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  • प्यार ! (हिन्दी कविता)

     02.06.2020
    प्यार ! (हिन्दी कविता)

    प्यार !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    धूप छूकर

    चली जाती है

    जहां झूठे को

    और लौट कर नहीं आती

    फिर हफ्तों!

    पहाड़ियों की उन

    तमिस्र छाया में

    प्यार! तुम मुझे मिले

    झरना बनकर झूमते हुए।



    हिमाच्छादित शुभ्रवर्णा

    चोटियों के तले खड़े

    लम्बे देवदार की फुनगी पर

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    किरण बनकर बिखरते हुए।



    विशाल, अनगढ़

    बेडौल चट्टानों के बीच

    दूर-दूर तक फैली

    झाड़ियों के किनारे किनारे

    मीलों चली गईं

    सर्पिलाकार पगडण्डियों पर

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    खरगोश और मेमने बनकर

    डोलते हुए।



    आंखें फाड़-फाड़ कर

    देखा करता है हिमांशु

    रात-रात भर जागकर

    नदी के जिस उन्मुक्त प्रवाह को

    और विदा हो लेता है

    हर सवेरे अतृप्त ही,

    प्यार! मैंने तुम्हें देखा

    उर्मि बनकर फिसलते हुए।



    हजारों हाथ गहरी कन्दराओं में

    मारे तम के भय से

    वनैले हिंस्रक भी

    धरते नहीं पैर

    प्यार! मैंने तुम्हें वहां देखा

    हवा बनकर डोलते हुए।



    बड़ी-बड़ी चट्टानें खिसकती हैं

    प्रकृति के धनुष पर

    प्रत्यंचा बनकर

    और मुक्त कण्ठ से करती हैं

    ताण्डव का उद्घोष

    वहां पर प्यार! मैंने तुम्हें

    नदी बनकर

    उनका स्वागत करते देखा है

    छपाक की ध्वनि के साथ।

    मानों बोल उठी हों घाटियां

    घुंघरू बनकर।

    प्यार ! मैंने वह जलतरंग सुनी है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-19

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-19

    राजस्थान में वन्य जीवन (4)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    वन्य जीव अभयारण्य


    राजस्थान में 3 राष्ट्रीय उद्यान, 25 वन्यजीव अभयारण्य, 32 आखेट निषिद्ध वन्यजीव प्राणी विचरण क्षेत्र, 6 मृगवन और 5 जंतुआलय स्थित हैं।

    राष्ट्रीय उद्यान

    राज्य में रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान (सवाईमाधोपुर, क्षेत्रफल 392 वर्ग किमी) एवं केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर, क्षेत्र 28.73 वर्ग किमी) को विधिवत् राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया है। राष्ट्रीय मरु उद्यान (जैसलमेर, क्षेत्रफल 3,162 वर्ग किमी), सरिस्का अभयारण्य (अलवर, क्षेत्र 800 वर्ग किमी) तथा नाहरगढ़ राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य (जयपुर, 50 वर्ग किमी) को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की प्रारम्भिक घोषणा की जा चुकी है। इन क्षेत्रों में स्थित समस्त प्रकार के निजी अधिकारों को राज्य सरकार को समर्पित हो जाने के पश्चात् इन्हें विधिवत् रूप में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया जा सकेगा। 28 नवम्बर 2011 को राज्य सरकार ने कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा देने का निर्णय लिया। इसका क्षेत्रफल 508.60 वर्ग किमी होगा जिसमें कुम्भलगढ़ अभयारण्य के 23 वनखण्डों की 401.51 वर्ग किमी तथा टॉडगढ़-रावली अभयारण्य के 5 वन खण्डों की 107.09 वर्ग किमी भूमि सम्मिलित होगी। इसमें पाली, उदयपुर और राजसमन्द जिलों के क्षेत्र आयेंगे।


    राजस्थान के अभयारण्य व क्षेत्रफल

    सीता माता अभयारण्य : चित्तौड़गढ़ जिले की बड़ी सादड़ी तथा प्रतापगढ़ जिले की प्रतापगढ़, छोटी सादड़ी एवं धरियावद तहसीलों मंर 400 वर्ग किमी क्षेत्र में है तथा दुर्लभजीव चौसिंगा तथा उड़नगिलहरी के लिये प्रसिद्ध है।

    गजनेर अभयारण्य : यह बीकानेर जिले में है तथा बटबड़ पक्षी के लिये प्रसिद्ध है जिसे रेत का तीतर भी कहते हैं।

    बस्सी अभयारण्य : यह चित्तौड़गढ़ जिले में है जो जंगली बाघों के विचरण के लिये प्रसिद्ध है।

    ताल छापर अभ्यारण्य : यह चूरू जिले में है तथा काले हिरणों एवं कुरजां के लिये प्रसिद्ध है।

    आबू अभयारण्य : सिरोही जिले में स्थित यह अभयारण्य जंगली मुर्गों के लिये प्रसिद्ध है।


    मृगवन

    प्रदेश में चीतल, चिंकारा, कृष्णमृग तथा अन्य मृगों के संरक्षण के लिये 6 प्रमुख मृगवन स्थापित किये गये हैं- (1) चित्तौड़गढ़ मृगवन चित्तौड़गढ़, (2) सज्जनगढ़ मृगवन उदयपुर, (3) माचिया सफारी पार्क जोधपुर, (4) संजय उद्यान शाहपुरा (भीलवाड़ा), (5) पुष्कर मृगवन (अजमेर), (6) अशोक विहार मृगवन जयपुर।


    जंतुआलय

    राज्य में पाँच जंतुआलय हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के वन्य पशु एवं पक्षी रखे गए हैं। जयपुर जंतुआलय में वन्य पशुओं की 42 तथा पक्षियों की 75 प्रजातियाँ हैं। कोटा जंतुआलय में वन्य पशुओं की 17 तथा पक्षियों की 17 प्रजातियाँ हैं। बीकानेर जंतुआलय में वन्य पशुओं की 20 तथा पक्षियों की 22 प्रजातियाँ हैं। जोधपुर जंतुआलय में वन्य पशुओं की 7 तथा पक्षियों की 112 प्रजातियाँ हैं। उदयपुर जंतुआलय में वन्य पशुओं की 13 तथा पक्षियों की 25 प्रजातियाँ हैं।


    जैविक उद्यान

    राज्य में दो जैविक उद्यानों- उदयपुर में सज्जनगढ़ जैविक उद्यान एवं जयपुर में नाहरगढ़ जैविक उद्यान का विकास किया गया है। दोनों जैविक उद्यानों का मास्टर ले-आउट प्लान केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित किया गया है। इन दोनों उद्यानों में एलिफेन्ट सफारी की व्यवस्था है। जोधपुर में माचिया तथा कोटा में अभेड़ा में जैविक उद्यान विकसित करने हेतु योजना तैयार की गई है। कोटा में चम्बल के किनारे स्थित 'अभेड़ा'मगरमच्छों के लिये प्रसिद्ध है।


    राजस्थान में वन्य पशु संरक्षण

    राजस्थान में वन्य पशु संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत वन्य पशुओं के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है किंतु अवैध शिकार के कारण कई प्रजातियाँ लुप्त हो गयी हैं तथा कुछ प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं। वर्ष 2005 में राजस्थान में बाघों की संख्या अचानक ही घट कर लुप्त होने के कगार पर आ पहुँची।


    राजस्थान में 2,61,233 वन्यजीव

    राजस्थान में 42 बाघों सहित कुल 2,61,233 वन्यजीव हैं। इनमें से 1,25,858 वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र में हैं। इनमें से 42 बाघ, 408 बघेरे, 645 भालू, 4,461 चिंकारा, 2,025 काले हरिण, 276 चौसिंगा हरिण, 16,509 सांभर, 365 भेड़िये, 20,098 चीतल एवं 1,517 लकड़बग्घे हैं। संरक्षित क्षेत्र में 622 बिज्जू, 1,011 जंगली बिल्ली, 9,788 जंगली सूअर, 34,008 लंगूर, 1,578 लोमड़ी, 2,118 नेवले, 22,772 नील गाय, 1,355 सेहली (सेही), 6,222 सियार तथा 38 स्याहगोश हैं। असंरक्षित क्षेत्र में 1,35,375 वन्यजीव विचरण कर रहे हैं। इन क्षत्रों में बाघ का निवास नहीं है। असंरक्षित क्षेत्र में 30,509 चिंकारा, 10,507 काले हरिण, 262 चीतल, 50 चौसिंघा हरिण, 119 बेघेरे, 112 भालू, 924 भेड़िये, 45,152 नीलगाय, 15,518 लंगूर, 1,548 लकड़बग्घे, 16,044 सियार, 1,725 सेही, 4,193 लोमड़ी, 2,862 जंगली सूअर एवं 349 स्याहगोश एवं अन्य वन्य जीव सम्मिलित हैं।

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  • अजमेर का इतिहास - 83

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 83

    अजमेर के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेस की भूमिका


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में प्रेस का विशिष्ट स्थान रहा है। राजपूताना रियासतों में नागरिकों को आंदोलन करने तथा शासकों के विरुद्ध अपनी बात रखने के लिये नाम मात्र की भी स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में ब्रिटिश सत्ता होने से जनता को कुछ सीमा तक नागरिक अधिकार प्राप्त थे। यही कारण है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अजमेर में कई संगठनों की स्थापना हुई तथा बड़ी संख्या में समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ जिन्होंने सम्पूर्ण राजपूताने में राजनीतिक चेतना का अलख जगाया।

    ई.1885 में भारत में कांग्रेस की स्थापना हुई। इसी वर्ष अजमेर से कुछ समाचार पत्र प्रारंभ हुए। इनमें सबसे पहला समाचार पत्र राजस्थान टाइम्स था। यह अंग्रेजी समाचार पत्र था। इसका हिन्दी संस्करण राजस्थान पत्रिका के नाम से निकला। दोनों पत्रों के सम्पादकीय लेखों में अंग्रेजी प्रशासन की खुलकर आलोचना की जाती थी। ई.1888 में इन समाचार पत्रों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा इनके सम्पादक बक्शी लक्ष्मणदास को जेल में डालकर उन पर मुकदमा चलाया गया तथा डेढ़ साल के कारावास की सजा दी गई। ई.1907 में यह समाचार पत्र ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किये गये दमन के कारण बंद हो गया।

    ई.1885 में अजमेर से राजपूताना हेराल्ड नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके सम्पादक हनुमानसिंह थे तथा यह अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता था। इस पत्र में भारतीय राज्यों में अंग्रेज अधिकारियों के अनावश्यक हस्तक्षेप के विरुद्ध लेख एवं समाचार छपते थे। इस समाचार पत्र में इस विषय पर इतने लेख छपे कि ब्रिटिश संसद में इन लेखों के आधार पर अनेक प्रश्न उठे। विजयसिंह पथिक ने अजमेर से राजस्थान संदेश नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन किया। आर्थिक अभाव के कारण इसे बंद करना पड़ा। पथिकजी ने नव संदेश नामक पत्र निकाला किंतु वह भी अर्थाभाव के कारण नियमित रूप से नहीं चल सका। इस समाचार पत्र ने जन साधारण में काफी लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी।

    ई.1885 में ही अजमेर से राजपूताना मालवा टाईम्स नामक समाचार पत्र प्रारंभ हुआ। इसकी विषय वस्तु में भी देशी रियासतों में अंग्रेज अधिकारियों के अनावश्यक हस्तक्षेप का विरोध सम्मिलित था। ये समाचार पत्र अंग्रेजी में छपने के कारण आम पाठक से दूर थे किंतु इन्होंने प्रबुद्ध वर्ग को काफी सीमा तक प्रभावित किया।

    ई.1889 में अजमेर से अमृतदास चारण ने राजस्थान समाचार नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र प्रारम्भ किया। यह समाचार पत्र आर्यसमाज के विचारों से काफी प्रभावित था तथा इसमें राष्ट्रीय आंदोलन से सम्बन्धित सामग्री भी छपती थी। अजमेर से राजपूताना गजट नामक एक समाचार पत्र 19वीं सदी के अंतिम दशक में प्रारम्भ हुआ। इसने राजपूताना एवं अन्य क्षेत्रों के शासकों के अन्याय पूर्ण निर्णयों की भर्त्सना की तथा सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध वकालात की। इन समाचार पत्रों ने अजमेर के नागरिकों में जन चेतना पैदा करने का प्रयास किया जिससे अजमेर राजनीतिक चेतना का गढ़ बन गया।

    ई.1919 के पश्चात् समाचार पत्रों के प्रकाशन में और अधिक प्रगति हुई। समाचार पत्रों के प्रचलन में आने से प्रांतों की दूरियां मिट गई थीं तथा राजनीतिक आंदोलन प्रांत की सीमाओं को पार करके राष्ट्रीय चरित्र प्राप्त करता चला गया था। ई.1919 के पश्चात् देश में क्रांतिकारी आंदोलन का स्थान कांग्रेस के अहिंसा आंदोलन ने ले लिया। गांधीजी द्वारा प्रारंभ असहयोग आंदोलन, राजस्थान में अजमेर से प्रारंभ हुआ। गांधीजी की प्रेरणा से अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, विजयसिंह पथिक आदि ने शांतिपूर्ण तरीके से राजनीतिक चेतना जागृत करने और सामाजिक सुधारों के उद्देश्य से राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की।

    ई.1920 में इसका कार्यालय वरधा से अजमेर में स्थानांतरित कर दिया गया। कोटा, जोधपुर, उदयपुर एवं बूंदी में इसकी शाखायें स्थापित की गईं। इस समय अजमेर में तीन दलों के नेतृत्व में स्वतंत्रता सम्बन्धी गतिविधियां संचालित की जा रही थीं- विजयसिंह पथिक प्रथम दल का नेतृत्व कर रहे थे, अर्जुनलाल सेठी दूसरे दल का और जमनालाल बजाज एवं हरिभाऊ उपाध्याय के हाथों में तीसरे दल का नेतृत्व था। ई.1919 के बाद राजस्थान केसरी व तरुण राजस्थान का प्रकाशन आरम्भ हुआ। ई.1918 में राजपूताना मध्य भारत सभा की स्थापना हुई तथा ई.1919 से राजस्थान केसरी नामक समाचार पत्र वरधा से प्रकाशित होने तक विजयसिंह पथिक को इसका सम्पादक तथा रामनारायण चौधरी को सहायक सम्पादक बनाया गया।

    ई.1922 में विजयसिंह पथिक राजस्थान केसरी के सम्पादन कार्य से मुक्त हो गये। इसी वर्ष उन्होंने अजमेर से नवीन राजस्थान नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र निकालना आरंभ किया। इस समाचार पत्र का उद्देश्य राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत कर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाना था। इसके माध्यम से मेवाड़ के किसान आंदोलन को भारी समर्थन मिला। मेवाड़ राज्य ने विजयसिंह पथिक के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए मई 1923 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इनकी गिरफ्तारी के बाद नवीन राजस्थान के सम्पादन का भार शोभालाल गुप्त पर आ गया। मेवाड़ राज्य में राजस्थान केसरी एवं नवीन राजस्थान का प्रवेश प्रतिबन्धित कर दिया गया था।

    जयपुर, अलवर और बूंदी राज्यों ने भी अपने यहाँ इन समाचार पत्रों का प्रवेश बंद कर दिया। बूंदी, बरड़, अलवर के किसान आंदोलनों के समर्थन में लेख लिखने के कारण ऐसा किया गया। तरुण राजस्थान पर राजा महेन्द्र प्रताप की एक चिट्ठी और अग्र लेख छापने के आधार पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। रामनारायण चौधरी और शोभालाल गुप्त अभियुक्त बनाये गये। इन्हें जेल भेज दिया गया। इनका मुकदमा अंग्रेज कमिश्नर हॉपकिन्स की अदालत में चला। मुकदमे में काफी धांधली हुई।

    अंत में रामनारायण चौधरी को बरी कर दिया गया और शोभालाल गुप्त को एक साल की सजा हुई। शंकरलाल शर्मा ने भी ई.1928 तक तरुण राजस्थान में कार्य किया। तत्कालीन समाचार पत्र समाज सुधार की भूमिका का निर्वाह करते थे। रामनारायण चौधरी ने कम दहेज लाने वाली पुत्रवधू के प्रति अन्याय को बंद करवाया और एक महिला की समस्या सुलझाई जिसके पति की, किशनगढ़ रियासत के दीवान बहादुर पौनस्कर ने हत्या कर दी थी।

    ई.1926 के बाद हरिभाऊ उपाध्याय की गतिविधियाँ मेरवाड़ा में बढ़ीं। उन्होंने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल की स्थापना की एवं त्यागभूमि नामक समाचार पत्र आरंभ किया। इसके माध्यम से समाज सुधार, महिला उत्थान, छुआछूत विरोध, ग्रामीण उत्थान, चरखा व खादी तथा भारतीय परम्परा एवं संस्कृति के विकास को अपना ध्येय बनाया। जवाहरलाल नेहरू ने भी त्यागभूमि की भारी प्रशंसा की। यह समाचार पत्र आर्थिक अभाव के कारण ई.1931 में बंद हो गया।

    ई.1929 में रामनारायण चौधरी एवं शोभालाल गुप्त ने अजमेर से यंग राजस्थान नामक अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया। यह समाचार पत्र एक वर्ष ही निकल पाया क्योंकि दिसम्बर 1929 में रामनारायण चौधरी वरधा चले गये। विजयसिंह पथिक उग्र विचारों के व्यक्ति थे, उन्होंने ई.1929 से ई.1932 तक राजस्थान संदेश हिन्दी साप्ताहिक समाचार पत्र अजमेर से प्रकाशित किया। इसके माध्यम से वे राजस्थान में क्रांतिकारी जन चेतना उत्पन्न करने में सफल रहे।

    ई.1934 में उदारवादी विचारों का दरबार नामक समाचार पत्र मदनमोहन लाल गुप्ता के सम्पादन में अजमेर से प्रकाशित होने लगा। यह व्यापारिक आधारों पर संचालित था। 2 अक्टूबर 1936 से राजस्थान सेवक मण्डल के अधीन अजमेर से नवज्योति नामक साप्ताहिक हिन्दी पत्र का प्रकाशन आरम्भ हुआ। प्रारंभ में शोभालाल गुप्त इसके सम्पादक थे तथा शीघ्र ही यह कार्य रामनारायण चौधरी को सौंप दिया गया। इस समाचार पत्र का उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना व राष्ट्रीय आंदोलन को विकसित करना था। नवज्योति ने अंग्रेजों व सामंती शासकों की नीतियों का विरोध करते हुए जनता को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ई.1942 में रामनारायण चौधरी के साबरमती आश्रम चले जाने के कारण दुर्गाप्रसाद चौधरी नवज्योति के सम्पादक बने। यह राजस्थान में राष्ट्रीय आंदोलन का मुखपत्र बन गया। ई.1948 से यह साप्ताहिक के स्थान पर दैनिक समाचार पत्र बन गया।

    ई.1937 में अजमेर से हिन्दी साप्ताहिक पत्र मीरा का प्रकाशन जगदीश प्रसाद माथुर 'दीपक' एवं उनके भाई अम्बालाल माथुर ने किया। यह समाचार पत्र कांग्रेस, किसान व श्रमिकों का पक्का समर्थक था। देशी रियासतों में महिलाओं के उत्पीड़न के विरुद्ध ही मीरा ने जमकर आवाज उठाई। मीरा का प्रकाशन ई.1964 तक होता रहा। ई.1938 में जगदीश प्रसाद माथुर 'दीपक' के सम्पादन में अजमेर से रियासती नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। यह समाचार पत्र राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन का मुख पत्र बन गया। ई.1939 में ठाकुर नारायणसिंह एवं कनक मधुकर के सम्पादन में नवजीवन नामक साप्ताहिक हिन्दी पत्र प्रकाशित हुआ। ई.1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में नवज्योति, मीरा, रियासती एवं नवजीवन नामक समाचार पत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

    सिन्धी समाज के समाचार पत्र

    भारत पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान में चले गये सिन्ध क्षेत्र से, भारत में आये सिन्धी समाज ने बड़ी संख्या में अजमेर में निवास किया। इस कारण अजमेर से सर्वाधिक सिन्धी भाषा के समाचार पत्र निकले। इनमें दैनिक समाचार पत्र- हिन्दू (सं. किशन वरियाणी) तथा भारत भूमि (सं. टीकमदास खियलदास), साप्ताहिक समाचार पत्र- हिन्दवासी (सं. किशन मोटवाणी), हिन्दुभूमि (सं. नानकराम इसराणी), संत कंवरराम (सं. किशन वरियाणी), वीर विजय (सं. नथरमल नेशूमल), संत हाथीराम (सं. भैंरू पेंहलवाणी), पाक्षिक समाचार पत्र- सहयोग (सं. गुलाबराय रानी), मासिक समाचार पत्र- आर्यवीर (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), आत्म दर्शन (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), फुलवाड़ी (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), शेवा मार्ग (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), आदर्श (सं. एम आर बलेछा), आर्य प्रेमी (सं. मोहनलाल तेजवाणी) तथा मयार (सं. राधाकृष्ण विजलाणी) सम्मिलित हैं।

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  • क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

     02.06.2020
    क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

    क्या दलितों को कांग्रेस ने भड़काया !

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    दो अप्रैल 2018 को दलित आंदोलन के दौरान भारत-बंद, धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि कार्यक्रम हुए। ये कार्यक्रम कई स्थानों पर हिंसक हो गए। आग लगी, लोगों के घर जले, सिर फूटे, कुछ लोग मरे भी।

    कहा जा रहा है कि इसके पीछे कांग्रेस ने राजनीतिक रोटियां सेकीं।

    क्या वाकई में इसके पीछे कांग्रेस थी !

    इस प्रश्न पर विचार-विमर्श करने से पहले कुछ मूलभूत बातों पर विचार किया जाना चाहिए।

    भारत के सामाजिक ढांचे में कुछ दरारें हैं जिनका लाभ कभी देश विरोधी तो कभी सत्ता विरोधी शक्तियों ने उठाया है। पहले इसका लाभ महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी तथा बाबर ने उठाया, बाद में अंग्रेजों ने उठाया और मीडिया में आरोप लग रहा है कि अब कांग्रेस उठाना चाहती है !

    इस समस्या के इतिहास में थोड़ा और पीछे चलते हैं।

    जब कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था, श्रम आधारित जाति व्यवस्था में बदली तो समाज को उसके लाभ और हानि दोनों ही मिले। श्रम आधारित जाति व्यवस्था का लाभ श्रम कौशल से जुड़ा हुआ था जबकि इस व्यवस्था का नुक्सान कुछ अतिवादियों, मूर्खों एवं बुरी प्रवृत्ति के लोगों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध संगठित होकर षड़यंत्र करने के रूप में हुआ।

    जाति व्यवस्था ने अस्पृश्यता जैसे घृणित विचार को जन्म दिया। इसके कारण कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हुईं।

    भारत को आजादी मिलने तक देश में जातिवाद एक सामाजिक समस्या थी किंतु देश की आजादी के बाद यह राजनीतिक समस्या बन गई।

    जातिवादी व्यवस्था ने एससी-एसटी आरक्षण को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने मण्डल कमीशन को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने ओबीसी आरक्षण को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा जैसे शब्दों को जन्म दिया। जातिवादी व्यवस्था ने बुरी प्रवृत्ति के लोगों को समूचे हिन्दू धर्म को बुरा बताने का अवसर दिया। जातिवादी व्यवस्था ने जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन और दलित आंदोलन को जन्म दिया।

    जाति व्यस्था की आड़ में कुछ बुरे लोगों को हिन्दू धर्म के विरुद्ध विष वमन करने तथा उसे असहिष्णु, हिंसक और शोषकों का धर्म कहने का दुस्साहस हुआ। हिन्दू धर्म की अच्छाइयों की चर्चा बंद कर दी गई और समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा समानता जैसे राजनीतिक मुहावरे गढ़ लिए गए।

    नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक हिन्दू संगठनों को गांधीजी का हत्यारा बताकर देशवासियों को हिन्दू संगठनों के विरुद्ध भड़काते रहे। राहुल गांधी तो आर एस एस पर गांधीजी की हत्या का आरोप दोहरा कर मुकदमा तक झेल रहे हैं।

    आज भी कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत यही कहते हैं कि बीजेपी घृणा फैलाने वाली राजनीति करती है। देश का बहुसंख्यक हिन्दू अब इन बातों को पसंद नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि इन जुमलों की आड़ में अल्पसंख्यकों के वोट बटोरे जाते हैं। इसलिए देश का बहुसंख्यक हिन्दू, कांग्रेस से विमुख हो गया और केन्द्र में बीजेपी की सरकार बनी।

    जब देश का बहुसंख्यक हिन्दू, कांग्रेस से विमुख होकर बीजेपी की तरफ मुड़ गया तो कांग्रेस का राजनीतिक आधार ही खिसक गया। जिस अल्पसंख्यक वर्ग को कांग्रेस ने वोट बैंक में बदलकर सत्ता के घोड़े पर चढ़े रहने की आदत बना ली थी, वह घोड़ा धड़ाम से नीचे गिर गया। इसलिए कांग्रेस के समक्ष अब कोई चारा नहीं बचा, सिवाय इसके कि हिन्दू धर्म के वोटरों में सेंध लगाई जाए।

    देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी जानती है कि हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है ! जाति को जाति से लड़ाओ, और हिन्दू धर्म की एक-जुटता को चटखा दो। हिन्दू धर्म को जाति के नाम पर आसानी से कई टुकड़ों में बांटकर कुछ टुकड़ों को अपनी ओर किया जा सकता है। एससी, एसटी, ओबीसी, जनरल, अल्पसंख्यक जैसे बड़े टुकड़े तो थोड़े से ही परिश्रम से अलग किए जा सकते हैं।

    इस बैकग्राउण्ड के बाद अब हम अपने मूल विषय पर लौटते हैं। दलित आंदोलन के दौरान कुछ अजीबोगरीब घटनाएं हुईं जिनके कारण कांग्रेस पर दलित आंदोलन भड़काने के आरोप लगाए गए। दलितों का यह आंदोलन इस बात को लेकर हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी दलित द्वारा किसी सवर्ण के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवाने मात्र से सवर्ण व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं हो, पहले जांच हो तथा जांच के तथ्यों के आधार पर गिरफ्तारी हो ।

    दलित आंदोलन के नेताओं ने मुद्दे को भटकाया और उसे आरक्षण के मुद्दे में बदल दिया। कांग्रेस ने भी यही किया। दलित आंदोलन के नेताओं द्वारा सड़कों पर चल रहे जुलूसों में बार-बार कहा गया कि बीजेपी, दलितों का आरक्षण समाप्त कर रही है, जबकि बीजेपी बारबार दोहरा रही थी कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा। राहुल गांधी लगातार दोहराते रहे कि बीजेपी दलित विरोधी है, बीजेपी आरक्षण समाप्त करना चाहती है। यह भी कहा गया कि गुजरात से शुरू हुआ दलित आंदोलन भगवा राजनीति के लिए कफ़न साबित होगा !

    इस आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर हनुमानजी आदि देवी देवताओं की मूर्तियों पर सार्वजनिक रूप से जूते मारे गए और उन पर थूका गया। कुछ स्थानों पर सवर्णों के घर जलाए गए। प्रतिक्रिया में कुछ दलितों के घर भी जलाए गए। सोशियल मीडिया में हिन्दू धर्म के विरुद्ध घृणा फैलाने का दौर चला।

    राजस्थान में बीजेपी की एक एससी महिला एमएलए का घर भी जलाया गया। उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों ने उनके घर को आग लगाई। अन्य स्थानों से भी कुछ ऐसी बातें सामने आईं।

    यह तो प्रत्येक घटना की पुलिस जांच होने पर ही पता लग सकेगा कि किसी भी घटना में कांग्रेस का हाथ था या नहीं, तब तक जितने मुंह, उतनी बातें होंगी। इस बीच बीजेपी के कुछ दलित सांसद भी अपनी ही पार्टी के विरुद्ध शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ गए हैं। यह तो वक्त ही बताएगा कि उनकी शिकायतें कितनी सही हैं और कितनी गलत!

    कांग्रेस देश की बहुत जिम्मेदार तथा प्रतिष्ठित पार्टी है, उसके नेतृत्व में देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी और आजादी पाई। कांग्रेस ने देश पर 60 से अधिक वर्षों तक शासन किया। कांग्रेसी सरकारों के नेतृत्व में देश ने दुश्मनों को युद्धों में पराजित किया। अतः उससे किसी भी तरह की गैर जिम्मेदार हरकत की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए आवश्यक है कि कांग्रेस भी देश को गंभीर स्वर में स्वयं को निर्दोष बताने का प्रयास करे।

    दलित नेताओं को भी विचार करना चाहिए कि वे अपने समाज की अशिक्षा और निर्धनता का लाभ उठाकर उन्हें सरकार, समाज अथवा धर्म के विरुद्ध न भड़काएं। यह कैसे संभव है कि हम अपने देश से प्रेम करने का दंभ भरें और देशवासियों से घृणा करें!

    इससे पहले कि प्रत्येक जाति स्वयं को एक राष्ट्र समझे और हम पूरी दुनिया के समक्ष दया के लिए गिड़गिड़ाएं, हमें जिम्मेदार नागरिकों की तरह व्यवहार करना होगा। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तो और भी ज्यादा है।
    प्रेम से ही प्रेम उत्पन्न होता है, घृणा से किसी को भी अंत में कुछ प्राप्त नहीं होता

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-20

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-20

    राजस्थान में पशुधन (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राज्य में 18वीं पशुगणना के अनुसार वर्ष 2007 में 566.63 लाख पशुधन पाया गया। पशुधन में गौ-धन, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़े, टट्टू एवं खच्चर,गधे, ऊँट एवं सूअर सम्मिलित होते हैं। राज्य में कुक्कुट की संख्या 49.94 लाख पाई गई। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पशुधन का योगदान लगभग 8 प्रतिशत है। गौ-धन का 50 प्रतिशत एवं भैंसों की संख्या का 25 प्रतिशत खेती एवं परिवहन के काम आता है। कन्हैयालाल सेठिया ने राजस्थान के पशुधन का बखान करते हुए लिखा है-


    नारा नागौरी हिद ताता,

    मदुआ ऊँट अणूंता खाथा।

    ईं रै घोड़ां री कै बातां?

    धरती धोरां री।

    18वीं पशुगणना वर्ष 2007 के अनुसार पशुधन की उपलब्धता


    पशुगणना 2007 के अनुसार उपरोक्त पशुओं के साथ-साथ राज्य में 9301 खरगोश, 4993620 कुक्कुट, तथा 1246036कुत्ते भी निवास करते हैं। राज्य का पशुधन घनत्व 166 पशु प्रति वर्ग किमी है।


    सकल पशुधन का प्रतिशत वार वितरण

    राज्य में कुल पशुधन में गौ-धन (गाय बैल) 21.38 प्रतिशत, भैंस 19.58 प्रतिशत, भेड़ 19.75 प्रतिशत, बकरियाँ 37.95 प्रतिशत, ऊँट 0.75 प्रतिशत, सूअर 0.37 प्रतिशत तथा अन्य पशु 0.22 प्रतिशत हैं।


    पशुगणना से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

    (पशुगणना 2007 पर आधारित)


    राज्य में सर्वाधिक पशु संख्या वाला जिला       बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक गायों वाला जिला               उदयपुर

    राज्य में सर्वाधिक भैंसों वाला जिला               अलवर

    राज्य में सर्वाधिक भेड़ों वाला जिला               बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक बकरियों वाला जिला          बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक ऊँटों वाला जिला               बाड़मेर

    राज्य में सर्वाधिक दुग्ध संकलन वाला जिला    जयपुर

    राज्य में सर्वाधिक मुर्गियों वाला जिला            अजमेर

    राज्य में सबसे कम पशुसंख्या वाला जिला      धौलपुर

    राज्य में सबसे कम गायों वाला जिला             धौलपुर

    राज्य में सबसे कम भैंसों वाला जिला             जैसलमेर

    राज्य में सर्वाधिक पशुधन                           बकरी


    देश की अर्थव्यवस्था में राजस्थान के पशुधन का योगदान

    देश के कुल पशुधन में राजस्थान का अंश                      10.58 प्रतिशत

    देश के कुल दुग्ध उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी       10 %

    देश के बकरा मांस उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी     30 %

    देश के ऊन उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी              41.6%


    राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व

    राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पशुपालन व्यवसाय पर आधारित है। राज्य के लगभग 65 लाख परिवार पशुपालन एवं कृषि से जुड़े हुए हैं। पशुपालन से राज्य में उत्पादन की वृद्धि दर 4 से 6 प्रतिशत है जो कृषि क्षेत्र के 1 से 2 प्रतिशत की तुलना में लगभग 3 से 4 गुनी है। राज्य की 80 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या की आय का माध्यम पशुपालन है।

    प्रति-व्यक्ति पशुधन

    वर्ष 1951 की पशुगणना के अनुसार राज्य में प्रतिव्यक्ति पशुधन संख्या 1.59 थी जो वर्ष 2007 की पशुगणना के अनुसार घटकर 0.825 रह गई है। अर्थात् राज्य में मनुष्यों की तुलना में पशुधन की संख्या काफी कमी आई है।

    बाड़मेर जिले में राज्य का सर्वाधिक पशुधन

    बाड़मेर जिले में राज्य का सर्वाधिक पशुधन निवास करता है। वर्ष 2007 की पशुगणना के अनुसार बाड़मेर जिले में 44,71,975 पशुधन पाला जाता है। इनमें बकरियों की संख्या सर्वाधिक (22,21,007) तथा भेड़ों की संख्या (13,71,217) है। यही कारण है कि जिले में दुग्ध उत्पादन का स्तर काफी नीचे है।

    जोधपुर जिला राज्य में दूसरे नम्बर पर पशुधन

    संख्या की दृष्टि से जोधपुर जिला राज्य में दूसरे नम्बर पर है। जिले में कुल 33 लाख 28 हजार 143 पशुधन है जिसमें बकरियों की संख्या सर्वाधिक (14,02,242) तथा भेड़ों की संख्या (9,76,749) है।

    उदयपुर जिले में राज्य का सर्वाधिक गौ-धन

    प्रदेश में सर्वाधिक गौ-धन (9,46,318) उदयपुर जिले में पाला जाता है। फिर भी दुग्ध संकलन एवं विक्रय में उदयपुर जिला राज्य में छठे स्थान पर है।

    जयपुर जिला दुग्ध संकलन में सबसे आगे पशुधन

    उपलब्धता के मामले में जयपुर जिला राज्य में पाँचवे स्थान पर है किंतु दुग्ध संकलन तथा विक्रय के मामले में यह राज्य में पहले स्थान पर है।

    धौलपुर जिला गौ-धन पालन में सबसे पीछे

    धौलपुर जिले में राज्य का सबसे कम गौ-धन पाया जाता है। यहाँ मात्र 61,902 गौ-धन पाया गया है।


    राजस्थान में गौ-धन

    वर्ष 2007 की पशुगणना के अनुसार राज्य में गौ-धन की संख्या 124.10 लाख है। उदयपुर जिले में राज्य का सर्वाधिक गौ-धन पाया जाता है। बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, एवं भीलवाड़ा जिलों में भी गौ-धन बड़ी संख्या में पाला जाता है। पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर, बीकानेर, नागौर और जोधपुर आदि रेगिस्तानी जिलों में भी गौ-धन का बड़ी संख्या में पालन होता है। अलवर, भरतपुर, दौसा, सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों में गौपालन कम संख्या में होता है।

    गायों की उत्तम नस्लें : थारपारकर, कांकरेज, राठी तथा गिर नस्लों की गायों को डेयरी की उत्तम नस्लों की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।

    थारपारकर : थारपारकर नस्ल की गायें जैसलमेर, बाड़मेर तथा जोधपुर जिलों अर्थात् सीमावर्ती क्षेत्र में पायी जाती हैं।

    कांकरेज : कांकरेज नस्ल की गायें जालोर जिले के सांचोर क्षेत्र तथा उससे लगते हुए बाड़मेर जिले में पाई जाती है। यह दूध तथा बैल दोनों के लिये उत्तम मानी जाती है।

    राठी : राठी गाय को लाल सिंधी व साहीवाल नस्लों की मिश्रित नस्ल माना जाता है। ये गंगानगर से लेकर बीकानेर और जैसलमेर तक के क्षेत्र में प्रमुखता से पाई जाती है।

    गिर : इसे रैंडा तथा अजमेरा भी कहते हैं। यह नस्ल मध्य राजस्थान अर्थात् अजमेर, नागौर, टोंक तथा भीलवाड़ा जिलों में पाई जाती है।

    नागौरी : नागौरी नस्ल की गायें नागौर जिले में पाई जाती है। यह बैलों के लिये अधिक प्रसिद्ध है। मालवी : मालवी नस्ल की गायें चित्तौड़गढ़, कोटा, झालावाड़, डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा जिलों में पाये जाती हैं।

    बैलों की उत्तम नस्लें : राजस्थान में पायी जाने वाली बैलों की कुछ नस्लें पूरे देश में विख्यात हैं। इनमें कांकरेज (सांचोरी), नागौरी व मालवी अधिक प्रसिद्ध हैं। बैलों की हरियाणवी नस्ल गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर आदि जिलों में पाली जाती है। यह नस्ल भारवाहक एवं खेती के उपयुक्त होती है। कालीबंगा, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो आदि से प्राप्त अति प्राचीन मुहरों पर जिन बड़े-बड़े सींगों वाले सांडों के चित्र पाये जाते हैं, उन सींगों वाले गाय, बैल तथा सांडों के दर्शन यहाँ की विश्व विख्यात कांकरेज (सांचोरी) नस्ल में किये जा सकते हैं। राजस्थान के नागौरी बैल भी कार्यक्षमता के लिये पूरे देश में प्रसिद्ध हैं।

    द्विप्रयोजनी नस्लें : दूध देने तथा भार वाहन के काम में बराबर की उपयोगी द्विप्रयोजनी नस्लों में कांकरेज नस्ल सर्वाधिक उपयुक्त है। हरियाणवी नस्ल में भी यह गुण पाया जाता है।


    राजस्थान में भैंस पालन

    राज्य में भैंसों की संख्या 110.91 लाख है। अलवर जिला भैंस पालन की दृष्टि से सर्वाग्रणी है। यहाँ 9.74 लाख भैंसें पाली जाती हैं। इसके बाद जयपुर जिले का नम्बर आता है जहाँ 9.46 लाख, भरतपुर जिले में 4.74 लाख, उदयपुर जिले में 5.23 लाख, सीकर जिले में 5.15 लाख और नागौर जिले में 4.60 लाख भैंसे पाली जाती हैं। जैसलमेर जिले में सबसे कम (2664) भैंसे पाली जाती हैं। बाड़मेर तथा बीकानेर आदि रेगिस्तानी जिलों, हाड़ौती के कोटा व बारां जिलों एवं सिरोही जिले में भी भैंसों की संख्या कम है। राज्य में भैंस की मुर्रा नस्ल अधिक प्रचलित है। यह मूलतः पंजाब और हरियाणा की नस्ल है। यह नस्ल एक दिन में औसतन 10 किलो तथा अधिकतम 18 से 20 किलो दूध देती है। राजस्थान के दक्षिणी जिलों में गुजरात के काठियावाड़ मूल की जाफराबादी नस्ल पाली जाती है जिसे सूरती भी कहते हैं। यह नस्ल प्रतिदिन औसतन 11.5 किलो दूध देती है। राजस्थान पशुधन विकास बोर्ड द्वारा राज्य के विभिन्न पशु प्रजनन केन्द्रों पर मुर्रा नस्ल एवं देशी नस्ल के पशु संधारित कर प्रजनन हेतु पशुपालकों को उपलब्ध कराये जा रहे हैं।


    राजस्थान में भेड़ पालन

    भेड़ तथा बकरी पालन रेगिस्तानी क्षेत्रों के पशुपालकों का मुख्य धंधा है। भेड़ पालन में राजस्थान का भारत में अग्रणी स्थान है। चोकला, मारवाड़ी, जैसलमेरी, मगरा, मालपुरी, सोनाड़ी, नाली व पूंगल नस्ल की भेड़ें पाली जाती हैं। वर्ष 2007 की पशुगणना में राज्य में 1 करोड़ 11 लाख 89 हजार 855 भेड़ें पाई गईं। बाड़मेर जिले में सर्वाधिक 13.71 लाख, बीकानेर जिले में 7.07 लाख, जैसलमेर जिले में 12.91 लाख, पाली जिले में 9.24 लाख और जोधपुर जिले में 10.48 भेड़ें पायी जाती हैं। बाड़मेर जिले में भेड़ों की संख्या सर्वाधिक है।

    भेड़ की ऊन : गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, झुंझुनूं एवं बीकानेर जिलों में भेड़ की नाली नस्ल पाली जाती है। यह नस्ल प्रतिवर्ष 3 से 4 किलो ऊन प्रति पशु देती है। इसका रेशा 12 से 14 सेण्टीमीटर लम्बा होता है। मगरा, चोकला, पूगल तथा मारवाड़ी नस्ल की भेड़ें 2 किलो तक ऊन प्रतिवर्ष प्रतिपशु देती हैं। जैसलमेरी नस्ल साढ़े पाँच किलो तक ऊन देती है। भेड़ की ऊन कटाई के कार्य को लव कहते हैं। यह साल में तीन बार होती है। श्रावण-भाद्रपद माह में मिलने वाली ऊन को सावनी ऊन, कार्तिक माह में मिलने वाली ऊन को सियालु ऊन तथा चैत्र मास में मिलने वाली ऊन को चेती ऊन कहते हैं। कुछ पशुपालक साल में दो बार ऊन लेते हैं जिन्हें सावनी ऊन तथा फाल्गुनी ऊन कहते हैं।

    भेड़ का दूध : मारवाड़ के कुछ पशुपालक भेड़ों का दूध पीने के काम में लेते हैं। टूटी हुई अस्थियाँ जोड़ने के लिये भेड़ के दूध का लेपन किया जाता है। सोनाड़ी नस्ल की भेड़ प्रतिदिन 750 ग्राम से 1 किलो तक दूध तथा प्रतिवर्ष 750 ग्राम से डेढ़ किलो तक ऊन देती है।

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  • अजमेर का इतिहास - 84

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 84

    स्वतंत्र भारत में केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर


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    26 जनवरी 1950 को पांठ-पीपलोदा का जिला मध्य भारत प्रान्त में स्थानान्तरित कर दिया गया। पार्ट सी स्टेट बिल 1951 के पारित होने परे यह क्षेत्र अजमेर के पार्ट सी में सम्मिलित कर दिया गया और एक विधान सभा बनाई गई।

    राजस्थान की 19 रियासतों एवं 4 ठिकाणों का राजस्थान में एकीककरण होने के बाद भी इन रियासतों के केन्द्र में स्थित अजमेर को केन्द्र शासित प्रदेश बना रहने दिया गया। इससे अजमेर की स्थिति एक लघु टापू जैसी हो गई, जिसके चारों तरफ राजस्थान प्रदेश था और बीच में 2,417 वर्ग मील क्षेत्र और 7 लाख की आबादी वाला केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर था।

    चीफ कमिश्नर की सलाहकार परिषद

    अजमेर राज्य के प्रशासनिक संचालन के लिये चीफ कमिश्नर को सलाह देने के लिये ई.1946 से एक सलाहकार परिषद् बनी हुई थी। यह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी काम करती रही। इस सलाहकार परिषद में बालकृष्ण कौल, किशनलाल लामरोर, मिर्जा अब्दुल कादिर बेग, मुकुट बिहारी लाल भार्गव, कृष्णगोपाल गर्ग, मास्टर वजीरसिंह, पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में सूर्यमल मौर्य जिला बोर्ड एवं अजमेर राज्य की नगरपालिकाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि,को मनोनीत किया गया था।

    भारत विभाजन के कारण कादिर बेग पाकिस्तान चला गया। उसके स्थान पर सैयद अब्बास अली को नियुक्त किया गया। 1946 से 1952 तक की अवधि में अजमेर के चीफ कमिश्नर पद पर शंकर प्रसाद, सी. बी. नागरकर, के. एल. मेहता, ए. डी. पण्डित एवं एम. के. कृपलानी ने कार्य किया। 1952 में अजमेर विधान सभा के गठन के साथ ही यह परिषद समाप्त हो गई।

    अजमेर धारासभा

    अजमेर विधानसभा को धारासभा कहा जाता था। ई.1952 में अजमेर धारासभा की 30 सीटों के लिये प्रथम आम चुनाव हुए। 20 सीटों पर कांग्रेस, 3 सीटों पर भारतीय जनसंघ, 3 सीटों पर पुरुषार्थी पंचायत तथा 4 सीटों पर निर्दलीय सदस्य चुने गये। हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृत्व में अजमेर में पहली और अन्तिम सरकार बनी जिसमें बालकृष्ण कौल गृह एवं वित्त मंत्री तथा ब्यावर निवासी बृजमोहन शर्मा राजस्व एवं शिक्षा मंत्री बनाये गये। 24 मार्च 1952 को उपाध्याय मंत्रिमण्डल ने शपथ ली। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे हटूण्डी के गांधी आश्रम में ही रहे।

    22 मई 1952 को केन्द्रीय गृहमंत्री डॉ. कैलास नाथ काटजू ने अजमेर धारा सभा का उद्घाटन किया। भागीरथ सिंह को इस धारासभा का अध्यक्ष चुना गया तथा रमेशचंद्र भार्गव को इसका उपाध्यक्ष चुना गया। बाद में भार्गव को अध्यक्ष एवं अब्बास अली को उपाध्यक्ष बनाया गया। प्रतिपक्षी दल के नेता डॉ. अम्बालाल थे। धारासभा को चलाने के लिये 19 कानून बनाये गये।

    सरकार के कार्य में सहायता के लिये विकास समिति, विकास सलाहकार मण्डल, औद्योगिक सलाहकार मण्डल, आर्थिक जांच मण्डल, हथकरघा सलाहकार मण्डल, खादी एवं ग्रामोद्योग मण्डल, पाठ्यपुस्तक राष्ट्रीयकरण सलाहकार मण्डल, पिछड़ी जाति कल्याण मण्डल, बेकारी समिति, खान सलाहकार समिति, विक्टोरिया चिकित्सालय समिति, स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास समिति, नव सुरक्षित जन जांच समिति का कठन किया गया। इनमें सरकारी एवं गैर सरकारी सदस्यों को सम्मिलित किया गया।

    लोकसभा एवं राज्य सभा में प्रतिनिधित्व

    अजमेर राज्य से भारत की लोकसभा के लिये दो एवं राज्यसभा के लिये एक सदस्य चुने जाने की व्यवस्था की गई। ई.1952 में हुए लोकसभा चुनावों में अजमेर-नसीराबाद क्षेत्र से ज्वाला प्रसाद शर्मा तथा केकड़ी-ब्यावर क्षेत्र से मुकुट बिहारीलाल भार्गव चुने गये। राज्यसभा के लिये अब्दुल शकूर चुने गये। ई.1954 में करुम्बया को राज्य सभा सदस्य चुना गया।

    अजमेर से सामंतशाही का अंत

    अजमेर राज्य का क्षेत्रफल 2,417 वर्गमील था। 1951 की जनगणना के अनुसार अजमेर राज्य की जनसंख्या 6,93,372 थी। इस राज्य का दो तिहाई भाग जागीरदारों व इस्तमुरारदारों (ठिकाणेदारों) के अधीन था जबकि केकड़ी का पूरा क्षेत्र इस्तमुरारदारों के अधिकार में था। पूर्व में ये ठिकाणे जागीरों के रूप में थे और इन्हें सैनिक सेवाओं के बदले दिया गया था। इन ठिकानों के 277 गांवों में से 198 गांवों से सैनिक व्यय वसूल किया जाता था।

    ब्रिटिशकाल से पहले सामन्तशाही के दौरान यहाँ सत्तर बड़े इस्तमुरारदार और चार छोटे इस्तमुरारदार थे। इनमें से 64 ठिकाणे राठौड़ों के, 4 चीतों के, 1 सिसोदियों का तथा एक ठिकाणा गौड़ राजपूतों का था। ई.1872 में भारत सरकार ने इन्हें सनद प्रदान की थी। ई.1877 में अजमेर भू राजस्व भूमि विनियम के अंतर्गत इनका नियमन किया गया था। इस्तमुरारदारों की तीन श्रेणियां थीं- जब कभी किसी ठिाणे के इस श्रेणी के निर्धारण सम्बन्धी विवाद होते थे तो चीफ कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर वायसरॉय उसका समाधान निकालता था। ब्रिटिश काल में जब कभी कोई इस्तमुरारदार दरबार में भाग लेता था तो चीफ कमिश्नर की ओर से उसका सम्मान किया जाता था। यद्यपि इस्तमुरारदार राजाओं की श्रेणी में नहीं आते थे किंतु इन्हें भी विशेष अधिकार प्राप्त थे।

    अजमेर राज्य में नौ बड़े ठिकाणे थे- शाहपुरा, खरवा, पीसांगन, मसूदा, सावर, गोविंदगढ़, भिनाय, देवगढ़ एवं केकड़ी। केकड़ी जूनिया का हिस्सा था। जूनिया, भिनाय, सावर, मसूदा एवं पीसांगन के इस्तमुरारदार मुगल शासकों के मनसबदार थे। भिनाय ठिकाणे की सर्वाधिक प्रतिष्ठा थी तथा इसके ठाकुर, राव जोधा के वंशज थे। प्रतिष्ठा की दृष्टि से दूसरे नम्बर पर सावर का ठिकाणदार था जो सिसोदिया वंशी शक्तावत राजपूत था। जूनिया का ठिकाणेदार राठौड़ था। पीसांगन का ठिकाणेदार जोधावत राठौड़ था। मसूदा का ठिकाणेदार मेड़तिया राठौड़ था।

    अजमेर जिले में माफी की जमीनें भौम कहलाती थीं। भौम चार तरह की होती थीं। पहली वे जिनकी सम्पत्ति वंश परम्परा के स्वामित्व अधिकार सहित दी जाती थीं। दूसरी वे जिनकी सम्पत्ति अपराध के कारण, राज्य दण्ड स्वरूप राज्य जब्त कर लेता था। तीसरी वे जिनकी सम्पत्ति जब्त करने के अतिरिक्त, राजस्व के अधिकार छीन लिये जाते थे और चौथी वे जिन पर दण्ड स्वरूप जुर्माना किया जाता था।

    इस्तमुरारदार ब्रिटिश सरकार को भूराजस्व की निश्चित राशि वार्षिक लगान के रूप में देते थे। जागीरदार अपने क्षेत्र का भूराजस्व सरकार को नहीं देते थे। 11 अगस्त 1955 को अजमेर एबोलिशन ऑफ इण्टरमीडियरी एक्ट के द्वारा इस्तमुरारदार समाप्त कर दिये गये। इसी प्रकार 10 अक्टूबर 1955 को जागीरदार एवं छोटे ठिकाणेदारों को समाप्त किया गया। 1958 में भौम एवं माफीदारी व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया गया।

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  • गींदड़ नृत्य

     02.06.2020
    गींदड़ नृत्य

    गींदड़ नृत्य

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    राजस्थान के शेखावाटी अंचल में वसंत पंचमी से ही ढफ बजने लगते हैं तथा धमालें गाई जाने लगती हैं। कुछ धमाल भक्ति प्रधान एवं कुछ धमाल शृंगार प्रधान होती हैं। जब होली में 15 दिन रह जाते हैं तो गांव-गांव गींदड़ होने लगते हैं। इसे गींदड़ खेलना कहते हैं।

    होलिका दहन से दो दिन पहले रात भर गींदड़ होते हैं। इन आयोजनों में सैंकड़ों आदमी भाग लेते हैं। यह शेखावाटी अंचल का लोकनृत्य है। सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आसपास के क्षेत्रों में होली से पन्द्रह दिन पहले से इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होने लगते हैं।

    इस नृत्य में आयु, वर्ग एवं जाति-पांति का भेद नहीं रखा जाता है। परम्परागत रूप से यह नृत्य चांदनी रात में होता था किंतु अब विद्युत प्रकाश भी किया जाता है।

    नगाड़ा इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। नर्तक अपने हाथों में छोटे डण्डे लिये हुए होते हैं। नगाड़े की ताल के साथ इन डंडों को परस्पर टकराते हुए घूमते हैं तथा आगे बढ़ते हैं। नृत्य के साथ लोकगीत भी ठेके से मेल खाते हुए गाए जाते हैं। चार मात्रा का ठेका धीमी गति के नगाड़े पर बजता है।

    धीरे-धीरे उसकी गति तेज होती है। जैसे-जैसे नृत्य गति पकड़ता है, नगाड़े की ध्वनि भी तीव्र होती है। इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के स्वांग बनाये जाते हैं जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया, दुल्हा, दुल्हन आदि प्रमुख हैं। प्रत्येक नर्तक अपने पैरों में घुंघरू बांधे हुए होता है।

    यह मारवाड़ के डांडिया तथा गुजरात के गरबा नृत्य से मिलता-जुलता है। गींदड़ में गरबा की तरह ही कई पुरुष अपने दोनो हाथों में लकड़ी की डंडियाँ लेकर अपने आगे व पीछे के साथियों की डंडियों से टकराते हुए तथा गोल घेरे में चलते हुए आगे बढ़ते हैं। घेरे के केन्द्र में एक ऊँचा मचान बनाया जाता है जिस पर ऊँचा झँडा भी लगाया जाता है। मचान पर बैठा हुआ व्यक्ति नगाड़ा बजाता है।

    नगाड़े, चंग, धमाल व डंडियों की सम्मिलित ध्वनियों से आनंद दायक संगीत बजाया जाता है जिसकी ताल पर नृत्य होता है। गरबा और गींदड़ में मुख्य भेद डंडियों का होता है, गींदड़ की डंडियां गरबा के डांडियों से आकार में अधिक लम्बाई लिए होती हैं। गरबा में स्त्री-पुरुषों के जोडे होते हैं जबकि गींदड़ में मुख्य रूप से पुरुष ही स्त्रियों का स्वांग रचकर नाचते हैं।

    शेखावाटी क्षेत्र में कई स्थानों पर गींदड़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। बहुत से स्थानों पर गींदड़ खेलने की प्रतियोगिताएं होती हैं। गींदड़ को कहीं-कहीं गींदड़ी भी कहा जाता है। इस लोकनृत्य के साथ विभिन्न प्रकार के लोकगीत गाए जाते हैं- कठैं सैं आई सूंठ कठैं सैं आयो जीरो, कठैं सैं आयो ए भोळी बाई थारो बीरो।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-21

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-21

    राजस्थान में पशुधन (2)


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    राजस्थान में बकरी पालन


    राज्य के पशुधन में सर्वाधिक संख्या बकरियों की है। पशुगणना 2007 में राज्य में 2,15,02,996 बकरियां पायी गईं। बाड़मेर जिले में सर्वाधिक (22,28,415) बकरियां हैं। जोधपुर जिले में 14,39,505, नागौर जिले में 14,37,087, उदयपुर जिले में 12,20,165, तथा सीकर जिले में 11,42,930 बकरियां पाली जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों तथा हाड़ौती क्षेत्र में बकरियों की संख्या कम है।

    राज्य में बकरी की प्रमुख नस्लें

    बकरी की जमनापारी, बारबरी, मारवाड़ी, परबतसरी, सिरोही तथा शेखावाटी नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। भरतपुर, धौलपुर, करौली तथा सवाईमाधोपुर जिलों में बकरी की बारबरी नस्ल, कोटा, बूंदी तथा झालावाड़ जिलों में बकरी की जमनापारी नस्ल, सीकर तथा झुंझुनूं जिलों में शेखावाटी नस्ल, बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर जालोर, पाली गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिलों में बकरी की मारवाड़ी नस्ल पाली जाती है। सिरोही जिले में बकरी की सिरोही नस्ल, नागौर जिले के परबतसर क्षेत्र में परबतसरी नस्ल, अलवर जिले में अलवरी नस्ल, पाली जाती है। मारवाड़ी नस्ल की रोग प्रतिरोधक क्षमता सर्वाधिक होती है।

    दूध वाली नस्लें : दूध के लिये बकरी की मारवाड़ी, शेखावाटी, परबतसरी, अलवरी नस्लें अच्छी मानी जाती हैं।

    मांस वाली नस्लें : मांस के लिये लोही एवं सिरोही नस्लें अच्छी होती हैं।

    द्विप्रयोजनी नस्लें : बारबरी, सिरोही एवं जमनापारी नस्लें मांस उत्पादन के लिये अच्छी मानी जाती हैं।

    बकरी पालन को बढ़ावा देने हेतु किये गये उपाय

    नेशनल मिशन फॉर प्राटीन सप्लीमेंट्स में सघन बकरी उत्पादन को बढ़ावा देना और पारम्परिक लघु एवं पेस्टोरल सिस्टम के अंतर्गत बकरी पालन की उत्पादकता में वृद्धि करना सम्मिलित है। इसके तहत राजस्थान सहित देश के दस राज्यों में ग्रामीण बेरोजगारों के लिये गॉट स्काउट योजना चलाई जा रही है। इस योजना में युवाओं को बकरी पालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। गॉट स्काउट 10 कि.मी. की परिधि में दो हजार बकरियों की पहचान करेंगे जिन्हें स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध करवाई जायेंगी। बकरी पालकों को 95 बकरियों और 5 बकरों की यूनिट के लिये अनुदान दिया जाता है। राज्य में बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिये भरतपुर जिले के कुम्हेर में पशु प्रजनन फार्म, अजमेर जिले के रामसर में पशु प्रजनन फार्म, फतेहपुर में बकरी पालन योजना प्रारंभ की गई है।


    राजस्थान में ऊँट पालन

    राज्य की संस्कृति, सामाजिक जीवन एवं अर्थव्यवस्था में ऊँट का बड़ा योगदान है। 2007 की पशुगणना में राज्य में 4,21,836 ऊँट पाये गये हैं। ऊँट की जैसलमेरी, बीकानेरी एवं जोधपुर नस्लें अधिक प्रसिद्ध हैं। ऊँट को रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। राज्य से बड़ी संख्या में ऊंटों को दूसरे राज्यों एवं अन्य देशों में भेज दिये जाने के कारण इनकी संख्या में कमी आई है। नर ऊँट की अपेक्षा मादा ऊँट की अधिक मांग होती है। इस कारण राज्य में मादा ऊँट की संख्या में तेजी से कमी आई है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2014 में ऊँट को राज्य पशु घोषित करने का निर्णय लिया है।


    राजस्थान में अश्व पालन

    2007 की पशुगणना में राज्य में घोड़ों की संख्या 24,564 पायी गयी है। पश्चिमी राजस्थान के मालानी घोड़े पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त मारवाड़ी एवं काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े भी पाले जाते हैं। अधिकतर घोड़े पर्यटन व्यवसाय में लगे हुए हैं। इनके अतिरिक्त पुलिस बलों एवं सुरक्षा बलों द्वारा भी अल्प संख्या में पाले जाते हैं। पुराने रजवाड़े अब भी राजसी वैभव के प्रतीक के रूप में घोड़े पालते हैं। राज्य में टट्टू, खच्चर एवं गधे भी पर्याप्त संख्या में पाले जाते हैं तथा वे निर्धन जनसंख्या की आजीविका का प्रमुख आधार हैं।


    राजस्थान में कुक्कुट पालन

    मुर्गी पालन में राजस्थान का देश भर में पाँचवां स्थान है। राज्य में मुर्गी व्यवसाय से लगभग डेढ़ लाख लोगों को रोजगार मिलता है। वर्ष 2007 में देश के विभिन्न भागों में बर्ड फ्लू के संक्रमण के भय से बड़ी संख्या में मुर्गियों को मारा गया। इसके बाद वर्ष 2007 में हुई गणना में राज्य में 49 लाख 93 हजार 620 मुर्गियां पायी गयीं। राजस्थान का अजमेर जिला मुर्गी पालन में सबसे आगे है। वर्ष 2007 में यहाँ 15.86 लाख मुर्गियां पायी गईं। सबसे कम मुर्गी पालन धौलपुर जिले में होता है।

    मुर्गियों की प्रमुख नस्लें

    मुर्गियों की प्रमुख नस्लों में न्यू हैम्पशायर, रोड आईलैण्ड रेड, प्लाई माउथ रॉक, व्हाइट लेगहॉर्न, व्हाइट मिनॉरका, ब्लैक मिनॉरका, आस्ट्रेलार्प और आर्पिंगटन हैं। राजस्थान में आस्ट्रेलॉर्प नर तथा लेगहॉर्न मादा से उत्पन्न हुई संकर नस्ल एस्ट्रो व्हाइट मुर्गी के अण्डे अधिक काम में लिये जाते हैं।


    राजस्थान में मत्स्य पालन

    अंतर्देशीय मछली पालन नदियों, नहरों, झीलों, तालाबों तथा टैंकों में मछली पालन को अंतर्देशीय मछली पालन कहते हैं। उदयपुर जिले के जयसमंद, बांसवाड़ा जिले के माही बजाज सागर तथा डूंगरपुर जिले के बेक वाटर जलाशय में बड़ी मात्रा में मत्स्य उत्पादन होता है। जयपुर सजावटी मछलियों के बाजार के रूप में प्रसिद्धि पा रहा है। राजस्थान में प्रति वर्ष लगभग 32 हजार मै. टन मत्स्य उत्पादन होता है।

    राजस्थान में मछलियों की प्रमुख किस्में

    राजस्थान के तालाबों में मछली की, कतला, रोहिता, काला बासिल, मृगल मुल्लेट एवं रोहू किस्में पाली जाती हैं। नदियों में कतला मृगल व हिलसा किस्में पाली जाती हैं। हिमालय पर्वत का पानी लेकर आने वाली नहरों के माध्यम से राजस्थान की नदियों एवं तालाबों में चीन देश की मछलियां आ गई हैं जो तेजी से देशी नस्लों को नष्ट करके अपनी संख्या बढ़ा रही हैं।

    राजस्थान में मत्स्य पालन हेतु उपलब्ध क्षेत्र

    राजस्थान में मत्स्य पालन हेतु लगभग 4.23 लाख हैक्टेयर जल क्षेत्र (नदियों व नहरों में 0.87 लाख हैक्टेयर के अतिरिक्त) बड़े एवं मध्यम जलाशयों (3.29 लाख हैक्टेयर), तालाब व पोखर (0.94 लाख हैक्टेयर) के रूप में उपलब्ध है। विभिन्न जलाशयों को उन्नत किस्म के मत्स्य बीजों के संग्रहण तथा मत्स्य संवर्द्धन हेतु विकसित किया गया है। इन्हें मत्स्य उत्पादन हेतु लीज पर देकर राज्य के लिए राजस्व प्राप्त किया जाता है।

    मत्स्य बीज उत्पादन

    राज्य में मत्स्य पालन विकास का मुख्य उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उत्पादन कर उनको मत्स्य उत्पादन हेतु जलाशयों में संचय करके (जो कि मत्स्य उत्पादन हेतु प्रमुख आदान है) राज्य के राजस्व में वृद्धि करना और मत्स्य उत्पादन में वृद्धि कर मछुआरों को आजीविका उपलब्ध करवाना है।

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  • अजमेर का इतिहास - 85

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 85

    राजस्थान में प्रवेश


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    जैसे-जैस राजस्थान आकार लेता जा रहा था, अजमेर को राजस्थान में सम्मिलित करने की मांग बढ़ती जा रही थी। राजस्थान सरकार ने भारत सरकार के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत करके कहा कि नृजातीयता (मदजीदवसवहपबंससल), एकता तथा भाषा की दृष्टि से अजमेर सदैव से ही राजस्थान का अंग रहा है। ब्रिटिश शासन काल में पूर्णतः राजनीतिक दृष्टि से अजमेर को छोटा किंतु सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानकर उसे केन्द्र सरकार के अधीन रखने की आवश्यकता अनुभव हुई थी जिससे राजस्थान की रियासतों पर ब्रिटिश शासन की सत्ता बनी रहे।

    राजस्थान बनने से पहले अजमेर चारों तरफ से रियासतों से घिरा हुआ था किंतु राजस्थान बनने के बाद स्थिति बदल गई थी। राजस्थान का प्रशासनिक ढांचा संविधान के अंतर्गत पार्ट बी स्टेट का होने से पार्ट सी स्टेट की तुलना में काफी प्रगतिशील और लोकतांत्रिक है। ब्रिटिश सरकार द्वारा अजमेर मेरवाड़ा को सीधे केन्द्रीय नियंत्रण में रखने के आधार भी बदले हुए परिवेश में अप्रासंगिक हो गये हैं और अजमेर स्टेट के पृथक प्रशासनिक इकाई के रूप में निरतंरता प्रदान करने को कोई औचित्य नहीं रह गया। इस पर जो खर्च किया जा रहा था, वह भी जनसंख्या तथा राजस्व को देखते हुए असंतुलित था।

    अरावली पर्वत माला की तलहटी में डकैती की स्थिति बनी हुई थी। प्रायः डकैत अजमेर के सीमावर्ती पाली, भीलवाड़ा, उदयपुर आदि जिलों में डकैती डालकर अजमेर के क्षेत्र में घुस जाया करते थे। अजमेर की अधिकांश जनता भी यह चाहती थी कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की जाये जिससे जनता को पूरा लाभ मिल सके और उसके संसाधनों को भारी भरकम तथा खर्चीली प्रशासनिक मशीनरी द्वारा लंगड़ा न बनाया जाये। अजमेर में प्रजातांत्रिक शासन की स्थापना करने के लिये इसे राजस्थान में विलय करने तथा राजस्थान राज्य प्रशासन के अंतर्गत लाने की मांग की गई।

    अजमेर जिले का प्रशासनिक पुनर्गठन

    राजस्थान सरकार तथा राजस्थान की जनता की मांग को देखते हुए 1 नवम्बर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम प्रभाव में आया। अजमेर राज्य का राजस्थान राज्य में विलय कर दिया गया तथा अजमेर नाम से, राजस्थान के 26वें जिले का गठन किया गया। 1 दिसम्बर 1956 को, जयपुर जिले में सम्मिलित पूर्ववती किशनगढ़ रियासत, अजमेर जिले में सम्मिलित कर दी गई। किशनगढ़ में उस समय चार तहसीलें-किशनगढ़, रूपनगढ़, अरांई एवं सरवाड़ थीं।

    कैपीटल इन्कवायरी कमीशन

    11 जून 1956 को सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में कैपीटल इन्कवायरी कमीशन का गठन हुआ। इस कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर अजमेर में राजस्थान लोक सेवा आयोग का मुख्यालय खोला गया। 4 दिसम्बर 1957 को पारित शिक्षा अधिनियम के अंतर्गत अजमेर में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की स्थापना की गई। अजमेर में राजस्थान राजस्व मण्डल तथा राजस्थान आयुर्वेद निदेशालय की स्थापना की गई। ई.1956 में अजमेर जिले को जयपुर संभाग में सम्मिलित किया गया। जयपुर संभाग का नाम बदल कर अजमेर संभाग कर दिया गया किन्तु संभाग का मुख्यालय जयपुर में ही रखा गया। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय एवं रीजनल कॉलेज की भी अजमेर में स्थापना करके इसके महत्त्व को बनाये रखा गया।

    विभिन्न विकास कार्य

    15 जून 1958 से राजस्थान का भूमि राजस्व अधिनियम 1950 तथा खातेदारी अधिनियम 1955 अजमेर जिले में भी प्रभावी किये गये। 22 जुलाई 1958 को राजस्व मण्डल का अजमेर में हस्तांतरण किया गया। ई. 1959-60 में तहसीलों का पुनर्गठन किया गया और अरांई तथा रूपनगढ़ तहसीलें समाप्त कर दी गईं। जिले में पांच तहसीलें अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर, केकड़ी एवं सरवाड़ बना दी गईं। केकड़ी तहसील का हिस्सा देवली अलग करके टोंक जिले में मिला दिया गया। ई.1962 में सुखाड़िया सरकार ने संभागीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

    26 जनवरी 1987 को हरिदेव जोशी सरकार ने संभागीय व्यवस्था को पुनर्जीवित किया। अजमेर संभाग सहित 6 संभागों का निर्माण हुआ। अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक और नागौर जिले, अजमेर संभाग में रखे गये। 1 अगस्त को अजमेर में महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। 5 मई 1992 को अजमेर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय किया गया।

    ई.1996 में तारागढ़ दुर्ग के मार्ग पर भारत के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) की स्मृति में एक स्मारक बनवाया गया। सम्राट पृथ्वीराज की अश्वारूढ़ प्रतिमा स्थापित की गयी। ई.1997 में पुष्कर मार्ग पर नाग पहाड़ की गोद में दाहिरसेन स्मारक का निर्माण किया गया। यहाँ सिंधुपति महाराजा दाहिरसेन, संत कंवरराम, हेमू कालानी, स्वामी विवेकानंद तथा हिंगलाज माता की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। 19 जुलाई 2000 को अजमेर में अजमेर विद्युत वितरण निगम की स्थापना की गयी।

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  • घुड़ला नृत्य

     02.06.2020
    घुड़ला नृत्य

    घुड़ला नृत्य

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    घुड़ला नृत्य मारवाड़ क्षेत्र में किया जाता है। यह सुहागिन स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। कई स्थानों पर कुंवारी कन्याएं भी इसमें भाग लेती हैं। यह नृत्य गणगौर पर्व के आसपास किया जाता है। इस अवसर पर माता गौरी अर्थात् पार्वतीजी एवं उनके ईश्वर शिवजी की पूजा होती है। विधवा स्त्रियां भी गौर को पूजती हैं।

    घुड़ला नृत्य में सुहागिन स्त्रियां एवं कुंवारी लड़कियां छिद्र युक्त घड़े को सिर पर रखकर उसमें दिये जलाती हैं तथा नृत्य के दौरान घूमर और पणिहारी के अंदाज में गोल चक्कर बनाती हैं। इस नृत्य से मारवाड़ रियासत अर्थात जोधपुर राज्य की एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है।

    ई.1490 में मारवाड़ पर राव जोधा के पुत्र सातलदेव का राज्य था। उन दिनों मारवाड़ के राठौड़ राजकुमार मुस्लिम जागीरों को उजाड़कर अपने राज्य में मिला रहे थे। जोधा के पुत्र दूदा ने मेड़ता, बीदा ने लाडनूं तथा बीका ने बीकानेर राज्य की स्थापना की थी।

    इस कारण आसपास के मुस्लिम सूबेदार एवं जागीरदार मारवाड़ पर आक्रमण करते रहते थे। अजमेर का सूबेदार मल्लूखां भी मारवाड़ रियासत पर ताबड़तोड़ हमले कर रहा था। एक बार उसने अपने सहायक सिरिया खां तथा घुड़ले खां के साथ मारवाड़ के मेड़ता गांव पर आक्रमण किया। मार्ग में उसने पीपाड़ गाँव के तालाब पर सुहागिन स्त्रियों को गणगौर की पूजा करते हुए देखा। मल्लूखाँ ने उन सुहागिनों को पकड़ लिया तथा उन्हें लेकर अजमेर के लिए रवाना हो गया।

    जब यह समाचार राव सातल के पास पहुँचा तो राव सातल ने अपनी सेना लेकर मल्लू खाँ का पीछा किया। मेड़ता से दूदा तथा लाडनूं से बीदा की सेनाएं भी मल्लूखां को रोकने के लिए चल पड़ीं। मल्लूखां पीपाड़ से कोसाणा तक ही पहुँचा था कि जोधपुर नरेश सातल ने उसे जा घेरा। मल्लूखां और उसके साथी भाग छूटे किंतु मल्लूखां का सेनापति घुड़ले खां इस युद्ध में मारा गया। हिन्दू कन्याएं एवं सुहागिन स्त्रियां मुक्त करवा ली गयीं।

    सातल के सेनापति खीची सारंगजी ने घुड़ला खां का सिर काटकर राव सातल को प्रस्तुत किया। राव सातल ने घुड़लाखां का कटा हुआ सिर उन स्त्रियों को दे दिया जिन्हें मल्लू खां उठाकर ले जाना चाहता था। स्त्रियां उस कटे हुए सिर को लेकर गांव में घूमीं और उन्होंने राजा के प्रति आभार व्यक्त किया। महाराजा के आदेश से उस सिर को सारंगवास गांव में गाड़ा गया। जिसके कारण वह गांव आज भी घड़ाय कहलाता है।

    घायल राव सातल और उसके कुछ साथी सरदारों का उसी रात अपने डेरे में प्राणांत हो गया। इस घटना की स्मृति में आज भी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को घुड़ला निकाला जाता है। इस अवसर पर गाँव-गाँव में मेला लगता है।

    इस दिन औरतें कुम्हार के यहाँ से कोरा घड़ा लाकर उस पर सूत बांधती हैं तथा घड़े में बहुत से छेद करके उसमें मिट्टी का दीपक जलाती हैं। मटकी के छेद, घुड़ले के सिर में लगे तीर-बरछी के घाव समझे जाते हैं और उसमें रखा दीपक जीवात्मा का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन स्त्रियां एवं लड़कियां इस घड़े को लेकर गली-गली घूमती हैं तथा नृत्य करती हैं। घुड़ला घुमाने वाली महिलाओं को तीजणियां कहा जाता है। इस दौरान वे घुड़ले को चेतावनी देती हुई गाती हैं-

    घुड़ले रे बांध्यो सूत, घुड़लो घूमैला जी घूमैला।

    सवागण बारै आग, घुड़लो घूमैला जी घूमैला।


    इस आयोजन के माध्यम से मारवाड़ की सुहागिन स्त्रियां घुड़ले खां को चेतावनी देती हैं कि सुहागिनें माता पार्वती की पूजा करने जा रही हैं, घुड़ले खां में दम हो तो रोक ले।

    चैत्र सुदी तीज तक यह घुड़ला घुमाया जाता है तथा उसके बाद विसर्जित कर दिया जाता है। जोधपुर राज परिवार एवं सामंती परिवारों की स्त्रियाँ कुम्हार के यहाँ घुड़ला लेने लवाजमे के साथ जाती थीं। दासी घुड़ले को अपने सिर पर रख कर गणगौर की सवारी के साथ अष्टमी से तीज तक घुमाती थी। तीज के दिन महाराजा तलवार या खांडे से इस घड़े को खंडित करते थे। यह आयोजन गांव-गांव होता था तथा जनता घड़े के टुकड़ों को शकुन के तौर पर अपने अन्न के कोठार में रखती थी।

    घुड़ले के मेले के दूसरे दिन मारवाड़ में लोटियों का मेला होता था। संध्या के समय कन्याएँ एवं सुहागन 
    स्त्रियां टोली बनाकर, सिर पर छोटे-बड़े तीन चार कलश रखकर, गीत गाती हुई जलाशय, कुएँ या बावड़ी पर जाती थीं। जलाशय से जल भर कर उसमें दूब, पुष्प आदि रखकर गाजे-बाजे के साथ लौटती थीं। उस जल से गणगौर की पूजा की जाती थी। जोधपुर में गणगौर को पानी पिलाने के लिये लोटियाँ चांदी, तांबे तथा पीतल कीे होती थीं। कलश पर नारियल रखा जाता था एवं पुष्प मालाएँ बांधी जाती थीं। लोटियों वाली स्त्रियां गले में फूलों की माला पहन कर गीत गाती हुई पूजा स्थान को आतीं और गणगौर को पानी पिलाती थीं। यह परम्परा आज भी अनवरत रूप से चल रही है।

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