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  • भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी तथा गांधी इरविन पैक्ट का दुःखद पक्ष :

     21.08.2017
    भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी तथा गांधी इरविन पैक्ट का दुःखद पक्ष :

    भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी तथा गांधी इरविन पैक्ट का दुःखद पक्ष जब कभी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहीद दिवस आता है तो मुझे 1931 ईस्वी के गांधी-इरविन पैक्ट का स्मरण अवश्य होता है। मन में एक वेदना होती है जिसका वर्णन करना कठिन है। इस पूरे प्रकरण को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-

    भारत में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम के कारण इंग्लैण्ड की गोरी सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के बारे में सलाह देने हेतु 1927 ईस्वी में साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस कमीशन के समस्त सदस्य अँग्रेज थे। इसलिये इसे व्हाइट कमीशन भी कहते हैं। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया। हिन्दू महासभा सहित देश के अनेक संगठनों ने कांग्रेस का साथ देने का निश्चय किया।

    30 अक्टूबर 1928 को कमीशन का बहिष्कार करने के लिए लाहौर में लाला लाजपतराय के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकला। अँग्रेज पुलिस अधिकारी साण्डर्स ने लालाजी पर लाठियों के अनेक प्रहार करके उन्हें गम्भीर चोटें पहुँचाई। इन चोटों के कारण 17 नवम्बर 1928 को लालाजी का निधन हो गया। लालाजी द्वारा 1921 ईस्वी में लाहौर में स्थापित नेशनल कॉलेज के छात्र रहे भगतसिंह तथा उनके साथियों ने इस घटना को राष्ट्रीय अपमान समझा और इसका बदला लेने का निर्णय लिया। इन क्रांतिकारियों ने 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में पुलिस कार्यालय के ठीक सामने साण्डर्स को गोली मार दी। क्रांतिकारियों की तरफ से एक इश्तिहार जारी किया गया जिसमें कहा गया- ‘साण्डर्स मारा गया, लालजी की मृत्यु का बदला ले लिया गया।’

    इससे सारे देश में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। कुछ समय बाद इन क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। उन पर अंग्रेजों के न्यायालय में मुकदमा चला और भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई। देश का आम आदमी इन तीन युवा राष्ट्रभक्तों के साहस पर गर्व का अनुभव किया।

    इस सजा को सुनाये जाने के कुछ दिन बाद ही वायसराय लॉर्ड इरविन ने कांग्रेस को एक समझौते के लिये आमंत्रित किया ताकि स्वंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों द्वारा की गई ज्यादतियों से उत्पन्न असंतोष को कम किया जा सके। कांग्रेस ने इस समझौते के लिये मोहनदास कर्मचंद गांधी को नियत किया। कांग्रेस के प्रगतिशील तत्त्वों ने गांधीजी को सुझाव दिया कि वे सरकार से तब तक वार्त्ता करना स्वीकार न करें जब तक कि सरकार तीन क्रान्तिकारियों- भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की सजा को रद्द करना स्वीकार न कर ले परन्तु गांधीजी ने उनके सुझाव की अनदेखी करके वार्त्ता जारी रखी।

    कांग्रेस का युवा वर्ग तथा समूचा देश इन तीनों क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखता था किंतु गांधीजी ने जन-आंकाक्षाओं की परवाह किये बिना, अपने अहिंसावादी सिद्धांतों के नाम पर, भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को न तो कैद से छुड़वाने का और न उनकी फांसी की सजा को कम करवाने का प्रयास किया। गांधीजी ने दो कदम आगे बढ़कर, क्रांतिकारियों के विरुद्ध सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाही का समर्थन किया। पूरा देश और कांग्रेस का युवा वर्ग, गांधी-इरविन पैक्ट में क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के रुख से बहुत नाराज हुआ। यहां तक कि स्वयं लॉर्ड इरविन ने लिखा है कि मुझे गांधी के इस रुख से हैरानी हुई। मैं मन ही मन स्वयं को तैयार कर चुका था कि यदि गांधी, यह मांग करेंगे कि इन्हें फांसी न दी जाये, तो मैं यह भी करूंगा किंतु गांधी ने तो इन युवकों की फांसी का समर्थन किया।

    गांधीजी ने इन तीनों क्रांतिकारियों के प्राण बचाने के लिए न तो अनशन-उपवास किया और न ही आन्दोलन जारी रखा। इससे वामपंथियों को गहरा आघात पहुँचा। गांधी-इरविन पैक्ट के कुछ दिनों बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी हो गई। देश गुस्से से उलब पड़ा। इसके कुछ दिनों बाद ही मार्च 1931 में कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ। कांग्रेस के नवयुवक कार्यकर्ताओं ने देश में कई स्थानों पर गांधीजी के विरुद्ध काले झण्डों के साथ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। आन्दोलन के दौरान जनसाधारण ने जिस राजनीतिक जागृति का परिचय देते हुए गांधीजी के विरोध में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया, उससे गांधी सहित समस्त दक्षिणपंथी नेता भयग्रस्त हो गये। इसलिये गांधजी ने कराची अधिवेशन को सफलतापूर्वक कराने के लिये एक विशेष योजना तैयार की। उन्होंने सरदार पटेल की अनिच्छा एवं पटेल द्वारा कई बार मना करने के बावजूद, सरदार पटेल को कराची अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया। ताकि सरदार पटेल का जादुई व्यक्तित्व आंदोलनकारी युवकों को नियंत्रित करने में काम लिया जा सके। पटेल को गांधी का आदेश मानना पड़ा।

    जैसा कि पूर्व अपेक्षित था, जब गांधीजी और निर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष सरदार पटेल, अधिवेशन में भाग लेने कराची पहुँचे तो उन्हें जबरदस्त जन-आक्रोश का सामना करना पड़ा। खुले अधिवेशन में भी दक्षिणपंथी नेतृत्व को जोरदार विरोध का सामना करना पड़ा। गांधी और पटेल बड़ी कठिनता से इस समझौते को कांग्रेस से स्वीकार करा सके।

    प्रसिद्ध इतिहासकार अयोध्यासिंह ने गांधी-इरविन समझौते के सन्दर्भ में लिखा है- ‘कांग्रेस ने जिन मांगों के लिए आन्दोलन चलाया था, क्या उनमें से एक भी मांग पूरी हुई? नहीं। गांधीजी ने जो ग्यारह सूत्री मांग पत्र पेश किया था, क्या उनमें से एक भी बात मानी गई? नहीं। यहाँ तक कि नमक-कर भी नहीं हटाया गया। क्या लगानबन्दी और कर-बन्दी आन्दोलन के दौरान कुड़क की गई किसानों की चल-अचल सम्पत्ति वापस की गई? नहीं। क्या स्वराज की तरफ ले जाने वाली एक भी बात मंजूर की गई? नहीं।’

    कराची अधिवेशन के अवसर पर कांग्रेस के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने कहा- ‘यदि गांधजी की जगह किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसा समझौता किया होता तो उसे उठाकर समुद्र में फेंक दिया जाता।’ कई बार मैं विचार करता हूं कि आखिर गांधीजी ने इन तीनों क्रांतिकारियों के विरुद्ध इतना कड़ा रुख क्यों अपनाया? तब भीतर से एक ही जवाब आता है कि लाला लाजपतराय हिन्दू महासभा के नेता थे जिनकी हत्या का बदला लेने के लिये भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने साण्डर्स की हत्या की थी। गांधीजी कतई नहीं चाहते थे कि कांग्रेस के अतिरिक्त और भी कोई राजनीतिक संगठन इस देश में खड़ा हो। कुल मिलाकर यह राजनीतिक विद्वेश का मामला लगता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन

     21.08.2017
    भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 1



    भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन


    सिकंदर के भारत में आने (523 ई.पू.) से भी बहुत पहले, रोम के एक शासक ने कहा था- 'भारतीयों के बागों में मोर, उनके खाने की मेज पर काली मिर्च तथा उनके बदन का रेशम, हमें पागल बना देता है। हम इन चीजों के लिये बर्बाद हुए जा रहे हैं।' यह कथन इस बात का प्रमाण है कि यूरोप तथा भारत के बीच ईसा के जन्म के सैंकड़ों साल पहले भी व्यापारिक सम्बन्ध थे तथा व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था। भारतवासी ईसा से भी कई हजार साल पहले अर्थात् सैंधव सभ्यता के समय से ही स्वर्ण धातु के गुणों तथा उसके उपयोग से परिचित थे। दक्षिण भारत में भी ईसा से लगभग 1000 साल पहले स्वर्ण उत्पादन होता था किंतु भारत में स्वर्ण बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध था। इस कारण भारतवासी विदेशी व्यापार में मुद्रा के रूप में केवल सोना-चांदी ही स्वीकार करते थे। यही कारण है कि भारत के मसालों, सुगंधित काष्ठों, अनाज तथा कपड़ों को प्राप्त करने के लिये विश्व भर के देशों ने भारतीय व्यापारियों के समक्ष सोने-चांदी के ढेर लगा दिये।

    स्विस लेखक लैण्डर्स्टोन ने लिखा है- 'समुद्र में जाने के अनेक रास्ते एवं माध्यम हैं पर उद्देश्य केवल एक ही था- चमत्कारिक देश भारत पहुँचना, जो देश धन से लबालब भरा है।' अँग्रेजी लेखक शेक्सपीयर (1564-1616 ई.) ने भारत भूमि को विश्व के लिये महान अवसरों की चरम सीमा कहा है। अँग्रेजी कवि मिल्टन (1608-1674 ई.) ने विभिन्न देशों की विशेषता बताते हुए भारत के धन की चर्चा की है। जर्मन दार्शनिक हेगेल (1770-1831 ई.) ने भारत को मनोकामना की भूमि बताया है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक यूरोपीय जातियाँ भारत आने के लिये सदैव लालायित रहती थीं।

    यूरोपियन जातियों के आगमन के उद्देश्य

    कतिपय ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत में यूरोपीय जातियों के प्रवेश का कारण भारत के लोगों को सभ्य बनाना था। जबकि वास्तव में भारत में यूरोपीय जातियों के आगमन के दो उद्देश्य जान पड़ते हैं- (1.) भारत में व्यापार करके धन अर्जित करना तथा (2.) भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना। इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिये यूरोपीय जातियों को भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की आवश्यकता हुई। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि यूरोपीय जातियाँ इस देश में व्यापारिक उद्देश्यों को लेकर प्रविष्ट हुईं किंतु उन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक हाथ में धर्म का झण्डा और दूसरे हाथ में तलवार थाम रखी थी।

    पुर्तगालियों का भारत में प्रवेश

    15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप में सुदूर देशों की ओर के समुद्री मार्गों का पता लगाने का जो अभियान चला, उसमें यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। 1497 ई. में वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली नाविक अपने साथियों सहित सामान और हथियारों से भरा जहाजी बेड़ा लेकर पूर्वी द्वीपों की खोज में निकल पड़ा। अगस्त 1498 में वह भारत के विख्यात बन्दरगाह कालीकट पहुँचा। उसने कालीकट के राजा जमेरिन से कालीकट में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। इस समय तक समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था किंतु कुछ ही वर्षों में पुर्तगालियों ने अरब व्यापारियों पर विजय प्राप्त करके समस्त व्यापार पर एवं भारत तथा यूरोप के मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों पर नियंत्रण कर लिया।

    पुर्तगालियों ने कालीकट के राजा जमेरिन को उसके शत्रु राज्यों, मुख्यतः कोचीन राज्य के विरुद्ध सैनिक सहायता दी और भारत की राजनीति में प्रवेश किया। अल्मीडा (1505-1509 ई.) भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। उसने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया। अल्मीडा का उत्तराधिकारी अल्बुकर्क (1509-1515 ई.) अत्यंत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था जिसके नेतृत्व में भारत में पुर्तगाली शक्ति का निर्माण हुआ। उसने 1510 ई. में गोआ पर अधिकार किया। धीरे-धीरे पश्चिमी तट पर ड्यू, सालसेट, बसीन, चौल तथा पूर्वी तट पर (बंगाल में) हुगली और दक्षिण में मद्रास तट पर सानथोम पुर्तगालियों के अधिकार में चले गये।

    पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसालों के द्वीप तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने के लिये वे अन्य यूरोपीय जातियों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- 'पुर्तगालियों ने अपनी सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।'

    पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिये पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने में असमर्थ रहा। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। 1580 ई. में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया। 1588 ई. में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिये उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिये प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया। अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। 1629 ई. में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया। 1639 ई. में मराठों ने उनसे सालसेट और बसीन छीन लिये। 1661 ई. में पुर्तगालियों ने अपनी राजकुमारी का विवाह अँग्रेजों के राजा चार्ल्स (द्वितीय) के साथ किया तथा मुम्बई अँग्रेजों को दहेज में दे दिया।

    डचों का भारत में प्रवेश

    नीदरलैण्ड के निवासियों को डच कहा जाता है। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिये परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई। 1595 ई. में चार डच जहाज उत्तमाशा अंतरीप होकर भारत के लिये रवाना हुए। 1602 ई. में डचों ने भारत से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया। 1604 ई. में डच जहाजी बेड़ा कालीकट पहुँचा। डचों के पास पर्याप्त नाविक शक्ति थी। उन्होंने मछलीपट्टम, पेटापोली, पुलीकट आदि स्थानों से व्यापार करना आरम्भ किया। धीरे-धीरे उन्होंने पूर्वी द्वीपों से पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया।

    डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों- इण्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा एवं अन्य मसाला द्वीपों पर व्यापारिक आधिपत्य स्थापित करना था। भारत उनके व्यापारिक मार्ग की एक कड़ी मात्र था। अतः भारत में उन्होंने अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया। फिर भी उन्होंने भारतीय व्यापार को पूरी तरह नहीं छोड़ा। उन्होंने पश्चिमी भारत में गुजरात के सूरत, भड़ौंच, कैम्बे और अहमदाबाद, केरल के कोचीन, तमिलनाडु के नागपत्तम्, आंध्र प्रदेश के मच्छलीपत्तम्, बंगाल के चिनसुरा, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के आगरा में अपने व्यापारिक गोदाम बनाये। उन्होंने 1658 ई. में लंका को पुर्तगालियों से जीत लिया। डच व्यापारी, भारत से नील, रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा और अफीम खरीदते थे। पुर्तगालियों की तरह वे भी भारतीय उत्पादकों एवं भारतीय नौकरों के साथ क्रूर व्यवहार करते थे तथा उनका भयानक शोषण करते थे।

    स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, नीदरलैण्ड एवं इंग्लैण्ड के व्यापारी, शताब्दियों से अफ्रीका के लोगों को पकड़कर उन्हें विश्व के बाजारों में गुलाम के रूप में बेचने तथा खानों एवं बागानों में बलपूर्वक काम लेने के लिये उन पर भयानक अत्याचार करने के अभ्यस्त थे। इसलिये उन्हें भारत के स्थानीय लोगों का शोषण करने एवं उन पर अत्याचार करने में कोई हिचक नहीं होती थी।

    1718 ई. में अँग्रेजों ने डचों को हुगली तथा नागपत्तम् आदि स्थानों से खदेड़ दिया। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भी अँग्रेजों ने डचों को पछाड़ दिया। 1759 ई. में अँग्रेजों और डचों के मध्य बेदरा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें डच परास्त हो गये और उन्हें अँग्रेजों से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने, नई सैनिक भर्ती नहीं करने और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। इस प्रकार भारत में डचों का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया।

    अँग्रेजों का भारत में आगमन

    पुर्तगालियों की सफलता ने अँग्रेज व्यापारियों को भारत आने के लिये उत्तेजित किया। पुर्तगालियों द्वारा यूरोप के बाजारों में भारतीय मसालों, कालीमिर्च, रेशमी कपड़ों, सूती कपड़ों तथा विभिन्न औषधियों को बेचकर कमाये जा रहे मुनाफे को देखकर ब्रिटिश वासियों के खून में उबाल आता था। वे इस लाभप्रद व्यापार में हिस्सा लेने के लिये अधीर हो उठे किंतु सोलहवीं शताब्दी के अंत तक वे पुर्तगाल तथा स्पेन की नौसैनिक शक्ति को टक्कर देने में समर्थ नहीं थे। उन्होंने पचास से भी अधिक वर्षों तक इंग्लैण्ड से भारत के बीच वैकल्पिक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास किये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बीच उन्होंने समुद्री शक्ति जुटा ली। 1579 ई. में ड्रेक ने समुद्र के मार्ग से विश्व की परिक्रमा की। 1588 ई. में उन्होंने स्पेनिश आर्मेडा को परास्त करके पूरब की ओर जाने का समुद्री मार्ग खोल लिया।

    ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना

    1599 ई. में मर्चेण्ट एडवेंचर्स नामक सौदागरों के एक समूह के तत्त्वावधान में पूरब के साथ व्यापार करने के लिये एक ब्रिटिश संस्था की स्थापना की गई। 31 दिसम्बर 1600 को इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) ने लन्दन के इन व्यापारियों को पूरब के साथ व्यापार करने का अधिकार-पत्र प्रदान किया। इसी अधिकार-पत्र द्वारा इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित हुई। महारानी स्वयं इस कम्पनी की हिस्सेदार बन गई। 1601 ई. में इस कम्पनी के पहले जहाज ने इण्डोनेशिया के लिये व्यापारिक यात्रा आरम्भ की।

    हॉकिन्स की जहाँगीर से भेंट

    24 अगस्त 1608 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला जहाज हैक्टर सूरत के मामूली से बन्दरगाह पर आकर लगा। इस जहाज का कप्तान विलियम हॉकिन्स नाविक कम, लुटेरा अधिक था। हॉकिन्स, मुगल बादशाह जहाँगीर से भेंट करने आगरा पहुँचा। मुगल दरबार में पुर्तगालियों का प्रभाव था। उन्होंने हॉकिन्स का प्रबल विरोध किया। इस कारण हॉकिन्स मुगल दरबार से विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में असफल रहा किंतु जहाँगीर यूरोप के विभिन्न देशों से आ रहे गोरे व्यापारियों को भारत में बने रहने देना चाहता था ताकि भारत में व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहें। इसलिये जहाँगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब तथा एक जागीर प्रदान की। बाद में पुर्तगाली षड़यंत्र के कारण हॉकिन्स को आगरा से निकाल दिया गया। हॉकिन्स की दृष्टि में बादशाह जहाँगीर इतना धनवान और सामर्थ्यवान था कि उसकी अपेक्षा इंग्लैण्ड की रानी अत्यंत साधारण सूबेदारिन से अधिक नहीं ठहरती थी।

    पुर्तगालियों से झगड़ा

    1612 ई. में पाल केनिंग, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ परन्तु उसे भी पुर्तगालियों के विरोध के कारण मुगल दरबार में सफलता नहीं मिली। इस पर अँग्रेजों ने पुर्तगालियों से निबटने का निश्चय किया। उन्होंने पहले 1612 ई. में और बाद में 1614 ई. में पुर्तगालियों को युद्ध में परास्त किया तथा सूरत के समुद्री क्षेत्र से पुर्तगाली जहाजों को मार भगाया। इससे बादशाह जहाँगीर को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौ-सैनिक शक्ति का अनुमान हो गया। जहाँगीर स्वयं भी पुर्तगालियों पर अंकुश रखने के लिये एक मजबूत नौसेना का गठन करना चाहता था। जहाँगीर को लगा कि आवश्यकता हुई तो निकट भविष्य में अँग्रेजी नौसेना को मुगलों की सहायता के लिये काम में लिया जा सकेगा। इसलिये जब 1615 ई. के प्रारम्भ में विलियम एडवर्ड, राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ तो जहाँगीर ने अन्य विदेशी व्यापारियों की भाँति ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भी भारत में बस्तियाँ बसाने तथा व्यापार करने की अनुमति दे दी।

    पूरा अध्याय पढ़ने के लिये राजस्थान हिस्ट्री वैसाइट से अथवा अपने एण्ड्रोयड सैलफोन/टैब पर गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध राजस्थान हिस्ट्री एप से भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन नामक पुस्तक डाउनलोड करें।


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  • अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की राजनीतिक स्थिति

     21.08.2017
    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की राजनीतिक स्थिति

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 2

    अँग्रेज भारत में समुद्री मार्ग से 1608 ई. में आये। उस समय भारत में मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। मुगलों की केन्द्रीय सत्ता अत्यंत प्रबल थी। दक्षिण भारत के राज्य मुगलों की सीमा पर स्थित थे। अँग्रेजों के आगमन से बहुत पहले अर्थात् 1498 ई. से पुर्तगाली भारत में व्यापार कर रहे थे। डचों को भारत में आये हुए केवल चार साल हुए थे। इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अँग्रेजों ने विनम्र प्राथी बनकर भारत में अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरम्भ कीं जिनका विवरण पिछले अध्याय में दिया जा चुका है। सत्रहवीं सदी के अन्त तक बम्बई, कलकत्ता और मद्रास आदि समुद्री तट, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियों के मुख्य केन्द्र बन चुके थे। साथ ही देश के आन्तरिक भागों में पटना, अहमदाबाद, आगरा, बुरहानपुर आदि नगरों में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये थे।

    कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न

    बहुत से इतिहासकारों का कथन है कि 1608 से 1740 ई. तक ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में व्यापारिक कम्पनी की तरह काम करती रही। यह कथन बिल्कुल गलत है। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार के बल पर बढ़ाती रही। औरंगजेब के जीवन काल में ही कम्पनी ने भारत में विनम्र प्रार्थी की भूमिका त्यागने का भरसक प्रयास किया। वह भारतीयों से बलपूर्वक सस्ता माल खरीदकर भारतीयों को महंगा माल बेचती थी। जो निर्धन भारतीय उत्पादक एवं भारतीय नौकर, ऐसा नहीं करते थे, उन्हें कम्पनी के आदमी कोड़ों से पीटते थे। 1680 के दशक में बम्बई के गवर्नर जेराल्ड आन्जियर ने कम्पनी के लन्दन स्थित निदेशकों को लिखा- 'समय की मांग है कि आप अपने वाणिज्य का प्रबन्ध अपने हाथों में तलवार लेकर करें।' 1687 ई. में कम्पनी के निदेशकों ने मद्रास के गवर्नर को सलाह दी- 'आप नागरिक और सैनिक सत्ता की ऐसी नीति स्थापित करें और राजस्व की इतनी बड़ी राशि का सृजन कर उसे प्राप्त करें कि दोनों को सदा के लिये भारत पर एक विशाल सुदृढ़ सुरक्षित आधिपत्य के आधार के रूप में बनाए रखा जा सके।'

    मुगलों से सशस्त्र संघर्ष

    औरंगजेब के जीवन काल में ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की उग्र नीतियों के कारण कम्पनी के अधिकारियों और मुगल अधिकारियों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ जो सशस्त्र संघर्ष में बदल गया। 1686 ई. में कम्पनी ने हुगली को लूट लिया तथा मुगल बादशाह के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। औरंगजेब ने अँग्रेजों के विरुद्ध सख्त कदम उठाये। उसकी सेनाओं ने अँग्रेजों को बंगाल के कारखानों से निकालकर बाहर कर दिया। अँग्रेज भागकर गंगा के मुहाने पर स्थित एक ज्वर-ग्रस्त टापू पर चले गये। सूरत, मच्छलीपट्टम् और विशाखापट्टम् स्थित कारखानों पर भी मुगलों ने अधिकार कर लिया।

    बम्बई के किले को मुगल सेनाओं ने घेर लिया। मुगल सेना की ऐसी शक्ति देखकर अँग्रेज पुनः विनम्र प्रार्थी की भूमिका में आ गये। उन्होंने औरंगजेब से निवेदन किया कि कम्पनी ने बिना सोचे-समझे जो भी अपराध किये हैं, उन्हें क्षमा कर दिया जाये। उन्होंने भारतीय शासकों के संरक्षण में व्यापार करने की इच्छा व्यक्त की। वे एक बार पुनः चापलूसी और विनम्र याचनाओं पर उतर आये। औरंगजेब ने डेढ़ लाख रुपया क्षतिपूर्ति लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों को क्षमा कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि कम्पनी द्वारा चलाए जा रहे विदेशी व्यापार से भारतीय दस्तकारों और सौदागरों को लाभ होता है तथा इससे राज्य का खजाना समृद्ध होता है।

    इस प्रकार अँग्रेजों को पहले की भाँति भारत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई। कम्पनी एक ओर तो मुगल बादशाह से क्षमा याचना की नीति अपना रही थी किंतु दूसरी ओर वह अपने उग्र तरीकों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं थी। 1689 ई. में कम्पनी ने घोषणा की- 'अपने राजस्व की वृद्धि हमारी चिंता का उतना ही विषय है जितना हमारा व्यापार। जब बीस दुर्घटनाएं हमारे व्यापार में बाधा डाल सकती हैं, तब यही है जो हमारी ताकत को बनाए रखेगी। यही है जो हमें भारत में एक राष्ट्र बनाएगी.......।'

    औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी

    1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों की शक्ति पतनोन्मुख हो गई। यद्यपि मुगलों का अन्तिम बादशाह बहादुरशाह जफर 1858 ई. तक दिल्ली के तख्त का स्वामी बना रहा तथापि मुगलों की वास्तविक सत्ता 1800 ई. से काफी पहले ही समाप्त हो चुकी थी। शक्तिशाली सार्वभौम सत्ता के अभाव में विभिन प्रान्तों के सूबेदार केन्द्रीय सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करने लगे। मुगलों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं होने से मुगल शहजादे परस्पर युद्ध के माध्यम से ही उत्तराधिकार का निर्णय करते थे। इस कारण मुगल सल्तनत में बिखराव की गति बहुत तीव्र रही।

    औरंगजेब के बड़े पुत्र मुहम्मद मुअज्जम ने अपने भाइयों को युद्ध में मारकर बहादुरशाह (प्रथम) (1707-12 ई.) के नाम से तख्त पर अधिकार किया। उसने राजपूतों, सिक्खों और मराठों को दबाने का असफल प्रयास किया। फिर भी, उसके समय में मुगल सल्तनत में स्थिरता बनी रही। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद, ईरानी अमीर दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से जहाँदारशाह अपने भाइयों को परास्त करके 1713 ई. में तख्त पर बैठा। वह 10 माह में ही सैयद बंधुओं द्वारा तख्त से हटा दिया गया।

    इस प्रकार 1713 ई. में अमीरों द्वारा बादशाह की हत्या करके अपनी पसंद के शहजादों को मुगल तख्त पर बैठाने का जो सिलसिला आरम्भ किया, वह 1806 ई. में अकबर (द्वितीय) के तख्त पर बैठने के बाद ही समाप्त हुआ। जहाँदारशाह के बाद उसके मृत भाई अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रूखसियर (1713-19 ई.) को बादशाह बनाया गया। अब फर्रूखसियर और सैयद भाइयों में सत्ता के लिये खुलकर संघर्ष हुआ। फर्रूखसियर ने सैयद भाइयों से मुक्त होने का प्रयास किया परन्तु सैयद भाइयों ने मराठों तथा राजपूतों के सहयोग से उसे मार डाला। इसके बाद सैयदों ने 1719 ई. में, एक ही वर्ष में एक-एक करके रफी-उद्-दरजात, रफीउद्दौला और मुहम्मदशाह रंगीला को तख्त पर बैठाया।

    नादिरशाह का आक्रमण

    मुहम्मदशाह 1748 ई. तक राज्य करता रहा। उसके समय में 1739 ई. में नादिरशाह का आक्रमण हुआ। नादिरशाह भारत से लगभग 70 करोड़ रुपये की सम्पदा लूटकर ले गया जिसमें कोहिनूर हीरा तथा शाहजहाँ का तख्ते-ताउस भी सम्मिलित था। नादिरशाह के आक्रमण से मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा और स्थायित्व को गहरा धक्का लगा। मुहम्मदशाह के पश्चात् अहमदशाह ने 1748 से 1754 ई. तक तथा आलमगीर (द्वितीय) ने 1754 से 1759 ई. तक दिल्ली पर शासन किया परन्तु दोनों में से किसी में भी इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि साम्राज्य के पतन को रोक सके।

    क्षेत्रीय राज्यों का उदय

    मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए राजपूतों, सिक्खों, मराठों तथा मुगल अमीरों ने अपने-अपने राज्यों की स्थापना करने एवं उन्हें मजबूत बनाने का प्रयत्न किया। अनेक महत्त्वाकांक्षी सामन्तों एवं सूबेदारों ने स्वतंत्र तथा अर्द्ध-स्वंतत्र राज्यों की स्थापना की। ये लोग दिल्ली के बादशाह के प्रति नाममात्र की निष्ठा रखते थे। यह सिलसिला 1712 ई. में बहादुरशाह (प्रथम) की मृत्यु के बाद ही आरम्भ हो गया था। इसके परिणाम स्वरूप उत्तर एवं दक्षिण भारत में अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से कुछ राज्यों के शासक, मुगल सल्तनत से पृथक् राज्य स्थापित करने के बाद भी मुगल सल्तनत के अन्तर्गत बने रहने की घोषणा करते रहे।

    हैदराबाद

    निजाम-उल-मुल्क: दक्षिण भारत में हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना औरंगजेब के मनसबदार चिनकुलीचखाँ ने की। औरंगजेब की मृत्यु के समय वह बीजापुर में था। बहादुरशाह (प्रथम) ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद चिनकुलीच खाँ ने जहाँदारशाह के विरुद्ध फर्रूखसियर की सहायता की। अतः फर्रूखसियर ने बादशाह बनने पर चिनकुलीचखाँ को दक्षिण भारत के छः सूबों की सूबेदारी तथा खानखाना और निजाम-उल-मुल्क बहादुर फतहजंग की उपाधियाँ प्रदान कीं।

    1715 ई. में उसे पुनः दिल्ली बुलाया गया। उसे पहले मुरादाबाद की और फिर मालवा की सूबेदारी दी गई। चिनकुलीचखाँ (निजाम-उल-मुल्क) ने मालवा में अपनी शक्ति का विस्तार किया जिससे सैयद भाई उससे ईर्ष्या करने लगे। सैयद भाइयों ने बादशाह फर्रूखसियर पर दबाव डालकर दिलावरखाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त करवा दिया। निजाम-उल-मुल्क ने इसका विरोध किया और उसने एक युद्ध में दिलावरखाँ को मार डाला।

    निजाम-उल-मुल्क ने बुरहानपुर और असीरगढ़ के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार वह दक्षिण-पथ का स्वामी बन गया। फर्रूखसियर के बाद मुहम्मदशाह को बादशाह बनाया गया। मुहम्मदशाह ने सैयद भाइयों को समाप्त कर दिया और निजाम-उल-मुल्क को वजीर का पद देकर दिल्ली बुलाया।

    निजाम-उल-मुल्क दिल्ली आकर सल्तनत का काम करने लगा। वह सल्तनत की व्यवस्था सुधारना चाहता था किंतु मुहम्मदशाह को शीघ्र ही कुछ लोगों ने निजाम-उल-मुल्क के विरुद्ध भड़का दिया। इस कारण मुहम्मदशाह, निजाम-उल-मुल्क को नापसंद करने लगा और उसके सामने ही उसका उपहास करने लगा। बादशाह सरेआम लोगों से कहता था- 'देखो दक्षिण का गधा कितना सुंदर नाचता है।' इस कारण निजाम-उल-मुल्क नाराज होकर पुनः दक्षिण भारत चला गया। दक्षिण के नये

    सूबेदार मुबारिजखाँ ने उसका विरोध किया किंतु निजाम-उल-मुल्क ने मराठों की सहायता से मुबारिजखाँ को परास्त कर दिया। इस पर मुहम्मदशाह की आंखें खुलीं। उसने निजाम को अपने पक्ष में करने के लिये दक्षिण के 6 सूबे प्रदान किये।

    निजाम ने हैदराबाद को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र रूप से शासन व्यवस्था स्थापित कर ली। इस प्रकार लगभग 1720 ई. के लगभग हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। निजाम ने अपने राज्य की सीमाएँ ताप्ती नदी से लेकर कर्नाटक, मैसूर और त्रिचनापल्ली तक बढ़ा लीं। निजाम ने यद्यपि पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया किंतु उसने न तो अपने नाम के सिक्के चलाये और न राजछत्र धारण किया। उसने मुगल बादशाह से सम्बन्ध विच्छेद भी नहीं किया।

    बंगाल, बिहार और उड़ीसा

    मुर्शीदकुलीखाँ: 1707 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ बंगाल का नायब नाजिम तथा उड़ीसा का नाजिम था। 1713 ई. में फर्रूखसियर के शासनकाल में उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया। उसके समय में बंगाल में शांति रही और व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

    शुजाउद्दीन मुहम्मद: 1727 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ की मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मदखाँ बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बना। मुहम्मदशाह रंगीला ने 1733 ई. में उसे बिहार का सूबा भी दे दिया। इस प्रकार, बंगाल, उड़ीसा और बिहार तीनों सूबे उसके शासन के अन्तर्गत चले गये तथा केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव नाममात्र का रह गया। उसके शासनकाल में भी इन सूबों में शान्ति बनी रही।

    सरफराजखाँ: शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद 1739 ई. में उसका पुत्र सरफराजखाँ सूबेदार बना। वह अत्यधिक विलासी प्रवृत्ति का था। इस कारण शासन व्यवस्था बिगड़ गई। ऐसी स्थिति में बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दीखाँ ने उस पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सरफराजखाँ परास्त हुआ और मारा गया।

    अलीवर्दीखाँ: अलीवर्दीखाँ ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के तीनों सूबों पर अधिकार कर लिया। मुहम्मदशाह ने भी उसे सूबेदार स्वीकार कर लिया। अलीवर्दीखाँ ने 1740 से 1756 ई. तक शासन किया। उसे मराठों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। नागपुर का रघुजी भोंसले, जो पेशवा का प्रतिद्वन्द्वी था, ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर धावे मारने आरम्भ कर दिये। रघुजी के प्रतिनिधि भास्कर पन्त ने अलीवर्दीखाँ की सेना को कई बार परास्त किया। अलीवर्दीखाँ ने षड्यन्त्र रचकर भास्कर पन्त सहित कई मराठा सरदारों को मरवा दिया। इस पर क्रोधित होकर रघुजी भौंसले ने तीनों सूबों को बुरी तरह से रौंदा। अंत में अलीवर्दीखाँ को रघुजी से समझौता करना पड़ा तथा उड़ीसा का सूबा मराठों को सौंपना पड़ा। साथ ही बंगाल तथा बिहार की चौथ के बदले में रघुजी को 12 लाख रुपये वार्षिक देने का वचन देना पड़ा। अलीवर्दीखाँ को बंगाल का नवाब बनाने में हिन्दू व्यापारियों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। अतः अलीवर्दीखाँ ने भी अपने शासन में रायदुर्लभ, जगत सेठ, मेहताबराय, स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा मानिकचन्द्र आदि हिन्दुओं को उच्च पद दिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रभाव का मुख्य कारण बंगाल के व्यापार पर उनका एकाधिकार होना था।

    सिराजुद्दौला: अलीवर्दीखाँ ने अपने जीवनकाल में ही अपनी छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। अतः 1756 ई. में अलीवर्दीखाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने से रोका। इस कारण सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच प्लासी का युद्ध हुआ। अवध

    सआदतखाँ: अवध राज्य की स्थापना मीर मोहम्मद अमीन सआदत बुरहान-उल-मुल्क ने की जिसे सआदतखाँ भी कहते हैं। वह मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था। वह निजाम-उल-मुल्क का प्रतिद्वन्द्वी था। मीर मोहम्मद ने सैयद बन्धुओं के पतन में योगदान दिया था। इसके बदले में उसे सआदतखाँ की उपाधि तथा आगरा की सूबेदारी मिली। 1722 ई. में उसे अवध की सूबेदारी मिली। इसी समय से अवध राज्य का स्वतंत्र इतिहास प्रारंभ होता है। सआदतखाँ ने दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भाग लिया। 1732 ई. में उसने उत्तरी भारत में मराठों के प्रसार को रोकने के सम्बन्ध में बादशाह मुहम्मदशाह के समक्ष कुछ प्रस्ताव रखे परन्तु अन्य अमीरों के विरोध के कारण उसे सफलता नहीं मिली।

    बादशाह ने उसे पेशवा बाजीराव के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये। सआदतखाँ ने मार्च 1737 में मराठों की एक छोटी सी सेना को परास्त किया तथा बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को झूठी सूचना भिजवा दी कि उसने पेशवा बाजीराव को चम्बल के उस पार खदेड़ दिया है। जब बाजीराव को इस बात की जानकारी हुई तो उसने क्रोधित होकर दिल्ली पर धावा बोल दिया तथा सआदतखाँ की पोल खोल दी। इस घटना से मुगल दरबार में सआदतखाँ की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। इसका बदला सआदतखाँ ने नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण हेतु उकसाकर तथा उसके हाथों मुहम्मदशाह का अपमान करवा कर लिया। 1739 ई. में सआदतखाँ की मृत्यु हो गई।

    सफदरजंग: सआदत खाँ के बाद उसका भतीजा एवं दामाद सफदरजंग अवध का सूबेदार बना। 1748 ई. में मुगल बादशाह अहमदशाह ने उसे सल्तनत का वजीर नियुक्त किया। कुछ समय बाद उसे इलाहबाद का सूबा भी दे दिया। सफदरगंज ने अवध की सीमा पर स्थित रूहेलखण्ड में बसे हुए रूहेलों और फर्रूखाबाद के पठानों को दबाने का प्रयास किया। ये लोग अवध के क्षेत्रों में लूटमार करते रहते थे। सफदरगंज ने इस कार्य में जयप्पा सिन्धिया, मल्हारराव होलकर तथा जाट राजा सूरजमल का सहयोग लिया। 22 अप्रैल 1752 को सफदरगंज ने अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों से समझौता किया परन्तु बादशाह ने उस समझौते को रद्द करके पंजाब, अब्दाली को सौंप दिया। इस पर बादशाह और वजीर में अघोषित युद्ध छिड़ गया जिसमें वजीर परास्त हो गया तथा अपना पद त्यागकर अपने सूबे अवध को चला गया। अक्टूबर 1754 में उसकी मृत्यु हो गई।

    शुजाउद्दौला: सफदरजंग की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शुजाउद्दौला अवध का नवाब बना। उसके समय में अवध की राजनीति में गम्भीर परिवर्तन हुए। उसने मुगल शाहजादे अलीगौहार को अवध में शरण दी तथा पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया। अलीगौहर ने बादशाह बनने के बाद 1762 ई. में शुजाउद्दौला को वजीर के पद पर नियुक्त किया। शुजाउद्दौला ने बंगाल के नवाब मीर कासिम को अपने राज्य में शरण दी और अंग्रेजों के विरुद्ध बक्सर तथा कड़ा के युद्ध लड़े। इन युद्धों में शुजाउद्दौला की पराजय हुई। तब से अवध अँग्रेजों के प्रभाव में चला गया।

    बड़ौदा

    गुजरात मुगल सल्तनत के समृद्ध सूबों में से था किन्तु केन्द्रीय शक्ति के ह्रास के कारण गुजरात पर नियंत्रण बनाये रखना कठिन हो गया। जब मराठों को गुजरात से चौथ वसूली का अधिकार दिया गया तो मराठों का प्रभाव और अधिक बढ़ गया। गुजरात के तत्कालीन सूबेदार महाराजा अभयसिंह ने मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने का प्रयास किया किंतु महाराजा को 1733 ई. के युद्ध में बुरी तरह परास्त होना पड़ा और वह गुजरात का शासन अपने अधिकारियों को सौंपकर जोधपुर चला गया। 1735 ई. तक मराठे गुजरात के वास्तविक शासक बन गये। आगे चलकर गुजरात में बड़ौदा राज्य स्थापित हुआ जिस पर गायकवाड़ परिवार ने शासन किया।

    मालवा

    मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण दिल्ली दरबार का कोई भी अमीर मालवा में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं कर पाया। 1724 ई. के बाद पेशवा के तीन सेनानायकों- होलकर, सिन्धिया और पंवार ने क्रमशः इन्दौर, ग्वालियर और धार में मराठा शक्ति का विस्तार किया। आगे चलकर तीनों, स्वतंत्र मराठा राज्यों में बदल गये।

    पंजाब

    पंजाब के सूबेदार जकारियाखाँ ने लम्बे समय तक पंजाब में शान्ति बनाये रखी परन्तु 1737 से 1739 ई. तक नादिरशाह और 1752 से 1761 ई. तक अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों से पंजाब की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। दिल्ली दरबार की दलबन्दी और मुहम्मदशाह रंगीला की निर्बलता के कारण पंजाब में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी।

    राजपूताना

    बाबर के समय से ही मेवाड़ राज्य, मुगलों से पर्याप्त दूरी बनाये हुए था। औरंगजेब की धूर्त्तता और मक्कारी पूर्ण गतिविधियों के चलते जोधपुर, बीकानेर, आम्बेर तथा बूंदी आदि राजपूत राज्य, मुगलों से लगातार दूर होते जा रहे थे। फिर भी वे मुगल राजनीति में भाग लेते रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह तथा मारवाड़ नरेश अभयसिंह, मुगलों की सूबेदारी स्वीकार करते रहे तथा मराठों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करते रहे परन्तु मराठे निरंतर आगे बढ़ते रहे जिसके कारण केन्द्रीय राजनीति में राजपूत राज्यों की भूमिका गौण हो गई तथा राजपूताना राज्यों के शासक अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र शासक की भांति शासन करने लगे।

    मैसूर

    1565 ई. में तालीकोट के युद्ध के बाद विजयनगर राज्य का विघटन हो गया तथा मैसूर का हिन्दू राज्य अस्तित्त्व में आया था। 1704 ई. में मैसूर को औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। 1750 ई. के आसपास मैसूर पर चिकाकृष्णराज का शासन था। वह नाममात्र का शासक था। शासन की समस्त शक्तियाँ देवराज और नन्दराज नामक दो भाइयों के हाथों में थी। बाद में नन्दराज, राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। उस समय हैदरअली, नन्दराज की सेना में नायक के पद पर काम करता था। हैदरअली अनपढ़ होते हुए भी चतुर व्यक्ति था। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर नन्दराज ने उसे डिण्डुगल दुर्ग का फौजदार नियुक्त किया।

    1761 ई. में हैदरअली ने मैसूर के दीवान खाण्डेराव तथा राजमाता से मिलकर नन्दराज को परास्त कर दिया। नन्दराज के पराभव के बाद हैदरअली ने शासन, राजमाता को सौंपने के स्थान पर स्वयं अपने हाथ में ले लिया। हैदरअली ने दीवान खाण्डेराव को बंदीगृह में डाल दिया तथा स्वयं राजा के नाम पर शासन करने लगा।

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  • अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति :

     21.08.2017
    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति :

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 3

    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति 

    जहाँ एक ओर यूरोपीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यूरोपीय जातियों ने भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये भारत में प्रवेश किया वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी और अँग्रेजों की शोषणकारी नीतियों ने भारत की आर्थिक स्थिति को पतन के गर्त में पहुँचा दिया। ये दोनों ही बातें सही नहीं हैं। अँग्रेजों के आगमन के समय अर्थात् सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते समय निम्नलिखित तथ्य ध्यान में रखे जाने चाहिये-

    (1.) विगत 9 शताब्दियों अर्थात् अंग्रेजों के भारत में आने से पहले की 9 शताब्दियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा लगातार किये जा रहे आक्रमणों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो चुकी थी। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, चंगेजखाँ, तैमूरलंग, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली आदि आक्रांताओं द्वारा उत्तरी एवं पश्चिमी भारत में भयानक लूटमार मचाने, कत्ले आम मचाने, भारत के मंदिरों, राजाओं और सेठों का धन पशुओं पर लाद कर अपने देश ले जाने तथा कामगारों को पकड़कर ले जाने के कारण देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी तथा भारत के उद्योग-धंधों को गहरे घाव पहुँचे थे।

    (2.) दिल्ली सल्तनत तथा मुगलिया सल्तनत के अधिकांश मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू किसानों, हिन्दू व्यापारियों एवं हिन्दू तीर्थ-यात्रियों पर अधिक से अधिक कर लगाये जाने तथा मुस्लिम व्यापारियों एवं किसानों को विभिन्न प्रकार के करों में छूट दिये जाने के कारण बहुसंख्य हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी।

    (3.) बाबर से लेकर अकबर तक के लगभग 80 साल के शासनकाल में तथा औरंगजेब के 50 साल के शासन काल में अनवरत युद्ध चलते रहे। इन युद्धों के चलते, देश में समृद्धि कैसे बची रह सकती थी! जहाँ-जहाँ मुगल सेनाओं का पड़ाव रहा अथवा जिन राज्यों पर उनके आक्रमण हुए, वहाँ-वहाँ की खेतियां उजड़ गईं, उद्योग धंधे ठप्प हो गये तथा लोग अपने घरों को छोड़कर दर-दर भटकने पर विवश हो गये। इन कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी।

    (4.) किसानों तथा उनके परिवारों के द्वारा हाड़-तोड़ मेहनत करके जो अनाज उगाया जाता था, उसे बादशाहों, नवाबों, राजाओं तथा जागीरदारों के आदमियों द्वारा कर के रूप में लूट लिया जाता था। भू-राजस्व एवं कर चुकाने के बाद किसानों तथा उनके परिवारों के पास पेट भरने के लिये पर्याप्त अनाज नहीं बचता था।

    (5.) केन्द्रीय मुगल शासन की अराजकता, प्रांतीय मुस्लिम शासकों की कट्टरता, लगातार हो रहे अफगान आक्रमण, मराठों की लूट-खसोट, व्यापारिक चुंगी, स्थानीय करों की अधिकता तथा हिन्दुओं के साथ धार्मिक भेदभाव के उपरांत भी खेती तथा कुटीर धंधे केवल इसलिये चल रहे थे और लोग इसलिये जीवित थे कि जन साधारण में पूरा परिवार, साल के प्रत्येक दिन और दिन के अधिकांश समय में किसी न किसी काम में लगा रहता था।

    (6.) चारों ओर मची हुई लूट-मार के कारण बादशाहों, सूबेदारों, राजाओं एवं जागीरदारों के पास धन की आवक लगी रहती थी तथा जन साधारण दिन पर दिन निर्धन होता जा रहा था।

    भू-स्वामित्व

    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में सिद्धान्ततः शासक समस्त भूमि का स्वामी था परन्तु व्यावहारिक रूप में भूमि पर काश्त करने वाले जब तक भूमि कर (लगान) देते रहते थे, तब तक वे भूमि के मालिक बने रहते थे। सामान्य रूप से किसान न तो भूमि को बेच सकते थे और न उससे अलग हो सकते थे। डॉ. नोमान अहमद सिद्दीकी का मत है कि किसानों को जमीन बेचने और बन्धक रखने जैसे अधिकार नहीं थे। फिर भी किसानों का एक वर्ग जिसे मौरूसी कहा जाता था, इस प्रकार के अधिकारों का दावा करता था, जिन्हें दखलदारी का अधिकार (ओक्यूपेंसी राइट्स) कहा जा सकता है। सामान्यतः किसानों को बेदखल नहीं किया जाता था और उनके वंशजों का उनके खेतों पर उत्तराधिकार होता था। कुछ ऐसे किसान भी थे जो जमींदारों की अनुमति से खेत जोतते थे। उन्हें जमींदार अपनी इच्छा से कभी भी बेदखल कर सकता था। वस्तुतः कृषकों का वर्गीकरण कई स्तरों एवं श्रेणियों में हो सकता था।

    भूमि की श्रेणियाँ और किस्म

    कृषि भूमि को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था- (1.) खालसा भूमि और (2.) गैर-खालसा भूमि (जागीर, सासण आदि)। मुगलों के शासनकाल में जागीरदार अर्द्ध-स्वतंत्र शासक थे। बादशाह उनके आन्तरिक शासन में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता था। खालसा भूमि बादशाह के नियंत्रण में होती थी। मालगुजारी निश्चित करने के लिये भूमि को पोलज, परती, चाचर एवं बंजर में बाँटा गया था। यह वर्गीकरण भूमि को जोतने पर आधारित था। पोलज वह भूमि थी जिसे प्रत्येक वर्ष जोता जाता था। परती भूमि को कुछ समय के लिये बिना जोते ही छोड़ दिया जाता था। चाचर भूमि तीन-चार साल के लिए बिना जोते हुए छोड़ दी जाती थी। बंजर भूमि वह थी जिस पर पाँच साल से भी अधिक समय तक कोई उपज नहीं होती थी। प्रथम दो प्रकार की भूमियों (पोलज तथा परती) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया- अच्छी, मध्यम और खराब। इन तीनों श्रेणियों की प्रति बीघा औसत उपज को पोलज तथा परती के प्रति बीघा की सामान्य उपज मान लिया गया था। इन दोनों श्रेणियों की भूमि में विशेष अन्तर नहीं था; क्योंकि जिस वर्ष भी परती भूमि पर खेती की जाती थी, उसकी उपज पोलज के समान ही हुआ करती थी। चाचर भूमि में जब पहले साल खेती होती थी तो निश्चित दर का 2/5 भाग लिया जाता था और पाँच साल खेती होने के पश्चात् उस पर सामान्य दर से मालगुजारी ली जाती थी। बंजर भूमि पर भी पाँच साल के बाद पूरी दर से मालगुजारी ली जाती थी।

    कृषि का तरीका और फसलें

    अँग्रेजों के भारत में आने के समय पुराने ढंग से खेती की जाती थी। कृषि कार्यों में हल, खुरपी, पटेला, हंसिया तथा बैलों की जोड़ी काम में लाये जाते थे। अधिकांशतः खेती वर्षा पर निर्भर थी। सिंचाई के लिये बहुत कम नहरें उपलब्ध थीं। वर्षा के अभाव में प्रजा संतप्त हो जाती थी। किसानों का जीवन कष्टमय तथा मंथर गति से चलने वाला था। ग्रामवासियों की आवश्यकताएँ गाँव में ही पूर्ण होती थीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना नियत कार्य करता था। किसान खेत जोतता, बोता तथा काटता था। उस समय की मुख्य फसलों में गेहूं, बाजरा, मक्का, चावल, कपास, मटर, तिलहन, गन्ना आदि थे। फलों में आम, अँगूर, अनार, केले, खरबूजा, अंजीर, नींबू, खिरनी, जामुन आदि होते थे। औषधीय फसलों में जड़ी-बूटियाँ, मसाले और सुगन्धित काष्ठ उत्पन्न होते थे। अनाज-भण्डारण का सामान्य तरीका गड्ढों या खत्तियों में रखने का था जिससे अनाज लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था।

    किसानों की स्थिति

    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में किसानों की स्थिति अच्छी नहीं थी। राजनीतिक अस्थिरता, मराठों द्वारा की जाने वाली लूटपाट तथा केन्द्रीय नेतृत्व की कमजोरी के कारण स्थानीय शासक किसानों से बलपूर्वक कर वसूल करते थे। जिन क्षेत्रों पर मराठों के आक्रमण अधिक होते थे, वहाँ किसानों की स्थिति अधिक खराब थी। जब किसान स्थानीय शासक को कर चुका देते थे तो मराठे चौथ वसूली के लिये आ धमकते थे और यदि मराठे पहले लूट लेते थे तो बाद में स्थानीय शासक कर मांगता था। इस कारण बहुत से स्थानों पर खेती उजड़ गई थी। अठारहवीं शताब्दी में किसान का जीवन दरिद्र, घिनौना, दयनीय तथा अनिश्चित था। बहुत से किसान बर्बाद होकर डाकू बन जाते थे जो बड़े-बड़े दल बनाकर, प्रजा को लूटते फिरते थे।

    शिल्प तथा उद्योग

    भारत के गाँवों, कस्बों तथा शहरों में काम करने वाले शिल्पी तथा उद्यमी अपने पुराने जातिगत एवं परम्परागत कार्य करते थे। उनके औजार भी बहुत पुराने ढंग के थे। देश में बड़े पैमाने पर किसी उद्योग का विकास नहीं हुआ था। अधिकांश उद्योग स्थानीय रूप में थे जो पिता से पुत्र को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किये जाते थे। देश के कई शहर और क्षेत्र अपने विशिष्ट और श्रेष्ठ उत्पादों के लिये प्रसिद्ध हो गये थे। कई शाही कारखाने भी थे जो फारस देश के ढंग के अनुसार मुस्लिम शासकों द्वारा स्थापित किये गये थे। इन कारखानों में शाही तथा दरबारी लोगों की आवश्यकता की चीजें बनाई जाती थी। इनमें सुनार, किमखाब या रेशम तैयार करने वाले, कसीदाकारी करने वाले, चित्रकार, दर्जी, मलमल तथा पगड़ी बनाने वाले इत्यादि अनेक प्रकार के कारीगर होते थे, जो साथ मिलकर तथा अलग-अलग काम करते थे। प्रान्तों में भी स्थानीय माँग के अनुसार विभिन्ना प्रकार की वस्तुएं बनाने के कारखाने थे। इनमें बनने वाली वस्तुएं उच्च अधिकारियों को भेंट की जाती थीं।

    व्यापार एवं वाणिज्य

    भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय व्यापार एवं वाणिज्य के विषय में बहुत ही कम जानकारी मिलती है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार अँग्रेजों के आगमन के समय भारत का आन्तरिक एवं बाह्य, दोनों प्रकार का व्यापार उन्नति पर था। देश की आवश्यकताओं को पूरा करने के पश्चात् जो सामग्री शेष बचती, उसका निर्यात किया जाता था। यातायात एवं परिवहन की समस्या व्यापारियों तथा सामान ले जाने वाले साधनों के द्वारा पूर्ण हो जाती थी। देश में व्यापार के लिये अनेक मार्ग थे जो स्थानीय शासक द्वारा कर लेकर सुरक्षित रखे जाते थे।

    आन्तरिक व्यापार

    अँग्रेजों के आगमन के समय राजनीतिक अस्थिरता होने के उपरांत भी, भारत का आन्तरिक व्यापार काफी विस्तृत था। इस समय भी वैश्य वर्ग प्रमुख व्यापारी था। उत्तर भारत में व्यापार गुजरातियों एवं मारवाडि़यों द्वारा तथा दक्षिण में चेतियों द्वारा होता था। प्रत्येक गाँव में छोटा बाजार होता था, जहाँ छोटी-छोटी वस्तुओं का व्यापार होता था। कुछ दुकानंे चलती-फिरती होती थीं, जो घोड़े की पीठ पर लगाई जाती थीं। महत्त्वपूर्ण वस्तुओं का व्यापार शहर की मण्डियों में होता था। विभिन्न स्थानों पर साल भर में कुछ निश्चित मेले लगते थे जिनमें दूर-दूर से व्यापारी आते थे और खूब व्यापार होता था। फेरी लगाकर माल बेचने वाले तथा इस प्रकार के अन्य व्यापारी भी उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। बन्जारों के काफिले बैलों पर अनाज, चीनी, नमक आदि लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते थे। कई बार ये काफिले 20 से 30 हजार बैलों के होते थे। व्यापारी भी काफिलों में इधर-उधर जाते थे। भारत के महत्त्वपूर्ण व्यापारी गुजराती, मारवाड़ी और मुल्तानी थे। विदेशी मुसलमान व्यापारियों को खुरासानी कहा जाता था। वे मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली जैसे बड़े नगरों के बाजारों में माल की आपूर्ति करते थे।

    माल परिवहन के साधन

    उस काल में परिवहन के साधन बहुत कम थे। व्यापारिक माल प्रायः कच्ची एवं धूलभरी सड़कों से ले जाया जाता था। शासकों द्वारा मार्ग के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये जाते थे। यात्रियों एवं व्यापारियों की सुविधा के लिये स्थान-स्थान पर सरायें बनाई जाती थीं। इन स्थानों पर पशुओं के लिये चारा एवं पेयजल भी उपलब्ध रहता था। यात्रियों एवं व्यापारियों को मार्ग दिखाने के लिये छोटी-छोटी अटारी अथवा मीनार बने हुए थे। राजपूताने के भाट एवं चारण, खतरनाक सड़कों पर काफिलों का मार्ग-दर्शन तथा सुरक्षा करते थे। नदियां भी माल के परिवहन के लिये सस्ता साधन थीं। काश्मीर, बंगाल, सिन्ध तथा पंजाब में अधिकांश सामान नदी मार्ग से परिवहन किया जाता था। बंगाल में गंगा तथा ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियां, नेपाल की तराई में गण्डक, बिहार में कोसी, पंजाब में रावी, चिनाव, झेलम, सतलुज एवं व्यास, मध्य भारत में नर्मदा तथा चम्बल, दक्षिण में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि विभिन्न नदियों के माध्यम से बड़ी मात्रा में व्यापारिक माल का परिवहन होता था। बंगाल में नावों के बड़े बेड़े होते थे। यमुना में चौरस पेंदी की कुछ नावें 100 टन तक भारी होती थीं। गंगा में 400-500 टन भारी नावें चलती थीं। थट्टा से लाहौर तक जाने में 6-7 सप्ताह का समय लगता था, जबकि वापसी यात्रा में केवल 18 दिन लगते थे।

    सड़कों पर सुरक्षा

    केन्द्रीय, प्रान्तीय एवं स्थानीय शासक अपने-अपने क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने में रुचि लेते थे ताकि उनके क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आ सके तथा सरकार को अधिक आय हो सके। इस कारण सड़कों को सुरक्षित बनाने के प्रयत्न किये जाते थे परन्तु फिर भी लुटेरों का भय बना रहता था। इसलिये व्यापारी अपने काफिलों के साथ सशस्त्र सुरक्षा प्रहरी रखते थे तथा स्थानीय शासकों को शुल्क देकर उनसे सुरक्षा प्राप्त करते थे।

    चुंगी

    आंतरिक एवं बाह्य व्यापार हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाने एवं बाजार में विक्रय करने पर स्थान-स्थान पर चुंगी ली जाती थी। चुंगी के अतिरिक्त समस्त बड़े बाजारों तथा बन्दरगाहों पर अन्य शुल्क भी देने पड़ते थे। औरंगजेब ने इसकी मात्रा हिन्दू व्यापारियों के लिये पहले की अपेक्षा दो गुनी कर दी तथा मुसलमान व्यापारियों के लिये बिल्कुल हटा दी। इस कारण हिन्दुओं को व्यापार में कम लाभ होता था।

    व्यापार का स्वरूप

    अँग्रेजों के आगमन के समय देश के विभिन्न भागों के बीच व्यापार की स्थिति अच्छी थी। एक स्थान पर उत्पन्न होने वाली सामग्री को देश के विभिन्न भागों एवं देश से बाहर भेजा जाता था। बंगाल, से खाद्य वस्तुएँ, चावल, चीनी तथा मक्खन का समुद्री व्यापार होता था। ये वस्तुएँ कोरोमंडल, केपकामरिन के क्षेत्र से होती हुई कराची तक जाती थीं। बंगाल से चीनी गुजरात को तथा गेहूं दक्षिण भारत को जाते थे। पटना को चावल और सिल्क के बदले में गेहूं, चीनी तथा अफीम प्राप्त होती थी। केरल अफीम का आयात करता था। सत्रहवीं सदी में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिये आगरा अत्यंत प्रसिद्ध केन्द्र था। यह बंगाल और बिहार से कच्ची सिल्क, चीनी, चावल, गेहूं तथा मक्खन आदि वस्तुओं का व्यापार करता था। आगरा, देश तथा विदेशों में उत्तम प्रकार के नीले रंग के लिये बहुत प्रसिद्ध था। इसके समीपवर्ती क्षेत्रों जैसे- हिन्दुआन, बयाना, पंचूना, बिसौर तथा खनवा में गेहॅूँ पैदा होता था। यहाँ से गेहूं भारत के विभिन्न बन्दरगाहों तथा विदशों को भेजा जाता था। व्यापार के अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र लाहौर तथा मुल्तान थे। वास्तव में काबुल, कन्धार तथा फारस से होने वाला समस्त स्थल व्यापार इन नगरों से होकर होता था। लाहौर अपनी दरियों के लिये प्रसिद्ध था जबकि मुल्तान चीनी, अफीम, सूती माल तथा गन्धक के लिये प्रसिद्ध था। मुल्तान में सर्वोत्तम ऊँट उपलब्ध होते थे। गुजरात प्राचीनकाल से वाणिज्य का बड़ा और महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। इसके प्राकृतिक संसाधनों तथा उद्योगों ने इसे बंगाल की तरह धनी प्रांत बना दिया था। यह कपड़े की बुनाई का केन्द्र था। यहाँ के कपड़े गुजरात के मुख्य बंदरगाह कैम्बे द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत के दूसरे भागों को भेजे जाते थे। नील, शोरा तथा वस्त्रों के बदले विदेशी व्यापारी पश्चिम से विविध प्रकार की प्रसाधन सामग्री लाते थे जिन्हें गुजरात, दिल्ली, आगरा, राजस्थान तथा मालवा के हुजूर में भेजा जाता था। केरल काली मिर्चों का निर्यात तथा अफीम का आयात करता था। केरल में गुजरात, मालवा और अजमेर से गेहूं तथा दक्षिण व मलाबार से चावल मँगाया जाता था।

    पुलीकट का छपा हुआ कपड़ा बहुत बढि़या होता था जो गुजरात तथा मलाबार तट को भेजा जाता था। सिन्ध से भारत के विभिन्न भागों में गेहॅूँ, जौ, सूती कपड़े तथा घोड़े भेजे जाते थे और बदले में चावल, चीनी, इमारती लकड़ी तथा मसाले मँगाये जाते थे। काश्मीर में गुजरात, रावलपिंडी तथा लद्दाख से नमक, बुरहानपुर से अच्छा चावल तथा देश के विभिन्न भागों से चौड़े वस्त्र, गेहूं, दवाएँ, चीनी, तांबा, लोहा, तांबा, पीतल के बर्तन, शीशे का सामान, सोना, चाँदी और विलास की सामग्री मंगाई जाती थी। काश्मीर से आगरा तथा अन्य स्थानों को शॉल, ऊन तथा शोरा निर्यात होता था। इस प्रकार भारत के लगभग समस्त नगरों एवं विभिन्न राज्यों की राजधानियों के बीच उपयोगी वस्तुओं का व्यापार प्रचुर मात्रा में होता था।

    विदेशी व्यापार

    भारत का विदेशी व्यापार अत्यंत प्राचीन काल से विश्व भर के देशों से होता आया था। अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भी लंका, बर्मा, चीन, जापान, पूर्वी द्वीप समूह, नेपाल, फारस, मध्य एशिया, अरब और लालसागर के बन्दरगाहों तथा पूर्वी अफ्रीका से बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। कैम्बे, सूरत, भड़ौंच, गोआ, कालीकट, कोचीन, मछलीपट्टम, सतगाँव, सोनारगाँव तथा चटगाँव उस युग के प्रसिद्ध बन्दरगाह थे। लाहौर, मुल्तान, लाहरी बन्दर (सिन्ध), कैम्बे, पटना, अहमदाबाद तथा आगरा में बड़े-बड़े बाजार थे जहाँ विदेशों से वस्तुएँ आती थीं और फिर देश के विभिन्न भागों को भेजी जाती थीं। भारतीय वाणिज्य पूरी दुनिया की आंखों में चौंध पैदा करता था। इसी से प्रेरित होकर रूस के शासक पीटर महान (1682-1725 ई.) ने एक बार कहा था- 'याद रखो कि भारत का वाणिज्य विश्व का वाणिज्य है और ........ जो उस पर पूरा अधिकार कर सकेगा, वही यूरोप का अधिनायक होगा।'

    समुद्री मार्ग द्वारा व्यापार

    भारत को पश्चिमी देशों से मिलाने वाले दो मुख्य समुद्री मार्ग थे- (1.) फारस की खाड़ी से होकर तथा (2.) लालसागर से होकर। लालसागर वाला मार्ग थोड़ा दुष्कर था, अतः नाविक तथा सौदागर फारस की खाड़ी वाले मार्ग को पसन्द करते थे। यह मार्ग ईराक में बगदाद से आरम्भ होकर चीन में केन्टन तक जाता था। मनूची (1653-1708 ई.) ने लिखा है- 'अरब तथा फारस के जहाज खजूर, फल, घोड़े, समुद्री मोती तथा रत्न भारत में लाते थे, बदले में गुड़, चीनी, मक्खन, जैतून के फल तथा नारियल ले जाते थे।' भारत से कपड़ों का निर्यात प्रमुख रूप से होता था जबकि बहुमूल्य धातुएं, विभिन्न प्रकार के बर्तन एवं विविध उपयोगी सामग्री में प्रयुक्त होने वाली धातुएं, सौन्दर्य एवं प्रसाधन सामग्री बड़े स्तर पर आयात की जाती थी। भारतीय माल कोरोमण्डल समुद्री तट के रास्ते से फारस ले जाया जाता था।

    भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपास से निर्मित कपड़ा एवं अन्य वस्तुएँ, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लंवग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें विशेषकर गेंडे तथा चीते की खाल, चन्दन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थी। विदेशों में भारतीय कपड़ों की अच्छी माँग थी। फारस तथा मिस्र आदि अरब देशों को उत्तम प्रकार की मलमल निर्यात होती थी। मोरलैण्ड के अनुसार 17वीं शताब्दी में रुई के सामान का वार्षिक निर्यात लगभग 8000 गाँठें था जिनमें से 4,700 गाँठें यूरोपीय देशों को जाती थीं। इसी शताब्दी के अन्त में भारतीय ताफता (सिल्क) तथा बूटेदार कपड़ा इंग्लैण्ड को निर्यात होने लगा था। लाख (गोंद) बंगाल तथा उड़ीसा में कई स्थानों पर बनाई जाती थी जिसका निर्यात डचों द्वारा फारस को किया जाता था। बर्मा, जावा, चीन, मलाया तथा अरब को समुद्री मार्ग से भारतीय अफीम एवं काली मिर्च का निर्यात होता था। फारस एवं उसके आगे के देशों को स्थल मार्ग से अफीम एवं वस्त्र आदि वस्तुओं का निर्यात होता था। भारत से दुनिया भर के देशों को चीनी, शोरा, लोहा, इस्पात, हींग, आँवला, दवाएँ, बहुमूल्य पत्थर तथा संगमरमर भी निर्यात किया जाता था। भारत में बहुमूल्य धातुओं का आयात किया जाता था।

    वान् ट्विस्ट (1638 ई.) ने लिखा है- 'भारत में सोने तथा चाँदी की खानें नहीं थीं, इसलिये विदेशों से ये दोनों धातुएँ आयात की जाती थीं तथा उनके निर्यात पर रोक थी। एक अँग्रेज यात्री विलियम हार्किज (1608-13 ई.) ने लिखा है- 'भारत में चाँदी प्रचुर मात्रा में है क्योंकि यहाँ समस्त देश सिक्के लाते हैं और उनके बदले में वाणिज्यिक वस्तुएँ ले जाते हैं। ये सिक्के भारत में ही रखे जाते हैं, बाहर नहीं जाते हैं।' चीन, जापान, मलक्का तथा अन्य समीपवर्ती देशों से सोना मंगवाया जाता था। पेगू (बर्मा) से मूँगा तथा मोती एवं फारस तथा अरब देशों से विभिन्न प्रकार के रत्न मंगवाये जाते थे। लिस्बन से पारा आयात किया जाता था।

    स्थल मार्ग द्वारा व्यापार

    भारत में मध्य एशिया और अफगानिस्तान से सूखे मेवे तथा ताजे फल, अम्बर हींग, खुरखुरे लाल पत्थर आदि का आयात होता था। नेपाल से पशु तथा सींग, कस्तूरी, सोहागा, चिरैता (औषधि की जड़ी-बूटी), मजीह (रंग), इलायची, चौरीस (तिब्बती गाय की पूंछ), महीन रोंये, बाज पक्षी तथा बालचर (एक सुगन्धित घास) मंगवाया जाता था। भूटान से कस्तूरी तथा तिब्बती गाय की पूंछ का आयात होता था। पुर्तगाली डाकुओं की गतिविधियों के कारण बर्मा के साथ व्यापार में कमी आ गई थी। घोड़े आयात की महत्त्वपूर्ण वस्तु थे। तुर्किस्तान में रहने वाले अजाक लोग भारत में बेचने के लिये बड़े स्तर पर घोड़े पालते थे। ये घोड़े 6,000 अथवा इससे बड़े झुण्ड में भारत को भेजे जाते थे।

    व्यापार संतुलन

    व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में था। समस्त देशों के व्यापारी, भारतीय बन्दरगाहों पर आते थे तथा विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुओं- छींट के कपड़े, मसाले, काली मिर्च, गेहूँ, घी, जड़ी-बूटियाँ और गोंद आदि के बदले में सोना, चांदी तथा रेशम देेते थे। इसलिये भारत को बहुमूल्य धातुओं का कुण्ड कहा जाता था। व्यापार संतुलन को भारत की बजाय, यूरोप के पक्ष में करने के लिये ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी निर्यात सूची को बढ़ाने का आदेश दिया। इंग्लैण्ड में भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे की इतनी अधिक माँग थी कि उससे इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी। इसलिये ब्रिटिश संसद ने विशेष कानून बनाकर 29 सितम्बर 1701 से फारस, चीन तथा पूर्वी हिन्द द्वीप समूह के चित्रित, छपे हुए एवं रंगे हुए लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा दी।

    वास्कोडिगामा के भारत आगमन के बाद लगभग एक शताब्दी (1500-1600 ई.) तक भारतीय विदेशी व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। पुलीकट, कासिम बाजार, पटना, बालोसर, नागपट्टम तथा कोचीन में पुर्तगालियों की मुख्य फैक्ट्रियाँ थीं। अरब देशों के व्यापारी जो भारत में आने वाले प्रमुख विदेशी व्यापारी थे, लगभग पूरी तरह हटा दिये गये। हॉलैण्ड वाले भी 1603 ई. में भाग लेने लगे थे। इससे यूरोपीय देशों के साथ भारतीय व्यापार में वृद्धि हुई। अंग्रजों ने 1608 ई. में पहली बार भारत के लिये व्यापारिक यात्रा की। वे अपने साथ पांच जहाजों में कपड़े, टीन, शीशे, चामू-कैंची की वस्तुएँ, पारा, शीशा तथा चमड़ा लेकर आये। उन्होंने भारत में अलग-अलग स्थानों पर गोदाम स्थापित किये जिन्हें अँग्रेज व्यापारी फैक्ट्रियाँ कहते थे तथा भारतीय व्यापारी कारखाना कहकर पुकारते थे। फ्रांस ने भी भारत में अपनी फैक्ट्रियाँ स्थाापित कीं। इन फैक्ट्रियों से मांग के अनुसार माल की आपूर्ति नहीं हो सकी इसलिये यूरोपीय व्यापारियों द्वारा भारत के मुख्य वाणिज्यिक केन्द्रों पर एजेन्ट नियुक्त किये गये। उनके माध्यम से देश के विभिन्न भागांे से व्यापार किया जाने लगा।

    उद्योगों की स्थिति

    भारत में अँग्रेजी शासन की स्थापना के पहले भारतीय कुटीर एवं लघु उद्योग उन्नत अवस्था में थे। सत्रहवीं और अठारवीं सदी के पूर्वार्द्ध में देश स्वदेशी उद्योगों के लिये बाहर के देशों में भी विख्यात था। भारतीय माल की विदेशों में बड़ी माँग थी। देश में दो तरह के उद्योग विकसित थे- ग्रामीण उद्योग तथा शहरी उद्योग। ग्रामीण उद्योग आम आदमी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शहरी उद्योगों द्वारा कला-कौशलपूर्ण वस्तुओं का निर्माण होता था। ये उद्योग विलासिता का सामान बनाने में अग्रणी थे। देश के कपास उत्पादक क्षेत्रों, दूरस्थ गाँवों और शहरों में कपड़ा तैयार किया जाता था। गांव-गांव और शहर-शहर में हाथकरघा पर मोटा कपड़ा यथा गाढ़ा एवं रेजी तैयार किये जाते थे। विभिन्न शिल्पों में लगे कारीगरों में से लगभग दो-तिहाई बुनकर थे। ग्रामीण उद्योगों की तुलना में नगरीय उद्योग अधिक संगठित थे और गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक अच्छा माल तैयार करते थे।

    कपड़ा उद्योग : भारतीय बुनकर नरम से नरम, महीन से महीन और मोटे से मोटा कपड़ा तैयार करने के लिये प्रसिद्ध थे। महीन कपड़े में मलमल सबसे विख्यात थी। इसके उत्पादन का मुख्य केन्द्र ढाका था। ढाका की मलमल विश्व भर में प्रसिद्ध थी। बीस गज लम्बे और एक गज चौड़े मलमल को एक अँगूठी में से निकाला जा सकता था। इस प्रकार की मलमल का थान तैयार करने में 6 माह लगते थे। आम उपयोग का कपड़ा गाँव-गाँव और शहर-शहर में बनाया जाता था परन्तु विशेष प्रकार का कपड़ा कुछ स्थानों पर ही तैयार होता था। इस प्रकार के केन्द्रों में ढाका, जहानाबाद (पटना के पास), बुलन्दशहर, सिकन्दराबाद, लखनऊ, बनारस, रायबरेली में जायस, फैजाबाद में पांडा, रामपुर, मुरादाबाद, कानपुर, प्रतापगढ़, शाहपुर, अलीपुर, मेरठ, आगरा, दिल्ली, रोहतक, ग्वालियर, चंदेरी, इन्दौर और दक्षिण भारत में आर्नी, हैदराबाद, रायचूर, सेलभ, तंजौर तथा मदुरा विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। इन केन्द्रों पर विभिन्न डिजाइनों और किस्मों का अच्छा कपड़ा तैयार होता था। देश में कताई-बुनाई रंगाई, छपाई, सोना एवं चाँदी के धागों का निर्माण भी बड़े स्तर पर होता था।

    रेशम वस्त्र उद्योग : भारत में बहुत कम रेशम पैदा होता था इसलिये रेशम का बाहर से आयात किया जाता था किंतु भारत में बना रेशम का कपड़ा पुनः बड़ी मात्रा में निर्यात किया जाता था। बनारस, आगरा, लाहौर, पाटियाला, अमृतसर, राजशाही, मुर्शीदाबाद, वीरभूमि, बर्दवान, बांकुड़ा और मिदनापुर रेशमी वस्त्र निर्माण के प्रसिद्ध केन्द्र थे। बनारस और आगरा वस्त्रों पर कढ़ाई के लिये तथा सबसे बढि़या रेशमी वस्त्र के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध थे। ऊनी वस्त्र उद्योग भी उन्नत अवस्था में था। पंजाब और राजस्थान में मोटे ऊनी कम्बल, गलीचे, रस्से आदि बनते थे। लाहौर, लुधियाना और अमृतसर में अनेक प्रकार की ऊनी वस्तुएँ- कम्बल, शॉल, कोट, मोजे, दस्ताने और सर्दियों में काम आने वाले अन्य कपड़े बनते थे। जयपुर, बीकानेर और जोधपुर के ऊनी कपड़े प्रसिद्ध थे।

    लौह उद्योग : भारत का लौह उद्योग काफी उन्नत था। भारत के लुहार लोहे की गलाई और ढलाई के कार्य में निपुण थे। स्थान-स्थान पर शस्त्र निर्माण, तोप निर्माण, जहाज निर्माण एवं कृषि उपकरण निर्माण के उद्योग थे। भारत में लोहे से बनी सामग्री लंदन तक जाती थी। महाराष्ट्र, आंध्र और बंगाल में जहाज निर्माण उद्योग विकसित हुआ। यूरोपीय कम्पनियाँ अपने उपयोग के लिये भारत में बने जहाज खरीदती थी। एक अंग्रेजी पर्यवेक्षक ने लिखा है- 'जहाज निर्माण में भारतीयों ने अँग्रेजों से जितना सीखा, उससे अधिक उन्हें पढ़ाया।' मिट्टी के बर्तन एवं मूर्तियाँ: भारत में मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और खिलौने बनाने का उद्योग भी विकसित था। बंगाल में खुलना, दिनाजपुर, रानीगंज; उत्तर प्रदेश में लखनऊ, रामपुर और अलीगढ़, दक्षिण में मद्रास, मदुरा और सेलम के कुम्हार विशेष किस्म के कलात्मक और मिट्टी के पक्के बर्तन बनाने में दक्ष थे।

    विविध उद्योग : लगभग पूरे देश में भवन-निर्माण, पत्थर और लकड़ी की नक्काशी, ईंट और चूना बनाने, कागज बनाने, सोना-चाँदी तथा जवाहरात के आभूषण बनाने, चीनी, नमक एवं नील बनाने, तांबा, पीतल, काँसा आदि की वस्तुएँ एवं बर्तन बनाने के उद्योग विकसित अवस्था में थे। विभिन्न प्रकार के बीजों से तेल निकालने का काम बड़े स्तर पर होता था। बाँस और चमड़ा उद्योग भी लोकप्रिय था। बाँस से विभिन्न वस्तुएँ बनाने का काम कुछ जातियों का वंशानुगत व्यवसाय था।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय, नौ सौ साल से चल ही विदेशी आक्रांताओं की लूट के उपरांत भी, बादशाहों, अमीरों, राजाओं तथा जागीरदारों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी तथा उनके महलों में विलासिता के समस्त साधन उपलब्ध थे। देश में नहरों, कुओं तथा तालाबों की कमी के बावजूद वर्षा की मात्रा अच्छी होने से देश के अधिकांश भागों में खेती की जाती थी। घर-घर में कुटीर उद्योग विकसित थे जिनमें विपुल मात्रा में विविध प्रकार की सामग्री तैयार की जाती थी। विदेशी व्यापार उन्नत होने से शासकों को कर के रूप में अच्छी आय होती थी। आंतरिक एवं विदेशी व्यापार बहुत होता था। विदेशी व्यापार भारत के पक्ष में था। भारत के कुटीर उद्योग देश-वासियों की आवश्यकताओं को पूरी करने के साथ-साथ विदेशों को निर्यात किये जाने के लिये भी माल तैयार करते थे। सूती, ऊनी, रेशमी वस्त्र, शाल-दुशालें, चन्दन की वस्तुएँ, कागज, जूते, बक्से, चमड़ा, चीनी, नील, रंग, लकड़ी की वस्तुएँ, सोना-चाँदी के आभूषण, विलासिता की वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं। इतना होने पर भी देश में जन साधारण की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। किसान हाड़तोड़ परिश्रम करके खेती करते थे। छोटे कारीगर हाथ से सामग्री का उत्पादन करते थे। इस उत्पादन के लाभ का अधिक हिस्सा कर के रूप में शासक और मुनाफे के रूप में बड़े व्यापारी लूट लेते थे। भू-राजस्व कर के साथ-साथ चुंगी एवं स्थानीय करों की अधिकता थी। इस कारण बादशाह, सूबेदार, राजा एवं जागीरदारों के पास काफी धन एकत्र हो जाता था किंतु जन साधारण अभावों एवं कष्टों से बिलबिला रहा था। पूरा परिवार हर समय किसी न किसी काम में लगा रहता था फिर भी दो समय की रोटी का प्रबंध करना कठिन था।

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  • बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

     21.08.2017
    बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय - 4

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना तथा भारत में प्रवेश

    1600 ई. में ब्रिटेन के कुछ व्यापारियों ने पूर्वी देशों में व्यापार करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी स्थापित की। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) इस कम्पनी की हिस्सेदार थी। इस कम्पनी को अपने जहाजों तथा माल की सुरक्षा के लिए सैन्य बल रखना पड़ता था। कम्पनी को भारत में प्रवेश करते ही पुर्तगालियों से टक्कर लेनी पड़ी। पुर्तगालियों को परास्त करने के बाद उन्हें भारत के पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी बस्तियाँ स्थापित करने की अनुमति मिली। इन बस्तियों की रक्षा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को स्वयं करनी पड़ती थी। इस कार्य के लिए कम्पनी को सैनिकों की संख्या में निरंतर वृद्धि करनी पड़ती थी। इस प्रकार, कम्पनी की सेना का विस्तार होता चला गया। यद्यपि कम्पनी ने सर्वप्रथम सूरत को केन्द्र बनाकर व्यापार आरम्भ किया किन्तु उसे प्रादेशिक लाभ सर्वप्रथम दक्षिण भारत में प्राप्त हुआ, जब 1639 ई. में वाण्डिवाश के हिन्दू राजा ने कम्पनी को मद्रास का क्षेत्र प्रदान किया तथा कम्पनी को एक दुर्ग बनवाने की अनुमति दी। कम्पनी ने यहाँ सेण्ट जॉर्ज फोर्ट नामक प्रसिद्ध दुर्ग बनवाया। 1669 ई. में कम्पनी को बम्बई का क्षेत्र भी मिल गया।

    बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियाँ

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल में अपनी पहली व्यापारिक बस्ती हुगली में 1651 ई. में स्थापित की। उन दिनों मुगल बादशाह शाहजहाँ का पुत्र शाहशुजा बंगाल का सूबेदार था। उसने एक फरमान जारी करके कम्पनी को बंगाल सूबे में व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया और कम्पनी द्वारा निर्यात किये जाने वाले माल को चुँगी-कर से मुक्त रखने की सुविधा भी प्रदान की। अँग्रेजों ने हुगली के साथ ही कासिम बाजार तथा पटना में भी अपनी व्यापारिक कोठियां स्थापित कीं। 1691 ई. में प्रति वर्ष 3000 रुपये देने की शर्त पर कम्पनी को बंगाल में सीमा शुल्क देने से मुक्त कर दिया गया। 1693 ई. में कम्पनी को मद्रास के पास तीन गाँवों की जमींदारी मिली। 1698 ई. में कम्पनी को 12,000 रुपये वार्षिक भुगतान के बदले, बंगाल में तीन गाँवों- सूतानुती, गोविन्दपुर और कौलिकत्ता की जमींदारी मिल गई। इनकी सुरक्षा के लिए कम्पनी ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम नामक दुर्ग बनवाया। द्वितीय कर्नाटक युद्ध के समय कम्पनी को तंजौर के राजा से देवीकोटाई और उसके निकट का भूभाग प्राप्त हुआ जिसकी वार्षिक आय 30,000 रुपये थी। इस प्रकार कम्पनी बड़े भू-भाग की जमींदार बन गई।

    अठारहवीं शताब्दी में बंगाल की स्थिति

    औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा मुगल सल्तनत के तीन पृथक् सूबे थे। 1705 ई. में औरंगजेब ने मुर्शीदकुली जफरखाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया। कुछ समय बाद उड़ीसा का सूबा भी उसे दे दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजनैतिक अस्थिरता के काल में मुर्शीदकुली जफरखाँ एक स्वतन्त्र शासक की भाँति शासन करने लगा। 1727 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दौलाखाँ बंगाल का सूबेदार बना। उसने बिहार के सूबे को भी बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले लिया। इस प्रकार पूर्वी भारत के तीनों समृद्ध सूबे उसके अधीन हो गये। 1739 ई. में शुजाउद्दौला की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सरफराजखाँ उसका उत्तराधिकारी बना। वह निर्बल, अयोग्य और विलासी था। उस समय अलीवर्दीखाँ बिहार का नायब सूबेदार था। अपै्रल 1740 में अलीवर्दीखाँ ने अपने स्वामी सरफराजखाँ पर आक्रमण कर दिया। सरफराजखाँ युद्ध में परास्त हुआ तथा मारा गया। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला (1719-48 ई.) अलीवर्दीखाँ के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही करने में असमर्थ था इसलिये उसने अलीवर्दीखाँ को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का सूबेदार मान लिया।

    चुंगी को लेकर बंगाल के सूबेदारों से विवाद

    1717 ई. में मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने एक फरमान द्वारा कम्पनी के सामान पर लगने वाली चुँगी-कर या सीमा-शुल्क माफ कर दिया। इससे कम्पनी को बहुत मुनाफा हुआ। ज्यों-ज्यों मुगलों की सत्ता कमजोर होती गई, बंगाल के सूबेदार, शासन के सम्बन्ध में स्वतंत्र होते गये। वे चाहते थे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी, बंगाल सूबे में व्यापार करने के लिये बंगाल के सूबेदार से अनुमति प्राप्त करे। इस प्रकार बंगाल के सूबेदार और ईस्ट इण्डिया कम्पनी में मतभेद उत्पन्न हो गये जो समय के साथ बढ़ते ही गये। आगे चलकर दोनों के मध्य जो युद्ध लड़े गये, उनका मूल कारण व्यापार पर चुंगी का विषय ही था। कलकत्ता के आस-पास का क्षेत्र जो कम्पनी को जमींदारी के रूप में मिला था, उस पर भी दोनों पक्षों में विवाद था। बंगाल के सूबेदार का मानना था कि उसके सूबे के समस्त जमींदारी क्षेत्रों पर उसका नियन्त्रण है परन्तु कम्पनी का मानना था कि जमींदारी क्षेत्र में उसे स्वायत्तता प्राप्त है तथा बंगाल के सूबेदार को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

    अलीवर्दीखाँ का शासन

    अलीवर्दीखाँ, सैद्धांतिक रूप से मुगल बादशाह की ओर से बंगाल का सूबेदार था किंतु व्यावहारिक रूप में वह एक स्वतंत्र शासक था। उसने 1740 ई. से 1756 ई. तक बंगाल पर शासन किया। उसके समय में मराठों ने निरन्तर आक्रमण करके बंगाल के आर्थिक जीवन को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया। अतः 1751 ई. में उसे मराठों से समझौता करके उन्हें उड़ीसा का अधिकांश भाग तथा प्रतिवर्ष 12 लाख रुपया चौथ के रूप में देना स्वीकार करना पड़ा। मराठों की तरफ से निश्चिंत होने के बाद अलीवर्दीखाँ ने शासन व्यवस्था की तरफ ध्यान दिया। उसे बंगाल का सूबेदार बनने में बंगाल के हिन्दू व्यापारियों से महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला था। अतः उसने हिन्दुओं को महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। राय दुर्लभ, जगत सेठ बन्धु मेहताब राय और स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा माणिकचन्द्र आदि हिन्दू व्यापारियों का उसके शासन में भारी सम्मान बना रहा।

    उस समय बंगाल का अधिकांश व्यापार हिन्दू व्यापारियों के हाथों में था। यूरोपीय व्यापारियों से सम्पर्क होने के बाद हिन्दू व्यापारियों का कारोबार और अधिक बढ़ गया और वे बहुत समृद्ध हो गये। बंगाल से कृषि उपज, सूती वस्त्र तथा रेशम का भारी मात्रा मंे निर्यात होता था। बढ़ते हुए व्यापार तथा लाभ ने बंगाल के हिन्दू व्यापारियों को अँग्रेज व्यापारियों का मित्र बना दिया। यही कारण है कि जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य संघर्ष हुआ तो बंगाल के हिन्दू व्यापारियों ने कम्पनी के साथ सहानुभूति रखी तथा उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    अलीवर्दीखाँ और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सम्बन्ध कभी मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। कम्पनी की शिकायत थी कि उसे 1717 ई. के शाही फरमान के अनुसार व्यापारिक सुविधायें नहीं दी जा रही हैं। इसके विपरीत नवाब का मत था कि कम्पनी को जो सुविधाएँ दी गई हैं, वह उनका दुरुपयोग कर रही है। इस कारण बंगाल के सरकारी कोष को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। अतः कम्पनी को चाहिए कि वह अपने मुनाफे का कुछ अंश सीमा शुल्क के रूप में सरकार को दे। कम्पनी इसके लिए तैयार नहीं थी। विवाद का दूसरा कारण कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षायें भी थीं।

    कर्नाटक के युद्धों में मिली सफलता से कम्पनी का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इस कारण कम्पनी, बंगाल में भी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में जुट गई। दूसरी तरफ अलीवर्दीखाँ को आभास हो गया कि दोनों यूरोपीय कम्पनियों (अंग्रेजों और फ्रांसीसियों) में कभी भी संघर्ष छिड़ सकता है जिससे बंगाल की शान्ति भंग हो सकती है। अतः नवाब ने आरम्भ से ही दोनों कम्पनियों को अपनी बस्तियों की किलेबन्दी करने तथा अस्त्र-शस्त्रों को जमा करने की अनुमति नहीं दी। उसका कहना था कि व्यापारी को सामरिक तैयारी में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। अलीवर्दीखाँ के सुझाव के उपरान्त भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक सेना गठित कर ली। इसका मुख्य ध्येय मराठों की लूटमार से अपनी बस्ती की रक्षा करना था। अपनी बस्ती के अलावा अँग्रेजों ने आसपास के कुछ अन्य क्षेत्रों को भी मराठों की लूटमार से बचाया तथा मराठों द्वारा लूटे गये क्षेत्रों के लोगों को थोड़ी-बहुत आर्थिक सहायता भी दी। इसका परिणाम बहुत अच्छा निकला। अँग्रेजों ने स्थानीय लोगों की सहानुभूति प्राप्त कर ली, जो आगे चलकर उनके काम आई। 1756 ई. में यूरोप में आरम्भ हुए सप्तवर्षीय युद्ध के कारण दक्षिण भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा फ्रैंच इण्डिया कम्पनी में संघर्ष आरम्भ हो गया परन्तु अलीवर्दीखाँ ने दोनों कम्पनियों पर कठोर नियंत्रण रखा और उन्हें आपस में लड़ने नहीं दिया।

    कम्पनी के व्यापार में अभूतपूर्व

    वृद्धि यद्यपि अलीवर्दीखाँ के शासन में कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो सकी किंतु कम्पनी का कारोबार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा। भारत से इंग्लैण्ड में कम्पनी का आयात 1708 ई. में 5 लाख पौण्ड मूल्य का था जो 1740 ई. में बढ़कर 17.95 लाख पौण्ड मूल्य का हो गया। यह वृद्धि तो तब हुई जबकि इंग्लैण्ड की संसद ने अँग्रेजी कपड़ा उद्योग के संरक्षण करने तथा इंग्लैण्ड से भारत को चांदी का निर्यात रोकने के लिये, 29 सितम्बर 1701 को एक विशेष कानून बनाकर भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा रखी थी।

    सिराजुद्दौला का अँग्रेजों से संघर्ष

    अलीवर्दीखाँ के कोई पुत्र नहीं था। केवल तीन पुत्रियाँ थीं जिन्हें उसने अपने तीन भतीजों से ब्याह दिया था। अलीवर्दीखाँ ने अपने दामादों को पूर्णिमा, ढाका तथा पटना का सूबेदार नियुक्त किया। इन तीनों दामादों का निधन अलीवर्दीखाँ के जीवनकाल में ही हो गया। इसलिये अलीवर्दीखाँ ने अपनी सबसे छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु इस निर्णय से सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंद्वी भड़क गये।

    अलीवर्दीखाँ की सबसे बड़ी पुत्री घसीटी बेगम सिराजुद्दौला के मृत बड़े भाई के अल्पवयस्क पुत्र मुराउद्दौला को गोद लेकर उसे बंगाल का नवाब बनाने का प्रयत्न करने लगी। घसीटी बेगम का दीवान राजवल्लभ चतुर राजनीतिज्ञ था, वह घसीटी बेगम का मार्गदर्शन कर रहा था। अलीवर्दीखाँ की दूसरी पुत्री का पुत्र शौकतजंग जो पूर्णिया का गवर्नर था, स्वयं को बंगाल की नवाबी का सही उत्तराधिकारी समझता था। अलीवर्दीखाँ का बहनोई और प्रधान सेनापति मीर जाफर भी नवाब बनने का इच्छुक था। ये सब लोग एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।

    10 अपै्रल 1756 को 82 वर्ष की अवस्था में अलीवर्दीखाँ की मृत्यु हो गई। इसके बाद सिराजुद्दौला बिना किसी बाधा के तख्त पर बैठ गया। उसने अपनी बड़ी मौसी घसीटी बेगम को छल से बन्दी बना लिया तथा शौकतजंग के विरुद्ध भी सैनिक कार्यवाही करके उसे अपने अधीन कर लिया। सिराजुद्दौला गुस्सैल स्वभाव का युवक था। उसने तख्त पर बैठते ही कम्पनी को आदेश दिया कि वे उसी प्रकार व्यापार करें जिस तरह वे मुर्शीदकुली खाँ के समय में करते थे। कम्पनी के अधिकारियों ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस समय तक वे फ्रांसीसियों पर निर्णायक विजय प्राप्त कर चुके थे और नवाब को सबक सिखाने की युक्ति कर रहे थे। इन सब कारणों से दो माह से भी कम समय में सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच झगड़ा हो गया।

    सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच झगड़े के कारण

    (1.) प्रतिद्वंद्वियों की महत्त्वाकांक्षाएं: अँग्रेजों और सिराजुद्दौला के मध्य संघर्ष होने के कई कारण थे। एक ओर सिराजुद्दौला अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिये सख्त कदम उठा रहा था तो दूसरी ओर उसकी मौसी घसीटी बेगम का दत्तक पुत्र मुराउद्दौला, अलीवर्दीखाँ की दूसरी पुत्री का पुत्र शौकतजंग तथा अलीवर्दीखाँ का बहनोई मीर जाफर भी नवाब बनने के लिये षड्यंत्र कर रहे थे।

    (2.) अँग्रेजों का षड्यंत्र: ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी इस नीति पर चल रहे थे कि जब किसी राज्य में उत्तराधिकार का झगड़ा हो तो किसी न किसी दावेदार की सहायता करके अपने पक्ष के व्यक्ति को तख्त पर बैठाया जाये तथा राज्य में अपना प्रभाव बढ़ाया जाये ताकि व्यापार के लिये अधिक से अधिक सुविधायें प्राप्त करके अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके। इसलिये वे सिराजुद्दौला के विरोधियों की सहायता तथा नवाब के आदेशों की अवज्ञा करने लगे। जब सिराजुद्दौला को इस बात का अनुभव हुआ तो उसने अँग्रेजों के प्रभाव को कम करने का निर्णय लिया।

    (3.) अँग्रेजों के प्रति संदेह: अँग्रेजों का मानना था कि सिराजुद्दौैला आरम्भ से ही अँग्रेजों को सन्देह की दृष्टि से देखता था किंतु अँग्रेज इतिहासकारों का यह दावा सही नहीं है। तत्कालीन साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में सिराजुद्दौला अंग्रेजों से सहानुभूति रखता था। 1752 ई. में जब कम्पनी का अध्यक्ष हुगली आया था, तब सिराजुद्दौला ने उसका स्वागत किया था। हॉलवेल के अनुसार अलीवर्दीखाँ ने मरने से पूर्व सिराजुद्दौला को अँग्रेजों पर कड़ी दृष्टि रखने की चेतावनी दी थी, क्योंकि उसे आशंका थी कि कर्नाटक जैसा षड्यंत्र बंगाल में भी दोहराया जा सकता है। अतः नवाब बनने के बाद शिराजुद्दौला के रुख में अंतर आ गया और वह अँग्रेजों की कार्यवाहियों को नियन्त्रित करने का प्रयास करने लगा।

    (4.) नवाब के प्रति अँग्रेजों की अशिष्टता: जब सिराजुद्दौला तख्त पर बैठा तब अँग्रेज अधिकारी जान-बूझकर उसके दरबार से अनुपस्थित रहे और उन्होंने सिराजुद्दौला को भेंट भी नहीं दी। इस प्रकार उन्होंने नवाब की अवहेलना कर उसके प्रति अशिष्टता का प्रदर्शन किया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही जब सिराजुद्दौला ने अँग्रेजों की कासिम बाजार फैक्ट्री देखने की इच्छा व्यक्त की तो अँग्रेजों ने उसे फैक्ट्री दिखाने से मना कर दिया। जब नवाब ने उनके व्यापार के बारे में जानकारी चाही तो अँग्रेजों ने उसे जानकारी देने से भी मना कर दिया। इस प्रकार अँग्रेजों द्वारा जानबूझ कर बार-बार अवज्ञा किये जाने से सिराजुद्दौला उनसे नाराज हो गया।

    (5.) व्यापारिक झगड़ा: मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने 1717 ई. में शाही फरमान द्वारा अँग्रेजों को बंगाल में चुँगी दिये बिना व्यापार करने की सुविधा दी थी। इसके आधार पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपना व्यापार तो फैला रही थी किंतु बंगाल के नवाब को चुंगी नहीं देती थी। कम्पनी इस सुविधा का दुरुपयोग करने लगी। वह भारतीय व्यापारियों से कुछ-ले-देकर उनके माल को भी अपना बताकर चुँगी बचा लेती थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अध्यक्ष अपने हस्ताक्षरों से बंगाल में कम्पनी के माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने का अनुज्ञा पत्र जारी करता था। इसे दस्तक कहा जाता था। दस्तक वाले सामान पर चुँगी-कर वसूल नहीं किया जाता था। कम्पनी के कई कर्मचारी निजी व्यापार करते थे और अपने व्यापारिक सामान को भी कम्पनी का बताकर चुँगी बचाते थे। इससे नवाब को आर्थिक हानि होती थी। इस स्थिति से उबरने के लिये सिराजुद्दौला कम्पनी के साथ कोई नया समझौता करना चाहता था। अँग्रेज इस विशेषाधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं थे। अतः दोनों पक्षों में युद्ध होना अनिवार्य हो गया। वस्तुतः दोनों के मध्य संघर्ष का मूल कारण यही था।

    (6.) कलकत्ता में आने वाले माल पर अँग्रेजों द्वारा चुंगी लगाना: कलकत्ता अँग्रेजों के अधिकार में था। अँग्रेज एक ओर तो नवाब को किसी प्रकार का कर नहीं चुका रहे थे तथा दूसरी ओर उन्होंने कलकत्ता के बाजार में स्थानीय व्यापारियों द्वारा लाये जाने वाले माल पर भारी कर एवं चुंगी लगा दिये।

    (7.) नवाब के शत्रुओं को संरक्षण देना: अँग्रेजों की बस्ती कलकत्ता के नाम से विख्यात थी। कलकत्ता, नवाब के शत्रुओं तथा विद्रोहियों के लिए आश्रय स्थल बनी हुई थी। जब नवाब ने घसीटी बेगम को बन्दी बनाया तो दीवान राजवल्लभ ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति अपने लड़के कृष्णवल्लभ के साथ कलकत्ता भिजवा दी। उसने घसीटी बेगम की सम्पत्ति को भी छिपाने का प्रयास किया। इस पर नवाब ने उसे दीवान पद से हटा दिया और कलकत्ता के अँग्रेज अधिकारियों से कहा कि वे कृष्णवल्लभ, नवाब को सौंप दें। कम्पनी के अधिकारियों ने नवाब की इस मांग को ठुकरा दिया। इससे सिराजुद्दौला और भी अधिक नाराज हो गया।

    (8.) कलकत्ता की किलेबन्दी: सिराजुद्दौला के नवाब बनते ही यूरोप में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ने से भारत में स्थित दोनों कम्पनियों में भी युद्ध होने की आशंका उत्पन्न हो गई। इसलिये दोनों कम्पनियों ने बंगाल में अपने-अपने स्थानों की किलेबन्दी करना और सैनिकों की संख्या बढ़ाना आरम्भ कर दिया। नवाब ने दोनों कम्पनियों को आदेश दिये कि वे अपने स्थानों की किलेबन्दी का काम बन्द कर दें। फ्रांसीसियों ने नवाब के आदेश को मान लिया परन्तु अँग्रेजों ने आदेश की पालना नहीं की। वे उस समय कलकत्ता के चारों तरफ एक खाई खुदवा रहे थे। जब नवाब के अधिकारियों ने उन्हें खाई को भर देने के लिए कहा तो एक अँग्रेज अधिकारी ने उन्हें जवाब दिया- 'यह खाई अवश्य भर दी जायेगी परन्तु मुसलमानों के सिरों से।' जब सिराजुद्दौला को यह सूचना दी गई तो उसने अँग्रेजों को सबक सिखाने का निर्णय किया।

    (9.) जमींदारी की गलत व्याख्या: कम्पनी को कलकत्ता बस्ती के आसपास के क्षेत्र की जमींदारी दी गई थी। नवाब का मानना था कि जमींदार उसका प्रतिनिधि मात्र है और उसका काम नवाब की तरफ से जमींदारी क्षेत्र से राजस्व वसूल करना तथा शान्ति बनाये रखना है। उस क्षेत्र पर नवाब का राजनीतिक प्रभुत्व सर्वोपरि है तथा कम्पनी नवाब के आदेशों का पालन करने के लिये बाध्य है परन्तु कम्पनी का मानना था कि उसे अपने क्षेत्र में पूर्ण राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त है, नवाब को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। नवाब अँग्रेज अधिकारियों की दलीलों को मानने के लिये तैयार नहीं था। उसने अपने अधिकारियों को कम्पनी के अधिकारियों से वार्त्ता करने भेजा परन्तु अँग्रेज अधिकारियों ने नवाब के शान्ति-प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। ऐसी स्थिति में सिराजुद्दौला के समक्ष, कम्पनी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा। इतिहासकार हिल ने लिखा है- 'जिन कारणों से नवाब ने अँग्रेजों पर आक्रमण किया उनमें तर्क अवश्य था।'

    नवाब द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही

    कासिम बाजार फैक्ट्री पर अधिकार: 4 जून 1756 को सिराजुद्दौला ने मुर्शिदाबाद के निकट अँग्रेजों की कासिम बाजार फैक्ट्री पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। फैक्ट्री के अँग्रेज अधिकारी वाट्सन ने आत्मसमर्पण कर दिया।

    फोर्ट विलियम पर अधिकार: 5 जून 1756 को नवाब ने 50,000 सैनिकों के साथ कलकत्ता पर धावा बोला। उस समय कलकत्ता में अँग्रेजों के पास केवल 500 सैनिक थे। 15 जून को नवाब की सेना ने फोर्ट विलियम को घेर लिया। पराजय निश्चित जानकर गवर्नर ड्रेक और अँग्रेज अधिकारी अपने परिवारों को लेकर जहाज पर सवार होकर हुगली नदी में स्थित फुल्टा टापू पर चले गये। किले की रक्षा का भार हॉलवेल के नेतृत्व में थोड़े से सैनिकों को सौंप दिया गया। दो दिन बाद हॉलवेल ने समर्पण कर दिया। 20 जून को फोर्ट विलियम तथा कलकत्ता पर नवाब का अधिकार हो गया। बाद में वाट्सन ने स्वीकार किया कि- 'नवाब के शान्ति प्रस्ताव पर्याप्त थे। उन्हें ठुकराकर तथा कासिम बाजार की घटना से कोई सबक न लेकर गवर्नर ड्रेक ने स्वयं खतरा मोल लिया था।'

    कालकोठरी (ब्लैक होल) की घटना: 20 जून को फोर्ट विलियम का पतन हो गया। दुर्ग में उपस्थित अँग्रेजों को बन्दी बना लिया गया। कहा जाता है कि नवाब के किसी अधिकारी ने अँग्रेजों को रात्रि में 18 फुट लम्बी और 15 फुट चौड़ी एक कोठरी में बंद कर दिया। जब प्रातःकाल में कोठरी का दरवाजा खोला गया तो कई बन्दी मर चुके थे। इतिहास में यह दुर्घटना काल कोठरी अथवा ब्लैक होल के नाम से विख्यात है। इस दुर्घटना का विवरण हॉलवेल द्वारा लिखे गये एक पत्र से मिला है। हॉलवेल के अनुसार जून मास की भयंकर गर्मी में नवाब के आदेश से 146 अँग्रेज बन्दियों को काल कोठरी में बंद किया गया। सुबह तक 123 व्यक्ति मर गये, केवल 23 व्यक्ति ही जीवित रह पाये जिनमें से हॉलवेल भी एक था। ब्लैक होल की घटना पर इतिहासकारों में गम्भीर विवाद है। कुछ फ्रांसीसी एवं आर्मीनियन दस्तावेजों में भी इस घटना का उल्लेख मिलता है परन्तु मरने वालों की संख्या एक जैसी नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि अँग्रेजों ने इस घटना को काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया है। उनका एकमात्र उद्देश्य सिराजुद्दौला को क्रूर शासक सिद्ध करना था ताकि भारत में स्थित अँग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त की जा सके और उन्हें नवाब के विरुद्ध उकसाया जा सके। हॉलवेल ने अवश्य ही इस कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा होगा।

    डॉ. भोलानाथ और डॉ. ब्रिजेन गुप्ता ने इस दुर्घटना को सही माना है। अधिकांश इतिहाकारों की मान्यता है कि यदि यह स्वीकार कर लें कि इस प्रकार की घटना हुई थी तो भी इसके लिए सिराजुद्दौला को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग ब्लैकहोल की घटना की सत्यता में विश्वास नहीं करते उनके तर्क इस प्रकार से हैं-

    (1.) तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रन्थों, शेर-ए-मुतेखरीन और रायस-उस-सलातीन आदि में इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता।

    (2.) तत्कालीन अँग्रेजी पुस्तकों, मद्रास कौंसिल के दस्तावेजों, कम्पनी के डायरेक्टरों को क्लाइव तथा वाट्सन द्वारा लिखे गये पत्रों आदि में भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।

    (3.) फुल्टा टापू पर जाने वाले अँग्रेजों द्वारा लिखी गई प्रोसीडिंग्स में भी इस घटना का उल्लेख नहीं है।

    (4.) इतिहासकार जे. एच. लिटल के अनुसार जिन अँग्रेजों का कालकोठरी की घटना में मारा जाना बताया गया है, वे तूफान में मरे थे।

    (5.) 18 फुट लम्बी और 15 फुट चौड़ी कोठरी में 146 व्यक्तियों को किसी भी प्रकार से नहीं ठूँसा जा सकता।

    (6.) हॉलवेल ने जो सूची दी है, उतने आदमी फोर्ट विलियम में मौजूद ही नहीं थे। हॉलवेल अत्यन्त ही झूठा व्यक्ति था। इसकी पुष्टि स्वयं क्लाइव एवं वाट्सन के कथनों से होती है।

    (7.) हॉलवेल ने बाद में इसी प्रकार का आरोप मीर जाफर पर भी लगाया था कि उसने एक रात में असंख्य अँग्रेजों को मरवा डाला। हॉलवेल ने मृत व्यक्तियों की सूची भी दी परन्तु बाद में क्लाइव और वाट्सन ने लिखा है कि हॉलवेल का आरोप असत्य था और उसकी सूची के अधिकांश व्यक्ति अभी तक जीवित हैं।

    (8.) 1757 ई. में अँग्रेजों ने जब नवाब सिराजुद्दौला के साथ सन्धि की तो उन्होंने कई बातों की क्षतिपूर्ति के लिए नवाब से धन की माँग की थी। यदि कालकोठरी की घटना घटित हुई होती तो अँग्रेज मृत लोगों का मुआवजा अवश्य माँगते। चूंकि इस प्रकार का मुआवजा नहीं माँगा गया। अतः इस बात की संभावना अधिक है कि इस प्रकार की कोई दुर्घटना घटित नहीं हुई।



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  • आंग्ल मराठा युद्ध और मराठों का पतन

     07.09.2018
    आंग्ल मराठा युद्ध और मराठों का पतन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय - 5

    छत्रपति शिवाजी (1646-1680 ई.) ने मराठा शक्ति को संगठित करने का काम किया। औरंगजेब जैसा शक्तिशाली मुगल बादशाह भी मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। छत्रपति शाहू के शासन काल में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। इससे मराठा संगठन अपनी उन्नति के चरम पर पहुँच गया। इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिये ई.1761 में मराठों को अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली से टक्कर लेनी पड़ी। पानीपत के मैदान में दोनों शक्तियों में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें मराठों की निर्णायक पराजय हुई। सर जादुनाथ सरकार ने लिखा है- 'पानीपत का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था। मराठा सेना की मुकुट मणि वहीं गिर गई।'

    इस युद्ध के बाद अहमदशाह अब्दाली वापस अफगानिस्तान लौट गया। इस कारण वह पानीपत की जीत का राजनीतिक लाभ नहीं उठा सका। मेजर इवान्स बेल ने लिखा है- 'यद्यपि इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई तथापि विजयी अफगान वापस चले गये और उन्होंने फिर कभी भारत के मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया।'

    निःसंदेह मराठों ने उल्लेखनीय क्षति उठायी किंतु उन्होंने बहुत कम समय में इस क्षति को पूरा कर लिया। मराठा इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई का मत है- 'इसमें संदेह नहीं कि जहाँ तक जनशक्ति का सम्बन्ध है, उन्हें (मराठों को) इस युद्ध से भारी क्षति पहुँची; पर इसके अतिरिक्त मराठों के भाग्य पर इस विपत्ति का वस्तुतः कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नई पीढ़ी के लोग शीघ्र ही पानीपत में होने वाली क्षति की पूर्ति करने के लिए उठ खड़े हुए।'

    पेशवा माधवराव (प्रथम) (1761-1772 ई.) ने मराठों में पुनः उत्साह एवं अनुशासन स्थापित किया। उसने शीघ्र ही पानीपत की पराजय का दाग धो दिया। उसके नेतृत्व में मराठा पुनः उतने ही शक्तिशाली बन गये जितने पानीपत के युद्ध से पूर्व थे किन्तु 18 नवम्बर 1772 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। मराठों के लिए उसकी मुत्यु पानीपत से भी अधिक घातक सिद्ध हुई। पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई और मराठा दरबार षड्यन्त्रों का अड्डा बन गया। मराठा सरदार स्वतंत्र आचरण करने लगे और उनमें भारी फूट पड़ गई। अँग्रेजों ने मराठों की फूट से लाभ उठाने का निर्णय लिया। 1772 ई. में भारत के राजनीतिक रंगमंच पर केवल दो शक्तियाँ- मराठा और ईस्ट इण्डिया कम्पनी, सर्वोच्चता प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील थीं। अतः इन दोनों शक्तियों में संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।

    रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 ई.

    1773 ई. में ब्रिटिश संसद ने रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित किया जिसके माध्यम से बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सियों पर बंगाल के गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल का नियन्त्रण स्थापित किया गया। कौंसिल के प्रत्येक सदस्य को मत देने का समान अधिकार था। मतों की संख्या बराबर होने की स्थिति में गवर्नर जनरल को अतिरिक्त मत देने का अधिकार था। कौंसिल के तीन सदस्य गवर्नर जनरल से व्यक्तिगत शत्रुता रखते थे। इस कारण गवर्नर जनरल कौंसिल में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं करवा पाता था।

    अँग्रेजों की मराठा नीति

    गवर्नर जनरल के अधिकार एवं शक्तियां स्पष्ट नहीं होने से दोनों प्रेसीडेन्सियों के अधिकारी स्वछन्द होकर कार्य करने लगे। दक्षिण व मध्य भारत की ऐसी कोई शक्ति नहीं थी, जिनसे उन्होंने झगड़ा मोल न ले रखा हो। बम्बई प्रेसीडेन्सी के गवर्नर की स्वच्छन्द प्रवृत्ति के कारण ही अँग्रेजों को मराठों से संघर्ष करना पड़ा। मराठों के सम्बन्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक नीति तैयार की जिसके तीन प्रमुख भाग थे-

    (1.) उन दिनों दक्षिण में मुख्य रूप से तीन शक्तियाँ कार्यरत थीं- हैदराबाद का निजाम, महाराष्ट्र के मराठा और मैसूर का हैदरअली। यदि ये तीनों शक्तियां अँग्रेजों के विरुद्ध एक हो जातीं तो दक्षिण में अँग्रेजों का अस्तित्त्व समाप्त हो सकता था। अतः अँग्रेज चाहते थे कि ये तीनों शक्तियाँ आपस में लड़ती रहें।

    (2.) दक्षिण की इन तीनों शक्तियों में मराठा सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी थे। अतः अँग्रेजों ने तय किया कि मराठों को घरेलू झगड़ों में फँसाये रखना चाहिये, ताकि बंगाल व उत्तर भारत में अँग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभाव में उन्हें हस्तक्षेप करने का अवसर न मिल सके।

    (3.) दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर अपने पैर फैलाने के लिए सालसेट, बसीन व गुजरात का कुछ भाग कम्पनी को अपने अधिकार में कर लेना चाहिए।

    आंग्ल-मराठा सम्बन्ध

    मुगल शक्ति के पतन के बाद उत्तर भारत में उत्पन्न हुई रिक्तता को मराठे तेजी से भरते जा रहे थे। अँग्रेज उनके प्रभाव को रोकना चाहते थे किंतु 18वीं शताब्दी के मध्य तक अँग्रेजों के पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वे मराठों का सामना कर सकें। अतः कम्पनी इस बात का ध्यान रखती थी कि वह ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे मराठों से संघर्ष करना पड़े। फिर भी वह निजाम, हैदरअली तथा मराठों को एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने का कार्य करती रही।

    1758 ई. में अँग्रेजों व मराठों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार अँग्रेजों ने मराठों से दस गाँव तथा मराठा क्षेत्र में कुछ व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं। 1759 ई. में ब्रिटिश अधिकारी प्राइस व थामस मॉट्सन पूना गये। इन दोनों का उद्देश्य मराठों से सालसेट व बसीन प्राप्त करना था किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली।

    पानीपत में मराठों की पराजय ने अंग्रेजों को पुनः प्रोत्साहित किया तथा 1767 ई. में थामस मॉट्सन को पुनः पूना भेजा गया। इस बार भी सालसेट एवं बसीन के सम्बन्ध में कोई समझौता नहीं हो सका। पेशवा माधवराव (प्रथम), मैसूर के शासक हैदरअली के विरुद्ध अँग्रेजों की सहायता प्राप्त करना चाहता था किन्तु कम्पनी इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। फिर भी मॉट्सन ने पेशवा को आश्वासन दिया कि कम्पनी मराठों से कभी युद्ध नहीं करेगी और यदि कोई तीसरी शक्ति मराठों से युद्ध करती है तो कम्पनी मराठों के विरुद्ध उस तीसरी शक्ति को सहायता नहीं देगी।

    18 नवम्बर 1772 को पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु हो गयी। उसके कोई सन्तान नहीं थी, अतः उसका भाई नारायणराव (1772-1773 ई.) पेशवा की मनसब पर बैठा। नारायण का चाचा राघोबा (रघुनाथ) स्वयं पेशवा बनना चाहता था। अतः राघोबा ने अपनी पत्नी आनन्दीबाई के सहयोग से 13 अगस्त 1773 को नारायणराव की हत्या करवा दी और अपने आपको पेशवा घोषित कर दिया। बालाजी जनार्दन ने राघोबा की इस कार्यवाही का विरोध किया। बालाजी जनार्दन को नाना फड़नवीस के नाम से जाना जाता है। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में मराठों ने बाराभाई संसद का निर्माण किया और शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया। उनके सामने समस्या यह थी कि पेशवा किसे बनाया जाये?

    जिस समय नारायणराव की मृत्यु हुई थी, उस समय उसकी पत्नी गंगाबाई गर्भवती थी। 18 अपै्रल 1774 को उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम माधवराव (द्वितीय) रखा गया। बाराभाई संसद ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा घोषित कर दिया तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। बाराभाई संसद ने राघोबा को बंदी बनाने के आदेश दिये। इस पर राघोबा ने दिसम्बर 1774 में थाणे पर आक्रमण कर दिया किन्तु परास्त होकर भाग खड़ा हुआ।

    सूरत की सन्धि (1775 ई.)

    राघोबा भागकर बम्बई गया। उसने बम्बई कौंसिल के अध्यक्ष हॉर्नबाई से बातचीत की। इस बातचीत के बाद कम्पनी की बम्बई शाखा और राघोबा के बीच 6 मार्च 1775 को एक सन्धि हुई जिसे सूरत की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता करेगी।

    (2.) राघोबा कम्पनी की बम्बई शाखा को थाणे, बसीन, सालसेट व जम्बूसर (गुजरात) के प्रदेश देगा।

    (3.) राघोबा की सुरक्षा के लिए 2500 अँग्रेज सैनिक पूना में रखे जायेंगे जिनका खर्च सवा लाख रुपये वार्षिक के हिसाब से राघोबा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी को देगा।

    (4.) राघोबा अपनी सुरक्षा के बदले कम्पनी की बम्बई शाखा को छः लाख रुपये वार्षिक देगा।

    (5.) यदि राघोबा पूना से कोई संधि या समझौता करेगा तो उसमें अँग्रेजों को भी सम्मिलित करेगा। रेगुलेटिंग एक्ट के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बम्बई शाखा राघोबा से किसी तरह की संधि करने के लिये अधिकृत नहीं थी। बम्बई शाखा ने यह सन्धि गवर्नर जनरल से पूछे बिना की थी। सन्धि के पश्चात् हॉर्नबाई ने पत्र लिखकर इसकी सूचना गवर्नर जनरल को भेज दी। इस सन्धि के कारण अँग्रेज व मराठों के संघर्षों का सूत्रपात हुआ तथा मॉट्सन ने मराठों को जो आश्वासन दिया था, उसे इस सन्धि द्वारा तोड़ दिया गया। राघोबा ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण सम्पूर्ण मराठा जाति की प्रतिष्ठा का बलिदान कर दिया।

    प्रथम आंग्ल-मराठा संघर्ष (1775-1782 ई.)

    सूरत की सन्धि के बाद बम्बई सरकार ने राघोबा की सहायता हेतु एक सेना भेजी। अँग्रेजी सेनाएँ पूना की ओर बढ़ीं। 18 मई 1775 को अँग्रेजों एवं मराठों के बीच अरास नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें मराठे परास्त हुए। अँग्रेजों ने सालसेट पर अधिकार कर लिया किन्तु इसी समय बंगाल कौंसिल ने हस्तक्षेप किया। क्योंकि बम्बई सरकार ने यह समझौता बिना बंगाल कौंसिल की स्वीकृति से किया था। बंगाल कौंसिल ने सूरत की सन्धि को अस्वीकार करके मराठों के विरुद्ध चल रहे युद्ध को बंद करने का आदेश दिया। ऐसा करने के कई कारण थे-

    (1.) यह सन्धि राघोबा द्वारा हस्ताक्षरित थी और वह उस समय पेशवा नहीं था।

    (2.) सूरत की सन्धि से कम्पनी को अनावश्यक युद्ध में भाग लेना पड़ा था।

    (3.) मराठा शक्ति से अँग्रेजों को कोई क्षति नहीं हुई थी, अतः उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं था।

    (4.) यह सन्धि रेग्यूलेटिंग एक्ट के विरुद्ध थी।

    पुरन्दर की संधि (1776 ई.)

    यद्यपि बंगाल कौंसिल ने युद्ध बन्द करने का आदेश दिया था, फिर भी युद्ध बन्द नहीं हुआ। तब बंगाल कौंसिल ने कर्नल अप्टन को मराठों से बातचीत करने पूना भेजा। अप्टन के पूना पहुँचने पर युद्ध बन्द हो गया। पूना में अप्टन और मराठों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये, क्योंकि अप्टन ने राघोबा को सौंपने से इन्कार कर दिया। साथ ही अप्टन, सालसेट व बसीन पर अधिकार बनाये रखना चाहता था। अतः यह वार्त्ता असफल हो गई और युद्ध पुनः चालू हो गया। मराठों ने युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई किन्तु दुर्भाग्य से पेशवा का विद्रोही मराठा सरदार सदाशिव एक दूसरे मोर्चे पर मराठों के विरुद्ध आ धमका। मराठे दो मोर्चों पर युद्ध नहीं कर सके और उन्होंने अँग्रेजों से सन्धि करने हेतु प्रार्थना की। अँग्रेजों ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। 1 मार्च 1776 को दोनों पक्षों में एक संधि हुई जिसे पुरन्दर की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

    (1.) कम्पनी ने शिशु माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक मान लिया।

    (2.) अँग्रेजों ने राघोबा से युद्ध करने पर जो राशि खर्च की है, उसके लिए मराठा, अँग्रेजों को 12 लाख रुपये देंगे।

    (3.) सूरत की सन्धि को रद्द कर दिया गया।

    (4.) मराठों ने राघोबा को 3 लाख 15 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार कर लिया।

    (5.) राघोबा कोई सेना नहीं रखेगा तथा गुजरात के कोपर गाँव में जाकर रहेगा।

    (6.) कम्पनी ने मराठों से सालसेट तथा बम्बई के निकट जो टापू प्राप्त किये हैं वे कम्पनी के पास ही रहेंगे।

    इस सन्धि पर मराठों की ओर से सुखराम बापू ने तथा अँग्रेजों की ओर से कर्नल अप्टन ने हस्ताक्षर किये किन्तु बम्बई सरकार तथा वारेन हेस्टिंग्ज इस सन्धि को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि को कागज का एक टुकड़ा कहा। इसी बीच मराठों ने विद्रोही सदाशिव राव भाऊ को पकड़कर उसकी हत्या कर दी। अब मराठे अँग्रेजों से निपटने के लिए तैयार थे। स्थिति उस समय और अधिक जटिल बन गई, जब 1778 ई. में एक फ्रांसीसी राजदूत सैण्ट लूबिन, फ्रांस के बादशाह का पत्र लेकर मराठा दरबार में पहुँचा। मराठों ने उसका शानदार स्वागत किया किन्तु जब अँग्रेज राजदूत मॉट्सन पूना पहुँचा तो उसका विशेष स्वागत नहीं किया गया। अतः यह अफवाह फैल गई कि मराठों एवं फ्रांसीसियों में सन्धि हो गई है।

    उधर मॉट्सन ने मराठा दरबार के मंत्री मोरोबा को अपनी ओर मिलाकर नाना फड़नवीस और सुखराम बापू में फूट डलवा दी। सुखराम बापू, जिसने पुरन्दर की संधि पर हस्ताक्षर किये थे, विद्रोही हो गया। उसने गुप्त रूप से बम्बई सरकार को लिखा कि वह राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता देने को तैयार है। अतः बम्बई सरकार ने कहा कि चूँकि पुरन्दर की सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाला स्वयं हमारे निकट आ रहा है, इसलिए पुनः युद्ध चालू करने पर सन्धि का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। बंगाल कौंसिल ने इसका विरोध किया किन्तु वारेन हेस्टिंग्ज ने बम्बई सरकार का समर्थन किया। यद्यपि मराठों ने स्पष्ट कर दिया कि फ्रांसीसियों के साथ उनकी कोई सन्धि नहीं हुई है तथा सैण्ट लुबिन को भी वापस भेज दिया गया है किन्तु हेस्टिंग्ज ने मार्च 1778 में बम्बई सरकार को युद्ध करने का अधिकार दे दिया।

    बड़गांव की संधि (1779 ई.)

    बम्बई सरकार ने कर्नल एगटस के नेतृत्व में एक सेना भेजी। कर्नल एगटस मराठों के द्वारा परास्त कर दिया गया। उसके स्थान पर कर्नल काकबर्क को भेजा गया। मराठा सेना का नेतृत्व महादजी सिन्धिया एवं मल्हारराव होलकर कर रहे थे। मराठा सेना धीरे-धीरे पीछे हटती गई और ब्रिटिश सेना आगे बढ़ती गई। ब्रिटिश सेना पूना से 18 मील दूर तेलगाँव के मैदान तक पहुँच गई। 19 जनवरी 1779 को तेलगाँव पहुँचते ही अँग्रेजों को ज्ञात हो गया कि मराठों ने उन्हें तीन ओर से घेर लिया है। अँग्रेजों ने अपने गोला-बारूद में आग लगाकर पीछे हटना आरम्भ किया। इस पर मराठों ने आगे बढ़कर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें अँग्रेज परास्त हो गये। इस पराजय के साथ ही बम्बई सरकार को एक अपमानजनक समझौता करना पड़ा। 29 जनवरी 1779 को दोनों पक्षों में बड़गांव की संधि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं-

    (1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, राघोबा को मराठों के हवाले कर देगी।

    (2.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अब तक जिन मराठा प्रदेशों पर अधिकार किया है, वे मराठों को सौंप दिये जायेंगे।

    (3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जब तक शर्तों को पूरा न करे, तब तक दो अँग्रेज अधिकारी बन्धक के रूप में मराठों की कैद में रहेंगे। बड़गाँव की संधि अँग्रेजों के लिए घोर अपमानजनक थी। स्वयं हेस्टिंग्ज ने कहा- 'जब बड़गाँव संधि की धाराओं को पढ़ता हूँ तो मेरा सिर लज्जा से झुक जाता है।' अतः हेस्टिंग्ज ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया और मराठों के विरुद्ध दो सेनाएँ भेजीं। एक सेना का नेतृत्व कर्नल पोफम कर रहा था और दूसरी का नेतृत्व कर्नल गॉडर्ड कर रहा था। जब नाना फड़नवीस को अँग्रेजों के आक्रमण की सूचना मिली तो उसने नागपुर के शासक भोंसले, हैदराबाद के निजाम तथा मैसूर के शासक हैदरअली को अपनी ओर मिलाया तथा अँग्रेजों का सामना करने की योजना तैयार की किन्तु हेस्टिंग्ज ने कूटनीति से निजाम व भौंसले को मराठों से अलग कर दिया।

    कर्नल गाडर्ड अहमदाबाद एवं बसीन पर अधिकार करके 1780 ई. में बड़ौदा पहुँच गया। उसने बड़ौदा के शासक फतेहसिंह गायकवाड़ से सन्धि की और पूना की ओर बढ़ा किन्तु पूना के निकट मराठों ने उसे काफी क्षति पहुँचाई। उत्तर दिशा में कर्नल पोफम ग्वालियर की ओर बढ़ा। 3 अगस्त 1780 को उसने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उसके बाद सिप्री नामक स्थान पर महादजी सिन्धिया एवं पोफम के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें महादजी परास्त हो गया। 13 अक्टूबर 1781 को उसने अँग्रेजों से सन्धि कर ली। इस सन्धि में एक धारा यह भी थी कि महादजी मराठों व अँग्रेजों के बीच सन्धि करवायेगा तथा सन्धि का पालन करवाने हेतु स्वयं अपनी गारण्टी देगा।

    सालबाई की सन्धि (1782 ई.)

    इधर गुजरात में कर्नल गॉडर्ड व मराठों के बीच युद्ध चल रहा था। ब्रिटिश सेना का दबाव बढ़ता जा रहा था। इस दबाव को कम करने के लिए नाना फड़नवीस ने हैदरअली को कर्नाटक पर आक्रमण करने को कहा। इस पर हैदरअली ने कर्नाटक पर धावा बोल दिया। इसके बाद अँग्रेजों की निरन्तर पराजय होने लगी। ब्रिटिश सेना का मनोबल गिरने लगा। अतः हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को मराठों से वार्त्ता करने भेजा। वार्त्ता के दौरान हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को तथा नाना फड़नवीस को जो पत्र लिखे, उनसे स्पष्ट होता है कि हेस्टिंग्स, मराठों से सन्धि करने के लिए अत्यधिक व्यग्र था। 17 मई 1782 को अँग्रेजों और मराठों के बीच सालबाई की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) अँग्रेजों ने राघोबा का साथ छोड़ने का आश्वासन दिया तथा मराठों ने उसे 25,000 रुपये मासिक पेन्शन देना स्वीकार कर लिया।

    (2.) सालसेट तथा भड़ौच को छोड़कर मराठा राज्य के अन्य समस्त भू-भागों से कम्पनी अपना अधिकार त्यागने पर सहमत हो गई।

    (3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा फतेसिंह गायकवाड़ को बड़ौदा का शासक स्वीकार कर लिया। बड़ौदा के जिन भू-भागों पर कम्पनी ने अधिकार कर लिया था, उन्हें पुनः बड़ौदा के शासक को लौटा दिया गया।

    (4.) इस सन्धि की स्वीकृति के छः माह के अन्दर हैदरअली जीते हुए प्रदेश लौटा देगा।

    इस संधि पर महादजी एवं नाना फड़नवीस के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये। क्योंकि नाना का मित्र एवं अँग्रेजों का शत्रु हैदरअली, अभी तक अँग्रेजों से लड़ रहा था। अतः जब तक हैदरअली युद्ध के मैदान में था, अँग्रेजों से सन्धि करना हैदरअली के साथ विश्वासघात करने जैसा था। जब 7 दिसम्बर 1782 को हैदरअली की मृत्यु हो गई, तब नाना ने 20 दिसम्बर 1782 को सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये।

    सन्धि का महत्त्व

    साल्बाई की सन्धि कुछ विशेष दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। अँग्रेजों ने मराठों से सन्धि करके मैसूर को मराठों से अलग कर दिया। मैसूर का शासक हैदरअली मराठों की सहायता से वंचित हो गया। हैदरअली की मृत्यु के बाद उसके पुत्र टीपू ने यद्यपि युद्ध जारी रखा, किन्तु उसे मराठों की सहायता नहीं मिल सकी।

    स्मिथ के अनुसार सालबाई की सन्धि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इसने दक्षिण भारत में कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित कर दिया तथा इसके बाद 20 वर्षों तक कम्पनी एवं मराठों के बीच शान्ति बनी रही। स्मिथ ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। वस्तुतः यह सन्धि कम्पनी की असफलता को सूचित करती है। अँग्रेजों ने इस सन्धि के पूर्व जो कुछ प्राप्त किया था, उसमें से सालसेट को छोड़कर शेष सब खो दिया। इस सन्धि ने पेशवा की स्थिति को सुदृढ़ बनाया तथा महादजी सिंधिया का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया कि वह मैसूर पर प्रभुत्व स्थापित करने लगा।

    अँग्रेजों ने शाहआलम के मामले में हस्तक्षेप न करने का वादा किया। इससे शाहआलम पर महादजी सिंधिया का प्रभाव अधिक बढ़ गया और शाहआलम ने महादजी सिंधिया को मुगल सल्तनत का वकील-ए-मुतलक नियुक्त किया। अतः इस सन्धि से अँग्रेजों के प्रभुत्व की बजाय, मराठों के प्रभुत्व में वृद्धि हुई। अँग्रेजों एवं मराठों के बीच 20 वर्षों तक की दीर्घ शान्ति का कारण सालबाई की सन्धि नहीं थी, अपितु अँग्रेज उत्तर भारत में दूसरी समस्याओं में उलझ गये थे, जिससे वे मराठों की ओर ध्यान नहीं दे सके। इधर मराठा संघ में भी फूट पड़ गई थी।

    पिट्स इण्डिया एक्ट

    1784 ई. में ब्रिटिश संसद ने पिट्स इण्डिया एक्ट पारित किया जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन करेगी। इस एक्ट में यह भी प्रावधान किया गया कि गवर्नर जनरल को आपातकाल में, कौंसिल के बहुमत की स्वीकृति प्राप्त किये बिना भी कार्य करने के विशेष अधिकार होंगे।

    हेस्टिंग्ज की विदाई

    1785 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज अपना कार्यकाल पूरा होने पर इंग्लैण्ड चला गया। वारेन हेस्टिंग्ज के अत्याचारों, आर्थिक शोषण एवं कुकर्मों की गूंज ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी हुई। क्लाइव की भांति उस पर भी मुकदमा चला जो सात साल तक (1788-1795 ई. तक) चलता रहा। उस पर बीस से भी अधिक आरोप लगाये गये। प्रधानमंत्री पिट प्रारम्भ में हेस्टिंग्ज के पक्ष में था किंतु बाद में हेस्टिंग्ज का विरोधी हो गया। अंत में हेस्टिंग्ज को क्लाइव की ही भांति दोष-मुक्त घोषित कर दिया गया। इस मुकदमे को लड़ने में हेस्टिंग्ज ने एक लाख पौण्ड खर्च किये। वह इतनी राशि भारत से लूटकर नहीं ले जा पाया था। इसलिये इस मुकदमे ने हेस्टिंग्ज को बर्बाद कर दिया।

    अहस्तक्षेप की नीति

    हेस्टिंग के बाद मेकफर्सन ने 1785 से 1786 ई. में 21 माह तक कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। सितम्बर 1786 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। कार्नवालिस ने सामान्यतः अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया। 1793 ई. में वह इंग्लैण्ड लौट गया तथा सर जॉन शोर (1793-1798 ई.) को गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने भी कार्नवालिस की नीति का अनुसरण किया। 1795 ई. में हैदराबाद के निजाम एवं मराठों के बीच खरदा का युद्ध हुआ। निजाम ने कम्पनी से सैनिक सहायता मांगी किंतु कम्पनी ने देशी राज्यों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप करने तथा निजाम को सहायता देने से इन्कार कर दिया। निजाम मराठों से परास्त हो गया और उसे मराठों से अपमानजनक शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी। 1796 ई. में पेशवा माधवराव (द्वितीय) की मृत्यु हो गई तथा बाजीराव (द्वितीय) पेशवा के मनसब पर बैठा।

    1798 ई. में सर जॉन शोर को वापिस इंग्लैण्ड बुला लिया गया। इस प्रकार सालबाई की सन्धि के बाद 20 वर्ष तक अंग्र्रेजों तथा मराठों के बीच शान्ति रही किंतु इस अवधि में मराठे अपने अन्य शत्रुओं से निपटते रहे। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव फैलने लगा। इस अवधि में महादजी सिन्धिया की शक्ति में भी अपूर्व वृद्धि हुई तथा पेशवा की शक्ति का ह्रास हुआ।

    लार्ड वेलेजली द्वारा अहस्तक्षेप की नीति का त्याग (1798-1805 ई.)

    1798 ई. में मार्क्विस वेलेजली को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने सहायक संधियों के माध्यम से हैदराबाद के निजाम, अवध के नवाब, मराठों के पेशवा, राजपूताने के अलवर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर और त्रावणकोर के राजा सहित अनेक राजाओं और नवाबों पर कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित की।

    मराठों में परस्पर संघर्ष

    पेशवा बाजीराव (द्वितीय) (1796-1851 ई.) अयोग्य व्यक्ति था। उसके समय में नाना फड़नवीस शासन का कार्य संभालता था। 13 मार्च 1800 को नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों में परस्पर संघर्ष प्रारम्भ हो गये। दो मराठा सरदारों- ग्वालियर के दौलतराव सिन्धिया तथा इन्दौर के यशवंतराव होलकर के बीच इस विषय को लेकर प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो गयी कि पेशवा पर किसका प्रभाव रहे।

    पेशवा बाजीराव (द्वितीय) किसी शक्तिशाली मराठा सरदार का संरक्षण चाहता था। अतः उसने दौलतराव सिन्धिया का संरक्षण स्वीकार कर लिया। बाजीराव तथा सिन्धिया ने होलकर के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना लिया। होलकर के लिये यह स्थिति असहनीय थी। इस कारण 1802 ई. के प्रारम्भ में सिन्धिया एवं होलकर के बीच युद्ध छिड़ गया। जब होलकर मालवा में सिन्धिया की सेना के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त था, तब पेशवा ने पूना में होलकर के भाई बिट्ठूजी की हत्या करवा दी। होलकर अपने भाई की हत्या का बदला लेने पूना की ओर चल पड़ा। होलकर ने पूना के निकट पेशवा और सिन्धिया की संयुक्त सेना को परास्त किया और एक विजेता की भाँति पूना में प्रवेश किया।

    होलकर ने राघोबा के दत्तक पुत्र अमृतराव के बेटे विनायकराव को पेशवा घोषित कर दिया। इस पर पेशवा बाजीराव (द्वितीय) भयभीत होकर बसीन (बम्बई के पास अँग्रेजों की बस्ती) चला गया। बसीन में उसने वेलेजली से प्रार्थना की कि वह उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दे। वेलेजली भारत में कम्पनी की सर्वोपरि सत्ता स्थापित करना चाहता था। मैसूर की शक्ति को नष्ट करने के बाद अब मराठे ही उसके एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी रह गये थे। अतः वह मराठा राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर ढूँढ रहा था। पेशवा द्वारा प्रार्थना करने पर वेलेजली को यह अवसर मिल गया।

    बसीन की संधि (1802 ई.)

    वेलेजली ने पेशवा के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह सहायक सन्धि स्वीकार कर ले तो उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दी जा सकती है। पेशवा ने वेलेजली की शर्त को स्वीकार कर लिया। 31 दिसम्बर 1802 को पेशवा और कम्पनी के बीच बसीन की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) पेशवा अपने राज्य में 6,000 अँग्रेज सैनिकों की एक सेना रखेगा तथा इस सेना के खर्चे के लिए 26 लाख रुपये वार्षिक आय का भू-भाग अँग्रेजों को देगा।

    (2.) पेशवा बिना अँग्रेजों की अनुमति के मराठा राज्य में किसी अन्य यूरोपियन को नियुक्ति नहीं देगा और न अपने राज्य में रहने की अनुमति देगा।

    (3.) पेशवा सूरत पर से अपना अधिकार त्याग देगा।

    (4.) निजाम और गायकवाड़ के विरुद्ध पेशवा के झगड़ों के पंच निपटारे का कार्य कम्पनी द्वारा किया जायेगा।

    (5.) पेशवा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी देशी राज्य के साथ सन्धि, युद्ध अथवा पत्र-व्यवहार नहीं करेगा।

    बसीन की सन्धि का महत्त्व

    बसीन की सन्धि के द्वारा पेशवा ने मराठों के सम्मान एवं स्वतंत्रता को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों बेच दिया, जिससे मराठा शक्ति को भारी धक्का लगा। सिडनी ओवन ने लिखा है- 'इस सन्धि के पश्चात् सम्पूर्ण भारत में, कम्पनी का राज्य स्थापित हो गया।' अँग्रेज इतिहासकारों ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। इस सन्धि का सबसे बड़ा दोष यह था कि अब अँग्रेजों का मराठों से युद्ध होना प्रायः निश्चित हो गया, क्योंकि वेलेजली ने मराठों के आन्तरिक झगड़ों को तय करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया था। वेलेजली ने कहा था कि इससे शान्ति तथा व्यवस्था बनी रहेगी किन्तु इस संधि के बाद सबसे व्यापक युद्ध हुआ। वेलेजली ने सन्धि का औचित्य बताते हुए कहा था कि अँग्रेजों को मराठों के आक्रमण का भय था किन्तु जब मराठे स्वयं अपने झगड़ों में उलझे हुए थे, तब फिर अँग्रेजों पर आक्रमण करने का प्रश्न ही नहीं था। वास्तविकता यह थी कि वेलेजली भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने पर तुला हुआ था और वह मराठों को ऐसी सन्धि में उलझा देना चाहता था, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग खुल जाये। अतः बसीन की सन्धि ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं।

    द्वितीय आँग्ल-मराठ युद्ध (1803-1805 ई.)

    बसीन की सन्धि के बाद मई 1803 में बाजीराव (द्वितीय) को अँग्रेजों के संरक्षण में पुनः पेशवा बनाया गया। मराठा सरदार इसे सहन करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने पारस्परिक वैमनस्य को भुलाककर अँग्रेजों के विरुद्ध एक होने का प्रयत्न किया। सिन्धिया और भौंसले तो एक एक हो गये, किन्तु सिन्धिया व होलकर की शत्रुता अभी ताजी थी। अतः होलकर पूना छोड़कर मालवा चला गया। गायकवाड़ अँग्रेजों का मित्र था। अतः उसने भी इस अँग्रेज विरोधी संघ में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया। इस प्रकार अँग्रेजों के विरुद्ध सैनिक अभियान करने के लिये केवल सिन्धिया व भौंसले ही बचे। उन्होंने अँग्रेजों से युद्ध करने की तैयारी आरम्भ कर दी। जब वेलेजली को इसकी सूचना मिली तो उसने 7 अगस्त 1803 को मराठों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और एक सेना अपने भाई आर्थर वेलेजली तथा दूसरी जनरल लेक के नेतृत्व में मराठों के विरुद्ध भेजी।

    देवगढ़ की संधि (1803 ई.)

    आर्थर वेलेजली ने सर्वप्रथम अहमदनगर पर विजय प्राप्त की। तत्पश्चात् अजन्ता व एलोरा के निकट असाई नामक स्थान पर सिन्धिया व भौंसले की संयुक्त सेना को परास्त किया। असीरगढ़ व अरगाँव के युद्धों में मराठा पूर्ण रूप से परास्त हुए। अरगाँव में परास्त होने के बाद 17 दिसम्बर 1803 को भौंसले ने अँग्रेजों से देवगढ़ की सन्धि कर ली। इस सन्धि के अन्तर्गत भौंसले ने वेलेजली की सहायक सन्धि की समस्त शर्तें स्वीकार कर लीं किंतु राज्य में कम्पनी की सेना रखने सम्बन्धी शर्त स्वीकार नहीं की। वेलेजली ने इस शर्त पर जोर नहीं दिया। इस सन्धि के अनुसार कटक तथा वर्धा नदी के निकटवर्ती क्षेत्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिये गये।

    सुर्जी-अर्जन की संधि (1803 ई.)

    जनरल लेक ने उत्तरी भारत की विजय यात्रा आरम्भ की। उसने सर्वप्रथम अलीगढ़ पर अधिकार किया। तत्पश्चात् दिल्ली पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। जनरल लेक ने भरतपुर पर आक्रमण किया और भरतपुर के शासक से सहायक सन्धि की। भरतपुर के बाद उसने आगरा पर अधिकार किया। अन्त में लासवाड़ी नामक स्थान पर सिन्धिया की सेना पूर्णतः परास्त हुई। सिन्धिया को विवश होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करनी पड़ी। 30 दिसम्बर 1803 को सुर्जीअर्जन नामक गाँव में यह सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार सिन्धिया ने दिल्ली, आगरा, गंगा-यमुना का दोआब, बुन्देलखण्ड, भड़ौंच, अहमदनगर का दुर्ग, गुजरात के कुछ जिले, जयपुर व जोधपुर अँग्रेजों के प्रभाव में दे दिये। उसने कम्पनी की सेना को भी अपने राज्य में रखना स्वीकार कर लिया। अँग्रेजों ने सिन्धिया को उसके शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया।

    सिन्धिया व भौंसले ने बसीन की सन्धि को भी स्वीकार कर लिया। इन सफलताओं से उत्साहित होकर वेलेजली ने घोषणा की- 'युद्ध के प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया है। इससे सदैव शान्ति बनी रहेगी।' किन्तु वेलेजली का उक्त कथन ठीक नहीं निकला, क्योंकि शान्ति शीघ्र ही भंग हो गई।

    होलकर से युद्ध

    होलकर अब तक इन घटनाओं से उदासीन था। उसने सिन्धिया व भौंसले के आत्मसमर्पण के बाद अँग्रेजों से युद्ध करने का निर्णय लिया और अप्रैल 1804 में संघर्ष छेड़ दिया। उसने सर्वप्रथम राजपूताना में कम्पनी के मित्र राज्यों पर आक्रमण किया। यह आक्रमण अँग्रेजों के लिए चुनौती था। 16 अप्रेल 1804 को लार्ड वेलेजली ने जनरल लेक को लिखा कि जितनी जल्दी हो सके, जसवंतराव होलकर के विरुद्ध युद्ध आरम्भ किया जाये। ऑर्थर वेलेजली के नेतृत्व में दक्षिण की ओर से तथा कर्नल मेर के नेतृत्व में गुजरात की ओर से होलकर के राज्य पर आक्रमण किया गया।

    इस कार्य में दक्षिण भारत तथा गुजरात की अन्य राजनीतिक शक्तियों की सहायता ली गयी किंतु होलकर ने इस मिश्रित सेना को बुरी तरह परास्त किया। वेलेजली ने कर्नल मॉन्सन के नेतृत्व में राजपूताने की तरफ एक सेना भेजी। कर्�

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  • भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना और विस्तार

     21.08.2017
    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना और विस्तार

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 6

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना  के कारण

    भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना और विस्तार के वास्तविक कारणों के विषय में इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि भारत में ब्रिटिश भारत की स्थापना एक चमत्कारिक घटना थी। कुछ इतिहासकारों के अनुसार भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना संयोगवश हुई, जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सोची समझी नीति का हिस्सा थी। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना भारतीयों की कमजोरी एवं परस्पर फूट का परिणाम थी। इन चारों धारणाओं पर विचार किये जाने की आवश्यकता है-

    (1.) भारत में अँग्रेजी शासन की स्थापना एक आश्चर्यजनक घटना थी-

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में साम्राज्य की स्थापना करने के लिये नहीं आई थी। उसके उपरांत भी भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना होना एक आश्चर्यजनक घटना समझी जानी चाहिये। यह भी एक आश्चर्य था कि भारत में अँग्रेजों से पहले जितने भी विदेशियों ने अपने राज्यों की स्थापना की, वे पश्चिम दिशा से भारत में घुसे थे जबकि अँग्रेजों ने बंगाल अर्थात् पूर्व दिशा से भारत में अपना राज्य आरम्भ किया।

    (2.) भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना एक संयोग थी-

    प्रोफेसर साले, अल्फ्रेड लॉयल तथा ली-वार्नर आदि इतिहासकारों की मान्यता है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार एक सुनिश्चित योजना का परिणाम न होकर संयोग की बात थी। इन विद्वानों के अनुसार पिट्स इण्डिया एक्ट में, कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य विस्तार न करने की नीति का स्पष्ट उल्लेख इन शब्दों में किया गया है- 'भारत में राज्य विस्तार और विजय योजनाओं का अनुसरण करना, इस राष्ट्र की नीति, सम्मान और इच्छा के विरुद्ध है।' अतः इन इतिहासकारों के अनुसार कम्पनी द्वारा घोषित इस नीति के बावजूद भारत में कम्पनी के राज्य की स्थापना एवं विस्तार होना केवल संयोग की बात थी।

    (3.) भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना सोची समझी नीति का हिस्सा थी-

    अनेक इतिहासकारों का मत है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य विस्तार पूर्णतः सोची-समझी गई नीति का परिणाम था। इन इतिहासकारों के अनुसार पिट्स इण्डिया एक्ट की धारा 34 जो कि एक पृष्ठ से भी अधिक लम्बी है, में स्पष्ट कहा गया है कि- 'फोर्ट विलियम के गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल को, भविष्य में संचालक समिति अथवा उसकी सीक्रेट कमेटी के आदेश के बिना भारतीय राज्यों अथवा नरेशों में से किसी के विरुद्ध युद्ध घोषित करने, युद्ध आरम्भ करने अथवा युद्ध करने के लिए सन्धि करने अथवा उसके क्षेत्रफल की सुरक्षा करने की गारण्टी देने का वैध अधिकार नहीं होगा।' इसका अर्थ यह हुआ कि संचालक समिति अथवा सीक्रेट कमेटी की अनुमति से उन्हें युद्ध करने का वैध अधिकार था। इस धारा में यह भी अपवाद था कि- 'जहाँ भारत में अँग्रेजों के विरुद्ध अथवा अँग्रेजों के आश्रित राज्य के विरुद्ध लड़ाई आरम्भ की जा चुकी हो अथवा तैयारियाँ की जा चुकी हो।' इस अपवाद से स्पष्ट है कि गवर्नर जनरल किसी भी स्थिति में साम्राज्यवादी नीति का आश्रय ले सकता था।

    (4.) अँग्रेजी शासन की स्थापना भारतीयों की कमजोरी का परिणाम थी-

    पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैण्ड, ब्रिटेन एवं फ्रांस आदि देशों से आने वाले लोग व्यापारी थे। वे अपने जहाजों एवं जन-माल की रक्षा के लिये अपने साथ सशस्त्र सैनिक रखते थे। अँग्रेज व्यापारी स्थानीय शासकों एवं मुगल बादशाहों की अनुमति प्राप्त करके भारत में व्यापार करने लगे। उनका उद्देश्य भारत में अधिक से अधिक लाभ अर्जित करना था ताकि वृद्धावस्था में इंग्लैण्ड लौटकर शेष जीवन सुख से बिता सकें। इसके उपरांत भी अँग्रेज व्यापारी भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में इसलिये सफल रहे क्योंकि भारतीयों में एकता नहीं थी। भारत की केन्द्रीय सत्ता के स्वामी मुगल शहजादे तख्त प्राप्त करने के लिये एक दूसरे का रक्त बहाने में व्यस्त थे। हिन्दू शासक अपने खोये हुए राज्यों की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष कर रहे थे। मराठे सम्पूर्ण भारत से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने के कार्य में व्यस्त थे। अफगान आक्रांता हर समय भारत की छाती रौंद रहे थे। इस प्रकार भारत की समस्त शक्तियां एक दूसरे के रक्त की प्यासी बनी हुई थीं तथा अँग्रेजों को ऐसे कमजोर देश पर अधिकार जमाने में अधिक रक्त नहीं बहाना पड़ा।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना न तो संयोग से हुई थी और न वह कोई चमत्कारिक घटना थी। कम्पनी के अधिकारियों द्वारा औरंगजेब के समय से ही भारत में व्यापार बढ़ाने के लिये तलवार का सहारा लेने की वकालात की जाने लगी थी। अतः यह निश्चित है कि एक सुनिश्चित योजना के अनुसार सम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया गया। भारतीयों की कमजोरी ने अंग्रेजों की सोची समझी नीति को साकार करने के लिये रास्ता आसान कर दिया।

    भारत में साम्राज्य विस्तार की ब्रिटिश नीतियाँ

    जहांगीर के समय से भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियां आरम्भ हो गयी थीं। लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे और उन्होंने 'व्यापार, न कि भूमि' की नीति अपनाई। मुगलों के अस्ताचल में जाने एवं पुर्तगाली, डच तथा फ्रैंच शक्तियों को परास्त कर भारत में अपने लिये मैदान साफ करने में अँग्रेजों को अठारहवीं सदी के मध्य तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 23 जून 1757 के प्लासी युद्ध के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में प्रथम बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई। इसके बाद अँग्रेजों ने अपनी नीति 'भूमि, न कि व्यापार' कर दी।

    गांधीजी के परम सहयोगी प्यारेलाल ने लिखा है- 'देशी राज्यों के परिप्रेक्ष्य में ब्रिटिश नीति में कई परिवर्तन हुए किंतु भारत में साम्राज्यिक शासन को बनाये रखने का प्रमुख विचार, उन परिवर्तनों को जोड़ने वाले सूत्र के रूप में सदैव विद्यमान रहा। यह नीति तीन मुख्य चरणों से निकली जिन्हें घेराबंदी (Ring Fence), सहायक समझौता (Subsidiary Alliance) तथा अधीनस्थ सहयोग (Subordinate Co-operation) कहा जाता है। राज्यों की दृष्टि से इन्हें 'ब्रिटेन की सुरक्षा', 'आरोहण' तथा 'साम्राज्य' कहा जा सकता है।'

    प्रथम चरण - बाड़बंदी (1756-98 ई.)

    ब्रिटिश नीति के प्रथम चरण (1756-98 ई.) में नियामक विचार 'सुरक्षा' तथा 'भारत में इंगलैण्ड की स्थिति' का प्रदर्शन' था। इस काल में कम्पनी अपने अस्तित्त्व के लिये संघर्ष कर रही थी। यह चारों ओर से अपने शत्रुओं और प्रतिकूलताओं से घिरी हुई थी। इसलिये स्वाभाविक रूप से कम्पनी ने स्थानीय संभावनाओं में से मित्र एवं सहायक ढूंढे। इन मित्रों के प्रति कम्पनी की नीति चाटुकारिता युक्त, कृपाकांक्षा युक्त एवं परस्पर आदान-प्रदान की थी। लॉर्ड क्लाइव (1758-67) ने प्लासी के युद्ध से पहले और उसके बाद में मुगल सत्ता की अनुकम्पा प्राप्त करने की चतुर नीति अपनाई। बक्सर युद्ध के पश्चात् 1765 ई. में हुई इलाहाबाद संधि से ईस्ट इण्डिया कम्पनी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हुई। वारेन हेस्टिंग्स (1772-1785 ई.) के काल में स्थानीय शक्तियों की सहायता से राज्य विस्तार की नीति अपनाई गई। 1784 ई. के पिट्स इण्डिया एक्ट में घोषणा की गयी कि किसी भी नये क्षेत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के क्षेत्र में जबर्दस्ती नहीं मिलाया जायेगा। लार्ड कार्नवालिस (1786-1793 ई.) तथा सर जॉन शोर (1793-1798 ई.) ने देशी राज्यों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति अपनायी। इस नीति को अपनाने के पीछे उनका विचार मित्र शक्तियों की अवरोधक दीवार खड़ी करने तथा जहाँ तक संभव हो सके, विजित मित्र शक्तियों की बाड़बंदी (Ring Fence) में रहने का था।

    दूसरा चरण - सहायक समझौते (1798-1813 ई.)

    मारवाड़ रियासत ने ई. 1786, 1790 तथा 1796 में, जयपुर रियासत ने ई. 1787, 1795 तथा 1799 में एवं कोटा रियासत ने ई. 1795 में मराठों के विरुद्ध अँग्रेजों से सहायता मांगी किंतु अहस्तक्षेप की नीति के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन अनुरोधों को स्वीकार नहीं किया। शीघ्र ही अनुभव किया जाने लगा कि यदि स्थानीय शक्तियों की स्वयं की घेरेबंदी नहीं की गयी तथा उन्हें अधीनस्थ स्थिति में नहीं लाया गया तो अँग्रेजों की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। इस कारण लॉर्ड वेलेजली (1798 से 1805 ई.) के काल में ब्रिटिश नीति का अगला चरण आरम्भ हुआ। इस चरण में 'सहयोग' के स्थान पर 'प्रभुत्व' ने प्रमुखता ले ली। वेलेजली ने सहायक संधि की पद्धति निर्मित की। इस पद्धति में देशी शासक, रियासत के आंतरिक प्रबंध को अपने पास रखता था किंतु बाह्य शांति एवं सुरक्षा के दायित्व को ब्रिटिश शक्ति को समर्पित कर देता था। इस प्रकार वेलेजली ने 'सहायक संधियों' के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को समस्त भारतीय राज्यों पर थोपने का निर्णय लिया ताकि देशी राज्य, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध किसी तरह का संघ न बना सकें। उसने सहायता के समझौतों से ब्रिटिश प्रभुत्व को और भी दृढ़ता से स्थापित कर दिया। वेलेजली ने प्रयत्न किया कि राजपूताने के राज्यों को ब्रिटिश प्रभाव एवं मित्रता के क्षेत्र में लाया जाये किंतु उसे इस कार्य में सफलता नहीं मिली।

    तीसरा चरण - अधीनस्थ सहयोग (1817-1858 ई.)

    1805 ई. में वेलेजली के लौट जाने के बाद ब्रिटिश नीति में पुनः परिवर्तन हुआ। कार्नवालिस (1805 ई.) तथा बारलो (1805-1807 ई.) ने देशी रियासतों की ओर से किये जा रहे संधियों के प्रयत्नों को अस्वीकृत किया तथा अहस्तक्षेप की नीति अपनाई किंतु शीघ्र ही इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे और मराठे फिर से शक्तिशाली हो गये। अतः 1814 ई. में चार्ल्स मेटकाफ ने लॉर्ड हेस्टिंग्ज को लिखा कि यदि समय पर विनम्रता पूर्वक मांगे जाने पर भी (देशी राज्यों को) संरक्षण प्रदान नहीं किया गया तो संभवतः बाद में, प्रस्तावित संरक्षण भी अमान्य कर दिये जायेंगे। जॉन मैल्कम की धारणा थी कि सैनिक कार्यवाहियों तथा रसद सामग्री दोनों के लिये इन राज्यों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण होना चाहिये अन्यथा ये राज्य हमारे शत्रुओं को हम पर आक्रमण करने के लिये योग्य साधन उपलब्ध करवा देंगे।

    हेस्टिंग्स का मानना था कि राजपूत रियासतों पर हमारा प्रभाव स्थापित होने से सिक्खों और उनको सहायता देने वाली शक्तियों के बीच शक्तिशाली प्रतिरोध बन जायगा। इससे न केवल सिन्धिया, होलकर और अमीरखाँ की बढ़ती हुई शक्ति नियंत्रित होगी, जो उसके अनुमान से काफी महत्वपूर्ण उद्देश्य था, बल्कि उससे मध्य भारत में कम्पनी की सैनिक और राजनैतिक स्थिति को अत्यधिक सुदृढ़ बनाने में भी सहायता मिलेगी। इस नीति के तहत 1817 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्ज देशी राज्यों से अधीनस्थ संधियाँ करने को तत्पर हुआ।

    हेस्टिंग्ज ने अपना उद्देश्य लुटेरी पद्धति के पुनरुत्थान के विरुद्ध अवरोध स्थापित करना तथा मराठा शक्ति के विस्तार को रोकना बताया। उसने तर्क दिया कि चूंकि मराठे, पिण्डारियों की लूटमार को नियंत्रित करने में असफल रहे हैं अतः मराठों के साथ की गयी संधियों को त्यागना न्याय संगत होगा। हेस्टिंग्स ने चार्ल्स मेटकाफ को राजपूत शासकों के साथ समझौते सम्पन्न करने का आदेश दे दिया। गवर्नर जनरल का पत्र पाकर चार्ल्स मेटकॉफ ने राजपूत शासकों को कम्पनी का सहयोगी बनने के लिये आमंत्रित किया। इस पत्र में कहा गया कि राजपूताना के राजा जो खिराज मराठों को देते आये हैं उसका भुगतान ईस्ट इण्डिया कम्पनी को करें। यदि किसी अन्य पक्ष द्वारा राज्य से खिराज का दावा किया जायेगा तो उससे कम्पनी निबटेगी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार होगा किंतु उन्हें अपने व्यय पर ब्रिटिश सेना अपने राज्य में रखनी पड़ेगी। कम्पनी द्वारा संरक्षित राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये कम्पनी से अनुमति लेनी होगी। इस सब के बदले में कम्पनी ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का दायित्व ग्रहण किया।

    इस प्रकार हेस्टिंग्ज ने देशी राज्यों के समक्ष बाह्य सुरक्षा एवं आंतरिक शांति का चुग्गा डाला जिसे चुगने के लिये भारत के देशी राज्य आगे आये और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जाल में फंस गये।

    भारत में लगभग 600 देशी राज्य थे जिनकी संख्या समय के साथ घटती बढ़ती रहती थी। 1817-18 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के 40 देशी राज्यों के साथ अधीनस्थ संधियाँ की गईं।

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना

    क्लाइव का योगदान

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग 1757 ई. में क्लाइव के नेतृत्व में लड़े गये प्लासी के युद्ध के बाद से ही खुल गया था। इस युद्ध ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल का स्वामी बना दिया तथा वह राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गई। 1764 ई. में बक्सर के युद्ध में मिली विजय से कम्पनी का भारत की तीन प्रमुख शक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम पर दबदबा स्थापित हो गया। इस युद्ध में मल्हारराव होलकर भी अँग्रेजों से परास्त हो गया। इससे ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई। क्लाइव की सफलताएं इतनी जबर्दस्त थीं कि 1765 ई. में उसे दुबारा बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया। क्लाइव ने दृढ़ संकल्प शक्ति से दुःसाहस पूर्ण कार्य किये जिनसे भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सका।

    वारेन हेस्टिंग्ज का योगदान

    1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज बंगाल का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने क्लाइव के काम को तेजी से आगे बढ़ाया। उसने मुगल बादशाह की 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी और बंगाल के नवाब की 53 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन घटाकर 16 लाख रुपये कर दी। उसने 1772 ई. में बंगाल से द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त किया। 1773 ई. में ब्रिटिश संसद ने रेगुलेटिंग एक्ट पारित किया तथा बंगाल में गवर्नर के स्थान पर गवर्नर जनरल की नियुक्ति की जाने लगी। हेस्टिंग्ज के समय में मराठों के विरुद्ध कई सैनिक कार्यवाहियां की गईं किंतु ईस्ट इण्डिया कम्पनी को कई बार मराठों से अपमानजनक शर्तों पर संधि करनी पड़ी।

    अहस्तक्षेप की नीति से साम्राज्य विस्तार को आघात (1784-98 ई.)

    1784 ई. में ब्रिटिश संसद ने पिट्स इण्डिया एक्ट पारित किया जिसमें कहा गया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन करेगी। यह प्रावधान भी किया गया कि गवर्नर जनरल को आपातकाल में, कौंसिल के बहुमत की स्वीकृति प्राप्त किये बिना भी कार्य करने के विशेष अधिकार होंगे। हेस्टिंग के बाद मेकफर्सन ने 1785 से 1786 ई. में 21 माह तक कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। सितम्बर 1786 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसने सामान्यतः अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया। इस नीति के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य स्थापना की दिशा में किये जा रहे कार्य में अवरोध उत्पन्न हो गया। 1793 ई. में सर जॉन शोर को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने भी अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण किया। 1795 ई. में हैदराबाद के निजाम एवं मराठों के बीच खरदा का युद्ध हुआ। निजाम ने कम्पनी से सैनिक सहायता मांगी किंतु कम्पनी ने देशी राज्यों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप करने तथा निजाम कोे सहायता देने से इन्कार कर दिया। इस कारण निजाम मराठों से परास्त हो गया और उसे मराठों से अपमानजनक शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी। अहस्तक्षेप की नीति के काल में नाना फड़नवीस के नेतृत्व में उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव फैलने लगा। इस अवधि में महादजी सिन्धिया की शक्ति में भी अपूर्व वृद्धि हुई तथा पेशवा की शक्ति का ह्रास हुआ।

    मार्क्विस वेलेजली तथा उसकी सहायक संधियाँ

    जिस समय मार्क्विस वेलेजली (1798-1805 ई.) को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया, उस समय कम्पनी की अहस्तक्षेप की नीति के कारण भारत में कम्पनी का प्रभाव क्षीण हो चला था। भारत की प्रमुख शक्तियाँ कम्पनी का विरोध कर रहीं थी। मैसूर का शासक टीपू, जिसने कार्नवालिस के समय अँग्रेजों से परास्त होकर श्रीरंगपट्टम की सन्धि की थी, अब श्रीरंगपट्टम की सन्धि का अपमान का बदला लेने की तैयारी कर रहा था। हैदराबाद का निजाम भी अँग्रेजों से नाराज था, क्योंकि मराठों के विरुद्ध हुए युद्ध में अँग्रेजों ने उसकी कोई सहायता नहीं की थी। मराठे भी दक्षिण में अँग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभाव को समाप्त करने की तैयारी कर रहे थे। भारत में नियुक्ति के समय वेलेजली की आयु 37 वर्ष थी। वह सामा्रज्यवादी, महत्वाकांक्षी तथा अत्यंत कूटनीतिज्ञ व्यक्ति था। कम्पनी विस्तार के विषय में उसकी तुलना उसके पूर्ववर्ती क्लाइव एवं वारेन हेस्टिंग्ज तथा पश्चवर्ती लार्ड डलहौजी से की जा सकती है। वेलेजली ने सहायक संधियों के माध्यम से हैदराबाद के निजाम, अवध के नवाब, मराठों के पेशवा, राजपूताने के अलवर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर और त्रावणकोर के राजा सहित अनेक राजाओं और नवाबों पर कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित की।

    अहस्तक्षेप की नीति का परित्याग

    माना जाता है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट्ट ने लॉर्ड वेलेजली को आदेश दिये थे कि वह भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करे तथा अमरीका के स्वतंत्रता संग्राम में इंग्लैण्ड ने जो प्रतिष्ठा खोई है, उसे भारत में साम्राज्य विस्तार कर पुनः प्राप्त करे। भारत में कम्पनी की सत्ता स्थापित करने के लिए फ्रांसीसियों के प्रभाव को समाप्त करना आवश्यक था। इसलिए लॉर्ड वेलेजली ने भारत आते ही पिट्स इण्डिया एक्ट की धारा 34 का अर्थ बताते हुए कहा कि- 'इस धारा के शब्दों अथवा इसकी भावना से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यह उचित और न्यायसंगत साधनों से राज्य विस्तार के विरुद्ध है।'

    सहायक सन्धि प्रथा से पूर्ववर्ती संधियाँ

    लॉर्ड वेलेजली भारत में कम्पनी राज्य का विस्तार करने के दृढ़ संकल्प के साथ आया था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारतीय राज्यों पर कम्पनी के आधिपत्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करना आवश्यक था। इसलिए वेलेजली ने सहायक सन्धि प्रथा को जन्म दिया। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि यह वेलेजली की मौलिक नीति नहीं थी। जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे ने लिखा है- 'वेलेजली ने मराठों की चौथ और सरदेशमुखी प्रणाली को देखकर ही इस नीति का निर्माण किया था।' कुछ इतिहासकार फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले को इस नीति का जन्मदाता मानते हैं, क्योंकि उसने भारतीय नरेशों से उपहार और भेंट आदि ग्रहण करके उन्हें सैनिक सहायता देने की प्रथा आरम्भ की थी। अल्फ्रेड लॉयल के अनुसार 1765 ई. से 1801 ई. के मध्य चार चरणों में सहायक सन्धि प्रथा का क्रमिक विकास हुआ-

    (1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतीय शासकों के साथ की गई संधियों के पहले चरण में, कम्पनी अपने मित्र भारतीय शासक को आवश्यकता होने पर सैनिक सहायता देती थी और बदले में उससे एक निश्चित धनराशि प्राप्त करती थी। ऐसी सन्धियाँ 1765 ई. में अवध के साथ तथा 1768 ई. में निजाम के साथ की गईं।

    (2.) द्वितीय चरण में यह परिवर्तन किया गया कि कम्पनी से सन्धि करने वाले भारतीय शासक की सुरक्षा के लिए एक स्थायी सेना कम्पनी अपने ही क्षेत्र में रखने का आश्वासन देती थी और उसके बदले में उस भारतीय शासक से वार्षिक निश्चित धनराशि प्राप्त करती थी। कम्पनी की सेना को मित्र राज्य की सीमा में नहीं रखकर कम्पनी राज्य की सीमा में रखा जाता था। वारेन हेस्टिंग्ज ने 1773 ई. में अवध के नवाब से ऐसी ही सन्धि की थी तथा अवध के नवाब ने रोहिल्लों के विरुद्ध युद्ध में कम्पनी की इस सेना का प्रयोग किया था।

    (3.) आगे चलकर तीसरे चरण में, कम्पनी ने अपनी सेना को सन्धि करने वाले राज्य की सीमा में ही नियुक्त करना आरम्भ कर दिया, जिस राज्य की सुरक्षा का दायित्व कम्पनी अपने ऊपर लेती थी। 1798 ई. में वेलेजली ने निजाम के साथ इसी प्रकार की सन्धि की और निजाम से इस सेना का वार्षिक व्यय लेना निश्चित किया।

    (4.) संधियों के चौथे चरण में, कम्पनी सन्धि करने वाले राज्य से, सेना का खर्च निश्चित धन के रूप में लेने के स्थान पर राज्य का निश्चित आय का भूभाग स्थायी रूप से अपने अधिकार में रखने लगी। इस प्रकार की सन्धि 1801 ई. में अवध के नवाब से की गई। उससे गोरखपुर, इलाहाबाद, कानपुर, फर्रूखाबाद, इटावा, बरेली और मुरादाबाद के जिले प्राप्त किये गये।

    सहायक संधि प्रथा के आविष्कार का वास्तविक उद्देश्य

    वेलेजली की सहायक सन्धि की प्रथा, उपरोक्त क्रम में पांचवा चरण कही जा सकती है। क्योंकि उसकी नीति उपर्युक्त समस्त चरणों से थोड़ी भिन्न थी। उसके पूर्व की गई सन्धियों के समय कम्पनी का उद्देश्य सीमित था। वह कम-से-कम खर्च में अपने क्षेत्रों की सुरक्षा के उपाय खोज रही थी, जिसे सुरक्षा घेरे की नीति कहा गया है। अर्थात् कम्पनी के क्षेत्रों के चारों ओर मित्र राज्यों का सुरक्षा घेरा स्थापित किया गया। इसलिए सन्धि करने वाले राज्य की स्वतंत्रता तथा उसकी सार्वभौम सत्ता को कम करने का प्रयास नहीं किया गया था, जबकि वेलेजली की सहायक सन्धि प्रथा का उद्देश्य सन्धि करने का प्रयास नहीं था, अपितु सन्धि करने वाले राज्य पर कम्पनी के आधिपत्य को थोपना तथा उस राज्य की शासन व्यवस्था को कम्पनी के नियंत्रण में लाना था। अर्थात् इस प्रथा का उद्देश्य कम्पनी द्वारा देशी राज्य की घेराबंदी करना था।

    जगन्नाथ प्रसाद मिश्र ने वेलेजली की सहायक सन्धि प्रथा की तुलना एक मकड़ी के जाले से करते हुए लिखा है- 'जिस प्रकार मकड़ी के जाले में फँसने के बाद कोई भी कीड़ा बाहर नहीं निकल पाता, उसी प्रकार जो भारतीय राज्य सहायक सन्धि के जाल में एक बार फँसा, वह कभी भी उससे बाहर नहीं निकल सका। जाले में बैठी हुई मकड़ी जैसे अपने जाल में फँसे शिकार को अपनी सुविधानुसार कभी भी दबोच सकती है, उसी प्रकार कम्पनी ने भी, जब भी आवश्यक समझा, भारतीय राज्य पर अपना फंदा कड़ा कर दिया।' जगन्नाथ प्रसाद मिश्र के उक्त कथन से स्पष्ट है कि वेलेजली की सहायक सन्धि प्रथा, उसके पहले के अधिकारियों द्वारा की जा रही संधियों से नितांत भिन्न थी।

    सहायक सन्धि प्रथा का जन्म

    सहायक सन्धि की शर्तें

    वेलेजली ने देशी राज्यों के शासकों के साथ अलग-अलग सहायक सन्धियाँ कीं। इन संधियों की अधिकांश शर्तें एक जैसी थीं। सहायक सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) सैद्धांतिक रूप से सहायक संधि, कम्पनी और सम्बन्धित राज्य के बीच समानता के आधार पर होती थी किंतु वास्तव में देशी राज्य के शासक को कम्पनी की अधीनस्थ मित्रता स्वीकार करनी पड़ती थी।

    (2.) देशी राज्य के वैदेशिक मामलों पर कम्पनी का नियंत्रण हो जाता था। देशी राज्य, कम्पनी सरकार की अनुमति के बिना न तो किसी अन्य शासक से युद्ध कर सकता था और न किसी प्रकार का राजनैतिक समझौता कर सकता था। इस प्रकार सन्धि करने वाले राज्य की बाह्य स्वतंत्रता समाप्त हो जाती थी।

    (3.) देशी राज्य को अँग्रेजों के अतिरिक्त अन्य किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकरी में रखने अथवा निवास करने की अनुमति देने का अधिकार नहीं होता था। इस शर्त का मुख्य उद्देश्य देशी राज्यों में फ्रांसीसियों के प्रभाव को समाप्त करना था।

    (4.) देशी राज्य को अपने व्यय पर राज्य में कम्पनी की एक सेना रखनी पड़ती थी। यदि कोई राज्य इस सहायक सेना के व्यय के लिए धन नहीं दे सकता, तो उस धनराशि के बराबर आय का अपना भू-भाग कम्पनी को सौंपना पड़ता था।

    (5.) देशी राज्य में कम्पनी की तरफ से एक अधिकारी नियुक्त किया जाता था जिसे रेजीडेन्ट अथवा पॉलिटिकल एजेन्ट कहते थे। वह राज्य की राजधानी में अथवा उसके निकट रहता था। वह राज्य तथा कम्पनी के बीच कड़ी का काम करता था तथा यह देखता था कि राज्य के द्वारा संधि की शर्तों का पालन किया जा रहा है अथवा नहीं! आगे चलकर ये अधिकारी देशी राज्य में उत्तराधिकार के मामलों में अनाधिकार हस्तक्षेप करने लगे तथा अपने इच्छित व्यक्ति को गद्दी पर बैठाने लगे।

    (6.) इस सन्धि को स्वीकार करने वाले देशी राज्य को कम्पनी यह आश्वासन देती थी कि यदि उस राज्य पर कोई अन्य शक्ति आक्रमण करती है तो कम्पनी उस राज्य की रक्षा करेगी। यदि उस राज्य में आन्तरिक विद्रोह हो जाता है तो कम्पनी उस विद्रोह को समाप्त करने में सहयोग करेगी।

    (7.) कम्पनी अपने मित्र राज्य को यह आश्वासन देती थी कि कि उस राज्य के आन्तरिक प्रशासन में कभी हस्तक्षेप नहीं करेगी।

    (8.) दोनों पक्ष घनिष्ठ मित्रता बनाये रखने का वादा करते थे तथा एक पक्ष के मित्र या शत्रु, दूसरे पक्ष के मित्र या शत्रु मानने की बात स्वीकार करते थे।

    वेलेजली के बाद जब लॉर्ड हेस्टिंग्ज (1813-1823 ई.) भारत आया तब उसने देखा कि प्रत्येक देशी राज्य किसी न किसी शक्ति को (अर्थात् मराठों, मुगलों, फ्रांसिसियों, डचों आदि को) खिराज अर्थात् वार्षिक कर चुकाता है। अतः हेस्टिंग्ज ने सहायक संधि में एक और शर्त जोड़ दी कि कम्पनी से सहायक संधि करने वाले देशी राज्य के द्वारा अनिवार्य रूप से खिराज की वह राशि कम्पनी को चुकानी पड़ेगी जो उसके पूर्ववर्ती शक्ति को चुकाई जाती रही है।

    सहायक सन्धि प्रथा की समीक्षा

    सहायक संधि की प्रथा भारत के देशी राज्यों के लिये विष तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिये अमृत सिद्ध हुई। इसके निम्नलिखित प्रमुख परिणाम निकले-

    (1.) देशी राज्यों का शोषण: वेलेजली द्वारा आरम्भ की गई सहायक सन्धि प्रथा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साम्राज्य विस्तार के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। देशी राज्य इन संधियों के मकड़ जाल में फंसकर अपनी सम्प्रभुता गंवा बैठे। अँग्रेजों ने शासन की जिम्मेदारी तो भारतीय राज्यों पर ही रखी किंतु उन्हें संरक्षण देने के नाम पर उनका भरपूर शोषण किया। इस प्रकार कम्पनी ने भारतीय राज्यों पर, भारतीय राज्यों के शासन तंत्र के माध्यम से शासन किया।

    (2.) बिना किसी व्यय के सेना का निर्माण: उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट की शक्ति में तेजी से वृद्धि हो रही थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भय था कि कहीं नेपोलियन भारत पर आक्रमण न कर दे। अतः कम्पनी अपनी सैनिक शक्ति में विस्तार करना चाहती थी किन्तु कम्पनी के लिये विशाल सेना का खर्च वहन कर पाना सम्भव नहीं था। वेलेजली ने बड़ी चतुराई से यह काम कर लिया। उसने सहायक प्रथा के द्वारा कम्पनी की सेना में वृद्धि भी कर ली और उसका खर्च भी कम्पनी को वहन नहीं करना पड़ा। यद्यपि भारतीय राज्यों में कम्पनी की सेना उस राज्य की सुरक्षा के लिए रखी जाती थी, किन्तु इस सेना का प्रयोग करने का अधिकार केवल कम्पनी के पास था। इतना ही नहीं, आवश्यकता होने पर कम्पनी उस सेना का प्रयोग उस राज्य के विरुद्ध भी करती थी। सहायक संधियों का आविष्कार करने से पहले, कम्पनी की सेना कम्पनी राज्य के भीतर रहती थी तथा उसे एक स्थान से दूरस्थ स्थान पर भेजने में बड़ी कठिनाई होती थी। सहायक संधियों के बाद कम्पनी की सेना सन्धि करने वाले हर राज्य में नियुक्त रहती थी। इस कारण उन्हें किसी भी निकटवर्ती क्षेत्र में बड़ी आसानी से भेजा जाने लगा। वेलेजली ने बाद में स्वीकार किया था कि 22,000 सेना को कम्पनी की आर्थिक स्थिति पर कोई प्रभाव डाले बिना किसी भी भारतीय राज्य के विरुद्ध भेजा जा सकता है।

    (3.) सैनिक सीमाओं का विस्तार: सहायक सन्धियों के सफल रहने से कम्पनी की सैनिक सीमाएँ उसकी राजनैतिक सीमाओं से भी आगे निकल गईं। 1805 ई. में कम्पनी की राजनैतिक सीमा बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा कुछ गिने-चुने स्थानों तक सीमित थी किन्तु उसकी सैनिक सीमा उत्तर भारत में अवध व रोहिलखण्ड तक तथा दक्षिण में कर्नाटक तक फैल गई। इस कारण कम्पनी की राजनैतिक सीमाएँ पूर्णतः सुरक्षित हो गईं। इस व्यवस्था से कम्पनी को अपनी राजनैतिक सीमाओं के और अधिक विस्तार का अवसर मिल गया। निजाम के साथ सहायक सन्धि हो जाने के बाद वेलेजली के लिए मैसूर विजय करना सरल हो गया। इसी प्रकार अवध के साथ सन्धि होने के बाद रोहिलखण्ड, आगरा तथा दिल्ली पर सरलता से अधिकार कर लिया गया।

    (4.) देशी राज्यों के क्षेत्रों को हड़पने में सुविधा: कम्पनी द्वारा जिन देशी राज्यों से सहायक सन्धियाँ की गईं, उनसे सैनिक व्यय के नाम पर विस्तृत-भू-भाग स्थायी रूप से कम्पनी ने अपने अधिकार में ले लिये। इससे कम्पनी का साम्राज्य विस्तार होता चला गया। जो देशी राज्य सहायक सेना का खर्च समय पर नहीं चुका पाता था, कम्पनी उस राज्य के उपजाऊ और सम्पन्न प्रदेशों को स्थायी रूप से अपने अधीन कर लेती थी। राज्य के उपजाऊ हिस्से कम्पनी द्वारा हड़प लिये जाने के बाद, देशी राज्यों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि वे अपना शासन भी सुचारू रूप से नहीं चला सके।

    (5.) राज्यों के शासन पर अधिकार: राज्यों में अव्यवस्था फैलने पर कम्पनी ने राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया और राज्यों का वित्तीय प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। देशी शासक इतने सहम गये कि उन्हें कम्पनी के अधिकारियों से यह पूछने तक का साहस नहीं होता था कि वे उनके राज्य में कितना राजस्व एकत्रित कर रहे हैं और उसे कहाँ खर्च कर रहे हैं।

    (6.) देशी राज्यों में अलगाव: सन्धि करने वाले देशी राज्यों की विदेश नीति पर कम्पनी का नियंत्रण हो जाने से प्रत्येक देशी राज्य एक दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। इन अलग-थलग पड़े राज्यों का कम्पनी के रेजीडेण्ट्स और पोलिटिकल एजेण्ट्स ने जमकर शोषण किया।

    (7.) फ्रांसीसियों का दमन: इन सन्धियों के फलस्वरूप देशी राज्यों द्वारा फ्रान्सीसी आदि विदेशी शक्तियों से संधि कर लिये जाने की आशंका समाप्त हो गई। समस्त देशी राज्यों से फ्रांसीसियों को निकला दिया गया जिससे भारतीय राज्यों में फ्रांसीसियों का अस्तित्त्व समाप्त हो गया। इसी प्रकार ईरानियों एवं सिंधी मुसलमानों को भी देशी राज्यों की सेवाओं से निकाल दिया गया जो उत्तर भारत के राज्यों में उत्पातों की जड़ समझे जाते थे।

    (8.) देशी राज्यों की सैनिक शक्ति का क्षरण: देशी रा�

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  • ब्रिटिश भारत में जमींदारी, रैय्यतवाड़ी और महलवाड़ी व्यवस्थाएँ

     21.08.2017
    ब्रिटिश भारत में जमींदारी, रैय्यतवाड़ी और महलवाड़ी व्यवस्थाएँ

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 7



    भारत में भू-राजस्व व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    भारत में वैदिक काल से ही राजा को प्रजा से भोग प्राप्त करने का अधिकार था। भोग, किसी भी प्रकार के उत्पादन का प्रायः छठा अंश होता था जो प्रजा से राजन्य को मिलता था और राजन्य उसके बदले में अपनी प्रजा की शत्रुओं से सुरक्षा करता था तथा प्रजा की आध्यात्मिक उन्नति के प्रयास करता था। प्रान्तीय शासक जो कि राजन्य के लिये भोग एकत्र करते थे भोगिक अथवा भोगपति कहलाते थे। यही वैदिक व्यवस्था आगे चलकर भू-राजस्व व्यवस्था के रूप में विकसित हुई।

    हिन्दू शासकों के काल में भू-राजस्व वसूली व्यवस्था

    गुप्तकाल में राज्य की आय का मुख्य साधन भूमिकर था, जिसे भाग, भोग या उद्रेग कहते थे। यह उपज का 1/6 भाग अर्थात् लगभग 16.6 प्रतिशत होता था। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन में राज्य की आय का प्रधान साधन भूमि-कर था। राज्य द्वारा किसानों से उपज का चौथा भाग अर्थात् 25 प्रतिशत कर के रूप में लिया जाता था। विशिष्ट परिस्थितियों में केवल आठवां भाग अर्थात् 12.5 प्रतिशत कर के रूप में लिया जाता था। सम्राट को किसानों से पशु भी भेंट के रूप में मिलते थे। नगरों में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के विक्रय-मूल्य का दसवां भाग राज्य को कर के रूप में मिलता था। हर्षवर्धन भी गुप्तों की भांति अपनी प्रजा से उपज का केवल छठा भाग कर के रूप में लेता था। राजपूत शासक भी उपज का 1/6 से लेकर 1/4 अंश भू-राजस्व के रूप में प्राप्त करते रहे।

    दिल्ली सल्तनत काल में भू-राजस्व वसूली व्यवस्था

    दिल्ली सल्तनत काल में कुतुबुद्दीन ऐबक ने लगान-सम्बन्धी पुराने नियम ही चालू रखे किंतु उसके बाद के मुस्लिम शासकों ने भू-राजस्व लगभग दो से तीन गुना तक बढ़ा दिया। राजस्व वसूली का काम हिन्दू अधिकारी ही करते रहे। अलाउद्दीन खिलजी के शासन में किसान की फसल में से 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य का होता था। किसानों को चारागाह तथा मकान का भी कर देना पड़ता था। उसने लगान वसूली के लिए सैन्य अधिकारी नियुक्त किये तथापि वह पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका। लगान वसूली का कार्य अब भी हिन्दू मुकद्दम, खुत तथा चौधरी करते थे जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। सुल्तान ने उनके समस्त विशेषाधिकारों को समाप्त करके उनका वेतन निश्चित कर दिया। खुत तथा बलहर अर्थात् हिन्दू जमींदारों पर इतना अधिक कर लगाया गया कि वे निर्धन हो गये। मुहम्मद बिन तुगलक ने दोआब पर कर में भारी वृद्धि की। बरनी के अनुसार बढ़ा हुआ कर, प्रचलित करों का दस तथा बीस गुना था। (प्रचलित लगान दर पर दस से बीस गुनी वृद्धि करना संभव नहीं था। बरनी की इस कटु आलोचना का कारण यह था कि बरनी उलेमा वर्ग का था जिसके साथ मुहम्मद बिन तुगलक की बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं थी। बरनी, बरान का रहने वाला था जिसे दो-आब के कर का शिकार बनना पड़ा था। इसलिये बरनी में मात्भूमि के प्रेम का आवेश था परन्तु बरनी द्वारा की गई कटु आलोचना निराधार नहीं थी। करों में अवश्य ही इतनी वृद्धि की गई थी कि हिन्दू किसानों के पास उपज का मामूली सा अंश भी न बच सके।) किसानों पर भूमि कर के अतिरिक्त घरी अर्थात गृह-कर तथा चरही अर्थात् चरागाह-कर भी लगाया गया। प्रजा को इन करों से बड़ा कष्ट हुआ। शेरशाह सूरी ने पैदावार का एक तिहाई अर्थात् 33 प्रतिशत हिस्सा लगान के रूप में लेना निश्चित किया।

    मुगल काल में भू-राजस्व वसूली व्यवस्था

    मुगल काल में भू-राजस्व उपज का 1/2 अर्थात् 50 प्रतिशत भू-राजस्व के रूप में देना पड़ता था। किसानों द्वारा घोर परिश्रम करने के बाद फसल तैयार होती थी, किन्तु भू-राजस्व एवं अन्य करों तथा चुंगियों को चुकाने के बाद उनके पास इतना अनाज बड़ी कठिनाई से बचता था कि वे अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल सकें। जहांगीर तथा शाहजहां के समय में भी यही व्यवस्था चलती रही। औरंगजेब ने अकबर के समय के लगान (भू-राजस्व) निर्धारण का तरीका बदल दिया। औरंगजेब से पहले, सरकारी अधिकारी लगान वसूल करते थे किन्तु औरंगजेब ने किसानों से लगान वसूलने के लिये ठेकेदारी प्रथा आरम्भ की। ठेकेदार, किसानों से मनमाना लगान वसूलने लगे। इससे किसानों की दशा बिगड़ गई। दक्षिण के युद्धों में अत्यधिक धन की हानि होने से औरंगजेब ने किसानों एवं जनसाधारण पर कर बढ़ा दिये। इससे मुगल सल्तनत में असन्तोष बढ़ गया और विद्रोह की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। स्वयं औरंगजेब ऐसी स्थिति देखकर कहा करता था कि उसकी मृत्यु के बाद कैसा प्रलय आयेगा?

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल में दीवानी के अधिकार

    बक्सर युद्ध के बाद 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल प्रांत की दीवानी के अधिकार प्राप्त किये जिससे भू-राजस्व वसूली का दायित्व कम्पनी का हो गया। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समय में भी भू-राजस्व ही कम्पनी की आय का मुख्य स्रोत बन गया। जिस समय कम्पनी ने यह दायित्व ग्रहण किया, उस समय बंगाल में राजस्व के तीन स्रोत थे-

    (1.) माल: इसमें भू-राजस्व तथा नमक-कर सम्मिलित थे।

    (2.) सेर: इसमें आयात-निर्यात-कर तथा पथ-कर सम्मिलित थे।

    (3.) बाजी-जमा: इसमें आबकारी-कर, जुर्माना तथा अन्य कर सम्मिलित थे। उपरोक्त तीनों स्रोतों में भू-राजस्व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वह राज्य की आय का 80 प्रतिशत था। मुगल काल से बंगाल में भू-राजस्व की वसूली के लिये सुदृढ़ व्यवस्था की गई थी जो कम्पनी का शासन प्रारम्भ होने तक ज्यों की त्यों थी।

    भू-राजस्व वसूली के प्रमुख अधिकारी

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त करने के समय भू-राजस्व वसूली के प्रमुख अधिकारी इस प्रकार से थे-  

    कानूनगो: मुगल काल में भू-अभिलेखों को तैयार करने तथा उनके रख-रखाव का काम कानूनगो करता था। कानूनगो का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वह जमींदारों के कार्यों पर दृष्टि रखता था, राजकोष में नियमित राजस्व जमा करता था तथा किसानों के हितों का ध्यान रखता था। मुगल सल्तनत के पतन के साथ ही कानूनगो का पद वंशानुगत हो गया। फलस्वरूप अब वह न तो राज्य के हितों की देखभाल करता था और न किसानों के हितों का ध्यान रखता था, वरन् जमींदारों के साथ मिलकर किसानों पर अत्याचार करने लगा।

    आमिल: मुगलकालीन बंगाल में भू-राजस्व की वसूली आमिल करता था।

    फौजदार: सीमान्त क्षेत्रों में जमींदारों से वसूली फौजदार करता था। मुगलों के बाद यह कार्य ऐसे व्यक्ति करने लगे जो स्थानीय क्षेत्रों में प्रभाव रखते थे। फलस्वरूप दूरस्थ क्षेत्रों का भू-राजस्व सीमित होता गया तथा किसान भूमि के वंशानुगत मालिक हो गये।

    कम्पनी द्वारा राजस्व वसूली व्यवस्था में परिवर्तन

    नायब दीवान: 1765 ई. में कम्पनी ने जब बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त किया, तब कम्पनी केवल भू-राजस्व प्राप्त करने की इच्छुक थी, न कि भूमि की स्थिति के बारे में चिन्तित थी। इसलिये कम्पनी ने भू-राजस्व की वसूली का कार्य दो नायब दीवानों को सौंप दिया। दोनों नायब दीवान भू-राजस्व वसूल करके, नवाब के कोष में रुपया जमा करा देते थे और नवाब के कोष से यह राशि कम्पनी के कोष में स्थानान्तरित कर दी जाती थी। ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, कम्पनी की माँग में वृद्धि होती गई और वह भू-राजस्व की वसूली से सन्तुष्ट नहीं हुई। कम्पनी समझती थी कि नायब दीवानों द्वारा भू-राजस्व की रकम बीच में ही रख ली जाती है तथा किसान भी अपने हिस्से से अधिक का लगान अपने पास रख लेते हैं।

    जिला निरीक्षक: 1769 ई. में कम्पनी द्वारा भू-राजस्व की वसूली के निरीक्षण के लिए जिला निरीक्षकों की नियुक्ति की गई। जिला निरीक्षक स्वयं भ्रष्ट थे। अतः यह व्यवस्था भी पर्याप्त प्रतीत नहीं हुई।

    भू-राजस्व नियंत्रण परिषदें: कम्पनी द्वारा 1770 ई. में दो भू-राजस्व नियंत्रण परिषदें स्थापित की गईं। एक बंगाल के लिए, जिसका मुख्यालय मुर्शिदाबाद में रखा गया और दूसरी बिहार के लिए, जिसका मुख्यालय पटना रखा गया। ये दोनों परिषदें नायब दीवानों के कार्यों का निरीक्षण करती थीं।

    भू-राजस्व नियन्त्रण समिति:

    भू-राजस्व नियंत्रण परिषदों के काम का निरीक्षण करने के लिये कलकत्ता में एक भू-राजस्व नियन्त्रण समिति स्थापित की गई।

    कलक्टर: 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज ने भू-राजस्व प्रशासन में क्रांतिकारी सुधार लाते हुए दोनों नायब दीवानों का पद समाप्त कर अँग्रेजी निरिक्षकों को जिलों में राजस्व वसूल करने का काम सौंपा। इन निरीक्षकों को कलेक्टर (संग्राहक) पदनाम दिया गया। कलेक्टर की सहायता के लिए भारतीय दीवान नियुक्त किये गये। कलेक्टर का मुख्य कार्य लगान वसूल करना, लगान-पंजिका तैयार करना तथा दीवानी न्याय प्रदान करना था। सूबे का भू-राजस्व प्रशासन, गवर्नर तथा उसकी कौंसिल के हाथ में केन्द्रित कर दिया गया तथा इस कार्य के लिए उसे रेवेन्यू बोर्ड (राजस्व मण्डल) कहा जाने लगा। बोर्ड की सहायता के लिए एक भारतीय अधिकारी की नियुक्ति की गई जो राय-रायन कहलाता था।

    पाँच वर्षीय बंदोबस्त

    वारेन हेस्टिंग्स (1772-85 ई.) ने 1772 ई. में लगान वसूली के लिए एक वर्षीय समझाौता प्रणाली निरस्त करके, पाँच वर्षीय समझौता प्रणाली लागू की। इस प्रणाली के अंतर्गत अधिकतम बोली लगाने वाले व्यक्ति को पाँच वर्ष के लिए लगान वसूली का कार्य सौंपा जाता था। सामान्यतः इस कार्य के लिए जमींदारों को प्राथमिकता दी जाती थी।

    प्रांतीय परिषदों की स्थापना

    वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा स्थापित उपरोक्त व्यवस्था विशेष कारगर सिद्ध नहीं हुई। अतः नवम्बर 1773 में गवर्नर तथा उसकी कौंसिल ने एक नई योजना स्वीकृत की जो दो भागों में थी- प्रथम भाग की योजना अस्थायी थी जिसे तुरन्त लागू करना था तथा दूसरे भाग की योजना स्थायी थी, जिसे भविष्य में लागू करना था। अस्थाई योजना को 1774 ई. में लागू कर दिया गया। इस योजना के अनुसार बंगाल प्रेसीडेन्सी को छः डिवीजनों में विभक्त किया गया- कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, पटना, बर्दवान, दीनाजपुर और ढाका। प्रत्येक डिवीजन में एक प्रान्तीय परिषद स्थापित की गई जिसमें कम्पनी के पाँच वरिष्ठ अधिकारी होते थे। पाँच सदस्यों की इस परिषद में दो सदस्य गवर्नर की कौंसिल के सदस्य होते थे। परिषद को सहायता देने के लिये एक भारतीय अधिकारी नियुक्त किया गया, जो परिषद के लिए दीवान के रूप में कार्य करता था। कलेक्टरों को वापिस बुला लिया गया तथा उन्हें प्रान्तीय परिषदों के मुख्यालायों पर नियुक्त करके उन्हें इन परिषदों को सहायता देने को कहा गया। कलेक्टरों के स्थान पर भारतीय राजस्व अधिकारी नियुक्त किये गये जिन्हें नायब कहा जाता था। ये नायब भू-राजस्व वसूल करते थे और दीवानी अदालतों की अध्यक्षता करते थे।

    एक वर्षीय व्यवस्था

    वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 ई. में जो पाँच वर्षीय समझौता प्रणाली लागू की थी, उसकी अवधि 1777 ई. में समाप्त हो रही थी। बंगाल कौंसिल में इस बारे में भारी मतभेद उत्पन्न हो गये कि भू-राजस्व व्यवस्था की क्या प्रणाली हो? अतः कम्पनी के संचालकों ने कौंसिल द्वारा अन्तिम निर्णय लेने तक एक वर्षीय बन्दोबस्त लागू करने को कहा। इस कारण 1778 ई. से नीलामी पुनः प्रतिवर्ष होने लगी जिससे कम्पनी को भू-राजस्व की हानि हुई।

    प्रांतीय परिषदों की समाप्ति तथा राजस्व समिति की स्थापना

    1781 ई. में योजना का स्थायी भाग लागू किया गया। प्रान्तीय परिषदें समाप्त करके कलेक्टरों को वापिस केन्द्र में बुला लिया गया। जिलों का भू-राजस्व प्रशासन नायबों के पास ही रखा गया। रंगपुर, चित्रा और भागलपुर आदि कुछ जिलों में फिर से ब्रिटिश कलेक्टरों की नियुक्ति की गई। केन्द्र में चार सदस्यों की नई राजस्व समिति बनाई गई जिसमें कम्पनी के सर्वोच्च अधिकारी रखे गये। उनकी सहायता के लिए एक भारतीय दीवान रखा गया। राय-रायन के पद को बनाये रखा गया किन्तु वह दीवान के कार्र्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। राजस्व समिति के सदस्यों को स्थिर वेतन देने के स्थान पर, प्राप्त होने वाले भू-राजस्व का दो प्रतिशत देना तय किया गया। समिति के अध्यक्ष को अधिक हिस्सा दिया जाता था। गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल इस राजस्व समिति से निरन्तर संपर्क बनाये रखती थी ताकि समय-समय पर निर्देश दे सके तथा उसका निरीक्षण कर सके।

    जिलों में कलक्टरों की पुनः नियुक्ति

    उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि अभी तक कम्पनी भू-राजस्व व्यवस्था के लिए रास्ता खोज रही थी। इसीलिए हेस्टिंग्ज एक के बाद दूसरा प्रयोग करता रहा, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली। फिर भी, राजस्व मण्डल की स्थापना तथा कलेक्टर के पद का सृजन, भू-राजस्व के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कदम थे। फरवरी 1785 में वारेन हेस्टिंग्ज के जाने के बाद मेकफर्सन ने कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। उसके समय में कलेक्टरों को वापिस जिलों में भेज दिया गया तथा जिलों का पुनर्गठन कर उन्हें राजस्व मण्डल का नाम दिया गया। गवर्नर जनरल की कौंसिल के सदस्य को इसका अध्यक्ष एवं पांचवा सदस्य नियुक्त किया गया।

    शिरेस्तेदार की नियुक्ति

    जुलाई 1786 में मुख्य शिरेस्तेदार का नया पद सृजित किया गया, जो कानूनगो से भू-राजस्व के अभिलेख एवं सूचनाएँ एकत्रित करता था।

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  • ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

     21.08.2017
    ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 8


    ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

    ब्रिटिश सरकार की भू-राजस्व कर नीति ने भारत में, न केवल जमींदार एवं भूमिहीन किसान जैसे नये सामाजिक-आर्थिक वर्गों को जन्म दिया, अपितु देश की आर्थिक स्थिति को भी पूँजीवादी हितों के अनुरूप ढाल दिया। इस नीति ने कृषि-उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डाला। अँग्रेजों के आने के पहले किसानों का शोषण तो होता था किंतु कृषि-उत्पादन में आत्म-निर्भरता थी। अँग्रेजों के आने के बाद कृषि-उत्पादन में भारी गिरावट आई। इस गिरावट के लिये अँग्रेजों की कृषि नीति उत्तरदायी थी।

    कृषि पर बढ़ता बोझ

    1813 ई. तक ब्रिटिश कम्पनी ने व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रखा। इस कारण शिल्पी, दस्तकार एवं कारीगर बड़ी संख्या में बे-रोजगार होकर शहरों से गाँवों की ओर जाने को विवश हुए, जहाँ उन्होंने कृषि को जीविकोपार्जन का साधन बनाया। इस प्रकार कृषि पर निर्भर रहने वालों की संख्या बढ़ गई जिससे भूमि का विभाजन और उपविभाजन आरम्भ हुआ। भूमि के विभाजन से भूमि की उपलब्धता, कृषि-उत्पादन और कृषि में लगे हुए लोगों की संख्या के बीच असन्तुलन पैदा हो गया।

    कृषि उत्पादन में गिरावट

    भूमि पर आश्रित लोगों की संख्या बढ़ने से कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, क्योंकि भूमि सीमित थी। अँग्रेजों ने, इस गिरावट के लिए भारतीय कृषि भूमि की अनुर्वरता और कृषक की अकुशलता को उत्तरदायी ठहराया किन्तु वास्तव में कृषि-उत्पादन की कमी का कारण भूमि की अनुर्वरता अथवा कृषक की अकुशलता न होकर, कृषि पर बढ़ता हुआ कामगरों का बोझ, कृषि हेतु सिंचाई के साधनों का अभाव तथा किसान के पास पूंजी का अभाव होना था। ज्यों-ज्यों ब्रिटिश सत्ता का विस्तार होता गया, सरकार का खर्च बढ़ता गया और लगान में वृद्धि की जाती रही। लगान चुकाने में असमर्थ रहने पर बहुत से किसान खेती के कार्य से अलग हो जाते थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त होने से पहले बंगाल के नवाब मीर जाफर द्वारा 1764-65 ई. में 8.18 लाख पौंड का लगान वसूल किया गया था किंतु कम्पनी को दीवानी का अधिकार प्राप्त होने के बाद 1765-66 ई. में 14.70 लाख पौंड लगान के रूप में एकत्र किये गये। एक बार लगान-वृद्धि का जो क्रम चालू हुआ, वह चलता ही रहा। 1826 ई. तक लगान की राशि 24.20 लाख पौंड और 1857 ई. में 36 लाख पौंड तक पहुँच गई।

    ब्रिटिश सरकार ने लगान की दर काफी ऊँची रखी। उदारहण के तौर पर स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत यह दर 80 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त के अन्तर्गत आरम्भ में यह दर 66 प्रतिशत रखी गई किन्तु उत्पादन में कमी होने के कारण 45 प्रतिशत कर दी गई। लगान की इस अमानवीय व्यवस्था ने उत्पादन को महंगा बना दिया। इस कारण खेती पिछड़ गई और देश की आर्थिक व्यवस्था बिगड़ गई। किसानों की आर्थिक दुरावस्था गोरी सरकार के लिये राजनीतिक खतरा बन गई।

    लगान की अधिकता तथा कृषि उत्पादन के महँगेपन ने किसान को ऋण के भारी बोझ तले दबा दिया, जिससे वह कभी नहीं उबर सका। उसने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ऋण का सहारा लिया। लगान की बढ़ती हुई दर तथा किसान की सामाजिक आवश्यकताओं के कारण किसानों की ऋण-ग्रस्तता बढ़ती ही गई। ब्रिटिश सरकार ने किसानों की ऋण-ग्रस्तता का कारण, लगान की अधिकता नहीं बताकर, किसानों की फिजूलखर्ची व सामाजिक तथा पारिवारिक उत्सवों मेें धन फँूकने की आदत बताया, जो कि सत्य नहीं था। भारी लगान व साहूकार की मनमानी के कारण किसान ऋणों के बोझ से दबता ही चला गया।

    निरन्तर बढ़ती ऋण-ग्रस्तता के कारण किसानों की जमीन उसके हाथों से निकलती चली गई। साहूकार किसानों के ऋण के बदले में उनकी जमीनें हड़पने लगे। सरकार की ओर से इस प्रकार के हस्तान्तरण को रोकने के लिये कुछ कानून बनाये गये, जैसे- बंगाल काश्तकारी अधिनियम-1859, मद्रास काश्तकारी अधिनियम-1889, दक्कन कृषि सहायता अधिनियम, जो आगे चलकर बम्बई प्रेसीडेन्सी पर भी लागू किया गया, मध्य प्रदेश काश्तकारी अधिनियम-1898; आदि। ये कानून अधिक प्रभावी सिद्ध नहीं हुए और किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
    कृषि का वाणिज्यीकरण

    कृषि और कृषक की दशा बिगाड़ने के लिये ब्रिटिश सरकार की कृषि नीति ही नहीं अपितु औद्योगिक नीति भी जिम्मेदार थी। 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके मुक्त व्यापार नीति अपनाई गई। अब भारत केवल एक पूँजीवादी व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला देश ही नहीं था अपितु ब्रिटिश पूँजीपतियों के लिये एक मण्डी भी बन गया; जिसके कारण स्थानीय कुटीर उद्योग नष्ट हो गये। चूँकि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति उफान पर थी, अतः इंग्लैण्ड को अपने उद्योगों के लिये सस्ते माल की आवश्यकता थी, इस कारण भारत कच्चे माल का उत्पादन करने वाला देश बनकर रह गया। अब भारत को ब्रिटेन में बने माल की खपत करने वाले बाजार और कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले उपनिवेश की दोहरी भूमिका निभानी थी।

    भारत को अब केवल उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करना था, जिनकी इंग्लैण्ड के मिलों को एवं इंग्लैण्ड-वासियों को आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त भारत में पूंजीवादी व्यवस्था के बढ़ने के साथ-साथ नई लगान नीति के कारण किसान को अब नकद राशि की आवश्यकता थी। इसलिये अब किसान भी उन फसलों को उगाने के लिये विवश हुए जिनका बाजार में क्रय-विक्रय हो सके। जबकि इससे पहले किसान केवल उन्हीं फसलों को उगाता था जिनकी खपत स्थानीय स्तर पर होती थी। इस प्रकार उत्पादन के स्वरूप और प्रकृति में मूलभूत परिवर्तन हुए तथा भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण हो गया।

    नगदी फसलों की अवधारणा का विकास

    भारत में ब्रिटिश सत्ता स्थापित होने से पूर्व, उन जिन्सों का उत्पादन होता था जो कृषक परिवारों के दैनिक उपयोग के लिये आवश्यक थीं तथा जिनका प्रयोग विनिमय के लिये हो सकता था। ब्रिटिश पूंजीवाद के हस्तक्षेप से भारत का किसान केवल वे जिन्सें पैदा करने लगा जिनका देशी और विदेशी बाजार में अधिक मूल्य मिल सके। इस प्रकार कृषि के मूलभूत स्वरूप में परिवर्तन हो गया तथा अनेक स्थानों पर कुछ निश्चित फसलें उगाई जाने लगीं, जैसे- बंगाल में केवल जूट की खेती पर और पंजाब में केवल गेहूँ और कपास की खेती पर अधिक बल दिया गया। बनारस, बिहार, बंगाल, मध्य भारत तथा मालवा में अफीम के व्यापार के लिये पोस्त की खेती को बढ़ावा मिला। बर्मा में चावल की खेती बढ़ी। सरकार द्वारा इन कृषि उत्पादों को बढ़ाने के लिये किसानों को अग्रिम राशि भी दी जाती थी। 1853 ई. के बाद भारत में ब्रिटिश पूँजीपतियों द्वारा किये गये पूँजी निवेश के कारण नील, चाय, कॉफी, रबर आदि की खेती पर अधिक जोर दिया जाने लगा। भारत में यूरोपीय और ब्रिटिश पूँजीवाद की पहली पसन्द चाय, कॉफी, रबर और नील की खेती थी। इन फसलों के लिये उन्हें यूरोपीय बाजारों में अत्यधिक कीमत प्राप्त होती थी।

    (1.) नील की खेती : नील बागानों का कार्य निर्धन श्रमिकों से करवाया जाता था। उन्हें नील के बागानों में काम करने के लिये बलपूर्वक अग्रिम राशि दी जाती थी और फिर उन्हें बंधुआ श्रमिक बनाकर बागानों में काम करवाया जाता था। 1860 ई. में नील आयोग की रिपोर्ट आई जिसमें में कहा गया- 'रैयत ने पेशगी राशि चाहे अपनी इच्छा के विरुद्ध ली या खुशी से, वह कभी भी इसके बाद स्वतंत्र व्यक्ति नहीं रहा।' आयोग ने उन दिनों भारतीय गाँवों में प्रचलित इस कहावत का भी उल्लेख किया- 'अगर कोई नील के समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह सात पीढ़ियों तक स्वतंत्र नहीं हो सकता।' बिहार, आसाम और उत्तर प्रदेश के नील बागानों में श्रमिकों की स्थिति गुलामों जैसी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के परिणाम स्वरूप और बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण नील के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों को मुक्ति प्राप्त हुई।

    (2.) चाय-कॉफी के बागान :चाय और कॉफी के बागानों ने भी भारत में ब्रिटिश पूँजी निवेश को आकर्षित किया। इन बागानों में किसी प्रकार के श्रमिक कानून लागू नहीं थे। बागान मालिक, इन बागानों में काम करने वाले श्रमिकों का जी-भरकर शोषण करते थे। 1887 ई. में चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या लगभग 5 लाख थी। चाय-बागानों में काम करने हेतु श्रमिकों को लाने के लिये अत्यधिक छल-कपट किया जाता था तथा उनसे लुभावने वायदे किये जाते थे किन्तु जब वे एक बार बागानों में पहुँच जाते थे तो उन्हें बंदियों की तरह रखा जाता था। रायल कमीशन ऑन लेबर ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की है। इन श्रमिकों को निर्जन जंगलों में रखा जाता था जहाँ खाद्य पदार्थ नहीं मिलते थे और जो मिलते भी थे तो वे बहुत महँगे होते थे। इस कारण श्रमिक और उनके परिवार के लोग कुपोषण एवं घातक बीमारियों के शिकार होकर मर जाते थे परन्तु चाय बागानों के मालिकों को अपने लाभ के अतिरिक्त और किसी बात से मतलब नहीं था।

    (3.) जूट की खेती: यूरोप के कारखानों को जूट की बहुत बड़ी मात्रा में आवश्यकता थी इसलिये यूरोपीय और ब्रिटिश व्यापारियों ने जूट उद्योग में काफी पूँजी का निवेश किया। अतः यूरापनियनों की व्यापारिक एवं औद्योगिक आवश्यकता की पूर्ति के लिेय पटसन की खेती पर विशेष ध्यान दिया गया ताकि यूरोपीय मिलों को सस्ता रेशा मिल सके और यूरोपीय व्यापारियों एवं उद्योगपतियों को भारी लाभ हो सके। यूरोपीय व्यापारी एवं उद्योगपति पटसन और जूट से भारी लाभ अर्जित करते थे किंतु कच्चा माल देने वाले किसानों को उनके उत्पादन की बहुत ही कम कीमत देते थे।
    कृषि वाणिज्यीकरण के प्रभाव

    कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण होने के परिणामस्वरूप भारतीय किसानों एवं गांवों की तस्वीर तेजी से बदलने लगी। पूंजी का प्रवाह भारत से ब्रिटेन की तरफ हो गया तथा भारत के गांव तेजी से निर्धन होने लगे। किसान का पूरा परिवार दिन-रात परिश्रम करने के उपरांत भी ऋण लेकर लगान चुकाता था जिससे किसान बड़ी संख्या में सूदखोरों एवं साहूकारों के चंगुल में फंस गया तथा चारों ओर निर्धनता एवं भुखमरी का बोलबाला हो गया। कृषि वाणिज्यीकरण के कुछ प्रमुख प्रभाव इस प्रकार से हैं-

    (1.) गांवों में पूंजी की आवश्यकता : कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण भारतीय गांवों की वस्तु विनिमय क्षमता और आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई तथा गांवों में भी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पूंजी की अनिवार्यता हो गई। पूंजी आधारित अर्थव्यस्था का निर्माण होने से गांवों में उत्पादित प्रत्येक वस्तु शहरों की ओर जाने लगी।

    (2.) कृषकों की निर्धनता में वृद्धि : कृषि के वाणिज्यीकरण से व्यापारी वर्ग तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बहुत लाभ होने लगा परन्तु किसानों की निर्धनता में वृद्धि हुई। इसका मुख्य कारण व्यापारियों की छल-कपटपूर्ण नीति थी। वे खेत में खड़ी फसलों को सस्ते दामों पर खरीद लेते थे। किसान अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये, फसल मंडी में न ले जाकर, खेत में ही बेच देता था। ऐसे सौदे में व्यापारी फसल की बहुत कम कीमत तय करता था। इस कारण किसानों की निर्धनता बढ़ती चली गई।

    (3.) अकालों की भयावहता में वृद्धि : कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण फसलें औद्योगिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उगाई जाती थीं। जूट एवं कपास की खेती में वृद्धि होने से खाद्यान्नों की भारी कमी हो गई और अकाल पड़ने लगे। कम्पनी का शासन होने से पूर्व भी भारत में अकाल पड़ते थे किन्तु उनका कारण धान का अभाव न होकर यातायात के साधनों का अभाव था। ब्रिटिश शासन में पड़ने वाले अकाल व सूखों का प्रत्यक्ष कारण कम्पनी की दोषपूर्ण औद्योगिक एवं कृषि नीतियां थीं। इन नीतियों ने भारतीय किसानों को अत्यधिक निर्धन बना दिया। अकाल के समय खाद्यान्नों के दाम इतने अधिक बढ़ जाते थे कि लोगों के लिये अन्न खरीदना असम्भव हो जाता था। इस कारण प्रत्येक अकाल के समय हजारों लोग भूख से तड़प कर मर जाते थे। प्रायः शवों को उठाने का कोई प्रबन्ध नहीं होता था। इस कारण पूरा का पूरा क्षेत्र महामारी की चपेट में आ जाता था और हजारों लोग महामारी से ग्रस्त होकर मर जाते थे। कम्पनी के शासन में 1770 ई. के बंगाल के अकाल में बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या मर गई। 1860-61 ई. में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल पड़ा जिसमें दो लाख लोग मरे। 1865-66 ई. में उड़ीसा, बंगाल, बिहार एवं मद्रास में पड़े अकाल में बीस लाख लोग मरे। केवल उड़ीसा में ही 10 लाख लोग मारे गये। 1866-70 ई. के अकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बम्बई में 14 लाख से अधिक लोग मारे गये। इन क्षेत्रों की एक चौथाई जनसंख्या समाप्त हो गई। 1876-78 ई. में मद्रास, मैसूर, हैदराबाद, महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में भीषण अकाल पड़ा। इस अकाल में पंजाब में 8 लाख और मद्रास में 35 लाख लोग मरे। मैसूर की 20 प्रतिशत जनसंख्या मर गई। उत्तर प्रदेश में 12 लाख से अधिक लोग मरे। 1899 ई. के अकाल को छपनिया काल कहा जाता है, इसमें राजस्थान के 25 प्रतिशत लोग मर गये। विलियम डिग्बी के अनुसार 1854 से 1901 ई. के अकालों में देश में 2,88,25,000 लोग मौत के मुंह में समा गये। 1943 ई. में बंगाल के भीषण अकाल में 30 लाख लोग मरे।

    (4.) कृषकों के विद्रोह : नगदी फसलों की खेती के कारण किसानों का शहरों में आना-जान बढ़ गया। इससे किसानों में राजनीतिक चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। इस चेतना ने किसानों को शोषणकारियों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये उकसाया। जैसे-जैसे पूँजीवादी व्यवस्था कठोर होती चली गई, कृषक विद्रोह भी बढ़ने लगे। 1857 ई. में दक्कन में मराठा किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध बगावत की। किसानों में असंतोष को कम करने के लिये 1879 ई. में दक्कन काश्तकारी सहायता अधिनियम पारित किया गया। 1870 ई. में बंगाल के बंटाईदारों का आर्थिक संकट बढ़ने पर उन्होंने लगान देने से मना कर दिया। इसी समय संथालों ने भी विद्रोह किया। इस कारण 1885 ई. में बंगाल काश्तकारी अधिनियम पारित किया गया।

    (5.) नवीन आर्थिक-सामाजिक वर्गों का उदय : ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सामन्ती व्यवस्था को समाप्त करके जमींदार, छोटे काश्तकार, खेतिहर मजदूर आदि नवीन आर्थिक-सामाजिक वर्गों को जन्म दिया। नई लगान व्यवस्था ने भी भारतीय ग्रामीण सामाजिक सम्बन्धों पर गहरा प्रभाव डाला। परम्परागत रूप से भारतीय ग्रामीण समुदाय के सदस्यों में परस्पर सम्बन्धों का निर्धारण जातिगत सम्बन्धों, धार्मिक आधार, परम्परा या रीति-रिवाजों पर आधारित था। ब्रिटिश कानूनों तथा आर्थिक नीतियों ने परम्परागत सामाजिक व जातीय सम्बन्धों को शिथिल कर दिया। ब्रिटिश आर्थिक नीति के फलस्वरूप जो सामाजिक-आर्थिक वर्ग अस्तित्त्व में आये उनमें सबसे नीची सीढ़ी पर निम्न वर्ग था।

    (6.) भूमिहीन एवं श्रमिक वर्ग का उदय : ब्रिटिश कृषि नीति, आर्थिक नीति व लगान प्रणाली के परिणाम स्वरूप छोटे किसानों की जमीन उनके अधिकार से निकलकर साहूकारों के पास पहुंचने लगी जिससे भारतीय किसान भूमिहीन होकर खेतिहर श्रमिक में परिणत होने लगा। खेतिहर श्रमिकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ने से, समस्त खेतिहर जनसंख्या के लगभग आधे लोग इसी वर्ग में आ गये। 1875 ई. में देश में भूमिहीन कृषकों की संख्या 80 लाख थी जो 1901 ई. में बढ़कर 350 लाख तथा 1921 ई. में 390 लाख हो गई।

    (7.) यातायात एवं संचार साधनों में सुधार : कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण कृषि जिन्सों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक तेज गति से पहुंचाने के लिये रेल, सड़क एवं जहाजरानी परिवहन साधनों का विकास हुआ। जिन्सों की बिक्री, सौदे एवं भाव आदि सूचनाएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिये डाक-तार व टेलीफोन आदि संचार-व्यवस्थाओं का विकास हुआ। कम्पनी ने भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर अच्छी सड़कों का निर्माण किया ताकि बन्दरगाहों तक कच्चा माल पहुँचाने में सुविधा हो सके। यूरोपियन लेखकों ने लिखा है कि यह सब भारतीयों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने व विकसित करने के लिये किया गया जबकि वास्तविकता यह थी कि ये समस्त कार्य इसलिये किये गये ताकि वे भारतीय कच्चा माल लंकाशायर और मैनचेस्टर की मिलों तक सुगमता से पहुँचा सकें तथा वहाँ उत्पादित माल को भारत के दूरस्थ गाँवों तक पहुँचा सकें।

    (8.) विश्वव्यापी मंदी की मार : भारत का किसान कृषि के वाणिज्यीकरण से पहले, विश्वव्यापी मंदियों के दौर से बेअसर रहता था किंतु अब उसकी प्रतिस्पर्धा विश्व भर के किसानों से थी इसलिये उसका भी मंदी की चपेट में आ जाना स्वाभाविक था। भारत में वर्ष 1928-29 की मंदी के दौर से पहले 10 अरब 34 करोड़ रुपये मूल्य की पैदावार होती थी जो 1933 ई. में घटकर केवल 4 अरब 73 करोड़ रुपये मूल्य की रह गई। 



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  • ब्रिटिश शासन में भारत से धन का निष्कासन

     21.08.2017
    ब्रिटिश शासन में  भारत से धन का निष्कासन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 9

    भारत पर पाश्चात्य देशों के आक्रमण तो सिकंदर से पूर्व भी होते रहे किंतु उनके प्रभाव सीमित होने के कारण उनमें भारत से धन का विशेष निष्कासन नहीं हुआ। सिकंदर एवं उसके बाद के पाश्चात्य आक्रमणों में भी धन निष्कासन अत्यंत सीमित मात्रा में संभव हो सका। शक, कुषाण तथा हूण आदि आक्रांताओं ने भारत में ही अपने शासन स्थापित किये इसलिये वे भारत से धन निकालकर बाहर नहीं ले गये। 712 ई. में भारत पर मुस्लिम आक्रमणों का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह 1761 ई. में अहमदशाह अब्दाली के अंतिम आक्रमण तक जारी रहा। एक हजार वर्ष से भी अधिक लम्बे समय तक चले इस दौर में उत्तर भारत एवं पश्चिमी भारत से अपार धन सम्पदा लूटी गई फिर भी इन आक्रमणों से धन का निष्कासन उतना अधिक नहीं हुआ जितना 1757 ई. में प्लासी के युद्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के आरम्भ से लेकर 1947 ई. में ब्रिटिश ताज के राज्य की समाप्ति तक हुआ।

    मार्कोपोलो ने भारत को एशिया का मुख्य बाजार कहा है। सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांसिसी यात्री बर्नियर ने भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते हुए लिखा है- 'यह भारत एक अथाह गड्ढा है, जिसमें संसार का अधिकांश सोना और चांदी चारों तरफ से अनेक रास्तों से आकर जमा होता है....... यह मिस्र से भी अधिक धनी देश है।' बीसवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक दशा के बारे में एक इतिहासकार ने लिखा है- '20वीं सदी के आरम्भ में लगभग दस करोड़ व्यक्ति ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं जिन्हें किसी समय भी पेट भर अन्न नहीं मिलता।' स्पष्ट है कि इस अवधि में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश ताज, भारत को पूरी तरह चूस कर खोखला कर चुके थे।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश ताज द्वारा मचाई गई लूट

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1765 ई. में बंगाल की दीवानी के अधिकार प्राप्त किये तथा उसने तेजी से आगे बढ़कर उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक दो दशकों तक शेष देश को अपने चंगुल में ले लिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शिकंजा कसे जाने से पूर्व, भारत में उद्योग, कृषि एवं निर्यात की दशा संतोषजनक थी। ढाका की मलमल पूरे विश्व में विख्यात थी। हीरे-जवाहरात, गर्म मसाले, शृंगार प्रसाधन, हाथी दांत की कलात्मक वस्तुएं, सुगंधित तेल, इत्र, सूती एवं रेशम का कपड़ा विदेशों को निर्यात किये जाते थे।

    कम्पनी द्वारा देश पर शिकंजा कस लिये जाने के बाद भारत के ग्रामीण दस्तकारों, किसानों तथा व्यापारियों की स्थिति खराब होने लगी। वे कम्पनी की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने लगे। कम्पनी द्वारा बनाये गये कानूनों के कारण भारत से तैयार उत्पाद के स्थान पर कच्चा माल लंका शायर एवं मैनचेस्टर की मिलों को जाने लगा। व्यापार में कमाये गये लाभ एवं बंगाल की दीवानी से अर्जित राजस्व, तेजी से देश के बाहर जाने लगा। 1767 ई. में ब्रिटिश क्राउन ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को निर्देश दिये कि वह प्रति वर्ष रानी की सरकार को 4 लाख पौण्ड दे।

    जॉन सुलिवन ने भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति एवं उसके प्रभाव को दर्शाते हुए लिखा है- 'हमारी प्रणाली एक ऐसे स्पंज के रूप में काम करती है, जो गंगा के किनारों से प्रत्येक अच्छी वस्तु ले लेती है और टेम्स के किनारों पर निचोड़ देती है।'

    धन के बहिर्गमन का सिद्धांत

    भारत से धन के निष्कासन का सिद्धांत सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने 2 मई 1867 को लंदन में ईस्ट इण्डिया एसोसियेशन की बैठक में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा ब्रिटेन अपने शासन की कीमत पर भारत की सम्पदा को छीन रहा है। भारत में वसूल किये गये राजस्व का एक चौथाई भाग भारत से बाहर चला जाता है। भारत का रक्त निरंतर निचोड़ा जा रहा है।

    महादेव गोविंद रानाडे ने भी 1872 ई. में अपने एक भाषण में कहा- 'भारत की राष्ट्रीय आय के एक तिहाई हिस्से से अधिक, ब्रिटिश सरकार द्वारा किसी ने किसी रूप में लिया जाता है।'

    रमेशचंद्र दत्त ने इकॉनोमिक हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में लिखा है- 'भारत में हो रही धन की निकासी का उदाहरण आज तक विश्व के किसी भी देश में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा।' दादाभाई नौरोजी ने पॉवर्टी एण्ड ब्रिटिश रूल इन इण्डिया नामक शोध ग्रंथ में भारत से धन के बहिर्गमन के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत की मुख्य बातें इस प्रकार से हैं-

    (1.) धन के बर्हिगमन की राष्ट्रवादी परिभाषा का तात्पर्य भारत से धन-सम्पत्ति एवं माल का इंग्लैण्ड में हस्तान्तरण था जिसके बदले में भारत को इसके समतुल्य कोई भी आर्थिक, वाणिज्यिक या भौतिक प्रतिलाभ प्राप्त नहीं होता था।

    (2.) धन बर्हिगमन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम, ब्रिटिश प्रशासनिक, सैनिक और रेलवे अधिकारियों के वेतन देना, आय व बचत के एक भाग को इंग्लैण्ड भेजना और अँग्रेज अधिकारियों की पेंशन एवं अवकाश भत्तों को इंग्लैण्ड में भुगतान करना था।

    (3.) धन का बहिर्गमन भारत की निर्धनता का मुख्य कारण है।

    धन निष्कासन की मात्रा एवं स्वरूप

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन द्वारा भारत से निकाले गये धन की मात्रा का अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है। विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग आंकड़े दिये हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

    (1.) बंगाल प्रांत में प्राप्त होने वाले राजस्व एवं व्यय विवरण के अनुसार कम्पनी ने प्रथम छः वर्षों (1765-1771 ई.) में 1,30,66,991 पौण्ड शुद्ध राजस्व अर्जित किया जिसमें से 90,27,609 पौण्ड खर्च कर दिया। शेष बचे 40,39,152 पौण्ड का सामान इंग्लैण्ड भेज दिया गया।

    (2.) विलियम डिग्बी के अनुसार 1757 ई. से 1815 ई. तक भारत से 50 से 100 करोड़ पौण्ड राशि इंग्लैण्ड भेजी गई।

    (3.) 1828 ई. में मार्टिन मोंटमुगरी ने इस निर्गम का अनुमान 30 हजार मिलियन पौण्ड (3 करोड़ पौण्ड) प्रतिवर्ष की दर से लगाया।

    (4.) जॉर्ज विन्सेट द्वारा 1859 ई. में लगाये गये अनुमान के अनुसार 1834 ई. से 1851 ई. तक भारत से 42,21,611 पौण्ड धन का निष्कासन प्रतिवर्ष हुआ।

    (5.) भारत को कम्पनी के माध्यम से ब्रिटिश ताज को सत्ता हस्तांतरण से सम्बन्धित व्यय, चीन के साथ हुए युद्धों के व्यय, लंदन में इण्डिया ऑफिस के व्यय, भारतीय सेना की रेजीमेण्टों के प्रशिक्षण व्यय, चीन और फारस में इंग्लैण्ड के राजनयिक मिशनों के व्यय, इंग्लैण्ड से भारत तक टेलिग्राफ लाइनों के सम्पूर्ण व्यय आद विविध व्यय चुकाने पड़ते थे। इस कारण भारत पर वर्ष 1850-51 में 5.50 करोड़ रुपये का ऋण चढ़ गया।

    (6.) कम्पनी के अनुसार 1857 ई. के विद्रोह को दबाने में 47 करोड़ रुपये व्यय हुए। कम्पनी ने इस राशि को भारत पर कर्ज माना।

    (7.) दादा भाई नौरोजी तथा आर. सी. दत्त आदि राष्ट्रवादियों ने 1883 ई. से 1892 ई. तक के दस वर्षों में भारत से इंग्लैण्ड भेजी गई राशि 359 करोड़ पौण्ड बताई है।

    (8.) विभिन्न स्थलों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने पर अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 1834 से 1924 ई. तक के 90 वर्ष की अवधि में भारत से 394 से 591 मिलियन पौण्ड राशि इंग्लैण्ड भेजी गई।

    धन निष्कासन के परिणाम

    1765 ई. से 1947 ई. तक भारत से भारी परिमाण में किये गये धन निष्कासन के अत्यन्त बुरे परिणाम हुए- 

    (1.) 1939-40 ई. में भारत सरकार पर ब्रिटिश सरकार का 1200 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया। आश्चर्य है कि 1850-51 ई. में यह कर्ज केवल 5.50 करोड़ रुपये था।

    (2.) कर्ज बढ़ने से भारतीयों पर करों का बोझ बढ़ गया। भारत का यह कर प्रति व्यक्ति आय का 14 प्रतिशत से अधिक था। इससे भारतीयों का जीवन स्तर निरंतर गिरता चला गया।

    (3.) देश में दरिद्रता बढ़ने से बार-बार अकाल पड़ने लगे जिनमें हजारों लोग मरने लगे। एक अनुमान के अनुसार इन अकालों में 2.85 करोड़ लोग मरे।

    (4.) भारत की अर्थव्यवस्था, औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदल गई जिससे देश में गहरा आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।

    (5.) आम भारतीय के मन में अंग्रेजों के शासन से घृणा उत्पन्न हो गई जिससे राष्ट्रीय आंदोलनों को बल मिला।

    धन निष्कासन के सम्बन्ध में राष्ट्रवादी नेताओं के विचार

    दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को समस्त बुराइयों की बुराई (ईविल ऑफ ऑल ईविल्स) बताया है। 1905 ई. में उन्होंने कहा- 'धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण।'

    धन निष्कासन के सम्बन्ध में आर. सी. दत्त ने कहा- 'भारतीय राजाओं द्वारा कर लेना तो सूर्य द्वारा भूमि से पानी लेने के समान था जो पुनः वर्षा के रूप में भूमि पर उर्वरता देने के लिये वापस आता था, पर अँग्रेजों द्वारा लिया गया कर फिर भारत में वर्षा न करके इंग्लैण्ड में ही वर्षा करता था।'

    धन निष्कासन के सम्बन्ध में विदेशी विद्वानों के विचार लॉर्ड क्लाइव बंगाल को एडन का बगीचा एवं सोने का खजाना कहता था। उसने एडन के इस बगीचे को इंग्लैण्ड-वासियों की तरफ से लूटने का काम आरम्भ किया जिसे देखकर स्वयं अँग्रेज अधिकारियों के दिल दहल उठे। असम के चीफ कमिश्नर चार्ल्स इलियन ने व्यथित होकर लिखा- 'मैं यह कहने में नहीं हिचकूंगा कि आधे किसान साल भर में कभी यह भी नहीं जानते कि पूरा भोजन किस चिड़िया का नाम है। यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं है कि भारत में 10 करोड़ मनुष्यों की प्रति व्यक्ति आय 5 डॉलर वार्षिक से अधिक नहीं है।'

    मैकडॉनल्ड ने लिखा है- 'भारत में तीन करोड़ से लेकर पांच करोड़ तक ऐसे परिवार हैं जिनकी आय साढ़े तीन पैन्स प्रतिदिन से अधिक नहीं है।'

    विलियम हण्टर ने 1883 ई. में वायसरॉय की कौंसिल में कहा था- 'सरकार का लगान किसानों एवं उनके परिवारों के लिये पूरा अन्न भी नहीं छोड़ता। ब्रिटिश साम्राज्य में भारत के किसान के समान हृदय द्रवित करने वाला और कोई मनुष्य नहीं है।'

    राष्ट्रीय आय के विशेषज्ञ कोलीन क्लार्क ने विवरण सहित लिखा है- '1924-25 ई. के समय संसार में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय, भारतीय की आय से पांच गुना अधिक थी।'

    इस प्रकार 20वीं सदी के अंत में स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का ज्ञान होने पर भी एक भारतीय की औसत आयु 32 वर्ष थी जबकि पश्चिमी यूरोप के एक व्यक्ति की औसत आयु 60 वर्ष थी। पौष्टिक आहार के अभाव में भारतीय शीघ्र बीमार हो जाते थे और उपचार के अभाव में 32 वर्ष की औसत आयु में ही मर जाते थे।


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