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  • चित्रकूट का चातक - 53

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 53

    ऊदाराम ब्राह्मण

    दक्षिण में इस तरह की शांति देखकर खानेजहाँ लोदी की छाती पर साँप लोट गया। वह कतई नहीं चाहता था कि बादशाह इस बात को देखे कि जिस मोर्चे पर खानेजहाँ असफल हो गया, वहाँ किसी और ने सफलता के झण्डे गाढ़ दिये। वस्तुतः मुगलिया सल्तनत की स्थापना से लेकर उसके अंत तक मुगल सेनापतियों और अमीर-उमरावों में यह प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर बनी रही कि जीत का श्रेय मेरे ही नाम लिखा जावे।

    खानेजहाँ ने जहाँगीर को फिर से खानखाना के विरुद्ध भड़काया कि जब तक खानखाना दक्षिण में रहेगा, कभी भी पूरा दक्षिण मुगलों के अधीन नहीं होगा। खानखाना दक्षिण में अपनी आवश्यकता जतलाकर बादशाह की कृपा का पात्र बने रहना चाहता है तथा इस बहाने से बादशाह से दूर रह कर सत्ता का वास्तविक सुख भोग रहा है। वह दक्षिण में जो भी लूट करता है, अपने बेटों और सिपाहियों में बांट देता है। इसलिये उसके सिपाही मुगलिया सल्तनत के प्रति वफादार न होकर खानखाना के प्रति वफादार हैं। यदि मुझे वहाँ जाने दिया जाये तो दो साल में ही समूचा दक्षिण जहाँगीर के अधीन हो जायेगा।

    जहाँगीर फिर से खानेजहाँ की बातों में आ गया और उसने खानेजहाँ को बहुत सी सेना तथा रुपया देकर दक्षिण के लिये रवाना कर दिया। जोधपुर का राजा सूरसिंह भी राजपूतों की सेना सहित उसके साथ भेजा गया।

    खानेजहाँ को फिर से दक्षिण में आया देखकर दक्खिनियों में असंतोष तथा बेचैनी फूट पड़ी। उन्होंने मलिक अम्बर के नेतृत्व में खानखाना के बेटे शहनवाजखाँ के डेरे पर आक्रमण किया। शहनवाजखाँ और उसके भाई दाराबखाँ ने दो घड़ी तक ऐसी जर्बदस्त तलवार चलाई कि देखने वालों की आँखें पथरा गयीं। दक्खिनी मोर्चा छोड़कर कोसों दूर तक भागते चले गये।

    जब दक्षिण में पुनः शांति स्थापित हो गयी तो जहाँगीर ने परवेज के स्थान पर खुर्रम को दक्षिण में नियुक्त किया। खुर्रम ने खानखाना और उसके बेटों से प्रार्थना की कि अब चाहे जो भी हो सम्पूर्ण दक्षिण मुगलिया सल्तनत में शामिल किया जाये। खानखाना ने कहा कि यदि ऊदाराम ब्राह्मण को तीन हजारी मनसब दिला दिया जाये तो इस काम को किया जाना संभव है।

    ऊदाराम ब्राह्मण दक्खिनियों में उन दिनों बड़ी धाक रखता था। वह मलिक अम्बर की सेवा में नियुक्त था। मलिक अम्बर की वास्तविक ताकत ऊदाराम ही था। वह अत्यंत वीर, वचनों का धनी और व्यवहार कुशल सेनापति था। खानखाना ने अकबर के जमाने में ऊदाराम को वचन दिया था कि यदि ऊदाराम मलिक अम्बर को छोड़कर खानखाना की सेवा में आ जाये तो उसे तीन हजारी मनसब दिलवाया दिया जायेगा। ऊदाराम ने खानखाना की शर्त स्वीकार भी कर ली थी किंतु खानखाना अपना वचन पूरा कर सके इससे पहले ही अकबर की मृत्यु हो गयी और उसके बाद तो स्वयं खानखाना को ही दक्षिण से हटा लिया गया था। इस पर ऊदाराम खानखाना का शत्रु होकर घूमता था। अब अवसर आया तो खानखाना ने अपने पुराने वचन को पूरा करने की ठानी।

    खुर्रम ने जहाँगीर से कहकर ऊदाराम को तीन हजारी जात और पंद्रह हजारी सवार का मनसब दिलवा दिया। ऊदाराम को खानखाना की सेवा में गया जानकर मलिक अम्बर के हौंसले पस्त हो गये। उसने अपने समस्त किलों की चाबियाँ खुर्रम को भिजवा दीं। यह वही मलिक अम्बर था जिसके कारनामों के कारण चिंतित अकबर ने कई रातें जागते हुए बिताई थीं। मलिक अम्बर को मुगलों की शरण में गया हुआ देखकर दक्षिण के तमाम सरदार शहजादे खुर्रम की सेवा में हाजिर हो गये।

    यह सफलता पाकर खुर्रम खानखाना के दोनों बेटों शहनवाजखाँ तथा दाराबखाँ के साथ तमाम दक्षिणी सरदारों को लेकर जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने इस सफलता से प्रसन्न होकर खुर्रम पर मोती जवाहर निछावर किये। उसे तीस हजारी मनसब और दरबार में कुरसी पर बैठने का अधिकार दिया। खुर्रम ने भरे दरबार में बादशाह से अनुरोध किया कि दरबार में कुर्सी पर बैठने का यदि कोई वास्तविक हकदार है तो वह ऊदाराम ब्राह्मण है।

    कहर दर कहर

    खानखाना ने जहाँगीर को हीरे की एक खान समर्पित की जो खानखाना के बेटे अमरूल्लाह ने खानदेश के जमींदार पनजू से छीनी थी। जहाँगीर ने अत्यंत प्रसन्न होकर खानखाना का खिताब सात हजारी मनसब और सात हजारी सवार कर दिया। ये वे क्षण थे जब जहाँगीर अपने जीवन में खानखाना पर सर्वाधिक प्रसन्न हुआ। इसके बाद खानखाना के जीवन में फिर ऐसा अवसर न आया।

    जहाँगीर हर तरह से खानखाना को प्रसन्न किया चाहता था और उससे निकटता दर्शाना चाहता था। इसलिये उसने इस अवसर पर खानखाना के बेटे दाराबखाँ को नादरी का खिलअत दिया तथा खानखाना को सलाह देते हुए कहा- 'हमने सुना है कि इन दिनों शाहनवाजखाँ बहुत शराब पीता है। उसे कहो कि वह इस तरह अपने को नष्ट न करे।' (नादरी बिना बाहों की कमरी होती थी जो जामे के ऊपर पहनी जाती थी। इसे बिना बादशाह की अनुमति के कोई नहीं पहिन सकता था।)

    जब जहाँगीर खानखाना को यह सलाह दे रहा था तब अचानक ही उसका हाथ अपने गालों पर चला गया। यह वही गाल था जिस पर एक दिन अकबर ने सलीम को शराब न पीने की नसीहत के साथ जोरदार तमाचा मारा था।

    जब खानखाना बादशाह से विदा लेकर बुरहानपुर पहुँचा तो उसने पाया कि शाहनवाज अत्यधिक शराब पीने से मरणासन्न है। खानखाना ने बेटे का बहुत इलाज करवाया किंतु एक दिन मौत उसे खींचकर ले ही गयी। पत्नी माहबानो तथा दामाद दानियाल की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह तीसरा कहर था।

    जहाँगीर को जब यह समाचार मिला तो उसने खानखाना को सहानुभूति का संदेश भेजा। जहाँगीर और कुछ तो खानखाना का भला नहीं कर सकता था किंतु इतना प्रबंध उसने अवश्य किया कि खानखाना अपने बेटों और पोतों की तरक्की होते हुए देखकर प्रसन्न हो सके।

    जहाँगीर ने खानखाना के दूसरे बेटे दाराबखाँ का ओहदा बढ़ाकर पाँच हजारी मनसब कर दिया। शाहनवाजखाँ की सूबेदारी के सारे क्षेत्र दाराबखाँ को दे दिये। खानखाना के तीसरे पुत्र रहमानदाद को दो हजारी जात और सात सौ सवारों का मनसब दिया। शाहनवाज के पुत्र मनुचहर को दो हजारी जात तथा एक हजारी सवार का मनसब दिया और शाहनवाज के दूसरे पुत्र तुगरल को एक हजारी जात और पाँच सौ सवार का मनसब दिया। खानखाना अपने कुनबे को इस तरह आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न हुआ किंतु यह प्रसन्नता कुछ ही दिनों के लिये थी।

    मलिक अम्बर ने भले ही मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी किंतु ऊदाराम ब्राह्मण के हाथ से निकल जाने के कारण वह खानखाना से बहुत नाराज रहता था और उससे बदला लेने की योजनायें बनाता रहता था। एक दिन अवसर पाकर उसने खानखाना के तीसरे बेटे रहमानदाद को मार डाला। खानखाना पर फिर से विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। मुगलों की सेवा में वह अपने कुनबे की भेंट चढ़ाता जा रहा था। सियासत का यह घिनौना चेहरा देखकर खानखाना सकते में था। खानखाना की सेना में मलिक अम्बर का खौफ छा गया।

    जौहर

    पूरी मुगल सेना में हड़कम्प मचा हुआ था। जिसे देखो वही कुछ न कुछ नवीन सूचना बांटने में लगा हुआ था। जितने मुँह उतनी बातें। कोई कहता था कि खानखाना मलिक अम्बर के सामने समर्पण करने जा रहा है। कोई कहता था कि खानखाना ने जौहर करने का फैसला किया है। कोई कहता था कि बादशाह की कुमुक अहमदाबाद तक आ गयी है, इसलिये खानखाना उस कुमुक की प्रतीक्षा तक चुपचाप बैठा है। इतनी सारी बातों के बावजूद कोई भी सैनिक यह कहने की स्थिति में नहीं था कि इन सारी बातों में से कौन सी बात सही है।

    इन चर्चाओं को विराम तभी लगा जब शाम के समय खानखाना ने पूरी फौज को एकत्र कर आधिकारिक रूप से घोषणा की कि यदि एक माह के भीतर बादशाही कुमुक नहीं आती है तो खानखाना के सिपाहियों को जौहर करने के लिये तैयार रहना चाहिये। आगे का निर्णय सिपाहियों को करना था कि उनमें से कौन खानखाना का साथ निभाना चाहता है और कौन मोर्चा छोड़कर भागना चाहता है।

    हालांकि यह सभी जानते थे कि खानखाना की सेना अपने शत्रुओं और लुटेरों से इस कदर घिर गयी है कि मोर्चे पर से निकल भागना किसी के लिये संभव नहीं है। यहाँ तक कि स्वयं खानखाना के लिये भी नहीं। यदि ऐसा हो पाता तो खानखाना जौहर करने की घोषणा ही क्यों करता!

    जब मलिक अम्बर रहमानदाद को मारने में सफल हो गया और दाराबखाँ लाख चाहकर भी मलिक अम्बर को नहीं पकड़ सका तो मलिक अम्बर के हौंसले बुलंद हो गये। उधर उसे यह खबर भी मिली कि बादशाह स्वयं तो कश्मीर में जा बैठा है और उसके दूसरे अमीर-उमराव कोट कांगड़े की लड़ाई में बुरी तरह फंस गये हैं। यह सूचना पाकर मलिक अम्बर ने खुल्लमखुल्ला बगावत कर दी।

    मलिक अम्बर ने खुर्रम के साथ की हुई सारी संधियों को तोड़ डाला। उसे देखकर दूसरे दक्खिनियों ने भी मुगलों से विद्रोह कर दिया। खानखाना बहुत प्रयास करता था किंतु वह मलिक को दबा नहीं पाता था। शहनवाजखाँ और रहमानदाद के न रहने से खानखाना की ताकत बहुत घट गयी थी।

    खानखाना ने बादशाह को बहुत सी चिठ्ठियाँ भिजवाईं कि कुछ सेना भिजवाई जाये किंतु बादशाह की ओर से कोई जवाब नहीं आया। ऐसा नहीं था कि बादशाह तक चिठ्ठियाँ पहुँची नहीं, चिठ्ठियाँ पहुँची किंतु बादशाह उनका जवाब देने की स्थिति में नहीं रहा था। मेवाड़, कश्मीर और कोट कांगड़े में सेनाएं इस कदर उलझ गयीं थीं कि किसी भी तरह से खानखाना को कुमुक भिजवाया जाना संभव नहीं था। यही कारण था कि जहाँगीर खानखाना को जवाब भिजवाने की बजाय चुप लगा जाना ही अधिक उचित समझ रहा था।

    उधर दक्खिनियों ने खानखाना को खदेड़ना आरंभ किया और उसका पीछा करते हुए बुरहानपुर तक चले आये। बुरहानपुर में खानखाना बुरी तरह घिर गया। दक्खिनियों ने रसद की आपूर्ति काट दी। जिससे मुगल सेना के पशु घास और चारे के अभाव में मरने लगे। यहाँ तक कि आदमियों के भी भूखों मरने की नौबत आ गयी।

    एक-एक करके सारे प्रदेश हाथ से निकलते जा रहे थे और मुगल सिपाहियों की संख्या घटती जा रही थी। खाने-पीने का सुभीता न देखकर बहुत से सिपाही खानखाना को छोड़कर दक्खिनियों से जा मिले थे। मुगलों की घटती हुई ताकत को देखकर लुटेरों की फौज मुगल सेना के चारों ओर इकट्ठी हो गयी। ये लुटेरे मौका पाते ही मुगलों के डेरे में घुस जाते और उनका माल-असबाब लूट कर भाग खड़े होते।

    इस तरह सब काता-कूता कपास होते हुए देखकर खानखाना का मस्तिष्क सुन्न हो जाता था। वह एक ऊँची टेकरी पर घोड़ा खड़ा करके उस पर चढ़कर अपनी बूढ़ी आँखों से घण्टों तक उत्तर दिशा की ओर ताका करता था और किसी भी क्षण कुमुक आने की उम्मीद करता था किंतु वहाँ से कुमुक तो दूर किसी पत्र तक का जवाब नहीं आया।

    साठ हजार दक्खिनियों का मुकाबला मुगलों के छः-सात हजार सिपाही किसी भी तरह नहीं कर सकते थे। एक जमाना वह भी था जब खानखाना मुठ्ठी भर सिपाहियों को लेकर मुजफ्फरखाँ जैसे प्रबल शत्रु से जा भिड़ा था और उसके छक्के छुड़ा दिये थे किंतु वक्त के थपेड़ों ने खानखाना के शरीर और मन में इतना दम न छोड़ा था। यहाँ तक कि बराड़ और खानदेश भी उसके हाथ से निकल गये। ये वे क्षेत्र थे जिन्हें खानखाना ने सत्रह साल पहले अपने अधीन किया था।

    स्थितियाँ जब एक-दम असह्य हो गयीं तो खानखाना ने जहाँगीर को अंतिम पत्र लिखा कि यदि एक माह में आगरा से कुमुक नहीं भेजी गयी तो मेरे पास हिन्दू वीरों की तरह जौहर करने के अतिरिक्त और कोई उपाय न बचेगा। मैं अपने हरम की औरतों को आग में जला कर स्वयं अपने बेटों-पातों और सिपाहियों सहित शत्रु से जूझता हुआ मृत्यु को प्राप्त होऊंगा। मुगलिया सल्तनत को यही मेरी अंतिम सहायता होगी। शत्रुओं के हाथों अपमानित होने की अपेक्षा तो रण में जूझते हुए मर जाना अधिक श्रेयस्कर है।

    खानखाना का पत्र पाकर जहाँगीर के हाथों से तोते उड़ गये। वह एकदम से बेचैन हो उठा। उसने तुरंत ही अपना संदेशवाहक खानखाना को दौड़ाया कि खुर्रम के आने से पहले कोई कदम न उठाये। उसने कोट कांगड़ा के मोर्चे पर फतह हासिल होने का जश्न मना रहे खुर्रम को संदेश भिजवाया कि जिस तरह तुम्हारे दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने किसी जमाने में खानेआजम कोका को गुजरातियों के शिकंजे से छुड़ाया था, तुम भी उसी तरह तेज गति से बुरहानपुर पहुँच कर खानखाना को छुड़ाओ और यह शुभ समाचार मुझे तुरंत ही भिजवाओ। जहाँगीर ने अपनी स्वयं की भी लगभग सारी सेना कोकाखाँ के साथ दक्खिन के मोर्चे पर भिजवा दी।

    खुर्रम ताबड़तोड़ कूच करता हुआ बुरहानपुर पहुँचा। उसने दक्खिनियों में कसकर मार लगाई और खानखाना को उनके शिकंजे से बाहर निकाला। खुर्रम की प्रबलता देखकर मलिक अम्बर ने पुनः दीनता दिखाते हुए मुगलों के अधिकार वाले पुराने क्षेत्र खुर्रम को समर्पित कर दिये।


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  • चित्रकूट का चातक - 54

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 54

    आधा सेर कबाब

    किसी समय ईरान में मिर्जा गयास बेग नामक आदमी रहता था। वह था तो मिर्जाओं के वंश में से किंतु उसकी माली हालत बहुत खराब थी। एक दिन ऐसा भी आया कि घर में ठीक से खाने को न रहा। जब उसने सुना कि मलिक मसूद नामक व्यापारी अपने काफिले के साथ हिन्दुस्थान जा रहा है तो गयास बेग भी उसके साथ हो लिया।

    विकट रेगिस्तानी मार्ग में गयास बेग की औरत असमत बेगम ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम मेहरून्निसा रखा गया। ईरान से भारत तक के लम्बे सफर में अनेक बाधायें आयीं। कभी रेतीली आंधियों से मुकाबला हुआ तो कभी डाकुओं से। कभी पीने के पानी की कमी से जूझना पड़ा तो कभी पशुओं की महामारी से। फिर भी किसी तरह यह काफिला हिन्दुस्थान पहुँच गया। मलिक मसूद ने गयास बेग को अकबर के दरबार में नौकरी दिलवा दी।

    गयास बेग उद्यमी व्यक्ति था। उसने अपनी सेवा और स्वामिभक्ति से अकबर और उसके सेनापतियों को प्रसन्न कर लिया और उन्नति करता हुआ तीन सौ सवारों का मनसबदार बन गया।

    मेहरून्निसा का ईरानी खून हिन्दुस्तान की जलवायु में अच्छा रंग लाया और शीघ्र ही वह एक सुंदर युवती में परिवर्तित हो गयी। एक दिन जब शहजादे सलीम की दृष्टि मेहरून्निसा पर पड़ी तो वह उसे पाने के लिये आतुर हो गया। यह तब की बात है जब मेहरून्निसा ने यौवन की दहलीज पर पहला कदम ही रखा था और उधर सलीम के हरम में औरतों की संख्या आठ सौ से ऊपर जा पहुँची थी।

    गयास बेग तथा असमत बेगम की पहुँच सीधे अकबर तथा उसकी बेगमों तक थी इसलिये बिना विवाह किये मेहरून्निसा को पाना संभव नहीं था। सलीम ने अपनी माता तथा अन्य बेगमों से कहा कि मेहरून्निसा का विवाह मुझसे कर दिया जाये किंतु अकबर इस विवाह के लिये राजी नहीं हुआ। सलीम की इच्छा के विपरीत अकबर ने स्वयं रुचि लेकर मेहरून्निसा का विवाह अपने नौकर अलीकुली से कर दिया और सलीम हाथ मलता ही रह गया।

    जब सलीम जहाँगीर के नाम से तख्त पर बैठा तो उसके मन में मेहरून्निसा को पाने की ललक फिर से जागी। एक बार मेहरून्निसा के पति अलीकुली ने अकेले ही एक शेर को मारा। इस पर जहाँगीर ने उसे शेर अफगन की उपाधि दी और उसे बर्दवान का फौजदार नियुक्त कर दिया। जब शेर अफगन बर्दवान पहुँच गया तो जहाँगीर ने बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि शेर अफगन विद्रोह की तैयारियां कर रहा है, इसलिये उस पर निगाह रखी जाये। कुतुबुद्दीन ने शेरअफगन को गिरफ्तार करने का प्रयास किया किंतु इस संघर्ष में दोनों ही मारे गये। शेर अफगन के मारे जाने पर जहाँगीर ने मेहरून्निसा और उसकी बेटी को अपने पास बुलवा लिया। कुछ दिनों बाद जहाँगीर ने मेहरून्निसा से विवाह कर लिया और अपनी नयी बेगम का नाम रखा- नूरमहल।

    मेहरून्निसा भाग्य के इस तरह पलटा खाने से बहुत दुखी हुई किंतु शीघ्र ही उसे पता लग गया कि यह उसका अपकर्ष नहीं था अपितु भाग्योत्कर्ष के कारण ही ऐसा हुआ था। वह जितनी सुंदर थी, उससे कहीं अधिक बुद्धिमती थी। वह जितनी कोमलांगी थी, उससे कहीं अधिक कठोर हृदया थी। वह जितनी मधुर भाषिणी थी उससे कहीं अधिक चतुरा थी। धीरे-धीरे वह जहाँगीर की प्रीतपात्री बन गयी। जहाँगीर उसके सौंदर्य पाश में ऐसा बंधा कि सारे महत्वपूर्ण निर्णय उसी से पूछकर करने लगा। कुछ ही दिनों बाद जहाँगीर को लगने लगा कि उसने मेहरून्निसा को नूरमहल की उपाधि देकर उसके साथ न्याय नहीं किया है इसलिये जहाँगीर ने नूरमहल को नयी उपाधि दी- नूरजहाँ।

    कुछ ही दिानों में नूरजहाँ का नूर जहाँगीर के हरम से निकल कर उसके दरबार और पूरे देश में फैलने लगा। उसके पिता मिर्जा गयास बेग को एत्मादुद्दौला की तथा भाई को आसफखाँ की उपाधि मिली। अब वे दोनों बादशाह के दरबार में सर्वप्रमुख व्यक्ति हो गये। अब नूरजहाँ ही जागीरें, मनसब और उपाधियाँ बाँटने लगी। वह बादशाह का चिह्न धारण करके महल के झरोखे में बैठ जाती। उसने अपने नाम से सिक्के ढलवाये तथा वह विधवा औरत से साम्राज्ञी बन गयी। शाही फरमानों में जहाँगीर के साथ नूरजहाँ का भी नाम लिखा जाने लगा। जिस फरमान में नूरजहाँ का नाम नहीं होता था, उसे राजकीय कर्मचारी नहीं मानते थे।

    एक दिन ऐसा भी आया जब जहाँगीर ने अपने अमीरों से कहा कि मैंने अपना सारा राज्य नूरजहाँ को दे दिया है। अब मुझे क्या चाहिये? कुछ भी तो नहीं, सिवाय एक सेर शराब और आधा सेर कबाब के!

    भेड़िये का बच्चा

    जहाँगीर के पाँच बेटे थे- खुसरो, परवेज, खुर्रम, जहाँदार और शहरयार। खुसरो पहले ही बादशाह द्वारा आँखें फुड़वाकर मरवाया जा चुका था। अब परवेज ही सबसे बड़ा था और वही बादशाह को सबसे प्रिय था लेकिन नूरजहाँ के भाई आसफ अली की बेटी का विवाह खुर्रम के साथ हो जाने से नूरजहाँ परवेज के पक्ष में न थी जिससे परवेज का प्रभाव घट गया था।

    खुर्रम अत्यंत महत्वाकांक्षी, सत्ता लोलुप और दुराग्रही व्यक्ति था। नूरजहाँ का सहारा मिल जाने से अब तक उसी को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के सर्वाधिक अवसर मिले थे। यही कारण था कि अब तक सर्वाधिक लड़ाईयाँ खुर्रम ने ही लड़ी थीं और सर्वाधिक सफलतायें भी उसी ने अर्जित की थीं।

    जब नूरजहाँ ने अपने पेट से उत्पन्न अपने पूर्व पति शेरअफगन की बेटी का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे बेटे शहरयार से कर दिया तो नूरजहाँ की रुचि खुर्रम में न रही। वह चाहती थी कि खुर्रम के स्थान पर शहरयार को सफलतायें प्राप्त हों और वही बादशाह के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हो लेकिन शहरयार नितांत निकम्मा और अयोग्य आदमी था। जब वह उद्यम ही नहीं करता था तो सफलतायें कहाँ से मिलतीं!

    जब खुर्रम बादशाह से बहुत सा मान सम्मान और सेना पाकर दक्षिण को गया और खानखाना को दक्खिनियों के चंगुल से छुड़ाने के बाद एक के बाद एक करके सफलताओं के झण्डे गाढ़ने लगा तो नूरजहाँ को अच्छा नहीं लगा। उसने खुर्रम का प्रभाव घटाने के लिये दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को प्रदान कर दीं। खुर्रम को बहुत ही घटिया और अनुपजाऊ जागीरें दी गयीं किंतु दक्खिन में होने से उसे इस परिवर्तन का ज्ञान न हो सका।

    जब ईरान का शाह अब्बास सफवी कांधार पर चढ़कर आया तो जहाँगीर ने खुर्रम को आदेश भिजवाया कि वह खानखाना को लेकर शाह ईरान का रास्ता रोके तथा कांधार की रक्षा करे। जब खुर्रम खानखाना को साथ लेकर दक्षिण से पश्चिमी सूबों में आया तो उसे ज्ञात हुआ कि दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को दे दी गयी हैं तो खुर्रम मांडी में ही ठहर गया और बादशाह को संदेश भिजवाया कि वह वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद कांधार जायेगा।

    नूरजहाँ यही चाहती थी कि खुर्रम कोई गलती करे। उसने तत्काल मुगल सेनापतियों को संदेश भिजवाया कि वे खुर्रम को वहीं छोड़कर बादशाह की सेवा में कश्मीर चले आयें तथा बादशाह की ओर से खुर्रम को लिखवाया कि अब खुर्रम यहाँ न आये। मालवे, दक्खन और खानदेश के सूबे उसे इनायत किये जाते हैं, वहीं कहीं जाकर रहे।

    खुर्रम बादशाह के पत्र पाकर और भी भड़क गया। उसने अपने सेनापति सुंदर ब्राह्मण को आदेश दिया कि आगरा पर धावा करे। खानखाना को खुर्रम के साथ देखकर विक्रमाजीत सुंदर ब्राह्मण अपनी सेना लेकर आगरा पर चढ़ दौड़ा। उसने आगरे के कई नामी अमीरों के घर लूट लिये और बहुत सा धन लाकर खुर्रम को अर्पित किया। बादशाह यह समाचार पाते ही आगरा की ओर रवाना हुआ।

    खानखाना और उसका पुत्र दाराबखाँ भी खुर्रम के साथ थे। उन्हें भी बादशाह की सेवा में हाजिर होने के आदेश दिये गये किंतु नियति खानखाना के सामने आकर खड़ी हो गयी। एक ओर बादशाह जहाँगीर था जिसके हजार अहसान खानखाना पर थे तो दूसरी ओर शहजादा खुर्रम जो खानखाना के मरहूम बेटे शाहनवाजखाँ की बेटी का पति था। खानखाना दुविधा में फंस गया। वह कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में न रहा।

    बेटी जाना के विधवा हो जाने के बाद पौत्री ही अब उसके स्नेह का केंद्र थी किंतु जहाँगीर उस यतीम पौत्री के सुख को भी छीन लेना चाहता था। सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़कर खानखाना ने खुर्रम के साथ ही रहना ठीक समझा।

    इसी बीच नूरजहाँ के इशारे पर शहरयार ने जहाँगीर से निवेदन किया कि जब खुर्रम कांधार के मोर्चे पर जाने को तैयार नहीं है तो मुझे भेजा जाये। जहाँगीर ने शहरयार को कांधार जाने की अनुमति दे दी। जब कुछ दिनों बाद जहाँगीर को सूचना मिली कि शहरयार हार गया और शाह ईरान ने कांधार पर अधिकार कर लिया तो बादशाह बुरी तरह तिलमिला गया। वह किसी न किसी पर अपना क्रोध उतारने का अवसर ढूंढने लगा। शीघ्र ही उसे यह अवसर प्राप्त हो गया।

    जब जहाँगीर ने देखा कि अन्य सेनापति तो खुर्रम को छोड़कर जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हो गये हैं किंतु खानखाना तथा उसके बेटे-पोते खुर्रम के ही साथ हैं तो वह खानखाना पर बड़ा कुपित हुआ। उसने खानखाना को लिखा कि तेरा तो पूरा शरीर ही नमक हरामी से बना हुआ है। सत्तर वर्ष की उम्र में तूने बादशाह से विद्रोह करके अपना मुँह काला किया तो दूसरों को क्या दोष दूँ? तेरे बाप ने भी अपनी अंतिम अवस्था में मेरे बाप से विद्रोह किया था। तू भी अपने बाप का अनुगामी होकर हमेशा के लिये कलंकित हुआ। भेड़िये का बच्चा आदमियों में बड़ा होकर भी अंत में भेड़िया ही बनता है।'

    खानखाना समझ गया कि भाग्य रथ का पहिया उल्टा घूम चुका है। उस आयु में बादशाही कोप को झेल पाना खानखाना के बूते के बाहर की बात थी।

    दादा-पोते

    खानखाना के समझाने पर खुर्रम ने बादशाह के पास क्षमा याचना की कई अर्जियाँ भिजवाईं किंतु बादशाह ने उन पर कोई विचार नहीं किया। जो भी वकील अर्जी लेकर बादशाह के सामने हाजिर होता था, बादशाह उसी को कैद कर लेता था। नूरजहाँ की सलाह पर जहाँगीर ने बंगाल से परवेज को बुलाया और उसे खुर्रम पर आक्रमण करने के लिये भेजा। परवेज विशाल सेना लेकर खुर्रम तथा खानखाना के पीछे लग गया।

    इस समय खुर्रम के पास बीस हजार सिपाही थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सिपाही थे। फिर भी खानखाना का खुर्रम की ओर होना ही जीत की निशानी थी।

    जब परवेज चाँद के घाटे से उतर कर मालवे में आया तो खानखाना के मरहूम पुत्र शाहनवाजखाँ का बेटा मनूंचहर खुर्रम का साथ छोड़कर परवेज के पास चला गया। खानखाना के लिये यह बड़ा झटका था। खानखाना की समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन के रंगमच पर आखिर ईश्वर ने उसके लिये क्या भूमिका निश्चित की है। वह किसके लिये लड़े और किससे लड़े? यदि युद्ध के मैदान में उसका सामना मनूंचहर से हो गया तो खानखाना क्या करेगा? तलवार उठायेगा या गिरा देगा?

    इस नवीन परिस्थिति में खानखाना के लिये एक तरफ खुर्रम और एक तरफ परवेज न रह गये अपिुत उसके लिये तो यह ऐसी लड़ाई हो गयी थी जिसमें एक तरफ उसकी पौत्री थी तो दूसरी ओर पौत्र।

    खानखाना पशोपेश में पड़ गया लेकिन फिर भी उसने नियति के निर्णय को स्वीकार कर लिया कि वह जिस स्थान पर खड़ा था, उसी स्थान पर रहे अतः उसने खुर्रम का साथ नहीं छोड़ा। जब परवेज और खुर्रम की सेनाएं आमने-सामने हुई तो खुर्रम की सेना खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली। इससे खुर्रम खानखाना तथा दाराबखाँ को अपने साथ लेकर किसी तरह नर्मदा पार करके दक्खिन को भाग गया।

    षड़यंत्र

    - 'क्या बात है लाल मुहम्मद?'

    - 'हुजूर कहते हुए जुबान कटती है। जान बख्शी जाये तो कुछ हिम्मत करूं।'

    - 'बिना किसी डर के अपनी बात कहो, लाल मुहम्मद। तुम हमारे भरोसेमंद हो।'

    शहजादे खुर्रम से आश्वासन पाकर लाल मुहम्मद ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली और खुर्रम की ओर बढ़ा दी।

    - 'यह क्या है?' खुर्रम ने चिट्ठी एक साँस में पढ़ डाली।

    - 'हुजूर! खानखाना का मुखबिर यह चिट्ठी लेकर शहजादे परवेज के पास जाता था। किसी तरह मेरे हाथ पड़ गया।'

    - 'वह मुखबिर कहाँ है?'

    - 'वह मेरे डेरे में कैद है।'

    - 'उसे मेरे सामने हाजिर किया जाये।'

    थोड़ी ही देर बाद लाल मुहम्मद, खानखाना के मुखबिर को लेकर खुर्रम के डेरे में हाजिर हुआ।

    - 'क्या तुझे इस चिट्ठी के साथ पकड़ा गया है?' मुखबिर ने कोई जवाब नहीं दिया।

    - 'सच कह नहीं तो जीभ खींच लूंगा।' मुखबिर ने इस पर भी जुबान नहीं खोली तो खुर्रम ने तलवार उठाई। यह देखकर मुखबिर खुर्रम के पैरों में गिर पड़ा- 'मेरी जान बख्शी जाये हुजूर।'

    - 'क्यों बख्शी जाये तेरी जान?'

    - 'मैं तो गुलाम हूँ। कुसूरवार तो कोई और है।'

    - 'तो कुसूरवार का नाम बता।'

    - 'चिट्ठी लिखने वाले का नाम चिट्ठी के नीचे दर्ज है।'

    - 'मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ।'

    - 'जिसका नाम चिट्ठीके नीचे लिखा है, उसी ने मुझे यह चिट्ठी दी थी।'

    - 'खानखाना ने?'

    - 'हाँ हुजूर।'

    - 'सच कहता है?'

    - 'हाँ हुजूर।'

    - 'किसके पास ले जा रहा था?'

    - 'महावतखाँ के पास।'

    - 'लाल मुहम्मद! इस नामुराद को कैद में रख और खानखाना को मेरे सामने हाजिर कर।' थोड़ी ही देर में खानखाना शहजादे के डेरे में था।

    - 'यह क्या है?' खुर्रम ने खानखाना की ओर चिट्ठी बढ़ाई। खानखाना खुर्रम के हाथ से खत लेकर उत्सुकता से पढ़ने लगा।

    - 'हुजूर जरा जोर से पढ़िये ताकि मैं भी सुन सकूं।' खुर्रम ने व्यंग्य से कहा।

    - 'जो सौ आदमी नजरों में मेरी देखभाल नहीं रखते होते तो बेचैनी से कभी का उड़कर वहाँ पहुँच जाता।' खानखाना ने पढ़ा।

    - 'यह क्या है शहजादे?' खानखाना ने खुर्रम से पूछा।

    - 'यही तो हम जानना चाहते हैं हुजूर कि यह क्या है?' शहजादे के शब्द तल्खी और व्यंग्य से पूरी तरह लबरेज थे।

    - 'जब तक यह पता न लगे कि यह चिट्ठी किसने और किसे लिखी है, तब तक इसके बारे में कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता।'

    - 'अब ज्यादा होशियारी मत दिखाइये खानखाना। यह चिट्ठी आपने लिखी है और दुष्ट महावतखाँ को लिखी है। यह भी जान लीजिये कि आपका जो मुखबिर यह चिट्ठी लेकर महावतखाँ को देने जा रहा था, उसी ने हमें यह सब बताया है।' अपनी बात पूरी करते-करते खुर्रम की आँखों में खून उतर आया।

    - 'यह सरासर गलत है। मेरे विरुद्ध कोई साजिश हुई है।'

    - 'लाल मुहम्मद! इस बूढ़े शैतान को हथकड़ी-बेड़ी लगा दे और तब तक मत छोड़ जब तक मैं खुद तुझे ऐसा करने का हुक्म न दूँ।'

    खुर्रम का ऐसा आदेश सुनकर खानखाना ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा-

    'रहिमन सीधी चाल सों, प्यादा होत वजीर।

    फरजी साह न हुइ सकै, गति टेढ़ी तासीर।'


    (सीधे-सीधे चलने वाला प्यादा भी वजीर बन जाता है किंतु टेढ़ी चाल चलने वाला वजीर कभी भी बादशाह नहीं बन सकता। क्योंकि टेढ़ी चाल की तासीर ही ऐसी है)

    खर्रुम ने एक न सुनी। उसके आदेश से खानखाना के हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल दी गयीं तथा उसे उसी के डेरे में कैद कर दिया गया। थोड़ी ही देर बाद दाराबखाँ को भी हथकड़ियों बेड़ियों सहित खानखाना के डेरे में लाकर बंद किया गया। अपने बूढ़े बाप को इस हालत में देखकर दाराबखाँ फूट-फूट कर रोने लगा। दाराबखाँ ही एकमात्र बेटा था जो अब तक खानखाना का साथ निभा रहा था। खानखाना ने उसे दिलासा देते हुए कहा-

    'रहिमन चुप ह्नै बैठिये देखि दिनन को फेर।

    जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर।'


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  • चित्रकूट का चातक - 55

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 55

    वक्त की दगा

    जब महावतखाँ को खानखाना की कैद के समाचार मिले तो वह दूने उत्साह से भरकर खुर्रम की ओर दौड़ा। महावतखाँ को लगा कि भाग्य ने उसके लिये एक साथ दो-दो सफलतायें पाने का अवसर उपस्थित कर दिया है।

    खुर्रम की हालत तो उसी समय पतली हो गयी थी जब उसकी सेनाएं खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली थीं किंतु जब खानखाना को कैद कर लिया गया तो खुर्रम की रही सही ताकत भी जाती रही।

    महावतखाँ ने चारों ओर से खुर्रम को घेर लिया। उसके हाथी-घोड़े छीन लिये। धीरे-धीरे घेरा उस मुकाम पर पहुँच गया, जहाँ से महावतखाँ किसी भी दिन खुर्रम के डेरे पर आ धमक सकता था।

    इस पर खुर्रम ने लानतुल्ला को महावतखाँ से संधि की बात चलाने के लिये भेजा। लानतुल्ला का वास्तविक नाम तो अब्दुल्लाखाँ फिरोज जंग था, उसे जहाँगीर ने लानतुल्ला की उपाधि दी थी। तब से वह लानतुल्ला ही कहलाता था।

    लानतुल्ला का मित्र राव रतन हाड़ा इस समय महावतखाँ के लश्कर में था। लानतुल्ला ने उसी के माध्यम से संधि की बात चलाई। महावतखाँ ने लानतुल्ला से कहा- 'यदि तेरी जगह खानखाना आकर संधि की बात करे और सब कौल करार करे तो मैं संधि करूं।'

    लानतुल्ला ने यह बात जाकर खुर्रम को कह सुनाई। खुर्रम को पक्का विश्वास हो गया कि महावतखाँ और खानखाना में कोई न कोई सटपट अवश्य है। (सटपट- सांठगाँठ, जहाँगीर नामे में स्वयं बादशाह जहाँगीर ने इसी शब्द का प्रयोग किया है) फिर भी अपना बुरा वक्त जानकर खुर्रम ने नीचे दबना ही मुनासिब समझा और खानखाना तथा दाराबखाँ को बाइज्जत अपने सामने पेश करने के आदेश दिये।

    लानतुल्ला ने खानखाना और दाराबखाँ की हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ कटवाईं तथा उन्हें नहला धुलाकर भर पेट भोजन करवाया। जब बाप बेटों को खुर्रम के सामने पेश किया गया तो खुर्रम ने अपने स्थान से खड़े होकर उनका स्वागत किया और उन्हें अपने आसन पर बैठाते हुए कहा- 'मेरे लिये तो आज ईद हुई।'

    खानखाना समझ गया कि खुर्रम का कोई न कोई स्वार्थ खानखाना से अटक गया है तभी इतनी लल्लो-चप्पो कर रहा है। उसने खुर्रम को सम्बोधित करके कहा-

    'बिगरी बात बने नहीं, लाख करौ किन कोय।

    रहिमन फाटे दूध को मथे न माखन होय।'


    खानखाना का यह भाव देखकर खुर्रम उसके पैरों में गिर गया- 'आप बड़े हैं, हर तरह से इज्जत पाने के योग्य हैं, मेरे गुनाह मुआफ करें। मुसीबत में अपने ही काम आते हैं।'

    खानखाना ने खुर्रम की बजाय अपने पुत्र दाराबखाँ की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

    'रहिमन प्रीति न कीजिये, जस खीरा ने कीन।

    ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फाँकें तीन।'


    खानखाना की हँसी खुर्रम के कलेजे को चीर गयी फिर भी वह अपनी ही तरह का अकेला मक्कार था। वह जानता था कि खानखाना आसानी से चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आयेगा। उसने कुरान पर हाथ रखकर कसम खाई- 'मुझे अपने किये पर बेहद अफसोस है। आगे से हमेशा खानखाना की मर्यादा का ख्याल रखा जायेगा। मैं अपने आप को आपके हवाले करता हूँ। मेरी इज्जत आबरू आपके हाथ में है।'

    खानखाना ने कुरान को चूमते हुए कहा-

    'रहिमन खोजे ऊख में, जहाँ रसन की खानि।

    जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं यही प्रीति में हानि।'


    (जो गन्ना रस की खान है, उसमें भी जहाँ-जहाँ गाँठ होती है, रस नहीं होता। प्रेम में भी जहाँ गाँठ पड़ जाती है, वहाँ रस नहीं रहता।)

    जब खानखाना किसी भी तरह सीधे मुँह बात करने को तैयार नहीं हुआ तो खुर्रम ने अपने हरम की सारी औरतों को अपने डेरे में बुलवा कर खानखाना के पैरों में डाल दिया- 'ये सब आपकी बेटियाँ हैं। यदि आप चाहते हैं कि हरामी महावतखाँ इन्हें बेइज्जत करके लूटकर ले जाये तो बेशक आप मेरी मदद न करें।'

    खुर्रम का यह बाण सही निशाने पर लगा। पौत्री का शोक विह्वल मुँह देखकर खानखाना पसीज गया। उसके नेत्रों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कहा- 'बोल शहजादे, इस बूढ़े रहीम से तू क्या चाहता है। रहीम जान देकर भी तेरी इच्छा पूरी करेगा।'

    - 'ऐसा कुछ करो खानखाना कि मेरे और बादशाह के बीच बात अधिक न बिगड़े और मुझे अधिक न भटकना पड़े।'

    खानखाना के आदेश पर लानतुल्ला को महावतखाँ के पास भेजा गया और कहा गया कि वह इधर से खानखाना नदी के कराड़ पर आता है। वहाँ से महावतखाँ नदी के कराड़ पर पहुँचे। दोनों जने बीच नदी में नाव पर बैठ कर सुलह सफाई की बात करेंगे।

    अभी लानतुल्ला डेरे से बाहर निकला ही था कि लाल मुहम्मद ने आकर सूचना दी- 'बादशाही कुमुक नदी पार करके शहजादे के डेरों की ओर बढ़ रही है।

    लाल मुहम्मद का संदेश सुनते ही खानखाना डेरे से बाहर निकला। नदी के तट पर महावतखाँ की नावों की हलचल थी और खुर्रम की सेना में चारों ओर भगदड़ मची हुई थी। जिस खानखाना के मैदान में मौजूद रहते हुए कोई सिपाही कभी मोर्चा छोड़कर नहीं भागा था, आज वही सिपाही बिना लड़े ही भाग रहे थे। सिपाही तो उस वक्त तक खानखाना की रिहाई के बारे में जानते तक न थे। वे तो यही समझ रहे थे कि खानखाना हथकड़ी-बेड़ियों में जकड़ा हुआ अपने डेरे में पड़ा है।

    एकाएक ही विचित्र स्थिति उत्पन्न होने से खुर्रम की दशा खराब हो गयी। उसके सामने खुसरो का चेहरा घूमने लगा। खुर्रम ने सोचा कि यदि मैं बादशाही सेना के हाथ लग गया तो मेरी भी वही दशा होगी जो एक जमाने में खुसरो की हुई थी। उस समय खुसरो की दुर्दशा करवाने में मैं शामिल था और इस बार मेरी दुर्दशा करने में परवेज और शहरयार पीछे न रहेंगे। यदि जहाँगीर ने किसी तरह रहम करके छोड़ भी दिया तो मलिका नूरजहाँ उसे किसी भी तरह जीवित नहीं छोड़ेंगी।

    इन सब बातों पर विचार करते-करते खुर्रम इतना अधीर हुआ कि किसी तरह का मुकाबला न करके चुपचाप भाग खड़ा हुआ। किसी तरह उसने दाराबखाँ को हरम की औरतें लेकर आने के लिये कहा। घबराहट और जल्दबाजी में अपने पलायन की सूचना उसने खानखाना को भी नहीं दी। ऐसी भगदड़ मची कि दाराबखाँ भी बिना यह जाने कि खानखाना कहाँ है, हरम की औरतों को लेकर खुर्रम के पीछे भाग खड़ा हुआ।

    महावतखाँ को चढ़कर आया देखकर खानखाना ने उससे मुकाबला करने की तैयारी की किंतु समय इतना कम था कि तलवार हाथ में लेकर घोड़े पर सवार होने के अतिक्ति कुछ नहीं किया जा सकता था।

    खुर्रम और दाराबखाँ को अपने पास न पाकर खानखाना ने मुकाबले का इरादा त्याग दिया। मैदान की स्थिति यह थी कि गिनेचुने सिपाही ही उसके चारों ओर खड़े रह गये थे। खानखाना न तो मोर्चा छोड़कर भाग सकता था और न मुकाबला कर सकता था। आज से पहले खानखाना ने किसी के सामने समर्पण भी नहीं किया था किंतु वक्त ने आज वह समय भी ला दिया।

    इस तरह एकाकी छोड़ दिये जाने पर खानखाना घोड़े से नीचे उतर गया। उसने अपनी प्यारी तलवार निज सेवक फहीम के हाथ में दे दी। जूते उतार दिये और स्वयं नंगे पाँव महावतखाँ की ओर चल दिया। (फहीम एक राजपूत युवक था। वह खानखाना का निज सेवक तथा विश्वासपात्र था। वह खानखाना के गुणों पर रीझकर खानखाना की सेवा में रहता था।) फहीम ने कहा- 'मालिक! महावतखाँ विश्वास के योग्य नहीं है। दगा अवश्यंभावी है।'

    खानखाना ने पलट कर कहा- 'किसी महावतखाँ की औकात नहीं जो खानखाना से दगा करे। दगा तो वक्त ने की है और आगे भी जो करेगा, वक्त ही करेगा।'

    - 'इससे तो बेहतर है कि हथियार पकड़कर बादशाह के हुजूर में चलें।'

    - 'जब बादशाह के नाम पर नूरजहाँ के सामने घुटने टिकाने हैं तो तू यह मान ले कि महावतखाँ ही बादशाह है। तू यह मान ले कि शहजादा परवेज ही बादशाह है। तू यह क्यों नहीं समझता कि बादशाह जहाँगीर नहीं, बादशाह तो वक्त है, जो सबसे ज्यादा क्रूर और दगाबाज है।'

    खानखाना का जवाब सुनकर फहीम आँखों में आँसू भर कर खानखाना के पीछे-पीछे चला।

    उड़ावे फहीम!

    खानखाना अब पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया। उसका बेटा दाराबखाँ, बेटे शाहनवाजखाँ की पुत्री और दाराबखाँ के बेटे खुर्रम के पास थे और पोता मनूंचहर तथा स्वयं खानखाना परवेज के पास थे।

    ऐसी स्थिति में खानखाना के लिये कहीं ठौर न बची थी। जाये तो जाये कहाँ? उसने खुर्रम के निज मंत्री भीम सिसोदिया को पत्र लिखा कि यदि खुर्रम मेरे बेटों-पोतों को छोड़ दे तो मैं बादशाही लश्कर को दक्खिन से हटाकर आगरा भेज दूँ। नहीं तो बहुत मुश्किल पड़ेगी।

    इस पर भीम सिसोदिया ने लिखा- 'अभी तो पाँच-छः हजार लोग खुर्रम के लिये अपनी जान झौंकने के लिये शेष हैं। जब तू हमारे पास आयेगा तब तेरे बेटे को मारकर तेरा हिसाब किया जायेगा।'

    खानखाना समझ गया कि मुगलिया सल्तनत की गंदी सियासत पूरी तरह से खानखाना के परिवार को खत्म करके ही दम लेगी। इधर परवेज खानखाना से पूरी सेवा लेगा और अंत में उसे नष्ट कर देगा। उधर खुर्रम दाराबखाँ से पूरी सेवा लेगा और जब दाराबखाँ उसके काम का न रहेगा तो खुर्रम उसे नष्ट कर देगा। खानखाना यह बात दाराब और मनूंचहर को समझाना चाहता था किंतु उन तक पहुँचने या उन तक अपना संदेश पहुँचाने का कोई उपाय न था।

    कुछ दिनों बाद खबर आयी कि खुर्रम ने गोलकुण्डा होते हुए उड़ीसा के रास्ते बंगाल पर अमल जमा लिया है और दाराबखाँ को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया है। यह सुनकर परवेज ने बुरहानपुर से बंगाल जाने की तैयारी की और मनचूहर को खानपुर थाने का हाकिम बना दिया। यह देखकर खानखाना ने अपना माथा पीट लिया।

    खुर्रम को उदयपुर के राणा अमरसिंह के पुत्र भीमसिंह की सेवाएं मिल जाने से खुर्रम के हौंसले बुलंद थे। वह बंगाल को जीतने के बाद बिहार की ओर बढ़ा और उसे दबाने के बाद निरंतर आगे बढ़ता हुआ इलाहाबाद तक चढ़ आया।

    परवेज ने खानखाना के आधे परिवार को अपनी तरफ और आधे परिवार को खुर्रम की तरफ देखकर खानखाना का विश्वास नहीं किया। उसने खानखाना को कैद करने का निर्णय लिया।

    जब परवेज के आदेश पर महावतखाँ के आदमी नंगी तलवारें लेकर खानखाना के डेरे की तरफ बढ़े तो फहीम ने तलवार खींच ली। फहीम को अकेले ही लड़ने के लिये आया देखकर महावतखाँ ने कहा- 'तू अपनी जान व्यर्थ ही गंवाता है। तुझे क्या भय है?'

    - 'आप किस इरादे से नंगी तलवारें लेकर मेरे स्वामी के डेरे पर आये हैं, यह जाने बिना मैं आपको डेरे में प्रवेश नहीं करने दूंगा।'

    - 'शहजादे का हुक्म है कि बदकार खानखाना को गिरफ्तार करके हथकड़ी बेड़ी लगायी जाये।'

    - 'लेकिन क्यों? क्या गुनाह है मेरे स्वामी का?'

    - 'फहीम! महावतखाँ को अपना काम करने दो।' खानखाना ने कहा। वह डेरे के बाहर शोर होता हुआ सुनकर निकल आया था।

    - 'मेरी देह में प्राणों के रहते यह बदजात मेरे स्वामी को छू भी नहीं सकता।' फहीम ने ताल ठोकी।

    - 'गुस्ताख सिपाही! शहजादे की मंशा पूरी होने में रोड़ा बनता है। तेरा सिर कलम किया जायेगा।' महावतखाँ ने चीख कर कहा।

    - 'तुम क्या मेरा सिर कलम करोगे, मैं स्वयं ही अपने स्वामी पर कुरबान हो जाऊंगा।' इतना कहकर फहीम शेर की तरह उछला और अपनी तलवार का भरपूर वार महावतखाँ पर किया। महावतखाँ अचानक ही उसके वार कर देने से घोड़े से गिर पड़ा। तलवार उसकी भुजा पर निशान बनाती हुई निकल गयी। यदि वह जरा सा भी चूक जाता तो उसकी भुजा उसके शरीर से अलग हो जाती।

    - 'मारो नमक हराम को।' महावतखाँ चिल्लाया। दसियों तलवारें फहीम पर छा गयीं। कुछ देर बाद फहीम का शव ही धरती पर पड़ा दिखायी दिया। फहीम ने अपने स्वामी पर न्यौछावर होकर उस कहावत को नया ही अर्थ दे दिया जो उन दिनों खानखाना के दूसरे चाकरों द्वारा फहीम से ईष्या रखे जाने के कारण कही जाती थी- 'कमावे खानखाना उड़ावे मियाँ फहीम।' सच ही तो था, खानखाना ने अब तक जो भी यश और पुण्य अर्जित किया था फहीम ने अपनी जान न्यौछावर करके खानखाना की कीर्ति को दूर-दूर तक फैला दिया।

    जागत व्हैगो गो भोर

    फहीम के गिरते ही खानखाना गिरफ्तार कर लिया गया। उसका डेरा परवेज के डेरे के पास लगाया गया। खानखाना के डेरे के बाहर सामान्य सिपाहियों और छोटे ओहदेदारों के स्थान पर महावतखाँ जैसे सेनापति पहरा देते थे ताकि खानखाना कैद से न भाग छूटे।

    खानखाना की ओर से निश्चिंत होकर परवेज ने बनारस के पास खुर्रम को जा घेरा। इस समय खुर्रम के पास सात हजार सैनिक थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सैनिक थे। खुर्रम ने मैदान छोड़कर भाग जाने की योजना बनायी किंतु भीम सिसोदिया ने उसे भागने के बजाय रण में जूझ मरने की सलाह दी।

    खुर्रम आधे मन से लड़ने के लिये तैयार हुआ। शीघ्र ही परवेज की सेना ने खुर्रम की सेना को मार भगाया। परवेज की ताकत देखकर खुर्रम मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ किंतु भीम सिसोदिया ने मैदान छोड़ने से मना कर दिया। उसने इस युद्ध में ऐसी तलवार चलाई कि देखने वालों ने दाँतों तले अंगुली दबा ली।

    जब ये समाचार जहाँगीर को प्राप्त हुए तो जहाँगीर ने महावतखाँ को सात हजारी जात और सात हजारी सवार का मनसबदार बनाया। खानखाना के तुमन तौग भी महावतखाँ को सौंप दिये गये और उसका दर्जा खानखाना के बराबर कर दिया गया।

    इतने वर्षों की निष्ठा का यही परिणाम अब्दुर्रहीम को प्राप्त हुआ कि वह तो खानखाना से कैदी हो गया और महावतखाँ जैसा अदना आदमी खानखाना हो गया। महावतखाँ यह समाचार सुनाने अब्दुर्रहीम के डेरे में गया। उसने कहा- 'अब तू अकेला खानखाना न रहा। मैं भी खानखाना हूँ।'

    नियति की ऐसी करनी देखकर खानखाना ने उससे कहा-

    'उरग, तुरंग, नारी नृपति, नीच जाति, हथियार।

    रहिमन इन्हें सँभारिये, पलटत लगै ने बार।'


    - 'अब्दुर्रहीम! तू मौलवियों की तरह दूसरों को तो बहुत इल्म बाँटता फिरता है। जो तू ऐसा ही ज्ञानी है तो फिर तू इस दुर्दशा को क्यों पहुँचा? रहीम ने कहा-

    'करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर।

    चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत व्हैगो भोर। '


    (महावतखाँ! तू रहीम को भाग्यहीन ही जान जो बड़े घर में चोरी करने के लिये घुस गया और यह सोचते-सोचते सवेरा हो गया कि आज तो बड़ा लाभ हुआ। अर्थात् कुछ प्राप्त किये बिना ही पकड़ा गया।)

    रहीम का उक्ति सुनकर महावतखाँ ठहाका लगा कर हँसा। उसने कहा- 'किस मिट्टी का बना है तू जो इस मुसीबत में भी परिहास करता है!'

    मन उचाट

    खुर्रम ने दाराबखाँ को रोहतास से दक्षिण के मोर्चे पर जाने के आदेश दिये। दाराबखाँ रोहतास से निकल कर लगभग सौ कोस ही आगे गया होगा कि उसे अब्दुर्रहीम के कैदी हो जाने के समाचार मिले।

    अब्दुर्रहीम को दुबारा कैदी बनाये जाने पर दाराबखाँ को मुगलों से घृणा हो गयी। उसके फरिश्ते जैसे निर्दोष और पाक दामन बाप को पहले तो खुर्रम ने और अब परवेज ने कैद कर लिया था। दोनों ही बार अब्दुर्रहीम का दोष क्या था?

    उस बार खुर्रम ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा था कि अब्दुर्रहीम महावतखाँ से मिल गया है। जबकि महावतखाँ ने अब्दुर्रहीम की ओर से जाली पत्र लिखकर खुर्रम के आदमियों के हाथों पकड़वाया और खुर्रम ने उस पत्र को असली जानकर अब्दुर्रहीम तथा दाराबखाँ को कैद में डाल दिया।

    इस बार परवेज ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा कि उसका पुत्र दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में है इसलिये अब्दुर्रहीम को खुला छोड़ना मुगलों के हित में नहीं है। अब्दुर्रहीम स्वतंत्र रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! अब्दुर्रहीम बंदी रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! क्या मुगलों का हित ही सर्वोपरि है? जिस अब्दुर्रहीम के दमखम पर यह मुगलिया सल्तनत खड़ी हुई, उस अब्दुर्रहीम का अपना हित-अनहित कुछ नहीं?

    यदि दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में था तो इसमें अब्दुर्रहीम का क्या दोष था? जब अब्दुर्रहीम खुर्रम के पक्ष में था तब मनूंचहर भी तो परवेज के पास था! उस समय परवेज ने मनूंचहर को दण्डित क्यों नहीं किया? क्या केवल इसलिये कि तब अब्दुर्रहीम को कमजोर करने के लिये मनूंचहर को अपने पक्ष में रखा जाना मुगलों के हित में था!

    खुर्रम ने भी तो जहाँगीर से बगावत की! उसका दण्ड जहाँगीर को तो नहीं दिया जा सकता! उसी तरह दाराबखाँ के बागी हो जाने का दण्ड अब्दुर्रहीम को क्यों?

    दाराबखाँ इन्हीं सब बातों पर बारम्बार विचार करता हुआ फिर से अपने कुटुम्ब को एक जगह एकत्र करने और इस बिखराव से बाहर निकलने के उपाय के बारे में सोचता ही था कि खुर्रम का संदेश वाहक उसकी सेवा में उपस्थित हुआ और कहा कि खुर्रम ने उसे गढ़ी में बुलाया है।

    दाराबखाँ यह आदेश सुनकर चकरा गया। कहाँ तो उसे रोहतास से खानदेश जाने के आदेश दिये गये थे और कहाँ अब उसे बीच मार्ग से ही उल्टी दिशा में बंगाल बुलाया जा रहा है! (रोहतास पूर्वी उत्तर प्रदेश में है।)

    दाराबखाँ को लगा कि जिस प्रकार परवेज ने अब्दुर्रहीम के साथ छल किया, उसी प्रकार खुर्रम भी दाराबखाँ के साथ छल करना चाहता है। अवश्य ही दाल में कुछ काला है। अतः खुर्रम के पास जाना उचित नहीं है।

    दाराबखाँ को ज्ञात था कि इस समय परवेज भी बंगाल पर धावा करने की तैयारी में है। इसलिये बेहतर होगा कि दक्षिण को न जाकर बंगाल ही चला जाये ताकि परवेज से मिलकर खानााना को छुड़ाने के प्रयास किये जायें।

    दाराबखाँ ने खुर्रम के संदेशवाहक से कहा कि शहजादे को कहना कि शहजादा खुद तो गढ़ी में बैठा है किंतु बंगाल के दूसरे इलाकों में इस समय जमींदारों का विद्रोह हो रहा है, उसे दबाना जरूरी है। इसलिये मैं जमींदारों का विद्रोह दबाने के लिये जाता हूँ जब अवसर होगा तो मैं शहजादे की सेवा में गढ़ी में हाजिर हो जाऊंगा।

    खुर्रम ने दाराबखाँ को न आते देखकर दाराबखाँ के बेटे को पकड़ कर अब्दुल्लाहखाँ की देखरेख में रख दिया और स्वयं उड़ीसा के रास्ते दक्षिण को चल दिया।

    परवेज ने भी बंगाल पर अधिकार करके महावतखाँ को बंगाल में नियुक्त किया और स्वयं खुर्रम के पीछे दक्षिण को प्रस्थान कर गया।


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  • INDIAN LEADERS : COTEMPORARY OPINIONS

     21.08.2017
    INDIAN LEADERS : COTEMPORARY OPINIONS

     There is general consensus of opinion that the reactionary measures of Lytton and the Anglo-Indian agitation over the Ilbert Bill hastened the process which lad to the foundation of Congress towards the very end of the year 1885. The Indian National Congress was the fulfillment of and logical corollary to all the efforts at organising political associations in different parts of India. Towards the close of Lytton’s Vicroyalty, that is about 1878 and 1879, Allan Octavian Hume, a retired official of the Government of India, became convinced that some definite action was called for to counteract the growing unrest. Hume was an enlightened imperialist, alarmed at the growing gulf between the rulers and ruled. He had considerable misgiving about establishment of the Indian National Conference in 1883 by SurendraNath Banerjee, a dismissed government servant.

    He decided to bypass the National Conference and instead organise a loyal and innocuous political organisation. Hume made the National Congress, at least in the beginning, a forum for Pro-British and anti-Russian propaganda. The establishment of the congress was in fact as much the work of the Indian Moderates as of the Government. There was an identity of interest between the two. The former wanted political recognition as a means to rise in social scale, the latter a non-official political organisation to act as barometer of public opinion. Hume secured the sympathy and support of the Government officials and public men in India and England for the Indian National Congress. Thus the movement was a child both of England and India.

    The formation of the Congress represented from the point of view of Government an attempt to defeat or rather forestall an impending revolution. Hume own conception of the role of Congress was : ‘A safety valve for the escape of great and growing forces generated by our own action, was urgently needed and no more efficacious safety valve than our congress movement could possibly be devised.’ Something like a national organisation had been in the air, for quite some time. Hume took advantage of an already created atmosphere, helped by the fact that he was more acceptable to, Indians as free of regional loyalties. The nucleus of the Congress leadership consisted of men from Bombay and Calcutta who had come together in London in the late 1860’s and early 70’s while studying for the ICS or for law.. who all fell under the influence of Dadabhai Naoroji who was then settled in England as businessman-cum-publicist.

    Early in December 1884, Hume arrived in Bombay, apparently to bid farewall to Ripon and stayed there far three months. He discussed with Indian leaders about the holding of an annual conference, the organization the charter of demands and the formation of an Indian Party in Parliament. Later he visited Madras, Calcutta, Simla and several places in North-Western province and Avadh and probably also in the Punjab. In June, 1885, before the congress was started, Viceroy Dufferin was one of the first person whom Hume consulted. Dufferin warmly approved the proposal. But Dufferin advised Hume; ‘don’t ask Lord Reay, the Governor of Bombay to preside because it will be awkward for him if..administration comes to be severely criticized whilst he is the chair.’

    On the proposal of Hume, which was seconded by SubramaniaAiyar and supported by Talang and unanimously, carried, W. C. Bonnerjee was elected President of the first session of the Congress. Bonnerjee refuted the charge that congress was a nest of conspirators and disloyalists and affirmed that much had been done by Britain for the benefit of India and the whole country was truly grateful to her for it….. But a great deal still remain to be done.

    To Read Complete Book, please download E-Book - Indian Leaders : Contemporary Openions (1885-1922)

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  • जोधपुर जिला इतिहास एवं संस्कृति प्रश्नोत्तरी

     21.08.2017
    जोधपुर जिला इतिहास एवं संस्कृति प्रश्नोत्तरी

    जोधपुर प्रश्नोत्तरी



    1. जोधपुर दुर्ग की स्थापना किस वंश के राजा ने की?

    राठौड़/चौहान/प्रतिहार/सोलंकी

    (उत्तर- राठौड़)



    2. कौनसा राजा अपनी राजधानी मण्डोर से जोधपुर लेकर आया?

    राव रणमल/राव जोधा/सातल देव/राव चूण्डा

    (उत्तर- राव जोधा)



    3. उम्मेद पैलेस किस पत्थर से बना हुआ है-

    घाटू/छीतर/घीया/लाइम स्टोन

    (उत्तर- छीतर)



    4. जोधपुर के किस राजा के मरने पर औरंगजेब की बेगम ने कहा था कि आज मुगल सल्तनत का एक खंभा गिर गया?

    गजसिंह/जसवंतसिंह-प्रथम/जसवंतसिंह द्वितीय/अजीतसिंह/

    (उत्तर-जसवंतसिंह प्रथम )



    5. जोधपुर का कौनसा राजा प्रथम विश्व युद्ध में सर प्रताप के साथ फ्रांस के मोर्चे पर गया?

    सुमेरसिंह/सरदारसिंह/उम्मेदसिंह/गजसिंह

    (उत्तर- सुमेरसिंह)



    6. जोधपुर के किस राजकुमार ने बीकानेर शहर की स्थापना की?

    जोधा/बीका/सूजा/सातल

    (उत्तर- बीका )



    7. जोधपुर के किस राजा ने तुंगा की लड़ाई में माधोजी सिंधिया को हराया?

    जसवंतसिंह/विजयसिंह/मानसिंह/चूण्डा

    (उत्तर- विजयसिंह)



    8. जोधपुर शहर में स्थित गुलाब सागर किसने बनवाया?

    नैनी बाई/गुलाबराय/अनारा/जुबैदा

    (उत्तर- गुलाबराय)



    9. उम्मेद भवन का निर्माण क्यों किया गया था?

    जोधपुर का सौंदर्य बढ़ाने के लिये/अकाल राहत में लोगों को रोजगार देने के लिये/द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये चंदा इकट्ठा करने के लिये/जोधपुर में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये।

    (उत्तर- अकाल राहत में लोगों को रोजगार देने के लिये)



    10. जोधपुर में बनाये गये विण्डम हॉस्टीपल को अब किस नाम से जाना जाता है?

    उम्मेद हॉस्पीटल/गांधी हॉस्पीटल/पावटा हॉस्पीटल/मण्डोर सैटेलाइट हॉस्पीटल

    (उत्तर- गांधी हॉस्पीटल)



    11. मानसिंह पुस्तक प्रकाश कहां स्थित है?

    मण्डोर उद्यान में/उम्मेद उद्यान में/नेहरू पार्क में/मेहरानगढ़ किले में।

    (उत्तर- मेहरानगढ़ किले में।)



    12. जोधपुर के राजकुमार अमरसिंह राठौड़ को मुगल बादशाह ने कहां का राजा बनाया?

    आगरा/दिल्ली/ जाधपुर/ नागौर!

    (उत्तर- नागौर)



    13. 15 अगस्त 1947 को जोधपुर का राजा कौन था?

    उम्मेदसिंह/गजसिंह/हनवंतसिंह/सरदारसिंह

    (उत्तर- हनवंतसिंह)



    14. हैफा हीरो किसे कहा जाता है?

    मेजर दलपतसिंह/मेजर शैतानसिंह/कर्नल मोहनसिंह/सर प्रतापसिंह।

    (उत्तर- मेजर दलपतसिंह)



    15. किस औरत पर यह आरोप है कि उसने दयानंद सरस्वती को जोधपुर में जहर दिया जिससे स्वामीजी की कुछ दिन बाद मृत्यु हो गई?

    नन्हीं बाई/गुलाबराय/अनारा/जुबैदा!

    (उत्तर- नन्हीं बाई)



    16. जोधपुर का कौनसा राजा था जिसने स्वयं को काश्तकार घोषित किया?

    हनवंतसिंह/उम्मेदसिंह/जसवंतसिंह/गजसिंह

    (उत्तर- उम्मेदसिंह)



    17. आउवा का कौनसा जागीरदार था जिसने 1857 के क्रांतिकारियों को अपने महल में शरण दी?

    किशोरसिंह/कुशलासिंह चाम्पावत/जैतसिंह/गोरधन खींची

    (उत्तर- कुशालसिंह चाम्पावत)



    18. जुबली कोर्ट में वर्तमान में कौनसा कार्यालय चलता है? जिला कलक्टर कार्यालय/संभागीय आयुक्त कार्यालय/अतिरिक्त जिला कलक्टर कार्यालय/उपरोक्त तीनों।

    (उत्तर- उपरोक्त तीनों)



    19 जसवंतथड़ा क्या है?

    मंदिर/टीला/कॉलेज/स्मारक।

    (उत्तर- स्मारक)



    20 राजनीति में आने से पहले बरकतुल्लाह खां क्या करते थे?

    खिलाड़ी थे/सैनिक थे/जागीरदार थे/सरकारी सेवा में थे।

    (उत्तर- जागीरदार थे)



    21. बालसमंद झील किस स्थान पर है?

    जोधपुर-मण्डोर मार्ग पर/जोधपुर ओसियां मार्ग पर/जोधपुर पिचियाक मार्ग पर/जोधपुर-जवाई मार्ग पर।

    (उत्तर- जोधपुर मण्डोर मार्ग पर)



    22. तापी बावड़ी कहां स्थित है? मेहरानगढ़ किले में/चाचा की गली में/हटडि़यों के चौक के पास/अरणा-झरणा के पास।

    (उत्तर- जोधपुर शहर में स्थित भीमजी के मौहल्ले में हटड़यों के चौक के पास।)



    23. फतह सागर कहां स्थित है?

    नागौरी गेट के पास, मेड़ती दरवाजे के पास, सोजती दरवाजे के पास/सिवांची दरवाजे के पास।

    (उत्तर- मेड़ती दरवाजे के पास)



    24. राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर में किन वस्तुओं का संग्रहालय है?

    लोकवाद्यों का/ऐतिहासिक सिक्कों का/शिलालेखों का/प्राचीन पोथियों का?

    (उत्तर- लोकवाद्यों का) 



    25. ओरियेण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना किसने की?

    जोधपुर सरकार ने/राजस्थान सरकार ने/भारत सरकार ने/राजपूताने के एजीजी ने।

    (उत्तर- राजस्थान सरकार ने 1954 ईस्वी में।)



    26. मण्डलनाथ मंदिर का मुख्य देवता कौन है?

    शिव/विष्णु/दुर्गा/ब्रह्मा

    (उत्तर- शिव)



    27. बड़ी गांव लोकपाल के मंदिर के लिये प्रसिद्ध है?

    भैंरूजी/भोमियाजी/मामाजी/वीरजी?

    (उत्तर - भैंरूजी)



    28. खींचन में कौनसे प्रवासी पक्षी हर वर्ष बड़ी संख्या में आते हैं?

    कुरजां/कोयल/गोडावण/तिलोर

    (उत्तर - कुरजां) 



    29. सचियाय माता के मंदिर में किस देवी की प्रतिमा मुख्य रूप से स्थापित है?

    महिषासुर मर्दिनी/सांगिया देवी/आई माता/संतोषी माता!

    (उत्तर- महिषासुर मर्दिनी) 



    30. सीरवियों की किस देवी का मंदिर बिलाड़ा में है?

    आई माता/सांगिया माता/क्षेमकरी/आशापुरी

    (उत्तर- आई माता)



    31. जोधपुर में पहले जस्ते के पानी रखने के बर्तन/सुराहियों/बोतलें बनती थीं, उन्हें क्या कहते थे?

    केतली/बादला/डीवड़ी/ईडाणी।

    (उत्तर- बादला) 



    32 जोधपुर का घण्टाघर कहां स्थित है?

    मालकोट/भीमकोट/उमरकोट/गिरदीकोट

    (उत्तर- गिरदीकोट)



    33. अंग्रेजों द्वारा नाथों को देश निकाल दिये जाने पर कौनसा राजा जोधपुर का किला छोड़कर मण्डोर उद्यान में चला गया और वहीं पर अपने प्राण त्याग दिये?

    अजीतसिंह/मानसिंह/विजयसिंह/भीमसिंह

    (उत्तर- मानसिंह)



    34. महामंदिर तथा उदयमंदिर किस सम्प्रदाय के साधुओं के लिये बनवाये गये-

    लकुलीश सम्प्रदाय/नाथ सम्प्रदाय/गोरख सम्प्रदाय/दादूपंथी सम्प्रदाय?

    (उत्तर- नाथ सम्प्रदाय)



    35. वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को गंगश्यामजी के मंदिर में मूलका मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला विष्णु के किस अवतार से सम्बन्धित है?

    वराह/नृसिंह/वामन/कूर्म

    (उत्तर- नृसिंह)



    36. पश्चिमी राजस्थान में निवास करने वाली ढाढी, दमामी, मिरासी आदि जातियां किस परम्परागत पेशे से सम्बन्धित है?

    पत्थरों की पट्टियां (छीणें) निकालना/कठपुतली का खेल दिखाना/गायन, वादन एवं नृत्य करना/जंगलों से शहद निकालना?

    (उत्तर- गायन, वादन एवं नृत्य करना)



    37. जोधपुर राज्य का राजस्थान में विलय किस वर्ष में हुआ?

    1947/1948/1949/1956

    (उत्तर- 1949)



    38. जोधपुर का कौनसा राजा लॉर्ड मेयो द्वारा आयोजित अजमेर दरबार को छोड़कर चला आया?

    बख्तसिंह/तख्तसिंह/जसवंतसिंह/अभयसिंह?

    (उत्तर- तख्तसिंह)



    39. आजादी के बाद जोधपुर के किस राजा ने लोकसभा और विधानसभा दोनों का चुनाव एक साथ लड़ा और दोनों ही सीटों पर जीत हासिल की?

    उम्मेदसिंह/हनवंतसिंह/गजसिंह/सरदारसिंह?

    (उत्तर- हनवंतसिंह)



    40. जोधपुर के किस इतिहासकार ने महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) के समय नैणसी की ख्यात लिखी? दयालदास/बांकीदास/मूथा नैणसी/मुरारी दान?

    (उत्तर- मूथा नैणसी)



    41. जोधपुर के कितने व्यक्ति अब तक राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर रह चुके हैं-

    दो/तीन/चार/पांच

    (उत्तर- तीन, जयनारायण व्यास, बरकतउल्लाखां, अशोक गहलोत)।



    42. कौनसा इतिहासकार जोधपुर से सम्बन्धित नहीं है?

    पं. विश्वेश्वर नाथ रेउ/मूथा नैणसी/टैस्सीटोरी/जगदीशसिंह गहलोत?

    (उत्तर- टैस्सीटोरी)



    43. राजरणछोड़जी का मंदिर किसने बनवाया?

    राव जोधा की पुत्री शृंगारदेवी ने/राव गांगा की रानी पद्मावती ने/जसवंतसिंह द्वितीय की रानी जाड़ेची राजकंवर ने/विजयसिंह की रानी शेखावतजी ने ?

    (उत्तर- जसवंतसिंह द्वितीय की रानी जाड़ेची राजकंवर ने।)



    44. वीर दुर्गादास की छतरी कहां है?

    हरिद्वार/जोधपुर/उज्जैन/मथुरा?

    (उत्तर- उज्जैन)



    45. चिडि़या नाथ की टूंक पर जोधपुर का कौनसा प्रसिद्ध भवन बना हुआ है?

    शिप हाउस/बीजोलाई के महल/तलहटी के महल/जसवंतथड़ा/मेहरानगढ़?

    (उत्तर- मेहरानगढ़)



    46. कुंज बिहारी मंदिर कहां स्थित है?

    कटला बाजार/सरदारपुरा/जालप मौहल्ला/पुंगलपाड़ा?

    (उत्तर-कटला बाजार)



    47. जोधपुर में खरानना देवी का मंदिर है। यह देवी किस जाति या समुदाय से सम्बन्धित है?

    श्रीमाली ब्राह्मण/पुष्करणा ब्राह्मण/गौड़ ब्राह्मण/तैलंग ब्राह्मण?

    (उत्तर- दवे गोधा गोत्र के श्रीमाली ब्राह्मण )



    48. महाराजा अभयसिंह ने अपने किस भाई को नागौर का राज्य दिया जो बाद में अभयसिंह के पुत्र को हटाकर जोधपुर का राजा बन गया?

    बख्तसिंह/तख्तसिंह/अमरसिंह/इन्द्रसिंह?

    (उत्तर- बख्तसिंह)



    49. किस देवी के बारे में यह मान्यता है कि उसकी कृपा से 1965 के भारत-पाक युद्ध में जोधपुर शहर, पाकिस्तान द्वारा की गई बमबारी में भी पूरी तरह सुरक्षित बच गया?

    चामुण्डा देवी/संतोषी माता/लक्ष्मीमाता/आईमाता?

    (उत्तर- मेहरानगढ़ दुर्ग की चामुण्डा माता)



    50. जोधपुर के किस राजकुमार ने किशनगढ़ नामक अलग राज्य की स्थापना की?

    रूपसिंह/सांवलदास/किशनसिंह/सूरसिंह?

    (उत्तर - किशनसिंह)


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  • भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी तथा गांधी इरविन पैक्ट का दुःखद पक्ष :

     21.08.2017
    भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी तथा गांधी इरविन पैक्ट का दुःखद पक्ष :

    भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी तथा गांधी इरविन पैक्ट का दुःखद पक्ष जब कभी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहीद दिवस आता है तो मुझे 1931 ईस्वी के गांधी-इरविन पैक्ट का स्मरण अवश्य होता है। मन में एक वेदना होती है जिसका वर्णन करना कठिन है। इस पूरे प्रकरण को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-

    भारत में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम के कारण इंग्लैण्ड की गोरी सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के बारे में सलाह देने हेतु 1927 ईस्वी में साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस कमीशन के समस्त सदस्य अँग्रेज थे। इसलिये इसे व्हाइट कमीशन भी कहते हैं। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया। हिन्दू महासभा सहित देश के अनेक संगठनों ने कांग्रेस का साथ देने का निश्चय किया।

    30 अक्टूबर 1928 को कमीशन का बहिष्कार करने के लिए लाहौर में लाला लाजपतराय के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकला। अँग्रेज पुलिस अधिकारी साण्डर्स ने लालाजी पर लाठियों के अनेक प्रहार करके उन्हें गम्भीर चोटें पहुँचाई। इन चोटों के कारण 17 नवम्बर 1928 को लालाजी का निधन हो गया। लालाजी द्वारा 1921 ईस्वी में लाहौर में स्थापित नेशनल कॉलेज के छात्र रहे भगतसिंह तथा उनके साथियों ने इस घटना को राष्ट्रीय अपमान समझा और इसका बदला लेने का निर्णय लिया। इन क्रांतिकारियों ने 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में पुलिस कार्यालय के ठीक सामने साण्डर्स को गोली मार दी। क्रांतिकारियों की तरफ से एक इश्तिहार जारी किया गया जिसमें कहा गया- ‘साण्डर्स मारा गया, लालजी की मृत्यु का बदला ले लिया गया।’

    इससे सारे देश में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। कुछ समय बाद इन क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। उन पर अंग्रेजों के न्यायालय में मुकदमा चला और भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई। देश का आम आदमी इन तीन युवा राष्ट्रभक्तों के साहस पर गर्व का अनुभव किया।

    इस सजा को सुनाये जाने के कुछ दिन बाद ही वायसराय लॉर्ड इरविन ने कांग्रेस को एक समझौते के लिये आमंत्रित किया ताकि स्वंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों द्वारा की गई ज्यादतियों से उत्पन्न असंतोष को कम किया जा सके। कांग्रेस ने इस समझौते के लिये मोहनदास कर्मचंद गांधी को नियत किया। कांग्रेस के प्रगतिशील तत्त्वों ने गांधीजी को सुझाव दिया कि वे सरकार से तब तक वार्त्ता करना स्वीकार न करें जब तक कि सरकार तीन क्रान्तिकारियों- भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की सजा को रद्द करना स्वीकार न कर ले परन्तु गांधीजी ने उनके सुझाव की अनदेखी करके वार्त्ता जारी रखी।

    कांग्रेस का युवा वर्ग तथा समूचा देश इन तीनों क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखता था किंतु गांधीजी ने जन-आंकाक्षाओं की परवाह किये बिना, अपने अहिंसावादी सिद्धांतों के नाम पर, भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को न तो कैद से छुड़वाने का और न उनकी फांसी की सजा को कम करवाने का प्रयास किया। गांधीजी ने दो कदम आगे बढ़कर, क्रांतिकारियों के विरुद्ध सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाही का समर्थन किया। पूरा देश और कांग्रेस का युवा वर्ग, गांधी-इरविन पैक्ट में क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के रुख से बहुत नाराज हुआ। यहां तक कि स्वयं लॉर्ड इरविन ने लिखा है कि मुझे गांधी के इस रुख से हैरानी हुई। मैं मन ही मन स्वयं को तैयार कर चुका था कि यदि गांधी, यह मांग करेंगे कि इन्हें फांसी न दी जाये, तो मैं यह भी करूंगा किंतु गांधी ने तो इन युवकों की फांसी का समर्थन किया।

    गांधीजी ने इन तीनों क्रांतिकारियों के प्राण बचाने के लिए न तो अनशन-उपवास किया और न ही आन्दोलन जारी रखा। इससे वामपंथियों को गहरा आघात पहुँचा। गांधी-इरविन पैक्ट के कुछ दिनों बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी हो गई। देश गुस्से से उलब पड़ा। इसके कुछ दिनों बाद ही मार्च 1931 में कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ। कांग्रेस के नवयुवक कार्यकर्ताओं ने देश में कई स्थानों पर गांधीजी के विरुद्ध काले झण्डों के साथ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। आन्दोलन के दौरान जनसाधारण ने जिस राजनीतिक जागृति का परिचय देते हुए गांधीजी के विरोध में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया, उससे गांधी सहित समस्त दक्षिणपंथी नेता भयग्रस्त हो गये। इसलिये गांधजी ने कराची अधिवेशन को सफलतापूर्वक कराने के लिये एक विशेष योजना तैयार की। उन्होंने सरदार पटेल की अनिच्छा एवं पटेल द्वारा कई बार मना करने के बावजूद, सरदार पटेल को कराची अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया। ताकि सरदार पटेल का जादुई व्यक्तित्व आंदोलनकारी युवकों को नियंत्रित करने में काम लिया जा सके। पटेल को गांधी का आदेश मानना पड़ा।

    जैसा कि पूर्व अपेक्षित था, जब गांधीजी और निर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष सरदार पटेल, अधिवेशन में भाग लेने कराची पहुँचे तो उन्हें जबरदस्त जन-आक्रोश का सामना करना पड़ा। खुले अधिवेशन में भी दक्षिणपंथी नेतृत्व को जोरदार विरोध का सामना करना पड़ा। गांधी और पटेल बड़ी कठिनता से इस समझौते को कांग्रेस से स्वीकार करा सके।

    प्रसिद्ध इतिहासकार अयोध्यासिंह ने गांधी-इरविन समझौते के सन्दर्भ में लिखा है- ‘कांग्रेस ने जिन मांगों के लिए आन्दोलन चलाया था, क्या उनमें से एक भी मांग पूरी हुई? नहीं। गांधीजी ने जो ग्यारह सूत्री मांग पत्र पेश किया था, क्या उनमें से एक भी बात मानी गई? नहीं। यहाँ तक कि नमक-कर भी नहीं हटाया गया। क्या लगानबन्दी और कर-बन्दी आन्दोलन के दौरान कुड़क की गई किसानों की चल-अचल सम्पत्ति वापस की गई? नहीं। क्या स्वराज की तरफ ले जाने वाली एक भी बात मंजूर की गई? नहीं।’

    कराची अधिवेशन के अवसर पर कांग्रेस के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने कहा- ‘यदि गांधजी की जगह किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसा समझौता किया होता तो उसे उठाकर समुद्र में फेंक दिया जाता।’ कई बार मैं विचार करता हूं कि आखिर गांधीजी ने इन तीनों क्रांतिकारियों के विरुद्ध इतना कड़ा रुख क्यों अपनाया? तब भीतर से एक ही जवाब आता है कि लाला लाजपतराय हिन्दू महासभा के नेता थे जिनकी हत्या का बदला लेने के लिये भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने साण्डर्स की हत्या की थी। गांधीजी कतई नहीं चाहते थे कि कांग्रेस के अतिरिक्त और भी कोई राजनीतिक संगठन इस देश में खड़ा हो। कुल मिलाकर यह राजनीतिक विद्वेश का मामला लगता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन

     21.08.2017
    भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 1



    भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन


    सिकंदर के भारत में आने (523 ई.पू.) से भी बहुत पहले, रोम के एक शासक ने कहा था- 'भारतीयों के बागों में मोर, उनके खाने की मेज पर काली मिर्च तथा उनके बदन का रेशम, हमें पागल बना देता है। हम इन चीजों के लिये बर्बाद हुए जा रहे हैं।' यह कथन इस बात का प्रमाण है कि यूरोप तथा भारत के बीच ईसा के जन्म के सैंकड़ों साल पहले भी व्यापारिक सम्बन्ध थे तथा व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था। भारतवासी ईसा से भी कई हजार साल पहले अर्थात् सैंधव सभ्यता के समय से ही स्वर्ण धातु के गुणों तथा उसके उपयोग से परिचित थे। दक्षिण भारत में भी ईसा से लगभग 1000 साल पहले स्वर्ण उत्पादन होता था किंतु भारत में स्वर्ण बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध था। इस कारण भारतवासी विदेशी व्यापार में मुद्रा के रूप में केवल सोना-चांदी ही स्वीकार करते थे। यही कारण है कि भारत के मसालों, सुगंधित काष्ठों, अनाज तथा कपड़ों को प्राप्त करने के लिये विश्व भर के देशों ने भारतीय व्यापारियों के समक्ष सोने-चांदी के ढेर लगा दिये।

    स्विस लेखक लैण्डर्स्टोन ने लिखा है- 'समुद्र में जाने के अनेक रास्ते एवं माध्यम हैं पर उद्देश्य केवल एक ही था- चमत्कारिक देश भारत पहुँचना, जो देश धन से लबालब भरा है।' अँग्रेजी लेखक शेक्सपीयर (1564-1616 ई.) ने भारत भूमि को विश्व के लिये महान अवसरों की चरम सीमा कहा है। अँग्रेजी कवि मिल्टन (1608-1674 ई.) ने विभिन्न देशों की विशेषता बताते हुए भारत के धन की चर्चा की है। जर्मन दार्शनिक हेगेल (1770-1831 ई.) ने भारत को मनोकामना की भूमि बताया है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक यूरोपीय जातियाँ भारत आने के लिये सदैव लालायित रहती थीं।

    यूरोपियन जातियों के आगमन के उद्देश्य

    कतिपय ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत में यूरोपीय जातियों के प्रवेश का कारण भारत के लोगों को सभ्य बनाना था। जबकि वास्तव में भारत में यूरोपीय जातियों के आगमन के दो उद्देश्य जान पड़ते हैं- (1.) भारत में व्यापार करके धन अर्जित करना तथा (2.) भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना। इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिये यूरोपीय जातियों को भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की आवश्यकता हुई। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि यूरोपीय जातियाँ इस देश में व्यापारिक उद्देश्यों को लेकर प्रविष्ट हुईं किंतु उन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक हाथ में धर्म का झण्डा और दूसरे हाथ में तलवार थाम रखी थी।

    पुर्तगालियों का भारत में प्रवेश

    15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप में सुदूर देशों की ओर के समुद्री मार्गों का पता लगाने का जो अभियान चला, उसमें यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। 1497 ई. में वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली नाविक अपने साथियों सहित सामान और हथियारों से भरा जहाजी बेड़ा लेकर पूर्वी द्वीपों की खोज में निकल पड़ा। अगस्त 1498 में वह भारत के विख्यात बन्दरगाह कालीकट पहुँचा। उसने कालीकट के राजा जमेरिन से कालीकट में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। इस समय तक समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था किंतु कुछ ही वर्षों में पुर्तगालियों ने अरब व्यापारियों पर विजय प्राप्त करके समस्त व्यापार पर एवं भारत तथा यूरोप के मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों पर नियंत्रण कर लिया।

    पुर्तगालियों ने कालीकट के राजा जमेरिन को उसके शत्रु राज्यों, मुख्यतः कोचीन राज्य के विरुद्ध सैनिक सहायता दी और भारत की राजनीति में प्रवेश किया। अल्मीडा (1505-1509 ई.) भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। उसने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया। अल्मीडा का उत्तराधिकारी अल्बुकर्क (1509-1515 ई.) अत्यंत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था जिसके नेतृत्व में भारत में पुर्तगाली शक्ति का निर्माण हुआ। उसने 1510 ई. में गोआ पर अधिकार किया। धीरे-धीरे पश्चिमी तट पर ड्यू, सालसेट, बसीन, चौल तथा पूर्वी तट पर (बंगाल में) हुगली और दक्षिण में मद्रास तट पर सानथोम पुर्तगालियों के अधिकार में चले गये।

    पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसालों के द्वीप तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने के लिये वे अन्य यूरोपीय जातियों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- 'पुर्तगालियों ने अपनी सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।'

    पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिये पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने में असमर्थ रहा। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। 1580 ई. में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया। 1588 ई. में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिये उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिये प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया। अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। 1629 ई. में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया। 1639 ई. में मराठों ने उनसे सालसेट और बसीन छीन लिये। 1661 ई. में पुर्तगालियों ने अपनी राजकुमारी का विवाह अँग्रेजों के राजा चार्ल्स (द्वितीय) के साथ किया तथा मुम्बई अँग्रेजों को दहेज में दे दिया।

    डचों का भारत में प्रवेश

    नीदरलैण्ड के निवासियों को डच कहा जाता है। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिये परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई। 1595 ई. में चार डच जहाज उत्तमाशा अंतरीप होकर भारत के लिये रवाना हुए। 1602 ई. में डचों ने भारत से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया। 1604 ई. में डच जहाजी बेड़ा कालीकट पहुँचा। डचों के पास पर्याप्त नाविक शक्ति थी। उन्होंने मछलीपट्टम, पेटापोली, पुलीकट आदि स्थानों से व्यापार करना आरम्भ किया। धीरे-धीरे उन्होंने पूर्वी द्वीपों से पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया।

    डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों- इण्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा एवं अन्य मसाला द्वीपों पर व्यापारिक आधिपत्य स्थापित करना था। भारत उनके व्यापारिक मार्ग की एक कड़ी मात्र था। अतः भारत में उन्होंने अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया। फिर भी उन्होंने भारतीय व्यापार को पूरी तरह नहीं छोड़ा। उन्होंने पश्चिमी भारत में गुजरात के सूरत, भड़ौंच, कैम्बे और अहमदाबाद, केरल के कोचीन, तमिलनाडु के नागपत्तम्, आंध्र प्रदेश के मच्छलीपत्तम्, बंगाल के चिनसुरा, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के आगरा में अपने व्यापारिक गोदाम बनाये। उन्होंने 1658 ई. में लंका को पुर्तगालियों से जीत लिया। डच व्यापारी, भारत से नील, रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा और अफीम खरीदते थे। पुर्तगालियों की तरह वे भी भारतीय उत्पादकों एवं भारतीय नौकरों के साथ क्रूर व्यवहार करते थे तथा उनका भयानक शोषण करते थे।

    स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, नीदरलैण्ड एवं इंग्लैण्ड के व्यापारी, शताब्दियों से अफ्रीका के लोगों को पकड़कर उन्हें विश्व के बाजारों में गुलाम के रूप में बेचने तथा खानों एवं बागानों में बलपूर्वक काम लेने के लिये उन पर भयानक अत्याचार करने के अभ्यस्त थे। इसलिये उन्हें भारत के स्थानीय लोगों का शोषण करने एवं उन पर अत्याचार करने में कोई हिचक नहीं होती थी।

    1718 ई. में अँग्रेजों ने डचों को हुगली तथा नागपत्तम् आदि स्थानों से खदेड़ दिया। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भी अँग्रेजों ने डचों को पछाड़ दिया। 1759 ई. में अँग्रेजों और डचों के मध्य बेदरा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें डच परास्त हो गये और उन्हें अँग्रेजों से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने, नई सैनिक भर्ती नहीं करने और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। इस प्रकार भारत में डचों का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया।

    अँग्रेजों का भारत में आगमन

    पुर्तगालियों की सफलता ने अँग्रेज व्यापारियों को भारत आने के लिये उत्तेजित किया। पुर्तगालियों द्वारा यूरोप के बाजारों में भारतीय मसालों, कालीमिर्च, रेशमी कपड़ों, सूती कपड़ों तथा विभिन्न औषधियों को बेचकर कमाये जा रहे मुनाफे को देखकर ब्रिटिश वासियों के खून में उबाल आता था। वे इस लाभप्रद व्यापार में हिस्सा लेने के लिये अधीर हो उठे किंतु सोलहवीं शताब्दी के अंत तक वे पुर्तगाल तथा स्पेन की नौसैनिक शक्ति को टक्कर देने में समर्थ नहीं थे। उन्होंने पचास से भी अधिक वर्षों तक इंग्लैण्ड से भारत के बीच वैकल्पिक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास किये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बीच उन्होंने समुद्री शक्ति जुटा ली। 1579 ई. में ड्रेक ने समुद्र के मार्ग से विश्व की परिक्रमा की। 1588 ई. में उन्होंने स्पेनिश आर्मेडा को परास्त करके पूरब की ओर जाने का समुद्री मार्ग खोल लिया।

    ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना

    1599 ई. में मर्चेण्ट एडवेंचर्स नामक सौदागरों के एक समूह के तत्त्वावधान में पूरब के साथ व्यापार करने के लिये एक ब्रिटिश संस्था की स्थापना की गई। 31 दिसम्बर 1600 को इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) ने लन्दन के इन व्यापारियों को पूरब के साथ व्यापार करने का अधिकार-पत्र प्रदान किया। इसी अधिकार-पत्र द्वारा इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित हुई। महारानी स्वयं इस कम्पनी की हिस्सेदार बन गई। 1601 ई. में इस कम्पनी के पहले जहाज ने इण्डोनेशिया के लिये व्यापारिक यात्रा आरम्भ की।

    हॉकिन्स की जहाँगीर से भेंट

    24 अगस्त 1608 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला जहाज हैक्टर सूरत के मामूली से बन्दरगाह पर आकर लगा। इस जहाज का कप्तान विलियम हॉकिन्स नाविक कम, लुटेरा अधिक था। हॉकिन्स, मुगल बादशाह जहाँगीर से भेंट करने आगरा पहुँचा। मुगल दरबार में पुर्तगालियों का प्रभाव था। उन्होंने हॉकिन्स का प्रबल विरोध किया। इस कारण हॉकिन्स मुगल दरबार से विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में असफल रहा किंतु जहाँगीर यूरोप के विभिन्न देशों से आ रहे गोरे व्यापारियों को भारत में बने रहने देना चाहता था ताकि भारत में व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहें। इसलिये जहाँगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब तथा एक जागीर प्रदान की। बाद में पुर्तगाली षड़यंत्र के कारण हॉकिन्स को आगरा से निकाल दिया गया। हॉकिन्स की दृष्टि में बादशाह जहाँगीर इतना धनवान और सामर्थ्यवान था कि उसकी अपेक्षा इंग्लैण्ड की रानी अत्यंत साधारण सूबेदारिन से अधिक नहीं ठहरती थी।

    पुर्तगालियों से झगड़ा

    1612 ई. में पाल केनिंग, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ परन्तु उसे भी पुर्तगालियों के विरोध के कारण मुगल दरबार में सफलता नहीं मिली। इस पर अँग्रेजों ने पुर्तगालियों से निबटने का निश्चय किया। उन्होंने पहले 1612 ई. में और बाद में 1614 ई. में पुर्तगालियों को युद्ध में परास्त किया तथा सूरत के समुद्री क्षेत्र से पुर्तगाली जहाजों को मार भगाया। इससे बादशाह जहाँगीर को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौ-सैनिक शक्ति का अनुमान हो गया। जहाँगीर स्वयं भी पुर्तगालियों पर अंकुश रखने के लिये एक मजबूत नौसेना का गठन करना चाहता था। जहाँगीर को लगा कि आवश्यकता हुई तो निकट भविष्य में अँग्रेजी नौसेना को मुगलों की सहायता के लिये काम में लिया जा सकेगा। इसलिये जब 1615 ई. के प्रारम्भ में विलियम एडवर्ड, राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ तो जहाँगीर ने अन्य विदेशी व्यापारियों की भाँति ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भी भारत में बस्तियाँ बसाने तथा व्यापार करने की अनुमति दे दी।

    पूरा अध्याय पढ़ने के लिये राजस्थान हिस्ट्री वैसाइट से अथवा अपने एण्ड्रोयड सैलफोन/टैब पर गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध राजस्थान हिस्ट्री एप से भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन नामक पुस्तक डाउनलोड करें।


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  • अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की राजनीतिक स्थिति

     21.08.2017
    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की राजनीतिक स्थिति

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 2

    अँग्रेज भारत में समुद्री मार्ग से 1608 ई. में आये। उस समय भारत में मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। मुगलों की केन्द्रीय सत्ता अत्यंत प्रबल थी। दक्षिण भारत के राज्य मुगलों की सीमा पर स्थित थे। अँग्रेजों के आगमन से बहुत पहले अर्थात् 1498 ई. से पुर्तगाली भारत में व्यापार कर रहे थे। डचों को भारत में आये हुए केवल चार साल हुए थे। इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अँग्रेजों ने विनम्र प्राथी बनकर भारत में अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरम्भ कीं जिनका विवरण पिछले अध्याय में दिया जा चुका है। सत्रहवीं सदी के अन्त तक बम्बई, कलकत्ता और मद्रास आदि समुद्री तट, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियों के मुख्य केन्द्र बन चुके थे। साथ ही देश के आन्तरिक भागों में पटना, अहमदाबाद, आगरा, बुरहानपुर आदि नगरों में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये थे।

    कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न

    बहुत से इतिहासकारों का कथन है कि 1608 से 1740 ई. तक ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में व्यापारिक कम्पनी की तरह काम करती रही। यह कथन बिल्कुल गलत है। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार के बल पर बढ़ाती रही। औरंगजेब के जीवन काल में ही कम्पनी ने भारत में विनम्र प्रार्थी की भूमिका त्यागने का भरसक प्रयास किया। वह भारतीयों से बलपूर्वक सस्ता माल खरीदकर भारतीयों को महंगा माल बेचती थी। जो निर्धन भारतीय उत्पादक एवं भारतीय नौकर, ऐसा नहीं करते थे, उन्हें कम्पनी के आदमी कोड़ों से पीटते थे। 1680 के दशक में बम्बई के गवर्नर जेराल्ड आन्जियर ने कम्पनी के लन्दन स्थित निदेशकों को लिखा- 'समय की मांग है कि आप अपने वाणिज्य का प्रबन्ध अपने हाथों में तलवार लेकर करें।' 1687 ई. में कम्पनी के निदेशकों ने मद्रास के गवर्नर को सलाह दी- 'आप नागरिक और सैनिक सत्ता की ऐसी नीति स्थापित करें और राजस्व की इतनी बड़ी राशि का सृजन कर उसे प्राप्त करें कि दोनों को सदा के लिये भारत पर एक विशाल सुदृढ़ सुरक्षित आधिपत्य के आधार के रूप में बनाए रखा जा सके।'

    मुगलों से सशस्त्र संघर्ष

    औरंगजेब के जीवन काल में ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की उग्र नीतियों के कारण कम्पनी के अधिकारियों और मुगल अधिकारियों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ जो सशस्त्र संघर्ष में बदल गया। 1686 ई. में कम्पनी ने हुगली को लूट लिया तथा मुगल बादशाह के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। औरंगजेब ने अँग्रेजों के विरुद्ध सख्त कदम उठाये। उसकी सेनाओं ने अँग्रेजों को बंगाल के कारखानों से निकालकर बाहर कर दिया। अँग्रेज भागकर गंगा के मुहाने पर स्थित एक ज्वर-ग्रस्त टापू पर चले गये। सूरत, मच्छलीपट्टम् और विशाखापट्टम् स्थित कारखानों पर भी मुगलों ने अधिकार कर लिया।

    बम्बई के किले को मुगल सेनाओं ने घेर लिया। मुगल सेना की ऐसी शक्ति देखकर अँग्रेज पुनः विनम्र प्रार्थी की भूमिका में आ गये। उन्होंने औरंगजेब से निवेदन किया कि कम्पनी ने बिना सोचे-समझे जो भी अपराध किये हैं, उन्हें क्षमा कर दिया जाये। उन्होंने भारतीय शासकों के संरक्षण में व्यापार करने की इच्छा व्यक्त की। वे एक बार पुनः चापलूसी और विनम्र याचनाओं पर उतर आये। औरंगजेब ने डेढ़ लाख रुपया क्षतिपूर्ति लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों को क्षमा कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि कम्पनी द्वारा चलाए जा रहे विदेशी व्यापार से भारतीय दस्तकारों और सौदागरों को लाभ होता है तथा इससे राज्य का खजाना समृद्ध होता है।

    इस प्रकार अँग्रेजों को पहले की भाँति भारत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई। कम्पनी एक ओर तो मुगल बादशाह से क्षमा याचना की नीति अपना रही थी किंतु दूसरी ओर वह अपने उग्र तरीकों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं थी। 1689 ई. में कम्पनी ने घोषणा की- 'अपने राजस्व की वृद्धि हमारी चिंता का उतना ही विषय है जितना हमारा व्यापार। जब बीस दुर्घटनाएं हमारे व्यापार में बाधा डाल सकती हैं, तब यही है जो हमारी ताकत को बनाए रखेगी। यही है जो हमें भारत में एक राष्ट्र बनाएगी.......।'

    औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी

    1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों की शक्ति पतनोन्मुख हो गई। यद्यपि मुगलों का अन्तिम बादशाह बहादुरशाह जफर 1858 ई. तक दिल्ली के तख्त का स्वामी बना रहा तथापि मुगलों की वास्तविक सत्ता 1800 ई. से काफी पहले ही समाप्त हो चुकी थी। शक्तिशाली सार्वभौम सत्ता के अभाव में विभिन प्रान्तों के सूबेदार केन्द्रीय सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करने लगे। मुगलों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं होने से मुगल शहजादे परस्पर युद्ध के माध्यम से ही उत्तराधिकार का निर्णय करते थे। इस कारण मुगल सल्तनत में बिखराव की गति बहुत तीव्र रही।

    औरंगजेब के बड़े पुत्र मुहम्मद मुअज्जम ने अपने भाइयों को युद्ध में मारकर बहादुरशाह (प्रथम) (1707-12 ई.) के नाम से तख्त पर अधिकार किया। उसने राजपूतों, सिक्खों और मराठों को दबाने का असफल प्रयास किया। फिर भी, उसके समय में मुगल सल्तनत में स्थिरता बनी रही। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद, ईरानी अमीर दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से जहाँदारशाह अपने भाइयों को परास्त करके 1713 ई. में तख्त पर बैठा। वह 10 माह में ही सैयद बंधुओं द्वारा तख्त से हटा दिया गया।

    इस प्रकार 1713 ई. में अमीरों द्वारा बादशाह की हत्या करके अपनी पसंद के शहजादों को मुगल तख्त पर बैठाने का जो सिलसिला आरम्भ किया, वह 1806 ई. में अकबर (द्वितीय) के तख्त पर बैठने के बाद ही समाप्त हुआ। जहाँदारशाह के बाद उसके मृत भाई अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रूखसियर (1713-19 ई.) को बादशाह बनाया गया। अब फर्रूखसियर और सैयद भाइयों में सत्ता के लिये खुलकर संघर्ष हुआ। फर्रूखसियर ने सैयद भाइयों से मुक्त होने का प्रयास किया परन्तु सैयद भाइयों ने मराठों तथा राजपूतों के सहयोग से उसे मार डाला। इसके बाद सैयदों ने 1719 ई. में, एक ही वर्ष में एक-एक करके रफी-उद्-दरजात, रफीउद्दौला और मुहम्मदशाह रंगीला को तख्त पर बैठाया।

    नादिरशाह का आक्रमण

    मुहम्मदशाह 1748 ई. तक राज्य करता रहा। उसके समय में 1739 ई. में नादिरशाह का आक्रमण हुआ। नादिरशाह भारत से लगभग 70 करोड़ रुपये की सम्पदा लूटकर ले गया जिसमें कोहिनूर हीरा तथा शाहजहाँ का तख्ते-ताउस भी सम्मिलित था। नादिरशाह के आक्रमण से मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा और स्थायित्व को गहरा धक्का लगा। मुहम्मदशाह के पश्चात् अहमदशाह ने 1748 से 1754 ई. तक तथा आलमगीर (द्वितीय) ने 1754 से 1759 ई. तक दिल्ली पर शासन किया परन्तु दोनों में से किसी में भी इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि साम्राज्य के पतन को रोक सके।

    क्षेत्रीय राज्यों का उदय

    मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए राजपूतों, सिक्खों, मराठों तथा मुगल अमीरों ने अपने-अपने राज्यों की स्थापना करने एवं उन्हें मजबूत बनाने का प्रयत्न किया। अनेक महत्त्वाकांक्षी सामन्तों एवं सूबेदारों ने स्वतंत्र तथा अर्द्ध-स्वंतत्र राज्यों की स्थापना की। ये लोग दिल्ली के बादशाह के प्रति नाममात्र की निष्ठा रखते थे। यह सिलसिला 1712 ई. में बहादुरशाह (प्रथम) की मृत्यु के बाद ही आरम्भ हो गया था। इसके परिणाम स्वरूप उत्तर एवं दक्षिण भारत में अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से कुछ राज्यों के शासक, मुगल सल्तनत से पृथक् राज्य स्थापित करने के बाद भी मुगल सल्तनत के अन्तर्गत बने रहने की घोषणा करते रहे।

    हैदराबाद

    निजाम-उल-मुल्क: दक्षिण भारत में हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना औरंगजेब के मनसबदार चिनकुलीचखाँ ने की। औरंगजेब की मृत्यु के समय वह बीजापुर में था। बहादुरशाह (प्रथम) ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद चिनकुलीच खाँ ने जहाँदारशाह के विरुद्ध फर्रूखसियर की सहायता की। अतः फर्रूखसियर ने बादशाह बनने पर चिनकुलीचखाँ को दक्षिण भारत के छः सूबों की सूबेदारी तथा खानखाना और निजाम-उल-मुल्क बहादुर फतहजंग की उपाधियाँ प्रदान कीं।

    1715 ई. में उसे पुनः दिल्ली बुलाया गया। उसे पहले मुरादाबाद की और फिर मालवा की सूबेदारी दी गई। चिनकुलीचखाँ (निजाम-उल-मुल्क) ने मालवा में अपनी शक्ति का विस्तार किया जिससे सैयद भाई उससे ईर्ष्या करने लगे। सैयद भाइयों ने बादशाह फर्रूखसियर पर दबाव डालकर दिलावरखाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त करवा दिया। निजाम-उल-मुल्क ने इसका विरोध किया और उसने एक युद्ध में दिलावरखाँ को मार डाला।

    निजाम-उल-मुल्क ने बुरहानपुर और असीरगढ़ के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार वह दक्षिण-पथ का स्वामी बन गया। फर्रूखसियर के बाद मुहम्मदशाह को बादशाह बनाया गया। मुहम्मदशाह ने सैयद भाइयों को समाप्त कर दिया और निजाम-उल-मुल्क को वजीर का पद देकर दिल्ली बुलाया।

    निजाम-उल-मुल्क दिल्ली आकर सल्तनत का काम करने लगा। वह सल्तनत की व्यवस्था सुधारना चाहता था किंतु मुहम्मदशाह को शीघ्र ही कुछ लोगों ने निजाम-उल-मुल्क के विरुद्ध भड़का दिया। इस कारण मुहम्मदशाह, निजाम-उल-मुल्क को नापसंद करने लगा और उसके सामने ही उसका उपहास करने लगा। बादशाह सरेआम लोगों से कहता था- 'देखो दक्षिण का गधा कितना सुंदर नाचता है।' इस कारण निजाम-उल-मुल्क नाराज होकर पुनः दक्षिण भारत चला गया। दक्षिण के नये

    सूबेदार मुबारिजखाँ ने उसका विरोध किया किंतु निजाम-उल-मुल्क ने मराठों की सहायता से मुबारिजखाँ को परास्त कर दिया। इस पर मुहम्मदशाह की आंखें खुलीं। उसने निजाम को अपने पक्ष में करने के लिये दक्षिण के 6 सूबे प्रदान किये।

    निजाम ने हैदराबाद को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र रूप से शासन व्यवस्था स्थापित कर ली। इस प्रकार लगभग 1720 ई. के लगभग हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। निजाम ने अपने राज्य की सीमाएँ ताप्ती नदी से लेकर कर्नाटक, मैसूर और त्रिचनापल्ली तक बढ़ा लीं। निजाम ने यद्यपि पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया किंतु उसने न तो अपने नाम के सिक्के चलाये और न राजछत्र धारण किया। उसने मुगल बादशाह से सम्बन्ध विच्छेद भी नहीं किया।

    बंगाल, बिहार और उड़ीसा

    मुर्शीदकुलीखाँ: 1707 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ बंगाल का नायब नाजिम तथा उड़ीसा का नाजिम था। 1713 ई. में फर्रूखसियर के शासनकाल में उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया। उसके समय में बंगाल में शांति रही और व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

    शुजाउद्दीन मुहम्मद: 1727 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ की मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मदखाँ बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बना। मुहम्मदशाह रंगीला ने 1733 ई. में उसे बिहार का सूबा भी दे दिया। इस प्रकार, बंगाल, उड़ीसा और बिहार तीनों सूबे उसके शासन के अन्तर्गत चले गये तथा केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव नाममात्र का रह गया। उसके शासनकाल में भी इन सूबों में शान्ति बनी रही।

    सरफराजखाँ: शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद 1739 ई. में उसका पुत्र सरफराजखाँ सूबेदार बना। वह अत्यधिक विलासी प्रवृत्ति का था। इस कारण शासन व्यवस्था बिगड़ गई। ऐसी स्थिति में बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दीखाँ ने उस पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सरफराजखाँ परास्त हुआ और मारा गया।

    अलीवर्दीखाँ: अलीवर्दीखाँ ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के तीनों सूबों पर अधिकार कर लिया। मुहम्मदशाह ने भी उसे सूबेदार स्वीकार कर लिया। अलीवर्दीखाँ ने 1740 से 1756 ई. तक शासन किया। उसे मराठों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। नागपुर का रघुजी भोंसले, जो पेशवा का प्रतिद्वन्द्वी था, ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर धावे मारने आरम्भ कर दिये। रघुजी के प्रतिनिधि भास्कर पन्त ने अलीवर्दीखाँ की सेना को कई बार परास्त किया। अलीवर्दीखाँ ने षड्यन्त्र रचकर भास्कर पन्त सहित कई मराठा सरदारों को मरवा दिया। इस पर क्रोधित होकर रघुजी भौंसले ने तीनों सूबों को बुरी तरह से रौंदा। अंत में अलीवर्दीखाँ को रघुजी से समझौता करना पड़ा तथा उड़ीसा का सूबा मराठों को सौंपना पड़ा। साथ ही बंगाल तथा बिहार की चौथ के बदले में रघुजी को 12 लाख रुपये वार्षिक देने का वचन देना पड़ा। अलीवर्दीखाँ को बंगाल का नवाब बनाने में हिन्दू व्यापारियों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। अतः अलीवर्दीखाँ ने भी अपने शासन में रायदुर्लभ, जगत सेठ, मेहताबराय, स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा मानिकचन्द्र आदि हिन्दुओं को उच्च पद दिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रभाव का मुख्य कारण बंगाल के व्यापार पर उनका एकाधिकार होना था।

    सिराजुद्दौला: अलीवर्दीखाँ ने अपने जीवनकाल में ही अपनी छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। अतः 1756 ई. में अलीवर्दीखाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने से रोका। इस कारण सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच प्लासी का युद्ध हुआ। अवध

    सआदतखाँ: अवध राज्य की स्थापना मीर मोहम्मद अमीन सआदत बुरहान-उल-मुल्क ने की जिसे सआदतखाँ भी कहते हैं। वह मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था। वह निजाम-उल-मुल्क का प्रतिद्वन्द्वी था। मीर मोहम्मद ने सैयद बन्धुओं के पतन में योगदान दिया था। इसके बदले में उसे सआदतखाँ की उपाधि तथा आगरा की सूबेदारी मिली। 1722 ई. में उसे अवध की सूबेदारी मिली। इसी समय से अवध राज्य का स्वतंत्र इतिहास प्रारंभ होता है। सआदतखाँ ने दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भाग लिया। 1732 ई. में उसने उत्तरी भारत में मराठों के प्रसार को रोकने के सम्बन्ध में बादशाह मुहम्मदशाह के समक्ष कुछ प्रस्ताव रखे परन्तु अन्य अमीरों के विरोध के कारण उसे सफलता नहीं मिली।

    बादशाह ने उसे पेशवा बाजीराव के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये। सआदतखाँ ने मार्च 1737 में मराठों की एक छोटी सी सेना को परास्त किया तथा बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को झूठी सूचना भिजवा दी कि उसने पेशवा बाजीराव को चम्बल के उस पार खदेड़ दिया है। जब बाजीराव को इस बात की जानकारी हुई तो उसने क्रोधित होकर दिल्ली पर धावा बोल दिया तथा सआदतखाँ की पोल खोल दी। इस घटना से मुगल दरबार में सआदतखाँ की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। इसका बदला सआदतखाँ ने नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण हेतु उकसाकर तथा उसके हाथों मुहम्मदशाह का अपमान करवा कर लिया। 1739 ई. में सआदतखाँ की मृत्यु हो गई।

    सफदरजंग: सआदत खाँ के बाद उसका भतीजा एवं दामाद सफदरजंग अवध का सूबेदार बना। 1748 ई. में मुगल बादशाह अहमदशाह ने उसे सल्तनत का वजीर नियुक्त किया। कुछ समय बाद उसे इलाहबाद का सूबा भी दे दिया। सफदरगंज ने अवध की सीमा पर स्थित रूहेलखण्ड में बसे हुए रूहेलों और फर्रूखाबाद के पठानों को दबाने का प्रयास किया। ये लोग अवध के क्षेत्रों में लूटमार करते रहते थे। सफदरगंज ने इस कार्य में जयप्पा सिन्धिया, मल्हारराव होलकर तथा जाट राजा सूरजमल का सहयोग लिया। 22 अप्रैल 1752 को सफदरगंज ने अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों से समझौता किया परन्तु बादशाह ने उस समझौते को रद्द करके पंजाब, अब्दाली को सौंप दिया। इस पर बादशाह और वजीर में अघोषित युद्ध छिड़ गया जिसमें वजीर परास्त हो गया तथा अपना पद त्यागकर अपने सूबे अवध को चला गया। अक्टूबर 1754 में उसकी मृत्यु हो गई।

    शुजाउद्दौला: सफदरजंग की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शुजाउद्दौला अवध का नवाब बना। उसके समय में अवध की राजनीति में गम्भीर परिवर्तन हुए। उसने मुगल शाहजादे अलीगौहार को अवध में शरण दी तथा पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया। अलीगौहर ने बादशाह बनने के बाद 1762 ई. में शुजाउद्दौला को वजीर के पद पर नियुक्त किया। शुजाउद्दौला ने बंगाल के नवाब मीर कासिम को अपने राज्य में शरण दी और अंग्रेजों के विरुद्ध बक्सर तथा कड़ा के युद्ध लड़े। इन युद्धों में शुजाउद्दौला की पराजय हुई। तब से अवध अँग्रेजों के प्रभाव में चला गया।

    बड़ौदा

    गुजरात मुगल सल्तनत के समृद्ध सूबों में से था किन्तु केन्द्रीय शक्ति के ह्रास के कारण गुजरात पर नियंत्रण बनाये रखना कठिन हो गया। जब मराठों को गुजरात से चौथ वसूली का अधिकार दिया गया तो मराठों का प्रभाव और अधिक बढ़ गया। गुजरात के तत्कालीन सूबेदार महाराजा अभयसिंह ने मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने का प्रयास किया किंतु महाराजा को 1733 ई. के युद्ध में बुरी तरह परास्त होना पड़ा और वह गुजरात का शासन अपने अधिकारियों को सौंपकर जोधपुर चला गया। 1735 ई. तक मराठे गुजरात के वास्तविक शासक बन गये। आगे चलकर गुजरात में बड़ौदा राज्य स्थापित हुआ जिस पर गायकवाड़ परिवार ने शासन किया।

    मालवा

    मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण दिल्ली दरबार का कोई भी अमीर मालवा में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं कर पाया। 1724 ई. के बाद पेशवा के तीन सेनानायकों- होलकर, सिन्धिया और पंवार ने क्रमशः इन्दौर, ग्वालियर और धार में मराठा शक्ति का विस्तार किया। आगे चलकर तीनों, स्वतंत्र मराठा राज्यों में बदल गये।

    पंजाब

    पंजाब के सूबेदार जकारियाखाँ ने लम्बे समय तक पंजाब में शान्ति बनाये रखी परन्तु 1737 से 1739 ई. तक नादिरशाह और 1752 से 1761 ई. तक अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों से पंजाब की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। दिल्ली दरबार की दलबन्दी और मुहम्मदशाह रंगीला की निर्बलता के कारण पंजाब में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी।

    राजपूताना

    बाबर के समय से ही मेवाड़ राज्य, मुगलों से पर्याप्त दूरी बनाये हुए था। औरंगजेब की धूर्त्तता और मक्कारी पूर्ण गतिविधियों के चलते जोधपुर, बीकानेर, आम्बेर तथा बूंदी आदि राजपूत राज्य, मुगलों से लगातार दूर होते जा रहे थे। फिर भी वे मुगल राजनीति में भाग लेते रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह तथा मारवाड़ नरेश अभयसिंह, मुगलों की सूबेदारी स्वीकार करते रहे तथा मराठों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करते रहे परन्तु मराठे निरंतर आगे बढ़ते रहे जिसके कारण केन्द्रीय राजनीति में राजपूत राज्यों की भूमिका गौण हो गई तथा राजपूताना राज्यों के शासक अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र शासक की भांति शासन करने लगे।

    मैसूर

    1565 ई. में तालीकोट के युद्ध के बाद विजयनगर राज्य का विघटन हो गया तथा मैसूर का हिन्दू राज्य अस्तित्त्व में आया था। 1704 ई. में मैसूर को औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। 1750 ई. के आसपास मैसूर पर चिकाकृष्णराज का शासन था। वह नाममात्र का शासक था। शासन की समस्त शक्तियाँ देवराज और नन्दराज नामक दो भाइयों के हाथों में थी। बाद में नन्दराज, राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। उस समय हैदरअली, नन्दराज की सेना में नायक के पद पर काम करता था। हैदरअली अनपढ़ होते हुए भी चतुर व्यक्ति था। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर नन्दराज ने उसे डिण्डुगल दुर्ग का फौजदार नियुक्त किया।

    1761 ई. में हैदरअली ने मैसूर के दीवान खाण्डेराव तथा राजमाता से मिलकर नन्दराज को परास्त कर दिया। नन्दराज के पराभव के बाद हैदरअली ने शासन, राजमाता को सौंपने के स्थान पर स्वयं अपने हाथ में ले लिया। हैदरअली ने दीवान खाण्डेराव को बंदीगृह में डाल दिया तथा स्वयं राजा के नाम पर शासन करने लगा।

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  • अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति :

     21.08.2017
    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति :

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय: 3

    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति 

    जहाँ एक ओर यूरोपीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यूरोपीय जातियों ने भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये भारत में प्रवेश किया वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी और अँग्रेजों की शोषणकारी नीतियों ने भारत की आर्थिक स्थिति को पतन के गर्त में पहुँचा दिया। ये दोनों ही बातें सही नहीं हैं। अँग्रेजों के आगमन के समय अर्थात् सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते समय निम्नलिखित तथ्य ध्यान में रखे जाने चाहिये-

    (1.) विगत 9 शताब्दियों अर्थात् अंग्रेजों के भारत में आने से पहले की 9 शताब्दियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा लगातार किये जा रहे आक्रमणों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो चुकी थी। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, चंगेजखाँ, तैमूरलंग, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली आदि आक्रांताओं द्वारा उत्तरी एवं पश्चिमी भारत में भयानक लूटमार मचाने, कत्ले आम मचाने, भारत के मंदिरों, राजाओं और सेठों का धन पशुओं पर लाद कर अपने देश ले जाने तथा कामगारों को पकड़कर ले जाने के कारण देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी तथा भारत के उद्योग-धंधों को गहरे घाव पहुँचे थे।

    (2.) दिल्ली सल्तनत तथा मुगलिया सल्तनत के अधिकांश मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू किसानों, हिन्दू व्यापारियों एवं हिन्दू तीर्थ-यात्रियों पर अधिक से अधिक कर लगाये जाने तथा मुस्लिम व्यापारियों एवं किसानों को विभिन्न प्रकार के करों में छूट दिये जाने के कारण बहुसंख्य हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी।

    (3.) बाबर से लेकर अकबर तक के लगभग 80 साल के शासनकाल में तथा औरंगजेब के 50 साल के शासन काल में अनवरत युद्ध चलते रहे। इन युद्धों के चलते, देश में समृद्धि कैसे बची रह सकती थी! जहाँ-जहाँ मुगल सेनाओं का पड़ाव रहा अथवा जिन राज्यों पर उनके आक्रमण हुए, वहाँ-वहाँ की खेतियां उजड़ गईं, उद्योग धंधे ठप्प हो गये तथा लोग अपने घरों को छोड़कर दर-दर भटकने पर विवश हो गये। इन कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी।

    (4.) किसानों तथा उनके परिवारों के द्वारा हाड़-तोड़ मेहनत करके जो अनाज उगाया जाता था, उसे बादशाहों, नवाबों, राजाओं तथा जागीरदारों के आदमियों द्वारा कर के रूप में लूट लिया जाता था। भू-राजस्व एवं कर चुकाने के बाद किसानों तथा उनके परिवारों के पास पेट भरने के लिये पर्याप्त अनाज नहीं बचता था।

    (5.) केन्द्रीय मुगल शासन की अराजकता, प्रांतीय मुस्लिम शासकों की कट्टरता, लगातार हो रहे अफगान आक्रमण, मराठों की लूट-खसोट, व्यापारिक चुंगी, स्थानीय करों की अधिकता तथा हिन्दुओं के साथ धार्मिक भेदभाव के उपरांत भी खेती तथा कुटीर धंधे केवल इसलिये चल रहे थे और लोग इसलिये जीवित थे कि जन साधारण में पूरा परिवार, साल के प्रत्येक दिन और दिन के अधिकांश समय में किसी न किसी काम में लगा रहता था।

    (6.) चारों ओर मची हुई लूट-मार के कारण बादशाहों, सूबेदारों, राजाओं एवं जागीरदारों के पास धन की आवक लगी रहती थी तथा जन साधारण दिन पर दिन निर्धन होता जा रहा था।

    भू-स्वामित्व

    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में सिद्धान्ततः शासक समस्त भूमि का स्वामी था परन्तु व्यावहारिक रूप में भूमि पर काश्त करने वाले जब तक भूमि कर (लगान) देते रहते थे, तब तक वे भूमि के मालिक बने रहते थे। सामान्य रूप से किसान न तो भूमि को बेच सकते थे और न उससे अलग हो सकते थे। डॉ. नोमान अहमद सिद्दीकी का मत है कि किसानों को जमीन बेचने और बन्धक रखने जैसे अधिकार नहीं थे। फिर भी किसानों का एक वर्ग जिसे मौरूसी कहा जाता था, इस प्रकार के अधिकारों का दावा करता था, जिन्हें दखलदारी का अधिकार (ओक्यूपेंसी राइट्स) कहा जा सकता है। सामान्यतः किसानों को बेदखल नहीं किया जाता था और उनके वंशजों का उनके खेतों पर उत्तराधिकार होता था। कुछ ऐसे किसान भी थे जो जमींदारों की अनुमति से खेत जोतते थे। उन्हें जमींदार अपनी इच्छा से कभी भी बेदखल कर सकता था। वस्तुतः कृषकों का वर्गीकरण कई स्तरों एवं श्रेणियों में हो सकता था।

    भूमि की श्रेणियाँ और किस्म

    कृषि भूमि को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था- (1.) खालसा भूमि और (2.) गैर-खालसा भूमि (जागीर, सासण आदि)। मुगलों के शासनकाल में जागीरदार अर्द्ध-स्वतंत्र शासक थे। बादशाह उनके आन्तरिक शासन में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता था। खालसा भूमि बादशाह के नियंत्रण में होती थी। मालगुजारी निश्चित करने के लिये भूमि को पोलज, परती, चाचर एवं बंजर में बाँटा गया था। यह वर्गीकरण भूमि को जोतने पर आधारित था। पोलज वह भूमि थी जिसे प्रत्येक वर्ष जोता जाता था। परती भूमि को कुछ समय के लिये बिना जोते ही छोड़ दिया जाता था। चाचर भूमि तीन-चार साल के लिए बिना जोते हुए छोड़ दी जाती थी। बंजर भूमि वह थी जिस पर पाँच साल से भी अधिक समय तक कोई उपज नहीं होती थी। प्रथम दो प्रकार की भूमियों (पोलज तथा परती) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया- अच्छी, मध्यम और खराब। इन तीनों श्रेणियों की प्रति बीघा औसत उपज को पोलज तथा परती के प्रति बीघा की सामान्य उपज मान लिया गया था। इन दोनों श्रेणियों की भूमि में विशेष अन्तर नहीं था; क्योंकि जिस वर्ष भी परती भूमि पर खेती की जाती थी, उसकी उपज पोलज के समान ही हुआ करती थी। चाचर भूमि में जब पहले साल खेती होती थी तो निश्चित दर का 2/5 भाग लिया जाता था और पाँच साल खेती होने के पश्चात् उस पर सामान्य दर से मालगुजारी ली जाती थी। बंजर भूमि पर भी पाँच साल के बाद पूरी दर से मालगुजारी ली जाती थी।

    कृषि का तरीका और फसलें

    अँग्रेजों के भारत में आने के समय पुराने ढंग से खेती की जाती थी। कृषि कार्यों में हल, खुरपी, पटेला, हंसिया तथा बैलों की जोड़ी काम में लाये जाते थे। अधिकांशतः खेती वर्षा पर निर्भर थी। सिंचाई के लिये बहुत कम नहरें उपलब्ध थीं। वर्षा के अभाव में प्रजा संतप्त हो जाती थी। किसानों का जीवन कष्टमय तथा मंथर गति से चलने वाला था। ग्रामवासियों की आवश्यकताएँ गाँव में ही पूर्ण होती थीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना नियत कार्य करता था। किसान खेत जोतता, बोता तथा काटता था। उस समय की मुख्य फसलों में गेहूं, बाजरा, मक्का, चावल, कपास, मटर, तिलहन, गन्ना आदि थे। फलों में आम, अँगूर, अनार, केले, खरबूजा, अंजीर, नींबू, खिरनी, जामुन आदि होते थे। औषधीय फसलों में जड़ी-बूटियाँ, मसाले और सुगन्धित काष्ठ उत्पन्न होते थे। अनाज-भण्डारण का सामान्य तरीका गड्ढों या खत्तियों में रखने का था जिससे अनाज लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था।

    किसानों की स्थिति

    अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में किसानों की स्थिति अच्छी नहीं थी। राजनीतिक अस्थिरता, मराठों द्वारा की जाने वाली लूटपाट तथा केन्द्रीय नेतृत्व की कमजोरी के कारण स्थानीय शासक किसानों से बलपूर्वक कर वसूल करते थे। जिन क्षेत्रों पर मराठों के आक्रमण अधिक होते थे, वहाँ किसानों की स्थिति अधिक खराब थी। जब किसान स्थानीय शासक को कर चुका देते थे तो मराठे चौथ वसूली के लिये आ धमकते थे और यदि मराठे पहले लूट लेते थे तो बाद में स्थानीय शासक कर मांगता था। इस कारण बहुत से स्थानों पर खेती उजड़ गई थी। अठारहवीं शताब्दी में किसान का जीवन दरिद्र, घिनौना, दयनीय तथा अनिश्चित था। बहुत से किसान बर्बाद होकर डाकू बन जाते थे जो बड़े-बड़े दल बनाकर, प्रजा को लूटते फिरते थे।

    शिल्प तथा उद्योग

    भारत के गाँवों, कस्बों तथा शहरों में काम करने वाले शिल्पी तथा उद्यमी अपने पुराने जातिगत एवं परम्परागत कार्य करते थे। उनके औजार भी बहुत पुराने ढंग के थे। देश में बड़े पैमाने पर किसी उद्योग का विकास नहीं हुआ था। अधिकांश उद्योग स्थानीय रूप में थे जो पिता से पुत्र को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किये जाते थे। देश के कई शहर और क्षेत्र अपने विशिष्ट और श्रेष्ठ उत्पादों के लिये प्रसिद्ध हो गये थे। कई शाही कारखाने भी थे जो फारस देश के ढंग के अनुसार मुस्लिम शासकों द्वारा स्थापित किये गये थे। इन कारखानों में शाही तथा दरबारी लोगों की आवश्यकता की चीजें बनाई जाती थी। इनमें सुनार, किमखाब या रेशम तैयार करने वाले, कसीदाकारी करने वाले, चित्रकार, दर्जी, मलमल तथा पगड़ी बनाने वाले इत्यादि अनेक प्रकार के कारीगर होते थे, जो साथ मिलकर तथा अलग-अलग काम करते थे। प्रान्तों में भी स्थानीय माँग के अनुसार विभिन्ना प्रकार की वस्तुएं बनाने के कारखाने थे। इनमें बनने वाली वस्तुएं उच्च अधिकारियों को भेंट की जाती थीं।

    व्यापार एवं वाणिज्य

    भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय व्यापार एवं वाणिज्य के विषय में बहुत ही कम जानकारी मिलती है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार अँग्रेजों के आगमन के समय भारत का आन्तरिक एवं बाह्य, दोनों प्रकार का व्यापार उन्नति पर था। देश की आवश्यकताओं को पूरा करने के पश्चात् जो सामग्री शेष बचती, उसका निर्यात किया जाता था। यातायात एवं परिवहन की समस्या व्यापारियों तथा सामान ले जाने वाले साधनों के द्वारा पूर्ण हो जाती थी। देश में व्यापार के लिये अनेक मार्ग थे जो स्थानीय शासक द्वारा कर लेकर सुरक्षित रखे जाते थे।

    आन्तरिक व्यापार

    अँग्रेजों के आगमन के समय राजनीतिक अस्थिरता होने के उपरांत भी, भारत का आन्तरिक व्यापार काफी विस्तृत था। इस समय भी वैश्य वर्ग प्रमुख व्यापारी था। उत्तर भारत में व्यापार गुजरातियों एवं मारवाडि़यों द्वारा तथा दक्षिण में चेतियों द्वारा होता था। प्रत्येक गाँव में छोटा बाजार होता था, जहाँ छोटी-छोटी वस्तुओं का व्यापार होता था। कुछ दुकानंे चलती-फिरती होती थीं, जो घोड़े की पीठ पर लगाई जाती थीं। महत्त्वपूर्ण वस्तुओं का व्यापार शहर की मण्डियों में होता था। विभिन्न स्थानों पर साल भर में कुछ निश्चित मेले लगते थे जिनमें दूर-दूर से व्यापारी आते थे और खूब व्यापार होता था। फेरी लगाकर माल बेचने वाले तथा इस प्रकार के अन्य व्यापारी भी उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। बन्जारों के काफिले बैलों पर अनाज, चीनी, नमक आदि लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते थे। कई बार ये काफिले 20 से 30 हजार बैलों के होते थे। व्यापारी भी काफिलों में इधर-उधर जाते थे। भारत के महत्त्वपूर्ण व्यापारी गुजराती, मारवाड़ी और मुल्तानी थे। विदेशी मुसलमान व्यापारियों को खुरासानी कहा जाता था। वे मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली जैसे बड़े नगरों के बाजारों में माल की आपूर्ति करते थे।

    माल परिवहन के साधन

    उस काल में परिवहन के साधन बहुत कम थे। व्यापारिक माल प्रायः कच्ची एवं धूलभरी सड़कों से ले जाया जाता था। शासकों द्वारा मार्ग के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये जाते थे। यात्रियों एवं व्यापारियों की सुविधा के लिये स्थान-स्थान पर सरायें बनाई जाती थीं। इन स्थानों पर पशुओं के लिये चारा एवं पेयजल भी उपलब्ध रहता था। यात्रियों एवं व्यापारियों को मार्ग दिखाने के लिये छोटी-छोटी अटारी अथवा मीनार बने हुए थे। राजपूताने के भाट एवं चारण, खतरनाक सड़कों पर काफिलों का मार्ग-दर्शन तथा सुरक्षा करते थे। नदियां भी माल के परिवहन के लिये सस्ता साधन थीं। काश्मीर, बंगाल, सिन्ध तथा पंजाब में अधिकांश सामान नदी मार्ग से परिवहन किया जाता था। बंगाल में गंगा तथा ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियां, नेपाल की तराई में गण्डक, बिहार में कोसी, पंजाब में रावी, चिनाव, झेलम, सतलुज एवं व्यास, मध्य भारत में नर्मदा तथा चम्बल, दक्षिण में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि विभिन्न नदियों के माध्यम से बड़ी मात्रा में व्यापारिक माल का परिवहन होता था। बंगाल में नावों के बड़े बेड़े होते थे। यमुना में चौरस पेंदी की कुछ नावें 100 टन तक भारी होती थीं। गंगा में 400-500 टन भारी नावें चलती थीं। थट्टा से लाहौर तक जाने में 6-7 सप्ताह का समय लगता था, जबकि वापसी यात्रा में केवल 18 दिन लगते थे।

    सड़कों पर सुरक्षा

    केन्द्रीय, प्रान्तीय एवं स्थानीय शासक अपने-अपने क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने में रुचि लेते थे ताकि उनके क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आ सके तथा सरकार को अधिक आय हो सके। इस कारण सड़कों को सुरक्षित बनाने के प्रयत्न किये जाते थे परन्तु फिर भी लुटेरों का भय बना रहता था। इसलिये व्यापारी अपने काफिलों के साथ सशस्त्र सुरक्षा प्रहरी रखते थे तथा स्थानीय शासकों को शुल्क देकर उनसे सुरक्षा प्राप्त करते थे।

    चुंगी

    आंतरिक एवं बाह्य व्यापार हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाने एवं बाजार में विक्रय करने पर स्थान-स्थान पर चुंगी ली जाती थी। चुंगी के अतिरिक्त समस्त बड़े बाजारों तथा बन्दरगाहों पर अन्य शुल्क भी देने पड़ते थे। औरंगजेब ने इसकी मात्रा हिन्दू व्यापारियों के लिये पहले की अपेक्षा दो गुनी कर दी तथा मुसलमान व्यापारियों के लिये बिल्कुल हटा दी। इस कारण हिन्दुओं को व्यापार में कम लाभ होता था।

    व्यापार का स्वरूप

    अँग्रेजों के आगमन के समय देश के विभिन्न भागों के बीच व्यापार की स्थिति अच्छी थी। एक स्थान पर उत्पन्न होने वाली सामग्री को देश के विभिन्न भागों एवं देश से बाहर भेजा जाता था। बंगाल, से खाद्य वस्तुएँ, चावल, चीनी तथा मक्खन का समुद्री व्यापार होता था। ये वस्तुएँ कोरोमंडल, केपकामरिन के क्षेत्र से होती हुई कराची तक जाती थीं। बंगाल से चीनी गुजरात को तथा गेहूं दक्षिण भारत को जाते थे। पटना को चावल और सिल्क के बदले में गेहूं, चीनी तथा अफीम प्राप्त होती थी। केरल अफीम का आयात करता था। सत्रहवीं सदी में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिये आगरा अत्यंत प्रसिद्ध केन्द्र था। यह बंगाल और बिहार से कच्ची सिल्क, चीनी, चावल, गेहूं तथा मक्खन आदि वस्तुओं का व्यापार करता था। आगरा, देश तथा विदेशों में उत्तम प्रकार के नीले रंग के लिये बहुत प्रसिद्ध था। इसके समीपवर्ती क्षेत्रों जैसे- हिन्दुआन, बयाना, पंचूना, बिसौर तथा खनवा में गेहॅूँ पैदा होता था। यहाँ से गेहूं भारत के विभिन्न बन्दरगाहों तथा विदशों को भेजा जाता था। व्यापार के अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र लाहौर तथा मुल्तान थे। वास्तव में काबुल, कन्धार तथा फारस से होने वाला समस्त स्थल व्यापार इन नगरों से होकर होता था। लाहौर अपनी दरियों के लिये प्रसिद्ध था जबकि मुल्तान चीनी, अफीम, सूती माल तथा गन्धक के लिये प्रसिद्ध था। मुल्तान में सर्वोत्तम ऊँट उपलब्ध होते थे। गुजरात प्राचीनकाल से वाणिज्य का बड़ा और महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। इसके प्राकृतिक संसाधनों तथा उद्योगों ने इसे बंगाल की तरह धनी प्रांत बना दिया था। यह कपड़े की बुनाई का केन्द्र था। यहाँ के कपड़े गुजरात के मुख्य बंदरगाह कैम्बे द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत के दूसरे भागों को भेजे जाते थे। नील, शोरा तथा वस्त्रों के बदले विदेशी व्यापारी पश्चिम से विविध प्रकार की प्रसाधन सामग्री लाते थे जिन्हें गुजरात, दिल्ली, आगरा, राजस्थान तथा मालवा के हुजूर में भेजा जाता था। केरल काली मिर्चों का निर्यात तथा अफीम का आयात करता था। केरल में गुजरात, मालवा और अजमेर से गेहूं तथा दक्षिण व मलाबार से चावल मँगाया जाता था।

    पुलीकट का छपा हुआ कपड़ा बहुत बढि़या होता था जो गुजरात तथा मलाबार तट को भेजा जाता था। सिन्ध से भारत के विभिन्न भागों में गेहॅूँ, जौ, सूती कपड़े तथा घोड़े भेजे जाते थे और बदले में चावल, चीनी, इमारती लकड़ी तथा मसाले मँगाये जाते थे। काश्मीर में गुजरात, रावलपिंडी तथा लद्दाख से नमक, बुरहानपुर से अच्छा चावल तथा देश के विभिन्न भागों से चौड़े वस्त्र, गेहूं, दवाएँ, चीनी, तांबा, लोहा, तांबा, पीतल के बर्तन, शीशे का सामान, सोना, चाँदी और विलास की सामग्री मंगाई जाती थी। काश्मीर से आगरा तथा अन्य स्थानों को शॉल, ऊन तथा शोरा निर्यात होता था। इस प्रकार भारत के लगभग समस्त नगरों एवं विभिन्न राज्यों की राजधानियों के बीच उपयोगी वस्तुओं का व्यापार प्रचुर मात्रा में होता था।

    विदेशी व्यापार

    भारत का विदेशी व्यापार अत्यंत प्राचीन काल से विश्व भर के देशों से होता आया था। अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भी लंका, बर्मा, चीन, जापान, पूर्वी द्वीप समूह, नेपाल, फारस, मध्य एशिया, अरब और लालसागर के बन्दरगाहों तथा पूर्वी अफ्रीका से बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। कैम्बे, सूरत, भड़ौंच, गोआ, कालीकट, कोचीन, मछलीपट्टम, सतगाँव, सोनारगाँव तथा चटगाँव उस युग के प्रसिद्ध बन्दरगाह थे। लाहौर, मुल्तान, लाहरी बन्दर (सिन्ध), कैम्बे, पटना, अहमदाबाद तथा आगरा में बड़े-बड़े बाजार थे जहाँ विदेशों से वस्तुएँ आती थीं और फिर देश के विभिन्न भागों को भेजी जाती थीं। भारतीय वाणिज्य पूरी दुनिया की आंखों में चौंध पैदा करता था। इसी से प्रेरित होकर रूस के शासक पीटर महान (1682-1725 ई.) ने एक बार कहा था- 'याद रखो कि भारत का वाणिज्य विश्व का वाणिज्य है और ........ जो उस पर पूरा अधिकार कर सकेगा, वही यूरोप का अधिनायक होगा।'

    समुद्री मार्ग द्वारा व्यापार

    भारत को पश्चिमी देशों से मिलाने वाले दो मुख्य समुद्री मार्ग थे- (1.) फारस की खाड़ी से होकर तथा (2.) लालसागर से होकर। लालसागर वाला मार्ग थोड़ा दुष्कर था, अतः नाविक तथा सौदागर फारस की खाड़ी वाले मार्ग को पसन्द करते थे। यह मार्ग ईराक में बगदाद से आरम्भ होकर चीन में केन्टन तक जाता था। मनूची (1653-1708 ई.) ने लिखा है- 'अरब तथा फारस के जहाज खजूर, फल, घोड़े, समुद्री मोती तथा रत्न भारत में लाते थे, बदले में गुड़, चीनी, मक्खन, जैतून के फल तथा नारियल ले जाते थे।' भारत से कपड़ों का निर्यात प्रमुख रूप से होता था जबकि बहुमूल्य धातुएं, विभिन्न प्रकार के बर्तन एवं विविध उपयोगी सामग्री में प्रयुक्त होने वाली धातुएं, सौन्दर्य एवं प्रसाधन सामग्री बड़े स्तर पर आयात की जाती थी। भारतीय माल कोरोमण्डल समुद्री तट के रास्ते से फारस ले जाया जाता था।

    भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपास से निर्मित कपड़ा एवं अन्य वस्तुएँ, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लंवग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें विशेषकर गेंडे तथा चीते की खाल, चन्दन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थी। विदेशों में भारतीय कपड़ों की अच्छी माँग थी। फारस तथा मिस्र आदि अरब देशों को उत्तम प्रकार की मलमल निर्यात होती थी। मोरलैण्ड के अनुसार 17वीं शताब्दी में रुई के सामान का वार्षिक निर्यात लगभग 8000 गाँठें था जिनमें से 4,700 गाँठें यूरोपीय देशों को जाती थीं। इसी शताब्दी के अन्त में भारतीय ताफता (सिल्क) तथा बूटेदार कपड़ा इंग्लैण्ड को निर्यात होने लगा था। लाख (गोंद) बंगाल तथा उड़ीसा में कई स्थानों पर बनाई जाती थी जिसका निर्यात डचों द्वारा फारस को किया जाता था। बर्मा, जावा, चीन, मलाया तथा अरब को समुद्री मार्ग से भारतीय अफीम एवं काली मिर्च का निर्यात होता था। फारस एवं उसके आगे के देशों को स्थल मार्ग से अफीम एवं वस्त्र आदि वस्तुओं का निर्यात होता था। भारत से दुनिया भर के देशों को चीनी, शोरा, लोहा, इस्पात, हींग, आँवला, दवाएँ, बहुमूल्य पत्थर तथा संगमरमर भी निर्यात किया जाता था। भारत में बहुमूल्य धातुओं का आयात किया जाता था।

    वान् ट्विस्ट (1638 ई.) ने लिखा है- 'भारत में सोने तथा चाँदी की खानें नहीं थीं, इसलिये विदेशों से ये दोनों धातुएँ आयात की जाती थीं तथा उनके निर्यात पर रोक थी। एक अँग्रेज यात्री विलियम हार्किज (1608-13 ई.) ने लिखा है- 'भारत में चाँदी प्रचुर मात्रा में है क्योंकि यहाँ समस्त देश सिक्के लाते हैं और उनके बदले में वाणिज्यिक वस्तुएँ ले जाते हैं। ये सिक्के भारत में ही रखे जाते हैं, बाहर नहीं जाते हैं।' चीन, जापान, मलक्का तथा अन्य समीपवर्ती देशों से सोना मंगवाया जाता था। पेगू (बर्मा) से मूँगा तथा मोती एवं फारस तथा अरब देशों से विभिन्न प्रकार के रत्न मंगवाये जाते थे। लिस्बन से पारा आयात किया जाता था।

    स्थल मार्ग द्वारा व्यापार

    भारत में मध्य एशिया और अफगानिस्तान से सूखे मेवे तथा ताजे फल, अम्बर हींग, खुरखुरे लाल पत्थर आदि का आयात होता था। नेपाल से पशु तथा सींग, कस्तूरी, सोहागा, चिरैता (औषधि की जड़ी-बूटी), मजीह (रंग), इलायची, चौरीस (तिब्बती गाय की पूंछ), महीन रोंये, बाज पक्षी तथा बालचर (एक सुगन्धित घास) मंगवाया जाता था। भूटान से कस्तूरी तथा तिब्बती गाय की पूंछ का आयात होता था। पुर्तगाली डाकुओं की गतिविधियों के कारण बर्मा के साथ व्यापार में कमी आ गई थी। घोड़े आयात की महत्त्वपूर्ण वस्तु थे। तुर्किस्तान में रहने वाले अजाक लोग भारत में बेचने के लिये बड़े स्तर पर घोड़े पालते थे। ये घोड़े 6,000 अथवा इससे बड़े झुण्ड में भारत को भेजे जाते थे।

    व्यापार संतुलन

    व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में था। समस्त देशों के व्यापारी, भारतीय बन्दरगाहों पर आते थे तथा विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुओं- छींट के कपड़े, मसाले, काली मिर्च, गेहूँ, घी, जड़ी-बूटियाँ और गोंद आदि के बदले में सोना, चांदी तथा रेशम देेते थे। इसलिये भारत को बहुमूल्य धातुओं का कुण्ड कहा जाता था। व्यापार संतुलन को भारत की बजाय, यूरोप के पक्ष में करने के लिये ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी निर्यात सूची को बढ़ाने का आदेश दिया। इंग्लैण्ड में भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे की इतनी अधिक माँग थी कि उससे इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी। इसलिये ब्रिटिश संसद ने विशेष कानून बनाकर 29 सितम्बर 1701 से फारस, चीन तथा पूर्वी हिन्द द्वीप समूह के चित्रित, छपे हुए एवं रंगे हुए लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा दी।

    वास्कोडिगामा के भारत आगमन के बाद लगभग एक शताब्दी (1500-1600 ई.) तक भारतीय विदेशी व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। पुलीकट, कासिम बाजार, पटना, बालोसर, नागपट्टम तथा कोचीन में पुर्तगालियों की मुख्य फैक्ट्रियाँ थीं। अरब देशों के व्यापारी जो भारत में आने वाले प्रमुख विदेशी व्यापारी थे, लगभग पूरी तरह हटा दिये गये। हॉलैण्ड वाले भी 1603 ई. में भाग लेने लगे थे। इससे यूरोपीय देशों के साथ भारतीय व्यापार में वृद्धि हुई। अंग्रजों ने 1608 ई. में पहली बार भारत के लिये व्यापारिक यात्रा की। वे अपने साथ पांच जहाजों में कपड़े, टीन, शीशे, चामू-कैंची की वस्तुएँ, पारा, शीशा तथा चमड़ा लेकर आये। उन्होंने भारत में अलग-अलग स्थानों पर गोदाम स्थापित किये जिन्हें अँग्रेज व्यापारी फैक्ट्रियाँ कहते थे तथा भारतीय व्यापारी कारखाना कहकर पुकारते थे। फ्रांस ने भी भारत में अपनी फैक्ट्रियाँ स्थाापित कीं। इन फैक्ट्रियों से मांग के अनुसार माल की आपूर्ति नहीं हो सकी इसलिये यूरोपीय व्यापारियों द्वारा भारत के मुख्य वाणिज्यिक केन्द्रों पर एजेन्ट नियुक्त किये गये। उनके माध्यम से देश के विभिन्न भागांे से व्यापार किया जाने लगा।

    उद्योगों की स्थिति

    भारत में अँग्रेजी शासन की स्थापना के पहले भारतीय कुटीर एवं लघु उद्योग उन्नत अवस्था में थे। सत्रहवीं और अठारवीं सदी के पूर्वार्द्ध में देश स्वदेशी उद्योगों के लिये बाहर के देशों में भी विख्यात था। भारतीय माल की विदेशों में बड़ी माँग थी। देश में दो तरह के उद्योग विकसित थे- ग्रामीण उद्योग तथा शहरी उद्योग। ग्रामीण उद्योग आम आदमी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शहरी उद्योगों द्वारा कला-कौशलपूर्ण वस्तुओं का निर्माण होता था। ये उद्योग विलासिता का सामान बनाने में अग्रणी थे। देश के कपास उत्पादक क्षेत्रों, दूरस्थ गाँवों और शहरों में कपड़ा तैयार किया जाता था। गांव-गांव और शहर-शहर में हाथकरघा पर मोटा कपड़ा यथा गाढ़ा एवं रेजी तैयार किये जाते थे। विभिन्न शिल्पों में लगे कारीगरों में से लगभग दो-तिहाई बुनकर थे। ग्रामीण उद्योगों की तुलना में नगरीय उद्योग अधिक संगठित थे और गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक अच्छा माल तैयार करते थे।

    कपड़ा उद्योग : भारतीय बुनकर नरम से नरम, महीन से महीन और मोटे से मोटा कपड़ा तैयार करने के लिये प्रसिद्ध थे। महीन कपड़े में मलमल सबसे विख्यात थी। इसके उत्पादन का मुख्य केन्द्र ढाका था। ढाका की मलमल विश्व भर में प्रसिद्ध थी। बीस गज लम्बे और एक गज चौड़े मलमल को एक अँगूठी में से निकाला जा सकता था। इस प्रकार की मलमल का थान तैयार करने में 6 माह लगते थे। आम उपयोग का कपड़ा गाँव-गाँव और शहर-शहर में बनाया जाता था परन्तु विशेष प्रकार का कपड़ा कुछ स्थानों पर ही तैयार होता था। इस प्रकार के केन्द्रों में ढाका, जहानाबाद (पटना के पास), बुलन्दशहर, सिकन्दराबाद, लखनऊ, बनारस, रायबरेली में जायस, फैजाबाद में पांडा, रामपुर, मुरादाबाद, कानपुर, प्रतापगढ़, शाहपुर, अलीपुर, मेरठ, आगरा, दिल्ली, रोहतक, ग्वालियर, चंदेरी, इन्दौर और दक्षिण भारत में आर्नी, हैदराबाद, रायचूर, सेलभ, तंजौर तथा मदुरा विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। इन केन्द्रों पर विभिन्न डिजाइनों और किस्मों का अच्छा कपड़ा तैयार होता था। देश में कताई-बुनाई रंगाई, छपाई, सोना एवं चाँदी के धागों का निर्माण भी बड़े स्तर पर होता था।

    रेशम वस्त्र उद्योग : भारत में बहुत कम रेशम पैदा होता था इसलिये रेशम का बाहर से आयात किया जाता था किंतु भारत में बना रेशम का कपड़ा पुनः बड़ी मात्रा में निर्यात किया जाता था। बनारस, आगरा, लाहौर, पाटियाला, अमृतसर, राजशाही, मुर्शीदाबाद, वीरभूमि, बर्दवान, बांकुड़ा और मिदनापुर रेशमी वस्त्र निर्माण के प्रसिद्ध केन्द्र थे। बनारस और आगरा वस्त्रों पर कढ़ाई के लिये तथा सबसे बढि़या रेशमी वस्त्र के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध थे। ऊनी वस्त्र उद्योग भी उन्नत अवस्था में था। पंजाब और राजस्थान में मोटे ऊनी कम्बल, गलीचे, रस्से आदि बनते थे। लाहौर, लुधियाना और अमृतसर में अनेक प्रकार की ऊनी वस्तुएँ- कम्बल, शॉल, कोट, मोजे, दस्ताने और सर्दियों में काम आने वाले अन्य कपड़े बनते थे। जयपुर, बीकानेर और जोधपुर के ऊनी कपड़े प्रसिद्ध थे।

    लौह उद्योग : भारत का लौह उद्योग काफी उन्नत था। भारत के लुहार लोहे की गलाई और ढलाई के कार्य में निपुण थे। स्थान-स्थान पर शस्त्र निर्माण, तोप निर्माण, जहाज निर्माण एवं कृषि उपकरण निर्माण के उद्योग थे। भारत में लोहे से बनी सामग्री लंदन तक जाती थी। महाराष्ट्र, आंध्र और बंगाल में जहाज निर्माण उद्योग विकसित हुआ। यूरोपीय कम्पनियाँ अपने उपयोग के लिये भारत में बने जहाज खरीदती थी। एक अंग्रेजी पर्यवेक्षक ने लिखा है- 'जहाज निर्माण में भारतीयों ने अँग्रेजों से जितना सीखा, उससे अधिक उन्हें पढ़ाया।' मिट्टी के बर्तन एवं मूर्तियाँ: भारत में मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और खिलौने बनाने का उद्योग भी विकसित था। बंगाल में खुलना, दिनाजपुर, रानीगंज; उत्तर प्रदेश में लखनऊ, रामपुर और अलीगढ़, दक्षिण में मद्रास, मदुरा और सेलम के कुम्हार विशेष किस्म के कलात्मक और मिट्टी के पक्के बर्तन बनाने में दक्ष थे।

    विविध उद्योग : लगभग पूरे देश में भवन-निर्माण, पत्थर और लकड़ी की नक्काशी, ईंट और चूना बनाने, कागज बनाने, सोना-चाँदी तथा जवाहरात के आभूषण बनाने, चीनी, नमक एवं नील बनाने, तांबा, पीतल, काँसा आदि की वस्तुएँ एवं बर्तन बनाने के उद्योग विकसित अवस्था में थे। विभिन्न प्रकार के बीजों से तेल निकालने का काम बड़े स्तर पर होता था। बाँस और चमड़ा उद्योग भी लोकप्रिय था। बाँस से विभिन्न वस्तुएँ बनाने का काम कुछ जातियों का वंशानुगत व्यवसाय था।

    निष्कर्ष

    उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय, नौ सौ साल से चल ही विदेशी आक्रांताओं की लूट के उपरांत भी, बादशाहों, अमीरों, राजाओं तथा जागीरदारों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी तथा उनके महलों में विलासिता के समस्त साधन उपलब्ध थे। देश में नहरों, कुओं तथा तालाबों की कमी के बावजूद वर्षा की मात्रा अच्छी होने से देश के अधिकांश भागों में खेती की जाती थी। घर-घर में कुटीर उद्योग विकसित थे जिनमें विपुल मात्रा में विविध प्रकार की सामग्री तैयार की जाती थी। विदेशी व्यापार उन्नत होने से शासकों को कर के रूप में अच्छी आय होती थी। आंतरिक एवं विदेशी व्यापार बहुत होता था। विदेशी व्यापार भारत के पक्ष में था। भारत के कुटीर उद्योग देश-वासियों की आवश्यकताओं को पूरी करने के साथ-साथ विदेशों को निर्यात किये जाने के लिये भी माल तैयार करते थे। सूती, ऊनी, रेशमी वस्त्र, शाल-दुशालें, चन्दन की वस्तुएँ, कागज, जूते, बक्से, चमड़ा, चीनी, नील, रंग, लकड़ी की वस्तुएँ, सोना-चाँदी के आभूषण, विलासिता की वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं। इतना होने पर भी देश में जन साधारण की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। किसान हाड़तोड़ परिश्रम करके खेती करते थे। छोटे कारीगर हाथ से सामग्री का उत्पादन करते थे। इस उत्पादन के लाभ का अधिक हिस्सा कर के रूप में शासक और मुनाफे के रूप में बड़े व्यापारी लूट लेते थे। भू-राजस्व कर के साथ-साथ चुंगी एवं स्थानीय करों की अधिकता थी। इस कारण बादशाह, सूबेदार, राजा एवं जागीरदारों के पास काफी धन एकत्र हो जाता था किंतु जन साधारण अभावों एवं कष्टों से बिलबिला रहा था। पूरा परिवार हर समय किसी न किसी काम में लगा रहता था फिर भी दो समय की रोटी का प्रबंध करना कठिन था।

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  • बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

     21.08.2017
    बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

    आधुनिक भारत का इतिहास - अध्याय - 4

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना तथा भारत में प्रवेश

    1600 ई. में ब्रिटेन के कुछ व्यापारियों ने पूर्वी देशों में व्यापार करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी स्थापित की। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) इस कम्पनी की हिस्सेदार थी। इस कम्पनी को अपने जहाजों तथा माल की सुरक्षा के लिए सैन्य बल रखना पड़ता था। कम्पनी को भारत में प्रवेश करते ही पुर्तगालियों से टक्कर लेनी पड़ी। पुर्तगालियों को परास्त करने के बाद उन्हें भारत के पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी बस्तियाँ स्थापित करने की अनुमति मिली। इन बस्तियों की रक्षा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को स्वयं करनी पड़ती थी। इस कार्य के लिए कम्पनी को सैनिकों की संख्या में निरंतर वृद्धि करनी पड़ती थी। इस प्रकार, कम्पनी की सेना का विस्तार होता चला गया। यद्यपि कम्पनी ने सर्वप्रथम सूरत को केन्द्र बनाकर व्यापार आरम्भ किया किन्तु उसे प्रादेशिक लाभ सर्वप्रथम दक्षिण भारत में प्राप्त हुआ, जब 1639 ई. में वाण्डिवाश के हिन्दू राजा ने कम्पनी को मद्रास का क्षेत्र प्रदान किया तथा कम्पनी को एक दुर्ग बनवाने की अनुमति दी। कम्पनी ने यहाँ सेण्ट जॉर्ज फोर्ट नामक प्रसिद्ध दुर्ग बनवाया। 1669 ई. में कम्पनी को बम्बई का क्षेत्र भी मिल गया।

    बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियाँ

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल में अपनी पहली व्यापारिक बस्ती हुगली में 1651 ई. में स्थापित की। उन दिनों मुगल बादशाह शाहजहाँ का पुत्र शाहशुजा बंगाल का सूबेदार था। उसने एक फरमान जारी करके कम्पनी को बंगाल सूबे में व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया और कम्पनी द्वारा निर्यात किये जाने वाले माल को चुँगी-कर से मुक्त रखने की सुविधा भी प्रदान की। अँग्रेजों ने हुगली के साथ ही कासिम बाजार तथा पटना में भी अपनी व्यापारिक कोठियां स्थापित कीं। 1691 ई. में प्रति वर्ष 3000 रुपये देने की शर्त पर कम्पनी को बंगाल में सीमा शुल्क देने से मुक्त कर दिया गया। 1693 ई. में कम्पनी को मद्रास के पास तीन गाँवों की जमींदारी मिली। 1698 ई. में कम्पनी को 12,000 रुपये वार्षिक भुगतान के बदले, बंगाल में तीन गाँवों- सूतानुती, गोविन्दपुर और कौलिकत्ता की जमींदारी मिल गई। इनकी सुरक्षा के लिए कम्पनी ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम नामक दुर्ग बनवाया। द्वितीय कर्नाटक युद्ध के समय कम्पनी को तंजौर के राजा से देवीकोटाई और उसके निकट का भूभाग प्राप्त हुआ जिसकी वार्षिक आय 30,000 रुपये थी। इस प्रकार कम्पनी बड़े भू-भाग की जमींदार बन गई।

    अठारहवीं शताब्दी में बंगाल की स्थिति

    औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा मुगल सल्तनत के तीन पृथक् सूबे थे। 1705 ई. में औरंगजेब ने मुर्शीदकुली जफरखाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया। कुछ समय बाद उड़ीसा का सूबा भी उसे दे दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजनैतिक अस्थिरता के काल में मुर्शीदकुली जफरखाँ एक स्वतन्त्र शासक की भाँति शासन करने लगा। 1727 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दौलाखाँ बंगाल का सूबेदार बना। उसने बिहार के सूबे को भी बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले लिया। इस प्रकार पूर्वी भारत के तीनों समृद्ध सूबे उसके अधीन हो गये। 1739 ई. में शुजाउद्दौला की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सरफराजखाँ उसका उत्तराधिकारी बना। वह निर्बल, अयोग्य और विलासी था। उस समय अलीवर्दीखाँ बिहार का नायब सूबेदार था। अपै्रल 1740 में अलीवर्दीखाँ ने अपने स्वामी सरफराजखाँ पर आक्रमण कर दिया। सरफराजखाँ युद्ध में परास्त हुआ तथा मारा गया। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला (1719-48 ई.) अलीवर्दीखाँ के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही करने में असमर्थ था इसलिये उसने अलीवर्दीखाँ को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का सूबेदार मान लिया।

    चुंगी को लेकर बंगाल के सूबेदारों से विवाद

    1717 ई. में मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने एक फरमान द्वारा कम्पनी के सामान पर लगने वाली चुँगी-कर या सीमा-शुल्क माफ कर दिया। इससे कम्पनी को बहुत मुनाफा हुआ। ज्यों-ज्यों मुगलों की सत्ता कमजोर होती गई, बंगाल के सूबेदार, शासन के सम्बन्ध में स्वतंत्र होते गये। वे चाहते थे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी, बंगाल सूबे में व्यापार करने के लिये बंगाल के सूबेदार से अनुमति प्राप्त करे। इस प्रकार बंगाल के सूबेदार और ईस्ट इण्डिया कम्पनी में मतभेद उत्पन्न हो गये जो समय के साथ बढ़ते ही गये। आगे चलकर दोनों के मध्य जो युद्ध लड़े गये, उनका मूल कारण व्यापार पर चुंगी का विषय ही था। कलकत्ता के आस-पास का क्षेत्र जो कम्पनी को जमींदारी के रूप में मिला था, उस पर भी दोनों पक्षों में विवाद था। बंगाल के सूबेदार का मानना था कि उसके सूबे के समस्त जमींदारी क्षेत्रों पर उसका नियन्त्रण है परन्तु कम्पनी का मानना था कि जमींदारी क्षेत्र में उसे स्वायत्तता प्राप्त है तथा बंगाल के सूबेदार को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

    अलीवर्दीखाँ का शासन

    अलीवर्दीखाँ, सैद्धांतिक रूप से मुगल बादशाह की ओर से बंगाल का सूबेदार था किंतु व्यावहारिक रूप में वह एक स्वतंत्र शासक था। उसने 1740 ई. से 1756 ई. तक बंगाल पर शासन किया। उसके समय में मराठों ने निरन्तर आक्रमण करके बंगाल के आर्थिक जीवन को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया। अतः 1751 ई. में उसे मराठों से समझौता करके उन्हें उड़ीसा का अधिकांश भाग तथा प्रतिवर्ष 12 लाख रुपया चौथ के रूप में देना स्वीकार करना पड़ा। मराठों की तरफ से निश्चिंत होने के बाद अलीवर्दीखाँ ने शासन व्यवस्था की तरफ ध्यान दिया। उसे बंगाल का सूबेदार बनने में बंगाल के हिन्दू व्यापारियों से महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला था। अतः उसने हिन्दुओं को महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। राय दुर्लभ, जगत सेठ बन्धु मेहताब राय और स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा माणिकचन्द्र आदि हिन्दू व्यापारियों का उसके शासन में भारी सम्मान बना रहा।

    उस समय बंगाल का अधिकांश व्यापार हिन्दू व्यापारियों के हाथों में था। यूरोपीय व्यापारियों से सम्पर्क होने के बाद हिन्दू व्यापारियों का कारोबार और अधिक बढ़ गया और वे बहुत समृद्ध हो गये। बंगाल से कृषि उपज, सूती वस्त्र तथा रेशम का भारी मात्रा मंे निर्यात होता था। बढ़ते हुए व्यापार तथा लाभ ने बंगाल के हिन्दू व्यापारियों को अँग्रेज व्यापारियों का मित्र बना दिया। यही कारण है कि जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य संघर्ष हुआ तो बंगाल के हिन्दू व्यापारियों ने कम्पनी के साथ सहानुभूति रखी तथा उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    अलीवर्दीखाँ और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सम्बन्ध कभी मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। कम्पनी की शिकायत थी कि उसे 1717 ई. के शाही फरमान के अनुसार व्यापारिक सुविधायें नहीं दी जा रही हैं। इसके विपरीत नवाब का मत था कि कम्पनी को जो सुविधाएँ दी गई हैं, वह उनका दुरुपयोग कर रही है। इस कारण बंगाल के सरकारी कोष को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। अतः कम्पनी को चाहिए कि वह अपने मुनाफे का कुछ अंश सीमा शुल्क के रूप में सरकार को दे। कम्पनी इसके लिए तैयार नहीं थी। विवाद का दूसरा कारण कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षायें भी थीं।

    कर्नाटक के युद्धों में मिली सफलता से कम्पनी का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इस कारण कम्पनी, बंगाल में भी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में जुट गई। दूसरी तरफ अलीवर्दीखाँ को आभास हो गया कि दोनों यूरोपीय कम्पनियों (अंग्रेजों और फ्रांसीसियों) में कभी भी संघर्ष छिड़ सकता है जिससे बंगाल की शान्ति भंग हो सकती है। अतः नवाब ने आरम्भ से ही दोनों कम्पनियों को अपनी बस्तियों की किलेबन्दी करने तथा अस्त्र-शस्त्रों को जमा करने की अनुमति नहीं दी। उसका कहना था कि व्यापारी को सामरिक तैयारी में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। अलीवर्दीखाँ के सुझाव के उपरान्त भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक सेना गठित कर ली। इसका मुख्य ध्येय मराठों की लूटमार से अपनी बस्ती की रक्षा करना था। अपनी बस्ती के अलावा अँग्रेजों ने आसपास के कुछ अन्य क्षेत्रों को भी मराठों की लूटमार से बचाया तथा मराठों द्वारा लूटे गये क्षेत्रों के लोगों को थोड़ी-बहुत आर्थिक सहायता भी दी। इसका परिणाम बहुत अच्छा निकला। अँग्रेजों ने स्थानीय लोगों की सहानुभूति प्राप्त कर ली, जो आगे चलकर उनके काम आई। 1756 ई. में यूरोप में आरम्भ हुए सप्तवर्षीय युद्ध के कारण दक्षिण भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा फ्रैंच इण्डिया कम्पनी में संघर्ष आरम्भ हो गया परन्तु अलीवर्दीखाँ ने दोनों कम्पनियों पर कठोर नियंत्रण रखा और उन्हें आपस में लड़ने नहीं दिया।

    कम्पनी के व्यापार में अभूतपूर्व

    वृद्धि यद्यपि अलीवर्दीखाँ के शासन में कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो सकी किंतु कम्पनी का कारोबार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा। भारत से इंग्लैण्ड में कम्पनी का आयात 1708 ई. में 5 लाख पौण्ड मूल्य का था जो 1740 ई. में बढ़कर 17.95 लाख पौण्ड मूल्य का हो गया। यह वृद्धि तो तब हुई जबकि इंग्लैण्ड की संसद ने अँग्रेजी कपड़ा उद्योग के संरक्षण करने तथा इंग्लैण्ड से भारत को चांदी का निर्यात रोकने के लिये, 29 सितम्बर 1701 को एक विशेष कानून बनाकर भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा रखी थी।

    सिराजुद्दौला का अँग्रेजों से संघर्ष

    अलीवर्दीखाँ के कोई पुत्र नहीं था। केवल तीन पुत्रियाँ थीं जिन्हें उसने अपने तीन भतीजों से ब्याह दिया था। अलीवर्दीखाँ ने अपने दामादों को पूर्णिमा, ढाका तथा पटना का सूबेदार नियुक्त किया। इन तीनों दामादों का निधन अलीवर्दीखाँ के जीवनकाल में ही हो गया। इसलिये अलीवर्दीखाँ ने अपनी सबसे छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु इस निर्णय से सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंद्वी भड़क गये।

    अलीवर्दीखाँ की सबसे बड़ी पुत्री घसीटी बेगम सिराजुद्दौला के मृत बड़े भाई के अल्पवयस्क पुत्र मुराउद्दौला को गोद लेकर उसे बंगाल का नवाब बनाने का प्रयत्न करने लगी। घसीटी बेगम का दीवान राजवल्लभ चतुर राजनीतिज्ञ था, वह घसीटी बेगम का मार्गदर्शन कर रहा था। अलीवर्दीखाँ की दूसरी पुत्री का पुत्र शौकतजंग जो पूर्णिया का गवर्नर था, स्वयं को बंगाल की नवाबी का सही उत्तराधिकारी समझता था। अलीवर्दीखाँ का बहनोई और प्रधान सेनापति मीर जाफर भी नवाब बनने का इच्छुक था। ये सब लोग एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।

    10 अपै्रल 1756 को 82 वर्ष की अवस्था में अलीवर्दीखाँ की मृत्यु हो गई। इसके बाद सिराजुद्दौला बिना किसी बाधा के तख्त पर बैठ गया। उसने अपनी बड़ी मौसी घसीटी बेगम को छल से बन्दी बना लिया तथा शौकतजंग के विरुद्ध भी सैनिक कार्यवाही करके उसे अपने अधीन कर लिया। सिराजुद्दौला गुस्सैल स्वभाव का युवक था। उसने तख्त पर बैठते ही कम्पनी को आदेश दिया कि वे उसी प्रकार व्यापार करें जिस तरह वे मुर्शीदकुली खाँ के समय में करते थे। कम्पनी के अधिकारियों ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस समय तक वे फ्रांसीसियों पर निर्णायक विजय प्राप्त कर चुके थे और नवाब को सबक सिखाने की युक्ति कर रहे थे। इन सब कारणों से दो माह से भी कम समय में सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच झगड़ा हो गया।

    सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच झगड़े के कारण

    (1.) प्रतिद्वंद्वियों की महत्त्वाकांक्षाएं: अँग्रेजों और सिराजुद्दौला के मध्य संघर्ष होने के कई कारण थे। एक ओर सिराजुद्दौला अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिये सख्त कदम उठा रहा था तो दूसरी ओर उसकी मौसी घसीटी बेगम का दत्तक पुत्र मुराउद्दौला, अलीवर्दीखाँ की दूसरी पुत्री का पुत्र शौकतजंग तथा अलीवर्दीखाँ का बहनोई मीर जाफर भी नवाब बनने के लिये षड्यंत्र कर रहे थे।

    (2.) अँग्रेजों का षड्यंत्र: ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी इस नीति पर चल रहे थे कि जब किसी राज्य में उत्तराधिकार का झगड़ा हो तो किसी न किसी दावेदार की सहायता करके अपने पक्ष के व्यक्ति को तख्त पर बैठाया जाये तथा राज्य में अपना प्रभाव बढ़ाया जाये ताकि व्यापार के लिये अधिक से अधिक सुविधायें प्राप्त करके अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके। इसलिये वे सिराजुद्दौला के विरोधियों की सहायता तथा नवाब के आदेशों की अवज्ञा करने लगे। जब सिराजुद्दौला को इस बात का अनुभव हुआ तो उसने अँग्रेजों के प्रभाव को कम करने का निर्णय लिया।

    (3.) अँग्रेजों के प्रति संदेह: अँग्रेजों का मानना था कि सिराजुद्दौैला आरम्भ से ही अँग्रेजों को सन्देह की दृष्टि से देखता था किंतु अँग्रेज इतिहासकारों का यह दावा सही नहीं है। तत्कालीन साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में सिराजुद्दौला अंग्रेजों से सहानुभूति रखता था। 1752 ई. में जब कम्पनी का अध्यक्ष हुगली आया था, तब सिराजुद्दौला ने उसका स्वागत किया था। हॉलवेल के अनुसार अलीवर्दीखाँ ने मरने से पूर्व सिराजुद्दौला को अँग्रेजों पर कड़ी दृष्टि रखने की चेतावनी दी थी, क्योंकि उसे आशंका थी कि कर्नाटक जैसा षड्यंत्र बंगाल में भी दोहराया जा सकता है। अतः नवाब बनने के बाद शिराजुद्दौला के रुख में अंतर आ गया और वह अँग्रेजों की कार्यवाहियों को नियन्त्रित करने का प्रयास करने लगा।

    (4.) नवाब के प्रति अँग्रेजों की अशिष्टता: जब सिराजुद्दौला तख्त पर बैठा तब अँग्रेज अधिकारी जान-बूझकर उसके दरबार से अनुपस्थित रहे और उन्होंने सिराजुद्दौला को भेंट भी नहीं दी। इस प्रकार उन्होंने नवाब की अवहेलना कर उसके प्रति अशिष्टता का प्रदर्शन किया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही जब सिराजुद्दौला ने अँग्रेजों की कासिम बाजार फैक्ट्री देखने की इच्छा व्यक्त की तो अँग्रेजों ने उसे फैक्ट्री दिखाने से मना कर दिया। जब नवाब ने उनके व्यापार के बारे में जानकारी चाही तो अँग्रेजों ने उसे जानकारी देने से भी मना कर दिया। इस प्रकार अँग्रेजों द्वारा जानबूझ कर बार-बार अवज्ञा किये जाने से सिराजुद्दौला उनसे नाराज हो गया।

    (5.) व्यापारिक झगड़ा: मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने 1717 ई. में शाही फरमान द्वारा अँग्रेजों को बंगाल में चुँगी दिये बिना व्यापार करने की सुविधा दी थी। इसके आधार पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपना व्यापार तो फैला रही थी किंतु बंगाल के नवाब को चुंगी नहीं देती थी। कम्पनी इस सुविधा का दुरुपयोग करने लगी। वह भारतीय व्यापारियों से कुछ-ले-देकर उनके माल को भी अपना बताकर चुँगी बचा लेती थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अध्यक्ष अपने हस्ताक्षरों से बंगाल में कम्पनी के माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने का अनुज्ञा पत्र जारी करता था। इसे दस्तक कहा जाता था। दस्तक वाले सामान पर चुँगी-कर वसूल नहीं किया जाता था। कम्पनी के कई कर्मचारी निजी व्यापार करते थे और अपने व्यापारिक सामान को भी कम्पनी का बताकर चुँगी बचाते थे। इससे नवाब को आर्थिक हानि होती थी। इस स्थिति से उबरने के लिये सिराजुद्दौला कम्पनी के साथ कोई नया समझौता करना चाहता था। अँग्रेज इस विशेषाधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं थे। अतः दोनों पक्षों में युद्ध होना अनिवार्य हो गया। वस्तुतः दोनों के मध्य संघर्ष का मूल कारण यही था।

    (6.) कलकत्ता में आने वाले माल पर अँग्रेजों द्वारा चुंगी लगाना: कलकत्ता अँग्रेजों के अधिकार में था। अँग्रेज एक ओर तो नवाब को किसी प्रकार का कर नहीं चुका रहे थे तथा दूसरी ओर उन्होंने कलकत्ता के बाजार में स्थानीय व्यापारियों द्वारा लाये जाने वाले माल पर भारी कर एवं चुंगी लगा दिये।

    (7.) नवाब के शत्रुओं को संरक्षण देना: अँग्रेजों की बस्ती कलकत्ता के नाम से विख्यात थी। कलकत्ता, नवाब के शत्रुओं तथा विद्रोहियों के लिए आश्रय स्थल बनी हुई थी। जब नवाब ने घसीटी बेगम को बन्दी बनाया तो दीवान राजवल्लभ ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति अपने लड़के कृष्णवल्लभ के साथ कलकत्ता भिजवा दी। उसने घसीटी बेगम की सम्पत्ति को भी छिपाने का प्रयास किया। इस पर नवाब ने उसे दीवान पद से हटा दिया और कलकत्ता के अँग्रेज अधिकारियों से कहा कि वे कृष्णवल्लभ, नवाब को सौंप दें। कम्पनी के अधिकारियों ने नवाब की इस मांग को ठुकरा दिया। इससे सिराजुद्दौला और भी अधिक नाराज हो गया।

    (8.) कलकत्ता की किलेबन्दी: सिराजुद्दौला के नवाब बनते ही यूरोप में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ने से भारत में स्थित दोनों कम्पनियों में भी युद्ध होने की आशंका उत्पन्न हो गई। इसलिये दोनों कम्पनियों ने बंगाल में अपने-अपने स्थानों की किलेबन्दी करना और सैनिकों की संख्या बढ़ाना आरम्भ कर दिया। नवाब ने दोनों कम्पनियों को आदेश दिये कि वे अपने स्थानों की किलेबन्दी का काम बन्द कर दें। फ्रांसीसियों ने नवाब के आदेश को मान लिया परन्तु अँग्रेजों ने आदेश की पालना नहीं की। वे उस समय कलकत्ता के चारों तरफ एक खाई खुदवा रहे थे। जब नवाब के अधिकारियों ने उन्हें खाई को भर देने के लिए कहा तो एक अँग्रेज अधिकारी ने उन्हें जवाब दिया- 'यह खाई अवश्य भर दी जायेगी परन्तु मुसलमानों के सिरों से।' जब सिराजुद्दौला को यह सूचना दी गई तो उसने अँग्रेजों को सबक सिखाने का निर्णय किया।

    (9.) जमींदारी की गलत व्याख्या: कम्पनी को कलकत्ता बस्ती के आसपास के क्षेत्र की जमींदारी दी गई थी। नवाब का मानना था कि जमींदार उसका प्रतिनिधि मात्र है और उसका काम नवाब की तरफ से जमींदारी क्षेत्र से राजस्व वसूल करना तथा शान्ति बनाये रखना है। उस क्षेत्र पर नवाब का राजनीतिक प्रभुत्व सर्वोपरि है तथा कम्पनी नवाब के आदेशों का पालन करने के लिये बाध्य है परन्तु कम्पनी का मानना था कि उसे अपने क्षेत्र में पूर्ण राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त है, नवाब को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। नवाब अँग्रेज अधिकारियों की दलीलों को मानने के लिये तैयार नहीं था। उसने अपने अधिकारियों को कम्पनी के अधिकारियों से वार्त्ता करने भेजा परन्तु अँग्रेज अधिकारियों ने नवाब के शान्ति-प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। ऐसी स्थिति में सिराजुद्दौला के समक्ष, कम्पनी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा। इतिहासकार हिल ने लिखा है- 'जिन कारणों से नवाब ने अँग्रेजों पर आक्रमण किया उनमें तर्क अवश्य था।'

    नवाब द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही

    कासिम बाजार फैक्ट्री पर अधिकार: 4 जून 1756 को सिराजुद्दौला ने मुर्शिदाबाद के निकट अँग्रेजों की कासिम बाजार फैक्ट्री पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। फैक्ट्री के अँग्रेज अधिकारी वाट्सन ने आत्मसमर्पण कर दिया।

    फोर्ट विलियम पर अधिकार: 5 जून 1756 को नवाब ने 50,000 सैनिकों के साथ कलकत्ता पर धावा बोला। उस समय कलकत्ता में अँग्रेजों के पास केवल 500 सैनिक थे। 15 जून को नवाब की सेना ने फोर्ट विलियम को घेर लिया। पराजय निश्चित जानकर गवर्नर ड्रेक और अँग्रेज अधिकारी अपने परिवारों को लेकर जहाज पर सवार होकर हुगली नदी में स्थित फुल्टा टापू पर चले गये। किले की रक्षा का भार हॉलवेल के नेतृत्व में थोड़े से सैनिकों को सौंप दिया गया। दो दिन बाद हॉलवेल ने समर्पण कर दिया। 20 जून को फोर्ट विलियम तथा कलकत्ता पर नवाब का अधिकार हो गया। बाद में वाट्सन ने स्वीकार किया कि- 'नवाब के शान्ति प्रस्ताव पर्याप्त थे। उन्हें ठुकराकर तथा कासिम बाजार की घटना से कोई सबक न लेकर गवर्नर ड्रेक ने स्वयं खतरा मोल लिया था।'

    कालकोठरी (ब्लैक होल) की घटना: 20 जून को फोर्ट विलियम का पतन हो गया। दुर्ग में उपस्थित अँग्रेजों को बन्दी बना लिया गया। कहा जाता है कि नवाब के किसी अधिकारी ने अँग्रेजों को रात्रि में 18 फुट लम्बी और 15 फुट चौड़ी एक कोठरी में बंद कर दिया। जब प्रातःकाल में कोठरी का दरवाजा खोला गया तो कई बन्दी मर चुके थे। इतिहास में यह दुर्घटना काल कोठरी अथवा ब्लैक होल के नाम से विख्यात है। इस दुर्घटना का विवरण हॉलवेल द्वारा लिखे गये एक पत्र से मिला है। हॉलवेल के अनुसार जून मास की भयंकर गर्मी में नवाब के आदेश से 146 अँग्रेज बन्दियों को काल कोठरी में बंद किया गया। सुबह तक 123 व्यक्ति मर गये, केवल 23 व्यक्ति ही जीवित रह पाये जिनमें से हॉलवेल भी एक था। ब्लैक होल की घटना पर इतिहासकारों में गम्भीर विवाद है। कुछ फ्रांसीसी एवं आर्मीनियन दस्तावेजों में भी इस घटना का उल्लेख मिलता है परन्तु मरने वालों की संख्या एक जैसी नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि अँग्रेजों ने इस घटना को काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया है। उनका एकमात्र उद्देश्य सिराजुद्दौला को क्रूर शासक सिद्ध करना था ताकि भारत में स्थित अँग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त की जा सके और उन्हें नवाब के विरुद्ध उकसाया जा सके। हॉलवेल ने अवश्य ही इस कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा होगा।

    डॉ. भोलानाथ और डॉ. ब्रिजेन गुप्ता ने इस दुर्घटना को सही माना है। अधिकांश इतिहाकारों की मान्यता है कि यदि यह स्वीकार कर लें कि इस प्रकार की घटना हुई थी तो भी इसके लिए सिराजुद्दौला को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग ब्लैकहोल की घटना की सत्यता में विश्वास नहीं करते उनके तर्क इस प्रकार से हैं-

    (1.) तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रन्थों, शेर-ए-मुतेखरीन और रायस-उस-सलातीन आदि में इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता।

    (2.) तत्कालीन अँग्रेजी पुस्तकों, मद्रास कौंसिल के दस्तावेजों, कम्पनी के डायरेक्टरों को क्लाइव तथा वाट्सन द्वारा लिखे गये पत्रों आदि में भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।

    (3.) फुल्टा टापू पर जाने वाले अँग्रेजों द्वारा लिखी गई प्रोसीडिंग्स में भी इस घटना का उल्लेख नहीं है।

    (4.) इतिहासकार जे. एच. लिटल के अनुसार जिन अँग्रेजों का कालकोठरी की घटना में मारा जाना बताया गया है, वे तूफान में मरे थे।

    (5.) 18 फुट लम्बी और 15 फुट चौड़ी कोठरी में 146 व्यक्तियों को किसी भी प्रकार से नहीं ठूँसा जा सकता।

    (6.) हॉलवेल ने जो सूची दी है, उतने आदमी फोर्ट विलियम में मौजूद ही नहीं थे। हॉलवेल अत्यन्त ही झूठा व्यक्ति था। इसकी पुष्टि स्वयं क्लाइव एवं वाट्सन के कथनों से होती है।

    (7.) हॉलवेल ने बाद में इसी प्रकार का आरोप मीर जाफर पर भी लगाया था कि उसने एक रात में असंख्य अँग्रेजों को मरवा डाला। हॉलवेल ने मृत व्यक्तियों की सूची भी दी परन्तु बाद में क्लाइव और वाट्सन ने लिखा है कि हॉलवेल का आरोप असत्य था और उसकी सूची के अधिकांश व्यक्ति अभी तक जीवित हैं।

    (8.) 1757 ई. में अँग्रेजों ने जब नवाब सिराजुद्दौला के साथ सन्धि की तो उन्होंने कई बातों की क्षतिपूर्ति के लिए नवाब से धन की माँग की थी। यदि कालकोठरी की घटना घटित हुई होती तो अँग्रेज मृत लोगों का मुआवजा अवश्य माँगते। चूंकि इस प्रकार का मुआवजा नहीं माँगा गया। अतः इस बात की संभावना अधिक है कि इस प्रकार की कोई दुर्घटना घटित नहीं हुई।



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