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  • चित्रकूट का चातक - 38

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 38

    जसोदा बार बार भाखै

    अकबर ने शहजादा मुराद का विवाह खानखाना अब्दुर्रहीम के साले खाने-आजम मिर्जा अजीज कोका की बेटी से करना निश्चित किया। शहजादे मुराद के विवाह में भाग लेने के लिये अकबर ने मुगलिया सल्तनत के लगभग सभी बड़े अमीर, उमराव और सेनापतियों को पंजाब में बुलवाया जहाँ वह अपने विशाल लाव-लश्कर सहित डेरा डाले हुए था।

    अकबर ने इस मौके पर खानखाना को भी पत्र लिखकर बुलाया था कि यदि गुजरात में शांति हो गयी हो तो वह शहजादे के विवाह में शरीक होने के लिये चला आये। खानखाना सांडनी पर बैठकर पन्द्रह दिन की ताबड़तोड़ यात्रा करता हुआ पंजाब पहुँचा जहाँ बादशाह का लश्कर पड़ाव डाले हुए था। पंजाब में शहजादे का विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद अकबर खानखाना को अपने साथ सीकरी ले आया था। उनके साथ बहुत से अमीर उमराव भी आ गये थे जो अब तक सीकरी में ही पड़ाव डाले हुए बैठे थे।

    अकबर ने कहने को तो दिल्ली को अपनी राजधानी बना रखा था किंतु वह दिल्ली के स्थान पर फतहपुर सीकरी में अधिक रहता था। चौमासे में अक्सर वह शाम के समय आगरा आ जाता और देर रात तक अपने आदमियों के साथ यमुनाजी के तट पर जमा रहता। सायंकालीन दरबार में वह शासन और राजनीति की बातें अत्यंत आवश्यक होने पर ही किया करता था। अन्यथा यह समय उसके रागरंग और मनोविनोद के लिये निर्धारित था। उसने उज्जैन के परम पराक्रमी महाराजा विक्रमादित्य के अनुसरण पर अपने दरबार में भी नवरत्नों की नियुक्ति की थी। इन रत्नों में कवि, लेखक, गवैये, संगीतकार और अन्य विद्वान शामिल थे। सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्य रूप से नवरत्नों के सानिध्य में समय व्यतीत करने के लिये किया जाता था। इन नवरत्नों को भी उसने अलग-अलग उपाधियों से नवाज रखा था। आज के इस सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्यतः संगीत सम्राट तानसेन के गायन के लिये किया गया था।

    जब बहुत देर तक राग अलापने के बाद तानसेन ने सितार एक तरफ रखा तो दरबारी फिर से विचारों की दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान में लौटे। आज के गायन में तानसेन ने सूरदासजी का पद गाया था-

    ''जसोदा बार बार भाखै।

    है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहि राखै।''

    अकबर ने तानसेन से इस पद का अर्थ करने को कहा। तानसेन ने पद का अर्थ इन शब्दों में किया- 'मैया यशोदा बार-बार अर्थात् पुनः-पुनः यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!' इस पर अकबर ने फैजी की ओर देखा फैजी ने कहा- 'यशोदा बार-बार अर्थात् रो-रोकर यह रट लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!'

    - 'राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?' अकबर ने बीरबल से पूछा।

    - 'शहंशाह! इस पद का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है किंतु मेरे साथी समझ नहीं पा रहे हैं। माता यशोदा बार-बार अर्थात् द्वार-द्वार पर जाकर कहती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!'

    इस बार अकबर ने खाने आजम कोका की ओर देखा कोका ने कहा- 'यशोदा बार-बार अर्थात् दिन-दिन (प्रतिदिन) यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितैषी जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!'

    इस बार बारी आयी खानखाना की। खानखाना ने कहा- 'जहाँपनाह! तानसेन गायक हैं, इनको एक ही पद बार-बार अलापना पड़ता है इसलिये इन्होंने बार-बार का अर्थ पुनः-पुनः किया। फैजी फारसी के शायर हैं, इन्हें रोने के अलावा और क्या काम है! इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ''रो-रो'' कर किया। राजा बीरबल द्वार-द्वार घूमने वाले विप्र हैं इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ''द्वार-द्वार'' किया। खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं, उनको दिन, तिथि और वार से ही वास्ता पड़ता है इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ''दिन-दिन'' किया लेकिन बादशाह हुजूर इस पद का वास्तविक अर्थ यह है कि माता यशोदा का बाल-बाल अर्थात् रोम-रोम पुकारता है कि कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में ही रोक ले।'

    खानखाना का जवाब सुनकर अकबर की आँखों में प्रसन्नता का ज्वार उमड़ आया। उसने आसन से खड़े होकर रहीम को शाबासी दी। दूसरे सभासदों ने भी खानखाना की बहुत प्रशंसा की।

    वकीले मुतलक

    बादशाह ने दरबार बर्खास्त करने का आदेश दिया और खानखाना को संकेत से अपने साथ आने के लिये कह कर उठ खड़ा हुआ। एकांत पाकर बादशाह ने खानखाना से कहा- 'खानखाना! तुम्हें एक जिम्मेदारी सौंपता हूँ। मियाँ शाहबाज खाँ और राजा टोडरमल के बीच कुछ पैसों को लेकर झगड़ा है। तुम्हें पता लगाना है कि सच्चाई क्या है और गलती किसकी है? ज्यादातर अमीर इस झगड़े को लेकर दो खेमों में बंट गये हैं। चगताई अमीर शाहबाजखाँ के पक्ष में हैं और हिन्दू सरदार राजा टोडरमल के पक्ष में। जिससे दरबार का वातावरण खराब हो रहा है। किसी तरह यह बखेड़ा निबटाओ।'

    रहीम को लगा कि बादशाह ने उसे एक अलग तरह के रणक्षेत्र में नियुक्त कर दिया है। इसमें तलवारें नहीं चलनी हैं, दोनों ओर के तर्कों और दोनों ओर की स्वामिभक्तियों की बर्छियां चलनी हैं। सबसे विचित्र बात तो यह है कि दोनों ही पक्षों द्वारा चलाई गयी बर्छियों का वार खानखाना को अपनी छाती पर झेलना है। एक तरफ मुगल सल्तनत का वकीले मुतलक है तो दूसरी ओर सल्तनत का महत्वपूर्ण सेनापति। स्वयं बादशाह तक इन दोनों में से किसी को नाराज नहीं करना चाहता। भले ही दोनों ओर के पक्ष में से कोई भी हारे या जीते किंतु जरा सी भी चूक होते ही खानखाना की तो अकारण ही पराजय हो जानी है।

    बादशाह के आदेश से खानखाना ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अकबर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ ही दिनों बाद राजा टोडरमल और शाहबाजखाँ ने एक साथ बादशाह की सेवा में हाजिर होकर निवेदन किया कि अब उनका हिसाब साफ हो गया है और उनके बीच किसी तरह का विवाद नहीं है।

    बादशाह ने उन दोनों की वे दरख्वास्तें उन्हें वापिस लौटा दीं जो उन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध लिखकर बादशाह को दी थीं। उनके जाने के बाद बादशाह ने खानखाना को बुलाकर पूछा- 'यह क्या चमत्कार है खानखाना? कई महीनों से चला आ रहा यह झगड़ा अचानक ही कैसे निबट गया?'

    - 'जहाँपनाह! मैंने जब दोनों पक्षों से बात की तो मुझे अनुमान हुआ कि राजा टोडर मल मूंछ के लिये और शाहबाजखाँ पैसों के लिये लड़ रहा था। इसलिये मैंने झगड़ा निबटाने के लिये इस तरह की योजना बनाई कि शाहबाजखाँ के पास पैसा रह जाये और राजा टोडरमल के पास मूंछ।

    - 'गलती पर कौन था?'

    - 'गलती शाहबाजखाँ की थी किंतु वह किसी भी कीमत पर राजा टोडर मल को धन लौटाने के लिये तैयार नहीं था। जब मैंने शाहबाजखाँ से कहा कि यदि वह शेख अबुलफजल आदि अमीरों की उपस्थिति में अपनी गलती कबूल करे तो राजा टोडरमल उससे एक भी पैसा नहीं लेगा और यदि शाहबाजखाँ ऐसा नहीं करेगा तो उसे बादशाही कोप का शिकार होना पड़ेगा। इस पर शाहबाजखाँ तैयार हो गया।'

    - 'और राजा टोडर मल, वह कैसे माना?'

    - 'मैंने राजा टोडरमल से कहा कि यदि वह अपना पैसा छोड़ने को तैयार हो जाये तो शाहबाज खाँ शेख अबुल फजल की उपस्थिति में अपनी गलती मान लेगा। इससे राजा टोडरमल को पैसा भले ही न मिले किंतु बादशाह की निगाह में उसकी इज्जत बढ़ जायेगी। यह सुनकर राजा टोडरमल भी तैयार हो गया।'

    - 'तुमने कमाल कर दिया खानखाना। तुम तो वकील होने के लायक हो। जिस बखेड़े को मैं स्वयं भी प्रयास करके नहीं निबटा सका वह झगड़ा तुमने जरा सी युक्ति से निबटा दिया।

    भाग्य की बात! इस घटना के कुछ ही दिनों बाद साम्राज्य के वकीले मुतलक राजा टोडरमल की मृत्यु हो गयी। बादशाह ने खानखाना अब्दुर्रहीम को राज्य का नया वकीले मुतलक नियुक्त कर दिया। उन दिनों यह पद राज्य का सबसे बड़ा पद था। वकीले मुतलक बादशाह का प्रतिनिधि समझा जाता था। उसे कोई भी आदेश लिखित में देने की आवश्यकता नहीं थी। उसका आदेश बादशाह का आदेश होता था।

    जब वकीले मुतलक अब्दुर्रहीम चौंतीस वर्ष का हुआ तो उसके घर में एक के बाद एक तीन बेटों का जन्म हुआ। बादशाह स्वयं वकीले मुतलक के महलों में जाकर उसे पुत्रों के जन्म की बधाई देकर आया। यहाँ तक कि बादशाह ने स्वयं ही उनका नामकरण भी किया जो ऐरच, दाराब और कारन नाम से जाने गये। ये तीनों पुत्र अकबर की धात्री माहमअनगा की पुत्री माहबानू से हुए थे। माहबानू से ही जाना बेगम और एक अन्य पुत्री का जन्म हुआ था।

    बाद में रहीम को दो बेटे और प्राप्त हुए जिनके नाम रहमानदाद और अमरूल्लाह रखे गये। रहमनादाद का जन्म सौधा जाति की एक स्त्री से हुआ था और मिर्जा अमरूल्लाह एक दासी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।


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  • चित्रकूट का चातक - 39

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 39

    विचित्र दरबार

    - 'हुजूर! बाहर फरियादियों का हुजूम इकट्ठा हो गया है। कुछ लोग तो सुबह से आस लगाये बैठे हैं। शाम होने को आई।'

    - 'तो लोगों को मालूम हो गया कि रहीम आगरे में है?'

    - 'हाँ हुजूर! अब तो दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।'

    - 'अच्छा उन सबको दरबार में बैठा।'

    थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था। दरबार के फर्श पर महंगे कालीन बिछे थे। एक ओर एक विशाल चबूतरा बना हुआ था जिस पर अत्यंत भव्य और विशाल तख्त पड़ा था। तख्त की बारीक कारीगरी बरबस ही देखने वाले का ध्यान खींचती थी। तख्त पर चीन देश से आयी रेशम की महंगी चद्दरें और तकिये करीने से सजे हुए थे। समूचे आगरे में यदि कोई और दरबार किसी भी लिहाज से रहीम के दरबार से प्रतिस्पर्धा कर सकता था तो वह था स्वयं शहंशाह अकबर का दरबार।

    जितना भव्य दरबार था, उतना ही भव्य खानखाना स्वयं था। आज तो खानखाना की शोभा विशेष रूप से देखने योग्य थी। वह बादशाहों की भांति समस्त राजकीय चिह्न धारण किये हुए था। खानखाना के सिर का मुकुट महंगे और दुर्लभ हीरे जवाहरों से जगमगा रहा था। कलंगी के स्थान पर हुमा पक्षी का पंख हवा में फहराता था। इस पंख को केवल शहजादे ही धारण कर सकते थे। उसके तलवार की मूठ पर बड़े-बड़े याकूत, नीलम, पन्ने तथा वैदूर्य जड़े हुए थे।

    खानखाना के सेवकों ने सिंह की तरह गर्दन उठा कर चल रहे खानखाना के सिर पर हीरे-मातियों से जड़े सोने के छत्र की छाया कर रखी थी और वे दोनों दिशाओं से चंवर ढुलाते हुए चल रहे थे। जैसे ही खानखाना दरबार में दिखायी दिया, सैंकड़ों कण्ठ उसकी जय-जयकार करने लगे।

    आज के इस विशेष दरबार का आयोजन खानखाना के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में किया गया था। खानखाना ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित सेवकों और आगंतुकों पर डाली और मुंशी को दरबार की कार्यवाही आरंभ करने का संकेत किया।

    सबसे पहले जो आदमी उसकी सेवा में प्रस्तुत किया गया उसने सैनिकों के से कपड़े पहन रखे थे और हाथ में तलवार ले रखी थी। उस आदमी ने सिर पर जो पगड़ी धारण कर रखी थी, उस पगड़ी पर दो लम्बी-लम्बी कीलें लगी हुई थीं।

    - 'हुजूर! यह गुलाम आपकी सेना में नौकरी पाना चाहता है।' विचित्र वेशभूषा वाले आदमी ने सिर झुका कर निवेदन किया।

    - 'क्या नौकरी करोगे?'

    - 'हुजूर, सिपाही की।'

    - 'तुमने अपनी पगड़ी पर ये कीलें क्यों लगवा रखी हैं?'

    - 'हुजूर पहली कील तो उस आदमी के लिये है जो नौकरी पर तो रखे किंतु तन्खाह न दे।'

    - 'और दूसरी कील?'

    - 'दूसरी कील उस नौकर के लिये है जो तन्खाह तो ले किंतु काम न करे।'

    - 'कितनी तन्खाह चाहिये?'

    - 'दस रुपया महीना।'

    - 'कितनी उम्र है?'

    - 'पच्चीस साल।'

    - 'कितने साल नौकरी करेंगे?'

    - 'यही कोई पच्चीस साल।'

    - 'एक साल की तन्खाह कितनी हुई?'

    - 'एक सौ बीस रुपया।'

    - 'पच्चीस साल की कितनी हुई?'

    - 'तीन हजार रुपया।'

    - 'ये लीजिये तीन हजार रुपया और अपने सिर से पहली कील का बोझ उतार दीजिये। दूसरी कील का बोझ उठाने का आपको पूरा अधिकार है।'

    जीवन भर की कमाई आज ही पाकर युवक प्रसन्नता से कूदने लगा। दरबार में उपस्थित जन समुदाय फिर से खानखाना की जय-जयकार करने लगा।

    इसके बाद एक बुढ़िया की बारी थी। वह अपने हाथ में एक तवा लेकर आई थी। उसने कहा- 'हुजूर मैं आपको छूकर देखना चाहती हूँ।'

    - 'इस बुढ़िया की मुराद पूरी की जाये।' खानखाना ने आदेश दिया।

    बुढ़िया तवा लेकर तख्त पर चढ़ गयी और जैसे ही खानखाना के निकट पहुँची, अपने हाथ का तवा खानखाना की देह से रगड़ने लगी। कुछ देर बाद तख्त से नीचे उतर कर बड़ी हैरानी से तवे को उलट-पलट कर देखने लगी।

    बुढ़िया की उल्टी-सीधी चेष्टाएं देखकर अब्दुर्रहीम को हँसी आ गयी। वह बोला- 'निराश न हो बुढ़िया। तूने अपने लोहे का तवा पारस से ही रगड़ा है। अब यह सचमुच ही सोने का हो गया है। मुंशीजी! इस बुढ़िया को तवे के बराबर सोना तोलकर दे दिया जाये।' दरबार में फिर से जय-जयकार गूंजने लगी।

    अगला फरियादी एक गरीब ब्राह्मण था। उसने खानखाना के सामने आते ही मुसलमानों को गाली देना आरंभ कर दिया। जिनके कारण उसके जजमानों की संख्या घट गयी थी और अब वह भूखों मरने की स्थिति को पहुँच गया था।

    - 'विप्र देवता! इस प्रकार मत कोसो। तुम्हें खाने पीने को बहुत मिलेगा।'

    इतना सुनते ही ब्राह्मण देवता ने अपने सिर से मैली-कुचैली और स्थान-स्थान से फटी हुई पगड़ी खानखाना पर दे मारी और कहा- 'हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिसकी बात से प्रसन्न होओ, उसे कुछ न कुछ अवश्य दो। मेरे पास इस पगड़ी के सिवा कुछ नहीं है। यही तुझे देता हूँ।'

    खानखाना ने तुरंत ही अपना रत्न जड़ित स्वर्ण ताज उतार कर उस ब्राह्मण को दे दिया और उसकी मैली कुचैली तथा तार-तार हो रही पगड़ी अपने माथे पर बांधते हुए कहा- 'हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिससे कुछ लो, उसे अधिक नहीं तो, उतना तो अवश्य ही दो।'

    अगला फरियादी एक नौजवान था। उसे विश्वास न था कि खानखाना उसकी भी मुराद पूरी कर सकता है लेकिन उसने सुन रखा था कि खानखाना कवियों की बड़ी इज्जत करता है। भले ही कितना ही घटिया कवि हो, वह खानखाना के दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटता। इसलिये वह अपनी फरियाद एक कविता में ढाल कर लाया था। उसने कहा- 'हे उदार खानखाना! एक चन्द्रमुखी प्यारी है। वह जान मांगे तो कुछ सोच नहीं, रुपया मांगती है, यही मुश्किल है।'

    खानखाना ने मुस्कुरा कर पूछा- 'कितना रुपया मांगती है?'

    - 'एक लाख।' - 'तो तू एक लाख छः हजार ले जा।'

    - 'एक लाख तो ठीक, पर छः हजार क्यों?'

    - 'तेरे सजने-धजने के लिये। यदि इसी हाल में गया तो रुपया लेकर भी नहीं मानेगी।'

    जब युवक वहाँ से हटा तो एक बहुत ही कंगाल आदमी अपने स्थान से उठकर खड़ा हुआ और बोला- 'खानखाना! कैसे सम्बंधी हो तुम! अपने साढ़ू को नहीं पहचानते?'

    खानखाना ने कहा- 'आओ साढ़ूजी, मैं तो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। आओ यहाँ बैठो मेरे पास।'

    जब कंगाल खानखाना के बराबर तख्त पर बैठ गया तो खानखाना ने अपने मुंशी से कहा- 'मुंशीजी! साढ़ूजी को एक लाख रुपया देकर विदा किया जाये।'

    मुंशी बहुत देर से चुपचाप बैठा हुआ दरबार की कार्यवाही देख रहा था। इस बार उससे रहा न गया। उसने कंगले को व्यंग्य पूर्वक देखते हुए पूछा- 'गुस्ताखी मुआफ हुजूर! ये आपके साढ़ू हैं, पहले कभी इन्हें देखा नहीं?'

    - 'मुंशीजी! आप इन्हें नहीं पहचानते! देखिये, सम्पत्ति और विपत्ति दो बहिनें हैं। एक हमारे घर में है और एक इनके। इसी नाते से ये हमारे साढ़ू हैं।' कंगला अपनी ढीठता त्याग कर खानखाना के पैरों में गिर पड़ा।

    इस बार एक युवा पण्डित खानखाना के समक्ष था। - 'पाँय लागूं पण्डितजी। कहिये क्या सेवा करूँ?'

    युवा पण्डित खानखाना के सामने आकर कातर दृष्टि से देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे और उसका कण्ठ सूख गया।

    - 'आपके अंगोछे में क्या लिपटा हुआ है?' खानखाना ने पूछा।

    युवा पण्डित ने अपने अंगोछे में लिपटी हुई एक खाली शीशी निकाली और खानखाना की ओर बढ़ा दी। खानखाना के सेवक ने शीशी खानखाना को ले जाकर दी। खानखाना ने देखा, शीशी में पानी की केवल एक बूंद है। उन्होंने पण्डित की ओर देखकर कहा-

    'रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

    पानी गये न ऊबरे। मोती मानस चून।'


    पण्डित ने आँखों में आँसू भर कर कहा- 'हाँ, यही तो मैं भी कह रहा हूँ ।'

    - 'मुंशीजी! हमारे पास आईये।' खानखाना ने मुंशी को आदेश दिया।

    जब मुंशी खानखाना के ठीक पास जाकर खड़ा हो गया तो खानखाना ने उसके कान में कहा- 'इस पण्डित के घर का पता मालूम कर लो और आज रात को वहाँ एक लाख रुपया पहुँचाओ।'

    मुंशी फिर चक्कर में पड़ गया। उसकी आँखों में उभरे सवाल को देखकर खानखाना ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा- 'अरे भाई आप देखते नहीं हैं! पण्डितजी किसी प्रतिष्ठित खानदान के हैं इसलिये मुँह से कुछ मांग नहीं सकते किंतु संकेत से बता रहे हैं कि बिना धन के पानी बचे तो कैसे बचे। जैसे शीशी में एक बूंद ही है वैसे घर भी खाली होने को है।'

    अगला आदमी एक बूढ़ा मुसलमान था। उसकी निर्धनता उसके बुरे हाल का परिचय दूर से दे रही थी। वह हाथ जोड़कर खानखाना के ठीक सामने खड़ा हो गया।

    - 'बोलो बाबा।'

    - 'हुजूर! गुस्ताखी मुआफ हो। गुलाम आप पर पत्थर फैंक कर देखना चाहता है।' बूढ़े को हिन्दुस्तानी में बात करनी नहीं आती थी। वह ईरानी भाषा बोल रहा था।

    - 'ठीक है, जैसा जी में आये करो। मैं तैयार हूँ।' खानखाना ने ईरानी भाषा में ही जवाब दिया और अपनी ढाल संभाल कर बैठ गया। बूढ़े ने अपने कांपते हाथों में थामा हुआ पत्थर खानखाना पर दे मारा। पत्थर खानखाना की ढाल से जाकर टकराया।

    - 'मुंशी जी! बाबा को एक हजार रुपया दिया जाये।'

    - 'गुस्ताखी मुआफ हुजूर। क्या यह पत्थर फैंकने का पारिश्रमिक है?' मुंशी ने हाथ जोड़ कर पूछा।

    - 'नहीं मुंशीजी। बूढ़े बाबा ने यह पत्थर हम पर यह जांचने के लिये फैंका था। जब फलदार वृक्षों पर पत्थर देकर मारते हैं तो फल मिलते हैं, खानखाना क्या उनसे भी गया बीता है!'

    - 'खानखाना तेरी जय हो। युगों तक इस धरती पर तेरा इकबाल बुलंद रहे। मैं सचमुच ही ईरान से यहाँ तक चलकर तुझे जांचने के लिये ही आया हूँ। मेरा नाम शकेबी अस्फहानी है। मैं ईरान का रहने वाला हूँ। पार साल जब मैं मक्का जाते समय अदन में पहुँचा तो मैंने वहाँ कुछ बच्चों को एक गीत गाते हुए सुना कि- खानखाना आया। जिसके प्रताप से कुंआरी कन्याओं ने पति पाये। व्यापारियों ने माल बेचे, बादल बरसे और जल-थल भर गये। मैं उस गीत की वास्तविकता को अपनी आँखों से देखने के लिये यहाँ तक चला आया हूँ। मुझे इन रुपयों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें किसी जरूरतमंद इंसान को दे दिया जाये।' उपस्थित जनसमुदाय फिर से जय-जयकार करने लगा।

    इसके बाद मंडन कवि (ये बुंदेलखण्डी कवि थे) उठ कर खड़ा हुआ। उसने दोनों हाथ खानखाना की ओर फैला कर कहा-

    'तेरे गुन खानखानां परत दुनी के कान, तेरे काज ये गुन आपनो धरत हैं।

    तू तो खग्ग खोलि-खोलि खलन पै कर लेत यह तो पै कर नेक न डरत हैं।

    ]मंडन सुकवि तू चढ़त नवखंडन पै, ये भुजदण्ड तेरे चढ़िए रहत हैं।

    ओहती अटल खान साहब तुरक मान, तेरी या कमान तोसों तेहुँसों करत है।'


    मण्डन की कविता पूरी होते ही खानखाना पर फूल बरसने लगे। सैंकड़ों कण्ठों से निकली जयजयकार, उनसे दुगुनी हथेलियों से निकली तालियों की गड़गड़ाहट, ढोल, नगारों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि से आकाश व्याप्त हो गया। दरबार बर्खास्तगी की घोषणा के साथ ही खानखाना दस्तरख्वान पर जा बैठा। आज उसके दस्तरख्वान का प्रबंध दरबार में ही किया गया था। उसके साथ-साथ सैंकड़ों आदमियों के भोजन का प्रबंध किया गया था।


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  • चित्रकूट का चातक - 40

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 40

    शिकायत

    खानखाना का ऐसा ठाठ-बाट, अकूत सम्पदा और उसके दरबार की ऐसी निराली शान देखकर कई दुष्टों की छाती पर साँप लोट गये। कहाँ से लाया खानखाना यह सम्पदा? कहाँ से आये ये सारे साजो-सामान? कहाँ से आये इतने सारे लोग? सब कुछ रहस्यमय था। ऐसा ठाठ-बाट और ऐसा रूआब तो शहंशाह अकबर के अतिरिक्त और किसी अमीर, उमराव एवं सरदार के पास न था। कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों की छातियां ईर्श्या से दहकने लगीं। शहजादों की नाक में सलवटें पड़नी आरंभ हो गयीं।

    उन्हें सबसे अधिक शिकायत इस बात से थी कि साधारण सिपाही के घर में जन्म लेने वाला रहीम हुमा का पर लगाकर दरबार करता है। भले ही उसका बाप खानखाना के पद तक जा पहुँचा हो किंतु था तो वह मूल रूप से एक साधारण सिपाही ही! इस तरह का दरबार करना तो शहजादों को भी नसीब नहीं था। फिर रहीम की ऐसी क्या हैसियत है?

    जब आग जलती है तो धुंआ उसकी सूचना चारों ओर फैला ही देता है। जानने में रुचि न रखने वालों को भी आग की सूचना हो जाती है। रहीम के सम्बंध में भी यही हुआ। लोगों की छातियों में जलने वाली आग का धुंआ भी चारों ओर फैलने लगा और एक दिन बादशाह अकबर के महल तक जा पहुँचा।

    बादशाह इन खबरों को सुन-सुन कर मुस्कुराता था। एक दिन बहुत से अमीरों ने एक साथ बादशाह के हुजूर में इकट्ठे होकर रहीम की शिकायत की- 'बादशाह सलामत यह कमजात रहीम आपकी नेक मेहरबानियों को पाकर अपना दिमाग फेर बैठा है। वह आलीशान तख्त पर बैठकर बादशाहों और शहजादों की भांति दरबार लगाता है। लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटता है।'

    - 'लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटना कोई गुनाह है क्या?' बादशाह ने मुस्कुरा कर पूछा।

    बादशाह का जवाब सुनकर अमीरों के चेहरे फक पड़ गये। किसी तरह हिम्मत करके एक दरबारी ने कहा- 'बेशक यह गुनाह नहीं किंतु रहीम इतना माल-असबाब लाया कहाँ से, यह तो जानना चाहिये।'

    - 'तुम्हें क्या लगता है, रहीम ने कहीं चोरी की होगी या डाका डाला होगा।'

    - 'ऐसा लगता तो नहीं किंतु वह बेशुमार दौलत लुटा रहा है।'

    - 'इसके अलावा उसका कोई और गुनाह?'

    - 'हुजूरे आली! वह शहजादों की तरह सिर पर ताज रखता है और ताज पर हुमा का पर भी!' एक अमीर ने उत्तेजित होकर कहा।

    - 'और?'

    - 'हुजूर मेरी जान बख्शी जाये किंतु सही बात तो यह है कि वह आपकी तरह तख्त पर बैठकर चंवर ढुलवाता है और छत्र तान कर चलता है।'


    - 'तुम्हारी बात सही है, इसका क्या सबूत है तुम्हारे पास?'

    - 'सुबूत देखना है तो अभी बादशाह सलामत स्वयं जहमत फरमायें और रहीम के डेरे पर चलकर स्वयं अपनी आँखों से देख लें।'

    - 'ठीक है। आज ऐसा ही किया जाये।'

    कुछ ही देर में बादशाह की सवारी रहीम के डेरे पर थी। खानखाना को इत्तला मिली तो भागता हुआ ड्यौढ़ी पर हाजिर हुआ और अपने सिर से पगड़ी उतार कर हाथी के नीचे बिछाता हुआ बोला- 'मेरे धन्य भाग जो बादशाह सलामत की नजर इस ओर हुई।'

    - 'खानखाना! हमने तुम्हारे दरबार की बड़ी तारीफ सुनी है, इसलिये हम बिना बुलाये ही तुम्हारा दरबार देखने चले आये।' बादशाह ने हाथी से उतर कर पगड़ी के कपड़े पर पैर धरते हुए कहा।

    - 'इस गरीबखाने पर आपके पधारने के अलावा यहाँ और कोई तारीफ की बात नहीं है हुजूर। फिर भी आप ने इनायत की ही है तो कुछ न कुछ खास बात जरूर होगी।'

    - 'हमने सुना है तलवार का हुनर दासों को भी स्वामी बना देता है। क्या यह बात सही है खानखाना?'

    - 'नहीं बादशाह सलामत। यह बात सही नहीं है। स्वामिभक्ति और स्वामी की कृपा ही दास को स्वामी बना सकती है।' खानखाना ने शांति से प्रत्युत्तर दिया।

    बादशाह को रहीम के जवाब से बड़ी तसल्ली हुई बादशाह के आदेश से खानखाना ने बादशाह को अपना दरबार दिखाया। उसे देखकर अकबर की आँखें चौंधिया गयीं। वाकई में जगह काबिले तारीफ तो थी ही, रश्क करने लायक भी थी। अकबर खानखाना के तख्त पर जाकर बैठ गया। रहीम ने उसी क्षण दौड़कर हुमा के पर वाला ताज बादशाह के सिर पर रख दिया और स्वयं बादशाह के ऊपर छत्र तानकर खड़ा हो गया। उसके नौकर भी संकेत पाकर बादशाह पर चंवर ढुलाने लगे और बादशाह सलामत की जय-जयकार करने लगे।

    बादशाह ने पूछा- 'खानखाना! बादशाहों और शहजादों के काम में आने वाली चीजें तुम्हारे यहाँ क्या कर रही हैं?'

    - 'जिल्ले इलाही। मुझे अंदाज था कि एक न एक दिन हजरत यहाँ पधारेंगे। उसी की तैयारी में यह सामान मंगा रखा था। यदि शहजादों और बादशाहों के काम आने वाला यह सामान यहाँ नहीं होता तो मुझे आज अपने मालिक के सामने लज्जित होना पड़ता।

    - 'हम तुम्हारी आवभगत से प्रसन्न हुए खानखाना। आज से यह सब सामान तुम्हें दिया जाता है। हमारे हुक्म से अब तुम ही इसका उपयोग करो।' यह कहकर बादशाह उठ गया।

    जाडा

    - 'हुजूर! महाराणा प्रतापसिंह के भाई जगमाल का वकील जाडा महडू आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।' गुलाम ने राज्य के वकील खानखाना अब्दुर्रहीम से निवेदन किया। उस समय खानखाना अपने निजी दरबार में व्यस्त था।

    - 'जाडा महडू!' खानखाना के भीतर स्मृतियों का पिटारा खुला। कहाँ सुना यह नाम? कब? अचानक ही उसे जाडा महडू का प्रसंग याद आ गया, जैसे सोते से जाग पड़ा हो, 'जा उसे ले आ, यहीं ले आ। बड़ा मजेदार आदमी है।'

    अब्दुर्रहीम जब मेवाड़ में था तब उसने इस कवि की बड़ी तारीफ सुनी थी। जाडा महडू का वास्तविक नाम आसकरण चारण था। उसके जैसा चाटुकार जमाने में न था। शरीर से बहुत मोटा होने तथा चारणों की महडू शाखा में होने के कारण इसे मेवाड़ में जाडा महडू कहकर पुकारते थे। उन दिनों तो उसे जाडा से रूबरू होने का अवसर नहीं मिला था किंतु अब्दुर्रहीम के मन में जाडा से मिलने की बड़ी इच्छा थी जो आज अनायास ही पूरी हो रही थी।

    जब सेवक जाडा महडू को लेने बाहर गया तो खानखाना ने सरकारी कामों को स्थगित करते हुए, दरबार में उपस्थित सभासदों से कहा- 'तैयार हो जाओ। दरबार में बड़ा भूकम्प आने वाला है।' खानखाना की बात से दरबारियों को बड़ा अचंभा हुआ। आखिर यह जाडा महडू चीज क्या है जो खानखाना दरबार में भूकम्प आने की भविष्यवाणी कर रहे हैं! पहले तो कभी इसका नाम सुना नहीं!

    थोड़ी ही देर में गुलाम, जाडा महडू को लेकर उपस्थित हुआ। ठीक ही कहा था खानखाना ने। दरबार में उसका प्रवेश किसी भूकम्प से कम नहीं था। एक बहुत स्थूल काया ने दरवाजे से ही बादलों की तरह गरजना आरंभ कर दिया-

    'खानखानाँ नवाब रा अड़िया भुज ब्रह्मण्ड,

    पूठै तो है चंडिपुर धार तले नव खण्ड।'


    (
    अर्थात् - खानखानाँ नवाब की भुजा ब्रह्माण्ड में जा अड़ी है, जिसकी पीठ पर चंडीपुर अर्थात् दिल्ली है और जिसकी तलवार की धार के नीचे नवों खण्ड हैं।) 

    दरबार में बैठे बहुत से लोग समझ नहीं सके कि वह कह क्या रहा था लेकिन खानखाना डिंगल जानता था। उसे जाडा के छंद में बड़ा आनंद आया। जाडा ने अपनी दोनों भुजाओं को हवा में लहराते हुए कहा-

    'खानखानाँ नवाब रै खांडे आग खिवंत,

    जलवासा नर प्राजलै तृणवाला जीवंत। '


    (अर्थात् - खानखानाँ की तलवार से ऐसी आग बरसती है जिससे पानीदार वीर पुरुष तो जल मरते हैं लेकिन घास मुख में लिये (शरण में आये) हुए नहीं जलते।) जाडा एक क्षण के लिये ठहरा और अपने फैंफड़ों में वायु भरकर पूरी ताकत से बोला-

    खानखानाँ नवाब हो मोहि अचंभो एह,

    मायो किम गिरि मेरु मन साढ़ तिहस्यी देह। '


    (अर्थात् - मुझे यह आश्चर्य होता है कि खानखानाँ का मेरु पर्वत जैसा मन साढ़े तीन हाथ की देह में कैसे समाया है।)

    जाडा ने आगे बढ़ते हुए तीसरा दोहा पढ़ा-

    'खानखानाँ नवाब री आदमगीरी धन्न,

    यह ठकुराई मरु गिर मनी न राई मन्न। '


    (अर्थात् - खानखानाँ नवाब का औदार्य धन्य है कि मेरु पर्वत जैसे अपने प्रभुत्व को वे मन में राई के बराबर भी नहीं मानते।)

    अब जाडा खानखाना के ठीक निकट पहुंच चुका था। खानखाना ने अपने आसन से खड़े होकर दोनों हाथ आकाश की ओर उठाते हुए कहा-

    'धर जड्डी अंबर जड्डा, जड्डा महडू जोय।

    जड्डा नाम अलाह दा, और न जड्डा कोय। '


    (अर्थात् - धरा बड़ी है, आकाश बड़ा है, महडू शाखा का यह चारण बड़ा है और अल्लाह का नाम बड़ा है। इनके अलावा और कोई बड़ा नहीं है।)

    खानखाना की बात सुनकर जाडा आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा- 'खानखाना हुजूर! मैंने तो आपको प्रसन्न करने के लिये दोहा पढ़ा। आपने क्यों पढ़ा?'

    - 'जाडा को प्रसन्न करने के लिये।' खानखाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

    - 'मैंने तो अपने स्वार्थ से आपको प्रसन्न करना चाहा था। आप मुझे क्यों प्रसन्न करना चाहते थे।'

    - 'मैं अपने स्वार्थ से तुझे प्रसन्न करना चाहता था।'

    - 'मेरा स्वार्थ तो मुझे मालूम है, किंतु आपका स्वार्थ?'

    - 'जब तू अपना स्वार्थ कहेगा तो तुझे मेरा स्वार्थ भी ज्ञात हो जायेगा।'

    - 'मैं अपने मालिक की तरफ से अर्ज लेकर आया हूँ और अकेले में निवेदन करना चाहता हूँ।'

    - 'ठीक है। जब दरबार बर्खास्त हो जाये तो तू निर्भय होकर अपनी बात कहना। बता तुझे कविता का क्या ईनाम दिया जाये?'

    - 'मेरे स्वामी का काम ही मेरा ईनाम होगा।' जाडा ने जवाब दिया।

    - 'तेरे स्वामी का काम होने लायक होगा तो मैं वैसे ही कर दूंगा। मेरी इच्छा है कि तूने मेरी प्रशंसा में जो दोहे पढ़े हैं, उस हर दोहे के लिये तुझे एक लाख रुपया दिया जाये।' खानखाना ने कहा।

    - 'खानखाना की बुलंदी सलामत रहे। मैं अपना ईनाम फिर कभी ले लूंगा, फिलहाल तो अपने स्वामी का ही काम किया चाहता हूँ।' जाडा भी अपनी तरह का एक ही आदमी था। उसकी इच्छा रखने के लिये खानखाना ने दरबार बर्खास्त कर दिया।

    - 'अब बोल। क्या कहता है?'

    - 'हुजूर। प्रतापसिंह उदैपुर राज्य का मालिक बन बैठा है। मेरे स्वामी जगमाल उसके भाई हैं किंतु मेरे स्वामी को उसने कोई जागीर नहीं दी। यदि खानखाना मेहरबानी करें तो मेरे स्वामी उदैपुर की गद्दी पर बैठ सकते हैं। इसके बदले में मेवाड़ शहंशाह अकब्बर की अधीनता स्वीकार कर लेगा।'

    - 'तेरे मालिक को राज्य चाहिये तो मैं बादशाह से कहकर दूसरा राज्य दिलवा दूंगा लेकिन भाईयों में इस तरह का बैर करना और अपनी मातृभूमि शत्रु को सौंप देना उचित नहीं है जाडा।'

    - 'लेकिन बिना कुछ प्रत्युपकार प्राप्त किये बादशाह सलामत मेरे स्वामी को राज्य क्यों देंगे?'

    - 'प्रत्युपकार का जब समय आयेगा तो वह भी प्राप्त कर लिया जायेगा। बोल क्या कहता है?'

    - 'क्या चित्तौड़ का दुर्ग दिलवा देंगे?' जाडा ने प्रश्न किया।

    - 'प्रताप मर जायेगा किंतु तेरे मालिक को चित्तौड़ में चैन से नहीं बैठने देगा।'

    - 'तो फिर!'

    - 'जहाजपुर का परगना अभी मुगलों के कब्जे में है। तू कहे तो तेरे मालिक को वह परगना मिल सकता है लेकिन एक शर्त पर।'

    - 'सो क्या?' - 'तू भाईयों में बैर नहीं बढ़ायेगा और देश को दुश्मनों के हाथ नहीं बेचेगा।'

    खानखाना की बात सुनकर जाडा का मुँह काला पड़ गया। उसने गर्दन नीची करके कहा- 'वचन देता हूँ।'

    - 'तो ठीक है। तू समझ, जहाजपुर तेरे मालिक को मिल गया।'


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  • चित्रकूट का चातक - 41

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 41

    चाकर रघुबीर के

    - 'महात्मन्! शंहशाह की इच्छा है कि आप उनके दरबार को पवित्र करें।' शहंशाह अकबर के वकीले मुतलक और काशी के सूबेदार अब्दुर्रहीम खानखाना ने गुंसाईजी से हाथ जोड़कर निवेदन किया।

    - 'खानखानाजी, कैसी बात करते हैं आप? हम तो दास हैं। क्या आप राजपुरुष होकर इतना भी नहीं जानते कि दासों के आने से सम्राटों के दरबार पवित्र नहीं होते।'

    - 'आप दास नहीं, रामभक्त हैं और रामभक्त तो स्वयं रामजी के समान हैं। उनके आगमन से ही दरबार पवित्र होते हैं।'

    गुसांईजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया-

    'प्रभु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।

    तुलसी कहूंँ न राम से साहिब सील निधान।।'


    - 'शहंशाह के दरबार में जाने से किसी तरह का अमंगल नहीं होगा बाबा।' अब्दुर्रहीम ने धरती पर सिर टिका कर कहा।

    गुंसाईजी ने करुणा से अब्दुर्रहीम के सिर पर हाथ रख दिया-

    'राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास।

    सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास।।'


    अब्दुर्रहीम ने निराश होकर राजा टोडरमल की ओर देखा
     वकीले मुतलक को असफल होता देखकर राजा टोडरमल ने प्रयास किया- 'शंहशाह अकबर गुणियों की कद्र करने वाले हैं। वहाँ आपका यथोचित आदर सत्कार होगा गुसांईजी। जैसा आप चाहेंगे, वैसा ही सब प्रबंध शासन की ओर से हो जायेगा।'

    गुसांईजी ने राजा टोडरमल का अनुरोध अस्वीकार करते हुए उत्तर दिया-

    'राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास।

    सुमिरत सुभ मंगल कुसल मांगत तुलसीदास।।'


    - 'आपने जीवन भर निर्धनता के कष्ट सहे हैं। आपने स्वयं ने भी कहा है-

    नहीं दरिद्र सम दुख जग माहीं...........।'

    - 'दरिद्र कौन है राजन्?' गुसांईजी ने टोका तो राजा टोडरमल सहम गये, 'रामजी के चाकर दरिद्र नहीं होते। दरिद्रता तो तन की अवस्था है, मन की नहीं। क्या मन, तन का दास मात्र है? क्या यह आवश्यक है कि यदि तन दरिद्र हो तो मन भी दरिद्र हो जाये? यदि ऐसा नहीं है तो क्या व्यक्ति केवल तन मात्र है? क्या तन के दरिद्र होने से ही व्यक्ति दरिद्र हो जाता है?'

    - 'क्षमा करें देव! चूक हो गयी। मेरा आशय यह नहीं था। मेरे पास ऐसे शब्द कहाँ हैं जो मैं आपकी मर्यादा के अनुकूल संभाषण कर सकूं।'

    - 'दोष तुम्हारा नहीं है राजन्। दोष तुम्हारे परिवेश का है जिसमें तुम्हें दिन रात रहना पड़ता है। उसी विकृत परिवेश का परिणाम है कि राजपुरुषों की दृष्टि केवल व्यक्तियों के बाहरी स्वरूप में उलझ कर रह जाती है और वे बहुत सी भ्रामक परिभाषाएं गढ़ लेते हैं।'

    - 'गुसांईजी! यदि आप जैसे विवेकी पुरुष शासन में हों तो प्रजा को कई मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है।'

    - 'नहीं! यह सत्य नहीं है। प्रत्येक मनुष्य का अपना धर्म होता है और मनुष्य को अपने धर्म का ही पालन करना चाहिये। भगवान कृष्ण ने कहा है 'स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मौ भयावहः ।' शासन चलाना मेरा धर्म नहीं है।'

    - 'शंहशाह चाहते हैं कि आप जैसी विभूती का शेष जीवन आराम से कटे।' राजा टोडरमल ने हाथ जोड़ दिये।

    गुसाईंजी ने नेत्र मूंद कर कहा-

    'करिहौं कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस।

    जहाँ तहाँ दुख पाइहौ तबहीं तुलसीदास।।'


    - 'महात्मन्! सम्राट ने आपको यथोचित मनसब देने का भी निश्चय किया है।' इस बार राजा मानसिंह ने साहस किया।

    गुसांईजी राजा मानसिंह की ओर देखकर मुस्कुराये-

    'हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार।

    तुलसी हम का होंइगे नर के मनसबदार।'


    संध्या वंदन का समय होता देखकर गुसांईजी उठ खड़े हुए। उन्हीं के साथ तीनों राजपुरुष भी गुसांईजी को प्रणाम करके उठ कर खड़े हो गये। वे तीनों आज ही बादशाह अकबर के आदेश से गुसांईजी की सेवामें काशीजी में उपस्थित हुए थे किंतु दिन भर के प्रयास के बाद भी अपने उद्देश्य में असफल रहे थे।

    हुक्म उदूली

    - 'उस भिखारी को इतना घमण्ड?' क्रोध से चीख पड़ा अकबर।

    - 'नहीं जिल्लेइलाही। बाबा को किसी तरह का घमण्ड नहीं। उन्होंने अपनी युवावस्था में ही गृह संसार त्यागकर सन्यास धारण कर लिया था। अब वे फिर से संसारिक मोह माया में फंसना नहीं चाहते।' खानखाना ने निवेदन किया।

    - 'किंतु यदि बादशाही हुक्म की इसी तरह तौहीन होती रही तो रियाया एक दिन मुगलों का हुक्म मानना तो दूर बात सुनना भी बंद कर देगी।'

    बादशाह के कोप को देखकर खानखाना सहम गया। आखिर बादशाह के मन में क्या है? क्या करना चाहता है वह?

    - 'हमने आपको काशी का सूबेदार इसलिये नहीं बनाया है कि आप बादशाही हुक्म की तौहीन का समाचार हम तक पहुँचाया करें।'

    - 'क्षमा करें हुजूर! बाबा ने किसी हुक्म की तौहीन नहीं की है। न ही उन्हें किसी तरह का हुक्म दिया गया था।'

    - 'यदि बादशाही हुक्म नहीं सुनाया था तो फिर तुमने उस भिखमंगे से कहा क्या था?

    - 'उन्हें कहा गया था कि बादशाह की ऐसी इच्छा है कि आप उनके दरबार में चलकर मनसब स्वीकार करें।'

    - 'और उसने अस्वीकार कर दिया?' अकबर क्रोध से फुंकारा।

    - 'हाँ। उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।'

    - 'शब्दों की बाजीगरी से हमें बहलाओ मत खानखाना। बादशाह की इच्छा, बादशाह का प्रस्ताव और बादशाह का हुक्म, ये तीनों बातें एक ही अर्थ रखती हैं।' खानखाना निरुत्तर हो गया।

    - 'उसे यहाँ पकड़ कर मंगवाओ।'

    खानखाना के होश उड़ गये। बादशाह क्या करने को कहता है? कैसे संभव है यह? खानखाना की हिम्मत नहीं हुई कि बादशाह की ओर मुँह उठाकर देख सके। वह चुपचाप धरती में ही दृष्टि गड़ाये रहा।

    - 'तो आप भी बादशाह का हुक्म मानने से मना करते हैं?'

    - 'आप चाहें तो सर कलम कर लें किंतु गुलाम पर हुक्म उदूली की तोहमत न लगायें।' खानखाना ने किसी तरह हिम्मत करके कहा। उसने आज से पहले बादशाह को अपने ऊपर कुपित होते हुए नहीं देखा था।

    - 'हम जानते हैं कि तुम ही नहीं राजा टोडरमल और राजा मानसिंह भी यह हुक्म नहीं मानेंगे।'

    - 'जिल्ले इलाही जानते हैं कि ये दोनों भी इस गुलाम की तरह मुगलिया तख्त के मजबूत पहरेदार हैं।'

    - 'इसलिये हमने निश्चय किया है कि मुगलिया तख्त के इन पहरेदारों की जगह शहजादे मुराद को इस काम के लिये भेजा जायेगा।'

    बादशाह के आदेश से खानखाना सन्न रह गया। वह बादशाह को सलाम बजाकर राजा टोडरमल के दीवानखाने की ओर बढ़ गया। टोडरमल ने राजा मानसिंह, राजा बीरबल और तानसेन को भी अपनी कचहरी में बुलवा लिया। पाँचों राजपुरुषों ने बहुत देर तक माथा पच्ची की किंतु इस समस्या का कोई हल दिखायी नहीं दिया।

    एक पखवाड़ा बीतते न बीतते शहजादा मुराद गुसाईंजी को बांधकर आगरा ले आया। पाँचों राजपुरुषों ने गुसाईंजी से मिलने का बहुत प्रयास किया किंतु मुराद ने किसी को भी गुसाईंजी से मिलने की अनुमति नहीं दी। अंत में किसी तरह खानखाना गुसाईंजी तक पहुँचा। उसने देखा कि कारागार की अंधेरी कोठरी में प्रभूत मात्रा में दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। जिसके आलोक में एक भव्य मूर्ति ध्यानमग्न अवस्था में विराजमान है। खानखाना के कदमों की आहट से गुसाईंजी का ध्यान भंग हुआ।

    - 'कौन है?' गुसाईंजी ने पूछा।

    - 'मैं आपका गुनहगार हूँ बाबा।' एक आकृति को अपने पैरों में गिरते देखकर गुसाईंजी उठ कर खड़े हो गये। उन्होंने कण्ठ स्वर से पहचाना कि अब्दुर्रहीम है।

    - 'उठो खानखाना।' गुसाईंजी ने खानखाना को उठा कर छाती से लगा लिया।

    - 'मेरे ही कारण आप इस अवस्था को पहुँचे हैं।'

    - 'कोई किसी के कारण कहीं नहीं पहुँचता मित्र, सब अपने करमों और रामजी की इच्छा से चलायमान हैं।'

    दोनों मित्र कारागार की उसी अंधेरी कोठरी में धरती पर बैठ गये। रहीम ने कहा कुछ हरिजस सुनाओ बाबा। प्राणों में बहुत बेचैनी है। खानखाना के अनुरोध पर गुसाईंजी गाने लगे-

    है प्रभु मेरोई सब दोसु।

    सीलसिंधु, कृपालु, नाथ अनाथ, आरत पोसु।

    बेष बचन बिराग मन अब अवगुननि को कोसु।

    राम प्रीति प्रतीति पोली, कपट करतब ठोसु।

    राग रंग कुसंग हो सों साधु संगति रोसु।

    चहत केहरि जसहिं सेइ सृगाल ज्यों खरगोसु।

    संभु सिखवन रसन हूँ नित राम नामहिं घोसु।

    दंभहू कलिनाम कुंभज सोच सागर सोसु।

    मोद मंगल मूल अति अनुकूल निज निरजोसु।

    रामनाम प्रभाव सुनि तुलहिसहु परम परितोस।।


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  • चित्रकूट का चातक - 42

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 42

    बन्दर और लंगूर 

    आधी रात के बाद सीकरी में हा-हाकार मच गया। जहाँ देखो वहीं लंगूर। महलों, छतों और कंगूरों पर उत्पात मचाते हुए हजारों बन्दर और लंगूर अचानक ही जाने कहाँ से आ गये थे। सैंकड़ों वानर लाल-लाल मुँह के थे तो हजारों काले मुँह के। उनकी लम्बी पूंछों और विकराल दाँतों ने बच्चों और स्त्रियों को ही नहीं हट्टे-कट्टे पुरुषों को भी भय से त्रस्त कर दिया।

    देखते ही देखते यह वानर सेना अत्यंत कुपित होकर महलों का सामान इधर से उधर फैंकने लगी। जो कोई साहस करके वानरों को भगाने का प्रयास करता था, वानर सेना उसी को घेर लेती और घूंसों और चपतों से उसकी हालत खराब कर डालती। किसी की कुछ समझ में नहीं आता था कि इन वानरों से कैसे छुटकारा पाया जाये।

    निद्रा में खलल पड़ने से बादशाह भी उठ कर बैठ गया। उसने अपनी बंदूक निकाली और वानरों पर गोलियां दागने लगा किंतु यह देखकर उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा कि बहुत गोलियां चलाने के बाद भी, एक भी वानर को गोली नहीं लगी।

    जाने कितनी देर तक यह उत्पात चलता रहा। आखिर एक वानर बादशाह के हाथ से बंदूक छीनकर ले गया। बादशाह बेबस आदमियों की तरह देखता ही रह गया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि खानखाना दौड़ता हुआ आ रहा है। उसने कहा- ' इन वानरों को रोकना बहुत आवश्यक है जिल्ले इलाही।'

    - 'मगर कैसे? ये तो बन्दूक से भी नहीं मरते!'

    - 'ये बंदूक से नहीं मरेंगे शहंशाहे आलम! इन वानरों का उत्पात रोकने का एक ही उपाय है।'

    - 'तो उपाय करते क्यों नहीं?'

    - 'वह उपाय मेरे वश में नहीं।'

    - 'तो किसके वश में है?'

    - 'वह तो आपके ही वश में है।'

    - 'मैंने उपाय करके देख लिया। इन पर तो बारूद का भी असर नहीं होता।'

    - 'ये क्रुद्ध-विरुद्ध वानर हैं, बारूद से डरने वाले नहीं। ये तो अपने स्वामी के आदेश पर गुसांईजी को मुक्त करवाने आये हैं।'

    - 'कौन गुसांई?'

    - 'वही काशी के बाबा, जिन्हें शहजादे मुराद आपके आदेश से बंदी बना लाये हैं।'

    - 'सच कहते हो?'

    - 'जो आँखों से दिखता है, क्या वह भी सच नहीं है?'

    - 'ठीक है, हम भी उस बाबा को देखेंगे, अभी।' अकबर उठ कर कारागार को चल पड़ा। खानखाना ने भी बादशाह का अनुसरण किया। थोड़ी ही देर में वे दोनों गुसाईंजी के समक्ष थे। आगे-आगे अकबर और उसके पीछे-पीछे खानखाना ने कोठरी में प्रवेश किया। एक अद्भुत दृश्य उनके सामने था। अकबर ने देखा, उन्नत भाल पर प्रबल तेजपुंज धारण किये हुए एक गौर वर्ण ब्राह्मण आकाश की ओर हाथ उठाकर गा रहा था-

    संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बल बीरा।

    जै जै हनुमान गुसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।


    जाने कैसा आलोक था जो ब्राह्मण के मुखमण्डल से निकल कर पूरी कोठरी में फैल रहा था! आगंतुकों को देखकर गुसाईंजी ने पाठ रोक दिया। अकबर ने कहा- 'ब्राह्मण! जा मैं तुझे स्वतंत्र करता हूँ।'

    अकबर का आदेश सुनकर गुसांईजी ने कहा-

    'जो सत बार पाठ करि कोई, छूटहि बंदि महासुख होई

    जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।'


    (मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने अकबर की जेल से रिहाई के लिये हनुमान चालीसा की रचना की थी।)

    - 'मैंने सुना है कि तू बड़ा चमत्कारी है और घमण्डी भी।'

    - 'चमत्कारी तो इस सृष्टि को बनाने वाला है सम्राट। हम सब तो उसके संकेत मात्र पर नृत्य करने वाली कठपुतलियाँ हैं। हम अपनी इच्छा से न तो किसी को मनसबदार बना सकते हैं और न कारावास दे सकते हैं।' एक क्षण रुककर
    -

     'उमा दारू जोसित की नाईं। सबहि नचावत राम गुसाईं।'

    गुसांईजी ने शांत स्वर से कहा और कारा से बाहर प्रस्थान कर गये। मंत्रमुग्ध सा अकबर उनके पीछे-पीछे आया। कारा से बाहर निकल कर अकबर ने कहा-

    'आप धन्य हैं महात्मा!'

    गुसांईजी ने आकाश की ओर देखकर कहा-

    'हौं तो असवार रहौ खर कौ, तेरो ही नाम मोहि गयंद चढ़ायो।'

    अकबर ने महल में लौट कर देखा, समस्त वानर महल त्याग कर जा चुके थे।

    छत्तीस लाख

    - 'महाराज जगन्नाथ!' खानखाना ने अपने दरबार में उपस्थित कवि जगन्नाथ को सम्बोधित करके कहा।

    - 'जी हुजूर!'

    - 'तनिक इस पर पर विचार कीजिये और बताईये कि ये कैसा है?

    अच्युतचरण तरंगिणि शशिशेखर-मौलि-मालती माले।

    मन तनु वितरण-समये हरता देया न मे हरिता।।


    (-हे गंगा! जब मेरी मृत्यु हो तो तुम्हारे किनारे पर हो। हे माता! मेरी मृत्यु हो तो मुझे विष्णु का सारूप्य न देना, शिव का सारूप्य देना ताकि तुम मेरे सिर और आँखों पर बनी रहो।) पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा। अब से पहले गंगा मैया पर रहीम ने कोई कविता नहीं पढ़ी थी। 

    - 'खानखाना! जब तक कविवर जगन्नाथ आपके पद पर विचार करें, आप इस पद पर गौर फर्मायें।।' केशवराय ने खड़े होकर जुहार की।

    - 'सुनाइये कविराय। आप भी सुनाईये। हमें मालूम है कि आप हमारी तारीफ की बजाय अपनी तारीफ सुनना अधिक पसंद करेंगे।' खानखाना ने मुस्कुराकर केवशराय को अनुमति दी।

    केशव ने गाया-

    अमित उदार अति पाव विचारि चारु

    जहाँ-तहाँ आदरियां गंगाजी के नीर सों

    खलन के घालिबे को, खलक के पालिबे को

    खानखानां एक रामचन्द्रजी के तीर सों।।


    (यह कविता अब्दुर्रहीम की प्रशंसा में कही गयी है।)

    एक बार फिर पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा।

    - 'खानखाना! अनुमति हो तो हम भी कुछ कहें।' ये कवि गंग थे।

    - 'आप भी कहें कविवर। आपको कौन रोक सकता हैा!' खानखाना ने हँस कर कहा।

    - 'तो सुनिए खानखाना। कवि गंग आपकी सेवा में अपना नव रचित छंद प्रस्तुत करता है-

    चकित भँवर रहि गयो गमन नहिं करत कमलबन

    अहि फनि-मनि नहिं लेत तेज नहिं बहत पवन घन।

    हँस सरोवर तज्यो, चक्क चक्की न मिले अति

    बहु सुंदरि पद्मिनी, पुरुष न चहें न करें रति।

    खल भलित सेस कवि गंग भनि अतिम तज रवि रथ खस्यो।

    खानखान बैरमसुवन जि दिन कोप करि तंग कस्यो।।


    (- हे खानखाना! बैरम के पुत्र! जिस दिन तून क्रोध करके अपना तूणीर कसा। उस दिन भौंरा चकित होकर कमलवन को जाना भूल गया। सर्पराज अपने फण पर मणि रखना भूल गया और घनी वायु ने अपनी गति कम कर ली। हंस ने सरोवर त्याग दिया और चकवे तथा चकवी ने अपना मिलन बिसार दिया। पुरुषों ने पद्मिनी स्त्रियों के साथ रति करने से मुँह मोड़ लिया। शेषनाग भी व्याकुल हो गये। कवि गंग कहता है कि सूर्य देव का रथ भी अपने मार्ग से विचलित हो गया।)

    कवि गंग ने इतने मधुर स्वर में यह कविता कही कि सुनने वाले मंत्र मुग्ध से कविता के साथ ही बह गये। खानखाना ने कवित्त के भाव, अर्थ और पद लालित्य पर विचार करते हुए उसी समय अपने कोश में से छत्तीस लाख रुपये कविगंग को प्रदान किये। उस पूरे काल में संभवतः किसी और कवि को इतना बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था।

    मुख देखे दुःख उपजत

    - 'महाराज! बैरामखाँ को सुअन अब्दुर्रहीम महाराज के श्रीचरनन में कोटि-कोटि प्रणाम निवेदन करि रह्यौ। खानखाना ने अपना मस्तक भूमि पर रखकर कहा।

    - 'बिृंदाबन में तुम्हारौ स्वागत है खानखानाजू।' संत कुंभनदास ने रहीम को धरती से उठाकर गले लगा लिया।

    - 'भौत दिनन ते इच्छा रही संतन के दरसनन की, सो आज पूरी भईं' अब्दुर्रहीम ने भरे कण्ठ से कहा।

    - 'चहुं ओर तिहारे नाम की बड़ी चर्चा होय है खानखानाजू!'

    खानखाना ने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए कहा-

    'रहिमन धोखे भाव ते मुख ते निकसै राम।

    पावत पूरन परम गति कामादिक कौ धाम।।'


    - 'ऐसे देव दुर्लभ संस्कार कहाँ ते पाये?'

    - 'बाबा रामदास की हमारे कुल पै बड़ी कृपा हती। उन्हिन के प्रताप ते मो जैसे अधम कूं आप जैसे संतन के दर्शन सुलभ हुयि जायं हैं।'

    - 'बाबा रामदास कौ कुल धन्य भयौ, जो सूरा जैसौ सपूत जन्म्यौ। नेत्र ना हते फिर भी हरि गुन गाय-गाय के तर गयौ।'

    - 'महाराज! एक बिनती हती।'

    - 'तुम आदेस करौ खानखानाजू। हमारे लायक जो कछू काम होयगो हम पूरौ करिंगे।'

    संत ने प्रसन्न होकर कहा।

    - 'बादसाह की भौतई इच्छा है कि आप जैसे संत उनन के दरबार में रहैं।'

    खानखाना का प्रस्ताव पाकर संत चिंता में डूब गये। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोले- 'खानखानजू! तुम तौ ठहरे ज्ञानी। जरा तसल्ली ते बिचार कै बताओ कि बादसाह के दरबार में हम भिखारिन कौ कहा काम परौ?'

    - 'बादसाहन के दरबार में यदि गुनी लोग न रहें तो चाण्डाल अपनौ डेरा जमाय लेंगे। जाते बादसाह कौ तौ पतन हौवेगो ही, परजा भी दुख पावेगी।'

    - 'किंतु भैया आग और पानी का कहा मेल? ऊ ठहरौ बादसाह। दिन रात तरवारि चलावै, लोगन कू मारै। हम रहे भिखारी, भीख मांगैं हरि भजन करैं।' कुंभनदासजी का उत्तर सुनकर दीर्घ साँस छोड़ते हुए खानखाना ने कहा-

    'भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघू भूप।

    रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।।'


    खानखाना के मुखमण्डल पर निराशा छा गयी। वह चाहता था कि अकबर के दरबार में कुछ अच्छे संत और विचारवान् लोग रहें किंतु यह एक विचित्र बात थी कि कोई भी संत सत्ता के निकट नहीं जाना चाहता था जिससे अकबर के दरबार में धूर्तों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जाती थी।

    - 'अच्छा एक बात बताऔ, हम अकब्बर के दरबार में चल कै रहैं, ऐसी इच्छा तुम्हारी रही कै अकब्बर की?'

    संत के प्रश्न से खानखाना विचार में पड़ गया। बहुत सोच विचार कर बोला- 'बादसाह की।'

    - 'तौ तुम सीकरी जाय कें अकब्बर ते यों कहियौं कि कुंभनदास ने कहलवाई है कि-

    भगत कौ कहा सीकरी सों काम!

    आवत जात पनैहा टूटी, बिसरि गयौ हरि नाम।

    जाको मुख देखे दुख उपजत, ताकों करन परी परनाम।

    कुंभनदास लाल गिरधर बिन यह सब झूठौ धाम।

    खानखाना संत के चरणों की मिट्ठी सिर से लगाकर उठ गया।

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  • चित्रकूट का चातक - 43

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 43

    हुमा

    जिस प्रकार बारहमूला काश्मीर का दरवाजा है और जिस प्रकार गढ़ी बंगाल का दरवाजा है ठीक उसी प्रकार सहवान सिंध का दरवाजा है। सिंधु नद इस देश की जीवन रेखा है। जो नदियाँ अत्यधिक चौड़ी होती हैं, उन्हें प्राचीन काल में नद कहा जाता था। इस समय तक सिंधु नदी काफी क्षीण हो चुकी थी। सहवान का विख्यात दुर्ग इसी नदी के तट पर स्थित था। सिंधु नदी इस दुर्ग को तीन तरफ से घेरती थी। दुर्ग एक ऊँचे टीले पर विद्यमान था।

    ई. 1590 में अकबर ने खानखाना को कंधार पर आक्रमण करने का आदेश दिया। मुगल साम्राज्य के पैंतालीस बड़े सेनापति उसके साथ भेजे गये। कंधार किसी जमाने में अब्दुर्रहीम के पिता खानखाना बैरामखाँ के अधिकार में था किंतु बाद में ईरान के शाह को प्रदान कर दिया गया था। अब ईरान का बादशाह कमजोर हो चुका था और उसके लिये कंधार पर पकड़ बनाये रखना मुश्किल होता जा रहा था। दूसरी ओर तूरान का बादशाह कंधार पर आँख गढ़ाये हुए था। इन परिस्थितियों को देखकर अकबर ने कंधार को फिर से मुगलिया सल्तनत में शामिल करने का विचार किया और अब्दुर्रहीम को कंधार के लिये रवाना किया।

    मार्ग में अब्दुर्रहीम ने विचार किया कि कंधार जैसे निर्धन देश के लिये अपनी शक्ति और श्रम व्यय करना व्यर्थ है। इससे तो ठठ्ठा पर आक्रमण करना अधिक उचित है। ठठ्ठा विजय के पश्चात् सिंध विजय का मार्ग भी सुगम हो जायेगा, जहाँ से कुछ न कुछ धन अवश्य प्राप्त किया जा सकता है। यह सोचकर अब्दुर्रहीम ठठ्ठा की ओर रवाना हुआ किंतु इसी बीच सिंध से खबर आई कि सहवान के दुर्ग में आग लग गयी है और दुर्ग के भीतर रखा धान व चारा जल कर भस्म हो गया है।

    इस पर खानखाना ने अपनी एक सेना जलमार्ग से और एक सेना स्थल मार्ग से भेज कर सहवान को घेर लिया। सिंध पर विजय प्राप्त करना आसान कार्य न था। इसलिये उसने जैसलमेर से रावल भीम और बीकानेर से राव दलपत राठौड़ को भी अपनी मदद के लिये बुलवा लिया। जब अपना बल पूरा हो गया तो अब्दुर्रहीम ने अपनी फौज रात के अंधेरे में नावों में बैठाकर सहवान के दुर्ग की ओर रवाना कर दी। बहुत सी पैदल सेना हथियार लेकर नदी में उतर गयी। मुगल सेना ने रात भर में दुर्ग को चारों ओर से अच्छी तरह घेर लिया और बड़े तड़के ही तोपों से जलता हुआ बारूद फैंकने लगी।

    सिंधियों ने अपना देश बचाने का भरसक प्रयास किया किंतु वे दुर्ग में सुरक्षित होने के बावजूद मुगल सेना के समक्ष बिल्कुल कमजोर साबित हुए। इसका मुख्य कारण यह था कि सिंधी लोग यद्यपि मुसलमान हो गये थे किंतु अब भी वे प्राचीन आर्य पद्धति से ही युद्ध करते थे तथा युद्ध में भी अपनी नैतिकता को बनाये रखते थे जिसके तहत रात्रि में आक्रमण न करना, छल से वार न करना और पीठ पर हथियार न मारना शामिल था। जबकि मुगल सेना प्राचीन आर्य पद्धति में विश्वास नहीं करती थी, वह रात्रि में आक्रमण करने से नहीं हिचकती थी।

    विजय प्राप्त करने के लिये मुगल सेना किसी भी सीमा तक छल कर सकती थी। यहाँ तक कि शरण में आये हुए, निहत्थे, कमजोर, रण छोड़कर भागते हुए तथा अंग-भंग हुए शत्रु पर भी वार करती थी। पीठ पर वार करना तो मुगल सेना का परमधर्म था। इस कारण सिंधी वीर होने के बावजूद विजय प्राप्त नहीं कर सके।

    सहवान का दुर्ग गिरते देखकर उसका दुर्गपति मिरजा जानी समय रहते वहाँ से निकल गया और ठठ्ठे जा पहुंचा। अब्दुर्रहीम ने राजा टोडरमल के पुत्र धारू को उसके पीछे भेजा। मिर्जा जानी ने धारू को मार गिराया तथा मुगल सेना को काफी नुक्सान पहुँचाया। यह देखकर अब्दुर्रहीम क्रोधित होकर मिरजा जानी के पीछे लग गया। मिरजा जानी एक किले से दूसरे किले में भागता रहा किंतु खानखाना उसके पीछे लगा रहा। अंत में मिरजा जानी ने विस्तान का किला, सहवान का किला, बीस जंगी नाव और अपनी बेटी अब्दुर्रहीम को समर्पित कर दी। जब मिरजा जानी अब्दुर्रहीम की सेवा में उपस्थित हुआ तो बड़े भारी दरबार का आयोजन किया गया। इस दरबार में अब्दुर्रहीम के दरबारी मुल्ला शकेबी ने सिंध विजय पर एक कविता पढ़ी जिसमें कहा गया था- 'जो हुमा (एक पक्षी) आकाश में उड़ा करता था, उसको तूने (रहीम ने) पकड़ा और जाल से छोड़ दिया।'

    इस पर अब्दुर्रहीम ने मुल्ला को एक हजार अशर्फियां इनाम में दीं। मिरजा जानी भी उसी समय एक हजार अशर्फियां निकाल कर मुल्ला को देने लगा। इस पर मुल्ला ने पूछा- 'खानखाना ने इनाम दिया वह मेरी समझ में आता है किंतु तू क्यों देता है?'

    - 'रहमत खुदा की तुझ पर कि तूने मुझको हुमा कहा। जो गीदड़ कहता तो तेरी जीभ कौन पकड़ लेता? इसीसे इनाम देता हूँ।'

    अब्दुर्रहीम ने अपने बेटे एरच का विवाह मिरजा जानी की बेटी से कर दिया और दोनों दुर्ग अपने अधिकार में ले लिये।

    हसन गंगू

    आज जिस भूभाग को महाराष्ट्र के नाम से जाना जाता है, किसी समय उस भूभाग पर देवगिरि नाम का एक अत्यंत प्राचीन राज्य स्थित था। ई. 1306 में अल्लाउदीन खिलजी के गुलाम मलिक काफूर ने देवगिरि के राजा रामचंद्र और उसके परिवार को कैद करके दिल्ली भेज दिया था और देवगिरि को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया था। तब से दक्षिण में मुस्लिम शासन का आरंभ हुआ। इसी देवगिरि में हसन गंगू नाम के एक शिया मुसलमान का जन्म हुआ। बड़े होने पर उसने एक ब्राह्मण के यहाँ नौकरी कर ली। एक दिन उस ब्राह्मण ने हसनगंगू की भाग्य रेखाओं को देखकर बताया कि एक दिन तू इस प्रदेश का राजा बनेगा। उसी ब्राह्मण के निर्देश पर हसन गंगू मुहम्मद बिन तुगलक की सेना में भर्ती हो गया और शीघ्र ही वह दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का सबसे विश्वस्त आदमी बन गया।

    ई. 1347 में देवगिरि का सुल्तान मर गया। स्थितियाँ कुछ इस तरह की बनीं कि हसन गंगू हसन अब्दुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह के नाम से देवगिरि का राजा बन गया और उसने अपने ब्राह्मण स्वामी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिये अपने नवनिर्मित राज्य का नाम बहमनी राज्य रख दिया। अपने उसी पुराने ब्राह्मण स्वामी को हसन ने अपना प्रधानमंत्री बनाया।

    हसन गंगू के वंशज एक से बढ़कर एक क्रूर और अत्याचारी सुल्तान हुए तथा उन्होंने अपनी पूरी शक्ति अपने पड़ौसी विजयनगर साम्राज्य को कुचलने में लगाई। ई. 1422 में अहमदशाह बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह हसनगंगू की पांचवी पीढ़ी में था। उसने विजयनगर पर आक्रमण करके बीस हजार स्त्री पुरुषों को मौत के घाट उतारा। प्रजा की रक्षा के लिये राजा देवराय को उसकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। ई. 1461 में हसन गंगू की सातवीं पीढ़ी मे उत्पन्न हुमायूँ बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह क्रूरता की जीती जागती मिसाल था। उसे इतिहास में जालिम हुमायूँ कहा गया है। उसके अमीर जब प्रातः उसे सलाम करने जाते थे तो अपने बच्चों से अंतिम विदा लेकर जाते थे क्योंकि उनके वापिस जीवित लौटने की निश्चितता नहीं थी। वह कुसूरवार को ही नहीं अपितु उसके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार देता था।

    हसन खाँ गंगू के वंशज पौने दो सौ साल तक बहमनी राज्य पर शासन करते रहे। ई. 1538 में इस वंश के अंतिम सुल्तान कलीमुल्ला शाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इलहमातउल्ला वेश बदल कर मक्का भाग गया। उसके बाद बहमनी राज्य पाँच राज्यों में विभक्त हो गया। पहला राज्य अहमदनगर, दूसरा खानदेश, तीसरा बीजापुर, चौथा बरार और पाँचवा गोलकुण्डा। इन पाँचों राज्यों में मुस्लिम शासक राज्य करने लगे। वे सब के सब अपने आप को बादशाह कहते थे।

    चाँदबीबी

    सोलहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में अहमद नगर अपने सरदारों की आपसी लड़ाई से अत्यंत जर्जर हो चला था। बुरहान निजामशाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इब्राहीम निजामशाह अहमदनगर के तख्त पर बैठा। मात्र चार माह बाद ही वह बीजापुर के बादशाह आदिलखाँ के मुकाबिले में मारा गया। उस समय इब्राहीम निजामशाह का बेटा बहादुरशाह मात्र डेढ़ वर्ष का था। अतः इब्राहीम की बहिन चाँदबीबी राजकाज चलाने लगी लेकिन मुस्लिम सरदारों को एक औरत का शासन स्वीकार नहीं हुआ। वे चाँद बीबी के विरुद्ध दो धड़ों में विभक्त हो गये।

    पहला धड़ा दक्खिनियों का था जिनका नेता मियाँ मंझू था। दूसरा धड़ा हबशियों का था। उनका नेता इखलास खाँ था। दक्खिनियों के नेता मियाँ मंझू ने अहमदनगर में घुसकर इब्राहीम निजामशाह के डेढ़ साल के बेटे बहादुरशाह को उसकी फूफी चाँद बीबी से छीनकर जुनेर के किले में भेज दिया और दौलताबाद में कैद अहमदशाह को बुलाकर तख्त पर बैठा दिया। उस समय तो हबशी भी मियाँ मंझू के इस काम से सहमत हो गये किंतु बाद में जब उनके सरदार इखलासखाँ को पता लगा कि अहमदशाह राजवंश में से नहीं है तो उसने मियाँ मंझू से झगड़ा किया।

    हबशियों ने अहमदशाह के स्थान पर दुबारा से बहादुर शाह को अहमदनगर का सुल्तान बनाने के लिये अहमदनगर को घेर लिया और जुनेर के किलेदार से किले में कैद बहादुरशाह को मांगा। जुनेर का किलेदार मियाँ मंझू का विश्वस्त आदमी था। उसने बहादुरशाह हब्शियों को सौंपने से इन्कार कर दिया। जब हब्शी किसी भी तरह बहादुरशाह को नहीं पा सके तो उन्होंने अहमदनगर के बाजार से मोती शाह नाम के एक लड़के को पकड़ लिया और घोषणा की कि यह लड़का निजाम के परिवार से है अतः उसे बादशाह बनाया जाता है। कुछ दक्खिनी सरदार भी हब्शियों से आ मिले। इससे दस बारह हजार हब्शी और दक्खिनी घुड़सवार उस बादशाह के साथ हो गये।

    इस पर मियाँ मंझू ने गुजरात से शहजादी मुराद (यह शहजादी बुरहान निजामशाह के परिवार से थी) को अहमदनगर बुलवाया। अभी शहजादी मार्ग में ही थी कि हब्शियों में जागीरों और कामों के बंटवारे को लेकर आपस में तलवार चल गयी। बहुत से हब्शी आपस में ही कट कर मर गये। दक्खिनी सरदार हब्शियों की यह हालत देखकर फिर से मियाँ मंझू की सेवा में चले गये। अपने आदमियों को फिर से अपने पास आया देखकर मियाँ मंझू ने हब्शियों पर हमला कर दिया और बहुत से हब्शी मार गिराये। शेष हब्शी जान बचाकर भाग खड़े हुए।

    हब्शियों से निबटकर मियाँ मंझू ने चाँदबीबी से निबटने की योजना निर्धारित की किंतु उसी समय उसने सुना कि मुगल शहजादा मुराद और खानखाना अब्दुर्रहीम विशाल सेना लेकर अहमद नगर की ओर बढ़ रहे हैं। मंझू जानता था कि वह मुगल सेना के सामने कुछ घंटे भी नहीं टिक सकेगा। इसलिये उसने अनसारखाँ को खजानों तथा चाँदबीबी की चौकसी पर नियुक्त किया तथा स्वयं बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा से सहायता लेने के बहाने से अहमदनगर से बाहर निकल गया।

    मंझू के अहमदनगर से बाहर निकलते ही चाँदबीबी ने मुरतिजा निजामशाह के धाभाई मुहम्मदखाँ के साथ मिलकर अनसारखाँ को मार डाला और किले में बहादुर निजामशाह की दुहाई फेर दी।


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  • चित्रकूट का चातक - 44

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 44

    छोटे सरकार

    बड़ी-बड़ी मूंछों और लम्बी दाढ़ियों वाले चार दैत्याकार कहार शाही पालकी को अपने मजबूत कंधों पर उठाये हुए तेजी से नगर की सड़कों पर भागे चले जा रहे थे। शाही पालकी के आगे-आगे भाग रहे चोबदार और पालकी के बराबर चल रहे घुड़सवार सैनिकों की उपस्थिति से लगता था कि निश्चित ही शाही परिवार का कोई महत्वपूर्ण सदस्य पालकी में सवार है किंतु पालकी पर चारों ओर अत्यंत सावधानी से पर्दा पड़ा होने से यह अनुमान लगा पाना संभव नहीं था कि पालकी में कोई पुरुष है अथवा स्त्री और उनकी संख्या कितनी है।

    दैत्याकार कहार प्रत्येक कदम इस सावधानी से रखते थे कि उनका पैर किसी ऊँची-नीची जगह पर न पड़ जाये और पालकी के भीतर बैठी शाही सवारी को किसी तरह की असुविधा न हो। अचानक पालकी रुक गयी और कहारों ने दम साधने के लिये पालकी को सावधानी से नीचे रख दिया। पालकी के आगे चलने वाले चोबदार और साथ चलने वाले घुड़सवार सिपाही भी अपने घोड़ों से नीचे उतर पड़े।

    - 'क्या बात है मुहम्मद, तुम लोग रुक क्यों गये?' भीतर से एक बारीक किंतु दृढ़ आवाज में प्रश्न पूछा गया।

    - '........।' कहारों के नेता मुहम्मद से कोई जवाब देते नहीं बना। वह घबराकर अपने साथियों का मुँह देखने लगा।

    - 'तुमने जवाब नहीं दिया। सामने कोई मुश्किल है क्या? सड़क पर इतना शोर क्यों हो रहा है?'

    - 'सुलताना बीबी! छोटे सरकार की सवारी निकलने वाली है। उसे देखने के लिये सैंकड़ों बाशिंदे रास्ते के दोनों ओर जमा हैं। जब सवारी निकल जाये तो लोग भी निकल जायेंगे और हम भी।' पालकी के साथ चल रहे वृद्ध घुड़सवार फिरोजखाँ ने जवाब दिया। वह सुलताना चाँद बीबी का मुँह लगा विश्वस्त सिपाही था और उस समय से चाँद बीबी की सेवा में था जब बुरहान निजामशाह के महलों में उसका जन्म हुआ था। इतना ही नहीं, वृद्ध फिरोज अपने साथियों में कुछ अधिक अक्लमंद भी माना जाता था। इससे उसी ने जवाब देने का साहस किया।

    - 'छोटे सरकार! कौन छोटे सरकार?' सुलताना बीबी ने पूछा।

    - 'सुलताना! मथुरा के राजा किसनजी की सवारी जा रही है, वे ही छोटे सरकार हैं।'

    - 'क्या मथुरा देश का राजा हमारे अहमदनगर में आया हुआ है?

    - 'नहीं सुलताना बीबी! मथुरा में अब कोई राजा नहीं है। अब तो वहाँ मुगल बादशाह अकब्बर की हुकूमत है। किसनजी तो हजारों साल पहले मथुरा का राजा था जिसे हिन्दू रियाया आसमानी फरिश्ता मानकर उसकी इबादत करती है। उसी फरिश्ते की सवारी जा रही है, गाजे-बाजे के साथ।

    - 'उनकी सवारी कहाँ जा रही है फिरोज मियाँ?'

    - 'आज हिन्दुओं की देवझूलनी एकादशी है। इनमें मान्यता है कि आज के दिन फरिश्तों के बुतों को उनके मंदिर से निकाल कर किसी तालाब या नदी तक ले जाते हैं और भगवान को नहला कर तालाब या नदी के किनारे झूला खिलाते हैं।'

    थोड़ी ही देर में गाजे-बाजे की आवाज पालकी तक भी पहुँचने लगी और सड़क का कोलाहल बढ़ गया।

    - 'फिरोज मियाँ!'

    - 'हाँ सरकार।'

    - 'आपने हिन्दुओं के फरिश्ते को छोटे सरकार कहा, सो क्यों?'

    - 'सुलताना बीबी! अहमदनगर की सुलताना होने के कारण आप बड़ी सरकार हैं तो फिर मथुरा का राजा किसनजी तो छोटे सरकार ही हुआ।' बुद्धिमान वृद्ध ने सफेद बालों से भरा हुआ सिर पालकी की ओर झुका कर पलकें झपकाते हुए उत्तर दिया।

    गाजो-बाजों और सामूहिक स्वरों में गाये जाने वाले कीर्तन की आवाज बिल्कुल स्पष्ट हो चली थी। पर्दे के भीतर बैठी चाँद देर तक सुमधुर कीर्तन को सुनती रही। ऐसा संगीत उसने आज से पहले कभी नहीं सुना था। शब्द भी क्या थे जैसे आदमियों के कण्ठों से नहीं आसमानी जीवों के कण्ठों से निकल रहे हों। लगता था जैसे किसी ने शब्दों में सुगंध भर दी थी जिनकी महक से चारों ओर का वातारण महकने लगा था-

    साहब सिरताज हुआ, नन्द जू का आप पूत

    मारा जिन असुर, करी काली - सिर छाप है।

    कुन्दनपुर जाय के, सहाय करी भीषम की,

    रुक्मनी की टेक राखी, लागी नहीं खाप है।

    पाण्डव की पच्छ करी, द्रौपदी बढ़ायो चीर,

    दीन - से सुदामा की, मेटी जिन ताप है।

    निहचै करि सोधि लेहु, ज्ञानी गुनवान वेगि,

    जग में अनूप मित्र, कृष्ण कौ मिलाप है।


    (यह पद रसखान की बहिन दीवानी मुगलानी ताज का है जो ब्रज में रहकर कृष्ण भक्ति के पद रचा करती थी। )

    भजन सुनकर चाँद आपे में नहीं रही। वह अचानक पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आई। उसके शरीर पर बुर्का नहीं था। एक बिजली सी चमकी और लगा जैसे दिन में ही चाँद निकल आया। देखने वालों की आँखें चुंधिया गयीं। पूनम का जो चाँद आसमान के रहस्यमयी पर्दों में से निकलता था आज पालकी के पर्दों में से प्रकट हुआ। कहार, चोबदार और घुड़सवार हड़बड़ाकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

    - 'हमारे साथ आइये फिरोज मियाँ। आज हम छोटे सरकार को देखेंगे।' अपनी शाही मर्यादा भुलाकर चाँद किसनजी की सवारी की तरफ दौड़ पड़ी।

    बूढ़ा फिरोज, चोबदार और दूसरे सैनिक सुलताना के पीछे दौड़ पड़े। चाँद अपने होश में न थी। वह बदहवासों की तरह भगवान कृष्ण की सवारी की तरफ भागी। आगे-आगे कीमती कपड़ों में सजी-धजी एक मुस्लिम औरत और उसक पीछे सिपाहियों और चोबदारों को इस तरह भाग कर आते हुए देख कर भगवान कृष्ण की शोभायात्रा में चल रहे लोग डर कर पीछे हट गये। चाँद आगे बढ़ती रही और मार्ग स्वतः खाली हो गया। गाजे-बाजे बंद हो गये और भगवान की सवारी रुक गयी।

    ठीक भगवान के झूले के सामने जाकर चाँद खड़ी हो गयी और आँखें फाड़-फाड़ कर भगवान के विग्रह को निहारने लगी। उसने पलक तक नहीं गिरायी। चाँद को लगा कि किसनजी का बुत उसे अपनी ओर खींच रहा है। उसके मन में विचारों की आंधी उमड़ पड़ी। क्या यही है वह साहब सिरताज! नन्द जू का पूत? जिसने रुक्मनी और द्रौपदी की लाज रखी? मैं भी तो एक औरत हूँ, क्या यह मेरी लाज रखेगा? क्या सचमुच ही यह कोई आसमानी फरिश्ता है? ऐसी क्या बात है इसमें? यह मुझे अपनी ओर क्यों खींच रहा है ? क्या बुत किसी इंसान को खींच सकता है? क्या इसमें वाकई कोई आसमानी ताकत है?

    चाँद सुलताना को अपने बीच देखकर भक्तों ने सवारी वहीं रोक दी। जब बहुत देर तक सुलताना बुत बनी हुई, अपलक होकर भगवान को निहारती रही तो उसके सिपाहियों में बेचैनी फैल गयी। वृद्ध फिरोज ने साहस करके पूछा- 'यदि सुलताना का हुकुम हो तो हम लोग पालकी यहीं ले आयें?'

    सुलताना जैसे किसी अदृश्य लोक से निकल कर फिर से धरती पर आयी। क्या कमाल की बात है? अभी-अभी तो यहाँ कोई नहीं था। कहाँ चले गये थे ये लोग और फिर अचानक कहाँ से आ गये?

    किसी से कुछ न कहकर चाँद फिर से पालकी की ओर मुड़ी। तब तक कहार पालकी लेकर वहीं पहुँच चुके थे। भक्तों ने चाहा कि जब सुलताना की पालकी निकल जाये तो भगवान की सवारी को आगे बढ़ायें किंतु सुलताना ने कहा कि ये बड़े सरकार हैं, पहले इनकी सवारी आगे बढ़ेगी उसके बाद छोटे सरकार की यानि हमारी सवारी जायेगी।

    पूरा आकाश भगवान मुरली मनोहर और सुलताना बीबी की जय-जयकार से गूंज उठा। भक्तों ने अबीर गुलाल और पुष्पों की वर्षा करके उस क्षण को सदैव के लिये स्मरणीय बना दिया।

    बेर केर को संग

    सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार करने के बाद ई. 1591 में अकबर ने दक्षिण भारत के अहमदनगर, खानदेश, बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा राज्यों पर अधिकार करने की नीयत से अपने दूत इन राज्यों को भिजवाये और उनसे राजस्व की मांग की। इस पर खानदेश के सुल्तान राजा अलीखाँ ने तो अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली किंतु शेष राज्यों ने अकबर को इन्कार भिजवा दिया।

    इस पर ई. 1593 में अकबर ने शहजादा दानियाल को दक्षिण भारत के राज्यों पर विजय प्राप्त करने तथा उन्हें अपने साम्राज्य में शामिल करने के लिये भेजा। शहजादे की सेवा में खानखाना को नियुक्त किया गया। बादशाह ने दानियाल से पहले शहजादा मुराद को भी इसी काम के लिये भेज रखा था। यह निश्चित था कि दोनांे शहजादे दक्षिण में पहुँच कर शत्रु से लड़ने के बजाय आपस में लड़ेंगे।

    बादशाह को अपनी भूल का शीघ्र ही अनुमान हो गया। उसने दानियाल को वापस बुला लिया और शहजादा मुराद इसी काम पर बना रहा। मुराद एक नम्बर का धोखेबाज, घमण्डी, स्वार्थी तथा अविश्वसनीय आदमी था। उसका नाम भले ही मुराद था किंतु वास्तव में तो वह पूरा नामुराद था। वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था। दूसरी ओर खानखाना स्वतंत्र प्रवृत्ति का और अपने निर्णय स्वयं लेने वाला आदमी था। इस प्रकार दो विपरीत प्रवृत्तियों के स्वामी एक साथ रख दिये गये। यदि मुराद बेर की झाड़ी था तो खानखाना केले का वृक्ष।

    दिल्ली से आगरा पहुँचने पर खानखाना को परिवर्तन की जानकारी मिली। इस विपरीत नियुक्ति से खानखाना ने जान लिया कि चाहे जो हो, बेर की कंटीली झाड़ी केले के हरे भरे पेड़ को विक्षत करके रहेगी किंतु नियुक्ति की अदला बदली बीच मार्ग में और परिस्थितियों के वश हुई थी इसलिये खानखाना बादशाह से कुछ न कह सका और आगरा से अपनी सेना लेकर भेलसा होता हुआ उज्जैन पहुँचा। उधर मुराद गुजरात में खानखाना का रास्ता देख रहा था। जब उसने सुना कि खानखाना मालवा चला गया है तो वह बहुत आग बबूला हुआ। उसने खानखाना को चिट्ठी भिजवाई और ऐसा करने का कारण पूछा।

    खानखाना ने जवाब भिजवाया कि खान देश का सुल्तान राजा अलीखाँ भी बादशाही फौज के साथ हो जायेगा। मैं उसको लेकर आता हूँ तब तक आप गुजरात में शिकार खेलें। शहजादा इस जवाब को सुनकर और भी भड़का और अकेला ही गुजरात से दक्षिण को चल दिया। खानखाना यह समाचार पाकर अपना तोपखाना, फीलखाना (हस्तिसेना) और लाव-लश्कर उज्जैन में ही छोड़कर शहजादे के पीछे भागा।

    अहमदनगर से तीस कोस उत्तर में चाँदोर के पास खानखाना शहजादे की सेवा में प्रस्तुत हुआ किंतु शहजादे ने खानखाना से मुलाकात करने से इन्कार कर दिया। खानखाना दो दिन तक मुराद के आदमियों से माथा खपाता रहा। अंत में मुराद ने खानखाना को अपने पास बुलाया और बड़ी बेरुखी से पेश आया। सलाम भी ढंग से नहीं लिया।

    इस पर खानखाना और उसके आदमियों ने लड़ाई से हाथ खींच लिया। मुराद इतने नीच स्वभाव का आदमी था कि शहबाजखाँ कंबो और सादिक खाँ आदि अन्य मुगल सेनापति भी मुराद से हाथ खींच बैठे।

    जब मुराद और खानखाना की सम्मिलित सेनाओं ने अहमदनगर से आधा कोस पहले पड़ाव डाला तो बहुत से स्थानीय जमींदार, व्यापारी और सेनापति आदि शहजादे और खानखाना से रक्षापत्र लेने के लिये आये। शहजादे और खानखाना ने अहमदनगर के प्रमुख लोगों को अभय दे दिया और कहा कि यदि चाँद बीबी लड़ने के लिये नहीं आयेगी तो नगर पर हमला नहीं किया जायेगा। मुगल सिपाहियों को शहर में लूट मचाने की मनाही कर दी गयी।

    इधर तो शहजादा मुराद और खानखाना अदमदनगर को अभय प्रदान कर रहे थे और उधर दुष्ट शहबाजखाँ कंबो बिना शहजादे से अनुमति लिये चुपके से अहमदनगर के भीतर प्रविष्ट हो गया। उसके अनुशासन हीन और लालची सिपाहियों ने शहर में लूटपाट आरंभ कर दी।

    जब खानखाना को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वह किसी तरह शहर में प्रविष्टि हुआ और अपार परिश्रम करके मुगलिया सिपाहियों को लूटपाट करने से रोक कर बाहर लाया किंतु तब तक शहर में काफी नुक्सान हो चुका था। इससे शहरवालों का विश्वास मुगल सेनापतियों पर से हट गया और चाँदबीबी ने अहमदनगर के दरवाजे बंद करके मुगलों का सामना करने का निर्णय लिया।

    दूसरे दिन मुराद ने अहमद नगर को घेर लिया। चाँद बीबी की ओर से शाहअली तथा अभंगरखाँ मोर्चे पर आये किंतु लड़ाई में हार कर पीछे हट गये। मुगलों की फूट अब खुलकर सामने आ गयी। जब चाँदबीबी के सिपाही हार कर भाग रहे थे तो मुगल सेनापति एक दूसरे से यह कह कर लड़ने लगे कि तू उनके पीछे जा - तू उनके पीछे जा किंतु कोई नहीं गया और चाँद बीबी के आदमी फिर से किले में सुरक्षित पहुँच गये।

    अगले दिन मुगल सेनापतियों ने विचार किया कि यहाँ मुगलों की तीन बड़ी फौजें हैं- पहली मुराद की, दूसरी शहबाजखाँ कंबो की और तीसरी खानखाना की। इन तीनों में से एक किले पर घेरा डाले, दूसरी किले पर हमला करे तथा तीसरी सेना रास्तों को रोके किंतु यह योजना कार्यरूप नहीं ले सकी। मुराद युद्ध की योजना इस तरह से बनाता था कि विजय का श्रेय किसी भी तरह से खानखाना अथवा शहबाजखाँ कंबो न ले सके। इन योजनाओं को सुनकर खानखाना तो चुप हो जाता था और शहबाजखाँ उन योजनाओं का विरोध करने लगता था। इससे एक भी योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।

    मुराद के आदमियों ने मुराद को समझाया कि खानखाना इस लड़ाई को इस तरह चलाना चाहता है कि जीत का सेहरा शहजादे के सिर पर न बंध कर खानखाना के सिर पर बंधे। इस पर मुराद ने मुगल सेना का एक थाना कायम किया और खानखाना को उस पर बैठा दिया ताकि खानखाना अपनी जगह से हिल न सके।

    उधर मुराद और उसकी सेना के अत्याचार देखकर चाँदबीबी ने बीजापुर के बादशाह से सहायता मांगी। इस पर अहमद नगर, बीजापुर और गोलकुण्डा ने मिलकर मुगल सेना के विरुद्ध मोर्चा बांधा। बीजापुर का बादशाह इस संयुक्त सेना का सेनापति नियुक्त हुआ। उसके नेतृत्व में साठ हजार घुड़सवारों और त्वरित गति से चलायमान तोपखाने की सेना मुगलों से लड़ने के लिये आयी।

    मुराद ने इस सेना के आने से पहले ही अहमदनगर को लेने का विचार किया और खानखाना को बताये बिना अपने डेरे से लेकर किले की दीवार तक पाँच सुरंगें बिछा दीं। मुराद ने जुम्मे की नमाज पढ़ने के बाद इन सुरंगों में आग लगाने का निश्चय किया।

    चाँदबीबी को इन सुरंगों का पता चल गया। उसने दो सुरंगों की बारूद तो शुक्रवार दोपहर से पहले ही निकलवा लीं। जब वह तीसरी सुरंग से बारूद निकलवा रही थी तब मुराद ने सुरंगों को आग दिखा दी। इससे किले की पचास गज की दीवार उड़ गयी। किले के भीतर सुरंग खोद रहे लोगों में से कुछ तो मौके पर ही मारे गये और बाकी के भाग खड़े हुए। सुलताना चाँद बीबी फौरन महल से निकली ओर तलवार लेकर वहीं आ खड़ी हुई। उसे देखने के लिये दोनों ओर के सिपाहियों की भीड़ जुट गयी।

    उधर शहजादा और उसके अमीर शेष सुरंगों के फटने की प्रतीक्षा करते रहे और इधर चाँद बीबी ने तोपें, बान और बन्दूकें चुनकर रास्ता बंद कर दिया। खानखाना अपने थाने पर चुपचाप बैठा हुआ तमाशा देखता रहा। जब मुराद की फौज धावे के लिये आयी तो चाँद बीबी ने उस पर ऐसे बान और गोले मारे कि मुराद की सेना घबरा कर लौट गयी। चाँदबीबी पूरी रात किले के परकोटे पर खड़ी रही और उसने अपने सामने वह दीवार फिर से बनवा ली।

    मुराद ने खानखाना को पूरी तरह से इस युद्ध से अलग रखा था। इसलिये वह पूरी तरह निष्क्रिय बना रहा। इस दौरान वह तभी क्रियाशील हुआ जब उससे कुछ करने के लिये कहा गया।


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  • चित्रकूट का चातक - 45

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 45

    शहजादे की पगड़ी

    किले पर अधिकार करने में असफल रहने के बाद मुराद समझ गया कि खानखाना की शक्ति प्राप्त किये बिना अहमदनगर का किला नहीं लिया जा सकता। उसने हार कर खानखाना को बुलाया। खानखाना अपने आदमियों के साथ शहजादे की सेवा में हाजिर हुआ। मुराद ने अन्य दिनों के विपरीत बड़ी लल्लो-चप्पो के साथ खानखाना का स्वागत किया।

    - 'खानखाना! आप तो ईद के चाँद हो गये।' शहजादे ने अपनी दुष्ट आवाज में नकली मिठास भर कर कहा।

    - 'चाँद तो आप हैं शहजादे जिसका नूर पूरे आकाश को रौशन करता है। मैं तो छोटा सा सितारा हूँ। या यूँ कहिये छोटा सा दिया हूँ जो मुगलिया सल्तनत की किसी अंधेरी कोठरी में टिमटिमाता हूँ।'

    - 'खानखाना! यदि मुगलिया सल्तनत के आकाश में बादशाह सलामत सूरज बनकर चमकते हैं तो उस आकाश के चाँद केवल आप ही हो सकते हैं।'

    - 'यदि शहजादे मेरे बारे में ऐसा विचार रखते हैं तो यह मेरा सौभाग्य है। कहिये क्या आदेश है?'

    - 'आप तो जानते हैं खानखाना कि शहंशाह ने इस मोर्चे पर आपकी भी उतनी ही जिम्मेदारी तय की है, जितनी कि मेरी?'

    - 'मैं अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से पहचानता हूँ और जो भी आदेश मुझे दिये गये हैं, उन्हें मैं पूरा कर रहा हूँ।' खानखाना ने जवाब दिया।

    - 'आपने मुगलिया सल्तनत के लिये इतने युद्ध लड़े हैं, इससे पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ।'

    - 'कैसा नहीं हुआ शहजादे?'

    - 'यही कि आप मोर्चे पर मौजूद हों और फतह हासिल न हो?'

    - 'शहजादे स्वयं सक्षम हैं, वे बड़ी से बड़ी फतह हासिल कर सकते हैं।' खानखाना ने उदासीन होकर उत्तर दिया।

    - 'सच तो यह है खानखाना कि आपके या आपके पिता मरहूम खानखाना बैरामखाँ के बिना मुगलिया सल्तनत आज तक कोई भी बड़ी लड़ाई नहीं जीत सकी है।'

    - 'यह आपका बड़प्पन है जो इस नाचीज को इतना मान देते हैं। मैं तो मुगलों का अदना सा सिपाही हूँ।'

    - 'हमसे कोई गुस्ताखी हुई है खानखाना?'

    - 'मालिक गुस्ताखी नहीं करते, गुस्ताखी तो गुलाम करते हैं।'

    - 'हम जानते हैं खानखाना कि आप हमसे नाराज हैं।'

    - 'मेरे दुश्मनों ने आपसे यह बात कही होगी, मैं शहंशाह का गुलाम हूँ।'

    - 'हम जानते हैं कि आपसे बातों में भी नहीं जीत पायेंगे किंतु हम चाहते हैं कि अब अहमदनगर पर फतह हासिल हो।'

    - 'मुगलों को फतह हासिल हो, इससे अच्छी बात और क्या होगी शहजादे?'

    - 'किंतु यह जीत आपके सहयोग के बिना नहीं हो सकती।'

    - 'लेकिन मैं तो पहले से ही आपकी चाकरी में हाजिर हूँ।'

    - 'अच्छा अब आप ही बताईये कि क्या किया जाये?'

    - 'मेरे अकेले के किये कुछ नहीं होगा शहजादे। आप अपने विश्वस्त आदमियों से सलाह करें। जैसी सबकी राय बने, वैसा ही करें।'

    खानखाना की उदासीनता से मुराद समझ गया कि खानखाना की नाराजगी आसानी से दूर नहीं होगी। मुराद जैसा कांईयां जमाने भर में न था। उसने भी ठान ली थी कि वह खानखाना के माध्यम से ही अहमदनगर हासिल करेगा। मुराद ने अपने डेरे से सब अमीरों को जाने का संकेत किया और खानखाना को वहीं ठहरने के लिये कहा। जब डेरा खाली हो गया तो मुराद ने अपनी पगड़ी उतार कर खानखाना के पैरों में रख दी- 'मेरी लाज आपके हाथ में है खानखाना।'

    खानखाना इस अभिनय से पसीज गया। उसने पगड़ी उठा कर फिर से शहजादे के सिर पर रख दी और उसे वचन दिया कि वह पूरे मनोयोग से यत्न करेगा। खानखाना चाँद बीबी के बारे में काफी कुछ सुन चुका था और उसका प्रशसंक था। वह कतई नहीं चाहता था कि चाँद बीबी की कुछ भी हानि हो। उसने मुराद से कहा- 'श्रेष्ठ उपाय तो यह होगा कि बिना रक्तपात किये अहमदनगर हमारी अधीनता स्वीकार कर ले। इससे हमारे आदमियों की भी हानि नहीं होगी और इस समय मुगल सेना को जो धान और चारे की कमी है, उससे भी छुटकारा मिल जायेगा।'

    मुराद तो यही चाहता था कि किसी भी तरह अहमदनगर अधीनता स्वीकार कर ले। उसे राजधानी से चले तीन साल हो चले थे और अहमदनगर अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ था। वह राजधानी से अधिक दिनों तक दूर नहीं रहना चाहता था।

    - 'क्या यह संभव है?' - 'हाँ! यह संभव है। प्रयास करने पर सफलता अवश्य मिलेगी।'

    - 'तो फिर देर किस बात की है। आप आज ही अहमदनगर से बात कीजिये।'

    - 'यदि शहजादे की अनुमति हो तो मैं शहंशाह की ओर से दूत बनकर चाँद सुलताना की सेवा में जाऊँ और उसे किसी तरह राजी करूँ।'

    कहने की आवश्यकता नहीं कि मुराद ने खानखाना को तुरंत ही स्वीकृति प्रदान कर दी।


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  • चित्रकूट का चातक - 46

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 46

    रहस्यमय संवाद (1)

    शहजादे की अनुमति पाकर खानखाना स्वयं मुगलों की ओर से चाँदबीबी के सम्मुख उपस्थित हुआ। इससे उसके एक साथ दो उद्देश्य पूरे हो गये। एक तो खानखाना फिर से इस अभियान के केंद्र में आ गया और दूसरा यह कि चाँदबीबी को देख पाने की उसकी साध पूरी हो गयी। वह जब से अहमदनगर की सीमा में आया था तब से चाँद की बुद्धिमत्ता और कृष्ण भक्ति की बातें सुनता रहा था।

    बिना पिता, बिना भाई और बिना पुत्र के संरक्षण में एकाकी महिला का राजकाज चलाना स्वयं अपने आप में ही एक बड़ी बात थी तिस पर चारों ओर शत्रुओं की रेलमपेल। खानखाना को लगा इस साहसी और अद्भुत महिला को अवश्य देखना चाहिये।

    खानखाना अपने पाँच सवारों को लेकर दुर्ग में दाखिल हुआ। ऊँचे घोड़े पर सवार, लम्बे कद और पतली-दुबली देह का खानखाना दूर से ही दिखाई देता था। चाँद सुलताना के आदमी उसे सुलताना के महल तक ले गये। चाँद ने खानखाना के स्वागत की भारी तैयारियां कर रखी थीं। उसने शाही महलों को रंग रोगन और बंदनवारों से सजाया। रास्तों पर रंग-बिरंगी पताकाएं लगवाईं तथा महलों की ड्यौढ़ी पर खड़े रहकर गाजे बाजे के साथ खानखाना की अगुवाई की। अहमदनगर के अमीर, साहूकार और अन्य प्रमुख लोग भी खानखाना की अगुवाई के लिये उपस्थित हुए। जब खानखाना शाही महलों में पहुँचा तो उस पर इत्र और फूलों की वर्षा की गयी।

    बुर्के की ओट से चाँद ने खानखाना को तसलीम किया। खानखाना ने एक भरपूर दृष्टि अपने आसपास खड़े लोगों पर डाली और किंचित मुस्कुराते हुए कहा-

    'रहिमन रजनी ही भली, पिय सों होय मिलाप।

    खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।'


    वहाँ खड़े तमाम लोग खानखाना की इस रहस्य भरी बात को सुनकर अचंभे में पड़ गये। वे नहीं जान सके कि खानखाना ने ऐसा क्या कहा जो बुर्के के भीतर मुस्कान की शुभ्र चांदनी खिली और उसकी महक खानखाना तक पहुँच गयी! सुलताना ने लोक रीति के अनुसार खानखाना का आदर-सत्कार करके अपने महल के भीतरी कक्ष में पधारने का अनुरोध किया।

    खानखाना की इच्छानुसार एकांत हो गया। अब केवल दो ही व्यक्ति वहाँ थे, एक तो खानखाना और दूसरी ओर पर्दे की ओट में बैठी चाँद। खानखाना ने पर्दे की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

    'रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रंग दून।

    ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून।'


    - 'खानखाना! यदि पहेलियाँ ही बुझाते रहेंगे तो हमारी समझ में कुछ नहीं आयेगा।' चाँद की बारीक और मधुर आवाज कक्ष में फैल गयी।

    - 'सुलताना! मैंने कहा कि उसी प्रेम की सराहना की जानी चाहिये, जब दो व्यक्ति मिलें और अपना-अपना रंग त्याग दें। जैसे चूने और हल्दी को मिलाने पर हल्दी अपना पीलापन त्याग देती है और चूना अपनी सफेदी त्याग देता है।'

    - 'मैं अब भी नहीं समझी।'

    - 'सुलताना, जब तक आप पर्दे में रहेंगी तब तक मैं कैसे जानूंगा कि हल्दी ने अपना रंग त्याग कर चूने का रंग स्वीकार कर लिया है।'

    इस बार चाँद खानखाना का संकेत समझ गयी। वह पर्दे से बाहर निकल आयी। बचपन से वह खानखाना के बारे में सुनती आयी है। खानखाना की वीरता, दयालुता और दानवीरता के भी उसने कई किस्से सुने हैं। उसने यह भी सुना है कि खानखाना मथुरा के फरिश्ते किसनजी की तारीफ में कविता करता है। जिस दिन से चाँद ने किसनजी की सवारी के दर्शन किये हैं उस दिन से चाँद के मन में खानखाना से मिलने की इच्छा तीव्र हो गयी है। वह उनसे मिलकर किसनजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहती थी। आज वह अवसर अनायास ही उसे प्राप्त हो गया था। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह इस तरह खानखाना के सामने बेपर्दा होकर खड़ी होगी।

    चाँद को पर्दे से बाहर आया देखकर खानखाना ने हँसकर कहा-

    'रहिमन प्रीति न कीजिये जस खीरा ने कीन।

    ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन।'


    - 'इसका क्या अर्थ है कविराज?' सुलताना ने हँस कर पूछा। उसे अब पहिले का सा संकोच न रह गया था।

    - 'सुलताना! मैं चाहूंगा कि संधि के सम्बन्ध में जो भी बात हो, दिल से हो, निरी शाब्दिक नहीं हो।'

    - 'आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं खानखाना।' चाँद ने हँस कर कहा।

    - 'तुम पर विश्वास है इसीलिये कहता हूँ। ध्यान से सुनना-

    रहिमन छोटे नरन सों बैर भलो ना प्रीति।

    काटे चाटे स्वान के, दौऊ भांति विपरीत।'


    चाँद को समझ नहीं आया कि खानखाना ने ऐसा क्यों कहा? वह चुपचाप खानखाना को ताकती रही।

    - 'कुछ बोलो चाँद?'

    - 'खानखाना! हमारी समझ में कुछ नहीं आया।' चाँद ने कहा।

    चाँद की बेचैनी देखकर खानखाना मुस्कुराया-

    'रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहि।

    जै जानत ते कहत नहि, कहत ते जानत नाहि।'


    खानखाना की अत्यंत गूढ़ और रहस्य भरी बातों से चाँद के होश उड़ गये। जाने खानखाना क्या कहता था, जाने वह क्या चाहता था? खानखाना उसकी दुविधा समझ गया। उसने कहा- 'ओछे व्यक्तियों से न दुश्मनी अच्छी होती है और न दोस्ती। जैसे कुत्ता यदि दुश्मन बनकर काट खाये तो भी बुरा और यदि दोस्त होकर मुँह चाटने लगे तो भी बुरा।'

    - 'क्या मतलब हुआ इस बात का?'

    - 'मैं अपने स्वामी मुराद की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। वह भी एक ऐसा ही ओछा इंसान है। मतलब आप स्वयं समझ सकती हैं।'

    खानखाना की बात सुनकर चाँद और भी दुविधा में पड़ गयी। उसका मुँह उतर गया। कुछ क्षण पहले जो वह खानखाना को सरल सा इंसान समझे बैठी थी, वह भावना तिरोहित हो गयी। उसे लगा कि उसका पाला एक रहस्यमय इंसान से पड़ा है जिससे पार पाना संभवतः आसान न हो।

    - 'और दूसरे दोहे में आपने क्या कहा?'

    - 'दूसरे दोहे में मैंने कहा कि जो बातें हमारी सामर्थ्य से बाहर हैं, वे कहने सुनने की नहीं हैं। क्योंकि जो जानते हैं वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, वे जानते नहीं हैं।'

    - 'इस बात का क्या मतलब हुआ?'

    - 'इसका अर्थ यह हुआ कि जो बात मैंने तुम्हें अपने स्वामी के बारे में बताई है वह मेरी सामर्थ्य के बाहर की बात है। उसे कभी किसी और के सामने कदापि नहीं कहा जाये।'

    - 'खानखाना मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे हैं और आप मेरे लिये क्या संदेश लाये हैं।' चाँद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

    - 'ठहरो चाँद! इस तरह उतावली न हो। मैंने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। इसी से मैं तुम पर विश्वास करके दिल खोलकर अपनी बात कहता हूँ। मुराद एक धूर्त इंसान है इसलिये मैं जानबूझ कर स्वयं तुमसे संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। मैं तो तुम्हें केवल यह चेतावनी दे रहा था कि मैं जिस स्वामी की ओर से संधि करने आया हूँ, वह विश्वास करने योग्य नहीं है। चूंकि वह बहुत शक्तिशाली है, इसलिये वह शत्रुता करने योग्य भी नहीं है। मैंने ऐसा इसलिये कहा ताकि तुम्हारे मन में किसी तरह का भ्रम न रहे और तुम बाद में किसी परेशानी में न पड़ जाओ। तुम साहसी हो, बुद्धिमती हो, स्वाभिमानी हो, भगवान कृष्णचंद्र पर भरोसा करने वाली हो किंतु तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि तुम्हारा पाला किसी इंसान से नहीं अपितु शैतान से पड़ा है।'

    - 'यह तो मैं उसी समय देख चुकी हूँ जब मुगल सैनिकों ने नगर में घुस कर विश्वासघात किया। कृपया बताईये कि मैं मुराद से संधि करूं या नहीं?'

    - 'संधि तो तुम्हें करनी होगी किंतु सावधान भी रहना होगा।'

    - 'अर्थात्?'

    - 'यदि तुम संधि नहीं करोगी तो मुराद यहाँ से तब तक नहीं हिलेगा जब तक कि अहमदनगर उसके अधीन न हो जाये। संधि करने से तुम्हें यह लाभ होगा कि मुराद अपनी सेना लेकर अहमदनगर से चला जायेगा। और सावधान इसलिये रहना होगा कि यदि मुराद संधि भंग करे तो तुम तुरंत कार्यवाही करने की स्थिति में रहो।'

    - 'संधि का क्या प्रस्ताव तैयार किया है आपने?'

    - 'मेरा प्रस्ताव यह है कि बराड़ का वह प्रदेश जो बराड़ के अंतिम बादशाह तफावलखाँ के पास था और जिसे इन दिनों मुरतिजा निजामशाह ने दाब रखा है वह तो शहजादा मुराद ले ले और बाकी का राज्य माहोर के किले से चोल बन्दर तक और परेंड़े से दौलताबाद के किले और गुजरात की सीमा तक अहमदनगर के अधिकार में रहे।'

    - 'इससे मुझे क्या लाभ होगा?'

    - 'बरार अहमदनगर का मूल हिस्सा नहीं है। वह तो मुरतिजा ने तफावल खाँ से छीना था। यदि यह क्षेत्र तुम्हारे हाथ से निकल भी जाता है तो भी तुम्हारा मूल राज्य सुरक्षित रहेगा।'

    - 'क्या शहजादा मुराद इस बात को स्वीकार कर लेगा?'

    - 'हालांकि शहजादे की नजर पूरे अहमदनगर राज्य पर है किंतु फिलहाल उसे बराड़ से संतोष कर लेने के लिये मनाना मेरा काम है।'

    - 'और उसके बाद।'

    - 'बाद की बाद में देखी जायेगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलेंगी। हो सकता है बादशाह द्वारा मुराद को वापस बुला लिया जाये और यह पूरा काम मेरे अकेले के जिम्मे छोड़ दिया जाये या फिर हम दोनों के ही स्थान पर कोई और आये। यह भी हो सकता है कि तब तक तुम्हारी सैनिक शक्ति में इजाफा हो जाये और तुम मुगल सल्तनत से लोहा ले सकने की स्थिति में आ जाओ।'

    - 'क्या मुझे शहजादे के सामने पेश होना होगा?'

    - 'नहीं, तुम मुरतिजा को अपनी ओर से शहजादे की सेवा में भेज सकती हो।'

    खानखाना की बातों ने चाँद के हृदय में नयी आशा का संचार किया। उसने अनुभव किया कि खानखाना उतना रहस्यमय नहीं था, जितना उसे लगा था। वे रहस्यमयी बातें उसने अवश्य ही चाँद का दिल टटोलने के लिये कहीं थीं ताकि वह चाँद की तरफ से पूरी तरह आश्वस्त हो सके। सुलताना ने खानखाना का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

    - 'यदि राजनीति की बात पूरी हो गयी हों तो मेरी एक और अर्ज स्वीकार करिये।'

    - 'तुम्हारी इच्छा पूरी करके मुझे प्रसन्नता होगी।'

    - 'खानखाना! भले ही आप दुश्मन के सिपहसालार हैं और उसकी ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आये हैं किंतु मैं आपको अपना दुश्मन नहीं दोस्त मानती हूँ। इसी से मैं आप से अपने दिल के सारे भेद कहती हूँ लेकिन अपने दिल की कोई भी बात मैं आपसे कहूँ इससे पहले मैं आपकी मंजूरी चाहती हूँ।'

    - 'तुम्हें अपनी कोई भी बात मुझे कहने के लिये किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है चाँद। तुम बिना किसी रंज के अपनी बात कहो।'

    - 'खानखाना! मैं इस मुल्क की सुलताना जरूर हूँ किंतु वास्तव में तो मैं एक ऐसी औरत हूँ जिसके सिर पर किसी का साया नहीं है, न बाप का, न भाई का, न किसी और का। इससे मैं अपने आप को बहुत कमजोर और बेसहारा महसूस करती हूँ। आपसे मिलकर ऐसा लगा जैसे अचानक मेरे सिर पर मजबूत साया हो गया है। मैंने जब से होश संभाला है तब से चारों ओर दगा़ और खून-खराबे का ही मंजर देखा है। आप को देखकर पहली बार ऐसा लगा कि संसार में विश्वास भी कोई चीज है। आपसे रूबरू होकर मैं अपने को उसी प्रकार का सुकून महसूस करती हूँ जिस प्रकार मथुरा के राजा किसनजी को देखकर करने लगी थी। जब तक आप दक्षिण में हैं, तब तक मैं सब ओर से बेफिक्र हूँ। कृपा करके मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिससे यदि आप दक्षिण में न हों तब भी मुझे अपना मार्ग मिलता रहे।' बात पूरी करते-करते चाँद का गला भर आया और उसने सिर झुका लिया।

    चाँद की यह दशा देखकर खानखाना के मन में बड़ी करुणा उपजी। उन्होंने कहा- 'पूछो चाँद, तुम जो चाहो वही पूछो। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूंगा।'

    - 'किसी देश का सुल्तान कैसे सुरक्षित रह सकता है?' चाँद ने पूछा।

    खानखाना ने हँस कर कहा-

    -'खरच बढ्यो, उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन।

    कहु रहीम कैसे जिए, थोरे जल की मीन।'


    (जिस व्यक्ति का व्यय बढ़ जाता है, जिस व्यक्ति का उद्यम घट जाता है और जो राजा अपने मन में निष्ठुरता धारण कर लेता है, वे उसी प्रकार जीवित नहीं रहते जिस प्रकार कम जल में मछली जीवित नहीं रह सकती।)

    - 'संसार में हमारा हितैषी कौन है?' चाँद ने अगला सवाल पूछा।

    - 'रहिमन तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि।

    पर बस परे, परोस बस, परे मामिला जानि।'


    (तीन प्रकार से किसी व्यक्ति के हितैषी अथवा शत्रु होने की पहचान हो सकती है, या तो आदमी उसके अधीन हो जाये, या उसके पड़ौस में बस जाये या फिर उससे हमारा कोई काम पड़ जाये।)

    - 'इस संसार में किस पर विश्वास किया जा सकता है?'

    - 'यह रहीम निज संग लै जनमत जगत न कोय।

    बैर, प्रीति, अभ्यास, जस, होत होत ही होय।'


    (संसार में कोई भी व्यक्ति यह दृष्टि लेकर जन्म नहीं लेता। शत्रुता, प्रेम, आदत और यश होते होते ही होते हैं।)

    - 'विपत्ति में सच्चा सहारा कौन सा है?'

    - 'रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।

    बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय।'


    (अपनी सम्पत्ति के अतिरिक्त विपत्ति में कुछ भी काम नहीं आता। जिस प्रकार यदि कमल के पास जल नहीं हो तो कमल का मित्र सूर्य भी कमल का उपकार नहीं कर पाता। यहाँ तक कि मित्र होने पर भी सूर्य कमल को जला डालता है।)


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  • चित्रकूट का चातक - 47

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 47

     रहस्यमय संवाद (2)

    - 'अपने मन की बात किससे कहनी चाहिये?'

    - 'रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय,

    सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय।'


    (अपने मन की व्यथा किसी से नहीं कहनी चाहिये। लोग उस व्यथा को सुनकर प्रसन्न होंगे, व्यथा को कोई नहीं बांटेगा।)

    - 'यदि बादशाह दर-दर का भिखारी हो जाये तो उसे क्या करना चाहिये?'

    - 'काम न काहू आवई, मोल रहीम न लेई,

    बाजू टूटे बाज को, साहब चारा देई।'


    (सामर्थ्य शाली बाज जब अपना पंख खो देता है तो वह किसी काम का नहीं रहता। उसे कोई नहीं खरीदता। ऐसे बाज को परमात्मा ही भोजन देते हैं।)

    - 'क्या मृत्यु से बचा जा सकता है?'

    - 'सदा नगारा कूच का बाजत आठों जाम।

    रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम।'


    (संसार में हर समय मृत्यु का संगीत बजता रहता है। इस संसार में भला सदा के लिये कौन रह सका है!)

    - 'सच्चा सामर्थ्यवान कौन है?'

    - 'लोहे की न लुहार की, रहिमन कही विचार।

    जो हनि मारे सीस में, ताही की तलवार।'


    (यह निष्प्क्ष होकर कही गयी बात है कि तलवार का वास्तविक मालिक वही है जो उसका उपयोग कर सके।)

    - 'सब से बड़ा लाभ क्या है और सबसे बड़ी हानि क्या है?'

    - 'समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।

    चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।'


    (समय पर किये गये कार्य के समान लाभकारी कुछ भी नहीं है तथा समय पर चूक जाने से बड़ी हानि कोई नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति के हृदय को समय की चूक सालती रहती है।)

    - 'आदमी की चिंताएं कब समाप्त हो जाती हैं?'

    - 'चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

    जिनको कुछ ना चाहिए, वे साहन के साह।'


    (इच्छा रहित हो जाने से चिंता से भी छुटकारा मिल जाता है और मन को किसी की परवाह नहीं रहती। जिन्हें कुछ नहीं चाहिये वे बादशाहों के भी बादशाह हैं।)

    - 'खानखाना! मुझे लगता है, मेरे षड़यंत्रकारी अमीर एक दिन मुझे नष्ट कर देंगे। क्या मुझे आपकी शरण मिल सकती है?'

    - 'रहिमन बहु भेषज करत, ब्याधि न छाँड़त साथ।

    खग मृग बसत अरोग बन, हरि अनाथ के नाथ।'


    (अनेक औषधियां देने से भी व्याधि पीछा नहीं छोड़ती। केवल ईश्वर ही वास्तविक सहारा है जिसके बल पर पशु-पक्षी भी वन में पूर्णतः निरोग होकर बसते हैं।)

    खानखाना की सीधी सपाट बात सुनकर चाँद की आँखों में आँसू आ गये। किसी तरह अपने आप को संभाल कर बोली- 'आप ज्ञानी हैं, इसी से इतने उदासीन हैं और बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं किंतु मैं अज्ञानी हूँ, मैं आपकी तरह संतोषी नहीं हो सकती।'

    खानखाना उठ खड़ा हुआ। चाँद ने सिर पर दुपट्टा लेकर खानखाना को तसलीम कहा और आँखों में आँसू भरकर बोली- 'खानखाना! इस मायूस औरत की तसल्ली के लिये फिर कभी और भी पधारें। मेरा मन नहीं भरा।'

    चाँद पर्दे की ओट में चली गयी। खानखाना को लगा कि श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का निश्छल चाँद जो कुछ क्षण पहले तक कक्ष में उजाला किये हुए था, अचानक बादलों की ओट में चला गया।

    वचन भंग

    राजधानी से निकलने के बाद तीन साल बीत जाने पर भी शहजादा मुराद बादशाह अकबर को एक भी विजय की सूचना नहीं भेज पा रहा था इससे मुराद की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। जब खानखाना ने अहमदनगर की सुलताना चाँद बीबी की ओर से प्राप्त प्रस्ताव मुराद के समक्ष रखा कि यदि मुराद अहमदनगर से चला जाये तो चाँद उसे बरार का समस्त क्षेत्र दे सकती है तो मुराद ने अकस्मात् हाथ आये इस विशाल क्षेत्र को लेने से गुरेज नहीं किया और उसने संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।

    इस संधि के हो जाने पर सुलताना ने खानखाना का बड़ा आभार व्यक्त किया। संधि हो जाने के बाद जब खानखना जालना के लिये रवाना होने लगा तो चाँद ने उसके सम्मान में बड़ा दरबार किया। अहमदनगर के अमीरों ने खानखाना को नजराने पेश किये और उसके प्रति बड़ा आभार व्यक्त किया।

    खानखाना को गये हुए अभी कुछ ही दिन बीते होंगे कि मुराद ने संधि तोड़ दी और बराड़ से आगे बढ़कर पाटड़ी में भी अपना अमल कर लिया। इस पर दक्षिण के राजाओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देने लगा। उन्हें लगा कि इस विपदा से अकेले रहकर मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसके लिये उन्हें एकजुट होकर प्रयास करना पड़ेगा।

    चाँद सुलताना ने अपने विश्वस्त सेनापति सुहेलखाँ को मुगलों का रास्ता रोकने के लिये लिखाँ आदिलशाह और कुतुबशाह ने भी अपनी-अपनी सेनाएं भेज दीं। उस वक्त मुराद शाहपुर में और खानखाना जालना में था। जब खानखाना को ये सारे समाचार मिले तो वह शहजादे के पास आया और उसे वचन भंग करने के लिये भला बुरा कहा। शहजादा उस समय तो खानखाना से कुछ नहीं बोला किंतु उसने मन ही मन खानखाना से पीछा छुड़ाने का निश्चय कर लिया।

    मुराद स्वयं तो शाहपुर में ही बैठा रहा और उसने अपने आदमियों के साथ शहबाजखाँ कंबो, खानदेश के जागीरदार राजा अलीखाँ रूमी तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को सुहेलखाँ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा। मुराद के आदमियों ने मुराद के कहे अनुसार युद्ध की कपट पूर्ण व्यूह रचना की जिसका भेद बहुत कम आदमियों को मालूम था।

    पहर भर दिन चढ़ने के बाद युद्ध शुरू हुआ। मुराद की योजनानुसार खानखाना की सेना को इस प्रकार नियोजित किया गया कि वह शत्रु सेना के तोपखाने की सीधी चपेट में आ जाये। खानखाना के गुप्तचरों को इस बात का पता नहीं चल सका। खानदेश के राजा अलीखाँ रूमी को जब इस बात का ज्ञान हुआ कि मुराद ने खानखाना को तोपखाने की चपेट में रखा है तो उसके होश उड़ गये। उसने अपने विश्वस्त आदमियों से कहा- 'दोस्तो! मरने का दिन आ गया। आओ! मेरे पीछे आओ।'

    अलीखाँ और उसके विश्वस्त आदमी अपना जीवन खतरे में डालकर तोपों की सीधी मार में खड़े खानखाना को बचाने के लिये दौड़ पड़े। उन्हें ऐन वक्त पर अपना स्थान छोड़ दौड़कर जाते हुए देखकर मुराद के आदमी गुस्से से चिल्लाने लगे कि धोखेबाज अलीखाँ शत्रु की शरण में जा रहा है।

    राजा अलीखाँ ने उनकी परवाह नहीं की और किसी तरह खानखाना के पास जा पहुँचा। उसने कहा- 'खानखाना! आपके मित्रों ने आपके साथ दगा की है। आपको जानबूझ कर ऐसी जगह रखा गया है। सारी आतशबाजी आपके बराबर चुनी हुई है। अभी उसमें आग दी जाती है। इस वास्ते जो आप दाहिनी ओर मुड़ जावें तो ठीक होगा।'

    खानखाना तो तुरंत अपने आदमियों के सहारे उसी ओर मुड़ गया और राजा अलीखाँ रूमी उसके स्थान पर डट गया। जैसे ही खानखाना वहाँ से हटा, गनीम की तोपों को आग दिखाई गयी और सारा आकाश धुएँ से भर गया। यहाँ तक कि सूर्यदेव भी उस धुएँ से ढंक गये। कुछ पता नहीं चला कि कौन जीवित रहा और कौन मर गया। शत्रु की फौज राजा अलीखाँ को खानखाना समझ कर उस पर चढ़ बैठी। किसी को शत्रु मित्र की पहचान न रही। सब अमीर आपस में कट मरे। राजा अलीखाँ का भी काम तमाम हो गया। मुगलों की बड़ी भारी क्षति हुई। राजा जगन्नाथ अपने चार हजार सिपाहियों सहित मारा गया।

    धुआँ छंटने पर खानखाना ने फिर से उसी स्थान पर धावा किया जिस स्थान पर उसने राजा अलीखाँ को छोड़ा था किंतु राजा अलीखाँ नहीं मिला। इसी दौरान रात हो गयी और दोनों ओर की सेनाएं अपनी-अपनी जीत समझ कर सारी रात रणक्षेत्र में खड़ी रहीं। कोई भी घोड़े की पीठ से नहीं उतरा।

    दक्खिनी तो यह समझते रहे कि हमने खानखाना को मार डाला है और मुगल सेना यह समझती रही कि शत्रु पराजित हो कर भाग गया है। यह भाग्य अथवा प्रारब्ध का ही यत्न था कि जिस खानखाना को मार डालने के लिये उसके स्वामी ने षड़यंत्र रचा था, उसी खानखाना को बचाने के लिय सेवकों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।

    सुबह होने पर खानखाना ने अपना नक्कारा बजाया और अपना नरसिंगा फूंका जिसे सुनकर मुगल सेना के जो सिपाही युद्ध से भाग कर इधर-उधर छिपे हुए थे, खानखाना से आ मिले। खानखाना ने किसी तरह राजा अलीखाँ के क्षत-विक्षत शव को ढूंढ निकाला। उस समय खानखाना और उसके आदमियों के पास कुल सात हजार सवार रह गये थे जबकि शत्रु सैन्य में पच्चीस हजार घुड़सवार मौजूद थे। इस पर दौलतखाँ लोदी ने खानखाना से कहा- 'यदि मैं तोपखाने या हाथियों के सामने चढ़ कर जाऊंगा तो शत्रु तक पहुँचने से पहले ही मारा जाऊंगा इसलिये पीठ पीछे से धावा करता हूँ।'

    इस पर खानखाना ने दौलतखाँ लोदी से कहा- 'जो तू ऐसा करेगा तो दिल्ली का नाम डुबोवेगा।'

    - 'नाम को जीवित रखकर क्या करना है? यदि मैं जीवित रहा तो फिर से सौ दिल्लियाँ बसा लूंगा।' यह कह कर दौलतखाँ आगे बढ़ गया।

    दौलतखाँ लोदी के नौकर सैयद कासिम को खानखाना की नीयत पर शक हो गया। उसने दौलतखाँ के कान में फुसफुसा कर कहा- 'खानखाना आपको मरवा डालने के लिये ऐसा कह रहा है।'

    दौलतखाँ लोदी ने खानखाना की टोह लेने के लिये पूछा- 'इतना बता दो खानखाना! यदि हार हो जावे और मैं किसी तरह शत्रु के हाथों से बचकर वापिस आऊँ तो आप कहाँ मिलेंगे?'

    - 'लोथों के नीचे।' खानखाना ने जवाब दिया। इस जवाब से संतुष्ट होकर दौलतखाँ लोदी शत्रुओं पर धावा बोलने के लिये चला गया।

    खानखाना समझ गया कि उसकी नीयत पर शक किया जा रहा है। मुगलों का संशय मिटाने के लिये उस दिन खानखाना ने ऐसी लड़ाई की कि मुराद और उसके सलाहकार दांतों तले अंगुली दबाकर देखने के सिवाय कुछ न कर सके। शत्रु पक्ष का सेनापति सुहेलखाँ विशाल सेना का स्वामी होने के बावजूद खानखाना की छोटी सेना से परास्त हो गया। खानखाना यह चमत्कार करने का पुराना जादूगर था। इसी जादू के बल पर वह मुगल सल्तनत का खानखाना बना था।

    विजय प्राप्त होने पर खानखाना ने उस दिन पचहत्तर लाख रुपये और अपनी समस्त अन्य सम्पत्ति अपने सैनिकों में लुटा दी। दक्खिनियों के चालीस हाथी और तोपखाना खानखाना के हाथ लगे जो उसने मुराद को सौंप दिये।

    उस शाम मुगल सेना में चारों ओर विजय का उत्सव था। सिपाही छक कर शराब पीते थे और रक्कासाओं के साथ नगाड़ों की धुन पर घण्टों नाचते थे किंतु शायद ही कोई जान सका कि विजयी सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीमखाँ अपने डेरे में मुँह पर कपड़ा बांध कर जार-जार रो रहा था। उसके पास राजा अलीखाँ रूमी का क्षत-विक्षत शव रखा था। राजा अली खाँ बेर-केर के विपरीत संग के कारण मौत के उस विकराल मुँह में चला गया था, जहाँ से उसे लौटा कर लाना किसी के वश में नहीं था, यहाँ तक कि खानखाना के वश में भी नहीं।


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