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  • चित्रकूट का चातक - 33

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 33

    नववर्ष उत्सव

    आज के दरबार में बड़ी भीड़ थी। दरबारे आम में वैसे भी बड़ी भीड़ रहती है किंतु आज की भीड़ कुछ अलग किस्म की थी। आम दिनों में तो मांगने वालों और फरियादियों का तांता लगता है किंतु आज के दिन रियाया बादशाह को नये साल की मुबारिकबाद देने के लिये उपस्थित हुई थी।

    आज के दिन से हिन्दुओं के विक्रम संवत का 1638वां साल आरंभ हो रहा था। हर साल नये विक्रम पर इस तरह के विशेष दरबार का आयोजन नहीं होता था किंतु रियाया हर साल बादशाह को नये साल की मुबारिकबाद कहने आती थी इसलिये अकबर ने इस साल से नये साल का विशेष दरबार करना आरंभ किया।

    जब सारे मनसबदार, अमीर, उमराव और सरदार अपनी-अपनी पंक्ति में क्रमबद्ध खड़े हो गये तो बख्शी बादशाह को दरबार में लिवाकर लाया। अकबर ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित लोगों पर डाली। बादशाह की दृष्टि रहीम पर जाकर रुकी। रहीम ने बादशाह की इच्छा जानकर बादशाह और सभासदों को नववर्ष की बधाई देते हुए कहा -'जहाँपनाह! हिन्दुस्थान में नया साल आज के दिन से आरंभ होता है। इस मुबारक दिन की शुरूआत अच्छे कामों और अच्छी बातों से हो तो आज के दिन को यादगार बनाया जा सकता है।'

    - 'मिर्जाखाँ! आज के दिन तुम ही कोई इतनी अच्छी बात कहो जो हमें जीवन भर याद रहे।'

    - 'गरीबों और बेकसों पर रहम खाने वाले नेकदिल शंहशाह! आपका इकबाल युगों-युगों तक इस धरती पर बुलंद रहे। जहाँपनाह! आज धरती भर के बादशाहों में आपका प्रभुत्व सबसे बढ़ चढ़ कर है। आप सब प्रकार से सामर्थ्यवान हैं। प्रभुता आप पर फबती है किंतु आज के इस मुबारक दिन के उजाले में मेरा दिल कुछ और कहना चाहता है।'

    - 'तुम अपनी बात निश्चिंत होकर कह सकते हो मिर्जा!

    - 'जिल्ले इलाही! मेरा मन कहता है कि आदमी का प्रभुत्व वास्तव में ईश्वर का प्रभुत्व है। इसलिये वास्तव में प्रभुता ईश्वर को ही फबती है। उसके आगे बड़े से बड़ा बादशाह भी तुच्छ मनुष्य है। उस परम शक्तिशाली ईश्वर ने सब मनुष्यों को आजाद पैदा किया है तब फिर तुच्छ मनुष्य की क्या सामर्थ्य जो बादशाह होकर अपने ही जैसे मनुष्यों को गुलाम बनाये?'

    - 'तुम क्या कहना चाहते हो मिर्जा, खुलकर कहो।' रहीम की रहस्यमयी बात सुनकर अकबर के कान खड़े हो गये।

    - 'जहाँपनाह! बादशाही सिपाहियों, अमीरों, उमरावों तथा और भी जो ताकतवर लोग इस धरती पर हैं उन्होंने अपने ही जैसे लाखों आदमियों को जबर्दस्ती पकड़ कर गुलाम बना रखा है। जिस अल्लाह ने ताकतवर लोगों को बनाया है उसी परवरदिगार ने बेकस और मजलूम गुलामों को बनाया है। उन्हें जबर्दस्ती पकड़ना और उनसे बलपूर्वक गुलामी करवाना उचित नहीं है। क्यों नहीं आज नये साल के मुबारक दिन में हम अपने गुनाह कबूल करें और गुलामों को अल्लाह की इच्छा के मुताबिक आजाद कर दें।'

    मिर्जाखाँ की बात सुनकर बादशाह अचंभे के सागर में डूब गया। क्या ऐसा संभव है कि गुलामों को आजाद कर दिया जाये? हजारों साल से हमारे बाप-दादे गुलामों को पकड़ते आये हैं और उनसे अपनी सेवा करवाते आये हैं। यदि गुलाम न रहे तो हमारी सेवा टहल और नीच काम कौन करेगा?

    दरबारियों ने भी इस विचित्र बात को सुना तो वे अचंभे से जड़ हो गये। अकबर ने हिन्दू सरदार राजा टोडरमल की ओर देखा

    - 'जहाँपनाह! मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम बजा फर्माते हैं। इंसानों को जबर्दस्ती गुलाम बनाया जाना ठीक नहीं है। बात-बात पर गुलामों को कोड़े मारना, बात-बात पर उनकी खाल खिंचवा लेना, यह अमानवीय है तथा ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जान पड़ता है।'

    राजा टोडरमल ने कहा। - 'यदि गुलाम न रहे तो फिर सेवा, चाकरी और नीच टहल के काम कौन करेगा?' खानेजहाँ कोका ने ऐतराज किया।

    - 'यह काम स्वेच्छा से काम करने वाले सेवकों से करवाया जाये और इसके लिये उन्हें भृत्ति का भुगतान किया जाये।' राजा टोडरमल ने सुझाव दिया।

    - 'राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?' बादशाह ने बीरबल की ओर गर्दन घुमाई


    - 'जहाँपनाह..........! '

    - 'सम्राट अकबर की जय। राजा टोडरमल की जय। मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम की जय। राजा बीरबल की जय...........।'

    इससे पहले कि बीरबल कुछ जवाब देता, दरबारे आम में मौजूद सहस्रों लोगों की भीड़ बादशाह और उसके अमीरों की जय-जयकार बोलने लगी। राजा बीरबल ने मुस्कारकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

    - 'क्या किसी अमीर, उमराव, सरदार और राजा को इस सम्बंध में कुछ कहना है?' अकबर ने पूछा।

    परम्परा से गुलामों की निर्बाध सुविधा भोगने वाले तुर्क एवं मंगोल अमीरों को यह बात अच्छी नहीं लगी किंतु शहबाजखाँ का उदाहरण उनके सामने था। इस समय मिर्जाखाँ की इच्छा के विरुद्ध बोलने का एक ही अर्थ था और वह था बादशाह के कोप को आमंत्रण।

    जब कोई अमीर-उमराव कुछ नहीं बोला तो अकबर ने उसी क्षण ऐलान किया कि आज से उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति किसी को गुलाम नहीं बनायेगा। जो भी गुलाम इस समय जहाँ कहीं भी हैं वे मुक्त किये जाते हैं। वे अपने मर्जी के मुताबिक कहीं भी जाने को स्वतंत्र हैं। वे चाहें तो अपने वर्तमान मालिक के यहाँ चाकरी में रह सकते हैं लेकिन उनके मालिकों को उन्हें वेतन का भुगतान करना होगा। इस आदेश का उल्लंघन करने वाले सजा के हकदार होंगे।

    बीसियों हिन्दू सरदार, जागीरदार और मनसबदार उसी समय बादशाह अकबर, मिर्जा रहीम और राजा टोडरमल की जय-जयकार बोलने लगे। आम जनता ने भी उनके कण्ठ से कण्ठ मिलाया।

    नये साल के पहले दिन यह सचमुच एक बड़ा तोहफा था जो पूरे साढ़े तीन सौ साल बाद मिर्जा रहीम ने हिन्दुस्थान की प्रजा को दिलवाया था। कुतुबुदीन ऐबक ने 1193 ईस्वी में भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना की थी। वह स्वयं मुहम्मद गौरी का जेर खरीद गुलाम था। उसके शासन काल में हजारों हिन्दुओं को जबर्दस्ती पकड़ कर गुलाम बनाया गया था। तब से ही हिन्दुस्थान में यह परम्परा चली आ रही थी लेकिन आज हिन्दुस्थान के हजारों गरीब, बेकस और मायूस इंसानों की जिंदगी में आशा की नवीन किरण का संचार हुआ।

    आज का दिन रहीम का था। अभी उसका काम समाप्त नहीं हुआ था। उसने कहा- 'जहाँपनाह! इस मुबारक बादशाही इच्छा के लिये मैं आपको मुबारक देता हूँ लेकिन एक और अर्ज किया चाहता हूँ।'

    - 'कहो मिर्जाखाँ, अपने दिल की बात जरूर कहो। आज का दिन तुम्हारा है।'

    - 'हुजूर! अल्लाह ने मासूम पंछियों के सीने में मासूम दिल छुपाया है। इन मासूम दिलों में घाव करना अल्लाह के बंदों के लिये उचित नहीं है। इन मासूम परिंदों पर दया की जानी चाहिये।' रहीम ने निवेदन किया।

    - 'लेकिन हजारों आदमी चिड़ियों को पकड़ कर अपना रोजगार चलाते हैं। यदि परिंदों को मारने पर रोक लगाई गयी तो उन गरीब इंसानों का क्या होगा?' अकबर मिर्जाखाँ के सुझाव पर हैरान था।

    - 'परवर दिगार! इंसान बहुत छोटे लाभ के लिये बड़ा अपराध करता है। छोटे-छोटे जीव-जंतु, चिड़ियां और मछलियाँ इस प्रकृति की नियामत हैं, इनके वध पर रोक लगनी चाहिये।' मिर्जाखाँ अब भी अपनी बात पर अडिग था। अकबर ने फिर से राजा टोडरमल की ओर देखा।

    - 'जहाँपनाह! मिर्जाखाँ की बात सही है। आदमी अपना पेट भरने के लिये यदि बड़ा जानवर मारे तो एक जानवर से कई इंसानों का पेट भरेगा किंतु एक इंसान का पेट भरने के लिये जाने कितने छोटे-छोटे परिंदों की जान चली जाती है।'

    - 'लेकिन बड़े जानवर! वे भी तो अल्लाह के बनाये हुए हैं। जब छोटे जानवरों को मारना उचित नहीं है तो क्या बड़े जानवरों को मारना उचित है?' अकबर ने पूछा।

    - 'उचित तो उन्हें मारना भी नहीं है किंतु उन्हें मारने से पहले इंसान दस बार सोचता है और अत्यंत आवश्यक होने पर ही मारता है। जबकि निरीह परिंदों को तो वह बिना सोचे समझे, केवल अपने मौज, शौक और मनोरंजन के लिये मार डालता है।' राजा बीरबल ने जवाब दिया।

    - 'खानेजहाँ, आपका क्या विचार है?'

    - 'बादशाह की इच्छा ही सर्वोपरि है जिल्ले इलाही।' कोका ने सिर झुका कर जवाब दिया।

    - 'जब आप सबकी ऐसी ही इच्छा है तो हम आज के मुबारक दिन यह हुक्म देते हैं कि हमारे राज्य में बिना किसी कारण के किसी परिंदे और मछली आदि छोटे जीव को न मारा जाये। सब जीवों को अल्लाह की नियामत समझा जाये और अल्लाह का हुकुम मानकर उनकी रक्षा की जाये।' अकबर अपनी बात पूरी करके क्षण भर के लिये ठहरा।

    - 'आज के इस मुबारक मौके पर हम एक ऐलान और किया चाहते हैं।' सारे दरबार की निगाहें फिर से बादशाह की ओर घूम गयीं।

    - 'शहजादे सलीम के अतालीक का पद लम्बे समय से रिक्त है। हम बहुत दिनों से चिंतित थे कि शहजादे के योग्य अतालीक कहाँ से ढूंढ कर लायें। सौभाग्य से हमारे अपने दरबार में अत्यंत योग्य अतालीक मौजूद है किंतु हमारी निगाह उस ओर गयी ही नहीं। आज हम उसी योग्य और रहमदिल इंसान को अपने शहजादे का अतालीक मुकर्रर किया चाहते हैं।' अकबर ने फिर से अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

    कौन होगा शहजादे का नया अतालीक? समस्त दरबारियों की उत्सुक निगाहें अपने चारों ओर खड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों को खोजने लगीं।

    - 'जहाँपनाह! कौन वह सौभाग्यशाली है जिसे शहजादे का अतालीक मुकर्रर किया जाना तय किया गया है।'

    - 'मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम। वे हर तरह से इस कार्य के लिये उपयुक्त हैं। हम उन्हीं को शहजादे का नया अतालीक नियुक्त करते हैं। हमें भरोसा है कि मिर्जाखाँ के संरक्षण में शहजादे की उचित तालीम होगी और वह एक नेकदिल इंसान बन पायेगा।'

    मिर्जाखाँ बादशाह की इस आकस्मिक कृपा से अभिभूत था। उसके पास बादशाह का आभार ज्ञापित करने के लिये शब्द नहीं थे। इसी ऐलान के साथ नये साल का दरबार बर्खास्त हो गया। उस दिन आम रियाया, शिया अमीर और हिन्दू उमराव बादशाह अकबर, राजा टोडरमल और मिर्जाखाँ रहीम की जय जयकार बोलते हुए दरबार से निकले। चगताई, ईरानी और तूरानी सुन्नी अमीरों के चेहरों पर चिंता की नयी लकीरें उभर आयी थीं किंतु वे बादशाही कोप को गजबइलाही (ईश्वरीय प्रकोप) से कम नहीं समझते थे इसलिये चिंता की उन लकीरों को छुपा कर रखने में ही अपनी भलाई समझते थे।

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  • चित्रकूट का चातक - 34

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 34

    चित्रकूट की एक शाम

    वे तीनों असाधारण रूप से चुप थे और बड़ी देर से बिना कुछ बोले अपने कीमती और ऊँचे घोड़ों को मंथर गति से मंदाकिनी के किनारे-किनारे चलाये ले जा रहे थे। वनावली के सघन होने पर भी मार्ग बिल्कुल साफ था किंतु ऐसा लगता था कि नदी और अश्व अपनी-अपनी गति को एक दूसरे के अनुरूप बना कर गतिमान हो रहे थे। मंदाकिनी के निर्मल जल में किल्लोल करने वाली मछलियाँ और तट की बालुका पर चलने वाले अश्व एक दूसरे को भलीभांति देख सकते थे।

    वस्त्र एवं शस्त्र सज्जा से वे तीनों ही कोई उच्च राजपुरुष प्रतीत होते थे। तीनों के सिर पर मुगलिया राजशाही की प्रतीक एक जैसी पगड़ियाँ सुशोभित थीं जिनपर मूल्यवान मोहर और कलंगी जड़ी थी। तीनों राजपुरुषों की कमर में बड़ी-बड़ी तलवारें लटकी रही थीं जिनकी मूठों पर बहुमूल्य रत्न जड़े थे। उनकी पीठों पर सावधानी से बंधी ढालों में भी कीमती रत्नों की भरमार थी जिससे वे युद्ध में काम आने वाली वस्तु के स्थान पर सजावट की वस्तु अधिक प्रतीत होती थीं। इस साम्य के अतिरिक्त उन तीनों घुड़सवारों की शेष वेषभूषा आपस में मेल नहीं खाती थी।

    सबसे आगे चल रहा घुड़सवार कतिपय स्थूल और वर्तुलाकाय देह का स्वामी था। उसकी वय भी उसके साथियों में सर्वाधिक थी। वह प्रौढ़ावस्था को पार करके वानप्रस्थावस्था में प्रवेश करने को तैयार प्रतीत होता था। उसके माथे का गोल तिलक और देह के रेशमी वस्त्र उसके राजपुरुष होने की घोषणा तो करते थे किंतु चेहरे मोहरे से वह वह राजपुरुष न होकर कोई बड़ा सेठ साहूकर अधिक प्रतीत होता था। दूसरा घुड़सवार किसी प्रौढ़ वयस हिंदू नरेश जैसा दिखायी देता था। उसके माथे पर केसर-कुमकुम से शैव पद्धति का बड़ा सा तिलक अत्यंत सावधानी पूर्वक अंकित किया गया था जिसके मध्य में भस्म की क्षीण रेखा भी सुशोभित थी। तीसरा घुड़सवार लगभग पच्चीस वर्ष का कड़ियल जवान था। उसने मुगलिया नवाब की वेषभूषा धारण कर रखी थी। उसकी तीखी ठुड्डी और उस पर तरतीब से तराशी गयी तीखी दाढ़ी उसके तुर्क होने की परिचायक थी। उसकी छोटी और सतर्क आँखों से दर्प टपका ही पड़ता था जिसे सहन कर पाना हर किसी के वश का नहीं था।

    ये तीनों घुड़सवार आपस में घनिष्ठ मित्र थे और आज बहुत दिनों बाद साथ-साथ किसी ऐसी लम्बी यात्रा पर निकले थे जो किसी युद्ध के प्रयोजन से नहीं की जा रही थी। प्रयाग से सरैयों और उससे आगे सोनेपुर तक तो वे आपस में खूब बतियाते आये थे किंतु जैसे ही सरौही से कामदगिरि के दर्शन होने प्रारंभ हुए, तीनों ही मित्र असाधारण रूप से चुप हो गये थे तथा उनके घोड़ों की गति भी असाधारण रूप से धीमी हो गयी थी।

    सूर्यदेव पश्चिम की ओर झुक चले थे किंतु संध्या होने में अभी विलम्ब था। ये तीनों मित्र प्राकृतिक वनावली, मंदाकिनी के सानिध्य और कामद गिरि के दर्शनों का लाभ लेते हुए अंततः रामघाट पहुँच गये। यहाँ से वे अपने अश्वों से उतर पड़े। उन्होंने अपने अश्व मंदाकिनी के तट पर स्थित वृक्षों से बांध दिये और स्वयं नदी की रेती में उतर पड़े। अब उनका लक्ष्य सामने दिखायी देने वाली एक छोटी सी कुटिया थी जिसके बाहर तुलसी की झाड़ियां बहुतायत से विद्यमान थीं। इन झाड़ियों के चारों ओर नदी के वर्तुल प्रस्तरों से कलात्मक घेरे बने हुए थे।

    इन तीनों को अपनी ओर आता हुआ देखकर कुटिया में से एक प्रौढ़ वयस सन्यासी इनकी अगवानी के लिये बाहर आया। दोनों प्रौढ़ वयस राजपुरुष सन्यासी के पैरों में गिर पड़े। युवा खान अपरिचय के संकोच के कारण एक ओर खड़ा रहा।

    सन्यासी ने दोनों राजपुरुषों को उठा कर हृदय से लगाते हुए कहा- 'राजा टोडरमल! राजा मानसिंह! आप दोनों राजपुरुषों का इस अकिंचन की कुटिया में स्वागत है।'

    - 'गुसांईजी महाराज! रघुनाथजी ने हम पर बड़ी कृपा कीन्ही सो आपके दर्शन सुलभ हुए।' राजा टोडरमल ने हाथ जोड़कर सन्यासी की अभ्यर्थना करते हुए कहा।

    - 'रघुनाथजी के मन की दया को कौन जान सकता है! मुझे तो लगता है उन्होंने इस अकिंचन तुलसीदास पर कृपा करके आप जैसे दुर्लभ राजपुरुषों के दर्शन चित्रकूट में ही सुलभ करवा दिये। यह तो बताईये कि ये युवा सिपहसलार कौन हैं?'

    - 'ये खानखाना बैरामखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम हैं। आप बादशाह अकब्बर के मीर अर्ज हैं तथा शहजादे सलीम के शिक्षक भी। ये बहुत दिनों से आपसे मिलने को उत्सुक थे। आपके ही अनुरोध पर आज हम यहाँ आपके श्री चरणों में उपस्थित हो सके हैं।'

    - 'बहुत अच्छी बात की जो आप लोग इन्हें भी अपने साथ ले आये किंतु यह तो पता लगे कि ये मुझे कैसे जानते हैं और मुझसे क्यों भेंट किया चाहते हैं।'

    अब्दुर्रहीम ने किसी तरह हिम्मत जुटा कर कहा-

    'ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात।

    अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ।'


    खान के मुँह से इतना सुंदर दोहा सुनकर गुसांईंजी प्रसन्न हुए। उन्होंने हँस कर कहा-

    'उमा दारु जोषित की नाईं।

    सबहि नचावत राम गुसाईं।।'


    खान गुसांईंजी के पैरों में गिर पड़ा। उसने कहा-

    'जो रहीम तन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं।

    जल में जो छाया परी, काया भीजत नाहिं।'


    गुसांईंजी ने भाव विभोर होकर खान को धरती से उठाते हुए कहा-

    'तुलसी काया खेत है, मनसा भये किसान।

    पाप पुण्य दोऊ बीज हैं, बुवै सो लुणे निदान।'


    गुसांईजी की महती कृपा देखकर रहीम ने विह्वल होकर कहा-

    'तन रहीम है कर्म बस, मन राखो ओहि ओर।

    जल में उलटी नाव ज्यों, खैंचत गुन के जोर।।''


    गुसांईंजी ने रहीम को हृदय से लगा लिया तथा उसे अपने पास नारियल के पत्तों की चटाई पर बैठाते हुए कहा- 'और सुनाओ। कुछ ऐसा सुनाओ कि कानों को और सुख मिले।'

    - 'गुसांईंजी! मेरी ऐसी सामर्थ्य नहीं।' खान ने सहम कर कहा।

    - 'खानजू!' गुसांईंजी के नेत्रों में जल भर आया। गुसांईंजी की ऐसी विह्वलता देखकर रहीम गाने लगा-

    ''भज मन राम सियापति, रघुकुल ईस।

    दीनबंधु,  दुख  टारन,  कौसलधीस।

    भर नरहरि, नारायन, तजि बकवाद।

    प्रगटि खंभ ते राख्यो जिन प्रहलाद।

    गोरज धन बिच राखत, श्री ब्रजचंद।

    तिय दामिनि जिमि हेरत, प्रभा अमंद।।''
    (खानखाना कृत)

    गाते-गाते रहीम के नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसांईंजी के शरीर में भी रोमांच हो आया। उनकी रोमावली खड़ी हो गयी और आँखों के कोये आंसुओं से भीग गये। वे भी गाने लगे-

    ''राम राम रटु, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा।

    राम नाम नवनेह मेह को, मन! हठि होहि पपीहा।

    सब साधन फल कूप सरित सर, सागर सलिल निरासा।

    राम नाम रति स्वाति सुधा सुभ सीकर प्रेम पियासा।''


    गुसाईंजी चुप हुए तो रहीम ने गाया-

    ''तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारू चकोर।

    निसि बासर लागो रहै, कृष्णचंद की ओर।।''


    युगों-युगों से प्यासे चातक बहुत देर तक रघुनाथ कीर्तन का रसपान करते रहे। प्रौढ़ वयस राजपुरुष इस अद्भुत मिलन को देखकर रोमांचित थे। उन्हें इस बात का अनुमान तो था कि रहीम उत्कृष्ट कवि है किंतु वह इस उच्च कोटि का कृष्ण भक्त है, इसका ज्ञान उन्हें आज ही हुआ।

    बहुत देर तक कुटिया में आनंद रस बरसता रहा। पत्तियों के छिद्रों में से झांकते हुए सूर्यदेव अपनी गति भूल कर आकाश में थम ही गये। अचानक उन्हें अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ तो वे हड़बड़ा कर कामदगिरि की खोह में विश्राम करने के लिये प्रस्थान कर गये। सूर्य देव की इस हड़बड़ाहट के कारण अचानक ही अंधेरा हो गया। ठीक उसी समय शिष्यों ने आकर निवेदन किया- 'अतिथियों के लिये भोजन तैयार है।'

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  • चित्रकूट का चातक - 35

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 35

    प्रजापालन

    अतिथियों के भोजन के बाद चारों व्यक्ति तसल्ली से बैठे। किसी को किसी तरह की शीघ्रता न थी।

    - 'हमने सुना है कि राजाजी ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध बड़ी वीरता दिखायी।' गुसांईंजी ने मानसिंह की ओर देखते हुए कहा।

    गुसांईंजी के कथन से मानसिंह के मुख की आभा जाती रही, उसका कण्ठ सूख गया। वह कुछ नहीं बोल सका।

    - 'कहिये! क्या राणा ने अधीनता स्वीकार कर ली?' गुसाईंजी ने फिर प्रश्न किया।

    - 'नहीं! वे स्वाभिमानी हैं, वे जान दे देंगे किंतु पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे।'

    राजा मानसिंह ने किसी तरह प्रत्युत्तर दिया।

    - 'सुना है महाराणा ने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया!' गुसांईंजी ने फिर प्रश्न किया।

    - 'महाराणा ने वीरोचित व्यवहार ही किया है गुसांईंजी! दुर्भाग्य मेरा है, मैं ही उचित सत्कार के योग्य नहीं हूँ।'

    - 'अपने आप को उचित सत्कार के योग्य बनाओ राजाजी।'

    - 'मैं प्रयास करता हूँ किंतु यह मेरे बूते से बाहर की बात है।' - 'बूता तो रघुवीरजी देंगे। आप उनसे बूता मांग कर तो देखिये किंतु बूता मांगने से पहले बंधु के साथ विग्रह का भाव त्यागना होगा।'

    - 'मेरा उनसे कोई विग्रह नहीं। मैं तो कर्त्तव्य पालन के लिये ही उनके सामने हथियार उठाता हूँ।'

    - 'कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अकर्त्तव्य को ही कर्त्तव्य समझ बैठे हैं?'

    - 'मेरी तुच्छ बुद्धि मुझे कोई निर्णय नहीं करने देती।'

    - 'जो सहजता से उपलब्ध है, उसे स्वीकार कर लेने की लालसा हमें बुद्धि से काम ही नहीं करने देती।'

    - 'मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ गुसाईंजी।'

    - 'बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख है, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।'

    मानसिंह ने धरती पर माथा टिका दिया। उसके नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसाईंजी ने बड़े स्नेह से उसके माथे पर हाथ फिराया।

    - 'कहिये राजा टोडरमल! आपके राज्य में जनता सुख से तो है?' गुसाईंजी ने प्रौढ़ वयस स्थूलाकाय अतिथि को सम्बोधित करके पूछा।

    - 'राज्य शहंशाह अकब्बर का है महात्मन्। मैं तो उनका अकिंचन सेवक हूँ।' राजा टोडरमल ने सिर झुका कर उत्तर दिया।

    - 'राजा के मंत्री ही राजा की ओर से प्रजा का अनुशासन और उसकी सार-संभाल करते हैं। जिस राजा के सचिव, सहायक और सेवक प्रजा को दुख देते हैं, उस राजा का नाश हो जाता है और प्रजा पीड़ित होती है। आप राज्य के वित्त और अर्थ सचिव हैं। आपका उत्तरदायित्व तो सर्वाधिक है।'

    - 'सचिव के अधिकार की सीमा और अपनी सामर्थ्य भर तक तो मैं प्रजा पालन का प्रयास करता ही हूँ महात्मन्।'

    - 'इस समय भारत वर्ष की जनसंख्या कितनी है?'

    - 'सिंधु नदी से बंगाल के समुद्र तक तथा हिमालय से सेतुबंध रामेश्वरम् तक लगभग बारह करोड़ जन निवास करता है।'

    - 'उसमें से कितनी प्रजा मुगल साम्राज्य के अधीन है?'

    - 'लगभग दस करोड़ महात्मन्।'

    - 'मुगल साम्राज्य में मंत्रियों, सचिवों तथा उच्चाधिकारियों की संख्या कितनी है?'

    - 'कुल मिलाकर यही कोई आठ हजार मनसबदार होंगे।'

    - 'राजकीय कोश का कितना हिस्सा इन मनसबदारों में बँटता है?'

    - 'साम्राज्य की कुल आय का इकरानवे प्रतिशत इन मनसबदारों में बँट जाता है।

    - 'इन आठ हजार मनसबदारों में से सम्राट, राजपुत्रों तथा सचिवों आदि उच्च अधिकारियों की संख्या कितनी है?'

    - 'एक हजारी जात और उनसे ऊपर के मनसबदारों की संख्या चार सौ पैंतालीस है।'

    - 'उन पर राजकीय आय का कितना प्रतिशत व्यय होता है?'

    - 'यही कोई इकसठ प्रतिशत।'

    - 'सम्राट और राजपुत्रों की संख्या कितनी है?'

    - 'बादशाह तथा उसके शहजादों सहित प्रथम श्रेणी के कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों तथा रईसों की संख्या अड़सठ है।'

    - 'इनके ऊपर कितना खर्च होता है?'

    - 'लगभग सैंतीस प्रतिशत।'

    - 'शेष आय का क्या होता है?'

    - 'इसमें से अधिकांश राशि काजियों, उलेमाओं, खतीबों, मुहतसिबों, मुफ्तियों, सद्रों तथा तथा फकीरों में बँट जाती है।'

    - 'यह सारा धन आता कहाँ से है?'

    - 'प्रजा से विभिन्न प्रकार के करों के रूप में प्राप्त होता है।'

    - 'क्या इसके अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्राट अथवा उसके अधिकारियों के पास धन नहीं आता?'

    - 'युद्ध में लूटा गया धन बादशाह तथा उनके सैनिकों को प्राप्त होता है। उसे राजकीय कोष में जमा नहीं करवाया जाता। इसलिये उसका कोई हिसाब नहीं है।'

    - 'भारतवर्ष की जिस प्रजा से विपुल कर लेकर आप इतना धन एकत्र करते हैं, उसका कितना प्रतिशत प्रजा के हितार्थ व्यय किया जाता है?'

    - 'बादशाह, शहजादों तथा मनसबदारों को जो धन दिया जाता है, वह समस्त धन प्रजा के रक्षण हेतु सैन्य जुटाने में व्यय होता है।'

    - 'सम्राज्य विस्तार हेतु किया गया सैन्य व्यय प्रजा के रक्षण के लिये कैसे माना जा सकता है?'

    - 'प्रजा रक्षण एवं साम्राज्य विस्तार साथ-साथ ही चलते हैं प्रभु।'

    - 'जो सैन्य स्वयं ही प्रजा को लूटता फिरता हो, उनकी सम्पत्ति, गौ तथा स्त्रियों का हरण करता हो। उससे किस प्रकार के प्रजा रक्षण की अपेक्षा है आपको?' गुसाईंजी ने किंचित् रुष्ट होकर पूछा।

    राजा टोडर मल गुसाईंजी की खिन्नता देखकर सहम गया। उसके मुँह से कोई शब्द तक न निकल सका।

    - 'सत्य तो यह है राजाजी कि सम्राट, राजपुत्रों तथा सामंतों के भोग से बचा हुआ अधिशेष सैनिकों के सामने फैंका जाता है। इस उच्छिष्ट से सैनिकों का उदर नहीं भरता। उन्हें विवश होकर प्रजा में लूट मार करनी पड़ती है। इसमें आपका दोष नही है क्योंकि म्लेच्छ सम्राट के राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार यही है।'

    गुसाईंजी क्षण भर के लिये मौन रहे और फिर एक लम्बी साँस लेकर बोले-

    ''किसबी किसान कुल, बनिक भिखारी भाट,

    चाकर चपल नट, चोर, चार, चेटकी।

    पेट को पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,

    अरत गहन-गन, अहन अखेट की।

    ऊँचे नीचे करम धरम अधरम करि,

    पेट को ही पचत, बेचत बेटा बेटकी।

    तुलसी बुझाई एक राम घनश्याम ही तें,

    आग बड़वागि ते बड़ी है आग पेट की।

    दारिद दसानन दबाई, दुनी दीन बंधु।

    दुरित दहन देखि तुलसी हहा करी।''


    कुटिया में निस्तब्धता छा गयी। कुछ समय पश्चात् गुसांईजी ने ही मौन तोड़ा- 'आप लोग राज पुरुष हैं किंतु क्या इस सत्य से परिचित हैं कि आज प्रजा के मन में सत्ता के सत्य का अनुभव जितना गहरा है, उससे भी अधिक गहरा अनुभव सत्ता की व्यर्थता का है। किसान कारीगर, और सामान्य प्रजा भुखमरी अनिश्चय और सैन्य शोषण से त्रस्त है। सम्राट के पापों का दण्ड प्राकृतिक आपदाओं के रूप में फलित होता है। प्रजा दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करके किसी तरह अपने आप को जीवित रखे हुए है। बहुत से लोग घर बार छोड़कर योगियों, मुनियों, साधुओं, संतों, सिद्धों, तांत्रिकों तथा उदासीन तापसों के वेश धारण करके भिखारी बने हुए घूमते हैं। इनकी लूट पाट से त्रस्त प्रजा का विश्वास धर्म में से उठता जा रहा है। बड़ी संख्या में उत्पन्न पण्डों, पुरोहितों, पुजारियों और ज्योतिषियों ने भी प्रजा से धन ऐंठने के ना-ना उपाय ढूंढ निकाले हैं। लोगों की आस्था धर्माचारण से उठती जा रही है।

    कुटिया के बाहर रात गहराती जा रही थी और भीतर मौन।


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  • चित्रकूट का चातक - 36

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 36

    अयोग्य शिष्य

    कच्छवाहों की राजकुमारी जोधाबाई से निकाह करके अकबर ने उसे मरियम उज्जमानी नाम दिया और उसे शाह-बेगम घोषित किया। उससे उत्पन्न पुत्र सलीम का नामकरण सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर किया गया।

    सलीम का नामकरण भले ही सूफी संत के नाम पर किया गया था किंतु वह बहुत जिद्दी और क्रूर प्रवृत्ति का बालक था। उसकी शिक्षा के लिये कई शिक्षकों को नियुक्त किया गया किंतु वे इस दुष्ट बालक को नहीं पढ़ा सके। अंत में अकबर ने अब्दुर्रहीम को इस कार्य के लिये चुना।

    जब अब्दुर्रहीम को शहजादा सलीम का अतालीक बनाया गया तो उसने बादशाह का आभार जताने के लिये बड़ा भारी जलसा किया। बादशाह अपने तमाम अमीर-उमरावों और शहजादों सहित रहीम के डेरे पर हाजिर हुआ और दिल खोलकर मिर्जाखाँ की तारीफ में कसीदे पढ़े।

    अब्दुर्रहीम ने अकबर की इच्छानुसार जिद्दी बालक सलीम का समुचित शिक्षण प्रारंभ किया तथा बालक के शारीरिक, बौद्धिक एवं मानसिक विकास का हर संभव प्रयास किया किंतु सलीम भी शिक्षा के मामले में अपने बाप अकबर का ही अनुकरण करने वाला सिद्ध हुआ। जिस प्रकार हुमायूँ के लाख चाहने पर भी अकबर ने विधिवत् शिक्षा नहीं ली, उसी प्रकार सलीम भी पढ़ाई लिखाई से दूर ही रहा। भाग्य की यह विचित्र विडम्बना ही थी कि अकबर को बैरामखाँ जैसा और सलीम को अब्दुर्रहीम जैसा अद्भुत शिक्षक मिला किंतु वे अच्छी शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके।

    सलीम की अयोग्यता को देखकर अब्दुर्रहीम ने माथा पीट लिया किंतु फिर भी उसने किसी तरह सलीम को फारसी, तुर्की तथा हिन्दी भाषाओं का ज्ञान करवाया और हिन्दी तथा फारसी में कविता लिखना भी समझाया। उसे घुड़सवारी और तलवारबाजी का भी ज्ञान करवाया।

    जब सलीम पंद्रह साल का हुआ तो उसका विवाह कच्छवाहा राजकुमारी मानबाई से करवा दिया गया। इसके बाद तो सलीम का मन शिक्षा से पूरी तरह हट गया। उधर खानखाना भी मुगलिया सल्तनत का दक्षिण भारत में प्रसार करने में जुट गया तो उसके पास सलीम को पढ़ाने का समय न रहा।

    अब्दुर्रहीम के दूर हटते ही सलीम बुरे लोगों की संगत में पड़ गया और उसने अब्दुर्रहीम की शिक्षाओं को भुलाकर एक क्रूर इंसान का रूप ले लिया। उसके हरम में स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी जो शीघ्र ही आठ सौ तक जा पहुँची। दिन भर हिंजड़े, गवैये और नचकैये सलीम के हरम में धमाल मचाये रहते। सलीम इनके साथ दिन-रात शराब पीता और शिकार खेलने जाता। नियति ने भारत वर्ष के साथ कैसा क्रूर मजाक किया था, इस संस्कारहीन, अमर्यादित शराबी के भाग्य में विधाता ने भारत का भाग्य विधाता होने के अंक लिखे थे।

    कविता का व्याकरण

    शहजादे का अतालीक मुकर्रर किये जाने से अब्दुर्रहीम के रुतबे और ख्याति में एकाएक ही बहुत वृद्धि हुई। अब्दुर्रहीम की विद्वता की ख्याति सुनकर उसके दरबार में दुनिया भर के लोग जुटने लगे जिनमें कवियों की संख्या सर्वाधिक थी। हिन्दुस्थान, ईरान, तूरान तथा ख्वारिज्म के लगभग तीन सौ कवि निरंतर उसके दरबार में उपस्थित रहते। अब्दुर्रहीम स्वयं भी तुर्की, फारसी, अरबी, हिन्दी, संस्कृत अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं का जानकार था। उसने ग्यारह वर्ष की आयु में बिना गुरु की सहायता से पहली काव्य रचना की थी तब से उसकी कविता में निखार आता ही गया था। अकबर ने फ्रांस और यूरोपीय देशों से पत्राचार करने का जिम्मा रहीम पर ही छोड़ रखा था जिससे उन देशों के लोग भी जब रहीम से मिलने आते तो रहीम को खुश करने के लिये अपने देश के कवियों की कवितायें सुनाया करते।

    वास्तव में उन दिनों अकबर के दरबार तक पहुँचने का मार्ग अब्दुर्रहीम के दरबार से होकर गुजरता था। उस काल में शासक वर्ग के पास बज्म (आमोद-प्रमोद) और रज्म (युद्ध) को छोड़कर और कोई काम न था। इसलिये कविगण भी अधिकतर अपने आकाओं को खुश करने वाली, स्त्रियों के अंग लास्य का वर्णनातीत वर्णन करने वाली तथा हर तरह से अपने स्वामियों का मनोरंजन करने वाली कवितायें ही अधिक कहते थे। दर्शन और नीति से रहित उन कविताओं में चाटुकारिता का ही भाव अधिक होता था।

    इन बेस्वाद कविताओं का व्याकरण रहीम के मन को किंचित् भी रास नहीं आता था और कभी-कभी तो उसका मन दरबारी व्याकरण वाली कविताओं से पूरी तरह से उचाट हो जाता था फिर भी यदि रहीम को कवियों के बीच बैठना सुहाता था तो केवल इसलिये कि रहीम को पूरा विश्वास था कि यदि धरती से खून-खराबे का दौर कभी समाप्त होगा तो इन्हीं कवियों के दम पर। उन दिनों बहादुरी दिखाने वाले और दान देने वाले तो फिर भी मिल जाते थे किंतु कवियों और कविताओं का सम्मान करने वालों का पूरी तरह अभाव था।

    चाटुकार कवियों के साथ-साथ गंग, केशवदास (ये महाकवि बिहारी के पिता थे।) मंडन तथा चामुंडराय जैसे कविता के वास्तविक मर्म को जानने वाले कवि भी रहीम के दरबार में आने लगे थे। इन कवियों की कृपा से रहीम के पुस्तकालय में पूरी दुनिया के कवियों की कविताओं का संग्रह होने लगा था जिनकी नकलें उतारने और संभाल कर धरने के लिये तीन सौ से अधिक आदमी रहीम के पुस्तकालय में लगे रहते थे। रहीम का पुस्तकालय उस समय हिन्दुस्थान का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। कवियों के साथ चित्रकारों, गवैयों और संगीतकारों का भी अच्छा जमावड़ा होने लगा था।

    वस्तुतः इन सब उपायों से रहीम ने अपने समय की मुख्य धारा को ही बदल दिया। वह समय धरती का सबसे बड़ा तोपखाना खड़ा करने, हाथियों की सबसे बड़ी फौज संगठित करने, राज्य सीमाओं का विस्तार करने और निर्दोषों का खून बहाने की मिसालें कायम करने का था किंतु रहीम ने भारत का सबसे बड़ा कवि दरबार जोड़कर, सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित कर और गवैयों तथा चित्रकारों को प्रश्रय देकर अपने बाप दादों का पुराना ढर्रा ही बदल दिया था। इस तरह वह स्वयं एक आदमी न रहकर सांस्कृतिक प्रतिष्ठान बन गया था।

    इन सबसे अलग और बड़ी बात तो यह थी कि वह अपने दरबार के समस्त कवियों से अलग था और उसने अपना सुर उस समय की कवि परम्पराओं से न मिलाकर धूल, गरीबी और मुसीबतों में लिपटे गाँवों की गलियों में भटकने वाले कवियों और गवैयों से मिलाया। उसकी कविता में गरीब के आँसू थे जिनका व्याकरण अभावों और मुसीबतों में गढ़ा गया था।

    जुआ

    गुजरात के सुलतान मुजफ्फरखाँ को बादशाह अकबर कैद करके अपने साथ आगरा ले आया था किंतु कुछ दिनों बाद ही वह अकबर के नमक हराम नौकरों को अपनी और मिलाकर कैद से भाग निकलने में सफल हो गया और फिर से बड़ी भारी फौज एकत्र करके उसने लगभग पूरे गुजरात पर दखल जमा लिया। अहमदाबाद में बैठकर मुजफ्फरखाँ ने मुल्क में अपने नाम की दुहाई फेर दी। इससे अकबर की बड़ी किरकिरी हुई।

    दुबारा मुजफ्फरखाँ के पीछे जाना अकबर अपनी शान के खिलाफ समझता था। एक से एक बड़ा सेनापति अकबर की सेवा में हाजिर था किंतु वह इस मोर्चे पर किसी विश्वसनीय आदमी को ही भेजना चाहता था। बहुत सोच विचार करने के बाद अकबर ने मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम को यह जिम्मा सौंपा। रहीम के साथ दस हजार सैनिकों की फौज भेजी गयी।

    जब रहीम यह फौज लेकर मेड़ता के पास पहुंचा तो मुजफ्फरखाँ ने पट्टन में टिके हुए मुगल सेनापति कुतुबुद्दीन को मार डाला और आगे बढ़कर भंड़ूचमें भी भारी तबाही मचाई। अब्दुर्रहीम ताबड़तोड़ चलता हुआ पाटन पहुँचा। वहाँ पहुंचकर उसका उत्साह ठण्डा पड़ गया। उसे ज्ञात हुआ कि इस समय मुजफ्फरखाँ के पास चालीस हजार घुड़सवार और एक लाख पैदल सेना है।

    भाग्य रहीम को एक बार फिर से आगरा से गुजरात खींच ले आया था और बहुत दूर से कबड्डी दे रहा था। यह वही गुजरात था जो पहले भी दो बार रहीम का जीवन पूरी तरह से बदल चुका था। रहीम को लगा कि इस बार की चुनौती पहले की तमाम चुनौतियों से किसी भी तरह कम विषम नहीं थी। इस चुनौती को जीत पाना आसान नहीं था, चारों ओर मौत का ही सामान सजा हुआ था।

    अब्दुर्रहीम के दस हजार सैनिक तो मुजफ्फरखाँ के अजगर रूपी सैन्य के मुँह में मेमने की तरह पिस कर मरने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते थे। मिर्जाखाँ रहीम को उसके आदमियों ने सलाह दी कि मालवा से मुगल लश्कर मंगवा लिया जाये तभी मुजफ्फरखाँ पर हाथ डाला जाये। इस पर मिर्जाखाँ के मंत्री दौलतखाँ लोदी ने रहीम को गुप्त सलाह दी कि यदि वह अपने पिता की तरह भाग्य पलटना चाहता है तो बड़ा खतरा मोल ले। मालवा की सेना के आने पर युद्ध जीता गया तो उसका श्रेय अकेले रहीम को नहीं मिलेगा। उसमें दूसरे सेनापतियोंका हिस्सा होगा।

    मिर्जाखाँ को अपने मंत्री की बात जंच गयी और वह अपने दस हजार आदमियों के दम पर ही इस लड़ाई को जीतने की तैयारी करने लगा। उसने अपनी सेना के सात टुकड़े किये और उन्हें इस तरह समायोजित किया जिससे जरूरत पड़ने पर इन अंगों को आसानी से जोड़ा एवं अलग किया जा सके। स्वयं इस लश्कर के केंन्द्र में स्थित रहकर उसने हिन्दू राजाओं को अपने बांयी ओर तथा मुस्लिम सेनापतियों को दांयी ओर रखा। इसके बाद उसने गुजरात की ओर प्रस्थान किया।

    जब मुजफ्फरखाँ को ज्ञात हुआ कि अब्दुर्रहीम सात सेनाएं लेकर आ रहा है तो वह अहमदाबाद में आ टिका और अब्दुर्रहीम की प्रतीक्षा करने लगा। अब्दुर्रहीम अहमदाबाद के बाहर मानपुर में आकर ठहर गया। दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे की वास्तविक ताकत को तोलने में लग गयीं।

    इसी बीच रहीम ने एक नाटक खेला। उसने अपने कुछ विश्वस्त आदमियों को एक नकली फरमान बादशाह की ओर से बनाकर दिया और उन्हें चुपचाप आगरा की तरफ कुछ दूर चले जाने को कहा। फिर रहीम खुद ही बहुत सारे आदमी अपने साथ लेकर उनके पीछे गया और गाजे बाजे के साथ उन्हें अगवानी करके लौटा लाया। रहीम के नौकरों ने निर्धारित योजना के अनुसार बादशाह का नकली फरमान रहीम की सेवा में पेश किया।

    सारी सेना के बीच यह नकली फरमान जोर-जोर से पढ़कर सुनाया गया। इस फरमान में बादशाह ने लिखा था कि हम आते हैं, हमारे पहुँचने तक लड़ाई मत करना।

    यह फरमान सुनकर सारी सेना मारे प्रसन्नता के नाच उठी तथा उत्साह में भर कर सरखेज की तरफ आगे बढ़ गयी और अहमदाबाद के बाहर साबरमती के तट पर जाकर टिक गयी, जिस तरफ मुजफ्फरखाँ की फौज पड़ाव किये हुए थी। मुजफ्फरखाँ ने यह सुनकर कि बादशाह स्वयं फौज लेकर आ रहा है, बादशाह के आने से पहले से ही रहीम की सेना को नष्ट करने का विचार किया। उसने काफी दूर जाकर नदी पार करने तथा रहीम की सेना पर पीछे से वार करने की योजना बनायी। इस पर रहीम ने राय दुर्गा को मुजफ्फरखाँ की सेना को पीछे से रोकने के लिये नियुक्त किया और जब मुजफ्फरखाँ की आधी सेना नदी पार करने के लिये आगे बढ़ गयी तब रहीम अपनी बाकी की छः सेनाओं को लेकर मुजफ्फरखाँ पर जा चढ़ा। इससे मुजफ्फरखाँ की सेना में भ्रम फैल गया तथा सेना के दो टुकड़े हो गये।

    दिन चढ़े तक लड़ाई होती रही। भयानक मारकाट मची जिसमें अब्दुर्रहीम के ठीक सामने ढाल की तरह अड़े हुए सैनिकों का पूरी तरह चूरा हो गया। हरावल और एलतमश के पैर टूट जाने पर अब्दुर्रहीम की जान पर बन आयी। उसके आस-पास केवल एक सौ हाथी और तीन सौ घुड़सवार रह गये। मुजफ्फरखाँ इनके ठीक सामने अपने सात हजार सैनिकों के साथ जमा हुआ था। रहीम को इस विपन्न अवस्था में देखकर वह आगे बढ़ा। पक्के जुआरी की तरह रहीम इस स्थिति से निबटने के लिये पहले से ही तैयारी कर चुका था। उसने महावतों को आदेश दिया कि बिना कुछ भी देखे हुए जितनी तेजी से हो सके, उतनी तेजी से अपने हाथियों को आगे की ओर हूलते रहें और जहाँ तक हो सके ज्यादा से ज्यादा संख्या में दुश्मन के सैनिकों को रौंदते रहें।

    दुश्मन ठीक छाती पर चढ़ आया। जिस प्रकार समंदर की लहरों को गिन सकना संभव नहीं है उसी प्रकार इस दुश्मन से भी पार पाना संभव जान नहीं पड़ता था किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था। दांव खेला जा चुका था। अब तो केवल परिणाम ही जानना शेष था। एक बार तो ऐसी नौबत आयी कि मिर्जाखाँ के आदमियों ने मिर्जाखाँ के घोड़े की लगाम पकड़ ली और उसे जबर्दस्ती खींचकर मैदान से बाहर ले जाने लगे।

    मिर्जाखाँ को रणक्षेत्र से बाहर खींच ले जाने का प्रयास करने वाले उसके शुभचिंतक सैनिक नहीं जानते थे कि मिर्जाखाँ आज सेनापति नहीं था, जुआरी था, जिसने पराये हाथों में थमे पासों पर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। हर हालत में उसे खेलना ही अभीष्ट था, पक्के जुआरी की तरह, हारे चाहे जीते। उसने सैनिकों के हाथ से अपने घोड़े की रास छुड़ा ली और घोड़े को ऐंड़ लगाकर तेजी से आगे बढ़ गया।

    ठीक उसी समय रहीम की युक्ति काम कर गयी। रहीम के हाथियों ने मुजफ्फरखाँ की सेना को कुचल कर रख दिया। मुजफ्फरखाँ का तोपखाना आगे वाली सेना ले जा चुकी थी, बची हुई सेना हाथियों को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुई। फतह हासिल करने का वक्त आ पहुंचा था। रहीम और उसके आदमी दुगने जोश से तलवार चलाने लगे।

    यह विशुद्ध जुआ था जो मिर्जाखाँ ने भाग्योत्थान के लालच में खेला था। इसका परिणाम कुछ भी हो सकता था। भाग्यलक्ष्मी उस पर रीझी हुई थी, उसने मिर्जाखाँ के पक्ष में जीत का नया पन्ना लिख दिया। मुजफ्फरखाँ मात खाकर राजमहेन्द्र की ओर भागा।

    भागते हुए सैनिकों का पीछा करने के बजाय रहीम पलट कर खड़ा हो गया और नदी पार करके आने वाली मुजफ्फरखाँ की अग्रिम सेना की प्रतीक्षा करने लगा।

    उधर जब मुजफ्फरखाँ की अग्रिम सेना ने नदी पार की, तब उसे समाचार मिला कि मुजफ्फरखाँ परास्त होकर राज महेंद्र की ओर भाग गया है तब वह सेना भी आगे बढ़ने के बजाय फिर से नदी पार करके भाग खड़ी हुई। राय दुर्गा प्रतीक्षा ही करता रह गया।

    विजय की प्रसन्नता में रहीम ने अपने बचे खुचे सैनिकों को इकठ्ठा किया और अपना सर्वस्व उनमें बाँट दिया। आखिर में एक सिपाही मिर्जाखाँ की सेवा में हाजिर हुआ। उसे कुछ नहीं मिला था लेकिन तब तक रहीम का सर्वस्व बँट चुका था। मिर्जाखाँ ने अपने डेरे में निगाह घुमाई, वहाँ एक कलमदान के अतिरिक्त कुछ न रह गया था। रहीम ने सिपाही को कलमदान देकर कहा कि आज तो यही ले जाओ मौका आने पर, इस कलमदान के बदले में जो जी चाहे ले जाना।

    जब मिर्जाखाँ की जीत का समाचार आगरा पहुँचा तो अकबर ने मिर्जाखाँ का को खानखाना का खिताब, एक भारी खिलअत तथा पाँच हजारी मनसब बख्शा और रहीम के आदमियों के भी मनसब बढ़ाये।


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  • चित्रकूट का चातक - 37

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 37

    नोपकृतं

    गुजरात विजय के उपलक्ष्य में खानखाना बनाये जाने पर अब्दुर्रहीम दिल्ली दरबार में उपस्थित हुआ और उसने बादशाह के प्रति आभार का प्रदर्शन किया। बादशाह ने उसकी सेवाओं की प्रशंसा की और उसे फिर से मोर्चे पर लौट जाने के आदेश दिये।

    अब्दुर्रहीम को खानखाना बनाये जाने के उपलक्ष्य में अब्दुर्रहीम के महलों में भारी उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर अमीरों, उमरावों और हिन्दू नरेशों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कवि, गवैये और चित्रकार भी उपस्थित हुए। दिल्ली में इस समारोह की धूम मच गयी।

    वैसे भी नये, पुराने, अनाड़ी और मंजे हुए कवि अब्दुर्रहीम के समक्ष आने के लिये हर समय उत्सुक रहते थे तथा उसेे अपनी कविताएं सुनाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। वे अपनी कविताएं रहीम को सुनाते और अब्दुर्रहीम से प्रशंसा तथा पुरस्कार पाकर अपनी उन्नति का मार्ग खोलने की चेष्टा करते थे। इस अवसर पर जगन्नाथ त्रिशूली ने एक श्लोक रहीम के दरबार में उपस्थित कवियों के सामने सुनाया-

    प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु, मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

    नापकृतं नोपकृतमं न सत्कृतं कि कृत तेन।।


    अर्थात्- जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का (क्रमशः) अपकार, उपकार और सत्कार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

    दरबार में उपस्थित कवियों ने युवा कवि जगन्नाथ की बड़ी प्रशंसा की लेकिन रहीम कुछ चिंतत हो गये।

    - 'क्या बात है, खानखाना को श्लोक ठीक नहीं लगा?' युवा कवि ने सहमते हुए पूछा।

    - 'श्लोक बहुत सुंदर है किंतु कवि यदि अनुमति दे तो मैं इसमें कुछ संशोधन करना चाहता हूँ।' अब्दुर्रहीम ने कहा।

    - 'यदि खानखाना स्वयं मेरी कविता में सुधार करेंगे तो यह मेरा सौभाग्य होगा।' जगन्नाथ त्रिशूली ने कहा।

    - 'तो फिर इस श्लोक को इस तरह पढ़ो कवि-

    प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु, मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

    नोपकृतं नोपकृतं  नोपकृतं कि कृतं तेन।।


    अर्थात्- जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का क्रमशः उपकार, उपकार और उपकार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

    बनी के राना

    - 'अब्बा हुजूर, फिर क्या हुआ?' जाना ने पिता के कंधे पर मुक्का मारा।

    - 'अरे कब क्या हुआ?' खानखाना ने पूछा।

    - 'अरे कल जो कहानी आप हमें सुना रहे थे, उसमें आगे क्या हुआ?'

    - 'हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे?'

    - 'हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे? इतना भी याद नहीं रहता?' जाना ने पिता की नकल उतारते हुए कहा।

    - 'हाँ भई! नहीं रहता।'

    - 'अरे वो जंगल के सेर वाली।'

    - 'सेर नहीं शेर।'

    - 'लेकिन आप ही ने तो कल सेर बोला था।'

    - 'अरे वह तो कविता में ऐसे कह सकते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि शेर हमेशा के लिये सेर हो जायेगा।'

    - 'अच्छा अब्बा हुजूर! अब मैं शेर ही बोलूंगी, सेर नहीं। आप आगे की कहानी तो सुनाइये।'

    - 'हाँ तो कल हम कहाँ थे?'

    - 'हम तो यहीं थे, अपने डेरे में।'

    - 'डेरे में तो थे किंतु कहानी में कहाँ थे?'

    - इसे क्या मालूम, ये तो सो गयी थी।' ऐरेच ने कहा।

    - नहीं! मैं सोयी नहीं थी, मुझे सब याद है।

    - अच्छा बताओ तो तुम्हें क्या याद है?'

    - 'आप ने कहा था कि जब सियार ने जुलाहे को कंधे पर कपास धुनने का धुना और हाथ में कमानी लेकर जाते हुए देखा तो सियार ने सोचा कि यह कोई शिकारी है और शिकार मारने के लिये जंगल में आ रहा है। सियार ने सोचा कि यह कहीं मुझ पर ही तीर न मार दे इसलिये खुशामद से इसको खुश किया जाये।'

    - 'हाँ-हाँ! मैंने कल यहाँ तक ही कहानी सुनायी थी कि मियाँ फहीम आ गये थे हमें शिकार पर ले जाने के लिये।'

    - 'अब्बा हुजूर! ये खुशामद क्या होता है?'

    - 'जब किसी को प्रसन्न करने के लिये झूठी सच्ची तारीफ की जाती है तो उसे खुशामद कहते हैं। जैसे हम तुम्हारी खुशामद करते रहते हैं।' खानखाना ने बेटी के गाल पर चपत लगाते हुए कहा।

    - 'अब्बा हुजूर! ये जाना तो बस बोलती ही रहती है। आप कहानी सुनाईये ना।' दाराब ने मचल कर कहा।

    - 'अब्बा हुजूर! सियार ने जुलाहे की खुशामद कैसे की?' जाना ने अपनी नन्हीं हथेलियों से खानखाना का सिर अपनी ओर मोड़ते हुए कहा। वह नहीं चाहती थी कि पिता भाई की ओर देखे।

    - 'तू बीच-बीच में सवाल मत पूछ।' ऐरच ने जाना को धमकाया।

    - 'यदि तुम सब चुप होकर बैठोगे तो ही तो मैं कहानी सुना पाऊंगा ना!' खानखाना ने कहा।

    - 'अच्छा हम सब चुप होकर बैठते हैं।' कारन ने सब बच्चों को चुप रहने का संकेत किया।

    - 'सियार ने सोचा कि यदि मैं इस शिकारी को दिल्ली का राजा कहूंगा तो यह मुझसे बड़ा राजी होगा और मुझे नहीं मारेगा। इसलिये उसने बड़ी मीठी आवाज में कहा-

    ''कांधे धनुष हाथ में बाना। कहाँ चले दिल्ली पतराना।''

    जुलाहा पहली बार जंगल से गुजर रहा था। उसने सुना था कि जंगल में भयानक शेर रहते हैं जो आदमी को खा जाते हैं लेकिन उसने कभी भी शेर को देखा नहीं था। सियार को देखकर उसने सोचा कि हो न हो, यही शेर है। जुलाहा डर गया और उससे बचने का उपाय सोचने लगा। उसने सोचा कि बड़ा आदमी बड़ी बात ही सोचता है। यह खुद राजा है इसलिये मुझे भी राजा ही समझता है। यदि मैं इसे जंगल का राणा कहकर इसकी प्रशंसा करूं तो यह अवश्य ही मुझे छोड़ देगा। इसलिये जुलाहे ने कहा-

    ''तुम जंगल के सेर बनी के राना। बड़ेन की चाल बड़ेन पहचाना।''

    - 'फिर क्या हुआ?'

    - 'फिर क्या होना था, दोनों ने एक दूसरे की झूठी तारीफ की, दोनों ही एक दूसरे से डरते रहे और दोनों ही एक दूसरे को क्षमा करके अपने-अपने रास्ते चल दिये।

    - 'फिर क्या हुआ?'

    - 'फिर कुछ नहीं हुआ, खेल खतम, पैसा हजम।'

    - 'अब्बा हुजूर! हमें भी एक दिन शिकार मारने के लिये ले चलिये ना।' जाना ने कहा।

    - 'तू तो लड़की है। तू कैसे शिकार मारेगी! मैं लड़का हूँ, मैं अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊंगा।' ऐरच ने कहा।

    - 'मैं भी तो लड़का हूँ, मैं भी अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊँगा।' दाराब ने कहा।

    - 'नहीं लड़की होने से क्या होता है, मैं जरूर ही शिकार मारने जाऊँगी।' जाना ने कहा।

    - 'अच्छा-अच्छा। झगड़ो मत। तुम सब कल शिकार मारने चलना। तुम्हारी अम्मी को भी ले चलेंगे।' खानखाना ने बच्चों का फैसला करते हुए कहा।

    अहेर

    अरावली की सघन उपत्यकाओं में एक आदमी तेजी से भागा चला जा रहा था किंतु हाथ में गाय का रस्सा पकड़े हुए होने से उसकी गति तेज नहीं हो पाती थी। उसकी छोटी कटी हुई दाढ़ी तथा वेशभूषा से ज्ञात होता था कि वह कसाई है। कुछ लोग हाथों में लम्बी तलवार लेकर उसका पीछा कर रहे थे। उनकी वेशभूषा स्थानीय राजपूतों जैसी थी। कसाई, अपने पीछे आने वाले मनुष्यों के भय से ऐसे कठिन मार्ग का अनुसरण कर रहा था जिस मार्ग पर घोड़े आदि किसी सवारी पर बैठकर निकल पाना संभव नहीं था। इससे उसके कपड़े काँटों में उलझ कर तार-तार हो गये थे।

    जब गाय को लेकर भागने वाला कसाई किसी तरह पकड़ में न आया तो पीछा करने वाले मनुष्य तीन दिशाओं में इस प्रकार बिखर गये जिससे कि कसाई को किसी संकरे स्थान में घेरा जा सके। काफी देर की भाग दौड़ के बाद अंततः कसाई पकड़ा गया। पीछा करने वाले आदमियों ने तलवार के एक ही वार से गाय की रस्सी काट दी। गाय रस्सी कटते ही भाग खड़ी हुई।

    गाय के भाग जाने से क्रुद्ध होकर कसाई छुरा निकाल कर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर टूट पड़ा। उसका यह दुस्साहस देखकर पीछा करने वाले राजपूतों ने अपनी तलवारें उसकी छाती पर टिका दी। इससे पहले कि उनमें कुछ संवाद हो पाता। जाने कहाँ से एक खान अचानक प्रकट हुआ और राजपूतों को ललकारने लगा।

    - 'एक अकेले आदमी को इस तरह जंगल में घेरकर वध करने में तुम्हें लज्जा नहीं आती?' खान ने दूर से चिल्लाकर कहा।

    - 'पापी का वध करने में कैसी लज्जा?' एक राजपूत ने सचमुच ही उसका वध करने की नीयत से अपनी तलवार आकाश में घुमाई।

    - 'मैं कहता हूँ कि ठहर जा। अन्यथा अपनी जान से हाथ धोएगा।' खान ने तलवार घुमाने वाले इंसान को चेतावनी दी। अब वह इन लोगों के काफी निकट आ गया था।

    - 'मुझे आदेश देने वाला तू कौन होता है?' राजपूत ने अपनी तलवार खान की ओर घुमाते हुए कहा।

    - 'मैं कौन होता हूँ यह तो तुझे ज्ञात हो ही जायेगा फिलहाल तो तू मेरी तलवार का वार संभाल।' खान ने हवा में तलवार घुमाकर राजपूत पर भरपूर वार किया। राजपूत इस अप्रत्याशित हमले के लिये तैयार नहीं था। वह कंधा पीछे करके किसी तरह बचा।

    देखते ही देखते घमासान मच गया। अपनी परम्परा के मुताबिक एक राजपूत खान से दो-दो हाथ करने लगा। बाकी के तीनों राजपूत इन्हें देखने के लिये खड़े हो गये। राजपूतों को खान के साथ उलझा हुआ देखकर कसाई मौका पाकर भाग खड़ा हुआ। राजपूत कड़ियल जवान था तो खान भी उससे कम बलिष्ठ नहीं था। दोनों ही तलवार के खिलाड़ी जान पड़ते थे। थोड़ी देर बाद खान हाँफने लगा। वह भुजा पर राजपूत की तलवार का वार भी खा बैठा। वार बचाने के लिये जैसे ही खान जमीन पर झुका, राजपूत ने उसे लात मार कर जमीन पर गिरा दिया और फुर्ती से खान की छाती पर चढ़ बैठा।

    - 'अब बोल क्या कहता है?' राजपूत ने तलवार की नोक खान की छाती में चुभाते हुए पूछा। खान चुपचाप जमीन पर पड़ा रहा। उसकी भुजा और छाती में इतनी जोर का दर्द हो रहा था कि उससे बोलते नहीं बन पड़ रहा था।

    - 'सरदार इस खान का क्या किया जाये?' खान की छाती पर बैठै युवक ने अपने प्रौढ़ साथी की तरफ देखकर पूछा।

    - 'इसीसे पूछ। क्यों बीच में पड़ा था यह?'

    - 'तुम चार आदमी मिलकर एक आदमी को मार रहे थे इसी से मैं बीच में पड़ा।

    - 'किस अधिकार से?'

    - 'तलवार के अधिकार से।'

    - 'तू क्या राव उदयसिंह है, जो तू सिरोही राज्य में तलवार का अधिकारी हो गया।' (यह सिरोही राज्य का तत्कालीन राजा था। इस घटना के विवरण के साथ स्थान का उल्लेख किसी भी तत्कालीन ग्रंथ में नहीं मिलता किंतु ऐसा अनुमान होता है कि यह घटना सिरोही राज्य में घटित हुई होगी।)

    - 'तेरा राव उदयसिंह मेरा मातहत है।'

    - 'तो तू दिल्लीधीश्वर है?' प्रौढ़ राजपूत ने व्यंग्य पूर्वक कहा।

    - 'मैं दिल्लीधीश्वर अकबर का सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम हूँ।'

    - 'कौन अब्दुर्रहीम? क्या खानखाना बैरामखाँ का बेटा?'

    - 'हाँ वही।' - 'सच कहता है?'

    - 'हाँ।'

    - 'क्या तू वही अब्दुर्रहीम है जिसने मुगल राज्य में आदमी को गुलाम बनाने और चिड़ियों के मारने पर रोक लगवाई है?' दूसरे राजपूत ने पूछा।

    - 'हाँ।'

    - 'इतना बडा़ सेनापति, बिल्कुल अकेला? और इस अवस्था में?' प्रौढ़ सरदार ने खान की छाती पर बैठे युवक को खड़े होने का संकेत करते हुए कहा।

    - 'मैं यहाँ शिकार खेलने के लिये आया था। अपने साथियों से अलग होकर जंगल में भटक गया। खानखाना अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ बैठा। उसकी भुजा में अब भी भयानक दर्द हो रहा था।

    - 'बिना यह जाने कि गलती किस की है, बिना यह जाने कि वह कसाई कौन था, बिना यह जाने कि हम कौन हैं, तू बिना अपना परिचय दिये अचानक तलवार लेकर टूट पड़ा?'

    - 'हमें किसी पर टूट पड़ने के लिये किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। हम अपनी इच्छा के मालिक स्वयं हैं।'

    - 'हम चाहें तो तेरी गर्दन इसी समय काट दें किंतु तूने म्लेच्छों के राज्य में आदमियों को गुलाम बनाने पर रोक लगवाई है और तूने निरीह पक्षियों को मारने पर भी पाबंदी लगवाई है। तू नेक दिल इंसान है इसलिये हम तेरी जान नहीं लेते।'

    - 'मेरी जान लेना इतना आसान नहीं है सरदार। चाहे तो अपने मन की कर के देख ले।'

    - 'नहीं। हम तेरी जान नहीं लेंगे। इस डर से नहीं कि हमें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी अपितु इसलिये कि हम तेरी इज्जत करते हैं। हमने तेरे बारे में कई किस्से सुन रखे हैं। जा तू अपनी राह को चला जा और हमें अपनी राह जाने दे।'

    - 'ऐसे कैसे जायेगा सरदार? अभी तो तूने ही हमारा सत्कार किया है, हमारा सत्कार भी तो देख।'

    - 'बड़े आदमियों का सत्कार न ही मिले तो अच्छा। फिर कभी मौका लगा तो तेरा सत्कार भी देखेंगे।'

    जैसे ही सरदार अपने आदमियों को लेकर वहाँ से चलने को हुआ, खानखाना के साथी उसे ढूंढते हुए वहीं आ पहुँचे। खानखाना ने अपने आदमियों को संकेत किया। चारों राजपूत उसी समय बंदी बना लिये गये।

    बच्चे पिता के इस तरह अलग हो जाने से डर गये थे। माहबानू भी खानखाना के अचानक बिछड़ जाने से चिंतित थी किंतु अब उसके सुरक्षित मिल जाने से उसकी साँस में साँस आई।

    जब राजपूतों को खानखाना के डेरे पर लाया गया तो खानखाना ने उन राजपूतों से कहा- 'यदि अपनी गुस्ताखी के लिये क्षमा मांग लो तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।

    राजपूतों ने कहा- 'गाय की रक्षा करना हमारा धर्म है। यदि खानखाना चाहे तो हमारी गर्दन काट ले किंतु हम क्षमा नहीं मांगेंगे।'

    राजपूतों की दृढ़ता देखकर खानखाना ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया।

    रहीम अब सामान्य सिपाही न रहा था, अब वह बादशाहों का बादशाह अर्थात् खानखाना था। उसके भाग्य का सितारा बुलंदी पर था। विशाल मुगलिया सल्तनत का खानखाना हो जाने से उसका इकबाल लगभग पूरे उत्तरी भारत पर कायम हो गया था। हिन्दुस्थान ही नहीं अफगानिस्तान, ईरान, तूरान, ख्वारिज्म और फरगाना तक उसकी तूती बोलने लगी थी। वह जीवन का बहुत बड़ा इम्तिहान उत्तीर्ण करके इस दर्जे तक पहुँचा था। अब उसके जीवन में कठिनाईयाँ कम और उत्सव के अवसर अधिक थे।

    जब वह दिल्ली दरबार में बादशाह का धन्यवाद ज्ञापित करके फिर से अहमदाबाद जा रहा था तो मार्ग में उसके अमीरों ने उसके लिये शिकार का आयोजन किया। संयोगवश वह अपने आदमियों से अलग होकर एक पेड़ के नीचे बैठा सुस्ता रहा था, उसी दौरान यह घटना हो गयी। कहने को तो यह घटना छोटी ही थी किंतु प्राणों पर आये खतरे के हिसाब से यह उतनी ही बड़ी थी जितनी कि मुजफ्फरखाँ के सात हजार सैनिकों के सामने अपने तीन सौ घुड़सवार और सौ हाथी झौंक कर जीवन का जुआ खेल जाने की थी।

    इस घटना ने रहीम को बहुत सी बातें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसकी समझ में अच्छी तरह से आ गया कि आदमी भले ही हर स्थान पर नहीं पहुँचे किंतु उसकी खुशबू या बदबू स्वतः ही दूर-दूर तक फैल जाती है। मौका पड़ने पर आदमी की तलवार भले ही उसके प्राण न बचा सके किंतु उसकी खुशबू उसे अपरिचितों और जंगलों में भी उसके प्राण बचा ले जाती है। रहीम के अंतस का एक कौना रह-रह कर यह भी सोचता था कि कौन जाने किस निरीह कबूतर या चिड़िया की दुआ उसके काम आई हो! जाने किस बेकस गुलाम की दुआ ऐन वक्त पर उसके आड़े आ गयी हो!


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  • चित्रकूट का चातक - 38

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 38

    जसोदा बार बार भाखै

    अकबर ने शहजादा मुराद का विवाह खानखाना अब्दुर्रहीम के साले खाने-आजम मिर्जा अजीज कोका की बेटी से करना निश्चित किया। शहजादे मुराद के विवाह में भाग लेने के लिये अकबर ने मुगलिया सल्तनत के लगभग सभी बड़े अमीर, उमराव और सेनापतियों को पंजाब में बुलवाया जहाँ वह अपने विशाल लाव-लश्कर सहित डेरा डाले हुए था।

    अकबर ने इस मौके पर खानखाना को भी पत्र लिखकर बुलाया था कि यदि गुजरात में शांति हो गयी हो तो वह शहजादे के विवाह में शरीक होने के लिये चला आये। खानखाना सांडनी पर बैठकर पन्द्रह दिन की ताबड़तोड़ यात्रा करता हुआ पंजाब पहुँचा जहाँ बादशाह का लश्कर पड़ाव डाले हुए था। पंजाब में शहजादे का विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद अकबर खानखाना को अपने साथ सीकरी ले आया था। उनके साथ बहुत से अमीर उमराव भी आ गये थे जो अब तक सीकरी में ही पड़ाव डाले हुए बैठे थे।

    अकबर ने कहने को तो दिल्ली को अपनी राजधानी बना रखा था किंतु वह दिल्ली के स्थान पर फतहपुर सीकरी में अधिक रहता था। चौमासे में अक्सर वह शाम के समय आगरा आ जाता और देर रात तक अपने आदमियों के साथ यमुनाजी के तट पर जमा रहता। सायंकालीन दरबार में वह शासन और राजनीति की बातें अत्यंत आवश्यक होने पर ही किया करता था। अन्यथा यह समय उसके रागरंग और मनोविनोद के लिये निर्धारित था। उसने उज्जैन के परम पराक्रमी महाराजा विक्रमादित्य के अनुसरण पर अपने दरबार में भी नवरत्नों की नियुक्ति की थी। इन रत्नों में कवि, लेखक, गवैये, संगीतकार और अन्य विद्वान शामिल थे। सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्य रूप से नवरत्नों के सानिध्य में समय व्यतीत करने के लिये किया जाता था। इन नवरत्नों को भी उसने अलग-अलग उपाधियों से नवाज रखा था। आज के इस सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्यतः संगीत सम्राट तानसेन के गायन के लिये किया गया था।

    जब बहुत देर तक राग अलापने के बाद तानसेन ने सितार एक तरफ रखा तो दरबारी फिर से विचारों की दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान में लौटे। आज के गायन में तानसेन ने सूरदासजी का पद गाया था-

    ''जसोदा बार बार भाखै।

    है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहि राखै।''

    अकबर ने तानसेन से इस पद का अर्थ करने को कहा। तानसेन ने पद का अर्थ इन शब्दों में किया- 'मैया यशोदा बार-बार अर्थात् पुनः-पुनः यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!' इस पर अकबर ने फैजी की ओर देखा फैजी ने कहा- 'यशोदा बार-बार अर्थात् रो-रोकर यह रट लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!'

    - 'राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?' अकबर ने बीरबल से पूछा।

    - 'शहंशाह! इस पद का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है किंतु मेरे साथी समझ नहीं पा रहे हैं। माता यशोदा बार-बार अर्थात् द्वार-द्वार पर जाकर कहती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!'

    इस बार अकबर ने खाने आजम कोका की ओर देखा कोका ने कहा- 'यशोदा बार-बार अर्थात् दिन-दिन (प्रतिदिन) यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितैषी जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!'

    इस बार बारी आयी खानखाना की। खानखाना ने कहा- 'जहाँपनाह! तानसेन गायक हैं, इनको एक ही पद बार-बार अलापना पड़ता है इसलिये इन्होंने बार-बार का अर्थ पुनः-पुनः किया। फैजी फारसी के शायर हैं, इन्हें रोने के अलावा और क्या काम है! इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ''रो-रो'' कर किया। राजा बीरबल द्वार-द्वार घूमने वाले विप्र हैं इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ''द्वार-द्वार'' किया। खाने आजम कोका नजूमी (ज्योतिषी) हैं, उनको दिन, तिथि और वार से ही वास्ता पड़ता है इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ''दिन-दिन'' किया लेकिन बादशाह हुजूर इस पद का वास्तविक अर्थ यह है कि माता यशोदा का बाल-बाल अर्थात् रोम-रोम पुकारता है कि कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में ही रोक ले।'

    खानखाना का जवाब सुनकर अकबर की आँखों में प्रसन्नता का ज्वार उमड़ आया। उसने आसन से खड़े होकर रहीम को शाबासी दी। दूसरे सभासदों ने भी खानखाना की बहुत प्रशंसा की।

    वकीले मुतलक

    बादशाह ने दरबार बर्खास्त करने का आदेश दिया और खानखाना को संकेत से अपने साथ आने के लिये कह कर उठ खड़ा हुआ। एकांत पाकर बादशाह ने खानखाना से कहा- 'खानखाना! तुम्हें एक जिम्मेदारी सौंपता हूँ। मियाँ शाहबाज खाँ और राजा टोडरमल के बीच कुछ पैसों को लेकर झगड़ा है। तुम्हें पता लगाना है कि सच्चाई क्या है और गलती किसकी है? ज्यादातर अमीर इस झगड़े को लेकर दो खेमों में बंट गये हैं। चगताई अमीर शाहबाजखाँ के पक्ष में हैं और हिन्दू सरदार राजा टोडरमल के पक्ष में। जिससे दरबार का वातावरण खराब हो रहा है। किसी तरह यह बखेड़ा निबटाओ।'

    रहीम को लगा कि बादशाह ने उसे एक अलग तरह के रणक्षेत्र में नियुक्त कर दिया है। इसमें तलवारें नहीं चलनी हैं, दोनों ओर के तर्कों और दोनों ओर की स्वामिभक्तियों की बर्छियां चलनी हैं। सबसे विचित्र बात तो यह है कि दोनों ही पक्षों द्वारा चलाई गयी बर्छियों का वार खानखाना को अपनी छाती पर झेलना है। एक तरफ मुगल सल्तनत का वकीले मुतलक है तो दूसरी ओर सल्तनत का महत्वपूर्ण सेनापति। स्वयं बादशाह तक इन दोनों में से किसी को नाराज नहीं करना चाहता। भले ही दोनों ओर के पक्ष में से कोई भी हारे या जीते किंतु जरा सी भी चूक होते ही खानखाना की तो अकारण ही पराजय हो जानी है।

    बादशाह के आदेश से खानखाना ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अकबर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ ही दिनों बाद राजा टोडरमल और शाहबाजखाँ ने एक साथ बादशाह की सेवा में हाजिर होकर निवेदन किया कि अब उनका हिसाब साफ हो गया है और उनके बीच किसी तरह का विवाद नहीं है।

    बादशाह ने उन दोनों की वे दरख्वास्तें उन्हें वापिस लौटा दीं जो उन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध लिखकर बादशाह को दी थीं। उनके जाने के बाद बादशाह ने खानखाना को बुलाकर पूछा- 'यह क्या चमत्कार है खानखाना? कई महीनों से चला आ रहा यह झगड़ा अचानक ही कैसे निबट गया?'

    - 'जहाँपनाह! मैंने जब दोनों पक्षों से बात की तो मुझे अनुमान हुआ कि राजा टोडर मल मूंछ के लिये और शाहबाजखाँ पैसों के लिये लड़ रहा था। इसलिये मैंने झगड़ा निबटाने के लिये इस तरह की योजना बनाई कि शाहबाजखाँ के पास पैसा रह जाये और राजा टोडरमल के पास मूंछ।

    - 'गलती पर कौन था?'

    - 'गलती शाहबाजखाँ की थी किंतु वह किसी भी कीमत पर राजा टोडर मल को धन लौटाने के लिये तैयार नहीं था। जब मैंने शाहबाजखाँ से कहा कि यदि वह शेख अबुलफजल आदि अमीरों की उपस्थिति में अपनी गलती कबूल करे तो राजा टोडरमल उससे एक भी पैसा नहीं लेगा और यदि शाहबाजखाँ ऐसा नहीं करेगा तो उसे बादशाही कोप का शिकार होना पड़ेगा। इस पर शाहबाजखाँ तैयार हो गया।'

    - 'और राजा टोडर मल, वह कैसे माना?'

    - 'मैंने राजा टोडरमल से कहा कि यदि वह अपना पैसा छोड़ने को तैयार हो जाये तो शाहबाज खाँ शेख अबुल फजल की उपस्थिति में अपनी गलती मान लेगा। इससे राजा टोडरमल को पैसा भले ही न मिले किंतु बादशाह की निगाह में उसकी इज्जत बढ़ जायेगी। यह सुनकर राजा टोडरमल भी तैयार हो गया।'

    - 'तुमने कमाल कर दिया खानखाना। तुम तो वकील होने के लायक हो। जिस बखेड़े को मैं स्वयं भी प्रयास करके नहीं निबटा सका वह झगड़ा तुमने जरा सी युक्ति से निबटा दिया।

    भाग्य की बात! इस घटना के कुछ ही दिनों बाद साम्राज्य के वकीले मुतलक राजा टोडरमल की मृत्यु हो गयी। बादशाह ने खानखाना अब्दुर्रहीम को राज्य का नया वकीले मुतलक नियुक्त कर दिया। उन दिनों यह पद राज्य का सबसे बड़ा पद था। वकीले मुतलक बादशाह का प्रतिनिधि समझा जाता था। उसे कोई भी आदेश लिखित में देने की आवश्यकता नहीं थी। उसका आदेश बादशाह का आदेश होता था।

    जब वकीले मुतलक अब्दुर्रहीम चौंतीस वर्ष का हुआ तो उसके घर में एक के बाद एक तीन बेटों का जन्म हुआ। बादशाह स्वयं वकीले मुतलक के महलों में जाकर उसे पुत्रों के जन्म की बधाई देकर आया। यहाँ तक कि बादशाह ने स्वयं ही उनका नामकरण भी किया जो ऐरच, दाराब और कारन नाम से जाने गये। ये तीनों पुत्र अकबर की धात्री माहमअनगा की पुत्री माहबानू से हुए थे। माहबानू से ही जाना बेगम और एक अन्य पुत्री का जन्म हुआ था।

    बाद में रहीम को दो बेटे और प्राप्त हुए जिनके नाम रहमानदाद और अमरूल्लाह रखे गये। रहमनादाद का जन्म सौधा जाति की एक स्त्री से हुआ था और मिर्जा अमरूल्लाह एक दासी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।


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  • चित्रकूट का चातक - 39

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 39

    विचित्र दरबार

    - 'हुजूर! बाहर फरियादियों का हुजूम इकट्ठा हो गया है। कुछ लोग तो सुबह से आस लगाये बैठे हैं। शाम होने को आई।'

    - 'तो लोगों को मालूम हो गया कि रहीम आगरे में है?'

    - 'हाँ हुजूर! अब तो दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।'

    - 'अच्छा उन सबको दरबार में बैठा।'

    थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था। दरबार के फर्श पर महंगे कालीन बिछे थे। एक ओर एक विशाल चबूतरा बना हुआ था जिस पर अत्यंत भव्य और विशाल तख्त पड़ा था। तख्त की बारीक कारीगरी बरबस ही देखने वाले का ध्यान खींचती थी। तख्त पर चीन देश से आयी रेशम की महंगी चद्दरें और तकिये करीने से सजे हुए थे। समूचे आगरे में यदि कोई और दरबार किसी भी लिहाज से रहीम के दरबार से प्रतिस्पर्धा कर सकता था तो वह था स्वयं शहंशाह अकबर का दरबार।

    जितना भव्य दरबार था, उतना ही भव्य खानखाना स्वयं था। आज तो खानखाना की शोभा विशेष रूप से देखने योग्य थी। वह बादशाहों की भांति समस्त राजकीय चिह्न धारण किये हुए था। खानखाना के सिर का मुकुट महंगे और दुर्लभ हीरे जवाहरों से जगमगा रहा था। कलंगी के स्थान पर हुमा पक्षी का पंख हवा में फहराता था। इस पंख को केवल शहजादे ही धारण कर सकते थे। उसके तलवार की मूठ पर बड़े-बड़े याकूत, नीलम, पन्ने तथा वैदूर्य जड़े हुए थे।

    खानखाना के सेवकों ने सिंह की तरह गर्दन उठा कर चल रहे खानखाना के सिर पर हीरे-मातियों से जड़े सोने के छत्र की छाया कर रखी थी और वे दोनों दिशाओं से चंवर ढुलाते हुए चल रहे थे। जैसे ही खानखाना दरबार में दिखायी दिया, सैंकड़ों कण्ठ उसकी जय-जयकार करने लगे।

    आज के इस विशेष दरबार का आयोजन खानखाना के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में किया गया था। खानखाना ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित सेवकों और आगंतुकों पर डाली और मुंशी को दरबार की कार्यवाही आरंभ करने का संकेत किया।

    सबसे पहले जो आदमी उसकी सेवा में प्रस्तुत किया गया उसने सैनिकों के से कपड़े पहन रखे थे और हाथ में तलवार ले रखी थी। उस आदमी ने सिर पर जो पगड़ी धारण कर रखी थी, उस पगड़ी पर दो लम्बी-लम्बी कीलें लगी हुई थीं।

    - 'हुजूर! यह गुलाम आपकी सेना में नौकरी पाना चाहता है।' विचित्र वेशभूषा वाले आदमी ने सिर झुका कर निवेदन किया।

    - 'क्या नौकरी करोगे?'

    - 'हुजूर, सिपाही की।'

    - 'तुमने अपनी पगड़ी पर ये कीलें क्यों लगवा रखी हैं?'

    - 'हुजूर पहली कील तो उस आदमी के लिये है जो नौकरी पर तो रखे किंतु तन्खाह न दे।'

    - 'और दूसरी कील?'

    - 'दूसरी कील उस नौकर के लिये है जो तन्खाह तो ले किंतु काम न करे।'

    - 'कितनी तन्खाह चाहिये?'

    - 'दस रुपया महीना।'

    - 'कितनी उम्र है?'

    - 'पच्चीस साल।'

    - 'कितने साल नौकरी करेंगे?'

    - 'यही कोई पच्चीस साल।'

    - 'एक साल की तन्खाह कितनी हुई?'

    - 'एक सौ बीस रुपया।'

    - 'पच्चीस साल की कितनी हुई?'

    - 'तीन हजार रुपया।'

    - 'ये लीजिये तीन हजार रुपया और अपने सिर से पहली कील का बोझ उतार दीजिये। दूसरी कील का बोझ उठाने का आपको पूरा अधिकार है।'

    जीवन भर की कमाई आज ही पाकर युवक प्रसन्नता से कूदने लगा। दरबार में उपस्थित जन समुदाय फिर से खानखाना की जय-जयकार करने लगा।

    इसके बाद एक बुढ़िया की बारी थी। वह अपने हाथ में एक तवा लेकर आई थी। उसने कहा- 'हुजूर मैं आपको छूकर देखना चाहती हूँ।'

    - 'इस बुढ़िया की मुराद पूरी की जाये।' खानखाना ने आदेश दिया।

    बुढ़िया तवा लेकर तख्त पर चढ़ गयी और जैसे ही खानखाना के निकट पहुँची, अपने हाथ का तवा खानखाना की देह से रगड़ने लगी। कुछ देर बाद तख्त से नीचे उतर कर बड़ी हैरानी से तवे को उलट-पलट कर देखने लगी।

    बुढ़िया की उल्टी-सीधी चेष्टाएं देखकर अब्दुर्रहीम को हँसी आ गयी। वह बोला- 'निराश न हो बुढ़िया। तूने अपने लोहे का तवा पारस से ही रगड़ा है। अब यह सचमुच ही सोने का हो गया है। मुंशीजी! इस बुढ़िया को तवे के बराबर सोना तोलकर दे दिया जाये।' दरबार में फिर से जय-जयकार गूंजने लगी।

    अगला फरियादी एक गरीब ब्राह्मण था। उसने खानखाना के सामने आते ही मुसलमानों को गाली देना आरंभ कर दिया। जिनके कारण उसके जजमानों की संख्या घट गयी थी और अब वह भूखों मरने की स्थिति को पहुँच गया था।

    - 'विप्र देवता! इस प्रकार मत कोसो। तुम्हें खाने पीने को बहुत मिलेगा।'

    इतना सुनते ही ब्राह्मण देवता ने अपने सिर से मैली-कुचैली और स्थान-स्थान से फटी हुई पगड़ी खानखाना पर दे मारी और कहा- 'हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिसकी बात से प्रसन्न होओ, उसे कुछ न कुछ अवश्य दो। मेरे पास इस पगड़ी के सिवा कुछ नहीं है। यही तुझे देता हूँ।'

    खानखाना ने तुरंत ही अपना रत्न जड़ित स्वर्ण ताज उतार कर उस ब्राह्मण को दे दिया और उसकी मैली कुचैली तथा तार-तार हो रही पगड़ी अपने माथे पर बांधते हुए कहा- 'हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिससे कुछ लो, उसे अधिक नहीं तो, उतना तो अवश्य ही दो।'

    अगला फरियादी एक नौजवान था। उसे विश्वास न था कि खानखाना उसकी भी मुराद पूरी कर सकता है लेकिन उसने सुन रखा था कि खानखाना कवियों की बड़ी इज्जत करता है। भले ही कितना ही घटिया कवि हो, वह खानखाना के दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटता। इसलिये वह अपनी फरियाद एक कविता में ढाल कर लाया था। उसने कहा- 'हे उदार खानखाना! एक चन्द्रमुखी प्यारी है। वह जान मांगे तो कुछ सोच नहीं, रुपया मांगती है, यही मुश्किल है।'

    खानखाना ने मुस्कुरा कर पूछा- 'कितना रुपया मांगती है?'

    - 'एक लाख।' - 'तो तू एक लाख छः हजार ले जा।'

    - 'एक लाख तो ठीक, पर छः हजार क्यों?'

    - 'तेरे सजने-धजने के लिये। यदि इसी हाल में गया तो रुपया लेकर भी नहीं मानेगी।'

    जब युवक वहाँ से हटा तो एक बहुत ही कंगाल आदमी अपने स्थान से उठकर खड़ा हुआ और बोला- 'खानखाना! कैसे सम्बंधी हो तुम! अपने साढ़ू को नहीं पहचानते?'

    खानखाना ने कहा- 'आओ साढ़ूजी, मैं तो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। आओ यहाँ बैठो मेरे पास।'

    जब कंगाल खानखाना के बराबर तख्त पर बैठ गया तो खानखाना ने अपने मुंशी से कहा- 'मुंशीजी! साढ़ूजी को एक लाख रुपया देकर विदा किया जाये।'

    मुंशी बहुत देर से चुपचाप बैठा हुआ दरबार की कार्यवाही देख रहा था। इस बार उससे रहा न गया। उसने कंगले को व्यंग्य पूर्वक देखते हुए पूछा- 'गुस्ताखी मुआफ हुजूर! ये आपके साढ़ू हैं, पहले कभी इन्हें देखा नहीं?'

    - 'मुंशीजी! आप इन्हें नहीं पहचानते! देखिये, सम्पत्ति और विपत्ति दो बहिनें हैं। एक हमारे घर में है और एक इनके। इसी नाते से ये हमारे साढ़ू हैं।' कंगला अपनी ढीठता त्याग कर खानखाना के पैरों में गिर पड़ा।

    इस बार एक युवा पण्डित खानखाना के समक्ष था। - 'पाँय लागूं पण्डितजी। कहिये क्या सेवा करूँ?'

    युवा पण्डित खानखाना के सामने आकर कातर दृष्टि से देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे और उसका कण्ठ सूख गया।

    - 'आपके अंगोछे में क्या लिपटा हुआ है?' खानखाना ने पूछा।

    युवा पण्डित ने अपने अंगोछे में लिपटी हुई एक खाली शीशी निकाली और खानखाना की ओर बढ़ा दी। खानखाना के सेवक ने शीशी खानखाना को ले जाकर दी। खानखाना ने देखा, शीशी में पानी की केवल एक बूंद है। उन्होंने पण्डित की ओर देखकर कहा-

    'रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

    पानी गये न ऊबरे। मोती मानस चून।'


    पण्डित ने आँखों में आँसू भर कर कहा- 'हाँ, यही तो मैं भी कह रहा हूँ ।'

    - 'मुंशीजी! हमारे पास आईये।' खानखाना ने मुंशी को आदेश दिया।

    जब मुंशी खानखाना के ठीक पास जाकर खड़ा हो गया तो खानखाना ने उसके कान में कहा- 'इस पण्डित के घर का पता मालूम कर लो और आज रात को वहाँ एक लाख रुपया पहुँचाओ।'

    मुंशी फिर चक्कर में पड़ गया। उसकी आँखों में उभरे सवाल को देखकर खानखाना ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा- 'अरे भाई आप देखते नहीं हैं! पण्डितजी किसी प्रतिष्ठित खानदान के हैं इसलिये मुँह से कुछ मांग नहीं सकते किंतु संकेत से बता रहे हैं कि बिना धन के पानी बचे तो कैसे बचे। जैसे शीशी में एक बूंद ही है वैसे घर भी खाली होने को है।'

    अगला आदमी एक बूढ़ा मुसलमान था। उसकी निर्धनता उसके बुरे हाल का परिचय दूर से दे रही थी। वह हाथ जोड़कर खानखाना के ठीक सामने खड़ा हो गया।

    - 'बोलो बाबा।'

    - 'हुजूर! गुस्ताखी मुआफ हो। गुलाम आप पर पत्थर फैंक कर देखना चाहता है।' बूढ़े को हिन्दुस्तानी में बात करनी नहीं आती थी। वह ईरानी भाषा बोल रहा था।

    - 'ठीक है, जैसा जी में आये करो। मैं तैयार हूँ।' खानखाना ने ईरानी भाषा में ही जवाब दिया और अपनी ढाल संभाल कर बैठ गया। बूढ़े ने अपने कांपते हाथों में थामा हुआ पत्थर खानखाना पर दे मारा। पत्थर खानखाना की ढाल से जाकर टकराया।

    - 'मुंशी जी! बाबा को एक हजार रुपया दिया जाये।'

    - 'गुस्ताखी मुआफ हुजूर। क्या यह पत्थर फैंकने का पारिश्रमिक है?' मुंशी ने हाथ जोड़ कर पूछा।

    - 'नहीं मुंशीजी। बूढ़े बाबा ने यह पत्थर हम पर यह जांचने के लिये फैंका था। जब फलदार वृक्षों पर पत्थर देकर मारते हैं तो फल मिलते हैं, खानखाना क्या उनसे भी गया बीता है!'

    - 'खानखाना तेरी जय हो। युगों तक इस धरती पर तेरा इकबाल बुलंद रहे। मैं सचमुच ही ईरान से यहाँ तक चलकर तुझे जांचने के लिये ही आया हूँ। मेरा नाम शकेबी अस्फहानी है। मैं ईरान का रहने वाला हूँ। पार साल जब मैं मक्का जाते समय अदन में पहुँचा तो मैंने वहाँ कुछ बच्चों को एक गीत गाते हुए सुना कि- खानखाना आया। जिसके प्रताप से कुंआरी कन्याओं ने पति पाये। व्यापारियों ने माल बेचे, बादल बरसे और जल-थल भर गये। मैं उस गीत की वास्तविकता को अपनी आँखों से देखने के लिये यहाँ तक चला आया हूँ। मुझे इन रुपयों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें किसी जरूरतमंद इंसान को दे दिया जाये।' उपस्थित जनसमुदाय फिर से जय-जयकार करने लगा।

    इसके बाद मंडन कवि (ये बुंदेलखण्डी कवि थे) उठ कर खड़ा हुआ। उसने दोनों हाथ खानखाना की ओर फैला कर कहा-

    'तेरे गुन खानखानां परत दुनी के कान, तेरे काज ये गुन आपनो धरत हैं।

    तू तो खग्ग खोलि-खोलि खलन पै कर लेत यह तो पै कर नेक न डरत हैं।

    ]मंडन सुकवि तू चढ़त नवखंडन पै, ये भुजदण्ड तेरे चढ़िए रहत हैं।

    ओहती अटल खान साहब तुरक मान, तेरी या कमान तोसों तेहुँसों करत है।'


    मण्डन की कविता पूरी होते ही खानखाना पर फूल बरसने लगे। सैंकड़ों कण्ठों से निकली जयजयकार, उनसे दुगुनी हथेलियों से निकली तालियों की गड़गड़ाहट, ढोल, नगारों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि से आकाश व्याप्त हो गया। दरबार बर्खास्तगी की घोषणा के साथ ही खानखाना दस्तरख्वान पर जा बैठा। आज उसके दस्तरख्वान का प्रबंध दरबार में ही किया गया था। उसके साथ-साथ सैंकड़ों आदमियों के भोजन का प्रबंध किया गया था।


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  • चित्रकूट का चातक - 40

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 40

    शिकायत

    खानखाना का ऐसा ठाठ-बाट, अकूत सम्पदा और उसके दरबार की ऐसी निराली शान देखकर कई दुष्टों की छाती पर साँप लोट गये। कहाँ से लाया खानखाना यह सम्पदा? कहाँ से आये ये सारे साजो-सामान? कहाँ से आये इतने सारे लोग? सब कुछ रहस्यमय था। ऐसा ठाठ-बाट और ऐसा रूआब तो शहंशाह अकबर के अतिरिक्त और किसी अमीर, उमराव एवं सरदार के पास न था। कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों की छातियां ईर्श्या से दहकने लगीं। शहजादों की नाक में सलवटें पड़नी आरंभ हो गयीं।

    उन्हें सबसे अधिक शिकायत इस बात से थी कि साधारण सिपाही के घर में जन्म लेने वाला रहीम हुमा का पर लगाकर दरबार करता है। भले ही उसका बाप खानखाना के पद तक जा पहुँचा हो किंतु था तो वह मूल रूप से एक साधारण सिपाही ही! इस तरह का दरबार करना तो शहजादों को भी नसीब नहीं था। फिर रहीम की ऐसी क्या हैसियत है?

    जब आग जलती है तो धुंआ उसकी सूचना चारों ओर फैला ही देता है। जानने में रुचि न रखने वालों को भी आग की सूचना हो जाती है। रहीम के सम्बंध में भी यही हुआ। लोगों की छातियों में जलने वाली आग का धुंआ भी चारों ओर फैलने लगा और एक दिन बादशाह अकबर के महल तक जा पहुँचा।

    बादशाह इन खबरों को सुन-सुन कर मुस्कुराता था। एक दिन बहुत से अमीरों ने एक साथ बादशाह के हुजूर में इकट्ठे होकर रहीम की शिकायत की- 'बादशाह सलामत यह कमजात रहीम आपकी नेक मेहरबानियों को पाकर अपना दिमाग फेर बैठा है। वह आलीशान तख्त पर बैठकर बादशाहों और शहजादों की भांति दरबार लगाता है। लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटता है।'

    - 'लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटना कोई गुनाह है क्या?' बादशाह ने मुस्कुरा कर पूछा।

    बादशाह का जवाब सुनकर अमीरों के चेहरे फक पड़ गये। किसी तरह हिम्मत करके एक दरबारी ने कहा- 'बेशक यह गुनाह नहीं किंतु रहीम इतना माल-असबाब लाया कहाँ से, यह तो जानना चाहिये।'

    - 'तुम्हें क्या लगता है, रहीम ने कहीं चोरी की होगी या डाका डाला होगा।'

    - 'ऐसा लगता तो नहीं किंतु वह बेशुमार दौलत लुटा रहा है।'

    - 'इसके अलावा उसका कोई और गुनाह?'

    - 'हुजूरे आली! वह शहजादों की तरह सिर पर ताज रखता है और ताज पर हुमा का पर भी!' एक अमीर ने उत्तेजित होकर कहा।

    - 'और?'

    - 'हुजूर मेरी जान बख्शी जाये किंतु सही बात तो यह है कि वह आपकी तरह तख्त पर बैठकर चंवर ढुलवाता है और छत्र तान कर चलता है।'


    - 'तुम्हारी बात सही है, इसका क्या सबूत है तुम्हारे पास?'

    - 'सुबूत देखना है तो अभी बादशाह सलामत स्वयं जहमत फरमायें और रहीम के डेरे पर चलकर स्वयं अपनी आँखों से देख लें।'

    - 'ठीक है। आज ऐसा ही किया जाये।'

    कुछ ही देर में बादशाह की सवारी रहीम के डेरे पर थी। खानखाना को इत्तला मिली तो भागता हुआ ड्यौढ़ी पर हाजिर हुआ और अपने सिर से पगड़ी उतार कर हाथी के नीचे बिछाता हुआ बोला- 'मेरे धन्य भाग जो बादशाह सलामत की नजर इस ओर हुई।'

    - 'खानखाना! हमने तुम्हारे दरबार की बड़ी तारीफ सुनी है, इसलिये हम बिना बुलाये ही तुम्हारा दरबार देखने चले आये।' बादशाह ने हाथी से उतर कर पगड़ी के कपड़े पर पैर धरते हुए कहा।

    - 'इस गरीबखाने पर आपके पधारने के अलावा यहाँ और कोई तारीफ की बात नहीं है हुजूर। फिर भी आप ने इनायत की ही है तो कुछ न कुछ खास बात जरूर होगी।'

    - 'हमने सुना है तलवार का हुनर दासों को भी स्वामी बना देता है। क्या यह बात सही है खानखाना?'

    - 'नहीं बादशाह सलामत। यह बात सही नहीं है। स्वामिभक्ति और स्वामी की कृपा ही दास को स्वामी बना सकती है।' खानखाना ने शांति से प्रत्युत्तर दिया।

    बादशाह को रहीम के जवाब से बड़ी तसल्ली हुई बादशाह के आदेश से खानखाना ने बादशाह को अपना दरबार दिखाया। उसे देखकर अकबर की आँखें चौंधिया गयीं। वाकई में जगह काबिले तारीफ तो थी ही, रश्क करने लायक भी थी। अकबर खानखाना के तख्त पर जाकर बैठ गया। रहीम ने उसी क्षण दौड़कर हुमा के पर वाला ताज बादशाह के सिर पर रख दिया और स्वयं बादशाह के ऊपर छत्र तानकर खड़ा हो गया। उसके नौकर भी संकेत पाकर बादशाह पर चंवर ढुलाने लगे और बादशाह सलामत की जय-जयकार करने लगे।

    बादशाह ने पूछा- 'खानखाना! बादशाहों और शहजादों के काम में आने वाली चीजें तुम्हारे यहाँ क्या कर रही हैं?'

    - 'जिल्ले इलाही। मुझे अंदाज था कि एक न एक दिन हजरत यहाँ पधारेंगे। उसी की तैयारी में यह सामान मंगा रखा था। यदि शहजादों और बादशाहों के काम आने वाला यह सामान यहाँ नहीं होता तो मुझे आज अपने मालिक के सामने लज्जित होना पड़ता।

    - 'हम तुम्हारी आवभगत से प्रसन्न हुए खानखाना। आज से यह सब सामान तुम्हें दिया जाता है। हमारे हुक्म से अब तुम ही इसका उपयोग करो।' यह कहकर बादशाह उठ गया।

    जाडा

    - 'हुजूर! महाराणा प्रतापसिंह के भाई जगमाल का वकील जाडा महडू आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।' गुलाम ने राज्य के वकील खानखाना अब्दुर्रहीम से निवेदन किया। उस समय खानखाना अपने निजी दरबार में व्यस्त था।

    - 'जाडा महडू!' खानखाना के भीतर स्मृतियों का पिटारा खुला। कहाँ सुना यह नाम? कब? अचानक ही उसे जाडा महडू का प्रसंग याद आ गया, जैसे सोते से जाग पड़ा हो, 'जा उसे ले आ, यहीं ले आ। बड़ा मजेदार आदमी है।'

    अब्दुर्रहीम जब मेवाड़ में था तब उसने इस कवि की बड़ी तारीफ सुनी थी। जाडा महडू का वास्तविक नाम आसकरण चारण था। उसके जैसा चाटुकार जमाने में न था। शरीर से बहुत मोटा होने तथा चारणों की महडू शाखा में होने के कारण इसे मेवाड़ में जाडा महडू कहकर पुकारते थे। उन दिनों तो उसे जाडा से रूबरू होने का अवसर नहीं मिला था किंतु अब्दुर्रहीम के मन में जाडा से मिलने की बड़ी इच्छा थी जो आज अनायास ही पूरी हो रही थी।

    जब सेवक जाडा महडू को लेने बाहर गया तो खानखाना ने सरकारी कामों को स्थगित करते हुए, दरबार में उपस्थित सभासदों से कहा- 'तैयार हो जाओ। दरबार में बड़ा भूकम्प आने वाला है।' खानखाना की बात से दरबारियों को बड़ा अचंभा हुआ। आखिर यह जाडा महडू चीज क्या है जो खानखाना दरबार में भूकम्प आने की भविष्यवाणी कर रहे हैं! पहले तो कभी इसका नाम सुना नहीं!

    थोड़ी ही देर में गुलाम, जाडा महडू को लेकर उपस्थित हुआ। ठीक ही कहा था खानखाना ने। दरबार में उसका प्रवेश किसी भूकम्प से कम नहीं था। एक बहुत स्थूल काया ने दरवाजे से ही बादलों की तरह गरजना आरंभ कर दिया-

    'खानखानाँ नवाब रा अड़िया भुज ब्रह्मण्ड,

    पूठै तो है चंडिपुर धार तले नव खण्ड।'


    (
    अर्थात् - खानखानाँ नवाब की भुजा ब्रह्माण्ड में जा अड़ी है, जिसकी पीठ पर चंडीपुर अर्थात् दिल्ली है और जिसकी तलवार की धार के नीचे नवों खण्ड हैं।) 

    दरबार में बैठे बहुत से लोग समझ नहीं सके कि वह कह क्या रहा था लेकिन खानखाना डिंगल जानता था। उसे जाडा के छंद में बड़ा आनंद आया। जाडा ने अपनी दोनों भुजाओं को हवा में लहराते हुए कहा-

    'खानखानाँ नवाब रै खांडे आग खिवंत,

    जलवासा नर प्राजलै तृणवाला जीवंत। '


    (अर्थात् - खानखानाँ की तलवार से ऐसी आग बरसती है जिससे पानीदार वीर पुरुष तो जल मरते हैं लेकिन घास मुख में लिये (शरण में आये) हुए नहीं जलते।) जाडा एक क्षण के लिये ठहरा और अपने फैंफड़ों में वायु भरकर पूरी ताकत से बोला-

    खानखानाँ नवाब हो मोहि अचंभो एह,

    मायो किम गिरि मेरु मन साढ़ तिहस्यी देह। '


    (अर्थात् - मुझे यह आश्चर्य होता है कि खानखानाँ का मेरु पर्वत जैसा मन साढ़े तीन हाथ की देह में कैसे समाया है।)

    जाडा ने आगे बढ़ते हुए तीसरा दोहा पढ़ा-

    'खानखानाँ नवाब री आदमगीरी धन्न,

    यह ठकुराई मरु गिर मनी न राई मन्न। '


    (अर्थात् - खानखानाँ नवाब का औदार्य धन्य है कि मेरु पर्वत जैसे अपने प्रभुत्व को वे मन में राई के बराबर भी नहीं मानते।)

    अब जाडा खानखाना के ठीक निकट पहुंच चुका था। खानखाना ने अपने आसन से खड़े होकर दोनों हाथ आकाश की ओर उठाते हुए कहा-

    'धर जड्डी अंबर जड्डा, जड्डा महडू जोय।

    जड्डा नाम अलाह दा, और न जड्डा कोय। '


    (अर्थात् - धरा बड़ी है, आकाश बड़ा है, महडू शाखा का यह चारण बड़ा है और अल्लाह का नाम बड़ा है। इनके अलावा और कोई बड़ा नहीं है।)

    खानखाना की बात सुनकर जाडा आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा- 'खानखाना हुजूर! मैंने तो आपको प्रसन्न करने के लिये दोहा पढ़ा। आपने क्यों पढ़ा?'

    - 'जाडा को प्रसन्न करने के लिये।' खानखाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

    - 'मैंने तो अपने स्वार्थ से आपको प्रसन्न करना चाहा था। आप मुझे क्यों प्रसन्न करना चाहते थे।'

    - 'मैं अपने स्वार्थ से तुझे प्रसन्न करना चाहता था।'

    - 'मेरा स्वार्थ तो मुझे मालूम है, किंतु आपका स्वार्थ?'

    - 'जब तू अपना स्वार्थ कहेगा तो तुझे मेरा स्वार्थ भी ज्ञात हो जायेगा।'

    - 'मैं अपने मालिक की तरफ से अर्ज लेकर आया हूँ और अकेले में निवेदन करना चाहता हूँ।'

    - 'ठीक है। जब दरबार बर्खास्त हो जाये तो तू निर्भय होकर अपनी बात कहना। बता तुझे कविता का क्या ईनाम दिया जाये?'

    - 'मेरे स्वामी का काम ही मेरा ईनाम होगा।' जाडा ने जवाब दिया।

    - 'तेरे स्वामी का काम होने लायक होगा तो मैं वैसे ही कर दूंगा। मेरी इच्छा है कि तूने मेरी प्रशंसा में जो दोहे पढ़े हैं, उस हर दोहे के लिये तुझे एक लाख रुपया दिया जाये।' खानखाना ने कहा।

    - 'खानखाना की बुलंदी सलामत रहे। मैं अपना ईनाम फिर कभी ले लूंगा, फिलहाल तो अपने स्वामी का ही काम किया चाहता हूँ।' जाडा भी अपनी तरह का एक ही आदमी था। उसकी इच्छा रखने के लिये खानखाना ने दरबार बर्खास्त कर दिया।

    - 'अब बोल। क्या कहता है?'

    - 'हुजूर। प्रतापसिंह उदैपुर राज्य का मालिक बन बैठा है। मेरे स्वामी जगमाल उसके भाई हैं किंतु मेरे स्वामी को उसने कोई जागीर नहीं दी। यदि खानखाना मेहरबानी करें तो मेरे स्वामी उदैपुर की गद्दी पर बैठ सकते हैं। इसके बदले में मेवाड़ शहंशाह अकब्बर की अधीनता स्वीकार कर लेगा।'

    - 'तेरे मालिक को राज्य चाहिये तो मैं बादशाह से कहकर दूसरा राज्य दिलवा दूंगा लेकिन भाईयों में इस तरह का बैर करना और अपनी मातृभूमि शत्रु को सौंप देना उचित नहीं है जाडा।'

    - 'लेकिन बिना कुछ प्रत्युपकार प्राप्त किये बादशाह सलामत मेरे स्वामी को राज्य क्यों देंगे?'

    - 'प्रत्युपकार का जब समय आयेगा तो वह भी प्राप्त कर लिया जायेगा। बोल क्या कहता है?'

    - 'क्या चित्तौड़ का दुर्ग दिलवा देंगे?' जाडा ने प्रश्न किया।

    - 'प्रताप मर जायेगा किंतु तेरे मालिक को चित्तौड़ में चैन से नहीं बैठने देगा।'

    - 'तो फिर!'

    - 'जहाजपुर का परगना अभी मुगलों के कब्जे में है। तू कहे तो तेरे मालिक को वह परगना मिल सकता है लेकिन एक शर्त पर।'

    - 'सो क्या?' - 'तू भाईयों में बैर नहीं बढ़ायेगा और देश को दुश्मनों के हाथ नहीं बेचेगा।'

    खानखाना की बात सुनकर जाडा का मुँह काला पड़ गया। उसने गर्दन नीची करके कहा- 'वचन देता हूँ।'

    - 'तो ठीक है। तू समझ, जहाजपुर तेरे मालिक को मिल गया।'


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  • चित्रकूट का चातक - 41

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 41

    चाकर रघुबीर के

    - 'महात्मन्! शंहशाह की इच्छा है कि आप उनके दरबार को पवित्र करें।' शहंशाह अकबर के वकीले मुतलक और काशी के सूबेदार अब्दुर्रहीम खानखाना ने गुंसाईजी से हाथ जोड़कर निवेदन किया।

    - 'खानखानाजी, कैसी बात करते हैं आप? हम तो दास हैं। क्या आप राजपुरुष होकर इतना भी नहीं जानते कि दासों के आने से सम्राटों के दरबार पवित्र नहीं होते।'

    - 'आप दास नहीं, रामभक्त हैं और रामभक्त तो स्वयं रामजी के समान हैं। उनके आगमन से ही दरबार पवित्र होते हैं।'

    गुसांईजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया-

    'प्रभु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।

    तुलसी कहूंँ न राम से साहिब सील निधान।।'


    - 'शहंशाह के दरबार में जाने से किसी तरह का अमंगल नहीं होगा बाबा।' अब्दुर्रहीम ने धरती पर सिर टिका कर कहा।

    गुंसाईजी ने करुणा से अब्दुर्रहीम के सिर पर हाथ रख दिया-

    'राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास।

    सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास।।'


    अब्दुर्रहीम ने निराश होकर राजा टोडरमल की ओर देखा
     वकीले मुतलक को असफल होता देखकर राजा टोडरमल ने प्रयास किया- 'शंहशाह अकबर गुणियों की कद्र करने वाले हैं। वहाँ आपका यथोचित आदर सत्कार होगा गुसांईजी। जैसा आप चाहेंगे, वैसा ही सब प्रबंध शासन की ओर से हो जायेगा।'

    गुसांईजी ने राजा टोडरमल का अनुरोध अस्वीकार करते हुए उत्तर दिया-

    'राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास।

    सुमिरत सुभ मंगल कुसल मांगत तुलसीदास।।'


    - 'आपने जीवन भर निर्धनता के कष्ट सहे हैं। आपने स्वयं ने भी कहा है-

    नहीं दरिद्र सम दुख जग माहीं...........।'

    - 'दरिद्र कौन है राजन्?' गुसांईजी ने टोका तो राजा टोडरमल सहम गये, 'रामजी के चाकर दरिद्र नहीं होते। दरिद्रता तो तन की अवस्था है, मन की नहीं। क्या मन, तन का दास मात्र है? क्या यह आवश्यक है कि यदि तन दरिद्र हो तो मन भी दरिद्र हो जाये? यदि ऐसा नहीं है तो क्या व्यक्ति केवल तन मात्र है? क्या तन के दरिद्र होने से ही व्यक्ति दरिद्र हो जाता है?'

    - 'क्षमा करें देव! चूक हो गयी। मेरा आशय यह नहीं था। मेरे पास ऐसे शब्द कहाँ हैं जो मैं आपकी मर्यादा के अनुकूल संभाषण कर सकूं।'

    - 'दोष तुम्हारा नहीं है राजन्। दोष तुम्हारे परिवेश का है जिसमें तुम्हें दिन रात रहना पड़ता है। उसी विकृत परिवेश का परिणाम है कि राजपुरुषों की दृष्टि केवल व्यक्तियों के बाहरी स्वरूप में उलझ कर रह जाती है और वे बहुत सी भ्रामक परिभाषाएं गढ़ लेते हैं।'

    - 'गुसांईजी! यदि आप जैसे विवेकी पुरुष शासन में हों तो प्रजा को कई मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है।'

    - 'नहीं! यह सत्य नहीं है। प्रत्येक मनुष्य का अपना धर्म होता है और मनुष्य को अपने धर्म का ही पालन करना चाहिये। भगवान कृष्ण ने कहा है 'स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मौ भयावहः ।' शासन चलाना मेरा धर्म नहीं है।'

    - 'शंहशाह चाहते हैं कि आप जैसी विभूती का शेष जीवन आराम से कटे।' राजा टोडरमल ने हाथ जोड़ दिये।

    गुसाईंजी ने नेत्र मूंद कर कहा-

    'करिहौं कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस।

    जहाँ तहाँ दुख पाइहौ तबहीं तुलसीदास।।'


    - 'महात्मन्! सम्राट ने आपको यथोचित मनसब देने का भी निश्चय किया है।' इस बार राजा मानसिंह ने साहस किया।

    गुसांईजी राजा मानसिंह की ओर देखकर मुस्कुराये-

    'हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार।

    तुलसी हम का होंइगे नर के मनसबदार।'


    संध्या वंदन का समय होता देखकर गुसांईजी उठ खड़े हुए। उन्हीं के साथ तीनों राजपुरुष भी गुसांईजी को प्रणाम करके उठ कर खड़े हो गये। वे तीनों आज ही बादशाह अकबर के आदेश से गुसांईजी की सेवामें काशीजी में उपस्थित हुए थे किंतु दिन भर के प्रयास के बाद भी अपने उद्देश्य में असफल रहे थे।

    हुक्म उदूली

    - 'उस भिखारी को इतना घमण्ड?' क्रोध से चीख पड़ा अकबर।

    - 'नहीं जिल्लेइलाही। बाबा को किसी तरह का घमण्ड नहीं। उन्होंने अपनी युवावस्था में ही गृह संसार त्यागकर सन्यास धारण कर लिया था। अब वे फिर से संसारिक मोह माया में फंसना नहीं चाहते।' खानखाना ने निवेदन किया।

    - 'किंतु यदि बादशाही हुक्म की इसी तरह तौहीन होती रही तो रियाया एक दिन मुगलों का हुक्म मानना तो दूर बात सुनना भी बंद कर देगी।'

    बादशाह के कोप को देखकर खानखाना सहम गया। आखिर बादशाह के मन में क्या है? क्या करना चाहता है वह?

    - 'हमने आपको काशी का सूबेदार इसलिये नहीं बनाया है कि आप बादशाही हुक्म की तौहीन का समाचार हम तक पहुँचाया करें।'

    - 'क्षमा करें हुजूर! बाबा ने किसी हुक्म की तौहीन नहीं की है। न ही उन्हें किसी तरह का हुक्म दिया गया था।'

    - 'यदि बादशाही हुक्म नहीं सुनाया था तो फिर तुमने उस भिखमंगे से कहा क्या था?

    - 'उन्हें कहा गया था कि बादशाह की ऐसी इच्छा है कि आप उनके दरबार में चलकर मनसब स्वीकार करें।'

    - 'और उसने अस्वीकार कर दिया?' अकबर क्रोध से फुंकारा।

    - 'हाँ। उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।'

    - 'शब्दों की बाजीगरी से हमें बहलाओ मत खानखाना। बादशाह की इच्छा, बादशाह का प्रस्ताव और बादशाह का हुक्म, ये तीनों बातें एक ही अर्थ रखती हैं।' खानखाना निरुत्तर हो गया।

    - 'उसे यहाँ पकड़ कर मंगवाओ।'

    खानखाना के होश उड़ गये। बादशाह क्या करने को कहता है? कैसे संभव है यह? खानखाना की हिम्मत नहीं हुई कि बादशाह की ओर मुँह उठाकर देख सके। वह चुपचाप धरती में ही दृष्टि गड़ाये रहा।

    - 'तो आप भी बादशाह का हुक्म मानने से मना करते हैं?'

    - 'आप चाहें तो सर कलम कर लें किंतु गुलाम पर हुक्म उदूली की तोहमत न लगायें।' खानखाना ने किसी तरह हिम्मत करके कहा। उसने आज से पहले बादशाह को अपने ऊपर कुपित होते हुए नहीं देखा था।

    - 'हम जानते हैं कि तुम ही नहीं राजा टोडरमल और राजा मानसिंह भी यह हुक्म नहीं मानेंगे।'

    - 'जिल्ले इलाही जानते हैं कि ये दोनों भी इस गुलाम की तरह मुगलिया तख्त के मजबूत पहरेदार हैं।'

    - 'इसलिये हमने निश्चय किया है कि मुगलिया तख्त के इन पहरेदारों की जगह शहजादे मुराद को इस काम के लिये भेजा जायेगा।'

    बादशाह के आदेश से खानखाना सन्न रह गया। वह बादशाह को सलाम बजाकर राजा टोडरमल के दीवानखाने की ओर बढ़ गया। टोडरमल ने राजा मानसिंह, राजा बीरबल और तानसेन को भी अपनी कचहरी में बुलवा लिया। पाँचों राजपुरुषों ने बहुत देर तक माथा पच्ची की किंतु इस समस्या का कोई हल दिखायी नहीं दिया।

    एक पखवाड़ा बीतते न बीतते शहजादा मुराद गुसाईंजी को बांधकर आगरा ले आया। पाँचों राजपुरुषों ने गुसाईंजी से मिलने का बहुत प्रयास किया किंतु मुराद ने किसी को भी गुसाईंजी से मिलने की अनुमति नहीं दी। अंत में किसी तरह खानखाना गुसाईंजी तक पहुँचा। उसने देखा कि कारागार की अंधेरी कोठरी में प्रभूत मात्रा में दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। जिसके आलोक में एक भव्य मूर्ति ध्यानमग्न अवस्था में विराजमान है। खानखाना के कदमों की आहट से गुसाईंजी का ध्यान भंग हुआ।

    - 'कौन है?' गुसाईंजी ने पूछा।

    - 'मैं आपका गुनहगार हूँ बाबा।' एक आकृति को अपने पैरों में गिरते देखकर गुसाईंजी उठ कर खड़े हो गये। उन्होंने कण्ठ स्वर से पहचाना कि अब्दुर्रहीम है।

    - 'उठो खानखाना।' गुसाईंजी ने खानखाना को उठा कर छाती से लगा लिया।

    - 'मेरे ही कारण आप इस अवस्था को पहुँचे हैं।'

    - 'कोई किसी के कारण कहीं नहीं पहुँचता मित्र, सब अपने करमों और रामजी की इच्छा से चलायमान हैं।'

    दोनों मित्र कारागार की उसी अंधेरी कोठरी में धरती पर बैठ गये। रहीम ने कहा कुछ हरिजस सुनाओ बाबा। प्राणों में बहुत बेचैनी है। खानखाना के अनुरोध पर गुसाईंजी गाने लगे-

    है प्रभु मेरोई सब दोसु।

    सीलसिंधु, कृपालु, नाथ अनाथ, आरत पोसु।

    बेष बचन बिराग मन अब अवगुननि को कोसु।

    राम प्रीति प्रतीति पोली, कपट करतब ठोसु।

    राग रंग कुसंग हो सों साधु संगति रोसु।

    चहत केहरि जसहिं सेइ सृगाल ज्यों खरगोसु।

    संभु सिखवन रसन हूँ नित राम नामहिं घोसु।

    दंभहू कलिनाम कुंभज सोच सागर सोसु।

    मोद मंगल मूल अति अनुकूल निज निरजोसु।

    रामनाम प्रभाव सुनि तुलहिसहु परम परितोस।।


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  • चित्रकूट का चातक - 42

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 42

    बन्दर और लंगूर 

    आधी रात के बाद सीकरी में हा-हाकार मच गया। जहाँ देखो वहीं लंगूर। महलों, छतों और कंगूरों पर उत्पात मचाते हुए हजारों बन्दर और लंगूर अचानक ही जाने कहाँ से आ गये थे। सैंकड़ों वानर लाल-लाल मुँह के थे तो हजारों काले मुँह के। उनकी लम्बी पूंछों और विकराल दाँतों ने बच्चों और स्त्रियों को ही नहीं हट्टे-कट्टे पुरुषों को भी भय से त्रस्त कर दिया।

    देखते ही देखते यह वानर सेना अत्यंत कुपित होकर महलों का सामान इधर से उधर फैंकने लगी। जो कोई साहस करके वानरों को भगाने का प्रयास करता था, वानर सेना उसी को घेर लेती और घूंसों और चपतों से उसकी हालत खराब कर डालती। किसी की कुछ समझ में नहीं आता था कि इन वानरों से कैसे छुटकारा पाया जाये।

    निद्रा में खलल पड़ने से बादशाह भी उठ कर बैठ गया। उसने अपनी बंदूक निकाली और वानरों पर गोलियां दागने लगा किंतु यह देखकर उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा कि बहुत गोलियां चलाने के बाद भी, एक भी वानर को गोली नहीं लगी।

    जाने कितनी देर तक यह उत्पात चलता रहा। आखिर एक वानर बादशाह के हाथ से बंदूक छीनकर ले गया। बादशाह बेबस आदमियों की तरह देखता ही रह गया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि खानखाना दौड़ता हुआ आ रहा है। उसने कहा- ' इन वानरों को रोकना बहुत आवश्यक है जिल्ले इलाही।'

    - 'मगर कैसे? ये तो बन्दूक से भी नहीं मरते!'

    - 'ये बंदूक से नहीं मरेंगे शहंशाहे आलम! इन वानरों का उत्पात रोकने का एक ही उपाय है।'

    - 'तो उपाय करते क्यों नहीं?'

    - 'वह उपाय मेरे वश में नहीं।'

    - 'तो किसके वश में है?'

    - 'वह तो आपके ही वश में है।'

    - 'मैंने उपाय करके देख लिया। इन पर तो बारूद का भी असर नहीं होता।'

    - 'ये क्रुद्ध-विरुद्ध वानर हैं, बारूद से डरने वाले नहीं। ये तो अपने स्वामी के आदेश पर गुसांईजी को मुक्त करवाने आये हैं।'

    - 'कौन गुसांई?'

    - 'वही काशी के बाबा, जिन्हें शहजादे मुराद आपके आदेश से बंदी बना लाये हैं।'

    - 'सच कहते हो?'

    - 'जो आँखों से दिखता है, क्या वह भी सच नहीं है?'

    - 'ठीक है, हम भी उस बाबा को देखेंगे, अभी।' अकबर उठ कर कारागार को चल पड़ा। खानखाना ने भी बादशाह का अनुसरण किया। थोड़ी ही देर में वे दोनों गुसाईंजी के समक्ष थे। आगे-आगे अकबर और उसके पीछे-पीछे खानखाना ने कोठरी में प्रवेश किया। एक अद्भुत दृश्य उनके सामने था। अकबर ने देखा, उन्नत भाल पर प्रबल तेजपुंज धारण किये हुए एक गौर वर्ण ब्राह्मण आकाश की ओर हाथ उठाकर गा रहा था-

    संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बल बीरा।

    जै जै हनुमान गुसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।


    जाने कैसा आलोक था जो ब्राह्मण के मुखमण्डल से निकल कर पूरी कोठरी में फैल रहा था! आगंतुकों को देखकर गुसाईंजी ने पाठ रोक दिया। अकबर ने कहा- 'ब्राह्मण! जा मैं तुझे स्वतंत्र करता हूँ।'

    अकबर का आदेश सुनकर गुसांईजी ने कहा-

    'जो सत बार पाठ करि कोई, छूटहि बंदि महासुख होई

    जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।'


    (मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने अकबर की जेल से रिहाई के लिये हनुमान चालीसा की रचना की थी।)

    - 'मैंने सुना है कि तू बड़ा चमत्कारी है और घमण्डी भी।'

    - 'चमत्कारी तो इस सृष्टि को बनाने वाला है सम्राट। हम सब तो उसके संकेत मात्र पर नृत्य करने वाली कठपुतलियाँ हैं। हम अपनी इच्छा से न तो किसी को मनसबदार बना सकते हैं और न कारावास दे सकते हैं।' एक क्षण रुककर
    -

     'उमा दारू जोसित की नाईं। सबहि नचावत राम गुसाईं।'

    गुसांईजी ने शांत स्वर से कहा और कारा से बाहर प्रस्थान कर गये। मंत्रमुग्ध सा अकबर उनके पीछे-पीछे आया। कारा से बाहर निकल कर अकबर ने कहा-

    'आप धन्य हैं महात्मा!'

    गुसांईजी ने आकाश की ओर देखकर कहा-

    'हौं तो असवार रहौ खर कौ, तेरो ही नाम मोहि गयंद चढ़ायो।'

    अकबर ने महल में लौट कर देखा, समस्त वानर महल त्याग कर जा चुके थे।

    छत्तीस लाख

    - 'महाराज जगन्नाथ!' खानखाना ने अपने दरबार में उपस्थित कवि जगन्नाथ को सम्बोधित करके कहा।

    - 'जी हुजूर!'

    - 'तनिक इस पर पर विचार कीजिये और बताईये कि ये कैसा है?

    अच्युतचरण तरंगिणि शशिशेखर-मौलि-मालती माले।

    मन तनु वितरण-समये हरता देया न मे हरिता।।


    (-हे गंगा! जब मेरी मृत्यु हो तो तुम्हारे किनारे पर हो। हे माता! मेरी मृत्यु हो तो मुझे विष्णु का सारूप्य न देना, शिव का सारूप्य देना ताकि तुम मेरे सिर और आँखों पर बनी रहो।) पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा। अब से पहले गंगा मैया पर रहीम ने कोई कविता नहीं पढ़ी थी। 

    - 'खानखाना! जब तक कविवर जगन्नाथ आपके पद पर विचार करें, आप इस पद पर गौर फर्मायें।।' केशवराय ने खड़े होकर जुहार की।

    - 'सुनाइये कविराय। आप भी सुनाईये। हमें मालूम है कि आप हमारी तारीफ की बजाय अपनी तारीफ सुनना अधिक पसंद करेंगे।' खानखाना ने मुस्कुराकर केवशराय को अनुमति दी।

    केशव ने गाया-

    अमित उदार अति पाव विचारि चारु

    जहाँ-तहाँ आदरियां गंगाजी के नीर सों

    खलन के घालिबे को, खलक के पालिबे को

    खानखानां एक रामचन्द्रजी के तीर सों।।


    (यह कविता अब्दुर्रहीम की प्रशंसा में कही गयी है।)

    एक बार फिर पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा।

    - 'खानखाना! अनुमति हो तो हम भी कुछ कहें।' ये कवि गंग थे।

    - 'आप भी कहें कविवर। आपको कौन रोक सकता हैा!' खानखाना ने हँस कर कहा।

    - 'तो सुनिए खानखाना। कवि गंग आपकी सेवा में अपना नव रचित छंद प्रस्तुत करता है-

    चकित भँवर रहि गयो गमन नहिं करत कमलबन

    अहि फनि-मनि नहिं लेत तेज नहिं बहत पवन घन।

    हँस सरोवर तज्यो, चक्क चक्की न मिले अति

    बहु सुंदरि पद्मिनी, पुरुष न चहें न करें रति।

    खल भलित सेस कवि गंग भनि अतिम तज रवि रथ खस्यो।

    खानखान बैरमसुवन जि दिन कोप करि तंग कस्यो।।


    (- हे खानखाना! बैरम के पुत्र! जिस दिन तून क्रोध करके अपना तूणीर कसा। उस दिन भौंरा चकित होकर कमलवन को जाना भूल गया। सर्पराज अपने फण पर मणि रखना भूल गया और घनी वायु ने अपनी गति कम कर ली। हंस ने सरोवर त्याग दिया और चकवे तथा चकवी ने अपना मिलन बिसार दिया। पुरुषों ने पद्मिनी स्त्रियों के साथ रति करने से मुँह मोड़ लिया। शेषनाग भी व्याकुल हो गये। कवि गंग कहता है कि सूर्य देव का रथ भी अपने मार्ग से विचलित हो गया।)

    कवि गंग ने इतने मधुर स्वर में यह कविता कही कि सुनने वाले मंत्र मुग्ध से कविता के साथ ही बह गये। खानखाना ने कवित्त के भाव, अर्थ और पद लालित्य पर विचार करते हुए उसी समय अपने कोश में से छत्तीस लाख रुपये कविगंग को प्रदान किये। उस पूरे काल में संभवतः किसी और कवि को इतना बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था।

    मुख देखे दुःख उपजत

    - 'महाराज! बैरामखाँ को सुअन अब्दुर्रहीम महाराज के श्रीचरनन में कोटि-कोटि प्रणाम निवेदन करि रह्यौ। खानखाना ने अपना मस्तक भूमि पर रखकर कहा।

    - 'बिृंदाबन में तुम्हारौ स्वागत है खानखानाजू।' संत कुंभनदास ने रहीम को धरती से उठाकर गले लगा लिया।

    - 'भौत दिनन ते इच्छा रही संतन के दरसनन की, सो आज पूरी भईं' अब्दुर्रहीम ने भरे कण्ठ से कहा।

    - 'चहुं ओर तिहारे नाम की बड़ी चर्चा होय है खानखानाजू!'

    खानखाना ने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए कहा-

    'रहिमन धोखे भाव ते मुख ते निकसै राम।

    पावत पूरन परम गति कामादिक कौ धाम।।'


    - 'ऐसे देव दुर्लभ संस्कार कहाँ ते पाये?'

    - 'बाबा रामदास की हमारे कुल पै बड़ी कृपा हती। उन्हिन के प्रताप ते मो जैसे अधम कूं आप जैसे संतन के दर्शन सुलभ हुयि जायं हैं।'

    - 'बाबा रामदास कौ कुल धन्य भयौ, जो सूरा जैसौ सपूत जन्म्यौ। नेत्र ना हते फिर भी हरि गुन गाय-गाय के तर गयौ।'

    - 'महाराज! एक बिनती हती।'

    - 'तुम आदेस करौ खानखानाजू। हमारे लायक जो कछू काम होयगो हम पूरौ करिंगे।'

    संत ने प्रसन्न होकर कहा।

    - 'बादसाह की भौतई इच्छा है कि आप जैसे संत उनन के दरबार में रहैं।'

    खानखाना का प्रस्ताव पाकर संत चिंता में डूब गये। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोले- 'खानखानजू! तुम तौ ठहरे ज्ञानी। जरा तसल्ली ते बिचार कै बताओ कि बादसाह के दरबार में हम भिखारिन कौ कहा काम परौ?'

    - 'बादसाहन के दरबार में यदि गुनी लोग न रहें तो चाण्डाल अपनौ डेरा जमाय लेंगे। जाते बादसाह कौ तौ पतन हौवेगो ही, परजा भी दुख पावेगी।'

    - 'किंतु भैया आग और पानी का कहा मेल? ऊ ठहरौ बादसाह। दिन रात तरवारि चलावै, लोगन कू मारै। हम रहे भिखारी, भीख मांगैं हरि भजन करैं।' कुंभनदासजी का उत्तर सुनकर दीर्घ साँस छोड़ते हुए खानखाना ने कहा-

    'भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघू भूप।

    रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।।'


    खानखाना के मुखमण्डल पर निराशा छा गयी। वह चाहता था कि अकबर के दरबार में कुछ अच्छे संत और विचारवान् लोग रहें किंतु यह एक विचित्र बात थी कि कोई भी संत सत्ता के निकट नहीं जाना चाहता था जिससे अकबर के दरबार में धूर्तों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जाती थी।

    - 'अच्छा एक बात बताऔ, हम अकब्बर के दरबार में चल कै रहैं, ऐसी इच्छा तुम्हारी रही कै अकब्बर की?'

    संत के प्रश्न से खानखाना विचार में पड़ गया। बहुत सोच विचार कर बोला- 'बादसाह की।'

    - 'तौ तुम सीकरी जाय कें अकब्बर ते यों कहियौं कि कुंभनदास ने कहलवाई है कि-

    भगत कौ कहा सीकरी सों काम!

    आवत जात पनैहा टूटी, बिसरि गयौ हरि नाम।

    जाको मुख देखे दुख उपजत, ताकों करन परी परनाम।

    कुंभनदास लाल गिरधर बिन यह सब झूठौ धाम।

    खानखाना संत के चरणों की मिट्ठी सिर से लगाकर उठ गया।

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