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     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-20

    राजस्थान में पशुधन (1)


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    राज्य में 18वीं पशुगणना के अनुसार वर्ष 2007 में 566.63 लाख पशुधन पाया गया। पशुधन में गौ-धन, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़े, टट्टू एवं खच्चर,गधे, ऊँट एवं सूअर सम्मिलित होते हैं। राज्य में कुक्कुट की संख्या 49.94 लाख पाई गई। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पशुधन का योगदान लगभग 8 प्रतिशत है। गौ-धन का 50 प्रतिशत एवं भैंसों की संख्या का 25 प्रतिशत खेती एवं परिवहन के काम आता है। कन्हैयालाल सेठिया ने राजस्थान के पशुधन का बखान करते हुए लिखा है-


    नारा नागौरी हिद ताता,

    मदुआ ऊँट अणूंता खाथा।

    ईं रै घोड़ां री कै बातां?

    धरती धोरां री।

    18वीं पशुगणना वर्ष 2007 के अनुसार पशुधन की उपलब्धता


    पशुगणना 2007 के अनुसार उपरोक्त पशुओं के साथ-साथ राज्य में 9301 खरगोश, 4993620 कुक्कुट, तथा 1246036कुत्ते भी निवास करते हैं। राज्य का पशुधन घनत्व 166 पशु प्रति वर्ग किमी है।


    सकल पशुधन का प्रतिशत वार वितरण

    राज्य में कुल पशुधन में गौ-धन (गाय बैल) 21.38 प्रतिशत, भैंस 19.58 प्रतिशत, भेड़ 19.75 प्रतिशत, बकरियाँ 37.95 प्रतिशत, ऊँट 0.75 प्रतिशत, सूअर 0.37 प्रतिशत तथा अन्य पशु 0.22 प्रतिशत हैं।


    पशुगणना से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

    (पशुगणना 2007 पर आधारित)


    राज्य में सर्वाधिक पशु संख्या वाला जिला       बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक गायों वाला जिला               उदयपुर

    राज्य में सर्वाधिक भैंसों वाला जिला               अलवर

    राज्य में सर्वाधिक भेड़ों वाला जिला               बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक बकरियों वाला जिला          बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक ऊँटों वाला जिला               बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक दुग्ध संकलन वाला जिला    जयपुर

    राज्य में सर्वाधिक मुर्गियों वाला जिला            अजमेर

    राज्य में सबसे कम पशुसंख्या वाला जिला      धौलपुर

    राज्य में सबसे कम गायों वाला जिला             धौलपुर

    राज्य में सबसे कम भैंसों वाला जिला             जैसलमेर

    राज्य में सर्वाधिक पशुधन                           बकरी


    देश की अर्थव्यवस्था में राजस्थान के पशुधन का योगदान

    देश के कुल पशुधन में राजस्थान का अंश                      10.58 प्रतिशत

    देश के कुल दुग्ध उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी       10 %

    देश के बकरा मांस उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी     30 %

    देश के ऊन उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी              41.6%


    राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व

    राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पशुपालन व्यवसाय पर आधारित है। राज्य के लगभग 65 लाख परिवार पशुपालन एवं कृषि से जुड़े हुए हैं। पशुपालन से राज्य में उत्पादन की वृद्धि दर 4 से 6 प्रतिशत है जो कृषि क्षेत्र के 1 से 2 प्रतिशत की तुलना में लगभग 3 से 4 गुनी है। राज्य की 80 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या की आय का माध्यम पशुपालन है।

    प्रति-व्यक्ति पशुधन

    वर्ष 1951 की पशुगणना के अनुसार राज्य में प्रतिव्यक्ति पशुधन संख्या 1.59 थी जो वर्ष 2007 की पशुगणना के अनुसार घटकर 0.825 रह गई है। अर्थात् राज्य में मनुष्यों की तुलना में पशुधन की संख्या काफी कमी आई है।

    बाड़मेर जिले में राज्य का सर्वाधिक पशुधन

    बाड़मेर जिले में राज्य का सर्वाधिक पशुधन निवास करता है। वर्ष 2007 की पशुगणना के अनुसार बाड़मेर जिले में 44,71,975 पशुधन पाला जाता है। इनमें बकरियों की संख्या सर्वाधिक (22,21,007) तथा भेड़ों की संख्या (13,71,217) है। यही कारण है कि जिले में दुग्ध उत्पादन का स्तर काफी नीचे है।

    जोधपुर जिला राज्य में दूसरे नम्बर पर पशुधन

    संख्या की दृष्टि से जोधपुर जिला राज्य में दूसरे नम्बर पर है। जिले में कुल 33 लाख 28 हजार 143 पशुधन है जिसमें बकरियों की संख्या सर्वाधिक (14,02,242) तथा भेड़ों की संख्या (9,76,749) है।

    उदयपुर जिले में राज्य का सर्वाधिक गौ-धन

    प्रदेश में सर्वाधिक गौ-धन (9,46,318) उदयपुर जिले में पाला जाता है। फिर भी दुग्ध संकलन एवं विक्रय में उदयपुर जिला राज्य में छठे स्थान पर है।

    जयपुर जिला दुग्ध संकलन में सबसे आगे पशुधन

    उपलब्धता के मामले में जयपुर जिला राज्य में पाँचवे स्थान पर है किंतु दुग्ध संकलन तथा विक्रय के मामले में यह राज्य में पहले स्थान पर है।

    धौलपुर जिला गौ-धन पालन में सबसे पीछे

    धौलपुर जिले में राज्य का सबसे कम गौ-धन पाया जाता है। यहाँ मात्र 61,902 गौ-धन पाया गया है।


    राजस्थान में गौ-धन

    वर्ष 2007 की पशुगणना के अनुसार राज्य में गौ-धन की संख्या 124.10 लाख है। उदयपुर जिले में राज्य का सर्वाधिक गौ-धन पाया जाता है। बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, एवं भीलवाड़ा जिलों में भी गौ-धन बड़ी संख्या में पाला जाता है। पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर, बीकानेर, नागौर और जोधपुर आदि रेगिस्तानी जिलों में भी गौ-धन का बड़ी संख्या में पालन होता है। अलवर, भरतपुर, दौसा, सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों में गौपालन कम संख्या में होता है।

    गायों की उत्तम नस्लें : थारपारकर, कांकरेज, राठी तथा गिर नस्लों की गायों को डेयरी की उत्तम नस्लों की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।

    थारपारकर : थारपारकर नस्ल की गायें जैसलमेर, बाड़मेर तथा जोधपुर जिलों अर्थात् सीमावर्ती क्षेत्र में पायी जाती हैं।

    कांकरेज : कांकरेज नस्ल की गायें जालोर जिले के सांचोर क्षेत्र तथा उससे लगते हुए बाड़मेर जिले में पाई जाती है। यह दूध तथा बैल दोनों के लिये उत्तम मानी जाती है।

    राठी : राठी गाय को लाल सिंधी व साहीवाल नस्लों की मिश्रित नस्ल माना जाता है। ये गंगानगर से लेकर बीकानेर और जैसलमेर तक के क्षेत्र में प्रमुखता से पाई जाती है।

    गिर : इसे रैंडा तथा अजमेरा भी कहते हैं। यह नस्ल मध्य राजस्थान अर्थात् अजमेर, नागौर, टोंक तथा भीलवाड़ा जिलों में पाई जाती है।

    नागौरी : नागौरी नस्ल की गायें नागौर जिले में पाई जाती है। यह बैलों के लिये अधिक प्रसिद्ध है। मालवी : मालवी नस्ल की गायें चित्तौड़गढ़, कोटा, झालावाड़, डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा जिलों में पाये जाती हैं।

    बैलों की उत्तम नस्लें : राजस्थान में पायी जाने वाली बैलों की कुछ नस्लें पूरे देश में विख्यात हैं। इनमें कांकरेज (सांचोरी), नागौरी व मालवी अधिक प्रसिद्ध हैं। बैलों की हरियाणवी नस्ल गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर आदि जिलों में पाली जाती है। यह नस्ल भारवाहक एवं खेती के उपयुक्त होती है। कालीबंगा, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो आदि से प्राप्त अति प्राचीन मुहरों पर जिन बड़े-बड़े सींगों वाले सांडों के चित्र पाये जाते हैं, उन सींगों वाले गाय, बैल तथा सांडों के दर्शन यहाँ की विश्व विख्यात कांकरेज (सांचोरी) नस्ल में किये जा सकते हैं। राजस्थान के नागौरी बैल भी कार्यक्षमता के लिये पूरे देश में प्रसिद्ध हैं।

    द्विप्रयोजनी नस्लें : दूध देने तथा भार वाहन के काम में बराबर की उपयोगी द्विप्रयोजनी नस्लों में कांकरेज नस्ल सर्वाधिक उपयुक्त है। हरियाणवी नस्ल में भी यह गुण पाया जाता है।


    राजस्थान में भैंस पालन

    राज्य में भैंसों की संख्या 110.91 लाख है। अलवर जिला भैंस पालन की दृष्टि से सर्वाग्रणी है। यहाँ 9.74 लाख भैंसें पाली जाती हैं। इसके बाद जयपुर जिले का नम्बर आता है जहाँ 9.46 लाख, भरतपुर जिले में 4.74 लाख, उदयपुर जिले में 5.23 लाख, सीकर जिले में 5.15 लाख और नागौर जिले में 4.60 लाख भैंसे पाली जाती हैं। जैसलमेर जिले में सबसे कम (2664) भैंसे पाली जाती हैं। बाड़मेर तथा बीकानेर आदि रेगिस्तानी जिलों, हाड़ौती के कोटा व बारां जिलों एवं सिरोही जिले में भी भैंसों की संख्या कम है। राज्य में भैंस की मुर्रा नस्ल अधिक प्रचलित है। यह मूलतः पंजाब और हरियाणा की नस्ल है। यह नस्ल एक दिन में औसतन 10 किलो तथा अधिकतम 18 से 20 किलो दूध देती है। राजस्थान के दक्षिणी जिलों में गुजरात के काठियावाड़ मूल की जाफराबादी नस्ल पाली जाती है जिसे सूरती भी कहते हैं। यह नस्ल प्रतिदिन औसतन 11.5 किलो दूध देती है। राजस्थान पशुधन विकास बोर्ड द्वारा राज्य के विभिन्न पशु प्रजनन केन्द्रों पर मुर्रा नस्ल एवं देशी नस्ल के पशु संधारित कर प्रजनन हेतु पशुपालकों को उपलब्ध कराये जा रहे हैं।


    राजस्थान में भेड़ पालन

    भेड़ तथा बकरी पालन रेगिस्तानी क्षेत्रों के पशुपालकों का मुख्य धंधा है। भेड़ पालन में राजस्थान का भारत में अग्रणी स्थान है। चोकला, मारवाड़ी, जैसलमेरी, मगरा, मालपुरी, सोनाड़ी, नाली व पूंगल नस्ल की भेड़ें पाली जाती हैं। वर्ष 2007 की पशुगणना में राज्य में 1 करोड़ 11 लाख 89 हजार 855 भेड़ें पाई गईं। बाड़मेर जिले में सर्वाधिक 13.71 लाख, बीकानेर जिले में 7.07 लाख, जैसलमेर जिले में 12.91 लाख, पाली जिले में 9.24 लाख और जोधपुर जिले में 10.48 भेड़ें पायी जाती हैं। बाड़मेर जिले में भेड़ों की संख्या सर्वाधिक है।

    भेड़ की ऊन : गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, झुंझुनूं एवं बीकानेर जिलों में भेड़ की नाली नस्ल पाली जाती है। यह नस्ल प्रतिवर्ष 3 से 4 किलो ऊन प्रति पशु देती है। इसका रेशा 12 से 14 सेण्टीमीटर लम्बा होता है। मगरा, चोकला, पूगल तथा मारवाड़ी नस्ल की भेड़ें 2 किलो तक ऊन प्रतिवर्ष प्रतिपशु देती हैं। जैसलमेरी नस्ल साढ़े पाँच किलो तक ऊन देती है। भेड़ की ऊन कटाई के कार्य को लव कहते हैं। यह साल में तीन बार होती है। श्रावण-भाद्रपद माह में मिलने वाली ऊन को सावनी ऊन, कार्तिक माह में मिलने वाली ऊन को सियालु ऊन तथा चैत्र मास में मिलने वाली ऊन को चेती ऊन कहते हैं। कुछ पशुपालक साल में दो बार ऊन लेते हैं जिन्हें सावनी ऊन तथा फाल्गुनी ऊन कहते हैं।

    भेड़ का दूध : मारवाड़ के कुछ पशुपालक भेड़ों का दूध पीने के काम में लेते हैं। टूटी हुई अस्थियाँ जोड़ने के लिये भेड़ के दूध का लेपन किया जाता है। सोनाड़ी नस्ल की भेड़ प्रतिदिन 750 ग्राम से 1 किलो तक दूध तथा प्रतिवर्ष 750 ग्राम से डेढ़ किलो तक ऊन देती है।

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  • अजमेर का इतिहास - 84

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 84

    स्वतंत्र भारत में केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर


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    26 जनवरी 1950 को पांठ-पीपलोदा का जिला मध्य भारत प्रान्त में स्थानान्तरित कर दिया गया। पार्ट सी स्टेट बिल 1951 के पारित होने परे यह क्षेत्र अजमेर के पार्ट सी में सम्मिलित कर दिया गया और एक विधान सभा बनाई गई।

    राजस्थान की 19 रियासतों एवं 4 ठिकाणों का राजस्थान में एकीककरण होने के बाद भी इन रियासतों के केन्द्र में स्थित अजमेर को केन्द्र शासित प्रदेश बना रहने दिया गया। इससे अजमेर की स्थिति एक लघु टापू जैसी हो गई, जिसके चारों तरफ राजस्थान प्रदेश था और बीच में 2,417 वर्ग मील क्षेत्र और 7 लाख की आबादी वाला केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर था।

    चीफ कमिश्नर की सलाहकार परिषद

    अजमेर राज्य के प्रशासनिक संचालन के लिये चीफ कमिश्नर को सलाह देने के लिये ई.1946 से एक सलाहकार परिषद् बनी हुई थी। यह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी काम करती रही। इस सलाहकार परिषद में बालकृष्ण कौल, किशनलाल लामरोर, मिर्जा अब्दुल कादिर बेग, मुकुट बिहारी लाल भार्गव, कृष्णगोपाल गर्ग, मास्टर वजीरसिंह, पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में सूर्यमल मौर्य जिला बोर्ड एवं अजमेर राज्य की नगरपालिकाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि,को मनोनीत किया गया था।

    भारत विभाजन के कारण कादिर बेग पाकिस्तान चला गया। उसके स्थान पर सैयद अब्बास अली को नियुक्त किया गया। 1946 से 1952 तक की अवधि में अजमेर के चीफ कमिश्नर पद पर शंकर प्रसाद, सी. बी. नागरकर, के. एल. मेहता, ए. डी. पण्डित एवं एम. के. कृपलानी ने कार्य किया। 1952 में अजमेर विधान सभा के गठन के साथ ही यह परिषद समाप्त हो गई।

    अजमेर धारासभा

    अजमेर विधानसभा को धारासभा कहा जाता था। ई.1952 में अजमेर धारासभा की 30 सीटों के लिये प्रथम आम चुनाव हुए। 20 सीटों पर कांग्रेस, 3 सीटों पर भारतीय जनसंघ, 3 सीटों पर पुरुषार्थी पंचायत तथा 4 सीटों पर निर्दलीय सदस्य चुने गये। हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृत्व में अजमेर में पहली और अन्तिम सरकार बनी जिसमें बालकृष्ण कौल गृह एवं वित्त मंत्री तथा ब्यावर निवासी बृजमोहन शर्मा राजस्व एवं शिक्षा मंत्री बनाये गये। 24 मार्च 1952 को उपाध्याय मंत्रिमण्डल ने शपथ ली। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे हटूण्डी के गांधी आश्रम में ही रहे।

    22 मई 1952 को केन्द्रीय गृहमंत्री डॉ. कैलास नाथ काटजू ने अजमेर धारा सभा का उद्घाटन किया। भागीरथ सिंह को इस धारासभा का अध्यक्ष चुना गया तथा रमेशचंद्र भार्गव को इसका उपाध्यक्ष चुना गया। बाद में भार्गव को अध्यक्ष एवं अब्बास अली को उपाध्यक्ष बनाया गया। प्रतिपक्षी दल के नेता डॉ. अम्बालाल थे। धारासभा को चलाने के लिये 19 कानून बनाये गये।

    सरकार के कार्य में सहायता के लिये विकास समिति, विकास सलाहकार मण्डल, औद्योगिक सलाहकार मण्डल, आर्थिक जांच मण्डल, हथकरघा सलाहकार मण्डल, खादी एवं ग्रामोद्योग मण्डल, पाठ्यपुस्तक राष्ट्रीयकरण सलाहकार मण्डल, पिछड़ी जाति कल्याण मण्डल, बेकारी समिति, खान सलाहकार समिति, विक्टोरिया चिकित्सालय समिति, स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास समिति, नव सुरक्षित जन जांच समिति का कठन किया गया। इनमें सरकारी एवं गैर सरकारी सदस्यों को सम्मिलित किया गया।

    लोकसभा एवं राज्य सभा में प्रतिनिधित्व

    अजमेर राज्य से भारत की लोकसभा के लिये दो एवं राज्यसभा के लिये एक सदस्य चुने जाने की व्यवस्था की गई। ई.1952 में हुए लोकसभा चुनावों में अजमेर-नसीराबाद क्षेत्र से ज्वाला प्रसाद शर्मा तथा केकड़ी-ब्यावर क्षेत्र से मुकुट बिहारीलाल भार्गव चुने गये। राज्यसभा के लिये अब्दुल शकूर चुने गये। ई.1954 में करुम्बया को राज्य सभा सदस्य चुना गया।

    अजमेर से सामंतशाही का अंत

    अजमेर राज्य का क्षेत्रफल 2,417 वर्गमील था। 1951 की जनगणना के अनुसार अजमेर राज्य की जनसंख्या 6,93,372 थी। इस राज्य का दो तिहाई भाग जागीरदारों व इस्तमुरारदारों (ठिकाणेदारों) के अधीन था जबकि केकड़ी का पूरा क्षेत्र इस्तमुरारदारों के अधिकार में था। पूर्व में ये ठिकाणे जागीरों के रूप में थे और इन्हें सैनिक सेवाओं के बदले दिया गया था। इन ठिकानों के 277 गांवों में से 198 गांवों से सैनिक व्यय वसूल किया जाता था।

    ब्रिटिशकाल से पहले सामन्तशाही के दौरान यहाँ सत्तर बड़े इस्तमुरारदार और चार छोटे इस्तमुरारदार थे। इनमें से 64 ठिकाणे राठौड़ों के, 4 चीतों के, 1 सिसोदियों का तथा एक ठिकाणा गौड़ राजपूतों का था। ई.1872 में भारत सरकार ने इन्हें सनद प्रदान की थी। ई.1877 में अजमेर भू राजस्व भूमि विनियम के अंतर्गत इनका नियमन किया गया था। इस्तमुरारदारों की तीन श्रेणियां थीं- जब कभी किसी ठिाणे के इस श्रेणी के निर्धारण सम्बन्धी विवाद होते थे तो चीफ कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर वायसरॉय उसका समाधान निकालता था। ब्रिटिश काल में जब कभी कोई इस्तमुरारदार दरबार में भाग लेता था तो चीफ कमिश्नर की ओर से उसका सम्मान किया जाता था। यद्यपि इस्तमुरारदार राजाओं की श्रेणी में नहीं आते थे किंतु इन्हें भी विशेष अधिकार प्राप्त थे।

    अजमेर राज्य में नौ बड़े ठिकाणे थे- शाहपुरा, खरवा, पीसांगन, मसूदा, सावर, गोविंदगढ़, भिनाय, देवगढ़ एवं केकड़ी। केकड़ी जूनिया का हिस्सा था। जूनिया, भिनाय, सावर, मसूदा एवं पीसांगन के इस्तमुरारदार मुगल शासकों के मनसबदार थे। भिनाय ठिकाणे की सर्वाधिक प्रतिष्ठा थी तथा इसके ठाकुर, राव जोधा के वंशज थे। प्रतिष्ठा की दृष्टि से दूसरे नम्बर पर सावर का ठिकाणदार था जो सिसोदिया वंशी शक्तावत राजपूत था। जूनिया का ठिकाणेदार राठौड़ था। पीसांगन का ठिकाणेदार जोधावत राठौड़ था। मसूदा का ठिकाणेदार मेड़तिया राठौड़ था।

    अजमेर जिले में माफी की जमीनें भौम कहलाती थीं। भौम चार तरह की होती थीं। पहली वे जिनकी सम्पत्ति वंश परम्परा के स्वामित्व अधिकार सहित दी जाती थीं। दूसरी वे जिनकी सम्पत्ति अपराध के कारण, राज्य दण्ड स्वरूप राज्य जब्त कर लेता था। तीसरी वे जिनकी सम्पत्ति जब्त करने के अतिरिक्त, राजस्व के अधिकार छीन लिये जाते थे और चौथी वे जिन पर दण्ड स्वरूप जुर्माना किया जाता था।

    इस्तमुरारदार ब्रिटिश सरकार को भूराजस्व की निश्चित राशि वार्षिक लगान के रूप में देते थे। जागीरदार अपने क्षेत्र का भूराजस्व सरकार को नहीं देते थे। 11 अगस्त 1955 को अजमेर एबोलिशन ऑफ इण्टरमीडियरी एक्ट के द्वारा इस्तमुरारदार समाप्त कर दिये गये। इसी प्रकार 10 अक्टूबर 1955 को जागीरदार एवं छोटे ठिकाणेदारों को समाप्त किया गया। 1958 में भौम एवं माफीदारी व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया गया।

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  • गींदड़ नृत्य

     02.06.2020
    गींदड़ नृत्य

    गींदड़ नृत्य

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के शेखावाटी अंचल में वसंत पंचमी से ही ढफ बजने लगते हैं तथा धमालें गाई जाने लगती हैं। कुछ धमाल भक्ति प्रधान एवं कुछ धमाल शृंगार प्रधान होती हैं। जब होली में 15 दिन रह जाते हैं तो गांव-गांव गींदड़ होने लगते हैं। इसे गींदड़ खेलना कहते हैं।

    होलिका दहन से दो दिन पहले रात भर गींदड़ होते हैं। इन आयोजनों में सैंकड़ों आदमी भाग लेते हैं। यह शेखावाटी अंचल का लोकनृत्य है। सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आसपास के क्षेत्रों में होली से पन्द्रह दिन पहले से इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होने लगते हैं।

    इस नृत्य में आयु, वर्ग एवं जाति-पांति का भेद नहीं रखा जाता है। परम्परागत रूप से यह नृत्य चांदनी रात में होता था किंतु अब विद्युत प्रकाश भी किया जाता है।

    नगाड़ा इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। नर्तक अपने हाथों में छोटे डण्डे लिये हुए होते हैं। नगाड़े की ताल के साथ इन डंडों को परस्पर टकराते हुए घूमते हैं तथा आगे बढ़ते हैं। नृत्य के साथ लोकगीत भी ठेके से मेल खाते हुए गाए जाते हैं। चार मात्रा का ठेका धीमी गति के नगाड़े पर बजता है।

    धीरे-धीरे उसकी गति तेज होती है। जैसे-जैसे नृत्य गति पकड़ता है, नगाड़े की ध्वनि भी तीव्र होती है। इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के स्वांग बनाये जाते हैं जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया, दुल्हा, दुल्हन आदि प्रमुख हैं। प्रत्येक नर्तक अपने पैरों में घुंघरू बांधे हुए होता है।

    यह मारवाड़ के डांडिया तथा गुजरात के गरबा नृत्य से मिलता-जुलता है। गींदड़ में गरबा की तरह ही कई पुरुष अपने दोनो हाथों में लकड़ी की डंडियाँ लेकर अपने आगे व पीछे के साथियों की डंडियों से टकराते हुए तथा गोल घेरे में चलते हुए आगे बढ़ते हैं। घेरे के केन्द्र में एक ऊँचा मचान बनाया जाता है जिस पर ऊँचा झँडा भी लगाया जाता है। मचान पर बैठा हुआ व्यक्ति नगाड़ा बजाता है।

    नगाड़े, चंग, धमाल व डंडियों की सम्मिलित ध्वनियों से आनंद दायक संगीत बजाया जाता है जिसकी ताल पर नृत्य होता है। गरबा और गींदड़ में मुख्य भेद डंडियों का होता है, गींदड़ की डंडियां गरबा के डांडियों से आकार में अधिक लम्बाई लिए होती हैं। गरबा में स्त्री-पुरुषों के जोडे होते हैं जबकि गींदड़ में मुख्य रूप से पुरुष ही स्त्रियों का स्वांग रचकर नाचते हैं।

    शेखावाटी क्षेत्र में कई स्थानों पर गींदड़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। बहुत से स्थानों पर गींदड़ खेलने की प्रतियोगिताएं होती हैं। गींदड़ को कहीं-कहीं गींदड़ी भी कहा जाता है। इस लोकनृत्य के साथ विभिन्न प्रकार के लोकगीत गाए जाते हैं- कठैं सैं आई सूंठ कठैं सैं आयो जीरो, कठैं सैं आयो ए भोळी बाई थारो बीरो।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-21

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-21

    राजस्थान में पशुधन (2)


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    राजस्थान में बकरी पालन


    राज्य के पशुधन में सर्वाधिक संख्या बकरियों की है। पशुगणना 2007 में राज्य में 2,15,02,996 बकरियां पायी गईं। बाड़मेर जिले में सर्वाधिक (22,28,415) बकरियां हैं। जोधपुर जिले में 14,39,505, नागौर जिले में 14,37,087, उदयपुर जिले में 12,20,165, तथा सीकर जिले में 11,42,930 बकरियां पाली जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों तथा हाड़ौती क्षेत्र में बकरियों की संख्या कम है।

    राज्य में बकरी की प्रमुख नस्लें

    बकरी की जमनापारी, बारबरी, मारवाड़ी, परबतसरी, सिरोही तथा शेखावाटी नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। भरतपुर, धौलपुर, करौली तथा सवाईमाधोपुर जिलों में बकरी की बारबरी नस्ल, कोटा, बूंदी तथा झालावाड़ जिलों में बकरी की जमनापारी नस्ल, सीकर तथा झुंझुनूं जिलों में शेखावाटी नस्ल, बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर जालोर, पाली गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिलों में बकरी की मारवाड़ी नस्ल पाली जाती है। सिरोही जिले में बकरी की सिरोही नस्ल, नागौर जिले के परबतसर क्षेत्र में परबतसरी नस्ल, अलवर जिले में अलवरी नस्ल, पाली जाती है। मारवाड़ी नस्ल की रोग प्रतिरोधक क्षमता सर्वाधिक होती है।

    दूध वाली नस्लें : दूध के लिये बकरी की मारवाड़ी, शेखावाटी, परबतसरी, अलवरी नस्लें अच्छी मानी जाती हैं।

    मांस वाली नस्लें : मांस के लिये लोही एवं सिरोही नस्लें अच्छी होती हैं।

    द्विप्रयोजनी नस्लें : बारबरी, सिरोही एवं जमनापारी नस्लें मांस उत्पादन के लिये अच्छी मानी जाती हैं।

    बकरी पालन को बढ़ावा देने हेतु किये गये उपाय

    नेशनल मिशन फॉर प्राटीन सप्लीमेंट्स में सघन बकरी उत्पादन को बढ़ावा देना और पारम्परिक लघु एवं पेस्टोरल सिस्टम के अंतर्गत बकरी पालन की उत्पादकता में वृद्धि करना सम्मिलित है। इसके तहत राजस्थान सहित देश के दस राज्यों में ग्रामीण बेरोजगारों के लिये गॉट स्काउट योजना चलाई जा रही है। इस योजना में युवाओं को बकरी पालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। गॉट स्काउट 10 कि.मी. की परिधि में दो हजार बकरियों की पहचान करेंगे जिन्हें स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध करवाई जायेंगी। बकरी पालकों को 95 बकरियों और 5 बकरों की यूनिट के लिये अनुदान दिया जाता है। राज्य में बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिये भरतपुर जिले के कुम्हेर में पशु प्रजनन फार्म, अजमेर जिले के रामसर में पशु प्रजनन फार्म, फतेहपुर में बकरी पालन योजना प्रारंभ की गई है।


    राजस्थान में ऊँट पालन

    राज्य की संस्कृति, सामाजिक जीवन एवं अर्थव्यवस्था में ऊँट का बड़ा योगदान है। 2007 की पशुगणना में राज्य में 4,21,836 ऊँट पाये गये हैं। ऊँट की जैसलमेरी, बीकानेरी एवं जोधपुर नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। ऊँट को रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। राज्य से बड़ी संख्या में ऊंटों को दूसरे राज्यों एवं अन्य देशों में भेज दिये जाने के कारण इनकी संख्या में कमी आई है। नर ऊँट की अपेक्षा मादा ऊँट की अधिक मांग होती है। इस कारण राज्य में मादा ऊँट की संख्या में तेजी से कमी आई है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2014 में ऊँट को राज्य पशु घोषित करने का निर्णय लिया है।


    राजस्थान में अश्व पालन

    2007 की पशुगणना में राज्य में घोड़ों की संख्या 24,564 पायी गयी है। पश्चिमी राजस्थान के मालानी घोड़े पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त मारवाड़ी एवं काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े भी पाले जाते हैं। अधिकतर घोड़े पर्यटन व्यवसाय में लगे हुए हैं। इनके अतिरिक्त पुलिस बलों एवं सुरक्षा बलों द्वारा भी अल्प संख्या में पाले जाते हैं। पुराने रजवाड़े अब भी राजसी वैभव के प्रतीक के रूप में घोड़े पालते हैं। राज्य में टट्टू, खच्चर एवं गधे भी पर्याप्त संख्या में पाले जाते हैं तथा वे निर्धन जनसंख्या की आजीविका का प्रमुख आधार हैं।


    राजस्थान में कुक्कुट पालन

    मुर्गी पालन में राजस्थान का देश भर में पाँचवां स्थान है। राज्य में मुर्गी व्यवसाय से लगभग डेढ़ लाख लोगों को रोजगार मिलता है। वर्ष 2007 में देश के विभिन्न भागों में बर्ड फ्लू के संक्रमण के भय से बड़ी संख्या में मुर्गियों को मारा गया। इसके बाद वर्ष 2007 में हुई गणना में राज्य में 49 लाख 93 हजार 620 मुर्गियां पायी गयीं। राजस्थान का अजमेर जिला मुर्गी पालन में सबसे आगे है। वर्ष 2007 में यहाँ 15.86 लाख मुर्गियां पायी गईं। सबसे कम मुर्गी पालन धौलपुर जिले में होता है।

    मुर्गियों की प्रमुख नस्लें

    मुर्गियों की प्रमुख नस्लों में न्यू हैम्पशायर, रोड आईलैण्ड रेड, प्लाई माउथ रॉक, व्हाइट लेगहॉर्न, व्हाइट मिनॉरका, ब्लैक मिनॉरका, आस्ट्रेलार्प और आर्पिंगटन हैं। राजस्थान में आस्ट्रेलॉर्प नर तथा लेगहॉर्न मादा से उत्पन्न हुई संकर नस्ल एस्ट्रो व्हाइट मुर्गी के अण्डे अधिक काम में लिये जाते हैं।


    राजस्थान में मत्स्य पालन

    अंतर्देशीय मछली पालन नदियों, नहरों, झीलों, तालाबों तथा टैंकों में मछली पालन को अंतर्देशीय मछली पालन कहते हैं। उदयपुर जिले के जयसमंद, बांसवाड़ा जिले के माही बजाज सागर तथा डूंगरपुर जिले के बेक वाटर जलाशय में बड़ी मात्रा में मत्स्य उत्पादन होता है। जयपुर सजावटी मछलियों के बाजार के रूप में प्रसिद्धि पा रहा है। राजस्थान में प्रति वर्ष लगभग 32 हजार मै. टन मत्स्य उत्पादन होता है।

    राजस्थान में मछलियों की प्रमुख किस्में

    राजस्थान के तालाबों में मछली की, कतला, रोहिता, काला बासिल, मृगल मुल्लेट एवं रोहू किस्में पाली जाती हैं। नदियों में कतला मृगल व हिलसा किस्में पाली जाती हैं। हिमालय पर्वत का पानी लेकर आने वाली नहरों के माध्यम से राजस्थान की नदियों एवं तालाबों में चीन देश की मछलियां आ गई हैं जो तेजी से देशी नस्लों को नष्ट करके अपनी संख्या बढ़ा रही हैं।

    राजस्थान में मत्स्य पालन हेतु उपलब्ध क्षेत्र

    राजस्थान में मत्स्य पालन हेतु लगभग 4.23 लाख हैक्टेयर जल क्षेत्र (नदियों व नहरों में 0.87 लाख हैक्टेयर के अतिरिक्त) बड़े एवं मध्यम जलाशयों (3.29 लाख हैक्टेयर), तालाब व पोखर (0.94 लाख हैक्टेयर) के रूप में उपलब्ध है। विभिन्न जलाशयों को उन्नत किस्म के मत्स्य बीजों के संग्रहण तथा मत्स्य संवर्द्धन हेतु विकसित किया गया है। इन्हें मत्स्य उत्पादन हेतु लीज पर देकर राज्य के लिए राजस्व प्राप्त किया जाता है।

    मत्स्य बीज उत्पादन

    राज्य में मत्स्य पालन विकास का मुख्य उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उत्पादन कर उनको मत्स्य उत्पादन हेतु जलाशयों में संचय करके (जो कि मत्स्य उत्पादन हेतु प्रमुख आदान है) राज्य के राजस्व में वृद्धि करना और मत्स्य उत्पादन में वृद्धि कर मछुआरों को आजीविका उपलब्ध करवाना है।

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  • अजमेर का इतिहास - 85

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 85

    राजस्थान में प्रवेश


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    जैसे-जैस राजस्थान आकार लेता जा रहा था, अजमेर को राजस्थान में सम्मिलित करने की मांग बढ़ती जा रही थी। राजस्थान सरकार ने भारत सरकार के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत करके कहा कि नृजातीयता (मदजीदवसवहपबंससल), एकता तथा भाषा की दृष्टि से अजमेर सदैव से ही राजस्थान का अंग रहा है। ब्रिटिश शासन काल में पूर्णतः राजनीतिक दृष्टि से अजमेर को छोटा किंतु सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानकर उसे केन्द्र सरकार के अधीन रखने की आवश्यकता अनुभव हुई थी जिससे राजस्थान की रियासतों पर ब्रिटिश शासन की सत्ता बनी रहे।

    राजस्थान बनने से पहले अजमेर चारों तरफ से रियासतों से घिरा हुआ था किंतु राजस्थान बनने के बाद स्थिति बदल गई थी। राजस्थान का प्रशासनिक ढांचा संविधान के अंतर्गत पार्ट बी स्टेट का होने से पार्ट सी स्टेट की तुलना में काफी प्रगतिशील और लोकतांत्रिक है। ब्रिटिश सरकार द्वारा अजमेर मेरवाड़ा को सीधे केन्द्रीय नियंत्रण में रखने के आधार भी बदले हुए परिवेश में अप्रासंगिक हो गये हैं और अजमेर स्टेट के पृथक प्रशासनिक इकाई के रूप में निरतंरता प्रदान करने को कोई औचित्य नहीं रह गया। इस पर जो खर्च किया जा रहा था, वह भी जनसंख्या तथा राजस्व को देखते हुए असंतुलित था।

    अरावली पर्वत माला की तलहटी में डकैती की स्थिति बनी हुई थी। प्रायः डकैत अजमेर के सीमावर्ती पाली, भीलवाड़ा, उदयपुर आदि जिलों में डकैती डालकर अजमेर के क्षेत्र में घुस जाया करते थे। अजमेर की अधिकांश जनता भी यह चाहती थी कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की जाये जिससे जनता को पूरा लाभ मिल सके और उसके संसाधनों को भारी भरकम तथा खर्चीली प्रशासनिक मशीनरी द्वारा लंगड़ा न बनाया जाये। अजमेर में प्रजातांत्रिक शासन की स्थापना करने के लिये इसे राजस्थान में विलय करने तथा राजस्थान राज्य प्रशासन के अंतर्गत लाने की मांग की गई।

    अजमेर जिले का प्रशासनिक पुनर्गठन

    राजस्थान सरकार तथा राजस्थान की जनता की मांग को देखते हुए 1 नवम्बर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम प्रभाव में आया। अजमेर राज्य का राजस्थान राज्य में विलय कर दिया गया तथा अजमेर नाम से, राजस्थान के 26वें जिले का गठन किया गया। 1 दिसम्बर 1956 को, जयपुर जिले में सम्मिलित पूर्ववती किशनगढ़ रियासत, अजमेर जिले में सम्मिलित कर दी गई। किशनगढ़ में उस समय चार तहसीलें-किशनगढ़, रूपनगढ़, अरांई एवं सरवाड़ थीं।

    कैपीटल इन्कवायरी कमीशन

    11 जून 1956 को सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में कैपीटल इन्कवायरी कमीशन का गठन हुआ। इस कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर अजमेर में राजस्थान लोक सेवा आयोग का मुख्यालय खोला गया। 4 दिसम्बर 1957 को पारित शिक्षा अधिनियम के अंतर्गत अजमेर में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की स्थापना की गई। अजमेर में राजस्थान राजस्व मण्डल तथा राजस्थान आयुर्वेद निदेशालय की स्थापना की गई। ई.1956 में अजमेर जिले को जयपुर संभाग में सम्मिलित किया गया। जयपुर संभाग का नाम बदल कर अजमेर संभाग कर दिया गया किन्तु संभाग का मुख्यालय जयपुर में ही रखा गया। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय एवं रीजनल कॉलेज की भी अजमेर में स्थापना करके इसके महत्त्व को बनाये रखा गया।

    विभिन्न विकास कार्य

    15 जून 1958 से राजस्थान का भूमि राजस्व अधिनियम 1950 तथा खातेदारी अधिनियम 1955 अजमेर जिले में भी प्रभावी किये गये। 22 जुलाई 1958 को राजस्व मण्डल का अजमेर में हस्तांतरण किया गया। ई. 1959-60 में तहसीलों का पुनर्गठन किया गया और अरांई तथा रूपनगढ़ तहसीलें समाप्त कर दी गईं। जिले में पांच तहसीलें अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर, केकड़ी एवं सरवाड़ बना दी गईं। केकड़ी तहसील का हिस्सा देवली अलग करके टोंक जिले में मिला दिया गया। ई.1962 में सुखाड़िया सरकार ने संभागीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

    26 जनवरी 1987 को हरिदेव जोशी सरकार ने संभागीय व्यवस्था को पुनर्जीवित किया। अजमेर संभाग सहित 6 संभागों का निर्माण हुआ। अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक और नागौर जिले, अजमेर संभाग में रखे गये। 1 अगस्त को अजमेर में महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। 5 मई 1992 को अजमेर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय किया गया।

    ई.1996 में तारागढ़ दुर्ग के मार्ग पर भारत के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) की स्मृति में एक स्मारक बनवाया गया। सम्राट पृथ्वीराज की अश्वारूढ़ प्रतिमा स्थापित की गयी। ई.1997 में पुष्कर मार्ग पर नाग पहाड़ की गोद में दाहिरसेन स्मारक का निर्माण किया गया। यहाँ सिंधुपति महाराजा दाहिरसेन, संत कंवरराम, हेमू कालानी, स्वामी विवेकानंद तथा हिंगलाज माता की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। 19 जुलाई 2000 को अजमेर में अजमेर विद्युत वितरण निगम की स्थापना की गयी।

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  • घुड़ला नृत्य

     02.06.2020
    घुड़ला नृत्य

    घुड़ला नृत्य

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    घुड़ला नृत्य मारवाड़ क्षेत्र में किया जाता है। यह सुहागिन स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। कई स्थानों पर कुंवारी कन्याएं भी इसमें भाग लेती हैं। यह नृत्य गणगौर पर्व के आसपास किया जाता है। इस अवसर पर माता गौरी अर्थात् पार्वतीजी एवं उनके ईश्वर शिवजी की पूजा होती है। विधवा स्त्रियां भी गौर को पूजती हैं।

    घुड़ला नृत्य में सुहागिन स्त्रियां एवं कुंवारी लड़कियां छिद्र युक्त घड़े को सिर पर रखकर उसमें दिये जलाती हैं तथा नृत्य के दौरान घूमर और पणिहारी के अंदाज में गोल चक्कर बनाती हैं। इस नृत्य से मारवाड़ रियासत अर्थात जोधपुर राज्य की एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है।

    ई.1490 में मारवाड़ पर राव जोधा के पुत्र सातलदेव का राज्य था। उन दिनों मारवाड़ के राठौड़ राजकुमार मुस्लिम जागीरों को उजाड़कर अपने राज्य में मिला रहे थे। जोधा के पुत्र दूदा ने मेड़ता, बीदा ने लाडनूं तथा बीका ने बीकानेर राज्य की स्थापना की थी।

    इस कारण आसपास के मुस्लिम सूबेदार एवं जागीरदार मारवाड़ पर आक्रमण करते रहते थे। अजमेर का सूबेदार मल्लूखां भी मारवाड़ रियासत पर ताबड़तोड़ हमले कर रहा था। एक बार उसने अपने सहायक सिरिया खां तथा घुड़ले खां के साथ मारवाड़ के मेड़ता गांव पर आक्रमण किया। मार्ग में उसने पीपाड़ गाँव के तालाब पर सुहागिन स्त्रियों को गणगौर की पूजा करते हुए देखा। मल्लूखाँ ने उन सुहागिनों को पकड़ लिया तथा उन्हें लेकर अजमेर के लिए रवाना हो गया।

    जब यह समाचार राव सातल के पास पहुँचा तो राव सातल ने अपनी सेना लेकर मल्लू खाँ का पीछा किया। मेड़ता से दूदा तथा लाडनूं से बीदा की सेनाएं भी मल्लूखां को रोकने के लिए चल पड़ीं। मल्लूखां पीपाड़ से कोसाणा तक ही पहुँचा था कि जोधपुर नरेश सातल ने उसे जा घेरा। मल्लूखां और उसके साथी भाग छूटे किंतु मल्लूखां का सेनापति घुड़ले खां इस युद्ध में मारा गया। हिन्दू कन्याएं एवं सुहागिन स्त्रियां मुक्त करवा ली गयीं।

    सातल के सेनापति खीची सारंगजी ने घुड़ला खां का सिर काटकर राव सातल को प्रस्तुत किया। राव सातल ने घुड़लाखां का कटा हुआ सिर उन स्त्रियों को दे दिया जिन्हें मल्लू खां उठाकर ले जाना चाहता था। स्त्रियां उस कटे हुए सिर को लेकर गांव में घूमीं और उन्होंने राजा के प्रति आभार व्यक्त किया। महाराजा के आदेश से उस सिर को सारंगवास गांव में गाड़ा गया। जिसके कारण वह गांव आज भी घड़ाय कहलाता है।

    घायल राव सातल और उसके कुछ साथी सरदारों का उसी रात अपने डेरे में प्राणांत हो गया। इस घटना की स्मृति में आज भी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को घुड़ला निकाला जाता है। इस अवसर पर गाँव-गाँव में मेला लगता है।

    इस दिन औरतें कुम्हार के यहाँ से कोरा घड़ा लाकर उस पर सूत बांधती हैं तथा घड़े में बहुत से छेद करके उसमें मिट्टी का दीपक जलाती हैं। मटकी के छेद, घुड़ले के सिर में लगे तीर-बरछी के घाव समझे जाते हैं और उसमें रखा दीपक जीवात्मा का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन स्त्रियां एवं लड़कियां इस घड़े को लेकर गली-गली घूमती हैं तथा नृत्य करती हैं। घुड़ला घुमाने वाली महिलाओं को तीजणियां कहा जाता है। इस दौरान वे घुड़ले को चेतावनी देती हुई गाती हैं-

    घुड़ले रे बांध्यो सूत, घुड़लो घूमैला जी घूमैला।

    सवागण बारै आग, घुड़लो घूमैला जी घूमैला।


    इस आयोजन के माध्यम से मारवाड़ की सुहागिन स्त्रियां घुड़ले खां को चेतावनी देती हैं कि सुहागिनें माता पार्वती की पूजा करने जा रही हैं, घुड़ले खां में दम हो तो रोक ले।

    चैत्र सुदी तीज तक यह घुड़ला घुमाया जाता है तथा उसके बाद विसर्जित कर दिया जाता है। जोधपुर राज परिवार एवं सामंती परिवारों की स्त्रियाँ कुम्हार के यहाँ घुड़ला लेने लवाजमे के साथ जाती थीं। दासी घुड़ले को अपने सिर पर रख कर गणगौर की सवारी के साथ अष्टमी से तीज तक घुमाती थी। तीज के दिन महाराजा तलवार या खांडे से इस घड़े को खंडित करते थे। यह आयोजन गांव-गांव होता था तथा जनता घड़े के टुकड़ों को शकुन के तौर पर अपने अन्न के कोठार में रखती थी।

    घुड़ले के मेले के दूसरे दिन मारवाड़ में लोटियों का मेला होता था। संध्या के समय कन्याएँ एवं सुहागन 
    स्त्रियां टोली बनाकर, सिर पर छोटे-बड़े तीन चार कलश रखकर, गीत गाती हुई जलाशय, कुएँ या बावड़ी पर जाती थीं। जलाशय से जल भर कर उसमें दूब, पुष्प आदि रखकर गाजे-बाजे के साथ लौटती थीं। उस जल से गणगौर की पूजा की जाती थी। जोधपुर में गणगौर को पानी पिलाने के लिये लोटियाँ चांदी, तांबे तथा पीतल कीे होती थीं। कलश पर नारियल रखा जाता था एवं पुष्प मालाएँ बांधी जाती थीं। लोटियों वाली स्त्रियां गले में फूलों की माला पहन कर गीत गाती हुई पूजा स्थान को आतीं और गणगौर को पानी पिलाती थीं। यह परम्परा आज भी अनवरत रूप से चल रही है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-22

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-22

    राजस्थान में कृषि


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान की पहचान खरीफ में पैदा होने वाली फसलों से है। प्रदेश की मिट्टियां एवं जलवायु बाजरा, तिल, ज्वार, मूंग तथा मोठ आदि फसलों की खेती के लिये अत्यंत उपयुक्त है। कन्हैयालाल सेठिया ने राजस्थान प्रदेश की वनस्पति की प्रशंसा करते हुए लिखा है-


    लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,

    मक्की झालो दे'र बुलावै

    कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,

    धरती धोरां री।

    खरीफ की फसलों के अतिरिक्त राजस्थान में विभिन्न प्रकार की उत्तम प्रकार की वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं। रबी में गेहूँ, जौ, सरसों, रायड़ा, जीरा, ईसबगोल तथा अन्य फसलों की पैदावार होती है। दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में मक्का, गेहूँ, सरसों, चना, उड़द, गन्ना, चावल, तम्बाखू तथा कपास की खेती होती है। मैदानी क्षेत्रों की लगभग सभी शाक-सब्जियां यथा- आलू, फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठगोभी, मिर्च, बैंगन, टमाटर, मटर, मूली, पालक, पत्ता मैथी, लौकी, तोरी, टिण्डा, कद्दू, गाजर, ककड़ी, करेला, चुकंदर, शलजम आदि भी बहुतायत से पैदा की जाती है। मैदानी भागों के लगभग सभी फलों के उद्यान राजस्थान में स्थित हैं।

    आम, अमरूद, पपीता, केला, जामुन, चीकू, आड़ू, अंगूर, लीची, खजूर, नारियल, तरबूजा, खरबूजा, ककड़ी, संतरा, कीनू, माल्टा, नाशपाती, शरीफा, फालसा एवं अनानास आदि फलों का उत्पादन होता है। मसाले की फसलों में जीरा, धनिया, मिर्च, ईसबगोल, सौंफ, राई, मैथी, प्याज, लहसुन, हल्दी, अदरक, अजवायन, कालीजीरी, पोदीना, करीपत्ता, आदि का उत्पादन होता है। अन्य नगदी फसलों में मेहंदी, अरण्डी, रिजका, विभिन्न प्रकार के पुष्पों की खेती होती है। उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा चित्तौड़गढ़ जिलों में रतनजोत की खेती होती है। वनस्पतियों की इसी विविधता को लक्ष्य करके कन्हैयालाल सेठिया ने लिखा है-


    ईं रा फळ फुलड़ा मन भावण

    ईं रै धीणो आंगण-आंगण,

    बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,

    धरती धोरां री,

    राज्य में कृषि सम्बन्धी महत्वपूर्ण तथ्य


    देश के कुल कृषि क्षेत्र का 11 प्रतिशत राजस्थान में है। राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि का 28 प्रतिशत योगदान है। राजस्थान में 342.70 लाख हैक्टेयर भूमि उपलब्ध है जिसके 49.53 प्रतिशत भाग अर्थात् 169.74 लाख हैक्टेयर भूमि पर खेती होती है। 47.70 लाख हैक्टेयर भूमि पर पर साल में एक से अधिक बार फसल ली जाती है जिसे दुपज क्षेत्र कहते हैं। राजस्थान में फसलीय सघनता लगभग 130 प्रतिशत है। राजस्थान में खेतों का औसत आकार 3.38 हैक्टेयर है। राज्य की 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य से जुड़ी हुई है। राज्य के शुद्ध घरेलू उत्पादन में कृषि का योगदान 43.4 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट है कि राज्य के 70 प्रतिशत लोग राज्य की आय में 43 प्रतिशत योगदान करते हैं तथा 30 प्रतिशत लोग 57 प्रतिशत योगदान करते हैं।

    राज्य में सकल बोये गये क्षेत्र के 45.2 प्रतिशत क्षेत्रफल में अनाज, 19.12 प्रतिशत क्षेत्र में तिलहन, 15.65 प्रतिशत क्षेत्र में दालें, 13.22 प्रतिशत क्षेत्र पर चारा, 2.59 प्रतिशत क्षेत्र पर मसाले, 2.05 प्रतिशत क्षेत्र पर कपास एवं अन्य रेशेदार फसलें, 0.03 प्रतिशत क्षेत्र पर गन्ना, 0.12 प्रतिशत क्षेत्र पर फल, 0.58 प्रतिशत क्षेत्र पर सब्जियां, 1.18 क्षेत्र पर मादक एवं औषधीय फसलें तथा 0.26 प्रतिशत क्षेत्र पर अन्य फसलें बोई जाती हैं।


    राज्य में सिंचाई

    राज्य में उपलब्ध 90 प्रतिशत जल का उपयोग खेती के लिये होता है। राज्य में कृषि प्राथमिक तौर पर वर्षा पर निर्भर है। राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का अधिकांश भाग नलकूप और कुँओं पर निर्भर है। सकल सिंचित क्षेत्रफल 73.08 लाख हैक्टेयर है। राज्य में 170 लाख हैक्टेयर भूमि (कुल कृषि क्षेत्र) सिंचाई योग्य है जिसमें से 58.56 लाख हैक्टेयर भूमि (शुद्ध सिंचित क्षेत्र) पर सिंचाई की जा रही है अर्थात् राज्य के कुल कृषि क्षेत्र का मात्र 34.45 प्रतिशत भाग सिंचित क्षेत्र है। राज्य में सिंचाई सघनता 125 प्रतिशत है। अर्थात् सकल सिंचित क्षेत्र एवं शुद्ध सिंचित क्षेत्र का अनुपात 1.25 है। राज्य की खेती का 65 प्रतिशत भाग खरीफ की फसल के अंतर्गत आता है तथा अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर करता है। सकल सिंचित क्षेत्र की दृष्टि से श्रीगंगानगर, राज्य का पहला तथा हनुमागढ़ दूसरा जिला है। सकल सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से राजसमंद, अजमेर तथा डूंगरपुर जिले सबसे पीछे हैं। राज्य का भूगर्भीय जल स्तर प्रतिवर्ष 1 मीटर की दर से कम हो रहा है इस कारण राज्य के 237 ब्लॉक में से 195 ब्लॉक डार्क जोन घोषित किये गये हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 86

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 86

    बीसवीं सदी में अजमेर में शिक्षा


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    बीसवीं सदी के आरंभ में ब्राह्मण शिक्षकों को ईसाई शिक्षकों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाने लगा क्योंकि तब तक मिशन द्वारा बहुत से हिन्दुस्तानियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करके उन्हें शिक्षक नियुक्त करने योग्य बना लिया था। इससे ब्राह्मण शिक्षकों में असंतोष पनपा क्योंकि भारत में ब्राह्मण ही यह कार्य परम्परा से करते आ रहे थे। इसलिये सरकार ने ई.1913 में अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र में चल रहे 15 मिशनरी स्कूलों में केवल 9 स्कूलों को बंद कर दिया तथा मिशनरी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 500 से घटाकर 160 कर दी।

    सरकारी स्कूलों के खुलने एवं उनमें अंग्रेजी की शिक्षा दिये जाने से देशी स्कूलों को भी अपने पाठ्यक्रमों में अंग्रेजी की शिक्षा सम्मिलित करनी पड़ी तथा इन स्कूलों का भी तेजी से विकास हुआ। धीरे-धीरे मकतब और पोसालों का स्थान ऐसी पाठशालायें लेने लगीं जिनमें वास्तविक एवं ठोस शिक्षा दी जाती थी। ई.1931-32 में शिक्षा बोर्ड द्वारा ऐसी स्कूलों को 2000 रुपये की आर्थिक सहायता दी गई। इन पाठशालाओं में सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के बारे में शिक्षा दी जाती थी।

    वर्तमान समय में अजमेर की शिक्षण संस्थायें

    अजमेर का राजकीय महाविद्यालय राजस्थान का पहला महाविद्यालय है। दयानन्द महाविद्यालय अपनी कृषि स्नातक शिक्षा के लिये प्रसिद्ध रहा है। इस महाविद्यालय में कृषि फार्म, डेयरी, तरणताल तथा कृषि विज्ञान की प्रयोगशालायें देखने योग्य हैं। इन दोनों महाविद्यालयों का उल्लेख प्रसंगानुसार पूर्व के अध्यायों में कर दिया गया है। महिला शिक्षा के लिये यहाँ का अंग्रजी माध्यम का सोफिया कॉलेज भारत के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजो में गिना जाता है। इस महाविद्यालय की छात्रायें अपने आधुनिक विचारों एवं आधुनिकतम परिधानों के लिये प्रसिद्ध हैं। सावित्री कॉलेज महिलाओं का हिन्दी माध्यम कॉलेज है। आदर्शनगर में अन्ध विद्यालय भी अजमेर की महत्त्वपूर्ण शिक्षण संस्थाओं में से एक है। मूक एवं बधिरों के लिए भी एक विद्यालय लम्बे समय से कार्यरत है। मेयो कॉलेज भी भारत के शैक्षणिक जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका उल्लेख भी प्रसंगानुसार पूर्व के अध्याय मंू अलग से कर दिया गया है।

    महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय

    1 अगस्त 1987 को अजमेर विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। अपनी स्थापना के साथ ही इसके कंधों पर राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में निवास कर रहे लगभग 1.5 लाख विद्यार्थियों के लिये परीक्षाएं आयोजित करने का भार आ गया। ई.1990 में अजमेर विश्वविद्यालय में इतिहास, राजनीति विज्ञान, प्राणी शास्त्र, वनस्पति शास्त्र तथा गणित विभाग आरंभ किये गये। ई.1991 में एम.फिल. की उपाधि आरंभ की गई। इसी वर्ष पर्यावरण प्रौद्यागिकी, माइक्रोबायोलोजी आदि में पीजी डिप्लोमा तथा व्यवसायोन्मुखी पाठ्यक्रम आरंभ किये गये।

    प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई। मई 1992 में अजमेर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय किया गया। ई.1993 में इसे नये परिसर में स्थानांतरित किया गया। इस वर्ष माइक्रोबायोलॉजी विभाग, खाद्य एवं पोषण विभाग, एप्लाईड कैमिस्ट्री, प्रबंधन अध्ययन एवं कम्प्यूटर एप्लीकेशन्स विभाग आरम्भ किये गये। इसके बाद के कुछ ही वर्षों में विभिन्न विभागों में शोध कार्य, शोध पाठ्यक्रम तथा पीएचडी डिग्री हेतु प्रयोग एवं अध्ययन आरंभ किया गया। वर्तमान में इसमें 24 विभिन्न विभाग हैं।

    इस विश्वविद्यालय से राज्य के 9 जिलों के 214 राजकीय एवं निजी क्षेत्र के महाविद्यालय सम्बद्ध हैं। इस विश्वविद्यालय द्वारा वर्तमान में लगभग 1.35 लाख विद्यार्थियों के लिये प्रतिवर्ष विभिन्न परीक्षायें आयोजित करवाई जाती हैं। इसका मुख्य परिसर अजमेर से सात किलोमीटर दूर घूघरा गांव के निकट अजमेर-जयपुर सड़क पर स्थित है। यह बहुत सुंदर बना हुआ है।

    केन्द्रीय विश्वविद्यालय

    केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना 20 मार्च 2009 को हुई। यह अजमेर-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर किशनगढ़ के पास बांदरा सिंदरी में मुख्य मार्ग से सात सौ मीटर दूर स्थापित की गई है। जो अजमेर से 46 किलोमीटर दूर है। इसके प्रथम चांसलर प्रो. एम. एम. सांखुले थे।

    क्षेत्रीय महाविद्यालय

    पुष्कर रोड पर स्थित क्षेत्रीय महाविद्यालय की स्थापना ई.1963 में हुई। इसमें देश भर से छात्र-छात्राएं पढ़ने के लिये आते हैं। इसके परिसर में डिमोंस्ट्रेशन स्कूल स्थापित हैं। इस संस्था में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा में होने वाले परिवर्तनों का परीक्षण किया जाता है।

    सोफिया कॉलेज

    सोफिया कॉलेज की स्थापना ई.1919 में कन्या विद्यालय के रूप में हुई। ई.1926 में इसे पब्लिक इंग्लिश स्कूल के रूप में मान्यता दे दी गई। ई.1927 में इसे शिक्षा विभाग द्वारा अनुदान देना आरंभ किया गया। ई.1935 में यह हाईस्कूल के रूप में क्रमोन्नत किया गया। ई.1942 में यह इंटर कॉलेज बना। यह राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त संस्थान है। ई.1959 में यहां त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम आरंभ किया गया। तब इसे राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से सम्बद्ध किया गया। वर्तमान में यह महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है।

    सावित्री कॉलेज

    सावित्री कॉलेज की स्थापना ई.1914 में प्राथमिक कन्या विद्यालय के रूप में की गई। इसे ई.1933 में हाईस्कूल के रूप में क्रमोन्नत किया गया। ई.1943 में इसे इण्टमीडियेट कॉलेज के रूप में तथा ई.1951 में डिग्री कॉलेज के रूप में क्रमोन्नत किया गया। अब यहाँ स्नातकोत्तर तक की शिक्षा होती है। संगीत एवं चित्रकला की शिक्षा भी स्नातकोत्तर स्तर पर दी जाती है।

    कॉन्वेण्ट गर्ल्स कॉलेज

    अजमेर का कॉन्वेण्ट गर्ल्स कॉलेज इण्टर कॉलेज के रूप में खोला गया था। बाद में इसमें डिग्री की पढ़ाई करवाई जाने लगी।

    व्यावसायिक महाविद्यालय

    अजमेर के व्यावसायिक महाविद्यालयों में जियालाल शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, हरिभाऊ उपाध्याय महिला शिक्षक महाविद्यालय के नाम प्रमुख हैं। अजमेर में जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, राजकीय पोलिटेक्निक कॉलेज, महिला पोलिटेक्निक कॉलेज तथा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान भी स्थित हैं।

    अजमेर में महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय के नाम से यूनीवर्सिटी की भी स्थापना की गई है। संस्कृत शिक्षा के लिये राजकीय शास्त्री संस्कृत महाविद्यालय भी कार्यरत है। पश्चिम रेल्वे के कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिये यहाँ का प्रशिक्षण केन्द्र पूरे हिन्दुस्तान में प्रसिद्ध रहा है। अजमेर का विजयसिंह पथिक श्रमजीवी कॉलेज भी किसी समय पूरे भारत में प्रसिद्ध था। वर्तमान में भी जिले में उच्च शिक्षण संस्थाओं का निरंतर विकास हो रहा है। वर्तमान में अजमेर जिले में एक विश्वविद्यालय, 13 स्नातकोत्तर महाविद्यालय, 18 स्नातक महाविद्यालय, 2 अभियांत्रिकी महाविद्यालय, 2 पॉलिटेक्निक कॉलेज, 6 बी. एड. कॉलेज व 3 एम. बी. ए. संस्थान कार्यरत हैं।

    संगीत महाविद्यालय

    19 अक्टूबर 1942 को अजमेर में एन. एन. आयंगर ने अजमेर में संगीत समाज की स्थापना की। इस संस्थान ने संगीत महाविद्यालय की स्थापना की जिसके प्रथम प्राचार्य वी. एन. इनामदार थे। प्रारंभ में यह महाविद्यालय गन्धर्व महाविद्यालय से सम्बद्ध रहा। इसके बाद माधव संगीत महाविद्यालय से जोड़ा गया। ई.1960 से यह बैरागढ़ भोपाल के इंद्रा कला संगीत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गया। केन्द्रीय संगीत नाट्य अकादमी एवं राजस्थान संगीत एवं नाटक अकादमी से भी इसे सम्बद्धता प्राप्त है। यहां नृत्य शिक्षण की भी व्यवस्था है।

    विजयसिंह पथिक श्रमजीवी महाविद्यालय

    विजयसिंह पथिक श्रमजीवी महाविद्यालय की स्थापना राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर द्वारा 5 अगस्त 1968 को की गई।

    माध्यमिक शिक्षा बोर्ड

    पूरे राजस्थान में दसवीं तथा बारहवीं कक्षाओं की परीक्षायें आयोजित करने वाला माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर में स्थित है। इसकी स्थापना ई.1957 में हुई। यह बोर्ड ई.1958 से 1962 तक हाई स्कूल, हायर सैकेण्डरी तथा इन्टरमीडियेट की परीक्षायें आयोजित करता था। ई.1962 से इन्टरमीडियेट की परीक्षाएं बन्द कर दी गईं। ई.1964 से संस्कृत शालाओं के लिये प्रवेशिका और उपाध्याय परीक्षायें आयोजित की जाने लगीं। ई.1965 से हाई स्कूल परीक्षा के स्थान पर सैकेण्डरी परीक्षा आयोजित की जाने लगी। ई.1986 से सैकेण्डरी व सीनियर सैकेण्डरी (10 तथा 10+2) कक्षाओं की परीक्षायें आयोजित की जा रही हैं। बोर्ड द्वारा प्रतिवर्ष 25 हजार स्वयंपाठी विद्यार्थियों का शिक्षण तथा लगभग 8 लाख विद्यार्थियों की परीक्षायें आयोजित की जाती हैं।

    अंध विद्यालय

    अंध महाविद्यालय नेत्रहीनों की शिक्षा के लिये अंध विद्यालय की स्थापना ई.1935 में श्रीमती मनोरमा टण्डन एवं अन्य समाज सेवियों के प्रयासों से हुई। ई.1951 में इसे केन्द्र सरकार ने आदर्श बाल अंध विद्यालय का स्वरूप दे दिया। ई.1956 से यह राजस्थान सरकार के अधीन कार्य कर रहा है।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-23

     02.06.2020
     राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-23

    राजस्थान में खनिज सम्पदा


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    किसी क्षेत्र में मिलने वाले खनिज, उस क्षेत्र के पर्यावरण का प्रमुख अंग होते हैं। सीकर जिले के खेतड़ी क्षेत्र तथा उदयपुर जिले की जावर खान से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा काल में भी धातुओं का खनन होता था। खेतड़ी क्षेत्र तांबा उत्पादन के लिये तथा जावर खान चांदी उत्पादन के लिये जानी जाती थी। उदयपुर जिले की जावर खान राजस्थान की प्राचीन खानों में से है। मेवाड़ रियासत की समृद्धि में इस खान का महत्त्वपूर्ण योगदान था। खनिज की उपलब्धता एवं उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान समृद्ध राज्य है। देश में सर्वाधिक खानें तथा देश के 90 प्रतिशत खनिज भण्डार राजस्थान में उपलब्ध हैं किंतु खनिज उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान का, झारखण्ड के बाद देश में दूसरा स्थान है। खनिज उत्पादन के मूल्य की दृष्टि से राजस्थान का पूरे देश में आठवां स्थान है। राजस्थान को खनिजों से प्रतिवर्ष औसतन 100 मिलियन अमरीकी डॉलर रॉयल्टी प्राप्त होती है। प्रदेश में कुल 65 प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं। इनमें से 42 प्रकार के प्रधान (उंरवत) एवं 23 प्रकार के अप्रधान (उपदवत) खनिज हैं। इनके खनन में लगभग सवा तीन लाख श्रमिक लगे हुए हैं। खनिजों से राजस्थान में बीस लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है।


    राजस्थान में खनिज उत्पादन

    राज्य में प्रधान खनिजों के 2,849 खनन पट्टे तथा अप्रधान खनिजों के 11,849 खनन पट्टे एवं 16,297 उत्खनन लाईसेन्स हैं। वित्तीय वर्ष 2012-13 में भारत में 2,22,747 करोड़ रुपये मूल्य के खनिज प्राप्त किये गये जबकि राजस्थान में 23,503 करोड़ रुपये मूल्य खनिज प्राप्त किये गये जो कि देश का 10.6 प्रतिशत हैं। राजस्थान में कॉपर ओर के 35 मिलियन टन, सीसा एवं जस्ता ओर के 75 मिलियन टन, जिप्सम के 70 मिलियन टन, लाइमस्टोन के 1990 मिलियन टन तथा रॉक फॉस्फेट के 60 मिलियन टन भण्डार उपस्थित हैं। देश के कुल अधात्विक खनिजों में 24 प्रतिशत भागीदारी राजस्थान की है। गारनेट (तामड़ा), एमरल, वॉल्सोनाइट तथा जेस्पार खनिज पूरे देश में केवल राजस्थान प्रदेश में ही मिलते हैं।

    संगमरमर, रॉक फॉस्फेट, जिप्सम, एस्बेस्टॉस, सिलिका, फास्फोराइट, जस्ता, सीसा, फैल्सपार, सोपस्टोन (घीया पत्थर), टंग्सटन, कैल्साइट, बिरिल, वुल्फ्रेमाइट, तम्बा तथा इमारती पत्थर की दृष्टि से राजस्थान का देश के खनिज उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। देश का 77 प्रतिशत सीसा, 56 प्रतिशत टंगस्टन, 99 प्रतिशत जिंक, 89 प्रतिशत एस्बेस्टॉस, 80 प्रतिशत सोपस्टोन, 55 प्रतिशत बॉलक्ले, 66 प्रतिशत ऑकर, 70 प्रतिशत फेल्सपार, 50 प्रतिशत वुल्फ्रेमाइट तथा 36 प्रतिशत ताम्बा राजस्थान में निकालता है।

    प्रधान खनिज

    खनिज रियायती नियम 1960 के अंतर्गत आने वाले खनिज, प्रधान खनिज कहलाते हैं। इनके लिये नियमों एवं रॉयल्टी का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इन खनिजों का प्रयोग औद्योगिक उत्पादन में किया जाता है। इन खनिजों के खनन की पट्टा अवधि 20 या 30 वर्ष की होती है तथा अधिकतम 10 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र खनन हेतु स्वीकृत किया जाता है।

    अप्रधान खनिज

    अप्रधान खनिज रियायती नियम 1986 के अंतर्गत आने वाले खनिज, अप्रधान खनिज कहलाते हैं। इनके लिये नियमों एवं रॉयल्टी का निर्धारण राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। इन खनिजों का प्रयोग भवन निर्माण में होता है।

    राजस्थान के प्रमुख धात्विक खनिज

    राजस्थान के धातु खनिज में तांबा, सीसा, जस्ता, लोहा तथा चांदी का प्रमुख स्थान है। इनमें से कोई भी धातु अपने शुद्ध रूप में नहीं पायी जाती अपितु इनके अयस्क प्राप्त होते हैं।

    सीसा एवं जस्ता : राजस्थान में सीसा एवं जस्ता मिश्रित अवस्था में सल्फाइड्स के रूप में मिलता है। गैलेना, सिरूसाइट और एंगलीसाइट सीसे के प्रमुख अयस्क हैं। जस्ते के प्रमुख अयस्कों में सैल्फेराइट, स्मिथसोनाइट, विलेमाइट, जिन्काइट और हैमीमार्फाइट मिलते हैं। सीसे का उपयोग बैटरी, केबल कवरिंग, व्हाइटलेड और ब्रास निर्माण में तथा जस्ता का उपयोग दवाइयां और रसायन बनाने में होता है। जस्ता सांद्रण से जस्ता पिण्ड के निर्माण में चांदी और कैडमियम उप उत्पाद के रूप में प्राप्त होते हैं। राज्य में सीसा-जस्ता अयस्क के 3,330 लाख टन के भण्डार हैं। देश का 100 प्रतिशत जस्ता उत्पादन तथा 85 प्रतिशत सीसा उत्पादन राजस्थान में होता है। उदयपुर जिले के जावर, मोचिया मगरा, बलारिया, बरोड़ मगरा राजसमंद जिले के राजपुरा दरीबा, बामनियां कला, अजमेर जिले की घूघरा घाटी तथा सिरोही जिले के डेरी क्षेत्र में सीसा एवं जस्ता के अयस्क पाये जाते हैं। भीलवाड़ा जिले के रामपुर-आगूचा, पुर तथा बनेड़ा क्षेत्र में भी सीसा एवं जस्ता के बड़े भण्डार उपलब्ध हैं।

    गारनेट : भीलवाड़ा के आंगुचा से गारनेट भी प्राप्त किया जाता है।

    तांबा : तांबा उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान का देश में दूसरा स्थान है। राज्य में 2008-09 में 10.5 लाख टन तांबा अयस्क का उत्पादन हुआ। झुंझुनूं जिले के खेतड़ी-सिंघाना, मदन कुदान, कोलिहां, चांदमारी, अकवाली, सतकुई, करमारी और बनवास में तांबा अयस्क मिलता है। सिरोही जिले के बसंतगढ़, पीपेला, अजारी, गोलिया, सीकर जिले के बालेसर, तेजावाला, अहीरवाला एवं अलवर जिले के प्रतापगढ़-खो, दरीबा भगोनी क्षेत्र में भी तांबा अयस्क मिलता है।

    टंगस्टन : राज्य में नागौर जिले के डेगाना कस्बे के पास स्थित रावल पहाड़ी एवं सिरोही जिले के बाल्दा बड़ाबरा क्षेत्र से टंगस्टन का उत्पादन हुआ करता था किंतु डेगाना क्षेत्र में टंगस्टन की मात्रा अत्यंत कम हो जाने के कारण एवं बाल्दा-बडाबरा क्षेत्र के वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण दोनों ही स्थानों से टंगस्टन उत्पादन बंद कर दिया गया है।

    लोहा : राज्य में अच्छी किस्म के लोहे के सीमित भण्डार हैं। राज्य में अधिकांश लोहा हेमेटाइट किस्म का है जिसमें लौह तत्व 50 प्रतिशत से कम है। वर्ष 2008-09 में राज्य में 60.45 हजार टन लौह अयस्क का खनन हुआ। जयपुर, अलवर, झुंझुनूं, भीलवाड़ा एवं उदयपुर जिलों में इसके भण्डार मौजूद हैं।

    सोना : राजस्थान में सोना खेतड़ी स्थित तांबा परिद्रावण संयत्र से सहउत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। बांसवाड़ा जिले के भूखिया, आनंदपुरी, सादड़ी, सिरोही जिले के अजारी, धनवाव आदि क्षेत्रों में भी सोने की उपस्थिति का पता चला है। यहाँ प्रति टन खनिज में स्वर्ण की मात्रा 0.18 से 2.5 ग्राम मिलने के संकेत हैं।

    चांदी : चांदी के अयस्क सामान्यतः प्राइरार्जिराइट, अर्जेण्टाइट, पॉलीबैसाइट, प्राउस्टाइट और सेरार्जिराइट खनिज अयस्कों से प्राप्त होती है। चांदी के अयस्क सामान्यतः तांबा, सीसा एवं जस्ता अयस्कों के साथ पाये जाते हैं। राजस्थान में चांदी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के परिद्रावण संयंत्रों से सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। देश का 76 प्रतिशत चांदी उत्पादन राजस्थान में होता है।

    फेल्सपार : फेल्सपार रासायनिक दृष्टि से सोडियम, पोटेशियम एवं कैल्शियम के सिलिकेट्स हैं। राज्य में इस खनिज की प्राप्ति पेग्मेटाइट चट्टानों से होती है। देश में फेल्सपार के कुल 161.38 लाख टन के भण्डार हैं जिनमें से 98.67 लाख टन के भण्डार राजस्थान में मौजूद हैं। राजस्थान में उत्पादित फेल्सपार उच्च कोटि का है। इसके उत्पादन में अजमेर जिला सर्वाग्रणी है। इसका उपयोग कांच, मीनाकारी, चीनी मिट्टी के बर्तन और सफेद सीमेंट बनाने में होता है। अजमेर के अतिरिक्त जयपुर में भी इसका खनन होता है।


    राजस्थान के प्रमुख अधात्विक खनिज

    रॉक फास्फेट : फास्फोरस के दो प्रमुख अयस्क हैं- एपेटाइट और रॉक फॉस्फेट। रॉक फॉस्फेट का उपयोग रासायनिक उर्वरकों तथा फास्फोरिक अम्ल को बनाने में होता है। राजस्थान में रॉक फॉस्फेट उदयपुर, जैसलमेर, बांसवाड़ा, सीकर, जयपुर और अलवर जिलों में मिलता है। के 175 मिलियन टन के भण्डार अनुमानित किये गये हैं। रॉक फॉस्फेट उत्पादन करने वाले राज्यों में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है। उदयपुर जिले के झामरकोटड़ा क्षेत्र में ई. 1968 में देश का सबसे बड़ा रॉक फॉस्फेट भण्डार खोजा गया। भारत के खनिज जगत में यह बीसवीं शताब्दी की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी गयी।

    चूना पत्थर : इसका खनिज का सर्वाधिक उपयोग सीमेंट बनाने में किया जाता है। इसके अलावा कांच, शक्कर, कागज, कैल्सियम कार्बाइड एवं चमड़ा उद्योग में भी इसका उपयोग होता है। ब्लीचिंग पाउडर, सोडा ऐश, कैल्सियम क्लोराइड तथा उर्वरकों के निर्माण में भी इसका उपयोग होता है। राजस्थान में चूना पत्थर का अनुमानित भण्डार सात हजार मिलियन टन है जो देश के कुल अनुमानित भण्डार का 10 प्रतिशत है। नागौर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, जैसलमेर तथा कोटा जिलों में इसका अधिक उत्पादन होता है।

    अभ्रक : मैग्नेटाइट और पेग्मेटाइट चट्टानों से अभ्रक प्राप्त होता है। इसका उपयोग विद्युत उपकरणों, औषधि निर्माण, तार एवं टेलिफोन, विद्युत के विभिन्न संयत्रों, रेडियो वायुयान, मोटर गाड़ियों, लालटेन की चिमनियों, प्रसाधन सामग्री, इंसुलेटर, चश्मों, मकान की खिड़कियों तथा इंसुलेटिंग ईंटों के निर्माण में होता है। राजस्थान में अभ्रक का खनन भीलवाड़ा जिले में पोटला, गंगापुर, सहाड़ा, मांडल, जामोली, रायपुर बागौर महेंद्रगढ़ आदि स्थानों पर होता है। पोटला क्षेत्र में लेपिडोलाइट तथा शेष क्षेत्रों में मस्कोवाइट (सफेद अभ्रक) मिलता है। अजमेर जिले में मांगलियावास, सरवाड़, केकड़ी, जवाजा, नसीराबाद तथा किशनगढ़ खेत्रों में मस्कोवाइट प्राप्त होता है। भीलवाड़ा राजस्थान की प्रमुख अभ्रक मण्डी के रूप में जाना जाता है। देश का 12 प्रतिशत माइका राजस्थान में उत्पादित होता है।

    एस्बेस्टॉस : यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध रेशे वाला खनिज है। यह अघुलनशील एवं ताप अवरोधक है। इसका उपयोग ताप अवरोधक वस्तुओं, सीमेण्ट की चादरों, पाइप, बॉयलर्स, तथा सिनेमाहॉल के पर्दे के निर्माण में होता है। उदयपुर, राजसमंद, डूंगरपुर, अजमेर तथा पाली जिलों में इसकी खानें मिलती हैं। देश का 84 प्रतिशत एस्बेस्टॉस राजस्थान में उत्पादित होता है।

    बेण्टोनाइट : बेण्टोनाइट खनिज क्ले की महत्त्वपूर्ण किस्म है। फूलने वाली बेण्टोनाइट क्ले को सोडियम बेण्टोनाइट तथा न फूलने वाली बेण्टोनाइट क्ले को कैल्सियम बेण्टोनाइट कहतेे हैं। इस खनिज का उपयोग तेल के कुंओं की खुदाई, तेल के शोधन, डायमण्ड ड्रिलिंग तथा फाउण्ड्रीज में होता है। राज्य में इस खनिज का एकमात्र उत्पादक जिला बाड़मेर है जहाँ गिरल, हाथी सिंह की ढाणी, सोनेरी, अकली, थुम्बली आदि क्षेत्रों में इसकी खानें मौजूद हैं।

    जिप्सम : यह राज्य का प्रमुख अधात्विक खनिज है। यह चूरू-बीकानेर-श्रीगंगानगर पट्टी में बहुतायत से पाया जाता है। नागौर जिले के गोटन, खारिया खंगार, भदवासिया आदि क्षेत्रों में जिप्सम के भण्डार स्थित हैं। जैसलमेर जिले के नाचना क्षेत्र में भी जिप्सम के बड़े भण्डार हैं। इसका उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है। फिल्म उद्योग तथा चिकित्सा क्षेत्र में काम आने वाला प्लास्टर ऑफ पेरिस भी जिप्सम से ही बनाया जाता है। देश का 94 प्रतिशत जिप्सम राजस्थान में उत्पादित होता है। यह अत्यंत बारीक कणों में बदलकर हवा में घुल जाता है जिससे यह पर्यावरण को प्रदूषित करता है।


    राजस्थान के प्रमुख इमारती पत्थर

    राजस्थान में विविध प्रकार के पत्थरों के विशाल भण्डार उपस्थित हैं। भारत का 65 प्रतिशत पत्थर उत्पादन राजस्थान में होता है।

    ग्रेनाइट : यह आग्नेय चट्टानों से प्राप्त होता है। राजस्थान में ग्रेनाइट के भण्डार अरावली पर्वतीय क्षेत्र एवं पश्चिमी राजस्थान में स्थित हैं। इसकी कटाई, घिसाई एवं पॉलिश करके इसकी चमकदार टाइलें एवं स्लैब बना लिये जाते हैं जिनका उपयोग भवनों के बाहरी हिस्सों को सजाने, भीतरी हिस्सों में फर्श, अलमारी एवं चौखटें आदि बनाने में होता है। जालोर, सिरोही, बाड़मेर, भीलवाड़ा जिलों में पाया जाने वाला ग्रेनाइट अधिक प्रसिद्ध है। इसका निर्यात भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

    संगमरमर : राजस्थान में विभिन्न रंगों वाला संगमरमर पाया जाता है। भारत में उपलब्ध कुल संगमरमर का 95 प्रतिशत राजस्थान में पाया जाता है। राज्य के नागौर, राजसमंद उदयपुर, अलवर, सिरोही, जयपुर, पाली, जैसलमेर, अजमेर, डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा आदि 19 जिलों में विभिन्न प्रकार का संगमरमर पाया जाता है।

    सैण्ड स्टोन : यह अवसादी चट्टानों से प्राप्त होता है। कोटा, बूंदी, भीलवाड़ा, करौली, धौलपुर, भरतपुर, जोधपुर, नागौर तथा चित्तौड़गढ़ जिलों में इसकी खानें स्थित हैं।

    छीतर पत्थर : यह पत्थर जोधपुर के आस पास की खानों में पाया जाता है। यह हल्के गुलाबी रंग का संरंध्र पत्थर है। इससे जोधपुर शहर की अनेक इमारतें बनायी गयी हैं। जोधपुर का उम्मेद पैलेस इसी पत्थर के नाम पर छीतर पैलेस कहताता है।

    घाटू पत्थर : जोधपुर के आस पास की खानों में लाल रंग का घाटू पत्थर मिलता है। मध्यकाल में बनी अनेक ऐतिहासिक इमारतें इसी पत्थर से बनी हैं।

    राजस्थान का खनिज ईंधन

    प्राकृतिक गैस : राज्य में प्राकृतिक गैस के विपुल भण्डार उपलब्ध हैं। जैसलमेर जिले के मनहेरा टिब्बा, तन्नोट, पूर्वी तन्नोट, डंाडेवाला और बागी टिब्बा में प्राकृतिक गैस का वाणिज्यिक उत्पादन हो रहा है। रामगढ़ में गैस आधारित विद्युत उत्पादन इकाई स्थापित की गयी है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की खोज एवं संचालन का कार्य निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंपा गया है। बीकानेर जिले में 950 मिलियन टन कोल बैड मीथेन गैस उपलब्ध है जिससे 5500 मेगावाट क्षमता का बिजलीघर अथवा 2500 टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता वाला यूरिया संयंत्र लगाया जा सकता है। यह कोल बैड मीथेन 500 मीटर की गहराई पर उपलब्ध है।

    कोयला : राजस्थान में टरशियरी क्रम का लिग्नाइट कोयला पाया जाता है। एक अनुमान के अनुसार राजस्थान में लिग्नाइट के 9,800 लाख टन भण्डार मौजूद हैं। देश का 40 प्रतिशत लिग्नाईट उत्पादन राजस्थान में होता है। बाड़मेर के गिरल, कपूरड़ी, जालिपा, भाड़का, बीकानेर जिले के पलाना, गुढ़ा, बिथनोक, बरसिंघसर, मांडल चारण, रानेरी हाड़ला तथा नागौर जिले में कसनऊ, मेड़ता, लूनसरा आदि क्षेत्रों में लिग्नाईट का खनन होता है।

    खनिज तेल : राजस्थान ब्लॉक में 7.3 बिलियन बैरल ऑयल समतुल्य (अरब बैरल) कच्चा तेल उपलब्ध है। वर्तमान में राजस्थान ब्लॉक से 1,75,000 बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन निकाला जा रहा है जो कि भारत के कुल प्रतिदिन उत्पादन का 23.33 प्रतिशत होता है। उपलब्धता के आधार पर राजस्थान ब्लॉक से 3 लाख बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन निकाला जा सकता है जो कि भारत के कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत होता है।

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  • अजमेर का इतिहास - 87

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 87

    स्वातंत्र्योत्तर अजमेर के प्रमुख संस्थान


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    राजस्थान राजस्व मण्डल


    राजस्थान राजस्व मण्डल की स्थापना नवम्बर 1949 में जयपुर में हुई। इसके प्रथम अध्यक्ष ब्रजचंद शर्मा थे। 22 जुलाई 1958 को राजस्व मण्डल का अजमेर में हस्तांतरण किया गया। इसका प्रथम कार्यालय तोपदड़ा स्कूल के पीछे स्थित था। 26 जनवरी 1959 को इसे नये भवन में स्थानांतरित किया गया। मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने इसका उद्घाटन किया। वर्तमान में राजस्व मण्डल में एक अध्यक्ष तथा अधिकतम 15 सदस्य होते हैं।

    राजस्थान लोक सेवा आयोग

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले राजस्थान की विभिन्न रियासतों में अपने-अपने लो सेवा आयोग काम कर रहे थे। 16 अगस्त 1949 को जयपुर में राजस्थान लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। सरदार पटेल ने इसका उद्घाटन किया। इसके प्रथम अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश सर एस. के. घोष थे। कैपिटल इन्क्वायरी कमेटी की अनुशंसा पर 1 अगस्त 1958 को इसे अजमेर में स्थानांतरित कर दिया गया।

    रेलवे भर्ती बोर्ड

    रेलवे भर्ती बोर्ड की स्थापना ई.1983 में रेलवे सेवा आयोग अजमेर के रूप में हुई। ई.1985 में इसका नाम बदलकर रेलवे भर्ती बोर्ड किया गया। यह उत्तर पश्चिम रेलवे के अजमेर, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर डिवीजन और पश्चिम रेलवे के कोटा डिवीजन के गु्रप सी के वर्किंग व सुपरवाइजरी स्टाफ का चयन करता है।

    आयुर्वेद निदेशालय

    आयुर्वेद निदेशालय की स्थापना अजमेर के राजस्थान में विलय के पश्चात् की गई। यह राज्य के आयुर्वेद एवं यूनानी अस्पतालों का नियंत्रण करता है।

    राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र

    राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है जिसमें बीजीय मसालों पर अनुसंधान की जाती है।

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