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  • किसकी अंतर-आत्मा को पुकार रही हैं मीरा कुमार!

     03.06.2020
    किसकी अंतर-आत्मा को पुकार रही हैं मीरा कुमार!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    विपक्ष द्वारा 2017 के राष्ट्रपति चुनावों में प्रत्याशी बनाए जाने के बाद मीरा कुमार ने अंतर-आत्मा की पुकार पर मतदान करने की अपील की है। यह अपील 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनावों की याद दिलाती है जब ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया तथा विपक्ष ने सर चिंतामन द्वारकानाथ देशमुख को अपना प्रत्याशी बनाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ये दोनों ही प्रत्याशी पसंद नहीं आए। उस समय वी. वी. गिरि उपराष्ट्रपति थे, उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र देकर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। इंदिरा गांधी ने वी. वी. गिरी को समर्थन दे दिया और कांग्रेसियों से अपनी अंतर-आत्मा की आवाज पर मतदान करने की अपील की। कांग्रेसियों की अंतर-आत्मा जाग उठी और उन्होंने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी को हराकर निर्दलीय प्रत्याशी को राष्ट्रपति बना दिया। वी. वी. गिरि पर अनैतिक साधनों से चुनाव जीतने की रिट दायर हुई। वी. वी. गिरि भारत के राष्ट्रपति रहते हुए भी न्यायालय का सम्मान करते हुए व्यक्तिगतशः न्यायालय में उपस्थित हुए तथा न्यायालय में रिट खारिज हुई।

    1969 के बाद 2017 में एक बार फिर से नेताओं की अंतर-आत्मा को जगाने के लिए पुकार लगाई गई है। समझ में नहीं आया कि मीरा कुमार किस की अंतर-आत्मा को जगा रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि 1969 की तरह कांग्रेसियों की अंतर-आत्मा जाग पड़े और चौबेजी, छब्बेजी बनने की बजाय दुब्बेजी ही रह जाएं। कांग्रेस तो वैसे ही आपताकाल के दौरान 1976 में 42वें संविधान संशोधन के बाद भारत को धर्म-निरपेक्ष देश घोषित कर चुकी है। धर्म-निरपेक्ष लोग आत्मा-परमात्मा जैसी चीजों से काफी ऊपर उठे हुए होते हैं इसलिए वे किसी की अंतर-आत्मा को कैसे पुकार सकते हैं! यह अंतर-आत्मा क्या होती है, और कहाँ रहती है। धर्म से पूरी तरह निरपेक्ष मीरा कुमार को अंतर-आत्मा का एड्रेस किसने दिया !

    यदि मीरा कुमार भारतीय जनता पार्टी के सांसदों एवं विधायकों की अंतर-आत्मा को पुकार रही हैं तो भी यह बात समझ में नहीं आती है। कांग्रेस जिन भाजपाइयों के नेता नरेन्द्र मोदी पर मौत का सौदागर होने का आरोप लगाती रही है (सोनिया गांधी का 2007 के चुनावों में वक्तव्य), जिन भाजपाइयों और संघियों पर कांग्रेस, गांधी की हत्या का आरोप लगाती रही है (राहुल गांधी का 2014 के चुनावों में आरएसएस पर वक्तव्य), जिन भाजपाइयों पर कांग्रेस असहिष्णुता का आरोप लगाती रही है (2015 में कांग्रेस समर्थित साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा पुरस्कार लौटाने का अभियान) जिन भाजपाइयों पर कांग्रेस, साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाती रही है (दिग्विजय सिंह, राजीव शुक्ला सहित तमाम नेताओं के वक्तव्य), ऐसे भाजपाइयों से मीरा कुमार कैसे अंतर-आत्मा पर मतदान करने की अपील कर सकती हैं!

    जिन भाजपाइयों को मीरा कुमार ने लोकसभा में बोलने तक का मौका देने में कंजूसी की (सुषमा स्वराज का नवीनतम वक्तव्य) उन्हीं भाजपाइयों को अपनी चुनावी नौका के तारणहार के रूप में मीराकुमार कैसे देख सकती हैं! जो कांग्रेस, भाजपाइयों के नेता नरेन्द्र मोदी पर सहारा गु्रप से 9 बार धन लेने का आरोप लगाकर कोर्ट में मुंह की खा चुकी है। (राहुल गांधी का दिसम्बर 2016 का वक्तव्य), अब उसी कांग्रेस की जीवन भर सदस्य रही कांग्रेसी प्रत्याशी मीरा कुमार किस अंतर-आत्मा के जागने की आशा कर रही हैं! क्या वे कांग्रेस द्वारा घोषित साम्प्रदायिक शक्तियों (भाजपाइयों एवं संघियों) के बल पर राष्ट्रपति बनने का सपना संजोए बैठी हैं।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • घमण्ड और व्यापार ले डूबेंगे चीनी बौनों को!

     03.06.2020
    घमण्ड और व्यापार ले डूबेंगे चीनी बौनों को!


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    चीन जिस तरह से विश्व भर के देशों के साथ घमण्ड भरा व्यवहार कर रहा है, वह चीनी बौनों के लिए तो घातक सिद्ध होने वाला है ही, साथ ही पूरी दुनिया को तबाही की ओर ले जाने वाला है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हिटलर का घमण्ड जर्मनी को तथा नेपोलियन बोनापार्ट का घमण्ड फ्रांस को ले डूबा था किंतु उनके आचरण से केवल उनके देश बर्बाद नहीं हुए, पूरी दुनिया में बहुत बड़ी संख्या में मनुष्यों को मौत के मुंह में समा जाना पड़ा।

    चीन 1959 में तिब्बत को हड़प चुकने के बाद से नेपाल, लद्दाख, सिक्किम, भूटान तथा अरुणाचल प्रदेश को अपनी पांच अंगुलियां बताता रहा है। इन अंगुलियों को लेकर भारत से उसका सीमा विवाद है जो कभी न सुलझने वाली समस्या का रूप ले चुका है। 1962 में वह अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को लेकर भारत से दो-दो हाथ कर चुका है। 1975 में जब से सिक्किम, भारत में सम्मिलित हुआ है, चीन, सिक्किम की सीमा को लेकर आए दिन भारत से माथाफोड़ी करता रहता है। वह नेपाल में भारत के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न करके, नेपाल के हिन्दू राष्ट्र को समाप्त करवाकर, वहाँ धर्मनिरपेक्ष कम्युनिस्ट शासन स्थापित करवा चुका है। ताइवान को चीन कभी फूटी आंखों से नहीं देख पाया। भूटान में वह डोकलाम क्षेत्र में अवैध घुसपैठ कर रहा है तथा वहां सड़क बनाने का प्रयास कर रहा है।

    श्रीलंका के कोलम्बो बंदरगाह में दो पनडुब्बियों को तैनात करने के विषय पर 2014 में हुए समझौते को श्रीलंका द्वारा हाल ही में समाप्त कर दिए जाने के बाद, श्रीलंका के साथ भी चीन के सम्बन्ध खराब हो गए हैं। दक्षिण चीन सागर में अपनी धौंस धुपट्टी जमाने के लिए तैनात किए गये चीनी युद्धपोतों ने अमरीका को अपने समुद्री लड़ाकू पोत दक्षिण चीन सागर में भेजने के लिए उकसाया है। विएतनाम और ऑस्ट्रेलिया, चीनी व्यवहार से बुरी तरह से चिढ़े हुए हैं।

    चीन सिल्क रूट निर्माण के नाम पर ‘वन बेल्ट वन रोड’ के फार्मूले पर काम कर रहा है। इसके माध्यम से चीन, एशिया और यूरोप होते हुए अफ्रीकी तटों तक स्थित लगभग 60 देशों में अपना व्यापार फैलाने के बड़े एजेण्डे पर कार्य कर रहा है। स्पेन के मैड्रिड शहर के लिए चीन ने वर्ष 2014 में मालगाड़ी आरम्भ कर दी थी जिसके माध्यम से उसका सामान यूरोपीय देशों को पहुंचाया जा रहा है।

    चीनी अधिकृत काश्मीर के जरिए चीन, पाकिस्तान तक सड़क बना चुका है ताकि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक उसे सीधा सड़क मार्ग उपलब्ध हो सके। घोषित रूप में चीन ने ग्वादर बंदरगाह का विकास व्यापारिक उद्देश्यों के लिए किया है जिसके माध्यम से वह विश्व भर के बाजारों में अपना माल थोपना चाहता है किंतु आवश्यकता पड़ने पर वह ग्वादर बंदरगाह में चीनी युद्धपोत तैनात करके हिन्द महासागर, फारस की खाड़ी, मध्य-पूर्व के देशों तथा हॉर्न ऑफ अफ्रीकी रीजन्स तक दबाव बना सकता है। यह स्थिति भारत की सुरक्षा के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होने वाली है। इसलिए भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास करके समुद्र में बढ़ती हुई चीनी प्रगति को अवरुद्ध करने का प्रयास किया है।

    हाल ही में भूटान के डोकलाम क्षेत्र में चीनी बौनों और भारतीय सैनिकों के बीच हुई हाथापाई में ऊपरी तौर पर भले ही सीमा विवाद दिखाई देता है किंतु इसका असली कारण भारत में 1 जुलाई से लागू किया गया जीएसटी जान पड़ता है। चीन, भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उठाए गए अनेक कदमों से तिलमिलाया हुआ है। जापान, अमरीका और इजराइल के साथ बढ़ती हुई भारतीय दोस्ती, भारत द्वारा भारी मात्रा में खरीदी गई युद्ध सामग्री, मिसाइलें एवं युद्ध विमान, मेक इन इण्डिया अभियान तथा श्रीलंका पर प्रभाव डालकर चीनी युद्ध-पोतों की कोलम्बो में तैनाती पर रोक से तो चीन, भारत से नाराज था ही, जीएसटी के माध्यम से चीनी सामग्री पर 38 प्रतिशत कर लगाए जाने से चीन बुरी तरह झल्ला गया है।

    आज चीन की हालत ऐसी है कि उसे युद्ध के मैदानों में हराने की आवश्यकता नहीं है, उसके व्यापारिक हितों को नुक्सान पहुंचाकर उसकी कमर तोड़ी जा सकती है। चीन ने अपने विशालतम मानव संसाधन को काम दिया, नदियों को रोककर विश्व के सबसे बड़े बांध बनाए, बांधों से बिजली बनाई, बिजली से हजारों कारखाने खोले तथा बड़ी मात्रा में सैंकड़ों प्रकार के उत्पाद तैयार किए। यहां तक तो सब ठीक रहा किंतु आगे की डगर बहुत कठिन है। इस माल को खपाने के लिए पूरे संसार को चीन, बाजार के रूप में देख रहा है। इस बाजार पर कब्जा करने के लिए वह हर हथकण्डा अपना रहा है। नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी के माध्यम से चीन की इसी नस को दबाया है। अब चीन अपना माल चोरी-छिपे भारत को नहीं भेज सकेगा क्योंकि प्रत्येक भारतीय व्यापारी के लिए उस माल को जीएसटी के माध्यम से बेचना अनिवार्य हो गया है। इस माल पर अनिवार्य रूप से 38 प्रतिशत का कर लगेगा। इस कारण भारतीय कारखानों में तैयार उत्पादों के मुकाबले चीनी माल अधिक सस्ता नहीं रह जाएगा और वह भारतीय बाजार में टिक नहीं पाएगा।

    इसी बौखलाहट में चीन, भारत को 1962 की याद दिला रहा है। हालांकि चीन को यह समझ में नहीं आता कि यदि 1962 में जवाहरलाल नेहरू की जगह लालबहादुर शास्त्री या इंदिरा गांधी होती तो चीन सपने में भी 1962 को याद नहीं करता। भारत 1962 भूला नहीं है किंतु चीन को भी 1967 नहीं भूलना चाहिए जब इंदिरा गांधी के समय चीनी चूहों को भारतीय शेरों ने दूर तक खदेड़ दिया था। अपने देश की सीमाओं और व्यापार को फैलाने के लिए चीनी बौने पूरी दुनिया में घमण्ड भरा व्यवहार कर रहे हैं, यही घमण्ड और व्यापार चीन को ले डूबे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • चीन के उन्मादी बोलों का अंत कहाँ जाकर होगा !

     03.06.2020
    चीन के उन्मादी बोलों का अंत कहाँ जाकर होगा !


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    विश्व भर के लिए लाइलाज बीमारी बन चुका चीन उन्मादी बोल बोल रहा है। भारत के साथ-साथ, मंगोलिया, कजाकिस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, बर्मा, लाओस, विएतनाम, उत्तरी कोरिया से चीन की थल सीमाएं मिलती हैं। जापान, फिलिपीन्स, दक्षिण कोरिया तथा ताइवान से उसकी समुद्री सीमाएं मिलती हैं। इन सभी देशों से उसका सीमा विवाद है। तिब्बत को वह हड़प कर चुका है। भूटान पर उसकी कुदृष्टि है। पाकिस्तान से वह भारतीय काश्मीर का बड़ा हिस्सा ले चुका है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर होते हुए वह, अरब सागर के ग्वादर बंदरगाह तक सड़क बना चुका है। नेपाल में उसकी सड़क मौजूद है तथा यूरोप के मैड्रिड शहर तक उसकी रेललाइन जाती है। हिंद महासागर में उसने कृत्रिम द्वीप बनाकर अपनी मिसाइलें और युद्धपोत खड़े कर दिए हैं। पाकिस्तान तथा श्रीलंका में वह अपने बंदरगाह बना चुका है। भारत के सिक्किम, लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश को वह अपनी पांच में से तीन अंगुलियां बताता है। अक्साईचिन पर भी उसने दांत गढ़ा रखे हैं। जिन देशों से उसकी सीमा नहीं मिलती, उनसे भी चीन का विवाद है। यदि सारी दुनिया की धरती चीन को दे दी जाए तो भी चीन का उन्माद समाप्त नहीं होगा।

    यह बौना चीनी दैत्य पूरी दुनिया पर अपनी दादागिरि थोप रहा है। जब भी भारत शक्ति अर्जन का प्रयास करता है, लाल चीनी आंखें और भी अधिक लाल हो जाती हैं। जब भारत ने तिब्बत के दलाई लामा को शरण दी, तब उसने भारत पर हथियार उठाए। 1971 में भारत -पाकिस्तान युद्ध हुआ, तब चीन ने पाकिस्तान को सहायता दी। 1998 में भारत ने पोकरण परमाणु बम विस्फोट किया, तब चीन ने आंखें तरेरीं। जवाहरलाल नेहरू की कमजोरी को चीन ने भारत की कमजोरी समझ लिया किंतु इंदिरा गांधी ने चीन की कभी परवाह नहीं की इसलिए चीन अपनी मांद में दुबका रहा। राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी तथा नरेन्द्र मोदी ने चीन के साथ शांति और सहयोग की नीति अपनाई तो चीन को फिर से गलत फहमी उत्पन्न हो गई।

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि भारत और चीन के बीच युद्ध होगा तो वह द्विपक्षीय नहीं रह जाएगा। पाकिस्तान निश्चित रूप से भारत पर टूट कर पड़ेगा। ट्रम्प के नेतृत्व में अमरीका, पुतिन के नेतृत्व में रूस और नेतन्याहू के नेतृत्व में इजराइल भी चुप नहीं बैठेंगे। अरब देश, इजराइल से अपनी खुन्नस निकालने के लिए लपकेंगे और 1945 के बाद से शांति की राह पर चल रहा जापान भी प्रधानमंत्री शिन्हो आबे के नेतृत्व में हिन्द महासागर में अपनी शक्ति दिखाएगा और चीन से अपना सीमा विवाद हल करने का प्रयास करेगा। कट्टर सुन्नी देश इस बीच, शिया देश ईरान को निबटाने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं।

    विश्व के और भी कई देश, विश्व भर में आरम्भ हई जंग में कूदेंगे और अपनी निर्दोष जनता की आहुति देंगे। प्रथम विश्वयुद्ध की त्रासदी को भुगतने के बाद भी 1945 में विश्व शक्तियां परमाणु बम का उपयोग करने से स्वयं को नहीं रोक पाई थीं। 2017 में शक्ति और समृद्धि के घमण्ड से चूर दुनिया लाखों गुना शक्तिशाली हाइड्रोजन बमों का उपयोग करने से स्वयं को कैसे रोक पाएगी। सरलता से अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन के उन्माद का अंत कहाँ जाकर होगा तथा मानवता को चीन के उन्मादी बोलों की कितनी कीमती चुकानी होगी!

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • भगवान सूर्य की पत्नी के नाम से विख्यात क्षेत्र तालिबानियों ने हड़प लिया

     03.06.2020
    भगवान सूर्य की पत्नी के नाम से विख्यात क्षेत्र तालिबानियों ने हड़प लिया

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    भगवान सूर्य की पत्नी के नाम से विख्यात क्षेत्र तालिबानियों ने हड़प लिया पाकिस्तान के धुर पश्चिम में स्वात क्षेत्र स्थित है। यह हरी-भरी पहाडि़यों वाला अत्यंत सुंदर क्षेत्र है। इसीलिये इसे स्वात कहा जाता है। स्वात शब्द;स्वाति; का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है- सूर्य की पत्नी। यह क्षेत्र सचमुच इतना सुंदर है कि इसे भगवान सूर्य की पत्नी कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं। किसी समय यहाँ सैंकड़ों नदियों और झरनों के किनारों पर वैदिक ऋचाऐं गूंजा करती थीं। सैंकड़ों ऋषि मुनि यहां बैठकर सृष्टि की रचना और मनुष्य जीवन के उद्देश्यों के बारे में चिंतन और सृष्टिकर्त्ता का स्तवन किया करते थे। इसी स्वात घाटी के पश्चिम में स्थित है बामियान जिसे कभी नूरिस्तान भी कहा जाता था। अब स्वात पकिस्तान में है तथा बामियान अफगानिस्तान में। जब सैंकड़ों बौद्ध भिक्षु, भगवान बुद्ध के संदेश लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गये तो उनमें से कुछ भिक्षु स्वात घाटी तथा उससे लगे हुए बामियान को संसार की सबसे सुंदर तपस्थली मानकर यहीं रुक गये। उन्होंने यहां की पहाडि़यों में भगवान बुद्ध की हजारों मूर्त्तियों का उत्कीर्णन किया। बुद्ध की इन मूर्त्तियों ने इस क्षेत्र में नये स्वर्ग की रचना की। जब कोई भूला बिसरा यात्री इस क्षेत्र में अचानक पहुँच जाता से इस स्वर्ग को देखकर हैरान रह जाता। जब सूर्य रश्मियां हरियाली से ढकी हुई पहाडि़यों और उनमें उत्कीर्णित भगवान बुद्ध की हजारों मूर्त्तियों पर अठखेलियां करतीं तो लगता कि रश्मिरथी सूर्य की पत्नी स्वाति ने स्वयं प्रकट होकर भगवान सूर्य की रश्मियों से अपना शृंगार किया है। इस क्षेत्र में भगवान बुद्ध की मूर्त्तियों का इतने बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ कि यहां से मूर्त्तिशिल्प की गांधार शैली विकसित हुई। जब सिकन्दर विश्व विजय का स्वप्न लेकर भारत आते समय इस क्षेत्र से निकला तो वह इस सुंदर स्थान को देखकर हैरान रह गया। कुछ समय बाद जब सिकंदर ने घायल होकर विश्व विजय का स्वप्न त्याग दिया और वह वापस यूनान जाने के लिये लौटा तो उसने बामियान क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाये रखने के लिये अपनी सेना का एक हिस्सा यहीं छोड़ दिया। सिकन्दर के आदेश से हजारों यूनानी सैनिक अपने परिवारों सहित यहीं बस गये। नीली आँखों और लाल बालों के सैंकड़ों सुंदर यूनानियों के आ बसने से यह क्षेत्र और भी सुंदर हो गया। उनके देह सौंदर्य के कारण ही अफगानिस्तान के लोग इस क्षेत्र को नूरिस्तान कहने लगे। जब अफगानिस्तान पर अरब आक्रांताओं का आक्रमण हुआ तो नूरिस्तान के लोगों ने अरब आक्रांताओं के धर्म को मानने से मना कर दिया। अरब आक्रांता नूरिस्तान के बहादुर यूनानी लोगों को परास्त नहीं कर सके, न ही अन्य किसी तरह से उन्हें अपना धर्म कबूल करवा सके। हार-थक कर अरब लोगों ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर काफिरिस्तान कर दिया। जब चंगेजखाँ बामियान घाटी में पहुँचा तो वह यहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य, शिल्प सौंदर्य और मानव सौंदर्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। काफिरिस्तान के सुंदर इंसानों को मारने में चंगेजखाँ को बड़ा आनंद आया। नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की भयाक्रांत चीखों ने उसके तन-मन में आनंद भर दिया। चंगेज खां ने उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारा। बहादुर होने पर भी यूनानी लोग चंगेजखाँ के सैनिकों का सामना नहीं कर सके। हजारों स्त्री-पुरुष और बच्चे प्राण बचाने के लिये पहाड़ों में भाग गये। चंगेजखाँ ने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतारा। नूरिस्तान से निबट कर चंगेजखाँ ने बामियान घाटी में ही बसे सुर्ख शहर को जा घेरा। सुर्ख शहर की प्राकृतिक बनावट तथा दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि उस पर कोई भी सेना बाहर से आक्रमण करके अधिकार नहीं कर सकती थी, चाहे शत्रु सेना सौ वर्षों तक ही शहर को घेर कर क्यों न बैठी रहे। सुर्ख के राजा को नित्य नये विवाह करने का शौक था इसलिये वह चंगेजखाँ जैसे दुर्दांत शत्रु की परवाह किये बिना अपना विवाह करने के लिये चला गया तथा शहर को राजकुमारी के भरोसे छोड़ गया। सुर्ख की राजकुमारी अद्वितीय संुदरी थी तथा विवाह के योग्य भी। उसने चंगेजखाँ को गुप्त संदेश भिजवाया कि यदि चंगेजखाँ उसे अपनी रानी बना ले तो वह शहर पर उसका अधिकार करवा देगी। चंगेजखाँ ने राजकुमारी की शर्त स्वीकार कर ली। राजकुमारी ने चंगेजखाँ के आदमियों को वह पहाड़ी बता दी जहाँ से सुर्ख शहर को पानी मिलता था। चंगेजखाँ ने पानी का प्रवाह रोक दिया। पानी न मिलने के कारण सुर्ख शहर में हाहाकार मच गया और सुर्ख की सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा। सुर्ख पर अधिकार करते ही चंगेजखाँ ने राजकुमारी के महल को छोड़कर शेष शहर में कत्ले आम करने का आदेश दिया। चंगेजखाँ की वहशी सेना ने कई दिन तक शहर में कहर बरपाया किंतु राजकुमारी का महल लूट, हत्या और बलात्कार से बचा रहा। एक दिन शाम के समय चंगेजखाँ ने राजकुमारी को संदेश भिजवाया- ‘कल सवेरे फौज कूच करेगी। आप बाहर आ जाइये।’ राजकुमारी सफर के लिये तैयार होकर बाहर आ गयी। फौज पंक्तिबद्ध होकर प्रस्थान के लिये तैयार खड़ी थी। चंगेजखाँ राजकुमारी के स्वागत में उठ कर खड़ा हुआ। राजकुमारी दोनों बाहें फैलाकर आगे बढ़ी किंतु उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा जब उसने चंगेजखाँ के आदेश को सुना। वह अपने सैनिकों से कह रहा था- ‘प्रत्येक सिपाही इस दुष्ट राजकुमारी के सिर पर एक पत्थर मारे। जो अपने बाप की नहीं हुई वह मेरी क्या होगी?’ चंगेजखाँ के आदेश का पालन हुआ। राजकुमारी चीख मार कर नीचे गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद उसकी लोथ ही वहाँ रह गयी। राजकुमारी के महल की ईंट से ईंट बजा दी गयी। चंगेजखाँ की सेना लूट-खसोट और कत्ले-आम के नये अध्याय लिखने के लिये आगे चल पड़ी। पीछे छोड़ गयी सुर्ख शहर के खण्डहर, जो आज भी चंगेजखाँ के क्रूर कारनामों और राजकुमारी के पितृद्रोह की कहानी सुनाने के लिये मौजूद हैं। जब चंगेजखाँ अपनी सेना के साथ बामियान की घाटी में एक पहाड़ी क्षेत्र से होकर निकला तो उसने बहुत दूर से एक पहाड़ी से सट कर खड़े दो विशाल बुतों को देखा। निकट पहुँचने पर उसने पाया कि इन विशाल बुतों के पास छोटे-छोटे हजारों बुत बिखरे पड़े हैं। उसने पहाडि़यों में बनी हुई हजारों गुफाओं को भी देखा जो पत्थरों को काटकर बनाई गयी थीं। इन गुफाओं की दीवारों पर भी हजारों बुत खड़े थे जिनमें बहुत से टूटे हुए थे। इस अद्भुत दृश्य को देखकर उसकी आँखें हैरानी से फैल गयीं। दरअसल चंगेजखाँ उन पहाडि़यों में पहुँच गया था जहाँ उसके पहुँचने से लगभग सवा हजार साल पहले बौद्ध भिक्षुओं ने सैंकड़ों पहाडि़यों को काटकर विशाल बौद्ध मठों का निर्माण किया था तथा एक पहाड़ी के बाहरी हिस्से को काटकर भगवान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियाँ बनाईं थीं। इन मूर्तियों के ऊपर विशाल मेहराबों का निर्माण किया गया था। मेहराबों में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र से सम्बन्धित कई रंगीन चित्र भी बनाये थे। भिक्षुओं ने आसपास की पहाडि़यों को काटकर हजारों गुफाओं का निर्माण भी किया था तथा उनमें सुंदर मूर्तियों का उत्कीर्णन किया था। जब अंग्रेजों ने अफगानिस्तान पर अधिकार किया तो उन्होंने बामियान और स्वात क्षेत्र में बिखरी हुई मूर्त्तियों को फिर से सहेजने का काम किया। इस क्षेत्र में बिखरी सैंकड़ों मूर्त्तियों को एकत्रित करके एक म्यूजियम में रखवाया गया। आज ये मूर्त्तियां पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में बने एक राजकीय संग्रहालय में रखी हैं जिसे ‘‘स्वात म्यूजियम’’ के नाम से जाना जाता है। इन मूर्त्तियों को देखने के लिये दुनिया भर के हजारों पर्यटक प्रतिवर्ष स्वात पहुंचते हैं। इनमें ं यूरोपीय देशों के साथ ही चीन, जापान, कोरिया आदि उन एशियाई देशों के पर्यटक भी बड़ी संख्या में होते हैं जिनमें बौद्ध धर्म की व्यापक स्तर पर मान्यता है। वर्ष 1998 में अफगानिस्तान में जब तालिबान अपने चरम उफान पर था तब उन्होंने इन मूर्त्तियों पर तोपों से गोले बरसाये। भगवान बुद्ध की सैंकड़ों मूर्त्तियां एक बार फिर तोड़ डाली गईं। जब अमरीका ने तालिबान को अफगानिस्तान से खदेड़ दिया तब तालिबान ने भागकर पाकिस्तान में शरण ली। अब स्वात घाटी का वह हिस्सा जो पाकिस्तान में है, तालिबान के चंगुल में है। तालिबान ने धमकी दी है कि वह पाकिस्तान सरकार के राजकीय संग्रहालय;स्वात म्यूजियम को तोड़ कर नष्ट कर देगा। यह तो समय बतायेगा कि तालिबान स्वात म्यूजियम को निगल जायेगा या उससे पहले पाकिस्तान उन पर कोई कार्यवाही करने में सफल होगा किंतु यह निश्चित है कि यदि तालिबान स्वात म्यूजियम को निगलने में कामयाब हुआ तो उसका अगला निशाना यहां से केवल 40 किलोमीटर दूर स्थित तक्षशिला होगा। वही तक्षशिला जो किसी समय ज्ञान-विज्ञान और दर्शन का केन्द्र था और अब पूरी तरह खण्डहर के रूप में मौजूद है। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता,

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  • क्या तीन राजनेत्रियों के अहंकार ने गोपाल कृष्ण गांधी की नैया डुबो दी !

     03.06.2020
    क्या तीन राजनेत्रियों के अहंकार ने गोपाल कृष्ण गांधी की नैया डुबो दी !


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    गोपाल कृष्ण गांधी जिस पृष्ठ भूमि से आते हैं, उसे देखते हए उन्हें भाजपा द्वारा उपराष्ट्रपति पद के लिए समर्थन दिया जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। वे महात्मा गांधी के पौत्र हैं, उन्हें सार्वजनिक जीवन का 72 वर्ष लम्बा अनुभव है। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे तथा पूरे पांच साल तक पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल रहे। जब भाजपा को मोहनदास करमचंद गांधी से परहेज नहीं रहा तो, गोपाल कृष्ण देवदास गांधी से कैसा परहेज! फिर भी भाजपा ने गोपालकृष्ण गांधी को समर्थन नहीं देकर भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक सम्मानित, अनुभवी एवं परिपक्व नेता 68 वर्षीय वैंकया नायडू को सक्रिय राजनीति से विलग कर उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया तो इसके पीछे की बातें बहुत सी गहरी बाते हैं। शिवसेना ने एनडीए द्वारा उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के चयन के लिए की जा रही बैठक से ठीक पहले, चौराहे पर आकर गोपाल कृष्ण गांधी की हाण्डी फोड़ी तो भाजपा के लिए, गोपाल कृष्ण के नाम का समर्थन करना आसान नहीं रह गया था किंतु गोपाल गांधी की नैया डुबोने के लिए शिवसेना अकेली पर्याप्त नहीं थी।

    राजनीति में कहा कुछ जाता है और किया कुछ जाता है। जब उसके परिणाम आते हैं तो उनका मतलब कुछ और निकाला जाता है। यदि सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और मायावती चाहतीं तो भाजपा के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को समर्थन देकर उपराष्ट्रपति पद के लिए ऐसा व्यक्ति चुन सकती थीं जो भाजपा और विपक्ष दोनों के लिए समान रूप से स्वीकार्य हो किंतु तीनों राजनेत्रियों के अहंकार ने न केवल गोपाल कृष्ण गांधी की नैया डुबो दी अपितु विपक्ष द्वारा समर्थित प्रत्याशी को उपराष्ट्रपति बनाए जाने का अवसर भी हाथ से निकाल दिया। इतना ही नहीं इस अहंकार ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस तथा उसके थैले की अन्य पार्टियों के लिए पराजय का मार्ग और अधिक चौड़ा कर दिया है। बहुत सी विपक्षी पार्टियों के विधायकों ने खुलेआम अपनी पार्टी से विद्रोह करके भाजपा के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को वोट दिया है। उपराष्ट्रपति के लिए होने वाले मतदान में लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य इस विद्रोह को दोहरा सकते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राजनीति के चतुरतम खिलाड़ियों में से एक मुलायमसिंह से भी कुछ नहीं सीख सकी जिन्होंने राहुल का समर्थन लेने पर अपने ही बेटे के घुटने टिकवा दिए तथा राष्ट्रपति पद के भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में खुले आम वोट डलवाये।

    लगे हाथों कुछ बात गोपाल कृष्ण गांधी तथा उनके बाबा मोहनदास गांधी की भी हो जाए। भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु के प्रकरण में कांग्रेस के डिक्टेटर मोहनदास गांधी ने वर्ष 1931 में देश की आशाओं के विपरीत कार्य किया। देश चाहता था कि गांधीजी, लॉर्ड इरविन से होने वाली संधि में युवा क्रांतिकारियों की फांसी की सजा को माफ करवाएं किंतु गांधीजी तो जैसे स्वयं ही जिद पर अड़े थे कि भगतसिंह तथा उनके साथियों को फांसी अवश्य दी जाए। पाठकों को स्मरण दिला देना उचित होगा कि दिसम्बर 1921 में अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी को कांग्रेस का डिक्टेटर नियुक्त किया गया था। उनकी यह डिक्टेटरशिप यहां तक चली कि 1932 के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी कांग्रेस के एक मात्र प्रतिनिधि बनकर गए, गांधीजी ने साफ कह दिया कि वे कांग्रेस के अकेले प्रतिनिधि होंगे, किसी दूसरे नेता को नहीं ले जाएंगे। तत्कालीन वायसरय लॉड इरविन ने लिखा है कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि गांधीजी, भगतसिंह तथा उसके साथियों की फांसी की सजा माफ करने की मांग करेंगे किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी हो गई तब पूरा देश गांधीजी के खिलाफ गुस्से से उबल पड़ा जिसका सामना कांग्रेस को लाहौर अधिवेशन में करना पड़ा।

    भगतसिंह तथा उनके साथियों की फांसी का विरोध नहीं करने वाले उन्हीं गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी ने जब राष्ट्रद्रोही याकूब मेनन को न्यायालय के द्वारा दी गई फांसी की मांग का विरोध किया तो देश एक बार फिर से व्यथित हो उठा। राजनेता मानते हैं कि जनता की स्मरणशक्ति कमजोर होती है किंतु शिवसेना ने नेताओं का यह भ्रम दूर करने में जरा भी विलम्ब नहीं किया। जहाँ तक वैंकया नायडू का प्रश्न है, वे उसी आरएसएस की पृष्ठभूमि से आते हैं, जिस पर कांग्रेस के बहुत से नेता मोहनदास गांधी की हत्या में संलिप्तता का आरोप लगाते रहे हैं। इतिहास के इस मोड़ पर एक बार फिर आरएसएस के निष्ठावान स्वयं सेवक तथा कांग्रेस के गांधी आमने-सामने हो गए हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • फारुख अब्दुल्ला को क्यों चाहिए आजादी ?

     03.06.2020
    फारुख अब्दुल्ला को क्यों चाहिए आजादी ?


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    भारत की आजादी से 10 साल पहले जन्मे फारुख अब्दुल्ला अब 80 वर्ष के हो चुके हैं। भारत की आजादी से ज्यादा वर्षों की उनकी आयु हो चुकी है। 1980 में वे राजनीति में आए तथा पहली बार भारत की लोकसभा में सदस्य चुने गए। अपने पिता शेख अब्दुल्ला के मरने पर 1982 में वे कश्मीर प्रांत के पहली बार मुख्यमंत्री बने। फारुख अब्दुल्ला की माँ बेगम अकबर जहान मूलतः यूरोपीय पिता की संतान थीं। उन्होंने फारुख अब्दुल्ला को जन्म देने के अलावा दो बार भारत की लोकसभा में कश्मीर का प्रतिनिधित्व भी किया। अकबर जहान के यूरोपीय पिता अंग्रेजी भारत में होटलों की एक शृंखला के मालिक थे। अकबर जहान ने अंग्रेजी भारत तथा स्वतंत्र भारत की धरती पर 93 वर्ष की लम्बी जिंदगी व्यतीत की। शेख अब्दुल्ला की पत्नी होने के कारण उन्हें मादरे मेहरबान ए कश्मीर कहा गया।

    अपने 27 साल के राजनीतिक जीवन में फारुख अब्दुल्ला कई बार जम्मू-कश्मीर विधान सभा के सदस्य तथा मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वे मनमोहन सिंह सरकार में केबीनेट मंत्री भी रहे। फारुख के पुत्र उमर अब्दुल्ला को भी विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री तथा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विदेश राज्यमंत्री रहने का मौका मिला। अब्दुल्ला परिवार स्वयं को कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में ठीक वैसा ही मानता है जैसा कि भारत के परिप्रेक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू के परिवार को देखा जाता है। हालांकि यह अलग बात है कि भारत संसार के नक्शे पर सबसे बड़े देशों में शामिल होता है जिसका कि जम्मू-कश्मीर एक छोटा सा प्रांत है। अब्दुल्ला परिवार की इन दिनों ठीक वैसी ही स्थिति है जैसी कि इन दिनों भारत में जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारियों की चल रही है। नेहरू-गांधी परिवार की तरह अब्दुल्ला परिवार को भी पीढ़ी-दर पीढ़ी सत्ता सुख भोगने से सत्ता की ऐसी चाट लगी है कि अब, बिना सत्ता के बैठना उनके लिए असहनीय है। इस कारण जिस प्रकार नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी राहुल गांधी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जाकर कन्हैया के साथियों द्वारा मांगी जा रही आजादी का समर्थन करते रहे हैं, ठीक उसी प्रकार फारुख अब्दुल्ला भी कश्मीरी पत्थरबाजों की भारत से आजादी की मांग का समर्थन करते आए हैं।

    21 जुलाई को राहुल गांधी ने अपना एक पुराना वक्तव्य दोहराते हुए कहा है कि कश्मीर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा एनडीए सरकार की नीतियों की वजह से जल रहा है। यह संयोग नहीं हो सकता कि 21 जुलाई को ही फारुख अब्दुल्ला ने भी अपने पुराने बयान को दोहराते हुए कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए अमरीका तथा चीन की मध्यस्थता के प्रस्तावों को स्वीकार किया जाना चाहिए। हालांकि राहुल ने फारुख अब्दुल्ला के उस वक्तव्य को नकार दिया जिसमें तीसरे देश की मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया गया है। राहुल के लिए ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक हो गया कि इंदिरा गांधी के समय से ही शिमला समझौते के अनुसार कांग्रेस इस नीति पर चल रही है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर समस्या का निस्तारण इन दोनों देशों की आपसी बातचीत से होना चाहिए न कि किसी अन्य पक्ष की मध्यस्थता से।

    जिस आजादी की मांग का समर्थन फारुख अब्दुल्ला इन दिनों कर रहे हैं, ऐसी आजादी उन्हें और उनकी औलादों को भारत के अतिरिक्त और कहाँ मिलती! उनकी तीन पीढ़ियां, घर के बूढ़े, बच्चे और औरतें तक एमएलए, एमपी, मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर रह लिए। अब आजादी में क्या घाटा रह गया है! वे कौनसी आजादी की मांग कर रहे हैं। क्या वे अलग देश का निर्माण करके पाकिस्तान के उस स्वप्न को पूरा करना चाहते हैं जिसमें कश्मीर को भारत से उसी प्रकार अलग करने की योजना है जिस प्रकार पूर्वी पाकिस्तान बांगला देश के नाम से अलग देश बना! यदि फारुख अब्दुल्ला ऐसा चाहते हैं तो इससे अधिक घृणित बात और हो ही नहीं सकती। यदि फारुख ऐसा नहीं चाहते हैं तो वे खुलकर बताएं कि उनके मन में क्या है ? वे चीन और अमरीका की मदद से कश्मीर समस्या का क्या समाधान करवाना चाहते हैं?

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • सबके अपने-अपने कोट -

     03.06.2020
    सबके अपने-अपने कोट -

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


    भारत की मूल परम्परा बिना सिले हुए कपड़े पहनने की रही है। बिना सिली हुई मर्दानी धोती, औरतों की लांगदार धोती और बिना लांग की साड़ी, बिना सिले हुए उत्तरीय, साफे, लंगोटी और दुपट्टे में ही आम भारतीय का जीवन मजे में कटता था। यह तो नहीं कहा जा सकता कि जब मुसलमान इस देश में आये तोे वे अपने साथ पहली बार सिला हुआ कपड़ा लेकर आये किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि धोती की जगह सलवार, सुतन्नी और पजामे, गरारे तथा उत्तरीय की जगह कुर्ते, अचकन, शेरवानी मुसलमानों के साथ ही इस देश में आये। जब अंग्रेज इस देश में आये तो अपने साथ कोट-पैण्ट और चुस्त कपड़े लेकर आये। उनके कोट भी तरह-तरह के थे। हर समय का, हर ऋतु का और हर काम का अलग कोट। कुछ भारतीयों ने भी उनकी देखा-देखी, अपनी हैसियत के अनुसार कोट पहनने आरम्भ किये।

    जवाहर का गुलाब के फूल वाला कोट

    भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का कोट बिल्कुल अलग तरह का था जो गले से आरम्भ होकर घुटनों से जरा ही ऊपर समाप्त होता था। उस पर हर समय गुलाब का ताजा फूल जगमगाता रहता था। इस कोट में वे रौबदार व्यक्तित्व के धनी दिखाई देते थे। उस जमाने में जवाहरलाल नेहरू जैसा इक्का-दुक्का व्यक्ति ही ऐसा शालीन कोट पहन पाता था। शायद इसी कोट का चमत्कार था कि वे लंदन के नेताओं से जो चाहे मनवा लेते थे।

    शास्त्रीजी का फटे कॉलर वाला कोट

    लाल बहादुर शास्त्री गुदड़ी के लाल थे, उनके पास कोट नहीं था। कहते हैं जवाहरलाल ने शास्त्रीजी को अपना कोट दिया था। शास्त्रीजी जरूरत होने पर उसी कोट को पहन लेते थे। जब शास्त्रीजी प्रधानमंत्री बने तब भी वही कोट उनकी आवश्यकता पूरी करता रहा। इसी फटे कॉलर के कोट को पहनकर उन्हें 1971 की सर्दियों में पास्तिान के विरुद्ध अपने लड़ाकू विमानों को उड़ने के लिये कह दिया था जिसकी कि पूरी दुनिया को उम्मीद नहीं थी। यह किस्सा बहु-प्रचलित है कि जब शास्त्रीजी 1965 के युद्ध के बाद ताशकंद जाने लगे तो उनके सचिव ने कहा कि एक नया कोट सिलवा लेते हैं क्योंकि इस कोट का कॉलर फट गया है किंतु शास्त्रीजी ने मना कर दिया। इसी फटे हुए कॉलर वाले कोट को पहनने वाले शास्त्रीजी आम भारतीय के दिल और दिमाग पर आज तक छाये हुए हैं।

    इंदिरा का निर्गुटिया कोट

    इंदिरा गांधी भी सर्दियों में एक लेडीज कोट पहनती थीं। इस कोट में वे बड़ी गरिमामय और दृढ़ दिखती थीं। किसी की हिम्मत नहीं होती थीं कि कोई उनसे आंख मिलाकर बात कर ले। जब वे इस कोट को पहनकर निर्गुट सम्मेलनों में जातीं तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े नेताओं के पसीने छूट जातेे। इस निर्गुटिया कोट के बल पर वे दुनिया की बड़ी ताकतों की परवाह किये बिना, दुनिया के सैंकड़ों देशों में शक्तिपुंज के प्रतीक की तरह जगमगाती रहीं। उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये और दुनिया चूं भी नहीं कर सकी।

    डॉ. मनमोहनसिंह का रेनकोट

    वक्त ने करवट ली और भारतीय राजनीति के आकाश में डॉ. मनमोहनसिंह प्रकट हुए जिन्होंने दस वर्ष तक देश की सरकार चलाई। उनके कोट के बारे में अब तक किसी को पता नहीं था किंतु अचानक भारत की संसद में उनके रेनकोट की चर्चा हुई। मालूम पड़ा कि वे इस रेनकोट को पहनकर ही बाथरूम में नहाते रहे। यही कारण रहा कि कोयला खदानों की नीलामी की कालिख भले ही कितनी ही उड़ी हो, यही रेनकोट उनका अब तक बचाव कर रहा है।

    नमो का लखटकिया कोट

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लखटकिया कोट भी बहुत चर्चा में रहा। जनता को बताया गया कि इसकी कीमत 10 लाख रुपये है। इसी कोट को पहनकर वे अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा से मिलने गए। भारतीय भाइयों और बहनों ने उस कोट की ऐसी बैण्ड बजाई कि उसे नीलाम करवाकर माने। कोट की नीलामी से मिले 4.31 करोड़ रुपये पतित-पावनी देवनदी भागीरथी माँ गंगा की सफाई के लिये दिये गये हैं। और भी आयेंगे कोट समय बहुत बलवान है, देश भी बहुत बड़ा है और लोकतंत्र भी काफी मजबूत है, समय के साथ और भी कोट आयेंगे और देश की सेवा करेंगे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • बाबूजी धीरे चलना.... आगे टोल नाका है!!!!

     03.06.2020
    बाबूजी धीरे चलना.... आगे टोल नाका है!!!!


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    बाबूजी धीरे चलना.... आगे टोल नाका है!!!!

    ये तो कमाल हो गया! जयपुर-अजमेर टोल नाके पर ऐसी विचित्र घटना घटी कि दुकादार तो मेले में लुटे और तमाशबीन अपना सामान बेच गये। राज्य में कानून के मालिक तो हैं विधायक लोग किंतु टोल नाके के कर्मचारियों ने, इन मालिकों से ही लगातार दो दिन तक दो-दो बार गैरकानूनी बदतमीजी करके यह जता दिया कि देश में कानून कैसा और किसका चल रहा है! जो विधायक जनता को उसका अधिकार दिलाने के लिये बने हैं, वे अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सके। कबीर ने शायद इसीलिये कहा था- पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवत हांसी!!!! 

    यह घटना पहली बार नहीं घटी है। जयपुर और कोटा के बीच पड़ने वाले एक टोल नाके पर लगभग डेढ़-दो साल पहले राज्य के परिवहन मंत्री से ही टोल ले लिया गया। मंत्रीजी चिल्लाते रहे कि मैं परिवहन मंत्री हूँ किंतु किसी ने न सुनी। अंत में बेचारे विधानसभा में जाकर चिल्लाये किंतु उस टोल नाके पर अंधेरगर्दी आज भी राज्य कर रही है। अंधेरा कायम रहे!!!!

    टोल नाकों पर सामान्यतः यह नहीं लिखा रहता कि यहां कौन-कौन फ्री में निकलेगा! केवल इतना लिखा रहता है कि यहां इस-इस वाहन से इतने-इतने रुपये लिये जायेंगे। सारे सरकारी अधिकारी जिनके पास लाल रेखा खिंची हुई नम्बर प्लेट का वाहन नहीं है और उनके विभागों ने अनुबंध के वाहन लगा रखे हैं, दिन-रात इन टोलनाके वालों से परेशान रहते हैं। बेचारों का अपने ही जिले में सरकारी दौरे पर जाना किसी सर दर्द से कम नहीं होता। करें भी तो करें क्या, जीना यहां, मरना यहां!!!!

    टोल नाके भी क्या अजीब सी चीज हैं। न जाने किसने इनका आविष्कार किया होगा। कुछ पढ़े-लिखे से दिखने वाले अनपढ़ टाइप के कर्मचारी बहुत कम सैलेरी में इन नाकों पर तैनात किये जाते हैं। ये कर्मचारी तो केबिन में बैठकर पर्चियां फाड़ते रहते हैं किंतु नाके के पास ही सड़क पर खटिया बिछाकर कुछ बेफिक्रे से लोग ताश खेलते और चाय पीते रहते हैं। जब कभी केबिन वालों को जरूरत पड़ती है तो ये बेफिक्रे से लोग अचानक फिक्रमंद हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे सरकार ने असामाजिक तत्वों को खास तरह का रोजगार दे दिया है। सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का!!!!

    लगे हाथों टोल टैक्स की फिलोसोफी पर भी बात कर लें। टोल हर उस आम आदमी को देना होता है जो सड़क पर कम से कम चार पहिया वाहन लेकर निकलता है लेकिन क्यों????  यह समझ में नहीं आता।

    सरकार ने हर उस आदमी से पहले ही टैक्स ले लिया है जिसने भी वाहन खरीदा है। हर उस आदमी से टैक्स ले लिया है जिसने भी पैट्रोल या डीजल खरीदा है। हर उस आदमी से फीस ले रखी है जिसने भी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया है। हर उस आदमी से टैक्स ले रखा है जिसने भी आयकर चुकाया है। हर उस आदमी से सर्विस टैक्स ले रखा है जिसने अपने वाहन की मरम्मत करवाई है। हर उस आदमी से वैट ले रखा है जिसने भी अपने वाहन में कोई ऐसेसरी लगवाई है। हर उस आदमी से एज्यूकेशन सैस सहित दूसरे सैस ले रखे हैं जिन्होंने इनकम टैक्स भरा है। कहने का अर्थ ये कि सरकार ने सड़क पर वाहन चलाने वाले हर व्यक्ति से अच्छा-खासा टैक्स कई-कई बार ले रखा है। फिर टोल टैक्स किस बात का ?????

    क्या सड़क बनाना सरकार की ड्यूटी नहीं है?? क्या सड़क पर निर्बाध यातायात सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है??? क्या आम जनता से टोल लिया जाना और खास जनता को टोल से मुक्त रखा जाना, नागरिकों के बीच भेदभाव करने जैसा नहीं है ???? भारत के टोलनाके अंग्रेजी के इस पुराने जुमले को चरितार्थ करते हुए प्रतीत होते हैं, जिसे जवाहरलाल नेहरू भी दोहराया करते थे- सम पीपुल आर मोर ईक्वल इन डेमोक्रेसी!!!!

    टोल का एक गणित यह भी है कि लगभग हर 50 किलोमीटर पर एक टोल नाका है। हर टोल नाके पर एक वाहन कम से कम 15 मिनट तक व्यर्थ ही खड़ा रहकर धुआं छोड़ता है जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। इस दौरान जलने वाले पैट्रोल एवं डीजल पर जो विदेशी मुद्रा चुकाई जाती है, वह व्यर्थ जाती है। यदि सरकार टोल नाकों को बंद कर दे तो देश को लगभग उतने ही रुपये की बचत हो जायेगी, जितनी कमाई टोल के माध्यम से की जा रही है। 

    कोढ़ में खाज की स्थिति तो तब बनती है जब जनता से टोल के माध्यम से सड़क की पूरी लागत वसूल कर ली जाती है और टोल फिर भी जारी रहता है। तुलसीदासजी ने लिखा है कि राजा जब पुल बनाता है तो चींटियां भी उस पर चढ़कर नदी के पार चली जाती हैं। यहां तो सारी वसूली ही चींटियों से की जाती है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • इस्लामिक स्टेट में सूफी संतों के लिये जगह नहीं होगी!

     03.06.2020
    इस्लामिक स्टेट में सूफी संतों के लिये जगह नहीं होगी!

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    इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया के नाम से चल रहे मध्य एशियाई आतंकी संगठन ने पाकिस्तान में सूफी मत के संत की मजार पर 108 लोगों को मौत के घाट उतार कर एक बार फिर पूरी दुनिया को संदेश दिया है कि इस्लामिक स्टेट में सूफी मत के लिये कोई जगह नहीं होगी। ऊपरी तौर पर तो ऐसा ही लगता है कि यह मामला इतना ही है किंतु मामला केवल इतना ही नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि इस्लामिक स्टेट में किसी भी इंसान के लिये कोई जगह नहीं है। वहां केवल राक्षसों, शैतानों, पिशाचों, हैवानों और रक्त पिपासु जीवों के लिये जगह है। सूफी मत, इस्लाम से भी पुराना है तथा इसकी रहस्यवादी उपासना पद्धति का जन्म स्वतन्त्र रूप से हुआ है किंतु उसने विश्व के लगभग समस्त प्रमुख धार्मिक मतों से रहस्यवादी दर्शन को ग्रहण करके सार्वभौमिक स्वरूप ग्रहण किया है। उस पर भारतीय वेदान्त तथा बौद्ध धर्म का प्रभाव है तो यूनान के अफलातून (अरस्तू) के मत का भी उतना ही प्रभाव है। मसीही धर्म से भी उसने बहुत कुछ लिया है तो पैगम्बर मुहम्मद ने भी उस पर अपनी छाप छोड़ी है। इन सारे धर्मों और मतों में जो कुछ भी रहस्यमयी उपासना पद्धतियां थीं उन सबको सूफियों ने ग्रहण करके अपने लिये एक ऐसे अद्भुत दर्शन की रचना की जो अपने आप में बेजोड़ है। छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाई के। मोहे सुहागन कीनी से मोसे नैना मिलाई के .....। XXX गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस चल खुसरो घर आपने रैना भई विदेस।। ..... इस तरह की मीठी, मनमोहक तथा दिल को छने वाली बातें सूफी मत ही कह सका। मध्य एशिया की शामी जातियों के कबीलों की गोद में सूफी मत ने जन्म लिया तथा प्रेम के बोल बोलते हुए और अपनी मस्ती में नाचते-गाते हुए यह मत पूरी दुनिया में फैल गया। सूफी मत के भीतर बहुत से सम्प्रदाय हो गये जिनमें से 14 सम्प्रदाय भारत में आये। इनमें से भी चार सम्प्रदयों ने भारत में विशेष प्रभाव जमाया। पाकिस्तान में जिस सूफी संत की मजार पर आईसिस ने यह खूनी खेल खेला है, वह भी उसी धरती से सिन्ध पहुंचा जिस धरती पर आईसिस का जन्म हुआ है। सूफी मतों ने इस्लाम से जितना लिया नहीं है, उतना दिया है। इन्होंने ही भारत में इस्लाम के प्रसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। औरंगजेब की तलवार जो काम नहीं कर सकी, सूफियों के प्रेम के तरानों ने वो काम किया। भारत के मुसलमान तो इस्लाम और सूफी मत में अंतर करना भी नहीं जानते। वे अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और नागौर के सुल्तानुत्तारकीन की दरगाह पर उसी शिद्दत से जाते हैं जिस शिद्दत से वे किसी मस्जिद में या हज पर जाते हैं। आईसिस का यह कारनामा ऐसा ही है जैसे किसी पेड़ पर बैठकर उसके तने को काटना। यदि ट्रम्प ऐसे आईसिस को नष्ट करने के लिये संकल्पबद्ध हैं तो अमरीका में उनका विरोध करने वालों पर हैरानी होती है। तथा यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या अमरीका में भी आईसिस अपनी जड़ें गहरी जमा चुका है! क्या वे भी चाहते हैं कि आईसिस का खात्मा न हो, आतंकवाद का खात्मा न हो! कुल मिलाकर अजीब ही है ये दुनिया! यह सोचना भी गैरवाजिब नहीं लगता कि जब आईसिस पाकिस्तान के सिंध प्रदेश में ऐसे रक्तरंजित कारनामों को अंजाम दे सकता है, तो भारत क राजस्थान वहां से अधिक दूरी पर नहीं है। क्या इन क्रूर दैत्यों का ...अगला निशाना हम ही हैं! - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

     03.06.2020
    युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

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    रैगिंग पाश्चात्य जीवन शैली की कुछ अत्यंत बुरी बुराइयों में से है, जिसे भारतीयों ने कुछ अन्य बुराईयों की तरह जबर्दस्ती ओढ़ लिया है। यह अपने आप में इतनी बुरी है कि हम विगत कई वर्षाें से प्रयास करने के उपरांत भी इसे महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से समाप्त नहीं कर पाये हैं। इसका क्या कारण है! रैगिंग के जारी रहने का सबसे बड़ा कारण स्वयं रैगिंग ही है।

    जो युवा एक बार रैगिंग का शिकार हो जाते हैं, उनके मन से मानवीय संवेदनाएं नष्ट हो जाती हैं और वे अपनी रैगिंग का बदला दूसरे युवाओं से लेने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी मानसिकता के चलते रैगिंग को समाप्त नहीं किया जा सका है।

    भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने देश के समस्त शिक्षण संस्थाओं को निर्देश दे रखे हैं कि वे अपनी संस्थाओं को रैगिंग से मुक्त रखें। इन आदेशों के परिप्रेक्ष्य में अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में रैगिंग के विरुद्ध कुछ कदम भी उठाये हैं किंतु रैगिंग के शिकार हो चुके युवाओं के क्रूर व्यवहार के कारण रैगिंग बदस्तूर जारी है। यह बुराई तकनीकी, व्यावसायिक एवं चिकित्सा शिक्षण संस्थाओं में कैंसर का रूप ले चुकी है। विगत कुछ वर्षों में देश के अनेक शहरों में स्थित शिक्षण संस्थाओं में नवीन प्रवेश लेने वाले बच्चों को रैगिंग की काली छाया ने डस लिया। कई बच्चे हमेशा के लिये शिक्षण संस्था छोड़कर चले गये तो कुछ बच्चों को प्राणों से भी हाथ धोने पड़े।

    जो छात्र पिछली साल रैगिंग का शिकार हुए थे अब वही छात्र अपनी रैगिंग का बदला लेने के लिये नये छात्रों का बड़ी क्रूर मानसिकता के साथ स्वागत करने को उत्सुक दिखायी देते हैं। रैगिंग के दौरान बच्चों के साथ गाली-गलौच तथा मारपीट की जाती है जिसके साथ तर्क दिया जाता है कि इससे बच्चे बोल्ड बनेंगे और उनका दब्बूपन जाता रहेगा। यह तर्क सभ्य समाज मंे किसी भी समझदार व्यक्ति के गले उतरने वाला नहीं है। गाली, लात और घूंसे खाकर आदमी बोल्ड कैसे बनेगा? ऐसे व्यक्ति के भीतर तो एक ऐसी सहमी हुई कुण्ठित पसर्नलटी जन्म लेगी जो अपने से कमजोर लोगों पर हाथ उठाकर अपने अहम को संतुष्ट करना चाहेगी।

    अक्सर हम देखते हैं कि बात केवल गाली-गलौच या लात-घूंसों तक सीमित नहीं रहती। लड़कों के कपड़े उतरवाना, उन्हें हॉस्टल की बालकनी से रस्सी बांधकर लटका देना, धारा प्रवाह गंदी गालियां बोलने के लिये विवश करना, मुर्गे बनाना, घण्टों धूप में खड़े रखना, सिगरेट पिलाना, हीटर पर बैठने के लिये मजबूर करना जैसी क्रूर हरकतें होती हैं। आजकल तो इस तरह की शारीरिक प्रताड़ना पुलिस थानों में भी नहीं हो सकती जैसी कि शिक्षण संस्थाओं में हो रही है। तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि रैगिंग नहीं होगी तो जूनियर बच्चे अपने सीनियर्स में घुल-मिल नहीं पायेंगे। गाली-गलौच और लात घूसों के बल पर दूसरे लोगों को अपने समूह में शामिल करना एक विचित्र तर्क जैसा लगता है। यह तो आतंक के बल पर दोस्ती गांठने जैसा है। घुलने मिलने के लिये शालीन व्यवहार, मधुर वाणी और परस्पर सहयोग जैसे गुण आवश्यक होते हैं न कि दुर्व्यवहार।

    रैगिंग के शिकार युवा केवल कॉलेज कैम्पस में अपने से जूनियर छात्रों की रैगिंग लेकर ही संतुष्ट नहीं होते। उनमें से बहुत से युवा हमेशा के लिये दूसरों के प्रति संवदेना विहीन हो जाते हैं। वे सड़क, कार्यालय, परिवार एवं रिश्तेदारी में भी दूसरों को पीडि़त करने में सुख का आनंद अनुभव करते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा नागरिक, अच्छा कार्मिक, अच्छा पिता, अच्छा दोस्त और अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं तो हमें घर से ही शुरुआत करनी होगी और बच्चों को रैगिंग से दूर रहने के लिये प्रेरित करना होगा। जिन बच्चों की रैगिंग हो चुकी है, उन्हें बारबार समझाना होगा कि जो आपके साथ हुआ, उसे बुरे स्वप्न की तरह भूल जाओ तथा स्वयं किसी की रैगिंग मत लो।

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