों का सहयोग आवश्यक होगा या अनिवार्य? इस पर लॉरेंस ने जवाब दिया कि हमने संवैधानिक संरचना की स्थापना करने वाले तंत्र को बनाने के लिये विचार-विमर्श करने हेतु राज्यों को आमंत्रित करने की योजना बनायी है। यदि मैं आपको रात्रि के भोजन पर आमंत्रित करता हूँ तो आपके लिये वहाँ आना अनिवार्य नहीं है।

    यह निश्चय किया गया कि कैबीनेट मिशन रियासती भारत के कुछ निश्चित प्रतिनिधियों से ही भेंट करेगा। सबसे पहले वह नरेन्द्र मण्डल के चांसलर से भेंट करेगा। इसके बाद मध्यम आकार की रियासतों के प्रतिनिधि के रूप में आने वाले पटियाला, बीकानेर तथा नवानगर के शासकों से संयुक्त रूप से भेंट करेगा। मिशन लघु राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में आने वाले डूंगरपुर तथा बिलासपुर के शासकों से संयुक्त रूप से मुलाकात करेगा तथा हैदराबाद के प्रतिनिधि के रूप में नवाब छतारी, त्रावणकोर के प्रतिनिधि सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर एवं जयपुर के प्रतिनिधि मिर्जा इस्माइल से अलग-अलग साक्षात्कार करेगा।

    राजाओं से मुलाकातों का दौर पूरा कर लेने के बाद इस मिशन को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों से माथा खपाना था। इस प्रकार अब अंग्रेज भारत से अपने सम्मान जनक पलायन का फार्मला ढूंढने लगे। इस सुझाव पर कि मिशन को भारत के देशी राज्यों की जनता के प्रतिनिधियों से भी साक्षात्कार करना चाहिये, न तो भारत सरकार के राजनीतिक विभाग ने सहमति दी, न ही नरेन्द्र मण्डल के चांसलर सहमत हुए, न ही मिशन ने इस प्रश्न पर जोर दिया।

    2 अप्रेल 1946 को कैबिनेट मिशन तथा वायसराय के साथ साक्षात्कार के दौरान नरेन्द्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल ने स्पष्ट कर दिया कि देशी राज्य अपनी अधिकतम प्रभुसत्ता के साथ अपने अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। वे अपने आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत का कोई हस्तक्षेप नहीं चाहते। उन्होंने सलाह दी कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय राज्यों तथा ब्रिटिश भारत प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो राज्यों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो कि राज्यों से मिलकर बना हो? कोई भी भारतीय राजा भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गयी संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये।

    उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जायेगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जायेगा।

    मिशन ने इस स्थिति को शासकों के समक्ष स्पष्ट कर देना आवश्यक समझा किंतु शासकों ने इस पर कोई जोर नहीं दिया न ही इस विषय पर ब्रिटिश भारतीय नेताओं से बात की क्योंकि उन्हें लगता था कि इसके समर्थन में कोई भी सकारात्मक बयान देने से ब्रिटिश भारतीय नेताओं के साथ किसी भी मंच पर होने वाली उनकी बातचीत में शासकों की स्थिति कमजोर हो जायेगी। अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाये रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल संघ के माध्यम से ही हो सकते थे।

    राज्यों के महासंघ के निर्माण के प्रश्न पर लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि मिशन के लिये यह नया विचार है इसलिये वे इस पर विशद गहराई के साथ विचार नहीं कर सकते। यह सुझाव उन्हें रोचक और अच्छा लगा था इसलिये उन्होंने इस सुझाव को पूरी तरह रद्द नहीं किया। क्रिप्स का मानना था कि इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी। नवाब भोपाल ने पूछा कि क्या अंतरिम काल में संधियां बनी रहेंगी? राज्य सचिव ने जवाब दिया कि वे बनी रहेंगी किंतु उनका विचार था कि आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्रों में की गयी संधियां एवं व्यवस्थाएं तथा संचार व्यवस्थाएं आगे तक भी चल सकती हैं तथा बाद में उनका पुनरीक्षण किया जा सकता है।

    भोपाल नवाब का विचार था कि इस सम्बन्ध में अलग से कोई समझौता नहीं था तथा न ही अलग से ऐसा कोई मुद्दा था इसलिये संधियों को विभाजित नहीं किया जा सकता।

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  • अजमेर का इतिहास - 1

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 1

    प्राक्कथन


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर नगर का भारत के इतिहास में क्या महत्व है, वह ब्रिटिश शासन काल में कही जाने वाली कहावत- 'वन हू रूल्स अजमेर, रूल्स इण्डिया' से बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। अजमेर न केवल राजस्थान के मध्य में है अपितु उत्तर भारत के भी लगभग मध्य में है। पृथ्वीराज चौहान दिल्ली पर अपना शासन इसीलिये स्थापित कर सका क्योंकि वह अजमेर का शासक था। भारत पर मुस्लिम आधिपत्य से पहले ही मुहम्मद गौरी ने अजमेर के राजनीतिक महत्त्व को भलीभांति समझ लिया था। तभी तो मुहम्मद गौरी से लेकर दिल्ली सल्तनत के अधिकांश बादशाहों ने अजमेर पर अपना नियंत्रण कड़ाई से बनाये रखा।

    मुहम्मद बिन तुगलक ने कभी भी दिल्ली को भारत की राजधानी के लिये उपयुक्त नहीं समझा, इसलिये वह अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर दौलताबाद ले गया किंतु उसे भी राजधानी के रूप में अनुपयुक्त पाकर पुनः अपनी राजधानी को दिल्ली ले आया। मारवाड़ के राठौड़ शासक भी दिल्ली की राजनीति में इसीलिये गहरी पकड़ बनाये रख पाये क्योंकि अजमेर प्रायः उनके अधीन रहा। मेवाड़ के राणाओं ने अजमेर प्राप्त करने के लिये अपने स्वाभाविक मित्र राठौड़ों से शत्रुता की। दिल्ली सल्तनत के पराभव के बाद शेरशाह सूरी ने अजमेर को अपने अधीन लेने के लिये अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर मारवाड़ के राठौड़ों पर आक्रमण किया तथा अजमेर को अपने अधीन किया।

    जब अकबर ने भारत पर अपना शिकंजा कसना आरम्भ किया तो अजमेर की महत्ता उसकी दृष्टि से छिपी न रह सकी। अजमेर को स्थाई रूप से मुस्लिम प्रभाव में रखने के लिये उसने ख्वाजा की दरगाह के माध्यम से अजमेर को मुस्लिम राजधानी का रूप देने का प्रयास किया। अकबर से लेकर फर्रूखसीयर तक अजमेर मुगलों की सैनिक छावनी बना रहा।

    मुगलों के कमजोर पड़ जाने पर जयपुर के कच्छवाहों ने अजमेर पर अधिकार करने के लिये अपने स्वाभाविक मित्रों अर्थात् राठौड़ शासकों से विश्वासघात किया और उनकी हत्याएं करवाईं। मराठों ने भी अजमेर पर अधिकार जमाने के लिये ई.1737 से ई.1800 तक राठौड़ों से लम्बा संघर्ष किया। उस काल में उत्तरी भारत की दो महान शक्तियां- महादजी सिंधिया तथा मारवाड़ नरेश महाराजा विजयसिंह तब तक लड़ते रहे, जब तक कि दोनों ही लड़कर नष्ट नहीं हो गये।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने जब व्यापारिक कम्पनी का चोला उतारकर भारत सरकार के रूप में अवतार लिया तो उसने मराठों को धन देकर अजमेर खरीदा। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर को अपनी प्रादेशिक राजधानी बनाया तथा नसीराबाद में सैनिक छावनी स्थापित की। अजमेर से ही राजपूताने के सारे राजाओं की नकेलें कसी गईं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, अजमेर का महत्व बढ़ता गया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भारत में सामाजिक परिवर्तन की आंधी लाने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी अजमेर को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया।

    बीसवीं सदी में हर बिलास शारदा की आवाज पूरे भारत में इसलीये ध्यान देकर सुनी गई क्योंकि वे केन्द्रीय विधानसभा में अजमेर सीट से मनोनीत किये जाते थे। उन्होंने पूरे देश के लिये बाल विवाह निषेध का जो कानून बनवाया वह आज भी शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है।

    जिस अजमेर नगर ने हर युग में भारत वर्ष के बड़े से बड़े शासक की नींद उजाड़ी हो तथा जिस अजमेर के लिये लाखों मनुष्यों ने अपने बलिदान दिये हों, उस अजमेर नगर का इतिहास लिखना अत्यंत दुष्कर कार्य है। फिर भी मैं इसे लिखने का साहस जुटा सका तो केवल इसलिये कि मैं चार वर्ष तक अजमेर में रहा। मैंने अजमेर को पहली बार ई.1968 में देखा। दूसरी बार मैं अगस्त 1980 से अप्रेल 1984 तक दयानंद महाविद्यालय अजमेर का विद्यार्थी रहा।

    अपने अजमेर प्रवास के दौरान मैंने इस नगर की आत्मा के दर्शन किये और इस नगर की धड़कनों को सुना। मैंने राजकुमार लोत के विजयनाद को सुना। अरणोराज और बीसलदेव के विजयी घोड़ों की टापों को सुना। मैंने कवि चंद बरदाई के कवित्त और तारागढ़ के पहाड़ी से टकराती हुई पृथ्वीराज चौहान की बेबस चीखों को सुना। मैंने संयोगिता की उन सिसकियों को सुना जो आज भी इतिहास के नेपथ्य में सिसक रही हैं। मैंने उमादे के उन विरह गीतों को सुना जो अजमेर की पहाड़ियों में भटका करते हैं। मेरे द्वारा सुनी गईं वे सब ध्वनियां ही आज इस ग्रंथ के रूप में आपके हाथों में हैं।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - ताम्रपत्र एवं सिक्के

     15.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - ताम्रपत्र एवं सिक्के

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 109

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - ताम्रपत्र एवं सिक्के

    ताम्रपत्र

    शिलालेखों के साथ ताम्रपत्र एवं सिक्के भी प्राचीन शताब्दियों के समय के इतिहास निर्माण के प्रमुख स्रोत हैं किंतु बहुत से ताम्रपत्र नकली पाये गये हैं। उदयपुर के महाराणा भीमसिंह ने 19वीं शताब्दी में प्राचीन ताम्रपत्रों की एक बही तैयार करवाई थी जिसमें प्राचीन ताम्रपत्रों की नकल तैयार करके उन्हें सुरक्षित किया गया। यह बही अब बीकानेर अभिलेखागार में रखी हुई है।

    1. प्रश्नः ताम्रपत्र क्यों लिखे जाते थे?

    उतरः जब शासक किसी महत्वपूर्ण अवसर पर भूमि, गाँव, स्वर्ण एवं रत्न आदि दान देते थे या कोई अनुदान स्वीकृत करते थे, तब वे इस दान या अनुदान को ताम्बे की चद्दर पर उत्कीर्ण करवाकर देते थे ताकि पीढ़ियों तक यह साक्ष्य उस परिवार के पास उपलब्ध रहे।

    2. प्रश्नः ताम्रपत्रों की संख्या कितनी है?

    हजारों की संख्या में ताम्रपत्र उपलब्ध होते हैं।

    3. प्रश्नः दानपत्रों अथवा ताम्रपत्रों का क्या महत्व है?

    उतरः इनसे इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियां जोड़ने में सहायता मिली है।

    4. प्रश्नः अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन ताम्रपत्र कौनसा है?

    उतरः ई. 679 का धूलेव का दानपत्र।

    5. प्रश्नः राजस्थान के इतिहास पर प्रकाश डालने वाले अन्य महत्वपूर्ण ताम्रपत्र कौनसे हैं?

    उतरः ई. 956 का मघनदेव का ताम्रपत्र, ई.1002 का रोपी ताम्रपत्र, ई. 1180 का आबू के परमार राजा धारावर्ष का ताम्रपत्र, ई. 1185 का वीरपुर का दानपत्र, ई.1194 का कदमाल गाँव का ताम्रपत्र, ई.1206 का आहाड़ का ताम्रपत्र, ई.1259 का कदमाल ताम्रपत्र, ई. 1287 का वीरसिंह देव का ताम्रपत्र तथा ई.1437 का नादिया गाँव का ताम्रपत्र प्रमुख है। सिक्के पंचमार्का सिक्के जिन्हें आदत मुद्राएं भी कहा जाता है, राजस्थान में प्राप्त सबसे प्राीचन सिक्के हैं। सिक्कों के उपयोग से राजस्थान के इतिहास के कई दुर्लभ तथ्यों का पता लग सका है।

    6. प्रश्नः पंचमार्का सिक्के क्या हैं?

    उतरः जिन सिक्कों पर पंचिंग के निशान मिलते हैं उन्हें पंचमार्का सिक्के कहते हैं।

    7. प्रश्नः कौनसे सिक्के राजस्थान के प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं?

    उतरः पंचमार्का सिक्के, गधैया सिक्के, ढब्बू सिक्के, आहड़ उत्खनन से प्राप्त सिक्के, मालवगण के सिक्के और सीलें, राजन्य सिक्के, यौधेय सिक्के, रंगमहल से प्राप्त सिक्के, सांभर से प्राप्त मुद्रायें, सेनापति मुद्रायें, रेड से प्राप्त सिक्के, मित्र मुद्रायें, नगर मुद्रायें, बैराट से प्राप्त मुद्रायें, गुप्तकालीन सिक्के, गुर्जर-प्रतिहारों के सिक्के, चौहानों के सिक्के तथा मेवाड़ी सिक्के।

    8. प्रश्नः अजमेर से मिले एक सिक्के में एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम अंकित है। इससे क्या अनुमान होता है?

    उतरः पृथ्वीराज चौहान को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उसके सिक्कों को जब्त करके उन्हें अपने नाम से दुबारा जारी किया।

    9. प्रश्नः राजस्थान की विभिन्न रियासतों के सिक्कों से किस काल के इतिहास की जानकारी होती है?

    उतरः मध्यकाल एवं मध्येतर काल के इतिहास की।

    10. प्रश्नः स्वरूपशाही सिक्के किस रियासत ने जारी किये?

    उतरः उदयपुर रियासत ने।

    11. प्रश्नः मारवाड़ के राठौड़ राजाओं में किस राजा ने सर्वप्रथम अपना सिक्का जारी किया?

    उतरः नागौर के शासक राव अमरसिंह राठौड़ ने।

    12. प्रश्नः कुचामनी सिक्का किस रियासत द्वारा जारी किया गया?

    उतरः जोधपुर रियासत के कुचामन ठिकाणे के राजा को एक रुपये का चांदी का सिक्का ढालने की अनुमति दी गई थी जिसे कुचामणी सिक्का कहा जाता है।


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  • राजाओं ने एक-एक करके अपने पत्ते खोलने आरंभ कर दिये!

     03.06.2020
    राजाओं ने एक-एक करके अपने पत्ते खोलने आरंभ कर दिये!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कैबीनेट मिशन भारत को आजादी देने का सर्वसम्मत फार्मूला ढूंढने के लिये भारतीय राजाओं से वार्ता कर रहा था। दल के सदस्य स्टैफर्ड क्रिप्स का मानना था कि तकनीकी रूप से कैसी भी स्थिति हो किंतु जिस दिन आजाद भारत की नयी सरकार को सत्ता का हस्तांतरण किया जाये उससे पहले, ब्रिटिश भारत तथा रियासती भारत के मध्य वर्तमान में चल रही आर्थिक व्यवस्थाओं को यकायक भंग हो जाने से बचाने के लिये कोई व्यवस्था की जानी चाहिये। ऐसा व्यवधान राज्यों और ब्रिटिश भारत दोनों के लिये हानिकारक होगा तथा इसे देशी राज्यों के विरुद्ध लीवर के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। यह वार्तालाप मिशन द्वारा जाम साहब की इस प्रार्थना की स्वीकृति के साथ समाप्त हुआ कि जब ब्रिटिश भारत के भविष्य का प्रारूप निर्धारित हो जाये तब राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ एक बार फिर से विचार विमर्श किया जाये।

    कैबीनेट मिशन द्वारा छोटे राज्यों के प्रतिनिधियों- डूंगरपुर एवं बिलासपुर के शासकों के साथ 4 अप्रेल 1946 को साक्षात्कार किया गया। डूंगरपुर के शासक ने कहा कि भारत में केवल आधा दर्जन देशी राज्य ही ऐसे हैं जो ब्रिटिश भारत के प्रांतों की तुलना के समक्ष खड़े रह सकते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि छोटे राज्यों को अपनी प्रभुसत्ता बचाने के लिये क्षेत्रीयता एवं भाषा के आधार पर मिलकर बड़ी इकाई का निर्माण कर लेना चाहिये। छोटे राज्यों को भय है कि बड़े राज्य उन्हें निगल जाना चाहते हैं। छोटे राज्य संतोषजनक गारंटी चाहते हैं। यह सुझाव गलत है कि छोटे राज्यों का कोई भविष्य नहीं है। वे बड़े राज्यों से भी अधिक बलिदान देने को तैयार हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हैदराबाद, कश्मीर तथा मैसूर को छोड़कर शेष राज्यों को 9 क्षेत्रीय इकाईयों में विभक्त किया जाये। बिलासपुर के राजा ने कहा कि प्रत्येक राज्य को उसकी पुरानी आजादी पुनः लौटा दी जानी चाहिये तथा उसे अपनी मनमर्जी के अनुसार कार्य करने के लिये छोड़ दिया जाना चाहिये।

    कैबीनेट मिशन के सदस्यों द्वारा त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी से 9 अप्रेल को साक्षात्कार किया गया। रामास्वामी ने कहा कि परमोच्चसत्ता किसी उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। अंतरिम काल में परमोच्चता का संरक्षण किया जाना चाहिये किंतु यदि कोई विवाद न हो तो राजनीतिक विभाग के तंत्र को पुनरीक्षित किया जाना चाहिये। सर सी. पी. रामास्वामी का विश्वास था कि 601 राज्य भविष्य के भारत में प्रभावी इकाई नहीं हो 
    सकेंगे। छोटे राज्यों को बता दिया जाना चाहिये कि या तो वे स्वयं अपने आप समूह बना लें या फिर उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया जायेगा।

    हैदराबाद के प्रतिनिधि ने मांग की कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा छीनी गयी सीमाओं को फिर से हैदराबाद को लौटा दिया जाना चाहिये तथा उसे समुद्र तक का स्वतंत्र मार्ग दिया जाना चाहिये। जयपुर के दीवान मिर्जा इस्माइल ने अपने साक्षात्कार का बड़ा भाग इस विषय पर खर्च किया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के भेद कैसे दूर हो सकते हैं! उन्होंने जोर दिया कि भारतीय शासक परिवारों को बनाये रखना चाहिये क्योंकि वे भारत की संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा हैं। ब्रिटिश सरकार को भारत की समस्त समस्याओं को सुलझाये बिना ही भारत छोड़ देना चाहिये।

    मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि राज्यों के प्रतिनिधियों से वार्ता के उपरांत यह बात सामने आयी कि परमोच्चसत्ता उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये, उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिये। देशी राज्यों पर, भविष्य में बनने वाले संघ अथवा संघों में से किसी एक में मिलने के लिये दबाव नहीं डाला जाना चाहिये। राज्यों के शासक चाहें तो राज्यों का महासंघ बनाये जाने पर कोई आपत्ति नहीं की जानी चाहिये। राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये।

    इस प्रकार राजाओं ने एक-एक करके अपने पत्ते खोलने आरंभ कर दिये थे। वे समझ गये थे कि अब अंग्रेज देश में नहीं रहेंगे। इसलिये अंग्रेजों की कृपाकांक्षा करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाना अधिक उचित होगा कि कहीं भविष्य में बनने वाला आजाद भारत राजाओं के राज्यों को न निगल जाये। दूसरी तरफ छोटे राजा इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं बड़े राजा ही उन्हें न निगल जायें। रियासती भारत में अजीब से बेचैनी और कई तरफा घमासान मचने लगा था।

    राजाओं और उनके प्रतिनिधियों से निबटने के बाद कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बात की तथा उनके द्वारा सुझाये गये बिंदुओं पर विचार-विमर्श करने के लिये ने 9 मई 1946 को भोपाल नवाब को फिर से बुलाया। भोपाल नवाब ने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया कि भारतीय नेताओं द्वारा दिये गये सुझावों पर बात करने के लिये तो उन्हें बुलाया गया है किंतु देशी राज्यों ने जो सुझाव दिये थे उन पर विचार नहीं किया गया है। इस पर मिशन ने नवाब की शंकाओं का समाधान किया।

    12 मई 1946 को कैबीनेट मिशन ने राज्यों के सम्बन्ध में अपनी नीति स्पष्ट करते हुए भोपाल नवाब को एक स्मरणपत्र दिया जिसका शीर्षक ''संधियां एवं परमोच्चता" था। इसे ''12 मई 1946 का स्मरण पत्र" कहा जाता है। भारतीय समाचार पत्रों में इस स्मरण पत्र का प्रकाशन 22 मई को करवाया गया। इसमें कहा गया कि नरेन्द्र मंडल ने पुष्टि कर दी है कि भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति की अभिलाषा में भारतीय रियासतें देश के साथ हैं। परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा नयी बनने वाली सरकार या सरकारों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। सम्राट के साथ अपने सम्बन्धों द्वारा रियासतों ने जो अधिकार प्राप्त कर रखे हैं वे आगे नहीं रहेंगे तथा रियासतों ने सम्राट को जो अधिकार सौंप रखे हैं वे उन्हें वापस मिल जायेंगे। भारत से ब्रिटिश सत्ता के हट जाने पर जो रिक्तता होगी उसकी पूर्ति रियासतों को नये सम्बन्ध जोड़कर करनी होगी। भारतीय व्यवस्था में पारस्परिक समझौते के अतिरिक्त किसी भी बुनियाद पर रियासतों के प्रवेश का प्रावधान किये जाने का मंतव्य नहीं है। भारतीय रियासतें उपयुक्त मामलों में बड़ी प्रशासनिक इकाईयां बनाने या उनमें शामिल होने की इच्छा रखती हैं ताकि संवैधानिक योजना में वे उपयुक्त बन सकें और आंग्ल भारत के साथ बातचीत कर सकें।

    राज्यों के शासक यह जानकर प्रसन्न हुए कि परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा किसी अन्य सत्ता को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। समस्त अधिकार राज्यों को वापस मिल जायेंगे किंतु वे इस प्रस्ताव की प्रशंसा नहीं कर सके क्योंकि परमोच्चता की समाप्ति के बाद राज्यों को अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर ही निर्भर रहना था। लोकतांत्रिक पद्धति से निर्मित शक्तिशाली भारत सरकार उनके व्यक्तिगत शासन को बनाये रखने में क्यों रुचि लेगी? कांग्रेस ने इस स्मरण पत्र तथा उसके प्रभावों पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

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  • अजमेर का इतिहास - 2

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 2

    अनुक्रमणिका


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    1. प्राक्कथन

    3. प्रागैतिहासिक काल से गुप्तकाल तक

    4. अजमेर के चौहान शासक

    5. भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान

    6. चौहान कालीन अजमेर

    7. ललित विग्रहराज तथा हरकेलि नाटकों का परिचय

    8. अजमेर के चौहान शासकों के प्रमुख शिलालेख

    9. अजमेर का गर्व भंजन

    10. दिल्ली सल्तनत के अधीन अजमेर

    11. मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर

    12. नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

    13. शाहजहाँ

    14. दारा शिकोह एवं औरंगजेबयुद्ध

    15. औरंगजेब द्वारा अजमेर की उपेक्षा

    16. महाराजा अजीतसिंह

    17. विच्छिन्नता का युग

    18. अजमेर पर मराठों का शासन

    19. ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण

    20. फ्रांसिस विल्डर

    21. हेनरी मिडिल्टन

    22. कैवेण्डिश से स्पीयर्स तक

    23. अजमेर में एजीजी की नियुक्ति तथा विलियम बैण्टिक का दरबार

    24. रेशमी कीड़ा कवच से बाहर आया

    25. ब्रिटिश अधिकारियों को अग्रवाल सेठों का सहयोग

    26. कर्नल जे. डिक्सन और नया युग

    27. सदरलैण्ड द्वारा अजमेर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के प्रयास

    28. उन्नीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में अजमेर का प्रशासनिक परिदृश्य

    29. पोलिटिकल अधिकारियों द्वारा सामाजिक बुराइयों का निषेध

    30. ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अजमेर में शिक्षा का विकास

    31. अट्ठारह सौ सत्तावन की रक्तरंजित क्रांति

    32. अजमेर में ब्रिटिश क्राउन का शासन

    33. लॉर्ड मेयो का अजमेर दरबार

    34. अठारह सौ सत्तर का अजमेर

    35. कमिश्नर एल. एस. साण्डर्स

    36. साण्डर्स के समय अजमेर का प्रशासनिक दृश्य

    37. कमिश्नर जी. एच. ट्रेवर 

    38. कमिश्नर मैकान्जी से मार्टिण्डल तक

    39. कार्यवाहक चीफ कमिश्नर एवं एजीजी सी. के. एम. वॉल्टर

    40. चीफ कमिश्नर एवं एजीजी कर्नल जी. एच. ट्रेवर

    41. अठारह सौ इकरानवे की लूट

    42. चीफ कमिश्नर एवं एजीजी आर. जे. क्रॉस्थवेट एवं मार्टिण्डल

    43. तेजी से बदलते रहे कमिश्नर

    44. अजमेर में रेलवे का विकास

    45. रेल ने बदला अजमेर को

    46. उन्नीसवीं सदी के अंत में अजमेर

    47. अजमेर का गौरव मेयो कॉलेज

    48. ब्रिटिश काल में अजमेर का प्रशासन

    49. अजमेर में संवैधानिक विकास

    50. उन्नीसवीं शताब्दी में अजमेर से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र

    51. उन्नीसवीं सदी में अजमेर में शैक्षणिक विकास

    52. आर्यसमाज द्वारा अजमेर में नवीन शिक्षण पद्धति की स्थापना

    53. बीसवीं सदी में अजमेर

    54. अजमेर में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

    55. अजमेर में स्वतंत्रता आंदोलन

    56. अजमेर के साम्प्रदायिक दंगों पर नेहरू एवं पटेल में विवाद

    57. अजमेर के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेस की भूमिका

    58. केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर

    59. राजस्थान में प्रवेश

    60. बीसवीं सदी में अजमेर का शैक्षणिक विकास

    61. स्वातंत्र्योत्तर अजमेर के प्रमुख संस्थान

    62. राजस्थान राज्य अभिलेखागार में संग्रहीत अजमेर सम्बन्धी अभिलेख

    63. आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति

    64. उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में अजमेर नगर की जनसंख्या

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - लिखित इतिहास

     15.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - लिखित इतिहास

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 110

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान के इतिहास के स्रोत - लिखित इतिहास

    राजस्थान में इतिहास लेखन की परम्परा साहित्य लेखन के रूप में प्रारम्भ हुई। प्राचीन डिंगल, पिंगल एवं अन्य भाषाओं में रचे गये काव्य में राजाओं, राजकुमारों तथा सामन्तों के शौर्य, पराक्रम एवं दानवीरता आदि का वर्णन किया जाता था, जिनके माध्यम से राजस्थान के इतिहास लेखन में बड़ी सहायता मिली है। रावों एवं भाटों द्वारा अपने जजमानों की वंशावलियों का लेखन किया जाता था जो कि प्रायः अशुद्ध हैं। माना जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी में नैणसी की ख्यात से राजस्थान में इतिहास लेखन की स्वतंत्र परम्परा की शुरुआत हुई।

    1. प्रश्नः राजस्थान के इतिहास की प्राचीन लिखित सामग्री किन भाषाओं में मिलती है?

    उतरः संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं में।

    2. प्रश्नः पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् किस भाषा का ग्रंथ है?

    उतरः संस्कृत।

    3. प्रश्नः कुवलय माला किस भाषा का ग्रंथ है?

    उतरःप्राकृत भाषा।

    4. प्रश्नः कान्हड़दे प्रबंध किस भाषा में है?

    उतरः प्राचीन डिंगल।

    5. प्रश्नः मध्यकालीन लिखित सामग्री किस भाषा के ग्रंथों में प्राप्त होती है?

    उतरः संस्कृत, हिन्दी, डिंगल, अरबी, फारसी।

    6. प्रश्नः डिंगल भाषा के ग्रंथ किन शीर्षकों में लिखे गये हैं?

    उतरः प्रबंध, ख्यात, वंशावली, वचनिका, गुटके, बेलि, बात, वार्ता, नीसाणी, कुर्सीनामा, झूलणा, झमाल, छप्पय, कवित्त, गीत तथा विगत आदि।

    7. प्रश्नः अरबी फारसी ग्रंथ किन शीर्षकों में लिखे गये हैं?

    उतरः तारीख, तबकात, अफसाना, हकीकत आदि।

    8. प्रश्नः राजस्थान के इतिहास लेखन की दृष्टि से अरबी-फारसी के कौनसे ग्रंथ प्रमुख हैं?

    उतरः फरिश्ता की तारीखे फरिश्ता, जियाउद्दीन बरनी की तारीखे फीरोजशाही, अमीर खुसरो की तुगलकनामा, अबुल फजल की आइने अकबरी तथा अकबरनामा, बाबर की लिखी तुजुक-ए-बाबरी, जहाँगीर की लिखी तुजुक-ए-जहाँगीरी, गुलबदन की लिखी हुमायूंनामा, आदि।

    9. प्रश्नः रियासती काल में विभिन्न रियासतों के कौनसे दस्तावेज राजस्थान के इतिहास लेखन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं?

    उतरः फरमान, रुक्के, खरीते, तहरीरें, बहियां, पट्टे, आदि।

    10. प्रश्नः ब्रिटिश शासन काल में प्रकाशित किये गये कौनसे दस्तावेज राजस्थान के इतिहास लेखन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं?

    उतरः गजेटियर, एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट्स, सेंसस (जनगणना), सैटलमेंट्स, सर्वे, मेडिकल हवाला, पत्राचार की पत्रावलियां, कोटर््स के फैसले, अखबारों की कतरनें, पुलिस डायरियां, फेमीन रिपोटर््स, टाउन प्लानिंग रिपोर्ट्स आदि। अरबी-फारसी शोध संस्थान टोंक

    11. प्रश्नः टोंक के अरबी-फारसी शोध संस्थान की स्थापना कब हुई?

    उतरः ई. 1978 में।

    12. प्रश्नः टोंक के अरबी-फारसी शोध संस्थान में किन भाषाओं की पुस्तकों का दुर्लभ संग्रह है?

    उतरः अरबी एवं फारसी में।

    13. प्रश्नः टोंक के अरबी-फारसी शोध संस्थान में सर्वाधिक दुर्लभ पुस्तकें कौनसी हैं?

    उतरः औरंगजेब की लिखी आलमगिरी कुरान तथा शाहजहाँ द्वारा लिखवाई गयी ‘कुराने कमाल’ दुर्लभ पुस्तकें हैं।


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  • गोरी सरकार राजाओं को लावारिस बालक की तरह छोड़कर न जाये!

     03.06.2020
    गोरी सरकार राजाओं को लावारिस बालक की तरह छोड़कर न जाये!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कैबीनेट मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रकाशित की। इसे कैबीनेट मिशन प्लान तथा संयुक्त भारत योजना भी कहते हैं। इसके द्वारा संघीय संविधान का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भारत संघ की व्यवस्था जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे जाने थे। संघ में ब्रिटिश भारत के 11 प्रांत और समस्त देशी रियासतें शामिल होनी थीं। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होना था। शेष सभी विषय और अधिकार रियासतों के पास रहने थे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होनी थी जो बातचीत के द्वारा तय की जानी थी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना था। शेष विषयों पर राज्यों का अधिकार होना था।

    योजना में प्रांतों को 'ए’, 'बी’ और 'सी’ श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहली श्रेणी में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्यप्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, व बिहार थे। दूसरी श्रेणी में पंजाब, सिंध बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरी श्रेणी में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था। ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिये संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गयी व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया था।

    राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जायेंगे। ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिये जायेंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिये कि वे अपने भविष्य की स्थिति उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे या भारत से बाहर रह सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि एक सत्तात्मक भारत बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जायेंगे। मिशन ने कहा कि शासकों ने भारत में होने वाले नवीन संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया है किंतु यह सहयोग नवीन संवैधानिक ढांचे के निर्माण के दौरान समझौता वार्ता से ही प्राप्त हो सकेगा तथा यह समस्त राज्यों के मामले में एक जैसा नहीं होगा। प्रारंभिक अवस्था में संविधान सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वार्ता समिति द्वारा किया जायेगा। विचार-विमर्श के अंतिम चरण में राज्यों के वास्तविक प्रतिनिधि भाग लेंगे जिनकी संख्या 93 से अधिक नहीं होगी। राज्यों के प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया सम्बद्ध पक्षों के आपसी विचार-विमर्श से निश्चित की जायेगी। परमोच्च सत्ता की समाप्ति के बाद रियासतों को पूर्ण अधिकार होगा कि वे अपना भविष्य निश्चत करें परंतु उनसे यह आशा की जाती है कि वे संघीय सरकार के साथ कुछ समझौता अवश्य कर लेंगी।

    17 मई 
    1946 को एक प्रेस वार्ता में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने स्वीकार किया कि राज्यों के साथ महामना सम्राट की सरकार के सम्बन्ध, ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ सम्बन्धों से नितांत भिन्न थे। उन्होंने योजना के प्रस्तावों के बाहर जाने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्यों के प्रति सख्त रवैया अपनाने से न तो राज्यों की जनता का भला होगा और न ही ब्रिटिश प्रांतों की जनता का। उन्होंने कहा कि अंतरिम काल में राज्यों के साथ ब्रिटिश सम्बन्ध वैसे ही बने रहेंगे जैसे कि वे वर्तमान में हैं।

    17 मई को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वेवेल को एक पत्र लिखकर कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा कि रक्षा मामलों में, प्रस्तावित संघीय सरकार एवं संविधान के अधिकार का प्रावधान, राज्यों की अपनी सशस्त्र सेनाओं को तो प्रभावित नहीं करेगा? वित्त के मामले में भी संघ का अधिकार केवल उन्हीं राजस्व स्रोतों तक सीमित होना चाहिये जिन पर सहमति बनती है। किसी अन्य माध्यम से कर उगाहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। संचार के सम्बन्ध में वर्तमान में राज्यों को प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिये। संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व का तरीका राज्यों की सरकारों या समूहों के अधीन होना चाहये। संविधान सभा में सांप्रदायिकता का बड़ा प्रकरण, सभा में राज्यों के प्रतिनिधियों की बहुसंख्य उपस्थिति के दौरान मतदान से निर्धारित किया जाना चाहिये।

    नवाब ने मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिये कह सकेंगे। संविधान सभा को यह अधिकार नहीं होना चाहिये कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान सभा में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

    29 मई को लॉर्ड वेवेल ने एक पत्र भोपाल नवाब को भिजवाया जिसमें उन्होंने कहा कि नवाब द्वारा उठायी गयी अधिकतर बातें संविधान सभा में राज्यों और ब्रिटिश भारत के सदस्यों के मध्य होने वाले विचार-विमर्श के मुद्दे हैं। नवाब का यह तर्क काफी वजन रखता है कि संविधान सभा में प्रतिनिधि का चुनाव केवल शासकों के विवेकाधीन होना चाहिये किंतु मिशन का उद्देश्य ब्रिटिश भारत और रियासती भारत के मध्य स्वतंत्र सहलग्नता को बढ़ावा देने का है। नवाब को वेवेल का पत्र निराश करने वाला प्रतीत हुआ। उन्होंने 2 जून 1946 को फिर से वायसराय को पत्र लिखा- राज्यों को यह अधिकार है कि वे इस बात की मांग करें कि ब्रिटिश ताज राज्यों को ब्रिटिश भारत की दया पर न छोड़ दे, कम से कम राज्यों को संविधान सभा या संघीय संविधान में खराब स्थिति में तो न छोड़ें। नवाब विशेषतः इस मुद्दे पर परेशान थे कि कम से कम संघीय संविधान सभा में राज्यों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को सांप्रदायिक मुद्दों के समकक्ष रखा जाये तथा संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधि का चुनाव पूर्णतः राज्यों पर छोड़ा जाये।

    नवाब ने विश्वास व्यक्त किया कि सम्राट की सरकार की यह इच्छा तो कभी नहीं रही होगी कि राज्यों को उनकी वैधानिक एवं उचित मांगों तथा प्रभुसत्ता पूर्ण निकायों के रूप में उनके स्थापित और स्वीकृत अधिकारों को संरक्षित करने के लिये ताज की तरफ से कोई प्रयास किये बिना लावारिस बालक की भांति छोड़ दिया जाये। उन्होंने वायसराय से अपील की कि अपने उन मित्रों के विरुद्ध पक्ष न बनें जिन मित्रों ने अच्छे और बुरे समय में आपका साथ निभाया है तथा जो अपने शब्दों एवं आश्वासनों के प्रति वफादार रहे हैं। 4 जून 1946 को वायसराय ने नवाब के पत्र का जवाब दिया तथा शासकों की ओर से प्रकट की गयी उनकी चिंता की प्रशंसा की तथा लिखा कि नवाब राजनीतिक सलाहकार कोरफील्ड से इस पृष्ठभूमि पर किये गये विचार विमर्श के उपरांत दूसरा दृष्टिकोण अपना सकते थे। ये बातें बम्बई में होने वाली स्थायी समिति की बैठक में रखनी चाहिये।

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  • अजमेर का इतिहास - 3

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 3

    प्रागैतिहासिक काल से गुप्तकाल तक


    प्रागैतिहासिक काल

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    अजमेर के निकट खेड़ा तथा कडेरी से मानव सभ्यता के ऊषा काल के मानव अवशेष प्राप्त हुए हैं। सिन्धु घाटी सम्भ्यता में बाट के रूप में सीसे तथा सफेद-काले अभ्रक के टुकड़े प्रयुक्त होते थे। वे टुकड़े इन्हीं पहाड़ों से ले जाये जाते थे। सिंधु सभ्यता में प्राप्त छोटे-छोटे आकार की तश्तरियां, साहुल-गोलक तथा स्वर्ण रजत निर्मित वस्तुएं जो सभ्यता के आरंभिक काल में पाई गई थीं, संभव है कि वे भी अजमेर से ले जाई गई हों। मेगालिथिक एवं नॉन मेगालिथिक पॉलिशयुक्त लाल एवं काले उपकरण भी इस क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। चित्रयुक्त सलेटी उपकरणों की भी उपस्थिति इस जिले में पाई गई है। भूरे रंग के चित्रित खण्डित बर्तन, गैर प्रस्तरित काले व लाल रंग के बर्तन तथा उत्तरी क्षेत्र की काली मिट्टी से निर्मित बर्तन भी अजमेर के निकट चोसला गांव से प्राप्त किये गये हैं।

    पौराणिक काल

    देवी पुराण में पुष्कर को नौ पवित्र अरण्यों में से एक बताया गया है। पद्म पुराण कहता है कि जब ब्रह्मा यज्ञ करने के लिये पृथ्वी पर एक उचित स्थान खोज रहे थे, तब उनके हाथ से एक कमल पुष्प गिर गया और धरती पर तीन स्थानों पर टकराया। ये तीनों स्थान ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर एवं कनिष्ठ पुष्कर के नाम से जाने जाते हैं। वाल्मिकी रामायण के अनुसार ऋषि विश्वामित्र ने पुष्कर में तपस्या की। एक दिन स्वर्ग लोक की अप्सरा मेनका, पुष्कर के पवित्र जल में स्नान करने के लिये आई। जब विश्वामित्र की दृष्टि मेनका पर पड़ी तो वे उसके रूपजाल में बंध गये। यह एक बहुश्रुत आख्यान है। महाभारत में आये एक उल्लेख के अनुसार महर्षि वेदव्यास महाराजा युधिष्ठिर को निर्देशित करते हैं कि सिन्ध के जंगलों को पार करने तथा मार्ग में स्थित कई छोटी नदियों को पार करने के बाद आपको पुष्कर सरोवर में स्नान करना चाहिये।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर के तारागढ़ दुर्ग की स्थापना बाली ने अपनी पत्नी तारा के नाम पर की थी किंतु इस कथन का कोई एतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। फिर भी यह कथन, इस बात की ओर अवश्य संकेत करता है कि तारागढ़ की स्थापना काफी पुरानी है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व

    पुष्कर से पंचमार्क के सिक्के मिले हैं जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में पुष्कर की समृद्धि की कहानी कहते हैं। अजमेर से 58 किलोमीटर दूर बार्ली गांव के भीलोत माता मंदिर से अशोक (132 ई.पू. से 72 ई.पू.) से भी पहले की ब्राह्मी लिपि का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख राजपूताना संग्रहालय अजमेर में सुरक्षित है। यह शिलालेख वीर संवत् 84 (वि.सं. 386 अर्थात् ई.पू. 443) का है। इसकी तुलना सुहागपुरा तथा पिपरावा के शिलालेखों से की जा सकती है। ये शिलालेख खण्डित हैं। इनकी प्रथम पंक्ति जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी को इंगित करती है। दूसरी पंक्ति में वीर संवत 84 अंकित है, तीसरी पंक्ति में सालि मालिन का नाम दिया गया है।

    यह संभवतः दानदाता महिला थी। चौथी पंक्ति में माझमिका अथवा माध्यमिका शिलालेख की स्थापना करने के कारण के बारे में सूचना है। अनुमान है कि उस समय बार्ली, जैन संस्कृति का केन्द्र था। इस क्षेत्र में मिले सिक्कों से भी बार्ली की ब्राह्मीलिपि की तिथियों की पुष्टि होती है। इनसे यह भी अनुमान होता है कि उन दिनों बार्ली एक समृद्ध नगर रहा होगा। बार्ली का शिलालेख एक जैन राजा के बारे में सूचना देता है। स्थानीय आख्यानों के अनुसार यह राजा पद्मसेन था जिसने तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में पद्मावती नामक नगरी बसाई जिसे इंदरकोट भी कहते हैं। आज जहाँ सूरजकुण्ड, बनोली तथा किशनपुरा गांव स्थित हैं, कभी वहाँ पद्मावती नगरी स्थित थी। इस नगर को जल की आपूर्ति पाराची, नन्दा तथा सरस्वती नदियों से की जाती थी। उन दिनों इस क्षेत्र को कोंकण तीर्थ कहा जाता था। अब यह अजमेर नगर का ही अंग है। नदी के प्रबल वेग में बह जाने से पूर्व पद्मावती नगर, वर्षों तक फलता फूलता रहा।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व

    मध्य प्रदेश के सांची स्तूप के चार शिलालेखों से, दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में पुष्कर की महत्ता के बारे में ज्ञात होता है। इन शिलालेखों से ज्ञात होता है कि पुष्कर निवासी भिक्षु अर्हदीन, नगरक्षित, हिमगिरी तथा ईसिदत्ता (ईसिदत्ता भिक्षुणी थी) ने सांची में उदारता पूर्वक दान दिया। (इनके नाम इस प्रकार भी पढ़े जाते हैं- आय (आर्य), बुधरक्षित, संघरक्षिता, पुष्कर के लेवा पत्नी इषिदत्ता (ऋषिदत्ता)। इन शिलालेखों से यह भी ज्ञात होता है कि ईसा से दो सौ साल पहले, पुष्कर पवित्र तीर्थ स्थल तथा सुप्रसिद्ध नगर था।

    प्रथम शताब्दी ईस्वी

    गुलाम कादिर ने अपनी हस्तलिखित पुस्तक में एक संस्कृत लेख की चर्चा की है जिसमें लिखा है कि 'वि.सं. 106 (ई.49) में आषाढ़ शुक्ल पक्ष के 12वें दिन विक्रम व्यास की पुत्री, गोविन्द ब्राह्मण की पत्नी ने अपने पति के साथ आत्मदाह कर लिया।' यह पुस्तक ई.1830 में लिखी गई थी। अब यह मूल लेख कहीं भी देखने में नहीं आता है। कुषाण काल का एक खण्डित स्तम्भ नन्द में मिला था जो पुष्कर से कुछ मील की दूरी पर है। इस पर उत्कीर्ण संकेतों से स्पष्ट है कि ईसा की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में पुष्कर और इसके निकटवर्ती क्षेत्र कला और संस्कृति के उन्नत केन्द्र थे। उसी अवधि में उत्तमभद्रों का होना सिद्ध होता है जिन्होंने सीथियनों के समक्ष समर्पण कर दिया था।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी

    कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान में अजमेर का स्थापना काल 145 ईस्वी बताया है। हण्टर ने इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया तथा वाटसन ने गजेटियर ऑफ अजमेर में इसी तिथि को स्वीकार किया है किंतु इस तथ्य के समर्थन में अब तक कोई पक्का प्रमाण नहीं मिला है। अजमेर की स्थापना चौहानों ने की थी तथा चौहान इस समय तक अस्तित्व में नहीं आये थे। फिर भी यह निश्चित है कि इस समय अजमेर-पुष्कर क्षेत्र में उत्तमभद्र निवास करते थे। उनके पड़ौस में प्रथम शताब्दी ईस्वी के अंत तक मालवों ने वर्तमान जयपुर तथा टोंक के आसपास अपना स्वतंत्र गणराज्य स्थापित कर लिया था। इन मालवों का झगड़ा अजमेर-पुष्कर क्षेत्र के उत्तमभद्रों से हुआ। उत्तमभद्र शकों के मित्र थे। ऋषभदत्त (ऊषवदत्त) के लेख के अनुसार अजमेर का क्षेत्र शकों की क्षहरात शाखा के नहपान के अधीन था। (ऋषभदत्त नहपाण का दामाद था।)

    नासिक की एक गुफा के शिलालेख से ज्ञात होता है कि शकों का मुखिया ऋषभदत्त (ई.119-ई.123), भट्टारक (यह भट्टारक या तो नहपाण होना चाहिये या फिर नहपाण का भी स्वामी अर्थात् कोई कुषाण शासक होना चाहिये।) के आदेश से उत्तमभद्र जनजाति के मुखिया को मुक्त कराने के लिये गया था, जिसे मालवों द्वारा बंदी बना लिया गया। इस युद्ध में मालवों की करारी पराजय हुई जिसके पश्चात् शक वंश के राजा दीनिक के पुत्र उषवदत्त ने पुष्कर सरोवर में स्नान करने के बाद एक गांव तथा गायों का दान किया। पुष्कर से बैक्ट्रियन, यूनानी तथा शक क्षत्रपों के सिक्के बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। इससे अनुमान होता है कि उस काल में पुष्कर समृद्ध नगर था। कर्नल टॉड ने पालनपुर के अंग्रेज अधिकारी मेजर माइल्स को ई.1818 में एक बैक्ट्रियन तगमे की प्रतिलिपि प्रदान की थी, टॉड ने लिखा है कि मुझे यह बैक्ट्रियन मुद्रा अवन्ती के खण्डहरों में अथवा अजमेर की पवित्र झील के किनारे मिली थी। जब बौद्ध धर्म अपने यौवन पर था, तब बौद्धों ने बनारस, गया और मथुरा की भांति पुष्कर में भी अपनी गतिविधियों को केन्द्रित किया किंतु इस धर्म के हा्रस के साथ ही पुष्कर से उनकी विदाई हो गई।

    गुप्त काल

    पुष्कर से गुप्त शासकों के सोने-चांदी के सिक्के तथा ताम्बे के गधैया सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं। इनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि गुप्त काल में भी पुष्कर की समृद्धि और महत्ता बनी रही। चौहान शासकों के काल में भी अजमेर में गुप्तकालीन सोने और चांदी के सिक्के प्रचलन में थे।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि सभ्यता के उषा काल से ही इस क्षेत्र में मनुष्य की हलचल आरंभ हो गई थी। ईसा से चार सौ साल पहले से लेकर गुप्तकाल तक बार्ली तथा पुष्कर इस क्षेत्र के प्रमुख नगर थे। गुप्तकाल अथवा उससे भी पूर्व किसी समय में तारागढ़ दुर्ग की भी स्थापना हो चुकी थी। संभव है कि गुप्तकाल में अथवा उससे भी पहले अजमेर नगर भी किसी न किसी रूप में अस्तित्व में आ चुका हो किंतु इस सम्बन्ध में अधिक साक्ष्य नहीं मिलते।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान राज्य अभिलेखागार

     15.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 111

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    1. प्रश्नः राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना कब की गयी?

    उतरः ई.1955 में।

    2. प्रश्नः राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना किस उद्देश्य से की गयी?

    उतरः इतिहास की लिखित सामग्री को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से।

    3. प्रश्नः राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय कहाँ है?

    उतरः बीकानेर में।

    4. प्रश्नः राजस्थान राज्य अभिलेखागार की शाखाएं कहाँ है?

    उतरः जयपुर, कोटा, उदयपुर, अलवर, भरतपुर एवं अजमेर में।

    5. प्रश्नः राजस्थान राज्य अभिलेखागार में कौनसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री सुरक्षित है?

    उतरः ऐतिहासिक, प्रशासनिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक दृष्टि से उपयोगी एवं दुर्लभ सामग्री संग्रहीत है। इस सामग्री में मुगलकाल और मध्यकाल के अभिलेख, फरमान, निशान, मंसूर, पट्टा, परवाना, रुक्का, बहियां, अर्जियां, खरीता, पानड़ी, तोजी दो वरकी, चौपनिया, पंचांग आदि उपलब्ध हैं।

    6. प्रश्नः राजस्थान राज्य अभिलेखागार की सामग्री किन भाषाओं में है?

    उतरः उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, डिंगल, पिंगल, ढूंढाड़ी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, गुजराती, मराठी एवं हाड़ौती आदि।

    7. प्रश्नः बीकानेर अभिलेखागार के प्राविधिक खण्ड में कितने राज्यों के अभिलेख सुरक्षित हैं?

    उतरः 21 राज्यों के अभिलेख 7 संचय शालाओं में सुरक्षित हैं।

    8. प्रश्नः जयपुर राज्य के अभिलेख किन तिथियों एवं भाषाओं में हैं?

    उतरः ई. 1622 से 1743 तक उर्दू एवं फारसी में तथा ई. 1830 से 1949 तक के अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं।

    9. प्रश्नः जोधपुर राज्य के अभिलेख किन तिथियों एवं भाषाओं में हैं?

    उतरः ई.1643 से 1956 तक के मारवाड़ी भाषा में तथा ई. 1890 से 1952 तक अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं।

    10. प्रश्नः कोटा राज्य के अभिलेख किन तिथियों एवं भाषाओं में हैं?

    उतरः ई. 1635 से 1892 तक हाड़ौती भाषा में उपलब्ध हैं।

    11. प्रश्नः उदयपुर राज्य के अभिलेख किन तिथियों एवं भाषाओं में हैं?

    उतरः ई. 1884 से 1949 तक मेवाड़ी भाषा में तथा ई.1862 से 1947 तक अंग्रेजी भाषा में।

    12. प्रश्नः बीकानेर राज्य के अभिलेख किन तिथियों एवं भाषाओं में हैं?

    उतरः ई. 1625 से 1956 तक की अवधि के हैं। ये मारवाड़ी, उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी में उपलब्ध हैं।

    13. प्रश्नः अन्य रियासतों के अभिलेख किस अवधि के हैं?

    उतरः अलवर, किशनगढ़, बूंदी, सिरोही, भरतपुर, झालावाड़, कुशलगढ़ तथा करौली आदि रजवाड़ों के 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के अभिलेख सुरक्षित हैं।

    14. प्रश्नः अंग्रेजी शासन के दौरान अजमेर के एजीजी, कमिश्नर एवं चीफ कमिश्नर कार्यालयों के अभिलेख किस अवधि के हैं?

    उतरः ई. 1818 से लेकर 1956 तक।

    15. प्रश्नः प्रजापरिषदों एवं प्रजामंडलों के अभिलेख किस अवधि के हैं?

    उतरः ई.1920 से 1956 तक।

    16. प्रश्नः समाचार पत्र तथा समाचार पत्रों की कतरनें किस अवधि की हैं?

    उतरः ई. 1909 से लेकर बाद के समय की 3,000 से अधिक कतरनें।

    17. प्रश्नः मौखिक इतिहास खंड में क्या सामग्री रखी गई है?

    उतरः स्वतंत्रता सेनानियों से लिये गये 216 साक्षात्कार उन्हीं की आवाज में ध्वन्यांकित कर रखे गये हैं।

    18. प्रश्नः बीकानेर के अभिलेखागार में रखे गये दस्तावेजों को यदि धरती पर लम्बाई में फैलाया जाये तो उनकी लम्बाई कितनी होगी?

    उतरः एक अनुमान के अनुसार बीकानेर के अभिलेखागार में रखे गये दस्तावेजों को यदि धरती पर लम्बाई में फैलाया जाये तो उनकी लम्बाई पाँच लाख फुट होगी।

    19. प्रश्नः ताम्रपत्रों की बही कहाँ रखी हुई है?

    उतरः राज्य अभिलेखागार की उदयपुर शाखा की बख्शीशाला में।

    20. प्रश्नः ताम्रपत्रों की बही में क्या है?

    उतरः इस बही में 1838 ई. में 1,294 ताम्रपत्रों के नवीनीकरण करने का उल्लेख है। इन 1,294 ताम्रपत्रों में से 1,138 ताम्रपत्रों को गोरधनजी ने तथा 156 ताम्रपत्रों को रतना ने खोदा था। ये ताम्रपत्र महाराणा लाखा के काल से आरंभ होकर महाराणा भीमसिंह (ई.1828) तक के हैं।

    21. प्रश्नः अभिलेखागार की कोटा शाखा कहाँ स्थित है?

    उतरः सूरज पोल स्थिल तीन मंजिले झाला हाउस में।

    22. प्रश्नः कोटा शाखा में रियासत का कितना पुराना अभिलेख विद्यमान है?

    उतरः 300 वर्ष पुराना।

    23. प्रश्नः कोटा शाखा के अधिकांश अभिलेख किस भाषा में हैं?

    उतरः ये अभिलेख राजस्थान की सबसे कठिन मानी जाने वाली हाड़ौती भाषा में लिखा हुआ है।

    24. प्रश्नः राज्य में किस मिशन के अंतर्गत प्राचीन एवं दुर्लभ ग्रंथों की खोज का काम चल रहा है?

    उतरः राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन।

    25. प्रश्नः राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के अंतर्गत कितने प्राचीन ग्रंथ खोजे गये हैं?

    उतरः नवम्बर, 2009 तक राज्य अभिलेखागार द्वारा 21 जिलों में साढ़े सात लाख प्राचीन ग्रंथ खोजे हैं। ये ग्रंथ अभिलेखागार में रखे गये हैं। 11 जिलों में सर्वे का काम किया जाना है।


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