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  • द्वितीय विश्वयुद्ध में राजपूताने के कई राजा मोर्चे पर गये

     03.06.2020
    द्वितीय विश्वयुद्ध में राजपूताने के कई राजा मोर्चे पर गये

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। ब्रिटिश सरकार को राजाओं से आदमी, धन तथा सामग्री के रूप में सहायता की आशा थी। राजपूताने के राजाओं ने इस आशा को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की भरपूर सहायता की। जोधपुर महाराजा इससे पूर्व ही 26 अगस्त 1939 को वायसराय को तार भेजकर अनुरोध कर चुके थे कि भयानक अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में मैं यह अनुभव करता हूँ कि महामहिम वायसराय से अनुरोध करना मेरा कर्तव्य है कि कृपा करके संकट के समय महामना सम्राट के आदमियों तथा उनके सिंहासन के प्रति मेरी अविचल स्वामिभक्ति के बारे में सूचित किया जाये। मेरी प्रार्थना है कि युद्ध आरंभ होने पर मेरे राज्य के समस्त नागरिक एवं सैन्य संसाधन साम्राज्यिक सरकार के निष्पादन पर रखे जायें।

    जोधपुर नरेश भारत भर के राजाओं में सबसे पहले थे जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत सेवाएं तथा अपने राज्य के समस्त संसाधन साम्राज्यिक सरकार को सौंप दिये। वायसराय ने जोधपुर महाराजा को धन्यवाद का तार भिजवाया। जोधपुर का सरदार रिसाला प्रथम भारतीय राज्य सैन्य इकाई था जिसे भारतीय सेना में लिया गया तथा मोर्चे पर लड़ने के लिये चयनित किया गया। जोधपुर इन्फैण्ट्री युद्ध क्षेत्र में युद्ध के प्रारंभिक चरण में पहुंची। जोधपुर राज्य के सैनिक पांचवी सेना के साथ इटली के सलेरनो में उतरने वाले प्रथम सैनिक थे। जोधपुर वायु प्रशिक्षण केंद्र का भारतीय वायु सेना के पायलटों के प्रशिक्षण के लिये प्रबंधन किया गया। राज्य की ओर से तीन हवाई जहाज एवं एक गल ग्लाईडर ब्रिटिश सरकार को दिये गये। वायसराय युद्ध कोष के लिये राज्य की ओर से 3 लाख रुपये तथा जनता की ओर से 20 हजार रुपये दिये गये।

    जोधपुर राज्य की ओर से 25 हजार रुपये रैडक्रॉस फंड में दिये गये। युद्ध विभाग के लिये जोधपुर रेलवे वैगन निर्माण कारखाने में मीटर गेज के डिब्बे बनाये गये। जोधपुर रेलवे ने फाइटर एयर क्राफ्ट के लिये 4 लाख रुपये दिये। जोधपुर राज्य की जनता की ओर से जोधपुर बॉम्बर के लिये 2 लाख 30 हजार रुपये लंदन भिजवाये गये। राज्य की ओर से 4,71,200 रुपये का सोडियम सल्फेट युद्ध कार्य के लिये उपलब्ध करवाया गया। 1942-43 में जोधपुर की ओर से वायसराय युद्ध कोष के लिये 4 लाख रुपये और भिजवाये गये। इसके अलावा भी बहुत से संसाधन भेजे गये। महाराजा उम्मेदसिंह अपने छोटे भाई के साथ स्वयं युद्ध के मोर्चे पर गये। जब मित्र राष्ट्रों की सेनाएं विजयी हुईं तो जोधपुर में विजय समारोह आयोजित किये गये।

    युद्ध आरंभ के अगले दिन अर्थात् 4 सितम्बर 1939 को बीकानेर महाराजा ने युद्ध क्षेत्र में जाने के सम्बन्ध में पूर्व में किये गये अपने अनुरोधों को दोहराया तथा डेढ़ लाख रुपये ब्रिटेन के सम्राट को भिजवाये और एक हजार पाउंड युद्ध कार्यों के लिये दिये। बीकानेर राज्य के गंगा रिसाला को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। महाराजा गंगासिंह स्वंय रशिया तथा अदन के मोर्चे पर गये। सादुल लाइट इन्फैंट्री को ईराक तथा पर्शिया में लड़ने के लिये भेजा गया। बीकानेर विजय बैटरी ने भी विदेश में जाकर सम्राट की सेनाओं के साथ युद्ध सेवाएं दीं। इस सेना ने अराकान तथा मनिपुर में इन्फैन्ट्री की महत्वपूर्ण सहायता की।

    जयपुर नरेश मानसिंह भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सम्राट को अपनी निजी सेवाएं तथा अपनी सैनिक सेवाएं अर्पित करने वाले प्रथम राजाओं में से थे। उन्हें विश्वास था कि ब्रिटेन नाजी जर्मनी से अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिये नहीं अपितु विश्वशांति तथा सभ्यता के संरक्षण के लिये लड़ रहा था।

    महाराजा का दृढ़ विश्वास था कि इंगलैण्ड विश्व के नागरिकों के प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये लड़ रहा था।

    युद्ध आरंभ होने पर जयपुर की प्रथम बैटेलियन मध्य पूर्व में भेजी गयी जहाँ उसे मिश्र, साइप्रस, लीबिया, सीरिया तथा फिलिस्तीन में विभिन्न कामों पर लगाया गया। इसके बाद यह सेना इटली गयी जहाँ उसने जर्मनों के विरुद्ध लड़ते हुए अत्यंत कठिन बिंदु माउंट बफैलो पर अधिकार किया। युद्ध के दौरान प्रदत्त सेवाओं के लिये इस सेना को कई अलंकरण एवं पुरस्कार दिये गये।

    जयपुर नरेश मानसिंह को अपनी सेनाएं मोर्चे पर भेज कर ही संतोष नहीं हुआ। जिस दिन युद्ध आरंभ हुआ, उसी दिन महाराजा ने वायसराय को केबल भेजकर अनुरोध किया कि वह सम्र्राट से प्रार्थना करके मुझे अपने जीवन रक्षकों के साथ युद्ध के मोर्चे पर भिजवाये। वायसराय ने उत्तर भिजवाया कि अच्छा होगा कि वह भारत में ही रहे तथा अपने राज्य में कर्तव्य का निर्वहन करे। 12 सितम्बर को मानसिंह ने बकिंघम पैलेस को केबल किया कि मेरी व्यक्तिगत सेवाएं मेरे प्रिय संप्रभु के निष्पादन पर रखी जायें। बकिंघम पैलेस ने भी वही उत्तर दिया जो वायसराय ने दिया था।

    1940 के पूरे वर्ष में जयपुर नरेश इस अनुरोध को दोहराता रहा। वह ब्रिटिश सम्राट को उसी प्रकार की सेवाएं देना चाहता था जैसी कि उसके पूर्वज मुगलों को देते आये थे। अंत में उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी और अप्रेल 1941 में वह मध्यपूर्व के मोर्चे पर गया जहाँ कि उसकी अपनी रेजीमेण्ट तैनात थी। महाराजा मानसिंह ने सम्राट जॉर्ज षष्ठम् का आभार व्यक्त करते हुए केबल के माध्यम से विश्वास दिलाया कि मेरी तथा मेरे परिवार की अविचलित स्वामिभक्ति तथा शाश्वत निष्ठा महामना सम्राट तथा उनके सिंहासन के प्रति सदैव बनी रहेगी। मानसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही वायसराय युद्ध कोष में 3 लाख रुपये भिजवाये। 10 लाख रुपये युद्ध ऋण के लिये दिये। जयपुर राज्य ने द्वितीय विश्वयुद्ध पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च किये।

    उदयपुर के महाराणा भूपालसिंह ने युद्ध आरंभ होते ही 75 हजार रुपये युद्धकोष के लिये भिजवाये तथा युद्ध चलने तक प्रतिवर्ष 50 हजार रुपये भिजवाने का वचन दिया। ई.1940 में मेवाड़ लांसर्स तथा मेवाड़ इन्फेंट्री को मध्यपूर्व में लड़ने के लिये भेजा गया। युद्ध काल में राजसमंद झील का उपयोग नौसैनिक वायुयानों के लिये लैंण्डिंग बेस के रूप में किया गया। ब्रिटिश आर्मी के लिये मेवाड़ी नौजवान भर्ती किये गये तथा सामग्री भी प्रदान की गयी।

    द्वितीय विश्व युद्ध अंग्रेजी साम्राज्य के लिये अत्यंत घातक सिद्ध हुआ। इस समय तक राजा लोग जान गये थे कि यदि उन्हें भारत में अपना अस्तित्व बचाये रखना है तो हर हालत में अंग्रेजों को विजय की ओर ले जाना होगा। इस कारण उन्होंने प्राण प्रण से अंग्रेजों की सहायता की। यद्यपि विजयश्री अंत में अंग्रेजों का ही वरण करने वाली थी किंतु उसने अंग्रेजों के गले में विजयमाला डालने में इतना विलम्ब कर दिया कि अंग्रेजी साम्राज्य का चमकीला सूर्य अस्ताचल की ओर लुढ़क गया।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 18

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 18

    मौलाना आजाद द्वारा जिन्ना और प्रस्तावित पाकिस्तान का विरोध


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    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम में अनेक स्थानों पर पाकिस्तान निर्माण के सिद्धांत के विरोध में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनका जन्म 1988 में मक्का में हुआ था। वे अरबी, उर्दू, हिन्दी, संस्कृत, और अंग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान थे। उनकी शिक्षा काहिरा के अल अजहर में हुई थी।

    मौलाना अपने समय के सर्वाधिक बुद्धिमान मुस्लिम नेताओं में गिने जाते थे। वे जिन्ना के पाकिस्तान में नहीं, अपितु गांधीजी के भारत में रहना चाहते थे। वे भारत के मुसलमानों को भावी पाकिस्तान के सीमित संसाधनों की बजाय विशाल भारत के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को भोगते हुए देखना चाहते थे। वे जानते थे कि किस रोटी पर मक्खन अधिक लगा हुआ है! एक स्थान पर वे लिखते हैं- 'मुस्लिम लीग की पाकिस्तान वाली योजना पर मैंने हर दृष्टि से सोचा-विचारा है। हिन्दुस्तानी की हैसियत से देश की पूरी इकाई पर भविष्य में क्या असर पड़ेगा, इस पर गौर किया है। मुसलमान की हैसियत से, हिन्दुस्तान के मुसलमानों की किस्मत पर इसका क्या असर पड़ सकता है, इसका अन्दाजा लगाया है। इस येाजना के सभी पहलुओं पर गौर करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि यह न सिर्फ पूरे हिन्दुस्तान के लिए नुक्सान-देय है बल्कि मुसलमानों के लिए खास तौर पर है और दरअसल इससे तो जो मसले सुलझते हैं उससे कहीं ज्यादा पैदा होते हैं।'

    मुहम्मद अली जिन्ना जब भी कांग्रेस के किसी मुस्लिम प्रतिनिधि को किसी भी सरकारी समिति में सदस्य या सरकार में मंत्री बनाए जाने का विरोध करता था तो उसका सीधा असर मौलाना अबुल कलाम आजाद पर पड़ता था। क्योंकि वे कांग्रेस के मुस्लिम सदस्य थे और जिन्ना किसी भी मुसलमान को इस शर्त पर सरकार में शामिल होने दे सकता था जब वह कांग्रेस का न होकर मुस्लिम लीग का सदस्य हो। इसलिए मौलाना अबुल कलाम आजाद सदैव जिन्ना के विरोधी रहे। मौलाना ने जिन्ना द्वारा मांगे जा रहे मुसलमानों के भावी अलग देश के 'पाकिस्तान' नाम का विरोध किया।

    15 अप्रेल 1946 को उन्होंने एक वक्तव्य प्रकाशित करवाया जिसमें कहा गया- 'यह नाम मेरी तबियत के खिलाफ है। इसका आशय है कि दुनिया का कुछ हिस्सा पाक है और बाकी नापाक। इस तरह दुनिया को पाक और नापाक हिस्सों में बांटना इस्लाम की रूह को गलत साबित करना है। इस्लाम में ऐसे बंटवारे की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि हजरत मुहम्मद ने कहा है- खुदा ने मेरे लिए सारी दुनिया ही मस्जिद बनाई है। इसके अलावा पाकिस्तान की योजना मुझे पराजय का प्रतीक मालूम होती है जो यहूदियों की मांग के नमूने पर तैयार की गई है। यह तो मान लेना है कि पूरे हिन्दुस्तान की इकाई में मुसलमान अपने पैरों पर टिक नहीं सकेंगे इसलिए एक सुरक्षित कोने में सिमटकर उन्हें तसल्ली मिल जाएगी। यहूदियों की एक राष्ट्रीय आवास की मांग के साथ सहानुभूति रखी जा सकती है क्योंकि वे सारी दुनिया में बिखरे पड़े हैं और कहीं के भी अनुशासन में वे अहम पार्ट अदा नहीं कर सकते लेकिन हिन्दुस्तान के मुसलमानों की हालत तो बिल्कुल दूसरी है। उनकी संख्या लगभग 9 करोड़ है और हिन्दुस्तान की जिंदगी में उनकी तादाद और उनकी खूबियां इतनी अहम हैं कि अनुशासन और नीति के सभी सवालों पर बखूबी और पुरअसर तरीकों से अपना प्रभाव डाल सकते हैं। कुदरत ने कुछ इलाकों में उनको केन्द्रित कर उनकी मदद भी की है। ऐसी हालत में पाकिस्तान की कोई ताकत नहीं रह जाती। मुसलमान की हैसियत से कम से कम मैं तो पूरे मुल्क को अपना समझने का, इसकी सियासी और माली जिंदगी के फैसले में हिस्सा लेने का हक नहीं छोड़ सकता। मुझे तो जो हमारा बपौती हक है, उसे छोड़ना और उसके एक टुकड़े से तसल्ली करना कायरता का पक्का सबूत मालूम होता है। '

    मौलाना ने एक फार्मूला तैयार किया तथा उसे कांग्रेस की वर्किंग कमेटी से मनवा भी लिया। इसमें पाकिस्तान की येाजना की सारी अच्छी बातें तो थीं किंतु उसकी खराबियों से बचा गया था। विशेषकर जनसंख्या की अदला-बदली से। आजाद के बहुत से हिन्दू साथियों ने तो नहीं लेकिन आजाद ने महसूस किया था कि मुसलमानों का एक बड़ा डर यह था कि यदि पूरे हिन्दुस्तान को आजादी मिली तो केन्द्र का हिन्दू-प्रधान-शासन अल्पसंख्यक-मुसलमानों पर दवाब डालेगा, दखल देगा, बंदरघुड़की देगा, आर्थिक दृष्टि से सतायेगा और राजनीतिक तौर पर कुचल देगा। इस डर को दूर करने के लिए मौलाना की योजना थी कि दोनों पक्ष ऐसा हल मान लें जिसमें मुसलमानों के बहुमत वाले प्रदेश भीतरी मामलों में अपने विकास के लिए स्वतंत्र हों लेकिन साथ ही साथ जिन मामलों में पूरे देश का सवाल उठता हो, केन्द्र पर अपना प्रभाव डाल सकें।

    मौलाना ने लिखा है- 'हिन्दुस्तान की हालत ऐसी है कि केन्द्रीभूत और एकात्मक सरकार स्थापित करने का हर प्रयास असफल होकर ही रहेगा। इसी तरह हिन्दुस्तान को दो टुकड़ों में बांटने की कोशिश का भी वही परिणाम होगा। इस सवाल के सभी पहलुओं पर गौर करने क बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि इसका सिर्फ एक ही हल हो सकता है जो कांग्रेस फार्मूले में मौजूद है जिसमें प्रदेश और देश दोनों के विकास की संभावनाएं मौजूद हैं। ....... मैं उन लोगों में हूँ जो साम्प्रदायिक दंगों और कड़वाहटों के इस अध्याय को हिन्दुस्तान के जीवन में कुछ दिनों का दौर समझते हैं। मेरा पक्का विश्वास है कि जब हिन्दुस्तान अपने भाग्य की बागडोर स्वयं संभालेगा, तो यह खतरा समाप्त हो जाएगा। मुझे ग्लैडस्टोन का एक कथन याद आता है- आदमी के मन से पानी का भय दूर करना है तो उस आदमी को पानी में फैंक दो। उसी तरह हिन्दुस्तान अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठा ले और अपना कार्य संभालने लगे तभी डर और संदेह का यह वातावरण पूरी तरह दूर होगा। जब हिन्दुस्तान अपना ऐतिहासिक लक्ष्य प्राप्त कर लेगा तो साम्प्रदायिक संदेह और विरोध का वर्तमान अध्याय भुला दिया जाएगा और आधुनिक जीवन की समस्याओं का वह आधुनिक ढंग से सामना करेगा। भेद तो तब भी रहेंगे ही किंतु साम्प्रदायिक न होकर आर्थिक। राजनीतिक पार्टियों के बीच विरोध भी रहेगा किंतु वह धार्मिक न होकर आर्थिक और राजनीतिक होगा। भविष्य में गठबंधन और साझेदारी सम्प्रदाय के आधार पर नहीं, वर्ग के आधार पर होंगी और उसी तरह नीतियां निर्धारित होंगी। यदि यह दलील दी जाए कि यह सिर्फ मेरा विश्वास है जिसे भविष्य की घटनाएं गलत साबित कर देंगी तो मुझे यह कहना है कि नौ करोड़ मुसलमानों को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता और अपने भवितव्य को बचाने के लिए वे काफी ताकतवर हैं।'

    इस प्रकार मौलाना कभी नहीं चाहते थे कि मुसलमानों का अलग देश बने। वे चाहते थे कि मुसलमान अपना भविष्य भारत में देखें। मौलाना द्वारा किए जा रहे विरोध के बावजूद कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों तेजी से पाकिस्तान की ओर बढ़ रहे थे। अंतर केवल इतना था कि कांग्रेस एक कमजोर पाकिस्तान के निर्माण की तरफ बढ़ रही थी ताकि उसे बनने से पहले ही नष्ट किया जा सके जबकि मुस्लिम लीग एक मजबूत पाकिस्तान तलाश रही थी, एक ऐसा पाकिस्तान जो युगों तक कायम रहे, भारत का प्रतिद्वंद्वी बनकर रहे और भारत का प्रत्येक मुसलमान उस पाकिस्तान का नागरिक हो।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-113

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-113

    सरदार पटेल ने प्राचीन सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया


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    सोमनाथ का जगत् प्रसिद्ध मंदिर गुजरात के काठियावाड़ प्रदेश में स्थित था। मान्यता है कि यह ईसा के जन्म से भी पहले का मंदिर है। इस मंदिर को सिंध और अरब से आये मुस्लिम आक्रांताओं ने कई बार तोड़ा। आठवीं शती में नागभट्ट ने इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण करवाया। महमूद गजनवी ने इस मंदिर की सम्पदा लूटने के लिये भारत पर 17 बार भयानक आक्रमण किये। उसने इस मंदिर में पूजा कर रहे पचास हजार लोगों को मारकर मंदिर के शिवलिंग को तोड़ डाला। महमूद गजनवी, शिवलिंग के टुकड़ों को हाथी के पैरों से बांधकर गजनी ले गया और वहाँ जाकर उन रास्तों में चिनवा दिया जो गजनी के महलों से मस्जिदों तक जाते थे।

    इस मंदिर से महमूद गजनवी को विशाल सम्पदा हाथ लगी थी जिसे वह हाथियों, ऊँटों एवं बैलगाड़ियों पर लादकर गजनी ले गया। उसने इस मंदिर के भवन को भी बहुत क्षति पहुंचाई। गुजरात तथा मालवा के राजाओं ने इसका पुनिर्निर्माण करवाया। ई.1706 में पुनः औंरगजेब ने इसे गिरवा दिया। तब से यह भग्नावस्था में खड़ा था। भारत को स्वतंत्रता प्राप्त होते ही 13 नवम्बर 1947 को पटेल ने सोमनाथ के भग्न मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।

    पण्डित नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का तीव्र विरोध किया किंतु पटेल और मुंशी ठान चुके थे। अक्टूबर 1950 में पुराने भग्नावशेष हटा दिये गये। इससे पहले कि मंदिर का शिलान्यास होता, 15 दिसम्बर 1950 को पटेल का निधन हो गया। मई 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने केन्द्रीय मंत्री के. एम. मुंशी के निमंत्रण पर इस मंदिर का शिलान्यास किया।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 19

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 19

    कैबीनेट प्लान की मृत्यु


    जिन्ना की ना ......!

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    10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा कि- 'कांग्रेस पर समझौतों का कोई बंधन नहीं है और वह हर स्थिति का सामना करने के लिए उसी तरह तैयार है जैसे कि अब तक करती आई है...... ऐसी हालत में ख्याली पुलाव पकानेऔर सपने देखने से तो कोई फायदा होने वाला नहीं है।' मुस्लिम लीग ने नेहरू के वक्तव्य का अर्थ यह लगाया कि एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद कांग्रेस इस योजना में संशोधन कर देगी। अतः जिन्ना ने 27 जुलाई को ही मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई। जिन्ना ने उन्हें बताया कि- 'नेहरू कैबिनेट मिशन के समक्ष किए गए अपने वायदे से फिर गया है। इसलिए अब उन्हें नए हालात में उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में फैसला करना था।'

    पहले लियाकत अली ने एक-एक प्रस्ताव ऊँची आवाज में पढ़ा और फिर उन पर चर्चा शुरू हुई जो दो दिन तक चलती रही। सर फिरोज खान नून का आग्रह था- 'बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी गलती साफ तौर से कबूल करें जो हमने मिशन की योजना द्वारा तजवीज किए गए संघ को मान कर की है। हमें अपने पाकिस्तान के आदर्श की तरफ दोबारा लौट जाना चाहिए।' मौलाना हसरत मोहानी जबरदस्त नारेबाजी के बीच उठे और लगभग चीखते हुए बोले- 'अक्लमंदी इसी बात में है कि संवैधानिक प्रस्तावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाए। ..... हमें रोशनी का केवल एक ही मीरान रास्ता दिखा सकता है और वह है पूरी तरह संप्रभु पाकिस्तान का पृथक राज्य। सिर्फ कायद-ए-आजम के कहने की देर है, हिंदुस्तान के मुसलमान पल भर में बगावत का झंडा उठा लेंगे।' दूसरे मौलानाओं, खानों और मुल्लाओं ने भी इसी तरह की बातें दोहराईं। राजा गजनफर अली ने वायदा किया- 'अगर मिस्टर जिन्ना आवाज देंगे तो जिंदगी के हर हलके से मुलसममान आगे बढ़ कर पाकिस्तान हासिल करने के लिए संघर्ष में कूद पड़ेंगे।'

    कौंसिल की राय सुनने के बाद जिन्ना और उनकी कार्यसमिति ने 29 जुलाई 1946 को दो पस्ताव पेश किए। पहले प्रस्ताव के जरिए लीग ने मिशन के मई प्रस्तावों को दी गई अपनी स्वीकृति वापस ले ली और दूसरे के माध्यम से आगे की जाने वाली सीधी कार्यवाही का रास्ता तय किया गया। चूंकि मुस्लिम-भारत कोशिश कर-कर के थक चुका है, पर उसे समझौते और संवैधानिक तरीकों से भारतीय समस्या का शांतिपूर्ण समाधान करने में कामयाबी नहीं मिल पाई है, चूंकि कांग्रेस अंग्रेजों से साठ-गांठ करके भारत में ऊँची जाति के हिन्दुओं की हूकूमत कायम करने पर तुली हुई है, चूंकि हाल के घटनाक्रम में साबित हो गया है कि भारतीय मसलों का फैसला ताकत की राजनीति के दम पर होता है, न कि ईमानदारी और इंसाफ की बिनाह पर, चूंकि अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि भारत के मुसलमान अब आजाद और पूरी तरह से संप्रभु पाकिस्तान राज्य की स्थापना के बिना चैन से नहीं बैठेंगे ....... वक्त आ गया है कि मुसलमान-राष्ट्र पाकिस्तान हासिल करने के लिए सीधी कार्यवाही पर उतर कर अपने हकों की दावेदारी करें। अपने गौरव की रक्षा करें, अंग्रेजों की मौजूदा गुलामी और ऊँची जाति के हिन्दू-प्रभुत्व के अंदेशे से छुटकारा हासिल करें।

    दोनों प्रस्तावों के पारित हो जाने के बाद जिन्ना ने नतीजा निकाला- 'हमने एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक फैसला लिया है। जब से मुस्लिम लीग बनी है, हमने संवैधानिक तरीकों और संवैधानिक वार्ता के अलावा कोई और कदम नहीं उठाया। आज कांग्रेस और ब्रिटेन की मिली-जुली चाल के कारण हम मजबूरन यह कदम उठाने जा रहे हैं। हम पर दो मोर्चों से हमला हो रहा है। ....... आज हमने संविधानों और संवैधानिक तौर-तरीकों को अपना आखिरी सलाम बोल दिया है। हम जिन दो पक्षों से समझौता वार्ता कर रहे थे, उन्होंने पूरी वार्ता के दौरान हम पर पिस्तौलें ताने रखीं। एक की पिस्तौल के पीछे सत्ता और मशीनगनें थीं और दूसरे की पिस्तौल के पीछे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर देने की धमकी थी। हमें इस हालात का मुकाबला करना ही होगा। हमारे पास भी एक पिस्तौल है।'

    इस प्रकार मुस्लिम लीग ने कैबीनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति रद्द करके पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए सीधी कार्यवाही की घोषणा कर दी। इस घोषणा में कहा गया कि- 'आज से हम वैधानिक तरीकों से अलग होते हैं।....... आज हमने अपने लिए एक अस्त्र तैयार किया है और उसके उपयोग की स्थिति में हैं। ' मुस्लिम लीग के साथ-साथ कुछ अन्य राजनीतिक तत्वों ने भी कैबीनेट योजना को अस्वीकार कर दिया। नेहरू के वक्तव्य पर मौलाना अबुल कलाम आजाद ने टिप्पणी की कि- '1946 की गलती बड़ी महंगी साबित हुई।'

    जिन्ना ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- 'इन तमाम तथ्यों ने बिना किसी शक के यह साबित कर दिया है कि भारत की समस्या का एकमात्र हल पाकिस्तान है। जब तक कांग्रेस और मि. गांधी यह दावा करते रहेंगे कि वे पूरे देश की नुमाइंदगी करते हैं...... तब तक वे सच्ची हकीकत और संपूर्ण सत्य से इन्कार करते रहेंगे कि मुसलमानों का एकमात्र अधिकारपूर्ण संगठन मुस्लिम लीग है और जब तक वे इसी कूटनीतिक चक्र में घूमते रहेंगे तब तक न कोई समझौता हो सकता है, न ही कोई आजादी मिल सकती है। ...... अब तो मि. गांधी सारी दुनिया के सलाहकार की भाषा बोलने लगे हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस ....... भारत की जनता की ट्रस्टी है। पिछले डेढ़ सौ साल से इस ट्रस्टी का हमें काफी तजरुबा हो चुका है। हम कांग्रेस को अपना ट्रस्टी नहीं बनाना चाहते। हम अब बड़े हो चुके हें। मुसलमानों का केवल एक ही ट्रस्टी है और वह है मुसलमान-राष्ट्र।'

    जिन्ना ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों को भी चुन-चुन कर निशाना बनाया। उसने क्रिप्स पर आरोप लगाया कि- 'क्रिप्स ने हाउस ऑफ कॉमन्स में मिशन के लक्ष्यों की जो सहज परिभाषा दी थी, उसके दायरे से चालबाजी के साथ बच निकलने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने शब्दों की बाजीगरी का सहारा लिया और सदन को गुमराह किया। मुझे खेद है कि क्रिप्स ने अपनी कानूनी प्रतिभा को भ्रष्ट किया है।' जिन्ना ने कैबीनेट मिशन के दूसरे सदस्य पैथक लॉरेंस पर आरोप लगाया कि 'उन्होंने हाउस ऑफ लॉर्ड्स मंम कहा था कि जिन्ना मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर अपनी इजारेदारी नहीं चला सकते। मैं कोई व्यापारी नहीं हूँ। मैं तेल के लिए रियायतें नहीं मांग रहा। न ही किसी बनिए की तरह सौदेबाजी और तोल-मोल कर रहा हूँ।'

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-114

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-114

    पटेल ने शेख अब्दुल्ला की बोलती बंद कर दी


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    1949 में संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में सम्मिलित होने गये प्रतिनिधि मण्डल में शेख अब्दुल्ला भी शामिल थे। जब यह प्रतिनिधि मण्डल वापस लौट रहा था तब शेख ने लंदन में डेली टेलिग्राफ को एक साक्षात्कार दिया जिसमें शेख ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर कश्मीर को स्वतंत्र राज्य बनाने के अपने स्वप्न का खुलासा किया। पटेल ने शेख को दिल्ली बुलाकर कहा कि यदि उन्हें स्वतंत्रता चाहिये तो वे भारतीय सेना को काश्मीर से वापस बुलाने के लिये तैयार हैं।

    शेख का मुंह पीला पड़ गया क्योंकि उन्हें यह भलीभांति ज्ञात था कि भारतीय सेना के काश्मीर से निकलते ही पाकिस्तान घाटी पर अधिकार कर लेगा और शेख को अपना शेष जीवन कारावास में व्यतीत करना होगा। इस घटना के बाद जब तक पटेल जीवित रहे, शेख ने अपना मुंह नहीं खोला किंतु 15 दिसम्बर 1950 को पटेल की मृत्यु के बाद शेख ने अपनी विभाजनकारी गतिविधियां फिर से चालू कर दीं।

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  • गोरी सरकार ने भारतीयों को मूर्ख बनाने के लिये स्टैफर्ड क्रिप्स को भेजा!

     03.06.2020
    गोरी सरकार ने भारतीयों को मूर्ख बनाने के लिये स्टैफर्ड क्रिप्स को भेजा!

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    दिसम्बर 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका का प्रवेश हुआ जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारत प्रकरण को सुलझाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अमरीकी राष्ट्रपति इलियट रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिये ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। ब्रिटिश सरकार अमरीकी सरकार की सलाह की अनदेखी नहीं कर सकी क्योंकि अमरीकी सहायता के कारण ही युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति में सुधार आया था तथा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था स्थिर रह पायी थी।

    मार्च 1942 में जापान की शाही फौज भारत के इतने नजदीक आ गयी कि उसका आक्रमण कभी भी आरंभ हो सकता था। यह आक्रमण भारत पर नहीं,, भारत में डटे अंग्रेजों पर होना था। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत में स्वयं भारतीयों का सहयोग नहीं मिला तो जापानियों के सामने टिकना असंभव हो जायेगा। बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने नरम रुख अपनाया। इस प्रकार भारत संघ योजना को फिर से आरंभ करना पड़ा।

    11 मार्च 1942 को हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रधानमंत्री चर्चिल के बयान में कहा गया कि युद्ध मंत्रिमंडल, सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेज रहा है ताकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की इच्छाओं के अनुसार जिन सुधारों का प्रस्ताव किया है उनके बारे में भारतीयों के भय और शंकाओं का निवारण किया जा सके। क्रिप्स को राजतंत्रीय सरकार का पूरा विश्वास प्राप्त है। क्रिप्स अपने साथ जो प्रस्ताव ला रहे हैं, वह या तो पूर्णतः स्वीकृत किया जाना चाहिये या फिर पूर्णतः अस्वीकृत। भारतीय रियासतों के सम्बन्ध में इस प्रस्ताव में पहले के समझौते के पुनर्परीक्षण की बात कही गयी थी। भारत पहुँचने से पहले क्रिप्स ने वायसराय को लिखा कि वे भारत में सभी प्रमुख दलों के नेताओं से मिलना चाहेंगे।

    22 मार्च 1942 को क्रिप्स दिल्ली पहुंचे। 28 मार्च 1942 को क्रिप्स ने नरेन्द्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से वार्ता की। इनमें नवानगर के जामसाहब, बीकानेर महाराजा, पटियाला महाराजा, भोपाल नवाब, सर वी.टी. कृष्णामाचारी, सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर, नवाब छतारी, सर एम. एन. मेहता तथा मीर मकबूल मुहम्मद शामिल थे। क्रिप्स ने राजाओं को बताया कि यदि भारत संघ अस्तित्व में आता है तो राज्यों के सम्बन्ध स्वतंत्र उपनिवेश अर्थात् भारत संघ से होंगे न कि ब्रिटिश क्राउन से। परमोच्चता वाली संधियां तब तक अपरिवर्तित रहेंगी जब तक कि कोई राज्य नवीन परिस्थतियों में अपने आप को समायोजित करने के लिये इसे समाप्त करने की इच्छा प्रकट न करे।

    29 मार्च 1942 को क्रिप्स ने एक पत्रकार वार्ता में विभिन्न पक्षों के मध्य समझौते के लिये एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि युद्ध की समाप्ति के बाद, भारतीय संघ की स्थापना के उद्देश्य से नया संविधान बनाने हेतु संविधान सभा का गठन किया जायेगा। संविधान सभा में भारतीय राज्यों की भागीदारी का प्रावधान किया जायेगा। यदि ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत नये संविधान को स्वीकार न करे तो वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता है। उसे भारत संघ के बराबर का दर्जा दिया जायेगा। संविधानसभा का निर्माण विभिन्न प्रांतों की विधान सभाओं के निम्न सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से किया जायेगा। इस हेतु नये चुनाव करवाये जायेंगे। समस्त निम्न सदनों में जितने सदस्य होंगे उनकी दशांश संख्या, संविधान सभा की होगी। संविधान सभा में भारतीय रियासतें को अपनी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधि भेजने के लिये आमंत्रित किया जायेगा। रियासती प्रतिनिधियों के अधिकार ब्रिटिश भारतीय प्रतिनिधियों के समान होंगे। रियासतों को यह छूट होगी कि वे नया संविधान स्वीकार करें या न करें। संविधान सभा में कुल 207 सदस्य होने थे जिनमें से 158 ब्रिटिश भारत के तथा 49 रियासतों के।

    जब तक नवीन संविधान का निर्माण न हो जाये, सम्राट की सरकार, भारत के विश्वयुद्ध उपक्रम का हिस्सा होने के कारण, भारत की रक्षा का भार अपने हाथ में रखेगी परंतु सेना, साहस तथा सामग्री संसधान उपलब्ध करवाने का दायित्व भारत के नागरिकों के सहयोग से भारत सरकार पर होगा। सरकार की इच्छा है कि प्रमुख भारतीय दलों के नेताओं को अपने देश की कौंसिलों, कॉमनवेल्थ तथा यूनाईटेड नेशन्स में परामर्श के लिए तुरन्त और प्रभावोत्पादक ढंग से भाग लेने के लिये आमंत्रित किया जाये जिससे वे भारत की स्वतत्रंता के लिये आवश्यक एवं महत्वपूर्ण सक्रिय तथा निर्माणकारी सहयोग देने में समर्थ हो सकें।

    इस प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत की स्वाधीनता के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दे दिया जायेगा। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना उसकी इच्छा पर निर्भर करेगा। योजना का सबसे विवादित बिंदु यह था कि भारत का कोई भी प्रांत अपना संविधान बनाकर स्वतंत्र हो सकता था। ऐसा पाकिस्तान की मांग को ध्यान में रखकर किया गया था। योजना प्रस्तुत किये जोन के बाद पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब देते हुए क्रिप्स ने कहा कि भारत संघ के निर्माण के लिये तत्काल प्रयास किये जायेंगे। युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं की जायेगी। विभिन्न पक्षों में सहमति बनते ही प्रांतीय चुनाव करवाये जायेगें। चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही संविधान निर्माण सभा स्थापित की जायेगी। हम भारत पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते यहाँ तक कि समय सीमा भी नहीं।

    पत्रकारों ने पूछा कि क्या आपको पता है कि इंगलैण्ड का इतिहास अपने वायदों से मुकर जाने का रहा है। क्या आप इन प्रस्तावों की गारण्टी प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट से दिलवा सकते हैं? क्रिप्स का उत्तर था कि यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो किसी चीज की कोई प्रत्याभूति नहीं है। इसके लिये प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट उपलब्ध नहीं होंगे। क्रिप्स से पूछा गया कि इन प्रस्तावों के तहत संविधान सभा में देशी राज्यों की जनता की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। इस पर क्रिप्स ने कहा कि यदि किसी राज्य में निर्वाचन का कोई तरीका है तो उनका उपयोग किया जायेगा किंतु यदि किसी राज्य में चुनी हुई संस्थायें नहीं हैं तो वहाँ यह कार्य नामित प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा।

    यह पूछे जाने पर कि आप कैसे पता लगायेंगे कि देशी राज्य भारत संघ में शामिल होने जा रहे हैं, क्रिप्स ने कहा कि देशी राज्यों से यह पूछकर। जब यह पूछा गया कि क्या राज्यों के नागरिकों की कोई आवाज होगी, क्रिप्स ने कहा कि इसका निर्णय उन राज्यों की वर्तमान सरकारों द्वारा किया जायेगा। हम किसी प्रकार की नयी सरकारों का निर्माण नहीं करेंगे। राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार के सम्बन्ध संधियों के माध्यम से हैं, वे संधियां तब तक बनी रहेंगी जब तक कि राज्य उन्हें बदलने की इच्छा प्रकट न करें। यदि भारतीय राज्य, संघ में सम्मिलित होते हैं तो वे ठीक उसी परिस्थिति में रहेंगे जिसमें कि वे आज हैं।

    जब उनसे यह पूछा गया कि यदि कोई प्रांत या राज्य सम्मिलित न होना चाहे तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जायेगा? क्रिप्स ने कहा कि वे दूसरे राज्यों के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करेंगे जैसा कि वे अन्य शक्तियों यथा जापान, स्याम, चायना, बर्मा अथवा अन्य किसी देश के साथ करते हैं।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 20

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 20

    अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण


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    कांग्रेस ने कैबीनेट मिशन प्लान को तो स्वीकार कर लिया था किंतु उसमें अंतरिम सरकार के गठन का जो प्रस्ताव किया गया था, उसे अस्वीकार कर दिया था। अतः मुस्लिम लीग ने दावा किया कि कांग्रेस को छोड़कर भारत की अंतरिम सरकार बनाई जाए किंतु वायसराय ने देश की सबसे बड़ी पार्टी को छोड़कर अंतरिम सरकार बनाने से इन्कार कर दिया। जब 27 जुलाई 1946 को मुस्लिम कौंसिल ने बम्बई-बैठक में कैबीनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया तब कांग्रेस ने दूसरी चाल चली। उसने 8 अगस्त 1946 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई तथा उसमें प्रस्ताव पारित किया कि कांग्रेस कैबीनेट मिशन की दीर्घकालिक योजना एवं अंतरिम सरकार योजना दोनों को पूरी तरह मानती है।

    वायसराय लॉर्ड वैवेल चाहता था कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों दलों के सहमत होने पर अंतरिम सरकार का गठन हो किंतु मुस्लिम लीग, अंतरिम सरकार में शामिल हाने के लिए सहमत नहीं हुई। अगस्त 1946 में प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय लॉर्ड वैवेल को व्यक्तिगत तार भेजकर निर्देशित किया कि मुस्लिम लीग के बिना ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाए। लॉर्ड वैवेल ने जवाहरलाल नेहरू को सरकार बनाने का निमंत्रण भिजवा दिया जिसमें कहा गया कि- 'मेरे सामने अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव रखें। ...... यह आपको तय करना है कि आप इसके बारे में मि. जिन्ना से चर्चा करना चाहेंगे या नहीं। ..... मुझे यकीन है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि गठजोड़ सरकार ही इस नाजुक समय में भारत की नियति को सबसे अच्छी तरह निर्देशित कर सकती है। हमारे पास समय बहुत कम है।'

    नेहरू ने 10 अगस्त 1946 को वर्धा से वायसराय को एक पत्र लिखकर उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया तथा 13 अगस्त 1946 को जिन्ना को पत्र लिखकर उससे सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया तथा उससे मिलने का समय मांगा। जिन्ना ने जवाहरलाल के पत्र का जवाब इस प्रकार भिजवाया- 'न तो मुझे यह पता है कि आपके और वायसराय के बीच क्या खिचड़ी पकी है और न ही मुझे आपके बीच हुए किसी समझौते की जानकारी है। ....... अगर इसका मतलब यह है कि वायसराय ने आपको एक कार्यकारी परिषद गठित करने की जिम्मेदारी सौंपी है ..... और वे आपकी राय स्वीकार करने और उसके आधार पर कदम उठाने के लिए तैयार हो गए हैं तो यह स्थिति स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं है। ...... लेकिन अगर मुझसे मिलकर आप हिन्दू-मुसलमान सवाल पर गतिरोध हल करना चाहें तो मैं आपसे आज शाम छः बजे मिलने के लिए तैयार हूँ।'

    अंत में 15 अगस्त 1946 को जिन्ना के निवास पर नेहरू और जिन्ना की वार्ता हुई। इस वार्ता में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के सदस्यों को नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल करने से मना कर दिया। इस भेंट के बाद नेहरू ने वैवेल को सूचित किया कि नहेरू ने जिन्ना को आश्वासन दिया है कि संविधान सभा में किसी प्रमुख साम्प्रदायिक मसले पर तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक दोनों पक्षों का बहुमत उस पर सहमत न हो। किसी भी विवादास्पद मुद्दे को संघीय अदालत के पास फैसले के लिए भेजा जाएगा और हालांकि कांगेस प्रांतों के घटक-समूहों का विचार नापसंद करती है और केन्द्र के तहत स्वायत्त प्रांतों के बंदोबस्त को प्राथमिकता देती है, लेकिन अगर प्रांतों की इच्छा होगी तो वह घटक-समूह बनाने का विरोध नहीं करेगी। जवाहरलाल नेहरू को जिन्ना द्वारा की गई 'ना' का एक ही अर्थ था- 'बंगाल में सीधी कार्यवाही के माध्यम से हिन्दुओं का कत्ल।'

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-115

     03.06.2020
     सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-115

    काश्मीर, गोआ, चीन, तिब्बत और नेपाल को लेकर नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल


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    सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने अपना पूरा जीवन कांग्रेस में बिताया था। दोनों ही गांधीजी के निकट सहयोगी माने जाते थे किंतु दोनों के व्यक्तित्व में आकाश और पाताल जैसा अंतर था। दोनों ने इंग्लैण्ड में जाकर बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की किंतु सरदार पटेल वकालात में नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। नेहरू प्रायः सोचते रहते थे किंतु पटेल उसे कर डालते थे। नेहरू शास्त्रों के ज्ञाता थे किंतु पटेल शास्त्र और नीति दोनों के ज्ञाता थे।

    नेहरू केवल भाषणों के माध्यम से विरोधियों को आंख दिखाते थे किंतु पटेल भाषण के साथ-साथ सेनाओं का उपयोग करना भी जानते थे। पटेल ने भी नेहरू जितनी ही ऊँची शिक्षा पाई थी किंतु पटेल में अहंकार नहीं था। वे स्वयं कहते थे कि मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं। मेरा विकास कच्ची झौंपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है। पं. नेहरू को गांव की गंदगी तथा जीवन से चिढ़ थी।

    पं. नेहरू अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे तथा समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। 1950 में पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर उन्हें चीन तथा चीन की तिब्बत नीति के प्रति सावधान किया और चीन के रवैये को कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बताया। पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को भावी शत्रु की भाषा बताया। सरदार ने लिखा कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा।

    कम्युनिस्टी आभा से ग्रस्त नेहरू ने पटेल की बात नहीं सुनी तथा हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते रहे। इसका दुष्परिणाम 1962 में भारत को चीन के आक्रमण के रूप में भुगतना पड़ा। 1950 में नेपाल के सदंर्भ में लिखे पत्रों में भी पटेल ने नेहरू की नीति के प्रति अपनी असहमति एवं असंतोष व्यक्त किया। 1950 में गोवा की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में चली दो घण्टे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्त्ता सुनने के बाद पटेल ने नेहरू से केवल इतना ही पूछा, क्या हम गोवा जायेंगे, केवल दो घण्टे की बात है ?

    नेहरू इससे बड़े नाराज हुए। यदि पटेल की बात मान ली गई होती तो गोवा को अपनी स्वतंत्रता के लिये 1961 तक प्रतीक्षा न करनी पड़ती। पटेल जहाँ पाकिस्तान की छद्म कार्यवाहियों एवं शत्रुता पूर्ण चालों से सतर्क रहते थे वहीं नेहरू को विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। पटेल, भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी राजभक्ति से परिचित थे।

    विद्वानों का मत है कि पटेल बिस्मार्क की तरह थे किंतु लंदन के टाइम्स ने लिखा था- बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के समक्ष महत्वहीन हैं। यदि जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल के कहने पर चलते तो काश्मीर, चीन, तिब्बत और नेपाल की परिस्थितियां आज जैसी न होतीं। पटेल सही अर्थों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा छत्रपति महाराज शिवाजी जैसी दूरदृष्टि थी।

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  • आजादी के बाद भी अंग्रेज भारत में ब्रिटिश सेनाएं रखना चाहते थे!

     03.06.2020
    आजादी के बाद भी अंग्रेज भारत में ब्रिटिश सेनाएं रखना चाहते थे!

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    क्रिप्स योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि भारत की आजादी के बाद भी भारतीय राज्य, भारत संघ में सम्मिलित नहीं होते और ब्रिटिश क्राउन के सहयोगी बने रहते हैं तो गोरी सरकार ई.1818 में राज्यों के साथ की गयी संधियों के तहत उन राज्यों की रक्षा करने के लिये उन राज्यों में इम्पीरियल ट्रूप्स रखेगी। योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि कोई राज्य संविधान सभा में भाग लेता है किंतु संविधान निर्माण के पश्चात संघ में सम्मिलित नहीं होता है तो वह राज्य फिर से अपनी वर्तमान स्थिति को प्राप्त कर लेगा किंतु उसे नवीन संघ के साथ रेलवे, डाक और तार जैसे आर्थिक विषयों पर समायोजन करने पड़ेंगे। क्रिप्स का कहना था कि ब्रिटिश सरकार की यह इच्छा है कि सभी राज्य भारत संघ में सम्मिलित हों किंतु सरकार संधि दायित्वों को भंग करके उनसे जबर्दस्ती ऐसा करने को नहीं कहेगी।

    2 अप्रैल 1942 को राज्यों के शासक फिर क्रिप्स से मिले। इनमें बीकानेर नरेश सादूलसिंह, नवानगर के जाम साहब और पटियाला के महाराजा यदुवेंद्रसिंह शामिल थे। राजाओं ने कई बिंदुओं पर स्पष्टीकरण चाहा। पहला बिंदु यह था कि यदि कुछ रियासतें संघ में शामिल होना उचित नहीं समझें तो क्या ऐसी रियासतों अथवा रियासतों के समूहों को अपना अलग से पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न संघ बनाने का अधिकार होगा? रियासतों के प्रतिनिधि मण्डल द्वारा सर स्टैफर्ड क्रिप्स को एक स्मृतिपत्र दिया गया जिसमें अनुरोध किया गया कि यदि क्रिप्स चाहें तो रियासतों को अपना एक निजी संगठन बनाने का अधिकार प्रदान कर दें। साथ ही, यह भी कहा गया कि इसका मतलब अलग संगठन वास्तविक रूप में बनाना नहीं अपितु भारतीय संघ में रियासतों की मर्यादा को बढ़ाना है। क्रिप्स द्वारा कहा गया कि वैयक्तिक स्तर पर कमीशन को इस सुझाव में कोई आधारभूत कठिनाई दिखायी नहीं देती किंतु चूंकि इस परिस्थिति पर विचार नहीं किया गया है इसलिये कमीशन इस सम्बन्ध में निश्चित उत्तर देने की स्थिति में नहीं है। ब्रिटिश सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार कर सकती है।

    राजाओं द्वारा कुछ प्रश्न संघ निर्मित होने के बाद की स्थिति के सम्बन्ध में पूछे गये। क्या संघ बनने के बाद राज्यों की जनता, संघ की जनता हो जायेगी? क्या संघ राज्यों के ऊपर परमोच्च सत्ता प्राप्त कर लेगा? क्या किसी राज्य के लिये यह संभव होगा कि वह संघ में मिलने के बाद भी शासक के वंशानुगत अधिकारों एवं व्यक्तिगत मामलों को केवल ब्रिटिश क्राउन के अधिकार क्षेत्र में बना रहने दे? इन सब प्रश्नों का यह जवाब दिया गया कि सब कुछ आगे चलकर वास्तव में की जाने वाली व्यवस्था पर आधारित होगा जो कि संविधान सभा तथा राज्यों के मध्य होने वाले समझौते पर निर्भर करेगा।

    राजाओं द्वारा पूछा गया कि क्या प्रस्तावित संघ भौगोलिक निरंतरता तक सीमित रहेगा। क्रिप्स का उत्तर था कि सामान्यतः ऐसा ही होगा जब तक कि मध्यवर्ती राज्यों अथवा इकाईयों के बीच कुछ व्यवहारिक प्रबंध न कर लिये जायें। इन विवादों को सुलझाने के लिये ब्रिटिश सरकार के कार्यालय मौजूद रहेंगे। राज्यों तथा प्रांतों को संघ में सम्मिलित होने या न होने की पूरी छूट दी गयी है। वे चाहें तो नये प्रस्तावित संघ से बाहर रहें और चाहें तो उसमें शामिल हों। क्रिप्स द्वारा कहा गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की इच्छा के बिना भारत में बने रहना नहीं चाहती। जब तक कि भारतवासी अपने हित के लिये ब्रिटिश सरकार को भारत में बने न रहने देना चाहें, ब्रिटिश सरकार भारत में बनी नहीं रहेगी किंतु संघ में शामिल न होने वाले राज्यों के प्रति संधि दायित्वों का निर्वहन करने की सीमा तक वह भारत में बनी रहेगी। क्रिप्स ने आशा व्यक्त की कि समस्त भारतीय समझदार हैं और वे एक संघ के नीचे आने में सक्षम होंगे। अन्यथा उन्हें कई संघ बनाने होंगे और कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

    क्रिप्स ने राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को पहला कदम यह उठाना चाहिये कि वे अपने समूह बनायें अथवा संघीय सम्बन्ध स्थापित करें ताकि सहकारिता पर आधारित समूहों की भावना को बड़ी इकाईयों तक विस्तारित किया जा सके। विशेषकर साझा औद्योगिक एवं आर्थिक हितों के मामलों में, ताकि राज्य ब्रिटिश भारत से पीछे न रह जायें और संपूर्ण भारत के एक साथ विकास पर जोर दिया जा सके। राजाओं को चाहिये कि वे इस मुद्दे पर वायसराय से बात करें। एक राजा ने क्रिप्स से पूछा कि क्या नवीन परिस्थितियों में राजाओं को ब्रिटिश भारत के राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना चाहिये? इस सवाल के जवाब में क्रिप्स ने कहा कि मेरी सलाह है कि राज्यों के शासक ब्रिटिश भारत के नेताओं से सम्पर्क स्थापित करें ताकि भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान राजाओं को सुविधा रहे।

    2 अप्रेल को क्रिप्स ने तीन नरेशों को, जो उनसे मिलने आये थे, गुस्से में आकर कहा कि उन्हें अपना फैसला कांग्रेस या गांधी से करना होगा क्योंकि हम तो अब बिस्तर बोरिया बांधकर भारत से कूच करने वाले हैं। इस प्रकार क्रिप्स ने राजाओं को स्पष्ट किया कि वे अपने भविष्य के लिये भारत सरकार की तरफ देखें न कि ब्रिटिश सरकार की तरफ। क्रिप्स मिशन के इस रवैये से राजाओं को यह अप्रिय तथ्य स्पष्ट हो गया कि यदि ब्रिटिश भारत और राजसी भारत के हितों के बीच किसी तरह का विवाद हुआ तो महामना सम्राट की सरकार देशी राज्यों को नीचा दिखायेगी।

    क्रिप्स प्रस्ताव में प्रांतों को तो अपना पृथक संघ बनाने की आजादी थी परंतु रियासतों के लिये ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी। अगर उन्हें ऐसा करने का अधिकार दे दिया जाता तो भारत में पूरी तरह से बाल्कन राष्ट्र जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती। पूरा देश अनुभव कर रहा था कि राजाओं के इस प्रस्ताव में व्यवहारिकता का अभाव था क्योंकि देश के समस्त रजवाड़ों की सीमा ब्रिटिश भारत के क्षेत्र से संलग्न थी। अतः इस तरह का कोई संघ कैसे काम कर सकता था! 11 अप्रेल को कांग्रेस तथा मुस्लिमलीग ने क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। 22 अप्रेल को क्रिप्स लंदन चले गये। उनका मिशन असफल हो गया जिससे राजाओं ने चैन की सांस ली। राजाओं की इस दोहरी चाल से कांग्रेस को खासी निराशा हुई। उन्होंने राजाओं के विरुद्ध वक्तव्य दिये। नेहरू ने उन लोगों की पीठ थपथपायी जो राजाओं को धूर्त, झक्की अथवा मूर्ख कहते थे।

    क्रिप्स कमीशन असफल होकर लौट गया किंतु क्रिप्स कमीशन की असफलता वस्तुतः ब्रिटिश सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। योजना में किसी संशोधन तथा आश्वासन के प्रति निस्पृह रहने के लिये चर्चिल ने क्रिप्स को हार्दिक बधाई दी। वे कतई नहीं चाहते थे कि भारत को आजादी दी जाये। मिशन के असफल हो जाने पर विंस्टन चर्चिल ने मित्र राष्ट्रों को सूचित किया कि कांग्रेस की मांगों को मानने का एक ही अर्थ होता कि हरिजनों तथा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाता। अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को उसने समझा दिया कि भारतीय नेता परस्पर एकमत नहीं हैं।

    क्रिप्स मिशन की असफलता पर यह शक किया जाने लगा कि या तो क्रिप्स की पीठ में ब्रिटिश सरकार ने छुरा भौंक दिया है अथवा डीक्वेंस के शब्दों में चालाक क्रिप्स महज धोखेबाजी, छल कपट, विश्वासघात और दुहरी चालों से काम ले रहे थे और उन्हें इस पर जरा भी पश्चाताप नहीं था! गांधीजी के अनुसार क्रिप्स योजना आगे की तारीख का चैक था जिसका बैंक खत्म होने वाला था।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 21

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 21

    सीधी कार्यवाही


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    सीधी कार्यवाही कार्यक्रम को जान-बूझकर अस्पष्ट रखा गया। जिन्ना का कहना था कि वह नीतियों की चर्चा नहीं करने जा रहे हैं। लियाकत अली ने सीधी कार्यवाही को कानून के खिलाफ कार्यवाही बताया जो हिंसा का आश्रय लेने का व्यापक संकेत था। इस आह्वान का उद्देश्य शांपिूर्ण नहीं था। इसमें प्राणों की आहुति दी जानी थी। पूर्व-सैनिकों को लेकर गठित मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड सीधी कार्यवाही में सबसे आगे थी। 5 अगस्त 1946 को मॉर्निंग न्यूज के सम्पादक ने लिखा- 'मुसलमान अहिंसा की भाषा में विश्वास नहीं रखते।' इस समाचार पत्र ने 11 अगस्त 1946 को एक मुस्लिम नेता निजामुद्दीन के इस वक्तव्य को उद्धृत किया- 'हम एक सौ तरीकों से परेशानियां उत्पन्न कर सकते हैं। विशेषकर इसलिए कि हम अहिंसा का सहारा लेने के लिए बाध्य नहीं हैं। बंगाल के मुसमलान सीधी कार्यवाही का अर्थ अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए हमें उन्हें कोई रास्ता दिखाने की आवश्यकता नहीं है।'

    सीधी कार्यवाही की पूर्व संध्या को सैनिकों की भरती द्वारा मुस्लिम लीग नेशनल गार्डों को पुनः संगठित किया गया। सालार-ए-आला और अन्य प्रांतीय सालारों की नियुक्ति की गई। सीधी कार्यवाही से पहले ब्लूचिस्तान मुस्लिम नेशनल गार्डों के एक मजबूत तथा शक्तिशाली समूह को कई महानों के लिए बिहार में भेजा गया ताकि वे बिहार में मुसलमानों की सुरक्षा कर सकें। वस्तुतः इनकी बिहार में नियुक्ति तो एक दिखावा थी, वास्तव में इनसे कलकत्ता के दंगों में उपद्रव करवाया जाना था। कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर की रिपोर्ट के अनुसार 10 अगस्त 1946 से कलकत्ता से बाहर के गुण्डे लाठी, भालों तथा कटारों से लैस शहर की झुग्गियों में नजर आने लगे थे। ...... उस दिन कलकत्ता में बहुत से हिन्दू मारे गए थे..... अगले दिन वहाँ एक दिन पूर्व हुए हिन्दू नरसंहार का व्यापक प्रतिशोध लिया गया। गिद्धों ने शहर साफ कर दिया। 12 अगस्त 1946 को डॉन में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें कहा गया- 'मुसलमानों का अहिंसा में कोई यकीन नहीं है और न ही वे पाखण्डी हैं कि वैसे तो अहिंसा का उपदेश दें और वास्तव में हिंसा का सहारा लें।'

    16 अगस्त 1946 को बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने सरकारी कर्मचारियों को तीन दिन की असाधारण छुट्टी पर भेज दिया। कलकत्ता में नियुक्त ब्रिगेडियर जे. पी. सी. मेकिनले ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उस दिन बैरकों में ही रहें। कलकत्ता में ऑक्टरलोनी के नीडिल स्मारक पर बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी और लीग के अन्य नेताओं ने मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित किया। इस सभा में हावड़ा की जूट मिलों में काम करने वाले श्रमिक बड़ी संख्या में सम्मिलित हुए। सुहरावर्दी ने अपने भाषण में कहा- 'कैबीनेट मिशन एक धोखा था और अब वे देखेंगे कि अंग्रेज मिस्टर नेहरू से बंगाल पर कैसे हुकूमत करवा पाते हैं। मुक्ति हासिल करने के लिए सीधी कार्यवाही दिवस मुसलमानों के संघर्ष का पहला कदम साबित होगा। ...... आप लोग जल्दी घर लौटें ..... हमने सभी बंदोबस्त कर लिए हैं ताकि पुलिस और मिलिट्री आपके रास्ते में अड़चन न डाले।'

    इस सभा के समाप्त होते ही शहर में दंगे भड़क गए। बंगाल के गवर्नर बरो ने लॉर्ड वैवेल को एक तार भेजकर इन दंगों की जानकारी दी- 'छः बजे तक हालत यह है कि चारों तरफ बहुत सी जगहों पर साम्प्रदायिक झड़पें चल रही हैं।.... साथ में दुकानों की लूट और आगजनी भी जारी है। ज्यादातर पथराव ही किया जा रहा है, पर कुछ जगहों पर दोनों समुदायों के लोगों द्वारा बंदूकों का इस्तेमाल भी किया गया है और चाकूबाजी की कुछ घटनाओं की जानकारी भी मिली है। ..... दिन की शुरुआत से ही खासकर उत्तर-कलकत्ता के हिन्दू व्यापारियों के बीच घबराहट देखी जा सकती है जिसके कारण घटनाओं का ब्यौरा असलियत के मुकाबले बढ़ा-चढ़ाकर भी दिया जा रहा है। ...... यह अशांति अभी तक निश्चित रूप से साम्प्रदायिक ही है और इसे किसी भी तरह से ब्रिटिश विरोधी नहीं कहा जा सकता।'

    दंगों से पहले मुख्यमंत्री के हस्ताक्षरों वाले कूपन मस्लिम लीग की लॉरियों में वितरित किए गए। कलकत्ता के दैनिक 'द स्टेट्समैन' ने लिखा- 'लॉरियों में गुण्डों के समूह थे जो कही-कहीं रुककर आक्रमण कर रहे थे।'

    शाम को छः बजे दंगा प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया, लेकिन जब एरिया कमाण्डर ने उत्तरी बैरकों से सेवंथ बूस्टर्स और ग्रीन हावर्ड्स के सैनिकों को तैनाती का आदेश दिया तो उन्होंने रात आठ बजे देखा कि कॉलेज स्ट्रीट मार्केट धू-धू करके जल रहा है। भीड़ द्वारा की गई लूटमार के बीच एमहर्स्ट स्ट्रीट पर कुछ बिना जले मकान और दुकान पूरी तरह लूट लिए गए हैं। अजर सर्कूलर रोड पर सुलगता हुआ मलबा दिखाई दे रहा है। हैरिसन रोड पर डरे हुए निवासियों और घायलों की कराहें सुनी जा सकती हैं। कई लाशें देख कर लगता है कि उनकी मृत्यु अभी-अभी हुई है। मेजर लिवरमोर के अनुसार कलकत्ता युद्ध के मैदान में बदल चुका था। एक तरफ भीड़ की हुकूमत थी तथा दूसरी तरफ सभ्यता और भद्रता। उस हिंसाग्रस्त इलाके में अधिकतर गरीबों, नीची जाति के निरक्षरों की जानें गई थीं या वे लोग मारे गए थे जो लुटेरों और चील-कौवों की तरह टूट पड़ने वाली भीड़ से जान-माल की हिफाजत करने के मामले में कमजोर साबित हुए थे।

    जनरल टक्कर के अनुसार फरवरी में हुई हिंसा से हम सब स्तब्ध रह गए थे लेकिन इस बार तो मामला कुछ और ही था। हत्या के जुनून में भीड़ नंगी बर्बरता के साथ सिर्फ मारकाट और आगजनी पर उतारू थी। कलकत्ता शहर की बागडोर अपराध जगत के हाथों में जा चुकी थी ...... पुलिस की तरफ से हालात पर काबू पाने की कोई कोशिश नहीं थी। दिन में न कोई बस दिखती थी, न टैक्सी। रिक्शे तोड़ डाले अैर जला दिए गए थे। क्लर्कों के दफ्तर जाने का कोई जरिया नहीं बचा था। ..... शहर भर में लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। दंगाई भारी-भारी डण्डे और पैनी लोहे की छड़ें लिए घूम रहे थे। ..... प्रकट रूप में वे बहुत खरतनाक मूड में थे।.... एक व्यक्ति ..... पुलिस से ......सौ गज से भी कम दूरी पर पीट-पीट कर मार डाला गया था। पुलिस ..... जब तक धीरे-धीरे अपनी गाड़ियों से उतरती और कार्यवाही करती तब तक तीन लोगों की पीट-पीट कर जान ले ली गई और वे वहीं सड़क पर पड़े हुए थे।

    टक्कर ने लिखा है- 'सोमवार 19 अगस्त 1946 को मेजर लिवरमोर की प्लाटून ने एक चौराहे से डेढ़ सौ से अधिक शव हटाए। इस क्षेत्र में दुर्गंध सहनशक्ति से बाहर होती जा रही थी। जिसका एक कारण ये शव भी थे जिनके हटाने से एक नागरिक तो इतना उपकृत हुआ कि उसने प्लाटून को शैम्पेन की दो बोतलें दे डालीं। ...... रात को नौ बजे हमें आदेश मिला कि प्रातः चार बजे कर्फ्यू हटने से पहले कम से कम मुख्य सड़कों से तो शव हटा ही लिए जाने चाहिए। सड़ते हुए शव उठाने के कार्य में हमारी सहायता के लिए दुर्गंधरोधी और गैस मास्क भी भेजे गए। मुसलमान कब्रिस्तानों एवं हिन्दू शवदाह घाटों की पहचान करने वाले नक्शे भी हम तक जल्दी से जल्दी पहुंचने वाले थे। .... यह पता लगाना कितना कठिन था कि तीन दिन से मरे पड़े लोगों में से कौन हिन्दू है और मुसलमान कौन! मेरे अपने क्षेत्र का काम समाप्त होने में दो दिन तथा दो रातें और लग गईं। एक कम्पनी सेक्टर में कुल मिलाकर 507 शव मिले जिनमें से अधिकतर चार सौ वर्ग गज के एक मुहल्ले के थे। .... हैजे की महामारी का अंदेशा पैदा हो चुका था।'

    टक्कर ने लिखा है- '19 अगस्त की रात तक सड़ती हुई लाशों के खतरे से कलकत्ता इतना विचलित हो चुका था कि बंगाल की सरकार ने एक लाश ठिकाने लगाने के लिए सैनिकों को पांच रुपए देने की घोषणा की। इस काम में जिन लोगों को लगाया गया उनमें कलकत्ता के फोर्टेस स्टाफ का मेजर डोबनी भी था। ...... ब्रिटिश सैनिकों के इक्का-दुक्का दल के अलावा पूरा शहर बाकयदा मुर्दों के शहर में बदल चुका था। ..... सभी सड़कों पर रोशनी कर दी गई थी, ताकि सड़ते हुए इन्सानों और मलबे के ढेर दिखाई दे सकें। हथठेलों में लाशें भरी हुई थीं और उन्हें किनारे छोड़ दिया गया था। ...... जैसे ही पता चला कि अंग्रेज अपने दीवानेपन में लाशें जमा करते घूम रहे हैं, घरों और झौंपड़ियों से और लाशें निकलने लगीं। ..... पूरी रात यह भीषण काम किया जाता रहा।'

    टक्कर का अनुमान था कि इस हौलनाक हत्याकांड में मरने वालों की संख्या हजारों में तो रही होगी। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार लगभग 16 हजार बंगाली 16 से 20 अगस्त के बीच मारे गए। मार्गरेट बर्गवाइट की रिपोर्ट के अुनसार इससे भी कई गुना ज्यादा संख्या में हुगली का पुल पार करके भागते हुए देखे गए। कई दिनों तक पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों और घरेलू पशुओं की भीड़ हावड़ा रेलरोड स्टेशन की तरफ जाती रही। जब ट्रेनों में स्थान नहीं बचा तो हिंदू और मुसलमान अगल-अलग होकर कंकरीट के फर्श पर प्रतीक्षा करने लगे। यह तो पाकिस्तान निर्माण के लिए हुए रक्तपात की केवल एक झलक मात्र थी।

    लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- '16 अगस्त की सुबह धार्मिक नारे लगाते मुसलमानों की टोलियां अचानक अपनी झौंपड़ियों से निकलीं। छुरे, चाकू, तलवारें, लोहे की छड़ें, ऐसे कोई भी हथियार जो इंसान की खोपड़ी तोड़ सकते हों, उनके हाथों में चमक रहे थे। ये मुसलमान मुस्लिम लीग की ललकार के अनुसार बाहर निकले थे..... ताकि इंग्लैण्ड और कांग्रेस पार्टी के सामने साबित किया जा सके कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर रहेंगे ...... उन मुसलमान टोलियों ने जो भी हिन्दू दिखाई दिया, उसे मार कर शव शहर के खुले गटरों में फैंक दिए। पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। जल्दी ही शहर के दर्जनों स्थानों से काले धुंएं के खंभे आकाश में उठ-उठ कर डोलने लगे। हिन्दुओं की बस्तियां खाक हो रही थीं। बाजार धू-धू कर जल रहे थे। हिन्दू क्यों पीछे रहते? उन की भी टोलियों ने अपनी झौंपड़-पट्टियों से निकलना और मुसलमानों को मौत के घाट उतारना शुरू किया। ..... शहर में 6000 लोग मारे गए थे। 21 अगस्त को लॉर्ड वैवेल ने भारत सचिव पेथिक लारेंस को जानकारी भिजवाई कि वर्तमान अनुमान के अनुसार 3000 लोगों की जान जा चुकी है और 17 हजार लोग घायल हुए हैं। कांग्रेस पूरी तरह मान चुकी थी कि यह सारी गड़बड़ी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार की कारस्तानी है। लेकिन वायसराय को अभी तक इस आशय का कोई संतोषजनक प्रमाण नहीं मिला था। शवों के बारे में अनुमान यह था कि मारे गए लोगों में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं के मुकाबले खासी ज्यादा है। '

    मोसले ने लिखा है कि 16 अगस्त 1946 की सुबह से तीन दिन बाद की शाम तक कलकत्ता में 6 हजार लोगों को मारपीट, खून-खराबा, आग, छुरेबाजी और गोलियों से मौत के घाट उतारा गया। बीस हजार के साथ बलात्कार हुआ अथवा वे जीवन भर के लिए अपंग बना दिए गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लगभग 5000 लोगों की जानें गईं, 15,000 घायल हुए तथा 10 हजार लोग बेघर हुए।

    अगस्त के उत्तरार्ध में एक विदेशी संवाददाता ने जिन्ना से कलकत्ता के नरसंहार के बारे में पूछा तो उसका जवाब था- 'यदि कांग्रेस की सरकारें मुसलमानों का दमन और उत्पीड़न करती रहीं तो अशांति पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन हो जाएगा। ..... मेरी राय में पाकिस्तान की स्थापना करने के अतिरिक्त अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। ..... हम पाकिस्तान के गैर-मुसलमानों और हिन्दू जाति-अल्पसंख्यकों की देखभाल करने की गारंटी लेते हैं। इनकी संख्या लगभग ढाई करोड़ होगी। इनके हित की हर तरीके से सुरक्षा की जाएगी। ..... भारत को जल्दी से जल्दी सच्ची आजादी दिलाने और उपमहाद्वीप में रहने वाले सभी लोगों के कल्याण और खुशी का तरीका यही हो सकता है।'


    कई माह तक बेकाबू रहे कलकत्ता के हालात

    3.30 करोड़ मुसलमानों एवं 2.50 करोड़ हिन्दुओं के बंगाल को हिंसा और मौत का खेल खेलने के लिए सुरक्षित शिकारगाह समझकर 16 अगस्त 1946 को भले ही जिन्ना और उसके पिठ्ठू सुहरावर्दी ने सीधी कार्यवाही दिवस मना कर यह सोच लिया था कि वे जीत में रहे हैं किंतु यह हिंसा और मौत का ऐसा खेल था जिसमें जीत कभी भी किसी पक्ष की नहीं होती, अतः जिन्ना और सुहरावर्दी की भी नहीं हुई। कलकत्ता में पुलिस और मिलिट्री भले ही बैरकों से बाहर निकलकर सड़कों पर खड़ी हो गई किंतु हिंसा और मौत का खेल उसके पड़ौसी प्रांत बिहार में शुरू हो गया था। 9 नवम्बर 1946 को बिहार के गवर्नर सर ह्यू डो ने प्रांत में साम्प्रदायिक दंगों के बारे में एक रिपोर्ट गवर्नर जनरल वैवेल को भिजावाई इसमें कहा गया- 'सेना की नौ बटालियनें दंगा-प्रभावित देहाती क्षेत्रों में नियुक्त की गई हैं किंतु हिंदुओं की भीड़ें मुसलमानों को जहाँ हाथ लगते हैं, खत्म करने पर तुली हुई हैं। मरने वालों में तकरीबन सभी मुसलमान ही हैं और अनुमान यह है कि उनमें 75 प्रतिशत संख्या औरतों और बच्चों की है।'


    पाकिस्तान को बोलने दो!

    सीधी कार्यवाही दिवस में आशातीत सफलता मिलने के बाद मुस्लिम लीग द्वारा एक इश्तहार का प्रकाशन करवाया गया जिसका शीर्षक था- 'पाकिस्तान को बोलने दो!' इस इश्तहार में मुस्लिम लीग के नेता एस. एम. उस्मान ने कहा- 'रमजान के महीने में इस्लाम तथा 'काफिरों' के बीच पहला खुला युद्ध शुरू हुआ और मुसलमानों को जेहाद में संलग्न होने की अनुमति मिली। इस्लाम को शानदार विजय प्राप्त हुई। खुदा की इच्छा के अनुसार ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्राप्त करने के उद्देश्य से जेहाद शुरू करने के लिए इस पवित्र माह को चुना। हम मुसलमानों के पास ताज रहा है और हमने शासन किया है। हिम्मत मत हारो, तैयार हो जाओ और तलवार निकाल लो। ओ काफिर तुम्हारा अंत दूर नहीं है, तुम्हारा संहार जरूर होगा।'


    सुहरावर्दी का व्यवहार

    बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने इन दंगों का नेतृत्व करते हुए नारा दिया- 'लड़ कर लेंगे पाकिस्तान।' उसने 16 अगस्त को सरकारी दफ्तरों में अवकाश घोषित कर दिया ताकि मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता खुलकर हत्याएं कर सकें। बंगाल का गवर्नर सर फ्रेडरिक बरोज इन दंगों को रोकने के लिये कुछ नहीं कर पाया। बंगाल और बिहार हिन्दुओं के खून में नहा उठे। बंगाल के तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर जनरल एस. जी. टेलर ने अपने 'एस. जी. टेलर पेपर्स' में लिखा है- 'मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने उस समय कैसा व्यवहार किया था? सुहरावर्दी का व्यवहार निंदनीय था। उपद्रवों के चरम पर आर्मी एरिया कमाण्डर और मुख्यमंत्री ने कलकत्ता का दौरा किया। सेना के कमाण्डर ने कहा यह असामान्य है, सेना में हिन्दू और मुसलमान खुशी-खुशी एक साथ रहते और काम करते हैं। सुहरावर्दी ने अपनी भावनाओं को छिपाए बिना कहा, हम जल्द ही वह सब खत्म कर देंगे।' इस प्रकार सीधी कार्यवाही में कलकत्ता में लगभग दस हजार जानें लीं।


    मुस्लिम लीग के अन्य नेताओं का व्यवहार

    पंजाब के प्रमुख मुस्लिम लीगी नेता ममदौत ने लीग कर्मियों से एक उत्तेजित देश के सभी तरीकों का प्रयोग करने को कहा- 'हम अपने सभी बंधन तोड़ चुके हैं। अब हम भारत में इस्लाम की स्वतंत्रता के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ हैं।' सिंध के कानून व्यवस्था मंत्री गुलाम अली खाँ ने कहा- 'पाकिस्तान के सम्बन्ध में मुसलमानों का विरोध करने वाले हर किसी को नष्ट तथा तहस-नहस कर दिया जाएगा।' कलकत्ता के सटेट्समैन ने सीधी कार्यवाही के कार्यक्रमों को बहुत सूक्ष्मता से परखा। उसने लिखा है- 'बम्बई में फिरोज खाँ नून ने पाकिस्तान के निर्माण के लिए एक ध्वजोत्तोलन समारोह में भाग लिया और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को उनके सभी समर्थकों के साथ इस्लाम ग्रहण करने का न्यौता दिया। दिल्ली में 16 अगस्त को जामा मस्जिद में मुसलमानों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए काजी मुहम्मद ईसा ने मुसलमानों को खुद को पाकिस्तान का सैनिक मानने और अंतिम संघर्ष हेतु तैयार रहने के लिए कहा। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि मुस्लिम लीग किस प्रकार पूरे उत्तरी भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगों को बढ़ावा देकर साम्प्रदायिक विभाजन उत्पन्न करने के लिए डटी हुई थी।'


    नोआखाली में हिंसा

    अगस्त 1946 में जो कुछ कलकत्ता में हुआ, वह वहीं तक सीमित नहीं रहा। बंगाल के दूसरे बड़े शहर ढाका में हत्या, आगजनी और लूटपाट की वारदातें दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थीं। पर सबसे भीषण स्थिति अक्टूबर 1946 में मुस्लिम-बहुल पूर्वी-बंगाल के दो जिलों नोआखाली ओर तिप्परा में थी। संगठित गुंडे वहाँ व्यापक स्तर पर आर्थिक बहिष्कार, लूटपाट, आगजनी, बलात्कार तथा हत्या के जरिए असहाय हिन्दू पड़ौसियों को अपनी बर्बरता का शिकार बना रहे थे। साम्प्रदायिक उन्माद से सर्वाधिक पीड़ित नोआखाली जिले के सबडिवीजन फेनी में जब 9 अक्टूबर 1946 को सशस्त्र सैनिक टुकड़ियां पहुंचीं तो इससे कहीं अधिक बर्बरता से साम्प्रदायिक ताण्डव नोआखाली जिले के रामगंज थाने में शुरु हो गया। वहाँ लूटपाट, आगजनी, बलात्कार और हत्या के अलावा हिन्दुओं को जबर्दस्ती इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। इस सुनियोजित बर्बरता का नेतृत्व मुस्लिम लीग नहीं अपितु ई.1946 के चुनाव में पराजित भूतपूर्व विधायक गुलाब सरवर कर रहा था।

    पूर्वी बंगाल के नोआखाली और त्रिपुरा जिलों में लगभग 5000 हिन्दू मारे गए। नोआखाली में बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया गया तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किए गए। नोआखाली में 7.5 लाख हिन्दुओं को कई महीनों तक शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। इन दंगों की प्रतिक्रिया में बिहार में हिन्दुओं ने मुसलमानों पर आक्रमण कर दिया। सरकारी सूत्रों के अनुसार बिहार में लगभग 4,300 मुसलमान मारे गए।

    संयुक्त प्रान्त में 250 मुसलमान मारे गए। पूर्वी भारत की तरह पश्चिमी भारत में भी सीधी कार्यवाही में हिन्दुओं एवं सिक्खों के विरुद्ध भयानक हिंसा हुई। पंजाब में मरने वाले सिक्खों तथा हिन्दुओं की संख्या 3,000 तक पहुंच गई। दंगों के दौरान सिक्खों तथा हिन्दुओं की करोड़ों रुपये मूल्य की सम्पत्ति लूट ली गई अथवा तोड़-फोड़ एवं आगजनी में नष्ट कर दी गई। कांलिन्स एवं लैपियर ने लिखा है- 'नोआखाली धू-धू कर जल उठा। जहाँ गांधीजी अपनी प्रायश्चित यात्रा पर निकले। बिहार में कौमी दंगों का नंगा नाच हुआ। पश्चिमी तट पर बम्बई भी आग के शहर में बदल गया।....... इन घटनाओं ने देश के इतिहास को अत्यधिक प्रभावित किया। मुसलमानों ने वास्तव में साबित कर दिया कि यदि उन्हें उनका पाकिस्तान नहीं मिला तो सारे देश को खून से सान देने की जो धमकी वे बरसों से देते आ रहे थे, उसे एक डरावनी सच्चाई में बदल देने का दम-खम उनमें पूरी तरह था। जिस वीभत्स से दृश्य की कल्पना से ही गांधीजी के रोम सिहरते रहे थे, वह दृश्य अचानक मात्र गीदड़ भभकी न रहकर एक नंगी सच्चाई बना गया- गृह युद्ध!'


    बंगाल के अन्य शहरों एवं बिहार में हिंसा

    सिलहट एवं ढाका में भी लोग हताहत हुए। प्रतिशोध बहुत उग्र था और मूल उपद्रव की तुलना में वह कहीं अधिक भयानक था। एक के बदले तीन की नीति से नोआखाली और त्रिपुरा में जनता उत्तेजित हो उठी। इन दोनों जिलों में मुसलमान बहुसंख्यक और हिन्दू अल्पसंख्यक थे। नोआखाली में उनका अनुपात 18 लाख और 4 लाख का था। पूर्वी बंगाल के इन दोनों जिलों में अपराध जितनी भयानकता के साथ हुए थे उसे देखते हुए हताहतों की संख्या अधिक नहीं थी। नारी निर्यातन, बलपूर्वक विवाह, जबरन धर्म परिवर्तन, घरों में आग लगा देने, उन पर सामूहिक हमले और प्रसिद्ध परिवारों के इन हमलों में शिकार होने से पूर्वी बंगाल में अविश्वास फैल गया था कि वह तीन वर्ष पूर्व अकाल में हुई सामूहिक मृत्युओं से भी कहीं अधिक भीषण था। पूर्वी बंगाल से कितने ही हिन्दू भागकर बिहार आए और वहाँ अत्याचारों की कहानियां फैल गईं। इससे बिहारी जनता प्रतिशोध के लिए पागल हो उठी।

    अक्टूबर 1946 के अंत में साम्प्रदायिक विनाश की बर्बर विनाशलीला बिहार में शुरु हुई। बिहार पहले से ही बारूद के ढेर पर बैठा था। कलकत्ता, ढाका और नोआखाली की खबरों ने पलीते का काम किया। बिहार में साम्प्रदायिक हिंसा का का शिकार मुख्यतः वहाँ के मुसलमान अल्पसंख्यक हुए। लीग ने जब अंतरिम सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया तो वस्तुतः साम्प्रदायिक उन्माद में बह रहे रक्त से ही उसका राजतिलक हुआ।

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