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  • चित्रकूट का चातक - 48

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 48

    दक्षिण से वापसी

    यह बड़ी भारी विजय थी जिसके कारण पूरा दक्खिन काँप उठा था। जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधने तथा खानखाना से छुटकार पाने की फिराक में लगे शहजादे मुराद ने भागते हुए दक्खिनियों के पीछे अपना कोई लश्कर नहीं भेजा अन्यथा दक्खिनियों की बड़ी भारी हानि होती। खानखाना तो वैसे भी नहीं चाहता था कि इस शत्रु फौज का और अधिक नुक्सान हो।

    सुहेलखाँ पर विजय प्राप्त करके खानखाना फिर से जालना को लौट गया। जब परनाला और गावील के दुर्ग मुराद के हाथ लग गये तो उसने अपने सलाहकार सादिकखाँ के कहने से खानखाना को लिखा कि अब अवसर है कि चलकर अहमदनगर ले लें।

    मुराद का पत्र पाकर खानखाना के होश उड़ गये। उसे अनुमान तो था कि शहजादा अपने वचन से फिरेगा किंतु इतनी शीघ्र फिरेगा, इसका अनुमान खानखाना को न था। बहुत सोच विचार कर खानखाना ने मुराद को लिखा कि अभी तो यही उचित है कि इस वर्ष बराड़ में रहकर यहाँ के किलों को फतह करें और जब यह देश पूर्ण रूप से दब जाये तो दूसरे देशों पर जायें। इस लिखित जवाब से मुराद को खानखाना के विरुद्ध मजबूत प्रमाण मिल गया। उसने खानखाना का पत्र ढेर सारे आरोपों के साथ बादशाह अकबर को भिजवा दिया। उसमें प्रमुख शिकायत यह थी कि खानखाना बादशाह से दगा करके चाँद बीबी से मिल गया।

    शहजादे का पत्र पाकर अकबर खानखाना पर बड़ा बिगड़ा। उसने खानखाना को दक्खिन से लाहौर में तलब किया और खानखाना की जगह शेख अबुल को दक्षिण का सेनापति बनाकर भेज दिया।

    उलटा पहिया

    जब खानखाना लाहौर में अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ तो अकबर ने उसकी ड्यौढ़ी बंद करवा दी। बादशाह के खास अमीरों को बादशाह के महलों में ड्यौढ़ी पर हाजिर होने का अधिकार होता था। जब बादशाह किसी अमीर से नाराज हो जाता था तो उसका यह अधिकार छीन लिया जाता था। खानखाना निरंतर शहजादे की अप्रसन्नता, सादिकखाँ की शत्रुता और अपनी बेगुनाही के बारे में तरह-तरह से अर्ज करता रहा। जब कई माह बीत गये और कोई परिणाम नहीं निकला तो एक दिन खानखाना ने अंतिम प्रयास करने का निर्णय लिया और एक कवित्त लिखकर अकबर को भिजवाया-

    'रहिमन एक दिन वे रहे, बीच न सोहत हार।

    बायु जु ऐसी बह गयी, बीचन परे पहार।'


    (कभी ऐसा था कि हार का भी व्यवघान असह्य था और कुछ ऐसी हवा चली कि वे हार छाती पर पहाड़ हो गये हैं और ऐसी स्थिति में चुपचाप सहना ही एक मात्र विकल्प रह गया है।)

    अकबर इस कवित्त को पढ़कर पसीज गया। उसने खानखाना को अपने समक्ष बुलवाया। जब खानखाना बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ तो बादशाह ने पूछा- 'खानखाना! दक्षिण फतह का क्या उपाय है?'

    - 'यदि बादशाह सलामत शहजादे मुराद को वहाँ से हटा कर युद्ध की समस्त जिम्मेदारी मुझे सौंप दें तो दक्षिण पर फतह की जा सकती है।'

    खानखाना का जवाब सुनकर अकबर का चेहरा फक पड़ गया। उसे अनुमान नहीं था कि खानखाना भरे दरबार में शहजादे पर तोहमत लगायेगा। इसके बाद उसने खानखाना से कोई बात नहीं की और खानखाना को अपने मन से उतार कर फिर से उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी।

    जब अकबर लाहौर से आगरा के लिये रवाना हुआ तो खानखाना तथा खानेआजम कोका को भी आगरा के लिये कूच करने का आदेश दिया गया। मार्ग में अम्बाला पहुंचने पर खानखाना की पत्नी माहबानूं बीमार पड़ गयी। 
    माहबानूं अकबर की धाय की पुत्री थी और खानेआजम कोका की सगी बहिन थी। अकबर ने माहबानूं की देखभाल के लिये खानखाना और खाने आजम दोनों को अम्बाला में ही रुकने की अनुमति दी और स्वयं आगरा चला गया। कुछ दिन बाद माहबानूं मर गयी।

    भाग्य का पहिया उलटा घूमना आरंभ हो गया था। अब तक अब्दुर्रहीम को संसार में मिलता ही रहा था किंतु माहबानूं की मृत्यु के साथ अब्दुर्रहीम से नित्य प्रति दिन कुछ न कुछ छिन जाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। माहबानूं को अम्बाला में ही दफना कर रहीम आगरा चला आया।

    खप जासी खुरसाण

    - 'हुजूर! महाराणा अमरसिंह का चारण आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।' पहरेदार ने खानखाना को सूचना दी।

    - 'उसे यहीं ले आ।' खानखाना ने आज्ञा दी।

    चारण मुजरा करके चुपचाप खड़ा हो गया। खानखाना उस समय कुछ लिख रहा था। इसलिये वह मुजरा स्वीकार करके फिर से अपने काम में लग गया। खानखाना को व्यस्त देखकर चारण चुपचाप खड़ा रह गया। जब चारण काफी देर तक नहीं बोला तो खानखाना ने चारण की तरफ देखा चारण ने फिर से मुजरा कर दिया किंतु बोला कुछ नहीं।

    खानखाना ने फिर से मुजरा स्वीकार किया और अपने काम में लग गया। तीसरी बार फिर यही हुआ। जब खानखाना ने सिर ऊपर उठाया तो चारण ने फिर से मुजरा कर दिया।

    - 'अरे कमबख्त बोलता क्यों नहीं? क्या महाराणा ने मुजरे दिखाने के लिये भेजा है?' खानखाना ने हैरान होकर पूछा।

    - 'मेरे स्वामी की आज्ञा है कि जब तक खानखाना स्वयं बोलने के लिये न कहें, मैं कुछ भी न बोलूं।'

    - 'अच्छा तो बोल। मैं तुझे बोलने की आज्ञा देता हूँ।'

    - 'हुजूर! महाराणा ने कहलवाया है-

    हाड़ा कूरम राव बड़, गोखाँ जोख करंत।

    कहियो खानखानाँ ने, बनचर हुआ फिरंत।।

    तुबंरा सु दिल्ली गई, राठौड़ा कनवज्ज।

    राणपयं पै खान ने वह दिन दीसे अज्ज।।'


    (चौहान वंशीय हाड़ा, कच्छवाहे और राठौड़ महलों में विश्राम कर रहे हैं। खानखाना से कहना कि हम सिसोदिये तो वनचर हुए फिर रहे हैं। तंवरों से दिल्ली गयी, राठौड़ों से कन्नौज गया क्या खानखानाओं को राणाओं के लिये अब भी स्वतंत्रता दिखायी देती है?)

    चारण की बात सुनकर खानखाना सोच में पड़ गया। कुछ देर बाद जब वह अपने विचारों से बाहर निकला तो उसने कहा- 'अपने महाराणा से कहना-

    धर रहसी रहसी धरम, खप जासी खुरसाण।

    अमर विसंभर ऊपराँ राखो नहचो राण। '


    (यह धरती रहेगी, धर्म रहेगा। खुरासान देश से आया हुआ यह बादशाह मिट जायेगा। इसलिये हे राणा अमरसिंह! विश्वंभर पर विश्वास रखो।)

    चारण इस महान् आत्मा को नमस्कार करके भलीभांति नतमस्त होकर चला गया।

    फिर से दक्षिण में

    दक्षिण के मोर्चे से एक बुरी खबर आई जिसे सुनकर अकबर थर्रा उठा। दक्षिण ने बलि लेनी शुरू कर दी थी। शहजादा मुराद शराब के नशे में मिरगी आने से मर गया। इस पर अकबर ने शहजादे दानियाल को दक्षिण के लिये नियुक्त किया। जब दानियाल दक्षिण के लिये रवाना हो गया तो अकबर खानाखाना के डेरे पर हाजिर हुआ और बड़ी चिरौरी, मान-मुनव्वल करके खानखाना से विनती की कि वह भी दानियाल के साथ दक्षिण को जावे और किसी भी कीमत पर शहजादे को फतह दिलवाये।

    खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद। यदि वह किसी एक के साथ हो जाता है तो दूसरे के साथ अन्याय होना निश्चित ही है किंतु भाग्य की विडम्बना को स्वीकार कर खानखाना दक्षिण के लिये रवाना हो गया।

    नकाब में चाँद

    जब खानखाना दक्षिण में पहुँचा तो दानियाल ने उसे सबसे पहले अहमदनगर पर ही घेरा डालने के आदेश दिये। शहजादे के आदेश से खानखाना ने अहमदनगर को घेर लिया। एक रात जब खानखाना अपने डेरे में बैठा हुआ कुछ लिखा-पढ़ी कर रहा था तो उनकी नजर अचानक एक काले साये पर पड़ी जो चोरी से खानखाना के डेरे में आ घुसा था।

    खानखाना ने तुरंत तलवार खींच ली और नकाबपोश की तरफ झपटा। नकाबपोश को अनुमान नहीं था कि खानखाना उसे देख चुका है इसलिये पहले तो वह सहम कर पीछे हटा फिर अगले ही क्षण उसने अपने मुँह से नकाब हटा दिया। खानखाना की आँखें आश्चर्य से फटी रह गयीं।

    वह नकाबपोश और कोई नहीं अहमदनगर की सुल्ताना चाँद थी। खानखाना चाँद का यह दुस्साहस देखकर दंग रह गया।

    - 'तसलीम हुजूर!' चाँद ने हँस कर कहा।

    - 'तुम इस तरह यहाँ! तुम्हें पता नहीं तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है?' खानखाना ने चिंतित होकर कहा।

    चाँद फिर हँसी, उसने धीमी आवाज में कहा-

    'सदा नगारा कूच का बाजत आठों जाम।

    रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम।'


    - 'क्या चाहती हो?'

    -'वाह हुजूर! यह भी ठीक रही। जब आप हमारी ड्योढ़ी पर पधारे थे तब हमनें तो पलक पांवड़े बिछाकर हुजूर का ख़ैरमक़दम किया था। आज जब हमारी बारी आयी है तो पूछते हैं कि क्या चाहती हो?'

    - 'लेकिन मैं दिन के उजाले में सबके सामने आया था और तुम इस रात में चोरों की तरह आयी हो।'

    चाँद ने मुस्कुरा कर कहा-

    'रहिमन रजनी ही भली, पिय सों होय मिलाप।

    खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।'


    चाँद की इस बात से खानखाना निरुत्तर हो गया और लज्जित होकर बोला- 'आइये। तशरीफ रखिये।'

    चाँद निःसंकोच उसी आसन पर जाकर बैठ गयी जिस आसन पर कुछ देर पहले खानखाना बैठा हुआ था।

    - 'कहिये क्या सेवा करूँ।' खानखाना ने मुँह रूखा करके पूछा।

    - 'आप तो मुझे केवल इतना बता दें कि जब संधि की शर्तों के अनुसार मैं बराड़ पर अपना अधिकार त्याग चुकी हूँ, तब किस खुशी में आपकी सेनाओं ने फिर से अहमदनगर का रुख किया है?' -

    'मैंने तो उसी समय तुम्हें चेता दिया था कि संधि का कोई अर्थ नहीं है, वह तो मुराद को उस समय अहमदनगर से दूर ले जाने की चेष्टा मात्र थी।'

    - 'तो अब दानियाल को किस तरह दूर ले जायेंगे?'

    - 'रहिमन चाक कुम्हार को मांगे, दिया न देइ।

    छेद में डंडा डारि कै, चहै नाँद लै लेइ।। '


    (यदि कुम्हार चाक से मांगे तो चाक उसे एक छोटा सा दीपक तक न दे किंतु कुम्हार यदि चाक की हलक में डण्डा डालकर घुमा दे तो चाक उसे बड़ी से बड़ी नांद दे देता है। अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के सामने अनुनय का कोई अर्थ नहीं है। उसे तो दण्डित ही किया जाना चाहिये।)

    - 'अर्थात्?'

    - 'इसका अर्थ ये कि तुम्हें फिर से युद्ध का मार्ग छोड़कर युक्ति का मार्ग पकड़ना होगा।'

    - 'कैसी युक्ति?'

    - 'संधि की युक्ति।'

    - 'क्या यह स्थायी समाधान होगा?'

    - 'रहिमन भेषज के किए, काल जीति जो जात।

    बड़े-बड़े समरथ भए, तौ न कोउ मरि जात। '


    (यदि दवा और उपचार से मृत्यु को टाला जा सकता तो धरती पर बहुत से सामर्थ्यवान हुए हैं, वे कभी भी न मरते।)

    - 'ठीक है। संधि का प्रस्ताव बताइये।'

    - 'यदि अहमदनगर को बचाना चाहती है तो बहादुर निजाम को मेरे हवाले कर दे।'

    बहादुर निजाम चाँद के भाई मरहूम निजाम का बेटा था। इससे चाँद उसकी बुआ लगती थी। चूंकि बहादुर निजाम बालक था इसलिये उसके स्थान पर चाँद ही शासन का काम देखती थी और इसी अधिकार से सुलताना कहलाती थी।

    - 'खानखाना???' चीख पड़ी चाँद। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि खानखाना अपने मुँह से ऐसी बात निकालेगा।

    - 'घबराओ मत सुलताना। मैं निजाम को बादशाह अकबर की सेवा में यह कहकर हाजिर करूंगा कि अहमद नगर का निजाम आपकी अधीनता स्वीकार करता है और इसके बदले में अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है।'

    - 'उसके बाद!'

    - 'उसके बाद बहादुर निजाम शाह को मैं वापिस सुरक्षित अहमदनगर लाऊंगा और तुम्हें सौंप दूंगा।'

    - 'दगा़ हुई तो?'

    - 'मुगलिया राजनीति का तो आधार ही दगा़ है। तू चाहे तो मेरी बात मान, तू चाहे तो मत मान।'

    - 'लेकिन इसका अर्थ तो यही हुआ कि अहमदनगर मुगलों के अधीन हो जायेगा।'

    - 'जिस प्रकार उत्तर भारत के राजपूत राजाओं ने अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिये मुगलिया सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार यदि दक्षिणी राज्यों के राजा और सुलतान भी मुगलिया सल्तनत का प्रभुत्व स्वीकार कर ले तो वे अपने राज्य और प्रजा दोनों की सुरक्षा कर सकते हैं। समय को पहचानो चाँद! इस समय मुगलिया आंधी चल रही है। इस आंधी में दक्षिण के राज्य तिनके की भी सामर्थ्य नहीं रखते। जो भी इस आंधी का मार्ग रोकने का साहस करेगा, वह तिनके की तरह उड़ जायेगा।'

    - 'और हमारी स्वतंत्रता! उसका कोई अर्थ नहीं होता।'

    - 'जब मौका लगेगा तो सारे के सारे राज्य फिर से अपनी-अपनी खोई हुई स्वतंत्रता प्राप्त कर ही लेंगे।' - 'एक शर्त पर मैं बहादुर निजाम शाह को आपके हवाले कर सकती हूँ।'

    - 'कैसी शर्त?'

    - 'आप बहादुर निजाम शाह को अपने साथ यह समझ कर ले जायेंगे कि आप किसी और को नहीं, चाँद को ले जा रहे हैं।'

    - 'मंजूर है।' इसके बाद भी बड़ी देर तक दोनों में बातें होती रहीं। जब सारी बातें विस्तार से तय हो गयीं तो चाँद उठ खड़ी हुई।

    - 'हुजूर का हुक्म हो तो मैं अब जाऊँ?'

    - 'जो हुक्म से आया नहीं, वह हुक्म से जायेगा क्या?'

    खानखाना ने हँस कर कहा।

    - 'मेरे आदमी आपके डेरे से एक फर्लांग दूर खड़े हैं। मुझे वहाँ तक पहुँचाने की जहमत उठाइये। उसके बाद मैं चली जाऊंगी।'

    - 'चलिये।' खानखाना ने हँस कर कहा।

    चाँद ने अपना नकाब फिर से मुँह पर लपेट लिया। खानखाना ने उसी समय दो घोड़े मंगवाये। थोड़ी ही देर में दोनों घोड़े अपने सवारों को लेकर गहन अंधकार में विलीन हो गये।


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  • चित्रकूट का चातक - 49

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 49

     नियति के मोहरे

    उधर सुलताना ने और इधर खानखाना ने योजना के अनुसार जल्दी-जल्दी सियासी मोहरे इधर से उधर किये। सुलताना ने अभंगखाँ हबशी को पंद्रह हजार घुड़सवारों सहित किले से बाहर निकाल कर चित्तार की तरफ से दानियाल पर आक्रमण करने भेजा तथा चीतेखाँ हबशी को किले की आंतरिक सुरक्षा के लिये नियुक्त किया।

    खानखाना ने दानियाल से अनुमति लेकर चाँद से संधि की बात चलाई। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ जहाँ अकबर स्वयं डेरा डाले हुए था और युद्ध की समस्त प्रगति पर निगाह रख रहा था।

    इधर खानखाना अपने सियासी मोहरों के घर बदल रहा था और उधर नियति अपने मोहरों के घर तेजी से बदलने में लगी हुई थी। इधर खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ और उधर राजू दखनी ओर अम्बरचम्पू हबशी ने शाहअली के बेटे मुर्तिजा निजामशाह को अहमदनगर का स्वामी घोषित करके बादशाही थानों पर धावा बोल दिया।

    खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बादशाह की सेवा में हाजिर हुआ और चाँद सुलताना का संदेश पढ़कर सुनाया कि यदि बादशाह अहमदनगर राज्य की सुरक्षा करे तो चाँद मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेगी।

    बादशाह चाँद सुलताना के पत्र और बहादुर निजामशाह को अपनी सेवा में देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने दानियाल का विवाह खानखाना की बेटी जाना बेगम से करने की घोषणा की और पूरी तरह संतुष्ट होकर आगरा लौट गया।

    अभंगखाँ हबशी जो स्वयं को चाँद सुलताना का विश्वसनीय आदमी बताते हुए थकता नहीं था, उसने चित्तार पहुँच कर अपना इरादा बदल लिया और अपने डेरों में खुद आग लगाकर जुनेर के किले को भाग गया। चाँद ने यह समाचार सुना तो सिर पीटकर रह गयी लेकिन जब चाँद सुलताना ने मुर्तिजा निजामशाह, राजू दखनी और अम्बरचम्पू को पूरी तरह नालायकी पर उतरा हुआ देखा तो उसने सोचा कि यह ठीक ही हुआ जो अभंगखाँ जुनेर चला गया। चाँद ने अपने किलेदार चीतेखाँ हबशी से विचार विमर्श किया कि इन बदली हुई परिस्थितयों में बेहतर है कि किला दानियाल को सौंप दिया जाये और राजकीय कोष तथा राज्य सामग्री लेकर जुनेर के किले को चला जाये ताकि वहाँ हमारी सुरक्षा अधिक अच्छी तरह से हो सके।

    चीतेखाँ हबशी ने यह बात सुनते ही सबको यह कहना आरंभ कर दिया कि चाँद सुलताना तो मुगलों से मिल गयी है और उनको किला सौंपती है। चीतेखाँ ने किले से बाहर नियुक्त दक्खिनियों से सम्पर्क किया और उनके लिये किले के गुप्त मार्ग खोल दिये। जब दक्खिनी किले में प्रवेश कर गये तो हबशी भी उनसे जा मिले। इन लोगों ने मिलकर उसी दिन चाँद सुलताना की हत्या कर दी।

    जब खानखाना बुरहानपुर से बहादुर निजामशाह को लेकर अहमदनगर लौटा तो उसने मार्ग में चाँद की हत्या का समाचार सुना। इस समाचार को सुनकर खानखाना के दुःख का पार न रहा। उसके मुँह से बरबस ही निकला-

    'रहिमन मनहिं लगाहि के, देखि लेहु किन कोय।

    नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय। '


    (कोई किसी से भी प्रेम करले, उससे क्या होता है? मनुष्य के वश में क्या है? जो कुछ है नारायण की इच्छा के अधीन है।)

    बंदूक में शराब

    एक तरफ चाँद के नहीं रहने से और दूसरी तरफ मुराद के मर जाने से खानखाना सभी तरह की दुविधाओं से बाहर निकल आया था और वह दक्षिण में जबर्दस्त दबाव बना रहा था। खानखाना के पुत्र एरच ने भी पिता का बहुत साथ दिया और मलिक अम्बर जैसे दुर्दांत शत्रु को वह लगातार पीटता जा रहा था। उधर शहजादा दानियाल, अपने श्वसुर अब्दुर्रहीम और साले ऐरच के मजबूत हाथों में दक्खिन का अभियान सौंप कर स्वयं शराब में डूब गया।

    अकबर को जब दानियाल के बारे में तरह-तरह के समाचार मिलने लगे तो उसने दानियाल को लिखा कि वह आगरा आ जाये। दानियाल कतई नहीं चाहता था कि वह बादशाह के सामने जाये। वहाँ जाने से उसकी शराब और मौज-मस्ती में विघ्न पड़ जाने की पूरी-पूरी संभावना थी। अतः उसने बादशाह को पत्र भिजवाया कि खानखाना एक नम्बर का हरामखोर है। उस पर दृष्टि रखने के लिये मेरा दक्षिण में ही रहना आवश्यक है। इस पर अकबर ने उसे वापिस पत्र भिजवाया और लिखा कि मैं जानता हूँ कि हरामखोर कौन है! तू शराब पीने के लिये ही मेरे से दूर रहना चाहता है। खानखाना तेरी तरह से शराब नहीं पीता। तेरी तरह से झूठ नहीं बोलता। न ही तेरी तरह विश्वस्त सेवकों पर मिथ्या दोषारोपण करता है। तू फौरन आगरा चला आ अन्यथा भविष्य में तुझसे कोई सम्बंध नहीं रखूंगा।

    इस पर भी दानियाल आगरा नहीं गया। अकबर ने क्रोधित होकर खानखाना को बहुत भला-बुरा लिखा कि तेरे रहते हुए भी दानियाल मौत के मुँह में जा रहा है। यदि दानियाल की शराब पर पाबंदी न लगायी तो मुझसा बुरा कोई नहीं होगा।

    खानखाना ने दानियाल पर पहरा बैठा दिया और किसी को भी शहजादे के डेरे में शराब ले जाने की मनाही कर दी। इस पर भी दानियाल की चापलूसी में लगे हुए नमक हराम लोग बंदूक की नालियों में तेज शराब भरकर ले जाते और दानियाल को पिलाते। खानखाना इस बात को नहीं जान सका और एक दिन दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर गया।

    जब खानखाना को मालूम हुआ कि शराब भीतर कैसे पहुँचाई जाती थी तो उसने नमक हराम लोगों को मृत्युदण्ड दिया लेकिन जाने वाला जा चुका था। उसे किसी तरह नहीं लौटाया जा सकता था।

    दानियाल की मृत्यु से सबसे बड़ा कहर खानखाना पर ही टूटा था। उसकी बेटी जाना बेगम विधवा हो गयी। जाना बेगम ने दानियाल के शव के साथ ही मर जाने की चेष्टा की किंतु खानखाना ने किसी तरह बेटी को ऐसा करने से रोका।

    जाना बेगम ने अपने पिता के कहने से जान तो नहीं दी किंतु उसने सदा-सदा के लिये फटे हुए, मैले-कुचैले कपड़े पहन लिये। पत्नी की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह दूसरा कहर था। उससे बेटी का मुँह देखा नहीं जाता था। वह अंदर से टूटने लगा।

    तैमूर की समाधि

    मुराद के बाद दानियाल के मरने की खबर पाकर बादशाह का मन हर उस वस्तु से उचाट हो गया जो उसके आस-पास थी। उसके चेहरे का खुरदुरापन उसके मन में उतर आया था। वह मन की शांति प्राप्त करना चाहता था किंतु उसका कोई उपाय नहीं सूझता था। उसने मक्का जाने का निश्चय किया किंतु उस युग में एक बादशाह के लिये मक्का तक के मार्ग में पड़ने वाले समस्त राज्यों को जीते बिना अपनी सेना लेकर वहाँ तक पहुँचना संभव नहीं था और बिना सेना के जाने का अर्थ उसी गति को प्राप्त हो जाने जैसा था जिस गति को बैरामखाँ प्राप्त हुआ था। बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने तूरान जाने का इरादा किया जहाँ उसके पूर्वज तैमूर लंग की समाधि बनी हुई थी।

    यद्यपि तूरान तक पहुँच पाना भी अत्यंत कठिन था तथापि उतना कठिन नहीं जितना कि मक्का तक पहुँच पाना। फिर भी इस योजना को सल्तनत की पूरी सामर्थ्य झौंके बिना कार्यान्वित किया जाना संभव नहीं था। अतः अकबर ने दक्षिण से खानखाना अब्दुर्रहीम को, बंगाल से राजा मानसिंह को तथा लाहौर से कूलचीखाँ को आगरा बुलवाया और आगरा बुलवाने का प्रयोजन भी लिख भेजा।

    राजा मानसिंह तथा कूलचीखाँ तो बादशाह का आदेश मिलते ही अपनी-अपनी सेनायें लेकर आगरा के लिये रवाना हो गये किंतु खानखाना अपने स्थान से एक इंच भी नहीं हिला।

    बादशाह अकबर तथा उसके शहजादों के दुर्व्यहार और छलपूर्ण आचार विचार को देखकर खानखाना के मन में मुगल साम्राज्य की अभिवृद्धि हेतु पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया था। लम्बे समय से खानखाना यह अनुभव कर रहा था कि मुगल शहजादे यदि राजद्रोह भी करते हैं तो क्षमा कर दिये जाते हैं जबकि दूसरे अमीरों के बारे में मिथ्या शिकायतें मिलने पर भी अकबर अमीरों के साथ कठोरता से निबटता है।

    जब से मुराद के प्रकरण में अकबर ने खानखाना की ड्यौढ़ी बंद की थी तभी से खानखाना मन ही मन अकबर से नाराज था। पुत्री के शोक ने भी उसे तोड़ डाला था। अब वह कोई लड़ाई न तो लड़ना चाहता था और न जीतना चाहता था।

    इन सब कारणों से भी बढ़कर, सबसे बड़ा कारण यह था कि तैमूर लंग की समाधि में खानखाना की कोई रुचि नहीं थी। अतः उसने बादशाह को प्रत्युत्तर भिजवाया- 'बादशाह सलामत को जानना चाहिये कि मन की शांति तो तभी मिलेगी जब अशांति के वास्तविक कारण को जानकर उसे दूर करने के उपाय किये जायेंगे। यदि वह संभव न हो तो निरीह और कमजोर प्राणियों पर दया करने और उनकी सेवा करने से भी मन की शांति प्राप्त की जा सकती है। बादशाह सलामत को यह भी जानना चाहिये कि आपकी रियाया आपके कुल में पैदा हुए तैमूर बादशाह के बारे में उतनी श्रद्धा नहीं रखती जितनी कि आपमें रखती है क्योंकि रियाया का मानना है कि आपके पूर्वज तैमूर लंग के जमाने में हिंदुस्थान की रियाया पर बहुत अत्याचार हुए हैं। इससे यदि आप तैमूर बादशाह की समाधि के दर्शनों के लिये तूरान जायेंगे तो आपकी रियाया को आपके बारे में संदेह होगा। जिसका खामियाजा आपके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ेगा। बेहतर होगा कि आप इस इरादे को त्याग ही दें। मैं इस समय दक्षिण का मोर्चा किसी और के भरोसे छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित नहीं हो सकता हूँ। जब कभी दक्षिण में शांति स्थापित होगी तब आप मुझे जो भी आदेश देंगे, प्राण रहते पूरा करूंगा। मेरा विचार तो यही है, आगे आप बादशाह हैं, जैसा कहेंगे, मैं वही करूंगा।'

    इस कार्य में खानखाना की रूचि न देखकर और इतना स्पष्ट इन्कार देखकर अकबर के मन का उत्साह जाता रहा। उसने तूरान जाने का निश्चय त्याग दिया।

    विद्रोही

    अकबर के तीन शहजादों में से दो छोटे शहजादे मुराद और दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर चुके थे। तीसरा तथा सबसे बड़ा शहजादा सलीम भी अत्यधिक शराब पीकर न केवल खुद मौत के कगार पर जा खड़ा हुआ था अपितु अपने बुरे दोस्तों की सोहबत में अपने बाप अकबर तथा पूरी मुगलिया सल्तनत को मौत के कगार पर खींच कर ले जा रहा था। अकबर के बाद वही मुगलिया सल्तनत का उत्तराधिकारी हो सकता था किंतु बुरे आदमियों की संगत के कारण उसका दिमाग विकृत हो चला था। उसे बादशाह बनने की बड़ी शीघ्रता थी। वह अकबर के जीते जी उसकी सारी सम्पत्ति तथा राज्य पर अधिकार करना चाहता था किंतु अकबर इस अयोग्य, धोखेबाज, शराबी और अय्याश शहजादे को बादशाह नहीं बनाना चाहता था।

    ई. 1591 में जब अकबर गंभीर रूप से बीमार पड़ा तब अवसर पाकर सलीम ने बादशाह के भोजन में विष मिलवा दिया किंतु किसी तरह अकबर बच गया। जब अकबर मामले की तह तक गया तो उसका सारा संदेह सलीम पर ही गया। उसने सदैव के लिये सलीम को अपनी दृष्टि से च्युत कर दिया।

    सलीम की इस दुष्टता से अकबर के जीवन में चारों ओर निराशा छा गयी। उसने हिन्दू नरेशों को अपनी सल्तनत का रक्षक नियुक्त कर कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों से तो अपने राज्य की रक्षा कर ली थी किंतु कुल में ही जन्मा कुपुत्र, अकबर के सीने में जहर बुझी कटारी की तरह गढ़ गया। उससे निजात पाने का कोई उपाय नहीं था।

    अंत में अकबर ने सलीम के पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया। खुसरो के प्रति आसक्ति और अपने प्रति उपेक्षा देखकर सलीम बादशाह से खुल्लमखुल्ला विद्रोह करने पर उतारू हो गया।

    जब सलीम को मेवाड़ नरेश अमरसिंह के विरुद्ध अभियान के लिये भेजा गया तो वह मेवाड़ न जाकर अजमेर में ही अपना डेरा जमा कर बैठ गया। उन्हीं दिनों अजमेर के सूबेदार शहबाजखाँ कम्बो की मृत्यु हो गयी। सलीम ने अवसर मिलते ही शाही खजाने के एक करोड़ रुपये तथा शहबाजखाँ की निजी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया।

    उन्हीं दिनों सलीम को ज्ञात हुआ कि इस समय अकबर असीरगढ़ के मोर्चे पर है तथा आगरा के किले में राजकीय कोष के दो करोड़ रुपये रखे हुए हैं। सलीम ने उस कोष को हथियाने के लिये अजमेर से आगरा की ओर प्रयाण किया किंतु किलेदार और कोषाध्यक्ष की सतर्कता के कारण सलीम उस कोष को हाथ नहीं लगा सका। इसके बाद सलीम यमुना पार करके प्रयाग चला गया और उसने अपने आप को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर अपना दरबार जमा लिया। कुछ ही दिनों बाद उसे बिहार से भी शाही कोष के तीस लाख रुपये छीनने का अवसर मिल गया। शाही कोष से छीने गये लगभग डेढ़ करोड़ रुपये के बल पर सलीम ने तीस हजार सिपाही इकट्ठे कर लिये।

    सलीम के विद्रोह के समाचार सुनकर अकबर असीरगढ़ का मोर्चा छोड़कर आगरा आया। जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अकबर आगरा आ गया है तो सलीम ने प्रचारित किया कि वह भी अपने पिता की अभ्यर्थना करने के लिये आगरा जायेगा। वास्तव में तो उसका निश्चय अकबर को कैद करके स्वयं बादशाह बनने का था।

    सलीम अपने तीस हजार सिपाही लेकर चारों तरफ लूटमार करता हुआ आगरा की ओर बढ़ा। अकबर सलीम के इरादों को भांप गया। उसने अपने आदमियों के माध्यम से उसे कहलवाया कि यदि वह अपनी सेना को भंग करके प्रयाग लौट जाये तो उसे क्षमा कर दिया जायेगा।

    पिता की यह उदारता देखकर सलीम ने अपनी सेना प्रयाग को लौटा दी और अकबर से कहलवाया कि मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत होना चाहता हूँ। अकबर ने सलीम को अपनी सेवा में उपस्थित होने की अनुमति दे दी। आगरा आकर सलीम बादशाह के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोया। उसका यह भाव देखकर अकबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसे बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बनाकर बंगाल जाने के आदेश दिये तथा अपना खास तातार गुलाम उसकी सेवा में नियुक्त कर दिया।

    इलाहाबाद लौटकर सलीम पुनः मक्कार आदमियों से घिर गया और उसने बंगाल जाने से मना कर दिया। वह प्रयाग में नित्य दरबार आयोजित करके लोगों को मनसब और जागीरें बांटने लगा। इस समस्या का अंत न आता देखकर अकबर ने खानखाना को दक्षिण से बुलाने का विचार किया किंतु दक्षिण में खानखाना की सफलताओं को देखते हुए उसे वहाँ से हटाया जाना उचित नहीं था इसलिये बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने अबुलफजल को आगरा बुलवाया।


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  • चित्रकूट का चातक - 50

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 50

    कहर

    - 'आसमान से कहर बरपा है जिल्ले इलाही।' तातार गुलाम ने भय से कांपते हुए कहा।

    - 'क्या है कमजात? क्यों आसमान से कहर बरपाता है? तुझे शहजादे की सेवा में भेजा था, वहाँ से भाग आया क्या?' गुलाम की बात सुनकर अकबर को चिंता तो हुई किंतु उसने अपने स्वर को मुलायम ही बनाये रखा।

    - 'मुझे भाग ही आना पड़ा हुजूर।'

    - 'अच्छा बता, क्यों भाग आया?'

    - 'शहजादे ने आपके नेक दिल गुलाम हर फन मौला अबुल फजल का कत्ल करवा दिया है।'

    - 'क्या बकता है पाजी?' गुलाम की बात सुनकर अकबर सन्न रह गया और उत्तेजना में अपने स्थान से उठ कर खड़ा हो गया।

    - गुलाम की गुस्ताखी मुआफ हो आका। आपका हुक्म था कि जैसे ही कोई खास बात मालूम हो, मैं तुरंत आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊँ। आपके हुक्म की तामील में ही मैं यह समाचार पाकर वहाँ से भाग आया हूँ।'

    - 'कब और कहाँ हुआ यह?'

    - 'कोई बीस दिन हो गये हुजूर, नरवर में।'

    - 'किसने हलाक किया?'

    - 'ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला ने हुजूर।'

    गुलाम का जवाब सुनकर अकबर दहल गया। यह जानकर अकबर की निराशा का पार न था कि सलीम वीरसिंह बुंदेला से जा मिला है! सलीम इस हद तक आगे बढ़ जायेगा, अकबर ने इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी। अबुल फजल अकबर का अनन्य मित्र था। वह शहंशाह का खास आदमी माना जाता था। उसकी ख्याति पूरी सल्तनत में सबसे बुद्धिमान आदमी के रूप में थी। अकबर ने उससे अपनी समस्याओं का समाधान जानने के लिये उसे दक्षिण के मोर्चे से बुलवाया था किंतु सलीम ने उसकी हत्या करवाकर समस्याओं को खतरनाक मुकाम तक पहुँचा दिया था। अबुल फजल की मौत और बेटे की बेवफाई से अकबर शोक के गहन सागर में डूब गया। काफी देर तक वह चुपचाप महल की छत की ओर ताकता रहा। बहुत देर बाद वह अपने विचारों की आंधी में से बाहर निकला।

    - 'यह शमां गुल कर दे।' अकबर ने तातार गुलाम को आदेश दिया। उसके स्वर में शोक और कष्ट का लावा बह रहा था। शहंशाह का हुक्म पाकर गुलाम ने शमां बुझा दी।

    - 'और यह भी।'

    अकबर ने दूसरी शमां की ओर संकेत किया। गुलाम ने दूसरी शमां भी बुझा दी।

    - 'महल की सारी शमाएं बुझा दे और सारे दरवाजे बंद करके बाहर खड़ा रह। जब तक मैं न बुलाऊँ, किसी को भीतर न आने देना।'

    तातार गुलाम स्वामी के आदेशों की अक्षरशः पालना करने के लिये महल के दरवाजे बंद करके बाहर जाकर खड़ा हो गया। उसे मालूम न था कि पूरे तीन दिन तक उसे बुत की तरह वहीं खड़े रहना होगा।

    जब रियाया को मालूम हुआ कि बादशाह शमाएं बुझाकर तथा मुँह पर कपड़ा लपेट कर अपने महल में बंद हो गया है तो आगरा में हड़कम्प मच गया। कोई न जान सका कि आखिर ऐसा क्या हो गया है जो बादशाह इतना गमगीन है। लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अनुमान लगाने लगे।

    तीन दिन बाद जब अकबर अपने महलों से बाहर निकला तो उसने दो फरमान एक साथ जारी किये। पहला ये कि वीरसिंह को जहाँ भी पाया जाये मार डाला जाये तथा दूसरा ये कि शहजादे सलीम को आगरा में तलब किया जाये।

    सुलह

    अकबर की यह हालत देखकर सलीमा बेगम ने पिता-पुत्र के मध्य सुलह करवाने का विचार किया। वह अकबर से अनुमति लेकर इलाहाबाद गयी और सलीम को समझा बुझा कर आगरा ले आयी।

    सलीम अपने बाप की यह दुर्दशा देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ा और अपने अपराधों के लिये पश्चाताप करने लगा। अकबर ने अबुल फजल के गम को भुला दिया और सलीम को उठाकर छाती से लगा लिया। सलीम ने अपने सात सौ सत्तर हाथी और बारह हजार स्वर्ण मुद्रायें बादशाह को भेंट कीं।

    इस बार अकबर ने सलीम से कहा कि वह यदि बंगाल नहीं जाना चाहता है तो मेवाड़ पर अभियान करके अपने पूर्वजों की भांति यश लाभ करे। सलीम ने अकबर की बात मान ली और मेवाड़ के लिये रवाना हो गया। अभी वह आगरा से निकल कर फतहपुर सीकरी तक ही गया था कि उसका मन फिर से बदल गया। उसने अकबर को कहलवाया कि मैं महाराणा के विरुद्ध अभियान करने में स्वयं को असक्षम मानता हूँ अतः मुझे प्रयाग जाने दिया जाये। अकबर ने सलीम को नितांत निकम्मा जानकर उसकी यह प्रार्थना भी स्वीकार कर ली।

    प्रयाग पहुँच कर सलीम ने फिर से अपने को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया और दरबार लगाने लगा। वह अत्यधिक शराब पीने लगा। एक दिन शराब के नशे में धुत्त होकर उसने रानी मानबाई को कोड़ों से इस कदर पीटा कि ग्लानि वश मानबाई ने जहर खा लिया। मानबाई की मौत से राजा मानसिंह जो अब तक सलीम का सबसे बड़ा हितैषी था, सलीम का शत्रु हो गया।

    तातार गुलाम ने मानबाई की आत्महत्या का पूरा प्रकरण अकबर को लिखकर भेजा, सलीम ने तातार गुलाम की जीवित अवस्था में ही खाल खिंचवा ली। जब एक नौकर ने इसका विरोध किया तो सलीम ने शराब पीकर उसे इतना पीटा कि पिटाई के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गयी।

    एक दिन सलीम की निगाह अपने पिता अकबर के एक और खास नौकर पर पड़ी। जाने क्यों सलीम को उसे देखते ही इतना क्रोध आया कि उसे पीट-पीट कर नपुंसक बना दिया।

    इन सारे समाचारों के मिलने पर अकबर ने सलीम के सुधरने की आशा त्यागकर सलीम के सत्रह वर्षीय पुत्र खुसरो पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया। खुसरो आमेर नरेश मानसिंह की बहिन का पुत्र और खाने आजम मिर्जा कोका का दामाद था। इसलिये ये दोनों भी अकबर की योजना से सहमत हो गये तथा खुसरो को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने तथा सलीम को दण्डित करने के उपाय करने लगे।

    अकबर ने भले ही सलीम को राज्याधिकार से वंचित करने तथा खुसरो को शासन पर स्थापित करने का निर्णय ले लिया किंतु प्रारब्ध ने सलीम और खुसरो के भाग्यों में कुछ और ही लिखा था। अभी खुसरो को शासन पर स्थापित करने की योजना पर विचार चल ही रहा था कि अकबर की माता हमीदाबानू की मृत्यु हो गयी।

    सलीम अपनी दादी के मरने का समाचार पाकर बादशाह की मातमपुरसी के लिये आगरा आया और सीधे दरबार में ही हाजिर हुआ। अकबर ने दरबार में तो सलीम से कुछ नहीं कहा किंतु जब महल में उसे अकबर के सामने लाया गया तो अकबर ने खींचकर एक तमाचा सलीम के मुँह पर मारा तथा उसे स्नानागार में बंद कर दिया। राजा शालिवाहन को सलीम पर कड़ी निगरानी रखने तथा उसका मानसिक उपचार करने के लिये कहा गया।

    उस दिन जब अकबर ने दर्पण में अपना चेहरा देखा तो वह बुरी तरह चौंक उठा। उसे दर्पण में अपने चेहरे के स्थान पर बैरामखाँ का चेहरा दिखायी दिया। उसे लगा कि सलीम ने अकबर के विरुद्ध नहीं अपितु वर्षों बाद फिर किसी अकबर ने बैरामखाँ के विरुद्ध विद्रोह किया है। इसके बाद अकबर फिर कभी दर्पण नहीं देख सका और बुरी तरह से बीमार पड़ गया। शाही हकीम ने पूरा जोर लगाया किंतु उसे बादशाह की बीमारी पकड़ में नहीं आयी। वह जो भी दवा करता था, वह अकबर पर विष जैसा कार्य करती थी।

    राजा शालिवाहन ने पूरे दस दिन तक सलीम को स्नानागार में बंद रखा तथा इस दौरान उसे शराब की एक बूंद भी पीने को नहीं दी। दस दिन बाद जब राजा शालिवाहन ने सलीम को स्नानागार से बाहर निकाला तो सलीम ने पूरी दुनिया ही बदली हुई पायी।

    पहरे दर पहरे

    - 'शहजादे!' एक फुसफुसाहट सी सलीम के कानों में पड़ी। उसने इधर-उधर देखा किंतु कोई दिखाई नहीं दिया। बाहर शाम घिर आई थी तथा कमरे में इतना कम प्रकाश था कि उसमें कुछ भी स्पष्ट देखना संभव नहीं था।

    - 'इधर देखो, इधर।' सलीम ने फिर दृष्टि घुमाई किंतु कुछ भी दिखायी नहीं दिया।

    - 'इधर पर्दे के पीछे देखो शहजादे।' फुसफुसाहट दुबारा उभरी। सलीम के कमजोर शरीर में इतनी जान नहीं रही थी कि वह बिना सहारे के स्वयं चल कर पर्दे तक जा सके। दस दिन से शराब की एक बूंद भी नहीं मिली थी। उसे आज ही स्नानागार से बाहर निकाला गया था। इस सब के बावजूद अज्ञात भय ने सलीम को पर्दे तक जाने के लिये विवश किया।

    - 'कौन हो तुम?' पर्दे के पीछे छिपे हुए आदमी को देखकर सलीम ने पूछा।

    - ' शश्श्श्...........। धीरे बोलो शहजादे किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जायेगा।' पर्दे के पीछे छिपे हुए व्यक्ति ने शहजादे के होठों पर हाथ रख दिया।

    - 'लेकिन तुम हो कौन और क्या चाहते हो?' सलीम ने पूछा।

    - 'मैं आपके विश्वस्त मित्र उमराव रामसिंह कच्छवाहे का सेवक हूँ।'

    - 'तुम यहाँ छिपकर क्यों खड़े हो?'

    - 'क्योंकि मैं राजा शालिवाहन का पहरा तोड़कर चुपके से यहाँ पहुँचा हूँ।'

    - 'तो क्या कमरे के बाहर अब भी शालिवाहन का पहरा है?'

    - 'हाँ।'

    - 'तो तुम पहरा तोड़ कर क्यों आये, क्या तुम्हें अनुमति नहीं दी गयी?'

    - 'मैंनेअनुमति मांगी ही नहीं।'

    - 'लेकिन क्यों?' - 'क्योंकि मैं आपसे गुप्त वार्तालाप करने की इच्छा रखता हूँ।'

    - 'कैसा गुप्त वार्तालाप?'

    - 'मेरे स्वामी ने मुझे आदेश दिया है कि मैं उनका संदेश आप तक पहुँचाऊँ।'

    - 'कैसा संदेश?'

    - 'मेरे स्वामी ने कहलवाया है कि बादशाह सलामत बुरी तरह से बीमार हैं, ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे लेकिन स्थिति बहुत खराब है। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।'

    - 'लेकिन यह बात मुझे छुप कर क्यों बताई जा रही है?'

    - 'क्योंकि बादशाह की बीमारी की बात बहुत गुप्त रखी जा रही है और केवल कुछ ही लोग जानते हैं।'

    - 'लेकिन क्यों?'

    - 'क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका नहीं चाहते कि यह समाचार आप तक पहुँचे।'

    - 'क्यों?' - 'क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका, बादशाह सलामत की इच्छानुसार शहजादे खुसरो को हिन्दुस्थान का ताज सौंपने की तैयारियों में लगे हुए हैं।'

    - 'तो फिर तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो?'

    - 'शहजादे! समझने का प्रयास कीजिये। मैं आपके मित्र कच्छवाहा सरदार रामसिंह का सेवक हूँ। राजा मानसिंह का नहीं।'

    - 'रामसिंह क्या चाहता है?'

    - 'मेरे स्वामी आपको आगरा के तख्त पर बैठा हुआ देखना चाहते हैं।'

    - 'क्यों?'

    - 'यह तो वही जानें, मैं तो उनका संदेशवाहक मात्र हूँ।'

    - 'बादशाह सलामत की इच्छा के विरुद्ध रामसिंह मुझे किस तरह आगरा का ताज सौंपेगा?'

    - 'उन्होंने एक योजना तैयार की है। जिस तरह बादशाह सलामत के चारों ओर राजा मानसिंह का पहरा है, उसी तरह महलों के बाहर मेरे स्वामी रामसिंह ने अपना पहरा बैठा दिया है। उनके सिपाही बड़ी संख्या में फतहपुर सीकरी तथा आगरा के चारों ओर सिमट आये हैं। यदि मानसिंह ने आपको गिरफ्तार किया तो भी वह आपको महल से बाहर नहीं ले जा सकेगा।'

    - 'लेकिन उसने मेरी इस महल के भीतर हत्या कर दी तो?'

    - 'नहीं। राजा मानसिंह हिन्दू है, वह अपने बहनोई की हत्या कदापि नहीं करेगा।'

    - 'लेकिन अब मानबाई तो मर चुकी है और इस बात को लेकर वह मुझसे कई बार झगड़ा भी कर चुका है।'

    - 'फिर भी वह किसी भी सूरत में आपकी हत्या का प्रयास नहीं करेगा और न ही किसी और को करने देगा।'

    - 'लेकिन उसने मुझे कैद किया तो?'

    - 'ऐसी सूरत में मेरे स्वामी रामसिंह अपने आदमियों सहित महलों में प्रवेश करेंगे और आपको मुक्त करवाने का प्रयास करेंगे।'

    - 'अच्छा ठीक है। मुझे क्या करना है?'

    - 'आपको किसी तरह बादशाह सलामत तक पहुँचना है।'

    - 'इसमें क्या कठिनाई है? मैं अभी बादशाह सलामत की सेवा में जाता हूँ।'

    - 'बादशाह सलामत के महल के चारों ओर राजा मानसिंह का कड़ा पहरा है। वह आपको किसी भी हालत में बादशाह तक नहीं पहुँचने देगा।'

    - 'तो फिर?'

    - 'आप सलीमा बेगम से मिलने का प्रयास कीजिये और उनके माध्यम से बादशाह तक पहुंचिये।'

    - 'लेकिन मैंने सुना है कि सलीमा बेगम तो पहले से ही मुझ पर खफा हैं। क्या मैं अपनी माता मरियम उज्जमानी के माध्यम से वहाँ पहुँचूं?'

    - 'नहीं यह उचित नहीं होगा। महारानी जोधाबाई कभी भी बादशाह सलामत के निश्चय के विरुद्ध एक भी शब्द अपने मुँह से नहीं निकालेंगी।'

    - 'तो फिर?' - 'मेरे स्वामी ने सुझाव भिजवाया है कि आप सलीमा बेगम के माध्यम से प्रयास कीजिये।'

    - 'ठीक है। मैं ऐसा ही करूंगा लकिन मान लो कि मैं किसी तरह बादशाह सलामत के पास पहुँच गया और उन्होंने मुझे ताज सौंपने के स्थान पर खुसरो को ही बादशाह बनाने की जिद्द बनाये रखी तो?'

    - 'ऐसी स्थिति में हो सकता है कि हमें बादशाह सलामत को गिरफ्तार करना पड़े।'

    - 'क्या रामसिंह मेरे लिये बादशाह सलामत से विद्रोह करेगा?'

    - 'उनकी इच्छा तो नहीं है किंतु आवश्यक हुआ तो यह भी करना पड़ेगा।'

    पर्दे के पीछे छिपे हुए रहस्यमय व्यक्ति की बात पूरी हुई ही थी कि राजा शालिवाहन ने कक्ष में प्रवेश किया। सलीम चुपचाप पर्दे के पास से हट गया।


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  • चित्रकूट का चातक - 51

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 51

    हुमायूँ की तलवार

    अभी सूरज निकलने में कुछ समय था जब सलीमा बेगम ने अपनी लौण्डी सहित बादशाह सलामत के कक्ष में प्रवेश किया। सलीमा बेगम ने अपना पूरा बदन बुर्के में छिपा रखा था किंतु उसके मुँह से 
    कपड़ा हटा हुआ था। जबकि लौण्डी के चेहरे पर कपड़ा पड़ा हुआ था।

    सलीमा बेगम को देखकर कच्छवाहा पहरेदार चिंता में पड़ गया। क्या करे? क्या न करे? इससे पहले कभी भी ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई थी। उसमें इतना साहस न था कि सलीमा बेगम का मार्ग रोके या उससे कुछ पूछने का साहस करे। सलीमा बेगम के प्रवेश पर उसे कोई आपत्ति भी नहीं थी। उसे आपत्ति थी उसकी बुर्केदार लौण्डी से। राजा मानसिंह का आदेश था कि किसी को भी चेहरा छुपा कर बादशाह के पास जाने की अनुमति न दी जाये।

    इधर पहरेदार उचित अनुचित के ही विचार में फंसा हुआ था और उधर सलीमा बेगम अपनी लौण्डी सहित बादशाह के कक्ष में प्रवेश कर गयी। पहरेदार ने सतर्क होकर अपने साथी को दौड़ाया कि जाकर राजा मानसिंह को सूचित कर दे।

    - 'इस नेक सुबह के नेक उजाले में कनीज खुदाबंद से बादशाह सलामत की तंदरुस्ती की दुआ करती है।' सलीमा बेगम ने बादशाह को जागा हुआ देखकर तसलीम किया।

    अकबर के जर्द चेहरे पर मुर्दानी छायी हुई थी और कमजोरी के कारण उसका पूरा बदन काँप रहा था। उसकी आँखें गढ़ों में धंस गयी थीं और बालों का रंग मिट्टी में सनी सफेद सन जैसा हो गया था।

    - 'बेगम! सुबह भले ही नेक हो किंतु उसके उजाले में पहले की सी नेकी न रही।' बादशाह ने काँपते हुए शब्दों में सलीमा बेगम का अभिवादन स्वीकार किया।

    - 'दिल मायूस न करें शहंशाह। सुबह के उजाले में नेकी न रही तो क्या हुआ, दुनिया आपकी नेकी के उजाले से रौशन है।'

    - 'आप शाइरा हैं। उम्मीदों को जगाये रख सकती हैं किंतु हमारी तो सारी उम्मीदें ही खत्म हो गयीं।'

    - 'परवरदिगार! रियाया को अभी आपसे काफी उम्मीदें हैं।'

    - 'लेकिन हम किससे उम्मीद करें?'

    - 'अपनों से। बादशाह सलामत, उम्मीदें अपनों से ही की जाती हैं।'

    - 'लेकिन जो अपने थे, वे सब तो एक-एक करके हमें छोड़ते जा रहे हैं। बादशाह सलामत हुमायूँ हमें छोड़ गये। वालिदा हमीदाबानंू हमें छोड़ गयीं। खान बाबा बैरामखाँ ने हमें छोड़ दिया। हमारे नवरत्नों में से अबुल फजल, राजा टोडरमल और मियाँ तानसेन हमें छोड़ गये। शहजादे मुराद और दानियाल हमें छोड़ गये। और भी जाने कौन-कौन हमें छोड़ दें। इससे तो अच्छा है कि अब दुनिया से हमारी विदाई हो जाये।'

    - 'कायनात में आपकी सलामती की दुआ मांगने वालों की अब भी कमी नहीं है बादशाह सलामत।'

    - 'हाँ! उनकी कमी नहीं है। आप हैं, शाह बेगम मरियम उज्जमानी हैं, खानखाना अब्दुर्रहीम हैं लेकिन फिर भी जाने क्यों हर वक्त ऐसा लगता है कि जिसे हमारी सलामती की सबसे ज्यादा दुआ मांगनी चाहिये थी, वह तो खुद ही हमारी जान ले लेना चाहता है।'

    - 'आपका इशारा किस ओर है, शहंशाह?'

    - 'आप अच्छी तरह जानती हैं। शेखूबाबा से हमने कितना प्रेम किया! क्या उसका फर्ज नहीं था कि आज वो हमारा सहारा बनता?'

    - 'शेखूबाबा ने कुछ नादानियां की हैं जिल्ले इलाही किंतु वे आपके शहजादे हैं, क्षमा के योग्य हैं।' - 'क्षमा के योग्य हैं? आखिर कितनी बार क्षमा के योग्य हैं?'

    - 'राजा शालिवाहन के उपचार से उनका रोग दूर हो गया है और वे हर तरह से स्वस्थ होकर आपकी सेवा में हाजिर होने का इंतजार कर रहे हैं।'

    - 'बेगम! आप जानती हैं कि हमने शेखू बाबा का मुँह न देखने की कसम खाई है।'

    - 'जो रहमदिल बादशाह अपनी पूरी रियाया को औलाद मानकर उसके गुनाह माफ करता है, क्या वह अपनी औलाद पर रहम न कर सकेगा?'

    - 'जब किसी को रहम की जरूरत हो तो रहम करूं?' बादशाह खीझ पड़ा।

    - 'यह भी ठीक रही बादशाह सलामत! एक ओर तो आप शेखू बाबा का मुँह भी नहीं देखना चाहते और दूसरी ओर उनसे रहम की दरख्वास्त भी चाहते हैं आखिर वे अपनी बात कहें भी तो कैसे.........?' सलीमा बेगम की बात पूरी भी न हो पायी थी कि राजा मानसिंह ने कक्ष में प्रवेश किया। उसे देखते ही सलीमा बेगम का ईरानी चेहरा और भी सफेद हो गया। उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे।

    ठीक उसी समय सलीमा बेगम की लौण्डी ने अपने मुँह पर से पर्दा उठाया और आगे बढ़कर बादशाह के पास रखी म्यान में से तलवार खींच कर अपने हाथ में ले ली। लौण्डिया को तलवार खींचते देखकर राजा मानसिंह ने भी अपनी म्यान से तलवार खींची और लौण्डिया की ओर लपका किंतु उसका चेहरा पहचान कर उसकी ओर जाने के स्थान पर बादशाह की शैय्या के निकट जाकर खड़ा हो गया। यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि कोई कुछ नहीं समझ सका।

    सलीमा बेगम ने चीख कर कहा- 'शेखू बाबा!'

    - 'शेखू बाबा! कहाँ है शेखू बाबा?' बूढ़े बादशाह ने काँपती हुई आवाज में चिल्लाकर पूछा। उसने उठने का प्रयास किया किंतु उठ न सका।

    - 'मैं यहाँ हूँ बादशाह सलामत।' लौण्डी ने चीखकर कहा और अपना बुर्का उतार कर फैंक दिया।

    - 'तुमने यह तलवार क्यों उठायी? यह क्या बदसलूकी है?'

    - 'अपने पुरखों की तलवार उठाना बदसलूकी नहीं होती बादशाह सलामत। इस तलवार पर जितना आपका हक है, उतना ही मेरा भी है।'

    - 'इस चंगेजी तलवार को हाथ लगाने योग्य नहीं है तू। ला इसे इधर दे।' - 'अब आप बूढ़े और कमजोर हो गये हैं, अब आपको इसकी जरूरत नहीं रही। बड़े बादशाह हुजूर हुमायूँ की यह तलवार अब मेरे पास ही रहने दीजिये।' - 'मैं तेरे दिल की हसरत को जानता हूँ लेकिन तू इतना जान ले कि हाथ में तलवार पकड़ने लेने भर से तख्त और ताज हासिल नहीं हो जाते।'

    - 'जानता हूँ, अच्छी तरह से जानता हूँ कि तख्त और ताज कैसे हासिल होते हैं। इसलिये आपसे दरख्वास्त करता हूँ कि अब यह ताज भी मेरे सिर पर रख दें और आप इसके भार से मुक्त हो जायें।' सलीम ने अकबर की पगड़ी की ओर संकेत करते हुए कहा।

    - 'यह पाक चीज तुम्हारे सिर पर नहीं, शहजादे खुसरो के सिर पर रखी जायेगी।'

    - 'क्यों? क्या मैं चंगेजी खानदान का नहीं? क्या मेरी रगों में तैमूर लंग का खून नहीं?'

    - 'शहजादे खुसरो में भी ये सब खूबियां हैं।'

    - 'लेकिन खुसरो और इस पगड़ी के बीच मैं खड़ा हूँ।'

    - 'तुम्हें हटा दिया जायेगा।' अकबर ने गुस्से से काँपते हुए कहा।

    - 'कहीं ऐसा न हो कि हटाने वालों को हटना पड़े।'

    - 'तुम्हारी जुबान खींच ली जायेगी गुस्ताख। अकबर बीमार भले ही है किंतु मरा नहीं है।'

    - 'मेरी जुबान खींची गयी तो जिस खुसरो को आप मोहरा बनाकर मुझे शिकस्त दिया चाहते हैं, उसके बदन पर एक इंच चमड़ी भी न बचेगी।'

    - 'ऐसी बात कहने से पहले इतना तो सोच कि वह तेरी औलाद है!'

    - 'आप भी मेरे बारे में कुछ कहने से पहले यही सोचें तो बेहतर होगा जिल्ले इलाही।'

    - 'मैं चाहूं तो इसी समय मानसिंह तेरा सिर कलम कर दे।'

    - 'लेकिन सिर मानसिंह के बदन पर भी नहीं बचेगा। मेरे खैरख्वाह रामसिंह कच्छवाहे ने चारों ओर से महल को घेर रखा है। मानसिंह मेरी तरफ बढ़कर तो देखे।' सलीम ने चालाक चीते की तरह गुर्राकर कहा और अपने हाथ की तलवार तेजी से हवा में घुमायी।

    अकबर ने सिर पकड़ लिया। नहीं जीत सकता वह इस लड़ाई में। जाने कैसी लड़ाई है यह! उसे लगा कि उसकी साँस डूब रही है। आँखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा है। पूरे बदन पर चींटियां सी रेंग रही हैं। सलीमा ने चौंक कर बादशाह की ओर देखा और चीखती हुई सी बोली- 'जिल्ले इलाही! संभालिये अपने आप को।'

    अकबर ने सलीम और अपने जीवन दोनों से मायूस होकर सलीमा बेगम व मानसिंह की ओर देखा बैरामखाँ और अब्दुर्रहीम के बाद जिन दो शरीरों में अकबर के प्राण बसते थे वे दोनों ही उसके सामने खड़े थे। अकबर के एक संकेत पर वे अपने प्राण दे सकते थे किंतु लाख चाह कर भी वे वह नहीं कर सकते थे जिससे अकबर को शांति मिले। सच पूछो तो उस क्षण स्वयं अकबर भी नहीं जानता था कि क्या करने से उसके मन को शांति मिलेगी।

    अचानक डूबती हुई सांसें कुछ स्थिर हुईं। अकबर को लगा कि शरीर में अचानक ही चेतना लौट आयी है। आँखों से फिर दिखाई देने लगा है। कक्ष के बिम्ब अचानक ही बहुत स्पष्ट हो चले हैं। वह समझ गया कि यह बुझते हुए चिराग़ की अंतिम रौशनी है जो चिराग़ के बुझने से पहले एक बार अपनी पूरी चमक दिखाना चाहती है। उसने मानसिंह को संकेत किया कि पगड़ी उठाये। मानसिंह ने पगड़ी उठाकर अकबर के हाथों में रख दी।

    - 'मेरी हसरत तो अधूरी रह गयी सलीमा बेगम! तुम्हारी ही हसरत पूरी हो। आओ शहजादे मेरे पास आओ।'

    मानसिंह ने आश्चर्यचकित होकर बादशाह की ओर देखा। सलीम आगे बढ़कर ठीक बादशाह के पलंग तक पहुंच गया। बादशाह ने काँपते हुए हाथों से अपनी पगड़ी सलीम के माथे पर रख दी।

    - 'आज से तुम्हारा बादशाह यही है मानसिंह। इसकी रक्षा करना।' अपनी बात पूरी करके बूढ़ा बादशाह एक ओर को लुढ़क गया।

    असार संसार

    जिस दिन अकबर सलीम के सिर पर अपनी पगड़ी रखकर एक ओर को लुढ़क गया था उसके बाद वह कभी भी नये सूरज का उजाला नहीं देख सका। वह छः दिन तक बेहोश रहा। सातवें दिन आधी रात के लगभग अकबर के प्राण पंखेरू उड़ गये। राजा मानसिंह अपने आदमियों को लेकर महल से बाहर हो गया और जाते समय खुसरो को भी अपने साथ छिपा कर ले गया। कच्छवाहे रामसिंह ने आगरा का चप्पा-चप्पा खोज मारा किंतु खुसरो उसके हाथ नहीं लगा।

    बादशाह के मरते ही सलीम ने सबसे पहले शाही कोष को अपने अधिकार में लेने का काम किया। अकबर आगरा के किले में तीस करोड़ रुपया छोड़ कर मरा था। मानसिंह ने किले की किसी चीज को हाथ नहीं लगाया था, इससे वे रुपये बिना किसी बाधा के सलीम के हाथ लग गये। बादशाह की मौत के ठीक आठवें दिन सलीम नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा के तख्त पर बैठा। पहले ही दिन उसने कई राजाज्ञाएं प्रसारित कीं जिनमें दो राजाज्ञाएं प्रमुख थीं, पहली ये कि मानसिंह बंगाल के लिये प्रस्थान कर जाये तथा दूसरी ये कि जैसे भी हो शहजादे खुसरो को कैद करके मेरे सामने लाया जाये।

    राजा मानसिंह की तीन पीढ़ियों ने अकबर की तन मन से सेवा की थी। राजा मानसिंह की बुआ और बहिन भी अकबर तथा सलीम को ब्याही गयीं थीं। राजा भगवानदास तथा राजा मानसिंह ने अकबर के लिये बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती थीं। अकबर की मृत्यु से एक क्षण पहले तक मानसिंह मुगल सल्तनत का सबसे मजबूत कंधा गिना जाता था किंतु नियति के चक्र ने सलीम को बादशाह बना दिया था जो मानसिंह का घोर विरोधी था। जहाँगीर के हाथों अपमानित होकर राजा मानसिंह वृद्धावस्था में अपना टूटा हुआ दिल लेकर बंगाल के लिये प्रस्थान कर गया।

    आज वर्षों बाद उसे गुसांईजी के वे शब्द स्मरण हो आये थे, जो उन्होंने मानसिंह द्वारा महाराणा पर कोप करने की बात सुनकर कहे थे- 'बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख हैै, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। जो बंधु है, निरीह है, शरण में आया हुआ है, प्रेम, प्रीत और दया का पात्र है, उससे वैर कैसा? यदि मनुष्य के मन में स्वबंधु, स्वजाति, स्वधर्म और स्वराष्ट्र के प्रति अपनत्व नहीं होगा, वह प्राणि मात्र में ईश्वर के दर्शन कैसे कर सकेगा? अभी भी समय है राजन्! अपनी त्रुटियों का प्रतिकार करो। अपने बंधुओं को गले लगाओ अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।'

    सचमुच ही बंधुओं से वैर करके तथा अबंधुओं से प्रीत जोड़ कर क्या पाया था उसने? अपमान! तिरस्कार!! निष्कासन!!! स्वयं अपनी दुर्दशा और अपने बंधुओं की दुर्दशा। अपने धर्म की दुर्दशा और अपने राष्ट्र की दुर्दशा। महाराणा तो अपना उज्जवल चरित्र इतिहास को सौंप कर एकलिंग की सेवा में जा पहुँचा था किंतु स्वयं मानसिंह.......? राज्य की खातिर उसने अपनी बहिन-बेटियाँ शत्रुओं को ब्याह दीं। कुल पर कलंक लिया और दास होकर भी जीवन भर राजा कहलाने का भ्रम पाला।

    अपनी दशा देखकर मानसिंह की आँखों में आँसू आ गये और आत्मा चीत्कार कर उठी। हाय! किन विधर्मियों और शत्रुओं की दासता में जीवन बिताया..... किंतु अब पश्चाताप् करने से क्या होने वाला था। शरीर के खेत से काल रूपी चिड़िया उम्र का दाना चुगकर कभी की फुर्रर्रर्र... हो चुकी थी। जीवन के दिन अब बचे ही कितने थे? बंगाल पहुँचने के कुछ ही दिनों पश्चात् राजा मानसिंह की मृत्यु हो गयी। वह भग्न हृदय लेकर इस असार संसार से सदा-सर्वदा के लिये प्रस्थान कर गया।


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  • चित्रकूट का चातक - 52

     07.09.2018
    चित्रकूट का चातक - 52

    भाग्य की विडम्बना

    खुसरो आगरा से निकल कर दिल्ली होते हुए लाहौर की ओर भागा। अपने बारह हजार आदमी लेकर वह सिक्खों के गुरु अर्जुनदेव की शरण में पहुँचा। अर्जुनदेव ने उसे बादशाह होने का आशीर्वाद दिया। जब यह समाचार जहाँगीर को मिला तो उसकी रूह काँप गयी। वह स्वयं सेना लेकर लाहौर गया। भैंरोंवाल(लाहौर के पास। अब पाकिस्तान में है) के निकट पिता पुत्र की सेनाओं में घमासान हुआ। खुसरो के कई हजार आदमी मारे गये। अंत में वह मैदान छोड़कर काबुल के लिये भाग खड़ा हुआ। उसका कोष जहाँगीर के हाथ लग गया। जब खुसरो अत्यंत शीघ्रता में चिनाब पार कर रहा था, तब उसकी नावें जहाँगीर के आदमियों ने पकड़ लीं।

    जहाँगीर ने अपने बाप अकबर तथा अपने बेटे खुसरो से वैमनस्य का पूरा हिसाब अपने बाप के चहेते खुसरो से ही चुकता करने का निश्चय किया। उसने खुसरो के खास मित्रों को जीवित ही गधे और बैल की खालों में सिलवा दिया। उसके सैंकड़ों साथियों को एक मील लम्बी सूली पर कतार में लटका दिया। इसके बाद खुसरो को हाथी पर बैठा कर लटकते हुए शवों की कतारों के बीच से ले जाया गया। उससे कहा गया कि अपने हर आदमी की लाश के सामने रुके और झुक कर उसका सलाम कुबूल करे। इसके बाद खुसरो की आँखें फोड़ कर उसे कारागार में डाल दिया जहाँ पंद्रह साल बाद रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो गयी।

    खुसरो से निबटने के बाद जहाँगीर गुरु अर्जुन देव की ओर बढ़ा। जहाँगीर पहले से ही इस बात के लिये खफा़ था कि गुरु ने अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर के मित्र चंदूशाह के बेटे से करने से मना कर दिया था लेकिन अकबर के डर के कारण जहाँगीर कुछ कर नहीं पाया था। चंदूशाह लाहौर का दीवान था और वह गुरु की अथाह सम्पत्ति को हड़पने के लिये अपने बेटे का विवाह गुरु की बेटी से करना चाहता था। अब बदला लेने का अच्छा मौका हाथ लगा जानकर उसने गुरु को आदेश दिया कि राज्यद्रोही को आशीर्वाद देने के जुर्म में आप दो लाख रुपये का जुर्माना भरिये। गुरु ने कहा कि मैं तो साधु हूँ। मुझे तेरी सत्ता से कोई लेना देना नहीं है। जो भी मेरी शरण में आयेगा, उसे मैं आशीर्वाद दूंगा। जहाँगीर ने गुरु को कैद कर लिया तथा तरह-तरह की यातनायें दीं। अंत में एक दिन उन्हें बुरी तरह से तड़पा-तड़पा कर मार डाला। गुरु ने अत्याचारी जहाँगीर के हाथों मौत स्वीकार कर ली किंतु जुर्माना नहीं भरा। कुछ इतिहासकारों का मत है कि गुरु को नदी में डुबोकर मारा गया।

    यह भाग्य की ही विडम्बना थी कि जिस खुसरो को अकबर ने ताज देना चाहा था उसे तो अपने मित्रों सहित कारागार में मौत मिली और जिस सलीम को अकबर दर-दर का भिखारी बनाना चाहा था, वह पूरी शानो शौकत के साथ मुगलिया तख्त पर बैठकर अकबर के आदमियों को मौत के मुँह में पहुंचाता रहा।

    खानखाना की चिंता

    इधर खानखाना अपने दामाद दानियाल के मर जाने तथा अपनी बेटी के शोक में डूब जाने के दोहरे कहर से जर्जर हो चला था और उधर अकबर तथा सलीम के बीच घट रहे घटनाक्रम से उसकी चिंतायें दिन दूनी और रात चौगुनी होती जाती थीं।

    आगरा से जिस तरह के समचार मिल रहे थे उनसे खानखाना समझ गया कि अब जीवन में बुरे दिनों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जायेगी। अंत में एक दिन वह भी आया जब बादशाह अकबर की मृत्यु होने, सलीम के तख्त पर बैठने तथा खुसरो की आँखें फोड़ी जाकर कैद में डाले जाने के समाचार भी खानखाना तक पहुँचे।

    जब गुरु अर्जुन देव की हत्या होने का समाचार खानखाना तक पहुँचा तो खानखाना इस अत्याचार की सूचना से काँप उठा। खानखाना को दिल्ली और आगरा छोड़े हुए बारह साल बीत चले थे। इस बीच वहाँ सब कुछ बदल गया था। खानखाना के लगभग सभी पुराने मित्र या तो मृत्यु को प्राप्त हो गये थे या फिर उनका पहले का सा रुतबा न रहा था। जहाँगीर से भी उसका सम्पर्क कई वर्षों से नहीं रहा था। ऐसी स्थिति में जबकि जहाँगीर अकबर के विश्वस्त व्यक्तियों को चुन-चुन कर अपने मार्ग से हटा रहा था, खानखाना को समझ में नहीं आ रहा था कि वह नये बादशाह को मुजरा करने के लिये आगरा जाये या बादशाह की तरफ से किसी आदेश के आने की प्रतीक्षा करे!

    एक दिन खानखाना इसी चिंता में डूबा हुआ था कि द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- 'बादशाह के संदेश वाहक मुकर्रबखाँ खानखाना की सेवा में हाजिर होना चाहते हैं।' खानखाना ने मुकर्रबखाँ को अपने डेरे में आने की अनुमति दे दी। मुकर्रबखाँ ने खानखाना को शाही आदेश थमाया। बादशाह ने लिखा था- 'बादशाह सलामत खानखाना की सेवाओं से प्रसन्न हैं तथा उसे उसी ओहदे और रुतबे पर बनाये रखने की मंजूरी देते हैं जिस ओहदे और रुतबे पर उसे मरहूम बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने तैनात किया था। बादशाह सलामत यह भी आदेश देते हैं कि खानखाना उसी मेहनत और खैरख्वाही से दक्षिण विजय का काम करता रहे जो वह अब तक करता रहा है।'

    खानखाना ने इस दरियादिली के लिये बादशाह सलामत नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के प्रति अहसानमंद रहने तथा जीवन पर्यंत बादशाह के प्रति वफादार बने रहने का वचन दिया।

    इसके बाद मुकर्रबखाँ ने खानखाना को एक और आदेश थमाया जिसे पढ़कर खानखाना की रूह काँप गयी। बादशाह ने मरहूम शहजादे दानियाल के समस्त पुत्रों को बादशाह सलामत की रहबरी में आगरा भेजने का हुक्म दिया था ताकि उनकी बेहतर बेहतर परवरिश और बेहतर तालीम का इंतजाम हो सके।

    खानखाना जानता था कि दानियाल के बाद उसके बेटे ही जाना बेगम के जीवन का आधार बने हुए थे। यदि वे भी बादशाह ने छीन लिये तो जाना बेगम के जीवन में पूरी तरह अंधेरा छा जायेगा। खानखाना ने बहुत प्रकार से मुकर्रबखाँ को समझाने का प्रयास किया किंतु मुकर्रबखाँ अपनी बात पर अड़ा रहा कि बादशाह सलामत के आदेश की पालना हो अन्यथा इसे विद्रोह माना जायेगा।

    जब कोई उपाय नहीं बचा तो खानखाना ने रोती-बिलखती जाना बेगम की गोद से उसके बेटों को छीनकर मुकर्रबखाँ को सौंप दिये।

    समंद और फतूह

    बेटी जाना की तसल्ली के लिये खानखाना ने मुकर्रब खाँ के साथ ही आगरा जाने का विचार किया। वह चाहता था कि चाहे जैसे भी हो, जाना के बेटों को लौटा लाये।

    खानखाना पूरी तैयारी के साथ जहाँगीर के सामने उपस्थित हुआ। वह इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। उसने मोतियों के दो हार, ढेर सारे माणिक, तलवारें तथा तीन लाख रुपये जहाँगीर के पैरों में रख दिये और स्वयं भी जहाँगीर के पैरों में गिर पड़ा। जहाँगीर ने अपने गुरु को अपने पैरों में से उठा कर अपनी छाती से लगाकर, कृपा पूर्वक उसका माथा चूमते हुए कहा- - 'खानखाना! आप बादशाह के अतालीक होने के सम्मान से विभूषित हैं। इसलिये अब आपकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।'

    - 'मैं बादशाह सलामत की हर ख्वाहिश पूरी करने के लिये स्वयं को आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ ।'

    - 'हमारी हसरत है कि दो साल में पूरा दक्खिन हमारी सल्तनत में शुमार हो।'

    - 'मैं जान देकर भी बादशाह सलामत की ख्वाहिश पूरी करूंगा।'

    - 'तुम्हें हमसे क्या मदद चाहिये?'

    - 'बारह हजार घुड़सवार और उनके खर्चे के लिये दस लाख रुपये मिल जायें तो मैं दो साल में यह कार्य पूरा कर दूं। यदि ऐसा न करूं तो मुझे बादशाह का गुनहगार माना जाये।'

    - 'यह सहायता मंजूर की जाती है। और क्या चाहते हैं?'

    - 'यदि बादशाह सलामत प्रसन्न हों तो मैं अपनी बेटी जाना बेगम के पुत्रों को अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।'

    - 'क्यों, क्या तुम्हें हम पर भरोसा नहीं?'

    - 'भरोसे की न कहें, आप सिर मांग लें तो हाजिर है। इन बच्चों के सहारे जाना अपनी जिंदगी के दिन काट लेगी।'

    - 'ठीक है तुम उन्हें अपने साथ ले जा सकते हो।'

    जहाँगीर जैसा मक्कार जमाने में न था। वह कतई नहीं चाहता था कि दानियाल के बेटे खानखाना के पास रहें क्योंकि उसकी निगाह में खानखाना किसी भी तरह विश्वास करने योग्य न था। वह कभी भी सलीम के विरुद्ध विद्रोह करके शहजादे दानियाल के पुत्रों को मुगलिया तख्त पर बैठाने का षड़यंत्र रच सकता था किंतु इस समय जहाँगीर को खानखाना की जरूरत थी। वह खानखाना को प्रसन्न देखना चाहता था, इसलिये उसने खानखाना को दानियाल के पुत्र अपने साथ ले जाने की अनुमति दे दी।

    जहाँगीर ने खानखाना को ईरान के शाह से प्राप्त समन्द नामक घोड़ा, फतूह नाम का हाथी तथा बीस अन्य हाथी भी उसकी विदाई में उपहार के तौर पर दिये। समंद और फतूह आगरा की सेना में सर्वश्रेष्ठ घोड़ा और सर्वश्रेष्ठ हाथी माने जाते थे। इस उपहार के माध्यम से जहाँगीर खानखाना को जता देना चाहता था कि यदि खानखाना जहाँगीर के अनुकूल रहा तो उस पर बादशाही कृपा हर तरह से बनी रहेगी। जिस समय खानखाना ने पुनः दक्षिण के लिये कूच किया तो बादशाह ने खासा हाथी, सिरोपाव, जड़ाऊ तलवार और पेटी प्रदान किये।

    इतना सब हो जाने पर भी जहाँगीर को संतोष नहीं हुआ। खानखाना के चले जाने के बाद जहाँगीर ने शहजादा परवेज को भी दक्षिण की ओर रवाना किया तथा स्वयं आगरा से चलकर अजमेर में आकर बैठ गया। जहाँगीर ने शहजादे को पच्चीस लाख रुपये दिये और मुगलिया सल्तनत के लगभग तमाम विश्वस्त सेनापति भी उसके अधीन करके उसके साथ भेजे। लगभग दो सौ मनसबदार, एक हजार अहदी और कई हजार सैनिकों की विशाल कुमुक लेकर परवेज दक्षिण में पहुँचा। उसने खानखाना को प्रसन्न करने के लिये बादशाह की ओर से हाथी, घोड़े, जड़ाऊ हथियार और अन्य उपहार प्रदान किये। खानखाना ने एक लाल और दो मोती बादशाह को भिजवाये। बादशाह ने इन रत्नों की कीमत बीस हजार रुपये लगायी।

    जब यह सारी सेना दक्षिण में पहुँची तो दक्षिण में बड़ी भारी बेचैनी फैली। अब तक तो खानखाना लगभग सभी राज्यों से किसी न किसी प्रकार की संधि करके दक्षिण में शांति बनाये हुए था किंतु विशाल मुगल कुमुक को देखकर दक्खिनियों को इन संधियों पर विश्वास न रहा और वे इकठ्ठे होकर संघर्ष की तैयारी करने लगे।

    खानखाना अपनी बात से गिरना नहीं चाहता था इसलिये उसने बादशाह को लिखा कि और कुमुक न भेजी जाये किंतु दूसरी ओर शहजादा परवेज और अन्य सेनापतियों ने ज्यादा से ज्यादा कुमुक की मांग रखी। बादशाह ने और कुमुक भिजवा दी।

    सैंकड़ों सेनापतियों और हजारों सेनानायकों के एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाने से उनमें मतभेद होने लगा। प्रत्येक मामले पर वे अलग-अलग राय बनाकर बैठ जाते। कोई भी किसी से सहमत नहीं होता था। सबकी राय भिन्न होती थी और सब के सब अपनी ही बात को सही मानते थे। स्थितियाँ खानखाना के हाथ से निकल गयीं। परवेज ने उनके किसी भी सुझाव को स्वीकार नहीं किया। इस सब का परिणाम यह रहा कि जब परवेज ने बालाघाट पर चढ़ाई की तो दक्खिनियों ने मुगलों की रसद रोक दी जिससे बड़ी संख्या में हाथी, घोड़े और ऊंट मारे गये। अपनी सेना का जीवन बचाने के लिये परवेज को अपमान जनक शर्तों पर संधि करनी पड़ी। अहमदनगर का किला भी मुगलों के हाथ से निकल गया।

    शहजादा परवेज, खानेजहाँ लोदी तथा अन्य समस्त सेनापतियों ने इस पराजय का ठीकरा खानखाना के माथे पर फोड़ दिया। उन्होंने बादशाह को लिखा कि यह पराजय और बदनामी खानखाना की कुटिलता से हुई है। बादशाह खानखाना पर बहुत बिगड़ा। इस पर खानखाना ने बादशाह को लिखा कि मुझे दक्षिण से हटाकर दरबार में बुला लिया जाये। जहाँगीर ने ऐसा ही किया और खानेजहाँ को दक्षिण का सारा जिम्मा सौंप दिया।

    दक्षिण में आग

    खानखाना के दक्षिण से हटते ही दक्खिनियों के हौंसले बुलंद हो गये। वे एक जुट होकर खानेजहाँ लोदी में कसकर मार लगाने लगे। सल्तनत का विश्वस्त सेनापति अब्दुल्लाखाँ खानेजहाँ की सहायता के लिये भेजा गया किंतु वह हार कर गुजरात भाग आया। खाने आजम कोका भी बुरी तरह परास्त हुआ। रामदास कच्छवाहा और मानसिंह भी पीट दिये गये। फीरोज जंग भी मोर्चा छोड़कर गुजरात भाग आया। अली मरदानखाँ पकड़ा गया। शहजादा परवेज बुरहानपुर से बाहर ही नहीं निकल सका। मुगल सेनायें हर तरफ आग से घिर गयीं। स्थिति यह हो गयी कि मुगल जहाँ भी जाते थे, अपने आप को दक्खिनियों से घिरा हुआ पाते थे।

    यह सब देखकर जहाँगीर की आँखें खुलीं। वह समझ गया कि पिछले अठारह साल से खानखाना दक्षिण में शांति बनाये बैठा था, वह किसी और के वश की बात नहीं। खानखाना के शत्रुओं ने खानखाना के विरुद्ध जो शिकायतें की थीं उनकी वास्तविकता जहाँगीर के सामने आ गयी। उसने खानखाना को प्रसन्न करना आरंभ किया। खानखाना का मनसब बढ़ाकर छः हजारी कर दिया। उसके बेटे एरच को तीन हजारी मनसब तथा शाहनवाजखाँ की उपाधि दी। खानखाना के नौकर फरेन्दूखाँ को ढाई हजारी जात, खानखाना के मित्र राजा बरसिंह को चार हजारी जात तथा रायमनोहर को एक हजारी जात का मनसब दिया।

    खानखाना ने दक्षिण में पहुँच कर फिर से अपने मित्रों को एकत्र किया और पुरानी संधियों को पुनर्जीवित कर दिया। धीरे-धीरे आग बुझने लगी और मुगलों के हाथ से निकल गये समस्त पुराने क्षेत्र फिर से अधिकार में आ गये। इन सब दक्खिनियों से खानखाना ने कीमती रत्न प्राप्त करके जहाँगीर को भिजवाये। तीन माणिक, एक सौ तीन मोती, सौ याकूत, दो जड़ाऊ फरसे, मोतियों और याकूतों की जड़ी हुई किलंगी, जड़ाऊ झरझरी, जड़ाऊ तलवार, जड़ाऊ भुजबंद, हीरे की अंगूठी, मखमल की तरकश, पंद्रह हाथी तथा एक ऐसा घोड़ा भी इस भेंट में शामिल था जिसकी गर्दन के बाल धरती तक लटकते थे।

    खानखाना के पुत्र शाहनवाजखाँ ने भी अपनी ओर से पाँच हाथी तथा तीन सौ अनुपम वस्त्र बादशाह को भेंट किये। जहाँगीर इस भेंट को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह समझ गया कि दक्षिण में आग बुझ चुकी है।


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  • चित्रकूट का चातक - 53

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 53

    ऊदाराम ब्राह्मण

    दक्षिण में इस तरह की शांति देखकर खानेजहाँ लोदी की छाती पर साँप लोट गया। वह कतई नहीं चाहता था कि बादशाह इस बात को देखे कि जिस मोर्चे पर खानेजहाँ असफल हो गया, वहाँ किसी और ने सफलता के झण्डे गाढ़ दिये। वस्तुतः मुगलिया सल्तनत की स्थापना से लेकर उसके अंत तक मुगल सेनापतियों और अमीर-उमरावों में यह प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर बनी रही कि जीत का श्रेय मेरे ही नाम लिखा जावे।

    खानेजहाँ ने जहाँगीर को फिर से खानखाना के विरुद्ध भड़काया कि जब तक खानखाना दक्षिण में रहेगा, कभी भी पूरा दक्षिण मुगलों के अधीन नहीं होगा। खानखाना दक्षिण में अपनी आवश्यकता जतलाकर बादशाह की कृपा का पात्र बने रहना चाहता है तथा इस बहाने से बादशाह से दूर रह कर सत्ता का वास्तविक सुख भोग रहा है। वह दक्षिण में जो भी लूट करता है, अपने बेटों और सिपाहियों में बांट देता है। इसलिये उसके सिपाही मुगलिया सल्तनत के प्रति वफादार न होकर खानखाना के प्रति वफादार हैं। यदि मुझे वहाँ जाने दिया जाये तो दो साल में ही समूचा दक्षिण जहाँगीर के अधीन हो जायेगा।

    जहाँगीर फिर से खानेजहाँ की बातों में आ गया और उसने खानेजहाँ को बहुत सी सेना तथा रुपया देकर दक्षिण के लिये रवाना कर दिया। जोधपुर का राजा सूरसिंह भी राजपूतों की सेना सहित उसके साथ भेजा गया।

    खानेजहाँ को फिर से दक्षिण में आया देखकर दक्खिनियों में असंतोष तथा बेचैनी फूट पड़ी। उन्होंने मलिक अम्बर के नेतृत्व में खानखाना के बेटे शहनवाजखाँ के डेरे पर आक्रमण किया। शहनवाजखाँ और उसके भाई दाराबखाँ ने दो घड़ी तक ऐसी जर्बदस्त तलवार चलाई कि देखने वालों की आँखें पथरा गयीं। दक्खिनी मोर्चा छोड़कर कोसों दूर तक भागते चले गये।

    जब दक्षिण में पुनः शांति स्थापित हो गयी तो जहाँगीर ने परवेज के स्थान पर खुर्रम को दक्षिण में नियुक्त किया। खुर्रम ने खानखाना और उसके बेटों से प्रार्थना की कि अब चाहे जो भी हो सम्पूर्ण दक्षिण मुगलिया सल्तनत में शामिल किया जाये। खानखाना ने कहा कि यदि ऊदाराम ब्राह्मण को तीन हजारी मनसब दिला दिया जाये तो इस काम को किया जाना संभव है।

    ऊदाराम ब्राह्मण दक्खिनियों में उन दिनों बड़ी धाक रखता था। वह मलिक अम्बर की सेवा में नियुक्त था। मलिक अम्बर की वास्तविक ताकत ऊदाराम ही था। वह अत्यंत वीर, वचनों का धनी और व्यवहार कुशल सेनापति था। खानखाना ने अकबर के जमाने में ऊदाराम को वचन दिया था कि यदि ऊदाराम मलिक अम्बर को छोड़कर खानखाना की सेवा में आ जाये तो उसे तीन हजारी मनसब दिलवाया दिया जायेगा। ऊदाराम ने खानखाना की शर्त स्वीकार भी कर ली थी किंतु खानखाना अपना वचन पूरा कर सके इससे पहले ही अकबर की मृत्यु हो गयी और उसके बाद तो स्वयं खानखाना को ही दक्षिण से हटा लिया गया था। इस पर ऊदाराम खानखाना का शत्रु होकर घूमता था। अब अवसर आया तो खानखाना ने अपने पुराने वचन को पूरा करने की ठानी।

    खुर्रम ने जहाँगीर से कहकर ऊदाराम को तीन हजारी जात और पंद्रह हजारी सवार का मनसब दिलवा दिया। ऊदाराम को खानखाना की सेवा में गया जानकर मलिक अम्बर के हौंसले पस्त हो गये। उसने अपने समस्त किलों की चाबियाँ खुर्रम को भिजवा दीं। यह वही मलिक अम्बर था जिसके कारनामों के कारण चिंतित अकबर ने कई रातें जागते हुए बिताई थीं। मलिक अम्बर को मुगलों की शरण में गया हुआ देखकर दक्षिण के तमाम सरदार शहजादे खुर्रम की सेवा में हाजिर हो गये।

    यह सफलता पाकर खुर्रम खानखाना के दोनों बेटों शहनवाजखाँ तथा दाराबखाँ के साथ तमाम दक्षिणी सरदारों को लेकर जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने इस सफलता से प्रसन्न होकर खुर्रम पर मोती जवाहर निछावर किये। उसे तीस हजारी मनसब और दरबार में कुरसी पर बैठने का अधिकार दिया। खुर्रम ने भरे दरबार में बादशाह से अनुरोध किया कि दरबार में कुर्सी पर बैठने का यदि कोई वास्तविक हकदार है तो वह ऊदाराम ब्राह्मण है।

    कहर दर कहर

    खानखाना ने जहाँगीर को हीरे की एक खान समर्पित की जो खानखाना के बेटे अमरूल्लाह ने खानदेश के जमींदार पनजू से छीनी थी। जहाँगीर ने अत्यंत प्रसन्न होकर खानखाना का खिताब सात हजारी मनसब और सात हजारी सवार कर दिया। ये वे क्षण थे जब जहाँगीर अपने जीवन में खानखाना पर सर्वाधिक प्रसन्न हुआ। इसके बाद खानखाना के जीवन में फिर ऐसा अवसर न आया।

    जहाँगीर हर तरह से खानखाना को प्रसन्न किया चाहता था और उससे निकटता दर्शाना चाहता था। इसलिये उसने इस अवसर पर खानखाना के बेटे दाराबखाँ को नादरी का खिलअत दिया तथा खानखाना को सलाह देते हुए कहा- 'हमने सुना है कि इन दिनों शाहनवाजखाँ बहुत शराब पीता है। उसे कहो कि वह इस तरह अपने को नष्ट न करे।' (नादरी बिना बाहों की कमरी होती थी जो जामे के ऊपर पहनी जाती थी। इसे बिना बादशाह की अनुमति के कोई नहीं पहिन सकता था।)

    जब जहाँगीर खानखाना को यह सलाह दे रहा था तब अचानक ही उसका हाथ अपने गालों पर चला गया। यह वही गाल था जिस पर एक दिन अकबर ने सलीम को शराब न पीने की नसीहत के साथ जोरदार तमाचा मारा था।

    जब खानखाना बादशाह से विदा लेकर बुरहानपुर पहुँचा तो उसने पाया कि शाहनवाज अत्यधिक शराब पीने से मरणासन्न है। खानखाना ने बेटे का बहुत इलाज करवाया किंतु एक दिन मौत उसे खींचकर ले ही गयी। पत्नी माहबानो तथा दामाद दानियाल की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह तीसरा कहर था।

    जहाँगीर को जब यह समाचार मिला तो उसने खानखाना को सहानुभूति का संदेश भेजा। जहाँगीर और कुछ तो खानखाना का भला नहीं कर सकता था किंतु इतना प्रबंध उसने अवश्य किया कि खानखाना अपने बेटों और पोतों की तरक्की होते हुए देखकर प्रसन्न हो सके।

    जहाँगीर ने खानखाना के दूसरे बेटे दाराबखाँ का ओहदा बढ़ाकर पाँच हजारी मनसब कर दिया। शाहनवाजखाँ की सूबेदारी के सारे क्षेत्र दाराबखाँ को दे दिये। खानखाना के तीसरे पुत्र रहमानदाद को दो हजारी जात और सात सौ सवारों का मनसब दिया। शाहनवाज के पुत्र मनुचहर को दो हजारी जात तथा एक हजारी सवार का मनसब दिया और शाहनवाज के दूसरे पुत्र तुगरल को एक हजारी जात और पाँच सौ सवार का मनसब दिया। खानखाना अपने कुनबे को इस तरह आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न हुआ किंतु यह प्रसन्नता कुछ ही दिनों के लिये थी।

    मलिक अम्बर ने भले ही मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी किंतु ऊदाराम ब्राह्मण के हाथ से निकल जाने के कारण वह खानखाना से बहुत नाराज रहता था और उससे बदला लेने की योजनायें बनाता रहता था। एक दिन अवसर पाकर उसने खानखाना के तीसरे बेटे रहमानदाद को मार डाला। खानखाना पर फिर से विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। मुगलों की सेवा में वह अपने कुनबे की भेंट चढ़ाता जा रहा था। सियासत का यह घिनौना चेहरा देखकर खानखाना सकते में था। खानखाना की सेना में मलिक अम्बर का खौफ छा गया।

    जौहर

    पूरी मुगल सेना में हड़कम्प मचा हुआ था। जिसे देखो वही कुछ न कुछ नवीन सूचना बांटने में लगा हुआ था। जितने मुँह उतनी बातें। कोई कहता था कि खानखाना मलिक अम्बर के सामने समर्पण करने जा रहा है। कोई कहता था कि खानखाना ने जौहर करने का फैसला किया है। कोई कहता था कि बादशाह की कुमुक अहमदाबाद तक आ गयी है, इसलिये खानखाना उस कुमुक की प्रतीक्षा तक चुपचाप बैठा है। इतनी सारी बातों के बावजूद कोई भी सैनिक यह कहने की स्थिति में नहीं था कि इन सारी बातों में से कौन सी बात सही है।

    इन चर्चाओं को विराम तभी लगा जब शाम के समय खानखाना ने पूरी फौज को एकत्र कर आधिकारिक रूप से घोषणा की कि यदि एक माह के भीतर बादशाही कुमुक नहीं आती है तो खानखाना के सिपाहियों को जौहर करने के लिये तैयार रहना चाहिये। आगे का निर्णय सिपाहियों को करना था कि उनमें से कौन खानखाना का साथ निभाना चाहता है और कौन मोर्चा छोड़कर भागना चाहता है।

    हालांकि यह सभी जानते थे कि खानखाना की सेना अपने शत्रुओं और लुटेरों से इस कदर घिर गयी है कि मोर्चे पर से निकल भागना किसी के लिये संभव नहीं है। यहाँ तक कि स्वयं खानखाना के लिये भी नहीं। यदि ऐसा हो पाता तो खानखाना जौहर करने की घोषणा ही क्यों करता!

    जब मलिक अम्बर रहमानदाद को मारने में सफल हो गया और दाराबखाँ लाख चाहकर भी मलिक अम्बर को नहीं पकड़ सका तो मलिक अम्बर के हौंसले बुलंद हो गये। उधर उसे यह खबर भी मिली कि बादशाह स्वयं तो कश्मीर में जा बैठा है और उसके दूसरे अमीर-उमराव कोट कांगड़े की लड़ाई में बुरी तरह फंस गये हैं। यह सूचना पाकर मलिक अम्बर ने खुल्लमखुल्ला बगावत कर दी।

    मलिक अम्बर ने खुर्रम के साथ की हुई सारी संधियों को तोड़ डाला। उसे देखकर दूसरे दक्खिनियों ने भी मुगलों से विद्रोह कर दिया। खानखाना बहुत प्रयास करता था किंतु वह मलिक को दबा नहीं पाता था। शहनवाजखाँ और रहमानदाद के न रहने से खानखाना की ताकत बहुत घट गयी थी।

    खानखाना ने बादशाह को बहुत सी चिठ्ठियाँ भिजवाईं कि कुछ सेना भिजवाई जाये किंतु बादशाह की ओर से कोई जवाब नहीं आया। ऐसा नहीं था कि बादशाह तक चिठ्ठियाँ पहुँची नहीं, चिठ्ठियाँ पहुँची किंतु बादशाह उनका जवाब देने की स्थिति में नहीं रहा था। मेवाड़, कश्मीर और कोट कांगड़े में सेनाएं इस कदर उलझ गयीं थीं कि किसी भी तरह से खानखाना को कुमुक भिजवाया जाना संभव नहीं था। यही कारण था कि जहाँगीर खानखाना को जवाब भिजवाने की बजाय चुप लगा जाना ही अधिक उचित समझ रहा था।

    उधर दक्खिनियों ने खानखाना को खदेड़ना आरंभ किया और उसका पीछा करते हुए बुरहानपुर तक चले आये। बुरहानपुर में खानखाना बुरी तरह घिर गया। दक्खिनियों ने रसद की आपूर्ति काट दी। जिससे मुगल सेना के पशु घास और चारे के अभाव में मरने लगे। यहाँ तक कि आदमियों के भी भूखों मरने की नौबत आ गयी।

    एक-एक करके सारे प्रदेश हाथ से निकलते जा रहे थे और मुगल सिपाहियों की संख्या घटती जा रही थी। खाने-पीने का सुभीता न देखकर बहुत से सिपाही खानखाना को छोड़कर दक्खिनियों से जा मिले थे। मुगलों की घटती हुई ताकत को देखकर लुटेरों की फौज मुगल सेना के चारों ओर इकट्ठी हो गयी। ये लुटेरे मौका पाते ही मुगलों के डेरे में घुस जाते और उनका माल-असबाब लूट कर भाग खड़े होते।

    इस तरह सब काता-कूता कपास होते हुए देखकर खानखाना का मस्तिष्क सुन्न हो जाता था। वह एक ऊँची टेकरी पर घोड़ा खड़ा करके उस पर चढ़कर अपनी बूढ़ी आँखों से घण्टों तक उत्तर दिशा की ओर ताका करता था और किसी भी क्षण कुमुक आने की उम्मीद करता था किंतु वहाँ से कुमुक तो दूर किसी पत्र तक का जवाब नहीं आया।

    साठ हजार दक्खिनियों का मुकाबला मुगलों के छः-सात हजार सिपाही किसी भी तरह नहीं कर सकते थे। एक जमाना वह भी था जब खानखाना मुठ्ठी भर सिपाहियों को लेकर मुजफ्फरखाँ जैसे प्रबल शत्रु से जा भिड़ा था और उसके छक्के छुड़ा दिये थे किंतु वक्त के थपेड़ों ने खानखाना के शरीर और मन में इतना दम न छोड़ा था। यहाँ तक कि बराड़ और खानदेश भी उसके हाथ से निकल गये। ये वे क्षेत्र थे जिन्हें खानखाना ने सत्रह साल पहले अपने अधीन किया था।

    स्थितियाँ जब एक-दम असह्य हो गयीं तो खानखाना ने जहाँगीर को अंतिम पत्र लिखा कि यदि एक माह में आगरा से कुमुक नहीं भेजी गयी तो मेरे पास हिन्दू वीरों की तरह जौहर करने के अतिरिक्त और कोई उपाय न बचेगा। मैं अपने हरम की औरतों को आग में जला कर स्वयं अपने बेटों-पातों और सिपाहियों सहित शत्रु से जूझता हुआ मृत्यु को प्राप्त होऊंगा। मुगलिया सल्तनत को यही मेरी अंतिम सहायता होगी। शत्रुओं के हाथों अपमानित होने की अपेक्षा तो रण में जूझते हुए मर जाना अधिक श्रेयस्कर है।

    खानखाना का पत्र पाकर जहाँगीर के हाथों से तोते उड़ गये। वह एकदम से बेचैन हो उठा। उसने तुरंत ही अपना संदेशवाहक खानखाना को दौड़ाया कि खुर्रम के आने से पहले कोई कदम न उठाये। उसने कोट कांगड़ा के मोर्चे पर फतह हासिल होने का जश्न मना रहे खुर्रम को संदेश भिजवाया कि जिस तरह तुम्हारे दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने किसी जमाने में खानेआजम कोका को गुजरातियों के शिकंजे से छुड़ाया था, तुम भी उसी तरह तेज गति से बुरहानपुर पहुँच कर खानखाना को छुड़ाओ और यह शुभ समाचार मुझे तुरंत ही भिजवाओ। जहाँगीर ने अपनी स्वयं की भी लगभग सारी सेना कोकाखाँ के साथ दक्खिन के मोर्चे पर भिजवा दी।

    खुर्रम ताबड़तोड़ कूच करता हुआ बुरहानपुर पहुँचा। उसने दक्खिनियों में कसकर मार लगाई और खानखाना को उनके शिकंजे से बाहर निकाला। खुर्रम की प्रबलता देखकर मलिक अम्बर ने पुनः दीनता दिखाते हुए मुगलों के अधिकार वाले पुराने क्षेत्र खुर्रम को समर्पित कर दिये।


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  • चित्रकूट का चातक - 54

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 54

    आधा सेर कबाब

    किसी समय ईरान में मिर्जा गयास बेग नामक आदमी रहता था। वह था तो मिर्जाओं के वंश में से किंतु उसकी माली हालत बहुत खराब थी। एक दिन ऐसा भी आया कि घर में ठीक से खाने को न रहा। जब उसने सुना कि मलिक मसूद नामक व्यापारी अपने काफिले के साथ हिन्दुस्थान जा रहा है तो गयास बेग भी उसके साथ हो लिया।

    विकट रेगिस्तानी मार्ग में गयास बेग की औरत असमत बेगम ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम मेहरून्निसा रखा गया। ईरान से भारत तक के लम्बे सफर में अनेक बाधायें आयीं। कभी रेतीली आंधियों से मुकाबला हुआ तो कभी डाकुओं से। कभी पीने के पानी की कमी से जूझना पड़ा तो कभी पशुओं की महामारी से। फिर भी किसी तरह यह काफिला हिन्दुस्थान पहुँच गया। मलिक मसूद ने गयास बेग को अकबर के दरबार में नौकरी दिलवा दी।

    गयास बेग उद्यमी व्यक्ति था। उसने अपनी सेवा और स्वामिभक्ति से अकबर और उसके सेनापतियों को प्रसन्न कर लिया और उन्नति करता हुआ तीन सौ सवारों का मनसबदार बन गया।

    मेहरून्निसा का ईरानी खून हिन्दुस्तान की जलवायु में अच्छा रंग लाया और शीघ्र ही वह एक सुंदर युवती में परिवर्तित हो गयी। एक दिन जब शहजादे सलीम की दृष्टि मेहरून्निसा पर पड़ी तो वह उसे पाने के लिये आतुर हो गया। यह तब की बात है जब मेहरून्निसा ने यौवन की दहलीज पर पहला कदम ही रखा था और उधर सलीम के हरम में औरतों की संख्या आठ सौ से ऊपर जा पहुँची थी।

    गयास बेग तथा असमत बेगम की पहुँच सीधे अकबर तथा उसकी बेगमों तक थी इसलिये बिना विवाह किये मेहरून्निसा को पाना संभव नहीं था। सलीम ने अपनी माता तथा अन्य बेगमों से कहा कि मेहरून्निसा का विवाह मुझसे कर दिया जाये किंतु अकबर इस विवाह के लिये राजी नहीं हुआ। सलीम की इच्छा के विपरीत अकबर ने स्वयं रुचि लेकर मेहरून्निसा का विवाह अपने नौकर अलीकुली से कर दिया और सलीम हाथ मलता ही रह गया।

    जब सलीम जहाँगीर के नाम से तख्त पर बैठा तो उसके मन में मेहरून्निसा को पाने की ललक फिर से जागी। एक बार मेहरून्निसा के पति अलीकुली ने अकेले ही एक शेर को मारा। इस पर जहाँगीर ने उसे शेर अफगन की उपाधि दी और उसे बर्दवान का फौजदार नियुक्त कर दिया। जब शेर अफगन बर्दवान पहुँच गया तो जहाँगीर ने बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि शेर अफगन विद्रोह की तैयारियां कर रहा है, इसलिये उस पर निगाह रखी जाये। कुतुबुद्दीन ने शेरअफगन को गिरफ्तार करने का प्रयास किया किंतु इस संघर्ष में दोनों ही मारे गये। शेर अफगन के मारे जाने पर जहाँगीर ने मेहरून्निसा और उसकी बेटी को अपने पास बुलवा लिया। कुछ दिनों बाद जहाँगीर ने मेहरून्निसा से विवाह कर लिया और अपनी नयी बेगम का नाम रखा- नूरमहल।

    मेहरून्निसा भाग्य के इस तरह पलटा खाने से बहुत दुखी हुई किंतु शीघ्र ही उसे पता लग गया कि यह उसका अपकर्ष नहीं था अपितु भाग्योत्कर्ष के कारण ही ऐसा हुआ था। वह जितनी सुंदर थी, उससे कहीं अधिक बुद्धिमती थी। वह जितनी कोमलांगी थी, उससे कहीं अधिक कठोर हृदया थी। वह जितनी मधुर भाषिणी थी उससे कहीं अधिक चतुरा थी। धीरे-धीरे वह जहाँगीर की प्रीतपात्री बन गयी। जहाँगीर उसके सौंदर्य पाश में ऐसा बंधा कि सारे महत्वपूर्ण निर्णय उसी से पूछकर करने लगा। कुछ ही दिनों बाद जहाँगीर को लगने लगा कि उसने मेहरून्निसा को नूरमहल की उपाधि देकर उसके साथ न्याय नहीं किया है इसलिये जहाँगीर ने नूरमहल को नयी उपाधि दी- नूरजहाँ।

    कुछ ही दिानों में नूरजहाँ का नूर जहाँगीर के हरम से निकल कर उसके दरबार और पूरे देश में फैलने लगा। उसके पिता मिर्जा गयास बेग को एत्मादुद्दौला की तथा भाई को आसफखाँ की उपाधि मिली। अब वे दोनों बादशाह के दरबार में सर्वप्रमुख व्यक्ति हो गये। अब नूरजहाँ ही जागीरें, मनसब और उपाधियाँ बाँटने लगी। वह बादशाह का चिह्न धारण करके महल के झरोखे में बैठ जाती। उसने अपने नाम से सिक्के ढलवाये तथा वह विधवा औरत से साम्राज्ञी बन गयी। शाही फरमानों में जहाँगीर के साथ नूरजहाँ का भी नाम लिखा जाने लगा। जिस फरमान में नूरजहाँ का नाम नहीं होता था, उसे राजकीय कर्मचारी नहीं मानते थे।

    एक दिन ऐसा भी आया जब जहाँगीर ने अपने अमीरों से कहा कि मैंने अपना सारा राज्य नूरजहाँ को दे दिया है। अब मुझे क्या चाहिये? कुछ भी तो नहीं, सिवाय एक सेर शराब और आधा सेर कबाब के!

    भेड़िये का बच्चा

    जहाँगीर के पाँच बेटे थे- खुसरो, परवेज, खुर्रम, जहाँदार और शहरयार। खुसरो पहले ही बादशाह द्वारा आँखें फुड़वाकर मरवाया जा चुका था। अब परवेज ही सबसे बड़ा था और वही बादशाह को सबसे प्रिय था लेकिन नूरजहाँ के भाई आसफ अली की बेटी का विवाह खुर्रम के साथ हो जाने से नूरजहाँ परवेज के पक्ष में न थी जिससे परवेज का प्रभाव घट गया था।

    खुर्रम अत्यंत महत्वाकांक्षी, सत्ता लोलुप और दुराग्रही व्यक्ति था। नूरजहाँ का सहारा मिल जाने से अब तक उसी को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के सर्वाधिक अवसर मिले थे। यही कारण था कि अब तक सर्वाधिक लड़ाईयाँ खुर्रम ने ही लड़ी थीं और सर्वाधिक सफलतायें भी उसी ने अर्जित की थीं।

    जब नूरजहाँ ने अपने पेट से उत्पन्न अपने पूर्व पति शेरअफगन की बेटी का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे बेटे शहरयार से कर दिया तो नूरजहाँ की रुचि खुर्रम में न रही। वह चाहती थी कि खुर्रम के स्थान पर शहरयार को सफलतायें प्राप्त हों और वही बादशाह के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हो लेकिन शहरयार नितांत निकम्मा और अयोग्य आदमी था। जब वह उद्यम ही नहीं करता था तो सफलतायें कहाँ से मिलतीं!

    जब खुर्रम बादशाह से बहुत सा मान सम्मान और सेना पाकर दक्षिण को गया और खानखाना को दक्खिनियों के चंगुल से छुड़ाने के बाद एक के बाद एक करके सफलताओं के झण्डे गाढ़ने लगा तो नूरजहाँ को अच्छा नहीं लगा। उसने खुर्रम का प्रभाव घटाने के लिये दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को प्रदान कर दीं। खुर्रम को बहुत ही घटिया और अनुपजाऊ जागीरें दी गयीं किंतु दक्खिन में होने से उसे इस परिवर्तन का ज्ञान न हो सका।

    जब ईरान का शाह अब्बास सफवी कांधार पर चढ़कर आया तो जहाँगीर ने खुर्रम को आदेश भिजवाया कि वह खानखाना को लेकर शाह ईरान का रास्ता रोके तथा कांधार की रक्षा करे। जब खुर्रम खानखाना को साथ लेकर दक्षिण से पश्चिमी सूबों में आया तो उसे ज्ञात हुआ कि दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को दे दी गयी हैं तो खुर्रम मांडी में ही ठहर गया और बादशाह को संदेश भिजवाया कि वह वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद कांधार जायेगा।

    नूरजहाँ यही चाहती थी कि खुर्रम कोई गलती करे। उसने तत्काल मुगल सेनापतियों को संदेश भिजवाया कि वे खुर्रम को वहीं छोड़कर बादशाह की सेवा में कश्मीर चले आयें तथा बादशाह की ओर से खुर्रम को लिखवाया कि अब खुर्रम यहाँ न आये। मालवे, दक्खन और खानदेश के सूबे उसे इनायत किये जाते हैं, वहीं कहीं जाकर रहे।

    खुर्रम बादशाह के पत्र पाकर और भी भड़क गया। उसने अपने सेनापति सुंदर ब्राह्मण को आदेश दिया कि आगरा पर धावा करे। खानखाना को खुर्रम के साथ देखकर विक्रमाजीत सुंदर ब्राह्मण अपनी सेना लेकर आगरा पर चढ़ दौड़ा। उसने आगरे के कई नामी अमीरों के घर लूट लिये और बहुत सा धन लाकर खुर्रम को अर्पित किया। बादशाह यह समाचार पाते ही आगरा की ओर रवाना हुआ।

    खानखाना और उसका पुत्र दाराबखाँ भी खुर्रम के साथ थे। उन्हें भी बादशाह की सेवा में हाजिर होने के आदेश दिये गये किंतु नियति खानखाना के सामने आकर खड़ी हो गयी। एक ओर बादशाह जहाँगीर था जिसके हजार अहसान खानखाना पर थे तो दूसरी ओर शहजादा खुर्रम जो खानखाना के मरहूम बेटे शाहनवाजखाँ की बेटी का पति था। खानखाना दुविधा में फंस गया। वह कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में न रहा।

    बेटी जाना के विधवा हो जाने के बाद पौत्री ही अब उसके स्नेह का केंद्र थी किंतु जहाँगीर उस यतीम पौत्री के सुख को भी छीन लेना चाहता था। सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़कर खानखाना ने खुर्रम के साथ ही रहना ठीक समझा।

    इसी बीच नूरजहाँ के इशारे पर शहरयार ने जहाँगीर से निवेदन किया कि जब खुर्रम कांधार के मोर्चे पर जाने को तैयार नहीं है तो मुझे भेजा जाये। जहाँगीर ने शहरयार को कांधार जाने की अनुमति दे दी। जब कुछ दिनों बाद जहाँगीर को सूचना मिली कि शहरयार हार गया और शाह ईरान ने कांधार पर अधिकार कर लिया तो बादशाह बुरी तरह तिलमिला गया। वह किसी न किसी पर अपना क्रोध उतारने का अवसर ढूंढने लगा। शीघ्र ही उसे यह अवसर प्राप्त हो गया।

    जब जहाँगीर ने देखा कि अन्य सेनापति तो खुर्रम को छोड़कर जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हो गये हैं किंतु खानखाना तथा उसके बेटे-पोते खुर्रम के ही साथ हैं तो वह खानखाना पर बड़ा कुपित हुआ। उसने खानखाना को लिखा कि तेरा तो पूरा शरीर ही नमक हरामी से बना हुआ है। सत्तर वर्ष की उम्र में तूने बादशाह से विद्रोह करके अपना मुँह काला किया तो दूसरों को क्या दोष दूँ? तेरे बाप ने भी अपनी अंतिम अवस्था में मेरे बाप से विद्रोह किया था। तू भी अपने बाप का अनुगामी होकर हमेशा के लिये कलंकित हुआ। भेड़िये का बच्चा आदमियों में बड़ा होकर भी अंत में भेड़िया ही बनता है।'

    खानखाना समझ गया कि भाग्य रथ का पहिया उल्टा घूम चुका है। उस आयु में बादशाही कोप को झेल पाना खानखाना के बूते के बाहर की बात थी।

    दादा-पोते

    खानखाना के समझाने पर खुर्रम ने बादशाह के पास क्षमा याचना की कई अर्जियाँ भिजवाईं किंतु बादशाह ने उन पर कोई विचार नहीं किया। जो भी वकील अर्जी लेकर बादशाह के सामने हाजिर होता था, बादशाह उसी को कैद कर लेता था। नूरजहाँ की सलाह पर जहाँगीर ने बंगाल से परवेज को बुलाया और उसे खुर्रम पर आक्रमण करने के लिये भेजा। परवेज विशाल सेना लेकर खुर्रम तथा खानखाना के पीछे लग गया।

    इस समय खुर्रम के पास बीस हजार सिपाही थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सिपाही थे। फिर भी खानखाना का खुर्रम की ओर होना ही जीत की निशानी थी।

    जब परवेज चाँद के घाटे से उतर कर मालवे में आया तो खानखाना के मरहूम पुत्र शाहनवाजखाँ का बेटा मनूंचहर खुर्रम का साथ छोड़कर परवेज के पास चला गया। खानखाना के लिये यह बड़ा झटका था। खानखाना की समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन के रंगमच पर आखिर ईश्वर ने उसके लिये क्या भूमिका निश्चित की है। वह किसके लिये लड़े और किससे लड़े? यदि युद्ध के मैदान में उसका सामना मनूंचहर से हो गया तो खानखाना क्या करेगा? तलवार उठायेगा या गिरा देगा?

    इस नवीन परिस्थिति में खानखाना के लिये एक तरफ खुर्रम और एक तरफ परवेज न रह गये अपिुत उसके लिये तो यह ऐसी लड़ाई हो गयी थी जिसमें एक तरफ उसकी पौत्री थी तो दूसरी ओर पौत्र।

    खानखाना पशोपेश में पड़ गया लेकिन फिर भी उसने नियति के निर्णय को स्वीकार कर लिया कि वह जिस स्थान पर खड़ा था, उसी स्थान पर रहे अतः उसने खुर्रम का साथ नहीं छोड़ा। जब परवेज और खुर्रम की सेनाएं आमने-सामने हुई तो खुर्रम की सेना खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली। इससे खुर्रम खानखाना तथा दाराबखाँ को अपने साथ लेकर किसी तरह नर्मदा पार करके दक्खिन को भाग गया।

    षड़यंत्र

    - 'क्या बात है लाल मुहम्मद?'

    - 'हुजूर कहते हुए जुबान कटती है। जान बख्शी जाये तो कुछ हिम्मत करूं।'

    - 'बिना किसी डर के अपनी बात कहो, लाल मुहम्मद। तुम हमारे भरोसेमंद हो।'

    शहजादे खुर्रम से आश्वासन पाकर लाल मुहम्मद ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली और खुर्रम की ओर बढ़ा दी।

    - 'यह क्या है?' खुर्रम ने चिट्ठी एक साँस में पढ़ डाली।

    - 'हुजूर! खानखाना का मुखबिर यह चिट्ठी लेकर शहजादे परवेज के पास जाता था। किसी तरह मेरे हाथ पड़ गया।'

    - 'वह मुखबिर कहाँ है?'

    - 'वह मेरे डेरे में कैद है।'

    - 'उसे मेरे सामने हाजिर किया जाये।'

    थोड़ी ही देर बाद लाल मुहम्मद, खानखाना के मुखबिर को लेकर खुर्रम के डेरे में हाजिर हुआ।

    - 'क्या तुझे इस चिट्ठी के साथ पकड़ा गया है?' मुखबिर ने कोई जवाब नहीं दिया।

    - 'सच कह नहीं तो जीभ खींच लूंगा।' मुखबिर ने इस पर भी जुबान नहीं खोली तो खुर्रम ने तलवार उठाई। यह देखकर मुखबिर खुर्रम के पैरों में गिर पड़ा- 'मेरी जान बख्शी जाये हुजूर।'

    - 'क्यों बख्शी जाये तेरी जान?'

    - 'मैं तो गुलाम हूँ। कुसूरवार तो कोई और है।'

    - 'तो कुसूरवार का नाम बता।'

    - 'चिट्ठी लिखने वाले का नाम चिट्ठी के नीचे दर्ज है।'

    - 'मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ।'

    - 'जिसका नाम चिट्ठीके नीचे लिखा है, उसी ने मुझे यह चिट्ठी दी थी।'

    - 'खानखाना ने?'

    - 'हाँ हुजूर।'

    - 'सच कहता है?'

    - 'हाँ हुजूर।'

    - 'किसके पास ले जा रहा था?'

    - 'महावतखाँ के पास।'

    - 'लाल मुहम्मद! इस नामुराद को कैद में रख और खानखाना को मेरे सामने हाजिर कर।' थोड़ी ही देर में खानखाना शहजादे के डेरे में था।

    - 'यह क्या है?' खुर्रम ने खानखाना की ओर चिट्ठी बढ़ाई। खानखाना खुर्रम के हाथ से खत लेकर उत्सुकता से पढ़ने लगा।

    - 'हुजूर जरा जोर से पढ़िये ताकि मैं भी सुन सकूं।' खुर्रम ने व्यंग्य से कहा।

    - 'जो सौ आदमी नजरों में मेरी देखभाल नहीं रखते होते तो बेचैनी से कभी का उड़कर वहाँ पहुँच जाता।' खानखाना ने पढ़ा।

    - 'यह क्या है शहजादे?' खानखाना ने खुर्रम से पूछा।

    - 'यही तो हम जानना चाहते हैं हुजूर कि यह क्या है?' शहजादे के शब्द तल्खी और व्यंग्य से पूरी तरह लबरेज थे।

    - 'जब तक यह पता न लगे कि यह चिट्ठी किसने और किसे लिखी है, तब तक इसके बारे में कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता।'

    - 'अब ज्यादा होशियारी मत दिखाइये खानखाना। यह चिट्ठी आपने लिखी है और दुष्ट महावतखाँ को लिखी है। यह भी जान लीजिये कि आपका जो मुखबिर यह चिट्ठी लेकर महावतखाँ को देने जा रहा था, उसी ने हमें यह सब बताया है।' अपनी बात पूरी करते-करते खुर्रम की आँखों में खून उतर आया।

    - 'यह सरासर गलत है। मेरे विरुद्ध कोई साजिश हुई है।'

    - 'लाल मुहम्मद! इस बूढ़े शैतान को हथकड़ी-बेड़ी लगा दे और तब तक मत छोड़ जब तक मैं खुद तुझे ऐसा करने का हुक्म न दूँ।'

    खुर्रम का ऐसा आदेश सुनकर खानखाना ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा-

    'रहिमन सीधी चाल सों, प्यादा होत वजीर।

    फरजी साह न हुइ सकै, गति टेढ़ी तासीर।'


    (सीधे-सीधे चलने वाला प्यादा भी वजीर बन जाता है किंतु टेढ़ी चाल चलने वाला वजीर कभी भी बादशाह नहीं बन सकता। क्योंकि टेढ़ी चाल की तासीर ही ऐसी है)

    खर्रुम ने एक न सुनी। उसके आदेश से खानखाना के हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल दी गयीं तथा उसे उसी के डेरे में कैद कर दिया गया। थोड़ी ही देर बाद दाराबखाँ को भी हथकड़ियों बेड़ियों सहित खानखाना के डेरे में लाकर बंद किया गया। अपने बूढ़े बाप को इस हालत में देखकर दाराबखाँ फूट-फूट कर रोने लगा। दाराबखाँ ही एकमात्र बेटा था जो अब तक खानखाना का साथ निभा रहा था। खानखाना ने उसे दिलासा देते हुए कहा-

    'रहिमन चुप ह्नै बैठिये देखि दिनन को फेर।

    जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर।'


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  • चित्रकूट का चातक - 55

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 55

    वक्त की दगा

    जब महावतखाँ को खानखाना की कैद के समाचार मिले तो वह दूने उत्साह से भरकर खुर्रम की ओर दौड़ा। महावतखाँ को लगा कि भाग्य ने उसके लिये एक साथ दो-दो सफलतायें पाने का अवसर उपस्थित कर दिया है।

    खुर्रम की हालत तो उसी समय पतली हो गयी थी जब उसकी सेनाएं खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली थीं किंतु जब खानखाना को कैद कर लिया गया तो खुर्रम की रही सही ताकत भी जाती रही।

    महावतखाँ ने चारों ओर से खुर्रम को घेर लिया। उसके हाथी-घोड़े छीन लिये। धीरे-धीरे घेरा उस मुकाम पर पहुँच गया, जहाँ से महावतखाँ किसी भी दिन खुर्रम के डेरे पर आ धमक सकता था।

    इस पर खुर्रम ने लानतुल्ला को महावतखाँ से संधि की बात चलाने के लिये भेजा। लानतुल्ला का वास्तविक नाम तो अब्दुल्लाखाँ फिरोज जंग था, उसे जहाँगीर ने लानतुल्ला की उपाधि दी थी। तब से वह लानतुल्ला ही कहलाता था।

    लानतुल्ला का मित्र राव रतन हाड़ा इस समय महावतखाँ के लश्कर में था। लानतुल्ला ने उसी के माध्यम से संधि की बात चलाई। महावतखाँ ने लानतुल्ला से कहा- 'यदि तेरी जगह खानखाना आकर संधि की बात करे और सब कौल करार करे तो मैं संधि करूं।'

    लानतुल्ला ने यह बात जाकर खुर्रम को कह सुनाई। खुर्रम को पक्का विश्वास हो गया कि महावतखाँ और खानखाना में कोई न कोई सटपट अवश्य है। (सटपट- सांठगाँठ, जहाँगीर नामे में स्वयं बादशाह जहाँगीर ने इसी शब्द का प्रयोग किया है) फिर भी अपना बुरा वक्त जानकर खुर्रम ने नीचे दबना ही मुनासिब समझा और खानखाना तथा दाराबखाँ को बाइज्जत अपने सामने पेश करने के आदेश दिये।

    लानतुल्ला ने खानखाना और दाराबखाँ की हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ कटवाईं तथा उन्हें नहला धुलाकर भर पेट भोजन करवाया। जब बाप बेटों को खुर्रम के सामने पेश किया गया तो खुर्रम ने अपने स्थान से खड़े होकर उनका स्वागत किया और उन्हें अपने आसन पर बैठाते हुए कहा- 'मेरे लिये तो आज ईद हुई।'

    खानखाना समझ गया कि खुर्रम का कोई न कोई स्वार्थ खानखाना से अटक गया है तभी इतनी लल्लो-चप्पो कर रहा है। उसने खुर्रम को सम्बोधित करके कहा-

    'बिगरी बात बने नहीं, लाख करौ किन कोय।

    रहिमन फाटे दूध को मथे न माखन होय।'


    खानखाना का यह भाव देखकर खुर्रम उसके पैरों में गिर गया- 'आप बड़े हैं, हर तरह से इज्जत पाने के योग्य हैं, मेरे गुनाह मुआफ करें। मुसीबत में अपने ही काम आते हैं।'

    खानखाना ने खुर्रम की बजाय अपने पुत्र दाराबखाँ की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

    'रहिमन प्रीति न कीजिये, जस खीरा ने कीन।

    ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फाँकें तीन।'


    खानखाना की हँसी खुर्रम के कलेजे को चीर गयी फिर भी वह अपनी ही तरह का अकेला मक्कार था। वह जानता था कि खानखाना आसानी से चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आयेगा। उसने कुरान पर हाथ रखकर कसम खाई- 'मुझे अपने किये पर बेहद अफसोस है। आगे से हमेशा खानखाना की मर्यादा का ख्याल रखा जायेगा। मैं अपने आप को आपके हवाले करता हूँ। मेरी इज्जत आबरू आपके हाथ में है।'

    खानखाना ने कुरान को चूमते हुए कहा-

    'रहिमन खोजे ऊख में, जहाँ रसन की खानि।

    जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं यही प्रीति में हानि।'


    (जो गन्ना रस की खान है, उसमें भी जहाँ-जहाँ गाँठ होती है, रस नहीं होता। प्रेम में भी जहाँ गाँठ पड़ जाती है, वहाँ रस नहीं रहता।)

    जब खानखाना किसी भी तरह सीधे मुँह बात करने को तैयार नहीं हुआ तो खुर्रम ने अपने हरम की सारी औरतों को अपने डेरे में बुलवा कर खानखाना के पैरों में डाल दिया- 'ये सब आपकी बेटियाँ हैं। यदि आप चाहते हैं कि हरामी महावतखाँ इन्हें बेइज्जत करके लूटकर ले जाये तो बेशक आप मेरी मदद न करें।'

    खुर्रम का यह बाण सही निशाने पर लगा। पौत्री का शोक विह्वल मुँह देखकर खानखाना पसीज गया। उसके नेत्रों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कहा- 'बोल शहजादे, इस बूढ़े रहीम से तू क्या चाहता है। रहीम जान देकर भी तेरी इच्छा पूरी करेगा।'

    - 'ऐसा कुछ करो खानखाना कि मेरे और बादशाह के बीच बात अधिक न बिगड़े और मुझे अधिक न भटकना पड़े।'

    खानखाना के आदेश पर लानतुल्ला को महावतखाँ के पास भेजा गया और कहा गया कि वह इधर से खानखाना नदी के कराड़ पर आता है। वहाँ से महावतखाँ नदी के कराड़ पर पहुँचे। दोनों जने बीच नदी में नाव पर बैठ कर सुलह सफाई की बात करेंगे।

    अभी लानतुल्ला डेरे से बाहर निकला ही था कि लाल मुहम्मद ने आकर सूचना दी- 'बादशाही कुमुक नदी पार करके शहजादे के डेरों की ओर बढ़ रही है।

    लाल मुहम्मद का संदेश सुनते ही खानखाना डेरे से बाहर निकला। नदी के तट पर महावतखाँ की नावों की हलचल थी और खुर्रम की सेना में चारों ओर भगदड़ मची हुई थी। जिस खानखाना के मैदान में मौजूद रहते हुए कोई सिपाही कभी मोर्चा छोड़कर नहीं भागा था, आज वही सिपाही बिना लड़े ही भाग रहे थे। सिपाही तो उस वक्त तक खानखाना की रिहाई के बारे में जानते तक न थे। वे तो यही समझ रहे थे कि खानखाना हथकड़ी-बेड़ियों में जकड़ा हुआ अपने डेरे में पड़ा है।

    एकाएक ही विचित्र स्थिति उत्पन्न होने से खुर्रम की दशा खराब हो गयी। उसके सामने खुसरो का चेहरा घूमने लगा। खुर्रम ने सोचा कि यदि मैं बादशाही सेना के हाथ लग गया तो मेरी भी वही दशा होगी जो एक जमाने में खुसरो की हुई थी। उस समय खुसरो की दुर्दशा करवाने में मैं शामिल था और इस बार मेरी दुर्दशा करने में परवेज और शहरयार पीछे न रहेंगे। यदि जहाँगीर ने किसी तरह रहम करके छोड़ भी दिया तो मलिका नूरजहाँ उसे किसी भी तरह जीवित नहीं छोड़ेंगी।

    इन सब बातों पर विचार करते-करते खुर्रम इतना अधीर हुआ कि किसी तरह का मुकाबला न करके चुपचाप भाग खड़ा हुआ। किसी तरह उसने दाराबखाँ को हरम की औरतें लेकर आने के लिये कहा। घबराहट और जल्दबाजी में अपने पलायन की सूचना उसने खानखाना को भी नहीं दी। ऐसी भगदड़ मची कि दाराबखाँ भी बिना यह जाने कि खानखाना कहाँ है, हरम की औरतों को लेकर खुर्रम के पीछे भाग खड़ा हुआ।

    महावतखाँ को चढ़कर आया देखकर खानखाना ने उससे मुकाबला करने की तैयारी की किंतु समय इतना कम था कि तलवार हाथ में लेकर घोड़े पर सवार होने के अतिक्ति कुछ नहीं किया जा सकता था।

    खुर्रम और दाराबखाँ को अपने पास न पाकर खानखाना ने मुकाबले का इरादा त्याग दिया। मैदान की स्थिति यह थी कि गिनेचुने सिपाही ही उसके चारों ओर खड़े रह गये थे। खानखाना न तो मोर्चा छोड़कर भाग सकता था और न मुकाबला कर सकता था। आज से पहले खानखाना ने किसी के सामने समर्पण भी नहीं किया था किंतु वक्त ने आज वह समय भी ला दिया।

    इस तरह एकाकी छोड़ दिये जाने पर खानखाना घोड़े से नीचे उतर गया। उसने अपनी प्यारी तलवार निज सेवक फहीम के हाथ में दे दी। जूते उतार दिये और स्वयं नंगे पाँव महावतखाँ की ओर चल दिया। (फहीम एक राजपूत युवक था। वह खानखाना का निज सेवक तथा विश्वासपात्र था। वह खानखाना के गुणों पर रीझकर खानखाना की सेवा में रहता था।) फहीम ने कहा- 'मालिक! महावतखाँ विश्वास के योग्य नहीं है। दगा अवश्यंभावी है।'

    खानखाना ने पलट कर कहा- 'किसी महावतखाँ की औकात नहीं जो खानखाना से दगा करे। दगा तो वक्त ने की है और आगे भी जो करेगा, वक्त ही करेगा।'

    - 'इससे तो बेहतर है कि हथियार पकड़कर बादशाह के हुजूर में चलें।'

    - 'जब बादशाह के नाम पर नूरजहाँ के सामने घुटने टिकाने हैं तो तू यह मान ले कि महावतखाँ ही बादशाह है। तू यह मान ले कि शहजादा परवेज ही बादशाह है। तू यह क्यों नहीं समझता कि बादशाह जहाँगीर नहीं, बादशाह तो वक्त है, जो सबसे ज्यादा क्रूर और दगाबाज है।'

    खानखाना का जवाब सुनकर फहीम आँखों में आँसू भर कर खानखाना के पीछे-पीछे चला।

    उड़ावे फहीम!

    खानखाना अब पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया। उसका बेटा दाराबखाँ, बेटे शाहनवाजखाँ की पुत्री और दाराबखाँ के बेटे खुर्रम के पास थे और पोता मनूंचहर तथा स्वयं खानखाना परवेज के पास थे।

    ऐसी स्थिति में खानखाना के लिये कहीं ठौर न बची थी। जाये तो जाये कहाँ? उसने खुर्रम के निज मंत्री भीम सिसोदिया को पत्र लिखा कि यदि खुर्रम मेरे बेटों-पोतों को छोड़ दे तो मैं बादशाही लश्कर को दक्खिन से हटाकर आगरा भेज दूँ। नहीं तो बहुत मुश्किल पड़ेगी।

    इस पर भीम सिसोदिया ने लिखा- 'अभी तो पाँच-छः हजार लोग खुर्रम के लिये अपनी जान झौंकने के लिये शेष हैं। जब तू हमारे पास आयेगा तब तेरे बेटे को मारकर तेरा हिसाब किया जायेगा।'

    खानखाना समझ गया कि मुगलिया सल्तनत की गंदी सियासत पूरी तरह से खानखाना के परिवार को खत्म करके ही दम लेगी। इधर परवेज खानखाना से पूरी सेवा लेगा और अंत में उसे नष्ट कर देगा। उधर खुर्रम दाराबखाँ से पूरी सेवा लेगा और जब दाराबखाँ उसके काम का न रहेगा तो खुर्रम उसे नष्ट कर देगा। खानखाना यह बात दाराब और मनूंचहर को समझाना चाहता था किंतु उन तक पहुँचने या उन तक अपना संदेश पहुँचाने का कोई उपाय न था।

    कुछ दिनों बाद खबर आयी कि खुर्रम ने गोलकुण्डा होते हुए उड़ीसा के रास्ते बंगाल पर अमल जमा लिया है और दाराबखाँ को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया है। यह सुनकर परवेज ने बुरहानपुर से बंगाल जाने की तैयारी की और मनचूहर को खानपुर थाने का हाकिम बना दिया। यह देखकर खानखाना ने अपना माथा पीट लिया।

    खुर्रम को उदयपुर के राणा अमरसिंह के पुत्र भीमसिंह की सेवाएं मिल जाने से खुर्रम के हौंसले बुलंद थे। वह बंगाल को जीतने के बाद बिहार की ओर बढ़ा और उसे दबाने के बाद निरंतर आगे बढ़ता हुआ इलाहाबाद तक चढ़ आया।

    परवेज ने खानखाना के आधे परिवार को अपनी तरफ और आधे परिवार को खुर्रम की तरफ देखकर खानखाना का विश्वास नहीं किया। उसने खानखाना को कैद करने का निर्णय लिया।

    जब परवेज के आदेश पर महावतखाँ के आदमी नंगी तलवारें लेकर खानखाना के डेरे की तरफ बढ़े तो फहीम ने तलवार खींच ली। फहीम को अकेले ही लड़ने के लिये आया देखकर महावतखाँ ने कहा- 'तू अपनी जान व्यर्थ ही गंवाता है। तुझे क्या भय है?'

    - 'आप किस इरादे से नंगी तलवारें लेकर मेरे स्वामी के डेरे पर आये हैं, यह जाने बिना मैं आपको डेरे में प्रवेश नहीं करने दूंगा।'

    - 'शहजादे का हुक्म है कि बदकार खानखाना को गिरफ्तार करके हथकड़ी बेड़ी लगायी जाये।'

    - 'लेकिन क्यों? क्या गुनाह है मेरे स्वामी का?'

    - 'फहीम! महावतखाँ को अपना काम करने दो।' खानखाना ने कहा। वह डेरे के बाहर शोर होता हुआ सुनकर निकल आया था।

    - 'मेरी देह में प्राणों के रहते यह बदजात मेरे स्वामी को छू भी नहीं सकता।' फहीम ने ताल ठोकी।

    - 'गुस्ताख सिपाही! शहजादे की मंशा पूरी होने में रोड़ा बनता है। तेरा सिर कलम किया जायेगा।' महावतखाँ ने चीख कर कहा।

    - 'तुम क्या मेरा सिर कलम करोगे, मैं स्वयं ही अपने स्वामी पर कुरबान हो जाऊंगा।' इतना कहकर फहीम शेर की तरह उछला और अपनी तलवार का भरपूर वार महावतखाँ पर किया। महावतखाँ अचानक ही उसके वार कर देने से घोड़े से गिर पड़ा। तलवार उसकी भुजा पर निशान बनाती हुई निकल गयी। यदि वह जरा सा भी चूक जाता तो उसकी भुजा उसके शरीर से अलग हो जाती।

    - 'मारो नमक हराम को।' महावतखाँ चिल्लाया। दसियों तलवारें फहीम पर छा गयीं। कुछ देर बाद फहीम का शव ही धरती पर पड़ा दिखायी दिया। फहीम ने अपने स्वामी पर न्यौछावर होकर उस कहावत को नया ही अर्थ दे दिया जो उन दिनों खानखाना के दूसरे चाकरों द्वारा फहीम से ईष्या रखे जाने के कारण कही जाती थी- 'कमावे खानखाना उड़ावे मियाँ फहीम।' सच ही तो था, खानखाना ने अब तक जो भी यश और पुण्य अर्जित किया था फहीम ने अपनी जान न्यौछावर करके खानखाना की कीर्ति को दूर-दूर तक फैला दिया।

    जागत व्हैगो गो भोर

    फहीम के गिरते ही खानखाना गिरफ्तार कर लिया गया। उसका डेरा परवेज के डेरे के पास लगाया गया। खानखाना के डेरे के बाहर सामान्य सिपाहियों और छोटे ओहदेदारों के स्थान पर महावतखाँ जैसे सेनापति पहरा देते थे ताकि खानखाना कैद से न भाग छूटे।

    खानखाना की ओर से निश्चिंत होकर परवेज ने बनारस के पास खुर्रम को जा घेरा। इस समय खुर्रम के पास सात हजार सैनिक थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सैनिक थे। खुर्रम ने मैदान छोड़कर भाग जाने की योजना बनायी किंतु भीम सिसोदिया ने उसे भागने के बजाय रण में जूझ मरने की सलाह दी।

    खुर्रम आधे मन से लड़ने के लिये तैयार हुआ। शीघ्र ही परवेज की सेना ने खुर्रम की सेना को मार भगाया। परवेज की ताकत देखकर खुर्रम मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ किंतु भीम सिसोदिया ने मैदान छोड़ने से मना कर दिया। उसने इस युद्ध में ऐसी तलवार चलाई कि देखने वालों ने दाँतों तले अंगुली दबा ली।

    जब ये समाचार जहाँगीर को प्राप्त हुए तो जहाँगीर ने महावतखाँ को सात हजारी जात और सात हजारी सवार का मनसबदार बनाया। खानखाना के तुमन तौग भी महावतखाँ को सौंप दिये गये और उसका दर्जा खानखाना के बराबर कर दिया गया।

    इतने वर्षों की निष्ठा का यही परिणाम अब्दुर्रहीम को प्राप्त हुआ कि वह तो खानखाना से कैदी हो गया और महावतखाँ जैसा अदना आदमी खानखाना हो गया। महावतखाँ यह समाचार सुनाने अब्दुर्रहीम के डेरे में गया। उसने कहा- 'अब तू अकेला खानखाना न रहा। मैं भी खानखाना हूँ।'

    नियति की ऐसी करनी देखकर खानखाना ने उससे कहा-

    'उरग, तुरंग, नारी नृपति, नीच जाति, हथियार।

    रहिमन इन्हें सँभारिये, पलटत लगै ने बार।'


    - 'अब्दुर्रहीम! तू मौलवियों की तरह दूसरों को तो बहुत इल्म बाँटता फिरता है। जो तू ऐसा ही ज्ञानी है तो फिर तू इस दुर्दशा को क्यों पहुँचा? रहीम ने कहा-

    'करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर।

    चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत व्हैगो भोर। '


    (महावतखाँ! तू रहीम को भाग्यहीन ही जान जो बड़े घर में चोरी करने के लिये घुस गया और यह सोचते-सोचते सवेरा हो गया कि आज तो बड़ा लाभ हुआ। अर्थात् कुछ प्राप्त किये बिना ही पकड़ा गया।)

    रहीम का उक्ति सुनकर महावतखाँ ठहाका लगा कर हँसा। उसने कहा- 'किस मिट्टी का बना है तू जो इस मुसीबत में भी परिहास करता है!'

    मन उचाट

    खुर्रम ने दाराबखाँ को रोहतास से दक्षिण के मोर्चे पर जाने के आदेश दिये। दाराबखाँ रोहतास से निकल कर लगभग सौ कोस ही आगे गया होगा कि उसे अब्दुर्रहीम के कैदी हो जाने के समाचार मिले।

    अब्दुर्रहीम को दुबारा कैदी बनाये जाने पर दाराबखाँ को मुगलों से घृणा हो गयी। उसके फरिश्ते जैसे निर्दोष और पाक दामन बाप को पहले तो खुर्रम ने और अब परवेज ने कैद कर लिया था। दोनों ही बार अब्दुर्रहीम का दोष क्या था?

    उस बार खुर्रम ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा था कि अब्दुर्रहीम महावतखाँ से मिल गया है। जबकि महावतखाँ ने अब्दुर्रहीम की ओर से जाली पत्र लिखकर खुर्रम के आदमियों के हाथों पकड़वाया और खुर्रम ने उस पत्र को असली जानकर अब्दुर्रहीम तथा दाराबखाँ को कैद में डाल दिया।

    इस बार परवेज ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा कि उसका पुत्र दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में है इसलिये अब्दुर्रहीम को खुला छोड़ना मुगलों के हित में नहीं है। अब्दुर्रहीम स्वतंत्र रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! अब्दुर्रहीम बंदी रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! क्या मुगलों का हित ही सर्वोपरि है? जिस अब्दुर्रहीम के दमखम पर यह मुगलिया सल्तनत खड़ी हुई, उस अब्दुर्रहीम का अपना हित-अनहित कुछ नहीं?

    यदि दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में था तो इसमें अब्दुर्रहीम का क्या दोष था? जब अब्दुर्रहीम खुर्रम के पक्ष में था तब मनूंचहर भी तो परवेज के पास था! उस समय परवेज ने मनूंचहर को दण्डित क्यों नहीं किया? क्या केवल इसलिये कि तब अब्दुर्रहीम को कमजोर करने के लिये मनूंचहर को अपने पक्ष में रखा जाना मुगलों के हित में था!

    खुर्रम ने भी तो जहाँगीर से बगावत की! उसका दण्ड जहाँगीर को तो नहीं दिया जा सकता! उसी तरह दाराबखाँ के बागी हो जाने का दण्ड अब्दुर्रहीम को क्यों?

    दाराबखाँ इन्हीं सब बातों पर बारम्बार विचार करता हुआ फिर से अपने कुटुम्ब को एक जगह एकत्र करने और इस बिखराव से बाहर निकलने के उपाय के बारे में सोचता ही था कि खुर्रम का संदेश वाहक उसकी सेवा में उपस्थित हुआ और कहा कि खुर्रम ने उसे गढ़ी में बुलाया है।

    दाराबखाँ यह आदेश सुनकर चकरा गया। कहाँ तो उसे रोहतास से खानदेश जाने के आदेश दिये गये थे और कहाँ अब उसे बीच मार्ग से ही उल्टी दिशा में बंगाल बुलाया जा रहा है! (रोहतास पूर्वी उत्तर प्रदेश में है।)

    दाराबखाँ को लगा कि जिस प्रकार परवेज ने अब्दुर्रहीम के साथ छल किया, उसी प्रकार खुर्रम भी दाराबखाँ के साथ छल करना चाहता है। अवश्य ही दाल में कुछ काला है। अतः खुर्रम के पास जाना उचित नहीं है।

    दाराबखाँ को ज्ञात था कि इस समय परवेज भी बंगाल पर धावा करने की तैयारी में है। इसलिये बेहतर होगा कि दक्षिण को न जाकर बंगाल ही चला जाये ताकि परवेज से मिलकर खानााना को छुड़ाने के प्रयास किये जायें।

    दाराबखाँ ने खुर्रम के संदेशवाहक से कहा कि शहजादे को कहना कि शहजादा खुद तो गढ़ी में बैठा है किंतु बंगाल के दूसरे इलाकों में इस समय जमींदारों का विद्रोह हो रहा है, उसे दबाना जरूरी है। इसलिये मैं जमींदारों का विद्रोह दबाने के लिये जाता हूँ जब अवसर होगा तो मैं शहजादे की सेवा में गढ़ी में हाजिर हो जाऊंगा।

    खुर्रम ने दाराबखाँ को न आते देखकर दाराबखाँ के बेटे को पकड़ कर अब्दुल्लाहखाँ की देखरेख में रख दिया और स्वयं उड़ीसा के रास्ते दक्षिण को चल दिया।

    परवेज ने भी बंगाल पर अधिकार करके महावतखाँ को बंगाल में नियुक्त किया और स्वयं खुर्रम के पीछे दक्षिण को प्रस्थान कर गया।


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  • INDIAN LEADERS : COTEMPORARY OPINIONS

     21.08.2017
    INDIAN LEADERS : COTEMPORARY OPINIONS

     There is general consensus of opinion that the reactionary measures of Lytton and the Anglo-Indian agitation over the Ilbert Bill hastened the process which lad to the foundation of Congress towards the very end of the year 1885. The Indian National Congress was the fulfillment of and logical corollary to all the efforts at organising political associations in different parts of India. Towards the close of Lytton’s Vicroyalty, that is about 1878 and 1879, Allan Octavian Hume, a retired official of the Government of India, became convinced that some definite action was called for to counteract the growing unrest. Hume was an enlightened imperialist, alarmed at the growing gulf between the rulers and ruled. He had considerable misgiving about establishment of the Indian National Conference in 1883 by SurendraNath Banerjee, a dismissed government servant.

    He decided to bypass the National Conference and instead organise a loyal and innocuous political organisation. Hume made the National Congress, at least in the beginning, a forum for Pro-British and anti-Russian propaganda. The establishment of the congress was in fact as much the work of the Indian Moderates as of the Government. There was an identity of interest between the two. The former wanted political recognition as a means to rise in social scale, the latter a non-official political organisation to act as barometer of public opinion. Hume secured the sympathy and support of the Government officials and public men in India and England for the Indian National Congress. Thus the movement was a child both of England and India.

    The formation of the Congress represented from the point of view of Government an attempt to defeat or rather forestall an impending revolution. Hume own conception of the role of Congress was : ‘A safety valve for the escape of great and growing forces generated by our own action, was urgently needed and no more efficacious safety valve than our congress movement could possibly be devised.’ Something like a national organisation had been in the air, for quite some time. Hume took advantage of an already created atmosphere, helped by the fact that he was more acceptable to, Indians as free of regional loyalties. The nucleus of the Congress leadership consisted of men from Bombay and Calcutta who had come together in London in the late 1860’s and early 70’s while studying for the ICS or for law.. who all fell under the influence of Dadabhai Naoroji who was then settled in England as businessman-cum-publicist.

    Early in December 1884, Hume arrived in Bombay, apparently to bid farewall to Ripon and stayed there far three months. He discussed with Indian leaders about the holding of an annual conference, the organization the charter of demands and the formation of an Indian Party in Parliament. Later he visited Madras, Calcutta, Simla and several places in North-Western province and Avadh and probably also in the Punjab. In June, 1885, before the congress was started, Viceroy Dufferin was one of the first person whom Hume consulted. Dufferin warmly approved the proposal. But Dufferin advised Hume; ‘don’t ask Lord Reay, the Governor of Bombay to preside because it will be awkward for him if..administration comes to be severely criticized whilst he is the chair.’

    On the proposal of Hume, which was seconded by SubramaniaAiyar and supported by Talang and unanimously, carried, W. C. Bonnerjee was elected President of the first session of the Congress. Bonnerjee refuted the charge that congress was a nest of conspirators and disloyalists and affirmed that much had been done by Britain for the benefit of India and the whole country was truly grateful to her for it….. But a great deal still remain to be done.

    To Read Complete Book, please download E-Book - Indian Leaders : Contemporary Openions (1885-1922)

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  • जोधपुर जिला इतिहास एवं संस्कृति प्रश्नोत्तरी

     21.08.2017
    जोधपुर जिला इतिहास एवं संस्कृति प्रश्नोत्तरी

    जोधपुर प्रश्नोत्तरी



    1. जोधपुर दुर्ग की स्थापना किस वंश के राजा ने की?

    राठौड़/चौहान/प्रतिहार/सोलंकी

    (उत्तर- राठौड़)



    2. कौनसा राजा अपनी राजधानी मण्डोर से जोधपुर लेकर आया?

    राव रणमल/राव जोधा/सातल देव/राव चूण्डा

    (उत्तर- राव जोधा)



    3. उम्मेद पैलेस किस पत्थर से बना हुआ है-

    घाटू/छीतर/घीया/लाइम स्टोन

    (उत्तर- छीतर)



    4. जोधपुर के किस राजा के मरने पर औरंगजेब की बेगम ने कहा था कि आज मुगल सल्तनत का एक खंभा गिर गया?

    गजसिंह/जसवंतसिंह-प्रथम/जसवंतसिंह द्वितीय/अजीतसिंह/

    (उत्तर-जसवंतसिंह प्रथम )



    5. जोधपुर का कौनसा राजा प्रथम विश्व युद्ध में सर प्रताप के साथ फ्रांस के मोर्चे पर गया?

    सुमेरसिंह/सरदारसिंह/उम्मेदसिंह/गजसिंह

    (उत्तर- सुमेरसिंह)



    6. जोधपुर के किस राजकुमार ने बीकानेर शहर की स्थापना की?

    जोधा/बीका/सूजा/सातल

    (उत्तर- बीका )



    7. जोधपुर के किस राजा ने तुंगा की लड़ाई में माधोजी सिंधिया को हराया?

    जसवंतसिंह/विजयसिंह/मानसिंह/चूण्डा

    (उत्तर- विजयसिंह)



    8. जोधपुर शहर में स्थित गुलाब सागर किसने बनवाया?

    नैनी बाई/गुलाबराय/अनारा/जुबैदा

    (उत्तर- गुलाबराय)



    9. उम्मेद भवन का निर्माण क्यों किया गया था?

    जोधपुर का सौंदर्य बढ़ाने के लिये/अकाल राहत में लोगों को रोजगार देने के लिये/द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये चंदा इकट्ठा करने के लिये/जोधपुर में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये।

    (उत्तर- अकाल राहत में लोगों को रोजगार देने के लिये)



    10. जोधपुर में बनाये गये विण्डम हॉस्टीपल को अब किस नाम से जाना जाता है?

    उम्मेद हॉस्पीटल/गांधी हॉस्पीटल/पावटा हॉस्पीटल/मण्डोर सैटेलाइट हॉस्पीटल

    (उत्तर- गांधी हॉस्पीटल)



    11. मानसिंह पुस्तक प्रकाश कहां स्थित है?

    मण्डोर उद्यान में/उम्मेद उद्यान में/नेहरू पार्क में/मेहरानगढ़ किले में।

    (उत्तर- मेहरानगढ़ किले में।)



    12. जोधपुर के राजकुमार अमरसिंह राठौड़ को मुगल बादशाह ने कहां का राजा बनाया?

    आगरा/दिल्ली/ जाधपुर/ नागौर!

    (उत्तर- नागौर)



    13. 15 अगस्त 1947 को जोधपुर का राजा कौन था?

    उम्मेदसिंह/गजसिंह/हनवंतसिंह/सरदारसिंह

    (उत्तर- हनवंतसिंह)



    14. हैफा हीरो किसे कहा जाता है?

    मेजर दलपतसिंह/मेजर शैतानसिंह/कर्नल मोहनसिंह/सर प्रतापसिंह।

    (उत्तर- मेजर दलपतसिंह)



    15. किस औरत पर यह आरोप है कि उसने दयानंद सरस्वती को जोधपुर में जहर दिया जिससे स्वामीजी की कुछ दिन बाद मृत्यु हो गई?

    नन्हीं बाई/गुलाबराय/अनारा/जुबैदा!

    (उत्तर- नन्हीं बाई)



    16. जोधपुर का कौनसा राजा था जिसने स्वयं को काश्तकार घोषित किया?

    हनवंतसिंह/उम्मेदसिंह/जसवंतसिंह/गजसिंह

    (उत्तर- उम्मेदसिंह)



    17. आउवा का कौनसा जागीरदार था जिसने 1857 के क्रांतिकारियों को अपने महल में शरण दी?

    किशोरसिंह/कुशलासिंह चाम्पावत/जैतसिंह/गोरधन खींची

    (उत्तर- कुशालसिंह चाम्पावत)



    18. जुबली कोर्ट में वर्तमान में कौनसा कार्यालय चलता है? जिला कलक्टर कार्यालय/संभागीय आयुक्त कार्यालय/अतिरिक्त जिला कलक्टर कार्यालय/उपरोक्त तीनों।

    (उत्तर- उपरोक्त तीनों)



    19 जसवंतथड़ा क्या है?

    मंदिर/टीला/कॉलेज/स्मारक।

    (उत्तर- स्मारक)



    20 राजनीति में आने से पहले बरकतुल्लाह खां क्या करते थे?

    खिलाड़ी थे/सैनिक थे/जागीरदार थे/सरकारी सेवा में थे।

    (उत्तर- जागीरदार थे)



    21. बालसमंद झील किस स्थान पर है?

    जोधपुर-मण्डोर मार्ग पर/जोधपुर ओसियां मार्ग पर/जोधपुर पिचियाक मार्ग पर/जोधपुर-जवाई मार्ग पर।

    (उत्तर- जोधपुर मण्डोर मार्ग पर)



    22. तापी बावड़ी कहां स्थित है? मेहरानगढ़ किले में/चाचा की गली में/हटडि़यों के चौक के पास/अरणा-झरणा के पास।

    (उत्तर- जोधपुर शहर में स्थित भीमजी के मौहल्ले में हटड़यों के चौक के पास।)



    23. फतह सागर कहां स्थित है?

    नागौरी गेट के पास, मेड़ती दरवाजे के पास, सोजती दरवाजे के पास/सिवांची दरवाजे के पास।

    (उत्तर- मेड़ती दरवाजे के पास)



    24. राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर में किन वस्तुओं का संग्रहालय है?

    लोकवाद्यों का/ऐतिहासिक सिक्कों का/शिलालेखों का/प्राचीन पोथियों का?

    (उत्तर- लोकवाद्यों का) 



    25. ओरियेण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना किसने की?

    जोधपुर सरकार ने/राजस्थान सरकार ने/भारत सरकार ने/राजपूताने के एजीजी ने।

    (उत्तर- राजस्थान सरकार ने 1954 ईस्वी में।)



    26. मण्डलनाथ मंदिर का मुख्य देवता कौन है?

    शिव/विष्णु/दुर्गा/ब्रह्मा

    (उत्तर- शिव)



    27. बड़ी गांव लोकपाल के मंदिर के लिये प्रसिद्ध है?

    भैंरूजी/भोमियाजी/मामाजी/वीरजी?

    (उत्तर - भैंरूजी)



    28. खींचन में कौनसे प्रवासी पक्षी हर वर्ष बड़ी संख्या में आते हैं?

    कुरजां/कोयल/गोडावण/तिलोर

    (उत्तर - कुरजां) 



    29. सचियाय माता के मंदिर में किस देवी की प्रतिमा मुख्य रूप से स्थापित है?

    महिषासुर मर्दिनी/सांगिया देवी/आई माता/संतोषी माता!

    (उत्तर- महिषासुर मर्दिनी) 



    30. सीरवियों की किस देवी का मंदिर बिलाड़ा में है?

    आई माता/सांगिया माता/क्षेमकरी/आशापुरी

    (उत्तर- आई माता)



    31. जोधपुर में पहले जस्ते के पानी रखने के बर्तन/सुराहियों/बोतलें बनती थीं, उन्हें क्या कहते थे?

    केतली/बादला/डीवड़ी/ईडाणी।

    (उत्तर- बादला) 



    32 जोधपुर का घण्टाघर कहां स्थित है?

    मालकोट/भीमकोट/उमरकोट/गिरदीकोट

    (उत्तर- गिरदीकोट)



    33. अंग्रेजों द्वारा नाथों को देश निकाल दिये जाने पर कौनसा राजा जोधपुर का किला छोड़कर मण्डोर उद्यान में चला गया और वहीं पर अपने प्राण त्याग दिये?

    अजीतसिंह/मानसिंह/विजयसिंह/भीमसिंह

    (उत्तर- मानसिंह)



    34. महामंदिर तथा उदयमंदिर किस सम्प्रदाय के साधुओं के लिये बनवाये गये-

    लकुलीश सम्प्रदाय/नाथ सम्प्रदाय/गोरख सम्प्रदाय/दादूपंथी सम्प्रदाय?

    (उत्तर- नाथ सम्प्रदाय)



    35. वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को गंगश्यामजी के मंदिर में मूलका मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला विष्णु के किस अवतार से सम्बन्धित है?

    वराह/नृसिंह/वामन/कूर्म

    (उत्तर- नृसिंह)



    36. पश्चिमी राजस्थान में निवास करने वाली ढाढी, दमामी, मिरासी आदि जातियां किस परम्परागत पेशे से सम्बन्धित है?

    पत्थरों की पट्टियां (छीणें) निकालना/कठपुतली का खेल दिखाना/गायन, वादन एवं नृत्य करना/जंगलों से शहद निकालना?

    (उत्तर- गायन, वादन एवं नृत्य करना)



    37. जोधपुर राज्य का राजस्थान में विलय किस वर्ष में हुआ?

    1947/1948/1949/1956

    (उत्तर- 1949)



    38. जोधपुर का कौनसा राजा लॉर्ड मेयो द्वारा आयोजित अजमेर दरबार को छोड़कर चला आया?

    बख्तसिंह/तख्तसिंह/जसवंतसिंह/अभयसिंह?

    (उत्तर- तख्तसिंह)



    39. आजादी के बाद जोधपुर के किस राजा ने लोकसभा और विधानसभा दोनों का चुनाव एक साथ लड़ा और दोनों ही सीटों पर जीत हासिल की?

    उम्मेदसिंह/हनवंतसिंह/गजसिंह/सरदारसिंह?

    (उत्तर- हनवंतसिंह)



    40. जोधपुर के किस इतिहासकार ने महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) के समय नैणसी की ख्यात लिखी? दयालदास/बांकीदास/मूथा नैणसी/मुरारी दान?

    (उत्तर- मूथा नैणसी)



    41. जोधपुर के कितने व्यक्ति अब तक राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर रह चुके हैं-

    दो/तीन/चार/पांच

    (उत्तर- तीन, जयनारायण व्यास, बरकतउल्लाखां, अशोक गहलोत)।



    42. कौनसा इतिहासकार जोधपुर से सम्बन्धित नहीं है?

    पं. विश्वेश्वर नाथ रेउ/मूथा नैणसी/टैस्सीटोरी/जगदीशसिंह गहलोत?

    (उत्तर- टैस्सीटोरी)



    43. राजरणछोड़जी का मंदिर किसने बनवाया?

    राव जोधा की पुत्री शृंगारदेवी ने/राव गांगा की रानी पद्मावती ने/जसवंतसिंह द्वितीय की रानी जाड़ेची राजकंवर ने/विजयसिंह की रानी शेखावतजी ने ?

    (उत्तर- जसवंतसिंह द्वितीय की रानी जाड़ेची राजकंवर ने।)



    44. वीर दुर्गादास की छतरी कहां है?

    हरिद्वार/जोधपुर/उज्जैन/मथुरा?

    (उत्तर- उज्जैन)



    45. चिडि़या नाथ की टूंक पर जोधपुर का कौनसा प्रसिद्ध भवन बना हुआ है?

    शिप हाउस/बीजोलाई के महल/तलहटी के महल/जसवंतथड़ा/मेहरानगढ़?

    (उत्तर- मेहरानगढ़)



    46. कुंज बिहारी मंदिर कहां स्थित है?

    कटला बाजार/सरदारपुरा/जालप मौहल्ला/पुंगलपाड़ा?

    (उत्तर-कटला बाजार)



    47. जोधपुर में खरानना देवी का मंदिर है। यह देवी किस जाति या समुदाय से सम्बन्धित है?

    श्रीमाली ब्राह्मण/पुष्करणा ब्राह्मण/गौड़ ब्राह्मण/तैलंग ब्राह्मण?

    (उत्तर- दवे गोधा गोत्र के श्रीमाली ब्राह्मण )



    48. महाराजा अभयसिंह ने अपने किस भाई को नागौर का राज्य दिया जो बाद में अभयसिंह के पुत्र को हटाकर जोधपुर का राजा बन गया?

    बख्तसिंह/तख्तसिंह/अमरसिंह/इन्द्रसिंह?

    (उत्तर- बख्तसिंह)



    49. किस देवी के बारे में यह मान्यता है कि उसकी कृपा से 1965 के भारत-पाक युद्ध में जोधपुर शहर, पाकिस्तान द्वारा की गई बमबारी में भी पूरी तरह सुरक्षित बच गया?

    चामुण्डा देवी/संतोषी माता/लक्ष्मीमाता/आईमाता?

    (उत्तर- मेहरानगढ़ दुर्ग की चामुण्डा माता)



    50. जोधपुर के किस राजकुमार ने किशनगढ़ नामक अलग राज्य की स्थापना की?

    रूपसिंह/सांवलदास/किशनसिंह/सूरसिंह?

    (उत्तर - किशनसिंह)


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