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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-12 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-1 बुराई पर अच्छाई की विजय-गुलंगान

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-12 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-1  बुराई पर अच्छाई की विजय-गुलंगान

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-12


    बाली द्वीप पर दूसरा दिन

    15 अप्रेल 2017 को दूसरे दिन प्रातः पांच बजे ही आंख खुल गई। इस समय भारत में तो रात के ढाई ही बजे होंगे किंतु हमारे शरीर में लगी जैविक घड़ी ने स्थानीय समय से पूरी तरह से तालमेल बैठा लिया था। चावल के खेतों के बीच बने उस लॉन में पूरे परिवार के साथ बैठकर सुबह की चाय पीना, अपने आप में एक अलग ही अनुभव था। इसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

    मैं और विजय जल्दी ही तैयार होकर, पुतु का स्कूटर लेकर प्रातः आठ बजे फिर से उसी सब्जी मण्डी की ओर चल पड़े ताकि दूध और तरकारी खरीदी जा सकें। इस शांत प्रातः बेला में चावल के खेतों के बीच से निकलना एक सुखद अनुभव था। सड़क के दोनों किनारों पर फलों से लदे हुए केले, पपीते, खजूर और नारियल के वृक्ष सहज ही ध्यान आकर्षित करते थे।

    नृत्यलीन बारोंग

    अभी हम कुछ दूर ही चले थे कि मार्ग में हमें एक जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। हमने स्कूटर सड़क के किनारे खड़ा कर दिया तथा उसकी तस्वीरें उतारने लगे। जुलूस के बीच कपड़े का एक विशालाकाय जानवर नृत्य कर रहा था जिसके मुंह पर वाराह (शूकर) का मुखौटा लगा हुआ था। कपड़े के भीतर दो आदमी थे जो अपने हाथों और पैरों से इस प्रकार की भंगिमाएं बना रहे थे जिनसे वह विशालाकाय वाराह नृत्य करता हुआ दिखाई देता था और उसके गले में पड़ी पीतल की बड़ी सी घण्टी से सुमधुर ध्वनि निकल रही थी। उसके चारों ओर चल रहे कुछ श्रद्धालु अपने हाथों में ढोल, मंजीरे तथा स्थानीय वाद्य बजा रहे थे जिससे चारों ओर का वातावरण धार्मिक श्रद्धा से आप्लावित हो रहा था। एक महिला बांस की खपच्चियों पर कपड़े से बनी छतरी उठाए हुए एक शूकर के साथ चल रही थी।

    हमें बताया गया कि यह बारोंग है जो धरती पर बुरी आत्माओं के सफाए के लिए आया है और घर-घर जाकर वहाँ से बुराइयों का सफाया कर रहा है। एक अन्य कथा के अनुसार बारोंग एक बुरी ''रांग्डा'' अर्थात् विधवा स्त्री से युद्ध कर रहा है जो समस्त बुराइयों की जड़ है। यह कथा जावा की राजकुमारी महेन्द्रदत्ता से भी जुड़ी हुई है जो बाली द्वीप की महारानी थी तथा उसी ने बाली द्वीप के आदिवासियों में हिन्दू धर्म का प्रचलन किया था।

    एक क्षेपक के अनुसार रानी महेन्द्रदत्ता तंत्र-मंत्र करती थी इसलिए बाली के राजा धर्मोदयाना ने उसे अपने महल से निकाल दिया। वह जंगल में जाकर रहने लगी। राजा धर्मोदयाना के मरने पर रानी विधवा हो गई। इसे बाली में ''रांग्डा'' कहा जाता है। यह शब्द उत्तर भारत में विधवा स्त्री के लिए मध्यकाल में प्रचलित ''रांड'' शब्द से काफी मिलता जुलता है। हमने देखा कि वह जुलूस बारी-बारी से प्रत्येक घर के सामने जाकर रुकता था, बारोंग का नृत्य और भी तेज हो जाता था तथा गृहस्थ लोग घर से बाहर आकर, जुलूस के साथ चल रहे पुजारी को रुपए देते थे। शूकर के नृत्य की भाव-भंगिमा तथा जुलूस के द्वारा बजाया जा रहा संगीत, दोनों ही अपने आप में विशिष्ट थे। हमें याद आया कि पुतु ने बताया था कि आज हिन्दुओं का बड़ा त्यौहार है जिसे गुलंगान कहते हैं। हमें स्वतः स्पष्ट हो गया कि यह जुलूस गुलंगान का हिस्सा है। हमें ज्ञात हुआ कि वाराह के चेहरे वाले बारोंग की तरह बाघ तथा शेर के मिले जुले रूप वाला बारोंग भी आता है। वह शिव की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वह भी धरती पर से बुरी आत्माओं को नष्ट करने वाला माना जाता है।

    स्वर्ग से आती हैं आत्माएं

    बालीवासी गुलंगान का त्यौहार अधर्म पर धर्म की विजय के उत्सव के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग से पूर्वजों की आत्माएं भी उत्सव मनाने धरती पर आती हैं। इस त्यौहार की तुलना विश्व भर के हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाली दीपावली त्यौहार से की जा सकती है। हमें बताया गया कि यह उत्सव, मुख्य दिवस के तीन दिन पहले आरम्भ होकर मुख्य उत्सव के ग्यारह दिन बाद तक चलता है। मुख्य दिवस के तीन दिन पहले पेन्येकेबान मनाया जाता है। इस दिन हर हिन्दू के घर में केले का प्रसाद बनाकर देवता को अर्पित किया जाता है। अगले दिन अर्थात् मुख्य दिवस के दो दिन पहले पेन्याजान का आयोजन किया जाता है। इस दिन तले हुए चावलों का केक बनाकर देवताओं को अर्पित किया जाता है जिसे जाजा कहते हैं।

    इसके अगले दिन अर्थात् मुख्य त्यौहार से एक दिन पहले पेनाम्पाहान का आयोजन किया जाता है। इस दिन दावत का आयोजन किया जाता है जिसमें सूअर तथा मुर्गे काटे जाते हैं। मुख्य दिवस के अगले दिन परिवार के पुरुष सदस्य, बारोंग के साथ नाचते-गाते हुए जुलूस के रूप में घर-घर जाते हैं। गृहस्थ जन अपने घरों के आगे सजावट करते हैं तथा एक दूसरे के घर जाकर त्यौहार की बधाई देते हैं और मिठाई खाते हैं। त्यौहार के आयोजन के दस दिन बाद विशेष रूप से सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन किया जाता है तथा स्वर्ग से धरती पर आई पूर्वजों की आत्माओं को विदाई दी जाती है। पूर्वज आत्माओं के जाने के एक दिन बाद लोग मौज-मस्ती करते हैं। हंसी-ठट्ठा होता है, आनंद मनाया जाता है। चूंकि बाली का परम्परागत कलैण्डर 210 दिन का होता है इसलिए यह त्यौहार हर दस माह बाद मनाया जाता है।

    बांस ही बांस

    हम थोड़ी दूर और गए तो हमारा ध्यान घरों के आगे लगे हुए लम्बे से बांस की ओर गया जो लगभग 15-20 फुट की ऊँचाई पर जाकर फिर से धरती की तरफ मुड़ता था। इन्हें पेंजोर कहा जाता है। प्रत्येक बांस रंगीन कपड़ों, कागजों और फूलों से ढंका हुआ था। बांस के साथ ही धरती से लगभग पांच-छः फुट की ऊंचाई पर बांस की खपच्चियों से बना हुआ लघु देवालय लटका हुआ था। इसके भीतर देवता के प्रतीक के रूप में कोई प्रतिमा थी जिसके समक्ष कई रंगों के पुष्प, फल और अण्डे आदि रखे हुए थे। कुछ बांसों को तो इतनी अच्छी तरह से और इतने भव्य प्रकार से सजाया गया था कि दर्शक बांसों की कलाकृतियों को देखकर दांतों तले अंगुलियां दबा लें। हम समझ गए कि हर घर के आगे की गई यह सजावट भी आज के गुलंगान त्यौहार की अभिन्न आयोजना है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि भारत में दीपावली के अवसर पर घरों के बाहर कण्डीलों की सजावट की जाती है तथा रात्रि में दीप जलाकर देवी लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। पेंजोर पर लगे इन्द्रब्लाका में भी रात्रि के समय दीप जलाकर प्रकाश किया जाता है।

    सब्जी मण्डी में फिर से निराशा

    हम लगभग 9.30 बजे सब्जीमण्डी पहुंचे किंतु तब तक सब्जीमण्डी खुली नहीं थी। एकाध दुकानें ही खुली थीं जिन पर फल रखे थे। हमने बाली द्वीप पर उत्पन्न होने वाले दो स्थानीय फल खरीदे जिनके नाम हम याद नहीं रख सकते थे। इनमें से पहला फल बाहर से लगभग भारतीय लीची की तरह दिखाई देता था किंतु इसके भीतर एक बड़ा सा बीज था जिसके चारों ओर पीले रंग का सुगंधित और मीठा गूदा था। इसमें से पके हुए कटहल के बीज की सी सुगंध आ रही थी। दूसरा फल बाहर से तो चीकू की तरह दिखाई देता था किंतु उसके भीतर छोटे-छोटे बीजों वाला रसीला गूदा भरा हुआ था जो स्वादिष्ट तथा हल्का खट्टा था। चूंकि सब्जियां प्राप्त करना संभव नहीं था, इसलिए हम वे फल खरीद कर ही वापस लौट लिए। हमने कुछ जनरल स्टोर्स पर दूध का डिब्बा खरीदने का प्रयास किया किंतु वह किसी भी स्टोर पर उपलब्ध नहीं हुआ।

    कौए की आकृति वाली पगड़ी ठीक साढ़े दस बजे पुतु अपनी गाड़ी लेकर आ गया। आज वह कल वाली पोषाक में नहीं था। उसने स्थानीय परम्परागत वस्त्र धारण किये थे जो गुलंगान त्यौहार पर विशेष रूप से पहने जाते थे। उसने सफेद कोट नुमा एक शर्ट धारण कर रखी थी। कमर के नीचे विशेष शैली में बांधी हुई तहमद थी और सिर पर एक टोपी थी जिसमें आगे की ओर कुछ गांठें लगाकर ऐसी आकृति बनाई गई थी कि वहाँ किसी पक्षी के बैठे होने का आभास होता था। मैंने अनुमान लगाया कि इस पक्षी की आकृति भारतीय कौए से मिलती है।

    दुर्गा पूजा

    पुतु के साथ एक और दम्पत्ति आया था। महिला के हाथ में बांस की खपच्चियों से बनी हुई बड़ी सी टोकरी थी जिसमें बांस से बनी हुई छोटी-छोटी गोल थालियां रखी हुई थीं। इन थालियों में केला तथा सेब आदि फल, चावल से बनाई हुई दलिया जैसी कोई डिश और कई तरह के फूल रखे हुए थे। महिला ने बहुत ही आकर्षक कपड़े पहने हुए थे। वह एक मंझले कद की गौर-वर्ण महिला थी जिसकी आयु कठिनाई से 25 साल रही होगी। उसने अपनी टोकरी में से एक गोल थाली निकाली और उसे लॉन के एक कौने में काले रंग के पत्थरों से बने एक मंदिरनुमा स्तम्भ के सबसे ऊपरी आले में रख दिया। फिर उसी आले के समक्ष दो अगरबत्तियां जलाईं तथा मंदिर के समक्ष हाथ जोड़कर अपना मस्तक झुकाया।

    हमने देवालय के भीतर रखी पूजा की थाली में झांककर देखा तो हमें फूलों के बीच मुर्गी का भूरे रंग का एक अण्डा भी दिखाई दिया। हमने पुतु को बताया कि भारत में देवताओं की पूजा में अण्डा काम में नहीं लिया जाता। केवल पुष्प, फल एवं मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। नेपाल के हिन्दू भी, बाली के हिन्दुओं की तरह मुर्गी का अण्डा, भगवान की पूजा में चढ़ाते हैं। हमने उस महिला से जानने का प्रयास किया कि इस आले को क्या कहते हैं! किंतु वह अंग्रेजी का एक भी शब्द नहीं समझती थी। उसका पति भी अंग्रेजी नहीं जानता था। पुतु ने हमें बताया कि इस स्तम्भनुमा लघु देवालय को टुडुकरंग कहते हैं। यह प्रत्येक घर के भीतर, सामने वाले हिस्से में बना हुआ होता है। यह देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त है। देवी दुर्गा प्रत्येक घर की रक्षा करती हैं। यह पूजा उन्हीं के निमित्त हो रही है।

    धरती माता की पूजा

    टुडुकरंग की पूजा करने के बाद उस महिला ने पूजा की एक थाली, लॉन के एक कौने में नीचे धरती पर रखी तथा वहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं। इस गोल थाली में भी पहले वाली थाली के समान ही पूजन सामग्री रखी हुई थी। पुतु ने बताया कि पूजा की जो थाली धरती पर रखी गई है वह धरती माता की पूजा के लिए है, जो हर समय हमारी रक्षा करती है।

    काल पूजन

    अब बारी थी काल पूजन की। जिस प्रकार गृह परिसर में देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त टुडुकरंग बना हुआ होता है, ठीक उसी प्रकार बाली द्वीप पर प्रत्येक घर के बाहर, मुख्य द्वार के निकट कालराऊ बना हुआ होता है। यह भी काले पत्थर से निर्मित एक स्तम्भ देवालय होता है जिसमें काल की पूजा होती है। बाली में इसे मृत्यु का देवता माना जाता है। यह घर के मुख्य द्वार के साथ-साथ पूरी गली की रक्षा करता है। मैंने अनुमान लगाया कि घर के भीतर दुर्गा का तथा घर के बाहर शिव का मंदिर है। भारत में भी शिव को महाकाल कहते हैं, वही महाकाल यहाँ आकर कालराऊ बन गया है। भारत में राऊ, राजा को कहते हैं। यहाँ भी पूजा करने वाली उस युवती ने कालराऊ के समक्ष बांस की एक थाली अर्पित की तथा दो अगरबत्तियां जलाईं। इस थाली में भी फल-फूल तथा चावलों से बनी हुई कोई डिश थी। कालराऊ के देवालय के बाद उसने पहले की ही तरह फल-फूलों से युक्त एक थाली धरती पर रखी तथा यहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं।

    इन्द्राब्लाका

    कालराऊ के बाद महिला ने पास ही लगे लम्बे बांस के साथ लटके लघु देवालय में पूजा की एक थाली अर्पित की। पुतु ने बताया कि इसे इन्द्राब्लाका कहते हैं। यह इन्द्र भगवान की पूजा के निमित्त बनाया गया है। भगवान इन्द्र पूरे मौहल्ले की रक्षा करते हैं। गुलंगान के त्यौहार पर लगने वाले बांस पर तो इन्द्राब्लाका बनाया ही जाता है, यह प्रत्येक मौहल्ले भी स्थाई रूप से रहता है।

    सातू को पहचाना पुतु ने

    हमने सर्विस अपार्टमेंट परिसर में बने मंदिरों में पूजा करने आई उस महिला, उसके पति एवं पुतु को लड्डू खाने के लिए दिए जो हम भारत से अपने साथ बनाकर ले गए थे। वे तीनों, इस भारतीय मिठाई को खाकर बड़े प्रसन्न हुए। हमने उनके चेहरों की प्रसन्नता से अनुमान लगाया कि उनके लिए यह क्षण किसी उत्सव से कम नहीं था। लड्डू खाने के बाद पुतु ने हमें बताया कि इण्डोनेशिया में इस डिश को सातू कहा जाता है। मुझे स्मरण हुआ कि राजस्थान में तीज के अवसर पर जो सातू बनाया जाता है, उसे लड्डू की तरह ही बांधा जाता है। पुतु ने इसे वही सातू समझा था।

    तमन राम सीता

    दुर्गा और इन्द्र का पूजन देखने के बाद हम लोग पुतु के साथ तमन अयुन पुराडेसा के लिए रवाना हो गए। मार्ग में सड़क के किनारे एक पार्क दिखाई दिया जिसमें खड़ी हल्के नीले रंग की दो प्रतिमाएं दूर से ही दिखाई दे रही थीं। हमने पुतु से अनुरोध किया कि वह गाड़ी रोके। ये भगवान राम और सीता माता की विशाल प्रतिमाएं थीं जिनकी ऊंचाई लगभग 15 फुट रही होगी। ये दोनों प्रतिमाएं उसी हल्के नीले रंग के एक भव्य रथ में खड़ी हैं जिसमें चार घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े भी हल्के नीले रंग के हैं।

    राम और सीता की इतनी सुंदर, इतनी भव्य एवं इतनी विलक्षण प्रतिमाओं का वर्णन करना कठिन है। दोनों प्रतिमाओं को विविध प्रकार के आभूषणों से अलंकृत किया गया है जिन पर सुनहरी रंग किया गया है जिसके कारण प्रतिमाओं का आकर्षण कई गुना बढ़ गया है। सीता अभय मुद्रा में हैं और राम इस मुद्रा में खड़े हैं मानो बाली द्वीप वासियों को सम्बोधित कर रहे हों! अश्वों को भी स्वर्णिम आभा युक्त आभूषणों से सजाया गया है। रथ में आगे की ओर एक सारथी है जो रथ के जुए के ठीक मध्य में बैठा है और अश्वों को हांक रहा प्रतीत होता है। उसके निकट एक योद्धा हाथ में तलवार और ढाल लिए बैठा है। वह इतना जीवंत है, मानो अभी राक्षसों पर अपने हथियार लेकर टूट पड़ेगा। इन प्रतिमाओं के निकट एक काले ग्रेनाइट पर बड़े-बड़े अक्षरों में रोमन लिपि में लिखा है- तमन राम सीता।

    गदाधारी भीम

    तमन राम सीता से थोड़ी ही दूरी पर तमन अयुन पुराडेसा स्थित है। यह मंदिर एक दोहरे परकोटे के भीतर स्थित है। बाहरी परकोटा इतना बड़ा है मानो इसके भीतर पूरा नगर समाया हो। इस परकोटे के प्रवेश द्वार पर राम सीता की प्रतिमा की शैली की ही एक विशाल प्रतिमा स्थित है। यह भी हल्के नीले रंग की प्रतिमा है जिसकी ऊंचाई लगभग 15 फुट है। महाबली भीम के कंधे पर भारी-भरकम गदा, सिर पर मुकट, शरीर पर कवच तथा वस्त्र, सभी कुछ विलक्षण शैली में बने हुए हैं। यहाँ भी आभूषणों को सुनहरे रंग से पोता गया है, जिससे उनकी आभा कई गुणा बढ़ गई है। इस प्रतिमा के अंग सौष्ठव पर विशेष ध्यान दिया गया है जिससे भीम के महाबली होने का अनुमान स्वतः ही हो जाता है।

    द्वार पाल युग्म

    तमन अयुन पुराडेसा के बाहरी परकोटे के मुख्य द्वार के दोनों ओर (दाईं और बाईं) तथा दोनों तरफ (बाहर और भीतर) विशिष्ट शैली में द्वारपाल की प्रतिमाएं खड़ी दिखाई देती हैं। इनके मुख, भारत की कथकली नृत्य-कलाकारों के मुखौटों जैसे चौड़े और फैले हुए हैं जबकि मुख के भाव विकराल एवं उग्र हैं। इनके एक कंधे पर भारी-भरकम दण्ड बना हुआ होता है जो इनके द्वारपाल होने का साक्ष्य देता है। बाली में एक भी ऐसा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का स्थान, मंदिर अथवा धार्मिक स्थल नहीं होगा जहाँ मुख्य द्वार पर यह द्वारपाल युग्म दिखाई नहीं दे। हमने अनेक मंदिरों में भीतरी परिसर में भी जहाँ-तहाँ इन द्वारपाल प्रतिमाओं को खड़े हुए देखा। वस्तुतः ये भैंरव हैं। एकाध स्थान पर तो हमने इन्हें काले एवं सफेद रंग में भी देखा, ठीक वैसे ही जैसे भारत में काला और गोरा भैंरू पाए जाते हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-13 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-2 तमन अयुन पुराडेसा-तनाहलोट मंदिर

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-13 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-2 तमन अयुन पुराडेसा-तनाहलोट मंदिर

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-13


    बाली द्वीप पर दूसरा दिन-2


    तमन अयुन पुराडेसा  

    मंदिर में प्रवेश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को बीस हजार इण्डोनेशियन रुपए मूल्य का टिकट खरीदना होता है। हमने पांच टिकट खरीदे इसलिए एक लाख रुपए खर्च हो गए। यदि यह मुद्रा हमसे भारतीय रुपए में ली जाती तो हमें पांच सौ रुपए देने पड़ते जो कि इतने नहीं अखरते किंतु एक लाख रुपए सुनकर हमारा मन बैठ गया।

    यह बाली के प्राचीन राजवंश का मंदिर है। इसके भीतर प्राचीन झौंपड़ीनुमा मंदिर बने हुए हैं। ये एक मंजिल से लेकर ग्यारह मंजिले तक हैं तथा इन्हें मेरू कहा जाता है। इनकी ऊंचाई लगभग चालीस-पचास फुट है। आधार वाली झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे चौड़ा होता है, इसके ऊपर हर मंजिल की चौड़ाई कम होती जाती है। सबसे ऊपर की झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे कम चौड़ा होता है। इनके छज्जों पर काले रंग की लम्बी-लम्बी घास जैसी सजावट की गई है। पर्यटकों को बाहर से ही मंदिर देखने की अनुमति है। पर्यटकों की सुविधा के लिए मुख्य मंदिर परिसर के चारों ओर एक पक्का गलियारा बनाया गया है। पर्यटक इस गलियारे में चारों ओर घूम कर मंदिर के बाहरी हिस्से में बनी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के चित्र उतार सकते हैं। मंदिर परिसर में कुछ लोग समूह के रूप में बैठकर पूजा कर रहे थे। यह एक सुंदर प्राकृतिक स्थान है तथा सघन वनस्पति से आच्छादित है।

    जनजीवन की झांकी

    तमन अयुन मंदिर के प्रवेश द्वार में प्रवेश करते ही एक बड़ा सा मण्डप स्थित है। इसमें प्रतिमाओं के माध्यम से बाली की सांस्कृतिक एवं जन-जीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है। एक दृष्य में दो पुरुष मुर्गा लड़ाते हुए दिखाए गए हैं तथा दो मनुष्य उन्हें मुर्गा लड़ाते हुए देख रहे हैं। इनमें से एक धनी मनुष्य कुर्सी पर बैठा है जिसने हाथ में चिलम जैसी कोई चीज उठा रखी है। दूसरा व्यक्ति हाथ ऊपर करके लड़ाई प्रारम्भ करने का संकेत कर रहा है। एक तरफ बैलों की एक जोड़ी है जिसके कंधों पर हल रखा हुआ है। इनमें से एक बैल काले रंग का है और दूसरा बैल सफेद रंग का है। पास ही एक नृत्यांगना नृत्य की मुद्रा में है।

    देव प्रतिमाओं का खुला संग्रहालय

    इस मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर सैंकड़ों प्रतिमाएं रखी हुई हैं जिनमें से पत्थर से निर्मित बहुत सी प्रतिमाएं सैंकड़ों साल पुरानी प्रतीत होती हैं तो क्ले से निर्मित कुछ प्रतिमाएं आधुनिक काल की हैं। इन मूर्तियों के हाथों में तरह-तरह के पुष्प, वाद्ययंत्र एवं अस्त्र-शस्त्र लगे हुए हैं। बहुत सी अप्सराओं के वस्त्र भारतीय तथा यूनानी देवियों से मिलते-जुलते हैं। इनमें कुछ प्रतिमाएं पंखों वाले सिंहों की हैं तो कुछ प्रतिमाएं पंखों वाली अप्सराओं की भी हैं।

    औरंगुटान के चेहरों वाले मनुष्यों की प्रतिमाएं

    यहाँ स्थित बहुत सी मनुष्याकार प्रतिमाओं चेहरे मनुष्यों जैसे होते हुए भी बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों से मिलते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरे वाले मनुष्य पाए जाते होंगे! ऐसे मनुष्यों की आकृतियां हमने बाली द्वीप पर और भी कई स्थानों पर देखीं। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र, सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां, चेहरे फूले हुए, नाक गोल एवं मोटी, होंठों के भीतर स्थित बड़े-बड़े दांत, मांसल भुजाएं, पुष्ट जंघाएं तथा चेहरों पर हंसी दिखाई देती है।

    गोल आंखों वाले देवता

    मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर छोटे चबूतरे बने हुए हैं जिन पर तरह-तरह की आकृतियों एवं आकारों वाले देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हुई हैं। इनमें से कुछ देवताओं की आंखे गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। ये अत्यंत प्राचीन जान पड़ती हैं, लगभग एक हजार साल पुरानी भी हों तो आश्चर्य नहीं। इन मूर्तियों के माध्यम से मूर्तिकार, भविष्य के मानवों के लिए क्या संदेश छोड़कर गए, कुछ कहा नहीं जा सकता! पत्थर-नुमा जिन चबूतरों पर ये मूर्तियां खड़ी हैं, वे भी बहुत पुराने हैं। कुछ चबूतरों पर रखी मूर्तियां वर्षा, आंधी एवं समय के थपेड़ों से घिस-टूटकर, भारत में रखे जाने वाले शिवलिंगों की तरह, गोल-लम्बी पिण्डियों में बदल गई हैं।

    दीपा की शैतानियां

    मंदिर परिसर में ही रंग-बिरंगे पक्षियों का एक छोटा सा चिड़ियाघर बना हुआ है। अलग-अलग आकार और रंगों वाले पक्षी अपने-अपने पिंजरे में भांति-भांति की किल्लोल कर रहे थे। मेरी डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा इन पक्षियों को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। सभी पक्षी अलग-अलग प्रकार की आवाजें निकाल रहे थे। दीपा ने भी पक्षियों की नकल उतारने का प्रयास किया तथा अपने हाव-भाव से हमें यह समझाने का प्रयास किया कि देखो यहाँ कितनी तरह के पक्षी हैं।

    बाली वासियों से दोस्ती

    हम बड़ी कठिनाई से दीपा को पक्षियों वाले खण्ड से निकाल कर बाहर लाए। यहाँ कुछ पुरुष और महिलाएं एक तरफ छाया में बैठकर बांस की खपच्चियों की टोकरियां बुन रहे थे। दीपा ने इस तरह का काम होते हुए पहली बार देखा था। वह गोद से उतरकर उन लोगों की तरफ भाग गई और टोकरी बुनने वाली एक महिला की गोद में जाकर बैठ गई। उसने अपनी अटपटी शब्दावली में उन लोगों से बात करने का प्रयास किया मानो पूछना चाहती हो कि इतनी सुंदर टोकरियां आप कैसे बुन लेती हैं! हम भी हैरान थे, वातावरण का बच्चों पर कितना शीघ्र और कितना गहरा प्रभाव होता है!

    रंगीन घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां मंदिर से बाहर निकले तो हमने मंदिर के बाहर एक अच्छा-खासा मेला लगा हुआ पाया। यह मेला गुलंगान के अवसर पर लगा था। इसका स्वरूप किसी भारतीय मेले जैसा ही दिखाई देता था किंतु इसमें बिकने वाली सामग्री भारतीय मेलों की अपेक्षा बहुत अलग थी। इसमें रंग-बिरंगे घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं, मछलियां और कई प्रकार के पक्षियों के चूजे बिकने आए थे। इनमें से बहुत से पक्षी एवं मछलियां प्राकृतिक तौर पर ही चटख रंगों की थीं किंतु अधिकांश घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां कृत्रिम रूप से रंगे गए थे। दीपा ने जब उन्हें देखा तो उसकी प्रसन्नता का पार न रहा। उसे वे सबके सब खेलने के लिए चाहिये थे और हम उनमें से एक भी दिलवाने को तैयार नहीं थे। काफी देर तक छोटी चिड़ियाओं के एक पिंजरे को ध्यान से देखते रहने के बाद दीपा ने उनकी ही तरह चीं-चीं की आवाज लगानी शुरु कर दी।

    सड़क किनारे लंच

    तमन अयुन टेम्पल देख लेने के बाद हम पुतु के सथ तनाहलोट मंदिर के लिए रवाना हुए। यह मेंगवी से लगभग एक घण्टे की दूरी पर है। दोपहर हो चुकी थी। इसलिए हमने पुतु से कहा कि किसी ऐसे स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ बैठक हम भोजन कर सकें। भोजन हमने प्रातः अपने सर्विस अपार्टमेंट में बनाकर अपने साथ ले लिया था। पुतु ने एक हरे-भरे स्थान पर सड़क के किनारे बने छपरे के नीचे गाड़ी रोकी। यहाँ लकड़ी की दो चौकियां रखी हुई थीं। हमने उन्हीं पर बैठकर भोजन किया। यह एक अच्छी-खासी पिकनिक मनाने जैसा था। पास ही दो ठेले वाले खड़े थे जिन पर कुछ तरकारी और फल बिक रहे थे। उन दोनों ठेलों को एक ही महिला देख रही थी। जब हम भोजन करने बैठे तो वह महिला यह देखने के लिए हमारे पास चली आई कि हम क्या खाते हैं और कैसे खाते हैं! यह ठीक वैसी ही उत्सुकता थी जैसी भारत के लोग सड़कों पर चलते फिरंगियों को देखकर व्यक्त करते हैं।

    प्याज बेचने वाले की नीयत में खराबी

    भोजन करने के बाद हमने वहाँ खड़े एक ठेले पर जाकर देखा। वहाँ सब्जी के नाम पर केवल प्याज थी, वह भी बहुत छोटे आकार की। मैंने बड़ी कठिनाई से उससे समझा कि प्याज क्या भाव है। महिला ने मुझे एक किलो का बाट और बीस हजार रुपए निकालकर दिखाये। सौ रुपए किलो के भाव की छोटी प्याज थी तो अखरने वाली किंतु मैंने खरीदने का निर्णय लिया। जब महिला प्याज तोल चुकी, ठीक उसी समय उसका पुरुष साथी (संभवतः पति) वहाँ आया और उसने मुझे कैलकुलेटर पर टाइप करके बताया कि इस प्याज के लिए 40 हजार रुपए लगेंगे। मैंने अस्वीकृति में सिर हिलाया और तुली हुई प्याज वहीं छोड़ दी। महिला मुझ पर बहुत नाराज हुई और उसने मुझसे ईडियट कहा। संभवतः अंग्रेजी का एक यही शब्द था जिसे वह जानती थी और न जाने कब उसने किससे सीखा होगा! संभवतः वह समझ ही नहीं सकी थी कि उसके पति ने क्य बदमाशी की थी! मैं महिला की तरफ देखकर मुस्कुराया और पुतु की गाड़ी में बैठ गया।

    मंदिर देखने के लिए तीन लाख रुपए के टिकट

    लगभग एक घण्टे चलने के बाद हम तनाहलोट पहुंचे। प्राचीन तनाहलोट हिन्दू मंदिर, बाली द्वीप के तबनन रीजेंसी क्षेत्र में समुद्र के भीतर किंतु तट के काफी निकट बना हुआ है। पुतु ने हमें बताया कि यहाँ टिकट लेकर प्रवेश करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए साठ हजार रुपए का टिकट था। हमें पांच टिकट लेने पड़े इसलिए तीन लाख रुपए व्यय हो गए। यह एक विचित्र अनुभव था। भारत में किसी भी मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लेना पड़ता किंतु इण्डोनेशिया सरकार, देशी-विदेशी पर्यटकों से मंदिरों में प्रवेश के लिए भी इतना टिकट ले रही थी। संभवतः इण्डोनेशियाई सरकार की आय में पर्यटन से होने वाली आय बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। या फिर मुस्लिम देश होने के कारण हिन्दू मंदिरों पर टिकट लगाया गया है।

    बाली, जावा और चीन के व्यापारियों का अनोखा संसार

    मंदिर परिसर का आरम्भ एक भव्य और विशाल तोरण द्वार से होता है जिसकी ऊपर की ताकों में पीताम्बरधारी लम्बे दाढ़ी वाले ऋषि की मूर्ति स्थापित हैं। तोरण द्वार से लेकर समुद्र तट तक पहुंचने के लिए हमें लगभग एक किलोमीटर चलना पड़ा। इस पूरे मार्ग में बाली, जावा तथा चीन के सैंकड़ों व्यवसायी दुकानें लगाए हुए बैठे हैं। इन दुकानों पर हिन्दू देवी-देवताओं की एक से बढ़कर एक पेंटिंग देखी जा सकती हैं। चटखीले रंग, तीखे नाक-नक्श और भाव पूर्ण मुद्राओं में अंकित हिन्दू देवी-देवताओं का यह संसार, धरती से नितांत विलग ही दिखाई देता है।

    छः लाख रुपए के 10 रुद्राक्ष

    यहाँ भी वस्तुओं के दाम भारत की तुलना में कई गुना अधिक थे। हमने एक चीनी दुकान पर लगभग 10 रुद्राक्षों की एक माला के दाम पूछे जिसे कड़े की तरह हाथ की कलाई में पहना जाता है। भारत में यह माला अधिक से अधिक 20 रुपयों में खरीदी जा सकती है किंतु वहाँ हमें इस माला का दाम छः लाख इण्डोनेशियन रुपए अर्थात् तीन हजार भारतीय रुपए बताया गया। यहाँ भी नारियल 20 हजार इण्डोनेशियन रुपए में बिक रहा था।

    ज्ञान मुद्रा में सरस्वती

    इस बाजार में सरस्वती की श्वेत रंग की एक मनुष्याकार प्रतिमा भी बिकने के लिए आई थी जिसे देखकर कोई भी भारतीय दंग रह जाए। बाली शैली की इस प्रतिमा में देवी सरस्वती एक कमल पुष्प पर खड़ी हैं जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वेद, तीसरे हाथ में बिंजौरा का पुष्प और चौथा हाथ ज्ञान मुद्रा में है। देवी के पैरों के पास हंस पंख खोले खड़ा है।

    विशिष्ट शैली का द्वार

    जहाँ सड़क समाप्त हुई, वहीं से समुद्र तक जाने के लिए सीढ़ियों का सिलसिला आरम्भ हो गया। ठीक यहीं पर बाली की विशिष्ट शैली का प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस द्वार के दोनों तरफ के स्तंभों की बनावट इस प्रकार की होती है मानो किसी शिखरबंद मंदिर को ठीक बीच में से चीर कर दोनों हिस्सों को सड़क के दानों किनारों पर सरका दिया गया हो। इस द्वार पर भी बांस की भव्य सजावट है।

    भारतीय ऋषि की प्रतिमा

    यहाँ समुद्र के किनारे कुछ छोटे-छोटे स्तंभों पर विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं रखी हुई हैं। इनमें से एक प्रतिमा जटाजूट-धारी भारतीय ऋषि की जान पड़ती है जिसके गले एवं भुजाओं में मोटे-मोटे रुद्राक्ष पड़े हुए हैं। उसके एक हाथ में फूल और एक हाथ में देवता के समक्ष बजाई जाने वाली हाथ की घण्टी है। ऋषि प्रतिमा के सिर पर एक गोल टोपनुमा मुकुट है। आज किसी श्रद्धालु ने इस ऋषि प्रतिमा को पीताम्बर धारण करवा दिया था जिससे प्रतिमा की शोभा कई गुणा बढ़ गई प्रतीत होती थी।

    समुद्र ने मनाया तनाहलोट में गुलंगान

    जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमें ज्ञात हुआ कि इस समय समुद्र में ज्वार आया हुआ है इसलिए मंदिर तक जाने की अनुमति नहीं है। हमें द्वीप की मुख्य भूमि पर खड़े रहकर, लगभग 100 मीटर दूर स्थित टापू पर स्थित मंदिर को देखकर संतोष करना पड़ा। समुद्र की लहरें उस टापू से टकराकर लौट रही थीं। ऐसा लगता था मानो समुद्र भी गुलंगान के त्यौहार पर, मंदिर की सीढ़ियों और दीवारों का स्पर्श करने के लिए चला आया था। समुद्र के इस प्रकार अड़ंगा लगा देने के कारण हमें लगा मानो तीन लाख रुपए के टिकट व्यर्थ ही चले गए।

    नहीं मिला पवित्र जल

    पुतु ने हमें कहा कि जब आप समुद्र में होकर मंदिर तक जाएं तो वहाँ से पवित्र जल लेकर अपने ऊपर छिड़कें तथा अपने साथ भी लेकर आएं। यह ठीक वैसा ही था जैसा भारत के लोग नदियों में स्नान के लिए जाते समय करते हैं तथा गंगाजल अपने साथ लेकर आते हैं। अब चूंकि हम मंदिर तक पहुंच ही नहीं सके थे, इसलिए पवित्र जल प्राप्त करना भी संभव नहीं रह गया था।

    समुद्र किनारे सामूहिक पूजन

    जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमने वहाँ लगभग 150 फुट लम्बे, 40 फुट चौड़े एवं लगभग 4 फुट ऊंचे चबूतरे पर शानदार पीले रंग की छतरियां तनी हुई देखीं जो वहाँ स्थाई रूप से बने छोटे-छोटे लगभग दो-ढाई फुट ऊंचे देवालयों के ऊपर तानी गई थीं। इन लघु देवालयों के समक्ष केले एवं नारियल के पत्तों एवं बांस की बनी हुई छोटी-छोटी ट्रे अथवा थाली में पूजन सामग्री अर्पित की गई थी। इस पूरे चबूतरे को एक शानदार लम्बे पीले रंग के कपड़े से चारों ओर से ढंका गया था। इसके समक्ष सैंकड़ों नर-नारी परम्परागत नए परिधानों में सज-धज कर बैठे थे। कुछ पुजारी मंत्रों का उच्चारण करते हुए श्रद्धालुओं पर पवित्र जल का छिड़काव कर रहे थे। इस पूरे वातावरण में पीला और श्वेत रंग ही छाया हुआ था।

    सभी पुरुष सुखासन में अर्थात पालथी मार कर बैठे थे। अधिकांश महिलाएं भी उन्हीं की तरह सुखासन में विराजमान थीं किंतु कुछ महिलाएं बौद्ध भिक्षुओं की तरह घुटने मोड़कर, घुटनों और पंजों के सहारे उकड़ूं बैठी थीं। इस सामूहिक पूजन को देखना अत्यंत रोमांचकारी था। सारा काम बिना किसी आवाज के, बिना किसी भागम-भाग और चिल्ल-पौं के हो रहा था। यहाँ माता-पिता अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर नहीं आए थे। पुरुषों ने पुतु जैसी टोपियां पहनी हुई थीं जिनके आगे के हिस्से को गांठें लगाकर भारतीय कौए जैसी आकृति दी गई थी।

    पूजन क्षेत्र लोहे की जाली से घिरा हुआ था। इसके चारों ओर सैंकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक घूम रहे थे, किंतु श्रद्धालु जन उनकी तरफ से नितांत निश्चिंत थे। इस जाली के बाहर बहुत सी स्त्रियां अपने स्टॉल लगाकर खड़ी थीं जहाँ पूजा की थालियां बेची जा रही थीं।

    हाथ जोड़कर नमस्कार

    सभी स्त्री-पुरुष, देव पूजन के बीच-बीच में दोनों हाथ जोड़कर तथा उन्हें अपने माथे से लगाकर देवताओं को नमस्कार कर रहे थे, नमस्कार की यह मुद्रा ठीक वैसी ही थी, जैसी कि भारतीय हिन्दू, मंदिरों में देवताओं को प्रणाम करते हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-14 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-3 गुलंगान जुलूस- बारोंग के लिए बलि

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-14 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-3 गुलंगान जुलूस- बारोंग के लिए बलि

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 14


    बाली द्वीप पर दूसरा दिन- 3


    कुता में खरीददारी

    अभी सायं के चार बजे थे किंतु धूप की चमक कम होने लगी। हम भी थकान का अनुभव कर रहे थे। इसलिए हमने मैंगवी लौटने का निर्णय लिया। यह मार्ग कुता से होकर जाता था जो बाली द्वीप के मुख्य नगरों में से एक है। हमने पुतु से कहा कि किसी बड़े जनरल स्टोर पर चले ताकि हम कुछ तरकारी और दूध खरीद सकें। यदि हम भारत में होते तो अब तक तो मार्ग में दो-तीन बार चाय पी चुके होते किंतु यहाँ ऐसी कोई दुकान नहीं थी जिस पर चाय बिकती हो। तबनन क्षेत्र में एक रेस्टोरेंट में कॉफी थी किंतु वह भी बिना दूध-चीनी की। इसे पीना हमारे लिए न तो संभव था और न आनंददायक।

    काफी देर चलने के बाद कुता में एक बड़े मॉल के सामने पुतु ने गाड़ी रोकी। पुतु के हिसाब से यह एक मॉल था किंतु भारत के हिसाब से यह एक मध्यम आकार के जनरल स्टोर से अधिक कुछ भी नहीं था। यहाँ हमें कई तरह की हरी तरकारियां देखने को मिलीं। आलू, प्याज, टमाटर, दूध, फल भी प्रचुर मात्रा में थे। वहाँ कई तरह की प्याज और आलू रखे हुए थे जिनके कंटेनर पर लगे लेबल पर उसके भाव के साथ-साथ उस देश का नाम भी लिखा हुआ था जहाँ से वह तरकारी आई थी। यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि अधिकांश तरकारी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया तथा मुम्बई से आई थी। यहाँ तक कि केले भी विदेशी थे। बाली द्वीप के केले आकार में बहुत छोटे, स्वाद में खट्टे-मीठे और अपेक्षाकृत कम मुलायम थे। सेब कई प्रकार का था और विश्व के अनेक देशों से मंगाया गया था। विदेशों से आई हुई यह सारी तरकारी और फल, भारत की अपेक्षा कई गुना अधिक दामों पर उपलब्ध थी।

    हमने आगे के दिनों के हिसाब से तरकारी और दूध के डिब्बे खरीद लिए। दूध के इन डिब्बों पर दुधारू पशुओं चित्र बने हुए थे किंतु उनमें मिल्क पाउडर के साथ-साथ कई तरह के प्रोटीन और वनस्पति तेल भी मिले हुए थे।

    बांस के कण्डील

    अभी हम कुता शहर में कुछ दूर चले थे कि हमें महिलाओं का एक जुलूस सड़क पर चलता हुआ दिखाई दिया। हमारे अनुरोध पर पुतु ने गाड़ी सड़क पर एक तरफ लगा दी और हम जुलूस देखने के लिए नीचे उतर गए। यह एक शानदार जुलूस था जिसमें मुख्यतः महिलाएं ही भाग ले रही थीं। इन महिलाओं ने अनिवार्य रूप से लम्बी सफेद कमीज तथा काले रंग की तहमद पहन रखी थी। सभी महिलाओं ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट पर लाल रंग के कपड़े का फेंटा बांध रखा था।

    सभी महिलाओं के सिर पर बांस की खपच्चियों से बने हुए कंदील थे जिनके ऊपरी हिस्से में दीपक का प्रकाश जगमगा रहा था। ताजा बांस से निर्मित होने के कारण ये कंदीलें पीले रंग की दिखाई देती थीं तथा इन पर फूलों से सजावट भी की गई थी। ऐसा प्रतीत होता था कि ये कंदील किसी देवता के देवालय थे तथा इन देवताओं की शोभायात्रा निकाली जा रही थी।

    शोभा यात्रा में सम्मिलित समस्त महिलाओं का शरीर सधा हुआ, कमर सीधी, गर्दन तनी हुई तथा चाल मंद थी। जुलूस के अगले हिस्से में एक महिला सफेद कमीज के नीचे सफेद तहमद धारण करके आई थी। उसके साथ एक पुरुष भी चल रहा था, उसने भी सफेद कमीज तथा सफेद तहमद धारण कर रखी थी। ये दोनों इस शोभायात्रा में धार्मिक महत्व रखने वाले पुजारी अथवा ओझा जैसे प्रतीत हो रहे थे।

    इस शोभायात्रा के साथ कुछ ऐसी महिलाएं भी चल रही थीं जिन्होंने अपने सिर पर कंदील-नुमा देवालय नहीं उठा रखे थे। उनकी पोषाक की शैली तो वही थी किंतु उनकी कमीज, तहमद तथा फेंटे के रंग अलग थे। शोभायात्रा के अग्रभाग में कुछ पुरुष लाल रंग के दो छत्र उठाए चल रहे थे जैसे कि भारत में रामनवमी, अग्रसेन जयंती एवं चेटीचंड के जुलूसों में देखने को मिलते हैं।

    शानदार संगीतमय जुलूस कंदील वाली महिलाओं की शोभायात्रा जैसे ही हमारे सामने से आगे बढ़ गई, हमें कुछ दूरी पर सड़क पर चलता हुआ एक शानदार संगीतमय जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। इसमें केवल पुरुष और बच्चे सम्मिलित थे। कुछ छोटी लड़कियां भी अपने पिताओं की अंगुली पकड़ कर इस जुलूस में चल रही थीं। पुरुषों और लड़कों ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट तथा सफेद रंग की ठीक वैसी ही टोपी पहन रखी थी जैसी टोपी सुबह से पुतु धारण किये हुए था और जिसके स्थान पर भारतीय कौआ बैठे हुए होने का आभास होता था।

    पुरुषों तथा लड़कों ने एक विशेष शैली में तहमद बांध रखी थी। यह तहमद दो लड़ी थी। अर्थात् एक तहमद के ऊपर दूसरी तहमद बांधी हुई थी। नीचे वाली तहमद अधिक लम्बी थी तथा ऊपर वाली तहमद कम लम्बी थी। इस कारण दोनों तहमदें आसानी से दिखाई दे रही थीं। इनमें से एक तहमद प्रायः सफेद रंग की थी तथा दूसरी तहमद पीले अथवा लाल-पीले और सफेद-काली चौकड़ियों के कपड़े से बनी हुई थी। बाली के हिन्दुओं के लिए सफेद-काली चौकड़ी के कपड़े की तहमद का अवश्य ही कोई धार्मिक महत्व है क्योंकि इस तरह की तहमद नगर में बने हुए विभिन्न तोरणद्वारों के बाहर बनी मूर्तियों, स्तम्भनुमा देवालयों पर भी बंधी हुई हैं।

    जुलूस में सबसे आगे चल रहे युवक मृंदग, झांझ तथा कुछ विचित्र से वाद्ययंत्र बजाते हुए चल रहे थे। इनमें से कुछ वाद्ययंत्र भारतीय प्राचीन मंदिरों में अप्सराओं और गंधर्वों के हाथों में दिखाई देते हैं। इन वाद्ययंत्रों से निकल रही संगीतमय ध्वनि यद्यपि हमने जीवन में प्रथम बार सुनी थी किंतु यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था कि यह एक धार्मिक आयोजन का संगीत है। इस जुलूस को, साथ चल रहे युवक ही नियंत्रित कर रहे थे। चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस का एकाध कर्मचारी शायद ही कहीं दिखाई देता था किंतु इसके उपरांत भी कहीं कोई भागम-भाग, धक्का-मुक्की, चिल्ल-पौं जैसी स्थिति नहीं थी।

    सभी लोग बहुत शांत भाव से कदम से कदम मिलाते हुए आधी सड़क खाली छोड़कर चल रहे थे। छोटे बच्चों ने अपने पिताओं के हाथ अनिवार्य रूप से पकड़े हुए थे। इस जुलूस को देखकर वाहन स्वतः ही रुक जाते थे ताकि जुलूस निर्बाध रूप से चलता रहे।

    बाली के नागरिकों का आत्मानुशासन देखकर मुझ जैसे व्यक्ति को अचंभित होना स्वाभाविक था जिसने अपना पूरा जीवन भारत के भीड़-भड़ाके और शोर-शराबे में व्यतीत किया हो। जहाँ लोग अनिवार्य रूप से एक-दूसरे को धक्का देते हुए, एक दूसरे का कंधा छीलते हुए, जोर-जोर से चिल्लाते और बतियाते हुए सड़कों पर निकलते हैं। भारत में जुलूस का अर्थ ही सड़क पर फैली अफरा-तफरी से है। भारत की सड़कों पर निकलने वाले धार्मिक जुलूसों में आधी सड़क खाली कौन छोड़ता है!

    बारोंग के समक्ष बलि

    हम इन जुलूसों का आनंद लेकर फिर से पुतु की कार में सवार हो गए। अभी लगभग दो किलोमीटर चले थे कि पुतु ने गाड़ी को ब्रेक लगाये। हमने देखा कि सामने से एक और जुलूस चला आ रहा है। एक बड़ी सी खुली गाड़ी पर एक विशालाकाय बारोंग की प्रतिमा रखी हुई है। यह एक विशालयाकाय एवं भयानक दिखने वाली आकृति का वाराह था। लोग उसके सामने नृत्य कर रहे हैं।

    ठीक इसी समय दूसरी दिशा से सैंकड़ों स्त्री-पुरुषों का एक और जुलूस आया। ये लोग बहुत सजे-धजे थे और इन्होंने नये वस्त्र धारण कर रखे थे। अधिकांश महिलाओं ने सफेद अथवा पीले रंग के जालीदार कपड़े की लम्बी कमीजें पहन रखी थीं जिन पर लाल अथवा गुलाबी रंग के फेंटे बंधे थे। इन महिलाओं ने अपने सिरों पर बांस की टोकरियां उठा रखी थीं जिनमें फल-फूल रखे थे। कुछ लोगों ने अपने हाथों में केले के पत्ते लिए हुए थे।

    ये दोनों जुलूस एक चौरोहे की दो विपरीत दिशाओं से आए और चौराहे पर आकर ठहर गए। इसका अर्थ यह था कि एक जुलूस बारोंग के साथ आया था और दूसरा जुलूस बारोंग की पूजा करने के लिए आया था। बारोंग की आकृति अब शांत खड़ी थी तथा उसके समक्ष नृत्य बंद हो गया था। दूसरी तरफ से जो स्त्रियां टोकरियों में पूजन सामग्री लाई थीं, वह पूजन सामग्री टोकरियों सहित बारोंग के समक्ष रख दी गईं।

    बारोंग के साथ चल रहे ओझा जैसे दिखने वाले एक मनुष्य ने बारोंग की स्तुति में मंत्र बोलने आरम्भ किये। ये बाली की स्थानीय भाषा में थे, इसलिए हमारी समझ में नहीं आए। लगभग 15 मिनट तक मंत्रोच्चार एवं पूजन चलता रहा। इसके बाद ओझा को मुर्गी का एक छोटा चूजा दिया गया। एक व्यक्ति ने ओझा को बड़ी सी छुरी पकड़ाई। छोटा सा चूजा भय से कांप रहा था। ऐसा लगता था, वह समझ गया था कि उसके साथ क्या होने वाला है! मैं भी समझ चुका था कि यहाँ क्या होने वाला है! इसलिए इससे आगे देख पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं तस्वीरें उतारना छोड़कर पुतु की गाड़ी में आकर बैठ गया। मैंने कुछ क्षणों के लिए आंखें बंद करके ईश्वर से प्रार्थना की कि चूजे को इस प्रक्रिया में कष्ट न हो। पता नहीं इससे चूजे का कष्ट कम हुआ या नहीं, किंतु इससे मेरे मन को शांति अवश्य मिली थी।

    मैंने आंखें खोलकर पुतु से पूछा कि क्या उसकी बलि दी गई? पुतु ने बुझे स्वर से कहा कि हाँ बारोंग को चिकन की बलि दी गई ताकि वह प्रसन्न हो और इस नगर से समस्त बुराइयों को नष्ट करके यहाँ के लोगों की रक्षा करे। उसकी आवाज बता रही थी कि उसे भी इससे कष्ट हुआ है। हो भी क्यों नहीं, इन दिनों वह शाकाहारी बनने का अभ्यास जो कर रहा था और सप्ताह में दो दिन केवल शाकाहार कर रहा था। चौराहे पर सार्वजनिक बलि का आयोजन बहुत अटपटी लगने वाली बात है किंतु यह बाली के हिन्दू समाज में प्रचलित महत्वपूर्ण प्रथाओं में ऐ एक है जो सर्वजनहिताय- सर्वजनसुखाय की भावना से प्रेरित है। वैष्णव धर्म के प्रसार से पहले भारत के हिन्दुओं में भी यह कुप्रथा भिन्न-भिन्न रूपों में प्रचलित थी।

    मुझे स्मरण हो आया कि 27 जून 2002 को नेपाल के हिन्दू राजा ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाह ने भारत के कामाख्या मंदिर में देवी के समक्ष भैंसा, बकरा, भेड़, कबूतर तथा बत्तख की पंचबलि करवाई थी। इस घटना के पश्चात् छः साल से भी कम समय में नेपाल की जनता ने राजा ज्ञानेन्द्र शाह को गद्दी से उतारकर, नेपाल से राजशाही का समपापन कर दिया था। मुर्गी के बच्चे की बलि के बाद समस्त मनुष्य उठकर चले गए किंतु जाने से पहले वहाँ उपस्थित प्रत्येक वस्तु को उठाकर अपने साथ ले गए। सड़क और चौराहा ऐसे साफ हो गए जैसे कुछ देर पहले वहाँ कुछ हुआ ही नहीं था।

    पपीते की सब्जी

    जब मैंगवी गांव के बाहर चावल के खेतों में बने हुए अपने सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचे तो संध्या के छः बजे थे। सूर्य देवता पश्चिम में काफी नीचे आ गए थे किंतु दिन का उजाला अभी भी बना हुआ था। पिताजी की दृष्टि सर्विस अपार्टमेंट से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे खड़े पपीते के एक लम्बे पेड़ पर गई। पूरा पेड़ लम्बी आकृति के बड़े फलों से लदा हुआ था। पिताजी ने पुतु से पूछा कि क्या हम एक पपीता तोड़ सकते हैं! पुतु ने कहा कि ये पपीते पूरे मौहल्ले के हैं, इन्हें कोई भी तोड़कर अपने उपयोग में ले सकता है किंतु उसे बाजार में बेच नहीं सकता। पुतु को यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि हम कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर खाने वाले थे। पिताजी ने ही वह पपीता तोड़ा। पपीता तोड़ने के प्रयास में पपीता उनकी नाक पर आ गिरा और उन्हें हल्की सी चोट भी लगी किंतु पपीते की सब्जी इतनी स्वादिष्ट बनी कि उसके लिए यह चोट सहन की जा सकती थी।

    चावल के खेतों में चाय

    पीते और सूर्यास्त देखते हुए बीती संध्या हिन्दुस्तानी आदमी की सबसे बड़ी विलासिता है, सामूहिक रूप से बैठकर चाय पीना। हमारे पास दूध पर्याप्त मात्रा में आ चुका था। हमने सर्विस अपार्टमेंट में घुसते ही चाय बनाई और चावल के खेतों में खुलने वाले उसी लॉन में बैठकर पी जहाँ से धरती स्वर्ग जैसी दीख पड़ती थी। वह संध्या चावल के खेतों के बीच सूर्यास्त देखते हुए बीती। चाय का एक चरण पूरा होने पर दूसरा चरण भी आयोजित किया गया।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-15 बाली द्वीप पर तीसरा एवं चौथा दिन उबुद एवं कुता

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-15 बाली द्वीप पर तीसरा एवं चौथा दिन उबुद एवं कुता

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 15


    बाली द्वीप में तीसरा दिन


    तीसरी सुबह 16 अप्रेल को भी आंख जल्दी ही खुल गई। सूर्योदय का आनंद हमने उसी लॉन में बोगनविलिया के छज्जे के नीचे बैठकर चाय पीते हुए लिया। आज भी हमने पुतु को लगभग दस बजे बुलाया था ताकि हम सुबह का नाश्ता और दिन का खाना बनाकर अपने साथ ले सकें।

    मूंछों वाले बंदर

    ठीक दस बजे पुतु गाड़ी लेकर आ गया और हम उसके साथ चल पड़े। सबसे पहले वह हमें उलूवातू के प्रसिद्ध मंकी गार्डन में ले गया। यहाँ पूरे उद्यान में लाल मुंह के एवं अपेक्षाकृत छोटे आकार के बंदर हैं जिन की मूंछें देखकर आश्चर्य होता है। उस उद्यान में बंदरों एवं अन्य पशु-पक्षियों तथा जलचरों की बहुत सारी मूर्तियां हैं जो दर्शक का ध्यान बरबास ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। यहाँ बहुत सी नर-प्रतिमाएं ऐसी हैं जिनकी आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। मोटे होठों और फूल हुए गालों वाली औरंगुटान की देहयष्टि वाली मनुष्य प्रतिमाएं यहाँ भी दर्शकों को आश्चर्य में डाल देती हैं।

    यहाँ एक भी प्रतिमा ऐसी नहीं है जिसे सामान्य माना जाए अथवा उसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाएं कुछ पर्यटक बंदरों को खिलाने के लिए केले लाए थे। कुछ बंदर पर्यटकों के हाथों से केले लेकर शालीन भाव से खा रहे थे किंतु कई बंदर केलों को प्राप्त करने के लिए पर्यटकों के कंधों और सिर पर आकर बैठ रहे थे। यहाँ स्थित कुछ मूर्तियों को दखने से अनुमान हुआ कि इस वन के बंदर शताब्दियों से मनुष्यों के सिर पर बैठते आए हैं। हम लगभग दो घण्टे उबुद वानर वन में रुके। इस वन को देखने का अनुभव कभी न भुलाए जाने वाले अनुभवों में से है।

    राजा का उदास महल

    मूर्तियों एवं मूंछों वाले बंदरों के संसार से निकल कर हम कुता शहर के मुख्य भाग में आ गए जहाँ हमें कुता के प्राचीन शासक का महल देखने को मिला। महल का काफी हिस्सा खण्डहर हो गया है तथा जो कुछ भी ठीक-ठाक अवस्था में है, वह लगभग बंद कर दिया गया है। यह लाल रंग की ईंटों से बना हुआ भवन समूह है। इन ईंटों का निर्माण भारत में बनने वाली ईंटों के समान प्रतीत होता हैं अर्थात् कच्चे गारे से बनी की ईंटों को तेज आंच में पकाया गया है। पूरा महल अपनी भव्यता को खोकर उदास सा खड़ा हुआ प्रतीत होता है।

    जन सामान्य के बीच नृत्य-नाटिका का अभ्यास

    इस महल के एक हिस्से में कुछ स्थानीय महिला एवं पुरुष कलाकार इण्डोनेशियाई भाषा में किसी नृत्य-नाटिका का अभ्यास कर रहे थे। निकट बने लकड़ी के एक बड़े मण्डप में बहुत से कलाकार विविध प्रकार के वाद्ययंत्र बजा रहे थे। इनमं से अधिकांश वाद्ययंत्रों की आकृतियां भारतीय वाद्ययंत्रों से मेल नहीं खातीं। संसार के विभिन्न देशों से आए हुए दर्जनों पर्यटक इन कलाकारों को देखने के लिए उन्हें घेरा बनाकर खड़े थे। यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा था कि यहाँ नृत्य-नाटिकाओं के कलाकार खुले स्थान पर आकर अभ्यास करते हैं जबकि भारत में इस प्रकार का अभ्यास प्रायः बंद कमरों में किया जाता है।

    इतिहास एवं संस्कृति की पुस्तकें

    इस महल के चारों ओर, कुता का अत्यंत व्यस्त बाजार है। महल से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर हमें एक बड़ा बुक-स्टोर मिला जिसमें इण्डोनेशिया के इतिहास एवं संस्कृति से सम्बन्धित कई पुस्तकें उपलब्ध थीं। अन्य वस्तुओं की तरह किताबें भी बहुत महंगी थीं। फिर भी हमने अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुन लीं।

    कलाकृतियों की दुकानों में सन्नाटा

    यहाँ से पुतु हमें टैरेस फील्ड्स की तरफ ले गया जहाँ पहाड़ियों की ढलानों को सीढ़ी की तरह समतल बनाकर वहाँ चावल की खेती की जाती है। वहाँ तक जाने के लिए हमें एक नगरीय क्षेत्र से होकर निकलना पड़ा। यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि सड़क के दोनों ओर सजावटी कलाकृतियों की सैंकड़ों दुकानें स्थित थीं। बांस, लकड़ी तथा अन्य सामग्री से बनी कलाकृतियां। अत्यंत सुंदर पेंटिंग, सैंकड़ों तरह के समुद्री जीवों के खोल, रंग-बिरंगे आभूषण, क्या नहीं था वहाँ!

    इनमें से आधी से अधिक दुकानें बंद थीं तथा खुली हुई दुकानों में भी शायद ही किसी दुकान पर कोई ग्राहक खड़ा हुआ दिखाई दिया। यह बाली के लोगों के जीवन की वास्तविकता थी। यहाँ बहुत से परिवारों की आजीविका पर्यटकों के आगमन पर टिकी हुई है। चूंकि यह पर्यटकों के आने का मौसम नहीं था और बाली द्वीप पर बहुत कम पर्यटक मौजूद थे इसलिए इन दुकानों पर सन्नाटा था।

    राइस टैरेस फील्ड्स

    यह एक पहाड़ी क्षेत्र था, यहाँ बहुत सघन वनावली के बीच, चावल के टैरेस फील्ड्स स्थित थे। कुछ खेतों में किसान काम कर रहे थे। उनकी नुकीली शंक्वाकार टोपियां देखने वाले का मन मोह लेती हैं। हमें लग रहा था जैसे हम अलग ही संसार में आ गए हैं। पुतु ने एक स्थान पर गाड़ी रोककर हमें वहाँ से पैदल चलकर पहाड़ी उतरने तथा लगभग आधा किलोमीटर दूर दिखाई दे रही पहाड़ी पर पहुंचकर टैरेस फील्ड्स का आनंद लेने के लिए कहा। हमने बहुत से पर्यटकों को वहाँ जाते हुए भी देखा। हमारे पैरों में इतनी शक्ति नहीं थी कि हम एक पहाड़ी उतर कर और दूसरी पहाड़ी चढ़कर वहाँ तक पहुंचें और फिर इतना ही चलकर लौटें। इसलिए हमने वहाँ जाना टाल दिया तथा अगले गंतव्य के लिए चलने का अनुरोध किया।

    जंगल में मंगल

    थोड़ी देर चलने पर चावल के खेतों की शृंखला समाप्त हो गई तथा सघन पहाड़ियां आरम्भ हो गईं। यहाँ इतना सघन वन था कि हरीतिमा अपने चरम पर पहुंच गई प्रतीत होती थी। हमने पुतु से अनुरोध किया कि किसी स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ हम दोपहर का भोजन कर सकें। पुतु यहाँ के चप्पे-चप्पे से परिचित था। शीघ्र ही उसने सड़क के किनारे बने एक मंदिर के निकट स्थित बरामदे को तलाश लिया। यहाँ कोई मनुष्य नहीं था। मंदिर पर ताला पड़ा हुआ था तथा बारामदा भी पूरी तरह खाली था। हमने वहीं बैठकर भोजन करने का निर्णय लिया। जंगल में परिवार के साथ बैठकर इस प्रकार भोजन करने का हमारा यह पहला ही अवसर था। इस भोजन में ऐसा स्वाद आया जिसका वर्णन करना संभव नहीं है।

    दान-पुण्य एवं पूजा वाली थाली

    जहाँ बैठकर हमने भोजन किया, उसके निकट एक बंद दुकान थी जिसके बाहर लगे सूचीपट्ट से ज्ञात होता था कि यहाँ नारियल, पुष्प एवं अन्य पूजन सामग्री बिकती थी। इस सूचीपट्ट पर रोमन लिपि में यह शीर्षक अंकित था- ''दान पुण्य पूजा वाली रिंग पुरा दालेम'' अर्थात् दान-पुण्य एवं मंदिर में पूजा की गोल थाली की वस्तुओं के मूल्य। इस सूची की वस्तुओं के नाम तो मेरी समझ में नहीं आए किंतु उनकी दरों को पढ़कर सहज ही समझा जा सकता था कि ये बहुत महंगी थीं।

    चूजे के करतब

    हम भोजन कर ही रहे थे कि किसी पक्षी का एक रंगीन चूजा कहीं से भटक कर हमारे पास आ गया। यह चटख पीले रंग का पक्षी था जो उड़ नहीं सकता था। जैसे ही डेढ़ साल की दीपा की दृष्टि उस पर पड़ी, वह उसके पीछे लग गई। चूजा भी जैसे उसी के साथ खेलने आया। वह गोल-गोल घूमता हुआ दीपा को अपने पीछे दौड़ाने लगा। दीपा ने बहुत प्रयास किया किंतु उसे पकड़ नहीं सकी। जब दीपा थककर रुक जाती, चूजा उसके पास आकर खड़ा हो जाता और दीपा फिर से उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ती। यह क्रम काफी देर तक चला।

    देवता का थान

    भोजन करने के बाद हम लोग ऐसे ही थोड़ा बहुत पैदल चलकर जंगल देखने लगे। मैंने देखा कि निकट ही एक अन्य चबूतरा बना हुआ था जिसके चारों ओर लगभग डेढ़ फुट ऊंची चारदीवारी थी। मैं उत्सुकतावश उसके निकट चला गया। चबूतरे पर एक छोटा सा देवरा बना हुआ था जिसमें पत्थर की एक अनगढ़ प्रतिमा रखी थी। थान के पीछे की ओर एक लम्बा पेड़ खड़ा था जिससे देवालय पर छाया हो रही थी। यह लगभग वैसा ही था जिस प्रकार राजस्थान में खेजड़ी के नीचे गोगाजी और बायासां के थान होते हैं। मैंने इस थान की कई तस्वीरें उतारीं।

    इन्द्र का मंदिर

    जंगल में लंच का आनंद उठाकर हम फिर से पुतु की गाड़ी में चल पड़े। इस बार वह हमें पहाड़ों के बीच बने एक मंदिर ले गया। यह इन्द्र को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था। मंदिर तक पहुंचने के लिए काफी सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता और वापस ऊपर चढ़ना पड़ता। इसके लिए हमारे दल के सदस्य तैयार नहीं थे। हमारी अन्यमनस्कता का एक कारण यह भी था कि इस छोटे से मंदिर को देखने के लिए हमें अच्छी-खासी राशि व्यय करके टिकट खरीदने पड़ते। भारतीय होने के कारण हमें मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट खरीदना जंच नहीं रहा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए अलग से टिकट लेना पड़ रहा था। इसलिए हमने मंदिर तक उतरने का विचार त्याग दिया और मंदिर परिसर तथा भवन को ऊपर सड़क पर खड़े होकर देखा। यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर जान पड़ता था। बाली की परम्परा के अनुसार पूरा मंदिर काले पत्थर का बना हुआ था जिसकी दीवारों पर उगी हुई काई यह बता रही थी कि यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है तथा दीवारें वर्ष में अधिकांश दिनों में भीगी रहती हैं। मंदिर परिसर में बने जल-कुण्ड और उनमें कमल के पुष्प इस तरह का दृश्य उत्पन्न कर रहे थे जिस तरह के दृश्यों का अंकन भगवान वेदव्यास ने महाभारत में कई स्थानों पर किया है। विशेषकर यक्ष-प्रश्न वाले प्रकरण में।

    झरने से निराशा

    पुतु ने हमें एक प्राकृतिक जल प्रपात तक ले जाने का निर्णय लिया। यह बहुत हरा-भरा पहाड़ी स्थान था। यहाँ भी इण्डोनेशियाई सरकार के पर्यटन विभाग ने टिकट लगा रखा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए भी अलग से राशि चुकानी पड़ती थी। चूंकि हमने सुबह से केवल गाड़ी में भ्रमण किया था तथा पैदल चलकर किसी भी स्थान को निकट से नहीं देखा था। इसलिए यहाँ हमने रुकने का निर्णय लिया। लगभग आधा किलोमीटर तक पैदल चलकर तथा कुछ सीढ़ियां उतर कर हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ से झरना दिखाई देता था। इस पूरे मार्ग में बहुत से रेस्टोरेंट थे जिनमें नारियल, ब्लैक कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, चिकन, फिश, आमलेट जैसी बहुत सी चीजें बिक रही थीं किंतु इनमें से एक भी चीज हमारे काम की नहीं थी। हम चाय पीना चाहते थे किंतु बाली में चाय, वह भी दूध वाली चाय का मिलना असंभव जैसा ही था।

    जिस स्थान से झरना दिखाई देता था, मैं और पिताजी वहीं रुक गए। मधु, बच्चों को साथ लेकर झरने के निकट तक गई। झरना यहाँ से लगभग एक किलोमीटर और दूर था। यह इतना छोटा था कि मुझे लगा कि इससे बड़े झरने तो वर्षाकाल में रेगिस्तान के बीच स्थित अरणा-झरणा की पहाड़ियों में दिखाई देते हैं। यह देखकर अफसोस हुआ कि इसे दिखाने के लिए भी इण्डोनेशियाई सरकार पर्यटकों से टिकट के पैसे वसूल रही है। लगभग एक घण्टे बाद मधु ने लौटकर बताया कि यह स्थान उनके लिए है जो शराब पीकर झरने में नहाने का आनंद लेना चाहते हैं। नीचे शराब की कुछ दुकानें हैं जहाँ से यूरोपीय पर्यटक शराब खरीद रहे हैं और झरने में नहा रहे हैं।

    सर्विस अपार्टमेंट को वापसी

    शाम के लगभग तीन बज चुके थे। हम सर्विस अपार्टमेंट के लिए लौट पड़े। यहाँ से मैंगवी लगभग दो घण्टे की दूरी पर था। वहाँ पहुंचते-पहुंचते सूर्य देव का प्रकाश कम होने लगा। सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचते ही भानु ने चाय बनाई और हमने उसी शीशे वाले बरामदे के सामने बने लॉन में बैठकर पी जो सीधा चावल के खेतों में खुलता था। गर्म चाय पाकर आनंद का कोई पार नहीं था। हमें पुतु ने बताया कि अगले दिन हम एक-दो मंदिर तथा समुद्र-तट देख सकते हैं किंतु हमने अगला दिन विश्राम के लिए निर्धारित किया। हमें जोधपुर से चले लगभग एक सप्ताह हो गया था और अब हमें आराम की जरूरत थी। अब तक जो कुछ भी देखा था, उसे भी लिपिबद्ध करने की आवश्यकता थी। इसलिए हमने पुत्तु से कहा कि वह अगले दिन न आए।


    बाली द्वीप में चौथा दिन

    17 अप्रेल को भी नींद प्रातः पांच बजे के आसपास खुल गई। इस समय भारत में तो ढाई बज रहे होंगे। आज का दिन भी हमने चावल के खेतों में बने हुए लॉन में चाय पीने से आरम्भ किया। चूंकि आज पुतु को नहीं आना था, इसलिए हम ज्यादा रिलैक्स की स्थिति में थे। सुबह-सवेरे ही मैं लैपटॉप लेकर बैठ गया और पिछले तीन दिनों की यात्रा के अनुभवों को लिखने का प्रयस करने लगा। दस बजे के लगभग मधु ने कहा कि आज थोड़ी देर के लिए पैदल ही घूम आते हैं। इसलिए मैं, विजय और मधु पैदल ही पुरा तमन अयुन टेम्पल की तरफ चल पड़े।

    मुख्य द्वार पर स्वस्तिक एवं गणेश

    हम आज उस मार्ग पर चले जो खेतों के बीच से न होकर, गांव के बीच से होकर जाता था। हमने देखा कि अधिकांश घरों के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर या तो गणेशजी की प्रतिमा स्थापित है या फिर वहाँ स्वस्तिक आकृति अंकित है जिसे भारत में गणेशजी का प्रतीक माना जाता है। मार्ग में कुछ मंदिर देखे जिनके बाहर उसी प्रकार द्वारपाल बने हुए थे जिस प्रकार भारत में बनाए जाने की परम्परा है। अंतर केवल इतना था कि भारत में द्वारपालों को प्रमुखता नहीं दी जाती है इसलिए सहज ही उन पर ध्यान नहीं जाता जबकि बाली में मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों ओर द्वारपालों की मनुष्याकार प्रतिमाएं प्रमुखता से स्थापित की गई हैं जिन पर चटख रंग किये गए हैं।

    चुड़ैलों, राक्षसों और देवी-देवताओं का विचित्र संसार

    तमन अयुन मंदिर के मार्ग में हमारी दृष्टि अचानक एक विकराल स्त्री प्रतिमा पर गई। लगभग आठ फुट ऊंची यह विकराल प्रतिमा एक भवन की दीवार के बाहरी आले में लगी हुई थी। हमारा ध्यान उस भवन की ओर गया। यह एक प्रदर्शनी थी जिसमें बाली शैली के देवी-देवताओं और राक्षसों की सात से आठ फुट ऊँची प्रतिमाएं लगी हुई थीं। पैदल चलने के कारण हम थक चुके थे और भीतर जाने की हिम्मत नहीं थी। अभी तो हमें वापस भी लौटना था। इसलिए हमने विजय से कहा कि वह इस प्रदर्शनी का वीडियो बना लाए। हम उस वीडियो को ही देख लेंगे। इस प्रदर्शनी देखने के लिए पच्चीस हजार रुपए का टिकट था। जब विजय वीडियो बनाने प्रदर्शनी घर में चला गया तो मैं और मधु प्रदर्शनी घर के बाहर ही बैठ गए।

    विजय द्वारा बनाकर लाई गई वीडियो में हम चुड़ैलों, राक्षसों और देवी-देवताओं के अनोखे संसार को देखकर दंग रह गए। इसमें रामायण और महाभारत के प्रसंगों को दर्शाने वाली प्रतिमाएं थीं तो शिव-पार्वती, श्रीराम-जानकी आदि की बहुत सुंदर प्रतिमाएं भी थीं। सभी प्रतिमाएं विशुद्ध बाली शैली में थी। इनका अंग-सौष्ठव भिन्न प्रकार का था। प्रतिमाओं पर तेज चटख रंग किये हुए थे। प्रदर्शनी देखने के बाद हम अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट आए। शेष दिवस बाली यात्रा के संस्मरण लिखते हुए निकला।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-16 जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में पहला दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-16 जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में पहला दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 16

    जावा द्वीप पर पांच दिन



    बाली द्वीप से जावा द्वीप पर

    18 अप्रेल को हमें बाली द्वीप से विदा लेनी थी। हमारा विमान दोपहर 2.00 बजे का था किंतु हमने पुतु को प्रातः 9.00 बजे ही बुला लिया था। मैंगवी अर्थात् जिस स्थान पर हम ठहरे हुए थे, से देनपासार हवाई अड्डे की दूरी लगभग डेढ़ घण्टे की थी। देनपासार से हमें योग्यकार्ता जाना था जो कि जावा द्वीप पर स्थित है तथा इण्डोनेशिया के प्रमुख शहरों में से एक है। इसे जोगजकार्ता तथा जोगजा के नाम से भी जाना जाता है। बाली से योग्यकार्ता की हवाई दूरी 502 किलोमीटर है। इसलिए यह केवल 1 घण्टे 10 मिनट की घरेलू उड़ान थी। चूंकि बाली का समय योग्यकार्ता से एक घण्टे आगे है। इस कारण जब हम 2.00 बजे बाली से रवाना होकर तथा 1 घण्टे 10 मिनट की यात्रा करने के पश्चात् योग्यकार्ता एयरपोर्ट पर उतरे तो हमारी घड़ियों में 2.10 बज रहे थे।

    जावा द्वीप पर पहला दिन

    जैसा कि मैं पहले ही लिख चुका हूं कि हमने एक वैबसाइट के माध्यम से योग्यकार्ता में एक सर्विस अपार्टमेंट बुक करवा रखा था। यह मासप्रियो नामक मुस्लिम शिक्षक का फ्लैट था। उसने हमें भरोसा दिलाया कि हम उसके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी। इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने उन्हें भोजन बनाने के लिए मना कर दिया था क्योंकि हमारी संतुष्टि भारतीय प्रकार के भोजन से ही होने वाली थी। इम इस बात से आशंकित भी थे कि हर देश में शाकाहारी होने की परिभाषा बिल्कुल अलग है। जो भी हो, वैबसाइट पर उपलब्ध चित्रों के आधार पर हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया। सर्विस अपार्टमेंट के मालिक मि. मासप्रियो ने हमारे लिए एक ड्राइवर का प्रबंध किया जो हमें योग्यकार्ता एयरपोर्ट पर लेने के लिए आने वाला था। एयरपोर्ट से सर्विस अपार्टमेंट तक की टैक्सी के लिए 750 भारतीय रुपए भाड़ा बताया गया था, जो हमें ठीक ही लगा।

    मि. अन्तो से भेंट

    हमारी आशा के अनुरुप मि. मासप्रियो द्वारा भेजा गया ड्राइवर एयरपोर्ट के बाहर विजय के नाम की कागज की पट्टी लेकर खड़ा था। यह एक गोरे रंग और मंझले कद का हंसमुख युवक था। उसने बड़ी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया तथा भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। इस अभिवादन का जादू हमें विदेशी धरती पर जाकर ही ज्ञात हुआ। जैसे ही कोई इण्डोनेशियन व्यक्ति हाथ जोड़कर अभिवादन करता तो हमारे और उसके बीच की आधी दूरी उसी समय समाप्त हो जाती। ड्राइवर ने हमें अपना नाम अन्तो बताया तथा हम सबसे भी हमारे नाम पूछे। मुझे अनुमान है कि उसने उसी समय हमारे नाम याद भी कर लिए क्योंकि कुछ समय बाद उसने मुझे मि. मोहन कहकर सम्बोधित किया। उसके बाद मैंने भी उसे मि. अन्तो कहकर ही सम्बोधित किया। मैंने नोट किया कि जब भी मैं उसे मि. अन्तो कहता था तो उसके चेहरे पर विशेष प्रकार की मुस्कान आती थी। मि. अन्तो ने हमारे सामान को अपनी गाड़ी में जमाया। उसकी गाड़ी भी मि. पुतु की गाड़ी की तरह काफी बड़ी थी और हम अपने परिवार तथा सामान सहित मजे से उसमें बैठ गए।

    आई एम सॉरी

    अभी गाड़ी कुछ मीटर ही सरकी होगी कि मि. अन्तो ने आगे की सीट पर बैठे पिताजी से कहा- 'आई एम सॉरी, सीट बैल्ट प्लीज!' पिताजी ने भी उससे क्षमा मांगते हुए सीट बैल्ट लगाई। बाद में ज्ञात हुआ कि कुछ भी बोलने से पहले 'आईएम सॉरी' तथा बात के अंत में थैंक्यू कहना उसकी आदत थी। आगे चलकर हमें उसकी कुछ और अच्छी आदतें मालू हुईं। गाड़ी रोकते ही वह नीचे उतर कर कार का दरवाजा खोलता था और गाड़ी चलाने से पहले वह स्वयं सारे दरवाजे जांचता था कि वे बंद हुए हैं या नहीं। इस कार्य में वह बहुत ही कम समय लगाता था। उसकी एक अच्छी आदत यह भी थी कि जहाँ कहीं जरूरी होता था, वह हमें मार्ग में पड़ने वाले स्थान के नाम अथवा उसकी विशेषता के बारे में संक्षेप में अवश्य बताता था।

    योग्यकार्ता की चमचमाहट

    जब मि. अन्तो की गाड़ी एयरपोर्ट से बाहर निकलकर योग्यकार्ता की सड़कों पर फर्राटे भरने लगी तो हम इस नगर की चमक-दमक देखकर दंग रह गए। यह पूना जैसा एक बड़ा एवं आधुनिक शहर है। सड़कें काफी चौड़ी हैं जो डिवाइडर के माध्यम से दो प्रमुख हिस्सों में बंटी हुई हैं। प्रत्येक हिस्सा पुनः दो हिस्सों में बंटा हुआ है, बाईं ओर का हिस्सा दो पहिया वाहनों के लिए और दायीं ओर का हिस्सा चार पहिया वाहनों के लिए। इस व्यवस्था से वाहन तेजी से चल पा रहे थे और सड़क पर हॉर्न बजाने की नौबत ही नहीं आती थी। बीच-बीच में लालबत्ती पर जेबरा क्रॉसिंग की व्यस्था थी जहाँ से पैदल यात्री आसानी से आ-जा रहे थे।

    पूरी सड़क एकदम साफ-सुथरी, कहीं कोई भिखारी नहीं। चौराहों पर खड़े होकर सामान बेचने वाले अवांछित वैण्डर्स तक नहीं। सड़क के दोनों ओर भव्य बाजार था जिसका सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। इस क्षेत्र में बड़े मॉल और भव्य दुकानों की संख्या का कोई अंत नहीं था। लगभग आधा-पौन घण्टे तक योग्यकार्ता की सड़कों पर चलने के बाद हम समझ गए कि बाली और योग्यकार्ता में कोई समानता नहीं है। बाली की शांत और सीधी-सरल जिंदगी, योग्यकार्ता के चमक भरे आकर्षण से बिल्कुल अलग है। योग्यकार्ता की तुलना में बाली को साफ-सुथरा और सभ्य देहात ही कहा जा सकता है। हालांकि वहाँ भी कुता जैसे शहर हैं, किंतु वे योग्यकार्ता की तुलना में काफी छोटे हैं।

    मॉल की चमक-दमक और लड़कियों का शानदार व्यवहार

    हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि किसी शॉप से हमें दूध एवं सब्जियां खरीदनी हैं तो वह हमें एक मॉल में ले गया। मैं और विजय मॉल के भीतर गए। परिवार के शेष सदस्य गाड़ी में बैठे रहे। इस मॉल की संसार के किसी भी भव्य मॉल से तुलना की जा सकती थी। कांच और प्रकाश के घालमेल से बना हुआ एक अनोखा और चमचमाता संसार ही था वह। हमने वहाँ कुछ लोगों से बात करने का प्रयास किया ताकि हम पता कर सकें कि हमें दूध और सब्जियां किस हिस्से में अथवा किस मंजिल पर मिलेंगी किंतु हमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो अंग्रेजी जानता हो। वहाँ रोमन लिपि में इण्डोनेशियाई भाषा लिखी हुई थी जिसे समझना संभव नहीं था। इसलिए हमने अपने विवेक से ही दूध और सब्जियां तलाशने का निर्णय लिया। हमें शीघ्र ही एक मंजिल पर फल एवं सब्जियां दिखाई दीं।

    यहाँ दुनिया के बहुत से देशों से आई हुई सब्जियां रखी थीं। कितनी तरह की प्याज या कितने तरह के आलू या कितने तरह के सेब या कितने तरह के टमाटर थे, कहा नहीं जा सकता। केले, तरबूजे और खरबूजे भी कई प्रकार के थे। यहीं से हमें दूध के बंद डिब्बे भी मिल गए।

    हम इन जिंसों का भुगतान करने के लिए पेमेंट काउंटर पर गए तो हमें हर काउण्टर पर 18-20 साल की लड़कियां काम करती हुई दिखाई दीं। सभी के कान और सिरों पर स्कार्फ बंधे हुए थे। सभी के हाथ तेजी से काम करते थे। वे आनन-फानन में ग्राहक से भुगतान लेकर उसे निबटा देती थीं ताकि उसका समय खराब न हो। उन्होंने हमें देखते ही पहचान लिया कि ये भारतीय हैं, अतः हाथ जोड़कर हमें नमस्ते कहा और मुस्कुराकर हमारा स्वागत किया। बड़ी फुर्ती से उन्होंने हमारे सामान का बिल बनाया और हमसे भुगतान लेकर बचे हुए रुपए लौटाए। क्या भारत में इस प्रकार की शालीनता और तेजी से काम नहीं हो सकता, मैंने स्वयं से प्रश्न किया!

    यह एक विशाल मॉल था। चारों तरफ ग्राहक थे किंतु भीड़-भड़क्का कहीं भी नहीं था। किसी प्रकार की कोई चिल्ल-पौं, धक्का-मुक्की, बेचैनी, भागमभाग, बदतमीजी, काम में ढिलाई, कुछ भी तो ऐसा नहीं कि इन लड़कियों के काम में कोई कमी निकाली जा सके। बहुत कम स्टॉल्स पर हमने नौजवान लड़कों को खड़े हुए देखा, वहाँ 90 प्रतिशत अथवा उससे अधिक संख्या में लड़कियां ही काम कर रही थीं।

    निश्चित रूप से इण्डोनेशिया एक मुस्लिम देश है, इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है। इस पर भी भारत संसार के समक्ष यह दावा बार-बार दोहराता है कि संसार के सर्वाधिक मुसलमान हमारे यहाँ रहते हैं किंतु दोनों देशों के मुसलमानों में कितना अंतर है! भारत के मुसलमान अपनी गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन और जनसंख्या वृद्धि के लिए जाने जाते हैं। भारत की मुस्लिम औरतें अभी तक बुरका और तीन तलाक में उलझी हुई हैं किंतु इण्डोनेशिया की मुस्लिम लड़कियों ने संसार के समक्ष सिद्ध कर दिया है कि उनके बराबर शालीन और सभ्य व्यवहार किसी देश की औरतें नहीं कर सकती हैं। वे हर कार्य को धैर्य, शांति और कौशलपूर्ण ढंग से निबटाती हैं।

    आवासीय बस्तियों की चमक-दमक

    मॉल से निकलकर हम पुनः पार्किंग में खड़ी मि. अन्तो की गाड़ी तक आए और गाड़ी फिर से चल पड़ी। एयरपोर्ट से लगभग एक घण्टा चलने के बाद बाजार का सिलसिला समाप्त हो गया और आवासीय बस्तियां आरम्भ हुई। यहाँ दुकानों की संख्या इक्का-दुक्का रह गई। आवासीय क्षेत्र में आलीशान कोठियों की कोई कमी नहीं थी। एक से बढ़कर एक भवन।

    उजाड़ बस्ती में

    हमें चलते हुए लगभग एक घण्टा हो गया था। अंत में आवासीय बस्तियों का यह चमकदार सिलसिला भी समाप्त हो गया और मि. अन्तो की गाड़ी एक ऐसी सड़क पर मुड़ गई जहाँ से एक उजाड़ सी बस्ती आरम्भ होती थी। गाड़ी को इस सड़क पर मुड़ते देखकर हमारा माथ ठनका। यहाँ हरे रंग के पुते हुए छोटे-छोटे घर थे जिनके सामने मुर्गे दौड़ लगाते हुए दिखाई दिए। एक मस्जिद से लाउड स्पीकर पर अजान की आवाज आ रही थी। शीघ्र ही मि. अंतो की गाड़ी लोहे के एक बंद गेट के सामने रुक गई। यह वही दरवाजा था जिसका चित्र हमने वैबसाईट पर देखा था। बाहर से हालात अच्छे नहीं लगे किंतु हमने गाड़ी से सामान उतारना आरम्भ किया।

    सच्चाई से सामना होने पर हमारे होश उड़े

    गेट के भीतर दस फुट लम्बा और तीन फुट चौड़ा एक संकरा सा प्लेटफार्मनुमा मार्ग, भवन मुख्य कक्षों तक जाता था। इस मार्ग के दोनों तरफ पानी का एक विशाल हौद था जिसमें काले रंग का गंदा पानी दिखाई दे रहा था। डेड़ वर्ष की दीपा इस हौद में कभी भी गिर सकती थी। हर समय-भागम-भाग मचाए रहने वाली दीपा को तो हर समय पकड़ कर भी नहीं रखा जा सकता। कभी तो आदमी का ध्यान चूकेगा ही!

    कमरों की हालत और भी खराब थी। कमरों की छतों पर पंखे, एयरकण्डीशनर कुछ भी नहीं। दरवाजे टूटे हुए थे जिन पर लगी छोटी-छोटी कीलें, दरवाजों पर हाथ रखते ही चुभती थीं। दोनों कमरों में एक-एक टैबल फैन रखा था जिनमें से कठिनाई से ही हवा निकल रही थी। दोनों कमरों में एक-एक छोटी सीएफएल लटक रही थी जिनमें से बहुत कम उजाला फर्श तक पहुंच पा रहा था। वॉशबेसिन पर टोंटी नहीं थी और टॉयलेट की व्यवस्थाएं इतनी खराब थीं कि हमारा कलेजा कांप गया। दानों टॉयलेट में मल-त्याग के पश्चात् प्रक्षालन की व्यवस्था नहीं थी। एक कमरे के टॉयलेट में दरवाजे के स्थान पर पर्दा टंगा हुआ था। टॉयलेटों की दीवार में एक-एक घुण्डी लगी थी जिसे घुमाने पर छत के पास टंगे एक फव्वारे से पानी आता था। कैसे रहा जाएगा यहाँ, हममें से हर कोई अपने आप से यही सवाल कर रहा था।

    रसोई का पता किया तो ज्ञात हुआ कि वह अगले घर में है जहाँ मकान मालिक का भी भोजन बनता था। रसोई का फ्रिज खोला तो उसमें कटी हुई मछलियां और चिकन रखा था। मधु ने हाथ खड़े कर दिये कि वह उस रसोईघर में जाकर भोजन नहीं बनाएगी जहाँ पहले से ही फिश और चिकन रखा हुआ है। हमारे लिए भी यह संभव नहीं था कि हम वहाँ तैयार किया गया भोजन ग्रहण कर लें!

    इस व्यवस्था को देखते-समझते शाम के साढ़े पांच बजे से ऊपर का समय हो गया। हाथों-हाथ पदरेश में दूसरा सर्विस अपार्टमेंट ढूंढना संभव नहीं था। होटल में जाना इसलिए संभव नहीं था कि वहाँ भोजन तैयार करने की सुविधा नहीं होगी। हमने मकान मालिक से पूछा कि क्या आसपास और कोई दूसरा अपार्टमेंट मिल सकता है जो अधिक सुविधाजनक हो! मि. मासप्रियो ने स्पष्ट मना कर दिया। हमने मि. अन्तो से पूछा, उसने भी कहा कि वह किसी होटल में तो ले जा सकता है किंतु किसी सर्विस अपार्टमेंट के बारे में नहीं जानता।

    चूंकि योग्यकार्ता का समय बाली के समय से एक घण्टा पीछे था जबकि वास्तविक दूरी केवल 502 किलोमीटर ही थी, इसिलिए यहाँ अंधेरा बहुत जल्दी हो गया था। अफरा-तफरी करने से कुछ नहीं होने वाला था। इसलिए हमने धैर्य से काम लेने का निश्चय किया। मि. मासप्रियो से अनुरोध किया गया कि वह एक गैस और चूल्हे का प्रबंध हमारे कक्षों के सामने के संकरे से बरामदे में कर दे, लकड़ी की एक टेबल लगा दे और बाजार से आरओ वाटर की बीस लीटर की बोतल मंगवा दे ताकि हम अपना भोजन इस बरामदे में तैयार कर सकें। हमारी दशा देखकर मि. मासप्रियो को हम पर दया आ गई। उसने हमारी ये मांगें पूरी कर दीं।

    मुसीबत पर मुसीबत

    इधर तो मधु और भानु चाय तथा भोजन तैयार करने में जुटीं और उधर मैं और विजय इण्टरनेट के माध्यम से अगले तीन दिनों के लिए कोई अन्य सर्विस अपार्टमेंट बुक करवाने में जुटे। यहाँ भी एक संकट खड़ा हो गया। कमरों के भीतर वाई-फाई की कनैक्टिविटी नहीं मिल रही थी और कमरे के बाहर लैपटॉप नहीं चल पा रहा था क्योंकि थोड़ी देर चलने के बाद लैपटॉप की बैटरी डिस्चार्ज हो गई। बरामदे में कोई इलेक्ट्रिक सॉकेट नहीं था जहाँ से लैपटॉप जुड़ सकता था। हम लगभग तीन घण्टे तक प्रयास करते रहे, जैसे-तैसे हमने एक सर्विस अपार्टमेंट चुन तो लिया किंतु उसकी बुकिंग नहीं हो पाई क्योंकि वाईफाई की लो-कनैक्टिविटी के कारण हमारे पासपोर्ट की स्कैन कॉपी वैबसाईट तक नहीं पहुंच पा रही थी।

    सुषमा ने किया समाधान

    विजय ने अपनी छोटी बहिन सुषमा से सम्पर्क कर उसे अपनी समस्या बताई। इन्फोसिस में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम कर रही सुषमा वैसे तो चण्डीगढ़ रहती है किंतु इस दिन वह अपने ससुराल नई दिल्ली आई हुई थी। सुषमा के पति अर्थात् मेरे जामाता अनुपमजी, उस दिन अपनी कम्पनी के काम से कतर में थे। सुषमा ने दिल्ली से हमारे लिए उसी सर्विस अपार्टमेंट की बुकिंग करवा दी जो हमने वैबसाइट पर देखकर चुना था। इसका चैक-इन टाइम दिन में दो बजे के बाद का था किंतु हम वहाँ प्रातःकाल में शिफ्ट हो जाना चाहते थे। इसलिए विजय ने सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन मिस रोजोविता से सम्पर्क किया तथा उसे अपनी समस्या बताई। मिस रोजोविता ने कहा कि अपार्टमेंट की सफाई करवाने में समय लगेगा। इसलिए हम प्रातः 8 बजे नहीं अपितु प्रातः 11 बजे आ सकते हैं।

    मुर्गे बोलते रहे, मुल्ले बांग देते रहे और मच्छर काटते रहे

    जैसे-तैसे भोजन करके हम लोग सोए। रात निकालनी तो कठिन थी किंतु मन में इस बात से शांति भी थी कि केवल एक रात की ही बात है। हम तकलीफ सहन कर सकते थे किंतु गंदगी में बना भोजन, मांस-मछली की गंध और टॉयलेट में मलत्याग के पश्चात् शरीर को साफ करने की व्यवस्था के अभाव की स्थिति को सहन करने में सक्षम नहीं थे। दोनों कमरों के पंखों में से पूरी रात हवा नहीं निकली। गंदे पानी के हौद के कारण मच्छर बड़ी संख्या में मौजूद थे और पूरी रात हिन्दुस्तानी खून की दावत उड़ाते रहे। हर थोड़ी देर में गली में उपस्थित कोई न कोई मुर्गा बांग देता रहा और थोड़ी थोड़ी देर में पास की किसी मस्जिद से मुल्ला द्वारा दी जा रही अजान की आवाज गूंजती रही। नींद का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था। यह कैसी रात थी! मैंने कुछ रातें भारत-पाक सीमा पर पूरी-पूरी रात जीप में यात्रा करते हुए भी बिताई हैं, किंतु ऐसी खराब अनुभूति तो तब भी नहीं हुई।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-17 जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में दूसरा दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-17  जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में दूसरा दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-17  


    जावा द्वीप में पांच दिन  


    योग्यकार्ता में दूसरा दिन

    गंदगी और बदबू से विदा तथा मासप्रियो का उपदेश जैसे-तैसे प्रातः हुई। हम अपनी आदत के अनुसार प्रातः पांच बजे उठ गए। टॉयलेट में हमने अपने स्तर पर व्यवस्थाएं कीं। मधु और भानु ने बाहर उसी बरामदे में चाय बनाई और चिवड़ा भी तैयार कर लिया। ठीक नौ बजे मि. अन्तो अपनी गाड़ी लेकर आ गया। हमने गाड़ी में सामान रखा और मकान मालकिन से विदा लेने के लिए पास वाले घर में गए क्योंकि मासप्रियो इस समय स्कूल गया हुआ था। मकान मालकिन कम उम्र की भली सी लड़की थी। उसकी आंखें बता रही थी कि उसे अपने अतिथियों को हुई तकलीफ के लिए खेद था। संभवतः उसका पति समझ ही नहीं पाया होगा कि बेहतर आवासीय सुविधा किसे कहते हैं, सफाई में रहना किसे कहते हैं, और एक शाकाहारी परिवार के लिए मांस-मछली की उपस्थिति से होने वाली तकलीफ किसे कहते हैं!

    विजय ने चलते समय मि. मासप्रियो को एक मेल लिखा कि हम जा रहे हैं हम क्षमा चाहते हैं कि हम यहाँ अधिक नहीं रुक सके। इस पर मासप्रियो ने मेल पर ही विजय को उपदेश दिया कि आपको सावधानी से अपने लिए अपार्टमेंट बुक करवाने चाहिये। आपके साथ छोटी बच्ची है, दादाजी हैं, स्त्रियां हैं और आप इतने लापरवाह हैं। हम तो प्राकृतिक वातावरण चाहने वालों को अपना अपार्टमेंट देते हैं। बहुत से देशों के विदेशी यहाँ आकर ठहरे हैं और उन्होंने यहाँ की सुविधाओं की तारीफ की है। आपको पता होना चाहिये कि दिन में काटने वाले मच्छरों से डेंगू होता है। संभवतः वह यह कह रहा था कि मासप्रियो ने हमें बिना डेंगू वाले मच्छरों के बीच रखा था और अब हम जहाँ जा रहे हैं वहाँ हमारा सामना डेंगू वाले मच्छरों से होगा।

    उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली स्थिति संभवतः इसी को कहते हैं। उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं था कि हमें कितनी परेशानी हुई थी और वैबसाइट को दिये गए हमारे रुपए भी बर्बाद हो गए थे। मासप्रियो के उपदेशों का क्या प्रत्युत्तर दिया जा सकता था। संभवतः मासप्रियो सही कह रहा था क्योंकि जिन विदेशियों को यहाँ की सुविधाएं पसंद आई होंगी उनमें ताजे मुर्गे की उपलब्धता, गंदे पानी के हौद में से स्वयं ही मछलियों को छांटकर पकवाने की सुविधा और गली में बहुतायत से फिर रहे सूअरों की हर समय उपलब्धता जैसे सुविधाएं उन विदेशियों को शायद कहीं और नहीं मिलने वाली थीं। उन्हें लैट्रिन धोने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि वे तो इस कार्य के लिए टिश्यू पेपर का प्रयोग करते हैं। शराब के नशे में धुत्त होने के बाद किसी पंखे और एसी की जरूरत भी उन्हें कैसे हो सकती थी। इसलिए उनके लिए यहाँ सुख ही सुख पसरा हुआ था। गलत हम ही थे, हमारे जैसे लोग तो अपने ही देश में असहिष्णु कहलाते हैं क्योंकि हम दूसरों के साथ सामंजस्य क्यों नहीं बैठा पाते, फिर यदि विदेश में हमें कोई उपदेश दे रहा था, तो शायद ठीक ही दे रहा था!

    मि. अन्तो की निराशा

    मि. अन्तो हमें योग्यकार्ता शहर के मध्य भाग में स्थित प्रेसीडेंसी बिल्डिंग दिखाने ले गया। इस बिल्डिंग को देखने के लिए अच्छा खासा टिकट था और हमें कार से उतरकर काफी पैदल भी चलना पड़ता। रात की अनिद्रा ने हमें इस लायक नहीं छोड़ा था कि हम इतना पैदल चलें। भारत में ऐसी बिल्डिंगों को बिना कोई पैसा दिये देखा जा सकता है। इसलिए हमने इसे केवल बाहर से ही देखा। हमने भीतर जाने से मना कर दिया। मि. अन्तो को हमारी इस अरुचि से निराशा हुई किंतु वह मुस्कुराकर बोला ऑलराइट हम वाटर फोर्ट में चलते हैं जहाँ किंग अपनी क्वीन के साथ नहाता था।

    बेचाक और डोकार

    राजा के महल के चारों ओर शानदार सड़कें बनी हुई थीं जिन पर कारों और पैदल चलने वालों को तांता लगा हुआ था। सड़क के एक किनारे पर खड़े हुए हमें विचित्र प्रकार के रिक्शे चलते हुए दिखाई दिए। इन्हें नई दिल्ली में चलने वाले साइकिल रिक्शों की तरह मनुष्य द्वारा चलाया जाता है किंतु उन्हें खींचने की बजाय धकेला जाता है। अर्थात् आगे की तरफ दो यात्रियों के बैठने की जगह बनी हुई है और रिक्शा चालक की सीट रिक्शे के पिछले भाग में बनी हुई है। ऐसा संभवतः पर्यटकों की सुविधा के लिए किया गया था ताकि वे आराम से सड़कों का व्यू देख सकें। हालांकि ऐसे रिक्शे में रिक्शा चालक को अधिक ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है। मि. अन्तो से ज्ञात हुआ कि पर्यटकों की सुविधा के लिए जालान मालियो से लेकर बोरो केरटॉन तक इसी तरह के रिक्शे चलते हैं जिन्हें जावाई भाषा में बेचाक कहा जाता है। जावाई भाषा में अंग्रेजी के सी लैटर को हिन्दी भाषा का 'च' उच्चारित किया किया जाता है। शीघ्र ही हमारा ध्यान घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले तांगों पर गया। ये हल्के रथों की आकार में बने हुए हैं। इस तरह के रिक्शे किसी समय दिल्ली की सड़कों पर भी चला करते थे। इन्हें जावाई भाषा में एन्डोंग एवं डोकार कहा जाता है।

    जल महल और राजस्थानी परिधान वाली महिलाओं का समूह

    कुछ ही देर में हम लोग जल महल के सामने थे। यह एक बड़ा सा महल था जिसे चारों ओर ऊंची चारदीवारी से घेरा गया था। महल के बाहर एक सूचना पट्ट लगा हुआ था जिस पर इस स्थान का नाम नगायोग्यकार्ता तथा भवन का नाम कांटोर कागुनगन डालेम लिखा हुआ था। हमारा सारा सामान कार में लदा हुआ था क्योंकि हम पुराना अपार्टमेंट खाली करके आए थे और नए अपार्टमेंट में पहुंचने का समय नहीं हुआ था। यद्यपि मि. अन्तो एक सुसभ्य और सुशिक्षित मनुष्य जान पड़ता था तथापि परदेश में किसी तरह का खतरा नहीं उठाया जा सकता था। अतः पिताजी कार में बैठे रहे और शेष सदस्य जल महल देखने कार से नीचे उतरे। यहाँ प्रति पर्यटक 25 रुपए का टिकट था।

    यह वास्तव में एक भव्य जल महल था। एक ऐसा महल जिसके भीतर नहाने के ताल थे और उसके चारों ओर वस्त्र बदलने के कक्ष। महल कई हिस्सों में विभक्त था। हर हिस्से के प्रवेश-द्वार के ऊपर राक्षसी आकृतियों के चेहरे वाली मूर्तियां लगी हुई थीं। महल के मुख्य प्रवेश द्वार पर भी ऐसी ही एक मूर्ति का चेहरा लगा था। संयोगवश उसी समय जल महल में महिलाओं का एक समूह आया जिसके परिधान देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई। लगभग बीस महिलाओं के इस समूह की प्रत्येक महिला ने एक जैसे परिधान धारण कर रखे थे। दूर से देखने पर लगता था कि इन्होंने राजस्थानी महिलाओं की तरह छींट का घाघरा और गुलाबी रंग का ओढ़ना धारण कर रखा था किंतु निकट से देखने पर ज्ञात हुआ कि उन्होंने छींट का घाघरा नहीं अपितु एक चोगा पहन रखा था जिस पर सिर से लेकर कमर तक ओढ़ी गई गुलाबी ओढ़नी के कारण ऐसा लगता था कि उन्होंने राजस्थानी ढंग के परिधान धारण कर रखे हैं।

    इन स्त्रियों से बात करके यह जानना कठिन था कि वे किस देश से अथवा इण्डोनेशिया के किस द्वीप आई हैं। वे सभी महिलाएं पढ़ी-लिखीं और शिष्ट जान पड़ती थीं किंतु अंग्रेजी का एक भी शब्द नहीं समझती थीं। उन्होंने धूप के चश्मे लगा रखे थे, हाई हील की सैण्डिलें पहन रखी थीं तथा उनके कंधों पर महंगे लेडीज बैग लटक रहे थे। वे सैल्फी भी ले रही थीं। यह तय था कि ये महिलाएं इस द्वीप की नहीं थीं क्योंकि इस द्वीप पर रहने वाली महिलाओं के परिधान भिन्न प्रकार के थे।

    मिस रोजोविता से भेंट

    जल महल से बाहर आते-आते हमें लगभग 11.30 बज गए। अब हम आराम से अपने नए सर्विस अपार्टमेंट जा सकते थे। इसलिए हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि वह हमें नए अपार्टमेंट में ले चले ताकि कार में लदा सामान वहाँ उतारा जा सके तथा दोपहर का भोजन बनाया जा सके। हम लोग मि. मासप्रियो के अपार्टमेंट से चाय और चिवड़ा लेकर निकले थे। लगभग आधे घण्टे में हम नए अपार्टमेंट के सामने थे। यह अपार्टमेंट योग्यकार्ता स्पेशल रीजन के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र में स्थित है। इसे जावा द्वीप का मध्यवर्ती क्षेत्र कहा जा सकता है। जावा का राजा इसी क्षेत्र में निवास करता था, इसलिए इसे योग्यकार्ता स्पेशल रीजन कहा जाता है।

    यहाँ गलियों और मकानों के नम्बर एक के बाद एक लगे हुए थे इसलिए मिस रोजोविता को ढूंढने में हमें कोई कठिनाई नहीं हुई। मिस रोजोविता हमें अपार्टमेंट के सामने वाले बंगले में मिल गईं। हमें ज्ञात हुआ कि हमने सर्विस अपार्टटमेंट के रूप में जिस बंगले को बुक करवाया था, ठीक उसके सामने वाले बंगले में मिस रोजोविता अपने परिवार के साथ रहती थीं। मिस रोजोविता ने हाथ मिलाकर हम सभी का स्वागत किया। वे प्रसन्नचित्त, मिलनसार और हंसमुख क्रिश्चियन महिला हैं तथा बहुत पढ़े-लिखे परिवार की सदस्य हैं। उनके पिता किसी समय योग्यकार्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हुआ करते थे और किसी जमाने में उन्हें अमरीका की एक प्रतिष्ठित संस्था द्वारा बैस्ट मैन ऑफ योग्यकार्ता सिटी का पुरस्कार दिया गया था। ये सारी जानकारी हमें बंगले में लगे मैडलों, पुरस्कारों और चित्रों के माध्यम से हुई।

    नया अपार्टमेंट

    हमारा नया अपार्टमेंट समस्त सुख-सुविधाओं से सम्पन्न एक आरामदेह अपार्टमेंट था, जहाँ दीपा आराम से खेल सकती थी और उसके किसी हौद में गिरने का खतरा नहीं था। हम मच्छरों की पिन-पिन, मुर्गों की बांग और मुल्लाओं की अजान सुने बिना, पूरी रात आराम से सो सकते थे। इस बंगले की किचन से लेकर बैडरूम, कॉमन रूम, लॉबी, बाथरूम तथा टॉयलेट, सभी कुछ एक विशिष्ट योजना के अनुसार बनाए गए थे। किचन बहुत बड़ी थी जिसमें खाना बनाने के साथ-साथ, बड़ी डायनिंग टेबल लगी हुई थी। फ्रिज, गैस-प्लेट और वाटर कूलर से लेकर कीमती क्रॉकरी, कटलरी, यूटेन्सिल्स, मिनरल वॉटर किसी चीज की वहाँ कमी नहीं थी। सब-कुछ बहुत साफ-सुथरा और सलीके से लगा हुआ था। सारे कमरों में आरामदेह डलब-बैड सोफे और एयरकण्डीशनर लगे हुए थे। टीवी देखने के लिए अलग से एक कमरा था जहाँ बहुत महंगा सोफा रखा था। ड्राइंगरूम में केन का महंगा फर्नीचर था और एक कोने में एक्सरसाइज करने के लिए साइकिल भी रखी हुई थी।

    यह ऐसा घर था जिसका आराम किसी पांच सितारा होटल में भी उपलब्ध नहीं हो सकता था। इस घर के लिए हमें बहुत कम राशि व्यय करनी पड़ी थी जबकि किसी पांच सितारा होटल के लिए हमें कई गुना राशि व्यय करनी पड़ती। हम अपने चयन पर इतने प्रसन्न थे कि कल रात की सारी मनहूसियत शीघ्र ही हमारे मस्तिष्क से गायब हो गई। लगभग एक घण्टे में भोजन तैयार हो गया। हमने दोपहर का भोजन भी उसी समय कर लिया ताकि हमारा आज का दिन बर्बाद नहीं हो। हम आज परमबनन मंदिर देखना चाहते थे। हमारे विचार से यह देवताओं का बनाया हुआ वही मंदिर था जिसे देखने की लालसा में हम जावा आए थे।

    बंगले की दीवारों पर भारतीय झाड़ू

    मिस रोजोविता के बंगले के कमरों की दीवारें विभिन्न प्रकार की कलात्मक सामग्री से सजाई गई थीं। इनमें से एक ऐसी चीज भी थी जिसे सजावट की वस्तु के रूप में देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। यह थी नारियल की सीकों से बनी एक भारतीय झाड़ू। दो कमरों में इन झाड़ुओं को कलाकृतियों की तरह लटकाया गया था।

    जंगल में जावा संस्कृति की पोषाकों का प्रदर्शन

    मि. अन्तो हमें योग्यकार्ता से लेकर सेंट्रल जावा के लिए रवाना हुआ। मिस रोजोविता के अपार्टमेंट से परमबनन मंदिर तक की दूरी लगभग 40 किलोमीटर थी। बाहर धूप काफी तेज थी। मार्ग में एक स्थान पर लगभग 15-20 व्यक्ति विशिष्ट प्रकार के परिधान पहनकर खड़े थे। उनके सिर पर लाल, हरे एवं नीले रंग की टोपियां थीं जिनके किनारे आग की लपटों की तरह ऊपर की ओर उठे हुए थे। उन्होंने अपने हाथों में लम्बे भाले ले रखे थे जिन्हें लेकर वे अपने स्थान पर सीधे खड़े थे। उनकी कमर पर दोहरी तहमद या घुटनों से कुछ नीचे आने वाली चौड़ी सलवार थी। वे लोग धड़ के ऊपरी भाग में लम्बे कोट धारण किये हुए थे तथा कपड़े से बनी एक छोलदारी के नीचे खड़े थे। हमने मि. अन्तो से पूछा कि ये लोग कौन हैं और इस जंगल में क्यों खड़े हैं? मि. अन्तो ने बताया कि ये लोग पर्यटकों का मनोरंजन करने के लिए जावा द्वीप की संस्कृति को दर्शाने वाले कपड़े पहनकर खड़े हैं। मैंने उनके कुछ चित्र उतारे। मैंने अनुभव किया कि इन लोगों को अच्छा लगता था जब कोई विदेशी पर्यटक इनके फोटो खींचता था। वे फोटो खिंचवाने के लिए सीधे खड़े हो जाते थे और कैमरे की तरफ देखते थे।

    मंदिर में प्रवेश के लिए 1100 रुपए का शुल्क

    परमबनन शिव मंदिर, योग्यकार्ता नगर से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर, मध्य जावा क्षेत्र में स्थित है। मार्ग में एक स्थान पर रुककर, मि. अन्तो ने हमारे लिए परमबनन मंदिर में प्रवेश हेतु रियायती टिकटों का प्रबंध किया। विदेशी पर्यटकों से प्रति पर्यटक लगभग 1100 भारतीय रुपए का शुल्क लिया जाता है, हमें यह टिकट लगभग 1000 रुपए प्रति व्यक्ति की दर से मिल गया। हमें बताया गया कि इस मंदिर का प्रबन्धन यूनेस्को द्वारा किया जाता है तथा प्रवेश शुल्क का निर्धारण भी यूनेस्को द्वारा किया जाता है। हम यह सोचकर विस्मित थे कि आखिर इस मंदिर में ऐसी क्या विशेषता है जिसमें प्रवेश के लिए यूनेस्को द्वारा विदेशी पर्यटकों से इतनी भारी राशि ली जाती है! कार से उतरते ही मि. अन्तो ने हमें कार की डिक्की से निकाल कर दो बड़ी छतरियां दीं तथा सुझाव दिया कि इन्हें साथ रखिये, आपको इनकी आश्यकता होगी। हमें आश्चर्य हुआ कि आकाश में दूर-दूर तक बादल दिखाई नहीं दे रहे तथा धूप भी इतनी तेज नहीं लग रही, फिर भी हमने मि. अन्तो का सुझाव मान लिया।

    मंदिर ट्रस्ट द्वारा शानदार चाय से स्वागत

    मि. अन्तो हमें छोड़ने के लिए मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित कार्यालय तक आया तथा वहाँ के कर्मचारी को उसने रियायती कूपन दिए। यह सब उसने हमारे बिना कहे किया। कार्यालय से टिकट लेकर हमें सौंपते हुए मि. अन्तो ने कहा कि यहाँ चाय अवश्य पिएं, यह विदेशी पर्यटकों के टिकट में शामिल है, इसके लिए आपको अलग से शुल्क नहीं देना पड़ेगा। हमने मि. अन्तो का आभार व्यक्त किया और चाय की स्टॉल की तरफ बढ़ गए। यूनेस्को के कर्मचारियों द्वारा जावा द्वीप पर विदेशी अतिथियों के लिए चाय का अर्थात् दूध वाली चाय का शानदार प्रबंध किया गया था। यह अलग बात थी कि दूध, पाउडर को पानी में घोलकर बनाया गया था।

    दो अनजान देशों के दो अनजान बच्चों का अपूर्व स्नेह-मिलन

    जब हम लोग चाय पी रहे थे तभी दीपा की दृष्टि बेबी ट्रॉली में बैठे एक विदेशी बच्चे पर पड़ी जो मुश्किल से आठ-नौ माह का रहा होगा। यह परिवार किसी पूर्वी एशियाई देश से आया हुआ लग रहा था। दीपा उसकी ट्रॉली पर चढ़ गई और बच्चे को दुलारने-पुचकारने लगी। हमने दीपा को उस बच्चे से अलग करने का प्रयास किया किंतु दीपा हाथ आए अपने से छोटे बच्चे को आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी। वह बच्चा भी दीपा से लिपट गया। उस बच्चे के अभिभावक भी हमारी ही तरह, दो भिन्न देशों के अपरिचित बच्चों का यह स्नेह-मिलन देखकर कम आश्चर्य में नहीं थे। लगभग एक घण्टे बाद जब मंदिर परिसर में इन दानों बच्चों का एक बार पुनः सामना हुआ तो स्नेह-मिलन की यह प्रक्रिया पूर्ववत् पुनः दोहराई गई।

    परमबनन शिव मंदिर

    धूप तेज थी और जहाँ से हमने परमबनन मंदिर के लिए चलना आरम्भ किया था, वहाँ से परमबनन मंदिर के शिखर लगभग एक किलोमीटर दूर दिखाई दे रहे थे। जैसे-जैसे मंदिर के शिखर निकट आते गए, उनके चारों तरफ बिखरे हुए काले रंग के चौकोर एवं तराशे हुए सुगढ़ पत्थरों के विशाल ढेर हमारे सामने स्पष्ट होते गए। निकट जाने पर ज्ञात हुआ कि पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। यहाँ लगे सूचना-पट्टों से ज्ञात हुआ कि इस मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था। उस समय 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था। केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर 'त्रिमूर्ति मंदिर' कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं। इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के 'वाहन मंदिर' हैं। त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक 'आपित मंदिर' है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक 'केलिर मंदिर' हैं तथा चारों कोनों पर एक-एक 'पाटोक मंदिर' हैं। मुख्य मंदिर योजना के चारों ओर चार पंक्तियों में 224 मंदिर स्थित हैं। इस प्रकार कुल 240 मंदिर बने हुए थे किंतु सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के प्रबल भूकम्प में ये समस्त मंदिर गिर गए।

    लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे। मंदिर समूह के दूर-दूर तक फैले इन खण्डहरों को देखकर हमारी रुचि बढ़ती जा रही थी। खोज-बीन के पश्चात् जो इतिहास हमें ज्ञात हुआ वह किसी रहस्य और रोमांच भरी कहानी से कम नहीं था।

    रहस्य और रोमांच की ओर

    हम मंदिर की तरफ एक-एक कदम आगे बढ़ाते जा रहे थे। रहस्य और रोमांच से भरी एक दुनिया हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। उस समय तक हमें अनुमान नहीं था कि हम क्या देखने जा रहे हैं! यदि मस्तिष्क में कुछ था तो केवल इतना ही कि यह इण्डोनेशिया द्वीप का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है तथा भारत से बाहर स्थित हिन्दू मंदिरों में यह सबसे बड़ा है। हमें यह भी जानकारी थी कि इण्डोनेशिया के समस्त 17,508 द्वीपों पर स्थित किसी भी धर्म के मंदिरों में यह सबसे बड़ा है।

    परमबनन मंदिर से विदा

    समस्त मंदिरों को देखना हमारे लिए संभव नहीं था। इसलिए हम लगभग तीन घण्टे तक मंदिर परिसर में रहने के बाद लौट लिए। इस समय तक धूप काफी मंदी पड़ गई थी और आकाश में बादल भी दिखाई देने लगे थे। मि. अन्तो एक्जिट के पास ही खड़ा मिल गया। हम थके हुए थे, चाय पीने की इच्छा थी किंतु यहाँ दूध वाली चाय मिलना संभव नहीं था। अतः थकान उतारने के लिए नारियल पानी से अच्छा कोई विकल्प नहीं था।

    प्लाओसान बौद्ध मंदिर

    मि. अन्तो हमें परमबनन मंदिर जैसे ही खण्डहरों से युक्त एक और मंदिर परिसर में ले गया। पूछने पर ज्ञात हुआ कि यह प्लाओसान बौद्ध मंदिर है। यहाँ भी मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए टिकट खरीदना आवश्यक था। थकान होने के कारण हमारे लिए भीतर जाकर मंदिरों को देख पाना अत्यंत कठिन था। इसलिए हमने बाहर सड़क पर खड़े रहकर मंदिर परिसर एवं उसमें दूर तक बिखरे पड़े पत्थरों के विशाल ढेरों एवं उनके बीच खड़े भग्न मंदिरों का अवलोकन किया।

    आकाश में बादल घिर आए थे और बूंदा-बांदी आरम्भ हो गई थी। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक महिला अंगीठी पर भुट्टे सेक रही थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि एक भुट्टा इण्डोनेशियाई मुद्रा में 15 हजार रुपए का तथा भारतीय मुद्रा में 75 रुपए का था। भारत में यह भुट्टा एक तिहाई मूल्य में उपलब्ध हो जाता है। इसलिए भुट्टे का विचार भी त्याग देना पड़ा। इसी बीच बरसात बहुत जोरों से आरम्भ हो गई थी। हम मि. अन्तो की गाड़ी में बैठकर अपने निवास की ओर चल पड़े जो यहाँ से लगभग 20 किलोमीटर दूर था किंतु इस समय तक कार्यालयों का अवकाश हो गया था और योग्यकार्ता की सड़कें वाहनों से ठसाठस भर गई थीं। इस कारण ट्रैफिक बहुत रेंग-रेंग कर सरक रहा था। घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा पूरी तरह घिर आया जबकि अभी मुश्किल से साढ़े छः बजे थे।

    घर के बाहर मिस रोजोविता ने छोलदारी-नुमा एक छपरा बना रखा था जिसमें बैठकर लॉन तथा चारदीवारी के भीतर की वनस्पति एवं बारिश दोनों को देखने का आनंद लिया जा सकता था। हम यहीं बैठ गए। मधु और भानु चाय की तैयारियों में जुट गईं तथा मैंने और विजय ने मि. अंतों द्वारा आज किए गए व्यय का भुगतान किया तथा अगले दिन की कार्ययोजना निर्धारित की। पिताजी हमारे पास ही बैठ गए। थोड़ी देर में चाय बनकर आ गई। दिन भर की थकान के बाद बरसात के इस मौसम में गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुए हमने मिस रोजोविता को इस आरामदेह घर के सामने इस आरामदेह छोलदारी बनाने के लिए मन ही मन धन्यवाद दिया। दीपा की शैतानियां अब भी बदस्तूर जारी थीं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-18 जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में तीसरा दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-18  जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में तीसरा दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-18  

    जावा द्वीप में पांच दिन


    योग्यकार्ता में तीसरा दिन

    आज 20 अप्रेल हो चुकी थी। जावा के समयानुसार प्रातः चार बजे मेरी आंख खुल गई। मैंने हिसाब लगाया, इस समय बाली द्वीप पर सुबह के तीन ही बजे होंगे और भारत में रात के बारह बज रहे होंगे। यह शरीर भी कितना विचित्र है! इसमें लगी जैविक घड़ी स्वतः ही स्वयं को स्थानीय समय से समायोजित कर लेती है। कैसे होता है यह सब! पूरी दुनिया को जानने की लालसा रखने वाले हम, स्वयं अपने शरीर की क्षमताओं के बारे में कितना कम जानते हैं! मैंने देखा कि परिवार के अन्य सदस्य भी ठीक पांच बजे उठ गए थे। मानो वे भारत में हों और उनके उठने का सही समय हो गया हो!

    मि. अन्तो को हमने प्रातः 9 बजे आने का समय दिया था। वह ठीक समय पर गाड़ी लेकर आ गया। इस समय आकाश साफ था। धूप में तेजी नहीं थी और मौसम सुहावना था। हम सुबह का नाश्ता कर चुके थे और दोपहर का भोजन अपने साथ ले चुके थे। अतः मि. अन्तो के साथ चलने में हमें अधिक समय नहीं लगा। हमारा आज का सबसे पहला लक्ष्य बोरोबुदुर बौद्ध विहार था किंतु वहाँ जाने से पहले हम कम से कम दो काम करना चाहते थे। हमारी इण्डोनेशियाई मुद्रा समाप्त हो चली थी इसलिए हमें किसी विश्वसनीय मनी एक्सचेंजर से डॉलर के बदले इण्डोनेशियाई रुपए लेने थे। हम एक साथ अपने डॉलर एक्सचेंज नहीं कर रहे थे क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि जब हम इण्डोनेशिया से विदा हों तो हमें अपनी इण्डोनेशियाई मुद्रा फिर से डॉलर में कन्वर्ट कराने की फीस देनी पड़े। दूसरा काम यह था कि हम रेलवे स्टेशन जाकर, आने वाले कल की ट्रेन यात्रा के बोर्डिंग पास लेना चाहते थे। विजय ने नई दिल्ली से इस ट्रेन के लिए ऑनलाइन बुकिंग करवाई थी जिसका प्रिण्ट-आउट हमारे पास था किंतु ट्रेन में बैठने से पहले बोर्डिंग पास प्राप्त करने आवश्यक थे।

    करंसी एक्सचेंजर

    मि. अन्तो हमें सेंट्रल जावा के जालान मालियो क्षेत्र में बने एक पांच सितारा होटल में ले गया, जिसमें घुसते ही एक प्रतिष्ठित एवं विश्वसनीय मनी एक्सचेंजर ऑफिस था। हमने अपनी आवश्यकता के अनुसार कुछ डॉलर एक्सचेंज कराए। हमने देखा कि यहाँ भी समस्त काउण्टरों पर बीस-बाइस साल की लड़कियां दुनिया भर के देशों से आए विदेशियों की करंसी एक्सचेंज कर रही थीं। काउण्टर पर बैठी लड़की ने हमें छोटा सा फार्म भरने के लिए तथा अपना पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा। हमने उससे पूछा कि वह हमें एक डॉलर के बदले में कितने इण्डोनेशियाई रुपए देगी। उसने हमें एक इलेक्ट्रोनिक बोर्ड देखने के लिए संकेत किया जिसमें उस समय की इण्टरनेशनल रेट्स डिस्प्ले हो रही थीं। हमने संतोष में सिर हिलाया और उसे डॉलर दे दिये। उस लड़की ने फिर से हिसाब लगाया और हमें एक कागज पर लिखकर दिखाया कि हमें कितने इण्डोनेशियाई रुपए मिलेंगे। बिल्कुल सुलझी हुई कार्यवाही, कहीं कोई छिपाव-दुराव नहीं। समस्त व्यवहार बहुत ही मृदुल और कम शब्दों में। उसने हमारे पासपोर्ट से हमारी फार्म की डिटेल्स का मिलान किया और राशि हमें पकड़ा दी। इस पूरे काम में कठिनाई से पांच मिनट लगे होंगे। हम मनी एक्सचेंजर के ऑफिस से निकल कर जालान मालियो में आ गए।

    जालान मालियो में चहल-कदमी

    हमने जालान मालियो में कुछ दूर तक चहल-कदमी करने का निर्णय लिया। जावाई भाषा में जालान का अर्थ होता है गली और मालियो से आशय जावा के मालियो सरनेम वाले लोगों से है। जावा में 55 लाख लोगों का सरनेम मालियो है। यह गली उन्हीं में से किसी प्रतिष्ठित मालियो के नाम से जानी जाती है। सेंट्रल जावा प्रांत का जालान मालियो, नई दिल्ली के कनाट प्लेस की तरह भीड़ वाला क्षेत्र है। यहाँ शानदार चमचमाते हुए मॉल खड़े हैं। विदेशी सैलानियों का जमघट लगा रहता है। मालियो की चौड़ी सड़क के दोनों ओर चार सितारा और पांच सितारा होटलों की संख्या का कोई पार ही नहीं है। इस पूरी स्ट्रीट में बेचाक और डोकार काफी संख्या में चलते हुए दिखाई दिए जिन पर विदेशी पर्यटकों को घूमते हुए आसानी से देखा जा सकता है।

    तुगु स्टेस्यन

    मि. अन्तो हमें जालान मालियो से योग्यकार्ता शहर के तुगु रेलवे स्टेशन ले गया। यह जालान मालियो से अधिक दूर नहीं था। यद्यपि इस रेलवे स्टेशन को वर्तमान में योग्यकार्ता स्टेस्यन कहते हैं किंतु इसका पुराना नाम तुगु स्टेस्यन है तथा स्थानीय जनता में वही प्रचलित है। जावा में स्टेशन को स्टेस्यन उच्चारित किया जाता है। रेलेवे स्टेशन के मुख्य भवन पर बाहर की ओर बड़े-बड़े केसरिया रंग के अक्षरों एवं रोमन लिपि में केवल जोगजकार्ता लिखा हुआ है। यह क्षेत्र डच औपनिवेशिक युग में जावा का प्रसिद्ध स्थान हुआ करता था। प्रायः समस्त प्रमुख डच औपनिवेशिक अधिकारी इसी क्षेत्र में निवास करते थे। योग्यकार्ता का राजा भी उस काल में बताविया से तुगु स्टेशन के बीच यात्रा किया करता था। ई.2000 में इस स्टेशन का आधुनिकीकरण करके वर्तमान स्वरूप दिया गया। तभी इसका नाम तुगु की बजाय योग्यकार्ता किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि तुगु शब्द का सम्बन्ध औपनिवेशिक काल के डच शासकों से रहा होगा।

    मैंने और विजय ने स्टेशन पर बने ग्लास कैबिन में बैठे एक रेलवे अधिकारी के केबिन में जाकर पूछा कि हमें बोर्डिंग पास कहाँ से मिलेंगे। उस अधिकारी ने कहा कि बाहर एक वेंडिंग मशीन है, वहाँ से प्रिण्ट कर लीजिए। वह अधिकारी अंग्रेजी में बोल रहा था किंतु उसका लहजा ऐसा था मानो जावा द्वीप की किसी भाषा में बोल रहा हो। इसलिए मैं उसकी बात का एक भी शब्द नहीं समझ सका किंतु पता नहीं विजय को कैसे उसकी बात समझ में आ गई! मैं आज भी इस बात को सोचकर हैरान होता हूँ कि आखिर विजय ने उसकी बात को समझा कैसे! वेंडिंग मशीन पूरी तरह से ऑटोमैटिक थी। जैसे ही विजय ने ऑनलाइन बुकिंग के प्रिण्टआउट पर लगे बार कोड को मशीन के स्कैनर के सामने दिखाया, हमारे टिकट निकल कर बाहर आ गए। यदि यह काम मुझे करना होता तो कई लोगों के समझाए जाने के बाद ही मुझे समझ में आता कि बोर्डिंग टिकट का प्रिंट आउट कैसे लिया जायेगा! यह जैनरेशन गैप था। कोडिंग बार को समझने वाली आधुनिक मशीनों पर काम करना मेरी प्रौढ़ पीढ़ी के लोगों को कठिनाई से ही समझ में आता है।

    आधुनिकतम सुविधाओं से लैस इण्डोनेशिया

    अब तक मैं इस बात को कई बार अनुभव कर चुका था कि भले ही इण्डोनेशिया गरीब देश है और दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है, किंतु यहाँ की हर बात हैरान करने वाली है। यहाँ की दुकानों, मंदिरों, सरकारी कार्यालयों, स्टेशनों तथा ट्रेनों सहित हर स्थान पर अत्याधुनिक कम्प्यूटराइज्ड उपकरण लगे हैं। छोटी-छोटी लड़कियां इन्हें धड़ल्ले से संचालित करती हैं। भारत अभी इन सुविधाओं से कोसों दूर है। इण्डोनेशिया के नगरों से लेकर गांव और कस्बे अच्छी साफ-सफाई के कारण बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। भारत को सफाई का यह स्तर छूने में संभवतः कई शताब्दियां लगेंगी। यहाँ कहीं भी भीड़-भाड़, चिल्ल-पों तथा शोर-शराबा नहीं है। भारत के लोगों को इस नागरिक-समझ Civil Sense तक पहुंचने में संभवतः कई हजार वर्ष लगेंगे।

    मुस्लिम देश होने के बावजूद इण्डोनेशिया में हर उम्र की लड़कियां और औरतें वाणिज्यिक संस्थाओं, सार्वजनिक स्थलों एवं सरकारी विभागों में खुलकर काम करती हैं। कोई औरत बुरका नहीं पहनती। वे केवल अपना सिर और कान ढंकती हैं, वह भी अनिवार्य नहीं है। बहुत सी लड़कियां, मिनी स्कर्ट में दिखाई देती हैं। सभी लड़कियां अपने काम में दक्ष हैं। हमने किसी लड़की को या कर्मचारी को आपस में या मोबाईल फोन पर बात करते हुए नहीं देखा। अधिकतर स्थानों पर ड्रेस कोड लागू है। समस्त लड़कियां ड्रेस कोड का अनुसरण करती हैं। यदि लाउड स्पीकरों पर बजने वाली नमाज को छोड़ दें तो वहाँ गली-मुहल्लों और सड़कों पर न दिन में, न रात में, किसी तरह का शोर सुनाई नहीं देता।

    फलों की खरीददारी

    जब रेलेवे स्टेशन से रवाना हुए तो कार में बैठते ही पिताजी ने कहा कि रास्ते में किसी दुकान से फल खरीदने हैं। हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि वह ऐसी जगह कार रोक ले जहाँ से हम फल खरीद सकें। मि. अन्तो कार चलाता रहा किंतु कहीं भी ऐसा स्थान नहीं मिला जहाँ कार रोकी जा सके। इण्डोनेशिया में ट्रैफिक नियम बहुत कड़े हैं। यदि कोई ड्राइवर या नागरिक उनकी अवहेलना करता है तो वह बड़े संकट में फंस सकता है। हम मध्य जावा से बाहर निकलकर ग्रामीण क्षेत्र में आ गए। अंततः एक क्योस्क-नुमा दुकान पर मि. अन्तो ने कार रोकी। उसने हमसे माफी मांगी कि वह शहर में फलों की किसी दुकान पर क्यों नहीं रुक सका था। यहाँ चूंकि किसी तरह की कठिनाई नहीं है इसलिए आप लोग यहाँ से फल खरीद लें। हम उसकी कठिनाई को समझते थे। इसलिए हमने बिना किसी तरह का मुंह बिगाड़े हुए उसे यहाँ रुकने के लिए धन्यवाद दिया।

    यह एक छोटी सी दुकान थी जिसमें कई तरह के फल रखे हुए थे। यहाँ चमचमाते हुए विशाल मॉल में उपलब्ध रहने वाले विदेशी फलों का जखीरा नहीं था अपितु इण्डोनेशिया में पैदा होने वाले देशी फल थे। इनमें पीले रंग के छोटे-छोटे वे केले भी शामिल थे जो खाने में मीठे कम और खट्टे ज्यादा होते हैं। हमने वही केले लिए। इसी प्रकार छोटी-छोटी लीचियों जैसे गुच्छों में बंधा कोई भूरे रंग का फल था। इसे जावा की देशी लीची कहा जा सकता था। इसमें गूदा, रस और सुगंध तीनों ही कम थे। संतरों का आकार भी बहुत छोटा था। सेब अवश्य ही विदेशी रहे होंगे, पर वे भी छोटे आकार के थे।

    फल विक्रेता अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं समझता था किंतु विदेशियों को अपनी दुकान पर देखकर खुशी के मारे फूला नहीं समाया। उसके लिए उस गांव में यह गौरव का विषय था कि वह विदेशियों को अपनी दुकान से फल बेचे। वह दुकानदार भले ही नहीं समझता हो किंतु हम अब तक अच्छी तरह समझ चुके थे कि इण्डोनेशिया में खरीदरारी कैसे की जा सकती है। इसलिए हमने उससे थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कई प्रकार के फल लिए। दुकानदार का रोम-रोम पुलकित था। उसने शायद ही कभी सोचा होगा कि एक दिन वह उन विदेशियों को सफलता पूर्वक अपना सौदा बेच देगा जिनकी भाषा भी वह नहीं जानता। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हमारी जेब में इण्डोनिशाई रुपए थे जिनका इस्तेमाल करना भी हमें बखूबी आता था। फलों की खरीददारी हो चुकी थी। मि. अन्तो की कार फिर से बोरोबुदुर विहार की तरफ बढ़ने लगी। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कस्बाई फलों की दुकान के आसपास भी किसी तरह का कचरा या छिलके नहीं पड़े हुए थे।

    विशालाकाय पहाड़नुमा स्थापत्य संरचना

    लगभग एक घण्टा चलने के बाद हम बोरोबुदुर बौद्ध विहार पहुंचे। मार्ग में एक स्थान पर रुककर मि. अन्तो ने हमारे लिए रियायती टिकटों का प्रबंध करने का प्रयास किया किंतु इस बार वह सफल नहीं हो सका। मंदिर के प्रवेश द्वार पर टिकट खिड़की के पास उसने हमें छोड़ा। यहाँ एक व्यक्ति के टिकट का मूल्य 3 लाख इण्डोनेशियाई रुपए अर्थात् डेढ़ हजार भारतीय रुपए है। जब तक हमने टिकट खरीदे, तब तक मि. अन्तो अपनी कार पार्क करके आ चुका था। उसने फिर से हमें दो छतरियां पकड़ाईं तथा कहा कि यहाँ भी आप चाय पी सकते हैं, इसके लिए अलग से शुल्क नहीं लगेगा, यह विदेशी पर्यटकों के लिए ही है। हमने उसके हाथ से छतरियां लीं तथा उसे धन्यवाद देकर चाय के काउंटर की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में हम छतरियां हाथ में लेकर बौद्ध विहार की ओर बढ़ गए। लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद भी हमें विहार दिखाई नहीं दिया। फिर जैसे ही हम पेड़ों के झुरमुट को पार करके एक सड़क पर मुड़े, अचानक ही वह प्रकट हुआ। यह एक विशाल पहाड़ जैसा दिखाई देता है। भारत में बड़े-बड़े दुर्ग एवं विशालाकाय मंदिर हैं किंतु इससे पहले हमने इतनी विशालाकाय पहाड़नुमा स्थापत्य संरचना नहीं देखी थी।

    कठिन चढ़ाई

    इतनी ऊंचाई तक चढ़ना न केवल पिताजी के लिए, अपितु मेरे लिए भी काफी कठिन था। दीपा के लिए भी स्वतंत्र रूप से शिखर तक चढ़ पाना संभव नहीं था। हम सड़क पर कदम बढ़ाते हुए अंततः स्तूप के काफी निकट पहुंच गए। यहाँ आकर पिताजी की हिम्मत ने जवाब दे दिया। वे एक बैंच पर बैठ गए। मैंने, विजय तथा भानु से दीपा को लेकर चढ़ाई आरम्भ करने के लिए कहा और स्वयं पिताजी के साथ बैंच पर बैठ गया। लगभग आधे घण्टे बाद पिताजी ने कहा कि मैं पूरी चढ़ाई तो नहीं कर पाउंगा किंतु एक या दो मंजिल तक चलता हूँ। लगभग अस्सी वर्ष की आयु में इतनी चढ़ाई भी एक कठिन बात थी किंतु हम दोनों ने चढ़ाई आरम्भ कर ही दी।

    पिताजी दो मंजिल तक मेरे साथ चले। इस बीच उन्हें दो बार रुक जाना पड़ा। विजय और भानु भी दूसरी मंजिल पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। पिताजी ने दो मंजिलों तक का शिल्प और स्थापत्य देखने के बाद, नीचे उतरने का निर्णय लिया। मैंने उनसे कहा कि वे उसी बैंच पर जाकर बैठ जाएं जहाँ से हम आए थे। थोड़ी देर में हम भी आते हैं। पिताजी के लौट जाने के बाद मैंने मि. अन्तो द्वारा दी गई छतरियों को छड़ी की तरह प्रयोग करते हुए ऊपर चढ़ना आरंभ किया। पत्थरों का यह संसार निःसंदेह अचरज से भरा हुआ था। चूंकि पत्थरों की सीढ़ियों को लकड़ी की सीढ़ियों से ढंक दिया गया था इसलिए चढ़ने में आसानी रही। अन्यथा जूतों से घिसकर चिकने हुए पत्थरों पर चढ़ पाना और भी अधिक कठिन होता।

    रूप धातु से निर्वाण स्तर तक

    बोरोबुदुर चैत्य की रचना एक विशाल वर्तुलाकार स्तूप के रूप में है इसके चारों ओर बौद्ध ब्रह्माण्डिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तर बने हुए हैं जो कामध्यान (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) कहलाते हैं। दर्शक इन तीनों स्तरों का चक्कर लगाते हुए इसके शीर्ष पर अर्थात् बुद्धत्व की अवस्था को पहुँचता है। स्मारक में हर ओर से सीढ़ियों और गलियारों की विस्तृत व्यवस्था है। मुझे विगत अक्टूबर में चिकनगुनिया हुआ था जिसके कारण पैर अब तक दर्द करते थे, घुटनों में स्थित कार्टिलेज की पर्त भी अधिक चलते रहने के कारण भीतर की ओर दब गई थी, जिसके कारण घुटने बहुत दर्द कर रहे थे। फिर भी मैं सौभाग्य से हाथ आए इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। मैं बच्चों के साथ-साथ चलता हुआ तथा धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ, रूपधातु स्तर को पार करके अरूप धातु स्तर से होता हुआ निर्वाण स्तर को पहुंच ही गया।

    यहाँ का दृश्य बहुत अद्भुत था। दूर-दूर तक चावल के खेत लहरा रहे थे। मंद, सुहावनी एवं निर्मल वायु प्रवाहित हो रही थी। सूर्य देव भी अपनी प्रखरता छोड़कर मानो यहाँ के वायुमण्डल को अलौकिक तथा कम ऊष्ण प्रकाश प्रदान कर रहे थे। मोक्ष क्या होता है, यह तो मैं नहीं जानता किंतु इतनी ऊंचाई पर बैठकर हजारों बौद्ध भिक्षु निश्चय ही महात्मा बुद्ध द्वारा बताए गए प्रतीत्यसमुत्पात, चत्वारि आर्य सत्यानि तथा अष्टांग मार्ग पर चलते हुए अपने महान गंतव्य की ओर, अनदेखे, अनजाने अनंत की ओर यात्रा की तैयारी करते होंगे, इसमें किसी तरह का संदेह नहीं रह गया था।

    बोरोबुदुर चैत्य से वापसी

    यहाँ से हमें वापसी करनी थी। इस बार निर्वाण स्तर से नीचे उतर कर अरूप धातु स्तर से होते हुए रूप धातु स्तर पर लौटना था। मुझे लगा, हिन्दू दर्शन में जीव को अक्षर अर्थात् कभी नष्ट न होने वाला माना गया है तथा जीव के, ऊपरी लोकों से नश्वर शरीर में बार-बार आवागमन का जो सिद्धांत दिया गया है, वह यही है। मनुष्य अपनी तपस्या और भक्ति के बल पर कामनाओं को नष्ट करता हुआ सिद्धियों के आलोकमाय लोक में पहुंचता है, वहाँ कुछ अवधि तक अलौकिक सुख का उपभोग करता है और फिर से मृत्यु लोक में उतर आता है। ठीक वैसी ही प्रक्रिया तो थी यह! हिन्दू धर्म में भी मोक्ष की अवधारणा है, किंतु उस लक्ष्य को बहुत विरले जीव प्राप्त कर पाते हैं, उसके लिए वनस्पतियों के बीज की तरह अपने अहंकार को दूसरों की सेवा और ईश भक्ति की ऊर्वरा मिट्टी में गला कर नष्ट कर देना होता है।

    बोरोबुदुर चैत्य के लिए चढ़ाई आरम्भ करने के लगभग दो घण्टे बाद हम बोरोबुदुर चैत्य से नीचे उतर आए। जिस रास्ते से हम नीचे उतरे, वह चढ़ाई वाले रास्ते से अलग था। यह वैसा ही था जैसे किसी जीवात्मा का पुनर्जन्म किसी दूसरे गांव में हो गया हो और उसकी पुराने जन्म की स्मृतियां उसे पहले वाले गांव में जाने के लिए कह रही हों। स्तूप के दूसरी तरफ उतर जाने के कारण हमारे समक्ष एक नई समस्या खड़ी हो गई। पिताजी उसी मार्ग की तरफ बनी बैंच पर बैठकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे जहाँ से हमने चढ़ाई आरम्भ की थी। उन्हें ढूंढकर लाना कठिन काम हो गया क्योंकि उन तक पहुंचने के लिए मंदिर के चारों ओर चक्कर काटते हुए हमें कम से कम दो किलोमीटर चलना था। हमने मधु एवं भानू को दीपा के साथ वहीं एक बैंच पर बैठने के लिए कहा और मैं एवं विजय पिताजी को ढूंढने के लिए चढ़ाई की दिशा वाले मार्ग की ओर चल दिए। लगभग एक किलोमीटर चलने के बाद विजय ने मुझे वापस लौटा दिया और स्वयं अकेला ही पिताजी को लेने गया। मैंने उससे कहा कि वह पिताजी को लेकर यहाँ नहीं आए अपितु सीधा बाहर जाए। वहाँ कार पार्किंग में उसे मि. अन्तो मिल जाएगा। मैंने एक्जिट-वे पर लौटकर मधु, भानू एवं दीपा को लिया और हम लोग बोरोबुदुर परिसर से बाहर निकलने के लिए रवाना हुए। इसी मार्ग में समुद्ररक्षा नामक संग्रहालय स्थित है। इस विशुद्ध भारतीय नाम को पढ़कर हम सुखद आश्चर्य से भर गए।

    दीपा का इण्टरनेशनल फोटो

    अभी कुछ दूर ही चले होंगे कि इण्डोनेशियाई लड़कियों के एक समूह ने हमें घेर लिया। वे सैकण्डरी और हायर सैकेण्डरी स्टैण्डर्ड में पढ़ने वाली जान पड़ती थीं तथा दीपा के साथ फोटो खिंचवाना चाहती थीं। भानू ने उन्हें सहर्ष अनुमति दे दी। दीप की तो जैसे लॉटरी लग गई। एक लड़की उसे गोद में लेकर खड़ी हो गई और बाकी की लड़कियां उसके दोनों ओर खड़ी हो गईं। इतने में ही उन लड़कियों की टीचर दौड़ती हुई आई, उसने हमसे माफी मांगी और उन लड़कियों से नाराजगी भरे स्वर में पूछा कि क्या तुमने इस बच्ची के माता-पिता से परमिशन ले ली है! उसने कम से कम तीन बार यह प्रश्न पूछा और जब तीनों ही बार जवाब हाँ में आया तो वह भी दीपा के साथ फोटो खिंचवाने के लिए खड़ी हो गई। इसी बीच पास से गुजर रही कुछ अन्य देशों की लड़कियां भी दीपा को देखकर रुक गईं। उन्होंने भी अपने कैमरे क्लिक किए। मैं भी एक स्नैप क्लिक किए बिना नहीं रह सका।

    डेढ़ साल की दीपा अभी बोल भी नहीं सकती। उस ग्रुप में उन अनाजन लड़कियों में से बहुतों को एक-दूसरे की भाषा भी समझ में नहीं आती थी किंतु यह प्रेम की भाषा थी, बाल्यावस्था के प्रति सहज आकर्षण की भाषा थी जिसे वे सब बहुत अच्छी तरह समझती थीं। जाने किन-किन देशों की लड़कियों ने वह फोटो एक दूसरे से शेयर किया होगा। कितना अच्छा होता यदि धरती पर चारों ओर ऐसा ही स्नेहमय वातावरण होता! यदि ऐसा हुआ होता तो निश्चित ही लोग स्वर्ग, मोक्ष और परमात्मा की खोज में समय खराब नहीं करते। क्योंकि ये तीनों कहीं और नहीं, केवल प्रेम में निवास करते हैं।

    बाजार की लम्बी दीर्घा

    हम दीपा को उन लड़कियों से लेकर फिर से आगे बढ़े किंतु शीघ्र ही उस रास्ते ने हमें एक बाजार में ले जाकर छोड़ दिया। यह लगभग वैसा ही बाजार था जैसा कि भारत में तिब्बती और नेपाली लोग लगाकर बैठ जाते हैं। यहाँ इण्डोनेशियाई कलाकृतियां, कपड़े, चित्र, विभिन्न प्रकार के मनकों की मालाएं आदि बिक रहे थे। हम थके हुए थे और हमारी रुचि इनमें से किसी चीज में नहीं थी। फिर भी हमें इस बाजार में आगे ही बढ़ते रहना था। बाजार की हर गली का अंत एक नई गली में हो रहा था। लगभग डेढ़-दो किलोमीटर चलने के बाद हम पूरी तरह थक गए और एक नारियल पानी की दुकान पर बैठ गए। यहाँ भी 20 हजार रुपए का नारियल मिल रहा था। हमने 15 हजार रुपए में नारियल तय किया तथा एक बड़ा सा दिखने वाला नारियल छांटकर दुकान पर बैठी लड़की को छीलने के लिए दे दिया।

    तुम पास आए, जरा मुस्कुराए

    नारियल पानी वाली लड़की ने नारियल काटकर उसमें दो स्ट्रॉ डालकर हमें दे दिया। एक तो वहाँ के नारियल वैसे ही भारत में मिलने वाले नारियलों के मुकाबले दो से तीन गुने बड़े हैं, उस पर यह नारियल तो वहाँ के नारियलों में से भी बहुत बड़े आकार का था। हमने वह पानी अपने गिलासों में और पानी की बोतलों में भर लिया। उस नारियल में से लगभग दो लीटर पानी निकला। यह हम सबके के लिए एक बार में पीने के लिए पर्याप्त था।

    हम नारियल पानी पी ही रहे थे कि 20-22 साल के दो जावाई लड़के हमारे पास आकर गिटार बजाते हुए गाने लगे। इण्डोनेशिया में वे पहले भिखारी थे जो हमने देखे। वे दोनों अच्छे कपड़े पहने हुए थे। अच्छा गिटार बजा रहे थे। उनके गिटार से एक भारतीय हिन्दी फिल्मी की धुन निकलने लगी, और शीघ्र ही उन्होंने गाना शुरु कर दिया- 'तुम पास आए, जरा मुस्कराए ....... कुछ-कुछ होता है।' हम चौंके, इन्हें कैसे पता लगा कि हम भारतीय हैं किंतु अगले ही क्षण समझ में आ गया कि मधु के साड़ी पहने हुए होने से कोई भी हमें आसानी से पहचान सकता था कि हम भारतीय हैं। इतने अच्छे कपड़ों में और इतना अच्छा गिटार बजा रहे उन लड़कों को कुछ भी देने की हमारी इच्छा नहीं हुई। मेरा मन इसलिए भी खराब हो गया था कि अब तक मैं यह सोचता रहा था कि यहाँ भिखारी नहीं हैं, किंतु इन लड़कों ने वह धारणा तोड़ दी थी। कुछ ही देर में विजय पिताजी को लेकर वहीं आ गया। हमने उन्हें भी नारियल पानी पीने के लिए दिया और कुछ देर बाद हम वहाँ से चल दिये। इस समय दोपहर के तीन बज रहे थे। मि. अन्तो हमें पार्किंग एरिया में मिल गया।

    चलती हुई कार में लंच

    हमने मि. अन्तो से कहा कि कहीं किसी पार्क में गाड़ी रोक ले ताकि हम दोपहर का भोजन कर सकें। मि. अन्तो ने सुझाव दिया कि चूंकि शाम होने में बहुत कम समय बचा है इसलिए बेहतर होगा कि हम चलती कार में लंच कर लें, अन्यथा आगे वाला स्पॉट नहीं देख पाएंगे। यह एक अच्छा सुझाव था। इसलिए हमने कार में ही लंच कर लिया। ऐसा करने में किसी तरह की असुविधा भी नहीं हुई।

    गैम्बीरा लोका जू

    जावाई भाषा में गैम्बीरा का अर्थ होता है प्रसन्न, लोक का अर्थ होता है सार्वजनिक और जू का अर्थ होता है चिड़ियाघर। इस प्रकार इस चिड़ियाघर के नाम में गैम्बीरा जावाई भाषा से, लोका संस्कृत से ओर जू अंग्रेजी भाषा से लिया गया प्रतीत होता है। हमें जू तक पहुंचते-पहुंचते लगभग चार बज गए। यह चिड़ियाघर 54 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है तथा सायं साढ़े पांच बजे तक खुला रहता है, क्योंकि इसके बाद अंधेरा हो जाता है। हमारे पास कम समय बचा था। एक-डेढ़ घण्टे की अवधि में इसे पूरा देखना संभव नहीं था। फिर भी हमने जल्दी से टिकट लिए और जू में प्रवेश कर लिया।

    इस चिड़ियाघर को ई.1956 में खोला गया था। इसमें विविध प्रकार के पशुओं की 470 प्रजातियां रहती हैं जिनमें से ओरंगुटान, कोमोडो, ड्रैगन, गिब्बन और हिप्पोपोटोमस हमारे लिए विशेष आकर्षण के थे। हमने अपना ध्यान इन्हीं पर फोकस किया। यह चिड़ियाघर गजाहवोंग नदी पर बना हुआ है। जावा में हाथी को गज कहा जाता है। इस नदी के क्षेत्र में हाथी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं, संभवतः इसलिए इस नदी का नाम गजाह वोंग पड़ा होगा। एक बाड़े में जवाई हाथी प्रदर्शित किए गए हैं जो डीलडौल एवं शारीरिक बनावट में भारतीय हाथियों के मुकाबले में कहीं नहीं टिकते। फिर भी इन्हें देखना इसलिए रोचक था कि ये अपनी लम्बी सूण्ड फैलाकर देशी-विदेशी सैलानियों से केले आदि उपहार स्वीकार कर रहे थे।

    एक बाड़े में हमें भूरे रंग के दो ओरंगुटान दिखाई दिए। इनमें से एक ओरंगुटान लकड़ी के एक ऊंचे से मचान पर बैठा हुआ, देश-विदेशी पर्यटकों को देखने का आनंद ले रहा था जबकि उसका साथी गुफानुमा केबिन में आराम कर रहा था। लगभग एक घण्टे में हमने कोमोडो, ड्रैगन, गिब्बन और हिप्पोपोटोमस और विशालाकाय तोतों को देख लिया। एक बाड़े में चार-पांच ऊंट प्रदर्शित किए गए हैं। यह हमारे लिए पहला अवसर था जब हमने किसी ऊंट को चिड़ियाघर में प्रदर्शनकारी जंतुओं के बीच देखा था। ये एक थुम्बी वाले ऊंट हैं जैसे कि भारत के थार रेगिस्तान में पाए जाते हैं।

    भगवान भुवन भास्कर काफी नीचे झुक आए थे तथा चिड़ियाघर में प्रकाश काफी कम हो गया था। इसी बीच हमने एक पतले सांप को भी एक पिंजरे के बाहर रेंगते हुए देखा। अंधेरे में रुकना उचित नहीं था क्योंकि यह आम भारतीय चिड़ियाघरों की तरह नहीं था जो शहर के बीच कृत्रिम पार्क में स्थापित किए जाते हैं, यह वास्तविक घने जंगल के बीच फैला हुआ चिड़ियाघर था जहाँ पिंजरों के बाहर भी जानवर रहते हैं। अतः हम बाहर की ओर चल दिए। इसी बीच चिड़ियाघर के गार्ड अपनी मोटरसाइकिलों पर बैठकर जायजा लेते हुए दिखाई दिए कि अब कितने पर्यटक चिड़ियाघर में घूम रहे हैं। वहाँ केवल हम ही थे, हमारे बाहर निकलते ही गार्ड्स ने चिड़ियाघर का मुख्य फाटक बंद कर दिया। इस समय साढ़े पांच बजे से पांच-सात मिनट ऊपर हुए होंगे किंतु ऐसा लग रहा था मानो शाम के साढ़े सात बज गए हों।

    रावत जालान

     मि. अन्तो को इस बात की प्रसन्नता थी कि उसके बताए हुए दोनों स्थलों में हमने पूरी रुचि ली थी। हमने उससे अनुरोध किया कि हमें व्हीट फ्लोर, कुकिंग ऑइल, मिल्क और वेजीटेबल्स खरीदनी हैं इसलिए किसी डिपार्टमेंटल स्टोर पर ले चले। हमारे पास अब बहुत कम घी और आटा बचे थे। हमें आज शाम के साथ-साथ अगले तीन दिन का भोजन बनाकर अपने साथ लेना था जिसके लिए यह सामग्री पर्याप्त नहीं थी। सौभाग्य से मसाले अब भी पर्याप्त मात्रा में थे। मि. अंतो ने कुछ क्षण के लिए सोचा और फिर हमें एक मॉल ले जाने का निश्चय किया। जब हम मॉल पहुंचने वाले थे कि पिताजी की दृष्टि एक बड़े साइन बोर्ड पर पड़ी जिस पर रोमन लिपि में बड़े-बड़े अक्षरों में 'रावत जालान' लिखा हुआ था। पिताजी ने अनुमान लगाया कि जोधपुर में कुछ अग्रवाल परिवार अपना सरनेम जालान लगाते हैं। हो न हो यह जोधपुर के ही किसी अग्रवाल परिवार की दुकान हो। इसी प्रकार जोधपुर में रावत मिष्ठान भण्डार है जो कि जोधपुर के एक माली परिवार का है। पिताजी ने अनुमान लगाया कि संभवतः जोधपुर के किसी अग्रवाल परिवार एवं माली परिवार ने मिलकर यह स्टोर खोला हो। अतःयहाँ पूछने से हमें यह ज्ञात हो जाएगा कि जोगजकार्ता में गेहूं का आटा कहाँ मिल जायेगा तथा उसे जावाई भाषा में क्या कहते हैं!

    चूंकि सड़क काफी व्यस्त थी, अतः केवल विजय को उस दुकान पर भेजा गया। विजय ने जाकर देखा कि वह एक दवाईयों का बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर है। विजय ने जाकर रावत तथा जालान के बारे में पूछा तो वहाँ के इण्डोनेशियाई कर्मचारी विजय का सवाल ही नहीं समझ सके। बाद में हमें इण्टरनेट से ज्ञात हुआ कि इण्डोनेशियाई भाषा में Rawat Jalan का अर्थ Hospitalization street होता है। वहाँ उन शब्दों का आशय दवाइयों की बड़ी दुकान से था।

    सोयाबीन के तेल और गेहूं के आटे की खोज

    यह बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर था जहाँ मि. अंतो हमें लेकर गया। इस स्टोर में सैंकड़ों लम्बी-लम्बी रैक लगी हुई थीं जिनमें किराणे से लेकर सब्जी और फल, मछली, अण्डा और पैक्ड फूट उपलब्ध थे। हमने इस विशाल स्टोर में गेहूं का आटा और कुकिंग ऑइल ढूंढना आरम्भ किया। कुछ कर्मचारियों से भी पूछा किंतु कोई कर्मचारी हमारी बात नहीं समझ पाया। हमें कुछ रैक्स में नारियल तथा सूरजमुखी के कुकिंग ऑइल मिले किंतु समस्या यह आ गई कि इन पर झींगों के चित्र बने हुए थे। इन चित्रों से आशय यह था कि इनमें झींगे तले जा सकते हैं किंतु हम ऐसा तेल कैसे खरीद सकते थे जिन पर झींगे बने हुए हों।

    हमने एक कर्मचारी से व्हीट फ्लोर के बारे में पूछा। सौभाग्य से यह कर्मचारी थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानता था। उसने मुझे एक रैक दिखाया। मैंने वहाँ पैकेट उठा कर देखे तो निराशा ही हाथ लगी क्योंकि वह चावल का आटा था और इससे रोटियां नहीं बन सकती थीं। मैं वहाँ से पूरी तरह निराश होकर मुड़ ही रहा था कि मेरी दृष्टि एक रैक में रखे हुए पैकेट पर पड़ी मैंने अनमने ढंग से उसे भी उठाया तो खुशी से उछल पड़ा। इस पर Wheat Flour लिखा हुआ था। अब चाहे यह कितने भी महंगा क्यों न हो, खरीदना ही था। उस पूरे डिपार्टमेंटल स्टोर में व्हीट फ्लोर का यह अकेला ही पैकेट बचा था। दूध के पैकेट, आलू-प्याज, टमाटर तथा कुछ फल भी हमें मिल गए।

    अब केवल तेल की समस्या शेष थी। अंत में हमने नारियल तेल का एैसा पैकेट खरीदने का निर्णय लिया जिस पर किसी झींगे या मछली आदि का चित्र नहीं बना हुआ था। जब मैंने ऐसा एक पैकेट छांटा ही था कि अचानक विजय की दृष्टि एक रैक पर पड़ी। इसमें सोयाबीन के तेल की एक लीटर की शीशी रखी हुई थी। इसका यहाँ होना किसी चमत्कार से कम नहीं था। पिताजी सोयाबीन के तेल को खाने के लिए उपयुक्त नहीं मानते किंतु यहाँ सोयाबीन का तेल हमें किसी वरदान से कम नहीं लगा।

    तीन दिन की तैयारी

    हमारी खोज पूरी हो चुकी थी। अपने अपार्टमेंट पहुंचकर हमने मि. अन्तो को कल की तरह चाय पिलाई। उसके लिए चाय का पिया जाना एक आश्चर्यजनक घटना से कम नहीं होती थी। हमने उसके दिन भर के पेमेंट्स किए तथा मि. अन्तो को प्रातः सात बजे आने का अनुरोध किया। इसके बाद मधु और भानु ने मिलकर 21, 22 और 23 अप्रेल के खाने की तैयारी की। इसमें से 21 अप्रेल का दिन ट्रेन में, 22 अप्रेल का दिन होटल में तथा 23 अप्रेल का दिन हवाई जहाज में बीतने वाला था। इस दौरान हमें कहीं से शाकाहारी भोजन मिलने की आशा नहीं थी। मधु ने हमारे द्वारा खरीदा गया व्हीट फ्लोर का पैकेट खोल कर देखा, उसमें बहुत बारीक मैदा थी। मधु ने वह मैदा, हमारे पास उपलब्ध आटे में मिला दी। अब आसानी से ढाई दिन के लिए पूरियां बनाई जा सकती थीं। तीसरे दिन की शाम को साढ़े दस बजे तो हमें दिल्ली पहुंच ही जाना था। पूरियां तलने के बाद मधु ने कुछ आलू उबालकर अपने साथ रख लिए। बिना छिले हुए आलू यदि फ्रिज या एसी में रहें तो दो-ढाई दिन तक खराब नहीं होते। कच्ची प्याज, लाल टमाटर और नमकीन भुजिया भी तरकारी की तरह प्रयुक्त हो सकते हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-19 योग्यकार्ता से विदा - राजधानी जकार्ता में पहला दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-19   योग्यकार्ता से विदा - राजधानी जकार्ता में पहला दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-19  


    योग्यकार्ता से विदा 

    आज 21 अप्रेल को हमें योग्यकार्ता से इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता के लिए रवाना होना था। हमने एक लक्जरी ट्रेन से रिजर्वेशन करवा रखा था। यह ट्रेन प्रातः 8.57 पर योग्यकार्ता से चलकर सायं 4.52 पर जकार्ता पहुंचने वाली थी। रेलवे स्टेशन हमारे सर्विस अपार्टमेंट से केवल 8-9 किलोमीटर की दूरी पर था। फिर भी हमने टैक्सी ड्राइवर मि. अन्तो के सुझाव पर प्रातः 7 बजे निकलने का समय निर्धारित किया। उसका कहना था कि प्रातः के समय ऑफिस जाने वाले ट्रैफिक की काफी भीड़ होती है, जाम भी लग जाते हैं, इसलिए मार्ग में एक से डेढ़ घण्टा लग सकता है।

    हम लोग प्रातः चार बजे उठकर ही चलने की तैयारी करने लगे। प्रातः 6 बजे से वर्षा आरम्भ हो गई तथा प्रातः सात बजते-बजते वर्षा काफी तेज हो गई। ट्रेन का समय प्रातः 8.57 पर था और मुझे आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो, मि. अन्तो नहीं आए और हमारी ट्रेन चूक जाए किंतु मिस्टर अन्तो प्रातः 7 बजे से पहले ही आ गया। मुझे उसकी यह अनुशासन-प्रियता देखकर अच्छा लगा। उसने आते ही कहा- मिस्टर मोहन, वर्षा हो रही है और सड़क पर ट्रैफिक काफी है, इसलिए हमें तुरंत निकलना चाहिये। हम तैयार तो थे ही, तुरंत चल पड़े।

    मैं मि. अन्तो की छतरी लेकर मिस रोजोविता को गुडबाय कहने के लिए सामने के घर तक गया। घर का दरवाजा किसी युवक ने खोला। मैंने कहा- 'हम जा रहे हैं, आपका घर बहुत आराम देह था। हमने यहाँ अच्छा समय व्यतीत किया। कृपया घर संभाल लें।' युवक ने मुस्कुरा कर मुझे धन्यवाद दिया तथा कहा- 'घर संभालने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपकी यात्रा शुभ हो।' मि. अन्तो ठीक कह रहा था। सड़क पर बहुत ट्रैफिक था, यहाँ कार्यालयों का समय प्रातः शीघ्र ही आरम्भ हो जाता होगा। हमें 7 किलोमीटर की दूरी पार करने में लगभग एक घण्टा लगा।

    मि. अन्तो से विदा

    हम लगभग 8 बजे जोगजकार्ता स्टेशन पहुंच गए। हल्की बूंदा-बादी अब भी हो रही थी। मि. अन्तो ने छतरी बाहर निकाली किंतु हमने मना कर दिया। हमने जिस समय मि. अन्तो से रेलवे स्टेशन का किराया तय किया था, उस समय हम योग्यकार्ता से लगभग 30 किलोमीटर दूर (मासप्रियो के अपार्टमेंट में) थे किंतु इस समय हम केवल 7 किलोमीटर दूर से आए थे। इसलिए किराया कम ही बनता था किंतु हमने मि. अन्तो से किराया कम करने के लिए नहीं कहा तथा पूरा पेमेंट किया किंतु हमें आश्चर्य हुआ जब उसने 25 हजार इण्डिोनेशियाई रुपए वापस हमारे हाथ में रख दिए। भारत में तो ऐसा होना अत्यंत कठिन है। मि. अन्तो एक पढ़-लिखा, सुशिक्षित, सुसभ्य मुस्लिम युवक है। वह चाहता तो उसे आसानी से कोई व्हाइट कॉलर जॉब भी मिल सकता है किंतु वह जो भी काम कर रहा था, उसे कितने ढंग और प्रेम से कर रहा था, यह सीखने और समझने वाली बात थी। भारत में इतना पढ़ा-लिखा लड़का शायद ही टैक्सी ड्राइवर का काम करे। हालांकि मैंने दिल्ली में उन लड़कों को देखा है जो पार्ट टाइम जॉब के रूप में उबर और ओला की टैक्सियां चलाते हैं और अच्छा खासा कमा लेते हैं। उनका व्यवहार परम्परागत भारतीय ड्राइवरों की तुलना में बेहद शालीन है हालांकि शालीनता के मामले में मि. अन्तो उनसे भी बहुत आगे है।

    जोगजकार्ता स्टेस्यन के भीतर

    जिस ट्रेन से हमें जोगजकार्ता से जकार्ता जाना था, उसका नाम अरगो लावू था। यह एक लक्जरी ट्रेन थी जिसके एक्जीक्यूटिव क्लास में हमारा रिजर्वेशन था। हम अपनी इस यात्रा को यादगार बनाना चाहते थे। हमें ज्ञात था कि यह ट्रेन पूरे दिन चावल, केले और मक्का के खेतों से भरे हुए हरे मैदानों से होकर गुजरने वाली थी। इसलिए हमने सीटों का चयन खिड़की के पास किया था। इसके लिए इण्डोनेशिया सरकार ने हमसे कुछ अधिक किराया लिया था।

    ट्रेन आने में अभी एक घण्टे का समय था किंतु इस ट्रेन में जाने वाले यात्रियों के लिए बोर्डिंग खुल चुका था। यह ठीक वैसी ही व्यवस्था थी जैसी कि एयर पोर्ट पर हुआ करती है। हमने अपने बोर्डिंग पास स्टेशन के गेट पर खड़ी लेडी ऑफिसर्स को दिखाए। वे नेवी ब्लू रंग की शानदार यूनीफॉर्म में थीं। इस प्रकार की वर्दी सर्दियों में भारतीय नेवी के अफसर पहनते हैं। लेडी ऑफिसर्स का व्यवहार, उनकी यूनीफॉर्म की ही तरह शानदार था। उन्होंने बड़ी विनम्रता से हमें अपने पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा। लेडी ऑफिसर्स ने हमारे पासपोर्ट का हमारे बोर्डिंग पास से मिलान किया और हमें स्टेशन के भीतर जाने का अनुरोध किया। उन्होंने हमें बताया कि हमारी ट्रेन प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर आएगी। हम लोग स्टेशन के मुख्य भवन में से होते हुए एक नम्बर प्लेटफार्म को पार करते हुए दो नम्बर प्लेटफार्म पर जाकर खड़े हो गए। भारतीय होने के नाते हम ऐसा ही करने के अभ्यस्त थे। प्लेटफॉर्म नम्बर 1 से प्लेटफॉर्म नम्बर 2 के बीच जाने के लिए रेल की पटरियां पार करनी पड़ीं। यात्रियों की सुविधा के लिए दोनों प्लेटफार्म्स के बीच एक पतली सी सड़क बनी हुई थी। हमें कोई पुल पार नहीं करना पड़ा। जबकि भारत में किसी भी रेलवे स्टेशन पर बिना पुल पार किए, एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाया ही नहीं जा सकता।

    प्लेटफॉर्म नम्बर दो बहुत ही संकरा था। कठिनाई से 10 फुट चौड़ा। इसके दोनों ओर पटरियां बनी हुई थीं और इसके दूसरी ओर एक ट्रेन लगी हुई थी। हमें अनुमान था कि यह हमारी ट्रेन नहीं है। हमें खड़े हुए अभी दो मिनट हुए होंगे कि एक रेलवे कर्मचारी हमारे पास आया। इसने भी अन्य अधिकारियों की तरह पी कैप से लेकर ब्लैक शू तक पूरी वर्दी बहुत सलीके से पहन रखी थी। उसने हमारे निकट आकर विनम्रता से पूछा- 'व्हिच ट्रेन प्लीज!' जब हमने 'अर्गो लावू' कहा तो उसने कहा- 'दिस इज नॉत (नॉट) अरगो लावू। कम विद मी प्लीज।' हम अपना सामान लेकर उसके पीछे चल दिए। वह हमें फिर से प्लेटफार्म नम्बर एक पर ले गया और हमसे वहाँ रखीं शानदार कुर्सियों पर बैठने का अनुरोध किया। हमें यह बहुत सुविधा जनक भी लगा क्योंकि प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर खड़े होने के लिए समुचित स्थान नहीं था। इस समय सवा आठ बज चुके थे। हमने वहीं पर नाश्ता करने का निश्चय किया। हम नाश्ता करके चुके ही थे कि वही कर्मचारी पुनः हमारे पास आया और बोला- 'योअर त्रेन इज कमिंग, यू मे कम दीयर, ऑन प्लेतफॉर्म नम्बर तू।' हमने उसका अनुसरण किया।

    अरगो लावू

    अरगो लावू एक शानदार चमचमाती हुई ट्रेन है। जिस एसी चेयर कार में हमारा रिजर्वेशन था, उसमें दोनों तरफ दो-दो आरामदेह कुर्सियां लगी हुई थीं। कोच की सफाई देखते ही बनती थी। इसके कांच पूरी तरह साफ और पारदर्शी थे जिनसे बाहर का दृश्य बहुत साफ दिखाई देता था। कोच में सामने की ओर लगे टीवी स्क्रीन पर ट्रेन की स्पीड, ट्रेन के चालक तथा ट्रेन के सिक्योरिट ऑफिसर के नाम एवं सैलफोन नम्बर डिस्पले हो रहे थे। सिक्योरिटी ऑफिसर की तस्वीर भी इस स्क्रीन पर डिस्प्ले हो रही थी। पूरे मार्ग में ट्रेन संभवतः तीन-चार स्टेशनों पर ही रुकी थी किंतु जब भी ट्रेन किसी स्टेशन से गुजर रही होती थी तो उसका नाम भी स्क्रीन पर डिस्पले होता था।

    थोड़ी देर में एक ट्रेन हॉस्टेस अपनी ट्रॉली के साथ आई। यह एयर हॉस्टेस जैसी ही वर्दी पहने हुए थी और जिस प्रकार हवाई जहाज की एयर हॉस्टेस, यात्रियों को चाय-बिस्कुट बेचती हैं, यह भी बेच रही थी। हमने अुनमान लगाया कि भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी संभवतः इसी प्रकार की ट्रेन हॉस्टेस भारत की ट्रेनों में नियुक्त करना चाहते हैं। वे ट्रेन हॉस्टेस तो नियुक्त कर सकते हंय किंतु भारत की ट्रेनों में तो यात्रियों के चलने भर के लिए भी जगह नहीं होती, ये ट्रेन हॉस्टेस कहाँ होकर निकलेंगी। भारत के लोग कंधा छीले बिना तो दो कदम आगे नहीं बढ़ सकते। इन ट्रेन हॉस्टेसों के कंधे छिल-छिलकर लहू-लुहान हो जाया करेंगे। भारत के एक रेलमंत्री ने तो स्लीपर कोच में साइड अपर और साइड लोअर के बीच साइड मिडिल बर्थ भी लगा दी थी। इसके बाद तो कंधों के साथ-साथ घुटने भी छिलने लग गए थे। पूरा दिन अरगो लावू चावल और मक्का के खेतों से होकर गुजरती रही। नारियल और केले के झुरमुट भी दिखाई देते रहे। शाम सवा चार बजे यह गंबीरी जकार्ता स्टेशन पर पहुंची।


    जकार्ता में दो दिन

    गम्बीरी स्टेस्यन

    यह भारत के किसी भी व्यस्त रेलवे स्टेशन जैसा था किंतु इस स्टेशन को देखना, विश्व इतिहास के दर्शन करने से कम नहीं था। इस रेलवे स्टेशन का निर्माण डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में हुआ था। वर्तमान में बिजनिस क्लास और एक्जीक्यूटिव क्लास ट्रेन इस स्टेशन पर ठहरती हैं। इकॉनोमी क्लास ट्रेन पकड़ने के लिए पासार सेनेन स्टेशन जाना होता है। गम्बीरी स्टेशन पर ट्रेनों के रुकने का सिलसिला ई.1871 से आरम्भ हुआ। उस समय इसका नाम 'वेल्टेव्रेडेन स्टेशन' हुआ करता था। ई.1884 में पुराने स्टेशन की जगह नया वर्तमान स्टेशन बनाया गया। ई.1927 में इस स्टेशन को फिर से बनाया गया। इस बार इसे 'आर्क डेको स्टाइल' में बनाया गया जिससे यहाँ से गाड़ियों का आवागमन काफी सुविधाजनक हो गया।

    ई.1937 में इस स्टेशन का नाम बदलकर 'बाताविया कोनिंग्सप्लीन' (डच भाषा में इसका अर्थ होता है- हॉलैण्ड के राजा का स्थान) कर दिया गया। 27 दिसम्बर 1949 को इण्डोनेशिया डच सत्ता से स्वतंत्र हो गया। उसके बाद इण्डोनेशिया सरकार ने स्टेशन का नाम बदलकर 'जकार्ता गम्बीर स्टेस्यन' कर दिया। ई.1990 में इसे जोगलो आर्चीटैक्चरल स्टाइल में बनाया गया तथा इसे लाइमग्रीन रंग से सजाया गया।

    रोटी की दुकान

    हम लोग अपना सामान लेकर रेलवे स्टेशन के मुख्य भवन से बाहर आ गए। यहाँ हमारी दृष्टि एक छोटी सी दुकान पर पड़ी जिस पर रोमन लिपि में लिखा था- 'रोटी'। हमने दुकान में झांककर देखा, वहाँ मैदा से बनी हुई छोटे-छोटे आकार की बाटी जैसी रोटियां थीं। हमने दुकानदार से कोई पूछताछ नहीं की क्योंकि तरकारी के नाम पर क्या कुछ मिलने की संभावना थी, वह हमसे छिपा नहीं था।

    उत्तरा कहाँ है ?

    हम लोग अपना सामान लेकर रेलवे स्टेशन के मुख्य भवन से बाहर आ गए। हमने वहाँ से होटल पॉप के लिए कार-टैक्सी करनी चाही किंतु वहाँ खड़े कार-टैक्सी चालकों ने हमसे पांच लाख इण्डोनेशाई रुपए भाड़ा मांगा जो भारतीय मुद्रा में 2500 रुपए होते हैं। हमें ज्ञात था कि गंबीरी रेलवे स्टेशन से होटल पोप 29 किलोमीटर है। हम एक हजार रुपए का भुगतान करने को तैयार थे किंतु वे तैयार नहीं हुए। इस पर विजय ने उबर टैक्सी सेवा बुक की। थोड़ी ही देर में टैक्सी वाला रेलवे स्टेशन पहुंच गया और उसने हमसे कहा कि वह साउथ लॉबी में खड़ा है। हमने पास खड़े व्यक्तियों से पूछना चाहा कि जहाँ हम खड़े हैं, यह नॉर्थ लॉबी है कि साउथ। संयोगवश वहाँ हमें एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जो अंग्रेजी भाषा समझ सकता हो। अंत में हमने स्टेशन के भीतर जाकर रेलवे ऑथोरिटीज से पूछा तो उसने बताया कि आप नॉर्थ लॉबी में खड़े हैं।

    उसने एक तरफ संकेत करते हुए कहा कि यहाँ से बाहर निकलते ही साउथ लॉबी है। हम अपना सामान लेकर नॉर्थ लॉबी से साउथ लॉबी की ओर रवाना हुए तो अचानक मेरी दृष्टि पत्थर और सीमेंट से बने एक चौड़े खम्भे पर गई। वहाँ लोहे की एक प्लेट लगी हुई थी जिस पर रोमन लिपि में लिखा था - UTTARA LOBY ओह! ये तो इतना आसान था! वास्तव में जकार्ता के लोग उसे जावाई भाषा में उत्तरा लॉबी कहते हैं। यदि हम पूछते कि उत्तर लॉबी कौनसी है तो हमें तुरंत ही जवाब मिल जाता। हिन्दी भाषा का शब्द हजारों किलोमीटर दूर जावा द्वीप पर बहुतायत से प्रचलित था और हम उसे अंग्रेजी में ढूंढ रहे थे।

    केवल एक हजार तीस रुपए

    'होटल पॉप' गंबीरी रेलवे स्टेशन से लगभग 29 किलोमीटर दूर था। इस होटल का चयन विजय ने इसलिए किया था क्योंकि यह जकार्ता इण्टरनेशनल एयरपोर्ट से मात्र ढाई किलोमीटर दूर था। जकार्ता शहर विश्व के सबसे व्यस्ततम ट्रैफिक वाले शहरों में से है, इसिलए हम चाहते थे कि हम एयरपोर्ट जाते समय स्थानीय ट्रैफिक में न फंस जाएं। इस टैक्सी का ड्राइवर बहुत ही ढीला था, बिल्कुल अनाड़ियों की तरह कार चला रहा था। जब सड़क खाली होती थी तब भी स्पीड नहीं बढ़ाता था। हमने उससे कई बार अनुरोध किया कि वह अपनी कार की स्पीड बढ़ाए। वह अंग्रेजी न समझ में आने का नाटक करता रहा। पिताजी उस पर एक बार जोर से खीझ गए, तब जाकर उसकी समझ में आया कि हम क्या चाहते हैं। जकार्ता शहर वास्तव में घनीभूत भीड़ वाला शहर है। जब हम होटल पॉप पहुंचे तो चारों तरफ घना अंधेरा हो चुका था। हमने टैक्सी का भुगतान किया, बिल केवल 1030 रुपए (भारतीय मुद्रा के अनुसार) आया था। जबकि स्टेशन के बाहर खड़े कार टैक्सी वाले हमसे ढाई हजार रुपए की मांग कर रहे थे।

    होटल पॉप

    होटल पॉप पहुंचकर कहीं घूमने जाने का प्रश्न ही नहीं था। हमें होटल में बने एक डिपार्टमेंटल स्टोर से बिना दूध की चाय मिल गई। दीपा का मिल्क पाउडर का डिब्बा इस समय हमारे लिए वरदान सिद्ध हुआ। चाय काफी महंगी थी, पर चाय उपलब्ध थी, यही बड़ी उपलब्धि थी। यह एक सुविधाजनक एवं बहुत बड़ा होटल था। हमने कुछ देर टीवी देखा और खाना खाकर सो गए। होटल साफ-सुथरा एवं विभिन्न सुख-सुविधाओं से सुसज्जित था किंतु यहाँ वे आराम नहीं थे जो सर्विस अपार्टमेंट में उपलब्ध होते हैं। घर और होटल में जितना फर्क होना चाहिए, वह तो था ही।

    मुस्कुराहट से भरी वह इण्डोनेशियन लड़की

    22 अप्रेल को प्रातः पांच बजे आंख खुल गई। लगभग छः बजे मैं नीचे गया ताकि चाय की उपलब्धता के बारे में जाना जा सके। रिसेप्शन काउंटर पर कोई कर्मचारी नहीं था किंतु काउंटर के पास की लॉबी में 18-19 वर्ष की पतली-दुबली सुंदर सी लड़की खड़ी थी। मैंने उसकी तरफ देखा, वह एक दीवार से पीठ टिकाए शांत मुद्रा में खड़ी थी। उसे देखकर कहा जा सकता था कि वह अभी नहाकर अपनी ड्यूटी पर आई है अर्थात् रात्रि कालीन स्टाफ में से नहीं है। मैंने उससे गुड मॉर्निंग कहा तो उसने मुस्कुराकर बहुत ही संजीदगी से जवाब दिया। संभवतः उसे केवल इतनी ही अंग्रेजी आती थी। क्योंकि इसके बाद उसने एक भी शब्द नहीं बोला, केवल मुस्कुराती रही और कुछ भी पूछने पर संकेत भर करती रही।

    मैंने उससे पूछा कि यहाँ चाय कहां मिलेगी! वह निश्चित ही समझ गई थी कि इस समय आदमी को किस चीज की आवश्यकता हो सकती है! उसने चाय की एक बड़ी सी केटली की तरफ संकेत किया। मेरी प्रसन्नता का पार नहीं था। वहाँ न केवल लगभग 8 लीटर बड़ी चाय की केटली थी जिसमें चाय भरी हुई थी बल्कि मिल्क पाउडर के छोटे-छोटे पाउच भी रखे हुए थे। मैंने एक कप चाय तो उसी समय बनाकर पी ली और दल के शेष सदस्यों को यह खुशखबरी सुनाने के लिए अपने कमरों की तरफ लौट गया। कुछ ही देर में हम सब उस लॉबी में थे। इस दौरान मधु को एक भारतीय व्यक्ति मिला जिसने हिन्दी में कुछ कहा। मधु हिन्दी सुनकर चौंकी, उससे कुछ और पूछ पाती तब तक वह भारतीय भला मानुस तेजी से चलता हुआ दूर चला गया और फिर कभी दुबारा दिखाई नहीं दिया।

    हमारे पास फ्री नाश्ते के कूपन थे किंतु हम उन्हें किसी भी तरह काम में नहीं ले सकते थे क्योंकि नाश्ते में हमारे काम का कुछ भी नहीं था। इसलिए हमने एक-एक कप चाय और पी तथा अपने कमरों में तैयार होने के लिए चले गए। इस दौरान दीपा ने होटल के पूरे फ्रंट व्यू का जायजा लिया और मैंने लॉबी में गेस्ट्स की सुविधा के लिए रखे कम्पयूटरों पर ई-मेल वगैरा देखे।

    यदि वहाँ होते भारतीय लड़के-लड़कियां

    हम लगभग एक घण्टा उस लॉबी में रहे। इस बीच हमने देखा कि दुनिया के बहुत से देशों के पर्यटक यहाँ ठहरे हुए थे। वे चाय और नाश्ते के लिए इसी लॉबी में पहुंच रहे थे। इतने लोग वहाँ थे किंतु किसी तरह की चिल्ल-पौं नहीं थी। मुस्कुराहट से भरी वह इण्डोनेशियाई लड़की पूरे समय खड़ी रही और अतिथियों को अटैण्ड करती रही। वह बिना बोले ही अपना काम बड़ी कुशलता से कर रही थी। उसने किसी अतिथि को किसी तरह की कोई समस्या नहीं आने दी। मैंने मन में विचार किया कि यदि इसकी जगह भारतीय कर्मचारी होती तो वह अवश्य ही वहाँ पड़ी कुर्सियों को खींचकर बैठ जाती और पूरे समय सैलफोन पर बात करती रहती। मुस्कुराना तो दूर, वह अतिथियों को ढंग से जवाब भी नहीं देती क्योंकि उसकी प्राथमिकताएं और प्रशिक्षण सभी कुछ भिन्न तरह का होता। यदि उसके स्थान पर कोई भारतीय पुरुष कर्मचारी होता तो आधा समय वह अपने स्थान पर ही नहीं मिलता और जोर-जोर से बोलकर स्वयं ही वहाँ की शांति को भंग कर रहा होता।

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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-20 जावा द्वीप में पांच दिन - राजधानी जकार्ता से विदा

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-20 जावा द्वीप में पांच दिन - राजधानी जकार्ता से विदा

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-20

    राजधानी जकार्ता से विदा

    घटत कचा

    हमने आज का पूरा दिन जकार्ता शहर देखने लिए निर्धारित किया हुआ था। हमें ज्ञात हुआ कि जकार्ता में मोनास नेशनल म्यूजियम से तीन बस सेवाएं चलती हैं जो पर्यटकों को जकार्ता शहर की निःशुल्क यात्रा करवाती है। इनमें से पहली बस सेवा सांस्कृतिक स्थलों के लिए, दूसरी बस सेवा पुराने जकार्ता शहर के लिए तथा तीसरी बस सेवा नए जकार्ता शहर के लिए है। होटल पॉप से मोनास नेशनल म्यूजियम लगभग 24 किलोमीटर दूर है। इसलिए हमने उबर की टैक्सी बुक कर ली। लगभग 10 मिन्ट में टैक्सी आ गई। टैक्सी ड्राइवर 25-26 साल का गोरा-चिट्टा और सॉफ्ट-स्पीकिंग नौजवान था। उसके कपड़े काफी महंगे प्रतीत होते थे। उसने हाथों में रुद्राक्ष की वैसी ही माला पहन रखी थी जिसका मूल्य हमें तनाहलोट की चीनी दुकान में छः लाख इण्डोनेशियाई रुपए बताया गया था। मैंने मार्ग में उससे पूछा कि उसका मुख्य कार्य टैक्सी चलाना है या कुछ और! उसने हमें बताया कि उसका एक गैराज है तथा वह केबल सप्लाई का काम करता है। रविवार को उसके गैरेज की छुट्टी होती है, इसदिन वह उबर के लिए टैक्सी चलाता है। मैंने उससे पूछा कि क्या इस काम में बहुत अच्छी आमदनी होती है! उसने जवाब दिया कि कभी-कभी बहुत अच्छी आय होती है किंतु नॉरमल दिनों में भी कम नहीं होती। रास्ते में सड़क के किनारे एक विशाल चौराहे के बीच में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथ का मॉडल बना हुआ था जिसे घोड़े खींच रहे थे। मैंने टैक्सी चालक से पूछा कि यह किसका स्टेच्यू है! उसने कहा कि या तो यह घटत कचा है या भीमा है। उसका उत्तर चौंकाने वाला था। वह भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बारे में नहीं जानता था। उसके लिए श्रीकृष्ण से लेकर भीम और घटोत्कच एक जैसे ही थे।

    जकार्ता सिटी टूर

    निःशुल्क पर्यटन बस सेवा बुण्डारन होटल इण्डोनेशिया से आरम्भ होकर उत्तर की ओर थामरिन जालान स्थित सरीनाह डिपार्टमेंटल स्टोर तक जाती है और वहाँ से नेशनल म्यूजियम होती हुई जालान जुआण्डा में स्थित जालान महापहित तक जाती है और अंत में इस्ताना नेगारा अर्थात् नेगारा महल तक जाकर समाप्त हो जाती है। नेशनल म्यूजियम के पास ही मर्डेका स्क्वायर स्थित है। हमें मोनास नेशनल म्यूजियम के सामने से लाल रंग की एक बस मिली जो ओल्ड सिटी का दौरा करवाती थी। यह भीड़भाड़ से भरा हुआ बहुत बड़ा शहर है। इसमें एक करोड़ से अधिक जनसंख्या निवास करती है। संसार में 34 शहर ऐसे हैं जिनकी जनंसख्या 1 करोड़ से ऊपर है, जकार्ता उनमें से एक है। यह साउथ-ईस्ट एशिया का सबसे बड़ा शहर है। नए जकार्ता शहर में सड़क के किनारे विशाल मॉल, मार्केट, होटल, पैलेशियल बिल्डिंग्स और सरकारी कार्यालय खड़े हैं। यहाँ की सड़कें बहुत चौड़ी और साफ-सुथरी हैं। पूरी दुनिया से लोग जकार्ता शहर देखने आते हैं इसलिए विश्व भर के पर्यटकों का तांता लगा रहता है। ई.2020 तक इस शहर की जनसंख्या 16 करोड़ को पार कर जाने वाली है। इसलिए इण्डोनिशयाई सरकार ने वृहत् जकार्ता योजना पर काम करना आरम्भ कर दिया है जिसके तहत आसपास के गांवों और कस्बों को जकार्ता शहर में मिला लिया जाएगा। लगभग 40 मिनट में यह राउण्ड पूरा हो गया। इस बीच बस, कुछ म्यूजियम्स के सामने रुकी किंतु हमने बस में बैठे-बैठे ही शहर देखने का निर्णय लिया और बस के अंतिम पड़ाव पर उतर पड़े।

    फिर से तुम पास आए

    पुराने शहर में कुछ देर चहल-कदमी करने के बाद हमें पीले रंग की एक बस मिली जो हमें नए जकार्ता के स्थलों को दिखाती हुई फिर से नेशनल म्यूजियम ले जाने वाली थी। इस बस को 20-22 साल की एक लड़की चला रही थी। बस में दो लड़कियां टूरिस्ट गाईड के रूप में काम कर रही थीं तथा हर टूरिस्ट प्लेस के बारे में माइक्रोफोन पर बता रही थीं। यह विवरण इण्डोनेशियाई भाषा में होने से हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। अचानक उनमें से एक टूरिस्ट गाइड अपने स्थान से उठकर हमारे पास आई और बोली- इण्डिया! हमने हाँ कहा तो उसने अगला वाक्य टूटी-फूटी अंग्रेजी में बोला जिससे हमें अनुमान हुआ कि यह लड़की भारत गई थी और उसने दिल्ली शहर देखा है। मैंने मुस्कुराकर उसे ग्रीट किया और फिर से बाहर देखने लगा। मेरी रुचि बातों में न देखकर वह अपने स्थान पर चली गई और थोड़ा उच्च स्वर में वही गीत गाने लगी जो बोरोबुदुर स्मारक परिसर के मार्केट में दो युवक गिटार बजाते हुए गा रहे थे- 'तुम पास आए, यूं मुस्कुराए, क्या करूं हाए कि कुछ-कुछ होता है।' मैंने अनुमान लगाया कि इण्डोनेशिया में यह भारतीय फिल्म बहुत लोकप्रिय रही होगी! थोड़ी ही देर में मोनास एरिया आ गया जहाँ नेशनल म्यूजियम स्थित है। हम यहीं उतर गए क्योंकि इसके सामने ही मर्डेका स्क्वायर बना हुआ है। हम कुछ समय इसी क्षेत्र में गुजारना चाहते थे।

    मर्डेका स्क्वायर

    किसी समय यह स्थान जंगली भैंसों के चरने का स्थान हुआ करता था जो अधिक पानी में सुगमता से रह सकते थे। जावा के लोगों ने इन्हीं भैंसों के सहारे चावल की खेती आरम्भ की थी। 18वीं शताब्दी ईस्वी में डच लोगों ने इस स्थान पर कई महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण किया। ईस्ट-इण्डीज औपनिवेशिक सरकार के समय इस स्थान को कोनिंगस्प्लेइन अर्थात राजा का मैदान कहा जाता था। मर्डेका इण्डोनेशियाई शब्द है जिसका अर्थ है आजादी। अर्थात् डच लोगों के समय में जो राजाओं का स्थान था, वह अब आजादी का मैदान बन गया है। जकार्ता का राष्ट्रीय स्मारक जिस स्थान पर बना हुआ है, वह मर्डेका स्क्वैयर के नाम से जाना जाता है। इसे इण्डोनेशियाई भाषा में 'मैदान मर्डेका' तथा 'लापंगान मर्डेका' भी कहा जाता है।

    राष्ट्रीय स्मारक के चारों ओर चार मैदान स्थित हैं। इनके लिए भी मेदान (डमकंद) शब्द प्रयुक्त होता है। उत्तर दिशा वाले मैदान को मेदान उत्तरा कहा जाता है। ये दोनों ही शब्द हिन्दी भाषा के हैं। मर्डेका स्क्वैयर जकार्ता के ठीक केन्द्र में एक किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में स्थित है। यदि इसके अंतर्गत निकटवर्ती मैदानों को सम्मिलित कर लिया जाए तो इसका क्षेत्रफल 75 हैक्टेयर होता है। इस प्रकार यह संसार का सबसे बड़ा स्क्वैयर है। इसके मध्य में स्थित राष्ट्रीय स्मारक को स्थानीय भाषा में मोनास कहा जाता है। राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न कार्यक्रम, मिलिट्री परेड, नागरिक प्रदर्शन आदि इसी स्थान पर आयोजित होते हैं। सप्ताहंत की छुट्टियों में हजारों लोग अपने परिवारों के साथ यहाँ पहुंचते हैं। इसके चारों ओर विभिन्न सरकारी भवन स्थित हैं जिनमें मर्डेका पैलेस, नेशनल म्यूजियम, सुप्रीम कोर्ट, रेडियो ऑफ रिपब्लिक इण्डोनेशिया सहित विभिन्न सरकारी मंत्रालय भी शामिल है।

    राष्ट्रीय स्मारक

    मर्डेका मैदान के मध्य में इण्डोनेशिया का राष्ट्रीय स्मारक बना हुआ है। यह 132 मीटर ऊंची लाट है। इसे इण्डोनेशिया के राष्ट्रीय स्वातंत्र्य संग्राम का प्रतीक कहा जाता है। जब ई.1950 में डच सरकार ने इण्डोनेशिया को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी तो इण्डोनेशिया की राजधानी योग्यकार्ता से जकार्ता लाई गई। राष्ट्रपति सुकार्णो की पहल पर ई.1961 में मर्डेका स्कैवयर में राष्ट्रीय स्मारक का निर्माण आरम्भ किया गया। यह ई.1975 में बनकर तैयार हुआ तथा देश की जनता को समर्पित किया गया। इस लाट के ऊपरी हिस्से में 14.5 टन कांसे से 14 मीटर ऊंची एवं 6 मीटर चौड़ी, आग की लपटें बनाई गई हैं जिन पर 50 किलो स्वर्ण से बनी हुई चद्दर मंढी हुई है। यह प्रातः 8 बजे से सायं 4 बजे तक खुला रहता है। सायंकाल में 7 बजे से 10 बजे तक रात्रि कालीन पर्यटन के लिए पुनः खोला जाता है। सोमवार को पूरी तरह छुट्टी रहती है।

    संसार का सबसे बड़ा शिवलिंग इस स्मारक के निर्माण के लिए इण्डोनेशिया सरकार ने दो बार खुली प्रतियोगिताएं आयोजित कीं तथा दोनों ही बार एक ही डिजाइन चुना गया। जब यह डिजाइन राष्ट्रपति सुकार्णो को दिखाया गया तो उसे यह पसंद नहीं आया। सुकार्णो इस स्थान पर एक विशालाकाय शिवलिंग का निर्माण करना चाहता था जो जावा की संस्कृति का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर सके। वह यह भी चाहता था कि इस शिवलिंग को इस तरह बनाया जाए कि उसके आधार की योनि, चावल कूटने की ओखली की तरह दिखाई दे और शिवलिंग, चावल कूटने के मूसल की तरह हो।

    सुकार्णो के मस्तिष्क में जितनी विशाल योजना थी, यदि उसे अपनाया जाता तो इण्डोनेशिया की आर्थिक स्थिति ही डांवाडोल हो जाती। अतः 132 मीटर ऊंचे शिवलिंग का निर्माण किया गया जो चावल कूटने के मूसल को भी प्रदर्शित करता है तथा इसके आधार पर योनि को इस तरह बनाया गया है जो चावल कूटने की ओखली का प्रतिनिधित्व करती है। इसी तरह का एक छोटा स्मारक सेंट्रल जोगजा में भी बनाया गया है। इण्डोनेशिया के राष्ट्रीय स्मारक के रूप में बने शिवलिंग को सकारात्मकता, शक्ति एवं दिन का प्रतीक माना जाता है जबकि इसके आधार में बनी योनि जीव के शाश्वत अस्तित्व, संतुलन, सामंजस्य, ऊर्वरता एवं रात्रि का प्रतीक है।

    इस स्मारक को इण्डोनेशिया के स्थानीय पुष्प 'एमोर्फोफलुस टिटेनम' का प्रतीक भी माना जाता है। इस पुष्प के आधार भाग में एक योनि जैसी संरचना बनी होती है जिसके बीच स्तंभाकार रचना बाहर निकलती हुई दिखाई देती है। इस प्रकार यह संसार का सबसे बड़ा शिवलिंग है जो अपने आधार से 132 मीटर अर्थात् 433 फुट लम्बा है। इस लाट के भीतर म्यूजियम स्थापित किया गया है। इसके बाहरी हिस्से में प्रस्तर शिलाएं लगाई गई हैं जिन पर इण्डोनेशिया का इतिहास लिखा गया है। इसके आधार भाग में बने स्वातंत्र्य द्वार की बाईं दीवार पर इण्डोनेशिया का राष्ट्रीय चिह्न गरुड़ अंकित है जिसे यहाँ गरुड़ पंचशील कहा जाता है तथा Garuda Pancasila लिखा जाता है।

    मर्डेका स्क्वैयर से वापसी

    अभी लगभग साढ़े चार ही बजे थे कि अंधेरा घिरने लगा। आकाश में काले बादलों के समूह चारों तरफ उमड़-घुमड़ने लगे। आज न तो पुतु हमारे साथ था और न मि. अंतो। इसलिए हमने तत्काल होटल वापस लौटने का निर्णय लिया। विजय ने उबर की टैक्सी बुक की। केवल पांच मिनट में टैक्सी आ गई और हम अपने होटल लौट पड़े। हमने होटल पहुंचकर उसी छोटे से डिपार्टमेंटल स्टोर से चाय खरीदी। यह एक अच्छी और सुविधाजनक दुकान थी। जहाँ जरूरत की बहुत सारी चीजें उपलब्ध थीं।

    जावा द्वीप पर अंतिम दिन

    23 अप्रेल को हमें जावा द्वीप से विदाई लेने का दिन था। आज भी मैं प्रातः 6 बजे चाय पीने होटल की लॉबी में आया तो मुस्कुराहट से भरी वही लड़की, कल वाले स्थान पर खड़ी हुई अतिथियों का चाय पर स्वागत कर रही थी। आज हमें जकार्ता से नई दिल्ली के लिए हवाई जहाज पकड़ना था। मैं दीपा को अपने साथ ले आया था। उसने दीपा से हाथ मिलाया। मैं दीपा को उसके पास छोड़कर चाय के लिए बढ़ गया। इसी बीच विजय भी वहीं आ गया। हमने रिसेप्शन काउंटर पर खड़े युवक से एयरपोर्ट के लिए होटल की तरफ से उपलब्ध कराई जाने वाली फ्री कैब सर्विस के बारे में पूछा। उसने बताया कि दो सर्विस हैं- प्रातः सात बजे और प्रातः आठ बजे। आप जिसमें जाना चाहें, उसे अभी बुक करा लें। इस समय साढ़े छः बज चुके थे। हमने सात बजे वाली कैब बुक कर ली। केवल पैंतीस मिनट में हम सब तैयार होकर नीचे आ गए। कैब हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। होटल पॉप से जकार्ता एयरपोर्ट केवल दो किलोमीटर दूर है। उसने लगभग 7.20 पर हमें इण्टरनेशनल टर्मिनल पर छोड़ दिया।

    जकार्ता एयर पोर्ट पर

    हमारी फ्लाइट 11.30 बजे थी। यह 'इण्डोनेशिया एयर एशिया' की इण्टरनेशनल फ्लाइट थी जो हमें कुआलालम्पुर छोड़ने वाली थी और वहाँ से हमें नई दिल्ली के लिए दूसरी फ्लाइट लेनी थी। एयर पोर्ट पर पहुंचकर हमने सबसे पहला काम करेंसी बदलने का किया। हमारी जेब में रखी इण्डोनेशियाई करंसी आगे कुछ काम नहीं आने वाली थी। हमने एक काउण्टर पर इण्डोनेशियाई करंसी देकर डॉलर ले लिए क्योंकि यदि हम भारतीय मुद्रा प्राप्त करने का प्रयास करते तो हमें अधिक शुल्क देना पड़ता। डॉलर को भारत में आसान दरों पर भारतीय रुपए में बदला जा सकता है। करंसी एक्सचेंज की यह प्रक्रिया अपनाने से काफी बचत होती है।

    हमने एयरपोर्ट पर बोर्डिंग करने से पहले ही बाहर वेटिंग रूम में नाश्ता करने का विचार किया क्योंकि यदि हम अंदर जाने की प्रक्रिया आरम्भ कर देते तो उसमें कम से कम दो घण्टे लगने थे। मधु और भानु ने अभी सुबह की चाय भी नहीं पी थी और न ही दीपा ने दूध पिया था।

    जकार्ता एयर पोर्ट

    यह एक बहुत बड़ा एयर पोर्ट है, काफी साफ-सुथरा और आधुनिक कम्प्यटराईज्ड उपकरणों से सुसज्जित। जकार्ता में वायु-सेवाएं ई.1928 से आरम्भ हो गई थीं। पुराना एयरपोर्ट छोटा होने के कारण ई.1985 में नया एयरपोर्ट बनाया गया। इसे सुकार्णो हात्ता इण्टरनेशनल एयरपोर्ट कहा जाता है। यह संसार का सातवां सर्वाधिक एयर कनैक्टिविटी वाला एयरपोर्ट है तथा जकार्ता-सिंगापुर एयर रूट से जुड़ा हुआ है जो कि संसार के सर्वाधिक व्यस्त एयर-रूट में से एक है। इस एयरपोर्ट से प्रतिवर्ष 3.70 लाख हवाई उड़ानें होती हैं जिनमें 5.87 करोड़ यात्री विश्व भर की यात्रा करते हैं तथा 3.42 लाख मैट्रिक टन कार्गो ढोया जाता है। नाश्ता करने और चाय पीने के बाद हमने बोर्डिंग औपचारिकताएं आरंभ कीं जिनमें लगभग 2 घण्टे लग गए। कुछ समय टर्मिनल पर विश्राम करने को भी मिल गया। ठीक 11.30 बजे हमारी फ्लाइट ने जकार्ता की धरती छोड़ दी। यह हमारी न केवल जकार्ता से अपिुत जावा से और इण्डोनेशिया से भी विदाई थी। जब हम कुआलालम्पुर एयर पोर्ट पर उतरे तो हमारी घड़ियों में दोपहर के ढाई बजे थे। कुआलालम्पुर का समय जकार्ता से एक घण्टा आगे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में तीन नहीं अपितु दो घण्टे ही लगे थे। कुलालालम्पुर एयरपोर्ट भी जकार्ता एयरपोर्ट की तरह चमचमाता हुआ और शानदार है। यहाँ से अगली फ्लाईट मलेशियाई समय के अनुसार सायं 7.00 बजे मिलनी थी। इसलिए हमने यह समय एयरपोर्ट देखने में व्यतीत किया।

    सारा नजारा उलट गया

    हमने यहाँ कुछ फल लेने का निश्चय किया किंतु भाव सुनकर फल खरीदने का उत्साह जाता रहा। अब तक हम 1 भारतीय रुपए में 200 इण्डोनेशियन रुपए की दर से रुपया इस्तेमाल करने के अभ्यस्त हो गये थे किंतु यहाँ हमें 15 भारतीय रुपयों के बदले 1 मलेशियन रुपए की दर से खरीदरारी करनी थी जिसे रिंग्गिट कहते हैं। कुआलालम्पुर एयरपोर्ट पर सामान्य आकार का एक भारतीय सेब छः रिंग्गिट या डेढ़ डॉलर या नब्बे भारतीय रुपए का था जबकि भारत में हमें यह 20 से 25 भारतीय रुपए में मिलता है। इसकी अपेक्षा चाय काफी सस्ती थी। एक कप चाय हमें 75 भारतीय रुपए में मिल गई। यहाँ चारों तरफ एक अजीब सी गंध फैली हुई थी। हमने अनुमान लगाया कि यह अवश्य ही मछलियों और झींगों के उबाले जाने से निकलती होगी। इसलिए चाय हलक के नीचे बड़ी कठिनाई से नीचे उतर पाई।

    दीपा की भूख

    देखते ही देखते शाम के 7 बज गए और हमें नई दिल्ली के लिए फ्लाईट मिल गई। हवाई जहाज फिर से समुद्रों के ऊपर उड़ान भरने लगा। यह 10.30 बजे दिल्ली पहुंचने वाली थी किंतु इस उड़ान में वास्तव में हमें साढ़े पांच घण्टे लगने वाले थे। एक घण्टे बाद दीपा रोने लगी। लगभग एक घण्टे तक उसे लड्डू, मठरी, खाखरे, बिस्कुट आदि से बहलाने का प्रयास किया गया। भानु ने उसे मिल्क पाउडर से दूध बनाकर दिया किंतु वह चुप नहीं हुई। अंत में विजय ने एयरहोस्टेस से उबले हुए चावल का एक डिब्बा लेने का निर्णय किया। चावल देखकर दीपा खुश हो गई।

    इधर दीपा चावल खाती जा रही थी और उधर अंधेरे आकाश में, हमारा हवाई जहाज धरती से लगभग तीस हजार फुट ऊपर, एक हजार किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से समुद्रों के ऊपर उड़ा जा रहा था। जाने कितने समुद्र, जाने कितने द्वीप, जाने कितने देश और जाने कितने लोग जो हमें दिखाई नहीं दे रहे थे किंतु वे सब थे और उनके ऊपर से होकर हवाई जहाज पूरे वेग से उड़ रहा था। मैंने विचार किया, इन अंधेरों, इन समुद्रों और इन दूरियों के बीच तरह-तरह की संस्कृतियां हँसती-मुस्कुराती हैं। मुझे याद आ रहे थे तेजी से पीछे छूटते बाली द्वीप के वे निर्धन हिन्दू जिनके पास गाय नहीं है, गंगाजी नहीं हैं, दूध-घी की नदियां नहीं हैं। गेहूं नहीं है, फिर भी वे इन सब चीजों से प्रेम करते हैं क्योंकि वे स्वयं को हिन्दू मानने और कहने में गर्व की अनुभूति करते हैं और इस अनुभूति को जीवित रखने के लिए हजारों साल से संघर्ष कर रहे हैं किंतु दुनिया की किसी भी संस्कृति को उनकी इस अनुभूति की किंचिंत परवाह नहीं है, यहाँ तक कि गाय, गंगा और गेहूं के देश में रहने वाले हिन्दुओं को भी नहीं।

    हम बाली द्वीप के हिन्दुओं को अजायबघर में रखी वस्तुओं की नुमाइश की तरह देखने जाते हैं और अपने देश में आकर फिर से अपनी ही जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं। कौन जाने बाली के हिन्दू कब तक इस संघर्ष को जीवित रख सकेंगे! मैंने यह प्रश्न स्वयं से इसलिए भी किया कि जब हजारों साल तक हिन्दू धर्म की छांव में रहने वाले जावा के हिन्दू, इस्लाम को अपनाकर श्रीकृष्ण की प्रतिमा के 'घटत कच' होने का अनुमान लगाते हैं तब हमें यह पता लग जाता है कि उन्हें बाली द्वीप के हिन्दुओं से कितनी सहानुभूति है।


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  • छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 1 शिवाजी के समय का भारत

     20.08.2017
    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 1  शिवाजी के समय का भारत

    छत्रपति महाराज शिवाजी राजे - 1

    शिवाजी के समय का भारत

    प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी केन्द्र में तथा भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित महाराष्ट्र में भारत की कई महान् विभूतियों का जन्म हुआ है। ई.1630 में इसी महाराष्ट्र प्रदेश में छत्रपति शिवाजी राजे का जन्म हुआ। उनके जन्म से सवा चार सौ साल पहले से भारत विचित्र राजनीतिक परिस्थितियों में फंसा हुआ था। उत्तर भारत पर ई.1206 से 1526 तक कट्टर सुन्नी तुर्कों ने शासन किया। उन्होंने हिन्दुओं को निर्धनता और दुर्भाग्य के समुद्र में डुबोकर बड़ी संख्या में मुसलमान बना लिया था। ई.1526 से दिल्ली पर समरकंद से आए मंगोल शासन कर रहे थे। वे भी तुर्क थे तथा पहले के तुर्कों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। भारत में मुगलिया राज्य के संस्थापक बाबर ने भारत को दारूल-हर्श (काफिरों का देश) घोषित किया तथा स्वयं को जेहाद (धार्मिक यात्रा) पर बताया जिसका उद्देश्य काफिरों को मारना या मुसलमान बनाना होता है। उसके पौत्र अकबर ने उत्तर भारत के अधिकांश प्रबल हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके उनकी राजकुमारियों से या तो स्वयं ने विवाह कर लिए या अपने पुत्र सलीम के साथ कर दिये। इसी को आजकल अकबर की हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा उदारता कहा जाता है। जबकि मुगलों के हरम में गईं इन हिन्दू राजकुमारियों की कोख से जन्मे तुर्क शहजादों ने हिन्दुओं को पहले से कहीं अधिक दुर्भाग्य, निर्धनता और मृत्यु प्रदान की।

    उत्तर भारत में चित्तौड़ का प्रबल राज्य सदियों से शासन करता आया था जिसने अकबर के समक्ष घुटने टेकने तथा अपनी कन्याओं के विवाह मुसलमानों के साथ करने से मना कर दिया। इसलिए अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग में तीस हजार से अधिक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया। उसने हिन्दू राजाओं को अपना सेनापति नियुक्त किया तथा हिन्दुओं के हाथों ही हिन्दुओं को मरवाया। इसके बदले में उसने हिन्दुओं पर से जजिया हटाया ताकि हिन्दू राजा एवं इतिहासकार, अकबर की उदारता के गुण गाते रह सकें। अकबर के पुत्र जहांगीर ने भी हिन्दुओं को नष्ट करने की यही रेशमी फंदे वाली नीति अपनाई। उसके पुत्र शाहजहाँ ने भारत की हिन्दू प्रजा पर फिर से जजिया लगाया और बड़ी संख्या में हिन्दुओं का संहार करवाया। उसका पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी बादशाह सिद्ध हुआ। उसने भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करने का काम तेजी से आगे बढ़ाया।

    इस काल में दक्षिण भारत, पांच छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों- बरार में इमादशाही राज्य, अहमदनगर में निजामशाही राज्य, बीजापुर में आदिलशाही राज्य, गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा बीदर में बरीदशाही राज्य में बंटा हुआ था। इन पांचों राज्यों पर शिया बादशाह शासन करते थे। इन शिया मुस्लिम राज्यों ने दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया और हिन्दू प्रजा को लूटकर अपने महल खजानों से भर लिए। वे हिन्दुओं के तीर्थों एवं देवालयों को बुरी से तरह नष्ट करते आ रहे थे। एक तरफ तो दक्षिण भारत के शिया राज्य, दक्षिण के हिन्दुओं को नष्ट कर रहे थे तो दूसरी ओर उत्तर भारत के कट्टर सुन्नी शासक, इन शिया राज्यों को फूटी आंखों से भी नहीं देखना चाहते थे। सुन्नी शासकों की दृृष्टि में शिया भी वैसे ही काफिर थे जैसे कि हिन्दू।


    शिवाजी का जन्म अहमदनगर के निजामशाह राज्य के प्रभावशाली जागीरदार शाहजी भौंसले के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ। शिवाजी के जन्म के कुछ समय बाद शाहजी ने शिवाजी की माता जीजाबाई को स्वयं से अलग करके शिवनेर दुर्ग में रख दिया क्योंकि जीजाबाई का पिता जाधवराय, निजामशाह के शत्रुओं अर्थात् मुगलों की सेवा में चला गया था। ई.1636 में मुगलों ने अहमदनगर का राज्य समाप्त कर दिया तब शाहजी ने बीजापुर राज्य में नौकरी कर ली। जीजाबाई के पिता जाधवराय की भी जल्दी ही मृत्यु हो गई, इस कारण जीजाबाई का वह आश्रय भी समाप्त हो गया और वह कई वर्षों तक अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों में बने किलों में भटकती रही। मुगल सेनाएं शाहजी के पुत्र को मार डालना चाहती थीं क्योंकि शाहजी, पहले तो निजामशाह की ओर से और अब आदिलशाह की ओर से मुगलों से युद्धरत था। बालक शिवा कई बार मुगल सिपाहियों के हाथों में पड़ते-पड़ते बचा किंतु जीजाबाई के धैर्य और साहस से प्रत्येक बार, बालक शिवा के प्राणों की रक्षा हुई।

    इस प्रकार शिवाजी ने अपने बाल्यकाल में ही मुस्लिम सैनिकों द्वारा किए जा रहे हिन्दू प्रजा के कत्ल और शोषण को बहुत निकट से देखा। इन्हीं परिस्थितियों में शिवाजी 16 साल के हो गए और उन्होंने हिन्दू प्रजा के उद्धार के लिए स्वयं को तैयार करने तथा किलों को जीतने के लिए सेना बनाने का निश्चय किया। किलों को जीतने और बनाने के लिए यह आयु बहुत कम थी, किंतु शिवाजी के निश्चय उनकी आयु से कहीं बहुत आगे थे। उनके हृदय में भारत की निरीह जनता के लिए पीड़ा थी। इसी पीड़ा को दूर करने के लिए उन्होंने मुस्लिम राज्यों को समाप्त करके हिन्दू राज्य की स्थापना का सपना देखा जिसे वह हिन्दू पदपादशाही कहते थे।

    शिवाजी का मानना था कि मुगल अजेय नहीं हैं, उन्हें यह प्रेरणा अपने पिता शाहजी से मिली थी। शाहजी ने भी, अहमदनगर तथा बीजापुर के लिए मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया था और मुगलों के दांत खट्टे किए थे, जिससे शाहजी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। शाहजी की प्रेरणा से शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति का फिर से उदय हुआ। दक्षिण भारत में बहमनी राज्य की स्थापना से पहले मराठे ही इस क्षेत्र पर शासन करते थे। जीवन-पर्यंत किए गए संघर्ष के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना की। औरंगजेब जैसा क्रूर एवं मदांध शासक भी शिवाजी द्वारा संगठित की गई मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। अंत में यह मराठा शक्ति भारत से मुगल शासन को उखाड़ फैंकने के लिए यम की फांस सिद्ध हुई।

    प्रस्तुत पुस्तक में सत्रहवीं शताब्दी के महानायक छत्रपति शिवाजी राजे की जीवनी के साथ-साथ उनके संघर्ष एवं उनकी उपलब्धियों का ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लेखन एवं विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक में शिवाजी के समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए तथ्यों को काम में लेने का यथासंभव प्रयास किया गया है। शिवाजी के समकालीन ग्रंथों में से कुछ ग्रंथों का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जिनमें मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ), नुश्खा-ए-दिलकुशा, स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) आदि प्रमुख हैं। औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ नामक एक मुगल सेनापति ने गुप्त रूप से मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ) नामक ग्रन्थ की रचना की। यह एक विशाल ग्रन्थ है जो ई.1519 में बाबर के समरकंद एवं फरगना आक्रमणों से आरम्भ होकर उसके वंशज मुहम्मदशाह रंगीला के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ समाप्त होता है। ग्रन्थ का महत्व ई.1605 से 1733 तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (ई.1658) से लेकर ई.1733 तक के लिए अधिक है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है। औरंगजेब के समकालीन प्रसिद्ध हिन्दू सेनापति भीमसेन ने नुश्खा-ए-दिलकुशा नामक फारसी ग्रंथ में औरंगजेब के राज्यकाल का आंखों देखा इतिहास लिखाँ उसने महाराजा जसवन्तसिंह तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया था। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गए उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का अच्छा वर्णन किया है।

    यूरोपीय पर्यटक जॉन फ्रॉयर शिवाजी के जीवन काल में भारत घूमने आया। उसने अपनी आंखों से मुगलों की सेनाओं को शिवाजी का राज्य बर्बाद करते हुए देखा। उसने भारत में हुए अनुभवों के आधार पर ‘‘न्यू एकाउंट ऑफ ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड पर्शिया’’ नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में एक स्थान पर उसने लिखा है- ‘‘मुगल सेनाएं अपने मार्ग में आने वाली हर चीज को गिरा देती थीं। गांव के गांव जलाए जा रहे थे। खेतों में खड़ी मक्का की फसलें भूमि पर गिराई जा रही थी। पशुओं को पकड़कर मुगलों के राज्य को ले जाया जा रहा था तथा शिवाजी के राज्य में रहने वाले स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को बलपूर्वक दास बनाया जा रहा था।’’

    औरंगजेब के समय में इटली के वेनिस नगर का निवासी निकोलोआ मनूची ई.1650 में सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया तथा औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह की तरफ से उत्तराधिकार के युद्ध में भाग लिया। जब दारा, औरंगजेब से पराजित होकर सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो निकोलोआ मनूची भी उसके साथ सिन्ध तक गया था। मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया। कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किए गए अभियान में भाग लिया। उसने स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) नामक पुस्तक लिखी जिसमें शिवाजी के समय का आंखों देखा इतिहास भी उपलब्ध है।

    आधुनिक इतिहासकारों में जदुनाथ सरकार ने शिवाजी के संघर्ष और उपलब्धियों का अच्छा वर्णन किया है। आधुनिक काल के अनेक मराठी एवं अंग्रेजी लेखकों ने भी शिवाजी के संघर्ष एवं उपलब्धियों को निरपेक्ष होकर लिखा है। शिवाजी और मुगलों के बीच बहुत लम्बा-चौड़ा पत्र व्यवहार हुआ जिनसे हार-जीत के दावों को सफलतापूर्वक कसौटी पर कसा जा सकता है। इन ग्रंथों एवं पत्रों का उपयोग करते हुए इस ग्रंथ का प्रणयन किया गया है तथा सत्रहवीं शताब्दी के उस अप्रतिम, अतुल्य एवं महान राजा को विनम्र श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया गया है।

    इस पुस्तक को लिखते समय मुझे शिवाजी के पिता शाहजी का जीवन चरित्र पढ़ने का अवसर मिला। मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि भारत के इस वीर योद्धा के प्रति इतिहासकारों ने बहुत अन्याय किया है जिसके कारण विद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में शाहजी की छवि नकारात्मक बन गई है। उन्हें शिवाजी तथा उनकी माता जीजाबाई को त्यागने वाला तथा मुसलमान बादशाहों की नौकरी करने वाला साधारण एवं छोटा सा सेनानायक बताया गया है। जबकि शाहजी अपने समय में भारत के विख्यात योद्धाओं में गिने जाते थे। इस पुस्तक में उस अप्रतिम योद्धा के सम्बन्ध में ऐतिहासिक तथ्यों का पता लगाकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया गया है।


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