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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 25

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 25

    मिल गया पाकिस्तान


    प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत में चल रही अंतरिम सरकार की मुस्लिम लीग द्वारा बनाई जा रही गत को देखकर अंग्रेजों ने भारत से किसी भी तरह छुटकारा पाने का मन बना लिया। इसलिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने अचानक 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश-पार्लियामेंट में घोषणा की कि- 'अनिश्चितता की वर्तमान स्थिति खतरे से भरी है और अनिश्चित काल तक जारी नहीं रखी जा सकती। महामहिम की सरकार स्पष्ट कर देना चाहती है कि 20 जून 1948 के पहले ही जिम्मेदार भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का उसका निश्चित संकल्प है। ........... अगर पूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा जून 1948 तक कोई संविधान तैयार नहीं कर सकी तो महामहिम की सरकार विचार करेगी कि ब्रिटिश-भारत में केन्द्रीय सत्ता किसके हाथ में सौंपी जाए। किसी एक केन्द्रीय सरकार के हाथों में या कुछ अंचलों में प्रांतीय सरकारों के हाथों में।'

    इसी प्रस्ताव के अंत में लॉर्ड वैवेल के स्थान पर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का नया वायसराय बनाने की घोषणा की गई थी ताकि वे भारत के शासन का उत्तरदायित्व भारतीय हाथों में इस प्रकार हस्तांतरित कर सकें जो भारत के भावी सुख और सम्पन्नता को सर्वोत्तम ढंग से सुनिश्चित कर सके। इस घोषणा में प्रयुक्त शब्दों की आंच को प्रत्येक भारतीय सहज ही समझ सकता था। घोषणा का मंतव्य स्पष्ट था- सत्ता का हस्तांतरण हर हालत में होगा, चाहे जिसे भी करना पड़े, जैसे भी करना पड़े। चाहे भारत एक रहे या उसके टुकड़े हों। इसीलिए सत्ता के हस्तांतरण को महामना सम्राट की उदारता पूर्वक की गई घोषणा नहीं कहा जा सकता था अपितु इसके माध्यम से छिपे-शब्दों में चुनौती दी गई कि इस बार जिस भारतीय तत्व ने अंग्रेज सरकार पर अपनी शर्तें मनवाने का दबाव बनाने का प्रयास किया, वह निश्चित रूप से घाटे में रहेगा और सत्ता का हस्तांतरण उसे कर दिया जाएगा जो अंग्रेज सरकार की बात मानेगा। इस प्रकार इस बार सत्ता हस्तांतरण की जिम्मेदारी अंग्रेजों पर कम रह गई थी और भारतीयों पर अधिक आ गई थी कि वे शांति-पूर्वक आजादी ले लें......... अन्यथा अंग्रेज भारत को लावारिस छोड़कर चले जाएंगे।

    कांग्रेस समझ गई कि अब अंग्रेजों से लड़ने का समय समाप्त हो चुका है, अब उन्हें मुस्लिम लीग के हाथों से अपने देश को बचाना है, देश का कम से कम नुक्सान करके, अधिक से अधिक हिस्सा बचाना है। मुस्लिम लीग भी समझ गई कि अब उन्हें अंग्रेजों की तरफ से चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें अपने मुक्के केवल कांग्रेस पर बर्बाद करने हैं तथा भारत के देशी-राजाओं और दलित नेताओं को अपने पक्ष में करके अधिक से अधिक पाकिस्तान प्राप्त करना है। एक ऐसा पाकिस्तान जिसमें नेहरू, गांधी और पटेल न हों, कांग्रेस न हो, जनेऊधारी मालवीय जैसे पण्डित न हों, केवल जिन्ना हो, लियाकत अली हो, चौधरी मोहम्मद अली हो और आंख मूंद कर उनके पीछे चलने वाले सुहरावर्दी जैसे अनुयाई हों। इसलिए प्रधानमंत्री एटली की घोषणा के साथ ही भारत में अफरा-तफरी मच गई।

    किसी को आशा नहीं थी कि इंग्लैण्ड अपनी महारानी के मुकुट में जड़े सबसे कीमती हीरे को इतनी आसानी से छोड़ देगा। इसका श्रेय किसी एक तत्व को नहीं दिया जा सकता था। न तो भारत में चल रहे स्वाधीनता संग्राम को, न कांग्रेस को, न गांधीजी को...... जैसा कि बाद में दावा किया गया। अपितु यह एक बहुत सी घटनाओं और घटना-चक्रों का सम्मिलित परिणाम था जिनमें से कुछ इस प्रकार थीं-

    (1) अमरीका, रूस, फ्रांस, चीन जैसी अंतराष्ट्रीय शक्तियां इंग्लैण्ड पर दबाव डाल रही थीं कि वह भारत को स्वतंत्र करे।

    (2) भारत में चल रहे कम्यूनिस्ट आंदोलनों के कारण मजदूरों द्वारा हड़तालों की ऐसी शृंखला आरम्भ कर दी गई थी जिससे निबट पाना अंग्रेज सरकार के वश में नहीं रह गया था।

    (3) द्वितीय विश्व-युद्ध के मोर्चे पर इंग्लैण्ड की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि वह भारत जैसे बड़े देश पर नियंत्रण रखने योग्य ही नहीं रह गया था।

    (4) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आकस्मिक निधन से भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति अविश्वास अपने चरम पर पहुंच गया था। अधिकांश भारतीयों का मानना था कि सुभाष बाबू की हत्या की गई है और इस कार्य में अंग्रेज शामिल हैं।

    (5) मुस्लिम लीग सीधी कार्यवाही दिवस का आयोजन करके यह सिद्ध कर चुकी थी कि उसके गुण्डों को रोक पाना किसी के वश में नहीं है, न अंग्रेजी हुकूमत के और न कांग्रेस के।

    (6) कांग्रेस भी अब अंग्रेजों से ज्यादा मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने को व्याकुल हो उठी थी।

    (7) भारतीय सेनाओं के सशस्त्र विद्रोहों में अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएं होने से अंग्रेजों का आत्म-विश्वास पूरी तरह नष्ट हो गया।

    इन सबसे एक-साथ निबटने की शक्ति निश्चित रूप से ब्रिटेन में नहीं रह गई थी। अब परिस्थिति उस दौर में पहुंच चुकी थी जिसमें से अंग्रेजों को भारत से अपना पीछा छुड़ाना था ताकि भारत में रह रहे अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार सुरक्षित रूप से भारत से निकलकर इंग्लैण्ड पहुंच सकें। इसके लिए उन्हें भारत के दो तो क्या हजार टुकड़े भी करने पड़ते तो अंग्रेज उससे नहीं हिचकिचाते।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-120

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-120

    सोने का दिल लोहे के हाथ


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    संसार में ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं जो संसार की सेवा करने के लिए अपने हाथों को लोहे का और दिल को सोने का बना लेते हैं। सरदार पटेल ऐसे ही विरले महापुरुष थे। गुजरात के प्लेग रोगियों की सेवा करने के लिए उन्होंने अपना जीवन खतरे में डाल दिया और रोगियों की सेवा करते-करते, स्वयं प्लेग ग्रस्त होकर गांव से बाहर एक मंदिर में जाकर रहने लगे। उन्होंने अपनी कमाई भाइयों पर लुटा दी और प्रधानमंत्री की कुर्सी गांधीजी की इच्छा के लिए कुर्बान कर दी।

    वे चाहते थे तो प्रधानमंत्री बन सकते थे किंतु उन्होंने देश की स्वतंत्रता के रथ को तेजी से आगे बढ़ने देने के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी को वैसे ही त्याग दिया जैसे सुभाषचंद्र बोस ने गांधीजी की इच्छापूर्ति के लिए कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी त्याग दी थी। सरदार पटेल का निजी जीवन सरलता और सादगी से गहगह महकता था। पहली पत्नी की मृत्यु के उपरांत उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया। गरीबी का दंश झेलकर भी उन्होंने लंदन जाकर बैररिस्ट्री की पढ़ाई की। जब सम्पन्नता जीवन में आने लगी तो वकालात त्यागकर, वे स्वातंत्र्य समर में कूद पड़े।

    अंग्रेजी वेशभूषा त्यागकर उन्होंने देशी कुर्ता और धोती को अपना लिया। अपने पुत्र के विवाह के आयोजन पर उन्होंने केवल 12 रुपये व्यय किये। उनकी पुत्री मणिबेन आजीवन उनके साथ छाया की तरह रहीं किंतु वे भी साधारण खादी की मोटी सफेद साड़ी पहनती थीं। सरदार पटेल का त्यागमय जीवन भारतीय ऋषियों की परम्परा का जीता-जागता प्रमाण था। सोने के दिल और लोहे के हाथों वाले इस भारतीय ऋषि को हमारा शत-शत प्रणाम है।

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  • गोरे भारत से सम्मानजनक पलायन का रास्ता ढूंढने लगे!

     03.06.2020
    गोरे भारत से सम्मानजनक पलायन का  रास्ता ढूंढने लगे!

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    15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली द्वारा कैबीनेट मिशन को भारत भेजने की ऐतिहासिक घोषणा की गयी जिसने भारत के 565 राजाओं की भूमिका एवं भारतीय राजनीतिक प्रगति के लिये एक नवीन ध्वनि तथा रेखा निश्चित की। भूतकाल से बिल्कुल उलट, इस बार ब्रिटिश सरकार राजाओं से अपेक्षा कर रही थी कि वे भारत की स्वतंत्रता की प्राप्ति में बाधा न बनें अपितु भागीदारी निभायें। भारत के वायसराय लॉर्ड वेवेल के नाम भेजे एक तार में प्रधानमंत्री एटली ने लिखा कि 'लेबर गवर्नमेंट' वायसराय को नजर अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलायेगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।

    सरकार को राजाओं की ओर से आशंका थी कि वे अपनी संप्रभुता की दुहाई देकर एक बार फिर योजना के मार्ग में आ खड़े होंगे। इसलिये उन्होंने राजाओं को पहले ही आश्वासन दे दिया कि सम्राट के साथ उनके सम्बन्धों या उनके साथ की गयी संधियों और समझौतों में दिये गये अधिकारों में उनकी सहमति के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। 12 मार्च 1946 के पत्र में लार्ड वेवेल ने इस आश्वासन को दोहराया। इस पत्र में कहा गया कि बातचीत के अतिरिक्त और किसी आधार पर रियासतों को भारतीय ढांचे में मिलाने की योजना बनाने की कोई इच्छा नहीं है। इस प्रकार सत्ता के संवैधानिक हस्तांतरण के विकास क्रम में अंतिम, गंभीरतम और अपेक्षाकृत अधिक विमलमति युक्त परिणाम देने के लिये सम्राट की सरकार के तीन मंत्रियों का मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया।

    इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिये एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सकें। उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे।

    प्रेस वार्ता के दौरान लॉर्ड लॉरेंस से पूछा गया कि राज्यों का सहयोग आवश्यक होगा या अनिवार्य? इस पर लॉरेंस ने जवाब दिया कि हमने संवैधानिक संरचना की स्थापना करने वाले तंत्र को बनाने के लिये विचार-विमर्श करने हेतु राज्यों को आमंत्रित करने की योजना बनायी है। यदि मैं आपको रात्रि के भोजन पर आमंत्रित करता हूँ तो आपके लिये वहाँ आना अनिवार्य नहीं है।

    यह निश्चय किया गया कि कैबीनेट मिशन रियासती भारत के कुछ निश्चित प्रतिनिधियों से ही भेंट करेगा। सबसे पहले वह नरेन्द्र मण्डल के चांसलर से भेंट करेगा। इसके बाद मध्यम आकार की रियासतों के प्रतिनिधि के रूप में आने वाले पटियाला, बीकानेर तथा नवानगर के शासकों से संयुक्त रूप से भेंट करेगा। मिशन लघु राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में आने वाले डूंगरपुर तथा बिलासपुर के शासकों से संयुक्त रूप से मुलाकात करेगा तथा हैदराबाद के प्रतिनिधि के रूप में नवाब छतारी, त्रावणकोर के प्रतिनिधि सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर एवं जयपुर के प्रतिनिधि मिर्जा इस्माइल से अलग-अलग साक्षात्कार करेगा।

    राजाओं से मुलाकातों का दौर पूरा कर लेने के बाद इस मिशन को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों से माथा खपाना था। इस प्रकार अब अंग्रेज भारत से अपने सम्मान जनक पलायन का फार्मला ढूंढने लगे। इस सुझाव पर कि मिशन को भारत के देशी राज्यों की जनता के प्रतिनिधियों से भी साक्षात्कार करना चाहिये, न तो भारत सरकार के राजनीतिक विभाग ने सहमति दी, न ही नरेन्द्र मण्डल के चांसलर सहमत हुए, न ही मिशन ने इस प्रश्न पर जोर दिया।

    2 अप्रेल 1946 को कैबिनेट मिशन तथा वायसराय के साथ साक्षात्कार के दौरान नरेन्द्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल ने स्पष्ट कर दिया कि देशी राज्य अपनी अधिकतम प्रभुसत्ता के साथ अपने अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। वे अपने आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत का कोई हस्तक्षेप नहीं चाहते। उन्होंने सलाह दी कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय राज्यों तथा ब्रिटिश भारत प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो राज्यों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो कि राज्यों से मिलकर बना हो? कोई भी भारतीय राजा भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गयी संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये।

    उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जायेगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जायेगा।

    मिशन ने इस स्थिति को शासकों के समक्ष स्पष्ट कर देना आवश्यक समझा किंतु शासकों ने इस पर कोई जोर नहीं दिया न ही इस विषय पर ब्रिटिश भारतीय नेताओं से बात की क्योंकि उन्हें लगता था कि इसके समर्थन में कोई भी सकारात्मक बयान देने से ब्रिटिश भारतीय नेताओं के साथ किसी भी मंच पर होने वाली उनकी बातचीत में शासकों की स्थिति कमजोर हो जायेगी। अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाये रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल संघ के माध्यम से ही हो सकते थे।

    राज्यों के महासंघ के निर्माण के प्रश्न पर लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि मिशन के लिये यह नया विचार है इसलिये वे इस पर विशद गहराई के साथ विचार नहीं कर सकते। यह सुझाव उन्हें रोचक और अच्छा लगा था इसलिये उन्होंने इस सुझाव को पूरी तरह रद्द नहीं किया। क्रिप्स का मानना था कि इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी। नवाब भोपाल ने पूछा कि क्या अंतरिम काल में संधियां बनी रहेंगी? राज्य सचिव ने जवाब दिया कि वे बनी रहेंगी किंतु उनका विचार था कि आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्रों में की गयी संधियां एवं व्यवस्थाएं तथा संचार व्यवस्थाएं आगे तक भी चल सकती हैं तथा बाद में उनका पुनरीक्षण किया जा सकता है।

    भोपाल नवाब का विचार था कि इस सम्बन्ध में अलग से कोई समझौता नहीं था तथा न ही अलग से ऐसा कोई मुद्दा था इसलिये संधियों को विभाजित नहीं किया जा सकता।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 26

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 26

    मुस्लिम लीग द्वारा सशस्त्र कार्यवाही की तैयारी


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    प्रधानमंत्री एटली की घोषणा से जिन्ना समझ गया था कि अब पाकिस्तान बनने से कोई नहीं रोक सकता फिर भी वह स्वयं को हर स्थिति के लिए तैयार रखना चाहता था। पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार न किए जाने की संभावित स्थिति में जिन्ना बहुत ही चालाकी से मुसलमानों को एक खूनी गृहयुद्ध के लिए तैयार कर रहा था। उसका अगला कदम बहुत निर्णायक था। वह जानता था कि उसे पाकिस्तान मुस्लिम लीग के मंचों पर दिए गए राजनीतिक भाषणों से नहीं मिलेगा। पाकिस्तान मिलेगा मुस्लिम नेशनल गार्ड्स के चमकीले और पैने हथियारों से, जिसकी तैयारी वह पिछले सात साल से कर रहा था और सीधी कार्यवाही में वह हथियारों को सफल प्रयोग कर भी चुका था।

    15 जून 1940 को बम्बई के मुस्लिम लीग अधिवेशन में मुसलमानों की जान-माल की हिफाजत के लिए मुस्लिम नेशनल गार्ड को संगठित तथा मजबूत करने के लिए प्रांतीय मुस्लिीम लीगों को दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। तभी से यह स्पष्ट था कि मुस्लिम लीग जल्दी या बाद में एक गृहयुद्ध आरम्भ करने वाली थी। मुस्लिम नेशनल गार्ड् को विभिन्न प्रकार के हथियारों से लड़ने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस सेना के लिए बड़ी संख्या में हथियार एकत्रित किये गये थे और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को लीग की सेना में भर्ती किया गया था। इस सेना का विस्तार एवं सैन्य उपकरणों से लैस होना निरंतर जारी रहता था। इसके दो संगठन बनाये गये थे, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड।

    नेशनल गार्ड मुस्लिम लीग का गुप्त संगठन था। उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र एवं मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और ऐसे निर्देश दिये जाते थे जो उन्हें दंगों के समय लाभ पहुंचायें, जैसे लाठी, भाले और चाकू का इस्तेमाल। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को 'सालार' कहा जाता था। नेशनल गार्ड के लम्बे चौड़े जवान, हथियारों से लैस होकर जिन्ना के चारों ओर बने रहकर उसकी सुरक्षा करते थे। जनवरी 1947 में पंजाब पुलिस ने मुस्लिम नेशनल गार्ड के लाहौर कार्यालय पर छापा मारा तो वहाँ से बड़ी संख्या में स्टील के हेलमेट, बिल्ले तथा सैन्य उपकरण बरामद हुए।

    मुस्लिम नेशनल गार्ड के पास अपनी लारियां और जीपें थीं जिनका उपयोग हिंदू और सिक्ख क्षेत्रों पर आक्रमण करने तथा अकेले मुसाफिरों को लूटने में होता था। मुस्लिम नेशनल गार्ड के लोग अपने साथ पैट्रोल रखते थे जिसका उपयोग आगजनी में होता था। अप्रेल 1947 में पंजाब सरकार के प्रमुख सचिव अख्तर हुसैन ने पंजाब के गवर्नर को रिपोर्ट दी कि मुस्लिम लीग ने 5,630 गार्ड भरती किये हैं। इसके 15 दिन बाद की रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम लीग के नेशनल गार्डों की संख्या अब लगभग 39,000 है। मुस्लिम लीग ने सशस्त्र तैयारी करने के साथ ही उन प्रांतों में चल रही सरकारों एवं विधानसभाओं में दबाव बनाना आरम्भ किया जिन्हें वह भावी पाकिस्तान में सम्मिलित करना चाहती थी। असम में मुसलमानों का बहुमत नहीं था किंतु फिर भी मुस्लिम लीग उसे पाकिस्तान में शामिल करना चाहती थी। इन प्रांतों से मुस्लिम लीग ने हिन्दुओं को भगाना आरम्भ कर दिया ताकि हिन्दू स्वयं ही तंग आकर मुस्लिम लीग को उसका मनचाहा पाकिस्तान दे दें।

    जिस समय अंतरिम सरकार में देश के धन-सम्पदा को पाकिस्तान और भारत में बांटा जा रहा था, मुस्लिम लीग लॉर्ड माउण्टबेटन येाजना को विफल बनाने का यत्न कर रही थी। मिस्टर जिन्ना और गांधीजी ने एक संयुक्त वक्तव्य निकाला था और दोनों समुदायों के घटकों को परस्पर मैत्री भाव रखने के लिए कहा था। कम से कम मुस्लिम लीग की ओर से यह वक्तव्य हिन्दुओं की आंखों में धूल झोंकने के सदृश्य था। मुस्लिम लीग ने उस वक्तव्य की अवहेलना कर यह यत्न करना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुस्तान के वे क्षेत्र जो जिन्ना पाकिस्तान में चाहते थे और जो माउण्टबेटन योजना के अनुसार पाकिस्तान को नहीं मिले थे, उन पर यत्न-पूर्वक अधिकार कर लिया जाए।

    पंजाब में विगत 10 वर्षों से यूनियनिस्ट पार्टी के मलिक खिजिर हयात खाँ की संयुक्त सरकार थी जिसमें हिन्दू, मुसलमान एवं सिक्ख तीनों शामिल थे। लीग के कार्यकर्ताओं ने गुण्डागर्दी करके पंजाब में कानून एवं व्यवस्था इतनी अधिक बिगड़ गई कि 2 मार्च 1947 को हयात खाँ की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और गवर्नर ने मुस्लिम लीग की सरकार बनवा दी। पंजाब सदियों से हिन्दुओं की भूमि थी। ई.1881 की जनगणना में पंजाब की कुल जनसंख्या 1.76 करोड़ थी जिसमें से 43.8 प्रतिशत हिन्दू, 8.2 प्रतिशत सिक्ख, 47.6 प्रतिशत मुस्लिम, 0.1 प्रतिशत ईसाई तथा शेष अन्य धर्मों के लोग थे। ई.1941 की जनगणना में पंजाब की कुल आबादी 3.43 करोड़ थी जिनमें से हिन्दू केवल 29.1 प्रतिशत पाए गए। मुस्लिम 53.2 प्रतिशत, सिक्ख 14.9 प्रतिशत, ईसाई 1.9 प्रतिशत तथा शेष 1.3 प्रतिशत पाए गए। इस प्रकार 60 साल में हिन्दुओं की संख्या में 14.7 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि मुसलमानों की जनसंख्या में 5.6 प्रतिशत, सिक्खों की जनसंख्या में 6.7 प्रतिशत और ईसाइयों की जनसंख्या में 1.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। इस अवधि में पंजाब के लाखों हिन्दू कहाँ चले गए, इसका कोई हिसाब गोरी सरकार के पास नहीं था।

    पंजाब की भूमि पर यदि किसी का अधिकार हो सकता था तो वह हिन्दुओं एवं सिक्खों का सम्मिलित रूप से हो सकता था किंतु अब जबकि पंजाब का विभाजन होने जा रहा था, मुस्लिम लीग गुण्डागर्दी करके पंजाब पर अधिकार जमाना चाहती थी ताकि हिन्दुओं एवं सिक्खों को पंजाब से बेदखल करके पूरा पंजाब पाकिस्तान में मिलाया जा सके। सिक्खों की वीर जाति को यह सहन नहीं हुआ। उनके नेता मास्टर तारासिंह ने अलग सिक्खिस्तान की मांग की तथा सरे आम सिक्खों का आह्वान किया कि वे मुस्लिम लीग को समाप्त कर दें। मास्टर तारासिंह के आह्वान पर सिक्खों ने 4 मार्च 1947 को लाहौर में मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन किया।

    मुस्लिम लीग के गुण्डों ने इस जुलूस पर हमला कर दिया जिससे बलवा मच गया। लाहौर, अमृतसर, तक्षशिला एवं रावलपिण्डी सहित पंजाब के लगभग सभी बड़े शहरों में मार-काट मच गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2,049 आदमी मारे गए, 1000 से अधिक लोग बुरी तरह से घायल हुए। प्रेस रिपोर्टों के अनुसार इन दंगों में मुस्लिम लीग द्वारा मशीनगनें एवं राइफलें भी काम में ली गईं। अर्थात् पंजाब की मुस्लिम लीग सरकार ने पुलिस एवं सैनिक शास्त्रागारों के मुँह मुस्लिम लीग के गुण्डों के लिए खोल दिए थे। जनवरी 1947 से पूरे पंजाब में मुस्लिम लीग द्वारा गुप्त-रैलियां आयोजित होती रही थीं। हिन्दुओं की मक्कारी और निर्दयता के शिकार लोगों की खोपड़ियां और तस्वीरें उन रैलियों में प्रदर्शित होतीं। यदाकदा, जिन्दा और घायल मनुष्यों को भी एक रैली से दूसरी रैली में घुमाया जाता जो सबके सामने अपने घाव दिखाते और बयान करते कि वे घाव उन्हें किस प्रकार मक्कार और निर्दय हिन्दुओं के कारण लगे। ये रैलियां कभी गुप्त होतीं तो कभी सार्वजनिक, उस क्षेत्र की धार्मिक उदारता का भक्षण करती जा रही थीं।

    हिन्दुओं, मुसलमानों और सिक्खों की जिस मिली-जुली राज्य सरकार ने दस वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन चलाया था, उसे एकाएक जो इस्तीफा देना पड़ा, उसके पीछे धार्मिक उदारता में पड़ चुकी दरारें ही थीं। हिंसा की पहली लहर मार्च में आई जब एक सिक्ख नेता (मास्टर तारासिंह) ने मुस्लिम लीग के झण्डे को 'पाकिस्तान मुर्दाबाद' के नारे के साथ नीचे गिरा दिया। 3000 लोग जिनमें अधिकांश सिक्ख थे इन दंगों में मारे गए जो नगर-नगर, देहात-देहात में फूट पड़े, क्योंकि लीग के अपमान का बदला लेने के लिए मुसलमानों ने हथियार उठाकर घर से निकलने में कोई देरी नहीं की। लगभग 1 लाख व्यक्ति लाहौर छोड़कर भाग गए। बेहद जरूरी काम से ही लोग घरों से बाहर निकलते। घर से बाहर गया हुआ मनुष्य वापस लौट कर आएगा भी या नहीं कभी भरोसा नहीं होता। जैसा कि एक पुलिस अधिकारी ने लिखा है- 'लाहौर में मौत बिजली की तरह आया करती। यों आई, यों गई। इससे पहले कि कोई चिल्ला सके, बचाओ! लाश गिर चुकी होती। हर दरवाजा बंद, हर गली सूनी, पता ही नहीं चलता, कातिल कौन था और कहाँ चला गया।' हिन्दू और मुसलमान दोनों, एक-दूसरे से बढ़कर हिंसा कर रहे थे।

    मार्च 1947 में मुसलमानों ने पंजाब के सिक्खों का जो संहार किया, उसकी प्रतिक्रिया में सिक्खों को भी तुरंत हथियार लेकर निकल पड़ना चाहिए था। जब ऐसा न हुआ तो सुरक्षा अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। उन्होंने यही समझा कि सिक्खों जैसी वीर और युद्ध-प्रिय कौम ने अपनी गर्म-जोशी खो दी है। दौलत ने उन्हें आरामपसंद बना दिया है। लेकिन सिक्खों के मानस का यह मूल्यांकन पूर्णतः गलत था। जून के प्रारंभिक दिनों में लाहौर के एक होटल में सिक्ख नेताओं की गुप्त बैठक हुई। ये नेता तय करना चाहते थे कि यदि सचमुच विभाजन हो गया तो सिक्खों की मोर्चाबन्दी क्या हो।

    उस बैठक में मास्टर तारासिंह ने कहा- 'जैसे जापानियों और नाजियों ने आत्म-बलिदान दिया, वैसे ही हमें भी आत्म-बलिदान के लिए तैयार हो जाना है। वह दिन दूर नहीं, जब हमारी धरती पर आक्रमण होगा और हमारी औरतों की इज्जत दांव पर लग जाएगी। उठो! इन मुगल आक्रमणकारियों को एक बार फिर तबाह कर दो। हमारी जन्मभूमि खून मांग रही है। धरती माता की प्यास हम जरूर बुझाएंगे- अपने खून से और दुश्मनों के खून से।'

    कहा नहीं जा सकता कि लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने तारासिंह के भाषण के उक्त अंश किस स्रोत से लिए हैं! क्योंकि उन्होंने कोई स्रोत नहीं बताया है। वे लिखते हैं- 'भारत के साठ लाख सिक्खों में से पचास लाख उन दिनों अकेले पंजाब में बसे हुए थे। भले ही वे पंजाब की कुल आबादी के मात्र 13 प्रतिशत थे किंतु 40 प्रतिशत भूमि उन्हीं के कब्जे में थी। पंजाब की अनोखी फसलों का दो-तिहाई हिस्सा सिक्खों के ही हाथों पैदा होता था। हथियारों के प्रति उनके आकर्षण का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भारतीय सशस्त्र फौज के एक तिहाई सदस्य सिक्ख थे और दोनों विश्व-युद्धों में भारतीय सेना ने जो पदक जीते, उनमें से आधे सिक्खों के ही कारण जीते।'


    मेवस्थान की योजना

    कांग्रेस में शामिल वामपंथी विचारों के नेता डॉ. अशरफ के विद्यार्थी काल में शिक्षा प्राप्ति हेतु अलवर राज्य द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई थी। वह मेव मुसलमान था तथा कांग्रेस में रहकर मेवों की राजनीति करता था। उसने अलग मेवस्थान प्रस्थापित कर पाकिस्तान में संलग्न होने का शरारतपूर्ण सुझाव दिया था। मेवस्थान के लिए मची मारकाट से मार्च 1947 तक इस पूरे क्षेत्र में शांति व्यवस्था सर्वथा भंग हो गई। गुड़गांवा में मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने बहुत लूटमार मचा रखी थी। वहाँ का डिप्टी कमिश्नर गुण्डों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर रहा था। वल्लभभाई पटेल ने गुड़गांवा पहुंचकर डिप्टी कमिश्नर से इसके बारे में सवाल पूछे तो डिप्टी कमिश्नर ने उत्तर देने से इन्कार कर दिया। वल्लभभाई अपना सा मुख लेकर वापस आ गए।

    गुड़गांवा जिले में मेव जाति के मुसलमान बड़ी भारी संख्या में बसे हुए थे। सन् 1947 के आरम्भ से जुलाई 1947 तक जिला गुड़गांवा के गांव-गांव में बलवे हुए। वहाँ के गूजर और जाटों ने मुसलमानों का विरोध किया। इस पर भी हिन्दुओं के सैंकड़ों गांव जला डाले गए और वहाँ के गूजर, अहीर तथा जाट दिल्ली और गुड़गांवा में आश्रय पाने के लिए एकत्रित होने लगे। योजना कुछ ऐसी थी कि दिल्ली और गुड़गांवा हिन्दुओं से खाली करा दिए जाएं और यहाँ पर मुस्लिम लीग का अधिकार जमा लिया जाए। इसके लिए शस्त्रास्त्र भी स्मगल करके लाए गए थे। मुस्लिम लीग की यह योजना कुछ तो दिल्ली के हिन्दू युवकों ने विफल कर दी और कुछ अलवर राज्य जो जिला गुड़गांवा के किनारे पर था, ने चलने नहीं दी।

    अलवर के राजा ने अपने राज्य का मुख्यमंत्री हिन्दू सभा के एक नेता को बना रखा था। इस राज्य के प्रयत्न से वहाँ के मेव अपनी योजना में सफल नहीं हो सके। गांधीजी के सहयोगी मास्टर प्यारे लाल ने लिखा है- 'मुस्लिम लीग और इसके सहायकों के षड्यंत्र के सूत्रों का नवीन प्रमाण मिला था। कुछ सैनिक अधिकारी जो युद्धकाल में जापान की सेना के पीछे बर्मा में ब्रिगेडियर विंगेट के अधीन काम कर रहे थे, विध्वंसात्मक कार्यवाही करते पकड़े गए। वह किस प्रकार हिन्दुस्तान में घुस सके, यह एक रहस्यमय बात है। शस्त्रास्त्र के अवैधानिक रूप से हिन्दुस्तान में लाने की कार्यवाही बहुत तेजी से चल रही थी। इसमें हिन्दुस्तानी सेना के अंग्रेज अधिकारी सक्रिय सहयोग दे रहे थे। यह एक खुली निंदनीय बात थी। अवैधानिक शस्त्रास्त्रों के छिपे हुए कोश जिनमें हजारों स्टेनगन्स थीं, नागपुर, जबलपुर, कानपुर और कई स्थानों पर पाए गए। कांग्रेस हाईकमाण्ड को इन कोशों के लिखित प्रमाण मिले थे और पता चला था कि ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक विभाग भी इस कार्य में सम्मिलित है। यह विभाग कुछ राजाओं-महाराजाओं से मिलकर एक षड्यंत्र बना रहा था, जिससे हिन्दुस्तान की एकता भंग हो सके। ऐसे भी प्रमाण मिले, जिससे एक व्यवस्थित योजना का पता चला कि शस्त्रास्त्र देशी रियासतों से हिन्दुस्तान भर में भेजकर एक डी-डे मनाया जा सके।'

    बहुत से शस्त्रास्त्र मस्जिदों में एकत्रित किए हुए मिले। ये निःसंदेह मुस्लिम लीगी राज्य स्थापित करने के लिए थे।.... जबलपुर, नागपुर इत्यादि नगरों में जो शस्त्रास्त्रों के कोश मिले थे, वे कदाचित् मुस्लिम लीग के विशाल षड़्यंत्र का ही परिणाम था। इन कोशों के निर्माण में राजा-महाराजाओं का कितना हाथ था, कहना कठिन है। ....... वास्तविक बात यह है कि अंतरिम सरकार बनने के अपरांत पूरे हिन्दुस्तान में मुस्लिम लीग का षड़्यंत्र चल रहा था जिससे यदि पूर्ण हिन्दुस्तान नहीं तो हिन्दुस्तान के बहुत से भाग को पाकिस्तान बनाया जा सके।

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  • अजमेर का इतिहास - 1

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 1

    प्राक्कथन


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर नगर का भारत के इतिहास में क्या महत्व है, वह ब्रिटिश शासन काल में कही जाने वाली कहावत- 'वन हू रूल्स अजमेर, रूल्स इण्डिया' से बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। अजमेर न केवल राजस्थान के मध्य में है अपितु उत्तर भारत के भी लगभग मध्य में है। पृथ्वीराज चौहान दिल्ली पर अपना शासन इसीलिये स्थापित कर सका क्योंकि वह अजमेर का शासक था। भारत पर मुस्लिम आधिपत्य से पहले ही मुहम्मद गौरी ने अजमेर के राजनीतिक महत्त्व को भलीभांति समझ लिया था। तभी तो मुहम्मद गौरी से लेकर दिल्ली सल्तनत के अधिकांश बादशाहों ने अजमेर पर अपना नियंत्रण कड़ाई से बनाये रखा।

    मुहम्मद बिन तुगलक ने कभी भी दिल्ली को भारत की राजधानी के लिये उपयुक्त नहीं समझा, इसलिये वह अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर दौलताबाद ले गया किंतु उसे भी राजधानी के रूप में अनुपयुक्त पाकर पुनः अपनी राजधानी को दिल्ली ले आया। मारवाड़ के राठौड़ शासक भी दिल्ली की राजनीति में इसीलिये गहरी पकड़ बनाये रख पाये क्योंकि अजमेर प्रायः उनके अधीन रहा। मेवाड़ के राणाओं ने अजमेर प्राप्त करने के लिये अपने स्वाभाविक मित्र राठौड़ों से शत्रुता की। दिल्ली सल्तनत के पराभव के बाद शेरशाह सूरी ने अजमेर को अपने अधीन लेने के लिये अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर मारवाड़ के राठौड़ों पर आक्रमण किया तथा अजमेर को अपने अधीन किया।

    जब अकबर ने भारत पर अपना शिकंजा कसना आरम्भ किया तो अजमेर की महत्ता उसकी दृष्टि से छिपी न रह सकी। अजमेर को स्थाई रूप से मुस्लिम प्रभाव में रखने के लिये उसने ख्वाजा की दरगाह के माध्यम से अजमेर को मुस्लिम राजधानी का रूप देने का प्रयास किया। अकबर से लेकर फर्रूखसीयर तक अजमेर मुगलों की सैनिक छावनी बना रहा।

    मुगलों के कमजोर पड़ जाने पर जयपुर के कच्छवाहों ने अजमेर पर अधिकार करने के लिये अपने स्वाभाविक मित्रों अर्थात् राठौड़ शासकों से विश्वासघात किया और उनकी हत्याएं करवाईं। मराठों ने भी अजमेर पर अधिकार जमाने के लिये ई.1737 से ई.1800 तक राठौड़ों से लम्बा संघर्ष किया। उस काल में उत्तरी भारत की दो महान शक्तियां- महादजी सिंधिया तथा मारवाड़ नरेश महाराजा विजयसिंह तब तक लड़ते रहे, जब तक कि दोनों ही लड़कर नष्ट नहीं हो गये।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने जब व्यापारिक कम्पनी का चोला उतारकर भारत सरकार के रूप में अवतार लिया तो उसने मराठों को धन देकर अजमेर खरीदा। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर को अपनी प्रादेशिक राजधानी बनाया तथा नसीराबाद में सैनिक छावनी स्थापित की। अजमेर से ही राजपूताने के सारे राजाओं की नकेलें कसी गईं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, अजमेर का महत्व बढ़ता गया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भारत में सामाजिक परिवर्तन की आंधी लाने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी अजमेर को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया।

    बीसवीं सदी में हर बिलास शारदा की आवाज पूरे भारत में इसलीये ध्यान देकर सुनी गई क्योंकि वे केन्द्रीय विधानसभा में अजमेर सीट से मनोनीत किये जाते थे। उन्होंने पूरे देश के लिये बाल विवाह निषेध का जो कानून बनवाया वह आज भी शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है।

    जिस अजमेर नगर ने हर युग में भारत वर्ष के बड़े से बड़े शासक की नींद उजाड़ी हो तथा जिस अजमेर के लिये लाखों मनुष्यों ने अपने बलिदान दिये हों, उस अजमेर नगर का इतिहास लिखना अत्यंत दुष्कर कार्य है। फिर भी मैं इसे लिखने का साहस जुटा सका तो केवल इसलिये कि मैं चार वर्ष तक अजमेर में रहा। मैंने अजमेर को पहली बार ई.1968 में देखा। दूसरी बार मैं अगस्त 1980 से अप्रेल 1984 तक दयानंद महाविद्यालय अजमेर का विद्यार्थी रहा।

    अपने अजमेर प्रवास के दौरान मैंने इस नगर की आत्मा के दर्शन किये और इस नगर की धड़कनों को सुना। मैंने राजकुमार लोत के विजयनाद को सुना। अरणोराज और बीसलदेव के विजयी घोड़ों की टापों को सुना। मैंने कवि चंद बरदाई के कवित्त और तारागढ़ के पहाड़ी से टकराती हुई पृथ्वीराज चौहान की बेबस चीखों को सुना। मैंने संयोगिता की उन सिसकियों को सुना जो आज भी इतिहास के नेपथ्य में सिसक रही हैं। मैंने उमादे के उन विरह गीतों को सुना जो अजमेर की पहाड़ियों में भटका करते हैं। मेरे द्वारा सुनी गईं वे सब ध्वनियां ही आज इस ग्रंथ के रूप में आपके हाथों में हैं।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजाओं ने एक-एक करके अपने पत्ते खोलने आरंभ कर दिये!

     03.06.2020
    राजाओं ने एक-एक करके अपने पत्ते खोलने आरंभ कर दिये!

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    कैबीनेट मिशन भारत को आजादी देने का सर्वसम्मत फार्मूला ढूंढने के लिये भारतीय राजाओं से वार्ता कर रहा था। दल के सदस्य स्टैफर्ड क्रिप्स का मानना था कि तकनीकी रूप से कैसी भी स्थिति हो किंतु जिस दिन आजाद भारत की नयी सरकार को सत्ता का हस्तांतरण किया जाये उससे पहले, ब्रिटिश भारत तथा रियासती भारत के मध्य वर्तमान में चल रही आर्थिक व्यवस्थाओं को यकायक भंग हो जाने से बचाने के लिये कोई व्यवस्था की जानी चाहिये। ऐसा व्यवधान राज्यों और ब्रिटिश भारत दोनों के लिये हानिकारक होगा तथा इसे देशी राज्यों के विरुद्ध लीवर के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। यह वार्तालाप मिशन द्वारा जाम साहब की इस प्रार्थना की स्वीकृति के साथ समाप्त हुआ कि जब ब्रिटिश भारत के भविष्य का प्रारूप निर्धारित हो जाये तब राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ एक बार फिर से विचार विमर्श किया जाये।

    कैबीनेट मिशन द्वारा छोटे राज्यों के प्रतिनिधियों- डूंगरपुर एवं बिलासपुर के शासकों के साथ 4 अप्रेल 1946 को साक्षात्कार किया गया। डूंगरपुर के शासक ने कहा कि भारत में केवल आधा दर्जन देशी राज्य ही ऐसे हैं जो ब्रिटिश भारत के प्रांतों की तुलना के समक्ष खड़े रह सकते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि छोटे राज्यों को अपनी प्रभुसत्ता बचाने के लिये क्षेत्रीयता एवं भाषा के आधार पर मिलकर बड़ी इकाई का निर्माण कर लेना चाहिये। छोटे राज्यों को भय है कि बड़े राज्य उन्हें निगल जाना चाहते हैं। छोटे राज्य संतोषजनक गारंटी चाहते हैं। यह सुझाव गलत है कि छोटे राज्यों का कोई भविष्य नहीं है। वे बड़े राज्यों से भी अधिक बलिदान देने को तैयार हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हैदराबाद, कश्मीर तथा मैसूर को छोड़कर शेष राज्यों को 9 क्षेत्रीय इकाईयों में विभक्त किया जाये। बिलासपुर के राजा ने कहा कि प्रत्येक राज्य को उसकी पुरानी आजादी पुनः लौटा दी जानी चाहिये तथा उसे अपनी मनमर्जी के अनुसार कार्य करने के लिये छोड़ दिया जाना चाहिये।

    कैबीनेट मिशन के सदस्यों द्वारा त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी से 9 अप्रेल को साक्षात्कार किया गया। रामास्वामी ने कहा कि परमोच्चसत्ता किसी उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। अंतरिम काल में परमोच्चता का संरक्षण किया जाना चाहिये किंतु यदि कोई विवाद न हो तो राजनीतिक विभाग के तंत्र को पुनरीक्षित किया जाना चाहिये। सर सी. पी. रामास्वामी का विश्वास था कि 601 राज्य भविष्य के भारत में प्रभावी इकाई नहीं हो 
    सकेंगे। छोटे राज्यों को बता दिया जाना चाहिये कि या तो वे स्वयं अपने आप समूह बना लें या फिर उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया जायेगा।

    हैदराबाद के प्रतिनिधि ने मांग की कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा छीनी गयी सीमाओं को फिर से हैदराबाद को लौटा दिया जाना चाहिये तथा उसे समुद्र तक का स्वतंत्र मार्ग दिया जाना चाहिये। जयपुर के दीवान मिर्जा इस्माइल ने अपने साक्षात्कार का बड़ा भाग इस विषय पर खर्च किया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के भेद कैसे दूर हो सकते हैं! उन्होंने जोर दिया कि भारतीय शासक परिवारों को बनाये रखना चाहिये क्योंकि वे भारत की संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा हैं। ब्रिटिश सरकार को भारत की समस्त समस्याओं को सुलझाये बिना ही भारत छोड़ देना चाहिये।

    मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि राज्यों के प्रतिनिधियों से वार्ता के उपरांत यह बात सामने आयी कि परमोच्चसत्ता उत्तराधिकारी सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये, उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिये। देशी राज्यों पर, भविष्य में बनने वाले संघ अथवा संघों में से किसी एक में मिलने के लिये दबाव नहीं डाला जाना चाहिये। राज्यों के शासक चाहें तो राज्यों का महासंघ बनाये जाने पर कोई आपत्ति नहीं की जानी चाहिये। राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश भारत को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये।

    इस प्रकार राजाओं ने एक-एक करके अपने पत्ते खोलने आरंभ कर दिये थे। वे समझ गये थे कि अब अंग्रेज देश में नहीं रहेंगे। इसलिये अंग्रेजों की कृपाकांक्षा करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाना अधिक उचित होगा कि कहीं भविष्य में बनने वाला आजाद भारत राजाओं के राज्यों को न निगल जाये। दूसरी तरफ छोटे राजा इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं बड़े राजा ही उन्हें न निगल जायें। रियासती भारत में अजीब से बेचैनी और कई तरफा घमासान मचने लगा था।

    राजाओं और उनके प्रतिनिधियों से निबटने के बाद कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बात की तथा उनके द्वारा सुझाये गये बिंदुओं पर विचार-विमर्श करने के लिये ने 9 मई 1946 को भोपाल नवाब को फिर से बुलाया। भोपाल नवाब ने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया कि भारतीय नेताओं द्वारा दिये गये सुझावों पर बात करने के लिये तो उन्हें बुलाया गया है किंतु देशी राज्यों ने जो सुझाव दिये थे उन पर विचार नहीं किया गया है। इस पर मिशन ने नवाब की शंकाओं का समाधान किया।

    12 मई 1946 को कैबीनेट मिशन ने राज्यों के सम्बन्ध में अपनी नीति स्पष्ट करते हुए भोपाल नवाब को एक स्मरणपत्र दिया जिसका शीर्षक ''संधियां एवं परमोच्चता" था। इसे ''12 मई 1946 का स्मरण पत्र" कहा जाता है। भारतीय समाचार पत्रों में इस स्मरण पत्र का प्रकाशन 22 मई को करवाया गया। इसमें कहा गया कि नरेन्द्र मंडल ने पुष्टि कर दी है कि भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति की अभिलाषा में भारतीय रियासतें देश के साथ हैं। परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा नयी बनने वाली सरकार या सरकारों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। सम्राट के साथ अपने सम्बन्धों द्वारा रियासतों ने जो अधिकार प्राप्त कर रखे हैं वे आगे नहीं रहेंगे तथा रियासतों ने सम्राट को जो अधिकार सौंप रखे हैं वे उन्हें वापस मिल जायेंगे। भारत से ब्रिटिश सत्ता के हट जाने पर जो रिक्तता होगी उसकी पूर्ति रियासतों को नये सम्बन्ध जोड़कर करनी होगी। भारतीय व्यवस्था में पारस्परिक समझौते के अतिरिक्त किसी भी बुनियाद पर रियासतों के प्रवेश का प्रावधान किये जाने का मंतव्य नहीं है। भारतीय रियासतें उपयुक्त मामलों में बड़ी प्रशासनिक इकाईयां बनाने या उनमें शामिल होने की इच्छा रखती हैं ताकि संवैधानिक योजना में वे उपयुक्त बन सकें और आंग्ल भारत के साथ बातचीत कर सकें।

    राज्यों के शासक यह जानकर प्रसन्न हुए कि परमोच्चता समाप्त कर दी जायेगी तथा किसी अन्य सत्ता को स्थानांतरित नहीं की जायेगी। समस्त अधिकार राज्यों को वापस मिल जायेंगे किंतु वे इस प्रस्ताव की प्रशंसा नहीं कर सके क्योंकि परमोच्चता की समाप्ति के बाद राज्यों को अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर ही निर्भर रहना था। लोकतांत्रिक पद्धति से निर्मित शक्तिशाली भारत सरकार उनके व्यक्तिगत शासन को बनाये रखने में क्यों रुचि लेगी? कांग्रेस ने इस स्मरण पत्र तथा उसके प्रभावों पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 27

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 27

    लॉर्ड माउण्टबेटन की भारत में नियुक्ति


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    वायसरॉय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में तभी से असफल माना जाने लगा था जब वे जून 1945 की शिमला बैठक में वायसराय की काउंसिल में मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के मसले पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग को सहमत नहीं कर सके थे। जब अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा की गयी सीधी कार्यवाही से बंगाल और बिहार खून से नहा उठे तब वायसराय वैवेल की भारत में विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो गयी। उनके स्थान पर मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाया गया। लॉर्ड माउंटबेटन का पूरा नाम लुइस फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकोलस जॉर्ज माउंटबेटन था। उन्हें फर्स्ट अर्ल-माउण्टबेटन ऑफ बर्मा भी कहा जाता था। वे बेटनबर्ग के राजकुमार थे तथा ब्रिटिश राजपरिवार के सदस्य थे।

    माउंटबेटन ब्रिटिश नौसेना में एडमिरल थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें केजी, जीसीबी, ओएम, जीसीएसआई, जीसीआईई, जीसीवीओ, डीएसओ, पीसी, एफआरएस आदि उपाधियां दे रखी थीं। उनका जन्म 25 जून 1900 को इंग्लैण्ड में हुआ था। लॉर्ड माउंटबेटन इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पति राजकुमार फिलिप (ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग) के मामा थे। वह भारत के आखिरी वायसरॉय थे और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल थे। स्पष्ट दृष्टिकोण एवं सुलझे हुए विचारों का धनी होने के कारण लॉर्ड माउंटबेटन का व्यक्तित्व बहुत शानदार था। वे प्रभावशाली वक्ता, कुशल सेनापति एवं इंग्लैण्ड के जाने-माने लोगों में से एक थे। ब्रिटेन के लिए प्राप्त की गई सामरिक सफलताओं के कारण माउण्टबेटन इंग्लैण्ड की संसद से जो चाहते थे, प्राप्त कर लेते थे। यद्यपि वे लोकतंत्र के समर्थक थे तथापि ब्रिटिश राज-परिवार का सदस्य होने के कारण तथा ब्रिटेन के इतिहास से परिचित होने के कारण उनके मन में भारतीय राजाओं के प्रति विशेष सहानुभूति थी। उनकी पत्नी एडविना सरल स्वभाव एवं कोमल विचारों की स्वामिनी थीं। वे युद्धक्षेत्र में जाकर घायलों का उपचार करने, लोककल्याण का काम करने तथा अपने पति के कामों में उनका हाथ बंटाने के लिए जानी जाती थीं।

    लॉर्ड इस्मे को माउण्टबेटन का चीफ-ऑफ-स्टाफ नियुक्त किया गया। इस्मे एक परिपक्व अधिकारी था। वह ई.1940 से 45 के बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का चीफ-ऑफ-स्टाफ रह चुका था। एलन कैम्पबेल जॉनसन को माउण्टबेटन का प्रेस अटैची नियुक्त किया गया। वह ई.1939 से माउण्टबेटन के स्टाफ में काम कर रहा था। भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सर जॉर्ज एबेल को लॉर्ड माउण्टबेटन का निजी सचिव नियुक्त किया गया। वह पंजाब के गवर्नर के निजी सचिव एवं लॉर्ड वैवेल के निजी सचिव के पद पर कार्य कर चुका था इसलिए उसे भारत की समस्याओं का अच्छी तरह से ज्ञान था।

    जॉर्ज एबेल ने माउण्टबेटन से कहा कि भारत की वर्तमान दशा उस जहाज जैसी है जिसमें से आग की लपटें धू-धू कर उठ रही हों और जिसके गर्भ में बारूद भरा हुआ हो। सारी लड़ाई इसी बात की है कि आग बारूद तक पहले पहुंचेगी या उससे पहले हम उसे काबू में कर चुके होंगे। वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन के राजनीतिक सलाहकार तथा राजनीतिक विभाग का सचिव के रूप में सर कोनार्ड कोरफील्ड की नियुक्ति की गई। वह एक मिशनरी का बेटा था तथा इण्डियन सिविल सर्विस के अधिकारी के रूप में ई.1920 में लॉर्ड रीडिंग के समय भारत आया था। उसका कार्य भारतीय रजवाड़ों के साथ अधिक रहा था। वह हैदराबाद, रेवा, जयपुर तथा कुछ अन्य भारतीय रियासतों में पॉलिटिकल एजेंट के रूप में नियुक्त रहा।

    लॉर्ड वैवेल के समय उसे क्राउन रिप्रजेंटेटिव अर्थात् वायसराय का पोलिटिकल एडवाइजर बनाया गया। उसका काम वैवेल तथा देशी राजाओं के बीच सेतु के रूप में काम करने का था। लगभग पूरा जीवन भारतीय राजाओं के साथ व्यतीत करने के कारण वह देशी-राजाओं के बीच अधिक लोकप्रिय था तथा भारतीय नेताओं को पसंद नहीं करता था। हैदराबाद का नवाब उसका दोस्त था। इसलिए कोरफील्ड को हिन्दू राजाओं की बजाय मुस्लिम शासकों द्वारा अधिक पसंद किया जाता था। लॉर्ड माउण्टबेटन समय रहते कोरफील्ड के व्यक्तित्व की इस कमजोरी को समझ नहीं सका। इसलिए आगे चलकर माउण्टबेटन को सरदार पटेल एवं जवाहरलाल नेहरू आदि भारतीय नेताओं के सामने नीचा देखना पड़ा।

    भारत में वायसरॉय एवं गवर्नर जनरल के रूप में लॉर्ड माउण्टबेटन का काम केवल इतना था कि वे भारत को आजाद करके अंग्रेजों को उनकी पूरी गरिमा और शांति के साथ भारत से सुरक्षित निकाल ले जायें। 24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय एवं गवर्नर जनरल का कार्यभार संभाला। उस समय भारत बड़ी विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी जिसमें से 10 करोड़ मुस्लिम एवं 25 करोड़ हिन्दू तथा अन्य मतावलम्बी थे।

    कांग्रेस देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल था जिसे विश्वास था कि उसे 100 प्रतिशत हिन्दू, सिक्ख एवं अन्य मतावलम्बियों का तथा 90 प्रतिशत मुसलमानों का नेतृत्व प्राप्त था। जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था। कांग्रेस चाहती थी कि अंग्रेज भारत की सत्ता कांग्रेस को सौंपकर भारत से चले जाएं। मुस्लिम लीग चाहती थी कि अंग्रेज पहले भारत का विभाजन करें तथा मुसलमानों का अलग देश बनाएं। उसके बाद वे भारत को आजाद करें। हिन्दू-बहुल देश की सत्ता कांग्रेस को एवं मुस्लिम-बहुल देश की सत्ता मुस्लिम लीग को मिले। तीसरा बड़ा पक्ष भारतीय राजाओं का भी था जो कतई नहीं चाहते थे कि भारत को आजाद करके 565 देशी रियासतों को कांग्रेस के हाथों में सौंप दिया जाए।

    भारत में काम कर रही कम्यूनिस्ट पार्टियाँ तथा राष्ट्रवादी एवं हिन्दू प्रभाव वाले राजनीतिक दल विशेषकर हिन्दू महासभा चाहते थे कि अंग्रेज भारत को विभाजित नहीं करें, भारत अखण्ड रहे तथा उसकी सत्ता केवल कांग्रेस को नहीं देकर भारत की समस्त राजनीतिक पार्टियों को साझा रूप से सौंपी जाए तथा देश में लोकतंत्र की स्थापना हो। सिक्खों, दलितों, ईसाईयों एवं एंग्लो-इण्डियनों के भी अपने-अपने पक्ष थे। माउण्टबेटन को इन समस्त तत्वों से निबटना था, उन्हें संतुष्ट करना था तथा ब्रिटिश अधिकारियों, ब्रिटिश सैनिकों, उनके परिवारों, उनकी सम्पत्तियों तथा उनके घोड़ों आदि को सुरक्षित रूप से भारत से निकालकर इंग्लैण्ड ले जाना था। माउण्टबेटन को यह व्यवस्था भी करनी थी कि जिस समय रॉयल सेनाएं भारत छोड़कर जा रही हों, उस समय उपद्रवी, गुण्डे एवं हत्यारे किस्म के लोग भारत की निरीह जनता पर आक्रमण करके उसे हानि नहीं पहुँचाएं।

    भारतीय लोग आजादी का समरोह मनाएं, उनकी सम्पत्ति, ढोर-डंगर सुरक्षित रहें तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार नहीं हों। इतने सारे लक्ष्यों को एक साथ अर्जित करना कोई हँसी-खेल नहीं था। इन अर्थों में लॉर्ड माउण्टबेटन को अपने पूर्ववर्ती समस्त वायसरायों से अधिक कठिन काम करना था, उनसे भी अधिक जिन्होंने इंग्लैण्ड के लिए भारत को जीता था। माउंटबेटन ने भारत में अपने प्रथम भाषण में कहा कि उनका कार्यालय सामान्य वायसराय का नहीं रहेगा। वे ब्रिटिश सरकार की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण करने तथा कुछ ही माह में भारत की समस्या का समाधान ढूंढने के लिये आये हैं। माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि- 'देश का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है। ' माउण्टबेटन ने गांधी, जिन्ना, नेहरू, लियाकत अली तथा पटेल से वार्त्ताएं कीं। इन नेताओं ने माउण्टबेटन को बताया कि वे भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के सम्बन्ध में क्या विचार रखते थे और भारत की समस्या का क्या समाधान चाहते थे।

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  • अजमेर का इतिहास - 2

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 2

    अनुक्रमणिका


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    1. प्राक्कथन

    3. प्रागैतिहासिक काल से गुप्तकाल तक

    4. अजमेर के चौहान शासक

    5. भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान

    6. चौहान कालीन अजमेर

    7. ललित विग्रहराज तथा हरकेलि नाटकों का परिचय

    8. अजमेर के चौहान शासकों के प्रमुख शिलालेख

    9. अजमेर का गर्व भंजन

    10. दिल्ली सल्तनत के अधीन अजमेर

    11. मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर

    12. नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

    13. शाहजहाँ

    14. दारा शिकोह एवं औरंगजेबयुद्ध

    15. औरंगजेब द्वारा अजमेर की उपेक्षा

    16. महाराजा अजीतसिंह

    17. विच्छिन्नता का युग

    18. अजमेर पर मराठों का शासन

    19. ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण

    20. फ्रांसिस विल्डर

    21. हेनरी मिडिल्टन

    22. कैवेण्डिश से स्पीयर्स तक

    23. अजमेर में एजीजी की नियुक्ति तथा विलियम बैण्टिक का दरबार

    24. रेशमी कीड़ा कवच से बाहर आया

    25. ब्रिटिश अधिकारियों को अग्रवाल सेठों का सहयोग

    26. कर्नल जे. डिक्सन और नया युग

    27. सदरलैण्ड द्वारा अजमेर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के प्रयास

    28. उन्नीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में अजमेर का प्रशासनिक परिदृश्य

    29. पोलिटिकल अधिकारियों द्वारा सामाजिक बुराइयों का निषेध

    30. ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अजमेर में शिक्षा का विकास

    31. अट्ठारह सौ सत्तावन की रक्तरंजित क्रांति

    32. अजमेर में ब्रिटिश क्राउन का शासन

    33. लॉर्ड मेयो का अजमेर दरबार

    34. अठारह सौ सत्तर का अजमेर

    35. कमिश्नर एल. एस. साण्डर्स

    36. साण्डर्स के समय अजमेर का प्रशासनिक दृश्य

    37. कमिश्नर जी. एच. ट्रेवर 

    38. कमिश्नर मैकान्जी से मार्टिण्डल तक

    39. कार्यवाहक चीफ कमिश्नर एवं एजीजी सी. के. एम. वॉल्टर

    40. चीफ कमिश्नर एवं एजीजी कर्नल जी. एच. ट्रेवर

    41. अठारह सौ इकरानवे की लूट

    42. चीफ कमिश्नर एवं एजीजी आर. जे. क्रॉस्थवेट एवं मार्टिण्डल

    43. तेजी से बदलते रहे कमिश्नर

    44. अजमेर में रेलवे का विकास

    45. रेल ने बदला अजमेर को

    46. उन्नीसवीं सदी के अंत में अजमेर

    47. अजमेर का गौरव मेयो कॉलेज

    48. ब्रिटिश काल में अजमेर का प्रशासन

    49. अजमेर में संवैधानिक विकास

    50. उन्नीसवीं शताब्दी में अजमेर से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र

    51. उन्नीसवीं सदी में अजमेर में शैक्षणिक विकास

    52. आर्यसमाज द्वारा अजमेर में नवीन शिक्षण पद्धति की स्थापना

    53. बीसवीं सदी में अजमेर

    54. अजमेर में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

    55. अजमेर में स्वतंत्रता आंदोलन

    56. अजमेर के साम्प्रदायिक दंगों पर नेहरू एवं पटेल में विवाद

    57. अजमेर के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेस की भूमिका

    58. केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर

    59. राजस्थान में प्रवेश

    60. बीसवीं सदी में अजमेर का शैक्षणिक विकास

    61. स्वातंत्र्योत्तर अजमेर के प्रमुख संस्थान

    62. राजस्थान राज्य अभिलेखागार में संग्रहीत अजमेर सम्बन्धी अभिलेख

    63. आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति

    64. उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में अजमेर नगर की जनसंख्या

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  • गोरी सरकार राजाओं को लावारिस बालक की तरह छोड़कर न जाये!

     03.06.2020
    गोरी सरकार राजाओं को लावारिस बालक की तरह छोड़कर न जाये!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कैबीनेट मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रकाशित की। इसे कैबीनेट मिशन प्लान तथा संयुक्त भारत योजना भी कहते हैं। इसके द्वारा संघीय संविधान का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भारत संघ की व्यवस्था जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे जाने थे। संघ में ब्रिटिश भारत के 11 प्रांत और समस्त देशी रियासतें शामिल होनी थीं। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होना था। शेष सभी विषय और अधिकार रियासतों के पास रहने थे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होनी थी जो बातचीत के द्वारा तय की जानी थी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना था। शेष विषयों पर राज्यों का अधिकार होना था।

    योजना में प्रांतों को 'ए’, 'बी’ और 'सी’ श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहली श्रेणी में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्यप्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, व बिहार थे। दूसरी श्रेणी में पंजाब, सिंध बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरी श्रेणी में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था। ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिये संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गयी व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया था।

    राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जायेंगे। ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिये जायेंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिये कि वे अपने भविष्य की स्थिति उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे या भारत से बाहर रह सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि एक सत्तात्मक भारत बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जायेंगे। मिशन ने कहा कि शासकों ने भारत में होने वाले नवीन संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया है किंतु यह सहयोग नवीन संवैधानिक ढांचे के निर्माण के दौरान समझौता वार्ता से ही प्राप्त हो सकेगा तथा यह समस्त राज्यों के मामले में एक जैसा नहीं होगा। प्रारंभिक अवस्था में संविधान सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वार्ता समिति द्वारा किया जायेगा। विचार-विमर्श के अंतिम चरण में राज्यों के वास्तविक प्रतिनिधि भाग लेंगे जिनकी संख्या 93 से अधिक नहीं होगी। राज्यों के प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया सम्बद्ध पक्षों के आपसी विचार-विमर्श से निश्चित की जायेगी। परमोच्च सत्ता की समाप्ति के बाद रियासतों को पूर्ण अधिकार होगा कि वे अपना भविष्य निश्चत करें परंतु उनसे यह आशा की जाती है कि वे संघीय सरकार के साथ कुछ समझौता अवश्य कर लेंगी।

    17 मई 
    1946 को एक प्रेस वार्ता में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने स्वीकार किया कि राज्यों के साथ महामना सम्राट की सरकार के सम्बन्ध, ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ सम्बन्धों से नितांत भिन्न थे। उन्होंने योजना के प्रस्तावों के बाहर जाने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्यों के प्रति सख्त रवैया अपनाने से न तो राज्यों की जनता का भला होगा और न ही ब्रिटिश प्रांतों की जनता का। उन्होंने कहा कि अंतरिम काल में राज्यों के साथ ब्रिटिश सम्बन्ध वैसे ही बने रहेंगे जैसे कि वे वर्तमान में हैं।

    17 मई को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वेवेल को एक पत्र लिखकर कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा कि रक्षा मामलों में, प्रस्तावित संघीय सरकार एवं संविधान के अधिकार का प्रावधान, राज्यों की अपनी सशस्त्र सेनाओं को तो प्रभावित नहीं करेगा? वित्त के मामले में भी संघ का अधिकार केवल उन्हीं राजस्व स्रोतों तक सीमित होना चाहिये जिन पर सहमति बनती है। किसी अन्य माध्यम से कर उगाहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। संचार के सम्बन्ध में वर्तमान में राज्यों को प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिये। संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व का तरीका राज्यों की सरकारों या समूहों के अधीन होना चाहये। संविधान सभा में सांप्रदायिकता का बड़ा प्रकरण, सभा में राज्यों के प्रतिनिधियों की बहुसंख्य उपस्थिति के दौरान मतदान से निर्धारित किया जाना चाहिये।

    नवाब ने मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिये कह सकेंगे। संविधान सभा को यह अधिकार नहीं होना चाहिये कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान सभा में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

    29 मई को लॉर्ड वेवेल ने एक पत्र भोपाल नवाब को भिजवाया जिसमें उन्होंने कहा कि नवाब द्वारा उठायी गयी अधिकतर बातें संविधान सभा में राज्यों और ब्रिटिश भारत के सदस्यों के मध्य होने वाले विचार-विमर्श के मुद्दे हैं। नवाब का यह तर्क काफी वजन रखता है कि संविधान सभा में प्रतिनिधि का चुनाव केवल शासकों के विवेकाधीन होना चाहिये किंतु मिशन का उद्देश्य ब्रिटिश भारत और रियासती भारत के मध्य स्वतंत्र सहलग्नता को बढ़ावा देने का है। नवाब को वेवेल का पत्र निराश करने वाला प्रतीत हुआ। उन्होंने 2 जून 1946 को फिर से वायसराय को पत्र लिखा- राज्यों को यह अधिकार है कि वे इस बात की मांग करें कि ब्रिटिश ताज राज्यों को ब्रिटिश भारत की दया पर न छोड़ दे, कम से कम राज्यों को संविधान सभा या संघीय संविधान में खराब स्थिति में तो न छोड़ें। नवाब विशेषतः इस मुद्दे पर परेशान थे कि कम से कम संघीय संविधान सभा में राज्यों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को सांप्रदायिक मुद्दों के समकक्ष रखा जाये तथा संविधान सभा में राज्यों के प्रतिनिधि का चुनाव पूर्णतः राज्यों पर छोड़ा जाये।

    नवाब ने विश्वास व्यक्त किया कि सम्राट की सरकार की यह इच्छा तो कभी नहीं रही होगी कि राज्यों को उनकी वैधानिक एवं उचित मांगों तथा प्रभुसत्ता पूर्ण निकायों के रूप में उनके स्थापित और स्वीकृत अधिकारों को संरक्षित करने के लिये ताज की तरफ से कोई प्रयास किये बिना लावारिस बालक की भांति छोड़ दिया जाये। उन्होंने वायसराय से अपील की कि अपने उन मित्रों के विरुद्ध पक्ष न बनें जिन मित्रों ने अच्छे और बुरे समय में आपका साथ निभाया है तथा जो अपने शब्दों एवं आश्वासनों के प्रति वफादार रहे हैं। 4 जून 1946 को वायसराय ने नवाब के पत्र का जवाब दिया तथा शासकों की ओर से प्रकट की गयी उनकी चिंता की प्रशंसा की तथा लिखा कि नवाब राजनीतिक सलाहकार कोरफील्ड से इस पृष्ठभूमि पर किये गये विचार विमर्श के उपरांत दूसरा दृष्टिकोण अपना सकते थे। ये बातें बम्बई में होने वाली स्थायी समिति की बैठक में रखनी चाहिये।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 28

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 28

    जिन्ना को दे दो पूरी सरकार


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    गांधीजी का मानना था कि जिन्ना को पाकिस्तान कभी नहीं मिलेगा, जब तक कि अंग्रेज पाकिस्तान बनाकर उसे न दे दें। गांधीजी अपने साथियों को समझा-समझा कर हार गए थे, अंग्रेज ऐसा कभी नहीं करेंगे, जब तक कांग्रेस का बहुमत इसके विरोध में खड़ा है। विभाजन का फैसला वायसराय के नहीं कांग्रेस के हाथ में है। कांग्रेस चाहे तो इसे रोक सकती है। अंग्रेजों से कह दो कि वे चले जाएं। जो जैसा है, उसे वैसा ही छोड़कर चले जाएं। उनके पीछे जो भी होगा, हम देख लेंगे। भुगत लेंगे। अगर देश भर में आग लग जाती है, तो लग जाने दो, देश इस आग में तप कर कुन्दन की तरह निखर कर सामने आएगा, देश को अखण्ड रहने दो।

    गांधीजी को लगता था कि यदि अंग्रेज सरकार और कांग्रेस धैर्यपूर्वक कुछ समय व्यतीत करें और भारत की आजादी को कुछ दिन के लिए टाल दिया जाए तो भारत का विभाजन रुक सकता है। इसलिए जब गांधीजी ने माउण्टबेटन से पहली बार वार्ता की तो गांधीजी ने उनसे बार बार कहा- 'भारत को तोड़ियेगा नहीं, काटियेगा नहीं। खून की नदियां बहती हैं तो बहें।' 31 मार्च 1947 को गांधीजी ने एक सार्वजनिक वक्तव्य में कहा- 'यदि कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार होगी तो यह मेरी मृत्यु के बाद ही होगा। मैं भारत का विभाजन आजीवन नहीं होने दूंगा।'

    जब अंतरिम सरकार पूरी तरह विफल साबित होने लगी और जिन्ना किसी भी तरह पाकिस्तान का हठ छोड़ने को तैयार हनीं हुआ तब गांधीजी ने वायसराय को सुझाव दिया कि वे जवाहरलाल के स्थान पर जिन्ना को पूरी सरकार दे दें। माउण्टबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल जॉनसन ने लिखा है- 'गांधी ने सम्पूर्ण समस्या को हल करने के लिए आश्चर्यजनक प्रस्ताव रखा। वह यह था कि वर्तमान मंत्रिमण्डल को भंग करके जिन्ना को पूर्णतः मुस्लिम मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।'

    माउंटबेटन ने पूछा- 'जिन्ना की प्रतिक्रिया क्या होगी?' गांधी ने उत्तर दिया- 'जिन्ना कहेंगे, यह धूर्त गांधी की चाल है।' माउंटबेटन ने प्रश्न किया- 'और क्या उनका कहना सही नहीं होगा?' गांधी ने कहा- 'नहीं। मैं बिल्कुल दिल से कह रहा हूँ।' इस पर माउंटबेटन ने कहा- 'यदि आप इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की औपचारिक स्वीकृति ला कर दे सकें तो ....... मैं भी विचार करने को राजी हूँ।'

    मोसले ने इस घटना को इस प्रकार लिखा है- 'गाधीजी ने दो दिन माउण्टबेटन से लगातार मुलाकात की तथा दूसरे दिन माउण्टबेटन के समक्ष एक योजना रखी। यह योजना ऐसी थी जिसे देखकर वैवेल चीख उठता। उसकी योजना थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग का गतिरोध आसानी से हटाया जा सकता है। वायसराय को चाहिए कि मि. जिन्ना को बुलाकर सरकार बनाने का काम सौंपा जाए। इस सरकार में सिर्फ मुसलमान ही रहें या हिन्दू और मुसलमान दोनों, यह जिन्ना की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। वायसराय के वीटो के अलावा यह सरकार अपनी मर्जी से शासन चलाने में पूर्ण स्वतंत्र हो। वायसराय ने तुरन्त जवाब दिया कि योजना बड़ी आकर्षक है और वह सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा, यदि कांग्रेस भी इसे व्यावहारिक समझे। ..... कांग्रेस ने इस योजना को बुरी तरह ठुकरा दिया और वायसराय ने भी गांधी को लिखा कि इस योजना के सम्बन्ध में उसके विचारों के बारे में भी गलतफहमी हुई है।'

    मोसले ने इस योजना की विफलता का दोष वायसराय पर मंढ़ा है। वे लिखते हैं- 'बैठक के तुरंत बाद माउण्टबेटन और उसके अधिकारियों ने इस योजना की हत्या शुरू कर दी क्योंकि उनका यह विश्वास था कि यह योजना काम में नहीं लाई जा सकती। यह काम इतनी अच्छी तरह से किया गया कि बहुत जल्द गांधी ने घोषणा कर दी कि वह वायसराय के साथ बातचीत में और हिस्सा नहीं लेगा, सिर्फ कांग्रेस के मामलों में सलाह दिया करेगा।'

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