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  • सबके अपने-अपने कोट -

     03.06.2020
    सबके अपने-अपने कोट -

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    भारत की मूल परम्परा बिना सिले हुए कपड़े पहनने की रही है। बिना सिली हुई मर्दानी धोती, औरतों की लांगदार धोती और बिना लांग की साड़ी, बिना सिले हुए उत्तरीय, साफे, लंगोटी और दुपट्टे में ही आम भारतीय का जीवन मजे में कटता था। यह तो नहीं कहा जा सकता कि जब मुसलमान इस देश में आये तोे वे अपने साथ पहली बार सिला हुआ कपड़ा लेकर आये किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि धोती की जगह सलवार, सुतन्नी और पजामे, गरारे तथा उत्तरीय की जगह कुर्ते, अचकन, शेरवानी मुसलमानों के साथ ही इस देश में आये। जब अंग्रेज इस देश में आये तो अपने साथ कोट-पैण्ट और चुस्त कपड़े लेकर आये। उनके कोट भी तरह-तरह के थे। हर समय का, हर ऋतु का और हर काम का अलग कोट। कुछ भारतीयों ने भी उनकी देखा-देखी, अपनी हैसियत के अनुसार कोट पहनने आरम्भ किये।

    जवाहर का गुलाब के फूल वाला कोट

    भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का कोट बिल्कुल अलग तरह का था जो गले से आरम्भ होकर घुटनों से जरा ही ऊपर समाप्त होता था। उस पर हर समय गुलाब का ताजा फूल जगमगाता रहता था। इस कोट में वे रौबदार व्यक्तित्व के धनी दिखाई देते थे। उस जमाने में जवाहरलाल नेहरू जैसा इक्का-दुक्का व्यक्ति ही ऐसा शालीन कोट पहन पाता था। शायद इसी कोट का चमत्कार था कि वे लंदन के नेताओं से जो चाहे मनवा लेते थे।

    शास्त्रीजी का फटे कॉलर वाला कोट

    लाल बहादुर शास्त्री गुदड़ी के लाल थे, उनके पास कोट नहीं था। कहते हैं जवाहरलाल ने शास्त्रीजी को अपना कोट दिया था। शास्त्रीजी जरूरत होने पर उसी कोट को पहन लेते थे। जब शास्त्रीजी प्रधानमंत्री बने तब भी वही कोट उनकी आवश्यकता पूरी करता रहा। इसी फटे कॉलर के कोट को पहनकर उन्हें 1971 की सर्दियों में पास्तिान के विरुद्ध अपने लड़ाकू विमानों को उड़ने के लिये कह दिया था जिसकी कि पूरी दुनिया को उम्मीद नहीं थी। यह किस्सा बहु-प्रचलित है कि जब शास्त्रीजी 1965 के युद्ध के बाद ताशकंद जाने लगे तो उनके सचिव ने कहा कि एक नया कोट सिलवा लेते हैं क्योंकि इस कोट का कॉलर फट गया है किंतु शास्त्रीजी ने मना कर दिया। इसी फटे हुए कॉलर वाले कोट को पहनने वाले शास्त्रीजी आम भारतीय के दिल और दिमाग पर आज तक छाये हुए हैं।

    इंदिरा का निर्गुटिया कोट

    इंदिरा गांधी भी सर्दियों में एक लेडीज कोट पहनती थीं। इस कोट में वे बड़ी गरिमामय और दृढ़ दिखती थीं। किसी की हिम्मत नहीं होती थीं कि कोई उनसे आंख मिलाकर बात कर ले। जब वे इस कोट को पहनकर निर्गुट सम्मेलनों में जातीं तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े नेताओं के पसीने छूट जातेे। इस निर्गुटिया कोट के बल पर वे दुनिया की बड़ी ताकतों की परवाह किये बिना, दुनिया के सैंकड़ों देशों में शक्तिपुंज के प्रतीक की तरह जगमगाती रहीं। उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये और दुनिया चूं भी नहीं कर सकी।

    डॉ. मनमोहनसिंह का रेनकोट

    वक्त ने करवट ली और भारतीय राजनीति के आकाश में डॉ. मनमोहनसिंह प्रकट हुए जिन्होंने दस वर्ष तक देश की सरकार चलाई। उनके कोट के बारे में अब तक किसी को पता नहीं था किंतु अचानक भारत की संसद में उनके रेनकोट की चर्चा हुई। मालूम पड़ा कि वे इस रेनकोट को पहनकर ही बाथरूम में नहाते रहे। यही कारण रहा कि कोयला खदानों की नीलामी की कालिख भले ही कितनी ही उड़ी हो, यही रेनकोट उनका अब तक बचाव कर रहा है।

    नमो का लखटकिया कोट

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लखटकिया कोट भी बहुत चर्चा में रहा। जनता को बताया गया कि इसकी कीमत 10 लाख रुपये है। इसी कोट को पहनकर वे अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा से मिलने गए। भारतीय भाइयों और बहनों ने उस कोट की ऐसी बैण्ड बजाई कि उसे नीलाम करवाकर माने। कोट की नीलामी से मिले 4.31 करोड़ रुपये पतित-पावनी देवनदी भागीरथी माँ गंगा की सफाई के लिये दिये गये हैं। और भी आयेंगे कोट समय बहुत बलवान है, देश भी बहुत बड़ा है और लोकतंत्र भी काफी मजबूत है, समय के साथ और भी कोट आयेंगे और देश की सेवा करेंगे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • बाबूजी धीरे चलना.... आगे टोल नाका है!!!!

     03.06.2020
    बाबूजी धीरे चलना.... आगे टोल नाका है!!!!


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    बाबूजी धीरे चलना.... आगे टोल नाका है!!!!

    ये तो कमाल हो गया! जयपुर-अजमेर टोल नाके पर ऐसी विचित्र घटना घटी कि दुकादार तो मेले में लुटे और तमाशबीन अपना सामान बेच गये। राज्य में कानून के मालिक तो हैं विधायक लोग किंतु टोल नाके के कर्मचारियों ने, इन मालिकों से ही लगातार दो दिन तक दो-दो बार गैरकानूनी बदतमीजी करके यह जता दिया कि देश में कानून कैसा और किसका चल रहा है! जो विधायक जनता को उसका अधिकार दिलाने के लिये बने हैं, वे अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सके। कबीर ने शायद इसीलिये कहा था- पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवत हांसी!!!! 

    यह घटना पहली बार नहीं घटी है। जयपुर और कोटा के बीच पड़ने वाले एक टोल नाके पर लगभग डेढ़-दो साल पहले राज्य के परिवहन मंत्री से ही टोल ले लिया गया। मंत्रीजी चिल्लाते रहे कि मैं परिवहन मंत्री हूँ किंतु किसी ने न सुनी। अंत में बेचारे विधानसभा में जाकर चिल्लाये किंतु उस टोल नाके पर अंधेरगर्दी आज भी राज्य कर रही है। अंधेरा कायम रहे!!!!

    टोल नाकों पर सामान्यतः यह नहीं लिखा रहता कि यहां कौन-कौन फ्री में निकलेगा! केवल इतना लिखा रहता है कि यहां इस-इस वाहन से इतने-इतने रुपये लिये जायेंगे। सारे सरकारी अधिकारी जिनके पास लाल रेखा खिंची हुई नम्बर प्लेट का वाहन नहीं है और उनके विभागों ने अनुबंध के वाहन लगा रखे हैं, दिन-रात इन टोलनाके वालों से परेशान रहते हैं। बेचारों का अपने ही जिले में सरकारी दौरे पर जाना किसी सर दर्द से कम नहीं होता। करें भी तो करें क्या, जीना यहां, मरना यहां!!!!

    टोल नाके भी क्या अजीब सी चीज हैं। न जाने किसने इनका आविष्कार किया होगा। कुछ पढ़े-लिखे से दिखने वाले अनपढ़ टाइप के कर्मचारी बहुत कम सैलेरी में इन नाकों पर तैनात किये जाते हैं। ये कर्मचारी तो केबिन में बैठकर पर्चियां फाड़ते रहते हैं किंतु नाके के पास ही सड़क पर खटिया बिछाकर कुछ बेफिक्रे से लोग ताश खेलते और चाय पीते रहते हैं। जब कभी केबिन वालों को जरूरत पड़ती है तो ये बेफिक्रे से लोग अचानक फिक्रमंद हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे सरकार ने असामाजिक तत्वों को खास तरह का रोजगार दे दिया है। सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का!!!!

    लगे हाथों टोल टैक्स की फिलोसोफी पर भी बात कर लें। टोल हर उस आम आदमी को देना होता है जो सड़क पर कम से कम चार पहिया वाहन लेकर निकलता है लेकिन क्यों????  यह समझ में नहीं आता।

    सरकार ने हर उस आदमी से पहले ही टैक्स ले लिया है जिसने भी वाहन खरीदा है। हर उस आदमी से टैक्स ले लिया है जिसने भी पैट्रोल या डीजल खरीदा है। हर उस आदमी से फीस ले रखी है जिसने भी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया है। हर उस आदमी से टैक्स ले रखा है जिसने भी आयकर चुकाया है। हर उस आदमी से सर्विस टैक्स ले रखा है जिसने अपने वाहन की मरम्मत करवाई है। हर उस आदमी से वैट ले रखा है जिसने भी अपने वाहन में कोई ऐसेसरी लगवाई है। हर उस आदमी से एज्यूकेशन सैस सहित दूसरे सैस ले रखे हैं जिन्होंने इनकम टैक्स भरा है। कहने का अर्थ ये कि सरकार ने सड़क पर वाहन चलाने वाले हर व्यक्ति से अच्छा-खासा टैक्स कई-कई बार ले रखा है। फिर टोल टैक्स किस बात का ?????

    क्या सड़क बनाना सरकार की ड्यूटी नहीं है?? क्या सड़क पर निर्बाध यातायात सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है??? क्या आम जनता से टोल लिया जाना और खास जनता को टोल से मुक्त रखा जाना, नागरिकों के बीच भेदभाव करने जैसा नहीं है ???? भारत के टोलनाके अंग्रेजी के इस पुराने जुमले को चरितार्थ करते हुए प्रतीत होते हैं, जिसे जवाहरलाल नेहरू भी दोहराया करते थे- सम पीपुल आर मोर ईक्वल इन डेमोक्रेसी!!!!

    टोल का एक गणित यह भी है कि लगभग हर 50 किलोमीटर पर एक टोल नाका है। हर टोल नाके पर एक वाहन कम से कम 15 मिनट तक व्यर्थ ही खड़ा रहकर धुआं छोड़ता है जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। इस दौरान जलने वाले पैट्रोल एवं डीजल पर जो विदेशी मुद्रा चुकाई जाती है, वह व्यर्थ जाती है। यदि सरकार टोल नाकों को बंद कर दे तो देश को लगभग उतने ही रुपये की बचत हो जायेगी, जितनी कमाई टोल के माध्यम से की जा रही है। 

    कोढ़ में खाज की स्थिति तो तब बनती है जब जनता से टोल के माध्यम से सड़क की पूरी लागत वसूल कर ली जाती है और टोल फिर भी जारी रहता है। तुलसीदासजी ने लिखा है कि राजा जब पुल बनाता है तो चींटियां भी उस पर चढ़कर नदी के पार चली जाती हैं। यहां तो सारी वसूली ही चींटियों से की जाती है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • इस्लामिक स्टेट में सूफी संतों के लिये जगह नहीं होगी!

     03.06.2020
    इस्लामिक स्टेट में सूफी संतों के लिये जगह नहीं होगी!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया के नाम से चल रहे मध्य एशियाई आतंकी संगठन ने पाकिस्तान में सूफी मत के संत की मजार पर 108 लोगों को मौत के घाट उतार कर एक बार फिर पूरी दुनिया को संदेश दिया है कि इस्लामिक स्टेट में सूफी मत के लिये कोई जगह नहीं होगी। ऊपरी तौर पर तो ऐसा ही लगता है कि यह मामला इतना ही है किंतु मामला केवल इतना ही नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि इस्लामिक स्टेट में किसी भी इंसान के लिये कोई जगह नहीं है। वहां केवल राक्षसों, शैतानों, पिशाचों, हैवानों और रक्त पिपासु जीवों के लिये जगह है। सूफी मत, इस्लाम से भी पुराना है तथा इसकी रहस्यवादी उपासना पद्धति का जन्म स्वतन्त्र रूप से हुआ है किंतु उसने विश्व के लगभग समस्त प्रमुख धार्मिक मतों से रहस्यवादी दर्शन को ग्रहण करके सार्वभौमिक स्वरूप ग्रहण किया है। उस पर भारतीय वेदान्त तथा बौद्ध धर्म का प्रभाव है तो यूनान के अफलातून (अरस्तू) के मत का भी उतना ही प्रभाव है। मसीही धर्म से भी उसने बहुत कुछ लिया है तो पैगम्बर मुहम्मद ने भी उस पर अपनी छाप छोड़ी है। इन सारे धर्मों और मतों में जो कुछ भी रहस्यमयी उपासना पद्धतियां थीं उन सबको सूफियों ने ग्रहण करके अपने लिये एक ऐसे अद्भुत दर्शन की रचना की जो अपने आप में बेजोड़ है। छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाई के। मोहे सुहागन कीनी से मोसे नैना मिलाई के .....। XXX गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस चल खुसरो घर आपने रैना भई विदेस।। ..... इस तरह की मीठी, मनमोहक तथा दिल को छने वाली बातें सूफी मत ही कह सका। मध्य एशिया की शामी जातियों के कबीलों की गोद में सूफी मत ने जन्म लिया तथा प्रेम के बोल बोलते हुए और अपनी मस्ती में नाचते-गाते हुए यह मत पूरी दुनिया में फैल गया। सूफी मत के भीतर बहुत से सम्प्रदाय हो गये जिनमें से 14 सम्प्रदाय भारत में आये। इनमें से भी चार सम्प्रदयों ने भारत में विशेष प्रभाव जमाया। पाकिस्तान में जिस सूफी संत की मजार पर आईसिस ने यह खूनी खेल खेला है, वह भी उसी धरती से सिन्ध पहुंचा जिस धरती पर आईसिस का जन्म हुआ है। सूफी मतों ने इस्लाम से जितना लिया नहीं है, उतना दिया है। इन्होंने ही भारत में इस्लाम के प्रसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। औरंगजेब की तलवार जो काम नहीं कर सकी, सूफियों के प्रेम के तरानों ने वो काम किया। भारत के मुसलमान तो इस्लाम और सूफी मत में अंतर करना भी नहीं जानते। वे अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और नागौर के सुल्तानुत्तारकीन की दरगाह पर उसी शिद्दत से जाते हैं जिस शिद्दत से वे किसी मस्जिद में या हज पर जाते हैं। आईसिस का यह कारनामा ऐसा ही है जैसे किसी पेड़ पर बैठकर उसके तने को काटना। यदि ट्रम्प ऐसे आईसिस को नष्ट करने के लिये संकल्पबद्ध हैं तो अमरीका में उनका विरोध करने वालों पर हैरानी होती है। तथा यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या अमरीका में भी आईसिस अपनी जड़ें गहरी जमा चुका है! क्या वे भी चाहते हैं कि आईसिस का खात्मा न हो, आतंकवाद का खात्मा न हो! कुल मिलाकर अजीब ही है ये दुनिया! यह सोचना भी गैरवाजिब नहीं लगता कि जब आईसिस पाकिस्तान के सिंध प्रदेश में ऐसे रक्तरंजित कारनामों को अंजाम दे सकता है, तो भारत क राजस्थान वहां से अधिक दूरी पर नहीं है। क्या इन क्रूर दैत्यों का ...अगला निशाना हम ही हैं! - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

     03.06.2020
    युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    रैगिंग पाश्चात्य जीवन शैली की कुछ अत्यंत बुरी बुराइयों में से है, जिसे भारतीयों ने कुछ अन्य बुराईयों की तरह जबर्दस्ती ओढ़ लिया है। यह अपने आप में इतनी बुरी है कि हम विगत कई वर्षाें से प्रयास करने के उपरांत भी इसे महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से समाप्त नहीं कर पाये हैं। इसका क्या कारण है! रैगिंग के जारी रहने का सबसे बड़ा कारण स्वयं रैगिंग ही है।

    जो युवा एक बार रैगिंग का शिकार हो जाते हैं, उनके मन से मानवीय संवेदनाएं नष्ट हो जाती हैं और वे अपनी रैगिंग का बदला दूसरे युवाओं से लेने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी मानसिकता के चलते रैगिंग को समाप्त नहीं किया जा सका है।

    भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने देश के समस्त शिक्षण संस्थाओं को निर्देश दे रखे हैं कि वे अपनी संस्थाओं को रैगिंग से मुक्त रखें। इन आदेशों के परिप्रेक्ष्य में अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में रैगिंग के विरुद्ध कुछ कदम भी उठाये हैं किंतु रैगिंग के शिकार हो चुके युवाओं के क्रूर व्यवहार के कारण रैगिंग बदस्तूर जारी है। यह बुराई तकनीकी, व्यावसायिक एवं चिकित्सा शिक्षण संस्थाओं में कैंसर का रूप ले चुकी है। विगत कुछ वर्षों में देश के अनेक शहरों में स्थित शिक्षण संस्थाओं में नवीन प्रवेश लेने वाले बच्चों को रैगिंग की काली छाया ने डस लिया। कई बच्चे हमेशा के लिये शिक्षण संस्था छोड़कर चले गये तो कुछ बच्चों को प्राणों से भी हाथ धोने पड़े।

    जो छात्र पिछली साल रैगिंग का शिकार हुए थे अब वही छात्र अपनी रैगिंग का बदला लेने के लिये नये छात्रों का बड़ी क्रूर मानसिकता के साथ स्वागत करने को उत्सुक दिखायी देते हैं। रैगिंग के दौरान बच्चों के साथ गाली-गलौच तथा मारपीट की जाती है जिसके साथ तर्क दिया जाता है कि इससे बच्चे बोल्ड बनेंगे और उनका दब्बूपन जाता रहेगा। यह तर्क सभ्य समाज मंे किसी भी समझदार व्यक्ति के गले उतरने वाला नहीं है। गाली, लात और घूंसे खाकर आदमी बोल्ड कैसे बनेगा? ऐसे व्यक्ति के भीतर तो एक ऐसी सहमी हुई कुण्ठित पसर्नलटी जन्म लेगी जो अपने से कमजोर लोगों पर हाथ उठाकर अपने अहम को संतुष्ट करना चाहेगी।

    अक्सर हम देखते हैं कि बात केवल गाली-गलौच या लात-घूंसों तक सीमित नहीं रहती। लड़कों के कपड़े उतरवाना, उन्हें हॉस्टल की बालकनी से रस्सी बांधकर लटका देना, धारा प्रवाह गंदी गालियां बोलने के लिये विवश करना, मुर्गे बनाना, घण्टों धूप में खड़े रखना, सिगरेट पिलाना, हीटर पर बैठने के लिये मजबूर करना जैसी क्रूर हरकतें होती हैं। आजकल तो इस तरह की शारीरिक प्रताड़ना पुलिस थानों में भी नहीं हो सकती जैसी कि शिक्षण संस्थाओं में हो रही है। तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि रैगिंग नहीं होगी तो जूनियर बच्चे अपने सीनियर्स में घुल-मिल नहीं पायेंगे। गाली-गलौच और लात घूसों के बल पर दूसरे लोगों को अपने समूह में शामिल करना एक विचित्र तर्क जैसा लगता है। यह तो आतंक के बल पर दोस्ती गांठने जैसा है। घुलने मिलने के लिये शालीन व्यवहार, मधुर वाणी और परस्पर सहयोग जैसे गुण आवश्यक होते हैं न कि दुर्व्यवहार।

    रैगिंग के शिकार युवा केवल कॉलेज कैम्पस में अपने से जूनियर छात्रों की रैगिंग लेकर ही संतुष्ट नहीं होते। उनमें से बहुत से युवा हमेशा के लिये दूसरों के प्रति संवदेना विहीन हो जाते हैं। वे सड़क, कार्यालय, परिवार एवं रिश्तेदारी में भी दूसरों को पीडि़त करने में सुख का आनंद अनुभव करते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा नागरिक, अच्छा कार्मिक, अच्छा पिता, अच्छा दोस्त और अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं तो हमें घर से ही शुरुआत करनी होगी और बच्चों को रैगिंग से दूर रहने के लिये प्रेरित करना होगा। जिन बच्चों की रैगिंग हो चुकी है, उन्हें बारबार समझाना होगा कि जो आपके साथ हुआ, उसे बुरे स्वप्न की तरह भूल जाओ तथा स्वयं किसी की रैगिंग मत लो।

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  • हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिये क्योंकि....

     03.06.2020
     हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिये क्योंकि....

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    हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिये क्योंकि....
    ट्रम्प के डर से पाकिस्तान ने हाफिज सईद को नजरबंद किया है उसके बैंक खाते सीज किये हैं और हाफिज को पाकिस्तान से बाहर निकलने पर रोक लगाई है।

    ट्रम्प के डर से पाकिस्तान ने उन आतंकी समूहों को ढूंढ-ढूंढकर मारा है जिन्होंने सिंध में एक सूफी दरगाह पर हमला करके 150 लोग मार दिये थे।

    ट्रम्प के दबाव में यूएनओ में एक प्रस्ताव पारित करके उत्तरी कोरिया को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कोयला बेचने पर रोक लगाई गई है जिससे अब उत्तरी कोरिया का तानाशाह अपने मिसाइल कार्यक्रम के लिये पैसा नहीं जुटा पायेगा और दुनिया में हथियारों की होड़ में कमी आयेगी।

    ट्रम्प की इस कार्यवाही के कारण चीन अब उत्तरी कोरिया से कोयला नहीं खरीद पायेगा जिसके कारण चीन के कारखानों की रफ्तार में कमी आयेगी।

    ट्रम्प के रुख से प्रभावित होकर श्रीलंका ने चीन को अपने देश में एक बंदरगाह की स्थापना करने की जो स्वीकृति दी थी, वह वापस ले ली है। इस कारण चीन भारत को चारों ओर से घेरने के अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पायेगा।

    ट्रम्प की नीतियों के कारण भारत के लड़कों को अमरीका में और भी अधिक मोटे वेतन मिल सकेंगे। भारत से ब्रेन ड्रेन रुकेगा जिसके कारण भारत में कम लागत वाले उच्च विज्ञान और आधुनिकतम तकनीकी का विकास हो सकेगा।

    ट्रम्प की नीतियों के कारण अमरीका के सैंकड़ों एनजीओ को अब सऊदी अरब आदि देशों से जहाज भर-भरकर रुपया नहीं पहुंचेगा जिस रुपये से दुनिया भर के आतंकी अमरीका से अत्याधुनिक हथियार खरीदते थे। इस कारण आईसिस की गतिविधियों में अपने आप ही कमी आयेगी।

    हमें डोनाल्ड ट्रम्प से दुखी क्यों होना चाहिये .........

    यदि ट्रम्प आई लव इण्डिया आई लव हिन्दू कहते हैं ! 

    यदि ट्रम्प मैक्सिको की तरफ दीवार बनाकर बुरे लोगों को अमरीका में आने से रोकते हैं !

    यदि ट्रम्प सात देशों पर प्रतिबंध लगाकर अपने देश में बढ़ती शरणार्थियों की भीड़ पर अंकुश लगाना चाहते हैं !

    यदि ट्रम्प चीन की जगह ताइवान को गले लगाते हैं !

    यदि ट्रम्प अपने देश के लड़कों को घर बैठकर बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय उन्हें नौकरियों पर लगाना चाहते हैं !

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • जिंदा है जो इज्जत से वो इज्जत से मेरगा!

     03.06.2020
    जिंदा है जो इज्जत से वो इज्जत से मेरगा!

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      साठ के दशक में आई मदर इण्डिया फिल्म के गीत जन-जन की जिह्वा पर थे जिसके एक गीत की एक पंक्ति यह भी थी कि जिंदा है जो इज्जत से वो इज्जत से मरेगा............ किंतु देश में जैसा वातावरण बनाया जा चुका है, उसमें ऐसा लगता है कि जिंदा है जो विवादों में वो रातों रात मीडिया में छा जायेगा..... इज्जत से जियेगा.. बुद्धिजीवी कहलायेगा.... पैसे कमायेगा.........एमएलए बनेगा। इसी को कहते हैं मुंह में रजनीगंधा और कर लो दुनिया मुट्ठी में।

    एक बहुत ही होशियार हो गई डीयू की छात्रा ने कितनी बेशर्मी से लिखा कि उसके फौजी बाप को दुश्मन ने नहीं युद्ध ने मारा। मैं कहता हूं कि उसके फौजी बाप को उस वैज्ञानिक ने मारा जिसने बंदूक बनाई, जिसने गोली बनाई। उस मास्टर ने मारा जिसने वैज्ञानिक को बंदूक और गोली बनाने की शिक्षा दी। उस चाणक्य ने मारा जिसने भारत देश बनाया। उस विवेकानंद ने मारा जिसने देश को स्वाभिमान से उठ खड़ा होने की प्रेरणा दी। उस गांधी और नेहरू ने मारा जो देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुए।उस भगतसिंह ने मारा जिसने देश से गोरों को भगाने के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।

    उस वीर सावरकर ने मारा जिसने अंग्रेजों को उनकी औकात बताकर दो काले पानी की सजा भुगती। उस इंदिरागांधी ने मारा जिसने परमाणु बम का विस्फोट करके देश को शक्तिशाली बनाया।

    यह तो अच्छा हुआ कि जिस समय इसका फौजी पिता देश के लिये शहीद हुआ, उस समय डीयू की यह छात्रा इतनी समझदार नहीं हुई थी अन्यथा यह उसे लड़ने से यह कहकर रोक देती कि वार मत करो। वार मार देता है। तुम अपनी गोली भारत के उन नेताओं पर चलाओ जो पाकिस्तान के वार का जवाब वार से देते हैं.......... वगैरा-वगैरा।

    अराजकतावादी राजनीति के जन्मदाता अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी के राम सुब्रम्ण्यम की एजेंट इस छात्रा को यह नहीं बताया गया कि 1965 की लड़ाई में जब पाकिस्तान देश के कुछ हिस्सों में घुस आया था तो उसके सैनिकों ने हमारे देश की महिलाओं के स्तन काट दिये थे। बहुत सी औरतों का सतीत्व भंग हुआ था।

    जिस वार ने इस छात्रा के फौजी बाप को मारा, वह युद्ध क्या अटलबिहारी वाजपेयी ने शुरु किया था! क्या दुश्मन की गोली का जवाब गोली से देना बुरी बात है! क्या देश की सेनाएं अहिंसा का उपदेश देने और शत्रु का स्वागत करने के लिये सीमाओं पर खड़ी की गई हैं।

    शर्म करो!!! जैसे दुश्मन की गोली यह नहीं देखती कि सामने खड़ा दुश्मन कौन है वैसे ही उनके सैनिक यह नहीं देखेंगे कि जिस स्त्री के स्तन काट रहा है, उसके घर वाले फेसबुक पर पाकिस्तान का समर्थन कर रहे थे या विरोध। गौतम और गांधी का देश बताने वालों को यह बताना जरूरी है कि गौतम और गांधी की आड़ लेकर बुरी बातें मत करो, इसमें तुम्हारा भी बराबर का नुक्सान है।

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  • राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!

     03.06.2020
    राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!


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    राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!

    25 जुलाई को देश के नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने पहले भाषण में जवाहरलाल नेहरू का नाम नहीं लिया। गांधी के साथ, जनसंघ के संस्थापक सदस्य दीनदयाल उपाध्याय का नाम लिया तथा शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रपति भवन में जय श्री राम के नारे लगे। कांग्रेस की दृष्टि में ये ऐसे अपराध हैं जिनकी अपेक्षा धर्म निरपेक्ष देश के राष्ट्रपति से नहीं की जा सकती जिसे संविधान की रक्षा करनी है।

    रामनाथ कोविंद ने तो राम, कृष्ण, बुद्ध, वेदव्यास, चाणक्य, समुद्रगुप्त, विवेकानंद, कबीर, दयानंद, भगतसिंह, सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर आदि हजारों महापुरुषों और सती, सावित्री, अनुसूइया, राधा, सीता, जीजाबाई, लक्ष्मीबाई, दुर्गावती आदि महान नारियों के नाम भी नहीं लिए जिन्होंने इस देश का निर्माण किया तथा जो इस देश की आत्मा में रचते-बसते हैं। क्या कांग्रेस यह कहना चाह रही है कि भारत राष्ट्र का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ था! उससे पहले तो भारत था ही नहीं ! इसलिए राष्ट्रपति को अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नेहरू का नाम लेना आवश्यक है!

    नेहरू के नाम पर कांग्रेसियों को इतना ही गर्व है तो उनकी उपलब्धियां याद कर लें। उनके समय में पाकिस्तान और चीन ने भारत पर आक्रमण किए। पाकिस्तान और चीन ने कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा दबा लिया। नेहरू की नीतियों के कारण तिब्बत को चीन निगल गया। नेहरू की नीतियों के कारण नेपाल का राजा जो किताबों के बक्से में छिपकर भारत में मिलने आया था, उसे वापस लौटा दिया गया। नेहरू की नीतियों के कारण इजराइल से लगभग आधी शताब्दी तक भारत सरकार अपने सम्बन्ध नहीं बना सकी। नेहरू की नीतियों के कारण कश्मीर में धारा 370 लागू हुई और कश्मीर की समस्या यूएनओ पहुंची। कांग्रेसी नेताओं को नेहरू की नीतियों का और अधिक ज्ञान प्राप्त करना हो तो सरदार पटेल का 7 नवम्बर 1950 का वह पत्र पढ़ लें जिसमें उन्होंने नेहरू को उनकी नीतियों के कारण बुरी तरह लताड़ा है।

    नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कैसे बने, यह भी स्मरण कर लें। 1946 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाना था। गांधी सहित पूरा देश जानता था कि इस बार कांग्रेस का जो अध्यक्ष चुना जायेगा, अंग्रेज सरकार उसी को भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाएगी और वही स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री भी बनेगा। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव अधिकृत प्रदेश कांग्रेस कमेटियों द्वारा किया जाता था। उस समय देश में 15 अधिकृत प्रदेश कांग्रेस कमेटियां थीं जिनमें से 12 कमेटियों ने सरदार पटेल को इस पद के लिए चुना तथा तीन कमेटियों ने अलग-अलग नाम दिए जिनमें नेहरू का नाम शामिल नहीं था। मोहनदास गांधी हर कीमत पर नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे क्योंकि मुसलमानों के मामले पर सरदार पटेल को सख्त तथा नेहरू को मुलायम माना जाता था। इसलिए गांधीजी ने जे. बी. कृपलानी के माध्यम से कांग्रेस कमेटियों पर दबाव बनाया कि वे पटेल की जगह नेहरू को चुनें किंतु एक भी कांग्रेस कमेटी ने नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना स्वीकार नहीं किया। इसलिए गांधीजी ने सीधे पटेल से कहा कि वे अपनी दावेदारी छोड़ दें। पटेल ने गांधी की बात मान ली और नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के साथ-साथ देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

    कांग्रेस के एक बड़े नेता ने यह भी कहा है कि हमें तो दीनदयाल उपाध्याय की केवल एक ही उपलब्धि ज्ञात है कि 1968 में मुगल सराय रेलव स्टेशन पर ट्रेन के टॉयलेट में उनका शव मिला था। ऐसी बेशर्मी वाली बात करने वाले नेताओं को देश की जनता प्रबल बहुमत से नकार चुकी है। फिर भी वे अपनी जिह्वा से दूसरे दलों के नेताओं के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने से बाज नहीं आते। कांग्रेस को इस बात पर भी आपत्ति है कि राष्ट्रपति भवन में जय श्री राम के नारे क्यों लगे! कांग्रेस जो कुछ कह रही है उसका सीधी अर्थ यह है कि राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम लेना एक पवित्र अनिवार्यता है और जय श्री राम के नारे लगना त्याज्य बुराई ! कांग्रेस इस बात को देश के 100 करोड़ से अधिक रामभक्तों के गले कैसे उतार सकेगी !

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • योगी आदित्यनाथ से है चमत्कारों की आशा !

     03.06.2020
    योगी आदित्यनाथ से है चमत्कारों की आशा !

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    भारत के लोगों में चमत्कार-प्रियता का भाव कुछ अधिक ही है। इस प्रवृत्ति के युग-युगांतरकारी विस्तार का अधिकतम श्रेय नाथ-योगियों एवं वज्रयानी-सिद्धों को जाता है। उनके प्रभाव से भारत का आम आदमी इस बात में विश्वास करता है कि तप और योग के बल पर मनुष्य पानी पर चल सकता है, अग्नि में प्रवेश करके सुरक्षित रह सकता है, हवा में उड़ सकता है। वह अणु से भी छोटा और पर्वत से भी बड़ा हो सकता है। वह हजारों वर्षों तक जीवित रह सकता है। जब भारत में बौद्ध धर्म का बोलबाला हो गया तो नाथों ने योग का अद्भुत एवं चमत्कारपूर्ण दर्शन भारत की भोली-भाली जनता के समक्ष रखा। नौ-नाथों और चौरासी सिद्धों ने पूरे भारत में घूम-घूम कर योगबल से प्राप्त की जा सकने वाली सिद्धियों का प्रवचन एवं प्रदर्शन किया ताकि जन-सामान्य को ईश्वर के प्रति नत-मस्तक रहने, साधु संतों की सेवा करने तथा तप एवं योग के प्रति प्रेरित किया जा सके।

    भारतीय संस्कृति में जिन योगियों के नाम बड़ी श्रद्धा से लिये जाते हैं उनमें राजा हरिश्चंद्र, राजा भर्तृहरि, राजा गोपीनाथ, योगी मत्स्येन्द्रनाथ (मछन्दरनाथ), गोरखनाथ (गौरक्षनाथ), जालंधरनाथ एवं बालकनाथ आदि प्रमुख हैं। ग्रामीण अंचलों में जिन कालभैरव, बटुकनाथ और भैरवनाथ आदि के प्रकट होने, लोगों से साक्षात्कार करने, चमत्कार दिखाने, प्रेतों से लड़ने आदि कार्यों की चर्चा बहुतायत से होती है, वे भी वास्तव में नाथ-योगी ही थे जिन्हें शिवभक्त होने के कारण शिवजी का गण भी माना गया तथा उनके दैवीय-स्वरूप में विश्वास किया गया।

    मच्छन्दरनाथ के शिष्य गोरखनाथ थे। इन दोनों के बारे में एक कथा बहुत लोकप्रिय है कि मच्छन्दरनाथ एक बार कामरूप (आज का असम एवं अविभाजित बंगाल) देश में भिक्षाटन के लिये गये। उन्होंने एक घर की एक महिला को अपने योग के चमत्कार दिखाने की चेष्टा की। वह महिला मच्छन्दरनाथ से भी अधिक तंत्र जानने वाली थी। उसने मच्छन्दरनाथ को बकरा बनाकर अपने घर में बांध लिया। जब बहुत दिनों तक गुरु नहीं लौटे तो गोरखनाथ को उनकी चिंता हुई और वे उन्हें ढूंढने लगे किंतु मच्छन्दरनाथ का कहीं पता नहीं चला।

    इस पर गोरखनाथ ने योग बल से पता लगा लिया कि उनके गुरु कहां हैं और किस रूप में हैं। गोरखनाथ वहां पहुंचे और उन्होंने उस घर के बाहर पहुंचकर अलख लगाई- जाग मच्छन्दर गोरख आया। शिष्य की आवाज सुनकर, बकरे के रूप में खड़े मच्छन्दरनाथ को अपने सही स्वरूप का भान हुआ और गुरु उस तांत्रिक महिला के बंधन से मुक्त होने में सफल हुए। यह किस्सा पूरे भारत में इतना विख्यात है कि लगभग हर आदमी ने इसे किसी न किसी रूप में सुना है।

    वस्तुतः नाथ और सिद्ध योगियों की यह परम्परा शैव-धर्म की ही शाखाएं हैं किंतु ऐसे नाथ योगी भी हुए हैं जिन्हें वैष्णव धर्म तथा शैव धर्म दोनों में बराबर महत्व दिया जाता है। इन्हीं में से एक हुए भगवान दत्तात्रेय जिन्होंने आबू पर्वत पर रहकर तपस्या की। आज भी उनका एक मंदिर उस स्थान पर स्थित है। जालंधरनाथ की कर्मभूमि भी राजस्थान रही। माना जाता है कि जालोर नगर का नामकरण इन्हीं जालंधरनाथ के नाम पर हुआ।

    पश्चिमी राजस्थान में कनफड़े योगियों का एक ऐसा सम्प्रदाय विकसित हुआ जिसने शैव सम्प्रदाय का होते हुए भी वैष्णव धर्म में सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त की। इन्हीं में से एक थे आयस देवनाथ। ई.1793 में जोधपुर के राजकुमार मानसिंह ने जोधपुर नरेश भीमसिंह के भय से जालोर दुर्ग में शरण ली। दस साल तक जोधपुर की सेना जालोर दुर्ग को घेर कर बैठी रही किंतु मानसिंह को परास्त नहीं किया जा सका। अंत में ई.1803 में राजकुमार मानसिंह ने समर्पण करने का निश्चय किया।

    उसी पहाड़ी पर एक कनफड़ा योगी आयस देवनाथ रहता था। उसे जब राजा का निश्चय ज्ञात हुआ तो उसने कहा कि 21 अक्टूबर तक धैर्य रखो। मानसिंह ने उसकी बात मान ली। दैववश 20 अक्टूबर को समाचार आया कि जोधपुर नरेश भीमसिंह का निधन हो गया है। इसलिये जोधपुर राज्य का सेनापति सिंघी इन्द्रराज, मानसिंह को हाथी पर बैठाकर जोधपुर ले आया और उसे जोधपुर का राजा बना दिया।

    इस घटना से मानसिंह इतना प्रभावित हुआ के उसने देवनाथ को अपना गुरु मान लिया। वह देवनाथ के दर्शन किये बिना मुंह में अन्न का कण नहीं रखता था। उसने नाथ साधुओं की प्रशस्ति में अनेक ग्रंथों एवं काव्यों की रचना की जिनमें जालंधर चन्द्रोदय, जालन्धर चरित, नाथ कीर्तन, नाथ चन्द्रिका, नाथधर्म निर्णय, नाथ प्रशंसा, नाथ महिमा, नाथजी की स्तुति, नाथजी के पद तथा सिद्ध सम्प्रदाय प्रमुख हैं। मानसिंह का पुत्र छत्रसिंह, वैष्णव धर्म में आस्था रखता था। इसे लक्ष्य करके राजकवि बांकीदास ने लिखा- ‘जब मान को नंद गोविन्द रटै, तब गण्ड फटै कनफट्टन की। ’ इस कविता को सुनकर महाराजा मानसिंह इतना नाराज हुआ कि उसने बांकीदास को देश निकाला दे दिया। बाद में जब कैप्टेन लडलू ने नाथों को मारवाड़ से निकाल दिया, तब महाराजा मानसिंह दुखी होकर अपना महल छोड़कर मण्डोर उद्यान में चला गया और वहीं अपने प्राण त्याग दिये।

    उत्तर प्रदेश के नये मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, गोरखनाथ की परम्परा के योगी हैं। उनसे उत्तर प्रदेश को ही नहीं, पूरे भारत को आशा है कि वे भारत की राजनीति में कोई चमत्कार करके दिखायेंगे जिससे भारत की धर्म-प्राण जनता सुखी होगी। देश में कानून व्यवस्था सुधरेगी, दुष्टजन भयभीत होंगे। सज्जनों को अभय मिलेगा। निर्धनों की आशाएं फलीभूत होंगी, भूखों को भोजन मिलेगा, बीमारों को इलाज मिलेगा और छतहीनों को छत मिलेगी। अकर्मण्य लोग आलस्य त्यागकर परिश्रम करने को आतुर होंगे और तीर्थों की सुरक्षा एवं सफाई होगी। मूक पशु निर्भय होंगे, संत लोग भारत की जनता को सत्यनिष्ठ, सहिष्णु एवं धैर्यवान बनने की प्रेरणा देंगे। जनता के कर से प्राप्त होने वाली राशि का दुरुपयोग नहीं होगा।

    योगी आदित्यनाथ से इस चमत्कार की आशा इसलिये भी की जाती है कि वे वीतरागी हैं, विज्ञान के स्नातक हैं, विगत बाईस वर्षों से सांसद हैं, विचारवान हैं, स्पष्ट वक्ता हैं, दृढ़-प्रतिज्ञ हैं और ऐसे दल के प्रतिनिधि हैं जो तुष्टिकरण और जातिवाद की राजनति के स्थान पर सबका साथ सबका विकास की बात करता है। मेक इन इण्डिया की बात करता है, स्वच्छ भारत की बात करता है। -

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • जो करेगा रामजन्म भूमि की सेवा, वही पायेगा यशस्वी होने की मेवा।

     03.06.2020
    जो करेगा रामजन्म भूमि की सेवा, वही पायेगा यशस्वी होने की मेवा।

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    मेवाड़ के एक महाराणा अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिये सशस्त्र संघर्ष हेतु अपनी सेना लेकर अयोध्या गये थे। उस सेवा का परिणाम यह हुआ कि जब राजस्थान बना तो उसके पहले महाराज प्रमुख मेवाड़ के महाराणा बने।

    भारत की स्वतंत्रता से पहले, गीताप्रेस गोरखपुर के संस्थापकों में से एक श्री भाईजी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, श्रीराम जन्म भूमि पर मंदिर बनाने के लिये प्रयासरत थे। उन्होंने इसके लिये हुए आंदोलनों का नेतृत्व भी किया। इस सेवा का परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की इच्छा व्यक्त की किंतु श्री पोद्दार ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। वे भारत के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत रत्न को लेने से मना कर दिया। उन्होंने भारत के लगभग हर हिन्दू के घर में गीता, महाभारत, रामचरित मानस एवं कल्याण जैसे महान् ग्रंथ एवं पत्रिकाएं उपलब्ध कराने में अपना जीवन बिताया।

    श्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी राममंदिर को लेकर रथयात्रा की थी, उसका परिणाम यह हुआ कि केन्द्र में तीन बार अटल बिहारी वाजपेयी की तथा चौथी बार नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी। स्वयं लालकृष्ण आडवाणी अगले राष्ट्रपति के रूप में देखे जा रहे हैं।

    बाबूजी के नाम से विख्यात श्री कल्याणसिंह ने ई. 1992 में रामजन्म भूमि की सेवा करते हुए अपनी सरकार का बलिदान किया। वे आज भी राजस्थान के राज्यपाल हैं। 

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के रामजन्म भूमि आंदोलनों को गोरखपुर के गोरखमठ ने नये सिरे से आरम्भ किया। उसका फल यह हुआ कि गोरखमठ के महंत श्री आदित्य योगी आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

    योगी आदित्यनाथ रामजन्म भूमि आंदोलन से राजनीति में आये। आज केवल 44-45 साल की आयु में वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और उनके नाम की धमक सम्पूर्ण विश्व में गूंज रही है। जो रामजन्म भूमि की सेवा करेगा, वह मेवा पायेगा।

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  • जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

     03.06.2020
    जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च 2017 पर विशेष जनसंचार में वे सब विधाएं, संसाधन, उपकरण और तरीके आ जाते हैं जो निर्जन स्थान में सुईं गिरने की आवाज से लेकर शेर की दहाड़ तक को, देखते ही देखते विशाल जनसमूह तक पहुंचा सकें और जन-समुदाय, यह जानते हुए भी कि जो कुछ भी वह सुन, देख या पढ़ रहा है, वह उससे बहुत दूर कहीं घटित हुआ है किंतु समाज का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं को उस घटना से प्रभावित कर लेता है। समाज में मीडिया की भूमिका संवाद-वहन की होती है। वह समाज के विभिन्न वर्गों, सत्ता-केंद्रों, व्यक्तियों एवं संस्थाओं के बीच बातचीत ओर विचारों के आदान-प्रदान के लिये पुल का कार्य करता है। यही कारण है कि आज समस्त विश्व की सरकारें, राजनीतिक पार्टियां, व्यावसायिक प्रतिष्ठन, श्रमिक संगठन, साहित्यिक संस्थाएं आदि विभिन्न प्रकार के न्यास, अपनी योजनाओं, कार्यक्रमों, उपलब्धियों तथा उत्पादों को जनसंचार के किसी न किसी तरीके को अपनाकर जन-समूह अथवा अपने टारगेट ग्रुप के बीच लाते हैं। जनसंचार, एक ओर तो, इन न्यासों की विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों की चर्चा करता है तो दूसरी ओर वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, बेचैनियों, और विभ्रमों को दूसरे पक्ष तक पहुंचाने का प्रयास करता है। संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी ही उस, न्यास अथवा संस्था अथवा व्यक्ति की नैतिकता अथवा अनैतिकता को रेखांकित करती है। लोकतांत्रिक समाज में जनसंचार अर्थात् मीडिया का दायित्व इसलिये और भी बढ़ जाता है क्योंकि जनसंचार को अपना कार्य करने की पूरी छूट होती है और जनसामान्य द्वारा यह विश्वास किया जाता है कि जनसंचार ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया वाली स्टाइल में कार्य करेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मीडिया को चौथे स्तंभ का सम्मान केवल इसीलिये दिया जाता है क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह भी सरकार, विधायिका और न्यायपालिका की तरह अपनी जिम्मेदारी स्वयं अपनी प्रेरणा और विवेक के बल पर निष्पक्ष रहकर निभायेगा। कुशल नेतृत्व मिलने पर मीडिया, समाज को वांछित परिवर्तनों की दिशा में ले जाने में सहायक होता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है। साहित्य और जनसंचार का चोली-दामन का साथ है। साहित्य को यदि मनुष्य की वैचारिक सम्पदा की आत्मा मान लिया जाये तो जनसंचार अथवा मीडिया उसका शरीर है। जैसे शरीर के बिना आत्मा कोई कार्य नहीं कर सकती, उसी प्रकार जनसंचार के बिना साहित्य भी आगे नहीं बढ़ सकता। यदि इसे उलटा कर दें तो भी परिणाम यही निकलेगा अर्थात् साहित्य के बिना संचार के समस्त संसाधन, उसकी समस्त शक्ति और ऊर्जा, पूर्णतः निर्जीव और निष्प्रभावी है। साहित्य का अर्थ है सबका कल्याण। जनसंचार का ध्येय है जनकल्याण। अर्थात् जनकल्याण वह बिंदु है जहां साहित्य और जनसंचार अपने रूढ़ अर्थ खोकर एकाकार हो जाते हैं। दोनों के पास अपनी अंतर्चेतना होती है। दोनों के पास कल्पनाशीलता होती है। दोनों का एक ही प्रयोजन होता है। यदि हम रंगमंच, जनसंचार और साहित्य के सम्बन्धों पर एक साथ विचार करने का प्रयास करें तो पायेंगे कि रंगमंच और जनसंचार दोनों का पिता साहित्य है। यदि यह कहा जाये कि साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति रंगमंच है, तो इसमें कोई अश्यिोक्ति नहीं होगी। ऐसा इसलिये भी कि जब हम नाटक पर विचार करते हैं तो हम यह पाते हैं कि नाटक एक ऐसी साहित्यिक रचना है जो श्रवण एवं दृष्टि द्वारा दर्शक के हृदय को रसानुभूति कराती है। इसलिये कई बार नाटक को दृश्य-काव्य भी कहते हैं। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है। आधुनिक काल में जनसंचार के विभिन्न ससांधन हैं यदि उनके रंगमंच के साथ सम्बन्धों की व्याख्या की जाये तो यहां मामला कुछ प्रतिद्वद्विता से भरा हुआ दिखाई देता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कि पुत्र अपने पिता के राज्य पर अपने नैसर्गिक अधिकार का दावा तो करे किंतु उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन नहीं करे। जनसंचार का सामान्य अभिप्राय- समाचार पत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है। ये आधुनिक जनसंचार के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण की मजदूरी करते हैं लेकिन जिसे हम मीडिया यानी संवादवहन की युक्ति मानते आए हैं, उसकी हदें इससे कहीं अधिक व्यापक और समाज में विभिन्न रूपों में घुसी हुई हैं। पुराने जमाने के नौटंकी, स्वांग, नाटक, सभा तथा चित्रकला से लेकर आधुनकि युग के बैनर, पोस्टर, पंपलेट्स, भाषण, लोकगायन, विज्ञापन, सेमीनार, आदि जनसंचार की प्रचलित परिभाषा से किंचित भिन्न होने के बावजूद जनंसचार के ही भाई-बहिन हैं। आधुनिक स्मार्ट फोन का प्रारंभिक उद्देश्य भले ही टेलिफोन वाली भूमिका निभाना हो किंतु उन्नत तकनीक, बाजार की जरूरतों तथा गला-काट विज्ञापन-स्पर्धा ने उसे भी जनसंचार के आधुनिक और शक्तिशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। वाट्सएप तथा फेसबुक जैसे सॉफ्टवेयर्स ने ये सिद्ध कर दिया है कि स्मार्ट फोन नामक दैत्य को आने वाले कई दशकों तक परास्त नहीं किया जा सकेगा। जहां घरों में सास-बहू के रसीले-चुटीले तथा नाटकीयता से परिपूर्ण संवाद, आम घरों की आम दिनचर्या का हिस्सा हुआ करते थे, वहीं अब सास बहू के नाटक केवल टीवी के पर्दे पर सिमट गये हैं और वास्तविक जिंदगी की सास तथा बहुएं अपने-अपने कमरों में बैठकर अपने र्स्माट-फोन पर आंखें गढ़ाये हुए, वाट्सएप और फेसबुक पर व्यवस्त हैं। सभ्यता के आगे बढ़ने के साथ, जनसंचार के जिस माध्यम का सबसे पहले जन्म हुआ, मेरी दृष्टि में वह रंगमंच ही था। रंगमंच ने कई तरह के रूप धरे। यदि वह राजा, राजपरिवार और राजपण्डितों के मनोरंजन के लिये अपने सम्पूर्ण शास्त्रीय स्वरूप के साथ प्रकट हुआ तो जन सामान्य के लिये वह नौटंकी का आश्रयदाता बन गया। राज महलों के विशाल दालानों से लेकर राजा के दरबार तक पर रंगमंच हावी हो गया जहां विदूषकों ने कड़वी से कड़वी बातें राजाओं और रानियों को सुनाईं। यह रंगमंच की ही शक्ति थी कि कड़वी से कड़ी बात भी राजा ने हंसकर सुनी। रंगमंच कभी घबराया नहीं, पूरे जोश और शक्ति के साथ जनता की आवाज को राजमहलों और राजदरबारों तक पहुंचाता रहा। दूसरी ओर इस उदार हृदय रंगमंच ने गांवों की गलियों में जाकर नौटंकियों और नुक्कड़ नाटकों का रूप धर लिया ताकि कठोर परिश्रम और संघर्षपूर्ण नीरस जीवन के थपेड़ों से थके हुए किसानों, श्रमिकों और आम आदमी को मदभरी फुहारों से तृप्त किया जा सके। इस कारण नाटक राजा और राजपण्डित से लेकर आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बन गया। रंगमंच की शक्ति का अनुभव करते हुए, बड़े-बड़े पण्डितों ने एक से बढ़कर एक नाटक लिखे जो आज इस देश की बौद्धिक सम्पदा में सम्मिलित हैं। मैं संस्कृत भाषा के अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम् और मृच्छकटिका आदि उन शास्त्रीय नाटकों की सूची में नहीं जाउंगा अपितु केवल संकेत भर करूंगा जो केवल रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गये थे। इन नाटकों ने रंगमंच को उसकी ऊंचाइयां प्रदान कीं। जब कागज सरलता से उपलब्ध होने लगा, छापाखाना विस्तार पा गया और पत्र-पत्रिकाओं का प्रसार हुआ तो रंगमंच ने अपने नाटक पुस्तकों, पत्रिकाओं और समाचार पत्रों को दे दिये। अब नाटक छपने लगे। लोग उन्हें बड़े चाव से पढ़ते थे। उदाहरण के लिये जयशंकर प्रसाद और रामकुमार वर्मा के नाटक मूल रूप में पढ़े जाने के लिये ही लिखे गये। फिर भी रंगमंच ने उद्दात्त भाव दिखाते हुए उन नाटकों को थोड़ा परिमार्जित करके मंचित किया। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब आम आदमी की पहुंच रेडियो तक होने लगी तो नाटक, देखे या पढ़े जाने की बजाय, सुनने के लिये लिखा जाने लगा। रंगमंच अब केवल इफैक्ट्स के रूप में रह गया था जहां, पात्रों के संवादों के साथ-साथ ट्रेन की सीटी, चिडि़यों की चहचहाट या बाजार का शोर सुनाई देता था। यह रंगमंच के लिये अशुभ संकेत था। यही वह बिंदु था जहां से नाटक तो आगे बढ़ा किंतु रंगमंच का विकास रुक गया। अब दर्शकों की भीड़ रंगमंच की ओर उमड़ने की बजाय रेडियो से चिपक गई। विविध भारती ने हवामहल के रूप में छोटी-छोटी नाटिकाएं लाखों लोगों तक पहुंचाई। हममें से बहुत से लोगों ने हवामहल के लिये नाटिकांए बनाई हैं जिन्हें रेडियो ने झलकी का नाम दिया। फुल लेंथ रेडियो ड्रामा और स्पॉन्सर्ड सीरियल भी बनाये गये। जब बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से थोड़ा पहले, सिनेमा का प्रचलन हुआ तो रंगमंच के लिये सचमुच के खतरे की घण्टी बज गई। यहां नाटक भी था, पात्र भी थे, अभिनय भी था, कथा भी थी, संगीत भी था अर्थात् नाटक अपने समस्त अवयवों के साथ पूरे वैभव को लेकर उपस्थित था, यदि कुछ नहीं था तो केवल रंगमंच। फिर भी बुद्धिजीवी वर्ग के लिये रंगमंच काम करता रहा। भले ही दर्शकों की भीड़ नहीं थी किंतु रंगमंच बना रहा। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में जब टेलिविजन घर-घर आ गया तब तो रंगमंच केवल प्रतिबद्ध लोगों के लिये रह गया जहां, नाटक को देखने के लिये साहित्य प्रेमियों एवं बुद्धिजीवियों को आग्रह-पूर्वक रंगमंच के सामने लाया जाने लगा। आम आदमी, जिसमें किसान, श्रमिक या छोटा करोबारी एवं विविध प्रकार के कर्मचारी आदि गिने जा सकते हैं, लगभग पूरी तरह से रंगमंच से विमुख हो गया। आज के हालात ये हैं कि यदि यह यह कहा जाये कि जनसंचार ने नाटक से रंगमंच छीनकर, उसे सिनेमा का बड़ा पर्दा या टीवी का छोटा पर्दा या एफएम रेडियो का भौंपू पकड़ा दिया, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज टीवी पर जो कुछ भी चलता है, उसमें अधिकांशतः नाटक ही भरा हुआ है। यहां तक कि सिने तारिकाओं को मात करने वाली समाचार वाचिकाएं भी समाचार को नाटक के लहजे में प्रस्तुत करती हैं। विज्ञापनों को तैयार करने एवं प्रभावी बनाने में भी नाटक या नौटंकी का ही सहारा लिया जाता है, किंतु रंगमंच अनुपस्थित है। नाटक सब जगह मौजूद है, घर से लेकर संसद तक, किंतु रंगमंच गायब है। आज सिनेमा और टीवी के नाटक के लिये फ्लोर मैनेजर है, फ्लोर डायरेक्टर है, लाइटमैन है किंतु यह सब कैमेरे के लिये है। नट द्वारा प्रस्तुत नाटक को अब जनसंचार ने हड़प लिया है और रंगमंच को वीरान बना दिया है। हो सकता है कि आप लोग मेरे इस वक्व्य से सहमत नहीं हों किंतु कम से कम मुझे तो यही लगता है। जब वर्ष 2015 में मेरी पोस्टिंग झालावाड़ में हुई तो मेरे मन में उत्साह था कि इसी बहाने सही, उस ऐतिहासिक भवानी नाट्यशाला को मैं अपनी आंखों से देख सकूंगा जिसे देखने की साध वर्षों से मन में दबी हुई है। यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध रंगमंच है, उत्तर भारत में इसके जैसा भव्य रंगमंच न तो पहले बना न बाद में। एक शाम मैं वहां गया, वहां का हाल देखकर सन्न रह गया। इस भवन को लम्बे समय से बंद कर दिया गया था। मैंने किसी तरह ताला खुलवाया, भवानी नाट्शाला के भीतर कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहटें, बीटों की बदबू, तेज सन्नाटा और घनघोर अंधेरा मिलकर ऐसा शोककारी वातावरण बनाये हुए थे मानो इस रंगमंच पर नाटक खेलने वाले कलाकारों की आत्माएं सिसकियां भर रही हों। इस रंगमंच पर बड़े-बड़े नाटक खेले गये। एक-एक नाटक कई-कई महीनों तक चलता था। आज वह सब वैभव बिखर गया है। रंगमंच का लगभग यही हाल पूरे देश का है। रंगमंच से जुड़े हुए कुछ लोग जिद्दी बंजारों की तरह रंगमंच की यात्रा को जारी रखे हुए हैं। कुछ पढ़े लिखे लोग आ जाते हैं नाटक देखने किंतु वास्तविकता क्या है....... किससे छिपी है! -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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