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  • आंग्ल मराठा युद्ध और मराठों का पतन

     07.09.2018
    आंग्ल मराठा युद्ध और मराठों का पतन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय - 5

    छत्रपति शिवाजी (1646-1680 ई.) ने मराठा शक्ति को संगठित करने का काम किया। औरंगजेब जैसा शक्तिशाली मुगल बादशाह भी मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। छत्रपति शाहू के शासन काल में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। इससे मराठा संगठन अपनी उन्नति के चरम पर पहुँच गया। इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिये ई.1761 में मराठों को अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली से टक्कर लेनी पड़ी। पानीपत के मैदान में दोनों शक्तियों में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें मराठों की निर्णायक पराजय हुई। सर जादुनाथ सरकार ने लिखा है- 'पानीपत का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था। मराठा सेना की मुकुट मणि वहीं गिर गई।'

    इस युद्ध के बाद अहमदशाह अब्दाली वापस अफगानिस्तान लौट गया। इस कारण वह पानीपत की जीत का राजनीतिक लाभ नहीं उठा सका। मेजर इवान्स बेल ने लिखा है- 'यद्यपि इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई तथापि विजयी अफगान वापस चले गये और उन्होंने फिर कभी भारत के मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया।'

    निःसंदेह मराठों ने उल्लेखनीय क्षति उठायी किंतु उन्होंने बहुत कम समय में इस क्षति को पूरा कर लिया। मराठा इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई का मत है- 'इसमें संदेह नहीं कि जहाँ तक जनशक्ति का सम्बन्ध है, उन्हें (मराठों को) इस युद्ध से भारी क्षति पहुँची; पर इसके अतिरिक्त मराठों के भाग्य पर इस विपत्ति का वस्तुतः कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नई पीढ़ी के लोग शीघ्र ही पानीपत में होने वाली क्षति की पूर्ति करने के लिए उठ खड़े हुए।'

    पेशवा माधवराव (प्रथम) (1761-1772 ई.) ने मराठों में पुनः उत्साह एवं अनुशासन स्थापित किया। उसने शीघ्र ही पानीपत की पराजय का दाग धो दिया। उसके नेतृत्व में मराठा पुनः उतने ही शक्तिशाली बन गये जितने पानीपत के युद्ध से पूर्व थे किन्तु 18 नवम्बर 1772 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। मराठों के लिए उसकी मुत्यु पानीपत से भी अधिक घातक सिद्ध हुई। पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई और मराठा दरबार षड्यन्त्रों का अड्डा बन गया। मराठा सरदार स्वतंत्र आचरण करने लगे और उनमें भारी फूट पड़ गई। अँग्रेजों ने मराठों की फूट से लाभ उठाने का निर्णय लिया। 1772 ई. में भारत के राजनीतिक रंगमंच पर केवल दो शक्तियाँ- मराठा और ईस्ट इण्डिया कम्पनी, सर्वोच्चता प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील थीं। अतः इन दोनों शक्तियों में संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।

    रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 ई.

    1773 ई. में ब्रिटिश संसद ने रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित किया जिसके माध्यम से बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सियों पर बंगाल के गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल का नियन्त्रण स्थापित किया गया। कौंसिल के प्रत्येक सदस्य को मत देने का समान अधिकार था। मतों की संख्या बराबर होने की स्थिति में गवर्नर जनरल को अतिरिक्त मत देने का अधिकार था। कौंसिल के तीन सदस्य गवर्नर जनरल से व्यक्तिगत शत्रुता रखते थे। इस कारण गवर्नर जनरल कौंसिल में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं करवा पाता था।

    अँग्रेजों की मराठा नीति

    गवर्नर जनरल के अधिकार एवं शक्तियां स्पष्ट नहीं होने से दोनों प्रेसीडेन्सियों के अधिकारी स्वछन्द होकर कार्य करने लगे। दक्षिण व मध्य भारत की ऐसी कोई शक्ति नहीं थी, जिनसे उन्होंने झगड़ा मोल न ले रखा हो। बम्बई प्रेसीडेन्सी के गवर्नर की स्वच्छन्द प्रवृत्ति के कारण ही अँग्रेजों को मराठों से संघर्ष करना पड़ा। मराठों के सम्बन्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक नीति तैयार की जिसके तीन प्रमुख भाग थे-

    (1.) उन दिनों दक्षिण में मुख्य रूप से तीन शक्तियाँ कार्यरत थीं- हैदराबाद का निजाम, महाराष्ट्र के मराठा और मैसूर का हैदरअली। यदि ये तीनों शक्तियां अँग्रेजों के विरुद्ध एक हो जातीं तो दक्षिण में अँग्रेजों का अस्तित्त्व समाप्त हो सकता था। अतः अँग्रेज चाहते थे कि ये तीनों शक्तियाँ आपस में लड़ती रहें।

    (2.) दक्षिण की इन तीनों शक्तियों में मराठा सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी थे। अतः अँग्रेजों ने तय किया कि मराठों को घरेलू झगड़ों में फँसाये रखना चाहिये, ताकि बंगाल व उत्तर भारत में अँग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभाव में उन्हें हस्तक्षेप करने का अवसर न मिल सके।

    (3.) दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर अपने पैर फैलाने के लिए सालसेट, बसीन व गुजरात का कुछ भाग कम्पनी को अपने अधिकार में कर लेना चाहिए।

    आंग्ल-मराठा सम्बन्ध

    मुगल शक्ति के पतन के बाद उत्तर भारत में उत्पन्न हुई रिक्तता को मराठे तेजी से भरते जा रहे थे। अँग्रेज उनके प्रभाव को रोकना चाहते थे किंतु 18वीं शताब्दी के मध्य तक अँग्रेजों के पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वे मराठों का सामना कर सकें। अतः कम्पनी इस बात का ध्यान रखती थी कि वह ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे मराठों से संघर्ष करना पड़े। फिर भी वह निजाम, हैदरअली तथा मराठों को एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने का कार्य करती रही।

    1758 ई. में अँग्रेजों व मराठों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार अँग्रेजों ने मराठों से दस गाँव तथा मराठा क्षेत्र में कुछ व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं। 1759 ई. में ब्रिटिश अधिकारी प्राइस व थामस मॉट्सन पूना गये। इन दोनों का उद्देश्य मराठों से सालसेट व बसीन प्राप्त करना था किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली।

    पानीपत में मराठों की पराजय ने अंग्रेजों को पुनः प्रोत्साहित किया तथा 1767 ई. में थामस मॉट्सन को पुनः पूना भेजा गया। इस बार भी सालसेट एवं बसीन के सम्बन्ध में कोई समझौता नहीं हो सका। पेशवा माधवराव (प्रथम), मैसूर के शासक हैदरअली के विरुद्ध अँग्रेजों की सहायता प्राप्त करना चाहता था किन्तु कम्पनी इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। फिर भी मॉट्सन ने पेशवा को आश्वासन दिया कि कम्पनी मराठों से कभी युद्ध नहीं करेगी और यदि कोई तीसरी शक्ति मराठों से युद्ध करती है तो कम्पनी मराठों के विरुद्ध उस तीसरी शक्ति को सहायता नहीं देगी।

    18 नवम्बर 1772 को पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु हो गयी। उसके कोई सन्तान नहीं थी, अतः उसका भाई नारायणराव (1772-1773 ई.) पेशवा की मनसब पर बैठा। नारायण का चाचा राघोबा (रघुनाथ) स्वयं पेशवा बनना चाहता था। अतः राघोबा ने अपनी पत्नी आनन्दीबाई के सहयोग से 13 अगस्त 1773 को नारायणराव की हत्या करवा दी और अपने आपको पेशवा घोषित कर दिया। बालाजी जनार्दन ने राघोबा की इस कार्यवाही का विरोध किया। बालाजी जनार्दन को नाना फड़नवीस के नाम से जाना जाता है। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में मराठों ने बाराभाई संसद का निर्माण किया और शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया। उनके सामने समस्या यह थी कि पेशवा किसे बनाया जाये?

    जिस समय नारायणराव की मृत्यु हुई थी, उस समय उसकी पत्नी गंगाबाई गर्भवती थी। 18 अपै्रल 1774 को उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम माधवराव (द्वितीय) रखा गया। बाराभाई संसद ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा घोषित कर दिया तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। बाराभाई संसद ने राघोबा को बंदी बनाने के आदेश दिये। इस पर राघोबा ने दिसम्बर 1774 में थाणे पर आक्रमण कर दिया किन्तु परास्त होकर भाग खड़ा हुआ।

    सूरत की सन्धि (1775 ई.)

    राघोबा भागकर बम्बई गया। उसने बम्बई कौंसिल के अध्यक्ष हॉर्नबाई से बातचीत की। इस बातचीत के बाद कम्पनी की बम्बई शाखा और राघोबा के बीच 6 मार्च 1775 को एक सन्धि हुई जिसे सूरत की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता करेगी।

    (2.) राघोबा कम्पनी की बम्बई शाखा को थाणे, बसीन, सालसेट व जम्बूसर (गुजरात) के प्रदेश देगा।

    (3.) राघोबा की सुरक्षा के लिए 2500 अँग्रेज सैनिक पूना में रखे जायेंगे जिनका खर्च सवा लाख रुपये वार्षिक के हिसाब से राघोबा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी को देगा।

    (4.) राघोबा अपनी सुरक्षा के बदले कम्पनी की बम्बई शाखा को छः लाख रुपये वार्षिक देगा।

    (5.) यदि राघोबा पूना से कोई संधि या समझौता करेगा तो उसमें अँग्रेजों को भी सम्मिलित करेगा। रेगुलेटिंग एक्ट के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बम्बई शाखा राघोबा से किसी तरह की संधि करने के लिये अधिकृत नहीं थी। बम्बई शाखा ने यह सन्धि गवर्नर जनरल से पूछे बिना की थी। सन्धि के पश्चात् हॉर्नबाई ने पत्र लिखकर इसकी सूचना गवर्नर जनरल को भेज दी। इस सन्धि के कारण अँग्रेज व मराठों के संघर्षों का सूत्रपात हुआ तथा मॉट्सन ने मराठों को जो आश्वासन दिया था, उसे इस सन्धि द्वारा तोड़ दिया गया। राघोबा ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण सम्पूर्ण मराठा जाति की प्रतिष्ठा का बलिदान कर दिया।

    प्रथम आंग्ल-मराठा संघर्ष (1775-1782 ई.)

    सूरत की सन्धि के बाद बम्बई सरकार ने राघोबा की सहायता हेतु एक सेना भेजी। अँग्रेजी सेनाएँ पूना की ओर बढ़ीं। 18 मई 1775 को अँग्रेजों एवं मराठों के बीच अरास नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें मराठे परास्त हुए। अँग्रेजों ने सालसेट पर अधिकार कर लिया किन्तु इसी समय बंगाल कौंसिल ने हस्तक्षेप किया। क्योंकि बम्बई सरकार ने यह समझौता बिना बंगाल कौंसिल की स्वीकृति से किया था। बंगाल कौंसिल ने सूरत की सन्धि को अस्वीकार करके मराठों के विरुद्ध चल रहे युद्ध को बंद करने का आदेश दिया। ऐसा करने के कई कारण थे-

    (1.) यह सन्धि राघोबा द्वारा हस्ताक्षरित थी और वह उस समय पेशवा नहीं था।

    (2.) सूरत की सन्धि से कम्पनी को अनावश्यक युद्ध में भाग लेना पड़ा था।

    (3.) मराठा शक्ति से अँग्रेजों को कोई क्षति नहीं हुई थी, अतः उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं था।

    (4.) यह सन्धि रेग्यूलेटिंग एक्ट के विरुद्ध थी।

    पुरन्दर की संधि (1776 ई.)

    यद्यपि बंगाल कौंसिल ने युद्ध बन्द करने का आदेश दिया था, फिर भी युद्ध बन्द नहीं हुआ। तब बंगाल कौंसिल ने कर्नल अप्टन को मराठों से बातचीत करने पूना भेजा। अप्टन के पूना पहुँचने पर युद्ध बन्द हो गया। पूना में अप्टन और मराठों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये, क्योंकि अप्टन ने राघोबा को सौंपने से इन्कार कर दिया। साथ ही अप्टन, सालसेट व बसीन पर अधिकार बनाये रखना चाहता था। अतः यह वार्त्ता असफल हो गई और युद्ध पुनः चालू हो गया। मराठों ने युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई किन्तु दुर्भाग्य से पेशवा का विद्रोही मराठा सरदार सदाशिव एक दूसरे मोर्चे पर मराठों के विरुद्ध आ धमका। मराठे दो मोर्चों पर युद्ध नहीं कर सके और उन्होंने अँग्रेजों से सन्धि करने हेतु प्रार्थना की। अँग्रेजों ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। 1 मार्च 1776 को दोनों पक्षों में एक संधि हुई जिसे पुरन्दर की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

    (1.) कम्पनी ने शिशु माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक मान लिया।

    (2.) अँग्रेजों ने राघोबा से युद्ध करने पर जो राशि खर्च की है, उसके लिए मराठा, अँग्रेजों को 12 लाख रुपये देंगे।

    (3.) सूरत की सन्धि को रद्द कर दिया गया।

    (4.) मराठों ने राघोबा को 3 लाख 15 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार कर लिया।

    (5.) राघोबा कोई सेना नहीं रखेगा तथा गुजरात के कोपर गाँव में जाकर रहेगा।

    (6.) कम्पनी ने मराठों से सालसेट तथा बम्बई के निकट जो टापू प्राप्त किये हैं वे कम्पनी के पास ही रहेंगे।

    इस सन्धि पर मराठों की ओर से सुखराम बापू ने तथा अँग्रेजों की ओर से कर्नल अप्टन ने हस्ताक्षर किये किन्तु बम्बई सरकार तथा वारेन हेस्टिंग्ज इस सन्धि को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि को कागज का एक टुकड़ा कहा। इसी बीच मराठों ने विद्रोही सदाशिव राव भाऊ को पकड़कर उसकी हत्या कर दी। अब मराठे अँग्रेजों से निपटने के लिए तैयार थे। स्थिति उस समय और अधिक जटिल बन गई, जब 1778 ई. में एक फ्रांसीसी राजदूत सैण्ट लूबिन, फ्रांस के बादशाह का पत्र लेकर मराठा दरबार में पहुँचा। मराठों ने उसका शानदार स्वागत किया किन्तु जब अँग्रेज राजदूत मॉट्सन पूना पहुँचा तो उसका विशेष स्वागत नहीं किया गया। अतः यह अफवाह फैल गई कि मराठों एवं फ्रांसीसियों में सन्धि हो गई है।

    उधर मॉट्सन ने मराठा दरबार के मंत्री मोरोबा को अपनी ओर मिलाकर नाना फड़नवीस और सुखराम बापू में फूट डलवा दी। सुखराम बापू, जिसने पुरन्दर की संधि पर हस्ताक्षर किये थे, विद्रोही हो गया। उसने गुप्त रूप से बम्बई सरकार को लिखा कि वह राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता देने को तैयार है। अतः बम्बई सरकार ने कहा कि चूँकि पुरन्दर की सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाला स्वयं हमारे निकट आ रहा है, इसलिए पुनः युद्ध चालू करने पर सन्धि का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। बंगाल कौंसिल ने इसका विरोध किया किन्तु वारेन हेस्टिंग्ज ने बम्बई सरकार का समर्थन किया। यद्यपि मराठों ने स्पष्ट कर दिया कि फ्रांसीसियों के साथ उनकी कोई सन्धि नहीं हुई है तथा सैण्ट लुबिन को भी वापस भेज दिया गया है किन्तु हेस्टिंग्ज ने मार्च 1778 में बम्बई सरकार को युद्ध करने का अधिकार दे दिया।

    बड़गांव की संधि (1779 ई.)

    बम्बई सरकार ने कर्नल एगटस के नेतृत्व में एक सेना भेजी। कर्नल एगटस मराठों के द्वारा परास्त कर दिया गया। उसके स्थान पर कर्नल काकबर्क को भेजा गया। मराठा सेना का नेतृत्व महादजी सिन्धिया एवं मल्हारराव होलकर कर रहे थे। मराठा सेना धीरे-धीरे पीछे हटती गई और ब्रिटिश सेना आगे बढ़ती गई। ब्रिटिश सेना पूना से 18 मील दूर तेलगाँव के मैदान तक पहुँच गई। 19 जनवरी 1779 को तेलगाँव पहुँचते ही अँग्रेजों को ज्ञात हो गया कि मराठों ने उन्हें तीन ओर से घेर लिया है। अँग्रेजों ने अपने गोला-बारूद में आग लगाकर पीछे हटना आरम्भ किया। इस पर मराठों ने आगे बढ़कर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें अँग्रेज परास्त हो गये। इस पराजय के साथ ही बम्बई सरकार को एक अपमानजनक समझौता करना पड़ा। 29 जनवरी 1779 को दोनों पक्षों में बड़गांव की संधि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं-

    (1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, राघोबा को मराठों के हवाले कर देगी।

    (2.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अब तक जिन मराठा प्रदेशों पर अधिकार किया है, वे मराठों को सौंप दिये जायेंगे।

    (3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जब तक शर्तों को पूरा न करे, तब तक दो अँग्रेज अधिकारी बन्धक के रूप में मराठों की कैद में रहेंगे। बड़गाँव की संधि अँग्रेजों के लिए घोर अपमानजनक थी। स्वयं हेस्टिंग्ज ने कहा- 'जब बड़गाँव संधि की धाराओं को पढ़ता हूँ तो मेरा सिर लज्जा से झुक जाता है।' अतः हेस्टिंग्ज ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया और मराठों के विरुद्ध दो सेनाएँ भेजीं। एक सेना का नेतृत्व कर्नल पोफम कर रहा था और दूसरी का नेतृत्व कर्नल गॉडर्ड कर रहा था। जब नाना फड़नवीस को अँग्रेजों के आक्रमण की सूचना मिली तो उसने नागपुर के शासक भोंसले, हैदराबाद के निजाम तथा मैसूर के शासक हैदरअली को अपनी ओर मिलाया तथा अँग्रेजों का सामना करने की योजना तैयार की किन्तु हेस्टिंग्ज ने कूटनीति से निजाम व भौंसले को मराठों से अलग कर दिया।

    कर्नल गाडर्ड अहमदाबाद एवं बसीन पर अधिकार करके 1780 ई. में बड़ौदा पहुँच गया। उसने बड़ौदा के शासक फतेहसिंह गायकवाड़ से सन्धि की और पूना की ओर बढ़ा किन्तु पूना के निकट मराठों ने उसे काफी क्षति पहुँचाई। उत्तर दिशा में कर्नल पोफम ग्वालियर की ओर बढ़ा। 3 अगस्त 1780 को उसने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उसके बाद सिप्री नामक स्थान पर महादजी सिन्धिया एवं पोफम के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें महादजी परास्त हो गया। 13 अक्टूबर 1781 को उसने अँग्रेजों से सन्धि कर ली। इस सन्धि में एक धारा यह भी थी कि महादजी मराठों व अँग्रेजों के बीच सन्धि करवायेगा तथा सन्धि का पालन करवाने हेतु स्वयं अपनी गारण्टी देगा।

    सालबाई की सन्धि (1782 ई.)

    इधर गुजरात में कर्नल गॉडर्ड व मराठों के बीच युद्ध चल रहा था। ब्रिटिश सेना का दबाव बढ़ता जा रहा था। इस दबाव को कम करने के लिए नाना फड़नवीस ने हैदरअली को कर्नाटक पर आक्रमण करने को कहा। इस पर हैदरअली ने कर्नाटक पर धावा बोल दिया। इसके बाद अँग्रेजों की निरन्तर पराजय होने लगी। ब्रिटिश सेना का मनोबल गिरने लगा। अतः हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को मराठों से वार्त्ता करने भेजा। वार्त्ता के दौरान हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को तथा नाना फड़नवीस को जो पत्र लिखे, उनसे स्पष्ट होता है कि हेस्टिंग्स, मराठों से सन्धि करने के लिए अत्यधिक व्यग्र था। 17 मई 1782 को अँग्रेजों और मराठों के बीच सालबाई की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) अँग्रेजों ने राघोबा का साथ छोड़ने का आश्वासन दिया तथा मराठों ने उसे 25,000 रुपये मासिक पेन्शन देना स्वीकार कर लिया।

    (2.) सालसेट तथा भड़ौच को छोड़कर मराठा राज्य के अन्य समस्त भू-भागों से कम्पनी अपना अधिकार त्यागने पर सहमत हो गई।

    (3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा फतेसिंह गायकवाड़ को बड़ौदा का शासक स्वीकार कर लिया। बड़ौदा के जिन भू-भागों पर कम्पनी ने अधिकार कर लिया था, उन्हें पुनः बड़ौदा के शासक को लौटा दिया गया।

    (4.) इस सन्धि की स्वीकृति के छः माह के अन्दर हैदरअली जीते हुए प्रदेश लौटा देगा।

    इस संधि पर महादजी एवं नाना फड़नवीस के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये। क्योंकि नाना का मित्र एवं अँग्रेजों का शत्रु हैदरअली, अभी तक अँग्रेजों से लड़ रहा था। अतः जब तक हैदरअली युद्ध के मैदान में था, अँग्रेजों से सन्धि करना हैदरअली के साथ विश्वासघात करने जैसा था। जब 7 दिसम्बर 1782 को हैदरअली की मृत्यु हो गई, तब नाना ने 20 दिसम्बर 1782 को सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये।

    सन्धि का महत्त्व

    साल्बाई की सन्धि कुछ विशेष दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। अँग्रेजों ने मराठों से सन्धि करके मैसूर को मराठों से अलग कर दिया। मैसूर का शासक हैदरअली मराठों की सहायता से वंचित हो गया। हैदरअली की मृत्यु के बाद उसके पुत्र टीपू ने यद्यपि युद्ध जारी रखा, किन्तु उसे मराठों की सहायता नहीं मिल सकी।

    स्मिथ के अनुसार सालबाई की सन्धि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इसने दक्षिण भारत में कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित कर दिया तथा इसके बाद 20 वर्षों तक कम्पनी एवं मराठों के बीच शान्ति बनी रही। स्मिथ ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। वस्तुतः यह सन्धि कम्पनी की असफलता को सूचित करती है। अँग्रेजों ने इस सन्धि के पूर्व जो कुछ प्राप्त किया था, उसमें से सालसेट को छोड़कर शेष सब खो दिया। इस सन्धि ने पेशवा की स्थिति को सुदृढ़ बनाया तथा महादजी सिंधिया का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया कि वह मैसूर पर प्रभुत्व स्थापित करने लगा।

    अँग्रेजों ने शाहआलम के मामले में हस्तक्षेप न करने का वादा किया। इससे शाहआलम पर महादजी सिंधिया का प्रभाव अधिक बढ़ गया और शाहआलम ने महादजी सिंधिया को मुगल सल्तनत का वकील-ए-मुतलक नियुक्त किया। अतः इस सन्धि से अँग्रेजों के प्रभुत्व की बजाय, मराठों के प्रभुत्व में वृद्धि हुई। अँग्रेजों एवं मराठों के बीच 20 वर्षों तक की दीर्घ शान्ति का कारण सालबाई की सन्धि नहीं थी, अपितु अँग्रेज उत्तर भारत में दूसरी समस्याओं में उलझ गये थे, जिससे वे मराठों की ओर ध्यान नहीं दे सके। इधर मराठा संघ में भी फूट पड़ गई थी।

    पिट्स इण्डिया एक्ट

    1784 ई. में ब्रिटिश संसद ने पिट्स इण्डिया एक्ट पारित किया जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन करेगी। इस एक्ट में यह भी प्रावधान किया गया कि गवर्नर जनरल को आपातकाल में, कौंसिल के बहुमत की स्वीकृति प्राप्त किये बिना भी कार्य करने के विशेष अधिकार होंगे।

    हेस्टिंग्ज की विदाई

    1785 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज अपना कार्यकाल पूरा होने पर इंग्लैण्ड चला गया। वारेन हेस्टिंग्ज के अत्याचारों, आर्थिक शोषण एवं कुकर्मों की गूंज ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी हुई। क्लाइव की भांति उस पर भी मुकदमा चला जो सात साल तक (1788-1795 ई. तक) चलता रहा। उस पर बीस से भी अधिक आरोप लगाये गये। प्रधानमंत्री पिट प्रारम्भ में हेस्टिंग्ज के पक्ष में था किंतु बाद में हेस्टिंग्ज का विरोधी हो गया। अंत में हेस्टिंग्ज को क्लाइव की ही भांति दोष-मुक्त घोषित कर दिया गया। इस मुकदमे को लड़ने में हेस्टिंग्ज ने एक लाख पौण्ड खर्च किये। वह इतनी राशि भारत से लूटकर नहीं ले जा पाया था। इसलिये इस मुकदमे ने हेस्टिंग्ज को बर्बाद कर दिया।

    अहस्तक्षेप की नीति

    हेस्टिंग के बाद मेकफर्सन ने 1785 से 1786 ई. में 21 माह तक कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। सितम्बर 1786 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। कार्नवालिस ने सामान्यतः अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया। 1793 ई. में वह इंग्लैण्ड लौट गया तथा सर जॉन शोर (1793-1798 ई.) को गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने भी कार्नवालिस की नीति का अनुसरण किया। 1795 ई. में हैदराबाद के निजाम एवं मराठों के बीच खरदा का युद्ध हुआ। निजाम ने कम्पनी से सैनिक सहायता मांगी किंतु कम्पनी ने देशी राज्यों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप करने तथा निजाम को सहायता देने से इन्कार कर दिया। निजाम मराठों से परास्त हो गया और उसे मराठों से अपमानजनक शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी। 1796 ई. में पेशवा माधवराव (द्वितीय) की मृत्यु हो गई तथा बाजीराव (द्वितीय) पेशवा के मनसब पर बैठा।

    1798 ई. में सर जॉन शोर को वापिस इंग्लैण्ड बुला लिया गया। इस प्रकार सालबाई की सन्धि के बाद 20 वर्ष तक अंग्र्रेजों तथा मराठों के बीच शान्ति रही किंतु इस अवधि में मराठे अपने अन्य शत्रुओं से निपटते रहे। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव फैलने लगा। इस अवधि में महादजी सिन्धिया की शक्ति में भी अपूर्व वृद्धि हुई तथा पेशवा की शक्ति का ह्रास हुआ।

    लार्ड वेलेजली द्वारा अहस्तक्षेप की नीति का त्याग (1798-1805 ई.)

    1798 ई. में मार्क्विस वेलेजली को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने सहायक संधियों के माध्यम से हैदराबाद के निजाम, अवध के नवाब, मराठों के पेशवा, राजपूताने के अलवर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर और त्रावणकोर के राजा सहित अनेक राजाओं और नवाबों पर कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित की।

    मराठों में परस्पर संघर्ष

    पेशवा बाजीराव (द्वितीय) (1796-1851 ई.) अयोग्य व्यक्ति था। उसके समय में नाना फड़नवीस शासन का कार्य संभालता था। 13 मार्च 1800 को नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों में परस्पर संघर्ष प्रारम्भ हो गये। दो मराठा सरदारों- ग्वालियर के दौलतराव सिन्धिया तथा इन्दौर के यशवंतराव होलकर के बीच इस विषय को लेकर प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो गयी कि पेशवा पर किसका प्रभाव रहे।

    पेशवा बाजीराव (द्वितीय) किसी शक्तिशाली मराठा सरदार का संरक्षण चाहता था। अतः उसने दौलतराव सिन्धिया का संरक्षण स्वीकार कर लिया। बाजीराव तथा सिन्धिया ने होलकर के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना लिया। होलकर के लिये यह स्थिति असहनीय थी। इस कारण 1802 ई. के प्रारम्भ में सिन्धिया एवं होलकर के बीच युद्ध छिड़ गया। जब होलकर मालवा में सिन्धिया की सेना के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त था, तब पेशवा ने पूना में होलकर के भाई बिट्ठूजी की हत्या करवा दी। होलकर अपने भाई की हत्या का बदला लेने पूना की ओर चल पड़ा। होलकर ने पूना के निकट पेशवा और सिन्धिया की संयुक्त सेना को परास्त किया और एक विजेता की भाँति पूना में प्रवेश किया।

    होलकर ने राघोबा के दत्तक पुत्र अमृतराव के बेटे विनायकराव को पेशवा घोषित कर दिया। इस पर पेशवा बाजीराव (द्वितीय) भयभीत होकर बसीन (बम्बई के पास अँग्रेजों की बस्ती) चला गया। बसीन में उसने वेलेजली से प्रार्थना की कि वह उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दे। वेलेजली भारत में कम्पनी की सर्वोपरि सत्ता स्थापित करना चाहता था। मैसूर की शक्ति को नष्ट करने के बाद अब मराठे ही उसके एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी रह गये थे। अतः वह मराठा राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर ढूँढ रहा था। पेशवा द्वारा प्रार्थना करने पर वेलेजली को यह अवसर मिल गया।

    बसीन की संधि (1802 ई.)

    वेलेजली ने पेशवा के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह सहायक सन्धि स्वीकार कर ले तो उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दी जा सकती है। पेशवा ने वेलेजली की शर्त को स्वीकार कर लिया। 31 दिसम्बर 1802 को पेशवा और कम्पनी के बीच बसीन की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) पेशवा अपने राज्य में 6,000 अँग्रेज सैनिकों की एक सेना रखेगा तथा इस सेना के खर्चे के लिए 26 लाख रुपये वार्षिक आय का भू-भाग अँग्रेजों को देगा।

    (2.) पेशवा बिना अँग्रेजों की अनुमति के मराठा राज्य में किसी अन्य यूरोपियन को नियुक्ति नहीं देगा और न अपने राज्य में रहने की अनुमति देगा।

    (3.) पेशवा सूरत पर से अपना अधिकार त्याग देगा।

    (4.) निजाम और गायकवाड़ के विरुद्ध पेशवा के झगड़ों के पंच निपटारे का कार्य कम्पनी द्वारा किया जायेगा।

    (5.) पेशवा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी देशी राज्य के साथ सन्धि, युद्ध अथवा पत्र-व्यवहार नहीं करेगा।

    बसीन की सन्धि का महत्त्व

    बसीन की सन्धि के द्वारा पेशवा ने मराठों के सम्मान एवं स्वतंत्रता को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों बेच दिया, जिससे मराठा शक्ति को भारी धक्का लगा। सिडनी ओवन ने लिखा है- 'इस सन्धि के पश्चात् सम्पूर्ण भारत में, कम्पनी का राज्य स्थापित हो गया।' अँग्रेज इतिहासकारों ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। इस सन्धि का सबसे बड़ा दोष यह था कि अब अँग्रेजों का मराठों से युद्ध होना प्रायः निश्चित हो गया, क्योंकि वेलेजली ने मराठों के आन्तरिक झगड़ों को तय करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया था। वेलेजली ने कहा था कि इससे शान्ति तथा व्यवस्था बनी रहेगी किन्तु इस संधि के बाद सबसे व्यापक युद्ध हुआ। वेलेजली ने सन्धि का औचित्य बताते हुए कहा था कि अँग्रेजों को मराठों के आक्रमण का भय था किन्तु जब मराठे स्वयं अपने झगड़ों में उलझे हुए थे, तब फिर अँग्रेजों पर आक्रमण करने का प्रश्न ही नहीं था। वास्तविकता यह थी कि वेलेजली भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने पर तुला हुआ था और वह मराठों को ऐसी सन्धि में उलझा देना चाहता था, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग खुल जाये। अतः बसीन की सन्धि ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं।

    द्वितीय आँग्ल-मराठ युद्ध (1803-1805 ई.)

    बसीन की सन्धि के बाद मई 1803 में बाजीराव (द्वितीय) को अँग्रेजों के संरक्षण में पुनः पेशवा बनाया गया। मराठा सरदार इसे सहन करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने पारस्परिक वैमनस्य को भुलाककर अँग्रेजों के विरुद्ध एक होने का प्रयत्न किया। सिन्धिया और भौंसले तो एक एक हो गये, किन्तु सिन्धिया व होलकर की शत्रुता अभी ताजी थी। अतः होलकर पूना छोड़कर मालवा चला गया। गायकवाड़ अँग्रेजों का मित्र था। अतः उसने भी इस अँग्रेज विरोधी संघ में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया। इस प्रकार अँग्रेजों के विरुद्ध सैनिक अभियान करने के लिये केवल सिन्धिया व भौंसले ही बचे। उन्होंने अँग्रेजों से युद्ध करने की तैयारी आरम्भ कर दी। जब वेलेजली को इसकी सूचना मिली तो उसने 7 अगस्त 1803 को मराठों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और एक सेना अपने भाई आर्थर वेलेजली तथा दूसरी जनरल लेक के नेतृत्व में मराठों के विरुद्ध भेजी।

    देवगढ़ की संधि (1803 ई.)

    आर्थर वेलेजली ने सर्वप्रथम अहमदनगर पर विजय प्राप्त की। तत्पश्चात् अजन्ता व एलोरा के निकट असाई नामक स्थान पर सिन्धिया व भौंसले की संयुक्त सेना को परास्त किया। असीरगढ़ व अरगाँव के युद्धों में मराठा पूर्ण रूप से परास्त हुए। अरगाँव में परास्त होने के बाद 17 दिसम्बर 1803 को भौंसले ने अँग्रेजों से देवगढ़ की सन्धि कर ली। इस सन्धि के अन्तर्गत भौंसले ने वेलेजली की सहायक सन्धि की समस्त शर्तें स्वीकार कर लीं किंतु राज्य में कम्पनी की सेना रखने सम्बन्धी शर्त स्वीकार नहीं की। वेलेजली ने इस शर्त पर जोर नहीं दिया। इस सन्धि के अनुसार कटक तथा वर्धा नदी के निकटवर्ती क्षेत्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिये गये।

    सुर्जी-अर्जन की संधि (1803 ई.)

    जनरल लेक ने उत्तरी भारत की विजय यात्रा आरम्भ की। उसने सर्वप्रथम अलीगढ़ पर अधिकार किया। तत्पश्चात् दिल्ली पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। जनरल लेक ने भरतपुर पर आक्रमण किया और भरतपुर के शासक से सहायक सन्धि की। भरतपुर के बाद उसने आगरा पर अधिकार किया। अन्त में लासवाड़ी नामक स्थान पर सिन्धिया की सेना पूर्णतः परास्त हुई। सिन्धिया को विवश होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करनी पड़ी। 30 दिसम्बर 1803 को सुर्जीअर्जन नामक गाँव में यह सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार सिन्धिया ने दिल्ली, आगरा, गंगा-यमुना का दोआब, बुन्देलखण्ड, भड़ौंच, अहमदनगर का दुर्ग, गुजरात के कुछ जिले, जयपुर व जोधपुर अँग्रेजों के प्रभाव में दे दिये। उसने कम्पनी की सेना को भी अपने राज्य में रखना स्वीकार कर लिया। अँग्रेजों ने सिन्धिया को उसके शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया।

    सिन्धिया व भौंसले ने बसीन की सन्धि को भी स्वीकार कर लिया। इन सफलताओं से उत्साहित होकर वेलेजली ने घोषणा की- 'युद्ध के प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया है। इससे सदैव शान्ति बनी रहेगी।' किन्तु वेलेजली का उक्त कथन ठीक नहीं निकला, क्योंकि शान्ति शीघ्र ही भंग हो गई।

    होलकर से युद्ध

    होलकर अब तक इन घटनाओं से उदासीन था। उसने सिन्धिया व भौंसले के आत्मसमर्पण के बाद अँग्रेजों से युद्ध करने का निर्णय लिया और अप्रैल 1804 में संघर्ष छेड़ दिया। उसने सर्वप्रथम राजपूताना में कम्पनी के मित्र राज्यों पर आक्रमण किया। यह आक्रमण अँग्रेजों के लिए चुनौती था। 16 अप्रेल 1804 को लार्ड वेलेजली ने जनरल लेक को लिखा कि जितनी जल्दी हो सके, जसवंतराव होलकर के विरुद्ध युद्ध आरम्भ किया जाये। ऑर्थर वेलेजली के नेतृत्व में दक्षिण की ओर से तथा कर्नल मेर के नेतृत्व में गुजरात की ओर से होलकर के राज्य पर आक्रमण किया गया।

    इस कार्य में दक्षिण भारत तथा गुजरात की अन्य राजनीतिक शक्तियों की सहायता ली गयी किंतु होलकर ने इस मिश्रित सेना को बुरी तरह परास्त किया। वेलेजली ने कर्नल मॉन्सन के नेतृत्व में राजपूताने की तरफ एक सेना भेजी। कर्�

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  • भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना और विस्तार

     21.08.2017
    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना और विस्तार

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 6

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना  के कारण

    भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना और विस्तार के वास्तविक कारणों के विषय में इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि भारत में ब्रिटिश भारत की स्थापना एक चमत्कारिक घटना थी। कुछ इतिहासकारों के अनुसार भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना संयोगवश हुई, जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सोची समझी नीति का हिस्सा थी। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना भारतीयों की कमजोरी एवं परस्पर फूट का परिणाम थी। इन चारों धारणाओं पर विचार किये जाने की आवश्यकता है-

    (1.) भारत में अँग्रेजी शासन की स्थापना एक आश्चर्यजनक घटना थी-

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में साम्राज्य की स्थापना करने के लिये नहीं आई थी। उसके उपरांत भी भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना होना एक आश्चर्यजनक घटना समझी जानी चाहिये। यह भी एक आश्चर्य था कि भारत में अँग्रेजों से पहले जितने भी विदेशियों ने अपने राज्यों की स्थापना की, वे पश्चिम दिशा से भारत में घुसे थे जबकि अँग्रेजों ने बंगाल अर्थात् पूर्व दिशा से भारत में अपना राज्य आरम्भ किया।

    (2.) भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना एक संयोग थी-

    प्रोफेसर साले, अल्फ्रेड लॉयल तथा ली-वार्नर आदि इतिहासकारों की मान्यता है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार एक सुनिश्चित योजना का परिणाम न होकर संयोग की बात थी। इन विद्वानों के अनुसार पिट्स इण्डिया एक्ट में, कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य विस्तार न करने की नीति का स्पष्ट उल्लेख इन शब्दों में किया गया है- 'भारत में राज्य विस्तार और विजय योजनाओं का अनुसरण करना, इस राष्ट्र की नीति, सम्मान और इच्छा के विरुद्ध है।' अतः इन इतिहासकारों के अनुसार कम्पनी द्वारा घोषित इस नीति के बावजूद भारत में कम्पनी के राज्य की स्थापना एवं विस्तार होना केवल संयोग की बात थी।

    (3.) भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना सोची समझी नीति का हिस्सा थी-

    अनेक इतिहासकारों का मत है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य विस्तार पूर्णतः सोची-समझी गई नीति का परिणाम था। इन इतिहासकारों के अनुसार पिट्स इण्डिया एक्ट की धारा 34 जो कि एक पृष्ठ से भी अधिक लम्बी है, में स्पष्ट कहा गया है कि- 'फोर्ट विलियम के गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल को, भविष्य में संचालक समिति अथवा उसकी सीक्रेट कमेटी के आदेश के बिना भारतीय राज्यों अथवा नरेशों में से किसी के विरुद्ध युद्ध घोषित करने, युद्ध आरम्भ करने अथवा युद्ध करने के लिए सन्धि करने अथवा उसके क्षेत्रफल की सुरक्षा करने की गारण्टी देने का वैध अधिकार नहीं होगा।' इसका अर्थ यह हुआ कि संचालक समिति अथवा सीक्रेट कमेटी की अनुमति से उन्हें युद्ध करने का वैध अधिकार था। इस धारा में यह भी अपवाद था कि- 'जहाँ भारत में अँग्रेजों के विरुद्ध अथवा अँग्रेजों के आश्रित राज्य के विरुद्ध लड़ाई आरम्भ की जा चुकी हो अथवा तैयारियाँ की जा चुकी हो।' इस अपवाद से स्पष्ट है कि गवर्नर जनरल किसी भी स्थिति में साम्राज्यवादी नीति का आश्रय ले सकता था।

    (4.) अँग्रेजी शासन की स्थापना भारतीयों की कमजोरी का परिणाम थी-

    पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैण्ड, ब्रिटेन एवं फ्रांस आदि देशों से आने वाले लोग व्यापारी थे। वे अपने जहाजों एवं जन-माल की रक्षा के लिये अपने साथ सशस्त्र सैनिक रखते थे। अँग्रेज व्यापारी स्थानीय शासकों एवं मुगल बादशाहों की अनुमति प्राप्त करके भारत में व्यापार करने लगे। उनका उद्देश्य भारत में अधिक से अधिक लाभ अर्जित करना था ताकि वृद्धावस्था में इंग्लैण्ड लौटकर शेष जीवन सुख से बिता सकें। इसके उपरांत भी अँग्रेज व्यापारी भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में इसलिये सफल रहे क्योंकि भारतीयों में एकता नहीं थी। भारत की केन्द्रीय सत्ता के स्वामी मुगल शहजादे तख्त प्राप्त करने के लिये एक दूसरे का रक्त बहाने में व्यस्त थे। हिन्दू शासक अपने खोये हुए राज्यों की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष कर रहे थे। मराठे सम्पूर्ण भारत से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने के कार्य में व्यस्त थे। अफगान आक्रांता हर समय भारत की छाती रौंद रहे थे। इस प्रकार भारत की समस्त शक्तियां एक दूसरे के रक्त की प्यासी बनी हुई थीं तथा अँग्रेजों को ऐसे कमजोर देश पर अधिकार जमाने में अधिक रक्त नहीं बहाना पड़ा।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना न तो संयोग से हुई थी और न वह कोई चमत्कारिक घटना थी। कम्पनी के अधिकारियों द्वारा औरंगजेब के समय से ही भारत में व्यापार बढ़ाने के लिये तलवार का सहारा लेने की वकालात की जाने लगी थी। अतः यह निश्चित है कि एक सुनिश्चित योजना के अनुसार सम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया गया। भारतीयों की कमजोरी ने अंग्रेजों की सोची समझी नीति को साकार करने के लिये रास्ता आसान कर दिया।

    भारत में साम्राज्य विस्तार की ब्रिटिश नीतियाँ

    जहांगीर के समय से भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियां आरम्भ हो गयी थीं। लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे और उन्होंने 'व्यापार, न कि भूमि' की नीति अपनाई। मुगलों के अस्ताचल में जाने एवं पुर्तगाली, डच तथा फ्रैंच शक्तियों को परास्त कर भारत में अपने लिये मैदान साफ करने में अँग्रेजों को अठारहवीं सदी के मध्य तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 23 जून 1757 के प्लासी युद्ध के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में प्रथम बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई। इसके बाद अँग्रेजों ने अपनी नीति 'भूमि, न कि व्यापार' कर दी।

    गांधीजी के परम सहयोगी प्यारेलाल ने लिखा है- 'देशी राज्यों के परिप्रेक्ष्य में ब्रिटिश नीति में कई परिवर्तन हुए किंतु भारत में साम्राज्यिक शासन को बनाये रखने का प्रमुख विचार, उन परिवर्तनों को जोड़ने वाले सूत्र के रूप में सदैव विद्यमान रहा। यह नीति तीन मुख्य चरणों से निकली जिन्हें घेराबंदी (Ring Fence), सहायक समझौता (Subsidiary Alliance) तथा अधीनस्थ सहयोग (Subordinate Co-operation) कहा जाता है। राज्यों की दृष्टि से इन्हें 'ब्रिटेन की सुरक्षा', 'आरोहण' तथा 'साम्राज्य' कहा जा सकता है।'

    प्रथम चरण - बाड़बंदी (1756-98 ई.)

    ब्रिटिश नीति के प्रथम चरण (1756-98 ई.) में नियामक विचार 'सुरक्षा' तथा 'भारत में इंगलैण्ड की स्थिति' का प्रदर्शन' था। इस काल में कम्पनी अपने अस्तित्त्व के लिये संघर्ष कर रही थी। यह चारों ओर से अपने शत्रुओं और प्रतिकूलताओं से घिरी हुई थी। इसलिये स्वाभाविक रूप से कम्पनी ने स्थानीय संभावनाओं में से मित्र एवं सहायक ढूंढे। इन मित्रों के प्रति कम्पनी की नीति चाटुकारिता युक्त, कृपाकांक्षा युक्त एवं परस्पर आदान-प्रदान की थी। लॉर्ड क्लाइव (1758-67) ने प्लासी के युद्ध से पहले और उसके बाद में मुगल सत्ता की अनुकम्पा प्राप्त करने की चतुर नीति अपनाई। बक्सर युद्ध के पश्चात् 1765 ई. में हुई इलाहाबाद संधि से ईस्ट इण्डिया कम्पनी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हुई। वारेन हेस्टिंग्स (1772-1785 ई.) के काल में स्थानीय शक्तियों की सहायता से राज्य विस्तार की नीति अपनाई गई। 1784 ई. के पिट्स इण्डिया एक्ट में घोषणा की गयी कि किसी भी नये क्षेत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के क्षेत्र में जबर्दस्ती नहीं मिलाया जायेगा। लार्ड कार्नवालिस (1786-1793 ई.) तथा सर जॉन शोर (1793-1798 ई.) ने देशी राज्यों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति अपनायी। इस नीति को अपनाने के पीछे उनका विचार मित्र शक्तियों की अवरोधक दीवार खड़ी करने तथा जहाँ तक संभव हो सके, विजित मित्र शक्तियों की बाड़बंदी (Ring Fence) में रहने का था।

    दूसरा चरण - सहायक समझौते (1798-1813 ई.)

    मारवाड़ रियासत ने ई. 1786, 1790 तथा 1796 में, जयपुर रियासत ने ई. 1787, 1795 तथा 1799 में एवं कोटा रियासत ने ई. 1795 में मराठों के विरुद्ध अँग्रेजों से सहायता मांगी किंतु अहस्तक्षेप की नीति के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन अनुरोधों को स्वीकार नहीं किया। शीघ्र ही अनुभव किया जाने लगा कि यदि स्थानीय शक्तियों की स्वयं की घेरेबंदी नहीं की गयी तथा उन्हें अधीनस्थ स्थिति में नहीं लाया गया तो अँग्रेजों की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। इस कारण लॉर्ड वेलेजली (1798 से 1805 ई.) के काल में ब्रिटिश नीति का अगला चरण आरम्भ हुआ। इस चरण में 'सहयोग' के स्थान पर 'प्रभुत्व' ने प्रमुखता ले ली। वेलेजली ने सहायक संधि की पद्धति निर्मित की। इस पद्धति में देशी शासक, रियासत के आंतरिक प्रबंध को अपने पास रखता था किंतु बाह्य शांति एवं सुरक्षा के दायित्व को ब्रिटिश शक्ति को समर्पित कर देता था। इस प्रकार वेलेजली ने 'सहायक संधियों' के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को समस्त भारतीय राज्यों पर थोपने का निर्णय लिया ताकि देशी राज्य, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध किसी तरह का संघ न बना सकें। उसने सहायता के समझौतों से ब्रिटिश प्रभुत्व को और भी दृढ़ता से स्थापित कर दिया। वेलेजली ने प्रयत्न किया कि राजपूताने के राज्यों को ब्रिटिश प्रभाव एवं मित्रता के क्षेत्र में लाया जाये किंतु उसे इस कार्य में सफलता नहीं मिली।

    तीसरा चरण - अधीनस्थ सहयोग (1817-1858 ई.)

    1805 ई. में वेलेजली के लौट जाने के बाद ब्रिटिश नीति में पुनः परिवर्तन हुआ। कार्नवालिस (1805 ई.) तथा बारलो (1805-1807 ई.) ने देशी रियासतों की ओर से किये जा रहे संधियों के प्रयत्नों को अस्वीकृत किया तथा अहस्तक्षेप की नीति अपनाई किंतु शीघ्र ही इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे और मराठे फिर से शक्तिशाली हो गये। अतः 1814 ई. में चार्ल्स मेटकाफ ने लॉर्ड हेस्टिंग्ज को लिखा कि यदि समय पर विनम्रता पूर्वक मांगे जाने पर भी (देशी राज्यों को) संरक्षण प्रदान नहीं किया गया तो संभवतः बाद में, प्रस्तावित संरक्षण भी अमान्य कर दिये जायेंगे। जॉन मैल्कम की धारणा थी कि सैनिक कार्यवाहियों तथा रसद सामग्री दोनों के लिये इन राज्यों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण होना चाहिये अन्यथा ये राज्य हमारे शत्रुओं को हम पर आक्रमण करने के लिये योग्य साधन उपलब्ध करवा देंगे।

    हेस्टिंग्स का मानना था कि राजपूत रियासतों पर हमारा प्रभाव स्थापित होने से सिक्खों और उनको सहायता देने वाली शक्तियों के बीच शक्तिशाली प्रतिरोध बन जायगा। इससे न केवल सिन्धिया, होलकर और अमीरखाँ की बढ़ती हुई शक्ति नियंत्रित होगी, जो उसके अनुमान से काफी महत्वपूर्ण उद्देश्य था, बल्कि उससे मध्य भारत में कम्पनी की सैनिक और राजनैतिक स्थिति को अत्यधिक सुदृढ़ बनाने में भी सहायता मिलेगी। इस नीति के तहत 1817 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्ज देशी राज्यों से अधीनस्थ संधियाँ करने को तत्पर हुआ।

    हेस्टिंग्ज ने अपना उद्देश्य लुटेरी पद्धति के पुनरुत्थान के विरुद्ध अवरोध स्थापित करना तथा मराठा शक्ति के विस्तार को रोकना बताया। उसने तर्क दिया कि चूंकि मराठे, पिण्डारियों की लूटमार को नियंत्रित करने में असफल रहे हैं अतः मराठों के साथ की गयी संधियों को त्यागना न्याय संगत होगा। हेस्टिंग्स ने चार्ल्स मेटकाफ को राजपूत शासकों के साथ समझौते सम्पन्न करने का आदेश दे दिया। गवर्नर जनरल का पत्र पाकर चार्ल्स मेटकॉफ ने राजपूत शासकों को कम्पनी का सहयोगी बनने के लिये आमंत्रित किया। इस पत्र में कहा गया कि राजपूताना के राजा जो खिराज मराठों को देते आये हैं उसका भुगतान ईस्ट इण्डिया कम्पनी को करें। यदि किसी अन्य पक्ष द्वारा राज्य से खिराज का दावा किया जायेगा तो उससे कम्पनी निबटेगी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार होगा किंतु उन्हें अपने व्यय पर ब्रिटिश सेना अपने राज्य में रखनी पड़ेगी। कम्पनी द्वारा संरक्षित राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये कम्पनी से अनुमति लेनी होगी। इस सब के बदले में कम्पनी ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का दायित्व ग्रहण किया।

    इस प्रकार हेस्टिंग्ज ने देशी राज्यों के समक्ष बाह्य सुरक्षा एवं आंतरिक शांति का चुग्गा डाला जिसे चुगने के लिये भारत के देशी राज्य आगे आये और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जाल में फंस गये।

    भारत में लगभग 600 देशी राज्य थे जिनकी संख्या समय के साथ घटती बढ़ती रहती थी। 1817-18 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के 40 देशी राज्यों के साथ अधीनस्थ संधियाँ की गईं।

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना

    क्लाइव का योगदान

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग 1757 ई. में क्लाइव के नेतृत्व में लड़े गये प्लासी के युद्ध के बाद से ही खुल गया था। इस युद्ध ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल का स्वामी बना दिया तथा वह राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गई। 1764 ई. में बक्सर के युद्ध में मिली विजय से कम्पनी का भारत की तीन प्रमुख शक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम पर दबदबा स्थापित हो गया। इस युद्ध में मल्हारराव होलकर भी अँग्रेजों से परास्त हो गया। इससे ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई। क्लाइव की सफलताएं इतनी जबर्दस्त थीं कि 1765 ई. में उसे दुबारा बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया। क्लाइव ने दृढ़ संकल्प शक्ति से दुःसाहस पूर्ण कार्य किये जिनसे भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सका।

    वारेन हेस्टिंग्ज का योगदान

    1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज बंगाल का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने क्लाइव के काम को तेजी से आगे बढ़ाया। उसने मुगल बादशाह की 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी और बंगाल के नवाब की 53 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन घटाकर 16 लाख रुपये कर दी। उसने 1772 ई. में बंगाल से द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त किया। 1773 ई. में ब्रिटिश संसद ने रेगुलेटिंग एक्ट पारित किया तथा बंगाल में गवर्नर के स्थान पर गवर्नर जनरल की नियुक्ति की जाने लगी। हेस्टिंग्ज के समय में मराठों के विरुद्ध कई सैनिक कार्यवाहियां की गईं किंतु ईस्ट इण्डिया कम्पनी को कई बार मराठों से अपमानजनक शर्तों पर संधि करनी पड़ी।

    अहस्तक्षेप की नीति से साम्राज्य विस्तार को आघात (1784-98 ई.)

    1784 ई. में ब्रिटिश संसद ने पिट्स इण्डिया एक्ट पारित किया जिसमें कहा गया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन करेगी। यह प्रावधान भी किया गया कि गवर्नर जनरल को आपातकाल में, कौंसिल के बहुमत की स्वीकृति प्राप्त किये बिना भी कार्य करने के विशेष अधिकार होंगे। हेस्टिंग के बाद मेकफर्सन ने 1785 से 1786 ई. में 21 माह तक कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। सितम्बर 1786 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसने सामान्यतः अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया। इस नीति के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य स्थापना की दिशा में किये जा रहे कार्य में अवरोध उत्पन्न हो गया। 1793 ई. में सर जॉन शोर को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने भी अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण किया। 1795 ई. में हैदराबाद के निजाम एवं मराठों के बीच खरदा का युद्ध हुआ। निजाम ने कम्पनी से सैनिक सहायता मांगी किंतु कम्पनी ने देशी राज्यों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप करने तथा निजाम कोे सहायता देने से इन्कार कर दिया। इस कारण निजाम मराठों से परास्त हो गया और उसे मराठों से अपमानजनक शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी। अहस्तक्षेप की नीति के काल में नाना फड़नवीस के नेतृत्व में उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव फैलने लगा। इस अवधि में महादजी सिन्धिया की शक्ति में भी अपूर्व वृद्धि हुई तथा पेशवा की शक्ति का ह्रास हुआ।

    मार्क्विस वेलेजली तथा उसकी सहायक संधियाँ

    जिस समय मार्क्विस वेलेजली (1798-1805 ई.) को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया, उस समय कम्पनी की अहस्तक्षेप की नीति के कारण भारत में कम्पनी का प्रभाव क्षीण हो चला था। भारत की प्रमुख शक्तियाँ कम्पनी का विरोध कर रहीं थी। मैसूर का शासक टीपू, जिसने कार्नवालिस के समय अँग्रेजों से परास्त होकर श्रीरंगपट्टम की सन्धि की थी, अब श्रीरंगपट्टम की सन्धि का अपमान का बदला लेने की तैयारी कर रहा था। हैदराबाद का निजाम भी अँग्रेजों से नाराज था, क्योंकि मराठों के विरुद्ध हुए युद्ध में अँग्रेजों ने उसकी कोई सहायता नहीं की थी। मराठे भी दक्षिण में अँग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभाव को समाप्त करने की तैयारी कर रहे थे। भारत में नियुक्ति के समय वेलेजली की आयु 37 वर्ष थी। वह सामा्रज्यवादी, महत्वाकांक्षी तथा अत्यंत कूटनीतिज्ञ व्यक्ति था। कम्पनी विस्तार के विषय में उसकी तुलना उसके पूर्ववर्ती क्लाइव एवं वारेन हेस्टिंग्ज तथा पश्चवर्ती लार्ड डलहौजी से की जा सकती है। वेलेजली ने सहायक संधियों के माध्यम से हैदराबाद के निजाम, अवध के नवाब, मराठों के पेशवा, राजपूताने के अलवर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर और त्रावणकोर के राजा सहित अनेक राजाओं और नवाबों पर कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित की।

    अहस्तक्षेप की नीति का परित्याग

    माना जाता है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट्ट ने लॉर्ड वेलेजली को आदेश दिये थे कि वह भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करे तथा अमरीका के स्वतंत्रता संग्राम में इंग्लैण्ड ने जो प्रतिष्ठा खोई है, उसे भारत में साम्राज्य विस्तार कर पुनः प्राप्त करे। भारत में कम्पनी की सत्ता स्थापित करने के लिए फ्रांसीसियों के प्रभाव को समाप्त करना आवश्यक था। इसलिए लॉर्ड वेलेजली ने भारत आते ही पिट्स इण्डिया एक्ट की धारा 34 का अर्थ बताते हुए कहा कि- 'इस धारा के शब्दों अथवा इसकी भावना से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यह उचित और न्यायसंगत साधनों से राज्य विस्तार के विरुद्ध है।'

    सहायक सन्धि प्रथा से पूर्ववर्ती संधियाँ

    लॉर्ड वेलेजली भारत में कम्पनी राज्य का विस्तार करने के दृढ़ संकल्प के साथ आया था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारतीय राज्यों पर कम्पनी के आधिपत्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करना आवश्यक था। इसलिए वेलेजली ने सहायक सन्धि प्रथा को जन्म दिया। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि यह वेलेजली की मौलिक नीति नहीं थी। जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे ने लिखा है- 'वेलेजली ने मराठों की चौथ और सरदेशमुखी प्रणाली को देखकर ही इस नीति का निर्माण किया था।' कुछ इतिहासकार फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले को इस नीति का जन्मदाता मानते हैं, क्योंकि उसने भारतीय नरेशों से उपहार और भेंट आदि ग्रहण करके उन्हें सैनिक सहायता देने की प्रथा आरम्भ की थी। अल्फ्रेड लॉयल के अनुसार 1765 ई. से 1801 ई. के मध्य चार चरणों में सहायक सन्धि प्रथा का क्रमिक विकास हुआ-

    (1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतीय शासकों के साथ की गई संधियों के पहले चरण में, कम्पनी अपने मित्र भारतीय शासक को आवश्यकता होने पर सैनिक सहायता देती थी और बदले में उससे एक निश्चित धनराशि प्राप्त करती थी। ऐसी सन्धियाँ 1765 ई. में अवध के साथ तथा 1768 ई. में निजाम के साथ की गईं।

    (2.) द्वितीय चरण में यह परिवर्तन किया गया कि कम्पनी से सन्धि करने वाले भारतीय शासक की सुरक्षा के लिए एक स्थायी सेना कम्पनी अपने ही क्षेत्र में रखने का आश्वासन देती थी और उसके बदले में उस भारतीय शासक से वार्षिक निश्चित धनराशि प्राप्त करती थी। कम्पनी की सेना को मित्र राज्य की सीमा में नहीं रखकर कम्पनी राज्य की सीमा में रखा जाता था। वारेन हेस्टिंग्ज ने 1773 ई. में अवध के नवाब से ऐसी ही सन्धि की थी तथा अवध के नवाब ने रोहिल्लों के विरुद्ध युद्ध में कम्पनी की इस सेना का प्रयोग किया था।

    (3.) आगे चलकर तीसरे चरण में, कम्पनी ने अपनी सेना को सन्धि करने वाले राज्य की सीमा में ही नियुक्त करना आरम्भ कर दिया, जिस राज्य की सुरक्षा का दायित्व कम्पनी अपने ऊपर लेती थी। 1798 ई. में वेलेजली ने निजाम के साथ इसी प्रकार की सन्धि की और निजाम से इस सेना का वार्षिक व्यय लेना निश्चित किया।

    (4.) संधियों के चौथे चरण में, कम्पनी सन्धि करने वाले राज्य से, सेना का खर्च निश्चित धन के रूप में लेने के स्थान पर राज्य का निश्चित आय का भूभाग स्थायी रूप से अपने अधिकार में रखने लगी। इस प्रकार की सन्धि 1801 ई. में अवध के नवाब से की गई। उससे गोरखपुर, इलाहाबाद, कानपुर, फर्रूखाबाद, इटावा, बरेली और मुरादाबाद के जिले प्राप्त किये गये।

    सहायक संधि प्रथा के आविष्कार का वास्तविक उद्देश्य

    वेलेजली की सहायक सन्धि की प्रथा, उपरोक्त क्रम में पांचवा चरण कही जा सकती है। क्योंकि उसकी नीति उपर्युक्त समस्त चरणों से थोड़ी भिन्न थी। उसके पूर्व की गई सन्धियों के समय कम्पनी का उद्देश्य सीमित था। वह कम-से-कम खर्च में अपने क्षेत्रों की सुरक्षा के उपाय खोज रही थी, जिसे सुरक्षा घेरे की नीति कहा गया है। अर्थात् कम्पनी के क्षेत्रों के चारों ओर मित्र राज्यों का सुरक्षा घेरा स्थापित किया गया। इसलिए सन्धि करने वाले राज्य की स्वतंत्रता तथा उसकी सार्वभौम सत्ता को कम करने का प्रयास नहीं किया गया था, जबकि वेलेजली की सहायक सन्धि प्रथा का उद्देश्य सन्धि करने का प्रयास नहीं था, अपितु सन्धि करने वाले राज्य पर कम्पनी के आधिपत्य को थोपना तथा उस राज्य की शासन व्यवस्था को कम्पनी के नियंत्रण में लाना था। अर्थात् इस प्रथा का उद्देश्य कम्पनी द्वारा देशी राज्य की घेराबंदी करना था।

    जगन्नाथ प्रसाद मिश्र ने वेलेजली की सहायक सन्धि प्रथा की तुलना एक मकड़ी के जाले से करते हुए लिखा है- 'जिस प्रकार मकड़ी के जाले में फँसने के बाद कोई भी कीड़ा बाहर नहीं निकल पाता, उसी प्रकार जो भारतीय राज्य सहायक सन्धि के जाल में एक बार फँसा, वह कभी भी उससे बाहर नहीं निकल सका। जाले में बैठी हुई मकड़ी जैसे अपने जाल में फँसे शिकार को अपनी सुविधानुसार कभी भी दबोच सकती है, उसी प्रकार कम्पनी ने भी, जब भी आवश्यक समझा, भारतीय राज्य पर अपना फंदा कड़ा कर दिया।' जगन्नाथ प्रसाद मिश्र के उक्त कथन से स्पष्ट है कि वेलेजली की सहायक सन्धि प्रथा, उसके पहले के अधिकारियों द्वारा की जा रही संधियों से नितांत भिन्न थी।

    सहायक सन्धि प्रथा का जन्म

    सहायक सन्धि की शर्तें

    वेलेजली ने देशी राज्यों के शासकों के साथ अलग-अलग सहायक सन्धियाँ कीं। इन संधियों की अधिकांश शर्तें एक जैसी थीं। सहायक सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

    (1.) सैद्धांतिक रूप से सहायक संधि, कम्पनी और सम्बन्धित राज्य के बीच समानता के आधार पर होती थी किंतु वास्तव में देशी राज्य के शासक को कम्पनी की अधीनस्थ मित्रता स्वीकार करनी पड़ती थी।

    (2.) देशी राज्य के वैदेशिक मामलों पर कम्पनी का नियंत्रण हो जाता था। देशी राज्य, कम्पनी सरकार की अनुमति के बिना न तो किसी अन्य शासक से युद्ध कर सकता था और न किसी प्रकार का राजनैतिक समझौता कर सकता था। इस प्रकार सन्धि करने वाले राज्य की बाह्य स्वतंत्रता समाप्त हो जाती थी।

    (3.) देशी राज्य को अँग्रेजों के अतिरिक्त अन्य किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकरी में रखने अथवा निवास करने की अनुमति देने का अधिकार नहीं होता था। इस शर्त का मुख्य उद्देश्य देशी राज्यों में फ्रांसीसियों के प्रभाव को समाप्त करना था।

    (4.) देशी राज्य को अपने व्यय पर राज्य में कम्पनी की एक सेना रखनी पड़ती थी। यदि कोई राज्य इस सहायक सेना के व्यय के लिए धन नहीं दे सकता, तो उस धनराशि के बराबर आय का अपना भू-भाग कम्पनी को सौंपना पड़ता था।

    (5.) देशी राज्य में कम्पनी की तरफ से एक अधिकारी नियुक्त किया जाता था जिसे रेजीडेन्ट अथवा पॉलिटिकल एजेन्ट कहते थे। वह राज्य की राजधानी में अथवा उसके निकट रहता था। वह राज्य तथा कम्पनी के बीच कड़ी का काम करता था तथा यह देखता था कि राज्य के द्वारा संधि की शर्तों का पालन किया जा रहा है अथवा नहीं! आगे चलकर ये अधिकारी देशी राज्य में उत्तराधिकार के मामलों में अनाधिकार हस्तक्षेप करने लगे तथा अपने इच्छित व्यक्ति को गद्दी पर बैठाने लगे।

    (6.) इस सन्धि को स्वीकार करने वाले देशी राज्य को कम्पनी यह आश्वासन देती थी कि यदि उस राज्य पर कोई अन्य शक्ति आक्रमण करती है तो कम्पनी उस राज्य की रक्षा करेगी। यदि उस राज्य में आन्तरिक विद्रोह हो जाता है तो कम्पनी उस विद्रोह को समाप्त करने में सहयोग करेगी।

    (7.) कम्पनी अपने मित्र राज्य को यह आश्वासन देती थी कि कि उस राज्य के आन्तरिक प्रशासन में कभी हस्तक्षेप नहीं करेगी।

    (8.) दोनों पक्ष घनिष्ठ मित्रता बनाये रखने का वादा करते थे तथा एक पक्ष के मित्र या शत्रु, दूसरे पक्ष के मित्र या शत्रु मानने की बात स्वीकार करते थे।

    वेलेजली के बाद जब लॉर्ड हेस्टिंग्ज (1813-1823 ई.) भारत आया तब उसने देखा कि प्रत्येक देशी राज्य किसी न किसी शक्ति को (अर्थात् मराठों, मुगलों, फ्रांसिसियों, डचों आदि को) खिराज अर्थात् वार्षिक कर चुकाता है। अतः हेस्टिंग्ज ने सहायक संधि में एक और शर्त जोड़ दी कि कम्पनी से सहायक संधि करने वाले देशी राज्य के द्वारा अनिवार्य रूप से खिराज की वह राशि कम्पनी को चुकानी पड़ेगी जो उसके पूर्ववर्ती शक्ति को चुकाई जाती रही है।

    सहायक सन्धि प्रथा की समीक्षा

    सहायक संधि की प्रथा भारत के देशी राज्यों के लिये विष तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिये अमृत सिद्ध हुई। इसके निम्नलिखित प्रमुख परिणाम निकले-

    (1.) देशी राज्यों का शोषण: वेलेजली द्वारा आरम्भ की गई सहायक सन्धि प्रथा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साम्राज्य विस्तार के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। देशी राज्य इन संधियों के मकड़ जाल में फंसकर अपनी सम्प्रभुता गंवा बैठे। अँग्रेजों ने शासन की जिम्मेदारी तो भारतीय राज्यों पर ही रखी किंतु उन्हें संरक्षण देने के नाम पर उनका भरपूर शोषण किया। इस प्रकार कम्पनी ने भारतीय राज्यों पर, भारतीय राज्यों के शासन तंत्र के माध्यम से शासन किया।

    (2.) बिना किसी व्यय के सेना का निर्माण: उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट की शक्ति में तेजी से वृद्धि हो रही थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भय था कि कहीं नेपोलियन भारत पर आक्रमण न कर दे। अतः कम्पनी अपनी सैनिक शक्ति में विस्तार करना चाहती थी किन्तु कम्पनी के लिये विशाल सेना का खर्च वहन कर पाना सम्भव नहीं था। वेलेजली ने बड़ी चतुराई से यह काम कर लिया। उसने सहायक प्रथा के द्वारा कम्पनी की सेना में वृद्धि भी कर ली और उसका खर्च भी कम्पनी को वहन नहीं करना पड़ा। यद्यपि भारतीय राज्यों में कम्पनी की सेना उस राज्य की सुरक्षा के लिए रखी जाती थी, किन्तु इस सेना का प्रयोग करने का अधिकार केवल कम्पनी के पास था। इतना ही नहीं, आवश्यकता होने पर कम्पनी उस सेना का प्रयोग उस राज्य के विरुद्ध भी करती थी। सहायक संधियों का आविष्कार करने से पहले, कम्पनी की सेना कम्पनी राज्य के भीतर रहती थी तथा उसे एक स्थान से दूरस्थ स्थान पर भेजने में बड़ी कठिनाई होती थी। सहायक संधियों के बाद कम्पनी की सेना सन्धि करने वाले हर राज्य में नियुक्त रहती थी। इस कारण उन्हें किसी भी निकटवर्ती क्षेत्र में बड़ी आसानी से भेजा जाने लगा। वेलेजली ने बाद में स्वीकार किया था कि 22,000 सेना को कम्पनी की आर्थिक स्थिति पर कोई प्रभाव डाले बिना किसी भी भारतीय राज्य के विरुद्ध भेजा जा सकता है।

    (3.) सैनिक सीमाओं का विस्तार: सहायक सन्धियों के सफल रहने से कम्पनी की सैनिक सीमाएँ उसकी राजनैतिक सीमाओं से भी आगे निकल गईं। 1805 ई. में कम्पनी की राजनैतिक सीमा बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा कुछ गिने-चुने स्थानों तक सीमित थी किन्तु उसकी सैनिक सीमा उत्तर भारत में अवध व रोहिलखण्ड तक तथा दक्षिण में कर्नाटक तक फैल गई। इस कारण कम्पनी की राजनैतिक सीमाएँ पूर्णतः सुरक्षित हो गईं। इस व्यवस्था से कम्पनी को अपनी राजनैतिक सीमाओं के और अधिक विस्तार का अवसर मिल गया। निजाम के साथ सहायक सन्धि हो जाने के बाद वेलेजली के लिए मैसूर विजय करना सरल हो गया। इसी प्रकार अवध के साथ सन्धि होने के बाद रोहिलखण्ड, आगरा तथा दिल्ली पर सरलता से अधिकार कर लिया गया।

    (4.) देशी राज्यों के क्षेत्रों को हड़पने में सुविधा: कम्पनी द्वारा जिन देशी राज्यों से सहायक सन्धियाँ की गईं, उनसे सैनिक व्यय के नाम पर विस्तृत-भू-भाग स्थायी रूप से कम्पनी ने अपने अधिकार में ले लिये। इससे कम्पनी का साम्राज्य विस्तार होता चला गया। जो देशी राज्य सहायक सेना का खर्च समय पर नहीं चुका पाता था, कम्पनी उस राज्य के उपजाऊ और सम्पन्न प्रदेशों को स्थायी रूप से अपने अधीन कर लेती थी। राज्य के उपजाऊ हिस्से कम्पनी द्वारा हड़प लिये जाने के बाद, देशी राज्यों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि वे अपना शासन भी सुचारू रूप से नहीं चला सके।

    (5.) राज्यों के शासन पर अधिकार: राज्यों में अव्यवस्था फैलने पर कम्पनी ने राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया और राज्यों का वित्तीय प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। देशी शासक इतने सहम गये कि उन्हें कम्पनी के अधिकारियों से यह पूछने तक का साहस नहीं होता था कि वे उनके राज्य में कितना राजस्व एकत्रित कर रहे हैं और उसे कहाँ खर्च कर रहे हैं।

    (6.) देशी राज्यों में अलगाव: सन्धि करने वाले देशी राज्यों की विदेश नीति पर कम्पनी का नियंत्रण हो जाने से प्रत्येक देशी राज्य एक दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। इन अलग-थलग पड़े राज्यों का कम्पनी के रेजीडेण्ट्स और पोलिटिकल एजेण्ट्स ने जमकर शोषण किया।

    (7.) फ्रांसीसियों का दमन: इन सन्धियों के फलस्वरूप देशी राज्यों द्वारा फ्रान्सीसी आदि विदेशी शक्तियों से संधि कर लिये जाने की आशंका समाप्त हो गई। समस्त देशी राज्यों से फ्रांसीसियों को निकला दिया गया जिससे भारतीय राज्यों में फ्रांसीसियों का अस्तित्त्व समाप्त हो गया। इसी प्रकार ईरानियों एवं सिंधी मुसलमानों को भी देशी राज्यों की सेवाओं से निकाल दिया गया जो उत्तर भारत के राज्यों में उत्पातों की जड़ समझे जाते थे।

    (8.) देशी राज्यों की सैनिक शक्ति का क्षरण: देशी रा�

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  • ब्रिटिश भारत में जमींदारी, रैय्यतवाड़ी और महलवाड़ी व्यवस्थाएँ

     21.08.2017
    ब्रिटिश भारत में जमींदारी, रैय्यतवाड़ी और महलवाड़ी व्यवस्थाएँ

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 7



    भारत में भू-राजस्व व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    भारत में वैदिक काल से ही राजा को प्रजा से भोग प्राप्त करने का अधिकार था। भोग, किसी भी प्रकार के उत्पादन का प्रायः छठा अंश होता था जो प्रजा से राजन्य को मिलता था और राजन्य उसके बदले में अपनी प्रजा की शत्रुओं से सुरक्षा करता था तथा प्रजा की आध्यात्मिक उन्नति के प्रयास करता था। प्रान्तीय शासक जो कि राजन्य के लिये भोग एकत्र करते थे भोगिक अथवा भोगपति कहलाते थे। यही वैदिक व्यवस्था आगे चलकर भू-राजस्व व्यवस्था के रूप में विकसित हुई।

    हिन्दू शासकों के काल में भू-राजस्व वसूली व्यवस्था

    गुप्तकाल में राज्य की आय का मुख्य साधन भूमिकर था, जिसे भाग, भोग या उद्रेग कहते थे। यह उपज का 1/6 भाग अर्थात् लगभग 16.6 प्रतिशत होता था। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन में राज्य की आय का प्रधान साधन भूमि-कर था। राज्य द्वारा किसानों से उपज का चौथा भाग अर्थात् 25 प्रतिशत कर के रूप में लिया जाता था। विशिष्ट परिस्थितियों में केवल आठवां भाग अर्थात् 12.5 प्रतिशत कर के रूप में लिया जाता था। सम्राट को किसानों से पशु भी भेंट के रूप में मिलते थे। नगरों में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के विक्रय-मूल्य का दसवां भाग राज्य को कर के रूप में मिलता था। हर्षवर्धन भी गुप्तों की भांति अपनी प्रजा से उपज का केवल छठा भाग कर के रूप में लेता था। राजपूत शासक भी उपज का 1/6 से लेकर 1/4 अंश भू-राजस्व के रूप में प्राप्त करते रहे।

    दिल्ली सल्तनत काल में भू-राजस्व वसूली व्यवस्था

    दिल्ली सल्तनत काल में कुतुबुद्दीन ऐबक ने लगान-सम्बन्धी पुराने नियम ही चालू रखे किंतु उसके बाद के मुस्लिम शासकों ने भू-राजस्व लगभग दो से तीन गुना तक बढ़ा दिया। राजस्व वसूली का काम हिन्दू अधिकारी ही करते रहे। अलाउद्दीन खिलजी के शासन में किसान की फसल में से 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य का होता था। किसानों को चारागाह तथा मकान का भी कर देना पड़ता था। उसने लगान वसूली के लिए सैन्य अधिकारी नियुक्त किये तथापि वह पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका। लगान वसूली का कार्य अब भी हिन्दू मुकद्दम, खुत तथा चौधरी करते थे जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। सुल्तान ने उनके समस्त विशेषाधिकारों को समाप्त करके उनका वेतन निश्चित कर दिया। खुत तथा बलहर अर्थात् हिन्दू जमींदारों पर इतना अधिक कर लगाया गया कि वे निर्धन हो गये। मुहम्मद बिन तुगलक ने दोआब पर कर में भारी वृद्धि की। बरनी के अनुसार बढ़ा हुआ कर, प्रचलित करों का दस तथा बीस गुना था। (प्रचलित लगान दर पर दस से बीस गुनी वृद्धि करना संभव नहीं था। बरनी की इस कटु आलोचना का कारण यह था कि बरनी उलेमा वर्ग का था जिसके साथ मुहम्मद बिन तुगलक की बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं थी। बरनी, बरान का रहने वाला था जिसे दो-आब के कर का शिकार बनना पड़ा था। इसलिये बरनी में मात्भूमि के प्रेम का आवेश था परन्तु बरनी द्वारा की गई कटु आलोचना निराधार नहीं थी। करों में अवश्य ही इतनी वृद्धि की गई थी कि हिन्दू किसानों के पास उपज का मामूली सा अंश भी न बच सके।) किसानों पर भूमि कर के अतिरिक्त घरी अर्थात गृह-कर तथा चरही अर्थात् चरागाह-कर भी लगाया गया। प्रजा को इन करों से बड़ा कष्ट हुआ। शेरशाह सूरी ने पैदावार का एक तिहाई अर्थात् 33 प्रतिशत हिस्सा लगान के रूप में लेना निश्चित किया।

    मुगल काल में भू-राजस्व वसूली व्यवस्था

    मुगल काल में भू-राजस्व उपज का 1/2 अर्थात् 50 प्रतिशत भू-राजस्व के रूप में देना पड़ता था। किसानों द्वारा घोर परिश्रम करने के बाद फसल तैयार होती थी, किन्तु भू-राजस्व एवं अन्य करों तथा चुंगियों को चुकाने के बाद उनके पास इतना अनाज बड़ी कठिनाई से बचता था कि वे अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल सकें। जहांगीर तथा शाहजहां के समय में भी यही व्यवस्था चलती रही। औरंगजेब ने अकबर के समय के लगान (भू-राजस्व) निर्धारण का तरीका बदल दिया। औरंगजेब से पहले, सरकारी अधिकारी लगान वसूल करते थे किन्तु औरंगजेब ने किसानों से लगान वसूलने के लिये ठेकेदारी प्रथा आरम्भ की। ठेकेदार, किसानों से मनमाना लगान वसूलने लगे। इससे किसानों की दशा बिगड़ गई। दक्षिण के युद्धों में अत्यधिक धन की हानि होने से औरंगजेब ने किसानों एवं जनसाधारण पर कर बढ़ा दिये। इससे मुगल सल्तनत में असन्तोष बढ़ गया और विद्रोह की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। स्वयं औरंगजेब ऐसी स्थिति देखकर कहा करता था कि उसकी मृत्यु के बाद कैसा प्रलय आयेगा?

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल में दीवानी के अधिकार

    बक्सर युद्ध के बाद 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल प्रांत की दीवानी के अधिकार प्राप्त किये जिससे भू-राजस्व वसूली का दायित्व कम्पनी का हो गया। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समय में भी भू-राजस्व ही कम्पनी की आय का मुख्य स्रोत बन गया। जिस समय कम्पनी ने यह दायित्व ग्रहण किया, उस समय बंगाल में राजस्व के तीन स्रोत थे-

    (1.) माल: इसमें भू-राजस्व तथा नमक-कर सम्मिलित थे।

    (2.) सेर: इसमें आयात-निर्यात-कर तथा पथ-कर सम्मिलित थे।

    (3.) बाजी-जमा: इसमें आबकारी-कर, जुर्माना तथा अन्य कर सम्मिलित थे। उपरोक्त तीनों स्रोतों में भू-राजस्व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वह राज्य की आय का 80 प्रतिशत था। मुगल काल से बंगाल में भू-राजस्व की वसूली के लिये सुदृढ़ व्यवस्था की गई थी जो कम्पनी का शासन प्रारम्भ होने तक ज्यों की त्यों थी।

    भू-राजस्व वसूली के प्रमुख अधिकारी

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त करने के समय भू-राजस्व वसूली के प्रमुख अधिकारी इस प्रकार से थे-  

    कानूनगो: मुगल काल में भू-अभिलेखों को तैयार करने तथा उनके रख-रखाव का काम कानूनगो करता था। कानूनगो का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वह जमींदारों के कार्यों पर दृष्टि रखता था, राजकोष में नियमित राजस्व जमा करता था तथा किसानों के हितों का ध्यान रखता था। मुगल सल्तनत के पतन के साथ ही कानूनगो का पद वंशानुगत हो गया। फलस्वरूप अब वह न तो राज्य के हितों की देखभाल करता था और न किसानों के हितों का ध्यान रखता था, वरन् जमींदारों के साथ मिलकर किसानों पर अत्याचार करने लगा।

    आमिल: मुगलकालीन बंगाल में भू-राजस्व की वसूली आमिल करता था।

    फौजदार: सीमान्त क्षेत्रों में जमींदारों से वसूली फौजदार करता था। मुगलों के बाद यह कार्य ऐसे व्यक्ति करने लगे जो स्थानीय क्षेत्रों में प्रभाव रखते थे। फलस्वरूप दूरस्थ क्षेत्रों का भू-राजस्व सीमित होता गया तथा किसान भूमि के वंशानुगत मालिक हो गये।

    कम्पनी द्वारा राजस्व वसूली व्यवस्था में परिवर्तन

    नायब दीवान: 1765 ई. में कम्पनी ने जब बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त किया, तब कम्पनी केवल भू-राजस्व प्राप्त करने की इच्छुक थी, न कि भूमि की स्थिति के बारे में चिन्तित थी। इसलिये कम्पनी ने भू-राजस्व की वसूली का कार्य दो नायब दीवानों को सौंप दिया। दोनों नायब दीवान भू-राजस्व वसूल करके, नवाब के कोष में रुपया जमा करा देते थे और नवाब के कोष से यह राशि कम्पनी के कोष में स्थानान्तरित कर दी जाती थी। ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, कम्पनी की माँग में वृद्धि होती गई और वह भू-राजस्व की वसूली से सन्तुष्ट नहीं हुई। कम्पनी समझती थी कि नायब दीवानों द्वारा भू-राजस्व की रकम बीच में ही रख ली जाती है तथा किसान भी अपने हिस्से से अधिक का लगान अपने पास रख लेते हैं।

    जिला निरीक्षक: 1769 ई. में कम्पनी द्वारा भू-राजस्व की वसूली के निरीक्षण के लिए जिला निरीक्षकों की नियुक्ति की गई। जिला निरीक्षक स्वयं भ्रष्ट थे। अतः यह व्यवस्था भी पर्याप्त प्रतीत नहीं हुई।

    भू-राजस्व नियंत्रण परिषदें: कम्पनी द्वारा 1770 ई. में दो भू-राजस्व नियंत्रण परिषदें स्थापित की गईं। एक बंगाल के लिए, जिसका मुख्यालय मुर्शिदाबाद में रखा गया और दूसरी बिहार के लिए, जिसका मुख्यालय पटना रखा गया। ये दोनों परिषदें नायब दीवानों के कार्यों का निरीक्षण करती थीं।

    भू-राजस्व नियन्त्रण समिति:

    भू-राजस्व नियंत्रण परिषदों के काम का निरीक्षण करने के लिये कलकत्ता में एक भू-राजस्व नियन्त्रण समिति स्थापित की गई।

    कलक्टर: 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज ने भू-राजस्व प्रशासन में क्रांतिकारी सुधार लाते हुए दोनों नायब दीवानों का पद समाप्त कर अँग्रेजी निरिक्षकों को जिलों में राजस्व वसूल करने का काम सौंपा। इन निरीक्षकों को कलेक्टर (संग्राहक) पदनाम दिया गया। कलेक्टर की सहायता के लिए भारतीय दीवान नियुक्त किये गये। कलेक्टर का मुख्य कार्य लगान वसूल करना, लगान-पंजिका तैयार करना तथा दीवानी न्याय प्रदान करना था। सूबे का भू-राजस्व प्रशासन, गवर्नर तथा उसकी कौंसिल के हाथ में केन्द्रित कर दिया गया तथा इस कार्य के लिए उसे रेवेन्यू बोर्ड (राजस्व मण्डल) कहा जाने लगा। बोर्ड की सहायता के लिए एक भारतीय अधिकारी की नियुक्ति की गई जो राय-रायन कहलाता था।

    पाँच वर्षीय बंदोबस्त

    वारेन हेस्टिंग्स (1772-85 ई.) ने 1772 ई. में लगान वसूली के लिए एक वर्षीय समझाौता प्रणाली निरस्त करके, पाँच वर्षीय समझौता प्रणाली लागू की। इस प्रणाली के अंतर्गत अधिकतम बोली लगाने वाले व्यक्ति को पाँच वर्ष के लिए लगान वसूली का कार्य सौंपा जाता था। सामान्यतः इस कार्य के लिए जमींदारों को प्राथमिकता दी जाती थी।

    प्रांतीय परिषदों की स्थापना

    वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा स्थापित उपरोक्त व्यवस्था विशेष कारगर सिद्ध नहीं हुई। अतः नवम्बर 1773 में गवर्नर तथा उसकी कौंसिल ने एक नई योजना स्वीकृत की जो दो भागों में थी- प्रथम भाग की योजना अस्थायी थी जिसे तुरन्त लागू करना था तथा दूसरे भाग की योजना स्थायी थी, जिसे भविष्य में लागू करना था। अस्थाई योजना को 1774 ई. में लागू कर दिया गया। इस योजना के अनुसार बंगाल प्रेसीडेन्सी को छः डिवीजनों में विभक्त किया गया- कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, पटना, बर्दवान, दीनाजपुर और ढाका। प्रत्येक डिवीजन में एक प्रान्तीय परिषद स्थापित की गई जिसमें कम्पनी के पाँच वरिष्ठ अधिकारी होते थे। पाँच सदस्यों की इस परिषद में दो सदस्य गवर्नर की कौंसिल के सदस्य होते थे। परिषद को सहायता देने के लिये एक भारतीय अधिकारी नियुक्त किया गया, जो परिषद के लिए दीवान के रूप में कार्य करता था। कलेक्टरों को वापिस बुला लिया गया तथा उन्हें प्रान्तीय परिषदों के मुख्यालायों पर नियुक्त करके उन्हें इन परिषदों को सहायता देने को कहा गया। कलेक्टरों के स्थान पर भारतीय राजस्व अधिकारी नियुक्त किये गये जिन्हें नायब कहा जाता था। ये नायब भू-राजस्व वसूल करते थे और दीवानी अदालतों की अध्यक्षता करते थे।

    एक वर्षीय व्यवस्था

    वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 ई. में जो पाँच वर्षीय समझौता प्रणाली लागू की थी, उसकी अवधि 1777 ई. में समाप्त हो रही थी। बंगाल कौंसिल में इस बारे में भारी मतभेद उत्पन्न हो गये कि भू-राजस्व व्यवस्था की क्या प्रणाली हो? अतः कम्पनी के संचालकों ने कौंसिल द्वारा अन्तिम निर्णय लेने तक एक वर्षीय बन्दोबस्त लागू करने को कहा। इस कारण 1778 ई. से नीलामी पुनः प्रतिवर्ष होने लगी जिससे कम्पनी को भू-राजस्व की हानि हुई।

    प्रांतीय परिषदों की समाप्ति तथा राजस्व समिति की स्थापना

    1781 ई. में योजना का स्थायी भाग लागू किया गया। प्रान्तीय परिषदें समाप्त करके कलेक्टरों को वापिस केन्द्र में बुला लिया गया। जिलों का भू-राजस्व प्रशासन नायबों के पास ही रखा गया। रंगपुर, चित्रा और भागलपुर आदि कुछ जिलों में फिर से ब्रिटिश कलेक्टरों की नियुक्ति की गई। केन्द्र में चार सदस्यों की नई राजस्व समिति बनाई गई जिसमें कम्पनी के सर्वोच्च अधिकारी रखे गये। उनकी सहायता के लिए एक भारतीय दीवान रखा गया। राय-रायन के पद को बनाये रखा गया किन्तु वह दीवान के कार्र्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। राजस्व समिति के सदस्यों को स्थिर वेतन देने के स्थान पर, प्राप्त होने वाले भू-राजस्व का दो प्रतिशत देना तय किया गया। समिति के अध्यक्ष को अधिक हिस्सा दिया जाता था। गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल इस राजस्व समिति से निरन्तर संपर्क बनाये रखती थी ताकि समय-समय पर निर्देश दे सके तथा उसका निरीक्षण कर सके।

    जिलों में कलक्टरों की पुनः नियुक्ति

    उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि अभी तक कम्पनी भू-राजस्व व्यवस्था के लिए रास्ता खोज रही थी। इसीलिए हेस्टिंग्ज एक के बाद दूसरा प्रयोग करता रहा, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली। फिर भी, राजस्व मण्डल की स्थापना तथा कलेक्टर के पद का सृजन, भू-राजस्व के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कदम थे। फरवरी 1785 में वारेन हेस्टिंग्ज के जाने के बाद मेकफर्सन ने कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। उसके समय में कलेक्टरों को वापिस जिलों में भेज दिया गया तथा जिलों का पुनर्गठन कर उन्हें राजस्व मण्डल का नाम दिया गया। गवर्नर जनरल की कौंसिल के सदस्य को इसका अध्यक्ष एवं पांचवा सदस्य नियुक्त किया गया।

    शिरेस्तेदार की नियुक्ति

    जुलाई 1786 में मुख्य शिरेस्तेदार का नया पद सृजित किया गया, जो कानूनगो से भू-राजस्व के अभिलेख एवं सूचनाएँ एकत्रित करता था।

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  • ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

     21.08.2017
    ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 8


    ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

    ब्रिटिश सरकार की भू-राजस्व कर नीति ने भारत में, न केवल जमींदार एवं भूमिहीन किसान जैसे नये सामाजिक-आर्थिक वर्गों को जन्म दिया, अपितु देश की आर्थिक स्थिति को भी पूँजीवादी हितों के अनुरूप ढाल दिया। इस नीति ने कृषि-उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डाला। अँग्रेजों के आने के पहले किसानों का शोषण तो होता था किंतु कृषि-उत्पादन में आत्म-निर्भरता थी। अँग्रेजों के आने के बाद कृषि-उत्पादन में भारी गिरावट आई। इस गिरावट के लिये अँग्रेजों की कृषि नीति उत्तरदायी थी।

    कृषि पर बढ़ता बोझ

    1813 ई. तक ब्रिटिश कम्पनी ने व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रखा। इस कारण शिल्पी, दस्तकार एवं कारीगर बड़ी संख्या में बे-रोजगार होकर शहरों से गाँवों की ओर जाने को विवश हुए, जहाँ उन्होंने कृषि को जीविकोपार्जन का साधन बनाया। इस प्रकार कृषि पर निर्भर रहने वालों की संख्या बढ़ गई जिससे भूमि का विभाजन और उपविभाजन आरम्भ हुआ। भूमि के विभाजन से भूमि की उपलब्धता, कृषि-उत्पादन और कृषि में लगे हुए लोगों की संख्या के बीच असन्तुलन पैदा हो गया।

    कृषि उत्पादन में गिरावट

    भूमि पर आश्रित लोगों की संख्या बढ़ने से कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, क्योंकि भूमि सीमित थी। अँग्रेजों ने, इस गिरावट के लिए भारतीय कृषि भूमि की अनुर्वरता और कृषक की अकुशलता को उत्तरदायी ठहराया किन्तु वास्तव में कृषि-उत्पादन की कमी का कारण भूमि की अनुर्वरता अथवा कृषक की अकुशलता न होकर, कृषि पर बढ़ता हुआ कामगरों का बोझ, कृषि हेतु सिंचाई के साधनों का अभाव तथा किसान के पास पूंजी का अभाव होना था। ज्यों-ज्यों ब्रिटिश सत्ता का विस्तार होता गया, सरकार का खर्च बढ़ता गया और लगान में वृद्धि की जाती रही। लगान चुकाने में असमर्थ रहने पर बहुत से किसान खेती के कार्य से अलग हो जाते थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त होने से पहले बंगाल के नवाब मीर जाफर द्वारा 1764-65 ई. में 8.18 लाख पौंड का लगान वसूल किया गया था किंतु कम्पनी को दीवानी का अधिकार प्राप्त होने के बाद 1765-66 ई. में 14.70 लाख पौंड लगान के रूप में एकत्र किये गये। एक बार लगान-वृद्धि का जो क्रम चालू हुआ, वह चलता ही रहा। 1826 ई. तक लगान की राशि 24.20 लाख पौंड और 1857 ई. में 36 लाख पौंड तक पहुँच गई।

    ब्रिटिश सरकार ने लगान की दर काफी ऊँची रखी। उदारहण के तौर पर स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत यह दर 80 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त के अन्तर्गत आरम्भ में यह दर 66 प्रतिशत रखी गई किन्तु उत्पादन में कमी होने के कारण 45 प्रतिशत कर दी गई। लगान की इस अमानवीय व्यवस्था ने उत्पादन को महंगा बना दिया। इस कारण खेती पिछड़ गई और देश की आर्थिक व्यवस्था बिगड़ गई। किसानों की आर्थिक दुरावस्था गोरी सरकार के लिये राजनीतिक खतरा बन गई।

    लगान की अधिकता तथा कृषि उत्पादन के महँगेपन ने किसान को ऋण के भारी बोझ तले दबा दिया, जिससे वह कभी नहीं उबर सका। उसने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ऋण का सहारा लिया। लगान की बढ़ती हुई दर तथा किसान की सामाजिक आवश्यकताओं के कारण किसानों की ऋण-ग्रस्तता बढ़ती ही गई। ब्रिटिश सरकार ने किसानों की ऋण-ग्रस्तता का कारण, लगान की अधिकता नहीं बताकर, किसानों की फिजूलखर्ची व सामाजिक तथा पारिवारिक उत्सवों मेें धन फँूकने की आदत बताया, जो कि सत्य नहीं था। भारी लगान व साहूकार की मनमानी के कारण किसान ऋणों के बोझ से दबता ही चला गया।

    निरन्तर बढ़ती ऋण-ग्रस्तता के कारण किसानों की जमीन उसके हाथों से निकलती चली गई। साहूकार किसानों के ऋण के बदले में उनकी जमीनें हड़पने लगे। सरकार की ओर से इस प्रकार के हस्तान्तरण को रोकने के लिये कुछ कानून बनाये गये, जैसे- बंगाल काश्तकारी अधिनियम-1859, मद्रास काश्तकारी अधिनियम-1889, दक्कन कृषि सहायता अधिनियम, जो आगे चलकर बम्बई प्रेसीडेन्सी पर भी लागू किया गया, मध्य प्रदेश काश्तकारी अधिनियम-1898; आदि। ये कानून अधिक प्रभावी सिद्ध नहीं हुए और किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
    कृषि का वाणिज्यीकरण

    कृषि और कृषक की दशा बिगाड़ने के लिये ब्रिटिश सरकार की कृषि नीति ही नहीं अपितु औद्योगिक नीति भी जिम्मेदार थी। 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके मुक्त व्यापार नीति अपनाई गई। अब भारत केवल एक पूँजीवादी व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला देश ही नहीं था अपितु ब्रिटिश पूँजीपतियों के लिये एक मण्डी भी बन गया; जिसके कारण स्थानीय कुटीर उद्योग नष्ट हो गये। चूँकि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति उफान पर थी, अतः इंग्लैण्ड को अपने उद्योगों के लिये सस्ते माल की आवश्यकता थी, इस कारण भारत कच्चे माल का उत्पादन करने वाला देश बनकर रह गया। अब भारत को ब्रिटेन में बने माल की खपत करने वाले बाजार और कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले उपनिवेश की दोहरी भूमिका निभानी थी।

    भारत को अब केवल उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करना था, जिनकी इंग्लैण्ड के मिलों को एवं इंग्लैण्ड-वासियों को आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त भारत में पूंजीवादी व्यवस्था के बढ़ने के साथ-साथ नई लगान नीति के कारण किसान को अब नकद राशि की आवश्यकता थी। इसलिये अब किसान भी उन फसलों को उगाने के लिये विवश हुए जिनका बाजार में क्रय-विक्रय हो सके। जबकि इससे पहले किसान केवल उन्हीं फसलों को उगाता था जिनकी खपत स्थानीय स्तर पर होती थी। इस प्रकार उत्पादन के स्वरूप और प्रकृति में मूलभूत परिवर्तन हुए तथा भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण हो गया।

    नगदी फसलों की अवधारणा का विकास

    भारत में ब्रिटिश सत्ता स्थापित होने से पूर्व, उन जिन्सों का उत्पादन होता था जो कृषक परिवारों के दैनिक उपयोग के लिये आवश्यक थीं तथा जिनका प्रयोग विनिमय के लिये हो सकता था। ब्रिटिश पूंजीवाद के हस्तक्षेप से भारत का किसान केवल वे जिन्सें पैदा करने लगा जिनका देशी और विदेशी बाजार में अधिक मूल्य मिल सके। इस प्रकार कृषि के मूलभूत स्वरूप में परिवर्तन हो गया तथा अनेक स्थानों पर कुछ निश्चित फसलें उगाई जाने लगीं, जैसे- बंगाल में केवल जूट की खेती पर और पंजाब में केवल गेहूँ और कपास की खेती पर अधिक बल दिया गया। बनारस, बिहार, बंगाल, मध्य भारत तथा मालवा में अफीम के व्यापार के लिये पोस्त की खेती को बढ़ावा मिला। बर्मा में चावल की खेती बढ़ी। सरकार द्वारा इन कृषि उत्पादों को बढ़ाने के लिये किसानों को अग्रिम राशि भी दी जाती थी। 1853 ई. के बाद भारत में ब्रिटिश पूँजीपतियों द्वारा किये गये पूँजी निवेश के कारण नील, चाय, कॉफी, रबर आदि की खेती पर अधिक जोर दिया जाने लगा। भारत में यूरोपीय और ब्रिटिश पूँजीवाद की पहली पसन्द चाय, कॉफी, रबर और नील की खेती थी। इन फसलों के लिये उन्हें यूरोपीय बाजारों में अत्यधिक कीमत प्राप्त होती थी।

    (1.) नील की खेती : नील बागानों का कार्य निर्धन श्रमिकों से करवाया जाता था। उन्हें नील के बागानों में काम करने के लिये बलपूर्वक अग्रिम राशि दी जाती थी और फिर उन्हें बंधुआ श्रमिक बनाकर बागानों में काम करवाया जाता था। 1860 ई. में नील आयोग की रिपोर्ट आई जिसमें में कहा गया- 'रैयत ने पेशगी राशि चाहे अपनी इच्छा के विरुद्ध ली या खुशी से, वह कभी भी इसके बाद स्वतंत्र व्यक्ति नहीं रहा।' आयोग ने उन दिनों भारतीय गाँवों में प्रचलित इस कहावत का भी उल्लेख किया- 'अगर कोई नील के समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह सात पीढ़ियों तक स्वतंत्र नहीं हो सकता।' बिहार, आसाम और उत्तर प्रदेश के नील बागानों में श्रमिकों की स्थिति गुलामों जैसी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के परिणाम स्वरूप और बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण नील के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों को मुक्ति प्राप्त हुई।

    (2.) चाय-कॉफी के बागान :चाय और कॉफी के बागानों ने भी भारत में ब्रिटिश पूँजी निवेश को आकर्षित किया। इन बागानों में किसी प्रकार के श्रमिक कानून लागू नहीं थे। बागान मालिक, इन बागानों में काम करने वाले श्रमिकों का जी-भरकर शोषण करते थे। 1887 ई. में चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या लगभग 5 लाख थी। चाय-बागानों में काम करने हेतु श्रमिकों को लाने के लिये अत्यधिक छल-कपट किया जाता था तथा उनसे लुभावने वायदे किये जाते थे किन्तु जब वे एक बार बागानों में पहुँच जाते थे तो उन्हें बंदियों की तरह रखा जाता था। रायल कमीशन ऑन लेबर ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की है। इन श्रमिकों को निर्जन जंगलों में रखा जाता था जहाँ खाद्य पदार्थ नहीं मिलते थे और जो मिलते भी थे तो वे बहुत महँगे होते थे। इस कारण श्रमिक और उनके परिवार के लोग कुपोषण एवं घातक बीमारियों के शिकार होकर मर जाते थे परन्तु चाय बागानों के मालिकों को अपने लाभ के अतिरिक्त और किसी बात से मतलब नहीं था।

    (3.) जूट की खेती: यूरोप के कारखानों को जूट की बहुत बड़ी मात्रा में आवश्यकता थी इसलिये यूरोपीय और ब्रिटिश व्यापारियों ने जूट उद्योग में काफी पूँजी का निवेश किया। अतः यूरापनियनों की व्यापारिक एवं औद्योगिक आवश्यकता की पूर्ति के लिेय पटसन की खेती पर विशेष ध्यान दिया गया ताकि यूरोपीय मिलों को सस्ता रेशा मिल सके और यूरोपीय व्यापारियों एवं उद्योगपतियों को भारी लाभ हो सके। यूरोपीय व्यापारी एवं उद्योगपति पटसन और जूट से भारी लाभ अर्जित करते थे किंतु कच्चा माल देने वाले किसानों को उनके उत्पादन की बहुत ही कम कीमत देते थे।
    कृषि वाणिज्यीकरण के प्रभाव

    कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण होने के परिणामस्वरूप भारतीय किसानों एवं गांवों की तस्वीर तेजी से बदलने लगी। पूंजी का प्रवाह भारत से ब्रिटेन की तरफ हो गया तथा भारत के गांव तेजी से निर्धन होने लगे। किसान का पूरा परिवार दिन-रात परिश्रम करने के उपरांत भी ऋण लेकर लगान चुकाता था जिससे किसान बड़ी संख्या में सूदखोरों एवं साहूकारों के चंगुल में फंस गया तथा चारों ओर निर्धनता एवं भुखमरी का बोलबाला हो गया। कृषि वाणिज्यीकरण के कुछ प्रमुख प्रभाव इस प्रकार से हैं-

    (1.) गांवों में पूंजी की आवश्यकता : कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण भारतीय गांवों की वस्तु विनिमय क्षमता और आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई तथा गांवों में भी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पूंजी की अनिवार्यता हो गई। पूंजी आधारित अर्थव्यस्था का निर्माण होने से गांवों में उत्पादित प्रत्येक वस्तु शहरों की ओर जाने लगी।

    (2.) कृषकों की निर्धनता में वृद्धि : कृषि के वाणिज्यीकरण से व्यापारी वर्ग तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बहुत लाभ होने लगा परन्तु किसानों की निर्धनता में वृद्धि हुई। इसका मुख्य कारण व्यापारियों की छल-कपटपूर्ण नीति थी। वे खेत में खड़ी फसलों को सस्ते दामों पर खरीद लेते थे। किसान अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये, फसल मंडी में न ले जाकर, खेत में ही बेच देता था। ऐसे सौदे में व्यापारी फसल की बहुत कम कीमत तय करता था। इस कारण किसानों की निर्धनता बढ़ती चली गई।

    (3.) अकालों की भयावहता में वृद्धि : कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण फसलें औद्योगिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उगाई जाती थीं। जूट एवं कपास की खेती में वृद्धि होने से खाद्यान्नों की भारी कमी हो गई और अकाल पड़ने लगे। कम्पनी का शासन होने से पूर्व भी भारत में अकाल पड़ते थे किन्तु उनका कारण धान का अभाव न होकर यातायात के साधनों का अभाव था। ब्रिटिश शासन में पड़ने वाले अकाल व सूखों का प्रत्यक्ष कारण कम्पनी की दोषपूर्ण औद्योगिक एवं कृषि नीतियां थीं। इन नीतियों ने भारतीय किसानों को अत्यधिक निर्धन बना दिया। अकाल के समय खाद्यान्नों के दाम इतने अधिक बढ़ जाते थे कि लोगों के लिये अन्न खरीदना असम्भव हो जाता था। इस कारण प्रत्येक अकाल के समय हजारों लोग भूख से तड़प कर मर जाते थे। प्रायः शवों को उठाने का कोई प्रबन्ध नहीं होता था। इस कारण पूरा का पूरा क्षेत्र महामारी की चपेट में आ जाता था और हजारों लोग महामारी से ग्रस्त होकर मर जाते थे। कम्पनी के शासन में 1770 ई. के बंगाल के अकाल में बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या मर गई। 1860-61 ई. में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल पड़ा जिसमें दो लाख लोग मरे। 1865-66 ई. में उड़ीसा, बंगाल, बिहार एवं मद्रास में पड़े अकाल में बीस लाख लोग मरे। केवल उड़ीसा में ही 10 लाख लोग मारे गये। 1866-70 ई. के अकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बम्बई में 14 लाख से अधिक लोग मारे गये। इन क्षेत्रों की एक चौथाई जनसंख्या समाप्त हो गई। 1876-78 ई. में मद्रास, मैसूर, हैदराबाद, महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में भीषण अकाल पड़ा। इस अकाल में पंजाब में 8 लाख और मद्रास में 35 लाख लोग मरे। मैसूर की 20 प्रतिशत जनसंख्या मर गई। उत्तर प्रदेश में 12 लाख से अधिक लोग मरे। 1899 ई. के अकाल को छपनिया काल कहा जाता है, इसमें राजस्थान के 25 प्रतिशत लोग मर गये। विलियम डिग्बी के अनुसार 1854 से 1901 ई. के अकालों में देश में 2,88,25,000 लोग मौत के मुंह में समा गये। 1943 ई. में बंगाल के भीषण अकाल में 30 लाख लोग मरे।

    (4.) कृषकों के विद्रोह : नगदी फसलों की खेती के कारण किसानों का शहरों में आना-जान बढ़ गया। इससे किसानों में राजनीतिक चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। इस चेतना ने किसानों को शोषणकारियों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये उकसाया। जैसे-जैसे पूँजीवादी व्यवस्था कठोर होती चली गई, कृषक विद्रोह भी बढ़ने लगे। 1857 ई. में दक्कन में मराठा किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध बगावत की। किसानों में असंतोष को कम करने के लिये 1879 ई. में दक्कन काश्तकारी सहायता अधिनियम पारित किया गया। 1870 ई. में बंगाल के बंटाईदारों का आर्थिक संकट बढ़ने पर उन्होंने लगान देने से मना कर दिया। इसी समय संथालों ने भी विद्रोह किया। इस कारण 1885 ई. में बंगाल काश्तकारी अधिनियम पारित किया गया।

    (5.) नवीन आर्थिक-सामाजिक वर्गों का उदय : ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सामन्ती व्यवस्था को समाप्त करके जमींदार, छोटे काश्तकार, खेतिहर मजदूर आदि नवीन आर्थिक-सामाजिक वर्गों को जन्म दिया। नई लगान व्यवस्था ने भी भारतीय ग्रामीण सामाजिक सम्बन्धों पर गहरा प्रभाव डाला। परम्परागत रूप से भारतीय ग्रामीण समुदाय के सदस्यों में परस्पर सम्बन्धों का निर्धारण जातिगत सम्बन्धों, धार्मिक आधार, परम्परा या रीति-रिवाजों पर आधारित था। ब्रिटिश कानूनों तथा आर्थिक नीतियों ने परम्परागत सामाजिक व जातीय सम्बन्धों को शिथिल कर दिया। ब्रिटिश आर्थिक नीति के फलस्वरूप जो सामाजिक-आर्थिक वर्ग अस्तित्त्व में आये उनमें सबसे नीची सीढ़ी पर निम्न वर्ग था।

    (6.) भूमिहीन एवं श्रमिक वर्ग का उदय : ब्रिटिश कृषि नीति, आर्थिक नीति व लगान प्रणाली के परिणाम स्वरूप छोटे किसानों की जमीन उनके अधिकार से निकलकर साहूकारों के पास पहुंचने लगी जिससे भारतीय किसान भूमिहीन होकर खेतिहर श्रमिक में परिणत होने लगा। खेतिहर श्रमिकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ने से, समस्त खेतिहर जनसंख्या के लगभग आधे लोग इसी वर्ग में आ गये। 1875 ई. में देश में भूमिहीन कृषकों की संख्या 80 लाख थी जो 1901 ई. में बढ़कर 350 लाख तथा 1921 ई. में 390 लाख हो गई।

    (7.) यातायात एवं संचार साधनों में सुधार : कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण कृषि जिन्सों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक तेज गति से पहुंचाने के लिये रेल, सड़क एवं जहाजरानी परिवहन साधनों का विकास हुआ। जिन्सों की बिक्री, सौदे एवं भाव आदि सूचनाएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिये डाक-तार व टेलीफोन आदि संचार-व्यवस्थाओं का विकास हुआ। कम्पनी ने भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर अच्छी सड़कों का निर्माण किया ताकि बन्दरगाहों तक कच्चा माल पहुँचाने में सुविधा हो सके। यूरोपियन लेखकों ने लिखा है कि यह सब भारतीयों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने व विकसित करने के लिये किया गया जबकि वास्तविकता यह थी कि ये समस्त कार्य इसलिये किये गये ताकि वे भारतीय कच्चा माल लंकाशायर और मैनचेस्टर की मिलों तक सुगमता से पहुँचा सकें तथा वहाँ उत्पादित माल को भारत के दूरस्थ गाँवों तक पहुँचा सकें।

    (8.) विश्वव्यापी मंदी की मार : भारत का किसान कृषि के वाणिज्यीकरण से पहले, विश्वव्यापी मंदियों के दौर से बेअसर रहता था किंतु अब उसकी प्रतिस्पर्धा विश्व भर के किसानों से थी इसलिये उसका भी मंदी की चपेट में आ जाना स्वाभाविक था। भारत में वर्ष 1928-29 की मंदी के दौर से पहले 10 अरब 34 करोड़ रुपये मूल्य की पैदावार होती थी जो 1933 ई. में घटकर केवल 4 अरब 73 करोड़ रुपये मूल्य की रह गई। 



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  • ब्रिटिश शासन में भारत से धन का निष्कासन

     21.08.2017
    ब्रिटिश शासन में  भारत से धन का निष्कासन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 9

    भारत पर पाश्चात्य देशों के आक्रमण तो सिकंदर से पूर्व भी होते रहे किंतु उनके प्रभाव सीमित होने के कारण उनमें भारत से धन का विशेष निष्कासन नहीं हुआ। सिकंदर एवं उसके बाद के पाश्चात्य आक्रमणों में भी धन निष्कासन अत्यंत सीमित मात्रा में संभव हो सका। शक, कुषाण तथा हूण आदि आक्रांताओं ने भारत में ही अपने शासन स्थापित किये इसलिये वे भारत से धन निकालकर बाहर नहीं ले गये। 712 ई. में भारत पर मुस्लिम आक्रमणों का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह 1761 ई. में अहमदशाह अब्दाली के अंतिम आक्रमण तक जारी रहा। एक हजार वर्ष से भी अधिक लम्बे समय तक चले इस दौर में उत्तर भारत एवं पश्चिमी भारत से अपार धन सम्पदा लूटी गई फिर भी इन आक्रमणों से धन का निष्कासन उतना अधिक नहीं हुआ जितना 1757 ई. में प्लासी के युद्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के आरम्भ से लेकर 1947 ई. में ब्रिटिश ताज के राज्य की समाप्ति तक हुआ।

    मार्कोपोलो ने भारत को एशिया का मुख्य बाजार कहा है। सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांसिसी यात्री बर्नियर ने भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते हुए लिखा है- 'यह भारत एक अथाह गड्ढा है, जिसमें संसार का अधिकांश सोना और चांदी चारों तरफ से अनेक रास्तों से आकर जमा होता है....... यह मिस्र से भी अधिक धनी देश है।' बीसवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक दशा के बारे में एक इतिहासकार ने लिखा है- '20वीं सदी के आरम्भ में लगभग दस करोड़ व्यक्ति ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं जिन्हें किसी समय भी पेट भर अन्न नहीं मिलता।' स्पष्ट है कि इस अवधि में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश ताज, भारत को पूरी तरह चूस कर खोखला कर चुके थे।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश ताज द्वारा मचाई गई लूट

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1765 ई. में बंगाल की दीवानी के अधिकार प्राप्त किये तथा उसने तेजी से आगे बढ़कर उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक दो दशकों तक शेष देश को अपने चंगुल में ले लिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शिकंजा कसे जाने से पूर्व, भारत में उद्योग, कृषि एवं निर्यात की दशा संतोषजनक थी। ढाका की मलमल पूरे विश्व में विख्यात थी। हीरे-जवाहरात, गर्म मसाले, शृंगार प्रसाधन, हाथी दांत की कलात्मक वस्तुएं, सुगंधित तेल, इत्र, सूती एवं रेशम का कपड़ा विदेशों को निर्यात किये जाते थे।

    कम्पनी द्वारा देश पर शिकंजा कस लिये जाने के बाद भारत के ग्रामीण दस्तकारों, किसानों तथा व्यापारियों की स्थिति खराब होने लगी। वे कम्पनी की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने लगे। कम्पनी द्वारा बनाये गये कानूनों के कारण भारत से तैयार उत्पाद के स्थान पर कच्चा माल लंका शायर एवं मैनचेस्टर की मिलों को जाने लगा। व्यापार में कमाये गये लाभ एवं बंगाल की दीवानी से अर्जित राजस्व, तेजी से देश के बाहर जाने लगा। 1767 ई. में ब्रिटिश क्राउन ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को निर्देश दिये कि वह प्रति वर्ष रानी की सरकार को 4 लाख पौण्ड दे।

    जॉन सुलिवन ने भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति एवं उसके प्रभाव को दर्शाते हुए लिखा है- 'हमारी प्रणाली एक ऐसे स्पंज के रूप में काम करती है, जो गंगा के किनारों से प्रत्येक अच्छी वस्तु ले लेती है और टेम्स के किनारों पर निचोड़ देती है।'

    धन के बहिर्गमन का सिद्धांत

    भारत से धन के निष्कासन का सिद्धांत सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने 2 मई 1867 को लंदन में ईस्ट इण्डिया एसोसियेशन की बैठक में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा ब्रिटेन अपने शासन की कीमत पर भारत की सम्पदा को छीन रहा है। भारत में वसूल किये गये राजस्व का एक चौथाई भाग भारत से बाहर चला जाता है। भारत का रक्त निरंतर निचोड़ा जा रहा है।

    महादेव गोविंद रानाडे ने भी 1872 ई. में अपने एक भाषण में कहा- 'भारत की राष्ट्रीय आय के एक तिहाई हिस्से से अधिक, ब्रिटिश सरकार द्वारा किसी ने किसी रूप में लिया जाता है।'

    रमेशचंद्र दत्त ने इकॉनोमिक हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में लिखा है- 'भारत में हो रही धन की निकासी का उदाहरण आज तक विश्व के किसी भी देश में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा।' दादाभाई नौरोजी ने पॉवर्टी एण्ड ब्रिटिश रूल इन इण्डिया नामक शोध ग्रंथ में भारत से धन के बहिर्गमन के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत की मुख्य बातें इस प्रकार से हैं-

    (1.) धन के बर्हिगमन की राष्ट्रवादी परिभाषा का तात्पर्य भारत से धन-सम्पत्ति एवं माल का इंग्लैण्ड में हस्तान्तरण था जिसके बदले में भारत को इसके समतुल्य कोई भी आर्थिक, वाणिज्यिक या भौतिक प्रतिलाभ प्राप्त नहीं होता था।

    (2.) धन बर्हिगमन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम, ब्रिटिश प्रशासनिक, सैनिक और रेलवे अधिकारियों के वेतन देना, आय व बचत के एक भाग को इंग्लैण्ड भेजना और अँग्रेज अधिकारियों की पेंशन एवं अवकाश भत्तों को इंग्लैण्ड में भुगतान करना था।

    (3.) धन का बहिर्गमन भारत की निर्धनता का मुख्य कारण है।

    धन निष्कासन की मात्रा एवं स्वरूप

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन द्वारा भारत से निकाले गये धन की मात्रा का अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है। विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग आंकड़े दिये हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

    (1.) बंगाल प्रांत में प्राप्त होने वाले राजस्व एवं व्यय विवरण के अनुसार कम्पनी ने प्रथम छः वर्षों (1765-1771 ई.) में 1,30,66,991 पौण्ड शुद्ध राजस्व अर्जित किया जिसमें से 90,27,609 पौण्ड खर्च कर दिया। शेष बचे 40,39,152 पौण्ड का सामान इंग्लैण्ड भेज दिया गया।

    (2.) विलियम डिग्बी के अनुसार 1757 ई. से 1815 ई. तक भारत से 50 से 100 करोड़ पौण्ड राशि इंग्लैण्ड भेजी गई।

    (3.) 1828 ई. में मार्टिन मोंटमुगरी ने इस निर्गम का अनुमान 30 हजार मिलियन पौण्ड (3 करोड़ पौण्ड) प्रतिवर्ष की दर से लगाया।

    (4.) जॉर्ज विन्सेट द्वारा 1859 ई. में लगाये गये अनुमान के अनुसार 1834 ई. से 1851 ई. तक भारत से 42,21,611 पौण्ड धन का निष्कासन प्रतिवर्ष हुआ।

    (5.) भारत को कम्पनी के माध्यम से ब्रिटिश ताज को सत्ता हस्तांतरण से सम्बन्धित व्यय, चीन के साथ हुए युद्धों के व्यय, लंदन में इण्डिया ऑफिस के व्यय, भारतीय सेना की रेजीमेण्टों के प्रशिक्षण व्यय, चीन और फारस में इंग्लैण्ड के राजनयिक मिशनों के व्यय, इंग्लैण्ड से भारत तक टेलिग्राफ लाइनों के सम्पूर्ण व्यय आद विविध व्यय चुकाने पड़ते थे। इस कारण भारत पर वर्ष 1850-51 में 5.50 करोड़ रुपये का ऋण चढ़ गया।

    (6.) कम्पनी के अनुसार 1857 ई. के विद्रोह को दबाने में 47 करोड़ रुपये व्यय हुए। कम्पनी ने इस राशि को भारत पर कर्ज माना।

    (7.) दादा भाई नौरोजी तथा आर. सी. दत्त आदि राष्ट्रवादियों ने 1883 ई. से 1892 ई. तक के दस वर्षों में भारत से इंग्लैण्ड भेजी गई राशि 359 करोड़ पौण्ड बताई है।

    (8.) विभिन्न स्थलों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने पर अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 1834 से 1924 ई. तक के 90 वर्ष की अवधि में भारत से 394 से 591 मिलियन पौण्ड राशि इंग्लैण्ड भेजी गई।

    धन निष्कासन के परिणाम

    1765 ई. से 1947 ई. तक भारत से भारी परिमाण में किये गये धन निष्कासन के अत्यन्त बुरे परिणाम हुए- 

    (1.) 1939-40 ई. में भारत सरकार पर ब्रिटिश सरकार का 1200 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया। आश्चर्य है कि 1850-51 ई. में यह कर्ज केवल 5.50 करोड़ रुपये था।

    (2.) कर्ज बढ़ने से भारतीयों पर करों का बोझ बढ़ गया। भारत का यह कर प्रति व्यक्ति आय का 14 प्रतिशत से अधिक था। इससे भारतीयों का जीवन स्तर निरंतर गिरता चला गया।

    (3.) देश में दरिद्रता बढ़ने से बार-बार अकाल पड़ने लगे जिनमें हजारों लोग मरने लगे। एक अनुमान के अनुसार इन अकालों में 2.85 करोड़ लोग मरे।

    (4.) भारत की अर्थव्यवस्था, औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदल गई जिससे देश में गहरा आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।

    (5.) आम भारतीय के मन में अंग्रेजों के शासन से घृणा उत्पन्न हो गई जिससे राष्ट्रीय आंदोलनों को बल मिला।

    धन निष्कासन के सम्बन्ध में राष्ट्रवादी नेताओं के विचार

    दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को समस्त बुराइयों की बुराई (ईविल ऑफ ऑल ईविल्स) बताया है। 1905 ई. में उन्होंने कहा- 'धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण।'

    धन निष्कासन के सम्बन्ध में आर. सी. दत्त ने कहा- 'भारतीय राजाओं द्वारा कर लेना तो सूर्य द्वारा भूमि से पानी लेने के समान था जो पुनः वर्षा के रूप में भूमि पर उर्वरता देने के लिये वापस आता था, पर अँग्रेजों द्वारा लिया गया कर फिर भारत में वर्षा न करके इंग्लैण्ड में ही वर्षा करता था।'

    धन निष्कासन के सम्बन्ध में विदेशी विद्वानों के विचार लॉर्ड क्लाइव बंगाल को एडन का बगीचा एवं सोने का खजाना कहता था। उसने एडन के इस बगीचे को इंग्लैण्ड-वासियों की तरफ से लूटने का काम आरम्भ किया जिसे देखकर स्वयं अँग्रेज अधिकारियों के दिल दहल उठे। असम के चीफ कमिश्नर चार्ल्स इलियन ने व्यथित होकर लिखा- 'मैं यह कहने में नहीं हिचकूंगा कि आधे किसान साल भर में कभी यह भी नहीं जानते कि पूरा भोजन किस चिड़िया का नाम है। यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं है कि भारत में 10 करोड़ मनुष्यों की प्रति व्यक्ति आय 5 डॉलर वार्षिक से अधिक नहीं है।'

    मैकडॉनल्ड ने लिखा है- 'भारत में तीन करोड़ से लेकर पांच करोड़ तक ऐसे परिवार हैं जिनकी आय साढ़े तीन पैन्स प्रतिदिन से अधिक नहीं है।'

    विलियम हण्टर ने 1883 ई. में वायसरॉय की कौंसिल में कहा था- 'सरकार का लगान किसानों एवं उनके परिवारों के लिये पूरा अन्न भी नहीं छोड़ता। ब्रिटिश साम्राज्य में भारत के किसान के समान हृदय द्रवित करने वाला और कोई मनुष्य नहीं है।'

    राष्ट्रीय आय के विशेषज्ञ कोलीन क्लार्क ने विवरण सहित लिखा है- '1924-25 ई. के समय संसार में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय, भारतीय की आय से पांच गुना अधिक थी।'

    इस प्रकार 20वीं सदी के अंत में स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का ज्ञान होने पर भी एक भारतीय की औसत आयु 32 वर्ष थी जबकि पश्चिमी यूरोप के एक व्यक्ति की औसत आयु 60 वर्ष थी। पौष्टिक आहार के अभाव में भारतीय शीघ्र बीमार हो जाते थे और उपचार के अभाव में 32 वर्ष की औसत आयु में ही मर जाते थे।


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  • ब्रिटिश शासन में कुटीर उद्योगों का पतन

     04.05.2018
    ब्रिटिश शासन में कुटीर उद्योगों का पतन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 10


    अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारतीय कुटीर उद्योग 


    अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारतीय कुटीर उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ की गुणवत्ता विश्वभर में प्रसिद्ध थी। भारत में सूत कातना और बुनना, प्राचीन काल से ही एक घरेलू व्यवसाय था। भारत शताब्दियों से सुन्दर और महीन सूती कपड़ों के लिये सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध था। कपड़ा देश के निर्यात की सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु थी। इसके उत्पादन के मुख्य केन्द सम्पूर्ण भारत में फैले हुए थे। ढाका की मलमल पूरे विश्व में मंगवाई जाती थी।

    1918 ई. में प्रकाशित प्रथम भारतीय औद्योगिक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि जिस समय आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के जन्म स्थान पश्चिमी यूरोप में असभ्य जातियां निवास करती थीं, उस समय भारत अपने शासकों के वैभव और शिल्पकारों की उच्च कोटि की कलात्मक कारीगरी के लिये विख्यात था। काफी समय बाद भी जब पश्चिम के साहसी सौदागर पहली बार भारत पहुंचे, तब भी इस देश का आद्यौगिक विकास किसी भी कीमत पर विकसित यूरोप के देशों से कम नहीं था।

    1616 ई. से 1619 ई. के समय का वर्णन करते हुए टेरी ने लिखा है- 'रंग और छापे का काम भी भारत में इस समय श्रेष्ठ था। पक्के रंगों का प्रयोग किया जाता था और सुन्दर चित्र और बेल-बूटे बनाये जाते थे। यद्यपि सूती कपड़े की तुलना में रेशमी कपड़े की बुनाई का काम कम होता था। फिर भी यह एक महत्त्वपूर्ण हस्तकला उद्योग था।'

    मुगल काल में कालीन एवं शॉल उद्योग, काष्ठ उद्योग, चमड़ा उद्योग, स्वर्ण उद्योग, चीनी उद्योग, हाथी-दाँत उद्योग भी विश्व भर में प्रसिद्ध हो गये थे। इस प्रकार, अँग्रेजों के आने से पहले 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारत; विश्व का एक प्रमुख औद्योगिक केन्द्र था। 17वीं शताब्दी के मध्य में बर्नियर नामक फ्रांसीसी यात्री ने लिखा- 'भारतवर्ष को छोड़कर कोई भी देश ऐसा नहीं था जहाँ इतनी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ पाई जाती हों।'

    बर्नियर एक बहुत बड़े कमरे (हॉल) का विवरण देता है जिसे वह कारखाने के नाम से पुकारता है। वह लिखता है- 'एक बड़े कमरे में निपुण कार्यकर्त्ता के निरीक्षण में कढ़ाई करने वाले व्यस्त हैं, दूसरे में सुनार, तीसरे में चित्रकार, चौथे में लैकर (वार्निश करने वाले), पाँचवे में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा मोची, छठे में रेशम, जरी और बारीक मलमल के उत्पादक। शिल्पी प्रतिदिन प्रातःकाल कारखाने में काम के लिये आते हैं, दिन भर व्यस्त रहते हैं और शाम को घर लौट जाते हैं।'

    विदेशी यात्रियों के यात्रा-वर्णन से एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की पुष्टि होती है कि 18वीं सदी तक भारत के कुटीर उद्योग उन्नत अवस्था में थे और भारत की आर्थिक स्थिति अन्य देशों की तुलना में अच्छी थी।

    भारतीय उद्योगों का वर्गीकरण

    डॉ. राधाकमल मुखर्जी ने अँग्रेजों के भारत में आने से पहले के भारतीय उद्योगों को इस प्रकार वर्गीकृत किया है-

    (1.) घरेलू आवश्यकता पूर्ति हेतु ग्रामीण उद्योग ये उद्योग खेती के अवकाश काल में चलते थे तथा घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। इनमें स्थानीय सामग्री यथा- सरकंडे, घास, बाँस, मिट्टी, ऊन, सूत आदि का प्रयोग होता था।

    (2.) कृषि उपकरण आधारित ग्रामीण उद्योग ये उद्योग कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाली सामग्री बनाते थे। गाँव के आत्मनिर्भर समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लुहार, बढ़ई, कुम्हार आदि बराबर काम में लगे रहते थे।

    (3.) कलात्मक ग्रामीण उद्योग गाँव के कलात्मक उद्योग जो कि उच्च कोटि की ग्रामीण कला के प्रतीक थे और जिनकी समुद्र पार के देशों में भी माँग थी।

    (4.) नगरीय उद्योग इनका संगठन अत्यंत उच्चकोटि का था। इनमें से कुछ उद्योग आज के औद्योगिक विश्व में भी जीवित हैं, जैसे- कश्मीरी शॉल उद्योग, उत्तरी भारत का फुलकरी उद्योग आदि।

    ग्रामीण उद्योगों की विशेषताएँ

    (1.) कच्चे माल की उपलब्धता

    ग्रामीण उद्योगों की विशेषता यह थी कि ग्रामीण कारीगर, गाँव से ही अपने शिल्प के लिये आवश्यक कच्चे माल (जैसे लकड़ी, मिट्टी, चमड़ा, कपड़ा आदि) का प्रबन्ध कर लेता था। जंगलों से लकड़ी मिल जाती थी, मृत पशुओं पर से मोची अपने काम के लिये चमड़ा प्राप्त करता था। देश के प्रायः प्रत्येक भाग में कपास की खेती होती थी। लोहा तथा अन्य धातुएं ही ऐसी होती थीं जो नगरीय बाजारों से क्रय करनी पड़ती थीं। इस प्रकार उद्योग के लिये आवश्यक कच्चे माल के लिये गाँव लगभग आत्म-निर्भर थे।

    (2.) तैयार माल की खपत

    गाँव में जो चीजें बनती थीं उनमें से अधिकांश की खपत गाँव में ही हो जाती थी। इसका कारण यह था कि हस्तशिल्पी पूरे गाँव का या कुछ विशेष परिवारों का सेवक होता था। इसलिये उसे अपना माल बेचने के लिये अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी जो माल बच जाता था, वह विभिन्न गाँवों में लगने वाले साप्ताहिक मेलों में बेचा जाता था।

    (3.) मूलभूत आवश्यकताओं की सामग्री का निर्माण

    ग्रामीण उद्योग केवल मनुष्य की मूल आवश्यकताओं तक सीमित थे। गाँव में विलासिता की वस्तुएँ उत्पादन करने वाला उद्योग नहीं के बराबर था।

    (4.) वस्तु-विनिमय आधारित विपणन

    गाँव में उत्पादित वस्तुओं का विनिमय गाँव की प्रजा तक सीमित था। आवश्यकता पड़ने पर किसान दस्तकार से सामान या सेवा लेता था किन्तु वह दस्तकार को हर बार भुगतान नहीं करता था। दस्तकार का भुगतान समस्त गांव की सम्मिलित जिम्मेदारी होती थी। कारीगर को गांव की ओर से गाँव की जमीन का कुछ अंश स्थायी तौर पर जोतने के लिये मिला रहता था या फसल कटने पर उसे अनाज की निश्चित मात्रा दी जाती थी।

    नगरीय उद्योगों की विशेषताएँ

    ग्रामीण उद्योग के साथ-साथ नगरीय उद्योग भी विद्यमान थे। ग्रामीण उद्योगों द्वारा जहाँ गाँव की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी, वहीं नगरीय उद्योग, कुलीन सामंत वर्ग एवं धनी व्यापारी वर्ग के उपयोग तथा विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन करते थे। नगरीय उद्योगों को मूलतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- (

    1.) नगरों के समस्त उद्योगों का बहुत बड़ा हिस्सा भारत और विदेशों के कुलीन और सम्पन्न लोगों के लिये विलासिता एवं अर्द्ध-विलासिता की सामग्री का उत्पादन करता था।

    (2.) वे उद्योग जो राज्य या सार्वजनिक संस्थाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

    (3.) वे उद्योग जिनमें लोहा गलाने, कलमी शोरा तैयार करने या चूड़ी बनाने जैसे काम किये जाते थे।

    नगरीय उद्योगों का बाजार अत्यंत सीमित था क्योंकि इन उद्योगों में केवल सामंत, कुलीन एवं धनी व्यक्तियों तथा निर्यात के लिये जाने वाली वस्तुओं का निर्माण होता था।

    नगरीय उद्योग में काम करने वाले दो प्रकार के व्यक्ति थे-

    (1.) स्वतंत्र रूप से काम करने वाले।

    (2.) राज्य या व्यापारिक प्रतिष्ठान के कारखानों में नौकरी करने वाले।

    बड़े नगरों में प्रत्येक उद्योग एक संघ (श्रेणी) में संगठित था। प्रत्येक उद्योग का एक मुखिया होता था। वह श्रम तथा उत्पादन का मूल्य निर्धारित करता था तथा विवादों का निपटारा करता था। अनुभवी शिल्पकार नये शिल्पकारों को प्रशिक्षण देते थे। उद्योग एक वंशानुगत व्यवसाय था और शिल्पकार एक विशेष जाति का सदस्य होता था। इसलिये शिल्प-संघ जातीय सत्ता से नियंत्रित होते थे।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कठिनाइयाँ ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक व्यापारिक संस्था थी जिसका मूल उद्देश्य भारत के माल और उत्पादनों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करके लाभ अर्जित करना था।

    कम्पनी को भारतीय उद्योगों के साथ काम करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा-

    (1.) कम्पनी भारत में तैयार माल के बदले में सोने-चांदी के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकती थी क्योंकि ब्रिटेन में ऐसा कुछ भी नहीं बनता था या पैदा होता था जिसे भारतीय सामग्री के बदले में दिया जा सके।

    (2.) भारतीय कपड़े को इंग्लैण्ड में ले जाकर बेचने से कम्पनी को तो बड़ा लाभ हुआ किंतु इंग्लैण्ड के कपड़ा उद्योग के लिये संकट उत्पन्न हो गया। रॉबिन्सन क्रूसो नामक उपन्यास के लेखक डैफी ने लिखा है- 'भारतीय कपड़ा हमारे घरों, अलमारियों और सोने के कमरों में घुस गया है। परदे, गद्दे, कुर्सियों और बिस्तर के रूप में और कुछ नहीं, अपितु केलिको या भारतीय सामान है।'

    (3.) 1688 ई. में जब इंग्लैण्ड में फ्रांस से होने वाले आयात पर रोक लगा दी गई तो कम्पनी द्वारा भारत से किये जाने वाले आयात में भारतीय सूती कपड़े का स्थान सबसे ऊपर हो गया। सूती कपड़े के आयात में वृद्धि होने से इंग्लैण्ड में कम्पनी के विरुद्ध विरोध भड़क उठा। यह विरोध दो कारणों से हुआ- 

         (अ.) भारत से किये जाने वाले व्यापार के कारण इंग्लैण्ड का सोना-चांदी भारत जा रहे थे।

         (ब.) इंग्लैण्ड के नवोदित रेशमी वस्त्र उद्योग के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया था।

    इस कारण 1700 ई. में एक कानून बनाया गया कि फ्रांस, चीन या ईस्टइंडीज में बने रेशम, बंगाल के रेशम या रेशमी कपड़े अथवा उक्त देशों में छपे या रंगे गये कपड़े ब्रिटिश शासन के क्षेत्र में न तो पहने जा सकेंगे और न किसी अन्य प्रकार से काम में लाये जायेंगे। इस प्रतिबंध के उपरांत भी इंग्लैण्ड में भारत के सूती कपड़े का आयात बन्द नहीं हो सका।

    1702 ई. में सादे सूती कपडे़ पर भारी आयात शुल्क लगाया गया। इसके उपरांत भी इंग्लैण्ड में भारतीय सूती कपड़े का आयात बढ़ता ही गया। भारतीय कपड़े की श्रेष्ठता के कारण 1750 ई. के बाद भी भारत से उल्लेखनीय मात्रा में सूती कपड़ा मंगाया गया। यह इस तथ्य के बावजूद था कि भारतीय कपड़ा प्रयुक्त करने वालों पर इंग्लैण्ड में जुर्माना लगाया जाता था। 1760 ई. में एक अँग्रेजी महिला पर 200 पौण्ड का जुर्माना केवल इसलिये लगाया गया कि उसके पास एक विदेशी रूमाल था।

    भारतीय कुटीर उद्योगों के विनाश के कारण

    (1.) मुगल सत्ता के विघटन से उत्पन्न स्थिति औरंगजेब के जीवनकाल में ही मुगलों की केन्द्रीय सत्ता शिथिल होने लगी तथा 1707 ई. में उसकी मृत्यु के बाद तेजी से पतन की ओर अग्रसर हो गई। विभिन्न प्रान्तों के सूबेदार केन्द्रीय सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करने लगे। दक्षिण की मराठा शक्ति, उत्तरी भारत में भी आ धमकी और मुगलों की संरक्षक बन गई। नादिरशाह (1739 ई.) और अहमदशाह अब्दाली (1761 ई.) के आक्रमणों ने देश की स्थिति को अत्यधिक शोचनीय बना दिया। अशान्ति और अराजकता की इस स्थिति में कुटीर-उद्योगों का ह्रास हुआ। जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उन पर चोट की तो वे भरभरा कर गिरने लगे।

    (2.) देशी राज्यों का विनाश भारतीय रियासतों के शासक परम्परागत भारतीय कुटीर-उद्योगों के संरक्षक थे। वे कुशल शिल्पियों एवं कारीगरों को निरन्तर सहायता एवं संरक्षण देकर प्रोत्साहित करते थे। उनके महलों एवं दरबारों की साज-सज्जा के लिये श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं की माँग बनी रहती थी। भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के बाद देशी राज्यों का अन्त होने लगा और कम्पनी की शासन व्यवस्था स्थापित होने लगी। देशी राज्यों की समाप्ति से नगरीय परम्परागत हस्तकलाओं एवं उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा। राज्यों के समाप्त हो जाने से हास्तकला सामग्री की माँग घट गई जिससे श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं का उत्पादन कम हो गया तथा बड़ी संख्या में शिल्पी बेरोजगार हो गये।

    (3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी की दमनकारी नीतियाँ अँग्रेजों ने भारत से आयात-निर्यात के व्यापार में अपना पक्ष मजबूत रखने के लिए न्यूनतम मूल्य पर अधिक-से-अधिक माल खरीदने और इस कार्य में सैनिक बल का प्रयोग करने की नीति बनाई। कम्पनी के अधिकारी तथा उनके प्रतिनिधि भारतीय जुलाहों को एक निश्चित समय में निश्चित प्रकार का कपड़ा तैयार करने के लिये विवश करते थे और फिर अपनी इच्छानुसार काफी कम मूल्य चुकाते थे। आना-कानी करने वाले जुलाहों के अँगूठे काट दिये जाते थे। इस कारण वस्त्र उद्योग में लगे हुए हजारों परिवार बंगाल छोड़कर भाग गये। यही स्थिति अन्य उद्योगों के कारीगरों तथा श्रमिकों की हुई।

    1762 ई. में बंगाल के नवाब ने कम्पनी के अधिकारियों से कम्पनी के एजेन्टों की शिकायत की- 'कम्पनी के एजेंट रैयतों, किसानों, व्यापारियों, आदि से जबरदस्ती एक चौथाई कीमत देकर उनके माल और उत्पादन हड़प रहे हैं और किसानों आदि को मार-पीटकर तथा उनका दमन करके अपनी एक रुपये की चीज पाँच रुपये में बेच रहे है।'

    ऐसी परिस्थितियों में भारतीय कारीगरों के लिये काम करना असम्भव हो गया। भारतीय माल खरीदने और भारत में कम्पनी की पूँजी लगाने का तरीका ऐसा रखा गया कि हर बार गरीब बुनकर या कारीगर के साथ धोखा होता था।

    सर विलियम बोल्ट्स ने लिखा है- 'आमतौर पर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती क्योंकि कम्पनी की ओर से नियुक्त गुमाश्ते उनसे जो चाहते हैं, हस्ताक्षर करा लेते हैं। जितने रुपये उन्हें दिये जाते हैं उतने लेने से इन्कार करने पर वे रुपये उनकी कमरबन्द में बाँध दिये जाते हैं और कोड़ों से मार-पीटकर उन्हें भगा दिया जाता है।'

    कम्पनी और उसके कर्मचारियों द्वारा अपनाये गये तौर-तरीकों का भारतीय कुटीर उद्योगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ना अनिवार्य था।

    (4.) इंग्लैण्ड के अन्य व्यापारियों का भारत में प्रवेश उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इंग्लैण्ड का युवा वर्ग भारत में मची लूट में अपनी हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिये मचल उठा। इसलिये 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके निजी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने की छूट दे दी गई। इससे इंग्लैण्ड के बहुत से व्यापारिक संस्थान अपना-अपना माल लेकर भारत आ गये। उनके आने से भारत में आर्थिक शोषण का नया दौर आरम्भ हुआ। 1813 ई. के पूर्व भारत का महत्त्व लूटपाट तथा कर एवं नजराने प्राप्त करने के साधन के रूप में था जबकि 1813 ई. के बाद भारत का महत्त्व, इस दृष्टि से हो गया कि इंग्लैण्ड की मशीनों द्वारा तैयार किया गया माल भारत में किस प्रकार खपाया जाये और इंग्लैण्ड की मशीनों के लिये कच्चा माल भारत से इंग्लैण्ड किस तरह लाया जाये।

    (5.) औद्योगिक क्रान्ति का प्रभाव 1769 ई. में जेम्स वाट ने भाप की शक्ति का आविष्कार किया। उसके बाद इंग्लैण्ड में मशीनीकरण एवं औद्योगिकीकरण का काम हुआ। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत की लूट से जो कुछ अर्जित किया गया, उसी से आधुनिक इंग्लैण्ड का निर्माण हुआ तथा इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति सम्पन्न हुई। भारत से लूटे गये कच्चे माल से इंग्लैण्ड की मशीनों पर बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा। अँग्रेजी कारखानों में बने हुए माल के लिये बाजार ढँूढने का काम आरम्भ हुआ। इन उत्पादों ने भारतीय माल को पहले तो विदेशी बाजारों से और फिर भारतीय बाजारों से खदेड़ना आरम्भ कर दिया। भारत के परम्परागत कुटीर-उद्योग, इंग्लैण्ड की मशीनों पर उत्पादित अच्छे माल से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके, विशेषकर उस स्थिति में जब उनसे राज्याश्रय छिन गया था। भारत में पुराने इजारेदारों की जगह स्वतंत्र बाजार का निर्माण किया गया। भारत जो सूती कपड़े का निर्यातक देश था, सूती कपड़े का आयातक बन गया।

    कार्ल मार्क्स ने 10 जून 1853 को न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में द ब्रिटिश रूल इन इण्डिया शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उसने लिखा कि ब्रिटिश भाप और विज्ञान ने समूचे हिन्दुस्तान में कृषि और कारखाना उद्योग की एकता को जड़ से उखाड़ फैंका।

    (6.) भारतीय माल पर निषेधात्मक शुल्क इंग्लैण्ड में मशीनों से सूती कपड़ा बनने पर भी वह भारतीय कपड़े की तुलना में महँगा था। इसलिये ब्रिटिश सरकार ने एक ओर तो भारतीय माल के आयात पर इतना अधिक शुल्क लगा दिया कि उसका आयात ही न हो सके और दूसरी ओर अपने माल पर किसी तरह का शुल्क चुकाये बिना, भारत पर अपना माल लाद दिया। साथ ही उत्पीड़न और अन्याय के द्वारा भारतीय मंडियों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

    (7.) कठोर कानूनों के द्वारा कच्चे माल की लूट 1814 ई. के बाद ब्रिटिश सरकार ने ऐसे कानूनों का निर्माण किया जिनके सहारे भारत से कच्चे माल का सुगमता पूर्वक निर्यात किया जा सके और तैयार माल को भारत में बेचा जा सके। लगातार पड़ रहे अकालों के कारण लाखों भारतीय भूखे मर रहे थे किंतु भारत का अनाज बाहर भेजा जा रहा था। देश के भीतर चुंगी और सीमा-शुल्क बढ़ा दिये गये ताकि भारतीय व्यापारी व्यापार न कर सकें। 1835 ई. में भारतीय रुई पर 15 प्रतिशत चुंगी तथा सूती कपड़े पर 25 प्रतिशत चुंगी निर्धारित की गई ताकि भारतीय उत्पादक, कपड़े के स्थान पर रुई का ही निर्यात करें। ब्रिटिश अधिकारी ट्रेवेलियन ने लिखा है- 'व्यक्तिगत और घरेलू उपयोग की 235 से भी अधिक वस्तुओं पर अन्तर्देशीय कर लगाये गये थे।'

    (8.) पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव भारत के कुटीर-उद्योगों के पतन में पाश्चात्य सभ्यता और शिक्षा ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पश्चिमी शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों में लगे भारतीय, विदेशी वस्तुओं के प्रति आकर्षित हुए। घरों में सजावट के लिये स्वदेशी कलात्मक वस्तुओं के स्थान पर पाश्चात्य सामग्री का उपयोग होने लगा। विदेशी वस्तुओं का उपयोग समाज में गौरव और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। शासक, सामन्त, सरकारी कर्मचारी, नवयुवा वर्ग, विदेशी वस्तुओं के उपयोग में एक-दूसरे से होड़ करने लगे थे। ऐसी स्थिति में स्वदेशी वस्तुओं- विशेषकर साज-सज्जा की कलात्मक वस्तुओं एवं सूती वस्त्रों की माँग में कमी आने लगी और कुटीर-उद्योगों का पतन होने लगा।

    (9.) भारतीय कागज पर रोक भारतीय नगरों के बाहर प्रायः एक छोटा उपनगर होता था जहाँ कागज बनता था। ब्रिटिश शासकों ने भारतीय कार्यालयों में ब्रिटेन में बने कागज का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया। इससे भारत के कागज उद्योग को भारी क्षति पहुँची। आज भी भारत के बहुत से नगरों में कागज मौहल्ला के नाम से स्थान मिलते हैं।

    (10.) भारतीय जहाजरानी के प्रयोग पर रोक ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इंग्लैण्ड एवं भारत के बीच होने वाले व्यापार के लिये केवल ब्रिटिश जहाजों का उपयोग किया। इससे भारतीय नौ-परिवहन उद्योग पर संकट खड़ा हो गया।

    (11.) अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण पर रोक भारत के उत्तर-पश्चिम में कच्छ, सिन्ध और पंजाब प्रांतों में ढाल, तलवार और अन्य हथियारों का खूबसूरत काम होता था किन्तु ब्रिटिश शासन ने इस काम को पूरी तरह समाप्त कर दिया। अँग्रेजी शासन ने हथियारों से लैस रहने और उनके उपयोग की आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया और उन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस कारण ये उद्योग भी नष्ट हो गये।

    (12.) रेल का निर्माण ब्रिटिश सरकार ने भारत में रेलों का निर्माण इस उद्देश्य से किया कि वह ब्रिटेन के उद्योगों को कच्चे माल और बाजार सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। 19वीं शताब्दी में भारत में रेलों का जाल बिछ गया। इससे ग्रामीण हस्तशिल्प वैश्विक प्रतिस्पर्धा का शिकार हो गया। साथ ही भारतीय हस्त-शिल्पियों का पारम्परिक ग्रामीण समुदाय के साथ सम्बन्ध शिथिल होने लगा। क्योंकि अब सात समंदर पार से आने वाली सस्ती मशीनी चीजें गाँव में भी उपलब्ध होने लगीं। यातायात के सुगम साधनों से गाँव के लोग शहर जाने लगे जिससे ग्रामीण समुदाय टूटने लगे। सस्ते यूरोपीय सूती कपड़े और बर्तनों के अत्यधिक आयात से ग्रामीण हस्तकला उद्योग नष्ट हो गये।

    (13.) अकालों का दुष्प्रभाव ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद बार-बार पड़ने वाले अकालों ने भी कुटीर-उद्योगों के पतन में योगदान दिया। अकालों के परिणामस्वरूप लाखों लोग मारे गये जिनमें कारीगर और शिल्पी भी थे। इसके अलावा जो लोग बच गये थे, उनकी स्थिति भी शोचनीय हो गई थी। जुलाहे, धोबी, कुम्हार, लुहार, बढ़ई आदि शिल्पकार बेकारी और भुखमरी से पीड़ित हो गये और उनके व्यवसाय चौपट हो गये।

    (14.) गिल्ड पद्धति का नाश जब तक भारतीय शहरी उद्योगों में गिल्ड पद्धति बनी रही, कुटीर-उद्योगों में अनुशासन बना रहा। गिल्ड पद्धति के नष्ट होने से कारीगरों एवं उनके द्वारा निर्मित्त वस्तुओं पर निगरानी रखने वाला कोई संगठन न रहा। इससे कुटीर-उद्योगों को भारी धक्का लगा।

    (15.) प्रशिक्षण का अभाव भारतीय कारीगरों को औद्योगिक कौशल देने के लिये जिस प्रशिक्षण की आवश्यकता थी, उसका नितांत अभाव रहा। प्रशिक्षण के अभाव में वे उत्तम कोटि की वस्तुएँ बनाने में असफल रहे जिससे उनके उत्पादों की माँग घट गई और परम्परागत उद्योग बन्द हो गये। इस प्रकार, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक भारत के कुटीर-उद्योग धीरे-धीरे समाप्त प्रायः हो गये किन्तु वे पूर्णतः विनष्ट नहीं हो सके, उनमें से कुछ तो आज भी जीवित हैं।


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  • ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारत में न्यायिक सुधार

     21.08.2017
    ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारत में न्यायिक सुधार

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 11

    मुगल कालीन न्याय व्यवस्था का ह्रास

    मुगल कालीन न्याय व्यवस्था कुरान के सिद्धांतों पर अवलम्बित थी किंतु उसका दण्ड विधान हिन्दुओं पर भी लागू किया गया था। अकबर के काल में काजी न्याय करते थे तथा मीर अदल का सम्बन्ध ऐसे मामलों से होता था जो दोनों समुदायों की धार्मिक विधि में सम्मिलित नहीं थे। मुगल प्रशासन के उत्तरार्द्ध में भूमि सुपुर्दगी प्रथा से समृद्ध भू-स्वामियों की शक्ति बढ़ने लगी। इससे न्याय व्यवस्था भी कई तरह से प्रभावित हुई। नई स्थिति में न्याय-प्रशासन केवल बड़े शहरों तक ही सीमित रह गया, जहाँ गवर्नरों की शक्ति अधिक थी। अन्य क्षेत्रों में न्याय से सम्बन्धित अधिकारियों के स्थान जमींदारों, धनी किसानों और लगान अधिकारियों ने प्राप्त कर लिये। दीवानी और फौजदारी अदालतों पर जमींदारों का अधिकार स्थापित हो गया। इस प्रकार 1757 ई. में प्लासी के युद्ध के पहले ही न्याय प्रबन्ध बिगड़ता जा रहा था, जो कम्पनी के शासन के आरम्भिक वर्षों में और अधिक बिगड़ गया।

    बंगाल में द्वैध शासन के अंतर्गत न्याय व्यवस्था

    बक्सर के युद्ध के बाद 1765 ई. में कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी के अधिकार प्राप्त हुए। दीवानी का तात्पर्य था कि कम्पनी बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लगान वसूल करे और दीवानी मुकदमों का फैसला करे। निजामत (सैनिक शक्ति और फौजदारी मुकदमों का अधिकार) नवाब ने पहले ही कम्पनी को दे दिया था। लॉर्ड क्लाईव इतनी सारी जिम्मेदारी कम्पनी पर नहीं डालना चाहता था, क्योंकि वह जानता था कि कम्पनी इतनी बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पायेगी। इसीलिए क्लाइव ने वैदेशिक सम्बन्ध, सैनिक शक्ति तथा राजस्व प्राप्त करने के अधिकार कम्पनी के पास रखे किन्तु न्याय व्यवस्था भारतीयों के जिम्में छोड़ दी। इस कार्य के लिए बंगाल और बिहार में दो नायब दीवान नियुक्त किये गये। इस प्रकार कम्पनी इन क्षेत्रों में शासक तो थी, किन्तु अपने शासन के लिए उत्तरदायी नहीं थी। यह व्यवस्था वारेन हेस्टिंग्ज की नियुक्ति तक चलती रही।

    वारेन हेस्टिंग्ज के पहले न्याय-प्रबन्ध में जो भी परिवर्तन किये गये वे केवल लगान बढ़ाने के उद्देश्य से प्रेरित थे। 1769 ई. में कम्पनी की सलेक्ट कमेटी ने यूरोपीय पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जिनका कार्य न्याय प्रणाली पर नियंत्रण रखना था, क्योंकि लगान अधिकारियों और जमींदारों द्वारा न्यायिक अधिकारों का मनमाने ढंग से प्रयोग किया जा रहा था और न्याय अधिकारियों के पद वंशानुगत हो जाने से लोगों को न्याय मिलने की संभावना कम होती जा रही थी। दूसरी ओर राजस्व के मामलों में न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से कम्पनी ने दो राजस्व नियंत्रक कौंसिलें, मुर्शिदाबाद और पटना में स्थापित कीं। ये अपील के मुकदमों में उच्च न्यायालय के समान थीं किन्तु उनके कार्य करने का ढंग वैसा ही मनमाना और अनियमित था जैसा कि लगान अधिकारियों और जमींदारों का था।

    एक ओर मुगल न्याय व्यवस्था बिगड़ रही थी और दूसरी ओर कम्पनी की न्याय व्यवस्था विकसित नहीं हो पा रही थी। कम्पनी की सलेक्ट कमेटी और प्रेसीडेन्ट एवं कौंसिल के बीच लगातार होने वाले झगड़ों, मराठा और मैसूर के युद्धों और बंगाल के भयंकर अकालों के कारण कम्पनी सरकार न्याय-प्रबन्ध की ओर ध्यान नहीं दे सकी।

    हेस्टिंग्ज द्वारा किये गये उपाय

    न्याय-व्यवस्था में सुधार लाने की दृष्टि से वारेन हेस्टिंग्ज का काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। भारत में ब्रिटिश न्याय प्रणाली की स्थापना इसी काल में हुई। कानून का शासन तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता इस प्रणाली की विशेषताएँ थीं। कानून के शासन से अभिप्राय था- निरंकुश शक्ति के स्थान पर नियंत्रित और निश्चित विधि की सर्वोच्चता एवं प्रधानता तथा कानून के समक्ष समस्त व्यक्तियों और वर्गों की बराबरी। स्वतंत्र न्याय व्यवस्था का अर्थ था- न्याय व्यवस्था में कार्यपालिका का हस्तक्षेप न होना तथा न्यायाधीशों की सुरक्षा। ये विचार इंग्लैण्ड में 18वीं शताब्दी में संविधान का अंग बन चुके थे। भारत में ये सिद्धान्त लागू होते ही न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अनेक विवाद उठ खड़े हुए। सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना से ये झगड़े और अधिक बढ़ गये। इन्हें रोकने के लिए विशेष कानून बनाये गये। भारत में उठने वाले विवाद विदेशी शासन के परिणाम थे। ये विवाद मुख्यतः अँग्रेज वकीलों एवं न्यायाधीशों, प्रशासकों और व्यापारियों के बीच थे, जिनमें भारतीयों की भूमिका मूक दर्शक की थी। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए हेस्टिंग्ज ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारने का भरसक प्रयत्न किया।

    दीवानी अदालतों की स्थापना

    क्लाइव द्वारा स्थापित द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त कर कम्पनी ने दीवानी का उत्तरदायित्व स्वयं ग्रहण कर लिया, जिसमें दीवानी न्याय व्यवस्था भी सम्मिलित थी। उसने मुगल व्यवस्था पर आधारित न्याय प्रणाली को अपनाने का प्रयत्न किया। सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था को पुनर्गठित किया गया तथा प्रत्येक अदालत का कार्यक्षेत्र निर्धारित किया गया। सिविल और फौजदारी मामलों के लिये अलग अदालतें थीं। दस रुपये तक के मामलों में प्रधान या मुखिया निर्णय ले सकता था। प्रत्येक जिले में दीवानी अदालत स्थापित की गई जिसकी अध्यक्षता यूरोपीय कलेक्टर करता था। इनमें 500 रुपयों तक के मामलों पर निर्णय किया जाता था। इस दीवानी अदालत में अलग-अलग प्रकार के मामले आते थे, यथा- सम्पत्ति के विवाद, वंशानुगत अधिकार, विवाह, जाति, कर्ज, हिसाब, किराए, साझेदारी, संविदा आदि से सम्बद्ध झगड़े। दीवानी अदालत के ऊपर कलकत्ता में सदर दीवानी अदालत स्थापित की गई। इन सुधारों के साथ ही हेस्टिंग्ज ने मुर्शिदाबाद और पटना की राजस्व कौंसिलें समाप्त कर दीं। इसके बाद भी न्याय प्रणाली पर लगान विभाग का प्रभाव बना रहा। 1774 ई. के बाद यह प्रभाव और अधिक बढ़ गया। जब कलेक्टरों को वापिस बुलाने के बाद छः प्रान्तीय कौंसिलें बनाई गईं तो न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ गया।

    फौजदारी अदालतों की स्थापना

    कम्पनी फौजदारी मामलों में हस्तक्षेप करना नहीं चाहती थीं, क्योंकि इस क्षेत्र में उत्तरदायित्व अधिक था और आय नहीं थी। इसलिए यह क्षेत्र भारतीय अधिकारियों- मुहम्मद रजा खाँ और सिताबराय पर छोड़ दिया गया। इस क्षेत्र में हस्तक्षेप केवल अराजकता रोकने और कानून व्यवस्था बनाये रखने के उद्देश्य से किया जाता था। फौजदारी क्षेत्र में केवल इस्लामी कानून लागू किये गये थे तथा दण्ड भी उन्हीं के आधार पर दिया जाता था। इस व्यवस्था की विरुद्ध अँग्रेज पर्यवेक्षकों को अनेक प्रकार की शिकायतें थीं। अतः हेस्टिंग्ज ने फौजदारी विभाग को सुधारने के उद्देश्य से 1772 ई. में एक नई योजना बनाई। उसने प्रत्येक जिले में फौजदारी अदालत स्थापित की जिसमें काजी, मुफ्ती तथा मौलवी नियुक्त किये गये। सबसे ऊपर सदर निजामत अदालत बनाई गई जिसका संचालन दरोगा-ए-अदालत, प्रधान काजी, प्रधान मुफ्ती तथा तीन मौलवी करते थे। जिला स्तर पर न्याय व्यवस्था, यूरोपीय कलेक्टर द्वारा नियंत्रित थी किन्तु वह स्वयं न्यायालय का सदस्य नहीं था। सदर निजामत अदालत कुछ समय के लिए मुर्शिदाबाद से कलकत्ता लाई गई जिससे उस पर कम्पनी का अधिक नियंत्रण रखा जा सके किन्तु हेस्टिंग्ज ने मुहम्मद रजा खाँ को पुनः नायब नियुक्त किया, जिसने गवर्नर जनरल की अनुमति से फौजदारी अदालतों का पुनर्गठन किया। कुल मिलाकर 23 जिला फौजदारी अदालतें बनाई गईं। बड़े जिलों के प्रमुख नगरों में फौजदारी थाने स्थापित किये गये। फौजदारी अदालतों और थानों के साथ जेलें भी बनाई गईं किन्तु हेस्टिंग्ज का यह प्रयोग भी सफल नहीं माना जा सकता, क्योंकि अदालतों को अपना निर्णय लागू करने के लिए न तो पर्याप्त अधिकार दिये गये और न साधन।

    कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना

    वारेन हेस्टिंग्ज के काल में रेगुलेटिंग एक्ट द्वारा कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया गया। इसका कार्यक्षेत्र कलकत्ता नगर के नागरिकों तक सीमित था। इस न्यायालय में बाहर के मामलों की सुनवाई तभी हो सकती थी, जब दोनों पक्ष इसके लिए तैयार हों। कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय में ब्रिटिश कानून लागू होते थे जबकि सदर दीवानी और सदर निजामत में मुस्लिम या हिन्दू कानून लागू होते थे। सदर दीवानी और सदर निजामत न्यायालयों के कार्यक्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय से टकराते थे जिसे सुलझाने के लिए हेस्टिंग्ज ने इम्पे को सदर दीवानी अदालत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जो सर्वोच्च न्यायालय का भी प्रधान न्यायाधीश था। कम्पनी के संचालकों द्वारा आपत्ति करने के कारण 1782 ई. में इम्पे ने त्याग-पत्र दे दिया। इस प्रकार न्याय व्यवस्था में भी द्वैधता चलती रही। हेस्टिंग्ज ने अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में न्याय व्यवस्था में सुधार का एक और प्रयत्न किया। उसने एक न्यायिक योजना प्रस्तुत की तथा उसके द्वारा न्याय और भू-राजस्व के कार्यों को पृथक् करने का प्रयत्न किया किन्तु यह प्रयोग बहुत ही कम समय तक चला। इस काल में हिन्दू विधि संहिता तथा मुस्लिम विधि का अँग्रेजी भाषा में अनुवाद किया गया। 1781 ई. की संहिता द्वारा न्याय व्यवस्था का केन्द्रीयकरण किया गया। इससे पुरानी न्याय प्रणाली की सरलता समाप्त हो गई और पाश्चात्य सिद्धान्तों के प्रभाव से जटिलता बढ़ गई। अब न्याय एवं कानून एक ऐसी विशेष व्यवस्था बन गया जिसका संचालन केवल वकील ही कर सकते थे।

    कार्नवालिस के न्यायिक सुधार

    सितम्बर 1786 में लॉर्ड कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसने कानूनी विशेषज्ञ सर जॉन विलियम की सहायता से न्यायिक सुधार किये। कार्नवालिस से पहले, दीवानी न्यायाधीश केवल न्यायिक कार्य करते थे, उनका लगान वसूली से कोई सम्बन्ध नहीं था। 1786 ई. में संचालक मण्डल ने आदेश दिया कि मजिस्ट्रेट, कलेक्टर और जज के कार्य एक ही व्यक्ति द्वारा किये जायें। अतः जून 1787 में कार्नवालिस ने इन तीनों पदों को एक साथ मिला दिया।

    राजस्व न्यायालयों की समाप्ति

    1793 ई. में भूमि का स्थायी बन्दोबस्त लागू किया गया। इसके साथ ही भू-राजस्व वसूल करने के काम को पुनः न्याय से अलग कर दिया गया। कार्नवालिस की 1793 ई. की योजना द्वारा समस्त राजस्व न्यायालय समाप्त कर दिये गये। कलेक्टरों से न्यायिक अधिकार छीन लिए गये तथा सम्पूर्ण दीवानी न्यायालयों का श्रेणीकरण कर दिया गया।

    मुंसिफ अदालतें

    नए न्याय प्रबन्ध में 50 रुपये तक के मामलों को मुंसिफ अदालतों में निबटाया जाने लगा। इसके ऊपर रजिस्ट्रार अदालतें थीं जिन्हें 200 रुपये तक के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार था। इनमें यूरोपीय न्यायाधीश नियुक्त किये जाते थे।

    जिला अदालतें

    रजिस्ट्रार अदालतों में दिये गये निर्णयों के विरुद्ध अपील नगर या जिला अदालतों में होती थी जहाँ यूरोपीय न्यायाधीश, भारतीय अधिकारियों की सहायता से मुकदमों की सुनवाई करते थे।

    प्रान्तीय अदालतें

    जिला अदालतों के ऊपर कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, ढाका और पटना में चार प्रान्तीय अदालतें बनाई गईं। कुछ मामलों में ये न्यायालय प्रथम अधिकार क्षेत्र का कार्य भी करते थे। यहाँ यूरोपीय न्यायाधीश की अध्यक्षता में 1000 रुपये तक के मामले सुने जाते थे।

    सदर दीवानी अदालत

    प्रान्तीय अदालतों के ऊपर कलकत्ता में सदर दीवानी अदालत थी जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल के सदस्य निर्णय लेते थे। पाँच हजार रुपये से अधिक के मामलों की अपील किंग-इन-कांउसिल के समक्ष की जा सकती थी।

    फौजदारी न्यायालायों में सुधार

    कार्नवालिस द्वारा फौजदारी न्यायालायों में भी कई सुधार किये गये। हेस्टिंग्ज मुगल न्याय प्रणाली को हटाने के पक्ष में नहीं था, वह मुगल प्रणाली के दोषों को ही दूर करना चाहता था। दूसरी ओर कार्नवालिस व्यापक सुधार लाने के पक्ष में था। फौजदारी अदालतों में सुधार लाने के उद्देश्य से 3 दिसम्बर 1790 को एक विस्तृत मसौदा तैयार किया गया। इसमें मुसलमान न्यायाधिकारियों के मार्ग-दर्शन के लिए एक नियम बनाया गया जिसके अनुसार हत्या के मामलों में हत्या के अस्त्र या ढंग की बजाय हत्यारे की मंशा पर अधिक बल दिया गया। मृतक के अभिभावकों की इच्छा से क्षमा करना अथवा रक्त का मूल्य निर्धारित करना बन्द कर दिया गया। यह निश्चय किया गया कि साक्षी के धर्म का, वाद पर कोई प्रभाव नहीं होगा। इस्लामी कानून में मुसलमानों की हत्या के मामलों में अन्य धर्म वाले साक्षी नहीं माने जाते थे।

    सदर निजामत की पुनः स्थापना

    कार्नवालिस ने न्याय संगठन में भी कई सुधार किये। मुहम्मद रजा खाँ के पद को समाप्त करके कलकत्ता में पुनः सदर निजामत अदालत स्थापित की गई।

    सर्किट अदालतें

    गवर्नर जनरल और कौंसिल के अधीन जिला फौजदारी अदालतें समाप्त करके चार चलती-फिरती अदालतें (सर्किट अदालतें) स्थापित की गईं। इनके लिए साल में दो बार आन्तरिक प्रदेशों का दौरा करना आवश्यक था। केवल यूरोपियन व्यक्ति ही इनकी अध्यक्षता कर सकते थे। इन्हें मृत्यु दण्ड देने का अधिकार था परन्तु उसकी पुष्टि सदर निजामत अदालत से होनी आवश्यक थी। गवर्नर जनरल को क्षमादान का अधिकार था।

    कार्नवालिस कोड

    कार्नवालिस ने जो सुधार किये उन्हें कार्यान्वित करने के लिए एक संहिता भी तैयार करवाई गई जिसे कार्नवालिस कोड कहा जाता है। कार्नवालिस कोड की दो मुख्य विशेषताएँ थीं- (1.) निजामत अदालतों में अँग्रेज न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा (2.) न्याय व्यवस्था को प्रशासन से अलग करना। कार्नवालिस के आने के पूर्व जिले में कलेक्टर, राजस्व प्रशासन का मुख्य अधिकारी था तथा जिले का प्रधान न्यायाधीश भी। एक ओर वह राजस्व का निर्धारण करता था और उसे वसूल करता था, वहीं दूसरी ओर उसी के राजस्व निर्धारण व वसूली के निर्णय के विरुद्ध न्यायाधीश के रूप में मुकदमों की सुनवाई भी करता था। कार्नवालिस कोड द्वारा कलेक्टर को केवल राजस्व निर्धारण व उसकी वसूली का कार्य सौंपा गया और न्यायिक कार्य दूसरे अधिकारी को सौंप दिये गये। कार्नवालिस कोड लागू होने से पहले, फौजदारी मामलों में मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दुओं की गवाही को स्वीकार नहीं किया जाता था किन्तु कार्नवालिस कोड में यह स्पष्ट नियम बना दिया कि गवाही देने के लिये धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति पर प्रतिबन्ध नहीं होगा। कार्नवालिस कोड में अंग-भंग, सूली पर चढ़ाना आदि अमानुषिक दण्ड समाप्त कर दिये गये तथा कठोर कारावास की सजा देने की व्यवस्था की गई। वकीलों को लाईसेन्स देने की व्यवस्था की गई। लाइसेंस प्राप्त वकील ही वकालत कर सकता था। वकीलों की फीस भी निश्चित कर दी गई। यदि कोई वकील निर्धारित से अधिक फीस लेता था तो उसे वकालत के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता था। कार्नवालिस कोड में व्यवस्था की गई कि यदि कम्पनी के अधिकारी गैर-कानूनी कार्य करें तो उन पर भी मुकदमा चलाया जाये। ऐसे मामलों में केवल ऐसे अँग्रेज जज ही जाँच कर सकते थे, जो सरकार से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में आर्थिक लाभ प्राप्त न करते हों।

    कार्नवालिस की न्याय-प्रणाली पश्चिमी न्यायिक धारणाओं पर आधारित थी। इसमें राजाओं के निजी कानूनों तथा धार्मिक कानूनों का स्थान धर्म-निरपेक्ष कानून ने ले लिया। विधि की सर्वोच्चता स्थापित की गई। कार्नवालिस कोड के तात्कालिक परिणाम लाभदायक सिद्ध नहीं हुए। नये कानून इतने जटिल थे कि साधारण लोग इन्हें समझ नहीं पाते थे। इस प्रणाली में न्याय प्राप्त करने में इतना समय लगता था और यह इतना महँगा पड़ता था कि यह निर्धन लोगों के योग्य नहीं था। वकीलों की चालबाजियों के कारण मुकदमेबाजी बहुत बढ़ गई। झूठे गवाह बनाये जाने लगे, न्यायालय का काम बढ़ने से निर्णय सुनाने में बहुत समय लगने लगा। स्वयं कार्नवालिस ने स्वीकार किया कि उसके काल में 60,000 से अधिक मुकदमे न्यायालयों में फँसे पड़े थे। इस प्रणाली में, परम्परागत न्याय प्रणाली के पंचायत, जमींदार, काजी, फौजदार तथा निजामत आदि व्यवस्थाओं एवं अधिकारियों का स्थान यूरोपीय न्यायाधीशों ने ले लिया जिन्हें भारतीय रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं की जानकारी नहीं थी। भारतीय न्यायाधीशों के स्थान पर अँग्रेज न्यायधीशों की नियुक्ति करना इस व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष था। कार्नवालिस का एकमात्र उद्देश्य यह था कि भारतीयों के स्थान पर अँग्रेज न्यायाधीशों की नियुक्ति करके कम्पनी की सर्वोच्चता स्पष्ट कर दी जाये। इतिहासकार मिल ने स्वीकार किया है कि अँग्रेजी न्यायालयों से अपराधों की संख्या बढ़ी तथा लोगों में भय व आंतक फैल गया।

    कार्नवालिस कोड के दोषों को दूर करने के लिए कम्पनी सरकार ने 1793 ई. से 1813 ई. के बीच अनेक कदम उठाये। छोटे मुकदमों को शीघ्र निपटाने के आदेश दिये गये। न्यायिक अधिकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके वेतन बढ़ाये गये। इन अधिकारियों को हेलीबरी कॉलेज में प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई तथा उन्हें भारतीय भाषाओं, न्याय और सरकारी कानूनों की जानकारी दी गई। साथ ही न्याय प्रणाली में केन्द्रीयकरण करने के लिए विभिन्न योजनाएँ बनाई जाने लगीं।

    कार्नवालिस कोड का विरोध

    मद्रास प्रेसीडेन्सी में जब कार्नवालिस कोड लागू करने का प्रश्न उठा तो टॉमस मुनरो ने इसका विरोध किया। उसके विचार में कार्नवालिस प्रणाली कृत्रिम और विदेशी थी जिसने परम्परागत संस्थाओं को हटा दिया था। मुनरो, ग्राम पंचायतों एवं सरपंचों को दीवानी और फौजदारी के छोटे मामलों में सुनवाई के अधिकार देकर उन्हें प्रोत्साहित करता रहा। जिला प्रशासन में भी परम्परागत ढंग से कार्यपालिका को शक्तिशाली बनाया गया। कलेक्टर को मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारों के साथ किराये और सीमा सम्बन्धी झगड़ों को निपटाने का अधिकार दिया गया। दिल्ली के रेजीडेन्ट मेटकॉफ ने भी इसी व्यवस्था को अपनाया। इसमें परम्परागत मुगल संस्थाओं को बनाये रखा गया तथा राज्य शक्तियों में केन्द्रीयकरण लाया गया।

    कार्नवालिस के जाने के बाद यह प्रयत्न किया गया कि लोगों को उपलब्ध न्याय की सुविधा में कमी कर दी जाये। इसलिए 1795 ई. में मुकदमा दायर करते समय धन जमा कराने की पुरानी प्रणाली पुनः आरम्भ की गई तथा स्टाम्प पेपर का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया। 1797 ई. में अपील की सुविधाएँ भी कम कर दी गईं। यद्यपि न्याय को दुर्लभ एवं अधिक महँगा बना दिया गया फिर भी मुकदमों की संख्या बढ़ती ही गई। लोगों की जान-माल की सुरक्षा का भय ज्यों-का-त्यों बना रहा। अतः जान-माल की सुरक्षा के लिए 1807 ई. में जमींदारों को पुनः दायित्व सौंपना पड़ा।

    लॉर्ड हेस्टिंग्ज के न्यायिक सुधार

    1813 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्ज गवर्नर जनरल बनकर भारत आया जिसने प्रचलित व्यवस्था में संशोधन किया। 1814 ई. में प्रत्येक थाने में एक मुंसिफ की नियुक्ति की गई जो 64 रुपये तक के मामले निपटा सकता था। प्रत्येक जिले में एक सदर अमीन की नियुक्ति की गई जो 150 रुपये तक के मामलों की सुनवाई कर सकता था। सदर अमीन के निर्णय के विरुद्ध अपील दीवानी अदालत में तथा यहाँ से अपील प्रान्तीय न्यायालय में की जा सकती थी। जो मुकदमे सीधे दीवानी अदालत में दायर होते थे, उनकी अपील सदर दीवानी अदालत में की जा सकती थी। कार्य का बोझ कम करने तथा कार्य प्रणाली को सरल बनाने की दृष्टि से कुछ मामलों में अपील करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और कुछ मामलों में केवल एक बार अपील करने की सुविधा दी गई। 1821 ई. में मुंसिफ को 150 रुपये तक के मामले तथा सदर अमीन को 500 रुपये तक के मामले सुनने का अधिकार दिया गया। दीवानी अदालतों के रजिस्ट्रार को 50 रुपये तक के मामले तथा विशेष परिस्थिति में दीवानी अदालतों द्वारा प्रेषित 500 रुपये तक के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार दिया गया। यहाँ से अपील सीधे ही प्रान्तीय न्यायालय में की जा सकती थी। 500 रुपये से ऊपर के मामले जिला दीवानी अदालतों में तथा 5,000 रुपये से ऊपर के मामले सीधे प्रान्तीय न्यायालय में दायर किये जा सकते थे। सदर दीवानी अदालत, कोई मुकदमा जिला दीवानी अदालत से प्रान्तीय अपील न्यायालय में स्थानान्तरित कर सकती थी। लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने कलेक्टर और मजिस्ट्रेट के पद को पुनः मिला दिया जिसे कार्नवालिस ने स्थायी बन्दोबस्त के बाद पृथक् कर दिया था। कार्नवालिस कोड में भी महत्त्वपूर्ण संशोधन किये गये। मद्रास व बम्बई में भारतीय जजों के वेतन में वृद्धि की गई ताकि वे ईमानदारी से कार्य करें। यद्यपि बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल ने भारत में पुनः प्राचीन संस्थाओं को स्थापित करने तथा पंचायतों को पुनर्जीवित करने की अनुशंसा की थी, किन्तु इन अनुशंसाओं को कार्यान्वित नहीं किया गया।


    लॉर्ड विलियम बैंटिक के न्यायिक सुधार

    बैंटिक के आने के समय तक भी न्याय व्यवस्था में अनेक दोष थे। कम्पनी ने अब तक भारत में विशाल क्षेत्र प्राप्त कर लिया था तथा न्याय प्रशासन का मुख्यालय कलकत्ता में था। विभिन्न भागों से कलकत्ता की दूरी अधिक होने के कारण न्याय प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा था। अपील एवं भ्रमण की चार अदालतें अधिक खर्चीली थीं और इनका कोई विशेष लाभ भी नहीं था। इन पर मकदमों का बोझ भी अधिक था, जिससे शीघ्र न्याय प्रदान करना संभव नहीं था। डिवीजनल न्यायालयों व प्रान्तीय अपील न्यायालयों में अकुशलता एवं अनियमितताएँ व्याप्त थीं जिनके कारण न्यायालयों में मुकदमों के ढेर लगे हुए थे। इन मुकदमों के अभियुक्त महीनों तक जेल में पड़े रहते थे।

    कार्नवालिस ने भारतीयों को न्यायालय के उच्च पदों व उत्तरदायित्वों से अलग रखा था जिससे भारतीयों में रोष था। न्यायालय की भाषा फारसी थी तथा मुकदमा दर्ज करने वाले को अपनी भाषा में बात कहने का अधिकार नहीं था। बैंटिक ने इन दोषों को दूर करने का प्रयास किया। ऐसा करने का एक कारण यह भी था कि ब्रिटिश सरकार, चार्टर एक्ट-1833 ई. पर विचार करने जा रही थी जिस पर कम्पनी का भविष्य निर्भर करता था। इसलिए कम्पनी के प्रशासनिक दोषों को दूर करना आवश्यक था, ताकि संसद को शिकायत करने का अवसर न मिल सके।

    न्यायिक सुधार, व्यापक सुधारों का केवल एक भाग था। बैंटिक ने न्यायिक सुधारों के द्वारा अपील एवं भ्रमण की चार अदालतें समाप्त कर दीं। साथ ही दंड विधान की कठोरता को कम कर दिया। अपराधियों को कोड़े लगवाने की प्रथा समाप्त कर दी। यह सुधार बैंथम की उस अवधारणा पर आधारित था कि अपराधी को सजा, सुधारने के लिए दी जानी चाहिए, बदले के लिये नहीं। उसने कमिशनरों के फौजदारी अधिकार जिला न्यायाधीश को सौंप दिये और जिला न्यायाधीश ने अपने मजिस्ट्रेट के अधिकार कलेक्टर के लिए छोड़ दिये। मजिस्ट्रेट को दो वर्ष की सश्रम कारावास की सजा देने का अधिकार दिया गया। इसके विरुद्ध सिविल न्यायालय में अपील की जा सकती थी।

    कलेक्टरों को लगान सम्बन्धी मामले निपटाने के अधिकार दिये गये। इसकी अपील सिविल न्यायालयों में की जा सकती थी। अपील का मुकदमा स्वयं कलेक्टर के विरुद्ध होता था। 1831 ई. में बैंटिक ने जिला एवं सत्र न्यायालय स्थापित किया। 1831 ई. में ही भारतीयों को सदर अमीन के पद पर नियुक्त किया गया जो जिला व शहरी न्यायालय के विरुद्ध अपीलें सुन सकते थे। न्यायिक क्षेत्र में किसी भारतीय को दिया जाने वाला सदर अमीन का पद सर्वोच्च था किन्तु यूरोपियन अथवा अमेरिकन से सम्बन्धित मुकदमे, मुन्सिफ या सदर अमीन की अदालत में नहीं सुने जा सकते थे।

    कम्पनी राज्य का विस्तार धीरे-धीरे पश्चिम की ओर होता जा रहा था। इसलिए आगरा प्रान्त बनाया गया जो कलकत्ता से काफी दूर था। न्याय पाने के लिए कलकत्ता जाने में समय और धन बर्बाद होते थे। इसलिए आगरा में ही अपील अदालत की स्थापना की गई। इसी उद्देश्य से इलाहाबाद में सदर दीवानी और सदर निजामत अदालतें स्थापित की गईं, जिससे दिल्ली और उत्तर पश्चिमी प्रान्त में आसानी से न्याय प्रशासन चल सके। अदालतों में फारसी भाषा के स्थान पर प्रान्तीय भाषाओं का प्रयोग होने लगा। बंगाल में जूरी प्रणाली आरम्भ की गई, ताकि यूरोपियन जजों को भारतीयों की सहायता उपलब्ध हो सके। 1832 ई. के नियम में यह भी कहा गया कि यूरोपियन जज किसी मामले को प्रतिष्ठित भारतीयों की पंचायत के पास भेज सकेंगे और पंचायत मामले की जाँच कर अपनी रिपोर्ट जजों के पास भेजेगी। जज अपने लिये भारतीय सहायक नियुक्त कर सकते थे, जो प्रत्येक मामले में अपनी अलग राय दे सकते थे।

    न्याय क्षेत्र में सुधार कार्यक्रम को लागू करने में लॉर्ड मैकाले का महत्त्वपूर्ण योगदान था। 1833 ई. के चार्टर एक्ट में स्पष्ट कहा गया था कि विधि-प्रणाली के दोष समाप्त किये जाने चाहिए। सुधार लाना इसलिए भी आवश्यक हो गया था कि इस एक्ट द्वारा ब्रिटिश नागरिकों को भारत में सम्पत्ति खरीदने-बेचने के पूर्ण अधिकार दे दिये गये थे जिसकी भारत में कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी। इस समस्या का मैकाले के पास एक ही समाधान था- विधि का संहिताकरण। संहिताकरण के कार्य में मैकाले को प्रिंसेप सहित अनेक प्रशासकों के विरोध का सामना करना पड़ा। बहुमत मिलेट के विधि संग्रह के पक्ष में था किन्तु मैकाले ने बड़ी चतुराई से इस विवाद को विधि आयोग के लिए छोड़ दिया। बैंटिक ने विधि आयोग का अध्यक्ष मैकाले को ही बनाया। संहिताकरण कार्य में उसने व्यवहारिकता और आवश्यकता को प्राथमिकता दी। मैकाले की सबसे बड़ी सफलता उसकी नई दंड संहिता थी।

    विलियम बैंण्टिक के बाद न्यायिक सुधार

    लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में 1853 ई. के चार्टर एक्ट के समय विधि-संहिता का प्रश्न पुनः उठाया गया और दूसरा विधि आयोग बनाया गया। इसके परिणाम स्वरूप 1859 से 1861 ई. के बीच दण्डविधि, सिविल कार्य विधि तथा दण्ड प्रक्रिया पारित की गई। इन सुधारों ने सम्पूर्ण भारत के लिये एक विधि प्रणाली प्रदान की। विभिन्न क्षेत्रों में थोड़ा-बहुत अन्तर बना रहा। दूसरी ओर यूरोपीय अधिकारियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये न्याय संगठन में परिवर्तन करने की बात भी उठाई गई जिससे भारतीय न्याय प्रणाली, ब्रिटिश न्याय प्रणाली के अनुकूल होती गई। 1861 ई. में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम द्वारा पुराने सर्वोच्च न्यायालय और सदर अदालतों को समाप्त कर कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई।

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना

    1866 ई. में एक और उच्च न्यायालय आगरा में स्थापित किया गया जिसे 1875 ई. में इलाहाबाद स्थानान्तरित कर दिया गया। बाद में लाहौर और पटना में भी ऐसे ही उच्च न्यायालय स्थापित किये गये।

    संघीय न्यायालय की स्थापना

    इस न्याय प्रणाली में अन्तिम महत्त्वपूर्ण सुधार 1935 ई. में किया गया जब संघीय न्यायालय की स्थापना की गई। इसने उच्चतम न्यायालय का स्थान ग्रहण कर लिया। कहने को यह भारत का सर्वोच्च न्यायालय था किंतु वास्तविक अर्थों में यह सर्वोच्च न्यायालय नहीं था क्योंकि अनेक मामलों में सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय के विरुद्ध लन्दन स्थित प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी।

    *****THE END*****

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  • भारत में पश्चिमी शिक्षा का प्रसार

     21.08.2017
    भारत में पश्चिमी शिक्षा का प्रसार

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 12 


    प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति

    प्रचीन भारत में शिक्षा प्रणाली का विकास आध्यात्मिक आवश्यकताओं के कारण हुआ था। इस कारण शिक्षा का स्वरूप व्यावसायिक नहीं था। शिक्षा का विकास ऋषियों और मुनियों के आश्रमों में हुआ था इस कारण जन-साधारण की शिक्षा का दायित्व राज्य पर नहीं था। शिक्षा का उद्देश्य परम तत्त्व की प्राप्ति अर्थात् सत्य की खोज था। इस कारण भारतीय शिक्षा का मूल आधार आस्था, विश्वास, विनय एवं अभ्यास के चार पायों पर खड़ा था। छात्र को अपने पिता का घर छोड़कर गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। उन्हें वेद, वेदांग, उपनिषद, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिल्पवेद एवं योग आदि की शिक्षा दी जाती थी। छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। गुरुकुल में रहने वाले ब्राह्मण परिवारों एवं उनके शिष्यों का निर्वहन राजाओं, सामंतों तथा श्रेष्ठि परिवारों द्वारा दी गई सहायता से होता था। शिक्षा पूर्णतः स्वतंत्र थी। राजा भी गुरुकुल की व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करता था। शिक्षा का माध्यम देवभाषा संस्कृत था जिसमें सम्पूर्ण धार्मिक एवं सांसारिक ज्ञान उपलब्ध था। ब्राह्मण कन्याएं अपने पिता के आश्रम में ज्ञान प्राप्त करती थीं। राजपुत्रियां राजप्रासादों में शिक्षा प्राप्त करती थीं, उन्हें घुड़सवारी, रथ संचालन, धनुष विद्या तथा तलवार चलाना सिखाया जाता था। बड़े श्रेष्ठियों की पुत्रियां घर पर रहकर विभिन्न कलाओं का ज्ञान प्राप्त करती थीं। उन्हें नारी जीवन को सुखमय बनाने का ज्ञान दिया जाता था। अन्य वर्गों की लड़कियों की औपचारिक शिक्षा का प्रबंध नहीं था।
    मध्यकाल में शिक्षा

    मुसलमानों के भारत आगमन के पश्चात्, परम्परागत हिन्दू शिक्षण पद्धति में बड़ा परिवर्तन आया। दूरस्थ गुरुकुलों का स्थान स्थानीय पोसालों एवं चटशालाओं ने ले लिया जिनमें विद्यार्थी अपने गुरु को निर्धारित शुल्क देते थे। लड़कियों के लिये घरों से निकलना और अधिक प्रतिबंधित हो गया। जनसामान्य के लिए गांवों और कस्बों में पण्डितों द्वारा छोटे-छोटे विद्यालय खोले गये जिनमें बच्चों को भारतीय भाषाओं में पढ़ना, लिखना और प्रारम्भिक गणित करना सिखाया जाता था। साथ में धर्मिक शिक्षा भी दी जाती थी। इन विद्यालयों से प्रायः व्यापारी-पुत्र लाभ उठाते थे। ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के बच्चे भी इन विद्यालयों में पढ़ते थे।

    मुसलमानों ने अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबंध मस्जिदों में किया जहाँ मौलवी, मुस्लिम बच्चों की बहुत थोड़ी संख्या को दीनी इल्म देते थे। आगे चलकर मदरसों की व्यवस्था आरम्भ हुई जिनमें मुख्यतः मुस्लिम बच्चे पढ़ते थे। हिन्दू बच्चे भी फारसी सीखने के लिये मदरसों में जाते थे क्योंकि राज्य-कार्य की भाषा फारसी थी।

    उच्च हिन्दू शिक्षा, विद्यालयों, आश्रमों, चतुष्पाठी आदि संस्थाओं में दी जाती थी, जिसमें ब्राह्मण शिक्षक, अत्यंन्त सादा जीवन व्यतीत करते हुए अध्यात्म, दर्शन, कर्मकाण्ड, संहिताओं एवं स्मृतियों का अध्ययन-अध्यापन करते थे। अन्य जातियों के लिए धर्मिक आधार पर उच्च शिक्षा निषिद्ध थी। इस प्रकार अँग्रेजों के आने के पहले हिन्दुओं में शिक्षा समाज के अत्यंत सीमित वर्ग को ही उपलब्ध थी। उच्च शिक्षा पर केवल ब्राह्मणों का अधिकार था। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा हिन्दू संस्कृति के मूल सिद्धांतों पर अवलम्बित थी, जो आश्रम व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था में विश्वास करना, वेदों की महानता में विश्वास करना और वेदों की व्याख्या करने वाले ब्राह्मणों की क्षमता में विश्वास करना सिखाती थी।

    इस शिक्षा के माध्यम से बच्चों को अपने माता-पिता, गुरुजन, अतिथि एवं राजा के प्रति सम्मान की भावना दी जाती थी। यह शिक्षा व्यक्ति को समाज की संरचना के अनुकूल बनाने का साधन थी तथा भारतीय संस्कृति की गौरवपूर्ण परम्परा थी। इसमें यह दोष अवश्य था कि सामान्यतः स्त्रियां, श्रमिक जातियाँ और किसान शिक्षा से वंचित थे।

    मुस्लिम शिक्षा, हिन्दू शिक्षा से अलग थी। मुस्लिम जनता में शिक्षा पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं था फिर भी बहुत कम मुस्लिम बालक मदरसों में पढ़ते थे जहाँ उन्हें कुरान एवं उसके सिद्धांतों की जानकारी दी जाती थी। उच्च शिक्षा का माध्यम अरबी भाषा थी, क्योंकि कुरान की रचना इसी भाषा में हुई थी, फिर भी कुछ मदरसों में कुरान के साथ-साथ फारसी और अन्य विषयों की शिक्षा भी दी जाती थी। दोनों समुदायों की शिक्षा में एक भारी अन्तर यह था कि हिन्दू विद्यालय समाज के विशिष्ट वर्ग के लिए थे, जबकि मुस्लिम मदरसे सबके लिए खुले थे, जो एक पैगम्बर में विश्वास करते थे।

    देश में राजनीतिक एवं प्रशासनिक अराजकता अपने चरम पर थी, इस कारण हिन्दुओं एवं मुसलमानों, दोनों वर्गों में शिक्षा पतनोन्मुख थी। देश में मुद्रित पुस्तकों का अभाव था। स्वेदशी विद्यालय, चाहे वे ब्राह्मणों द्वारा चलाये जाते हों या फिर मौलवियों द्वारा, बच्चों की बड़ी संख्या को शिक्षित करने में असफल थे। लड़कियों के लिए तो शिक्षा का प्रावधान ही नहीं था।
    ईसाई मिशनरियों द्वारा आरंभिक शैक्षणिक कार्य

    पुर्तगाली मिशनरियों के प्रयास

    यूरोप से भारत आने वाली जातियों में सर्वप्रथम पुर्तगाली थे। पुर्तगाली मुख्य रूप से दो उद्देश्य लेकर भारत आये थे- (1.) धर्म-प्रचार और (2.) व्यापार। धर्म-प्रचार के लिए जनता को बाइबिल का ज्ञान कराना आवश्यक था। इसलिये 1542 ई. में पुर्तगाली पादरी सेण्ट फ्रांसिस जेवियर भारत आया। वह लोगों को बाइबिल के उपदेश देता था तथा ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता था। उसने अनेक स्कूल भी खोले। 1575 से 1580 ई. के बीच उसने बम्बई के पास बान्द्रा, गोआ के पास चौल तथा कुछ अन्य स्थानों पर कॉलेज खोले जिनमें बाइबिल, लेटिन भाषा, पुर्तगाली व्याकरण, तर्कशास्त्र तथा पुर्तगाली संगीत की शिक्षा दी जाती थी। भारत आने वाला दूसरा प्रमुख पादरी रॉबर्ट डे नोबिल था। इन दोनों पादरियों ने पश्चिमी भारत में ईसाई धर्म तथा शिक्षा का प्रसार किया। पुर्तगाली पादरियों ने ही भारत में छापाखाने स्थापित किये। सर्वप्रथम उन्होंने ही बाइबिल का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करके उसे पुस्तकों के रूप में छापकर साधारण जनता के बीच वितरित किया। इसीलिए पुर्तगालियों को भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली का जन्मदाता माना जाना चाहिए।

    नीदरलैण्ड वासियों के प्रयास

    यूरोप से भारत आने दूसरे यूरोपीय, नीदरलैण्ड-वासी डच थे। उन्होंने अपनी कम्पनी के कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा देने के लिए भारत में कई पाठशालाएं खोलीं जिनमें कुछ भारतीय बच्चों को भी प्रवेश दिया गया। उनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था किंतु अग्रजों से प्रतिद्वंद्विता के कारण उन्हें शीघ्र ही भारत छोड़ देना पड़ा। उनके जाते ही उनकी शिक्षा व्यवस्था भी समाप्त हो गई।

    फ्रांस वासियों के प्रयास

    सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपनी व्यापारिक कोठियाँ चन्द्रनगर, माही, यनाम, कारोकल और पाण्डीचेरी के निकट स्थापित कीं। इन कोठियों में काम करने वाले फ्रैंच अधिकारियों के बच्चों के लिये उन्होंने फ्रैंच स्कूलों की स्थापना की। पुर्तगालियों की भांति उन्होंने भी अपने स्कूलों में स्थानीय भाषाओं की शिक्षा की व्यवस्था की। इन पाठशालाओं में भारतीय अध्यापकों को नियुक्त किया जाता था तथा भारतीय छात्रों को भी प्रवेश दिया जाता था जिन्हें भोजन, कपड़े और पुस्तकें निःशुल्क देकर स्कूल में आने के लिये प्रोत्साहित किया जाता था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अँग्रेजों से परास्त होकर भारत छोड़ना पड़ा तथा फ्रैंच बस्तियों पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया और फ्रांसिसी स्कूल भी उनके अधिकार में चले गये।

    डेनमार्क वासियों के प्रयास

    अन्य यूरोपियनों की तरह डेनमार्क के व्यापारियों ने भी दक्षिण भारत में तंजोर के समीप तथा बंगाल में कलकत्ता के समीप सेरामपुर में अपनी कोठियां बनाईं। यद्यपि व्यापारिक या राजनैतिक दृष्टि से इन दोनों स्थानों का कोई महत्त्व नहीं है किन्तु कालान्तर में ये दोनों स्थान मिशनरी शिक्षा के प्रमुख केन्द्र बन गये। इस दिशा में डेनमार्क वासियों का कार्य काफी सफल रहा। इन दोनों स्थानों पर दो जर्मन मिशनरियों ने शिक्षण कार्य किया। उन्होंने बाइबिल का तमिल भाषा में अनुवाद किया। तमिल भाषा का व्याकरण और कोष बनाये तथा एक छापाखाना स्थापित किया। उन्होंने अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए ट्रेनिंग स्कूल खोले। डेनमार्क वासियों का अन्य केन्द्र बंगाल का सेरामपुर (श्रीरामपुर) बेप्टिस्ट मिशनरियों का प्रमुख कार्य क्षेत्र बन गया।
    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आरम्भिक शैक्षणिक कार्य

    दिसम्बर 1600 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई। अन्य यूरोपीय कम्पनियों की भांति इसने भी भारत में अपनी कोठियां बनाईं जहाँ काफी संख्या में अँग्रेज व्यापारी तथा कम्पनी के कर्मचारी बस गये। उनकी धार्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कम्पनी ने इंग्लैण्ड से कुछ पादरी भारत भेजे। इन पादरियों ने कम्पनी के अँग्रेज कर्मचारियों की धार्मिक क्रियाओं सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति करने के साथ-साथ कम्पनी के भारतीय कर्मचारियों को ईसाई बनाना प्रारम्भ किया।

    नये बनाये गये ईसाइयों तथा कम्पनी के अँग्रेज कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा के लिए कम्पनी ने कई स्कूल खोले। 1698 ई. में इंग्लैण्ड की संसद ने कम्पनी को निर्देशित किया कि कम्पनी अपने प्रत्येक कारखाने पर एक पादरी तथा 500 टन या इससे अधिक वजनी जहाज पर एक चैपलेन (धर्मगुरु) नियुक्त करे। कम्पनी सैनिक स्थानों तथा कारखानों के पास स्कूल खोले। इस आदेश से कम्पनी को धर्म-प्रचार करने तथा स्कूल खोलने के अधिकार मिल गये। इसके बाद कम्पनी ने 1715 ई. में मद्रास, 1718 ई. में बम्बई और 1731 ई. में कलकत्ता में स्कूल स्थापित किये।

    बक्सर विजय के बाद 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मालगुजारी वसूल करने के दीवानी अधिकार प्राप्त हुए। इससे कम्पनी एक राजनैतिक शक्ति बन गई। अब तक कम्पनी ने अँग्रेज और एंग्लो-इण्डियन कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा की ओर ही ध्यान दिया था किन्तु 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज के गवर्नर जनरल बनने के बाद कम्पनी ने भारतीय बच्चों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया।

    1781 ई. में कलकत्ता में एक मदरसा स्थापित किया गया जिसमें अरबी तथा फारसी के अध्ययन की व्यवस्था की गई। इस मदरसे को खोलने का उद्देश्य मुस्लिम भद्र समाज के युवकों को कम्पनी में नौकरी करने योग्य बनाना था। 1791 ई. में हिन्दू कुलीनों के पुत्रों को पढ़ाने के लिये बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई। इसमें संस्कृत भाषा के साथ-साथ हिन्दू विधि, साहित्य एवं धर्म का अध्यापन किया जाता था। ईसाई मिशनरी भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्कूल खोलकर भारतीय बच्चों को शिक्षा दे रहे थे। उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा में पश्चिमी दर्शन, अध्यात्म, नैतिकता, तर्कशास्त्र तथा अँग्रेजी भाषा सम्मिलित थी। 1784 ई. में सर विलियम जॉन ने बंगाल एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। जॉन ओवन ने बंगाल में स्कूल स्थापित किया जिसमें अँग्रेजी पढ़ाने का प्रावधान किया गया। 1800 ई. में लॉर्ड वेलेजली ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज स्थापित किया। इसमें कम्पनी के अधिकारियों को भारतीय भाषाओं एवं रीति-रिवाजों का प्रशिक्षण दिया जाता था।
    ईसाई धर्म और पश्चिमी शिक्षा का जुड़ाव


    1792 ई. में चार्ल्स ग्रांट ने इंग्लैण्ड में प्रकाशित अपनी पुस्तक ऑब्जर्वेशन्स ऑन दी स्टेट ऑफ सोसाइटी एमोंग दी एशियाटिक सबजेक्ट्स में इस बात पर बल दिया कि भारत में ईसाई धर्म और पश्चिमी ज्ञान के प्रसार के लिए स्कूल स्थापित किये जायें। 1793 ई. में जिस समय इंग्लैण्ड की संसद में कम्पनी के अनुज्ञा-पत्र के नवीनीकरण पर विचार चल रहा था, उस समय बिशप विल्बर फोर्स ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स सदन में प्रस्ताव रखा कि कम्पनी के डायरेक्टरों को भारत में ईसाई धर्म-प्रचार के लिए मिशनरी भेजने का अधिकार दिया जाये। इस प्रस्ताव का संसद में घोर विरोध हुआ और यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका किन्तु इंग्लैण्ड में यह विचार जोर पकड़ने लगा कि कम्पनी को भारतीयों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ब्रिटिश संसद ने इस बात को स्वीकार कर लिया तथा 1813 ई. के चार्टर एक्ट में भारतीयों की शिक्षा के लिए एक लाख रुपये वार्षिक व्यय का प्रावधान रखा।
    पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण (1813-1853 ई.)

    1813 ई. का चार्टर एक्ट भारतीय शिक्षा के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ है। क्योंकि अब कम्पनी ने भारतीयों की शिक्षा को अपने कर्त्तव्यों में सम्मिलित कर लिया था। इसके बाद ईसाई मिशनरी अधिक-से अधिक संख्या में स्कूल खोलने के लिए भारत आने लगे। 1813 ई. के चार्टर एक्ट से भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में तीव्र विवाद उठ खड़े हुए क्योंकि एक्ट में बहुत ही अस्पष्ट भाषा का प्रयोग किया गया था। एक्ट द्वारा निर्धारित धनराशि किस प्रकार खर्च की जायेगी इसे स्पष्ट नहीं किया गया था। एक्ट में केवल शिक्षा नीति के उद्देश्यों का उल्लेख था।

    ये उद्देश्य इस प्रकार थे- (1.) साहित्य का पुनरुद्धार और उन्नति। (2.) भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहन। (3.) ब्रिटिश भारत की जनता में विज्ञान की स्थापना तथा वृद्धि।

    इस एक्ट को लेकर जो प्रश्न उठ खड़े हुए वे थे, वे इस प्रकार थे- (1.) शिक्षा नीति के उद्देश्यों की भावना क्या है? (2.) शिक्षा का माध्यम क्या होगा? (3.) शिक्षा संस्थाओं की व्यवस्था करने वाली एजेन्सियां कौनसी होंगी? (4.) सर्व-साधारण में शिक्षा के प्रचार के तरीके क्या होंगे? इन चारों प्रश्नों पर कम्पनी के उच्चाधिकारियों में तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गये। सबसे तीव्र मतभेद शिक्षा के माध्यम को लेकर था।

    इस प्रश्न पर तीन विचारधाराएं सामने आईं- (1.) कम्पनी के पुराने कर्मचारी संस्कृत और अरबी भाषाओं के अध्ययन पर बल देते थे। उनकी मान्यता थी कि पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का ज्ञान इन भाषाओं के माध्यम से दिया जा सकता है। (2.) मुनरो और एलफिंस्टन, आधुनिक भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा देने के पक्ष में थे। उनकी मान्यता थी कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के माध्यम से पश्चिमी ज्ञान जनता तक पहुँचाया जा सकता है। (3.) चार्ल्स ग्रान्ट तथा उसके अनुयायी यह मानते थे कि पश्चिमी ज्ञान को सुचारू रूप देने के लिए अँग्रेजी ही सबसे प्रभावशाली माध्यम है। इस विचारधारा के समर्थक ईसाई मिशनरी और कम्पनी के नवयुवक कर्मचारी थे। लॉर्ड मैकाले के भारत में आने के बाद यह विचारधारा काफी मजबूत हो गई। अगले बीस वर्षों तक कम्पनी के उच्चाधिकारी इन्हीं विवादों में उलझे रहे।

    1833 ई. का चार्टर एक्ट

    1833 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में कम्पनी के व्यापार का एकाधिकार समाप्त करके भारत के दरवाजे निजी व्यापारियों के लिये खोल दिये गये। इसका लाभ ईसाई मिशनरियों ने भी उठाया। उन्होंने शिक्षा की आड़ में, ईसाई धर्म के प्रचार का काम तेजी से आगे बढ़ाया।

    लॉर्ड मैकाले के विचार

    फरवरी 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपना प्रसिद्ध विचार-पत्र लिखा जिसमें उसने भारतीय साहित्य दर्शन एवं ज्ञान के विरुद्ध तथा पश्चिमी ज्ञान एवं अँग्रेजी भाषा के पक्ष में अनोखे तर्क दिये। उसने विज्ञान की शिक्षा देने के लिए अँग्रेजी माध्यम का प्रबल समर्थन किया। उसकी दृष्टि में देशी भाषाओं में साहित्यिक तथा वैज्ञानिक शिक्षा देने की क्षमता नहीं थी। उसने संस्कृत और अरबी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने का विरोध किया। अँग्रेजी भाषा का गुणगान करते हुए उसने लिखा- 'अँग्रेजी भाषा में जो साहित्य अब तक उपलब्घ है वह तीन सौ वर्ष के सम्पूर्ण विश्व की समस्त भाषाओं में उपलब्ध साहित्य से अधिक मूल्यवान है।'

    मैकाले के अनुसार यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की अलमारी का एक खाना संस्कृत और अरबी के सम्पूर्ण देशी साहित्य के बराबर था। मैकाले ने भारतीय आयुर्विज्ञान, ज्योतिष, इतिहास और भूगोल पर करारा प्रहार करते हुए लिखा- 'आयुर्विज्ञान के सिद्धान्त जो एक अँग्रेज नालबन्द का अपमान करेंगे, ज्योतिष शास्त्र जो एक अँग्रेजी बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों में हँसी पैदा करेगा, इतिहास जिसमें तीस फुट ऊँचे बादशाह और तीस हजार वर्ष लम्बा शासन काल होगा, भूगोल जिसमें घी-दूध के समुद्र होंगे; इन सबको हम सरकारी खर्च पर प्रोत्साहन देंगे।'

    गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-1835 ई.) ने मैकाले के विचारों से सहमति प्रकट की। 1834 ई. में बैंटिक ने मैकाले की अध्यक्षता मंल एक समिति गठित की जिसकी कार्यवाही का विवरण 2 फरवरी 1835 को जारी हुआ। यह आधुनिक भारतीय शिक्षा का महत्त्वपूर्ण घोषणापत्र था। इसे भारतीय शिक्षा के मील के पत्थर के रूप में भी जाना जाता है।

    इस घोषणा पत्र से चार बातें प्रमुख रूप से उभर कर सामने आईं- (1.) भारतीय भाषा, साहित्य, दर्शन, विज्ञान एवं ज्ञान हर तरह से बौना है। (2.) पश्चिमी भाषा एवं ज्ञान की सर्वश्रेष्ठता निश्चित है। (3.) भारत में शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी होना चाहिये। (4.) भारत की विशाल जनसंख्या को सरकारी संसाधनों से शिक्षा नहीं दी जा सकती। इसलिये शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

    विलियम बैंटिक ने 7 मार्च 1835 को एक आदेश जारी करके कहा कि ब्रिटिश सरकार का महान उद्देश्य भारतीयों में यूरोपीय साहित्य और विज्ञान को प्रोत्साहन देना है। शिक्षा पर व्यय की जाने वाली राशि केवल अँग्रेजी शिक्षा पर ही खर्च की जानी चाहिए। बैंटिक ने भारत में नियमित शिक्षण व्यवस्था के विकास में बहुत रुचि दिखाई।

    लॉर्ड मैकाले की देन

    भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में मैकाले की देन के विषय पर विद्वानों में भारी मतभेद है। कुछ उसे उन्नति के मार्ग का मशाल वाहक मानते हैं तो कुछ उसे अँग्रेजी शिक्षा के विस्तार के कारण भारत में उत्पन्न होने वाले असन्तोष और राजनीतिक अशान्ति के लिए उत्तरदायी मानते हैं। कुछ विद्वान भारतीय भाषाओं, संस्कृति और धर्म के बारे में उसकी अज्ञानता की कटु आलोचना करते हुए उसे निन्दनीय मानते हैं तो कुछ उसे भारतीय भाषाओं की अवहेलना के लिए दोषी ठहराते हैं। मैकाले को उन्नति के मार्ग का मशाल-वाहक कहना, उसकी अतिश्योक्तिपूर्ण प्रशंसा करना है। मैकाले द्वारा भारतीय साहित्य और धर्म की अनर्गल आलोचना करना तथा उसका मखौल उड़ाना वास्तव में निन्दनीय है। भारत में अँग्रेजी शासकों ने उसके इस सिद्धान्त का अक्षरंशः पालन किया कि- 'यदि किसी देश को दास रखना है तो उसके साहित्य और संस्कृति का विनाश कर देना चाहिये।'

    उपरोक्त दोषों के होते हुए यह भी सत्य है कि जिस पश्चिमी ज्ञान का मैकाले ने समर्थन किया उस पश्चिमी ज्ञान ने भारत को लाभ भी पहुँचाया। नये ज्ञान और शिक्षा ने भारत में एकता स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिमी देशों में होने वाले वैज्ञानिक अनुसन्धानों तथा उपलब्धियों से भारतीयों को परिचित करवाया और भारतीय भाषाओं के विकास में योगदान दिया जिसके फलस्वरूप इन भाषाओं में से कुछ को आगे चलकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा देने योग्य बनाया जा सका।

    लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1835 ई. के निर्णय द्वारा भारत में शिक्षा के मूल उद्देश्य और माध्यम को लेकर चल रहे विवाद का समाधान करने का प्रयत्न किया, फिर भी यह विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अगले गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड ने नवम्बर 1839 में एक आदेश द्वारा इस विवाद को पूरी तरह से समाप्त किया। उसने शिक्षा पर खर्च की जाने वाली धनराशि को बढ़ा दिया तथा यह आदेश भी दिया कि समाज के वरिष्ठ वर्ग को उच्च शिक्षा दी जाए ताकि यह वर्ग अपनी संस्कृति तथा ज्ञान को जन-साधारण तक पहुँचा सके। यह नीति ऊपर से नीचे की ओर शिक्षा-प्रसार के प्रसिद्ध सिद्धान्त पर आधारित थी। 1844 ई. में कम्पनी सरकार ने एक प्रस्ताव पारित करके स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरियों में उन्हीं लोगों को प्राथमिकता दी जायेगी जो पश्चिमी ज्ञान और अँग्रेजी भाषा जानते होंगे।

    1813 ई. से 1853 ई. तक की अवधि में ब्रिटिश प्रान्तों तथा राजपूताना राज्यों में हुए शिक्षा विस्तार का विवरण इस प्रकार से है-

    (1.) बंगाल: ब्रिटिश संसद द्वारा 1813 ई. का चार्टर एक्ट पारित किये जाने के बाद, 1817 ई. में कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी तथा कलकत्ता हिन्दू कॉलेज की स्थापना हुई। 1819 ई. में कलकत्ता स्कूल सोसाइटी स्थापित की गई। इन दोनों सोसाइटियों ने कलकत्ता तथा बंगाल के अन्य स्थानों पर सैकड़ों प्राथमिक स्कूल खोले, जिनके द्वारा शिक्षा का काफी प्रसार हुआ। 1823 ई. में गवर्नर जनरल के आदेश से जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन नाम से एक केन्द्रीय समिति स्थापित की गई। संस्कृत के महान् विद्वान विल्सन को इसका सचिव बनाया गया।

    (2.) बम्बई: बम्बई में भी 1815 ई. में सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग दी एजुकेशन ऑफ द पूअर नामक समिति स्थापित की गई। आगे चलकर इस सोसाइटी का नाम बॉम्बे एज्यूकेशन सोसाइटी कर दिया गया। बॉम्बे नेटिव एज्यूकेशन सोसाइटी की भी स्थापना हुई। इन सोसाइटियों ने बम्बई, पूना आदि नगरों में अनेक स्कूल और कॉलेज खोलकर शिक्षा का प्रसार किया।

    (3.) मद्रास: मद्रास में भी मद्रास स्कूल सोसाइटी तथा कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन नामक संस्थाएं स्थापित हुईं जिन्होंने मद्रास में शिक्षा प्रसार का सराहनीय कार्य किया। शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नॉर्मल स्कूलों की स्थापना करना, इन सोसाइटियों का महत्त्वपूर्ण कार्य था। इस प्रकार तीनों ब्रिटिश प्रेसीडेन्सियों में, शिक्षा प्रसार के लिए अनेक सोसाइटियों की स्थापना हुई।

    (4.) उत्तर-पश्चिमी प्रान्त: उत्तर-पश्चिमी प्रान्त का लेफ्टिनेन्ट गवर्नर जेम्स थॉमसन शिक्षा प्रसार के कार्य में बड़ी रुचि लेता था। उसने निर्णय लिया कि शिक्षा अँग्रेजी माध्यम की बजाय, मातृभाषा में दी जाये। उसने शिक्षा-प्रसार की एक विशद् योजना बनाकर केन्द्र सरकार से स्वीकृत करवाई। परम्परागत देशी शालाओं का सुधार और उनमें राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति की स्थापना, इस योजना की मुख्य विशेषता थी। यह योजना परीक्षण के तौर उत्तर-पश्चिमी प्रान्त के आठ जिलों में लागू की गई। तत्पश्चात् प्रान्त के अन्य जिलों में भी प्राथमिक स्कूलों की स्थापना की गई। इन स्कूलों के संचालन के लिए शिक्षा विभाग की स्थापना की गई जिसके अंतर्गत प्रत्येक दो या अधिक तहसीली स्कूलों के निरीक्षण के लिए एक परगना विजिटर नियुक्त किया गया। उसके ऊपर प्रत्येक जिले के लिए एक जिला विजिटर और उसके ऊपर सम्पूर्ण प्रान्त के लिए विजिटर-जनरल नियुक्त किया गया। ये पद ही आगे चलकर सर्किल इन्सपेक्टर, डिस्ट्रिक्ट इन्सपेक्टर और डायरेक्टर ऑफ पब्लिक एज्यूकेशन कहलाए। बाद में यह शिक्षा योजना, बंगाल एवं बिहार में भी लागू कर दी गई।

    (5.) पंजाब: 1849 ई. में पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय करने के बाद पंजाब के नये प्रान्त की स्थापना हुई थी। उस समय पंजाब में हिन्दू, सिक्ख और मुसलमानों द्वारा बहुत सी प्राथमिक स्कूलें चलाई जा रही थीं। ये स्कूल- मन्दिर, मस्जिद या गुरुद्वारों से सम्बद्ध होते थे। इनमें से कुछ में लड़कियों को भी शिक्षा जाती थी किन्तु बहुत ही कम लड़कियां शिक्षा प्राप्त करती थीं। 1849 ई. के बाद सरकार ने अमृतसर में एक स्कूल खोला जिसमें अन्य विषयों के साथ-साथ अँग्रेजी भी पढ़ाई जाती थी। इसके बाद 1853 ई. तक वहाँ कोई सरकारी स्कूल नहीं खोला गया।

    (6.) राजपूताना: लॉर्ड हेस्टिंग्ज के समय 1818 ई. में राजपूताना की प्रायः समस्त रियासतों के साथ अँग्रेजों ने सहायक सन्धियां कीं। राजपूताना की सैनिक परम्पराओं के कारण लॉर्ड हेस्टिंग्ज का राजपूताना से विशेष लगाव था। उसने सेरामपुर (बंगाल) के प्रसिद्ध ईसाई पादरी विलियम कैरे के पुत्र जबेज कैरे को राजपूताने में शिक्षा-प्रसार के लिए भेजा और उसे शिक्षा अधीक्षक के पद पर नियुक्त किया। 1819 ई. में उसने अजमेर पहुँच कर एक स्कूल की स्थापना की। तत्पश्चात् उसने पुष्कर में भी एक स्कूल खोला। अगले तीन वर्षों में उसने भिनाय और केकड़ी में भी स्कूल खोले किन्तु जबेज इन स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा देने लगा तो लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने उसे फटकारा। इन स्कूलों की विशेष प्रगति न देखकर 1827 ई. में इन्हें बन्द करके केवल अजमेर का स्कूल चालू रखा। 1831 ई. में उसे भी बन्द कर दिया गया।

    इस प्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने में शिक्षा प्रसार का प्रथम प्रयास लगभग असफल रहा। 1836 ई. में कम्पनी ने पुनः अजमेर में एक स्कूल खोला। उसे भी जनवरी 1843 में बन्द कर देना पड़ा। 1851 ई. में अजमेर में पुनः एक स्कूल खोला। तब से अजमेर में निरन्तर शिक्षा की प्रगति होती रही। राजस्थान की अन्य रियासतों में भी वहाँ के ब्रिटिश पोलीटिकल एजेन्टों के प्रयत्न से कुछ स्कूल खोले गये। 1842 ई. में अलवर तथा भरतपुर और 1844 ई. में जयपुर में प्रथम आधुनिक स्कूल खोला गया।

    तकनीकी शिक्षा

    1833 ई. से 1853 ई. की अवधि में भारत में स्त्रियों तथा मुसलमानों की शिक्षा के लिए कुछ प्रयत्न किये गये किन्तु उनका कोई ठोस परिणाम नहीं आया। इस अवधि में मेडिकल, इन्जीनीयरिंग तथा अन्य तकनीकी शिक्षा के लिए भी कुछ कदम उठाये गये। 1835 ई. में कलकत्ता और मद्रास में तथा 1845 ई. में बम्बई में मेडिकल कॉलेज खोले गये। 1846-47 ई. में अजमेर में भी मेडिकल स्कूल खोलने का प्रयास किया गया किन्तु यह प्रयास सफल नहीं हुआ। 1847 ई. में रुड़की में भारत का प्रथम इन्जीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया गया। 1850 ई. में मद्रास में एक औद्योगिक तथा व्यवसायिक स्कूल स्थापित किया गया।


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  • Forts and Palaces of Marwar

     21.08.2017
    Forts and Palaces of Marwar

    Cunstruction of Palacial Buildings in Marwar Region




    Marwar was a principality in Thar desert, established by Rathore rajputs in 14th century. A huge number of forts and palaces were built by the Rathore rulers but Many of those were already in existance in this region before the rise of Rathores. Naga rulers built Mandore and Nagaur forts. Pratiharas built Jalore fort. Chouhans constructed the fort of Siwana. The forts at Mehrangarh, Kuchawan, Bhadrajun, Malkot, Phalodi, Bhopalgarh, Rohat, Sojat, Bali, Jaitaran, Agewa, Kilon, Auwa, Pokhran etc. were built by Rathores. All these forts were good examples of military architecture.

    Early rajputs have their own style of constructing the palacial buildings but With the coming of the Muslims into power in this area, architecture of this land also assumed Indo-Islamic character finding expression in forts, citadels and palaces. Though their builders were Hindus, they liberally borrowed the structural features from Muslim buildings. No doubt, the builders in Marwar started following the Muslim features in their creations; yet the architectural art was essentially Hindu in spirit till the early years of the fifteenth century. Slowly and gradually, in the subsequent three to four centuries this art in Marwar came under the influence of Pathan and Mughal art. The Pathan and Mughal influences led to the assimilation in the field of architecture. The chief characteristic of this new style was the mystic spirit of unreality, especially in the fairy-like aspect of the cool white marble, with its glittering incrustations of mother-of-pearl and precious stones.

    Maharaja Sawai Jai Singh of Jaipur borrowed Aurangzeb's Baroque Style when he built the pink city of Jaipur as a new capital for his kingdom and he was soon followed by the States of Jodhpur and Udaipur. Therefore, the Baroque-Mughal style got itself blended with the Rocco style. The Chief characteristic of this late Rajasthan architecture is its 'musicality'- the structure of the buildings is almost lost behind the rich play of forms, of light and shadow and of colours.




    Forts of Marwar Region




    In India, maximum forts are situated in Maharashtra, Madhya Pradesh and Rajasthan. There are 656 forts in Maharashtra, 330forts in Madhya Pradesh and 250in Rajasthan. In ancient and medieval period, the popular and shorter route from Delhi to Somnath was via Marwar. So invaders like Mahmood Ghazni, Muhammad Gouri, Kutub-ud-din Aibak, Ala-ud-din Khilzi etc. when attacked Gujrat or Somnath, they adopted this route. Military strategy dictated that fortifications be raised on an elevated spot. So rulers of this area built a strong chain of forts and fortresses. The prominent forts were- Nagaur, Kuchawan, Maroth and Malkot (Nagaur distrct), Mehrangarh, Phalodi and Bhopalgarh (Jodhpur district), Rohtas, Nadole and Bali (pali district), Sonalgarh, Bhadrajun, Ratanpur, Lohiyana and Sancore (Jalore district), Siwana (Barmer district), Pokran (Jaisalmer district). Many of these forts, like Ratanpur and Sanchore forts were completely diminished by enemies. Umarkot was also a prominent fort of Marwar principality but East India Company took over its management and in 1947, this fort was transferrsd to Pakistan. These forts were used for the safety of not only royal families but the public also. A Large number of soldiers and artillery were kept here for whole year. When Marwar state had a treaty of subsidiary alliance with East India Company and later on when aircrafts came into existence, the forts did not remain safe. So the construction of the forts and fortresses was stopped and the royal families started building their palaces and havelis in outer areas.

    Forts of Ancient period

    Mandore Fort :

    This town was in existance in the 4th century A.D. Some names of individuals are engraved in two or three places near the cave of Nahadrao in characters of early Gupta period. According to a stone inscription of V.S. 894, Mandore was originally ruled by Naga rulers. Later on Gupta rulers conquered this fort and they also did some constructions in the campus of the fort. There was a fort when the town was taken into possession by the Pratiharas in the 6th century A.D. Bhogbhatta, Kakka, Rajjil and Dadda, the four sons of Pratihar Harishchandra constructed a wall around it. The place is of great historical interest from having been the capital of the Parihars till 1381 A.D., when it was wrested from them by Rao Chunda, and subsequently the seat of government of the Rathore Rajputs till 1459 A.D., when Mehranghrh fort and Jodhpur city were founded. The fort of Mandore was built by a Buddhist architect but now in ruins, contains a low and dark pillared chamber, in which is found the sculptured effigy of Nahar Rao, a famous Parihar chief. The two inscriptions of the time of Kakkuk brother of Bahuk from Ghatiyala (twenty miles north of Jodhpur) reveal that the son of Pratihar ruler Harishchandra built the boundary wall at Mandore after possession over it. Nag Bhalta built a temple of Nahadswami at Mandore fort. The elder son of Nahad sacrificed the whole domain, gifted it to the younger brothers and underwent penances at Mandore.

    Nagaur Fort :

    According to Dodwell, Nagaur fort was built by black Naga rulers in 2nd century A.D. Initially it was a mud fort. The town is said to take its name from its traditional founders, the Naga Rajputs. From the 7th century A.D., it was probably governed by Chauhans and was held succes¬sively by Prithvi Raj Chauhan, Muhammad Ghori, and the chiefs of Jodhpur, save for a time when it was possessed by the Bikaner chief by grant from Akbar, and by another Rathore family by grant from Shah Jahan. The fort, rising above the town, has a double wall nearly a mile long, the outer being 25 feet and the inner 50 feet above the ground, with a thickness of more than 30 feet at the base and about 12 feet at the top. The principal objects of interest in the fort are some palaces, a fountain with seventeen jets (dating from Akbars reign), a mosque erected by Shah Jahan, and a cave claimed by both Hindus and Musalmans as a place of retreat for their former saints.

    Jalore Fort :

    From Kuvlayamala, it is clear that in the 8th century A.D., Jalore was a flourishing town adorned with temples and buildings of rich men. It was ruled at this time by the Pratihar ruler Vatsraja. On a hill to the south and entirely commanding the town stands the fort, one of the most famous in Rajputana. Built by the Parihars of Mandore, its walls, composed of huge masses of cut stone, remain even now in a perfect state of preservation, although the place has been many times besieged. The fort is about 800 by 400 yards in extent, and accessible only by an ascent of 3 miles up a steep and slippery stone roadway, passing three distinct lines of defence, all of considerable strength. After the fall of Parihar empire, Jalore fort was held by the Paramaras till towards the end of the twelfth century, when the Chauhan Rao Kirthi Pal (of Nadol) took it and made it his capital. His grandson Udai Singh surrendered it to Shams-ud-dm Altamsh about 1210 A.D., but it was immediately restored to him. About 100 years later, Ala-ud-din Khilzi, after a lengthy siege, captured it from Kanhaddeo Chauhan, and a three-domed mosque, said to have been built by him, is still in good repair and daily use. About 1540 the fort passed into the possession of Raja Maldeo of Jodhpur. It remained in the hands of his ascendants till the independence. In the end of 18th century prince Mansingh of Jodhpur took shelter in this fort. Some buildings of that period still can be seen in the fort premise.

    Siwana Fort :

    This fort was built by Veer Narayana, the Parmara prince of king Bhoja in V.S. 1011 (954 A.D.). He called it "Kumthana". In 12th century A.D., Chauhans of Nadole won Jalore and later on they took possession of Siwana also. In 14th century, Sataldeo, the nephew of king Kanhaddeo of Jalore, was ruling over this fort. According to Kanhaddeo Prabandha, when Ala-ud-din Khilzi, the ruler of Delhi sultanate, headed towards Jalore, Sataldeo came forward and challenged him to attack on Siwana first and then go to Jalore. Ala-ud-din Khilzi changed his route and accepted the challenge to attack Siwana. Sataldeo was a brave warrior and he fought with full zeal against Khilzi. After a long and fierce fight Ala-ud-din Khilzi defeated Sataldeo. Khilzi changed the fort's name and thus "Kumthana" became "Siwana". Ptolemy, in his book "Geograpy" has mentioned about a desert city "Zoana", this is actually siwana. This city was situated in a hilly fort. In medieval period this fort remained under Rathore rulers of Jodhpur. In Tarikh-E-Alai, Ala-ud-din Khilzi decribes that Siwana was situated in horrible forest which was full of wild men who usually plundered the travelers. The fort of Siwana was located on a hilltop in which Sataldev lived like a Simurg and thousands of his nobles were doing his security.

    Forts of Medieval period

    Rathore rulers of Marwar and their nobles built many forts in Marwar during medieval period. The forts at Jodhpur, Bhadrajun, Bhopalgarh, Phalodi, Maroth and Kuchaman were prominent among them. The forts of Bhadrajun, Bhopalgarh, Maroth, Bali and Rohat were small in size. In 17th century, prince Akbar and princess Safiyat-Un-Nisa of Mugal empreror Aurangzeb were kept for some time in Rohat fort by Veer Durgadas Rathore. Lohiyana fort was destroyed by Jaswantsingh II of Jodhpur as the Thakur of Lohiyana became rebellious against the ruler of Jodhpur. In 1752 A.D., Phalodi fort was completely diminished by Maharaja Vijay Singh of Jodhpur to crush the rebellious Rathore noble Jogidas. It might have rebuilt during 18th century as Phalodi was an important cener for salt producing and it was situated at Jaisalmer State's border.

    Meherangarh Fort

    Jodhpur was capital of the state of Marwar. Dominating the city is Meherangarh, one of Rajasthan's great hilltop forts.Meherangarh appears impregnable, and with good reason. The fort stands out in great magnificence on an isolated rock about 400 ft. above the sandy plains. It is one of the most gigantic and majestic fort of erstwhile princely states enclosing within it oblong space of about 500 yards in width. This enclosure is almost completely covered by palaces, bar-racks and magazines. The height of its walls varies from 20 ft. to 112 ft. Seven barriers are thrown across its circuitous ascent, each having eminent portals and their sepa¬rate guards. There is no access to the ramparts, apart from one entrance of seven successive gateways, each with its own protective devices for the defence of the fort. The strength of the fort's massive walls, and of its gateways, are in direct contrast to delicately lovely residential buildings within. They feature few of the refinements of inlay and wall painting that are evident in states where there was more time for leisure and the pursuit of aesthetics.

    Nevertheless, Meherangarh has its own architectural drama, such as brilliant stained glass that creates colourful mosaics on the floors with the passage of the sun through the day. Meherangarh is the example of the most extensive fort ever built in Marwar. Rao Jodha got it constructed. Foundation of the fort was laid down by famous Charan Devi Kaniji on 12th May 1459. The Fort is surrounded by a wall 12 to 17 feet wide and 20 to 150 feet high. Maximum width of the Fort is 750 feet and length 1500 feet. This magnificient fort on a 400 feet high hill can be seen from a great distance.

    It is said that when the sky becomes clear after rains, Mehrangarh can be seen from Jalore Fort. According to astrology, the name of this fort is Chintamani but it was famous as Mihirgarh. Mihir means Sun and garh means fort. This Mihirgarh has now changed to Mehrangarh. Because it's shape is like that of a peacock's tail, it is also called Mayur Dhwaj Fort.The fort encloses the Palace, gates, temples, artillery, memorials, armoury etc. During Jodha's reign the area under the Fort was called Jodhaji ka Falsa. The construction of the front part of Loha pole (Gate) started in 1548 A.D. during Rao Maldeo's reign and was finished in 1752 A.D. during Maharaja Vijai Singh's reign. The walls of this gate have imprints of Sati Hands.Jai Pole is Located in the North West of the Fort, this gate was constructed by Raja Mansingh in 1806 A.D. in the memory of winning a battle against Jaipur. The Iron Gate fixed in this pole was brought by Udawat Amar Singh, Thakur of Nimbaj in 1730 A.D., from Ahmedabad during the reign of Maharaja Abhay Singh. Maharaja Man Singh fixed it in Jai Pole.In memory of winning the battle with Mugals, Fateh Pole was made by Maharaja Ajit Singh in 1707 A.D. Between Fateh Pole and Palace there are six other gates called Gopal Pole, Bheron Pole, Amrit Pole, Dhruv Pole, Loha Pole and Suraj Pole. Important buildings inside the fort are the Motimahal, Fatehmahal, Phoolmahal, Sringarmahal and the temples of Chamunda, Murlimanohar and Anand-ghan.

    Kuchawan Fort :

    Kuchawan was a head-quarter of a jagir estate of the earstwhile State of Jodhpur. A strong and well-built fort containing 18 Towers (Burj), several palatial buildings, temples and water reserviors was built by Rathore nobels on a hilltop near the town. The Thakurs of Kuchawan belongd to the Mertia sept of Rathore Rajputs, In state time a mint was established in this fort where silver coins were casted. The one rupee silver coin was known as Kuchawani rupia. In Jodhpur state, only Kuchawan Thakur among the nobels could issue currency.




    Palaces Of Marwar Region



    In times of peace, the rulers of Marwar built delicate palaces, incorporating the best from Rajput, Mughal and British architecture. These buildings are splen¬didly handsome, as Umaid Bhawan Palace in Jodhpur is, or exquis¬itely pretty, such as the Sheesh Mahal in Mehrangarh fort. Rarely has the world seen such thoughtful divisions of space as exists in Jodhpur. The palaces had to suit the dual lifestyle of the royals. They had to function as modern residences, as well as traditional Indian style palaces in which it was essential that there be separate women's quarters and corridors through which women could move from one area to another in privacy. Though the maharajas also built separate summer residences, the main palace almost inevitably had a room designed so that breeze flowed freely through it, where the royals could relax on a hot summer afternoon in the comfort of perfumed, cooling breezes. While later palaces had grand, sweeping staircases in the best Continental tradition, and were surrounded by open gardens, many of the earlier palaces were built within fortified walls and characterised by narrow staircases and unimpressive entrances to the royal apartments.

    A large number of luxurious palaces were built in the 19th and early 20th century for a variety of reasons. Jodhpur's Umaid Bhawan Palace was built to provide employment during a terrible famine.It was not just the architecture of the palaces that was spectacular; their furnishings also set them apart from other grand residences. Elaborate architectural motifs were picked out in window screens, pavilions, balconies, cupolas and turrets. Inside the palaces, French tapestry, French and English furniture, Belgian suites and Bohemian crystal chandeliers were used to create the world's richest homes. The look could be formal, or art deco. Often, sadly, it was eccentric because the royals shopped indiscriminately and shipped back everything that caught their fancy in Europe and England. Faberge eggs sat beside onyx lamps, and the Swiss watch industry worked overtime to keep royal households supplied with a clock for each mantelpiece, and there were often more than a hundred! Carpets worth small fortunes were casually flung in the halls, on staircases, and in cars. Silver and gold appointments in certain palace suites were common. In the ballroom, wood floors were provided for Western ballroom dancing. Those halls in which traditional mujras were staged were heavily carpeted. Inevitably too, trophies of hunts graced dining rooms and billiard rooms, and the maharaja's study.

    Palaces in Mehrangarh Fort :

    The palaces in Mehrangarh fort were built in an informal pattern over several centuries. They follow their own rhythm, with narrow staircases serving as the only means of access to the royal residences. The maze of buildings would have made it difficult for any invader to discover the right route to the innermost apartments, and this acted, therefore, as a defence, an essential element since Jodhpur was often at war! Main palaces at Meherangarh include Moti Mahal, the pearl palace, with its pierced stone screens and Shringar Chowki where coronation ceremonies were held. The Shringar Chowki was constructed during Maharaja Vijay Singh's reign. Jhanki Mahal in the women's area has a view of the public areas so that the royal women could watch the day's proceedings. Chandan Mahal was a hall of private audience in which affairs of state were discussed by the luminaries of the state. Rang Mahal is a pleasure palace, the Durbar Takht throne room contains an octagonal gaddi upon which the maharaja sat in state. The sheesh mahal was formerly a house of worship. The palaces have beautiful carved panels and perforated screens of red stone.

    Umaid Bhavan Palace :

    Umaid Bhavan Palace is built of pink Chheetar stone. The palace rises above the surrounding landscape, towering above the city in regal isolation, on its own hill.The 20th century Umaid Bhawan Palace was built in a time of peace and is open and Western in its design. Maharaja Umaid Singh hired an English engineer, H. V. Lanchester to design his new palace. Lanchester brought with him the heavy civic style of building to which he was accustomed. The building is located on Chheetar Hill. A special rail line was laid to transport building materials to the site. Slowly the great domes rose in royal splendour above the sur-rounding plain. Its builder and the architect had only one ambition: when complete, it was to rival the Viceroy's Palace in New Delhi, then also under construction. Under a dome, the like of which no other palace in Rajasthan has, Umaid Bhavan Palace contains over 300 rooms. It has its own theatre, eight dining rooms, and a banquet hall which seats three hundred people. A Ball Room catered to the westernised royal life-style. Much of the interior of the palace is in the art deco style. In fact it is said to be one of the finest surviving examples of art deco in the world. In the luxurious suites designed for the maharaja and maharani, Indian themes were painted by European artists. Entire baths were carved out of single blocks of marble. Deep within the bowels of the palace is an indoor swimming pool, with a mosaic of zodiac symbols.The royal family is still in residence in the palace, but so huge is the building that it also houses a magnificent museum and an impressive hotel.

    Palaces on Foot hills :

    Sawai Maharaja Sur Singh made a palace on a big rock in the plains of Mehrangarh. This palace can still be seen on the road between Ada Bazar and Juni Dhan Mandi. Sur Singh had made this palace for his queen Saubhagya Devi. Later this palace became the residence of widows of the royal family. The treasury and families of Maharaja Man Singh and Jaswant Singh II were also kept here. A tunnel was made from Fateh Pole at the fort to this palace passing Ranisar. This tunnel was used by queens in normal days and by the spies during emergency.Some secret rooms were also made in the palace which were used for keeping arms and treasure. The entrance of the palace is like a valley in which a large arch was constructed. Main entrance comes after a slight turn. The palace is made like the Bhool Bhuliya of Lucknow, to prevent the enemy from entering easily. Its stone work is extremely fascinating. The remains of the delicate carving on red sandstone can still be seen.

    Sur Sagar Palaces :

    About 1.5kms away from Jodhpur city, Maharaja Sur Singh got constructed a pond with beautiful gardens and palaces. These palaces are made on rectangular platforms made of white Marble. Two palaces opposite each other belong one each to ladies and gents. The palace for men was used by the king and other royal men, while the ladies' palace was used by the queens and their friends. Two large halls were constructed on the sides of the palaces, which were used by the maids and servants. The security walls made around the palaces, carved domes and arches are proof of the fine architecture of medieval period. The passage to the palaces starts after a large gate. When Marwar entered in an agreement with British government in 1817, these palaces were converted into the residence and office of the British Ambassdor in 1838. Jodhpur's first Post Office was opened in the meeting halls of these palaces. In 1909 when Lord Kichner came to Jodhpur, a museum was made in these palaces for him.

    Bijolai Palaces :

    Maharaja Takhat Singh built 'Bijolai Palaces'. These are located about
     11 kms from Jodhpur city. Maharaja Vijai Singh used to come to this place for hunting. Bijolai palace is divided into three parts. The stairs near the main wall reach the top of the palace. In the centre of the main palace is a large open space adjacent to the kitchen. The central part of the second and third floors have large halls each surrounded by 40 pillars. These are made of red sandstone and the interiors of the palace have been polished with shells. Maroon and blue shades can still be seen on the ceilings of the halls. All the sides of the halls have stone frame fittings from which doors are missing. Small almirahs are made on both sides of the doors which earlier had gold sheets covering them.

    Raikabag Palace :

    This palace is situated near Raikabag palace railway station. It was constructed in 1663 by Hadiji, queen of Maharaja Jaswant Singh I. Maharaja Jaswant Singh-II also liked this palace very much. He mostly stayed in the octagonal bungalow of this palace. In 1883 when Swami Dayanand Sarswati came to Jodhpur, his sermons were arranged for the public in the ground of this palace. Jaswant Singh-II used to listen to Swami Dayanand in this palace only.

    Zenana Palace :

    Zenana Palace was made on a picturesque spot in Mandore during the reign of Maharaja Ajit Singh (1707-24 A.D.). The grandeur and architecture of the palace catches the eye immediately. The palace is made like a small fort, surrounded with walls. The big stones used to make the main structure have been joined without any binding material. A large gate forms the entrance of the building with ventilators. The stones on the gate have flowers, domes and other designs sculpted on them. A large umbrella on the gate is also designed into various shapes and forms. Its centre has a large stone flower to hang chandeliars. Around the umbrella stone awnings beautifully are attached to it. This mahal is also monumental evidence to Marwar architecture.The palace has many rooms of various shapes. Different spots in the building have filigiree, flowers, leaves and other designs carved on them. The room towards the West after entering the gate has walls decorated with flowers and leaves and a scene showing an elephant attacking a lion.

    Ek Thamba Mahal :

    This palace in the form of a single pillar was also made during the reign of Maharaja Ajit Singh (1707-24 A.D.). This octagonal palace has been made by joining stones with filigiree work, the upper portions of which have been made into flowers. The palace is made of brown coloured soft sandstone which can be easily carved. The stones have been adjusted in such a manner that the joints can't be seen and the whole-building seems to be carved out of a very large single rock. Around the main structure which is in the form of a single pillar, awnings have been beautifully arranged in Bengali style. These prevent rain water from splashing straight on the building. The top two storeys of this three storeyed building have a large number of ventilators on all sides. These storeys can be reached by climbing the stone stairs within the palace. The structure is surrounded by a platform and an open space in front. A boundary has been made around the platform, with the help of small pillars. The main door can be reached by crossing this platform, though all the sides of the palace have an entrance.


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  • Havelis, Shrines and cenotaphs in Marwar

     21.08.2017
    Havelis, Shrines and cenotaphs in Marwar

    Havelis, Shrines and cenotaphs in Marwar

    Historical monuments include forts, palaces, Havelis, shrines, cenotaphs ,etc. Erstwhile Marwar principality of Thar desert was quite rich in this field. We have given a brief account of forts and palaces of this region. In this article a breiff account of Havelis, Shrines and cenotaphs is nentioned. Rulers of Mawar, Jagirdars and nobels, wealthy merchants and other people got constructed many buildings in the area which have immense historical importance.

    Havelis

    While the rulers were building palaces, the nobles and wealthy merchants of marwar built big residences which were called havelis (mansions), structured around a courtyard or a series of courtyards, with a zenana for the women, and a segregated front area strictly for male visitors. A number of beautiful havelis came up in almost every major Rajasthani prinspality.In 18th and 19th century almost every noble of Jodhpur state, got constucted his haveli in Jodhpur city for being the capital of the Marwar state. These havelis were known after their thikana, like- Pokran Haveli, Nimaj Haveli, Ras haveli, etc. Later on these havelis were called House, like Khejarla house, Asop house, Jhalamand house, Jasol house, ettc. There are so many old style havelis in jodhpur city. Most of them are of mediveal and modern period.

    Pokaran haveli, Asop haveli, Rakhi haveli, Pal Haveli, Pushya Nakshtra haveli, Haidar Building, Gol Building, Zawahar Khana, Udaimandir ka Aasan, Badi Miyan ki Haveli, Shyam Manohar Prabhu ki haveli (Chaupasani Temple), are famous havelis of Johpur city. Phalodi is also famous for havelis. Haveli of Motilal Amarchand Kochar, Haveli of Sangi das Thanvi, Haveli of Phool Chand Golechha, Haveli of Lal Chand Dhaddha, Haveli of Bachhawats and Havelis of Tatia family are well known havelis of Phalodi and are full of rich architect. Raj Singh was the prime Minister of Maharaja Gaj Singh and Maharaja Jaswant Singh (I). He costructed a haveli in Jodhpur, Now it is known as Asop Ki Haweli.It is located beyond Ada Bazar in Fulelav Ki Ghati near Nai Ka Bad. This haveli still can be seen.

    Pushya Nakshatra haveli was planned to have construction work in Pushya Nakshtar only. The construction went on 273 Pushya nakshatra days in 21 years but it could not be completed as its owner Bhurji died. He was the kamdar of Maharaja Jaswant Singh II. After passing a period of more than one century, this haveli is still incomplete. This is the unique example of its one type. A statue of Edward 7th of England was fixed in this haveli which is still in good condition. A picture of Queen Victoria was also fixed on a wall which in depilated condition now.

    Jawahar Khana

    Jawahar Khana is originally a haveli but when it was used for keeping treasury of Jodhpur state, it was popular as Jawahar Khana. It was built by Nanhi Bai, a beloved beautiful dancer of Maharaja Jaswant Singh (II.) Fifty feet high Jawahar Khana has sandstone walls with a width of 2.5 or 3 feet. A grand pole (gate) has to be crossed to enter the yellow sandstone (Cheetar) building. While the building was being made, Nanhi Bai passed a royal order that all the buildings around it should be at least 10 feet shorter than Jawahar Khana, and the order was followed throughout her life time. Nanhi Bai wanted to make Jawahar Khana straight, but this could be done only if Muhammad Khan Ekka's house was razed to the ground. Nanhi Bai ordered that Ekka's house be destroyed. Ekka was a loyal soldier who had won a Jagir near Rohat as a reward from the Maharaja.Ekka ran to the king. Nanhi was ordered to let the building be constructed at a tangent only. Thus today the Jawahar Khana is not a square building.Twenty two rooms and two big halls in the main portion were constructed in Jawahar Khana. One hall was used as a sitting room by Nanhi and the other as a bedroom. The hall facing the Pole (Gate) was used for evening dances. In between was a big ground for meetings or mehfils. In the rooms on the left of the Pole, chariots, palkis etc. were kept.

    Shrines and cenotaphs

    It was very old tradition in whole India that a shrine, cenotaph or deval is built in the memory of a ruler or noble or warrior or a member of royal family or deity or any other important man or woman after his or her death. This was very popular in Marwar also. There is hardly any village or town in Marwar where any cenotaph or shrine is not found. It is known as Chhatri in local tounge. In marwar, deities fall roughly into seven types- (1.) Sati, (2.) Pitrani, (3.) Junjhar (4.) Pitar, (5.) Shaheed, (6.) Devi, (7.) Bhumia. Most shrines develop a reputation for being efficacious for particular kinds of problems—sometimes specific diseases, physical handicaps, loss of property, mental illness and so on. Shrines- roadside shrines, consecrated stones, idoles and icons of these deities dot the landscape of Marwar.

    Cenotaphs of the Rulers at Panchkunda

    Near Panchkunda, there is a funeral place of the Rathore rulers of Marwar which has temple-like memorials ranging from V.S. 1451 to 1546. Cenotafs of Rao Chunda, Rao Ranmal, Rao Jodha and Rao Ganga may be seen here. The gates of the memorials have Ashka Matrikas, Ganga and Yamuna with their vehicles carved on them. Many depictions of public life like a sleeping man with a woman sitting near his feet, soldiers on elephants, horses, Ganesha with four arms, dance and music parties etc. can also be seen. One of the memorials of V.S. 1213 (1156 A.D.) has inscription with the names of Rathore Bhuwani's son Salkha and his three queens- Salkhan Devi Chahuvani, Sawal Devi Solankini and Sejna Devi Gehlotni. The Garbha grihas of these memorials are now empty. They possibly had some inscriptions earlier which are now missing.

    Cenotaphs of the Queens at Panchkunda

    Near Panchkunda, a ground enclosed with four walls has the Samadhi sthal or memorials of the Queens. Earlier known as Janana Shamshan, the memorials made here are a proof of the Marwar kings' love for art and taste for architecture. Out of a total of 42 cenotaphs, one which is known for its grandeur is the dome of Queen Surya Kanwari made on 32 carved pillars. Queen Surya Kanwari was the daughter of King Pratap Singh of Jaipur, who expired in 1882. A large inscription on the memorial gives the details of the memorial. The domes have shell polish. Some diamond shaped pieces have been fixed in the walls in such a manner that they give the impression of being diamonds only. The artistic pots on the domes have blackened and been damaged.The memorial dome of Rani Bhatiyani of King Man Singh is made on a high platform. Its stones have broken and the inscriptions have also been damaged intentionally. The stones of the stairs leading to the top of the dome have weakened but the top portion of the dome is somewhat safe and sturdy. Dome of Queen Tulsi, daughter of Maharaj Viraj Nath Singh (V.S.1933, 1876 A.D.), memorial of Chawanji Raniwada (V.S.1979, 1922 A.D.) mother of Maharaj Jodhraja and Queen of Maharaja Takhat Singh are almost destroyed. Besides, there are memorials of Rani Chauhanji - daughter of Bakhtawar Singh and Queen of Thakur Karan Singh; Gulab Kanwar - daughter of Maharaja Shiv Singh of Sirohi; Queen Udai Kanwar- daughter of Rana Chandan Singh of Dhamodhar; Queen Dewdi of Maharaja Prithvi Singh, Naruki Lunkaran Queen of Maharaja Mohabbat Singh and Teja Dewdi - grand mother of Maharaja Takhat Singh.

    Devals of Mandore

    In Mandore garden down below the rocky platue, littered with ruins, are the devals or cenotaphs of the former rulers of Marwar. These are from Rao Maldeo (1531-62 A. D.) to Maharaja Takhat Singh (1843-73 A. D.). Some devals are great examples of architecture, for example the Devals of Maharaja Jaswant Singh, Ajit Singh and Takhat Singh, especially that of Maharaja Jaswant Singh. Most of the Devals give an impression of a Devalaya or temple.The cenotaph of Maharaja Ajit Singh is the largest of all the other buildings and the architectural composition of the Chhatari may safely be put in the salivate and the Jain styles. Maharaja Ajit Singh's deval has carved stones which have been carved seperately and then put together on the platform. The complete memorial seems to be knotted with stones. This three storeyed deval has Sabha Mandap, Ardh Mandap and Garbhgriha with lots of carved pillars. The outer walls of the first two storeys are covered with small statues of 36x11 inches, each wall having 48 statues. In these gods and goddesses in different poses, men and women, animals and natural scenes have been depicted.

    Cenotaphs of Kaga

    five kilometers North of Jodhpur city, between the Aravali hills lies the famous pilgrim centre of Kaga. It is said that saint Kag Bhusundi worshipped here, as a result of which Bhagwati Ganga appeared at this place. Later funerals of royal family members started to be performed here. Now it is known as Kaga cremation ground. More than 150 devals and domes can still be seen here. These also include domes of Bhatis, Rathores, Champawats, Rao Rajputs, Swamis, Rajpurohits, Sanghis and Charans.The artistic pillars, white marble statues and inscriptions of these devals take the tourists into the glorious past of Marwar. They tell about those royal people who, by their deeds have taken important places in the foundation and enhancement of Hindu religion. The shell polish inscriptions, statues, horses and boundaries of many of these memorials are now broken. Because most of the inscriptions have been destroyed, it becomes difficult to know about each memorial, but some of them still have their descriptive stories written on them. Two of them are the 'Sati Mata Thans' of two queens of Thakur Gambhir Singh who had committed Sati on the funeral pyre of their husband. The domes opposite each other have memorials of Purbia Rajputs, impressive of them being that of Nuhasingh. There is also a Bekalu Shamshan. This place also has memorial cenotaphs of Shankar Bharti and his wife Maina Bai. On the right of the domes of Rajpurohits are the domes of Rao Chandisa family. At the centre of this group of domes is Shrimant Vikramaditya Rajput's high dome resting on 20 carved pillars. It was made by Rajpurush Gordhan Das in V.S. 1882. Some of the recent memorials are that of Kunwari Narendra Kanwar Rathore, great grand daughter of Rao Raja Surat Singh - grand mother of Maharaja Umed Singh and many other landlords.

    Jaswant Thada

    Construction work of Jaswant Thada was statrted by Maharaja Jaswant Singh (II) himself but it could not be completed during his life time. The work was completed in 1906A.D., during the reign of his son Maharaja Sardar Singh. This beautiful building looks like a fairytale castle in the midst of the clouds. The best of the three buildings of Jodhpur- Mehrangarh, Umed Bhawan and Jaswant Thada, are living symbols of bravery and grandeur of Jodhpur in the medieval and modern era.This castle sings the music of the morning with dawn, and looks like a messenger of calm and peace in moon light. The building is made on a platform of red sandstone. It has pictures of the Marwar rulers.

    Ahada Hingola Ki Chhatri

    When Rao Ranmal was killed in 1488 A.D., Maharana Kumbha sent his nobels, Akka Sisodia and Ahada Hingola to take the charge of Marwar State. After 15 years, Rao Jodha killed Akka Sisodia and Ahada Hingola and regained control over Mandore. Ahada Hingola's memorial was later built on a small hill in the battle field itself. Later the prime minister of Jodhpur, Pratap Singh converted it into a huge memorial in 1912 .This cenotaf is situated near Balsamand lake, on a very high platform, but has no inscription, statue or any other symbol left on it.

    Cenotaph of Amar Singh Rathore

    Amar Singh Rathore (1613-44 A.D.) was elder son of Maharaja Gajsingh of Jodhpur. After he was disinherited and exiled by his family, he entered the Mughals' service. His legendary bravery and battle prowess resulted in elevation to a high rank in the imperial nobility and personal recognition by the emperor, who made him the subedar (governor) of a region that was directly ruled by the emperor himself, Nagaur. In 1644, he was enraged by an attempt by the emperor to levy a fine on him for an unauthorized absence. In the emperor's presence, he stabbed and killed Salabat Khan, who had been asked to collect the fine. He is celebrated in some popular ballads of Rajasthan, Western Uttar Pradesh and Punjab. His Cenotaph is situated at Nagaur headqarters near Ginani Talao.

    Cenotaph of Jayappa

    Jayappaji Rao Scindia (1720-55A.D.) also known as Jayappa Dada Sahib, was a Maratha general. He ruled Gwalior State from 1745-55, succeeding his father Ranoji Rao Scindia who had founded it. He was killed by two Rathore Rajputs adherents of Maharaja Vijay Singh of Jodhpur at before the walls of Nagaur fort on 25 July 1755, after entanglement in the affairs of Jodhpur. He was succeeded by his son Jankoji Rao Scindia, killed at the Third Battle of Panipat in 1761. His memorial cenotaph was built in Tausar village near Nagaur town. This is in good condition even today. A shivlinga is established in the shrine.

    Other Historical cenotaphs

    A red sandstone dome near the domes of the queens in Panchkunda is called Brahmin Devta Ki Chhatri. The magnificient carvings on the dome have gods, godesses and animals on them. It is said that on completion of Mehrangarh fort, some religious rites were performed. That time, the heart of a Brahmin was offered to the holy fire. A memorial of this Brahmin, the dome is now damaged and the inscription on it missing.

    One of the domes in Kaga is that of Maharaja Jaswant Singh's Prime Minister Raj Singh Kumpawat. On an occassion, Maharaja Jaswant Singh was caught by an evil spirit. The spirit said, "I'll leave the king only if an equally brave person sacrifices himself". The prime minister offered to sacrific and beheaded himself. Maharaja Jaswant Singh built this grand dome in Kaga. Standing on a high platform, this memorial is of red sandstone with a white marble statue and an inscription on it. The dome of Maharaja Man Singh's military commander Indra Raj Singhvi is located on the way from Nagori Gate to the Mehrangarh fort. A statue and an inscription were also put in the memorial that time, which has been damaged today.

    Man Singh's maternal uncle, Shyam Singh's memorial can be seen on the left of the main door 'Jaipole' of the fort. Shyam Singh was the Thakur of Rakhi and Jojhawar and died fighting when Jaipur and Bikaner armies jointly attacked Jodhpur. It has an inscription stating 9 day of August month in 1854.Inside the fort, adjacent to the wall is the memorial of Kirat Singh Sodha, Chief of Jasol Thakur. Maharaja Man Singh built this memorial. Before the steep path to the fort, there is a dome on the left known as Dhanna Bhiyan Veeron Ki Chhatri. Maharaja Ajit Singh built this memorial.

    Opposite the old stadium, two domes of Gora Dhai exist. She was governess of Maharaja Ajit Singh. She committed Sati when her husband died on 18 May, 1704. In her memory Maharaja Ajit Singh constructed this Chhatri on 21 Aug. 1711. Made on six pillars, this Chhatri earlier had the statues of Gora Dhai and her husband. The new dome was built the district authorities in 20th century.

    There are many cenotafs of Singhvis near Akhaisagar. Akhaisagar was constructed by Bhim Singh's commander Akhai Raj Singhvi. After his death his memorial cenotaf was made here only. Indra Raj's son Fateh Raj was Maharaja Man Singh's diwan. After Fateh Raj's death, his dome was also built near those of his father and uncle.Opposite Baldev temple is another dome, near the domes of Indra Raj, Gul Raj and Fateh Raj, that of Singhvi Bhim Raj.

    Sufi Shrines

    Nagaur has the pride of early founding of Sufi shrines. One of the earliest Sufis to come to Nagaur was Sultan Tarkin, whose shrine was established during Hindu rule. After Khwaja Moinuddin established the Chishti Sufi order at Ajmer one of his disciples, named Hamiduddin, came to Nagaur. Hazrat Hamiduddin accommodated some Hindu principles in his teachings— he became a strict vegetarian and lovingly reared a cow in his shrine. Hindus worship him as "Tar Kishanji". His shrine is situated at Nagaur district head quarters.

    The Sufi shrine of Abban Shah (also known as jalan ro Pir) in Jalor is considered particularly significant for musicians: it is believed that this deity cures 'musical ills' and specific deficiencies in musical perform¬ance or skill. There is a jal tree in the shrine, the leaves of which are said to have a healing effect on the voice. The shrine is most often used for regaining the singing voice, which breaks after puberty.


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