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  • हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिये क्योंकि....

     03.06.2020
     हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिये क्योंकि....

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com 


    हम भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प से प्रसन्न होना चाहिये क्योंकि....
    ट्रम्प के डर से पाकिस्तान ने हाफिज सईद को नजरबंद किया है उसके बैंक खाते सीज किये हैं और हाफिज को पाकिस्तान से बाहर निकलने पर रोक लगाई है।

    ट्रम्प के डर से पाकिस्तान ने उन आतंकी समूहों को ढूंढ-ढूंढकर मारा है जिन्होंने सिंध में एक सूफी दरगाह पर हमला करके 150 लोग मार दिये थे।

    ट्रम्प के दबाव में यूएनओ में एक प्रस्ताव पारित करके उत्तरी कोरिया को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कोयला बेचने पर रोक लगाई गई है जिससे अब उत्तरी कोरिया का तानाशाह अपने मिसाइल कार्यक्रम के लिये पैसा नहीं जुटा पायेगा और दुनिया में हथियारों की होड़ में कमी आयेगी।

    ट्रम्प की इस कार्यवाही के कारण चीन अब उत्तरी कोरिया से कोयला नहीं खरीद पायेगा जिसके कारण चीन के कारखानों की रफ्तार में कमी आयेगी।

    ट्रम्प के रुख से प्रभावित होकर श्रीलंका ने चीन को अपने देश में एक बंदरगाह की स्थापना करने की जो स्वीकृति दी थी, वह वापस ले ली है। इस कारण चीन भारत को चारों ओर से घेरने के अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पायेगा।

    ट्रम्प की नीतियों के कारण भारत के लड़कों को अमरीका में और भी अधिक मोटे वेतन मिल सकेंगे। भारत से ब्रेन ड्रेन रुकेगा जिसके कारण भारत में कम लागत वाले उच्च विज्ञान और आधुनिकतम तकनीकी का विकास हो सकेगा।

    ट्रम्प की नीतियों के कारण अमरीका के सैंकड़ों एनजीओ को अब सऊदी अरब आदि देशों से जहाज भर-भरकर रुपया नहीं पहुंचेगा जिस रुपये से दुनिया भर के आतंकी अमरीका से अत्याधुनिक हथियार खरीदते थे। इस कारण आईसिस की गतिविधियों में अपने आप ही कमी आयेगी।

    हमें डोनाल्ड ट्रम्प से दुखी क्यों होना चाहिये .........

    यदि ट्रम्प आई लव इण्डिया आई लव हिन्दू कहते हैं ! 

    यदि ट्रम्प मैक्सिको की तरफ दीवार बनाकर बुरे लोगों को अमरीका में आने से रोकते हैं !

    यदि ट्रम्प सात देशों पर प्रतिबंध लगाकर अपने देश में बढ़ती शरणार्थियों की भीड़ पर अंकुश लगाना चाहते हैं !

    यदि ट्रम्प चीन की जगह ताइवान को गले लगाते हैं !

    यदि ट्रम्प अपने देश के लड़कों को घर बैठकर बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय उन्हें नौकरियों पर लगाना चाहते हैं !

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • जिंदा है जो इज्जत से वो इज्जत से मेरगा!

     03.06.2020
    जिंदा है जो इज्जत से वो इज्जत से मेरगा!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


      साठ के दशक में आई मदर इण्डिया फिल्म के गीत जन-जन की जिह्वा पर थे जिसके एक गीत की एक पंक्ति यह भी थी कि जिंदा है जो इज्जत से वो इज्जत से मरेगा............ किंतु देश में जैसा वातावरण बनाया जा चुका है, उसमें ऐसा लगता है कि जिंदा है जो विवादों में वो रातों रात मीडिया में छा जायेगा..... इज्जत से जियेगा.. बुद्धिजीवी कहलायेगा.... पैसे कमायेगा.........एमएलए बनेगा। इसी को कहते हैं मुंह में रजनीगंधा और कर लो दुनिया मुट्ठी में।

    एक बहुत ही होशियार हो गई डीयू की छात्रा ने कितनी बेशर्मी से लिखा कि उसके फौजी बाप को दुश्मन ने नहीं युद्ध ने मारा। मैं कहता हूं कि उसके फौजी बाप को उस वैज्ञानिक ने मारा जिसने बंदूक बनाई, जिसने गोली बनाई। उस मास्टर ने मारा जिसने वैज्ञानिक को बंदूक और गोली बनाने की शिक्षा दी। उस चाणक्य ने मारा जिसने भारत देश बनाया। उस विवेकानंद ने मारा जिसने देश को स्वाभिमान से उठ खड़ा होने की प्रेरणा दी। उस गांधी और नेहरू ने मारा जो देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुए।उस भगतसिंह ने मारा जिसने देश से गोरों को भगाने के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।

    उस वीर सावरकर ने मारा जिसने अंग्रेजों को उनकी औकात बताकर दो काले पानी की सजा भुगती। उस इंदिरागांधी ने मारा जिसने परमाणु बम का विस्फोट करके देश को शक्तिशाली बनाया।

    यह तो अच्छा हुआ कि जिस समय इसका फौजी पिता देश के लिये शहीद हुआ, उस समय डीयू की यह छात्रा इतनी समझदार नहीं हुई थी अन्यथा यह उसे लड़ने से यह कहकर रोक देती कि वार मत करो। वार मार देता है। तुम अपनी गोली भारत के उन नेताओं पर चलाओ जो पाकिस्तान के वार का जवाब वार से देते हैं.......... वगैरा-वगैरा।

    अराजकतावादी राजनीति के जन्मदाता अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी के राम सुब्रम्ण्यम की एजेंट इस छात्रा को यह नहीं बताया गया कि 1965 की लड़ाई में जब पाकिस्तान देश के कुछ हिस्सों में घुस आया था तो उसके सैनिकों ने हमारे देश की महिलाओं के स्तन काट दिये थे। बहुत सी औरतों का सतीत्व भंग हुआ था।

    जिस वार ने इस छात्रा के फौजी बाप को मारा, वह युद्ध क्या अटलबिहारी वाजपेयी ने शुरु किया था! क्या दुश्मन की गोली का जवाब गोली से देना बुरी बात है! क्या देश की सेनाएं अहिंसा का उपदेश देने और शत्रु का स्वागत करने के लिये सीमाओं पर खड़ी की गई हैं।

    शर्म करो!!! जैसे दुश्मन की गोली यह नहीं देखती कि सामने खड़ा दुश्मन कौन है वैसे ही उनके सैनिक यह नहीं देखेंगे कि जिस स्त्री के स्तन काट रहा है, उसके घर वाले फेसबुक पर पाकिस्तान का समर्थन कर रहे थे या विरोध। गौतम और गांधी का देश बताने वालों को यह बताना जरूरी है कि गौतम और गांधी की आड़ लेकर बुरी बातें मत करो, इसमें तुम्हारा भी बराबर का नुक्सान है।

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  • राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!

     03.06.2020
    राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम पवित्र अनिवार्यता एवं जय श्री राम त्याज्य बुराई!

    25 जुलाई को देश के नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने पहले भाषण में जवाहरलाल नेहरू का नाम नहीं लिया। गांधी के साथ, जनसंघ के संस्थापक सदस्य दीनदयाल उपाध्याय का नाम लिया तथा शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रपति भवन में जय श्री राम के नारे लगे। कांग्रेस की दृष्टि में ये ऐसे अपराध हैं जिनकी अपेक्षा धर्म निरपेक्ष देश के राष्ट्रपति से नहीं की जा सकती जिसे संविधान की रक्षा करनी है।

    रामनाथ कोविंद ने तो राम, कृष्ण, बुद्ध, वेदव्यास, चाणक्य, समुद्रगुप्त, विवेकानंद, कबीर, दयानंद, भगतसिंह, सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर आदि हजारों महापुरुषों और सती, सावित्री, अनुसूइया, राधा, सीता, जीजाबाई, लक्ष्मीबाई, दुर्गावती आदि महान नारियों के नाम भी नहीं लिए जिन्होंने इस देश का निर्माण किया तथा जो इस देश की आत्मा में रचते-बसते हैं। क्या कांग्रेस यह कहना चाह रही है कि भारत राष्ट्र का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ था! उससे पहले तो भारत था ही नहीं ! इसलिए राष्ट्रपति को अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नेहरू का नाम लेना आवश्यक है!

    नेहरू के नाम पर कांग्रेसियों को इतना ही गर्व है तो उनकी उपलब्धियां याद कर लें। उनके समय में पाकिस्तान और चीन ने भारत पर आक्रमण किए। पाकिस्तान और चीन ने कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा दबा लिया। नेहरू की नीतियों के कारण तिब्बत को चीन निगल गया। नेहरू की नीतियों के कारण नेपाल का राजा जो किताबों के बक्से में छिपकर भारत में मिलने आया था, उसे वापस लौटा दिया गया। नेहरू की नीतियों के कारण इजराइल से लगभग आधी शताब्दी तक भारत सरकार अपने सम्बन्ध नहीं बना सकी। नेहरू की नीतियों के कारण कश्मीर में धारा 370 लागू हुई और कश्मीर की समस्या यूएनओ पहुंची। कांग्रेसी नेताओं को नेहरू की नीतियों का और अधिक ज्ञान प्राप्त करना हो तो सरदार पटेल का 7 नवम्बर 1950 का वह पत्र पढ़ लें जिसमें उन्होंने नेहरू को उनकी नीतियों के कारण बुरी तरह लताड़ा है।

    नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कैसे बने, यह भी स्मरण कर लें। 1946 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाना था। गांधी सहित पूरा देश जानता था कि इस बार कांग्रेस का जो अध्यक्ष चुना जायेगा, अंग्रेज सरकार उसी को भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाएगी और वही स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री भी बनेगा। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव अधिकृत प्रदेश कांग्रेस कमेटियों द्वारा किया जाता था। उस समय देश में 15 अधिकृत प्रदेश कांग्रेस कमेटियां थीं जिनमें से 12 कमेटियों ने सरदार पटेल को इस पद के लिए चुना तथा तीन कमेटियों ने अलग-अलग नाम दिए जिनमें नेहरू का नाम शामिल नहीं था। मोहनदास गांधी हर कीमत पर नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे क्योंकि मुसलमानों के मामले पर सरदार पटेल को सख्त तथा नेहरू को मुलायम माना जाता था। इसलिए गांधीजी ने जे. बी. कृपलानी के माध्यम से कांग्रेस कमेटियों पर दबाव बनाया कि वे पटेल की जगह नेहरू को चुनें किंतु एक भी कांग्रेस कमेटी ने नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना स्वीकार नहीं किया। इसलिए गांधीजी ने सीधे पटेल से कहा कि वे अपनी दावेदारी छोड़ दें। पटेल ने गांधी की बात मान ली और नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के साथ-साथ देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

    कांग्रेस के एक बड़े नेता ने यह भी कहा है कि हमें तो दीनदयाल उपाध्याय की केवल एक ही उपलब्धि ज्ञात है कि 1968 में मुगल सराय रेलव स्टेशन पर ट्रेन के टॉयलेट में उनका शव मिला था। ऐसी बेशर्मी वाली बात करने वाले नेताओं को देश की जनता प्रबल बहुमत से नकार चुकी है। फिर भी वे अपनी जिह्वा से दूसरे दलों के नेताओं के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने से बाज नहीं आते। कांग्रेस को इस बात पर भी आपत्ति है कि राष्ट्रपति भवन में जय श्री राम के नारे क्यों लगे! कांग्रेस जो कुछ कह रही है उसका सीधी अर्थ यह है कि राष्ट्रपति के भाषण में नेहरू का नाम लेना एक पवित्र अनिवार्यता है और जय श्री राम के नारे लगना त्याज्य बुराई ! कांग्रेस इस बात को देश के 100 करोड़ से अधिक रामभक्तों के गले कैसे उतार सकेगी !

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • योगी आदित्यनाथ से है चमत्कारों की आशा !

     03.06.2020
    योगी आदित्यनाथ से है चमत्कारों की आशा !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    भारत के लोगों में चमत्कार-प्रियता का भाव कुछ अधिक ही है। इस प्रवृत्ति के युग-युगांतरकारी विस्तार का अधिकतम श्रेय नाथ-योगियों एवं वज्रयानी-सिद्धों को जाता है। उनके प्रभाव से भारत का आम आदमी इस बात में विश्वास करता है कि तप और योग के बल पर मनुष्य पानी पर चल सकता है, अग्नि में प्रवेश करके सुरक्षित रह सकता है, हवा में उड़ सकता है। वह अणु से भी छोटा और पर्वत से भी बड़ा हो सकता है। वह हजारों वर्षों तक जीवित रह सकता है। जब भारत में बौद्ध धर्म का बोलबाला हो गया तो नाथों ने योग का अद्भुत एवं चमत्कारपूर्ण दर्शन भारत की भोली-भाली जनता के समक्ष रखा। नौ-नाथों और चौरासी सिद्धों ने पूरे भारत में घूम-घूम कर योगबल से प्राप्त की जा सकने वाली सिद्धियों का प्रवचन एवं प्रदर्शन किया ताकि जन-सामान्य को ईश्वर के प्रति नत-मस्तक रहने, साधु संतों की सेवा करने तथा तप एवं योग के प्रति प्रेरित किया जा सके।

    भारतीय संस्कृति में जिन योगियों के नाम बड़ी श्रद्धा से लिये जाते हैं उनमें राजा हरिश्चंद्र, राजा भर्तृहरि, राजा गोपीनाथ, योगी मत्स्येन्द्रनाथ (मछन्दरनाथ), गोरखनाथ (गौरक्षनाथ), जालंधरनाथ एवं बालकनाथ आदि प्रमुख हैं। ग्रामीण अंचलों में जिन कालभैरव, बटुकनाथ और भैरवनाथ आदि के प्रकट होने, लोगों से साक्षात्कार करने, चमत्कार दिखाने, प्रेतों से लड़ने आदि कार्यों की चर्चा बहुतायत से होती है, वे भी वास्तव में नाथ-योगी ही थे जिन्हें शिवभक्त होने के कारण शिवजी का गण भी माना गया तथा उनके दैवीय-स्वरूप में विश्वास किया गया।

    मच्छन्दरनाथ के शिष्य गोरखनाथ थे। इन दोनों के बारे में एक कथा बहुत लोकप्रिय है कि मच्छन्दरनाथ एक बार कामरूप (आज का असम एवं अविभाजित बंगाल) देश में भिक्षाटन के लिये गये। उन्होंने एक घर की एक महिला को अपने योग के चमत्कार दिखाने की चेष्टा की। वह महिला मच्छन्दरनाथ से भी अधिक तंत्र जानने वाली थी। उसने मच्छन्दरनाथ को बकरा बनाकर अपने घर में बांध लिया। जब बहुत दिनों तक गुरु नहीं लौटे तो गोरखनाथ को उनकी चिंता हुई और वे उन्हें ढूंढने लगे किंतु मच्छन्दरनाथ का कहीं पता नहीं चला।

    इस पर गोरखनाथ ने योग बल से पता लगा लिया कि उनके गुरु कहां हैं और किस रूप में हैं। गोरखनाथ वहां पहुंचे और उन्होंने उस घर के बाहर पहुंचकर अलख लगाई- जाग मच्छन्दर गोरख आया। शिष्य की आवाज सुनकर, बकरे के रूप में खड़े मच्छन्दरनाथ को अपने सही स्वरूप का भान हुआ और गुरु उस तांत्रिक महिला के बंधन से मुक्त होने में सफल हुए। यह किस्सा पूरे भारत में इतना विख्यात है कि लगभग हर आदमी ने इसे किसी न किसी रूप में सुना है।

    वस्तुतः नाथ और सिद्ध योगियों की यह परम्परा शैव-धर्म की ही शाखाएं हैं किंतु ऐसे नाथ योगी भी हुए हैं जिन्हें वैष्णव धर्म तथा शैव धर्म दोनों में बराबर महत्व दिया जाता है। इन्हीं में से एक हुए भगवान दत्तात्रेय जिन्होंने आबू पर्वत पर रहकर तपस्या की। आज भी उनका एक मंदिर उस स्थान पर स्थित है। जालंधरनाथ की कर्मभूमि भी राजस्थान रही। माना जाता है कि जालोर नगर का नामकरण इन्हीं जालंधरनाथ के नाम पर हुआ।

    पश्चिमी राजस्थान में कनफड़े योगियों का एक ऐसा सम्प्रदाय विकसित हुआ जिसने शैव सम्प्रदाय का होते हुए भी वैष्णव धर्म में सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त की। इन्हीं में से एक थे आयस देवनाथ। ई.1793 में जोधपुर के राजकुमार मानसिंह ने जोधपुर नरेश भीमसिंह के भय से जालोर दुर्ग में शरण ली। दस साल तक जोधपुर की सेना जालोर दुर्ग को घेर कर बैठी रही किंतु मानसिंह को परास्त नहीं किया जा सका। अंत में ई.1803 में राजकुमार मानसिंह ने समर्पण करने का निश्चय किया।

    उसी पहाड़ी पर एक कनफड़ा योगी आयस देवनाथ रहता था। उसे जब राजा का निश्चय ज्ञात हुआ तो उसने कहा कि 21 अक्टूबर तक धैर्य रखो। मानसिंह ने उसकी बात मान ली। दैववश 20 अक्टूबर को समाचार आया कि जोधपुर नरेश भीमसिंह का निधन हो गया है। इसलिये जोधपुर राज्य का सेनापति सिंघी इन्द्रराज, मानसिंह को हाथी पर बैठाकर जोधपुर ले आया और उसे जोधपुर का राजा बना दिया।

    इस घटना से मानसिंह इतना प्रभावित हुआ के उसने देवनाथ को अपना गुरु मान लिया। वह देवनाथ के दर्शन किये बिना मुंह में अन्न का कण नहीं रखता था। उसने नाथ साधुओं की प्रशस्ति में अनेक ग्रंथों एवं काव्यों की रचना की जिनमें जालंधर चन्द्रोदय, जालन्धर चरित, नाथ कीर्तन, नाथ चन्द्रिका, नाथधर्म निर्णय, नाथ प्रशंसा, नाथ महिमा, नाथजी की स्तुति, नाथजी के पद तथा सिद्ध सम्प्रदाय प्रमुख हैं। मानसिंह का पुत्र छत्रसिंह, वैष्णव धर्म में आस्था रखता था। इसे लक्ष्य करके राजकवि बांकीदास ने लिखा- ‘जब मान को नंद गोविन्द रटै, तब गण्ड फटै कनफट्टन की। ’ इस कविता को सुनकर महाराजा मानसिंह इतना नाराज हुआ कि उसने बांकीदास को देश निकाला दे दिया। बाद में जब कैप्टेन लडलू ने नाथों को मारवाड़ से निकाल दिया, तब महाराजा मानसिंह दुखी होकर अपना महल छोड़कर मण्डोर उद्यान में चला गया और वहीं अपने प्राण त्याग दिये।

    उत्तर प्रदेश के नये मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, गोरखनाथ की परम्परा के योगी हैं। उनसे उत्तर प्रदेश को ही नहीं, पूरे भारत को आशा है कि वे भारत की राजनीति में कोई चमत्कार करके दिखायेंगे जिससे भारत की धर्म-प्राण जनता सुखी होगी। देश में कानून व्यवस्था सुधरेगी, दुष्टजन भयभीत होंगे। सज्जनों को अभय मिलेगा। निर्धनों की आशाएं फलीभूत होंगी, भूखों को भोजन मिलेगा, बीमारों को इलाज मिलेगा और छतहीनों को छत मिलेगी। अकर्मण्य लोग आलस्य त्यागकर परिश्रम करने को आतुर होंगे और तीर्थों की सुरक्षा एवं सफाई होगी। मूक पशु निर्भय होंगे, संत लोग भारत की जनता को सत्यनिष्ठ, सहिष्णु एवं धैर्यवान बनने की प्रेरणा देंगे। जनता के कर से प्राप्त होने वाली राशि का दुरुपयोग नहीं होगा।

    योगी आदित्यनाथ से इस चमत्कार की आशा इसलिये भी की जाती है कि वे वीतरागी हैं, विज्ञान के स्नातक हैं, विगत बाईस वर्षों से सांसद हैं, विचारवान हैं, स्पष्ट वक्ता हैं, दृढ़-प्रतिज्ञ हैं और ऐसे दल के प्रतिनिधि हैं जो तुष्टिकरण और जातिवाद की राजनति के स्थान पर सबका साथ सबका विकास की बात करता है। मेक इन इण्डिया की बात करता है, स्वच्छ भारत की बात करता है। -

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • जो करेगा रामजन्म भूमि की सेवा, वही पायेगा यशस्वी होने की मेवा।

     03.06.2020
    जो करेगा रामजन्म भूमि की सेवा, वही पायेगा यशस्वी होने की मेवा।

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    मेवाड़ के एक महाराणा अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिये सशस्त्र संघर्ष हेतु अपनी सेना लेकर अयोध्या गये थे। उस सेवा का परिणाम यह हुआ कि जब राजस्थान बना तो उसके पहले महाराज प्रमुख मेवाड़ के महाराणा बने।

    भारत की स्वतंत्रता से पहले, गीताप्रेस गोरखपुर के संस्थापकों में से एक श्री भाईजी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, श्रीराम जन्म भूमि पर मंदिर बनाने के लिये प्रयासरत थे। उन्होंने इसके लिये हुए आंदोलनों का नेतृत्व भी किया। इस सेवा का परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की इच्छा व्यक्त की किंतु श्री पोद्दार ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। वे भारत के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत रत्न को लेने से मना कर दिया। उन्होंने भारत के लगभग हर हिन्दू के घर में गीता, महाभारत, रामचरित मानस एवं कल्याण जैसे महान् ग्रंथ एवं पत्रिकाएं उपलब्ध कराने में अपना जीवन बिताया।

    श्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी राममंदिर को लेकर रथयात्रा की थी, उसका परिणाम यह हुआ कि केन्द्र में तीन बार अटल बिहारी वाजपेयी की तथा चौथी बार नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी। स्वयं लालकृष्ण आडवाणी अगले राष्ट्रपति के रूप में देखे जा रहे हैं।

    बाबूजी के नाम से विख्यात श्री कल्याणसिंह ने ई. 1992 में रामजन्म भूमि की सेवा करते हुए अपनी सरकार का बलिदान किया। वे आज भी राजस्थान के राज्यपाल हैं। 

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के रामजन्म भूमि आंदोलनों को गोरखपुर के गोरखमठ ने नये सिरे से आरम्भ किया। उसका फल यह हुआ कि गोरखमठ के महंत श्री आदित्य योगी आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

    योगी आदित्यनाथ रामजन्म भूमि आंदोलन से राजनीति में आये। आज केवल 44-45 साल की आयु में वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और उनके नाम की धमक सम्पूर्ण विश्व में गूंज रही है। जो रामजन्म भूमि की सेवा करेगा, वह मेवा पायेगा।

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  • जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

     03.06.2020
    जनसंचार के माध्यम और रंगमंच के बदलते हुए रूप

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    विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च 2017 पर विशेष जनसंचार में वे सब विधाएं, संसाधन, उपकरण और तरीके आ जाते हैं जो निर्जन स्थान में सुईं गिरने की आवाज से लेकर शेर की दहाड़ तक को, देखते ही देखते विशाल जनसमूह तक पहुंचा सकें और जन-समुदाय, यह जानते हुए भी कि जो कुछ भी वह सुन, देख या पढ़ रहा है, वह उससे बहुत दूर कहीं घटित हुआ है किंतु समाज का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं को उस घटना से प्रभावित कर लेता है। समाज में मीडिया की भूमिका संवाद-वहन की होती है। वह समाज के विभिन्न वर्गों, सत्ता-केंद्रों, व्यक्तियों एवं संस्थाओं के बीच बातचीत ओर विचारों के आदान-प्रदान के लिये पुल का कार्य करता है। यही कारण है कि आज समस्त विश्व की सरकारें, राजनीतिक पार्टियां, व्यावसायिक प्रतिष्ठन, श्रमिक संगठन, साहित्यिक संस्थाएं आदि विभिन्न प्रकार के न्यास, अपनी योजनाओं, कार्यक्रमों, उपलब्धियों तथा उत्पादों को जनसंचार के किसी न किसी तरीके को अपनाकर जन-समूह अथवा अपने टारगेट ग्रुप के बीच लाते हैं। जनसंचार, एक ओर तो, इन न्यासों की विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों की चर्चा करता है तो दूसरी ओर वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, बेचैनियों, और विभ्रमों को दूसरे पक्ष तक पहुंचाने का प्रयास करता है। संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी ही उस, न्यास अथवा संस्था अथवा व्यक्ति की नैतिकता अथवा अनैतिकता को रेखांकित करती है। लोकतांत्रिक समाज में जनसंचार अर्थात् मीडिया का दायित्व इसलिये और भी बढ़ जाता है क्योंकि जनसंचार को अपना कार्य करने की पूरी छूट होती है और जनसामान्य द्वारा यह विश्वास किया जाता है कि जनसंचार ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया वाली स्टाइल में कार्य करेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मीडिया को चौथे स्तंभ का सम्मान केवल इसीलिये दिया जाता है क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह भी सरकार, विधायिका और न्यायपालिका की तरह अपनी जिम्मेदारी स्वयं अपनी प्रेरणा और विवेक के बल पर निष्पक्ष रहकर निभायेगा। कुशल नेतृत्व मिलने पर मीडिया, समाज को वांछित परिवर्तनों की दिशा में ले जाने में सहायक होता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है। साहित्य और जनसंचार का चोली-दामन का साथ है। साहित्य को यदि मनुष्य की वैचारिक सम्पदा की आत्मा मान लिया जाये तो जनसंचार अथवा मीडिया उसका शरीर है। जैसे शरीर के बिना आत्मा कोई कार्य नहीं कर सकती, उसी प्रकार जनसंचार के बिना साहित्य भी आगे नहीं बढ़ सकता। यदि इसे उलटा कर दें तो भी परिणाम यही निकलेगा अर्थात् साहित्य के बिना संचार के समस्त संसाधन, उसकी समस्त शक्ति और ऊर्जा, पूर्णतः निर्जीव और निष्प्रभावी है। साहित्य का अर्थ है सबका कल्याण। जनसंचार का ध्येय है जनकल्याण। अर्थात् जनकल्याण वह बिंदु है जहां साहित्य और जनसंचार अपने रूढ़ अर्थ खोकर एकाकार हो जाते हैं। दोनों के पास अपनी अंतर्चेतना होती है। दोनों के पास कल्पनाशीलता होती है। दोनों का एक ही प्रयोजन होता है। यदि हम रंगमंच, जनसंचार और साहित्य के सम्बन्धों पर एक साथ विचार करने का प्रयास करें तो पायेंगे कि रंगमंच और जनसंचार दोनों का पिता साहित्य है। यदि यह कहा जाये कि साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति रंगमंच है, तो इसमें कोई अश्यिोक्ति नहीं होगी। ऐसा इसलिये भी कि जब हम नाटक पर विचार करते हैं तो हम यह पाते हैं कि नाटक एक ऐसी साहित्यिक रचना है जो श्रवण एवं दृष्टि द्वारा दर्शक के हृदय को रसानुभूति कराती है। इसलिये कई बार नाटक को दृश्य-काव्य भी कहते हैं। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है। आधुनिक काल में जनसंचार के विभिन्न ससांधन हैं यदि उनके रंगमंच के साथ सम्बन्धों की व्याख्या की जाये तो यहां मामला कुछ प्रतिद्वद्विता से भरा हुआ दिखाई देता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कि पुत्र अपने पिता के राज्य पर अपने नैसर्गिक अधिकार का दावा तो करे किंतु उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन नहीं करे। जनसंचार का सामान्य अभिप्राय- समाचार पत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है। ये आधुनिक जनसंचार के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण की मजदूरी करते हैं लेकिन जिसे हम मीडिया यानी संवादवहन की युक्ति मानते आए हैं, उसकी हदें इससे कहीं अधिक व्यापक और समाज में विभिन्न रूपों में घुसी हुई हैं। पुराने जमाने के नौटंकी, स्वांग, नाटक, सभा तथा चित्रकला से लेकर आधुनकि युग के बैनर, पोस्टर, पंपलेट्स, भाषण, लोकगायन, विज्ञापन, सेमीनार, आदि जनसंचार की प्रचलित परिभाषा से किंचित भिन्न होने के बावजूद जनंसचार के ही भाई-बहिन हैं। आधुनिक स्मार्ट फोन का प्रारंभिक उद्देश्य भले ही टेलिफोन वाली भूमिका निभाना हो किंतु उन्नत तकनीक, बाजार की जरूरतों तथा गला-काट विज्ञापन-स्पर्धा ने उसे भी जनसंचार के आधुनिक और शक्तिशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। वाट्सएप तथा फेसबुक जैसे सॉफ्टवेयर्स ने ये सिद्ध कर दिया है कि स्मार्ट फोन नामक दैत्य को आने वाले कई दशकों तक परास्त नहीं किया जा सकेगा। जहां घरों में सास-बहू के रसीले-चुटीले तथा नाटकीयता से परिपूर्ण संवाद, आम घरों की आम दिनचर्या का हिस्सा हुआ करते थे, वहीं अब सास बहू के नाटक केवल टीवी के पर्दे पर सिमट गये हैं और वास्तविक जिंदगी की सास तथा बहुएं अपने-अपने कमरों में बैठकर अपने र्स्माट-फोन पर आंखें गढ़ाये हुए, वाट्सएप और फेसबुक पर व्यवस्त हैं। सभ्यता के आगे बढ़ने के साथ, जनसंचार के जिस माध्यम का सबसे पहले जन्म हुआ, मेरी दृष्टि में वह रंगमंच ही था। रंगमंच ने कई तरह के रूप धरे। यदि वह राजा, राजपरिवार और राजपण्डितों के मनोरंजन के लिये अपने सम्पूर्ण शास्त्रीय स्वरूप के साथ प्रकट हुआ तो जन सामान्य के लिये वह नौटंकी का आश्रयदाता बन गया। राज महलों के विशाल दालानों से लेकर राजा के दरबार तक पर रंगमंच हावी हो गया जहां विदूषकों ने कड़वी से कड़वी बातें राजाओं और रानियों को सुनाईं। यह रंगमंच की ही शक्ति थी कि कड़वी से कड़ी बात भी राजा ने हंसकर सुनी। रंगमंच कभी घबराया नहीं, पूरे जोश और शक्ति के साथ जनता की आवाज को राजमहलों और राजदरबारों तक पहुंचाता रहा। दूसरी ओर इस उदार हृदय रंगमंच ने गांवों की गलियों में जाकर नौटंकियों और नुक्कड़ नाटकों का रूप धर लिया ताकि कठोर परिश्रम और संघर्षपूर्ण नीरस जीवन के थपेड़ों से थके हुए किसानों, श्रमिकों और आम आदमी को मदभरी फुहारों से तृप्त किया जा सके। इस कारण नाटक राजा और राजपण्डित से लेकर आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बन गया। रंगमंच की शक्ति का अनुभव करते हुए, बड़े-बड़े पण्डितों ने एक से बढ़कर एक नाटक लिखे जो आज इस देश की बौद्धिक सम्पदा में सम्मिलित हैं। मैं संस्कृत भाषा के अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम् और मृच्छकटिका आदि उन शास्त्रीय नाटकों की सूची में नहीं जाउंगा अपितु केवल संकेत भर करूंगा जो केवल रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गये थे। इन नाटकों ने रंगमंच को उसकी ऊंचाइयां प्रदान कीं। जब कागज सरलता से उपलब्ध होने लगा, छापाखाना विस्तार पा गया और पत्र-पत्रिकाओं का प्रसार हुआ तो रंगमंच ने अपने नाटक पुस्तकों, पत्रिकाओं और समाचार पत्रों को दे दिये। अब नाटक छपने लगे। लोग उन्हें बड़े चाव से पढ़ते थे। उदाहरण के लिये जयशंकर प्रसाद और रामकुमार वर्मा के नाटक मूल रूप में पढ़े जाने के लिये ही लिखे गये। फिर भी रंगमंच ने उद्दात्त भाव दिखाते हुए उन नाटकों को थोड़ा परिमार्जित करके मंचित किया। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब आम आदमी की पहुंच रेडियो तक होने लगी तो नाटक, देखे या पढ़े जाने की बजाय, सुनने के लिये लिखा जाने लगा। रंगमंच अब केवल इफैक्ट्स के रूप में रह गया था जहां, पात्रों के संवादों के साथ-साथ ट्रेन की सीटी, चिडि़यों की चहचहाट या बाजार का शोर सुनाई देता था। यह रंगमंच के लिये अशुभ संकेत था। यही वह बिंदु था जहां से नाटक तो आगे बढ़ा किंतु रंगमंच का विकास रुक गया। अब दर्शकों की भीड़ रंगमंच की ओर उमड़ने की बजाय रेडियो से चिपक गई। विविध भारती ने हवामहल के रूप में छोटी-छोटी नाटिकाएं लाखों लोगों तक पहुंचाई। हममें से बहुत से लोगों ने हवामहल के लिये नाटिकांए बनाई हैं जिन्हें रेडियो ने झलकी का नाम दिया। फुल लेंथ रेडियो ड्रामा और स्पॉन्सर्ड सीरियल भी बनाये गये। जब बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से थोड़ा पहले, सिनेमा का प्रचलन हुआ तो रंगमंच के लिये सचमुच के खतरे की घण्टी बज गई। यहां नाटक भी था, पात्र भी थे, अभिनय भी था, कथा भी थी, संगीत भी था अर्थात् नाटक अपने समस्त अवयवों के साथ पूरे वैभव को लेकर उपस्थित था, यदि कुछ नहीं था तो केवल रंगमंच। फिर भी बुद्धिजीवी वर्ग के लिये रंगमंच काम करता रहा। भले ही दर्शकों की भीड़ नहीं थी किंतु रंगमंच बना रहा। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में जब टेलिविजन घर-घर आ गया तब तो रंगमंच केवल प्रतिबद्ध लोगों के लिये रह गया जहां, नाटक को देखने के लिये साहित्य प्रेमियों एवं बुद्धिजीवियों को आग्रह-पूर्वक रंगमंच के सामने लाया जाने लगा। आम आदमी, जिसमें किसान, श्रमिक या छोटा करोबारी एवं विविध प्रकार के कर्मचारी आदि गिने जा सकते हैं, लगभग पूरी तरह से रंगमंच से विमुख हो गया। आज के हालात ये हैं कि यदि यह यह कहा जाये कि जनसंचार ने नाटक से रंगमंच छीनकर, उसे सिनेमा का बड़ा पर्दा या टीवी का छोटा पर्दा या एफएम रेडियो का भौंपू पकड़ा दिया, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज टीवी पर जो कुछ भी चलता है, उसमें अधिकांशतः नाटक ही भरा हुआ है। यहां तक कि सिने तारिकाओं को मात करने वाली समाचार वाचिकाएं भी समाचार को नाटक के लहजे में प्रस्तुत करती हैं। विज्ञापनों को तैयार करने एवं प्रभावी बनाने में भी नाटक या नौटंकी का ही सहारा लिया जाता है, किंतु रंगमंच अनुपस्थित है। नाटक सब जगह मौजूद है, घर से लेकर संसद तक, किंतु रंगमंच गायब है। आज सिनेमा और टीवी के नाटक के लिये फ्लोर मैनेजर है, फ्लोर डायरेक्टर है, लाइटमैन है किंतु यह सब कैमेरे के लिये है। नट द्वारा प्रस्तुत नाटक को अब जनसंचार ने हड़प लिया है और रंगमंच को वीरान बना दिया है। हो सकता है कि आप लोग मेरे इस वक्व्य से सहमत नहीं हों किंतु कम से कम मुझे तो यही लगता है। जब वर्ष 2015 में मेरी पोस्टिंग झालावाड़ में हुई तो मेरे मन में उत्साह था कि इसी बहाने सही, उस ऐतिहासिक भवानी नाट्यशाला को मैं अपनी आंखों से देख सकूंगा जिसे देखने की साध वर्षों से मन में दबी हुई है। यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध रंगमंच है, उत्तर भारत में इसके जैसा भव्य रंगमंच न तो पहले बना न बाद में। एक शाम मैं वहां गया, वहां का हाल देखकर सन्न रह गया। इस भवन को लम्बे समय से बंद कर दिया गया था। मैंने किसी तरह ताला खुलवाया, भवानी नाट्शाला के भीतर कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहटें, बीटों की बदबू, तेज सन्नाटा और घनघोर अंधेरा मिलकर ऐसा शोककारी वातावरण बनाये हुए थे मानो इस रंगमंच पर नाटक खेलने वाले कलाकारों की आत्माएं सिसकियां भर रही हों। इस रंगमंच पर बड़े-बड़े नाटक खेले गये। एक-एक नाटक कई-कई महीनों तक चलता था। आज वह सब वैभव बिखर गया है। रंगमंच का लगभग यही हाल पूरे देश का है। रंगमंच से जुड़े हुए कुछ लोग जिद्दी बंजारों की तरह रंगमंच की यात्रा को जारी रखे हुए हैं। कुछ पढ़े लिखे लोग आ जाते हैं नाटक देखने किंतु वास्तविकता क्या है....... किससे छिपी है! -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च 2017

     03.06.2020
    विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च 2017

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    विश्व रंगमंच दिवस पर टाउनहॉल जोधपुर में सोमवार, 27 मार्च 2017 को राजस्थान कला साहित्य संस्थान जोधपुर एवं राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का दैनिक भास्कर जोधपुर में प्रकाशित समाचार

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  • प्रशान्त भूषण ने भगवान श्रीकृष्ण पर हमला क्यों बोला ?

     03.06.2020
    प्रशान्त भूषण ने भगवान श्रीकृष्ण पर हमला क्यों बोला ?

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    प्रशान्त भूषण में वे सब विशेषताएं हैं जो बहुत कम लोगों में मिलती हैं। वे शिक्षित हैं, बुद्धिजीवी हैं, आयु और अनुभव से परिपक्व हैं तथा अर्थ-सम्पन्न हैं किंतु उन्होंने योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा यूपी में चलाये जा रहे एण्टी-रोमियो अभियान का विरोध करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के लिये जो बचकानी बात कही, उसके लिये प्रशांत भूषण की जितनी निंदा और भर्त्सना की जाये कम है। मेरी दृष्टि में आजाद भारत में भगवान श्रीकृष्ण पर यह पहला हमला है, उम्मीद की जानी चाहिये कि यही अंतिम भी होगा।

    प्रशान्त भूषण ने प्रलाप किया है कि भगवान श्रीकृष्ण बहुत सी लड़कियों को छेड़ते थे जबकि रोमियो ने केवल एक लड़की से प्रेम किया था। इसलिये योगी को एण्टी-रोमियो-स्क्वायड की जगह एण्टी-कृष्ण-स्क्वायड बनाना चाहिये था। यदि कोई सामान्य मेधा का व्यक्ति यह बात कहता तो उसे हँस कर टाला जा सकता था क्योंकि हिन्दू धर्म में बहुत कुछ सहने की शक्ति है, वह अज्ञानियों की अशिष्टता को सह लेता है किंतु बुद्धिजीवी होने का दंभ पालने वाले लोग ऐसी अशोभनीय बातें कहेंगे तो उनकी भर्त्सना करना अनिवार्य हो जायेगा, अन्यथा हिन्दू धर्म की सहनशीलता और कायरता का अर्थ एक ही हो जायेगा।

    प्रशांत भूषण ने श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र को कितना पढ़ा, समझा और जाना है, शायद बिल्कुल नहीं। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को वे लड़कियां छेड़ना कह रहे हैं! भगवान ने बाल्यकाल की लीलाएं गोकुल और वृंदावन में कीं जहां उन्होंने कई असुर मारे और गोप-गोपियों के साथ क्रीड़ाएं करते हुए सम्पूर्ण सृष्टि को प्रेम की गहनता और आनंद का अनुभव कराया। वहीं उन्होंने गौओं की सेवा की आवश्यकता को प्रतिपादित किया और स्वयं गौ-चारण करके भारतीय संस्कृति को ऐसी अनुपम देन दी जो आज भी हमारी गौरवमयी थाती है। हजारों हिन्दुओं ने गायों की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये हैं।

    वृंदावन में ही भगवान श्रीकृष्ण ने जगत्जननी, मां लक्ष्मी की अवतार राधारानी के साथ लीलाएं कीं। क्या प्रशांत भूषण इस बात को समझ सकते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण ही राधा हैं। राधा नामक कोई पृथक् अस्तित्व है ही नहीं। श्रीकृष्ण ही राधा का रूप धरकर भक्त के हृदय की विकलता, उसके उल्लास और आनंद का अनुभव करते हैं।

    क्या प्रशांत भूषण इस बात को समझ सकते हैं कि विष्णु कभी लक्ष्मी का स्पर्श नहीं करते। हर क्षण वेदों के उच्चारण में लीन ब्रह्माजी की पुत्री सरस्वती हैं, कामदेव को भस्म करने वाले भगवान भोलेनाथ और शैलपुत्री के पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं, वहीं भगवान विष्णु और लक्ष्मी का न कोई दाम्पत्य जीवन है और न संतान है। जब विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया तो सीताजी ने अपनी मानसिक शक्ति से लव और कुश को जन्म दिया। जब भगवान, श्रीकृष्ण के अवतार में आये तो उन्होंने राधाजी से विवाह नहीं किया। रुक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बाली तो उनकी लौकिक लीलाओं का हिस्सा हैं जो द्वारिकाधीश की रानियां हैं।

    किशोरावस्था में पैर रखते ही भगवान को कंस का वध करने के लिये मथुरा जाना पड़ा। मथुरा का शाब्दिक अर्थ है- देहासक्ति से विक्षुब्ध मन! कंस को वध करके उन्होंने सम्पूर्ण ब्रज मण्डल को सुखी बनाया और वे मथुरा के राजा हो गये। इसके बाद उन्होंने कभी गोकुल या वृंदावन में पैर नहीं रखा। भगवान से देहासक्ति से विक्षुब्द मथुरा में निवास किया। तब क्या अपनी किशोरावस्था अथवा युवावस्था में लड़कियों को छेड़ने के लिये भगवान अपने राजमहलों से निकलकर मथुरा की गलियों में घूमते रहे होंगे! मथुरा से वे अपनी प्रजा को जरासंध के आक्रमणों से बचाने के लिये द्वारिका ले गये। द्वारिका का राजा रहते हुए उन्होंने जरासंध द्वारा भेजे गये भयानक योद्धा कालयवन का मुचुकुंद ऋषि से वध करवाया। उसके बाद उन्होंने पाण्डु-पुत्र भीम और अर्जुन के साथ मगध पहुंचकर आततायी राजा जरासंध का वध करवाया।

    भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक एक अत्याचारी राजा का वध किया। उसके रनिवास में सोलह हजार एक सौ महिलाएं, गुलामों की तरह नारकीय जीवन व्यतीत करती थीं। भगवान ने उन समस्त स्त्रियों को अभयदान दिया तथा उनकी ही प्रार्थना पर भगवान ने उन्हें अपनी पत्नी कहना स्वीकार किया। अब श्रीकृष्ण की रानियां कहलाने वाली ये सोलह हजार एक सौ शोषित, पीडि़त एवं बेसहारा स्त्रियां हर तरह से सुरक्षित थीं। कोई उनकी तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकता था।

    वे श्रीकृष्ण ही थे जिन्होंने भारत भूमि पर तिलचट्टों की तरह फैल गये बुरे राजाओं के सामूहिक विनाश की रूपरेखा तैयार की जिसकी परिणति महाभारत में हुई। अग्रसेन जैसे कुछ अच्छे राजाओं को इस युद्ध से दूर रखा गया और युधिष्ठिर को भारत का सम्राट बनाया गया। भारत के समस्त बुरे राजा, श्रीकृष्ण द्वारा मचाई गई विनाश लीला में तिनकों की तरह जल कर नष्ट हो गये।

    वे श्रीकृष्ण ही थे जिन्होंने युद्ध के मैदान में क्षत्रिय राजकुमार अर्जुन को श्रीमद्भगवत् गीता का उपदेश दिया। एक ऐसा उपदेश जिसे ईश्वर की कृपा से युक्त मेधा वाला व्यक्ति ही समझ पाता है। श्रीमद्भागवत् हिन्दू मेधा की पराकाष्ठा है। हिन्दू इसके नाम पर प्राण न्यौछावर करते हैं। इसका नाम लेने के बाद मिथ्या सम्भाषण नहीं कहते, चाहे प्राण ही क्यों न चले जायें!

    प्रशांत भूषण ने जो कुछ कहा है वह ठीक वैसा ही है जैसा कुछ विकृत मानसिकता के लोगों ने दुर्गा माता के सम्बन्ध में अनर्गल प्रलाप किया था। ईश्वरीय कृपा से विहीन व्यक्ति ही ऐसा प्रलाप कर सकता है जैसा कि प्रशांत भूषण ने किया है। क्या विश्व की किसी भी तामसिक शक्ति में ऐसा साहस है कि वह एण्टी-कृष्ण-स्क्वायड बना सके! फिर भी यदि किसी के मस्तिष्क में कीड़े कुलबुलाते हैं तो प्रयास करके देखे, कंस, जरासंध, नरकासुर और दुर्योधन की तरह स्वयं ही नष्ट हो जाएंगे। यह सनातन-पुरातन भारतीय संस्कृति तो इसी तरह काल के प्रवाह के साथ चिरंतन बनी रहेगी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और यशोधरा राजे की बातों का सच क्या है !

     03.06.2020
    मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और  यशोधरा राजे की बातों का सच क्या है !

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    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 31 मार्च को भिण्ड में एक वक्तव्य दिया कि ग्वालियर का सिंधिया राजा अंग्रेजों के साथ मिल गया था तथा सिंधिया ने भिण्ड की जनता पर जुल्म ढाये। उसके बाद मध्य प्रदेश भाजपा के कुछ और वरिष्ठ नेताओं ने भी इस बात को दोहराया। शिवराजसिंह मंत्रिमण्डल में कैबीनेट मंत्री जो कि ग्वालियर के अंतिम राजा जीवाजीराव सिंधिया की पुत्री हैं, ने कहा इस पर प्रतिक्रिया दी कि राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपनी दो पुत्रियों यशोधरा राजे तथा वसुन्धरा राजे के आभूषण बेचकर भारतीय जनता पार्टी को खड़ा किया, अब अपने ही आरोप लगा रहे हैं। इन दोनों वक्तव्यों का सच क्या है, देश के सामने आना चाहिये। क्योंकि शिवराजसिंह, यशोधरा राजे तथा वसुन्धरा राजे, तीनों ही सार्वजनिक जीवन में हैं। उन लोगों को सच जानने का अधिकार है जिनके वोट लेकर ये नेता, देश की जनता पर शासन कर रहे हैं। सबसे पहले शिवराजसिंह के वक्तव्य का सच जानने का प्रयास करते हैं।

    क्या ग्वालियर के राजा अंग्रेजों से मिल गये थे!

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत की लगभग साढ़े छः सौ रियासतों में से केवल 43 रियासातों से वर्ष 1817-18 में अधीनस्थ सहायता की संधियां की थीं जिनमें ग्वालियर रियासत भी सम्मिलित थी। इस संधि के तहत ग्वालियर राज्य की सुरक्षा का भार ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ले लिया तथा ग्वालियर के राजा ने अंग्रेजी सेना को अपने खर्चे पर ग्वालियर में रखना स्वीकार कर लिया। ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय जयाजीराव सिंधिया ग्वालियर का राजा था। सिंधिया ने क्रांतिकारी सैनिकों के विरुद्ध, अंग्रेजों की सहायता की। इस पर तात्यां टोपे ने ग्वालियर राज्य पर आक्रमण कर दिया। ग्वालियर के राजा को अपनी सेना में केवल 3000 सैनिक तथा 32 तोपें रखने का अधिकार था। टोपे ने सिंधिया की सेना तथा राजधानी पर अधिकार कर लिया।

    अपने सैनिकों को विद्रोही हुआ देखकर जयाजीराव सिंधिया घोड़े पर बैठकर भाग निकला। एक अंग्रेज इतिहासकार ने लिखा है कि ग्वालियर का राजा घोड़े की पीठ से तब तक नहीं उतरा जब तक कि वह दिल्ली नहीं पहुंच गया। सिंधिया ने अंग्रेजी सेनापतियों से सहायता की याचना की। सर ह्यूरोज ने बड़ी सेना लेकर ग्वालियर पर आक्रमण किया। अंततः तात्यां टोपे परास्त होकर दक्षिण भारत की तरफ चला गया। अंग्रेजों ने सिंधिया को फिर से ग्वालियर की गद्दी पर बैठाया। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड केनिंग ने लिखा है कि यदि मुसीबत की इस घड़ी में ग्वालियर ने सहायता नहीं की होती तो मुझे अपना बोरिया बिस्तर बांधकर इंग्लैण्ड के लिये रवाना होना पड़ता। यहां से ग्वालियर और अंग्रेजों का नया रिश्ता आरम्भ हुआ जो भारत के आजाद होने तक चलता रहा।

    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जो वक्तव्य दिया है उसका परिप्रेक्ष्य यही घटना है। यह सही है कि 1857 में ग्वालियर मध्य भारत की सर्वाधिक शक्तिशाली रियासत थी जिसकी दूरी दिल्ली से बहुत अधिक नहीं थी। यदि ग्वालियर ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ दिया होता तो 1857 की क्रांति का परिणाम कुछ और ही होता।

    सिंधिया द्वारा दी गई सहायता के बदले अंग्रेजों ने उसे अपनी सेना में 5 हजार सिपाही तथा 36 तोपें रखने का अधिकार दिया। उसे बहुत सी भूमि भी ईनाम में दी गई। ई.1877 में उसे भारत की उन छः बड़ी रियासतों- हैदराबाद, मैसूर, बड़ौदा, कश्मीर त्रावणकोर तथा ग्वालियर में सम्मिलित किया गया जिनके राजाओं को 21 तोपों की सलामी का अधिकार मिला। इन छः राजाओं को देश के अन्य राजाओं की तुलना में अधिक अधिकार प्राप्त थे। अन्य राजाओं को 19 से लेकर 9 तोपों की सलामी दी जाती थी।

    जयाजीराव सिंधिया का पुत्र माधवराव सिंधिया इतना प्रभावशाली था कि इंग्लैण्ड का राजा जॉर्ज पंचम अपनी रानी मेरी सहित ग्वालियर आकर, सिंधिया का अतिथि हुआ। सिंधिया ने अपने राजमहल के डाइनिंग हॉल में चांदी की एक रेलगाड़ी बनवा रखी थी जो भोजनशाला से 200 व्यक्तियों का भोजन लेकर डाइनिंग टेबल तक आती थी। अतिथिगण उस ट्रेन से भोजन लेकर अपनी प्लेटों में रखते थे। जब इंग्लैण्ड के राजा और रानी ग्वालियर आये तो उनके लिये भी इसी ट्रेन में भोजन लाया गया। दुर्भाग्य से यह ट्रेन ठीक उसी समय पटरी से उतर गयी जब वह इंग्लैण्ड के राजा के सामने थी। उसमें रखा भोजन जॉर्ज पंचम पर गिर पड़ा और उसके सारे कपड़े खराब हो गये। जॉर्ज पंचम को इस असहज स्थिति में देखकर माधवराव सिंधिया की हालत खराब हो गई। दीवान जरमनी दास ने लिखा है कि माधवराव ने अपने दो बच्चों के नाम राजा-रानी के नाम पर रखकर अपनी साख बचाई। इस घटना के बाद महाराजा माधवराव के पुत्र जीवाजी राव का नाम बदलकर जॉर्ज जीवाजीराव हो गया।

    जब कांग्रेस के नेतृत्व में देश की आजादी का आंदोलन चला तो महाराजा माधवराव सिंधिया, कांग्रेस का विरोधी हो गया। दीवान जरमनी दास ने लिखा है कि महाराजा ग्वालियर ने ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर अपने कर्मचारी नियुक्त कर रखे थे जो ट्रेन से उतरने वाले यात्रियों के सिर से गांधी टोपी उतार लेते थे। महाराजा को उस दिन बहुत खुशी होती थी जिस दिन वे सौ टोपियां जमा कर लेते थे।

    जून 1925 में माधवराव सिंधिया की मृत्यु हुई और उसके 9 वर्षीय पुत्र जॉर्ज जीवाजी राव को ग्वालियर का राजा बनाया गया। वयस्क होने पर नवम्बर 1936 में उसे राज्याधिकार प्राप्त हुए। वी. पी. मेनन ने लिखा है कि जीवाजी राव खुले विचारों वाला सुसंस्कारित राजा था। वह समय के साथ चलने वाला था। उसने ग्वालियर रियासत से बाहर बड़े उद्योगों में निवेश करके, ग्वालियर राज्य को भारत की सर्वाधिक धनी रियासतों में से एक बना दिया था। दिसम्बर 1946 में उसने अपने राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना करने की मंशा जताई तथा मई 1947 में उसने अपने राज्य के भीतर बनी लोकप्रिय सरकार को समर्थन देने की घोषणा की। उसने इस सरकार के नेतृत्व में राज्य की जनता के लिये बनने वाले संविधान के निर्माण में भी सहयोग देने की घोषणा की।

    द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जब भारत की आजादी की कार्यवाहियां तेज हुईं तो चैम्बर ऑफ प्रिंसेज के चांसलर भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां ने जिन्ना के साथ मिलकर एक षड़यंत्र रचा जिसके तहत भारतीय राजाओं को पाकिस्तान में मिलने के लिये तैयार करना था।

    ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारतीय राजाओं को यह छूट दी थी कि वे चाहें तो भारत में मिलें, या पाकिस्तान में मिलें या अपने राज्यों के अलग गुट बनाकर अलग-अलग देश बना लें, या कोई भी राज्य स्वयं को भारत और पाकिस्तान की तरह स्वतंत्र देश बना ले। भोपाल का नवाब इसी छूट का लाभ उठाते हुए भारतीय राजाओं को भावी पाकिस्तान में मिलने या भारत से अलग देश बनाने के लिये प्रेरित कर रहा था।

    भारत के हिन्दू राजा, भोपाल नवाब की इस चेष्टा से सहमत नहीं थे जिसके अनुसार भारत के तीन टुकड़े कर दिये जायें। पहला टुकड़ा हिन्दू आबादी वाले ब्रिटिश प्रांतों का, दूसरा टुकड़ा मुस्लिम आबादी वाले ब्रिटिश प्रांतों का तथा तीसरा टुकड़ा देशी राज्यों के राज्यसंघ का। हिन्दू राजा समझ गये कि जिन्ना तथा हमीदुल्ला खां द्वारा भारत के विरुद्ध एक खतरनाक षड़यंत्र रचा गया है। इसलिये बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, पटियाला एवं ग्वालियर के राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल के चांसलर हमीदुल्ला खां के विरुद्ध अपना मोर्चा बना लिया ताकि जिन्ना तथ हमीदुल्ला द्वारा चली जा रही कपट चालों का मुकाबला किया जा सके।

    इससे पहले कि जिन्ना के षड़यंत्र का कुछ परिणाम सामने आता, 21 तोपों की सलामी का अधिकार रखने वाले 5 राजाओं- मैसूर, बड़ौदा, कश्मीर त्रावणकोर तथा ग्वालियर ने परस्पर सलाह करके भारत में मिलने की घोषणा कर दी। इस घोषणा से मुहम्मद अली जिन्ना तथा हमीदुल्लाखां के षड़यंत्र पर पानी फिर गया तथा एक मजबूत भारत के निर्माण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि हैदराबाद, जूनागढ़ और काश्मीर अभी भी भारत से अलग रहने का प्रयास कर रहे थे।

    ग्वालियर के राजा ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में दी गई छूट का लाभ उठाते हुए अपनी निकटवर्ती रियासातों के राजाओं के साथ एक संधि पत्र पर भी हस्ताक्षर किये जिसके तहत इन रियासतों द्वारा यह व्यवस्था स्वीकार की गई कि यह गुट स्वतंत्र भारत के अंदर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाकर रहेगा।

    ग्वालियर द्वारा मध्य भारत यूनयिन में सम्मिलित होने का विरोध

    जब देश आजाद हो गया तब सरदार पटेल ने मध्य भारत की 25 रियासतों को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में गठित करना चाहा। तब ग्वालियर का राजा जॉर्ज जीवाजी राव तथा उसकी रानी विजयाराजे सिंधिया, सरदार पटेल के इस कार्य के विरोधी हो गये। क्योंकि ग्वालियर, भारत की उन बड़ी रियासतों में से था जिन्हें भारत की आजादी से पहले, सरदार पटेल द्वारा दिलाये गये भरोसे के अनुसार अपनी रियासत को स्वतंत्र भारत के भीतर स्वतंत्र राज्य के रूप में बनाये रखने का अधिकार था।

    मानकेकर ने लिखा है- ‘‘महाराजा (जीवाजी राव सिंधिया) की बजाय महारानी (विजयाराजे सिंधिया, असली नाम लेखा दिव्येश्वरी देवी, जो नेपाल के शक्तिशाली राणा परिवार की पुत्री थीं), ग्वालियर राज्य को स्वतंत्र बनाये रखने के लिये अधिक अड़ी हुई थीं।’’ उन्होंने जनता की सहायता से, ग्वालियर राज्य को किसी अन्य इकाई में विलय नहीं किये जाने के लिये बड़ा आंदोलन खड़ा कर लिया था। सरदार पटेल भारत की प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत देशी राज्यों की राजशाही को बनाये रखने के लिये किसी भी तरह तैयार नहीं थे। उन्होंने महाराजा जीवाजी राव तथा उनकी महारानी विजयाराजे को अपने बंगले पर लंच के लिये आमंत्रित किया। जब यह दम्पत्ति सरदार के बंगले पर पहुंचा तो सरदार ने मजाकिया लहजे में कहा कि आप अपने पति को लेकर भयभीत हैं जो कि अपना मुकुट खोने जा रहे हैं। महारानी ने कठोर लहजे में जवाब दिया कि आपको इस सम्बन्ध में निर्णय लेने से पहले ग्वालियर रियासत की जनता का पक्ष सुनना चाहिये।

    जब लंच पर बात नहीं बनी तो वी. पी. मेनन शाम को महारानी से मिलने होटल मेडियन गये और डिनर के बाद रात 10 बजे से रात 2 बजे तक रियासत के विलय पर महारानी से बहस करते रहे। चार घण्टे की लम्बी बहस के बाद महारानी थक गई और समझ गई कि सरदार के दृढ़ निश्चय के समक्ष झुक जाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। रानी की हाँ के बाद मेनन ने महाराजा को स्पष्ट रूप से सूचित कर दिया कि सरदार पटेल निर्णय ले चुके हैं कि ग्वालियर रियासत का मध्य भारत प्रांत में विलय किया जायेगा। आप अकेले ऐसे राज्य नहीं हैं जिनकी रियासत स्वतंत्र रहने के लिये सक्षम है। हैदराबाद तथा मैसूर के अतिरिक्त प्रत्येक रियासत का विलय होना अवश्यम्भावी है। मेनन ने महाराजा को प्रलोभन दिया कि उन्हें रियासतों के विलय के बाद गठित नई इकाई का संवैधानिक प्रमुख अर्थात् महाराज प्रमुख बना दिया जायेगा। मेनन ने यह भी लालच दिया कि यदि महाराजा इस समय हाँ करते हैं तो उनके प्रिवीपर्स तथा सम्पत्तियों की रक्षा की गारण्टी केन्द्र सरकार देगी, उन्हें स्थानीय नेताओं की मर्जी पर नहीं छोड़ा जायेगा। मेनन ने यह भी धमकी दी कि यदि सिंधिया, भारत सरकार की बात मानने से मना करता है, तो ये सारी सुविधाएं इंदौर को दे दी जायेंगी।

    महाराजा समझ गया कि उसके सामने, पटेल और मेनन की बातें मानने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है। अंत में 28 मार्च 1948 को जवाहरलाल नेहरू ने मध्य भारत यूनियन का उद्घाटन किया तथा सिंधिया को राजप्रमुख एवं इंदौर के होलकर को उपराजप्रमुख बनाया गया।

    यशोधरा राजे के वक्तव्य का सच

    अब यशोधरा राजे के उस वक्तव्य पर विचार किया जाना चाहिये जिसमें उन्होंने कहा है कि राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपनी दो पुत्रियों यशोधरा राजे तथा वसुन्धरा राजे के आभूषण बेचकर भारतीय जनता पार्टी को खड़ा किया, अब अपने ही आरोप लगा रहे हैं। क्या यह सच हो सकता है कि भारत की सबसे धनी रियासत जो आकार में ग्रीक देश के बराबर थी, की पूर्व महारानी को अपनी बेटियों के आभूषण बेचकर एक राजनीतिक दल खड़ा करना पड़े!

    सरदार पटेल के सचिव, रियासती विभाग के सचिव तथा लॉर्ड माउण्टबेटन के राजनीतिक सलाहकार रहे वी. पी. मेनन ने लिखा है- ग्वालियर के राजा ने दो फण्ड बना रखे थे, पहले फण्ड का नाम था- ग्वालियर इन्वेस्टमेंट फण्ड तथा दूसरे फण्ड का नाम था- गंगाजली फण्ड। भारत की आजादी के समय इन दोनों फण्डों की कुल राशि 17 करोड़ रुपये थी। भारत सरकार ने इन दोनों फण्डों का अधिग्रहण कर लिया। साथ ही राजकीय कोष में 3.09 करोड़ रुपये की नगदी थी, इसका भी अधिग्रहण कर लिया गया।

    ग्वालियर रियासत के गंगाजली फण्ड का इतिहास बहुत रोचक है। इस फण्ड की स्थापना इसलिये की गई थी कि यदि कभी सिंधियाओं को अपना राज्य छोड़ना पड़े तो इस कोष की राशि को वे अपने साथ ले जा सकें। इस फण्ड को खड़ा करने के लिये सिंधिया राजघराने ने एक अनोखा तरीका अपनाया। जब भी राजपरिवार में कोई नया आभूषण बनवाया जाता तो पुराने आभूषण को एक बड़े जार अर्थात् गंगाजली में डाल दिया जाता। साथ ही यदि कोई नगद राशि भी बची हुई होती तो उसे भी इसी जार में डाल दिया जाता। इस प्रकार यह फण्ड खड़ा हो गया। इसी प्रकार सिंधियाओं ने औद्योगिक क्षेत्र में निवेश करके एक और फण्ड खड़ा किया जिसे ग्वालियर इन्वेस्टमेंट फण्ड कहा जाता था। इन दोनों फण्डों की सम्मिलित राशि इतनी अधिक थी कि इसके ब्याज से मध्य भारत यूनियन के समस्त 25 राजाओं के प्रिवीपर्स की राशि का भुगतान किया जा सकता था।

    16 जुलाई 1961 को जीवाजीराव का निधन हो गया तथा 1970 के दशक में राजमाता विजयाराजे सिंधिया और उनके इकलौते पुत्र माधवराव सिंधिया के बीच सम्पत्ति को लेकर विवाद हुआ जिसकी अनुमानित कीमत 1000 करोड़ रुपये थी। माता तथा पुत्र दोनों ने ही इस सम्पत्ति को अपने अधिकार में लेने की चेष्टा की तथा बहुत सी सम्पत्ति बेच दी। वर्ष 1990 में माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी दादी राजमाता विजयाराजे तथा अपने पिता माधवराव के विरुद्ध कोर्ट में मुकदमा दायर किया कि इन दोनों को हमारी पैतृक सम्पत्ति को खुर्द-बुर्द (डिस्पोज) करने से रोका जाये। इस सम्पत्ति के अंतर्गत स्वर्ण, जवाहरात, आभूषण, पेंटिंग्स, गलीचे, झाड़-फानूस, 80 एकड़ में ग्वालियर में स्थित बकिंघम पैलेस जैसे कई महल, दिल्ली, मुम्बई, पूना, उज्जैन तथा आदि शहरों में फैली हुई कोठियां इसमें सम्मिलित थीं। एक बार आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने ग्वालियर राजमहल से 53 क्विंटल चांदी जब्त की थी जो आपात काल के बाद वापस ग्वालियर राजपरिवार को लौटा दी गई। दिल्ली में 40 एकड़ भूमि में जो सिंधिया पौटेरी नाम जागीर थी, अकेले इसकी कीमत 1990 के दशक में 300 करोड़ आंकी गई थी। इस विशाल सम्पत्ति को लेकर दिल्ली, मुम्बई, पूना, ग्वालियर तथा जबलपुर के न्यायालयों में 50 से अधिक मुकदमे चले।

    इतनी विशाल सम्पदा की स्वामिनी अपनी बेटियों के गहने बेचकर भारतीय जनता पार्टी का निर्माण कर रही थी, यह बात सुनकर ही हँसी आ सकती है। यह निश्चित है कि विजया राजे ने पार्टी की आर्थिक सहायता की होगी किंतु उन्होंने अपनी बेटियों के धन से पार्टी खड़ी की, यह बात सही नहीं है। विजया राजे ने भाजपा के निर्माण के लिये ग्वालियर क्षेत्र से बाहर शायद ही कोई सहायता दी हो। यह अवश्य स्वीकार किया जा सकता है कि उनके द्वारा दी गई सहायता ग्वालियर क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे स्थानीय नेताओं को दी गई होगी।

    खिलाड़ी है कोई अनाड़ी है कोई!

    शिवराजसिंह चौहान तथा यशोधरा राजे द्वारा दिये गये वक्तव्यों पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विवेचन किया गया है। कौन कितना सच बोल रहा है, इसका निर्णय पाठकों पर छोड़ा जाता है। आलेख का समापन करते हुए एक पंक्ति मेरे मस्तिष्क में गूंज रही है- खिलाड़ी है कोई, अनाड़ी है कोई।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • गंगा-जमुनी संस्कृति

     03.06.2020
    गंगा-जमुनी संस्कृति

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    एक समय था जब देश के प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालयों एवं निवासों में इफ्तार की दावतों के दृश्य दिखाई देते थे। एक ये समय है कि कहीं प्रधानमंत्री गंगाजी की आरती कर रहे हैं, कहीं मुख्यमंत्री नौरतों में नौ-दुर्गाओं को जिमा रहे हैं। कहीं गायों को चारा खिलाया जा रहा है। कहीं माताएं हाथों में सोटे लेकर शराब की दुकानें तोड़ रही हैं। यह है गंगाजी की संस्कृति --------------।

    कुछ लोग इन दृश्यों से विचलित हैं। पुराने वाले दृश्यों में उन्हें साम्प्रदायिक सौहार्द दिखाई देता था, अब हिन्दू कट्टरता दिखाई दे रही है। अरे भई गंगा-जमुनी संस्कृति में कभी गंगाजी भी तो दिखाई दें। सो दिखाई दे रही हैं।

    ये जमुनाजी कब से अलग तरह की संस्कृति का प्रतीक बन गईं ! जमनाजी की भी वही संस्कृति है जो गंगाजी की है। श्रीकृष्ण का सुदर्शन इस संस्कृति का रक्षक है। ये दोनों एक ही हैं, शब्दजाल बुनकर इन्हें अलग-अलग संस्कृतियों के बिम्ब के रूप में दिखाया जा रहा है। दजला-फरात की संस्कृति को जमनी संस्कृति कहा जा रहा है।

    श्रीराम का धनुष ही श्रीकृष्ण का सुदर्शन है, वही दुर्गाजी और भोले नाथ का त्रिशूल है। जो वेदों में लिखा है वही सूर के पदों में समाया है। वही गीता का ज्ञान है, वहीं दुर्गा सप्तशती की स्तुतियां हैं। यदि इनमें कुछ नहीं है तो वह चीज है, राजनीतिक लोगों अर्थात् वोटों के लुटेरों और भिखारियों द्वारा बुने जा रहे शब्दों के कूटजाल। जिन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव, धर्म-निरेक्षता, डीएनए की समानता और गंगा-जमुनी संस्कृति की एकता की बातों के सुनहरे शब्दजाल बुने हैं।। इन बातों ने भारत माता, गौ माता और मातृशक्ति को बड़ी मुसीबतों में फंसा दिया है। 

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