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  • अजमेर का इतिहास - 11

     03.06.2020
     अजमेर का इतिहास - 11

    भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (2)


    चौहान-गहड़वाल संघर्ष

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जैसे दक्षिण में चौलुक्य चौहानों के शत्रु थे, वैसे ही उत्तर पूर्व में गहड़वाल चौहानों के शत्रु थे। जब पृथ्वीराज ने नागों, भण्डानकों तथा चंदेलों को परास्त कर दिया तो कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद्र में चौहानराज के प्रति ईर्ष्या जागृत हुई। कुछ भाटों के अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल के कोई लड़का न था अतः अनंगपाल तोमर ने दिल्ली का राज्य भी अपने दौहित्र पृथ्वीराज चौहान को दे दिया। अनंगपाल की दूसरी पुत्री का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ था जिसका पुत्र जयचन्द हुआ। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) तथा जयचन्द मौसेरे भाई थे।

    (पृथ्वीराज की माता कर्पूरदेवी चेदिदेश की राजकुमारी थी न कि दिल्ली की। भाटों और ख्यातों ने पृथ्वीराज को अनंगपाल का दौहित्र कहा गया है। हो सकता है कि चेदिदेश के कलचुरी राजा अचलराज तथा दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल के बीच कोई वैवाहिक सम्बन्ध हो जिसके आधार पर पृथ्वीराज दिल्ली के अनंगपाल का दौहित्र लगता हो।) जब अनंगपाल ने पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य देने की घोषणा की तो जयचन्द पृथ्वीराज का शत्रु हो गया और उसे नीचा दिखाने के अवसर खोजने लगा। पृथ्वीराज चौहान स्वयं तो सुन्दर नहीं था किन्तु उसमें सौन्दर्य बोध अच्छा था। उसने पांच सुन्दर स्त्रियों से विवाह किये जो एक से बढ़ कर एक रमणीय थीं।

    पृथ्वीराज रासो के लेखक कवि चन्द बरदाई ने चौहान तथा गहड़वाल संघर्ष का कारण जयचंद की पुत्री संयोगिता को बताया है। कथा का सारांश इस प्रकार से है- पृथ्वीराज की वीरता के किस्से सुनकर जयचन्द की पुत्री संयोगिता ने मन ही मन उसे पति स्वीकार कर लिया। जब राजा जयचन्द ने संयोगिता के विवाह के लिये स्वयंवर का आयोजन किया तो पृथ्वीराज को आमन्त्रित नहीं किया गया, वरन् उसकी लोहे की मूर्ति बनाकर स्वंयवर शाला के बाहर द्वारपाल की जगह खड़ी कर दी गई। संयोगिता को जब इस स्वयंवर के आयोजन की सूचना मिली तो उसने पृथ्वीराज को संदेश भिजवाया कि वह पृथ्वीराज से ही विवाह करना चाहती है। पृथ्वीराज अपने विश्वस्त अनुचरों के साथ वेष बदलकर कन्नौज पंहुचा।

    संयोगिता ने प्रीत का प्रण निबाहा और अपने पिता के क्रोध की चिन्ता किये बिना, स्वयंवर की माला पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में डाल दी। जब पृथ्वीराज को संयोगिता के अनुराग की गहराई का ज्ञान हुआ तो वह स्वयंवर शाला से ही संयोगिता को उठा लाया। कन्नौज की विशाल सेना उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकी। पृथ्वीराज के कई विश्वस्त और पराक्रमी सरदार कन्नौज की सेना से लड़ते रहे ताकि राजा पृथ्वीराज, कन्नौज की सेना की पकड़ से बाहर हो जाये। सरदार अपने स्वामी की रक्षा के लिए तिल-तिलकर कट मरे। राजा अपनी प्रेयसी को लेकर सुरक्षित राजधानी को पहुँच गया। (पातसाहि का ब्यौरा नामक ग्रंथ में पृथ्वीराज संयोगिता प्रकरण का अंश इस प्रकार से दिया गया है- तब राजा पृथ्वीराज संजोगता परणी। जहि राजा कैसा कुल सौला 16 सूरी का 100 हुआ। त्याके भरोसे परणी ल्याओ। लड़ाई सावता कही। पणी राजा जैचंद पूंगलो पूज्यो नहीं। संजोगता सरूप हुई। तहि के बसी राजा हुवो। सौ म्हैला ही मा रही। महीला पंदरा बारा ने नीसरियो नहीं।)

    भाटों की कल्पना अथवा वास्तविकता

    प्रेम, बलिदान और शौर्य की इस प्रेम गाथा को पृथ्वीराज रासो में बहुत ही सुन्दर विधि से अंकित किया है। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन ने अपने उपन्यास पूर्णाहुति में भी इस प्रेमगाथा को बड़े सुन्दर तरीके से लिखा है। रोमिला थापर, आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर ओझा आदि इतिहासकारों ने इस घटना के सत्य होने में संदेह किया है क्योंकि संयोगिता का वर्णन रम्भामंजरी में तथा जयचंद्र के शिलालेखों में नहीं मिलता। इन इतिहासकारों के अनुसार संयोगिता की कथा 16वीं सदी के किसी भाट की कल्पना मात्र है। दूसरी ओर सी.वी. वैद्य, गोपीनाथ शर्मा तथा डा.दशरथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने इस घटना को सही माना है।

    रहस्यमय शासक

    पृथ्वीराज चौहान का जीवन शौर्य और वीरता की अनुपम कहानी है। वह वीर, विद्यानुरागी, विद्वानों का आश्रयदाता तथा प्रेम में प्राणों की बाजी लगा देने वाला था। उसकी उज्जवल कीर्ति भारतीय इतिहास के गगन में धु्रव नक्षत्र की भांति दैदीप्यमान है। आज आठ सौ साल बाद भी वह कोटि-कोटि हिन्दुओं के हदय का सम्राट है। उसे अन्तिम हिन्दू सम्राट कहा जाता है। उसके बाद इतना पराक्रमी हिन्दू राजा इस धरती पर नहीं हुआ। उसके दरबार में विद्वानों का एक बहुत बड़ा समूह रहता था। उसे छः भाषायें आती थीं तथा वह प्रतिदिन व्यायाम करता था। वह उदारमना तथा विराट व्यक्तित्व का स्वामी था।

    चितौड़ का स्वामी समरसी (समरसिंह) उसका सच्चा मित्र, हितैषी और शुभचिंतक था। पृथ्वीराज का राज्य सतलज नदी से बेतवा तक तथा हिमालय के नीचे के भागों से लेकर आबू तक विस्तृत था। जब तक संसार में शौर्य जीवित रहेगा तब तक पृथ्वीराज चौहान का नाम भी जीवित रहेगा। उसकी सभा में धार्मिक एवं साहित्यक चर्चाएं होती थीं। उसके काल में कार्तिक शुक्ला 10 वि.सं. 1239 (ई.1182) में अजमेर में खतरगच्छ के जैन आचार्य जिनपति सूरि तथा उपकेशगच्छ के आचार्य पद्मप्रभ के बीच शास्त्रार्थ हुआ। ई.1190 में जयानक ने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'पृथ्वीराज विजय' की रचना की। डा. दशरथ शर्मा के अनुसार, अपने गुणों के आधार पर पृथ्वीराज चौहान योग्य व रहस्यमय शासक था।

    पृथ्वीराज की रानियां

    पृथ्वीराज की रानियों की कोई विश्वसनीय संख्या नहीं दी जा सकती। कहीं-कहीं उसके पांच विवाहों का उल्लेख मिलता है किंतु पृथ्वीराज विजय एवं चौहान कुल कल्पदु्रम पृथ्वीराज की 16 रानियों का उल्लेख करते हैं- (1.) आबू के राव आल्हण पंवार की पुत्री इच्छिनी पंवार, (2.) मण्डोर के राव नाहड़ प्रतिहार की पुत्री जतनकंवर, (3.) देलवाड़ा के रामसिंह सोलंकी की पुत्री प्रतापकंवर, (4.) नागौर के दाहिमा राजपूतों की पुत्री सूरज कंवर, (5.) गौड़ राजकुमारी ज्ञान कंवर, (6.) बड़गूजरों की राजकुमारी नंद कंवर, (7.) यादव राजकुमारी पद्मावती। (8.) गहलोत राजकुमारी कंवर दे, (9.) आमेर नरेश पंजन की राजकुमारी जस कंवर कछवाही, (10.) मण्डोर के चंद्रसेन की पुत्री चंद्रकंवर पड़िहार, (11.) राठौड़ तेजसिंह की पुत्री शशिव्रता, (12.) देवास की सोलंकी राजकुमारी चांदकंवर, (13.) बैस राजा उदयसिंह की पुत्री रतनकंवर, (14.) सोलंकियों की राजकुमारी सूरजकंवर, (15.) प्रतापसिंह मकवाणी तथा (16.) कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता।

    ये समस्त नाम विश्वसनीय नहीं कहे जा सकते किंतु इनमें से कुछ नाम सही होने चाहिये।

    पृथ्वीराज के पुत्र

    पृथ्वीराज के पुत्रों की वास्तविक संख्या ज्ञात नहीं है। कुछ इतिहासकार केवल गोविंदराज को ही पृथ्वीराज का एकमात्र पुत्र मानते हैं। यह अपने पिता के समय में ही सेना का संचालन करता था। हम्मीर महाकाव्य ने भी इसी नाम का उल्लेख किया है। मुस्लिम इतिहासकारों ने गोविंदराज अथवा किसी भी पुत्र का कोई उल्लेख नहीं किया है। पृथ्वीराज रासो एवं अन्य हिन्दू ग्रंथों के अनुसार पृथ्वीराज का सबसे बड़ा पुत्र रेणसी था। दूसरा पुत्र गोविंदराज था। इसके अतिरिक्त बलभद्र भरत, अक्षय कुमार, जोध एवं लाखन भी पृथ्वीराज चौहान के पुत्र बताये जाते हैं जो अजमेर पर पुनः अधिकार करने के प्रयासों में मारे गये। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज की गुहिलोत रानी कंवरदे के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनमें से एक रेणसी तथा दूसरा पुत्र सामंतसिंह था।

    शहाबुद्दीन गौरी के आक्रमण

    ई.1173 में मुहम्मद शहाबुद्दीन गौरी को गजनी का गवर्नर नियुक्त किया गया। गद्दी पर बैठने के बाद उसने भारत की तफर बढ़ना आरंभ किया। ई.1178 में चौहान सेनाओं से प्रथम बार उसकी मुठभेड़ हुई। ई.1181 में उसने सियालकोट का दुर्ग हिन्दुओं से छीन लिया। ई.1186 में उसने खसरू मलिक को परास्त करके लाहौर भी छीन लिया। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है। प्रबन्ध कोष का लेखक बीस बार गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है। सुर्जन चरित्र में 21 बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में 23 बार गौरी का हारना अंकित है।

    तराइन की विजय

    ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा का दुर्ग हिन्दुओं से छीन लिया। उस समय यह दुर्ग चौहानों के अधीन था। पृथ्वीराज उस समय तो चुप बैठा रहा किन्तु ई.1191 में जब मुहम्मद गोरी, तबरहिंद (सरहिंद) जीतने के बाद आगे बढ़ा तो पृथ्वीराज ने करनाल जिले के तराइन के मैदान में उसका रास्ता रोका। यह लड़ाई इतिहास में तराइन की प्रथम लड़ाई के नाम से जानी जाती है। युद्ध के मैदान में गौरी का सामना दिल्ली के राजा गोविंदराय से हुआ। गौरी ने गोविंदराय पर भाला फैंक कर मारा जिससे गोविंदराय के दो दांत बाहर निकल गये। गोविंदराय ने भी प्रत्युत्तर में अपना भाला गौरी पर देकर मारा। इस वार से गौरी बुरी तरह घायल हो गया और उसके प्राणों पर संकट आ खड़ा हुआ। यह देखकर गौरी के आदमी उसे मैदान से ले भागे। बची हुई फौज में भगदड़ मच गई। मुहम्मद गौरी लाहौर पहुँचा तथा अपने घावों का उपचार करके गजनी लौट गया। पृथ्वीराज ने आगे बढ़कर तबरहिंद का दुर्ग गौरी के सेनापति काजी जियाउद्दीन से छीन लिया। काजी को बंदी बनाकर अजमेर लाया गया जहाँ उससे विपुल धन लेकर उसे गजनी लौट जाने की अनुमति दे दी गई।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 38

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 38

    जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    16 जुलाई 1947 को वी. पी. मेनन ने इंगलैण्ड में भारत उपसचिव सर पैट्रिक को एक तार दिया कि वायसराय ने मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर के प्रतिनिधियों से भारत में विलय के विषय में बातचीत की। उन सबकी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। 2 अगस्त 1947 को मेनन ने पैट्रिक को सूचित किया कि भारत के लगभग समस्त राजा अपने राज्यों का भारतीय संघ में विलय करने के लिए तैयार हो गये हैं। केवल हैदराबाद, भोपाल और इंदौर हिचकिचा रहे हैं। वायसराय ने देशी नरेशों से बात की है और इन राज्यों के नरेशों ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने पर सहमति दर्शायी है- ग्वालियर, पटियाला, कोटा, जोधपुर, जयपुर, रामपुर, नवानगर, झालावाड़, पन्ना, टेहरी गढ़वाल, फरीदकोट, सांगली, सीतामऊ, पालीताना, फाल्टन, खैरागढ़, सांदूर।

    यद्यपि जोधपुर राज्य 28 अप्रेल 1947 से संविधान सभा में भाग ले रहा था तथा जोधपुर के युवा महाराजा हनवंतसिंह दो बार भारत में मिलने की घोषणा कर चुके थे किंतु वे देश को स्वतंत्रता मिलने से ठीक 10 दिन पहले पाकिस्तान का निर्माण करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उनका साथ देने वाले नवाब भोपाल एवं धौलपुर के महाराजराणा के चक्कर में आ गये। जब राजपूताना के राज्यों का स्वतंत्र समूह गठित करने की योजना विफल हो गयी तो राजनीतिक विभाग के पाकिस्तान-परस्त सदस्यों ने राजपूताना के राज्यों को सलाह दी कि वे पाकिस्तान में मिल जायें क्योंकि भारत पाकिस्तान की सीमा पर स्थित होने के कारण कानूनन वे ऐसा कर सकते थे। इनमें से जोधपुर राज्य एक था। महाराजा हनवंतसिंह कांग्रेस से घृणा करते थे तथा जोधपुर की रियासत पाकिस्तान से लगी हुई थी। इसलिए हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट करने की सोची।

    जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं की जोधपुर नरेश से कई बार भेंट हुई थी और अंतिम भेंट में वे जैसलमेर के महाराजकुमार को भी साथ ले गये थे। बीकानेर नरेश ने उनके साथ जाने से मना कर दिया था और हनवंतसिंह जिन्ना के पास अकेले जाने में हिचकिचा रहे थे। उन लोगों को देखकर जिन्ना की बांछें खिल गयीं। जिन्ना जानते थे कि अगर ये दोनों रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गयीं तो अन्य राजपूत रियासतें भी पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायेंगी। इससे पंजाब और बंगाल के बंटवारे की कमी भी पूरी हो जायेगी तथा समस्त प्रमुख रजवाड़ों को हड़पने की कांग्रेसी योजना भी विफल हो जायेगी। जिन्ना ने एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करके अपनी कलम के साथ जोधपुर नरेश को दे दिया और कहा कि आप इसमें जो भी शर्तें चाहें, भर सकते हैं। इसके बाद कुछ विचार विमर्श हुआ। इस पर हनवंतसिंह पाकिस्तान में मिलने को तैयार हो गये। फिर वे जैसलमेर के महाराजकुमार की ओर मुड़े और उनसे पूछा कि क्या वे भी हस्ताक्षर करेंगे?

    महाराजकुमार ने कहा कि वे एक शर्त पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं कि यदि कभी हिंदू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ तो जिन्ना हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों का पक्ष नहीं लंेगे। यह एक बम के फटने जैसा था जिसने महाराजा हनवंतसिंह को अचंभे में डाल दिया। जिन्ना ने हनवंतसिंह पर बहुत दबाव डाला कि वे दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दें। जब महाराजकुमार जैसलमेर ने पाकिस्तान में विलय से मना कर दिया तो महाराजा डांवाडोल हो गये। इस अवसर का लाभ उठाकर महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने महाराजा को सलाह दी कि वे अंतिम निर्णय लेने से पहले अपनी माताजी से भी सलाह ले लें। महाराजा को यह बहाना मिल गया और उन्होंने यह कह कर जिन्ना से विदा ली कि वे इस विषय में सोच समझ कर अपने निर्णय से एक-दो दिन में अवगत करायेंगे। कर्नल केसरीसिंह ने जोधपुर लौटकर प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को तथ्यों से अवगत करवाया।

    षड़यंत्र की गंभीरता को देखकर वेंकटाचार ने 6 अगस्त 1947 को बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर के पास पत्र भिजवाया। पत्र में लिखा था कि भोपाल नवाब महाराजा जोधपुर को जिन्ना से मिलाने ले गये थे। जिन्ना ने पेशकश की थी कि वे जोधपुर को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देकर संधि करने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी पेशकश की कि जोधपुर राज्य को जो हथियार चाहिये वे पाकिस्तान के बंदरगाह से बिना 'सीमांत-कर' दिए, लाये जा सकते हैं। जिन्ना ने महाराजा जोधपुर को राजस्थान का सर्वेसर्वा बनाने की पेशकश की जिससे जोधपुर महाराजा चकित रह गये और उनके मन में इच्छा जागी कि वे राजस्थान के सम्राट बन जायेंगे। महाराजा के सेक्रेटरी कर्नल केसरीसिंह जिन्ना के निवास पर महाराजा के साथ गये थे किंतु उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। अतः उन्हें पूरी शर्तों के बारे में पता नहीं था।

    जब महाराजा दूसरे दिन भोपाल नवाब के साथ जिन्ना से मिलने गये तो संधि का प्रारूप हस्ताक्षरों के लिए तैयार था। उस समय महाराजा ने केसरीसिंह से कहा कि मैं संधि पर हस्ताक्षर करके राजस्थान का बादशाह हो जाउंगा। केसरीसिंह ने उन्हें समझाया कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये और ऐसा करने से पहले अपनी माता व अन्य सम्बन्धियों से विचार विमर्श करना चाहिये। इस पर महाराजा ने यह आश्वासन देकर जिन्ना से विदा ली कि वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों से सलाह करके 8 अगस्त को संधि पर हस्ताक्षर करेंगे। केसरीसिंह ने भी इस आश्वासन को दोहराया। जोधपुर लौटकर हनवंतसिंह ने सरदार समंद पैलेस में राज्य के जागीरदारों की एक बैठक बुलायी तथा उनकी राय जाननी चाही। दामली ठाकुर के अतिरिक्त और कोई जागीरदार भारत सरकार से संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हुआ। महाराजा तीन दिन जोधपुर में रहे। पाकिस्तान में मिलने के प्रश्न पर जोधपुर के वातावरण में काफी क्षोभ था। जब हनवंतसिंह तीन दिन बाद दिल्ली लौटे तो मेनन को बताया गया कि यदि मेनन ने महाराजा को शीघ्र नहीं संभाला तो वे पाकिस्तान में मिल सकते हैं। मेनन ने माउंटबेटन से निवेदन किया कि वे जोधपुर महाराजा को भारत में सम्मिलित होने के लिए सहमत करें।

    मेनन इंपीरियल होटल गये और महाराजा से कहा कि लॉर्ड माउंटबेटन उनसे बातचीत करना चाहते हैं। मेनन तथा हनवंतसिंह कार में वायसराय भवन गये। वायसराय ने अपने आकर्षक व्यक्त्त्वि एवं दृढ़ निश्चय से महाराजा से इस प्रकार बात की जैसे कोई अध्यापक अपने अनुशासनहीन छात्र को समझाता है। उन्होंने महाराजा से कहा कि उन्हें अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का पूरा अधिकार है किंतु उन्हें इसके परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये। वे स्वयं हिन्दू हैं एवं उनकी अधिकांश प्रजा हिन्दू है। महाराजा का यह कदम इस सिद्धांत के विरुद्ध होगा कि भारत के टुकड़े केवल दो भागों में होंगे जिनमें से एक मुस्लिम देश होगा और दूसरा गैर मुस्लिम देश। उनके पाकिस्तान में विलय से जोधपुर में सांप्रदायिक दंगे होंगे। कांग्रेस के भी आंदोलन करने की संभावना है। महाराजा ने माउंटबेटन को बताया कि जिन्ना ने खाली कागज पर अपनी शर्तें लिखने के लिए कहा है जिन पर जिन्ना हस्ताक्षर कर देंगे। इस पर मेनन ने कहा कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ किंतु उससे महाराजा को ठीक उसी तरह कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जिस तरह जिन्ना के हस्ताक्षरों के बावजूद महाराजा को पाकिस्तान से कुछ नहीं मिलेगा। इस पर माउंटबेटन ने मेनन से कहा कि मेनन भी जिन्ना की तरह महाराजा को कुछ विशेष रियायतें दें।

    महाराजा ने अपने राज्य का विलय भारत में करने की बात मान ली और प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। महाराजा तथा मेनन के बीच कुछ विशेषाधिकारों पर सहमति हुई जिन्हें लिखित रूप में आ जाने पर मेनन स्वयं जोधपुर लेकर गये। 8 अगस्त 1947 को माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को भेजे गये प्रतिवेदन में कहा गया कि जोधपुर के प्रधानमंत्री वेंकटाचार ने सूचित किया है कि- 'जोधपुर के युवक महाराजा ने दिल्ली में वायसराय के साथ दोपहर का खाना खाने के पश्चात् यह कहा था कि वे भारतीय संघ में मिलना चाहते हैं परंतु इसके तुरंत बाद ही धौलपुर महाराजा ने जोधपुर महाराजा को दबाया कि वे भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं हों। जोधपुर महाराजा को जिन्ना के पास ले जाया गया और नवाब भोपाल तथा उनके वैधानिक सलाहकार जफरुल्ला खाँ की उपस्थिति में जिन्ना ने यह पेशकश की कि यदि महाराजा 15 अगस्त को अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दें तो उन्हें ये रियायतें दी जायेंगी- (1)कराची के बंदरगाह की समस्त सुविधाएं जोधपुर राज्य को दी जायेंगी। (2) जोधपुर राज्य को शस्त्रों का आयात करने दिया जायेगा। (3) जोधपुर-हैदराबाद (सिंध) रेलवे पर जोधपुर का अधिकार होगा। (4) जोधपुर राज्य के अकाल ग्रस्त जिलों के लिए पूरा अनाज उपलब्ध करवाया जायेगा। ....... महाराजा अब भी यह सोचते हैं कि जिन्ना द्वारा की गयी पेशकश सर्वोत्तम है और उन्होंने भोपाल नवाब को तार द्वारा सूचित किया है कि उनकी स्थिति अनिश्चित है और वे उनसे 11 अगस्त को मिलेंगे। 7 अगस्त को हनवंतसिंह बड़ौदा गये जहाँ उन्होंने महाराजा गायकवाड़ को समझाया कि प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। भोपाल नवाब भी प्रयास कर रहे हैं कि जोधपुर, कच्छ व उदयपुर के नरेश भी प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। मैंने (माउण्टबेटन ने) जोधपुर के महाराजा को इस विषय पर तार भेजा है कि वे शीघ्रातिशीघ्र आकर मुझसे मिलें। मुझे सबसे अधिक दुःख इस बात का है कि भोपाल नवाब मेरे मुँह पर तो मित्र की भांति व्यवहार करते हैं परंतु पीठ पीछे मेरी योजना को विफल करने का षड़यंत्र करते हैं। मैं उनकी चालाकियों के विषय में उनके दिल्ली आने पर स्पष्ट बात करूंगा।'

    11 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने देशी राज्यों के नरेशों से वार्तालाप किया तथा नवाब भोपाल से उस सूचना पर स्पष्टीकरण मांगा जो सरदार पटेल को प्राप्त हुई थी, जिसके अनुसार नवाब ने जोधपुर महाराजा पर दबाव डाला था कि वे उनके साथ चलकर जिन्ना से मिलें।

    भोपाल नवाब ने अपने उत्तर में वायसराय को सूचित किया- '6 अगस्त को महाराजा धौलपुर व दो अन्य राजाओं ने मुझे सूचना दी कि महाराजा जोधपुर मुझसे (भोपाल नवाब से) मिलना चाहते हैं। मैंने (नवाब ने) उन्हें उत्तर दिया कि मुझे उनसे मिलकर प्रसन्नता होगी। जब महाराजा मेरे पास आये तो उन्होंने कहा कि वे जिन्ना से शीघ्र मिलकर उनकी शर्तों का ब्यौरा जानना चाहते हैं। जिन्ना दिल्ली छोड़कर हमेशा के लिए कराची जाने वाले थे। इस कारण अत्यंत व्यस्त थे। फिर भी मैंने महाराजा के लिए साक्षात्कार का समय ले लिया। हमें दोपहर बाद का समय दिया गया जिसकी सूचना महाराजा को भिजवा दी गयी। महाराजा मेरे निवास स्थान पर तीसरे पहर आये और हम दोनों जिन्ना से मिलने गये। महाराजा ने जिन्ना से पूछा कि जो राजा पाकिस्तान से सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं, उनको वे क्या रियायत देंगे? जिन्ना ने उत्तर दिया कि मैं पहले ही यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि हम राज्यों से संधि करेंगे और उन्हें अच्छी शर्तें देकर स्वतंत्र राज्य की मान्यता देंगे। फिर महाराजा ने बंदरगाह की सुविधा, रेलवे का अधिकार, अनाज तथा शस्त्रों के आयात के विषय में वार्त्ता की। वार्त्ता के दौरान इस बात की कोई चर्चा नहीं हुई कि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करें या न करें। मैं इस साक्षात्कार के बाद भोपाल लौट गया जहाँ मुझे महाराजा धौलपुर का टेलिफोन पर संदेश मिला कि महाराजा जोधपुर शनिवार (9 अगस्त) को दिल्ली लौट रहे हैं अतः मुझे (नवाब को) दिल्ली पहुँच जाना चाहिये। मैं शनिवार को दिल्ली पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे महाराजा का संदेश मिला कि मैं सीधे महाराजा जोधपुर के निवास स्थान पर पहुँचूं। वहाँ पहुँचने पर महाराजा धौलपुर ने कहा कि मुझे कुछ प्रतीक्षा और करनी पड़ेगी क्योंकि जोधपुर महाराजा वायसराय से मिलने गये हुए हैं और कुछ ही देर में लौटने वाले हैं परंतु महाराजा वायसराय के पास अधिक समय तक ठहर गये और हमारे पास आने का समय नहीं मिला। उन्होंने टेलिफोन द्वारा यह संदेश भिजवाया कि वे जोधपुर जा रहे हैं और संध्या को वापस लौटेंगे....शनिवार संध्या को महाराजा धौलपुर आये और कहा कि जोधपुर महाराजा अभी तक नहीं लौटे हैं, प्रतीत होता है कि वे रविवार सवेरे लौटेंगे। रविवार (10 अगस्त) को लगभग डेढ़ बजे मुझे धौलपुर नरेश का निमंत्रण मिला कि मैं उनके (धौलपुर नरेश के) साथ दोपहर के खाने पर सम्मिलित होऊं। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जोधपुर नरेश भी वहाँ थे। वे अपने गुरु को साथ लेकर आये थे। महाराजा ने मुझसे उनका परिचय करवाते हुए कहा कि ये मेरे दार्शनिक व मार्गदृष्टा हैं। जिन्ना से भेंट के बाद मैं उसी दिन जोधपुर महाराजा से मिला था। महाराजा ने कहा कि हम लोग उनके गुरु से बातचीत करें। धौलपुर व अन्य राजाओं ने गुरु से विस्तृत वार्तालाप किया जिसमें मैंने बहुत कम भाग लिया। जब मैं विदा लेने लगा तो महाराजा जोधपुर ने कहा कि वे सोमवार (11 अगस्त) को सवेरे मुझसे मिलने आयेंगे। अपने निश्चय के अनुसार वे सोमवार 10 बजे मुझसे मिलने आये तथा कहा कि उनके गुरु अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं परंतु स्वयं उन्होंने निर्णय कर लिया है कि वे भारतीय संघ में ही रहेंगे। मैने महाराजा से कहा कि आप अपने राज्य के मालिक हैं और कुछ भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।'

    वायसराय ने भोपाल नवाब द्वारा भेजे गये तथ्यों को सही माना है। ओंकारसिंह ने इस विवरण के आधार पर यह माना है कि जिन्ना और जोधपुर नरेश की भेंट के समय कर्नल केसरीसिंह महाराजा के साथ नहीं थे अन्यथा नवाब ने उनका उल्लेख अवश्य किया होता। ओंकारसिंह के अनुसार अवश्य ही केसरीसिंह ने यह मिथ्या भ्रम फैलाया था कि इस भेंट के दौरान केसरीसिंह भी उपस्थित थे और इसी भ्रम के कारण मानकेकर और पन्निकर आदि ने तथ्यों को विकृत कर दिया है। 16 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को अपना अंतिम प्रतिवेदन भेजा गया जिसके अनुच्छेद 41 में कहा गया- '8 अगस्त को मैंने महाराजा जोधपुर को बुलाया तो वे उसी रात्रि को विलम्ब से जोधपुर से दिल्ली पहँुचे और अगले दिन सेवेरे (9 अगस्त को) मुझसे मिले। महाराजा ने निःसंकोच स्वीकार किया कि वे जिन्ना से मिले थे और नवाब भोपाल का विवरण सही है। पटेल को जब जोधपुर महाराजा की चाल का पता चला तो वे महाराजा को मनाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हो गये। पटेल ने यह बात मान ली कि महाराजा जोधपुर राज्य में बिना किसी रुकावट के शस्त्रों का आयात कर सकेंगे। राज्य के अकालग्रस्त जिलों को पूरे खाद्यान्न की आपूर्ति की जायेगी और इस हेतु भारत के अन्य क्षेत्रों की अवहेलना की जायेगी। महाराजा द्वारा जोधपुर रेलवे की लाइन कच्छ राज्य के बंदरगाह तक मिलाने में कोई रुकावट नहीं की जायेगी। पटेल की इस स्वीकृति से महाराजा संतुष्ट हो गये और उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत के साथ रहेंगे।'

    ओंकारसिंह का मानना है कि महाराजा हनवंतसिंह न तो पाकिस्तान में मिलना चाहते थे और न ही राजस्थान के सम्राट बनना चाहते थे अपितु वे तो अपने राज्य के लिए अधिकतम सुविधायें प्राप्त करने के लिए सरदार पटेल पर दबाव बनाना चाहते थे।

    स्वतंत्रता सेनानी प्रवीण चंद्र छाबड़ा के अनुसार यदि सरदार पटेल ने जोधपुर महाराजा को गिरफ्तार करने की चेतावनी नहीं दी जोती तो इतिहास अन्य भी हो सकता था। गोकुल भाई भट्ट ने लिखा है- 'तब जोधपुर का मामला बहुत पेचीदा हो रहा था, क्योंकि जोधपुर के महाराजा की पाकिस्तान के साथ सांठ-गांठ हो रही थी। उनसे पत्र-व्यवहार भी हुआ था। समझौते का मसौदा भी तैयार हो गया था। वहाँ से कुछ एक्ट्रैस (अभिनेत्रियां) भी भेजी गई थीं। इस तरह से बहुत कुछ हुआ था।'

    सरदार पटेल ने जोधपुर महाराजा को दिल्ली बुलाया और कहा- 'क्या पाकिस्तान के साथ जाना है आपको? तो वे घबरा गए, कुछ जवाब नहीं दे पाए और सरदार ने जरा कड़ाई से कहा कि देखिए! अगर आपको जाना है तो आपको भेज दूँ, रियासत नहीं जाएगी। इस प्रकार कुछ डांट-डपट भी की गई। राजमाता ने जब यह सुना कि हनुवंतसिंह को इस तरह सरदार ने कहा है तो उन्होंने मुझसे (गोकुल भाई भट्ट से) कहा कि व्यक्तिगत रूप से गोकुल भाई आप ही ध्यान रखिए कि कोई ऐसी बात न हो। अपने को तो देश के साथ, भारत के साथ रहना है और मेरे लड़के ने कुछ भी किया हो या नहीं किया हो, उसे भूल जाना चाहिए। सरदार साहब उसके ऊपर इतना कुछ न करें। रूआंसी माँ ने भट्टजी से अनुरोध किया कि मेरे सिर पर हाथ रखिए और इसमें मदद करें, ये सब बातें तो हैं। आखिर जोधपुर महाराजा ने मान लिया और भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।'

    उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जोधपुर नरेश अवश्य ही भोपाल नवाब और महाराजराणा धौलपुर की चाल में फँस कर उन संभावनाओं का पता लगाने के लिए जिन्ना तक पहुँच गये थे कि उनका अधिक लाभ किसमें है, भारत संघ में मिलने में, पाकिस्तान में मिलने में अथवा इन दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर अलग अस्तित्व बनाये रखने में? गणेश प्रसाद बरनवाल ने लिखा है- 'जोधपुर और त्रावणकोर के हिन्दू राजाओं ने कुछ अलगाववादी चालाकियां करनी चाहीं किंतु पटेल की सजगता ने उन्हें पानी-पानी कर दिया।'

    सबसे पहले सुमनेश जोशी ने जोधपुर से प्रकाशित समाचार पत्र 'रियासती' में जोधपुर नरेश के पाकिस्तान में मिलने के इरादे का भण्डाफोड़ किया। 20 अगस्त 1947 के अंक में 'राजपूताने के जागीरदारों और नवाब भोपाल के मंसूबे पूरे नहीं हुए' शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जोधपुर राज्य के संघ प्रवेश से जो प्रसन्नता यहाँ के राजनैतिक क्षेत्र में हुई है उसके पीछे आश्चर्य भी है कि नये महाराजा ने बावजूद अपने तिलकोत्सव के भाषण के, संघ प्रवेश में क्यों हिचकिचाहट दिखायी?

    भोपाल नवाब ने हवाई जहाजों के जरिये 16 रियासतों के साथ सम्पर्क कायम करने का प्रयास किया। उन्होंने जोधपुर के मामले में इसलिए कामयाबी हासिल कर ली क्योंकि उनके चारों तरफ जागीरदार थे जो रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के पक्ष में थे। जैसा कि महाराजा साहब के ननिहाल ठिकाने के प्रेस से प्रकाशित क्षत्रिय वीर के एक लेख में इशारा था, पाकिस्तान जागीरी प्रथा के प्रति उदार है जबकि हिन्दुस्तान इस प्रथा को उठाना चाहता है। अतः पैलेस के जागीरदार स्वभावतः हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को ज्यादा पंसद करते हैं। इससे जोधपुर रियासत की काफी बदनामी हुई है। हिन्दुस्तान यूनियन से दूर रहने का जो षड़यंत्र किया गया था उसमें यह भी प्रचारित किया गया था कि सर स्टैफर्ड क्रिप्स हिन्दुस्तान आयेंगे तथा उनसे बातचीत करके रियासतों का सम्बन्ध सीधा इंगलैण्ड से करवा दिया जायेगा। इस नाम पर बहुत लोग बेवकूफ बनने वाले थे। अतः और लोगों को भी पाकिस्तान की तरफ से स्वतंत्र रहने का लोभ दिया गया। जोधपुर की अस्थायी हिच, इन समस्त बातों का सामूहिक परिणाम था। जाम साहब के पास भी भोपाल का संदेश गया था पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उदयपुर महाराजा के पास जोधपुर का संदेश गया जिसका महाराणा ने कड़ा उत्तर दिया। ऐसेम्बली लॉबी में भी जोधपुर का यूनियन में प्रवेश अत्यंत चर्चा का विषय है।


    रियासती विभाग के सचिव की कनपटी पर पिस्तौल

    जब 9 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन महाराजा हनवंतसिंह को लेकर वायसराय के पास गये तथा वायसराय के कहने पर मेनन ने महाराजा को विशेष रियायतें देने की बात मान ली तब वायसराय ने मेनन से कहा कि वे महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लें और वायसराय हैदराबाद के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने अंदर चले गये। वायसराय की अनुपस्थिति में महाराजा ने एक रिवॉल्वर निकाली और मेनन से कहा कि- 'यदि तुमने जोधपुर की जनता को भूखों मारा तो मैं तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा परंतु महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। मेनन के अनुसार हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देने के बाद माउंटबेटन दूसरे कमरे से चले गये और महाराजा ने अपना रिवॉल्वर निकालकर मेनन की तरफ करके कहा- 'मैं तुम्हारे संकेत पर नहीं नाचूंगा।'

    मेनन ने कहा कि- 'यदि आप सोचते हैं कि मुझे मारकर या मारने की धमकी देकर प्रविष्ठ संलेख को समाप्त कर सकते हैं तो यह आपकी गंभीर भूल है। बच्चों जैसा नाटक बंद कर दें। इतने में ही माउंटबेटन लौट आये। मेनन ने उन्हें पूरी बात बतायी। माउंटबेटन ने इस गंभीर बात को हलका करने का प्रयत्न किया और हँसी-मजाक करने लगे। जब तक जोधपुर नरेश की मनोदशा सामान्य हो गयी। मैं उन्हें छोड़ने के लिए उनके निवास तक गया।'

    ओंकारसिंह के अनुसार महाराजा के पास रिवॉल्वर नहीं, एक छोटा पैन-पिस्तौल था जिसे उन्होंने स्वयं ही बनाया था। इसी पैन-पिस्तौल से उन्होंने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किए थे। हस्ताक्षर करने के पश्चात् महाराजा ने मजाक में मेनन से कहा था कि मैंने जिस पैन से हस्ताक्षर किए हैं, उसी से तुम्हें भी मार सकता हूँ। मेनन भयभीत हो गये। इस पर महाराजा खूब हँसे। जब महाराजा ने पैन का एक हिस्सा खोलकर बताया कि वह पैन, पिस्तौल का भी काम कर सकता है तो मेनन भौंचक्के रह गये। उसी समय लॉर्ड माउंटबेटन कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने सारे प्रकरण को परिहास के रूप में लिया। महाराजा हनवंतसिंह ने ये तथ्य नवम्बर 1947 में ओंकारसिंह को बताये थे। महाराजा ने यह पैन-पिस्तौल लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। माउंटबेटन उसे लंदन ले गये तथा लंदन के मैजिक सर्कल के संग्रहालय में रखने हेतु भेंट कर दिया। यह पैन-पिस्तौल आज भी लंदन में सुरक्षित है। अंत में महाराजा को विलय पत्र पर हस्ताक्षकर करने पड़े।


    सोढ़ों का थारपारकर पाकिस्तान में चला गया

    सिंध में सोढ़ा हिन्दू राजपूतों का सदियों पुराना ऊमरकोट नामक राज्य था। मुगलों के भारत आगमन से पूर्व से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता होने तक ऊमरकोट क्षेत्र जोधपुर राज्य का भाग था और एक संधि के अंतर्गत भारत की आजादी से लगभग एक शताब्दी पूर्व ब्रिटिश सरकार को दिया गया था। जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह इसे फिर से प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहे थे किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। जब भारत विभाजन योजना स्वीकार कर ली गयी तो सिंध के सोढ़ा राजपूतों के एक शिष्टमंडल ने जोधपुर आकर महाराजा हनवंतसिंह से प्रार्थना की कि सिंध प्रांत के थारपारकर जिले को भारत व जोधपुर राज्य में मिलाने का प्रयत्न करें।

    हनवंतसिंह ने वायसराय को लिखा कि ऊमरकोट को फिर से जोधपुर राज्य को लौटाया जाये परंतु वायसराय ने यह कहकर इस विषय पर विचार करने से इन्कार कर दिया कि देश के विभाजन व स्वतंत्रता के दिन निकट हैं और सीमा के सारे विवाद रैडक्लिफ आयोग के विचाराधीन हैं अतः अब इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। सोढ़ा राजपूतों ने इस विषय पर एक पत्र केंद्र सरकार को लिखा और उसकी प्रतिलिपियां नेहरू को भी दीं कि उनकी भाषा व संस्कृति मारवाड़ राज्य की भाषा और संस्कृति से काफी मिलती है। उनके अधिकांश विवाह सम्बन्ध भी जोधपुर राज्य में होते रहे हैं। अतः उनके क्षेत्र को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सोढ़ों की इस मांग का समर्थन अखिल भारतीय हिन्दू धर्मसंघ ने भी किया। धर्मसंघ की मांग थी कि हिन्दू बहुलता के आधार पर सिंध प्रांत के दो टुकड़े कर दिए जायें एवं नवाबशाह, हैदराबाद, थारपारकर तथा कराची जिले के एक भाग को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सिंध की प्रांतीय कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया। सिंध प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष डा. चौइथराम गिडवाणी ने भारत सरकार से अपील की कि थारपारकर जिले में हिन्दुओं का स्पष्ट बहुमत है अतः उसे जोधपुर राज्य में मिलाना न्यायसंगत होगा। महाराजा हनवंतसिंह ने दिल्ली में अनेक नेताओं से बातचीत की किंतु इस विषय पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अतिरिक्त किसी अन्य नेता ने रुचि नहीं ली। मुखर्जी केंन्द्रीय मंत्रिमण्डल में अल्पमत में थे अतः उनके प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला और सोढ़ा हिन्दू जागीरदारों का सदियों पुराना थारपारकर राज्य सदैव के लिए पाकिस्तान में चला गया।


    जोधपुर राज्य में पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या

    पाकिस्तान से लगने वाली 325 किलोमीटर लम्बी सीमा पर दोनों तरफ के शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। 28 अगस्त 1947 को मारवाड़ जंक्शन में एस. के. मुखर्जी की अध्यक्षता में एक शरणार्थी शिविर खोला गया जिसमें 2 लाख शरणार्थियों के अस्थायी निवास, भोजन, आश्रय तथा चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिविर में कई महिलाओं ने बच्चों को भी जन्म दिया जिन्हें स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिशुओं के लिए दूध की व्यवस्था की गयी। बहुत सी संस्थाओं तथा दानी लोगों ने इस शिविर को धन, दवायें, कपड़े तथा भोजन प्रदान किया। बहुत से लोगों ने शिविर में उपस्थित होकर निशुल्क सेवायें प्रदान कीं। महाराजा जोधपुर के अतिरिक्त बी. डी. एण्ड सी. आई. रेलवे, श्री उम्मेद मिल्स पाली तथा सोजत रोड प्रजा मण्डल ने भी शिविर को महत्त्वपूर्ण सहायता उपलब्ध करवायी। सितम्बर 1947 में सिंध प्रांत के प्रधानमंत्री एम. ए. खुसरो ने अपने सलाहकार एवं सिंध के बड़े नेता मोहम्मद हसीम गजदर को इस आशय से जोधपुर भेजा कि वे जोधपुर के मुसलमानों को समझायें कि वे जोधपुर के सुशासित एवं शांतिपूर्ण राज्य को छोड़कर पाकिस्तान नहीं आयें।

    जोधपुर राज्य में आये हुए शरणार्थियों को सुविधायें देने के लिए मारवाड़ शरणार्थी एक्ट 1948 बनाया गया। इस एक्ट के तहत पंजीकृत शरणार्थियों को मारवाड़ राज्य में मारवाड़ियों के समान अधिकारों के आधार पर नौकरियां दी गयीं। जोधपुर राज्य में लगभग 46 हजार शरणार्थी पाकिस्तान से आये जिन्हें राज्य की ओर से मकान, भूखण्ड एवं कर्ज उपलब्ध करवाये गये। शरणार्थियों के लिए राज्य की ओर से विद्यालय तथा नारी-शालायें बनायी गयीं। सिंध से आने वाले अधिकांश शरणार्थी जोधपुर नगर में ही बस गये। उमरकोट में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों ने महाराजा जोधपुर से प्रार्थना की कि महाराजा इस क्षेत्र के पुष्करणा परिवारों को पाकिस्तान से निकालने की व्यवस्था करें क्योंकि इस क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए केवल उँट ही एकमात्र सवारी है तथा बड़े आकार वाले गरीब पुष्करणा ब्राह्मण परिवारों के लिए उँट की पीठ पर इतना लम्बा मार्ग पार करके निकल पाना संभव नहीं है। इन परिवारों ने स्वयं को मूलतः जोधपुर राज्य के शिव एवं पोकरण क्षेत्र की प्रजा बताते हुए महाराजा से रोजगार, काश्त हेतु भूमि एवं आवास की भी मांग की।

    मीरपुरखास के डिप्टी कलक्टर कार्यालय के हैडक्लर्क शामदास ताराचंद ने महाराजा को पत्र लिखकर मांग की कि इस क्षेत्र में पुष्करणा ब्राह्मणों के परिवारों से कुल 50 व्यक्ति राजकीय सेवा में हैं उन्हें जोधपुर राज्य की सेवा में नौकरी दी जाये। इनमें से 1 डिप्टी सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ पुलिस, 1 मैडिकल ऑफीसर, 1 नायब तहसीलदार एवं सैकेण्ड क्लास मजिस्ट्रेट, 1 सबइंसपेक्टर ऑफ पुलिस, 5 अंग्रेजी के अध्यापक, 15 हिन्दी के अध्यापक, 10 महिला अध्यापक, 4 कम्पाउण्डर, 5 पुलिस हैडकांस्टेबल तथा 5 राजस्व विभाग के लिपिक हैं। जोधपुर से हज यात्रा पर गये हुए कुछ मुस्लिम परिवारों ने 2 अक्टूबर 1947 को मक्का से महाराजा हनवंतसिंह को लिखा कि हम अपने परिवारों को खुदा के भरोसे पर जोधपुर में छोड़कर आये थे किंतु यहाँ हमें अपने बच्चों तथा परिवारों से लगातार सूचना मिल रही है कि जोधपुर राज्य में उनकी जान को खतरा है। यद्यपि हमें विश्वास है कि जोधपुर राज्य के हिन्दू, मुसलमानों से झगड़ा नहीं करेंगे किंतु जोधपुर राज्य में बाहर से आने वाले सिक्खों के दबाव में वे ऐसा कर सकते हैं। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उनके जीवन की रक्षा करें। इस पत्र की प्रति राजमाता को भी भेजी गयी।

    पाकिस्तानी नेता एच. एस. सुहरावर्दी ने 18 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा को पत्र लिखकर जोधपुर राज्य में सांप्रदायिक स्थितियों पर कड़ी आपत्ति जताई। उसने लिखा कि मुझे शिकायत प्राप्त हुई है कि अहमदाबाद-कराची के बीच यात्रा करने वाले मुस्लिम यात्रियों को लूनी एवं हैदराबाद-सिंध के बीच स्थित बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर लूटा जा रहा है जो कि आपके क्षेत्राधिकार में है। राजस्थान की रियासतों में शरणार्थियों की समस्याओं पर विचार करने के लिए 6 नवम्बर 1947 को भारत सरकार के गृह-मंत्रालय ने अलवर, भरतपुर, बीकानेर, जयपुर तथा जोधपुर राज्य के राजाओं की एक बैठक बुलाई। टाण्डो मुहम्मद खान से महाराज किशनचंद्र शर्मा ने 29 अक्टूबर 1947 को पत्र लिखकर जोधपुर महाराजा से मांग की कि सिंध-हैदराबाद जिले के टाण्डो डिवीजन में 5-6 गौशालायें हैं जिनमें 1000-1500 गायें हैं। चूंकि इस क्षेत्र के सम्पन्न परिवार मारवाड़ को पलायन कर गये हैं इसलिए इन गौशालाओं की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है तथा गायों की स्थिति करुणा जनक है। उनके लिए 20-25 गरीब ब्राह्मण परिवार ही शेष बचे हैं। अतः आप इम्पीरियल बैंक के माध्यम से गौशालाओं के लिए धन भिजवायें।

    सिंध से आये कई पुष्करणा ब्राह्मणों ने जो कि ज्योतिष का काम करते थे, हनवंतसिंह को अलग-अलग पत्र लिखकर अनुरोध किया कि हमें राजज्योतिषी नियुक्त किया जाये। इन पत्रों में इच्छा व्यक्त की गयी कि महाराजा हमसे आशीर्वाद लेने के लिए हमें बुलाये। जोधपुर महाराजा की फाइल में एक गुमनाम पत्र लगा हुआ है। यह पत्र महाराजा के निजी सचिव के कार्यालय में 18 नवम्बर 1947 को प्राप्त हुआ था। इस पत्र में किसी व्यक्ति ने महाराजा से शिकायत की है कि जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आ रहे हैं उन्हें रेलवे कर्मचारियों एवं कस्टम वालों द्वारा तंग किया जा रहा है और रिश्वत मांगी जा रही है। शरणार्थियों द्वारा लाये गये सामान की मात्रा अधिक बताकर उसका किराया मांगा जा रहा है तथा पैसा न होने पर सामान छीन लिया जाता है। उधर तो हिन्दुओं को पाकिस्तान ने लूट लिया और इधर हिन्दूओं को हिन्दू ही लूट रहे हैं। महाराजा अपने गुप्तचरों के माध्यम से पता लगवायें तथा शरणार्थियों की रक्षा करें। शरणार्थियों के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो रहा। कल की ही बात है कि जो मुसलमान हज करके लौटे हैं उनके पास बहुत सामान था किंतु न तो कस्टम वालों ने चैक किया और न रेलवे वालों ने सामान तोल कर देखा।

    ऐसे ही एक टंकित गुमनाम पत्र में महाराजा को शिकायत की गयी है कि सिंध से आये शरणार्थियों को राशन एवं आवास के स्थान पर लातें और मुक्के मिल रहे हैं जबकि पाकिस्तान पहुंचने वाले शरणार्थियों को पाकिस्तान में पूरा राशन, रोजगार और सुविधायें मिल रही हैं। जो हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भारत भाग आये हैं, पाकिस्तानी अधिकारी उन हिन्दुओं के घरों के ताले तोड़कर उन्हें उन मकानों में घुसा रहे हैं। इसके विपरीत जोधपुर राज्य के मकान मालिक हिन्दू शरणार्थियों से 10-15-20 गुना किराया मांग रहे हैं। 6 से 12 माह तक का किराया एक साथ लिया जा रहा है। शरणार्थियों को अपने आभूषण बेचने पड़ रहे हैं। शरणार्थियों के लिए अलग से कॉलोनी बनायी जाये।


    कर्मचारियों की समस्या

    देश के विभाजन के समय सांप्रदायिक समस्या उठ खड़ी होने से जोधपुर रेलवे के कुछ कर्मचारियों को अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान से निकल पाना कठिन हो गया। ऐसे 600 हिन्दू कर्मचारी जो सिंध प्रांत में नियुक्त थे, पाकिस्तान से निकलने में आई कठिनाई के कारण कुछ दिनों तक अपने काम पर नहीं आ सके। जब वे भारत लौटे तो रेलवे ने उन्हें काम पर नहीं लिया गया तथा 3 माह तक निलम्बित रखने के पश्चात सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया। इस पर जोधपुर के रेलवे स्टाफ ने 28 नवम्बर 1947 को प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भिजवाया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह ज्ञापन रेलवे मंत्रालय को भिजवा दिया। रेल मंत्रालय ने रियासती विभाग को सूचित किया कि वह इस प्रकरण में कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। रियासती मंत्रालय ने रेलवे मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश दे रखे थे कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर राज्यों से रेलवे मंत्रालय द्वारा सीधा पत्राचार नहीं किया जाना चाहिये। इसी प्रकार जोधपुर कर्मचारी संघ ने रियासती विभाग के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत कर मांग की कि इस कर्मचारी संघ को सरकार द्वारा मान्यता दी जानी चाहिये। कर्मचारियों के वेतन एवं भत्ते वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ाये जाने चाहिये। महंगाई भत्ता बढ़ाया जाना चाहिये। श्रमिकों के लिए पुस्तकालय एवं क्लब की सुविधा होनी चाहिये। श्रमिकों एवं उनके परिवारों के लिए निःशुल्क चिकित्सालय होना चाहिये। रियासती विभाग द्वारा इस प्रकरण को राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को आबू भिजवा दिया गया।


    जोधपुर रेलवे की सम्पत्ति की निकासी

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सिंध क्षेत्र ब्रिटिश-भारत की बम्बई प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था। ई.1900 में जोधपुर रेलवे ने 133.40 मील लम्बी रेल लाइन बालोतरा से पश्चिमी सीमा में ब्रिटिश राज्य की सीमा में बनायी थी। भारत सरकार ने 1 जनवरी 1929 को मीरपुर खास से जुडे़ खण्डों को सिंध लाइट रेल्वे कम्पनी लिमिटेड से खरीद कर जोधपुर रेलवे को प्रबंधन हेतु सौंप दिया। ई.1939 में जोधपुर रेलवे द्वारा खाडरू से नवाबशाह तक 30.72 मील लम्बा रेलमार्ग बिछाया गया। इसे 29 नवम्बर 1939 को आरंभ किया गया। 31 दिसम्बर 1942 को पुनः भारत सरकार ने सिंध लाइट रेलवे से मीरपुर खास से खाडरू तक का 49.50 मील लम्बा रेलमार्ग भी खरीद कर जोधपुर रेलवे को सौंप दिया जिससे जोधपुर रेलवे के ब्रिटिश खण्ड की लम्बाई 318.74 मील हो गयी। इस पथ पर रेल संचालन जोधपुर रेलवे द्वारा किया जाता था तथा सारा रॉलिंग स्टॉक जोधपुर रेलवे का था।

    जब सिंध क्षेत्र के पाकिस्तान में जाने के संकेत मिलने लगे तो उस समय जोधपुर रेलवे के मुख्य अभियंता सी. एल. कुमार ने सिंध क्षेत्र में स्थित रेलवे स्टेशनों एवं वहाँ कार्यरत निर्माण निरीक्षक एवं रेलपथ निरीक्षक कार्यालयों के भण्डारगृहों में पड़ी रेल-सम्पत्ति को जोधपुर में लाने का कार्य अत्यंत दक्षता एवं बुद्धिमत्ता से किया। यदि समय रहते यह कदम नहीं उठाया गया होता तो लाखों रुपये की रेल-सामग्री पाकिस्तान में रह गयी होती। जोधपुर रेलवे के रॉलिंग स्टॉक के हस्तांतरण की तिथि 31.7.1947 निश्चित की गयी थी किंतु पाकिस्तान सरकार ने इस तिथि से कुछ दिन पूर्व ही 6 इंजन, 75 कोच, 4 ऑफीसर्स कैरिज तथा 300 से अधिक वैगन बलपूर्वक रोक लिए। इसका मूल्य 17 लाख रुपये आंका गया। इससे जोधपुर एवं पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेल सेवा ठप्प हो गयी। जोधपुर सरकार ने पाकिस्तान सरकार से मांग की कि वह रोके गये रॉलिंग स्टॉक तथा पाकिस्तान में निकलने वाले जोधपुर राज्य के 50 लाख रुपये के राजस्व का भुगतान करे तथा अपना प्रतिनिधि जोधपुर भेजकर मामले का निस्तारण करे किंतु पाकिस्तान सरकार ने जोधपुर सरकार की कोई बात नहीं सुनी। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास ने पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त श्री प्रकाश से बात की। अंत में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से पाकिस्तान सरकार ने 50 लाख रुपये जोधपुर सरकार को देने तय किए।

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    गौरी का अंतिम आक्रमण

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    गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। उसने एक से एक खूनी दरिन्दा अपनी सेना में जमा किया। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गये तो ई.1192 में वह पुनः पृथ्वीराज से लड़ने के लिये अजमेर की ओर चल दिया। इस बीच उसने अपनी सहायता के लिये कन्नौज के राजा जयचंद को भी अपनी ओर मिला लिया। हर बिलास शारदा के अनुसार कन्नौज के राठौड़ों (मारवाड़ के राठौड़, कन्नौज के गहड़वालों के ही वंशज माने जाते हैं, इसलिये हर बिलास शारदा ने राठौड़ शब्द काम में लिया है।) तथा गुजरात के सोलंकियों ने एक साथ षड़यन्त्र करके पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये शहाबुद्दीन को आमंत्रित किया। गौरी को कन्नौज तथा जम्मू के राजाओं द्वारा सैन्य सहायता उपलब्ध करवाई गई।

    संधि का छलावा

    जब गौरी लाहौर पहुँचा तो उसने अपना दूत अजमेर भेजा तथा पृथ्वीराज से कहलवाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले और गौरी की अधीनता मान ले। पृथ्वीराज ने उसे प्रत्युत्तर भिजवाया कि वह गजनी लौट जाये अन्यथा उसकी भेंट युद्ध स्थल में होगी। मुहम्मद गोरी, पृथ्वीराज को छल से जीतना चाहता था। इसलिये उसने अपना दूत दुबारा अजमेर भेजकर कहलवाया कि वह युद्ध की अपेक्षा सन्धि को अच्छा मानता है इसलिये उसके सम्बन्ध में उसने एक दूत अपने भाई के पास गजनी भेजा है। ज्योंही उसे गजनी से आदेश प्राप्त हो जायेंगे, वह स्वदेश लौट जायेगा तथा पंजाब, मुल्तान एवं सरहिंद को लेकर संतुष्ट हो जायेगा।

    इस संधि वार्ता ने पृथ्वीराज को भुलावे में डाल दिया। वह थोड़ी सी सेना लेकर तराइन की ओर बढ़ा, बाकी सेना जो सेनापति स्कंद के साथ थी, वह उसके साथ न जा सकी। उसका दूसरा सेनाध्यक्ष उदयराज भी समय पर अजमेर से रवाना न हो सका। पृथ्वीराज का मंत्री सोमेश्वर जो युद्ध के पक्ष में न था तथा पृथ्वीराज के द्वारा दण्डित किया गया था, वह अजमेर से रवाना होकर शत्रु से जाकर मिल गया। जब पृथ्वीराज की सेना तराइन के मैदान में पहुँची तो संधि वार्ता के भ्रम में आनंद में मग्न हो गई तथा रात भर उत्सव मनाती रही। इसके विपरीत गौरी ने शत्रुओं को भ्रम में डाले रखने के लिये अपने शिविर में भी रात भर आग जलाये रखी और अपने सैनिकों को शत्रुदल के चारों ओर घेरा डालने के लिये रवाना कर दिया।

    ज्योंही प्रभात हुआ, राजपूत सैनिक शौचादि के लिये बिखर गये। ठीक इसी समय तुर्कों ने अजमेर की सेना पर आक्रमण कर दिया। चारों ओर भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज जो हाथी पर चढ़कर युद्ध में लड़ने चला था, अपने घोड़े पर बैठकर शत्रु दल से लड़ता हुआ मैदान से भाग निकला। वह सिरसा के आसपास गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया और मारा गया। गोविंदराय और अनेक सामंत वीर योद्धाओं की भांति लड़ते हुए काम आये।

    तराइन का मैदान

    मुहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान के बीच की दूसरी लड़ाई भी तराइन के मैदान में हुई। इतिहास में यह तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है। फरिश्ता निजामुद्दीन अहमद तथा लेनपूल आदि कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद गौरी एवं पृथ्वीराज चौहान के बीच ई.1191 एवं 1192 के युद्ध नारायण नाम स्थान पर लड़े गये जिसे तारावदी भी कहा जाता है। कतिपय आधुनिक इतिहासकारों (ईश्वरी प्रसाद ने मिडाइवल इण्डिया पृ. 133 पर पाद टिप्पणी दी है- अधिकतर इतिहास में इसे नाराइन लिखा गया है जो कि गलत है। गांव का नाम तराइन है। यह थाणेश्वर एवं करनाल के बीच स्थित है। संभवतः यह त्रुटि पर्शियन लिपि के कारण हुई है।) के अनुसार ये युद्ध तारावदी नामक स्थान पर लड़े गये जिसे तराइन भी कहा जाता है। समकालीन लेखक मिन्हाज उस सिराज द्वारा लिखित तबकात-इ-नासिरी में भी तराइन नाम दिया गया है। आधुनिक लेखक युद्ध स्थल का सही नाम इसी को मानते हैं। नारायन के स्थान पर तराइन अथवा तराइन के स्थान पर नारायन पाठ का यह अंतर पर्शियन लिपि की शिकस्ता ढंग की लेखनी के कारण हुआ है जिसमें पहले अक्षर के ऊपर कुछ बिंदुओं के अंतर के कारण तराइन का नाराइन अथवा नाराइन का तराइन हो जाता है।

    सम्राट की हत्या

    तराइन की पहली लड़ाई का अमर विजेता दिल्ली का राजा तोमर गोविन्दराज तथा चितौड़ का राजा समरसिंह भी तराइन की दूसरी लड़ाई में मारे गये। तुर्कों ने भागती हुई हिन्दू सेना का पीछा किया तथा उन्हें बिखेर दिया। पृथ्वीराज के अंत के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

    पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज का अंत गजनी में दिखाया गया है। इस विवरण के अनुसार पृथ्वीराज पकड़ लिया गया और गजनी ले जाया गया जहॉं उसकी आंखें फोड़ दी गईं। पृथ्वीराज का बाल सखा और दरबारी कवि चन्द बरदाई भी उसके साथ था। उसने पृथ्वीराज की मृत्यु निश्चित जानकर शत्रु के विनाश का कार्यक्रम बनाया। कवि चन्द बरदाई ने गौरी से निवेदन किया कि आंखें फूट जाने पर भी राजा पृथ्वीराज शब्द भेदी निशाना साध कर लक्ष्य वेध सकता है। इस मनोरंजक दृश्य को देखने के लिये गौरी ने एक विशाल आयोजन किया। एक ऊँचे मंच पर बैठकर उसने अंधे राजा पृथ्वीराज को लक्ष्य वेधने का संकेत दिया। जैसे ही गौरी के अनुचर ने लक्ष्य पर शब्द उत्पन्न किया, कवि चन्द बरदाई ने यह दोहा पढ़ा-


    चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण

    ता उपर सुल्तान है मत चूके चौहान।

    गौरी की स्थिति का आकलन करके पृथ्वीराज ने तीर छोड़ा जो गौरी के कण्ठ में जाकर लगा और उसी क्षण उसके प्राण पंखेरू उड़ गये। शत्रु का विनाश हुआ जानकर और उसके सैनिकों के हाथों में पड़कर अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चन्द बरदाई ने राजा पृथ्वीराज के पेट में अपनी कटार भौंक दी और अगले ही क्षण उसने वह कटार अपने पेट में भौंक ली। इस प्रकार दोनों अनन्य मित्र वीर लोक को गमन कर गये। उस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 26 वर्ष थी। इतिहासकारों ने चंद बरदाई के इस विवरण को सत्य नहीं माना है क्योंकि इस ग्रंथ के अतिरिक्त इस विवरण की और किसी समकालीन स्रोत से पुष्टि नहीं होती।

    हम्मीर महाकाव्य में पृथ्वीराज को कैद करना और अंत में उसको मरवा देने का उल्लेख है। विरुद्धविधिविध्वंस में पृथ्वीराज का युद्ध स्थल में काम आना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध का लेखक लिखता है कि विजयी शत्रु पृथ्वीराज को अजमेर ले आये और वहाँ उसे एक महल में बंदी के रूप में रखा गया। इसी महल के सामने मुहम्मद गौरी अपना दरबार लगाता था जिसको देखकर पृथ्वीराज को बड़ा दुःख होता था। एक दिन उसने मंत्री प्रतापसिंह से धनुष-बाण लाने को कहा ताकि वह अपने शत्रु का अंत कर दे। मंत्री प्रतापसिंह ने उसे धनुष-बाण लाकर दे दिये तथा उसकी सूचना गौरी को दे दी। पृथ्वीराज की परीक्षा लेने के लिये गौरी की मूर्ति एक स्थान पर रख दी गई जिसको पृथ्वीराज ने अपने बाण से तोड़ दिया। अंत में गौरी ने पृथ्वीराज को गड्ढे में फिंकवा दिया जहाँ पत्थरों की चोटों से उसका अंत कर दिया गया।

    दो समसामयिक लेखक यूफी तथा हसन निजामी पृथ्वीराज को कैद किया जाना तो लिखते हैं किंतु निजामी यह भी लिखता है कि जब बंदी पृथ्वीराज जो इस्लाम का शत्रु था, सुल्तान के विरुद्ध षड़यन्त्र करता हुआ पाया गया तो उसकी हत्या कर दी गई। मिनहाज उस सिराज उसके भागने पर पकड़ा जाना और फिर मरवाया जाना लिखता है। फरिश्ता भी इसी कथन का अनुमोदन करता है। अबुल फजल लिखता है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।

    उपरोक्त सारे विवरणों में से केवल यूफी और निजामी समसामयिक हैं, शेष लेखक बाद में हुए हैं किंतु यूफी और निजामी पृथ्वीराज के अंत के बारे में अधिक जानकारी नहीं देते। निजामी लिखता है कि पृथ्वीराज को कैद किया गया तथा किसी षड़यन्त्र में भाग लेने का दोषी पाये जाने पर मरवा दिया गया। यह विवरण पृथ्वीराज प्रबन्ध के विवरण से मेल खाता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वीराज को युद्ध क्षेत्र से पकड़कर अजमेर लाया गया तथा कुछ दिनों तक बंदी बनाकर रखने के बाद अजमेर में ही उसकी हत्या की गई।

    भारत के इतिहास का प्राचीन काल समाप्त

    ई.1192 में चौहान पृथ्वीराज (तृतीय) की मृत्यु के साथ ही भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर जाता है। इस समय भारत में दिल्ली, अजमेर तथा लाहौर प्रमुख राजनीतिक केन्द्र थे और ये तीनों ही मुहम्मद गौरी और उसके गवर्नरों के अधीन जा चुके थे।

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  • किशनगढ़ राजवंश की हिन्दी साहित्य को देन

     03.06.2020
    किशनगढ़ राजवंश की हिन्दी साहित्य को देन

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       राजस्थान के ठीक मध्य में किशनगढ़ नामक एक छोटी सी रियासत थी जिसने 1605 ई. के आसपास आकार लेना आरंभ किया और 1611 ई. में वह पूरी तरह से स्थापित हो गई। इस रियासत के लघुकाय होने का अनुमान केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि राजस्थान की सबसे बड़ी मारवाड़ रियासत का क्षेत्रफल 34,963 वर्गमील था जबकि किशनगढ़ रियासत का क्षेत्रफल केवल 858 वर्गमील था। इस प्रकार मारवाड़ रियासत में से किशनगढ़ जैसी 41 रियासतें बन सकती थीं। किशनगढ़ रियासत पर 1611 ई. से 1948 ई. तक की 337 वर्ष की अवधि में 19 राजाओं ने शासन किया। इनमें से कई शासक युद्ध के मोर्चे पर वीर गति को प्राप्त हुए। फिर भी इस राजवंश ने हिन्दी साहित्य को इतना विपुल एवं समृद्ध साहित्य प्रदान किया है कि हिन्दी साहित्य इस राजवंश का चिरकाल तक ऋणी रहेगा। इस आलेख में हम उनके योगदान की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

    हिन्दी साहित्य में वि.सं. 1375 (1318 ई.) से वि.सं. 1700 (1643 ई.) तक का काल भक्तिकालीन साहित्य का माना जाता है तथा वि.सं. 1700 (1643 ई.) से वि.सं. 1900 (1843 ई.) तक का काल रीतिकालीन साहित्य का माना जाता है। किशनगढ़ रियासत की स्थापना 1605 ई. से 1612 ई. के बीच हुई। इस समय हिन्दी साहित्य में भक्ति काल और रीति काल का संक्रांति काल था। उत्तर भारत में तुलसीदास जैसे भक्त भी उस युग का सर्वोत्कृष्ट भक्ति काव्य रच रहे थे तो केशव भी रीतिकालीन रचनाओं का सृजन कर रहे थे। उस समय के साहित्यिक परिवेश से प्रभावित होकर किशनगढ़ रियासत के शासकों ने भक्ति रस से परिपूर्ण श्रेष्ठ काव्य रचनाएं लिखीं तो रीति कालीन शृंगारिक रचनाओं का सृजन भी विपुल मात्रा में किया। चूंकि किशनगढ़ रियासत के शासकों ने महाप्रभु वल्लभाचार्य की शिष्य परम्परा को स्वीकार किया था तथा रियासत में सलेमाबाद में निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ स्थापित थी इसलिये स्वाभाविक ही था कि वे श्री राधा-कृष्ण को निमित्त बनाकर भक्ति रचनाओं का प्रतिपादन करते।

    किशनगढ़ रियासत के शासकों में साहित्य, कला एवं संगीत प्रेम की सुदीर्घ परम्परा रही। महाराजा किशनसिंह के पौत्र महाराजा रूपसिंह (1644-1658 ई.) ने वीरत्व और राजनैतिक कौशल के साथ-साथ भावुक हृदय भी पाया था। वह भगवान कृष्ण का अनन्य भक्त एवं उच्च कोटि का कवि था। उसका लिखा 750 दोहों का एक ग्रंथ रूपसतसई उपलब्ध हुआ है जो रीति-काल का श्रेष्ठ ‘भक्ति-ग्रंथ’ है। राजा रूपसिंह के पद बड़े भावपूर्ण और भक्तिरस की अविरल धारा प्रवाहित करने वाले हैं।

    रूपसिंह के पश्चात् उसका पुत्र मानसिंह किशनगढ़ का शासक हुआ। रूपसिंह तथा मानसिंह का समकालीन कवि वृंद मूलतः बीकानेर रियासत का निवासी था। उसका पिता बीकानेर राज्य से मेड़ता आकर रहने लगा। कवि वृंद, शाहजहां के समकालीन किशनगढ़ नरेश महाराजा रूपसिंह का दरबारी कवि था। उसके लिखे ग्रंथ बड़े प्रसिद्ध हैं। वृंद सतसई में उसने नीति का सुंदर विवेचन किया है। किशनगढ़ नरेश मानसिंह (1658-1706 ई.) कवि वृंद को आगरा से किशनगढ़ लाया। महाराजा मानसिंह स्वयं उत्कृष्ट साहित्यकार था उसने ‘‘संत सम्प्रदाय कल्पदु्रम’’ की रचना की जो पुष्टि मार्ग का प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। मानसिंह की बहिन चारूमती इतिहास में अपनी कृष्ण भक्ति के लिए प्रसिद्ध हो गई है। औरंगजेब उससे बलपूर्वक विवाह करना चाहता था किंतु चारुमती ने मेवाड़ नरेश राजसिंह को अपने पति के रूप में स्वीकार किया जो भगवान श्री कृष्ण का अनन्य भक्त था।

    महाराजा मानसिंह का पुत्र महाराजा राजसिंह (1706-1748 ई.) भी हिन्दी का अच्छा कवि था। गोस्वामी रणछोड़ उसका काव्य गुरु था। उसने ही महाराजा राजसिंह को गुरुमंत्र और उपदेश दिये। गोस्वामी रणछोड़ स्वयं भी चित्रकार तथा कवि था। वह कविवंृद का शिष्य था। राजसिंह कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी, संगीत प्रेमी और परम वीर था। राजसिंह द्वारा रचित 24 ग्रंथ उपलब्ध हैं। ये समस्त ग्रंथ वैष्णव मंदिरों मंे मनाये जाने वाले विविध उत्सवों से सम्बधित हैं। महाराजा राजसिंह द्वारा लिखित जन्मोत्सव के विष्णुपद, शरद पून्यो के विष्णु पद, रास के विष्णु पद, होली के विष्णु पद, फूलडोल के विष्णुपद, रथ यात्रा के विष्णु पद, राखी के विष्णु पद, चांदनी के कवित्त, अक्षय तृतीया के कवित्त, कीर्तन कवित्त, पंच कड़ी कवित्त, पवित्रा के कवित्त, राधाष्टमी के पद, बसंत के पद, दीप मालिका के पद, धमार के पद, रामनवमी के पद, वर्षा के पद, दानलीला के पद, खण्डिता के पद, ग्रीष्म ऋतु के पद, रुक्मणि हरण, हिंडोरा के पद, नृसिंह चतुर्दशी के पद आदि ग्रंथों में बृजभाषा की मधुरता तथा पदों की संगीतात्मकता अवलोकनीय है।

    हिन्दी साहित्य में वि.सं. 1700 (1643 ई.) से वि.सं. 1900 (1843 ई.) तक का काल रीतिकालीन साहित्य का माना जाता है। इस युग में वल्लभ सम्प्रदाय के कवियों में सात्विकता का स्थान शृंगार ने ले लिया था। भक्ति में भोग और विलास की प्रधानता हो गई। कृष्ण मंदिर, कृष्ण महल बन गये। राधा और कृष्ण के संयोग और वियोग के चित्र साधारण नायक और नायिकाओं के सांचे में ढालकर उतारे जाने लगे। सूरदास आदि ने कृष्ण भक्ति के जिस विशाल पादप को अपने हृदय की शुद्ध भक्ति के रस से सींचा था, अब इसे आधिकारी पात्रों द्वारा मलिन हृदय के कलुषित वासना जल से सींचा जाने लगा। कुछ तो विद्यापति इसकी राह पहले ही बना चुके थे और कुछ उस समय का वातावरण सामूहिक रूप से इस प्रकार का बन चुका था। पररकीया के उन्मुक्त प्रेम के चित्र उतारने की नैतिक अनुमति कामशास्त्रीय ग्रंथों तथा उज्जवल नीलमणि से मिल ही चुकी थी।

    राजसिंह कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी, संगीत प्रेमी और परम वीर था। उसके पुत्र सावंतसिंह की शिक्षा दीक्षा ऐसे ही अनुपम संस्कारों के बीच हुई थी। ऐसे साहित्यिक वातावरण में 1699 ई. में महाराजा सावंतसिंह का जन्म हुआ। वह नागरीदास के नाम से कवितायें लिखता था। उसने 1725 ई. में मनोरथ मंजरी तथा 1731 ई. में रसिक रत्नावली लिखी। 1748 ई. में वह राजा बना किंतु छोटे भाई के हाथों छले जाने के कारण राज्य से वंचित होकर वृंदावन में रहने लगा। वह 1764 ई. तक जीवित रहा। वह वल्लभाचार्य की पुष्टिमार्गी शाखा की शिष्य परम्परा में था इसलिये स्वाभाविक ही था कि उस पर तत्कालीन आध्यात्मिक एवं साहित्यिक परिवेश का प्रभाव होता। इसीलिये नागरीदास ने अपनी पासवान बनीठनी को राधारानी मानकर उसके रूप की उपासना की तथा नागरीदास के नाम से साहित्यिक रचनाएं कीं। उसकी बहुत सी रचनाएं भक्ति साहित्य के अंतर्गत रखी जाती हैं तो उनके रचे विपुल काव्य को हिन्दी साहित्य का श्रेष्ठ रीति काव्य भी कहा जा सकता है। भक्ति सम्बन्धी उसकी एक रचना इस प्रकार से है-

    बिनु हरि सरन सुख नहीं कहूँ।

    छाड़ि छाया कलपदु्रम जग धूप दुख क्यौं सहूँ

    कलिकाल कलह कलेस सरिता बृथा मा मधि बहूँ।

    दास नागर ठौर निर्भय कृष्ण चरननि रहूँ।

    सावंतसिंह (नागरीदास) ने छोटे-बड़े कुल 265 ग्रंथों की रचना की। उसके 75 ग्रंथों का संकलन नागर समुच्चय के नाम से संवत 1955 में प्रकाशित हुआ था। उसके लिखे प्रसिद्ध ग्रंथों में- रसिक लावनी, विहार चंद्रिका, निकुंज विलास, कवि वैराग्य वल्लरी, भक्ति सार, पारायण विधि प्रकाश, ब्रज सार, गोपी प्रेम प्रकाश, ब्रज बैकुण्ठ तुला, भक्ति मग दीपिका, पद प्रबोध माला, रामचरित माला, जुगल भक्ति विनोद, फाग बिहार, बाल विनोद, बन विनोद, तीर्थानंद, सुजानानंद, तन जन प्रसंग, छूटक पद तथा इश्क चमन सम्मिलित हैं। नागरीदास द्वारा लिखी गई पुस्तक इश्क चमन के उत्तर में मेवाड़ के महाराणा अरिसिंह ने ‘रसिक चमन’ नाम का हिन्दी उर्दू मिश्रित काव्य बनाया।

    नागरीदास रीति काव्य का उत्कृष्ट कवि, कुशल चित्रकार और संगीतज्ञ था। शृंगार और प्रेम उसके काव्य का प्राण है। ब्रज भाषा का माधुर्य, उसकी अनुप्रासिकता तथा गीतात्मकता देखते ही बनती है। उसने शृंगार के क्षेत्र में प्रेम तत्व के विविध विधानों को अत्यंत सरसता और मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है। अलंकार वैभव नायिका भेद चित्रण, नख शिख वर्णन सभी अनूठे बन पड़े हैं। दोहा चौपाई, कवित्त छंदों की प्रधानता है। पद विविध, राग रागिनियों में बंधे हुए हैं। कवि पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के प्रेम काव्यों की गहरी छाप है। नागरीदास का लिखा एक पद इस प्रकार से है-

    फूलनि को गई उत सखी मिली जहां तहां,

    इत कौं रंगीले कुछु औरे ढार में ढरे। रसिक रसाल बाल दयौ चाहे उर माल,

    जब नंद लाल हंसि आगै हाथ लैं करे।

    उरझी चितैं न कम्प स्वेद सुर रंग भये,

    नागरिया नागर अनंग रंग सौं भरे।

    राधे जू दयो है हार मोतिन को मोहन 
    कूं,

    मोहन जू हार होय राधे के गरे परे।

    भक्ति के क्षेत्र में नागरी दास ने दास्य, सख्य, आत्मविनोद, भावों का सुंदर निरूपण किया है। सावंतसिंह की पासवान बनीठनी ने भी कृष्ण भक्ति के पद लिखे जो नागर समुच्चय में समाविष्ट हैं। सांवतसिंह की विमाता महारानी बांकावती ने ब्रजदासी के नाम से श्रीमद्भागवत का ब्रज भाषा में पद्यानुवाद किया जो ब्रजदासी भागवत के नाम से प्रसिद्ध है।

    महारानी बांकावती की पुत्री सुुंदर कुंवरी श्रेष्ठ कवि एवं संगीतकार थी। उसका विवाह 31 साल की आयु में हुआ, उसने 15 वर्ष की आयु से काव्य सृजन आरंभ किया। उसने अपने पदों को संगीत की तकनीक के आधार पर बहुत श्रेष्ठ विधि से व्यवस्थित किया। उसने नेहनिधि, वृंदावन गोपी महात्म्य, संकेत-युगल, रंघर गोपी महात्म्य, रसपुंज, प्रेम सम्पुट, सुर संग्रह, भाव प्रकाश, मित्र शिक्षा, युगल ध्यान तथा राम रहस्य नामक ग्रंथों की रचना की और भक्ति गीत लिखे। सुंदर कुंवरी के साहित्य में कृष्ण की युगल भक्ति प्रकट हुई है। कृष्ण के बाल रूप का भी सुंदर कुंवरी ने बहुत सुंदर वर्णन किया है-

    रज मांहि मगन कैसो खेलत है।

    सुभग चिकुट तन धूरि धूसरित डेलिक किलक सकेलत है।

    चौंकि चकित चहुँ औरनि चितवत छिपि माटी मुख मेलत है।

    सुंदर कुंवरी घुटुरुवनि दौरत कोटिन छवि पग पेलत है।

    महाराजा सरदारसिंह की पुत्री छत्रकुंवरी ने 1788 ई. में प्रेम विनोद नामक प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ लिखा जो 
    शृंगार रस की महत्वपूर्ण रचना है। उसके लिखे एक पद में चौसर खेलने का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-

    बाढ़ी चित चाह दोऊ, खेलत उमाह भरे।

    दसा प्रेम पूर छिल अंग दरसत हैं।

    प्रेम दांव देत प्रिय झूंठे ही रुंगट कहै

    गहै पानि-पानि रिस मिसै परसत हैं।

    किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह ने ‘‘रावत प्रतापसिंघ ने मोहोकमसिंघ हरिसिंघोत देवगढ़ धणी री वार्ता’’ लिखी। इस पुस्तक में महाराजा ने प्रतापगढ़ रियासत के तीसरे नम्बर के राजकुमार मोहकमसिंह की वीरता की बड़ी प्रशंसा की। महाराजा बिड़दसिंह ने जयदेव कृत गीतगोविंद की टीका लिखी। वह फारसी और अरबी भाषाओं का ज्ञाता था। संस्कृत भाषा पर उसे असाधारण अधिकार प्राप्त था।

    किशनगढ़ राजवंश के साथ-साथ किशनगढ़ के जनसामान्य द्वारा भी हिन्दी साहित्य को अनुपम रचनाएं प्रदान की गईं। किशनगढ़ रियासत में निम्बार्क सम्प्रदाय का सर्वप्रथम प्रवर्तन करने वाले परशुराम देव का रचना काल वि. 1550 से 1600 तक का है। उनके द्वारा रचित ग्रंथों में परशुराम सागर सहित कुल 30 ग्रंथ मिलते हैं। उनका साहित्य कबीर, तुलसी, सूर और मीरा के समकक्ष रखा जा सकता है। उन्होंने दोहा, चौपाई, कवित्त, आदि छंदों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। इनकी भाषा मारवाड़ी और ब्रज मिश्रित है। इनके काव्य में राम-कृष्ण की समन्वयात्मक साधना प्रकट हुई है। गेय पदों में दास्य, सख्य, आत्म निवेदन आदि भक्ति भावों की सरस अभिव्यंजना हुई है तथा बड़े आकर्षक ढंग से नीति की शिक्षा देकर खण्डन मण्डन द्वारा सन्तोचित ढंग से सम्यक साधना तथा सरस सामाजिक जीवन की व्याख्या की गई है।

    वि.सं. 1754 से 1797 तक वृंदावन देव सलेमाबाद की निम्बार्काचार्य पीठ के आचार्य रहे। उन्होंने महाराजा राजसिंह, सावंतसिंह, महारानी बांकावती तथा राजकुमारी सुंदर कुंवरी को धार्मिक शिक्षा दी। वृंदावन देव का प्रसिद्ध ग्रंथ गीतामृत गंगा है जिसमें श्रीकृष्ण चरित्र गाया गया है। इसमें गोपी प्रेम की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की गई है। करणीदीन चारण, हरिचरन दास, टीला स्वामी, सुकवि वल्लभ, हीरा लाल सनाढ्य, विजयराम, राय कवि, कनीराम मुंशी, दौलतराम, दयालाल और दामोदर इत्यादि कवि और साहित्यकार भी किशनगढ़ रियासत के प्रमुख साहित्यकारों में से हैं। बहुत से जैन यतियों की रचनाएं भी मिलती हैं जो किशनगढ़ दुर्ग के सरस्वती भण्डार, चिंतामणि मंदिर, जैन उपाश्रयों और महावीर पुस्तकालय में संग्रहीत हैं।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 39

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 39

    बीकानेर रियासत का भारत में विलय


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    बीकानेर राज्य भारत के थारपारकर रेगिस्तान में स्थित एक पुरानी रियासत थी जो ई.1465 के आसपास अस्तित्व में आई थी। इसके शासक जोधपुर राज्य के राठौड़ वंश में से ही निकले थे। भारत की आजादी के समय सादुलसिंह बीकानेर का राजा था। संविधान सभा में प्रतिनिधि भेजने से लेकर भारत संघ में विलय की घोषणा के मामले में बीकानेर देश के समस्त देशी राज्यों में अग्रणी रहा किंतु महाराजा स्वतंत्र भारत में अपने अधिकारों को लेकर अत्यंत सतर्क था। 15 जुलाई 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने भारत के प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र लिखा जिसमें 110 पैरागा्रफ थे। महाराजा ने लिखा कि प्रजा परिषद वाले, राज्य में इस प्रकार का प्रचार कर रहे हैं कि निकट भविष्य में समस्त भारत में गांधी-राज हो जायेगा और भारतीय राज्य भी उन में मिला लिए जायेंगे। तिरंगा ही एकमात्र झण्डा होगा। जबकि वास्तविकता तो यह है कि न तो गांधीजी के ऐसे विचार हैं और न ही भारतीय राज्य भारत में अपने अस्तित्व को सम्मिलित करने जा रहे हैं। इस पत्र से यह आभास होता है कि बीकानेर नरेश भले ही जोर-शोर से भारत संघ में मिलने की घोषणा कर रहे था किंतु वह यह आश्वासन भी चाहता था कि स्वतंत्र भारत में उसकी रियासत पूरी तरह स्वतंत्र बनी रहेगी।


    फिरोजपुर वाटर हैड वर्क्स का मामला

    ब्रिटिश सरकार की घोषणा के अनुसार भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित किए जाने वाले क्षेत्रों का निर्णय हिन्दू अथवा मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर होना था। इस आधार पर पाकिस्तान ने पंजाब के फिरोजपुर स्थित 'वाटर हैड वर्क्स' पर भी अपना दावा जताया। इस नहर से बीकानेर राज्य की एक हजार वर्ग मील से अधिक भूमि सिंचित होती थी। महाराजा सादूलसिंह ने बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्निकर, जस्टिस टेकचंद बक्षी और मुख्य अभियंता कंवरसेन को बीकानेर राज्य का पक्ष रखने के लिए नियुक्त किया। पन्निकर ने रियासती विभाग के मंत्री तथा विभाजन हेतु गठित उच्चस्तरीय परिषद के सदस्य सरदार पटेल पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वे सुनिश्चत कर लें कि फिरोजपुर हैड वर्क्स पूर्णतः भारत सरकार द्वारा नियंत्रित रहेगा। महाराजा ने माउंटबेटन तथा पटेल को संदेश भिजवाया कि यदि फिरोजपुर हैड वर्क्स और गंगनहर का एक भाग पाकिस्तान में जाता है तो हमारे लिए पाकिस्तान में सम्मिलित होने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। अंग्रेजों ने उनकी समस्या को समझा तथा उन्हें आश्वासन दिया कि फिरोजपुर हैडवर्क्स भारत में ही रहेगा। 17 अगस्त 1947 को जब रेडक्लिफ रिपोर्ट प्रकाशित हुई तब उसमें फिरोजपुर हैड वर्क्स को भारत में बने रहने का निर्णय हुआ।

    6 अगस्त 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। यथास्थिति समझौता पत्र पर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्न्किर द्वारा हस्ताक्षर किए गये। रियासती विभाग ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वायसराय और सरदार पटेल ने महाराजा द्वारा निर्वहन की गयी भूमिका के प्रति आभार व्यक्त किया है। संक्षिप्त अवधि में ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करके महाराजा ने भारत तथा राज्यों के समान हित के लिए त्याग किया है। वायसराय तथा सरदार पटेल ने आशा व्यक्त की है कि इस विलय पत्र के माध्यम से प्रस्तुत उदाहरण से, आने वाले समय में भारत तथा राज्यों के मध्य सहयोग का एक नया युग आरंभ होगा जो संपूर्ण देश को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से मजबूत बनायेगा। इस प्रविष्ठ संलेख के द्वारा महाराजा ने रक्षा, संचार और विदेश मामलों पर अपनी सारी सत्ता केंद्र सरकार को सौंप दी और शेष विषयों में महाराजा ने अपने आप को स्वतंत्र मान लिया। अधिकांश रियासतों ने भवितव्य के आगे सिर झुका कर प्रविष्ठ संलेख पर दस्तखत कर दिए। इनमें सबसे पहला बीकानेर का महाराजा था, जो वायसराय का पुराना दोस्त था। बड़े नाटकीय अंदाज में उसने हस्ताक्षर किए।

    15 अगस्त 1947 को महाराजा ने एक भाषण में कहा- 'ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के साथ भारतीय रियासतों को यह छूट थी कि वे अलग रहें और नये राष्ट्र के साथ सम्बन्धित होने से मना कर दें। कानूनी दृष्टि से आज हम समस्त स्वतंत्र हो सकते हैं क्योंकि हमने ब्रिटिश साम्राज्य को आधिपत्य का जो अधिकार सौंपा था, वह भारतीय स्वतंत्रता कानून के अंतर्गत हमें वापिस मिल गया। हम अलग रह सकते थे और भारतीय राष्ट्र में विलय नहीं करते। एक क्षण के विचार से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि इसका परिणाम कितना विनाशकारी होता। शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात आ गयी थी कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जायेगा। इसके परिणाम का पूर्व ज्ञान रखते हुए मैंने बिना हिचकिचाहट के भारत के उन तत्वों के साथ सहयोग करने का निश्चय किया जो एक मजबूत केन्द्रीय सरकार की स्थापना के लिए कार्य कर रहे थे।'

    सरदार पटेल ने देशी राज्यों के भारत में विलय के पश्चात महाराजा सादूलसिंह का धन्यवाद करते हुए उन्हें लिखा कि- 'राजाओं को गलत राह पर ले जाने के लिए जान-बूझकर जो संदेह और भ्रम उत्पन्न किए गये उन्हें मिटाने में महाराजा ने जो कष्ट किया, उससे मैं भलीभांति परिचित हूँ। महाराजा का नेतृत्व निश्चय ही समयानुकूल और प्रभावशाली रहा है।'

    स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ माह बाद जनवरी 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन बीकानेर राज्य के दौरे पर आये। उन्होंने अपने भाषण में सादूलसिंह की प्रशंसा करते हुए कहा- 'महाराजा प्रथम शासक थे जिन्होंने भारत का नया संविधान बनाने में मदद देने के लिए संविधान निर्मात्री सभा में प्रतिनिधि भेजकर यह अनुभव कर लिया कि भविष्य में राजा लोगों को क्या करना है। महाराजा पहले शासक थे जिन्होंने रियासतों के अपने पास के संघ में सम्मिलित होने के मेरे प्रस्तावों का समर्थन किया।'

    2 सितम्बर 1954 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने बीकानेर में महाराजा सादूलसिंह की मूर्ति का अनावरण करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा की- 'जब एक ओर भारत के बंटवारे की विपत्ति आ रही थी और दूसरी ओर भारतवर्ष के टुकड़े किए जाने के लिए द्वार खोला जा रहा था, उन्होंने जवांमर्दी, देशप्रेम तथा दूरदर्शिता से अपने आप को खड़ा करके उस दरवाजे का मुँह बंद कर दिया।'


    बीकानेर राज्य में पाकिस्तान से शरणार्थियों का आगमन

    नव-निर्मित पाकिस्तान के साथ बीकानेर राज्य की लगभग 320 किलोमीटर लम्बी सीमा थी। बीकानेर द्वारा भारत संघ में सम्मिलित होने का निर्णय लेने पर इस सीमा को पार करके लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आये तथा भारत से पाकिस्तान गये। लगभग 7-8 लाख लोग भारत से निकाल कर सुरक्षित रूप से पाकिस्तान पहुंचाये गये। बीकानेर राज्य की सीमा पर बहावलपुर राज्य था जिसमें 1.90 लाख हिन्दू तथा 50 हजार सिक्ख रहते थे। बहावलपुर राज्य के हासिलपुर में 350 सिक्ख एवं हिन्दू मार डाले गये। इससे बहावलपुर राज्य के अन्य कस्बों एवं गाँवों में भगदड़ मच गयी। 15 अगस्त 1947 के बाद बीकानेर राज्य में लगभग 75 हजार शरणार्थी आये जिनके लिए शरणार्थी शिविरों की स्थापना की गयी। बहुत से लोगों को बीकानेर से 40 किलोमीटर दूर कोलायत भेजा गया। इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से राज्य की व्यवस्थायें गड़बड़ा गयीं।

    राज्य की ओर से शरणार्थियों के ठहरने व भोजन-पानी की व्यवस्था की गयी। कोलायत तथा सुजानगढ़ आदि कस्बों में शरणार्थियों को ठहराया गया। गंगानगर क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में शरणार्थी आये। इन शरणार्थियों पर पाकिस्तान में बहुत अत्याचार हुए थे इसलिए वे मुसलमानों से बदला लेने पर उतारू थे। उन्हें शांत रखने तथा मुसलमानों पर आक्रमण न करने देने के लिए राज्य की ओर से सेना लगायी गयी। सेना ने बहुत से मुसलमानों को बहावलपुर राज्य में सुरक्षित पहुंचाया। जब चूरू के महाजनों ने अपने मुसलमान नौकरों को नौकरी से निकाल दिया तो वे मुसलमान, महाराजा सादूलसिंह के पास बीकानेर आ गये। महाराजा ने विशेष रेलगाड़ी से नौकरों को वापस चूरू भिजवाया तथा महाजनों को कहकर उन्हें वापस नौकरी में रखवाया। जो लोग बीकानेर राज्य छोड़कर पाकिस्तान चले गये थे उन्हें महाराजा ने फिर से बीकानेर राज्य में आकर बसने का न्यौता दिया तथा जो हिंदू शरणार्थी पाकिस्तान से बीकानेर राज्य में आ गये थे उन्हें ब्रिटिश-भारत में भेजने के लिए महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया। पाकिस्तान से आये 50,746 शरणार्थियों को बीकानेर राज्य द्वारा 2,58,516 बीघा जमीन आवंटित की गयी। बहुत से सिक्ख पाकिस्तान के रहीमयार खान नामक जिले में घेर कर रोक लिए गये। बीकानेर राज्य के अधिकारियों ने बहावलपुर के राज्याधिकारियों से बात करके इन शरणार्थियों को निकलवाया।

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  • अजमेर का इतिहास - 13

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 13

    चौहान कालीन अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजयराज चौहान द्वारा बसाया गया अजमेर नगर निरंतर वृद्धि को प्राप्त करता हुआ तारागढ़ दुर्ग से बाहर के क्षेत्र में फैलता चला गया। छः सौ वर्षों में अजमेर नगर पर कई आक्रमण हुए किंतु नगर को कोई हानि नहीं पहुँच सकी। पृथ्वीराज चौहान के समय में अजमेर नगर तारागढ़ की पहाड़ी के नीचे पश्चिमी कौने में बसा हुआ था। यह नूरजहाँ के चश्मे (यह झरना अत्यंत प्राचीन काल से मौजूद था। जहाँगीर ने इसका नामकरण नूरजहाँ के नाम पर किया) और बाग (यह उद्यान सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जहाँगीर ने लगावाया था। इस उद्यान के जामुन उन्नीसवीं शताब्दी में भी अजमेर में प्रसिद्ध थे।) तक विस्तृत था। इस शहर का परकोटा और द्वार उन्नीसवीं शती में भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में विद्यमान थे। इस परकोटे का उत्तरी द्वार लक्ष्मी पोल कहलाता था जो तारागढ़ जाने वालों को रास्ते में दिखाई देता था। पृथ्वीराज के समय अजमेर में विख्यात जैन मंदिर मौजूद थे तथा तालाब बीसला (ई.1873 में मुराद अली ने इसे पाल बीचला लिखा है तथा इसे वीरान बताया है।) पर कुछ पुराने महल बने हुए थे जो जहाँगीर के समय तक मौजूद रहे।


    चौहान शासकों का धर्म

    शैव धर्म

    चौहान शासकों में शैव धर्म सर्वाधिक लोकप्रिय धर्म था। अनेक चौहान शासकों के इष्ट देवता शिव थे। हर्षनाथ की पहाड़ी का शिव मंदिर चौहानों के शैव होने का प्रमाण है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह शिव मंदिर न होकर हर्षनाथ भैरव का मंदिर है। दोनों ही स्थिति में चौहान शैव प्रमाणित होते हैं। विग्रहराज द्वारा रचित नाटक 'हरकेलि' में चौहान शासक विग्रहराज (चतुर्थ) ने शिव के मुख से गौरी के समक्ष कहलवाया है कि कवि विग्रहराज ने अपने 'हरकेलि' नाटक करने में मुझे इतना प्रसन्न कर दिया है कि मैं स्वयं इस नाटक को देखने जाउंगा। नाटक के अंत में भगवान शिव, काव्य जगत् में विग्रहराज की यशः पताका चिरकाल तक बने रहने का वरदान देते हैं तथा विग्रहराज को शाकंभरी पर राज्य करने के लिये पुनः अजमेर भेज देते हैं। इन पंक्तियों से भी चौहान शासकों की भगवान शिव के प्रति निष्ठा प्रकट होती है।

    सोमेश्वर तथा पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) के सिक्कों के पृष्ठ भाग में बैठा हुआ नंदी अंकित है जिसके पुट्ठे पर त्रिशूल अंकित है और लेख में आशावरी श्री सामन्तदेव अंकित है। इस सिक्के से भी चौहानों के शैव होने की पुष्टि होती है। नंदी तथा त्रिशूल तो शैव चिह्न हैं ही, साथ ही आशावरी से आशय चौहानों की इष्ट देवी आशापुरी से है जो कि महिषासुरमर्दिनी का अवतार है।

    वैष्णव धर्म

    चौहान साम्राज्य में वैष्णव धर्म भी अन्य धार्मिक सम्प्रदायों की तरह लोकप्रिय रहा। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर अजमेर से प्राप्त एक लेख जिसे डी. सी. सरकार ने सम्पादित किया है, उसमें विष्णु के कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध ओर कल्कि का स्पष्ट उल्लेख है। चौहान नरेश विष्णु भक्त थे। उनके राज्य में विष्णु भक्ति का ही अधिक प्रचार था। राजपूताना म्यूजियम अजमेर में शेषशायी विष्णु (8-11 वीं शताब्दी) और त्रिपुरुष प्रतिमा आज भी सुरक्षित है।

    हर्षनाथ (सांभर) से विष्णु की बैठी हुई और बाघरा (अजमेर) से विष्णु की कमलासन प्रतिमायें प्राप्त हो चुकी हैं। चौहान शासकों में से कुछ राजाओं ने भगवान विष्णु को अपना आराध्य देव बनाया था। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य से ज्ञात होता है कि चामुण्डराज (1040-65 ई.) ने नरवर में वैष्णव मंदिर का निर्माण करवाया। चौहान शासक अर्णोराज भी भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा रखता था। सोमेश्वर ने तो अपने राजकीय आवास में ही विष्णु का मंदिर स्थापित कर दिया था। पृथ्वीराज द्वितीय के सम्बन्ध में (1165-1169 ई.) अभिलेखिकीय प्रमाण से ज्ञात होता है कि उसने भगवान मुरारी की कृपा प्राप्त करने के लिये प्रार्थना की थी। मुरारी को विष्णु का स्वरूप माना जाता है। इसी प्रकार नाडौल के चौहान राजा रतनपाल भी विष्णु के भक्त थे। इसी वंश के शासक कीर्तिपाल ने विष्णु की उपासना श्रीधर के रूप में की थी। चौहान शासकों के राज्य में विष्णु की उपासना अपराजितेश के रूप में भी की जाती थी। अजयदेव के चांदी मिश्रित धातु तथा ताम्बे के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की मूर्त्ति उत्कीर्ण है जो उसके वैष्णव होने का प्रमाण है।


    चौहान कालीन शासन व्यवस्था चौहानों की शासन व्यवस्था

    में प्राचीन आर्य शासन पद्धति के अनुसार राजा ही सम्पूर्ण शक्तियों का केन्द्र बिंदु था। वह अपने अधिकारों का स्वयं उपभोग करता था। कोष पर उसके अधिकार सीमित थे। ज्येष्ठ पुत्र नैसर्गिक रूप से उसका उत्तराधिकारी होता था। राज्य के समस्त कर्मचारी राजा के प्रति उत्तरदायी होते थे। राजा स्वेच्छा से गद्दी नहीं छोड़ सकता था। धर्म ग्रंथों द्वारा परम्परागत रूप से राजा का कार्य निर्दिष्ट था। प्रशासन की सुविधा के लिये राज्यकार्य कई विभागों में विभक्त था। राजा की अपनी सम्पत्ति राजकीय भोग अथवा स्वभोग कहलाती थी। सम्पूर्ण राज्य, वर्तमान जिलों की भांति पुरों में विभक्त था। पुरपाल स्वयं सेनानायक होते थे। पुरपाल को सलाह देने के लिये एक समिति होती थी जिसमें बारिक अर्थात् बारी-बारी से चुने जाने वाले सदस्य होते थे। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी।

    इसका प्रशासन पंचकुल द्वारा चलाया जाता था। ग्राम सचिव को करण्कि कहते थे जो पंचकुल के कार्यों का लेखा जोखा रखता था। पंचकुल के कार्यालय को श्रीकरण कहते थे।


    अजमेर के चौहान साम्राज्य के प्रमुख शासनाधिकारी

    अजमेर का चौहान साम्राज्य, शासनाधिकारियों की एक सृदढ़ व्यवस्था पर खड़ा था। कम से कम चालीस प्रकार के अधिकारी एवं कर्मचारी राजकीय सेवाओं में थे। इनके पदनाम इस प्रकार से हैं-

    1. मुख्य अमात्य(मुख्यमंत्री), 2. विग्रहिकामात्य (विदेश मंत्री), 3. अक्षपटलिक (मुख्य सचिव), 4. दण्डनायक (प्रांत अधिकारी), 5. महाध्यक्ष पटलिक (वित्त एवं राजस्व मंत्री), 6. कोषाध्यक्ष, 7. श्रीकरण(केन्द्रीय सचिव), 8.सेनाधिपति (सेनापति), 9. भण्डागारिक (खाद्यमंत्री), 10. महामात्य (महासचिव), 11. महाव्यूहपति (प्रधान सेनापति), 12. पत्याध्यक्ष (पदाति सेना का अध्यक्ष), 13. महाअश्वपति (घुड़सेना का अध्यक्ष), 14. गोल्मिक (थानेदार), 15. दुःसाध्य (गुप्तचर प्रमुख), 16.चौराद्वरणिक(कारागृह अध्यक्ष), 17. महादण्डनायक (सेनापति), 18. भट्ट, भट्टपुत्र, सरपतिक, बनजारा, दारिका (ये सब छोटे कर्मचारी थे), 19. कोटपाल (दुर्ग अधिकारी), 20. पुरपाल (जिला शासक), 21. राजचिंतक (जिलाधीश), 22. प्रांत पालक (गवर्नर), 23. महासाहनी (अश्वशाला का अध्यक्ष), 24. करणिक (लिपिक), 25. भिषक (राजवैद्य), 26. प्रतिहार (द्वारपाल), 27. नैमित्तिक (राजज्योतिषी), 28. विषयपति, 29. दण्डपाषिक, 30. शौल्किक (कर अधिकारी), 31. तारिक (वनपाल), 32. आटविक (पशु शालाओं एवं गौशालाओं की देखरेख करने वाला बड़ा कर्मचारी), 33.चाट (छोटा कर्मचारी), 34. महाबलाधिकृत (सर्वोच्च पुलिस अधिकारी), 35. परिग्रहिक (कनिष्ठ अधिकारी), 36. महास्थान (मुख्यालय),37. राजस्थानीय (राजकीय अधिकारी), 38. तलार, 39. तलाररक्ष, 40. महंत, महंत पट्टलिक, गोष्ठी पंचकुल, चौकड़िया (विभिन्न प्रकार के ग्राम मुखियाओं को भिन्न-भिन्न नामों से बुलाते थे)।


    पृथ्वीराज के शासन में न्याय व्यवस्था

    पृथ्वीराज के शासन में न्याय व्यवस्था आर्यों की प्राचीन पद्धति पर आधारित थी। ग्राम स्तर पर समस्त निर्णय एक ग्राम सभा करती थी। जो कोई व्यक्ति इस ग्राम सभा के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता था, वह अपना प्रकरण लेकर क्षेत्रीय अधिकारी के समक्ष उपस्थित होता था। यदि वहाँ भी संतोषजनक निर्णय नहीं हो पाता था तो परिवादी अपना परिवाद लेकर सम्राट के समक्ष उपस्थित होता था। पृथ्वीराज के राज्य द्वार पर एक घण्टा लटका हुआ रहता था। परिवादी उसे बजाता था। राजा उस परिवादी को बुलाकर उसका परिवाद सुनता था तथा अपना निर्णय सुनाता था। जहाँगीर ने पृथ्वीराज चौहान की इसी घण्टा पद्धति का अनुकरण किया था। अपराधियों के लिये दण्ड की कड़ी व्यवस्था थी। उनके लिये कारावास बने हुए थे।


    चौहान कालीन अर्थव्यवस्था

    चौहान साम्राज्य के अंतर्गत ऊर्वर भूमि तथा जल, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। इस कारण प्रजा सम्पन्न, सुखी एवं संतुष्ट थी। उन पर करों का भार अधिक नहीं था। भूमिकर वसूलने में कठोरता नहीं की जाती थी। भूमि कर अनाज एवं धन, दोनों रूपों में लिया जाता था। राजकोष की आय का दूसरा सबसे बड़ा साधन वाणिज्य एवं व्यापार से मिलने वाला कर था। सांभर झील से उत्पन्न होने वाले नमक से भी राज्य को अच्छी आय होती थी। पशु मेलों का आयोजन होता था जिनसे कर मिलता था। अश्वपालकों से भी कर लिया जाता था। वनों एवं पर्वतों से भी आय होती थी। जनता को वनों से कुछ लकड़ी बिना कर चुकाये ही काटने की अनुमति थी। राजकोष का अधिकतर भाग सेना तथा सैन्य अभियानों पर व्यय होता था। राजा की ओर से दान किया जाता था। राज्य के बड़े अधिकारियों को सेवा के बदले में जागीर मिलती थी तथा छोटे कर्मचारियों को वेतन मिलता था। मंदिरों एवं धार्मिक व्यक्तियों के जीवन निर्वाह हेतु भूमि एवं गांव दिये जाते थे। उस काल में अजमेर में गुप्तों की सोने और चांदी की मुद्राएं अधिक प्रचलन में थीं। (गौरीशंकर ओझा को अजमेर से गुप्तकाल के 20 सिक्के सोने के तथा 5 सिक्के चांदी के प्राप्त हुए थे।)

    चौहान कालीन मुद्राएँ

    विक्रम संवत की सातवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक राजस्थान के प्राचीन हिन्दू राजवंशों में से कवले तीन ही वंशों के सोने, चांदी या ताम्बे के सिक्के प्राप्त हुए हैं। ये सिक्के मेवाड़ के गुहिल, कन्नौज के प्रतिहार और अजमेर के चौहानों के हैं। इनमें सोने का सिक्का केवल गुहिलवंशी बप्प (बापा रावल) का मिला है। चौहानों के सिक्कों में एक ओर नंदी तथा दूसरी तरफ हाथ में भाला लिये हुए सवार होता था और कभी एक ओर लक्ष्मी और दूसरी ओर केवल लेख रहता था।

    अजयदेव (द्वितीय) से पहले किसी भी चौहान शासक की मुद्रा प्राप्त नहीं होती। चौहानों का सबसे पहला सिक्का अजयदेव का मिला है जो बारहवीं शताब्दी का है। ये चांदी मिश्रित धातु तथा ताम्बे के बने हैं। ये दो प्रकार के हैं। पहले पर सीधी तरफ लक्ष्मी की मूर्त्ति है जो सुघड़ नहीं है। पृष्ठ भाग में श्री अजय देव लिखा है। राजा सोमेश्वर के ई.1171 के धौड़ लेख से ज्ञात होता है कि अजयदेव के चांदी के सिक्के सोमेश्वर के समय में भी प्रचलन में थे। अजयदेव के दूसरे सिक्के पर सीधी तरफ एक भद्दी आकृति है तथा दूसरी तरफ रानी श्री सोमल देवी अंकित है।

    अजयदेव के बाद सोमेश्वर के सिक्के मिलते हैं जो मिश्रित धातु के हैं। इनका भार 53 ग्राम है। इनमें सीधी तरफ दायें हाथ में भाला लिये हुए घुड़सवार की आकृति है तथा ऊपर श्री सोमेश्वर देव लिखा हुआ है। पृष्ठ भाग में बैठा हुआ नंदी अंकित है जिसके पुट्ठे पर त्रिशूल अंकित है और लेख में आशावरी श्री सामन्तदेव अंकित है। आशावरी से आशय चौहानों की इष्ट देवी आशापुरी से है। पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) ने भी अपने सिक्के जारी किये। ये सिक्के सोमेश्वर के सिक्कों की अपेक्षा काफी सुंदर हैं। इनके सीधी तरफ भाला लिये हुए घुड़सवार है तथा लेख में श्री पृथ्वीराज देव अंकित है। इस सिक्के का पृष्ठ भाग सोमेश्वर के सिक्के के समान ही है। पृथ्वीराज के सिक्के का भार, सोमेश्वर के सिक्के से कम है। पृथ्वीराज के एक सिक्के को मुहम्मद शहाबुद्दीन गौरी ने दुबारा जारी किया। इसके सीधे भाग पर एक अश्वारोही है तथा श्री पृथ्वीराज देव अंकित है। पृष्ठ भाग में नंदी के ऊपर की ओर श्री मोहम्मद बिन साम अंकित है।

    चौहान काल में कौड़ियां सहित विभिन्न प्रकार की मुद्रायें प्रचलन में थीं। पांच कौड़ियों के बराबर एक पावीसा होता था। 4 पावीसा के बराबर एक बीसा होता था। 5 बीसा के बराबर 1 लोहटेक होता था। 4 लोहटेक के बराबर चांदी का एक रूपक होता था। 5 रूपक के बराबर 12 द्रम्म होते थे तथा 5 रूपक के बराबर ही सोने का एक निष्क होता था। चौहान कालीन एक भी सोने का सिक्का अब तक नहीं मिला है। चौहानों में विग्रहराज चतुर्थ सर्वाधिक पराक्रमी राजा हुआ किंतु उसके काल का किसी भी प्रकार का कोई सिक्का अब तक नहीं मिला है।

    भूमि का नाप-तौल

    पृथ्वीराज चौहान के काल में भूमि नापने की सबसे छोटी इकाई अंगुल थी। 24 अंगुल का एक हाथ, 4 हाथ का एक दण्ड, 2000 दण्ड का एक कोस तथा चार कोस का एक योजना होता था।


    बहुविवाह, सती और जौहर प्रथा

    बहु विवाह प्रथा

    चौहान शासकों में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। सिंहराज के बारे में कहा जाता है कि उसकी कैद में भी उतनी ही रानियां थीं जितनी उसके महल में थीं। ई.1132 के बस्सी अभिलेख में चाहमान अजयपाल की तीन रानियों का उल्लेख है। साहित्यिक स्रोतों के अनुसार अर्णोराज चाहमान की 2 रानियों- मारोट की सुधवा एवं गुर्जरेश चौलुक्य जयसिंह की पुत्री कंचन देवी का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार पृथ्वीराज तृतीय की भी अनेक रानियां थीं।

    सती प्रथा

    चौहान राजवंश में सती प्रथा प्रचलित थी। चाहमान अजयपाल की मृत्यु पर सोमलदेवी सहित तीन रानियों के सती होने का उल्लेख मिलता है।

    जौहर प्रथा

    उस काल में जौहर प्रथा भी प्रचलित थी। ई. 724 अथवा ई.726 में में सिंध आक्रमण के समय दुर्लभराज (प्रथम) की रानियों ने जौहर का आयोजन किया। पृथ्वीराज तृतीय के भाई हरिराज ने, कुतुबुद्दीन ऐबक की सेनाओं के भय से, अपने सेनापति एवं स्त्री सहित जीवित ही अग्नि में प्रवेश किया था।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 40

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 40

    जूनागढ़ का नवाब बेगमों की बजाय कुत्ते लेकर पाकिस्तान भाग गया


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    गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित जूनागढ़ रियासत की स्थापना ई.1735 में शेरखान बाबी नामक मुगल सिपाही ने की थी। इसका क्षेत्रफल 3,337 वर्ग मील तथा जनसंख्या 6,70,719 थी। रियासत की 80 से 90 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू थी किंतु शासक मुस्लिम था। रियासत का अंतिम नवाब सर मुहम्मद महाबत खान रसूलखानजी (तृतीय) 11 वर्ष की आयु में शासक बना था। उसने मेयो कॉलेज अजमेर में पढ़ाई की थी। उसे तरह-तरह के कुत्ते पालने तथा शेरों का शिकार करने का शौक था। उसके पास सैंकड़ों कुत्ते थे। एक बार उसने एक कुत्ते का एक कुतिया से विवाह करवाया जिस पर उसने बहुत धन व्यय किया तथा पूरे राज्य में तीन दिन का अवकाश घोषित किया। ई.1947 में मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता सर शाह नवाज भुट्टो को कराची से बुलाकर जूनागढ़ राज्य का दीवान बनाया गया।

    शाह नवाज भुट्टो ने जूनागढ़ के नवाब को डराया कि यदि जूनागढ़ भारत में मिला तो सरकार, उसके कुत्तों को मार डालेगी तथा शेरों का राष्ट्रीयकरण कर देगी। जबकि पाकिस्तान में वह अपने कुत्तों को सुरक्षित रख सकेगा तथा निर्बाध रूप से शेरों का शिकार कर सकेगा। यह बात नवाब के मस्तिष्क में बैठ गई। जूनागढ़ रियासत चारों ओर से हिन्दू रियासतों से घिरी हुई थी किंतु रियासत की दक्षिण एवं दक्षिण-पश्चिम सीमा अरब सागर से मिलती थी। जूनागढ़ नवाब ने सोचा कि वह आसानी से पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकता है। वास्तविकता यह थी कि जूनागढ़ रियासत तथा पाकिस्तान की सीमा के बीच 240 मील की दूरी में समुद्र स्थित था। फिर भी सनकी नवाब भारत में मिलने की बजाय पाकिस्तान में मिलने के लिये तैयार हो गया। वह यह भी भूल गया कि राज्य की 80 प्रतिशत जनता हिन्दू है तथा उसकी रियासत चारों ओर हिन्दू रियासतों से घिरी हुई है जो कि भारत में मिल चुकी हैं।

    जब वायसराय की 25 जुलाई 1947 की दिल्ली बैठक के बाद भारत सरकार ने नवाब को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन भिजवाया तो नवाब ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा 15 अगस्त 1947 को समाचार पत्रों में एक घोषणा पत्र प्रकाशित करवाया- 'पिछले कुछ सप्ताहों से जूनागढ़ की सरकार के समक्ष यह सवाल रहा है कि वह हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करे। इस मसले के समस्त पक्षों पर सरकार को अच्छी तरह गौर करना है। यह ऐसा रास्ता अख्तयार करना चाहती है जिससे अंततः जूनागढ़ के लोगों की तरक्की और भलाई स्थायी तौर पर हो सके तथा राज्य की एकता कायम रहे और साथ ही साथ उसकी आजादी और ज्यादा से ज्यादा बातों पर इसके अधिकार बने रहें। गहरे सोच विचार और सभी पहलुओं पर जांच परख के बाद सरकार ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है और अब उसे जाहिर कर रही है। राज्य का विश्वास है कि वफादार रियाया, जिसके दिल में राज्य की भलाई और तरक्की है, इस फैसले का स्वागत करेगी।' जूनागढ़ नवाब की यह घोषणा न केवल भारत के एकीकरण के लिए काम कर रहे सरदार पटेल को, अपितु रियासती जनता को भी सीधी चुनौती थी।

    जूनागढ़ नवाब द्वारा पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करने से जूनागढ़ की जनता में बेचैनी फैल गई तथा जनता ने नवाब की कार्यवाही का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्र अस्थायी सरकार स्थापित कर ली। भारत सरकार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली को तार भेजकर कहलवाया कि वह जूनागढ़ के सम्मिलन को अस्वीकृत कर दे। लॉर्ड माउण्टबेटन ने इस तार को चीफ ऑफ द गवर्नर जनरल्स स्टाफ लॉर्ड इस्मे के हाथों कराची भिजवाया। लियाकत अली ने भारत सरकार की इस मांग को यह कहकर मानने से अस्वीकार कर दिया कि जो टेलिग्राम लॉर्ड इस्मे के साथ भेजा गया है, उस पर सम्बन्धित मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। 13 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ नवाब का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा। पाकिस्तान से एक छोटी टुकड़ी समुद्र के रास्ते जूनागढ़ को रवाना कर दी गई।

    पाकिस्तान की यह कार्यवाही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य, हुए उस समझौते का उल्लंघन थी जिसमें दोनों पक्षों ने यह मान लिया था कि भारत की सीमाओं से घिरी हुई रियासतों को भारत में ही मिलना होगा। जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलने की घोषणा को पाकिस्तान द्वारा स्वीकार कर लिये जाने के बाद, नवाब मुहम्मद महाबत खानजी के सैनिकों ने, जूनागढ़ राज्य की हिन्दू जनता का उत्पीड़न करना आरम्भ कर दिया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू, जूनागढ़ छोड़कर भाग जायें। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था। नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया। उन रियासतों ने भारत सरकार से सहायता मांगी। माउण्टबेटन ने सुझाव दिया कि इस मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल को यह सुझाव पसंद नहीं आया। वे जूनागढ़ को कड़ा सबक सिखाकर हैदराबाद और काश्मीर को भी चुनौती देना चाहते थे। 24 सितम्बर 1947 को भारत सरकार ने काठियावाड़ डिफेंस फोर्स से जूनागढ़ के विरुद्ध कार्यवाही करने को कहा। इस सेना ने जूनागढ़ को चारों तरफ से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया। 24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया। वह अपनी चार बेगमों एवं सैंकड़ों कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम तथा बहुत से कुत्ते जूनागढ़ में ही छूट गये। नवाब अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गये। 9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। 20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया तथा 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को पाकिस्तान में नवाब मुहम्मद महाबत खानजी की मृत्यु हुई। जूनागढ़ का दीवान शाह नवाज भुट्टो भी पाकिस्तान चला गया जहाँ उसे कराची में बहुत बड़ी जमीन दी गई।

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  • अजमेर का इतिहास - 14

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 14

    ललित विग्रहराज तथा हरकेलि नाटकों का परिचय


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर और शाकम्भरी के चौहान नरेशों का शिलांकित ग्रंथों के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। विग्रहराज चतुर्थ (1152-64) कवि बांधव तो था ही, साथ में स्वयं भी कवि था। उसने अजमेर में सरस्वती मंदिर नामक पाठशाला बनवाई। (कुतुबुद्दीन ऐबक तथा शम्सुद्दीन अल्तमश के समय में इसे मस्जिद का रूप दिया गया। अब इसे ढाई दिन का झौंपड़ा कहते हैं।) इस पाठशाला में दो महत्त्वपूर्ण संस्कृत नाटक 'हरकेलि नाटक' तथा 'ललित विग्रहराज' काले रंग के कई शिलाखण्डों पर उत्कीर्ण करवाकर लगवाये गये थे जिनमें से चार शिलांकित फलक ई.1875-76 में खोजे जाकर अजमेर के राजपूतना संग्रहालय में सुरक्षित रखे गये थे।

    ये शिलालेख ऐसे स्थान से प्राप्त हुए हैं जो भवन निर्माण एवं शिल्पकला की दृष्टि से प्रशंसनीय है। साथ ही लेख लिपियुक्त होने से भवन निर्माण के काल निर्णय में भी सहायता करते हैं, जो कि ई.1153 के आसपास होनी चाहिये। प्रस्तरों पर नाटकों का उत्कीर्णन तथा इस प्रकार के भवन में उसकी स्थापना, भवन के संस्कृत पाठशाला के रूप में उपयोग होना भी सिद्ध करता है। इसका भोज की धारा स्थित पाठशाला से अनुकरण करना भी यही इंगित करता है। नाटकों के ये अंश, संस्कृत साहित्य तथा इतिहास के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। चूंकि इन नाटकों के शेष अंश अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं हुए हैं, अतः अनुमान लगाया जाता है कि वे संभवतः अजमेर स्थित इसी पाठशाला के आसपास दबे हुए हैं। संस्कृत साहित्य के इतिहास में डॉ. कृष्णामाचारी ने सम्पूर्ण नाटक के अभाव में ललित विग्रहराज तथा हरकेलि नाटकों का उल्लेख मात्र किया है। सुभाषितावली में विग्रहाराजदेव का एक छन्द भी समुद्धृत किया गया है।

    ललित विग्रहराज

    काले पत्थर की शिलाओं पर देवनागरी में उत्कीर्ण संस्कृत एवं प्राकृत में लिखे गये 4 फलकों में से 2 फलकों पर ललित विग्रहराज नामक नाटक उत्कीर्ण है जो चाहमान राजा विग्रहराज चतुर्थ के सम्मान में राजकवि सोमदेव द्वारा विरचित है। प्रथम फलक में 37 पंक्तियां हैं। 1 से 18 तथा 21 से 32 तक की पंक्तियां पर्याप्त सुरक्षित एवं पठनीय अवस्था में हैं। प्रथम पंक्तियां कुछ अस्पष्ट हैं। 33 से 36 तक की पंक्तियों में से कुछ अक्षर छूटे हुए होने के कारण वाक्य अपूर्ण हैं।

    इस नाटक में कवि ने विग्रहराज और इंद्रपुरी के वसंतपाल की राजकुमारी देसलदेवी की प्रेमकथा को लिपिबद्ध किया है। इसी प्रसंग में विग्रहराज और गजनी के तुरुष्क हम्मीर (संभवतः अमीर खुसरो शाह (ई.1153-60) का संस्कृत रूप।) के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने का संकेत दिया है। यह नाटक त्रुटित रूप में दो शिलाफलकों पर उत्कीर्ण मिला है। पहले फलक पर प्रथम अंक का अंतिम अंश तथा द्वितीय अंक का प्रारंभिक भाग अंकित है जबकि दूसरे फलक पर तीसरे अंक का अंतिम अंश तथा चतुर्थ अंश का अधिकांश भाग उत्कीर्ण है।

    प्रस्तरांकित अंश का आरम्भ शशिप्रभा तथा राजा के वार्तालाप से होता है। डॉ. कीलहॉर्न का कथन है कि इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि राजा, वसंतपाल की पुत्री देसलदेवी के प्रेम में आसक्त था। (वसंतपाल नामक कोई राजा 12वीं शती में नहीं देखा जाता है। नाम से अनुमान लगाया जाता है कि यह दिल्ली के तोमरों में से कोई राजा रहा होगा।) लेख की 20वीं पंक्ति से विदित होता है कि यह राजकुमारी उत्तर में इन्द्रपुर अथवा उसके आसपास की रहने वाली थी। दो प्रेमियों को स्वप्न में पृथक होते देखकर नायिका अपनी विश्वासपात्र सखी शशिप्रभा को राजा के विचार जानने के लिये भेजती है।

    शशिप्रभा अपनी सखी के प्रेम की सीमा से अवगत होकर, उसके अभीष्ट को अभिव्यक्त करने हेतु जाना चाहती है। राजा शशिप्रभा से पृथक न होने की इच्छा प्रकट करता है और उसके स्थान पर कल्याणवती को राजकुमारी के पास भेजने को कहता है। इस प्रकार राजा ने कल्याणवती द्वारा प्रेम संदेश में नायिका को सूचित किया कि निकट भविष्य में होने वाली तुरुष्क राजाओं के विरुद्ध अभियान में राजकुमारी को उसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण है। शशिप्रभा का राजा के साथ सुख पूर्वक आवास करने का यथावश्यक प्रबंध करने के पश्चात् राजा अपने मध्याह्न कालीन कार्यक्रमों के लिये चला जाता है। यहीं तृतीय अंक समाप्त हो जाता है।

    चतुर्थ अंक का आरम्भ होने पर दो तुरुष्क कारावासी सम्मुख आते हैं जो शाही आवास की खोज करते-करते, शाकम्भरी में या उसके आसपास विग्रहराज का शिविर लगे होने की सूचना देते हैं। इसी ऊहापोह में सौभाग्य से वे तुरुष्क राजा द्वारा भेजे गये षड़यन्त्रकारी से मिलते हैं। वह बताता है कि कैसे उसने भिक्षुक वेश में राजा के दर्शन के लिये आये जन समुदाय के साथ, राजा के शिविर में प्रवेश किया। वह यह भी सूचित करता है कि चाहमान विग्रहराज की सेना में एक सहस्र हाथी, एक लक्ष घोड़े तथा दस लाख पदाति हैं। इतनी बड़ी सेना निश्चय ही एक बार समुद्र का जल भी सुखा दे। राजा के आवास को बताकर वह चला जाता है। तदनन्तर दोनों बंदी शाही आवास तक पहुँचकर राजा से मिलते हैं जो अपनी प्रिया के विषय में सोच रहे थे। वे काव्यगत छंदों में राजा को कुछ निवेदन करते हैं। बन्दी, राजा से पर्याप्त पुरस्कार पाते हैं। ये छन्द प्रस्तर बहुत खराब हो गये हैं।

    विग्रहराज अपने द्वारा हम्मीर के शिविर में भेजे गये षड़यन्त्रकारी दूत के अभी तक वापिस लौटकर न आने से चिंतित होते हैं किंतु उसी समय दूत वापिस आ जाता है और अपने स्वामी को शत्रु की सेना तथा गतिविधि के विषय में जो कुछ जान सका, उसे व्यक्त करता है कि हम्मीर की सेना में अगणित हाथी, रथ, तुरंग और पैदल सेना है और उसका शिविर भी सर्वथा सुरक्षित है। पिछले दिन तो यह सेना वव्वेरण, जिस स्थान पर विग्रहराज था, उससे तीन योजन दूर थी किंतु आज केवल एक योजन दूर है। यह भी ज्ञात हुआ है कि हम्मीर सेना की पूरी तैयारी कर अपने दूत को युद्ध के आह्वान के लिये राजा विग्रहराज के पास भेजने वाला है।

    षड़यन्त्रकारी के चले जाने पर विग्रहराज अपने भाई राजा सिंहबल को बुलाता है। उसे परिस्थिति से परिचित कराकर, उससे तथा प्रधान अमात्य श्रीधर से, आगे क्या करना चाहिये, इसकी सम्मति मांगता है। चतुर मंत्री, शक्तिशाली शत्रु से युद्ध न करने की मंत्रणा देता है किंतु राजा विग्रहराज, अपने मित्र राजा की रक्षा एवं सहायता करने के कर्त्तव्य की दृष्टि से शांति पूर्वक संधि नहीं करने को कहता है। विग्रहराज का भाई सिंहबल विग्रहराज की इच्छानुसार कार्य करने को उत्साहित करता है। इस मंत्रणा के समय ही हम्मीर के संदेशवाहक के आने का समाचार मिलता है। संदेशवाहक के अंदर आने पर वह राजा की कांति तथा शक्ति चिह्नों को देखकर चकित हो जाता है। वह जिस कार्य के लिये यहाँ भेजा गया था, उसे करने में असमर्थ सा अनुभव करने लगता है। यहीं लेख समाप्त हो जाता है।

    लेख के अंशों से ऐसा विदित होता है कि विग्रहराज तथा हम्मीर वर्तमान परिस्थिति में आपस में नहीं लड़े और राजा विलास में लीन रहा किंतु दिल्ली सिवालिक लेख के अनुसार वीसलदेव विग्रहराज ने यथार्थ में मुसलमानों से युद्ध किया था और अंततः उन्हें परास्त कर भारत से बाहर भगा दिया था। अतः निश्चित ही युद्ध हुआ था जिसका आगे के उन फलकों पर उल्लेख होना चाहिये जो कि अभी तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। यह नाटक, तत्कालीन युद्ध प्रणालियों में कुशल षड़यन्त्र, दूत एवं संदेश वाहकों का होना तथा अपरिमित सैन्य शक्ति रखना आदि की ओर संकेत करता है। गूढ़ मंत्रणा तथा मंत्री की सम्मति को दर्शाकर कुशल मंत्री परषिद की ओर संकेत किया गया है।

    विग्रहराज केवल एक महान राजा ही नहीं, अपितु एक उद्भट विद्वान तथा प्रतिभावान कवि भी था। लेख के अध्ययन से साहित्य शास्त्र की गरिमा का बोध होता है। अपने राज्य प्रशासन में वह शिक्षा एवं ज्ञान को प्रश्रय देने वाला था। वह सदैव मुस्लिम आक्रमणकारियों से त्रस्त रहता था। उस पर भी काव्य तथा कवियों तथा सोमदेव आदि को सम्मान देना उसकी योग्यता को प्रकट करता है। नाटकों में प्रयुक्त पात्रों के अनुसार प्राकृत बोली तथा संस्कृत भाषा का प्रयोग करने से उस समय की शिक्षा पर प्रकाश पड़ता है। नाटक की भाषा ललित तथा अर्थ गौरव से ओतप्रोत है। पद्य सरस, अलंकार एवं छंदों का सुंदर सन्निवेश इसकी विशेषता है। इस नाटक के माध्यम से इस उद्भट विद्वान को संस्कृत साहित्य में सम्मानित स्थान प्राप्त है। यह नाटक परिशीलन संस्कृत तथा प्राकृत साहित्य के ऐतिहासिक महत्त्व पर पूर्ण प्रकाश डालता है।

    हरकेलि

    तृतीय तथा चतुर्थ शिलाखण्डों पर 'हरकेलि' नामक नाटक का कुछ अंश उत्कीर्ण है। हरकेलि नाटक के रचयिता स्वयं शाकंभरी नरेश महाराजाधिराज परमेश्वर विग्रहराज देव थे। तृतीय शिला पर द्वितीय और तृतीय अंकों के कुछ भाग अंकित हैं और चतुर्थ शिला पर क्रौंचविजय नामक पांचवे अंक का उत्तरार्द्ध उत्कीर्ण है। छठी शताब्दी के महाकवि भारवि कृत किरातार्जुनीयम् की परम्परा में लिखे गये इस नाटक के पंचम अंक क्रौंचविजय में अर्जुन की तपस्या तथा शिव के साथ हुए विग्रह का वर्णन है।

    शिलाखण्ड की 32, 35, 37 तथा 40वीं पंक्ति से हरकेलि नाटक का शाकंभरी के महाराजाधिराज परमेश्वर विग्रहराज द्वारा रचे जाने का स्पष्ट भान हो जाता है। नाटक की तिथि संवत् 1210 मार्ग सुदि 5 आदित्य दिने सर्वण नक्षत्रे मकरस्थे चंद्र हर्षणयोगे वालाव कर्णे हरकेलिनाटकम् तदनुसार रविवार 22 नवम्बर 1153 है।

    यह नाटक शिव पार्वती संवाद तथा विदूषक-प्रतिहार वार्ता से आरंभ होता है जैसा कि खण्डित भाग से ज्ञात होता है, रावण द्वारा शिव की उपासना की गई है। शिव तथा उनके गण, शबर अर्थात् जंगलों में घूमने वालों के रूप में सम्मुख आते हैं। कुछ लोगों को मनोहर सुगंधि युक्त यज्ञ करते हुए देखकर शिव अपने गण मूक को इसका कारण जानने के लिये भेजते हैं। मूक लौटकर बताता है कि अर्जुन एक यज्ञ कर रहा है। शिव अपने गण को अर्जुन के पास किरात का रूप धारण करके जाने का आदेश देते हैं तथा शिव के वहाँ आने तक प्रतीक्षा करने को कहते हैं। मूक अर्जुन के पास जाता है। शिव अपनी दिव्य दृष्टि से देखते हैं कि मूक और अर्जुन परस्पर लड़ रहे हैं। शिव किरात रूप धारण करके अपने गण की सहायता करने जाते हैं। अर्जुन तथा शिव के बीच भयंकर युद्ध होता है।

    प्रतिहार इस युद्ध के समाचार माता गौरी को सुनाता है। शिव द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वी अर्जुन की शक्ति का लोहा मानने के साथ ही युद्ध समाप्त होता है। तदनन्तर शिव और गौरी, अर्जुन के सन्मुख वास्तविक स्वरूप में प्रकट होते हैं। अर्जुन, शिव को अनजाने में कष्ट व हानि पहुँचाने के लिये क्षमा याचना करता है तथा शिव को परमेश्वर एवं जगन्नियंता कहकर उनकी स्तुति करता है। अर्जुन की शक्ति से प्रसन्न होकर शिव, अर्जुन को पाशुपत अस्त्र प्रदान करते हैं।

    कवि ने शिव के मुख से गौरी के सामने कहलवाया है कि कवि विग्रहराज ने अपने 'हरकेलि' नाटक करने में मुझे इतना प्रसन्न कर दिया है कि मैं स्वयं इस नाटक को देखने जाउंगा। शिव, काव्य जगत् में विग्रहराज की यशः पताका चिरकाल तक बने रहने का वरदान देते हैं तथा शाकंभरी का राज्य करने के लिये विग्रहराज को पुनः वापस भेज देते हैं। शिव तथा उनके गण कैलाश पर्वत को लौट जाते हैं। चतुर्थ फलक में नाटक के द्वितीय व तृतीय अंक उत्कीर्ण हैं, लेख पर्याप्त संरक्षित है।

    कथानक तथा काव्यगत विशेषताओं की दृष्टि से लेखक, कवि भारवि से प्रभावित है। नाटक में शार्दुल विक्रीड़ित, वसंततिलका, शिखरिणी, स्ग्रधरा, अनुष्टुप, पुष्पिताग्रा, हरिणी और मदाक्रांता आदि छंदों का समवेत रूप से प्रयोग होने से कवि की प्रतिभा परिलक्षित होती है। लेख में प्रयुक्त प्राकृत बोली में साधारण शौरसेनी भाषा के साथ-साथ शशिप्रभा द्वारा आर्य छंदों में महाराष्ट्री भाषा का प्रयोग किया गया है। तुरुष्क बंदी तथा तुरुष्क गुप्तचरों के संवादों के लिये मागधी भाषा प्रयुक्त की गई है। नाटक में जिन पात्रों द्वारा जो-जो प्राकृत बोलियां बुलवाई गई हैं, वे अन्य किसी नाटक की अपेक्षा, हेमचंद्र द्वारा निर्धारित नियमों के अधिक निकट होने से पर्याप्त रुचिकर हैं।

    प्रस्तरांकित लेख महीपति के पुत्र तथा गोविंद (राजा भोज के परम प्रियजन) के पौत्र भास्कर द्वारा उत्कीर्ण किया गया है जो भारत में नियुक्त हुए सेनापति के परिवार से सम्बन्धित है।

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  • किशनगढ़ की चित्रकला पर वल्लभ एवं निम्बार्क मतों का प्रभाव

     03.06.2020
    किशनगढ़ की चित्रकला पर वल्लभ एवं निम्बार्क मतों का प्रभाव

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    किशनगढ़ की चित्रकला शैली विश्व भर में अपने अनूठेपन के लिये जानी जाती है। न केवल जनसमान्य में अपितु किशनगढ़ के राजवंश में भी चित्रकला के प्रति दृढ़ अनुराग रहा। यही कारण है कि जोधपुर एवं जयपुर जैसी बड़ी रियासतों के बीच में स्थित होते हुए भी किशनगढ़ जैसी अत्यंत छोटी रियासत में स्वतंत्र चित्रशैली का विकास हुआ। सौंदर्य की दृष्टि से किशनगढ़ के चित्र बड़े रोचक हैं।


    पुराणों का प्रभाव-

    किशनगढ़ रियासत की स्थापना होने से पूर्व इस क्षेत्र की प्रजा पर अरावली की उपत्यका में स्थित पुराण प्रसिद्ध पिप्पलाद तीर्थ का व्यापक प्रभाव था। पिप्पलाद तीर्थ में निम्बार्क सम्प्रदाय की पीठ स्थापित होने पर वैष्णवों के इसी मत का प्रजा में प्रभाव हो गया।

    वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव-

    वल्लभ सम्प्रदाय से राजपूताने का सम्बन्ध महाप्रभु वल्लभाचार्य के जीवनकाल में ही हो गया था। माना जाता है कि वे द्वारिका से लौटते हुए पुष्कर आये। आज भी पुष्कर का एक घाट वल्लभ घाट के नाम से जाना जाता है। इसके बाद से राजपूताना रियासतों में वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव आरंभ हुआ। 9 अप्रेल 1669 को औरंगजेब ने उत्तर भारत के समस्त हिन्दू मंदिरों को गिराने के आदेश दिये। इससे मथुरा, वंृदावन तथा अन्य स्थानों के मंदिरों के पुजारी अपने आराध्य देवों की प्रतिमाओं को लेकर राजपूताने की रियासतों में पलायन करने लगे। वल्लभ सम्प्रदाय के गिरिराज मंदिर के गुंसाई दामोदर अपने चाचा गोविन्द एवं अन्य पुजारियों को साथ लेकर 29 सितम्बर 1669 को गोवर्धन से चले। वे आगरा, बूंदी, कोटा एवं पुष्कर होते हुए किशनगढ़ पहुंचे। किशनगढ़ के महाराजा मानसिंह ने ‘पीताम्बर की गाल’ में भगवान को पूर्ण भक्ति सहित विराजमान करवाया और विविधत् उनकी पूजा की।

    यहाँ से श्रीनाथजी जोधपुर राज्य के चौपासनी गांव होते हुए मेवाड़ में सिहाड़ गांव पधारे। श्रीनाथजी के आने से राजपूताना की समस्त रियासतों में ब्रज की संस्कृति का युगांतरकारी प्रभाव पड़ा। मेवाड़ रियासत में महाराणा ने शैव गुरु के साथ-साथ वैष्णव गुरु भी स्वीकार किया। जोधपुर तथा किशनगढ़ के राजवंश तो गोकुलिये गुसाईंयों के शिष्य हो गये तथा वल्लभ सम्प्रदाय को ही मानने लगे। इन रियासतों में गोकुलिये गुसाईंयों का बहुत जोर था। किशनगढ़ वल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख केन्द्रों में से था इसलिये किशनगढ़ के साहित्य, संगीत एवं चित्रों यहाँ तक कि पूरी संस्कृति पर उसका व्यापक प्रभाव हुआ।

    वल्लभाचार्य ने राधा को श्री कृष्ण की आत्मशक्ति कहा है। इसलिये वह श्रीकृष्ण से अभिन्न है। यही कारण है कि वल्लभाचार्य ने राधा कृष्ण की प्रेम लीला को भक्ति के सर्वोत्कृष्ट रूप में स्वीकार किया। उन्होंने पुष्टि मार्ग में बाल, दाम्पत्य और परकीय कान्ता, इन तीनों भावों का समावेश किया जिन्हें ब्रजांगना, गोपी और गोपांगना की भावनाओं से स्पष्ट किया गया है।

    श्री नृत्य गोपाल के दो स्वरूप हैं- छोटा श्याम स्वरूप तथा बड़ा बलराम स्वरूप। किशनगढ़ रियासत के संस्थापक महाराजा किशनसिंह (1605 से 1615 ई.) ने दोनों स्वरूपों को अपने माथे पर धारण किया। उसका पौत्र महाराजा रूपसिंह (1644-1658 ई.) गोपीनाथजी का दीक्षित शिष्य था। गोपीनाथ महाप्रभु वल्लभाचार्य के प्रपौत्र (विट्ठलनाथजी के सबसे छोटे पुत्र) थे। गोपीनाथ ने 1647 ई. में महाराजा रूपसिंह को उपदेश दिया था। इस उपदेश से राजा अत्यधिक भाव विभोर हुआ। रात्रि को स्वप्न में श्रीनाथजी ने राजा को आदेश दिया कि मेरे विग्रह को अपने घर में स्थापित करे। महाराज ने इस स्वप्न की चर्चा गोपीनाथ से की। गोपीनाथ ने इस समस्या का समाधान निकाला। उन्होंने श्रीनृत्यगोपाल के स्वरूप को श्री कल्याणरायजी की गोद में पधरा दिया जिससे श्री नृत्य गोपाल गोद के ठाकुर कहलाये, परिणामस्वरूप यह मूर्ति महाराज के साथ जहां वह जाते, साथ जाती थी।

    वल्लभाचार्य के पुष्टि मार्ग का मूलमंत्र है- मैं श्रीकृष्ण की शरण हूँ। सहस्रों वर्षों से मेरा श्री कृष्ण से वियोग हुआ है। वियोग जन्य तप और क्लेश से मेरा आनंद तिरोहित हो गया है। अतः मैं भगवान श्रीकृष्ण को देह, इंिद्रय, प्राण, अंतःकरण, स्त्री, गृह, पुत्र, वित्त और आत्मा सब कुछ समर्पित करता हूँ। हे कृष्ण मैं आपका ही दास हूँ और आपकी शरण में हूँ। किशनगढ़ के राजवंश पर वल्लभाचार्य के पुष्टि सम्प्रदाय का इतना अधिक प्रभाव था कि किशनगढ़ के कई राजा राजपाट और जीवन के प्रति वैराग्य का भाव रखते थे।


    निम्बार्क सम्प्रदाय का प्रभाव

    निम्बार्क सम्प्रदाय वैष्णव मत का प्रमुख सम्प्रदाय है। किशनगढ़ रियासत के सलेमाबाद कस्बे में स्थित निम्बार्क सम्प्रदाय के मंदिर में विराजित राधा-माधव के विग्रह को ‘‘गीत गोविंद’’ के रचयिता जयदेव अपने सिर पर धरकर मथुरा लाये थे। वह मथुरा के पास गोवर्द्धन में गोविंद कुण्ड में पड़ी हुई थी। वहाँ से गोविन्द शरण के द्वारा राधा माधव निम्बार्क तीर्थ लाये गये। निम्बार्क सम्प्रदाय में राधा-कृष्ण की उभयमयी मूर्ति की उपासना का विधान है। सावंतसिंह के इस पद पर निम्बार्क मत का प्रभाव स्प्ष्ट रूप से देखा जा सकता है-

    कहा है परायो सब दीसत ही राधे ही को,

    बिन ही विचारै झूंठे वचन उचारे जू

    राधे ही की भूमि यह राधे ही के खग मृग

    राधे ही को नाम रहै, सांझ औ सकारे जू।।

    राधे ही के सरवर, तरवर हैं राधे जू के,

    राधे के ही फूल फल नागर निहारे जू

    राधे की दुहाई फिरै राधे ही को वृंदावन

    तुम कौन लला बीच हटकनि हारे जू।


    किशनगढ़ चित्रशैली का आरंभ-

    यह कहना कठिन है कि किशनगढ़ शैली का पहला चित्र कब बना किंतु यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि 17वीं शताब्दी के अंत में किशनगढ़ में कुशल चित्रकार, चित्र बना रहे थे। महाराजा हरिसिंह (1628-1644 ई.) कला और साहित्य का प्रेमी था। उसका कला प्रेम उसके द्वारा बनाये गये चित्रों में प्रकट होता है। उसके बनाये हुए चित्र मुगल शैली से प्रभावित हैं।

    महाराजा रूपसिंह (1644-1658 ई.) भी चित्रकला का प्रेमी था। जब बलख और काबुल विजय के बाद दिल्ली आया तब शाहजहाँ ने उसका बड़ा सम्मान किया और उससे पुरस्कार मांगने को कहा। इस पर महाराज ने बादशाह से महाप्रभु वल्लभाचार्य का वह चित्र मांगा जो सिकन्दर लोदी ने किसी दक्ष चित्रकार को महाप्रभु के समक्ष बैठाकर बनवाया था। इस चित्र को पाने की अभिलाषा महाराजा के मन में बहुत दिनों से थी जो इस प्रकार पूरी हुई।

    महाराजा मानसिंह (1658-1706 ई.) के समय के कलाकारों की कृतियां आज भी देखी जा सकती हैं। 1694 ई. में बना राजकुमार राजसिंह का एक चित्र दृश्टव्य है जिसमें राजकुमार को घोड़े पर सवार होकर काले हिरण का शिकार करते हुए दिखाया गया है। इस चित्र के पीछे एक लेख भी अंकित है। इस चित्र पर भी मुगल प्रभाव स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है। इस समय के चित्रों में लम्बी अंगुलियां बनाई जाती थीं। इन्हीं दिनों में बनी राजा सहसमल की पेण्टिंग में भी प्राचीन समय की संस्कृति के प्रभाव को देखा जा सकता है।  
    किशनगढ़ की चित्रकला को वैशिष्ट्य प्रदान करने में महाराजा राजसिंह (1706-1748 ई.) का बहुत बड़ा योगदान है।

    किशनगढ़ शैली का समृद्धि काल-

    किशनगढ़ शैली का समृद्धि काल महाराजा सावंतसिंह (1748-1764 ई.) के समय से प्रारंभ होता है जिसमें नागरीदास की वैष्णव धर्म के प्रति श्रद्धा, चित्रकला मंे रुचि और उसकी प्रेयसी बणीठणी से प्रेम का बड़ा हाथ रहा है। संत प्रकृति भावुक मन, संगीतमय वातावरण में पले होने के कारण पिता की काव्यात्मक चित्र दृष्टि को आत्मसात करके सावंतसिंह ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द और चित्रों को बनाया। अति भावुकता के कारण वह सदैव कृष्ण भक्ति में ही मग्न होकर काव्य और चित्र सृजन करने को तत्पर हुआ और वल्लभाचार्य की भक्तिमयी चित्रण परम्परा को आगे बढ़ाया। उसके द्वारा बनाये गये चार रेखांकन किशनगढ़ दरबार के निजी संग्रह में उपलब्ध हैं। जयपुर पोथीखाना के दो चित्रपटों में नागरीदास और बणीठणी चित्रित हैं। कृष्ण भक्ति में नागरीदास का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से मुखरित हुआ है। उसकी प्रेरणा से किशनगढ़ शैली के चित्रों का साहित्यिक आधार ठोस एवं सशक्त बना। तत्कालीन धर्मिक भावना ने काव्य को और काव्य ने चित्रकला को इस प्रकार प्रभावित किया कि काव्य और चित्रकला का यह पारस्परिक सम्बन्ध विशेष रूप से चित्रों में स्पष्ट हुआ क्योंकि दोनों ही मनुष्य की सौन्दर्यानुभूति से प्रेरित होते हैं।

    महाराजा सांवतसिंह श्रीकृष्ण भक्त तथा चित्रकला का ज्ञाता था और कला-प्रेमी नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नागरीदास के कारण ही किषनगढ़ के चित्रों को नई पहचान मिली। सांवतसिंह के समय में निहालचंद बड़ा चित्रकार हुआ जिसने बनी-ठनी के चित्र को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलवाई। सांवतसिंह ने ही निहालचंद को कृष्ण और राधा के चित्र बनाने के लिये प्रेरित किया।  
    किशनगढ़  चित्रकला की उन्नति तथा विकास का श्रेय कवि नागरीदास को जाता है। उसकी साहित्यक अभिरुचि और कला प्रेम ने चित्रकला के ऐसे दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत किये जो भविष्य में संसार की चित्रकला का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।

    नागरीदास के कलात्मक व्यक्तित्व ने किशनगढ़ शैली को एक नवीन मोड़ दिया। उसमें रूप सौंदर्य के प्रति अपूर्व जिज्ञासा के साथ ही भावुक हृदय की भक्ति भावना भी थी। नागरीदास राजा होते हुए भी राज्य लिप्सा से बहुत दूर रहे। गृहस्थ होते हुए भी उन्होंने योगी की तरह जीवन व्यतीत किया। किशनगढ़ शैली में प्राण फूंकने वाले नागरीदास महान रसिक, भावुक कवि, कला मर्मज्ञ तथा राधा माधव युगल रूप के भक्त थे।

    किशनगढ़ चित्र शैली की विशेषतायें-

    किशनगढ़ चित्रशैली में बनी पुरुषों की आकृतियों में उभरा हुआ ललाट, पतले अधर, तीखी नासिका, काली रेखाओं से युक्त कमलकार आँखें, लम्बी भुजाएं, कोमल अंगुलियां, ऊँचे कंधे, छरहरा शरीर, खुले केश, मोतियों से सजी हुई पेच बंधी सफेद पगड़ी, कानों में मुक्ताफल, मणिमालाओं से आच्छादित कंठ तथा दुपट्टे से सुशोभित क्षीण कटि प्रदर्शित की जाती थी। नारी आकृतियों में कटि तक फैली केशराशि, काजल की घनी किंतु सुंदर रेखा से युक्त कमल नयन, चमेली की पांखुरियों जैसे अधर, नुकीली चिबुक, तीखी भृकुटी, पतली कमर, लहंगा, कंचुकी से ढका सुंदर शरीर, हाथ में अर्द्धविकसित कमल, अलंकारों से सुसज्जित शरीर, चित्रित किये जाते थे। रंग संयोजन की दृष्टि से भी किशनगढ़ की चित्रशैली विशिष्ट है। हरे, स्लेटी, गुलाबी, लाल, नीले, रंगों को विरोधात्मक ढंग से चित्रित किया गया है। किशनगढ़ के लघु चित्रों की रंग योजना भी महत्व रखती है। इन चित्रों की विषय वस्तु में प्रणय निवेदन, नीले वस्त्रों को धारण करके संगीत का आनंद उठाती हुई राधा, गोपियों के साथ नृत्य करते श्रीकृष्ण, राधा का दुपट्टा पकड़े कृष्ण, राधा को चमेली की माला भेंट करते कृष्ण, कमल पुष्प शैय्या पर विराजमान राधा-कृष्ण, राधा को कृष्ण का संदेश थमाते हुए दूती, नायक नायिकाओं के चित्र, होली, दीपावली एवं सांझीलीला आदि उत्सव, शिकार आदि सम्मिलित हैं। राधा-माधव के अतिरिक्त कुछ चित्र सीता-राम के भी हैं। इन चित्रों में प्रकृति चित्रण को प्रधानता दी गई है। किशनगढ़ शैली की वेषभूषा फर्रूखसीयर कालीन है।


    किशनगढ़ शैली पर वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव

    किशनगढ़ की चित्रकला पर वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव विशेष स्थान रखता है। वल्लभाचार्य ने स्वयं कहा है कि त्याग से, श्रवण, कीर्तिनादि साधनांे से प्रेम का बीज हृदय में जमता है। इस भाव को आत्मसात करते हुए किशनगढ़ के चित्रकारों ने चित्रण के लिये कृष्ण भक्ति को ही अपनी तूलिका का आधार बनाया। चूंकि महाप्रभु वल्लभाचार्य स्वयं चित्रकार एवं चित्र प्रेमी थे, अतः चित्रकला में निपुण होना तब आचार्य परम्परा के अनुकूल एक आचरण हो गया था।

    आँखों पर आध्यात्मिक प्रभाव-

    किशनगढ़ शैली के चित्रों में आँखें आध्यात्मिक चिन्तन की छाया से आच्छादित सी प्रतीत होती हैं। वे आंखें चाहे राधा-कृष्ण की हों या बणीठणी की। नागरीदास ने अपने काव्य और चित्रों में आंखों का वर्णन अधिक किया है।

    किशनगढ़ शैली का आनंदप्रद आधार-

    भारतीय जीवन दर्शन का अंतिम छोर सहज है और वही सहज, मध्य युगीन भक्ति साहित्य में बहुत ही विशिष्ट रूप मंे अंकित हुआ है। वही सहजता मध्य युगीन संगीत और चित्रकला में अंकित हुई है। यही सहज भक्ति भाव हमें किशनगढ़ के चित्रों में स्पष्ट दिखायी देता है। भक्तों और उपासकों ने इसे भावनाओं के इन्द्रधनुषी रूप में संवारते हुए अपने जीवन में परम शांति का अनुभव किया। यही रूप, आराधना द्वारा आराधक को पाने की वह चरम परिणति है जिसमें मन को श्रीकृष्ण के आनंदप्रद आधार पर केन्द्रित करने और उनकी भावनाओं में लीन रखने हेतु चित्र दर्शन का मार्ग कृष्ण भक्तों को भक्ति के ही एक मार्ग के रूप में लक्षित हुआ है। आगे चलकर तो चित्र दर्शन का मार्ग प्रत्यक्ष दर्शन तक के लिये उन्हें उचित प्रतीत होने लगा था।

    प्रकृति चित्रण-

    किशनगढ़ के प्रकृति सम्बन्धी चित्रों में प्राकृतिक सुषमा जैसे काव्य रूप में समाई हुई है। दूधिया रात, रिमझिम वर्षा के अवशेष जो भवनों के मध्य दिखाये गये हैं, सघन कुंजों से झांकते विशाल महल, सुखद सरोवर की लहरों से अठखेलियां करती नौकायें, सुंदर कमल दलों से ढंके जलाशय, पक्षियों और वृक्षों के लालित्यपूर्ण लतापत्रों की सघनता, प्रातः और सांध्यकालीन बादलों का सुंदर सिंदूरी चित्रण ही काव्यमय पृष्ठभूमि का साक्षी है।

    अनंत सौंदर्य का सृजन-

    संयोजन की दृष्टि से किशनगढ़ के चित्र एक विशाल काव्य चित्र से प्रतीत होते हैं जिसमें प्रकृति के सौंदर्य को बहुत ही सहजता से चित्रित किया गया है। वह चित्र चाहे कृष्ण-राधिका का होली खेलते हुए हो, आपसी संवाद का हो, नौका विहार का हो, सघन कुंज का हो, सभी में अनंत सौंदर्य का सृजन किया गया है। इन चित्रों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकार की दृष्टि भक्ति में इतनी रची बसी थी कि वह प्रकृति के आध्यात्मिक सौन्दर्य का आनंद लेता था। इस शैली के आलेखन तथा तूलिका की गतिशीलता को दृष्टि पथ पर रख कर देखें तो स्वर्ग को भी विमुग्ध कर देने वाली इन झाँकियों में कल्पना की ऐसी परादृष्टि है कि पार्थिव जगत में ही बैठकर हम उसका रसपान कर लेते हैं।

    सार रूप में यह कहा जा सकता है कि अपनी रसमयी मनोहारी रंग योजना, आकर्षक एवं गतिमान रेखा-सौंदर्य तथा लावण्यमय संयोजन वैशिष्ट्य के कारण किशनगढ़ शैली के चित्र न केवल भारत में वरन् विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। काव्य और कला का जो संगम हम किशनगढ़ शैली में पाते हैं वह अद्वितीय है।


    किशनगढ़ शैली के कतिपय विशिष्ट चित्र

    किशनगढ़ के कलाकारों को भक्तिभाव ही चित्र और काव्य के लिये सहज लगा और कई चित्र पूजा अर्चना के बनते गये जिनमें प्रमुख चित्र राजा नागरीदास की उपासना 1739 ई. का है। यह चित्र भक्ति भाव की दृष्टि से बहुत ही श्रेष्ठ है। इसमें नागरीदास को अपने महल में प्रातःकालीन पूजा करते हुए दिखाया गया है। पास ही पूजा की सामग्री रखी हुई है। बणीठणी को भी हाथों में फूलों की माला लेकर पूजा करने के लिये आते हुए दर्शाया गया है। उसके वस्त्रों और चेहरे पर ताजगी है। उसे साड़ी पहने हुए दिखाया गया है। पर्दे, फर्श, आदि पर सुंदर अलंकरण किया हुआ है। स्थापत्य सादगी लिये हुए है। प्राकृतिक वातावरण बहुत ही सहज और शांत है। वृक्षों पर बंदरों को दिखाया गया है। बीच में तुलसी का पौधा है, उस पर फूलों की माला चढ़ी हुई है। बणीठणी के पीछे कुछ सखियां पूजा की अन्य सामग्री लिये हुए दिखायी गई हैं। महलों की दीवारें सफेद रंग की दिखाई गई हैं। वस्त्रों में पीला रंग प्रदर्शित किया गया है। इस चित्र में नागरीदास को गौरवर्ण का दर्शाया गया है।

    एक अन्य चित्र ‘‘राजा सावंतसिंह की पूजा और बणीठणी’’ 1740 ई. का है। इस चित्र में गोपिकाएं नहीं हैं और सामने खिड़की में कोई आकृति नहीं दिखायी गई है। बणीठणी पीले रंग की साड़ी पहने फूलों की माला हाथ में लिये हुए है। सामने नागरीदास को माला फेरते हुए दिखाया गया है। अग्रभूमि में कमल दल चित्रित किये गये हैं। बीच में संगमरमर का बना फुहारा दिखाया गया है। इस चित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नागरीदास को श्यामवर्णी दिखाया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जिस समय यह चित्र बना उस समय राजा पूर्ण रूप से अपने आराध्य में रचबस गया था। आंखों को बहुत ही आध्यात्मिक बनाया गया है जो भक्ति द्वार तक पहुंचने का श्रेष्ठ माध्यम है। यहां तक कि चित्रकार को भी वे कृष्ण रूप में ही दिखाई दिये। तभी तो चित्रकार की तूलिका ने आध्यात्मिक सृजन कर भक्तिमय वातावरण 
    रंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया।

    कृष्ण और राधा की उपासना चित्र में कृष्ण और राधा को विशेष सिंहासन पर बैठे हुए दिखाया गया है। गोपिकाएं उनकी पूजा अर्चना के लिये फूल माला इत्यादि सामग्री लेकर आते हुए दिखाई गई हैं। पृष्ठभूमि में कदली तथा आम आदि वृक्षों को बनाया गया है। आराध्य युगल के रूप चित्रण में प्रकृति के नाना उपमानों का आश्रय लिया है। उन्होंने प्रकृति के साथ मानवीय भावों की सम्बद्धता चित्रित की है। कृष्ण लीलाओं और प्रकृति की इस अद्भुत स्थिति के ही कारण उन्होंने कृष्ण के लीला धाम का अलौकिक रूप चित्रित किया है जो भक्तों की दृष्टि में लोकोत्तर आनंद प्रदान करने वाला है। चित्र को देखने से शांत रस और भक्ति रस की धारा के दर्शन होते हैं। यही चित्रकार की तूलिका और उसके आंतरिक भाव का सहज रूप है जो चित्रों की प्रमुख विशेषता है।

    भारत की मोनालिसा-

    महाराजा राजसिंह की रानी बांकावती, बनीठनी को दिल्ली से तीन पैसे में खरीद कर लाई थीं। उस समय बनी ठनी की आयु केवल 10 वर्ष थी। वह संगीत एवं काव्य मंे पारंगत थी। उसे नागरीदास ने अपनी प्रेयसी बनाया तथा उसे राधाजी मानकर उसकी आराधना की थी। उसके सौंदर्य को लक्ष्य करके नागरीदास ने बनीठनी के चित्र बनाये। निहाल चंद ने भी उसके रूप के आधार पर राधा का मौडल तैयार कर लिया था। इसकी अभिव्यक्ति हर चित्र में हुई। इस ऐरिक डिकिंस ने भारतीय मोनालिसा कहा। 5 मई 1973 को भारत सरकार ने निहाल चंद के बनाये चित्र बनीठनी पर डाक टिकट जारी किया जिसकी पचास लाख प्रतियां जारी की गईं। इस चित्र ने पूरे विश्व में कला प्रेमियों में हलचल मचा दी। उनका ध्यान भारतीय कला की ओर खिंचा। उसमें भी प्रमुख रूप से किशनगढ़ शैली विश्व पटल पर पुनः प्रतिष्ठिति हुई। एक बार फिर निहालचंद की तूलिका ने सदियों बाद विश्व में परचम लहराया। इसी कारण पूरी दुनिया के कला प्रेमी एवं पर्यटक भारत खिंचे चले आते हैं। कुछ इतिहासकारों ने बनीठनी को नागरीदास की पासवान बताया है जबकि जयसिंह नीरज के अनुसार वह कभी भी नागरीदास की पासवान नहीं रही। वह अवश्य ही गायण और कवयित्री थी। बनीठनी का चित्रकला संसार में उतना ही आदरपूर्ण स्थान है जितना राधारानी और मोनालिसा का।

    निहालचंद-

    किशनगढ़ शैली का समृद्धकाल सावंतसिंह और उसके समकालीन कलाकार निहाल चंद को ही जाता है। कलाकार समाज का दर्पण होता है। उसके आसपास जो घटित होता है, वह उसे ही चित्रित करता है। सावंतसिंह ने निहालचंद तथा उसके पुत्रों- सीताराम और सूरजमल को अपने दरबार में नौकरी पर रखा। निहालचंद थे तो दरबारी चित्रकार किंतु उन्हें सानिध्य मिला नागरीदास का। वातावरण मिला भक्तिभाव का, फिर क्या था, आराधना की परत दर परत सृजित होती गई। भक्ति के लिये मानव मन के अनन्त भाव माध्यम हो सकते हैं। निहालचंद ने सैंकड़ों चित्रों का सृजन किया। निहालचंद ने चित्रांे में भक्तिभाव को सहज रूप में धारण करने का माध्यम नेत्रों को ही माना है। निहालचंद के बनाये चित्र बणीठणी को एरिक डिकिन्सन ने राजस्थान की मोनालिसा कहकर उसका आदर किया। किशनगढ़ की चित्रशैली के इतिहास में महाराजा नागरीदास और चित्रकार निहालचंद का वही स्थान है जो कांगड़ा की शैली में महाराजा संसार चंद और उनके कलाकारों का है। नागरीदास और निहालचंद के चित्र स्वयं में एक शैली बन गये। इस शैली के अन्य प्रमुख चित्रकारों के नाम इस प्रकार हैं- भवानीदास, अमरचंद, सूरतराम, सीताराम, बदनसिंह, नानगराम आदि।

    एरिक डिकिन्सन तथा कार्ल खण्डालावाला-

    किशनगढ़ की चित्रकला को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिकन्स तथा कार्ल खंडालावाल को जाता है। उनके प्रयासों से किशनगढ़ की चित्रकला की ख्याति विश्व के कई देशों तक पहुंची तथा विश्व भर के पर्यटक किशनगढ़ की ओर आकर्षित हुए। एरिक डिकिन्सन लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के व्याख्याता थे। वे भारतीय संस्कृति के महान प्रशंसक थे। वे यहां के खान-पान, ढीली पोशाक तथा हिन्दी कविता से भी बहुत लगाव रखते थे। 1943 ई. में जब वे अजमेर के मेयो कॉलेज में शैक्षणिक भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने किशनगढ़ राजघराने की चित्रकला के खजाने को भी देखा। राजाओं की पेंटिंग, व्यक्तिचित्र, और सामान्य चित्रों को देखकर वे उनसे सम्मोहित हो गये। विषय वस्तु शारीरिक बनावट, रंग संयोजन आदि की दृष्टि से ये चित्र अन्य शैलियों से अलग थे। ऐरिक के प्रयत्नों से राष्ट्रीय संग्रहालय में कुछ चयनित चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। तभी से किशनगढ़ की चित्रकला की देश-विदेशों में ख्याति फैल गई। -

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 41

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 41

    सरदार पटेल ने हैदराबाद राज्य को भारत में मिला लिया


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    15 अगस्त 1947 तक भारत में न मिलने वाली दूसरी रियासत हैदराबाद थी। हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में मुगल सूबेदार चिनकुलीजखाँ ने की थी। उसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई.1798 में हैदराबाद रियासत ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि (सबसीडरी एलायंस) की। हैदराबाद निजाम को अंग्रेज सरकार द्वारा 21 तोपों की सलामी दी जाती थी।

    भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,14,190 वर्ग किलोमीटर था। यह भारत का सबसे बड़ा तथा सबसे समृद्ध देशी राज्य था। क्षेत्रफल में वह फ्रांस जितना बड़ा था। हैदराबाद राज्य की जनसंख्या लगभग 1,63,40,000 थी। वर्तमान में स्थित महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश प्रांतों के भू-भाग, हैदाराबाद राज्य में स्थित थे। जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु राज्य की 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। हैदराबाद राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी।

    निजाम को भारत का सबसे अमीर शासक माना जाता था। निजाम प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था। निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे। राज्य की समस्त नौकरियां मुसलमानों के लिये आरक्षित थीं। ई.1947 में हैदाराबाद में एक विधान सभा बनाई गई जिसमें 48 पद मुसलमानों के लिये तथा 38 पद हिन्दुओं के लिये रखे गये ताकि कोई कानून ऐसा न बन सके जो मुसलमान रियाया के अधिकारों के विरुद्ध हो। इस विधानसभा को इतने अधिकार दिये गये कि यदि निजाम स्वयं भी चाहे तो मुसलमान रियाया के अधिकारों में कटौती न कर सके। निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति, ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था। इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था।

    निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा। जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। निजाम, लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा। हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि- 'हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।'

    9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने मन की अकुलाहट को खुलकर व्यक्त किया- 'पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां क्लॉज जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया। यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करता है बल्कि यह आभास भी देता है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा। जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही। इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है। मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया। आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले। मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये। लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है। मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।'

    इस पर वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा। ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद के लिये एक ही रास्ता है कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाये किंतु हैदराबाद के अधिकारियों एवं कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर चल रहे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के अधिकारियों ने नवाब को सलाह दी कि वह वायसराय की सलाह को न माने। 7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने सरदार पटेल के निर्देश पर हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। निजाम ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने के लिये रियासती पुलिस के साथ-साथ कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक हो गया। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।

    वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में निजाम ने भारत के साथ 'स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट' पर दस्तख्त कर दिये जिसके अनुसार भारत और हैदराबाद के बीच पोस्ट ऑफिस, टेलिग्राफ, रेल, सड़क यातायात एवं व्यापार आदि सुचारू रूप से जारी रहें परन्तु निजाम, भारत संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा। निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकरों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ताकि वे रियासत छोड़कर भाग जायें।

    रजाकारों की हिंसक वारदातों से रियासत में शान्ति एवं व्यवस्था बिगड़ गई। हैदराबाद रियासत से होकर गुजरने वाले रेलमार्गों तथा सड़कों को क्षतिग्रस्त किया जाने लगा तथा रेलों एवं बसों से यात्रा करने वाले हिन्दुओं को लूटा जाने लगा। इससे स्थिति बहुत खराब हो गई। मुस्लिम रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भारत सरकार को धमकी दी कि वे सम्पूर्ण भारत को जीतकर दिल्ली के लाल किले पर निजाम का आसफजाही झण्डा फहरायेंगे। इसके बाद हैदराबाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्याएं की जाने लगीं तथा उनकी सम्पत्ति को लूटा अथवा नष्ट किया जाने लगा। माउण्टबेटन, सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने निजाम को समझाने का प्रयास किया परन्तु अब स्थिति निजाम के नियन्त्रण में भी नहीं रही थी। रजाकार और कट्टर मुल्ला-मौलवी, मुसलमान जनता को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे थे।

    सरदार पटेल और वी. पी. मेनन तब तक चुप रहे जब तक कि माउण्टबेटन इंग्लैण्ड नहीं लौट गये। जून 1948 में माउण्टबेटन के इंग्लैण्ड लौट जाने के दो माह बाद, सितम्बर 1948 में निजाम ने घोषणा की कि वह माउण्टबेटन योजना को स्वीकार करने के लिये तैयार है। इस पर 13 सितम्बर 1948 को पटेल ने उत्तर दिया- 'अब बहुत देरी हो चुकी। माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है।' उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे। इसलिये उन्होंने उसी दिन भारतीय सेना को हैदराबाद को भारत में एकीकृत करने के आदेश दिये। इस कार्यवाही को ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया।

    मेजर जनरल जोयन्तोनाथ चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना हैदराबाद में प्रवेश कर गई। पांच दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने मुस्लिम रजाकारों के प्रतिरोध को कुचल डाला। हजारों रजाकार मारे गये। पूरे हैदराबाद में रजाकरों के शव पड़े हुए दिखाई देने लगे। 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद के सेनापति जनरल ई.आई. एड्रूस ने सिकंदराबाद में जनरल चौधरी के समक्ष समर्पण कर दिया। इस प्रकार केवल 5 दिन की सशस्त्र-कार्यवाही में हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था। 18 सितम्बर को मेजर जनरल चौधरी ने हैदराबाद रियासत के सैनिक गवर्नर का पद संभाल लिया। हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया। विवश होकर निजाम को नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी। सरदार पटेल ने उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया। उसे रियासत का मानद मुखिया बना रहने दिया गया। बाद में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो हैदराबाद रियासत को तोड़कर उसके क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र प्रांतों में मिला दिये गये।

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