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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 14

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 14

    साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलनों एवं स्वराज्य दल की गतिविधियों से विवश होकर ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के बारे में सलाह देने के लिए साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस कमीशन के समस्त सदस्य अँग्रेज थे। इसलिये इसे व्हाइट कमीशन भी कहते हैं। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया। भारत-सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि साइमन कमीशन का विरोध करने से क्या लाभ है जबकि भारतवासी स्वयं ऐसा कोई संविधान तैयार करने में असमर्थ हैं जिसे भारत के समस्त दल स्वीकार करते हों! भारतीय नेताओं ने भारत-सचिव की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तथा भारत के भावी संविधान के लिये एक प्रस्ताव तैयार करने हेतु एक समिति का गठन किया।

    मोतीलाल नेहरू को समिति का अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू को सचिव नियुक्त किया गया। इसमें सुभाषचंद्र बोस तथा सर तेज बहादुर सप्रू सहित कुल 8 सदस्य थे। इस समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है। इस रिपोर्ट में भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना, अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए अधिकारों की घोषणा तथा वयस्क मताधिकार आदि बातें सम्मिलित की गईं। दिसम्बर 1928 में सर्वदलीय बैठक में जिन्ना ने नेहरू समिति के प्रस्तावों पर तीन संशोधन रखे किन्तु वे स्वीकार नहीं किये गये। मुहम्मद शफी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने प्रारम्भ से ही नेहरू समिति का बहिष्कार किया। 31 दिसम्बर 1928 और 1 जनवरी 1929 को आगा खाँ की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय मुस्लिम कान्फ्रेंस की बैठक बुलाई गई। इसमें नेहरू रिपोर्ट के समस्त प्रस्तावों के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किये गये। जिन्ना ने इस कान्फ्रेंस में भाग नहीं लिया परंतु उसने मार्च 1929 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें नेहरू रिपोर्ट के मुकाबले 14 शर्तें रखीं। मुस्लिम सम्प्रदाय से सम्बन्धित शर्तें इस प्रकार थीं-

    (1) भविष्य का संविधान संघीय होना चाहिए तथा बची हुई शक्ति का प्रयोग प्रान्तों द्वारा होना चाहिए।

    (2) सभी प्रान्तों के लिए स्वायत्त शासन का एक माप स्वीकार किया जाए।

    (3) देश के समस्त विधानमण्डलों एवं अन्य चुनी गई पार्टियों का एक निश्चित सिद्धांत पर पुनर्गठन हो जो प्रत्येक प्रान्त में प्रभावशाली अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करे।

    (4) केन्द्र में मुस्लिम प्रतिनिधित्व एक तिहाई से कम नहीं होना चाहिए।

    (5) प्रतिनिधित्व साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली पर आधारित हो।

    (6) पंजाब, बंगाल, उत्तर प्रदेश और सीमा प्रान्त में कोई प्रादेशिक पुनर्विभाजन मुस्लिम बहुसंख्यकों को प्रभावित न करे।

    (7) पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता हो, यदि किसी समुदाय के 3/4 सदस्य विरोध प्रकट करें तो वह विधेयक पारित नहीं किया जाए।

    (8) सिंध को बम्बई से पृथक किया जाए।

    (9) अन्य प्रान्तों की तरह उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त एवं बलूचिस्तान में भी समान अधिकार दिए जाएं।

    (10) मुस्लिम संस्कृति, धर्म, निजी कानून, मुस्लिम शिक्षा तथा भाषा के उत्थान एवं रक्षा के लिए खुली वकालात करने की छूट हो।

    (11) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को संरक्षण प्राप्त हो।

    (12) केन्द्र एवं प्रांतीय सरकारों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या 1/3 हो।

    (13) यूनिटों की स्वीकृति के बिना संविधान में परिवर्तन नहीं किया जाए।

    (14) पृथक् मतदान प्रणाली, मुस्लिम स्वीकृति के बिना नहीं हटाई जाए।

    नेहरू रिपोर्ट में जिन्ना की मांग संख्या 1, 12 एवं 13 को छोड़कर शेष 11 मांगें पहले ही मान ली गई थीं किंतु जिन्ना को इनसे संतोष नहीं हुआ। दूसरी ओर हिन्दू महासभा को भी नेहरू समिति के कई प्रस्ताव स्वीकार नहीं थे, विशेषकर सिंध को बम्बई से पृथक् किए जाने का प्रस्ताव। शाहनवाज भुट्टो, मुहम्मद अली जिन्ना और सर गुलाम हुसैन चाहते थे कि सिंध को बम्बई से अलग किया जाए किंतु लाला लाजपतराय तथा हरचंदराय सिंध को बम्बई के साथ ही रखना चाहते थे ताकि पृथक सिंध क्षेत्र के रूप में एक मुस्लिम बहुल प्रांत का उदय नहीं हो सके। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, सिंध हिन्दू पंचायत आदि संगठनों ने पृथक्कीकरण के प्रस्ताव का विरोध किया। हिन्दू महासभा का आरोप था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण करने के लिए नेहरू रिपोर्ट में हिन्दुओं के लिए अहितकर प्रस्ताव रखे गए थे। इस प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के कारण यह रिपोर्ट कूड़े के ढेर में फैंक दिए जाने से अधिक महत्व प्राप्त नहीं कर सकी।


    साइमन कमीशन की रिपोर्ट

    ई.1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में दिए गए मुख्य सुझाव इस प्रकार थे-

    (1) प्रांतों में दोहरा शासन समाप्त करके उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए।

    (2) भारत के लिए संघीय शासन की स्थापना की जाए।

    (3) उच्च न्यायालय को भारतीय सरकार के अधीन कर दिया जाए।

    (4) अल्पसंख्यकों के हितों के लिए गवर्नर एवं गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां दी जाएं।

    (5) सेना का भारतीयकरण हो।

    (6) बर्मा को भारत से पृथक् किया जाए तथा सिंध एवं उड़ीसा को नए प्रांतों के रूप में मान्यता दी जाए।

    (7) प्रत्येक दस वर्ष पश्चात् भारत की संवैधानिक प्रगति की जांच को समाप्त कर दिया जाए तथा ऐसा लचीला संविधान बनाया जाए जो स्वतः विकसित होता रहे।

    सर जॉन साइमन साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली का विरोधी था। उसके अनुसार यह एक घृणित प्रणाली है जो वही बीमारी पैदा करती है जिसके निदान के लिए इसका प्रयोग किया जाता है परन्तु मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड आयोग की ही भांति साइमन कमीशन ने भी कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौते के सांप्रदायिक अंशों को स्वीकार कर लिया तथा मुसलमानों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व अर्थात् केन्द्रीय सभा एवं प्रांतीय विधायिकाओं में मुसलमानों के लिए अलग सीटों के आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार कर लिया। साइमन कमीशन की रिपोर्ट में भारत में बनने वाले भावी संघ के निम्न-सदन (लोकसभा) में 250 सीटें प्रस्तावित की गईं जिनमें से गैर-मुस्लिमों को 150 (60 प्रतिशत) तथा मुस्लिमों को 100 (40 प्रतिशत) सीटें देनी प्रस्तावित की गईं।


    पृथक मुस्लिम राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध

    नेहरू समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए 14 सूत्री मांग-पत्र के रूप में जिन्ना का साम्प्रदायिक कार्यक्रम सामने आ चुका था, कांग्रेस इस कार्यक्रम को अस्वीकार तो करती थी किंतु देश में जिन्ना का खुलकर विरोध नहीं किया जा रहा था। नवम्बर 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाने वाला था। इसलिए हिन्दू महासभा के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. शिवराम मुंजे ने एक वक्तव्य जारी करके भारत सरकार को संविधान संशोधन के विषय में कुछ सुझाव दिए-

    (1) सभी समुदायों को अपने मताधिकार के प्रयोग करने के समस्त अधिकार सभी प्रांतों में समान होने चाहिए।

    (2) समस्त समितियों के लिए संयुक्त चुनाव पद्धति द्वारा चुनाव कराए जाएं।

    (3) किसी धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर सीटों के आरक्षण न दिए जाएं।

    (4) किसी भी प्रांत में सीटों का आरक्षण बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में नहीं हो।

    (5) भारत के प्रांतों का प्रतिनिधित्व, यदि आवश्यक हो तो योग्यता के आधार पर किया जाए।

    (6) धर्म की बहुलता के आधार पर प्रांतों की रचना नहीं की जानी चाहिए जिसके कारण भारत मुस्लिम भारत, सिख भारत, ईसाई भारत और हिन्दू भारत के रूप में विभाजित हो जाए तथा राष्ट्रीयता के लिए बाधक बन जाए।

    (7) सरकारी नौकरियों की प्राप्ति में किसी धर्म या जाति को महत्व न देकर प्रतियोगिता को महत्व दिया जाए।

    (8) केन्द्र एवं प्रांतीय मंत्रिमण्डलों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या निर्धारित नहीं की जानी चाहिए, सम्मिलित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

    (9) केन्द्र सरकार को अपनी बची हुई शक्ति प्रांतों को नहीं देनी चाहिए। केन्द्र सरकार मजबूत होनी चाहिए।

    (10) सभी सम्प्रदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वतंत्रता, पूजा पद्धति की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा प्राप्ति की स्वतंत्रता तथा संस्थाओं के गठन की स्वतंत्रता होनी चाहिए।


    लंदन के गोलमेज सम्मेलनों में सरकार की विफलता

    साइमन कमीशन की रिपोर्ट में प्रस्तावित संघीय-भारत के निर्माण की दिशा में विचार विमर्श करने हेतु, ब्रिटिश सरकार ने 12 नवम्बर 1930 को लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया। सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में तीव्र मतभेद हो जाने से भारत में संघीय सरकार के निर्माण पर कोई निर्णय नहीं हो सका। 17 सितम्बर 1931 को लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से अकेले गांधीजी ने भाग लिया। यह सम्मेलन भी असफल रहा। 17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस समय कांग्रेस अवैध संस्था घोषित हो चुकी थी इसलिये वह सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी।


    सिंध को मुस्लिम-बहुल प्रांत बनाने की मांग

    मुस्लिम लीग के ई.1930 के इलाहाबाद सम्मेलन के तुरंत बाद ई.1931 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने भारतीय विधान सभाओं में मुस्लिम समुदाय के लिये जनसंख्या के अनुपात से सीटों के आरक्षण की मांग की। उन्होंने यह मांग भी की कि सिंध को नये मुस्लिम बहुल प्रांत का दर्जा दिया जाये। ई.1931 में जिन्ना ने कहा कि भारत की समस्या को सुलझाने के लिए चार पक्षों में बात-चीत आवश्यक थी- (1) अंग्रेज सरकार, (2) भारतीय राज्य (देशी रियासतें) (3) मुसलमान और (4) हिन्दू। ई.1938 में उसने अपने इस तर्क को पुनः दोहराया।


    अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की हवा निकाली

    ई.1932 में अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयास किए गए तथा एकता सम्मेलन का आयेाजन किया गया। इस सम्मेलन द्वारा नवम्बर 1932 में नियुक्त कमेटी हिन्दू-मुस्लिम समस्या के हल के एकदम करीब पहुंच गई थी। केन्द्रीय विधानसभा में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के बारे में एक समझौता भी हो गया था और तय हो गया था कि 32 प्रतिशत सीटें मुसलमानों को दी जाएंगी। लेकनि कमेटी का काम पूरा होने से पहले ही भारत सचिव सैमुएल होर ने हस्तक्षेप किया और घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को केंद्रीय विधानसभा में 33.33 प्रतिशत सीटें देने का फैसला किया है। उसने सिंध को भी अलग प्रदेश घोषित किया और उसको प्रचुर आर्थिक सहायता देने का वायदा किया। इस तरह एकता सम्मेलन की सारी मेहनत पर पानी फिर गया।


    ई.1932 का साम्प्रदायिक पंचाट

    जब गोलमेज सम्मेलनों से भी साम्प्रदायिक समस्या का समाधान नहीं हो पाया तो 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश सरकार ने अपनी तरफ से साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा की। इस पंचाट निर्णय के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने केन्द्रीय विधान सभा में गैर-मुस्लिमों को 250 में से 105 सीटें (42 प्रतिशत) दी गईं जबकि भारत में हिन्दुओं की संख्या 75 प्रतिशत थी। मुसलमानों को 33 प्रतिशत सीटें दी गईं जबकि उनकी जनसंख्या 25 प्रतिशत थी। साइमन कमीशन ने गैर-मुस्लिमों के लिए केन्द्रीय विधान सभा में 250 में से 150 (60 प्रतिशत) सीटें प्रस्तावित की थीं किंतु प्रधानमंत्री मैकडानल ने इन सीटों को घटाकर 42 प्रतिशत कर दिया। इससे हिन्दुओं, सिक्खों, जैनों एवं बौद्धों में सरकार एवं मुसलमानों के प्रति क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इस पंचाट निर्णय के अन्तर्गत मुसलमानों की ही तरह यूरोपियनों, सिक्खों, भारतीय ईसाईयों, एंग्लो-इंण्डियनों, राजाओं और जागीरदारों को विभिन्न प्रान्तीय विधान सभाओं में अपने-अपने समुदायों के प्रतिनिधियों को पृथक् निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने का अधिकार दिया गया।

    डा. अम्बेडकर के प्रयत्नों से दलित वर्ग को अपने प्रतिनिधियों को पृथक निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने की सुविधा दी गई। इस प्रकार इस पंचाट के माध्यम से अँग्रेजों ने बांटो एवं राज्य करो के सिद्धान्त पर देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने, दलितों को अलग प्रतिनिधित्व देकर हिन्दू-समाज का बंटवारा करने, भारतीय अल्पसंख्यकों को अनुचित महत्त्व प्रदान कर राष्ट्रीय एकता को छिन्न-छिन्न करने, राजाओं और जागीरदारों के लिए पृथक्-निवार्चन की व्यवस्था कर अप्रजातांत्रिक तत्त्वों को प्रोत्साहन देने तथा भारत में प्रगतिशील तत्त्वों की गतिविधियों को नियंत्रित एवं कमजोर करने का षड़यंत्र रचा तथा धर्म एवं व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व का विभाजन करके भारत को नई समस्याओं के खड्डे में फैंक दिया।


    गांधी और अम्बेडकर में पूना-पैक्ट

    गांधीजी ने साम्प्रदायिक पंचाट का, विशेषकर दलितों को हिन्दुओं से पृथक् करने वाले प्रावधानों का जोरदार विरोध किया तथा 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गये। डॉ. अम्बेडकर ने इस व्रत को 'राजनैतिक धूर्त्तता' बताया। कुछ लोगों ने इसे अपनी मांग मनवाने का तरीका बतलाया। जब गांधीजी का स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने लगा तब कांग्रेसी नेताओं ने 26 सितम्बर 1932 को डॉ. अम्बेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता करवाया। यह समझौता पूना पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध है। इसके द्वारा साम्प्रदायिक पंचाट के आपत्तिजनक भाग को हटाया गया तथा डॉ.अम्बेडकर दलितों के लिए दुगने स्थान सुरक्षित करवाने में सफल रहे। भारत की समस्या के हल को लेकर डॉ. अम्बेडकर का गांधीजी और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों से विवाद रहता था। इसलिए अम्बेडकर ने गांधी और जिन्ना की तुलना करते हुए कहा कि- 'इन दोनों ही नेताओं को भारतीय राजनीति से अलग हो जाना चाहिए।'


    भारत सरकार अधिनियम 1935 में अल्पसंख्यकों का हिन्दुओं पर वर्चस्व

    लंदन के तीन गोलमेज सम्मेलनों एवं साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा के बाद भारत में नया संविधान लागू किया गया। इसे भारत सरकार अधिनियम 1935 कहते हैं। इस संविधान ने भारत सरकार अधिनियम 1919 का स्थान लिया। नए कानून के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे-

    (1) बर्मा को भारत से पृथक् कर दिया जाएगा।

    (2) उड़ीसा एवं सिंध नामक नवीन प्रांतों का गठन किया जाएगा।

    (3) एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश-भारत के प्रान्त एवं देशी राज्य सम्मिलित होंगे।

    (4) प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा।

    (5) शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किए जायेंगे- (प) संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे। (पप) प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा (पपप) समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून मान्य होगा।

    (6) संघीय संविधान के अधीन दो सदन होंगे।

    (7) हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में 375 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के प्रतिनिधियों की संख्या 250 एवं देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 125 होगी।

    (8) निम्न-सदन में ब्रिटिश-भारत के 250 प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा होगा। इनमें से 105 सीटें सामान्य थीं जबकि 19 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 82 सीटें मुसलमानों के लिए, 6 सीटें सिक्खों के लिए, 4 एंग्लो-इण्डियन के लिए 8 सीटें यूरोपियन्स के लिए, 8 सीटें भारतीय ईसाइयों के लिए, 11 सीटें उद्योगपतियों के लिए, 7 सीटें जमींदारों के लिए, 10 सीटें श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए, 9 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थीं।

    (9) कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में कुल 260 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के सदस्यों की संख्या 156 तथा देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 104 होगी। ब्रिटिश-भारत के 156 सदस्यों में से 75 सीटें जनरल के लिए, 6 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 4 सिक्खों के लिए, 49 मुसलमानों के लिए, 6 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-109

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-109

    डॉ. अम्बेडकर की नियुक्ति में पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी


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    संविधान सभा में सरदार पटेल ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनवाने के लिये नेताओं को सहमत किया तथा अम्बेडकर के पक्ष में वातावरण तैयार किया। सरदार पटेल संविधान सभा की अनेक महत्त्वपूर्ण सामितियों यथा अल्पसंख्यक समिति, आदिवासी समिति, मौलिक अधिकार समिति तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष थे।

    पटेल ने संविधान सभा में प्रांतीय संविधान का मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें राज्यपालों को अत्यंत सीमित अधिकार दिये गये। पटेल चाहते थे कि राज्यपाल किसी भी स्थिति में, चुनी गई सरकार के कामकाज को प्रभावित न करें। पटेल ने ही राष्ट्रपति द्वारा संसद में दो एंग्लो इण्डियन्स को नामित करने का प्रावधान करवाया।

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  • राजाओं और नेताओं के मध्य वाक्युद्ध आरंभ हो गया!

     03.06.2020
    राजाओं और नेताओं के मध्य वाक्युद्ध आरंभ हो गया!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मार्च 1940 में नयी दिल्ली में वायसराय की अध्यक्षता में चैम्बर ऑफ प्रिसेंज की बैठक हुई जिसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया कि भारत के राजा अपने राज्यों की सम्प्रभुता की गारण्टी, संधि में प्रदत्त अधिकारों की सुरक्षा तथा ब्रिटिश प्रभुसत्ता के किसी अन्य भारतीय सत्ता को स्थानांतरण से पूर्व राजाओं की सहमति प्राप्त किये जाने की अनिवार्यता की शर्त पर ही डोमिनियन स्टेटस के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान करेंगे। लंदन से प्रकाशित समाचार पत्र 'द टाइम्स’ ने इस पर टिप्पणी की कि यह प्रस्ताव प्रदर्शित करता है कि भारतीय राजा संवैधानिक प्रगति का विरोध करते हैं तथा वे भारतीय आजादी का भी विरोध करते हैं।


    नवानगर के जाम साहब ने मांग की कि राजाओं के राज्य की सुरक्षा के लिये नये संविधान में विशेष सुरक्षा उपाय एवं गारण्टियाँ होनी चाहिये तथा राजाओं की सहमति के बिना उनके अधिकारों में परिवर्तन का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। भारत की सभी इकाईयों के लिये संवैधानिक बाध्यता होनी चाहिये कि वे एक दूसरे का सम्मान करें तथा उन इकाईयों के लिये विशेष आचरण संहिता होनी चाहिये। संविधान बनाने के लिये राजा लोग किसी भी विचार विमर्श में सम्मिलित होने के लिये तैयार हैं जो कि वायसराय द्वारा आरंभ किया गया हो किंतु तभी जबकि राजाओं की आवाज को उनकी महत्ता और ऐतिहासिक स्थिति के अनुसार आनुपातिक रूप से प्रमुखता दी जाये।

    बीकानेर नरेश गंगासिंह ने कहा कि राजाओं ने विगत 10 वर्षों में अपनी स्थिति बिना किसी त्रुटि के स्पष्ट की है। उन्होंने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया है जो ब्रिटिश ताज के अधीन डोमिनियन स्टेटस की ओर ले जाते हैं। इस समय राजा लोग केवल अपनी सम्प्रभुता की गारण्टी और सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहे हैं।

    गंगासिंह ने कहा कि भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक धड़ों में राजाओं को विश्वास में लिये बिना भारत का भविष्य निर्धारित किये जाने की मनोवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में यह दोहराया जाना उपयुक्त था कि राज्यों की पूर्ण स्वतंत्रता तथा ब्रिटिश सत्ता के साथ चुनौती विहीन समानता को ध्यान में रखे बिना लिया गया कोई भी फैसला राजाओं को स्वीकार्य नहीं होगा। संवैधानिक समझौता दो पक्षों के बीच नहीं अपितु तीन पक्षों- ब्रिटिश ताज, ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के मध्य होना चाहिये। अब तक यह देखा गया है कि भारतीय राजा तस्वीर में ही नहीं लाये गये हैं।

    महाराजा ने कहा कि कांग्रेस की तरफ से यह आरोप लगाया जा रहा है कि राजा लोग साम्राज्य की उपज हैं, यह भी कि राजा लोग ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज से अलग उनका कोई स्थान नहीं है, यह भी कि रियासतों का प्रश्न भारत की साम्राज्यिक प्रगति के उद्देश्य के लिये लटकायी गयी मछली है, यह कि रियासतों की समस्या ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया भूत है, .........मुझे यह कहने की इजाजत होनी चाहिये कि कई छोटी और बड़ी रियासतें अपने अस्तित्व के लिये अपने प्राचीन शासकों की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं तथा भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से कहीं अधिक पुरानी हैं। उनके दावों को, ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करके हवा में खारिज नहीं किया जा सकता। यह तो ब्रिटिश भारत ही है जो कि ब्रिटिश सरकार की रचना है। यह आरोप भी लगाया गया है कि राजाओं ने कांग्रेस के प्रति अमित्रता का व्यवहार किया है किंतु यह स्थिति का सही विवेचन नहीं है। कांग्रेस ही लगातार देशी राजाओं के प्रति सक्रिय विरोध का प्रदर्शन करती रही है। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने बयान दिये हैं कि वे रियासतों को संघ में नहीं देखना चाहते। यह कि वे राज्यों की संधियों को रद्दी कागज का टुकड़ा समझ कर फाड़ देंगे और यहाँ तक कि वे रियासतों को समाप्त हुआ देखना चाहेंगे।

    सम्मेलन में उपस्थित राजाओं ने ब्रिटिश ताज के प्रति वफादारी निभाने तथा साम्राज्य के प्रति सहयोग करते रहने का प्रस्ताव भी पारित किया। इस पर लंदन से प्रकाशित होने वाले द टाइम्स समाचार पत्र ने टिप्पणी की कि ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा आवश्यकता पड़ने पर देशी राजाओं के इस प्रस्ताव से लाभ उठाने की तैयारियां कर ली गयी हैं तथा भारतीय सैनिक टुकड़ियां ब्रिटिश सेनाओं के साथ मिलकर युद्ध में भाग ले रही हैं।

    सम्मेलन में वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा कि यद्यपि संघीय योजना स्थगित कर दी गयी है किंतु साम्राज्यिक सरकार विश्वास करती है कि भारतीय एकता केवल संघ के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है तथा संघ को देशी राज्यों की विशेष परिस्थितियों एवं परम्पराओं को अनुमति देनी होगी। देशी राज्यों के बिना अखिल भारतीय संघ वैसा ही अविचारणीय होगा जैसा कि ब्रिटिश भारतीय संघ मुसलमानों के बिना।

    वायसराय ने कहा कि यह अच्छा होगा कि कांग्रेस इस सच्चाई को समझे कि भारत में संवैधानिक प्रगति को इसलिये स्थगित कर दिया गया है क्योंकि भारत की मुख्य पार्टियाँ परस्पर सहमति बनाने में असफल रही हैं। युद्ध के चलते हुए भी भारत सरकार एवं साम्राज्यिक सरकार ने कांग्रेस तथा ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग के बीच बन गयी खाई को पाटने के परिश्रम युक्त कार्य को छोड़ा नहीं है।

    बहुसंख्य छोटी रियासतों की समस्याओं की और भी वायसराय ने देशी राजाओं का ध्यान आकर्षित किया जिनके पास आधुनिक प्रशासन को चलाने के लिये न तो आदमी हैं और न धन। सामान्य सेवाओं के निष्पादन के लिये, जहाँ कहीं भी भौगोलिक रूप से संभव हो, इन रियासतों के समूहीकरण के द्वारा संघीय इकाईयों के निर्माण की योजना भी वायसराय के मस्तिष्क में थी। इससे इन देशी रियासतों के भारतीय संघ में सम्मिलन का मार्ग भी सरल हो जायेगा।

    बीकानेर नरेश द्वारा चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में दिये गये भाषण में कांग्रेस की आलोचना पर नेताओं में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई। महाराजा ने अपने पूर्वजों की बलिष्ठ भुजाओं का उल्लेख करके नेताओं को खुली चुनौती दी थी। महाराजा ने मानो पानी में ही आग लगा दी थी इसलिये भारतीय राजनीति का अप्रत्याशित रूप से गर्म हो उठना स्वाभाविक था। गांधीजी के परम सहयोगी प्यारे लाल ने हरिजन में विस्तृत लेख माला लिखकर राजाओं को उनकी वास्तविक सामर्थ्य बताने का बीड़ा उठाया जिसका विस्तार से उल्लेख आगे की कड़ियों में किया जायेगा।

    देश बड़ी ही विचित्र स्थिति में जा पहुंचा था। एक ओर तो ब्रिटिश भारत की जनता गोरों से आजादी प्राप्त करने के लिये सड़कों पर संघर्ष कर रही थी तो दूसरी ओर भारतीय नौजवान सेनाओं में भर्ती होकर अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद की रक्षा के लिये लड़ रहे थे। एक ओर कांग्रेस गोरों को देश से भगाने का उपक्रम कर रही थी तो दूसरी ओर राजा लोग किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि गोरे भारत छोड़कर जायें। एक ओर कांग्रेस ब्रिटिश भारत और रियासती भारत को एक करने के लिये जूझ रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग अलग मुस्लिम देश की मांग करके कांग्रेस के सिर में दर्द पैदा कर रही थी और गोरी सरकार की मुश्किलों को दूर करने में सहयोग दे रही थी।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 15

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 15

    असम्भव सपना: पाकिस्तान


    रहमत अली ने किया पाकिस्तान शब्द का आविष्कार


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    ई.1933 में रहमत अली नामक एक विद्यार्थी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें कहा गया कि भारतीय मुसलमानों को अपना राज्य हिन्दुओं से अलग कर लेना चाहिये। रहमत अली ब्रिटेन में रहकर पढ़ रहा था और उस समय उसकी आयु 40 वर्ष थी। उसने अपने प्रस्ताव में कहा कि भारत को अखण्ड रखने की बात अत्यंत हास्यास्पद और फूहड़ है। भारत के जिन उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों- पंजाब, काश्मीर, सिंध, सीमांत प्रदेश तथा ब्लूचिस्तान में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें अलग करके पाकिस्तान नामक देश बनाया जाना चाहिये। उसके प्रस्ताव का समापन इन शब्दों के साथ हुआ था- 'हिन्दू राष्ट्रीयता की सलीब पर हम खुदकुशी नहीं करेंगे।'

    कैंब्रिज विश्वविद्यालय के भारतीय मुस्लिम विद्यार्थियों ने रहमत अली का साथ दिया। उन्होंने 'पाकिस्तान नाउ ऑर नेवर।' शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें कहा गया कि- 'भारत किसी एक अकेले राष्ट्र का नाम नहीं है। न ही एक अकेले राष्ट्र का घर है। वास्तव में यह इतिहास में पहली बार ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित एक राष्ट्र की उपाधि है। मुसलमानों की जीवन शैली भारत के अन्य लोगों से भिन्न है। इसलिये उनका अपना राष्ट्र होना चाहिये। हमारे राष्ट्रीय रिवाज और कैलेंडर अलग हैं। यहाँ तक कि हमारा खान-पान तथा परिधान भी भिन्न है।' रहमत अली ने 'पाकिस्तान' शब्द के दो अर्थ बताये- पहले अर्थ के अनुसार पाकिस्तान माने पवित्र भूमि। दूसरे अर्थ के अनुसार पाकिस्तान शब्द का निर्माण उन प्रांतों के नामों की अंग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षरों से हुआ है जो इसमें शामिल होने चाहिये- पंजाब, अफगानिया (उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत), काश्मीर तथा सिंध। शेष शब्द बलूचिस्तान शब्द के अंतिम भाग से लिये गये। बाद में देश के पूर्वी भाग में स्थित असम तथा बंगाल और दक्षिण में स्थित हैदराबाद तथा मालाबार को भी पाकिस्तान में शामिल करने की योजना बनायी गयी। इस योजना के अनुसार संपूर्ण 'गैर-मुस्लिम राष्ट्र' को 'मुस्लिम-देश' द्वारा घेरा जाना था तथा गैर-मुस्लिम राष्ट्र के बीच-बीच में मुस्लिम पॉकेट यथा अलीगढ़, भोपाल, हैदराबाद, जूनागढ़, आदि को भी पाकिस्तान का हिस्सा होना था।

    रहमत अली के इस प्रस्ताव पर जिन्ना की प्रतिक्रिया के बारे में लैरी कॉलिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- 'जिस व्यक्ति को एक दिन पाकिस्तान के पिता की संज्ञा से विभूषित किया जाने वाला था, उसी मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को एक असम्भव सपना कह कर ई.1933 में रहमत अली का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।' वस्तुतः रहमत अली जीवन भर लंदन में रहकर पाकिस्तान के लिये संघर्ष करता रहा किंतु जिन्ना ने कभी भी रहमत अली को महत्व नहीं दिया। जिन्ना को भय था कि कहीं रहमत अली, जिन्ना का स्थान न छीन ले।


    मुहम्मद अली जिन्ना का भारत की राजनीति में पुर्नआगमन

    जैसे ही ई.1933 में रहमत अली ने 'पाकिस्तान' नामक राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत की, वह अवधारणा रातों-रात लंदन में रहने वाले मुस्लिम युवाओं के बीच प्रसिद्धि पा गयी। दुनिया भर के अखबार इसका हल्ला मचाने लगे तो मुस्लिम लीग की हवाई कल्पनाओं को मानो नये पंख मिल गये। अब मुस्लिम लीग को एक ऐसे लीडर की तलाश थी जिसने भारत से बाहर निकलकर दुनिया को देखा हो, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को जानता हो और जो अंग्रेजों से उन्हीं की भाषा में पूरे फर्राटे के साथ बात कर सके। जो नेहरू, पटेल और गांधी जैसा बड़ा वकील हो और जो नेहरू, गांधी और पटेल से भारत का एक बड़ा हिस्सा छीन सके।

    मुस्लिम लीगी नेताओं की दृष्टि फिर से अपने पुराने अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना पर टिक गयी और वे उसे ई.1934 में लंदन से बैरिस्टरी का काम छुड़वाकर फिर से भारत ले आये। यह पहली बार हो रहा था कि भविष्य में बनने वाले एक देश के लिये एक नेता लंदन से आयात किया जा रहा था। उसी साल जिन्ना केन्द्रीय धारा सभा के लिये चुना गया और उसी साल वह अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का पुनः अध्यक्ष भी हुआ। इस बार जिन्ना के तेवर बदले हुए थे। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रवाद का अलाप लगाना छोड़कर मुस्लिम हितों की बात कर रहा था। वह कांग्रेस के नेताओं के विरोध में बोलने के लिए अवसरों की ताक में रहता था और गांधी एवं नेहरू की खुलकर आलोचना करता था। अब वह कांग्रेस में नहीं था, केवल मुस्लिम लीग में था। इस बार वह भारतीय नहीं था, केवल मुस्लिम नेता था। इस बार उसे भारत की आजादी और उन्नति की चिंता नहीं थी, केवल मुसलमानों के भावी देश के निर्माण की चिंता करनी थी। अब पाकिस्तान जिन्ना के लिए 'असम्भव सपना' नहीं था अपितु केवल 'यही एक सपना शेष' रह गया था जिसे जिन्ना अपने जीवन काल में पूरा होते हुए देखना चाहता था।

    एक ओर जिन्ना और मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक राजनीति के खतरनाक चरण में पहुंच चुके थे किंतु दूसरी ओर कांग्रेसी नेता बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पा रहे थे। वे हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपनी विरासत समझ रहे थे तथा मुस्लिम लीग एवं उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना, दोनों को सिरे से नकार रहे थे। जिन्ना को फिर से राजनीति में लौट आते हुए देखकर पाकिस्तान का स्वप्न देखने वाला रहमत अली बुरी तरह से चिढ़ गया। वह जिन्ना को पसंद नहीं करता था। रहमत अली इस्लाम की परम्परागत वेशभूषा, भाषा और खानपान को ही मुसलमान होने की गारण्टी मानता था जबकि जिन्ना अंग्रेजी कपड़े पहनता था, अंग्रेजी भाषा में सोचता और बोलता था, अंग्रेजी शैली में बैठकर खाना खाता था। इसलिए रहमत अली की दृष्टि में जिन्ना असली मुसलमान नहीं था। रहमत अली ने पहले भी जिन्ना के विरुद्ध आग उगली थी किंतु जब जिन्ना भारत छोड़कर इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी करने लगा तो रहमत अली ने उसके विरुद्ध बोलना बंद कर दिया था किंतु अब जबकि जिन्ना न केवल भारतीय राजनीति में लौट आया था, अपतिु मुस्लिम लीग का अध्यक्ष भी बन गया था, इसलिए रहमत अली ने जिन्ना के विरुद्ध हमले तेज कर दिए।

    8 जुलाई 1935 को रहमत अली ने एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें उसने जिन्ना को निशाना बनाते हुए कहा- 'मैं दिल से उम्मीद करता हूँ के आप मेहरबानी करके पाकिस्तान की अटल मांग पर हमें पूरा समर्थन देंगे। न्याय और समता पर आधारित हिंदोस्तान से भिन्न पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व के रूप में पाकिस्तान की मांग करना एक पवित्र अधिकार है। ....... पाकिस्तान हिन्दुओं की जमीन नहीं है और न ही उसकी जनता हिंदोस्तान की नागरिक है। ..... हमारे राष्ट्रीय जीवन का बुनियादी आधार और सार उससे एकदम अलग है जिस पर हिन्दूवाद आधारित है और परवान चढ़ रहा है। ..... सरकार द्वारा नामजद मुसलमान प्रतिनिधियों द्वारा गोलमेज सम्मेलन में भारत को महासंघ बनाने की योजना पर सहमति देकर किए गए हमारे राष्ट्रीय भविष्य के बेहद शर्मनाक समर्पण की हम पाकिस्तानी बार-बार भर्त्सना कर चुके हैं। ये लोग न तो पाकिस्तान के प्रतिनिधि थे और न ही पाकिस्तानी जनता की नुमाइंदगी कर रहे थे। ...... इतिहास की चेतावनी की पूरी तरह उपेक्षा करते हुए समर्पण की कला के इन प्रतिष्ठित महारथियों ने हमारी राष्ट्रीयता को बेच दिया है और भावी पीढ़ियों की बलि चढ़ा दी है। पाकिस्तान के साथ की गई सबसे ज्यादा अपमानजनक गद्दारी के लिए इन लोगों को इतिहास के सामने जवाबदेही करनी होगी। '

    संभवतः रहमत अली ने जिन्ना को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मान लिया था और उसी ईर्ष्या के कारण वह जिन्ना पर हमले कर रहा था। इसलिए जिन्ना भी तेजी से मुसलमानों के लिए अलग देश की राजनीति को आगे बढ़ा रहा था। भारत में एक केन्द्रीय अथवा संघीय व्यवस्था की स्थापना को जिन्ना ने 'हिन्दू राज्य का स्वप्न' कहना आरम्भ किया। जिन्ना का कहना था- 'आज हम केवल एक चौथाई भारत मांग रहे हैं और तीन चौथाई उनके लिए छोड़ देने को तैयार हैं। यदि उन्होंने अधिक जिद की तो शायद उन्हें यह भी न मिले।' एक अन्य अवसर पर जिन्ना ने कहा- 'हिन्दुओं ने पिछले एक हजार वर्षों से भारत पर राज्य नहीं किया है। हम उन्हें तीन चौथाई भारत राज्य करने के लिए दे रहे हैं। हमारे एक चौथाई भारत पर लालच की दृष्टि न रखो।'

    भारत के मुसलमान कभी हिन्दू राज्य स्वीकार नहीं करेंगे जिसका परिणाम यह होगा कि देश में अव्यवस्था और अराजकता फैल जाएगी। ई.1936 में शौकत अली की मूर्ति का अनावरण करते हुए जिन्ना ने कहा- 'वर्तमान राजनीतिक समस्या यह थी कि इंग्लैण्ड सारे भारत पर राज्य करने का इच्छुक था और गांधीजी इस्लामी भारत का शासक बनना चाहते थे और हम दोनों में से किसी एक को या समान रूप से दोनों को मुसलमानों पर नियंत्रण स्थापित करने नहीं देंगे।'

    उधर लंदन में रहमत अली जिन्ना को नकार रहा था तो इधर जवाहरलाल नेहरू देश में तेजी से पनप रही मुस्लिम लीग की समानांतर राजनीति पर हमले कर रहे थे। वे केवल कांग्रेस को ही भारतीय राजनीति में देखना चाहते थे। ई.1937 में जब प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हुए तो जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया- 'देश में केवल दो ही ताकतें हैं- सरकार और कांग्रेस।....... कांग्रेस सरकार के खिलाफ वोट देने का मतलब हैब्रिटिश प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए वोट देना.......केवल कांग्रेस ही सरकार का मुकाबला कर सकती है। कांग्रेस के विरोधियों के हित आपस में जुड़े हुए हैं। उनकी मांगों का जनता से कुछ लेना देना नहीं है।' इस वक्तव्य के कारण जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गया और उसके बाद उसने नेहरू को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। उसने तुरंत प्रतिवाद करते हुए कहा- 'मैं कांग्रेस का साथ देने से इंकार करता हूँ, देश में एक तीसरा पक्ष भी है और वह है मुसलमानों का।' कुछ दिन बाद जिन्ना ने नेहरू और कांग्रेस को चेतावनी दी- 'वे मुसलमानों को अकेला छोड़ दें।'

    नेहरू ने जवाब दिया- 'मिस्टर जिन्ना बंगाल के मुसमलान मामलों में कांग्रेस की दखलंदाजी पर एतराज करते हुए कहते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों को अकेला छोड़ दे। ...... किन मुसलमानों को? जाहिर है कि केवल उनको जो मिस्टर जिन्ना और मुस्लिम लीग के अनुयायी हैं। ....... मुस्लिम लीग का लक्ष्य क्या है? क्या वह भारत की आजादी के लिए लड़ रही है? क्या वह साम्राज्यवाद विरोधी है ? मेरा विचार है, नहीं। वह मुसलमानों के एक गुट की नुमाइंदगी करती है जिसमें निश्चित रूप से काफी प्रतिष्ठित लोग हैं। ये लोग उच्च-मध्यम वर्ग के ऊँचे हलकों में सक्रिय रहते हैं और उनका मुसलमान जनता से सम्पर्क नहीं है। मुसलमानों के निम्न-मध्यमवर्ग से भी उनका सम्बन्ध कम ही है। मिस्टर जिन्ना को जान लेना चाहिए कि मुस्लिम लीग के ज्यादातर सदस्यों के मुकाबले में मुसलमानों के ज्यादा सम्पर्क में रहता हूँ।'

    इस भाषण के एक माह बाद एक साक्षात्कार में जिन्ना ने कहा- 'हर बात में दखल देने वाले कांग्रेस के इस अध्यक्ष के बारे में क्या कहूँ? लगता है कि वे सारी दुनिया की जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ढो रहे हैं। अपने काम से मतलब रखने के बजाय हर बात में टांग अड़ाना उनके लिए जरूरी है।' नेहरू ने अपने भाषणों में बार-बार जिन्ना पर प्रहार किए कि वे ड्राइंग रूम की राजनीति से बाहर निकलकर सारे-सारे दिन खेतों में काम करने वाले एक करोड़ मुसलमानों तक पहुंचें। जिन्ना और मुस्लिम लीग के पास नेहरू के इन बयानों की कोई काट नहीं थी। उन्हें भय हुआ कि कहीं सचमुच ही निर्धन मुस्लिम समुदाय नेहरू एवं कांग्रेस की बातों में न आ जाए। जाहिर था कि लीग केवल एक ही तरीके से मुसलमान जनता को जगाकर, आंदोलित करके, अपने नेतृत्व के पीछे चला सकती थी। वह तरीका था- 'इस्लाम खतरे में है।' दीन का सवाल उठाकर ही लीग अपना झण्डा सबसे अलग उड़ा सकती थी।

    ई.1937 के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। ये चुनाव भारत सरकार अधिनियम-1935 में किये गये प्रावधानों के अंतर्गत हुए थे। मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। बंगाल, आसाम तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप मंर उभर कर सामने आई। केवल पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को कम मत मिले। ग्यारह प्रान्तों में मुसलमानों के लिए सुरक्षित 482 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटें, मुस्लिम लीग को 108 सीटें तथा निर्दलीय मुसलमानों को 128 सीटें मिलीं। पंजाब में अधिकांश सीटें यूनियनिस्ट पार्टी को मिलीं।

    बंगाल में फजलुल हक की प्रजा-पार्टी को 38 सीटें मिलीं। चुनावों में कांग्रेस को मिली भारी विजय से जिन्ना तिलमिला गया। उसने सोचा कि भारत के समस्त मुस्लिम राजनीतिक दलों को लीग के अन्तर्गत संगठित करके ही हिन्दुओं की पार्टी अर्थात् कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद जिन्ना ने द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुसलमानों की कमजोरी बनाने तथा उस कमजोरी को अपने पक्ष में भुनाने का निर्णय लिया। जिन्ना ने भारतीय राजनीति की पूरी दिशा बदल दी। उसके साथियों ने मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के झूठे आंकड़े और मनगढ़ंत घटनाएं प्रचारित करके 'इस्लाम खतरे में है' जैसे भड़काऊ नारे दिये और मुसलमानों में कृत्रिम भय पैदा करके साम्प्रदायिकता की समस्या को चरम पर पहुंचा दिया।

    13 अक्टूबर 1937 को जिन्ना बम्बई से लखनऊ गए। लखनऊ रेलवे स्टेशन पर मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने उनके डिब्बे को घेर लिया। उनका जोश इस कदर फूट पड़ रहा था और हिन्दू हमले का मुकाबला करने का उनका इरादा इतना पक्का था कि अक्सर शांत और अविचलित रहने वाले मि. जिन्ना भी भावुक हो गए।....... उनके चेहरे पर एक कठोर दृढ़ता छा गई। साथ ही उन्हें यह देखकर संतोष भी हो रहा था कि उनके लोग आखिरकार उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने जनता के भड़के हुए जज्बात पर मरहम लगाने के लिए कुछ लफ्ज कहे। कई मुसलमान तो वहाँ अपने नेता को देखकर जज्बात में आकर रोने लगे। उन्हें यकीन था कि उनका नेता उन्हें गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाएगा।

    ई.1937 के निर्वाचनों से यह स्पष्ट हो चुका था कि किसी भी केन्द्रीय व्यवस्था में हिन्दुओं का बहुमत रहेगा। इसलिए किसी ऐसी योजना को प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया जिसका मुसलमान जनता तथा विभिन्न मुस्लिम दल समर्थन करें और अंग्रेज सरकार उसे स्वीकार कर ले। जिन्ना को कांग्रेस की स्वीकृति की इतनी चिंता नहीं थी। अक्टूबर 1937 में जबकि कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमण्डलों को काम करते हुए कुछ सप्ताह भी नहीं बीते थे, जिन्ना ने यह आक्षेप लगाना आरम्भ कर दिया था कि मुसलमान कांग्रेस सरकार से किसी न्याय की आशा नहीं कर सकते। जिन्ना ने वंदे मातरम्, हिन्दी भाषा को प्रोत्साहन तथा कांग्रेसी ध्वज को सम्मान देने के विषय में शिकायत की।

    अप्रेल 1938 के मध्य में कलकत्ता के फ्लडलाइटों की रोशनी में नहाए हुए एम्फीथिएटर में जिन्ना ने ललकार कर कहा- 'कांग्रेस मुख्य तौर से एक हिन्दू संगठन है। मुसलमान एक से ज्यादा बार यह साफ कर चुके हैं कि धर्म, संस्कृति भाषा और विवाह कानून आदि के अलावा भी एक सवाल है जो उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन चुका है। उनका भविष्य और नियति इस बात पर निर्भर हैं कि उन्हें उनके राजनीतिक अधकार मिलते हैं या नहीं। उन्हें राष्ट्रीय जीवन में, सरकार में, देश के प्रशासन में उनकी वाजिब हिस्सेदारी मिलती है या नहीं। वे इसके लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे। हिन्दू राज स्थापित करने का कोई भी सपना और विचार कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मुसलमानों पर कोई हावी नहीं हो सकता और जब तक उनमें जरा सा भी दम बाकी है, वे हथियार नहीं डालेंगे।' जिन्ना कांग्रेस को मुस्लिम लीग का आदर करने और उससे डरने का सबक सिखाना चाहते थे, साथ ही अपने अनुयाइयों के लिए उनके पास पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने और ठोस रूप से एकजुट जनता के रूप में गोलबंद होने का सबक था।

    इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने अपने समाजवादी कार्यक्रम में मुसलमानों से सहयोग करने की अपील की किन्तु डॉ. इकबाल ने इसे मुसलमानों की सांस्कृतिक एकता को नष्ट करने की योजना बताया। इकबाल ने जिन्ना को भरपूर सहयोग दिया। इकबाल की मध्यस्थता से जिन्ना-सिकन्दर समझौता हुआ तथा पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के मुस्लिम सदस्य, मुस्लिम लीग के भी सदस्य बन गये। इसके तुरन्त बाद बंगाल में फजलुल हक के नेतृत्व में और सिन्ध में सादुल्लाखाँ के नेतृत्व में विधान सभाओं के मुस्लिम सदस्यों ने मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार कर ली। इससे मुस्लिम लीग शक्तिशाली पार्टी हो गई। इसी दौरान संयुक्त प्रान्त में मन्त्रिमण्डल निर्माण सम्बन्धी विवाद ने मुस्लिम लीग की लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान दिया।

    कांग्रेस और लीग के बीच अविश्वास की वृद्धि के कारण ऊपरी तौर पर गौण लगने वाले मसले, जैसे कि कांग्रेस के 'तिरंगे' झण्डे को फहराना, 'वन्देमातरम्' को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाना, उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग की मांग उठाना आदि भी अब साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए। जिन्ना ने इसका लाभ उठाया और मुसलमानों पर अपने नेतृत्व और मुस्लिम लीग का प्रभाव मजबूती से आरोपित कर दिया। फलस्वरूप ई.1927 में मुस्लिम लीग की सदस्य संख्या जो मात्र 1330 थी, ई.1938 में एक लाख हो गई और ई.1944 में 20 लाख पहुँच गई।

    जिन्ना मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था कहता था जबकि कांग्रेस उसके इस दावे को अस्वीकार करती थी क्योंकि जिन्ना के दावे को स्वीकार करने का अर्थ था कि कांग्रेस न तो एकमात्र अखिल भारतीय पार्टी है और न हिन्दू और मुसलमान, दोनों की पार्टी है। इस कारण जिन्ना, कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं, विशेषतः महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू से चिढ़ा हुआ रहता था। वह गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी, साँप और हर किसी से होड़ करने वाला हिन्दू कहता था। गांधीजी के लिये उसका कहना था- 'इस आदमी को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।' जवाहरलाल नेहरू के लिये जिन्ना का कहना था- 'उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।'

    कांग्रेस के नेताओं के लिये जिन्ना का व्यवहार असह्य था। फिर भी गांधीजी हर हाल में जिन्ना को कांग्रेस के आंदोलन के साथ रखना चाहते थे। इस प्रकार कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग, दोनों पार्टियों के शर्षस्थ नेताओं के व्यक्तिगत मतभेदों ने देश में साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया। अप्रेल 1938 में नेहरू एवं जिन्ना के मध्य हुए पत्र-व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में कई मौलिक अंतर थे। जिन्ना चाहता था कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया जाए। नेहरू उसे केवल एक साम्प्रदायिक संगठन मानने को तैयार थे। जिन्ना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का व्यवहार एकाधिकारी तथा प्रभुत्वसम्पन्न संस्था जैसा था। 12 अप्रेल 1938 के पत्र में जिन्ना ने लिखा- 'जब तक मुस्लिम लीग को कांग्रेस पूर्ण समानता के स्तर पर स्वीकार नहीं करती और एक हिन्दू-मुस्लिम समझौते के बारे में बातचीत नहीं करती, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी और अपनी आंतरिक शक्ति पर निर्भर रहना पड़ेगा। वह ही हमारे महत्व और प्रतिष्ठा का सूचक होगा।'

    26 दिसम्बर 1938 को बम्बई में दिए गए अपने भाषण में जिन्ना ने कांग्रेस के 'एक-राष्ट्र स्वप्न' की तीव्र आलोचना की तथा कांग्रेस को केवल एक हिन्दू संगठन बताया। जिन्ना ने गांधीजी पर तीखे प्रहार करते हए कहा- 'कांग्रेस के पीछे किसका दिमाग काम कर रहा है? मिस्टर गांधी का। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यह मिस्टर गांधी ही हैं जिन्होंने उन आदर्शों को नष्ट कर दिया है जिनके आधार पर कांग्रेस की शुरुआत हुई थी। इसी एक अकेले व्यक्ति के ऊपर कांग्रेस को हिंदूवाद के पुनरुत्थान का औजार बनाने की जिम्मेदारी जाती है। उनका लक्ष्य हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान करके इस देश में हिन्दू राज्य स्थापित करना है और अपने इसी मकसद के लिए वे कांग्रेस का इस्तेमाल कर रहे हैं ....... आज हिन्दू मानसिकता और हिन्दू नजरिया बड़ी सावधानी से पाला-पोसा जा रहा है। ...... नई शर्तें मानने और कांग्रेस नेताओं के आदेशों पर चलने के लिए मुसलमान मजबूर किए जा रहे हैं।'


    मुक्ति दिवस

    मुस्लिम लीग द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आक्षेप सम्बन्धी 'पिरपुर रिपोर्ट' ई.1939 में प्रकाशित हुई। इसी प्रकार बिहार में कांग्रेस शासन के दोषों को स्पष्ट करने के लिए 'शरीफ रिपोर्ट' प्रकाशित की गई। ई.1939 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों के त्यागपत्र दिए जाने के पश्चात् जिन्ना ने मुसलमानों से कहा कि वे 22 सितम्बर 1939 को 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाएँ क्योंकि कांग्रेस मंत्रिमण्डल समाप्त हो चुके थे।


    दीनिया संकल्पना

    ई. 1940 में रहमत अली ने 'इस्लाम की मिल्लत और भारतीयता का खतरा' शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित किया। इस इश्तहार में उसने कहा कि मुसलमानों को अलग राष्ट्र के निर्माण का प्रयास करना चाहिये। रहमत अली ने 'इण्डिया' शब्द के अंग्रेजी अक्षरों में हेरफेर करके 'दीनिया' शब्द का निर्माण किया जिसका अर्थ था- 'एक ऐसा उपमहाद्वीप जो इस्लाम में धर्मान्तरित होने की प्रतीक्षा कर रहा है।' रहमत अली ने बंगाल एवं आसाम का पुनः नामकरण करते हुए उसे 'बंगुश ए इस्लाम' नाम दिया। इस नाम का अर्थ था 'इस्लाम का बंगुश'। बंगुश बंगाल का एक मुगल सामंत था। रहमत अली ने बिहार का नाम फरूखिस्तान, उत्तर प्रदेश का नाम हैदरिस्तान तथा राजपूताना का नाम मोइनिस्तान रखा। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम पर मोइनिस्तान की कल्पना की गयी। उसने हैदराबाद का नाम ओसमानिस्तान रखा। मलाबार के मोपला मार्गों को मोपलिस्तान नाम दिया गया। इनके अलावा साफिस्तान और नसरिस्तान क्षेत्रों की भी कल्पना की गई। रहमत अली द्वारा दीनिया (भारत) के मानचित्र पर दिखाए गए गैरमुस्लिम क्षेत्र अप्रभावी और बेकार टुकड़े नजर आते थे जो मुस्लिम राज्यों के सभी ओर छितराए हुए थे। रहमत अली की कल्पना के अनुसार वे मुस्लिम राज्य हिन्दू भारत से संघर्ष के द्वारा जन्मे थे और इस हिन्दू भारत को अपने अंदर समाहित करने, उन्हें धर्मांतरित करने तथा उन पर विजय प्राप्त करने की नीति का अनुसरण कर रहे थे। ई. 1942 में रहमत अली ने एक और इश्तहार 'मिल्लत और उसका मिशन' निकाला जिसके अनुसार भारत की नियति में पूरी तरह इस्लाम और मुस्लिम प्रभुत्व में धर्मांतरित होना लिखा है।


    भारत-विभाजन योजनाओं की बाढ़

    भारत विभाजन की तरह-तरह की योजनाएं प्रस्तुत की जाने लगीं। कुछ ने रहमत अली की योजना के अनुसार प्रस्ताव किया कि सिर्फ पंजाब, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, ब्लूचिस्तान और काश्मीर को भारत से अलग कर देना चाहिए। कुछ लोग अब्दुल लतीफ की योजना का समर्थन करते थे जिसके अनुसार उपर्युक्त प्रांतों के अलावा बंगाल और हैदराबाद को भी अलग कर लेना चाहिए तथा एक मुस्लिम राज्य की स्थापना करनी चाहिए। यह राज्य भारत के सब मुसलमानों का राज्य होगा। कुछ समय बाद रहमत अली ने अपने विचार बदल लिए और उसने भारत के समस्त प्रांतों में मुसलमानों के स्वायत्तशासी राज्यों की मांग करनी शुरू कर दी थी।


    अंग्रेज सरकार मुस्लिम लीग से पूर्व-अनुमति ले

    इन योजनाओं से प्रभावित होकर जिन्ना ने फरवरी 1940 में भारत सरकार से मांग की कि कोई भी आगामी सुधार योजना उस समय तक लागू नहीं की जाए जब तक कि उसके लिए लीग की पूर्व अनुमति प्राप्त न हो जाए। इस समय तक मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश हेतु औपचारिक प्रस्ताव भी पारित नहीं किया था। 6 मार्च 1940 को अलीगढ़ में भाषण देते हुए जिन्ना ने कहा- 'हिन्दू-मुसलमान समझौता केवल समानता के आधार पर हो सकता है न कि गांधीजी की शर्तों के आधार पर। ' चूंकि यह समानता पश्चिमी प्रजातंत्रीय प्रणाली से उपलब्ध नहीं हो सकती थी इसलिए वे प्रजातंत्रीय प्रणाली के विरुद्ध थे। उसका तर्क था कि- 'इस्लाम ऐसे प्रजातंत्र में विश्वास नहीं रखता जिसमें निर्णय का अधिकार गैर-मुसलमानों को हो।' उसने हिन्दू मुस्लिम समझौते के सम्भव न होने के लिए मुख्य कारण यह बताया था कि मुसलमान भारत के भावी प्रशासन में बराबर के साझीदार होना चाहते थे। अर्थात् वह अपनी शर्तें कड़ी करता जा रहा था और बात को घुमाकर बड़े ही लच्छेदार शब्दों में कह रहा था कि भारत के भावी संघ की केन्द्रीय एवं प्रांतीय सभाओं में हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए बराबर संख्या में सीटें हों। यह मांग किसी भी प्रजातांत्रिक आधार पर उचित नहीं ठहराई जा सकती थी। इसलिए किसी समझौते का प्रश्न नहीं उठता था।


    मुस्लिम लीग का पाकिस्तान प्रस्ताव

    24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया जिसमें कहा गया कि- 'ऑल इण्डिया मुसलिम लीग के इस अधिवेशन का यह दृढ़ मत है कि कोई भी वैधानिक योजना इस देश में सफल नहीं हो सकती और न वह मुसलमानों को स्वीकार हो सकती है जब तक कि यह निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर तैयार नहीं की जाती: भौगोलिक दृष्टि से सटे प्रांतों (यूनिटों) को मिलाकर अंचल बना दिए जाएं। ये अंचल भूमि के आवश्यक आदान-प्रदान के साथ इस तरह बनाए जाने चाहिए जिससे वे क्षेत्र, जिनमें संख्या की दृष्टि से मुसलमानों का बहुमत है जैसे हिंदुस्तान के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में, मिलाकर स्वाधीन राज्य बना दिए जाएं जिनमें उनके घटक यूनिट स्वायत्त और सार्वभौम होंगे।'

    मुस्लिम लीग के इस लाहौर-प्रस्ताव में पाकिस्तान शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था किंतु इसे पाकिस्तान-प्रस्ताव के नाम से ही जाना जाता है। इस अधिवेशन में जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा- 'मैं चाहता हूँ कि आप अपने आप को संगठित करने का महत्त्व समझें ...... आप अपनी आंतरिक शक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। अपने आप पर निर्भर रहो। अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए अपने में शक्ति पैदा करो। ...... अंग्रेज सरकार द्वारा भारत के भविष्य के संविधान के संदर्भ में कोई घोषणा बिना हमारी सहमति नहीं की जानी चाहिए .......। यदि ऐसी कोई घोषणा की जाती है और बिना हमारी स्वीकृति और सहमति के कोई अंतरिम समझौता किया जाता है तो भारत के मुसलमान इसका विरोध करेंगे। ...... एक हजार वर्षों के सम्पर्क के बावजूद ऐसी राष्ट्रीयताएं जो सदा की भांति भिन्न और अलग-अलग हैं, केवल प्रजातंत्रीय प्रणाली की स्थापना से किस प्रकार एक राष्ट्र बन सकती हैं? .....भारत की समस्या अंतर्जातीय न होकर अन्तर्राष्ट्रीय है। यदि अंग्रेज सरकार इस उपमहाद्वीप के लोगों की सुख और समृद्धि की इच्छुक है तब एक मात्र विकल्प यही है कि भारत को कई राज्यों में विभक्त करके यहाँ की बड़ी कौमों को पृथक्-पृथक् भाग दे दिए जाएं। ..... यह एक स्वप्न है कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक सम्मिलित राष्ट्रीयता प्राप्त कर सकेंगे। ये दोनों सम्प्रदाय बिल्कुल भिन्न हैं। ...... वर्तमान कृत्रिम एकता केवल अंग्रेजी राज्य की देन है ...... भारत के मुसलमान किसी भी ऐसे संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं की सरकार स्थापित हो सके। मुसलमान एक अल्पसंख्यक समुदाय नहीं है ....... वे प्रत्येक परिभाषा के अनुसार एक कौम (नेशन) हैं और उन्हें अपना वतन, राज्य तथा क्षेत्रफल मिलना चाहिए ..... हम अपने लक्ष्य से डरा-धमकाकर विचलित नहीं किए जा सकते .....।'

    गांधीजी ने मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव पर तुरंत प्रतिक्रिया दी। 30 मार्च 1940 के हरिजन में उन्होंने लिखा- 'विभाजन एक स्पष्ट असत्य है। मेरी पूरी आत्मा इस विचार के खिलाफ है कि हिंदुत्व और इस्लाम- दो विरोधी संस्कृतियों तथा सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे सिद्धांत को मानना मेरे लिए ईश्वर को नकारना है। मैं अपनी पूरी आत्मा के साथ यह विश्वास करता हूँ कि कुरान का ईश्वर, गीता का भी ईश्वर है। मैं इस विचार का विरोध करता हूँ कि करोड़ों हिन्दुओं ने अपने धर्म के रूप में इस्लाम को स्वीकार करने के बाद अपनी राष्ट्रीयता बदल दी।' डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने दुःख के साथ कहा- 'द्विराष्ट्र का सिद्धांत एकता की संवेदनशील इच्छा के विकास की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेगा।' डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भविष्यवाणी की- 'विभाजन को सबसे अधिक सम्बद्ध लोगों की सद्भावना से प्राप्त करने की संभावना नहीं है, यह वैमनस्य दोनों ओर विद्यमान रहेगा।'

    हिन्दू नेताओं द्वारा दी जा रही प्रतिक्रियाओं को नकारते हुए, लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव का समर्थन करने वाले मुस्लिम लीगी नेता खलीकुज्जमाँ ने कहा- 'यदि हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच मुद्दों को तलवार के बल पर सुलझाना है तो मुसलमानों को कोई डर नहीं है।' मई 1940 में मुस्लिम लीग के बम्बई प्रादेशिक अधिवेशन में जिन्ना ने कहा- 'अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने भारत के मुसलमानों को सही दिशा दिखा दी है। उन्हें एक उत्तम कार्यक्रम, एक नीति, एक मंच और एक ध्वज प्रदान किया है ...... भारतीय राष्ट्र केवल कांग्रेस हाईकमाण्ड के मस्तिष्क में ही विद्यमान है। हमारा प्रस्ताव यह है कि हिन्दू और मुसलमान दो सम्मानपूर्ण कौमों की भांति साथ-साथ अच्छे पड़ौसियों की भांति रहें न कि हिन्दू उच्च और मुसलमान निम्न कौम की भांति रहें जिसमें हिन्दू बहुमत मुसलमानों पर नियंत्रण करे। भारत विभाजन की योजना साम्प्रदायिक नहीं अपितु राजनीतिक समस्याओं का हल है क्योंकि इस योजना के अधीन हिन्दू और मुसलमान समान अधिकार और स्थान प्राप्त कर सकेंगे। '

    के. एम. मुंशी ने अपनी पुस्तक पिलग्रिमेज टू फ्रीडम में लिखा है कि इसके तुरंत ही पीछे मुस्लिम लीग के नेताओं ने, जहाँ-जहाँ भी उनसे हो सका, बलवे कराने आरंभ कर दिये। ढाका, अहमदाबाद, बम्बई के बलवे तो अधिक भयंकर हुए थे।

    जिन्ना का कहना था कि पाकिस्तान के लिए संघर्ष अंग्रेजों से नहीं बल्कि कांग्रेस से था। नवम्बर 1940 में जिन्ना ने कहा- 'हम इंग्लैण्ड से अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते हैं। यही कारण है कि हमने आरम्भ से ही इंग्लैण्ड के मार्ग में रुकावटें नहीं डालीं। यद्यपि पाकिस्तान ही हमारी नौका का लक्ष्य है फिर भी हमने इंग्लैण्ड सरकार के समर्थन को प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान की मांग को पूर्व-शर्त के रूप में नहीं रखा। हमने केवल यह आश्वासन चाहा कि इंग्लैण्ड सरकार कांग्रेस से कोई स्थाई समझौता करके हमारा साथ न छोड़ दे।'

    दिसम्बर 1940 में जिन्ना ने पाकिस्तान योजना के पक्ष में यह तर्क दिया कि जिस प्रकार किसी एक सम्मिलित परिवार में दो भाइयों के लिए मिलकर रहना असम्भव हो जाने की स्थिति में सम्पत्ति विभाजन के पश्चात् वे शांति पूर्वक रह सकते हैं उसी प्रकार भारत विभाजन भी लाभदायक होगा किंतु जब ई.1944 में गांधीजी ने यही तर्क प्रस्तुत किया तो जिन्ना ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि तब मुसलमानों को एक केन्द्रीय व्यवस्था के अधीन रहना पड़ता। सितम्बर 1944 में गांधीजी भारत को दो राष्ट्रों का देश मानने को तैयार नहीं थे। वे इसे एक संयुक्त परिवार मान सकते थे जिसके वे मुसलमान सदस्य जो उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भागों में बहुमत में थे, अलग रहना चाहते थे। गांधीजी मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव को निम्नलिखित शर्तों पर स्वीकार करना चाहते थे -

    (1) निर्धारित क्षेत्रों के निवासियों की इच्छा किसी निर्वाचन अथवा अन्य पद्धति द्वारा जान ली जाए।

    (2) यदि उनका उत्तर हाँ में हो तो भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् उन्हें अलग स्वतंत्र राज्यों में संगठित कर दिया जाए।

    (3) एक संधि द्वारा बाह्य सुरक्षा, आंतरिक संचार साधन, आयात-निर्यात आदि विषयों का संचालन किया जाए।

    इस प्रकार लाहौर प्रस्ताव के परिणाम स्वरूप जो व्यवस्था उत्पन्न हो सकती थी, उसे गांधीजी ने स्वीकार तो किया किंतु वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। जिन्ना ने गांधीजी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस समय तक जिन्ना के लाहौर प्रस्ताव में एक परिवर्तन आ चुका था। वह अब उत्तर-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भागों को पाकिस्तान के दो क्षेत्र मानने लगा था तथा दोनों भागों को दो पृथक् राज्य बनाने के विरुद्ध हो चुका था। जिन्ना उपरोक्त विभाजन के बाद एक केन्द्रीय व्यवस्था के भी विरुद्ध था क्योंकि वह इस प्रकार के सम्मिलित प्रबन्धों का उत्तरदायित्व दोनों देशों की अलग संवैधानिक सभाओं को देना चाहता था।


    लिनलिथगो ने उठाया फायदा

    कांग्रेस विगत पचास सालों से भी अधिक समय से भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रही थी। उसकी इस मांग को न केवल पूरे भारत में अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिल रहा था। इस मांग का एक ही अर्थ था कि अंग्रेज सरकार कांग्रेस को सत्ता सौंप कर यहाँ से चली जाये किंतु मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग का फच्चर फंसा देने से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त 1940 के अपने प्रसिद्ध प्रस्ताव में कहा- 'बिना कहे यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार भारत की शांति और कल्याण की अपनी वर्तमान जिम्मेदारियां किसी ऐसी सरकार को नहीं सौंप सकतीं जिसके प्रभुत्व को भारत के राष्ट्रीय जीवन में विशाल और महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया हो।' वायसराय की इस घोषणा से मुस्लिम लीग को अपनी पाकिस्तान की मांग के प्रति नैतिक समर्थन मिल गया।


    ई.1941 में पाकिस्तान की मांग और पुष्ट हो गयी

    मुस्लिम लीग के ई.1941 के मद्रास वार्षिक सत्र में पाकिस्तान की मांग और भी जोरदार तरीके से की गयी। इस सत्र में जिन्ना द्वारा इस मांग की विस्तृत व्याख्या भी की गयी। उसने कहा कि ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का लक्ष्य है कि हम भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों में पूर्ण रूप से स्वतंत्र, अलग राष्ट्र की स्थापना करें जिसमें रक्षा, विदेश मामलों, संचार, कस्टम, मुद्रा विनिमय आदि पर पूरा हमारा नियंत्रण रहेगा। हम किसी भी परिस्थिति में एक केन्द्रीय सरकार के साथ संपूर्ण भारतीय संविधान नहीं चाहते। हम इसके लिये कभी सहमत नहीं होंगे।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-110

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-110

    पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिये जाने का विरोध किया


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    पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिये जाने का भी विरोध किया। पटेल का कहना था कि यह राशि काश्मीर में भारत के विरुद्ध काम में ली जायेगी किंतु गांधी ने पटेल की इस बात का यह कहकर विरोध किया कि यदि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये नहीं दिये गये तो उसके बदले में अधिक हिंसा और बदले की कार्यवाही की जायेगी।

    कैबीनेट ने पटेल के प्रस्ताव का पक्ष लिया किंतु गांधी ने आमरण अनशन पर बैठने की घोषणा कर दी जब तक कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये न दे दिये जायें। कैबीनेट ने गांधीजी की बात को स्वीकार कर लिया, इससे पटेल को दुःख हुआ।

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  • प्यारेलाल ने महाराजा गंगासिंह को मुँहतोड़ जवाब दिया

     03.06.2020
    प्यारेलाल ने महाराजा गंगासिंह को मुँहतोड़ जवाब दिया

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    बीकानेर गंगासिंह ने चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में दिये गये भाषण में तीन प्रमुख बातें कही थीं- एक तो यह कि राजा लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद की उपज नहीं हैं अपितु ब्रिटिश भारत ब्रिटिश सम्राज्यवाद की उपज है। दूसरी यह कि अधिकांश रियासतें अपने राजाओं की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं इसलिये उन्हें मिटाया नहीं जा सकता। तीसरी यह कि राजा लोग कांग्रेस से नहीं लड़ रहे, कांग्रेस राजाओं से द्वेष भाव रखती है।

    इन बातों का जवाब देने के लिये गांधीजी के परम सहयोगी प्यारेलाल ने 20 अप्रेल 1940 के हरिजन में एक विस्तृत लेख लिखा जिसमें कहा गया कि दुर्भाग्य से इस प्रकार की बेतुकी बात हो गयी है किंतु यह बहुत विलम्ब से कही गयी है। परमोच्च सत्ता से राजाओं के सम्बन्धों की संवैधानिक स्थिति चाकर अथवा अधीनस्थ सहयोग की है, कोई भी कह सकता है कि यह कांग्रेस की शब्दावली नहीं है। इसकी नींव उस साम्राज्यवादी शासन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों ने रखी थी जिसके बारे में बीकानेर के महाराजा अनेक बार कह चुके हैं कि उन्हें इन सम्बन्धों पर गर्व है। महाराजा की इस बात पर उठायी गयी आपत्ति कि राजा लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रचना हैं, भारतीय राज्यों की यह परिभाषा भारत सरकार अधिनियम 1935 में देखी जा सकती है जो कि इस प्रकार से है- ''भारतीय राज्य का अर्थ है कोई भी ऐसा क्षेत्र जो ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं हो, जिसे सम्राट ने राज्य होने की मान्यता दे रखी हो, चाहे वह स्टेट, अथवा एस्टेट अथवा जागीर या अन्य कुछ कह कर सम्बोधित की गयी हो।"

    प्यारेलाल ने लिखा कि राजाओं की वैधानिक स्थिति विशुद्धतः सम्राट की मान्यता पर निर्भर करती है। रियासती भारत के साथ ब्रिटिश सम्बन्धों का इतिहास ऐसे उदाहरणों से छितराया हुआ है जिनमें साम्राज्यिक शक्ति की एक श्वांस के द्वारा आवश्यकतानुसार परिवर्तित होती हुई नीति से रियासतों को बनाया गया अथवा बिगाड़ा गया अथवा जमींदारियों को ठिकानों में (चीफशिप्स) में बदला गया अथवा इसका उल्टा किया गया।.........मध्य भारत में इस समय ऐसी 145 रियासतें हैं जो मराठों की प्रभुसत्ता समाप्त होने के समय अस्तित्व में नहीं थीं उन्हें ए.जी.जी. द्वारा मान्यता प्रदत्त है। कुल 212 नयी रियासतों का निर्माण किया गया है.......इन रियासतों को श्रेणी प्रदान करते समय जिस सिद्धांत की पालना की गयी है उसमें रियासत के मुखिया के अधीन गाँवों की संख्या, उसकी आय तथा उसकी अन्य स्थिति को ध्यान में रखा गया है। यहाँ तक कि वे भूस्वामी जो एक या दो गाँवों के स्वामी थे, उन्हें भी छठी या सातवीं श्रेणी में रख दिया गया। आगे चलकर, नयी बनी हुई 212 रियासतें उत्तराधिकारियों के बंटवारे के कारण छोटी होती हुई विलुप्त हो गयीं और मात्र कृषि भूमि रह गयीं। कई रियासतें अपनी शक्तियों का उपयोग करने में असमर्थ पायी गयीं और वे समस्त शक्तियों से वंचित कर दी गयीं।

    अब उलटा करके देखें, इम्पीरियल गजेटियर 1907 में रियासतों की कुल संख्या 693 दी गयी है किंतु वर्ष 1925 की सूची में रियासतों की संख्या केवल 562 ही दी गयी है। 1925 में रियासतों की कम संख्या का कारण मध्य भारत एजेंसी के तहत ठिकाणों की संख्या का 148 से घटकर मात्र 89, बर्मा ऐजेंसी के तहत 52 से घटकर शून्य तथा असम एजेंसी के तहत 52 से घटकर 1 रह जाना है। यहाँ तक कि जोधपुर एवं भरतपुर के शक्तिशाली राजाओं की स्थिति भी चौंकाने वाले स्तर तक बदलती रही है........मुगल शासन द्वारा जोधपुर एवं भरतपुर के शक्तिसम्पन्न राजाओं को जमींदार कहकर संबोधित किया गया है जो कि वर्तमान समय में किये जाने वाले सम्बोधन से काफी नीचे है और हम उन शासकों के शासन काल के बारे में जानते हैं। वे बादशाह के सिंहासनारोहण के समय उपस्थित रहने के लिये बाध्य थे।

    प्यारेलाल लिखते हैं कि बीकानेर महाराजा का यह बयान सच नहीं है कि राजा लोग साम्राज्यिक सत्ता की रचना नहीं हैं। ऐतिहासिकता और सच्चाई यह है कि 562 रियासतों में से अधिकांश रियासतों का निर्माण ब्रिटिश सत्ता ने ही किया है। सच्चाई तो इससे भी आगे है। आज भारतीय रियसातों में आंतरिक प्रशासन के लिये अपनायी गयी पद्धति में न तो राजतंत्र के लिये आवश्यक खूबियां मौजूद हैं, न लोकप्रिय सरकारों की संवैधानिक पद्धतियां मौजूद हैं, वह व्यक्तिपरक शासन है जो कि भारत में साम्राज्यिक पद्धति द्वारा प्रदत्त शासन का सह उत्पाद है।

    महाराजा साहब का यह कथन कि अनेक रियासतें अपने अस्तित्व के लिये अपने वर्तमान शासकों के पूर्वजों की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं, मैं बीकानेर के इतिहास के गौरव को किंचित मात्र भी क्षति पहुँचाये बिना कहना चाहता हूँ कि बीकानेर और ब्रिटिश सरकार के मध्य प्रथम संधि 9 मार्च 1818 को हुई थी जिसमें कहा गया था कि महाराजा और उनके उत्तराधिकारी पर सहमत हैं कि ब्रिटिश सरकार राज्य की रक्षा करेगी तथा महाराजा और उसके उत्तराधिकारी ब्रिटिश सरकार के अधीनस्थ सहयोग के तहत काम करेंगे तथा उसकी सर्वोच्चता को स्वीकार करेंगे। महाराजा एवं उनके उत्तराधिकारी किसी के ऊपर आक्रमण नहीं करेंगे। ब्रिटिश सरकार को अधिकार होगा कि विद्रोही ठाकुरों और उनकी जनता को शक्तिविहीन कर दे। इस कार्य का पूरा व्यय बीकानेर राज्य को वहन करना होगा।

    प्यारेलाल आगे लिखते हैं- 1830 में ब्रिटिश रेजीडेंट ने विद्रोही सामंतों को कुचलने में महाराजा की सहायता के लिये बीकानेर राज्य में सेना भेजने का निर्णय लिया किंतु महाराजा को समझा दिया गया कि भविष्य में उसे अपनी असंतुष्ट जनता के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार से सैनिक सहायता मांगने का कोई अधिकार नहीं होगा। 1871 में असंतोष उत्पन्न हुआ, रियासत कर्ज में थी। महाराजा द्वारा राजस्व वृद्धि किये जाने के विरुद्ध प्रबल असंतोष भड़क गया। ठाकुर ने बीकानेर छोड़ कर ब्रिटिश सीमा में शरण ली। महाराजा और उसके सामंतों के बीच के विवाद को सुलझाने के लिये ब्रिटिश जाँच नियुक्त की गयी। ई.1883 में रियासत के मामले संदेह से देखे गये। बीकानेर में रेजीडेंट पॉलिटिकल एजेंट की नियुक्ति की गयी। क्या इन उदाहरणों के परिप्रेक्ष्य में भी महाराजा बीकानेर को अपने पूर्वजों की शक्तिशाली भुजाओं पर आधारित राज्य कहेंगे?

    प्यारेलाल ने बटलर समिति के हवाले से लिखा है- यह बात ऐतिहासिक तथ्यों से साम्य नहीं रखती कि ब्रिटिश सत्ता के संपर्क में आने से पूर्व भारतीय राज्य पूर्णतः स्वतंत्र थे। उनमें से कुछ का उद्धार किया गया, कुछ का निर्माण ब्रिटिश सत्ता द्वारा किया गया..... परमोच्चता और केवल परमोच्चता के माध्यम से ही ये सम्बन्ध मजबूत बनाये गये हैं।......... जिनके ऊपर भारतीय राजा अपनी सुरक्षा के लिये पीढ़ियों से विश्वास कर सकते आये हैं। यदि परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये तो रियासतों के नष्ट होने तथा उन्हें संलग्न कर लिये जाने का अत्यधिक खतरा है।

    भारत सरकार द्वारा अलिख भारतीय संघ की योजना स्थगित कर दिये जाने के बाद महाराजा गंगासिंह ने सम्राट के संरक्षण में एक एसे संघ की कल्पना की जिसमें भारतीय रियासतें समान जागीरदार के रूप में मानी जायें और राजाओं को वायसराय की देख-रेख में रखकर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रखे जायें। इसे देखते हुए 1941 में वी. पी. मेनन ने नयी योजना बनायी जिसके अनुसार रजवाड़ों को ब्रिटिश हिंदुस्तान का हिस्सा बन जाना था। इन राज्यों का आंतरिक प्रशासन राजाओं के ही हाथों में रहना था और सुरक्षा, विदेश तथा यातायात केंद्रीय सरकार के हाथों में ले लिया जाना था। इस योजना से केंद्रीय हिंदुस्तान की नींव पड़ सकती थी किंतु लार्ड लिनलिथगो ने उस योजना को उस कूड़े में डाल दिया जिस पर किसी की नजर भी नहीं पड़ सकती थी।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 16

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 16

    क्रिप्स मिशन की भारत-संघ योजना


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    दिसम्बर 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका का प्रवेश हुआ जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारत प्रकरण को सुलझाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अमरीकी राष्ट्रपति इलियट रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। ब्रिटिश सरकार अमरीकी सरकार की सलाह की अनदेखी नहीं कर सकी क्योंकि अमरीकी सहायता के कारण ही युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति में सुधार आया था तथा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था स्थिर रह पायी थी। मार्च 1942 में जापान की शाही फौज भारत के इतने नजदीक आ गई कि उसका आक्रमण कभी भी आरम्भ हो सकता था। यह आक्रमण भारत पर नहीं, भारत में डटे अंग्रेजों पर होना था। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत में स्वयं भारतीयों का सहयोग नहीं मिला तो जापानियों के सामने टिकना असम्भव हो जाएगा। बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने नरम रुख अपनाया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार को प्रथम गोलमेज सम्मेलन में आरम्भ हुई 'भारत संघ योजना' को फिर से आरम्भ करना पड़ा।

    11 मार्च 1942 को इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने हाउस ऑफ कॉमन्स में एक वक्तव्य दिया जिसमें कहा गया- 'युद्ध मंत्रिमंडल, सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेज रहा है ताकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की इच्छाओं के अनुसार जिन सुधारों का प्रस्ताव किया है उनके बारे में भारतीयों के भय और शंकाओं का निवारण किया जा सके। क्रिप्स को राजतंत्रीय सरकार का पूरा विश्वास प्राप्त है। क्रिप्स अपने साथ जो प्रस्ताव ला रहे हैं, वह या तो पूर्णतः स्वीकृत किया जाना चाहिए या फिर पूर्णतः अस्वीकृत।'

    22 मार्च 1942 को क्रिप्स दिल्ली पहुंचे। वे साम्यवादी चिंतन वाले नेता थे तथा उन्हें भारतीयों के साथ सहानुभूति थी किंतु वे राजाओं और राजशाही को पसंद नहीं करते थे। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। उनकी तैयारी केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग से निबटने की थी, उन्हें पता ही नहीं था कि भारत में उनके मिशन के लिए इन दोनों से बड़ी मुसीबत भारतीय राजाओं की है। राजाओं के पक्ष को लगभग अनसुना करने के कारण ही क्रिप्स मिशन सफल नहीं हो सका। भारत में उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग सहित विभिन्न भारतीय पक्षों से बात की तथा भारतीय क्या लेना चाहते हैं और इंग्लैण्ड की गोरी सरकार उन्हें क्या देना चाहती है, इस अंतर को समझने का प्रयास किया। वी. बी. कुलकर्णी ने लिखा है- क्रिप्स भारत का मित्र और शुभचिंतक समझा जाता था।

    28 मार्च 1942 को क्रिप्स ने नरेन्द्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से वार्ता की। क्रिप्स ने राजाओं को बताया कि 'यदि भारत संघ अस्तित्व में आता है तो देशी-राज्यों के सम्बन्ध स्वतंत्र उपनिवेश अर्थात् भारत संघ से होंगे न कि ब्रिटिश क्राउन से। परमोच्चता वाली संधियां तब तक अपरिवर्तित रहेंगी जब तक कि कोई राज्य नवीन परिस्थतियों में अपने आप को समायोजित करने के लिए इसे समाप्त करने की इच्छा प्रकट न करे।' राजाओं ने क्रिप्स के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। वे अपना भाग्य कांग्रेस के हाथों में नहीं सौंपना चाहते थे। इसलिए भारत की आजादी के बाद भी वे अपने राज्यों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा पूर्व में की गई संधियों के दायरे में ब्रिटिश क्राउन के अधीन रखना चाहते थे।

    29 मार्च 1942 को क्रिप्स ने एक पत्रकार वार्ता में विभिन्न पक्षों के मध्य समझौते के लिए एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि- 'युद्ध की समाप्ति के बाद, भारतीय संघ की स्थापना के उद्देश्य से नया संविधान बनाने हेतु संविधान सभा का गठन किया जाएगा। संविधान सभा में ब्रिटिश प्रांतों एवं देशी राज्यों की भागीदारी का प्रावधान किया जाएगा। यदि ब्रिटिश-भारत का कोई प्रांत नए संविधान को स्वीकार न करे तो वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता है। उसे भारत संघ के बराबर का दर्जा दिया जाएगा। संविधान सभा का निर्माण विभिन्न प्रांतों की विधान सभाओं के निम्न सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से किया जाएगा। इस हेतु नए चुनाव करवाए जाएंगे। समस्त निम्न सदनों में जितने सदस्य होंगे उनकी दशांश संख्या, संविधान सभा की होगी। संविधान सभा में भारतीय रियासतों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधि भेजने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। रियासती प्रतिनिधियों के अधिकार ब्रिटिश-भारतीय प्रतिनिधियों के समान होंगे। रियासतों को यह छूट होगी कि वे नया संविधान स्वीकार करें या न करें। संविधान सभा में कुल 207 सदस्य होंगे जिनमें से 158 ब्रिटिश-भारत के तथा 49 रियासतों के होंगे। जब तक नवीन संविधान का निर्माण न हो जाए, सम्राट की सरकार, भारत के विश्व-युद्ध उपक्रम का हिस्सा होने के कारण, भारत की रक्षा का भार अपने हाथ में रखेगी परन्तु सेना, साहस तथा सामग्री संसधान उपलब्ध करवाने का दायित्व भारत के नागरिकों के सहयोग से भारत सरकार पर होगा। सरकार की इच्छा है कि प्रमुख भारतीय दलों के नेताओं को अपने देश की कौंसिलों, कॉमनवेल्थ तथा यूनाईटेड नेशन्स में परामर्श के लिए तुरन्त और प्रभावोत्पादक ढंग से भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाए जिससे वे भारत की स्वतत्रंता के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण सक्रिय तथा निर्माणकारी सहयोग देने में समर्थ हो सकें।'

    योजना प्रस्तुत किए जाने के बाद पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब देते हुए क्रिप्स ने कहा कि 'भारत संघ के निर्माण के लिए तत्काल प्रयास किए जाएंगे। युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं की जाएगी। विभिन्न पक्षों में सहमति बनते ही प्रांतीय चुनाव करवाए जाएंगे। चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही संविधान निर्माण सभा स्थापित की जाएगी। हम भारत पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते यहाँ तक कि समय सीमा भी नहीं।'

    पत्रकारों ने पूछा कि- 'क्या आपको पता है कि इंगलैण्ड का इतिहास अपने वायदों से मुकर जाने का रहा है? क्या आप इन प्रस्तावों की गारण्टी प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट से दिलवा सकते हैं?' क्रिप्स का उत्तर था कि- 'यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो किसी चीज की कोई प्रत्याभूति नहीं है। इसके लिए प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट उपलब्ध नहीं होंगे।' क्रिप्स से पूछा गया कि- 'इन प्रस्तावों के तहत संविधान सभा में देशी राज्यों की जनता की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।' इस पर क्रिप्स ने कहा कि- 'यदि किसी राज्य में निर्वाचन का कोई तरीका है तो उनका उपयोग किया जाएगा किंतु यदि किसी राज्य में चुनी हुई संस्थायें नहीं हैं तो वहाँ यह कार्य नामित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाएगा।'

    पत्रकारों ने पूछा- 'आप कैसे पता लगायेंगे कि देशी राज्य, भारत संघ में शामिल होने जा रहे हैं?' क्रिप्स ने कहा- 'देशी राज्यों से पूछकर।' पत्रकारों ने पूछा- 'क्या राज्यों के नागरिकों की कोई आवाज होगी?' क्रिप्स ने कहा- 'इसका निर्णय उन राज्यों की वर्तमान सरकारों द्वारा किया जाएगा। हम किसी प्रकार की नई सरकारों का निर्माण नहीं करेंगे। राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार के सम्बन्ध संधियों के माध्यम से हैं, वे संधियां तब तक बनी रहेंगी जब तक कि राज्य उन्हें बदलने की इच्छा प्रकट न करें। यदि भारतीय राज्य, संघ में सम्मिलित होते हैं तो वे ठीक उसी परिस्थिति में रहेंगे जिसमें कि वे आज हैं।'

    पत्रकारों ने पूछा- 'यदि कोई प्रांत या राज्य सम्मिलित न होना चाहे तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा?' क्रिप्स ने कहा- 'वे दूसरे राज्यों के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करेंगे जैसा कि वे अन्य शक्तियों यथा जापान, स्याम, चायना, बर्मा अथवा अन्य किसी देश के साथ करते हैं।'

    क्रिप्स योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि भारत की आजादी के बाद भी भारतीय राज्य, भारत संघ में सम्मिलित नहीं होते और ब्रिटिश क्राउन के सहयोगी बने रहते हैं तो गोरी सरकार ई.1818 में देशी-राज्यों के साथ की गई संधियों के तहत उन राज्यों की रक्षा करने के लिए उन राज्यों में इम्पीरियल ट्रूप्स (साम्राज्यिक सेना) रखेगी। योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि कोई देशी-राज्य संविधान सभा में भाग लेता है किंतु संविधान निर्माण के पश्चात संघ में सम्मिलित नहीं होता है तो वह राज्य फिर से अपनी वर्तमान स्थिति को प्राप्त कर लेगा किंतु उसे नवीन संघ के साथ रेलवे, डाक और तार जैसे सामुदायिक महत्व के विषयों पर समायोजन करने पड़ेंगे। क्रिप्स का कहना था कि ब्रिटिश सरकार की यह इच्छा है कि सभी देशी-राज्य भारत संघ में सम्मिलित हों किंतु सरकार, संधि-दायित्वों को भंग करके उनसे जबर्दस्ती ऐसा करने को नहीं कहेगी।

    क्रिप्स ने देशी राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को पहला कदम यह उठाना चाहिए कि वे अपने समूह बनायें अथवा संघीय सम्बन्ध स्थापित करें ताकि सहकारिता पर आधारित समूहों की भावना को बड़ी इकाईयों तक विस्तारित किया जा सके। एक राजा ने क्रिप्स से पूछा कि क्या नवीन परिस्थितियों में राजाओं को ब्रिटिश-भारत के राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना चाहिये? इस सवाल के जवाब में क्रिप्स ने कहा कि मेरी सलाह है कि राज्यों के शासक, ब्रिटिश-भारत के नेताओं से सम्पर्क स्थापित करें ताकि भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान राजाओं को सुविधा रहे।

    2 अप्रेल को क्रिप्स ने तीन नरेशों को, जो उनसे मिलने आए थे, गुस्से में आकर कहा- 'उन्हें अपना फैसला कांग्रेस या गांधी से करना होगा क्योंकि हम तो अब बिस्तर बोरिया बांधकर भारत से कूच करने वाले हैं।' इस प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत की स्वाधीनता के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दे दिया जाएगा। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना उसकी इच्छा पर निर्भर करेगा। योजना का सबसे विवादित बिंदु यह था कि भारत का कोई भी प्रांत अपना संविधान बनाकर स्वतंत्र हो सकता था। ऐसा पाकिस्तान की मांग को ध्यान में रखकर किया गया था। क्रिप्स-मिशन में औपनिवेशिक स्वराज्य देने की कोई अवधि निश्चित नहीं की गई थी। इसका स्वरूप अस्पष्ट और अनिश्चित था। क्रिप्स मिशन में मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग को एक कदम और आगे बढ़ा दिया गया। इसमें देशी राज्यों और मुस्लिम लीग को प्रसन्न रखने के लिए उन राज्यों और प्रान्तों को यह छूट दी गई कि वे स्वेच्छानुसार भारतीय संघ में सम्मिलित हो सकते हैं।

    मुस्लिम-बहुल प्रान्तों को भारतीय संघ से अलग रहने का अधिकार प्राप्त हो गया। देशी राज्यों में जनता की राय जानने को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था। देशी नरेशों को उनके राज्यों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति का अधिकार दिया गया। इस प्रकार संविधान-निर्मात्री परिषद् में चौथाई सदस्य अप्रजातांत्रिक ढंग से आते और वे रुढ़िवादी होने के कारण प्रगतिशील सुधारों का विरोध करते। ब्रिटिश प्रान्तों को संघ में सम्मिलित होने या न होने का अधिकार देकर सरकार ने साम्प्रदायिक तत्त्वों को प्रोत्साहन दिया। मुस्लिम लीग पाकिस्तान बनाने की माँग पर अड़ी रही किंतु पंजाब के सिक्खों ने मुस्लिम लीग की इस मांग का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग द्वारा मांगे जा रहे पाकिस्तान में पूरा पंजाब शामिल था किंतु पंजाब के सिक्ख किसी भी कीमत पर भारत से बाहर किसी अन्य देश में जाने को तैयार नहीं थे।

    क्रिप्स-मिशन ने अल्पसंख्यकों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा की बात तो की किंतु उनकी स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत नहीं की। दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोग भी क्रिप्स-मिशन की रिपोर्ट से असंतुष्ट थे। उनका कहना था कि क्रिप्स-योजना में उनके हितों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। क्रिप्स मिशन ने भारत की रक्षा का दायित्व भारतीयों के हाथ में न देकर ब्रिटिश सरकार के पास रखने का प्रावधान किया। यह बात कांग्रेस को मान्य नहीं थी। इस प्रकार सभी पक्ष क्रिप्स-प्रस्ताव से असंतुष्ट हो गए। कांग्रेस, हिंदू-महासभा और मुस्लिम लीग ने इन प्रस्तावों को मानने से अस्वीकार कर दिया।

    क्रिप्स प्रस्ताव में ब्रिटिश-प्रांतों एवं देशी रियासतों को तो अपना पृथक संघ बनाने या संघ से अलग रहने की आजादी थी परन्तु यदि उन्हें ऐसा करने दिया जाता तो भारत में बाल्कन-राष्ट्र जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती। पूरा देश अनुभव कर रहा था कि क्रिप्स के इस प्रस्ताव में व्यावहारिकता का अभाव था क्योंकि देश के समस्त रजवाड़ों की सीमा ब्रिटिश-भारत के क्षेत्र से संलग्न थी। अतः इस तरह का कोई संघ कैसे काम कर सकता था! 11 अप्रेल को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया।

    22 अप्रेल 1942 को क्रिप्स लंदन चले गए। उनका मिशन असफल हो गया जिससे राजाआंे ने चैन की सांस ली। राजाओं की इस दोहरी चाल से कांग्रेस को विशेष निराशा हुई। उन्होंने राजाओं के विरुद्ध वक्तव्य दिए। नेहरू ने उन लोगों की पीठ थपथपाई जो राजाओं को धूर्त, झक्की अथवा मूर्ख कहते थे। क्रिप्स कमीशन असफल होकर लौट गया किंतु क्रिप्स कमीशन की असफलता वस्तुतः ब्रिटिश सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। योजना में किसी संशोधन तथा आश्वासन के प्रति निस्पृह रहने के लिए चर्चिल ने क्रिप्स को हार्दिक बधाई दी। चर्चिल कतई नहीं चाहता था कि भारत को आजादी दी जाए। मिशन के असफल हो जाने पर विंस्टन चर्चिल ने मित्र राष्ट्रों को सूचित किया- 'कांग्रेस की मांगों को मानने का एक ही अर्थ होता कि हरिजनों तथा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाता। चर्चिल ने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को समझा दिया कि भारतीय नेता परस्पर एकमत नहीं हैं।'

    क्रिप्स मिशन की असफलता पर यह शक किया जाने लगा कि या तो क्रिप्स की पीठ में ब्रिटिश सरकार ने छुरा भौंक दिया है अथवा डीक्वेंस के शब्दों में- 'चालाक क्रिप्स महज धोखेबाजी, छल कपट, विश्वासघात और दुहरी चालों से काम ले रहे थे और उन्हें इस पर जरा भी पश्चाताप नहीं था!' लॉर्ड वैवेल ने 27 जुलाई 1943 को अपनी डायरी में लिखा- 'प्रधानमंत्री चर्चिल भारत और उससे सम्बन्धित हर बात से घृणा करता है। ... भारत को स्वतंत्र करने के विचार मात्र से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का वह उपासक पागल हो जाता था।' गांधीजी के अनुसार- 'क्रिप्स योजना आगे की तारीख का चैक था जिसका बैंक खत्म होने वाला था।'

    डू ऑर डाई, नाउ ऑर नेवर ई.1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध जोरों पर था। जब सुभाष चंद्र बोस को पूर्वी भारत में हवाई हमलों एवं जमीनी हमलों में सफलताएं मिलने लगीं तो कांग्रेसी नेता सुभाष की सफलताओं से घबरा गए। उन्हें लगा कि यदि सुभाष के विमान दिल्ली में उतर गए तो अंग्रेजों को भारत की सत्ता सुभाष बाबू को सौंपनी पड़ेगी। इस स्थिति की कल्पना भी कांग्रेसी नेताओं के रोंगटे खड़े कर देती थी। इसलिए जवाहरलाल नेहरू ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- 'हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे।' इस प्रकार कांग्रेसियों की अहिंसा का हिमालय अपनी पराजय की आशंका उत्पन्न होते ही पिघल गया। 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने बम्बई में एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें गांधीजी ने 'डू और डाई' तथा 'नाउ ऑर नेवर' के नारे लगाए तथा अंग्रेजों से कहा कि वे आज रात ही भारत छोड़ कर चले जाएं। इसे अगस्त क्रांति एवं भारत छोड़ो आंदोलन कहा जाता है। उसी रात बहुत से कांग्रेसी नेता जेलों में डाल दिए गए। सरकार के इस कदम के विरोध में देश में व्यापक हिंसा फैल गई। बड़ी संख्या में जन-धन की हानि हुई।


    मुस्लिम लीग को लाभ

    जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया तो मुस्लिम लीग बड़ी कठिनाई में पड़ गई। वह अब तक 'पहले पाकिस्तान फिर आजादी' के लिए लड़ती आई थी किंतु कांग्रेस पाकिस्तान की बात किए बिना ही आजादी मांग रही थी। यदि अंग्रेज भारत का विभाजन किए बिना चले जाएंगे तो मुस्लिम लीग को नए सिरे से पाकिस्तान के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और इस बार उनका मुकाबला मुस्लिम लीग से सहानुभूति रखने वाले अंग्रेजों से नहीं अपितु मुस्लिम लीग को समाप्त करने की मंशा रखने वाले कांग्रेसियों से होगा। इसलिए जिन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ असभ्य भाषा में भाषण दिये। उसने कहा- 'कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया है। ऐसा करते वक्त कांग्रेस ने सिर्फ अपना स्वार्थ देखा है, दूसरों का नहीं।' जिन्ना ने मुसलमानों का आह्वान किया कि वे इस आंदोलन से बिल्कुल अलग रहें।'

    इस आंदोलन के आरम्भ होने से पहले ही कांग्रेस के बड़े नेता जेल भेज दिए गए। इस कारण आंदोलन का नेतृत्व छोटे स्तर के कार्यकताओं के हाथों में चला गया जिन्होंने गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को ताक पर रखकर पूरे देश में व्यापक हिंसा की। इस कारण मुस्लिम लीग के पक्ष वाली प्रेस ने इस पूरे आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से लड़ रहे कांग्रेसियों को 'गुण्डे' शब्द से संबोधित किया। कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ उतनी सख्त बातंग ब्रिटिश प्रेस ने भी नहीं कीं जितनी मुस्लिम लीग प्रेस ने कहीं। मुस्लिम लीग वर्किंग कमेटी ने मित्र-राष्ट्रों का ध्यान हिन्दुस्तान के 10 करोड़ मुसलमानों की उन अंचलों में सार्वभौम राज्यों की स्थापना की मांग की तरफ खींचा, जो उनका निवास स्थान है और जहाँ उनका बहुमत है।

    भारत-छोड़ो आंदोलन का सबसे ज्यादा लाभ मुस्लिम लीग को मिला। आंदोलन के कारण कांग्रेसी नेता तो जेल में चले गए जबकि मुस्लिम लीगी नेता स्वतंत्र रहे तथा उन्होंने अंग्रेजों के युद्ध-प्रयासों में सक्रिय सहयोग देकर अंग्रजों की सहानुभूति जीत ली ताकि मुसलमानों को अलग पाकिस्तान देने का जो इरादा अंग्रेज पहले से दिखा रहे थे, वह और पक्का हो जाए। नवम्बर 1942 के मध्य में दिल्ली में जिन्ना ने भारत के मुसलमानों से पाकिस्तान हासिल करने के लिए कटिबद्ध रहने की अपील करते हुए कहा कि- 'या तो हम पाकिस्तान लेकर रहेंगे और या फिर अपना अस्तित्व ही मिटा देंगे।' हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने दिसम्बर 1942 में कानपुर में आयोजित अधिवेशन में जिन्ना की मांग का विरोध करते हुए कहा कि- 'पाकिस्तान की मांग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।' सावरकर ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी सम्मानपूर्ण शर्तों पर भारत-ब्रिटिश समझौते के लिए अंतिम प्रयास करने के लिए बैठाई। मुखर्जी ने भी जिन्ना से बात की किंतु कोई नतीजा नहीं निकला।


    वायसराय को भारत की भौगोलिक एकता का स्मरण

    वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (ई.1936-44) अपनी नियुक्ति के समय भारत संघ के निर्माण का सपना लेकर आए थे जिसे इंग्लैण्ड की सरकार के अधीन स्वायत्तता दी जा सके किंतु परिस्थितियां तेजी से लिनलिथगो के हाथों से निकलती जा रही थीं। पहले तो देशी-राज्यों के राजाओं ने प्रस्तावित संघ में मिलने से मना कर दिया और अब कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग न केवल आपस में लड़ रही थीं अपितु कांग्रेस अंग्रेजों को बिना किसी संघ के निर्माण के भारत से बाहर चले जाने के लिए संघर्ष कर रही थी। लिनलिथगो ने स्थिति संभालने का प्रयास करने के लिए 17 दिसम्बर 1942 को एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स की वार्षिक सभा में एक ऐसा वक्तव्य दिया जो अंग्रेज शासक मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद से कभी नहीं देते थे। वह वक्तव्य इस प्रकार था- 'भारत की भौगोलिक एकता बनाए रखी जाए क्योंकि विभाजित भारत का विश्व में कोई महत्त्व नहीं रह जाएगा।'


    बाँटो और भागो

    लिनलिथगो के इस बयान पर मुस्लिम लीग के नेता आग-बबूला हो गए। वायसराय न केवल मुस्लिम लीग के अब तक के परिश्रम पर पानी फेर रहा था अपितु वह सीधे-सीधे उन कांग्रेसियों का पक्ष ले रहा था जो अंग्रेजों को आधी रात में ही भारत छोड़कर चले जाने को कह रहे थे। इसलिए मुस्लिम लीग के नेताओं ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में अपनी आवाज और अधिक मुखर की ताकि वह भारत की सरहदों को पार करके, विश्वयुद्ध लड़ रहे मित्र-राष्ट्रों के कानों तक अच्छी तरह पहुंच जाए। मुस्लिम लीग द्वारा अपनी आवाज तीखी कर दिए जाने के बावजूद जब इंग्लैण्ड के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं सरकी तो दिसम्बर 1943 में मुस्लिम लीग ने कराची अधिवेशन में 'भारत छोड़ो' नारे के विरुद्ध एक विचित्र नारा दिया- 'बाँटो और भागो' इस नारे के माध्यम से अंग्रेजों का आह्वान किया गया था कि वे भारत को हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बाँटकर यहाँ से भाग जाएं।


    बंगाल में अकाल की विभीषिका

    इसी बीच एक बड़ी मानव त्रासदी हुई। अंग्रेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चों पर लड़ रही अपनी फौज के लिए भारत से इतना चावल और गेहूं पानी के जहाजों में भरकर सैनिकों को भिजवा दिया कि ई.1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया और बंगाल में 30 लाख आदमी मर गए। इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति नफरत अपने चरम पर पहुंच गई। देश भर में कम्युनिस्ट आंदोलन एवं क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ गईं। फिर भी मुस्लिम लीग मानवता की इस भयानक त्रासदी से तथा क्रांतिकारी आंदोलन से असंपृक्त रहकर केवल पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाती रही।


    भारतीय संघ के निर्माण हेतु कुछ और योजनाएं

    सप्रू योजना

    दिसम्बर 1944 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। प्रांतों एवं राज्यों के प्रस्तावित भारतीय संघ में सम्मिलित होने अथवा अलग रहने के प्रश्न पर समिति ने सिफारिश की कि ब्रिटिश-भारत के किसी भी प्रांत को संघ में शामिल नहीं होने का विकल्प नहीं होगा। ब्रिटिश-भारत का प्रांत हो या देशी राज्य, एक बार सम्मिलित होने के बाद उसे संघ से अलग होने का अधिकार नहीं होगा। ब्रिटिश-भारत, जिस तरह से किसी भी ब्रिटिश-भारतीय प्रांत को अलग होने की आज्ञा देना स्वीकार नहीं कर सकता उसी तरह देशी राज्यों को भी इसकी अनुमति नहीं दे सकता। सप्रू समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं था, इसलिए समिति ने अपनी इच्छा से संघ में शामिल होने के अतिरिक्त रियासतों के विषय में कोई और सिफारिश नहीं की। समिति द्वारा यह सिफारिश भी की गई कि जहाँ तक हो सके राज्य प्रमुख, राज्यों के शासकों में से ही चुना जाना चाहिए। साथ ही उसमें राज्यों के मंत्री पद की भी व्यवस्था हो जिसकी सहायता के लिए राज्यों की सलाहकार समिति हो। सप्रू समिति की अवधारणा के अनुसार भारतीय संघ केवल एक राज्य होगा जिसमें संघीय इकाइयां होंगी चाहे वह प्रांतों की हों या राज्यों की। संघ से असंबद्ध राज्य भी होंगे। किसी भी विदेशी शक्ति का इन इकाइयों पर कोई अधिकार नहीं होगा चाहे वे संघ में शामिल हों या न हों।

    रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रस्ताव

    रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से एम. एन. राय द्वारा स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया। 6 जनवरी 1945 को ऑल इण्डिया कान्फ्रेन्स ऑफ दी रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के द्वारा इस प्रारूप को पृष्ठांकित किया गया जिसमें कहा गया कि अंतरिम सरकार को संपूर्ण भारत के लिए संविधान की घोषणा करनी चाहिये तथा उसे भारतीय रियासतों पर भी लागू किया जाना चाहिये। इसे पूर्व में ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राजाओं के मध्य हुए द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से किया जाना चाहिये जिसके माध्यम से भारतीय राजाओं को कुछ वित्तीय अनुदानों के बदले अपने अधिकार भारत सरकार के समक्ष समर्पित करने होंगे।

    अन्य विद्वानों के प्रस्ताव

    प्रो. कूपलैण्ड ने नदियों को आधार बनाकर जनसंख्या के अनुसार उनके क्षेत्रीय विभाजन की योजना प्रस्तुत की। सर सुल्तान अहमद ने भारत तथा यूनाइटेड किंगडम के मध्य संधि के माध्यम से भारत-पाक विभाजन की योजना प्रस्तुत की। इनमें देशी राज्यों के बारे में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी। ई.1943-44 में अर्देशिर दलाल, डा. राधा कुमुद मुखर्जी तथा डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं जिनमें भारत की सांप्रदायिक समस्या का समाधान ढूंढने की चेष्टा की गयी किंतु इन सभी योजनाओं में देशी राज्यों की समस्या को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।


    राजगोपालाचारी प्लेटफॉर्म

    6 मई 1944 को गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया। इसी के साथ भारत छोड़ो आंदोलन भी समाप्त हो गया। लिब्ररल पार्टी के नेता तेज बहादुर सप्रू एवं राजगोपालाचारी ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से बात करके गांधी और जिन्ना के बीच समझौता करवाने का प्रयास किया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी भी चाहती थी कि गांधी और जिन्ना भारत की आजादी के लिए लड़ें न कि एक दूसरे के खिलाफ लड़कर देश की शक्ति व्यर्थ करें। इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने देश भर में एक नारा उछाला- 'गांधी-जिन्ना फिर मिलें' इन प्रयासों ने असर दिखाया तथा राजगोपालाचारी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित किए गए-

    (1) युद्ध के दौरान मुस्लिम लीग को पूर्ण स्वाधीनता की मांग का समर्थन करना चाहिए तथा संक्रमण काल के लिए अस्थाई अंतरिम सरकार बनाने में कांग्रेस का सहयोग करना चाहिए।

    (2) युद्ध के बाद मुस्लिम बहुमत के क्षेत्रों की सीमा के निर्धारण के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाना चाहिए। उन क्षेत्रों के समस्त निवासियों के जनमत या साधारण मतदान के किसी भी अन्य स्वरूप द्वारा निश्चित किया जाना चाहिए कि उनका अलग राज्य बनना चाहिए या नहीं।

    (3) जनमत संग्रहण के पहले अपने-अपने दृष्टिकोण का समर्थन करने का अधिकार सब दलों का होगा। अगर अलगाव हो जाए तो दोनों राज्यों के प्रतिरक्षा, व्यवसाय और अन्य उद्देश्यों के लिए समझौता करना चाहिए।

    (4) जनसंख्या का कोई भी स्थानांतरण बिल्कुल ऐच्छिक आधार पर होगा।

    (5) ये शर्तें तभी लागू होंगी जब ब्रिटेन भारत के शासन की सारी सत्ता और जिम्मेदारी हस्तांतरित कर देगा।

    इस प्रस्ताव के आधार पर 4 सितम्बर 1944 को गांधीजी एवं जिन्ना के बीच बम्बई में वार्तालाप आरम्भ हुआ जो कि 17 सितम्बर तक चलता रहा। यह वार्तालाप बहुत गुप्त होता था तथा पत्रों के आदान-प्रदान से होता था। ये पत्र वार्तालाप पूरा होने के बाद प्रकाशित कर दिए गए। यह वार्तालाप असफल हो गया। असफलता का कारण जिन्ना की जिद था। जिन्ना चाहता था कि किसी भी प्रकार का जनमत संग्रहण करने से पहले ही और ब्रिटिश राज के रहते ही कांग्रेस मान ले कि पाकिस्तान स्थापित किया जाएगा। जिन्ना ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के अंदर पूरा पंजाब, पूरा बंगाल, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, बलूचिस्तान और असम को पाकिस्तान में शामिल करना होगा। गांधीजी किसी भी कीमत पर जिन्ना को पाकिस्तान देने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए वार्तालाप विफल हो गया और पूरे देश को इस विफलता से बड़ी निराशा हुई।


    अस्थाई सरकार के गठन के लिए समझौता

    मई 1945 में केन्द्रीय विधान सभा में कांग्रेस के नेता भूलाभाई देसाई और मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली के बीच केन्द्र में अस्थाई सरकार बनाने के बारे में एक समझौता हुआ। इसमें निश्चित किया गया कि इस सरकार में 40 प्रतिशत कांग्रेस के, 40 प्रतिशत लीग के और शेष 20 प्रतिशत पद अन्य गुटों के लिए होंगे। यह प्रस्ताव लॉर्ड वैवेल के समक्ष रखा गया। वह ब्रिटिश सरकार से सलाह करने के लिए लंदन गया। लम्बे विचार-विमर्श के बाद मई के अंत में ब्रिटिश सरकार ने इस समझौते को अपनी स्वीकृति दे दी।

    14 जून 1945 को भारत सचिव एल. एस. एमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत के सम्बन्ध में नई नीति की घोषणा की। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार भारत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सरकार स्थापित करने के लिए तैयार है। 25 जून 1945 को लॉर्ड वैवेल ने शिमला में एक सम्मेलन आयोजित किया। वायसराय की घोषणा के अनुसार इसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अध्यक्षों, परिगणित जातियों और सिक्खों के प्रतिनिधियों, केन्दीय विधानसभा में कांग्रेस दल के नेता और मुस्लिम लीग के उपनेता, केन्द्रीय राज्यपरिषद में कांग्रेस दल और मुस्लिम लीग के नेता, विधान सभा में नेशनलिस्ट पार्टी और यूरोपीय ग्रुप के नेता एवं उस समय की प्रान्तीय सरकारों के मुख्यमंत्री निमंत्रित किए गए थे।

    सम्मेलन में वायसराय की कार्यकारिणी के गठन को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद हो गया। वैवेल ने 14 सदस्यों की एक्जीक्यूटिव कौंसिल का प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि इसमें 5 नाम कांग्रेस द्वारा, 5 नाम मुस्लिम लीग द्वारा और 4 नाम वायसराय द्वारा दिए जाएंगे। कांग्रेस ने आजाद, नेहरू, पटेल, एक पारसी और एक भारतीय ईसाई का नाम दिया। वैवेल ने एक सिक्ख, दो परिगणित जातियों और पंजाब के मुख्यमंत्री खिजिर हयात का नाम दिया। जिन्ना ने कांग्रेस के द्वारा दिए गए मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर आपत्ति कर दी। उसका कहना था कि कौंसिल में कोई भी मुस्लिम सदस्य केवल मुस्लिम लीग से हो सकता है। कांग्रेस मौलाना की बजाय कोई दूसरा नाम दे। इस मुद्दे पर इतनी टसल हुई कि यह सम्मेलन विफल हो गया।

    मुस्लिम लीग की यह जिद्द पूरे देश को हैरान करने वाली थी। क्योंकि इस समय पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, पंजाब और सिंध में मुस्लिम जनसंख्या का बहुमत होते हुए भी वहाँ मुस्लिम लीग की सरकारें नहीं बन सकी थीं। पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के नेता खिजिर हयात खाँ मुख्यमंत्री थे। सिंध में सर गुलाम हुसैन की कांग्रेस समर्थित सरकार थी। यही हालत असम की थी। बंगाल में गवर्नर शासन था। ऐसी स्थिति में मुस्लिम लीग यह दावा कैसे कर सकती थी कि मुस्लिम लीग ही समूचे भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती हैै। जिन्ना का रवैया इसलिए भी हैरान करने वाला था क्योंकि यदि जिन्ना इस कौंसिल के गठन को स्वीकार कर लेता तो 14 सदस्यों की इस कौंसिल में मुसलमानों की संख्या 7 अर्थात् 50 प्रतिशत होती जो कि भारत की मुस्लिम जनंसख्या के अनुपात की तुलना में दो गुनी होती। यदि यह सरकार बनती तो जिन्ना और मुसलमान लाभ में रहते किंतु जिन्ना को 'लाभ' नहीं 'पाकिस्तान' चाहिए था।

    जिन्ना और गांधीजी का मतभेद केवल एक बिंदु पर रहता था। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही एकमात्र वह संस्था है जो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है। केवल इसी विवाद के कारण कांग्रेस और मुस्लिम लीग में कभी कोई समझौता नहीं हो पाया, यदि हुआ भी तो शीघ्र ही इसी बिंदु पर आकर भंग हो गया। शिमला सम्मेलन में भी यही सब दोहराया गया। शिमला सम्मेलन विफल होने के बाद लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में असफल माना जाने लगा। 21 नवम्बर 1945 को जिन्ना ने पेशावर में दिए एक भाषण में, मुस्लिम लीग द्वारा भारतीय प्रतिनिधियों की अस्थाई सरकार न बननेे देने के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देते हुए कहा- 'एक अच्छा सेना संचालक उस समय तक आक्रमण करने का आदेश नहीं देता जब तक उसे विजय का विश्वास न हो अथवा उसे सम्मानपूर्ण पराजय का विश्वास तो निश्चित तौर पर होना ही चाहिए।' ...... भारत में एक राज्य बने रहने के सुझाव को जिन्ना मुसलमानों की दासता का सुझाव कहता था।


    भारत में साम्प्रदायिक दंगों की लहर

    जब क्रिप्स मिशन असफल हो गया, राजगोपालाचारी फार्मूले की हवा निकल गई, भारतीयों की अस्थाई सरकार का गठन नहीं हो सका और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी तो मुस्लिम लीग हिंसा पर उतर आई। वर्ष 1946 का प्रारम्भ साम्प्रदायिक दंगों के साथ ही हुआ और वर्ष के अंत तक पूरा देश दंगामय हो गया। दंगों की शुरुआत अलीगढ़ से हुई और उसका विशाल रूप बंगाल, बिहार और पंजाब ने ले लिया।

    जनवरी 1946 में देश में प्रांतीय विधानसभाओं के लिए चुनाव हुए जिनमें मिली विजय के बाद सिंध एवं बंगाल में मुस्लिम लीग ने सरकार बनाई। इसके बाद इन दोनों ही प्रांतों में हिन्दुओं को भगाने का काम आरम्भ हो गया। इन प्रांतों में हिन्दुओं के समक्ष तीन ही विकल्प थे या तो वे इस्लाम स्वीकार कर लें या मर जाएं या प्रांत छोड़कर भाग जाएं। केन्दीय शासन से कोई मदद नहीं मिली, इस कारण हिन्दुओं का धर्मांतरण, इस्लाम स्वीकार न करने पर उनका कत्ल, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार तथा उनकी सम्पत्ति को लूटने का कार्य बंगाल के प्रधानमंत्री सुहरावर्दी के शासन में चल रहा था। इन जघन्य हत्यााओं के प्रति जिन्ना और सुहरावर्दी मूक बने रहे। इस कारण असहाय हिन्दू बिहार आदि प्रांतों में भाग आए। हिन्दुओं में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी इसलिए हिन्दू महासभा की प्रेरणा से महाराष्ट्र में हिन्दू राष्ट्र सेना का गठन हुआ और महाराष्ट्र में ही रामसेना एवं बजरंग सेना आदि की भी स्थापना हुई।

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     03.06.2020
     सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-111

    पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग स्थापित करने के निर्णय का विरोध किया


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    1949 में पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिमी बंगाल, असम एवं त्रिपुरा में 8 लाख से अधिक शरणार्थी घुस आये। इन शरणार्थियों को पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा बलपूर्वक भारतीय क्षेत्रों में धकेला जा रहा था। ये हिंसा और उत्पीड़न के मारे हुए हिन्दू नागरिक थे। नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खां को इस समस्या का शांति पूर्वक समाधान निकालने के लिये आमंत्रित किया।

    नेहरू के तरीके से असंतुष्ट होकर पटेल ने लियाकत अली खां से भेंट की तथा उसे सख्त लहजे में संदेश दिया कि वह इस तरह की हरकतों से बाज आये। इस पर नेहरू ने लियाकत अली खां के समक्ष प्रस्ताव रखा कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश अल्पसंख्यक आयोगों की स्थापना करे। पटेल ने नेहरू के इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की। श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा के. सी. नेगी ने नेहरू की तुष्टिकरण की नीतियों से नाराज होकर मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 17

     03.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 17

    कैबीनेट मिशन ने नहीं दिया पाकिस्तान


    भारत में सैनिक विद्रोह

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    18 अगस्त 1945 को सुभाषचंद्र बोस की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उसके बाद अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को पकड़ कर फांसी पर लटकाना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस अब तक आजाद हिन्द फौज को अपने शत्रु के रूप में देखती रही थी। उसने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखायी। भारतीय सिपाहियों को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों से सहानुभूति दिखाते हुए सशस्त्र विद्रोह कर दिया। 20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक, हड़ताल पर चले गए। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गई। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किए। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक भी हड़ताल पर चले गए। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गए। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी।

    मुस्लिम लीग द्वारा की जा रही मार-काट एवं भारतीय सेनाओं में हो रहे विद्रोहों के बाद इंग्लैण्ड की गोरी सरकार को समझ में आने लगा कि अब एक भी दिन की देरी किए बिना भारत को आजादी देनी होगी चाहे कांग्रेस, मुस्लिम लीग, दलित पक्ष एवं भारतीय-राजाओं द्वारा कितने ही अड़ंगे क्यों न लगाए जाएं। इंग्लैण्ड की सरकार ने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिए उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की।


    कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

    15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि ग्रेट-ब्रिटेन की लेबर सरकार, ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिए एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है। उन्होंने कहा- 'मुझे आशा है कि ब्रिटिश-भारत तथा रियासती-भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि 'भारतीय राज्य' अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिए भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।'

    इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा इस कमीशन (आयोग) में तीन कैबीनेट मंत्री रखे गए-

    (1) भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेन्स,

    (2) व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और

    (3) फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर।

    इस कमीशन को 'कैबीनेट मिशन' भी कहा जाता है। 24 मार्च 1946 को यह आयोग भारत पहुंच गया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री एटली ने भारत के वायसराय लॉर्ड वैवेल के नाम एक तार भेजा जिसमें लिखा था- 'लेबर गवर्नमेंट वायसराय को नजर-अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलाएगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।'

    इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा- 'हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिए एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सके।' उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि- 'हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे। '

    2 अप्रेल 1946 को कैबीनेट मिशन तथा वायसराय के साथ हुई बैठक में नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ ने देशी राज्यों के लिए भारत एवं पाकिस्तान से अलग देश की मांग की। उसने कहा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर देशी-राज्यों तथा ब्रिटिश-भारत के प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो देशों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो देशी-राज्यों से मिलकर बना हो? कोई भी भारतीय राजा, भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गई संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता।

    परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। कैबीनेट मिशन के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स का मानना था कि यदि देशी राजाओं को भारतीय संघ से अलग रहने की स्वीकृति दी जाती है तो इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी। उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेन्द्र मण्डल की स्थाई समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश-भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी।

    राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जाएगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जाएगा। अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाए रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण आजादी के समय बनने वाले भारतीय संघ को करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल भारतीय-संघ के माध्यम से ही हो सकते थे। कैबीनेट मिशन भारत को आजादी देने का सर्वसम्मत फार्मूला ढूंढने के लिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग एवं भारतीय राजाओं के संघ 'नरेन्द्र मण्डल' से वार्ता कर रहा था। इस वार्तालाप से राजाओं की समझ में आ गया कि अब अंग्रेज देश में नहीं रहेंगे। इसलिए अंग्रेजों की कृपाकांक्षा प्राप्त करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाना चाहिए कि कहीं भविष्य में बनने वाला आजाद भारत राजाओं के राज्यों को न निगल जाए। दूसरी तरफ छोटे राजा इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं बड़े राजा ही उन्हें न निगल जाएं। रियासती-भारत में अजीब सी बेचैनी और कई तरफा घमासान मचने लगा था। राजाओं और उनके प्रतिनिधियों से निबटने के बाद कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बात की।


    अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे

    जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में था, उस पर मानसिक दबाव बनाने के लिए 29 मार्च 1946 को अलीगढ़ में दंगों से शुरुआत की गई। भारत सरकार के होम डिपार्टमेंट की गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार यह दंगा 29 मार्च 1946 को उस समय शुरु हुआ जब अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मुस्लिम विद्यार्थियों एवं एक हिन्दू कपड़े के व्यापारी के बीच आपसी झड़पें हुईं। इस दंगे में 17 लोग घायल हुए जिनमें से एक की मौत हो गई। दुकानों के जलने से 5 से 10 लाख रुपए की सम्पत्ति नष्ट होने का अनुमान था।


    मुस्लिम लीग का दिल्ली अधिवेशन

    जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में विभिन्न पक्षों से बात कर रहा था, उसी दौरान अप्रेल 1946 के प्रारम्भ में नई दिल्ली मंल मुस्लिम लीग के विधान सभा सदस्यों ने एक अधिवेशन आयोजित किया। इसमें लीग के नेताओं ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए भड़काऊ भाषण दिए। जिन्ना ने हर संभव तरीके से विरोध करने की धमकी दी। उसने कहा- 'यदि कोई भी अंतरिम व्यवस्था मुसलमानों पर थोपी गई तो मैं स्वयं को किसी भी खतरे, परीक्षा या बलिदान जो भी मेरे से मांगा जा सकता है, को झेलने के लिए शपथ लेता हूँ।' अधिवेशन में सभी मुस्लिम सदस्यों द्वारा पढ़े जाने के लिए एक प्रतिज्ञा तैयार की गई जिसमें कहा गया- 'मैं अपने आप को मेरे से जो भी बलिदान, परीक्षा या खतरा उठाने हेतु कहा जाएगा, झेलने की शपथ लेता हूँ।' पंजाबी नेता फिरोज खाँ नून ने कहा- 'जो विनाश मुस्लिम करेंगे, उससे चंगेज खां और हलाकू ने जो किया, उसे भी शर्म आ जाएगी।' उसने यह भी कहा कि यदि ब्रिटेन अथवा हिन्दुओं ने पाकिस्तान नहीं दिया तो रूस यह कार्य करेगा। बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने कहा- 'यदि हिन्दू सम्मान और शांति से रहना चाहते हैं तो कांग्रेस को पाकिस्तान की स्वीकृति देनी चाहिए।' सीमांत नेता कयूम खाँ ने घोषणा की- 'मुसलमानों के पास सिवाय तलवार निकालने के और कोई मार्ग नहीं बचेगा।' बंगाल लीग के जनरल सैक्रेटरी अब्दुल हाशिम ने कहा- 'जहाँ न्याय और समता असफल हो, चमचमाता इस्पात मसले को तय करेगा।' पंजाब के शौकत हयात खाँ ने कहा- 'मेरे प्रांत की लड़ाकू जाति केवल एक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रही है। आप हमें केवल एक अवसर दीजिए और हम नमूना पेश कर देंगे जबकि ब्रिटिश सेना अभी भी मौजूद है।' मुस्लिम लीग का आक्रोश मुख्य रूप में अंग्रेज सरकार पर बरसा जिस पर ब्रिटिश मजदूर दल का नियंत्रण था। उसने प्रारम्भिक वर्षों में लीग की अपेक्षा कांग्रेस के प्रति अधिक सहानुभूति का प्रदर्शन किया था।

    मुस्लिम लीग के इस रवैये पर कड़ी प्रतिक्रिया करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि- 'पृथ्वी पर कोई भी ताकत यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी पाकिस्तान को अस्तित्व में नहीं ला सकती जैसा कि जिन्ना चाहते हैं।' पटेल ने मुसलमानों से कहा कि- 'मुसलमानों एवं हिन्दुओं के मध्य गृहयुद्ध की कीमत पर ही उन्हें पाकिस्तान मिल सकता है।'


    शिमला में त्रिदलीय सम्मेलन

    5 मई 1946 को सरकार ने शिमला में त्रिदलीय सम्मेलन बुलाया। इसमें कैबीनेट मिशन द्वारा प्रस्तावित किया गया कि भारत में एक केन्द्र सरकार का गठन किया जाएगा जिसके पास विदेशी मामले, रक्षा एवं संचार मामले रहेंगे। प्रांतों का समूहीकरण होगा जो अन्य मामलों को निबटाएगा और शेष अधिकार भी उन्हीं के पास रहेंगे। इस सम्मेलन में कांग्रेस ने एक शक्ति सम्पन्न केन्द्र के निर्माण पर जोर दिया तथा मांग की कि प्रस्तावित भारतीय संघ, कैबीनेट मिशन द्वारा सुझाए गए तीन विषयों के अतिरिक्त मुद्रा, कस्टम और ऐसे विषयों को देखे जो उसके अनुकूल हों।

    संघ को आवश्यकतानुसार आय वसूल करने तथा संविधान के विफल होने की स्थिति में या संकटकाल में आवश्यकतानुसार कार्यवाही करने में सक्षम होना चाहिए। कांग्रेस के इस प्रस्ताव में ई.1928 के नेहरू कमेटी के प्रस्तावों को ही दोहराया गया था। दूसरी ओर मुस्लिम लीग शक्तिशाली मुस्लिम प्रांतों के समूहों का संगठन चाहती थी जो पाकिस्तान का जन्मदाता बन सके और संघीय सरकार की शक्ति को क्षीण करके न्यूनतम स्तर पर रख सके। इस प्रकार इस शिमला सम्मेलन में भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच का विरोध ज्यों का त्यों बना रहा तथा कांग्रेस द्वारा मुसलमानों के लिए अलग देश बनाने का विरोध और मुस्लिम लीग के लिए अलग देश बनाने की आवश्यकता ज्यों की त्यों बनी रही। इसलिए कैबीनेट मिशन ने अपनी ओर से प्रस्ताव घोषित करने का निर्णय लिया।


    कैबीनेट मिशन प्लान

    16 मई 1946 को कैबीनेट मिशन ने अपनी योजना प्रकाशित की। इसे 'कैबीनेट मिशन प्लान' तथा 'संयुक्त भारत योजना' भी कहते हैं। इसके द्वारा भविष्य में बनने वाले भारत संघ के लिए संघीय संविधान का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भावी भारत संघ की व्यवस्था की जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे जाने थे। संघ में ब्रिटिश-भारत के 11 प्रांत और समस्त 565 देशी रियासतें शामिल होनी थीं। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होना था।

    शेष सभी विषय और अधिकार रियासतों के पास रहने थे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होनी थी जो बातचीत के द्वारा तय की जानी थी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना था। शेष विषयों पर राज्यों का अधिकार होना था। कैबीनेट मिशन प्लान में ब्रिटिश-प्रांतों को 'ए', 'बी' और 'सी' समूहों अथवा श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहले अर्थात् 'ए' समूह में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्य-प्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, एवं बिहार थे। दूसरे अर्थात् 'बी' समूह में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरे अर्थात् 'सी' समूह में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था। ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिए संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गई व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया। राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश-भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जाएंगे। ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिए जाएंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिए कि वे अपने भविष्य की स्थिति उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे या भारत से बाहर रह सकते थे।

    कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि 'एक-सत्तात्मक-भारत' बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जाएंगे। 17 मई 1946 को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वैवेल को एक पत्र लिखकर कैबीनेट मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिए कह सकें। संविधान सभा को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार-विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान सभा में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व सम्बन्धित राज्यों द्वारा उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।


    दुःखों से मुक्ति का बीज

    इस प्रकार कैबीनेट मिशन ने स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्र भारत के केवल दो टुकड़े नहीं होंगे अपितु समूह ए, बी एवं सी के रूप में तीन टुकड़े तथा चौथा टुकड़ा देशी-राज्यों का भी होगा जो कि एक अथवा उससे अधिक यहाँ तक कि पांच सौ पैंसठ तक हो सकता था। भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता के लिए अत्यधिक घातक और खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी। इस घोषणा ने देशी शासकों को भविष्य में बनने वाली अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है।

    देश को ए, बी एवं सी समूहों में बांटकर, मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है। कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिए उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिए निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा। कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि- 'दुःख-दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे।'


    कैबीनेट मिशन कम्पलीट

    16 मई 1946 की कैबीनेट मिशन योजना यद्यपि एक अभिशंषा के रूप में प्रस्तुत की गई थी किंतु फिर भी यह किसी पंच-निर्णय (ज्त्प्ठन्छ।स् ।ॅ।त्क्) से कम नहीं थी। योजना के प्रकाशन के साथ ही भारत में कैबीनेट मिशन का काम पूरा हो चुका था और अब उसे इंग्लैण्ड लौट जाना था। मिशन ने भारत छोड़ने से पहले भारतीय समाचार पत्रों को एक वक्तव्य दिया- 'कैबीनेट प्रस्ताव भारतीयों को शीघ्रातिशीघ्र आजादी देने का एक मार्ग है जिसमें आंतरिक उपद्रव एवं झगड़े की संभावनाएं न्यूनतम हैं।' 29 जून 1946 को कैबीनेट मिशन ने इस आशा के साथ भारत छोड़ दिया कि और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान सभा का गठन तो होगा ही। क्रिप्स तथा पैथिक लॉरेंस ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि- 'मिशन अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा।'


    कांग्रेस की हाँ .....!

    यद्यपि कैबीनेट योजना कांग्रेस की इच्छा के अनुसार नहीं थी तथापि जवाहरलाल नेहरू को विश्वास था कि कैबीनेट योजना में प्रस्तावित प्रांतों का कोई समूह बनेगा ही नहीं। क्योंकि संविभाग 'ए' के सभी और 'बी' तथा 'सी' के कुछ राज्य समूहीकरण के विरुद्ध रहेंगे। नेहरू का सोचना बिल्कुल सही था क्योंकि पंजाब और बंगाल के हिन्दू इस योजना को स्वीकार करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकते थे। इसलिए नेहरू ने 6-7 जुलाई 1946 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में कैबीनेट योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा जो 51 के मुकाबले 205 मतों से स्वीकृत हो गया। इस प्रकार कांग्रेस ने कैबीनेट योजना स्वीकार कर ली।


    देशी राजाओं की हाँ .....!

    कैबीनेट मिशन के माध्यम से राजओं की मुँहमांगी मुराद पूरी होने जा रही थी और वे एक बार फिर से ई.1817-18 से पहले की स्थिति में अर्थात् पूर्ण स्वतंत्र राज्य होने जा रहे थे। इसलिए 17 जुलाई 1946 को आयोजित नरेन्द्र मण्डल के सम्मेलन में राजाओं ने अपने मुँह में आ रहे पानी को छुपाते हुए स्वयं को देशभक्त प्रदर्शित करने का अवसर हाथ से नहीं जाने दिया और घोषणा की कि नरेन्द्र मण्डल देश की इस इच्छा से पूर्ण सहमति रखता है कि भारत को तत्काल राजनीतिक महिमा प्राप्त हो। राजाओं की इच्छा, संवैधानिक समस्याओं के निस्तारण के कार्य में प्रत्येक संभावित योगदान देने की है।


    मुहम्मद अली जिन्ना की हाँ .....!

    कैबीनेट मिशन योजना में सीधे-सीधे पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया गया था किंतु प्रांतीय विधान सभाओं में हिन्दु-बहुमत, मुस्लिम बहुमत तथा मुस्लिमों के हल्के बहुमत के आधार पर 'ए', 'बी' एवं 'सी' समूहों के निर्माण की बात कही गई थी जो अपने-अपने लिए अलग संविधान बना सकते थे। जिन्ना को इस समूहीकरण योजना में भविष्य में पाकिस्तान के निर्माण की आशा दिखाई दे रही थी। इसलिए उसने सीधे-सीधे पाकिस्तान न मिलने पर भी इस योजना को स्वीकार करने का निर्णय लिया। कैबीनेट मिशन योजना पर विचार करने के लिए बुलाई गई मुस्लिम लीग की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि- 'पूर्ण सार्वभौम पाकिस्तान के लक्ष्य की प्राप्ति भारत के मुसलमानों का अपरिवर्तनीय उद्देश्य अब भी बना हुआ है, इसलिए हम इसके दीर्घकालीन और अंतरिम दोनों भागों को स्वीकार करते हैं क्योंकि मिशन की योजना में पाकिस्तान का आधार निहित है। '

    इस प्रकार जिन्ना कैबीनेट मिशन के जाल में फँस गया और भारत की आजादी का रास्ता साफ होता हुआ दिखाई देने लगा। जो जिन्ना पिछले पंद्रह साल से इस ध्येय के लिए भारतीय जनता का खून और मुस्लिम लीगी नेताओं का पसीना बहाता रहा था कि अंग्रेज भारत को आजाद करने से पहले उसके टुकड़े करें, वही जिन्ना भारत के टुकड़े हुए बिना ही अंग्रेजों को भारत से जाने की अनुमति दे रहा था। राजनीति के कुछ पन्ने पढ़ा हुआ साधारण व्यक्ति भी अनुमान लगा सकता था कि अपने इस निर्णय के लिए जिन्ना शीघ्र ही पश्चाताप की भयानक अग्नि में झुलसने वाला था।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-112

     03.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-112

    पटेल ने नेहरू की व्यक्तिगत इच्छाओं को कांग्रेस पर हावी नहीं होने दिया


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    मीडिया ने पटेल पर आरोप लगाया कि उनका गृह मंत्रालय गांधी की रक्षा नहीं कर पाया। इससे दुःखी होकर पटेल ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। इस पर नेहरू ने पटेल का त्यागपत्र यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि नेहरू और पटेल तीस साल से कांग्रेस में एक साथ एक उद्देश्य के लिये काम करते रहे हैं और गांधी की मृत्यु के बाद उन दोनों के लिये लड़ना अच्छी बात नहीं होगी। पटेल का त्यागपत्र तो टल गया किंतु उसके बाद भी राजनैतिक विषयों पर नेहरू और पटेल के बीच मतभेद बने रहे।

    नेहरू द्वारा अपनाई गई तीन नीतियों- 1948 में काश्मीर मुद्दे को यूनाइटेड नेशन्स में ले जाने, 1950 में तिब्बत को चीन के विरुद्ध सहायता न देने तथा गोआ से पुर्तगालियों को निकालने हेतु सैनिक कार्यवाही न किये जाने पर पटेल एवं नेहरू के बीच तीव्र मतभेद, पटेल की मृत्यु तक बने रहे। जब नेहरू ने काश्मीर मुद्दे पर पटेल तथा गृह मंत्रालय के अधिकारियों को किनारे लगाने का प्रयास किया तो पटेल ने जोरदार प्रतिवाद किया। 1950 में नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर दबाव बनाया कि वे राजगोपालाचारी के पक्ष में, राष्ट्रपति पद हेतु दिया गया अपना नामांकन वापस ले लें।

    नेहरू की इस कार्यवाही ने कांग्रेसी नेताओं को बुरी तरह नाराज कर दिया। कांग्रेसियों को लगा कि नेहरू, कांग्रेस पर अपनी इच्छा थोपने का प्रयास कर रहे हैं। नेहरू ने पटेल से कहा कि वे राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनवाने में नेहरू की सहायता करें। इस पर पटेल ने पार्टी की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने से मना कर दिया तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही भारत का प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया। 1950 में नेहरू ने पुरुषोत्तम दास टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिये खड़े हुए। टण्डन की छवि एक हिन्दू नेता की थी इसलिये नेहरू ने उनका विरोध किया तथा जीवराम कृपलानी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की अपील करते हुए कहा कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो नेहरू त्यागपत्र दे देंगे।

    पटेल ने नेहरू के दृष्टिकोण का विरोध करते हुए गुजरात में टण्डन को समर्थन देने की घोषणा कर दी। कृपलानी गुजरात के ही रहने वाले थे किंतु उन्हें गुजरात से एक भी वोट नहीं मिला। पटेल का विश्वास था कि नेहरू की इच्छा कांग्रेस के लिये कानून नहीं है किंतु जब टण्डन जीत गये तो नेहरू को समझ में आ गया कि उन्होंने कांग्रेस का पूरा विश्वास खो दिया है। इस पर नेहरू ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। तब पटेल ने नेहरू को त्यागपत्र देने से मना कर दिया।

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