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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-116

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-116

    भविष्य के चीनी आक्रमण का पूर्वाभास था सरदार पटेल को


    पटेल का नेहरू को लिखा ऐतिहासिक पत्र

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    नई दिल्ली,

    7 नवंबर 1950

    मेरे प्रिय जवाहरलाल, मेरे अहमदाबाद से लौटने और उसी दिन हुई समिति की बैठक के बाद से, जिसकी जानकारी मुझे उसके शुरू होने से केवल 15 मिनट पहले मिली थी और मुझे अफसोस है कि उस कारण में उससे संबंधित दस्तावेज भी नहीं पढ़ पाया, मैं तिब्बत के बारे में चिन्तित हूं, मैंने सोचा कि मुझे अपने विचार तुम्हारे साथ बांटने चाहिए।

    मैंने अपने विदेश मंत्रालय और पीकिंग में हमारे राजदूत तथा उनके जरिए चीनी सरकार के बीच हुए सारे पत्रव्यवहार को पढ़ा है, मैंने इस पत्रव्यवहार को अपने राजदूत तथा चीनी सरकार को अनुकूल ढंग से पढ़कर पेश करने की कोशिश की, परंतु मुझे यह कहते हुए दुःख हो रहा है कि इस अध्ययन के बाद उनमें से कोई भी मेरी आंखों में खरा नहीं उतरा। चीनी सरकार ने शांति के इरादों का प्रवचन करके हमें धोखा दिया है। मुझे लगता है कि उन्होंने मौका देखकर हमारे राजदूत को शांतिपूर्वक ढंग से तिब्बत की समस्या सुलझाने का झांसा देकर उनके मन में अपनी जगह बना ली थी।

    निस्संदेह जब यह पत्रव्यवहार चल रहा होगा तब चीनियों ने तिब्बत पर आक्रमण करने की सारी योजना तैयार कर ली होगी। ऐसा लगता है कि चीनी अंत में हमसे विश्वासघात करेंगे। सबसे दुःख की बात यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया। उन्होंने अपने मार्गदर्शन के लिए हम पर भरोसा किया, हम उन्हें चीनी कूटनीतिक जंजाल या चीनी दुर्भाव से बचाने में असमर्थ रहे। हाल में जन्मी परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है कि हम दलाई लामा को नहीं बचा पाएंगे।

    हमारे राजदूत को चीनियों द्वारा अपनाई नीतियों और किए गए कर्मों के स्पष्टीकरण और उसकी सफाई ढूंढने में बहुत कष्ट झेलने पड़े हैं। जैसे कि विदेशी मामलों के मंत्रालय द्वारा भेजे गए एक तार में बताया गया था कि जब चीनी सरकार के समक्ष हमारे दूत ने हमारी ओर से एक या दो मुद्दों पर आपत्ति प्रकट की तो उन्हें उनकी ओर से ढीलापन और फिजूल की माफियां देखने को मिलीं। क्या कोई भी समझदार व्यक्ति इस बात को मान सकता है कि चीन को तिब्बत में एंग्लो अमेरीकन गुप्त योजनाओं से किसी तरह का कोई खतरा हो सकता है। इसलिए, यदि चीनी इस बात को सच मानते हैं तो जाहिर सी बात है कि, उन्हें हम पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं होगा और हमें एंग्लो अमेरिकी राजनीति या उनकी योजनाओं की कठपुतली समझते होंगे।

    यदि आपके उनके साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क के बाद वे हमारे प्रति ऐसा सोचते हैं तो चाहे हम उन्हें अपना जितना गहरा मित्र समझें, वो बेशक हमें अपना दोस्त नहीं मानते। हमें उनकी इस साम्यवादी मनोवृत्ति 'जो भी उनके साथ नहीं है, उनके खिलाफ है' को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा। पिछले कई महीनों से रूसी खेमे से बाहर केवल हम अकेले ही चीन के यूएनओ में दाखिले के लिए और अमेरीकियों से फोरमोसा के मामले में आश्वासन लेने के लिए लड़ रहे हैं। हमने चीनियों की भावनाओं को शांत करने की, उनकी आशंकाओं को कम करने की और अमरीका, ब्रिटेन एवं यूएनओ के साथ हमारी वार्ताओं में उनकी जायज मांगों का समर्थन करने की हर मुमकिन कोशिश की है।

    इस सब के बावजूद चीन हमारी अरुचि से सहमत नहीं है, वह हमें शक की नजरों से लगातार देख रहा है और बाहर से देखो तो शक्की मानसिकता साफ दिखाई देती है जिसमें शायद थोड़ी शत्रुता भी मिली हुई है। मुझे नहीं लगता है कि हम चीन को अपने नेक इरादों, अपनी मित्रता और सद्भावना पर विश्वास दिलाने के लिए इससे ज्यादा और कुछ काम कर सकते हैं। पीकिंग में बैठा हमारा राजदूत जो हमारे इस मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण को उन तक पहुंचाने का सामर्थ्य रखता है, शायद वो भी इस काम में असफल हो गया है। उनके द्वारा भेजा गया आखिरी तार, एक सम्पूर्णतः असभ्य कार्य है, न केवल इसलिए क्योंकि चीनी ताकतों का तिब्बत में प्रवेश हमारे विद्रोह को नकारता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि हमारा रवैया विदेशी दबाव से प्रभावित है। ये किसी मित्र की नहीं बल्कि हेाने वाले शत्रु की भाषा लगती है।

    इसे पृष्ठभूमि में रखते हुए हमें अब, जैसा कि हम जानते थे, तिब्बत के विलुप्त हो जाने से और चीन का हमारे घर के दरवाजे तक विस्तार करने से, हमारे समक्ष खड़ी होने वाली नई परिस्थितियों के बारे में सोचना होगा। पूरे इतिहास में हमें कभी अपनी उत्तरपूर्वी सीमा के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ी है; उत्तरी दिशा में स्थित हिमालय पर्वत को सदा अभेद्य माना जाता रहा है; हमारे मित्र ने हमें कभी कोई परेशानी नहीं दी। चीनी विभाजित हैं। उनकी अपनी आंतरिक समस्याओं के कारण उन्होंने कभी हमें हमारी सीमाओं पर तंग नहीं किया।

    1914 में हमने तिब्बत के साथ संधि स्थापित की जिसे चीन की मंजूरी हासिल नहीं थी। हमें लगा कि तिब्बत का स्वशासन इस स्वतंत्र संधि की मान्यता के लिए काफी है। लेकिन हमें शायद उस पर चीन की मंजूरी भी हस्ताक्षरित करवा लेनी चाहिए थी। शायद चीन के लिए अधिराज्य के मायने कुछ और ही हैं। इसलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि बहुत जल्द चीनी, तिब्बत और हमारे बीच हुए अनुबन्धों से भी पल्ला झाड़ लेंगे। जिससे तिब्बत के साथ हुए सभी सीमांत और आर्थिक समझौते, जिन पर हम पिछली आधी सदी से काम करते आ रहे हैं, उबलते तेल की हांडी में जा गिरेंगे। चीन अब विभाजित नहीं रहा। वह संयुक्त और शक्तिशाली हो गया है।

    उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में हिमालय के साथ साथ सरहद के इस पार हमारी ऐसी आबादी है जो जातीय रूप से तिब्बतियों और मंगोलों से ज्यादा अलग नहीं है। अपरिभाषित सीमाओं और हमारी तरफ की आबादी की तिब्बतियों और चीनियों से समरूपता, आने वाले समय में चीन और हमारे बीच संकट पैदा कर सकती है।

    अर्वाचीन और कड़वा इतिहास हमें यह सीख देता है कि साम्यवाद, साम्राज्यवाद से बचने की ढाल नहीं है और साम्यवादी भी साम्राज्यवादियों या अन्य किसी और की भी भांति उतने ही अच्छे या बुरे हैं। चीन केवल हिमालय पर्वत के इस पार के हिस्से में नहीं बल्कि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों में भी दिलचस्पी रखता है। चीनियों की तो बर्मा पर नजर है; बर्मा की मुश्किल यह है कि उसके पास तो मैक मोहन लाइन भी नहीं, जिसके इर्द गिर्द वह कोई समझौता तैयार कर सके।

    चीनियों की अधिग्रहण नीति और साम्यवादियों का साम्राज्यवाद पश्चिमी ताकतों के विस्तारवाद या साम्राज्यवाद से भिन्न है। पहले के पास विचारधारा का वह चोगा है जो इसे दस गुना और खतरनाक बना देता है। विचारधारा के विस्तार के पीछे जातीय, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक दावे छिपे हैं। इसलिए, उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाला खतरा दोनों, साम्यवादी भी है और साम्राज्यवादी भी। जहां, हमारी सुरक्षा को पहले ही पश्चिम और उत्तरपश्चिमी दिशाएं ललकार रही थीं, अब उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से हमारे लिए नया खतरा पैदा हो गया है।

    इसलिए सदियों में पहली बार भारत को एक ही समय पर दो भिन्न दिशाओं में अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए खुद को एकत्रित करना होगा। अब तक हम पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए, जो हम से दुर्बल है, अपनी सुरक्षा योजनाएं तैयार करते आए हैं। अब हमें उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में बसे साम्यवादी चीन को ध्यान में रखते हुए तैयारियां करनी होंगी, एक ऐसा साम्यवादी चीन जिसके निश्चित लक्ष्य और उद्देश्य हैं और जिसके मन में किसी भी हाल में हमारे प्रति मित्रता की भावना दिखाई नहीं देती।

    इस सम्भावित तकलीफदेह सीमा की राजनैतिक परिस्थितियों पर भी हमें विचार कर लेना चाहिए। हमारी उत्तर और उत्तरपूर्वी सीमाओं में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र बसे हैं। संचारण के हिसाब से ये सभी इलाके बहुत कमजोर हैं। इनमें लगातार रक्षात्मक रेखाएं नहीं बनाई गई हैं।

    यहां से घुसपैठ करना बहुत आसान काम है। बहुत कम गलियारों में पुलिस सुरक्षा मौजूद हैं। जो चौकियाँ हैं, उन सब में भी हमारे सैनिक तैनात नहीं हैं। इन क्षेत्रों के साथ अपने सम्पर्क को हम किसी भी हाल में नजदीकी नहीं कह सकते। यहां पर रहने वाले लोग भारत के प्रति कोई विशेष निष्ठा भाव नहीं रखते। दार्जिलिंग तथा कैलिंगपौंग क्षेत्रों में भी मंगोली प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पिछले तीन वर्षों में हम नागा या असम की किसी भी अन्य पहाड़ी आदिवासी जाति की ओर कोई विशेष प्रशंसनीयस कदम नहीं बढ़ा सके हैं। यूरोपीय धर्मप्रचारक एवं अन्य अतिथि इन जातियों के सम्पर्क में अवश्य रहे हैं लेकिन इनका प्रभाव भारत के अनुकूल हरगिज नहीं था। कुछ समय पहले सिक्किम में कुछ राजनैतिक उत्तेजना हुई थी। हो सकता है कि वहां असंतुष्टि की भावना अभी भी सुलग रही हो।

    बाकियों की तुलना में भूटान थोड़ा शांत है लेकिन तिब्बती लोगों के साथ उसकी नजदीकियां हानिकारक हो सकती हैं। नेपाल में बल शक्ति पर आधारित, अल्पतंत्रीय शासन चल रहा है; यह वहां के उग्र नागरिकों तथा आधुनिक जमाने के प्रबुद्ध विचारों के बीच टकराव है। ऐसी परिस्थिति में लोगों को खतरे का अहसास दिलाना या उन्हें रक्षात्मक तौर पर दृढ़ बनाना एक बहुत मुश्किल कार्य है और इस मुश्किल को आसान करने का एकमात्र रास्ता है प्रबुद्ध दृढ़ता, ताकत और स्पष्ट नीतियां। मुझे पूर्ण विश्वास है कि चीनी और उनकी प्रेरणा के स्रोत सोवियत रूस, इन कमजोर कड़ियों का फायदा उठाने में कभी नहीं चूकेंगे, कुछ हद तक उनकी विचारधाराओं के समर्थन में और कुछ हद तक उनके लक्ष्यों के समर्थन में।

    मेरे विचार में ऐसी परिस्थिति में हम न तो नमनशील हो सकते हैं और न ही ढुलमुल सकते हैं। हमें न केवल अपने लक्ष्यों को स्पष्टतः साध लेना चाहिए परंतु उन तक पहुंचने के रास्तों को भी अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए। हमारे द्वारा की गई छोटी सी गलती लक्ष्यों के चुनाव में या फिर उन्हें कार्यान्वित करने हेतु लिए जाने वाले निर्णयों में से किसी तरह की ढील, हमें कमजोर बना देगी और हमारे सामने खड़ी साफ दिखाई दे रही धमकियों को और विशाल कर देगी।

    इन बाहरी खतरों के साथ साथ हमें अब आतंरिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा। मैंने पहले ही (एचवीआर) अयंगर को विदेश मंत्रालय को इन मामलों पर आसूचना विभाग की समीक्षा रिपोर्ट की एक नकल भिजवा देने के निर्देश दिए हैं। अब तक भारतीय साम्यवादी पार्टी को बाहरी देशों में साम्यवादियों से सम्पर्क साधने में या उनसे हथियार या कागज पत्री आदि की सप्लाई लेने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी। उन्हें इस काम के लिए पूर्व दिशा में स्थित कठिन बर्मी या पाकिस्तानी सीमाओं को प्रयोग में लाना पड़ रहा था या लंबे समुद्र तटों का सहारा लेना पड़ रहा था। अब इनके पास चीनी साम्यवादियों तक पहुंचने का एक आसान रास्ता उपलब्ध हो जाएगा, जिनके जरिए ये आराम से अन्य विदेशी साम्यवादियों तक भी पहुँच पाएंगे। गुप्तचरों, पांचवे स्तम्भ लेखकों एवं साम्यवादियों की घुसपैठ एक आम और आसान बात बन जाएगी।

    तेलंगाना और वारंगल में कहीं कहीं स्थित साम्यवादियों से निपटने की जगह हमें शायद अपनी उत्तरी और उत्तरपूर्वी सीमा के साथ बसी साम्यवादी चुनौतियों से भी जूझना होगा, अपनी गोला बारूद की सप्लाई के लिए वे सुरक्षित रूप से चीन में साम्यवादी आयुधशालाओं पर निर्भर कर सकते हैं। इस तरह, ये सारी परिस्थितियां हमारे सामने ऐसी मुश्किलें लेकर आई हैं जिन पर हमें तुरंत कोई निर्णय लेना होगा ताकि, जैसा मैंने पहले भी कहा था, हम अपनी नीतियों के उद्देश्य तय करके उनकी उपलब्धि का रास्ता इख्तियार कर सकें। यह भी स्पष्ट है कि हमारे द्वारा एक ऐसा व्यापक कदम उठाना चाहिए जिसमें न केवल हमारी रक्षात्मक नीति और तैयारी की स्थिति सम्मिलित हो बल्कि आतंरिक सुरक्षा की समस्या भी, जिससे हमें बिना एक क्षण बर्बाद किए निपटना चाहिए। हमें सीमा के कमजोर इलाकों में प्रशासनिक एवं राजनैतिक समस्याओं से भी निपटना होगा जिनका मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूँ।

    बेशक, मेरे लिए इन सभी समस्याओं का विस्तृत विवरण करना तो संभव नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं नीचे कुछ ऐसी समस्याओं के बारे में बात करने जा रहा हूँ, मेरे विचार में जिनका समाधान बहुत जल्द हो जाना चाहिए और जिनके इर्द गिर्द ही हमें अपनी प्रशासनिक तथा सैनिक नीतियां तैयार करके इन्हें लागू करने की योजना बनानी चाहिए।

    ए) भारतीय सीमाओं एवं आतंरिक सुरक्षा की चीनी चुनौतियों से होने वाले खतरे का आसूचना एवं सैन्य आकलन।

    बी) अपने सैन्य दलों की स्थिति का निरीक्षण और उनकी आवश्यक पुनः तैनाती, विशेष तौर पर उन क्षेत्रों एवं रास्तों की सुरक्षा को लेकर जिन पर भविष्य में विवादों की सम्भावना है।

    सी) अपने सुरक्षा दलों की ताकतों का मूल्यांकन और इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सेना की कटौती योजना पर पुनः विचार।

    डी) हमारी रक्षात्मक आवश्यकताओं पर चिरस्थाई सोच विचार। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम बंदूकों, गोलाबारूद तथा कवचित सप्लाई पर विशेष ध्यान नहीं देंगे तो हमारी रक्षात्मक स्थिति लगातार कमजोर पड़ती जाएगी और हम पश्चिम एवं उत्तरपश्चिम तथा उत्तर एवं उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाली दोहरी चुनौतियों के खतरों से लड़ने के योग्य नहीं रहेंगे।

    इ) जहां तक चीन के यूएनओ में प्रवेश का सवाल है, चीन से हमें मिले दो टूक जवाब और उनके तिब्बत की ओर रवैये को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि हमें और देर तक उनके दावों का समर्थन करना चाहिए। चीन की कोरीयन युद्ध में सक्रिय हिस्सेदारी को देखते हुए यूएनओ में शायद उन्हें बहिष्कृत करने का अप्रत्यक्ष खतरा होगा। हमें इस समस्या पर भी अपना रुख निर्धारित कर लेना चाहिए।

    एफ) अपनी उत्तरी एवं उत्तरपूर्वी सीमाओं को मजबूत करने के लिए हमारे द्वारा उठाए जाने वाले राजनैतिक एवं प्रशासनिक कदम। इसमें सम्पूर्ण सीमा सम्मिलित होगी यानि कि नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र।

    जी) सीमा क्षेत्रों तथा उनके बगल में बसे क्षेत्रों जैसे कि यूपी, बिहार, बंगाल एवं असम की आंतरिक सुरक्षा के उपाय।

    एच) इन क्षेत्रों तथा सेनाओं पर तैनात फौजी चौकियों के लिए सड़क, रेल, हवाई और बेतार संचारण विकास।

    आई) सीमा चौकियों की सुरक्षा एवं उनकी आसूचना।

    जे) ल्हासा तथा यांग्त्से और यतुंग की व्यापार चौकियों में हमारे मिशन का भविष्य और इन रास्तों की सुरक्षा के लिए तिब्बत में काम कर रहे हमारे रक्षा दल।

    के) मैकमोहन रेखा के संबंध में हमारी नीति।

    ये कुछ सवाल मेरे मन में उमड़कर मुझे परेशान करते हैं। हो सकता है कि इन मसलों पर सोचविचार हमें चीन, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन तथा बर्मा के साथ हमारे संबंधों के व्यापक प्रश्नों की ओर ले जाए। वैसे तो ये सब सवाल आम ही हैं लेकिन इनमें से कुछ एक प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण भी हो सकते हैं। जैसे कि हो सकता है हमें इस बात पर विचार करना पड़े कि क्या हमें बर्मा से हमारे संबंध घनिष्ठ करके उन्हें चीन से निपटने के लिए दृढ़ता मुहैया करवानी चाहिए। मुझे लगता है कि हम पर दबाव डालने से पहले चीन, बर्मा पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। चीन के साथ लगती सीमाएं पूरी तरह अपरिभाषित हैं, जिससे चीन, सीमा पर ठोस दावे कर सकता है। मौजूदा स्थिति में बर्मा चीन के लिए एक सरल मुश्किल पैदा करके हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।

    मेरा सुझाव है कि हमें जल्दी मिलकर इन समस्याओं पर व्यापक सोच विचार कर लेना चाहिए और तुरंत उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों पर भी निर्णय ले लेना चाहिए और इसके साथ ही अन्य समस्याओं पर भी फुर्तीली नजर दौड़ाते हुए उनसे निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर फैसला ले लेना चाहिए।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 22

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 22

    बन गई नेहरू की अंतरिम सरकार


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    लॉर्ड वैवेल ने कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुसार 2 सितम्बर 1946 को दिल्ली में अंतरिम सरकार का गठन करवाया। इसमें केवल कांग्रेसी नेता शामिल हुए। इस सरकार में जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। साथ ही सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, एम. आसफ अली, सी. राजगोपालाचारी, शरतचंद्र बोस, डॉ. जॉन मथाई, सरदार बलदेवसिंह, सर शफाअत अहमद खाँ, जगजीवनराम, सैयद अली जहीर ओर कोवेसजी होरमुसजी भाभा को मंत्री बनाया गया। पाँच पद स्थानापन्न रखे गए जो कि मुस्लिम लीग के लिए थे। कांग्रेस ने तीन गैर-मुस्लिम लीगी मुसलमानों को मंत्री बनाया था, यह मुस्लिम लीग के लिए किसी भी परिस्थिति में सह्य नहीं हुआ।

    जिन्ना ने घोषणा की- 'वायसराय ने मुस्लिम लीग और मुसलमानों पर जबर्दस्त चोट की है किंतु मुझे विश्वास है कि भारत के मुसलमान दृढ़ता और साहस से इस आघात को झेल लेंगे। इस अंतरिम सरकार में अपने लिए न्यायपूर्ण और सम्मानजनक भागीदारी हासिल करने में असफल रहने से उन्हें सबक मिलेगा। ..... मैं अभी कहता हूँ कि जो कदम उन्होंने उठाया है, उसमें न तो कोई बुद्धिमानी दिखाई है और न ही राजनीतिज्ञता का परिचय दिया है। इसके खतरनाक और गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। ऊपर से उन्होंने तीन मुसलमानों को नामजद करके हमारे आहत मन को और अधिक आहत किया है। जबकि उन्हें पता है कि उन्हें मुसलमान-भारत का सम्मान और विश्वास हासिल नहीं है।'

    कांग्रेस द्वारा अंतरिम सरकार की शपथ लेने की पूर्व संध्या पर 1 सितम्बर 1946 को बम्बई साम्प्रदायिक दंगों से थर्रा उठा। सेंडहर्स्ट रोड पर मुसलमानों के घरों पर काले झण्डे लहराने लगे। कर्फ्यू लगा दिया गया, सेना बुला ली गई परन्तु एक रात्रि तक चले हिंसा के अनुष्ठान में 35 लोगों की जान ले ली गईं और 175 व्यक्ति घायल हो गए। एक सप्ताह तक बम्बई में छिटपुट दंगे चलते रहे। 10 सितम्बर तक 200 नागरिकों की जान जा चुकी थी। कराची में भी हिंसा हुई किंतु लीग के मुख्यमंत्री शेख गुलाम हुसैन द्वारा प्रसारित शांति और सहिष्णुता की अपील से शहर के मुसलमानों को अपने जज्बात थामने में मदद मिली।

    सिंध के अंग्रेज मुख्य सचिव का कहना था- 'कलकत्ता की खौफनाक घटनाओं के कारण एक पक्ष तो मनहूस नाराजगी लिए बैठा है और दूसरा बेवकूफाना घबराहट का शिकार है।' मुख्य सचिव की रिपोर्ट के अनुसार दोनों समुदाय खुफिया तौर पर हथियारबंद होने में लगे हैं। 2 सितम्बर 1946 को जवाहरलाल ने अंतरिम सरकार का गठन किया तथा 7 सितम्बर को देश की जनता के नाम प्रसारित संदेश में नेहरू ने कहा- 'इस प्राचीन धरती पर एक नई सरकार बनी है। हम इसे अंतरिम या अस्थाई सरकार कहते हैं। ..... हमारी यह प्राचीन और प्यारी भूमि एक बार फिर तकलीफों और दुःखों से निकल कर अपनी अस्मिता प्राप्त कर रही है। एक बार फिर युवावस्था प्राप्त करके उसकी आंखों में साहस की चमक आई है। एक बार फिर उसने स्वयं में विश्वास और अपनी मंजिल के दर्शन किए हैं।'

    सरकार के शपथ लेने के कुछ दिना बाद अंतरिम सरकार के गैर-मुस्लिमलीगी मंत्री सर शफात अहमद खाँ को शिमला में मुस्लिम लीग के कट्टरपंथियों ने चाकू से सात बार गोद डाला। वैवेल द्वारा बार-बार प्रयास किए जाने पर तथा नेहरू द्वारा अपने मंत्रिमण्डल से गैर-मुस्लिम लीगी मुसलमान मंत्रियों एवं सुभाष चंद्र बोस के भाई शरत्चंद्र बोस को मंत्रिमण्डल से हटा दिए जाने पर मुस्लिम लीग ने भी अंतरिम सरकार में शामिल होने की स्वीकृति दे दी ताकि कांग्रेस सरकार को परेशान किया जा सके। मुस्लिम लीग की तरफ से लियाकत अली, आई. आई. चुंदरीगर, अब्दुल रब निश्तर और जोगेन्द्रनाथ मण्डल मंत्री बनाए गए। जिन्ना ने जोगेन्द्रनाथ को संभवतः इसलिए मुस्लिम लीग की ओर से मंत्री बनवाया ताकि कांग्रेस यह दावा न करे कि वह देश के सम्पूर्ण हिन्दुओं का नेतृत्व करती है।

    2 नवम्बर को मुस्लिम लीग के सदस्य अंतरिम सरकार में सम्मिलित होने के लिए सौगंध लेने के लिए वायसराय भवन में गए। नेहरू भी वहाँ पर गए थे। इनकी मोटर गाड़ी भवन के बाहर खड़ी थी और कहा जाता है कि मुसलमान भीड़ ने मोटर गाड़ी को आग लगा दी। इसी दिन लियाकत अली इत्यादि मुसलमान नेता केन्द्रीय विधान सभा में भाग लेने के लिए आए जवाहर लाल की गाड़ी को मुसलमान भीड़ ने घेर लेने का यत्न किया और यदि उस समय कुछ हिन्दू युवक नेहरू को बचाने लिए उस मुस्लिम भीड़ पर आक्रमण न कर देते, तो नेहरू पर क्या बीतती, कहना कठिन है। उसी शाम दिल्ली के सदर बाजाद में मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने गाड़ियां रोक-रोक कर हिन्दुओं को मुसलमानों से पृथक् करके मारना आरम्भ कर दिया। हिन्दू भी उनके विरोध में उतर आए। इससे कई घण्टे तक मार-काट की स्थिति रही।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-117

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-117

    वायुयान दुर्घटना ने देश को चिंता में डाल दिया


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    29 मार्च 1949 को सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन तथा यादवेंद्र सिंह के साथ दिल्ली से वायुयान से राजस्थान के लिये रवाना हुए। बीच मार्ग में इंजन में खराबी आ गई तथा प्लेन का सम्पर्क रेडियो से कट गया। वायुयान के चालक ने वायुयान को नदी के पेटे में उतार लिया जिससे पटेल बच गये। जब पटेल वापस दिल्ली लौटे तो सैंकड़ों देशवासियों ने हवाई अड्डे पर उनका भव्य स्वागत किया।

    संसद में सांसदों ने पटेल का अभूतपूर्व स्वागत किया। उनके सम्मान में आधे घण्टे तक संसद की कार्यवाही रोक दी गई। पटेल को पंजाब विश्वविद्यालय तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि दी गई।

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  • सुभाषचंद्र बोस की सफलता से घबरा उठी कांग्रेस!

     03.06.2020
    सुभाषचंद्र बोस की सफलता से घबरा उठी कांग्रेस!

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    द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ होने के समय कांग्रेस अंग्रेजों से भारत को आजाद किये जाने के लिये संघर्ष कर रही थी तथा साथी ही देश को मुस्लिम लीग और 565 भारतीय राजाओं के हाथों खण्ड-खण्ड किये जाने से रोकने के प्रयास कर रही थी किंतु अगस्त 1942 के आते आते उसे एक नये मोर्चे पर जूझना पड़ा। इस नये मोर्चे की पृष्ठभूमि को समझने के लिये हमें इतिहास में कुछ वर्ष पीछे जाना पड़ेगा जब ई.1920 में महात्मा बालगंगाधर तिलक का निधन हुआ और उनके स्थान पर मोहनदास कर्मचंद गांधी ने कांग्रेस पर अपनी पकड़ बना ली।

    यहाँ से कांग्रेस ने नया अवतार लिया। अब वह देश को आजाद करवाने का संकल्प कम व्यक्त करती थी और देश में शांति तथा अहिंसा की स्थापना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करने में उत्साह अधिक दिखाती थी। यहाँ तक कि महात्मा की जो उपाधि अब तक तिलक को प्राप्त थी, अब वह खिसक कर गांधीजी के पास आ गयी। गांधीजी की इस नीति के प्रति सबसे पहला असंतोष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक शांतिवादी संगठन नहीं अपितु भारत की स्वतंत्रता का माध्यम है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का भी ऐसा ही बयान सामने आया। ऐसा लगने लगा कि कांग्रेस गांधीजी द्वारा की गयी सैद्धांतिक घेराबंदी से बाहर आने को छटपटा रही है। इस छटपटाहट का प्रभाव लक्षित हुआ ई.1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनावों में।

    मार्च 1939 में गांधीजी से तीव्र मतभेद रखने वाले सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में अपने आप को दुबारा खड़ा किया और गांधीजी के प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैया को हरा दिया। इससे नाराज होकर गांधीजी ने अपनी सारी ऊर्जा सुभाष बाबू को अध्यक्ष पद से हटाने में लगा दी। कांग्रेस को अंतर्कलह से बचाने के लिये सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेस ने उन्हें प्राथमिक सदस्यता से भी निकाल दिया। मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये। सुभाषचंद्र ने बम्बई जाकर वीर सावरकर से भेंट की। सावरकर ने उन्हें सलाह दी कि कांग्रेस अंग्रेजों के पुतले तोड़कर आजादी हासिल नहीं कर सकती। बेहतर होगा कि युद्ध में फंसे हुए अंग्रेजों पर हथियारों से चोट की जाये और उन्हें भारत छोड़ देने के लिये विवश कर दिया जाये। सावरकर ने सुभाष से कहा कि रास बिहारी बोस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जायें और अंग्रेजों के अंतराष्ट्रीय शत्रुओं से मिलकर भारत की आजादी की घोषणा करें। इस नवीन मार्गदर्शन के आलोक में सुभाष ने देश को आजाद करने का एक नया मास्टर प्लान तैयार किया। वे जर्मनी चले गये और हिटलर से मिलकर रेडियो बर्लिन से उन्होंने भारत की आजादी की घोषणा कर डाली। वे टोकियो और सिंगापुर भी गये और उन्होंने आजाद हिन्द फौज को अंग्रेजों के विरुद्ध झौंक दिया।

    अगस्त 1942 के आते-आते पूर्वेशिया में ब्रिटिश साम्राज्य के किले जापान द्वारा पिटने लगे। अंग्रेजी साम्राज्य की अपराजेयता को एशियाईयों ने एक मिथक सिद्ध कर दिया था। सिंगापुर, मलाया, बर्मा आदि में कल के मालिक अंग्रेज शरणार्थी बनकर हाय-तौबा मचा रहे थे। शरणार्थियों में भारतीय भी थे जो स्वदेश लौटना चाहते थे। जापानियों के सहयोग से सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज का जयनाद भारत भूमि के निकट आता जा रहा था। कांग्रेस की दुविधा यही थी।

    सुभाषचंद्र की सफलता कांग्रेस के लिये गले की हड्डी बन सकती थी। कांग्रेस को स्पष्ट दिखायी देने लगा था कि यदि सुभाष को भारत पर अधिकार करने में सफलता मिल जाती है तो भारत का शासन कांग्रेस के हाथों में नहीं आयेगा, अपितु सुभाषचंद्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज के हाथों में जायेगा। गांधीजी के अनन्य शिष्य जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि हम भारत की सड़कों पर सुभाष बाबू का सामना तलवारों से करेंगें। अहिंसा के पुजारी सत्ता दूर जाती देखकर तलवारों की भाषा में बात करने लगे थे! कांग्रेस को लगा कि यदि अंग्रेज भारत छोड़ देते हैं तो सुभाषचंद्र को भारत पर आक्रमण करने का नैतिक आधार नहीं रहेगा। इसलिये कांग्रेस ने अपने अब तक के रुख में जबर्दस्त पलटी मारी तथा अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया। गांधीजी ने आंदोलन के लिये इस बात को आधार बनाया कि जब तक अंग्रेज भारत में बने रहेंगे, तब तक भारत पर जापान के आक्रमण का खतरा बना रहेगा। स्वतंत्र भारत ही जापानियों का सक्षमता से मुकाबला कर पायेगा। कांग्रेस द्वारा अब तक शांतिपूर्ण तरीके से चलाये गये आंदोलनों के विपरीत भारत छोड़ो आंदोलन को हिंसक रूप दे दिया गया।

    7 अगस्त 1942 को बम्बई में आयोजित कांग्रेस में अत्यंत घबराये हुए स्वर में गांधीजी ने कहा कि मैं तत्काल स्वतंत्रता चाहता हूँ, यदि मिल सके तो आज रात, प्रभात होने से पूर्व ही.... अब स्वाधीनता के लिये सांप्रदायिक एकता की स्थापना होने तक नहीं रुका जा सकता....... कांग्रेस को अब या तो आजादी प्राप्त कर लेनी है या अपने आप को मिटा देना है..... याद रखिये कि यह आजादी कांग्रेस जनों की नहीं है बल्कि 40 करोड़ भारत वासियों की होगी..... आप सभी स्त्री पुरुषों को इसी क्षण से अपने को आजाद समझना चाहिये। और ऐसा आचरण करना चाहिये कि जैसे आपने साम्राज्यवाद का जुआ उतार फैंका है.........। इस सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से नाउ और नेवर तथा करो या मरो के नारे दिये गये। इसके बाद 11 अगस्त को बम्बई, पूना, अहमदाबाद, कानपुर तथा देश के अन्य नगरों में हिंसक आंदोलन फूट पड़ा।

    गोरे हैरान थे। जो कांग्रेस 1885 से 1942 तक शांत रही थी, वह सुभाषचंद्र बोेस की सफलता से घबराकर हिंसा पर उतर आयी थी। इस आंदोलन में रेलवे को 18 लाख रुपये की क्षति पहुंचायी गयी। 9 लाख रुपये की मोटर गाड़ियां फूंक दी गयीं। 954 डाकघरों पर हमले हुए। 12 हजार स्थानों पर टेलिफोन के तार काटे गये। 318 रेलवे स्टेशन फूंक दिये गये जिससे साढ़े छः लाख रुपये की सम्पत्ति नष्ट हो गयी। 59 ट्रेनें उलट दी गयीं। आंदोलन को कुचलने के लिये सेना और पुलिस ने 538 स्थानों पर फायरिंग की जिससे 940 व्यक्ति मर गये, 1630 व्यक्ति घायल हो गये। 60 हजार लोग गिरफ्तार किये गये। 18 हजार लोग नजरबंद किये गये। 6 स्थानों पर हवाईजहाज से बम गिराये गये। 60 बार सेना बुलाई गयी।

    यह सरकारी आंकड़ा था जो केन्द्रीय धारा सभा में 13 फरवरी 1943 को प्रस्तुत किया गया था। वास्तविकता इससे कहीं आगे थी। कांग्रेस की गणना के अनुसार इस आंदोलन में 15 हजार लोगों की जानें गयीं। सरकार ने जनता से 90 लाख रुपये की क्षति पूर्ति वसूल की जबकि सरकार ने केवल 29 लाख रुपये वसूल करने की बात स्वीकार की। यह वसूली हिन्दुओं से की गयी। अंग्रेज जाति, मुस्लिम समुदाय से क्षति पूर्ति की वसूली न करके मुसलमानों को यह जताना चाहती थी कि अब गोरी सरकार हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों को पसंद करती है। गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे अधिक लाभ मुस्लिम लीग को मिला। इस आंदोलन के कारण कांग्रेस के प्रत्येक प्रमुख नेता को जेल में डाल दिया गया जबकि मुस्लिम लीग के नेता न केवल स्वतंत्र रहे अपितु अंग्रेजों के युद्ध प्रयास में सक्रिय सहयोग का वचन देकर उन्होंने अंग्रेजों की सहानुभूति भी जीत ली ताकि मुसलमानों को अलग पाकिस्तान देने का जो निश्चय अंग्रेज पहले से ही दिखा रहे थे, वह और पक्का हो जाये।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 23

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 23

    संविधान सभा में जिन्ना का फच्चर


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    कैबीनेट योजना के प्रस्तावों के तहत कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने संविधान सभा में भाग लेने पर अपनी सहमति दी थी किंतु बाद में कुछ बिंदुओं की व्याख्या पर दोनों दलों में विवाद हो गया। जुलाई 1946 में संविधान निर्मात्री समिति के सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस के 212 सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम लीग के मात्र 73 सदस्य ही हो पाये। मुस्लिम लीग ने अपने आप को इससे अलग कर लिया। वह संविधान सभा के जाल में फंसना नहीं चाहती थी।

    जिन्ना ने कहा- 'हिंदुस्तान में गतिरोध हिन्दुस्तानियों और अंग्रेजों के बीच उतना ज्यादा नहीं। वह हिन्दू-कांग्रेस और मुसलिम-लीग के बीच है। ...... जब तक पाकिस्तान मंजूर नहीं किया जाता, कुछ भी हल नहीं किया जा सकता और न हल किया जा सकेगा। ...... एक नहीं दो संविधान सभाएं होंगी, एक हिन्दुस्तान का संविधान बनाने और निश्चित करने के लिए और दूसरी पाकिस्तान का संविधान बनाने और निश्चित करने के लिए।...... हम भारतीय समस्या को दस मिनट में हल कर सकते हैं, यदि मि. गांधी कह दें कि वे सहमत हैं कि पाकिस्तान होना चाहिए तथा अपनी वर्तमान सीमाओं के साथ छः प्रांतों- सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, बंगाल और असम के बने चौथाई भारत को लेकर पाकिस्तान राज्य बनेगा।'

    जिन्ना के इस वक्तव्य पर गांधीजी ने टिप्पणी की- 'हो सकता है कि केवल कांग्रेस प्रांत और देशी नरेश ही संविधान सभा में सम्मिलित हों। मेरे विचार से यह शोभनीय और पूर्णतः तथ्यसंगत होगा।' 9 दिसम्बर 1946 को विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरम्भ किया। डी. आर. मानकेकर ने लिखा है- 'तनाव, निराशा एवं अनिश्चतता के वातावरण में विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरंभ किया।'


    लंदन में जिन्ना पाकिस्तान को लेकर भावुक हो गया

    13 दिसम्बर 1946 को जिन्ना ने लंदन के किंग्जवे हॉल में ब्रिटिश सरकार से मुस्लिम राष्ट्र के लिये भाव विह्वल अपील की- 'पाकिस्तान में एक सौ मिलियन लोग केवल मुसलमान होंगे। भारत के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जो हमारी अपनी भूमि है और जहाँ हम सत्तर प्रतिशत बहुमत में हैं, में अपना एक राष्ट्र चाहते हैं। वहाँ हम अपनी जीवन शैली के अनुसार रह सकते हैं। हमें कहा गया कि तथाकथित एकीकृत भारत अंग्र्रेजों द्वारा बनाया गया है। वह तलवार के जोर पर था। उसे उसी तरह नियंत्रित रखा जा सकता है जैसे नियंत्रित रखा गया है। किसी के कहने पर भ्रमित न हों कि भारत एक है तथा वह एक क्यों नहीं रह सकता? हमसे पूछिये कि हम क्या चाहते हैं? मैं कहता हूँ कि पाकिस्तान। इसके अलावा हम कुछ नहीं चाहते।'


    जवाहर लाल नेहरू ने फिर दोहराई अपनी गलती

    जवाहर लाल नेहरू अत्यंत महत्वाकांक्षी राजनेता थे। वे पहले भी अनावश्यक वक्तव्य देकर अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर कैबीनेट मिशन को मृत्यु के मुख में धकेल चुके थे। इस बार उन्होंने देशी-राज्यों के शासकों के विरुद्ध वक्तव्य दे मारा। 21 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा ने नरेन्द्र मण्डल द्वारा गठित राज्य संविधान वार्ता समिति से वार्ता करने के लिए संविधान वार्ता समिति नियुक्त की।

    इसके प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा- 'मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे खेद है कि हमें राजाओं की समिति से वार्ता करनी पड़ेगी। मैं सोचता हूँ कि राज्यों की तरफ से हमें राज्यों के लोगों से बात करनी चाहिए थी। मैं अब भी यह सोचता हूँ कि यदि वार्ता समिति सही कार्य करना चाहती है तो उसे समिति में ऐसे प्रतिनिधि सम्मिलित करने चाहिए किंतु मैं अनुभव करता हूँ कि इस स्तर पर आकर हम इसके लिए जोर नहीं डाल सकते।'

    देशी राजा चाहते तो नेहरू के इस वक्तव्य के लिए वे कांग्रेस को कड़ी सजा दे सकते थे और संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया को निष्फल कर सकते थे किंतु देशी राज्यों के शासकों ने देश-हित की बलिवेदी पर नेहरू की गलती को नजर-अंदाज कर दिया।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-118

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-118

    आम आदमी की तरह पटेल का अंतिम संस्कार किया गया


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    1950 की गर्मियों में पटेल का स्वास्थ्य तेजी से गिरा। उनकी खांसी में खून आने लगा। मणिबेन ने पटेल की बैठकों तथा कार्य-घण्टों की संख्या कम कर दी तथा पटेल के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये व्यक्तिगत मेडिकल स्टाफ नियुक्त किया गया। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानरॉय जो कि डॉक्टर भी थे, को ज्ञात हुआ कि पटेल अब अपनी मृत्यु के निकट होने को लेकर मजाक कर रहे हैं तथा उन्होंने अपने साथी मंत्री एन.वी. गाडगिल के समक्ष यह कहा है कि अब वे अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहेंगे। 2 नवम्बर 1950 को पटेल का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया। वे बार-बार बेहोश होने लगे।

    12 दिसम्बर 1950 को उन्हें दिल्ली ले जाया गया। उस दिन नेहरू, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद तथा मेनन दिल्ली एयरपोर्ट पर उन्हें विदा देने आये। पटेल बहुत कमजोर हो चुके थे। उन्हें कुर्सी सहित ही विमान में चढ़ाया गया। बम्बई में सांताक्रूज हवाई अड्डे पर विशाल जन समूह उनके स्वागत के लिये खड़ा था। पटेल को तनाव से बचाने के लिये जूहू हवाई अड्डे पर उतारा गया। यहाँ मुख्यमंत्री बी. जीत्र खेर तथा मोरारजी देसाई ने उनका स्वागत किया। बम्बई के राज्यपाल की कार उन्हें लेने आई थी जिससे वे बिड़ला हाउस पहुंचे।

    15 दिसम्बर 1950 को उन्हें दूसरी बार तीव्र हृदयाघात हुआ तथा उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के अगले दिन भारतीय नागरिक सेवाओं तथा भारतीय पुलिस सेवा के डेढ़ हजार से अधिक अधिकारियों ने पटेल के दिल्ली स्थित निवास पर उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने भारत माता के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति की शपथ ग्रहण की। भारत के इतिहास में ऐसा दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखा गया। बम्बई सरकार ने गिरगाम चौपाटी पर उनका अंतिम संस्कार करने की योजना बनाई किंतु मणिबेन ने कहा कि सरदार की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार सामान्य आदमी की तरह सोनापुर में किया जाये।

    अब इस स्थान को मैरीन लाइन्स कहा जाता है। इसी स्थान पर पटेल के भाई का तथा पटेल की पत्नी का अंतिम संस्कार किया गया था। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिये दस लाख लोग आये। प्रधानमंत्री नेहरू, राजगोपालाचारी तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी उपस्थित रहे। उनकी मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे।

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  • राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल से सामूहिक त्यागपत्र दे दिया!

     03.06.2020
    राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल से सामूहिक त्यागपत्र दे दिया!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    विश्वयुद्ध में इंगलैण्ड की लगातार पतली होती जा रही हालत, क्रिप्स मिशन की असफलता तथा भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठ भूमि में अक्टूबर 1943 में लॉर्ड वेवेल भारत के नये वायसराय एवं गवर्नर जनरल नियुक्त किये गये। उन्होंने घोषणा की कि मैं अपने थैले में बहुत सी चीजें ला रहा हूँ। जिस समय वेवेल भारत आये उस समय कांग्रेस अखण्ड भारत के लिये लड़ रही थी जबकि मुस्लिम लीग भारत के कुछ बड़े खण्ड पाकिस्तान के रूप में हथियाना चाहती थी। इस संघर्ष में तृतीय पक्ष राजाओं का था जिन्हें भय था कि कहीं कांग्रेस राज्यों की प्रभुसत्ता भी न हथिया ले। वे नरेन्द्र मण्डल के चांसलर के नेतृत्व में अपनी लड़ाई लड़ रहे थे।

    इन तीनों पक्षों के परस्पर संघर्ष के कारण ही भारत की स्वतंत्रता लम्बे समय से टलती आ रही थी। नरेन्द्र मण्डल के चांसलर नवाब भोपाल एक ढुलमुल केंद्र के पक्षधर थे जिसमें अवशिष्ट शक्तियां राज्यों में निहित हों। नरेन्द्र मण्डल का चांसलर बनने के बाद एक वक्तव्य में नवाब ने कहा कि अनुदार व्यक्तियों ने हमें अभी से धमकाना आरंभ कर दिया है कि जब समय आयेगा, इंगलैण्ड परेशानी पैदा करने में सक्षम शत्रुओं (अर्थात् कांग्रेस) को गले लगाने के लिये, हमें (अर्थात् राजाओं को) नीचा दिखायेगा। कृपया इंगलैण्ड को बता दें कि भारतीय राज्य इस लांछन को कपटपूर्ण मानते हुए इसका खण्डन करते हैं। हमें इंगलैण्ड द्वारा इन कठिन परिस्थितियों में दिये गये वचन पर पूरा विश्वास है।

    क्रिप्स के लौट जाने के बाद से कांग्रेसी नेताओं तथा भारतीय राजाओं के मध्य लम्बी रस्साकशी चल रही थी। कांग्रेस चाहती थी कि देशी राज्य भारतीय संघ में मिल जायें और राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व करें। जबकि दूसरी ओर राजा मानते थे कि संघ में मिलना या न मिलना, संविधान सभा में सम्मिलित होना या न होना, उनका विशेषाधिकार है। राजा लोग यह भी चाहते थे कि उनका प्रतिनिधित्व उनके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि करें। सरकार दोनों पक्षों को संतुष्ट करना चाहती थी। उसने कांग्रेस को संतुष्ट करने के लिये राज्यों पर जोर डाला कि वे अपने प्रशासन को आधुनिक रूप दें और लोकप्रिय सरकारें स्थापित करें। राज्यों को संतुष्ट करने के लिये गोरी सरकार द्वारा आश्वासन दिया गया कि परमोच्च सत्ता उत्तराधिकारी राज्यों को स्थानांतरित नहीं की जायेगी।

    18 सितम्बर 1944 को नरेन्द्र मण्डल के चांसलर ने वायसराय को सूचना दी कि वे नरेन्द्र मण्डल के आगामी अधिवेशन में प्रस्ताव रखेंगे कि ब्रिटिश सत्ता के साथ राज्यों के जो सम्बन्ध हैं और ब्रिटिश सत्ता को राज्यों में जो अधिकार प्राप्त हैं, सम्बन्धित राज्यों से विचार विमर्श के बिना किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित नहीं किये जा सकते। ब्रिटिश सत्ता के प्रतिनिधि सम्राट की सरकार को सूचित करें कि शाही घोषणाओं द्वारा हाल ही में यह कहा गया है कि राज्यों के साथ की हुई संधियां, सनदें, अधिकार पत्र तथा आंतरिक स्वतंत्रता सम्बन्धी समझौते स्थापित रखना और उनके स्थायी रहने की व्यवस्था करना सरकार की निश्चित नीति है, तब ऐसी दशा में सम्राट और राज्यों के सम्बन्धों में परिवर्तन करने तथा सम्राट के अन्य पक्षों के साथ किये गये समझौतों को, बिना राज्यों की पूर्व स्वीकृति लिये राज्यों पर लागू करने की प्रवृत्ति ने राज्यों में गंभीर आशंका और चिंता की स्थिति उत्पन्न कर दी है जिसका शीघ्र निराकरण आवश्यक है। सरकार की यह इच्छा कभी नहीं रही होगी कि वह राज्यों को लावारिस जमीन की तरह छोड़ दे। यदि कांग्रेस हमें नीचा दिखाना और लूटना चाहती है तो हम लड़ेंगे।

    26 नवम्बर 1944 को वायसराय वेवेल ने चासंलर द्वारा के इस प्रस्ताव को यह कह कर निषिद्ध कर दिया कि जब इस विषय पर वायसराय और राजाओं के मध्य विचार-विमर्श चल रहा है तब इस प्रकार के प्रस्ताव से जनता में मिथ्या संदेश जायेगा।

    नरेन्द्र मण्डल की स्थायी समिति ने मांग की कि ब्रिटिश भारत को सत्ता का हस्तांतरण किये जाने से पूर्व राज्यों के आंतरिक प्रशासन में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाना चाहिये ताकि प्रत्येक प्रकार के भय को समाप्त किया जा सके। राजनीतिक विभाग नरेन्द्र मण्डल के इस विचार से सहमत नहीं हुआ तथा उसने राजाओं को कड़े पत्र लिखे। इन पत्रों की भाषा से राजाओं ने अपने आपको अपमानित अनुभव किया और राज्यों की स्थिति के लगातार क्षय के विरोध में दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में सामूहिक त्यागपत्र दे दिया।

    दिसम्बर 1944 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। समिति ने सिफारिश की कि ब्रिटिश भारत के किसी भी प्रांत को संघ में अनिवार्यतः सम्मिलित होना होगा। रियासतें अपनी इच्छा से इसमें सम्मिलित हो सकेंगी। एक बार सम्मिलित होने के बाद उसे संघ से अलग होने का अधिकार नहीं होगा। समिति द्वारा यह सिफारिश भी की गई कि जहाँ तक हो सके राज्य प्रमुख, राज्यों के शासकों में से ही चुना जाना चाहिए। साथ ही उसमें राज्यों के मंत्री पद की भी व्यवस्था हो जिसकी सहायता के लिए राज्यों की सलाहकार समिति हो। सप्रू समिति की अवधारणा के अनुसार भारतीय संघ केवल एक राज्य होगा जिसमें संघीय इकाइयां होंगी चाहे वह प्रांतों की हों या राज्यों की। संघ से असंबद्ध राज्य भी होंगे। किसी भी विदेशी शक्ति का इन इकाइयों पर कोई अधिकार नहीं होगा चाहे वे संघ में शामिल हों या न हों।

    रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से एम. एन. राय द्वारा स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया। 6 जनवरी 1945 को ऑल इण्डिया कान्फ्रेन्स ऑफ दी रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के द्वारा इस प्रारूप को पृष्ठांकित किया गया जिसमें कहा गया कि अंतरिम सरकार को संपूर्ण भारत के लिये संविधान की घोषणा करनी चाहिये तथा उसे भारतीय रियासतों पर भी लागू किया जाना चाहिये। इसे पूर्व में ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राजाओं के मध्य हुए द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से किया जाना चाहिये जिसके माध्यम से भारतीय राजाओं को कुछ वित्तीय अनुदानों के बदले अपने अधिकार भारत सरकार के समक्ष समर्पित करने होंगे।

    प्रो. कूपलैण्ड ने नदियों को आधार बनाकर जनसंख्या के अनुसार उनके क्षेत्रीय विभाजन की योजना प्रस्तुत की। सर सुल्तान अहमद ने भारत तथा यूनाइटेड किंगडम के मध्य संधि के माध्यम से भारत पाक विभाजन की योजना प्रस्तुत की इनमें देशी राज्यों के बारे में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी। 1943 में अर्देशिर दलाल, डा. राधा कुमुद मुखर्जी तथा डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं जिनमें भारत की सांप्रदायिक समस्या का समाधान ढूंढने की चेष्टा की गयी किंतु देशी राज्यों की समस्या को अधिक महत्व नहीं दिया गया।

    25 जून 1945 को लार्ड वेवेल ने शिमला में समस्त सम्बद्ध पक्षों का एक सम्मेलन बुलाया जो 18 दिन तक चला। वेवेल द्वारा कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौता करवाने तथा अंतरिम सरकार गठित करने का प्रयास किया गया। इस आश्वासन के बाद स्थायी समिति ने अपने त्यागपत्र भी वापस ले लिये।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 24

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 24

    मुस्लिम लीग द्वारा कांग्रेस की नाक में दम


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    वीरेन्द्र कुमार बरनवाल ने लिखा है- 'अंतरिम सरकार में लीग की भागीदारी वस्तुतः जिन्ना की गृहयुद्ध की रणनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंच पर विस्तार था।' जब मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में सम्मिलित हुई तो वायसराय लॉर्ड वैवेल ने कांग्रेस को सलाह दी कि वित्त मंत्रालय कांग्रेस के पास रहे तथा सरदार पटेल उसके मंत्री बनें। क्योंकि सरकार चलाने के लिये उन्हें कदम-कदम पर इस मंत्रालय की आवश्यकता होगी। पटेल तब तक जिन्ना को तथा पूरी मुस्लिम लीग को अच्छी तरह समझ चुके थे इसलिये उन्होंने मुस्लिम लीग को वित्त मंत्रालय देना बेहतर समझा ताकि गृह मंत्रालय और रियासती मंत्रालय अपने पास रख सकें तथा इन मंत्रालयों का उपयोग आजादी के समय देशी रजवाड़ों को भारत में ही बनाये रखने में किया जा सके।

    मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खाँ को अंतरिम सरकार में वित्तमंत्री बनाया गया किंतु लियाकत अली खाँ वित्त मंत्रालय मिलने से खुश नहीं था। वह अपने लिये गृह मंत्रालय चाहता था। चौधरी मोहम्मद अली ने, लियाकत अली को समझाया कि यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह ऐसा बजट बनाये कि कांग्रेस की सहायता करने वाले करोड़पतियों का दम निकल जाये। चौधरी मोहम्मद अली भारतीय अंकेक्षण और लेखा सेवा का अधिकारी था। उसने लंदन से अर्थशास्त्र तथा विधि में शिक्षा प्राप्त की थी।

    चौधरी के सुझाव पर लियाकत अली ने वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और खर्चे के मदों पर आपत्ति उठाने लगा। ऐसा करके मुस्लिम लीग, सरकार में होते हुए भी सरकार को ठप्प कर देना चाहती थी। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा है- 'मंत्रिमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्र्यों में बाधा डालते थे। वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के खिलाफ थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि हमारे प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकतअली खाँ ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिये नया झटका था। कांग्रेस की घोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाये और पूंजीवादी समाज के स्थान पर शनैः शनैः समाजवादी पद्धति अपनायी जाये। जवाहरलाल नेहरू और मैं भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था। आयकर वसूली के लिये भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता थी। लियाकत अली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाये कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे। इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थाई रूप से भारी क्षति पहुंचती। लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। उसने घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किये गये हैं। कांग्रेसी नेता उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उसने मंत्रिमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उसने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी। जब उसने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गये। राजगोपालाचारी और सरदार पटेल ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया।'

    वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अली खाँ को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। उसने अपने कार्यकलापों से मंत्रिमण्डल को पंगु बना दिया। मंत्रिगण लियाकत अली खाँ की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे। लियाकत अली खाँ ने कांग्रेसी मंत्रियों को ऐसी उलझन में डाला कि वे कर्तव्यविमूढ़ हो गये। घनश्यामदास बिड़ला ने गांधीजी और जिन्ना के बीच खाई पाटने के उद्देश्य से लियाकत अली खाँ को समझाने की बहुत चेष्टा की किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर वायसराय ने लियाकत अली खाँ से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।

    कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच बढ़ती जा रही कड़वाहट को दूर करने के लिए 3-6 दिसम्बर 1946 को लंदन में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री मि. एटली, वायसरॉय लॉर्ड वैवेल, कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना ने भाग लिया। यह सम्मेलन भी कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के मतभेदों को दूर करने में असमर्थ रहा। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार को भारत का भविष्य पूरी तरह से दिखाई दे गया। ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट संकेत कर दिया कि अब वह भारत के बंटवारे की तरफ बढ़ेगी।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-119

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-119

    विष्णुगुप्त चाणक्य तथा समुद्रगुप्त की तरह राष्ट्र के निर्माता थे सरदार पटेल


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    भारत के विभाजन के समय, सरदार पटेल पर हिन्दुओं का पक्ष लेने तथा साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया गया। मौलाना आजाद ने अपनी पुस्तक में पटेल की बहुत आलोचना की है। हिन्दू राष्ट्रवादी शक्तियां भी उन्हें भारत का विभाजन स्वीकारने में जल्दबाजी करने का आरोप लगाती रही हैं। सुभाषचंद्र बोस के पक्षधर सरदार पटेल पर यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने जीवन भर गांधी का पक्ष लिया तथा गांधी के विरोधियों को कमजोर करने का काम किया।

    समाजवादी नेता जयप्रकाश तथा अशोक मेहता ने सरदार पटेल पर आरोप लगाया है कि वे भारतीय उद्योपतियों विशेषकर बिड़ला परिवार तथा साराभाई परिवार का व्यक्तिशः पक्ष लेते थे। कुछ इतिहासकारों ने उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने देशी राज्यों का एकीकरण करने के लिये, देशी राज्यों को स्व-विवेक एवं स्व-इच्छा से काम नहीं लेने दिया। इतिहास गवाह है कि पटेल पर लगाये गये समस्त आरोप निराधार हैं।

    भारत के एकीकरण एवं देशी राज्यों के एकीकरण के लिये यह देश पटेल का उतना ही ऋणी है जितना कि विष्णुगुप्त चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य तथा समुद्रगुप्त का। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा जे.आर.डी. टाटा का मानना था कि नेहरू की बजाय पटेल अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते। वे भारत के सफलतम गृहमंत्री थे।

    जनवरी 1947 के अंक में टाइम मैगजीन ने उनका चित्र अपने कवर पेज पर मुद्रित किया। उनकी मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे। पटेल की मृत्यु के बाद वर्षों तक सरकार ने पटेल के बारे में न तो कोई साहित्य प्रकाशित किया न उनकी स्मृति में कोई आयोजन किये। 1980 में अहमदाबाद में सरदार पटेल राष्ट्रीय स्मारक की स्थापना की गई। 1991 में उन्हें भारत रत्न दिया गया।

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  • सुभाष बाबू के प्रेत ने नेताजी के बलिदान का बदला मांगना आरंभ कर दिया

     03.06.2020
    सुभाष बाबू के प्रेत ने नेताजी के बलिदान का बदला मांगना आरंभ कर दिया

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    द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की भारी क्षति हुई। युद्ध के दौरान इंगलैण्ड पर अेकेले भारत का ही 500 अरब का कर्जा हो गया। युद्ध आरंभ होते समय ई.1939 में भारतीय सेना में 25 लाख सैनिक थे जो ई.1945 में घटकर 12 लाख ही रह गये थे। इनमें से ब्रिटिश सैनिकों की संख्या युद्ध के पश्चात् 11,400 रह गयी थी जो 1947 में घटकर मात्र 4,000 रह जाने वाली थी।

    भारतीय सिविल सेवा में ब्रिटिश तत्व 1935 की अपेक्षा घटकर आधा रह गया था। इस कारण भारत सरकार का भारतीयकरण युद्ध प्रारंभ होने से पहले ही आरंभ हो गया था और वह चरम तक पहुंच चुका था। इसका परिणाम यह होना था कि अगर भारत को स्वतंत्रता नहीं भी मिलती तो भी 1948 में भारत में ब्रिटेन के केवल तीन सौ सिविल सर्वेण्ट रह जाने थे। जबकि ई.1914 में भारतीय सिविल सेवा के 1400 सदस्यों में से मात्र 70 सदस्य ही भारतीय थे।

    भारत को स्वतंत्र करने के लिये इंग्लैण्ड पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी पड़ने लगा था। ब्रिटेन की संसद में विपक्ष के नेता विंस्टन चर्चिल किसी भी सूरत में भारतीय स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे किंतु उन्होंने भी अमरीकी दबाव में स्वीकार किया कि भारतीयों को आजादी देनी पड़ेगी जिसकी आशा में भारतीयों ने अंग्रेजों की ओर से युद्ध में भाग लिया था। रूस और चीन भी इंग्लैण्ड पर दबाव डाल रहे थे कि उसे युद्ध के समय किया गया अपना वायदा निभाना चाहिये तथा भारत को स्वतंत्रता दे देनी चाहिये।

    जुलाई 1945 में लेबर पार्टी ने ब्रिटेन में सरकार बनायी। क्लेमेंट एटली इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री बने। भारतीय स्वाधीनता के कट्टर शत्रु और भारत विरोधियों को उकसाने वाले एल. एस. एमरी को भारत कार्यालय से हटा दिया गया। उनका स्थान लॉर्ड पैथिक लारेन्स ने लिया। क्लेमेंट एटली भारतीय स्वतंत्रता के उत्साही समर्थक तो नहीं थे किंतु वे महान यथार्थवादी थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि चकनाचूर हुआ ब्रिटेन, भारत में रक्षक सेना का उत्तरदायित्व नहीं उठा सकेगा।

    नये मंत्रिमंडल से सलाह करके वायसराय ने 19 सितम्बर 1945 को घोषणा की कि सम्राट की सरकार भारत को शीघ्र स्वशासन सौंपने के लिये एक संविधान परिषद का निर्माण करेगी ताकि भारतीय अपना संविधान खुद बना सकें। आगामी सर्दियों में देश में चुनाव कराये जायेंगे ताकि संविधान परिषद बन सके। राज्यों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श करके निश्चित किया जायेगा कि किस प्रकार से वे संविधान सभा में सर्वोत्तम विधि से भाग ले सकते हैं। कांग्रेस ने जोर दिया कि संविधान सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व वे प्रतिनिधि ही कर सकते हैं जिनका निर्वाचन व्यापक स्तर पर हुए चुनावों में हुआ हो। इस घोषणा से राजाओं को भय हुआ कि ब्रिटिश सरकार राज्यों के सम्बन्ध में भी परमोच्चता को स्थानांतरित कर सकती है।

    इंगलैण्ड पर पड़ने वाले युद्ध कालीन मनोवैज्ञानिक दबावों की सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता किंतु एक और भी बहुत बड़ा तत्व था जिसने ब्रिटिश सरकार के मनोविज्ञान को हिलाकर रख दिया था। अधिकांश ब्रिटिश इतिहासकारों ने इस तत्व की चर्चा तक नहीं की है। यदि की भी है तो अत्यंत दबी हुई जुबान से। भारतीय इतिहासकार भी ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा वर्णित तथ्यों की भूल-भुलैया में गुम होकर रह जाते हैं। ब्रिटिश सरकार पर सर्वाधिक प्रभाव डालने वाला मनोवैज्ञानिक तत्व था आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के साथ भारतीय फौजों द्वारा दर्शायी गयी सहानुभूति। इस सहानुभूति का परिणाम भारतीय नौ सेना एवं वायु सेना में सैनिक विद्रोह के रूप में परिलक्षित हुआ था।

    7 मई 1945 को जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था। 6 अगस्त एवं 9 अगस्त 1942 को अमरीका द्वारा हिरोशिमा तथा नागासाकी पर बम गिराये जाने के बाद जापान भी टूट चुका था। 13 अगस्त को जापान द्वारा आत्मसमर्पण किये जाने के 5 दिन बाद 18 अगस्त 1945 को सुभाष बाबू एक बमवर्षक विमान से सिंगापुर से टोकियो जा रहे थे कि वह विमान भी मार्ग में ही नष्ट हो गया और सुभाष बाबू हमेशा के लिये एक पहेली बनकर संसार की आंखों से ओझल हो गये।

    अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को पकड़ कर फांसी पर लटकाना आरंभ कर दिया था। कांग्रेस अब तक आजाद हिन्द फौज को अपने शत्रु के रूप में देखती रही थी। उसने अपनी यह नीति जारी रखी तथा उसने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखायी।

    भारतीय सिपाहियों को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों से सहानुभूति दिखाते हुए सशस्त्र विद्रोह कर दिया। 20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक हड़ताल पर चले गये। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गयी। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किये। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक हड़ताल पर चले गये। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गये। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी।

    अंग्रेजों को लगा जैसे नेताजी सुभाषचंद्र बोस का प्रेत नेताजी के बलिदान का बदला मांग रहा था। सैन्य विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार समझ गयी थी कि अब एक भी दिन की देरी किये बिना भारत को आजादी देनी होगी चाहे मुस्लिम लीग द्वारा कितना ही अड़ंगा क्यों न लगाया जाये। उसने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिये उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की। तीन कैबीनेट मंत्री एक नये प्रस्ताव के साथ भारत भेजे गये। 19 फरवरी 1946 को ब्रिटिश सरकार ने भारत सचिव लार्ड पैथिक लारेन्स, व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर की एक समिति बनाई जिसे कैबिनेट मिशन कहा जाता है।

    15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि लेबर सरकार ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिये एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है। उन्होंने कहा कि मुझे आशा है कि ब्रिटिश भारत तथा रियासती भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि भारतीय राज्य अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिये भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।

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