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  • अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़

     27.06.2018
    अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़

    अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़


    चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा ई.1968 में चित्तौड़ दुर्ग में स्थित फतह प्रकाश महल में की गई। इस भवन का निर्माण महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) द्वारा दुर्ग के मध्य भाग में करवाया गया। इस भवन के प्रांगण में बने कुण्ड में संगमरमर के कमलपुष्प पर महाराणा की प्रतिमा प्रदर्शित है।

    यह आयताकार भवन दो-मंजिला है तथा इसके चारों कोनों पर गुम्बज बनी हुई हैं जो 6-7 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देती हैं। गुम्बज पर सुवर्ण कलश अलंकृत हैं। महल के ऊपर की मंजिल में एक बड़ा हॉल बना हुआ है जिसमें रंगीन कांच की नक्काशी करके विभिन्न प्रकार के बेल-बूटे एवं पशु-पक्षियों की आकृतियां बनाई गई हैं। ऊपर की मंजिल में लकड़ी युक्त खिड़कियां, इस प्रकार बनाई गई हैं कि अन्दर की तरफ से व्यक्ति बाहर का दृश्य देख सके परन्तु बाहर खड़े व्यक्ति को अन्दर का दृश्य दिखाई न दे।

    महल का प्रवेश-द्वार उत्तर दिशा की ओर खुलता है जिसमें प्रवेश करते ही गणपति की भव्य प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इस संग्रहालय में 640 पाषाण प्रतिमाएं, 18 धातु प्रतिमाएं, 256 धातु कलाकृतियाँ एवं आभूषण, 85 मृण्मय सामग्री, 35 काष्ठ-कलाकृतियां, 100 लघुचित्र, 20 तैलचित्र, 2,060 सिक्के और 307 अन्य वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।

    पुरातत्व कक्ष

    इस कक्ष में पूर्व-पाषाण-कालीन उपकरण एवं नगरी से प्राप्त कुषाण-कालीन मृण्मय सामग्री प्रदर्शित की गई है, जिन पर विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी एवं पुष्पाकृतियां बनी हुई हैं। मोलेला (उदयपुर) के कुंभकारों द्वारा निर्मित देवी-देवताओं की आधुनिक मृण्मूर्तियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इनमें भैरव, काली, दुर्गा, चामुण्डा, नागदेव आदि प्रमुख हैं।

    प्रतिमा कक्ष

    प्रतिमा कक्ष में संजोए गए संग्रह में गुप्तकाल से लेकर आधुनिक काल तक की प्रतिमाओं को स्थान दिया गया है। अधिकांश प्रतिमाएं चित्तौड़ दुर्ग से प्राप्त हुई हैं। प्रतापगढ़, पानगढ, राश्मी (चित्तौड़गढ़) जहाजपुर, मेजाबांध (भीलवाड़ा) आदि स्थानों से प्राप्त प्रतिमाएं भी प्रदर्शित की गई हैं। यहाँ के संग्रह में केन्द्रीय पुरातत्व से प्राप्त अश्ववाहिनी देवी मध्योत्तर काल एवं जहाजपुर से प्राप्त गोधासन गौरी की श्वेत एवं कृष्ण की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। धातु प्रतिमाओं में विष्णु, वेणु-गोपाल एवं नन्दी की प्रतिमाएं महत्वपूर्ण हैं जो जिलाधीश कार्यालय चित्तौड़ से प्राप्त हुई हैं। एक प्रतिमा में भगवान विष्णु को चौकी पर विराजमान मुद्रा में दर्शाया गया है।

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष में मध्यकालीन हथियारों का संग्रह है जिनमें जिरहबख्तर, शिरस्त्राण, ढालें, तलवारें, बन्दूकें और कटारें मुख्य हैं। इस कक्ष की अधिकांश सामग्री उदयपुर संग्रहालय से तथा कुछ सामग्री जयपुर संग्रहालय से प्राप्त हुई है। जहांगीर कालीन चमड़े का कवच तथा बस्सी (चित्तौड़) से प्राप्त दस्ताने उल्लेखनीय हैं। यहाँ प्रदर्शित बन्दूकों की अधिकतम लम्बाई सात से आठ फुट तक है। ये बन्दूकें ऊँट पर बैठकर बारूद दागने के काम आती थीं।

    पेन्टिंग कक्ष

    पेन्टिंग कक्ष में मेवाड़ के महाराणाओं के मनुष्याकार तैलचित्र प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें बप्पा रावल, कुम्भा, सांगा, उदयसिंह, प्रतापसिंह, फतहसिंह एवं भूपालसिंह के चित्र महत्वपूर्ण हैं। पन्नाधाय का तैलचित्र भी प्रदर्शित किया गया है। अधिकांश चित्र विभागीय कलाकार मोहन लाल शर्मा द्वारा तैयार किए गए हैं। लघु चित्रों में उदयपुर संग्रहालय से प्राप्त 18वीं सदी के योगवशिष्ट, नैषध, मेवाड़ शैली के गोकुलचन्द के चित्र एवं भदेसर (चित्तौड़गढ़) से प्राप्त आधुनिक शैली के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

    आदिवासी दीर्घा

    चित्तौड़ संग्रहालय में आदिवासी युगल भील óी-पुरुष तथा गाड़िया लोहार के प्लास्टर निर्मित मॉडल प्रदर्शित हैं। मेवाड़ से इन जातियों का विशेष सम्बन्ध था। राणा प्रताप की सेना में आदिवासी वीरों ने महत्वपूर्ण योगदान किया।

    दरबार हॉल

    स्वतंत्रता प्राप्ति की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर सितम्बर 1997 में संग्रहालय भवन के ऊपर की मंजिल दरबार-हॉल में ‘मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर’ प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे बाद में स्थाई कर दिया गया।

    मीरांबाई के चित्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में भक्त शिरोमणि महारानी मीरां से सम्बन्धित चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं जो मीरां समिति चित्तौड़गढ़ की ओर से वर्ष 1981 में संग्रहालय को भेंट स्वरूप प्राप्त हुए थे।

    काष्ठ कलाकृतियाँ

    संग्रहालय के एक कक्ष में बस्सी (चित्तौड़गढ़) में निर्मित काष्ठ कलाकृतियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें ईसर, गणगौर, रासलीला दृश्य आदि महत्वपूर्ण हैं।

    सिक्के

    यहाँ के संग्रह में चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा जिले से प्राप्त ताम्बे एवं चांदी के कुछ सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं जो मुगलकाल से लेकर आधुनिक काल तक के हैं। सोने का एक मुगलकालीन सिक्का ग्राम शंभूगढ़ (भीलवाड़ा) से प्राप्त हुआ है जिसके एक तरफ बादशाह शब्द स्पष्ट पढ़ने में आता है। इस संग्रहालय को देखने के लिए प्रतिवर्ष 1 से 2 लाख पर्यटक एवं शोधार्थी आते हैं।


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  • अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं, हिंदुओं से प्राप्त किया

     30.06.2017
    अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं, हिंदुओं से प्राप्त किया

    लॉर्ड वेलेजली के समय में अलवर, भरतपुर तथा धौलपुर राज्यों के साथ की गयी संधियां अब तक चली आ रही थीं। लॉर्ड हेस्टिंग्स (ई.1813 से 1823) द्वारा पद संभालने के समय अलवर, भरतपुर और धौलपुर को छोड़कर प्रायः समस्त राजपूताना अंग्रेजी नियन्त्रिण से बाहर था।

    लॉर्ड हेस्टिंग्स के समय में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताना के 14 राज्यों के साथ सहायक संधियां की गयीं तथा उनको अंग्रेजों के अधीन कर लिया गया। इनमें से करौली, टोंक तथा कोटा राज्यों के साथ वर्ष 1817 में, जोधपुर, उदयपुर, बूंदी, बीकानेर, किशनगढ़, बांसवाड़ा, जयपुर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर तथा जैसलमेर के साथ वर्ष 1818 में तथा सिरोही राज्य के साथ वर्ष 1823 में संधि की गयी। इस प्रकार लॉर्ड हेस्टिंग्स ने राजपूताना में ब्रिटिश प्रभुसत्ता स्थापित की। बाद में जब झालावाड़ राज्य अस्तित्व में आया तब 1838 में झालावाड़ राज्य के साथ संधि की गयी।

    अंग्रेजों से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार था किंतु उन्हें अपने खर्चे पर ब्रिटिश फौजों को अपने राज्य में रखना पड़ता था। इन संधियों के तहत एक राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये पूरी तरह ब्रिटिश राज्य पर निर्भर रहना पड़ता था। इस सब के बदले में अंग्रेजों ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का जिम्मा लिया।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने के प्रत्येक राज्य के साथ अलग-अलग संधि की गयी। अंग्रेजों द्वारा भारतीय रियासतों के राजाओं के साथ किये गये मित्रता के समझौतों को अलग-अलग करके और राज्यानुसार नहीं लिया जा सकता क्योंकि बहुत से मामलो में परिस्थितियाँ समान थीं। राजाओं को अपनी आंतरिक समस्याओं को सुलझाने के लिये एक अधिक शक्तिशाली सत्ता की सहायता और संरक्षण आवश्यक था।

    ली वारनर ने लिखा है- सन् 1818 से भारतीय रियासतों के प्रति अंग्रेजों का दृष्टिकोण अधीन समझौते का बन गया।

    राजपूताना के कई राज्यों पर कई दशकों से सिंधिया और होलकर का आधिपत्य चला आ रहा था। मराठों के पतन के बाद राजपूत राज्यों में इतनी ताकत नहीं रह गयी थी कि वे अपनी स्वतंत्रता को फिर से स्थापित करें। उन्होंने तुरंत ही ब्रिटिश आधिपत्य मान लिया।

    इस प्रकार भारत की राजनैतिक दुर्बलता का लाभ उठा कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में शासन का अधिकार प्राप्त किया। देश में केवल 40 रियासतें ऐसी थीं जिनकी ब्रिटिश सरकार के साथ वास्तविक संधियां हुईं थीं। शेष पाँच सौ से अधिक रियासतें अंग्रेजी शासन काल में ब्रिटिश परमोच्च सत्ता की सनदों और जागीरों के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थीं।

    राजपूत शासकों ने इससे पूर्व इतने प्रभावकारी और निश्चित रूप से अपनी स्वाधीनता किसी अन्य शक्ति (मुगलों अथवा मराठा सत्ता) को इस सीमा तक समर्पित नहीं की थी जैसी कि उन्होंने 1818 ई.में अंग्रेजों के समक्ष की। अंग्रेजों ने देशी रियासतों के साथ संधियां सोच समझ कर सम्पन्न की थीं। उन के उद्देश्य भी निश्चित थे। वे 'झण्डे के पीछे व्यापार है' के सिद्धांत में विश्वास रखते थे।

    इस प्रकार ब्रिटिश भारत का राजनैतिक ढांचा बनाने का जो काम ई.1799 में टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ आरंभ हुआ था वह ई.1819 (पेशवा को हटाये जाने) के बीच की 20 वर्षों की अवधि में तैयार हुआ। इस अवधि के आरंभ में मैसूर के मुस्लिम राज्य का विनाश हो गया और इस अवधि के अंत में मराठों का संघ राज्य अनेक सरदारों में बिखर गया। इन दोनों विजयों ने अंग्रेजों को भारत का स्वामी बना दिया।

    डब्लू. डब्लू हंटर ने स्वीकार किया है कि अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं बल्कि हिंदुओं, मराठों और सिक्खों से प्राप्त किया। वह लिखता है- मुस्लिम राजकुमार हम से बंगाल, कर्नाटक तथा मैसूर में लड़े परंतु सर्वाधिक विरोध हिंदुओं की ओर से हुआ।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूताना के राज्यों ने मराठों और पिण्डारियों से सुरक्षा पाने के लिये अंग्रेजों से संधि नहीं की थी अपितु कम्पनी सरकार ने पिण्डारियों को नष्ट करने तथा मराठा शक्ति के विस्तार को रोकने के लिए राजपूत राज्यों से संधि की। सच्चाई यह है कि न केवल देशी रियासतें अपितु अंग्रेज भी मराठों तथा पिण्डारियों से त्रस्त थे तथा उनसे मुक्ति चाहते थे। मराठे तथा पिण्डारी देशी राज्यों तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी दोनों के साथ शत्रुवत् व्यवहार कर रहे थे। इस प्रकार ''शत्रु का शत्रु मित्र" के सिद्धांत को आधार बनाकर दोनों पक्षें में मित्रता हो गयी। अंग्रेजों और देशी राज्यों की यह मित्रता आगे चलकर भारत के लिये बहुत ही खतरनाक सिद्ध हुई।

    राजपूताना के देशी राज्यों के साथ हुई संधि के पश्चात् ई.1819 में पेशवा को हटा दिया गया। इसी तरह पिण्डारी अमीरखां को भी टोंक में स्थापित करके उसकी गतिविधियों को समाप्त कर दिया गया किंतु पिण्डारियों के अन्य गिरोह विशेषकर करीमखां, वसील मुहम्मद और चीतू का सफाया किया जाना अभी शेष था। इन गिरोहों के राजपूताना में शरण लेने की पूरी आशंका थी।

    राजपूताने के राज्यों ने भले ही अपने कुछ अन्य कारणों से भी संधि की हो किंतु अंग्रेजों के लिये इन संधियों को करने का उद्देश्य राजपूताना को मराठों और पिण्डारियों के लिये शरणस्थली बनने देने से रोकना ही था। यही कारण था कि संधि के समय अंग्रेजों ने देशी राज्यों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप से स्वयं को दूर ही रखा था। देशी राज्यों को केवल बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा का ही वचन दिया गया था।

    इन संधियों के आरंभ होने से देशी राज्यों के सामंतों को पूरी तरह दबा दिया गया तथा राजाओं की स्थिति अपने सामंतों के ऊपर दृढ़ हो गयी। इससे राजाओं को सामंतों के आतंक से छुटकारा मिला किंतु अब वे अंग्रेजी सत्ता के अधीन हो गये। अंग्रेज अधिकारी निरंकुश बर्ताव करने लगे तथा शासन के आंतरिक मामलों में भी उनका हस्तक्षेप हो गया। इन संधियों के तहत जहाँ देशी राज्यों को बिना कोई अधिकार दिये केवल दायित्व सौंप दिये गये वहीं अंग्रेजों को बिना कोई दायित्व निभाये असीमित अधिकार प्राप्त हो गये। राजाओं को सुरक्षा तो मिली किंतु उनकी स्वतंत्रता नष्ट हो गयी। यहाँ तक कि अंग्रेज अधिकारी देशी राज्य के उत्तराधिकारी के मनोनयन में भी हस्तक्षेप करने लगे।

    इन संधियों के हो जाने से राजपूताना में मराठों, अंग्रेजों, फ्रांसिसियों तथा पिण्डारियों के आक्रमण बंद हो गये। राज्यों के सैनिक अभियानों तथा आक्रामक प्रवृत्ति का प्रायः अंत हो गया। राज्यों को भीतर तथा बाहर दोनों ही मोर्चों पर पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गयी।

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  • अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर

     27.06.2018
    अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर

    अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर


    डूंगरपुर राजकीय संग्रहालय की स्थापना ई.1959 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा वागड़ क्षेत्र की पुरा सामग्री एवं कला सामग्री के संरक्षण एवं प्रदर्शन के उद्देश्य से की गई। ई.1960 में डूंगरपुर पंचायत समिति हॉल में प्रतिमाओं एवं पुरावस्तुओं का प्रदर्शन किया गया। समय के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की सामग्री का अध्ग्रिहण किया जाता रहा जिससे यह संग्रहालय समृद्ध होता चला गया।

    ईस्वी 1970 में पूर्व डूंगरपुर रियासत के राजपरिवार के सदस्य महारावल लक्ष्मणसिंह तथा डॉ. नगेन्द्रसिंह ने डूंगरपुर राजवंश से सम्बद्ध प्राचीन वस्तुओं एवं व्यक्तिगत संग्रह की वस्तुओं को संग्रहालय को देने का निश्चय किया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत संग्रह की समस्त कलाकृतियां, धातु प्रतिमाएँ तथा ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं राजकीय संग्रहालय को प्रदान कर दीं।

    ई.1973 में पुरासामग्री को विधिवत रूप से प्रदर्शित कर इसे राजकीय संग्रहालय का स्वरूप प्रदान किया गया। राजपरिवार द्वारा संग्रहालय के लिए भूमि भी उपलब्ध कराई गई। इस भूमि पर सरकार द्वारा एक भवन का निर्माण किया गया तथा 11 फरवरी 1988 को नवीन संग्रहालय भवन का उद्घाटन किया गया। वर्तमान में इस संग्रहालय में तीन दीर्घाएं हैं जिनमें 197 मूर्तियां, 23 शिलालेख, धातु प्रतिमाएँ, सिक्के तथा वागड़ क्षेत्र के आदिवासी जनजीवन से सम्बन्धित सामग्री प्रदर्शित की गई है।

    डूंगरपुर राजस्थान के दक्षिण-पश्चिम सीमांत क्षेत्र में स्थित है। यहाँ की प्रतिमाओं का पत्थर स्थानीय खानों से प्राप्त किया गया था। यह पत्थर गाढ़े नीले-हरे रंग का है। इसे मेवाड़ में परेवा पत्थर कहा जाता था। डूंगरपुर संग्रहालय में 5-6वीं शताब्दी की गुप्तकालीन प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित की गई हैं। मृगचर्म युक्त ब्रहमी, पद्मपाणि-यक्ष, कौमारी आदि की प्रतिमाएँ महत्वपूर्ण हैं।

    वीणाधारी शिव, कुबेर एवं गणेश की मूर्तियां भी उल्लेखनीय हैं। खण्डित अवस्था में होने पर भी ये प्रतिमाएँ अपने काल की मूर्तिकला पर प्रकाश डालने में पर्याप्त सक्षम हैं। वीणाधर शिव तल्लीन भाव में नन्दी पर आरूढ़ हैं। शिव की यह प्रतिमा इस क्षेत्र से प्राप्त प्रतिमाओं में सबसे प्राचीन है। प्रारंभिक मध्यकाल स्थानक वराह का अधोभाग, आसनस्थ कुबेर, दम्पत्ति, सुर-सुन्दरी का धड़, आसनस्थ ध्यानमुद्रा में आदिनाथ, महिषासुरमर्दिनी तथा स्थानक चामुण्डा की प्रतिमाएँ भी दर्शनीय हैं।

    डूंगरपुर से 25 किलोमीटर दूर आमझरा नामक स्थान से गुप्तोत्तर कालीन प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ की पहाड़ियों को देखने से विशाल भवनों की नीवें दिखाई देती हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि किसी समय यहाँ विशाल मंदिर रहे होंगे। पुरातत्वविद् रत्नचंद्र अग्रवाल ने इस क्षेत्र से अनेक प्राचीन मूर्तियों को खोजा। ये मूर्तियाँ गुप्तोत्तर काल की थीं। उत्तर मध्यकाल की प्रतिमाओं में स्थानक सूर्य, हरिहर (संयुक्त प्रतिमा) दशावतार के अंकन के साथ उत्कीर्ण की गई हैं।

    मध्योत्तर कालीन प्रतिमाओं में तपस्यारत पार्वती, गरुड़ासीन लक्ष्मीनारायण एवं महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमाएँ उल्लेखनीय हैं। इसी काल की अनेक जैन प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित हैं। महारावल लक्ष्मणसिंह एवं डॉ. नगेन्द्र सिंह डूंगरपुर से भेंट स्वरूप प्राप्त प्रतिमाएँ, शिलालेख, लघुचित्र एवं वास्तु खण्ड भी मध्योत्तर युगीन कला का प्रतिनिधित्व करते हैं।

    डॉ. नगेन्द्रसिंह के सौजन्य से प्राप्त नटराज, भगवान बुद्व, अर्द्धनारीश्वर, भैरवी आदि प्रतिमाएँ संग्रहालय की विशिष्ट कला सम्पदाएं हैं। इस संग्रहालय में चित्रों के माध्यम से वागड़ क्षेत्र की अनेक सांस्कृतिक परम्पराओं का प्रदर्शन किया गया है। सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताओं तथा सांस्कृतिक केन्द्रों के छाया चित्रों तथा स्थानीय कलाकृतियों को भी संजोया गया है।


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  • पिण्डारियों एवं मराठों से कई गुना अधिक राशि वसूल की अंग्रेजों ने

     01.07.2017
    पिण्डारियों एवं मराठों से  कई गुना अधिक राशि वसूल की अंग्रेजों ने

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूत राज्यों के साथ की गयी संधियों के आरंभ होने से राजपूताने में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। राज्यों को मराठों और पिण्डारियों से छुटकारा मिला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी देशी राज्यों में रेजीडेण्ट एवं पोलिटिकल एजेण्ट बन कर आये जिससे मराठों और पिण्डारियों की लूट खसोट बंद हुई किंतु अंग्रेजों की लूटखसोट आरंभ हो गयी।

    राजपूताने से जितनी लूट पिण्डारियों ने तथा जितनी चौथ मराठों ने वसूल की थी उससे कई गुना अधिक खिराज अंग्रेजों ने वसूल की जिससे देशी राज्यों की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी और वे पहले से भी अधिक कर्जे में डूब गये। अंग्रेजी संरक्षण में चले जाने के पश्चात् राजपूताने के प्रायः समस्त राज्यों ने अंग्रेज अधिकारियों की सलाह से अपनी राज्य की आय बढ़ाने के लिये भूमि बंदोबस्त को अपनाया। अंग्रेजों का खिराज चुकाने के लिये पुराने करों में वृद्धि की गयी तथा नये कर भी लगा दिये गये। करों की वसूली में पहले की अपेक्षा काफी कड़ाई बरती जाने लगी जिससे जनता में असंतोष पनपा।

    राज्यों में नियुक्त अंग्रेजी एजेण्टों ने राजदूत का व्यवहार न करके अधिनायकों जैसा व्यवहार किया। उन्होंने रियासतों के निजी मामलों में हस्तक्षेप किया। ब्रिटिश रेजिडेंटों ने तानाशाहों के अधिकार प्राप्त कर लिये। उन्होंने राज्यों की सेवा में अपने मन पसंद अधिकारियों की नियुक्ति करके एक तरह से सहायक संधि के स्थान पर हस्तक्षेप की नीति अपना ली। इससे राज्यों में अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष पनपा।

    अंग्रेज अधिकारियों ने राज्यों के शासक एवं उसके उत्तराधिकारी नियुक्त करने में भी हस्तक्षेप किया। अल्प वयस्क शासक सम्बन्धी समस्याएं और ब्रिटिश हस्तक्षेप, देशी राज्यों में उत्तराधिकारियों और शासकों की आयु निर्धारण से जुड़ा हुआ एक विवादग्रस्त क्षेत्र बन गया जिसमें ब्रिटिश हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। राजा पद के कई दावेदार राजमहलों से निकलकर सड़क पर आ गये और सड़क पर बैठने को विवश हुए कई राजकुमार महलों में जा बैठे।

    भारत में वयस्कता की आयु सम्बन्धी सीमाएं सुनिश्चित नहीं थीं। विभिन्न अवसरों और आवश्यकतानुसार इसका निर्धारण होता था। अंग्रेजी सत्ता के पूर्व इस निर्धारण में कोई विशेष आपत्ति और व्यवधान नहीं हुआ। यह स्थिति किसी न किसी प्रकार चलती रही किंतु ब्रिटिश सरकार ने देशी राज्यों की उत्तराधिकार की समस्या के दौरान इसमें सुनिश्चित व्यवस्था करना उपयुक्त व आवश्यक समझा।

    इस नीति के अनुसार वयस्कता की आयु 18 वर्ष सुनिश्चित की गयी और यह व्यवस्था की गयी कि 18 वर्ष से पूर्व शासक अल्पवयस्क माना जायेगा। ऐसी स्थिति में राज्य के शासन का संचालन होने तक अर्थात् 18 वर्ष की आयु पूरी करने तक राज्य शासन ब्रिटिश नियंत्रण में संचालित किया जायेगा अथवा उनके द्वारा नियुक्त शासक का संरक्षक (रीजेण्ट) कम्पनी सरकार की सहमति और स्वीकृति के आधार पर प्रशासन चलायेगा। बड़े राज्यों में यह प्रशासन रीजैंसी कौंसिल’ द्वारा और छोटे राज्यों में 'पॉलिटिकल ऐजेण्टों’ द्वारा नियंत्रित और संचालित होना था। वयस्कता प्राप्त होने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा राज्य के समस्त प्रशासनिक अधिकार वयस्क नरेश को सौंप दिये जाने थे।

    इस प्रकार इन संधियों से राजाओं के राज्यों को स्थिरता तो मिली किंतु राजाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई। राज्य के सरदारों के स्थान पर अंग्रेज अधिकारी राजाओं के लिये सिर दर्द बन गये। इन संधियों से राज्यों के सरदारों तथा जनता को कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। कई मामलों में राज्य के सामंत तथा सरदार लोग राजाओं के निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा अंग्रेज अधिकारियों से मिलकर राज्य की जनता को लूटने खसोटने में लग गये। यदि राजा इन सामंतों के विरुद्ध किसी तरह की कार्यवाही करने का विचार करता तो ये सामंत अंग्रेज अधिकारी की सेवा में उपस्थित होकर मन चाही सुविधा प्राप्त कर लेते थे।

    1818 तक पंजाब और सिंध को छोड़कर लगभग सारा भारतीय उपमहाद्वीप अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया था। इसके एक हिस्से पर अंग्रेज सीधे शासन करते थे और बाकी पर अनेक भारतीय शासकों का शासन था किंतु राजाओं पर अंग्रेजों की सर्वोपरि सत्ता थी। धीरे-धीरे राज्यों के पास अपनी वस्तुतः कोई फौज नहीं रह जानी थी। अपने ही जैसे दूसरे राज्यों से सम्बन्ध कायम करने के लिये भी वे स्वतंत्र नहीं रह गये थे।

    राजाओं के अपने क्षेत्रों में उन्हीं पर नियंत्रण रखने के लिये जो अंग्रेजी फौजें रखी जाती थीं, उनके लिये भी राजाओं को भारी रकम चुकानी पड़ती थी। संधि की शर्तों के अनुसार राजा अपने आंतरिक मामलों में स्वायत्त थे किंतु व्यवहार रूप में उन्हें ब्रिटिश सत्ता स्वीकार करनी पड़ती थी। इस सत्ता का प्रयोग रेजिडेंट करता था। इस कारण ये राज्य हमेशा परीक्षा काल में ही रहते थे।

    इन संधियों के होने के कई वर्षों बाद थामसन ने लिखा- राज्यों द्वारा की गयी संधियों के शब्दों को ध्यान में रखते हुए यह मानना होगा कि राजाओं द्वारा व्यापक रूप से अनुभूत कष्ट आज प्रमाणित हैं। सर्व स्थानों में आंतरिक कार्यों में प्रचुर मात्रा में हस्तक्षेप हुआ है। राजनैतिक अधिकारियों के प्राधिकार तथा उनकी उपस्थिति नाराजी से देखी जाती है।

    ई.1830 में बिशप हेबर ने लिखा था, कोई भी देशी राजा उतना कर नहीं लगाता जितना हम लगाते हैं। ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह न मानते हों कि कर आवश्यकता से अधिक लगाया जाता है और जनता निर्धन होती जा रही है। बंगाल से भिन्न हिंदुस्तान में देशी राजाओं के राज्य में रहने वाले किसान कम्पनीराज में रहने वाले किसानों से कहीं अधिक गरीब और पस्त दिखाई देते हैं। उनका व्यापार चौपट हो गया है।

    इन संधियों के हो जाने से राज्यों के सैनिक अभियानों तथा आक्रामक प्रवृत्ति का प्रायः अंत हो गया। अब राजपूताने के राज्यों पर बाह्य सैनिक क्रियाओं तथा संघर्ष की समाप्ति हो गयी और उन्हें संधि के अंतर्गत पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गयी। कहा जाता है कि इस संधि के हो जाने से जयपुर नरेश जगतसिंह अपनी मृत्यु के समय अत्यंत आश्वस्त था कि उसका राज्य मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से मुक्त हो गया है और भविष्य में ब्रिटिश कम्पनी उसकी बाह्य आक्रमणों से रक्षा करेगी।

    इन संधियों के बाद देशी राज्यों के शासकों को बिना कोई अधिकार दिये केवल दायित्व सौंप दिये गये वहीं अंग्रेजों को बिना कोई दायित्व निभाये असीमित अधिकार प्राप्त हो गये।

    इन संधियों के आरंभ होने से देशी राज्यों के सामंतों को पूरी तरह दबा दिया गया तथा राजाओं की स्थिति अपने सामंतों के ऊपर दृढ़ हो गयी। इससे राजाओं को सामंतों के आतंक से छुटकारा मिला किंतु अब वे अंग्रेजी सत्ता के अधीन हो गये। अंग्रेज अधिकारी निरंकुश बर्ताव करने लगे तथा शासन के प्रत्येक आंतरिक मामले में उनका हस्तक्षेप हो गया।

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  • अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा

     01.07.2018
    अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा

    अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा


    अंग्रेज पुरातत्वविद् सी. एस. हैक्ट ने बून्दी राज्य के इन्दरगढ़ क्षेत्र से क्वार्टजाइट से निर्मित पाषाण-कालीन उपकरण खोजे थे जो भारतीय संग्रहालय कलकत्ता में रखे गए। इसी प्रकार कोटा राज्य से प्राप्त कुछ अन्य सामग्री भी देश-विदेश के अन्य संग्रहालयों को चली गई।

    कोटा महाराव उम्मेद सिंह (द्वितीय) के समय ई.1936 में कोटा राज्य की प्राचीन एवं कलात्मक सामग्री का सर्वेक्षण एवं संग्रहण कर, संग्रहालय बनाने का विचार सामने आया। इस विचार को क्रियान्वित करने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. ए. एस. अल्टेकर से कोटा रियासत का पुरातात्विक सर्वेक्षण करवाया गया। फलस्वरूप कोटा के आस-पास चौदह प्राचीन स्थल प्रकाश में आए।

    कोटा संग्रहालय की स्थापना को मूर्त स्वरूप प्रदान करने के लिए सुप्रसिद्ध इतिहासकार डा. मथुरालाल से ई.1943 में पुनः सर्वेक्षण करवाया गया। परिणामस्वरूप लगभग एक सौ प्रतिमाएं एवं शिलालेख प्रकाश में आए। कोटा राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पुरा सामग्री एवं कलाकृतियों को ब्रजविलास भवन में रखवाया गया तथा ई.1946 में राजकीय संग्रहालय कोटा की विधिवत नींव रखी गई।

    ई.1946 से 1951 तक यह संग्रहालय ब्रजविलास भवन में रहा। स्वतंत्रता प्रािप्त के पश्चात् यह संग्रहालय कोटा गढ़महल स्थित हवामहल में स्थानांतरित किया गया। ई.1991 तक यह संग्रहालय हवामहल में रहा किंतु संग्रहालय-सामग्री में वृद्धि हो जाने से स्थान कम पड़ने लगा। अतः इसे पुनः छत्रविलास उद्यान के ब्रजविलास भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। पुरासामग्री एवं कलासामग्री के प्रदर्शन के लिए संग्रहालय दीर्घाओं का वैज्ञानिक ढंग से निर्माण करवाया गया तथा संग्रहालय का पुनर्गठन कर दिसम्बर 1995 में जनसाधारण के लिए खोला गया।

    ब्रजविलास संग्रहालय भवन उत्तर मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य शिल्प का सुन्दर नमूना है तथा सरकार द्वारा घोषित संरक्षित स्मारक है। इस संग्रहालय को मूर्तिकला की विविधता एवं चित्रकला संग्रह की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। संग्रहालय में संगृहीत प्रतिमाएँ, शिलालेख, सिक्के, लघुचित्र, हस्तलिखित ग्रंथ तथा विविध कला सामग्री को कालक्रम, विषय-वस्तु एवं प्राप्ति-स्थल के आधार पर वर्गीकृत कर छः दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।

    पुरा सामग्री कक्ष

    पुरा सामग्री दीर्घा में हाड़ौती क्षेत्र से प्राप्त मध्यपाषाण युग से लेकर गुप्तकाल तक की पुरासामग्री एवं कलासामग्री का प्रदर्शन किया गया है जिसमें झालावाड़ जिले में कालीसिन्ध तथा आहू नदी के संगम पर स्थित गागरोन दुर्ग, कालीसिन्ध के निकट तीनधार और आहू नदी के निकट स्थित भीलवाड़ी गांव आदि स्थलों से प्राप्त मध्यप्रस्तर युग (50 हजार वर्ष पूर्व से 10 हजार वर्ष पूर्व तक) के पाषाण उपकरणों का प्रदर्शन किया गया है जिनमें कुल्हाड़ी, स्क्रैपर, बाण की नोक आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त लघुपाषाण कालीन अर्थात् नवपाषाण कालीन (10 हजार वर्ष पूर्व से 5 हजार वर्ष पूर्व तक) के प्रस्तर उपकरण भी प्रदर्शित हैं जिनमें कोर, फलक, ब्लेड आदि प्रमुख हैं।

    ताम्रयुगीन एवं ऐतिहासिक स्थलों यथा धाकड़खेड़ी, कैथून, मानसगांव (जिला कोटा), नमाणा, केशोरायपाटन (जिला बूंदी), बड़वा (जिला बारां) आदि से प्राप्त मृदपात्र जिनमें मालवा क्षेत्र की पुरा संस्कृति से सम्बन्धित पात्रखण्ड (मालावा वेयर अथवा ब्लैक ऑन रैड वेयर) काले और लाल धरातल वाले पात्रखण्ड (ब्लैक एण्ड रैड वेयर), सलेटी रंग के पात्रखण्ड (ग्रे वेयर) तथा ऐतिहासिक काल की मृणमूर्तियां, पक्की मिट्टी का शतरंज का पासा एवं मोहरें, कर्णाभूषण, पहिया आदि अनेक प्रकार की मनोरंजन एवं श्ृंगार सामग्री प्रदर्शित की गई है। इस पुरा एवं कला सामग्री के माध्यम से मानव जाति के सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है। आदि-मानव के भोजन संग्रहण अवस्था से निकलकर भोजन उत्पादन की अवस्था में प्रवेश करने तक की विकास यात्रा को दो तैल-चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। कोटा के समीप चंद्रसेन नामक स्थान पर शतुमुर्ग के चालीस हजार वर्ष प्राचीन अण्डशतक मिले हैं जिन्हें रेखांकन से सजाया गया है। उन्हें भी इस संग्रहालय में रखा गया है।

    मुद्रा कक्ष

    संग्रहालय में सर्वाधिक प्राचीन सिक्का चांदी से निर्मित पंचमार्क चौकोर सिक्का है जिस पर फूल बने हुए हैं। इस प्रकार के सिक्कों का चलन ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व था। कोटा-बूंदी क्षेत्र से प्राप्त प्राचीनतम सिक्के इण्डोससैनियन और गधिया प्रकार के हैं जो ग्राम निमोदा, तहसील दीगोद और बूंदी-नमाना रोड पर खुदाई के दौरान प्राप्त हुए थे। चौहान राजा अजयदेव तथा उसकी रानी सोमलदेवी के सिक्के एक दफीने के रूप मिले हैं, वे भी इस संग्रहालय में सुरक्षित हैं। अजयदेव के सिक्कों पर चित की तरफ नागरी लिपि में अजयदेव अंकित है और पट की ओर लक्ष्मी देवी की आकृति उत्कीर्ण है। सोमल देवी के सिक्कों पर नागरी लिपि में सोमल देवी एवं पट की ओर अश्वारोही की आकृति बनी है।

    कोटा संभाग के विभिन्न स्थलों से प्राप्त अल्लाउद्दीन खिलजी, मुबारकशाह, गयासुद्दीन तुगलक और अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब आदि के सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं। हाड़ौती क्षेत्र की कोटा, बूंदी एवं झालावाड़ रियासतों के सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं। मेवाड़, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, करौली, भरतपुर और टोंक आदि रियासतों के सिक्के भी प्रदर्शित हैं जो कोटा राज्य के रानीहेड़ा गांव में मिले थे। ये सिक्के मुगल बादशाह अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब और मुहम्मदशाह के समय के हैं।

    प्रतिमा कक्ष

    हाड़ौती क्षेत्र स्थापत्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न रहा है तथा भौगोलिक रूप से मालवा क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण मालवा की संस्कृति से प्रभावित रहा है। इस क्षेत्र में वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध एवं जैन मतावलम्बियों से सम्बन्धित स्थापत्य एवं मूर्तिकला के अवशेष प्रचुर संख्या में प्राप्त होते हैं। संग्रहालय में 150 से अधिक प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। इनमें बाड़ौली, दरा, अटरू, रामगढ़ विलास, काकोनी, शाहबाद, आगर, औघाड़, मन्दरगढ़ आदि से प्राप्त प्रतिमाएँ प्रमुख हैं। संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र से प्राप्त गुप्तकाल से लेकर मध्यकाल तक निर्मित देवालयों के अवशेषों, मूर्तियों, उत्कीर्ण पाषाणों आदि सामग्री को संकलित किया गया है। संग्रहालय में विलास से प्राप्त यमराज की एक प्रतिमा प्रदर्शित की गई है जो हाथ में कपाल लिए हुए है। विषय-वस्तु एवं प्राप्ति स्थल के आधार पर प्रतिमा कक्ष को छः उपकक्षों में विभाजित किया गया है।

    दरा प्रतिमा कक्ष में दरा क्षेत्र से प्राप्त गुप्तकालीन प्रस्तर प्रतिमाएं रखी गई हैं। ख्यातिलब्ध तंत्रपट्टिका (झल्लरी वादक) इंग्लैण्ड में हुए भारत महोत्वस में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। नन्दी तथा कलात्मक प्रस्तर स्तम्भ-खण्ड आदि भी प्रदर्शित हैं। शैव प्रतिमा कक्ष में काकूनी, अटरू आदि स्थलों से प्राप्त उमा-महेश्वर, शिव के विभिन्न स्वरूपों यथा विलास के लकुलीश एवं अंधकासुर वध, रामगढ़ से प्राप्त शिव ताण्डव आदि प्रतिमाएं, बारां के शक्ति-गणेश, काकूनी के कार्तिकेय, भैरव आदि प्रतिमाएं प्रदर्शित की गई हैं। ये सभी प्रतिमाएं 9वीं-10वीं शताब्दी की हैं। संयुक्त देव प्रतिमा कक्ष में 9वीं शताब्दी ईस्वी की गांगोभी से प्राप्त योगनारायण, विलास से प्राप्त हरि-हर, पितामह-मार्तण्ड की संयुक्त देव प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। गंगोभी से प्राप्त प्रतिमाएँ सफेद पत्थर की हैं। शेषशायी विष्णु की प्रतिमा भूरे पत्थर से निर्मित है।

    वैष्णव प्रतिमा कक्ष में शाहबाद से प्राप्त 8वीं शताब्दी की बैकुण्ठ-विष्णु (नृसिंह, वराह, विष्णु) प्रतिमा, बाड़ौली से प्राप्त 9वीं शताब्दी की संयुक्त राज्य अमेरिका एवं रूस में हुए भारत महोत्सव में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली शेष-शायी विष्णु प्रतिमा, औघाड़ (शाहबाद) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की विष्णु प्रतिमा, वराह, वामन, नृसिंह आदि विष्णु-दशावतार प्रतिमाओं सहित विष्णु के 24 स्वरूपों की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। मातृकाएं एवं दिक्पाल कक्ष में ऐन्द्रीय, वाराही, वैष्णवी, ब्रह्माणी, चामुण्डा, लक्ष्मी आदि मातृकाओं की प्रतिमाएं, अग्नि, वरुण, ईशान, वायु, कुबेर, यम आदि दिक्पाल तथा नवग्रह पटल आदि का प्रदर्शन है। हाड़ौती क्षेत्र के रामगढ़, काकूनी, विलास, अटरू, गांगोभी आदि स्थलों से प्राप्त ये प्रतिमाएं 9वीं से 11वीं शताब्दी की हैं।

    अधिकांश हिन्दू नरेश बौद्ध एवं जैन धर्म को भी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। इस कारण इस क्षेत्र से इन दोनों धर्मों से सम्बन्धित प्रतिमाएं भी बड़ी संख्या में मिली हैं। इस क्षेत्र में 8वीं से 13वीं शताब्दी तक की काकूनी, अटरू केशोरायपाटन, झालरापाटन, विलास, रामगढ़ आदि स्थलों से जैन तीर्थंकरों ऋषभनाथ, अजितनाथ, विमलनाथ, शांतिनाथ, मणिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी आदि की प्रस्तर प्रतिमाएं प्रदर्शित की गई हैं। बाड़ौली से प्राप्त 9वीं शताब्दी की शेषशायी विष्णु प्रतिमा का छायाचित्र प्रदर्शित किया गया है।

    ऐतिहासिक कक्ष

    ऐतिहासिक कक्ष में शिलालेखों, अó-शó, पट्ट-परिधान तथा हाड़ौती क्षेत्र के स्वतन्त्रता संग्राम से सम्बन्धित इतिहास की झांकी प्रस्तुत की गई है।

    मौखरी राजकुमारों के यूप स्तम्भ: बड़वा ग्राम से प्राप्त वि.सं. 295 के यूप स्तम्भों से वैदिक यज्ञों की जानकारी प्राप्त होती है। इन स्तम्भों को संग्रहालय में एक अलग चबूतरे पर प्रदर्शित किया गया है। इन स्तूपों से यज्ञ अश्व बांधे गए थे। वैदिक परम्परा के अनुसार ये यूप आधार भाग में चौकोर, मध्य भाग में अष्टकोणीय और शीर्ष भाग पर मुड़े हुए हैं तथा पीले रंग के बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। इन यूपों पर कुषाण कालीन ब्राह्मी लिपि में (ई.238 का) एक शिलालेख अंकित है जिससे ज्ञात होता है कि इन यूपों के निर्माणकर्ता मौखरी वंश के बल के पुत्र बलर्धन सोमदेव और बलसिंह थे, जिन्होंने यहाँ त्रिराज एवं ज्योतिषेम यज्ञ करके इन्हें स्थापित किया था। राजस्थान में तीसरी शताब्दी ईस्वी में मौखरी राज्य की सूचना देने वाला यह अकेला शिलालेख प्राप्त हुआ है।

    शिलालेख: संग्रहालय में प्रदर्शित विश्ववर्मा का वि.सं. 480 का गंगधार (झालावाड़ जिले में स्थित) से प्राप्त लेख विष्णु मंदिर के निर्माण का उल्लेख करता है। चारचौमा का वि.सं. 557 का अभिलेख, चन्द्रभागा (झालरापाटन) का शीतलेश्वर महादेव का वि.सं. 746 का लेख तथा कन्सुआ (कोटा) का वि.सं. 795 का लेख शिव मन्दिरों के निर्माण की तिथि की सूचनाएं देते हैं। शेरगढ़ के कोषवर्धन अभिलेख से ज्ञात होता है कि वि.सं. 847 में नागवंश के राजा देवदत्त ने एक मंदिर तथा बौद्ध विहार का निर्माण करवाया था। रामगढ़ से प्राप्त वि.सं. 1219 का त्रिशावर्मा का अभिलेख इसी वंश के राजा मलयवर्मा द्वारा 10वीं शताब्दी में विजय के उपलक्ष्य में किए गए शिवालय के जीर्णोद्धार का उल्लेख करता है। शेरगढ़ में भण्डदेवरा से प्राप्त विक्रम की 12वीं एवं 13वीं शताब्दी के लेख तथा चांदखेडी का वि.सं. 1476 का लेख प्रमुख हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित शिलालेखों में रामगढ़ से प्राप्त शिलालेख, श्रीमलयदेव वर्मण का शिलालेख भी सम्मिलित हैं।

    बाद के शिलालेखों में कोटा रियासत के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं जिनमें चाकरी बन्द करने की सूचना, वि.सं.1861 में महाराव रामसिंह का जैसलमेर में विवाह होने की सूचना, महाराव रामसिंह (वि.सं.1884-1922) द्वारा दरा में शेर का शिकार करने पर मनाए गए उत्सव का विवरण, वि.सं. 1906, शाहबाद का सं. 1678 का शिलालेख, झाला जालिम सिंह (प्रथम) का 19वीं शताब्दी का शिलालेख आदि प्रदर्शित है। इन शिलालेखों से हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है। इन प्रसिद्ध शिलालेखों के साथ-साथ हाड़ौती में अन्य कई स्थानों से प्राप्त प्रसिद्ध शिलालेखों की देवनागरी में प्रतिलिपियां रखी गई है।

    ताम्रपत्र एवं खरीते आदि: संग्रहालय में कुछ ताम्रपत्रों के मूल लेख तथा कुछ ताम्रपत्रों के अनुवाद भी उपलब्ध हैं। शाहबाद और दरा से लाए गए कुछ शिलालेख भी उपलब्ध कराए गए हैं। शिलालेखों के साथ ही खरीतों पर लगाए जाने वाली चपड़ी की सील के कुछ लेख भी मौजूद हैं जिनमें राव माधोसिंह, महाराव रामसिंह, वजीरखान नसरतजंग, बलवन्तसिंह, जार्ज रसेल आदि के लेख प्रमुख है। कोर्ट स्टाम्प की मोहर के लेख भी प्रदर्शित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र एवं पट्ट-परिधान कक्ष

    अस्त्र-शस्त्र एवं पट्ट-परिधान कक्ष में 18वीं-19वीं शताब्दी के अó-शó, तोड़ेदार बन्दूकें, कोटा-बून्दी-उदयपुर की कटारें, छुरियां, तलवारें-ढालें, भाले, धनुष एवं तीर तथा जिरहबख्तर आदि को सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया गया है। कोटा शासकों के पट्ट-परिधान, चोगा मारगर्दानी, चोगा मखमल, सुरमई, पशमीना, बागा मलमल केसरिया आदि भी प्रदर्शित हैं।

    हस्तलिखित ग्रन्थ

    हस्तलिखित कक्ष में 18वीं-19वीं शताब्दी के सचित्र हस्तलिखित ग्रन्थ- व्रतोत्सव चन्द्रिका, गीता पंचरत्न, गीता सूक्ष्माक्षरी भागवत, भागवत सूक्ष्माक्षरी, कल्पसूत्र, विष्णु सहस्रनाम, कुरानमज़ीद आदि प्रदर्शित की गई हैं। कोटा राज्य का सरस्वती भण्डार पहले इसी संग्रहालय से जुड़ा हुआ था जिसमें 5000 हस्तलिखित ग्रंथ थे। सरस्वती भण्डार के अलग हो जाने के पश्चात् कुछ विशिष्ट हस्तलिखित ग्रंथ ही संग्राललय में रह गए हैं। इनमें से अधिकांश ग्रंथ चित्रित हैं। ये ग्रंथ चित्र तथा चार्ट स्वर्ण अक्षरी, चित्र काव्य, भोजपत्री एवं नक्काशी से अलंकृत हैं।

    चित्रित ग्रंथों में 1190 पृष्ठों की भागवत प्रमुख है जिसमें प्रत्येक पृष्ठ पर लगभग 11 पंक्तियों का लेखन है। ग्रंथ की भाषा संस्कृत एवं लिपि नागरी है। इसका लेखन 18वीं शताब्दी ईस्वी का है। इसका आकार 14 इंच गुणा 6 इंच माप का है। दूसरी महत्वपूर्ण चित्रित पुस्तक भागवत सूक्ष्म-अक्षरी है जिसका आकार 6.9 इंच गुणा 3 इंच है। इसमें सुनहरी रेखांकन का काम है तथा इसमें 18वीं शताब्दी में बने दशावतार के चित्र हैं। यहाँ एक गीता भी सूक्ष्म अक्षरी है जिसमें इतने बारीक अक्षर हैं कि इसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से पढ़ने में भी कठिनाई आती है। इसका आकार साढे़ आठ इंच गुणा साढ़े पांच इंच है।

    एक अन्य गीता सप्त श्लोकी कर्त्तारित अक्षरी है। गीता पंचरत्न नामक ग्रंथ में 236 पृष्ठ एवं 23 चित्र हैं तथा कई जगह अक्षर स्वर्ण में लिखे गए हैं। स्वर्ण अक्षरों से युक्त एक अन्य ग्रंथ में शत्रुशल्यस्तोत्र भी सम्मिलित है। दुर्जनशल्यस्तोत्र काले रंग के पृष्ठ पर सफेद स्याही से लिखा गया है।

    आशीर्वचन तथा सिद्धान्त रहस्य भी प्रमुख ग्रन्थ हैं। अन्य प्रमुख ग्रन्थ हैं- कल्पसूत्र, यक्रसार, वल्लभोत्सव चन्द्रिका, सर्वाेत्तम नवरत्न, पृथ्वीराज-युद्ध, डूंगसिंह की वीरगाथा, अश्व परीक्षा, ज्ञान चौपड़ आदि। उम्मेदसिंह चरित काव्य में कोटा के पुराने इतिहास का उल्लेख है। कुरान मजीद ग्रन्थ का आकार 7 इंच गुणा 4 इंच है। इसमें 764 पृष्ठ हैं। यह अरबी लिपि में लिखा है तथा इसमें सुन्दर कारीगरी का काम है।

    एक चावल पर उत्कीर्ण गायत्री मंत्र भी इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण वस्तु है। इसमें 268 अक्षर हैं। यह उत्कीर्ण चावल 11 सितम्बर 1939 को महाराव उम्मेदसिंह की सालगिरह पर दिल्ली के फतह संग्रहालय द्वारा तैयार कर भेंट किया गया था।

    चित्रशाला कक्ष

    चित्रशाला कक्ष में 10वीं से 19वीं शताब्दी के लघुचित्रों को प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शित लघुचित्रों में कृष्णलीला (नामकरण, कृष्ण लालन, बाल-लीला, माखन चोरी, गौ-चारण, कालियादमन, रासक्रीड़ा, केशि वध, तृणावत वध, बकासुर वध, दावानल पान आदि) से सम्बन्धी चित्र, सांस्कृतिक उत्सवों, होली, गणगौर, घुड़-दौड़, शिकार आदि के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। 18वीं-19वीं सदी के कुछ चित्रों में बहुत ही रोचक चित्रण दर्शाया गया है। एक हाथी ने दूसरे हाथी पर अपना दांत गड़ाकर उसे लहूलुहान कर दिया है। दूसरा भी हार मानने को तेयार नही है। वह झुक कर शत्रु हाथी के पेर में सूंड डालकर पटखनी देने का प्रयास कर रहा है।

    स्वतन्त्रता संग्राम कक्ष

    स्वतन्त्रता संग्राम कक्ष में हाड़ौती क्षेत्र के ई.1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के दो चित्रों का प्रदर्शन किया गया है। ई.1857 से स्वतन्त्रता प्राप्ति तक के संग्राम में अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले कतिपय स्वतन्त्रता सेनानियों का योगदान, उनके छायाचित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय भवन

    संग्रहालय भवन अर्थात् ब्रज विलास भवन राज्य सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है। भवन के कक्षों की जालियाँ, झरोखे, घुमावदार तथा उन पर टिके हुए तिकोन, आयाताकार छज्जे, चौकोर एवं गोलाकार स्तम्भों पर टिकी छज्जों से युक्त छतरियाँ एवं बरामदे आदि स्थापत्य शिल्प उत्तर मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य शैली का सुन्दर नमूना है। रियासती काल में यह भवन अनेक महत्वपूर्ण प्रयोजनों जैसे कोटा राज्य शासकों की अन्य शासकों के साथ गुप्त संधियाँ, मन्त्रणाएं, विभिन्न उत्सवों पर कोटा महाराव द्वारा अपने सगे-सम्बन्धियों, सरदारों, उमरावों आदि को दिए जाने वाले भोज हेतु उपयोग में आता रहा था। इस प्रकार ब्रज विलास संग्रहालय भवन अपने में हाड़ौती अंचल की पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए है।

    बावड़ी

    संग्रहालय परिसर में बनी हुई एक मध्यकालीन बावड़ी भी दर्शनीय है।


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  • जयपुर महाराजा को विश्वास था कि कम्पनी उसके राज्य की रक्षा करेगी

     02.07.2017
    जयपुर महाराजा को विश्वास था कि कम्पनी उसके राज्य की रक्षा करेगी

    आम्बेर राज्य के 34वें कच्छवाहा राजा जगतसिंह (ई.1803-1818) ने 12 दिसम्बर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ संधि की किंतु ई.1805 में अंग्रेजों द्वारा संधि को भंग कर दिया गया। ई.1816 में भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा जयपुर राज्य के बीच पुनः संधि हुई किंतु यह संधि भी अंग्रेजों द्वारा खिराज की भारी रकम मांगे जाने के कारण भंग हो गयी थी।

    कुछ समय के उपरांत ही परिस्थितियों ने जयपुर महाराजा जगतसिंह और ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पुनः संधि करने के लिये बाध्य कर दिया। मराठा सरदार सिंधिया और होलकर निर्भय होकर सारे राजस्थान में तथा जयपुर रियासत में लूटमार करने लगे। रियासत को पिंडारियों की लूटमार का भी शिकार होना पड़ा। यही नहीं, रियासत के सामन्त भी महाराजा के विरुद्ध विद्रोह करने लगे।

    मराठों एवं पिण्डारियों के बढ़ते हुए हस्तक्षेप तथा अपने जागीरदारों की विद्रोही गतिविधियों से परेशान होकर महाराजा जगतसिंह ने राज्य की सुरक्षा के लिये अंग्रेजों से संधि करने का प्रयास किया। अंग्रेजों के साथ संधिवार्ता करने के लिये सामोद के रावल बैरीसाल नाथावात के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मण्डल फरवरी 1818 में दिल्ली भेजा गया। ब्रिटिश सरकार भी अब अपने साम्राज्य विस्तार में मराठों एवं पिण्डारियों को बाधक समझ कर उनकी शक्ति का दमन करना चाहती थी। काफी चर्चा के उपरांत 2 अप्रेल 1818 को ईस्ट इण्डया कम्पनी और जयपुर रियासत के मध्य संधि हुई। इस संधि की प्रमुख धाराएं इस प्रकार से थीं -

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महाराजा जगतसिंह तथा उसके उत्तराधिकारियों में मित्रता, लाभ और एकता के सम्बंध बने रहेंगे। महाराजा के उत्तराधिकारी संधि की पालना के लिये बाध्य होंगे। एक पक्ष के शत्रु और मित्र दूसरे पक्ष के शत्रु और मित्र होंगे। अर्थात् यदि किसी एक पक्ष पर शत्रु आक्रमण करते हैं तो उसे दोनों पक्षों पर आक्रमण माना जायेगा।

    ब्रिटिश सरकार जयपुर रियासत की सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेती है। अंग्रेज जयपुर के शत्रुओं को खदेड़ने में जयपुर की सहायता करेंगे। महाराजा जगतसिंह और उसके उत्तराधिकारी ब्रिटिश सरकार के साथ अधीनस्थ सहयोगी की हैसियत से काम करेंगे तथा उसकी प्रभुता स्वीकार करेंगे और अन्य राज्यों अथवा अन्य राज्य प्रमुखों से किसी प्रकार के सम्बंध नहीं रखेंगे।

    महाराजा और उसके उत्तराधिकारी किसी भी राज्य अथवा राज्य प्रमुख से किसी भी प्रकार की संधि या पत्र व्यवहार ब्रिटिश सरकार की जानकारी और अनुमोदन के बिना नहीं करेंगे। सामान्य पत्र व्यवहार मित्रों तथा सम्बंधियों के साथ करते रहेंगे। बिना अंग्रेजों की अनुमति के महाराजा और उसके उत्तराधिकारी किसी अन्य राज्य पर आक्रमण नहीं करेंगे। यदि किसी अन्य राज्य के साथ विवाद हो जाता है तो उसे मध्यस्थता तथा निर्णय के लिये ब्रिटिश सरकार को सौंप देंगे।

    जयपुर नरेश नियमित रूप से खिराज की राशि ब्रिटिश सरकार के दिल्ली कोषागार में जमा करवाते रहेंगे। पहले वर्ष के लिये खिराज की राशि जयपुर में निरंतर हुए विनाश को देखते हुए माफ कर दी गयी। दूसरे वर्ष से यह राशि इस प्रकार तय की गयी- दूसरे वर्ष के लिये 4 लाख, तीसरे वर्ष 5 लाख, चौथे वर्ष 6 लाख, पाँचवे वर्ष 7 लाख तथा छठे वर्ष 8 लाख रुपये। इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि जब राज्य की राजस्व आय 40 लाख वार्षिक से अधिक हो जायेगी तो उसका 5/16 भाग 8 लाख की खिराज राशि के अतिरिक्त और देय होगा।

    ब्रिटिश सरकार की मांग पर जयपुर रियासत अपने साधनों के अनुसार अपनी सेवाएं प्रदान करेगी। महाराजा और उसके उत्तराधिकारी अपने राज्य के स्वतंत्र शासक बने रहेंगे। ब्रिटिश सरकार के दीवानी और फौजदारी कानून को वहाँ पर लागू नहीं किया जायेगा। जब तक महाराजा ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी सच्ची मित्रता का इजहार करता रहेगा, तब तक कम्पनी उसे सुरक्षा और उसके विकास में मदद देती रहेगी। यह संधि कम्पनी सरकार की ओर से सर चार्ल्स मेटकाफ तथा महाराजाधिराज जगतसिंह की ओर से उनके प्रतिनिधि ठाकुर बेरीसाल नाथावत के मध्य 2 अप्रेल 1818 के दिन सम्पन्न हुई। गवर्नर जनरल के सचिव टी. जे. एडम ने 15 अप्रेल 1818 को इस संधि का अनुमोदन कर दिया।

    ई.1803 की संधि में जयपुर राज्य के प्रति कम्पनी की ओर से जिस मित्रता और आदर का भाव था वह इस संधि में अनुपस्थित था। अब रियासत बराबरी की स्थिति में न रहकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीनस्थ हो गयी थी। इस संधि के उपरांत महाराजा जगतसिंह की स्थिति अपने जागीरदारों के बीच काफी मजबूत हो गयी तथा रियासत को मराठों और पिण्डारियों से मुक्ति मिल गयी।

    इस संधि में सर्वाधिक उल्लेखनीय बात यह थी कि खिराज की जो राशि तय की गयी वह बहुत भारी थी। इतनी बड़ी धनराशि जयपुर के शासकों ने न तो कभी मुगलों को दी थी और न मराठों को। मुगलों या मराठों को जो राशि देय होती थी वह पूर्ण रूप से कभी भी नहीं चुकायी जायी जाती थी। सदैव ही कुछ न कुछ बाकी रहा करती थी किंतु ईस्ट इण्डिया कम्पनी तो खिराज की राशि निश्चत तारीख से पहले ही वसूल कर लेती थी। खिराज की यह रकम राज्य की आय को देखते हुए बहुत अधिक थी।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने के कुछ माह बाद 21 दिसम्बर 1818 को महाराजा जगतसिंह की मृत्यु हो गयी। कहा जाता है कि इस संधि के हो जाने से जगतसिंह अपनी मृत्यु के समय अत्यंत आश्वस्त था कि उसका राज्य मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से मुक्त हो गया है और भविष्य में ब्रिटिश कम्पनी उसकी बाह्य आक्रमणों से रक्षा करेगी।

    जगतसिंह के कोई संतान नहीं थी इसलिये प्रधानमंत्री मोहनराम तिवाड़ी ने नरवर के पूर्व राजा के पुत्र मोहनसिंह को जयपुर का महाराजा घोषित कर दिया किंतु अन्य सामंतों ने इसका विरोध किया किंतु जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी को यह ज्ञात हुआ कि स्व. महाराजा की एक पत्नी गर्भवती है तो उसने मोहनसिंह को जयपुर का राजा नहीं बनने दिया। 25 अप्रेल 1819 को भटियानी रानी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इसी बालक को जयसिंह तृतीय के नाम से जयपुर का महाराज बना दिया। दिल्ली के रेजीडेण्ट सर डेविड ऑक्टरलोनी ने जयपुर में रीजेंसी की सरकार बनायी तथा राजमाता (भटियानी रानी) राज्य की रीजेण्ट बनायी गयी।

    जयपुर का प्रधानमंत्री मोहनराम तिवाड़ी रेजीडेंट ऑक्टरलोनी का आदमी था किंतु राजमाता ने रावल बेरीसाल को राज्य का मुख्तार (प्रधानमंत्री) बना दिया। इस बात पर राजमाता तथा ऑक्टरलोनी में मनमुटाव हो गया। ऑक्टरलोनी ने राजमाता के प्रभाव को कम करने के लिये राजमाता के विरोधी गुट को बढ़ावा दिया जिससे जयपुर राज्य में षड़यंत्र, कलह तथा गुटबाजी ने जोर पकड़ लिया। रावल बेरीसाल राजमाता का पक्ष छोड़कर ऑक्टरलोनी से मिल गया। इस पर राजमाता ने फौजीराम को अपना सलाहकार बनाया। 14 दिसम्बर 1820 को महल की चारदीवारी में फौजीराम तथा कुछ और लोगों की हत्या कर दी गयी। राजमाता ने बैरीसाल के प्रतिद्वंद्वी झूथाराम को अपना प्रमुख सलाहकार बनाया।

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  • अध्याय - 23 राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा

     01.07.2018
     अध्याय - 23 राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा

     अध्याय - 23 राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा


    राजस्थान के हाड़ौती अंचल में पर्यटन हेतु आने वाले देशी एवं विदेशी पर्यटकों में जिन दर्शनीय स्थानों पर जाने की ललक दिखाई देती है उनमें कोटा नगर के प्राचीन गढ़ परिसर स्थित महलों में गैर सरकारी स्तर से संचालित किया जा रहा राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय प्रमुख है। इस संग्रहालय की स्थापना कोटा एवं हाड़ौती अंचल की कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण एवं प्रदर्शन के लिए उद्देश्य से दृष्टि से राजस्थान दिवस पर 30 मार्च, 1970 को की गई थी।

    राजमहल के मुख्य प्रवेश द्वार ‘हथियापोल’ से प्रवेश कर इस संग्रहालय में पहुंचा जाता है। हथियापोल में दोनों ओर स्थित कलात्मक हाथियों को कोटा शासक महाराव भीमसिंह (प्रथम) (वि.सं. 1764-1777) बूंदी से लाया था और उसने ही द्वार पर स्थापित करवाया था। हथियापोल से प्रवेश करने पर पहले कोटा राजपरिवार के आराध्य देव बृजनाथजी का मंदिर आता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप बोरसली की ड्यौढ़ी से अंदर जाने पर विशाल खुला चौक आता है जो राजमहल का आन्तरिक चौक है। यहीं पर संग्रहालय के विविध कक्ष बने हुए हैं जिनमें प्रदर्शित प्राचीन सामग्री दर्शकों को लुभाती है। इस संग्रहालय को चित्रकला की दृष्टि से अनुपम माना जाता है।

    संग्रहालय के दरबार हाल की पुरा-वस्तुओं में महाराव उम्मेदसिंह (द्वितीय) की आदमकद आकर्षक मूर्ति, राजसी साजो समान, विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र यथा-पैरों से बजाए जाने वाला हारमोनियम, सुबिर वाद्य बांक्या, करनाल, ईसर गणगौर की प्रतिमाएं, 120 पत्तों का खेल गंजीफा, चौपड़, खिलौने, राजसी वó तथा उन्हें रखने का पिटारा, हाथीदांत, संगमरमर तथा चीनी मिट्टी की कलात्मक वस्तुएं केरोसीन से चलने वाला पंखा, सवारी में प्रयुक्त होने वाला सुनहरी हौदा, राजचिन्ह का कलात्मक चिह्न, चांदी का हौदा, हाथी दांत एवं धातुओं की चौपड़, चांदी के खिलौने तथा अन्य कलात्मक वस्तुएं यथा सिंहासन, सुनहरी महाजन, पालकियां, श्रीनाथजी का सिंहासन एवं बाजोट, चांदी के दीप स्तम्भ, मीनाकारी तथा जड़ाऊ के काम का ठाकुरजी का पालना, तैरने के तूम्बे, कलमदान, सिद्धयंत्र, राजसी हुक्के, झाला जालिमसिंह के नहाने का 29 सेर वजन का पीतल का चरा, संगमरमर का कलात्मक ऐरावत, कमर में बांधा जा सकने वाला कलमदान आदि सैकड़ों कलात्मक, दुर्लभ एवं आकर्षक वस्तुएँ हैं।

    दरबार हाल के बाहर बरामदे में जलघड़ी, धूपघड़ी, खगोल यंत्र प्रदर्शित हैं। राजमहल चौक में पुरानी नौबतें रखी हैं जिसमें मुकुन्द सिंह के काल की नौबत भी है जो कोटा रियासत का द्वितीय शासक था।

    शस्त्र कक्ष

    दरबार के आगे राजमहल के दाहिनी ओर की गैलेरी में मध्ययुगीन अस्त्र-शस्त्रों के अलावा कोटा के शासकों द्वारा काम में लिए गए शस्त्र भी प्रदर्शित हैं। एक म्यान में दो तलवारें, पिस्तौल सहित तलवार, ढालें, अनेक प्रकार की कटारें, भाले, बरछे, नेजे, तीर-कमान, फरसा, गदा, खुखरी, गुप्तियां, छड़ियां, खंजर, पेशकब्ज, कारद, बन्दूकें, सुनहरी पिस्तौल के अलावा राज्य का झण्डा, निशान, सुनहरी चोब, सुनहरी मोरछल एवं चंवर दर्शनीय हैं। सोने का मुगल-कालीन राजकीय चिन्ह माही मरातिब’ भी इसी कक्ष में देखा जा सकता है। कोटा नरेश महाराव भीमसिंह (प्रथम) को उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए मुगल बादशाह मोहम्मदशाह ने ई.1720 में प्रदान किया था। इसी मुगल शासक द्वारा प्रदत्त सर्वधातु की नक्कारा जोड़ी तथा योद्धा एवं अश्व को पहनाने का जिरह बख्तर भी माधोसिंह संग्रहालय की अनूठी चीजें हैं।

    वन्यजीव कक्ष

    इस कक्ष में कोटा के राजपरिवार के सदस्यों द्वारा शिकार के दौरान मारे गए चुनिन्दा वन्य जीव हैं, जिनमें शेर, तेन्दुआ, सिंह, सांभर, भालू, घड़ियाल, गौर मछली, खरमौर एवं काले तीतर आदि सम्मिलित हैं। सैकड़ों वर्षों पूर्व मारे गए जीव-जन्तु विशेष तकनीक से सुरक्षित रखे हुए हैं जो आज भी जीवन्त प्रतीत होते हैं।

    छायाचित्र कक्ष

    वन्यजीव कक्ष से लगे छायाचित्र कक्ष में ई.1880 से वर्तमान काल तक के अनेक छायाचित्र प्रदर्शित हैं। ई.1857 की क्रान्ति के दौरान कोटा में किस स्थान पर क्या घटना घटित हुई थी इसका चित्रण यहाँ प्रदर्शित एक मानचित्र में किया गया है। यह नक्शा कोटा के पूर्व महाराव बृजराज सिंह ने तैयार किया है।

    चित्र कक्ष

    इस कक्ष में मुगल तथा कोटा-बूंदी के चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। चित्रकारों द्वारा बनाए गए इन कलात्मक चित्रों में गज एवं अश्व में विश्व दर्शन, श्रीनाथजी का नवनिधि चित्र जिसमें गोस्वामी बालकों को विशेष वेशभूषा में दर्शाया गया है, कोटा चित्र शैली के प्रतिनिधि चित्र हैं।

    राजमहल कक्ष

    यह कक्ष भी संग्रहालय का ही हिस्सा है जिसमें अभी भी राजगद्दी की प्रतिकृति रखी है। रियासत काल में यहीं पर दरीखाना भी होता था। दरबार राजगद्दी पर बैठते थे और उमराव, सामन्त, उच्च अधिकारी, राज मान्यता प्राप्त विशिष्ट जन हाड़ौती की राज दरबारी पोशाक में अपने-अपने निर्धारित स्थान पर बैठते थे। इस कक्ष में कांच की कारीगरी का काम मुगलयुगीन है। कांच की कारीगरी में मीनाकारी, डाक की जड़ाई, जामी कांच की जड़ाई, गोलों के कांच की जड़ाई, साणा की जड़ाई कोटा के बेगरी परिवार के शिल्पकारों द्वारा निर्मित है। राजमहल की दीवारों में सफेद चूने में गहरे नीले, हरे तथा कत्थई रंगों के कांच का काम दर्शनीय है। इसी कक्ष में कोटा राज्य का केसरिया गरुड़ ध्वज एक चित्र पर प्रदर्शित है। दाहिनी ओर कोटा राज्य का सुन्दर नक्शा, बाईं ओर बूंदी राजघराने का वंशवृक्ष तथा उसी के पास कोटा राजघराने का वंशवृक्ष प्रदर्शित किया गया है। एक बड़े चार्ट में दरीखाने में उपस्थित व्यक्तियों की बैठने की स्थिति दर्शायी गई है।

    राजमहल की ऊपरी मंजिल के अधिकांश कक्ष चित्रित हैं जिनमें लक्ष्मी भंडार तिबारी, अर्जुन महल, छत्र महल में कोटा शैली के अनुपम भित्तिचित्र बने हैं। भीम महल में लगे कालीन बहुत सुन्दर एवं कलात्मक हैं जिन्हें कोटा जेल के कैदियों ने बनाया था। तीसरी मंजिल पर स्थित बड़ा महल का निर्माण कोटा के प्रथम शासक राव माधोसिंह (वि.सं. 1681-1705) ने करवाया था। इस महल में राजस्थान की सभी चित्र शैलियों में बनाए गए भित्तिचित्र प्रदर्शित हैं। पूरा महल चित्रों से भरा हुआ है। सवारी, दरबार और उत्सव आदि विविध विषयों को कलमकारों ने प्राकृतिक रंगों से चित्रित किया है। महल के बाह्य कक्ष में अधिकांश चित्र कांच के फ्रेम में दीवार पर जड़े हुए हैं। इसी से लगा हुआ एक आकर्षक झरोखा है, जिसे ‘सूरज गोख’ कहते हैं। इसमें रंगीन कांच का काम बड़ा ही सुन्दर बन पड़ा है।


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  • राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग

     12.07.2017
    राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग

    राजस्थान के ऐतिहासिक दुर्ग

    लेखक - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    प्रकाशक - राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर


    प्रथम संस्करण-  जुलाई 2017

    भूमिका

    ‘दुः’ का तात्पर्य दुष्कर (कठिन) से है तथा ‘ग’ का तात्पर्य गमन करने से है। अर्थात् दुर्ग का तात्पर्य उस रचना से है जिस तक गमन करना कठिन होता है। दुर्ग से ही दुर्गम बना है। अतः सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘दुर्ग’ स्थापत्य की वह रचना है जो शत्रु से सुरक्षा तथा युद्ध के लिये विशेष रूप से तैयार की गई हो। सामान्य शब्दों में कहें तो जिस भवन अथवा भवन समूह के चारों ओर प्राकार (प्राचीर अथवा परकोटा) हो, जिसमें सैनिक सन्नद्ध हों, जिसकी प्राचीर पर युद्ध उपकरण लगे हों, जिसमें शत्रु आसानी से प्रवेश न कर सके, जिसका मार्ग दुर्गम हो, शत्रु जिसमें प्रवेश करके भी राजा तक न पहुंच पाये, आदि गुणों से युक्त भवन को दुर्ग कहा जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक दुर्ग में ये सभी गुण हों। सामान्यतः वह भवन जिसके चारों ओर सुदृढ़ परकोटा हो, दुर्ग कहा जा सकता है। मानव जाति ने दुर्ग अथवा दुर्ग की तरह का परिघा (प्राकार अथवा परकोटा) तथा परिखा (खाई) से युक्त आवासीय बस्तियों की रचना करने की कला मध्य-पाषाण काल में ही सीख ली थी ताकि वह वन्य पशुओं तथा शत्रुओं से अपनी रक्षा कर सके। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, प्राकार निर्माण मानव सभ्यता की आवश्यकता बन गया। जब राज्य नामक व्यवस्था आरम्भ हुई तो राजा के लिये दुर्ग का निर्माण करना आवश्यक हो गया।

    शुक्र नीति में राज्य के सात अंग- राजा, मंत्री, सुहृत, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना बताये हैं। अर्थात् इन सात चीजों के होने पर ही राज्य स्थापित हो सकता था। शुक्र नीति में दुर्ग को राज्य का हाथ और पैर कहा गया-

    दृग मांत्यं सुहच्छोत्रं मुखं कोशो बलं मनः

    हस्तौ पादौ दुर्गे राष्ट्रे राज्यांगानि स्मृतानि हि।।


    मनुस्मृति में कहा गया है कि दुर्ग में स्थित एक धनुर्धारी, दुर्ग से बाहर खड़े सौ योद्धाओं का सामना कर सकता है तथा दुर्ग में स्थित सौ धनुर्धारी, दस हजार सैनिकों से युद्ध कर सकते हैं-

    एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।

    शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्ग विधीयते।।


    आगे चलकर जब जनपदों, महाजनपदों एवं चक्रवर्ती साम्राज्यों की स्थापना हुई तो एक-एक सम्राट के अधीन कई-कई दुर्ग होने लगे। सम्राट अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये दुर्गों की विशाल श्ृंखला खड़ी करने लगे। ये दुर्ग-श्ृंखलाएं बड़े-बड़े साम्राज्यों का आधार बन गईं। यही कारण है कि राजा, महाराजा, सामंत, ठिकाणेदार तथा सेनापतियों ने अपनी तथा अपने राज्य अथवा क्षेत्र की सुरक्षा के लिये विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण करवाया। ऋग्वेद में दुर्ग अथवा पुर के कई उदाहरण मिलते हैं। उस काल में दुर्ग चौड़े तथा विशाल होते थे और उनके अंदर विस्तृत क्षेत्र होता था। इसकी तुलना मध्यकालीन नगर परकोटे से की जा सकती है।

    समय के साथ, दुर्ग के स्थापत्य एवं शिल्प में विकास होता गया और दुर्गों की रचना जटिल होती चली गई। दुर्ग का प्राकार दोहरा और कहीं-कहीं तो तिहारा भी हो गया। भरतपुर के दुर्ग में दुर्ग-प्राचीर के बाहर मिट्टी की प्राचीर बनवाई गई थी ताकि तोप के गोले मिट्टी की दीवार में धंस जायें और दुर्ग का वास्तविक प्राकार सुरक्षित रह सके। दुर्ग के चारों ओर खाई खोदकर उसमें पानी भरने की व्यवस्था की गई ताकि शत्रु आसानी से दुर्ग की प्राचीर तक नहीं पहुंच सके।

    संस्कृत साहित्य में गढ़ की रचना के संदर्भ में कपिशीश नामक एक संरचना का उल्लेख मिलता है। इसे राजस्थान में कवसीस कहा जाता था। बाद में इन्हें जीवरखा कहा जाना लगा। जीवरखा, टेढ़-मेढ़े ढलान युक्त मार्गों पर बनाया गया एक छोटा गढ़ होता था जिसमें सैनिक रखे जाते थे। इसे अंगरखा भी कहते थे। दुर्ग के ऊपर चार-पांच अश्वों के एक साथ चल सकने योग्य चौड़ी प्राचीर बनाई जाती थी इन्हीं पर घुमटियों के रूप में जीवरखे अथवा अंगरखे बनाये जाते थे। यहाँ से दुर्ग रक्षक सैनिक आक्रांता सैनिकों पर तीर, गर्म तेल, पत्थर आदि फैंकते थे। जब तोपों का प्रचलन हो गया तो प्राचीर के ऊपरी हिस्से में मोखे बनाये जाने लगे जिनमें तोपों के मुंह खुलते थे। दुर्ग की प्राचीर को मजबूत बनाने के लिये उसके बीच-बीच में गोलाकार बुर्ज बनाई जाने लगी जो भीतर से पोली होती थी। यह एक प्रकार से कपिशीश का ही परिष्कृत रूप थी। इसके भीतर सैनिक एवं युद्ध सामग्री संगृहीत की जाती थी।

    दुर्ग में स्थित राजा अथवा सम्राट के आवास तक पहुंचने के लिये एक से अधिक संख्या में दरवाजों का निर्माण होता था जिन्हें पोल कहते थे। इन पोलों पर सैनिकों का कड़ा पहरा रहता था। राजस्थान के अधिकांश बड़े दुर्गों में कई-कई पोल हैं। इनमें पूर्व की तरफ का दरवाजा सामान्यतः सूरजपोल, पश्चिम की ओर का चांद पोल तथा उत्तर की ओर का धु्रव पोल कहलाता था। दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर फैंकने के यंत्र लगाये जाते थे। यह चड़स जैसा यंत्र होता था जिसके माध्यम से पत्थर के गोले दूर तक फैंके जा सकते थे। इन यंत्रों का आविष्कार मनुष्य द्वारा उत्तर वैदिक काल में कर लिया गया था। इन्हें, ढेंकुली, नालि, भैंरोयंत्र तथा मरकटी यंत्र आदि नामों से पुकारा जाता था। इन यंत्रों का उपयोग सोलहवीं शताब्दी ईस्वी अर्थात् तब तक होता रहा जब तक कि भारतीय शासकों को तोपें और बंदूकें प्राप्त नहीं हो गईं। रणथंभौर दुर्ग में शत्रु पर दुर्ग की प्राचीर से जल प्रवाहित करने की व्यवस्था थी। ऐसी व्यवस्था अन्य दुर्गों में देखने को नहीं मिली है।

    हिन्दू किलों को तोड़ने के लिये मुगलों ने तीन प्रकार की रचनाएं काम में लीं- पाशीब, साबात तथा बारूद। किले की प्राचीर की ऊंचाई तक मिट्टी तथा पत्थरों की सहायता से चबूतरा बनाया जाता था जिसे पाशीब कहते थे। पाशीब का निर्माण सरल नहीं था क्योंकि पाशीब बनाने वाले शिल्पियों एवं सैनिकों पर दुर्ग की प्राचीर से पत्थर के गोले बरसाये जाते थे। उन्हें सुरक्षा देने के लिये साबात बनाये जाते थे। साबात गाय, बैल, भैंस या भैंसे आदि पशुओं के मोटे चमड़े की छावन को कहते थे। किले से बरसने वाले पत्थरों की मार से बचने के लिये मोटे चमड़े की लम्बी छत बनाई जाती थी जिसके नीचे रहकर सैनिक दुर्ग की दीवार तक पहुंच जाते थे तथा दुर्ग की नींव एवं दीवारों में बारूद भरकर उसमें विस्फोट करते थे। अकबर ने चित्तौड़ के किले को तोड़ने के लिये ये तीनों तरीके काम में लिये थे।

    दुर्ग के भीतर सम्पूर्ण नगर बसाने, खेती करने एवं पशु पालन करने की भी परम्परा थी ताकि यदि दुर्ग को शत्रु द्वारा घेर लिया जाये तो लम्बे समय तक दुर्ग के भीतर खाद्य सामग्री एवं अन्य जीवनोपयोगी सामग्री की उपलब्धता बनी रह सके। जालोर दुर्ग, दणथंभौर दुर्ग, चित्तौड़ दुर्ग आदि पर मुसलमान शासकों ने कई-कई वर्ष लम्बे घेरे डाले किंतु दुर्ग के भीतर की स्वावलम्बी व्यवस्था के कारण वे दुर्ग पर तभी विजय प्राप्त कर सके जब या तो दुर्ग के भीतर रसद सामग्री बिल्कुल ही समाप्त हो गई या फिर किसी अपने ने दुर्ग के भेद, आक्रमणकारी को दे दिये। जालोर, सिवाना, रणथंभौर आदि दुर्गों का पतन ऐसे ही धोखों से हुआ था।

    राजस्थान के दुर्गों को एक भवन या भवनों का समूह न मानकर एक परम्परा माना जाना चाहिये। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि किसी दुर्ग की स्थापना किसी समय में, किसी वंश के किसी राजा ने की। समय के साथ वह राजा और उसका वंश दोनों इतिहास के नेपथ्य में चले गये किंतु दुर्ग वहीं पर बना रहा। उसका हस्तांतरण, जीर्णोद्धार, पुननिर्निर्माण एवं विस्तार भी हुआ किंतु उसका मूल निर्माता, दुर्ग की जो संरचना करके चला गया, उसमें आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया जा सका। इस पुस्तक में दुर्गों का वर्गीकरण उसके मूल निर्माताओं के काल अथवा वंश के आधार पर किया गया है। उदाहरण के लिये महाभारतकालीन दुर्ग, यादवों के दुर्ग, गुहिलों के दुर्ग इत्यादि।

    दुर्ग बनाने में निष्णात कुछ शिल्पियों ने दुर्ग रचना, शिल्प एवं स्थापत्य पर ग्रंथों की रचना भी की। इनमें महाराणा कुंभा के आश्रित शिल्पी मंडन का नाम प्रमुख है। राजस्थान के दुर्ग निर्माताओं में महाराणा कुंभा का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। माना जाता है कि कुंभा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया। उसके समय मेवाड़ राज्य के अधीन दुर्गों की संख्या 84 तक जा पहुंची थी।

    यद्यपि राजस्थान के समस्त राजपूत शासकों के लिये, शत्रु से अपनी सुरक्षा के लिये दुर्ग का होना अनिवार्य था किंतु इनमें भी हाड़ा चौहान गढ़ में अपनी मजबूती के लिये प्रसिद्ध हुए। इस सम्बन्ध में एक दोहा देखा जा सकता है-

    बलहठ बंका देवड़ा, करतब बंका गौड़।

    हाड़ा बांका गाढ़ में, रण बंका राठौड़।।


    प्रस्तुत पुस्तक में राजस्थान के छोटे-बड़े सभी प्रकार के दुर्गों को लेने का प्रयास किया गया है किंतु सभी दुर्गों को समाहित किया जाना सम्भव नहीं हो सका। दुर्ग वर्णन में, महत्वपूर्ण दुर्गों के निर्माण काल, दुर्ग के शासक, इतिहास, दुर्ग में घटित विशिष्ट घटनाएं तथा प्रमुख स्थापत्य विशिष्टताओं का समावेश किया गया है। कुछ भूले-बिसरे दुर्ग जो काल के गाल में समा गये, उन्हें भी इस पुस्तक में स्थान देने का प्रयास किया गया है। आशा है यह पुस्तक पाठकों के लिये उपयोगी सिद्ध होगी।


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  • अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

     01.07.2018
    अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

    अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ राज्य में हाड़ौती क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। उस समय इसका नाम आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम रखा गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा सर भवानीसिंह (ई.1874-1929) की इस संग्रहालय की स्थापना एवं वृद्धि में गहन रुचि रही। उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री, शिलालेख, प्रतिमाएँ, सिक्के, हस्तलिखित ग्रंथ, अस्त्र-शस्त्र, दुर्लभ चित्र तथा हस्तशिल्प का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई।

    वर्तमान में यह संग्रहालय राजस्थान सरकार के पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग के अधीन कार्य कर रहा है। वर्ष 2011 में इस संग्रहालय को गढ़-पैलेस में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ यह आज भी काम कर रहा है।

    हाड़ौती क्षेत्र में कोटा के आलनिया, गेपरनाथ, दरा, जवाहर सागर बांध, बारां के कन्यादह (कृष्ण विलास), कपिलधारा, बूंदी के गरड़दा, रामेश्वर, भीमलत, देवझर, नलदेह, केवड़िया, धारवा, पलका, सुई का नाका एवं झालावाड़ जिले के कालीसिंध एवं आहू के संगम पर गागरोन दुर्ग, आहू नदी के निकट भीलवाड़ी, आमझीरी नाला आदि क्षेत्रों से प्रस्तर युगीन मानव सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इस सामग्री में से बहुत सी सामग्री राजकीय संग्रहालय कोटा में रखी गई है तथा शेष प्रतिमाएँ, पुरा सामग्री एवं कलाकृतियां झालावाड़ संग्रहालय में छः दीर्घाओं में प्रदर्शित की गई हैं।

    प्रतिमा दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में प्रमुख रूप से हाड़ौती क्षेत्र के ध्वस्त मंदिरों से प्रतिमाएँ लाकर संगृहीत की गई हैं। प्रत्येक कालखण्ड के मूर्तिकारों ने अपने काल को अलग दिखाने के लिए अपनी प्रतिमाओं में कुछ विशिष्ट चिह्न बनाए हैं, जिनके आधार पर प्रतिमाओं के निर्माण काल का अनुमान लगाया जा सकता है। इन प्रतिमाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक इस क्षेत्र में मूर्तिकला का निरंतर विकास होता रहा।

    इन प्रतिमाओं में गुप्तकालीन प्रतिमाओं को देवी-देवताओं के शरीर के गठीलेपन के आधार पर पहचाना जाना संभव है। गुप्त काल के बाद की प्रतिमाओं में यह लक्षण शनैःशनैः कम होता चला गया है तथा उनके आभूषणों एवं वस्त्रों का अंकन बढ़ता चला गया है। जहाँ से ये प्रतिमाएँ लाई गई हैं, उन मंदिरों के अवशेष आज भी जंगलों में बिखरे पड़े हैं।

    झलावाड़ संग्रहालय की प्रतिमाएँ भले ही गुप्तकाल के लगभग पांच सौ साल बाद की हैं किंतु इनका वैभव किसी भी प्रकार कम नहीं है। शिल्पकारों ने नृत्यांगनाओं के अंगों की मांसलता, मुखमण्डल की कमनीयता एवं ऐन्द्रिक तृप्ति का भाव दर्शाने में किंचित भी कंजूसी नहीं बरती है। उन्नत उरोज, विशाल आंखें, लम्बी बाहें, पुष्ट जंघाएं एवं रमणभाव से खड़े होने की मुद्रा, दर्शक को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती हैं। दलहनपुर के देवालयों में निर्मित सभामण्डप एवं रंगमण्डप के गोलाकार स्तम्भों पर मूर्तिकला का अद्भुत अंकन किया गया है।

    दलहनपुर एवं सूर्यमंदिर झालरापाटन इस क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्यकला शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं। संग्रहालय में रखी गई अधिकांश प्रतिमाएँ अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में हैं। संग्रहालय के मुख्य हॉल एवं बरामदे में काकूनी, अटरू, विलास, रामगढ़, बारां आदि स्थालों से लाई गई प्रतिमाएँ प्रमुखता से प्रदर्शित हैं जो 6ठी से 18वीं सदी की हैं। इनमें अर्द्धनारीश्वर, नरवाराह, चामुण्डा, चक्रपुरुष, लकुलीश, सूर्य, बटुक भैरव, सुर-सुंदरी आदि महत्वपूर्ण हैं। हाड़ौती क्षेत्र से वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर, बौद्ध और जैन आदि विभिन्न सम्प्रदायों की प्रतिमाएँ उपलब्ध हुई हैं जिन्हें इस संग्रहालय में एक साथ देखा जा सकता है।

    वैष्णव प्रतिमाओं में चन्द्रभागा से प्राप्त 9वीं शताब्दी के वैकुष्ठ विष्णु (त्रिमुखी विष्णु), 10वीं शताब्दी की नरवराह प्रतिमा, बड़ी कलमण्डी (तहसील-पाटन) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की महावराह प्रतिमा, शंखोधरा पाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वामनावतार प्रतिमा, देवगढ़ (डग) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की शेषशायी विष्णु प्रतिमा, बिन्जोरी (तहसील-पाटन) से प्राप्त बालमुकुन्द आदि प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं।

    सूर्यमंदिर झलारापाटन से प्राप्त एक नृत्यांगना की प्रतिमा भी 10वीं शताब्दी ईस्वी की है, जिसे इस संग्रहालय में स्थान दिया गया है। कृष्ण बाललीला फलक रंगपाटन झालावाड़ से प्राप्त हुआ था। यह भी 10वीं शर्ती ईस्वी का है। इसमें नदी के दोनों ओर भारतीय जनजीवन की झांकी का चित्रण है। नदी में मछली एवं अन्य जलचर दिखाए गए हैं।

    फलक के ऊपरी भाग में एक परिवार में स्त्री-पुरुष एवं तीन बच्चे दिखाए गए हैं। एक बच्चा स्त्री की गोद में बैठा है। फलक के बाएं हिस्से में ऊपर की ओर श्रीकृष्ण, शकटासुर का वध कर रहे हैं। पूतनावध एवं दधिमंथन के दृष्य भी अंकित हैं। महिलाओं के सिर पर आकर्षक जूड़ा बंधा हुआ है। नीचे की ओर माता यशोदा एवं बालकृष्ण का अंकन है। इनके नीचे शंख, कच्छप एवं निधियां अंकित हैं।

    10वीं शताब्दी ईस्वी की चतुर्मुखी ब्रह्मा की प्रतिमा लाल पत्थर से निर्मित है। इस प्रतिमा के चारों हाथ खण्डित हैं। मुख पर दाढ़ी का अंकन है, उदर भाग उभरा हुआ तथा कटि मेखला के ऊपर लटका हुआ है। ब्रह्मा के कानों में कुण्डल, गले में माला तथा भुजाओं में बाजूबंद हैं। दोनों ओर परिचारक एवं परिचारिकाएं अंकित हैं। एक प्रस्तर फलक में केशी वध का अंकन किया गया है। भवानीमण्डी के निकट खोड़ से प्राप्त यह प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है। इस प्रतिमा में भगवान श्रीकृष्ण केशी नामक राक्षस का वध करते हुए दिखाए गए हैं।

    चतुर्भुज कृष्ण का दक्षिण ऊर्ध्वहस्त प्रहार करने की मुद्रा में है एवं दक्षिण निम्नहस्त में खड्ग का अंकन है। वाम ऊर्ध्वहस्त में चक्र का अंकन किया गया है जबकि वाम निम्नहस्त से भगवान, केशी के बल का प्रतिरोध कर रहे हैं। एक प्रस्तर फलक में संगीत एवं नृत्य की सभा का अंकन किया गया है। मध्यकालीन मंदिरों में रंगमण्डपों का निर्माण आवश्यक रूप से होता था जिनमें इस प्रकार की संगीत एवं नृत्यसभाओं का अंकन किया जाता था। झालावाड़ संग्रहालय में प्रदर्शित फलक 10वीं शताब्दी ईस्वी का है तथा इसे बारां जिले के काकूनी क्षेत्र से प्राप्त किया गया है। इसमें एक पुरुष वादक के हाथ में ढोलक, दूसरे के हाथ में मंझीरा बजाते हुए दर्शाया गया है। बीच में एक नर्तकी कत्थक नृत्य की मुद्रा में है। वादकों एवं नृतकी के पैर नृत्य की मुद्रा में हैं। उनकी शारीरिक रचना सुडौल है तथा सभी कलाकार युवावस्था में हैं।

    कमलासन पर विराजमान सूर्य की 10-11वीं शताब्दी ईस्वी की एक प्रतिमा रंगपाटन से प्राप्त हुई है। सूर्य के दोनों हाथों में कमल दल हैं। सूर्य के पैरों में बूट हैं तथा शरीर पर कवच धारण कर रखा है जिनसे यह सिद्ध होता है कि इस प्रतिमा पर पारसियों की मूर्ति कला का प्रभाव है। सूर्यदेव ने अपने गले में वनमाला धारण कर रखी है। कुबेर की प्रतिमा 10-11वीं शती ईस्वी की है। यह काकूनी से प्राप्त हुई थी जो अब बारां जिले में है तथा झालावाड़ जिले की सीमा पर बहने वाली नदी के तट पर स्थित है। कुबेर ललितासन मुद्रा में हैं तथा उसके दाएं हाथ में धन की थैली है। दाईं ओर चंवरधारिणी का अंजलिबद्ध मुद्रा में सुंदर अंकन है। शैव प्रतिमाओं में चन्द्रभागा (पाटन) से प्राप्त 8वीं शताब्दी की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा, 9वीं शताब्दी की नटराज प्रतिमा, 10वीं शतब्दी का त्रिमुखी शिव, उमामहेश्वर प्रतिमा, रंगपाटन से प्राप्त 11वीं शताब्दी की अन्धकासुरवध प्रतिमा, डग से प्राप्त लकुलीश प्रतिमा, शंखोधरा से प्राप्त 10-11वीं शताब्दी की भैरव एवं गणेश प्रतिमाएँ आदि प्रदर्शित हैं।

    चंद्रावती से प्राप्त 8वीं शताब्दी की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा चतुर्भुजी है जिसमें दायीं तरफ शिव विराजमान हैं। उनका दायां मुख्य हाथ नंदी के ऊपर रखा हुआ है, इस हाथ में कड़ा धारण किया हुआ है तथा ऊपरी दायें हाथ में त्रिशूल धारण किया हुआ है। त्रिशूल के पीछे सर्प का सुंदर अंकन है। बायीं ओर के हिस्से में पार्वती उत्कीर्ण हैं। उनका बायां ऊपरी हाथ खण्डित है तथा नीचे के हाथ में चूड़ियां धारण की हुई हैं। पुरुष भाग में ऊर्ध्व रेतस एवं स्त्री भाग में योनी का अंकन किया गया है।

    चंद्रभागा एवं कालीसिंध के संगम पर गोविंदपुरा नामक स्थान से 8वीं शती ईस्वी की लकुलीश की एक प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा मुकुटाकृति (शुकनास) गवाक्ष में पद्मासन में विराजमान है। प्रतिमा के दो हाथ हैं जिनमें से दायां हाथ अभय मुद्रा में है तथा बायें हाथ में लकुटी है। लकुलीश को ऊर्ध्व-रेत्स अवस्था में उत्कीर्ण किया गया है। लकुलीश के दोनों ओर लंगोटधारी परिचारकों का अंकन है। दायें हाथ की तरफ वाले साधु के सिर पर बालों का अंकन कोटा संग्रहालय के झल्लरीवादकों के सिर के बालों जैसा है। लकुलीश की यह प्रतिमा ठीक वैसी ही है जैसी कि इस श्लोक में वर्णित है-

    लकुलीश ऊर्ध्वमेढ पद्मासन सुंस्थितम्।

    दक्षिणे मातुलिंग च वामे च दण्डप्रकीर्तितम्।।


    नृत्यरत अष्टभुजी शिव का भी एक फलक दर्शनीय है। यह भी 10वीं शताब्दी ईस्वी का है तथा शिव के हाथ एवं पैर नृत्य की मुद्रा में हैं। दोनों ऊर्ध्व भुजाओं में सर्प लिपटा हुआ है। दाएं मध्य हस्त में बाण, दाएं अधोहस्त में त्रिशूल है, बाएं मध्य हस्त में धनुष, बाएं अधोहस्त में खट्वांग धारण कर रखा है। प्रतिमा के दोनों ओर आयताकार पुष्प एवं व्यालों का अंकन है। 10वीं शती की कल्याण सुंदर प्रतिमा भी लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित है।

    इस प्रतिमा में भगवान शिव एवं पार्वती के विवाह का दृश्य अंकित है। भगवान शिव, अपने वाम भाग में खड़ी पार्वती का वरण कर रहे हैं। चतुर्बाहु शिव विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित हैं। पार्वती के नेत्र धरती की तरफ झुके हुए हैं। उनके मुख पर नववधू का संकोच दिखाई दे रहा है। शिव दाएं ऊर्ध्व हस्त में त्रिशूल धारण किए हुए हैं तथा दूसरे हाथ से पार्वती की हथेली पकड़े हुए हैं। उनके बाएं ऊर्ध्व हस्त में नाग है तथा बाईं तरफ का दूसरा हाथ पार्वती के कंधे पर है। गोलाकार स्तम्भों के बीच शिव एवं पार्वती को प्रभामण्डल से सम्पन्न दर्शाया गया है। आसपास परिचारिकाएं एवं शार्दूल का अंकन है।

    10वीं शताब्दी ईस्वी की अंधकासुर वध की प्रतिमा रंगपाटन झालावाड़ से प्राप्त की गई थी। यह भी लाल बलुआ पत्थर की है। इस प्रतिमा में छः भुजाओं वाले शिव द्वारा अंधकासुर के वध करने का दृश्य अंकित किया गया है। दोनों तरफ के ऊर्ध्वहस्तों में भगवान ने सर्प धारण कर रखे हैं। दाएं मध्यहस्त में डमरू तथा दाएं अधोहस्त में खड्ग है। बाएं ऊर्ध्वहस्त में ढाल है। शिव ने अंधकासुर को त्रिशूल से बेधकर ऊपर उठा रखा है। शिव का बायां पैर एक अन्य राक्षस की पीठ पर रखा है।

    एक योगिनी, अंधक का रक्तपान कर रही है। प्रतिमा में दोनों ओर त्रिभंग मुद्रा में सेवक-सेविकाओं एवं शार्दूल का अंकन किया गया है। शाक्त प्रतिमाओं में 8वीं शताब्दी की चन्द्रभागा (पाटन) से प्राप्त चामुण्डा प्रतिमा, पाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वाराही प्रतिमा, झूमकी (पाटन) से प्राप्त 11वीं शताब्दी की महिषासरमर्दिनी आदि महत्त्वपूर्ण प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं।

    स्थानक सुंदरी की प्रतिमा 9वीं शताब्दी ईस्वी की है। इसे झालरापाटन में बहने वाली चन्द्रभागा नदी के किनारे से प्राप्त किया गया था। संयुक्त देव प्रतिमाओं में रंगपाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की मार्तण्ड-भैरव, चन्द्रभागा से प्राप्त पूर्व मध्यकालीन सूर्य-नारायण प्रतिमा, चन्द्रभागा से ही प्राप्त 10वीं शताब्दी की हरिहर प्रतिमा, पितामहमार्तण्ड प्रतिमा, काकूनी, रंगपाटन आदि स्थलों से प्राप्त संयुक्त देव प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। हरिहर की प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है तथा बारां जिले के काकूनी से प्राप्त की गई है।

    इस चतुर्भुजी प्रतिमा के आधे दक्षिण भाग में शिव एवं वाम भाग में विष्णु का अंकन है। दक्षिण ऊर्ध्वहस्त में त्रिशूल एवं अधोहस्त में पुष्प है। वाम ऊर्ध्वहस्त में चक्र एवं अधोहस्त में शंख है। देव प्रतिमा विभिन्न आभूषणों से अलंकृत है। शिव की तरफ वाले भाग में नीचे की तरफ नंदी का अंकन है। दोनों ओर तीन-तीन परिचारक खड़े हुए हैं।

    जैन प्रतिमाओं में तीर्थंकर अजितनाथ की 9वीं शती इस्वी की प्रतिमा बलुआ लाल पत्थर की है। अजितनाथ को कायोत्सर्ग मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। सुसज्जित परिकर के ऊपरी भाग में घटाभिषेक का दृश्य अंकित है। दोनों ओर रथिका में एक-एक तीर्थंकर को पद्मासन में बैठे हुए दर्शाया गया है। पाद पीठ पर अजितनाथ के चिह्न के रूप में हाथी का अंकन है।

    झालरापाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की सर्वतोभद्र प्रतिमा, रतनपुरा से प्राप्त 10वीं शताब्दी की अजितनाथ प्रतिमा, गागरोन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वृषभनाथ प्रतिमा, काकूनी से प्राप्त चक्रेश्वर प्रतिमा, पंचपहाड़ से प्राप्त 16वीं शताब्दी की वासुपूज्य प्रतिमा, पार्श्व नाथ आदि प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। कोटा-झालावाड़ क्षेत्र में बौद्धों की हीनयान शाखा का प्रभाव रहा है। यहाँ बौद्धों के कुछ आश्रम एवं उपाश्रय स्थित थे। इसलिए इस क्षेत्र से कतिपय बौद्ध मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। 10वीं शती ईस्वी के एक प्रस्तर फलक में शिल्पकार द्वारा गुरुकुल आश्रम में दो बौद्ध गुरुओं एवं दो शिष्यों का अंकन किया गया है। दोनों साधुओं के बीच में खड़े बालक के सिर पर बालों का अंकन राजकुमार सिद्धार्थ के सिर के बालों जैसा है। राजकुमार सिद्धार्थ को गुरुओं के उपदेशों को ध्यानमग्न होकर सुनते हुए प्रदर्शितत किया गया है। इन प्रतिमाओं पर गांधार, यूनानी एवं ईरानी मूर्तिकला का मिश्रण का प्रभाव परिलक्षित होता है।

    शिलालेख दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में पहली शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर 19वीं शताब्दी इस्वी तक की अवधि के कई प्राचीन शिलालेख प्रदर्शित किए गए हैं। कालाजी (जिला बारां) से प्राप्त कुई का अभिलेख प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व का है। बारां से प्राप्त तीसरी शताब्दी ईस्वी का लेख ब्राह्मी लिपि में है। गंगधार नरेश नरवर्मन के पुत्र विश्ववर्मन का ई.423 का शिलालेख उल्लेखनीय है, इसमें विष्णु के आयुध तथा भेदभाव का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि परम वैष्णवसचिव मयूराक्ष ने तांत्रिक दर्शन के अन्तर्गत मातृकाओं के पवित्र स्थान का भी निर्माण करवाया था। वैष्णव मतावलम्बी द्वारा तांत्रिक शैली के देवस्थान का निर्माण किया जाना उस युग के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है।

    चन्द्रावती (झालरापाटन) के चंद्रमौलेश्वर मंदिर का ई.689 का शिलालेख तथा यहीं से प्राप्त वि.स. 746 का राजा दुर्गमण का शिलालेख भी प्रदर्शित किए गए हैं। कंसुआ (जिला कोटा) के शिवमंदिर से प्राप्त 8वीं शताब्दी का शिलालेख, शेरगढ़ (जिला बारां) का 9वीं शताब्दी का बौद्ध परम्परा का शिलालेख भी उल्लेखनीय हैं। मगननाथ की डूंगरी (झालरापाटन) से प्राप्त उदयादित्य का ई.1086 का शिलालेख भी प्रदर्शित किया गया है। तुलसीराम के कुण्ड (झालरापाटन) से प्राप्त वि.स. 1193 का लेख भी महत्वपूर्ण है।

    रामगढ़, किशनगढ़, बारां से ई.1162-75 के शिलालेख, बड़वा, अंता तथा मध्यकालीन इतिहास के अनेक शिलालेख प्रदर्शित हैं। ग्राम बेड़ला (गंगधार) से प्राप्त वि.स. 1687 का झाला दयालदास का शिलालेख तथा झालरापाटन से प्राप्त वि.सं. 1853 का झाला जालिम सिंह का अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    ई.1796 में कोटा राज्य के सेनापति झाला जालिमसिंह ने चंद्रावती नगर के ध्वंसावशेषों से लगभग पौन किलोमीटर उत्तर में झालरापाटन नगर की स्थापना की। इस नवीन नगर में प्राचीन चंद्रावती नगर के ध्वस्त अवशेषों की सामग्री काम में ली गई। जालिमसिंह ने झालरापाटन नगर के मध्य में एक पत्थर लगावाया जिस पर राजकीय घोषणा अंकित करवाई कि जो व्यक्ति इस नगर में आकर रहेगा उससे चुंगी नहीं ली जाएगी तथा यदि उसे राज्य की तरफ से अर्थ-दण्ड दिया गया है तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा। इस घोषणा ने मारवाड़ तथा हाड़ौती क्षेत्र के व्यापारियों को तेजी से आकर्षित किया जिससे झालरापाटन एक समृद्ध नगर बन गया। ई.1850 में राजा पृथ्वीसिंह के कामदार ने यह पत्थर झील में फैंक दिया तथा ई.1796 की घोषणा को वापस ले लिया। ई.1876 में यह पत्थर पुनः झील से बाहर निकाला गया। अब यह पत्थर झालावाड़ संग्रहालय में रखा हुआ है। यह 9 फुट लम्बा और डेढ़ फुट चौड़ा है।

    मुद्रा दीर्घा

    प्राचीन चिह्नित (आहत) मुद्राएं, कुषाण सिक्के, सातवाहन सिक्के, गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं, इण्डोससेनियन (गधैया सिक्के), कोटा-बूंदी-झालावाड़ रियासतों की मुद्राएं, इण्डोग्रीक एवं इण्डोनेशिया की रजत एवं ताम्र मुद्राएं इस संग्रहालय की अनुपम धरोहर हैं। मुद्राओं के साथ उनका संक्षिप्त विवरण भी लिखा गया है। पंचमार्क अथवा आहत मुद्राएं ई.पू.600 से ई.पू.200 तक की हैं। इनके अग्रभाग पर सूर्य, षडचक्र, तीन शिवलिंग, बच्चे के साथ खरगोश, कुत्ता, सात पत्तियों के झाड़ वाला गमला आदि बने हुए हैं।

    समुद्रगुप्त का चौथी शताब्दी ईस्वी का सिक्का ध्वज प्रकार का है जिसके अग्रभाग पर सम्राट की प्रतिमा उत्कीर्ण है। सम्राट सीधा खड़ा हुआ है तथा उसने बाएं हाथ को ऊपर उठाकर उसमें ध्वज धारण किया हुआ है। सम्राट का दायां हाथ हवन वेदिका में आहुति देते हुए दिखाया गया है। सम्राट के सामने की ओर विजय-ध्वज अंकित है जिस पर शक्ति एवं गति का प्रतीक गरुड़ विराजमान है। सिक्के के उसी भाग में ब्राह्मी लिपि में ‘समरशतवितत विजयो जित रिपुरजितो दिवं जयति’ अर्थात् सर्वत्र विजयी सम्राट जिसने सैंकड़ों युद्धों में विजय प्रात कर शत्रु को पराजित किया है, स्वर्गश्री की प्राप्ति करता है, अंकित है। सिक्के के पृष्ठभाग पर देवी लक्ष्मी की प्रतिमा उत्कीर्ण है। लक्ष्मी सिंहासन पर आरूढ़ हैं तथा उनके सिर के पीछे प्रभामण्डल का अंकन किया गया है। सिक्के के इसी भाग पर ब्राह्मी लिपि में पराक्रमः अंकित किया गया है। देवी के बाएं हाथ में कॉर्नुफोनिया एवं दाएं हाथ में पाश है।

    झालावाड़ रियासत का सिक्का चांदी से निर्मित है। इस पर दोनों ओर अरबी लिपि में लेख अंकित है। अग्रभाग पर ‘मल्लिकाह मुआज्जमा विक्टोरिया सल्तनत इंग्लिस्तान’ अंकित है। पृष्ठभाग पर ‘मानूस मैमनत सनह् 39 जुलूस जरब झालावाड़’ लिखा गया है। इस सिक्के का वजन 11.29 ग्राम है।

    लघुचित्र एवं चित्रित ग्रंथ दीर्घा

    इस संग्रहालय में 18-19वीं शती के हस्तलिखित ताड़पत्र एवं दुर्लभ ग्रंथ प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें भागवत, औतारचरित, भाषा चरित्र, नहरदान, भारट द्वारा लिखित चित्रग्रंथ प्रमुख हैं। पुरुषोत्तम महाकाव्य, ताड़ के पत्ते पर लिखित वर्णन आदि प्रमुख हैं। शालीहोत्र चित्रित ग्रंथ अश्वचिकित्सा से सम्बन्धित है। चित्रित अरब शाहनामा तथा कुरान भी प्रदर्शित हैं। हस्तलिखित चित्रित ग्रंथों में श्लोकों का चित्रानुवाद दिया गया है। चित्रों में हाथों से रंग भरे गए हैं। अधिकांश चित्रों के रंग आज भी अच्छी अवस्था में हैं। लघुचित्र कला दीर्घा में वेद एवं देवचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

    चित्रवीथी में नायक-नायिका, बाहरमासा, विष्णु के दशावतार, विष्णु के चौबीस स्वरूप, कृष्ण लीला, लोकजीवन के प्रसंग भी प्रदर्शित हैं। कुछ चित्र जयपुर, बूंदी एवं किशनगढ़ शैली के हैं। एक चित्र में दो वृक्षों के मध्य छाया में चतुर्बाहु श्रीकृष्ण को शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए हुए दिखाया गया है। भगवान के सम्मुख गौएं अपने बछड़ों के साथ खड़ी हैं। गौधन के पीछे ग्वालवृंद भी भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में अंकित हैं। भगवान के पीछे की ओर सेविकाएं मोरपंखी, चंवर आदि लिए खड़ी हैं। नदी में मछली, कमल, बत्तख, नाव तथा पक्षियों का अंकन किया गया है। इसे भगवान के संकर्षण स्वरूप का चित्र कहा जाता है। झालवाड़ संग्रहालय में कांच एवं कपड़े पर बने चित्र भी संकलित हैं।

    हस्त-शिल्प दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में 19वीं-20वीं शती की हस्तशिल्प सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। संगमरमर के पत्थर पर कलात्मक कामसूत्र विषयक कलाकृतियां, हाथी, घोड़ा, देवी दुर्गा की प्रतिमा, हाथी दांत से बना पंखा, दूरबीन, चाकू, सलाइयां आदि प्रदर्शित हैं। एक कलात्मक ग्लोब में दीपक और भारत का नक्शा अंकित हैं। एक रैक में विभिन्न आकृतियों के सीप प्रदर्शित किए गए हैं। 19वीं शताब्दी में निर्मित रेशम का एक रूमाल भी संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय में 10वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी की लकड़ी की एक मुड़ी हुई छड़ी रखी है जो गोल्फ अथवा हॉकी जैसा कोई खेल खेलने के काम आती रही होगी। यह 101 सेंटीमीटर लम्बी तथा 10 सेंटीमीटर मोटी है। रेशम एवं मखमल के कपड़े से 18-19वीं शताब्दी में बनी एक पगड़ी भी प्रदर्शित है। अस्त्र-शस्त्र दीर्घा अस्त्र-शस्त्र दीर्घा में मध्ययुगीन हथियारों से लेकर 19वीं शती तक के अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शित हैं। इनमें प्रथम महायुद्ध के दौरान काम में ली गई रिवॉल्वर उल्लेखनीय है।

    इसके अतिरिक्त तलवारें, ढालें एवं तीर-कमान आदि भी विषयवार प्रदर्शित हैं। विभिन्न आकृति की छुरियां एवं विभिन्न धातुओं से बने तलवारों के दस्ते भी दर्शनीय हैं। कुछ तलवारों पर मध्यकालीन अरबी लिपि में लिखावट की गई है तथा सोने एवं चांदी की कारीगरी की गई है। कलात्मक ढालों पर तहनिशां एवं जरनिशा का काम किया गया है।


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  • कैप्टन स्टेवार्ड जबर्दस्ती जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बन गया

     04.07.2017
    कैप्टन स्टेवार्ड जबर्दस्ती  जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बन गया

    राजमाता भटियानी तथा प्रधानमंत्री ठाकुर बैरीसाल सिंह के झगड़ों पर अंकुश लगाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कैप्टन स्टेवार्ड को जयपुर में पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया। जयपुर में इस नियुक्ति का सर्वत्र विरोध हुआ किंतु राजमाता भटियानी की एक न चली। स्टेवार्ड ने 17 अप्रेल 1821 को जयपुर में आकर जबर्दस्ती अपना कार्यालय जमा लिया। तभी से जयपुर में पोलिटिकल एजेंसी की स्थापना हो गयी। गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने राजमाता और बैरीसाल को निर्देश भेजे कि राजस्व सम्बन्धी मामलों में स्टेवार्ड की राय से ही कार्य करें। धीरे-धीरे जयपुर राज्य में पोलिटिकल एजेण्ट ने वास्तविक शासक के अधिकार हथिया लिये।

    यह कहना अधिक उचित नहीं होगा कि सारी ज्यादती अंग्रेज अधिकारियों की तरफ से थी। शासक का नाबालिग होना, राजपरिवार के सदस्यों में सत्ता प्राप्ति के लिये खींचतान होना तथा सत्ता से चिपके हुए लोगों का एक दूसरे को जान से मार डालने के लिये आतुर रहना, आदि कई ऐसे कारण थे जिनके कारण अंग्रेज अधिकारियों की स्थिति दृढ़ होती चली गयी। ई.1823 में राजदरबार में दरोगा की नियुक्ति को लेकर राजमाता तथा प्रधानमंत्री बैरीसाल के बीच झगड़ा हो गया। रीजेण्ट ऑक्टरलोनी ने खुलकर बैरीसाल का पक्ष लिया तथा राजमाता के कृपापात्र झूथाराम को जयपुर राज्य से बाहर निकाल दिया। रेजीडेण्ट ऑक्टरलोनी तथा पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टन स्टेवार्ड ने राजमाता की प्रतिष्ठा और गरिमा गिराने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। बैरीसाल का पक्ष लेने के कारण ऑक्टरलोनी पूरे जयपुर राज्य में बदनाम हो गया।

    बैरीसाल निकम्मा प्रशासक सिद्ध हुआ। उसके काल में जयपुर राज्य में भ्रष्टाचार, राजकीय आय का दुरुपयोग, प्रशासकीय अव्यवस्था तथा गबन चरम पर
    पहुंच गये। ईशरदा और शेखावाटी की सेनाओं को वेतन नहीं दिया जा सका जिससे उनमें विद्रोह हो गया। ई.1824 में तोरावाटी की चार बटालियनों ने वेतन न मिलने पर विद्रोह कर दिया। शेखावाटी के सैनिक विद्रोह के लिये ऑक्टरलोनी बैरीसाल को जिम्मेदार मानता था तो पोलिटिकल ऐजेण्ट रपर (स्टेवार्ट का उत्तराधिकारी) इसे राजमाता की साजिश मानता था।

    ई.1824 में ऑक्टरलोनी स्वयं जयपुर आया। उसने डिग्गी के ठाकुर मेघसिंह को मुख्तार के पद पर नियुक्त कर दिया। राजमाता को नीचा दिखाने के लिये बैरीसाल को अधिकार दिया गया कि वह पोलिटिकल एजेंसी में अपना वकील नियुक्त कर सकता है। जब तक रपर जयपुर में पोलिटिकल एजेण्ट रहा राजमाता तथा उसके बीच छत्तीस का आंकड़ा बना रहा। ई.1825 में चार्ल्स मेटकाफ दिल्ली में रेजीडेण्ट बना। उसने रपर के स्थान पर कैप्टेन लो को जयपुर राज्य का पोलिटिकल ऐजेण्ट नियुक्त किया तथा उसे निर्देश दिये कि वह राज्य के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप न करे तथा राजमाता को शासन संचालन में पूर्ण स्वतंत्रता दे। मेटकाफ ने झूथाराम को फिर से जयपुर राज्य में आने की अनुमति दिलवाई।

    कैप्टेन लो भी अपने पूर्ववर्ती पोलिटिकल एजेण्टों की तरह अत्यंत महात्वाकांक्षी एवं दुराग्रही था। उसने राजमाता को चैन से नहीं बैठने दिया तथा उन सामंतों को संरक्षण दिया जो रानी के विरुद्ध थे तथा राज्य को नुक्सान पहुंचा रहे थे जिससे जयपुर राज्य की आय और अधिक गिर गयी। राज्य ने खिराज समय पर चुकाने के लिये प्रजा पर नये कर लगाये व पुराने करों में वृद्धि की जिससे जनता रुष्ट हो गयी। प्रजा का यह क्रोध अंग्रेजों के प्रति था न कि राजा के प्रति। कर वृद्धि के कारण प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी थी।

    कैप्टेन लो ने राजमाता पर जोर डाला कि वह शिशु महाराजा को प्रकट करे। राजमाता की प्रभुसत्ता को समाप्त करने के लिये लो ने यह चाल चली थी। उसकी धारणा थी कि महाराजा के प्रकट होने से रीजेंसी की अवधि समाप्त हो जायेगी तथा प्रशासन का कार्य राज्य के सामंतों की परिषद के द्वारा किया जाने लगेगा तथा राजमाता के स्थान पर बैरीसाल को शासन के अधिकार मिल जायेंगे। पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टेन लो की महत्वाकांक्षा के मार्ग में रेजीडेण्ट चार्ल्स मेटकाफ बहुत बड़ा रोड़ा सिद्ध हुआ। उसने निर्णय दिया कि भले ही महाराजा प्रकट हो जाये किंतु शासन के अधिकार राजमाता के पास ही रहेंगे।

    मेटकाफ का बल पाकर रानी नये जोश से भर गयी उसने प्रशासन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये तथा मेघसिंह को मुख्तार के पद से हटाकर चान्दसिंह को मुख्तार बनाया। चूंकि परम्परा को तोड़ते हुए रानी के अधिकारों को चुनौती देने के लिये सामंतों की बैठक बुलायी गयी थी इसलिये सामंतों को रानी से मुँहजोरी करने का दुःसाहस होने लगा जिससे राज्य की आय और गिर गयी तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को खिराज नहीं दिया जा सका। राजमाता ने प्रार्थना की कि खिराज की रकम 8 लाख प्रतिवर्ष से घटाकर कम कर दी जाये किंतु कैप्टन लो ने राजमाता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इस समय तक दिल्ली में रेजीडेण्ट बदल चुका था तथा मेटकाफ का स्थान कोल ब्रक ने ले लिया था। उसने राजमाता को अनुमति दी कि वह झूंथाराम को राज्य का मुख्तार बना सकती है।

    झूथाराम सामंतों पर अंकुश नहीं लगा सका, लगा भी नहीं सकता था क्योंकि सामंतों को पोलिटिकल एजेण्ट का संरक्षण प्राप्त था। राज्य की आय बढ़ाने के लिये झूथाराम को अपने बलबूते पर ही कुछ करना था। चूंकि राज्य अंग्रेजों के संरक्षण में था इसलिये झूथाराम ने किलों में रखी जाने वाली सेना कम कर दी ताकि राज्य के व्यय में कमी आये। सैनिकों के निर्वहन के लिये जागीर में दी गयी भूमि फिर से खालसा में मिला ली गयी। इससे रुष्ट होकर रणथंभौर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इन विद्रोहियों को जागीरदारों ने ही उकसाया था। झूथाराम ने जो सेना इस विद्रोह को दबाने के लिये भेजी वह विद्रोहियों को नहीं दबा सकी। इस पर रानी ने पोलिटिकल एजेण्ट से सहायता मांगी किंतु एजेण्ट ने इसे राज्य का आंतरिक मामला बताकर सहायता करने से इन्कार कर दिया।

    इसी समय नवम्बर 1830 में ब्रिटिश ऐजेंसी को जयपुर से अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया। इस पर पोलिटिकल एजेण्ट की तरफ के सामंतों ने समझा कि यह राजमाता तथा कैप्टेन लो के बीच शक्ति परीक्षण चल रहा है और उन्होंने लो के हाथ मजबूत करने के लिये स्थान-स्थान पर विद्रोह कर दिया। इसे दबाने के लिये रीजेण्ट (राजमाता भटियानी) तथा मुख्तार (झूथाराम) को बड़े पापड़ बेलने पड़े जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गयी। इसी काल में जयपुर राज्य को जोधपुर, बीकानेर, करौली तथा टौंक राज्यों से भी सरहदों पर उलझना पड़ा।

    ई.1833 में राजमाता भटियानी का देहांत हो गया। महाराजा जगतसिंह की मृत्यु (1818) से लेकर पूरे 15 साल तक वह जयपुर राज्य को बचाने के लिये जूझती रही और अंत में राजनीति की गंदी गलियों में हाथ-पांव मारते हुए अपने अवयस्क पुत्र जयसिंह को झूथाराम के हवाले करके इस संसार से कूच कर गयी। राज्य का सारा बोझ झूथाराम पर आ पड़ा। झूथाराम न तो जयपुर राज्य के सामंतों पर अंकुश लगा सका, न राज्य की अर्थव्यवस्था को सुधार सका और न अंग्रेज अधिकारियों का विश्वास पात्र बना रह सका।केवल राजमाता भटियानी ही उसे राज्य का शुभचिंतक मानकर किसी तरह प्रधानमंत्री बनाये रखने में सफल रही थी।

    कहा नहीं जा सकता था कि झूथाराम सही था या गलत किंतु उस युग की प्रवृत्ति ही ऐसी थी कि झूठ इतनी सफाई से, इतनी बार और इतने लोगों द्वारा बोला जाता था कि झूठ तो सच बन जाता था और सच- झूठ। इस प्रोपेगण्डा के चलते झूथाराम जयपुर राज्य में अलोकप्रिय हो गया। अब उसका पतन निकट दिखायी देने लगा था।

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