Blogs Home / Blogs / /
  • ब्रिटेन का राजा भारतीय राजाओं के लिये चिंतित था!

     03.06.2020
    ब्रिटेन का राजा भारतीय राजाओं के लिये चिंतित था!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब ब्रिटेन ने अंतिम रूप से भारत छोड़ने का निर्णय लिया तथा सत्ता हस्तांतरण की तिथि निश्चित की तो आश्चर्यजनक रूप से न तो व्हाइट हॉल ने और न ही भारतीय राजाओं ने संधियों का उल्लेख किया जबकि अब तक राजा इन संधियों की दुहाई देकर ही भारत की आजादी का मार्ग अवरुद्ध करते आये थे।

    जिस समय माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाकर भेजा गया उस समय इंगलैण्ड के सम्राट जार्ज षष्ठम् ने माउंटबेटन से कहा कि मुझे हिंदुस्तानी रजवाड़ों की स्थिति के बारे में चिंता है क्योंकि उनका ब्रिटेन से सीधा संधि मूलक सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध हिंदुस्तान की आजादी के साथ समाप्त हो जायेगा। आजादी के बाद जो देश बनेंगे उनसे जब तक रजवाड़े अपना सम्बन्ध न जोड़ लें, वे अपने आप को खतरनाक स्थिति में पायेंगे। इसलिये माउंटबेटन, राजाओं को होनी पर संतोष करने के लिये समझायें ओर जो नई सरकार या सरकारें बनें, उनसे किसी न किसी तरह का समझौता कर लेने की सलाह दें।

    माउंटबेटन ने सम्राट के कथन का अर्थ लगाया कि रजवाड़ों को दोनों में से किसी न किसी देश के साथ मिल जाना चाहिये। वास्तव में उस समय राजा जार्ज षष्ठम् की क्या मंशा थी, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। क्या राजा के मन में कोई योजना थी? क्या वह यह चाहता था कि भारतीय रजवाड़े नयी सरकारों से मिल जायें ? या सिर्फ फेडरल संबंध ही रखें? कुछ भी स्पष्ट नहीं था।

    24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय का कार्यभार संभाला। प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय को एक पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार की नीति का खुलासा किया। इसमें कहा कहा गया कि- महामना सम्राट की सरकार का यह निश्चित उद्देश्य है कि भारत में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के दायरे में विधानसभा की सहायता से एक सरकार, केबीनेट मिशन की योजना के आधार पर बने और काम करे। अपनी पूरी ताकत लगाकर आपको सभी दलों को इस लक्ष्य की ओर ले जाना चाहिये। चूंकि यह योजना प्रमुख दलों की सहमति से ही बन सकती है इसलिये किसी दल को मजबूर करने का सवाल ही नहीं उठता। अगर 1 अक्टूबर तक आप समझते हों कि हिंदुस्तानी रजवाड़ों की सहायता के साथ या उसके बिना ब्रिटिश भारत में सरकार बनाने की कोई संभावना नहीं है तो आपको इसकी खबर सरकार को देनी चाहिये और सलाह भेजनी चाहिये कि किस तरह निश्चित तिथि को सत्ता हस्तांतरित की जा सकती है।

    इस पत्र में यह भी लिखा गया था कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय रियासतें ब्रिटिश भारत में बनने वाली नयी सरकार से अपने सम्बन्धों का समायोजन करें लेकिन सम्राट की सरकार की मंशा यह कतई नहीं है कि परमसत्ता के अधीनस्थ शक्तियों एवं दायित्वों का स्थानांतरण नयी उत्तराधिकारी सरकार को कर दिया जाये। यह मंशा नहीं है कि सत्ता के स्थानांतरण से पूर्व की परमसत्ता को एक निर्णायक पद्धति के तौर पर लिया जाये अपितु आवश्यकता पड़ने पर वायसराय अपनी समझ के अनुसार प्रत्येक रियासत के साथ अलग से ब्रिटिश क्राउन के सम्बन्धों के समायोजन पर वार्ता कर सकते हैं। वायसराय देशी रियासतों की सहायता करेंगे ताकि रियासतें ब्रिटिश भारत के नेताओं के साथ भविष्य के लिये वाजिब एवं न्यायपूर्ण सम्बन्ध बना सकें। अंतरिम सरकार के साथ आपको किस तरह के सम्बन्ध बनाने हैं, इस सम्बन्ध में लार्ड वेवेल द्वारा 30 मई 1946 को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को लिखा गया पत्र आपका निर्देशन करेगा। सम्राट की सरकार भारत की अंतरिम सरकार को वह दर्जा नहीं देगी जो औपनिवेशिक सरकार को होंगे फिर भी अंतरिम सरकार के साथ वही व्यवहार किया जायेगा जो एक औपनिवेशिक सरकार के साथ किया जाना चाहिये ताकि अंतरिम सरकार अपने आप को भविष्य के लिये तैयार कर सके।

    इस प्रकार माउंटबेटन का कार्य भारत में लगभग 200 वर्ष पुराने ब्रिटिश शासन का समापन करना था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये माउंटबेटन को इतनी शक्तियां दी गयीं जितनी कि तब तक भारत के किसी भी वायसराय को नहीं दी गयीं थीं।

    जिस समय माउण्टबेटन ने वायसराय का कार्यभार संभाला, उस समय भारत विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। देश की जनसंख्या लगभग पैंतीस करोड़ थी जिसमें से 10 करोड़ मुस्लिम मतानुयायी एवं 25 करोड़ हिन्दू व अन्य मतों के अनुयायी थे। कांग्रेस, देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी थी जिसे विश्वास था कि वह 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतों के अनुयायियों का तथा 90 प्रतिशत मुस्लिम मतानुयायियों को नेतृत्व करती है और मुस्लिम लीग को देश के लगभग 10 प्रतिशत मुस्लिम मतानुयायियों का समर्थन प्राप्त है। जबकि मुस्लिम लीग मानती थी कि उसे देश के 90 प्रतिशत मुस्लिम मतानुयायियों का समर्थन प्राप्त है।

    एक ओर मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग को लेकर देश में खून की होली खेल रही थी तो दूसरी ओर कांग्रेसी नेता अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग को मानने के लिये तैयार नहीं थे। गांधीजी अपने साथियों को यह समझा रहे थे कि जिन्ना को पाकिस्तान तब तक नहीं मिलेगा, जब तक कि अंग्रेज पाकिस्तान बनाकर उसे दे न दें और अंग्रेज ऐसा तब तक नहीं करेंगे जब तक कि कांग्रेस का बहुमत इसके विरोध में खड़ा है। कांग्रेस चाहे तो इसे रोक सकती है। अंग्रेजों से कह दो कि वे चले जाएं। जो जैसा है उसे वैसा ही छोड़ कर चले जायें। उनके पीछे जो भी होगा, हम देख लेंगे, भुगत लेंगे। अगर देश में आग लगती है तो लग जाने दो। देश इस आग में तप कर कुंदन की तरह निखर कर सामने आयेगा, देश को अखण्ड रहने दो। पता नहीं गांधी किस आग में तप कर देश के कुंदन बनने की बात कर रहे थे। कांग्रेस को उनकी बातें समझ में आनी बंद हो गयी थीं। अब वे कांग्रेस के लिये एक दिगभ्रमित नेता था। एक ओर कांग्रेस का यह हाल था जबकि दूसरी ओर मुस्लिम लीग की स्पष्ट मांग थी कि अंग्रेज पहले देश का बंटवारा करें तब देश छोड़ें।

    गांधीजी की मान्यता के ठीक उलट, अंग्रेजों की मान्यता थी कि जब तक हिंदुस्तान हिंदू मुस्लिम झगड़े में उलझा है तब तक हिंदुस्तान को आजादी नहीं दी जा सकती। अंग्रेजों का मानना था कि अगर अंग्रेज अपनी ओर से पाकिस्तान की मांग मान लें तो कांग्रेस पूरी ताकत से इसके विरुद्ध संघर्ष करेगी और यदि पाकिस्तान की मांग को नहीं माना गया तो मुसलमान बगावत करेंगे और गृहयुद्ध होगा।

    इस प्रकार 1947 के आते-आते भारत की आजादी की लड़ाई केवल कांग्रेस और अंग्रेजों के बीच न रहकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस और अंग्रेजों के दोहरे मोर्चे में बदल गयी थी। सुभाष चंद्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज इतिहास के नेपथ्य में जा चुके थे तथा भारतीय राजा अब भारत की आजादी का मार्ग रोकने के लायक नहीं रह गये थे।

    कांग्रेस अंग्रेजों पर आरोप लगा रही थी कि भारत के अंग्रेज जानबूझ कर मुस्लिम लीग की मदद कर रहे हैं ताकि झगड़ा बना रहे और उनका राज भी। दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देश की नैया मंझधार में ला खड़ी की थी। सांप्रदायिकता का ज्वार इस नैया को बेरहमी से थपेड़े मार रहा था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 33

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 33

    अहमदपुर चौरोली


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अंग्रेजों का बनाया हुआ यूनाईटेड प्रोविंस (यू.पी.) अब उत्तर प्रदेश (यू.पी.) कहलाता है। इस प्रांत के पश्चिमी हिस्से में एक छोटा सा गांव है अहमदपुर चौरोली। यह गांव अविभाजित पंजाब एवं संयुक्त प्रांत की सीमा पर बहने वाली यमुना नदी से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर था। गांव के चारों ओर गेहूँ और गन्ने के विशाल खेत लहलहाते थे और धरती के चप्पे-चप्पे पर खुशहाली का साम्राज्य था। इस गांव में सभी जातियों के लोग सदियों से मिलजुल कर रहते आए थे। गांव के शांत वातावरण एवं खुशहाली को देखते हुए ही मुगलों के समय में निकटवर्ती रन्हेरा गांव से शाहजी सेढ़ूराम ने अहमदपुर चौरोली में आकर डेरा जमाया। उनके दो पुत्र थे- लाला केवलराम एवं लाला काशीराम। समय के साथ शाहजी सेढ़ूराम के परिश्रमी वंशजों ने बहुत उन्नति की। जब इलाहाबाद की संधि के बाद ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह को पेंशन पर भेज दिया तो चौरोली अहमदपुर का क्षेत्र भी अंग्रेजों के अधीन हो गया। अंग्रेजों ने देश में नया राजस्व ढांचा खड़ा किया जिसका आधार जमींदारी प्रथा थी। लाला काशीराम के वंशजों ने भी चौरोली एवं उसके आसपास बड़ी-बड़ी जमींदारियां खरीदीं तथा वे रईस कहलाने लगे। आसपास के सारे गांवों से बिल्कुल अलग इस गांव में लालाओं की बड़ी हवेलियां, नोहरे एवं दुकानें थीं।

    जब 4 जून 1947 को माउण्टबेटन योजना घोषित हो गई और भारत विभाजन में कुछ ही दिन रह गए तब चौरोली गांव के लोगों में भी वैसी ही बेचैनी फैल गई, जैसी उन दिनों भारत के प्रत्येक गांव में देखी जा सकती थी। गांव में एकाध मुस्लिम परिवार भी रहा करता था जिसके कुछ युवक तांगा चलाया करते थे। एक युवक हर शुक्रवार को नमाज पढ़ने के लिए निकटवर्ती जेवर कस्बे में भी जाया करता था जहाँ मस्जिद थी। उन्हीं दिनों कुछ मस्जिदों में पाकिस्तान निर्माण के लिए चंदा एकत्रित किया जाने लगा। गांव के एक युवक ने भी दो सौ रुपए दिए ताकि किसी तरह पाकिस्तान बन जाए। उन दिनों एक तांगा चलाने वाले परिवार के लिए 200 रुपया बहुत बड़ी बात थी। तब जार्ज षष्ठम् का आधी चांदी वाला एक रुपया, एक रुपए में ही चला करता था जो अब लगभग 400 रुपए मूल्य का है।

    उन दिनों पूरे क्षेत्र में यह अफवाह जोरों पर थी कि आने वाली 15 अगस्त को पूरे देश में बहुत बड़ा बलवा होगा। ग्रंथ लेखक के पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता को भी उन्हीं युवकों में से किसी ने संभावित बलवे की बात बताई थी। उन्होंने (ग्रंथ लेखक के पिता ने) अपने विद्यालय के शिक्षक पण्डित कर्णसिंहजी से इस बारे में पूछा जो कि दूर-दूर तक के गांवों में बहुत ख्याति-प्राप्त एवं सम्मानित व्यक्ति थे। पण्डितजी ने जवाब दिया कि उस दिन कुछ नहीं होगा, पूरी तरह शांति रहेगी। पण्डितजी की बात पूरी तरह सही निकली क्योंकि जब 15 अगस्त आया तो गांव वैसे ही शांत और सामान्य बना रहा जैसा अन्य दिनों में रहा करता था।

    गांव के लोगों के भाईचारे के कारण चौराली गांव तथा उसके आसपास के लगभग सारे गांव पूरी तरह शांत रहे किंतु चौरोली गांव से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर बहने वाली यमुनाजी के उस पार से चिंताजनक खबरें आने लगीं। यमुना-पार का वह क्षेत्र उन दिनों अविभाजित पंजाब में था तथा आजकल हरियाणा प्रांत में है। इस क्षेत्र से कुछ दूरी पर रेवाड़ी-गुड़गांव का इलाका लगता था जहाँ उन दिनों मेवों ने पृथक् मेवस्थान के लिए हिंसक कार्यवाहियां चला रखी थीं। महाभारत में आए प्रसंग एवं पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रस्तावित मेवस्थान वही क्षेत्र था जहाँ भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने खाण्डव वन का दहन करके नागों का सफाया किया था। ई.1947 के आसपास इस पूरे क्षेत्र में मेव जाति बड़ी संख्या में निवास करती थी। एक दिन गांव में खबर आई कि मेव बड़ी संख्या में एकत्रित होकर यमुना-पार के हिन्दुओं के गांवों पर हमला करेंगे। मेवों की योजना यह थी कि हिन्दुओं से यह पूरा इलाका खाली कराकर इसे मेवस्थान में बदल दिया जाए। उनकी धारणा थी कि चूंकि पंजाब पाकिस्तान में जा रहा है इसलिए मेवों द्वारा बनाया जा रहा मेवस्थान भारत-पाकिस्तान के बीच में होगा तथा आसानी से पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा। जब मेवों के आक्रमण के समाचार आए तो चौरोली एवं उसके आस-पास के बहुत से गांवों के हिन्दू युवक लाठी, बल्लम और भाले लेकर यमुना पार के उन गांवों में जाकर जमा हो गए जहाँ मेवों के हमले होने की आशंका थी। ये खेतीहर गांव थे जिनमें किसी भी घर में तलवार का पाया जाना एक कठिन बात थी।

    गांव के लोग जानवरों से अपने खेतों को बचाने के लिए लाठी, बल्लम एवं भाले ही रखा करते थे। जब सशस्त्र मेवों ने हमले किए तो हिन्दू युवकों ने उनका मार्ग रोका और उन्हें सफलता पूर्वक रेवाड़ी की ओर खदेड़ दिया। इस संघर्ष में भाग लेने वालों में ग्रंथ लेखक के पितामह श्री मुकुंदीलाल गुप्ता भी थे, हालांकि उस समय अपने परिवार में वे अकेले वयस्क पुरुष थे तथा घर की महिलाओं के मना करने पर भी वे इस संघर्ष में भाग लेने के लिए गए। मेवों के भाग जाने के तीन-चार दिन बाद गांव के युवक वापस लौटकर आए। उन दिनों गढ़-गंगा में प्रत्येक पूर्णिमा को मेला लगता था। इस अवसर पर चौरोली गांव से लगभग 20-25 गाड़ियों में बैठकर लोग गंगा-स्नान को जाया करते थे। इस क्षेत्र में मुसलमानों के कई गांव थे। जब साम्प्रदायिक दंगे अपने चरम पर थे तो एक बार पूर्णिमा के मेले में बलवा मचा इस अवसर पर निकटवर्ती भुन्ना गांव के जाट लड़कों ने बड़े पराक्रम का प्रदर्शन किया। उस समय यह कहावत चल पड़ी थी- 'गढ़ गंगा के जाट न होते, तो लोगों के ठाठ न होते।'

    इस दंगे के बाद मची भगदड़ में कुछ युवकों ने लगभग 25-30 मुस्लिम औरतों को पकड़ लिया। उन्होंने अपनी गाड़ियों में से सवारियां उतार दीं और इन पकड़ी हुई औरतों को बैठा लिया। चौरोली तथा उसके आसपास के कुछ गांवों के युवक जिनके विवाह नहीं हो रहे थे, उन्होंने उन औरतों से विवाह करके गृहस्थियां बसा लीं। इस सम्बन्ध में एक मुक्तक भी बना था जिसके कुछ अंश इस प्रकार थे-



    संवत् 2003 का किस्सा तुम्हें सुनाते हैं.......

    सुतन्ने उनके फाड़-फाड़ धोती उनको पहराय दई........

    गंगाजी उनको नह्वा-नह्वा गंगादेई उनका नाम धरा........।



    कहने को यह चौरोली जैसे एक छोटे से गांव की छुट-पुट घटनाएं हैं किंतु उन दिनों उत्तर भारत के गांवों में इस तरह के दृश्य बहुत साधारण बात बन गए थे। इन दंगों में बहुत से लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े। बहुत से घायल हुए और अनगिनत स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। वे स्त्रियां सचमुच भाग्यशाली थीं जिन्हें दंगों की हिंसा के बाद भी अपना लिया जाता था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 7

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 7

    अजमेर के चौहान शासक (4)


    दसवीं शताब्दी में अजमेर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजा तंत्रपाल ने वाक्पतिराज पर आक्रमण किया किंतु बुरी तरह परास्त हुआ। वाक्पतिराज के तीन पुत्र थे। सिंहराज, लक्ष्मणराज तथा वत्सराज। वाक्पतिराज की मृत्यु के बाद ई.950 में सिंहराज उसका उत्तराधिकारी हुआ। लक्ष्मणराज नाडौल के पृथक राज्य का स्वामी हुआ। इसे लखनसी भी कहते हैं।

    सिंहराज

    सिंहराज महान राजा हुआ। तोमरों ने राजा लवण की सहायता से सिंहराज के राज्य पर आक्रमण किया किंतु तोमर पराजित हो गये। सिंहराज ने लवण को बंदी बना लिया। इस पर प्रतिहार शासक स्वयं चलकर सिंहराज के पास आया और उसने सिंहराज से प्रार्थना करके लवण को मुक्त करवाया। सिंहराज के बारे में कहा जाता है कि उसकी कैद में उतनी ही रानियां थीं जितनी उसके महल में थीं। वह अपनी उदारता के लिये भी उतना ही प्रसिद्ध था जितना कि सैन्य अभियानों के लिये। हम्मीर महाकाव्य कहता है कि जब उसके अभियान का डंका बजता तो कर्नाटक का राजा उसकी चापलूसी करने लगता।

    लाट (माही एवं नर्बदा के बीच का दोआब) का राजा अपने दरवाजे उसके लिये खोल देता। चोल नरेश (मद्रास नरेश) कांपने लगता, गुजरात का राजा अपना सिर खो देता तथा अंग (पश्चिमी बंगाल) के राजा का हृदय डूब जाता। वह लगातार मुसलमानों से लड़ता रहा। एक युद्ध में उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। एक अन्य अवसर पर उसने, सुल्तान हाजीउद्दीन के नेतृत्व में अजमेर से 25 किलोमीटर दूर जेठाना तक आ पहुँची मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया। सिंहराज ई.956 तक जीवित रहा। हर्ष अभिलेख के अनुसार हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

    विग्रहराज (द्वितीय)

    सिंहराज का पुत्र विग्रहराज (द्वितीय) ई.973 में उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया। अजमेर का राज्य प्राचीन काल से सपादलक्ष (अर्थात् एक लाख तथा चौथाई लाख) कहलाता था। इससे अर्थ यह लिया जाता है कि अजमेर राज्य में सवा लाख नगर एवं गांव थे। सम्पूर्ण पूर्व एवं दक्षिणी राजपूताना, मारवाड़ का काफी बड़ा हिस्सा तथा उत्तर में भटनेर तक का क्षेत्र इस राज्य में सम्मिलित था। संस्कृत का सपादलक्ष ही हिन्दी भाषा में श्वाळक (सवा लाख) बन गया जिसमें नागौर, अजमेर तथा सांभर आते थे।

    विग्रहराज (द्वितीय) ने प्रतिहारों की अधीनता त्याग दी और पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया। विग्रहराज (द्वितीय) ने ई.973 से ई.996 के बीच में गुजरात पर आक्रमण किया। गुजरात का शासक मूलराज अपनी राजधानी खाली करके कच्छ में भाग गया। इस पर विग्रहराज अपनी राजधानी अजमेर लौट आया। उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्बदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। प्रबंध चिंतामणि के लेखक मेरुतुंग ने भी इस विजय का उल्लेख किया है। चौदहवीं शताब्दी में लिखे गये हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज (द्वितीय) ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ अफगानियों ने उठाया।

    दुर्लभराज (द्वितीय) तथा गोविंदराज (द्वितीय)

    विग्रहराज (द्वितीय) के बाद दुर्लभराज (द्वितीय) तथा उसके बाद गोविंदराज (द्वितीय) अजमेर के शासक हुए।


    ग्यारहवीं शताब्दी में अजमेर

    ई.1008 में जब महमूद गजनवी ने अनंगपाल पर आक्रमण किया तब उज्जैन, कलिंजर, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली तथा अजमेर के राजाओं ने एक संधि की तथा मुस्लिम आक्रमणों के विरुद्ध एक संघ बनाया। राजा अनंगपाल की सहायता के लिये हिन्दू औरतों ने अपने आभूषण गलाकर बेच दिये तथा उससे प्राप्त धन इस संघ की सहायता के लिये भेजा। (निःसंदेह इस कार्य में अजमेर की औरतें भी सम्मिलित थीं।) अजमेर के शासक गोविंदराज (द्वितीय) ने महमूद गजनवी को परास्त किया।

    वाक्पतिराज (द्वितीय)

    गोविंदराज (द्वितीय) का उत्तराधिकारी उसका पुत्र वाक्पतिराज (द्वितीय) हुआ। उसने मेवाड़ के शासक अम्बाप्रसाद का वध किया।

    वीर्यराम

    वाक्पतिराज (द्वितीय) के बाद वीर्यराम अजमेर का राजा हुआ। वह मालवा के राजा भोज का समकालीन था। वीर्यराम के शासन काल में ई.1024 में महमूद गजनवी ने अजमेर पर आक्रमण किया तथा गढ़ बीठली को घेर लिया किंतु घायल होकर अन्हिलवाड़ा को भाग गया। वीर्यराम ने मालवा पर आक्रमण किया किंतु भोज के हाथों परास्त होकर मारा गया।

    चामुण्डराज

    वीर्यराम का उत्तराधिकारी चामुण्डराज हुआ। उसने शक मुसलमानों के स्वामी हेजामुद्दीन को पकड़ लिया। दुर्लभराज (तृतीय) चामुण्डराज के बाद ई.1075 में दुर्लभराज (तृतीय) उत्तराधिकारी हुआ जिसे दूसल भी कहते हैं। उसने मुसलमान सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया। ई.1080 में मेवात के शासक महेश ने अजमेर के शासक दुर्लभराज (तृतीय) की अधीनता स्वीकार की। ई.1091 से 1093 के मध्य उसने गुजरात पर आक्रमण किया तथा वहाँ के राजा कर्ण को मार डाला ताकि मालवा का शासक उदयादित्य, गुजरात पर अधिकार कर सके। मेवाड़ के शासक वैरिसिंह ने दुर्लभराज को कुंवारिया में हुए युद्ध में मार डाला।

    विग्रहराज (तृतीय)

    दुर्लभराज के बाद विग्रहराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। इसे बीसल अथवा वीसल भी कहा जाता था। उसने भी मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया तथा हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरों को मार भगाया। इस विजय के बाद दिल्ली के स्तम्भ लेख लगावाया गया। इस स्तम्भ लेख में लिखा गया है कि विन्ध्य से हिमालय तक म्लेच्छों को निकाल बाहर किया गया जिससे आयावर्त एक बार फिर पुण्यभूमि बन गया।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार अन्हिलवाड़ा पाटन के चौलुक्य राजा ने, विग्रहराज द्वारा निर्मित राजाओं के संघ में सम्मिलित होने से मना कर दिया। जब गजनी (के शासक की तरफ) से (अजमेर के शासक से) कर के साथ-साथ वफादारी की शपथ मांगी गई तो शाकम्भरी के स्वामी ने अपने सामन्तों के नाम फरनाम जारी किया। इस पर ठट्ठ और मुलतान के सरदारों के साथ मण्डोर और भटनेर के सैन्य समूह भी आये। गंगा और यमुना के बीच अंतर प्रदेश के सैनिक, समस्त राजपूत शाखाएं उसके झण्डे के नीचे एकत्रित हुईं किंतु चौलुक्य नहीं आये। इसलिये विग्रहराज (तृतीय) ने अन्हिलवाड़ा पाटन पर आक्रमण की तैयारी की। इस पर अन्हिलवाड़ा पाटन का चौलुक्य राजा कर्ण भी अजमेर पर आक्रमण करने के लिये चल पड़ा। मारवाड़ में सोजत के निकट दोनों राजाओं में युद्ध हुआ। चौलुक्य राजा परास्त होकर जालोर भाग गया।

    इस पर भी विग्रहराज ने उसका पीछा नहीं छोड़ा तो चौलुक्य राजा कर्ण गिरनार भाग गया। जब विग्रहराज को लगा कि कर्ण उसे मुंह नहीं दिखाना चाहता तो विग्रहराज उसका पीछा छोड़कर अजमेर लौट आया। कुछ दिन बाद कर्ण ने अपनी सेना दुबारा से खड़ी कर ली और विग्रहराज को संदेश भेजा कि वह विग्रहराज के बराबर है तथा 'कर' के रूप में विग्रहराज को तलवार के टुकड़े देने को तैयार है यदि विग्रहराज ले सके तो ले ले। इस पर विग्रहराज ने गुजरात से लाये गये बंदियों को मुक्त कर दिया तथा स्वयं फिर से सेना सजा कर गुजरात पर चढ़ बैठा। उसने अपनी सेना को एक वृत्ताकार क्रम में जमाया तथा पहले ही धावे में 2000 चौलुक्यों को मार डाला। उसके अगले दिन दोनों पक्षों में संधि हुई। कर्ण ने अपनी पुत्री का विवाह विग्रहराज के साथ कर दिया। विग्रहराज ने विजय स्थल पर अपने नाम से वीसलनगर नामक नगर की स्थापना की। यह नगर आज भी विद्यमान है।

    प्रबंधकोष के अनुसार विग्रहराज (तृतीय) ने एक ब्राह्मण स्त्री का सतीत्व भंग किया। उस ब्राह्मणी ने विग्रहराज को श्राप दिया। इस श्राप के कारण विग्रहराज तृतीय की मृत्यु हुई। पृथ्वीराज रासो में भी इसी प्रकार की एक कथा दी गई है जिसके अनुसार बीसलदेव ने एक सुंदर परमार रानी का सतीत्व भंग किया। उसके पति के श्राप देने से बीसलदेव की मृत्यु हुई। ये दोनों कथायें बीसलदेव की मृत्यु के बहुत बाद में जोड़ी गई हैं। इसलिये इनकी सत्यता का परीक्षण होना संभव नहीं है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 34

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 34

    आखिर बन गया पाकिस्तान


    भारत के शरीर से जहर अलग

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    7 अगस्त 1947 को जिन्ना वायसराय के डकोटा पर कराची चला गया। जाते समय वायसराय ने उसे रॉल्स रायस गाड़ी और मुसलमान एडीसी लेफ्टिनेंट अहसन का उपहार दिया तथा स्वयं छोड़ने के लिए हवाई अड्डे तक गया। जिन्ना के जाने के अगले दिन पटेल ने वक्तव्य दिया- 'भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र यहाँ हैं। मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे।' जिस दिन जिन्ना कराची पहुंचा, उसने अपने एडीसी से कहा- 'मैंने कभी सोचा नहीं था कि यह मुमकिन होगा। मैंने अपनी जिन्दगी में पाकिस्तान देखने की उम्मीद भी नहीं की थी।'

    जिन्ना के भारत-मोह के बारे में और भी लोगों ने लिखा है। यह ठीक वैसा ही था मानो कोई झगड़ालू बच्चा अपने खिलौने लड़-झगड़ कर दूसरों से अलग कर रहा हो और फिर सारे खिलौनों को अपना समझ रहा हो। 1946 के अंत में जब पाकिस्तान का बनना लगभग तय हो गया था, जिन्ना कुल्लू घाटी में व्यास नदी के किनारे शांत और रमणीक कस्बे कटराइन में 'द रिट्रीट' नामक एक सुंदर बंगला खरीदने की बातचती चला रहा था। पाकिस्तान का जो नक्शा उस समय आकार ग्रहण कर रहा था, उसकी सीमा में कुल्लू घाटी किसी भी हालत में नहीं आने वाली थी। 13 अगस्त 1947 को गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने कराची पहुंचकर पाकिस्तान की एसेम्बली में भाषण दिया तथा जिन्ना को गवर्नर जनरल के पद की शपथ दिलवाकर तीसरे पहर भारत लौट आए।

    पाकिस्तान के नेता माउण्टबेटन के भारत-प्रेम के कारण उनसे इतनी घृणा करते थे कि कई साल बाद जब माउण्बेटन भारत आए तो पाकिस्तान ने उनके हवाई जहाज को पाकिस्तान के ऊपर होकर उड़ने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार 14 अगस्त 1947 को हिन्दू एवं मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर भारत दो देशों में बंट गया। ब्रिटिश शासन के अधीन हिन्दू बहुल क्षेत्र 'भारत संघ' के रूप में तथा मुस्लिम बहुल क्षेत्र 'पाकिस्तान' के रूप में अस्तित्व में आया। 14 अगस्त की मध्यरात्रि में वायसराय ने भारत की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण देकर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की।


    दो सिरों वाला कटा-फटा पाकिस्तान

    15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया। इस प्रकार वायसराय माउण्टबेटन एवं मुहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान के निर्माण के लिए केवल 72 दिन का समय प्राप्त हुआ। पाकिस्तान के पास न कोई राजधानी मौजूद थी, न कोई संविधान मौजूद था, न भावी देश की कोई रूपरेखा मौजूद थी, न पाकिस्तान की सीमाएं मौजूद थीं, न उसकी सेनाएं मौजूद थीं और न राजस्व के स्रोत निश्चित थे। 72 दिन में बनने वाले पाकिस्तान के लिए केवल एक योजक तत्व था जिसके आधार पर पाकिस्तान का निर्माण किया जाना था और वह था- पाकिस्तान में सब-कुछ इस्लामिक होना चाहिए।

    रैडक्लिफ की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जो पाकिस्तान अस्तित्व में आया उसके किसी भी अंग में कोई तारतम्य निर्मित नहीं हो पाया। अखण्ड भारत की कुल भूमि 43,16,746 वर्ग किलोमीटर थी जिसमें से 10,29,483 वर्ग किलोमीटर अर्थात् 23.85 प्रतिशत भूमि पाकिस्तान को मिली। ई.1947 में अखण्ड भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39.5 करोड़ थी जिसमें से 3 करोड़ से कुछ अधिक पूर्वी-पाकिस्तान में तथा लगभग 3.5 करोड़ पश्चिमी-पाकिस्तान में चली गई। इस प्रकार अखण्ड भारत की अनुमानतः 16 प्रतिशत जनसंख्या पाकिस्तान में चली गई। ई.1951 की जनगणनाओं में भारत की कुल जनसंख्या 36.10 करोड़ तथा पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 7.50 करोड़ पाई गई। इस प्रकार पाकिस्तान की जनंसख्या दोनों की सम्मिलित जनसंख्या का 17.2 प्रतिशत थी। भारत की राजस्व-आय का 17 प्रतिशत तथा सेना का 33 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को प्राप्त हुआ।

    जिन्ना के पाकिस्तान के दो सिर थे, पहला सिर हिमालय की पहाड़ियों में था जिसे पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया। पाकिस्तान की राजधानी का मालिक यही सिर था। दूसरा सिर बंगाल की खाड़ी में था, इसकी नैसर्गिक राजधानी कलकत्ता थी जो भारत में रह गई थी और कृत्रिम राजधानी कराची में थी जो इस सिर से 1600 किलोमीटर दूर थी। पहला सिर पंजाबी मिश्रित उर्दू बोलता था तथा दूसरे सिर के द्वारा बोली जाने वाली बांग्ला भाषा को हेय समझता था। इस सिर का कुछ हिस्सा केवल सिंधी और कुछ हिस्सा केवल पश्तून समझता था। बंगाल की खाड़ी में स्थित पाकिस्तान का दूसरा सिर बंगला बोलता और समझता था तथा उर्दू बोलने वालों को जान से मार डालना चाहता था। यही था पाकिस्तान ...... ऐसा ही बना था जिन्ना का पाकिस्तान।


    सिक्खों की पीड़ा समझने वाला कोई नहीं था

    जब पाकिस्तान बना तो सबसे अधिक क्षति सिक्खों को हुई। सम्पूर्ण सिक्ख जाति को बहुत बड़ी मात्रा में जन, धन एवं भूमि का बलिदान देना पड़ा। रावी, चिनाव, झेलम, सतलुज एवं व्यास के हरे-भरे मैदानों में सिक्ख तब से रहते आए थे जब उनके पुरखे हिन्दू हुआ करते थे। वे कब धीरे-धीरे हिन्दू से सिक्ख हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला किंतु ई.1947 के भारत विभाजन ने पंजाब को दो टुकड़ों में बांट दिया। इससे पंजाब के हरे-भरे मैदान तो उनसे छिने ही, साथ ही लाखों सिक्खों को जान से हाथ धोना पड़ा और पचास लाख से अधिक सिक्खों को पूर्वी-पंजाब से भागकर पश्चिमी-पंजाब आना पड़ा। सिक्खों के प्राणों से भी प्रिय ऐतिहासिक नगर एवं गुरुद्वारे पाकिस्तान में चले गए। इनमें लाहौर, गुजरांवाला, ननकाना साहब तथा रावलपिण्डी के इतिहास गुरुओं के इतिहास से जुड़े हुए थे। ननकाना साहब में गुरु नानक का जन्म हुआ था। लाहौर के बारे में तो पंजाबियों में यह कहावत कही जाती थी- 'जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई।' हसन अब्दाल में गुरुद्वारा पंजी साहिब था, लाहौर के गुरुद्वारा डेरा साहिब में पांचवे गुरु अर्जुन देव की हत्या हुई थी, करतारपुर में गुरुद्वारा करतारपुर साहब था जहाँ गुरु नानक का निधन हुआ था। इनके साथ ही सिक्खों ने लाहौर स्थित महाराजा रंजीत सिंह के पवित्र स्थान को भी गंवा दिया।


    सिंधियों की पीड़ा सबसे भयानक थी

    भारत विभाजन में सिंधी जाति ने अपने पुरखों की पूरी धरती ही खो दी। सिंधी जाति हजारों साल से सिंध क्षेत्र में रहती आई थी किंतु ई.712 से लेकर ई.1947 के बीच की अवधि में सिंधियों को पूरी तरह से या तो अपनी धरती खोनी पड़ी या अपना धर्म बदलना पड़ा। ई.1947 में हुए भारत विभाजन के समय सम्पूर्ण सिंध क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। इसमें खैरपुर, दादू, लाड़कवा, जेकबाबाद, हैदराबाद, कराची, मीरपुर खास, जिला नवाबशाह, टण्डो आदम आदि मिलाकर लगभग 65 हजार वर्गमील का क्षेत्र था। इस कारण इन क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू-सिंधी भारत में आ गए और मुस्लिम-सिंधी पाकिस्तान में रह गए। वर्तमान समय में पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र की जनसंख्या में लगभग 94 प्रतिशत मुसलमान एवं लगभग 6 प्रतिशत हिन्दू हैं। भारत में इस समय लगभग 38 लाख सिंधी रहते हैं। विभाजन के समय हिन्दू-सिंधियों की पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं था, समझने की तो कौन कहे, सुनने वाला तक कोई नहीं था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 8

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 8

    अजमेर के चौहान शासक (5)


    बारहवीं शताब्दी में अजमेर

    पृथ्वीराज (प्रथम)

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    वीसलदेव का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज (प्रथम) हुआ। उसके समय में चौलुक्यों की सेना पुष्कर को लूटने आई। इस पर पृथ्वीराज (प्रथम) ने चौलुक्यों पर आक्रमण करके 500 चौलुक्यों को मार डाला। उसने सोमनाथ के मार्ग में एक भिक्षागृह बनाया। शेखावटी क्षेत्र में स्थित जीणमाता मंदिर में लगे वि.सं.1162 (ई.1105) के अभिलेख में अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान (प्रथम) का उल्लेख है।

    अजयदेव (अजयराज अथवा अजयपाल)

    पृथ्वीराज (प्रथम) के बाद अजयदेव अजमेर का राजा हुआ। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार ई.1113 के लगभग चौहान अजयपाल (अजयराज) ने अजमेर को अपनी राजधानी बनाया। (हमारी मान्यता है कि अजमेर की स्थापना सातवीं शताब्दी में अजयपाल ने की जो शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों के क्रम में तीसरा था। वह चौहान वासुदेव का पौत्र तथा चौहान सामंतदेव का पुत्र था। जिस पहाड़ी पर तारागढ़ बना हुआ है वह पहाड़ी इसी राजा के नाम से अजगंध कहलाती थी। हो सकता है कि कुछ समय के लिये अजमेर चौहानों की राजधानी न रही हो तथा ई.1113 में अजयराज ने पुनः अजमेर को अपनी राजधानी बनाया। इसलिये अधिकांश इतिहासकार इस अजयराज को अजमेर का संस्थापक मानते हैं। अजयपाल को अजयराज तथा अजयराज को अजयपाल कहकर भाटों ने इतिहास को और जटिल बनाने का काम किया है।)

    उसके बाद ही अजमेर का विश्वसनीय इतिहास प्राप्त होना आरंभ होता है। अजयराज ने चांदी तथा ताम्बे के सिक्के चलाये। उसके कुछ सिक्कों पर उसकी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है। अजयराज शैव होते हुए भी धर्म सहिष्णु था। उसने जैन और वैष्णव धर्मावलम्बियों को सम्मान की दृष्टि से देखा। उसने जैनों को अजमेर में मंदिर बनाने की अनुमति प्रदान की और पार्श्वनाथ के मंदिर के लिये सुवर्ण कलश प्रदान किया। उसके समय में होने वाले दिगम्बर और श्वेताम्बरों के शास्त्रार्थ की अध्यक्षता उसके स्वयं के द्वारा किया जाना यह बताता है कि वह दोनों मतावलम्बियों का विश्वासभाजन था और उनके शास्त्रों का मर्मज्ञ था। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयदेव ने संसार को सिक्कों से भर दिया। उसकी रानी सोमलदेवी नये सिक्कों की डिजाइन बनाने की शौकीन थी। ई.1123 में अजयदेव ने मालवा के मुख्य सेनापति साल्हण को पकड़ लिया। उसने अजमेर पर चढ़कर आये मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर उनका बड़ी संख्या में संहार किया।

    अजयराज ने चाचिक, सिंधुल तथा यशोराज पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें मार डाला। वह मालवा के प्रधान सेनापति सल्हण को पकड़ कर अजमेर ले आया तथा एक मजबूत दुर्ग में बंद कर दिया। उसने मुसलमानों को परास्त करके बड़ी संख्या में उनका वध किया। उसने उज्जैन तक का क्षेत्र जीत लिया। अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था। ई.1130 से पहले किसी समय अजयराज अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य का भार देकर पुष्करारण्य में जा रहा। अजयराज ई.1140 तक जीवित रहा।

    दो अजयदेवों में उलझा इतिहास

    अब तक अजमेर के चौहानों के इतिहास के सम्बन्ध में जितने भी प्राचीनतम उल्लेख मिलते हैं, उनसे अनुमान होता है कि अजमेर के चौहानों में दो राजाओं के नाम अजयदेव, अजयपाल, अजयराज अथवा अज थे। इनमें से पहला ईसा की छठी अथवा सातवीं शताब्दी में हुआ। वह चौहान शासक वासुदेव से वंशक्रम में तीसरा था। जबकि दूसरा अजयदेव बारहवीं शताब्दी में हुआ। वह वासुदेव से वंशक्रम में पच्चीसवां था। इन दोनों अजयदेवों के इतिहास आपस में इतने उलझ गये हैं कि उन्हें बिना किसी और ठोस प्रमाण के, अलग नहीं किया जा सका। डॉ. दशरथ शर्मा और डॉ. गोपीनाथ शर्मा जैसे मूर्धन्य इतिहासकारों ने इस उलझन में फंसकर, अजमेर नगर की स्थापना अजयदेव (प्रथम) के द्वारा छठी शताब्दी में की जानी न मानकर, दूसरे अजयदेव द्वारा बारहवीं शताब्दी में की जानी मान ली है। हमारा स्पष्ट मत है कि छठी-सातवीं शताब्दी के अजयदेव ने ही अजमेर नगर की स्थापना की।

    अर्णोराज

    अजयदेव का पुत्र अर्णोराज, अजयदेव का उत्तराधिकारी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। अर्णोराज ई.1133 के आसपास अजमेर की गद्दी पर बैठा तथा ई.1155 तक शासन करता रहा। वह भी अपने पूर्वजों की भांति शक्तिशाली शासक हुआ। अजमेर संग्रहालय की खण्ड प्रशस्ति से विदित होता है कि उसने उन तुर्कों को पराजित किया जो मरुस्थल को पार करके अजमेर तक आ पहुँचे थे। इस आक्रमण की तिथि ई.1135 होनी चाहिये। मुसलमानों की सेना पुष्कर को नष्ट करके अजमेर की तरफ बढ़ी और पुष्कर की घाटी का उल्लंघन करके अजमेर नगर के बाहर तक आ पहुँची।

    अर्णोराज ने उनका संहार कर उन पर विजय प्राप्त की। जिस स्थल पर यवनों का रक्त गिरा था उस स्थल को शुद्ध करने के लिये वहाँ उसने एक हवन किया तथा उस स्थान पर आनासागर झील बनाई। उसने मालवा के नरवर्मन को परास्त किया। उसने अपनी विजय पताका को सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक ले जाकर अपने वंश की परम्परा के महत्त्व को बढ़ाया। हरितानक देश तक अभियान का नेतृत्व कर उसने अपनी पैतृक विजय भावनाओं के प्रति कटिबद्धता प्रकट की। इन विजयों से उसने पंजाब के कुछ पूर्वी भाग और संयुक्त प्रांत के पश्चिमी भाग को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया।

    अर्णोराज ने हरियाणा, दिल्ली तथा वर्तमान उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले (तब वराणा राज्य अथवा वरण नगर) पर भी अधिकार कर लिया। उसने खतरगच्छ के अनुयायियों के लिये भूमिदान दिया तथा पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया। देवबोध तथा धर्मघोष उसके समय के प्रकाण्ड विद्वान थे जिनको उसने सम्मानित किया। चौलुक्यों तथा चौहानों के बीच राज्य विस्तार को लेकर लम्बे समय से संघर्ष चला आ रहा था। अर्णोराज के समय में यह संघर्ष अपने चरम को पहुँच गया। अर्णोराज अपने राज्य का विस्तार मालवा की तरफ करना चाहता था जबकि चौलुक्य शासक सिद्धराज जयसिंह अपने राज्य का विस्तार राजस्थान की ओर बढ़ाना चाहता था।

    ई.1134 में सिद्धराज जयसिंह ने अजमेर पर आक्रमण किया किंतु अर्णोराज ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद हुई संधि के अनुसार सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया। ई.1142 में चौलुक्य कुमारपाल, चौलुक्यों की गद्दी पर बैठा तो चाहमान-चौलुक्य संघर्ष फिर से तीव्र हो गया। (कुमारपाल सिद्धराज जयसिंह का पुत्र नहीं था। वह दहिथली के राजा त्रिभुवनपाल का पुत्र था तथा चौलुक्य राजवंश की ही एक शाखा से था। सिद्धराज जयसिंह के अपना कोई पुत्र नहीं था इसलिये उसने बाहड़ को गोद लिया था।

    सिद्धराज बाहड़ को राजा बनाना चाहता था किंतु ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि कुमारपाल ही गुजरात का अगला राजा होगा और आगे चलकर ऐसा ही हुआ।) हेमचंद्र ने लिखा है कि अर्णोराज ने कुछ राजाओं को एकत्रित करके गुजरात पर धावा बोल दिया। अर्णोराज आक्रामक था और उसने चाहड से मिलकर गुजरात के सामंतों में फूट डालकर कुमारपाल की स्थिति को गंभीर बना दिया था। हर बिलास शारदा के अनुसार अर्णोराज, अपने श्वसुर सिद्धराज जयसिंह के दत्तक पुत्र बाहड़ को गुजरात का राजा बनाना चाहता था इसलिये उसने ई.1145 में कुमारपाल पर आक्रमण कर दिया।

    इस युद्ध में कुमारपाल हार गया तथा उसने अपनी बहिन देवलदेवी का विवाह अर्णोराज के साथ कर दिया। अर्णोराज तथा कुमारपाल के बीच दूसरा युद्ध ई.1150 के आसपास हुआ। जयसिंह सूरी, जिनमण्डन, चरित्र सुंदर तथा प्रबंध कोष के अनुसार एक समय अर्णोराज और उसकी स्त्री देवलदेवी जो कि कुमारपाल की बहिन थी, चौपड़ खेलते समय हास्य विनोद में एक दूसरे के वंश की निंदा करने लगे। हास्य-विनोद, वैमनस्य में बदल गया जिसके फलस्वरूप देवलदेवी ने कुमारपाल को अर्णोराज पर आक्रमण करने के लिये उकसाया। कुमारपाल ने अर्णोराज पर आक्रमण कर दिया।

    डॉ. गोपीनाथ शर्मा उपरोक्त कथन को सत्य नहीं मानते क्योंकि कुमारपाल की किसी भी बहिन का विवाह अर्णोराज से नहीं हुआ था। जब अर्णोराज को यह ज्ञात हुआ कि कुमारपाल अपनी सेना लेकर अजमेर की ओर आ रहा है तो अर्णोराज भी अपनी सेना लेकर गुजरात की ओर चल पड़ा। आबू के निकट दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें कुमारपाल ने अर्णोराज को परास्त कर दिया। चौलुक्यों की विजयी सेना अजमेर तक आ पहुँची परंतु वह सुदृढ़ दीवारों को पार करके नगर में नहीं घुस सकी।

    कुमारपाल को हताश होकर अजमेर से लौट जाना पड़ा। कुछ समय बाद एक बार फिर अर्णोराज ने अपनी विफलता का बदला लेने की योजना बनाई। इस बार फिर चौलुक्य आगे बढ़ते हुए अजमेर तक आ पहुँचे तथा एक बार पुनः अर्णोराज की करारी पराजय हुई। इस प्रकार ई.1150 में चौलुक्य कुमारपाल ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। पराजित अर्णोराज को विजेता कुमारपाल के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना पड़ा तथा हाथी-घोड़े भी उपहार में देने पड़े। इस पराजय से अर्णोराज की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा फिर भी उसके राज्य की सीमाएं अपरिवर्तित बनी रहीं। इस विजय के बाद कुमारपाल चित्तौड़ दुर्ग में गया जहाँ उसने एक शिलालेख खुदवाकर लगवाया जिसमें अपनी अजमेर विजय का उल्लेख किया।

    रास माला के अनुसार अजमेर की सेना का नेतृत्व गोविंदराज ने किया इस कारण कुमारपाल की सेना में युद्ध के दौरान संशय बना रहा किंतु अर्णोराज लोहे की एक बर्छी लग जाने से गिर गया। इससे कुमारपाल की विजय हो गई। अर्णोराज के तीन पुत्र थे। उनमें से जगदेव तथा विग्रहराज (चतुर्थ) का जन्म मारवाड़ की राजकुमारी सुधवा के गर्भ से हुआ था जबकि सोमेश्वर का जन्म अन्हिलवाड़ा पाटन की राजकुमारी कंचनदेवी के गर्भ से हुआ था। सोमेश्वर का बचपन सिद्धराज जयसिंह की राजसभा में बीता था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 35

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 35

    क्या कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने पाकिस्तान आंदोलन में सहायता की?


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1940 में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने ब्रिटिशों से संघर्ष न करने के लिए गांधीजी के नेतृत्व पर प्रहार किया। ई.1941 में जब हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया तो मास्को ने विश्व की सभी कम्युनिस्ट और प्रगतिशील शक्तियों को सोवियत रूस के संघर्ष या सोवियत संघ के मित्र राष्ट्रों के संघर्ष में अपना योगदान देने का आग्रह किया। उस समय सीपीआई के महासचिव पी. सी. जोशी ने यह मत व्यक्त किया कि मुस्लिम लीग प्रमुख राजनीतिक संगठन है। उसने कांग्रेस से अलग राष्ट्र की मांग को स्वीकार करने का आग्रह किया। सितम्बर 1942 में सी. पी. आई. की केन्द्रीय समिति ने यह प्रस्ताव अंगीकार किया- भारतीय जनसमुदाय के प्रत्यंक अंग जिसका उसके देश में सम्बद्ध क्षेत्र, समान ऐतिहासिक परम्परा, समान भाषा, संस्कृति, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति, समान आर्थिक जीवन हो, उसे स्वतंत्र भारतीय केन्द्र या संघ में एक स्वायत्त राज्य के रूप में रहने के अधिकार के साथ एक भिन्न राष्ट्रीयता प्रदान करनी चाहिए और अपनी इच्छा पर उसे केन्द्र या संघ से अलग होने का भी अधिकार होना चाहिए।

    1940 के दशक के मध्य में ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद ने ए. के. गोपालन के साथ केरल में मुसलमानों के एक जुलूस का नेतृत्व किया जिसमें पाकिस्तान जिंदाबाद और मोपलिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ख्वाजा अहमद अब्बास जो कि एक वामंथी थे, को यह कहना पड़ा कि सी.पी.आई. ने भारत को नुकसान पहुंचाया जिसमें मुस्लिम अलगाववादियों को एक सैद्धांतिक आधार प्रदान किया जाना शामिल था।

    ई.1946 में ब्रिटिश कम्यूनिट पार्टी के एक नेता रजनी पामदत्ता के दबाव में सी.पी.आई. ने अपना रुख बदलते हुए पाकिस्तान को ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा मुस्लिम पूंजीवाद के बीच का एक षड्यंत्र बताया। उस समय तक मुस्लिम-कम्युनिस्टों का दृष्टिकोण बदलने के लिए काफी देर हो चुकी थी।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 9

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 9

    अजमेर के चौहान शासक (6)


    विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव)

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कुमारपाल के हाथों अर्णोराज की पराजय के बाद ई.1150 अथवा ई.1151 में राजकुमार जगदेव ने अपने पिता अर्णोराज की हत्या कर दी और स्वयं अजमेर की गद्दी पर बैठ गया किन्तु शीघ्र ही ई.1152 में उसे उसके छोटे भ्राता विग्रहराज (चतुर्थ) द्वारा हटा दिया गया। विग्रहराज (चतुर्थ) को बीसलदेव अथवा वीसलदेव के नाम से भी जाना जाता है। वह ई.1152 से ई.1163 तक अजमेर का राजा रहा। उसका शासन न केवल अजमेर के इतिहास के लिये अपितु सम्पूर्ण भारत के इतिहास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

    वीसलदेव ने ई.1155 से 1163 के बीच तोमरों से दिल्ली तथा हॉंसी छीन लिए। (नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग-1, पृ. 405 पाद टिप्पणी 43 के अनुसार वीसलदेव ने ई.1150 के आसपास तंवर अनंगपाल से दिल्ली छीनी। इसी अनंगपाल ने दिल्ली में विष्णुपाद पहाड़ी पर लोहे का लाट लगावाया था जिस पर आज तक जंग नहीं लगा। यह लाट विष्णु की ध्वजा के रूप में स्थापित करवाया था। इसे कीली भी कहते हैं तथा यह कुतुब मीनार के पास महरौली गांव में स्थित है। पृथ्वीराज रासो ने इसी अनंगपाल की पुत्री कमला का विवाह अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ होना तथा उसी से पृथ्वीराज चौहान का उत्पन्न होना बताया है किंतु यह मनगढ़ंत है। पृथ्वीराज की माता चेदि देश की राजकुमारी कर्पूर देवी थी न कि तंवर राजकुमारी कमला।)

    वीसलदेव ने चौलुक्यों और उनके अधीन परमार राजाओं से भारी युद्ध किये तथा उन्हें पराजित कर उनसे नाडोल, पाली और जालोर नगर एवं आसपास के क्षेत्र छीन लिए। उसने जालोर के परमार सामन्त को दण्ड देने के लिए जालोर नगर को जलाकर राख कर दिया। चौलुक्य कुमारपाल को परास्त करके उसने अपने पिता की पराजय का बदला लिया।

    मुसलमानों से भी बीसलदेव ने अनेक युद्ध लड़े। वीसलदेव के समय वव्वेरा (यह जयपुर रियासत के शेखावाटी क्षेत्र का बबेरा गांव होना चाहिये जिसके खण्डहर दूर-दूर तक फैले हुए हैं।) तक मुसलमानों की सेना पहुँच गई। वीसलदेव उस सेना को परास्त कर मुसलमानों को आर्यावर्त्त से बाहर निकालने के लिये उत्तर की तरफ बढ़ा दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और शिलालेख उत्कीर्ण किया गया। यह शिलालेख 9 अप्रेल 1163 का है तथा इसे शिवालिक स्तंभ लेख कहते हैं। इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें।

    वीसलदेव के राज्य की सीमायें शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग उसके राज्य के अंतर्गत थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी शक्ति और बल से विग्रहराज ने म्लेच्छों का दमन कर आर्यावर्त्त को वास्तव में आर्य भूमि बना दिया था। जिस मुस्लिम शासक हम्मीर को परास्त करने का उल्लेख ललितविग्रह नाटक में किया गया है, वह गजनी का अमीर खुशरूशाह था।

    शिवालिक लेख के अनुसार वीसलदेव के राज्य की सीमायें हिमालय से लेकर विंध्याचल पर्वत तक थीं। इस पूरे क्षेत्र से उसने मुस्लिम गवर्नरों को परास्त करके अटक के उस पार तक मार भगाया था। प्रबन्ध कोष उसे तुरुष्कों का विजेता बताता है। इस काल में दिल्ली केवल ठिकाणा बन कर रह गई जिसकी राजधानी अजमेर थी। वह भारत का प्रथम चौहान सम्राट था और उसका भतीजा पृथ्वीराज चौहान भारत का अंतिम चौहान सम्राट था। उसकी विशाल सेना में एक हजार हाथी, एक सौ हजार घुड़सवार तथा उससे भी अधिक संख्या में पैदल सिपाही थे।

    विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। वह स्वयं हरकेलि नाटक का रचयिता था। उसके दरबारी कवि सोमदेव ने ललित विग्रहराज नामक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक की रचना की।

    अजमेर में उसने धार की ही तरह का एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो अब अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है। इस विद्यालय परिसर से 75 पंक्तियों का एक विस्तृत शिलालेख प्राप्त हुआ है जो इस बात की घोषणा करता है कि इस विद्यालय का निर्माण वीसलदेव ने करवाया था। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज द्वारा संस्कृत में लिखित हरकेलि नाटक के छः चौके मिले हैं जो 22 नवम्बर 1153 की तिथि के हैं। राजपूताना संग्रहालय में रखा उसका शिलालेख घोषणा करता है कि चौहान शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। उसने अपने नाम पर अजमेर में वीसलसर झील बनवाई जिसके बीच उसके रहने के प्रासाद और उसके चारों ओर अनेक मंदिर बनवाये। उसने वीसलपुर नामक कस्बे की स्थापना की तथा कई दुर्गों का निर्माण करवाया। धर्मघोष सूरी के कहने पर उसने एकादशी के दिन पशुवध पर प्रतिबन्ध लगाया।

    विग्रहराज के समय में चौहान राज्य की चहुंमुखी प्रगति हुई। हिमालय से लेकर नर्मदा तक उसका नाम बड़े आदर से लिया जाता था। डॉ. दशरथ शर्मा ने उसके बारे में लिखा है कि उसकी महत्ता निर्विवाद है क्योंकि वह सेनाध्यक्ष के साथ-साथ विजेता, साहित्य का संरक्षक, अच्छा कवि और सूझ-बूझ वाला निर्माता था। पृथ्वीराज विजय का लेखक कहता है कि जब विग्रहराज की मृत्यु हो गई तो कविबांधव की उपाधि निरर्थक हो गई क्योंकि इस उपाधि को धारण करने की क्षमता किसी में नहीं रह गई थी। कीलहॉर्न ने भी उसकी विद्वता को स्वीकार करते हुए लिखा है कि वह उन हिन्दू शासकों में से था जो कालिदास और भवभूति की होड़ कर सकते थे। विग्रहराज का समय सपादलक्ष का सुवर्ण काल था।

    वीसलदेव के कार्यकाल में ई.1154 में प्रसिद्ध जैन आचार्य जिनदत्त सूरि की अजमेर में मृत्यु हुई। दादाबाड़ी में उसका स्मारक बना हुआ है। इस जैनाचार्य ने अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार किया तथा क्षत्रियों को तलवार छोड़कर वैश्य धर्म अपनाने के लिये प्रेरित किया। यह एक आश्चर्य की ही बात है कि जिन दिनों में अजमेर पर मुस्लिम आक्रांताओं के प्रबल आक्रमण हो रहे थे, उन दिनों में यह जैन आचार्य क्षत्रियों को शस्त्र के स्थान पर शास्त्र अपनाने का उपदेश दे रहा था।

    ई.1157 में गूजरों ने पुष्कर झील तथा उसके किनारों पर बने हुए मंदिरों पर अधिकार कर लिया तथा वहाँ से ब्राह्मणों को मार भगाया। इस पर उसी वर्ष दीपावली के दिन संन्यासियों ने पुष्कर पर अधिकार जमाये बैठे गूजरों पर आक्रमण किया तथा उन्हें पुष्कर से निकाल दिया और मुख्य मंदिरों में अपने प्रतिनिधि नियुक्त किये।

    दो वीसलदेवों में उलझा इतिहास

    जिस प्रकार दो शासकों के नाम अजयदेव, अजयपाल अथवा अजयराज होने से अजमेर का इतिहास उलझ गया है, उसी प्रकार दो वीसलदेवों के नामों से भी अजमेर का इतिहास उलझा हुआ है। विग्रहराज (तृतीय) एवं विग्रहराज (चतुर्थ) दोनों को इतिहासकारों ने वीसलदेव कहा है। दोनों के काल की कुछ घटनायें बिल्कुल एक जैसी बताई गई हैं। इससे संशय होता है कि दोनों के इतिहास परस्पर उलझ गये हैं।

    अमरगंगेय

    ई.1163 में विग्रहराज (चतुर्थ) की मृत्यु के बाद उसका अवयस्क पुत्र अमरगंगेय अथवा अपरगंगेय अजमेर की गद्दी पर बैठा। वह मात्र 5-6 वर्ष ही शासन कर सका और चचेरे भाई पृथ्वीराज (द्वितीय) द्वारा हटा दिया गया। पृथ्वीराज (द्वितीय), जगदेव का पुत्र था। उसके समय का ई.1167 का एक अभिलेख हांसी से मिला है जिसमें कहा गया है कि चौहान शासक चंद्रवंशी हैं।

    पृथ्वीराज (द्वितीय)

    मेवाड़ के जहाजपुर परगने के धौड़ गांव के रूठी रानी के मंदिर से ई.1168 (ज्येष्ठ वदि 13, वि.सं.1224) का एक शिलालेख मिला है जिसमें कहा गया है कि पृथ्वीभट्ट (पृथ्वीराज द्वितीय) ने अपनी भुजाओं के बल से शाकम्भरी नरेश पर विजय प्राप्त की। इस शिलालेख का आशय यह है कि जिस राज्य को विग्रहराज (चतुर्थ) ने, पृथ्वीराज (द्वितीय) के पिता जगदेव से छीन लिया था, उस राज्य को जगदेव के पुत्र पृथ्वीराज (द्वितीय) ने अपनी भुजाओं के बल से पुनः प्राप्त कर लिया। इस शिलालेख में पृथ्वीभट्ट (पृथ्वीराज द्वितीय) की रानी का नाम सुहावदेवी बताया गया है।

    पृथ्वीराज (द्वितीय) उपकार कार्यों के लिये जाना गया। उसने राजा वास्तुपाल को हराया, मुसलमानों को पराजित किया तथा उसने हांसी के दुर्ग में एक महल बनवाया। (इस महल को ई.1801 में मॉन्स पैरॉन ने अपनी तोपों से नष्ट किया। हांसी दुर्ग में जॉर्ज थॉमस एक राज्य की स्थापना करना चाहता था।) पृथ्वीराज ने मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने के लिये अपने मामा गुहिल किल्हण को हांसी का अधिकारी नियुक्त किया। उसका राज्य अजमेर और शाकम्भरी के साथ-साथ थोड़े (जहाजपुर के निकट), मेनाल (चित्तौड़ के निकट) तथा हांसी (पंजाब में) तक विस्तृत था। ई.1169 में पृथ्वीराज (द्वितीय) की निःसंतान अवस्था में ही मृत्यु हो गई।

    सोमेश्वर

    सोमेश्वर, चौलुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह की पुत्री कंचनदेवी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। उसका बचपन गुजरात में सिद्धराज जयसिंह तथा कुमारपाल के दरबार में बीता था। अपने ननिहाल में रहने के दौरान ही उसने चौलुक्यराज कुमारपाल के शत्रु कोंकण नरेश मल्लिकार्जुन का युद्ध में सिर काटकर ख्याति प्राप्त कर ली थी। कोंकण विजय के समय ही सोमेश्वर ने कलचुरी की राजकुमारी कर्पूरदेवी से विवाह किया। कर्पूरदेवी का पिता अचलराज चेदि देश (जबलपुर के आसपास ) का राजा था जिससे उसे दो पुत्र- पृथ्वीराज तथा हरिराज हुए।

    ई.1169 में पृथ्वीराज (द्वितीय) के निःसंतान मरने पर, उसके पितामह अर्णोराज का अब एक पुत्र सोमेश्वर ही जीवित बचा था। अतः अजमेर के सामंतों द्वारा सोमेश्वर को अजमेर का शासक बनने के लिये आमंत्रित किया गया। सोमेश्वर अपनी रानी कर्पूरदेवी तथा दो पुत्रों पृथ्वीराज एवं हरिराज के साथ अजमेर आया। उसके साथ नागरवंशी, स्कंद, बामन तथा सोढ़ नामक व्यक्ति भी अजमेर आये। ये गुजरात के सम्मानित व्यक्ति अथवा उच्चाधिकारी रहे होंगे।

    सोमेश्वर प्रतापी राजा हुआ। उसके राज्य में बीजोलिया, रेवासा, थोड़, अणवाक आदि भाग सम्मिलित थे। सोमेश्वर के समय का एक लेख बिजौलिया में मिला है जिसे बिजौलिया अभिलेख कहते हैं। यह लेख 5 फरवरी 1170 का है। इसमें चौहान शासकों की वंशावली दी गयी है। उसके समय की एक छतरी अजमेर में मिली है। यह छतरी राजकीर्ति जैनाचार्य की है। इस पर एक अभिलेख उत्कीर्ण है जिसमें वि.सं. 1228 (ई.1171) की तिथि अंकित है।

    सोमेश्वर ने भी अपने पूर्वजों की भांति नगर, मंदिर और प्रासादों के निर्माण में रुचि ली। उसने अपने पिता अर्णोराज की मूर्ति बनवाकर तथा अपनी स्वयं की मूर्ति बनवाकर उत्तरी भारत में मूर्ति निर्माण कला को बढ़ावा दिया। उसके समय के सिक्के अजमेर की समृद्धि की कहानी कहते हैं। शैव धर्मावलम्बी होते हुए भी उसने जैन धर्म के प्रति सहिष्णुतापूर्ण नीति का अवलम्बन किया। उसने वैद्यनाथ का विशाल मंदिर बनवाया जो वीसलदेव के महलों से भी ऊँचा था। इस मंदिर में उसने ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की मूर्तियाँ स्थापित करवाईं तथा अपने पिता की अश्वारूढ़ प्रतिमा बनवाकर लगवाईं। उसने अजमेर में पांच मंदिर बनवाये जो ऊँचाई में, पहाड़ों से प्रतिस्पर्धा करते थे। इन मंदिरों को वह पांच कल्पवृक्ष कहता था। उसने अजमेर से 9 मील दूर गौगनक (गंगवाना) तथा अन्य स्थानों पर कई मंदिर बनवाये। बिजौलिया अभिलेख के अनुसार उसका राशि नाम प्रताप लंकेश्वर था। वह शक्तिशाली राजा था, उसने अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। उसके समय में फिर से चौलुक्य-चौहान संघर्ष छिड़ गया जिससे उसे हानि उठानी पड़ी। ई.1179 में सोमेश्वर की मृत्यु हो गई।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार सोमेश्वर के भाई कानराई ने अजमेर के भरे दरबार में एक गलतफहमी के कारण अन्हिलवाड़ा के राजा प्रतापसिंह सोलंकी की हत्या कर दी। इस पर अन्हिलवाड़ा के सोलंकी शासक भोला भीम (ई.1179-1242) ने अपने पिता प्रतापसिंह सोलंकी की हत्या का बदला लेने के लिये अजमेर पर आक्रमण किया। भोला भीम के आक्रमण में सोमेश्वर मारा गया। रासमाला कानराई के हाथों प्रतापसिंह की मृत्यु की घटना का उल्लेख तो करती है किंतु यह भी कहती है कि भोला भीम ने अजमेर पर आक्रमण का निश्चय त्याग दिया क्योंकि उस समय एक मुस्लिम आक्रांता अन्हिलवाड़ा के विरुद्ध अभियान पर था। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने अपने पिता सोमेश्वर की हत्या का बदला लेने के लिये गुजरात पर आक्रमण किया तथा भोला भीम को मार डाला। पृथ्वीराज विजय में न तो भोला भीम के अजमेर अभियान का उल्लेख है और न ही पृथ्वीराज द्वारा भोला भीम पर आक्रमण करने का उल्लेख है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 36

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 36

    रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान


    पंजाब में दंगों की शुरुआत

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कलकत्ते से बढ़कर दंगे उत्तर, पूर्व और पश्चिमी की ओर फैलने लगे, पूर्वी बंगाल में नोआखाली तक, जहाँ मुसलमानों ने हिन्दुओं का कत्ल किया था और इधर बिहार तक जहाँ हिन्दुओं ने मुसलमानों का। मुल्ले लोग पंजाब और सरहदी सूबों में बिहार में मारे गए मुसलमानों की खोपड़ियाँ संदूकों में भर-भरकर घूमने लगे। सदियों से देश के उत्तर-पश्चिमी सरहदी इलाकों में रहते आ रहे हिंदू और सिक्ख अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षा के लिए पूरब की तरफ अर्थात् हिन्दू और सिक्खों की बहुतायत वाले इलाकों की तरफ भागने लगे। कोई पैदल ही चल पड़े, कोई बैलगाड़ियों में, कोई ठसाठस भरी लारियों में लदे, तो कोई रेलगाड़ियों में लटके या उनकी छतों पर पटे। रास्तों में उनकी मुठभेड़ें वैसे ही त्रस्त मुसलमानों से हुई, जो सुरक्षा के लिए पश्चिम में भाग रहे थे। दंगे भगदड़ में बदल गए। 1947 की गर्मियों तक जबकि पाकिस्तान के नए राज्य के निर्माण की विविधवत् घोषणा की जा चुकी थी, लगभग एक करोड़ हिंदू, मुसलमान और सिख इसी भगदड़ में फँसे थे। मानसून के आगमन तक दस लाख के लगभग मनुष्य मारे जा चुके थे। पूरे उत्तरी भारत में हथियार तने हुए थे, लोग भय-त्रस्त थे और लुक छिप रहे थे। शांति के एकाकी अवशिष्ट मरुद्वीप थे दूर सरहद पर पड़ने वाले छिटके-छितरे छोटे-छोटे दुर्गम गांव।

    सिरिल रैडक्लिफ की विभाजन रेखा ने पचास लाख हिन्दुओं और सिक्खों को पाकिस्तानी पंजाब में छोड़ दिया था। भारतीय पंजाब में पचास लाख मुसलमान छूट गए थे। ये तीनों जातियां एक दूसरे पर टूट पड़ीं। कांलिन्स एवं लैपियर ने लिखा है- जब यूरोप के लोगों एक दूसरे की जान ली तो बम, हथगोलों और गैस चैम्बरों का इस्तेमाल हुआ। जब पंजाब की जनता खुद अपना सर्वनाश करने निकली तो लाठियों, हॉकी-स्टिकों, बर्फ तोड़ने के सूजों, छुरों, मुद्गरों, तलवारों, कुल्हाड़ियों, हथौड़ों, ईंटों और बघनखों का उपयोग हुआ। जनता ने इस हद तक आपसी घृणा, क्रूरता और राक्षस-प्रवृत्ति का परिचय दिया कि सभी नेता हक्के-बक्के रह गए। ...... उस छोटी सी अवधि में न्यूनतम विवेक और अधिकतम उन्माद के साथ भारत और पाकिस्तान की शैतान पूजा की। ...... लाहौर की नालियां एक दम लाल पड़ गई थीं क्योंकि उनमें मानव-रक्त प्रवाहित हो रहा था।

    14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनते ही लाहौर में हिन्दू और सिक्ख मौहल्लों में पानी की आपूर्ति काट दी गई। भयानक गर्मी ने लोगों को प्यास का दीवाना कर दिया। उनके मुहल्लों के बाहर मुस्लिम टुकड़ियां हथियार ताने खड़ी थीं। पानी की एक डोल की भीख मांगने के लिए जो भी स्त्रियां और बच्चे मुहल्ले से बाहर आ रहे थे, उन्हें निर्दयता से मौत के घाट उतारा जा रहा था। कम से कम आधा दर्जन स्थानों पर शहर धू-धू कर जल रहा था।

    कैप्टेन रॉबर्ट एटकिन्स को लाहौर में शांति-व्यवस्था बहाल करने के लिए गोरखों की सेना के साथ भेजा गया। उसे शहर में इक्की-दुक्की अटैचियों और बच्चों को थामे हुए गिड़गिड़ाते हुए हिन्दुओं और सिक्खों ने घेर लिया। वे चाहते थे कि उन्हें शिविरों में रखा जाए। लगभग एक लाख हिन्दू और सिक्ख पुराने लाहौर में कैद हो चुके थे। चारों ओर आग लगाकर उनकी पानी की आपूर्ति काट दी गई थी। ...... शाह आलम गेट के पास जो प्रसिद्ध गुरुद्वारा था, उसे एक भीड़ ने घेर कर आग लगा दी।

    15 अगस्त को पाकिस्तान से भारत आने वाली 10 डाउन एक्सप्रेस ट्रेन भारत पंजाब के अमृतसर रेलवे स्टेशन पर आकर रुकी। पूरी ट्रेन के मुसाफिरों को बुरी तरह से काट डाला गया था। ट्रेन की समस्त आठों बोगियों में कटे हुए गले, फटी हुई खोपड़ियां, बाहर निकली आंतें, कटे-कटाए हाथ-पैर और धड़ पड़े थे। कुछ घायल लोग अब भी जीवित थे और पीड़ा से कराह रहे थे। ट्रेन के अंतिम हिस्से में एक डिब्बे पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- 'यह ट्रेन हम नेहरू और पटेल के नाम आजादी की सौगात के बतौर भेज रहे हैं।' उस समय अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पश्चिमी पंजाब से पहले की आई हुई ट्रेनों में आए हुए शरणार्थियों की भारी भीड़ बैठी थी। वे इन लाशों को देखकर क्रोध एवं उन्माद से फट पड़े।

    भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ ट्रेनों पर एक-जैसे हमले हो रहे थे। दोनों ही तरफ मुनष्य का लिंग उसकी पहचान बना गया। भारत में सिक्खों और हिन्दुओं ने ऐसे प्रत्येक ट्रेन यात्री को कत्ल लिया जो मर्द हो ओर जिसका खतना हो चुका हो। पाकिस्तान में भी आक्रमणकारी प्रत्येक मर्द यात्री के लिंग की जांच करते। खतना नहीं, जिंदगी नहीं। ऐसे दौर कई बार आए, जब लाहौर और अमृतसर के स्टेशनों पर पहुंचने वाली प्रत्येक ट्रेन लाशों और घायलों से ही लदी हुई मिली। आजादी की कितनी बड़ी कीमत दोनों देशों की जनता चुका रही थी, इसका साक्षात् उदाहरण अश्विनी दुबे नामक एक कर्नल ने लाहौर में देखा, जहाँ वह भारत की ओर से शांति स्थापना अधिकारी के रूप में भेजा गया था। घायलों और लाशों से लदी एक ट्रेन लाहौर के प्लेटफार्म पर आकर रुकी। हर डिब्बे में सन्नाटा छाया हुआ था। हर दरवाजे के नीचे से खून रिस-रिस कर पटरियों पर गिर रहा था, जैसे किसी रेफ्रिजिरेटर की बर्फ अत्यधिक गर्मी के कारण पिघलकर बहती जा रही थी। ट्रेनों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सैनिक साथ चलते तो थे किंतु जब हिन्दुओं द्वारा आक्रमण होता तो हिन्दू सैनिक उन पर गोली न चला पाते। इसी प्रकार मुसलमान सैनिक मुसलमानों के आक्रमणों को रोक पाने में समर्थ नहीं थे।

    न्यूयार्क टाइम्स के एक संवाददाता रॉबर्ट ट्रम्बुल ने लिखा- वीभत्सतम दृश्यों ने भी मुझे उतना आघात नहीं पहुंचाया है, जितना भारत के इन दृश्यों ने। भारत में इन दिनों जितनी बारिश नहीं होती, उतना खूर गिर रहा है। सैंकड़ों की दर से लाशें तो नजर आती ही हैं, उन हजारों हिन्दुस्तानियों को किसने गिना है जो आंख, या नाक के बिना, हाथ-पैरों या यौन-अंगों के बिना अभिशप्त भूतों की तरह भटक रहे हैं? गोली से मरने का मौका तो शायद ही किसी भाग्यवान को मिलता है। आम तौर पर मर्दों, औरतों और बच्चों को भी मुदगरों या पत्थरों इत्यादि से इतना पीटा जाता है कि उनकी मौत सुनिश्चित हो जाए लेकिन उन्हें पूरी तरह मारे बिना छोड़ दिया जाता है। भीषण गर्मी और झूमती मक्खियों के कारण वे कितनी बुरी मौत, कितने धीमे-धीमे मरतेे होंगे, इसकी क्या कल्पना भी की जा सकती है?

    राक्षसीपने में कोई जाति किसी से कम नहीं थी। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स के एक अधिकारी ने जब सिक्खों के आक्रमण के बाद एक गांव में प्रवेश किया तो पाया कि चार मुसलमान शिशु खुली अंगीठियों पर उसी तरह भूने गए थे, जिस तरह से सूअर के बच्चे भूने जाते। एक और अधिकारी ने ऐसी हिन्दू औरतों को देखा जिन्हें जूथ बनाकर कत्ल करने के लिए ले जाया जा रहा था और जिनके स्तनों को मुसलमान उन्मादियों ने काट डाला था। अड़तालीस घण्टे भी नहीं बीते होंगे कि पूर्वी-पंजाब से लेकर पश्चिमी-पंजाब से भयंकर सांप्रदायिक दंगों की खबरें आने लगीं और दिल्ली से कराची तक कोई भी इनकी आग से अछूता नहीं बचा। भारत और पाकिस्तान दोनों ही में इन हंगामों की आग धू-धू कर जलने लगी। सेना के विभाजन का परिणाम यह हुआ कि उसके अंदर खुद सांप्रदायिकता घुस गई। सैनिक, हंगामों को शांत करने की जगह स्वयं उसमें सम्मिलित हो गए। सेना और प्रशासन के अधिकारियों ने इन हंगामों को खूब बढ़ाने की कोशिश की।

    पंजाब के ब्रिटिश गवर्नर सर फ्रांसिस मूडी ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना के नाम 5 सितम्बर 1947 को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया- 'मैं हर एक से कह रहा हूँ कि मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि सिक्ख सरहद कैसे पार कर रहे हैं। बड़ी बात यह है कि जितनी जल्दी हो उतनी ही जल्दी इनसे पिंण्ड छुड़ाया जाए।' इन साम्प्रदायिक दंगों में पाकिस्तान और भारत दोनों में कितने आदमी मारे गए, कितने शरणार्थी बनाए गए, कितनी युवतियों का अपहरण किया गया और उन्हें नीलाम किया गया, इसका सही हिसाब देना किसी के लिए भी संभव नहीं। केवल पंजाब में ऐसी घटनाओं का हिसाब निम्नलिखित था- 'छः लाख मारे गए। 1,40,00,000 शरणार्थी बना दिए गए। दोनों पक्षों द्वारा 1,00,000 युवतियों का अपहरण किया गया, बलपूर्वक उनका धर्मांतरण किया गया और उन्हें नीलाम कर दिया गया। पंजाब और बंगाल को और फिर दोनों देशों को मिलाकर विचार करने पर ऐसी घटनाओं की संख्या दूने से कम न होगी।'

    माइकल ब्रीचर ने लिखा है कि- 'अफवाह, भय तथा उन्माद के कारण लगभग एक करोड़ बीस लाख लोगों की अदला बदली हुई जिनमें से आधे हिन्दू तथा आधे मुसलमान थे। एक साल समाप्त होने से पूर्व लगभग पाँच लाख लोग या तो मर गये या मार डाले गये। दिल्ली की गलियां शरणार्थियों से भर गयीं। '

    मोसले ने लिखा है कि- 'इस अदला बदली में छः लाख लोग मारे गये, एक करोड़ चालीस लाख लोग घरों से निकाले गये तथा एक लाख जवान लड़कियों का अपहरण हुआ या जबर्दस्ती उनको नीलाम किया गया। ...... बच्चों की टांगों को पकड़ कर दीवारों पर पटक दिया गया, लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ और उनकी छातियां काट दी गयीं। गर्भवती औरतों के पेट चीर दिये गये।'

    जिन्ना और लियाकत अली की नीति पर सवाल उठाते हुए अयोध्यासिंह ने लिखा है- 'क्या जिन्ना या प्रधानमंत्री लियाकत अली ने पाकिस्तान में हिंदुओं और सिक्खों का कत्लेआम रोकने के लिए फौरन कदम उठाए? क्या उन्होंने साम्राज्यवाद के मूडी जैसे एजेंटों को फौरन निकाल बाहर किया? नहीं, उन्होंने उल्टे बढ़ावा दिया। हिंदुओं और सिक्खों को पाकिस्तान से निकाल बाहर करना चंद मुस्लिम सरमाएदारों और जमींदारों के इन चाकरों की नीति बन गई।'

    सिक्ख और हिन्दू शरणार्थियों का पहला जत्था पश्चिमी पंजाब से भारत आ गया था। ये पंजाब के लगभग 100 गांवों एवं शहरों से आए थे तथा इनकी संख्या लगभग बत्तीस हजार थी। ये लोग वीभत्स अत्याचार और अपमान सहकर जान हथेली पर रखे हुए भारत आए थे और उन्हें दिल्ली से 120 मील के फासले पर धूप और धूल के बीच भारत के प्रथम शरणार्थी शिविर में बसाया गया था। गांधीजी ने आग्रह किया कि वह उन शरणार्थियों से मिलना चाहेंगे और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को साथ चलना चाहिए। जब गांधी और नेहरू की गाड़ियां शरणार्थी शिविर में पहुंचीं तो क्रोध से चीखते हुए लोगों ने उन्हें घेर लिया।

    अगस्त माह में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली ने एक खुली जीप में बैठक भारतीय-पंजाब एवं पाकिस्तानी-पंजाब के दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया। गांधीजी को पंजाब जाने का अवसर ही न मिला। उन्हें दिल्ली में रुक जाना पड़ा। घृणा और हिंसा की महामारियों का रोगाणु भारत की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुका था। उधर गांधीजी ने कलकत्ता में अपना उपवास तोड़ा और इधर दिल्ली में आग सुलगनी शुरू हो गई। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने आरोप लगाया है कि- 'सिक्खों के अकाली दल और हिन्दुओं के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मिलकर दिल्ली को भी कौमी दंगों की लपटों में झौंक दिया।'

    दिल्ली के मुसलमानों को, जिनमें से अधिकांश अब पाकिस्तान चले जाना चाहते थे, ऐसे शरणार्थी शिविरों में बसाया गया जो हिन्दुओं एवं सिक्खों के आक्रमणों से तो बचे हुए थे किंतु उस गंदगी से नहीं जिसके कारण बीमारियां उत्पन्न हो रही थीं और लोगों की जान ले रही थीं। हुमायूं के मकबरे और पुराने किले में डेढ़-दो लाख मुसलमान शरणार्थी बसाए गए। वे इस हद तक डरे हुए थे कि अपने मृतकों को दफनाने के लिए भी वे उन दीवारों से बाहर नहीं निकलते थे अपितु लाशों को ऊंची दीवारों से बाहर की तरफ गिरा दिया करते थे जिधर गिद्धों और कुत्तों द्वारा खा लिए जाते। दिल्ली में ज्यों ही गांधी का आगमन हुआ, मुसलमान शरणार्थियों में नई जान पड़ गई। जब तक जिन्ना भारत में था, मुसलमानों ने हमेशा उसे अपना मसीहा माना। अब जब जिन्ना पाकिस्तान चला गया था, मुसलमानों ने उसके राजनीतिक दुश्मन गांधीजी को मसीहा मान लिया था।

    आगामी दो महीनों तक पंजाब के मैदानों से गुजर रही त्रस्त मानवता के प्रचण्ड कारवां, लाल सिरों वाली छोटी-छोटी पिनों का रूप पाकर गर्वनमेंट-हाउस के नक्शों पर चींटी जैसी चाल से सकरते रहने वाले थे। पिनों के वे जरा-जरा से लालसिर, भयंकरतम, मानवीय पीड़ाओं के प्रतीक थे- ऐसी पीड़ाएं कि जिन्हें मनुष्य सहन नहीं कर सके, लेकिन जिन्हें मनुष्यों ने ही सहन किया। शरणार्थियों की समस्या दुनिया में समय-समय पर पैदा होती रही है, जिसके कारण अनेक असाधारण और अविस्मरणीय दृश्य सामने आए हैं लेकिन क्या कोई दृश्य उस कारवां के नजदीक खड़ा हो सकता है जिसमें आठ लाख व्यक्ति चलते देखे गए थे? भारत-विभाजन का उपहार वह कारवां, मानव इतिहास का सबसे बड़ा कारवां था, जिसकी प्रचण्डता की कल्पना मात्र से दिल बैठने लगता है। छोटे-बड़े अनेक कारवां इधर से उधर और उधर से इधर सरक रहे थे। प्रत्येक कारवां की प्रगति के अनुसार गवर्नमेंट हाउस के उन नक्शों पर लालसिरों वाली पिनों को धीरे-धीरे सरकाया जाता रहता। हर सुबह सरकारी हवाई जहाज अपनी निरीक्षण उड़ानों पर उड़ते।

    भोजन और दवा के नाम पर जो भी उपलब्ध हो सकता, उसे वे उन कारवांओं पर गिराते। लूट-खसोट न मच जाए, इसलिए हर प्रमुख कारवां के साथ सुरक्षा सैनिक चलते थे। वे बंदूक की नोक पर ही हर चीज के बंटवारे का प्रयास करते। धीमे-धीमे सरकते कारवां को आसमान से देखना एक ऐसा अनुभव था जिसे वे पायलट कभी न भूल सके। एक पायलट ने लिखा है कि वे दो सौ मील प्रति घण्टे की गति से पूरे पन्द्रह मिनट तक उड़ता रहा किंतु कारवां के इस छोर से उस छोर तक नहीं पहुंच सका। दिन के वक्त कारवां के चलने से धूल की लम्बी लकीर आसमान की तरफ उठने लगती। हजारों गाय-भैंस-बैलगाड़ियां और ऊँट गाड़ियां इन कारवाओं के साथ चलतीं और धूल उड़ातीं। रात को सब ठहर जाते थकान और भूख के मारे। हर परिवार अपनी-अपनी आग जलाता, ताकि जो भी रूखा-सूखा तैयार हो सकता है उससे पेट की आग बुझ जाए। धूल की बजाए अब धुएं की लकीर आसमान की तरफ उठने लगती। लम्बी और ऊंची लकीर जो आगे-पीछे सरकती न हो, एक ही जगह खड़ी-खड़ी उठ रही हो और जिसकी तली में धधक रही हो आग........।

    कैप्टेन एटकिन्स और उसके गोरखा सैनिकों ने शरणार्थियों की सुरक्षा के पीछे अनेक सप्ताह व्यतीत किए। हिन्दुओं का कारवां भारत में जाते और मुसलमानों के कारवां को पाकिस्तान तक पहुंचाते। ....... शरणार्थी रवानगी के समय प्रसन्न दिखाई देते फिर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते, त्यों-त्यों भूख-प्यास और थकान के मारे बेहाल हो जाते। भीषण गर्मी उनसे सहन नहीं होती। उन्हें डर सा लगने लगता कि यह देशान्तर यात्रा कभी खत्म होगी भी या नहीं? छोटी-से छोटी चीज का वजन भी उन्हें भारी पड़ने लगता। एक-एक करके वे चीजें फैंकना शुरू करते। अंत में जब वे अपनी मंजिल तक पहुंचते, उनके पास कुछ भी शेष नहीं रहता। बिल्कुल कुछ नहीं। सबसे दुर्भाग्यशाली वे होते जो अपनी देशान्तर यात्रा पूरी कर ही न पाते। बूढ़े, बीमार और बच्चे जल्दी थक जाते। जिन मां-बापों की शक्तियां इतना साथ न देती कि वे बच्चों को उठाकर आगे बढ़ते रह सकें, वे उन्हें रास्ते में ही त्यागकर खुद कारवां के साथ निकल जाते। ऐसे बच्चे भूख-प्यास से तड़प कर मरते। चलते करवां में से अचानक वृद्ध अलग निकल जाते। वे रास्ते के निकट किसी छाया की खोज करते जिसकी शांति में बैठकर वे अपने कष्टपूर्ण जीवन के अंत की प्रतीक्षा कर सकें।

    इन कारवाओं के साथ चल रहे सैनिकों को अपने स्टेशन वैगनों में गर्भवती स्त्रियों के प्रसव भी करवाने पड़ रहे थे। प्रसव के तुरंत बाद अपने नवजात शिशु को लेकर वह स्त्री भारत या पाकिस्तान की दिशा में पैदल चल देती। कारवां अपने पीछे लाशों की जो गंदगी छोड़ जाते, उसका वर्णन कठिन है। लाहौर से अमृतसर के बीच की 45 मील लम्बी सड़क पर से अनेक कारवां गुजरे। वह पूरी सड़क खुली कब्र में बदल गई। इस सड़क पर भयानक दुर्गंध आती थी। ...... गिद्ध लाशें खा-खाकर इतने भारी हो गए थे कि उड़ भी नहीं सकते थे। जंगली कुत्तों को स्वाद का ऐसा नशा पड़ गया कि वे लाशों के केवल यकृत खाते, बाकी अंगों को छोड़ देते। भारत विभाजन के समय पूर्वी पंजाब से बीकानेर आए ऐसे ही एक परिवार की सदस्य श्रीमती कैलाश वर्मा ने मुझे बताया था कि लोगों में अपने दुधमुँहे शिशुओं को अपने साथ लाने की चाहत अंत तक समाप्त नहीं होती थी किंतु जब उन्हें भूख, बीमारी, अशक्तता आदि के कारण बच्चांे को लेकर चल पाना असंभव हो जाता तो वे अपने लड़के को गोदी से उतार कर जीवित ही सड़क के किनारे छोड़ देते ताकि यदि ईश्वर ने उसके भाग्य में जिंदगी लिखी हो तो वह जिंदा बच जाए किंतु गोद से उतारी हुई लड़की को धरती पर रखकर उसका गला अपने पैरों से दबा देते थे ताकि उसे बड़ी होकर वेश्यावृत्ति न करनी पड़े।

    लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने आरोप लगाया है कि सिक्खों के आक्रमण सबसे भयानक हुआ करते थे। उनके जत्थे गन्ने और गेहूं के खेतों में से अचानक प्रकट होकर, भयंकर चीत्कार के साथ, कारवां के उस हिस्से पर टूट पड़ते, जहाँ सुरक्षा प्रबंध सबसे कमजोर होता। कारवां के जो लोग लड़खड़ा कर पीछे रह जाते, उन पर भी वे भयानक आक्रमण करते। कई बार हिन्दुओं और मुसममानों के कारवां आमने सामने से एक ही सड़क पर पार होने लगते। तब उनका व्यवहार कैसा रहेगा, पहले से कोई अनुमान नहीं लगा सकता। घृणा की आग में झुलसते वे लोग एक-दूसरे पर टूट पड़ते और उन्हें छुड़ाना कठिन हो जाता। इन आपसी झगड़ों में लाशें तक गिर जातीं। कई बार एक दूसरे को पार करते मुसलमान हिन्दुओं को बताते और हिन्दू भी मुसलमानों को बताते कि वे अपने पीछे कौन-कौन सी जगहें खाली छोड़ आए हैं कि जहाँ आप लोग जाकर कब्जा जमा लें। विभिन्न अनुमानों के अनुसार इन दंगों में 5 लाख लोग मारे गए।

    1,20,00,000 लोगों को जन-धन की हानि हुई। इस दौरान पूरे देश में स्थान-स्थान पर बलवे, अग्निकाण्ड, स्त्रियों के अपहरण एवं लूट-मार हो रही थी। जस्टिस जी. डी. खोसला ने अपनी पुस्तक 'स्टर्न रैकनिंग' में पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त, सिन्ध और बंगाल में हो रहे बलवों इत्यादि का स्पष्ट चित्र चित्रित किया है। कांग्रेस के नेता जो अंतरिम सरकार में पहुंचे थे, अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर सके। वे इस पद के सर्वथा अयोग्य थे। न्यायाधीश जी. डी. खोसला जिन्हें उन हत्याकाण्डों और विपदाओं का प्रमुख अध्येता माना जाता है, के अनुमान के अनुसार 16 अगस्त 1946 से ई.1947 के अंत तक 10 लाख लोगों की हत्या हुई थी।

    इंग्लैण्ड के दो प्रमुख इतिहासकारों पेण्डरल मून और एच. वी. हडसन ने क्रमशः 2 लाख और 2..5 लाख मौतें होने का अंदाजा लगाया। शरणार्थियों के काफिले तब तक आते रहे जब तक कि 1 करोड़ 50 लाख शरणार्थियों का आवागमन पूरा नहीं हो गया। बंगाल की सरहद अपेक्षाकृत शांत रही जहाँ 10 लाख व्यक्ति शरणार्थी बनकर इस पार से उस पार आए-गए। इस तबाही के कारण भारत के सभी प्रमुख नेताओं एवं अंतिम वायसराय को पूरे विश्व में कटुतम आलोचना का सामना करना पड़ा। केवल 55 हजार सैनिकों की पंजाब बाउण्ड्री फोर्स उन दंगों को काबू में रखने के लिए इतनी संक्षिप्त थी कि उस सेना के निर्माता लॉर्ड माउण्टबेटन एवं उनके सलाहकारों की अदूरदर्शिता पर सभी इतिहासकार आश्चर्य करते रहे गए। ...... पंजाब के दंगे चाहे कितने प्रचण्ड रहे हों, कुल मिलाकर उन्होंने भारत की सम्पूर्ण आबादी के केवल दसवें हिस्से को प्रभावित किया और वे पंजाब के अलावा अन्य प्रांतों में प्रायः नहीं फैल सके।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अजमेर का इतिहास - 10

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 10

    भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    सोमेश्वर की मृत्यु होने पर उसका 11 वर्षीय पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) ई.1179 में अजमेर की गद्दी पर बैठा। भारत के इतिहास में वह पृथ्वीराज चौहान तथा राय पिथौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गद्दी पर बैठते समय अल्प वयस्क होने के कारण उसकी माता कर्पूर देवी अजमेर का शासन चलाने लगी। कर्पूर देवी, चेदि देश की राजकुमारी थी तथा कुशल राजनीतिज्ञ थी। उसने बड़ी योग्यता से अपने अल्पवयस्क पुत्र के राज्य को संभाला। उसने दाहिमा राजपूत कदम्बवास को अपना प्रधानमंत्री बनाया जिसे केम्ब वास तथा कैमास भी कहते हैं। कदम्ब वास ने अपने स्वामि के षट्गुणों की रक्षा की तथा राज्य की रक्षा के लिये चारों ओर सेनाएं भेजीं। वह विद्यानुरागी था जिसे पद्मप्रभ तथा जिनपति सूरि के शास्त्रार्थ की अध्यक्षता का गौरव प्राप्त था। उसने बड़ी राजभक्ति से शासन किया। नागों के दमन में कदम्बवास की सेवाएं श्लाघनीय थीं। चंदेल तथा मोहिलों ने भी इस काल में शाकम्भरी के राज्य की बड़ी सेवा की। कर्पूरदेवी का चाचा भुवनायक मल्ल (इसके भुवनमल्ल अथवा भुवनीकमल नाम भी मिलते हैं।) पृथ्वीराज की देखभाल के लिये गुजरात से अजमेर आ गया तथा उसके कल्याण हेतु कार्य करने लगा। जिस प्रकार गरुड़ ने राम और लक्ष्मण को मेघनाद के नागपाश से मुक्त किया था, उसी प्रकार भुवनमल्ल ने पृथ्वीराज को शत्रुओं से मुक्त रखा।

    कर्पूरदेवी के संरक्षण से मुक्ति

    कर्पूरदेवी का संरक्षण काल कम समय का था किंतु इस काल में अजमेर और भी सम्पन्न और समृद्ध नगर बन गया। पृथ्वीराज ने कई भाषाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया तथा अपनी माता के निर्देशन में अपनी प्रतिभा को अधिक सम्पन्न बनाया। इसी अवधि में उसने राज्य कार्य में दक्षता अर्जित की तथा अपनी भावी योजनाओं को निर्धारित किया जो उसकी निरंतर विजय योजनाओं से प्रमाणित होता है। पृथ्वीराज कालीन प्रारंभिक विषयों एवं शासन सुव्यवस्थाओं का श्रेय कर्पूरदेवी को दिया जा सकता है जिसने अपने विवेक से अच्छे अधिकारियों को अपना सहयोगी चुना और कार्यों को इस प्रकार संचालित किया जिससे बालक पृथ्वीराज के भावी कार्यक्रम को बल मिले। पृथ्वीराज विजय के अनुसार कदम्बवास का जीवन पृथ्वीराज व माता कर्पूरदेवी के प्रति समर्पित था। कदम्बवास की ठोड़ी कुछ आगे निकली हुई थी। वह राज्य की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखता था। कहीं से गड़बड़ी की सूचना पाते ही तुरंत सेना भेजकर स्थिति को नियंत्रण में करता था।

    कदम्बवास की मृत्यु

    संभवतः संरक्षण का समय एक वर्ष से अधिक न रह सका तथा ई.1178 में पृथ्वीराज ने स्वयं सभी कार्यों को अपने हाथ में ले लिया। इस स्थिति का कारण उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं कार्य संचालन की क्षमता उत्पन्न होना हो सकता है। संभवतः कदम्बवास की शक्ति को अपने पूर्ण अधिकार से काम करने में बाधक समझ कर उसने कुछ अन्य विश्वस्त अधिकारियों की नियुक्ति की जिनमें प्रतापसिंह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भाग्यवश कदम्बवास की मृत्यु ने कदम्बवास को पृथ्वीराज के मार्ग से हटाया। रासो के लेखक ने कदम्बवास की हत्या स्वयं पृथ्वीराज द्वारा होना लिखा है तथा पृथ्वीराज प्रबन्ध में उसकी मृत्यु का कारण प्रतापसिंह को बताया है। डॉ. दशरथ शर्मा पृथ्वीराज या प्रतापसिंह को कदम्बवास की मृत्यु का कारण नहीं मानते क्योंकि हत्या सम्बन्धी विवरण बाद के ग्रंथों पर आधारित है। मृत्यु सम्बन्धी कथाओं में सत्यता का कितना अंश है, यह कहना कठिन है किंतु पृथ्वीराज की शक्ति संगठन की योजनाएं इस ओर संकेत करती हैं कि पृथ्वीराज ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति में कदम्बवास को बाधक अवश्य माना हो तथा उससे मुक्ति का मार्ग ढूंढ निकाला हो। इस कार्य में प्रतापसिंह का सहयोग मिलना भी असम्भव नहीं दिखता। इस कल्पना की पुष्टि कदम्बवास के ई.1180 के पश्चात् कहीं भी महत्त्वपूर्ण घटनाओं के साथ उल्लेख के अभाव से होती है।

    अपरगांग्य तथा नागार्जुन का दमन

    उच्च पदों पर विश्वस्त अधिकारियों को नियुक्त करने के बाद पृथ्वीराज ने अपनी विजय नीति को आरंभ करने का बीड़ा उठाया। पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद उसके चाचा अपरगांग्य(इस समय तक सोमेश्वर को कोई भाई जीवित नहीं था। अतः अपरगांग्य तथा नागार्जुन, सोमेश्वर के चचेरे भाईयों के पुत्र होंगे।) ने विद्रोह का झण्डा उठाया। पृथ्वीराज ने उसे परास्त किया तथा उसकी हत्या करवाई। इस पर पृथ्वीराज के दूसरे चाचा तथा अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह को प्रज्ज्वलित किया तथा गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने गुड़गांव पर भी आक्रमण किया। नागार्जुन गुड़गांव से भाग निकला किंतु उसके स्त्री, बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य पृथ्वीराज के हाथ लग गये। पृथ्वीराज ने उन्हें बंदी बना लिया। पृथ्वीराज बहुत से विद्रोहियों को पकड़कर अजमेर ले आया तथा उन्हें मौत के घाट उतार कर उनके मुण्ड नगर की प्राचीरों और द्वारों पर लगाये गये जिससे भविष्य में अन्य शत्रु सिर उठाने की हिम्मत न कर सकें। नागार्जुन का क्या हुआ, कुछ विवरण ज्ञात नहीं होता।

    भण्डानकों का दमन

    राज्य के उत्तरी भाग में मथुरा, भरतपुर तथा अलवर के निकट भण्डानक जाति रहती थी। विग्रहराज (चतुर्थ) ने इन्हें अपने अधीन किया था किंतु उसे विशेष सफलता नहीं मिली। ई.1182 के लगभग पृथ्वीराज चौहान दिगिवजय के लिये निकला। उसने भण्डानकों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियां घेर लीं। बहुत से भण्डानक मारे गये और बहुत से उत्तर की ओर भाग गये। इस आक्रमण का वर्णन समसामयिक लेखक जिनपति सूरि ने किया है। इस आक्रमण के बाद भण्डानकों की शक्ति सदा के लिये क्षीण हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीराज के राज्य की दो धुरियां- अजमेर तथा दिल्ली एक राजनीतिक सूत्र में बंध गईं।

    चंदेलों का दमन

    अब पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमायें उत्तर में मुस्लिम सत्ता से, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात से, पूर्व में चंदेलों के राज्य से जा मिलीं। चंदेलों के राज्य में बुन्देलखण्ड, जेजाकमुक्ति तथा महोबा स्थित थे। कहा जाता है कि एक बार चंदेलों के राजा परमारदी देव ने पृथ्वीराज के कुछ घायल सैनिकों को मरवा दिया। उनकी हत्या का बदला लेने के लिये पृथ्वीराज चौहान ने चंदेलों पर आक्रमण किया। उसने जब चंदेल राज्य को लूटना आरंभ किया तो परमारदी भयभीत हो गया। परमारदी ने अपने सेनापतियों आल्हा तथा ऊदल को पृथ्वीराज के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतारा। तुमुल युद्ध के पश्चात् परमारदी के सेनापति परास्त हुए। आल्हा तथा ऊदल ने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। उनके गुणगान सैंकड़ों साल से लोक गीतों में किये जाते हैं। आल्हा की गणना सप्त चिरंजीवियों में की जाती है। महोबा राज्य का बहुत सा भूभाग पृथ्वीराज चौहान के हाथ लगा। उसने अपने सामंत पंजुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त किया।

    ई.1182 के मदनपुर लेख के अनुसार पृथ्वीराज ने जेजाकमुक्ति के प्रवेश को नष्ट किया। सारंगधर पद्धति और प्रबंध चिंतामणि के अनुसार परमारदी ने मुख में तृण लेकर पृथ्वीराज से क्षमा याचना की। चंदेलों के राज्य की दूसरी तरफ की सीमा पर कन्नौज के गहरवारों का शासन था। माऊ शिलालेख के अनुसार महोबा और कन्नौज में मैत्री सम्बन्ध था। चंदेलों और गहड़वालों का संगठन, पृथ्वीराज के लिये सैनिक व्यय का कारण बन गया।

    चौहान-चौलुक्य संघर्ष

    पृथ्वीराज (तृतीय) के समय में चौहान-चौलुक्य संघर्ष एक बार पुनः उठ खड़ा हुआ। पृथ्वीराज ने आबू के सांखला परमार नरेश की पुत्री इच्छिना से विवाह कर लिया। इससे गुजरात का चौलुक्य राजा भीमदेव (द्वितीय) पृथ्वीराज से नाराज हो गया क्योंकि भीमदेव भी इच्छिना से विवाह करना चाहता था। डॉ. ओझा इस कथन को सत्य नहीं मानते क्योंकि ओझा के अनुसार उस समय आबू में धारावर्ष परमार का शासन था न कि सांखला परमार का।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज के चाचा कान्हड़देव (यह भी सोमेश्वर के चचेरे भाइयों में से एक होना चाहिये।) ने भीमदेव के चाचा सारंगदेव के सात पुत्रों की हत्या कर दी। इससे नाराज होकर भीमदेव ने अजमेर पर आक्रमण कर दिया और सोमेश्वर चौहान की हत्या करके नागौर पर अपना अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिये भीमदेव को युद्ध में परास्त कर मार डाला और नागौर पर पुनः अधिकार कर लिया। इन कथानकों में कोई ऐतिहासिक महत्त्व नहीं है क्योंकि सोमेश्वर की मृत्यु किसी युद्ध में नहीं हुई थी तथा भीमदेव (द्वितीय) ई.1241 के लगभग तक जीवित था।

    चौहान-चालुक्य संघर्ष के फिर से उठ खड़े होने का कारण जो भी हो किंतु वास्तविकता यह भी थी कि चौहानों तथा चौलुक्यों के राज्यों की सीमायें मारवाड़ में आकर मिलती थीं। इधर पृथ्वीराज (तृतीय) और उधर भीमदेव (द्वितीय), दोनों ही महत्त्वाकांक्षी शासक थे। इसलिये दोनों में युद्ध अवश्यम्भावी था। खतरगच्छ पट्टावली में ई.1187 में पृथ्वीराज द्वारा गुजरात अभियान करने का वर्णन मिलता है। बीरबल अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है। कुछ साक्ष्य इस युद्ध की तिथि ई.1184 बताते हैं। इस युद्ध में चौलुक्यों की पराजय हो गई। इस पर चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार के प्रयासों से चौहानों एवं चौलुक्यों में संधि हो गई। संधि की शर्तों के अनुसार चौलुक्यों ने पृथ्वीराज चौहान को काफी धन दिया।

    खतरगच्छ पट्टावली के अनुसार अजमेर राज्य के कुछ धनी व्यक्ति जब इस युद्ध के बाद गुजरात गये तो गुजरात के दण्डनायक ने उनसे भारी राशि वसूलने का प्रयास किया। जब चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार को यह बात ज्ञात हुई तो उसने दण्डनायक को लताड़ा क्योंकि जगदेव के प्रयासों से चौलुक्यों एवं चौहानों के बीच संधि हुई थी और वह नहीं चाहता था कि यह संधि टूटे। इसलिये जगदेव ने दण्डनायक को धमकाया कि यदि तूने चौहान साम्राज्य के नागरिकों को तंग किया तो मैं तुझे गधे के पेट में सिलवा दूंगा। वि.सं.1244 के वेरवल से मिले जगदेव प्रतिहार के लेख में इससे पूर्व भी अनेक बार पृथ्वीराज से परास्त होना सिद्ध होता है। इस अभियान में ई.1187 में पृथ्वीराज चौहान ने आबू के परमार शासक धारावर्ष को भी हराया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • कैसे बना था पाकिस्तान - 37

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 37

    देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल


    राजाओं के मन में कांग्रेस की ओर से आशंका

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 घोषित हुआ तो उसकी धारा 8 में प्रावधान किया गया कि देशी राज्यों पर से 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जाएगी। बहुत से राजाओं ने अंग्रेजों द्वारा दी जा रही इस सुविधा का लाभ उठाने का मन बनाया। इस सुविधा के आधार पर देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिये स्वतंत्र थे।

    मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के आंदोलन के माध्यम से बनने वाले भावी पाकिस्तान में पूरे पंजाब और पूरे बंगाल की मांग की थी किंतु भारत-पाकिस्तान की वास्तविक सीमाओं का खुलासा पाकिस्तान बनने से पहले तक नहीं किया गया। इन कारणों से भारतीय राजाओं के मन में यह भ्रम बना रहा कि पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाएगा। इस कारण जैसलमेर, बीकानेर, अलवर, जोधपुर आदि बहुत सी रियासतों को लगता था कि देश का विभाजन होने के बाद उनका राज्य भारत एवं पाकिस्तान दोनों की सीमाओं के बीच में स्थित होगा इसलिए वे अपनी मर्जी से भारत या पाकिस्तान में से किसी को भी चुनने की स्थिति में होंगे। चूंकि कांग्रेस शुरु से ही राजाओं को धमका रही थी कि रियासतों पर से परमोच्चता का अधिकार ब्रिटिश क्राउन से समाप्त होकर संघीय सरकार को मिल जाएगा इसलिए राजा लोग कांग्रेस-शासित भारत में मिलने से डरने लगे।

    29 जनवरी 1947 को बंबई के ताजमहल होटल में नरेंद्र मण्डल की बैठक हुई जिसमें 60 राजा और 100 राज्यों के मंत्री उपस्थित थे। बैठक में नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब ने कहा- 'हमें कहा जा रहा है कि या तो हम हट जायें या फिर हाशिये पर जियें। हमारे लिये इन धमकियों के आगे घुटने टेक देना अशोभनीय होगा।' नवाब ने वे आधारभूत सिद्धांत भी गिनाये जिन पर राज्य समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने मांग की कि कैबीनेट मिशन योजना का पूर्ण अनुसरण किया जाये। त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी ने संविधान सभा पर आरोप लगाया कि वह राज्यों में सरकार का प्रारूप निश्चित करने की चेष्टा कर रही है। सम्मेलन में पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से राजाओं ने इच्छा प्रकट की कि कैबीनेट मिशन योजना के तहत प्रस्तावित भारत संघ में संविधान के निर्माण के लिये शासकगण अपना हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं।

    अलवर नरेश ने 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में आयोजित नरेंद्र-मंडल की बैठक में कहा कि- 'देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये' किंतु 10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा की। अब भी बहुत से राजा संविधान सभा से बाहर थे इसलिए 18 अप्रेल 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद के आठवें अधिवेशन में राजाओं को चेतावनी दी कि जो राजा इस समय संविधान सभा में सम्मिलित नहीं होंगे उन्हें देश का शत्रु समझा जायेगा और उन्हें इसके दुष्परिणाम भोगने होंगे। लियाकत अली ने राजाओं का आह्वान किया कि वे नेहरू की धमकियों में न आयें। नेहरू, गांधी प्यारेलाल आदि कांग्रेसी नेताओं द्वारा देशी राज्यों के प्रति प्रयुक्त की जा रही कठोर भाषा से बहुत से राजा कांग्रेस से नाराज एवं भयभीत थे। इसलिए वे पाकिस्तान में मिलने या स्वतंत्र रहने या देशी राज्यों का अलग समूह बनाकर उसमें मिलने पर विचार कर रहे थे।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अधिकांश राज्य, हिंदू राज्य थे। हैदराबाद, भोपाल, जूनागढ़ एवं टोंक राज्यों के शासक तो मुसलमान थे किंतु वहाँ की बहुसंख्यक जनता हिन्दू थी। जबकि काश्मीर का राजा हिन्दू था किंतु उसकी बहुसंख्यक प्रजा मुसलमान थी। इस प्रकार जातीय आधार पर भारत के राज्य और उनकी जनता ब्रिटिश-भारत के हिंदू बहुल क्षेत्र से जुड़े हुए थे। आजादी के समय भारत में 566 देशी रियासतें थीं जिनमें से 12 रियासतें- बहावलपुर, खैरपुर, कलात, लास बेला, मकरान, खरान, अम्ब (तनावल), चित्राल, हुंजा, धीर, नगर तथा स्वात, पाकिस्तानी क्षेत्रों से घिरी हुई थीं। इसलिये उन्हें पाकिस्तान में सम्मिलित किया जाना था। शेष 554 रियासतें भारत में रह जानी थीं। मुस्लिम शासकों द्वारा शासित जूनागढ़ (सौराष्ट्र), हैदराबाद (दक्षिण भारत) एवं भोपाल (मध्य भारत) तथा हिन्दू शासक द्वारा शासित किंतु मुस्लिम बहुल राज्य काश्मीर भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए। कुछ हिन्दू राज्य भी भारत एवं पाकिस्तान से स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखने लगे।

    पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थित कलात नामक रियासत ने पाकिस्तान में मिलने से मना कर दिया। जिन्ना उस समय तो चुप लगा गया किंतु मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना ने कलात पर आक्रमण करके उसे बलपूर्वक पाकिस्तान में मिला लिया। छोटे राज्यों के पास भारत संघ में मिल जाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था किंतु बड़े एवं सक्षम राज्यों की स्थिति अलग थी। त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं काश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। भोपाल नवाब नरेन्द्र मण्डल के चांसलर पद का दुरुपयोग करते हुए केन्द्र में एक मजबूत संघ का निर्माण नहीं होने देना चाहते थे। ऐसी परिस्थति में बीकानेर नरेश सादूलसिंह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर देश के राजाओं का नेतृत्व करने के लिये आगे आये और उन्होंने नवाब द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को भेद डाला।

    10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां जैसे महत्वपूर्ण राज्यों ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा करके नवाब के मंसूबों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। शासकगण चाहते थे कि परमोच्चता की समाप्ति तुरंत हो ताकि वे अपने अधिकारों के लिये अधिक मजबूती से मोल भाव कर सकें किंतु ब्रिटिश सरकार का मानना था कि ब्रिटिश-भारत के लिये सम्प्रभुता की समाप्ति तथा रियासती-भारत के लिये परमोच्चता की समाप्ति की अलग-अलग तिथियां नहीं हो सकतीं। राजपूताना के राज्यों ने आजादी के द्वार पर खड़े देश के इतिहास के रुख को सदा-सदा के लिये सही दिशा में मोड़ दिया।

    राजपूताना के राजाओं ने इस समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उन पर भारत की संवैधानिक प्रगति का शत्रु होने का आरोप न लगे। 5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने के निर्णय की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। काश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूह के द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किये जाने की संभावना थी। इस प्रकार कुछ देशी रियासतों के शासकों की महत्वाकांक्षायें देश की अखण्डता के लिये खतरा बन गयीं। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर तथा बाद में स्वतंत्र भारत में ब्रिटेन के प्रथम हाईकमिश्नर सर आर्चिबाल्ड नेई को रजवाड़ों के साथ किसी प्रकार की संधि होने में संदेह था। माउंटबेटन ने सरदार पटेल से कहा- 'यदि राजाओं से उनकी पदवियां न छीनी जायें, महल उन्हीं के पास बने रहें, उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त रखा जाये, प्रिवीपर्स की सुविधा जारी रहे तथा अंग्रेजों द्वारा दिये गये किसी भी सम्मान को स्वीकारने से न रोका जाये तो वायसराय राजाओं को इस बात पर राजी कर लेंगे कि वे अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलीन करें और स्वतंत्र होने का विचार त्याग दें।'

    पटेल ने माउंटबेटन के सामने शर्त रखी कि- 'वे माउंटबेटन की शर्त को स्वीकार कर लेंगे यदि माउंटबेटन सारे रजवाड़ों को भारत की झोली में डाल दें।' तेजबहादुर सप्रू का कहना था- 'मुझे उन राज्यों पर, चाहे वह छोटे हों अथवा बड़े, आश्चर्य होता है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे समझते हैं कि वे इस तरह से स्वतंत्र हो जायेंगे और फिर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखेंगे।' दुर्दिन के मसीहाओं ने भविष्यवाणी की थी कि- 'हिंदुस्तान की आजादी की नाव रजवाड़ों की चट्टान से टकरायेगी।'


    संभालिए अपने बच्चे

    भारत को स्वतंत्र किये जाने की घोषणा के बाद लंदन इवनिंग स्टैण्डर्ड में कार्टूनिस्ट डेविड लो का एक 'Your Babies Now' शीर्षक से छपा था जिसमें भारत के राष्ट्रीय नेताओं के समक्ष भारतीय राजाओं की समस्या का सटीक चित्रण किया गया था। इस कार्टून में नेहरू तथा जिन्ना को अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे हुए दिखाया गया था जिनकी गोद में कुछ बच्चे बैठे थे। ब्रिटेन को एक नर्स के रूप में दिखाया गया था जो यूनियन जैक लेकर दूर जा रही थी। नेहरू की गोद में बैठे हुए बच्चों को राजाओं की समस्या के रूप में दिखाया गया था जो नेहरू के घुटनों पर लातें मार कर चिल्ला रहे थे।


    जिन्ना का षड़यंत्र

    एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिये ऐसा करना सुविधाजनक था। जिन्ना यह प्रयास कर रहा था कि अधिक से अधिक संख्या में देशी रियासतें अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दें अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायें ताकि भारतीय संघ स्थायी रूप से दुर्बल बन सके। जिन्ना राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहता था कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है। जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उसने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया जा रहा था कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं। निजाम हैदराबाद के प्रति माउंटबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने कोरफील्ड और भोपाल नवाब का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया।


    पाकिस्तान के प्रति कतिपय हिन्दू राजाओं का रवैया

    त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे।


    बड़ौदा महाराजा प्रतापसिंह की पदच्युति

    बड़ौदा महाराजा प्रतापसिंह ने अपने हाथ से सरदार पटेल को पत्र लिखा कि जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे। इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को महाराजा बड़ौदा स्वीकार किया। भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर राजा विनम्र देश-सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये बनाया था, उसे भंग कर दिया गया। उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा।


    भोपाल नवाब का षड़यंत्र

    भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहा था किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो तीसरे मोर्चे के नेता भोपाल नवाब ने अपनी मुट्ठी खोल दी और प्रत्यक्षतः विभाजनकारी मुस्लिम लीग के समर्थन में चला गया तथा जिन्ना का निकट सलाहकार बन गया। वह जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गया जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। रियासती मंत्रालय के सचिव ए. एस. पई ने पटेल को एक नोटशीट भिजवायी कि भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहा है।

    भोेपाल नवाब शासक मंडल के चांसलर के महत्वपपूर्ण पद पर था, उसने नए वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन से कहा कि वह कांग्रेस से नफतरत करता है और कांग्रेस शासित भारत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होगा। भारत के विभाजन के निश्चय से उसकी विध्वंसकारी गतिविधियां तेज हो गईं। उसने जोधपुर, इन्दौर और उदयपुर के शासकों को अपने साथ मिलाने की कोशिश की ताकि वह अपनी रियासत के लिए भौगोलिक निकटता पा सके और उसे पाकिस्तान के हवाले कर सके। नवाब चाहता था कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये। इसलिये उन्होंने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनायी कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य पाकिस्तान का अंग बन जायें। इस योजना में सबसे बड़ी बाधा उदयपुर और बड़ौदा की ओर से उपस्थित हो सकती थी। महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया।


    धौलपुर के राजराणा षड़यंत्र में सम्मिलित

    भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खाँ ने धौलपुर के महाराजराणा उदयभानसिंह को हिन्दू रियासतों को पाकिस्तान में मिलाने की योजना में सम्मिलित कर लिया। उदयभानसिंह जाटों की प्रमुख रियासत के बहुपठित, बुद्धिमान एवं कुशल राजा माने जाते थे किंतु वे किसी भी कीमत पर धौलपुर को भारत संघ में मिलाने को तैयार नहीं थे। इसलिए वे जिन्ना के चक्कर में आ गए। जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा महाराजराणा ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिये आमंत्रित किया। नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे।


    अलवर राज्य में पाकिस्तान में सम्मिलित होने का प्रचार

    भोपाल नवाब का साथ करने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे, यह बात बम्बई के उनके भाषण से स्पष्ट हो गई थी। अर्थात् एक तरफ से अलवर राज्य में लीग की राजनीति का प्रचार हो रहा था और दूसरी तरफ राज्य के राजपूत सरदारों, जमींदारों द्वारा प्रचार किया जा रहा था कि अलवर राज्य को न हिन्दी संघराज्य में मिलना चाहिए और न पाकिस्तान में। राज्य को अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहिए। उसमें भी कतिपय विशिष्ट स्वार्थ-सम्बद्ध लोगों ने महाराज के मन में इस बात को जमा दिया था कि हिन्दी संघ राज्य में तो अलवर को कदापि शामिल नहीं होना चाहिए। इन सब चक्करों के कारण अलवर राज्य हिन्दी संघराज्य में शामिल होन के सम्बन्ध में निराश हो गया था।

    खरे ने लिखा है कि यदि पूरे पंजाब को पाकिस्तान में शामिल करने की मुस्लिम लीग की मांग मान ली जाती तो अलवर राज्य की सीमा पाकिस्तान से मिल जाती किंतु पंजाब का विभाजन होने और पूर्वी पंजाब के भारत में रह जाने से यह संभावना समाप्त हो गई। अलवर नरेश फिर भी अपनी जिद पर पूर्ववत् दृढ़ रहा। 16-17 अप्रेल 1947 को ग्वालियर में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजापरिषद् का सम्मेलन हुआ, इसमें महाराज अलवर ने नेहरू द्वारा देशी राज्यों को सम्बोधित करके कही गई कठोर घोषणाओं का उल्लेख करते हुए कहा- 'जो लोग हमारा निःपात करने पर आज ही तुले हुए हैं, उन लोगों से हम क्यों सहयोग करें। कांग्रेस के इन नेताओं से हमें भय है। वे हमें नष्ट कर देंगे। इसके विपरीत मुस्लिम लीग वाले हमें निश्चित आश्वासन दे रहे हैं कि देशी राज्यों की स्वतंत्रता अबाधित रहेगी। इसलिए हम उन्हें ही क्यों न मिलें? इस विषय में धर्म का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। यद्यपि हम कट्टर हिन्दू हैं तथापि पाकिस्तान में मिलने से हमारे हिन्दुत्व पर क्या आंच आने वाली है?'

    अलवर महाराजा अपने भाषणों में भले ही कुछ भी कहता रहा हो किंतु राज्य के प्रधानमंत्री द्वारा सरदार पटेल के साथ हुई बैठक के बाद 1 जुलाई 1947 को राज्य के मंत्रिमण्डल ने हिन्दी संघराज्य में शामिल होने का निर्णय लिया तथा उसी दिन तार एवं पत्र द्वारा हिन्दुस्थान सरकार को सूचित किया गया कि हिन्दी संघराज्य की संविधान समिति में अलवर राज्य के शामिल होने की प्रकट घोषणा की गई।


    कोरफील्ड के दुष्प्रयास

    कोनार्ड कोरफील्ड भारत सरकार के राजनीतिक विभाग का सचिव था तथा देशी रियासतों को ही असली भारत मानता था जिनसे उसे गहरी सहानुभूति थी। इसलिए कोरफील्ड ने रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से देशी राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। कोरफील्ड चाहता था कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें। बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना जितना मुश्किल हो सके बना दिया जाये। कोरफील्ड ने रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं तीन रास्ते हैं, वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। कोरफील्ड के प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे।


    रियासती विभाग का गठन

    कोरफील्ड के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग अस्तित्व में आया। कांग्रेस को आशा थी कि यह लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा। हमीदुल्ला खाँ, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे। वी. पी. मेनन को पटेल का सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया। ऐसा माना जाता था कि वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे। पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर और भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुआ। नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ जैसे सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी तथा भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरी शर्मा आदि अनुभवी लोग कार्य कर रहे थे। पटेल ने मेनन से कहा कि- 'पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को वह अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनायें लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है।'


    केवल तीन विषयों पर विलय

    आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। एक ओर कोरफील्ड अंग्रेजों की सत्ता समाप्ति से पहले रजवाड़ों से केन्द्रीय सत्ता का विलोपन करने के काम में लगा हुआ था जिससे एक-एक करके सारी व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं। दूसरी ओर सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जिन्हें अंग्रेजों ने रद्द करना आरंभ कर दिया था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में कैसे बात की जाये? मेनन ने सरदार को सुझाव दिया कि राजाओं से केवल तीन विषयों में विलय करने के लिये कहा जाये। ये तीन विषय रक्षा, विदेशी मामले और संचार से सम्बन्धित थे। पटेल से अनुमति लेकर मेनन ने माउंटबेटन से इस कार्य में सहयोग मांगा। मेनन ने वायसराय से कहा कि- 'यदि सारे रजवाड़े भारत में मिल जाते हैं तो विभाजन का घाव काफी कम हो जायेगा तथा यदि इस काम में माउंटबेटन ने सहयोग दिया तो भारत की जनता सदियों तक उनकी ऋणी रहेगी।'

    माउंटबेटन ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया। 5 जुलाई 1947 को पटेल ने राजाओं से अपील की कि- 'वे 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। देशी राज्यों को सार्वजनिक हित के तीन विषय- रक्षा, विदेशी मामले और संचार संघ को सुपुर्द करने होंगे जिसकी स्वीकृति उन्होंने केबीनेट मिशन योजना के समय दी थी। भारतीय संघ इससे अधिक उनसे और कुछ नहीं मांग रहा। संघ देशी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं रखता। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है।'

    पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि- 'यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता उसको हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उसकी भूल होगी। परमोच्चता तो जनता में निहित है।' एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित हो जाने का निमंत्रण था। सरदार के शब्दों में यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधि से बेहतर था।

    इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय के लिये पहला पांसा फैंका गया जिसका परिणाम यह हुआ कि बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का एक बार फिर तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और कांग्रेस को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×