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  • अजमेर का इतिहास - 3

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 3

    प्रागैतिहासिक काल से गुप्तकाल तक


    प्रागैतिहासिक काल

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर के निकट खेड़ा तथा कडेरी से मानव सभ्यता के ऊषा काल के मानव अवशेष प्राप्त हुए हैं। सिन्धु घाटी सम्भ्यता में बाट के रूप में सीसे तथा सफेद-काले अभ्रक के टुकड़े प्रयुक्त होते थे। वे टुकड़े इन्हीं पहाड़ों से ले जाये जाते थे। सिंधु सभ्यता में प्राप्त छोटे-छोटे आकार की तश्तरियां, साहुल-गोलक तथा स्वर्ण रजत निर्मित वस्तुएं जो सभ्यता के आरंभिक काल में पाई गई थीं, संभव है कि वे भी अजमेर से ले जाई गई हों। मेगालिथिक एवं नॉन मेगालिथिक पॉलिशयुक्त लाल एवं काले उपकरण भी इस क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। चित्रयुक्त सलेटी उपकरणों की भी उपस्थिति इस जिले में पाई गई है। भूरे रंग के चित्रित खण्डित बर्तन, गैर प्रस्तरित काले व लाल रंग के बर्तन तथा उत्तरी क्षेत्र की काली मिट्टी से निर्मित बर्तन भी अजमेर के निकट चोसला गांव से प्राप्त किये गये हैं।

    पौराणिक काल

    देवी पुराण में पुष्कर को नौ पवित्र अरण्यों में से एक बताया गया है। पद्म पुराण कहता है कि जब ब्रह्मा यज्ञ करने के लिये पृथ्वी पर एक उचित स्थान खोज रहे थे, तब उनके हाथ से एक कमल पुष्प गिर गया और धरती पर तीन स्थानों पर टकराया। ये तीनों स्थान ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर एवं कनिष्ठ पुष्कर के नाम से जाने जाते हैं। वाल्मिकी रामायण के अनुसार ऋषि विश्वामित्र ने पुष्कर में तपस्या की। एक दिन स्वर्ग लोक की अप्सरा मेनका, पुष्कर के पवित्र जल में स्नान करने के लिये आई। जब विश्वामित्र की दृष्टि मेनका पर पड़ी तो वे उसके रूपजाल में बंध गये। यह एक बहुश्रुत आख्यान है। महाभारत में आये एक उल्लेख के अनुसार महर्षि वेदव्यास महाराजा युधिष्ठिर को निर्देशित करते हैं कि सिन्ध के जंगलों को पार करने तथा मार्ग में स्थित कई छोटी नदियों को पार करने के बाद आपको पुष्कर सरोवर में स्नान करना चाहिये।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर के तारागढ़ दुर्ग की स्थापना बाली ने अपनी पत्नी तारा के नाम पर की थी किंतु इस कथन का कोई एतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। फिर भी यह कथन, इस बात की ओर अवश्य संकेत करता है कि तारागढ़ की स्थापना काफी पुरानी है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व

    पुष्कर से पंचमार्क के सिक्के मिले हैं जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में पुष्कर की समृद्धि की कहानी कहते हैं। अजमेर से 58 किलोमीटर दूर बार्ली गांव के भीलोत माता मंदिर से अशोक (132 ई.पू. से 72 ई.पू.) से भी पहले की ब्राह्मी लिपि का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख राजपूताना संग्रहालय अजमेर में सुरक्षित है। यह शिलालेख वीर संवत् 84 (वि.सं. 386 अर्थात् ई.पू. 443) का है। इसकी तुलना सुहागपुरा तथा पिपरावा के शिलालेखों से की जा सकती है। ये शिलालेख खण्डित हैं। इनकी प्रथम पंक्ति जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी को इंगित करती है। दूसरी पंक्ति में वीर संवत 84 अंकित है, तीसरी पंक्ति में सालि मालिन का नाम दिया गया है।

    यह संभवतः दानदाता महिला थी। चौथी पंक्ति में माझमिका अथवा माध्यमिका शिलालेख की स्थापना करने के कारण के बारे में सूचना है। अनुमान है कि उस समय बार्ली, जैन संस्कृति का केन्द्र था। इस क्षेत्र में मिले सिक्कों से भी बार्ली की ब्राह्मीलिपि की तिथियों की पुष्टि होती है। इनसे यह भी अनुमान होता है कि उन दिनों बार्ली एक समृद्ध नगर रहा होगा। बार्ली का शिलालेख एक जैन राजा के बारे में सूचना देता है। स्थानीय आख्यानों के अनुसार यह राजा पद्मसेन था जिसने तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में पद्मावती नामक नगरी बसाई जिसे इंदरकोट भी कहते हैं। आज जहाँ सूरजकुण्ड, बनोली तथा किशनपुरा गांव स्थित हैं, कभी वहाँ पद्मावती नगरी स्थित थी। इस नगर को जल की आपूर्ति पाराची, नन्दा तथा सरस्वती नदियों से की जाती थी। उन दिनों इस क्षेत्र को कोंकण तीर्थ कहा जाता था। अब यह अजमेर नगर का ही अंग है। नदी के प्रबल वेग में बह जाने से पूर्व पद्मावती नगर, वर्षों तक फलता फूलता रहा।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व

    मध्य प्रदेश के सांची स्तूप के चार शिलालेखों से, दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में पुष्कर की महत्ता के बारे में ज्ञात होता है। इन शिलालेखों से ज्ञात होता है कि पुष्कर निवासी भिक्षु अर्हदीन, नगरक्षित, हिमगिरी तथा ईसिदत्ता (ईसिदत्ता भिक्षुणी थी) ने सांची में उदारता पूर्वक दान दिया। (इनके नाम इस प्रकार भी पढ़े जाते हैं- आय (आर्य), बुधरक्षित, संघरक्षिता, पुष्कर के लेवा पत्नी इषिदत्ता (ऋषिदत्ता)। इन शिलालेखों से यह भी ज्ञात होता है कि ईसा से दो सौ साल पहले, पुष्कर पवित्र तीर्थ स्थल तथा सुप्रसिद्ध नगर था।

    प्रथम शताब्दी ईस्वी

    गुलाम कादिर ने अपनी हस्तलिखित पुस्तक में एक संस्कृत लेख की चर्चा की है जिसमें लिखा है कि 'वि.सं. 106 (ई.49) में आषाढ़ शुक्ल पक्ष के 12वें दिन विक्रम व्यास की पुत्री, गोविन्द ब्राह्मण की पत्नी ने अपने पति के साथ आत्मदाह कर लिया।' यह पुस्तक ई.1830 में लिखी गई थी। अब यह मूल लेख कहीं भी देखने में नहीं आता है। कुषाण काल का एक खण्डित स्तम्भ नन्द में मिला था जो पुष्कर से कुछ मील की दूरी पर है। इस पर उत्कीर्ण संकेतों से स्पष्ट है कि ईसा की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में पुष्कर और इसके निकटवर्ती क्षेत्र कला और संस्कृति के उन्नत केन्द्र थे। उसी अवधि में उत्तमभद्रों का होना सिद्ध होता है जिन्होंने सीथियनों के समक्ष समर्पण कर दिया था।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी

    कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान में अजमेर का स्थापना काल 145 ईस्वी बताया है। हण्टर ने इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया तथा वाटसन ने गजेटियर ऑफ अजमेर में इसी तिथि को स्वीकार किया है किंतु इस तथ्य के समर्थन में अब तक कोई पक्का प्रमाण नहीं मिला है। अजमेर की स्थापना चौहानों ने की थी तथा चौहान इस समय तक अस्तित्व में नहीं आये थे। फिर भी यह निश्चित है कि इस समय अजमेर-पुष्कर क्षेत्र में उत्तमभद्र निवास करते थे। उनके पड़ौस में प्रथम शताब्दी ईस्वी के अंत तक मालवों ने वर्तमान जयपुर तथा टोंक के आसपास अपना स्वतंत्र गणराज्य स्थापित कर लिया था। इन मालवों का झगड़ा अजमेर-पुष्कर क्षेत्र के उत्तमभद्रों से हुआ। उत्तमभद्र शकों के मित्र थे। ऋषभदत्त (ऊषवदत्त) के लेख के अनुसार अजमेर का क्षेत्र शकों की क्षहरात शाखा के नहपान के अधीन था। (ऋषभदत्त नहपाण का दामाद था।)

    नासिक की एक गुफा के शिलालेख से ज्ञात होता है कि शकों का मुखिया ऋषभदत्त (ई.119-ई.123), भट्टारक (यह भट्टारक या तो नहपाण होना चाहिये या फिर नहपाण का भी स्वामी अर्थात् कोई कुषाण शासक होना चाहिये।) के आदेश से उत्तमभद्र जनजाति के मुखिया को मुक्त कराने के लिये गया था, जिसे मालवों द्वारा बंदी बना लिया गया। इस युद्ध में मालवों की करारी पराजय हुई जिसके पश्चात् शक वंश के राजा दीनिक के पुत्र उषवदत्त ने पुष्कर सरोवर में स्नान करने के बाद एक गांव तथा गायों का दान किया। पुष्कर से बैक्ट्रियन, यूनानी तथा शक क्षत्रपों के सिक्के बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। इससे अनुमान होता है कि उस काल में पुष्कर समृद्ध नगर था। कर्नल टॉड ने पालनपुर के अंग्रेज अधिकारी मेजर माइल्स को ई.1818 में एक बैक्ट्रियन तगमे की प्रतिलिपि प्रदान की थी, टॉड ने लिखा है कि मुझे यह बैक्ट्रियन मुद्रा अवन्ती के खण्डहरों में अथवा अजमेर की पवित्र झील के किनारे मिली थी। जब बौद्ध धर्म अपने यौवन पर था, तब बौद्धों ने बनारस, गया और मथुरा की भांति पुष्कर में भी अपनी गतिविधियों को केन्द्रित किया किंतु इस धर्म के हा्रस के साथ ही पुष्कर से उनकी विदाई हो गई।

    गुप्त काल

    पुष्कर से गुप्त शासकों के सोने-चांदी के सिक्के तथा ताम्बे के गधैया सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं। इनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि गुप्त काल में भी पुष्कर की समृद्धि और महत्ता बनी रही। चौहान शासकों के काल में भी अजमेर में गुप्तकालीन सोने और चांदी के सिक्के प्रचलन में थे।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि सभ्यता के उषा काल से ही इस क्षेत्र में मनुष्य की हलचल आरंभ हो गई थी। ईसा से चार सौ साल पहले से लेकर गुप्तकाल तक बार्ली तथा पुष्कर इस क्षेत्र के प्रमुख नगर थे। गुप्तकाल अथवा उससे भी पूर्व किसी समय में तारागढ़ दुर्ग की भी स्थापना हो चुकी थी। संभव है कि गुप्तकाल में अथवा उससे भी पहले अजमेर नगर भी किसी न किसी रूप में अस्तित्व में आ चुका हो किंतु इस सम्बन्ध में अधिक साक्ष्य नहीं मिलते।

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  • कैबीनेट मिशन ने भारत को विभाजन की ओर धकेल दिया

     03.06.2020
    कैबीनेट मिशन ने भारत को विभाजन की ओर धकेल दिया

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    वायसराय के राजनीतिक सलाहकार सर कोनार्ड कोरफील्ड भारतीय राजाओं के पक्ष में थे। उन्हें भारतीय नेता फूटी आँख नहीं सुहाते थे। उन्हें भय था कि स्वतंत्र भारत में कांग्रेस, राजाओं तथा उनके राज्यों को निगल जायेगी। इसलिये राजाओं की मदद की जानी आवश्यक है। उन्होंने 8 जून 1946 को बम्बई में आयोजित नरेन्द्र मण्डल की संवैधानिक सलाहकार समिति में, 9 जून को आयोजित रियासती मंत्रियों की समिति में तथा 10 जून को आयोजित नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति की बैठक में राजाओं को आश्वस्त किया कि परमोच्चता की समाप्ति के बाद के अंतरिम काल में राजनीतिक विभाग, राज्यों के हितों की सुरक्षा करने, संविधान सभा में विचार-विमर्श करने, समूहीकरण एवं सहबद्धता की व्यवहारिक योजनाएं बनाने, प्रत्येक राज्य की व्यक्तिगत संधियों के पुनरीक्षण करने, उनके आर्थिक हितों को सुरक्षित बनाने तथा अल्पसंख्यकों के प्रशासन हेतु की जानी वाली व्यवस्थाओं में राज्यों की सहायता करेगा। यदि शासक राज्यों की जनता से व्यक्तिगत संपर्क रखेंगे तो उन्हें आंतरिक समर्थन प्राप्त होगा।

    कोरफील्ड ने राजाओं को सलाह दी कि वे एक संविधान वार्ता समिति का निर्माण करें जो स्वतंत्र भारत की संविधान सभा में किये जाने वाले विचार-विमर्श के लिये शर्तें तय करे। उनके द्वारा सुझाये गये बिंदुओं ने नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति द्वारा 10 जून 1946 को पारित किये गये प्रस्ताव के लिये प्रचुर सामग्री प्रदान की। इस प्रस्ताव में कहा गया कि कैबीनेट मिशन योजना ने भारत की स्वतंत्रता के लिये आवश्यक तंत्र प्रदान किया है तथा भविष्य में होने वाले विचार-विमर्श के लिये भी समुचित आधार प्रदान किया है।

    इस प्रस्ताव में कैबीनेट मिशन द्वारा परमोच्चता के सम्बन्ध में की गयी घोषणा का भी स्वागत किया गया तथा अंतरिम काल में की जाने वाली व्यवस्थाओं के लिये आवश्यक समायोजनों की आवश्यकता भी जताई। प्रस्ताव में कहा गया कि कैबीनेट योजना में उल्लेख किये गये आधारभूत महत्व के अनेक मामलों की व्याख्या की जानी आवश्यक है जिन्हें कि भविष्य के विचार-विमर्श के लिये छोड़ दिया गया है। नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति ने कोरफील्ड की सलाह पर एक समझौता समिति का निर्माण किया तथा नरेन्द्र मण्डल के चांसलर अर्थात् भोपाल नवाब को अधिकृत किया कि वह कैबिनेट योजना में सुझाये गये प्रावधान के अनुसार संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय समिति से विचार विमर्श करे।

    इस पर अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद ने नरेन्द्र मण्डल के चांसलर के अधिकारों को चुनौती दी। परिषद पूर्व में ही 21-23 अक्टूबर 1945 को जयपुर में आयोजित बैठक में मांग कर चुकी थी कि संभावित भारतीय संविधान निर्मात्री समिति में राज्यों के प्रतिनिधियों को जनता द्वारा चुनकर भेजा जाना चाहिये। नरेन्द्र मंडल को देशी राज्यों का अधिवक्ता कैसे माना जा सकता है जबकि देश की सात बड़ी रियासतें- हैदराबाद, कश्मीर, बड़ौदा, मैसूर, ट्रावनकोर, कोचीन और इन्दौर नरेन्द्र मण्डल की सदस्य कभी नहीं रहीं। कैबीनेट योजना के अंतर्गत इन सात राज्यों को जनसंख्या के आधार पर संविधान सभा में 40 प्रतिशत से भी अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार था। वार्ता समिति में जनता के प्रतिनिधियों को सम्मिलित नहीं किया गया था। अतः समिति को किसी प्रकार का निर्णय लेने का वैध अधिकार नहीं है।

    भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता व अखंडता के लिये अत्यधिक घातक व खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी। इस घोषणा ने देशी शासकों को अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है। देश को ए, बी एवं सी क्षेत्रों में बांटकर मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गयी सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है। कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिये उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिये निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा। इस प्रकार कांग्रेस ने कई आपत्तियां उठाईं और कई बातों पर स्पष्टीकरण चाहा। उसकी मांग यह भी थी कि प्रतिनिधि चाहे प्रांतों के हों अथवा रियासतों के, विधान सभा के लिये एक जैसी चुनाव प्रक्रिया होनी चाहिये।

    कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि दुःख दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे। स्वयं कैबीनेट मिशन ने इस योजना के बारे में घोषणा की थी कि यह भारतीयों को शीघ्रातिशीघ्र आजादी देने का एक मार्ग है जिसमें आंतरिक उपद्रव एवं झगड़े की संभावनायें न्यूनतम हैं। 6-7 जुलाई 1946 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में नेहरू ने कैबीनेट योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा जो 51 के मुकाबले 205 मतों से स्वीकृत हो गया। नेहरू को विश्वास था कि प्रांतों का कोई समूह बनेगा ही नहीं। क्योंकि संविभाग ए के सभी और बी तथा सी के कुछ राज्य समूहीकरण के विरुद्ध रहेंगे।

    17 जुलाई 1946 को आयोजित नरेन्द्र मण्डल के सम्मेलन में ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें घोषणा की गयी कि नरेन्द्र मण्डल देश की इस इच्छा से पूर्ण सहमति रखता है कि भारत को तत्काल राजनीतिक महिमा प्राप्त हो। राजाओं की इच्छा संवैधानिक समास्यों के निस्तारण के कार्य में प्रत्येक संभावित योगदान देने की है। ब्रिटिश सरकार पहले ही यह कह चुकी थी कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्रता चाहता है तो उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं आयेगी। अब राजाओं ने भी घोषणा कर दी कि वे भी बाधा नहीं बनना चाहते तथा किसी भी आवश्यक परिवर्तन के लिये दी गयी उनकी सहमति अनावश्यक रूप से वापस नहीं ली जायेगी।

    बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने कैबीनेट मिशन की घोषणा को भारत की स्वतंत्रता के लिये सबसे महान कदम बताते हुए कहा कि राजाओं को स्वतंत्र भारत में अपने पद की चिंता नहीं करनी चाहिये। उन्हें परिवर्तन का महत्व अनुभव करना चाहिये और उसी के अनुसार अपने को ढालना चाहिये।

    27 जुलाई 1946 को बीकानेर नरेश ने एक बार फिर कहा कि 16 मई की योजना, जिसमें रियासतों और प्रांतों दोनों को मिलाकर संघ बनाने का प्रस्ताव है, की स्वीकृति भारत की स्वतंत्रता के लिये उठाया गया सबसे महान कदम है। मैंने यह सदा अनुभव किया है कि यदि राजा और रियासतें इस समय भारत में होने वाले परिवर्तनों की महत्ता को पूरी तरह ध्यान में रखें और अपने मन और नीति को उसके अनुसार बनायें तो स्वतंत्र भारत में अपने उपयुक्त स्थान के बारे में उन्हें कोई डर नहीं होना चाहिये। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिये कि जो कुछ हो रहा है, वह बहुत गम्भीर है।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 29

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 29

    आशा और निराशा में झूलने लगा देश


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    गांधी, नेहरू एवं पटेल आदि अधिकतर कांग्रेसी हिन्दू नेता भारत के विभाजन के विरुद्ध थे। नेहरू विभाजन को लेकर संभवतः अब भी असमंजस में थे। उन्हें लगता था कि कांग्रेस के राष्ट्रवादी मुसलमानों की सहायता से भारत विभाजन को रोका जा सकता है। वे इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि अधिकतर कांग्रेसी मुस्लिम नेता नेहरू-पटेल और गांधी की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे। एक बार वल्लभभाई पटेल ने हंसी-हंसी में परंतु अति दुःख के साथ कहा था कि- 'कांग्रेस में केवल एक राष्ट्रीय मुसलमान रह गया है और वह जवाहरलाल नेहरू है।' राजाजी राजगोपालाचारी जैसे कुछ लोग बेकार के पचड़े में पड़कर भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा समझते थे कि भारत का युक्ति-युक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये। उस समय भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक घनश्यामदास बिड़ला जो कि पिछले बहुत समय से कांग्रेस के बड़े नेताओं को आजादी की लड़ाई के लिए धन एवं संसाधन उपलब्ध कराते रहे थे, भी राजाजी के विचारों से सहमत थे।


    घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरू से विभाजन स्वीकार करने का अनुरोध किया

    घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरूजी के नाम एक पत्र लिखकर उन्हें विभाजन की मांग को स्वीकार कर लेने का सुझाव दिया- 'साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्ति-युक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का ही विरोध कैसे किया जा सकता है......। अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है। मुझे तो पूरा विश्वास है कि अगर आप पाकिस्तान देने को तैयार हो जायें तो मुसलमान उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उनका स्वीकार करना या न करना बाद की बात है फिलहाल हमारा पाकिस्तान की मांग का विरोध करना मुसलमानों के मन में पाकिस्तान की प्यास ही बढ़ायेगा।'


    बँटवारा ही एकमात्र रास्ता

    वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना ने 1947 की गर्मियों में पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। अस्पतालों और दंगे से तबाह गांवों में उसने साम्प्रदायिक क्रूरता के दृश्य देखे- हाथ-कटे बच्चे, पेट-कटे हुए गर्भवती औरतें, सारे परिवार में अकेला बचा रहने वाला बच्चा! ..... उसका दृढ़ विश्वास हो गया कि उसके पति और साथी ठीक कहते है, बंटवारा ही एकमात्र रास्ता है।


    माउण्टबेटन ने जवाहर लाल को भारत-विभाजन के लिए तैयार किया

    एडविना के तर्क से सहमत होकर माउंटबेटन ने गांधी, नेहरू और पटेल को भारत के विभाजन के लिये तैयार किया। गांधीजी ने विभाजन को मानने से इंकार कर दिया किंतु नेहरू और पटेल मान गये। जब मौलाना ने नेहरू को विभाजन का समर्थन करते देखा तो वह दंग रह गए। उन्होंने लिखा है- 'विभाजन के सबसे बड़े विरोधी जवाहरलाल नेहरू माउण्टबेटन के भारत आगमन के एक माह में ही भारत विभाजन की आवश्यकता से सहमत हो गए।'

    नेहरू के विचारों में परिवर्तन के लिए माउण्टबेटन को जिम्मेदार बताते हुए मौलाना आजाद ने एडविना की भूमिका की ओर भी संकेत किया है- 'जवाहरलाल नेहरू माउंटबेटन से प्रभावित थे किंतु नेहरू माउंटबेटन से भी अधिक एडविना से प्रभावित थे। वह न केवल अत्यंत बुद्धिमती थी अपितु अत्यधिक आकर्षक एवं मैत्रीपूर्ण स्वभाव की महिला थी। वह अपने पति की गहरी प्रशंसक थी तथा बहुत से मामलों में उसने अपने पति को अपने विचार बदलने पर विवश भी किया था।' मौलाना ने नेहरू के विचारों में परिवर्तन के लिए नेहरू के मित्र कृष्णा मेनन को भी संभावित उत्तरदायी माना है। वे लिखते हैं- 'नेहरू प्रायः कृष्णा मेनन की सलाह सुनते थे। मुझे यह देखकर बहुत प्रसन्नता नहीं हुई कि मेनन ने इस मामले में नेहरू को गलत सलाह दी थी।'


    पटेल भारत-विभाजन के लिए पहले से ही तैयार थे

    यह कहना गलत होगा कि सरदार पटेल को माउण्टबेटन ने भारत-विभाजन के लिए समझाया या तैयार किया। सरदार तो पहले से ही विभाजन के पक्ष में थे किंतु वे न केवल प्रमुख कांग्रेसी नेता थे अपितु उस काल की राजनीति में गांधीजी के सबसे बड़े सहायक थे, इसलिए प्रकट रूप से वे गांधीजी की नीति का समर्थन करते थे कि देश का विभाजन नहीं होना चाहिए किंतु वे जानते थे कि तत्कालीन परिस्थितियों में यह संभव नहीं था। अबुल कलाम ने लिखा है- 'मैं आश्चर्यचकित एवं दुःखी हुआ जब पेटल ने यह कहा कि हम पसंद करें या नहीं किंतु भारत में दो राष्ट्र हैं। पटेल इस बात से सहमत थे कि मुसलमानों और हिन्दुओं को अब एक देश में एकीकृत नहीं किया जा सकता।' मौलाना एवं गांधी के विचारों में बहुत समानता थी किंतु पटेल और मौलाना के विचारों में इतना अधिक अंतर था कि मौलाना और पटेल कभी एक दूसरे की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं करते थे। इस बात का क्या अर्थ था? लेखक की राय में इस बात का सीधा सा अर्थ यही निकलता था कि पटेल और गांधीजी के विचारों में भी बहुत विरोध था किंतु पटेल गांधीजी का विरोध नहीं करते थे। मौलाना और गांधीजी विभाजन नहीं चाहते थे किंतु पटेल चाहते थे, और वे इसे भारत की राजनीतिक एवं साम्प्रदायिक समस्याओं के अंत के लिए एकमात्र उपाय के रूप में देख रहे थे।


    माउण्टबेटन की दृष्टि में जिन्ना उन्मादी था!

    जहाँ गांधीजी, खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना आजाद सहित बहुत से कांग्रेसी नेता अब भी यह समझ रहे थे कि किसी न किसी तरह से विभाजन टल जाएगा किंतु माउण्टबेटन जानते थे कि सच्चाई क्या है! माउण्टबेटन ने लिखा है- 'देश का विभाजन करने पर जिन्ना इस कदर आमादा थे कि मेरे किसी शब्द ने उनके कानों में प्रवेश किया ही नहीं, हालांकि मैंने ऐसी हर चाल चली जो मैं चल सकता था, ऐसी हर अपील मैंने की जो मेरी कल्पना में आ सकती थी। पाकिस्तान को जन्म देने का सपना उन्हें घुन की तरह लग चुका था। कोई तर्क काम न आया। ....... दो कारणों से जिन्ना की ताकत बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। उन्होंने स्वयं को मुस्लिम लीग का बादशाह बनाने में सफलता पा ली थी। लीग के अन्य सदस्य समझौते के लिए शायद तैयार हो भी जाते, लेकिन जब तक जिन्ना जिन्दा थे, उन सदस्यों की जुबान नहीं खुल सकती थी।'

    जिन्ना की जिद में जो उन्माद छिपा हुआ था, उसे माउण्टबेटन ने पहचान लिया था, बहस किए जाइए, किए जाइए, किए जाइए। जिन्ना कुछ सुनने वाला नहीं। जब सुनने वाला ही नहीं, फिर बहस के पीछे समय जाया करके, गृह-युद्ध के खतरे को और-और बढ़ाते जाने का अर्थ?


    पटेल ने प्रांतीय विभाजन का प्रस्ताव पारित करवाया

    पटेल ने पंजाब एवं बंगाल के विभाजन का एक प्रस्ताव पारित किया तथा कांग्रेसियों को समझाया कि चूंकि पाकिस्तान का निर्माण इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक जनसंख्या के आधार पर होना है इसलिए पंजाब एवं बंगाल के हिन्दुओं को भारत में रहने का अधिकार है, जिन्ना उन्हें पाकिस्तान में शामिल नहीं कर सकते इसलिए भारत विभाजन से पहले पंजाब एवं बंगाल का विभाजन किया जाए। पटेल ने कांग्रेसियों को समझाया कि जिन्ना किसी भी हालत में ऐसे पाकिस्तान को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पूरा पंजाब एवं पूरा बंगाल नहीं हो, इस प्रकार भारत के विभाजन को टाला जा सकता है। पटेल की बात कांग्रेसियों को उचित लगी। कुछ लोगों का मानना था कि पटेल ने भारत के विभाजन को रोकने के लिए प्रांतीय विभाजन का प्रस्ताव तैयार किया था।

    मोसले ने लिखा है- 'अपने सभी साथियों की अपेक्षा पटेल ही ठीक-ठीक जानते थे कि वे क्या कह रहे हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष भारत विभाजन के प्रस्ताव को पटेल ने प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में पंजाब को दो टुकड़ों में बांटने की सिफारिश थी। एक टुकड़ा हिन्दुओं का, दूसरा मुसलमानों का। सिक्खों को यह आजादी थी कि वे कहाँ रहेंगे इसका निर्णय वे स्वयं कर सकें। निर्णय का संकेत स्पष्ट था। यदि कांग्रेस एक प्रदेश का बंटवारा मान सकती है तो देश के बंटवारे का कैसे विरोध कर सकती है! कांग्रेस के संगठनकर्त्ता और संचालक की हैसियत से वह महसूस करता था कि आजाद हिन्दुस्तान में विरोधी दल के रूप में मुस्लिम लीग का मतलब है मुसीबत, कांग्रेस की योजनाओं का अंत, कानूनों पर रोकथाम। ...... पटेल ने वर्किंग कमेटी के एक सदस्य को लिखा- 'यदि लीग पाकिस्तान के लिए अड़ जाती है तो फिर उसका एकमात्र तरीका है बंगाल और पंजाब का बंटवारा। ...... मैं नहीं समझता कि ब्रिटिश सरकार इस बंटवारे के लिए सहमत हो जाएगी। आखिरकार शक्तिशाली दल के हाथों सरकार सौंप देने की अक्ल आएगी। और यदि नहीं आई तो भी कोई बात नहीं। केन्द्र की मजबूत सरकार होगी, पूर्वी बंगाल, पंजाब का कुछ हिस्सा, सिंध और बलूचिस्तान इस केन्द्र के अधीन स्वतंत्र होंगे। केन्द्र इतना शक्तिशाली होगा कि अंततः वह भी इसमें आ जाएंगे।'

    नेहरू को यह योजना पसंद आई। वह इस बंटवारे के माध्यम से जिन्ना को संदेश देना चाहता था कि यदि वह बंटवारा मांगेगा तो उसका हश्र यह भी हो सकता है। जब मौलाना आजाद और गांधीजी दिल्ली से बाहर थे तब यह प्रस्ताव कांग्रेस वर्किंग कमेटी में पारित करा लिया गया।

    पटेल भले ही कांग्रेसियों को यह समझा रहे थे कि वे पाकिस्तान की मांग को दबाने के लिए यह चाल चल रहे हैं किंतु वस्तुतः वे इस प्रस्ताव के माध्यम से अंत्यत चतुराई से भारत-विभाजन की ओर बढ़ रहे थे क्योंकि जब तक कांग्रेस पंजाब एवं बंगाल के विभाजन का निर्णय नहीं लेती है, तब तक भारत के विभाजन का निर्णय संभव ही नहीं था और पटेल ने गांधी तथा आजाद की अनुपस्थिति में कांग्रेस से यह निर्णय करवा लिया।


    जिन्ना भारत का विभाजन चाहता था न कि पंजाब और बंगाल का

    मुहम्मद अली जिन्ना को जिस पाकिस्तान की चाहत थी उसके अंतर्गत पांच नदियों से सिंचित विशाल पंजाब में लहलहाते गेहूं और गन्ने के खेत और गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के जलों से सिंचित बंगाल में लहलहाते चावल, गन्ने और पटसन के खेत शामिल थे। उसमें पंजाब के लाहौर, अमृतसर, रावपिण्डी और कराची तथा बंगाल के कलकत्ता और ढाका जैसे विशाल व्यावसायिक एवं औद्योगिक नगर शामिल थे। पंजाब और बंगाल के बल पर वह खैबर-पख्तून, बलोचिस्तान तथा सिंध के निर्धन क्षेत्रों के लोगों का पेट भरना चाहता था। सरदार पटेल ने जिन्ना की इस कमजोरी को पकड़ लिया था और वे भारत का विभाजन रोकने के लिए पंजाब और बंगाल का विभाजन करने की बात करने लगते थे। उनका तर्क था कि पंजाब और बंगाल के मुसलमानों के साथ इन राज्यों के हिन्दू पाकिस्तान को नहीं सौंपे जा सकते।

    जब माउण्टबेटन ने जिन्ना से भेंट की तो वायसराय ने उसे बताया कि वे भारत का विभाजन नहीं कर सकते। इस पर जिन्ना ने कहा कि विभाजन तो उन्हें करना ही होगा। ई.1938-39 में उन लोगों ने (हिन्दुओं ने) हमारे साथ जो किया था, उसके कारण उन पर हमें भरोसा नहीं। आपके जाने के बाद हम कुछ चुने हुए हिन्दुओं के रहम पर रह जाएंगे। हमें दबाया जाएगा। हमारे साथ बहुत बुरा होगा। माउण्टबेटन ने जिन्ना को भरोसा दिलाना चाहा कि- 'नेहरू और उनके साथियों का ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है। फिर भी यदि आपको पाकिस्तान चाहिए तो मुझे पंजाब और बंगाल का विभाजन करना होगा। आप पंजाब और बंगाल के हिन्दुओं को पाकिस्तान नहीं ले जा सकते।'

    जिन्ना ने कहा- 'आप यह नहीं समझते कि पंजाब एक राष्ट्र है, बंगाल एक राष्ट्र है। एक आदमी पंजाबी या बंगाली पहले है, बाद में हिन्दू या मुसलमान। अगर आप ये सूबे हमें देंगे तो किसी भी हालत में उनका बंटवारा नहीं करेंगे। इससे खून खराबा होगा।'

    माउण्टबेटन ने कहा- 'हिन्दू-मुसलमान, पंजाबी-बंगाली से पहले वह भारतीय है। इसलिए आप भारत के एक बने रहने के पक्ष में दलील दे रहे हैं। ..... यदि आप कैबीनेट मिशन प्लान को मान लेते तो आपको बहुत अधिक स्वायत्त अधिकार मिल जाते। पंजाब और बंगाल अपना शासन स्वयं संभालते। संयुक्त राष्ट्र अमरीका से भी अधिक स्वायत्तता होगी। फिर आप अल्पसंख्यक जनता को मनचाहे ढंग से दबाने की खुशी भी हासिल कर सकेंगे क्योंकि आप केन्द्र को हस्तक्षेप करने से टोक सकेंगे। क्या यह बात आपको अनुकूल लगती है?'

    जिन्ना ने कहा- 'नहीं! मैं भारत का एक हिस्सा नहीं बनना चाहता। हिन्दू राज्य के अधीन होने से तो मैं सब-कुछ खो देना ज्यादा पसंद करूंगा।'


    विभाजन केवल पागलपन

    कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के नेताओं से हुए विचार-विमर्श से माउण्टबेटन समझ गए कि भारत का बंटवारा अनिवार्य है। मुसलमानों को पाकिस्तान देना ही होगा। अन्यथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग अनन्त काल तक एक दूसरे से लड़ते ही रहेंगे। इसलिए उन्होंने भारत विभाजन की एक योजना तैयार की तथा इंग्लैण्ड की एटली सरकार को भेज दी। इस योजना के साथ माउण्टबेटन ने एक पत्र भी लिखा- 'विभाजन केवल पागलपन है। अगर इन अविश्वसनीय कौमी दंगों ने एक-एक व्यक्ति को वहशी न बना दिया होता, अगर विभाजन का एक भी विकल्प ढूंढ सकने की स्थिति होती तो दुनिया का कोई व्यक्ति मुझे इस पागलपन को स्वीकार करने के लिये बहका नहीं सकता। विश्व के सामने स्पष्ट रहना चाहिये कि ऐसे दीवानगी भरे फैसले की पूरी जिम्मेदारी भारतीय कंधों पर है, क्योंकि एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब स्वयं भारतीय अपने इस फैसले पर बुरी तरह पछतायेंगे।'

    यह एक बड़ी विचित्र बात थी कि जिन भारतीय नेताओं को माउंटबेटन ने भारत विभाजन के लिये बड़ी मुश्किल से तैयार किया था, उन्हीं भारतीय नेताओं पर माउंटबेटन ने भारत विभाजन का आरोप रख दिया। माउंटबेटन को अपने प्रतिवेदन में 'भारतीयों' शब्द का प्रयोग न करके 'लीगी नेताओं' शब्द प्रयुक्त करने चाहिये थे।


    मौलाना आजाद को गांधीजी से निराशा

    31 मार्च 1947 को गांधीजी ने माउण्टबेटन से भेंट की और गांधीजी को यह जानकर दुःख हुआ कि पटेल और नेहरू भी विभाजन के समर्थक हो गए हैं। गांधीजी की वायसराय से हुई भेंट के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद गांधीजी से मिलने पहुंचे। उन्होंने इस भेंट के संस्मरण अपनी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम में लिखे हैं-'मैं फौरन उनसे मिलने गया और उनका पहला कटाक्ष था- बंटवारा अब खतरा बन गया है। लगता है कि वल्लभभाई और यहाँ तक कि जवाहरलाल ने भी घुटने टेक दिए हैं। अब आप क्या कीजिएगा? क्या आप मेरा साथ देंगे या आप भी बदल गए हैं?'

    मैंने जवाब दिया- 'मैं बंटवारे के खिलाफ रहा हूँ और अब भी हूँ। बंटवारे के खिलाफ जितना मैं आज हूँ उतना पहले कभी न था लेकिन मुझे यह देखकर अफसोस है कि जवाहरलाल और सरदार पटेल ने भी हार मंजूर कर ली है और आपके शब्दों में हथियार डाल दिए हैं। मेरी आशा अब एकमात्र आप पर टिकी है। अगर आप बंटवारे के खिलाफ खड़े हों तो हम अब भी उसे रोक सकते हैं। अगर आप भी मंजूर कर लेते हैं तो मुझे यह डर है कि हिंदुस्तान का सर्वनाश हो जाएगा।'

    गांधीजी ने कहा- 'आप भी कैसा सवाल पूछते हैं? अगर कांग्रेस बंटवारा मंजूर करेगी तो उसे मेरी लाश के ऊपर करना पड़ेगा। जब तक मैं जिंदा हूं मैं भारत के बंटवारे के लिए कभी राजी न हूंगा। और अगर मेरा वश चला तो कांग्रेस को भी इसे मंजूर करने की इजाजत नहीं दूंगा। ........ बाद में उसी दिन गांधीजी लॉर्ड माउंटबेटन से मिले। वे दूसरे दिन भी उनसे मिले और फिर दो अप्रैल को भी मिले। ज्यों ही वे लॉर्ड माउंटबेटन से पहली बार मिलकर वापस आए त्यों ही सरदार पटेल उनके पास पहुंचे और दो घण्टे तक गुप्त वार्ता करते रहे। इस मुलाकात में क्या हुआ, मैं नहीं जानता। लेकिन जब मैं फिर गांधीजी से मिला तो मुझे इतना बड़ा आघात लगा जितना जिंदगी में कभी भी नहीं लगा था, क्योंकि मैंने देखा कि वह भी बदल गए हैं।'

    गांधीजी भी क्यों बदल गए और बंटवारे के पक्ष में हो गए. इसके ऊपर प्रकाश डालते हुए आजाद ने बताया कि देश की एकता बचाए रखने के लिए गांधीजी ने लॉर्ड माउंटबेटन को सुझाव दिया था कि जिन्ना को सरकार बनाने दी जाए और उन्हें अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों का चुनाव करने दिया जाए। माउंटबेटन को यह बात कुछ जंच गई थी किंतु इस सुझाव का जबर्दस्त विरोध नेहरू और पटेल दोनों ने किया और इसे वापस लेने के लिए गांधीजी को बाध्य किया। आजाद ने लिखा- 'गांधीजी ने मुझे यह बात याद दिलाई और कहा कि परिस्थितियां अब ऐसी हैं कि बंटवारा अवश्यंभावी लगता है।' मौलाना अबुल कलाम आजाद का विचार था कि गांधीजी, सरदार पटेल के प्रभाव के कारण बंटवारे का विरोध नहीं कर सके और उसके समर्थक बन गए।


    बेईमान रैफरी

    यद्यपि कुछ अंग्रेज इतिहासकारों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग की लड़ाई में अंग्रेजों को रैफरी की भूमिका से युक्त बताया है किंतु वास्तविकता यह थी कि अब तक अंग्रेज-शक्ति मुस्लिम लीग का ही अधिक साथ देती आयी थी। वह उस बेईमान रैफरी की तरह थी जो मौका पाते ही चुपके से दो मुक्के उस प्रतिद्वंद्वी में जमा देती थी जो उसे पसंद नहीं था। अक्सर ये मुक्के कांग्रेस को पड़ते थे क्योंकि कांग्रेस हर हालत में भारत की आजादी चाहती थी जबकि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के माध्यम से भारत की आजादी का रास्ता अवरुद्ध कर रखा थ।

    नेहरू ने बचाया देश को

    भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श के बाद माउण्टबेटन ने भारत विभाजन की एक योजना तैयार की जिसे माउंटबेटन प्लान कहा जाता है। वायसराय ने मई 1947 के आरम्भ में इस योजना को ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के लिए लॉर्ड इस्मे के साथ लंदन भिजवा दिया। भारत की आजादी की योजना में लॉर्ड माउण्टबेटन ने प्रस्तावित किया कि भारत को दो स्वतंत्र देशों के रूप में आजादी दी जायेगी जिसमें से एक टुकड़ा पाकिस्तान होगा और दूसरा भारत। पाकिस्तानी क्षेत्रों का निर्धारण अंग्रेजों द्वारा नहीं किया जाएगा अपितु इसका निर्णय भारतीय स्वयं करेंगे।

    अंग्रेजों के अधीन 11 ब्रिटिश प्रांतों में से प्रत्येक प्रांत को पाकिस्तान या भारत में मिलने का निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार होगा। यदि किसी ब्रिटिश प्रांत की जनता चाहे तो वह प्रांत भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी के भी साथ मिलने से इन्कार करके अपने प्रदेश को स्वतंत्र देश बना सकेगी। ऐसा करने के पीछे माउंटबेटन का तर्क यह था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान। प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये पूर्ण स्वतंत्र रहे। जो प्रजा पाकिस्तान में मिलना चाहे, वह पाकिस्तान में मिले। जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। इसके निर्णय की प्रक्रिया ब्रिटिश प्रांतों में लम्बे समय से चल रही लेजिस्लेटिव एसम्बलियों के माध्यम से होनी थी।

    माउण्टबेटन द्वारा भारत में स्थित लगभग 565 देशी रियासतों के लिए भी यही प्रक्रिया प्रस्तावित की गई थी जिसके अनुसार प्रत्येक देशी रियासत को अधिकार होगा कि वह चाहे तो भारत में मिले, चाहे पाकिस्तान में मिले, चाहे स्वतंत्र रहे अथवा कुछ रियासतें मिलकर अपने लिए अलग-अलग देश बना लें। इस प्रकार माउंटबेटन ने कैबीनेट मिशन योजना की अनदेखी करके पाकिस्तान निर्माण के लिए क्रिप्स मिशन वाला खतरनाक रास्ता अपनाया। यह अत्यंत खरतनाक योजना थी जिससे देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और भारत बाल्कन द्वीपों की तरह बिखर जाता। भारत देश का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। भारत में से निकलकर ब्रिटिश-प्रांत एवं देशी-रियासातें अलग-अलग देशों का ऐसा गुच्छा बन जातीं जो एक-दूसरे के रक्त की प्यासी होतीं। न तो कांग्रेसी नेताओं ने और न मुस्लिम लीग के नेताओं ने ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना कभी की थी। इस स्वतंत्रता से तो देश अंग्रेजों के अधीन रहकर तब तक स्वतंत्रता की प्रतीक्षा कर सकता था जब तक कि भारत स्वयं को एक रूप में, एक साथ और एक आत्मा के साथ स्वतंत्र होने योग्य बना ले।

    जब माउण्टबेटन ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन की योजना इंग्लैण्ड भेज दी तब एक दिन उन्होंने इस योजना का प्रारूप जवाहरलाल नेहरू को दिखाया। जवाहरलाल नेहरू उस समय तक माउण्टबेटन की पत्नी एडविना के गहरे मित्र बन चुके थे। दोनों ही मिलकर सिगरेट पीते थे, साथ-साथ यात्राएं करते थे तथा चाय की चुस्कियों एवं डिनर के छुरी-कांटों के साथ भारत की राजनीति पर घण्टों बात करते थे। माउण्टबेटन को विश्वास था कि आजाद-खयालों एवं व्यक्तिगत आजादी के पक्षधर अंग्रेजी पढ़े-लिखे नेहरू ईमानदारी से बनाई गई इस योजना को देखते ही सहमत हो जाएंगे किंतु हुआ बिल्कुल ठीक उलटा। जवाहरलाल नेहरू इस योजना को देखते ही आग बबूला हो गये। वे अखण्ड भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री थे तथा उनकी आंखों में अब भी अखण्ड एवं स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तैर रही थी, जो उन्हें कभी नहीं मिलने वाली थी। यदि वे इस योजना को स्वीकार कर लेते तो वे संभवतः एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री रह जाते जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होना था। इस योजना के आधार पर बनने वाले लगभग छः सौ देशों में से शायद ही कोई उन्हें प्रधानमंत्री बनाने को तैयार होता। उन्होंने अत्यंत रूखे शब्दों में इस योजना को मानने से अस्वीकार कर दिया।

    जवाहरलाल का जवाब सुनकर माउण्टबेटन को निराशा हुई किंतु उन्होंने जवाहरलाल से ही कहा कि ठीक है वे लंदन भेजी जा चुकी योजना को रद्द कर देंगे और शीघ्र ही एक नई योजना तैयार करवाकर जवाहरलाल को दिखाएंगे।


    भारत विभाजन की योजना में संशोधन

    जवाहरलाल नेहरू के नाराज हो जाने पर माउण्टबेटन की दृष्टि सरदार पटेल पर गई किंतु अब तक माउण्टबेटन समझ चुके थे कि इस योजना के मामले में पटेल तो नेहरू से भी अधिक कठोर सिद्ध होंगे। अतः माउण्टबेटन ने भारत सरकार में दोहरी भूमिका निभा रहे अपने राजनीतिक सलाहकार एवं सरदार पटेल के रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन से दूसरी योजना तैयार करने को कहा। जहाँ लॉर्ड माउण्टबेटन के स्टाफ में इण्डियन सिविल सर्विस के बड़े-बड़े दिग्गज अधिकरी मौजूद थे और जिनकी छातियां ऑक्सफोर्ड एवं कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटियों की बड़ी-बड़ी डिग्रियों से जगमगाती थीं और जिनकी बुद्धिमानी के डंके पूरे इंग्लैण्ड में बजते थे और जिन्होंने भारत में अपनी जिंदगी के बहुत बड़े हिस्से गुजार दिये थे, उन सभी को नकार कर माउण्टबेटन ने एक ऐसे आदमी को भारत विभाजन की संशोधितत योजना बनाने के लिए बुलाया जो बहुत साधारण भारतीय परिवार के बारह सदस्यों में से एक था और जो केवल 13 वर्ष की आयु में अपना स्कूल, घर और गांव छोड़कर बरसों तक दिल्ली की सड़कों पर हमाली और मजदूरी करता रहा था और रेलवे के इंजनों में कोयला झौंककर पेट पालता रहा था और जो केवल दो अंगुलियों से अंग्रेजी का टाइपराइटर चलाता था। इसका नाम वी. पी. मेनन था। उन दिनों पटेल और मेनन के दिमागों का गठजोड़ बहुत खतरनाक माना जाता था।

    माउण्टबेटन को अनुमान भी नहीं था कि शतरंज की जिस चौसर पर माउण्टबेटन और जवाहरलाल नेहरू अपने-अपने मोहरे आगे बढ़ा रहे थे उस चौसर पर माउण्टबेटन और जहवाहरलाल तो स्वयं ही प्यादों से अधिक हैसियत नहीं रखते थे। असली खेल तो वी. पी. मेनन और सरदार पटेल खेलने वाले थे। चौसर भी मेनन और पटेल की थी और प्यादे भी। पटेल और मेनन ने बहुत पहले ही एक योजना अपने दिमाग में बना रखी थी। अब समय आ गया था जब मेनन उसे कागजों पर उतार दें।

    जहवारलाल नेहरू से बात करने के बाद माउण्टबेटन ने वी. पी. मेनन को बुलवाया तथा उन्हें उसी समय एक योजना बनाकर देने को कहा। माउण्टबेटन ने इस बात का ध्यान रखा कि मेनन को पटेल से नहीं मिलने दिया जाए क्योंकि योजना बनाने से पहले यदि मेनन पटेल से मिले तो जहवारलाल को संदेह होगा कि विभाजन की नई योजना पटेल ने तैयार की है। जवाहरलाल कतई नहीं चाहते थे कि इस योजना को बनाने का श्रेय पटेल को मिले। वी. पी. मेनन उसी समय वायसरॉय निवास पर टाइपराइटर लेकर बैठ गए और उन्होंने चार घण्टों में टाइपराइटर की मदद से एक योजना कागजों पर उतार दी। ऐसा लगता था कि यह मेनन ने तैयार की है किंतु वास्तव में इस योजना का खाका पटेल द्वारा पहले ही वी. पी. मेनन को बता दिया गया था। ऑफिस के पोर्च में बैठकर हिमालय के विहंगम दृश्य का आनंद लेते हुए, लंच से डिनर के बीच फैले समय में अर्थात् कठिनाई से छः घण्टे तक काम करके एक ऐसे व्यक्ति ने भारतीय आजादी को नए सांचे में ढालने का गौरव प्राप्त किया, जिसने अपनी सरकारी नौकरी दो अंगुलियों से टाइपिंग करते हुए शुरू की थी। उसने जो मसौदा दुबारा लिखकर तैयार किया, उस आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप को नए सिरे से व्यवस्थित किया जाना था और दुनिया का नक्शा भी बदल जाने वाला था।

    इस योजना में प्रस्तावित कि हिन्दू-बहुल आबादी भारत में रहेगी। मुस्लिम-बहुल आबादी वाले क्षेत्र पाकिस्तान में जायेंगे। प्रत्येक ब्रिटिश प्रांत को अनिवार्यतः भारत या पाकिस्तान में मिलना होगा। पंजाब और बंगाल का आबादी के आधार पर बंटवारा होगा। देशी रजवाड़े अपनी मर्जी से हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में मिल सकेंगे या फिर अलग देश के रूप में स्वतंत्र रह सकेंगे। नेहरू ने इस योजना को देखते ही स्वीकार कर लिया। माउण्टबेटन जानते थे कि जिन्ना आसानी से इस योजना को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उसकी मांग पूरे पंजाब और पूरे बंगाल की थी। इसके साथ-साथ ब्लूचिस्तान, सिंध और खैबर-पख्तून तो धर्म के आधार पर जिन्ना के थे ही। फिर भी माउण्टबेटन ने पंजाब और बंगाल के विभाजन वाली यह योजना स्वीकृति के लिए अपने सहायक लॉर्ड इस्मे के साथ लंदन भेज दी।


    जिन्ना से भय

    लियोनार्ड मोसले ने लिखा है- 'योजना को स्वीकृति के लिये लंदन भेज दिये जाने के बाद माउंटबेटन जिन्ना की तरफ से आशंकित हो गया। उसे लगा कि जिन्ना छंटे हुए पाकिस्तान का विरोध करेगा। इसलिये उसने जिन्ना से बात की और उससे आश्वस्त होकर इस्मे को लंदन में तार भेजा कि मुझे पूरा विश्वास है कि जिन्ना इसे मान लेगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि जिन्ना बहुत ही चालाक और सौदेबाज है, वह मुझे बहका भी सकता है। माउंटबेटन को इतने पर भी संतोष नहीं हुआ। उसने जिन्ना से निबटने के लिये एक आपात योजना भी तैयार की कि यदि जिन्ना एन वक्त पर मुकर गया तो उस समय क्या किया जायेगा। इस आपात् योजना में मुख्यतः यह प्रावधान किया गया था कि चूंकि जिन्ना ने योजना को अस्वीकार कर दिया है इसलिये सत्ता वर्तमान सरकार को ही सौंपी जा रही है।'


    मौलाना अबुल कलाम द्वारा विभाजन का विरोध

    जब मौलाना अबुल कलाम आजाद को ज्ञात हुआ कि माउंटबेटन ब्रिटिश मंत्रिमण्डल को भारत विभाजन के लिये राजी करने हेतु लंदन जा रहे हैं तो मौलाना ने शिमला जाकर माउंटबेटन से भेंट की और प्रस्ताव रखा कि कैबीनेट मिशन प्लान पर दृढ़ रहें ताकि देश का विभाजन टाला जा सके। इस पर लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा कि यदि सत्ता हस्तांतरण में देरी की गयी तो लोग ब्रिटिश सरकार की नीयत पर शक करेंगे और सरकार की बदनामी होगी।


    गांधीजी का असमंजस

    वायसराय एवं गवर्नर जनरल माउण्टबेटन के प्रयासों से 6 मई 1947 को गांधीजी ने नई दिल्ली में मुहम्मद अली जिन्ना के निवास पर भेंट की। उन दोनों के बीच भारत का वह नक्शा रखा गया जिसमें पाकिस्तान हरे रंग से दिखाया गया था। गांधीजी ने जिन्ना से बहुत अनुनय-विनय की कि वह पाकिस्तान को लेने की जिद्द छोड़ दे। गांधीजी ने जिन्ना से यहाँ तक कहा कि- 'यदि वह पाकिस्तान की मांग छोड़ देता है तो उसे आजाद भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा' किंतु जिन्ना टस से मस नहीं हुआ। इस भेंट के बाद जिन्ना ने एक परिपत्र जारी किया जिसमें कहा गया कि मिस्टर गांधी बंटवारे के सिद्धांत को नहीं मानते हैं। उनके लिये बंटवारा अनिवार्य नहीं है। जबकि मेरी दृष्टि में न सिर्फ बंटवारा अनिवार्य है अपितु हिन्दुस्तान की राजनीतिक समस्या का एकमात्र व्यावहारिक हल भी है।

    7 मई 1947 की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने अपना निर्णय जनता के समक्ष रखा- 'कल में जिन्ना साहब के पास गया था। हमारे बीच राजनीतिक विरोध बहुत ज्यादा है। वे पाकिस्तान मांगते हैं, मैं उसका विरोधी हूँ परन्तु कांग्रेस वालों ने लगभग निर्णय कर लिया है कि पाकिस्तान की मांग पूरी कर दी जाए। हाँ पंजाब और बंगाल के जिन इलाकों में हिन्दुओं का बहुमत है, वे पाकिस्तान को न मिलें। केवल वे ही प्रदेश पाकिस्तान में जाएंगे जहाँ मुसलमानों का बहुमत है। मैं तो इसके भी विरुद्ध हूँ। देश के टुकड़े करने की बात से मैं कांप उठता हूँ। परन्तु यह विचार रखने वाला इस समय मैं अकेला हूँ। मैं किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करता। जिन्ना साहब को मैंने साफ कह दिया है कि मैं तो हिन्दू, मुसलमान, पारसी सिक्ख, जैन, ईसाई आदि सभी जातियों का सेवक हूँ, ट्रस्टी हूँ। इसलिए पाकिस्तान के निर्माण में मैं दिलचस्पी नहीं लूंगा। और उसकी स्वीकृति पर मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा। मैंने जिन्ना साहब को यह भी नम्रतापूर्वक बताया कि आप हिंसा के जोर से या ऐसे नामर्दी भरे रवैये से पाकिस्तान नहीं ले सकते। समझाकर शांति से सारा देश भले ही आपको सौंप दिया जाए, उससे मैं खुश हो जाउंगा। ऐसा होगा तो मैं सबसे पहली बधाई दूंगा।'


    गांधीजी द्वारा पाकिस्तान निर्माण का पुनः विरोध

    18 मई 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन भारत-विभाजन की योजना लेकर दिल्ली से लंदन गए। पूरा देश जानता था कि लॉर्ड माउंटबेटन भारत-विभाजन की अनुमति लेने के लिए लंदन गए हैं किंतु 30 मई 1947 को जिस दिन भारत-विभाजन योजना पर एटली और चर्चिल का अनुमोदन लेकर वायसराय लंदन से भारत लौटे, उसी शाम को प्रार्थना सभा में गांधीजी ने विभाजन का कठोर शब्दों में विरोध करते हुए कहा- 'देश अगर धू-धू करके जलने लगता है, तो भी..... पाकिस्तान के नाम पर हम एक इंच भूमि नहीं देंगे। ' गांधीजी भले ही पाकिस्तान न बनने देने की गंभीर घोषणाएं कर रहे थे किंतु भीतर ही भीतर हताश थे और वे अच्छी तरह समझ चुके थे कि इस विषय पर अब कांग्रेस में उनके विचारों का समर्थन करने वालों की संख्या घट गई है। यहाँ तक कि उनके पुराने साथी नेहरू और पटेल भी पाकिस्तान निर्माण के समर्थक हो गए हैं। इससे दुःखी होकर एक दिन उन्होंने प्रार्थना सभा में सबके सामने कहा- 'आज मैं स्वयं को अकेला पाता हूँ। सरदार पटेल और जवाहरलाल भी सोचते हैं कि मेरा स्थिति का आकलन गलत है तथा विभाजन पर सहमति से शांति अवश्य वापस होगी....।'


    भारत को बीच में से चीरने की योजना

    जब माउंटबेटन नयी योजना की स्वीकृति लेकर भारत आ गये तो अचानक जिन्ना ने मांग की कि उसे पूर्वी-पाकिस्तान और पश्चिमी-पाकिस्तान को मिलाने के लिये हिंदुस्तान से होकर एक हजार मील का रास्ता चाहिये। इस पर कांग्रेस फिर बिफर पड़ी किंतु माउण्टबेटन ने किसी तरह दोनों पक्षों में बीच-बचाव किया। गुरुदत्त ने लिखा है- 'जिन्ना उत्तरी और पश्चिमी-पाकिस्तान को मिलाने के लिए हिमालय के नीचे-नीचे एक सौ मील चौड़ी पट्टी चाहता था।' दिल्ली में सीधी कार्यवाही दिवस का खतरा मई 1947 के दूसरे सप्ताह में कलकत्ता डेली में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें एक संवाददाता द्वारा लिखा गया कि- ' परिस्थिति का मेरा अध्ययन इस प्रकार है....... दिल्ली में वैसा ही डायरेक्ट एक्शन शीघ्र होने वाला है। जैसा अभी-अभी पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में किया गया है। ........ हिन्दुस्तान की केन्द्रीय सरकार के संचार विभाग को अविलम्ब मुसलमानी बना दिया गया है। दिल्ली टेलिफोन विभाग के समस्त आवश्यक स्थानों पर यूरोपियन, हिन्दू और सिक्ख अधिकारियों को निकालकर मुसलमान नियुक्त कर दिए गए हैं। जिससे वैसा ही समय पड़ने पर जैसा पंजाब और पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में अभी-अभी पड़ा था, समस्त संचार साधन दिल्ली के भीतर और दिल्ली के हिन्दुस्तान के अन्य भागों के साथ काट लिए जाएं अथवा नियंत्रण में कर लिए जाएं।' सरकार द्वारा समय पर किए गए प्रबंध से यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई, दिल्ली में डायरेक्ट एक्शन नहीं हो सका।

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  • अजमेर का इतिहास - 4

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 4

    अजमेर के चौहान शासक (1)


    चौहानों का उद्भव

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    छठी शताब्दी ईस्वी के लगभग चौहानों का उदय हुआ। उन्होंने सांभर झील के आसपास अपनी शक्ति बढ़ाई। (फुलेरा तथा अजमेर के बीच, 260 53' से 270 1' उत्तरी अक्षांशों तथा 740 54' से 750 14' पूर्वी देशांतरों के बीच 20 मील लम्बी तथा 2 से 7 मील चौड़ी खारे पानी की झील। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 90 वर्गमील है।) राजशेखर द्वारा लिखित प्रबंधकोष के अनुसार चौहान शासकों में वासुदेव पहला शासक था जिसने ई.551 में सपादलक्ष (सांभर) में शासन किया। बिजोलिया अभिलेख कहता है कि वासुदेव सांभर झील का प्रवर्तक था। उसका पुत्र सामंतदेव हुआ। सामंतदेव का वंशज अजयराज था। अजयराज के वंशज प्रतिहार शासकों के अधीन रहकर राज्य करते थे किन्तु ईसा की ग्याहरवीं शताब्दी के लगभग उन्होंने स्वयं को प्रतिहारों से स्वतन्त्र कर लिया।

    चौहान शासकों की उपाधियाँ

    चौहानों का प्रारंभिक शासन सपादलक्ष देश पर था। उनकी राजधानी शाकंभरी (सांभर) थी। इसलिये वे शाकंभरीश्वर तथा शंभरीराज कहलाते थे। गूवक प्रथम को हर्षराय भी कहा गया है जो कि उसकी उपाधि जान पड़ती है। हर्षनाथ भगवान शिव का भैरव अवतार माना जाता है जो कि चौहानों द्वारा पूज्य था। वि.सं.1215 (ई.1158) के नरहड़ लेख में विग्रहराज चतुर्थ के नाम के आगे परमभट्टारक-महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये अंकित किया गया है। ये उपाधियाँ चौहानों के सम्पूर्णप्रभुत्व सम्पन्न शासक होने की घोषणा करती हैं। पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा कहा जाता था। राय उसकी उपाधि जान पड़ती है तथा पिथौरा का आशय पृथ्वीराज से है।

    अजमेर की स्थापना

    इतिहासकार अजमेर का स्थापना काल ई.145 से लेकर ई.1153 (वि.सं. 1170) के लगभग बताते हैं जो कि एक बहुत ही लम्बा समय है। कर्नल टॉड ने एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान, हण्टर ने इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया, तथा वाटसन ने गजेटियर ऑफ अजमेर में अजमेर की स्थापना का काल 145 ईस्वी बताया है जो कि अजमेर नगर की स्थापना की सबसे प्राचीन तिथि है।

    समस्त इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि अजमेर की स्थापना चौहान राजा अजयपाल ने की और अजमेर का प्राचीन नाम अजयमेरु था। उसका सही समय अभी तक निर्धारित नहीं हो सका है। हर बिलास शारदा ने अजयपाल का शासन काल छठी शताब्दी ईस्वी का अंत अथवा सातवीं शताब्दी का आरंभ माना है। अपने इस मत के समर्थन में उन्होंने चौहान राजाओं की उस वंशावली का उल्लेख किया है जो राजशेखर द्वारा लिखित ग्रंथ प्रबंधकोश में दी गई है। इस वंशावली के अनुसार अजमेर का संस्थापक अज या अजयपाल, शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों के क्रम में तीसरा था तथा इसे अजयराज भी कहा जाता था। वह चौहान वासुदेव का पौत्र तथा चौहान सामंतदेव का पुत्र था।

    डॉ.दशरथ शर्मा ने अर्ली चौहान डाइनेस्टीज में अजयराज को अजमेर का संस्थापक माना है तथा उसके दो और नाम अजयदेव तथा अल्हन भी बताये हैं। उन्होंने अजमेर की स्थापना का काल 1170 विक्रमी ( ई.1113) के आसपास निश्चित किया है। उन्होंने अपना मत अपभ्रंश काव्यत्रयी के आधार पर प्रस्तुत किया है जिसके लेखक जिनदत्त सूरी, अर्णोराज के समकालीन थे। यह पुस्तक प्रबंधकोश से भी पुरानी है। इसके आधार पर चौहान राजा अजयराज शाकाम्बरी के राजाओं के क्रम में पच्चीसवें नम्बर पर आता है। इस प्रकार से एक वंशावली में राजा का क्रम तृतीय तथा दूसरी वंशावली में उसी राजा का क्रम पच्चीसवां है। पर्याप्त संभव है कि ये दो अलग राजा हों। इसलिये इनका कालक्रम भी अलग हो। यद्यपि प्रबंधकोश अपभ्रंश काव्यत्रयी से बाद का है तथापि प्रबंधकोश के मत को पूर्णतः त्याग देना तर्कसंगत नहीं है।

    डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने भी अजयराज को अजमेर का संस्थापक माना है तथा अजमेर का स्थापना काल ई.1113 माना है। मुराद अली ने लिखा है कि जिस राजा ने पटन (जहाँ सोमनाथ का मंदिर था) बसाया, उसी ने अजमेर को भी आबाद किया।

    शाकाम्बरी के चौहान राजाओं के क्रम में सभी इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि इस क्रम में प्रथम राजा वासुदेव था। प्रबंधकोश में इस राजा का काल 608 विक्रमी (551 ई.) दिया गया है। साथ ही भण्डारकर के आधार पर दशरथ शर्मा भी यह स्वीकार करते हैं कि उसका काल 627 ईस्वी के लगभग था। यह अंतर उतना नहीं जितना कि अजयराज के काल के सम्बन्ध में है। इस कारण प्रबंधकोश का मत अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

    यद्यपि हर बिलास शारदा ने प्रबंधकोश के आधार पर शाकाम्बरी के पहले चौहान राजा वासुदेव के काल को 551 ईस्वी तथा उस श्रेणी में तृतीय अजयराज को छठी शताब्दी से पहले के काल में मानकर अजमेर की स्थापना इसी काल में बताई है परंतु वे अपने इस मत के समर्थन में ऐसा कोई निश्चित तर्क प्रस्तुत नहीं कर सके हैं जिसके आधार पर इस तिथि को निर्विवाद रूप से सही माना जा सके। डॉ. दशरथ शर्मा द्वारा बताया गया अजमेर का स्थापना काल 1170 विक्रमी (1113 ई.) के लगभग को भी पूर्ण रूपेण सही नहीं माना जा सकता क्योंकि ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे कि अजमेर नगर के इस समय से पूर्व स्थित होने का ज्ञान मिलता है।

    कर्नल टॉड ने लिखा है कि चावड़ावंश का राजा बीरदेव कन्नौज का अधिपति था। उसकी एक पुत्री का नाम मिलन देवी (मीनल देवी) था। यह राजकुमारी, अजमेर के चौहान राजा को ब्याही गई थी। उसकी पंद्रहवीं पीढ़ी में कुमारपाल हुआ। वस्तुतः टॉड ने गलती से चौलुक्य राजा को चावड़ा राजा लिखा है। क्योंकि कुमार पाल चौलुक्य था न कि चावड़ा। कुमार पाल ने ई.1143 से 1171 तक गुजरात पर शासन किया। यदि वह वीरदेव की पंद्रहवीं पीढ़ी में था तो वीरदेव का काल लगभग 300 से 350 साल पहले का अर्थात् ईसा की आठवीं शताब्दी का ठहरता है। अतः इससे भी अनुमान होता है कि आठवीं शताब्दी में अजमेर नगर अस्तित्व में था।

    तारीखे फरिश्ता में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिनके अनुसार अजमेर वि.सं. 1170 (1113 ई.) से काफी पहले मौजूद था। अजमेर का सबसे पहले नाम उस समय आता है जिस समय ई.997 में सुबुक्तगीन के विरुद्ध लाहौर के शासक की सहायता के लिये अजमेर के राय ने अपनी सेना भेजी थी। डॉ. दशरथ शर्मा इस वर्णन को सही नहीं मानते क्योंकि मध्ययुगीन इतिहासकार जैसे उतबी, इब्न उल अथर एवं निजामुद्दीन आदि लेखकों के ग्रंथों में इस घटना का उल्लेख नहीं है। इसलिये वह तारीख ए फरिश्ता में लिखित अजमेर को शाकाम्बरी मानते हैं। तथापि जब तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि अजमेर की स्थापना उस काल में नहीं हुई थी, तब तक हम फरिश्ता के कथन को पूर्ण रूपेण असत्य नहीं मान सकते। डॉ. दशरथ शर्मा स्वयं स्वीकार करते हैं कि भले ही यह बाद में लिखा गया ग्रंथ है किंतु यह अन्य मुस्लिम ग्रंथों से अधिक विस्तृत है तथा स्थान-स्थान पर इसकी सूचनायें प्राचीन हिन्दू ग्रंथों से मिलती हैं। इस ग्रंथ में कुछ सामग्री उन ग्रंथों से भी ली गई है जो अब उपलब्ध नहीं हैं। इस कारण जब तक तारीखे फरिश्ता के विरुद्ध कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल जाता, तब तक फरिश्ता के कथन को त्यागा नहीं जा सकता। इस आधार पर अजमेर का स्थापना काल 997 ई.से पहले आ जाता है।

    हर बिलास शारदा ने इस काल से पहले के भी कुछ उदाहरण अजमेर के अस्तित्व में होने के सम्बन्ध में दिये हैं। उनके अनुसार अजमेर में दिगम्बर जैन मुनियों के थड़ों एवं छत्रियों में 8वीं एवं 9वीं शताब्दी के शिलालेख मिले हैं। इनमें भट्टाकर रत्न कीर्ति के शिष्य हेमराज की कीर्ति समाधि पर अंकित शिलालेख पर तिथि विक्रमी 817 (760 ई.) है और इस प्रकार अजमेर कम से कम इस काल में एक सम्पन्न नगर था। यद्यपि यह संभव है कि अजमेर की स्थापना से पूर्व भी जैन मुनियों की स्मृति में इन थड़ों एवं छत्रियों का निर्माण किया गया हो। अन्य छतरियों में ई.845, ई.854 तथा ई.871 की तिथियां दी गई हैं।

    आठवीं से 10वीं शताब्दी में राजा धरणीवराह ने अपने भाइयों को नव कोट दिए जिसका एक पद्य इस प्रकार से है- मण्डोवर सावंत हुवो अजमेर अजैसू। गढ पूंगल गजवंत हुवो लुद्रवै भाणभू। भोजराज धर धाट हुवो हांसू पारक्कर। अल पल्ल अरबुद्द भोजराजा जालंधर। नव कोड़ किराडू संजुगत, थिर पंवार हर थपिप्या। धरणीवराह धर भाइयां, कोट वांट जू जू कियो।

    इस कवित्त से भी यह सिद्ध होता है कि अजमेर दसवीं शताब्दी से पूर्व एक प्रमुख नगर था।

    कलचुरि संवत 490 (वि.सं. 796 तथा ई.सन् 739) का चालुक्य पुलकेशी दानपत्र कहता है कि अरब के खलीफा हशाम (ई.724 से 743) के भारतीय प्रदेशों के शासक जुनैद की सेना ने मारवाड़, भीनमाल, अजमेर तथा गुजरात आदि पर चढ़ाई की। इससे भी प्रकट होता है कि अजमेर आठवीं शताब्दी से पहले अस्तित्व में था।

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  • जिन्ना ने कैबीनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया

     03.06.2020
    जिन्ना ने कैबीनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया

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    कैबीनेट मिशन योजना में एक अंतरिम सरकार के गठन का भी प्रस्ताव किया गया था। इस सरकार में वायसराय को छोड़कर शेष सभी पदों को भारतीयों से भरा जाना था। जातीय-दलीय कोटे से 14 सदस्यों की सम्मिलित सरकार बननी थी जिसमें कांग्रेस के 5 सवर्ण हिंदू सदस्य, मुस्लिम लीग के 5 सदस्य, परिगणित हिंदू जाति का 1 सदस्य और अन्यान्य अल्पसंख्यकों के 3 सदस्य होने थे। गांधीजी ने कांग्रेस के 5 सदस्यों में 1 राष्ट्रवादी मुसलमान को शामिल करने पर जोर दिया। इस पर जिन्ना पूर्व की भांति फिर अड़ गये कि कि मुस्लिम लीग ही एकमात्र संस्था है जो मुसलमानों का नेतृत्व कर सकती है। कांग्रेस को इसका अधिकार नहीं। जिन्ना के इस दावे के सामने वायसराय वेवेल, कैबिनेट मिशन तथा कांग्रेस ने आत्मसमर्पण कर दिया।

    10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा कि कांग्रेस पर समझौतों का कोई बंधन नहीं है और वह हर स्थिति का सामना करने के लिये उसी तरह तैयार है जैसे कि अब तक करती आयी है। मुस्लिम लीग ने नेहरू के वक्तव्य का अर्थ यह लगाया कि एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद कांग्रेस इस योजना में संशोधन कर देगी। अतः जिन्ना ने 27 जुलाई को ही मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई और कैबीनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति रद्द करके पाकिस्तान प्राप्त करने के लिये सीधी कार्यवाही की घोषणा कर दी। इस घोषणा में कहा गया कि आज से हम वैधानिक तरीकों से अलग होते हैं। मुस्लिम लीग के साथ-साथ अन्य राजनीतिक तत्वों ने भी इस योजना को अस्वीकार कर दिया। नेहरू की घोषणा पर मौलाना अबुल कलाम आजाद ने टिप्पणी की कि 1946 की गलती बड़ी महंगी साबित हुई।

    कैबीनेट मिशन योजना में राज्यों की जनता का उल्लेख नहीं किया गया था, उसमें केवल नरेशों को प्रधानता दी गयी थी। जयनारायण व्यास ने इसका विरोध किया और दिल्ली में एक विराट सम्मेलन का आयोजन कर ऐसा वातावरण पैदा कर दिया कि नेहरू और पटेल को भी उसमें उपस्थित होकर आश्वासन देना पड़ा कि ऐसी कोई योजना स्वीकार नहीं की जायेगी जिसमें देशी राज्यों की जनता की उपेक्षा हो। अंत में गांधी के यह विश्वास दिलाने पर कि देशी राज्यों की जनता के हितों की उपेक्षा नहीं की जायेगी, व्यास चुप हुए।

    इस प्रकार चारों ओर कैबीनेट मिशन योजना के विरुद्ध घनघोर वातावरण बन गया तथापि कांग्रेस इस बात पर सहमत थी कि कैबीनेट योजना के तहत देश में एक अंतरिम सरकार का तत्काल गठन किया जाना चाहिये। 29 जून 1946 को कैबीनेट मिशन इस आशा के साथ भारत छोड़ चुका था कि और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान सभा का गठन तो होगा ही। क्रिप्स तथा पैथिक लॉरेन्स ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि मिशन अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा। 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना यद्यपि एक अभिशंषा के रूप में प्रस्तुत की गयी थी किंतु फिर भी यह किसी पंचनिर्णय से कम नहीं थी क्योंकि मिशन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य सहमति के निर्माण में असफल रहा था। कैबिनेट मिशन योजना और उसके अनंतर गतिविधियों के सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं होगा कि क्रिप्स मिशन की ही भांति कैबीनेट मिशन की भी मौत लिखी थी।

    16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही दिवस मनाया जिसके कारण कलकत्ता में हजारों हिन्दुओं की जानें गयीं।

    वायसराय चाहता था कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों दलों के सहमत होने पर अंतरिम सरकार का गठन हो किंतु मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हाने के लिये सहमत नहीं हुई। अगस्त 1946 के अंत में प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय लॉर्ड वेवेल को व्यक्तिगत तार भेजकर निर्देशित किया कि मुस्लिम लीग के बिना ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाये। वेवेल ने कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुसार 2 सितम्बर 1946 को दिल्ली में अंतरिम सरकार का गठन किया। इसमें केवल कांग्रेसी नेता शामिल हुए। इसलिये पाँच पद स्थानापन्न रखे गये जो कि मुस्लिम लीग के लिये थे। 15 अक्टूबर 1946 को मुस्लिम लीग भी अंतरिम सरकार में शामिल हो गयी।

    कैबीनेट मिशन योजना के प्रस्तावों के तहत कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने संविधान सभा में भाग लेने पर अपनी सहमति दी थी किंतु बाद में कुछ बिंदुओं की व्याख्या पर दोनों दलों में विवाद हो गया तथा मुस्लिम लीग ने अपनी सहमति वापिस ले ली। जुलाई 1946 में संविधान निर्मात्री समिति के सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस के 212 सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम लीग के मात्र 73 सदस्य ही हो पाये। इसलिये मुस्लिम लीग संविधान सभा के जाल में फंसना नहीं चाहती थी। मुस्लिम लीग ने अपने आप को इससे अलग कर लिया। गांधीजी की टिप्पणी थी कि हो सकता है कि केवल कांग्रेस प्रांत और देशी नरेश ही इसमें सम्मिलित हों। मेरे विचार से यह शोभनीय और पूर्णतः तथ्यसंगत होगा। 9 दिसम्बर 1946 को तनाव, निराशा एवं अनिश्चितता के वातावरण में विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    21 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा ने नरेन्द्र मण्डल द्वारा गठित राज्य संविधान वार्ता समिति से वार्ता करने के लिये संविधान वार्ता समिति नियुक्त की। इसके प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे खेद है कि हमें राजाओं की समिति से वार्ता करनी पड़ेगी। मैं सोचता हूँ कि राज्यों की तरफ से हमें राज्यों के लोगों से बात करनी चाहिये थी। मैं अब भी यह सोचता हूँ कि यदि वार्ता समिति सही कार्य करना चाहती है तो उसे समिति में ऐसे प्रतिनिधि सम्मिलित करने चाहिये किंतु मैं अनुभव करता हूँ कि इस स्तर पर आकर हम इसके लिये जोर नहीं डाल सकते।

    इस प्रकार 1940 से लेकर 1946 तक के काल में राजपूताना के राज्यों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये अपने राज्य के संसधान ब्रिटिश सरकार को सौंपकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन किया किंतु संघ के निर्माण की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत क्रिप्स प्रस्ताव तथा कैबिनेट मिशन प्रस्ताव में रुचि का प्रदर्शन नहीं किया। जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर राज्यों ने नरेन्द्र मण्डल के माध्यम से क्रिप्स एवं कैबीनेट मिशन के साथ हुई वार्ताओं में भाग लिया किंतु उदयपुर लगभग अनुपस्थित दिखायी दिया। जयपुर एवं जोधपुर राज्य ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों एवं पुलिस अधिकारियों के माध्यम से प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में थे तो उदयपुर राज्य भी ब्रिटिश साम्राज्य के हाथों की कठपुतली बना रहा। इतना अंतर अवश्य था कि जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर सहित राजपूताना के समस्त राज्य अपनी इच्छा से अंग्रेजों के वफादार चाकर बने रहे किंतु उदयपुर ने विवश होकर अंग्रेजों की चाकरी की।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 30

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 30

    सुहरावर्दी द्वारा अलग बंगाल बनाने की योजना


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लॉर्ड माउंटबेटन योजना को बदलने के लिए एक और चाल चली गई। बंगाल का मुख्यमंत्री सुहरावर्दी जो बंगाल में सीधी कार्यवाही का खलनायक था, गांधीजी के पास एक प्रस्ताव लेकर आया। उसकी योजना यह थी कि कांग्रेस मान जाए कि पूर्ण बंगाल को एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया जाए। गांधीजी इसके लिए तैयार हो गए। बाबू शरत्चन्द्र बोस और दूसरे बंगाली कांग्रेसी भी इस चाल में फंस गए और स्वतंत्र बंगाल की योजना बनने लगी किंतु हिन्दू महासभा के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस योजना का रहस्योद्घाटन कर दिया। डॉ. मुखर्जी का कहना था कि यह स्वतंत्र बंगाल की योजना पूर्ण बंगाल को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का षड़्यंत्र है। उन्होंने बताया कि- 'पहले बंगाल को एक स्वतंत्र देश बनाया जाएगा और जब यह स्वतंत्र देश अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में असफल होगा तो वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमान इसे पूरा का पूरा पाकिस्तान के हाथों में दे देंगे।'

    डॉ. मुखर्जी द्वारा मुस्लिम लीग के षड़यंत्र का रहस्योद्घाटन कर दिए जाने के बाद गांधीजी ने सुहरावर्दी के समक्ष शर्त रखी कि गांधीजी इस योजना को तभी आशीर्वाद देना स्वीकार करेंगे जब बंगाल विधान सभा के तीन चौथाई सदस्य बहुमत से इस योजना को पारित कर देंगे। इसके साथ ही गांधीजी यह शर्त भी लगाना चाहते थे कि भविष्य में कभी भी कोई भी निश्चय तब तक मान्य नहीं होगा, जब तक स्वतंत्र बंगाल की विधान सभा के तीन चौथाई हिन्दू सदस्य उस निर्णय के पक्ष में नहीं होंगे। मुस्लिम लीग ने कहा कि स्वतंत्र बंगाल की विधान सभा के निर्णय तीन चौथाई मत से स्वीकार हुआ करेंगे किंतु गांधीजी की मांग का आशय यह नहीं था, वे तो हिन्दुओं के तीन-चौथाई बहुमत की बात कर रहे थे। कांग्रेसी नेताओं को मुस्लिम लीग के इस षड़यंत्र का भी पता चल गया कि बंगाल की मुस्लिम लीग सुहरावर्दी की सहायता से बंगाल विधान सभा के अछूत जाति के सदस्यों को मुस्लिम लीग की योजना के पक्ष में करने में लगी है। इस प्रकार मुस्लिम लीग की यह चाल भी असफल हुई।

    सुहरावर्दी की इस योजना के पीछे एक खतरनाक मनोविज्ञान काम कर रहा था। वास्तव में पाकिस्तान का असम्भव-सपना सम्भव बनाने में सुहरावर्दी का सबसे अधिक योगदान था। उसने ही बंगाल में 'लड़ कर लेंगे पाकिस्तान' का आह्वान किया था। उसने ही कलकत्ता में 'सीधी कार्यवाही दिवस' की योजना बनाई थी और अत्यंत क्रूरता-पूर्वक कार्यान्वित की थी। जिन्ना तो केवल जुबानी-नेतागिरी कर रहा था, धरती पर उसका कार्यान्वयन तो सुहरावर्दी और उसके जैसे लोग कर रहे थे किंतु अब जब पाकिस्तान बनने का समय आ गया तो सुहरावर्दी को अपने पैरों के तले धरती खिसकती हुई अनुभव हुई थी।

    मुहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली, चौधरी मुहम्मद अली तथा अब्दुल रब निश्तर जैसे नेता जो अब तक दिल्ली में राजनीति करते रहे थे, वे पाकिस्तान बनने के बाद पश्चिमी-पाकिस्तान के कराची अथवा किसी अन्य नगर में बैठकर राजनीति करने वाले थे, पूर्वी बंगाल और उसके नेताओं की स्थिति द्वितीय श्रेणी के नेताओं जैसी होने जा रही थी। इसलिए उसने गांधीजी को दी गई योजना के माध्यम से भावी पूर्वी-पाकिस्तान की, भावी पश्चिमी-पाकिस्तान से मुक्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया था। मोसले ने इस ओर संकेत करते हुए लिखा है- 'सुहरावर्दी ने स्वतंत्र बंगाल की मांग कबूल करवाने की आखिरी कोशिश की क्योंकि उसे पता था कि पाकिस्तान में उसे वह जगह नहीं मिलने वाली थी, जो वह चाहता था। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल के लिए नाजीमुद्दीन को चुन लिया था। सुहरावर्दी भारत में ही रहने की सोच रहा था।'

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  • अजमेर का इतिहास - 5

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 5

    अजमेर के चौहान शासक (2)


    चौहानों की वंश परम्परा

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    पृथ्वीराज विजय हम्मीर महाकाव्य तथा हम्मीर रासो आदि ग्रंथों के अनुसार चौहान सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। विग्रहराज चतुर्थ (ई.1152-1163) के समय के एक शिलालेख में भी चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है। यह शिलालेख राजपूताना म्यूजियम अजमेर में उपलब्ध है। ई.1167 का हांसी अभिलेख तथा माउण्ट आबू का ई.1320 का अचलेश्वर मंदिर अभिलेख चौहानों को चंद्रवंशी क्षत्रिय बताते हैं। पृथ्वीराज रासो ने चौहानों को अग्निकुल का बताया है। एक अन्य मत के अनुसार चौहानों का सम्बन्ध मोरिय शासकों से है। डॉ. ओझा के अनुसार ये सूर्यवंशी क्षत्रिय थे और गोत्रोच्चार में इन्हें चंद्रवंशीय क्षत्रिय माना जाता है। डॉ. दशरथ शर्मा चाहमानों की उत्पत्ति ब्राह्मण वंश से मानते हैं। चाहमानों का प्राचीन रायपाल का सेवाड़ी अभिलेख चाहमानों को इंद्र का वंशज बताता है।

    भाटों और चारणों ने चाहमानों को अग्निवंशीय माना है। उनका मूल आधार पृथ्वीराज रासो में दिया गया एक कथानक है जिसके अनुसार जब ऋषियों ने आबू में यज्ञ करना आरंभ किया तो राक्षसों ने यज्ञ में मल-मूत्र, हड्डियां आदि अपवित्र वस्तुएं डालकर उसे अपवित्र करने की चेष्टा की। वसिष्ठ ऋषि ने यज्ञ की रक्षा के लिये मंत्र सिद्धि से चार पुरुष उत्पन्न किये जो प्रतिहार, परमार, चौलुक्य तथा चौहान कहलाये। मूथा नैणसी तथा सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी इसी कथानक को प्रमुखता दी है। इस कारण परवर्ती ख्यातकारों ने चाहमानों को अग्निवंशीय माना। आधुनिक काल के इतिहासकारों के अनुसार चौहान सूर्यवंशी अथवा चंद्रवंशी हो सकते हैं किंतु अग्निकुल का होने की बात गलत है।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार ये सूर्यवंशी भी नहीं हो सकते क्योंकि ऐसा तभी हो सकता है जब ये इक्ष्वाकुवंशी हों जबकि किसी भी सा्रेत से इनका इक्ष्वाकुवंशी होना सिद्ध नहीं होता है। इसलिये ये सूर्यवंशी नहीं हैं किंतु प्रतापी होने के कारण इन्हें सूर्यवंशी कहा जाने लगा। कर्नल टॉड ने इन्हें विदेशी माना है तथा अपने कथन के समर्थन में कहा है कि चाहमानों के रस्म और रिवाज मध्य एशियाई जाति के रस्म और रिवाज जैसे हैं। डॉ. स्मिथ तथा क्रुक ने भी इसी मत को स्वीकार किया है किंतु ओझा इस मत को स्वीकार नहीं करते।

    क्या चौहान मालवों की ही एक शाखा हैं ?

    अजमेर के सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज चतुर्थ के समय का एक शिलालेख मिला है जो अब राजपूताना म्यूजियम में सुरक्षित है। इस शिलालेख में चौहानों के आदि पुरुष चाहमान की स्तुति इन शब्दों में की गई है- 'सूर्य देव आपकी रक्षा करें......उससे (सूर्य से) मालवों (के वंश में) एवं अपने मार्ग से स्खलित मनुष्यों के लिये दण्ड विधान की व्यवस्था करने वाला उत्पन्न हुआ। वह देव वंश से उत्पन्न अन्य राजाओं के द्वारा अनुगमन किये जाने वाला था। वह घ्रुण कीट की तरह छिद्रान्वेषी नहीं था। वह सूर्य वंश के अरण्य में कदम्ब शाख पर उत्पन्न हुआ था। सबको आश्चर्य में डालने वाला यह कुश का वंश, याचकों के लिये फलप्रद था। उसकी प्रजा आधि-व्याधि, दुश्चरित्र, दुर्गति से मुक्त थी। उसके राजा इक्ष्वाकु रामादि की तरह सप्त भुजाओं वाली पृथ्वी का पालन करने वाले हुए। उसी वंश में दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर राजाओं से अनुरंजन प्राप्त करने वाला चाहमान उत्पन्न हुआ।'

    इस शिलालेख में चौहानों के मूल पुरुष एवं वंश के बारे में तीन मुख्य बातें कही गई हैं- (1.) चौहानों का आदि पुरुष मालव वंश में उत्पन्न हुआ था। (2.) चौहानों का आदि पुरुष सूर्य वंश के इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न हुआ था। (3.) चौहानों का आदि पुरुष भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंश में उत्पन्न हुआ था। (4.) चौहानों का आदि पुरुष चाहमान था।

    इस शिलालेख में चौहान शासकों के मूल पुरुष का मालव वंश की ओर संकेत करना अत्यंत महत्वपूर्ण जान पड़ता है। क्योंकि मालव जाति ने प्रथम शताब्दी ईस्वी के अंत तक वर्तमान अजमेर जिले की सीमा पर वर्तमान जयपुर तथा टोंक नगरों के आसपास अपना स्वतंत्र गणराज्य स्थापित किया था। अतः पर्याप्त संभव है कि पांच सौ वर्षों में मालव नागौर, सांभर तथा अजमेर आदि क्षेत्रों में विस्तृत हो गये हों। यह भी पर्याप्त संभव है कि मालवों में से ही चाहमान नाम का कोई राजा या राजकुमार हुआ हो और उसके वंशजों से चौहानों की अलग शाखा चली हो।


    सातवीं शताब्दी में अजमेर

    अजमेर के इतिहास का पहला चरण

    सातवीं शताब्दी में अजमेर की स्थापना के साथ ही अजमेर के इतिहास का प्रथम चरण आरंभ होता है जो ई.1196 में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ समाप्त होता है। इस पूरी अवधि में अजमेर शाकम्भरी राज्य की राजधानी रहा तथा अजमेर के चौहान शासक मुसलमान आक्रांताओं को दिल्ली एवं अजमेर से से बाहर रखने के लिये संघर्ष करते रहे। यह पूरी शताब्दी अजमेर के चौहान शासकों के स्वर्ण काल की गाथा कहती है।

    अजयपाल

    ई.683 के आसपास अजयपाल अजमेर का राजा हुआ। उसने अजमेर नगर की स्थापना की। अपने अंतिम वर्षों में वह अपना राज्य अपने पुत्र को देकर पहाड़ियों में जाकर तपस्या करने लगा। हर बिलास शारदा के अनुसार अजयपाल अपनी वृद्धावस्था में फॉय सागर से चार मील दक्षिण में अजयपाल घाटी में जाकर रहा। अजमेर में अजयपाल की पूजा अजयपाल बाबा के नाम से होती है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में छठी तिथि अजयपाल बाबा की तिथि मानी जाती है। इस दिन यहाँ पर एक मेला भरता है जिसमें अजमेर नगर के लोग उस स्थान पर जाकर श्रद्धांजलि देते हैं जहाँ राजा अजयपाल के अंतिम दिन व्यतीत हुए थे। लोगों का विश्वास है कि अजयपाल बाबा, अजमेर के भाग्य के स्वामी हैं तथा बीमारियों, सर्पों एवं जानवरों से लोगों की रक्षा करते हैं।

    विग्रहराज (प्रथम) से गोविंदराज (प्रथम)

    अजयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहराज (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। विग्रहराज (प्रथम) के बाद विग्रहराज (प्रथम) का पुत्र चंद्रराज (प्रथम), चंद्रराज (प्रथम) के बाद विग्रहराज (प्रथम) का दूसरा पुत्र गोपेन्द्रराज अजमेर का राजा हुआ। इसे गोविंदराज (प्रथम) भी कहते हैं। यह मुसलमानों से लड़ने वाला पहला चौहान राजा था। उसने मुसलमानों की सेनाओं को परास्त करके उनके सेनापति सुल्तान बेग वारिस को बंदी बना लिया।

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  • अंग्रेजों ने भारी मन से भारत से विदा होने का मन बनाया!

     03.06.2020
    अंग्रेजों ने भारी मन से भारत से विदा होने का मन बनाया!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    युद्ध समाप्ति की पृष्ठ भूमि में भेजे गये कैबीनेट मिशन की असफलता के बाद ब्रिटिश सरकार पर भारत को स्वतंत्र करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव पड़ने लगा। ब्रिटेन की संसद में विपक्ष के नेता विंस्टन चर्चिल किसी भी सूरत में भारतीय स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे किंतु उन्होंने भी अमरीकी दबाव में स्वीकार किया कि भारतीयों को आजादी देनी पड़ेगी जिसकी आशा में भारतीयों ने अंग्रेजों की ओर से युद्ध में भाग लिया था। रूस और चीन भी इंग्लैण्ड पर दबाव डाल रहे थे कि इंग्लैण्ड युद्ध के समय किया गया वायदा निभाये तथा भारत को स्वतंत्रता दे। इन सब कारणों से इंगलैण्ड सरकार ने भारी मन से भारत को स्वतंत्रता देने का मन बनाया।


    20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ''हाउस ऑफ कॉमन्स" में घोषणा की कि जून 1948 तक भारत की एक उत्तरदायी सरकार को सत्ता हस्तांतरित कर दी जायेगी। स्वयं ब्रिटेनवासियों के लिये यह एकदम अप्रत्याशित था कि भारत को इतनी शीघ्र आजादी दी जाये। एटली की घोषणा में कहा गया था कि महामना सम्राट की सरकार ने पक्का निश्चय कर लिया है कि वह जून 1948 तक भारत में उत्तरदायी लोगों को सत्ता हस्तांतरित कर देगी।.......सरकार भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान जिसमें सभी भारतीयों की सहमति हो, भारत में लागू करने की संसद में संस्तुति करेगी। यदि जून 1948 तक इस प्रकार का संविधान, संविधान सभा द्वारा नहीं बनाया गया तो ब्रिटिश सरकार यह सोचने के लिये विवश होगी कि ब्रिटिश भारत में केंद्र की सत्ता किसको सौंपी जाये? क्या यह नयी केंद्रीय सरकार को या कुछ क्षेत्रों में प्रांतीय सरकारों को? या फिर किसी अन्य उचित माध्यम को भारतीय जनता के सर्वोच्च हित के लिये दी जाये.......।

    इस घोषणा में राज्यों के सम्बन्ध में कहा गया था कि महामाना सम्राट की सरकार की यह मंशा नहीं है कि परमोच्चता के अधीन राज्यों की शक्तियां तथा दायित्व ब्रिटिश भारत में किसी अन्य सरकार को सौंपी जायें। यह मंशा भी नहीं है कि सत्ता के अंतिम हस्तांतरण की तिथि के पूर्व तक परमोच्चता को बनाये रखा जाये। अपितु यह विचार किया गया है कि अंतरिम काल के लिये राज्यों के साथ ब्रिटिश ताज के सम्बन्ध किसी समझौते के द्वारा समायोजित किये जा सकते हैं।

    इस बयान का राजाओं द्वारा एक स्वर से स्वागत किया गया। नवाब भोपाल ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि जब अंग्रेज चले जायेंगे तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा राज्य स्वतंत्र हो जायेंगे। त्रावाणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी का मानना था कि प्रधानमंत्री एटली के इस बयान के अनुसार सत्ता के अंतिम हस्तांतरण के बाद राज्य स्वतंत्र राजनीतिक इकाईयां बन जायेंगे जो कि नयी सरकार के साथ वार्ताओं के माध्यम से व्यवस्थाएं करेंगे तथा नवीन भारतीय व्यवस्था में अपनी स्थिति को प्राप्त करेंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री के बयान का इस प्रकार विश्लेषण किया कि महामना सम्राट की सरकार का मानना है कि वर्तमान संविधान सभा पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती है तथा वह कैबीनेट मिशन की योजना के अनुसार काम नहीं कर रही है। उन्होंने एक अन्य प्रेस वार्ता में दावा किया कि एटली के बयान ने कैबीनेट मिशन योजना को आच्छादित (सुपरसीड) कर लिया है तथा उसने राज्यों को खुला छोड़ दिया है ताकि राज्य तत्काल ही अपने आंतरिक एवं बाह्य मामालों को इस प्रकार मान्यता दें कि ब्रिटिश भारत से बराबर के स्तर पर वार्ता करने के लिये 10 या 12 से अधिक इकाईयां न हों।

    मोसले ने लिखा है- विंस्टल चर्चिल (पूर्व प्रधानमंत्री एवं तत्कालीन प्रतिपक्ष के नेता) जिसके लिये कांग्रेस एक भीड़ थी और गांधी एक उपद्रवी था, इस घोषणा को सुनकर सूखी घास पर गिरे बम की तरह भड़क उठा। उसने कहा कि इन तथाकथित राजनीतिज्ञों के हाथों में हिन्दुस्तान की बागडोर देकर ऐसे लोगों के हाथों शासन सौंपा जा रहा है जिनका कुछ वर्षों में कोई चिह्न नहीं रह जायेगा। उसने सलाह दी कि एक तिथि निश्चित करने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता ली जानी चाहिये। चर्चिल ने यह भी कहा कि दुश्मनों में से बहुतों ने इंगलैण्ड की रक्षा की है किंतु स्वयं अपने ही हाथों से इंगलैण्ड को कौन बचा सकता है? शर्मनाक पलायन, समय से पहले की इस भाग दौड़ में कम से कम हम उस दुख दर्द में योगदान न दें जो हममें से बहुतों को कचोट रहा है, शर्म की रेखा और रंग तो न बढ़ायें।

    भारत में आजादी का आंदोलन तथा सांप्रदायिक तनाव जिस चरम पर पहुंच चुके थे उन्हें देखते हुए अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में और उसके बाहर चर्चिल की चिल्लाहट को सुनने वाला कोई नहीं रह गया था। भारत बारूद के ढेर पर आ खड़ा हुआ था।

    मोसले ने लिखा है कि जिन्ना और मुस्लिम लीग कांग्रेस पर अविश्वास करते थे तथा कांग्रेस वायसराय पर अविश्वास करती थी। वायसराय को भी इंगलैण्ड की सरकार पर अविश्वास था और एटली की वायसराय वेवल में आस्था नहीं रही थी। सरदार पटेल को विश्वास था कि देश में गृहयुद्ध की संभावना रोकने और हिंदू मुसलमानों के बीच सद्भावना पनपने की चिंता में वेवेल भारत को और दस वर्ष तक अंग्रेजी शासन के तले रखेगा। ऐसी स्थिति में मि. एटली और क्रिप्स ने भारत की आजादी को कार्यरूप देने के लिये वेवल के स्थान पर माउन्टबेटन को भारत का वायसराय नियुक्त किया।

    लार्ड माउंटबेटन भारत में ब्रिटिश क्राउन के बीसवें और अंतिम प्रतिनिधि थे। उनका पूरा नाम लुई फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकॉलस माउंटबेटन था। वे इंगलैण्ड की उसी महारानी के प्रपौत्र थे जिसने कैसरे हिंद की उपाधि धारण करके भारत को अपने साम्राज्य में शामिल करने का उद्घोष किया था। लुई माउंटबेटन के पिता एक जर्मन मूल के ब्रिटिश थे जो रॉयल नेवी में चीफ के पद तक पहुंच कर विश्वयुद्ध के समय अपने पद से हटाये गये थे। ये लोग जर्मनी के बेटनबर्ग के रहने वाले थे इसलिये प्रारंभ में अपना उपनाम बेटनबर्ग लिखा करते थे किंतु बाद में ये लोग माउंटबेटन उपनाम लिखने लगे। अपने पिता की तरह लुई माउंटबेटन भी रॉयल नेवी में अधिकारी बने और रीयर एडमिरल के पद तक जा पहुंचे थे। उनकी महत्वाकांक्षा थी कि वे उस पद तक पहुंचें जिस पद से उनके पिता को अपमानजनक परिस्थितियों में हटाया गया था।

    मोसले ने लिखा है कि माउंटबेटन में भारतीय रजवाड़ों के लिये न तो प्रशंसा का भाव था न धैर्य, उनमें जो सबसे अच्छे थे उन्हें वह अर्धविकसित तानाशाह समझते थे और जो सबसे खराब थे उन्हें गया-बीता और चरित्रहीन! माउंटबेटन का मानना था कि कांग्रेस की बढ़ती हुई ताकत को देखकर भी रजवाड़ों ने अपने प्रशासन में किसी तरह की प्रजातंत्रात्मक प्रणाली शुरू नहीं की। 1935 में अवसर था किंतु वे भारत संघ में सम्मिलित नहीं हुए। इन हरकतों के कारण माउंटबेटन उन्हें मूर्खों की जमात कहते थे।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 32

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 32

    कागजों से बाहर आने लगा बँटवारा


    भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

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    4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वाधीनता विधेयक प्रस्तुत किया गया। 15 जुलाई को वह बिना किसी संशोधन के हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा और 16 जुलाई को हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा पारित कर दिया गया। 18 जुलाई 1947 को उस पर ब्रिटिश सम्राट के हस्ताक्षर हो गए। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की कुल 20 धाराएं थीं, जिनका सारांश इस प्रकार है-

    (1) ब्रिटिश सरकार द्वारा सत्ता हस्तांतरित करने से 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वाधीन सम्प्रभु अधिराज्य (डोमिनियन) अस्तित्व में आएंगे।

    (2) पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान, उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त, असम का सिलहट जिला, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल होंगे। शेष प्रांत भारतीय अधिराज्य में रहेंगे। सत्ता हस्तांतरण की तिथि को देशी राज्यों से परमोच्चता विलोपित हो जायेगी तथा देशी राज्यों एवं ब्रिटिश ताज के मध्य समस्त संधियां एवं व्यवस्थाएं समाप्त हो जायेंगी। देशी रियासतें अपना निर्णय स्वयं लेंगी कि वे भारत में सम्मिलित हों या पाकिस्तान में, या फिर दोनों से अलग रहें अथवा किसी या किन्ही अलग समूह या समूहों का निर्माण करें।

    (3) पाकिस्तान और भारत दोनों को अपना संविधान लागू करने की स्वतंत्रता होगी। ब्रिटिश राष्ट्र-मण्डल की सदस्यता दोनों देशों के लिए स्वैच्छिक होगी। 15 अगस्त के बाद दोनों अधिराज्यों में ब्रिटिश संसद का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाएगा।

    (4) दोनों अधिराज्य अपना पृथक् अथवा संयुक्त गवर्नर जनरल रख सकेंगे।

    (5) 15 अगस्त से ब्रिटिश सरकार का भारत सचिव पद सेवामुक्त हो जाएगा। सेना का आवंटन दोनों अधिराज्यों में होगा, हिज मेजस्टी की सेना विसर्जित हो जाएगी।

    भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम में भारत एवं पाकिस्तान को 'सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन अधिराज्य' (कम्पलीट सोवरीन डोमिनियन स्टेट) का दर्जा दिया गया किंतु डोमिनियन का वास्तविक अर्थ- 'ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल के अधीन स्वायत्तशासी देश' (सेल्फ गवर्निंग मेम्बर नेशन ऑफ द कॉमनवैल्थ) होता है। सम्पूर्ण-प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र को 'अधिराज्य' (डोमिनियन) नहीं कहा जाता। ब्रिटिश क्राउन चाहता था कि आजाद भारत को डोमिनियन स्टेटस दिया जाए किंतु भारतीय नेता चाहते थे कि भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राज्य के रूप में स्वतंत्रता दी जाए। इसलिए इस अधिनियम में दोनों शब्दों के एक साथ प्रयोग किया गया था।

    लॉर्ड माउंटबेटन को इस उद्देश्य के साथ भारत भेजा गया था कि वे 20 जून 1948 तक भारत को स्वतंत्र करके अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को भारत से निकालकर इंग्लैण्ड ले आएंगे किंतु माउण्टबेटन ने जिस तेज गति से काम किया था उसके कारण यह तिथि खिसककर और नजदीक आ गई थी और अब भारत की आजादी एवं विभाजन में एक माह से भी कम समय रह गया था। इस कारण देश में अफरा-तफरी, मार-काट और पलायन का सिलसिला तेज हो गया। हालांकि लोगों को यह ठीक से पता नहीं था कि भारत की सीमाएं कहाँ समाप्त होंगी और पाकिस्तान कहाँ से आरम्भ होगा! एन. वी. गाडगिल ने अपनी पुस्तक 'गवर्नमेंट फ्रॉम इनसाइड' में लिखा है- 'देश में मुख्य राजनीतिक शक्ति 'इण्डियन नेशनल कांग्रेस' थी और इसके नेता गण थके हुए लोग थे। उनको पिछले चालीस वर्ष के निरन्तर संघर्ष से होने वाले लाभ पर विश्वास नहीं था। उनको भविष्य के विषय में भी भरोसा नहीं था। वे इस बात से डरते थे कि यदि कुछ अधिक खींचा-तानी की गई तो सब-कुछ टूट-फूट कर विनष्ट हो जाएगा। परिणाम यह था कि पुराने बहादुर संघर्ष करने वाले भी समझौता करने पर तैयार थे और प्राप्त को खतरे में डालने की इच्छा नहीं रखते थे।'


    विभाजन कौंसिल का गठन

    विभाजन का काम दक्षता से निबटाने के लिये वायसराय की अध्यक्षता में एक विभाजन कौंसिल का गठन किया गया जिसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में एच. एम. पटेल तथा पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी मोहम्मद अली को रखा गया। उनकी सहायता के लिये बीस समितियां और उपसमितियां गठित की गयीं जिनमें लगभग सौ उच्च अधिकारियों की सेवाएं ली गयीं। इन समितियों का काम विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव तैयार करके अनुमोदन के लिये विभाजन कौंसिल के पास भेजना था।

    लैरी कांलिन्स तथा दॉमिनिक लैपियर ने इस विभाजन प्रक्रिया का बड़ा रोचक वर्णन किया है-'15 अगस्त के आने में अब ठीक 73 दिन बाकी बच रहे थे। तलाक के कागजात इस बीच हर सूरत में तैयार हो जाने चाहिए। कर्मचारियों को लगातार सावधान और चुस्त रखने के लिए माउण्टबेटन ने एक विशिष्ट कलैण्डर छपवाकर दिल्ली के प्रत्येक सम्बन्धित कार्यालय में लगवा दिया। उस कैलेण्डर का एक पन्ना रोज फाड़ा जाता। प्रत्येक पन्ने के बीचों-बीच लाल घेरे के अंदर वह आंकड़ा छपा दिखाई देता जो यह बताता कि 15 अगस्त के आने में अब कुल कितने दिन शेष रह गए हैं। मानो किसी अणु-विस्फोट की उलटी गिनती शुरू हो गई हो, इस प्रकार रोज एक-एक दिन गिना जा रहा था- और रोज एक-एक दिन कम हो रहा था।'

    उस अलौकिक भारतीय तलाक में, मालमत्ता के कागजात तैयार करने का भारी भरकम काम, आखिर जिन दो व्यक्तियों के कंधों पर आकर पड़ा, वे दोनों समान रुतबे के वकील थे। ...... उनमें से एक मुसलमान था और दूसरा हिन्दू ...... चौधरी मोहम्मद अली और एच. एम. पटेल क्रमशः मुसलमानों और हिन्दुओं के हितों की रक्षा करते हुए रोज फाइल पर फाइल निबटा रहे थे। लगभग एक सौ कर्मचारी जिन्हें बीसेक समितियों और उप समितियों में विभाजित किया गया था, रोज उन वकीलों को तरह-तरह की रिपोर्ट देते थे। उस आधार पर दोनों वकील जो अनुशंसा पत्र तैयार करते, उन्हें विभाजन कौंसिल के पास अंतिम अनुमोदन के लिए भेज दिया जाता। स्वयं वायसराय इस विभाजन कौंसिल के अध्यक्ष थे। ...... दोनों पार्टियों के बीच उग्रतम बहसें धन को लेकर हुईं। सबसे नाजुक प्रश्न उस उधारी का था, जिसे अंग्रेजों से वसूल करना आसान नहीं लग रहा था, क्योंकि उनका खजाना खाली था। ...... जब अंग्रेज भारत को छोड़ रहे थे, तब भारत के 500 अरब डॉलर उनकी तरफ निकलते थे। कर्ज का यह जबर्दस्त बोझ इंग्लैण्ड पर विश्व-युद्ध के दौरान चढ़ गया था। राष्ट्रीय उधारी के अलावा धन और भी कई रूपों में फंसा हुआ था। स्टेट बैंकों की नकदी। बैंक ऑफ इण्डिया के वाल्टों में रखी सोने की ईंटें। चुटकियों में सिर काट लेते नागाओं के बीच, झौंपड़ी में बस कर अपनी ड्यूटी निभा रहे जिला कमिश्नरों के पास रखी छोटी-छोटी रकमें देश भर में फैले डाक-घरों की स्टेशनरी इत्यादि का मूल्य। ...... कौंसिल द्वारा बैंकों, सरकारी विभागों तथा पोस्ट ऑफिस में रखे हुए रुपयों, सामान और यहाँ तक कि फर्नीचर के बंटवारे हेतु निर्णय लिये गये। बंटवारे में तय किया गया कि पाकिस्तान को बैंकों में रखी नकदी का और स्टर्लिंग शेष का 17.5 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होगा। यह भी तय किया गया कि पाकिस्तान को भारत के राष्ट्रीय कर्ज का 17.5 प्रतिशत हिस्सा चुकाना पड़ेगा। यह भी तय किया गया कि देश के विशाल सरकारी तंत्र में जो कुछ भी स्थानानंतरण द्वारा हटाया जा सकता है, उसका 80 प्रतिशत भारत को एवं 20 प्रतिशत पाकिस्तान को दिया जाये। ........ देश में कुल 18 हजार 77 मील लम्बी सड़कें तथा 26 हजार 421 मील रेल की पटरियां थीं। इनमें से 4 हजार 913 मील सड़कें तथा 7 हजार 112 मील रेल पटरियां पाकिस्तान के हिस्से में गईं। वायसराय की सफेद सुनहरी ट्रेन भारत के हिस्से में आयी, उसके बदले में भारतीय सेना के कमाण्डर इन चीफ तथा पंजाब के गर्वनर की सभी कारें पाकिस्तान को दे दी गयीं। वायसराय के पास सोने के पतरों वाली छः तथा चांदी के पतरों वाली छः बग्घियां थीं। इनमें से सोने के पतरों वाली बग्घियां भारत के हिस्से में आयीं तथा चांदी के पतरों वाली बग्घियां पाकिस्तान के हिस्से में गयीं।

    मोसले ने लिखा है- चार जजों के दो अलग-अलग बोर्ड पंजाब और बंगाल के लिए बनाए गए। हर बोर्ड में दो जज भारत की ओर से और दो पाकिस्तान की ओर से रखे गए। दो जजों को छोड़कर शेष सभी जज हिन्दुस्तान की हाईकोर्ट के जज थे। सर सिरिल की देखरेख में सी. सी. बिस्वास और बी. के. मुखर्जी (कांग्रेस की ओर से) तथा सालेह मोहम्मद अकरम और एम. ए. रहमान (मुस्लिम लीग की ओर से) बंगाल का बंटवारा करेंगे। मेहरचंद महाजन और तेजसिंह (कांग्रेस की ओर से) और दीन मोहम्मद तथा मोहम्मद मुनीर (मुस्लिम लीग की ओर से) पंजाब का बंटवारा करेंगे।


    दो वैकल्पिक सरकारें

    भारत में चुनी हुई वैधानिक संसद के अस्तित्व में नहीं होने से संविधान सभा को ही संसद तथा संविधान सभा का दोहरा दर्जा दिया गया। विभाजन से पहले भारत में जो अंतरिम सरकार चल रही थी उसमें से लॉर्ड माउंटबेटन ने दो वैकल्पिक सरकारों का निर्माण किया जो 15 अगस्त को अस्तित्व में आने वाले दोनों देशों के प्रशासन को संभाल सकें। ई.1935 के भारत सरकार अधिनियम में सुविधापूर्ण सुधार करके भारत में ई.1947 से ई.1950 तक तथा पाकिस्तान में ई.1947 से 1956 तक संविधान का काम लिया गया।


    भारतीय सेना का विभाजन

    अंग्रेजों के समय भारत की सेना विश्व की विशाल सेनाओं में से एक थी। भारतीय सेना न केवल प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में अपितु समय-समय पर होने वाले चीन युद्ध, बॉक्सर युद्ध आदि में भी लड़ने जाती रहती थीं। युद्ध समाप्ति के बाद भी भारत की सेना में लगभग 25 लाख सैन्य अधिकारी एवं सैनिक थे किंतु युद्ध के कारण इंग्लैण्ड सरकार की आर्थिक स्थिति खराब हो जाने से भारत की सेनाओं में भारी कटौतियां की गईं। यही कारण था कि ई.1947 में भारत विभाजन के समय भारत की सेनाओं में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, गोरखा, एंग्लोइण्डियन एवं आदिवासी आदि समस्त जातियों के सैन्य अधिकारियों एवं सैनिकों की संख्या केवल 12 लाख के आसपास रह गई थी। इनका भी बंटवारा किया गया।

    हिन्दू, सिक्ख एवं ईसाई सैनिकों के लिए अपने देश के चयन का निर्णय करना बहुत आसान था। उन्हें भारत में ही रहना था क्योंकि जिन्ना के पाकिस्तान में उनके लिए जगह नहीं थी किंतु मुसलमान सैनिकों के लिए यह निर्णय बहुत हृदय विदारक था। देश-भक्ति के जज्बे से ओत-प्रोत हजारों मुस्लिम सैनिक भारत को ही अपना देश मानते आए थे, वे इस देश के लिए जीने-मरने की कसमें खाते आए थे, अब कुछ नेताओं की जिद पर वे अपने देश को छोड़कर जाने का निर्णय इतनी आसानी से कैसे कर सकते थे! इसलिए यद्यपि अधिकांश मुस्लिम सैनिक अपना भग्न-हृदय लेकर पाकिस्तान जाने के लिए तैयार हो गए तथापि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिकों ने भारत में रहने का ही संकल्प व्यक्त किया। भारत माता ने इन मुस्लिम सैनिकों को अपना पुत्र मानकर सहर्ष सीने से लगा लिया। यह इस्लाम के नाम पर उन्माद फैलाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उसके साथियों की करारी हार थी।


    पंजाब बाउण्ड्री फोर्स का गठन

    देश के विभाजन से पहले ही सरकार ने पंजाब बाउण्ड्री फोर्स का गठन किया। इसके लिए जारी आदेश में कहा गया कि पंजाब में शांति बनाए रखने के लिए दोनों सरकारों ने 1 अगस्त 1947 से विशेष सैनिक कमाण्ड स्थापित करने का फैसला किया है जो सियालकोट, गुजरांवाला, शेखपुरा, लायलपुरा, मौंटमुगरी, लाहौर, अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, फिरोजपुर और लुधियाना के जिलों में काम करेगा। दोनों सरकारों की सहमति से इसका फौजी कमाण्डर मेजर जनरल रीस नियुक्त किया गया है। भारत की ओर से ब्रिगेडियर दिगम्बरसिंह तथा पाकिस्तान की ओर से कर्नल अयूब खान सलाहकार के रूप में रहेंगे। 15 अगस्त के बाद दोनों नई सरकारों की फौज पर इन क्षेत्रों में मेजर जनरल रीस का नियंत्रण रहेगा जो सुप्रीम कमाण्डर और सम्मिलित सुरक्षा कौंसिल की मारफत दोनों सरकारों के प्रति जिम्मेदार रहेगा। यदि आवश्यकता समझी गई तो दोनों सरकारें बंगाल में भी ऐसे संगठन खड़े करने से नहीं हिचकेंगी। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स में 50 हजार सैनिक नियुक्त किए गए। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स के अधिकांश सैनिक चौथी हिन्दुस्तानी डिवीजन के थे। ये सैनिक द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इरिट्रिया, पश्चिमी रेगिस्तान और इटली, इसालियन पूर्वी अफ्रीका, अलामियेन, मोंटे केसीनो आदि देशों में मोर्चे संभाल चुके थे।


    कर्मचारियों के लिये विशेष रेल

    उच्च सरकारी अधिकारियों, सैनिक अधिकारियों, चपरासियों, रसोइयों, बाबुओं, हरिजनों आदि से एक फॉर्म भरवाकर उन्हें भारत सरकार में रहने या पाकिस्तान सरकार में जाने का विकल्प उपलब्ध कराया गया। पाकिस्तान जाने वाले कर्मचारियों और उनके साथ जाने वाले कागजों के लिये रेलवे ने 3 अगस्त 1947 से दिल्ली से करांची तक विशेष रेलगाड़ियों का संचालन किया। इन रेलगाड़ियों को लौटती बार में पाकिस्तान से भारत आने वाले कर्मचारियों को लेकर आना था। उस समय तक रेल गाड़ियां भयानक सांप्रदायिक उन्माद की चपेट में आ चुकी थीं। इसलिये स्टेट्समैन ने आम जनता से अपील की कि आम जनता गाड़ियों का उपयोग न करे। स्टेट्समैन को आशा थी कि कर्मचारियों की रेलगाड़ियां सुरक्षित रहेंगी किंतु स्टेट्समैन की उम्मीद से परे पाकिस्तान से कर्मचारियों को लेकर आने वाली रेलगाड़ियां भी सांप्रदायिक हमलों की चपेट में आयीं।


    रैडक्लिफ आयोग ने खींची विभाजन रेखा

    भारत एवं पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारण करने के लिये 27 जून 1947 को रैडक्लिफ आयोग का गठन किया गया। इसका अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ इंगलैण्ड का प्रसिद्ध वकील था। रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुंचा। उसकी सहायता के लिये प्रत्येक प्रांत में चार-चार न्यायाधीशों के एक बोर्ड की नियुक्ति की गयी। इन न्यायाधीशों में से आधे कांग्रेस द्वारा एवं आधे मुस्लिम लीग द्वारा नियुक्त किये गये थे। पंजाब के गवर्नर जैन्किन्स ने माउंटबेटन को पत्र लिखकर मांग की कि रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त से पूर्व अवश्य ही प्रकाशित कर देनी चाहिये ताकि लोगों की भगदड़ खत्म हो। भारत विभाजन समिति ने भी वायसराय से यही अपील की। रैडक्लिफ जहाँ भी जाता लोग उसे घेर लेते और अपने पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश करते। रैडक्लिफ की कलम का एक झटका उन्हें जमा या उखाड़ सकता था। उस अंग्रेज को प्रसन्न करने के लिये वे किसी भी सीमा तक कुछ भी कर सकते थे। रेडक्लिफ पर नक्शों, दरख्वास्तों, धमकियों और घूस की बारिश होने लगी। उसकी रिपोर्ट 9 अगस्त 1947 को तैयार हो गयी किंतु माउण्टबेटन ने उसे 17 अगस्त को उजागर करने का निर्णय लिया ताकि स्वतंत्रता दिवस के आनंद में रसभंग की स्थिति न बने। इस कारण पंजाब और बंगाल में असमंजस की स्थिति बनी रही। रैडक्लिफ के काम से न तो भारतीय नेता प्रसन्न हुए और न ही पाकिस्तानी नेता। दोनों ने ही जमकर रैडक्लिफ की आलोचना की। इससे रुष्ट होकर रैडक्ल्फि ने पारिश्रमिक के रूप में निश्चित की गयी दो हजार पौण्ड की राशि को लेने से मना कर दिया।

    विभाजन रेखाअएं खींचते समय सिरिल रैडक्लिफ ने सर्वाधिक गौर इसी पर किया था कि बहुसंख्य जनता का धर्म क्या है। फलस्वरूप जो विभाजन रेखा खींची गई, वह तकनीकी दृष्टि से सही थी किंतु व्यावहारिक दृष्टि से सत्यानाशी। ...... बंगाल की विभाजन रेखा ने दोनों भागों को एक आर्थिक अभिशाप दिया। विश्व का 85 प्रतिशत पटसन जिस क्षेत्र में पैदा होता था, वह पाकिस्तान को मिला लकिन वहाँ एक भी ऐसी मिल नहीं था जहाँ पटसन की खपत हो सकती थी। उसकी सौ से भी ज्यादा मिलें कलकत्ता में थीं। यह महानगर भारत के हिस्से में आया किंतु पटसन नहीं। ....... पंजाब की विभाजन रेखा काश्मीर की सरहद पर स्थित एक घने जंगल के बीच से शुरू हुई जहाँ से ऊझ नामक नदी की पश्चिमी धारा पंजाब में प्रवेश करती है। जहाँ-जहाँ संभव हुआ, विभाजन रेखा ने रावी और सतलुज नदियों का पीछा किया। दो सौ मील दक्षिण में उतरकर उसने भारतीय मरुभूमि को छुआ। लाहौर पाकिस्तान को मिला और अमृसर अपने स्वर्ण-मंदिर के साथ भारत के हिस्से में आया।


    ताजमहल को पाकिस्तान ले जाने की मांग

    भारत विभाजन की तिथि घोषित हो जाने के बाद पाकिस्तान जाने वाले कुछ मुसलमानों ने मांग की कि ताजमहल को तोड़कर पाकिस्तान ले जाना चाहिये और वहाँ फिर से निर्मित किया जाना चाहिये, क्योंकि उसका निर्माण एक मुगल ने किया था किंतु यह मांग कोई जोर नहीं पकड़ सकी।


    नए गवर्नर जनरलों की नियुक्ति

    भारत विभाजन के साथ ही अस्तित्व में आने वाले दो नवीन राष्ट्रों में राष्ट्राध्यक्षों की नियुक्ति का प्रश्न कम जटिल नहीं था। भारत के अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे तथा स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पद पर वही नियुक्त किए जाने थे किंतु गवर्नर जनरल एवं वायसराय की जगह किसी नए व्यक्ति को नियुक्त किया जाना था। पाकिस्तान में इन दोनों पदों में से एक पद पर मुहम्मद अली जिन्ना को एवं दूसरे पद पर किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाना था। भारतीय नेताओं ने लॉर्ड माउंटबेटन को ही स्वाधीन भारत का गवर्नर जनरल बनाए रखना स्वीकार किया किंतु माउंटबेटन ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड में भारतीय नेताओं की उदारता की धूम मच गई।

    प्रधानमंत्री एटली, विपक्ष के नेता विंस्टन चर्चिल तथा स्वयं ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज षष्ठम् ने माउंटबेटन को तार भेजकर निर्देश दिए कि वे भारतीय नेताओं के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें। इस प्रकार भावी स्वतंत्र भारत के लिए भावी गवर्नर जनरल के पद का निर्धारण अत्यंत गरिमामय ढंग से कर लिया गया। मुहम्मद अली जिन्ना ने भावी पाकिस्तान के गवर्नर जनरल के पद के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया तथा प्रधानमंत्री का पद लियाकत अली के लिए तय किया। माउण्टबेटन ने जिन्ना को याद दिलाया कि लोकतांत्रिक प्रणाली में शासन की समस्त शक्तियां प्रधानमंत्री में निहित होती हैं न कि गवर्नर जनरल में। जिन्ना ने कहा, पाकिस्तान में गवर्नर जनरल तो मैं ही होऊंगा तथा प्रधानमंत्री को वही करना होगा जो मैं कहूंगा। वायसराय की काउंसिल के सदस्य, संविधान सभा के सदस्य एवं अलवर राज्य के प्रधानमंत्री आदि विभिन्न पदों पर रहे हिन्दू महासभाई नेता नारायण भास्कर खरे ने अपनी पुस्तक मेरी देश सेवा के भाग-दो में 14 नवम्बर 1954 को टाइम्स ऑफ इण्डिया में प्रकाशित एक आलेख का हवाला दिया है।

    इसमें एक अमरीकी पत्रकार द्वारा लुई फिशर एवं गांधीजी के बीच हुए एक वार्तालाप का उल्लेख किया गया है जिसमें गांधीजी ने लुई फिशर से कहा- 'जब मैं हिन्दुस्तान का वायसराय होऊंगा, तब दक्षिण अफ्रीका के गोरों को अपनी कुटिया में बुलाऊंगा और कहूंगा कि आप लोगों ने मेरे लोगों को कुचला है किंतु मैं आपका अनुसरण नहीं करूंगा। मैं आपके साथ उदारता का व्यवहार करूंगा। मैं आपके समान कालों को लिंच करके नहीं मारूंगा। आपकी ओर भयंकर क्रूरता है। एक गोरा मारा गया तो सब का सब गांव नष्ट कर दिया जाता है।' इस तरह कुछ और भी उदाहरणों के साथ नारायण भास्कर ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि गांधीजी के मन में 'स्वदेशी-वायसराय' बनने की इच्छा थी। जब भारत को स्वतंत्रता मिली तब एक भी मंच से यह बात नहीं उठी। उस समय गांधीजी की आयु 78 वर्ष हो चुकी थी तथा वे शारीरिक रूप से इतने कमजोर हो चुके थे कि वे मनु, आभा तथा सुशीला बेन आदि का सहारा लिए बिना चल भी नहीं पाते थे।

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  • अजमेर का इतिहास - 6

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 6

    अजमेर के चौहान शासक (3)


    आठवीं शताब्दी में अजमेर

    दुर्लभराज (प्रथम)

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    गोविंदराज (प्रथम) के बाद दुर्लभराज (प्रथम) अजमेर का राजा हुआ। इसे दूलाराय भी कहते हैं। जब प्रतिहार शासक वत्सराज ने बंगाल के शासक धर्मपाल पर चढ़ाई की तब दुर्लभराज, प्रतिहारों के सेनापति के रूप में इस युद्ध में सम्मिलित हुआ। उसने बंगाल की सेना को परास्त कर अपना झण्डा बंगाल तक लहरा दिया। दुलर्भराय का गौड़ राजपूतों से भी संघर्ष हुआ। दुर्लभराज पहला राजा था जिसके समय में अजमेर पर मुसलमानों का सर्वप्रथम आक्रमण हुआ।

    खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई। यह आक्रमण अत्यंत भयानक था। इस युद्ध में संभवतः कुछ प्रमुख चौहानों ने दुर्लभराज का साथ नहीं दिया। इस कारण दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने युद्ध में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया। चौहान रानियों ने जौहर का आयोजन किया। दुर्लभराज का युद्धक्षेत्र में ही वध कर दिया गया। तारागढ़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। दूल्हराय का छोटा भाई माणक राय सांभर भाग गया। वहाँ उसने शाकम्भरी देवी का मंदिर बनवाया।


    सम्मत सात सौ इकतालीस मालत पाने बीस।

    सांभर आया तात सरस माणक राय सर लीस।

    -पृथ्वीराज रासौ।


    कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर पर यह आक्रमण ई.724 से ई.726 के बीच, अब्दुल रहमान अल मारी के पुत्र जुनैद के नेतृत्व में हुआ जो खलीफा हाशम (ई.724 से ई.743) के अधीन, सिंध का कमाण्डर था। आक्रमण की यह तिथि अन्य साक्ष्यों से मेल नहीं खाती। अवश्य ही यह आक्रमण बाद के वर्षों में हुआ होगा। (दुर्लभराज प्रथम ई.724 में मृत्यु को प्राप्त हुआ, उसका पुत्र गूवक प्रथम हुआ जिसे ई.805 में नागावलोक की सभा में सम्मनित किया गया। इन दोनों तिथियों में 81 साल का अंतर है। यदि दुर्लभराज की मृत्यु के समय गूवक प्रथम की आयु 1 वर्ष भी हो तो नागावलोक की सभा में सम्मानित होते समय उसकी आयु 82 वर्ष ठहरती है। उस युग में किसी राजा का 81 वर्ष तक शासन करना एक कठिन जान पड़ने वाली बात है।)

    राजकुमार लोत का वध

    इस युद्ध में दुर्लभराज का सात वर्षीय पुत्र लोत एक तीर लगने से मर गया। वह शस्त्र लेकर युद्ध भूमि में लड़ रहा था। इस घटना ने उन चौहानों को बहुत प्रभावित किया जो अजमेर के युवा राजा दूलाराय की अवज्ञा कर रहे थे। जिस दिन राजकुमार लोत मारा गया, उस दिन को पवित्र दिन माना गया तथा राजकुमार लोत की प्रतिमा बनाकर देवताओं की तरह पूजी गई। लोत का निधन ज्येष्ठ माह की द्वादशी को सोमवार के दिन हुआ।

    राजा माणिकपाल (राय)

    कर्नल टॉड के अनुसार सिन्ध से किसी शत्रु ने अजमेर पर आक्रमण करके वहाँ के राजा माणिकपाल (राय) का वध किया। कुछ समय बाद हर्षराय चौहान ने नासिरुद्दीन से अजमेर छीन लिया। यह पर्याप्त संभव है कि अजमेर कुछ समय तक मुसलमानों के अधिकार में रहा। उस समय दुर्लभराज का भाई माणिकपाल जिसने कि संभवतः दुर्लभराज का साथ नहीं दिया था, अजमेर के पतन के बाद सांभर में जाकर रहा। पर्याप्त संभव है कि मुसलमानों ने सांभर पर भी आक्रमण किया हो तथा माणिकपाल भी मुसलमानों के हाथों मारा गया हो। इस युद्ध के बाद के किसी काल में दुर्लभराज प्रथम के पुत्र गूवक (प्रथम) ने तारागढ़ पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में किया होगा। टॉड ने मुलसमानों से अजमेर लेने वाले राजा का नाम हर्षराय लिखा है। यह हर्षराय, गूवक (प्रथम) की उपाधि जान पड़ती है। क्योंकि गूवक के पूर्ववर्ती राजा माणिकपाल के नाम में भी राय लगा हुआ है तथा बारहवीं शताब्दी में पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा कहा जाता था। हर्ष, भगवान शिव का नाम है जो कि अजमेर के चौहानों द्वारा पूज्य थे। गूवक ने अनंत क्षेत्र में हर्ष का मंदिर बनवाया था। संभवतः इसी से उसे हर्षराय कहा जाता था।

    अजमेर स्थित एक छतरी में ई.760 का शिलालेख उत्कीर्ण है जिसमें जैन मुनि रत्नकीर्ति के अनुयायी हेमराज की मृत्यु होने का उल्लेख है। इस छतरी में किसी राजा का उल्लेख नहीं किया गया है।


    नौवीं शताब्दी में अजमेर

    गूवक (प्रथम)

    दुर्लभराज प्रथम (दूलाराय) के बाद उसका पुत्र गूवक (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। संभवतः उसी ने आठवीं शताब्दी के किसी कालखण्ड में, मुसलमानों से अजमेर पुनः छीनकर अजमेर का उद्धार किया। वह सुप्रसिद्ध योद्धा हुआ। ई.805 में कन्नौज के शासक नागावलोक (नागभट्ट द्वितीय) की राजसभा में गूवक को वीर की उपाधि दी गई। गूवक (प्रथम) ने अनंत प्रदेश (वर्तमान में राजस्थान का सीकर जिला) में अपने अराध्य हर्ष महादेव का मंदिर बनवाया।

    चंद्रराज (द्वितीय) तथा गूवक (द्वितीय)

    गूवक (प्रथम) के बाद उसका पुत्र चंद्रराज (द्वितीय) अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक (द्वितीय) अजमेर का राजा हुआ। उसकी बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज (प्रथम) के साथ हुआ।

    चंदनराज

    गूवक द्वितीय के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा उसके राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिया। चंदनराज की रानी रुद्राणी ने पुष्कर के तट पर एक सहस्र शिवलिंगों की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की।

    वाक्पतिराज

    चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। उसका राज्य समृद्ध था। उसने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची। वह एक महान योद्धा था। उसने 188 युद्ध जीते।

    चित्तौड़ की सहायता

    ई.753 के आसपास अजमेर के निकट जूनिया, सावर, देवलिया और श्रीनगर में गौड़ राजपूतों की जागीरें थीं। जिस समय बगदाद के खलीफा अलमामूं ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की उस समय चित्तौड़ पर खुंमाण (द्वितीय) का शासन था। (अब्बासिया खानदान का अलमामूं ई.813 से 833 तक बगदाद का खलीफा रहा। खुमांण (द्वितीय) ई.812 से 836 के बीच चित्तौड़ का शासक रहा।) खुंमाण की सहायता के लिये तथा चित्तौड़ की रक्षा के लिये काश्मीर से सेतुबंध तक के अनेक राजा चित्तौड़ आये। उनमें अजमेर से गौड़ों का आना लिखा है। भाटों ने इस युद्ध में तारागढ़ से रैवरों का खुमाण की सहायता के लिये आना लिखा है। यह तारागढ़ कौनसा है तथा रैवर कौनसे हैं, कहा नहीं जा सकता। अजमेर से प्राप्त कुछ छतरियों में ई.845, 854 तथा 871 की तिथियों के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिनमें जैन भट्टाराकों का उल्लेख है।

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