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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 7 बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 7  बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 7

    बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

    बोरोबुदुर महायान बौद्ध विहार मध्य जावा प्रान्त के मगेलांग नगर में स्थित है। यह भी परमबनन शिव मंदिर तथा प्लाओसान बौद्ध विहार की भांति मूलतः 9वीं सदी ईस्वी में निर्मित है। जिस समय यह बना था उस समय यह संसार का सबसे बड़ा बौद्ध विहार था। इसका यह स्थान आज भी सुरक्षित है। यह छः वर्गाकार चबूतरों पर बना हुआ है जिसमें से तीन चबूतरों का ऊपरी भाग वृत्ताकार है। इस विहार में उत्कीर्णित प्रतिमाओं वाली 2,672 प्रस्तर शिलाएं (Relief pannels) और 504 बौद्ध प्रतिमाएं पाई गई हैं। इसके केन्द्र में स्थित प्रमुख गुम्बद के चारों ओर स्तूप वाली 72 बुद्ध प्रतिमाएं हैं।

    इसका निर्माण 9वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ। विहार की बनावट जावाई बुद्ध स्थापत्यकला के अनुरूप है जो इंडोनेशियाई जावाई मूल के स्थानीय लोगों की पूर्वज पूजा और बौद्ध निर्वाण अवधारणा का मिश्रित रूप है। विहार के स्थापत्य में भारत की चौथी-पांचवी शताब्दी की गुप्त कालीन स्थापत्य कला का प्रभाव भी दिखाई देता है किंतु इण्डोनेशियाई स्थापत्य तत्व पर्याप्त मात्रा में उपस्थित हैं जिसके कारण इसे इंडोनेशियाई स्थापत्य संरचना माना जाना चहिए।

    इसकी रचना एक विशालाकाय स्तूप के रूप में मण्डलाकार है तथा सम्पूर्ण निर्माण, किसी स्मारक की तरह दिखाई देता है। वस्तुतः यह भगवान बुद्ध का पूजा-स्थल और विश्व-प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ-स्थल है। इस स्मारक के चारों ओर बौद्ध ब्रह्माण्डिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तर बने हुए है जो कामध्यान (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) कहलाते हैं। दर्शक इन तीनों स्तरों का चक्कर लगाते हुए इसके शीर्ष पर अर्थात् बुद्धत्व की अवस्था को पहुँचता है। स्मारक में हर ओर से सीढ़ियों और गलियारों की विस्तृत व्यवस्था है। गलियारों में होते हुए निकलने पर 1,460 शिलालेखों (Narrative Relief Panels) और स्तम्भ-वेष्टनों ;सीढ़ियों पर लगने वाली घुमावदार छड़ों- Balustrades) के माध्यम से दर्शनार्थियों को आगे बढ़ने के लिए स्वतः ही मार्गदर्शन मिलता रहता है।

    इस स्मारक का निर्माण कार्य 9वीं शताब्दी में आरम्भ हुआ था, मुख्य निर्माण तभी पूरे कर लिए गए थे किंतु उसके बाद की शताब्दियों में कुछ न कुछ निर्माण निरंतर चलता ही रहा था।

    चण्डी बोरोबुदुर

    इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी कहा जाता है। इस कारण बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ''चण्डी बोरोबुदुर'' भी कहा जाता है। जावा में चण्डी शब्द प्राचीन बनावट के द्वार और स्नान से सम्बन्धित रचनाओं के लिए प्रयुक्त होता है। बोरोबुदुर शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है। इस शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अंग्रेज इतिहासकार सर थॉमस रैफल्स की पुस्तक History of Java में हुआ था किंतु इस नाम का इससे पुराना कोई उल्लेख किसी शिलालेख अथवा ग्रंथ में उपलब्ध नहीं होता है। ई.1365 के एक तालपत्र (ताड़पत्र) में कहा गया है कि ''पवित्र बौद्ध पूजा स्थल नगरकरेतागमा'' को ''बुदुर'' कहा जाता है। यह तालपत्र मजापहित राजदरबारी एवं बौद्ध विद्वान मपु प्रपंचा द्वारा ई.1365 में लिखा गया था। संभवतः थॉमस रैफल्स ने (ई.1814 में) उसी तालपत्र के आधार पर इस बौद्ध स्मारक का नाम बोरो बुदुर लिखा।

    कुछ विद्वानों के अनुसार बोरोबुदुर, बोरे-बुदुर का अपभ्रंश है जिसका अर्थ ''बोरे गाँव के निकट बुदुर (बुद्ध) का मंदिर'' था। इण्डोनेशिया में अधिकांश मंदिरों के नाम निकटतम गाँवों के नाम पर रखे हुए हैं। जावा भाषा के अनुसार इस स्मारक का नाम ''बुदुरबोरो'' होना चाहिए। रैफल्स ने यह भी सुझाव दिया कि बुदुर सम्भवतः आधुनिक जावा भाषा के शब्द बुद्ध से बना है।

    अन्य पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार नाम का दूसरा घटक (बुदुर) जावा भाषा के ''भुधारा'' शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- ''पहाड़''। ध्यान देने की बात है कि भारत में भूधर का अर्थ पहाड़ होता है। अन्य सम्भावित शब्द-व्युत्पतियों के अनुसार बोरोबुदुर ''बुद्ध उहर'' अर्थात् बुद्ध-विहार है और यह जावा भाषा के ''बियरा बेदुहुर'' शब्द का अपभ्रंश उच्चारण है। बुद्ध-उहर का अर्थ ''बुद्ध का नगर'' भी हो सकता है। जावा भाषा में बेदुहुर शब्द का अर्थ ''एक उच्च स्थान'' भी होता है। कसपरिस के अनुसार बोरोबुदूर का मूल नाम भूमि सम्भार भुधार है जो एक संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ ''बोधिसत्व के दस चरणों के संयुक्त गुणों का पहाड़'' है।

    धार्मिक बौद्ध इमारत का निर्माण और उद्घाटन

    बोरोबुदुर के निर्माण एवं उद्घाटन के सम्बन्ध में दो शिलालेख मिले हैं। ये दोनों शिलालेख तमांगगंग रीजेंसी में केदु नामक स्थान पर मिले हैं। ई.824 के कायुमवुंगान शिलालेख के अनुसार राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी ने जिनालया (उन लोगों का क्षेत्र जिन्होंने सांसारिक इच्छा और और अपने आत्मज्ञान पर विजय प्राप्त कर ली) नामक धार्मिक भवन का उद्घाटन किया। ई.824 के ही त्रितेपुसन शिलालेख में लिखा है कि क्री कहुलुन्नण (प्रमोदवर्द्धिनी को कहुलुन्नण भी कहते हैं) ने भूमिसम्भार नामक कमूलान को धन और रख-रखाव सुनिश्चित करने के लिए (कर-रहित) भूमि प्रदान की। कमूलान का अर्थ ''उद्गम स्थल'' होता है। यह पूर्वजों की याद में बनाया गया एक धार्मिक स्थल है जो शैलेन्द्र राजंवश से सम्बंधित है।

    बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत का रहस्य

    बोरोबुदुर बौद्धमंदिर, योग्यकर्ता नगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर और सुरकर्ता नगर से 86 किलोमीटर दूर स्थित है। यह दो जुड़वां ज्वालामुखियों, सुंदोरो-सुम्बिंग और मेर्बाबू-मेरापी एवं दो नदियों प्रोगो और एलो के बीच एक ऊंचे क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र को केदू का मैदान भी कहा जाता है। स्थानीय मिथकों एवं दंतकथाओं के अनुसार केदू का मैदान, जावा के पवित्र स्थलों में से एक है। इस क्षेत्र की उच्च कृषि उर्वरता के कारण इसे The Garden of Jawa अर्थात् जावा का बगीचा भी कहा जाता है। 20वीं सदी में मरम्मत कार्य के दौरान यह पाया गया कि इस क्षेत्र के तीनों बौद्ध मंदिर, बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत, एक सीधी रेखा में स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों मंदिर किसी धार्मिक कारण से एक सीध में बनाए गए थे, यह कारण क्या था, इसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है।

    विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे पिरामिड पाए गए हैं जो एक सीधी रेखा में स्थित हैं और यह माना जाता है कि ये पिरामिड धरती के मुनष्यों ने नहीं बनाए थे अपितु दूसरे ग्रहों से धरती पर आए परग्रही इंसानों ने बनाए थे।

    झील में तैरता पुष्प कमल था बोरोबुदुर

    स्मारक बोरोबुदुर मंदिर का निर्माण समुद्र तल से 265 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक झील मंए खड़ी 49 फुट ऊंची चट्टान पर किया गया था। इस प्राचीन झील का अस्तित्व, 20वीं सदी के आरम्भ में पुरातत्वविदों के बीच गहन चर्चा का विषय था।

    ई.1931 में हिंदू और बौद्ध वास्तुकला के डच विद्वान डब्ल्यू ओ. जे. नियूवेनकैम्प द्वारा विकसित सिद्धांत के अनुसार ''केदू मैदान'' प्राचीन काल में एक झील हुआ करता था और बोरोबुदुर अपने निर्माण के समय इसी झील में कमल पुष्प के समान तैरता था। इसके निर्माण का समय मंदिर में उत्कीर्णित उच्चावचों और 8वीं तथा 9वीं सदी के दौरान सामान्य रूप से प्रयुक्त शाही पात्रों के अभिलेखों की तुलना से अनुमानित किया जाता है। बोरोबुदुर सम्भवतः ई.800 के लगभग स्थापित हुआ। यह मध्य जावा में शैलेन्द्र राजवंश के शिखर काल ई.760 से 830 से मेल खाता है। इस समय यह श्रीविजय राजवंश के प्रभाव में था। इसके निर्माण का अनुमानित समय 75 वर्ष है और निर्माण कार्य ई.825 के लगभग समरतुंग के कार्यकाल में पूर्ण होना अनुमानित है।

    जावा में हिन्दू और बौद्ध शासकों के समय में भ्रम की स्थिति है। शैलेन्द्र राजवंश को बौद्ध धर्म का कट्टर अनुयायी माना जाता है। यद्यपि सोजोमेर्टो में प्राप्त प्रस्तर शिलालेखों के अनुसार वे हिन्दू थे। उनके काल में केदु मैदान के निकट स्थित मैदानों और पहाड़ों में हिन्दू मंदिरों एवं बौद्ध स्मारकों का निर्माण हुआ। ई.720 में शैव राजा संजय ने बोरोबुदुर से 10 कि.मी. पूर्व में स्थित वुकिर पहाड़ी पर शिव परमबनन मंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया। कुछ विद्वानों के अनुसार उस काल में बोरोबुदुर सहित इस क्षेत्र के अन्य बौद्ध मंदिरों का निर्माण इसलिए सम्भव था क्योंकि संजय के उत्तराधिकारी राकाई पिकातान ने बौद्ध अनुयाइयों को इस तरह के मंदिरों के निर्माण की अनुमति प्रदान कर दी थी। ई.778 के कलसन राजपत्र के अनुसार, पिकातान ने बौद्धों के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध समुदाय को कलसन नामक गाँव दिया।

    कुछ पुरातत्वविदों का मत है कि एक हिन्दू राजा द्वारा बौद्ध स्मारकों की स्थापना में सहायता करना, इस बात का प्रमाण है कि जावा में कभी भी बड़ा धार्मिक टकराव नहीं था। यद्यपि इस समय वहाँ दो विरोधी राजवंश राज्य कर रहे थे जिनमें से शैलेन्द्र राजवंश बौद्ध धर्म का अनुयाई था और संजय राजवंश शैव धर्म का। इन दोनों राजवंशों में आगे चलकर रातु बोको महालय को लेकर ई.856 में युद्ध हुआ। भ्रम की स्थिति परमबनन परिसर के लारा जोंग्गरंग मंदिर के बारे में भी मौजूद है जो संजय राजवंश के बोरोबुदुर के प्रत्युत्तर में शैलेन्द्र राजवंश के विजेता रकाई पिकातान ने स्थापित करवाया। अन्य मतों के अनुसार वहाँ पर शान्तिपूर्वक सह-अस्तित्व का वातावरण था जहाँ ''रारा-जोंग्गरंग'' शैलेन्द्र राजवंश की राजकुमारी होकर भी संजय राजवंश में रानी बनकर आई और शिव मंदिर के निर्माण में भागीदार रही।

    गुमनामी के अंधेरों में गुम बोरोबुदुर

    ई.928 से 1006 के बीच मेरापी पहाड़ में शृंखलाबद्ध ज्वालामुखियों के फूट पड़ने के कारण राजा मपु सिनदोक ने माताराम राजवंश (इसे संजय राजवंश भी कहते हैं) की राजधानी को पूर्वी जावा में स्थानान्तरित कर दिया। इस कारण बोरोबुदुर का क्षेत्र निर्जन हो गया और यह मंदिर कई सदियों तक ज्वालामुखीय राख तथा जंगल के बीच छिपा रहा। इस स्मारक का अस्पष्ट उल्लेख मध्यकाल में ई.1365 के लगभग मपु प्रपंचा की पुस्तक नगरकरेतागमा में मिलता है जो मजापहित काल में लिखी गई। इसमें 'बुदुर में विहार' होने का उल्लेख है। मनुष्यों की दृष्टि से ओझल हो जाने के बाद भी यह स्मारक लोक कथाओं में जीवित रहा और इसके साथ कई दंतकथाएं जुड़ गईं।

    14वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश का पतन हो गया और जावाई लोगों को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। इस कारण चौदहवीं शताब्दी में इस द्वीप पर समस्त निर्माण कार्य बन्द हो गए। अधिकतर लोग मुसलमान बन चुके थे तथा बचे हुए बौद्ध जान बचाकर बाली द्वीप तथा भारत आदि देशों को भाग गए थे। इसलिए बोरोबुदुर की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं रहा। इस बीच जावा द्वीप पर कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए और सत्ताओं के परिवर्तन होते रहे।

    18वीं सदी के दो प्राचीन ''बाबाद'' (जावाई वृत्तांत) में इस स्मारक के साथ जुड़ी हुई असफलताओं की कथा का उल्लेख मिलता है। ''बाबाद तनाह जावी'' (अथवा जावा का इतिहास) के अनुसार ई.1709 में माताराम साम्राज्य के राजा ''पकुबुवोनो प्रथम'' के प्रति विद्रोह करना ''मास डाना'' के लिए घातक सिद्ध हुआ। इसमें लिखा है कि ''रेडी बोरोबुदुर'' पहाड़ी की घेराबंदी की गई। इसमें विद्रोहियों की पराजय हुई तथा राजा ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। ''बाबाद माताराम'' (माताराम साम्राज्य का इतिहास) में बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ई.1757 में योग्यकार्ता सल्तनत के युवराज ''मोंचोनागोरो'' के दुर्भाग्य से जोड़ा गया है। इसके अनुसार स्मारक में प्रवेश निषेध होने पर भी वह एक छिद्रित स्तूप के भीतर छिपकर इसके भीतर गया। अपने महल में वापस आने के बाद वह बीमार हो गया और अगले दिन उसका निधन हो गया। सोक्मोनो नामक एक लेखक ने ई.1976 में लौकिक मत का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब 15वीं सदी में जावा के लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया तो इस मंदिर को उजाड़ना आरम्भ कर दिया।

    अंग्रेजों द्वारा बोरोबुदुर स्मारक की खोज

    ई.1811-16 की अवधि में जावा द्वीप ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन रहा। जावा के ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने जावा के इतिहास में गहरी रुचि ली। उसने जावा द्वीप का दौरा किया तथा द्वीप पर उपलब्ध प्राचीन वस्तुओं को आधार बनाकर एवं स्थानीय निवासियों से चर्चा करके जावा का इतिहास तैयार किया। उसके समय में जावा द्वीप पर कई प्राचीन स्मारकों को खोज निकाला गया। ई.1814 में सेमारंग के निरीक्षण दौरे पर, बुमिसेगोरो गाँव के निकट के जंगल में एक बड़े स्मारक के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। वह स्वयं इसकी खोज करने में असमर्थ था। अतः उसने एच. सी. कॉर्नेलियस नामक एक अभियंता को अन्वेषण का काम सौंपा। कॉर्नेलियस तथा उसके 200 साथियों ने यहाँ फैले जंगल के पेड़ों को काट डाला तथा दूर-दूर तक फैली घास को जलाकर मैदान की तरह साफ कर दिया। बोरोबुदुर स्मारक ज्वालामुखीय राख के नीचे दबा हुआ था, उसे भी खोदकर बाहर निकाला गया। स्मारक के ढहने के खतरे को देखते हुए उन्होंने खुदाई का काम बहुत अधिक नहीं किया। इस प्रकार रैफल्स को इस स्मारक के पुनरुद्धार का श्रेय प्राप्त है।

    डच ईस्ट-इण्डीज सरकार द्वारा संरक्षण

    1816 ई. में ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स को जावा छोड़ देना पड़ा और जावा द्वीप पर नीदरलैण्ड की ''डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी'' का अधिकार हो गया। इसके बाद जावा को ''ईस्टइण्डीज कॉलॉनी'' कहा जाने लगा। केदु के डच प्रशासक हार्टमान ने कॉर्नेलियस के कार्य को आगे बढ़ाया और 1835 ई. में पूरे परिसर को भूमि से बाहर निकाल लिया। बोरोबुदुर के पुनरुत्थान में उसने व्यक्तिगत दिलचस्पी ली। उसने इस बारे में कोई लेखन कार्य नहीं किया किंतु दंतकथाओं को आधार बनाकर स्मारक स्थल की खुदाई को जारी रखा तथा मुख्य स्तूप में बुद्ध की बड़ी मूर्ति को खोज निकाला। 1842 ई. में हार्टमान ने मुख्य गुम्बद का अन्वेषण किया, हालांकि उसके द्वारा खोजा गया कार्य अज्ञात है।

    जावा की डच ईस्ट-इण्डीज सरकार ने डच अभियंता एफ. सी. विल्सन तथा जे. एफ. जी. ब्रुमुण्ड को स्मारक के अध्ययन का कार्य सौंपा। विल्सन ने इस स्मारक की प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के सैकड़ों रेखाचित्र बनाए तथा ब्रुमुण्ड ने राइटअप तैयार किए। ब्रुमुण्ड का कार्य 1859 ई. में पूरा हुआ। डच सरकार विल्सन के रेखाचित्रों को साथ जोड़कर ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित लेख प्रकाशित करना चाहती थी लेकिन ब्रुमुण्ड ने सहयोग नहीं किया। सरकार ने बाद में एक अन्य शोधार्थी सी. लीमान्स को यह कार्य सौंपा। उसने विल्सन के स्रोतों और ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित निबन्ध लिपिबद्ध किए। ई.1873 में ''बोरोबुदुर का निबंधात्मक अध्ययन'' अंग्रेजी भाषा में में प्रकाशित हुआ और उसके एक वर्ष बाद इसका फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया गया। स्मारक का प्रथम चित्र 1873 ई. में डच-फ्लेमिश तक्षणकार इसिडोर वैन किंस्बेर्गन ने लिया।

    धीरे-धीरे इस स्थान की चर्चा होने लगी और यह विश्व भर के शोधार्थियों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। ई.1882 में सांस्कृतिक कलाकृतियों के मुख्य निरीक्षक ने स्मारक की कमजोर स्थिति के कारण प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) को किसी अन्य स्थान पर संग्रहालय में स्थानान्तरित करने का आग्रह किया। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने पुरातत्वविद् ग्रोयन वेल्ड्ट को स्थान का अन्वेषण करने और परिसर की वास्तविक स्थिति ज्ञात करने के लिए नियुक्त किया। उसने अपने प्रतिवेदन में कहा कि यह डर अनुचित है इसलिए इसे इसी स्थिति में बनाए रखा जाए।

    बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री दुनिया भर में पहुंची

    जब इस स्मारक की प्रसिद्धि होने लगी तो देशी-विदेशी लोगों ने बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री को स्मृतिचिह्न के रूप में चुराना आरम्भ कर दिया और इसकी मूर्तियों तथा कलात्मक पत्थरों को लूट लिया। इनमें से कुछ भाग तो औपनिवेशिक सरकार की सहमति से भी लूटे गए। 1886 ई. में श्यामदेश के राजा चुलालोंगकॉर्न ने जावा की यात्रा की और बोरोबुदुर से कुछ मूर्तियाँ अपने देश ले जाने का आग्रह किया। उसे मूर्तियों के आठ छकड़े भरकर ले जाने की अनुमति मिल गई। इस सामग्री में विभिन्न स्तंभों से उतारे गए तीस मूर्ति-शिलापट्ट, पांच बुद्ध प्रतिमाएं, दो सिंह मूर्तियाँ, एक व्यालमुख प्रणाल, कुछ सीढ़ियों और दरवाजों के कला अनुकल्प और एक द्वारपाल प्रतिमा सम्मिलित थीं। इनमें से कुछ प्रमुख कलाकृतियाँ, जैसे शेर, द्वारपाल, काल, मकर और विशाल जलस्थल (नाले) आदि, बैंकॉक राष्ट्रीय संग्रहालय के जावा कला कक्ष में प्रदर्शित की गई हैं।

    बोरोबुदुर मंदिर का पुनर्स्थापन

    1885 ई. में योग्यकार्ता की पुरातत्व सोसाइटी के अध्यक्ष यजेर्मन ने बोरोबुदुर स्मारक में एक छुपे हुए पैर को खोजा। प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के छुपे हुए पैर व्यक्त करने वाले चित्र 1890-91 ई. में बने। जावा की डच ईस्टइण्डीज सरकार ने इस खोज के बाद बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक के संरक्षण देने की दिशा में काम आगे बढ़ाया। 1890 ई. में सरकार ने इसके सरंक्षण हेतु योजना तैयार करने के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बैठाया। इसमें डच कलाविद् एवं इतिहासकार ब्रांडेस, डच सैन्य अभियंता थियोडोर वैन एर्प और डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभियंता वैन डी कमर को सम्मिलित किया गया। इस आयोग ने 1902 ई. में ईस्टइण्डीज सरकार के सामने तीन प्रस्तावों वाली योजना रखी। पहले प्रस्ताव में स्मारक के कोनों को पुनः स्थापित करने, अव्यवस्थित पत्थरों को हटाने, वेदिकाओं को सुदृढ़ करने और झरोखे, महराब (तोरण), स्तूप तथा मुख्य गुम्बद को पुनर्स्थापित करने के सुझाव सम्मिलित थे ताकि तत्काल होने वाली संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सके। दूसरे प्रस्ताव में प्रकोष्ठ को हटाने, उचित रखरखाव करने, तलों (छतों) और स्तूपों की मरम्मत करके जल-निकासी में सुधार करने के सुझाव सम्मिलित थे। उस समय इस कार्य की अनुमानित लागत लगभग 48,800 डच गिल्डर थी।

    1907 से 1911 ई. के मध्य थियोडोर वैन एर्प के सुझावों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया। इस कार्य के पहले चरण में प्रथम सात माह तक स्मारक के आसपास खुदाई की गई ताकि बुद्ध की मूर्तियों के सिर और स्तम्भों के पत्थर खोजे जा सकें। इसके बाद वैन एर्प ने तीनों ऊपरी वृत्ताकार चबूतरों और स्तूपों को ध्वस्त करके उनका पुनः निर्माण करवाया। इसी बीच, वैन एर्प ने स्मारक में सुधार हेतु अन्य विषयों की खोज की जिनके आधार पर 34,600 गिल्डर की लागत के नए कार्य स्वीकृत किए गए। वैन एर्प ने मुख्य स्तूप के शिखर पर छत्र (तीन स्तरीय छतरी) का पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ करवाया किंतु बाद में उसने छत्र को पुनः हटा दिया क्योंकि शिखर के निर्माण के लिए मूल पत्थर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे तथा बोरोबुदुर के शिखर की मूल बनावट ज्ञात नहीं थी। हटाया गया छत्र अब बोरोबुदुर से कुछ सौ मीटर उत्तर में स्थित कर्म विभांगगा संग्रहालय में रखा है।

    पुनर्स्थापन के कार्य को सामान्यतः मूर्तियों की सफाई पर केन्द्रित रखा गया तथा वैन एर्प ने जलनिकासी की समस्या का समाधान नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि पन्द्रह वर्षो में स्मारक के गलियारों की दीवारें झुकने लगी और प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) में दरारें दिखने लगीं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वैन एर्प ने मरम्मत कार्य में कंकरीट का उपयोग किया था जिससे क्षारीय लवण तथा कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड का घोल बाहर आने लगा और उसका बहाव शेष हिस्सों पर भी होने लगा किंतु 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और उसके समाप्त होते ही 1945 ई. में इंडोनेशियाई राष्ट्रीय क्रांति आरम्भ हो गई जो 1949 ई. तक चली। इन कारणों से बोरोबुदुर का पुनर्स्थापन कार्य बीच में ही रुक गया। इस दौरान स्मारक को मौसम की प्रतिकूलता तथा जल-निकासी की समस्या का सामना करना पड़ा जिसके कारण पत्थरों की मूल बनावट खिसकने लगी और दीवारें धरती में धँसने लगीं।

    1950 के दशक तक बोरोबुदुर ढहने की कगार पर पहुँच गया। 1965 ई. में इंडोनेशिया ने यूनेस्को से बोरोबुदुर सहित अन्य स्मारकों का अपक्षय रोकने के लिए सहायता मांगी। 1968 ई. में इंडोनेशिया के पुरातत्व सेवा के प्रमुख प्रोफेसर सोक्मोनो ने ''बोरोबुदुर सरंक्षण अभियान'' आरम्भ किया और बड़े पैमाने पर मरम्मत परियोजना आरम्भ की। 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में इंडोनेशिया सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से बोरोबुदुर स्मारक को बचाने के लिए बड़ा नवीनीकरण कराने का अनुरोध किया।

    इण्डोनेशिया सरकार के इस अनुरोध पर ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, साइप्रस, फ्रांस तथा जर्मनी ने इस कार्य के लिए धन उपलब्ध कराया। इस धन से इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को ने 1975-82 ई. तक बड़ी नवीनीकरण परियोजना के अंतर्गत स्मारक का जीर्णोद्धार करवाया। नवीनीकरण के दौरान दस लाख से भी अधिक पत्थर हटाकर उन्हें एक तरफ विशाल आरे के आकार में जमाकर रखा गया जिससे उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सके तथा सूचीबद्ध रूप से सफाई और परिरक्षण के काम किए जा सकें। पत्थरों को सूक्ष्मजीवियों से मुक्त करने के लिए कीटनाशकों से उपचारित किया गया। स्मारक की नींव को सुदृढ़ बनाया गया तथा समस्त 1460 स्तम्भों की सफाई की गई। पुनर्स्थापन में पाँच वर्गाकार चबूतरों को हटाकर वापस लगाने तथा जल-निकासी प्रणाली में सुधार लाने का कार्य भी सम्मिलित था। इस विशाल परियोजना में लगभग 600 लोगों ने कार्य किया और कुल 69,01,243 अमीरीकी डॉलर व्यय हुए। नवीनीकरण का कार्य पूर्ण होने के बाद यूनेस्को ने 1991 ई. में बोरोबुदुर को विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध किया। वर्तमान में बोरोबुदुर स्मारक तीर्थ-यात्रियों एवं विश्व भर के पर्यटकों के लिए खुला हुआ है।

    धार्मिक समारोह

    यूनेस्को द्वारा विशाल नवीनीकरण के बाद, बोरोबुदुर को पुनः तीर्थयात्रा और पूजास्थल के रूप में काम में लिया जाने लगा। वर्ष में एक बार, मई या जून माह में पूर्णिमा के दिन इंडोनेशिया में बौद्ध धर्म के लोग गौतम बुद्ध के जन्म, निधन और शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के उपलक्ष्य में वैशाख उत्सव मनाते हैं। वैशाख का यह दिन इंडोनेशिया में राष्ट्रीय छुट्टी के रूप में मनाया जाता है तथा तीन बौद्ध मंदिरों मेदुत से पावोन होते हुए बोरोबुदुर तक समारोह मनाया जाता है।

    बम विस्फोटों से उड़ाने का षड़यंत्र

    21 जनवरी 1985 को बोरोबुदुर स्मारक में अचानक हुए नौ बम विस्फोटों से स्मारक के नौ स्तूप बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। यह षड़यंत्र कुछ मुस्लिम उग्रवादियों ने रचा था। एक मुस्लिम धर्मोपदेशक हुसैन अली अल हब्स्याई को पकड़ लिया गया तथा लगभग 6 साल तक चले मुकदमे के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बम ले जाने वाले उग्रवादी समूह के दो अन्य सदस्यों को 20 वर्ष के कारावास की एवं एक अन्य व्यक्ति को 13 वर्ष के कारावास की सजा मिली।

    पर्यटकों की संख्या में वृद्धि

    बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक इंडोनेशिया में विश्व भर के पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। 1974 ई. में स्मारक को देखने के लिए 2 लाख 60 हजार पर्यटक आए जिनमें से 36 हजार विदेशी पर्यटक थे। देश में अर्थव्यवस्था संकट से पूर्व 1990 के दशक के मध्य तक यह संख्या बढ़कर 25 लाख प्रति वर्ष तक पहुँच गई जिनमें से 80 प्रतिशत घरेलू पर्यटक थे।

    भूकम्प से अप्रभावित

    27 मई 2006 को मध्य जावा के दक्षिणी तट पर रिक्टर पैमाने पर 6.2 तीव्रता का भूकम्प आया। इस घटना से योग्यकर्ता नगर के निकट के क्षेत्रों में गंभीर क्षति के साथ बहुत से लोग हताहत हुए किंतु बोरोबुदुर इससे अप्रभावित रहा।

    मेरापी पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

    वर्ष 2010 के अक्टूबर और नवम्बर माह में बोरोबुदुर मंदिर से लगभग 28 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित मेरापी पर्वत में भयानक ज्वालामुखी विस्फोट हुए जिनसे बोरोबुदुर स्मारक को भारी क्षति पहुंची तथा ज्वालामुखीय राख मंदिर पर आकर गिरी। 3 से 5 नवम्बर तक मंदिर की मूर्तियों पर राख की 2.5 सेंटीमीटर मोटी परत चढ़ गई। आस-पास के पेड़-पौधों को भी हानि पहुंची। 5 से 9 नवम्बर तक मंदिर परिसर को राख की सफाई करने के लिए बन्द रखा गया। यूनेस्को ने मेरापी पर्वत से ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बोरोबुदुर के पुनर्स्थापन की लागत के रूप में 30 लाख अमरीकी डॉलर की सहायता प्रदान की। मंदिर की जल निकासी प्रणाली में ज्वालामुखीय राख भर गई थी जिसे हटाने के लिऐ फिर से 55 हजार से अधिक प्रस्तर शिलाएं हटाई गईं। इस पूरे कार्य में लगभग एक साल लग गया।

    जर्मनी द्वारा संरक्षण कार्य

    जनवरी 2012 में जर्मनी की सरकार के दो प्रस्तर सरंक्षण विशेषज्ञों ने 10 दिन मंदिर में रहकर मन्दिर की स्थिति का अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर जून 2012 में जर्मनी ने द्वितीय चरण के पुनर्स्थापन कार्यों के लिए यूनेस्को को 1,30,000 अमीरी डॉलर की सहायता देने का प्रस्ताव किया। अक्टूबर 2012 में पत्थर सरंक्षण, सूक्ष्मजैविकी, सरंचना अभियांत्रिकी और रासायनिक अभियान्त्रिकी के छः विशेषज्ञों ने एक सप्ताह तक बोरोबुदुर में रहकर इसका पुनः निरीक्षण किया। इसके बाद यहाँ एक बार फिर से संरक्षण कार्य करवाए गए। जून 2012 में बोरोबुदुर को विश्व के सबसे बड़े पुरातत्व स्थल के रूप में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। अगस्त 2014 में इस स्मारक की सीढ़ियों पर लकड़ी का आवरण लगाया गया ताकि मूल सीढ़ियों को जूतों से घिसने से बचाया जा सके।

    केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

    13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित पूर्वी जावा के केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ जो योग्यकर्ता तक सुनाई दिया। इससे निकली राख से प्रभावित होने के कारण बोरोबुदुर, परमबनन और रातु बोको सहित योग्यकर्ता और मध्य जावा के बड़े पर्यटन स्थल कुछ दिनों के लिए बन्द कर दिये गये। इस दौरान बोरोबुदुर की सरंचना को ज्वालामुखीय राख से बचाने के लिए प्रतिष्ठित स्तूपों और मूर्तियों को ढक दिया गया।

    आईसिस के निशाने पर अगस्त 2014 में आईएसआईएस (आईसिस) की इंडोनेशियाई शाखा ने सोशियल मीडिया पर धमकी दी कि वह बोरोबुदुर सहित इंडोनेशिया की अन्य मूर्ति परियोजनाओं को शीघ्र ही ध्वस्त करेगा। इसके बाद इंडोनेशियाई पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा बोरोबुदुर मंदिर की सुरक्षा बढ़ाई गई। सरकार ने मंदिर परिसर में सीसीटीवी लगाए और रात में सुरक्षा पहरा बढ़ा दिया।

    जावाई स्थापत्य स्मारक घोषित

    जब जावा में रह रहे भारतीय बौद्धों और हिन्दुओं को इस स्मारक के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बोरोबुदुर की पहाड़ी पर बड़ी संख्या में निर्माण कार्य आरम्भ कर दिये। इण्डोनेशिया की मुस्लिम सरकार को इस स्थान से कोई भी हिन्दू अथवा बौद्ध पुण्य स्थान संरचना नहीं मिली। इस कारण सरकार ने इसे हिन्दू अथवा बौद्ध स्थल न मानकर स्थानीय जावा संस्कृति का स्मारक घोषित किया है।

    बौद्ध चैत्य एवं स्मारक का प्रारूप

    बोरोबुदुर को एक बड़े स्तूप की तरह निर्मित किया गया है ऊपर से देखने पर यह विशाल तांत्रिक बौद्ध मंडल जैसा दिखाई देता है। यह बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और मन के स्वभाव को निरूपित करता है। इसका मूल आधार वर्गाकार है जिसकी प्रत्येक भुजा 118 मीटर है। इसमें नौ मंजिलें हैं। निचली छः मंजिलें वर्गाकार तथा ऊपरी तीन मंजिलें वृत्ताकार हैं।

    ऊपरी मंजिल के मध्य में एक बड़े स्तूप के चारों ओर घण्टी के आकार के 72 छोटे स्तूप हैं जो सजावटी छिद्रों से युक्त है। बुद्ध की मूर्तियाँ इन छिद्रयुक्त सहस्रपात्रों के अन्दर स्थापित हैं। बोरोबुदुर का स्वरूप पिरामिड से प्रेरित है। पश्चिम जावा के प्रागैतिहासिक ऑस्ट्रोनेशियाई महापाषाण संस्कृति के स्थल पुंडेन बेरुंडक, पंग्गुयांगां, किसोलोक और गुनुंग पडंग नामक स्थानों पर विभिन्न स्थल दुर्ग और पत्थरों से निर्मित सोपान-पिरामिड संरचनाएं पाई गई हैं। पत्थर से बने पिरामिडों के निर्माण के पीछे स्थानीय विश्वास है कि पर्वतों और ऊँचे स्थानों पर पैतृक आत्माओं अथवा ह्यांग का निवास होता है। बोरोबुदुर स्मारक की आधारभूत बनावट को पुंडेन बेरुंडक पिरमिड से प्रेरित माना जाता है तथा महायान बौद्ध विचारों और प्रतीकों के साथ निगमित पाषाण परंपरा का विस्तार माना जाता है।

    बोरोबुदुर का मंदिर का आध्यात्मिक महत्व

    स्मारक के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से तीन लोकों को निरूपित करते हैं। ये तीन लोक क्रमशः कामधातु (इच्छाओं की दुनिया), रूपधातु (रूपों की दुनिया) और अरूपधातु (रूपरहित दुनिया) हैं। साधारण मनुष्य का जीवन इनमें से निम्नतर जीवन स्तर, अर्थात् इच्छाओं की दुनिया में रहता है। जो लोग अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, वे प्रथम स्तर से उपर उठकर वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से रूपों को देख तो सकते हैं लेकिन उनकी इच्छा नहीं होती।

    अंत में मनुष्य उन्नति करता हुआ पूर्ण बुद्धत्व को प्राप्त करता है। यह मानव का मूल एवं विशुद्ध स्तर होता है। इसमें वह रूपरहित निर्वाण को प्राप्त होता है। संसार के जीवन चक्र से ऊपर हो जाता है, जहाँ प्रबुद्ध आत्मा शून्य के समान, सांसारिक रूप के साथ संलग्न नहीं होती, उसे पूर्ण शून्य अथवा अपने आप अस्तित्वहीन रखना आता है।

    बोरोबुदुर स्मारक में कामधातु को आधार से निरूपित किया गया है, रूपधातु को पाँच वर्गाकार मंजिलों (सरंचना) से और अरूपधातु को तीन वृत्ताकार मंजिलों तथा विशाल शिखर स्तूप से निरूपित किया गया है। इन तीन स्तरों के स्थापत्य गुणों में लाक्षणिक अन्तर हैं। उदाहरण के लिए रूपधातु में मिलने वाले वर्ग और विस्तृत अलंकरण, अरूपधातु के सरल वृत्ताकार मंजिल में लुप्त हो जाते हैं, जिससे रूपों की दुनिया को निरूपित किया जाता है। जहाँ लोग नाम और रूप से जुड़े रहते हैं और रूपहीन दुनिया में परिवर्तित हो जाते हैं।

    बोरोबुदुर में सामूहिक पूजा इस तरह की जाती है मानो किसी तीर्थ में भ्रमण कर रहे हों। मंदिर की सीढ़ियां और गलियारा तीर्थ यात्रियों को शिखर तक जाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। प्रत्येक मंजिल आत्मज्ञान के एक स्तर को निरूपित करती है। तीर्थ यात्रियों का मार्गदर्शन करने वाला पथ बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान को प्रतीकात्मक रूप में परिकल्पित करता है।

    1885 ई. में इस स्मारक के आधार में छिपी हुई एक संरचना आकस्मिक रूप से खोजी गई। छुपे हुये पैर में, प्रतिमा उत्कीर्णित शिलापट्ट ;त्मसपमद्धि भी शामिल हैं, जिनमें से 160 वास्तविक कामधातु के विवरण की व्याख्या करते हैं। शिलालेखित चौखटों पर भी शिल्पकारों द्वारा नक्काशियों के बारे में कुछ आवश्यक अनुदेश लिखे हुए थे। वास्तविक आधार के ऊपर झालरदार आधार बना हुआ है जिसका उद्देश्य आज भी रहस्य बना हुआ है। माना जाता है कि यह झालर पहाड़ी में विनाशकारी आपदा आने की स्थिति में वास्तविक आधार को आच्छादित करने के लिए है। अन्य मतों के अनुसार झालरदार आधार बनाने का कारण, स्मारक के मूल आधार की बनावट के उन दोषों को छिपाना है, जो प्राचीन भारतीय वास्तु शास्त्र का उल्लंघन करते हैं।

    504 बुद्ध प्रतिमाएं

    बोरोबुदुर मंदिर में भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। पाँच वर्गाकार चबूतरों (रूपधातु स्तर) के साथ-साथ ऊपरी चबूतरे (अरूपधातु स्तर) पर पद्मासन मूर्तियाँ स्थित हैं। रूपधातु स्तर पर देवली में बुद्ध की प्रतिमाएं स्तंभ वेष्टन (वेदिका) के बाहर पंक्तियों में क्रमबद्ध हैं।

    ऊपरी स्तर पर मूर्तियों की संख्या लगातार कम होती जाती है। प्रथम वेदिका में 104 देवली, दूसरी में 88, तीसरी में 72, चौथी में 72 और पाँचवी में 64 देवली हैं। कुल मिलाकर रूपधातु स्तर तक 432 बुद्ध मूर्तियाँ हैं।

    अरूपधातु स्तर (तीन वृत्ताकार चबूतरों) पर बुद्ध की मूर्तियाँ स्तूपों के अन्दर स्थित हैं। प्रथम वृत्ताकार चबूतरे पर 32 स्तूप, दूसरे पर 24 और तीसरे पर 16 स्तूप हैं जिनका योग 72 स्तूप होता है। मूल 504 बुद्ध मूर्तियों में से 300 से अधिक क्षतिग्रत हैं जिनमें से अधिकतर मूर्तियों के सिर गायब हैं। कुल 43 मूर्तियाँ गायब हैं।

    स्मारक की खोज होने से पहले, इन मूर्तियों के सिरों को मूर्ति-तस्करों ने चुराया और पश्चिमी देशों के संग्राहलयों को बेच दिया। बुद्ध मूर्तियों के इन सिरों में से कुछ एम्स्टर्डम के ट्रोपेन म्यूजियम और कुछ लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय सहित विभिन्न संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं। बुद्ध की समस्त मूर्तियाँ दूर से देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं किंतु इनकी मुद्रा अथवा हाथों की स्थिति में भिन्नता है। मुद्रा के पाँच समूह हैं- उत्तर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और शिरोबिंदु। ये सभी मुद्राएं महायान के अनुसार पाँच क्रममुक्त दिक्सूचक को निरुपित करती हैं। प्रथम चार वेदिकाओं में पहली चार मुद्राएं (उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) में प्रत्येक मूर्ति कम्पास की एक दिशा को निरुपित करती है। पाँचवी वेदिका में बुद्ध की मूर्ति और ऊपरी चबूतरे के 72 स्तूपों में स्थित मूर्तियाँ समान मुद्रा (शिरोबिंदु) में हैं। प्रत्येक मुद्रा, पाँच ध्यानी बुद्ध में से किसी एक को निरूपित करती है जिनमें प्रत्येक का अलग आध्यात्मिक कारण है।

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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 8 परमबनन शिव मंदिर समूह

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 8  परमबनन शिव मंदिर समूह


    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 8  


    परमबनन शिव मंदिर समूह


    मध्य जावा में स्थित परमबनन शिव मंदिर समूह, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और विशाल हिंदू मंदिर समूह है। यह मंदिर समूह मुख्यतः भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। परमबनन मंदिर विश्व भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर परिसर में काले रंग के चौकोर, आयातकार एवं विभिन्न आकृतियों में तराशे हुए, सुगढ़ एवं विशालाकाय पत्थरों के सैंकड़ों विशाल ढेर स्थित हैं जो नौवीं शताब्दी इस्वी के विशाल मंदिर समूह की उपस्थिति को दर्शाते हैं। पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मूल मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। इस मंदिर समूह का विनाश किसी शक्तिशाली भूकम्प के दौरान हुआ।

    परमबनन शिव मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। उस समय कुल 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था जिनमें केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर त्रिमूर्ति मंदिर कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं। इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के मंदिर हैं। त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक आपित मंदिर है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक केलिर मंदिर तथा चारों कोनों पर एक-एक पाटोक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर योजना के चारों ओर चार पंक्तियों में कुल 224 मंदिरों के अवशेष स्थित हैं। इस प्रकार कुल यहाँ कुल 240 मंदिर स्थित थे किंतु 16वीं शती ईस्वी में प्रबल भूकम्प से ये मंदिर गिर गए। लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे।

    बौद्ध धर्म एवं शैव धर्म की प्रतिस्पर्द्धा

    भारत से आए कई हिन्दू राजकुमारों ने जावा द्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए। सातवीं-आठवी शताब्दी ईस्वी में मध्य जावा क्षेत्र में संजय राजवंश के वंशज राज्य करते थे। यह राजवंश मूलतः हिन्दू धर्म को मानने वाला था किंतु बाद में किसी काल में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आठवीं शताब्दी ईस्वी में शैलेन्द्र वंश के राजाओं ने संजय वंश के शासकों को परास्त करके मध्य जावा से परे धकेल दिया और मेदांग राज्य की स्थापना की। संजय वंश पूर्वी जावा पर शासन करने लगा। शैलेन्द्र वंश के राजा भी महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बोरोबुदुर एवं सेवू के विशाल एवं गगनचुम्बी महायान बौद्ध मंदिरों का निर्माण किया। शैलेन्द्र वंश के राजा लगभग एक शताब्दी तक मध्य जावा पर शासन करते रहे।

    हिन्दू धर्म की जय तथा मंदिर का निर्माण

    नौवीं शताब्दी ईस्वी में एक बार पुनः शैलेन्द्र वंश का पतन हो गया एवं उनके स्थान पर पुनः संजय वंश का उत्थान हुआ और उन्होंने माताराम राज्य की स्थापना की। इस समय तक इस वंश के राजाओं ने पुनः शैव-हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिए ई.850 के आसपास माताराम राज्य के संजय वंशीय राजा राकाई पिकातान ने हिन्दू धर्म की विजय के रूप में इस मंदिर समूह का निर्माण कराना आरम्भ किया ताकि शैलेन्द्र वंश के शासकों को उनकी ही भाषा में विशाल मंदिरों के निर्माण के माध्यम से जवाब दिया जा सके। इतिहासकारों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण इस बात की घोषणा थी कि अब मध्य जावा में माताराम साम्राज्य (मेदांग साम्राज्य) बौद्ध-महायान धर्म के स्थान पर हिन्दू-शैव धर्म में परिवर्तित हो गया है।

    राकाई पिकातान के उत्तराधिकारी राजाओं- लोकपाल तथा बालीतुंग महाशंभु ने मंदिरों का निर्माण निरंतर जारी रखा। ई.856 के शिवगढ़ शिलालेख के अनुसार इस मंदिर को मूलतः भगवान शिव को समर्पित किया गया था तथा इस मंदिर का मूल नाम शिवगढ़ था। जिस स्थान पर आज यह मंदिर समूह स्थित है, उसके ठीक निकट से नौवीं शताब्दी ईस्वी में ओपाक नामक नदी बहती थी। मंदिर को सुरक्षित करने के लिए इस नदी का रुख मोड़ा गया। अब यह नदी मंदिर के पश्चिम में है तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना राजा बालितुंग द्वारा की गई। इसके बाद से राज परिवार के समस्त धार्मिक आयोजन इसी मंदिर में होने लगे। बालितुंग के उत्तराधिकारी राजाओं- दक्ष एवं तुलोडोंग द्वारा भी मंदिर का विस्तार किया गया। उस काल में इस मंदिर के बाहरी क्षेत्र में सैंकड़ों ब्राह्मण परिवार निवास करते थे।

    मंदिर का विघटन

    ई.930 के बाद के किसी वर्ष में मपू सिंदोक नामक राजा ने जावा में इस्याना वंश की स्थापना की तथा जावा की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में स्थानांतरित कर दिया। ऐसा परमबनन के उत्तर में स्थित मेरापी पहाड़ में ज्वालामुखी के सक्रिय हो जाने के कारण किया गया। राज्याश्रय हट जाने के बाद से मंदिर का विघटन आरम्भ हो गया। फिर भी यह हिन्दू प्रजा की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना रहा। सोलहवीं शताब्दी में आए एक भयंकर भूकम्प में इस मंदिर समूह के समस्त मंदिर धरती पर गिर गए। ई.1755 में माताराम साम्राज्य का विभाजन हुआ तथा यह योग्यकार्ता (जोगजा) एवं सुराकार्ता (सोलो) राज्यों में विभक्त हो गया। इन दोनों राज्यों के सीमा इसी मंदिर पर आकर समाप्त होती थी। अब उन राज्यों की पहचान योग्यकार्ता एवं सेंट्रल जावा के रूप में की जाती है।

    मंदिर की जीर्णोद्धार यात्रा

    जब डच लोग इस द्वीप पर आए तो ई.1811 में उनकी दृष्टि इस मंदिर समूह के खण्डहरों पर पड़ी। उन्होंने खजाने की लालसा में इस मंदिर को और भी खोद डाला। बाद में डच लोगों द्वारा इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया। तब पाया गया कि आस-पास के लोग इन मंदिरों के पत्थरों को उठाकर अपने घरों की नीवों में डालते थे तथा घरों की चिनाई करते थे। ई.1918 में डच लोगों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण आरम्भ किया। ई.1930 में जीर्णोद्धार के काम में तेजी आई तथा यह कार्य आज भी जारी है। मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य आसान नहीं था। अधिकतर अलंकृत पत्थर दूरस्थ क्षेत्रों में ले जाकर भवन निर्माण में लगा दिए गए थे। ऐसे में सरकार ने निर्णय लिया कि केवल उन्हीं मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा जिनकी कम से कम 75 प्रतिशत सामग्री उपलब्ध है तथा जिनका कोई डिजाइन, चित्र अथवा नक्शा उपलबध है। मंदिर के पुननिर्माण के लिए इसके चारों ओर खड़े हो गए बाजार एवं मानव बस्तियों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया।

    रामकथा के मंचन हेतु स्टेडियमों का निर्माण

    मंदिर परिसर में ही ओपाक नदी के तट पर ओपन एयर तथा इण्डोर स्टेडियमों का निर्माण किया गया ताकि वहाँ रामकथा का मंचन किया जा सके। जावा द्वीप पर रामकथा नृत्य नाटिकाएं हजारों साल से मंचित की जाती रही हैं। उन विभिन्न नृत्य नाटिकाओं को ढूंढकर फिर से इन स्टेडियमों तक लाया गया। चंद्र ज्योत्सना के प्रकाश में इन नाटिकाओं का मंचन किया जाता है तो विश्व भर के पर्यटक मंत्र-मुग्ध रह जाते हैं। गलुंगन, तावुर केसंगा तथा नायेपी आदि हिन्दू पर्वों पर इस मंदिर परिसर में हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। उस दौरान बहुत से दल रामकथाओं का मंचन करते हैं।

    सुन्नी मुसमलान द्वारा शिव मंदिर का उद्घाटन

    ई.1953 में मुख्य शिव मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा हो गया। इण्डोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने इस मंदिर का उद्घाटन किया जो इस्लाम की सुन्नी शाखा का मुसलमान था। इस समय तक जावा की 80 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमान थी किंतु उन्हें इस हिन्दू मंदिर को फिर से खड़ा करने, उसका उद्घाटन करने और उसके दरवाजे पूरे संसार के पर्यटकों के लिए खोलने में कोई परहेज नहीं था, अपितु वे गर्व की अनुभूति करते थे कि उन्होंने अपनी सैंकड़ों साल पहले खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर लिया था। भारत में जहाँ कि 80 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या निवास करती है, श्रीकृष्ण जन्म भूमि मथुरा, श्री राम जन्म भूमि अयोध्या और विश्वनाथ मंदिर काशी के मंदिरों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है, इन मंदिरों पर राजनीति करके, कुछ राजनीतिक दल मुसलमानों के और कुछ राजनीतिक दल हिन्दुओं के वोट प्राप्त करते हैं। मुझे जावा में सरदार पटेल का स्मरण हो आया जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षी इरादों को विफल करके सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवा दिया था। अन्यथा आज उसकी दशा भी अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ के मंदिरों जैसी ही होती।

    वर्ष 2006 में पुनः भूकम्प से क्षति

    अभी मंदिर को खुले लगभग 53 वर्ष ही हुए थे कि वर्ष 2006 में मध्य जावा में पुनः जोर का भूकम्प आया। मंदिर को फिर से क्षति पहुंची और इण्डोनेशिया के आर्कियोलोजी विभाग द्वारा मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करके इसे दर्शकों के लिए सुरक्षित बनाया गया। इस दौरान मंदिर कई महीनों तक बंद रहा।

    सोलह मुख्य मंदिरों एवं दो लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण

    वर्ष 2009 में नंदी मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो गया और यह दर्शकों के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर भगवान शिव के मुख्य मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इसके बाद एक-एक करके मंदिरों का पुनर्निर्माण होता गया और वे दर्शकों के लिए खोले जाते रहे। वर्तमान में भीतरी मुख्य क्षेत्र के सभी 8 मुख्य मंदिरों एवं सभी 8 लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण पूरा कर लिया गया है। बाहरी क्षेत्र के 224 पेरवारा मंदिरों में से केवल 2 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जा सका है।

    वर्ष 2010 में परमबनन सेंचुरी घोषित

    वर्ष 2010 में इण्डोनेशियाई सरकार ने परमबनन, रातू बोको, कालासन, सारी तथा प्लाओसान मंदिरों के समस्त क्षेत्रों को घेरते हुए परमबनन सेंचुरी घोषित किया। यह सेंचुरी 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है।

    वर्ष 2014 में ज्वालामुखी की राख का सामना

    परमबनन शिव मंदिर को दुबारा से खोले हुए आठ वर्ष भी नहीं बीते थे कि 13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित केलुड ज्वालामुखी फट पड़ा जिसका धमाका दो किलोमीटर दूर तक सुनाई दिया। इस ज्वालामुखी से बड़ी मात्रा में निकली काली और गर्म राख उड़कर इन मंदिरों तक भी आई और इन मंदिरों को भारी नुक्सान पहुंचा। इस कारण इस मंदिर सहित आसपास के समस्त मंदिरों को श्रद्धालुओं, दर्शकों एवं पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया। इसे काफी दिनों बाद, राख हटाए जाने के पश्चात् ही फिर से खोला जा सका।

    रारा जोंग्गरांग की कथा

    परमबनन शिव मंदिर को जावा द्वीप वासी रारा जोंग्गरांग मंदिर कहते हैं। रारा जोंग्गरांग का अर्थ होता है- पतली कुमारी। जावा द्वीप की एक दंत कथा के अनुसार किसी समय जावा द्वीप पर पेंगिंग तथा बोको नामक दो राज्य थे। पेंगिंग राज्य समृद्ध एवं खुशहाल राज्य था जिस पर राजा प्रबु डामार मोयो का शासन था जिसके बंडुंग बोण्डोवोसो नामक पुत्र था। बोको राज्य पर मानवभक्षी क्रूर राक्षस प्रबु बोको का शासन था। उसका एक सहयोगी पातिह गुपोलो नामक राक्षस भी बड़ा क्रूर था। प्रबु बोको की कन्या रारा जोंगरांग बहुत सुंदर थी। प्रबु बोको पेंगिंग राज्य को जीतकर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। इसलिए उसने विशाल सेना का निर्माण किया।

    एक दिन अचानक उसकी सेनाओं ने पेंगिंग रज्य पर आक्रमण कर दिया। पेंगिंग का राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो अपनी सेना लेकर उस राक्षस राजा से लड़ने के लिए चला। एक भयानक युद्ध के बाद राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने अपनी रहस्यमयी शक्तियों से राक्षस राजा प्रबु बोको को मार डाला। प्रबु बोको का सहयोगी राक्षस पातिह गुपोलो बची हुई सेना को युद्ध क्षेत्र से लेकर भाग गया। वह मृत राजा की राजधानी बोको पहुंचा और राजमहल में जाकर राजकुमारी रारा जोंगराग को सूचित किया कि उसका पिता युद्ध में मर गया है। उसी समय पेंगिंग की सेना आ पहुंची और उन्होंने मृतराजा की राजधानी एवं उसके महल पर अधिकार कर लिया।

    राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने राजकुमार रोरो जोंगराग को देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु राजकुमारी ने विवाह करने से मना कर दिया। जब राजकुमार ने राजकुमारी पर बार-बार जोर डाला तो राजकुमारी ने राजकुमार के समक्ष दो शर्तें रखीं। पहली तो यह कि उसे जलतुण्ड नामक एक विशाल कूप बनाना पड़ेगा तथा दूसरी शर्त यह कि राजकुमार को अपनी शक्तियों के बल पर एक रात में 1000 मंदिरों का निर्माण करना पड़ेगा। राजकुमार ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं तथा तुरंत ही एक कूप का निर्माण करना आरम्भ कर दिया। राजकुमार ने अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर शीघ्र ही कुआं खोद डाला तथा राजकुमारी को कुआं देखने के लिए बुलाया। राजकुमारी ने राजकुमार को कुएं में उतरकर दिखाने के लिए कहा। जब राजकुमार कुएं में उतरा तो राजकुमारी के पिता के साथी राक्षस पातिह गुपोलो ने कुंए को मिट्टी एवं पत्थरों से बंद कर दिया। बड़ी कठिनाई से राजकुमार उसे कुएं से बाहर निकल सका।

    इस धोखे के बाद भी राजकुमारी के प्रति राजमकुमार का प्रेम कम नहीं हुआ। अब राजकुमारी ने राजकुमार से दूसरी शर्त पूरी करने के लिए कहा। राजकुमार ने उन दिव्य आत्माओं का आह्वान किया जो उसकी सहायता करती थीं। वे आत्माएं जब 999 मंदिर बना चुकीं और 1000 वें मंदिर का निर्माण करने लगीं तो राजकुमारी ने अपने राक्षस साथियों की सहायता से पूर्व दिशा में चावल के खेतों और भूसे में भयानक आग लगा दी जिससे मंदिर बना रही आत्माओं को लगा कि सूर्य निकल आया है और वे काम छोड़कर फिर से धरती में प्रवेश कर गईं। इस प्रकार एक हजारवां मंदिर अधूरा ही रह गया। जब राजकुमार को इस छल के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने राजकुमारी जोंग्गरांग को श्राप दिया कि वह पत्थर की मूर्ति में बदल जाए। राजकुमारी तत्काल ही पत्थर की मूर्ति में बदल गई और राजकुमार ने अधूरे पड़े मंदिर का निर्माण पूरा करके उस मूर्ति को वहाँ स्थापित कर दिया। वही मूर्ति अब दुर्गा के रूप में पूजी जाती है जिसे स्थानीय लोग रारा जोंग्गरांग कहते हैं। यही मूर्ति शिव मंदिर के उत्तर वाले प्रकोष्ठ में लगी हुई है।

    परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की आयोजना

    सम्पूर्ण मंदिर परिसर लगभग 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है। मंदिर परिसर के केन्द्रीय भाग में मुख्यतः ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं। तीनों देवों की प्रतिमाओं के मुख पूर्व दिशा में हैं। प्रत्येक प्रधान मंदिर के सम्मुख पश्चिम दिशा में मुंह करके उसी देव से संबंधित एक मंदिर स्थित हैं जो तीनों देवों के वाहनों को समर्पित हैं। ब्रह्मा मंदिर के सामने हंस का, विष्णु मंदिर के सामने गरुड़ का और शिव मंदिर के सामने नन्दी का मंदिर स्थित है। शिव मंदिर बहुत बड़ा और सुंदर है। यह मंदिर तीनों प्रमुख मंदिरों के मध्य में है। शिव मंदिर के उत्तर में भगवान विष्णु का और दक्षिण में भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। रोरो जोंग्गरंग मंदिर या परमबनन मंदिर दुनिया भर के हिंदुओं के साथ-साथ, स्थानीय लोगों के लिए भी भक्ति एवं अध्यात्म का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

    परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की प्रतिमाएं

    परमबनन परिसर का मुख्य मंदिर अर्थात् शिव मंदिर 47 मीटर ऊंचा है तथा आधार पर 34 मीटर लम्बा एवं 34 मीटर चौड़ा है। मंदिर के पूर्व में बनी सीढ़ियों से होकर ऊपर जाया जाता है जहाँ एक के बाद एक करके चारों ओर कुल चार कक्ष बने हुए हैं जिनमें से पूर्व दिशा की ओर के मुख्य कक्ष में भगवान शिव की प्रतिमा खड़ी है। उत्तर की तरफ वाले कक्ष में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा प्रतिमा है। एक कक्ष में भगवान गणेश एवं एक कक्ष में अगस्त्य ऋषि की प्रतिमा है। ब्रह्मा मंदिर में केवल एक ही कक्ष है जिसमें केवल ब्रह्मा की प्रतिमा है। इसी प्रकार विष्णु मंदिर में भी केवल एक कक्ष है जिसमें केवल भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।

    श्रीराम कथा प्रसंगों की अद्भुत प्रतिमाएं

    मुख्य मंदिरों के पूजा कक्षों की बाहरी दीवारों पर प्रदक्षिणा अथवा परिक्रमा करने के पथ बने हुए हैं। इन प्रदक्षिणा पथों के दोनों ओर की दीवारों पर रामकथा एवं श्रीकृष्ण लीला के प्रसंगों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई हैं। रामकथा प्रसंग के मूर्ति फलक शिव मंदिर से आरम्भ होते हैं तथा ब्रह्मा मंदिर में जाकर पूर्ण होते हैं। इन दीवारों पर लोकपालों एवं विविध देवताओं की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों का उत्पीड़न, रावण द्वारा सीता का हरण, जटायु द्वारा सीता को बचाने की चेष्टा, भगवान द्वारा मारीच का वध, रावण द्वारा कैलास पर्वत को उठाने के दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं। एक पैनल में अशोक वाटिका में सीता माता के समक्ष हनुमानजी द्वारा रामकथा के निवेदन का बड़ा ही जीवन्त दृश्य अंकित किया गया है इस चित्र में माता सीता और हनुमानजी के चेहरे के भाव एवं मुद्राएं इतनी भाव प्रवण बनाई गई हैं कि संसार में इस दृश्य का ऐसा अद्भुत अंकन शायद ही कहीं और हुआ हो। यह बीच में से एक टूटा हुआ पैनल है किंतु सौभाग्य से दोनों चेहरे पूरी तरह सुरक्षित हैं। जीर्णोद्धार के दौरान इस पैनल को फिर से जोड़कर खड़ा किया गया है।

    भागवत पुराण के प्रसंगों का अंकन

    हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए परमबनन मंदिर आस्था का केंद्र है। परमबनन मंदिर इतना सुंदर है की इसकी बनावट किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले। मंदिर की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग मूर्तियों के रूप में अंकित हैं। विष्णु मंदिर के परिक्रमा पथ में भागवत पुराण के आधार पर श्रीकृष्ण लीला के प्रसंग शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं। बाल कृष्ण की लीलाओं के अंकन को देखकर दर्शक सम्मोहित सा खड़ा रह जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध और कृष्ण-बलराम द्वारा कालिय वध के प्रसंग इतने सुंदर बने हुए हैं जिन्हें देखकर दर्शक, मूर्तिकारों की समझ और कला के प्रति अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।

    कमल-पुष्प पर मानव खोपड़ी

    पास में ही एक शिव प्रतिमा है जिसमें शिव ध्यानस्थ हैं। उनके दाहनी ओर बहुत सुंदर त्रिशूल खड़ा हुआ है और बाईं ओर कमल नाल पर लगे पुष्प के ऊपर एक खोपड़ी रखी हुई दिखाई दे रही है। भगवान के शरीर पर विविध प्रकार के आभूषण एवं अलंकरण सुशोभित हैं। भगवान के हाथों में रुद्राक्ष की माला है किंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रतिमा में कोई सर्प दिखाई नहीं दे रहा है।

    पशु-पक्षियों एवं कल्पतरू का अंकन

    इन मंदिरों की बाहरी दीवारों की ताकों में सिंह, हिरण, खरगोश, बिल्ली आदि का अंकन है। साथ ही तोते, मोर, हंस, लोकपाल, अप्सराएं एवं अन्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। एक ताक में हंस अपनी चोंच लम्बी करके पानी पीने का प्रयास कर रहा है। एक ताक में दो मादा तोते बैठे हैं जिनके मुंह के स्थान पर स्त्रियों के सुंदर चेहरे बने हुए हैं जिन्होंने विविध प्रकार के आभूषण एवं मुकुट धारण कर रखे हैं। एक अन्य ताक में एक मादा तोता तथा एक नर तोता बैठे हुए हैं जिनमें मुंह के स्थान पर नर एवं नारी के मुख बने हुए हैं। मादा तोते में मानवीय आकृति का समावेश करते हुए स्तन भी बनाए गए हैं।

    परग्रही प्राणी जैसे गरुड़

    शिव मंदिर के बाहर के प्रदक्षिणा पथ में एक प्रतिमा में भगावान विष्णु की सेवा में गरुड़ विराजमान हैं, गरुड़ का सिर अपेक्षाकृत लम्बा बनाया गया है जिसे देखकर मिश्र देश के उन लम्बी खोपड़ियों वाले देवताओं का स्मरण होता है जिनके लिए माना जाता है कि ये परग्रही मानव थे और दूसरे लोक से धरती पर आए थे। गरुड़ के सिर पर जटाओं एवं उनसे बंधे हुए जूड़े का भी अंकन किया गया है। गरुड़ के नीचे जल में तैरती हुई मछलियां दिखाई गई हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में विश्राम कर रहे हैं, गरुड़ उनकी सेवा में हैं तथा हाथों में कमल पुष्प सुशोभित है।






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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 9 उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 9 उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 9

    उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं 

    बाली द्वीप के पडंग्टेगल गांव में स्थित 'उबुद-वानर-वन' लगभग 12 हैक्टेयर क्षेत्र में स्थित है जिसमें लाल मुंह, अपेक्षाकृत छोटी काया एवं सफेद रंग की बड़ी मूंछो वाले लगभग 700 बंदर निवास करते हैं। यह संसार के प्राचीनतम वनों में से एक है तथा इस छोटे से वन में वृक्षों की 186 प्रजातियां चिह्ति की गई हैं। इस वन में तीन प्रमुख मंदिर स्थित हैं-

    (1.) पुरा दालेम अगुंग पडंग्टेगल, यह मंदिर मृत्यु के महान देवता अर्थात् शिव को समर्पित है। (बाली के हिन्दू भगवान शिव को मृत्यु का महान देवता मानते हैं।)

    (2.) पुरा बेजी, यह मंदिर पाप नाशिनी देवी गंगा को समर्पित है।

    (3.) पुरा प्रजापति, यह मंदिर जन्म देने वाले देवता ब्रह्मा को समर्पित है।

    ये मंदिर लगभग 1000 साल पुराने हैं। स्वाभाविक है कि इस क्षेत्र में देवी-देवताओं की बहुत सी मूर्तियां पाई जाएं किंतु इन मंदिरों के निर्माण से पहले भी इस क्षेत्र में सैंकड़ों मूर्तियां बनाई गईं जो आज भी देखी जा सकती हैं। उबुद वानर वन परिसर में विभिन्न प्रकार के मनुष्यों, पशु-पक्षियों तथा जलचरों की अति प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। अनेक मनुष्याकार प्रतिमाओं के चेहरे, मनुष्यों की बजाय, बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों जैसे दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरों वाले मनुष्य निवास करते थे। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र तथा सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां हैं। इनके चेहरे फूले हुए हैं जिन पर बनी गोल एवं मोटी नाक दूर से ध्यान आकर्षित करती है। होंठों के भीतर अथवा बाहर निकले हुए बड़े-बड़े दांत इन्हें आधुनिक मनुष्यों से अलग प्रदर्शित करते हैं। इनी भुजाएं मांसल, जंघाएं पुष्ट तथा चेहरों पर विचित्र भाव दिखाई देते हैं। बहुत सी नर-नारी प्रतिमाओं की आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं।

    यहाँ यह समझा जाना आवश्यक है कि भारत में भी श्रीराम कथा के काल में दक्षिण भारत के वनों में बहुत सी ऐसी मानव बस्तियां थीं जिनके चेहरे वानरों, रीछों एवं भालुओं से मिलते थे। लम्बे दांतों वाले मानवों की बस्तियां भी तब अस्तित्व में रहे होने का अनुमान है जिन्हें राक्षस कहा जाता है। पर्याप्त संभव है कि उबुद वानर वन परिसर की विचित्र प्रतिमाएं इसी काल के मानवों से सम्बन्धित हों।

    उबुद वानर वन परिसर में स्थित प्रतिमाओं की बनावट, उनका अंग वैशिष्ट्य तथा प्रतिमाओं की वर्तमान अवस्था को देखकर कहा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण किसी एक सभ्यता द्वारा नहीं किया जाकर, कम से कम दो सभ्यताओं द्वारा किया गया है। इन प्रतिमाओं का कई प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

    (अ.) सभ्यताओं के आधार पर वर्गीकरण-

    1. प्राचीन सभ्यता की प्रतिमाएं- इनका निर्माण आधुनिक ''होमो सेपियन-सेपियन'' प्रजाति के ''क्रोमैग्नन मानव'' के समय में ही हुआ है किंतु उस युग में इन द्वीपों पर निवास करने वाला मानव आज के मानव जैसा चेहरा विकसित नहीं कर पाया था क्योंकि इन प्रतिमाओं के चेहरे मानवों की बजाय बंदर, चिम्पैंजी तथा ओरंगुटान से अधिक मिलते हैं। पर्याप्त संभव है कि ये प्रतिमाएं उन आदि मानवों को देखकर किन्हीं परग्रही जीवों ने बनाई हों! गोल आंखों वाली तथा टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं इसी काल की हैं।

    2. आधुनिक सभ्यता की प्रतिमाएं - इनका निर्माण वर्तमान मानव सभ्यता के क्रोमैग्नन मानव द्वारा बहुत बाद के युगों में अर्थात् आज से 1100-1200 वर्ष पहले किया गया है, जब हिन्दू राजकुमार इन द्वीपों पर अपने राज्य स्थापित कर चुके थे। इनमें मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली प्रतिमाएं मिलती हैं। इन मूर्तियों को लम्बी एवं पतली आंखों से पहचाना जा सकता है।

    (ब.) आंखों के आधार पर वर्गीकरण

    1. गोल आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें नहीं हैं- ये प्रतिमाएं किसी अति प्राचीन सभ्यता की प्रतीत होती हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं में ओरंगुटान जैसे मनुष्यों, राक्षसों एवं बंदरों की प्रतिमाएं हैं तथा इन सब के चेहरे एवं नथुने फूले हुए हैं।

    2. टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं, जिन पर पलकें नहीं हैं - ऐसी केवल एक ही प्रतिमा देखने को मिली, यह किसी परग्रही देवता की जान पड़ती है। यह प्रतिमा क्रोमैग्नन मानव द्वारा बनाई गई नहीं है। इसे किसी परग्रही जीव द्वारा ही बनाया गया होगा।

    3. आधुनिक मनुष्यों जैसी लम्बी आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें बनी हुई हैं - इस वर्ग में मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली, दोनों प्रकार की प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।

    (स.) मुखाकृति के आधार पर वर्गीकरण -

    1. राक्षसी चेहरों वाली प्रतिमाएं

    2. मनुष्यों के मुख वाली प्रतिमाएं

    3. पशुओं के मुख वाली प्रतिमाएं

    प्राचीन सभ्यता एवं आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा इन तीनों ही प्रकार की मुखाकृतियों वाली प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, जिन्हें स्पष्ट रूप से अलग-अलग पहचाना जा सकता है।

    (द.) जीभ के आधार पर वर्गीकरण-

    1. लम्बी जीभ वाली प्रतिमाएं - इस प्रकार की प्रतिमाओं में अधिकांश प्रतिमाएं गोल आंखों वाली तथा अत्यंत प्राचीन हैं। ये प्रतिमाएं प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाले देवी-देवताओं यथा अग्नि देव, वायु देव आदि की प्रतीत होती हैं। लम्बी जीभ वाली कुछ प्रतिमाओं की आंखें लम्बी एवं पतली हैं जो आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा बनाई गई हैं तथा प्राचीन प्रतिमाओं का आधुनिक संस्करण हैं।

    2. सामान्य जीभ वाली प्रतिमाएं - इनमें से कुछ प्रतिमाएं प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतीत होती हैं तथा कुछ, प्राचीन प्रतिमाओं का नवीन संस्करण जान पड़ती हैं जिनका निर्माण आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा किया गया है।

    प्रतिमाओं के इस संक्षिप्त वर्गीकरण के बाद उबुद वानर वन की कुछ प्रमुख प्रतिमाओं का परिचय दिया जाना उचित होगा।

    टेलिस्कोपिक आंखों वाले देवता की प्रतिमा

    एक देव-प्रतिमा का मुंह सामने से पूरी तरह चपटा है जिस पर आखें इस तरह बनाई गई हैं मानो वहाँ दूरबीन की नलियां रखी हुई हों। दोनों आंखों के बीच में एक मणि जैसी रचना है। इस मूर्ति में दिखाई दे रहा देवता अपने पैरों पर उकडूं बैठा है तथा घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़े होने अथवा उड़ने की तैयारी की मुद्रा में है। इस तरह की आखों वाली और कोई प्रतिमा इस परिसर में नहीं दिखी। ऐसा लगता है कि इस प्रतिमा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि यहां कभी दूसरे ग्रह के लोग आए थे जो देखने के लिए टेलिस्कोप जैसे यंत्रों का प्रयोग करते थे। इसके वक्ष पर आधुनिक क्रॉस बेल्ट जैसा कवच धारण किया हुआ है। सिर पर गोल टोप है जिससे खोपड़ी पूरी तरह ढंक गई है। यह मूर्ति एक हजार साल अथवा उससे अधिक प्राचीन प्रतीत होती है। इसकी ठोड़ी और नाक काफी घिस गई है।

    हंसती हुई नागकन्या

    इसी परिसर में एक नागकन्या का अद्भुत अंकन किया गया है। यह नागकन्या आंखें बंद किये हुए बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में बैठी है जिसके लम्बे और वलयाकार केश आगे वक्ष तक लटके हुए हैं। इसके पेट पर बने हुए शल्कों से ज्ञात होता है कि यह मानवी नहीं है, अपितु नागकन्या है। इस नागकन्या की देहयष्टि, अन्य प्रतिमाओं के विपरीत अर्थात् कृशकाय है। इसके दोनों हाथों और दोनों पैरों में चार-चार अंगुलियों का अंकन किया गया है। किसी भी हाथ या पैर में अंगूठा नहीं बनाया गया है।

    विचित्र आंखों वाली एक और प्रतिमा

    उबुद परिसर की बावड़ी के पास ही एक मनुष्य की प्रतिमा लगी है जिसकी आंखें पूरी तरह गोल हैं किंतु ये आंखें अन्य गोल आंखों वाली प्रतिमाओं से बिल्कुल भिन्न हैं। दोनों आंखें पूरी तरह चेहरे से उभर कर बाहर आई हुई हैं। पलकें नहीं होने से पता नहीं लगता कि ये आंखें खुली हैं या बंद। प्रतिमा के कान बहुत विशाल हैं। इस प्रतिमा ने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां बंद करके अपने वक्ष के पास बगल में ही रखी हुई हैं। मोटे-मोटे
    दांत स्पष्ट दिखाई देते हैं जिनमें से ऊपर वाली पंक्ति में से दोनों तरफ का एक-एक दांत बाहर आया हुआ है। इस प्रतिमा के मुख्य पत्थर में ही सिर पर छोटी सी पगड़ी तथा टांगों पर छोटी सी लंगोटी उत्कीर्ण की गई है।

    बावड़ी में गणेश एवं गंगा

    उबुद वानर वन परिसर में एक चौकोर बावड़ी है, जो अधिक गहरी नहीं है। इसकी एक दीवार पर भगवान गणेश की सैंकड़ों साल पुरानी, पत्थर की प्रतिमा लगी हुई है। इसके पास ही एक देवी प्रतिमा भी है, जो स्पष्ट पहचानने में नहीं आती किंतु यह देवी गंगा की प्रतिमा है जिसके हाथ में लिए गए पत्थर के कलश से जल की अविरल धारा आज भी बह रही है। इस जल को गंगाजल के समान ही पवित्र माना जाता है। इस बावड़ी एवं प्रतिमाओं का निर्माण भारतीय हिन्दू राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंच जाने के बाद हुआ है।

    गीदड़ मुखी मनुष्य का आकाशीय प्राणियों से वार्तालाप

    एक मनुष्याकार प्रतिमा में एक ऐसे मनुष्य का अंकन किया गया है जिसका मुख गीदड़ अथवा कुत्ते की तरह है तथा उसने अपना मुंह पूरी तरह खोलकर आकाश की तरफ उठा रखा है। ऐसा लगता है कि वह आकाश में स्थित प्राणियों को कोई संदेश दे रहा है। उसने एक हाथ में एक यंत्र उठा रखा है तथा दूसरा हाथ इस प्रकार की मुद्रा में है मानो वह अपनी अंगुलियों से इस यंत्र को संचालित करेगा। इस प्रतिमा की आंखें लम्बी और पतली हैं जिनसे स्पष्ट है कि यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित है तथा संभव है कि किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा बनाई गई प्रतिमा की अनुकृति है जिसमें गोल आंखों के स्थान पर लम्बी एवं पतली आंखों का अंकन किया गया है।

    गीदड़ के मुख वाली स्त्री प्रतिमा

    एक अन्य प्रतिमा में एक ऐसी बैठी हुई स्त्री का अंकन किया गया है जिसका मुख मादा-गीदड़ जैसा है। इसका मुख आकाश की तरफ होते हुए भी पहली वाली प्रतिमा की अपेक्षा नीचा है। इसके हाथों की अंगुलियां अपेक्षाकृत अधिक लम्बी एवं पतली हैं। इसके गले में सुंदर हार है जिस पर जटिल अलंकरण किया गया है। हाथों में कंगन, पैरों में पायजेब एवं कंधों पर अंगद भी देखे जा सकते हैं। अंगद का अंकन भुजाओं पर किया जाता है किंतु इस प्रतिमा में कंधों पर दिखाई दे रहा है। इसने अपना दायां हाथ दायें घुटने पर एवं बायां हाथ बायें घुटने पर रखा हुआ है। इसके अधो भाग पर किसी वस्त्र का अंकन किया गया है जबकि वक्ष पूरी तरह खुला हुआ है। स्तन सामान्य आकार के एवं आकर्षक बनाए गए हैं। इसकी आंखें भी लम्बी एवं पतली हैं, चेहरा एवं होठ पतले हैं। इस अंकन के आधार पर कहा जा सकता है कि इसे आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित किया गया है।

    पथ्य तैयार करते हुए मनुष्य की प्रतिमा

    एक वटवृक्ष के नीचे स्थित चबूतरे पर एक भरी हुई देहयष्टि वाले व्यक्ति की प्रतिमा है जो पालथी लगाए हुए प्रसन्न मुद्रा में बैठा है। उसके सामने एक शिला रखी हुई है जिस पर एक गोल पत्थर रखा हुआ है। यह एक वैद्य की प्रतिमा प्रतीत होती है जो किसी जड़ी-बूटी से दवा बनाने की तैयारी में है। इस वैद्य की आकृति मनुष्य से कम, औरंगुटान से अधिक मिलती है। ऐसा लगता है कि यह किसी अन्य ग्रह से आया हुआ प्राणी है जिसने बाली-वासियों को चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान दिया है। इस प्रतिमा में एक बात और ध्यान देने की है कि यह मनुष्य आंखें बंद किये हुए है और इसके दोनों हाथ प्रार्थना के भाव से जुड़े हुए हैं जिससे प्रतीत होता है कि यह दवा तैयार करने से पहले किसी देवता अथवा दिव्य शक्ति का आह्वान कर रहा है।

    लम्बी जीभ वाला विचित्र मनुष्य

    इसी परिसर में लगभग पांच फुट की एक ऐसी मनुष्य प्रतिमा रखी हुई है जिसकी जीभ कई फुट लम्बी है तथा पेट तक लटकी हुई है। इस जीभ पर एवं उसके आसपास पानी की लहरें बनी हुई हैं जिससे अनुमान होता है कि यह जल का देवता है। इसकी आंखें गोल हैं तथा लगभग चेहरे से बाहर आई हुई हैं। इस मनुष्य के पैर बहुत छोटे हैं। यह प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित जान पड़ती है।

    पैरों में नक्षत्र वाला विचित्र मनुष्य

    एक मनुष्य ने अपने दोनों हाथों में कोई गोला ले रखा है तथा एक पैर से वह उस गोले पर आघात करने की मुद्रा में है। मनुष्य के दांत बाहर दिख रहे हैं तथा चेहरे पर प्रसन्नता मिश्रित विचित्र भाव हैं जो किसी भी तरह सौम्य नहीं कहे जा सकते। इस मनुष्य के हाथ और पैरों के अग्र भाग विशेष ध्यान देने योग्य हैं। इन पर अंगुलियों की जगह विशिष्ट प्रकार का अलंकरण है। मानो उसने किसी धातु ऐ बने ग्लव्ज (दस्ताने) पहन रखे हैं। गोले पर टिका हुआ पैर मछली जैसा दिखता है तथा हाथ किसी पक्षी के मजबूत पंजे की तरह दिखाई देता है। गोले पर छिद्रनुमा केन्द्र का अंकन किया गया है तथा इस छिद्र से किरणें निकल रही हैं जिससे आभास होता है कि यह गोला कोई नक्षत्र है। इस मनुष्य की आंखें पूरी तरह गोल हैं जिन पर मोटी-मोटी भौंहों का अंकन किया गया है। गालों और ठोढ़ी पर हल्की दाढ़ी है तथा सिर पर पतली सी पगड़ी है।

    पशु चर्म लपेटने वाली स्थूल स्त्री

    निकट ही एक स्थूलकाय स्त्री की प्रतिमा है जिसने कमर पर मृगछाला की तरह किसी पशु की चर्म लपेट रखी है तथा उसकी नाभि पर एक नाग बंधा हुआ है। यह स्त्री घुटनों के बल बैठी हुई है तथा इसकी जीभ नाभि तक लटकी हुई है। वक्ष पर दिखाये गए स्तन सामान्य आकार के किंतु बेडौल हैं। सिर के बाल खुले हुए हैं। इसने बायां हाथ अपने सिर पर रखा हुआ है जिसके कारण बाईं बगल खुली हुई दिखाई देती है तथा कंधे पर पड़े हुए एक सांप का मुख इस बगल में झांक रहा है। स्त्री का दायां हाथ दिखाई नहीं देता किंतु दायें हाथ की अंगुलियां दायें स्तन पर रखी हुई हैं। इसकी आंखें काफी बड़ी और गोल हैं जो एक गोलक में रखी हुई हैं। होठ काफी मोटे हैं तथा चेहरे की भाव भंगिमा अपेक्षाकृत शांत है। यह मूर्ति भी कई शताब्दियों पुरानी प्रतीत होती है। इसकी लम्बी जीभ यह संकेत करती है कि यह किसी प्राकृतिक शक्ति पर नियंत्रण रखने वाली देवी की प्रतिमा है। अंकन के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि यह तूफान की देवी है।

    अग्निदेव एवं उनकी पत्नी

    एक चबूतरे के कौने पर एक स्त्री-पुरुष की युगल प्रतिमा बनी हुई है जिसमें उनके सिर एवं मुख दिखाई दे रहे हैं। यह प्रतिमा किसी और स्थान से लाकर इस चबूतरे पर स्थापित की गई है। दोनों चेहरों पर बनी आंखें पतली एवं सुंदर हैं। यह प्रतिमा काफी बाद के काल की है तथा यहां रखी अन्य प्रतिमाओं की शैली से मेल नहीं खाती है। पुरुष की आंखें स्पष्ट रूप से खुली हुई हैं जबकि स्त्री की आंखें बंद हैं। दोनों की जिह्वाएं मुख से बाहर निकलकर लटकी हुई हैं और आपस में मिल रही हैं। पुरुष की जिह्वा अधिक चौड़ी, अधिक बड़ी है। इस जिह्वा पर अग्नि की लम्बी लपटों का अंकन किया गया है। स्त्री की जिह्वा पर अपेक्षाकृत छोटी ज्वालाओं का अंकन है।

    ये संभवतः अग्निदेव तथा उनकी पत्नी हैं। दोनों मुखों के होंठ, आंख, नाक, कान, दांत सभी कुछ आज के मनुष्य के समान बहुत सुंदर बनाए गए हैं। दोनों के ही चेहरों के भाव सौम्य हैं। दोनों चेहरे मुस्कुरा रहे हैं जिसके कारण इनकी दंतपक्तियां स्पष्ट और लुभावनी बन पड़ी हैं। दोनों के कानों में आभूषणों का अलंकरण है। दोनों के गले में बारीक एवं मोटे मनकों की कई-कई मालाएं हैं जो वक्षों तक लटक रही हैं। स्त्री के केश वेणी के रूप में बांधे गए हैं जिन पर अच्छा अलंकरण किया गया है। स्त्री के बाएं कान का कर्णफूल बहुत सुंदर है तथा सूर्य की तरह गोल है। पुरुष की भौहें ऊपर उठकर सिर के बालों से मिल गई हैं तथा सिर के केश अग्नि की ज्वाला की तरह ऊर्ध्वगामी हैं। स्त्री के माथे पर सुंदर मुकुट बांधा गया है। मुकुट का अंकन एक मेखला के रूप में किया गया है जिसके बीच में एक कलात्मक पैण्डल बांधा हुआ है। स्त्री के बालों का जूड़ा कलात्मक रूप देकर बांधा गया है।

    यह प्रतिमा भी भारतीय राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंचन के बाद की प्रतीत होती है क्योंकि भारतीय पुराणों में वर्णित अग्निदेव का इस प्रतिमा पर पूरा प्रभाव दृष्टिगत होता है।

    बड़े स्तनों वाली स्त्री प्रतिमा

    राक्षस प्रतिमा के निकट ही एक स्त्री प्रतिमा रखी हुई है जिसका केवल धड़ एवं ऊपरी भाग दिखाई देता है। इस स्त्री प्रतिमा में स्थूलकाय स्तन बने हुए हैं। स्तनों को आगे की ओर लम्बा बनाने के लिए उनमें वलय बनाए गए हैं। इन स्तनों की तुलना आधुनिक काल की बकरियों के स्तनों से की जा सकती है। इस स्त्री की मुखमुद्रा में प्रसन्न्ता के स्थान पर पीड़ा का भाव अधिक है। ऐसे स्तनों वाली और भी प्रतिमाएं बाली द्वीप पर देखने को मिलीं। बाली के कुछ प्राचीन चित्रों में भी ऐसे स्तनों वाली स्त्रियां दिखाई गई हैं।

    लम्बी जीभ और सुंदर चेहरे वाली स्त्री

    इस परिसर में रखी एक स्त्री प्रतिमा में, वर्तमान मानव सभ्यता में दिखाई देने वाली नारी का अंकन किया गया है जिसकी गर्दन के दोनों ओर से गुंथी हुई चोटियां सामने आ रही हैं। इन चोटियों को सजाने के लिए बड़े मनकों का प्रयोग किया गया है। सिर के पीछे के केश खुले हुए हैं और कंधों के दूसरी तरफ दिखाई दे रहे हैं। स्त्री का चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा है, दांतों की सुंदर पंक्तियां दूर से दिखाई देती हैं, आंखें पतली, नुकली एवं आनुपतिक हैं और पूरी तरह खुली हुई हैं। स्त्री के वक्ष पर साड़ी जैसे किसी वस्त्र का अंकन किया गया है। चेहरे पर सौम्य भाव हैं तथा पूरा चेहरा प्रसन्नता से दमकता हुआ प्रतीत होता है। यह प्रतिमा, गोल आंखों वाली प्रतिमा से कई सौ साल बाद की प्रतीत होती है। इसके चेहरे के भाव आज की स्त्रियों से मिलते जुलते हैं किंतु बाली की स्त्रियों से नहीं, भारतीय देवियों के चेहरों से।

    दो दांतों वाली राक्षस प्रतिमा

    एक स्थूलाकाय पुरुष प्रतिमा के मुंह से दोनों तरफ एक-एक दांत बाहर निकला हुआ है। चेहरे पर दाढ़ी है तथा मुख के भाव अपेक्षाकृत क्रूर हैं। यह बैठी हुई मुद्रा में है जिसने अपने दोनों पैर आगे की ओर सिकोड़ कर हाथों की तरह मिला लिए हैं। इसकी बाईं भुजा कंधे के ऊपरी हिस्से से निकलती हुई है जबकि दाईं भुजा सामान्य से कुछ नीचे से निकल रही है। इस राक्षस ने अधो-वस्त्र धारण कर रखा है तथा ऊपरी हिस्सा नग्न है। आंखों का गोलक पूरी तरह गोल बनाया गया है जिसके ऊपरी आधे हिस्से को पलकों से ढंक दिया गया है तथा नीचे का आधा हिस्सा खुला हुआ है जिसमें से आखों का रैटीना एवं कोर्निया वाला भाग इस तरह बनाया गया है कि दोनों के रंग अलग दिखाई देते हैं मानो यह मूर्ति न होकर चित्र हो। इस तरह की आँखों वाली यह अकेली प्रतिमा यहां देखेने को मिली। इस राक्षस का बायां हाथ उसके बायें घुटने पर है तथा दायां हाथ दायीं बगल के पास इस प्रकार रखा हुआ है मानो अभय मुद्रा में रखना चाहता हो किंतु हाथों की अंगुलियां आगे की ओर मुड़ी हुई हैं।

    गांधार शैली के वस्त्रों वाली प्रतिमाएं

    उबुद वानर वन परिसर में कुछ प्रतिमाओं के वस्त्र गांधार शैली की तरह लहरदार बनाए गए हैं। इन प्रतिमाओं में मनुष्य शरीर भरे हुए तथा आधुनिक मनुष्यों की आकृतियों से मिलते हैं। सहज ही समझा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं पर बौद्धों का प्रभाव है। ऐसी ही एक स्त्री प्रतिमा के सिर पर बंदर का सुंदर अंकन किया गया है। स्त्री के स्तन अपेक्षाकृत छोटे बनाए गए हैं जो कि वस्त्र से ढंके हुए हैं। स्त्री की लम्बी एवं पतली आंखें बंद हैं, चेहरे का भाव सौम्य नहीं है। यह बौद्ध भिक्षुणी जान पड़ती है।

    कौन थे औरंगुटान जैसे मानवों की प्रतिमाओं को बनाने वाले 

    जावा द्वीप पर मानव की उपस्थिति लगभग 10 लाख वर्ष पुरानी है। यहाँ से ''होमो इरैक्टस'' (अर्थात् सीधे खड़े होने में दक्ष) मानव प्रजाति के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म प्राप्त किये गये हैं। इसे ''पिथेकेंथ्रोपस इरैक्टस'' (अर्थात् सीधा खड़ा होने वाला बंदर जैसा मानव) भी कहते हैं। बड़े मस्तिष्क वाला हमारा यह पूर्वज काफी घुमक्कड़ था। वह प्रथम प्राचीन मानव था जो अफ्रीकी महाद्वीप से बाहर निकलकर पूरे विश्व में अपनी जाति का प्रसार करने लगा। यह आज के मनुष्य और प्राचीन बंदर के मध्य की अंतिम कड़ी थी। इस मानव प्रजाति में से ही आज से लगभग डेढ़ लाख साल पहले ''होमो सैपियन सैपियन'' प्रजाति विकसित हुई। आज से लगभग 40 हजार साल पहले 'होमो सैपियन सैपियन'' का आधुनिक संस्करण अर्थात् ''क्रोमैग्नन मैन'' प्रकट हुआ।  

    उबुद वानर वन परिसर में स्थित प्राचीनतम प्रतिमाएं उस काल की हैं जब क्रौमैग्नन का चेहरा पूर्णतः आज के मानव जैसा नहीं बन पाया था। एक संभावना यह भी है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण उस काल में धरती पर आने वाले परग्रही जीवों द्वारा किया गया हो क्योंकि पर्याप्त संभव है कि उस काल का मानव, मूर्ति निर्माण करने में असक्षम हो किंतु उन्हें देखकर परग्रही जीवों ने उनकी प्रतिमाएं इस वन प्रांतर में बनाई हों ताकि भविष्य का मानव इस सभ्यता के बारे में जान सके। इन्हीं मूर्तियों में एक मूर्ति उन्होंने अपनी भी बनाई जिसकी आंखों पर दूरबीन की नलियां लगी हुई हैं। इस मूर्ति का चेहरा न तो औरंगुटान जैसी शक्लों वाले मोटे आदमियों से मिलता है, न राक्षसों की शक्लों वाले आदमियों से मिलता है न वहाँ मौजूद परवर्ती काल की मूर्तियों के देवताओं से मिलता है। बाली एवं जावा द्वीप में खड़े विशाल मंदिर समूह भी इन द्वीपों पर परग्रही जीवों के आने का साक्ष्य देते हैं तथा इन द्वीपों की दंत कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन द्वीपों पर कभी राक्षस राजा राज्य करते थे जो एक रात में 1000 प्रतिमाएं बनाने में सक्षम थे।

    गाय-बछड़े की अद्भुत वात्सल्य प्रतिमा

    जहाँ से हम उबुद वानर वन में प्रवेश करते हैं, वहीं लगभग 100 मीटर की दूरी पर चलते ही दीवार पर गाय-बछड़े की अद्भुत प्रतिमा रखी हुई दिखाई देती है। इस प्रतिमा में गाय अपने बछड़े को अपने वक्ष से चिपका कर मनुष्य की तरह बैठी हुई है। उसका एक खुर बछड़े की गर्दन पर इस तरह रखा हुआ है मानो वह बछड़े को इसी खुर के सहारे संभाले हुए हो। गाय तथा बछड़े, दोनों के कान लम्बे हैं, दोनों की आंखें बहुत सुंदर हैं तथा खुली हुई हैं। गाय के सिर पर छोटे-छोटे सींग हैं। सिर पर दोनों तरफ दो-दो सींग उकेरे गए हैं। गाय एवं बछड़े की लम्बी आंखों से स्पष्ट पहचाना जा सकता है कि इस प्रतिमा का निर्माण आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा किया गया है न कि आदिम सभ्यता के लोगों द्वारा।

    ड्रैगन प्रतिमाएं

    कभी इस द्वीप पर विशालाकाय कोमोडो डैªगन रहे होंगे। कुछ प्राचीन कोमोडो ड्रैगन प्रतिमाएं बावड़ी के निकट दिखाई पड़ती हैं। कोमोडो ड्रैगन से हटकर भी कुछ ड्रैगन प्रतिमाएं हैं जो चीनी ड्रैगन जैसी दिखाई देती हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं सर्प की तरह लेटी हुई मुद्रा में हैं तो कुछ मनुष्य की तरह खड़ी हुई मुद्रा में हैं। एक ड्रैगन प्रतिमा के मुख में एक बंदर बैठा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह ड्रैगन के मुंह को फाड़ने का प्रयास कर रहा हो। इस ड्रैगन के शरीर पर अन्य ड्रैगन उत्कीर्ण किया हुआ है जो किसी अन्य बंदर को निकट आने से रोकता हुआ प्रतीत होता है। यह आधुनिक काल के मानवों द्वारा निर्मित सैंकड़ों साल पुरानी प्रतिमा है।

    तलवार एवं ढाल वाले योद्धा की प्रतिमा

    एक स्तम्भ पर भरे हुए शरीर वाले योद्धा की मनुष्याकर प्रतिमा खड़ी है जिसने बाएं हाथ में ढाल एवं दायें हाथ में तलवार ले रखी है। इसकी आंखें लम्बी, मूछें बड़ी एवं भाव-भंगिमा कठोर है। यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं में से है। इसके सिर पर छोटा मुकुट है तथा कान किसी धातु की चद्दर से ढके हुए प्रतीत होते हैं। यह प्रतिमा बहुत बाद की जान पड़ती है।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-10 बाली एवं जावा द्वीपों की यात्रा

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-10 बाली एवं जावा द्वीपों की यात्रा

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 10 

    बाली एवं जावा द्वीपों की यात्रा

    इण्डोनेशिया के प्रति उत्सुकता क्यों !

    यद्यपि इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथापि इण्डोनेशियाई रुपयों एव डाक टिकटों पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें धर्नुधारी श्रीराम, सर्पधारी भगवान शिव, शुंडधारी भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी, विष्णु के वाहन गरुड़ आदि प्रमुख हैं। इण्डोनेशिया के साढ़े सत्रह हजार द्वीपों में बाली नामक एक ऐसा द्वीप भी है जहाँ 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या हिन्दू धर्मावलम्बी है तथा अनेक प्राचीन हिन्दू मंदिर स्थित हैं। संसार का सबसे बड़ा कहा जाने वाला बोरोबुदुर मंदिर भी इण्डोनेशिया के जावा द्वीप में स्थित है जो कि एक बौद्ध मंदिर है। हमारे मन में सात समंदर पार के इन हिन्दुओं की संस्कृति एवं उनके मंदिरों को देखने की लालसा थी। इसी कारण हमने अपनी ग्यारह दिवसीय पारिवारिक यात्रा के लिए इण्डोनेशिया का चयन किया।

    सामान की ऊहापोह

    हमारे इस पारिवारिक दल में छः सदस्य थे जिनमें मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता, मेरी पत्नी मधुबाला, पुत्र विजय, पुत्र-वधू भानुप्रिया एवं डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा सम्मिलित थी। हमारा परिवार विशुद्ध शाकाहारी है जो मांस, मछली, अण्डा किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करता। कुल 11 दिन की यात्रा में छः व्यक्तियों के लिए शाकाहारी भोजन एवं अल्पाहार की व्यवस्था करना किसी चुनौती से कम नहीं था। हमें अनुमान था कि इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु हम इस बात को लेकर आशंकित थे कि जावा द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलना कठिन है क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत जनसंख्या इस्लाम को मानने वालों की है जिनमें शायद शाकाहार के प्रति आग्रह न हो।

    हम इस बात को लेकर भी आशंकित थे कि बहुत से स्थानों पर मछली और अण्डा को मांसाहार नहीं माना जाता जबकि हमारे लिए तो ये वस्तुएं मांसाहार ही हैं। इसलिए हमने भोजन बनाने के लिए प्रेशर कुकर, तवा, बेलन, चाकू तथा अन्य आवश्यक बर्तन और कच्ची सामग्री यथा गेहूं का आटा, घी, मसाले एवं दालें आदि अपने साथ ले लीं। चूंकि बहुत से देशों में साबुत बीज तथा लिक्विड नहीं ले जाया जा सकता, इसलिए हमने तेल तथा चावल अपने साथ नहीं लिए। इसका खामियाजा हमें पूरी यात्रा में भुगतना पड़ा। इस कच्ची भोजन सामग्री के कारण सामान का वजन बढ़ जाने की समस्या उत्पन्न हो गई, इसका समाधान हमने कपड़ों में कमी करके किया। ओढ़ने-बिछाने के लिए कुछ नहीं लिया तथा पहनने के कपड़े भी कम से कम लिए।

    समय की घालमेल और शरीर की जैविक घड़ी

    यह 13 अप्रेल की शाम थी जब हम मलिण्डो एयर फ्लाइट से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुआलालम्पुर के लिए रवाना हुए। 13 अप्रेल की रात 10.05 बजे दिल्ली से रवाना होकर यह फ्लाईट 14 अप्रेल को प्रातः 6 बजे कुआलालम्पुर पहुंची। वस्तुतः हम विमान में कुल साढ़े पांच घण्टे ही बैठे थे। इस हिसाब से भारत में सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे किंतु मलेशिया, भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित होने के कारण वहाँ का समय भारत से ढाई घण्टे आगे चल रहा था, इसलिए वहाँ सुबह के छः बज चुके थे।

    डेढ़ घण्टे बाद अर्थात् प्रातः 7.30 बजे हमें कुआलालम्पुर एयरपोर्ट से बाली देनपासार के लिए फ्लाइट मिली जो इण्डोनिशयाई समय के अनुसार प्रातः 10.30 बजे बाली की प्रांतीय राजधानी देनपासार पहुंची। समय की घालमेल इण्डोनेशिया से भारत वापसी के समय भी हुई। हम 23 अप्रेल को प्रातः 11.30 बजे इण्डोनेशिया एयर एशिया फ्लाइट द्वारा जकार्ता से चलकर दोपहर ढाई बजे कुआलालम्पुर पहुंचे। कुआलालम्पुर का समय जकार्ता से एक घण्टा आगे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में तीन घण्टे नहीं अपितु दो घण्टे ही लगे। 23 अप्रेल को मलेशियाई समय के अनुसार सायं 7.00 बजे हम एयर एशिया की फ्लाइट द्वारा कुआलालम्पुर से चलकर रात्रि 10.00 बजे नई दिल्ली पहुंचे। भारत का समय कुआलालम्पुर से ढाई घण्टे पीछे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में साढ़े तीन घण्टे नहीं अपितु 5.30 घण्टे लगे।

    यह आश्चर्य-जनक बात थी कि केवल एयरपोर्ट की घड़ियों में ही समय का हेरफेर नहीं हो रहा था। हमारे शरीर की जैविक घड़ी भी अपने भीतर का समय उसी प्रकार बदल रही थी और हमें दिन या रात्रि की अनुभूति स्थानीय समय के अनुसार हो रही थी। यह संभवतः उन चुम्बकीय तरंगों के कारण था जो हर स्थान पर अपना अलग प्रभाव रखती हैं।

    मलिण्डो और एयर एशिया की एयर होस्टेस मलिण्डो एयर फ्लाइट सर्विस मलेशिया की है। मलिण्डो फ्लाइट की एयर होस्टेस विशेष प्रकार की ड्रेस पहनती हैं। गले से लेकर कमर तक कसा हुआ कोट तथा कमर से नीचे छींटदार खुली हुई तहमद होती है जो कमर पर केवल एक बार लपेटी हुई होती है। इस तहमद में लगभग पूरी टांगें दिखाई देती हैं। इण्डोनेशिया एयर एशिया एयर फ्लाइट सर्विस इण्डोनेशिया देश की है। इस फ्लाइट की एयर होस्टेस गले से कमर तक खुले कॉलर वाला एक कोट पहनती हैं तथा कमर से नीचे एक अत्यंत कसी हुई मिनी स्कर्ट धारण करती हैं। मुझे यह देखकर हैरानी थी कि जहाँ भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश की अधिकांश मुस्लिम महिलाएं बुर्के में रहने को अनिवार्य मजहबी रस्म मानती हैं, वहीं मलेशिया एवं इण्डोनेशिया जो कि दोनों ही मुस्लिम देश हैं, की एयर होस्टेस बुर्का डालना तो दूर, अपनी टांगों को खुला रखने में भी बहुत सहजता का अनुभव करती हैं।

    दोनों ही देशों की एयर होस्टेस को देखकर तब तो और भी अधिक हैरानी होती है जब वे यात्रियों का स्वागत भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर तथा मुस्कुराकर करती हैं। उनका व्यवहार विशेष रूप से विनम्र तथा सहयोग एवं सेवा की भावना वाला है। वे यात्रियों की सीट बैल्ट बांधने-खोलने, उन्हें गर्म-ठण्डा पेयजल देने, उनका सामान रैक में लगाने जैसी छोटी-छोटी सेवाएं मुस्कुरा कर करती हैं। अपनी बात विनम्रता से कहती हैं तथा यात्रियों को विदा देते समय पुनः हाथ जोड़कर अभिवादन करती हुई उन्हें आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं देती हैं।

    मलिण्डो की आवभगत

    मलेशिया की एयर फ्लाइट सर्विस 'मलिण्डो' की आवभगत हमारे लिए अविस्मरणीय घटना बन गई है। 13 अप्रेल की रात्रि का भोजन हमने बुक करवा रखा था तथा विशेष हिदायत दे रखी थी कि हमें 'जैन-भोजन' उपलब्ध कराया जाए। यह हमारी अपेक्षा के अनुरूप था लेकिन हैरानी तब हुई जब 14 अप्रेल को प्रातः नौ बजे एयर होस्टेस गर्म नाश्ता लेकर उपस्थित हुई। हमने यह सोचकर मना कर दिया कि यह अवश्य ही नॉनवेज होगा किंतु एयर होस्टेस ने आग्रह पूर्वक कहा कि यह पूरी तरह वैजीटेरियन है तथा इसमें केवल गेहूं के आटे के परांठे एवं अरहर की दाल है।

    यह नाश्ता हमने बुक नहीं करवा रखा था किंतु एयर सर्विस द्वारा अपनी ओर से उपलब्ध कराया गया था। उन गर्म परांठों और भारतीय तरीके से छौंक लगी हुई अरहर की दाल इतनी स्वादिष्ट थी कि भारतीयों को भी हैरानी में डाल दे। हिन्द महासागर के ऊपर से उड़ते हुए यह अनपेक्षित दाल-परांठों का नाश्ता जीवन भर याद रखने योग्य था। मलिण्डो जैसी सदाशयता और आवभगत हमें अपनी यात्रा के दौरान इण्डिोनेशिया एयर एशिया की तीनों फ्लाईट्स में देखने को नहीं मिली।

    सर्विस अपार्टमेंट्स की बुकिंग

    चूंकि होटलों में खाना नहीं बनाया जा सकता इसलिए हमारे सामने समस्या यह थी कि हमारे रहने की व्यवस्था किसी शाकाहारी हिन्दू परिवार में हो जाए। यह कार्य सरल नहीं था, ऐसे परिवार को भारत में बैठे हुए ढूंढ निकालना, समुद्र में से किसी सुईं को ढूंढ निकालने जैसा था। इस समस्या का समाधान किया आधुनिक समय में प्रचलन में आई सर्विस अपार्टमेंट्स की सुविधा ने। विश्व के बहुत से देशों में विशेषकर उन देशों में जहाँ पर्यटन, अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, बहुत से परिवार अपने घर का खाली हिस्सा पर्यटकों को उपलब्ध करा रहे हैं। इन्हें सर्विस अपार्टमेंट्स कहा जाता है। कुछ वैबसाइट्स ने इन सर्विस अपार्टमेंट्स को अपने तंत्र पर जोड़ रखा है, विश्व भर में बैठे पर्यटक इनका लाभ उठा सकते हैं। हमने उन सर्विस अपार्टमेंट्स का चयन किया जिनमें भोजन बनाने के लिए अलग से रसोई-घर हो।

    सौभाग्य से बाली में एक ऐसा परिवार हमें मिल गया जिसमें पति का नाम पुतु तथा पत्नी का नाम पुतु एका था। यह एक हिन्दू परिवार है और इसने पर्यटकों के लिए अलग से एक पांच सितारा होटल जैसी सुविधाओं वाला और कांच की दीवारों से घिरा हुआ एक अत्यंत रमणीय और आरामदायक फ्लैट चावल के खेतों के बीच बना रखा है। यह ऐसा ही था जैसे भारत में आकर कोई किसी छोटी से ढाणी में रहे तथा सुविधाजनक आवास का आनंद उठाए। हमारे मन में एक आशंका अपनी सुरक्षा को लेकर थी। खेतों के बीच अनजान देश में इस प्रकार अकेले परिवार का निवास करना, कहीं किसी संकट को आमंत्रण देना तो नहीं था! फिर भी जब हमें ज्ञात हुआ कि श्रीमती पुतु एका बहुत पढ़ी-लिखी हैं और प्रायः अंतर्राष्ट्रीय सेमीनारों में भाग लेने के लिए मलेशिया, सिंगापुर तथा अन्य देशों को जाती रहती हैं तो हमने पांच दिन के लिए इस सर्विस फ्लैट को बुक करवा लिया।

    योग्यकार्ता में निवास करने वाले मासप्रियो नामक एक मुस्लिम शिक्षक ने हमें अपनी वैबसाइट के माध्यम से भरोसा दिलाया कि हम उनके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी। इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया।

    बाली और योग्यकार्ता में तो यह व्यवस्था हो गई किंतु जकार्ता में ऐसा किया जाना संभव नहीं था क्योंकि जकार्ता विश्व के सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले शहरों में से है जहाँ लगभग हर समय जाम लगा रहता है। चूंकि सर्विस अपार्टमेंट्स प्रायः शहर के कुछ दूर ही मिलते हैं इसलिए उनका चयन करना इस खतरे को आमंत्रण देता था कि हम अपनी यात्रा के अंतिम दिन प्रातः साढ़े ग्यारह बजे की फ्लाइट ट्रैफिक जाम में फंसने के कारण चूक जाएं। अतः हमने अपने प्रवास की अंतिम बुकिंग जकार्ता एयर पोर्ट के निकट ही किसी होटल में करने का निर्णय लिया।

    होटल में किसी तरह का भोजन बनाया जाना संभव नहीं था इसलिए हमने योजना बनाई कि जब हम 21 अप्रेल की सुबह को योग्यकार्ता से चलेंगे तो 22 और 23 के भोजन भी व्यवस्था कर लेंगे। आपात्कालीन व्यवस्था के तहत हमने जोधपुर से लड्डू, मठरी, शकरपारे और खाखरे आदि अपने साथ ले लिए।

    समुद्र के किनारे दौड़

    14 अप्रेल की प्रातः लगभग सवा दस बजे हमें विमान की खिड़की से बाली द्वीप का किनारा दिखाई देने लगा और 15 मिनट पश्चात् अर्थात् प्रातः साढ़े दस बजे हम बाली द्वीप की प्रांतीय राजधानी देनपासार में उतर गए। यह एयरपोर्ट किसी बंदरगाह की तरह समुद्र तट पर बना हुआ है। हवाई जहाज कुछ समय तक समुद्र के किनारे बने विशाल रनवे पर दौड़ता रहा। यह एक बहुत ही अद्भुत दृश्य था। राजस्थान में रेलगाड़ी और बसें रेगिस्तान के किनारों पर दौड़ती हैं और हम यहाँ समुद्र के किनारे सरपट भागे जा रहे थे। बाली का समुद्र बहुत शांत, साफ और निर्मल है जिसके किनारे नारियल के झुरमुट इसे बहुत आकर्षक बनाए हुए हैं। इस समुद्र के जल का रंग भी सहज ही आकर्षित करने वाला है।

    खाली हाथ

    इण्डोनेशिया में पर्यटकों के लिए वीजा निःशुल्क है तथा पर्यटकों के वहाँ पहुंचने पर ही हाथों-हाथ दिया जाता है। वीजा लेने, आव्रजन (इमीग्रेशन) की औपचारिकताएं पूरी करने तथा एयरपोर्ट अथॉरिटी से अपना सामान प्राप्त करने में हमें लगभग एक घण्टे का समय लग गया। इतना सब कर लेने के बाद भी हमारी हिम्मत एयरपोर्ट से बाहर निकलने की नहीं हो रही थी। इण्डोनेशियाई मुद्रा की दृष्टि से हम खाली हाथ जो थे। हमारी जेब में भारतीय मुद्रा तथा अमरीकी डॉलर थे जिनकी व्यवस्था हमने दिल्ली में ही कर ली थी। चूंकि भारत में कानूनन इण्डोनेशिया की मुद्रा उपलब्ध नहीं होती, इसलिए हमें एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले इण्डोनेशियाई मुद्रा की व्यस्था करनी थी। सौभाग्य से एयर पोर्ट के निकास पर ही कुछ मनीचेंजर एजेंट बैठते हैं, उन्होंने हमारी चिंता दूर की।

    देखते ही देखते मालामाल भारतीय मुद्रा से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना घाटे का सौदा था। इसलिए हमने भारत में 64.54 रुपए की दर से अमरीकी डॉलर खरीद लिए थे। यहाँ हमें अमरीकी डॉलर से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना था। डॉलर में इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना लाभ का सौदा था। इस अल्टा-पल्टी में हमें भारत के 1 रुपए के बदले 205 इण्डोनेशियाई रुपए मिल गए। हमने 700 डॉलर एक्सचेंज करवाये जिनके लिए हमने भारत में 45,178 रुपए चुकाये थे। यहाँ हमें 700 डॉलर के बदले 92 लाख 61 हजार 490 इण्डोनेशियाई रुपए प्राप्त हुए। भारत में 92 लाख रुपए की रकम बहुत बड़ी होती है। इतने रुपए में भारत में कोई आदमी पूरी जिंदगी निकाल सकता है जबकि हमें इण्डोनेशिया में केवल 10 दिन निकालने थे। इसलिए हमें बहुत ही अटपटा लग रहा था कि हमारी जेब में 92 लाख रुपए हैं। जो भी हो, हम देखते ही देखते मालामाल तो हो ही गए थे।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-11 बाली द्वीप पर पहला दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-11  बाली द्वीप पर पहला दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 11  


    बाली द्वीप पर पांच दिन


    पुतु से भेंट 

    अब हम एयरपोर्ट से बाहर जा सकते थे। हमने बाली द्वीप के मैंगवी नामक एक छोटे से गांव में अपना सर्विस अपार्टमेंट बुक कराया था जो देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। इसी अपार्टमेंट का मालिक पुतु स्वयं पर्यटकों को वाहन उपलब्ध कराता है तथा ड्राइविंग भी स्वयं ही करता है। हमें आशा थी कि पुतु हमें लेने आएगा किंतु एयरपोर्ट पर हमें बहुत विलम्ब हो गया था, इसलिए मन में आशंका भी थी कि कहीं लौट नहीं गया हो किंतु सौभाग्य से पुतु, विजय तायल के नाम की कागज की पट्टी लिए एयरपोर्ट के बाहर ही खड़ा मिल गया।

    यह एक अच्छे-खासे डील-डौल वाला लम्बा चौड़ा, हंसमुख और गौर-वर्ण नवयुवक था जिसने बड़े करीने से अपने बाल बना रखे थे और बेहद साफ सुथरे पैण्ट-शर्ट पहन रखे थे। उसने हमारा स्वागत दोनों हाथ जोड़कर तथा होठों पर लम्बी मुस्कान के साथ किया। उसने हमें नमस्ते कहा तथा हमसे हाथ भी मिलाया। उसके चेहरे से स्पष्ट ज्ञात होता था कि जितनी प्रसन्नता हमें उसे देखकर हुई है, उससे कहीं अधिक प्रसन्नता उसे अपने भारतीय अतिथियों को देखकर हुई है।

    पुतु काफी बड़ी वातानुकूलित कार लेकर आया था जिसमें हम छः सदस्य मजे से बैठ सकते थे तथा हमारा सामान भी आराम से आ सकता था। हमारे भाग्य से वह अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह से समझ सकता था। उसने न केवल हमारा सामान अपनी कार के पिछले हिस्से में जमाया अपितु हमारे लिए कार के दरवाजे भी खोले। भारत में ऐसे विनम्र एवं अनुशासित टैक्सी चालक शायद ही देखने को मिलें।

    पुतु ने कार स्टार्ट करते ही पूछा- क्या आप लोग हिन्दू हैं? जब हमने कहा कि हाँ हम हिन्दू हैं, तो पुतु के चेहरे की मुस्कान और भी चौड़ी हो गई। उसने विनम्रता से कहा कि मैं भी हिन्दू हूँ तथा मेरी वाइफ भी हिन्दू है। ऐसा कहते समय उसके चेहरे पर गर्व और आनंद के जो भाव थे, उनका वर्णन किया जाना कठिन है, केवल कल्पना ही की जा सकती है। लगे हाथों उसने बता दिया कि उसकी पत्नी जिसका नाम पुतु एका है, पूरी तरह शाकाहारी है। मैं अभी शाकाहारी होने का प्रयास कर रहा हूं तथा सप्ताह में दो दिन चिकन या अन्य प्रकार का मांस नहीं खाता।

    देनपासार एयरपोर्ट से मैंगवी गांव तक लगभग डेड़ घण्टे का समय लगने वाला था। अधिकांश मार्ग, देनपासार शहर से होकर जाता था। इस समय का उपयोग हमने शहर के बाजारों, घरों तथा सड़क के ट्रैफिक को देखने में किया।

    शोर और गंदगी से पूरी तरह मुक्त

    हमारे आश्चर्य का पार नहीं था। शहर की सड़कों पर ट्रैफिक तो था किंतु वाहन चालकों में किसी तरह की भागमभाग, बेचैनी, प्रतिस्पर्द्धा नहीं थी। सब अपनी लेन में चल रहे थे। दुपहिया वाहनों के लिए सड़क के बाईं ओर का हिस्सा निर्धारित था। कोई वाहन एक दूसरे से आगे निकलने का प्रयास नहीं कर रहा था। न कोई हॉर्न बजा रहा था। सड़कें पूरी तरह साफ थीं। कचरे का ढेर दिखाई देना तो दूर, कहीं कागज या पेड़ों के पत्ते तक दिखाई नहीं दे रहे थे। सड़कों के किनारे कचरापात्र लगे थे, लोग अपने हाथों का कचरा, कचरापात्रों में ही फैंकने के अभ्यस्त थे।

    घास-फूस का दूध तीस हजार रुपए किलो

    हमने पुतु से पूछा कि क्या सर्विस अपार्टमेंट में दूध की व्यस्था हो जायेगी। तो उसने साफ कह दिया कि नहीं, यहाँ आपको कहीं भी दूध नहीं मिलेगा। आप चाहें तो पैक्ड मिल्क खरीद सकते हैं। हमें झटका तो लगा किंतु अन्य कोई उपाय नहीं था। एक जनरल स्टोर के सामने पुतु ने अपनी कार रोकी तथा हमें दूध खरीदने के लिए कहा। स्टोर में जाकर मुझे एक और बड़ा झटका लगा। मैं किसी भी तरह दुकानदार को यह नहीं समझा पाया कि मैं क्या खरीदना चाहता हूँ। न ही मैं स्वयं, स्टोर में दूध की थैलियां खोज सका।

    पुतु की कार मुझसे काफी दूर थी। इसलिए उसकी सहायता लेने के लिए मुझे काफी चलना पड़ता। अंत में एक अन्य ग्राहक ने मेरी बात समझी और मुझे एक फ्रिज में से कागज का एक डिब्बा दिखाया। मैंने डिब्बे को पढ़ा तो एक झटका और खा गया। यह न्यूजीलैण्ड से आया हुआ दूध था जिसका निर्माण वनस्पतियों, वनस्पति तेलों और कई तरह के प्रोटीनों से मिलकर हुआ था। मुझे विवश होकर यही दूध खरीदना पड़ा। एक बड़ा झटका उस समय और लगा जब दुकानदार ने मुझसे एक लीटर दूध के लिए तीस हजार इण्डोनेशियन रुपयों की मांग की। मैंने तत्काल भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया कि यह डेढ़ सौ रुपया लीटर पड़ा। मुझे समझ में आने लगा था कि मालामाल हो जाने की खुशी अधिक समय तक टिकी नहीं रहने वाली है।

    बीस हजार रुपए का नारियल

    दूध की दुकान के बाहर पानी वाले नारियलों की एक थड़ी थी। पिताजी ने वहाँ से एक नारियल खरीदा। मैंने पूछा कितने रुपए दूं तो थड़ी पर बैठी औरत ने अपने गल्ले में से बीस हजार रुपए का नोट दिखाया। मैंने फिर भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया। यह 100 रुपए का था। भारत में जहाँ पानी वाला नारियल 25-30 रुपए में मिल जाता है, बाली में यह 100 रुपए का था। बाली में वस्तुओं का मूल्य भारत की तुलना में कहीं अधिक था। इण्डोनेशियाई रुपयों के बल पर मालामाल होने का उत्साह अब काफी कम पड़ गया था।

    मेंगवी गांव का वह कांच का बंगला

    देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर मेंगवी गांव का सर्विस अपार्टमेंट देखते ही हमारी मंत्र मुग्ध होने जैसी स्थिति हो गई। यह एक शानदार छोटा सा बंगला था जिसके आरामदेह कमरों में बड़े-बड़े पलंग, सफेद सूती चद्दरें, आधुनिक शैली में बने शावर युक्त बाथरूम और आदमकद शीशों वाले ड्रेसिंग रूम तो मन को मोहते ही थे, साथ ही बंगले का बरामदा एक बड़े और खुले लॉन में खुलता था जो सीधा चावल के विशाल खेतों से जुड़ा हुआ था।

    यहाँ शानदार बोगनविलिया और तरह-तरह के फूलों वाली झाड़ियां लगी हुई थीं जिनके बीच में बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियां और सेंट्रल टेबल का प्रबंध किया गया था। बंगले में एयर कण्डीशनर, गीजर, इलेक्ट्रिक आयरन, वाई-फाई जैसी सारी आधुनिक सुख-सुविधाएं दिल खोलकर जुटाई गई थीं। बंगले का बाहरी बरामदा शीशे की दीवारों से बना हुआ था। यहाँ से बैठकर चावल के खेतों का दृश्य देखते ही बनता था। एक छोटी सी लाइब्रेरी का भी प्रबंध किया गया था।

    इस बंगले की सबसे बड़ी विशेषता थी इसका रसोई-घर। यह भी आधुनिक शैली में बनी हुई रसोई थी जिसमें फ्रिज, कुकिंग गैस, रोस्टर, आर ओ से साफ किया गया पानी आदि सभी सुविधाएं मौजूद थीं। यदि इसमें कुछ नहीं था तो वे थे चकला, बेलन और तवा जिनका प्रबन्ध हम भारत से ही करके लाए थे। हमारे लगभग पांच दिन इसी बंगले में निकलने वाले थे।

    बाली द्वीप में पहला दिन

    14 अप्रेल 2017 को हम अपने सर्विस अपार्टमेंट में लगभग एक बजे पहुंच गए। रास्ते में हमने एक सब्जी मण्डी देखी जिसे देखकर तबियत प्रसन्न हो गई और निर्णय लिया गया कि संध्या काल में इस सब्जी मण्डी से सब्जियां खरीदी जाएंगी।

    हम लम्बी यात्रा की थकान से बुरी तरह थके हुए थे। इसलिए हमने पहला दिन आराम करने, चाय पीने और लॉन में बैठकर चावल के खेतों को देखने में बिताया। पुतु ने हमें बताया कि कल बाली द्वीप पर हिन्दुओं का सबसे बडा त्यौहार है। इसलिए वह अगले दिन थोड़ा विलम्ब से आएगा। हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि हमें भी अपनी दैनंदिनी से निवृत्त होने और अपना भोजन तैयार करने में प्रातः के साढ़े दस तो बजने ही थे। हमें पुतु ने एक दुपहिया स्कूटर दे दिया ताकि हम यदि आसपास कहीं जाना चाहें तो जा सकें।

    फूलों का अनोखा संसार शाम के समय मैं और विजय, पुतु का दुपहिया स्कूटर लेकर तरकारी और दूध खरीदने के लिए उसी सब्जी मण्डी में पहुंचे जो प्रातः काल में हमने मैंगवी आते समय देखी थी। यह पुरा तमन अयुन टेम्पल का निकटवर्ती क्षेत्र था। हमारे लिए यह एक और झटका खाने वाला समय था। वहाँ सब्जी मण्डी नहीं थी, केवल फूलों की थड़ियां और दुकानें थीं, जिन्हें हम सुबह हरी सब्जियां समझ बैठे थे। कई तरह के फूल, कई रंगों के फूल। चारों तरफ फूल ही फूल। प्राकृतिक रूप से उत्पन्न फूलों के साथ-साथ बांस की खपच्चियों से बने हुए दर्जनों प्रकार के फूल सजे हुए थे। ये सारे फूल हिन्दुओं के अगले दिन के बड़े त्यौहार में उपयोग लिए जाने हेतु बिकने आए थे।

    मण्डी में भीड़-भाड़ थी किंतु हिन्दुस्तान की भीड़ की तुलना में कुछ भी नहीं। बहुत से लोग अपने परिवारों के साथ फूल खरीदने आए थे। वे फूल खरीदते थे, मोलभाव भी करते थे किंतु कहीं कोई बहस नहीं थी, कोई भी जोर-जोर से नहीं बोल रहा था। लोग आपस में हंस-बोल रहे थे किंतु एक शालीनता जैसे विद्यमान थी।

    फल एवं सब्जी मण्डी की वे महिला दुकानदार

    फूलों की मण्डी से सटी हुई एक पतली गली थी जिसमें जाने पर हमें वास्तव में एक फल और सब्जी मण्डी दिखाई दी। इस मण्डी में भारत की तरह छोटी-छोटी दुकानें बनी हुई थीं और लकड़ी के बने हुए ठेले भी देखे जा सकते थे। हमें यह देखकर प्रसन्नता हुई कि वहाँ कई तरह के फल मौजूद थे किंतु यह देखकर मन उदास भी हुआ कि सब्जियां बहुत ही कम थीं। सेब थे किंतु चालीस से पचास हजार रुपए किलो अर्थात् भारतीय मुद्रा में दो सौ से ढाई सौ रुपए किलो। केले थे किंतु चार हजार रुपए का एक केला। अर्थात् भारतीय मुद्रा में बीस रुपए का एक केला। हजारों में भाव सुनकर ही मुझे पसीना आ जाता था। हालांकि भारतीय मुद्रा में हिसाब लगाकर कुछ तसल्ली मिलती थी, किंतु समस्त फल एवं सब्जियां भारत की तुलना में बहुत महंगी थीं।

    कुछ ठेलों पर सब्जियां थीं जिनमें आलू, प्याज, लौकी, पत्ता गोभी, बैंगन और तुरई ही प्रमुख थीं। एकाध सब्जियां स्थानीय प्रवृत्ति की थीं जिनके नाम पूछने पर भी हमें याद नहीं रहे। उनका उपयोग कैसे किया जा सकता था, यह जानने में तो हम पूरी तरह असफल रहे। क्योंकि समस्त दुकानदार जो कि शत-प्रतिशत महिलाएं थीं, अंग्रेजी का एक भी अक्षर नहीं जानती थीं। वे हमें बाट और रुपए दिखाकर समझाने का प्रयास करती थीं कि कितनी सब्जी के लिए हमें कितने रुपए देने पड़ेंगे। हम जहाँ भी रुक जाते, आस-पास की दुकानों की महिलाएं भी उठकर हमारे पास आ जातीं। वे यह देखना और सुनना चाहती थीं कि हम तरकारी कैसे खरीदते हैं, उनकी बात को कैसे समझते हैं और हम किस प्रकार बोलते हैं!

    सब्जी बेचने वाली उन महिलाओं को देखकर सहज ही जाना जा सकता था कि वे बहुत निर्धन हैं, भारतीय सब्जी बेचने वाली महिलाओं से भी अधिक निर्धन। भले ही उनके द्वारा बोला जा रहा एक भी शब्द हमारे पल्ले नहीं पड़ रहा था किंतु उनकी वाणी और मुखमुद्रा हमें यह बता रही थी कि वे हमें अपने बीच पाकर प्रसन्न थीं और किसी न किसी बहाने से हमसे बात करना चाहती थीं। हमने किसी तरह आलू, प्याज और टमाटर खरीदे तथा यह निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह आकर ताजी तरकारी खरीदेंगे।

    विदेशियों को पहचानने वाले कुत्ते

    यद्यपि इस समय संध्या के सात ही बजे थे किंतु अंधेरा बहुत घिर आया था हम लौट पड़े। सर्विस अपार्टमेंट पहुंचते-पहुंचते तो गहरी रात हो गई। यद्यपि अभी साढ़े सात ही बजे थे। मार्ग में हमें यह भय भी लगा कि हमें विदेशी और असुरक्षित जानकर कोई हम पर आक्रमण न कर दे। यद्यपि ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ, मैंगवी गांव के उन कुत्तों ने हमें फिर से पहचान कर भौंकना आरम्भ कर दिया था। कुत्तों की आंखें हमें स्पष्ट रूप से धमका रही थीं कि हम जानते हैं कि तुम विदेशी हो, इसलिए अपने अपार्टमेंट में ही रहो, इधर-उधर मत घूमो। मुझे याद आया कि भारत में भी गलियों के कुत्ते विदेशी पर्यटकों को देखकर इसी प्रकार भौंकते हैं। स्वयं के लिए विदेशी शब्द सोच पाना भी बड़ा अटपटा सा था।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-12 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-1 बुराई पर अच्छाई की विजय-गुलंगान

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-12 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-1  बुराई पर अच्छाई की विजय-गुलंगान

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-12


    बाली द्वीप पर दूसरा दिन

    15 अप्रेल 2017 को दूसरे दिन प्रातः पांच बजे ही आंख खुल गई। इस समय भारत में तो रात के ढाई ही बजे होंगे किंतु हमारे शरीर में लगी जैविक घड़ी ने स्थानीय समय से पूरी तरह से तालमेल बैठा लिया था। चावल के खेतों के बीच बने उस लॉन में पूरे परिवार के साथ बैठकर सुबह की चाय पीना, अपने आप में एक अलग ही अनुभव था। इसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

    मैं और विजय जल्दी ही तैयार होकर, पुतु का स्कूटर लेकर प्रातः आठ बजे फिर से उसी सब्जी मण्डी की ओर चल पड़े ताकि दूध और तरकारी खरीदी जा सकें। इस शांत प्रातः बेला में चावल के खेतों के बीच से निकलना एक सुखद अनुभव था। सड़क के दोनों किनारों पर फलों से लदे हुए केले, पपीते, खजूर और नारियल के वृक्ष सहज ही ध्यान आकर्षित करते थे।

    नृत्यलीन बारोंग

    अभी हम कुछ दूर ही चले थे कि मार्ग में हमें एक जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। हमने स्कूटर सड़क के किनारे खड़ा कर दिया तथा उसकी तस्वीरें उतारने लगे। जुलूस के बीच कपड़े का एक विशालाकाय जानवर नृत्य कर रहा था जिसके मुंह पर वाराह (शूकर) का मुखौटा लगा हुआ था। कपड़े के भीतर दो आदमी थे जो अपने हाथों और पैरों से इस प्रकार की भंगिमाएं बना रहे थे जिनसे वह विशालाकाय वाराह नृत्य करता हुआ दिखाई देता था और उसके गले में पड़ी पीतल की बड़ी सी घण्टी से सुमधुर ध्वनि निकल रही थी। उसके चारों ओर चल रहे कुछ श्रद्धालु अपने हाथों में ढोल, मंजीरे तथा स्थानीय वाद्य बजा रहे थे जिससे चारों ओर का वातावरण धार्मिक श्रद्धा से आप्लावित हो रहा था। एक महिला बांस की खपच्चियों पर कपड़े से बनी छतरी उठाए हुए एक शूकर के साथ चल रही थी।

    हमें बताया गया कि यह बारोंग है जो धरती पर बुरी आत्माओं के सफाए के लिए आया है और घर-घर जाकर वहाँ से बुराइयों का सफाया कर रहा है। एक अन्य कथा के अनुसार बारोंग एक बुरी ''रांग्डा'' अर्थात् विधवा स्त्री से युद्ध कर रहा है जो समस्त बुराइयों की जड़ है। यह कथा जावा की राजकुमारी महेन्द्रदत्ता से भी जुड़ी हुई है जो बाली द्वीप की महारानी थी तथा उसी ने बाली द्वीप के आदिवासियों में हिन्दू धर्म का प्रचलन किया था।

    एक क्षेपक के अनुसार रानी महेन्द्रदत्ता तंत्र-मंत्र करती थी इसलिए बाली के राजा धर्मोदयाना ने उसे अपने महल से निकाल दिया। वह जंगल में जाकर रहने लगी। राजा धर्मोदयाना के मरने पर रानी विधवा हो गई। इसे बाली में ''रांग्डा'' कहा जाता है। यह शब्द उत्तर भारत में विधवा स्त्री के लिए मध्यकाल में प्रचलित ''रांड'' शब्द से काफी मिलता जुलता है। हमने देखा कि वह जुलूस बारी-बारी से प्रत्येक घर के सामने जाकर रुकता था, बारोंग का नृत्य और भी तेज हो जाता था तथा गृहस्थ लोग घर से बाहर आकर, जुलूस के साथ चल रहे पुजारी को रुपए देते थे। शूकर के नृत्य की भाव-भंगिमा तथा जुलूस के द्वारा बजाया जा रहा संगीत, दोनों ही अपने आप में विशिष्ट थे। हमें याद आया कि पुतु ने बताया था कि आज हिन्दुओं का बड़ा त्यौहार है जिसे गुलंगान कहते हैं। हमें स्वतः स्पष्ट हो गया कि यह जुलूस गुलंगान का हिस्सा है। हमें ज्ञात हुआ कि वाराह के चेहरे वाले बारोंग की तरह बाघ तथा शेर के मिले जुले रूप वाला बारोंग भी आता है। वह शिव की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वह भी धरती पर से बुरी आत्माओं को नष्ट करने वाला माना जाता है।

    स्वर्ग से आती हैं आत्माएं

    बालीवासी गुलंगान का त्यौहार अधर्म पर धर्म की विजय के उत्सव के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग से पूर्वजों की आत्माएं भी उत्सव मनाने धरती पर आती हैं। इस त्यौहार की तुलना विश्व भर के हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाली दीपावली त्यौहार से की जा सकती है। हमें बताया गया कि यह उत्सव, मुख्य दिवस के तीन दिन पहले आरम्भ होकर मुख्य उत्सव के ग्यारह दिन बाद तक चलता है। मुख्य दिवस के तीन दिन पहले पेन्येकेबान मनाया जाता है। इस दिन हर हिन्दू के घर में केले का प्रसाद बनाकर देवता को अर्पित किया जाता है। अगले दिन अर्थात् मुख्य दिवस के दो दिन पहले पेन्याजान का आयोजन किया जाता है। इस दिन तले हुए चावलों का केक बनाकर देवताओं को अर्पित किया जाता है जिसे जाजा कहते हैं।

    इसके अगले दिन अर्थात् मुख्य त्यौहार से एक दिन पहले पेनाम्पाहान का आयोजन किया जाता है। इस दिन दावत का आयोजन किया जाता है जिसमें सूअर तथा मुर्गे काटे जाते हैं। मुख्य दिवस के अगले दिन परिवार के पुरुष सदस्य, बारोंग के साथ नाचते-गाते हुए जुलूस के रूप में घर-घर जाते हैं। गृहस्थ जन अपने घरों के आगे सजावट करते हैं तथा एक दूसरे के घर जाकर त्यौहार की बधाई देते हैं और मिठाई खाते हैं। त्यौहार के आयोजन के दस दिन बाद विशेष रूप से सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन किया जाता है तथा स्वर्ग से धरती पर आई पूर्वजों की आत्माओं को विदाई दी जाती है। पूर्वज आत्माओं के जाने के एक दिन बाद लोग मौज-मस्ती करते हैं। हंसी-ठट्ठा होता है, आनंद मनाया जाता है। चूंकि बाली का परम्परागत कलैण्डर 210 दिन का होता है इसलिए यह त्यौहार हर दस माह बाद मनाया जाता है।

    बांस ही बांस

    हम थोड़ी दूर और गए तो हमारा ध्यान घरों के आगे लगे हुए लम्बे से बांस की ओर गया जो लगभग 15-20 फुट की ऊँचाई पर जाकर फिर से धरती की तरफ मुड़ता था। इन्हें पेंजोर कहा जाता है। प्रत्येक बांस रंगीन कपड़ों, कागजों और फूलों से ढंका हुआ था। बांस के साथ ही धरती से लगभग पांच-छः फुट की ऊंचाई पर बांस की खपच्चियों से बना हुआ लघु देवालय लटका हुआ था। इसके भीतर देवता के प्रतीक के रूप में कोई प्रतिमा थी जिसके समक्ष कई रंगों के पुष्प, फल और अण्डे आदि रखे हुए थे। कुछ बांसों को तो इतनी अच्छी तरह से और इतने भव्य प्रकार से सजाया गया था कि दर्शक बांसों की कलाकृतियों को देखकर दांतों तले अंगुलियां दबा लें। हम समझ गए कि हर घर के आगे की गई यह सजावट भी आज के गुलंगान त्यौहार की अभिन्न आयोजना है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि भारत में दीपावली के अवसर पर घरों के बाहर कण्डीलों की सजावट की जाती है तथा रात्रि में दीप जलाकर देवी लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। पेंजोर पर लगे इन्द्रब्लाका में भी रात्रि के समय दीप जलाकर प्रकाश किया जाता है।

    सब्जी मण्डी में फिर से निराशा

    हम लगभग 9.30 बजे सब्जीमण्डी पहुंचे किंतु तब तक सब्जीमण्डी खुली नहीं थी। एकाध दुकानें ही खुली थीं जिन पर फल रखे थे। हमने बाली द्वीप पर उत्पन्न होने वाले दो स्थानीय फल खरीदे जिनके नाम हम याद नहीं रख सकते थे। इनमें से पहला फल बाहर से लगभग भारतीय लीची की तरह दिखाई देता था किंतु इसके भीतर एक बड़ा सा बीज था जिसके चारों ओर पीले रंग का सुगंधित और मीठा गूदा था। इसमें से पके हुए कटहल के बीज की सी सुगंध आ रही थी। दूसरा फल बाहर से तो चीकू की तरह दिखाई देता था किंतु उसके भीतर छोटे-छोटे बीजों वाला रसीला गूदा भरा हुआ था जो स्वादिष्ट तथा हल्का खट्टा था। चूंकि सब्जियां प्राप्त करना संभव नहीं था, इसलिए हम वे फल खरीद कर ही वापस लौट लिए। हमने कुछ जनरल स्टोर्स पर दूध का डिब्बा खरीदने का प्रयास किया किंतु वह किसी भी स्टोर पर उपलब्ध नहीं हुआ।

    कौए की आकृति वाली पगड़ी ठीक साढ़े दस बजे पुतु अपनी गाड़ी लेकर आ गया। आज वह कल वाली पोषाक में नहीं था। उसने स्थानीय परम्परागत वस्त्र धारण किये थे जो गुलंगान त्यौहार पर विशेष रूप से पहने जाते थे। उसने सफेद कोट नुमा एक शर्ट धारण कर रखी थी। कमर के नीचे विशेष शैली में बांधी हुई तहमद थी और सिर पर एक टोपी थी जिसमें आगे की ओर कुछ गांठें लगाकर ऐसी आकृति बनाई गई थी कि वहाँ किसी पक्षी के बैठे होने का आभास होता था। मैंने अनुमान लगाया कि इस पक्षी की आकृति भारतीय कौए से मिलती है।

    दुर्गा पूजा

    पुतु के साथ एक और दम्पत्ति आया था। महिला के हाथ में बांस की खपच्चियों से बनी हुई बड़ी सी टोकरी थी जिसमें बांस से बनी हुई छोटी-छोटी गोल थालियां रखी हुई थीं। इन थालियों में केला तथा सेब आदि फल, चावल से बनाई हुई दलिया जैसी कोई डिश और कई तरह के फूल रखे हुए थे। महिला ने बहुत ही आकर्षक कपड़े पहने हुए थे। वह एक मंझले कद की गौर-वर्ण महिला थी जिसकी आयु कठिनाई से 25 साल रही होगी। उसने अपनी टोकरी में से एक गोल थाली निकाली और उसे लॉन के एक कौने में काले रंग के पत्थरों से बने एक मंदिरनुमा स्तम्भ के सबसे ऊपरी आले में रख दिया। फिर उसी आले के समक्ष दो अगरबत्तियां जलाईं तथा मंदिर के समक्ष हाथ जोड़कर अपना मस्तक झुकाया।

    हमने देवालय के भीतर रखी पूजा की थाली में झांककर देखा तो हमें फूलों के बीच मुर्गी का भूरे रंग का एक अण्डा भी दिखाई दिया। हमने पुतु को बताया कि भारत में देवताओं की पूजा में अण्डा काम में नहीं लिया जाता। केवल पुष्प, फल एवं मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। नेपाल के हिन्दू भी, बाली के हिन्दुओं की तरह मुर्गी का अण्डा, भगवान की पूजा में चढ़ाते हैं। हमने उस महिला से जानने का प्रयास किया कि इस आले को क्या कहते हैं! किंतु वह अंग्रेजी का एक भी शब्द नहीं समझती थी। उसका पति भी अंग्रेजी नहीं जानता था। पुतु ने हमें बताया कि इस स्तम्भनुमा लघु देवालय को टुडुकरंग कहते हैं। यह प्रत्येक घर के भीतर, सामने वाले हिस्से में बना हुआ होता है। यह देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त है। देवी दुर्गा प्रत्येक घर की रक्षा करती हैं। यह पूजा उन्हीं के निमित्त हो रही है।

    धरती माता की पूजा

    टुडुकरंग की पूजा करने के बाद उस महिला ने पूजा की एक थाली, लॉन के एक कौने में नीचे धरती पर रखी तथा वहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं। इस गोल थाली में भी पहले वाली थाली के समान ही पूजन सामग्री रखी हुई थी। पुतु ने बताया कि पूजा की जो थाली धरती पर रखी गई है वह धरती माता की पूजा के लिए है, जो हर समय हमारी रक्षा करती है।

    काल पूजन

    अब बारी थी काल पूजन की। जिस प्रकार गृह परिसर में देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त टुडुकरंग बना हुआ होता है, ठीक उसी प्रकार बाली द्वीप पर प्रत्येक घर के बाहर, मुख्य द्वार के निकट कालराऊ बना हुआ होता है। यह भी काले पत्थर से निर्मित एक स्तम्भ देवालय होता है जिसमें काल की पूजा होती है। बाली में इसे मृत्यु का देवता माना जाता है। यह घर के मुख्य द्वार के साथ-साथ पूरी गली की रक्षा करता है। मैंने अनुमान लगाया कि घर के भीतर दुर्गा का तथा घर के बाहर शिव का मंदिर है। भारत में भी शिव को महाकाल कहते हैं, वही महाकाल यहाँ आकर कालराऊ बन गया है। भारत में राऊ, राजा को कहते हैं। यहाँ भी पूजा करने वाली उस युवती ने कालराऊ के समक्ष बांस की एक थाली अर्पित की तथा दो अगरबत्तियां जलाईं। इस थाली में भी फल-फूल तथा चावलों से बनी हुई कोई डिश थी। कालराऊ के देवालय के बाद उसने पहले की ही तरह फल-फूलों से युक्त एक थाली धरती पर रखी तथा यहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं।

    इन्द्राब्लाका

    कालराऊ के बाद महिला ने पास ही लगे लम्बे बांस के साथ लटके लघु देवालय में पूजा की एक थाली अर्पित की। पुतु ने बताया कि इसे इन्द्राब्लाका कहते हैं। यह इन्द्र भगवान की पूजा के निमित्त बनाया गया है। भगवान इन्द्र पूरे मौहल्ले की रक्षा करते हैं। गुलंगान के त्यौहार पर लगने वाले बांस पर तो इन्द्राब्लाका बनाया ही जाता है, यह प्रत्येक मौहल्ले भी स्थाई रूप से रहता है।

    सातू को पहचाना पुतु ने

    हमने सर्विस अपार्टमेंट परिसर में बने मंदिरों में पूजा करने आई उस महिला, उसके पति एवं पुतु को लड्डू खाने के लिए दिए जो हम भारत से अपने साथ बनाकर ले गए थे। वे तीनों, इस भारतीय मिठाई को खाकर बड़े प्रसन्न हुए। हमने उनके चेहरों की प्रसन्नता से अनुमान लगाया कि उनके लिए यह क्षण किसी उत्सव से कम नहीं था। लड्डू खाने के बाद पुतु ने हमें बताया कि इण्डोनेशिया में इस डिश को सातू कहा जाता है। मुझे स्मरण हुआ कि राजस्थान में तीज के अवसर पर जो सातू बनाया जाता है, उसे लड्डू की तरह ही बांधा जाता है। पुतु ने इसे वही सातू समझा था।

    तमन राम सीता

    दुर्गा और इन्द्र का पूजन देखने के बाद हम लोग पुतु के साथ तमन अयुन पुराडेसा के लिए रवाना हो गए। मार्ग में सड़क के किनारे एक पार्क दिखाई दिया जिसमें खड़ी हल्के नीले रंग की दो प्रतिमाएं दूर से ही दिखाई दे रही थीं। हमने पुतु से अनुरोध किया कि वह गाड़ी रोके। ये भगवान राम और सीता माता की विशाल प्रतिमाएं थीं जिनकी ऊंचाई लगभग 15 फुट रही होगी। ये दोनों प्रतिमाएं उसी हल्के नीले रंग के एक भव्य रथ में खड़ी हैं जिसमें चार घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े भी हल्के नीले रंग के हैं।

    राम और सीता की इतनी सुंदर, इतनी भव्य एवं इतनी विलक्षण प्रतिमाओं का वर्णन करना कठिन है। दोनों प्रतिमाओं को विविध प्रकार के आभूषणों से अलंकृत किया गया है जिन पर सुनहरी रंग किया गया है जिसके कारण प्रतिमाओं का आकर्षण कई गुना बढ़ गया है। सीता अभय मुद्रा में हैं और राम इस मुद्रा में खड़े हैं मानो बाली द्वीप वासियों को सम्बोधित कर रहे हों! अश्वों को भी स्वर्णिम आभा युक्त आभूषणों से सजाया गया है। रथ में आगे की ओर एक सारथी है जो रथ के जुए के ठीक मध्य में बैठा है और अश्वों को हांक रहा प्रतीत होता है। उसके निकट एक योद्धा हाथ में तलवार और ढाल लिए बैठा है। वह इतना जीवंत है, मानो अभी राक्षसों पर अपने हथियार लेकर टूट पड़ेगा। इन प्रतिमाओं के निकट एक काले ग्रेनाइट पर बड़े-बड़े अक्षरों में रोमन लिपि में लिखा है- तमन राम सीता।

    गदाधारी भीम

    तमन राम सीता से थोड़ी ही दूरी पर तमन अयुन पुराडेसा स्थित है। यह मंदिर एक दोहरे परकोटे के भीतर स्थित है। बाहरी परकोटा इतना बड़ा है मानो इसके भीतर पूरा नगर समाया हो। इस परकोटे के प्रवेश द्वार पर राम सीता की प्रतिमा की शैली की ही एक विशाल प्रतिमा स्थित है। यह भी हल्के नीले रंग की प्रतिमा है जिसकी ऊंचाई लगभग 15 फुट है। महाबली भीम के कंधे पर भारी-भरकम गदा, सिर पर मुकट, शरीर पर कवच तथा वस्त्र, सभी कुछ विलक्षण शैली में बने हुए हैं। यहाँ भी आभूषणों को सुनहरे रंग से पोता गया है, जिससे उनकी आभा कई गुणा बढ़ गई है। इस प्रतिमा के अंग सौष्ठव पर विशेष ध्यान दिया गया है जिससे भीम के महाबली होने का अनुमान स्वतः ही हो जाता है।

    द्वार पाल युग्म

    तमन अयुन पुराडेसा के बाहरी परकोटे के मुख्य द्वार के दोनों ओर (दाईं और बाईं) तथा दोनों तरफ (बाहर और भीतर) विशिष्ट शैली में द्वारपाल की प्रतिमाएं खड़ी दिखाई देती हैं। इनके मुख, भारत की कथकली नृत्य-कलाकारों के मुखौटों जैसे चौड़े और फैले हुए हैं जबकि मुख के भाव विकराल एवं उग्र हैं। इनके एक कंधे पर भारी-भरकम दण्ड बना हुआ होता है जो इनके द्वारपाल होने का साक्ष्य देता है। बाली में एक भी ऐसा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का स्थान, मंदिर अथवा धार्मिक स्थल नहीं होगा जहाँ मुख्य द्वार पर यह द्वारपाल युग्म दिखाई नहीं दे। हमने अनेक मंदिरों में भीतरी परिसर में भी जहाँ-तहाँ इन द्वारपाल प्रतिमाओं को खड़े हुए देखा। वस्तुतः ये भैंरव हैं। एकाध स्थान पर तो हमने इन्हें काले एवं सफेद रंग में भी देखा, ठीक वैसे ही जैसे भारत में काला और गोरा भैंरू पाए जाते हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-13 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-2 तमन अयुन पुराडेसा-तनाहलोट मंदिर

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-13 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-2 तमन अयुन पुराडेसा-तनाहलोट मंदिर

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-13


    बाली द्वीप पर दूसरा दिन-2


    तमन अयुन पुराडेसा  

    मंदिर में प्रवेश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को बीस हजार इण्डोनेशियन रुपए मूल्य का टिकट खरीदना होता है। हमने पांच टिकट खरीदे इसलिए एक लाख रुपए खर्च हो गए। यदि यह मुद्रा हमसे भारतीय रुपए में ली जाती तो हमें पांच सौ रुपए देने पड़ते जो कि इतने नहीं अखरते किंतु एक लाख रुपए सुनकर हमारा मन बैठ गया।

    यह बाली के प्राचीन राजवंश का मंदिर है। इसके भीतर प्राचीन झौंपड़ीनुमा मंदिर बने हुए हैं। ये एक मंजिल से लेकर ग्यारह मंजिले तक हैं तथा इन्हें मेरू कहा जाता है। इनकी ऊंचाई लगभग चालीस-पचास फुट है। आधार वाली झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे चौड़ा होता है, इसके ऊपर हर मंजिल की चौड़ाई कम होती जाती है। सबसे ऊपर की झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे कम चौड़ा होता है। इनके छज्जों पर काले रंग की लम्बी-लम्बी घास जैसी सजावट की गई है। पर्यटकों को बाहर से ही मंदिर देखने की अनुमति है। पर्यटकों की सुविधा के लिए मुख्य मंदिर परिसर के चारों ओर एक पक्का गलियारा बनाया गया है। पर्यटक इस गलियारे में चारों ओर घूम कर मंदिर के बाहरी हिस्से में बनी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के चित्र उतार सकते हैं। मंदिर परिसर में कुछ लोग समूह के रूप में बैठकर पूजा कर रहे थे। यह एक सुंदर प्राकृतिक स्थान है तथा सघन वनस्पति से आच्छादित है।

    जनजीवन की झांकी

    तमन अयुन मंदिर के प्रवेश द्वार में प्रवेश करते ही एक बड़ा सा मण्डप स्थित है। इसमें प्रतिमाओं के माध्यम से बाली की सांस्कृतिक एवं जन-जीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है। एक दृष्य में दो पुरुष मुर्गा लड़ाते हुए दिखाए गए हैं तथा दो मनुष्य उन्हें मुर्गा लड़ाते हुए देख रहे हैं। इनमें से एक धनी मनुष्य कुर्सी पर बैठा है जिसने हाथ में चिलम जैसी कोई चीज उठा रखी है। दूसरा व्यक्ति हाथ ऊपर करके लड़ाई प्रारम्भ करने का संकेत कर रहा है। एक तरफ बैलों की एक जोड़ी है जिसके कंधों पर हल रखा हुआ है। इनमें से एक बैल काले रंग का है और दूसरा बैल सफेद रंग का है। पास ही एक नृत्यांगना नृत्य की मुद्रा में है।

    देव प्रतिमाओं का खुला संग्रहालय

    इस मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर सैंकड़ों प्रतिमाएं रखी हुई हैं जिनमें से पत्थर से निर्मित बहुत सी प्रतिमाएं सैंकड़ों साल पुरानी प्रतीत होती हैं तो क्ले से निर्मित कुछ प्रतिमाएं आधुनिक काल की हैं। इन मूर्तियों के हाथों में तरह-तरह के पुष्प, वाद्ययंत्र एवं अस्त्र-शस्त्र लगे हुए हैं। बहुत सी अप्सराओं के वस्त्र भारतीय तथा यूनानी देवियों से मिलते-जुलते हैं। इनमें कुछ प्रतिमाएं पंखों वाले सिंहों की हैं तो कुछ प्रतिमाएं पंखों वाली अप्सराओं की भी हैं।

    औरंगुटान के चेहरों वाले मनुष्यों की प्रतिमाएं

    यहाँ स्थित बहुत सी मनुष्याकार प्रतिमाओं चेहरे मनुष्यों जैसे होते हुए भी बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों से मिलते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरे वाले मनुष्य पाए जाते होंगे! ऐसे मनुष्यों की आकृतियां हमने बाली द्वीप पर और भी कई स्थानों पर देखीं। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र, सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां, चेहरे फूले हुए, नाक गोल एवं मोटी, होंठों के भीतर स्थित बड़े-बड़े दांत, मांसल भुजाएं, पुष्ट जंघाएं तथा चेहरों पर हंसी दिखाई देती है।

    गोल आंखों वाले देवता

    मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर छोटे चबूतरे बने हुए हैं जिन पर तरह-तरह की आकृतियों एवं आकारों वाले देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हुई हैं। इनमें से कुछ देवताओं की आंखे गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। ये अत्यंत प्राचीन जान पड़ती हैं, लगभग एक हजार साल पुरानी भी हों तो आश्चर्य नहीं। इन मूर्तियों के माध्यम से मूर्तिकार, भविष्य के मानवों के लिए क्या संदेश छोड़कर गए, कुछ कहा नहीं जा सकता! पत्थर-नुमा जिन चबूतरों पर ये मूर्तियां खड़ी हैं, वे भी बहुत पुराने हैं। कुछ चबूतरों पर रखी मूर्तियां वर्षा, आंधी एवं समय के थपेड़ों से घिस-टूटकर, भारत में रखे जाने वाले शिवलिंगों की तरह, गोल-लम्बी पिण्डियों में बदल गई हैं।

    दीपा की शैतानियां

    मंदिर परिसर में ही रंग-बिरंगे पक्षियों का एक छोटा सा चिड़ियाघर बना हुआ है। अलग-अलग आकार और रंगों वाले पक्षी अपने-अपने पिंजरे में भांति-भांति की किल्लोल कर रहे थे। मेरी डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा इन पक्षियों को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। सभी पक्षी अलग-अलग प्रकार की आवाजें निकाल रहे थे। दीपा ने भी पक्षियों की नकल उतारने का प्रयास किया तथा अपने हाव-भाव से हमें यह समझाने का प्रयास किया कि देखो यहाँ कितनी तरह के पक्षी हैं।

    बाली वासियों से दोस्ती

    हम बड़ी कठिनाई से दीपा को पक्षियों वाले खण्ड से निकाल कर बाहर लाए। यहाँ कुछ पुरुष और महिलाएं एक तरफ छाया में बैठकर बांस की खपच्चियों की टोकरियां बुन रहे थे। दीपा ने इस तरह का काम होते हुए पहली बार देखा था। वह गोद से उतरकर उन लोगों की तरफ भाग गई और टोकरी बुनने वाली एक महिला की गोद में जाकर बैठ गई। उसने अपनी अटपटी शब्दावली में उन लोगों से बात करने का प्रयास किया मानो पूछना चाहती हो कि इतनी सुंदर टोकरियां आप कैसे बुन लेती हैं! हम भी हैरान थे, वातावरण का बच्चों पर कितना शीघ्र और कितना गहरा प्रभाव होता है!

    रंगीन घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां मंदिर से बाहर निकले तो हमने मंदिर के बाहर एक अच्छा-खासा मेला लगा हुआ पाया। यह मेला गुलंगान के अवसर पर लगा था। इसका स्वरूप किसी भारतीय मेले जैसा ही दिखाई देता था किंतु इसमें बिकने वाली सामग्री भारतीय मेलों की अपेक्षा बहुत अलग थी। इसमें रंग-बिरंगे घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं, मछलियां और कई प्रकार के पक्षियों के चूजे बिकने आए थे। इनमें से बहुत से पक्षी एवं मछलियां प्राकृतिक तौर पर ही चटख रंगों की थीं किंतु अधिकांश घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां कृत्रिम रूप से रंगे गए थे। दीपा ने जब उन्हें देखा तो उसकी प्रसन्नता का पार न रहा। उसे वे सबके सब खेलने के लिए चाहिये थे और हम उनमें से एक भी दिलवाने को तैयार नहीं थे। काफी देर तक छोटी चिड़ियाओं के एक पिंजरे को ध्यान से देखते रहने के बाद दीपा ने उनकी ही तरह चीं-चीं की आवाज लगानी शुरु कर दी।

    सड़क किनारे लंच

    तमन अयुन टेम्पल देख लेने के बाद हम पुतु के सथ तनाहलोट मंदिर के लिए रवाना हुए। यह मेंगवी से लगभग एक घण्टे की दूरी पर है। दोपहर हो चुकी थी। इसलिए हमने पुतु से कहा कि किसी ऐसे स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ बैठक हम भोजन कर सकें। भोजन हमने प्रातः अपने सर्विस अपार्टमेंट में बनाकर अपने साथ ले लिया था। पुतु ने एक हरे-भरे स्थान पर सड़क के किनारे बने छपरे के नीचे गाड़ी रोकी। यहाँ लकड़ी की दो चौकियां रखी हुई थीं। हमने उन्हीं पर बैठकर भोजन किया। यह एक अच्छी-खासी पिकनिक मनाने जैसा था। पास ही दो ठेले वाले खड़े थे जिन पर कुछ तरकारी और फल बिक रहे थे। उन दोनों ठेलों को एक ही महिला देख रही थी। जब हम भोजन करने बैठे तो वह महिला यह देखने के लिए हमारे पास चली आई कि हम क्या खाते हैं और कैसे खाते हैं! यह ठीक वैसी ही उत्सुकता थी जैसी भारत के लोग सड़कों पर चलते फिरंगियों को देखकर व्यक्त करते हैं।

    प्याज बेचने वाले की नीयत में खराबी

    भोजन करने के बाद हमने वहाँ खड़े एक ठेले पर जाकर देखा। वहाँ सब्जी के नाम पर केवल प्याज थी, वह भी बहुत छोटे आकार की। मैंने बड़ी कठिनाई से उससे समझा कि प्याज क्या भाव है। महिला ने मुझे एक किलो का बाट और बीस हजार रुपए निकालकर दिखाये। सौ रुपए किलो के भाव की छोटी प्याज थी तो अखरने वाली किंतु मैंने खरीदने का निर्णय लिया। जब महिला प्याज तोल चुकी, ठीक उसी समय उसका पुरुष साथी (संभवतः पति) वहाँ आया और उसने मुझे कैलकुलेटर पर टाइप करके बताया कि इस प्याज के लिए 40 हजार रुपए लगेंगे। मैंने अस्वीकृति में सिर हिलाया और तुली हुई प्याज वहीं छोड़ दी। महिला मुझ पर बहुत नाराज हुई और उसने मुझसे ईडियट कहा। संभवतः अंग्रेजी का एक यही शब्द था जिसे वह जानती थी और न जाने कब उसने किससे सीखा होगा! संभवतः वह समझ ही नहीं सकी थी कि उसके पति ने क्य बदमाशी की थी! मैं महिला की तरफ देखकर मुस्कुराया और पुतु की गाड़ी में बैठ गया।

    मंदिर देखने के लिए तीन लाख रुपए के टिकट

    लगभग एक घण्टे चलने के बाद हम तनाहलोट पहुंचे। प्राचीन तनाहलोट हिन्दू मंदिर, बाली द्वीप के तबनन रीजेंसी क्षेत्र में समुद्र के भीतर किंतु तट के काफी निकट बना हुआ है। पुतु ने हमें बताया कि यहाँ टिकट लेकर प्रवेश करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए साठ हजार रुपए का टिकट था। हमें पांच टिकट लेने पड़े इसलिए तीन लाख रुपए व्यय हो गए। यह एक विचित्र अनुभव था। भारत में किसी भी मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लेना पड़ता किंतु इण्डोनेशिया सरकार, देशी-विदेशी पर्यटकों से मंदिरों में प्रवेश के लिए भी इतना टिकट ले रही थी। संभवतः इण्डोनेशियाई सरकार की आय में पर्यटन से होने वाली आय बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। या फिर मुस्लिम देश होने के कारण हिन्दू मंदिरों पर टिकट लगाया गया है।

    बाली, जावा और चीन के व्यापारियों का अनोखा संसार

    मंदिर परिसर का आरम्भ एक भव्य और विशाल तोरण द्वार से होता है जिसकी ऊपर की ताकों में पीताम्बरधारी लम्बे दाढ़ी वाले ऋषि की मूर्ति स्थापित हैं। तोरण द्वार से लेकर समुद्र तट तक पहुंचने के लिए हमें लगभग एक किलोमीटर चलना पड़ा। इस पूरे मार्ग में बाली, जावा तथा चीन के सैंकड़ों व्यवसायी दुकानें लगाए हुए बैठे हैं। इन दुकानों पर हिन्दू देवी-देवताओं की एक से बढ़कर एक पेंटिंग देखी जा सकती हैं। चटखीले रंग, तीखे नाक-नक्श और भाव पूर्ण मुद्राओं में अंकित हिन्दू देवी-देवताओं का यह संसार, धरती से नितांत विलग ही दिखाई देता है।

    छः लाख रुपए के 10 रुद्राक्ष

    यहाँ भी वस्तुओं के दाम भारत की तुलना में कई गुना अधिक थे। हमने एक चीनी दुकान पर लगभग 10 रुद्राक्षों की एक माला के दाम पूछे जिसे कड़े की तरह हाथ की कलाई में पहना जाता है। भारत में यह माला अधिक से अधिक 20 रुपयों में खरीदी जा सकती है किंतु वहाँ हमें इस माला का दाम छः लाख इण्डोनेशियन रुपए अर्थात् तीन हजार भारतीय रुपए बताया गया। यहाँ भी नारियल 20 हजार इण्डोनेशियन रुपए में बिक रहा था।

    ज्ञान मुद्रा में सरस्वती

    इस बाजार में सरस्वती की श्वेत रंग की एक मनुष्याकार प्रतिमा भी बिकने के लिए आई थी जिसे देखकर कोई भी भारतीय दंग रह जाए। बाली शैली की इस प्रतिमा में देवी सरस्वती एक कमल पुष्प पर खड़ी हैं जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वेद, तीसरे हाथ में बिंजौरा का पुष्प और चौथा हाथ ज्ञान मुद्रा में है। देवी के पैरों के पास हंस पंख खोले खड़ा है।

    विशिष्ट शैली का द्वार

    जहाँ सड़क समाप्त हुई, वहीं से समुद्र तक जाने के लिए सीढ़ियों का सिलसिला आरम्भ हो गया। ठीक यहीं पर बाली की विशिष्ट शैली का प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस द्वार के दोनों तरफ के स्तंभों की बनावट इस प्रकार की होती है मानो किसी शिखरबंद मंदिर को ठीक बीच में से चीर कर दोनों हिस्सों को सड़क के दानों किनारों पर सरका दिया गया हो। इस द्वार पर भी बांस की भव्य सजावट है।

    भारतीय ऋषि की प्रतिमा

    यहाँ समुद्र के किनारे कुछ छोटे-छोटे स्तंभों पर विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं रखी हुई हैं। इनमें से एक प्रतिमा जटाजूट-धारी भारतीय ऋषि की जान पड़ती है जिसके गले एवं भुजाओं में मोटे-मोटे रुद्राक्ष पड़े हुए हैं। उसके एक हाथ में फूल और एक हाथ में देवता के समक्ष बजाई जाने वाली हाथ की घण्टी है। ऋषि प्रतिमा के सिर पर एक गोल टोपनुमा मुकुट है। आज किसी श्रद्धालु ने इस ऋषि प्रतिमा को पीताम्बर धारण करवा दिया था जिससे प्रतिमा की शोभा कई गुणा बढ़ गई प्रतीत होती थी।

    समुद्र ने मनाया तनाहलोट में गुलंगान

    जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमें ज्ञात हुआ कि इस समय समुद्र में ज्वार आया हुआ है इसलिए मंदिर तक जाने की अनुमति नहीं है। हमें द्वीप की मुख्य भूमि पर खड़े रहकर, लगभग 100 मीटर दूर स्थित टापू पर स्थित मंदिर को देखकर संतोष करना पड़ा। समुद्र की लहरें उस टापू से टकराकर लौट रही थीं। ऐसा लगता था मानो समुद्र भी गुलंगान के त्यौहार पर, मंदिर की सीढ़ियों और दीवारों का स्पर्श करने के लिए चला आया था। समुद्र के इस प्रकार अड़ंगा लगा देने के कारण हमें लगा मानो तीन लाख रुपए के टिकट व्यर्थ ही चले गए।

    नहीं मिला पवित्र जल

    पुतु ने हमें कहा कि जब आप समुद्र में होकर मंदिर तक जाएं तो वहाँ से पवित्र जल लेकर अपने ऊपर छिड़कें तथा अपने साथ भी लेकर आएं। यह ठीक वैसा ही था जैसा भारत के लोग नदियों में स्नान के लिए जाते समय करते हैं तथा गंगाजल अपने साथ लेकर आते हैं। अब चूंकि हम मंदिर तक पहुंच ही नहीं सके थे, इसलिए पवित्र जल प्राप्त करना भी संभव नहीं रह गया था।

    समुद्र किनारे सामूहिक पूजन

    जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमने वहाँ लगभग 150 फुट लम्बे, 40 फुट चौड़े एवं लगभग 4 फुट ऊंचे चबूतरे पर शानदार पीले रंग की छतरियां तनी हुई देखीं जो वहाँ स्थाई रूप से बने छोटे-छोटे लगभग दो-ढाई फुट ऊंचे देवालयों के ऊपर तानी गई थीं। इन लघु देवालयों के समक्ष केले एवं नारियल के पत्तों एवं बांस की बनी हुई छोटी-छोटी ट्रे अथवा थाली में पूजन सामग्री अर्पित की गई थी। इस पूरे चबूतरे को एक शानदार लम्बे पीले रंग के कपड़े से चारों ओर से ढंका गया था। इसके समक्ष सैंकड़ों नर-नारी परम्परागत नए परिधानों में सज-धज कर बैठे थे। कुछ पुजारी मंत्रों का उच्चारण करते हुए श्रद्धालुओं पर पवित्र जल का छिड़काव कर रहे थे। इस पूरे वातावरण में पीला और श्वेत रंग ही छाया हुआ था।

    सभी पुरुष सुखासन में अर्थात पालथी मार कर बैठे थे। अधिकांश महिलाएं भी उन्हीं की तरह सुखासन में विराजमान थीं किंतु कुछ महिलाएं बौद्ध भिक्षुओं की तरह घुटने मोड़कर, घुटनों और पंजों के सहारे उकड़ूं बैठी थीं। इस सामूहिक पूजन को देखना अत्यंत रोमांचकारी था। सारा काम बिना किसी आवाज के, बिना किसी भागम-भाग और चिल्ल-पौं के हो रहा था। यहाँ माता-पिता अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर नहीं आए थे। पुरुषों ने पुतु जैसी टोपियां पहनी हुई थीं जिनके आगे के हिस्से को गांठें लगाकर भारतीय कौए जैसी आकृति दी गई थी।

    पूजन क्षेत्र लोहे की जाली से घिरा हुआ था। इसके चारों ओर सैंकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक घूम रहे थे, किंतु श्रद्धालु जन उनकी तरफ से नितांत निश्चिंत थे। इस जाली के बाहर बहुत सी स्त्रियां अपने स्टॉल लगाकर खड़ी थीं जहाँ पूजा की थालियां बेची जा रही थीं।

    हाथ जोड़कर नमस्कार

    सभी स्त्री-पुरुष, देव पूजन के बीच-बीच में दोनों हाथ जोड़कर तथा उन्हें अपने माथे से लगाकर देवताओं को नमस्कार कर रहे थे, नमस्कार की यह मुद्रा ठीक वैसी ही थी, जैसी कि भारतीय हिन्दू, मंदिरों में देवताओं को प्रणाम करते हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-14 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-3 गुलंगान जुलूस- बारोंग के लिए बलि

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-14 बाली द्वीप पर दूसरा दिन-3 गुलंगान जुलूस- बारोंग के लिए बलि

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 14


    बाली द्वीप पर दूसरा दिन- 3


    कुता में खरीददारी

    अभी सायं के चार बजे थे किंतु धूप की चमक कम होने लगी। हम भी थकान का अनुभव कर रहे थे। इसलिए हमने मैंगवी लौटने का निर्णय लिया। यह मार्ग कुता से होकर जाता था जो बाली द्वीप के मुख्य नगरों में से एक है। हमने पुतु से कहा कि किसी बड़े जनरल स्टोर पर चले ताकि हम कुछ तरकारी और दूध खरीद सकें। यदि हम भारत में होते तो अब तक तो मार्ग में दो-तीन बार चाय पी चुके होते किंतु यहाँ ऐसी कोई दुकान नहीं थी जिस पर चाय बिकती हो। तबनन क्षेत्र में एक रेस्टोरेंट में कॉफी थी किंतु वह भी बिना दूध-चीनी की। इसे पीना हमारे लिए न तो संभव था और न आनंददायक।

    काफी देर चलने के बाद कुता में एक बड़े मॉल के सामने पुतु ने गाड़ी रोकी। पुतु के हिसाब से यह एक मॉल था किंतु भारत के हिसाब से यह एक मध्यम आकार के जनरल स्टोर से अधिक कुछ भी नहीं था। यहाँ हमें कई तरह की हरी तरकारियां देखने को मिलीं। आलू, प्याज, टमाटर, दूध, फल भी प्रचुर मात्रा में थे। वहाँ कई तरह की प्याज और आलू रखे हुए थे जिनके कंटेनर पर लगे लेबल पर उसके भाव के साथ-साथ उस देश का नाम भी लिखा हुआ था जहाँ से वह तरकारी आई थी। यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि अधिकांश तरकारी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया तथा मुम्बई से आई थी। यहाँ तक कि केले भी विदेशी थे। बाली द्वीप के केले आकार में बहुत छोटे, स्वाद में खट्टे-मीठे और अपेक्षाकृत कम मुलायम थे। सेब कई प्रकार का था और विश्व के अनेक देशों से मंगाया गया था। विदेशों से आई हुई यह सारी तरकारी और फल, भारत की अपेक्षा कई गुना अधिक दामों पर उपलब्ध थी।

    हमने आगे के दिनों के हिसाब से तरकारी और दूध के डिब्बे खरीद लिए। दूध के इन डिब्बों पर दुधारू पशुओं चित्र बने हुए थे किंतु उनमें मिल्क पाउडर के साथ-साथ कई तरह के प्रोटीन और वनस्पति तेल भी मिले हुए थे।

    बांस के कण्डील

    अभी हम कुता शहर में कुछ दूर चले थे कि हमें महिलाओं का एक जुलूस सड़क पर चलता हुआ दिखाई दिया। हमारे अनुरोध पर पुतु ने गाड़ी सड़क पर एक तरफ लगा दी और हम जुलूस देखने के लिए नीचे उतर गए। यह एक शानदार जुलूस था जिसमें मुख्यतः महिलाएं ही भाग ले रही थीं। इन महिलाओं ने अनिवार्य रूप से लम्बी सफेद कमीज तथा काले रंग की तहमद पहन रखी थी। सभी महिलाओं ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट पर लाल रंग के कपड़े का फेंटा बांध रखा था।

    सभी महिलाओं के सिर पर बांस की खपच्चियों से बने हुए कंदील थे जिनके ऊपरी हिस्से में दीपक का प्रकाश जगमगा रहा था। ताजा बांस से निर्मित होने के कारण ये कंदीलें पीले रंग की दिखाई देती थीं तथा इन पर फूलों से सजावट भी की गई थी। ऐसा प्रतीत होता था कि ये कंदील किसी देवता के देवालय थे तथा इन देवताओं की शोभायात्रा निकाली जा रही थी।

    शोभा यात्रा में सम्मिलित समस्त महिलाओं का शरीर सधा हुआ, कमर सीधी, गर्दन तनी हुई तथा चाल मंद थी। जुलूस के अगले हिस्से में एक महिला सफेद कमीज के नीचे सफेद तहमद धारण करके आई थी। उसके साथ एक पुरुष भी चल रहा था, उसने भी सफेद कमीज तथा सफेद तहमद धारण कर रखी थी। ये दोनों इस शोभायात्रा में धार्मिक महत्व रखने वाले पुजारी अथवा ओझा जैसे प्रतीत हो रहे थे।

    इस शोभायात्रा के साथ कुछ ऐसी महिलाएं भी चल रही थीं जिन्होंने अपने सिर पर कंदील-नुमा देवालय नहीं उठा रखे थे। उनकी पोषाक की शैली तो वही थी किंतु उनकी कमीज, तहमद तथा फेंटे के रंग अलग थे। शोभायात्रा के अग्रभाग में कुछ पुरुष लाल रंग के दो छत्र उठाए चल रहे थे जैसे कि भारत में रामनवमी, अग्रसेन जयंती एवं चेटीचंड के जुलूसों में देखने को मिलते हैं।

    शानदार संगीतमय जुलूस कंदील वाली महिलाओं की शोभायात्रा जैसे ही हमारे सामने से आगे बढ़ गई, हमें कुछ दूरी पर सड़क पर चलता हुआ एक शानदार संगीतमय जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। इसमें केवल पुरुष और बच्चे सम्मिलित थे। कुछ छोटी लड़कियां भी अपने पिताओं की अंगुली पकड़ कर इस जुलूस में चल रही थीं। पुरुषों और लड़कों ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट तथा सफेद रंग की ठीक वैसी ही टोपी पहन रखी थी जैसी टोपी सुबह से पुतु धारण किये हुए था और जिसके स्थान पर भारतीय कौआ बैठे हुए होने का आभास होता था।

    पुरुषों तथा लड़कों ने एक विशेष शैली में तहमद बांध रखी थी। यह तहमद दो लड़ी थी। अर्थात् एक तहमद के ऊपर दूसरी तहमद बांधी हुई थी। नीचे वाली तहमद अधिक लम्बी थी तथा ऊपर वाली तहमद कम लम्बी थी। इस कारण दोनों तहमदें आसानी से दिखाई दे रही थीं। इनमें से एक तहमद प्रायः सफेद रंग की थी तथा दूसरी तहमद पीले अथवा लाल-पीले और सफेद-काली चौकड़ियों के कपड़े से बनी हुई थी। बाली के हिन्दुओं के लिए सफेद-काली चौकड़ी के कपड़े की तहमद का अवश्य ही कोई धार्मिक महत्व है क्योंकि इस तरह की तहमद नगर में बने हुए विभिन्न तोरणद्वारों के बाहर बनी मूर्तियों, स्तम्भनुमा देवालयों पर भी बंधी हुई हैं।

    जुलूस में सबसे आगे चल रहे युवक मृंदग, झांझ तथा कुछ विचित्र से वाद्ययंत्र बजाते हुए चल रहे थे। इनमें से कुछ वाद्ययंत्र भारतीय प्राचीन मंदिरों में अप्सराओं और गंधर्वों के हाथों में दिखाई देते हैं। इन वाद्ययंत्रों से निकल रही संगीतमय ध्वनि यद्यपि हमने जीवन में प्रथम बार सुनी थी किंतु यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था कि यह एक धार्मिक आयोजन का संगीत है। इस जुलूस को, साथ चल रहे युवक ही नियंत्रित कर रहे थे। चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस का एकाध कर्मचारी शायद ही कहीं दिखाई देता था किंतु इसके उपरांत भी कहीं कोई भागम-भाग, धक्का-मुक्की, चिल्ल-पौं जैसी स्थिति नहीं थी।

    सभी लोग बहुत शांत भाव से कदम से कदम मिलाते हुए आधी सड़क खाली छोड़कर चल रहे थे। छोटे बच्चों ने अपने पिताओं के हाथ अनिवार्य रूप से पकड़े हुए थे। इस जुलूस को देखकर वाहन स्वतः ही रुक जाते थे ताकि जुलूस निर्बाध रूप से चलता रहे।

    बाली के नागरिकों का आत्मानुशासन देखकर मुझ जैसे व्यक्ति को अचंभित होना स्वाभाविक था जिसने अपना पूरा जीवन भारत के भीड़-भड़ाके और शोर-शराबे में व्यतीत किया हो। जहाँ लोग अनिवार्य रूप से एक-दूसरे को धक्का देते हुए, एक दूसरे का कंधा छीलते हुए, जोर-जोर से चिल्लाते और बतियाते हुए सड़कों पर निकलते हैं। भारत में जुलूस का अर्थ ही सड़क पर फैली अफरा-तफरी से है। भारत की सड़कों पर निकलने वाले धार्मिक जुलूसों में आधी सड़क खाली कौन छोड़ता है!

    बारोंग के समक्ष बलि

    हम इन जुलूसों का आनंद लेकर फिर से पुतु की कार में सवार हो गए। अभी लगभग दो किलोमीटर चले थे कि पुतु ने गाड़ी को ब्रेक लगाये। हमने देखा कि सामने से एक और जुलूस चला आ रहा है। एक बड़ी सी खुली गाड़ी पर एक विशालाकाय बारोंग की प्रतिमा रखी हुई है। यह एक विशालयाकाय एवं भयानक दिखने वाली आकृति का वाराह था। लोग उसके सामने नृत्य कर रहे हैं।

    ठीक इसी समय दूसरी दिशा से सैंकड़ों स्त्री-पुरुषों का एक और जुलूस आया। ये लोग बहुत सजे-धजे थे और इन्होंने नये वस्त्र धारण कर रखे थे। अधिकांश महिलाओं ने सफेद अथवा पीले रंग के जालीदार कपड़े की लम्बी कमीजें पहन रखी थीं जिन पर लाल अथवा गुलाबी रंग के फेंटे बंधे थे। इन महिलाओं ने अपने सिरों पर बांस की टोकरियां उठा रखी थीं जिनमें फल-फूल रखे थे। कुछ लोगों ने अपने हाथों में केले के पत्ते लिए हुए थे।

    ये दोनों जुलूस एक चौरोहे की दो विपरीत दिशाओं से आए और चौराहे पर आकर ठहर गए। इसका अर्थ यह था कि एक जुलूस बारोंग के साथ आया था और दूसरा जुलूस बारोंग की पूजा करने के लिए आया था। बारोंग की आकृति अब शांत खड़ी थी तथा उसके समक्ष नृत्य बंद हो गया था। दूसरी तरफ से जो स्त्रियां टोकरियों में पूजन सामग्री लाई थीं, वह पूजन सामग्री टोकरियों सहित बारोंग के समक्ष रख दी गईं।

    बारोंग के साथ चल रहे ओझा जैसे दिखने वाले एक मनुष्य ने बारोंग की स्तुति में मंत्र बोलने आरम्भ किये। ये बाली की स्थानीय भाषा में थे, इसलिए हमारी समझ में नहीं आए। लगभग 15 मिनट तक मंत्रोच्चार एवं पूजन चलता रहा। इसके बाद ओझा को मुर्गी का एक छोटा चूजा दिया गया। एक व्यक्ति ने ओझा को बड़ी सी छुरी पकड़ाई। छोटा सा चूजा भय से कांप रहा था। ऐसा लगता था, वह समझ गया था कि उसके साथ क्या होने वाला है! मैं भी समझ चुका था कि यहाँ क्या होने वाला है! इसलिए इससे आगे देख पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं तस्वीरें उतारना छोड़कर पुतु की गाड़ी में आकर बैठ गया। मैंने कुछ क्षणों के लिए आंखें बंद करके ईश्वर से प्रार्थना की कि चूजे को इस प्रक्रिया में कष्ट न हो। पता नहीं इससे चूजे का कष्ट कम हुआ या नहीं, किंतु इससे मेरे मन को शांति अवश्य मिली थी।

    मैंने आंखें खोलकर पुतु से पूछा कि क्या उसकी बलि दी गई? पुतु ने बुझे स्वर से कहा कि हाँ बारोंग को चिकन की बलि दी गई ताकि वह प्रसन्न हो और इस नगर से समस्त बुराइयों को नष्ट करके यहाँ के लोगों की रक्षा करे। उसकी आवाज बता रही थी कि उसे भी इससे कष्ट हुआ है। हो भी क्यों नहीं, इन दिनों वह शाकाहारी बनने का अभ्यास जो कर रहा था और सप्ताह में दो दिन केवल शाकाहार कर रहा था। चौराहे पर सार्वजनिक बलि का आयोजन बहुत अटपटी लगने वाली बात है किंतु यह बाली के हिन्दू समाज में प्रचलित महत्वपूर्ण प्रथाओं में ऐ एक है जो सर्वजनहिताय- सर्वजनसुखाय की भावना से प्रेरित है। वैष्णव धर्म के प्रसार से पहले भारत के हिन्दुओं में भी यह कुप्रथा भिन्न-भिन्न रूपों में प्रचलित थी।

    मुझे स्मरण हो आया कि 27 जून 2002 को नेपाल के हिन्दू राजा ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाह ने भारत के कामाख्या मंदिर में देवी के समक्ष भैंसा, बकरा, भेड़, कबूतर तथा बत्तख की पंचबलि करवाई थी। इस घटना के पश्चात् छः साल से भी कम समय में नेपाल की जनता ने राजा ज्ञानेन्द्र शाह को गद्दी से उतारकर, नेपाल से राजशाही का समपापन कर दिया था। मुर्गी के बच्चे की बलि के बाद समस्त मनुष्य उठकर चले गए किंतु जाने से पहले वहाँ उपस्थित प्रत्येक वस्तु को उठाकर अपने साथ ले गए। सड़क और चौराहा ऐसे साफ हो गए जैसे कुछ देर पहले वहाँ कुछ हुआ ही नहीं था।

    पपीते की सब्जी

    जब मैंगवी गांव के बाहर चावल के खेतों में बने हुए अपने सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचे तो संध्या के छः बजे थे। सूर्य देवता पश्चिम में काफी नीचे आ गए थे किंतु दिन का उजाला अभी भी बना हुआ था। पिताजी की दृष्टि सर्विस अपार्टमेंट से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे खड़े पपीते के एक लम्बे पेड़ पर गई। पूरा पेड़ लम्बी आकृति के बड़े फलों से लदा हुआ था। पिताजी ने पुतु से पूछा कि क्या हम एक पपीता तोड़ सकते हैं! पुतु ने कहा कि ये पपीते पूरे मौहल्ले के हैं, इन्हें कोई भी तोड़कर अपने उपयोग में ले सकता है किंतु उसे बाजार में बेच नहीं सकता। पुतु को यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि हम कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर खाने वाले थे। पिताजी ने ही वह पपीता तोड़ा। पपीता तोड़ने के प्रयास में पपीता उनकी नाक पर आ गिरा और उन्हें हल्की सी चोट भी लगी किंतु पपीते की सब्जी इतनी स्वादिष्ट बनी कि उसके लिए यह चोट सहन की जा सकती थी।

    चावल के खेतों में चाय

    पीते और सूर्यास्त देखते हुए बीती संध्या हिन्दुस्तानी आदमी की सबसे बड़ी विलासिता है, सामूहिक रूप से बैठकर चाय पीना। हमारे पास दूध पर्याप्त मात्रा में आ चुका था। हमने सर्विस अपार्टमेंट में घुसते ही चाय बनाई और चावल के खेतों में खुलने वाले उसी लॉन में बैठकर पी जहाँ से धरती स्वर्ग जैसी दीख पड़ती थी। वह संध्या चावल के खेतों के बीच सूर्यास्त देखते हुए बीती। चाय का एक चरण पूरा होने पर दूसरा चरण भी आयोजित किया गया।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-15 बाली द्वीप पर तीसरा एवं चौथा दिन उबुद एवं कुता

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-15 बाली द्वीप पर तीसरा एवं चौथा दिन उबुद एवं कुता

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 15


    बाली द्वीप में तीसरा दिन


    तीसरी सुबह 16 अप्रेल को भी आंख जल्दी ही खुल गई। सूर्योदय का आनंद हमने उसी लॉन में बोगनविलिया के छज्जे के नीचे बैठकर चाय पीते हुए लिया। आज भी हमने पुतु को लगभग दस बजे बुलाया था ताकि हम सुबह का नाश्ता और दिन का खाना बनाकर अपने साथ ले सकें।

    मूंछों वाले बंदर

    ठीक दस बजे पुतु गाड़ी लेकर आ गया और हम उसके साथ चल पड़े। सबसे पहले वह हमें उलूवातू के प्रसिद्ध मंकी गार्डन में ले गया। यहाँ पूरे उद्यान में लाल मुंह के एवं अपेक्षाकृत छोटे आकार के बंदर हैं जिन की मूंछें देखकर आश्चर्य होता है। उस उद्यान में बंदरों एवं अन्य पशु-पक्षियों तथा जलचरों की बहुत सारी मूर्तियां हैं जो दर्शक का ध्यान बरबास ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। यहाँ बहुत सी नर-प्रतिमाएं ऐसी हैं जिनकी आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। मोटे होठों और फूल हुए गालों वाली औरंगुटान की देहयष्टि वाली मनुष्य प्रतिमाएं यहाँ भी दर्शकों को आश्चर्य में डाल देती हैं।

    यहाँ एक भी प्रतिमा ऐसी नहीं है जिसे सामान्य माना जाए अथवा उसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाएं कुछ पर्यटक बंदरों को खिलाने के लिए केले लाए थे। कुछ बंदर पर्यटकों के हाथों से केले लेकर शालीन भाव से खा रहे थे किंतु कई बंदर केलों को प्राप्त करने के लिए पर्यटकों के कंधों और सिर पर आकर बैठ रहे थे। यहाँ स्थित कुछ मूर्तियों को दखने से अनुमान हुआ कि इस वन के बंदर शताब्दियों से मनुष्यों के सिर पर बैठते आए हैं। हम लगभग दो घण्टे उबुद वानर वन में रुके। इस वन को देखने का अनुभव कभी न भुलाए जाने वाले अनुभवों में से है।

    राजा का उदास महल

    मूर्तियों एवं मूंछों वाले बंदरों के संसार से निकल कर हम कुता शहर के मुख्य भाग में आ गए जहाँ हमें कुता के प्राचीन शासक का महल देखने को मिला। महल का काफी हिस्सा खण्डहर हो गया है तथा जो कुछ भी ठीक-ठाक अवस्था में है, वह लगभग बंद कर दिया गया है। यह लाल रंग की ईंटों से बना हुआ भवन समूह है। इन ईंटों का निर्माण भारत में बनने वाली ईंटों के समान प्रतीत होता हैं अर्थात् कच्चे गारे से बनी की ईंटों को तेज आंच में पकाया गया है। पूरा महल अपनी भव्यता को खोकर उदास सा खड़ा हुआ प्रतीत होता है।

    जन सामान्य के बीच नृत्य-नाटिका का अभ्यास

    इस महल के एक हिस्से में कुछ स्थानीय महिला एवं पुरुष कलाकार इण्डोनेशियाई भाषा में किसी नृत्य-नाटिका का अभ्यास कर रहे थे। निकट बने लकड़ी के एक बड़े मण्डप में बहुत से कलाकार विविध प्रकार के वाद्ययंत्र बजा रहे थे। इनमं से अधिकांश वाद्ययंत्रों की आकृतियां भारतीय वाद्ययंत्रों से मेल नहीं खातीं। संसार के विभिन्न देशों से आए हुए दर्जनों पर्यटक इन कलाकारों को देखने के लिए उन्हें घेरा बनाकर खड़े थे। यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा था कि यहाँ नृत्य-नाटिकाओं के कलाकार खुले स्थान पर आकर अभ्यास करते हैं जबकि भारत में इस प्रकार का अभ्यास प्रायः बंद कमरों में किया जाता है।

    इतिहास एवं संस्कृति की पुस्तकें

    इस महल के चारों ओर, कुता का अत्यंत व्यस्त बाजार है। महल से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर हमें एक बड़ा बुक-स्टोर मिला जिसमें इण्डोनेशिया के इतिहास एवं संस्कृति से सम्बन्धित कई पुस्तकें उपलब्ध थीं। अन्य वस्तुओं की तरह किताबें भी बहुत महंगी थीं। फिर भी हमने अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुन लीं।

    कलाकृतियों की दुकानों में सन्नाटा

    यहाँ से पुतु हमें टैरेस फील्ड्स की तरफ ले गया जहाँ पहाड़ियों की ढलानों को सीढ़ी की तरह समतल बनाकर वहाँ चावल की खेती की जाती है। वहाँ तक जाने के लिए हमें एक नगरीय क्षेत्र से होकर निकलना पड़ा। यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि सड़क के दोनों ओर सजावटी कलाकृतियों की सैंकड़ों दुकानें स्थित थीं। बांस, लकड़ी तथा अन्य सामग्री से बनी कलाकृतियां। अत्यंत सुंदर पेंटिंग, सैंकड़ों तरह के समुद्री जीवों के खोल, रंग-बिरंगे आभूषण, क्या नहीं था वहाँ!

    इनमें से आधी से अधिक दुकानें बंद थीं तथा खुली हुई दुकानों में भी शायद ही किसी दुकान पर कोई ग्राहक खड़ा हुआ दिखाई दिया। यह बाली के लोगों के जीवन की वास्तविकता थी। यहाँ बहुत से परिवारों की आजीविका पर्यटकों के आगमन पर टिकी हुई है। चूंकि यह पर्यटकों के आने का मौसम नहीं था और बाली द्वीप पर बहुत कम पर्यटक मौजूद थे इसलिए इन दुकानों पर सन्नाटा था।

    राइस टैरेस फील्ड्स

    यह एक पहाड़ी क्षेत्र था, यहाँ बहुत सघन वनावली के बीच, चावल के टैरेस फील्ड्स स्थित थे। कुछ खेतों में किसान काम कर रहे थे। उनकी नुकीली शंक्वाकार टोपियां देखने वाले का मन मोह लेती हैं। हमें लग रहा था जैसे हम अलग ही संसार में आ गए हैं। पुतु ने एक स्थान पर गाड़ी रोककर हमें वहाँ से पैदल चलकर पहाड़ी उतरने तथा लगभग आधा किलोमीटर दूर दिखाई दे रही पहाड़ी पर पहुंचकर टैरेस फील्ड्स का आनंद लेने के लिए कहा। हमने बहुत से पर्यटकों को वहाँ जाते हुए भी देखा। हमारे पैरों में इतनी शक्ति नहीं थी कि हम एक पहाड़ी उतर कर और दूसरी पहाड़ी चढ़कर वहाँ तक पहुंचें और फिर इतना ही चलकर लौटें। इसलिए हमने वहाँ जाना टाल दिया तथा अगले गंतव्य के लिए चलने का अनुरोध किया।

    जंगल में मंगल

    थोड़ी देर चलने पर चावल के खेतों की शृंखला समाप्त हो गई तथा सघन पहाड़ियां आरम्भ हो गईं। यहाँ इतना सघन वन था कि हरीतिमा अपने चरम पर पहुंच गई प्रतीत होती थी। हमने पुतु से अनुरोध किया कि किसी स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ हम दोपहर का भोजन कर सकें। पुतु यहाँ के चप्पे-चप्पे से परिचित था। शीघ्र ही उसने सड़क के किनारे बने एक मंदिर के निकट स्थित बरामदे को तलाश लिया। यहाँ कोई मनुष्य नहीं था। मंदिर पर ताला पड़ा हुआ था तथा बारामदा भी पूरी तरह खाली था। हमने वहीं बैठकर भोजन करने का निर्णय लिया। जंगल में परिवार के साथ बैठकर इस प्रकार भोजन करने का हमारा यह पहला ही अवसर था। इस भोजन में ऐसा स्वाद आया जिसका वर्णन करना संभव नहीं है।

    दान-पुण्य एवं पूजा वाली थाली

    जहाँ बैठकर हमने भोजन किया, उसके निकट एक बंद दुकान थी जिसके बाहर लगे सूचीपट्ट से ज्ञात होता था कि यहाँ नारियल, पुष्प एवं अन्य पूजन सामग्री बिकती थी। इस सूचीपट्ट पर रोमन लिपि में यह शीर्षक अंकित था- ''दान पुण्य पूजा वाली रिंग पुरा दालेम'' अर्थात् दान-पुण्य एवं मंदिर में पूजा की गोल थाली की वस्तुओं के मूल्य। इस सूची की वस्तुओं के नाम तो मेरी समझ में नहीं आए किंतु उनकी दरों को पढ़कर सहज ही समझा जा सकता था कि ये बहुत महंगी थीं।

    चूजे के करतब

    हम भोजन कर ही रहे थे कि किसी पक्षी का एक रंगीन चूजा कहीं से भटक कर हमारे पास आ गया। यह चटख पीले रंग का पक्षी था जो उड़ नहीं सकता था। जैसे ही डेढ़ साल की दीपा की दृष्टि उस पर पड़ी, वह उसके पीछे लग गई। चूजा भी जैसे उसी के साथ खेलने आया। वह गोल-गोल घूमता हुआ दीपा को अपने पीछे दौड़ाने लगा। दीपा ने बहुत प्रयास किया किंतु उसे पकड़ नहीं सकी। जब दीपा थककर रुक जाती, चूजा उसके पास आकर खड़ा हो जाता और दीपा फिर से उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ती। यह क्रम काफी देर तक चला।

    देवता का थान

    भोजन करने के बाद हम लोग ऐसे ही थोड़ा बहुत पैदल चलकर जंगल देखने लगे। मैंने देखा कि निकट ही एक अन्य चबूतरा बना हुआ था जिसके चारों ओर लगभग डेढ़ फुट ऊंची चारदीवारी थी। मैं उत्सुकतावश उसके निकट चला गया। चबूतरे पर एक छोटा सा देवरा बना हुआ था जिसमें पत्थर की एक अनगढ़ प्रतिमा रखी थी। थान के पीछे की ओर एक लम्बा पेड़ खड़ा था जिससे देवालय पर छाया हो रही थी। यह लगभग वैसा ही था जिस प्रकार राजस्थान में खेजड़ी के नीचे गोगाजी और बायासां के थान होते हैं। मैंने इस थान की कई तस्वीरें उतारीं।

    इन्द्र का मंदिर

    जंगल में लंच का आनंद उठाकर हम फिर से पुतु की गाड़ी में चल पड़े। इस बार वह हमें पहाड़ों के बीच बने एक मंदिर ले गया। यह इन्द्र को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था। मंदिर तक पहुंचने के लिए काफी सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता और वापस ऊपर चढ़ना पड़ता। इसके लिए हमारे दल के सदस्य तैयार नहीं थे। हमारी अन्यमनस्कता का एक कारण यह भी था कि इस छोटे से मंदिर को देखने के लिए हमें अच्छी-खासी राशि व्यय करके टिकट खरीदने पड़ते। भारतीय होने के कारण हमें मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट खरीदना जंच नहीं रहा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए अलग से टिकट लेना पड़ रहा था। इसलिए हमने मंदिर तक उतरने का विचार त्याग दिया और मंदिर परिसर तथा भवन को ऊपर सड़क पर खड़े होकर देखा। यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर जान पड़ता था। बाली की परम्परा के अनुसार पूरा मंदिर काले पत्थर का बना हुआ था जिसकी दीवारों पर उगी हुई काई यह बता रही थी कि यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है तथा दीवारें वर्ष में अधिकांश दिनों में भीगी रहती हैं। मंदिर परिसर में बने जल-कुण्ड और उनमें कमल के पुष्प इस तरह का दृश्य उत्पन्न कर रहे थे जिस तरह के दृश्यों का अंकन भगवान वेदव्यास ने महाभारत में कई स्थानों पर किया है। विशेषकर यक्ष-प्रश्न वाले प्रकरण में।

    झरने से निराशा

    पुतु ने हमें एक प्राकृतिक जल प्रपात तक ले जाने का निर्णय लिया। यह बहुत हरा-भरा पहाड़ी स्थान था। यहाँ भी इण्डोनेशियाई सरकार के पर्यटन विभाग ने टिकट लगा रखा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए भी अलग से राशि चुकानी पड़ती थी। चूंकि हमने सुबह से केवल गाड़ी में भ्रमण किया था तथा पैदल चलकर किसी भी स्थान को निकट से नहीं देखा था। इसलिए यहाँ हमने रुकने का निर्णय लिया। लगभग आधा किलोमीटर तक पैदल चलकर तथा कुछ सीढ़ियां उतर कर हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ से झरना दिखाई देता था। इस पूरे मार्ग में बहुत से रेस्टोरेंट थे जिनमें नारियल, ब्लैक कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, चिकन, फिश, आमलेट जैसी बहुत सी चीजें बिक रही थीं किंतु इनमें से एक भी चीज हमारे काम की नहीं थी। हम चाय पीना चाहते थे किंतु बाली में चाय, वह भी दूध वाली चाय का मिलना असंभव जैसा ही था।

    जिस स्थान से झरना दिखाई देता था, मैं और पिताजी वहीं रुक गए। मधु, बच्चों को साथ लेकर झरने के निकट तक गई। झरना यहाँ से लगभग एक किलोमीटर और दूर था। यह इतना छोटा था कि मुझे लगा कि इससे बड़े झरने तो वर्षाकाल में रेगिस्तान के बीच स्थित अरणा-झरणा की पहाड़ियों में दिखाई देते हैं। यह देखकर अफसोस हुआ कि इसे दिखाने के लिए भी इण्डोनेशियाई सरकार पर्यटकों से टिकट के पैसे वसूल रही है। लगभग एक घण्टे बाद मधु ने लौटकर बताया कि यह स्थान उनके लिए है जो शराब पीकर झरने में नहाने का आनंद लेना चाहते हैं। नीचे शराब की कुछ दुकानें हैं जहाँ से यूरोपीय पर्यटक शराब खरीद रहे हैं और झरने में नहा रहे हैं।

    सर्विस अपार्टमेंट को वापसी

    शाम के लगभग तीन बज चुके थे। हम सर्विस अपार्टमेंट के लिए लौट पड़े। यहाँ से मैंगवी लगभग दो घण्टे की दूरी पर था। वहाँ पहुंचते-पहुंचते सूर्य देव का प्रकाश कम होने लगा। सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचते ही भानु ने चाय बनाई और हमने उसी शीशे वाले बरामदे के सामने बने लॉन में बैठकर पी जो सीधा चावल के खेतों में खुलता था। गर्म चाय पाकर आनंद का कोई पार नहीं था। हमें पुतु ने बताया कि अगले दिन हम एक-दो मंदिर तथा समुद्र-तट देख सकते हैं किंतु हमने अगला दिन विश्राम के लिए निर्धारित किया। हमें जोधपुर से चले लगभग एक सप्ताह हो गया था और अब हमें आराम की जरूरत थी। अब तक जो कुछ भी देखा था, उसे भी लिपिबद्ध करने की आवश्यकता थी। इसलिए हमने पुत्तु से कहा कि वह अगले दिन न आए।


    बाली द्वीप में चौथा दिन

    17 अप्रेल को भी नींद प्रातः पांच बजे के आसपास खुल गई। इस समय भारत में तो ढाई बज रहे होंगे। आज का दिन भी हमने चावल के खेतों में बने हुए लॉन में चाय पीने से आरम्भ किया। चूंकि आज पुतु को नहीं आना था, इसलिए हम ज्यादा रिलैक्स की स्थिति में थे। सुबह-सवेरे ही मैं लैपटॉप लेकर बैठ गया और पिछले तीन दिनों की यात्रा के अनुभवों को लिखने का प्रयस करने लगा। दस बजे के लगभग मधु ने कहा कि आज थोड़ी देर के लिए पैदल ही घूम आते हैं। इसलिए मैं, विजय और मधु पैदल ही पुरा तमन अयुन टेम्पल की तरफ चल पड़े।

    मुख्य द्वार पर स्वस्तिक एवं गणेश

    हम आज उस मार्ग पर चले जो खेतों के बीच से न होकर, गांव के बीच से होकर जाता था। हमने देखा कि अधिकांश घरों के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर या तो गणेशजी की प्रतिमा स्थापित है या फिर वहाँ स्वस्तिक आकृति अंकित है जिसे भारत में गणेशजी का प्रतीक माना जाता है। मार्ग में कुछ मंदिर देखे जिनके बाहर उसी प्रकार द्वारपाल बने हुए थे जिस प्रकार भारत में बनाए जाने की परम्परा है। अंतर केवल इतना था कि भारत में द्वारपालों को प्रमुखता नहीं दी जाती है इसलिए सहज ही उन पर ध्यान नहीं जाता जबकि बाली में मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों ओर द्वारपालों की मनुष्याकार प्रतिमाएं प्रमुखता से स्थापित की गई हैं जिन पर चटख रंग किये गए हैं।

    चुड़ैलों, राक्षसों और देवी-देवताओं का विचित्र संसार

    तमन अयुन मंदिर के मार्ग में हमारी दृष्टि अचानक एक विकराल स्त्री प्रतिमा पर गई। लगभग आठ फुट ऊंची यह विकराल प्रतिमा एक भवन की दीवार के बाहरी आले में लगी हुई थी। हमारा ध्यान उस भवन की ओर गया। यह एक प्रदर्शनी थी जिसमें बाली शैली के देवी-देवताओं और राक्षसों की सात से आठ फुट ऊँची प्रतिमाएं लगी हुई थीं। पैदल चलने के कारण हम थक चुके थे और भीतर जाने की हिम्मत नहीं थी। अभी तो हमें वापस भी लौटना था। इसलिए हमने विजय से कहा कि वह इस प्रदर्शनी का वीडियो बना लाए। हम उस वीडियो को ही देख लेंगे। इस प्रदर्शनी देखने के लिए पच्चीस हजार रुपए का टिकट था। जब विजय वीडियो बनाने प्रदर्शनी घर में चला गया तो मैं और मधु प्रदर्शनी घर के बाहर ही बैठ गए।

    विजय द्वारा बनाकर लाई गई वीडियो में हम चुड़ैलों, राक्षसों और देवी-देवताओं के अनोखे संसार को देखकर दंग रह गए। इसमें रामायण और महाभारत के प्रसंगों को दर्शाने वाली प्रतिमाएं थीं तो शिव-पार्वती, श्रीराम-जानकी आदि की बहुत सुंदर प्रतिमाएं भी थीं। सभी प्रतिमाएं विशुद्ध बाली शैली में थी। इनका अंग-सौष्ठव भिन्न प्रकार का था। प्रतिमाओं पर तेज चटख रंग किये हुए थे। प्रदर्शनी देखने के बाद हम अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट आए। शेष दिवस बाली यात्रा के संस्मरण लिखते हुए निकला।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-16 जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में पहला दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-16 जावा द्वीप में पांच दिन - योग्यकार्ता में पहला दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 16

    जावा द्वीप पर पांच दिन



    बाली द्वीप से जावा द्वीप पर

    18 अप्रेल को हमें बाली द्वीप से विदा लेनी थी। हमारा विमान दोपहर 2.00 बजे का था किंतु हमने पुतु को प्रातः 9.00 बजे ही बुला लिया था। मैंगवी अर्थात् जिस स्थान पर हम ठहरे हुए थे, से देनपासार हवाई अड्डे की दूरी लगभग डेढ़ घण्टे की थी। देनपासार से हमें योग्यकार्ता जाना था जो कि जावा द्वीप पर स्थित है तथा इण्डोनेशिया के प्रमुख शहरों में से एक है। इसे जोगजकार्ता तथा जोगजा के नाम से भी जाना जाता है। बाली से योग्यकार्ता की हवाई दूरी 502 किलोमीटर है। इसलिए यह केवल 1 घण्टे 10 मिनट की घरेलू उड़ान थी। चूंकि बाली का समय योग्यकार्ता से एक घण्टे आगे है। इस कारण जब हम 2.00 बजे बाली से रवाना होकर तथा 1 घण्टे 10 मिनट की यात्रा करने के पश्चात् योग्यकार्ता एयरपोर्ट पर उतरे तो हमारी घड़ियों में 2.10 बज रहे थे।

    जावा द्वीप पर पहला दिन

    जैसा कि मैं पहले ही लिख चुका हूं कि हमने एक वैबसाइट के माध्यम से योग्यकार्ता में एक सर्विस अपार्टमेंट बुक करवा रखा था। यह मासप्रियो नामक मुस्लिम शिक्षक का फ्लैट था। उसने हमें भरोसा दिलाया कि हम उसके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी। इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने उन्हें भोजन बनाने के लिए मना कर दिया था क्योंकि हमारी संतुष्टि भारतीय प्रकार के भोजन से ही होने वाली थी। इम इस बात से आशंकित भी थे कि हर देश में शाकाहारी होने की परिभाषा बिल्कुल अलग है। जो भी हो, वैबसाइट पर उपलब्ध चित्रों के आधार पर हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया। सर्विस अपार्टमेंट के मालिक मि. मासप्रियो ने हमारे लिए एक ड्राइवर का प्रबंध किया जो हमें योग्यकार्ता एयरपोर्ट पर लेने के लिए आने वाला था। एयरपोर्ट से सर्विस अपार्टमेंट तक की टैक्सी के लिए 750 भारतीय रुपए भाड़ा बताया गया था, जो हमें ठीक ही लगा।

    मि. अन्तो से भेंट

    हमारी आशा के अनुरुप मि. मासप्रियो द्वारा भेजा गया ड्राइवर एयरपोर्ट के बाहर विजय के नाम की कागज की पट्टी लेकर खड़ा था। यह एक गोरे रंग और मंझले कद का हंसमुख युवक था। उसने बड़ी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया तथा भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। इस अभिवादन का जादू हमें विदेशी धरती पर जाकर ही ज्ञात हुआ। जैसे ही कोई इण्डोनेशियन व्यक्ति हाथ जोड़कर अभिवादन करता तो हमारे और उसके बीच की आधी दूरी उसी समय समाप्त हो जाती। ड्राइवर ने हमें अपना नाम अन्तो बताया तथा हम सबसे भी हमारे नाम पूछे। मुझे अनुमान है कि उसने उसी समय हमारे नाम याद भी कर लिए क्योंकि कुछ समय बाद उसने मुझे मि. मोहन कहकर सम्बोधित किया। उसके बाद मैंने भी उसे मि. अन्तो कहकर ही सम्बोधित किया। मैंने नोट किया कि जब भी मैं उसे मि. अन्तो कहता था तो उसके चेहरे पर विशेष प्रकार की मुस्कान आती थी। मि. अन्तो ने हमारे सामान को अपनी गाड़ी में जमाया। उसकी गाड़ी भी मि. पुतु की गाड़ी की तरह काफी बड़ी थी और हम अपने परिवार तथा सामान सहित मजे से उसमें बैठ गए।

    आई एम सॉरी

    अभी गाड़ी कुछ मीटर ही सरकी होगी कि मि. अन्तो ने आगे की सीट पर बैठे पिताजी से कहा- 'आई एम सॉरी, सीट बैल्ट प्लीज!' पिताजी ने भी उससे क्षमा मांगते हुए सीट बैल्ट लगाई। बाद में ज्ञात हुआ कि कुछ भी बोलने से पहले 'आईएम सॉरी' तथा बात के अंत में थैंक्यू कहना उसकी आदत थी। आगे चलकर हमें उसकी कुछ और अच्छी आदतें मालू हुईं। गाड़ी रोकते ही वह नीचे उतर कर कार का दरवाजा खोलता था और गाड़ी चलाने से पहले वह स्वयं सारे दरवाजे जांचता था कि वे बंद हुए हैं या नहीं। इस कार्य में वह बहुत ही कम समय लगाता था। उसकी एक अच्छी आदत यह भी थी कि जहाँ कहीं जरूरी होता था, वह हमें मार्ग में पड़ने वाले स्थान के नाम अथवा उसकी विशेषता के बारे में संक्षेप में अवश्य बताता था।

    योग्यकार्ता की चमचमाहट

    जब मि. अन्तो की गाड़ी एयरपोर्ट से बाहर निकलकर योग्यकार्ता की सड़कों पर फर्राटे भरने लगी तो हम इस नगर की चमक-दमक देखकर दंग रह गए। यह पूना जैसा एक बड़ा एवं आधुनिक शहर है। सड़कें काफी चौड़ी हैं जो डिवाइडर के माध्यम से दो प्रमुख हिस्सों में बंटी हुई हैं। प्रत्येक हिस्सा पुनः दो हिस्सों में बंटा हुआ है, बाईं ओर का हिस्सा दो पहिया वाहनों के लिए और दायीं ओर का हिस्सा चार पहिया वाहनों के लिए। इस व्यवस्था से वाहन तेजी से चल पा रहे थे और सड़क पर हॉर्न बजाने की नौबत ही नहीं आती थी। बीच-बीच में लालबत्ती पर जेबरा क्रॉसिंग की व्यस्था थी जहाँ से पैदल यात्री आसानी से आ-जा रहे थे।

    पूरी सड़क एकदम साफ-सुथरी, कहीं कोई भिखारी नहीं। चौराहों पर खड़े होकर सामान बेचने वाले अवांछित वैण्डर्स तक नहीं। सड़क के दोनों ओर भव्य बाजार था जिसका सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। इस क्षेत्र में बड़े मॉल और भव्य दुकानों की संख्या का कोई अंत नहीं था। लगभग आधा-पौन घण्टे तक योग्यकार्ता की सड़कों पर चलने के बाद हम समझ गए कि बाली और योग्यकार्ता में कोई समानता नहीं है। बाली की शांत और सीधी-सरल जिंदगी, योग्यकार्ता के चमक भरे आकर्षण से बिल्कुल अलग है। योग्यकार्ता की तुलना में बाली को साफ-सुथरा और सभ्य देहात ही कहा जा सकता है। हालांकि वहाँ भी कुता जैसे शहर हैं, किंतु वे योग्यकार्ता की तुलना में काफी छोटे हैं।

    मॉल की चमक-दमक और लड़कियों का शानदार व्यवहार

    हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि किसी शॉप से हमें दूध एवं सब्जियां खरीदनी हैं तो वह हमें एक मॉल में ले गया। मैं और विजय मॉल के भीतर गए। परिवार के शेष सदस्य गाड़ी में बैठे रहे। इस मॉल की संसार के किसी भी भव्य मॉल से तुलना की जा सकती थी। कांच और प्रकाश के घालमेल से बना हुआ एक अनोखा और चमचमाता संसार ही था वह। हमने वहाँ कुछ लोगों से बात करने का प्रयास किया ताकि हम पता कर सकें कि हमें दूध और सब्जियां किस हिस्से में अथवा किस मंजिल पर मिलेंगी किंतु हमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो अंग्रेजी जानता हो। वहाँ रोमन लिपि में इण्डोनेशियाई भाषा लिखी हुई थी जिसे समझना संभव नहीं था। इसलिए हमने अपने विवेक से ही दूध और सब्जियां तलाशने का निर्णय लिया। हमें शीघ्र ही एक मंजिल पर फल एवं सब्जियां दिखाई दीं।

    यहाँ दुनिया के बहुत से देशों से आई हुई सब्जियां रखी थीं। कितनी तरह की प्याज या कितने तरह के आलू या कितने तरह के सेब या कितने तरह के टमाटर थे, कहा नहीं जा सकता। केले, तरबूजे और खरबूजे भी कई प्रकार के थे। यहीं से हमें दूध के बंद डिब्बे भी मिल गए।

    हम इन जिंसों का भुगतान करने के लिए पेमेंट काउंटर पर गए तो हमें हर काउण्टर पर 18-20 साल की लड़कियां काम करती हुई दिखाई दीं। सभी के कान और सिरों पर स्कार्फ बंधे हुए थे। सभी के हाथ तेजी से काम करते थे। वे आनन-फानन में ग्राहक से भुगतान लेकर उसे निबटा देती थीं ताकि उसका समय खराब न हो। उन्होंने हमें देखते ही पहचान लिया कि ये भारतीय हैं, अतः हाथ जोड़कर हमें नमस्ते कहा और मुस्कुराकर हमारा स्वागत किया। बड़ी फुर्ती से उन्होंने हमारे सामान का बिल बनाया और हमसे भुगतान लेकर बचे हुए रुपए लौटाए। क्या भारत में इस प्रकार की शालीनता और तेजी से काम नहीं हो सकता, मैंने स्वयं से प्रश्न किया!

    यह एक विशाल मॉल था। चारों तरफ ग्राहक थे किंतु भीड़-भड़क्का कहीं भी नहीं था। किसी प्रकार की कोई चिल्ल-पौं, धक्का-मुक्की, बेचैनी, भागमभाग, बदतमीजी, काम में ढिलाई, कुछ भी तो ऐसा नहीं कि इन लड़कियों के काम में कोई कमी निकाली जा सके। बहुत कम स्टॉल्स पर हमने नौजवान लड़कों को खड़े हुए देखा, वहाँ 90 प्रतिशत अथवा उससे अधिक संख्या में लड़कियां ही काम कर रही थीं।

    निश्चित रूप से इण्डोनेशिया एक मुस्लिम देश है, इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है। इस पर भी भारत संसार के समक्ष यह दावा बार-बार दोहराता है कि संसार के सर्वाधिक मुसलमान हमारे यहाँ रहते हैं किंतु दोनों देशों के मुसलमानों में कितना अंतर है! भारत के मुसलमान अपनी गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन और जनसंख्या वृद्धि के लिए जाने जाते हैं। भारत की मुस्लिम औरतें अभी तक बुरका और तीन तलाक में उलझी हुई हैं किंतु इण्डोनेशिया की मुस्लिम लड़कियों ने संसार के समक्ष सिद्ध कर दिया है कि उनके बराबर शालीन और सभ्य व्यवहार किसी देश की औरतें नहीं कर सकती हैं। वे हर कार्य को धैर्य, शांति और कौशलपूर्ण ढंग से निबटाती हैं।

    आवासीय बस्तियों की चमक-दमक

    मॉल से निकलकर हम पुनः पार्किंग में खड़ी मि. अन्तो की गाड़ी तक आए और गाड़ी फिर से चल पड़ी। एयरपोर्ट से लगभग एक घण्टा चलने के बाद बाजार का सिलसिला समाप्त हो गया और आवासीय बस्तियां आरम्भ हुई। यहाँ दुकानों की संख्या इक्का-दुक्का रह गई। आवासीय क्षेत्र में आलीशान कोठियों की कोई कमी नहीं थी। एक से बढ़कर एक भवन।

    उजाड़ बस्ती में

    हमें चलते हुए लगभग एक घण्टा हो गया था। अंत में आवासीय बस्तियों का यह चमकदार सिलसिला भी समाप्त हो गया और मि. अन्तो की गाड़ी एक ऐसी सड़क पर मुड़ गई जहाँ से एक उजाड़ सी बस्ती आरम्भ होती थी। गाड़ी को इस सड़क पर मुड़ते देखकर हमारा माथ ठनका। यहाँ हरे रंग के पुते हुए छोटे-छोटे घर थे जिनके सामने मुर्गे दौड़ लगाते हुए दिखाई दिए। एक मस्जिद से लाउड स्पीकर पर अजान की आवाज आ रही थी। शीघ्र ही मि. अंतो की गाड़ी लोहे के एक बंद गेट के सामने रुक गई। यह वही दरवाजा था जिसका चित्र हमने वैबसाईट पर देखा था। बाहर से हालात अच्छे नहीं लगे किंतु हमने गाड़ी से सामान उतारना आरम्भ किया।

    सच्चाई से सामना होने पर हमारे होश उड़े

    गेट के भीतर दस फुट लम्बा और तीन फुट चौड़ा एक संकरा सा प्लेटफार्मनुमा मार्ग, भवन मुख्य कक्षों तक जाता था। इस मार्ग के दोनों तरफ पानी का एक विशाल हौद था जिसमें काले रंग का गंदा पानी दिखाई दे रहा था। डेड़ वर्ष की दीपा इस हौद में कभी भी गिर सकती थी। हर समय-भागम-भाग मचाए रहने वाली दीपा को तो हर समय पकड़ कर भी नहीं रखा जा सकता। कभी तो आदमी का ध्यान चूकेगा ही!

    कमरों की हालत और भी खराब थी। कमरों की छतों पर पंखे, एयरकण्डीशनर कुछ भी नहीं। दरवाजे टूटे हुए थे जिन पर लगी छोटी-छोटी कीलें, दरवाजों पर हाथ रखते ही चुभती थीं। दोनों कमरों में एक-एक टैबल फैन रखा था जिनमें से कठिनाई से ही हवा निकल रही थी। दोनों कमरों में एक-एक छोटी सीएफएल लटक रही थी जिनमें से बहुत कम उजाला फर्श तक पहुंच पा रहा था। वॉशबेसिन पर टोंटी नहीं थी और टॉयलेट की व्यवस्थाएं इतनी खराब थीं कि हमारा कलेजा कांप गया। दानों टॉयलेट में मल-त्याग के पश्चात् प्रक्षालन की व्यवस्था नहीं थी। एक कमरे के टॉयलेट में दरवाजे के स्थान पर पर्दा टंगा हुआ था। टॉयलेटों की दीवार में एक-एक घुण्डी लगी थी जिसे घुमाने पर छत के पास टंगे एक फव्वारे से पानी आता था। कैसे रहा जाएगा यहाँ, हममें से हर कोई अपने आप से यही सवाल कर रहा था।

    रसोई का पता किया तो ज्ञात हुआ कि वह अगले घर में है जहाँ मकान मालिक का भी भोजन बनता था। रसोई का फ्रिज खोला तो उसमें कटी हुई मछलियां और चिकन रखा था। मधु ने हाथ खड़े कर दिये कि वह उस रसोईघर में जाकर भोजन नहीं बनाएगी जहाँ पहले से ही फिश और चिकन रखा हुआ है। हमारे लिए भी यह संभव नहीं था कि हम वहाँ तैयार किया गया भोजन ग्रहण कर लें!

    इस व्यवस्था को देखते-समझते शाम के साढ़े पांच बजे से ऊपर का समय हो गया। हाथों-हाथ पदरेश में दूसरा सर्विस अपार्टमेंट ढूंढना संभव नहीं था। होटल में जाना इसलिए संभव नहीं था कि वहाँ भोजन तैयार करने की सुविधा नहीं होगी। हमने मकान मालिक से पूछा कि क्या आसपास और कोई दूसरा अपार्टमेंट मिल सकता है जो अधिक सुविधाजनक हो! मि. मासप्रियो ने स्पष्ट मना कर दिया। हमने मि. अन्तो से पूछा, उसने भी कहा कि वह किसी होटल में तो ले जा सकता है किंतु किसी सर्विस अपार्टमेंट के बारे में नहीं जानता।

    चूंकि योग्यकार्ता का समय बाली के समय से एक घण्टा पीछे था जबकि वास्तविक दूरी केवल 502 किलोमीटर ही थी, इसिलिए यहाँ अंधेरा बहुत जल्दी हो गया था। अफरा-तफरी करने से कुछ नहीं होने वाला था। इसलिए हमने धैर्य से काम लेने का निश्चय किया। मि. मासप्रियो से अनुरोध किया गया कि वह एक गैस और चूल्हे का प्रबंध हमारे कक्षों के सामने के संकरे से बरामदे में कर दे, लकड़ी की एक टेबल लगा दे और बाजार से आरओ वाटर की बीस लीटर की बोतल मंगवा दे ताकि हम अपना भोजन इस बरामदे में तैयार कर सकें। हमारी दशा देखकर मि. मासप्रियो को हम पर दया आ गई। उसने हमारी ये मांगें पूरी कर दीं।

    मुसीबत पर मुसीबत

    इधर तो मधु और भानु चाय तथा भोजन तैयार करने में जुटीं और उधर मैं और विजय इण्टरनेट के माध्यम से अगले तीन दिनों के लिए कोई अन्य सर्विस अपार्टमेंट बुक करवाने में जुटे। यहाँ भी एक संकट खड़ा हो गया। कमरों के भीतर वाई-फाई की कनैक्टिविटी नहीं मिल रही थी और कमरे के बाहर लैपटॉप नहीं चल पा रहा था क्योंकि थोड़ी देर चलने के बाद लैपटॉप की बैटरी डिस्चार्ज हो गई। बरामदे में कोई इलेक्ट्रिक सॉकेट नहीं था जहाँ से लैपटॉप जुड़ सकता था। हम लगभग तीन घण्टे तक प्रयास करते रहे, जैसे-तैसे हमने एक सर्विस अपार्टमेंट चुन तो लिया किंतु उसकी बुकिंग नहीं हो पाई क्योंकि वाईफाई की लो-कनैक्टिविटी के कारण हमारे पासपोर्ट की स्कैन कॉपी वैबसाईट तक नहीं पहुंच पा रही थी।

    सुषमा ने किया समाधान

    विजय ने अपनी छोटी बहिन सुषमा से सम्पर्क कर उसे अपनी समस्या बताई। इन्फोसिस में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम कर रही सुषमा वैसे तो चण्डीगढ़ रहती है किंतु इस दिन वह अपने ससुराल नई दिल्ली आई हुई थी। सुषमा के पति अर्थात् मेरे जामाता अनुपमजी, उस दिन अपनी कम्पनी के काम से कतर में थे। सुषमा ने दिल्ली से हमारे लिए उसी सर्विस अपार्टमेंट की बुकिंग करवा दी जो हमने वैबसाइट पर देखकर चुना था। इसका चैक-इन टाइम दिन में दो बजे के बाद का था किंतु हम वहाँ प्रातःकाल में शिफ्ट हो जाना चाहते थे। इसलिए विजय ने सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन मिस रोजोविता से सम्पर्क किया तथा उसे अपनी समस्या बताई। मिस रोजोविता ने कहा कि अपार्टमेंट की सफाई करवाने में समय लगेगा। इसलिए हम प्रातः 8 बजे नहीं अपितु प्रातः 11 बजे आ सकते हैं।

    मुर्गे बोलते रहे, मुल्ले बांग देते रहे और मच्छर काटते रहे

    जैसे-तैसे भोजन करके हम लोग सोए। रात निकालनी तो कठिन थी किंतु मन में इस बात से शांति भी थी कि केवल एक रात की ही बात है। हम तकलीफ सहन कर सकते थे किंतु गंदगी में बना भोजन, मांस-मछली की गंध और टॉयलेट में मलत्याग के पश्चात् शरीर को साफ करने की व्यवस्था के अभाव की स्थिति को सहन करने में सक्षम नहीं थे। दोनों कमरों के पंखों में से पूरी रात हवा नहीं निकली। गंदे पानी के हौद के कारण मच्छर बड़ी संख्या में मौजूद थे और पूरी रात हिन्दुस्तानी खून की दावत उड़ाते रहे। हर थोड़ी देर में गली में उपस्थित कोई न कोई मुर्गा बांग देता रहा और थोड़ी थोड़ी देर में पास की किसी मस्जिद से मुल्ला द्वारा दी जा रही अजान की आवाज गूंजती रही। नींद का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था। यह कैसी रात थी! मैंने कुछ रातें भारत-पाक सीमा पर पूरी-पूरी रात जीप में यात्रा करते हुए भी बिताई हैं, किंतु ऐसी खराब अनुभूति तो तब भी नहीं हुई।


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