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  • जो बोया था, वही काट रहे हैं मुलायमसिंह

     03.06.2020
    जो बोया था, वही काट रहे हैं मुलायमसिंह

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारतीय राजनीति में प्रतिदिन ऐसा कुछ विक्षुब्धकारी घटित होता है कि कोई भी लेखक कम्प्यूटर का की-बोर्ड और माउस उठाने के लिये विवश हो जाये। (पहले के लेखक कलम उठाते थे) मैं सामान्यतः राजीनीतिक लेखन नहीं करता हूँ किंतु यदि कोई घटना इतिहास की झलक दिखाती है तो राजनीति पर लिखने से परहेज भी नहीं करता। भारतीय राजनीति में नेताजी के नाम से विख्यात किये गये मुलायमसिंह यादव (वस्तुतः यह टाइटल सुभाषचंद्र बोस का है) के साथ इन दिनों जो कुछ हो रहा है, उसके लिये कोई और नहीं वे स्वयं ही जिम्मेदार हैं, कम से कम मैं तो ऐसा ही मानता हूँ। मुलायमसिंह का राजनीतिक जीवन खुली किताब की तरह हमारे सामने है। वे 1989 से 1991, 1993 से 1995 तथा 2003 से 2007 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वे देवगौड़ा मंत्रिमण्डल में रक्षामंत्री रहे और आज भी लोकसभा सदस्य हैं। ये वहीं मुलायमसिंह हैं जिन्होंने वर्ष 2004 में सोनिया गांधी की ताजपोशी रोकी। ये वही मुलायमसिंह हैं जिन्होंने लालू यादव, ममता बनर्जी तथा अन्य राजनेताओं के साथ अलग-अलग समय पर राजनीतिक समझौते किये और उन हर्फों की स्याही सूखने से पहले ही तोड़ दिये। ये वही मुलायमसिंह हैं जिन्होंने अयोध्या के कार सेवकों पर गोलियां चलवाने से कभी परहेज नहीं किया। उनकी सरकार के समय कारसेवकों के शव बोरियों में भरकर सरयू नदी में बहाये गये। कारसेवकों को कुचलने की अपनी जिद पर वे इस बुरी तरह कायम रहे कि उन्होंने यह कहने में भी परहेज नहीं किया कि औरंगजेब मेरा आदर्श है। अब जिस आदमी का आदर्श औरंगजेब होगा, उसे परिवार का प्रेम कैसे मिलेगा! औरंगजेब को भी नहीं मिला था। औरंगजेब ने भी किसी को प्रेम नहीं किया था। उसने अपने 65 वर्षीय बूढ़े पिता शाहजहां को कैद में डालकर बड़े भाई दारा शिकोह को दर्दनाक मौत दी। दूसरे नम्बर के बड़े भाई शाहशुजा और चौथे नम्बर के छोटे भाई मुराद को धोखे से मारा। हालांकि जब जब औरंगजेब 89 वर्ष का बूढ़ा हो गया और उसकी कमर 90 डिग्री के कोण पर झुक गई तथा गर्दन स्प्रिंग पर रखी हुई गेंद की तरह कांपने लगी, तब उसने आशा की कि उसका परिवार उसे प्रेम करेगा किंतु परिवार उसे सहन भले ही करता रहा किंतु प्रेम नहीं कर सका। औरंगजेब को आदर्श बताने वाले मुलायमसिंह यादव भी अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव से प्रेम पाने की आशा लगाये हुए हैं किंतु अखिलेश और रामगोपाल सहित, मुलायम से जुड़े तमाम लोग मुलायमसिंह को आदर और इज्जत तो दे सकते हैं किंतु प्रेम नहीं। औरंगजेबों की यही नियति हुआ करती है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • यदि चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो क्या होगा!

     03.06.2020
    यदि चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो क्या होगा!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    चीनी मीडिया ने जैसी धमकी दी है, यदि ऐसा कभी भी नहीं हो तो ही ठीक है परन्तु ईश्वर न करे यदि चीन कभी हम पर आक्रमण कर दे तो..... देश के भीतर क्या दृश्य होगा- - नेता लोग अपनी गाडि़यों में बैठकर किसी सुरक्षित अण्डर ग्राउण्ड की तलाश में निकल पड़ेंगे। - पुलिस के जवान, नेताओं की गाडि़यां सुरक्षित स्थान पर जा सकें, इसके लिये सड़कें रोक कर खड़े हो जायेंगे। - अमीर लोग अपना पैसा और बीवी-बच्चे लेकर विदेशों में भाग जायेंगे। - मध्यम वर्गीय पति अपनी पत्नियों के गलों से सोने की चैनें उतार कर भारत सरकार को देंगे ताकि सैनिकों के लिये धूप के चश्मे और बर्फ पर चलने लायक जूते खरीदे जा सकें। - गरीबों के बच्चे सरकारी स्कलों में राष्ट्रभक्ति के नारे लगायेंगे और जय हो-जय हो गायेंगे। देश की सीमा पर क्या दृश्य होगा- - पाकिस्तान की सेना सीमा पर गोलीबारी करने लगेगी - पाकिस्तान के आतंकवादी भारत की सीमाएं लांघकर देश में घुस आयेंगे। - बांगला देश और नेपाल की सीमाएं भी सुरक्षित नहीं रहेंगी। वहां से भी आतंकवादी भारत में घुसेंगे। - भारतीय मिलिट्री के जवान धूप के चश्मे, बर्फ पर चलने वाले जूते और आधुनिक बंदूकों के बिना ही सरहद पर अपने प्राणों की बाजी लगायेंगे। देश के बाहर क्या दृश्य होगा- - ट्रम्प और पुतिन तब तक ज्ञान बघारते रहेंगे जब तक कि भारत में चीन अपनी ताण्डव लीला के एक विशेष बिंदु पर न पहुंच जाये। और फिर........ - .......... ईश्वर न करे कि 1025 दोहराया जाये जब महमूद गजनवी ने भारतीय राजाओं की फूट का लाभ उठाकर सोमनाथ को भंग किया। - .......... ईश्वर न करे कि 1192 दोहराया जाये जब संधि का छलावा देकर पृथ्वीराज चौहान को पकड़ा गया और अंधा करके पहाडि़यों से धक्का देकर, पत्थरों से मार डाला गया। - .......... ईश्वर न करे कि 1303 दोहराया जाये जब रावल रत्नसिंह को धोखे से बंदी बनाकर मारा गया और चित्तौड़ दुर्ग में 30 हजार हिन्दुओं का कत्ले आम हुआ। - .......... ईश्वर न करे कि 1761 दोहराया जाये जब अहमदशाह अब्दाली ने उत्तर भारत को रौंदने वाले 1 लाख मदमत्त मराठे काट डाले और उनका पेशवा हृदयाघात से मर गया। - .......... ईश्वर न करे कि 1526 दोहराया जाये जब कुछ गद्दार, महाराणा सांगा को खानवा के मैदान में धोखा देकर भाग लिये और महाराणा को युद्ध क्षेत्र में शत्रु के तीर से घायल होकर गिरना पड़ा। - .......... ईश्वर न करे कि 1544 दोहराया जाये जब शेरशाह सूरी ने उत्तर भारत के सबसे बड़े राजा मालदेव के शिविर के आगे झूठे पत्र डाल दिये तथा जैता और कूंपा को अपने सिर कटवाकर अपनी सच्चाई का प्रमाण देना पड़ा। - .......... ईश्वर न करे कि 1556 दोहराया जाये जब हेमू का तोपखाना आगे चला गया और बैरामखां ने तोपखाना अपने अधिकार में करके हेमू का सिर तलवार से अलग कर दिया। - .......... ईश्वर न करे कि 1962 दोहराया जाये जब चीन भारत की छाती पर चढ़ बैठा और जवाहरलाल पंचशील के गीत गाते हुए लंदन और श्रीलंका की यात्राएं करते रहे। जीतता वही है...... - .......... जो समय रहते चेत जाता है। - .......... जो खयाली पुलावों की बजाय महाराणा प्रताप की तरह घास की रोटी खाता है। - ..........जो छत्रपति शिवाजी की तरह छोटे से खंजर से भी अफजलखां को मारने की तैयारी करता है। - .......... जो लालबहादुर शास्त्री की तरह फटा हुआ कोट पहिनकर हवाई मोर्चा खोलता है। - .......... जो इंदिरा गांधी की तरह अमरीका के सातवें बेड़े की परवाह किये बिना बांगला देश में घुस जाता है। वास्तविकता क्या है?????? - भारतीय राजनीतिक दलों ने अपने-अपने वोटों के लिये भारत की जनता को इतने टुकड़ों में बांट दिया है कि आज एक ही देश में हर जाति अपना अलग देश बनाकर रह रही है। - ....... सबको आरक्षण चाहिये...... सबको अपने कम योग्य पुत्रों के लिये सरकारी नौकरियां चाहिये...... सबको मोटा बैंक बैलेंस चाहिये...... सबको अपनी बेटी की शादी में बांटने के लिये हजारों की संख्या में निमंत्रण पत्र चाहिये......। ये सब बातें हमारे पराभव की गारण्टी हैं। इन्हें रोकने की ताकत आज किसी में नहीं बची है। - इतना सब होने पर भी दिल के कोने में आशा बची रहेगी कि- - ....... भारत की धरती पर फिर कोई वीर सावरकर पैदा होगा जो दो बार काले पानी की सजा भोगकर देश को आजाद करायेगा। - ....... फिर कोई रास बिहारी बोस होगा जो जापान में जाकर अपनी सेना खड़ी करेगा। - ....... फिर कोई सुभाषचंद्र बोस होगा जो कलक्टर की नौकरी ठुकराकर भारत माता की बेडि़यां खोलेगा। - ....... फिर कुछ युवक चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां बनकर जन्मेंगे और अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये एक-जुट होकर लड़ेंगे। इसलिये हमें..... - ........ चीनी मीडिया को हलके में लेकर उसका मजाक बनाने की बजाय, हमें अपना घर मजबूत करना चाहिये। -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


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  • राजस्थान हिस्ट्री एप के 500 डाउनलोड्स हुए।

     03.06.2020
    राजस्थान हिस्ट्री एप के 500 डाउनलोड्स हुए।

     

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    19 दिसम्बर 2016 को गूगल प्ले स्टोर पर लॉंच किये गये rajasthanhistory एप के 500 डाउनलोड्स एक माह में हो गये हैं। एक माह की संक्षिप्त अवधि में rajasthanhistory.com पर भी 156 पाठकों ने अपना रजिस्ट्रेशन करवाया है। rajasthanhistory facebook page पर 20 हजार से अधिक पाठकों ने पहुंचकर अपनी रुचि प्रदर्शित की है। 

     

    मित्रों, शुभचिंतकों, पाठकों एवं युवा मित्रों द्वारा दिये गये इस अनुपम सहयोग के लिये मैं आप सबका आभार व्यक्त करता हूँ।

    मेरा प्रयास रहेगा कि राजस्थान एवं भारत के इतिहास की अमूल्य धरोहर के साथ-साथ अच्छा साहित्य भी पाठकों के लिये बहुत ही कम मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता रहे। साथ ही युवा साथियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिये उच्च गुणवत्ता से युक्त पठन सामग्री उपलब्ध हो सके।

     

    आप सबके विश्वास एवं सहयोग की अपेक्षा सदैव रहेगी। 

     


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  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से सुसज्जित है एनएलयू जोधपुर की लाइब्रेरी-

     03.06.2020
    अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से सुसज्जित है एनएलयू जोधपुर की लाइब्रेरी-

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अंतर्राष्ट्रीय सुविधाओं से सुसज्जित एनएलयू जोधपुर की लाइब्रेरी में विधि-छात्रों, शोधार्थियों, अध्यापकों एवं विधिवेत्ताओं के लिये बीस हजार से अधिक पुस्तकें, सैंकड़ों लॉ-जर्नल, दर्जनों सॉफ्टवेयर, ऑनलाइन डाटाबेस तथा विभिन्न इण्टरनेशनल लॉ-फोरम्स से कनैक्टिविटी उपलब्ध कराई गई है। विधि छात्रों में रिसर्च प्रोजेक्ट, रिसर्च पेेपर, थीसिस, आर्टीकल्स आदि लिखने की नैसर्गिक प्रतिभा को बढ़ावा देने तथा कट-कॉपी पेस्ट को रोकने के लिये इस लाइब्रेरी में एण्टी प्लेजिअरिज्म सॉफ्टवेयर स्थापित किया गया है। 

    अंतर्राष्ट्रीय स्तर की लाइब्रेरी

    आज के विधि छात्रों के लिये लॉ डिग्री की पढ़ाई किसी परम्परागत क्लास रूम की पढ़ाई से बिल्कुल अलग हो गई है। विद्यार्थियों को अपनी तैयारी के दौरान न केवल भारत के सर्वोच्च न्यायालय एवं विभिन्न राज्यों में कार्यरत उच्च न्यायालयों के मुकदमों में हुए निर्णयों एवं चर्चाओं की जानकारी रखनी होती है अपितु विश्व भर के विभिन्न देशों में न्यायिक क्षेत्र में हो रहे शोध, विभिन्न देशों में बन रहे कानूनों, दुनिया भर के न्यायालयों में हो रहे निर्णयों एवं एकेडेमिक फोरम्स पर हो रही बौद्धिक चर्चाओं से भी अवगत रहना होता है। इसके लिये एनएलयू जोधपुर ने अपने छात्रों के लिये एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की लाइब्रेरी उपलब्ध करवाई है। भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में इतनी उच्च स्तरीय लाइब्रेरी उपलब्ध हैं।

    ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी की सदस्यता

    पूरी तरह वातानुकूलित इस लाइब्रेरी में एक साथ 275 विद्यार्थी बैठकर पुस्तकों, शोध पत्रिकाओं एवं अन्य विधि पत्रिकाओं आदि का अध्ययन कर सकते हैं। छात्रों को शैक्षणिक सामग्री की स्कैन कॉपी, फोटो कॉपी आदि भी लाइब्रेरी के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है। लाइब्रेरी में हाईस्पीड इण्टरनेट सुविधा उपलब्ध कराई गई है तथा लाइब्रेरी ने ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी एवं अनेक लॉ फोरम्स की सदस्यता ले रखी है। इनके माध्यम से एनएलयू के छात्र उन विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी में उपलब्ध विशेषज्ञ विषय सामग्री, ई-बुक्स, ई-जरनल्स, दुनिया भर के न्यायालयों के मुकदमों के विवरण एवं निर्णय, विभिन्न देशों में प्रचलित कानूनों आदि की जानकारी सरलता से प्राप्त कर लेते हैं।

    ऑनलाइन लीगल रिसर्च सर्विसेज

    इसी प्रकार विधिवेत्ताओं, अधिवक्ताओं एवं विधि विशेषज्ञों के लिये वेस्टलॉ, मनुपुत्र, जे-स्टोर, हाइन ऑनलाइन, लेक्सिस-नेक्सिस, क्लूवर आरबिट्रेशन, एस एस सी ऑनलाइन, आदि ऑनलाइन लीगल रिसर्च सर्विसेज भी उपलब्ध हैं जिन पर लाखों विधि आलेख उपलब्ध हैं। एनएलयू के छात्र इन आलेखों से लाभ उठा सकते हैं किंतु इनकी कट-कॉपी पेस्ट करने की बजाय अपना मौलिक पत्र अथवा थीसिस पेपर तैयार करना जरूरी होता है, इसके लिये लाइब्रेरी ने इलेक्ट्रोनिक सॉफ्टवेयर स्थापित किया है। यदि कोई छात्र ऐसा करता है तो यह सॉफ्टवेयर कट-कॉपी-पेस्ट को तुरंत पकड़ लेता है।

    निःशुल्क ऑनलाइन डाटाबेस

    लॉ विद्यार्थियों को लाइब्रेरी द्वारा सीडी रोम आधारित सेवाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके माध्यम से छात्रों को इण्डियन लॉ इंस्टीट्यूट के जरनल, एनुअल सर्वे ऑफ इण्डियन लॉ, आर्बीट्रेशन इण्टरेक्टिव, सुप्रीम कोर्ट के एआईआर, जेसअप प्रीपरेटरी वीडियोज आदि उपलब्ध कराये जाते हें। लाइब्रेरी द्वारा छात्रों को डाइरेक्ट्री ऑफ ओपन एक्सेस जरनल्स, सोशियल साइंस रिसर्च नेटवर्क, ओपन एक्सेस जरनल्स ऑफ इनफ्लिबेंट डाइरेक्ट्री, एडवोकेट खोज, शोधगंगा-शोध गंगोत्री सर्विस ऑफ इनफ्बिेंट आदि निशुल्क ऑनलाइन डाटाबेस उपलब्ध कराया जाता है।

    स्वचालित एसओयूएल सॉफ्टवेयर 

    लाईब्रेरी में मूट कोर्ट की तैयारी करने के लिये विद्यार्थियों को अंतर्राष्ट्रीय मानदण्डों के अनुसार समस्त शैक्षणिक सुविधाओं, इण्टरनेट एवं फर्नीचर से सुसज्जित साउण्ड पू्रफ वातानुकूलित केबिन उपलब्ध कराये जाते हैं। लाइब्रेरी को पूरी तरह स्वचालित एसओयूएल सॉफ्टवेयर से जोड़ा गया है तथा पुस्तकों को डिवी डेसिमल वर्गीकरण पद्धति से जमाया गया है ताकि छात्रों को वांछित पुस्तक एवं सामग्री ढूंढने में कम से कम समय लगे। इसी प्रकार छात्रों के लिये लाइब्रेरी के प्रवेश द्वार पर एक इलेक्ट्रोनिक नोड उपलब्ध कराया गया है जिसमें लाइब्रेरी के समस्त कैटेलॉग उपलब्ध हैं। लाइब्रेरी में 20 हजार से अधिक पुस्तकें हैं तथा 100 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जरनल्स सब्सक्राइब किये हुए हैं।

    दिव्यांगों के लिये मित्रवत् 

    यह लाइब्रेरी दिव्यांगों के लिये मित्रवत् है। नेत्र-दिव्यांगों के लिये आवश्यक ई-बुक रीडर, जेऐडब्लूएस सॉफ्टवेयर तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इस लाइब्रेरी में साल भर में औसतन केवल 18 अवकाश होते हैं। सप्ताह के छः दिन यह लाइब्रेरी प्रातः 8 बजे से रात्रि के साढ़े दस बजे तक खुली रहती है। रविवार के दिन यह दोपहर 12 बजे से रात्रि 8 बजे तक खुलती है। विश्वभर से आने वाले लॉ प्रोफेसर्स एवं विधि विशेषज्ञ भी इस लाइब्रेरी का लाभ उठाते हैं। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महाराजा जोधपुर द्वारा वितरित पुरस्कार एवं पदोन्नतियां

     03.06.2020
    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महाराजा जोधपुर द्वारा वितरित पुरस्कार एवं पदोन्नतियां

    स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् पुरस्कारों का वितरण-

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    24 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा ने अपने निजी स्टाफ के अधिकारियों को पदोन्नतियां, पुरस्कार तथा निःशुल्क भूमि प्रदान कीं।

    पदोन्नति- 1. महाराजा के पसर्नल मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल राव राजा हनूतसिंह - ऑनरेरी ब्रिगेडियर 2. सरदार इन वेटिंग कैप्टेन महाराज अनोपसिंह - मेजर 3. महल के प्रशासनिक अधिकारी गोवर्धनसिंह - कैप्टेन

    स्वर्ण एवं ताजीम (एकवारी)- 1. कम्पट्रोलर ऑफ द हाउस होल्ड मेजर डॉ. बी. एल. रावत 2. ठाकुर करणसिंह

    स्वर्ण- 1. जोधपुर स्टेट रेलवे के महाप्रबंधक के सेक्रेटरी मि. जे. ए. फोलिओट पॉवेल

    पालकी, सिरोपाव एवं स्वर्ण- 1. पं नंदलाल

    राज्य रत्न- 1. डा. निरंजन नाथ गुरटूं

    स्टाईपेण्ड, फण्ड एण्ड ग्रांट्स- 1. डॉ. निरंजन नाथ गुरटूं - 200.00 रुपये प्रमिमाह 2. साह अमृतराज - 200.00 रुपये प्रमिमाह 3. करण चंद्र भण्डारी - 100.00 रुपये प्रमिमाह 4. खेमचंद भण्डारी - 100.00 रुपये प्रमिमाह

    निशुल्क भूखण्ड एवं भूमि का अनुदान- 1. कैप्टेन ठाकुर रतनसिंह ए. डी. सी. 2. कैप्टेन ठाकुर मनोहरसिंह - ए. डी. सी. 3. भोपालचंद लोढ़ा- महाराजा ने भोपालचंद लोढ़ा के विरुद्ध चल रहे समस्त जांच प्रकरण भी वापस ले लिये।

    राजस्थान में सम्मिलिन से पहले रैंक/सम्मान व उपाधियों का वितरण-

    जोधपुर महाराजा के पुत्र उत्पन्न होने की प्रसन्नता में 18 मार्च 1948 को महाराजा ने बहुत से लोगों को ऑनरेरी रैंक, मिलिट्री रैंक, राज्य रत्न, नगरसेठ व रायबहादुर की उपाधियां, स्वर्ण, ताजीम, हाथ का कुराब, हाथी सिरोपाव, पालकी सिरोपाव आदि बांटे-

    ऑनरेरी रैंक- 1. मेजर जनरल महाराजाधिराज श्री अजीतसिंह साहिब - जनरल 2. दीवान बहादुर ठाकुर माधोसिंहजी साहिब ऑफ संखवास - कर्नल 3. मेजर महाराज श्री हिम्मतसिंहजी साहिब - ले. कर्नल 4. महाराज हनवंतसिंहजी - ले. कर्नल 5. मेजर राजा हरिसिंह ऑफ कुचामन - ले. कर्नल 6. मेजर कुंवर बिशनसिंहजी - ले. कर्नल 7. ठाकुर करणसिंहजी- ले. कर्नल 8. ठाकुर भैंरोसिंहजी ऑफ खेजड़ला - मेजर 9. महाराजा नरपतसिंहजी ऑफ बांसवाड़ा - मेजर 10. कुंवर लक्ष्मणसिंहजी - मेजर 11. ले. ओंकारसिंह, डिप्टी प्राइवेट सेक्रेटरी - कैप्टेन 12. मि. अनोपसिंह जुडिशयल सेक्रेटरी - कैप्टेन 13. मि. पदमसिंह - कैप्टेन

    रैंक- 1. मेजर महाराजा प्रेमसिंहजी- ले. कर्नल 2. मेजर ठाकुर मोहनसिंहजी - ले. कर्नल

    राज्यरत्न- 1. लाला हरिश्चंद्रजी, जुडिशियल मिनिस्टर 2. रायबहादुर जसवतंराजजी मेहता, मिनिस्टर फॉर लोकल बॉडीज 3. मि. बी. के. मजूमदार, पर्सनल फिजीशियन ऑफ दी हिज हाइनेस दी महाराजा साहिब बहादुर

    नगर सेठ- 1. मेजर मोहनलाल सांघी

    राय बहादुर- 1. शाह मदन मोहनजी जागीरदार, चौक लखनऊ

    सम्मान की बहाली- 1. मि. गोरधनलाल काबरा

    गोल्ड एण्ड ताजीम- 1. कैप्टेन ठाकुर मनोहरसिंहजी ऑफ धामाली - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम 2. कैप्टेन ठाकुर रतनसिंहजी ऑफ भीकमकोर - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम 3. ले. कुंवर हेमसिंहजी - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम

    ताजीम- 1. ले. कर्नल ठाकुर विक्रमसिंहजी ऑफ सामलिया (अलवर स्टेट) 2. ठाकुर नाथूदानजी महरिया 3. शाह मदनमोहनजी जागीरदार, चौक लखनऊ

    हाथ का कुरब- 1. मेजर टीका कुशवंतसिंहजी ऑफ बदरू खां (नाभा स्टेट)

    ताजीम एण्ड हाथी सिरोपाव- 1. रायबहादुर ठाकुर बख्तावरसिंहजी, इंसपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस

    हाथी सिरोपाव- 1. राय बहादुर राज्य रत्न जसवंतरायजी मेहता 2. मि. नवल किशायर, चीफ जज 3. मेजर डॉ. बी. एल. रावत, कम्प्ट्रोलर ऑफ हाउस होल्ड 4. पं. नन्दलालजी

    गोल्ड एण्ड हाथी सिरोपाव 1. मि. सी. के. दुरई, जनरल मेनेजर जोधपुर रेलवे

    गोल्ड एण्ड पालकी सिरोपाव- 1. ठाकुर कानसिंहजी, डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस 2. मि. सी. एल. कुमार, चीफ इंजीनियर जोधपुर रेलवे 3. मि. हेतीदान, हुजूर सेक्रटरी 4. मि. समरथ राज, पोलिटिकल सेक्रेटरी 5. मि. अनोपसिंह, ज्युडीशियल सेक्रेटरी 6. मि. अब्दुल हक, डिवलपमेंट सेक्रेटरी 7. कैप्टेन गोरधनसिंह, होम सेक्रेटरी 8. एम. एस. राय, एक्स हैड मास्टर ऑफ दरबार हाईस्कूल एण्ड एक्स सेक्रेटरी ऑफ गवर्नमेण्ट ऑफ जोधपुर 9. मि. उमराव चंद भण्डारी 10. राज्य वैद्य गोविंद चंद्र 11 आचार्य रामकिशनजी (मेड़ता) 12. सेठ गजधर सोमानी ऑफ मौलासर (डीडवाना) 13. मि. शैतानसिंह, पर्सनल ऑडरली टू दी हिज हाइनेस दी महाराजा साहिब बहादुर

    गोल्ड- 1. डा. ई. डब्लू हैवर्ड प्रिंसीपल मैडिकल ऑफीसर 2. मि. एफ. एफ. फर्ग्यूसन, चीफ इंजीनियर पी. डब्लू. डी. 3. मि. एम.   पी. फ्लैटोहेम 4. पं. रामगोपाल, फाइनेंस सेक्रेटरी 5. मि. रामनिवास माछर, 6. डा. हरिगोपाल दवे 7. मि. एम. ए. राय, एक्जीक्यूटिव इंजीनियर जोधपुर रेलवे 8. ठाकुर चंद्र सिंहजी एजेण्ट सरदार समंद 9. वैद्य गंगा सहाय, डीडवाना

    पालकी सिरोपाव- 1. मि. हरिसिंह सेक्रेटरी टू हर हाइनेस श्री महारानीजी साहिबा 2. पं. पन्नालाल 3. मि. हुकमराज मेहता 4. मि. अमृतराज मेहता

    ताजीम, गोल्ड एण्ड हाथी सिरोपाव- रिटायर्ड ले. कर्नल्स- 1. ले. कर्नल ठाकुर बहादुर सिंह ओ. बी. आई. 2. ले. कर्नल रायबहादुर   राय राजा सुजानसिंह 3. ले. कर्नल हेमसिंह 4. ले. कर्नल हीरसिंह 5. ले. कर्नल ठाकुर अनोपसिंह 6. ले. कर्नल ठाकुर अमानसिंह 7. ले. कर्नल ठाकुर जवाहर सिंह एम. बी. ई. 8. ले. कर्नल रायबहादुर ठाकुर दलपतसिंह ऑफ रोहट

    वर्तमान ले. कर्नल्स- 1. ले. कर्नल के. श्यामसिंह हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्स 2. ले. कर्नल कुमार अर्जुनसिंह, डायरैक्टर ऑफ   रीसैटलमेंट 3. ले. कर्नल कल्याण सिंह, जोधपुर लांसर्स 4. ले. कर्नल धोकलसिंह सैकेण्ड जोधपुर इन्फैण्ट्री 5. ले. कर्नल सुल्तानसिंह हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्स 6. ले. कर्नल ठाकुर मोहनसिंह, दुर्गा हॉर्स 7. ले. कर्नल महाराजा  प्रेमसिंह फोर्ट्स गार्ड 8. ले. कर्नल ठाकुर रामसिंह डी. एस. ओ. सरदार इन्फैण्ट्री 9. ले. कर्नल ठाकुर डूंगरसिंह एम.ओ. सरदार इन्फैण्ट्री टी. जी.

    हाथी सिरोपाव- हैड क्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्सेज- 1. मेजर धोकलसिंह

    जोधपुर लांसर्स- 1. मेजर चंदनसिंह 2. मेजर ठाकुर जगतसिंह 3. मेजर के. सरदार सिंह 4. मेजर भोपालसिंह

    जोधपुर लांसर्स ट्रेनिंग सेंटर- 1. मेजर रामदानसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री- 1. मेजर दीप सिंह 2. मेजर जेठूं सिंह 3. कैप्टेन महाराज दान सिंह

    जोधपुर इन्फैण्ट्री- 1. महाराजा रेवतसिंह

     मिलिट्री हॉस्पीटल 1. मेजर पी. आर. बादवा

    पालकी सिरोपाव- हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्सेज- 1. कैप्टेन हरिसिंह 2. कैप्टेन डी. ए. राजहंस

    जोधपुर लांसर्स- 1. कैप्टेन खीमसिंह 2. कैप्टेन गिरधारीसिंह एम. बी. ई.

    जोधपुर लांसर्स ट्रेनिंग सेंटर- 1. कैप्टेन के. उम्मेदसिंह 2. कैप्टेन एस. के. बनर्जी सैकेण्ड

    जोधपुर इन्फैण्ट्री- 1. कैप्टेन पेहप सिंह 2. कैप्टेन करीमखान 3. कैप्टेन माधोसिंह

    जोधपुर इन्फैण्ट्री सेंटर- 1. कैप्टेन मगनसिंह

    दुर्गा हॉर्स 1. कैप्टेन प्रेमसिंह 2. कैप्टेन रावराजा देवीसिंह

    फोर्ट्स गार्ड- 1. कैप्टेन रेवतसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री- 1. कैप्टेन सवाईसिंह

    घोर सिरोपाव- जोधपुर इन्फैण्ट्री सेंटर- 1. ले. दुर्जनसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री- 1. सै. ले. गुलाबसिंह

    फोर्ट्स गार्ड- 1. सै. ले. मगनसिंह

    ऑनरेरी रैन्क्स- 1. ले. क. मेजर ज्यॉफ गोडविन 2. मेजर मि. उमाशंकर गौड़

    गार्डन सुपरिन्टेण्डेण्ट को पदोन्नति- 31 मार्च 1949 को ऑफीशियेटिंग सुपरिन्टेण्डेण्ट गार्डन्स एण्ड जू खींवराज को पदोन्नति   देकर अधीक्षक के पद पर 250-15-400 के वेतमान में नियुक्त किया गया।

    कस्टम में छूट-

    4 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने राज्य में जिन लोगों को कस्टम ड्यूटी में छूट दे रखी थी, वह वापस ले ली किंतु यह छूट जोधपुर महाराजा तथा राजपरिवार के निम्नलिखित सदस्यों के लिये पूर्ववत् जारी रखी गयी- 1. हिज हाइनेस द महाराजा साहिब बहादुर 2. महाराजाधिराज श्री सर अजीतसिंहजी साहिब 3. महाराज श्री हिम्मतसिंहजी साहिब 4. महाराज श्री हरिसिंहजी साहिब 5. महाराज श्री देवीसिंहजी साहिब 6. महाराज दलीपसिंहजी साहिब

    राज्य कर्मचारी एवं रेलवे कर्मचारियों को भूखण्ड-

    4 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने जोधपुर राज्य के कर्मचारियों एवं जोधपुर रेलवे के कर्मचारियों को मसूरिया में भूखण्ड दिये गये जिसकी दर आधा रुपया प्रति वर्गगज निर्धारित की गयी।

    राजस्थान में सम्मिलित होने के बाद मानद रैंक का वितरण-

    5 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने अपने खान, बरकतउल्लाखां को मेजर का मानद रैंक प्रदान किया। यह अधिकारी नई दिल्ली में जोधपुर राज्य का प्रतिनिधि था।

    महाराजा के भाई को सेना में नियुक्ति-

    6 अप्रेल 1949 को जोधपुर महाराजा द्वारा अपने भाई महाराज हरिसिंह को जोधपुर स्टेट फोर्सेज में सैकेण्ड लेफ्टीनेंट नियुक्त किया गया। उन्हें नियमित आधार पर नियुक्ति दी गयी जो कि 1 दिसम्बर 1947 से प्रभावी मानी गयी। उनका वेतन जोधपुर लांसर्स से दिये जाने की व्यवस्था की गयी।

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  • राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (भाग - 1)

     03.06.2020
    राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (भाग - 1)

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कर्नल टॉड का जन्म 20 मार्च 1782 को इंगलैण्ड के इंग्लिस्टन नामक स्थान पर हुआ था। उसके किसी पूर्वज ने स्कॉटलैण्ड के राजा रॉबर्ट दी ब्रूस के बच्चों को इंगलैण्ड के राजा की कैद से छुड़ाया था इस कारण टॉड परिवार को नाइटबैरोनेट की उपाधि तथ लोमड़ी का चिह्न धारण करने का अधिकार मिला हुआ था। जब जेम्स टॉड 17 वर्ष का हुआ तो ई. 1799 में वह ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सैनिक अधिकारी के रूप में बंगाल भेज दिया गया।

    वहाँ कुछ दिनों के लिये उसे नौसैनिक के रूप में भी काम करने का अनुभव प्राप्त हुआ। अगले ही वर्ष वह पैदल सेना में लैफ्टीनेंट के पद पर नियुक्त किया गया। वहाँ से उसकी नियुक्ति पहले कलकत्ता, फिर बंगाल तथा फिर दिल्ली में हुई। ई. 1801 में उसे दिल्ली के पास एक पुरानी नहर की पैमाइश करने का काम दिया गया। ई. 1805 में मिस्टर ग्रीम मर्सर को कम्पनी सरकार की तरफ से दौलतराव सिंधिया के दरबार में भेजा गया। कर्नल टॉड भी भारतीय राजाओं के ठाठ बाट देखने की लालसा में मर्सर के साथ हो लिया। यह वह समय था जब यूरोपीय अधिकारियों को राजपूताना एवं उसके आसपास के प्रदेश के भूगोल का बहुत ही कम ज्ञान था। उन्होंने जो नक्शे बना रखे थे उनमें अनुमान से नाम लिखे गये थे। उन नक्शों की स्थिति यह थी कि उनमें चित्तौड़गढ़ को उदयपुर के पश्चिम में दर्शाया गया था जो कि वास्तव में पूर्व में है। अंग्रेजों का अनुमान था कि राजपूताना की नदियां दक्षिण की तरफ बहती हुई नर्मदा से मिल जाती हैं।

    इस भूल को तो हिन्दुस्तान के भूगोल के प्रथम शोधकर्ता मि. रेलन ने शुद्ध किया किंतु शेष अपूर्णतायें ज्यों की त्यों बनी रहीं। जिस समय मर्सर दिल्ली से चला उस समय सिंधिया उदयपुर में था। इसलिये मर्सर को दिल्ली से आगरा तथा जयपुर होते हुए उदयपुर पहुँचना था। ई. 1791 में कम्पनी सरकार का गवर्नर कर्नल पामर जिस मार्ग से उदयपुर गया था उस मार्ग का एक नक्शा डॉक्टर हंटर ने बनाया था। मर्सर के पास वही नक्शा था। जब मर्सर के साथ जेम्स टॉड को भी अनुमति मिली तो टॉड ने उस नक्शे की जांच करने का मानस बनाया। जिस दिन वह दिल्ली से रवाना हुआ उसी दिन से वह अपने मार्ग को नाप-नाप कर नक्शे में अंकित करने लगा। जून 1806 में टॉड मर्सर के साथ उदयपुर पहुँचा। जब दिल्ली से उदयपुर तक का नक्शा तैयार हो गया तो टॉड की इच्छा हुई कि वह उदयपुर के आसपास के क्षेत्र को भी देखे और नापे।

    सिंधिया की सेना उदयपुर से चलकर चित्तौड़ गढ़ के मार्ग से होती हुई मालवा पार करके बुंदेलखण्ड पहुंची। टॉड भी इसी सेना के साथ लग लिया। इस पूरी यात्रा में टॉड न केवल नक्शे तैयार करता रहा अपितु उसने मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान का इतिहास, जनश्रुति तथा शिलालेख आदि का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया। इसके बाद तो टॉड ने इन कामों को करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वह अपनी प्रत्येक यात्रा में यही करता रहता था जिससे उसके पास राजपूताने के इतिहास की विपुल सामग्री एकत्रित हो गयी जिसका उपायोग उसने " एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान" नामक पुस्तक लिखने में किया। आगे चलकर इसी पुस्तक के नाम पर इस प्रदेश का नाम राजस्थान पड़ा। इस प्रकार राजस्थान का नामकरण करने का श्रेय भी कर्नल टॉड को जाता है। उससे पहले इस क्षेत्र को राजपूताना कहा जाता था।

    जब सिंधिया की सेना ने राहटगढ़ पर घेरा डाला तब टॉड अपने थोड़े से सिपाहियों को लेकर बेतवा नदी के किनारों के पास से होता हुआ चंबल तक के अज्ञात स्थानों तक पहुंचा तथा वहाँ से पश्चिम की ओर चलकर कोटा पहुँच गया। उसने चंबल, कालीसिंध, पार्वती, बनास आदि मुख्य नदियों के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र तथा उनके संगम स्थलों का पता लगाया। उन दिनों इस पूरे क्षेत्र में लूटमार का बाजार गर्म था। ठग, पिण्डारी, डाकू तथा सैनिक लोग राहगीरों को लूटते फिरते थे। टॉड भी कई बार लूटा गया। अनेक बार उसे अपने डेरे छोड़कर रात्रि में ही भागना पड़ा। कोटा से चलकर टॉड भरतपुर, कठूंमर और सेंतरी होता हुआ जयपुर पहुँचा। वहाँ से टोंक, इन्दरगढ़, गूगल, छपरा, राघूगढ़, अरोन, कुरवा और भोरासा के मार्ग से सागर जा पहुंचा तथा राहटगढ़ आकर सिंधिया की सेना से मिल गया।

    टॉड ने इस पूरे मार्ग के नक्शे तैयार कर लिये। जब सिंधिया ग्वालियर पहुँचा तब भी टॉड उसके पीछे लगा रहा और नक्शे बनाता रहा। ई. 1810 में उसने नक्शे बनाने वाले दो दल तैयार किये। एक दल को सिंध की ओर तथा दूसरे दल को सतलुज नदी के दक्षिणी रेगिस्तान में भेजा गया। पहला दल शेख अब्दुल बरकत के नेतृत्व में उदयपुर से गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, लखपत और सिंध हैदराबाद होता हुआ पश्चिम की ओर सिंधु नदी पारकर ठठ्ठा में पहुंचा तथा नदी के किनारे-किनारे सीवान् तक चला गया। फिर सिंधु नदी से उतर कर बांये किनारे होते हुए खैरपुर पहुंचा। वहाँ से बेखर के टापू में होकर उमरसुमरा के रेगिस्तान से जैसलमेर, मारवाड़ और जयपुर के क्षेत्रों को नापता हुआ नरवर में टॉड से आ मिला। दूसरा दल मदारीलाल के नेतृत्व में सतलज के दक्षिणी रेतीले प्रदेश तथा लगभग संपूर्ण राजपूताना के राज्यों में भेजा गया। मदारीलाल अत्यंत योग्य, विश्वसनीय एवं परिश्रमी व्यक्ति था।

    टॉड उसके द्वारा किये गये कार्य की जांच नहीं करता था किंतु अन्य आदमियों द्वारा किये गये कार्य पर विश्वास नहीं करता था और उनके द्वारा किये गये कार्य की स्वयं जांच करता था। कर्नल टॉड जिस क्षेत्र से भी निकलता, उस क्षेत्र की जानकारी रखने वाले लोगों को अपने पास बुला लेता और उनसे पूछ-पूछ कर जानकारियां लिखता रहता था। इस कारण जब वह अपने घोड़े पर बैठकर यात्रा कर रहा होता था तब उसके दोनों और ओर तथा आगे पीछे उन लोगों के घोड़े चला करते थे जो टॉड को राजपूताने के राज्यों के इतिहास की बातें बताते रहते थे। कर्नल टॉड योग्य अधिकारी था। अपने द्वारा किये गये कार्य की सत्यता की जांच करने के लिये भी उसने एक तरीका ढूंढ निकाला था।

    वह जिस किसी भी क्षेत्र में जाता उस क्षेत्र में डाक लाने ले जाने वाले लोगों से अवश्य सम्पर्क किया तथा अपने काम की सत्यता जांचने के लिये उन डाकियों के विवरण को काम में लिया। 1813 में टॉड को कर्नल बनाया गया। 1815 तक 10 वर्ष के असाधारण परिश्रम में कर्नल टॉड के पास नक्शों की 11 जिल्दें तैयार हो गयीं। ई. 1815 में उसने अपने नक्शों की एक प्रति गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज को भेंट की। हेस्टिंग्ज ने उसके महान परिश्रम की बड़ी प्रशंसा की तथा नक्शों की एक नकल पर अपने हस्ताक्षर करके टॉड को इस आशय के साथ सौंप दी कि यदि भविष्य में इन नक्शों पर कोई अन्य व्यक्ति स्वयं के द्वारा निर्मित होने का दावा प्रस्तुत करे तो उसके खंडन के प्रमाण के रूप में हेस्टिंग्ज के हस्ताक्षर दिखा दिये जायें। ये नक्शे यूरोप भी पहुँचे तथा यूरोप को राजपूताने की रहस्यमयी रियासतों की वास्तविक जानकारी हुई। बाद में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पेशवा के राज्य का बंटवारा किया तथा राजपूताने में पिण्डारियों के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया तब इन नक्शों ने बड़ी मदद की। 1805 से लेकर 1817 तक 12 वर्ष की अवधि में कर्नल टॉड ने लगभग पूरा राजपूताना देख लिया। था। उस काल में राजपूताने के भूगोल, इतिहास तथा राजपूताने की राजनीतिक परिस्थितियों की जितनी जानकारी कर्नल टॉड को थी, उतनी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में किसी अन्य अधिकारी को नहीं थी।

    इस समय राजपूताना में 17 छोटी-बड़ी हिन्दू रियासतें थीं जिनके शासक हजारों साल से आपस में युद्ध करके एक दूसरे को कमजोर करते आये थे। मुगलों के लगभग 200 वर्ष शासन काल में उदयपुर को छोड़कर शेष रियासतें मुगलों के संरक्षण में रही थीं। जिसके कारण इन रियासतों के परस्पर युद्ध लगभग बंद से हो गये थे किंतु मुगलों के कमजोर पड़ते ही ये फिर से लड़ने लगे थे। इन रियासतों के जागीरदार भी राजाओं की नाक में दम किये रहते। राजमहलों के षड़यन्त्रों के कारण राज्य का वातावरण अत्यन्त विषाक्त रहता था। प्रत्येक राजकुमार अपने पिता के बाद राजा बनना चाहता था जिससे राज्य के भीतर भी युद्ध हो जाते थे। मुगलों के पतन के बाद मराठों, डाकुओं और पिण्डारियों ने इन राजपूत रियासतों की हालत खराब कर रखी थी। वे गरीब असहाय जनता को लूटते ही थे, राजाओं के महलों में भी घुस जाते और राजमहलों तक को लूट लेते थे तथा कई लोगों की हत्याएं कर देते थे। जोधपुर, जयपुर, मेवाड़, आदि सभी बड़े राज्य इनसे त्रस्त थे।

    ई. 1807 तक 1813 तक लॉर्ड मिण्टो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल था, उसने देशी राज्यों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी जिससे मराठों और पिण्डारियों को राजपूताना में नंगा नाच करने की छूट मिल गयी। राजपूताना लुटेरों का घर बन गया। ई. 1806 में कर्नल टॉड मेवाड़ से होकर गुजरा। उसने उस समय के राजपूताने की दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- "जहाजपुर होकर कुंभलमेर जाते समय मुझे एक सौ चालीस मील में दो कस्बों के सिवा और कहीं मनुष्य के पैरों के चिह्न तक नहीं दिखाई दिये। जगह-जगह बबूल के पेड़ खड़े थे और रास्तों पर घास उग रही थी। उजड़े गावों में चीते, सूअर आदि वन्य पशुओं ने अपने रहने के स्थान बना रखे थे। उदयपुर में जहाँ पहले पचास हजार घर आबाद थे अब केवल तीन हजार रह गये थे। मेर और भील पहाड़ियों से निकल कर यात्रियों को लूटते थे।"

    कर्नल टॉड को महान राजपूताने की दुर्दशा पर बड़ा तरस आया जब उसने देखा कि राजपूत राजाओं में महान गुणों का वास होते हुए भी तनिक भी एकता नहीं है। जैसे ही किसी राजा या राजकुमार में विवाद हुआ, वे सीधे मराठों की शरण में जा पहुँचते थे या फिर पिण्डारियों की सेवाएं प्राप्त करते थे। इस कारण राजा, प्रजा, राज्य एवं राजवंश जर्जर होते चले जा रहे थे। टॉड ने निश्चय किया कि इस महान प्रदेश को मराठों और पिण्डारियों के उत्पात से बचाना चाहिये तथा राजपूताने को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवाएं प्रदान की जानी चाहिये। कर्नल टॉड ने 1814-15 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उच्च अधिकारियों को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि इन पिण्डारियों को कुचला जाये अन्यथा राजपूताना नष्ट हो जायेगा। कम्पनी सरकार ने टॉड से पिण्डारियों के विरुद्ध की जाने वाली लड़ाई की पूरी योजना बनवाई। टॉड ने पिण्डारियों की सामरिक शक्ति, उनके दबदबे वाले क्षेत्र तथा राजपूताने की स्थिति को ध्यान में रखकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की और उसे सरकार को भेज दिया। इस योजना को बनाने में कर्नल टॉड द्वारा निर्मित नक्शों ने बड़ी सहायता की। सरकार ने कर्नल टॉड का बड़ा आभार व्यक्त किया। ई. 1817 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल मार्कीस ऑफ हेस्टिंग्स ने पिण्डारियों को नष्ट करने का निर्णय लिया। मेजर जनरल सर ऑक्टरलोनी, जनरल डॉनकिन, जनरल मार्शल, जनरल ऐडम्स और जनरल ब्राउन को राजपूताना एवं मध्य भारत में पिण्डारियों को घेर कर मारने का काम सौंपा गया। इन जनरलों ने पूरा राजपूताना और मध्य भारत घेर लिया। जब कर्नल टॉड को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने कम्पनी सरकार को लिखा कि मुझे भी पिण्डारियों को कुचलने के कार्य पर लगाया जाये। गवर्नर जनरल ने टॉड का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

    पहले तो गवर्नर जनरल ने टॉड को मेजर जनरल ऑक्टरलोनी के अधीन नियुक्त करने का विचार किया किंतु टॉड की महत्ता को देखते हुए उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर हाड़ौती क्षेत्र में रांवटा नामक स्थान पर नियुक्त किया गया। कर्नल टॉड का काम था राजपूताना तथा मध्य भारत को घेर कर खड़े जनरलों के बीच समन्वय स्थापित करना, उन्हें आगे की कार्यवाही के बारे में सुझाव देना तथा पिण्डारियों एवं मराठों की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुँचाना। कर्नल टॉड की सम्मति से ही अंग्रेज जनरलों ने अपनी सेनाओं का प्रयाण नियत किया।

    टॉड ने व्यवस्था की कि प्रतिदिन उसे कम से कम 20 स्थानों से पिण्डारियों की हलचल के सम्बन्ध में सूचनाएं प्राप्त हों। टॉड इन सूचनाओं का सार निकालकर कर विभिन्न जनरलों को भेज देता था। एक बार टॉड को सूचना मिली कि करीम खां पिण्डारी का बेटा 1500 पिण्डारियों के साथ रांवटा से 30 मील दूरी पर कालीसिंध के निकट आ पहुँचा है। उस समय टॉड के पास मात्र 32 सैनिक ही थे। उन दिनों कोटा राज्य का फौजदार झाला जालिमसिंह रावटा में मुकाम कर रहा था। टॉड तुरंत ही जालिमसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ तथा पिण्डारियों के विरुद्ध कोटा राज्य से सहायता मांगी।

    उस समय जालिमसिंह 70 साल का हो चुका था तथा उसकी दोनों आँखों ने काम करना बंद कर दिया था किंतु उसका विवेक पूरी तरह जाग्रत था। जालिमसिंह ने उसी समय 250 सिपाही टॉड के साथ कर दिये। कर्नल टॉड ने कुल 282 सिपाहियों के साथ 1500 पिण्डारियों पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में 150 पिण्डारी मारे गये तथा शेष जान बचाकर भाग खड़े हुए। टॉड ने पिण्डारियों के डेरे लूट लिये तथा उनके बहुत से हाथी, घोड़े तथा ऊंट छीन लिये। टॉड को यहाँ से काफी धन भी प्राप्त हुआ जिससे टॉड ने कोटा से 6 मील दूर चंद्रभागा नदी पर एक पुल बनवा दिया जिसका नाम हेस्टिंग्स ब्रिज रखा। पिण्डारियों और मरहठों का उपद्रव मिटने पर कम्पनी सरकार ने राजपूताना के राज्यों से संधि करने का काम आरंभ किया।

    कर्नल टॉड को उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी तथा जैसलमेर राज्यों का पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया गया तथा उनका मुख्यालय उदयपुर में स्थापित किया गया। फरवरी 1818 में कर्नल टॉड उदयपुर के लिये रवाना हुआ। टॉड ने लिखा है कि इस बार तो मेवाड़ की दशा 1806 ई. की दशा से भी अधिक बुरी थी। भीलवाड़ा में जहाँ पहले 6000 घरों की बस्ती थी, अब वहाँ एक भी मनुष्य नहीं रहता था। बहुत से लोग मराठों के भय से मेवाड़ छोड़कर मालवा तथा हाड़ौती आदि स्थानों को चले गये थे। राज्य की आय बहुत घट गयी थी, सरदारों ने खालसे के बहुत से गाँव दबा लिये थे। मेवाड़ राज्य से जो संधि हुई थी उसमें मेवाड़ राज्य को आंतरिक एवं बाह्य शत्रुओं से अभय मिल गया तथा बदले में मेवाड़ के महाराणा ने आवश्यकता होने पर अपने राज्य के समस्त सैनिक संसाधन अंग्रेजों को सुपुर्द करने स्वीकार कर लिये।

    अंग्रेजों को वार्षिक खिराज देने के सम्बन्ध में तय हुआ कि प्रथम पाँच वर्ष तक तो मेवाड़ के राजस्व में से एक चौथाई भाग खिराज के रूप में लिया जायेगा और इसके बाद 3/8 भाग वसूल किया जायेगा। फरवरी 1818 में कप्तान टॉड उदयपुर आया तो महाराणा ने उसका बड़ा भव्य स्वागत किया। एक दिन महाराणा ने सब सरदारों को बुलाकर बड़ा दरबार किया। इस दरबार में टॉड ने महाराणा से पूछा कि जो सरदार आपके विरोधी हों, उनके नाम बताईये, अंग्रेजी सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये तैयार है। महाराणा भीमसिंह ने यहाँ भी उदारता दिखायी और बोला- "मैंने अब तक के सारे अपराध क्षमा कर दिये हैं किंतु अब जो लोग भविष्य में कसूर करेंगे, उसकी सूचना आपको दी जायेगी।"

    राजपूताना की हिन्दू रियासतें अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में थीं। इन पर शासन करने वाले नृवंशों में समय-समय पर बदलाव होता रहा था जिसके साथ उनके आकारों में भी परिवर्तन आता गया था। इन रियासतों में प्रशासन का तरीका अत्यंत प्राचीन था जिनमें शक, कुषाण, हूण, मुस्लिम तथा मंगोल आदि जातियों के प्रशासनिक तौर तरीकों का घाल मेल होता चला गया था। जब यूरोपीय जातियों का भारत में आगमन हुआ तब भी राजपूताना की रियासतें पुरातन हिन्दू प्रविधियों एवं मुगल शासन विधियों से ही प्रशासित होती रहीं। रियासतों में राजाओं का निरंकुश शासन था किंतु उनसे भी अधिक निरंकुशता राजाओं के अधीन रहकर जागीरों का प्रशासन करने वाले जागीरदारों तथा ठिकाणों में व्याप्त थी। चूंकि प्रशासन व्यक्तिगत प्रकृति का था इसलिये राजा अथवा जागीरदार के व्यक्तित्व के आधार पर ही शासन अच्छा या बुरा हो जाता था। अच्छे राजाओं तथा जागीरदारों ने अच्छा शासन देने का प्रयास किया किंतु जैसे ही बुरे व्यक्ति का शासन हुआ, उसके साथ ही शासन भी बुरा हो जाता था।

    जब ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने देशी रियासतों के साथ सहायक संधियां कीं तो ब्रिटिश अधिकारियों ने इन रियासतों के प्रशासन को सुधारने का काम अपने हाथ में लिया। ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य यह था कि वे समझते थे कि बेहतर प्रशासन से रियासत में शांति आयेगी जिससे लोगों की आय में वृद्धि होगी और रियासत के राजस्व में बढ़ोतरी होगी। अंग्रेजों को अपना खिराज राज्य के राजस्व में से ही वसूलना होता था। राजपूताना रियासतों में सबसे पहला राज्य मेवाड़ था जिसका प्रशासन मेवाड़ के प्रथम पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल जेम्स टॉड ने अपने हाथ में लिया।

    कप्तान टॉड ने मेवाड़ की आर्थिक दशा सुधारने के लिये सेठ जोरावरमल को इंदौर से उदयपुर बुलाया। सेठ जोरावरमल मूलतः जैसलमेर का ही रहने वाला ओसवाल बनिया था किंतु वह होलकर के इंदौर राज्य में जाकर व्यापार करने से खूब उन्नति कर गया था। उसने बड़े-बड़े शहरों में अपनी दूकानें स्थापित कर ली थीं। इंदौर का राजा उसे कई राजकीय दायित्व भी सौंपता रहता था। उसी ने होलकर तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य समझौता करवाया था। इससे प्रसन्न होकर कम्पनी सरकार तथा होलकर ने उसे कई सम्मान दिये थे। महाराणा ने जोरावरमल से आग्रह किया कि वह उदयपुर में अपनी दूकान स्थापित करे तथा राज्य के कामों में जो रुपये खर्च हों वे तुम्हारी दुकान से दिये जायें और राज्य की सारी आय तुम्हारे यहाँ जमा रहे। जोरावरमल ने टॉड तथा महाराणा का आग्रह स्वीकार करके अपनी दूकान उदयपुर में स्थापित कर ली। उसने नये खेड़े बसाये, किसानों को सहायता दी और चोरों एवं लुटेरों को दण्ड दिलवाकर मेवाड़ राज्य में शांति स्थापित करने में सहायता की। उसका कुशल प्रबंधन देखकर पोलिटिकल एजेण्ट ने अंग्रेजी कोष का प्रबंध भी उसी को सौंप दिया।

    महाराणा ने उसे पालकी तथा छड़ी का सम्मान, बदनोर परगने का पारसोली गाँव तथा सेठ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद कर्नल टॉड ने अपना ध्यान मेरवाड़ा क्षेत्र की ओर लगाया। राजपूताने के ठीक मध्य में स्थित इस पहाड़ी प्रदेश में मेर जाति बड़ी संख्या में रहती थी जो जंगली, युद्धप्रिय और बहुत उपद्रवी थी। इस प्रदेश का कुछ भूभाग मेवाड़ रियासत में, कुछ भूभाग मारवाड़ रियासत में तथा कुछ भाग अजमेर जिले के अंग्रेजी शासन वाले क्षेत्र में आता था। 25 जून 1818 को सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंप दिया था। इसलिये अंग्रेजी सरकार ने इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिये उसी साल नसीराबाद में सैन्य छावनी स्थापित की। अक्टूबर 1818 में टॉड ने मेरों को दबाने के लिये रूपाहेली के ठाकुर सालिमसिंह की अध्यक्षता में मेवाड़ के बदनोर, देवगढ़, आमेट तथा बनेड़ा ठिकानों की सेनायें भेजीं।

    टॉड ने मेवाड़ के पूर्वोत्तर भाग के समस्त छोटे-बड़े सरदारों, जागीरदारों, भोमियों तथा आसियों आदि को भी मेरवाड़े पर भेजा। मेरों ने पहाड़ों के संकरे रास्तों पर नाकाबंदी करली जिससे घबराकर रूपाहेली के ठाकुर ने पहाड़ों पर आक्रमण करने का निश्चय त्याग दिया तथा मैदानी क्षेत्रों में अपने थाने बैठा दिये।

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  • राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (2)

     03.06.2020
    राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (2)

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    मार्च 1919 में अंग्रेजी सेना भी सालिमसिंह से आ मिली। इन दोनों सेनाओं ने मिलकर मेरों के मुख्य स्थान बोरवा, झाक और लुलुवा पर अधिकार कर लिया तथा अपने थाने बैठा दिये। इस पर मेरों ने जोधपुर राज्य की तरफ से अंग्रेजी थानों पर हमले करने आरंभ कर दिये। नवम्बर 1819 में टॉड जोधपुर आया तथा उधर से भी थानों का प्रबंध करवा दिया। इस प्रकार मेरवाड़ा चारों ओर से घिर गया। जब सालिमसिंह रूपाहेली को लौट गया तो मेरों ने थानों पर हमला करके अंग्रेजी थानेदारों को मार डाला तथा कई थाने उठा दिये। इस पर सालिमसिंह फिर लौट कर आया। उसने सैंकड़ों मेरों को मार डाला तथा टॉड के निर्देश पर फिर से थाने स्थापित करके उनमें 100-100 सिपाही तैनात कर दिये।

    कर्नल टॉड ने मेरवाड़ा में अंग्रेजी सेनाएं रखने के लिये दो नये दुर्ग बनवाये। एक का नाम टॉडगढ़ तथा दूसरे का नाम महाराणा के नाम पर भीमगढ़ रखा। मेरों को लुटेरों से किसान बनाने के लिये मेवाड़ राज्य की ओर से जमीनें प्रदान की गयीं तथा कुछ मेरों को सेना में भर्ती करने के लिये मेर बटालियन का गठन किया गया। मेरों को दबाने में सफल रहने पर सालिमसिंह को कप्तॉन टॉड की ओर से प्रशंसा पत्र तथा महाराणा की ओर से अमर बेलणा घोड़ा, बाड़ी तथा सीख का सिरोपाव दिया गया। अमर बेलणा घोड़ा उस घोड़े को कहते थे जिसके बूढ़ा होने पर या मरने पर उसके स्थान पर दूसरा घोड़ा भेजा जाता था। सीख का सिरोपाव प्रतिवर्ष दशहरे पर नौकरी समाप्त कर अपने ठिकाने में लौटने वाले सरदार को दिया जाता था।

    मेरवाड़ा पर तीन राज्यों का अधिकार होना ठीक न समझ कर दिल्ली के रेजीडेण्ट जनरल ऑक्रलोनी ने मारवाड़ तथा मेवाड़ के शासकों को लिखा कि वे अपने राज्य में आने वाले मेरवाड़ा प्रदेश के गाँव 10 वर्ष के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंप दे। मारवाड़ तो इस बात को मान गया किंतु मेवाड़ ने इन्कार कर दिया। इस पर कम्पनी ने बलपूर्वक मेवाड़ के हिस्से वाला मेरवाड़ा अपने अधीन कर लिया। इस घटना से महाराणा भीमसिंह बड़ा दुखी हुआ। महाराणा ने इसकी शिकायत गवर्नर जनरल से की। गवर्नर जनरल ने चार्ल्स मेटकाफ के माध्यम से महाराणा को पत्र लिखवाकर इस घटना के लिये खेद व्यक्त किया किंतु मेरवाड़ा के क्षेत्र पर अंग्रजों का अधिकार बना रहा। ई. 1847 में यह क्षेत्र सदा के लिये अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

    टॉड ने मेवाड़ की आय बढ़ाने के लिये कई उपाय किये। उसने ई. 1819 में झाला जालिमसिंह से जहाजपुरा का परगना फिर से प्राप्त कर मेवाड़ में मिला दिया तथा महाराणा का दैनिक व्यय 1000 रुपये स्थिर किया।

    ई. 1818 में मेवाड़ राज्य की वार्षिक आय 1 लाख 20 हजार रुपये थी किंतु टॉड की व्यवस्था से ई. 1821 में यह आय बढ़कर 8 लाख 77 हजार 634 रुपये हो गयी। ई. 1822 में यह 11 से 12 लाख रुपये के बीच में अनुमानित की गयी। राज्य की आय में जबर्दस्त वृद्धि के उपरांत भी अंग्रेजी सरकार का खिराज था महाराणा को 1000 रुपये प्रतिदिन जेबखर्च दिया जाना सरल कार्य नहीं था। इस कारण टॉड ने एक साहूकार से 18 रुपये सैंकड़ा सूद की दर से कर्ज लिया।

    ई. 1821 में कप्तान टॉड बीमार पड़ गया और अपने सहायक एजेंट कप्तान वॉग को कार्यभार सौंप कर इंगलैण्ड चला गया। इस पर राज्य का शासन प्रबंध फिर से महाराणा के हाथ में आ गया। वॉग ने महाराणा को 1000 रुपये रोज दिलवाने की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया जिससे महाराणा को निजी व्यय का प्रबंध स्वयं करना पड़ा। मार्च 1823 में कप्तान स्पीयर्स मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट होकर आया किंतु एक माह बाद ही उसके स्थान पर कप्तान कॉव आ गया। कॉव को ज्ञात हुआ कि महाराणा ने एक वर्ष के भीतर 83 गाँव विभिन्न लोगों को दे दिये हैं जिससे राज्य की आय घट गयी है तथा महाजन का कर्ज 2 लाख रुपये एवं अंग्रेज सरकार का खिराज 8 लाख रुपये चढ़ गया है। कॉव ने महाराणा को एक हजार रुपया प्रतिदिन देकर शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया।

    इस समय मेवाड़ में शासन प्रबंध महाराणा तथा अंग्रेज सरकार दोनों की ओर से होता था। महाराणा की तरफ से प्रत्येक जिले में कामदार और एजेंट की ओर से चपरासी नियुक्त था। दोनों मिलकर आय वसूल करते थे। इस द्वैध शासन से तंग आकर जनता ने अंग्रेज सरकार से शिकायत की। इस पर कॉव ने कुछ सुधार किये। कॉव के प्रबंध से राज्य की आय फिर से सुधर गयी तथा महाराणा का खर्च, अंग्रेजी सरकार का खिराज एवं महासन का सूद एवं असल सभी कुछ चुका दिये गये। ई. 1826 में कॉव के स्थान पर कप्तान सदरलैण्ड मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट बना। उसने पहले के एजेंटों द्वारा नियुक्त चपरासियों को थानों और परगनों में से बाहर निकाल दिया इस प्रकार कप्तान टॉड तथा कप्तान कॉव ने मेवाड़ राज्य में जो शासन व्यवस्था एवं आर्थिक प्रबंध लागू किये उनसे मेवाड़ राज्य की आय में तो वृद्धि हुई ही, साथ ही राजपूताना की रियासतों में अंग्रेजी शासन की धाक जम गयी।

    अपने प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ कर्नल टॉड राजपूताना के राज्यों एवं प्राचीन राजवंशों के इतिहास को संकलित करने में संलग्न रहता था। ई. 1819 में टॉड उदयपुर से नाथद्वारा, कुंभलगढ़, घाणेराव तथा नाडोल होते हुए जोधपुर आया। नाडोल में उसने लाखण सी के समय के दो शिलालेख वि. संवत 1024 तथा 1039 के तलाश किये जिनसे अजमेर व नाडोल के चौहान, जालोर के सोनगरा चौहान तथा सिरोही के देवड़ा चौहानों का इतिहास संकलन करने में बड़ी सहायता मिली। टॉड ने वि. सं. 1218 का आल्हणदेव के समय का एक ताम्रपत्र तथा एक अन्य ताम्रपत्र भी खोज निकाले। इस यात्रा में उसने कई सिक्के, प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकें तथा शिलालेख संकलित किये। जोधपुर नरेश मानसिंह ने टॉड को विजयविलास, सूर्यविलास तथा मारवाड़ की ख्यात आदि कई पुस्तकें भेंट कीं।

    जोधपुर प्रवास के दौरान टॉड प्रतिहारों की प्राचीन राजधानी मण्डोर को देखने के लिये गया। अजमेर एवं पुष्कर में भी उसने कई सिक्के एकत्रित किये। कहते हैं कि एक बार कर्नल टॉड ने जहाजपुर में मक्का की रोटी खायी जिसे खाते ही उसका सिर घूमने लगा, जीभ भारी हो गयी और कंठ रुंध गया। किसी देशी वैद्य ने टॉड को सलाह दी कि उसकी तिल्ली बढ़ी हुई है यदि वह तिल्ली पर जोंक लगवा ले तो इस रोग से मुक्ति मिल जायेगी। टॉड ने उसी समय 60 जोंकें मंगवाकर तिल्ली पर लगा दीं तथा चारपाई पर लेट गया। उसने अपने साथ चल रहे ब्राह्मणों एवं पटेलों से कहा कि वे इतिहास सुनाना जारी रखें। स्वास्थ्य के अधिक खराब हो जाने पर 1 जून 1822 को कर्नल टॉड उदयपुर से इंगलैण्ड के लिये रवाना हो गया।

    इस यात्रा में भी वह सिरोही, आबू, चंद्रावती, पालनपुर, सिद्धपुर, अन्हिलवाड़ा, अहमदाबाद तथा बड़ौदा आदि कई स्थानों पर गया। इनमें से कई स्थानों पर उससे पहले कोई अंग्रेज नहीं पहुँचा था। देलवाड़ा गाँव के मंदिरों को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ। 14 जनवरी 1823 को वह बंबई पहुंचा। वह अपने साथ राजपूताना रियासतों के सैंकड़ों शिलालेख, 20 हजार प्राचीन सिक्के, पुस्तकें तथा ऐतिहासिक सामग्री ले गया। इस यात्रा का वर्णन उसने अपनी पुस्तक "ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया" में किया। तीन सप्ताह तक बम्बई में रहकर वह पानी के जहाज से अपने देश के लिये रवाना हो गया।

    जब तक भारत भूमि का तट दिखाई देता रहा, वह टकटकी लगाये उदास आँखों से भारत माता को देखता रहा। वह इस देश को ही अपना देश समझने लगा था किंतु जलवायु की प्रतिकूलता के कारण उसे यह प्यारा देश छोड़ना पड़ रहा था। अंत में भीगी आँखों से उसने भारत माता को अंतिम प्रणाम किया। कर्नल टॉड 53 वर्ष तक जिया। 18 नवम्बर 1835 को इंगलैण्ड में उसने अंतिम सांस ली। उस समय भी भारत माता का प्यारा मुख उसके नेत्रों में बसा हुआ था। राजपूताना रियासतों में आधुनिक शासन की नींव रखने वाला वह पहला अंग्रेज अधिकारी था।

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  • महिला सशक्तीकरण की मिसाल हैं झालावाड़ की बुनकर महिलाएं

     03.06.2020
    महिला सशक्तीकरण की मिसाल हैं झालावाड़ की बुनकर महिलाएं

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    झालावाड़ जिले के असनावर, रायपुर, झालरापाटन, झिरी, सुनेल, मोलक्या, देवरी तथा निकटवर्ती गांवों  में 200 से अधिक बुनकर महिलाएं, महिला सशक्तीकरण की मिसाल बनकर उभरी हैं। वे अपने घरों में बैठकर साड़ी, खेस, सफेद फैब्रिक, तौलिये, बुनती हैं तथा दरी, पट्टी, गलीचे एवं एक किलो वाली रजाइयां भी बनाती हैं। इस कार्य से वे प्रतिदिन 150 से 250 रुपया कमाती हैं। इस आय के लिये उन्हें नरेगा में काम नहीं मांगना पड़ता, खेतों में चिलचिलाती धूप में फावड़ा-कुदाली नहीं चलानी पड़ती तथा सिर पर टोकरा उठाकर गलियों में सामान बेचने नहीं जाना पड़ता। न ही कमठे पर जाकर सिर पर पत्थर ढोने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इस आमदनी के बल पर ये महिलाएं अपनी गृहस्थी का खर्च उठाने के साथ-साथ अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भी पढ़ा रही हैं। वे जानती हैं कि पढ़ाई का क्या महत्व है! कशीदाकारी और ब्लॉक प्रिण्टिंग भी हो रही है गांवों में गांव की महिलाएं हथकरघे पर खेस तथा चद्दर का मोटा कपड़ा बुनने तक ही सीमित नहीं रही हैं। वे बड़ी सफाई से सफेद रंग का मजबूत और महीन कपड़ा बुनती हैं जिसे देखकर कपड़ा-मिलें भी पानी मांग लें। इस कपड़े का वे मनचाहा अर्ज रखती हैं तथा रजाई के खोल, चद्दर आदि बनाने के लिये उसकी सिलाई, कशीदाकारी, ब्लॉक प्रिण्टिंग आदि भी स्वयं करती हैं। दिल्ली, भोपाल और जयपुर तक जाती हैं ये महिलाएं बहुत कम पढ़ी-लिखी हैं किंतु हिम्मत के बल पर उन्होंने अपनी सारी झिझक को पीछे छोड़ दिया है जिसके चलते वे अब केवल अपने घरों तक ही सीमित नहीं रह गई हैं, अपतिु अपने द्वारा तैयार किये गये कपड़े को जिला उद्योग केन्द्र तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से दिल्ली, जयपुर, जोधपुर, अजमेर तथा भोपाल में लगने वाले हस्तशिल्प मेलों तथा प्रदर्शनियों में ले जाकर बेचती हैं। दिल्ली में 10 दिन में लगभग 5 से 6 लाख रुपये तक का माल बिक जाता है। अंतर्राष्ट्रीय फैशन डिजाइनर बीबी रसैल हैरान हुईं इन्हें देखकर बांगलादेश की अंतर्राष्ट्रीय फैशन डिजाइनर बीबी रसैल 7 मार्च 2016 को झालावाड़ जिले की यात्रा पर आईं तथा इन महिला बुनकरों के गांव में जाकर उनसे मिलीं। उन्होंने इन महिला बुनकरों, रेडिमेड कपड़े सिलने वाले महिला स्वयं सहायता समूहों तथा कशीदाकारी करने वाले महिला स्वयं सहायता समूहों से बात की एवं असनावर गांव की महिला बुनकरों को हाथकरघे पर काम करते हुए देखा। उन्होंने झालावाड़ जिले की असनावर, रायपुर तथा निकटवर्ती गांवों में लगभग 200 महिलाओं द्वारा बड़े स्तर पर कपड़ा बुने जाने को महिला सशक्तीकरण का बड़ा उदाहरण बताया तथा कहा कि यहां हर महिला आत्मविश्वास से अपना स्वयं का कार्य घर में बैठकर कर रही है तथा प्रत्येक महिला स्वाभिमान के साथ प्रतिमाह 5 से 6 हजार रुपये कमा रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निकल सकती है अच्छी मांग झालावाड़ के महिला बुनकर समूहों द्वारा पक्के रंगों का प्रयोग किया जा रहा है, अच्छी डिजाइनें काम में ली जा रही हैं तथा अच्छी गुणवत्ता का धागा प्रयुक्त हो रहा है। इस कारण इनके द्वारा उत्पादित साडि़यों, खेसों, तौलियों, दरियों, गलीचों तथा सफेद खादी की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी मांग निकलने की संभावना है। बीबी रसैल ने असनावर में तैयार किये जा रहे चौड़े पाट के सफेद कपड़े की गुणवत्ता को देखकर सुखद आश्चर्य व्यक्त किया और कहा कि यह बहुत अच्छा और बहुत सस्ता है। गांव में ही इस कपड़े पर ब्लॉक प्रिंटिंग भी की जा रही है। गांव में 1 किलो भार की अच्छी किस्म की रजाइयों को देखकर उन्होंने कहा कि इसकी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी मांग हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय फैशन डिजाइनर ने खरीदी असनावर की खादी बीबी रसैल ने स्वयं भी अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में प्रदर्शित करने के लिये इन महिलाओं से 7-7 मीटर लम्बे खेसों के दो थान बनवाये हैं। कुछ दरियां, तौलिये एवं चद्दरें भी तैयार करवाई हैं। उन्होंने असनावर गांव में तैयार सफेद खादी स्वयं अपने लिये खरीदी। उन्होंने एक दर्जन तौलिये भी बांगलादेश ले जाने के लिये खरीदे। गलीचे देखकर हर कोई रह जाता है हैरान गलीचे और नमदे बनाने का काम परम्परागत रूप से राजस्थान में होता आया है किंतु असनावर की महिलाओं ने सूत के प्रयोग से ऐसे कलात्मक गलीचे बनाये हैं और उन्हें ऐसे मनोहारी रंग प्रदान किये हैं कि देखने वाला दांतों तले अंगुली दबा लेता है। जिला स्तर पर बनाई जा रही है वैबसाइट जिला कलक्टर डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी इन महिला बुनकरों के लिये एक वैबसाइट बनवा रहे हैं ताकि झालावाड़ के उत्पादों की बिक्री राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संभव हो सके। जिला कलक्टर का मानना है कि असंगठित रूप से काम करने के कारण इन महिलाओं को उनके उत्पादों की अभी भी कम कीमत मिल रही है। यदि इन्हें सुसंगठित विपणन व्यवस्था से जोड़ दिया जाये तो इनकी आय में अच्छी वृद्धि हो सकती है। इस वैबसाइट पर, तैयार उत्पादों के नमूनों के चित्रों के साथ-साथ महिला बुनकरों एवं अन्य आर्टीजन्स के नाम एवं सम्पर्क सूत्र आदि उपलब्ध कराये जायेंगे ताकि क्रेता सीधे ही इन कारीगरों से माल खरीद सकें तथा बिचौलियों की भूमिका को समाप्त किया जा सके। जिला कलक्टर का प्रयास है कि और भी गांवों की महिलाएं इस काम को सीखें और झालावाड़ इस कार्य के लिये कोटाडोरिया की तरह एक ब्राण्ड बन जाये।

                                                                                                                                               -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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  • संभागीय आयुक्त 19 दिसम्बर को करेंगे वैबसाइट एवं गूगल एप की लांचिंग

     03.06.2020
    संभागीय आयुक्त 19 दिसम्बर को करेंगे वैबसाइट एवं गूगल एप की लांचिंग

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्रेस विज्ञप्ति जोधपुर 18 दिसम्बर। शौर्य एवं स्वामिभक्ति की गाथाओं से समृद्ध राजस्थान का इतिहास एवं साहित्य अब ई-बुक्स एवं गूगल एप पर भी उपलब्ध होगा जिसका लाभ विश्व भर के अनेक देशों के पाठक उठा सकेंगे। इस वैबवाइट एवं गूगल एप से दुनिया के किसी भी देश में निवास करने वाले राजस्थानियों एवं भारतीयों के साथ-साथ विदेशी पाठकों को भी राजस्थान के शौर्य एवं स्वामिभक्ति की गाथाओं से समृद्ध इतिहास एवं साहित्य उपलब्ध हो सकेगा। शुभदा प्रकाशन जोधपुर ने इसके लिये पूर्णतः समर्पित वैबसाइट एवं गूगल एप तैयार करवाया है जिसकी लांचिंग 19 दिसम्बर को प्रातः 11.30 बजे जोधपुर के संभागीय आयुक्त श्री रतन लाहौटी अपने कार्यालय में करेंगे। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि वैबसाइट www.rajasthanhistory.com तथा गूगल एप rajasthanhistory पर राजस्थान के योद्धा, महापुरुष, दुर्ग, नगर एवं रियासती इतिहास के साथ-साथ कला, साहित्य, संस्कृति, लोक-परम्परा आदि पर भी बहुत कम मूल्य में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये ई-बुक्स उपलब्ध कराई गई हैं। साथ ही भारत के इतिहास पर भी पुस्तकें उपलब्ध रहेंगी। पाठक इस वैबसाइट एवं एप से ई-बुक्स के साथ-साथ मुद्रित पुस्तकों का भी लाभ उठा सकेंगे। इस वैबसाइट एवं एप को जोधपुर की ही संस्था डब्लूएसक्यूब टैक ने तैयार किया है। डब्लूएस क्यूब के डायरेक्टर कुशाग्र भाटिया ने बताया कि rajasthanhistory वैबसाइट को किसी भी कम्प्यूटर से एक्सेस किया जा सकेगा जबकि ई-बुक्स पढ़ने के लिये किसी भी एण्ड्रॉयड डिवाइस पर गूगल प्ले स्टोर से rajasthanhistory फ्री एप डाउनलोड करना होगा। फिलहाल ई-बुक्स की खरीद पर 50 से 90 प्रतिशत तक रियायत रहेगी जबकि कुछ ई-बुक्स फ्री उपलब्ध कराई गई हैं। साहित्यकारों, लेखकों एवं मीडिया प्रतिनिधियों को 1000 रुपये मूल्य तक की ई-बुक्स निःशुल्क उपलब्ध कराई जायेंगी। इसके लिये उन्हें mlguptapro@gmail.com पर अपना नाम, ईमेल आईडी, सैलफोन नम्बर, मीडिया संस्थान का नाम अथवा स्वयं द्वारा लिखित पुस्तकों की जानकारी देनी होगी। इस रजिस्ट्रेशन के बाद ई-बुक्स के लिये निशुल्क कूपन जारी किया जायेगा। यह योजना 31 जनवरी तक उपलब्ध रहेगी। -डॉ. मोहनलाल गुप्ता मोबाईल फोन: 94140 76061

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  • अंग्रेज देते थे राजाओं को तोपों की सलामी

     03.06.2020
    अंग्रेज देते थे राजाओं को तोपों की सलामी

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मुगलों के आगमन से पूर्व राजपूताना में 11 राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़, आम्बेर, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, अजमेर, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं करौली। मुगलों के काल में राजपूताना में 7 नये राज्य अस्तित्व में आये- कोटा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, किशनगढ़, प्रतापगढ़ तथा शाहपुरा जबकि एक राज्य- अजमेर समाप्त हो गया। इस प्रकार राजपूताना के राज्यों की संख्या 17 हो गयी। औरंगजेब के पश्चात अधिकतर राज्यों के सम्बंध मुगलों से विच्छेद हो गये तथा मुगल साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। ई. 1818 से 1857 तक राजपूताना के राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के संरक्षण में रहे। इस काल में राजपूताना में दो नये राज्य अस्तित्व में आये- टोंक तथा झालावाड़। ई. 1818 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने मरहठा शासक दौलतराम सिंधिया से संधि करके अजमेर पर अधिकार कर लिया। बाद में इसमें मेरवाड़ा क्षेत्र भी मिला दिया गया। इस प्रकार अंग्रेजों के काल में एक केन्द्रशासित प्रदेश- ‘‘अजमेर-मेरवाड़ा’’ भी अस्तित्व में आया। जैसे जैसे भारत में अंग्रेजों का राज्य फैलता गया वैसे-वैसे उनके मन में यह विश्वास जड़ जमाता गया कि गोरी जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी ‘ईश्वर’ नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने और शासन करने के लिये पैदा हुई है। उन्होंने राजपूताना की रियासतों पर नियंत्रण के लिये एजेंट टू द गवर्नर जनरल (ए. जी. जी.) को नियुक्त किया जिसका मुख्यालय अजमेर में था। राजपूतना ए. जी. जी. के अधीन पालनपुर, दंाता, ईडर तथा विजयनगर रियासतें भी थीं जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुजरात में शामिल कर दी गयीं। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं को भारत की आजादी की लड़ाई के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। यही कारण था कि अंग्रेजों और भारतीय राजाओं का गठबंधन 1857 के गदर के समय तथा बाद में कांग्रेस के नेतृत्व में चले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय भारत की जनता के सामने चट्टान की तरह आकर खड़ा हो गया। इस चट्टान को राजपूताना की रियासतों में आजादी की लड़ाई का बिगुल बजाने वाले जयनारायण व्यास (जोधपुर), गोकुल भाई भट्ट (उदयपुर), हीरालाल शास्त्री (जयपुर), रघुबर दयाल गोयल (बीकानेर), सागरमल गोपा (जैसलमेर), ठाकुर केशरीसिंह (शाहपुरा) तथा विजयसिंह पथिक (बिजौलिया) जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने पिघला कर पानी बना दिया जिसके कारण अंग्रेज शक्ति और राजा दोनों ही एक साथ विलुप्त हो गये। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं को अपनी ओर मिलाये रखने के लिये उन्हें प्रशासन में कनिष्ठ भागीदारी दी। उन्हें यूरोप की सैर करवायी, विदेशी शराब उपलब्ध करवायी तथा अंग्रेजी मेम के साथ नृत्य करने की सुविधायें दीं। तरह-तरह की उपाधियों से अलंकृत किया तथा रॉल्स रॉयस जैसी महंगी कारें खरीदने का अधिकार दिया। इन सब सुविधाओं से बढ़कर जो सुविधा अंग्रेजी सरकार की ओर से भारतीय राजाओं को उपलब्ध थी, वह थी- अंग्रेज सरकार की ओर से भारतीय राजाओं को तोपों की सलामी। अंग्रेजों ने इन राज्यों के राजाओं को उनकी हैसियत के अनुसार तोपों की संख्या निश्चित की थी। राजस्थान की रियासतों में उदयपुर के शासक को 19 तोपों की सलामी दी जाती थी। इसके बाद नम्बर आता था- बीकानेर, भरतपुर, बूंदी, जयपुर, जोधपुर, करौली, कोटा तथा टोंक का। इनके शासकों को 17 तोपों की सलामी दी जाती थी। अलवर, बांसवाड़ा, धौलपुर, डूंगरपुर, जैसलमेर, किशनगढ़, प्रतापगढ़ तथा सिरोही के शासकों को 15 तोपों की सलामी दी जाती थी। झालावाड़ के शासक को 13 तोपों की सलामी दी जाती थी। इन रियासतों के अतिरिक्त तीन ठिकाने लावा, कुशलगढ़ तथा नीमराणा भी थे। जिनके शासकों को तोपों की सलामी नहीं दी जाती थी। इन्हें ‘‘नॉन सैल्यूट स्टेट’’ भी कहा जाता था। अंग्रेज सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों के राजाओं के लिये तोपों की सलामी की संख्या निर्धारित करते समय राजाओं की हैसियत राज्य के आकार, उसकी प्राचीनता, उसकी जनसंख्या अथवा वार्षिक राजस्व आदि तथ्यों से नहीं आंकी गयी थी। अपितु यह हैसियत अंग्रेज सरकार के साथ उस राज्य के सम्बन्धों की स्थिति पर भी निर्भर करती थी। आजादी के बाद राजाओं का यह विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया। -मोहनलाल गुप्ता

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