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  • राहुल गांधी के झूठ से देश और आरएसएस का इतिहास नहीं बदल जाएगा

     03.06.2020
    राहुल गांधी के झूठ से देश और आरएसएस का इतिहास नहीं बदल जाएगा


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    मेरा दागिस्तान की भूमिका में, कज्जाक लेखक रसूल हमजातोव ने अबू तालिब का एक कोटेशन लिखा है- यदि तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा। यह एक साहित्यकार द्वारा जीवन के अनुभव के आधार पर लिखा गया दार्शनिक सत्य है। मेरा विश्वास है कि कांग्रेसी मित्र इसमें किसी हिंसा के दर्शन नहीं करेंगे। आजकल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार इतिहास पर गोलियां दाग रहे हैं। उन्होंने कहा है कि आरएसएस ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ा। उन्होंने कहा है कि आरएसएस ने हमेशा अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि आरएसएस हर स्थान पर अपने आदमियों को बैठा रही है। उन्होंने कहा है कि आरएसएस-बीजेपी मिलकर भारत के संविधान को बदलना चाहते हैं। उन्होंने वीर सावरकर का नाम लिए बिना उन पर भी कीचड़ उछाला है।

    राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों की सिलसिलेवार बात होनी चाहिए। आरएसएस का जन्म 1925 में हुआ। उस समय बाल गंगाधर तिलक के निधन को पांच साल हो चुके थे और कांग्रेस का नेतृत्व पूरी तरह मोहनदास गांधी और उनके साथियों के हाथों में था। उस समय जलियांवाला बाग में 484 लोगों को शहीद हुए 6 साल हो चुके थे और कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसा का राग अलाप रही थी। कांग्रेस की पिलपिली नीतियों के कारण बंगाल और पंजाब में क्रांतिकारियों का आक्रोश अपने चरम पर पहुंच रहा था और वे भारत को स्वतंत्र कराने के लिए मरने-मारने पर आमादा थे।

    उन दिनों मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग को लेकर सड़कों पर हिन्दुओं का खून बहाने की तैयारियां जोर-शोर से कर रही थी। लीग की अपनी एक निजी सेना थी जिसमें लड़ने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था। हथियार एकत्र किये जा रहे थे और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को लीग की सेना में भर्ती किया जा रहा था। उसके दो संगठन बनाये गये, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड। नेशनल गार्ड मुस्लिम लीग का गुप्त संगठन था। उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र एवं मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और दंगों के समय लाठी, भाले और चाकू के इस्तेमाल के निर्देश दिये जाते थे। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को ‘‘सालार’’ कहा जाता था।

    ऐसी विचित्र परिस्थितियों में हिन्दु समाज की रक्षा के लिए आरएसएस का जन्म हुआ। खाकी खाकी नेकर पहनने वाले ये लोग हाथ में लाठी लेकर व्यायाम आदि करने के लिए एकत्रित होते थे और हिन्दू धर्म रूपी रत्न की मंजूषा की सुरक्षा के लिए अलख जगाने को तत्पर थे। आर एस एस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगवार का उद्देश्य आरएसएस के रूप में राजनीतिक संगठन खड़ा करना नहीं था, क्योंकि ऐसा करने से आरएसएस के रूप में कांग्रेस के समानांतर हिन्दुओं का अलग राजनीतिक संगठन खड़ा हो जाता और इससे देश के स्वतंत्रता आंदोलन में फूट जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती। 1925 से 1940 तक डॉ. हेडगवार और 1940 से 1973 तक माधव 
     राव सदाशिव राव गोलवलकर आरएसएस के माध्यम से हिन्दू समाज के सांस्कृतिक उत्थान के लिए कार्य करते रहे। यह कार्य आज भी जारी है। यही कारण था कि हेडगवार सहित आरएसएस के हजारों स्वयं सेवक व्यक्तिगत रूप से देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुए। 

    1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो आरएसएस के स्वयं सेवक हिन्दू जनता को मुस्लिम आक्रमणों से बचाने के लिए देश की सीमाओं पर जाकर खड़े हो गए। इस कारण हजारों निरीह हिन्दुओं के प्राण बचाए जा सके। काश्मीर रियासत को भारत में विलय करवाने में आरएसएस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सरदार पटेल के कहने पर गुरु गोलवलकर ने हरिसिंह को भारत में सम्मिलन के लिए तैयार किया। आगे चलकर जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने देश पर आई विपत्तियों में आरएसएस की सेवाएं लीं।

    1962 के भारत-चीन युद्ध में आरएसएस ने देश की सेना के साथ-कंधे से कंधा मिलाया। सैनिक मार्गों के रक्षण का कार्य आरएसएस को सौंपा गया। सेना को रसद उपलब्ध कराने तथा शहीदों के परिवारों को संभालने में आरएसएस की प्रमुख भूमिका रही। इस योगदान के परिणाम स्वरूप जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस को 1963 की दिल्ली की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। 1962 के चीन युद्ध में हालात ऐसे थे कि कम्यूनिस्ट पार्टियां भारत की हार और चीन की जीत का स्वप्न देख रही थीं और चीनी सेनाओं के लिए विजय मालाएं हाथ में लिए बैठी थीं। नेहरू के निमंत्रण पर आरएसएस के 3500 मजबूत स्वयं सेवकों ने परेड में भाग लेकर देश की नागरिक इच्छा शक्ति का अनूठा प्रदर्शन किया। उस परेड के चित्र आज भी उपलब्ध हैं।

    1965 के भारत-पाक युद्ध के समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सेना को युद्ध सामग्री उपलब्ध कराने में आरएसएस से सेवाएं प्राप्त कीं। शास्त्रीजी ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था एवं कानून व्यवस्था आरएसएस के हाथों में सौंप दी। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इंदिरा गांधी के समय आरएसएस देश का पहला और एक मात्र सबसे बड़ा संगठन था जिसने घायल सैनिकों के लिए रक्तदान शिविरों का आयोजन किया तथा घायल सैनिकों को रक्त की कोई कमी नहीं होने दी।

    गोलवलकर जी के निधन पर, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जिन भाव-भीने शब्दों में लोकसभा में उन्हें श्रद्धांजलि दी थी, उन शब्दों को कभी भुलाया नहीं जा सकता

    राहुल गांधी ने बीजेपी और आरएसएस पर संविधान बदलने की मंशा रखने का आरोप लगाया है। यह तो राहुल गांधी ही जानें कि ऐसा वे क्यों कह रहे हैं किंतु क्या जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने देश का संविधान नहीं बदला। इंदिरा गांधी ने तो संविधान से राजा राम, सीता और हिन्दू देवी देवताओं के चित्र हटा दिए। राजीव गांधी ने शाहबानो केस में संविधान में संशोधन कर दिया। तो क्या नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की प्रबल बहुमत से चुनी हुई सरकार को संविधान में संशोधन करने का अधिकार नहीं ?

    वीर सावरकर को लेकर राहुल गांधी ने जो कुछ कहा है, उसके सम्बन्ध में केवल इतना कहना पर्याप्त होगा कि दो-दो काले पानी की सजा भुगतने वाला तथा अपने सम्पूर्ण परिवार को राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए बलि चढ़ाने वाला देश का यह स्वंत्रता सेनानी अपनी तरह का पूरे विश्व इतिहास में अकेला उदाहरण है। वीर सावरकर के लिए कहा जाता है कि गांधीजी ने उतना चरखा नहीं चलाया होगा जितना वीर सावरकर ने अण्डमान की जेल में कोल्हू चलाया। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि राहुल गांधी के झूठ बोलने से देश और आरएसएस का इतिहास नहीं बदल जाएगा।

    -डॉ. मोहन लाल गुप्ता


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


     





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  • यहां तो हर माता दुखी दिखाई देती है !

     03.06.2020
    यहां तो हर माता दुखी दिखाई देती है !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत भले ही अपने आपको विश्व का भूतपूर्व जगद्गुरु कहकर मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में खोया रहे किंतु वास्तविकता यह है कि भारत में हर माता दुखी दिखाई दे रही है। हिन्दू माताएं चाहती हैं कि उनके बच्चे शराब न पियें किंतु उनकी कौन सुन रहा है! उत्तर प्रदेश में न्यायालय के आदेश से शराब की दुकानों को हाईवे से हटा दिया गया, किंतु वे कहाँ जायेंगी, इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। पता चले भी तो कैसे, न्यायालय ने तो कुछ बताया नहीं और सरकार को कुछ सूझता नहीं। इसलिये शराब की दुकानें चुपचाप रातों-रात हाईवे से चलकर गांव-कस्बों और नगरों के गली मुहल्लों में आकर सज गईं। बड़ी उम्र वाले तो हाईवे से शराब खरीद ही लाते थे, अब बच्चे भी खरीदने और पीने लगे। अब भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर से कह सकते हैं- देखी मेरे गरीबों की अमीरी!

    जब गांवों में शराब के भभके उठने लगे तो लगभग पूरे उत्तर प्रदेश की माताएं हाथों में डण्डे लेकर शराब की दुकानों पर पिल पड़ीं। जगह-जगह दंगों जैसी स्थिति बन गई। फंस गये बिचारे मुख्यमंत्री योगी। क्या करें? कैसे बंद करें शराब की दुकानों को? अभी-अभी तो किसानों के 30 हजार करोड़ रुपयों के कर्ज माफ करके बैठे हैं। सरकार तो पैसों से चलती है, शराब से मिलने वाला राजस्व, सरकार की कमाई का मोटा जरिया ठहरा। किशोर कांत जैसे चुतर सुजान अब आकर सरकारों को कोई नुस्खा क्यों नहीं सुझाते कि सांप कैसे मरे और लाठी कैसे बची रहे!

    कुल मिलाकर स्थिति ये है कि सरकार शराब बेचना बंद नहीं कर सकती। कोर्ट उन्हें हाईवे पर चलने नहीं दे सकती। माताएं उन्हें गांवों में रहने नहीं दे सकतीं। इसलिये मेरा सुझाव है कि सरकार जिला कलक्टर कार्यालयों की देखरेख में पुलिस थानों, आबकारी चौकियों और अस्पतालों में शराब बेचने की व्यवस्था करे। पता लग जायेगा कितने वीर-बहादुर शराब पी पाते हैं! पुलिस वाले, आबकारी वाले और अस्पताल वाले अपने आप इन लोगों से निबट लेंगे। आखिर अंग्रेजों ने कलक्टर नामक जो व्यवस्था स्थापित की थी उसका उसका मूल काम रेवेन्यू कलक्ट करना ही तो था! पर्यटन से जुड़ी सरकारी संस्थाएं तो वैसे भी शराब बेचती ही हैं।

    मुस्लिम माताएं इसलिये दुखी हैं कि वे तीन तलाक से मुक्ति चाहती हैं किंतु भाई लोग हैं कि मानते ही नहीं। कहते हैं कि इंसान इस मामले में कुछ नहीं कर सकता, ये तो उसका ही हुक्म है जिसने ये सारी कायनात बनाई है। यानी कि कोर्टों से भी ऊपर की कोर्ट। अरे बाप रे! अब उससे कौन उलझे! किंतु मुस्लिम माताएं अपनी बात पर अड़ी हुई हैं, कहती हैं कि ये सब मुल्ला मौलवियों का खोला हुआ धंधा है, ऊपर वाले का कोई हुकुम नहीं है, मुल्ला-मौलवी लोग ऊपर वाले के नाम पर अपनी रोटियां सेक रहे हैं। 

    गाय माता इसलिये दुखी है क्योंकि पुलिस और प्रशासन को वे ट्रक ही दिखाई ही नहीं पड़ते जिनमें गायें जिबह करने के लिये कत्लखानों को ले जाई जाती हैं। इसलिये राजस्थान जैसे शांत प्रदेश में भी 20 हजार के लगभग युवक हाथों में लाठियां लेकर, राज्य से बाहर जाने वाली सड़कों की दिन-रात निगहबानी करते हैं। गायों से भरा ट्रक दिखाई देने पर ये पुलिस को सूचना देते हैं। पुलिस की हालत ये है कि वह कानून से ज्यादा परम्परा का ध्यान रखती है इस कारण वह हमेशा घटना को पूरी घट लेने के बाद ही वहां पहुंचती है। यानी कि जब तक पुलिस, गौरक्षकों के फोन सुनकर वहां आती है, तब तक गौरक्षक और तस्करों के बीच मामला चरम पर पहुंच चुका होता है। जब कोई तस्कर मर जाता है तो लोग इन गौ-रक्षकों को गुण्डा कहने लगते हैं। 

    गौ-माता सब देख और समझ रही है कि इससे तो पहले वाला जमाना ही अच्छा था जिसमें गौ-माता की रक्षा के लिये प्राण हथेली पर रखने वाले गोगाजी पीर और तेजाजी वीर के नाम से पूजे जाते थे। 

    जब सरकार ने हर जिले में साक्षरता कार्यक्रम चलाया था तब गांव-गांव में जन सामान्य में से आखर दूत नियुक्त किये थे और स्थान-स्थान पर आखर देवरा बनाये थे। तो क्या जन सामान्य अपनी मर्जी से गौ-माता की रक्षा के लिये गौरक्षक नियुक्त नहीं कर सकता और गौरक्षा चौकियां नहीं बना सकता। सौ बातों की बात ये है कि पुलिस और प्रशासन गौ-तस्करों को पकड़ ही नहीं पा रहा, अन्यथा इन सब चीजों की नौबत ही नहीं आती। 

    सरकारी तंत्र को भले ही न हो, वोटों के उपासकों को भले ही न हो किंतु इन सब माताओं से भारत के आम आदमी की सहानुभूति है और रहेगी। 


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  • तो क्या धर्म निरपेक्षता का रंग हरा है !

     03.06.2020
    तो क्या धर्म निरपेक्षता का रंग हरा है !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    बरसों बीत गये बड़े-बड़े लोगों के मुंह से यह सुनते हुए कि धर्म का कोई रंग नहीं होता। जो लोग ये बात कहते थे, वे यह कहने में भी देर नहीं लगाते थे कि भगवा रंग धार्मिक कट्टरता फैलाता है। अक्सर यह सोचने पर विवश होना पड़ता था कि यदि धार्मिक कट्टरता का रंग भगवा है तो धर्म-निरपेक्षता का रंग कौन सा है!

    आज जाकर यह ज्ञात हुआ कि धर्मनिरपेक्षता का रंग हरा होता है। यदि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत सोमवार 10 अप्रेल को पटना नहीं गये होते तो मुझे आज भी यह बात पता नहीं चलती। मोहन भागवत जब पटना एयरपोर्ट से बाहर आए तो बिहार के एक संगठन ने हरे झण्डे लेकर मोहन भागवत का विरोध किया जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष स्वयं सेवक संघ कहता है।

    जब मोहन भागवत, बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के कदमकुआं स्थित आवास पहुंचे तो धर्मनिरपेक्ष स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने उन्हें वहां भी हरे झण्डे दिखाये तथा सुशील मोदी के घर के सामने देर तक मोहन भागवत के खिलाफ नारेबाजी करते रहे। इन कार्यकर्ताओं के केवल झण्डे ही हरे नहीं थे, उनके कुर्ते पायजामे और टोपी तक हरे थे। शायद कुर्ते पायजामे के नीचे भी हरे ही अन्तर्वस्त्र धारण कर रखे होंगे क्योंकि कोई अन्य रंग धर्मनिरपेक्ष लोगों को छू भी गया तो उनकी धर्मनिरपेक्षता भ्रष्ट हो जाने का खतरा रहता होगा।

    धर्मनिरपेक्ष स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता काफी देर तक झंडा लेकर वहीं डटे रहे। प्रदर्शन की खबर मिलने पर बिहार की धर्मनिरपेक्ष पुलिस भी कदमकुआं पहुंची और प्रदर्शनकारियों को भाई-बीरा करके मनाकर ले गई। तब तक वैसे भी मीडिया वाले फोटो खींच चुके थे और समाचार टेलिविजन पर फ्लैश होने आरम्भ हो गये थे। अचानक जिशान इमाम फातमी और चंदन यादव अड़ गये कि हम तो गिरफ्तारी देंगे। बिहार की धर्मनिरपेक्ष पुलिस ने उन्हें सुशील मोदी के घर के आगे से गिरफ्तार करके थाने ले जाकर छोड़ दिया, उन पर किसी तरह की एफआईआर दर्ज नहीं की गई।

    पाठकों को याद होगा कि बरसों पहले एक फिल्मी गीत लिखा गया था जो आज भी पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी को रेडियो-टीवी पर बजता है- रंग हरा है हरिसिंह नलवे से, रंग बना बसंती भगतसिंह, रंग अमन का वीर जवाहर है। जानते हैं न हरे रंग वाले सरदार हरिसिंह नलवा के बारे में! नहीं जानते तो हम बताते हैं।

    हरिसिंह नलवा का जन्म ईस्वी 1791 में अविभाजित पंजाब में हुआ। वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना के अध्यक्ष थे। हरिसिंह ने पठानों के विरुद्ध हुई बहुत सी लड़ाईयों का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में सिख फौज ने कश्मीर पर विजय प्राप्त कर उसे सिख राज्य में सम्मिलित किया। यही नहीं, काबुल पर भी विजय प्राप्त की। खैबर दर्रे से होने वाले अफगान आक्रमणों से देश को मुक्त किया। ईस्वी 1837 में वे जमरूद के युद्ध में लड़ते हुए शहीद हुए। यह वही मोर्चा था जहां मारवाड़ के बहु-चर्चित महाराजा जसवंतसिंह भी अफगानियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। हरिसिंह नलवा की तुलना भारत के श्रेष्ठ सेनानायकों से की जाती है।

    यहाँ हरिसिंह नलवा की चर्चा इसलिये कि गीतकार के अनुसार भारतीय तिरंगे का हरा रंग इसी हरिसिंह नलवा का प्रतीक है, तो अब यह समझ में नहीं आता कि यह हरा रंग धर्मनिरपेक्षता का रंग कैसे हो गया! धर्मनिरपेक्ष स्वयं सेवक संघ के कुर्ता-पायजमा, टोपी-झण्डा हरे रंग के कैसे हो गये! गीतकार के हिसाब से तो हरा रंग, सिख धर्म के वीर सेनापति की वीरता अर्थात् धार्मिक कट्टरता प्रतीक है जो केसरिया रंग वाले हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये पैदा हुआ था। फिर भी यदि बिहार के धर्मनिरपेक्ष स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता कहते हैं कि हरा रंग धर्मनिरपेक्षता को दर्शाता है तो हम क्या कर सकते हैं! किंतु इतना तो पूछ ही सकते हैं कि वे लोग हरे रंग को धर्मनिरपेक्षता का रंग क्यों मानते हैं!

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  • लॉलीपॉप छाप राजनीति से नहीं बचेंगे कुलभूषण के प्राण !

     03.06.2020
    लॉलीपॉप छाप राजनीति से नहीं बचेंगे कुलभूषण के प्राण !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    पाकिस्तानी सेना ने भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी कुलभूषण जाधव को ईरान से अगवा किया, उसे पाकिस्तान लाकर बलूचिस्तान से गिरफ्तार करना दिखाया और उस पर यह आरोप लगाकर सैन्य अदालत में खड़ा कर दिया कि वह बलूचिस्तान में विध्वंसक कार्यवाही कर रहा था तथा पाकिस्तान में भारत के लिये जासूसी कर रहा था। पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने कुलभूषण को जासूसी के आरोप में मौत की सजा सुनाई है। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में वक्तव्य दिया है कि भारतीय राजनायिकों को कुलभूषण जाधव से मिलने नहीं दिया गया।

    हैरानी होती है इन सब बातों को पढ़-सुनकर। भारत सरकार के इस दावे की स्याही अभी सूखी नहीं है जिसमें कहा गया था कि सर्जीकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान की सेना के होश ठिकाने आ जायेंगे। क्या इसी को होश ठिकाने आना कहते हैं! भारत के प्रधानमंत्री तो मियां नवाज शरीफ की मां के पैर छूकर और वहां खीर खाकर आये थे, क्या हुआ प्रेम की उस पींग का!

    खीर की खीझ मिटाने के लिये भारत की विदेश मंत्री तो यूएनओ में बड़ा कड़क भाषण देकर आईं थीं और दावा किया गया था कि इस भाषण के बाद पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में पूरी तरह एक्सपोज हो गया है। क्या इसी को एक्सपोज होना कहते हैं!

    कहा जा रहा था कि अमरीकी चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद पकिस्तान की घिग्घी बन्ध गई है! क्या इसी को घिग्घी बंधना कहते हैं! जिस ट्रम्प ने चुनावों के दौरान आई लव इण्डिया तथा आई लव हिन्दू, कहा था, चुनावों के बाद तो उन्हें एक बार भी इण्डिया के हिन्दू याद नहीं आये। क्या इसी को सच्चा प्यार कहते हैं!

    कुलभूषण की मौत पर देश के भीतर लॉलीपॉप छाप राजनीति हो रही है। हालत यह है कि संसद में कविताएं पढ़ी जा रही हैं। सुषमा स्वराज कह रही हैं कि कुलभूषण जाधव सिर्फ अपने मां-बाप का नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का बेटा है! इस कविता से कुलभूषण की रिहाई पर क्या फर्क पड़ने वाला है! क्या ऐसे लॉलीपॉल छाप वक्तव्य घड़ियाली आंसूओं से ज्यादा मूल्य रखते हैं!

    विदेश मंत्री की ये सारी भावनाएं उस समय क्यों फूट कर बाहर आ रही हैं जब कि पाकिस्तानी सैनिक अदालत ने कुलभूषण को मौत की सजा सुना दी है। कुलभूषण को ईरान से अगवा तो बहुत दिन पहले कर लिया गया था! सुषमा स्वराज कह रही हैं कि सरकार जाधव के परिजनों के संपर्क में है और मजबूती से उनके साथ खड़ी है। क्या इसी को सम्पर्क में रहना और मजबूती से खड़े रहना कहते हैं!

    सरकार के साथ-साथ एक दृष्टि देश की सैक्यूलर फोर्सेज पर भी डाल लेते हैं। वाघा बॉर्डर और जन्तर-मन्तर पर मोमबत्तियां जलाने वाली बड़ी-बड़ी ताकतवर सैक्यूलर फोर्सेज देश में मौजूद हैं। वे प्रेम, शांति और सद्भाव के बल पर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी पर अपना प्रभाव रखती हैं। वे सीमा की समस्याएं भांगड़ा और कुचिपुड़ि से करना जानती हैं। वे भगवा रंग की कट्टरता और संकीर्ण दृष्टिकोण को छोड़कर किसी और चीज से नहीं भड़कती हैं।

    यदि सैक्यूलर फोर्सेज का वाघा बॉर्डर और जन्तर-मन्तर पर मोमबत्तियां जलाने का जुनून कुछ हल्का पड़ गया हो तो जरा देख लें कि भारत के पूर्व वायुसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव के प्राण सकंट में हैं। सैक्यूलर फोर्सेज से अपील है कि वे जाधव को पाकिस्तान के खूनी पंजों से बचाने के लिये अपने प्रभाव को काम में लें। सैक्यूलर फोर्सेज चाहें तो क्या नहीं कर सकतीं! उनके सद्प्रयासों से अंतर्राष्ट्रीय ताकतें भी पाकिस्तान पर दबाव बना सकती हैं।

    जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी सहित कुछ अन्य यूनिवर्सिटियों में आजादी चाहने वाले कम्यूनिस्टों से अपील है कि भारत से अपनी आजादी के लिये तो बहुत जोश दिखाते हो, कुलभूषण की आजादी के लिये भी कुछ आवाज लगाओ!

    कल ही की बात है, बांगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत के राष्ट्रपति को हिल्सा मछली पकाकर खिलाई है, राष्ट्रपतिजी उस हिल्सा का हवाला देकर ही शेख हसीना से एक वक्तव्य कुलभूषण जाधव के पक्ष में दिलवा दें तो हिल्सा का बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। लेकिन हिल्सा पकाना और बात है, किसी की जान बचाने के लिये कहना दूसरी बात है।

    इन सारी बातों को यहां कहने का एक ही आशय है कि लॉलीपॉप छाप राजनीति से कुलभूषण के प्राण नहीं बचेंगे।यदि कुलभूषण को फांसी हो गई तो पूरी दुनिया में बैठे भारतीय अपने आपको असुरक्षित अनुभव करेंगे। कौन जाने कब पाकिस्तानी सेना उन्हें किसी देश से उठा ले! यह भारत सरकार की असली परीक्षा है। कुछ करके दिखायें। पाकिस्तान में बैठे भारत के राजनयिक यदि कुलभूषण से नहीं मिल सकते तो उनका वहां क्या काम हैं, वे आज ही दिल्ली क्यों नहीं लौट आते।

    संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीकी राजदूत निक्की हेली को भारत की बेटी कहकर इतराने वाले ही कुछ प्रयास करे देखें। देश को इस समय वास्तव में लॉलीपॉप छाप राजनीति से बाहर निकलने की आवश्यकता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • वसुन्धरा सरकार जाए या न जाए, राजस्थान की जनता तो सजा भुगत चुकी !

     03.06.2020
    वसुन्धरा सरकार जाए या न जाए, राजस्थान की जनता तो सजा भुगत चुकी !

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    राजस्थान का मीडिया भीतर ही भीतर एक बार फिर सुलग रहा है, चिन्गारी भी पुरानी है और आग भी वही। अब गई, अब गई, अब की बार तो बिल्कुल ही गई। इन चुनावों के बाद, इस बजट के बाद, संसद के इस सत्र के बाद............ वसुन्धरा की सरकार का जाना तय है, इस तरह के चर्चे सुनते-सुनाते साढ़े तीन साल निकल गये। भगोड़े ललित मोदी के लिये वसुन्धरा राजे द्वारा विदेशी अदालत में गवाही देने का मामला हुआ, धौलपुर पैलेस होटल के शेयरों की ऊंचे भावों में बिक्री का मामला खुला, धौलपुर में जमीन का प्रकरण उछला, खान घोटाले में अशोक सिंघवी को अंदर किया गया, लालचंद असवाल की गिरफ्तारी हुई, एनआरएचएम घोटाले में नीरज के पवन को भीतर धरा गया....... और भी बहुत कुछ हुआ। जब भी सरकार के अन्दरखाने कुछ हुआ या कभी चौराहे पर भी आया, राजस्थान का मीडिया हुक्के की तरह गुड़गुड़ करता रहा और वसुन्धरा सरकार ताल ठोककर हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही। आज वसुन्धरा सरकार का गठन हुए साढ़े तीन साल का समय बीत चुका है। अब यदि वसुन्धरा सरकार चली भी जाती है तो का बरखा जब कृषि सुखाने! क्या साढ़े तीन साल से तकलीफें भोग रही जनता के घावों पर मरहम लग जायेगा ? और यदि यदि वसुन्धरा सरकार एक-डेढ़ साल और चल भी गई तो क्या राजस्थान की जनता पर आसमान टूट पड़ेगा ? दोनों ही काम नहीं होंगे लेकिन दोनों ही स्थितियों में वसुन्धरा राजे के हाथों में लड्डू रहेंगे। वसुन्धरा राजे के सामने बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व लाचार दिखाई देता है। नुक्सान इतना हो चुका है कि यदि वसुन्धरा सरकार को हटाया जाता है तो भी अगले चुनावों में बीजेपी का रास्ता साफ होता दिखाई नहीं देता। ऐसी स्थिति में वसुन्धरा राजे हार का ठीकरा आसानी से केन्द्रीय नेतृत्व के सिर फोड़ेंगी। और यदि केन्द्रीय नेतृत्व, वसुन्धरा की सरकार को यूं ही चलते रहने देता है तो भी वसुन्धरा राजे के हाथ में लड्डू, उनकी सरकार के तो पांच साल पूरे हो ही गए! यह एक अजीब सी लोकतांत्रिक सरकार है, जिसका जनता के साथ सीधा संवाद नहीं है। मुख्यमंत्री की जगह महारानी वाली स्टाइल है। जनता की भलाई के लिये किये जाने वाले दावे तो बड़े-बड़े हैं किंतु सरकारी खजाने में ही पैसा-टका मुश्किल से जुड़ रहा है, जनता की भलाई हो भी तो कैसे! सड़कों के खड्डे, आनंदपाल जैसे माफिया, अस्पतालों में मरीजों की भीड़, सब-कुछ सरकार की पकड़ और नियंत्रण से बाहर है। सरकारी विभागों पर से सरकार का विश्वास उठ गया है। बहुत सा काम पीपीपी मोड पर या ठेके पर दिया जा चुका है। सरकार के मंत्री झूठ बोलते हैं कि वन्यजीवों को निजी एजेंसियों के हाथों में नहीं सौंपा जायेगा किंतु भीतरखाने वे पूरी तैयारी करते हैं कि राज्य के वन्यजीवों को विदेशी कम्पनियों के हाथों सौंप दिया जाये! मीडिया में बात फूटने पर सारी योजना धरी की धरी रह जाती है। सरकारी अफसर मुख्यमंत्री के सामने तो धरती पर बिछे हुए दिखाई देते हैं किंतु जनता को आंखें दिखाते हैं। आज आम आदमी सरकारी कार्यालयों में सीधा जाने की बजाय बीजेपी के किसी नेता से सिफारिश करवाना उचित समझता है किंतु उनकी भी सुनता कौन है! विपक्ष के साथ तो सरकार ने मानो छत्तीस का आंकड़ा ही बना रखा है, बीजेपी के अपने विधायक भी इस सरकार से असंतुष्ट हैं। सरकार ने अपना जनसम्पर्क भी ऐसे लोगों के हाथों में दे दिया है जिनका मीडिया से संतुलित संवाद ही नहीं है। छोटे और बड़े-बड़े समाचार पत्र भी विज्ञापनों के लिये तरस रहे हैं। जिनकी सरकार तक सीधी पहुंच है, उन्हें विज्ञापनों की मलाई मिलती है। यहां तक कि राज्य के एक बड़े अखबार को तो मामला कोर्ट में ले जाना पड़ा। राजस्थान का मीडिया लोकसभा के इस सत्र के अवसान की बाट जोह रहा है, जिसके बाद केन्द्रीय मंत्रिमण्ड का विस्तार होना तय माना जा रहा है और यह भी कि इस बार मुख्यमंत्री अवश्य बदला जायेगा। वसुन्धरा को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में लिया जाना भी तय माना जा रहा है। क्या वसुन्धरा सरकार इस बार भी फिक्र को धुएं में उड़ा पायेगी! -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • काश्मीर के पत्थरबाजों से अब कौनसी बात करनी शेष रह गई है !

     03.06.2020
    काश्मीर के पत्थरबाजों से अब कौनसी बात करनी शेष रह गई है !

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    एक समय था जब केन्द्र में बैठी कांग्रेस सरकार की काश्मीर नीति को, विपक्षी भारतीय जनता पार्टी पानी पी-पीकर कोसा करती थी और सिर के बदले सिर मांगती थी। एक समय ये है कि वर्दीधारी भारतीय सैनिक काश्मीर में गुण्डों के हाथों पिट रहे हैं। स्कूली लड़कियां स्कूलों से निकलकर ‘‘हमें चाहिये आजादी’’ के कोरस गा रही हैं। पच्चीस-तीस साल के दाढ़ी-मूंछों वाले मर्द स्कूली ड्रेस में, कंधों पर स्कूली बस्ते लटकाकर मिलिट्री और पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर और लाठियां बरसा रहे हैं तथा भारतीय सैनिकों को लात और घूंसों से मार रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय सेना भगवान बुद्ध का अवतार धारण करके अंगुलीमाल की आत्मा के परिवर्तित होने की चुपचाप प्रतीक्षा कर रही है।

    काश्मीर की अनुभवहीन मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती भारत की राजधानी में आकर वक्तव्य देती हैं कि समस्या के समाधान का मार्ग बातचीत से ही खुल सकता है लेकिन एक तरफ से पत्थर और दूसरी तरफ से गोलियां बरस रही हों तो बातचीत सम्भव नहीं है। तो क्या वे यह कहने के लिये दिल्ली आई थीं कि पत्थर भले ही चलते रहें किंतु गोलियां खामोश रहें ताकि बातचीत का रास्ता खुल सके !

    यदि संसार की समस्त समस्याओं का अंत बातचीत ही है तो फिर ये गोलियां बनी ही क्यों हैं ? जनता की गाढ़ी कमाई के कर से खरीदी गई गोलियां क्या केवल सैनिकों की कमर में लटकाने के लिये हैं ? काश्मीर की समस्या में ऐसा नया क्या है जो मानव सभ्यता के इतिहास में पहले से उपलब्ध नहीं है ? क्या भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों और कौरवों के बीच बातचीत का रास्ता खोल पाये थे ? क्या वीर हनुमान और अंगद, राजा रामचंद्र और रावण के बीच बातचीत का रास्ता खोल पाये थे ? क्या प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले बातचीत का मार्ग नहीं अपनाया गया था ? मैं भी मानता हूं कि बातचीत का रास्ता अपनाया जाना चाहिये, लेकिन कब तक ?

    यदि उपरोक्त उदाहरणों को पुराना समझकर छोड़ दिया जाये और केवल काश्मीर पर ही बात की जाये तो ऐसी कौनसी बात है जो सन् 1947 से लेकर 2017 तक की 70 साल की अवधि में अब तक हो नहीं पाई है और अब पीडीपी की मुख्यमंत्री करवाना चाहती हैं! जब न तो गोलियां चल रही थीं और न पत्थर, तब यह बातचीत क्यों नहीं कर ली गई ? और यदि बातचीत ही करते रहना है तो भारतीय सेना को वहां से हटा क्यों नहीं लिया जाता ? भारतीय सैनिक भी किसी माँ के बेटे हैं, किसी के भाई और किसी के पिता हैं। वे पत्थर खाने के लिये वहां क्यों हैं ? सैनिक युद्ध करने के लिये होता है, शौर्य का प्रदर्शन करने के लिये होता है, न कि पत्थर और लाठियां खाकर योगाभ्यास करने के लिये।

    महबूबा मुफ्ती ने एक और हास्यास्पद बात कही है कि पत्थरबाज हमारे अपने हैं। तो क्या अपने घर से विद्रोह करने वालों के सिर नहीं कुचल दिये जाते ? क्या पाण्डवों ने कौरवों को मारकर धरती पर नहीं सुला दिया ? चलो महाभारत के उदाहरण को एक बार फिर छोड़ दिया जाये तो क्या 1948, 1965, 19़71 और 1999 में भारत ने उन पाकिस्तानी सैनिकों को जान से नहीं मार डाला जो 1947 में भारत से ही अलग होकर पाकिस्तानी बने थे ? क्या भारत और काश्मीर की सरकारें वास्तव में इस भ्रम में हैं कि काश्मीर के पत्थरबाज हमारे अपने हैं। यदि ऐसा है तो मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि इससे अधिक अंधापन तो महाभारत के धृतराष्ट्र में भी नहीं था।

    काश्मीर की मुख्यमंत्री ने एक और बचकानी बात कही है कि दो से तीन महीनों में काश्मीर समस्या का हल निकल जायेगा। तो क्या मुख्यमंत्री ने किसी प्रयोगशाला में काश्मीर समस्या के बैक्टीरियाओं की जांच करवाई है जिसमें इन बैक्टीरियाओं के दो-तीन माह में स्वतः समाप्त हो जाने की पुष्टि हुई है ! हैरानी होती है ऐसे बचकाना वक्तव्यों पर! वे किसे मूर्ख बना रही हैं। सत्ता के लोभ में आंख मूंदकर बैठी केन्द्र की बीजेपी सरकार को या भारतीय सेना के जवानों को! क्या भारतीय सेना काश्मीर में पत्थरबाजों से पत्थर खाकर, भविष्य में इस योग्य बचेगी कि वह पाकिस्तान के संभावित एटमबमों से निबट सके !

    काश्मीर से सैंकड़ो किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ में तो हालात और भी बुरे हैं। नक्सली औरतें, सीआरपीएफ के जवानों के प्राण ले रही हैं। सीआरपीएफ के जवान निरही कीड़े-मकोड़ों की भांति मारे जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2003 से भारतीय जनता पार्टी के डॉ. रमनसिंह की सरकार है। तो क्या भारतीय जनता पार्टी की नीतियां इतनी कमजोर हैं कि वे 14 साल में भी छत्तीसगढ़ की समस्या का हल नहीं ढूंढ पाईं। या फिर यह कमजोरी सीआरपीएफ आदि केन्द्रीय बलों की है ?

    यह समय बातें करने का नहीं है, कुछ करके दिखाने का है। देश को कैशलैस बना देने से सारी समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला। अब तो यह भी लगने लगा है कि कैशलैस वाला जुमला कहीं देश की वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिये तो नहीं है ! भारतीय जनता पार्टी की सरकारों से जो अपेक्षाएं थीं वे धीरे-धीरे धूमिल होती हुई दिखाई दे रही हैं। राजस्थान की निर्णय विहीन सरकार से लेकर केन्द्र की मोदी सरकार तक हर जगह ऐसी ही स्थितियां दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय जनता पार्टी केा नहीं भूलना चाहिये कि अटलबिहारी वाजपेयी सरकार की लच्छेदार चालाकियों की विफलताओं के बाद बीजेपी को 10 वर्षों तक विपक्ष में बैठना पड़ा था। यह भी नहीं भूलना चाहिये कि डॉ. मनमोहनसिंह की 10 वर्षों की भयानक गलतियों और अकृमण्यता के बाद ही बीजेपी को दुबारा मौका मिला है। बीजेपी को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि समय का पहिया तेजी से आगे बढ़ जाता है और फिर कभी पीछे नहीं घूमता। अभी बहुत कुछ नहीं बिगड़ा है, भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार उठें और देश की वास्तविक समस्याओं पर दृढ़ता से काम करें।

    मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि लॉलीपॉप छाप राजनीति से देश की समस्याओं का हल नहीं होगा। आज दुनिया तेजी से बदल रही है। यूरोप के उदारीकरण और वैश्वीकरण की बखिया उधड़ रही है। वे फिर से अपने देशों की सीमाएं एक दूसरे के लिये बंद कर रहे हैं। उन्हें स्वयं को बचाने की चिंता है न कि अपने पड़ौसियों को। हमें भी स्वयं को बचाने के लिये हर संभव प्रयास करना चाहिये।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • संसार भर से समर्थन के स्वर और भारतीय सेना की गर्जना एक साथ सुनाई दे रहे हैं!

     03.06.2020
    संसार भर से समर्थन के स्वर और भारतीय सेना की गर्जना एक साथ सुनाई दे रहे हैं!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    पिछले कुछ दिनों में एक साथ कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें सम्पूर्ण संसार से भारत के पक्ष में समर्थन के स्वर और भारतीय सेना की भीम-गर्जना स्पष्ट सुनाई दे रही हैं। 18 मई को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 न्यायाधीशों ने एक स्वर और एक राय से कुलभूषण जाधव के मामले में न केवल पाकिस्तान के झूठ को मानने से मना कर दिया अपितु भारत द्वारा प्रस्तुत तथ्यों को स्वीकार करके पूरे संसार के समक्ष दोनों देशों के अंतर को गहराई से रेखांकित भी किया। यह फैसला आने वाले समय में इतने गहरे असर डालेगा कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ का तख्ता पलटा जा सकता है और वहां एक बार पुनः सैनिक शासन थोपा जा सकता है।

    21 मई को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब में दिए गए भाषण में भारत को आतंकवाद से पीड़ित बताकर भारत के साथ सहानुभूति व्यक्त की और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भारत के विरुद्ध जहर उगलने से रोकने के लिए माइक पर फटकने तक नहीं दिया। पाठकों को याद होगा कि 2 फरवरी 2017 को इसी स्तंभ में मैंने लिखा था कि हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिए। क्योंकि ट्रम्प के डर से पाकिस्तान ने हाफिज सईद को नजरबंद किया है, उसके बैंक खाते सीज किये हैं और हाफिज को पाकिस्तान से बाहर निकलने पर रोक लगाई है। ट्रम्प के डर से पाकिस्तान ने उन आतंकी समूहों को ढूंढ-ढूंढकर मारा है जिन्होंने सिंध में एक सूफी दरगाह पर हमला करके 150 लोग मार दिये थे। अब पुनः ट्रम्प ने भारत की चिंताओं का समर्थन करके और पाकिस्तान को उसकी हैसियत का शीशा दिखा करके, भारत के सुनहरे भविष्य की ओर संकेत किया है। इतना ही नहीं ट्रम्प ने पूरे मुस्लिम जगत से अपील की है कि वे आतंकियों को अपने पूजा स्थलों से निकाल दें, अपने समुदाय से निकाल दें, अपने धर्मस्थलों से निकाल दें और उन्हें पूरी धरती से निकाल दें।

    21 मई को भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने मेजर नितिन गोगोई को पुरस्कृत करके जिस इच्छाशक्ति का परिचय दिया, उसके पीछे सेना की हुंकार स्पष्ट सुनाई दे रही है। मेजर नितिन गोगोई विगत 9 अप्रेल को कश्मीर में निर्वाचन कर्मचारियों को अपने संरक्षण में लेजा रहे थे। इन लोगों को अचानक सैंकड़ों पत्थरबाजों ने घेर लिया और पत्थर बरसाने लगे। स्थिति इतनी विकट हो गई कि किसी भी समय न केवल चुनाव कर्मियों को अपितु सैनिकों को भी प्राणों से हाथ धोना पड़ सकता था। ऐसी स्थिति में सेना के पास सामान्यतः दंगाइयों पर फायरिंग करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं होता। यदि मेजर गोगोई पत्थरबाजों पर गोलियां चलाते तो बड़ी संख्या में लोग हताहत होते जिसके लिए भारत सरकार को भारत के भीतर छिपे बैठे तथाकथित मानवतावादियों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता। मेजर गोगोई ने सूझबूझ से काम लेते हुए एक पत्थरबाज को पकड़कर अपनी जीप के सामने बांध दिया ताकि पत्थरबाज, आर्मी की गाड़ी पर पत्थर न फैंक सकें।

    उनकी युक्ति तो काम कर गई किंतु अरुंधती राय ने कश्मीर पहुंचकर आर्मी की इस कार्यवाही की कटु आलोचना की। कुछ अन्य लोगों ने भी अरुंधती का समर्थन किया। इस पर सांसद परेश रावल ने ट्वीट किया कि पत्थरबाज की जगह अरुंधती रॉय को जीप सेे बांधा जाना चाहिए था। इस ट्वीट के आते ही आर्मी चीफ द्वारा मेजर गोगोई को पुरस्कृत करने की घोषणा की गई। अन्यथा इससे पहले तो सेना ने मेजर के विरुद्ध जांच के आदेश दे रखे थे। अरुंधति रॉय, अभिषेक मनु सिंघवी और सुरजेवाला जैसे लोग, कभी भी किसी भी सही बात का समर्थन नहीं करेंगे। कहा जा सकता है कि सेना ने गोगोई को पुरस्कृत करने का निर्णय केवल अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए नहीं किया है, अपितु अरुंधति जैसे लोगों को करारा जवाब देने और भविष्य में भी ऐसी कार्यवाहियों का समर्थन करने की घोषणा के रूप में किया है।

    भारतीय सेना का यह भीमगर्जन मंगलवार 23 मई को फिर सुनाई दिया जब भारतीय सेना ने कश्मीर के नौशेरा क्षेत्र में पाकिस्तानी चौकियों पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया जहां से आतंकवादियों को सहायता मिलती थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय सेना की यह गर्जना आगे भी सुनाई देगी।


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  • बचाना होगा भारत के पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को

     03.06.2020
    बचाना होगा भारत के पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लंदन के लेगटम संस्थान और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने उनासी मानकों के आधार पर विश्व के एक सौ चार देशों का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है। इन देशों में विश्व की नब्बे प्रतिशत आबादी रहती है और इस सूची में भारत को पैंतालीसवां स्थान मिला है। सामाजिक मूल्यों के मामले में भारत को विश्व में पहले स्थान पर रखा गया है। यदि इस सूची में से विकसित देशों को निकाल दें तो विकासशील देशों की सूची में भारत को प्रथम दस शीर्ष देशों में स्थान मिला है। देश का सामाजिक ढांचा, परिवार व्यवस्था, मैत्री भावना, सरकार के आर्थिक सिद्धांत, उद्यमों के लिये अनुकूल वातावरण, विभिन्न संस्थाओं में लोकतंत्र, देश की शासन व्यवस्था, आम आदमी का स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक मूल्य और सुरक्षा आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मानक हैं जिनकी कसौटी पर भारत संसार में पैंतानीसवें स्थान पर ठहराया गया है और चीन पिचहत्तरवें स्थान पर। भारत के अन्य पड़ौसी देशों- पाकिस्तान, बांगलादेश, अफगानिस्तान, बर्मा, श्रीलंका, नेपाल और भूटान आदि की स्थिति तो और भी खराब है। ऐसा कैसे हुआ? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये एक ही उदाहरण देखना काफी होगा। पिछले दिनों जब चीन ने अपना साठवां स्थापना दिवस मनाया था तब राष्ट्रीय फौजी परेड में भाग ले रहे सैनिकों की कॉलर पर नुकीली आलपिनें लगा दी थीं ताकि परेड के दौरान सैनिकों की गर्दन बिल्कुल सीधी रहे। किसी भी नागरिक को इस फौजी परेड को देखने के लिये अनुमति नहीं दी गई थी। लोगों को घरों से निकलने से मना कर दिया गया था, बीजिंग में कर्फ्यू जैसी स्थिति थी। लोग यह परेड केवल अपने टी.वी. चैनलों पर ही देख सकते थे। इसके विपरीत हर साल नई दिल्ली में आयोजित होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में भारत के सिपाही गर्व से सीना फुलाकर और गर्दन सीधी करके चलते हैं, हजारों नागरिक हाथ में तिरंगी झण्डियां लेकर इन सिपाहियों का स्वागत करते हैं और करतल ध्वनि से उनका हौंसला बढ़ाते हैं। यही कारण है कि कारगिल, शियाचिन और लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों से लेकर बाड़मेर और जैसलमेर के धोरों, बांगला देश के कटे फटे नदी मुहानों और अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक के समूचे तटवर्ती क्षेत्र में भारत के सिपाही अपने प्राणों पर खेलकर भारत माता की सीमाओं की रक्षा करते हैं। हमारी सरकार सैनिकों के कॉलर पर तीखी पिनें चुभोकर उनकी गर्दन सीधी नहीं करती, देश प्रेम का भाव ही सिपाही की गर्दन को सीधा रखता है। इसी अंतर ने हमें पैंतालीसवें और चीन को पिचहत्तरवें स्थान पर रखा है। लंदन की लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट में भारत की परिवारिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा गया है। वस्तुतः भारत की परिवार व्यवस्था संसार की सबसे अच्छी परिवार व्यवस्था रही है। भारतीय पति-पत्नी का दायित्व बोध से भरा जीवन पूरे परिवार के लिये समर्पित रहता है। इसी समर्पण से भारतीय परिवारों को समृद्ध और सुखी रहने के लिये आवश्यक ऊर्जा मिलती है। जबकि आर्थिक रूप से समृद्ध देशों में पति-पत्नी एक बैरक में रहने वाले दो सिपाहियों की तरह रहते हैं, जो दिन में तो अपने-अपने काम पर चले जाते हैं, रात को दाम्पत्य जीवन जीते हैं और उनके छोटे बच्चे क्रैश में तथा बड़े बच्चे डे बोर्डिंग में पलते हैं। पश्चिमी देशों की औरतें अपने लिये अलग बैंक बैलेंस रखती हैं। उनके आभूषणों पर केवल उन्हीं का अधिकार होता है। आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने के कारण उनमें अहमन्यता का भाव होता है और वे अपने पहले, दूसरे या तीसरे पति को तलाक देकर अगला पुरुष ढूंढने में अधिक सोच विचार नहीं करतीं। इसके विपरीत आम भारतीय स्त्री विवाह के बाद पूरा जीवन एक ही परिवार में व्यतीक करती है। जैसे-जैसे उसकी आयु जैसे जैसे बढ़ती जाती है, परिवार में उसका सम्मान और अधिकार भी बढ़ते जाते हैं। भारतीय स्त्रियां धन-सम्पत्ति और अधिकारों के लिये किसी से स्पर्धा नहीं करती हैं, जो पूरे परिवार का है, वह सब कुछ उसका भी है। पारम्परिक रूप से भारतीय औरत अपने लिये अलग बैंक खाते नहीं रखती है, उसके आभूषण उसके पास न रहकर पूरे परिवार के पास रहते हैं। वह जो खाना बनाती है, उसे परिवार के सारे सदस्य चाव से खाते हैं, बीमार को छोड़कर किसी के लिये अलग से कुछ नहीं बनता। जब वह बीमार हो जाती है तो घर की बहुएं उसके मल मूत्र साफ करने से लेकर उसकी पूरी तीमारदारी करती हैं। बेटे भी माता-पिता की उसी भाव से सेवा करते हैं जैसे मंदिरों में भगवान की पूजा की जाती है। कुछ लोगों को शंका हो सकती है कि यह किस युग की बात है! उन्हें मेरी सलाह है कि भारत के 116 करोड़ लोगों में से केवल कतिपय सम्पन्न शहरियों को देखकर अपनी राय नहीं बनायें, गांवों में आज भी न्यूनाधिक यही स्थिति है। शहरों में भी 80 प्रतिशत से अधिक घरों में आज भी परम्परागत भारतीय परिवार रहते हैं जहाँ औरतें संध्या के समय सिर पर पल्ला रखकर तुलसी के नीचे घी का दिया जलाती हैं और घर की बड़ी-बूढि़यों से अपने लम्बे सुहाग का अशीर्वाद मांगती हैं। ऐसी स्थिति में यदि लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट ने सामाजिक मूल्यों के मामलें में भारत को संसार का पहले नम्बर का देश बताया है तो इसमें कौनसे आश्चर्य की बात है! भारत का समाज कम खर्चीला समाज रहा है। घर, परिवार और बच्चों के साथ जीना, गली मुहल्ले में मिल जुल कर उत्सव मनाना, हरि भजन में समय बिताना, कम कमाना और कम आवश्यकतायें खड़ी करना, भारतीय सामाजिक जीवन का आधार रहा है। इसके विपरीत पश्चिमी देशों की जीवन शैली होटलों में शराब पार्टियां करने, औरतों को बगल में लेकर नाचने, महंगी पोशाकें पहनने और अपने खर्चों को अत्यधिक बढ़ा लेने जैसे खर्चीले शौकों पर आधारित रही है। आजकल टी वी चैनलों और फिल्मों के पर्दे पर एक अलग तरह का भारत दिखाया जा रहा है जो हवाई जहाजों में घूमता है, गर्मी के मौसम में भी महंगे ऊनी सूट और टाई पहनता है तथा चिपचिपाते पसीने को रोकने के लिये चौबीसों घण्टे एयरकण्डीशनर में रहता है। टीवी के विज्ञापनों में दिखने वाला भारत, वास्तविक नहीं है। वह भारत की नकली तस्वीर है जो आज के बाजारवाद और उपभोक्तवाद की देन है। आज भी भारत का बहुत बड़ा हिस्सा दिन भर धूप भरी सड़कों पर फल-सब्जी का ठेला लेकर घूमता है, सड़क पर बैठकर पत्थर तोड़ता है, पेड़ के नीचे पाठशालायें लगाता है और किसी दीवार की ओट मंे खड़ा होकर मूत्र त्यागता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इन लोगों का योगदान एयरकण्डीशनर में छिपकर बैठे लोगों से किसी प्रकार कम नहीं है। इन्हीं लोगों की बदौलत कम खर्चीले समाज का निर्माण होता है। यदि इन सब लोगों को एयर कण्डीशनर में बैठने की आवश्यकता पड़ने लगी तो धरती पर न तो बिजली बचेगी और न बिजली बनाने के लिये कोयला बचेगा। लेगटम प्रोस्पेरिटी इण्डेक्स में भारतीय समाज की इन विशेषताओं को प्रशंसा की दृष्टि से देखा गया है। टी वी पर हर समय चलने वाले सीरियलों में भी एक अलग ही तरह का भारत दिखाया जा रहा है जहाँ बहुएं सास के विरुद्ध और सास बहुओं के विरुद्ध षड़यंत्र कर रही हैं। भाई एक दूसरे की इण्डस्ट्री पर कब्जा करने की योजनाएं बना रहे हैं। बेटियां अपने पिता को शत्रु समझ रही हैं और ननद भाभियां एक दूसरे की जान की दुश्मन बनी हुई हैं। यह कैसा भारत है? कहाँ रहता है यह? आजकल एक भारत और उभर रहा है जिसने इन सारे भारतों को पीछे छोड़ने की कसम खा रखी है। कुछ वर्ष पहले दीपा मेहता ने सिनेमा दर्शकों की जेब ढीली करने के लिये भारतीय महिलाओं में समलैंगिकता की फायर लगाने का प्रयास किया। इसी बीच बेबी खुशबू युवा हो गईं और उन्होंने फिल्म बनाने वालों का ध्यान आकर्षित करने के लिये बयान दिया कि प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के इस युग में भारतीय समाज नारी से कौमार्य की अपेक्षा न करे। परफैक्ट इण्डियन ब्राइड मानी जाने वाली अमृता राव ने जब देखा कि फिल्म निर्माता ठण्डी नायिका के रूप में देख रहे हैं तो उसने हॉट बनने के लिये बयान दे मारा कि शादी के पहले सैक्स में बुराई नहीं। राखी सावंत और संभवना सेठ का तो कहना ही क्या है! हमें लंदन के लेगटम संस्थान और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन का आभारी होना चाहिये कि उन्होंने इतने सारे भारतों के बीच असली भारत को ढूंढ निकाला है और सामाजिक मूल्यों के पैमाने पर भारत को सबसे पहला स्थान दिया है। हमारा भी यह कर्त्तव्य बनता है कि हम नकली भारतों की तरफ चुंधियाई हुई आँखों से देखना छोड़कर असली भारत की तरफ देखना आरंभ करें। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • झालावाड़ से हर साल ढाई से तीन लाख भेड़ें मालवा प्रवास पर जाती हैं

     03.06.2020
    झालावाड़ से हर साल ढाई से तीन लाख भेड़ें मालवा प्रवास पर जाती हैं

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    हजारों भेड़ों के समूह को एक निश्चित पथ का अनुसरण करते हुए देखना कम रोमांचकारी नहीं है। मारवाड़ से मालवा तक के ये सैंकड़ों यायावर भारी भरकम लाल पगडि़यों के कारण किसी बावरे अहेरी से कम नहीं लगते। हर साल वे इसी तरह गाते-गुनगुनाते मारवाड़ से मालवा की तरफ जाते हैं तथा वर्षा काल आरम्भ होते ही फिर से उन्हीं रास्तों पर आते हुए दिखाई देते हैं जिन रास्तों से वे गये थे। हर वर्ष की तरह, हर युग की तरह। यही क्रम नियति ने उनके लिये निश्चित किया है। मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित राजस्थान का झालावाड़ जिला राजस्थान के प्रवासी भेड़पालकों को हर साल 31 अक्टूबर तक मालवा प्रवास के लिये विदाई देता है। भेड़ रेगिस्तानी पशु है किंतु रेगिस्तान में जल एवं वनस्पति की न्यूनता होने के कारण भेडें़ साल भर वहां नहीं रह पातीं। इसलिये शीतकाल आरम्भ होते ही मारवाड़ के भेड़पालक अपने कंधों पर लम्बी लाठियां और पानी की सुराहियां लेकर मालवा के कठिन पथ के लिये निकल पड़ते हैं। उनके साथ जाने वाली भेड़ों की संख्या हर साल बढ़ती जाती है। हर साल ढाई से तीन लाख भेड़ें मालवा जाती हैं। विगत सैंकड़ों साल से भेड़ें अपने चरवाहों के संकेतों का अनुगमन करती हुई उनके साथ सैंकड़ों मील की यात्रा करती हैं। मरुस्थल के चरवाहों की सुर्ख लाल पगडि़यां दूर से ही उनके रेबारी होने का उद्घोष करती हैं। सर्दिया आरम्भ होते ही ये लोग अपनी भेड़ों को लेकर मालवा की तरफ जाते हैं ताकि उनकी भेड़ों को खुले मैदानों में चराया जा सके। जून-जुलाई माह में वर्षा आरम्भ होने तक ये लोग अपनी भेड़ों और परिवारों के साथ मालवा में ही रहते हैं। हरी घास से सजा मालवा का पठार हर वर्ष अपने इन अतिथियों की प्रतीक्षा में आंखें बिछाये तैयार रहता है। सर्दी और गर्मी के लगभग 8 माह वहां रहने के पश्चात् वर्षा आरम्भ होते ही ये फिर अपनी भूमियों की ओर लौटते हैं। पूरा वर्षा काल अर्थात् लगभग चार माह का समय वे राजस्थान में व्यतीत करते हैं। झालावाड़ जिले में बारापाटी, बाघेर, हरिगढ़ तथा पनवाड़ के जंगल उनके निवास करने के लिये प्रिय स्थल हैं। गागरोन से देवीरीघाटा के बीच एवं कोकंदा-धनवाद के जंगलों में भी बड़ी संख्या में इनके डेरे होते हैं। सर्दियां आरम्भ होते ही ये पुनः मालवा को प्रस्थान कर जाते हैं। सैंकड़ों वर्ष से यही क्रम चला आ रहा है। झालावाड़ जिले से इनके निक्रमण के चार मार्ग हैं- डग-दूधलिया होकर, भालता होकर, रायपुर-इंदौर होकर तथा रावतभाटा-भैंसरोड़गढ़ होते हुए। रेबारी शब्द चरवाहे से ही बना है। जब आर्यों ने सभ्यता की ओर कदम बढ़ाये तो पशु-चारण को प्रथम व्यवसाय के रूप में अपनाया। ये स्वयं को उन्हीं प्राचीन आर्यों के वंशज मानते हैं। आर्य स्वयं को देवताओं के वंशज मानते थ। इसलिये ये लोग भी स्वयं को देवासी कहते हैं जो देवांशी का ही अपभ्रंश है। इन लोगों में उच्च आर्य परम्पराएं हैं। ये श्वेत अंगरखी और धोती पहनते हैं। सिर पर गहरे लाल रंग की भारी भरकम पगड़ी बांधते हैं। त्यौहार आदि विशेष अवसरों पर पगड़ी पर सुनहरी जरी एवं गोटे-पट्टी की पगडि़यां धारण करते हैं। रेबारी महिलायें रंगीन कपड़े पहनती हैं। उनके घाघरे अपेक्षाकृत गहरे रंग के, बड़े घेर वाले और वजन में काफी भारी होते हैं। उनके पैरों में चांदी के भारी कड़े, सिर से पांव तक चांदी के छोटे बड़े ढेर से आभूषण, आँखों में काजल, माथे पर चौड़ी बिंदिया और सिर से लेकर पैरों तक गोदने गुदे हुए होते हैं। रेबारियों की देह पर स्वर्ण आभूषण भी अनिवार्य रूप से होते हैं। ये घी-दूध का भोजन करते हैं। विवाह जैसी उच्च संस्था भी इनमें अनिवार्य रूप से है। जीवन भर चलते रहने के कारण समाज और धर्म की उच्च मर्यादाओं का पालन करना कम कठिन साधना नहीं है परन्तु रेबारी समाज इसे सहज रूप से साध लेता है। कहीं कोई दुविधा और चिंता नहीं। चिंता है तो केवल अपनी भेड़ों की। वे भूखी न रह जायें। वे बीमार न पड़ जायें। वे रेवड़ से बिछुड़कर कहीं चली न जायें। उन्हें जंगली जानवर उठाकर न ले जायें। जब रेबारी अपनी भेड़ों को चराते हुए जंगलों से गुजर रहे होते हैं तब इनकी औरतें घर-गृहस्थी का सामान ऊंटों पर लादकर सड़क मार्ग से इनके समानांतर चलती रहती हैं। इन्हें डेरा कहा जाता है। इन डेरों में चारपाई से लेकर रसोई तथा पहनने के कपड़ों से लेकर जंगल में मचान बनाने तक की सामग्री होती है। छोटे बच्चे इन्हीं ऊंटों पर मजे से सवार रहते हैं। भेड़ें तथा मादा ऊंट जीवन भर इनकी दूध तथा घी सम्बन्धी आवश्यकताएं पूरी करती हैं। इसी दूध और घी के बल पर ये जीवन भर स्वस्थ और ह्रष्ट-पुष्ट रहते हैं तथा जीवन के कठोर संघर्ष का सामना करते हैं। अधिकांश चरवाहे इन भेड़ों के मालिक नहीं हैं। भेड़ों के मालिक कोई और हैं जो मारवाड़ के पाली, जालोर, नागौर तथा चूरू आदि जिलों में रहते हैं। वे लम्बरदार कहलाते हैं। साल में दो बार भेड़ों से ऊन उतारी जाती है। तब ये लम्बरदार आकर भेड़ों की ऊन बिकने से प्राप्त हुई राशि इनसे लेते हैं। जब कभी इन चरवाहों के परिवार में विवाह आदि के अवसर आते हैं तब ये चरवाहे अपने घर जाते हैं। जीवन में ऐसे अवसर कम ही आते हैं। इनका अधिकांश जीवन पशुओं को चराने के लिये ‘डेंग’ पर ही निकल जाता है। इनमें सम्पन्नता की कोई कमी नहीं है। प्रत्येक रेबारी के कानों में सोने की मुरकियां, स्त्री और पुरुष दोनों के पैरों में चांदी के कड़े तथा रेबारी औरतों के गले में सोने की कंठियां सहज रूप से देखी जा सकती हैं। भेड़ों के निष्क्रमण के समय मार्ग में पड़ने वाले खेतों को सबसे अधिक खतरा होता है। लाख ध्यान रखने पर भी भेड़ें कभी न कभी किसी न किसी खेत में घुस ही जाती हैं। तब आरम्भ होता है इनके जीवन का सबसे बुरा सपना अर्थात् किसानों और चरवाहों का संघर्ष। जो कभी-कभी रक्त-रंजित संघर्ष में भी बदल जाता है। राजस्थान सरकार किसानों और चरवाहों दोनों की समस्याओं को समझते हुए भेड़ों के आगमन एवं निष्क्रमण के समय सुरक्षा के पूरे उपाय करती है। इनके परम्परागत मार्गों को चिह्नित करके सम्पूर्ण मार्ग पर विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। झालावाड़ जिले में भेड़ों के आवागमन मार्ग पर 20 चौकियां स्थापित की जाती हैं जिन पर राजस्व विभाग के कार्मिक, होमगार्ड्स, पुलिसकर्मी, पशु चिकित्सक नियुक्त किये जाते हैं तथा राशन सामग्री आदि की व्यवस्था की जाती है। जिस अवधि में भेड़ पालक जिले में रहते हैं, उनके बच्चों को पढ़ाने के लिये विशेष व्यवस्था की जाती है। उनके लिये केरोसिन, दवाएं, चीनी, आटा, गेहूं, पेयजल आदि का प्रबंध किया जाता है। भेड़ निष्क्रमण की दृष्टि से झालावाड़ जिले में मिश्रौली एवं पिड़ावा अतिसंवेदनशील क्षेत्र हैं। जहां कई बार संघर्ष की स्थिति बनी है किंतु जिला प्रशासन की चुस्ती के कारण संघर्ष की घटनाएं टल जाती हैं। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • चित्तौड़ दुर्ग का कालिका माता मंदिर वास्तव में आठवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है!

     03.06.2020
    चित्तौड़ दुर्ग का कालिका माता मंदिर वास्तव में आठवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है!

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    भारत में सूर्य पूजा सदियों से प्रचलित रही है। आज जिस देवत्रयी में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सम्मिलित किया जाता है, वस्तुतः किसी समय सूर्य, विष्णु और महेश को सम्मिलित किया जाता था। सिरोही जिले का वसंतगढ़ सूर्य मंदिर अब खण्डहर रूप में ही बचा है किंतु राजस्थान में आज भी बहुत से प्राचीन सूर्य मंदिर स्थित हैं।

    चित्तौड़ गढ़ दुग में स्थित कालिका मंदिर भी वस्तुतः आठवीं शताब्दी ईस्वी का सूर्य मंदिर है जिसे अब कालिका माता मंदिर कहते हैं। यह मंदिर, दुर्ग के दक्षिणी भाग में जयमल और पत्ता की हवेलियों के दक्षिण में स्थित है जो ऊँची जगती पर बना हुआ है।

    वर्तमान में देवालय के गर्भगृह में कालिका माता की प्रतिमा प्रतिष्ठित है किंतु मंदिर के जंघा भाग तक के स्थापत्य और मूर्त्यांकन को देखने से स्पष्ट होता है कि मूलतः यह सूर्य मंदिर था। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे दसवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित होना बताया है। रत्नचंद्र अग्रवाल इसे आठवीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं। शअरी एम. ए. डाक्य ने इसे आठवीं अथवा नौवीं शताब्दी में निर्मित मंदिर स्वीकार किया है। जनश्रुतियों के अनुसार जब आठवीं शताब्दी ईस्वी में बापा रावल ने चित्तौड़ दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित किया था, तब उसी ने अपने कुलदेव सूर्य की सेवा पूजा के लिये इस सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस दृष्टि से यह मंदिर इस दुर्ग परिसर की सबसे पुरानी रचना सिद्ध होता है।

    इस मंदिर में भगवान सूर्य की श्वेत प्रतिमा स्थापित है जिसके हाथ में चक्र उत्कीर्ण है जो पद्म के समान प्रतिभासित होता है। यह सूर्य की प्रतिमा के हाथ में अनिवार्यतः उकेरा जाता है। वर्तमान में इसी प्रतिमा को काली की प्रतिमा कहा जाता है जो कि सही नहीं है। काली की मूर्ति काले पत्थर की होती है न कि सफेद पत्थर की। काली की प्रतिमा में चक्र का अंकन नहीं होता है। सफेद पत्थर की प्रतिमा के पास काली की एक काले पत्थर की प्रतिमा भी स्थापित है जो कि शास्त्र सम्मत नहीं है, क्योंकि किसी भी मंदिर में प्रधान देवता के एक ही स्वरूप की दो प्रतिमाएं स्थापित नहीं होती हैं।

    मंदिर की जगती अथवा कुर्सी, दुर्ग के धरातल से ऊपर उठी हुई है। मंदिर का पूर्वाभिमुख प्रवेश द्वार और द्वार की तरफ जगती तक चढ़ने के लिये सात-सात सीढि़यों के खण्ड में विभाजित प्रवेश पथ तथा मंदिर के गर्भगृह के भीतर अन्तर-प्रदक्षिणा पथ एवं बाह्य-प्रदक्षिणा पथ बने होने की वास्तु स्थिति एवं इस मंदिर के गर्भगृह के द्वार, ताकों एवं सभा मण्डप इत्यादि भागों पर किया गया मूर्त्यांकन एवं अलंकरण अपने युग की ही नहीं अपितु दक्षिणी राजस्थान के इतिहास के समस्त युगों की अति विशिष्ट स्थापत्य रचना स्वीकारने के लिए बाध्य करते हैं।

    इस मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार के बाहर ऊपर की तरफ सप्ताश्व रथ आरूढ़ सूर्य की प्रतिमा बनी है तथा उसके बांयीं तरफ लक्ष्मी के साथ गरुड़ पर आरूढ़ विष्णु और दाहिनी तरफ नन्दी पर आरूढ़ शिव-पार्वती का मूर्त्यांकन है। गर्भगृह के उत्तर-दक्षिण में बनी ताकों में सप्ताश्व रथ पर आरूढ़ सूर्य की प्रतिमाएं अंकित हैं। गर्भगृह के बाहर एक हाथ में खड्ग तथा दूसरा हाथ अभय मुद्रा में अंकित अश्विनी कुमार; गजारूढ़, वज्र एवं कमल धारी इन्द्र; चतुर्बाहु अग्नि; कमलधारी आसनस्थ सूर्य तथा खट्वांग धारण किए यम की मूर्तियां बनी हैं। अपने वाहन मकर पर आरूढ़ वरुण, अपने वाहन मृग के साथ वायु, अपने वाहन अश्व के साथ चन्द्रमा तथा उत्तरी-पूर्वी दिशा के अधिपति देव ईशान की मूर्तियां भी जड़ी गई हैं।

    मंदिर के बाहरी भाग की ताकों में शिव-पार्वती, वराह, समुद्र मंथन अभिप्राय आदि से सम्बन्धत मूर्तियां लगी हुई हैं। ये सब मूर्तियां एवं मूर्तिपट्ट जिस क्रम एवं प्रक्रिया में लगे हैं, वे इस मंदिर के सूर्य मंदिर के रूप में निर्माण की कहानी कहते हैं। मंदिर का सभामण्डप पारम्परिक स्थूल स्तम्भों पर खड़ा है जिन पर घट पल्लव पत्र लता, मकर, कीर्ति मुख, कीचक अभिप्राय इत्यादि का अलंकरण किया गया है। सभामण्डप अलग-अलग खण्डों में विभक्त है जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कमल पुष्पों को उकेरा गया है जो स्पष्ट रूप से सभा-मण्डप की छत को बनाने की गुप्तकालीन परम्परा की याद दिलाते हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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