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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 2 इण्डोनेशिया का इतिहास - 2

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 2  इण्डोनेशिया का इतिहास - 2

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 2



    संजय राजवंश (माताराम राज्य)

    संजय राजवंश एक प्राचीन जावाई राजवंश था। इस वंश के राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की, वह माताराम राज्य कहलाया। संभवतः जावा द्वीप की मातृ-सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण इस राज्य को माताराम कहा गया। माताराम राज्य की स्थापना ब्रांटाज नदी की घाटी में हुई थी। यहाँ की भूमि उपजाऊ थी और खेती प्रचुरता से होती थी। कंग्गल लेख के अनुसार इस राजवंश की स्थापना ई.732 में संजय नामक राजा ने की। यह शिलालेख मागेलांग नामक नगर के दक्षिण-पश्चिम में मिला है। इसकी लिपि दक्षिण भारत के तत्कालीन पल्लव शासकों द्वारा प्रयुक्त होने वाली लिपि है तथा इसकी भाषा संस्कृत है। इस शिलालेख में कुंजरकुंजा क्षेत्र की पहाड़ी पर शिवलिंग स्थापित किए जाने के बारे में जानकारी दी गई है। इस शिलालेख में कहा गया है कि राजा सन्न ने इस द्वीप पर फिर से अधिकार किया तथा उसने लम्बे समय तक बुद्धिमत्ता पूर्वक एवं कौशल पूर्वक राज्य किया।


    राजा सन्न की मृत्यु के बाद राजवंश की एकता भंग हो गई जिससे राज्य खण्डित होने लगा किंतु स्वर्गीय राजा सन्न की बहिन सन्नह के पुत्र संजय ने सत्ता संभाली। उसने राज्य में धर्म, साहित्य तथा विविध कलाओं का प्रचार किया तथा सैन्य शक्ति में वृद्धि की। उसने आसपास के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया तथा जनता को सुखी एवं समृद्ध बनाने का प्रयास किया। राजा सन्न एवं संजय को ''चरित परहयंगान'' भी कहा जाता है। पश्चवर्ती काल की एक पुस्तक के अनुसार राजा सुन्न को गलुह के राजा पुरबासोरा ने परास्त कर दिया। इसलिए उसे मेरापी के पर्वत में शरण लेनी पड़ी। संजय ने उसके खोए हुए राज्य को फिर से जीता तथा पश्चिमी जावा, मध्य जावा, पूर्वी जावा एवं बाली तक अपना राज्य फैला लिया।

    संजय ने मलयु तथा केलिंग परह्यंगान के राजा ''संग श्रीविजय'' से भी युद्ध किया। इसके बाद की अवधि में शैलेन्द्र राज्य द्वारा संजय राज्य को उत्तरी जावा में धकेल दिया गया। कालासन शिलालेख के अनुसार शैलेन्द्र राज्य का उत्थान ई.778 के लगभग हुआ था। इस काल में संजय राज्य एवं शैलेन्द्र राज्य एक दूसरे के पड़ौस में स्थित थे और यह काल शांति, सहयोग एवं सहअस्तित्व से युक्त था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संजय राजवंश नामक कोई वंश नहीं था, केवल शैलेन्द्र राजवंश था जो मध्य जावा में शासन करता था। इस राज्य को मेदांग कहा जाता था। इसकी राजधानी माताराम क्षेत्र में थी तथा इसके शासक शैलेन्द्र वंश के थे। संजय वंश के राजा भी इसी शैलेन्द्र राजवंश से निकले थे।

    संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातान का विवाह शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी (ई.833-56) से हुआ। समय के साथ संजय राजवंश का प्रभाव माताराम राज्य में बढ़ता गया तथा वे बौद्ध धर्म मानने वाले शैलेन्द्र राज्य को प्रतिस्थापित करते रहे। राकाई पिकातान ने शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग के पुत्र बालापुत्र को उसके राज्य से निकाल दिया जो कि राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी का भाई था। जब मध्य जावा से शैलेंद्र वंश के राजा बालापुत्र का राज्य समाप्त हो गया तो वह भाग कर सुमात्रा चला गया। सुमात्रा में श्री विजय वंश के राजा राज्य करते थे। बालापुत्र ने श्री विजय साम्राज्य के तत्कालीन राजा को परास्त करके अपने अधीन कर लिया और स्वयं सुमात्रा का परमोच्च शासक बन गया।

    राजा पिकातान के काल में जावा में शैव धर्म को पुनः राजकीय प्रश्रय प्राप्त हुआ तथा यह संरक्षण मेदांग राज्य के अंत होने तक जारी रहा। संजय वंश के हिन्दू राजाओं ने मध्य जावा में विश्वविख्यात शिव मंदिर बनवाया तथा जावा द्वीप पर हिन्दू संस्कृति का प्रसार किया। राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी ने 9वीं शताब्दी ईस्वी में विश्व प्रसिद्ध बोरोबुदुर बौद्ध विहार बनवाया। योग्यकार्ता, सुराकार्ता तथा मध्य जावा, माताराम राज्य के प्रमुख केन्द्र थे। यह अत्यंत ऊर्वर क्षेत्र में स्थित था इसलिए इस राज्य में परमबनन तथा बोरोबुदुर जैसे विशाल मंदिरों का निर्माण संभव हो सका। ई.850 तक संजय राजवंश, सम्पूर्ण माताराम राज्य का शासक बन गया।

    ई.907 के बालितुंग शिलालेख से भी संजय राजवंश की जानकारी मिलती है। इसके अनुसार जब संजय वंश का कोई राजा मर जाता था तो वह दिव्य रूप धारण कर लेता था। इसी शिलालेख के आधार पर संजय राजवंश के राजाओं की सूची तैयार की गई है। ई.929 में संजय वंश का राजा मपु सिंदोक, माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्व जावा में ले गया। इसका कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान किया जाता है कि मेरापी ज्वालामुखी के फट पड़ने के कारण ऐसा किया गया होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सुमात्रा के श्री विजय राज्य द्वारा मध्य जावा पर आक्रमण कर देने के कारण राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले जाना पड़ा होगा। इसके साथ ही मध्य जावा से संजय राजवंश का शासन समाप्त हो गया तथा पूर्वी जावा में इस्याना नामक नवीन राजवंश का उदय हुआ।

    चम्पा से सम्बन्ध

    जावा राज्य का चम्पा राज्य से निकट का सम्बन्ध था जो कि दक्षिण-पूर्वी एशिया की मुख्य भूमि पर स्थित था। यह सम्बन्ध संजय राजवंश के उदय होने तक बना रहा। चम्पा के लोग चम कहलाते थे और उन्हें भारतीयकृत ऑस्ट्रोनेशियाई माना जाता है। मध्य जावा के द्वीप पर संजय राजवंश के काल में निर्मित मंदिरों की अनेक स्थापत्य विशेषताओं को चम मंदिरों में देखा जा सकता है।

    इस्याना राजवंश

    जावा द्वीप के माताराम हिन्दू राज्य के नए शासक वंश को इस्याना राजवंश कहा जाता है जिन्होंने संजय राजवंश के बाद सत्ता संभाली। इसकी स्थापना मपु सिंदोक ने की जो माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले गया। चोइदेस नामक लेखक ने लिखा है कि सिंदोक ने श्री इस्याना (विक्रमाधर्मोत्तुंगदेव) के नाम से पूर्वी जावा में नए राजवंश की स्थापना की। उसकी पुत्री इस्याना तुंगविजय, मपु सिंदोक की उत्तराधिकारी हुई। इस्याना तुंगविजय के बाद इस्याना तुंगविजय का पुत्र मकुतावंशवर्द्धन पूर्वी जावा का राजा हुआ। उसके बाद धर्मवंग्सा उसका उत्तराधिकारी हुआ। इस्याना राजवंश के काल में ई.996 में भारत-युद्ध गाथा का जावाई भाषा में अनुवाद किया गया। ई.1016-17 में सुमात्रा द्वीप के श्री विजय साम्राज्य के राजा ने जावा द्वीप पर आक्रमण किया तथा राजा धर्मवंग्स की राजधानी को नष्ट कर दिया। इस युद्ध में इस्याना राजवंश समाप्त हो गया।

    केदिरी वंश (काहुरिपन राज्य)

    ई.1019 में ऐरलंग्गा ने मेदांग राज्य को फिर से इकट्ठा किया तथा काहुरिपन नामक नया राज्य अस्तित्व में आया। ऐरलंग्गा ई.1042 तक शासन करता रहा। ऐरलिंग्गा के वंशज केदिरी कहलाए। माना जाता है कि काहुरिपन नामक राज्य, इस्याना राज्य की ही निरंतरता में था। केदिरी राजवंश ई.1222 तक शासन करता रहा।

    सिंघसरी वंश

    ई.1222 में जावा के केदिरी राजा नष्ट हो गए तथा सिंघसरी राजवंश अस्तित्व में आया। वे ई.1292 तक शासन करते रहे। इस क्षेत्र को वर्तमान में मलांग कहते है।

    मजापहित साम्राज्य

    ई.1294 में जावा में विजय नामक राजा ने मजापहित साम्राज्य की स्थापना की। यह इण्डोनेशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी त्रोवुलान थी जो सुराबाया के निकट स्थित थी। ई.1350 में इस वंश में हायम वुरुक नामक राजा हुआ जो इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था। उसका मंत्री 'गजह मद' वीर एवं बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने शपथ ग्रहण की कि जब तक वह सम्पूर्ण इण्डोनेशिया द्वीप समूह को मजापहित साम्राज्य के अधीन नहीं लाएगा, तब तक वह अपने भोजन में पलापा (मसाले) का उपयोग नहीं करेगा। निश्चत ही उसने अपनी शपथ पूरी की जिसके कारण मजापहित साम्राज्य में वह सम्पूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हो गया जो वर्तमान में इण्डोनेशिया गणतंत्र में सम्मिलित है। हालांकि उसका प्रत्यक्ष नियंत्रण केवल जावा, बाली एवं मदुरा पर था।

    हायम वुरुक ई.1389 तक शासन करता रहा। जब बीसवीं सदी में इण्डोनेशिया ने अपना पहला सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा तो उसका नाम गजह मद के सम्मान में पलापा रखा गया। यह राजवंश ई.1478 तक हिन्दू राजवंश के रूप में शासन करता रहा।

    देमक राज्य (मध्य जावा)

    ई.1478 के पश्चात् जावा में इस्लाम की आंधी चलने लगी जिसके क्रूर झौंकों से मजापहित साम्राज्य के हिन्दू राजाओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और सत्ता का केन्द्र मध्य जावा के सेमारांग से 30 किलोमीटर पूर्व में चला गया। यह जावा की हजारों साल पुरानी संस्कृति के लिए बहुत बड़ा आघात था। हजारों हिन्दू परिवार जावा द्वीप छोड़कर भाग गए और उन्होंने बाली द्वीप में ब्रोमो पर्वत (टेंगेर) के निकट जाकर शरण ली। पंद्रहवीं शताब्दी में जावा के लोगों ने जब इस्लाम स्वीकार किया तो एक बार पुनः जावा की संस्कृति में बदलाव आया और हिन्दू-जावाई संस्कृति में इस्लाम ने प्रवेश करके जावा की वर्तमान संस्कृति को जन्म दिया। देमक राज्य का पहला राजा रादेन पाताह था। उसका पिता मजापहित वंश का अंतिम राजा था तथा माता जेआम्पा, एक मुस्लिम स्त्री थी। दूसरा राजा पातिउनूस और तीसरा राजा ट्रेंग्गोनो हुआ।

    हिन्दू राज्य केलापा का पतन

    देमक राज्य में नौ ''वली सोंगो'' नामक इस्लामिक नेता हुए जिन्होंने जावा द्वीप पर इस्लाम को फैलाया। ई.1527 में देमक सुल्तानों ने जावा द्वीप के अंतिम हिन्दू राज्य ''केलापा'' को भी जीत लिया और उसका नाम ''जयकार्ता'' रखा जो अब ''जकार्ता'' कहलाता है। उन्हीं दिनों उत्तर भारत का सर्वाधिक प्रबल-प्रतापी हिन्दू शासक महाराणा सांगा, बर्बर मुस्लिम आक्रांता बाबर के हाथों पराजित हुआ।

    पाजांग राज्य

    ट्रेंग्गोनो का जामाता जोको टिंग्किर, देमक राज्य का अंतिम शासक सिद्ध हुआ। वह ई.1540 में देमक राज्य की राजधानी सोलो से 10 किलोमीटर पश्चिम में पाजांग में ले गया। वह टिंग्किर गांव का रहने वाला जोको (लड़का) था इसलिए उसे जोको टिंग्किर कहा जाता था।

    मुस्लिम माताराम राज्य (द्वितीय)

    माताराम राज्य (द्वितीय) में योग्यकार्ता तथा सुराकार्ता नामक क्षेत्र स्थित थे। पानेमबाहान सेनोपति माताराम (द्वितीय) राज्य का पहला राजा था। वह ई.1584 में राजा बना तथा ई.1601 तक राज्य करता रहा। उसका पिता पेमानाहान (की अगेंग माताराम) पाजांग राज्य का प्रमुख योद्धा था। उसका पड़दादा मजापहित राज्य का अंतिम राजा था। पानेमबाहान का अर्थ होता है दोनों हाथ जोड़कर नाक से स्पर्श करते हुए आदर पूर्वक प्रणाम करना। प्राचीन जावाई संस्कृति में बड़ों को प्रणाम करने का यही तरीका रहा है।

    सुल्तान पानेमबाहान का जावा में बहुत सम्मान था। उसके बचपन का नाम सुतोविजोयो था। उसकी जादुई शक्तियों और रहस्यमयी कारनामों की कहानियां कही जाती हैं। जिस महल में वह साधना करता था तथा अलौकिक शक्तियां प्राप्त करता था, वह योग्यकार्ता से 5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। उसकी कब्र पर प्रतिवर्ष हजारों यात्री तीर्थयात्रा करते हैं तथा इसे माताराम साम्राज्य का पवित्र स्थल माना जाता है। ई.1613-45 तक इस वंश में आगुंग हान्योक्रोकुसुमो नामक शक्तिशाली राजा हुआ। उसकी मृत्यु के बाद माताराम राजवंश का ह्रास होने लगा।

    जावा की प्राचीन संस्कृति पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव

    जावा के प्राचीन साहित्य, कला एवं संस्कृति पर भारतीय साहित्य, कला एवं संस्कृति का प्रभाव प्रभूत मात्रा में देखा जा सकता है। जावा द्वीप पर बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू मंदिरों के खण्डहर बिखरे पड़े हैं। मध्य जावा में स्थित लारा जोंग्गरांग का मंदिर भारतीय शैली में बना है जिसमें राम कथा और कृष्णलीला के प्रसंग उत्कीर्ण हैं। जावा द्वीप की प्रतिमाओं में भारतीय आभूषणों की भरमार है जिनमें काल-मकर अधिक लोकप्रिय है। जावा का धार्मिक साहित्य रामायण एवं महाभारत की कथाओं पर आधारित है। भारतीय उपनिषदों का अध्यात्म एवं दर्शन तथा बाद के युगों में उत्पन्न होने वाले तांत्रिक विधानों का भी जावा की संस्कृति पर बहुतायत से प्रभाव है। शिव एवं विष्णु की संयुक्त प्रतिमाएं भी जावा द्वीप पर मिली हैं।

    जावा की कविताओं एवं गीतों पर भी भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है। जावा के राजाओं के नाम भी भारतीय राजाओं से मिलते-जुलते हैं। उनके दरबारों में भी भारतीय राजपरम्पराएं प्रचलित थीं। वर्तमान में जावा द्वीप में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहने के कारण हिन्दू संस्कृति के चिह्न विलुप्त प्रायः हैं किंतु हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के कुछ शब्द जावा द्वीप पर आज भी प्रचलित हैं जो भारत से जावा के प्राचीन सम्बन्धों के मुंह बोलते प्रमाण हैं।

    बोर्नियो में हिन्दू संस्कृति

    शंखद्वीप (बोर्नियो) में हिन्दू संस्कृति का प्रसार पहली शताब्दी इस्वी में आरम्भ हुआ। चौथी शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजाओं ने बोर्नियो में अपनी सत्ता स्थापित की। बोर्नियो से चौथी शताब्दी ईस्वी के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिनसे बोर्नियो में उस काल में वैदिक धर्म के अस्तित्व में होने के साक्ष्य मिलते हैं। पांचवी शताब्दी ईस्वी में बोर्नियो एवं सुमात्रा द्वीपों पर जावा के शैलेन्द्र राजवंश का अधिकार हो गया। बोर्नियो में प्राप्त होने वाले खण्डहरों से भगवान शिव एवं बुद्ध की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। लकड़ी का एक मंदिर भी प्राप्त हुआ है। बोर्नियो के स्थापत्य एवं कला पर भारतीय प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।

    सुमात्रा में बौद्ध धर्मानुयायी श्री विजय राजवंश

    प्राचीन भारतीय संस्कृत साहित्य में सुमात्रा द्वीप को स्वर्णदीप तथा स्वर्णभूमि कहा गया है क्योंकि इस द्वीप के ऊपरी क्षेत्रों में स्वर्ण धातु के विशाल भण्डार उपलब्ध थे। सुमात्रा में चौथी शताब्दी ईस्वी में भारतीय राजाओं ने अपने राज्य स्थापित किए। चीनी सदंर्भों के अुनसार सुमात्रा के श्री विजयन वंश के राजा ने ई.1017 में अपना दूत चीन के राजा के पास भेजा था। 10वीं शताब्दी ईस्वी से 13वीं शताब्दी ईस्वी के काल में अरब भूगोलवेत्ताओं ने इस द्वीप के लिए लामरी अथवा लामुरी शब्द का प्रयोग किया है।

    13वीं शताब्दी इस्वी में मार्को पोलो ने इसे सामारा अथवा सामारचा कहा। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में विदेशी यात्री ऑडोरिक ऑफ पोरडेनोन ने समुद्र के लिए सुमोल्त्रा शब्द का प्रयोग किया। इसके बाद यूरोपीय लेखक इस द्वीप के लिए यही शब्द प्रयुक्त करने लगे। 14वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में इस द्वीप पर ''समुद्र पासी'' (समुद्र के पास) नामक राज्य की स्थापना हुई। यही ''समुद्रपासी'' बाद में सुमात्रा कहलाने लगा। बाद में इस राज्य को मुसलमानों ने समाप्त कर दिया तथा अचेह सल्तनत की स्थापना की। अचेह के सुल्तान अलाउद्दीन शाह ने ई.1602 में इंगलैण्ड की रानी एलिजाबेथ प्रथम को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपना परिचय ''अचेह तथा सामुद्रा का सुल्तान'' के रूप में दिया है।

    मेलायु राज्य को श्री विजय वंश के राजाओं ने समाप्त कर दिया। श्री विजय राजवंश बौद्ध धर्म को मानने वाले राजा थे। ये पालेमबांग के निकट केन्द्रित थे। सुमात्रा के राजाओं ने 7वीं से 9वीं शताब्दी ईस्वी तक इण्डोनेशिया द्वीप समूह में मलय संस्कृति का प्रसार किया। श्री विजय साम्राज्य के लोग समुद्री द्वीपों में व्यापार किया करते थे। श्री विजय राजाओं के काल में पालेमबांग शिक्षा एवं विद्या का उन्नत केन्द्र था तथा यहाँ चीन के बौद्ध भिक्षु, तीर्थयात्रा के लिए आया करते थे। चीनी बौद्ध यात्री चिंग ने ई.671 में भारत जाने से पहले सुमात्रा में संस्कृत भाषा का अध्ययन किया। जब वह भारत यात्रा के बाद चीन लौट रहा था तो एक बार पुनः सुमात्रा द्वीप पर रुका और वहाँ उसने अनेक बौद्ध ग्रंथों का चीनी में अनुवाद किया।

    श्री विजय वंश के राजाओं को 11वीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के चोल राजाओं से परास्त हो जाना पड़ा। इससे श्री विजय राजवंश कमजोर पड़ गया और इस्लाम को सुमात्रा में प्रवेश करने का अवसर मिल गया। हालांकि अरब और भारत के मुस्लिम व्यापारी 6ठी एवं 7वीं शताब्दी ईस्वी से सुमात्रा में व्यापार करने आते थे। 13वीं शताब्दी के अंत में समुद्रा के हिन्दू राजा को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा तथा वे श्री विजय के स्थान पर अचेह सल्तनत कहलाने लगे। ई.1292 में मार्को पोलो तथा ई.1345-46 में इब्न बतूता ने सुमात्रा द्वीप की यात्रा की तथा उन्होंने अचेह सल्तनत को देखा।

    बीसवीं शताब्दी ईस्वी तक अचेह सल्तनत अस्तित्व में रही। बाद में सुमात्रा द्वीप के बहुत से राज्य डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों अपनी स्वतंत्रता खो बैठे लेकिन अचेह सल्तनत ई.1873 से 1903 तक डचों से लोहा लेती रही।

    ई.1903 में अचेह सल्तनत का पतन हो गया और सम्पूर्ण सुमात्रा द्वीप डचों के अधिकार में चला गया। इसके बाद से सुमात्रा डचों के लिए काली मिर्च, रबर तथा तेल का मुख्य उत्पादक द्वीप बन गया। सुमात्रा के अनेक विद्वानों एवं स्वतंत्रता सेनानियों ने इण्डोनेशिया के स्वतंत्रता युद्ध में भाग लिया जिनमें मोहम्मद हात्ता तथा सूतन स्जाहरिर प्रमुख थे। इनमे ंसे मोहम्मद हत्ता इण्डोनेशिया गणतंत्र के प्रथम उप राष्ट्रपति एवं सूतन स्जाहरिर प्रथम प्रधान मंत्री बने। ई.1976 से 2005 तक इण्डोनेशियाई सरकार के विरुद्ध स्वतंत्र अचेह आंदोलन चलाया गया। इस संघर्ष में वर्ष 2001 एवं 2002 में सुमात्रा द्वीप के हजारों नागरिक मारे गए। उत्तरी सुमात्रा में सात हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं। इन पर भारतीय मंदिर स्थापत्य, धर्म एवं दर्शन का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

    इण्डोनेशियाई द्वीपों के मुसलमानों की संस्कृति

    जावा सहित, इण्डोनेशिया द्वीप समूह के अन्य द्वीपों के मुसलमान, अरब तथा पश्चिम एशिया के मुसमलानों से काफी भिन्न हैं। चूंकि इन द्वीपों पर मातृ प्रधान सत्ता हुआ करती थी इसलिए मुसलमान बनने के बाद भी इन्होंने पुरुष के स्थान पर स्त्री की प्रधानता को ही स्वीकार किया। यहाँ तलाक देने का अधिकार पुरुष को नहीं होकर, स्त्री को है। अरब तथा पश्चिम एशिया के मुसमलान मूर्ति पूजा नहीं करते जबकि जावा आदि द्वीपों के मुसलमानों ने पूरी तरह से मूर्तियों का परित्याग नहीं किया। यही कारण है कि आज भी इन द्वीपों पर बड़ी संख्या में प्राचीन एवं नवीन मूर्तियां पाई जाती हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 3 इण्डोनेशिया का इतिहास - 3

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 3  इण्डोनेशिया का इतिहास - 3


    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 3



    मसाला द्वीपों से व्यापार के लिए यूरोप में प्रतिस्पर्द्धा

    भारत में गुप्त काल एवं उससे पहले भी ईस्ट-इण्डीज द्वीपों के साथ व्यापार होता आया था। 16वीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत में मुगल शासन की स्थापना हुई, तब भी यह व्यापार बिना किसी बड़ी बाधा के किया जा रहा था। भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ, सूती कपड़ा, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लवंग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें, गेंडे तथा चीते की खाल, चंदन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थे। ये उत्पाद यूरोपीय देशों के साथ-साथ जावा, सुमात्रा, बोड़ा, मलाया, बोर्नियो, अकनि, पेगु, स्याम, बेटम आदि पूर्वी देशों को जाते थे।

    उस काल में भारत से अफीम पेगु (लोअर बर्मा), जावा, चीन, मलाया, फारस एवं अरब देशों को भेजी जाती थी। जिस काल में भारत में मुगल शासन अपनी जड़ें जमा रहा था, उसी काल में यूरोप के छोटे-छोटे देशों में पूर्वी द्वीप समूह के मसाला द्वीपों से व्यापार करने की प्रतिस्पर्द्धा अपने चरम पर पहुंच रही थी।

    यूरोपीय देशों में समुद्रों पर वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्द्धा

    15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप के विभिन्न देशों ने सुदूर देशों के समुद्री मार्गों का पता लगाने का अभियान चलाया ताकि उनके साथ व्यापार किया जा सके। इस अभियान में यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसाला द्वीपों तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाए रखने के लिए वे अन्य यूरोपीय देशों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- 'पुर्तगालियों ने सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।'

    पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिए पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाए नहीं रख सका। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। ई.1580 में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया।

    डच लोग हॉलैण्ड नामक छोटे से यूरोपीय देश में रहा करते थे। यह देश यूरोप में जर्मनी तथा बेल्जियम के बीच स्थित था। बाद में उन्होंने अपने देश का नाम बदलकर नीदरलैण्ड कर लिया। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिए परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई। ई.1602 में डचों ने भारत तथा ईस्ट-इण्डीज द्वीपों से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया।

    पुर्तगाल पर अधिकार कर लेने के कारण समुद्रों में स्पेन की तूती बोलने लगी थी किंतु ई.1588 में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिए उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया। अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया।

    भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। फ्रांस भी पुर्तगाल, नीदरलैण्ड, स्पेन तथा इंग्लैण्ड की तरह समुद्री रास्तों पर अपना दबदबा स्थापित करने के प्रयास करता रहता था किंतु फ्रांस देश के भीतर ही अशांति से गुजर रहा था इसलिए वह इस स्पर्द्धा में पीछे रह गया। ई.1604-19 के मध्य फ्रांस की सरकार ने दो बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की किन्तु ये कम्पनियाँ असफल रहीं। लुई चौहदवें के शासनकाल में उसके मंत्री कालबर्ट ने ई.1644 में तीसरी बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी को भारत तथा ईस्ट-इण्डीज देशों में व्यापार के साथ-साथ उपनिवेश स्थापित करने तथा ईसाई धर्म का प्रसार करने का काम सौंपा गया।

    मसाला द्वीपों के लिए पुर्तगालियों एवं डचों में संघर्ष

    पुर्तगालियों ने ई.1511 में मलक्का पर अधिकार कर लिया तथा शीघ्र ही वे ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपना दबदबा स्थापित करने में सफल हो गए। हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) के डच व्यापारियों को ईस्ट-इण्डीज देशों के मसाले पुर्तगाल के बाजारों से खरीदने पड़ते थे किंतु जब ई.1580 में पुर्तगाल पर स्पेन ने कब्जा जमा लिया और ई.1588 में स्पेन को इंग्लैण्ड ने पीट दिया तब डच लोगों ने सीधे ही ईस्ट-इण्डीज देशों की तरफ कदम बढ़ाने आरम्भ किए। ई.1602 में हॉलैण्ड में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई। वे भारत के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में प्रवेश करने के उद्देश्य से आए थे।

    शीघ्र ही डच लोग पुर्तगालियों पर हावी होने लगे। उन्होंने ई.1605 में अम्बोयाना पर सत्ता स्थापित कर ली तथा ई.1619 में जकार्ता जीतकर इसके खंडहरों पर ''बैटेविया'' नामक नगर बसाया। ई.1639 में उन्होंने भारत में गोवा पर घेरा डाला और इसके दो साल बाद, ई.1641 में पुर्तगालियों से मलक्का भी छीन लिया। ई.1658 में डचों ने सीलोन की अंतिम पुर्तगाली बस्ती पर अधिकार जमा लिया।

    डचों ने भारत के गुजरात प्रांत में कोरोमंडल समुद्र तट, बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अपनी व्यापारिक कोठियां खोलीं। डच लोग मुख्यतः मसालों, नीम, कच्चे रेशम, शीशा, चावल एवं अफीम का व्यापार करते थे। ई.1759 में हुए ''वेदरा के युद्ध'' में अंग्रेजों से हार के बाद डचों का भारत में अंतिम रूप से पतन हो गया किंतु वे ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपना दबदबा बनाए रखने में सफल रहे।

    इण्डोनेशिया पर डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज्य

    18वीं शताब्दी के मध्य में जावा माताराम मुस्लिम राजवंश को अपने क्षेत्र एवं शक्ति डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समक्ष समर्पित करने पड़े। ई.1749 में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी जावा की वास्तविक शासक शक्ति बन गई।

    डचों द्वारा मसाला द्वीपों का शोषण

    डचों ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीपों का भयानक शोषण किया। 16वीं से 18वीं शताब्दी की अवधि में हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) यूरोप का सर्वाधिक धनी देश माना जाता था। इण्डोनेशिया के लोग सदियों से चावल की खेती करते आए थे जो कि उनका मुख्य आहार था किंतु डचों ने उन्हें पकड़कर दास बना लिया और उनसे गन्ना एवं कॉफी की खेती करवाने लगे ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक लाभ अर्जित कर सकें। इस कारण इन द्वीपों पर अनाज की कमी हो गई और भुखमरी फैल गई।

    इण्डोनेशियाई द्वीपों पर नेपोलियन बोनापार्ट का शासन

    ई.1789-99 के बीच फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के समय राजनीतिक एवं सामजिक क्रांति हुई। फ्रांस के नए सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने इण्डोनेशिया सहित पूर्वी एशिया एवं मध्य एशिया के बहुत से द्वीपों पर अधिकार कर लिया तथा इण्डोनेशिया में फ्रांस की प्रभुसत्ता स्थापित हो गई।

    इण्डोनेशियाई द्वीपों पर इंगलैण्ड का शासन

    ई.1811 में ब्रिटेन ने नेपोलियन बोनापार्ट से इण्डोनेशिया छीन लिया। इंग्लैण्ड भी केवल 8 वर्ष तक इण्डोनेशिया पर अधिकार बनाए रख सका। ई.1819 में आयोजित वियेना कांग्रेस में हुए निर्णय के अनुसार इंग्लैण्ड ने इण्डोनेशिया के द्वीप हॉलैण्ड (डचों) को सौंप दिए।


    इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम

    इण्डोनेशिया में डचों के विरुद्ध विद्रोह

    ई.1825 में इण्डोनेशिया की जनता ने डच शासन के विरुद्ध जबर्दस्त विद्रोह किया किंतु इस विद्रोह को कुचल दिया गया। डचों का दमन चक्र इतना क्रूर था कि लगभग 95 वर्ष तक इण्डोनेशिया की जनता शांत बनी रही। प्रथम विश्वयुद्ध (ई.1914-19) में मित्रराष्ट्रों ने लोकतंत्र एवं स्वतंत्रता का नारा दिया। इससे इण्डोनेशिया में भी राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार हुआ किंतु जब विश्वयुद्ध समाप्त हो गया और इण्डोनेशिया को कुछ नहीं मिला तो ई.1920 में जावा और सुमात्रा में डच शासन के विरुद्ध असंतोष फूट पड़ा। शीघ्र ही आंदोलनकारियों में फूट पड़ गई और डच सरकार ने स्वतंत्रता के आंदोलन को पूरी तरह कुचल दिया।

    इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय दल का गठन

    ई.1927 में डच सरकार ने इण्डोनेशिया के शासन में कई सुधार किए तथा संसद की स्थापना की जिसमें से दो तिहाई सांसद जनता द्वारा मनोनीत किए जाने तथा एक तिहाई सांसद डच सरकार द्वारा मनोनीत किए जाने का प्रावधान था। संसद का अध्यक्ष, सरकार द्वारा ही नियुक्त किया जाता था। जनता इन सुधारों से संतुष्ट नहीं हुई तथा उसी वर्ष सुकाणों के नेतृत्व में ''इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय पार्टी'' का गठन किया गया। इस दल ने इण्डोनेशिया में राष्ट्रीय आंदोलन को नए सिरे से आरम्भ किया तथा गांव-गांव में जाकर स्कूल खोले ताकि नवयुवकों को राष्ट्रभक्ति एवं आजादी की शिक्षा दी जा सके। ई.1929 में सरकार ने इस दल पर प्रतिबंध लगा दिया।

    इण्डोनेशियाई द्वीपों पर जापान का अधिकार

    द्वितीय विश्वयुद्ध (ई.1939-45) के दौरान ई.1942 में जापान ने इण्डोनेशियाई द्वीपों पर अधिकार करके सैनिक शासन स्थापित कर दिया। डचों को इण्डोनेशिया खाली करना पड़ा किंतु कुछ द्वीप तब भी उनके अधिकार में रहे। ई.1945 में जब जापान का पतन हुआ तो जापान सरकार ने आत्मसमर्पण करने से पहले इण्डोनेशिया को स्वतंत्र करने की घोषणा की।

    इण्डोनेशियाई गणतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष

    सुकार्णो की इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय पार्टी ने अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति में देश में सरकार बनाने का प्रयास किया किंतु डच लौट आए और उन्होंने इण्डोनेशिया को स्वतंत्र करने से मना कर दिया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अडिग रहे तथा दोनों के बीच वार्तालाप चलता रहा। अंत में 25 मार्च 1947 को लिंगायती (लिंगजाति/लिंग्गाडजती) समझौता हुआ जिसके अनुसार जावा, सुमात्रा और मदुरा में इण्डोनेशियाई गणराज्य को मान्यता दे दी गई।

    सुकार्णो इण्डोनेशिया के समस्त द्वीपों को मिलकार एक देश बनाना चाहता था और डच सरकार चाहती थी कि इण्डोनेशियाई द्वीपों और हौलेण्ड को मिलाकर एक संघ-राज्य बनाया जाए। फलतः दोनों पक्षों में फिर से संघर्ष आरम्भ हो गया। डच सरकार ने सुकार्णो के अधिकार वाले क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया तथा इसे पुलिस कार्यवाही कहा। इस पर भारत तथा ऑस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में उठाया। सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप से जनवरी 1948 में युद्ध बंद हो गया।

    ''बैटेविया'' की घटना के बाद दिसम्बर 1948 में दोनों पक्षों में पुनः युद्ध आरम्भ हो गया किंतु तब तक विश्व जनमत सुकार्णो के पक्ष मे हो चुका था। सुरक्षा परिषद में पुनः युद्धबंदी का प्रस्ताव पारित हुआ जिसे डच सरकार ने अस्वीकार कर दिया और सुकार्णो तथा उसके साथियों को बंदी बना लिया।

    इण्डोनेशिया गणराज्य को मान्यता

    23 अगस्त से 2 नवम्बर 1949 तक हेग में इण्डोनेशियाई समस्या को सुलझाने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें हुए निर्णय के बाद इण्डोनेशिया को संघ राज्य घोषित किया गया तथा डॉ. सुकार्णो द्वारा घोषित गणराज्य को मान्यता दी गई। इस समझौते के अनुसार 27 नवम्बर 1949 को इण्डोनेशिया की वास्तविक सत्ता सुकार्णो के नेतृत्व वाली सरकार को सौंप दी गई किंतु इण्डोनेशियाई राज्य संघ में हॉलैण्ड की औपचारिक साझेदारी मानी गई। अर्थात् इण्डोनेशिया में हॉलैण्ड एवं इण्डोनेशियाई सरकार को बराबर सम्प्रभु राष्ट्र माना गया। जनता इस सम्बन्ध को भी समाप्त करना चाहती थी। अतः 15 अगस्त 1950 को इण्डोनेशियाई एकीकृत गणतन्त्र की स्थापना की गई तथा ई.1955 में इण्डोनेशिया एवं हॉलैण्ड के बीच के समस्त सम्बन्ध समाप्त हो गए।


    बाली द्वीप में हिन्दू सभ्यता का विकास

    बाली में ऑस्ट्रोनेशियन मानव सभ्यता का प्रारम्भ

    बाली, इंडोनेशिया का एक ''द्वीप प्रान्त'' है। यह जावा द्वीप के पूर्व में तथा लोम्बोक द्वीप के पश्चिम में स्थित है। ईसा से लगभग 2000 साल पहले यहाँ मानवीय बस्तियों के बसने का क्रम आरम्भ हुआ। ये मानव ऑस्ट्रोनेशियन जाति के थे जो दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीपों से आकर यहाँ बस रहे थे। ये लोग आदिवासी थे तथा सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में थे जबकि इस काल में भारत में अत्यंत उन्नत सभ्यता एवं संस्कृति फल-फूल रही थी। बाली द्वीप से मिली एक अति प्राचीन मुद्रा पर जंगली भैंसे के कंधों पर हल रखकर चावल की खेती करने का दृश्य अंकित किया गया है।

    बाली द्वीप में हिन्दू संस्कृति का प्रवेश

    भारतीय हिन्दू, बाली तथा आसपास के द्वीपों पर सबसे पहले कब पहुंचे, यह ठीक से नहीं बताया जा सकता किंतु इतना स्पष्ट है कि ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले से ही हिन्दुओं की बस्तियां बड़ी संख्या में जावा, सुमात्रा, मलाया तथा बाली आदि द्वीपों पर बस गई थीं। सुमात्रा, जावा तथा बाली द्वीपों पर हिन्दुओं का सबसे बड़ा जमावड़ा था। बाली द्वीप से ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण कुछ लेख मिले हैं जो ईसा से दो शताब्दी से भी अधिक पुराने हैं। ब्राह्मी लिपि के ये लेख हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। बाली द्वीप का नाम भी बहुत पुराना है।

    ईसा की चौथी एवं पांचवी शताब्दी में भारतीय राजकुमारों ने ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपने छोटे-बड़े अनेक राज्य स्थापित कर लिए थे। बाली तथा इसके आस-पास फैले हजारों द्वीपों पर हिन्दू जाति निवास करती थी। बाली से प्राप्त विष्णु, ब्रह्मा, शिव, नंदी, स्कन्द और महाकाल की मूर्तियों से इस तथ्य की पुष्टि होती है। बहुत से बौद्ध भी बाली और उसके निकटवर्ती द्वीपों पर आ जुटे। पौराणिक हिन्दू धर्म के साथ-साथ इन द्वीपों में बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ। ये दोनों धर्म बाली तथा उसके निकटवर्ती द्वीप समूह पर सातवीं शताब्दी ईस्वी तक बिना किसी संघर्ष के फलते-फूलते रहे।

    ई.914 का एक शिलालेख बाली से मिला है जिसमें श्री केसरी वर्मा नामक राजा का उल्लेख है। ई.989 के लगभग जावा के राजा मपू सिंदोक की प्रपौत्री महेन्द्रदत्ता (गुण-प्रिय-धर्मा-पत्नी) का विवाह बाली के राजा उदयन वर्मदेव (धर्मोद्यनवर्मदेव) के साथ हुआ। इस विवाह के कारण बाली में जावा की हिन्दू संस्कृति एवं हिन्दू धर्म का प्रचार और भी अधिक विस्तार पा गया। महेन्द्रदत्ता ने ई.1001 के लगभग ऐरलांग्गा नामक पुत्र को जन्म दिया जो बाली का राजा बना। ई.1098 में इसी वंश में राजकुमारी सकलेन्दु किरण का जन्म हुआ जिसने ई.1115 से 1119 तक बाली द्वीप पर शासन किया। उसके बाद सूराधिप, जयशक्ति, जयपंगुस, आदिकुंती केतन एवं परमेश्वर आदि राजा हुए। इस प्रकार बाली का यह हिन्दू राजवंश 1293 ईस्वी तक शासन करता रहा। 1293 ईस्वी में जावा के मजापहित वंश के राजा ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया। उसके राज्य में कई हजार द्वीप थे।





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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 4 बाली द्वीप पर इस्लाम का प्रवेश एवं वर्तमान बाली

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 4  बाली द्वीप पर इस्लाम का प्रवेश एवं वर्तमान बाली

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 4

    बाली द्वीप पर इस्लाम का प्रवेश

    सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब में इस्लाम की आंधी उठी जो देखते ही देखते बवण्डर बनकर चारों तरफ फैलने लगी। सातवीं शताब्दी ईस्वी में ही अरब व्यापारियों के रूप में पहली बार मुसलमानों ने बाली द्वीप पर पैर रखा। उनके प्रभाव से कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। सोलहवीं शताब्दी आते-आते यह प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया कि बाली को छोड़कर शेष सभी द्वीपों के शासकों एवं प्रजा ने इस्लाम स्वीकर कर लिया। 15वीं शताब्दी में इस्लाम रूपी आन्धी के तेज झौंके इण्डोनेशयिाई द्वीपों को झकझोरने लगे। अंततः 1478 ईस्वी में जावा का मजापहित हिन्दू साम्रज्य ध्वस्त हुआ और अधिकांश द्वीपों पर मुसलमान सुलतानों ने सत्ता हथिया ली। उन्होंने इन द्वीपों के हिन्दुओं पर भयानक अत्याचार किये। उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाना, उनकी सम्पत्ति तथा स्त्रियों का हरण कर लेना तथा हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार देना, अत्यंत साधारण बात थी।

    ऐसी स्थिति में जावा, सुमात्रा, मलाया और अन्य द्वीपों के अभिजात्य-वर्गीय हिन्दू भाग-भाग कर बाली आने लगे। बाली में एकत्रित हुए हिन्दुओं ने मुसलमानों से मोर्चा लेने का निर्णय लिया। मुसलमानों ने बहुत प्रयास किये किंतु हिन्दुओं की संगठित शक्ति के कारण बाली द्वीप में हिन्दुओं का तथा हिन्दू धर्म का पतन नहीं हुआ। आसपास के द्वीपों में रह रहे हजारों बौद्धों को भी यहीं शरण मिल सकी। जब मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मलाया द्वीप समूह (अब मलेशिया) से हिन्दू सभ्यता का अंत कर दिया गया तब बाली द्वीप ने वहाँ के हिन्दू राजाओं एवं संस्कृति को भी शरण दी।

    बाली में ही बचे हिन्दू और बौद्ध

    लगभग 100 साल तक इण्डोनेशियाई द्वीपों में मुसलमानों के अत्याचार निर्बाध रूप से जारी रहे और तब तक जारी रहे जब तक कि बाली को छोड़कर शेष द्वीपों में मुस्लिम सत्ताएं स्थापित नहीं हो गईं तथा वहाँ की लगभग समस्त प्रजा ने इस्लाम स्वीकार नहीं कर लिया। परिणामतः ईस्ट-इण्डीज द्वीपों में केवल बाली द्वीप पर ही हिन्दू जनसंख्या बची रह गई।

    बाली द्वीप पर डचों का अधिकार

    ई.1597 में पहली बार डच लोगों का बाली द्वीप पर आगमन हुआ। उस समय बाली द्वीप पर हिन्दू राजा का शासन था। डचों ने बाली द्वीप पर अपनी आर्थिक गतिविधियां आरम्भ कीं जो धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों में बदल गईं। ई.1839 में डच लोगों ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया तथा ई.1840 के आते-आते बाली द्वीप के उत्तरी तट पर डच लोगों का शासन हो गया। इसके बाद उन्होंने तेजी से बाली द्वीप के शेष भाग पर अधिकार जमाना आरम्भ किया। ई.1906 में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने बाली के हिन्दू राजवंश के लगभग 200 लोगों को मार डाला तथा उनके साथ ही बाली के हजारोें हिन्दू सैनिकों को भी मौत के घाट उतार दिया। ई.1911 में उन्होंने बाली द्वीप को डच साम्राज्य में शामिल कर लिया।

    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ई.1942 में जापान ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया ताकि वह बाली द्वीप को आधार-शिविर की तरह उपयोग करके मित्र राष्ट्रों से भलीभांति लड़ सके। जापानियों के दबाव में डच लोगों को बाली द्वीप खाली करना पड़ा किंतु वे निकटवर्ती द्वीपों पर अपना अधिकार जमाए रखने में सफल रहे।

    हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये जाने के बाद अगस्त 1945 में जापान ने मित्र राष्ट्रों के समक्ष घुटने टेक दिये। बाली के लोगों ने इसे अपने लिए सुअवसर समझा। उन्होंने अपनी स्वयं की एक सेना बना ली और बाली में रह रही जापानी सेना पर आक्रमण कर दिया। जापानियों को बाली द्वीप से भागना पड़ा किंतु इस समय स्वतंत्रता का सुख बाली के लोगों के भाग्य में लिखा ही नहीं था।

    जापान का पतन होने के बाद डच लोग पुनः बाली लौट आए ताकि वे अपने खोये हुए राज्य का फिर से निर्माण कर सकें। बाली के लोगों ने डच सेना से संघर्ष करने की तैयारी की तथा मरते दम तक लड़ने का निर्णय लिया। कर्नल नगुरा राय के नेतृत्व में बाली के लोगों ने डच लोगों पर बड़ा आत्मघाती आक्रमण किया किंतु हिन्दुओं के दुर्भाग्य से इस युद्ध में विजय डच लोगों के हाथ लगी। बाली की सेना पूर्णतः नष्ट हो गई और बाली द्वीप फिर से डच लोगों के अधीन हो गया। यह स्थिति भी अधिक समय तक बनी नहीं रह सकी।

    ई.1949 में कुछ मुस्लिम आंदोलनकारियों ने सुकार्णो तथा हात्ता के नेतृत्व में इण्डोनेशिया के हजारों द्वीपों को सम्मिलित करते हुए ''रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इण्डोनेशिया'' नामक देश का निर्माण किया तथा उसमें बाली द्वीप को भी सम्मिलित कर लिया। डच सरकार ने इस नये देश को मान्यता दे दी। इसके बाद विश्व के अन्य देशों ने भी इण्डोनेशिया रिपब्लिक के निर्माण को स्वीकार कर लिया। डच लोगों को एक बार पुनः बाली द्वीप खाली करना पड़ा।

    पांच लाख लोगों की हत्या

    ई.1950-60 के बीच इण्डोनेशिया में एक बार फिर से राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई जिसके कारण सेना को हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया। निरंकुश सेना ने इण्डोनेशिया के विभिन्न द्वीपों में लगभग 5 लाख लोगों को मार डाला। बाली द्वीप पर 80 हजार से 1 लाख लोग मारे गये।

    आगूंग पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

    अभी सैनिक ताण्डव समाप्त भी नहीं हुआ था कि ई.1963 में आगूंग पर्वत में विस्फोट होने से बाली द्वीप पर हजारों लोग मारे गये तथा आर्थिक संकट खड़ा हो गया। हजारों बाली वासियों को द्वीप खाली करके अन्य द्वीपों को भाग जाना पड़ा।

    पर्यटन को बनाया आर्थिक उन्नति का आधार

    ई.1965-66 में सुहार्तो ने सुकार्नो की सरकार को अपदस्थ कर दिया। उसने बाली द्वीप को आर्थिक सम्बल देने के लिए पर्यटन को मुख्य आधार बनाया। इसके बाद से बाली की दशा में सुधार आने लगा। साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया। विश्व भर से पर्यटकों को बाली द्वीप पर लाने के प्रयास आरम्भ हुए। बाली के सुंदर सागरीय द्वीपों, चावल के हरे-भरे खेतों तथा प्राचीनतम हिन्दू मंदिरों को देखने के लिए लाखों लोग दुनिया भर से बाली आने लगे। बाली के लोगों को नये रोजगार प्राप्त हुए, लोगों में आत्मविश्वास तथा स्थिरता आने लगी।

    मुस्लिम आतंकियों के बाली द्वीप पर हमले

    बाली द्वीप को विश्व भर के पर्यटकों में अपनी पहचान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ किए हुए अभी कुछ दशक भी नहीं बीते थे कि ई.2002 में एक मुस्लिम आतंकवादी ने बाली द्वीप के सबसे प्रमुख केन्द्र कुता में बम विस्फोट करके 202 अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को मार डाला। पूरे विश्व में इस हमले का बुरा प्रभाव पड़ा। केवल तीन साल बाद ई.2005 में एक बार पुनः मुस्लिम आतंकवादियों ने बाली द्वीप के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को निशाना बनाया। इसके बाद से बाली में आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत कम हो गई तथा बाली एक बार पुनः निर्धनता के खड्डे में जा गिरा।


    वर्तमान समय में बाली

    पर्यटकों का स्वर्ग बाली

    वर्तमान समय में बाली द्वीप की कुल जनसंख्या में से 90 प्रतिशत हिन्दू है। शेष 10 प्रतिशत जनसंख्या में बौद्ध, मुस्लिम एवं ईसाई हैं। यह विश्व विख्यात पर्यटन स्थान है जिसकी कला, संगीत, नृत्य और मन्दिर मनमोहक हैं। यहाँ की राजधानी देनपासार नगर है। मध्य बाली में स्थित उबुद नामक नगर भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। यह बाली द्वीप में कला और संस्कृति का प्रधान स्थान है। दक्षिण बाली में स्थित ''कुता'' एक प्रमुख नगर है। जिम्बरन बाली में मछुओं का ग्राम और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। द्वीप के उत्तरी तट पर सिंहराज नगर स्थित है। 
    आगूंग पर्वत और ज्वालामुखी बतुर पर्वत दो ऊंची चोटियां हैं।

    हँसते-मुस्कुराते चेहरों वाले लोग

    बाली के लोग सरल, हंसमुख एवं श्रमजीवी किन्तु निर्धन, फटेहाल और अभावग्रस्त हैं। स्त्री और पुरुष दोनों ही, दिन भर हाड़-तोड़ परिश्रम करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। पुरुष अपेक्षाकृत अधिक परिश्रम के कामों अर्थात् वाहन चालन, कृषि एवं निर्माण कार्यों में संलग्न हैं, वहीं महिलाएं प्रायः किसी न किसी प्रकार की छोटी-मोटी दुकान चलाती हैं। या सड़कों के किनारे नारियल, केले और विभिन्न प्रकार के फूल बेचती हुई दिखाई देती हैं।

    भारत और भारतीयों से है करते हैं प्यार

    कई अर्थो में बाली द्वीप, भारत का एक संस्करण दिखाई देता है तो कई अर्थों में यह भारत से बिल्कुल अलग है। बाली के स्थानीय व्यक्ति भारतीयों को देखकर प्रसन्न होते हैं और पहली ही भेंट में यह बताना नहीं भूलते कि हम भी हिन्दू हैं। वे ये भी बताते हैं कि हमारे परिवार में कौन-कौन शाकाहारी है और कौन व्यक्ति भारत जाकर गंगा स्नान कर आया है। यह देखना और जानना किसी सुखद अश्चर्य से कम नहीं होता कि भारतीय हिन्दुओं के प्रति इनके मन में अपार आदर और स्नेह है। जैसे ही आप इनकी दुकान पर पहुंचते हैं, या मार्ग में मिलते हैं, बाली के अधिकांश लोग ''स्वस्तिम् अस्तु'' कहकर दोनों हाथ जोड़ते हैं और मुस्कुराकर आपका स्वागत करते हैं। इनकी आंखें बताती हैं कि उन्हें यह ज्ञात है कि भारत बहुत धनी और सभ्य देश है तथा बाली के लोगों की जड़ें भारत में हैं।

    साफ-सुथरा द्वीप बाली एक साफ-सुथरा द्वीप है, सड़कों पर गंदगी, भीड़-भड़क्का एवं शोरगुल नहीं है। सड़कें अपेक्षाकृत संकरी किंतु मजबूत हैं। कहीं भी टूटी-फूटी या उधड़ी हुई सड़कें देखने को नहीं मिलती हैं, इससे अनुमान होता है कि यहाँ भ्रष्टाचार या तो है ही नहीं और यदि है तो बहुत ही कम है। ठेकेदारों और इंजीनियरों ने सड़क निर्माण में पूरी सामग्री का उपयोग किया है। सड़क के दोनों ओर पैदल यात्रियों के लिए पटरियां बनी हुई हैं, साइन बोर्ड भी भली भांति लगे हुए हैं।

    सड़कों के किनारे लगे सूचना पट्ट एवं दुकानों के बाहर लगे नामपट्ट बाली की स्थानीय भाषा ''बहासा इण्डोनेशियन'' में लिखे हुए हैं, जो कि मलय भाषा से बनी है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि ये सभी पट्ट रोमन लिपि में लिखे हुए हैं जो देखने में तो अंग्रेजी भाषा के लगते हैं किंतु विदेशी पर्यटकों को पढ़ने में नहीं आते। यह ठीक वैसा ही है जैसे मराठी लोगों ने मराठी भाषा के लिए ''देवनागरी'' लिपि अपना ली है।

    बाली द्वीप के नगरों में बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर बहुत कम हैं। अधिकांश दुकानें बहुत छोटी हैं तथा उनमें बिक्री के लिए बहुत कुछ उपलब्ध नहीं है। ब्रेड (डबल रोटी), कोल्ड ड्रिंक, अण्डा, डिब्बाबंद चिकन, डिब्बाबंद मछली, पूजा के फूल, नारियल, अगरबत्ती, प्लास्टिक के छोटे-मोटे सामान आदि दैनिक उपयोग की सामग्री अधिक बिकती है। दुकानों के बाहर एक-एक लीटर की मिट्टी के तेल, डीजल और पैट्रोल से भरी बोतलें रखी रहती हैं, क्योंकि यहाँ पैट्रोल पम्प केवल मुख्य नगर की परिधि में ही उपलब्ध हैं, वे भी गिने-चुने।

    गाय, गंगा और गेहूँ रहित बाली के हिन्दू भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार गाय, भारतीय धर्म का मुख्य आधार गंगा और भारतीय भोजन की थाली का मुख्य आधार गेहूं, बाली द्वीप में देखने को नहीं मिलते। यहाँ दुधारू पशु नहीं पाले जाते। यहाँ घरों में दूध एवं चाय नहीं पिये जाते। किसी विशिष्ट अतिथि के आने पर, मध्यम एवं उच्च वर्गीय परिवारों में बिना दूध की कॉफी बनाई जाती है। यहाँ के लोगों का पूरा जीवन बीत जाता है किंतु ये न तो गाय, भैंस, बकरी आदि दुधारू पशुओं के दर्शन कर पाते हैं और न ही पशुओं के दूध का स्वाद चख पाते हैं। शैशव अवस्था में शिशु लगभग एक साल तक माँ का दूध पीता है, उसके बाद चिकन खाने लगता है, और फिर सूअर का मांस तथा मछली आदि। ऊंट और घोड़ा भी बाली में नहीं हैं। आश्चर्य की बात है कि यहाँ की सड़कों पर पशु घूमते दिखाई नहीं देते। गांवों में जाएं तो गलियों में केवल इक्का-दुक्का कुत्ते दिखाई देते हैं।

    गाय-भैंस के अभाव में सामान्यतः घरों में दूध-दही-छाछ-मक्खन-घी का उपयोग नहीं होता। बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर पर डिब्बाबंद योघर्ट मिलता है, इसका उपयोग केवल पर्यटक करते हैं। यह बहुत महंगा है, सामान्यतः 50 ग्राम योघर्ट के लिए भारतीय मुद्रा में 60 रुपए चुकाने होते हैं। इसका स्वाद दही से काफी अलग होता है तथा यह गोंद की तरह चिपचिपा होने के कारण आम भारतीय के लिए अनुपयोगी है।

    फसलों के नाम पर खेतों में प्रायः चावल, मक्का और गन्ना दिखाई देता है। चावल बहुतायत में होता है किंतु बासमाती चावल या खुशबूदार अच्छा चावल भारत से मंगाया जाता है। गेहूं, जौ, चना, बाजरा आदि अनाज और मूंग, मोठ, उड़द, चंवला आदि दालें यहाँ नहीं उगाई जातीं। भिण्डी, आलू और प्याज जैसी सब्जियां भी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, भारत एवं अन्य देशों से आयात की जाती हैं। आयातित सब्जियां आम दुकानों पर नहीं मिलतीं। ये सब्जियां बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स में काफी ऊंची दरों पर प्लास्टिक के रैपर में बंद करके बेची जाती हैं एवं बड़े होटलों में विदेशी पर्यटकों के लिए उपलब्ध रहती हैं।

    भारतीय देवी-देवताओं में है विश्वास

    बाली के लोग रामायण, भगवान राम, देवी सीता एवं रामदूत हनुमान के प्रति श्रद्धा रखते हैं। चारों वेद, गीता, महाभारत, एवं पाण्डु पुत्र भीम तथा वीर अर्जुन की चर्चा करना गौरव का विषय मानते हैं। भगवान राम, इन्द्र, सरस्वती, कृष्ण, शिव, अर्जुन और भीम की विशाल एवं सुंदर प्रतिमाएं चौराहों पर लगी हुई हैं जो पर्यटकों के आकर्षण और कौतूहल का विषय हैं क्योंकि भारत में केवल हनुमानजी अथवा शिवजी की ही इतनी बड़ी प्रतिमाएं देखी जाती हैं। हनुमानजी की प्रतिमाएं विकराल स्वरूप की हैं। सीता को ये देवी सिन्ता कहते हैं तथा उनमें बड़ी श्रद्धा रखते हैं। देवी सिन्ता की अत्यंत सुंदर और विशाल प्रतिमाएं चौराहों पर देखने को मिलती हैं। सरस्वती की बहुत सुन्दर प्रतिमाएं, दर्शकों का मन मोह लेती हैं। मूर्ति निर्माण की यह एक विशिष्ट परम्परा है, इसमें रागात्मकता एवं मनोरम्यता का तत्व अधिक है।

    भारत के चौराहों पर मोहनदास गांधी, इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा बहुत से स्थानीय नेताओं आदि की मूर्तियां पाई जाती हैं किंतु भारतीय पर्यटक बाली द्वीप में भगवान श्रीराम, देवी सीता, भगवान श्रीकृष्ण तथा रामभक्त हनुमान की मूर्तियां देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। भगवान शिव, पार्वती एवं गणेश की प्रतिमाएं भी चौराहों, उद्यानों एवं होटलों आदि में दिखाई देती हैं। अधिकतर मंदिरों के प्रवेश द्वार पर गणेश प्रतिमाएं लगी हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे आकार की हैं तथा ठीक वैसी ही हैं जैसी भारत में पाई जाती हैं। द्वारपालों की कुछ मूर्तियां दैत्यों जैसी दिखाई देती हैं। सामान्यतः ये मूर्तियां मंदिरों और नगरों के द्वारों के बाहर लगी रहती हैं।

    प्रत्येक घर के अंदर तथा बाहर स्तम्भ मंदिर बने होते हैं। लगभग चार पांच फुट ऊंचे स्तम्भ पर एक छोटा आला होता है जिसे काला (स्तंभ पर स्थित लघु देवालय) कहते हैं। घर के भीतर बने काला को पुंगुनकरन अर्थात् धरती का देवता कहते हैं। घर के भीतर के काला में देवी दुर्गा के भी देवालय होते हैं। घर के बाहर के देव स्थान को इन्द्राब्लॉका कहा जाता है, यह गली-मौहल्ले की रक्षा करता है। ब्रह्मा, विष्णु महेश को कुनिंगन्न (त्रिदेव) कहा जाता है। साल में एक बार यलो डे मनाया जाता है। उस दिन स्त्री-पुरुष पीले वस्त्र धारण करते हैं। यह भारत के बसंत पंचमी का ही रूप है। गलुगन्गन पर्व पर सार्वजनिक अवकाश होता है। पके हुए चावल को नासि तथा कच्चे चावल को सयुर कहा जाता है, जो बाली का मुख्य खाद्य है।

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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 5 इण्डोनेशिया के प्रमुख हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 5 इण्डोनेशिया के प्रमुख हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 5


    इण्डोनेशिया के प्रमुख हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर


    इण्डोनेशिया के अनेक द्वीपों पर प्राचीन हिन्दू देवालय, बौद्ध चैत्य तथा विहार बने हुए थे जिनमें से अधिकतर मंदिर एवं चैत्य मुस्लिम आक्रांताओं की भेंट चढ़ गए। जब सुहार्तो की सरकार ने विश्व पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इण्डोनेशिया को नए सिरे से तैयार करने का काम आरम्भ किया तब से अब तक कई मंदिर एवं चैत्य खण्डहरों के नीचे से खोज निकाले गए हैं। इंडोनेशिया के मंदिरों पर सर्वाधिक प्रभाव राम कथा का देखने को मिलता है। परमबनन शिव मंदिर में लगी प्रस्तर शिलाओं पर रामायण के बहुत से दृश्य अंकित हैं। इस मंदिर में कृष्णलीला के प्रसंग भी बड़ी संख्या में उत्कीर्ण हैं।

    जावा द्वीप के मंदिर

    जावा में हिन्दू धर्म के प्रभाव को आसानी से समझा जा सकता हैं। जावा द्वीप पर 15 बड़े हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं जिनमें परमबनन शिव मंदिर और बोरोबुदुर बौद्ध विहार मुख्य हैं। दूसरे प्रमुख मंदिरों में ई.750 में बना देंग मंदिर, 9वीं शताब्दी का प्लाओसान मंदिर, 15वीं सदी में बना सथो मंदिर, सिंघसरी साम्राज्य के काल में ई.1248 में बना किदाल मंदिर, जन्म से पहले जीवन को दर्शाता 15वीं सदी मे बना सुख मंदिर और मजापहित साम्राज्य के समय में 12वीं तथा 15वीं सदी के दौरान बना ''पनतरन मंदिर'' सम्मिलित हैं। इन मंदिरों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सांस्कृतिक श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।

    जकार्ता के मंदिर

    जकार्ता शहर का वास्तविक नाम जयकार्ता है। यह पश्चिमी जावा में स्थित है तथा इंडोनेशिया की राजधानी है। जकर्ता में 17 प्रमुख हिन्दू मंदिर पाए गए हैं जिनमें नौवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित विशाल शिव मंदिर, 926 ई. में बना तीर्थ एम्पुल मंदिर, 11वीं सदी में बना गोवा गजह (शिव मंदिर), 14वीं शताब्दी में निर्मित बेसैख का माता मंदिर और 1633 ई. में निर्मित पुरा उलुंदनु ब्रतन (शिव मंदिर) प्रमुख हैं।

    योग्यकार्ता के मंदिर

    योग्यकार्ता शहर मध्य जावा में स्थित है। फरवरी 2010 में योग्यकर्ता में स्थित एक निजी मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में दो मंदिरों के अवशेष मिले जब विश्वविद्यालय ने वहाँ बनी एक मस्जिद के पास पुस्तकालय बनाने के लिए खुदाई आरम्भ की। ये मंदिर लगभग 1100 साल पुराने हैं तथा विशाल और अद्वितीय हैं। ऐसे मंदिर इंडोनेशिया के इतिहास में पहले कभी नहीं देखे गए। इन मंदिरों में भगवान् शिव के शिवलिंगों के साथ-साथ भगवान् गणेश की प्रतिमाएं मिली हैं। एक अन्य स्थान पर हुई खुदाई में पुरातत्व विभाग को भगवान् शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा मिली। नंदी की यह प्रतिमा, सामान्य नंदी प्रतिमाओं से काफी अलग है और दूसरी मूर्तियों की तरह चौड़ी भी नहीं है।

    सिंघसरी शिव मंदिर

    13वीं शताब्दी में बना सिंघसरी शिव मंदिर पूर्वी जावा के सिंघसरी नामक स्थान पर बना हुआ है। यह विशाल शिव मंदिर अपनी भव्यता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। मंदिर में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जिसके पूजन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। भगवान शिव से सम्बन्धित समस्त पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाए जाते हैं।

    बाली द्वीप के मंदिर

    बाली भाषा में ''पुरा'' का अर्थ मंदिर होता है। अक्टूबर 2012 में इंडोनेशिया के पुरातत्व विभाग ने बाली द्वीप का सर्वेक्षण किया तथा चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के एक विशाल हिन्दू मंदिर को खोज निकालने का दावा किया। पुरातत्वविदों ने देश को सूचित किया कि पूर्वी देन्पासार में नदी बेसिन में हो रही खुदाई में धरती से तीन फुट नीचे उन्हें एक विशालकाय पत्थर मिला तथा आगे हुई खुदाई में पाया गया कि यह वास्तव में एक विशाल मंदिर की आधारशिला है। ऐसे पत्थर बड़ी संख्या में मिले जो यह प्रमाणित करते हैं कि चौदहवीं सदी में इस नदी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ।

    पुरा तमन अयुन (सरस्वती मंदिर)

    देवी सरस्वती को समर्पित यह मंदिर बाली के उबुद नगर में है। देवी सरस्वती को हिन्दू धर्म में विद्या, ज्ञान और संगीत की देवी माना जाता हैं, इसलिए यहाँ पर भी देवी सरस्वती की पूजा ज्ञान और विद्या की देवी के रूप में ही की जाती है। यहाँ पर एक सुन्दर कुंड भी बना है, जो इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है। यहाँ प्रतिदिन संगीत के कार्यक्रम होते हैं। संस्कृत में अयन का अर्थ होता है- घर। बाली द्वीप का अयुन शब्द संस्कृत के अयन शब्द से ही बना है।

    पुरा बेसकिह मंदिर

    बाली द्वीप के माउंट अगुंग में स्थित यह मंदिर प्रकृति की गोद में बसा इंडोनेशिया का सबसे सुन्दर मंदिर है। यह बाली का सबसे बड़ा और पवित्र मंदिर भी है, जो बाली के महत्वपूर्ण मंदिरों की शृंखला में सम्मिलित किया गया है। 1995 ई. में इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

    गिन्यार क्षेत्र के मंदिर

    बाली द्वीप के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित गिन्यार में 1986 ई. में हुई खुदाई में वासा मदिर सामने आया जो 11 मीटर चौड़ा है। 2010 ई. तक इंडोनेशिया के पुरातत्वविद, गिन्यार में धरती के नीचे दबे हुए 16 और मंदिरों को ढूँढ़ने में सफल हो गए।

    तनाहलोट मंदिर (विष्णु मंदिर)

    बाली द्वीप पर स्थित विशाल समुद्री चट्टान पर भगवान विष्णु को समर्पित तनाहलोट मंदिर 15वीं में निर्मित हुआ। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है तथा इण्डोनेशिया के मुख्य आकर्षणों में से एक है। यह मंदिर बाली द्वीप के हिन्दुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। जब समुद्र में ज्वार आता है तो मंदिर में जाने का मार्ग बंद हो जाता है तथा भाटा आने पर यह मार्ग खुल जाता है जिससे मंदिर तक जा सकते हैं। पर्यटकों को मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं होती है। वे बाहर की रेलिंग से भीतर का दृश्य देख सकते हैं।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 6 प्लाओसान बौद्ध मंदिर

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 6  प्लाओसान बौद्ध मंदिर

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 6


    प्लाओसान बौद्ध मंदिर


    प्लाओसान बौद्ध मंदिर भी एक मंदिर समूह है जिसमें मंदिरों के खण्डहर स्थित हैं। यह मंदिर परमबनन मंदिर के उत्तर-पश्चिम में केवल एक किलोमीटर की दूरी पर है। इस स्थान को बुगिसान गांव कहते हैं। यह सेंट्रल जावा के परमबनन जिले की क्लाटेन रीजेंसी का कस्बे जैसा गांव है जहाँ पक्की दुकानों की पंक्तियां बनी हुई हैं। मंदिर के निकट लगभग 200 मीटर की दूरी से होकर डेंगोक नामक नदी बहती है। मंदिर के चारों ओर धान के खेत हैं। केले और नारियल के झुरमुट यत्र-तत्र दिखाई देते हैं।

    प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। इसका निर्माण काल भी नौवीं शताब्दी इस्वी का है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजकुमारी काहुलुन्नान अथवा प्रमोदवर्द्धिनी ने करवाया जो कि शैलेन्द्र वंश के सम्राट-उन्गा अथवा समरातुंगा की पुत्री थी। इस राजकुमारी का विवाह पूरे हिन्दू विधि विधान से राकाई पिकातान से हुआ था जो कि ई.850 के आसपास मध्य जावा का माताराम वंश (संजय वंश) का शासक था।

    इस मंदिर समूह में दो प्रकार के बौद्ध मंदिर हैं- प्लाओसान लोर एवं प्लाओसान किडुल। इन दोनों प्रकार के मंदिरों को एक सड़क द्वारा अलग किया गया है। प्लाओसान लोर उत्तर में एवं प्लाओसान किडुल दक्षिण की ओर स्थित है। प्लाओसान मंदिर परिसर में 174 छोटे भवन हैं। इनमें से 116 स्तूप हैं तथा 58 चैत्य हैं। बहुत से भवनों पर शिलालेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से दो लेख यह सूचित करते हैं कि यह मंदिर राकाई पिकातान द्वारा उपहार स्वरूप बनाए गए हैं। इन लेखों की तिथियां 825-850 ईस्वी के बीच की हैं जबकि परमबनन मंदिर की तिथि 856 ईस्वी की है। इन दोनों मंदिरों का निर्माण एक ही राजा के द्वारा करवाया गया किंतु इनके शिल्प में पर्याप्त अंतर है।

    परमबनन मंदिर विशुद्ध हिन्दू स्थापत्य विधि से बने थे जबकि प्लाओसान मंदिरों का निर्माण परम्परागत बौद्ध शैली में कराया गया था। प्लाओसान लोर में दो मुख्य मंदिर हैं जिन्हें जुड़वां मंदिर कहा जा सकता है। दोनों मंदिरों के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल बैठे हुए हैं। इनका खुला हुआ भाग मण्डप कहलाता है। इन मंदिरों को उच्च एवं निम्न स्तरों में विभक्त किया गया है तथा तीन कक्षों में विभक्त किया गया है। निम्न स्तर के कक्षों में बहुत सी प्रतिमाएं स्थित थीं किंतु वर्तमान में प्रत्येक कक्ष के दोनों ओर बोधिसत्व की एक-एक प्रतिमा ही स्थित है। मुख्य आधार की केन्द्रीय प्रतिमा गायब हो गई है। यह कांसे की बुद्ध प्रतिमा थी जिसके दोनों ओर पत्थर की बोधिसत्व प्रतिमाएं विराजमान थीं।

    इतिहासकारों का अनुमान है कि प्रत्येक मुख्य मंदिर में कुल 9 प्रतिमाएं रही होंगी जिनमें से 6 बोधिसत्व प्रस्तर प्रतिमाएं तथा 3 कांस्य बुद्ध प्रतिमाएं थीं। इन प्रकार दोनों जुड़वा मंदिरों में कुल 18 प्रतिमाएं रही होंगी। इन जुड़वा मंदिरों के एक कक्ष में एक खमेर राजा की प्रतिमा भी खुदी हुई है जो संभवतः बाद में खोदी गई होगी। इस प्रतिमा को उसके मुकुट से पहचाना जा सकता है।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 7 बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 7  बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 7

    बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

    बोरोबुदुर महायान बौद्ध विहार मध्य जावा प्रान्त के मगेलांग नगर में स्थित है। यह भी परमबनन शिव मंदिर तथा प्लाओसान बौद्ध विहार की भांति मूलतः 9वीं सदी ईस्वी में निर्मित है। जिस समय यह बना था उस समय यह संसार का सबसे बड़ा बौद्ध विहार था। इसका यह स्थान आज भी सुरक्षित है। यह छः वर्गाकार चबूतरों पर बना हुआ है जिसमें से तीन चबूतरों का ऊपरी भाग वृत्ताकार है। इस विहार में उत्कीर्णित प्रतिमाओं वाली 2,672 प्रस्तर शिलाएं (Relief pannels) और 504 बौद्ध प्रतिमाएं पाई गई हैं। इसके केन्द्र में स्थित प्रमुख गुम्बद के चारों ओर स्तूप वाली 72 बुद्ध प्रतिमाएं हैं।

    इसका निर्माण 9वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ। विहार की बनावट जावाई बुद्ध स्थापत्यकला के अनुरूप है जो इंडोनेशियाई जावाई मूल के स्थानीय लोगों की पूर्वज पूजा और बौद्ध निर्वाण अवधारणा का मिश्रित रूप है। विहार के स्थापत्य में भारत की चौथी-पांचवी शताब्दी की गुप्त कालीन स्थापत्य कला का प्रभाव भी दिखाई देता है किंतु इण्डोनेशियाई स्थापत्य तत्व पर्याप्त मात्रा में उपस्थित हैं जिसके कारण इसे इंडोनेशियाई स्थापत्य संरचना माना जाना चहिए।

    इसकी रचना एक विशालाकाय स्तूप के रूप में मण्डलाकार है तथा सम्पूर्ण निर्माण, किसी स्मारक की तरह दिखाई देता है। वस्तुतः यह भगवान बुद्ध का पूजा-स्थल और विश्व-प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ-स्थल है। इस स्मारक के चारों ओर बौद्ध ब्रह्माण्डिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तर बने हुए है जो कामध्यान (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) कहलाते हैं। दर्शक इन तीनों स्तरों का चक्कर लगाते हुए इसके शीर्ष पर अर्थात् बुद्धत्व की अवस्था को पहुँचता है। स्मारक में हर ओर से सीढ़ियों और गलियारों की विस्तृत व्यवस्था है। गलियारों में होते हुए निकलने पर 1,460 शिलालेखों (Narrative Relief Panels) और स्तम्भ-वेष्टनों ;सीढ़ियों पर लगने वाली घुमावदार छड़ों- Balustrades) के माध्यम से दर्शनार्थियों को आगे बढ़ने के लिए स्वतः ही मार्गदर्शन मिलता रहता है।

    इस स्मारक का निर्माण कार्य 9वीं शताब्दी में आरम्भ हुआ था, मुख्य निर्माण तभी पूरे कर लिए गए थे किंतु उसके बाद की शताब्दियों में कुछ न कुछ निर्माण निरंतर चलता ही रहा था।

    चण्डी बोरोबुदुर

    इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी कहा जाता है। इस कारण बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ''चण्डी बोरोबुदुर'' भी कहा जाता है। जावा में चण्डी शब्द प्राचीन बनावट के द्वार और स्नान से सम्बन्धित रचनाओं के लिए प्रयुक्त होता है। बोरोबुदुर शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है। इस शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अंग्रेज इतिहासकार सर थॉमस रैफल्स की पुस्तक History of Java में हुआ था किंतु इस नाम का इससे पुराना कोई उल्लेख किसी शिलालेख अथवा ग्रंथ में उपलब्ध नहीं होता है। ई.1365 के एक तालपत्र (ताड़पत्र) में कहा गया है कि ''पवित्र बौद्ध पूजा स्थल नगरकरेतागमा'' को ''बुदुर'' कहा जाता है। यह तालपत्र मजापहित राजदरबारी एवं बौद्ध विद्वान मपु प्रपंचा द्वारा ई.1365 में लिखा गया था। संभवतः थॉमस रैफल्स ने (ई.1814 में) उसी तालपत्र के आधार पर इस बौद्ध स्मारक का नाम बोरो बुदुर लिखा।

    कुछ विद्वानों के अनुसार बोरोबुदुर, बोरे-बुदुर का अपभ्रंश है जिसका अर्थ ''बोरे गाँव के निकट बुदुर (बुद्ध) का मंदिर'' था। इण्डोनेशिया में अधिकांश मंदिरों के नाम निकटतम गाँवों के नाम पर रखे हुए हैं। जावा भाषा के अनुसार इस स्मारक का नाम ''बुदुरबोरो'' होना चाहिए। रैफल्स ने यह भी सुझाव दिया कि बुदुर सम्भवतः आधुनिक जावा भाषा के शब्द बुद्ध से बना है।

    अन्य पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार नाम का दूसरा घटक (बुदुर) जावा भाषा के ''भुधारा'' शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- ''पहाड़''। ध्यान देने की बात है कि भारत में भूधर का अर्थ पहाड़ होता है। अन्य सम्भावित शब्द-व्युत्पतियों के अनुसार बोरोबुदुर ''बुद्ध उहर'' अर्थात् बुद्ध-विहार है और यह जावा भाषा के ''बियरा बेदुहुर'' शब्द का अपभ्रंश उच्चारण है। बुद्ध-उहर का अर्थ ''बुद्ध का नगर'' भी हो सकता है। जावा भाषा में बेदुहुर शब्द का अर्थ ''एक उच्च स्थान'' भी होता है। कसपरिस के अनुसार बोरोबुदूर का मूल नाम भूमि सम्भार भुधार है जो एक संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ ''बोधिसत्व के दस चरणों के संयुक्त गुणों का पहाड़'' है।

    धार्मिक बौद्ध इमारत का निर्माण और उद्घाटन

    बोरोबुदुर के निर्माण एवं उद्घाटन के सम्बन्ध में दो शिलालेख मिले हैं। ये दोनों शिलालेख तमांगगंग रीजेंसी में केदु नामक स्थान पर मिले हैं। ई.824 के कायुमवुंगान शिलालेख के अनुसार राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी ने जिनालया (उन लोगों का क्षेत्र जिन्होंने सांसारिक इच्छा और और अपने आत्मज्ञान पर विजय प्राप्त कर ली) नामक धार्मिक भवन का उद्घाटन किया। ई.824 के ही त्रितेपुसन शिलालेख में लिखा है कि क्री कहुलुन्नण (प्रमोदवर्द्धिनी को कहुलुन्नण भी कहते हैं) ने भूमिसम्भार नामक कमूलान को धन और रख-रखाव सुनिश्चित करने के लिए (कर-रहित) भूमि प्रदान की। कमूलान का अर्थ ''उद्गम स्थल'' होता है। यह पूर्वजों की याद में बनाया गया एक धार्मिक स्थल है जो शैलेन्द्र राजंवश से सम्बंधित है।

    बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत का रहस्य

    बोरोबुदुर बौद्धमंदिर, योग्यकर्ता नगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर और सुरकर्ता नगर से 86 किलोमीटर दूर स्थित है। यह दो जुड़वां ज्वालामुखियों, सुंदोरो-सुम्बिंग और मेर्बाबू-मेरापी एवं दो नदियों प्रोगो और एलो के बीच एक ऊंचे क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र को केदू का मैदान भी कहा जाता है। स्थानीय मिथकों एवं दंतकथाओं के अनुसार केदू का मैदान, जावा के पवित्र स्थलों में से एक है। इस क्षेत्र की उच्च कृषि उर्वरता के कारण इसे The Garden of Jawa अर्थात् जावा का बगीचा भी कहा जाता है। 20वीं सदी में मरम्मत कार्य के दौरान यह पाया गया कि इस क्षेत्र के तीनों बौद्ध मंदिर, बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत, एक सीधी रेखा में स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों मंदिर किसी धार्मिक कारण से एक सीध में बनाए गए थे, यह कारण क्या था, इसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है।

    विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे पिरामिड पाए गए हैं जो एक सीधी रेखा में स्थित हैं और यह माना जाता है कि ये पिरामिड धरती के मुनष्यों ने नहीं बनाए थे अपितु दूसरे ग्रहों से धरती पर आए परग्रही इंसानों ने बनाए थे।

    झील में तैरता पुष्प कमल था बोरोबुदुर

    स्मारक बोरोबुदुर मंदिर का निर्माण समुद्र तल से 265 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक झील मंए खड़ी 49 फुट ऊंची चट्टान पर किया गया था। इस प्राचीन झील का अस्तित्व, 20वीं सदी के आरम्भ में पुरातत्वविदों के बीच गहन चर्चा का विषय था।

    ई.1931 में हिंदू और बौद्ध वास्तुकला के डच विद्वान डब्ल्यू ओ. जे. नियूवेनकैम्प द्वारा विकसित सिद्धांत के अनुसार ''केदू मैदान'' प्राचीन काल में एक झील हुआ करता था और बोरोबुदुर अपने निर्माण के समय इसी झील में कमल पुष्प के समान तैरता था। इसके निर्माण का समय मंदिर में उत्कीर्णित उच्चावचों और 8वीं तथा 9वीं सदी के दौरान सामान्य रूप से प्रयुक्त शाही पात्रों के अभिलेखों की तुलना से अनुमानित किया जाता है। बोरोबुदुर सम्भवतः ई.800 के लगभग स्थापित हुआ। यह मध्य जावा में शैलेन्द्र राजवंश के शिखर काल ई.760 से 830 से मेल खाता है। इस समय यह श्रीविजय राजवंश के प्रभाव में था। इसके निर्माण का अनुमानित समय 75 वर्ष है और निर्माण कार्य ई.825 के लगभग समरतुंग के कार्यकाल में पूर्ण होना अनुमानित है।

    जावा में हिन्दू और बौद्ध शासकों के समय में भ्रम की स्थिति है। शैलेन्द्र राजवंश को बौद्ध धर्म का कट्टर अनुयायी माना जाता है। यद्यपि सोजोमेर्टो में प्राप्त प्रस्तर शिलालेखों के अनुसार वे हिन्दू थे। उनके काल में केदु मैदान के निकट स्थित मैदानों और पहाड़ों में हिन्दू मंदिरों एवं बौद्ध स्मारकों का निर्माण हुआ। ई.720 में शैव राजा संजय ने बोरोबुदुर से 10 कि.मी. पूर्व में स्थित वुकिर पहाड़ी पर शिव परमबनन मंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया। कुछ विद्वानों के अनुसार उस काल में बोरोबुदुर सहित इस क्षेत्र के अन्य बौद्ध मंदिरों का निर्माण इसलिए सम्भव था क्योंकि संजय के उत्तराधिकारी राकाई पिकातान ने बौद्ध अनुयाइयों को इस तरह के मंदिरों के निर्माण की अनुमति प्रदान कर दी थी। ई.778 के कलसन राजपत्र के अनुसार, पिकातान ने बौद्धों के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध समुदाय को कलसन नामक गाँव दिया।

    कुछ पुरातत्वविदों का मत है कि एक हिन्दू राजा द्वारा बौद्ध स्मारकों की स्थापना में सहायता करना, इस बात का प्रमाण है कि जावा में कभी भी बड़ा धार्मिक टकराव नहीं था। यद्यपि इस समय वहाँ दो विरोधी राजवंश राज्य कर रहे थे जिनमें से शैलेन्द्र राजवंश बौद्ध धर्म का अनुयाई था और संजय राजवंश शैव धर्म का। इन दोनों राजवंशों में आगे चलकर रातु बोको महालय को लेकर ई.856 में युद्ध हुआ। भ्रम की स्थिति परमबनन परिसर के लारा जोंग्गरंग मंदिर के बारे में भी मौजूद है जो संजय राजवंश के बोरोबुदुर के प्रत्युत्तर में शैलेन्द्र राजवंश के विजेता रकाई पिकातान ने स्थापित करवाया। अन्य मतों के अनुसार वहाँ पर शान्तिपूर्वक सह-अस्तित्व का वातावरण था जहाँ ''रारा-जोंग्गरंग'' शैलेन्द्र राजवंश की राजकुमारी होकर भी संजय राजवंश में रानी बनकर आई और शिव मंदिर के निर्माण में भागीदार रही।

    गुमनामी के अंधेरों में गुम बोरोबुदुर

    ई.928 से 1006 के बीच मेरापी पहाड़ में शृंखलाबद्ध ज्वालामुखियों के फूट पड़ने के कारण राजा मपु सिनदोक ने माताराम राजवंश (इसे संजय राजवंश भी कहते हैं) की राजधानी को पूर्वी जावा में स्थानान्तरित कर दिया। इस कारण बोरोबुदुर का क्षेत्र निर्जन हो गया और यह मंदिर कई सदियों तक ज्वालामुखीय राख तथा जंगल के बीच छिपा रहा। इस स्मारक का अस्पष्ट उल्लेख मध्यकाल में ई.1365 के लगभग मपु प्रपंचा की पुस्तक नगरकरेतागमा में मिलता है जो मजापहित काल में लिखी गई। इसमें 'बुदुर में विहार' होने का उल्लेख है। मनुष्यों की दृष्टि से ओझल हो जाने के बाद भी यह स्मारक लोक कथाओं में जीवित रहा और इसके साथ कई दंतकथाएं जुड़ गईं।

    14वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश का पतन हो गया और जावाई लोगों को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। इस कारण चौदहवीं शताब्दी में इस द्वीप पर समस्त निर्माण कार्य बन्द हो गए। अधिकतर लोग मुसलमान बन चुके थे तथा बचे हुए बौद्ध जान बचाकर बाली द्वीप तथा भारत आदि देशों को भाग गए थे। इसलिए बोरोबुदुर की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं रहा। इस बीच जावा द्वीप पर कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए और सत्ताओं के परिवर्तन होते रहे।

    18वीं सदी के दो प्राचीन ''बाबाद'' (जावाई वृत्तांत) में इस स्मारक के साथ जुड़ी हुई असफलताओं की कथा का उल्लेख मिलता है। ''बाबाद तनाह जावी'' (अथवा जावा का इतिहास) के अनुसार ई.1709 में माताराम साम्राज्य के राजा ''पकुबुवोनो प्रथम'' के प्रति विद्रोह करना ''मास डाना'' के लिए घातक सिद्ध हुआ। इसमें लिखा है कि ''रेडी बोरोबुदुर'' पहाड़ी की घेराबंदी की गई। इसमें विद्रोहियों की पराजय हुई तथा राजा ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। ''बाबाद माताराम'' (माताराम साम्राज्य का इतिहास) में बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ई.1757 में योग्यकार्ता सल्तनत के युवराज ''मोंचोनागोरो'' के दुर्भाग्य से जोड़ा गया है। इसके अनुसार स्मारक में प्रवेश निषेध होने पर भी वह एक छिद्रित स्तूप के भीतर छिपकर इसके भीतर गया। अपने महल में वापस आने के बाद वह बीमार हो गया और अगले दिन उसका निधन हो गया। सोक्मोनो नामक एक लेखक ने ई.1976 में लौकिक मत का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब 15वीं सदी में जावा के लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया तो इस मंदिर को उजाड़ना आरम्भ कर दिया।

    अंग्रेजों द्वारा बोरोबुदुर स्मारक की खोज

    ई.1811-16 की अवधि में जावा द्वीप ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन रहा। जावा के ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने जावा के इतिहास में गहरी रुचि ली। उसने जावा द्वीप का दौरा किया तथा द्वीप पर उपलब्ध प्राचीन वस्तुओं को आधार बनाकर एवं स्थानीय निवासियों से चर्चा करके जावा का इतिहास तैयार किया। उसके समय में जावा द्वीप पर कई प्राचीन स्मारकों को खोज निकाला गया। ई.1814 में सेमारंग के निरीक्षण दौरे पर, बुमिसेगोरो गाँव के निकट के जंगल में एक बड़े स्मारक के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। वह स्वयं इसकी खोज करने में असमर्थ था। अतः उसने एच. सी. कॉर्नेलियस नामक एक अभियंता को अन्वेषण का काम सौंपा। कॉर्नेलियस तथा उसके 200 साथियों ने यहाँ फैले जंगल के पेड़ों को काट डाला तथा दूर-दूर तक फैली घास को जलाकर मैदान की तरह साफ कर दिया। बोरोबुदुर स्मारक ज्वालामुखीय राख के नीचे दबा हुआ था, उसे भी खोदकर बाहर निकाला गया। स्मारक के ढहने के खतरे को देखते हुए उन्होंने खुदाई का काम बहुत अधिक नहीं किया। इस प्रकार रैफल्स को इस स्मारक के पुनरुद्धार का श्रेय प्राप्त है।

    डच ईस्ट-इण्डीज सरकार द्वारा संरक्षण

    1816 ई. में ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स को जावा छोड़ देना पड़ा और जावा द्वीप पर नीदरलैण्ड की ''डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी'' का अधिकार हो गया। इसके बाद जावा को ''ईस्टइण्डीज कॉलॉनी'' कहा जाने लगा। केदु के डच प्रशासक हार्टमान ने कॉर्नेलियस के कार्य को आगे बढ़ाया और 1835 ई. में पूरे परिसर को भूमि से बाहर निकाल लिया। बोरोबुदुर के पुनरुत्थान में उसने व्यक्तिगत दिलचस्पी ली। उसने इस बारे में कोई लेखन कार्य नहीं किया किंतु दंतकथाओं को आधार बनाकर स्मारक स्थल की खुदाई को जारी रखा तथा मुख्य स्तूप में बुद्ध की बड़ी मूर्ति को खोज निकाला। 1842 ई. में हार्टमान ने मुख्य गुम्बद का अन्वेषण किया, हालांकि उसके द्वारा खोजा गया कार्य अज्ञात है।

    जावा की डच ईस्ट-इण्डीज सरकार ने डच अभियंता एफ. सी. विल्सन तथा जे. एफ. जी. ब्रुमुण्ड को स्मारक के अध्ययन का कार्य सौंपा। विल्सन ने इस स्मारक की प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के सैकड़ों रेखाचित्र बनाए तथा ब्रुमुण्ड ने राइटअप तैयार किए। ब्रुमुण्ड का कार्य 1859 ई. में पूरा हुआ। डच सरकार विल्सन के रेखाचित्रों को साथ जोड़कर ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित लेख प्रकाशित करना चाहती थी लेकिन ब्रुमुण्ड ने सहयोग नहीं किया। सरकार ने बाद में एक अन्य शोधार्थी सी. लीमान्स को यह कार्य सौंपा। उसने विल्सन के स्रोतों और ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित निबन्ध लिपिबद्ध किए। ई.1873 में ''बोरोबुदुर का निबंधात्मक अध्ययन'' अंग्रेजी भाषा में में प्रकाशित हुआ और उसके एक वर्ष बाद इसका फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया गया। स्मारक का प्रथम चित्र 1873 ई. में डच-फ्लेमिश तक्षणकार इसिडोर वैन किंस्बेर्गन ने लिया।

    धीरे-धीरे इस स्थान की चर्चा होने लगी और यह विश्व भर के शोधार्थियों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। ई.1882 में सांस्कृतिक कलाकृतियों के मुख्य निरीक्षक ने स्मारक की कमजोर स्थिति के कारण प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) को किसी अन्य स्थान पर संग्रहालय में स्थानान्तरित करने का आग्रह किया। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने पुरातत्वविद् ग्रोयन वेल्ड्ट को स्थान का अन्वेषण करने और परिसर की वास्तविक स्थिति ज्ञात करने के लिए नियुक्त किया। उसने अपने प्रतिवेदन में कहा कि यह डर अनुचित है इसलिए इसे इसी स्थिति में बनाए रखा जाए।

    बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री दुनिया भर में पहुंची

    जब इस स्मारक की प्रसिद्धि होने लगी तो देशी-विदेशी लोगों ने बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री को स्मृतिचिह्न के रूप में चुराना आरम्भ कर दिया और इसकी मूर्तियों तथा कलात्मक पत्थरों को लूट लिया। इनमें से कुछ भाग तो औपनिवेशिक सरकार की सहमति से भी लूटे गए। 1886 ई. में श्यामदेश के राजा चुलालोंगकॉर्न ने जावा की यात्रा की और बोरोबुदुर से कुछ मूर्तियाँ अपने देश ले जाने का आग्रह किया। उसे मूर्तियों के आठ छकड़े भरकर ले जाने की अनुमति मिल गई। इस सामग्री में विभिन्न स्तंभों से उतारे गए तीस मूर्ति-शिलापट्ट, पांच बुद्ध प्रतिमाएं, दो सिंह मूर्तियाँ, एक व्यालमुख प्रणाल, कुछ सीढ़ियों और दरवाजों के कला अनुकल्प और एक द्वारपाल प्रतिमा सम्मिलित थीं। इनमें से कुछ प्रमुख कलाकृतियाँ, जैसे शेर, द्वारपाल, काल, मकर और विशाल जलस्थल (नाले) आदि, बैंकॉक राष्ट्रीय संग्रहालय के जावा कला कक्ष में प्रदर्शित की गई हैं।

    बोरोबुदुर मंदिर का पुनर्स्थापन

    1885 ई. में योग्यकार्ता की पुरातत्व सोसाइटी के अध्यक्ष यजेर्मन ने बोरोबुदुर स्मारक में एक छुपे हुए पैर को खोजा। प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के छुपे हुए पैर व्यक्त करने वाले चित्र 1890-91 ई. में बने। जावा की डच ईस्टइण्डीज सरकार ने इस खोज के बाद बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक के संरक्षण देने की दिशा में काम आगे बढ़ाया। 1890 ई. में सरकार ने इसके सरंक्षण हेतु योजना तैयार करने के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बैठाया। इसमें डच कलाविद् एवं इतिहासकार ब्रांडेस, डच सैन्य अभियंता थियोडोर वैन एर्प और डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभियंता वैन डी कमर को सम्मिलित किया गया। इस आयोग ने 1902 ई. में ईस्टइण्डीज सरकार के सामने तीन प्रस्तावों वाली योजना रखी। पहले प्रस्ताव में स्मारक के कोनों को पुनः स्थापित करने, अव्यवस्थित पत्थरों को हटाने, वेदिकाओं को सुदृढ़ करने और झरोखे, महराब (तोरण), स्तूप तथा मुख्य गुम्बद को पुनर्स्थापित करने के सुझाव सम्मिलित थे ताकि तत्काल होने वाली संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सके। दूसरे प्रस्ताव में प्रकोष्ठ को हटाने, उचित रखरखाव करने, तलों (छतों) और स्तूपों की मरम्मत करके जल-निकासी में सुधार करने के सुझाव सम्मिलित थे। उस समय इस कार्य की अनुमानित लागत लगभग 48,800 डच गिल्डर थी।

    1907 से 1911 ई. के मध्य थियोडोर वैन एर्प के सुझावों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया। इस कार्य के पहले चरण में प्रथम सात माह तक स्मारक के आसपास खुदाई की गई ताकि बुद्ध की मूर्तियों के सिर और स्तम्भों के पत्थर खोजे जा सकें। इसके बाद वैन एर्प ने तीनों ऊपरी वृत्ताकार चबूतरों और स्तूपों को ध्वस्त करके उनका पुनः निर्माण करवाया। इसी बीच, वैन एर्प ने स्मारक में सुधार हेतु अन्य विषयों की खोज की जिनके आधार पर 34,600 गिल्डर की लागत के नए कार्य स्वीकृत किए गए। वैन एर्प ने मुख्य स्तूप के शिखर पर छत्र (तीन स्तरीय छतरी) का पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ करवाया किंतु बाद में उसने छत्र को पुनः हटा दिया क्योंकि शिखर के निर्माण के लिए मूल पत्थर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे तथा बोरोबुदुर के शिखर की मूल बनावट ज्ञात नहीं थी। हटाया गया छत्र अब बोरोबुदुर से कुछ सौ मीटर उत्तर में स्थित कर्म विभांगगा संग्रहालय में रखा है।

    पुनर्स्थापन के कार्य को सामान्यतः मूर्तियों की सफाई पर केन्द्रित रखा गया तथा वैन एर्प ने जलनिकासी की समस्या का समाधान नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि पन्द्रह वर्षो में स्मारक के गलियारों की दीवारें झुकने लगी और प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) में दरारें दिखने लगीं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वैन एर्प ने मरम्मत कार्य में कंकरीट का उपयोग किया था जिससे क्षारीय लवण तथा कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड का घोल बाहर आने लगा और उसका बहाव शेष हिस्सों पर भी होने लगा किंतु 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और उसके समाप्त होते ही 1945 ई. में इंडोनेशियाई राष्ट्रीय क्रांति आरम्भ हो गई जो 1949 ई. तक चली। इन कारणों से बोरोबुदुर का पुनर्स्थापन कार्य बीच में ही रुक गया। इस दौरान स्मारक को मौसम की प्रतिकूलता तथा जल-निकासी की समस्या का सामना करना पड़ा जिसके कारण पत्थरों की मूल बनावट खिसकने लगी और दीवारें धरती में धँसने लगीं।

    1950 के दशक तक बोरोबुदुर ढहने की कगार पर पहुँच गया। 1965 ई. में इंडोनेशिया ने यूनेस्को से बोरोबुदुर सहित अन्य स्मारकों का अपक्षय रोकने के लिए सहायता मांगी। 1968 ई. में इंडोनेशिया के पुरातत्व सेवा के प्रमुख प्रोफेसर सोक्मोनो ने ''बोरोबुदुर सरंक्षण अभियान'' आरम्भ किया और बड़े पैमाने पर मरम्मत परियोजना आरम्भ की। 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में इंडोनेशिया सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से बोरोबुदुर स्मारक को बचाने के लिए बड़ा नवीनीकरण कराने का अनुरोध किया।

    इण्डोनेशिया सरकार के इस अनुरोध पर ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, साइप्रस, फ्रांस तथा जर्मनी ने इस कार्य के लिए धन उपलब्ध कराया। इस धन से इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को ने 1975-82 ई. तक बड़ी नवीनीकरण परियोजना के अंतर्गत स्मारक का जीर्णोद्धार करवाया। नवीनीकरण के दौरान दस लाख से भी अधिक पत्थर हटाकर उन्हें एक तरफ विशाल आरे के आकार में जमाकर रखा गया जिससे उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सके तथा सूचीबद्ध रूप से सफाई और परिरक्षण के काम किए जा सकें। पत्थरों को सूक्ष्मजीवियों से मुक्त करने के लिए कीटनाशकों से उपचारित किया गया। स्मारक की नींव को सुदृढ़ बनाया गया तथा समस्त 1460 स्तम्भों की सफाई की गई। पुनर्स्थापन में पाँच वर्गाकार चबूतरों को हटाकर वापस लगाने तथा जल-निकासी प्रणाली में सुधार लाने का कार्य भी सम्मिलित था। इस विशाल परियोजना में लगभग 600 लोगों ने कार्य किया और कुल 69,01,243 अमीरीकी डॉलर व्यय हुए। नवीनीकरण का कार्य पूर्ण होने के बाद यूनेस्को ने 1991 ई. में बोरोबुदुर को विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध किया। वर्तमान में बोरोबुदुर स्मारक तीर्थ-यात्रियों एवं विश्व भर के पर्यटकों के लिए खुला हुआ है।

    धार्मिक समारोह

    यूनेस्को द्वारा विशाल नवीनीकरण के बाद, बोरोबुदुर को पुनः तीर्थयात्रा और पूजास्थल के रूप में काम में लिया जाने लगा। वर्ष में एक बार, मई या जून माह में पूर्णिमा के दिन इंडोनेशिया में बौद्ध धर्म के लोग गौतम बुद्ध के जन्म, निधन और शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के उपलक्ष्य में वैशाख उत्सव मनाते हैं। वैशाख का यह दिन इंडोनेशिया में राष्ट्रीय छुट्टी के रूप में मनाया जाता है तथा तीन बौद्ध मंदिरों मेदुत से पावोन होते हुए बोरोबुदुर तक समारोह मनाया जाता है।

    बम विस्फोटों से उड़ाने का षड़यंत्र

    21 जनवरी 1985 को बोरोबुदुर स्मारक में अचानक हुए नौ बम विस्फोटों से स्मारक के नौ स्तूप बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। यह षड़यंत्र कुछ मुस्लिम उग्रवादियों ने रचा था। एक मुस्लिम धर्मोपदेशक हुसैन अली अल हब्स्याई को पकड़ लिया गया तथा लगभग 6 साल तक चले मुकदमे के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बम ले जाने वाले उग्रवादी समूह के दो अन्य सदस्यों को 20 वर्ष के कारावास की एवं एक अन्य व्यक्ति को 13 वर्ष के कारावास की सजा मिली।

    पर्यटकों की संख्या में वृद्धि

    बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक इंडोनेशिया में विश्व भर के पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। 1974 ई. में स्मारक को देखने के लिए 2 लाख 60 हजार पर्यटक आए जिनमें से 36 हजार विदेशी पर्यटक थे। देश में अर्थव्यवस्था संकट से पूर्व 1990 के दशक के मध्य तक यह संख्या बढ़कर 25 लाख प्रति वर्ष तक पहुँच गई जिनमें से 80 प्रतिशत घरेलू पर्यटक थे।

    भूकम्प से अप्रभावित

    27 मई 2006 को मध्य जावा के दक्षिणी तट पर रिक्टर पैमाने पर 6.2 तीव्रता का भूकम्प आया। इस घटना से योग्यकर्ता नगर के निकट के क्षेत्रों में गंभीर क्षति के साथ बहुत से लोग हताहत हुए किंतु बोरोबुदुर इससे अप्रभावित रहा।

    मेरापी पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

    वर्ष 2010 के अक्टूबर और नवम्बर माह में बोरोबुदुर मंदिर से लगभग 28 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित मेरापी पर्वत में भयानक ज्वालामुखी विस्फोट हुए जिनसे बोरोबुदुर स्मारक को भारी क्षति पहुंची तथा ज्वालामुखीय राख मंदिर पर आकर गिरी। 3 से 5 नवम्बर तक मंदिर की मूर्तियों पर राख की 2.5 सेंटीमीटर मोटी परत चढ़ गई। आस-पास के पेड़-पौधों को भी हानि पहुंची। 5 से 9 नवम्बर तक मंदिर परिसर को राख की सफाई करने के लिए बन्द रखा गया। यूनेस्को ने मेरापी पर्वत से ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बोरोबुदुर के पुनर्स्थापन की लागत के रूप में 30 लाख अमरीकी डॉलर की सहायता प्रदान की। मंदिर की जल निकासी प्रणाली में ज्वालामुखीय राख भर गई थी जिसे हटाने के लिऐ फिर से 55 हजार से अधिक प्रस्तर शिलाएं हटाई गईं। इस पूरे कार्य में लगभग एक साल लग गया।

    जर्मनी द्वारा संरक्षण कार्य

    जनवरी 2012 में जर्मनी की सरकार के दो प्रस्तर सरंक्षण विशेषज्ञों ने 10 दिन मंदिर में रहकर मन्दिर की स्थिति का अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर जून 2012 में जर्मनी ने द्वितीय चरण के पुनर्स्थापन कार्यों के लिए यूनेस्को को 1,30,000 अमीरी डॉलर की सहायता देने का प्रस्ताव किया। अक्टूबर 2012 में पत्थर सरंक्षण, सूक्ष्मजैविकी, सरंचना अभियांत्रिकी और रासायनिक अभियान्त्रिकी के छः विशेषज्ञों ने एक सप्ताह तक बोरोबुदुर में रहकर इसका पुनः निरीक्षण किया। इसके बाद यहाँ एक बार फिर से संरक्षण कार्य करवाए गए। जून 2012 में बोरोबुदुर को विश्व के सबसे बड़े पुरातत्व स्थल के रूप में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। अगस्त 2014 में इस स्मारक की सीढ़ियों पर लकड़ी का आवरण लगाया गया ताकि मूल सीढ़ियों को जूतों से घिसने से बचाया जा सके।

    केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

    13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित पूर्वी जावा के केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ जो योग्यकर्ता तक सुनाई दिया। इससे निकली राख से प्रभावित होने के कारण बोरोबुदुर, परमबनन और रातु बोको सहित योग्यकर्ता और मध्य जावा के बड़े पर्यटन स्थल कुछ दिनों के लिए बन्द कर दिये गये। इस दौरान बोरोबुदुर की सरंचना को ज्वालामुखीय राख से बचाने के लिए प्रतिष्ठित स्तूपों और मूर्तियों को ढक दिया गया।

    आईसिस के निशाने पर अगस्त 2014 में आईएसआईएस (आईसिस) की इंडोनेशियाई शाखा ने सोशियल मीडिया पर धमकी दी कि वह बोरोबुदुर सहित इंडोनेशिया की अन्य मूर्ति परियोजनाओं को शीघ्र ही ध्वस्त करेगा। इसके बाद इंडोनेशियाई पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा बोरोबुदुर मंदिर की सुरक्षा बढ़ाई गई। सरकार ने मंदिर परिसर में सीसीटीवी लगाए और रात में सुरक्षा पहरा बढ़ा दिया।

    जावाई स्थापत्य स्मारक घोषित

    जब जावा में रह रहे भारतीय बौद्धों और हिन्दुओं को इस स्मारक के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बोरोबुदुर की पहाड़ी पर बड़ी संख्या में निर्माण कार्य आरम्भ कर दिये। इण्डोनेशिया की मुस्लिम सरकार को इस स्थान से कोई भी हिन्दू अथवा बौद्ध पुण्य स्थान संरचना नहीं मिली। इस कारण सरकार ने इसे हिन्दू अथवा बौद्ध स्थल न मानकर स्थानीय जावा संस्कृति का स्मारक घोषित किया है।

    बौद्ध चैत्य एवं स्मारक का प्रारूप

    बोरोबुदुर को एक बड़े स्तूप की तरह निर्मित किया गया है ऊपर से देखने पर यह विशाल तांत्रिक बौद्ध मंडल जैसा दिखाई देता है। यह बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और मन के स्वभाव को निरूपित करता है। इसका मूल आधार वर्गाकार है जिसकी प्रत्येक भुजा 118 मीटर है। इसमें नौ मंजिलें हैं। निचली छः मंजिलें वर्गाकार तथा ऊपरी तीन मंजिलें वृत्ताकार हैं।

    ऊपरी मंजिल के मध्य में एक बड़े स्तूप के चारों ओर घण्टी के आकार के 72 छोटे स्तूप हैं जो सजावटी छिद्रों से युक्त है। बुद्ध की मूर्तियाँ इन छिद्रयुक्त सहस्रपात्रों के अन्दर स्थापित हैं। बोरोबुदुर का स्वरूप पिरामिड से प्रेरित है। पश्चिम जावा के प्रागैतिहासिक ऑस्ट्रोनेशियाई महापाषाण संस्कृति के स्थल पुंडेन बेरुंडक, पंग्गुयांगां, किसोलोक और गुनुंग पडंग नामक स्थानों पर विभिन्न स्थल दुर्ग और पत्थरों से निर्मित सोपान-पिरामिड संरचनाएं पाई गई हैं। पत्थर से बने पिरामिडों के निर्माण के पीछे स्थानीय विश्वास है कि पर्वतों और ऊँचे स्थानों पर पैतृक आत्माओं अथवा ह्यांग का निवास होता है। बोरोबुदुर स्मारक की आधारभूत बनावट को पुंडेन बेरुंडक पिरमिड से प्रेरित माना जाता है तथा महायान बौद्ध विचारों और प्रतीकों के साथ निगमित पाषाण परंपरा का विस्तार माना जाता है।

    बोरोबुदुर का मंदिर का आध्यात्मिक महत्व

    स्मारक के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से तीन लोकों को निरूपित करते हैं। ये तीन लोक क्रमशः कामधातु (इच्छाओं की दुनिया), रूपधातु (रूपों की दुनिया) और अरूपधातु (रूपरहित दुनिया) हैं। साधारण मनुष्य का जीवन इनमें से निम्नतर जीवन स्तर, अर्थात् इच्छाओं की दुनिया में रहता है। जो लोग अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, वे प्रथम स्तर से उपर उठकर वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से रूपों को देख तो सकते हैं लेकिन उनकी इच्छा नहीं होती।

    अंत में मनुष्य उन्नति करता हुआ पूर्ण बुद्धत्व को प्राप्त करता है। यह मानव का मूल एवं विशुद्ध स्तर होता है। इसमें वह रूपरहित निर्वाण को प्राप्त होता है। संसार के जीवन चक्र से ऊपर हो जाता है, जहाँ प्रबुद्ध आत्मा शून्य के समान, सांसारिक रूप के साथ संलग्न नहीं होती, उसे पूर्ण शून्य अथवा अपने आप अस्तित्वहीन रखना आता है।

    बोरोबुदुर स्मारक में कामधातु को आधार से निरूपित किया गया है, रूपधातु को पाँच वर्गाकार मंजिलों (सरंचना) से और अरूपधातु को तीन वृत्ताकार मंजिलों तथा विशाल शिखर स्तूप से निरूपित किया गया है। इन तीन स्तरों के स्थापत्य गुणों में लाक्षणिक अन्तर हैं। उदाहरण के लिए रूपधातु में मिलने वाले वर्ग और विस्तृत अलंकरण, अरूपधातु के सरल वृत्ताकार मंजिल में लुप्त हो जाते हैं, जिससे रूपों की दुनिया को निरूपित किया जाता है। जहाँ लोग नाम और रूप से जुड़े रहते हैं और रूपहीन दुनिया में परिवर्तित हो जाते हैं।

    बोरोबुदुर में सामूहिक पूजा इस तरह की जाती है मानो किसी तीर्थ में भ्रमण कर रहे हों। मंदिर की सीढ़ियां और गलियारा तीर्थ यात्रियों को शिखर तक जाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। प्रत्येक मंजिल आत्मज्ञान के एक स्तर को निरूपित करती है। तीर्थ यात्रियों का मार्गदर्शन करने वाला पथ बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान को प्रतीकात्मक रूप में परिकल्पित करता है।

    1885 ई. में इस स्मारक के आधार में छिपी हुई एक संरचना आकस्मिक रूप से खोजी गई। छुपे हुये पैर में, प्रतिमा उत्कीर्णित शिलापट्ट ;त्मसपमद्धि भी शामिल हैं, जिनमें से 160 वास्तविक कामधातु के विवरण की व्याख्या करते हैं। शिलालेखित चौखटों पर भी शिल्पकारों द्वारा नक्काशियों के बारे में कुछ आवश्यक अनुदेश लिखे हुए थे। वास्तविक आधार के ऊपर झालरदार आधार बना हुआ है जिसका उद्देश्य आज भी रहस्य बना हुआ है। माना जाता है कि यह झालर पहाड़ी में विनाशकारी आपदा आने की स्थिति में वास्तविक आधार को आच्छादित करने के लिए है। अन्य मतों के अनुसार झालरदार आधार बनाने का कारण, स्मारक के मूल आधार की बनावट के उन दोषों को छिपाना है, जो प्राचीन भारतीय वास्तु शास्त्र का उल्लंघन करते हैं।

    504 बुद्ध प्रतिमाएं

    बोरोबुदुर मंदिर में भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। पाँच वर्गाकार चबूतरों (रूपधातु स्तर) के साथ-साथ ऊपरी चबूतरे (अरूपधातु स्तर) पर पद्मासन मूर्तियाँ स्थित हैं। रूपधातु स्तर पर देवली में बुद्ध की प्रतिमाएं स्तंभ वेष्टन (वेदिका) के बाहर पंक्तियों में क्रमबद्ध हैं।

    ऊपरी स्तर पर मूर्तियों की संख्या लगातार कम होती जाती है। प्रथम वेदिका में 104 देवली, दूसरी में 88, तीसरी में 72, चौथी में 72 और पाँचवी में 64 देवली हैं। कुल मिलाकर रूपधातु स्तर तक 432 बुद्ध मूर्तियाँ हैं।

    अरूपधातु स्तर (तीन वृत्ताकार चबूतरों) पर बुद्ध की मूर्तियाँ स्तूपों के अन्दर स्थित हैं। प्रथम वृत्ताकार चबूतरे पर 32 स्तूप, दूसरे पर 24 और तीसरे पर 16 स्तूप हैं जिनका योग 72 स्तूप होता है। मूल 504 बुद्ध मूर्तियों में से 300 से अधिक क्षतिग्रत हैं जिनमें से अधिकतर मूर्तियों के सिर गायब हैं। कुल 43 मूर्तियाँ गायब हैं।

    स्मारक की खोज होने से पहले, इन मूर्तियों के सिरों को मूर्ति-तस्करों ने चुराया और पश्चिमी देशों के संग्राहलयों को बेच दिया। बुद्ध मूर्तियों के इन सिरों में से कुछ एम्स्टर्डम के ट्रोपेन म्यूजियम और कुछ लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय सहित विभिन्न संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं। बुद्ध की समस्त मूर्तियाँ दूर से देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं किंतु इनकी मुद्रा अथवा हाथों की स्थिति में भिन्नता है। मुद्रा के पाँच समूह हैं- उत्तर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और शिरोबिंदु। ये सभी मुद्राएं महायान के अनुसार पाँच क्रममुक्त दिक्सूचक को निरुपित करती हैं। प्रथम चार वेदिकाओं में पहली चार मुद्राएं (उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) में प्रत्येक मूर्ति कम्पास की एक दिशा को निरुपित करती है। पाँचवी वेदिका में बुद्ध की मूर्ति और ऊपरी चबूतरे के 72 स्तूपों में स्थित मूर्तियाँ समान मुद्रा (शिरोबिंदु) में हैं। प्रत्येक मुद्रा, पाँच ध्यानी बुद्ध में से किसी एक को निरूपित करती है जिनमें प्रत्येक का अलग आध्यात्मिक कारण है।

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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 8 परमबनन शिव मंदिर समूह

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 8  परमबनन शिव मंदिर समूह


    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 8  


    परमबनन शिव मंदिर समूह


    मध्य जावा में स्थित परमबनन शिव मंदिर समूह, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और विशाल हिंदू मंदिर समूह है। यह मंदिर समूह मुख्यतः भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। परमबनन मंदिर विश्व भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर परिसर में काले रंग के चौकोर, आयातकार एवं विभिन्न आकृतियों में तराशे हुए, सुगढ़ एवं विशालाकाय पत्थरों के सैंकड़ों विशाल ढेर स्थित हैं जो नौवीं शताब्दी इस्वी के विशाल मंदिर समूह की उपस्थिति को दर्शाते हैं। पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मूल मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। इस मंदिर समूह का विनाश किसी शक्तिशाली भूकम्प के दौरान हुआ।

    परमबनन शिव मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। उस समय कुल 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था जिनमें केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर त्रिमूर्ति मंदिर कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं। इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के मंदिर हैं। त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक आपित मंदिर है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक केलिर मंदिर तथा चारों कोनों पर एक-एक पाटोक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर योजना के चारों ओर चार पंक्तियों में कुल 224 मंदिरों के अवशेष स्थित हैं। इस प्रकार कुल यहाँ कुल 240 मंदिर स्थित थे किंतु 16वीं शती ईस्वी में प्रबल भूकम्प से ये मंदिर गिर गए। लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे।

    बौद्ध धर्म एवं शैव धर्म की प्रतिस्पर्द्धा

    भारत से आए कई हिन्दू राजकुमारों ने जावा द्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए। सातवीं-आठवी शताब्दी ईस्वी में मध्य जावा क्षेत्र में संजय राजवंश के वंशज राज्य करते थे। यह राजवंश मूलतः हिन्दू धर्म को मानने वाला था किंतु बाद में किसी काल में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आठवीं शताब्दी ईस्वी में शैलेन्द्र वंश के राजाओं ने संजय वंश के शासकों को परास्त करके मध्य जावा से परे धकेल दिया और मेदांग राज्य की स्थापना की। संजय वंश पूर्वी जावा पर शासन करने लगा। शैलेन्द्र वंश के राजा भी महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बोरोबुदुर एवं सेवू के विशाल एवं गगनचुम्बी महायान बौद्ध मंदिरों का निर्माण किया। शैलेन्द्र वंश के राजा लगभग एक शताब्दी तक मध्य जावा पर शासन करते रहे।

    हिन्दू धर्म की जय तथा मंदिर का निर्माण

    नौवीं शताब्दी ईस्वी में एक बार पुनः शैलेन्द्र वंश का पतन हो गया एवं उनके स्थान पर पुनः संजय वंश का उत्थान हुआ और उन्होंने माताराम राज्य की स्थापना की। इस समय तक इस वंश के राजाओं ने पुनः शैव-हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिए ई.850 के आसपास माताराम राज्य के संजय वंशीय राजा राकाई पिकातान ने हिन्दू धर्म की विजय के रूप में इस मंदिर समूह का निर्माण कराना आरम्भ किया ताकि शैलेन्द्र वंश के शासकों को उनकी ही भाषा में विशाल मंदिरों के निर्माण के माध्यम से जवाब दिया जा सके। इतिहासकारों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण इस बात की घोषणा थी कि अब मध्य जावा में माताराम साम्राज्य (मेदांग साम्राज्य) बौद्ध-महायान धर्म के स्थान पर हिन्दू-शैव धर्म में परिवर्तित हो गया है।

    राकाई पिकातान के उत्तराधिकारी राजाओं- लोकपाल तथा बालीतुंग महाशंभु ने मंदिरों का निर्माण निरंतर जारी रखा। ई.856 के शिवगढ़ शिलालेख के अनुसार इस मंदिर को मूलतः भगवान शिव को समर्पित किया गया था तथा इस मंदिर का मूल नाम शिवगढ़ था। जिस स्थान पर आज यह मंदिर समूह स्थित है, उसके ठीक निकट से नौवीं शताब्दी ईस्वी में ओपाक नामक नदी बहती थी। मंदिर को सुरक्षित करने के लिए इस नदी का रुख मोड़ा गया। अब यह नदी मंदिर के पश्चिम में है तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना राजा बालितुंग द्वारा की गई। इसके बाद से राज परिवार के समस्त धार्मिक आयोजन इसी मंदिर में होने लगे। बालितुंग के उत्तराधिकारी राजाओं- दक्ष एवं तुलोडोंग द्वारा भी मंदिर का विस्तार किया गया। उस काल में इस मंदिर के बाहरी क्षेत्र में सैंकड़ों ब्राह्मण परिवार निवास करते थे।

    मंदिर का विघटन

    ई.930 के बाद के किसी वर्ष में मपू सिंदोक नामक राजा ने जावा में इस्याना वंश की स्थापना की तथा जावा की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में स्थानांतरित कर दिया। ऐसा परमबनन के उत्तर में स्थित मेरापी पहाड़ में ज्वालामुखी के सक्रिय हो जाने के कारण किया गया। राज्याश्रय हट जाने के बाद से मंदिर का विघटन आरम्भ हो गया। फिर भी यह हिन्दू प्रजा की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना रहा। सोलहवीं शताब्दी में आए एक भयंकर भूकम्प में इस मंदिर समूह के समस्त मंदिर धरती पर गिर गए। ई.1755 में माताराम साम्राज्य का विभाजन हुआ तथा यह योग्यकार्ता (जोगजा) एवं सुराकार्ता (सोलो) राज्यों में विभक्त हो गया। इन दोनों राज्यों के सीमा इसी मंदिर पर आकर समाप्त होती थी। अब उन राज्यों की पहचान योग्यकार्ता एवं सेंट्रल जावा के रूप में की जाती है।

    मंदिर की जीर्णोद्धार यात्रा

    जब डच लोग इस द्वीप पर आए तो ई.1811 में उनकी दृष्टि इस मंदिर समूह के खण्डहरों पर पड़ी। उन्होंने खजाने की लालसा में इस मंदिर को और भी खोद डाला। बाद में डच लोगों द्वारा इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया। तब पाया गया कि आस-पास के लोग इन मंदिरों के पत्थरों को उठाकर अपने घरों की नीवों में डालते थे तथा घरों की चिनाई करते थे। ई.1918 में डच लोगों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण आरम्भ किया। ई.1930 में जीर्णोद्धार के काम में तेजी आई तथा यह कार्य आज भी जारी है। मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य आसान नहीं था। अधिकतर अलंकृत पत्थर दूरस्थ क्षेत्रों में ले जाकर भवन निर्माण में लगा दिए गए थे। ऐसे में सरकार ने निर्णय लिया कि केवल उन्हीं मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा जिनकी कम से कम 75 प्रतिशत सामग्री उपलब्ध है तथा जिनका कोई डिजाइन, चित्र अथवा नक्शा उपलबध है। मंदिर के पुननिर्माण के लिए इसके चारों ओर खड़े हो गए बाजार एवं मानव बस्तियों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया।

    रामकथा के मंचन हेतु स्टेडियमों का निर्माण

    मंदिर परिसर में ही ओपाक नदी के तट पर ओपन एयर तथा इण्डोर स्टेडियमों का निर्माण किया गया ताकि वहाँ रामकथा का मंचन किया जा सके। जावा द्वीप पर रामकथा नृत्य नाटिकाएं हजारों साल से मंचित की जाती रही हैं। उन विभिन्न नृत्य नाटिकाओं को ढूंढकर फिर से इन स्टेडियमों तक लाया गया। चंद्र ज्योत्सना के प्रकाश में इन नाटिकाओं का मंचन किया जाता है तो विश्व भर के पर्यटक मंत्र-मुग्ध रह जाते हैं। गलुंगन, तावुर केसंगा तथा नायेपी आदि हिन्दू पर्वों पर इस मंदिर परिसर में हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। उस दौरान बहुत से दल रामकथाओं का मंचन करते हैं।

    सुन्नी मुसमलान द्वारा शिव मंदिर का उद्घाटन

    ई.1953 में मुख्य शिव मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा हो गया। इण्डोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने इस मंदिर का उद्घाटन किया जो इस्लाम की सुन्नी शाखा का मुसलमान था। इस समय तक जावा की 80 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमान थी किंतु उन्हें इस हिन्दू मंदिर को फिर से खड़ा करने, उसका उद्घाटन करने और उसके दरवाजे पूरे संसार के पर्यटकों के लिए खोलने में कोई परहेज नहीं था, अपितु वे गर्व की अनुभूति करते थे कि उन्होंने अपनी सैंकड़ों साल पहले खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर लिया था। भारत में जहाँ कि 80 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या निवास करती है, श्रीकृष्ण जन्म भूमि मथुरा, श्री राम जन्म भूमि अयोध्या और विश्वनाथ मंदिर काशी के मंदिरों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है, इन मंदिरों पर राजनीति करके, कुछ राजनीतिक दल मुसलमानों के और कुछ राजनीतिक दल हिन्दुओं के वोट प्राप्त करते हैं। मुझे जावा में सरदार पटेल का स्मरण हो आया जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षी इरादों को विफल करके सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवा दिया था। अन्यथा आज उसकी दशा भी अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ के मंदिरों जैसी ही होती।

    वर्ष 2006 में पुनः भूकम्प से क्षति

    अभी मंदिर को खुले लगभग 53 वर्ष ही हुए थे कि वर्ष 2006 में मध्य जावा में पुनः जोर का भूकम्प आया। मंदिर को फिर से क्षति पहुंची और इण्डोनेशिया के आर्कियोलोजी विभाग द्वारा मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करके इसे दर्शकों के लिए सुरक्षित बनाया गया। इस दौरान मंदिर कई महीनों तक बंद रहा।

    सोलह मुख्य मंदिरों एवं दो लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण

    वर्ष 2009 में नंदी मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो गया और यह दर्शकों के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर भगवान शिव के मुख्य मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इसके बाद एक-एक करके मंदिरों का पुनर्निर्माण होता गया और वे दर्शकों के लिए खोले जाते रहे। वर्तमान में भीतरी मुख्य क्षेत्र के सभी 8 मुख्य मंदिरों एवं सभी 8 लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण पूरा कर लिया गया है। बाहरी क्षेत्र के 224 पेरवारा मंदिरों में से केवल 2 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जा सका है।

    वर्ष 2010 में परमबनन सेंचुरी घोषित

    वर्ष 2010 में इण्डोनेशियाई सरकार ने परमबनन, रातू बोको, कालासन, सारी तथा प्लाओसान मंदिरों के समस्त क्षेत्रों को घेरते हुए परमबनन सेंचुरी घोषित किया। यह सेंचुरी 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है।

    वर्ष 2014 में ज्वालामुखी की राख का सामना

    परमबनन शिव मंदिर को दुबारा से खोले हुए आठ वर्ष भी नहीं बीते थे कि 13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित केलुड ज्वालामुखी फट पड़ा जिसका धमाका दो किलोमीटर दूर तक सुनाई दिया। इस ज्वालामुखी से बड़ी मात्रा में निकली काली और गर्म राख उड़कर इन मंदिरों तक भी आई और इन मंदिरों को भारी नुक्सान पहुंचा। इस कारण इस मंदिर सहित आसपास के समस्त मंदिरों को श्रद्धालुओं, दर्शकों एवं पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया। इसे काफी दिनों बाद, राख हटाए जाने के पश्चात् ही फिर से खोला जा सका।

    रारा जोंग्गरांग की कथा

    परमबनन शिव मंदिर को जावा द्वीप वासी रारा जोंग्गरांग मंदिर कहते हैं। रारा जोंग्गरांग का अर्थ होता है- पतली कुमारी। जावा द्वीप की एक दंत कथा के अनुसार किसी समय जावा द्वीप पर पेंगिंग तथा बोको नामक दो राज्य थे। पेंगिंग राज्य समृद्ध एवं खुशहाल राज्य था जिस पर राजा प्रबु डामार मोयो का शासन था जिसके बंडुंग बोण्डोवोसो नामक पुत्र था। बोको राज्य पर मानवभक्षी क्रूर राक्षस प्रबु बोको का शासन था। उसका एक सहयोगी पातिह गुपोलो नामक राक्षस भी बड़ा क्रूर था। प्रबु बोको की कन्या रारा जोंगरांग बहुत सुंदर थी। प्रबु बोको पेंगिंग राज्य को जीतकर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। इसलिए उसने विशाल सेना का निर्माण किया।

    एक दिन अचानक उसकी सेनाओं ने पेंगिंग रज्य पर आक्रमण कर दिया। पेंगिंग का राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो अपनी सेना लेकर उस राक्षस राजा से लड़ने के लिए चला। एक भयानक युद्ध के बाद राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने अपनी रहस्यमयी शक्तियों से राक्षस राजा प्रबु बोको को मार डाला। प्रबु बोको का सहयोगी राक्षस पातिह गुपोलो बची हुई सेना को युद्ध क्षेत्र से लेकर भाग गया। वह मृत राजा की राजधानी बोको पहुंचा और राजमहल में जाकर राजकुमारी रारा जोंगराग को सूचित किया कि उसका पिता युद्ध में मर गया है। उसी समय पेंगिंग की सेना आ पहुंची और उन्होंने मृतराजा की राजधानी एवं उसके महल पर अधिकार कर लिया।

    राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने राजकुमार रोरो जोंगराग को देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु राजकुमारी ने विवाह करने से मना कर दिया। जब राजकुमार ने राजकुमारी पर बार-बार जोर डाला तो राजकुमारी ने राजकुमार के समक्ष दो शर्तें रखीं। पहली तो यह कि उसे जलतुण्ड नामक एक विशाल कूप बनाना पड़ेगा तथा दूसरी शर्त यह कि राजकुमार को अपनी शक्तियों के बल पर एक रात में 1000 मंदिरों का निर्माण करना पड़ेगा। राजकुमार ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं तथा तुरंत ही एक कूप का निर्माण करना आरम्भ कर दिया। राजकुमार ने अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर शीघ्र ही कुआं खोद डाला तथा राजकुमारी को कुआं देखने के लिए बुलाया। राजकुमारी ने राजकुमार को कुएं में उतरकर दिखाने के लिए कहा। जब राजकुमार कुएं में उतरा तो राजकुमारी के पिता के साथी राक्षस पातिह गुपोलो ने कुंए को मिट्टी एवं पत्थरों से बंद कर दिया। बड़ी कठिनाई से राजकुमार उसे कुएं से बाहर निकल सका।

    इस धोखे के बाद भी राजकुमारी के प्रति राजमकुमार का प्रेम कम नहीं हुआ। अब राजकुमारी ने राजकुमार से दूसरी शर्त पूरी करने के लिए कहा। राजकुमार ने उन दिव्य आत्माओं का आह्वान किया जो उसकी सहायता करती थीं। वे आत्माएं जब 999 मंदिर बना चुकीं और 1000 वें मंदिर का निर्माण करने लगीं तो राजकुमारी ने अपने राक्षस साथियों की सहायता से पूर्व दिशा में चावल के खेतों और भूसे में भयानक आग लगा दी जिससे मंदिर बना रही आत्माओं को लगा कि सूर्य निकल आया है और वे काम छोड़कर फिर से धरती में प्रवेश कर गईं। इस प्रकार एक हजारवां मंदिर अधूरा ही रह गया। जब राजकुमार को इस छल के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने राजकुमारी जोंग्गरांग को श्राप दिया कि वह पत्थर की मूर्ति में बदल जाए। राजकुमारी तत्काल ही पत्थर की मूर्ति में बदल गई और राजकुमार ने अधूरे पड़े मंदिर का निर्माण पूरा करके उस मूर्ति को वहाँ स्थापित कर दिया। वही मूर्ति अब दुर्गा के रूप में पूजी जाती है जिसे स्थानीय लोग रारा जोंग्गरांग कहते हैं। यही मूर्ति शिव मंदिर के उत्तर वाले प्रकोष्ठ में लगी हुई है।

    परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की आयोजना

    सम्पूर्ण मंदिर परिसर लगभग 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है। मंदिर परिसर के केन्द्रीय भाग में मुख्यतः ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं। तीनों देवों की प्रतिमाओं के मुख पूर्व दिशा में हैं। प्रत्येक प्रधान मंदिर के सम्मुख पश्चिम दिशा में मुंह करके उसी देव से संबंधित एक मंदिर स्थित हैं जो तीनों देवों के वाहनों को समर्पित हैं। ब्रह्मा मंदिर के सामने हंस का, विष्णु मंदिर के सामने गरुड़ का और शिव मंदिर के सामने नन्दी का मंदिर स्थित है। शिव मंदिर बहुत बड़ा और सुंदर है। यह मंदिर तीनों प्रमुख मंदिरों के मध्य में है। शिव मंदिर के उत्तर में भगवान विष्णु का और दक्षिण में भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। रोरो जोंग्गरंग मंदिर या परमबनन मंदिर दुनिया भर के हिंदुओं के साथ-साथ, स्थानीय लोगों के लिए भी भक्ति एवं अध्यात्म का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

    परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की प्रतिमाएं

    परमबनन परिसर का मुख्य मंदिर अर्थात् शिव मंदिर 47 मीटर ऊंचा है तथा आधार पर 34 मीटर लम्बा एवं 34 मीटर चौड़ा है। मंदिर के पूर्व में बनी सीढ़ियों से होकर ऊपर जाया जाता है जहाँ एक के बाद एक करके चारों ओर कुल चार कक्ष बने हुए हैं जिनमें से पूर्व दिशा की ओर के मुख्य कक्ष में भगवान शिव की प्रतिमा खड़ी है। उत्तर की तरफ वाले कक्ष में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा प्रतिमा है। एक कक्ष में भगवान गणेश एवं एक कक्ष में अगस्त्य ऋषि की प्रतिमा है। ब्रह्मा मंदिर में केवल एक ही कक्ष है जिसमें केवल ब्रह्मा की प्रतिमा है। इसी प्रकार विष्णु मंदिर में भी केवल एक कक्ष है जिसमें केवल भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।

    श्रीराम कथा प्रसंगों की अद्भुत प्रतिमाएं

    मुख्य मंदिरों के पूजा कक्षों की बाहरी दीवारों पर प्रदक्षिणा अथवा परिक्रमा करने के पथ बने हुए हैं। इन प्रदक्षिणा पथों के दोनों ओर की दीवारों पर रामकथा एवं श्रीकृष्ण लीला के प्रसंगों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई हैं। रामकथा प्रसंग के मूर्ति फलक शिव मंदिर से आरम्भ होते हैं तथा ब्रह्मा मंदिर में जाकर पूर्ण होते हैं। इन दीवारों पर लोकपालों एवं विविध देवताओं की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों का उत्पीड़न, रावण द्वारा सीता का हरण, जटायु द्वारा सीता को बचाने की चेष्टा, भगवान द्वारा मारीच का वध, रावण द्वारा कैलास पर्वत को उठाने के दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं। एक पैनल में अशोक वाटिका में सीता माता के समक्ष हनुमानजी द्वारा रामकथा के निवेदन का बड़ा ही जीवन्त दृश्य अंकित किया गया है इस चित्र में माता सीता और हनुमानजी के चेहरे के भाव एवं मुद्राएं इतनी भाव प्रवण बनाई गई हैं कि संसार में इस दृश्य का ऐसा अद्भुत अंकन शायद ही कहीं और हुआ हो। यह बीच में से एक टूटा हुआ पैनल है किंतु सौभाग्य से दोनों चेहरे पूरी तरह सुरक्षित हैं। जीर्णोद्धार के दौरान इस पैनल को फिर से जोड़कर खड़ा किया गया है।

    भागवत पुराण के प्रसंगों का अंकन

    हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए परमबनन मंदिर आस्था का केंद्र है। परमबनन मंदिर इतना सुंदर है की इसकी बनावट किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले। मंदिर की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग मूर्तियों के रूप में अंकित हैं। विष्णु मंदिर के परिक्रमा पथ में भागवत पुराण के आधार पर श्रीकृष्ण लीला के प्रसंग शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं। बाल कृष्ण की लीलाओं के अंकन को देखकर दर्शक सम्मोहित सा खड़ा रह जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध और कृष्ण-बलराम द्वारा कालिय वध के प्रसंग इतने सुंदर बने हुए हैं जिन्हें देखकर दर्शक, मूर्तिकारों की समझ और कला के प्रति अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।

    कमल-पुष्प पर मानव खोपड़ी

    पास में ही एक शिव प्रतिमा है जिसमें शिव ध्यानस्थ हैं। उनके दाहनी ओर बहुत सुंदर त्रिशूल खड़ा हुआ है और बाईं ओर कमल नाल पर लगे पुष्प के ऊपर एक खोपड़ी रखी हुई दिखाई दे रही है। भगवान के शरीर पर विविध प्रकार के आभूषण एवं अलंकरण सुशोभित हैं। भगवान के हाथों में रुद्राक्ष की माला है किंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रतिमा में कोई सर्प दिखाई नहीं दे रहा है।

    पशु-पक्षियों एवं कल्पतरू का अंकन

    इन मंदिरों की बाहरी दीवारों की ताकों में सिंह, हिरण, खरगोश, बिल्ली आदि का अंकन है। साथ ही तोते, मोर, हंस, लोकपाल, अप्सराएं एवं अन्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। एक ताक में हंस अपनी चोंच लम्बी करके पानी पीने का प्रयास कर रहा है। एक ताक में दो मादा तोते बैठे हैं जिनके मुंह के स्थान पर स्त्रियों के सुंदर चेहरे बने हुए हैं जिन्होंने विविध प्रकार के आभूषण एवं मुकुट धारण कर रखे हैं। एक अन्य ताक में एक मादा तोता तथा एक नर तोता बैठे हुए हैं जिनमें मुंह के स्थान पर नर एवं नारी के मुख बने हुए हैं। मादा तोते में मानवीय आकृति का समावेश करते हुए स्तन भी बनाए गए हैं।

    परग्रही प्राणी जैसे गरुड़

    शिव मंदिर के बाहर के प्रदक्षिणा पथ में एक प्रतिमा में भगावान विष्णु की सेवा में गरुड़ विराजमान हैं, गरुड़ का सिर अपेक्षाकृत लम्बा बनाया गया है जिसे देखकर मिश्र देश के उन लम्बी खोपड़ियों वाले देवताओं का स्मरण होता है जिनके लिए माना जाता है कि ये परग्रही मानव थे और दूसरे लोक से धरती पर आए थे। गरुड़ के सिर पर जटाओं एवं उनसे बंधे हुए जूड़े का भी अंकन किया गया है। गरुड़ के नीचे जल में तैरती हुई मछलियां दिखाई गई हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में विश्राम कर रहे हैं, गरुड़ उनकी सेवा में हैं तथा हाथों में कमल पुष्प सुशोभित है।






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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 9 उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 9 उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 9

    उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं 

    बाली द्वीप के पडंग्टेगल गांव में स्थित 'उबुद-वानर-वन' लगभग 12 हैक्टेयर क्षेत्र में स्थित है जिसमें लाल मुंह, अपेक्षाकृत छोटी काया एवं सफेद रंग की बड़ी मूंछो वाले लगभग 700 बंदर निवास करते हैं। यह संसार के प्राचीनतम वनों में से एक है तथा इस छोटे से वन में वृक्षों की 186 प्रजातियां चिह्ति की गई हैं। इस वन में तीन प्रमुख मंदिर स्थित हैं-

    (1.) पुरा दालेम अगुंग पडंग्टेगल, यह मंदिर मृत्यु के महान देवता अर्थात् शिव को समर्पित है। (बाली के हिन्दू भगवान शिव को मृत्यु का महान देवता मानते हैं।)

    (2.) पुरा बेजी, यह मंदिर पाप नाशिनी देवी गंगा को समर्पित है।

    (3.) पुरा प्रजापति, यह मंदिर जन्म देने वाले देवता ब्रह्मा को समर्पित है।

    ये मंदिर लगभग 1000 साल पुराने हैं। स्वाभाविक है कि इस क्षेत्र में देवी-देवताओं की बहुत सी मूर्तियां पाई जाएं किंतु इन मंदिरों के निर्माण से पहले भी इस क्षेत्र में सैंकड़ों मूर्तियां बनाई गईं जो आज भी देखी जा सकती हैं। उबुद वानर वन परिसर में विभिन्न प्रकार के मनुष्यों, पशु-पक्षियों तथा जलचरों की अति प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। अनेक मनुष्याकार प्रतिमाओं के चेहरे, मनुष्यों की बजाय, बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों जैसे दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरों वाले मनुष्य निवास करते थे। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र तथा सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां हैं। इनके चेहरे फूले हुए हैं जिन पर बनी गोल एवं मोटी नाक दूर से ध्यान आकर्षित करती है। होंठों के भीतर अथवा बाहर निकले हुए बड़े-बड़े दांत इन्हें आधुनिक मनुष्यों से अलग प्रदर्शित करते हैं। इनी भुजाएं मांसल, जंघाएं पुष्ट तथा चेहरों पर विचित्र भाव दिखाई देते हैं। बहुत सी नर-नारी प्रतिमाओं की आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं।

    यहाँ यह समझा जाना आवश्यक है कि भारत में भी श्रीराम कथा के काल में दक्षिण भारत के वनों में बहुत सी ऐसी मानव बस्तियां थीं जिनके चेहरे वानरों, रीछों एवं भालुओं से मिलते थे। लम्बे दांतों वाले मानवों की बस्तियां भी तब अस्तित्व में रहे होने का अनुमान है जिन्हें राक्षस कहा जाता है। पर्याप्त संभव है कि उबुद वानर वन परिसर की विचित्र प्रतिमाएं इसी काल के मानवों से सम्बन्धित हों।

    उबुद वानर वन परिसर में स्थित प्रतिमाओं की बनावट, उनका अंग वैशिष्ट्य तथा प्रतिमाओं की वर्तमान अवस्था को देखकर कहा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण किसी एक सभ्यता द्वारा नहीं किया जाकर, कम से कम दो सभ्यताओं द्वारा किया गया है। इन प्रतिमाओं का कई प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

    (अ.) सभ्यताओं के आधार पर वर्गीकरण-

    1. प्राचीन सभ्यता की प्रतिमाएं- इनका निर्माण आधुनिक ''होमो सेपियन-सेपियन'' प्रजाति के ''क्रोमैग्नन मानव'' के समय में ही हुआ है किंतु उस युग में इन द्वीपों पर निवास करने वाला मानव आज के मानव जैसा चेहरा विकसित नहीं कर पाया था क्योंकि इन प्रतिमाओं के चेहरे मानवों की बजाय बंदर, चिम्पैंजी तथा ओरंगुटान से अधिक मिलते हैं। पर्याप्त संभव है कि ये प्रतिमाएं उन आदि मानवों को देखकर किन्हीं परग्रही जीवों ने बनाई हों! गोल आंखों वाली तथा टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं इसी काल की हैं।

    2. आधुनिक सभ्यता की प्रतिमाएं - इनका निर्माण वर्तमान मानव सभ्यता के क्रोमैग्नन मानव द्वारा बहुत बाद के युगों में अर्थात् आज से 1100-1200 वर्ष पहले किया गया है, जब हिन्दू राजकुमार इन द्वीपों पर अपने राज्य स्थापित कर चुके थे। इनमें मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली प्रतिमाएं मिलती हैं। इन मूर्तियों को लम्बी एवं पतली आंखों से पहचाना जा सकता है।

    (ब.) आंखों के आधार पर वर्गीकरण

    1. गोल आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें नहीं हैं- ये प्रतिमाएं किसी अति प्राचीन सभ्यता की प्रतीत होती हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं में ओरंगुटान जैसे मनुष्यों, राक्षसों एवं बंदरों की प्रतिमाएं हैं तथा इन सब के चेहरे एवं नथुने फूले हुए हैं।

    2. टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं, जिन पर पलकें नहीं हैं - ऐसी केवल एक ही प्रतिमा देखने को मिली, यह किसी परग्रही देवता की जान पड़ती है। यह प्रतिमा क्रोमैग्नन मानव द्वारा बनाई गई नहीं है। इसे किसी परग्रही जीव द्वारा ही बनाया गया होगा।

    3. आधुनिक मनुष्यों जैसी लम्बी आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें बनी हुई हैं - इस वर्ग में मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली, दोनों प्रकार की प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।

    (स.) मुखाकृति के आधार पर वर्गीकरण -

    1. राक्षसी चेहरों वाली प्रतिमाएं

    2. मनुष्यों के मुख वाली प्रतिमाएं

    3. पशुओं के मुख वाली प्रतिमाएं

    प्राचीन सभ्यता एवं आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा इन तीनों ही प्रकार की मुखाकृतियों वाली प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, जिन्हें स्पष्ट रूप से अलग-अलग पहचाना जा सकता है।

    (द.) जीभ के आधार पर वर्गीकरण-

    1. लम्बी जीभ वाली प्रतिमाएं - इस प्रकार की प्रतिमाओं में अधिकांश प्रतिमाएं गोल आंखों वाली तथा अत्यंत प्राचीन हैं। ये प्रतिमाएं प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाले देवी-देवताओं यथा अग्नि देव, वायु देव आदि की प्रतीत होती हैं। लम्बी जीभ वाली कुछ प्रतिमाओं की आंखें लम्बी एवं पतली हैं जो आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा बनाई गई हैं तथा प्राचीन प्रतिमाओं का आधुनिक संस्करण हैं।

    2. सामान्य जीभ वाली प्रतिमाएं - इनमें से कुछ प्रतिमाएं प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतीत होती हैं तथा कुछ, प्राचीन प्रतिमाओं का नवीन संस्करण जान पड़ती हैं जिनका निर्माण आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा किया गया है।

    प्रतिमाओं के इस संक्षिप्त वर्गीकरण के बाद उबुद वानर वन की कुछ प्रमुख प्रतिमाओं का परिचय दिया जाना उचित होगा।

    टेलिस्कोपिक आंखों वाले देवता की प्रतिमा

    एक देव-प्रतिमा का मुंह सामने से पूरी तरह चपटा है जिस पर आखें इस तरह बनाई गई हैं मानो वहाँ दूरबीन की नलियां रखी हुई हों। दोनों आंखों के बीच में एक मणि जैसी रचना है। इस मूर्ति में दिखाई दे रहा देवता अपने पैरों पर उकडूं बैठा है तथा घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़े होने अथवा उड़ने की तैयारी की मुद्रा में है। इस तरह की आखों वाली और कोई प्रतिमा इस परिसर में नहीं दिखी। ऐसा लगता है कि इस प्रतिमा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि यहां कभी दूसरे ग्रह के लोग आए थे जो देखने के लिए टेलिस्कोप जैसे यंत्रों का प्रयोग करते थे। इसके वक्ष पर आधुनिक क्रॉस बेल्ट जैसा कवच धारण किया हुआ है। सिर पर गोल टोप है जिससे खोपड़ी पूरी तरह ढंक गई है। यह मूर्ति एक हजार साल अथवा उससे अधिक प्राचीन प्रतीत होती है। इसकी ठोड़ी और नाक काफी घिस गई है।

    हंसती हुई नागकन्या

    इसी परिसर में एक नागकन्या का अद्भुत अंकन किया गया है। यह नागकन्या आंखें बंद किये हुए बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में बैठी है जिसके लम्बे और वलयाकार केश आगे वक्ष तक लटके हुए हैं। इसके पेट पर बने हुए शल्कों से ज्ञात होता है कि यह मानवी नहीं है, अपितु नागकन्या है। इस नागकन्या की देहयष्टि, अन्य प्रतिमाओं के विपरीत अर्थात् कृशकाय है। इसके दोनों हाथों और दोनों पैरों में चार-चार अंगुलियों का अंकन किया गया है। किसी भी हाथ या पैर में अंगूठा नहीं बनाया गया है।

    विचित्र आंखों वाली एक और प्रतिमा

    उबुद परिसर की बावड़ी के पास ही एक मनुष्य की प्रतिमा लगी है जिसकी आंखें पूरी तरह गोल हैं किंतु ये आंखें अन्य गोल आंखों वाली प्रतिमाओं से बिल्कुल भिन्न हैं। दोनों आंखें पूरी तरह चेहरे से उभर कर बाहर आई हुई हैं। पलकें नहीं होने से पता नहीं लगता कि ये आंखें खुली हैं या बंद। प्रतिमा के कान बहुत विशाल हैं। इस प्रतिमा ने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां बंद करके अपने वक्ष के पास बगल में ही रखी हुई हैं। मोटे-मोटे
    दांत स्पष्ट दिखाई देते हैं जिनमें से ऊपर वाली पंक्ति में से दोनों तरफ का एक-एक दांत बाहर आया हुआ है। इस प्रतिमा के मुख्य पत्थर में ही सिर पर छोटी सी पगड़ी तथा टांगों पर छोटी सी लंगोटी उत्कीर्ण की गई है।

    बावड़ी में गणेश एवं गंगा

    उबुद वानर वन परिसर में एक चौकोर बावड़ी है, जो अधिक गहरी नहीं है। इसकी एक दीवार पर भगवान गणेश की सैंकड़ों साल पुरानी, पत्थर की प्रतिमा लगी हुई है। इसके पास ही एक देवी प्रतिमा भी है, जो स्पष्ट पहचानने में नहीं आती किंतु यह देवी गंगा की प्रतिमा है जिसके हाथ में लिए गए पत्थर के कलश से जल की अविरल धारा आज भी बह रही है। इस जल को गंगाजल के समान ही पवित्र माना जाता है। इस बावड़ी एवं प्रतिमाओं का निर्माण भारतीय हिन्दू राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंच जाने के बाद हुआ है।

    गीदड़ मुखी मनुष्य का आकाशीय प्राणियों से वार्तालाप

    एक मनुष्याकार प्रतिमा में एक ऐसे मनुष्य का अंकन किया गया है जिसका मुख गीदड़ अथवा कुत्ते की तरह है तथा उसने अपना मुंह पूरी तरह खोलकर आकाश की तरफ उठा रखा है। ऐसा लगता है कि वह आकाश में स्थित प्राणियों को कोई संदेश दे रहा है। उसने एक हाथ में एक यंत्र उठा रखा है तथा दूसरा हाथ इस प्रकार की मुद्रा में है मानो वह अपनी अंगुलियों से इस यंत्र को संचालित करेगा। इस प्रतिमा की आंखें लम्बी और पतली हैं जिनसे स्पष्ट है कि यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित है तथा संभव है कि किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा बनाई गई प्रतिमा की अनुकृति है जिसमें गोल आंखों के स्थान पर लम्बी एवं पतली आंखों का अंकन किया गया है।

    गीदड़ के मुख वाली स्त्री प्रतिमा

    एक अन्य प्रतिमा में एक ऐसी बैठी हुई स्त्री का अंकन किया गया है जिसका मुख मादा-गीदड़ जैसा है। इसका मुख आकाश की तरफ होते हुए भी पहली वाली प्रतिमा की अपेक्षा नीचा है। इसके हाथों की अंगुलियां अपेक्षाकृत अधिक लम्बी एवं पतली हैं। इसके गले में सुंदर हार है जिस पर जटिल अलंकरण किया गया है। हाथों में कंगन, पैरों में पायजेब एवं कंधों पर अंगद भी देखे जा सकते हैं। अंगद का अंकन भुजाओं पर किया जाता है किंतु इस प्रतिमा में कंधों पर दिखाई दे रहा है। इसने अपना दायां हाथ दायें घुटने पर एवं बायां हाथ बायें घुटने पर रखा हुआ है। इसके अधो भाग पर किसी वस्त्र का अंकन किया गया है जबकि वक्ष पूरी तरह खुला हुआ है। स्तन सामान्य आकार के एवं आकर्षक बनाए गए हैं। इसकी आंखें भी लम्बी एवं पतली हैं, चेहरा एवं होठ पतले हैं। इस अंकन के आधार पर कहा जा सकता है कि इसे आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित किया गया है।

    पथ्य तैयार करते हुए मनुष्य की प्रतिमा

    एक वटवृक्ष के नीचे स्थित चबूतरे पर एक भरी हुई देहयष्टि वाले व्यक्ति की प्रतिमा है जो पालथी लगाए हुए प्रसन्न मुद्रा में बैठा है। उसके सामने एक शिला रखी हुई है जिस पर एक गोल पत्थर रखा हुआ है। यह एक वैद्य की प्रतिमा प्रतीत होती है जो किसी जड़ी-बूटी से दवा बनाने की तैयारी में है। इस वैद्य की आकृति मनुष्य से कम, औरंगुटान से अधिक मिलती है। ऐसा लगता है कि यह किसी अन्य ग्रह से आया हुआ प्राणी है जिसने बाली-वासियों को चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान दिया है। इस प्रतिमा में एक बात और ध्यान देने की है कि यह मनुष्य आंखें बंद किये हुए है और इसके दोनों हाथ प्रार्थना के भाव से जुड़े हुए हैं जिससे प्रतीत होता है कि यह दवा तैयार करने से पहले किसी देवता अथवा दिव्य शक्ति का आह्वान कर रहा है।

    लम्बी जीभ वाला विचित्र मनुष्य

    इसी परिसर में लगभग पांच फुट की एक ऐसी मनुष्य प्रतिमा रखी हुई है जिसकी जीभ कई फुट लम्बी है तथा पेट तक लटकी हुई है। इस जीभ पर एवं उसके आसपास पानी की लहरें बनी हुई हैं जिससे अनुमान होता है कि यह जल का देवता है। इसकी आंखें गोल हैं तथा लगभग चेहरे से बाहर आई हुई हैं। इस मनुष्य के पैर बहुत छोटे हैं। यह प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित जान पड़ती है।

    पैरों में नक्षत्र वाला विचित्र मनुष्य

    एक मनुष्य ने अपने दोनों हाथों में कोई गोला ले रखा है तथा एक पैर से वह उस गोले पर आघात करने की मुद्रा में है। मनुष्य के दांत बाहर दिख रहे हैं तथा चेहरे पर प्रसन्नता मिश्रित विचित्र भाव हैं जो किसी भी तरह सौम्य नहीं कहे जा सकते। इस मनुष्य के हाथ और पैरों के अग्र भाग विशेष ध्यान देने योग्य हैं। इन पर अंगुलियों की जगह विशिष्ट प्रकार का अलंकरण है। मानो उसने किसी धातु ऐ बने ग्लव्ज (दस्ताने) पहन रखे हैं। गोले पर टिका हुआ पैर मछली जैसा दिखता है तथा हाथ किसी पक्षी के मजबूत पंजे की तरह दिखाई देता है। गोले पर छिद्रनुमा केन्द्र का अंकन किया गया है तथा इस छिद्र से किरणें निकल रही हैं जिससे आभास होता है कि यह गोला कोई नक्षत्र है। इस मनुष्य की आंखें पूरी तरह गोल हैं जिन पर मोटी-मोटी भौंहों का अंकन किया गया है। गालों और ठोढ़ी पर हल्की दाढ़ी है तथा सिर पर पतली सी पगड़ी है।

    पशु चर्म लपेटने वाली स्थूल स्त्री

    निकट ही एक स्थूलकाय स्त्री की प्रतिमा है जिसने कमर पर मृगछाला की तरह किसी पशु की चर्म लपेट रखी है तथा उसकी नाभि पर एक नाग बंधा हुआ है। यह स्त्री घुटनों के बल बैठी हुई है तथा इसकी जीभ नाभि तक लटकी हुई है। वक्ष पर दिखाये गए स्तन सामान्य आकार के किंतु बेडौल हैं। सिर के बाल खुले हुए हैं। इसने बायां हाथ अपने सिर पर रखा हुआ है जिसके कारण बाईं बगल खुली हुई दिखाई देती है तथा कंधे पर पड़े हुए एक सांप का मुख इस बगल में झांक रहा है। स्त्री का दायां हाथ दिखाई नहीं देता किंतु दायें हाथ की अंगुलियां दायें स्तन पर रखी हुई हैं। इसकी आंखें काफी बड़ी और गोल हैं जो एक गोलक में रखी हुई हैं। होठ काफी मोटे हैं तथा चेहरे की भाव भंगिमा अपेक्षाकृत शांत है। यह मूर्ति भी कई शताब्दियों पुरानी प्रतीत होती है। इसकी लम्बी जीभ यह संकेत करती है कि यह किसी प्राकृतिक शक्ति पर नियंत्रण रखने वाली देवी की प्रतिमा है। अंकन के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि यह तूफान की देवी है।

    अग्निदेव एवं उनकी पत्नी

    एक चबूतरे के कौने पर एक स्त्री-पुरुष की युगल प्रतिमा बनी हुई है जिसमें उनके सिर एवं मुख दिखाई दे रहे हैं। यह प्रतिमा किसी और स्थान से लाकर इस चबूतरे पर स्थापित की गई है। दोनों चेहरों पर बनी आंखें पतली एवं सुंदर हैं। यह प्रतिमा काफी बाद के काल की है तथा यहां रखी अन्य प्रतिमाओं की शैली से मेल नहीं खाती है। पुरुष की आंखें स्पष्ट रूप से खुली हुई हैं जबकि स्त्री की आंखें बंद हैं। दोनों की जिह्वाएं मुख से बाहर निकलकर लटकी हुई हैं और आपस में मिल रही हैं। पुरुष की जिह्वा अधिक चौड़ी, अधिक बड़ी है। इस जिह्वा पर अग्नि की लम्बी लपटों का अंकन किया गया है। स्त्री की जिह्वा पर अपेक्षाकृत छोटी ज्वालाओं का अंकन है।

    ये संभवतः अग्निदेव तथा उनकी पत्नी हैं। दोनों मुखों के होंठ, आंख, नाक, कान, दांत सभी कुछ आज के मनुष्य के समान बहुत सुंदर बनाए गए हैं। दोनों के ही चेहरों के भाव सौम्य हैं। दोनों चेहरे मुस्कुरा रहे हैं जिसके कारण इनकी दंतपक्तियां स्पष्ट और लुभावनी बन पड़ी हैं। दोनों के कानों में आभूषणों का अलंकरण है। दोनों के गले में बारीक एवं मोटे मनकों की कई-कई मालाएं हैं जो वक्षों तक लटक रही हैं। स्त्री के केश वेणी के रूप में बांधे गए हैं जिन पर अच्छा अलंकरण किया गया है। स्त्री के बाएं कान का कर्णफूल बहुत सुंदर है तथा सूर्य की तरह गोल है। पुरुष की भौहें ऊपर उठकर सिर के बालों से मिल गई हैं तथा सिर के केश अग्नि की ज्वाला की तरह ऊर्ध्वगामी हैं। स्त्री के माथे पर सुंदर मुकुट बांधा गया है। मुकुट का अंकन एक मेखला के रूप में किया गया है जिसके बीच में एक कलात्मक पैण्डल बांधा हुआ है। स्त्री के बालों का जूड़ा कलात्मक रूप देकर बांधा गया है।

    यह प्रतिमा भी भारतीय राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंचन के बाद की प्रतीत होती है क्योंकि भारतीय पुराणों में वर्णित अग्निदेव का इस प्रतिमा पर पूरा प्रभाव दृष्टिगत होता है।

    बड़े स्तनों वाली स्त्री प्रतिमा

    राक्षस प्रतिमा के निकट ही एक स्त्री प्रतिमा रखी हुई है जिसका केवल धड़ एवं ऊपरी भाग दिखाई देता है। इस स्त्री प्रतिमा में स्थूलकाय स्तन बने हुए हैं। स्तनों को आगे की ओर लम्बा बनाने के लिए उनमें वलय बनाए गए हैं। इन स्तनों की तुलना आधुनिक काल की बकरियों के स्तनों से की जा सकती है। इस स्त्री की मुखमुद्रा में प्रसन्न्ता के स्थान पर पीड़ा का भाव अधिक है। ऐसे स्तनों वाली और भी प्रतिमाएं बाली द्वीप पर देखने को मिलीं। बाली के कुछ प्राचीन चित्रों में भी ऐसे स्तनों वाली स्त्रियां दिखाई गई हैं।

    लम्बी जीभ और सुंदर चेहरे वाली स्त्री

    इस परिसर में रखी एक स्त्री प्रतिमा में, वर्तमान मानव सभ्यता में दिखाई देने वाली नारी का अंकन किया गया है जिसकी गर्दन के दोनों ओर से गुंथी हुई चोटियां सामने आ रही हैं। इन चोटियों को सजाने के लिए बड़े मनकों का प्रयोग किया गया है। सिर के पीछे के केश खुले हुए हैं और कंधों के दूसरी तरफ दिखाई दे रहे हैं। स्त्री का चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा है, दांतों की सुंदर पंक्तियां दूर से दिखाई देती हैं, आंखें पतली, नुकली एवं आनुपतिक हैं और पूरी तरह खुली हुई हैं। स्त्री के वक्ष पर साड़ी जैसे किसी वस्त्र का अंकन किया गया है। चेहरे पर सौम्य भाव हैं तथा पूरा चेहरा प्रसन्नता से दमकता हुआ प्रतीत होता है। यह प्रतिमा, गोल आंखों वाली प्रतिमा से कई सौ साल बाद की प्रतीत होती है। इसके चेहरे के भाव आज की स्त्रियों से मिलते जुलते हैं किंतु बाली की स्त्रियों से नहीं, भारतीय देवियों के चेहरों से।

    दो दांतों वाली राक्षस प्रतिमा

    एक स्थूलाकाय पुरुष प्रतिमा के मुंह से दोनों तरफ एक-एक दांत बाहर निकला हुआ है। चेहरे पर दाढ़ी है तथा मुख के भाव अपेक्षाकृत क्रूर हैं। यह बैठी हुई मुद्रा में है जिसने अपने दोनों पैर आगे की ओर सिकोड़ कर हाथों की तरह मिला लिए हैं। इसकी बाईं भुजा कंधे के ऊपरी हिस्से से निकलती हुई है जबकि दाईं भुजा सामान्य से कुछ नीचे से निकल रही है। इस राक्षस ने अधो-वस्त्र धारण कर रखा है तथा ऊपरी हिस्सा नग्न है। आंखों का गोलक पूरी तरह गोल बनाया गया है जिसके ऊपरी आधे हिस्से को पलकों से ढंक दिया गया है तथा नीचे का आधा हिस्सा खुला हुआ है जिसमें से आखों का रैटीना एवं कोर्निया वाला भाग इस तरह बनाया गया है कि दोनों के रंग अलग दिखाई देते हैं मानो यह मूर्ति न होकर चित्र हो। इस तरह की आँखों वाली यह अकेली प्रतिमा यहां देखेने को मिली। इस राक्षस का बायां हाथ उसके बायें घुटने पर है तथा दायां हाथ दायीं बगल के पास इस प्रकार रखा हुआ है मानो अभय मुद्रा में रखना चाहता हो किंतु हाथों की अंगुलियां आगे की ओर मुड़ी हुई हैं।

    गांधार शैली के वस्त्रों वाली प्रतिमाएं

    उबुद वानर वन परिसर में कुछ प्रतिमाओं के वस्त्र गांधार शैली की तरह लहरदार बनाए गए हैं। इन प्रतिमाओं में मनुष्य शरीर भरे हुए तथा आधुनिक मनुष्यों की आकृतियों से मिलते हैं। सहज ही समझा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं पर बौद्धों का प्रभाव है। ऐसी ही एक स्त्री प्रतिमा के सिर पर बंदर का सुंदर अंकन किया गया है। स्त्री के स्तन अपेक्षाकृत छोटे बनाए गए हैं जो कि वस्त्र से ढंके हुए हैं। स्त्री की लम्बी एवं पतली आंखें बंद हैं, चेहरे का भाव सौम्य नहीं है। यह बौद्ध भिक्षुणी जान पड़ती है।

    कौन थे औरंगुटान जैसे मानवों की प्रतिमाओं को बनाने वाले 

    जावा द्वीप पर मानव की उपस्थिति लगभग 10 लाख वर्ष पुरानी है। यहाँ से ''होमो इरैक्टस'' (अर्थात् सीधे खड़े होने में दक्ष) मानव प्रजाति के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म प्राप्त किये गये हैं। इसे ''पिथेकेंथ्रोपस इरैक्टस'' (अर्थात् सीधा खड़ा होने वाला बंदर जैसा मानव) भी कहते हैं। बड़े मस्तिष्क वाला हमारा यह पूर्वज काफी घुमक्कड़ था। वह प्रथम प्राचीन मानव था जो अफ्रीकी महाद्वीप से बाहर निकलकर पूरे विश्व में अपनी जाति का प्रसार करने लगा। यह आज के मनुष्य और प्राचीन बंदर के मध्य की अंतिम कड़ी थी। इस मानव प्रजाति में से ही आज से लगभग डेढ़ लाख साल पहले ''होमो सैपियन सैपियन'' प्रजाति विकसित हुई। आज से लगभग 40 हजार साल पहले 'होमो सैपियन सैपियन'' का आधुनिक संस्करण अर्थात् ''क्रोमैग्नन मैन'' प्रकट हुआ।  

    उबुद वानर वन परिसर में स्थित प्राचीनतम प्रतिमाएं उस काल की हैं जब क्रौमैग्नन का चेहरा पूर्णतः आज के मानव जैसा नहीं बन पाया था। एक संभावना यह भी है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण उस काल में धरती पर आने वाले परग्रही जीवों द्वारा किया गया हो क्योंकि पर्याप्त संभव है कि उस काल का मानव, मूर्ति निर्माण करने में असक्षम हो किंतु उन्हें देखकर परग्रही जीवों ने उनकी प्रतिमाएं इस वन प्रांतर में बनाई हों ताकि भविष्य का मानव इस सभ्यता के बारे में जान सके। इन्हीं मूर्तियों में एक मूर्ति उन्होंने अपनी भी बनाई जिसकी आंखों पर दूरबीन की नलियां लगी हुई हैं। इस मूर्ति का चेहरा न तो औरंगुटान जैसी शक्लों वाले मोटे आदमियों से मिलता है, न राक्षसों की शक्लों वाले आदमियों से मिलता है न वहाँ मौजूद परवर्ती काल की मूर्तियों के देवताओं से मिलता है। बाली एवं जावा द्वीप में खड़े विशाल मंदिर समूह भी इन द्वीपों पर परग्रही जीवों के आने का साक्ष्य देते हैं तथा इन द्वीपों की दंत कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन द्वीपों पर कभी राक्षस राजा राज्य करते थे जो एक रात में 1000 प्रतिमाएं बनाने में सक्षम थे।

    गाय-बछड़े की अद्भुत वात्सल्य प्रतिमा

    जहाँ से हम उबुद वानर वन में प्रवेश करते हैं, वहीं लगभग 100 मीटर की दूरी पर चलते ही दीवार पर गाय-बछड़े की अद्भुत प्रतिमा रखी हुई दिखाई देती है। इस प्रतिमा में गाय अपने बछड़े को अपने वक्ष से चिपका कर मनुष्य की तरह बैठी हुई है। उसका एक खुर बछड़े की गर्दन पर इस तरह रखा हुआ है मानो वह बछड़े को इसी खुर के सहारे संभाले हुए हो। गाय तथा बछड़े, दोनों के कान लम्बे हैं, दोनों की आंखें बहुत सुंदर हैं तथा खुली हुई हैं। गाय के सिर पर छोटे-छोटे सींग हैं। सिर पर दोनों तरफ दो-दो सींग उकेरे गए हैं। गाय एवं बछड़े की लम्बी आंखों से स्पष्ट पहचाना जा सकता है कि इस प्रतिमा का निर्माण आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा किया गया है न कि आदिम सभ्यता के लोगों द्वारा।

    ड्रैगन प्रतिमाएं

    कभी इस द्वीप पर विशालाकाय कोमोडो डैªगन रहे होंगे। कुछ प्राचीन कोमोडो ड्रैगन प्रतिमाएं बावड़ी के निकट दिखाई पड़ती हैं। कोमोडो ड्रैगन से हटकर भी कुछ ड्रैगन प्रतिमाएं हैं जो चीनी ड्रैगन जैसी दिखाई देती हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं सर्प की तरह लेटी हुई मुद्रा में हैं तो कुछ मनुष्य की तरह खड़ी हुई मुद्रा में हैं। एक ड्रैगन प्रतिमा के मुख में एक बंदर बैठा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह ड्रैगन के मुंह को फाड़ने का प्रयास कर रहा हो। इस ड्रैगन के शरीर पर अन्य ड्रैगन उत्कीर्ण किया हुआ है जो किसी अन्य बंदर को निकट आने से रोकता हुआ प्रतीत होता है। यह आधुनिक काल के मानवों द्वारा निर्मित सैंकड़ों साल पुरानी प्रतिमा है।

    तलवार एवं ढाल वाले योद्धा की प्रतिमा

    एक स्तम्भ पर भरे हुए शरीर वाले योद्धा की मनुष्याकर प्रतिमा खड़ी है जिसने बाएं हाथ में ढाल एवं दायें हाथ में तलवार ले रखी है। इसकी आंखें लम्बी, मूछें बड़ी एवं भाव-भंगिमा कठोर है। यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं में से है। इसके सिर पर छोटा मुकुट है तथा कान किसी धातु की चद्दर से ढके हुए प्रतीत होते हैं। यह प्रतिमा बहुत बाद की जान पड़ती है।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-10 बाली एवं जावा द्वीपों की यात्रा

     07.09.2018
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-10 बाली एवं जावा द्वीपों की यात्रा

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 10 

    बाली एवं जावा द्वीपों की यात्रा

    इण्डोनेशिया के प्रति उत्सुकता क्यों !

    यद्यपि इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथापि इण्डोनेशियाई रुपयों एव डाक टिकटों पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें धर्नुधारी श्रीराम, सर्पधारी भगवान शिव, शुंडधारी भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी, विष्णु के वाहन गरुड़ आदि प्रमुख हैं। इण्डोनेशिया के साढ़े सत्रह हजार द्वीपों में बाली नामक एक ऐसा द्वीप भी है जहाँ 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या हिन्दू धर्मावलम्बी है तथा अनेक प्राचीन हिन्दू मंदिर स्थित हैं। संसार का सबसे बड़ा कहा जाने वाला बोरोबुदुर मंदिर भी इण्डोनेशिया के जावा द्वीप में स्थित है जो कि एक बौद्ध मंदिर है। हमारे मन में सात समंदर पार के इन हिन्दुओं की संस्कृति एवं उनके मंदिरों को देखने की लालसा थी। इसी कारण हमने अपनी ग्यारह दिवसीय पारिवारिक यात्रा के लिए इण्डोनेशिया का चयन किया।

    सामान की ऊहापोह

    हमारे इस पारिवारिक दल में छः सदस्य थे जिनमें मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता, मेरी पत्नी मधुबाला, पुत्र विजय, पुत्र-वधू भानुप्रिया एवं डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा सम्मिलित थी। हमारा परिवार विशुद्ध शाकाहारी है जो मांस, मछली, अण्डा किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करता। कुल 11 दिन की यात्रा में छः व्यक्तियों के लिए शाकाहारी भोजन एवं अल्पाहार की व्यवस्था करना किसी चुनौती से कम नहीं था। हमें अनुमान था कि इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु हम इस बात को लेकर आशंकित थे कि जावा द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलना कठिन है क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत जनसंख्या इस्लाम को मानने वालों की है जिनमें शायद शाकाहार के प्रति आग्रह न हो।

    हम इस बात को लेकर भी आशंकित थे कि बहुत से स्थानों पर मछली और अण्डा को मांसाहार नहीं माना जाता जबकि हमारे लिए तो ये वस्तुएं मांसाहार ही हैं। इसलिए हमने भोजन बनाने के लिए प्रेशर कुकर, तवा, बेलन, चाकू तथा अन्य आवश्यक बर्तन और कच्ची सामग्री यथा गेहूं का आटा, घी, मसाले एवं दालें आदि अपने साथ ले लीं। चूंकि बहुत से देशों में साबुत बीज तथा लिक्विड नहीं ले जाया जा सकता, इसलिए हमने तेल तथा चावल अपने साथ नहीं लिए। इसका खामियाजा हमें पूरी यात्रा में भुगतना पड़ा। इस कच्ची भोजन सामग्री के कारण सामान का वजन बढ़ जाने की समस्या उत्पन्न हो गई, इसका समाधान हमने कपड़ों में कमी करके किया। ओढ़ने-बिछाने के लिए कुछ नहीं लिया तथा पहनने के कपड़े भी कम से कम लिए।

    समय की घालमेल और शरीर की जैविक घड़ी

    यह 13 अप्रेल की शाम थी जब हम मलिण्डो एयर फ्लाइट से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुआलालम्पुर के लिए रवाना हुए। 13 अप्रेल की रात 10.05 बजे दिल्ली से रवाना होकर यह फ्लाईट 14 अप्रेल को प्रातः 6 बजे कुआलालम्पुर पहुंची। वस्तुतः हम विमान में कुल साढ़े पांच घण्टे ही बैठे थे। इस हिसाब से भारत में सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे किंतु मलेशिया, भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित होने के कारण वहाँ का समय भारत से ढाई घण्टे आगे चल रहा था, इसलिए वहाँ सुबह के छः बज चुके थे।

    डेढ़ घण्टे बाद अर्थात् प्रातः 7.30 बजे हमें कुआलालम्पुर एयरपोर्ट से बाली देनपासार के लिए फ्लाइट मिली जो इण्डोनिशयाई समय के अनुसार प्रातः 10.30 बजे बाली की प्रांतीय राजधानी देनपासार पहुंची। समय की घालमेल इण्डोनेशिया से भारत वापसी के समय भी हुई। हम 23 अप्रेल को प्रातः 11.30 बजे इण्डोनेशिया एयर एशिया फ्लाइट द्वारा जकार्ता से चलकर दोपहर ढाई बजे कुआलालम्पुर पहुंचे। कुआलालम्पुर का समय जकार्ता से एक घण्टा आगे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में तीन घण्टे नहीं अपितु दो घण्टे ही लगे। 23 अप्रेल को मलेशियाई समय के अनुसार सायं 7.00 बजे हम एयर एशिया की फ्लाइट द्वारा कुआलालम्पुर से चलकर रात्रि 10.00 बजे नई दिल्ली पहुंचे। भारत का समय कुआलालम्पुर से ढाई घण्टे पीछे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में साढ़े तीन घण्टे नहीं अपितु 5.30 घण्टे लगे।

    यह आश्चर्य-जनक बात थी कि केवल एयरपोर्ट की घड़ियों में ही समय का हेरफेर नहीं हो रहा था। हमारे शरीर की जैविक घड़ी भी अपने भीतर का समय उसी प्रकार बदल रही थी और हमें दिन या रात्रि की अनुभूति स्थानीय समय के अनुसार हो रही थी। यह संभवतः उन चुम्बकीय तरंगों के कारण था जो हर स्थान पर अपना अलग प्रभाव रखती हैं।

    मलिण्डो और एयर एशिया की एयर होस्टेस मलिण्डो एयर फ्लाइट सर्विस मलेशिया की है। मलिण्डो फ्लाइट की एयर होस्टेस विशेष प्रकार की ड्रेस पहनती हैं। गले से लेकर कमर तक कसा हुआ कोट तथा कमर से नीचे छींटदार खुली हुई तहमद होती है जो कमर पर केवल एक बार लपेटी हुई होती है। इस तहमद में लगभग पूरी टांगें दिखाई देती हैं। इण्डोनेशिया एयर एशिया एयर फ्लाइट सर्विस इण्डोनेशिया देश की है। इस फ्लाइट की एयर होस्टेस गले से कमर तक खुले कॉलर वाला एक कोट पहनती हैं तथा कमर से नीचे एक अत्यंत कसी हुई मिनी स्कर्ट धारण करती हैं। मुझे यह देखकर हैरानी थी कि जहाँ भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश की अधिकांश मुस्लिम महिलाएं बुर्के में रहने को अनिवार्य मजहबी रस्म मानती हैं, वहीं मलेशिया एवं इण्डोनेशिया जो कि दोनों ही मुस्लिम देश हैं, की एयर होस्टेस बुर्का डालना तो दूर, अपनी टांगों को खुला रखने में भी बहुत सहजता का अनुभव करती हैं।

    दोनों ही देशों की एयर होस्टेस को देखकर तब तो और भी अधिक हैरानी होती है जब वे यात्रियों का स्वागत भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर तथा मुस्कुराकर करती हैं। उनका व्यवहार विशेष रूप से विनम्र तथा सहयोग एवं सेवा की भावना वाला है। वे यात्रियों की सीट बैल्ट बांधने-खोलने, उन्हें गर्म-ठण्डा पेयजल देने, उनका सामान रैक में लगाने जैसी छोटी-छोटी सेवाएं मुस्कुरा कर करती हैं। अपनी बात विनम्रता से कहती हैं तथा यात्रियों को विदा देते समय पुनः हाथ जोड़कर अभिवादन करती हुई उन्हें आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं देती हैं।

    मलिण्डो की आवभगत

    मलेशिया की एयर फ्लाइट सर्विस 'मलिण्डो' की आवभगत हमारे लिए अविस्मरणीय घटना बन गई है। 13 अप्रेल की रात्रि का भोजन हमने बुक करवा रखा था तथा विशेष हिदायत दे रखी थी कि हमें 'जैन-भोजन' उपलब्ध कराया जाए। यह हमारी अपेक्षा के अनुरूप था लेकिन हैरानी तब हुई जब 14 अप्रेल को प्रातः नौ बजे एयर होस्टेस गर्म नाश्ता लेकर उपस्थित हुई। हमने यह सोचकर मना कर दिया कि यह अवश्य ही नॉनवेज होगा किंतु एयर होस्टेस ने आग्रह पूर्वक कहा कि यह पूरी तरह वैजीटेरियन है तथा इसमें केवल गेहूं के आटे के परांठे एवं अरहर की दाल है।

    यह नाश्ता हमने बुक नहीं करवा रखा था किंतु एयर सर्विस द्वारा अपनी ओर से उपलब्ध कराया गया था। उन गर्म परांठों और भारतीय तरीके से छौंक लगी हुई अरहर की दाल इतनी स्वादिष्ट थी कि भारतीयों को भी हैरानी में डाल दे। हिन्द महासागर के ऊपर से उड़ते हुए यह अनपेक्षित दाल-परांठों का नाश्ता जीवन भर याद रखने योग्य था। मलिण्डो जैसी सदाशयता और आवभगत हमें अपनी यात्रा के दौरान इण्डिोनेशिया एयर एशिया की तीनों फ्लाईट्स में देखने को नहीं मिली।

    सर्विस अपार्टमेंट्स की बुकिंग

    चूंकि होटलों में खाना नहीं बनाया जा सकता इसलिए हमारे सामने समस्या यह थी कि हमारे रहने की व्यवस्था किसी शाकाहारी हिन्दू परिवार में हो जाए। यह कार्य सरल नहीं था, ऐसे परिवार को भारत में बैठे हुए ढूंढ निकालना, समुद्र में से किसी सुईं को ढूंढ निकालने जैसा था। इस समस्या का समाधान किया आधुनिक समय में प्रचलन में आई सर्विस अपार्टमेंट्स की सुविधा ने। विश्व के बहुत से देशों में विशेषकर उन देशों में जहाँ पर्यटन, अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, बहुत से परिवार अपने घर का खाली हिस्सा पर्यटकों को उपलब्ध करा रहे हैं। इन्हें सर्विस अपार्टमेंट्स कहा जाता है। कुछ वैबसाइट्स ने इन सर्विस अपार्टमेंट्स को अपने तंत्र पर जोड़ रखा है, विश्व भर में बैठे पर्यटक इनका लाभ उठा सकते हैं। हमने उन सर्विस अपार्टमेंट्स का चयन किया जिनमें भोजन बनाने के लिए अलग से रसोई-घर हो।

    सौभाग्य से बाली में एक ऐसा परिवार हमें मिल गया जिसमें पति का नाम पुतु तथा पत्नी का नाम पुतु एका था। यह एक हिन्दू परिवार है और इसने पर्यटकों के लिए अलग से एक पांच सितारा होटल जैसी सुविधाओं वाला और कांच की दीवारों से घिरा हुआ एक अत्यंत रमणीय और आरामदायक फ्लैट चावल के खेतों के बीच बना रखा है। यह ऐसा ही था जैसे भारत में आकर कोई किसी छोटी से ढाणी में रहे तथा सुविधाजनक आवास का आनंद उठाए। हमारे मन में एक आशंका अपनी सुरक्षा को लेकर थी। खेतों के बीच अनजान देश में इस प्रकार अकेले परिवार का निवास करना, कहीं किसी संकट को आमंत्रण देना तो नहीं था! फिर भी जब हमें ज्ञात हुआ कि श्रीमती पुतु एका बहुत पढ़ी-लिखी हैं और प्रायः अंतर्राष्ट्रीय सेमीनारों में भाग लेने के लिए मलेशिया, सिंगापुर तथा अन्य देशों को जाती रहती हैं तो हमने पांच दिन के लिए इस सर्विस फ्लैट को बुक करवा लिया।

    योग्यकार्ता में निवास करने वाले मासप्रियो नामक एक मुस्लिम शिक्षक ने हमें अपनी वैबसाइट के माध्यम से भरोसा दिलाया कि हम उनके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी। इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया।

    बाली और योग्यकार्ता में तो यह व्यवस्था हो गई किंतु जकार्ता में ऐसा किया जाना संभव नहीं था क्योंकि जकार्ता विश्व के सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले शहरों में से है जहाँ लगभग हर समय जाम लगा रहता है। चूंकि सर्विस अपार्टमेंट्स प्रायः शहर के कुछ दूर ही मिलते हैं इसलिए उनका चयन करना इस खतरे को आमंत्रण देता था कि हम अपनी यात्रा के अंतिम दिन प्रातः साढ़े ग्यारह बजे की फ्लाइट ट्रैफिक जाम में फंसने के कारण चूक जाएं। अतः हमने अपने प्रवास की अंतिम बुकिंग जकार्ता एयर पोर्ट के निकट ही किसी होटल में करने का निर्णय लिया।

    होटल में किसी तरह का भोजन बनाया जाना संभव नहीं था इसलिए हमने योजना बनाई कि जब हम 21 अप्रेल की सुबह को योग्यकार्ता से चलेंगे तो 22 और 23 के भोजन भी व्यवस्था कर लेंगे। आपात्कालीन व्यवस्था के तहत हमने जोधपुर से लड्डू, मठरी, शकरपारे और खाखरे आदि अपने साथ ले लिए।

    समुद्र के किनारे दौड़

    14 अप्रेल की प्रातः लगभग सवा दस बजे हमें विमान की खिड़की से बाली द्वीप का किनारा दिखाई देने लगा और 15 मिनट पश्चात् अर्थात् प्रातः साढ़े दस बजे हम बाली द्वीप की प्रांतीय राजधानी देनपासार में उतर गए। यह एयरपोर्ट किसी बंदरगाह की तरह समुद्र तट पर बना हुआ है। हवाई जहाज कुछ समय तक समुद्र के किनारे बने विशाल रनवे पर दौड़ता रहा। यह एक बहुत ही अद्भुत दृश्य था। राजस्थान में रेलगाड़ी और बसें रेगिस्तान के किनारों पर दौड़ती हैं और हम यहाँ समुद्र के किनारे सरपट भागे जा रहे थे। बाली का समुद्र बहुत शांत, साफ और निर्मल है जिसके किनारे नारियल के झुरमुट इसे बहुत आकर्षक बनाए हुए हैं। इस समुद्र के जल का रंग भी सहज ही आकर्षित करने वाला है।

    खाली हाथ

    इण्डोनेशिया में पर्यटकों के लिए वीजा निःशुल्क है तथा पर्यटकों के वहाँ पहुंचने पर ही हाथों-हाथ दिया जाता है। वीजा लेने, आव्रजन (इमीग्रेशन) की औपचारिकताएं पूरी करने तथा एयरपोर्ट अथॉरिटी से अपना सामान प्राप्त करने में हमें लगभग एक घण्टे का समय लग गया। इतना सब कर लेने के बाद भी हमारी हिम्मत एयरपोर्ट से बाहर निकलने की नहीं हो रही थी। इण्डोनेशियाई मुद्रा की दृष्टि से हम खाली हाथ जो थे। हमारी जेब में भारतीय मुद्रा तथा अमरीकी डॉलर थे जिनकी व्यवस्था हमने दिल्ली में ही कर ली थी। चूंकि भारत में कानूनन इण्डोनेशिया की मुद्रा उपलब्ध नहीं होती, इसलिए हमें एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले इण्डोनेशियाई मुद्रा की व्यस्था करनी थी। सौभाग्य से एयर पोर्ट के निकास पर ही कुछ मनीचेंजर एजेंट बैठते हैं, उन्होंने हमारी चिंता दूर की।

    देखते ही देखते मालामाल भारतीय मुद्रा से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना घाटे का सौदा था। इसलिए हमने भारत में 64.54 रुपए की दर से अमरीकी डॉलर खरीद लिए थे। यहाँ हमें अमरीकी डॉलर से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना था। डॉलर में इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना लाभ का सौदा था। इस अल्टा-पल्टी में हमें भारत के 1 रुपए के बदले 205 इण्डोनेशियाई रुपए मिल गए। हमने 700 डॉलर एक्सचेंज करवाये जिनके लिए हमने भारत में 45,178 रुपए चुकाये थे। यहाँ हमें 700 डॉलर के बदले 92 लाख 61 हजार 490 इण्डोनेशियाई रुपए प्राप्त हुए। भारत में 92 लाख रुपए की रकम बहुत बड़ी होती है। इतने रुपए में भारत में कोई आदमी पूरी जिंदगी निकाल सकता है जबकि हमें इण्डोनेशिया में केवल 10 दिन निकालने थे। इसलिए हमें बहुत ही अटपटा लग रहा था कि हमारी जेब में 92 लाख रुपए हैं। जो भी हो, हम देखते ही देखते मालामाल तो हो ही गए थे।


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  • हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-11 बाली द्वीप पर पहला दिन

     20.08.2017
    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया-11  बाली द्वीप पर पहला दिन

    हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया - 11  


    बाली द्वीप पर पांच दिन


    पुतु से भेंट 

    अब हम एयरपोर्ट से बाहर जा सकते थे। हमने बाली द्वीप के मैंगवी नामक एक छोटे से गांव में अपना सर्विस अपार्टमेंट बुक कराया था जो देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। इसी अपार्टमेंट का मालिक पुतु स्वयं पर्यटकों को वाहन उपलब्ध कराता है तथा ड्राइविंग भी स्वयं ही करता है। हमें आशा थी कि पुतु हमें लेने आएगा किंतु एयरपोर्ट पर हमें बहुत विलम्ब हो गया था, इसलिए मन में आशंका भी थी कि कहीं लौट नहीं गया हो किंतु सौभाग्य से पुतु, विजय तायल के नाम की कागज की पट्टी लिए एयरपोर्ट के बाहर ही खड़ा मिल गया।

    यह एक अच्छे-खासे डील-डौल वाला लम्बा चौड़ा, हंसमुख और गौर-वर्ण नवयुवक था जिसने बड़े करीने से अपने बाल बना रखे थे और बेहद साफ सुथरे पैण्ट-शर्ट पहन रखे थे। उसने हमारा स्वागत दोनों हाथ जोड़कर तथा होठों पर लम्बी मुस्कान के साथ किया। उसने हमें नमस्ते कहा तथा हमसे हाथ भी मिलाया। उसके चेहरे से स्पष्ट ज्ञात होता था कि जितनी प्रसन्नता हमें उसे देखकर हुई है, उससे कहीं अधिक प्रसन्नता उसे अपने भारतीय अतिथियों को देखकर हुई है।

    पुतु काफी बड़ी वातानुकूलित कार लेकर आया था जिसमें हम छः सदस्य मजे से बैठ सकते थे तथा हमारा सामान भी आराम से आ सकता था। हमारे भाग्य से वह अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह से समझ सकता था। उसने न केवल हमारा सामान अपनी कार के पिछले हिस्से में जमाया अपितु हमारे लिए कार के दरवाजे भी खोले। भारत में ऐसे विनम्र एवं अनुशासित टैक्सी चालक शायद ही देखने को मिलें।

    पुतु ने कार स्टार्ट करते ही पूछा- क्या आप लोग हिन्दू हैं? जब हमने कहा कि हाँ हम हिन्दू हैं, तो पुतु के चेहरे की मुस्कान और भी चौड़ी हो गई। उसने विनम्रता से कहा कि मैं भी हिन्दू हूँ तथा मेरी वाइफ भी हिन्दू है। ऐसा कहते समय उसके चेहरे पर गर्व और आनंद के जो भाव थे, उनका वर्णन किया जाना कठिन है, केवल कल्पना ही की जा सकती है। लगे हाथों उसने बता दिया कि उसकी पत्नी जिसका नाम पुतु एका है, पूरी तरह शाकाहारी है। मैं अभी शाकाहारी होने का प्रयास कर रहा हूं तथा सप्ताह में दो दिन चिकन या अन्य प्रकार का मांस नहीं खाता।

    देनपासार एयरपोर्ट से मैंगवी गांव तक लगभग डेड़ घण्टे का समय लगने वाला था। अधिकांश मार्ग, देनपासार शहर से होकर जाता था। इस समय का उपयोग हमने शहर के बाजारों, घरों तथा सड़क के ट्रैफिक को देखने में किया।

    शोर और गंदगी से पूरी तरह मुक्त

    हमारे आश्चर्य का पार नहीं था। शहर की सड़कों पर ट्रैफिक तो था किंतु वाहन चालकों में किसी तरह की भागमभाग, बेचैनी, प्रतिस्पर्द्धा नहीं थी। सब अपनी लेन में चल रहे थे। दुपहिया वाहनों के लिए सड़क के बाईं ओर का हिस्सा निर्धारित था। कोई वाहन एक दूसरे से आगे निकलने का प्रयास नहीं कर रहा था। न कोई हॉर्न बजा रहा था। सड़कें पूरी तरह साफ थीं। कचरे का ढेर दिखाई देना तो दूर, कहीं कागज या पेड़ों के पत्ते तक दिखाई नहीं दे रहे थे। सड़कों के किनारे कचरापात्र लगे थे, लोग अपने हाथों का कचरा, कचरापात्रों में ही फैंकने के अभ्यस्त थे।

    घास-फूस का दूध तीस हजार रुपए किलो

    हमने पुतु से पूछा कि क्या सर्विस अपार्टमेंट में दूध की व्यस्था हो जायेगी। तो उसने साफ कह दिया कि नहीं, यहाँ आपको कहीं भी दूध नहीं मिलेगा। आप चाहें तो पैक्ड मिल्क खरीद सकते हैं। हमें झटका तो लगा किंतु अन्य कोई उपाय नहीं था। एक जनरल स्टोर के सामने पुतु ने अपनी कार रोकी तथा हमें दूध खरीदने के लिए कहा। स्टोर में जाकर मुझे एक और बड़ा झटका लगा। मैं किसी भी तरह दुकानदार को यह नहीं समझा पाया कि मैं क्या खरीदना चाहता हूँ। न ही मैं स्वयं, स्टोर में दूध की थैलियां खोज सका।

    पुतु की कार मुझसे काफी दूर थी। इसलिए उसकी सहायता लेने के लिए मुझे काफी चलना पड़ता। अंत में एक अन्य ग्राहक ने मेरी बात समझी और मुझे एक फ्रिज में से कागज का एक डिब्बा दिखाया। मैंने डिब्बे को पढ़ा तो एक झटका और खा गया। यह न्यूजीलैण्ड से आया हुआ दूध था जिसका निर्माण वनस्पतियों, वनस्पति तेलों और कई तरह के प्रोटीनों से मिलकर हुआ था। मुझे विवश होकर यही दूध खरीदना पड़ा। एक बड़ा झटका उस समय और लगा जब दुकानदार ने मुझसे एक लीटर दूध के लिए तीस हजार इण्डोनेशियन रुपयों की मांग की। मैंने तत्काल भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया कि यह डेढ़ सौ रुपया लीटर पड़ा। मुझे समझ में आने लगा था कि मालामाल हो जाने की खुशी अधिक समय तक टिकी नहीं रहने वाली है।

    बीस हजार रुपए का नारियल

    दूध की दुकान के बाहर पानी वाले नारियलों की एक थड़ी थी। पिताजी ने वहाँ से एक नारियल खरीदा। मैंने पूछा कितने रुपए दूं तो थड़ी पर बैठी औरत ने अपने गल्ले में से बीस हजार रुपए का नोट दिखाया। मैंने फिर भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया। यह 100 रुपए का था। भारत में जहाँ पानी वाला नारियल 25-30 रुपए में मिल जाता है, बाली में यह 100 रुपए का था। बाली में वस्तुओं का मूल्य भारत की तुलना में कहीं अधिक था। इण्डोनेशियाई रुपयों के बल पर मालामाल होने का उत्साह अब काफी कम पड़ गया था।

    मेंगवी गांव का वह कांच का बंगला

    देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर मेंगवी गांव का सर्विस अपार्टमेंट देखते ही हमारी मंत्र मुग्ध होने जैसी स्थिति हो गई। यह एक शानदार छोटा सा बंगला था जिसके आरामदेह कमरों में बड़े-बड़े पलंग, सफेद सूती चद्दरें, आधुनिक शैली में बने शावर युक्त बाथरूम और आदमकद शीशों वाले ड्रेसिंग रूम तो मन को मोहते ही थे, साथ ही बंगले का बरामदा एक बड़े और खुले लॉन में खुलता था जो सीधा चावल के विशाल खेतों से जुड़ा हुआ था।

    यहाँ शानदार बोगनविलिया और तरह-तरह के फूलों वाली झाड़ियां लगी हुई थीं जिनके बीच में बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियां और सेंट्रल टेबल का प्रबंध किया गया था। बंगले में एयर कण्डीशनर, गीजर, इलेक्ट्रिक आयरन, वाई-फाई जैसी सारी आधुनिक सुख-सुविधाएं दिल खोलकर जुटाई गई थीं। बंगले का बाहरी बरामदा शीशे की दीवारों से बना हुआ था। यहाँ से बैठकर चावल के खेतों का दृश्य देखते ही बनता था। एक छोटी सी लाइब्रेरी का भी प्रबंध किया गया था।

    इस बंगले की सबसे बड़ी विशेषता थी इसका रसोई-घर। यह भी आधुनिक शैली में बनी हुई रसोई थी जिसमें फ्रिज, कुकिंग गैस, रोस्टर, आर ओ से साफ किया गया पानी आदि सभी सुविधाएं मौजूद थीं। यदि इसमें कुछ नहीं था तो वे थे चकला, बेलन और तवा जिनका प्रबन्ध हम भारत से ही करके लाए थे। हमारे लगभग पांच दिन इसी बंगले में निकलने वाले थे।

    बाली द्वीप में पहला दिन

    14 अप्रेल 2017 को हम अपने सर्विस अपार्टमेंट में लगभग एक बजे पहुंच गए। रास्ते में हमने एक सब्जी मण्डी देखी जिसे देखकर तबियत प्रसन्न हो गई और निर्णय लिया गया कि संध्या काल में इस सब्जी मण्डी से सब्जियां खरीदी जाएंगी।

    हम लम्बी यात्रा की थकान से बुरी तरह थके हुए थे। इसलिए हमने पहला दिन आराम करने, चाय पीने और लॉन में बैठकर चावल के खेतों को देखने में बिताया। पुतु ने हमें बताया कि कल बाली द्वीप पर हिन्दुओं का सबसे बडा त्यौहार है। इसलिए वह अगले दिन थोड़ा विलम्ब से आएगा। हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि हमें भी अपनी दैनंदिनी से निवृत्त होने और अपना भोजन तैयार करने में प्रातः के साढ़े दस तो बजने ही थे। हमें पुतु ने एक दुपहिया स्कूटर दे दिया ताकि हम यदि आसपास कहीं जाना चाहें तो जा सकें।

    फूलों का अनोखा संसार शाम के समय मैं और विजय, पुतु का दुपहिया स्कूटर लेकर तरकारी और दूध खरीदने के लिए उसी सब्जी मण्डी में पहुंचे जो प्रातः काल में हमने मैंगवी आते समय देखी थी। यह पुरा तमन अयुन टेम्पल का निकटवर्ती क्षेत्र था। हमारे लिए यह एक और झटका खाने वाला समय था। वहाँ सब्जी मण्डी नहीं थी, केवल फूलों की थड़ियां और दुकानें थीं, जिन्हें हम सुबह हरी सब्जियां समझ बैठे थे। कई तरह के फूल, कई रंगों के फूल। चारों तरफ फूल ही फूल। प्राकृतिक रूप से उत्पन्न फूलों के साथ-साथ बांस की खपच्चियों से बने हुए दर्जनों प्रकार के फूल सजे हुए थे। ये सारे फूल हिन्दुओं के अगले दिन के बड़े त्यौहार में उपयोग लिए जाने हेतु बिकने आए थे।

    मण्डी में भीड़-भाड़ थी किंतु हिन्दुस्तान की भीड़ की तुलना में कुछ भी नहीं। बहुत से लोग अपने परिवारों के साथ फूल खरीदने आए थे। वे फूल खरीदते थे, मोलभाव भी करते थे किंतु कहीं कोई बहस नहीं थी, कोई भी जोर-जोर से नहीं बोल रहा था। लोग आपस में हंस-बोल रहे थे किंतु एक शालीनता जैसे विद्यमान थी।

    फल एवं सब्जी मण्डी की वे महिला दुकानदार

    फूलों की मण्डी से सटी हुई एक पतली गली थी जिसमें जाने पर हमें वास्तव में एक फल और सब्जी मण्डी दिखाई दी। इस मण्डी में भारत की तरह छोटी-छोटी दुकानें बनी हुई थीं और लकड़ी के बने हुए ठेले भी देखे जा सकते थे। हमें यह देखकर प्रसन्नता हुई कि वहाँ कई तरह के फल मौजूद थे किंतु यह देखकर मन उदास भी हुआ कि सब्जियां बहुत ही कम थीं। सेब थे किंतु चालीस से पचास हजार रुपए किलो अर्थात् भारतीय मुद्रा में दो सौ से ढाई सौ रुपए किलो। केले थे किंतु चार हजार रुपए का एक केला। अर्थात् भारतीय मुद्रा में बीस रुपए का एक केला। हजारों में भाव सुनकर ही मुझे पसीना आ जाता था। हालांकि भारतीय मुद्रा में हिसाब लगाकर कुछ तसल्ली मिलती थी, किंतु समस्त फल एवं सब्जियां भारत की तुलना में बहुत महंगी थीं।

    कुछ ठेलों पर सब्जियां थीं जिनमें आलू, प्याज, लौकी, पत्ता गोभी, बैंगन और तुरई ही प्रमुख थीं। एकाध सब्जियां स्थानीय प्रवृत्ति की थीं जिनके नाम पूछने पर भी हमें याद नहीं रहे। उनका उपयोग कैसे किया जा सकता था, यह जानने में तो हम पूरी तरह असफल रहे। क्योंकि समस्त दुकानदार जो कि शत-प्रतिशत महिलाएं थीं, अंग्रेजी का एक भी अक्षर नहीं जानती थीं। वे हमें बाट और रुपए दिखाकर समझाने का प्रयास करती थीं कि कितनी सब्जी के लिए हमें कितने रुपए देने पड़ेंगे। हम जहाँ भी रुक जाते, आस-पास की दुकानों की महिलाएं भी उठकर हमारे पास आ जातीं। वे यह देखना और सुनना चाहती थीं कि हम तरकारी कैसे खरीदते हैं, उनकी बात को कैसे समझते हैं और हम किस प्रकार बोलते हैं!

    सब्जी बेचने वाली उन महिलाओं को देखकर सहज ही जाना जा सकता था कि वे बहुत निर्धन हैं, भारतीय सब्जी बेचने वाली महिलाओं से भी अधिक निर्धन। भले ही उनके द्वारा बोला जा रहा एक भी शब्द हमारे पल्ले नहीं पड़ रहा था किंतु उनकी वाणी और मुखमुद्रा हमें यह बता रही थी कि वे हमें अपने बीच पाकर प्रसन्न थीं और किसी न किसी बहाने से हमसे बात करना चाहती थीं। हमने किसी तरह आलू, प्याज और टमाटर खरीदे तथा यह निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह आकर ताजी तरकारी खरीदेंगे।

    विदेशियों को पहचानने वाले कुत्ते

    यद्यपि इस समय संध्या के सात ही बजे थे किंतु अंधेरा बहुत घिर आया था हम लौट पड़े। सर्विस अपार्टमेंट पहुंचते-पहुंचते तो गहरी रात हो गई। यद्यपि अभी साढ़े सात ही बजे थे। मार्ग में हमें यह भय भी लगा कि हमें विदेशी और असुरक्षित जानकर कोई हम पर आक्रमण न कर दे। यद्यपि ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ, मैंगवी गांव के उन कुत्तों ने हमें फिर से पहचान कर भौंकना आरम्भ कर दिया था। कुत्तों की आंखें हमें स्पष्ट रूप से धमका रही थीं कि हम जानते हैं कि तुम विदेशी हो, इसलिए अपने अपार्टमेंट में ही रहो, इधर-उधर मत घूमो। मुझे याद आया कि भारत में भी गलियों के कुत्ते विदेशी पर्यटकों को देखकर इसी प्रकार भौंकते हैं। स्वयं के लिए विदेशी शब्द सोच पाना भी बड़ा अटपटा सा था।


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