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  • चित्रकूट का चातक - 28

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 28

    दो फकीर

    बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन दीवाना बादशाह की सेवा में उपस्थित हुए तो बादशाह ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उतावलापन बादशाह के स्वभाव में न था किंतु आज वह बादशाह नहीं रह गया था, पितृहीन बालक हो गया था। यही कारण था कि उसने किसी भी प्रश्न का उत्तर पाये बिना लगातार ढेर सारे प्रश्न पूछ लिये। जब बादशाह ने अपने प्रश्नों पर विराम लगाया तो वह बुरी तरह हांफ रहा था। जम्बूर ने एक हाथ अपनी लम्बी दाढ़ी पर और दूसरा हाथ तस्बीह के दाने पर फेरते हुए कहा-

    - 'अय दुनिया भर के बादशाहों के बादशाह! खानाखाना इस दुनिया में जिस काम के लिये आया था वह पूरा हो चुका था और धरती पर उसकी मौजूदगी की कोई खास वज़ह नहीं रह गयी थी। इसलिये परवरदिगार! तूने उसे अपनी चाकरी में ले लिया।' बाबा जम्बूर ने अदृश्य आस्मानी ताकत को सम्बोधित करके कहा।

    - 'अय पाक रूह अकब्बर! मेरे रहमदिल दोस्त बैरामखाँ ने अपने सारे फ़र्ज बखूबी पूरे किये। क़यामत के दिन जब खुदा उसके अच्छे-बुरे का हिसाब करेगा तो उसकी रूह शर्मसार नहीं होगी।' फकीर मुहम्मद अमीन ने आस्मानी ताकत के सज़दे में सिर झुकाया।

    - 'वह तो ठीक है लेकिन हुआ क्या था?' अकबर ने और भी बेचैन होकर पूछा। इन दोनों फकीरों के उत्तर में ऐसा कुछ नहीं था जो बादशाह को किंचित भी संतुष्ट कर सकता।

    - 'ऐ शाहों के शाह! बेचैन न हो। फकीर मुहम्मद अमीन तुझे सारी बातें तफ़सील से बतायेगा।' बाबा जम्बूर ने तरुण बादशाह की बेचैनी ताड़ ली।

    - 'हम फकीरों का सियासी लोगों से कोई रिश्ता नहीं होता। न ही सियासी बातें हमारी समझ में आती हैं किंतु इतना मैं जरूर जानता हूँ कि खानाखाना जिस तरह पूरी जिन्दगी अपने दुश्मनों से लड़ता रहा था और उन्हें कदम-कदम पर शिकस्त देता रहा था, उसके कारण यह मुनासिब ही था कि हिन्दुस्तान की जमीन पर उसका कोई दोस्त नहीं रह गया था। जब तक वह तेरे साथ था, उसने अपनी तेग म्यान में नहीं रखी थी किंतु जब वह हज़ करने के लिये तुझसे रुखसत हुआ तो उसने अपनी तेग म्यान में रखकर हम फकीरों का साथ कर लिया। उसी समय मैंने जाना कि उसके दिल में फकीरों, कमजो़रों और यहाँ तक कि अपने दुश्मनों के लिये भी कितनी ज़गह थी! जिस शेरशाह के पुत्र सलीमशाह को बैरामखाँ ने जंग के मैदान में हलाक किया था, उसी सलीमशाह की बेटी जब पनाह मांगने आयी तो बैरामखाँ ने उसे पनाह भी दी और अपने साथ हज पर ले जाना भी मंजूर कर लिया लेकिन उसकी दरियादिली को किसी ने नहीं जाना।' मुहम्मद अमीन का गला भर आया।

    - 'जब तक तलवार उसके हाथ में थी तब तक किसी दुश्मन का हौसला न हुआ कि वह बैरामखाँ की ओर आँख उठाकर देख सके लेकिन जैसे ही दुश्मनों का मालूम हुआ कि बैरामखाँ ने तलवार छोड़कर हज़ के लिये जाना मंजूर किया है तो दुश्मन चारों ओर से उस पर छा गये। फिर भी दुश्मनों में इतना साहस नहीं था कि सामने से बैरामखाँ पर वार करते। बैरामखाँ को भी उनकी कोई परवाह नहीं थी लेकिन एक दिन जब वह कुदरत की खूबसूरती को देखता हुआ पाटन के सहस्रलिंग तालाब में नहाने के लिये उतरा तो अफगान मुबारक लोहानी घात लगाकर बैठ गया ...........।'

    - 'मुबारक लोहानी कौन है?' अकबर ने मुहम्मद अमीन को टोका।

    - 'मुबारक लोहानी एक अफगान नौजवान है। उसका बाप पाँच साल पहले मच्छीवाड़ा की लड़ाई में बैरामखाँ की तलवार से मारा गया था। इसलिये मुबारक लोहानी के दिल में नफरत की आग जल रही थी। वह तभी से बैरामखाँ के पीछे लगा हुआ था और एक बेहतर मौके की तलाश में था।' मुहम्मद अमीन ने जवाब दिया।

    - 'आगे क्या हुआ?' अकबर ने बालक की तरह मचलकर पूछा।

    - 'जैसे ही बैरामखाँ तालाब से बाहर निकला तो मुबारक लोहानी चीते की तरह उछलकर सामने आया और उसने बैरामखाँ की पीठ में खंजर भौंक दिया। बैरामखाँ वहीं गिर पड़ा। खंजर उसके सीने में आर-पार हो गया था। इसलिये कुछ ही पल में खानखान की रूह बदन से फ़ना हो गयी।' बात पूरी करते करते बाबा जम्बूर की भी आँखें भीग आयीं।

    (बैरामखाँ के वध के बारे में अलग-अलग उल्लेख मिलता है। एक इतिहासकार ने लिखा है कि बैरामखाँ पाटन में नित्य प्रति पट्टन के बागों और मकानों को देखने जाया करता था। एक दिन वह नाव में बैठकर सहस्रलिंग तालाब का जलमहल देखने गया। वहाँ से आते समय जब नाव से उतरकर घोड़े पर सवार होने लगा तो मुबारकखाँ 30-40 पठानों के साथ तालाब के तट पर आया और ऐसा जाहिर किया कि मिलने को आया है। खानखाना ने उन सबको बुलवा लिया। मुबारकखाँ ने बैरामखाँ के पास पहुँचते ही छुरा निकालकर बैरामखाँ की पीठ में ऐसा मारा कि छाती के पार हो गया। फिर और एक पठान ने मस्तक पर तलवार मारकर काम पूरा कर दिया। बैरामखाँ के साथी भाग छूटे। फकीरों ने उसकी लोथ उठाकर शेख हिसाम की कब्र के पास गाड़ दी। )

    - 'आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था। बैरामखाँ को उसकी नाफिक्री ने मार डाला। मैंने कई बार उसे आगाह किया था कि अपने दुश्मनों पर नज़र रखा कर। उनके इरादे नेक नहीं हैं।' मुहम्मद अमीन ने आँखें मींचते हुए कहा। अकबर ने भी अपनी आँखों में छलछला आयीं पानी की बूंदों को छिपाने के लिये पलकें बंद कर लीं।

    बादशाह यद्यपि तरुण था और उदास भी किंतु फिर भी उसकी आँखों में जाने कैसा रौब छाया हुआ था कि फकीर होने पर भी न तो मुहम्मद अमीन और न ही बाबा जम्बूर उसकी आँखों में सीधे-सीधे झांक सके थे। जैसे ही बाबा जम्बूर को अनुमान हुआ कि बादशाह ने पलकें बन्द कर ली हैं तो उसने बादशाह के चेहरे को ध्यान से देखा बादशाह के चेहरे पर बनने वाली लकीरों में अब्दुर्रहीम का भविष्य छिपा हुआ था। जम्बूर इन लकीरों से बनने वाले चित्रों को देखकर आश्वस्त होना चाहता था।

    खुरदरा चेहरा

    बहुत देर तक तरुण बादशाह के खुरदरे चेहरे पर विभिन्न प्रकार की लकीरें बनती-बिगड़ती रहीं। अधिकतर लकीरें ऐसी थीं जिन्हें बाबा जम्बूर किसी भी हालत में नहीं पढ़ सकता था लेकिन बाबा जम्बूर ने हारना नहीं सीखा था। बाबा जम्बूर तो उस समय भी नहीं हारा था जब मुबारक लोहानी ने बैरामखाँ की पीठ में छुरा भौंक दिया था और बैरामखाँ जमीन पर गिरकर छटपटा रहा था। बाबा जम्बूर तो उस समय भी नहीं हारा था जिस समय मुबारक ने बैरामखाँ के डेरे पर पहुँच कर लूटमार व अंधाधुंध हत्याएं करनी आरंभ कर दी थी और बैरामखाँ का समूचा परिवार नाश के कगार पर जा खड़ा हुआ था। मुबारक लोहानी कुचले हुए नाग की तरह फुंफकार रहा था। एक तो अफगानी और तिस पर बैरी। उसके मन में बदले की जाने कैसी भीषण आग जल रही थी!

    जब मुबारक लोहानी बैरामखाँ के डेरे की ओर बढ़ा तो बाबा जम्बूर को मुबारक लोहानी के खतरनाक इरादों का पता लग गया। बाबा जम्बूर खून से लथपथ बैरामखाँ के शव को यूँ ही छोड़कर मुबारक लोहानी के पीछे दौड़ पड़ा। मुबारक बैरामखाँ के समूचे वंश को ही नष्ट कर डालना चाहता था। बैरामखाँ के अधिकतर गुलाम मुबारक लोहानी की तलवार की भेंट चढ़ गये। जो जान बचा सकते थे, खानाखाना के परिवार को असुरक्षित छोड़कर भाग छूटे थे। मुबारक लोहानी ने बैरामखाँ की सुंदर और जवान बीवी सलीमा बेगम तथा चार वर्ष के लड़के अब्दुर्रहीम को बहुत ढूंढा किंतु फकीर मुहम्मद अमीन दीवाना ने उस समय बाबा जम्बूर का साथ दिया। इसी से बेगम सलीमा और बालक रहीम मुबारक के हाथ नहीं लगे।

    मुबारक लोहानी बाबा जम्बूर के पीछे लग गया किंतु बाबा जम्बूर ने हार नहीं मानी। एक के बाद एक गाँव, खेत, खलिहान और जंगल-जंगल भागता रहा है वह बैरामखाँ के परिवार को लेकर। ऐसी आँख-मिचौनी हुई उन दोनों के बीच कि चूहे-बिल्ली भी शर्मा जायें। अफगानी लुटेरों ने कई बार उन्हें घेर लिया किंतु बाबा जम्बूर हर बार बच निकला। तब से लेकर अब तक बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन, सलीमा बेगम और अब्दुर्रहमान को लेकर भागते रहे हैं। मुबारक लोहानी और उसके अफगान लुटेरों से आँख-मिचौनी खेलते हुए पाटन से अहमदाबाद, जालोर और आगरा तक आ पहुँचना संभव नहीं था यदि बाबा जम्बूर ने हार मान ली होती।

    रहीम की माँ नहीं चाहती थी कि बैरामखाँ का परिवार फिर से अकबर के पास पहुँचे। वह चाहती थी कि उसके पिता के यहाँ अलवर में ही बैरामखाँ का पूरा परिवार बस जाये किंतु सलीमा बेगम और बाबा जम्बूर ने उसकी बात नहीं मानी। चाहती तो सलीमा बेगम भी नहीं थी कि फिर से अकबर से सामना हो किंतु परिस्थितियों के आगे वह विवश थी।

    बाबर की बेटी गुलरुख की औलाद होने के कारण सलीमा बेगम भी दिल्ली के तख्त पर अपना उतना ही अधिकार मानती थी जितना अकबर मानता था। खुद बैरामखाँ ने सलीमा बेगम का हाथ हुमायूँ से इसी लिये मांगा था कि यदि हुमायूँ के भाई दगा करके हुमायूँ की किसी औलाद को जिंदा न रहने दें तो बैरामखाँ उन गद्दारों के स्थान पर बाबर की नवासी सलीमा बेगम को हिन्दुस्थान के तख्त पर बैठा सके।

    इतनी सारी बातें जानने पर भी अकबर ने सलीमा बेगम का कोई लिहाज नहीं किया था और बैरामखाँ को देश निकाला दे दिया था। मन ही मन घृणा करने लगी थी वह अकबर से किंतु भाग्य की कैसी विडम्बना थी कि अब बैरामखाँ के न रहने पर वह खुद फिर से अकबर के पास ही जा रही थी।

    सलीमा बेगम के आदेश पर बाबा जम्बूर उसे और अब्दुर्रहीम को बैरामखाँ के हरम की सारी औरतों के साथ आगरा ले आया था। वह जानती थी कि बैरामखाँ के परिवार को अब यदि कोई सुरक्षित रख सकता है तो केवल अकबर। भले ही अकबर और खानाखाना में अंतिम दिनों में मनमुटाव हो गया हो, भले ही बादशाह ने बैरामखाँ के पीछे अपनी फौज लगा दी हो और भले ही बैरामखाँ बादशाह से विद्रोह पर उतर आया हो किंतु अकबर इतना कृतघ्न कभी नहीं हो सकता कि अपने संरक्षक के असहाय परिवार की रक्षा करने से मना कर दे।

    बाबा जम्बूर ने अनुमान लगाया कि बादशाह के खुरदरे चेहरे पर बनती-बिगड़ती लकीरों में उन्हीं सब पुरानी बातों के चित्र बन और बिगड़ रहे हैं। बाबा जम्बूर उन चित्रों को पहचानने की कोशिश कर रहा था जिनमें बैरामखाँ का अतीत और रहीम का भविष्य छिपा हुआ था।


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  • चित्रकूट का चातक - 29

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 29

    प्रलाप

    अकबर के खुरदरे चेहरे से चिंता की लकीरें मिटी नहीं। न तो अब्दुर्रहीम और न ही दोनों करिश्माई फकीर उसके सीने में जलती आग को शांत कर पाये। बादशाह ने अपने आप को भीषण ज्वाला में घिरे हुए पाया। हहराती हुई लपटों में झुलसा जा रहा था वह। जाने कैसा लावा था जो पिघल-पिघल कर उसके मन में भर गया था! स्थितियाँ इतनी विकट हो जायेंगी, इसका उसे स्वप्न में भी अनुमान नहीं था। उसने जीतना चाहा था किंतु बाजी उसके हाथ से निकल गयी थी। वह जीत कर भी हार गया था, सदा-सदा के लिये।

    संसार में अब ऐसा कोई नहीं बचा था जिसे दिखाने के लिये वह जीतना चाहता था। उसने तो चाहा था कि बैरामखाँ देखे कि अकबर बिना बैरामखाँ के भी जीत सकता है किंतु बैरामखाँ ने उसे यह अवसर ही नहीं दिया। यह ठीक था कि उसने बैरामखाँ को परास्त किया था किंतु वह बैरामखाँ को परास्त नहीं करना चाहता था। बैरामखाँ ने उसे ऐसा करने के लिये मजबूर किया था। अकबर की इच्छा तो केवल इतनी ही थी कि खानाखाना अपनी आँखों से देखे कि अकबर जीत के लिये खानाखाना का मोहताज नहीं है। वह स्वयं भी जीत सकता है अपने बल बूते पर!

    आज उसे बार-बार 'कालानौर' याद आ रहा था जब वह कुल तेरह साल की उम्र में बैरामखाँ के संरक्षण में मानकोट के दुर्ग पर घेरा डाले हुए था। अपनी विशाल सेना के साथ दुर्ग में बंद सिकन्दर सूर किसी भी भाँति काबू में आता ही न था। एक तो बैरामखाँ के पास सैनिकों की संख्या बहुत कम थी और दूसरी ओर राजधानी आगरा से किसी तरह की सहायता मिलने की आशा भी नहीं थी। बैरामखाँ के पास कुछ ही वफादार शिया सिपाही बचे थे जिन्हें बैरामखाँ फारस के शाह तहमास्प से लेकर आया था या फिर जिन सिपाहियों को खुद बैरामखाँ ने अपने बलबूते पर सेना में भरती किया था।

    खानखाना को यह लड़ाई उन्हीं मुट्ठी भर सिपाहियों के बूते पर लड़नी थी क्योंकि बादशाह हुजूर (हुमायूँ) तो आगरा छोड़कर जंग के मैदान में आते ही नहीं थे। बादशाह हुजूर के सिपहसलार दबी-ढंकी जुबान से चर्चा करते थे कि बादशाह हुजूर अपनी पुरानी आदत के अनुसार बादशाही पाते ही फिर से अय्याशी में डूब गये थे। सिपहसलारों का यह भी कहना था कि बादशाह हुजूर को जो भी पैसा मिलता था, बादशाह हुजूर उसे शराब और सुंदर औरतों पर खर्च कर डालते थे। यही कारण था कि बादशाह हुजूर को मरहूम बड़े बादशाह हुजूर (बाबर) द्वारा जीता गया हिन्दुस्तान लगभग हमेशा के लिये खोकर फारस भाग जाना पड़ा था। बादशाह हुजूर में इतनी क्षमता न थी कि वे हिन्दुस्तान पर फिर से राज्य कायम कर सकते।

    यह तो खानखाना ही था जो किसी भी कीमत पर बादशाह हुजूर को हिन्दुस्तान का ताज दिलवाने पर तुले हुआ था। यह उसी का बुलंद हौसला था कि बादशाह हुजूर रेगिस्तान की खाक छानना छोड़कर फिर से आगरा में आ बैठे थे और हिन्दुस्तान के बादशाह कहलाने लगे थे। पूरे पन्द्रह साल तक बैरामखाँ घोड़े की पीठ पर बैठा रहा था तो केवल इसलिये कि बादशाह हुजूर को दिल्ली और आगरा के तख्त पर फिर से बैठा सके। लेकिन बादशाह हुजूर! उन्हें तो जैसे ही आगरा मिला, तलवार म्यान में रख ली। उन्होंने बैरामखाँ को सिकन्दर सूर के पीछे लगा दिया था और स्वयं आगरा के महलों में रहकर रास-रंग में डूब गये थे।

    कक्ष में कुछ आवाज हुई तो अकबर ने सिर उठा कर देखा मशालची मशालों में तेल डाल रहा था। संभवतः सूरज डूबने को था। मशालों से निकलने वाले धुएँ से कुछ देर निजात पाने के लिये वह महल से निकल कर बाहर बागीचे में आ गया। पेड़ों की चोटी पर सूरज की किरणें अब भी थकी-हारी सी बैठी थीं। बादशाह ने चारों ओर आँख घुमाकर देखा, कैसी अजीब वीरानगी सी फैली हुई है! जाने कहाँ गयीं यहाँ की रौनकें! शायद खानबाबा के साथ चली गयीं! बैरामखाँ का ध्यान आया तो अकबर फिर से विचारों की दुनिया में डूब गया।

    क्या सोच रहा था वह कुछ देर पहले! कालानौर! हाँ, वही तो! कालानौर के दृश्य अकबर की आँखों के सामने तैर गये। उनमें से कुछ चित्र तो इतने ताजे थे मानो आज कल में ही देखे हों और कुछ चित्र धूमिल हो चले थे। कुछ तो संभवतः स्मृति पटल से पूरी तरह लुप्त भी हो गये थे।

    अकबर स्मृति पटल पर शेष बच गये चित्रों से बात करने लगा। कितना निर्भर करते थे बादशाह हुजूर खानबाबा पर! लगता था जैसे बादशाह हुजूर को खुदा के बाद खानबाबा का ही आसरा था। तभी तो बादशाह हुजूर ने हमें बारह वर्ष की उम्र में ही खानबाबा के संरक्षण में दे दिया था ताकि हम जंग और जंग के मैदान को समझ सकें। और खानबाबा! उन्हें भी तो जैसे बादशाह हुजूर की प्रत्येक मंशा पूरी करने का नशा सा छाया रहता था। लगता था जैसे बादशाह हुजूर की जीभ से आदेश बाद में निकलता था, उसकी पालना पहले हो जाती थी!

    बादशाह हुजूर जानते थे कि वे जो कर रहे हैं, वह एक बादशाह के लिये उचित नहीं है। वे ये भी जानते थे कि बादशाही का आधार जंग का मैदान होता है न कि उसका हरम। इसीलिये तो बादशाह हुजूर ने हमें हरम में पलकर बड़ा होने देने के बजाय मैदाने जंग में रखना अधिक उचित समझा था। बादशाह हुजूर की मंशा को समझकर खानबाबा ने हमें जंग और मैदाने जंग की हर पेचीदगी समझाई। इतना ही नहीं खानबाबा ने तो हमें जीवन में आने वाली उन पेचीदगियों को भी बताया जिन्हें केवल एक बाप ही बेटे को बताता है। हम भी तो कितना प्रसन्न थे एक अतालीक को पाकर! उन दिनों तो जैसे वे ही हमारे सब कुछ थे- दोस्त, उस्ताद और यहाँ तक कि वालिद भी।

    देखा जाये तो खानबाबा को पाने से पहले हमने जीवन में पाया ही क्या था? मनहूसियत और केवल मनहूसियत! हमारा तो जन्म ही मनहूसियतों के बीच हुआ था। जाने कितनी तरह की मनहूसियतें तकदीर बनाने वाले ने हमारी किस्मत में लिखी थीं! रेगिस्तान में चारों ओर पसरी हुई धूल, सिर पर मगज को तपा देने वाला सूरज और हमें मार डालने के लिये चारों तरफ घूमते हुए दुश्मन। दुश्मन भी कैसे? हमारे अपने सगे सम्बंधी!

    माँ-बाप जान बचाकर भागे तो हमें पीछे भूल गये। और हमारी किस्मत तो देखो! हम उन सगे सम्बंधियों के बीच पल कर बड़े हुए जो दुश्मनों से भी अधिक संगदिल और बेरहम हुआ करते हैं। जब हमारा सगा चाचा कामरान ही हमें दीवार पर टांक कर तोप से उड़ा देने को उतारू था तो फिर दूसरा कौन था जो हम पर रहम करता! कैसा था हमारा कुनबा! ऐसे तंगदिल और स्वार्थी मनुष्यों का झुण्ड जो अपने ही खून के खिलाफ षड़यंत्र रचता था! जो अपनों का ही खून पीने को लालायित रहता था। बड़े बादशाह हुजूर (बाबर) को तो हमने देखा नहीं किंतु सुना है कि वे अपने कुनबे से बहुत प्रेम करते थे। फिर क्यों उनका कुनबा इतने घृणित लोगों से भर गया था!

    तब हमारे लिये यह दुनिया तपते हुए रेगिस्तान से अधिक क्या थी? तरुण बादशाह की आँखों में पानी तैर आया। खानबाबा जैसे तपते हुए रेगिस्तान में ठण्डी हवा का झौंका बनकर आये थे। जब कांधार में तोपें आग के शोले उगल रहीं थीं और हम मारे डर के हाथ पैर फैंक-फैंक कर रो रहे थे तब खानबाबा ही थे जिन्होंने किले की दीवार पर चढ़कर हमें छाती से लगा लिया था।

    खानाबाबा के रूप में पहली बार हमारा परिचय प्रेम और विश्वास के संसार से हुआ था। तब पहली बार हमें पता लगा था कि जन्म देने वाली माँ और छाया देने वाले बाप के अलावा भी संसार में अच्छे लोग होते हैं। कितना चाहा था हमने कि अधिक से अधिक दिन हम खानबाबा के साथ मैदाने जंग में रहें और उनसे वो सब इल्म हासिल करें जो एक बादशाह के पास होना चाहिये किंतु कुदरत को तो यह भी मंजूर नहीं था। उधर हम खानबाबा से जंग और जिंदगी के सबक सीख रहे थे तो इधर कुदरत हमारे लिये जंग और जिंदगी में मुश्किलों के नये हर्फ लिख रही थी।

    लगभग ऐसा ही मनहूस दिन था वह भी जब बादशाह हुजूर की असमय मौत का समाचार कालानौर जंग के मैदान में पहुँचा था। कैसा लगा था तब! जैसे कोई शीशा झन्ना कर टूट पड़ता है! जैसे आसमानी बिजली जमीन पर आ गिरती है! जैसे कोई घोड़ा तेज रफ्तार से दौड़ता हुआ पहाड़ों की खाई में जा गिरता है।

    कुदरत ने जाने कैसी मनहूसियत लिखी थी हमारी जिंदगी में! खानबाबा भी तो जैसे सन्न रह गये थे! उन पर यह दोहरी मार थी। मानकोट का दुर्ग एक दो दिन में ही टूटने वाला था। ऐसे में यदि बादशाह हुजूर की मौत का समाचार सिकन्दर सूर तक पहुँच जाता तो वह दोगुने जोश से भर जाता!

    सेना और सेनापति बादशाह के लिये लड़ते हैं, भले ही बादशाह कैसा भी क्यों न हो। बिना बादशाह के लड़ती हुई सेना को शायद ही कोई सेनापति जीत हासिल करा सके! यह भी तो संभव था कि यदि हमारी अपनी मुगल सेना को बादशाह हुजूर की मौत का समाचार मिल जाता तो जाने कितने सैनिक खानबाबा का साथ छोड़कर सिकन्दर सूर से जा मिलते! यदि ऐसा हो जाता तो हाथ आयी हुई बाजी निश्चत ही पराजय में बदल जाती।

    हमारी स्थिति तो और भी विचित्र थी। बादशाह हुजूर के बाद हम ही हिन्दुस्तान के तख्त के वारिस थे किंतु बादशाह हुजूर उस समय हमारे लिये जो तख्त छोड़ गये थे उसके नीचे केवल दिल्ली और आगरा के ही सूबे थे और वे भी पूरे नहीं थे। अधिकांश इलाकों पर सिकन्दर सूर के वफादार सूबेदार कायम थे।

    तेरह वर्ष के बालक ही तो थे हम! हमारी समझ में कुछ नहीं आता था कि ऐसी स्थिति में हम क्या करें? लगता था कि हम भी बादशाह हुजूर की तरह शतरंज के बादशाह बनकर रह जायेंगे? क़यामत जैसी मुश्किल के उन दिनों में खानबाबा ही तो एकमात्र भरोसा रह गये थे हमारे। इस मुसीबत से बाहर निकलने के रास्ते केवल खानबाबा जानते थे। जो कुछ करना था उन्हीं को करना था, हमें तो केवल उनके साथ रहना था।

    स्मृतियों का झरोखा एक बार खुला तो खुलता ही चला गया। रात काफी हो गयी थी। बरसात के दिन थे इसलिये ओस भी गिर रही थी लेकिन बादशाह बाहर की दुनिया से बेखबर जाने किन विचारों में डूबा हुआ था! गुलाम हाथ बांधे खड़े थे। बेगमों तक खबर पहुँची तो वे भी चली आयीं थी। मुँह लगे अमीर-उमराव भी खिदमत में हाजिर थे किंतु किसी की मजाल नहीं थी जो तरुण बादशाह को भीतर चलने के लिये कह सके। इस समय बादशाह को टोकने का एक ही अर्थ था और वह था बादशाही कोप!

    बादशाह के करीबी लोग जानते थे कि आज बादशाह उस हद तक गमगीन है जिस हद तक कोई अपने पिता की मौत पर होता है। जाने कैसा सम्बंध था बादशाह और बैरामखाँ के बीच? शायद ही कोई अनुमान लगा सकता था! कितना-कितना प्रेम था दोनों के बीच और कितनी-कितनी घृणा! शायद ही संसार में ऐसा कहीं होता हो। यदि कोई आदमी बादशाह के सामने बैरामखाँ का उल्लेख भर कर देता था तो उसे बादशाह की गालियां खानी पड़ती थीं, चाहे वह बैरामखाँ की प्रशंसा करे या फिर उसकी बुराई।

    स्मृतियों के भण्डार में कितने-कितने चित्र थे जो अकबर को बैरामखाँ से जोड़े हुए थे। हुमायूँ बैरामखाँ की सेवाओं का उल्लेख करते हुए अक्सर भावुक हो जाता था और कहा करता था कि बैरामखाँ की सेवाओं के प्रत्युपकार में कई तैमूरी बादशाह और शहजादे कुरबान किये जा सकते हैं किंतु भाग्य की विडम्बना यह रही कि इतना सब जानने पर भी अकबर ने बैरामखाँ को देश निकाला दिया था। तरुण बादशाह को आज उन बातों का स्मरण बरबस हो आया।


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  • चित्रकूट का चातक - 30

     07.06.2017

    शत्रु की वापसी

    जब माहम अनगा को पता लगा कि बैरामखाँ का बेटा फिर से बादशाह के पास लौट आया है तो उसकी चिंता का पार न रहा। उसे लगा कि अब तक के सब किये धरे पर पानी फिर गया। माहम चाहती थी कि माहम का अपना बेटा आदमखाँ तरक्की करे और उसे खानखाना बनाया जाये किंतु यदि बैरामखाँ का बेटा अकबर के पास रहेगा तो अकबर का ध्यान उस ओर अधिक रहेगा। माहम अनगा का साहस न हुआ कि वह स्वयं अकबर से कुछ कहे। वह अनुभव करने लगी थी कि जब से बैरामखाँ को हज के लिये भेजा गया तब से अकबर माहम अनगा की राय तो जानना चाहता है किंतु उनमें से अमल एक पर भी नहीं करता।

    माहम अनगा ने हमीदा बानू को तैयार किया ताकि वह अपने बेटे शहंशाह अकबर को समझाये कि शत्रु के बेटे को अपने घर में पनाह देना ठीक नहीं है। एक दिन जब यह समर्थ हो जायेगा, अपने बाप की ही तरह अहसान फरामोश होकर गद्दारी करेगा। अकबर जानता था कि माहम अनगा और हमीदा बानू कभी भी बैरामखाँ के बेटे का स्वागत नहीं करेंगी किंतु अब वह पहले की तरह कच्चा नहीं रहा था और पुरानी गलतियाँ दोहराना नहीं चाहता था।

    अकबर ने मातम पुरसी के बहाने से सलीमा बेगम से मुलाकात की और सारी बातें विस्तार से समझाईं। उसने सलीमा बेगम से कहा कि अपने अतालीक और संरक्षक बैरामखाँ के परिवार की सुरक्षा करना मेरा उतना ही फर्ज है जितना कि अपने पिता हुमायूँ के परिवार की सुरक्षा करना लेकिन माहम अनगा और हमीदाबानू कभी नहीं चाहेंगे कि सलीमा बेगम और रहीम यहाँ रहें। आज नहीं तो कल कोई न कोई बखेड़ा खड़ा होगा ही। इसलिये ऐसा प्रबंध किया जाना आवश्यक है कि माहम अनगा और हमीदाबानू के दिलों से सलीमा बेगम और रहीम के प्रति दुश्मनी का भाव खत्म हो जाये।

    सलीमा बेगम भले ही अकबर की फुफेरी बहिन थी किंतु उसने कभी भी खुलकर अकबर से बात नहीं की थी। जाने क्यों उसे यह खुरदरे चेहरे का लड़का कभी भी अच्छा नहीं लगा था लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल गयी थीं और सवाल पसंद नापसंद का न रहकर अस्तित्व को बचाये रखने का हो गया था।

    अकबर ने सलीमा बेगम के सामने दो प्रस्ताव रखे। पहला तो यह कि सलीमा बेगम अकबर से निकाह कर ले ताकि माहम अनगा उसकी ओर आँख उठा कर भी नहीं देखे। दूसरा प्रस्ताव यह था कि बालक रहीम का विवाह माहम अनगा की बेटी माह बानू से कर दिया जाये। इस तरह माहम अनगा रहीम के खिलाफ भी न रह सकेगी लेकिन यह दूसरी वाली योजना अभी किसी को न बतायी जाये।

    सलीमा बेगम न हाँ कह सकी, न ना। सलीमा बेगम की खुद की कोई औलाद नहीं थी, फिर भी रहीम उसके मरहूम पति बैरामखाँ का बेटा तो था ही। इतनी कम उम्र में पितृहीन हो गये बालक के लिये सलीमा के मन में बहुत दया थी। रहीम की मासूम आँखों में सलीमा बेगम को मरहूम बैरामखाँ का चेहरा दिखाई देता था। यद्यपि बैरामखाँ उम्र में सलीमा बेगम से लगभग दुगुना था किंतु वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी। वह अक्सर तुर्की अदब में कवितायें लिख कर बैरामखाँ को सुनाया करती थी और बैरामखाँ एक-एक कविता के लिये उसे सोने की अशर्फियाँ दिया करता था।

    यूँ तो सलीमा बेगम को विधाता ने दिल खोलकर रूप दिया था किंतु सलीमा बेगम जानती थी कि जिस प्रकार अकबर रूप तृष्णा से सलीमा बेगम की ओर ताका करता था, उसके उलट बैरामखाँ सलीमा बेगम के रूप पर कम और उसकी कविता पर अधिक जान छिड़कता था। सलीमा बेगम की लिखी हुई कितनी ही कवितायें बैरामखाँ ने याद कर ली थीं जिन्हें वह गाहे-बगाहे गुनगुनाया करता था। वह स्वयं भी नयी-नयी कविता लिख कर तथा अपने खानदान के और लोगों द्वारा लिखी गयी कविता सलीमा बेगम को सुनाया करता था।

    जब कोई नया कवि बैरामखाँ के दरबार में आता तो बैरामखाँ उसकी कविता सलीमा बेगम को भी सुनाने का प्रबंध किया करता था। पूरी पूरी रात कवितायें कहते और सुनते बीत जाती थीं। रहीम की माँ को कविता से कोई लगाव नहीं था। वह बालक रहीम को गोद में लेकर चुपचाप उन दोनों की कवितायें सुनती रहती थी किंतु रहीम कविता में बड़ा रस लेता था। मात्र पाँच साल का होने पर भी वह विलक्षण बुद्धि वाला था। पिता द्वारा एक बार सुनाई गई कविता उसे हमेशा के लिये याद हो जाती थी। (अब्दुर्रहीम का जन्म जमालखां मेवाती की बेटी के गर्भ से माघ बदी 1, संवत 1613 अर्थात् 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में हुआ था।)

    अपने और रहीम के भविष्य को देखते हुए सलीमा बेगम ने चुपचाप अकबर से निकाह कर लिया। ऐसा करने में उसने एक और भलाई देखी। उसे लगा कि एक बार जब वह अकबर के निकट पहुंच जायेगी तो रहीम की माता तथा अन्य बेगमों को भी भली भांति सुरक्षा दे सकेगी। बैरामखाँ के बाकी परिवार को भी संरक्षण प्राप्त हो जायेगा।

    माहम अनगा, बाबर की बेटी गुलरुख की औलाद के विरुद्ध एक शब्द नहीं बोल सकी और यह निकाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया। जब माहम अनगा अकबर को नये विवाह की बधाई देने आई तो अकबर ने दूसरा पासा फैंका। उसने कहा कि अब माह बानू की भी सगाई कर देनी चाहिये। माहम अनगा ने समझा कि बादशाह उसे खुश करने की नीयत से कह रहा है। उसने गंभीरता से नहीं लिया लेकिन उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब अकबर ने पास बैठे रहीम के कंधे पर हाथ मारते हुए पूछा- 'क्यों मियाँ? क्या खयाल है?'

    बालक रहीम तो कुछ नहीं बोला किंतु माहम के चेहरा काला स्याह पड़ गया। अल्लाह जाने बादशाह के मन में क्या है? वह तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि बैरामखाँ इस रूप में लौटकर उसे शिकस्त देगा। माहम अनगा कुछ नहीं बोल सकी। निस्तब्ध होकर बादशाह के चेहरे को ताकती रही। अब वह स्तनपान करने वाला बालक न था, हिन्दुस्थान का बादशाह था। उसकी इच्छा के विरुद्ध एक लफ्ज भी निकालने की ताकत किसी में नहीं थी। माहम अपना काला पड़ गया चेहरा लिये अकबर के कक्ष से बाहर हो गयी।

    कुछ ही दिनों बाद अब्दुर्रहीम को मिर्जाखाँ की उपाधि दी गयी और उससे माहम अनगा की बेटी माहबानू की सगाई भी कर दी गयी। पराजय से तिलमिलाई माहम ने खाट पकड़ ली। उसका दम भीतर ही भीतर घुटता था किंतु किसी से कुछ कह नहीं सकती थी। केवल इन दो उपायों से अकबर ने बैरामखाँ के परिवार को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया था। इसके बाद न तो हरम सरकार की कोई ताकत रह गयी थी और न उपयोगिता। रहीम के लौट आने के बाद अकबर का जोश लौट आया था और अब वह सारे काम अपनी मर्जी से करने लगा था।

    अकबर ने बालक रहीम की शिक्षा के लिये दिल्ली और ईरान के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक नियुक्त किये। तुर्की, फारसी, अरबी, संस्कृत, छंद रचना, गणित, घुड़सवारी, तलवारबाजी, नौका चालन सबके लिये अलग-अलग शिक्षक नियुक्त किये गये। देखते ही देखते कच्ची मिट्टी आकार ग्रहण करने लगी।

    रहीम को दो ही काम दिये गये थे। पहला काम था अपने शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण करना और दूसरा काम था शिक्षा प्राप्ति के बाद हर दम अकबर की सेवा में हाजिर रहना। अकबर दिन भर रहीम से तरह-तरह के सवाल करता रहता। बालक भी अपनी मति के अनुसार रोचक और रसभरे जवाब देता, जिन्हें सुनकर अकबर का रोम-रोम पुलकित हो उठता। शायद ही कोई जान सकता था कि जब अकबर रहीम से बात कर रहा होता था तो अपने अतालीक बैरामखाँ से बतिया रहा होता था। अकबर ने जो कुछ बैरामखाँ से सीखा था, उसने वह सब भी रहीम को दे दिया। बादशाह के निरंतर सानिध्य से रहीम का व्यक्तित्व निखरने लगा, उसके जवाब बालकों जैसे न होकर सयानों जैसे होने लगे।

    दिन प्रति दिन सलीमा बेगम और रहीम के प्रति अकबर का बढ़ता हुआ मोह देखकर अकबर की बेगमों का माथा ठनका। उन्हें अपना और अपने पुत्रों का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। पहले तो वे माहम अनगा से अपने दिल की बात कह लेती थीं किंतु अब तो वह सहारा भी न रहा था।

    हरम सरकार के दुर्दिन

    माहम अनगा की बेटी माहबानू की सगाई अब्दुर्रहीम से कर देने की खुशी में अकबर ने माहम अनगा के बेटे अजीज कोका को खानेआजम की पदवी दी लेकिन कुछ दिनों बाद जब अकबर ने अतगाखाँ को राज्य का वकीले मुतलक (वकीले मुतलक का अर्थ था प्रधानमंत्री। बाद में यह पद दीवान कहलाने लगा) नियुक्त किया तो माहम अनगा समझ गयी कि अब मेरे दिन लद गये। माहम अनगा के बेटे आदमखाँ, जंवाई शिहाबुद्दीन, खानखाना मुनअमखाँ तथा हरम सरकार चलाने में शामिल रहने वाले दूसरे लोगों को अतगाखाँ की नियुक्ति अच्छी नहीं लगी और वे वकीले मुतलक की अवज्ञा करने लगे। एक दिन आदमखाँ अपने कुछ आदमियों के साथ महल में जा पहुँचा और सरकारी काम करते हुए अतगाखाँ की हत्या कर दी। इसके बाद वह महल के उस हिस्से की ओर बढ़ा जहाँ अकबर सो रहा था।

    बादशाह को सोया हुआ जानकर और आदमखाँ को नंगी तलवार सहित बादशाही महल की ओर आते जानकर एक 
    ख्वाजा (हिंजड़ों को ख्वाजा कहा जाता था) ने बादशाही महल के दरवाजे बंद कर दिये और स्वयं आदमखाँ का रास्ता रोककर खड़ा हो गया। शोरगुल से बादशाह की नींद खुल गयी और वह हरम के बाहर निकल आया। हींजड़ों के मुँह से सारी बात सुनकर अकबर ने आदमखाँ से पूछा कि उसने वकीले मुतलक की हत्या क्यों की?

    आदमखाँ समझ नहीं सका कि अब हरम सरकार के दिन लद गये हैं और अकबर अब पहले वाला अकबर नहीं रहा है। वक्त की नजाकत समझना तो दूर रहा, आदमखाँ शराब के नशे में बादशाह से बक-झक करने लगा। इस पर अकबर ने अपनी म्यान से तलवार निकाल कर आदमखाँ की छाती पर टिका दी और उससे कहा कि वह अपनी तलवार हिंजड़े को दे दे लेकिन आदमखाँ ने अपनी तलवार हिंजड़े को देने की बजाय बादशाह की तलवार छीनने की चेष्टा की तथा बादशाह की कलाई पकड़ ली। इस बेअदबी से अकबर की खूनी ताकत हुंकार कर जाग बैठी। उसने आदमखाँ के मुँह पर कसकर मुक्का मारा जिससे आदमखाँ बेहोश हो गया।

    अकबर ने हरम के हिंजड़ों को आदेश दिये कि आदमखाँ के हाथ-पैर बांध दिये जायें और उसे महल की मुंडेर से नीचे फैंक दिया जाये। जब हिंजड़ों ने आदमखाँ को नीचे फैंक दिया तो अकबर ने हिंजड़ों से कहा कि इसे एक बार फिर से मुंडेर पर ले जाओ और फिर से नीचे फैंको। हिंजड़ों ने कहा कि बादशाह सलामत यह तो मर चुका है।

    इस पर अकबर ने हिंजड़ों को लतियाते हुए कहा- 'कमबख्तो! जैसा मैं कहूँ वैसा करो अन्यथा तुम्हें भी मुंडेर से नीचे फिंकवा दूंगा।' हिंजड़े डर गये। उन्होंने बादशाह के आदेश से एक बार फिर आदमखाँ को मुंडेर से नीचे फैंक दिया। उसका शव पत्थरों पर बिखर गया। शैतानी खून के छींटे दूर-दूर तक उछल गये।

    आदमखाँ का यह हश्र देखकर उसका बहनोई शियाबुद्दीन, खानखाना मुनअमखाँ और दूसरे साथी डर कर भाग गये। उन्हें भय हुआ कि कहीं अकबर उनके लिये भी वही आदेश न दे। आदमखाँ से निबट कर अकबर माहम अनगा के महल में गया और उसने खाट पर पड़ी हुई माहम अनगा को पूरी घटना कह सुनाई। माहम को सारे समाचार पहले ही मिल गये थे।

    अपने बेटे की मौत का विवरण बादशाह के मुँह से सुनकर वह केवल इतना ही कह सकी- 'शहंशाह! आपने बिल्कुल ठीक किया है।' इस घटना के ठीक चालीसवें दिन माहम मर गयी।


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  • चित्रकूट का चातक - 31

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 31

    फिर से गुजरात

    हुमायूँ के गुजरात अभियान के दौरान बैरामखाँ का सितारा बुलंदी पर पहुँचा था और वह साधारण सिपाही से मुगलिया सल्तनत का खानखाना तथा अकबर के अतालीक के पद पर आसीन हुआ था। ईस्वी 1572 में अकबर ने गुजरात पर चढ़ाई की। इस अभियान में उसने मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम को भी अपने साथ लिया। रहीम उस समय 16 साल का कड़ियल जवान था और उसके भाग्योदय का समय आ पहुँचा था। यह एक विचित्र बात थी कि कुदरत ने पिता की तरह पुत्र के भाग्योदय का प्रहसन भी गुजरात की जमीन पर लिखा था।

    जब अकबर पाटन पहुँचा तो उसे बैरामखाँ का स्मरण हो आया। उसने मिर्जाखाँ को अपने पास बुलाया। अकबर ने रहीम से फिर से वह सब पूछा कि कैसे बैरामखाँ की हत्या हुई। अपनी बाल्य स्मृतियों के पिटारे में से रहीम ने वह सब विवरण कह सुनाया जो जहरीले कांटे की तरह रहीम के हृदय में गड़ा रहता था। रहीम के मुँह से फिर से बैरामखाँ की हत्या का विवरण सुनकर अकबर रोने को हो आया। उसने उस पाटन का राज्य रहीम को दे दिया जिस पाटन में बैरामखाँ की लोथ गिरी थी।

    रहीम भाग्य की इस करवट पर हैरान था। यह वही पाटन थी जिसकी जमीन पर उसके बाप बैरामखाँ का खून गिरा था। यह वही पाटन थी जहाँ से चार साल का रहीम बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन दीवाना की गोद में बैठकर भाग खड़ा हुआ था। यह वही पाटन थी जहाँ उसके बाप की कब्र मौजूद थी और जिस कब्र को उसने कभी नहीं देखा था। आज मिर्जाखाँ रहीम उसी पाटन का गवर्नर था।

    मिर्जाखाँ अकबर से अनुमति लेकर अपने बाप की कब्र पर आँसू बहाने के लिये गया। बाप जो पाटन की कब्र में सोया था। बाप जो बेटे के दिल में सोया था। बाप जो खून के एक-एक कतरे में समाया हुआ था। बाप जिसे पाटन ने छीन लिया था। बाप जो कवि था। बाप जो योद्धा था। बाप जो बादशाहों का बादशाह था। उस बाप की कब्र पर बैठकर रहीम बहुत देर तक आँसू बहाता रहा।

    इस प्रकार गुजरात की जमीन पर रहीम के भाग्य ने पहला कदम धरा। उस समय रहीम नहीं जानता था कि यही गुजरात एक दिन उसे भी खानखाना के आसन पर बैठायेगा और एक दिन पूरा गुजरात ही रहीम को दे दिया जायेगा। पाटन की सूबेदारी मिलने के दो साल बाद अकबर ने खाने आजम कोका से गुजरात छीन कर रहीम को सौंप दिया।

    सितारा बुलंदी पर

    जब अकबर ने मेवाड़ नरेश महाराणा प्रतापसिंह के खिलाफ अभियान किया तो उसने अपने समस्त योग्य सेनापतियों को अजमेर पहुँचने का आदेश दिया। मिर्जाखाँ को भी ये आदेश भेजे गये। पूरे दो साल तक मिर्जाखाँ रहीम, शहबाजखाँ आदि मुगल सेनापतियों के साथ मेवाड़ के पहाड़ों में भटकता रहा। इस अभियान में रहीम ने प्रतापसिंह के बारे मे बहुत सी बातें सुनीं। वह चाहता था कि किसी दिन प्रतापसिंह को रूबरू देखे किंतु इसका सौभाग्य उसे कभी नहीं मिला। न जाने क्यों रहीम का मन चाहता था कि इस युद्ध में प्रतापसिंह जीत जाये।

    होने को तो रहीम अकबर का सेनापति था और हाथ में तलवार लेकर अकबर के लिये ही लड़ता था किंतु उसका मन इस लड़ाई में कदापि उसका साथ नहीं देता था। वह एक अजीब सिपाही था जो अपने दुश्मन की जीत चाहता था। दो साल की दीर्घ अवधि में बहुत से आदमी गंवा कर और बहुत से निरपराध मेवाड़ियों का खून बहाकर ये लोग कुंभलमेर, गोगूंदा और उदयपुर पर अधिकार करने में सफल हो गये।

    मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम के काम से प्रसन्न होकर अकबर ने ईस्वी 1580 में उसे मीर अर्ज के पद पर नियत किया। मीर अर्ज का काम यह था कि जो लोग बादशाह से अपनी दीन दशा कहने आयें, उनका वृत्तांत बादशाह की सेवा में निवेदन करे और जो उसका उत्तर मिले वह उनको जाकर कह दे। यदि संतोषजनक उत्तर न मिले तो याची की वास्तविक स्थिति को देखते हुए पुनः बादशाह से प्रार्थना करने का साहस करे। अब तक यह काम किसी एक अधिकारी के जिम्मे नहीं होता था। प्रत्येक दिन के लिये अलग आदमी नियत होता था किंतु मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम की स्पष्टवादी प्रवृत्ति एवं निर्भीक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अकबर ने रहीम को इस काम पर नियुक्त कर दिया।

    रहीम ने यह काम इतनी सफलता से किया कि मात्र आठ माह बाद ही अकबर ने अजमेर की सूबेदारी और रणथंभौर का दुर्ग भी रहीम को सौंप दिये। मिर्जा रहीम देशपति और गढ़पति हो गया। उसका सितारा भाग्य के आकाश पर पूरे जोर से चमकने लगा।

    जब रहीम अजमेर की सूबेदारी संभाल कर फिर से बादशाह को सलाम करने के लिये दिल्ली आया तो बख्शियों ने रहीम को शहबाजखाँ के ऊपर खड़ा किया। इस पर शहबाजखाँ बिगड़ गया और उसने रहीम से नीचे खड़ा होने से मना कर दिया। जब इस बात का पता बादशाह को लगा तो उसने शहबाजखाँ को कछवाहा सरदार रायसाल दरबारी के पहरे में रख दिया। रहीम का यह रुतबा देखकर बड़े-बड़े अमीरों की रूह काँप गयी। वे समझ गये कि अभी रहीम का सितारा भाग्य के आकाश में और ऊँचा चढ़ेगा।

    मछलियाँ और कछुए

    ईसा की नौवीं-दसवीं शताब्दी में चम्बल नदी के किनारे कूर्मवंशी क्षत्रियों की तीन शाखाएं राज्य करती थीं। इनमें से एक शाखा नरवर पर, दूसरी ग्वालिअर पर तथा तीसरी शाखा दूबकण्ड पर कायम थी। इन तीनों शाखाओं को कच्छवाहा कहा जाता था। कच्छवाहा शब्द कश्यप अथवा कच्छप से बना है। कूर्म तथा कच्छप दोनों ही शब्दों का अर्थ कछुआ होता है। ग्यारहवीं शती के आरंभ में नरवर के राजकुमार धौलाराय ने पुराणकालीन मत्स्य क्षेत्र पर आक्रमण किया और इस क्षेत्र में बसने वाले मत्स्यों को परास्त कर अपना शासन स्थापित किया। ये मत्स्य इस काल में मीणे कहलाते थे। इस प्रकार कछुओं ने मछलियों को मार भगाया। मीन शब्द से मीणा बना है। मत्स्य और मीन दोनों ही शब्दों का अर्थ मछली होता है।

    जिस समय बाबर ने भारत की धरती पर पैर रखा उस समय कच्छवाहा वंश का राजा पृथ्वीराज इस क्षेत्र पर शासन करता था जिसकी राजधानी आमेर थी। बाबर का मार्ग रोकने वालों में राजा पृथ्वीराज भी प्रमुख था और वह खानुआ के मैदान में भी बाबर के विरुद्ध लड़ा था लेकिन उसके पुत्र पूर्णमल के काल से आमेर राज्य घनघोर अंतर्कलह में घिर गया और राजाओं की हत्याओं का लम्बा सिलसिला चल पड़ा।

    अकबर के शासन काल में आसकरण आमेर का राजा था। एक बार जब आसकरण तीर्थयात्रा के लिये गया तो उसके छोटे भाई भारमल (इसे बिहारीमल भी कहते हैं) ने आमेर पर कब्जा कर लिया और स्वयं को आमेर का राजा घोषित कर दिया। आसकरण ने अपना राज्य वापिस पाने के लिये पठान हाजीखाँ से मदद मांगी। जब हाजीखाँ सेना लेकर आमेर पर आया तो भारमल ने अपनी पुत्री किसनावती का डोला हाजीखाँ को भिजवा दिया। हाजीखाँ राजकुमारी लेकर वापस चला गया और आमेर पर भारमल का शासन पक्का हो गया। आसकरण देखता रह गया।

    भारमल एक स्वार्थी और निम्न विचारों का इंसान था। जब उसने देखा कि पठान हाजीखाँ में इतनी सामर्थ्य नहीं कि उसके राज्य को स्थायित्व दे सके तो उसने दिल्ली के बादशाह अकबर की शरण में जाने का विचार किया। ई.1562 में जब अकबर अजमेर जा रहा था तब भारमल दौसा के निकट उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। उसने अपनी पुत्री जोधाबाई तथा पुत्र भगवानदास, अकबर को समर्पित कर दिये।

    यह भारत के इतिहास में पहला अवसर था जब किसी प्रबल हिन्दू नरेश ने स्वेच्छा से अपनी पुत्री किसी मुस्लिम राजा को समर्पित की हो। अकबर ने संयोग से हाथ आये इस अवसर के मूल्य को पहचाना तथा जोधाबाई से विवाह कर लिया। राजा भारमल के पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मानसिंह को भी अकबर अपने साथ आगरा ले गया और उन्हें मनसब आदि देकर अपना चाकर बना लिया।

    मानसिंह तथा अकबर की आयु में कम ही अंतर था इसलिये उन दोनों में अच्छी मित्रता हो गयी। दोनों साथ-साथ शराब पीकर झगड़ते, दासियों का नृत्य देखते, साथ-साथ शिकार खेलते और युद्ध अभियानों पर जाते। कई बार दोनों नशे में चूर होकर किसी दासी के लिये गुत्थमगुत्था हो जाते किंतु नशा उतरते ही सुलह कर लेते। मानसिंह विद्वान, गुणी और प्रबल योद्धा था, उसकी सेवाओं से मुगल साम्राज्य का न केवल विस्तार हुआ अपितु उसमें स्थायित्व भी आ गया।

    राजा भारमल, भगवानदास, मानसिंह और टोडरमल जैसे हिन्दू वीरों की सेवाएं प्राप्त कर लेने के बाद अकबर की समझ में आया कि एक ओर तो उसके पिता और दादा के रक्त सम्बंधी, कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी सुन्नी अमीर हैं जो अकबर को हटाकर स्वयं बादशाह बनना चाहते हैं और दूसरी ओर हिन्दू नरेश हैं जो एक बार चाकरी स्वीकार कर लेने के बाद प्राण गंवाकर भी अपने स्वामी की रक्षा करते हैं। अतः अकबर ने हिन्दू नरेशों को मुगल साम्राज्य की रक्षा के लिये नियुक्त करने का निर्णय किया।

    उधर हिन्दू राजकुमारी से विवाह का अनुभव भी बहुत अच्छा रहा था। अतः अकबर ने समस्त हिन्दू नरेशों को आदेश दिया कि वे अपनी राजकुमारियों के डोले अकबर तथा अकबर के शहजादों और अमीरों के लिये भेजें। इस योजना से भारत वर्ष के हिन्दू नरेशों में हड़कम्प मच गया। कई राजकन्याओं ने आत्मघात कर लिया किंतु बात बात पर मूंछों की लड़ाई लड़ने वाले हिन्दू नरेश इस विपत्ति से अपनी रक्षा नहीं कर सके। न ही उन्होंने अपने जनेऊ, वेद और कन्याओं की रक्षा करने के लिये किसी संगठन का निर्माण किया। फलतः बहुत से राजाओं को अपनी कन्याएं मुगलों से ब्याहनी पड़ीं।

    इससे एक ओर तो हिन्दू नरेशों के जातीय गौरव का विगलन हुआ और दूसरी तरफ मुगल साम्राज्य की नींवें भारत में मजबूती से जम गयीं। सम्पूर्ण उत्तरी भारत में केवल मेवाड़ ही उस समय एकमात्र ऐसा हिन्दू नृवंश था जो चट्टान की तरह खड़ा था, जिसने न तो मुगलों की अधीनता स्वीकार की और न उन्हें अपनी कन्याएं सौंपना स्वीकार किया।


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  • चित्रकूट का चातक - 32

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 32

     पेट में दर्द

    जब मेवाड़ राजवंश ने अपनी कन्याएं मुगलों को देने से मना कर दिया तो अकबर ने अपनी सेनाओं का मुँह उदयपुर की ओर मोड़ दिया। राजा मानसिंह को विशाल सैन्य और बहुत सारी नसीहतें व हिदायतें देकर इस अभियान पर रवाना किया गया। मानसिंह दिल्ली से कूच कर पहले डूंगरपुर पहुँचा जहाँ उसने डूंगरपुर पर आक्रमण कर उसे हस्तगत कर लिया। डूंगरपुर का महारावल आसकरण मानसिंह के भय से पहाड़ों में भाग गया। अपनी सेना को डूंगरपुर में ही छोड़कर मानसिंह महाराणा को मनाने के लिये उदयपुर आया। महाराणा प्रतापसिंह ने मानसिंह को बंधु जानकर अपने महलों में विशाल दरबार का आयोजन किया तथा मानसिंह का बड़ा भारी स्वागत किया।

    औपचारिक स्वागत संभाषण के पश्चात् महाराणा ने मानसिंह से कहा- 'कुंअरजू! आप हमारे आत्मीय हैं, बंधु हैं, मेवाड़ की धरती आपका स्वागत करती है।'

    - 'महाराणाजी! जिस मेवाड़ की धरती को परमात्मा ने हर तरह से सुंदर और धन-धान्य से परिपूर्ण बनाया है, उसकी रक्षा और समृद्धि की कामना करना जितना आपका कर्तव्य है, उतना ही दायित्व आपके आत्मीय बंधु होने के नाते मेरा भी है।'

    - 'सम्पूर्ण भारतवर्ष हम सबकी जननी है, इसके कण-कण की रक्षा करना हम सबका कर्त्तव्य है।' महाराणा ने कहा।

    - 'मेवाड़ को भी अब अपने हित-अनहित के सम्बंध में दूसरे राज्यों की भांति प्रचलित मान्यताओं से कुछ हटकर सोचना चाहिये। ताकि प्रजा में स्थायित्व आये तथा शांति और समृद्धि का आगमन हो सके।' मानसिंह ने अकबरी शतरंज का पहला मोहरा आगे बढ़ाया।

    - 'मैं आपका आशय समझा नहीं कुंअरजू!'

    - 'मेवाड़ विगत सैंकड़ों वर्षों से दिल्ली से जूझता आया है। दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राजवंशों के रहते ऐसा करना उचित ही था किंतु मुगलों के दिल्लीधीश्वर बन जाने के बाद स्थिति बदल गयी है। अब दिल्ली से लोहा लेने में कोई लाभ नहीं है। इस अनावश्यक संघर्ष से मेवाड़ की शक्ति का अपव्यय हो रहा है तथा जनता की समृद्धि नष्ट हो रही है।'

    - 'कुंअरजू! मैं समझता हूँ कि इस समय हमारा आत्मीय बंधु नहीं अकब्बर का सेवक बोल रहा है।'

    - 'दोनों ही भूमिकाओं में मैं एक ही व्यक्ति हूँ महाराणाजी।'

    - 'तुम एक होकर भी दो भूमिकाएं निभा सकते हो किंतु हम नहीं। हमारी भूमिका हमारे पूर्वज लिख गये हैं, उसे नये सिरे से लिखना हमारे वश में नहीं है।'

    - 'महाराणाजी! यदि राजा का हठ प्रजा के लिये हितकर नहीं हो तो राजा को अपना हठ त्याग देना चाहिये।'

    - 'मेवाड़ में राजा और प्रजा अलग नहीं हैं कुंअरजू! जो राजा का हठ है, वही प्रजा का हठ है और जो प्रजा के लिये हितकर है, वही राजा के लिये भी हितकर है।'

    - 'आप तनिक शांत मस्तिष्क से विचार करें। आप भारत भर के राजाओं में सबसे बुद्धिमान, सबसे वीर और सबसे उत्तम राजा हैं। आपके जैसे महान् राजा की प्रजा अंतहीन संघर्ष का कष्ट उठाये यह उचित नहीं है।' मानसिंह ने महाराणा को उत्तेजित होते देखकर अपने शब्द बदले।

    - 'जब यह सम्पूर्ण संसार ही नश्वर है तो फिर कष्ट चिरस्थायी कैसे हो सकते हैं। एक न एक दिन उनका भी नाश होना ही है।'

    - 'किंतु किस मूल्य पर? जब मुगलों की सेना मेवाड़ भूमि को जलाकर राख कर देगी, तब यदि कष्ट नष्ट भी होंगे तो उनका क्या लाभ होगा?

    - 'मानसिंह।! मेवाड़ को जला कर राख कर देना आसान नहीं है। कोई प्रयास करके तो देखे।'

    - 'महाराणाजी! मैं नहीं चाहता कि कभी भी ऐसा हो किंतु आप कल्पना कीजिये कि जब मुगलों के लाख-लाख सैनिक मेवाड़ के चप्पे-चप्पे पर छा जायेंगे तब प्रजा के लिये कौनसी ठौर बचेगी?'

    - 'मेवाड़ की प्रजा म्लेच्छों की गुलामी करने के स्थान पर रणभूमि में मृत्यु का आलिंगन करना अधिक उचित समझेगी।'

    - 'शहंशाह अकबर ने आपसे मित्रता की अपेक्षा की है, न कि अधीनता की।'

    - 'मित्रता के नाम पर हिन्दुआनियों के डोले मुगल शहजादों को जायें, यह मित्रता नहीं है, अधीनता है, छल है, राष्ट्र का अपमान है।'

    महाराणा के उत्तर से मानसिंह का मुँह उतर गया। उसका वंश ही भारतवर्ष में पहला राजवंश था जिसने अपनी कुंअरि का डोला अकबर को देकर, इस कुचेष्टा का मार्ग प्रशस्त किया था। वह आगे कोई तर्क न करके गर्दन झुकाकर इतना ही बोला- 'मुगल आपसे कुंअरियों के डोले नहीं मांगेंगे।'

    महाराणा ने भी वातावरण को अत्यंत कटु हो आया देखकर इस विषय पर आगे बोलना उचित नहीं समझा। उसने विषय बदलते हुए कहा- 'कुंअरजू के सम्मान में उदयसागर की पाल पर भोजन का आयोजन किया गया है। आप कृपा कर वहीं पधारें। कुंअर अमरसिंह आपकी अगवानी करेंगे।'

    यह कहकर महाराणा उठ गया। उसके साथ ही समस्त सभासद भी उठ खड़े हुए। कुंअर अमरसिंह राजा मानसिंह को लेकर उदयसागर की पाल पर पहुँचा। मानसिंह के सम्मान में सचमुच ही भोजन का विशाल आयोजन किया गया था। मेवाड़ के समस्त सामंत और जागीरदार इस अवसर पर उपस्थित थे।

    राजा मानसिंह के सामने कांसे का बहुत बड़ा थाल रखा गया और उसमें विविध व्यंजन रखे गये। कुंअर अमरसिंह के लिये भी मानसिंह के सामने ही थाल लगाया गया था। जब अमरसिंह ने राजा मानसिंह को भोजन आरंभ करने का अनुरोध किया तो मानसिंह ने पूछा- 'क्या महाराणा भोजन नहीं करेंगे?'

    - 'महाराणाजू के पेट में दर्द है। इसलिये उन्होंने कहलवाया है कि मैं ही आपके साथ भोजन करूं।'

    पलक झपकते ही मानसिंह सारी स्थिति समझ गया। वह समझ गया कि महाराणा उसके साथ भोजन क्यों नहीं करना चाहता। अपमान से मानसिंह का चेहरा लाल हो गया और मारे क्रोध के उसकी साँस तेज-तेज चलने लगी। उसने अपनी म्यान में से कटार निकाली और उससे थाली उलटते हुए कहा- 'अब तो महाराणा के पेट की दवा लेकर आऊंगा तभी भोजन करूंगा।'

    मेवाड़ के सामंतों ने तलवारें खींच लीं। अमरसिंह ने उन्हें तलवारें म्यान में रखने का संकेत करते हुए मानसिंह से निवेदन किया- 'जैसी आपकी इच्छा कुंअरजू!'

    मानसिंह अपमान और क्रोध से तिलमिलाया हुआ चेहरा लिये हुए, डेरे से बाहर हो गया।

    जब मानसिंह बिना भोजन किये हुए ही जाने लगा तो महाराणा को सूचित किया गया। महाराणा ने उससे कहलवाया- 'यदि तुम अपनी सामर्थ्य से हमारे पेट दर्द की दवा लेकर आओगे तो हम मालपुरे में आपका स्वागत करेंगे और जो अपने फूफा अकब्बर के साथ आओगे तो जहाँ हमसे बन पड़ेगा, वहीं तुम्हारा सत्कार करेंगे।' मानसिंह एक बार फिर तिलमिला कर रह गया।

    महाराणा ने भोजन उठाकर कुत्तों को खिला दिया और तालाब के किनारे की मिट्टी खुदवाकर वहाँ गंगाजल छिड़कवाया।


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  • चित्रकूट का चातक - 33

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 33

    नववर्ष उत्सव

    आज के दरबार में बड़ी भीड़ थी। दरबारे आम में वैसे भी बड़ी भीड़ रहती है किंतु आज की भीड़ कुछ अलग किस्म की थी। आम दिनों में तो मांगने वालों और फरियादियों का तांता लगता है किंतु आज के दिन रियाया बादशाह को नये साल की मुबारिकबाद देने के लिये उपस्थित हुई थी।

    आज के दिन से हिन्दुओं के विक्रम संवत का 1638वां साल आरंभ हो रहा था। हर साल नये विक्रम पर इस तरह के विशेष दरबार का आयोजन नहीं होता था किंतु रियाया हर साल बादशाह को नये साल की मुबारिकबाद कहने आती थी इसलिये अकबर ने इस साल से नये साल का विशेष दरबार करना आरंभ किया।

    जब सारे मनसबदार, अमीर, उमराव और सरदार अपनी-अपनी पंक्ति में क्रमबद्ध खड़े हो गये तो बख्शी बादशाह को दरबार में लिवाकर लाया। अकबर ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित लोगों पर डाली। बादशाह की दृष्टि रहीम पर जाकर रुकी। रहीम ने बादशाह की इच्छा जानकर बादशाह और सभासदों को नववर्ष की बधाई देते हुए कहा -'जहाँपनाह! हिन्दुस्थान में नया साल आज के दिन से आरंभ होता है। इस मुबारक दिन की शुरूआत अच्छे कामों और अच्छी बातों से हो तो आज के दिन को यादगार बनाया जा सकता है।'

    - 'मिर्जाखाँ! आज के दिन तुम ही कोई इतनी अच्छी बात कहो जो हमें जीवन भर याद रहे।'

    - 'गरीबों और बेकसों पर रहम खाने वाले नेकदिल शंहशाह! आपका इकबाल युगों-युगों तक इस धरती पर बुलंद रहे। जहाँपनाह! आज धरती भर के बादशाहों में आपका प्रभुत्व सबसे बढ़ चढ़ कर है। आप सब प्रकार से सामर्थ्यवान हैं। प्रभुता आप पर फबती है किंतु आज के इस मुबारक दिन के उजाले में मेरा दिल कुछ और कहना चाहता है।'

    - 'तुम अपनी बात निश्चिंत होकर कह सकते हो मिर्जा!

    - 'जिल्ले इलाही! मेरा मन कहता है कि आदमी का प्रभुत्व वास्तव में ईश्वर का प्रभुत्व है। इसलिये वास्तव में प्रभुता ईश्वर को ही फबती है। उसके आगे बड़े से बड़ा बादशाह भी तुच्छ मनुष्य है। उस परम शक्तिशाली ईश्वर ने सब मनुष्यों को आजाद पैदा किया है तब फिर तुच्छ मनुष्य की क्या सामर्थ्य जो बादशाह होकर अपने ही जैसे मनुष्यों को गुलाम बनाये?'

    - 'तुम क्या कहना चाहते हो मिर्जा, खुलकर कहो।' रहीम की रहस्यमयी बात सुनकर अकबर के कान खड़े हो गये।

    - 'जहाँपनाह! बादशाही सिपाहियों, अमीरों, उमरावों तथा और भी जो ताकतवर लोग इस धरती पर हैं उन्होंने अपने ही जैसे लाखों आदमियों को जबर्दस्ती पकड़ कर गुलाम बना रखा है। जिस अल्लाह ने ताकतवर लोगों को बनाया है उसी परवरदिगार ने बेकस और मजलूम गुलामों को बनाया है। उन्हें जबर्दस्ती पकड़ना और उनसे बलपूर्वक गुलामी करवाना उचित नहीं है। क्यों नहीं आज नये साल के मुबारक दिन में हम अपने गुनाह कबूल करें और गुलामों को अल्लाह की इच्छा के मुताबिक आजाद कर दें।'

    मिर्जाखाँ की बात सुनकर बादशाह अचंभे के सागर में डूब गया। क्या ऐसा संभव है कि गुलामों को आजाद कर दिया जाये? हजारों साल से हमारे बाप-दादे गुलामों को पकड़ते आये हैं और उनसे अपनी सेवा करवाते आये हैं। यदि गुलाम न रहे तो हमारी सेवा टहल और नीच काम कौन करेगा?

    दरबारियों ने भी इस विचित्र बात को सुना तो वे अचंभे से जड़ हो गये। अकबर ने हिन्दू सरदार राजा टोडरमल की ओर देखा

    - 'जहाँपनाह! मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम बजा फर्माते हैं। इंसानों को जबर्दस्ती गुलाम बनाया जाना ठीक नहीं है। बात-बात पर गुलामों को कोड़े मारना, बात-बात पर उनकी खाल खिंचवा लेना, यह अमानवीय है तथा ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जान पड़ता है।'

    राजा टोडरमल ने कहा। - 'यदि गुलाम न रहे तो फिर सेवा, चाकरी और नीच टहल के काम कौन करेगा?' खानेजहाँ कोका ने ऐतराज किया।

    - 'यह काम स्वेच्छा से काम करने वाले सेवकों से करवाया जाये और इसके लिये उन्हें भृत्ति का भुगतान किया जाये।' राजा टोडरमल ने सुझाव दिया।

    - 'राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?' बादशाह ने बीरबल की ओर गर्दन घुमाई


    - 'जहाँपनाह..........! '

    - 'सम्राट अकबर की जय। राजा टोडरमल की जय। मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम की जय। राजा बीरबल की जय...........।'

    इससे पहले कि बीरबल कुछ जवाब देता, दरबारे आम में मौजूद सहस्रों लोगों की भीड़ बादशाह और उसके अमीरों की जय-जयकार बोलने लगी। राजा बीरबल ने मुस्कारकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

    - 'क्या किसी अमीर, उमराव, सरदार और राजा को इस सम्बंध में कुछ कहना है?' अकबर ने पूछा।

    परम्परा से गुलामों की निर्बाध सुविधा भोगने वाले तुर्क एवं मंगोल अमीरों को यह बात अच्छी नहीं लगी किंतु शहबाजखाँ का उदाहरण उनके सामने था। इस समय मिर्जाखाँ की इच्छा के विरुद्ध बोलने का एक ही अर्थ था और वह था बादशाह के कोप को आमंत्रण।

    जब कोई अमीर-उमराव कुछ नहीं बोला तो अकबर ने उसी क्षण ऐलान किया कि आज से उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति किसी को गुलाम नहीं बनायेगा। जो भी गुलाम इस समय जहाँ कहीं भी हैं वे मुक्त किये जाते हैं। वे अपने मर्जी के मुताबिक कहीं भी जाने को स्वतंत्र हैं। वे चाहें तो अपने वर्तमान मालिक के यहाँ चाकरी में रह सकते हैं लेकिन उनके मालिकों को उन्हें वेतन का भुगतान करना होगा। इस आदेश का उल्लंघन करने वाले सजा के हकदार होंगे।

    बीसियों हिन्दू सरदार, जागीरदार और मनसबदार उसी समय बादशाह अकबर, मिर्जा रहीम और राजा टोडरमल की जय-जयकार बोलने लगे। आम जनता ने भी उनके कण्ठ से कण्ठ मिलाया।

    नये साल के पहले दिन यह सचमुच एक बड़ा तोहफा था जो पूरे साढ़े तीन सौ साल बाद मिर्जा रहीम ने हिन्दुस्थान की प्रजा को दिलवाया था। कुतुबुदीन ऐबक ने 1193 ईस्वी में भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना की थी। वह स्वयं मुहम्मद गौरी का जेर खरीद गुलाम था। उसके शासन काल में हजारों हिन्दुओं को जबर्दस्ती पकड़ कर गुलाम बनाया गया था। तब से ही हिन्दुस्थान में यह परम्परा चली आ रही थी लेकिन आज हिन्दुस्थान के हजारों गरीब, बेकस और मायूस इंसानों की जिंदगी में आशा की नवीन किरण का संचार हुआ।

    आज का दिन रहीम का था। अभी उसका काम समाप्त नहीं हुआ था। उसने कहा- 'जहाँपनाह! इस मुबारक बादशाही इच्छा के लिये मैं आपको मुबारक देता हूँ लेकिन एक और अर्ज किया चाहता हूँ।'

    - 'कहो मिर्जाखाँ, अपने दिल की बात जरूर कहो। आज का दिन तुम्हारा है।'

    - 'हुजूर! अल्लाह ने मासूम पंछियों के सीने में मासूम दिल छुपाया है। इन मासूम दिलों में घाव करना अल्लाह के बंदों के लिये उचित नहीं है। इन मासूम परिंदों पर दया की जानी चाहिये।' रहीम ने निवेदन किया।

    - 'लेकिन हजारों आदमी चिड़ियों को पकड़ कर अपना रोजगार चलाते हैं। यदि परिंदों को मारने पर रोक लगाई गयी तो उन गरीब इंसानों का क्या होगा?' अकबर मिर्जाखाँ के सुझाव पर हैरान था।

    - 'परवर दिगार! इंसान बहुत छोटे लाभ के लिये बड़ा अपराध करता है। छोटे-छोटे जीव-जंतु, चिड़ियां और मछलियाँ इस प्रकृति की नियामत हैं, इनके वध पर रोक लगनी चाहिये।' मिर्जाखाँ अब भी अपनी बात पर अडिग था। अकबर ने फिर से राजा टोडरमल की ओर देखा।

    - 'जहाँपनाह! मिर्जाखाँ की बात सही है। आदमी अपना पेट भरने के लिये यदि बड़ा जानवर मारे तो एक जानवर से कई इंसानों का पेट भरेगा किंतु एक इंसान का पेट भरने के लिये जाने कितने छोटे-छोटे परिंदों की जान चली जाती है।'

    - 'लेकिन बड़े जानवर! वे भी तो अल्लाह के बनाये हुए हैं। जब छोटे जानवरों को मारना उचित नहीं है तो क्या बड़े जानवरों को मारना उचित है?' अकबर ने पूछा।

    - 'उचित तो उन्हें मारना भी नहीं है किंतु उन्हें मारने से पहले इंसान दस बार सोचता है और अत्यंत आवश्यक होने पर ही मारता है। जबकि निरीह परिंदों को तो वह बिना सोचे समझे, केवल अपने मौज, शौक और मनोरंजन के लिये मार डालता है।' राजा बीरबल ने जवाब दिया।

    - 'खानेजहाँ, आपका क्या विचार है?'

    - 'बादशाह की इच्छा ही सर्वोपरि है जिल्ले इलाही।' कोका ने सिर झुका कर जवाब दिया।

    - 'जब आप सबकी ऐसी ही इच्छा है तो हम आज के मुबारक दिन यह हुक्म देते हैं कि हमारे राज्य में बिना किसी कारण के किसी परिंदे और मछली आदि छोटे जीव को न मारा जाये। सब जीवों को अल्लाह की नियामत समझा जाये और अल्लाह का हुकुम मानकर उनकी रक्षा की जाये।' अकबर अपनी बात पूरी करके क्षण भर के लिये ठहरा।

    - 'आज के इस मुबारक मौके पर हम एक ऐलान और किया चाहते हैं।' सारे दरबार की निगाहें फिर से बादशाह की ओर घूम गयीं।

    - 'शहजादे सलीम के अतालीक का पद लम्बे समय से रिक्त है। हम बहुत दिनों से चिंतित थे कि शहजादे के योग्य अतालीक कहाँ से ढूंढ कर लायें। सौभाग्य से हमारे अपने दरबार में अत्यंत योग्य अतालीक मौजूद है किंतु हमारी निगाह उस ओर गयी ही नहीं। आज हम उसी योग्य और रहमदिल इंसान को अपने शहजादे का अतालीक मुकर्रर किया चाहते हैं।' अकबर ने फिर से अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

    कौन होगा शहजादे का नया अतालीक? समस्त दरबारियों की उत्सुक निगाहें अपने चारों ओर खड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों को खोजने लगीं।

    - 'जहाँपनाह! कौन वह सौभाग्यशाली है जिसे शहजादे का अतालीक मुकर्रर किया जाना तय किया गया है।'

    - 'मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम। वे हर तरह से इस कार्य के लिये उपयुक्त हैं। हम उन्हीं को शहजादे का नया अतालीक नियुक्त करते हैं। हमें भरोसा है कि मिर्जाखाँ के संरक्षण में शहजादे की उचित तालीम होगी और वह एक नेकदिल इंसान बन पायेगा।'

    मिर्जाखाँ बादशाह की इस आकस्मिक कृपा से अभिभूत था। उसके पास बादशाह का आभार ज्ञापित करने के लिये शब्द नहीं थे। इसी ऐलान के साथ नये साल का दरबार बर्खास्त हो गया। उस दिन आम रियाया, शिया अमीर और हिन्दू उमराव बादशाह अकबर, राजा टोडरमल और मिर्जाखाँ रहीम की जय जयकार बोलते हुए दरबार से निकले। चगताई, ईरानी और तूरानी सुन्नी अमीरों के चेहरों पर चिंता की नयी लकीरें उभर आयी थीं किंतु वे बादशाही कोप को गजबइलाही (ईश्वरीय प्रकोप) से कम नहीं समझते थे इसलिये चिंता की उन लकीरों को छुपा कर रखने में ही अपनी भलाई समझते थे।

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  • चित्रकूट का चातक - 34

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 34

    चित्रकूट की एक शाम

    वे तीनों असाधारण रूप से चुप थे और बड़ी देर से बिना कुछ बोले अपने कीमती और ऊँचे घोड़ों को मंथर गति से मंदाकिनी के किनारे-किनारे चलाये ले जा रहे थे। वनावली के सघन होने पर भी मार्ग बिल्कुल साफ था किंतु ऐसा लगता था कि नदी और अश्व अपनी-अपनी गति को एक दूसरे के अनुरूप बना कर गतिमान हो रहे थे। मंदाकिनी के निर्मल जल में किल्लोल करने वाली मछलियाँ और तट की बालुका पर चलने वाले अश्व एक दूसरे को भलीभांति देख सकते थे।

    वस्त्र एवं शस्त्र सज्जा से वे तीनों ही कोई उच्च राजपुरुष प्रतीत होते थे। तीनों के सिर पर मुगलिया राजशाही की प्रतीक एक जैसी पगड़ियाँ सुशोभित थीं जिनपर मूल्यवान मोहर और कलंगी जड़ी थी। तीनों राजपुरुषों की कमर में बड़ी-बड़ी तलवारें लटकी रही थीं जिनकी मूठों पर बहुमूल्य रत्न जड़े थे। उनकी पीठों पर सावधानी से बंधी ढालों में भी कीमती रत्नों की भरमार थी जिससे वे युद्ध में काम आने वाली वस्तु के स्थान पर सजावट की वस्तु अधिक प्रतीत होती थीं। इस साम्य के अतिरिक्त उन तीनों घुड़सवारों की शेष वेषभूषा आपस में मेल नहीं खाती थी।

    सबसे आगे चल रहा घुड़सवार कतिपय स्थूल और वर्तुलाकाय देह का स्वामी था। उसकी वय भी उसके साथियों में सर्वाधिक थी। वह प्रौढ़ावस्था को पार करके वानप्रस्थावस्था में प्रवेश करने को तैयार प्रतीत होता था। उसके माथे का गोल तिलक और देह के रेशमी वस्त्र उसके राजपुरुष होने की घोषणा तो करते थे किंतु चेहरे मोहरे से वह वह राजपुरुष न होकर कोई बड़ा सेठ साहूकर अधिक प्रतीत होता था। दूसरा घुड़सवार किसी प्रौढ़ वयस हिंदू नरेश जैसा दिखायी देता था। उसके माथे पर केसर-कुमकुम से शैव पद्धति का बड़ा सा तिलक अत्यंत सावधानी पूर्वक अंकित किया गया था जिसके मध्य में भस्म की क्षीण रेखा भी सुशोभित थी। तीसरा घुड़सवार लगभग पच्चीस वर्ष का कड़ियल जवान था। उसने मुगलिया नवाब की वेषभूषा धारण कर रखी थी। उसकी तीखी ठुड्डी और उस पर तरतीब से तराशी गयी तीखी दाढ़ी उसके तुर्क होने की परिचायक थी। उसकी छोटी और सतर्क आँखों से दर्प टपका ही पड़ता था जिसे सहन कर पाना हर किसी के वश का नहीं था।

    ये तीनों घुड़सवार आपस में घनिष्ठ मित्र थे और आज बहुत दिनों बाद साथ-साथ किसी ऐसी लम्बी यात्रा पर निकले थे जो किसी युद्ध के प्रयोजन से नहीं की जा रही थी। प्रयाग से सरैयों और उससे आगे सोनेपुर तक तो वे आपस में खूब बतियाते आये थे किंतु जैसे ही सरौही से कामदगिरि के दर्शन होने प्रारंभ हुए, तीनों ही मित्र असाधारण रूप से चुप हो गये थे तथा उनके घोड़ों की गति भी असाधारण रूप से धीमी हो गयी थी।

    सूर्यदेव पश्चिम की ओर झुक चले थे किंतु संध्या होने में अभी विलम्ब था। ये तीनों मित्र प्राकृतिक वनावली, मंदाकिनी के सानिध्य और कामद गिरि के दर्शनों का लाभ लेते हुए अंततः रामघाट पहुँच गये। यहाँ से वे अपने अश्वों से उतर पड़े। उन्होंने अपने अश्व मंदाकिनी के तट पर स्थित वृक्षों से बांध दिये और स्वयं नदी की रेती में उतर पड़े। अब उनका लक्ष्य सामने दिखायी देने वाली एक छोटी सी कुटिया थी जिसके बाहर तुलसी की झाड़ियां बहुतायत से विद्यमान थीं। इन झाड़ियों के चारों ओर नदी के वर्तुल प्रस्तरों से कलात्मक घेरे बने हुए थे।

    इन तीनों को अपनी ओर आता हुआ देखकर कुटिया में से एक प्रौढ़ वयस सन्यासी इनकी अगवानी के लिये बाहर आया। दोनों प्रौढ़ वयस राजपुरुष सन्यासी के पैरों में गिर पड़े। युवा खान अपरिचय के संकोच के कारण एक ओर खड़ा रहा।

    सन्यासी ने दोनों राजपुरुषों को उठा कर हृदय से लगाते हुए कहा- 'राजा टोडरमल! राजा मानसिंह! आप दोनों राजपुरुषों का इस अकिंचन की कुटिया में स्वागत है।'

    - 'गुसांईजी महाराज! रघुनाथजी ने हम पर बड़ी कृपा कीन्ही सो आपके दर्शन सुलभ हुए।' राजा टोडरमल ने हाथ जोड़कर सन्यासी की अभ्यर्थना करते हुए कहा।

    - 'रघुनाथजी के मन की दया को कौन जान सकता है! मुझे तो लगता है उन्होंने इस अकिंचन तुलसीदास पर कृपा करके आप जैसे दुर्लभ राजपुरुषों के दर्शन चित्रकूट में ही सुलभ करवा दिये। यह तो बताईये कि ये युवा सिपहसलार कौन हैं?'

    - 'ये खानखाना बैरामखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम हैं। आप बादशाह अकब्बर के मीर अर्ज हैं तथा शहजादे सलीम के शिक्षक भी। ये बहुत दिनों से आपसे मिलने को उत्सुक थे। आपके ही अनुरोध पर आज हम यहाँ आपके श्री चरणों में उपस्थित हो सके हैं।'

    - 'बहुत अच्छी बात की जो आप लोग इन्हें भी अपने साथ ले आये किंतु यह तो पता लगे कि ये मुझे कैसे जानते हैं और मुझसे क्यों भेंट किया चाहते हैं।'

    अब्दुर्रहीम ने किसी तरह हिम्मत जुटा कर कहा-

    'ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात।

    अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ।'


    खान के मुँह से इतना सुंदर दोहा सुनकर गुसांईंजी प्रसन्न हुए। उन्होंने हँस कर कहा-

    'उमा दारु जोषित की नाईं।

    सबहि नचावत राम गुसाईं।।'


    खान गुसांईंजी के पैरों में गिर पड़ा। उसने कहा-

    'जो रहीम तन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं।

    जल में जो छाया परी, काया भीजत नाहिं।'


    गुसांईंजी ने भाव विभोर होकर खान को धरती से उठाते हुए कहा-

    'तुलसी काया खेत है, मनसा भये किसान।

    पाप पुण्य दोऊ बीज हैं, बुवै सो लुणे निदान।'


    गुसांईजी की महती कृपा देखकर रहीम ने विह्वल होकर कहा-

    'तन रहीम है कर्म बस, मन राखो ओहि ओर।

    जल में उलटी नाव ज्यों, खैंचत गुन के जोर।।''


    गुसांईंजी ने रहीम को हृदय से लगा लिया तथा उसे अपने पास नारियल के पत्तों की चटाई पर बैठाते हुए कहा- 'और सुनाओ। कुछ ऐसा सुनाओ कि कानों को और सुख मिले।'

    - 'गुसांईंजी! मेरी ऐसी सामर्थ्य नहीं।' खान ने सहम कर कहा।

    - 'खानजू!' गुसांईंजी के नेत्रों में जल भर आया। गुसांईंजी की ऐसी विह्वलता देखकर रहीम गाने लगा-

    ''भज मन राम सियापति, रघुकुल ईस।

    दीनबंधु,  दुख  टारन,  कौसलधीस।

    भर नरहरि, नारायन, तजि बकवाद।

    प्रगटि खंभ ते राख्यो जिन प्रहलाद।

    गोरज धन बिच राखत, श्री ब्रजचंद।

    तिय दामिनि जिमि हेरत, प्रभा अमंद।।''
    (खानखाना कृत)

    गाते-गाते रहीम के नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसांईंजी के शरीर में भी रोमांच हो आया। उनकी रोमावली खड़ी हो गयी और आँखों के कोये आंसुओं से भीग गये। वे भी गाने लगे-

    ''राम राम रटु, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा।

    राम नाम नवनेह मेह को, मन! हठि होहि पपीहा।

    सब साधन फल कूप सरित सर, सागर सलिल निरासा।

    राम नाम रति स्वाति सुधा सुभ सीकर प्रेम पियासा।''


    गुसाईंजी चुप हुए तो रहीम ने गाया-

    ''तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारू चकोर।

    निसि बासर लागो रहै, कृष्णचंद की ओर।।''


    युगों-युगों से प्यासे चातक बहुत देर तक रघुनाथ कीर्तन का रसपान करते रहे। प्रौढ़ वयस राजपुरुष इस अद्भुत मिलन को देखकर रोमांचित थे। उन्हें इस बात का अनुमान तो था कि रहीम उत्कृष्ट कवि है किंतु वह इस उच्च कोटि का कृष्ण भक्त है, इसका ज्ञान उन्हें आज ही हुआ।

    बहुत देर तक कुटिया में आनंद रस बरसता रहा। पत्तियों के छिद्रों में से झांकते हुए सूर्यदेव अपनी गति भूल कर आकाश में थम ही गये। अचानक उन्हें अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ तो वे हड़बड़ा कर कामदगिरि की खोह में विश्राम करने के लिये प्रस्थान कर गये। सूर्य देव की इस हड़बड़ाहट के कारण अचानक ही अंधेरा हो गया। ठीक उसी समय शिष्यों ने आकर निवेदन किया- 'अतिथियों के लिये भोजन तैयार है।'

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  • चित्रकूट का चातक - 35

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 35

    प्रजापालन

    अतिथियों के भोजन के बाद चारों व्यक्ति तसल्ली से बैठे। किसी को किसी तरह की शीघ्रता न थी।

    - 'हमने सुना है कि राजाजी ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध बड़ी वीरता दिखायी।' गुसांईंजी ने मानसिंह की ओर देखते हुए कहा।

    गुसांईंजी के कथन से मानसिंह के मुख की आभा जाती रही, उसका कण्ठ सूख गया। वह कुछ नहीं बोल सका।

    - 'कहिये! क्या राणा ने अधीनता स्वीकार कर ली?' गुसाईंजी ने फिर प्रश्न किया।

    - 'नहीं! वे स्वाभिमानी हैं, वे जान दे देंगे किंतु पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे।'

    राजा मानसिंह ने किसी तरह प्रत्युत्तर दिया।

    - 'सुना है महाराणा ने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया!' गुसांईंजी ने फिर प्रश्न किया।

    - 'महाराणा ने वीरोचित व्यवहार ही किया है गुसांईंजी! दुर्भाग्य मेरा है, मैं ही उचित सत्कार के योग्य नहीं हूँ।'

    - 'अपने आप को उचित सत्कार के योग्य बनाओ राजाजी।'

    - 'मैं प्रयास करता हूँ किंतु यह मेरे बूते से बाहर की बात है।' - 'बूता तो रघुवीरजी देंगे। आप उनसे बूता मांग कर तो देखिये किंतु बूता मांगने से पहले बंधु के साथ विग्रह का भाव त्यागना होगा।'

    - 'मेरा उनसे कोई विग्रह नहीं। मैं तो कर्त्तव्य पालन के लिये ही उनके सामने हथियार उठाता हूँ।'

    - 'कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अकर्त्तव्य को ही कर्त्तव्य समझ बैठे हैं?'

    - 'मेरी तुच्छ बुद्धि मुझे कोई निर्णय नहीं करने देती।'

    - 'जो सहजता से उपलब्ध है, उसे स्वीकार कर लेने की लालसा हमें बुद्धि से काम ही नहीं करने देती।'

    - 'मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ गुसाईंजी।'

    - 'बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख है, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।'

    मानसिंह ने धरती पर माथा टिका दिया। उसके नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसाईंजी ने बड़े स्नेह से उसके माथे पर हाथ फिराया।

    - 'कहिये राजा टोडरमल! आपके राज्य में जनता सुख से तो है?' गुसाईंजी ने प्रौढ़ वयस स्थूलाकाय अतिथि को सम्बोधित करके पूछा।

    - 'राज्य शहंशाह अकब्बर का है महात्मन्। मैं तो उनका अकिंचन सेवक हूँ।' राजा टोडरमल ने सिर झुका कर उत्तर दिया।

    - 'राजा के मंत्री ही राजा की ओर से प्रजा का अनुशासन और उसकी सार-संभाल करते हैं। जिस राजा के सचिव, सहायक और सेवक प्रजा को दुख देते हैं, उस राजा का नाश हो जाता है और प्रजा पीड़ित होती है। आप राज्य के वित्त और अर्थ सचिव हैं। आपका उत्तरदायित्व तो सर्वाधिक है।'

    - 'सचिव के अधिकार की सीमा और अपनी सामर्थ्य भर तक तो मैं प्रजा पालन का प्रयास करता ही हूँ महात्मन्।'

    - 'इस समय भारत वर्ष की जनसंख्या कितनी है?'

    - 'सिंधु नदी से बंगाल के समुद्र तक तथा हिमालय से सेतुबंध रामेश्वरम् तक लगभग बारह करोड़ जन निवास करता है।'

    - 'उसमें से कितनी प्रजा मुगल साम्राज्य के अधीन है?'

    - 'लगभग दस करोड़ महात्मन्।'

    - 'मुगल साम्राज्य में मंत्रियों, सचिवों तथा उच्चाधिकारियों की संख्या कितनी है?'

    - 'कुल मिलाकर यही कोई आठ हजार मनसबदार होंगे।'

    - 'राजकीय कोश का कितना हिस्सा इन मनसबदारों में बँटता है?'

    - 'साम्राज्य की कुल आय का इकरानवे प्रतिशत इन मनसबदारों में बँट जाता है।

    - 'इन आठ हजार मनसबदारों में से सम्राट, राजपुत्रों तथा सचिवों आदि उच्च अधिकारियों की संख्या कितनी है?'

    - 'एक हजारी जात और उनसे ऊपर के मनसबदारों की संख्या चार सौ पैंतालीस है।'

    - 'उन पर राजकीय आय का कितना प्रतिशत व्यय होता है?'

    - 'यही कोई इकसठ प्रतिशत।'

    - 'सम्राट और राजपुत्रों की संख्या कितनी है?'

    - 'बादशाह तथा उसके शहजादों सहित प्रथम श्रेणी के कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों तथा रईसों की संख्या अड़सठ है।'

    - 'इनके ऊपर कितना खर्च होता है?'

    - 'लगभग सैंतीस प्रतिशत।'

    - 'शेष आय का क्या होता है?'

    - 'इसमें से अधिकांश राशि काजियों, उलेमाओं, खतीबों, मुहतसिबों, मुफ्तियों, सद्रों तथा तथा फकीरों में बँट जाती है।'

    - 'यह सारा धन आता कहाँ से है?'

    - 'प्रजा से विभिन्न प्रकार के करों के रूप में प्राप्त होता है।'

    - 'क्या इसके अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्राट अथवा उसके अधिकारियों के पास धन नहीं आता?'

    - 'युद्ध में लूटा गया धन बादशाह तथा उनके सैनिकों को प्राप्त होता है। उसे राजकीय कोष में जमा नहीं करवाया जाता। इसलिये उसका कोई हिसाब नहीं है।'

    - 'भारतवर्ष की जिस प्रजा से विपुल कर लेकर आप इतना धन एकत्र करते हैं, उसका कितना प्रतिशत प्रजा के हितार्थ व्यय किया जाता है?'

    - 'बादशाह, शहजादों तथा मनसबदारों को जो धन दिया जाता है, वह समस्त धन प्रजा के रक्षण हेतु सैन्य जुटाने में व्यय होता है।'

    - 'सम्राज्य विस्तार हेतु किया गया सैन्य व्यय प्रजा के रक्षण के लिये कैसे माना जा सकता है?'

    - 'प्रजा रक्षण एवं साम्राज्य विस्तार साथ-साथ ही चलते हैं प्रभु।'

    - 'जो सैन्य स्वयं ही प्रजा को लूटता फिरता हो, उनकी सम्पत्ति, गौ तथा स्त्रियों का हरण करता हो। उससे किस प्रकार के प्रजा रक्षण की अपेक्षा है आपको?' गुसाईंजी ने किंचित् रुष्ट होकर पूछा।

    राजा टोडर मल गुसाईंजी की खिन्नता देखकर सहम गया। उसके मुँह से कोई शब्द तक न निकल सका।

    - 'सत्य तो यह है राजाजी कि सम्राट, राजपुत्रों तथा सामंतों के भोग से बचा हुआ अधिशेष सैनिकों के सामने फैंका जाता है। इस उच्छिष्ट से सैनिकों का उदर नहीं भरता। उन्हें विवश होकर प्रजा में लूट मार करनी पड़ती है। इसमें आपका दोष नही है क्योंकि म्लेच्छ सम्राट के राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार यही है।'

    गुसाईंजी क्षण भर के लिये मौन रहे और फिर एक लम्बी साँस लेकर बोले-

    ''किसबी किसान कुल, बनिक भिखारी भाट,

    चाकर चपल नट, चोर, चार, चेटकी।

    पेट को पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,

    अरत गहन-गन, अहन अखेट की।

    ऊँचे नीचे करम धरम अधरम करि,

    पेट को ही पचत, बेचत बेटा बेटकी।

    तुलसी बुझाई एक राम घनश्याम ही तें,

    आग बड़वागि ते बड़ी है आग पेट की।

    दारिद दसानन दबाई, दुनी दीन बंधु।

    दुरित दहन देखि तुलसी हहा करी।''


    कुटिया में निस्तब्धता छा गयी। कुछ समय पश्चात् गुसांईजी ने ही मौन तोड़ा- 'आप लोग राज पुरुष हैं किंतु क्या इस सत्य से परिचित हैं कि आज प्रजा के मन में सत्ता के सत्य का अनुभव जितना गहरा है, उससे भी अधिक गहरा अनुभव सत्ता की व्यर्थता का है। किसान कारीगर, और सामान्य प्रजा भुखमरी अनिश्चय और सैन्य शोषण से त्रस्त है। सम्राट के पापों का दण्ड प्राकृतिक आपदाओं के रूप में फलित होता है। प्रजा दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करके किसी तरह अपने आप को जीवित रखे हुए है। बहुत से लोग घर बार छोड़कर योगियों, मुनियों, साधुओं, संतों, सिद्धों, तांत्रिकों तथा उदासीन तापसों के वेश धारण करके भिखारी बने हुए घूमते हैं। इनकी लूट पाट से त्रस्त प्रजा का विश्वास धर्म में से उठता जा रहा है। बड़ी संख्या में उत्पन्न पण्डों, पुरोहितों, पुजारियों और ज्योतिषियों ने भी प्रजा से धन ऐंठने के ना-ना उपाय ढूंढ निकाले हैं। लोगों की आस्था धर्माचारण से उठती जा रही है।

    कुटिया के बाहर रात गहराती जा रही थी और भीतर मौन।


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  • चित्रकूट का चातक - 36

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 36

    अयोग्य शिष्य

    कच्छवाहों की राजकुमारी जोधाबाई से निकाह करके अकबर ने उसे मरियम उज्जमानी नाम दिया और उसे शाह-बेगम घोषित किया। उससे उत्पन्न पुत्र सलीम का नामकरण सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर किया गया।

    सलीम का नामकरण भले ही सूफी संत के नाम पर किया गया था किंतु वह बहुत जिद्दी और क्रूर प्रवृत्ति का बालक था। उसकी शिक्षा के लिये कई शिक्षकों को नियुक्त किया गया किंतु वे इस दुष्ट बालक को नहीं पढ़ा सके। अंत में अकबर ने अब्दुर्रहीम को इस कार्य के लिये चुना।

    जब अब्दुर्रहीम को शहजादा सलीम का अतालीक बनाया गया तो उसने बादशाह का आभार जताने के लिये बड़ा भारी जलसा किया। बादशाह अपने तमाम अमीर-उमरावों और शहजादों सहित रहीम के डेरे पर हाजिर हुआ और दिल खोलकर मिर्जाखाँ की तारीफ में कसीदे पढ़े।

    अब्दुर्रहीम ने अकबर की इच्छानुसार जिद्दी बालक सलीम का समुचित शिक्षण प्रारंभ किया तथा बालक के शारीरिक, बौद्धिक एवं मानसिक विकास का हर संभव प्रयास किया किंतु सलीम भी शिक्षा के मामले में अपने बाप अकबर का ही अनुकरण करने वाला सिद्ध हुआ। जिस प्रकार हुमायूँ के लाख चाहने पर भी अकबर ने विधिवत् शिक्षा नहीं ली, उसी प्रकार सलीम भी पढ़ाई लिखाई से दूर ही रहा। भाग्य की यह विचित्र विडम्बना ही थी कि अकबर को बैरामखाँ जैसा और सलीम को अब्दुर्रहीम जैसा अद्भुत शिक्षक मिला किंतु वे अच्छी शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके।

    सलीम की अयोग्यता को देखकर अब्दुर्रहीम ने माथा पीट लिया किंतु फिर भी उसने किसी तरह सलीम को फारसी, तुर्की तथा हिन्दी भाषाओं का ज्ञान करवाया और हिन्दी तथा फारसी में कविता लिखना भी समझाया। उसे घुड़सवारी और तलवारबाजी का भी ज्ञान करवाया।

    जब सलीम पंद्रह साल का हुआ तो उसका विवाह कच्छवाहा राजकुमारी मानबाई से करवा दिया गया। इसके बाद तो सलीम का मन शिक्षा से पूरी तरह हट गया। उधर खानखाना भी मुगलिया सल्तनत का दक्षिण भारत में प्रसार करने में जुट गया तो उसके पास सलीम को पढ़ाने का समय न रहा।

    अब्दुर्रहीम के दूर हटते ही सलीम बुरे लोगों की संगत में पड़ गया और उसने अब्दुर्रहीम की शिक्षाओं को भुलाकर एक क्रूर इंसान का रूप ले लिया। उसके हरम में स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी जो शीघ्र ही आठ सौ तक जा पहुँची। दिन भर हिंजड़े, गवैये और नचकैये सलीम के हरम में धमाल मचाये रहते। सलीम इनके साथ दिन-रात शराब पीता और शिकार खेलने जाता। नियति ने भारत वर्ष के साथ कैसा क्रूर मजाक किया था, इस संस्कारहीन, अमर्यादित शराबी के भाग्य में विधाता ने भारत का भाग्य विधाता होने के अंक लिखे थे।

    कविता का व्याकरण

    शहजादे का अतालीक मुकर्रर किये जाने से अब्दुर्रहीम के रुतबे और ख्याति में एकाएक ही बहुत वृद्धि हुई। अब्दुर्रहीम की विद्वता की ख्याति सुनकर उसके दरबार में दुनिया भर के लोग जुटने लगे जिनमें कवियों की संख्या सर्वाधिक थी। हिन्दुस्थान, ईरान, तूरान तथा ख्वारिज्म के लगभग तीन सौ कवि निरंतर उसके दरबार में उपस्थित रहते। अब्दुर्रहीम स्वयं भी तुर्की, फारसी, अरबी, हिन्दी, संस्कृत अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं का जानकार था। उसने ग्यारह वर्ष की आयु में बिना गुरु की सहायता से पहली काव्य रचना की थी तब से उसकी कविता में निखार आता ही गया था। अकबर ने फ्रांस और यूरोपीय देशों से पत्राचार करने का जिम्मा रहीम पर ही छोड़ रखा था जिससे उन देशों के लोग भी जब रहीम से मिलने आते तो रहीम को खुश करने के लिये अपने देश के कवियों की कवितायें सुनाया करते।

    वास्तव में उन दिनों अकबर के दरबार तक पहुँचने का मार्ग अब्दुर्रहीम के दरबार से होकर गुजरता था। उस काल में शासक वर्ग के पास बज्म (आमोद-प्रमोद) और रज्म (युद्ध) को छोड़कर और कोई काम न था। इसलिये कविगण भी अधिकतर अपने आकाओं को खुश करने वाली, स्त्रियों के अंग लास्य का वर्णनातीत वर्णन करने वाली तथा हर तरह से अपने स्वामियों का मनोरंजन करने वाली कवितायें ही अधिक कहते थे। दर्शन और नीति से रहित उन कविताओं में चाटुकारिता का ही भाव अधिक होता था।

    इन बेस्वाद कविताओं का व्याकरण रहीम के मन को किंचित् भी रास नहीं आता था और कभी-कभी तो उसका मन दरबारी व्याकरण वाली कविताओं से पूरी तरह से उचाट हो जाता था फिर भी यदि रहीम को कवियों के बीच बैठना सुहाता था तो केवल इसलिये कि रहीम को पूरा विश्वास था कि यदि धरती से खून-खराबे का दौर कभी समाप्त होगा तो इन्हीं कवियों के दम पर। उन दिनों बहादुरी दिखाने वाले और दान देने वाले तो फिर भी मिल जाते थे किंतु कवियों और कविताओं का सम्मान करने वालों का पूरी तरह अभाव था।

    चाटुकार कवियों के साथ-साथ गंग, केशवदास (ये महाकवि बिहारी के पिता थे।) मंडन तथा चामुंडराय जैसे कविता के वास्तविक मर्म को जानने वाले कवि भी रहीम के दरबार में आने लगे थे। इन कवियों की कृपा से रहीम के पुस्तकालय में पूरी दुनिया के कवियों की कविताओं का संग्रह होने लगा था जिनकी नकलें उतारने और संभाल कर धरने के लिये तीन सौ से अधिक आदमी रहीम के पुस्तकालय में लगे रहते थे। रहीम का पुस्तकालय उस समय हिन्दुस्थान का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। कवियों के साथ चित्रकारों, गवैयों और संगीतकारों का भी अच्छा जमावड़ा होने लगा था।

    वस्तुतः इन सब उपायों से रहीम ने अपने समय की मुख्य धारा को ही बदल दिया। वह समय धरती का सबसे बड़ा तोपखाना खड़ा करने, हाथियों की सबसे बड़ी फौज संगठित करने, राज्य सीमाओं का विस्तार करने और निर्दोषों का खून बहाने की मिसालें कायम करने का था किंतु रहीम ने भारत का सबसे बड़ा कवि दरबार जोड़कर, सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित कर और गवैयों तथा चित्रकारों को प्रश्रय देकर अपने बाप दादों का पुराना ढर्रा ही बदल दिया था। इस तरह वह स्वयं एक आदमी न रहकर सांस्कृतिक प्रतिष्ठान बन गया था।

    इन सबसे अलग और बड़ी बात तो यह थी कि वह अपने दरबार के समस्त कवियों से अलग था और उसने अपना सुर उस समय की कवि परम्पराओं से न मिलाकर धूल, गरीबी और मुसीबतों में लिपटे गाँवों की गलियों में भटकने वाले कवियों और गवैयों से मिलाया। उसकी कविता में गरीब के आँसू थे जिनका व्याकरण अभावों और मुसीबतों में गढ़ा गया था।

    जुआ

    गुजरात के सुलतान मुजफ्फरखाँ को बादशाह अकबर कैद करके अपने साथ आगरा ले आया था किंतु कुछ दिनों बाद ही वह अकबर के नमक हराम नौकरों को अपनी और मिलाकर कैद से भाग निकलने में सफल हो गया और फिर से बड़ी भारी फौज एकत्र करके उसने लगभग पूरे गुजरात पर दखल जमा लिया। अहमदाबाद में बैठकर मुजफ्फरखाँ ने मुल्क में अपने नाम की दुहाई फेर दी। इससे अकबर की बड़ी किरकिरी हुई।

    दुबारा मुजफ्फरखाँ के पीछे जाना अकबर अपनी शान के खिलाफ समझता था। एक से एक बड़ा सेनापति अकबर की सेवा में हाजिर था किंतु वह इस मोर्चे पर किसी विश्वसनीय आदमी को ही भेजना चाहता था। बहुत सोच विचार करने के बाद अकबर ने मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम को यह जिम्मा सौंपा। रहीम के साथ दस हजार सैनिकों की फौज भेजी गयी।

    जब रहीम यह फौज लेकर मेड़ता के पास पहुंचा तो मुजफ्फरखाँ ने पट्टन में टिके हुए मुगल सेनापति कुतुबुद्दीन को मार डाला और आगे बढ़कर भंड़ूचमें भी भारी तबाही मचाई। अब्दुर्रहीम ताबड़तोड़ चलता हुआ पाटन पहुँचा। वहाँ पहुंचकर उसका उत्साह ठण्डा पड़ गया। उसे ज्ञात हुआ कि इस समय मुजफ्फरखाँ के पास चालीस हजार घुड़सवार और एक लाख पैदल सेना है।

    भाग्य रहीम को एक बार फिर से आगरा से गुजरात खींच ले आया था और बहुत दूर से कबड्डी दे रहा था। यह वही गुजरात था जो पहले भी दो बार रहीम का जीवन पूरी तरह से बदल चुका था। रहीम को लगा कि इस बार की चुनौती पहले की तमाम चुनौतियों से किसी भी तरह कम विषम नहीं थी। इस चुनौती को जीत पाना आसान नहीं था, चारों ओर मौत का ही सामान सजा हुआ था।

    अब्दुर्रहीम के दस हजार सैनिक तो मुजफ्फरखाँ के अजगर रूपी सैन्य के मुँह में मेमने की तरह पिस कर मरने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते थे। मिर्जाखाँ रहीम को उसके आदमियों ने सलाह दी कि मालवा से मुगल लश्कर मंगवा लिया जाये तभी मुजफ्फरखाँ पर हाथ डाला जाये। इस पर मिर्जाखाँ के मंत्री दौलतखाँ लोदी ने रहीम को गुप्त सलाह दी कि यदि वह अपने पिता की तरह भाग्य पलटना चाहता है तो बड़ा खतरा मोल ले। मालवा की सेना के आने पर युद्ध जीता गया तो उसका श्रेय अकेले रहीम को नहीं मिलेगा। उसमें दूसरे सेनापतियोंका हिस्सा होगा।

    मिर्जाखाँ को अपने मंत्री की बात जंच गयी और वह अपने दस हजार आदमियों के दम पर ही इस लड़ाई को जीतने की तैयारी करने लगा। उसने अपनी सेना के सात टुकड़े किये और उन्हें इस तरह समायोजित किया जिससे जरूरत पड़ने पर इन अंगों को आसानी से जोड़ा एवं अलग किया जा सके। स्वयं इस लश्कर के केंन्द्र में स्थित रहकर उसने हिन्दू राजाओं को अपने बांयी ओर तथा मुस्लिम सेनापतियों को दांयी ओर रखा। इसके बाद उसने गुजरात की ओर प्रस्थान किया।

    जब मुजफ्फरखाँ को ज्ञात हुआ कि अब्दुर्रहीम सात सेनाएं लेकर आ रहा है तो वह अहमदाबाद में आ टिका और अब्दुर्रहीम की प्रतीक्षा करने लगा। अब्दुर्रहीम अहमदाबाद के बाहर मानपुर में आकर ठहर गया। दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे की वास्तविक ताकत को तोलने में लग गयीं।

    इसी बीच रहीम ने एक नाटक खेला। उसने अपने कुछ विश्वस्त आदमियों को एक नकली फरमान बादशाह की ओर से बनाकर दिया और उन्हें चुपचाप आगरा की तरफ कुछ दूर चले जाने को कहा। फिर रहीम खुद ही बहुत सारे आदमी अपने साथ लेकर उनके पीछे गया और गाजे बाजे के साथ उन्हें अगवानी करके लौटा लाया। रहीम के नौकरों ने निर्धारित योजना के अनुसार बादशाह का नकली फरमान रहीम की सेवा में पेश किया।

    सारी सेना के बीच यह नकली फरमान जोर-जोर से पढ़कर सुनाया गया। इस फरमान में बादशाह ने लिखा था कि हम आते हैं, हमारे पहुँचने तक लड़ाई मत करना।

    यह फरमान सुनकर सारी सेना मारे प्रसन्नता के नाच उठी तथा उत्साह में भर कर सरखेज की तरफ आगे बढ़ गयी और अहमदाबाद के बाहर साबरमती के तट पर जाकर टिक गयी, जिस तरफ मुजफ्फरखाँ की फौज पड़ाव किये हुए थी। मुजफ्फरखाँ ने यह सुनकर कि बादशाह स्वयं फौज लेकर आ रहा है, बादशाह के आने से पहले से ही रहीम की सेना को नष्ट करने का विचार किया। उसने काफी दूर जाकर नदी पार करने तथा रहीम की सेना पर पीछे से वार करने की योजना बनायी। इस पर रहीम ने राय दुर्गा को मुजफ्फरखाँ की सेना को पीछे से रोकने के लिये नियुक्त किया और जब मुजफ्फरखाँ की आधी सेना नदी पार करने के लिये आगे बढ़ गयी तब रहीम अपनी बाकी की छः सेनाओं को लेकर मुजफ्फरखाँ पर जा चढ़ा। इससे मुजफ्फरखाँ की सेना में भ्रम फैल गया तथा सेना के दो टुकड़े हो गये।

    दिन चढ़े तक लड़ाई होती रही। भयानक मारकाट मची जिसमें अब्दुर्रहीम के ठीक सामने ढाल की तरह अड़े हुए सैनिकों का पूरी तरह चूरा हो गया। हरावल और एलतमश के पैर टूट जाने पर अब्दुर्रहीम की जान पर बन आयी। उसके आस-पास केवल एक सौ हाथी और तीन सौ घुड़सवार रह गये। मुजफ्फरखाँ इनके ठीक सामने अपने सात हजार सैनिकों के साथ जमा हुआ था। रहीम को इस विपन्न अवस्था में देखकर वह आगे बढ़ा। पक्के जुआरी की तरह रहीम इस स्थिति से निबटने के लिये पहले से ही तैयारी कर चुका था। उसने महावतों को आदेश दिया कि बिना कुछ भी देखे हुए जितनी तेजी से हो सके, उतनी तेजी से अपने हाथियों को आगे की ओर हूलते रहें और जहाँ तक हो सके ज्यादा से ज्यादा संख्या में दुश्मन के सैनिकों को रौंदते रहें।

    दुश्मन ठीक छाती पर चढ़ आया। जिस प्रकार समंदर की लहरों को गिन सकना संभव नहीं है उसी प्रकार इस दुश्मन से भी पार पाना संभव जान नहीं पड़ता था किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था। दांव खेला जा चुका था। अब तो केवल परिणाम ही जानना शेष था। एक बार तो ऐसी नौबत आयी कि मिर्जाखाँ के आदमियों ने मिर्जाखाँ के घोड़े की लगाम पकड़ ली और उसे जबर्दस्ती खींचकर मैदान से बाहर ले जाने लगे।

    मिर्जाखाँ को रणक्षेत्र से बाहर खींच ले जाने का प्रयास करने वाले उसके शुभचिंतक सैनिक नहीं जानते थे कि मिर्जाखाँ आज सेनापति नहीं था, जुआरी था, जिसने पराये हाथों में थमे पासों पर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। हर हालत में उसे खेलना ही अभीष्ट था, पक्के जुआरी की तरह, हारे चाहे जीते। उसने सैनिकों के हाथ से अपने घोड़े की रास छुड़ा ली और घोड़े को ऐंड़ लगाकर तेजी से आगे बढ़ गया।

    ठीक उसी समय रहीम की युक्ति काम कर गयी। रहीम के हाथियों ने मुजफ्फरखाँ की सेना को कुचल कर रख दिया। मुजफ्फरखाँ का तोपखाना आगे वाली सेना ले जा चुकी थी, बची हुई सेना हाथियों को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुई। फतह हासिल करने का वक्त आ पहुंचा था। रहीम और उसके आदमी दुगने जोश से तलवार चलाने लगे।

    यह विशुद्ध जुआ था जो मिर्जाखाँ ने भाग्योत्थान के लालच में खेला था। इसका परिणाम कुछ भी हो सकता था। भाग्यलक्ष्मी उस पर रीझी हुई थी, उसने मिर्जाखाँ के पक्ष में जीत का नया पन्ना लिख दिया। मुजफ्फरखाँ मात खाकर राजमहेन्द्र की ओर भागा।

    भागते हुए सैनिकों का पीछा करने के बजाय रहीम पलट कर खड़ा हो गया और नदी पार करके आने वाली मुजफ्फरखाँ की अग्रिम सेना की प्रतीक्षा करने लगा।

    उधर जब मुजफ्फरखाँ की अग्रिम सेना ने नदी पार की, तब उसे समाचार मिला कि मुजफ्फरखाँ परास्त होकर राज महेंद्र की ओर भाग गया है तब वह सेना भी आगे बढ़ने के बजाय फिर से नदी पार करके भाग खड़ी हुई। राय दुर्गा प्रतीक्षा ही करता रह गया।

    विजय की प्रसन्नता में रहीम ने अपने बचे खुचे सैनिकों को इकठ्ठा किया और अपना सर्वस्व उनमें बाँट दिया। आखिर में एक सिपाही मिर्जाखाँ की सेवा में हाजिर हुआ। उसे कुछ नहीं मिला था लेकिन तब तक रहीम का सर्वस्व बँट चुका था। मिर्जाखाँ ने अपने डेरे में निगाह घुमाई, वहाँ एक कलमदान के अतिरिक्त कुछ न रह गया था। रहीम ने सिपाही को कलमदान देकर कहा कि आज तो यही ले जाओ मौका आने पर, इस कलमदान के बदले में जो जी चाहे ले जाना।

    जब मिर्जाखाँ की जीत का समाचार आगरा पहुँचा तो अकबर ने मिर्जाखाँ का को खानखाना का खिताब, एक भारी खिलअत तथा पाँच हजारी मनसब बख्शा और रहीम के आदमियों के भी मनसब बढ़ाये।


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  • चित्रकूट का चातक - 37

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 37

    नोपकृतं

    गुजरात विजय के उपलक्ष्य में खानखाना बनाये जाने पर अब्दुर्रहीम दिल्ली दरबार में उपस्थित हुआ और उसने बादशाह के प्रति आभार का प्रदर्शन किया। बादशाह ने उसकी सेवाओं की प्रशंसा की और उसे फिर से मोर्चे पर लौट जाने के आदेश दिये।

    अब्दुर्रहीम को खानखाना बनाये जाने के उपलक्ष्य में अब्दुर्रहीम के महलों में भारी उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर अमीरों, उमरावों और हिन्दू नरेशों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कवि, गवैये और चित्रकार भी उपस्थित हुए। दिल्ली में इस समारोह की धूम मच गयी।

    वैसे भी नये, पुराने, अनाड़ी और मंजे हुए कवि अब्दुर्रहीम के समक्ष आने के लिये हर समय उत्सुक रहते थे तथा उसेे अपनी कविताएं सुनाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। वे अपनी कविताएं रहीम को सुनाते और अब्दुर्रहीम से प्रशंसा तथा पुरस्कार पाकर अपनी उन्नति का मार्ग खोलने की चेष्टा करते थे। इस अवसर पर जगन्नाथ त्रिशूली ने एक श्लोक रहीम के दरबार में उपस्थित कवियों के सामने सुनाया-

    प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु, मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

    नापकृतं नोपकृतमं न सत्कृतं कि कृत तेन।।


    अर्थात्- जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का (क्रमशः) अपकार, उपकार और सत्कार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

    दरबार में उपस्थित कवियों ने युवा कवि जगन्नाथ की बड़ी प्रशंसा की लेकिन रहीम कुछ चिंतत हो गये।

    - 'क्या बात है, खानखाना को श्लोक ठीक नहीं लगा?' युवा कवि ने सहमते हुए पूछा।

    - 'श्लोक बहुत सुंदर है किंतु कवि यदि अनुमति दे तो मैं इसमें कुछ संशोधन करना चाहता हूँ।' अब्दुर्रहीम ने कहा।

    - 'यदि खानखाना स्वयं मेरी कविता में सुधार करेंगे तो यह मेरा सौभाग्य होगा।' जगन्नाथ त्रिशूली ने कहा।

    - 'तो फिर इस श्लोक को इस तरह पढ़ो कवि-

    प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु, मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

    नोपकृतं नोपकृतं  नोपकृतं कि कृतं तेन।।


    अर्थात्- जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का क्रमशः उपकार, उपकार और उपकार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

    बनी के राना

    - 'अब्बा हुजूर, फिर क्या हुआ?' जाना ने पिता के कंधे पर मुक्का मारा।

    - 'अरे कब क्या हुआ?' खानखाना ने पूछा।

    - 'अरे कल जो कहानी आप हमें सुना रहे थे, उसमें आगे क्या हुआ?'

    - 'हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे?'

    - 'हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे? इतना भी याद नहीं रहता?' जाना ने पिता की नकल उतारते हुए कहा।

    - 'हाँ भई! नहीं रहता।'

    - 'अरे वो जंगल के सेर वाली।'

    - 'सेर नहीं शेर।'

    - 'लेकिन आप ही ने तो कल सेर बोला था।'

    - 'अरे वह तो कविता में ऐसे कह सकते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि शेर हमेशा के लिये सेर हो जायेगा।'

    - 'अच्छा अब्बा हुजूर! अब मैं शेर ही बोलूंगी, सेर नहीं। आप आगे की कहानी तो सुनाइये।'

    - 'हाँ तो कल हम कहाँ थे?'

    - 'हम तो यहीं थे, अपने डेरे में।'

    - 'डेरे में तो थे किंतु कहानी में कहाँ थे?'

    - इसे क्या मालूम, ये तो सो गयी थी।' ऐरेच ने कहा।

    - नहीं! मैं सोयी नहीं थी, मुझे सब याद है।

    - अच्छा बताओ तो तुम्हें क्या याद है?'

    - 'आप ने कहा था कि जब सियार ने जुलाहे को कंधे पर कपास धुनने का धुना और हाथ में कमानी लेकर जाते हुए देखा तो सियार ने सोचा कि यह कोई शिकारी है और शिकार मारने के लिये जंगल में आ रहा है। सियार ने सोचा कि यह कहीं मुझ पर ही तीर न मार दे इसलिये खुशामद से इसको खुश किया जाये।'

    - 'हाँ-हाँ! मैंने कल यहाँ तक ही कहानी सुनायी थी कि मियाँ फहीम आ गये थे हमें शिकार पर ले जाने के लिये।'

    - 'अब्बा हुजूर! ये खुशामद क्या होता है?'

    - 'जब किसी को प्रसन्न करने के लिये झूठी सच्ची तारीफ की जाती है तो उसे खुशामद कहते हैं। जैसे हम तुम्हारी खुशामद करते रहते हैं।' खानखाना ने बेटी के गाल पर चपत लगाते हुए कहा।

    - 'अब्बा हुजूर! ये जाना तो बस बोलती ही रहती है। आप कहानी सुनाईये ना।' दाराब ने मचल कर कहा।

    - 'अब्बा हुजूर! सियार ने जुलाहे की खुशामद कैसे की?' जाना ने अपनी नन्हीं हथेलियों से खानखाना का सिर अपनी ओर मोड़ते हुए कहा। वह नहीं चाहती थी कि पिता भाई की ओर देखे।

    - 'तू बीच-बीच में सवाल मत पूछ।' ऐरच ने जाना को धमकाया।

    - 'यदि तुम सब चुप होकर बैठोगे तो ही तो मैं कहानी सुना पाऊंगा ना!' खानखाना ने कहा।

    - 'अच्छा हम सब चुप होकर बैठते हैं।' कारन ने सब बच्चों को चुप रहने का संकेत किया।

    - 'सियार ने सोचा कि यदि मैं इस शिकारी को दिल्ली का राजा कहूंगा तो यह मुझसे बड़ा राजी होगा और मुझे नहीं मारेगा। इसलिये उसने बड़ी मीठी आवाज में कहा-

    ''कांधे धनुष हाथ में बाना। कहाँ चले दिल्ली पतराना।''

    जुलाहा पहली बार जंगल से गुजर रहा था। उसने सुना था कि जंगल में भयानक शेर रहते हैं जो आदमी को खा जाते हैं लेकिन उसने कभी भी शेर को देखा नहीं था। सियार को देखकर उसने सोचा कि हो न हो, यही शेर है। जुलाहा डर गया और उससे बचने का उपाय सोचने लगा। उसने सोचा कि बड़ा आदमी बड़ी बात ही सोचता है। यह खुद राजा है इसलिये मुझे भी राजा ही समझता है। यदि मैं इसे जंगल का राणा कहकर इसकी प्रशंसा करूं तो यह अवश्य ही मुझे छोड़ देगा। इसलिये जुलाहे ने कहा-

    ''तुम जंगल के सेर बनी के राना। बड़ेन की चाल बड़ेन पहचाना।''

    - 'फिर क्या हुआ?'

    - 'फिर क्या होना था, दोनों ने एक दूसरे की झूठी तारीफ की, दोनों ही एक दूसरे से डरते रहे और दोनों ही एक दूसरे को क्षमा करके अपने-अपने रास्ते चल दिये।

    - 'फिर क्या हुआ?'

    - 'फिर कुछ नहीं हुआ, खेल खतम, पैसा हजम।'

    - 'अब्बा हुजूर! हमें भी एक दिन शिकार मारने के लिये ले चलिये ना।' जाना ने कहा।

    - 'तू तो लड़की है। तू कैसे शिकार मारेगी! मैं लड़का हूँ, मैं अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊंगा।' ऐरच ने कहा।

    - 'मैं भी तो लड़का हूँ, मैं भी अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊँगा।' दाराब ने कहा।

    - 'नहीं लड़की होने से क्या होता है, मैं जरूर ही शिकार मारने जाऊँगी।' जाना ने कहा।

    - 'अच्छा-अच्छा। झगड़ो मत। तुम सब कल शिकार मारने चलना। तुम्हारी अम्मी को भी ले चलेंगे।' खानखाना ने बच्चों का फैसला करते हुए कहा।

    अहेर

    अरावली की सघन उपत्यकाओं में एक आदमी तेजी से भागा चला जा रहा था किंतु हाथ में गाय का रस्सा पकड़े हुए होने से उसकी गति तेज नहीं हो पाती थी। उसकी छोटी कटी हुई दाढ़ी तथा वेशभूषा से ज्ञात होता था कि वह कसाई है। कुछ लोग हाथों में लम्बी तलवार लेकर उसका पीछा कर रहे थे। उनकी वेशभूषा स्थानीय राजपूतों जैसी थी। कसाई, अपने पीछे आने वाले मनुष्यों के भय से ऐसे कठिन मार्ग का अनुसरण कर रहा था जिस मार्ग पर घोड़े आदि किसी सवारी पर बैठकर निकल पाना संभव नहीं था। इससे उसके कपड़े काँटों में उलझ कर तार-तार हो गये थे।

    जब गाय को लेकर भागने वाला कसाई किसी तरह पकड़ में न आया तो पीछा करने वाले मनुष्य तीन दिशाओं में इस प्रकार बिखर गये जिससे कि कसाई को किसी संकरे स्थान में घेरा जा सके। काफी देर की भाग दौड़ के बाद अंततः कसाई पकड़ा गया। पीछा करने वाले आदमियों ने तलवार के एक ही वार से गाय की रस्सी काट दी। गाय रस्सी कटते ही भाग खड़ी हुई।

    गाय के भाग जाने से क्रुद्ध होकर कसाई छुरा निकाल कर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर टूट पड़ा। उसका यह दुस्साहस देखकर पीछा करने वाले राजपूतों ने अपनी तलवारें उसकी छाती पर टिका दी। इससे पहले कि उनमें कुछ संवाद हो पाता। जाने कहाँ से एक खान अचानक प्रकट हुआ और राजपूतों को ललकारने लगा।

    - 'एक अकेले आदमी को इस तरह जंगल में घेरकर वध करने में तुम्हें लज्जा नहीं आती?' खान ने दूर से चिल्लाकर कहा।

    - 'पापी का वध करने में कैसी लज्जा?' एक राजपूत ने सचमुच ही उसका वध करने की नीयत से अपनी तलवार आकाश में घुमाई।

    - 'मैं कहता हूँ कि ठहर जा। अन्यथा अपनी जान से हाथ धोएगा।' खान ने तलवार घुमाने वाले इंसान को चेतावनी दी। अब वह इन लोगों के काफी निकट आ गया था।

    - 'मुझे आदेश देने वाला तू कौन होता है?' राजपूत ने अपनी तलवार खान की ओर घुमाते हुए कहा।

    - 'मैं कौन होता हूँ यह तो तुझे ज्ञात हो ही जायेगा फिलहाल तो तू मेरी तलवार का वार संभाल।' खान ने हवा में तलवार घुमाकर राजपूत पर भरपूर वार किया। राजपूत इस अप्रत्याशित हमले के लिये तैयार नहीं था। वह कंधा पीछे करके किसी तरह बचा।

    देखते ही देखते घमासान मच गया। अपनी परम्परा के मुताबिक एक राजपूत खान से दो-दो हाथ करने लगा। बाकी के तीनों राजपूत इन्हें देखने के लिये खड़े हो गये। राजपूतों को खान के साथ उलझा हुआ देखकर कसाई मौका पाकर भाग खड़ा हुआ। राजपूत कड़ियल जवान था तो खान भी उससे कम बलिष्ठ नहीं था। दोनों ही तलवार के खिलाड़ी जान पड़ते थे। थोड़ी देर बाद खान हाँफने लगा। वह भुजा पर राजपूत की तलवार का वार भी खा बैठा। वार बचाने के लिये जैसे ही खान जमीन पर झुका, राजपूत ने उसे लात मार कर जमीन पर गिरा दिया और फुर्ती से खान की छाती पर चढ़ बैठा।

    - 'अब बोल क्या कहता है?' राजपूत ने तलवार की नोक खान की छाती में चुभाते हुए पूछा। खान चुपचाप जमीन पर पड़ा रहा। उसकी भुजा और छाती में इतनी जोर का दर्द हो रहा था कि उससे बोलते नहीं बन पड़ रहा था।

    - 'सरदार इस खान का क्या किया जाये?' खान की छाती पर बैठै युवक ने अपने प्रौढ़ साथी की तरफ देखकर पूछा।

    - 'इसीसे पूछ। क्यों बीच में पड़ा था यह?'

    - 'तुम चार आदमी मिलकर एक आदमी को मार रहे थे इसी से मैं बीच में पड़ा।

    - 'किस अधिकार से?'

    - 'तलवार के अधिकार से।'

    - 'तू क्या राव उदयसिंह है, जो तू सिरोही राज्य में तलवार का अधिकारी हो गया।' (यह सिरोही राज्य का तत्कालीन राजा था। इस घटना के विवरण के साथ स्थान का उल्लेख किसी भी तत्कालीन ग्रंथ में नहीं मिलता किंतु ऐसा अनुमान होता है कि यह घटना सिरोही राज्य में घटित हुई होगी।)

    - 'तेरा राव उदयसिंह मेरा मातहत है।'

    - 'तो तू दिल्लीधीश्वर है?' प्रौढ़ राजपूत ने व्यंग्य पूर्वक कहा।

    - 'मैं दिल्लीधीश्वर अकबर का सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम हूँ।'

    - 'कौन अब्दुर्रहीम? क्या खानखाना बैरामखाँ का बेटा?'

    - 'हाँ वही।' - 'सच कहता है?'

    - 'हाँ।'

    - 'क्या तू वही अब्दुर्रहीम है जिसने मुगल राज्य में आदमी को गुलाम बनाने और चिड़ियों के मारने पर रोक लगवाई है?' दूसरे राजपूत ने पूछा।

    - 'हाँ।'

    - 'इतना बडा़ सेनापति, बिल्कुल अकेला? और इस अवस्था में?' प्रौढ़ सरदार ने खान की छाती पर बैठे युवक को खड़े होने का संकेत करते हुए कहा।

    - 'मैं यहाँ शिकार खेलने के लिये आया था। अपने साथियों से अलग होकर जंगल में भटक गया। खानखाना अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ बैठा। उसकी भुजा में अब भी भयानक दर्द हो रहा था।

    - 'बिना यह जाने कि गलती किस की है, बिना यह जाने कि वह कसाई कौन था, बिना यह जाने कि हम कौन हैं, तू बिना अपना परिचय दिये अचानक तलवार लेकर टूट पड़ा?'

    - 'हमें किसी पर टूट पड़ने के लिये किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। हम अपनी इच्छा के मालिक स्वयं हैं।'

    - 'हम चाहें तो तेरी गर्दन इसी समय काट दें किंतु तूने म्लेच्छों के राज्य में आदमियों को गुलाम बनाने पर रोक लगवाई है और तूने निरीह पक्षियों को मारने पर भी पाबंदी लगवाई है। तू नेक दिल इंसान है इसलिये हम तेरी जान नहीं लेते।'

    - 'मेरी जान लेना इतना आसान नहीं है सरदार। चाहे तो अपने मन की कर के देख ले।'

    - 'नहीं। हम तेरी जान नहीं लेंगे। इस डर से नहीं कि हमें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी अपितु इसलिये कि हम तेरी इज्जत करते हैं। हमने तेरे बारे में कई किस्से सुन रखे हैं। जा तू अपनी राह को चला जा और हमें अपनी राह जाने दे।'

    - 'ऐसे कैसे जायेगा सरदार? अभी तो तूने ही हमारा सत्कार किया है, हमारा सत्कार भी तो देख।'

    - 'बड़े आदमियों का सत्कार न ही मिले तो अच्छा। फिर कभी मौका लगा तो तेरा सत्कार भी देखेंगे।'

    जैसे ही सरदार अपने आदमियों को लेकर वहाँ से चलने को हुआ, खानखाना के साथी उसे ढूंढते हुए वहीं आ पहुँचे। खानखाना ने अपने आदमियों को संकेत किया। चारों राजपूत उसी समय बंदी बना लिये गये।

    बच्चे पिता के इस तरह अलग हो जाने से डर गये थे। माहबानू भी खानखाना के अचानक बिछड़ जाने से चिंतित थी किंतु अब उसके सुरक्षित मिल जाने से उसकी साँस में साँस आई।

    जब राजपूतों को खानखाना के डेरे पर लाया गया तो खानखाना ने उन राजपूतों से कहा- 'यदि अपनी गुस्ताखी के लिये क्षमा मांग लो तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।

    राजपूतों ने कहा- 'गाय की रक्षा करना हमारा धर्म है। यदि खानखाना चाहे तो हमारी गर्दन काट ले किंतु हम क्षमा नहीं मांगेंगे।'

    राजपूतों की दृढ़ता देखकर खानखाना ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया।

    रहीम अब सामान्य सिपाही न रहा था, अब वह बादशाहों का बादशाह अर्थात् खानखाना था। उसके भाग्य का सितारा बुलंदी पर था। विशाल मुगलिया सल्तनत का खानखाना हो जाने से उसका इकबाल लगभग पूरे उत्तरी भारत पर कायम हो गया था। हिन्दुस्थान ही नहीं अफगानिस्तान, ईरान, तूरान, ख्वारिज्म और फरगाना तक उसकी तूती बोलने लगी थी। वह जीवन का बहुत बड़ा इम्तिहान उत्तीर्ण करके इस दर्जे तक पहुँचा था। अब उसके जीवन में कठिनाईयाँ कम और उत्सव के अवसर अधिक थे।

    जब वह दिल्ली दरबार में बादशाह का धन्यवाद ज्ञापित करके फिर से अहमदाबाद जा रहा था तो मार्ग में उसके अमीरों ने उसके लिये शिकार का आयोजन किया। संयोगवश वह अपने आदमियों से अलग होकर एक पेड़ के नीचे बैठा सुस्ता रहा था, उसी दौरान यह घटना हो गयी। कहने को तो यह घटना छोटी ही थी किंतु प्राणों पर आये खतरे के हिसाब से यह उतनी ही बड़ी थी जितनी कि मुजफ्फरखाँ के सात हजार सैनिकों के सामने अपने तीन सौ घुड़सवार और सौ हाथी झौंक कर जीवन का जुआ खेल जाने की थी।

    इस घटना ने रहीम को बहुत सी बातें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसकी समझ में अच्छी तरह से आ गया कि आदमी भले ही हर स्थान पर नहीं पहुँचे किंतु उसकी खुशबू या बदबू स्वतः ही दूर-दूर तक फैल जाती है। मौका पड़ने पर आदमी की तलवार भले ही उसके प्राण न बचा सके किंतु उसकी खुशबू उसे अपरिचितों और जंगलों में भी उसके प्राण बचा ले जाती है। रहीम के अंतस का एक कौना रह-रह कर यह भी सोचता था कि कौन जाने किस निरीह कबूतर या चिड़िया की दुआ उसके काम आई हो! जाने किस बेकस गुलाम की दुआ ऐन वक्त पर उसके आड़े आ गयी हो!


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