Blogs Home / Blogs / /
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महाराजा जोधपुर द्वारा वितरित पुरस्कार एवं पदोन्नतियां

     03.06.2020
    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महाराजा जोधपुर द्वारा वितरित पुरस्कार एवं पदोन्नतियां

    स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् पुरस्कारों का वितरण-

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    24 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा ने अपने निजी स्टाफ के अधिकारियों को पदोन्नतियां, पुरस्कार तथा निःशुल्क भूमि प्रदान कीं।

    पदोन्नति- 1. महाराजा के पसर्नल मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल राव राजा हनूतसिंह - ऑनरेरी ब्रिगेडियर 2. सरदार इन वेटिंग कैप्टेन महाराज अनोपसिंह - मेजर 3. महल के प्रशासनिक अधिकारी गोवर्धनसिंह - कैप्टेन

    स्वर्ण एवं ताजीम (एकवारी)- 1. कम्पट्रोलर ऑफ द हाउस होल्ड मेजर डॉ. बी. एल. रावत 2. ठाकुर करणसिंह

    स्वर्ण- 1. जोधपुर स्टेट रेलवे के महाप्रबंधक के सेक्रेटरी मि. जे. ए. फोलिओट पॉवेल

    पालकी, सिरोपाव एवं स्वर्ण- 1. पं नंदलाल

    राज्य रत्न- 1. डा. निरंजन नाथ गुरटूं

    स्टाईपेण्ड, फण्ड एण्ड ग्रांट्स- 1. डॉ. निरंजन नाथ गुरटूं - 200.00 रुपये प्रमिमाह 2. साह अमृतराज - 200.00 रुपये प्रमिमाह 3. करण चंद्र भण्डारी - 100.00 रुपये प्रमिमाह 4. खेमचंद भण्डारी - 100.00 रुपये प्रमिमाह

    निशुल्क भूखण्ड एवं भूमि का अनुदान- 1. कैप्टेन ठाकुर रतनसिंह ए. डी. सी. 2. कैप्टेन ठाकुर मनोहरसिंह - ए. डी. सी. 3. भोपालचंद लोढ़ा- महाराजा ने भोपालचंद लोढ़ा के विरुद्ध चल रहे समस्त जांच प्रकरण भी वापस ले लिये।

    राजस्थान में सम्मिलिन से पहले रैंक/सम्मान व उपाधियों का वितरण-

    जोधपुर महाराजा के पुत्र उत्पन्न होने की प्रसन्नता में 18 मार्च 1948 को महाराजा ने बहुत से लोगों को ऑनरेरी रैंक, मिलिट्री रैंक, राज्य रत्न, नगरसेठ व रायबहादुर की उपाधियां, स्वर्ण, ताजीम, हाथ का कुराब, हाथी सिरोपाव, पालकी सिरोपाव आदि बांटे-

    ऑनरेरी रैंक- 1. मेजर जनरल महाराजाधिराज श्री अजीतसिंह साहिब - जनरल 2. दीवान बहादुर ठाकुर माधोसिंहजी साहिब ऑफ संखवास - कर्नल 3. मेजर महाराज श्री हिम्मतसिंहजी साहिब - ले. कर्नल 4. महाराज हनवंतसिंहजी - ले. कर्नल 5. मेजर राजा हरिसिंह ऑफ कुचामन - ले. कर्नल 6. मेजर कुंवर बिशनसिंहजी - ले. कर्नल 7. ठाकुर करणसिंहजी- ले. कर्नल 8. ठाकुर भैंरोसिंहजी ऑफ खेजड़ला - मेजर 9. महाराजा नरपतसिंहजी ऑफ बांसवाड़ा - मेजर 10. कुंवर लक्ष्मणसिंहजी - मेजर 11. ले. ओंकारसिंह, डिप्टी प्राइवेट सेक्रेटरी - कैप्टेन 12. मि. अनोपसिंह जुडिशयल सेक्रेटरी - कैप्टेन 13. मि. पदमसिंह - कैप्टेन

    रैंक- 1. मेजर महाराजा प्रेमसिंहजी- ले. कर्नल 2. मेजर ठाकुर मोहनसिंहजी - ले. कर्नल

    राज्यरत्न- 1. लाला हरिश्चंद्रजी, जुडिशियल मिनिस्टर 2. रायबहादुर जसवतंराजजी मेहता, मिनिस्टर फॉर लोकल बॉडीज 3. मि. बी. के. मजूमदार, पर्सनल फिजीशियन ऑफ दी हिज हाइनेस दी महाराजा साहिब बहादुर

    नगर सेठ- 1. मेजर मोहनलाल सांघी

    राय बहादुर- 1. शाह मदन मोहनजी जागीरदार, चौक लखनऊ

    सम्मान की बहाली- 1. मि. गोरधनलाल काबरा

    गोल्ड एण्ड ताजीम- 1. कैप्टेन ठाकुर मनोहरसिंहजी ऑफ धामाली - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम 2. कैप्टेन ठाकुर रतनसिंहजी ऑफ भीकमकोर - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम 3. ले. कुंवर हेमसिंहजी - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम

    ताजीम- 1. ले. कर्नल ठाकुर विक्रमसिंहजी ऑफ सामलिया (अलवर स्टेट) 2. ठाकुर नाथूदानजी महरिया 3. शाह मदनमोहनजी जागीरदार, चौक लखनऊ

    हाथ का कुरब- 1. मेजर टीका कुशवंतसिंहजी ऑफ बदरू खां (नाभा स्टेट)

    ताजीम एण्ड हाथी सिरोपाव- 1. रायबहादुर ठाकुर बख्तावरसिंहजी, इंसपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस

    हाथी सिरोपाव- 1. राय बहादुर राज्य रत्न जसवंतरायजी मेहता 2. मि. नवल किशायर, चीफ जज 3. मेजर डॉ. बी. एल. रावत, कम्प्ट्रोलर ऑफ हाउस होल्ड 4. पं. नन्दलालजी

    गोल्ड एण्ड हाथी सिरोपाव 1. मि. सी. के. दुरई, जनरल मेनेजर जोधपुर रेलवे

    गोल्ड एण्ड पालकी सिरोपाव- 1. ठाकुर कानसिंहजी, डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस 2. मि. सी. एल. कुमार, चीफ इंजीनियर जोधपुर रेलवे 3. मि. हेतीदान, हुजूर सेक्रटरी 4. मि. समरथ राज, पोलिटिकल सेक्रेटरी 5. मि. अनोपसिंह, ज्युडीशियल सेक्रेटरी 6. मि. अब्दुल हक, डिवलपमेंट सेक्रेटरी 7. कैप्टेन गोरधनसिंह, होम सेक्रेटरी 8. एम. एस. राय, एक्स हैड मास्टर ऑफ दरबार हाईस्कूल एण्ड एक्स सेक्रेटरी ऑफ गवर्नमेण्ट ऑफ जोधपुर 9. मि. उमराव चंद भण्डारी 10. राज्य वैद्य गोविंद चंद्र 11 आचार्य रामकिशनजी (मेड़ता) 12. सेठ गजधर सोमानी ऑफ मौलासर (डीडवाना) 13. मि. शैतानसिंह, पर्सनल ऑडरली टू दी हिज हाइनेस दी महाराजा साहिब बहादुर

    गोल्ड- 1. डा. ई. डब्लू हैवर्ड प्रिंसीपल मैडिकल ऑफीसर 2. मि. एफ. एफ. फर्ग्यूसन, चीफ इंजीनियर पी. डब्लू. डी. 3. मि. एम.   पी. फ्लैटोहेम 4. पं. रामगोपाल, फाइनेंस सेक्रेटरी 5. मि. रामनिवास माछर, 6. डा. हरिगोपाल दवे 7. मि. एम. ए. राय, एक्जीक्यूटिव इंजीनियर जोधपुर रेलवे 8. ठाकुर चंद्र सिंहजी एजेण्ट सरदार समंद 9. वैद्य गंगा सहाय, डीडवाना

    पालकी सिरोपाव- 1. मि. हरिसिंह सेक्रेटरी टू हर हाइनेस श्री महारानीजी साहिबा 2. पं. पन्नालाल 3. मि. हुकमराज मेहता 4. मि. अमृतराज मेहता

    ताजीम, गोल्ड एण्ड हाथी सिरोपाव- रिटायर्ड ले. कर्नल्स- 1. ले. कर्नल ठाकुर बहादुर सिंह ओ. बी. आई. 2. ले. कर्नल रायबहादुर   राय राजा सुजानसिंह 3. ले. कर्नल हेमसिंह 4. ले. कर्नल हीरसिंह 5. ले. कर्नल ठाकुर अनोपसिंह 6. ले. कर्नल ठाकुर अमानसिंह 7. ले. कर्नल ठाकुर जवाहर सिंह एम. बी. ई. 8. ले. कर्नल रायबहादुर ठाकुर दलपतसिंह ऑफ रोहट

    वर्तमान ले. कर्नल्स- 1. ले. कर्नल के. श्यामसिंह हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्स 2. ले. कर्नल कुमार अर्जुनसिंह, डायरैक्टर ऑफ   रीसैटलमेंट 3. ले. कर्नल कल्याण सिंह, जोधपुर लांसर्स 4. ले. कर्नल धोकलसिंह सैकेण्ड जोधपुर इन्फैण्ट्री 5. ले. कर्नल सुल्तानसिंह हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्स 6. ले. कर्नल ठाकुर मोहनसिंह, दुर्गा हॉर्स 7. ले. कर्नल महाराजा  प्रेमसिंह फोर्ट्स गार्ड 8. ले. कर्नल ठाकुर रामसिंह डी. एस. ओ. सरदार इन्फैण्ट्री 9. ले. कर्नल ठाकुर डूंगरसिंह एम.ओ. सरदार इन्फैण्ट्री टी. जी.

    हाथी सिरोपाव- हैड क्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्सेज- 1. मेजर धोकलसिंह

    जोधपुर लांसर्स- 1. मेजर चंदनसिंह 2. मेजर ठाकुर जगतसिंह 3. मेजर के. सरदार सिंह 4. मेजर भोपालसिंह

    जोधपुर लांसर्स ट्रेनिंग सेंटर- 1. मेजर रामदानसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री- 1. मेजर दीप सिंह 2. मेजर जेठूं सिंह 3. कैप्टेन महाराज दान सिंह

    जोधपुर इन्फैण्ट्री- 1. महाराजा रेवतसिंह

     मिलिट्री हॉस्पीटल 1. मेजर पी. आर. बादवा

    पालकी सिरोपाव- हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्सेज- 1. कैप्टेन हरिसिंह 2. कैप्टेन डी. ए. राजहंस

    जोधपुर लांसर्स- 1. कैप्टेन खीमसिंह 2. कैप्टेन गिरधारीसिंह एम. बी. ई.

    जोधपुर लांसर्स ट्रेनिंग सेंटर- 1. कैप्टेन के. उम्मेदसिंह 2. कैप्टेन एस. के. बनर्जी सैकेण्ड

    जोधपुर इन्फैण्ट्री- 1. कैप्टेन पेहप सिंह 2. कैप्टेन करीमखान 3. कैप्टेन माधोसिंह

    जोधपुर इन्फैण्ट्री सेंटर- 1. कैप्टेन मगनसिंह

    दुर्गा हॉर्स 1. कैप्टेन प्रेमसिंह 2. कैप्टेन रावराजा देवीसिंह

    फोर्ट्स गार्ड- 1. कैप्टेन रेवतसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री- 1. कैप्टेन सवाईसिंह

    घोर सिरोपाव- जोधपुर इन्फैण्ट्री सेंटर- 1. ले. दुर्जनसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री- 1. सै. ले. गुलाबसिंह

    फोर्ट्स गार्ड- 1. सै. ले. मगनसिंह

    ऑनरेरी रैन्क्स- 1. ले. क. मेजर ज्यॉफ गोडविन 2. मेजर मि. उमाशंकर गौड़

    गार्डन सुपरिन्टेण्डेण्ट को पदोन्नति- 31 मार्च 1949 को ऑफीशियेटिंग सुपरिन्टेण्डेण्ट गार्डन्स एण्ड जू खींवराज को पदोन्नति   देकर अधीक्षक के पद पर 250-15-400 के वेतमान में नियुक्त किया गया।

    कस्टम में छूट-

    4 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने राज्य में जिन लोगों को कस्टम ड्यूटी में छूट दे रखी थी, वह वापस ले ली किंतु यह छूट जोधपुर महाराजा तथा राजपरिवार के निम्नलिखित सदस्यों के लिये पूर्ववत् जारी रखी गयी- 1. हिज हाइनेस द महाराजा साहिब बहादुर 2. महाराजाधिराज श्री सर अजीतसिंहजी साहिब 3. महाराज श्री हिम्मतसिंहजी साहिब 4. महाराज श्री हरिसिंहजी साहिब 5. महाराज श्री देवीसिंहजी साहिब 6. महाराज दलीपसिंहजी साहिब

    राज्य कर्मचारी एवं रेलवे कर्मचारियों को भूखण्ड-

    4 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने जोधपुर राज्य के कर्मचारियों एवं जोधपुर रेलवे के कर्मचारियों को मसूरिया में भूखण्ड दिये गये जिसकी दर आधा रुपया प्रति वर्गगज निर्धारित की गयी।

    राजस्थान में सम्मिलित होने के बाद मानद रैंक का वितरण-

    5 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने अपने खान, बरकतउल्लाखां को मेजर का मानद रैंक प्रदान किया। यह अधिकारी नई दिल्ली में जोधपुर राज्य का प्रतिनिधि था।

    महाराजा के भाई को सेना में नियुक्ति-

    6 अप्रेल 1949 को जोधपुर महाराजा द्वारा अपने भाई महाराज हरिसिंह को जोधपुर स्टेट फोर्सेज में सैकेण्ड लेफ्टीनेंट नियुक्त किया गया। उन्हें नियमित आधार पर नियुक्ति दी गयी जो कि 1 दिसम्बर 1947 से प्रभावी मानी गयी। उनका वेतन जोधपुर लांसर्स से दिये जाने की व्यवस्था की गयी।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

  • स्वतंत्रता के तुरंत "/> स्वतंत्रता के तुरंत "> स्वतंत्रता के तुरंत ">
    Share On Social Media:
  • राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (भाग - 1)

     03.06.2020
    राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (भाग - 1)

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कर्नल टॉड का जन्म 20 मार्च 1782 को इंगलैण्ड के इंग्लिस्टन नामक स्थान पर हुआ था। उसके किसी पूर्वज ने स्कॉटलैण्ड के राजा रॉबर्ट दी ब्रूस के बच्चों को इंगलैण्ड के राजा की कैद से छुड़ाया था इस कारण टॉड परिवार को नाइटबैरोनेट की उपाधि तथ लोमड़ी का चिह्न धारण करने का अधिकार मिला हुआ था। जब जेम्स टॉड 17 वर्ष का हुआ तो ई. 1799 में वह ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सैनिक अधिकारी के रूप में बंगाल भेज दिया गया।

    वहाँ कुछ दिनों के लिये उसे नौसैनिक के रूप में भी काम करने का अनुभव प्राप्त हुआ। अगले ही वर्ष वह पैदल सेना में लैफ्टीनेंट के पद पर नियुक्त किया गया। वहाँ से उसकी नियुक्ति पहले कलकत्ता, फिर बंगाल तथा फिर दिल्ली में हुई। ई. 1801 में उसे दिल्ली के पास एक पुरानी नहर की पैमाइश करने का काम दिया गया। ई. 1805 में मिस्टर ग्रीम मर्सर को कम्पनी सरकार की तरफ से दौलतराव सिंधिया के दरबार में भेजा गया। कर्नल टॉड भी भारतीय राजाओं के ठाठ बाट देखने की लालसा में मर्सर के साथ हो लिया। यह वह समय था जब यूरोपीय अधिकारियों को राजपूताना एवं उसके आसपास के प्रदेश के भूगोल का बहुत ही कम ज्ञान था। उन्होंने जो नक्शे बना रखे थे उनमें अनुमान से नाम लिखे गये थे। उन नक्शों की स्थिति यह थी कि उनमें चित्तौड़गढ़ को उदयपुर के पश्चिम में दर्शाया गया था जो कि वास्तव में पूर्व में है। अंग्रेजों का अनुमान था कि राजपूताना की नदियां दक्षिण की तरफ बहती हुई नर्मदा से मिल जाती हैं।

    इस भूल को तो हिन्दुस्तान के भूगोल के प्रथम शोधकर्ता मि. रेलन ने शुद्ध किया किंतु शेष अपूर्णतायें ज्यों की त्यों बनी रहीं। जिस समय मर्सर दिल्ली से चला उस समय सिंधिया उदयपुर में था। इसलिये मर्सर को दिल्ली से आगरा तथा जयपुर होते हुए उदयपुर पहुँचना था। ई. 1791 में कम्पनी सरकार का गवर्नर कर्नल पामर जिस मार्ग से उदयपुर गया था उस मार्ग का एक नक्शा डॉक्टर हंटर ने बनाया था। मर्सर के पास वही नक्शा था। जब मर्सर के साथ जेम्स टॉड को भी अनुमति मिली तो टॉड ने उस नक्शे की जांच करने का मानस बनाया। जिस दिन वह दिल्ली से रवाना हुआ उसी दिन से वह अपने मार्ग को नाप-नाप कर नक्शे में अंकित करने लगा। जून 1806 में टॉड मर्सर के साथ उदयपुर पहुँचा। जब दिल्ली से उदयपुर तक का नक्शा तैयार हो गया तो टॉड की इच्छा हुई कि वह उदयपुर के आसपास के क्षेत्र को भी देखे और नापे।

    सिंधिया की सेना उदयपुर से चलकर चित्तौड़ गढ़ के मार्ग से होती हुई मालवा पार करके बुंदेलखण्ड पहुंची। टॉड भी इसी सेना के साथ लग लिया। इस पूरी यात्रा में टॉड न केवल नक्शे तैयार करता रहा अपितु उसने मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान का इतिहास, जनश्रुति तथा शिलालेख आदि का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया। इसके बाद तो टॉड ने इन कामों को करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वह अपनी प्रत्येक यात्रा में यही करता रहता था जिससे उसके पास राजपूताने के इतिहास की विपुल सामग्री एकत्रित हो गयी जिसका उपायोग उसने " एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान" नामक पुस्तक लिखने में किया। आगे चलकर इसी पुस्तक के नाम पर इस प्रदेश का नाम राजस्थान पड़ा। इस प्रकार राजस्थान का नामकरण करने का श्रेय भी कर्नल टॉड को जाता है। उससे पहले इस क्षेत्र को राजपूताना कहा जाता था।

    जब सिंधिया की सेना ने राहटगढ़ पर घेरा डाला तब टॉड अपने थोड़े से सिपाहियों को लेकर बेतवा नदी के किनारों के पास से होता हुआ चंबल तक के अज्ञात स्थानों तक पहुंचा तथा वहाँ से पश्चिम की ओर चलकर कोटा पहुँच गया। उसने चंबल, कालीसिंध, पार्वती, बनास आदि मुख्य नदियों के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र तथा उनके संगम स्थलों का पता लगाया। उन दिनों इस पूरे क्षेत्र में लूटमार का बाजार गर्म था। ठग, पिण्डारी, डाकू तथा सैनिक लोग राहगीरों को लूटते फिरते थे। टॉड भी कई बार लूटा गया। अनेक बार उसे अपने डेरे छोड़कर रात्रि में ही भागना पड़ा। कोटा से चलकर टॉड भरतपुर, कठूंमर और सेंतरी होता हुआ जयपुर पहुँचा। वहाँ से टोंक, इन्दरगढ़, गूगल, छपरा, राघूगढ़, अरोन, कुरवा और भोरासा के मार्ग से सागर जा पहुंचा तथा राहटगढ़ आकर सिंधिया की सेना से मिल गया।

    टॉड ने इस पूरे मार्ग के नक्शे तैयार कर लिये। जब सिंधिया ग्वालियर पहुँचा तब भी टॉड उसके पीछे लगा रहा और नक्शे बनाता रहा। ई. 1810 में उसने नक्शे बनाने वाले दो दल तैयार किये। एक दल को सिंध की ओर तथा दूसरे दल को सतलुज नदी के दक्षिणी रेगिस्तान में भेजा गया। पहला दल शेख अब्दुल बरकत के नेतृत्व में उदयपुर से गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, लखपत और सिंध हैदराबाद होता हुआ पश्चिम की ओर सिंधु नदी पारकर ठठ्ठा में पहुंचा तथा नदी के किनारे-किनारे सीवान् तक चला गया। फिर सिंधु नदी से उतर कर बांये किनारे होते हुए खैरपुर पहुंचा। वहाँ से बेखर के टापू में होकर उमरसुमरा के रेगिस्तान से जैसलमेर, मारवाड़ और जयपुर के क्षेत्रों को नापता हुआ नरवर में टॉड से आ मिला। दूसरा दल मदारीलाल के नेतृत्व में सतलज के दक्षिणी रेतीले प्रदेश तथा लगभग संपूर्ण राजपूताना के राज्यों में भेजा गया। मदारीलाल अत्यंत योग्य, विश्वसनीय एवं परिश्रमी व्यक्ति था।

    टॉड उसके द्वारा किये गये कार्य की जांच नहीं करता था किंतु अन्य आदमियों द्वारा किये गये कार्य पर विश्वास नहीं करता था और उनके द्वारा किये गये कार्य की स्वयं जांच करता था। कर्नल टॉड जिस क्षेत्र से भी निकलता, उस क्षेत्र की जानकारी रखने वाले लोगों को अपने पास बुला लेता और उनसे पूछ-पूछ कर जानकारियां लिखता रहता था। इस कारण जब वह अपने घोड़े पर बैठकर यात्रा कर रहा होता था तब उसके दोनों और ओर तथा आगे पीछे उन लोगों के घोड़े चला करते थे जो टॉड को राजपूताने के राज्यों के इतिहास की बातें बताते रहते थे। कर्नल टॉड योग्य अधिकारी था। अपने द्वारा किये गये कार्य की सत्यता की जांच करने के लिये भी उसने एक तरीका ढूंढ निकाला था।

    वह जिस किसी भी क्षेत्र में जाता उस क्षेत्र में डाक लाने ले जाने वाले लोगों से अवश्य सम्पर्क किया तथा अपने काम की सत्यता जांचने के लिये उन डाकियों के विवरण को काम में लिया। 1813 में टॉड को कर्नल बनाया गया। 1815 तक 10 वर्ष के असाधारण परिश्रम में कर्नल टॉड के पास नक्शों की 11 जिल्दें तैयार हो गयीं। ई. 1815 में उसने अपने नक्शों की एक प्रति गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज को भेंट की। हेस्टिंग्ज ने उसके महान परिश्रम की बड़ी प्रशंसा की तथा नक्शों की एक नकल पर अपने हस्ताक्षर करके टॉड को इस आशय के साथ सौंप दी कि यदि भविष्य में इन नक्शों पर कोई अन्य व्यक्ति स्वयं के द्वारा निर्मित होने का दावा प्रस्तुत करे तो उसके खंडन के प्रमाण के रूप में हेस्टिंग्ज के हस्ताक्षर दिखा दिये जायें। ये नक्शे यूरोप भी पहुँचे तथा यूरोप को राजपूताने की रहस्यमयी रियासतों की वास्तविक जानकारी हुई। बाद में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पेशवा के राज्य का बंटवारा किया तथा राजपूताने में पिण्डारियों के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया तब इन नक्शों ने बड़ी मदद की। 1805 से लेकर 1817 तक 12 वर्ष की अवधि में कर्नल टॉड ने लगभग पूरा राजपूताना देख लिया। था। उस काल में राजपूताने के भूगोल, इतिहास तथा राजपूताने की राजनीतिक परिस्थितियों की जितनी जानकारी कर्नल टॉड को थी, उतनी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में किसी अन्य अधिकारी को नहीं थी।

    इस समय राजपूताना में 17 छोटी-बड़ी हिन्दू रियासतें थीं जिनके शासक हजारों साल से आपस में युद्ध करके एक दूसरे को कमजोर करते आये थे। मुगलों के लगभग 200 वर्ष शासन काल में उदयपुर को छोड़कर शेष रियासतें मुगलों के संरक्षण में रही थीं। जिसके कारण इन रियासतों के परस्पर युद्ध लगभग बंद से हो गये थे किंतु मुगलों के कमजोर पड़ते ही ये फिर से लड़ने लगे थे। इन रियासतों के जागीरदार भी राजाओं की नाक में दम किये रहते। राजमहलों के षड़यन्त्रों के कारण राज्य का वातावरण अत्यन्त विषाक्त रहता था। प्रत्येक राजकुमार अपने पिता के बाद राजा बनना चाहता था जिससे राज्य के भीतर भी युद्ध हो जाते थे। मुगलों के पतन के बाद मराठों, डाकुओं और पिण्डारियों ने इन राजपूत रियासतों की हालत खराब कर रखी थी। वे गरीब असहाय जनता को लूटते ही थे, राजाओं के महलों में भी घुस जाते और राजमहलों तक को लूट लेते थे तथा कई लोगों की हत्याएं कर देते थे। जोधपुर, जयपुर, मेवाड़, आदि सभी बड़े राज्य इनसे त्रस्त थे।

    ई. 1807 तक 1813 तक लॉर्ड मिण्टो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल था, उसने देशी राज्यों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी जिससे मराठों और पिण्डारियों को राजपूताना में नंगा नाच करने की छूट मिल गयी। राजपूताना लुटेरों का घर बन गया। ई. 1806 में कर्नल टॉड मेवाड़ से होकर गुजरा। उसने उस समय के राजपूताने की दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- "जहाजपुर होकर कुंभलमेर जाते समय मुझे एक सौ चालीस मील में दो कस्बों के सिवा और कहीं मनुष्य के पैरों के चिह्न तक नहीं दिखाई दिये। जगह-जगह बबूल के पेड़ खड़े थे और रास्तों पर घास उग रही थी। उजड़े गावों में चीते, सूअर आदि वन्य पशुओं ने अपने रहने के स्थान बना रखे थे। उदयपुर में जहाँ पहले पचास हजार घर आबाद थे अब केवल तीन हजार रह गये थे। मेर और भील पहाड़ियों से निकल कर यात्रियों को लूटते थे।"

    कर्नल टॉड को महान राजपूताने की दुर्दशा पर बड़ा तरस आया जब उसने देखा कि राजपूत राजाओं में महान गुणों का वास होते हुए भी तनिक भी एकता नहीं है। जैसे ही किसी राजा या राजकुमार में विवाद हुआ, वे सीधे मराठों की शरण में जा पहुँचते थे या फिर पिण्डारियों की सेवाएं प्राप्त करते थे। इस कारण राजा, प्रजा, राज्य एवं राजवंश जर्जर होते चले जा रहे थे। टॉड ने निश्चय किया कि इस महान प्रदेश को मराठों और पिण्डारियों के उत्पात से बचाना चाहिये तथा राजपूताने को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवाएं प्रदान की जानी चाहिये। कर्नल टॉड ने 1814-15 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उच्च अधिकारियों को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि इन पिण्डारियों को कुचला जाये अन्यथा राजपूताना नष्ट हो जायेगा। कम्पनी सरकार ने टॉड से पिण्डारियों के विरुद्ध की जाने वाली लड़ाई की पूरी योजना बनवाई। टॉड ने पिण्डारियों की सामरिक शक्ति, उनके दबदबे वाले क्षेत्र तथा राजपूताने की स्थिति को ध्यान में रखकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की और उसे सरकार को भेज दिया। इस योजना को बनाने में कर्नल टॉड द्वारा निर्मित नक्शों ने बड़ी सहायता की। सरकार ने कर्नल टॉड का बड़ा आभार व्यक्त किया। ई. 1817 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल मार्कीस ऑफ हेस्टिंग्स ने पिण्डारियों को नष्ट करने का निर्णय लिया। मेजर जनरल सर ऑक्टरलोनी, जनरल डॉनकिन, जनरल मार्शल, जनरल ऐडम्स और जनरल ब्राउन को राजपूताना एवं मध्य भारत में पिण्डारियों को घेर कर मारने का काम सौंपा गया। इन जनरलों ने पूरा राजपूताना और मध्य भारत घेर लिया। जब कर्नल टॉड को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने कम्पनी सरकार को लिखा कि मुझे भी पिण्डारियों को कुचलने के कार्य पर लगाया जाये। गवर्नर जनरल ने टॉड का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

    पहले तो गवर्नर जनरल ने टॉड को मेजर जनरल ऑक्टरलोनी के अधीन नियुक्त करने का विचार किया किंतु टॉड की महत्ता को देखते हुए उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर हाड़ौती क्षेत्र में रांवटा नामक स्थान पर नियुक्त किया गया। कर्नल टॉड का काम था राजपूताना तथा मध्य भारत को घेर कर खड़े जनरलों के बीच समन्वय स्थापित करना, उन्हें आगे की कार्यवाही के बारे में सुझाव देना तथा पिण्डारियों एवं मराठों की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुँचाना। कर्नल टॉड की सम्मति से ही अंग्रेज जनरलों ने अपनी सेनाओं का प्रयाण नियत किया।

    टॉड ने व्यवस्था की कि प्रतिदिन उसे कम से कम 20 स्थानों से पिण्डारियों की हलचल के सम्बन्ध में सूचनाएं प्राप्त हों। टॉड इन सूचनाओं का सार निकालकर कर विभिन्न जनरलों को भेज देता था। एक बार टॉड को सूचना मिली कि करीम खां पिण्डारी का बेटा 1500 पिण्डारियों के साथ रांवटा से 30 मील दूरी पर कालीसिंध के निकट आ पहुँचा है। उस समय टॉड के पास मात्र 32 सैनिक ही थे। उन दिनों कोटा राज्य का फौजदार झाला जालिमसिंह रावटा में मुकाम कर रहा था। टॉड तुरंत ही जालिमसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ तथा पिण्डारियों के विरुद्ध कोटा राज्य से सहायता मांगी।

    उस समय जालिमसिंह 70 साल का हो चुका था तथा उसकी दोनों आँखों ने काम करना बंद कर दिया था किंतु उसका विवेक पूरी तरह जाग्रत था। जालिमसिंह ने उसी समय 250 सिपाही टॉड के साथ कर दिये। कर्नल टॉड ने कुल 282 सिपाहियों के साथ 1500 पिण्डारियों पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में 150 पिण्डारी मारे गये तथा शेष जान बचाकर भाग खड़े हुए। टॉड ने पिण्डारियों के डेरे लूट लिये तथा उनके बहुत से हाथी, घोड़े तथा ऊंट छीन लिये। टॉड को यहाँ से काफी धन भी प्राप्त हुआ जिससे टॉड ने कोटा से 6 मील दूर चंद्रभागा नदी पर एक पुल बनवा दिया जिसका नाम हेस्टिंग्स ब्रिज रखा। पिण्डारियों और मरहठों का उपद्रव मिटने पर कम्पनी सरकार ने राजपूताना के राज्यों से संधि करने का काम आरंभ किया।

    कर्नल टॉड को उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी तथा जैसलमेर राज्यों का पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया गया तथा उनका मुख्यालय उदयपुर में स्थापित किया गया। फरवरी 1818 में कर्नल टॉड उदयपुर के लिये रवाना हुआ। टॉड ने लिखा है कि इस बार तो मेवाड़ की दशा 1806 ई. की दशा से भी अधिक बुरी थी। भीलवाड़ा में जहाँ पहले 6000 घरों की बस्ती थी, अब वहाँ एक भी मनुष्य नहीं रहता था। बहुत से लोग मराठों के भय से मेवाड़ छोड़कर मालवा तथा हाड़ौती आदि स्थानों को चले गये थे। राज्य की आय बहुत घट गयी थी, सरदारों ने खालसे के बहुत से गाँव दबा लिये थे। मेवाड़ राज्य से जो संधि हुई थी उसमें मेवाड़ राज्य को आंतरिक एवं बाह्य शत्रुओं से अभय मिल गया तथा बदले में मेवाड़ के महाराणा ने आवश्यकता होने पर अपने राज्य के समस्त सैनिक संसाधन अंग्रेजों को सुपुर्द करने स्वीकार कर लिये।

    अंग्रेजों को वार्षिक खिराज देने के सम्बन्ध में तय हुआ कि प्रथम पाँच वर्ष तक तो मेवाड़ के राजस्व में से एक चौथाई भाग खिराज के रूप में लिया जायेगा और इसके बाद 3/8 भाग वसूल किया जायेगा। फरवरी 1818 में कप्तान टॉड उदयपुर आया तो महाराणा ने उसका बड़ा भव्य स्वागत किया। एक दिन महाराणा ने सब सरदारों को बुलाकर बड़ा दरबार किया। इस दरबार में टॉड ने महाराणा से पूछा कि जो सरदार आपके विरोधी हों, उनके नाम बताईये, अंग्रेजी सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये तैयार है। महाराणा भीमसिंह ने यहाँ भी उदारता दिखायी और बोला- "मैंने अब तक के सारे अपराध क्षमा कर दिये हैं किंतु अब जो लोग भविष्य में कसूर करेंगे, उसकी सूचना आपको दी जायेगी।"

    राजपूताना की हिन्दू रियासतें अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में थीं। इन पर शासन करने वाले नृवंशों में समय-समय पर बदलाव होता रहा था जिसके साथ उनके आकारों में भी परिवर्तन आता गया था। इन रियासतों में प्रशासन का तरीका अत्यंत प्राचीन था जिनमें शक, कुषाण, हूण, मुस्लिम तथा मंगोल आदि जातियों के प्रशासनिक तौर तरीकों का घाल मेल होता चला गया था। जब यूरोपीय जातियों का भारत में आगमन हुआ तब भी राजपूताना की रियासतें पुरातन हिन्दू प्रविधियों एवं मुगल शासन विधियों से ही प्रशासित होती रहीं। रियासतों में राजाओं का निरंकुश शासन था किंतु उनसे भी अधिक निरंकुशता राजाओं के अधीन रहकर जागीरों का प्रशासन करने वाले जागीरदारों तथा ठिकाणों में व्याप्त थी। चूंकि प्रशासन व्यक्तिगत प्रकृति का था इसलिये राजा अथवा जागीरदार के व्यक्तित्व के आधार पर ही शासन अच्छा या बुरा हो जाता था। अच्छे राजाओं तथा जागीरदारों ने अच्छा शासन देने का प्रयास किया किंतु जैसे ही बुरे व्यक्ति का शासन हुआ, उसके साथ ही शासन भी बुरा हो जाता था।

    जब ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने देशी रियासतों के साथ सहायक संधियां कीं तो ब्रिटिश अधिकारियों ने इन रियासतों के प्रशासन को सुधारने का काम अपने हाथ में लिया। ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य यह था कि वे समझते थे कि बेहतर प्रशासन से रियासत में शांति आयेगी जिससे लोगों की आय में वृद्धि होगी और रियासत के राजस्व में बढ़ोतरी होगी। अंग्रेजों को अपना खिराज राज्य के राजस्व में से ही वसूलना होता था। राजपूताना रियासतों में सबसे पहला राज्य मेवाड़ था जिसका प्रशासन मेवाड़ के प्रथम पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल जेम्स टॉड ने अपने हाथ में लिया।

    कप्तान टॉड ने मेवाड़ की आर्थिक दशा सुधारने के लिये सेठ जोरावरमल को इंदौर से उदयपुर बुलाया। सेठ जोरावरमल मूलतः जैसलमेर का ही रहने वाला ओसवाल बनिया था किंतु वह होलकर के इंदौर राज्य में जाकर व्यापार करने से खूब उन्नति कर गया था। उसने बड़े-बड़े शहरों में अपनी दूकानें स्थापित कर ली थीं। इंदौर का राजा उसे कई राजकीय दायित्व भी सौंपता रहता था। उसी ने होलकर तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य समझौता करवाया था। इससे प्रसन्न होकर कम्पनी सरकार तथा होलकर ने उसे कई सम्मान दिये थे। महाराणा ने जोरावरमल से आग्रह किया कि वह उदयपुर में अपनी दूकान स्थापित करे तथा राज्य के कामों में जो रुपये खर्च हों वे तुम्हारी दुकान से दिये जायें और राज्य की सारी आय तुम्हारे यहाँ जमा रहे। जोरावरमल ने टॉड तथा महाराणा का आग्रह स्वीकार करके अपनी दूकान उदयपुर में स्थापित कर ली। उसने नये खेड़े बसाये, किसानों को सहायता दी और चोरों एवं लुटेरों को दण्ड दिलवाकर मेवाड़ राज्य में शांति स्थापित करने में सहायता की। उसका कुशल प्रबंधन देखकर पोलिटिकल एजेण्ट ने अंग्रेजी कोष का प्रबंध भी उसी को सौंप दिया।

    महाराणा ने उसे पालकी तथा छड़ी का सम्मान, बदनोर परगने का पारसोली गाँव तथा सेठ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद कर्नल टॉड ने अपना ध्यान मेरवाड़ा क्षेत्र की ओर लगाया। राजपूताने के ठीक मध्य में स्थित इस पहाड़ी प्रदेश में मेर जाति बड़ी संख्या में रहती थी जो जंगली, युद्धप्रिय और बहुत उपद्रवी थी। इस प्रदेश का कुछ भूभाग मेवाड़ रियासत में, कुछ भूभाग मारवाड़ रियासत में तथा कुछ भाग अजमेर जिले के अंग्रेजी शासन वाले क्षेत्र में आता था। 25 जून 1818 को सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंप दिया था। इसलिये अंग्रेजी सरकार ने इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिये उसी साल नसीराबाद में सैन्य छावनी स्थापित की। अक्टूबर 1818 में टॉड ने मेरों को दबाने के लिये रूपाहेली के ठाकुर सालिमसिंह की अध्यक्षता में मेवाड़ के बदनोर, देवगढ़, आमेट तथा बनेड़ा ठिकानों की सेनायें भेजीं।

    टॉड ने मेवाड़ के पूर्वोत्तर भाग के समस्त छोटे-बड़े सरदारों, जागीरदारों, भोमियों तथा आसियों आदि को भी मेरवाड़े पर भेजा। मेरों ने पहाड़ों के संकरे रास्तों पर नाकाबंदी करली जिससे घबराकर रूपाहेली के ठाकुर ने पहाड़ों पर आक्रमण करने का निश्चय त्याग दिया तथा मैदानी क्षेत्रों में अपने थाने बैठा दिये।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (2)

     03.06.2020
    राजस्थान का पहला इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड (2)

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मार्च 1919 में अंग्रेजी सेना भी सालिमसिंह से आ मिली। इन दोनों सेनाओं ने मिलकर मेरों के मुख्य स्थान बोरवा, झाक और लुलुवा पर अधिकार कर लिया तथा अपने थाने बैठा दिये। इस पर मेरों ने जोधपुर राज्य की तरफ से अंग्रेजी थानों पर हमले करने आरंभ कर दिये। नवम्बर 1819 में टॉड जोधपुर आया तथा उधर से भी थानों का प्रबंध करवा दिया। इस प्रकार मेरवाड़ा चारों ओर से घिर गया। जब सालिमसिंह रूपाहेली को लौट गया तो मेरों ने थानों पर हमला करके अंग्रेजी थानेदारों को मार डाला तथा कई थाने उठा दिये। इस पर सालिमसिंह फिर लौट कर आया। उसने सैंकड़ों मेरों को मार डाला तथा टॉड के निर्देश पर फिर से थाने स्थापित करके उनमें 100-100 सिपाही तैनात कर दिये।

    कर्नल टॉड ने मेरवाड़ा में अंग्रेजी सेनाएं रखने के लिये दो नये दुर्ग बनवाये। एक का नाम टॉडगढ़ तथा दूसरे का नाम महाराणा के नाम पर भीमगढ़ रखा। मेरों को लुटेरों से किसान बनाने के लिये मेवाड़ राज्य की ओर से जमीनें प्रदान की गयीं तथा कुछ मेरों को सेना में भर्ती करने के लिये मेर बटालियन का गठन किया गया। मेरों को दबाने में सफल रहने पर सालिमसिंह को कप्तॉन टॉड की ओर से प्रशंसा पत्र तथा महाराणा की ओर से अमर बेलणा घोड़ा, बाड़ी तथा सीख का सिरोपाव दिया गया। अमर बेलणा घोड़ा उस घोड़े को कहते थे जिसके बूढ़ा होने पर या मरने पर उसके स्थान पर दूसरा घोड़ा भेजा जाता था। सीख का सिरोपाव प्रतिवर्ष दशहरे पर नौकरी समाप्त कर अपने ठिकाने में लौटने वाले सरदार को दिया जाता था।

    मेरवाड़ा पर तीन राज्यों का अधिकार होना ठीक न समझ कर दिल्ली के रेजीडेण्ट जनरल ऑक्रलोनी ने मारवाड़ तथा मेवाड़ के शासकों को लिखा कि वे अपने राज्य में आने वाले मेरवाड़ा प्रदेश के गाँव 10 वर्ष के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंप दे। मारवाड़ तो इस बात को मान गया किंतु मेवाड़ ने इन्कार कर दिया। इस पर कम्पनी ने बलपूर्वक मेवाड़ के हिस्से वाला मेरवाड़ा अपने अधीन कर लिया। इस घटना से महाराणा भीमसिंह बड़ा दुखी हुआ। महाराणा ने इसकी शिकायत गवर्नर जनरल से की। गवर्नर जनरल ने चार्ल्स मेटकाफ के माध्यम से महाराणा को पत्र लिखवाकर इस घटना के लिये खेद व्यक्त किया किंतु मेरवाड़ा के क्षेत्र पर अंग्रजों का अधिकार बना रहा। ई. 1847 में यह क्षेत्र सदा के लिये अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

    टॉड ने मेवाड़ की आय बढ़ाने के लिये कई उपाय किये। उसने ई. 1819 में झाला जालिमसिंह से जहाजपुरा का परगना फिर से प्राप्त कर मेवाड़ में मिला दिया तथा महाराणा का दैनिक व्यय 1000 रुपये स्थिर किया।

    ई. 1818 में मेवाड़ राज्य की वार्षिक आय 1 लाख 20 हजार रुपये थी किंतु टॉड की व्यवस्था से ई. 1821 में यह आय बढ़कर 8 लाख 77 हजार 634 रुपये हो गयी। ई. 1822 में यह 11 से 12 लाख रुपये के बीच में अनुमानित की गयी। राज्य की आय में जबर्दस्त वृद्धि के उपरांत भी अंग्रेजी सरकार का खिराज था महाराणा को 1000 रुपये प्रतिदिन जेबखर्च दिया जाना सरल कार्य नहीं था। इस कारण टॉड ने एक साहूकार से 18 रुपये सैंकड़ा सूद की दर से कर्ज लिया।

    ई. 1821 में कप्तान टॉड बीमार पड़ गया और अपने सहायक एजेंट कप्तान वॉग को कार्यभार सौंप कर इंगलैण्ड चला गया। इस पर राज्य का शासन प्रबंध फिर से महाराणा के हाथ में आ गया। वॉग ने महाराणा को 1000 रुपये रोज दिलवाने की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया जिससे महाराणा को निजी व्यय का प्रबंध स्वयं करना पड़ा। मार्च 1823 में कप्तान स्पीयर्स मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट होकर आया किंतु एक माह बाद ही उसके स्थान पर कप्तान कॉव आ गया। कॉव को ज्ञात हुआ कि महाराणा ने एक वर्ष के भीतर 83 गाँव विभिन्न लोगों को दे दिये हैं जिससे राज्य की आय घट गयी है तथा महाजन का कर्ज 2 लाख रुपये एवं अंग्रेज सरकार का खिराज 8 लाख रुपये चढ़ गया है। कॉव ने महाराणा को एक हजार रुपया प्रतिदिन देकर शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया।

    इस समय मेवाड़ में शासन प्रबंध महाराणा तथा अंग्रेज सरकार दोनों की ओर से होता था। महाराणा की तरफ से प्रत्येक जिले में कामदार और एजेंट की ओर से चपरासी नियुक्त था। दोनों मिलकर आय वसूल करते थे। इस द्वैध शासन से तंग आकर जनता ने अंग्रेज सरकार से शिकायत की। इस पर कॉव ने कुछ सुधार किये। कॉव के प्रबंध से राज्य की आय फिर से सुधर गयी तथा महाराणा का खर्च, अंग्रेजी सरकार का खिराज एवं महासन का सूद एवं असल सभी कुछ चुका दिये गये। ई. 1826 में कॉव के स्थान पर कप्तान सदरलैण्ड मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट बना। उसने पहले के एजेंटों द्वारा नियुक्त चपरासियों को थानों और परगनों में से बाहर निकाल दिया इस प्रकार कप्तान टॉड तथा कप्तान कॉव ने मेवाड़ राज्य में जो शासन व्यवस्था एवं आर्थिक प्रबंध लागू किये उनसे मेवाड़ राज्य की आय में तो वृद्धि हुई ही, साथ ही राजपूताना की रियासतों में अंग्रेजी शासन की धाक जम गयी।

    अपने प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ कर्नल टॉड राजपूताना के राज्यों एवं प्राचीन राजवंशों के इतिहास को संकलित करने में संलग्न रहता था। ई. 1819 में टॉड उदयपुर से नाथद्वारा, कुंभलगढ़, घाणेराव तथा नाडोल होते हुए जोधपुर आया। नाडोल में उसने लाखण सी के समय के दो शिलालेख वि. संवत 1024 तथा 1039 के तलाश किये जिनसे अजमेर व नाडोल के चौहान, जालोर के सोनगरा चौहान तथा सिरोही के देवड़ा चौहानों का इतिहास संकलन करने में बड़ी सहायता मिली। टॉड ने वि. सं. 1218 का आल्हणदेव के समय का एक ताम्रपत्र तथा एक अन्य ताम्रपत्र भी खोज निकाले। इस यात्रा में उसने कई सिक्के, प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकें तथा शिलालेख संकलित किये। जोधपुर नरेश मानसिंह ने टॉड को विजयविलास, सूर्यविलास तथा मारवाड़ की ख्यात आदि कई पुस्तकें भेंट कीं।

    जोधपुर प्रवास के दौरान टॉड प्रतिहारों की प्राचीन राजधानी मण्डोर को देखने के लिये गया। अजमेर एवं पुष्कर में भी उसने कई सिक्के एकत्रित किये। कहते हैं कि एक बार कर्नल टॉड ने जहाजपुर में मक्का की रोटी खायी जिसे खाते ही उसका सिर घूमने लगा, जीभ भारी हो गयी और कंठ रुंध गया। किसी देशी वैद्य ने टॉड को सलाह दी कि उसकी तिल्ली बढ़ी हुई है यदि वह तिल्ली पर जोंक लगवा ले तो इस रोग से मुक्ति मिल जायेगी। टॉड ने उसी समय 60 जोंकें मंगवाकर तिल्ली पर लगा दीं तथा चारपाई पर लेट गया। उसने अपने साथ चल रहे ब्राह्मणों एवं पटेलों से कहा कि वे इतिहास सुनाना जारी रखें। स्वास्थ्य के अधिक खराब हो जाने पर 1 जून 1822 को कर्नल टॉड उदयपुर से इंगलैण्ड के लिये रवाना हो गया।

    इस यात्रा में भी वह सिरोही, आबू, चंद्रावती, पालनपुर, सिद्धपुर, अन्हिलवाड़ा, अहमदाबाद तथा बड़ौदा आदि कई स्थानों पर गया। इनमें से कई स्थानों पर उससे पहले कोई अंग्रेज नहीं पहुँचा था। देलवाड़ा गाँव के मंदिरों को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ। 14 जनवरी 1823 को वह बंबई पहुंचा। वह अपने साथ राजपूताना रियासतों के सैंकड़ों शिलालेख, 20 हजार प्राचीन सिक्के, पुस्तकें तथा ऐतिहासिक सामग्री ले गया। इस यात्रा का वर्णन उसने अपनी पुस्तक "ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया" में किया। तीन सप्ताह तक बम्बई में रहकर वह पानी के जहाज से अपने देश के लिये रवाना हो गया।

    जब तक भारत भूमि का तट दिखाई देता रहा, वह टकटकी लगाये उदास आँखों से भारत माता को देखता रहा। वह इस देश को ही अपना देश समझने लगा था किंतु जलवायु की प्रतिकूलता के कारण उसे यह प्यारा देश छोड़ना पड़ रहा था। अंत में भीगी आँखों से उसने भारत माता को अंतिम प्रणाम किया। कर्नल टॉड 53 वर्ष तक जिया। 18 नवम्बर 1835 को इंगलैण्ड में उसने अंतिम सांस ली। उस समय भी भारत माता का प्यारा मुख उसके नेत्रों में बसा हुआ था। राजपूताना रियासतों में आधुनिक शासन की नींव रखने वाला वह पहला अंग्रेज अधिकारी था।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • महिला सशक्तीकरण की मिसाल हैं झालावाड़ की बुनकर महिलाएं

     03.06.2020
    महिला सशक्तीकरण की मिसाल हैं झालावाड़ की बुनकर महिलाएं

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    झालावाड़ जिले के असनावर, रायपुर, झालरापाटन, झिरी, सुनेल, मोलक्या, देवरी तथा निकटवर्ती गांवों  में 200 से अधिक बुनकर महिलाएं, महिला सशक्तीकरण की मिसाल बनकर उभरी हैं। वे अपने घरों में बैठकर साड़ी, खेस, सफेद फैब्रिक, तौलिये, बुनती हैं तथा दरी, पट्टी, गलीचे एवं एक किलो वाली रजाइयां भी बनाती हैं। इस कार्य से वे प्रतिदिन 150 से 250 रुपया कमाती हैं। इस आय के लिये उन्हें नरेगा में काम नहीं मांगना पड़ता, खेतों में चिलचिलाती धूप में फावड़ा-कुदाली नहीं चलानी पड़ती तथा सिर पर टोकरा उठाकर गलियों में सामान बेचने नहीं जाना पड़ता। न ही कमठे पर जाकर सिर पर पत्थर ढोने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इस आमदनी के बल पर ये महिलाएं अपनी गृहस्थी का खर्च उठाने के साथ-साथ अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भी पढ़ा रही हैं। वे जानती हैं कि पढ़ाई का क्या महत्व है! कशीदाकारी और ब्लॉक प्रिण्टिंग भी हो रही है गांवों में गांव की महिलाएं हथकरघे पर खेस तथा चद्दर का मोटा कपड़ा बुनने तक ही सीमित नहीं रही हैं। वे बड़ी सफाई से सफेद रंग का मजबूत और महीन कपड़ा बुनती हैं जिसे देखकर कपड़ा-मिलें भी पानी मांग लें। इस कपड़े का वे मनचाहा अर्ज रखती हैं तथा रजाई के खोल, चद्दर आदि बनाने के लिये उसकी सिलाई, कशीदाकारी, ब्लॉक प्रिण्टिंग आदि भी स्वयं करती हैं। दिल्ली, भोपाल और जयपुर तक जाती हैं ये महिलाएं बहुत कम पढ़ी-लिखी हैं किंतु हिम्मत के बल पर उन्होंने अपनी सारी झिझक को पीछे छोड़ दिया है जिसके चलते वे अब केवल अपने घरों तक ही सीमित नहीं रह गई हैं, अपतिु अपने द्वारा तैयार किये गये कपड़े को जिला उद्योग केन्द्र तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से दिल्ली, जयपुर, जोधपुर, अजमेर तथा भोपाल में लगने वाले हस्तशिल्प मेलों तथा प्रदर्शनियों में ले जाकर बेचती हैं। दिल्ली में 10 दिन में लगभग 5 से 6 लाख रुपये तक का माल बिक जाता है। अंतर्राष्ट्रीय फैशन डिजाइनर बीबी रसैल हैरान हुईं इन्हें देखकर बांगलादेश की अंतर्राष्ट्रीय फैशन डिजाइनर बीबी रसैल 7 मार्च 2016 को झालावाड़ जिले की यात्रा पर आईं तथा इन महिला बुनकरों के गांव में जाकर उनसे मिलीं। उन्होंने इन महिला बुनकरों, रेडिमेड कपड़े सिलने वाले महिला स्वयं सहायता समूहों तथा कशीदाकारी करने वाले महिला स्वयं सहायता समूहों से बात की एवं असनावर गांव की महिला बुनकरों को हाथकरघे पर काम करते हुए देखा। उन्होंने झालावाड़ जिले की असनावर, रायपुर तथा निकटवर्ती गांवों में लगभग 200 महिलाओं द्वारा बड़े स्तर पर कपड़ा बुने जाने को महिला सशक्तीकरण का बड़ा उदाहरण बताया तथा कहा कि यहां हर महिला आत्मविश्वास से अपना स्वयं का कार्य घर में बैठकर कर रही है तथा प्रत्येक महिला स्वाभिमान के साथ प्रतिमाह 5 से 6 हजार रुपये कमा रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निकल सकती है अच्छी मांग झालावाड़ के महिला बुनकर समूहों द्वारा पक्के रंगों का प्रयोग किया जा रहा है, अच्छी डिजाइनें काम में ली जा रही हैं तथा अच्छी गुणवत्ता का धागा प्रयुक्त हो रहा है। इस कारण इनके द्वारा उत्पादित साडि़यों, खेसों, तौलियों, दरियों, गलीचों तथा सफेद खादी की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी मांग निकलने की संभावना है। बीबी रसैल ने असनावर में तैयार किये जा रहे चौड़े पाट के सफेद कपड़े की गुणवत्ता को देखकर सुखद आश्चर्य व्यक्त किया और कहा कि यह बहुत अच्छा और बहुत सस्ता है। गांव में ही इस कपड़े पर ब्लॉक प्रिंटिंग भी की जा रही है। गांव में 1 किलो भार की अच्छी किस्म की रजाइयों को देखकर उन्होंने कहा कि इसकी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी मांग हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय फैशन डिजाइनर ने खरीदी असनावर की खादी बीबी रसैल ने स्वयं भी अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में प्रदर्शित करने के लिये इन महिलाओं से 7-7 मीटर लम्बे खेसों के दो थान बनवाये हैं। कुछ दरियां, तौलिये एवं चद्दरें भी तैयार करवाई हैं। उन्होंने असनावर गांव में तैयार सफेद खादी स्वयं अपने लिये खरीदी। उन्होंने एक दर्जन तौलिये भी बांगलादेश ले जाने के लिये खरीदे। गलीचे देखकर हर कोई रह जाता है हैरान गलीचे और नमदे बनाने का काम परम्परागत रूप से राजस्थान में होता आया है किंतु असनावर की महिलाओं ने सूत के प्रयोग से ऐसे कलात्मक गलीचे बनाये हैं और उन्हें ऐसे मनोहारी रंग प्रदान किये हैं कि देखने वाला दांतों तले अंगुली दबा लेता है। जिला स्तर पर बनाई जा रही है वैबसाइट जिला कलक्टर डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी इन महिला बुनकरों के लिये एक वैबसाइट बनवा रहे हैं ताकि झालावाड़ के उत्पादों की बिक्री राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संभव हो सके। जिला कलक्टर का मानना है कि असंगठित रूप से काम करने के कारण इन महिलाओं को उनके उत्पादों की अभी भी कम कीमत मिल रही है। यदि इन्हें सुसंगठित विपणन व्यवस्था से जोड़ दिया जाये तो इनकी आय में अच्छी वृद्धि हो सकती है। इस वैबसाइट पर, तैयार उत्पादों के नमूनों के चित्रों के साथ-साथ महिला बुनकरों एवं अन्य आर्टीजन्स के नाम एवं सम्पर्क सूत्र आदि उपलब्ध कराये जायेंगे ताकि क्रेता सीधे ही इन कारीगरों से माल खरीद सकें तथा बिचौलियों की भूमिका को समाप्त किया जा सके। जिला कलक्टर का प्रयास है कि और भी गांवों की महिलाएं इस काम को सीखें और झालावाड़ इस कार्य के लिये कोटाडोरिया की तरह एक ब्राण्ड बन जाये।

                                                                                                                                               -डॉ. मोहनलाल गुप्ता


  • Share On Social Media:
  • संभागीय आयुक्त 19 दिसम्बर को करेंगे वैबसाइट एवं गूगल एप की लांचिंग

     03.06.2020
    संभागीय आयुक्त 19 दिसम्बर को करेंगे वैबसाइट एवं गूगल एप की लांचिंग

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्रेस विज्ञप्ति जोधपुर 18 दिसम्बर। शौर्य एवं स्वामिभक्ति की गाथाओं से समृद्ध राजस्थान का इतिहास एवं साहित्य अब ई-बुक्स एवं गूगल एप पर भी उपलब्ध होगा जिसका लाभ विश्व भर के अनेक देशों के पाठक उठा सकेंगे। इस वैबवाइट एवं गूगल एप से दुनिया के किसी भी देश में निवास करने वाले राजस्थानियों एवं भारतीयों के साथ-साथ विदेशी पाठकों को भी राजस्थान के शौर्य एवं स्वामिभक्ति की गाथाओं से समृद्ध इतिहास एवं साहित्य उपलब्ध हो सकेगा। शुभदा प्रकाशन जोधपुर ने इसके लिये पूर्णतः समर्पित वैबसाइट एवं गूगल एप तैयार करवाया है जिसकी लांचिंग 19 दिसम्बर को प्रातः 11.30 बजे जोधपुर के संभागीय आयुक्त श्री रतन लाहौटी अपने कार्यालय में करेंगे। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि वैबसाइट www.rajasthanhistory.com तथा गूगल एप rajasthanhistory पर राजस्थान के योद्धा, महापुरुष, दुर्ग, नगर एवं रियासती इतिहास के साथ-साथ कला, साहित्य, संस्कृति, लोक-परम्परा आदि पर भी बहुत कम मूल्य में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये ई-बुक्स उपलब्ध कराई गई हैं। साथ ही भारत के इतिहास पर भी पुस्तकें उपलब्ध रहेंगी। पाठक इस वैबसाइट एवं एप से ई-बुक्स के साथ-साथ मुद्रित पुस्तकों का भी लाभ उठा सकेंगे। इस वैबसाइट एवं एप को जोधपुर की ही संस्था डब्लूएसक्यूब टैक ने तैयार किया है। डब्लूएस क्यूब के डायरेक्टर कुशाग्र भाटिया ने बताया कि rajasthanhistory वैबसाइट को किसी भी कम्प्यूटर से एक्सेस किया जा सकेगा जबकि ई-बुक्स पढ़ने के लिये किसी भी एण्ड्रॉयड डिवाइस पर गूगल प्ले स्टोर से rajasthanhistory फ्री एप डाउनलोड करना होगा। फिलहाल ई-बुक्स की खरीद पर 50 से 90 प्रतिशत तक रियायत रहेगी जबकि कुछ ई-बुक्स फ्री उपलब्ध कराई गई हैं। साहित्यकारों, लेखकों एवं मीडिया प्रतिनिधियों को 1000 रुपये मूल्य तक की ई-बुक्स निःशुल्क उपलब्ध कराई जायेंगी। इसके लिये उन्हें mlguptapro@gmail.com पर अपना नाम, ईमेल आईडी, सैलफोन नम्बर, मीडिया संस्थान का नाम अथवा स्वयं द्वारा लिखित पुस्तकों की जानकारी देनी होगी। इस रजिस्ट्रेशन के बाद ई-बुक्स के लिये निशुल्क कूपन जारी किया जायेगा। यह योजना 31 जनवरी तक उपलब्ध रहेगी। -डॉ. मोहनलाल गुप्ता मोबाईल फोन: 94140 76061

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • अंग्रेज देते थे राजाओं को तोपों की सलामी

     03.06.2020
    अंग्रेज देते थे राजाओं को तोपों की सलामी

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मुगलों के आगमन से पूर्व राजपूताना में 11 राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़, आम्बेर, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, अजमेर, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं करौली। मुगलों के काल में राजपूताना में 7 नये राज्य अस्तित्व में आये- कोटा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, किशनगढ़, प्रतापगढ़ तथा शाहपुरा जबकि एक राज्य- अजमेर समाप्त हो गया। इस प्रकार राजपूताना के राज्यों की संख्या 17 हो गयी। औरंगजेब के पश्चात अधिकतर राज्यों के सम्बंध मुगलों से विच्छेद हो गये तथा मुगल साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। ई. 1818 से 1857 तक राजपूताना के राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के संरक्षण में रहे। इस काल में राजपूताना में दो नये राज्य अस्तित्व में आये- टोंक तथा झालावाड़। ई. 1818 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने मरहठा शासक दौलतराम सिंधिया से संधि करके अजमेर पर अधिकार कर लिया। बाद में इसमें मेरवाड़ा क्षेत्र भी मिला दिया गया। इस प्रकार अंग्रेजों के काल में एक केन्द्रशासित प्रदेश- ‘‘अजमेर-मेरवाड़ा’’ भी अस्तित्व में आया। जैसे जैसे भारत में अंग्रेजों का राज्य फैलता गया वैसे-वैसे उनके मन में यह विश्वास जड़ जमाता गया कि गोरी जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी ‘ईश्वर’ नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने और शासन करने के लिये पैदा हुई है। उन्होंने राजपूताना की रियासतों पर नियंत्रण के लिये एजेंट टू द गवर्नर जनरल (ए. जी. जी.) को नियुक्त किया जिसका मुख्यालय अजमेर में था। राजपूतना ए. जी. जी. के अधीन पालनपुर, दंाता, ईडर तथा विजयनगर रियासतें भी थीं जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुजरात में शामिल कर दी गयीं। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं को भारत की आजादी की लड़ाई के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। यही कारण था कि अंग्रेजों और भारतीय राजाओं का गठबंधन 1857 के गदर के समय तथा बाद में कांग्रेस के नेतृत्व में चले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय भारत की जनता के सामने चट्टान की तरह आकर खड़ा हो गया। इस चट्टान को राजपूताना की रियासतों में आजादी की लड़ाई का बिगुल बजाने वाले जयनारायण व्यास (जोधपुर), गोकुल भाई भट्ट (उदयपुर), हीरालाल शास्त्री (जयपुर), रघुबर दयाल गोयल (बीकानेर), सागरमल गोपा (जैसलमेर), ठाकुर केशरीसिंह (शाहपुरा) तथा विजयसिंह पथिक (बिजौलिया) जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने पिघला कर पानी बना दिया जिसके कारण अंग्रेज शक्ति और राजा दोनों ही एक साथ विलुप्त हो गये। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं को अपनी ओर मिलाये रखने के लिये उन्हें प्रशासन में कनिष्ठ भागीदारी दी। उन्हें यूरोप की सैर करवायी, विदेशी शराब उपलब्ध करवायी तथा अंग्रेजी मेम के साथ नृत्य करने की सुविधायें दीं। तरह-तरह की उपाधियों से अलंकृत किया तथा रॉल्स रॉयस जैसी महंगी कारें खरीदने का अधिकार दिया। इन सब सुविधाओं से बढ़कर जो सुविधा अंग्रेजी सरकार की ओर से भारतीय राजाओं को उपलब्ध थी, वह थी- अंग्रेज सरकार की ओर से भारतीय राजाओं को तोपों की सलामी। अंग्रेजों ने इन राज्यों के राजाओं को उनकी हैसियत के अनुसार तोपों की संख्या निश्चित की थी। राजस्थान की रियासतों में उदयपुर के शासक को 19 तोपों की सलामी दी जाती थी। इसके बाद नम्बर आता था- बीकानेर, भरतपुर, बूंदी, जयपुर, जोधपुर, करौली, कोटा तथा टोंक का। इनके शासकों को 17 तोपों की सलामी दी जाती थी। अलवर, बांसवाड़ा, धौलपुर, डूंगरपुर, जैसलमेर, किशनगढ़, प्रतापगढ़ तथा सिरोही के शासकों को 15 तोपों की सलामी दी जाती थी। झालावाड़ के शासक को 13 तोपों की सलामी दी जाती थी। इन रियासतों के अतिरिक्त तीन ठिकाने लावा, कुशलगढ़ तथा नीमराणा भी थे। जिनके शासकों को तोपों की सलामी नहीं दी जाती थी। इन्हें ‘‘नॉन सैल्यूट स्टेट’’ भी कहा जाता था। अंग्रेज सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों के राजाओं के लिये तोपों की सलामी की संख्या निर्धारित करते समय राजाओं की हैसियत राज्य के आकार, उसकी प्राचीनता, उसकी जनसंख्या अथवा वार्षिक राजस्व आदि तथ्यों से नहीं आंकी गयी थी। अपितु यह हैसियत अंग्रेज सरकार के साथ उस राज्य के सम्बन्धों की स्थिति पर भी निर्भर करती थी। आजादी के बाद राजाओं का यह विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया। -मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक महारानी पद्मिनी

     03.06.2020
    भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक महारानी पद्मिनी

    भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक महारानी पद्मिनी

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    गुहिल वंश की स्थापना गुप्त वंश के ध्वंसावशेषों पर छठी शताब्दी ईस्वी में हुई थी। यह रघुवंशी ईक्ष्वाकुओं की ही एक प्रबल-प्रतापी शाखा थी जो अत्यंत प्राचीन काल से उत्तर भारत में शासन करती आई थी तथा धर्म एवं न्याय आधारित शासन करने के लिये विख्यात थी। विभिन्न कालखण्डों में गुजरात से लेकर आगरा तक इनका राज्य फैलता और सिकुड़ता रहता था।

    गुहिल वंश की रावल शाखा के राजाओं को मेवाड़ पर शासन करते हुए 550 वर्ष से अधिक समय हो गया था जब ई.1302 में रावल समरसिंह का पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का राजा हुआ। उसे शासन करते हुए कुछ ही महीने हुए थे कि दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने ई.1303 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।

    उस समय चित्तौड़, अपने पूर्ववर्ती राजा समरसिंह द्वारा चौहानों, चौलुक्यों एवं परमारों पर विजय प्राप्त कर लेने से उत्साहित था। चित्तौड़ की सेनाओं ने दिल्ली के सुल्तान नासिरुद्दीन तथा गयासुद्दीन बलबन की सेनाओं पर उल्लेखनीय विजयें प्राप्त की थीं इसलिये भी चित्तौड़ का मनोबल अपने चरम पर था। अतः चित्तौड़ ने पूरी शक्ति से अलाउद्दीन खिलजी का प्रतिरोध किया। अलाउद्दीन खिलजी का दरबारी लेखक अमीर खुसरो इस घेरे में खिलजी के साथ था। उसने अपने ग्रंथ तारीखे अलाई में इस युद्ध में चित्तौड़ की पराजय एवं सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की विजय के सम्बन्ध में लिखा है- ‘सुल्तान ने गंभीरी और बेड़च नदी के मध्य अपने शिविर की स्थापना की। उसके पश्चात् सेना ने दायें और बायें पार्श्व से किले को घेर लिया। ऐसा करने से तलहटी की बस्ती भी घिर गई। स्वयं सुल्तान ने अपना ध्वज चित्तौड़ नामक एक छोटी पहाड़ी पर गाढ़ दिया। वह वहीं पर दरबार लगाता था तथा घेरे के सम्बन्ध में दैनिक निर्देश देता था।

    चित्तौड़ दुर्ग अपने अजेय होने के सम्बन्ध में इतना आश्वस्त था कि उसने खिलजी की सेना के आने पर भी दुर्ग के द्वार बंद नहीं किये थे। जब खिलजी का घेरा कठिन होता गया और तुर्की सेना का पड़ाव लम्बी अवधि तक चला तो राजपूतों ने भी किले के फाटक बंद कर लिये और परकोटे पर मोर्चे बांधकर शत्रुदल का संहार करते रहे। सुल्तान की सेना ने मजनिकों से किले की चट्टानों को तोड़ने का लगभग 8 महीने तक अथक प्रयास किया पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

    सीसोदे के सामंत लक्ष्मणसिंह ने किले की रक्षा में अपने सात पुत्रों सहित प्राण गंवाये। चित्तौड़ का दुर्ग जीते बिना अलाउद्दीन खिलजी, दक्षिण भारत की ओर के अभियानों पर नहीं जा सकता था। इसिलये रावल को संधि के बहाने अपने शिविर में बुलाकर बंदी बनाया गया। इसके बाद दुर्ग रक्षकों को मांग भिजवाई गई कि महारानी पद्मिनी को समर्पित किया जाये।

    रावल के सेनापतियों ने महारानी को समर्पित करने के स्थान पर महारावल को मुक्त कराने का उपाय सोचा। महारानी के निकट सम्बन्धी गोरा-बादल नामक दो युवक, महारानी की डोली में बैठकर शत्रु के बीच पहुंचे तथा रावल रत्नसिंह को मुक्त कराया। इसके बाद युद्ध अपने चरम पर पहुंच गया। चित्तौड़ का दुर्ग गर्व से सिर ऊँचा किए हुए खड़ा था। तुर्कों की सेना टिड्डी दलों की तरह पूरे दुर्ग को घेर कर प्रतिदिन मारकाट मचाती थी।

    क्षत्रिय सैनिक दिन प्रतिदिन छीजने लगे और चारों ओर सर्वनाश के चिह्न दिखाई देने लगे। जब शत्रु से बचने का कोई उपाय दिखाई देना बंद हो गया तब महारानी पद्मििनी के नेतृत्व में राजपूत स्त्रियों और बच्चों ने जौहर की धधकती ज्वाला में प्राण उत्सर्ग कर दिये। मेवाड़ के सैनिक, दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सेना पर काल बनकर टूट पड़े किंतु किले का पतन हो गया।

    यह चित्तौड़ दुर्ग का पहला साका था। इस घेरे में चित्तौड़ की रावल शाखा के समस्त वीरों के काम आ जाने से चित्तौड़ की रावल शाखा का अंत हो गया। खिलजी के दरबारी लेखक अमीर खुसरो ने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर लिखा है- ‘26 अगस्त 1303 को किला फतह हुआ और राय (रावल रत्नसिंह) पहले तो भाग गया परंतु पीछ से स्वयं (खिलजी की) शरण में आया और तलवार की बिजली से बच गया। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग में 30 हजार मनुष्यों का कत्ल करने की आज्ञा दी तथा चित्तौड़ का राज्य अपने पुत्र खिजरखां को देकर चित्तौड़ का नाम खिजराबाद रक्खा।

    टॉड ने लिखा है- ‘अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ को अधीन कर लिया परन्तु जिस पद्मिनी के लिये उसने इतना कष्ट उठाया था, उसकी तो चिता की अग्नि ही उसके नजर आई।’ इस युद्ध में महारानी पद्मिनी द्वारा दिखाये गए अदम्य साहस एवं पातिव्रत्य धर्म के कारण वह भारतीय नारियों के लिये सीता और सती सावित्री की तरह आदर्श बन गई। इसी प्रकार गोरा एवं बादल द्वारा दिखाई गई वीरता के कारण, गोरा एवं बादल मिथकीय कथाओं के नायक बन गये।

    पद्मिनी की कथा को आधार बनाकर कई स्वतंत्र ग्रंथों की रचना हुईं छिताई चरित में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ के शासक को बंदी बनाकर जगह-जगह पर घुमाने का उल्लेख है। हेमरतन के गोरा-बादल चौपई में तथा लब्धोदय के पद्मिनी चरित्र में इस कथा को स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।

    मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मिनी के आख्यान को आधार बनाकर ‘पद्मावत’ नामक ग्रंथ की रचना की। इतिहास की दृष्टि से यह ग्रंथ नितांत अनुपयोगी और झूठा है। इस ग्रंथ का साहित्यिक मूल्य भी अधिक नहीं है किंतु सोलहवीं शताब्दी में लिखा हुआ होने के कारण, हिन्दी भाषा के प्रारम्भिक काल की रचना के रूप में इस ग्रंथ का महत्त्व है। वास्तव में इसका कथानक, उपन्यास की भांति कपोल-कल्पित है जिसके पात्रों एवं स्थानों के नाम इतिहास से ग्रहण किए गए हैं। महारानी पद्मिनी की कथा पर आधारित होने के कारण इस ग्रंथ को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुईं पद्मावत की रचना के 70 वर्ष बाद फरिश्ता ने और सोलहवीं शताब्दी में अबुल फजल ने इन तथ्यों को और अधिक तोड़-मरोड़कर इस कथा को विस्तार दे दिया।

    ई.1336 में जैन साधु कक्कड़ सूरि ने ‘नाभिनन्दनो जिनोद्धार प्रबन्ध’ लिखा जिसमें कहा गया है कि चित्रकूट के स्वामी को बन्दी बनाया गया और नगर-नगर बन्दर की तरह घुमाया गया।

    महारानी पद्मिनी एवं महारावल रत्नसिंह के बलिदान के लगभग 20 वर्ष बाद गुहिलों की सिसोदिया शाखा में उत्पन्न राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग पुनः हस्तगत किया तथा शौर्य, पराक्रम, तेज और बलिदान की सुषुप्त होती हुई धारा महाराणाओं के रूप में पुनः वेगवती हो गई और आज यह राजवंश धरती का सबसे प्राचीन राजवंश होने का गौरव रखता है।

    महारानी पद्मिनी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक

    महारानी पद्मिनी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। लगभग सवा सात सौ वर्षों से वह भारतीय महिलाओं को अपने तेज और धर्म पर टिके रहने की प्रेरणा देती है। गीतकार प्रदीप ने महारानी के प्रति अपने उद्गार इन शब्दों में व्यक्त किये थे- ‘कूद पड़ी थीं यहाँ हजारों पद्मनियां अंगारों पे’ यह गीत स्वतंत्र भारत में हर देशवासी की जिह्वा पर चढ़ा।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

  • भारत की राष्ट्रीय अस"/> भारत की राष्ट्रीय अस"> भारत की राष्ट्रीय अस">
    Share On Social Media:
  • बकरों के सिर काटने पर महाराजा ने ठाकुर का सिर कटवा लिया!

     03.06.2020
    बकरों के सिर काटने पर महाराजा ने ठाकुर का सिर कटवा लिया!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अठारहवीं शताब्दी में जोधपुर का महाराजा विजयसिंह वैष्णव धर्म के प्रति अनुराग एवं न्यायप्रियता के लिये समूचे उत्तरी भारत में विख्यात हुआ। उसके लिये मआसिरुल उमरा में लिखा है कि मारवाड़ का राजा विजयसिंह रियाया परवरी, अधीन होने वालों की परवरिश और सरकशों की सर-शिकनी में मशहूर है। उसकी पासवान गुलाबराय गोकुलिये गुसाईंयों की शिष्या थी। गुलाबराय के प्रभाव से महाराजा भी वैष्णव धर्म के सिद्धांतों की ओर प्रवृत्त हुआ। उसने पूरे मारवाड़ राज्य में पशुवध एवं मांस बिक्री पर रोक लगा दी तथा कसाइयों को चंवालिये अर्थात् पत्थर की पट्टियां ढोने का काम दिया। जो लोग महाराजा के आदेश से सहमत नहीं थे, उन्हें मारवाड़ छोड़कर जाने के आदेश दिये गये।

    कुछ सामंतों को महाराजा का यह आदेश अच्छा नहीं लगा और वे अवहेलना करने लगे। आसोप ठाकुर छत्तरसिंह ने जोधपुर से चालीस किलोमीटर दूर स्थित बावड़ी गांव में कुछ बकरे कटवाये और उन्हें बोरों में भरकर ऊँट पर लाद दिया तथा जोधपुर के लिये रवाना किया। जब ऊंट शहर के भीतर भीड़भाड़ वाली सड़क पर चल रहा था, किसी ने अपनी दुनाली बंदूक से धमाके किये जिनके कारण ऊंट बिदक कर तेजी से उछलने लगा। उस पर लदा एक बोरा धरती पर गिर गया और उसमें से बकरे का कटा हुआ सिर निकल कर बाहर लुढ़क गया। यह खबर महाराजा तक पहुंची तो ठाकुर को बुलाकर राजाज्ञा की अवहेलना करने का कारण पूछा गया। ठाकुर ने जवाब दिया कि उस बोरे में बकरे का सिर नहीं था, वह तो काली ऊन का गोला था। कुछ लोगों ने उसे बकरे का कटा हुआ सिर समझकर हल्ला मचा दिया था। महाराजा ने ठाकुर की बात मान ली।

    एक दिन महाराजा को ज्ञात हुआ कि दीवान जैतसिंह भी पाडे एवं बकरे काटकर खाता है और ठाकुरों को दावत देता है। महाराजा ने जैतसिंह को एकांत में फटकारा तथा ऐसा न करने के लिये पाबंद किया किंतु जैतसिंह ने अपनी आदत नहीं छोड़ी। एक दिन महाराजा को ज्ञात हुआ कि जैतसिंह ने मण्डोर उद्यान में एक भैंसा काटकर देवी को बलि चढ़ाई है तथा कई ठाकुरों को बुलाकर भैंसे, भेड़ और बकरों के मांस की दावत दी है। महाराजा ने ठाकुरों को सबक सिखाने का निर्णय लिया और खूबचंद सिंघवी एवं गोरधन खींची को भेजकर जैतसिंह को मौके पर ही पकड़ लिया। जब खूबचंद सिंघवी, दीवान जैतसिंह को लेकर महाराजा के सामने पहुंचा तो जैतसिंह ने महाराजा को झुककर मुजरा किया। उसी समय जैतसिंह की गर्दन धड़ से अलग कर दी गई। इस घटना के बाद दूसरे ठाकुरों की गतिविधियों पर स्वतः रोक लग गई।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • राजस्थानी कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ

     03.06.2020
    राजस्थानी कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियाँ

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    प्रकृति में घटने वाली घटनाएं बेतरतीब नहीं होतीं। उनके बीच निश्चित क्रम तथा तारतम्य होता है। यही कारण है कि कुछ निश्चित प्राकृतिक घटनाओं का सावधानी पूर्वक अवलोकन करके हम भविष्य में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं। ऋतुओं का आवागमन भी प्राकृतिक घटनाएं हैं जिनके बीच निश्चित क्रम तथा तारतम्य है। हजारों साल से मनुष्य इस तारतम्य को देख और समझ रहा है तथा इस संचित ज्ञान को लोकोक्तियों एवं कहावतों में ढालकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा रहा है।

    राजस्थानी कहावतों में वर्षा एवं अकाल सम्बन्धी भविष्यवाणियों का भण्डार भरा हुआ है। प्र्राचीन समय में किसान इन कहावतों को ध्यान में रखकर समय रहते ही पता लगा लेते थे कि आने वाली वर्षा ऋतु में वर्षा कितनी होगी तथा फसल कितनी मिलेगी। ग्रामीण अंचलों में आज भी किसानों द्वारा बहुत सी कहावतें कही जाती हैं। इनमें से कुछ कहावतें यहाँ दी जा रही हैं-

    काल केरड़ा सुगाळै बोर: अर्थात् कैर की झाड़ी पर अत्यधिक फल लगें तो वर्षा नहीं होगी, अकाल पड़ेगा एवं बेर की झाडि़यों पर अधिक बेर लगें तो अच्छी वर्षा होने का संकेत है। सुकाल होगा।

    काती रो मेह कटक बराबर: अर्थात् कार्तिक की वर्षा फसल के लिये बहुत हानिकारक है।

    आसोजां में मोती बरसे: अर्थात् आश्विन मास में होने वाली थोड़ी वर्षा भी खेती के लिये मूल्यवान होती है।

    ईसानी बिसानी: अर्थात् ईशान कोण में यदि बिजली चमके तो खेती अच्छी होगी। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि राजस्थान में मानसून उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात् ईशान कोण से ही प्रवेश करता है।

    चांद छोड़े हिरणी तो लोग छोड़े परणी: अर्थात् अक्षय तृतीया को यदि चन्द्रमा, मृगशिरा से पूर्व अस्त हो जाये तो भीषण अकाल पड़ेगा, जिसमें लोगों को अपनी स्त्रियों को घर पर छोड़कर जीवन निर्वाह के लिये अन्यत्र जाना पड़ेगा।

    बरसे भरणी, छोड़े परणी: अर्थात् यदि भरणी नक्षत्र में वर्षा होवे तो पति अपनी पत्नी को छोड़ भागे अर्थात् उसे कमाने के लिये विदेश जाना पड़ेगा। जे बरसे मघा तो धान रा ढगा: यदि मघा नक्षत्र में वर्षा हो तो अनाज अत्यधिक उत्पन्न होगा।

    जे बरसे उतरा तो धान न खावे कुतरा: यदि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वर्षा हो तो इतना धान होगा कि उसे कुत्ते भी नहीं खायेंगे।

    रोहण रेली तो रुपये की अधेली: अर्थात् यदि रोहिणी नक्षत्र में वर्षा हो तो रुपये की अधेली मिलेगी अर्थात् अकाल पड़ेगा।

    न भीज्यो काकड़ो, तो क्यूं टेरै हाळी लाकड़ो?: अर्थात् हे किसान यदि कर्क संक्रांति के दिन वर्षा न हो तो तुम व्यर्थ ही हल चलाते हो क्योंके कर्क संक्रांति के दिन वर्षा न होने से अकाल पड़ेगा।

    भादरवो गाज्यौ, काळ भाज्यौ: अर्थात् भादों में वर्षा होने पर अकाल भाग जाता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
  • लुप्त हो गई राजस्थानी प्रेमाख्यानों की परम्परा

     03.06.2020
    लुप्त हो गई राजस्थानी प्रेमाख्यानों की परम्परा

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    सम्पूर्ण विश्व प्रतिक्षण प्रेम का अभिलाषी है। यह मनुष्य की आत्मा का सबसे मधुर पेय है। इसके बिना जीवन अपूर्ण है। आदि काल से मनुष्य प्रेम का संधान करता आया है। यही कारण है कि धरती पर विकसित हुई समस्त सभ्यताओं में प्रेमाख्यानों की रचना हुई। राजस्थानी प्रेमाख्यान विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। कथ्य, तथ्य, शिल्प विधान एवं रागात्मकता की दृष्टि से ही नहीं अपितु इतिहास, सांस्कृतिक वैशिष्ट्य एवं सामाजिक परम्पराओं की विविधता के कारण इन्हें लोक संस्कृति का कोश कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

    प्राचीन एवं मध्यकालीन राजस्थानी प्रेमाख्यान, गद्य एवं पद्य के साथ-साथ चम्पू विधाओं में भी मिलते हैं जिसमें गद्य एवं पद्य दोनों का मिश्रण होता है। इस कारण प्रेमाख्यान वात, वेलि, वचनिका, विगत, दवावैत आदि शैलियों में रचे गए जिन्हें सार्वजनिक रूप से गाया एवं सुनाया जाता था। प्रेमाख्यानों के गायन अथवा वाचन में रसोद्रेक प्रस्तुतकर्ता के कौशल पर अधिक निर्भर करता था। थार रेगिस्तान में रहने वाली लंगा जाति इन प्रेमाख्यानों का प्रमुखता से गायन करती थी।

    प्रेमाख्यानों का आरम्भ प्रायः देवस्तुतियों के साथ होता था जिनमें सरस्वती एवं गणेश प्रमुख होते थे। इसके बाद कथा का स्थापना पक्ष होता था जिसमें कथानक के नायक एवं नायिका का परिचय भी सम्मिलित रहता था। कथानक के आगे बढ़ने पर प्रसंग के अनुसार स्वर के आरोह अवरोह बदलते थे। जब प्रसंग वीर रस से ओत-प्रोत होता था तो वाणी में ओज तथा गति बढ़ जाती थी जबकि करुण रस के प्रसंग में कथावाचक अथवा गायक अपनी वाणी को भी करुण शब्दों के उपयुक्त बना लेता था। राजस्थान के कुछ प्रसिद्ध प्रेमाख्यानों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार से है-

    ढोला मारू

    ढोला मारू राजस्थानी भाषा का श्रेष्ठ प्रेमाख्यान है। नरवर के राजा नल के पुत्र राजकुमार साल्ह कंवर अथवा धौलाराय को इस काव्य में ढोला कहा गया है तथा पूगल के राजा पिंगल की पुत्री राजकुमारी मारू अथवा मारवणी को को मारू कहा गया है। इस कथा के अनुसार किसी समय पूगल देश में पिंगल नामक राजा का शासन था। उन दिनों नरवर में राजा नल राज्य करता था। पिंगल की कन्या का नाम मारवणी था तथा नल के पुत्र का नाम ढोला था। एक बार पूगल देश में अकाल पड़ने से राजा सपरिवार पुष्कर में आकर रहने लगा। उन्हीं दिनों राजा नल भी सपरिवार तीर्थयात्रा के लिये पुष्कर आया। वहाँ दोनों राजाओं में मित्रता हो गयी। पिंगल ने अपनी कन्या का विवाह ढोला से कर दिया। उस समय ढोला की उम्र तीन वर्ष और मारवणी की उम्र डेढ़ वर्ष थी। शरद ऋतु आने पर दोनों राजा अपने-अपने राज्य को चले गये। मारवणी भी छोटी होने के कारण पिता के साथ पूगल चली गयी। जब ढोला जवान हुआ तो नल ने उसका दूसरा विवाह मारवा की राजकुमारी मालवणी से कर दिया। नल ने ढोला को उसके प्रथम विवाह की बात नहीं बतायी। इधर जब मारवणी बड़ी हुई तो उसके पिता ने ढोला को बुलाने के लिये कई दूत भेजे ंिकंतु नल ने उनको बीच में ही मरवा दिया। एक बार नरवर से घोड़ों के व्यापारी पूगल आये, उन्होंने ढोला के दूसरे विवाह की बात मारवणी को बता दी। पूगल ने कुछ ढाढियों को नरवर भेजकर ढोला को संदेश भेजा। ढाढियों ने मालवणी द्वारा तैनात किये गये आदमियों को धोखा देकर ढोला को मारवणी का संदेश पहुंचाया। ढोला घोड़े पर सवार होकर पूगल के लिये चल पड़ा। ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी ने आंखों में आंसू भरकर ढोला के घोड़े की रस्सी पकड़ ली। इसलिए ढोला उस समय तो रुक गया किंतु जब मालवणी सो गयी तब वह एक ऊँट पर बैठकर पूगल चला गया। पूगल में ढोला का बड़ा स्वागत हुआ। मारवाणी को ढोला के साथ विदा कर दिया गया। मार्ग में एक पड़ाव पर मारवणी को सांप ने काट खाया और मारवणी मर गयी। ढोला मारवणी की चिता बनाकर उसी के साथ जलने को उद्यत हुआ किंतु उसी समय शिव पार्वती वहाँ आ गये और उन्होंने मारवणी को जीवित कर दिया। मार्ग में ऊमर नाम के एक आदमी ने मारवणी को हथियाने के लिये ढोला को अफीम पिला दी। ऊमर के साथ मारवणी के पीहर की एक ढोलन थी, उसने गीत गाकर मारवणी को चेता दिया कि उसके साथ धोखा होने वाला है। मारवणी ने ढोला को ऊमर के पास से उठाने के लिये अपने ऊँट को छड़ी मारी जिससे ऊँट उछलने लगा। ढोला ऊँट को शांत करने के लिये आया तो मारवणी ने उससे ऊमर के कपट की बात कही। इस पर ढोला और मारवणी, ऊँट पर बैठकर भाग खड़े हुए। ऊमर ने उनका पीछा किया किंतु उसे हताशा हाथ लगी। ढोला और मरवण दोनों नरवर में जाकर सुख से रहने लगे। इस प्रेमाख्यान के दोहे लोक में बड़े चाव से गाये जाते थे, यथा-

    सोरठियो दूहो भलो, भल मरवण री बात

    जोबन छाई नार भली, तारां छाई रात।


    जेठवा ऊजली

    इस प्रेमाख्यान में धूमली के राजकुमार जेठवा तथा अमरा चारण की बेटी ऊजली की कथा है। एक दिन जेठवा शिकार करता हुआ जंगल में भटक गया। वर्षा के कारण वह घोड़े पर ही अचेत हो गया। घोड़ा राजकुमार को लेकर आधी रात के समय अमरा चारण के झौंपड़े के सामने पहुंचा और हिनहिनाने लगा। ऊजली ने बाहर आकर राजकुमार को अचेत अवस्था में देखा और शीत से ठिठुर रहे राजकुमार की देह को गर्मी देने के लिए अपने पिता की अनुमति लेकर राजकुमार के साथ सो गयी। राजकुमार के प्राण बच गये। प्रातः जब राजकुमार की नींद खुली तो उसने ऊजली को वचन दिया कि वह उसके साथ ही विवाह करेगा किंतु अपने राज्य में लौटकर ऊजली को भूल गया। इस पर ऊजली राजकुमार से मिलने के लिये उसकी राजधानी गयी किंतु राजकुमार ने उससे विवाह करने से मना कर दिया कि एक राजपुत्र का विवाह चारणी से नहीं हो सकता। इस पर ऊजली ने कुपित होकर राजकुमार को श्राप दिया जिससे राजकुमार की मृत्यु हो गयी। ऊजली जो कि राजकुमार को अपना पति मान चुकी थी, उसके साथ सती हो गयी।

    ‘जेठवा रा सोरठा’ में ऊजली की मार्मिक कथा का बखान किया गया है। इस घटना का समय 1400 से 1500 वि.सं. के मध्य माना जाता है। इस ग्रंथ का एक सोरठा इस प्रकार से है-

    वीणा! जंतर तार थें छोड़या उण राग रा।

    गुण ने रोवूं गमार जात न झींकू जेठवा।।


    खींवो आभळ

    यह राजस्थान का सुंदर प्रेमाख्यान है। इसके अनुसार चोटी वाले दुर्ग का राजकुमार खींवसिंह अत्यंत सुंदर तथा बलिष्ठ था। उसे अपनी भाभी की छोटी बहिन आभळदे से प्रेम था। आभळदे अद्वितीय सुंदरी थी। वह भी राजकुमार से प्रेम करती थी। आभलदे ने अपने परिवार वालों से कहा कि वह पुष्कर में स्नान करने जा रही है और इस बहाने से वह राजकुमार से मिलने के लिये आयी। खींवसिंह रात्रि के अंधकार में आभळ से मिलने के लिये आता था। आभळदे के चाचा को यह जानकारी हो गयी। उसने खींवसिंह को मार डाला। आभलदे ने बड़ा करुण विलाप किया जिससे पसीज कर शिव पार्वती प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रकट होकर खींवसिंह को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ।

    जसमा ओडण

    यह एक प्राचीन प्रेम कथा है जिसका कथानक इस प्रकार से है- ओड जाति का एक परिवार मिट्टी खोदने का काम करता था। इस परिवार की जसमा नामक स्त्री अत्यंत सुंदरी थी। एक बार उस देश के राजा की दृष्टि जसमा पर पड़ी तो वह उस पर मुग्ध हो गया और उससे विवाह करने के लिये तत्पर हो गया। जसमा पतिव्रता स्त्री थी और अपने पति से बहुत प्रेम करती थी उसने राजा के साथ विवाह करने से मना कर दिया। इस पर राजा ने सारे ओड पुरुषों को मरवा दिया। जसमा अपने पति की मृत देह के साथ सती हो गयी।

    नाग-नागमति की कथा

    नाग-नागमति की कथा ‘नागजी रा सोरठा’ में वर्णित है। यह एक विरह प्रधान प्रेमाख्यान है। एक समय नागमति उद्यान में झूला झूल रही थी। नाग उसके रूप पर मोहित हो गया। दोनों प्रेम की डोर से बंध गये। नागमति के माता-पिता ने नागमति का विवाह किसी अन्य स्थान पर कर दिया। इस पर नाग चिता सजाकर उसमें कूद पड़ा। जब नागमति ससुराल जा रही थी तब नागमति ने उस चिता को धधकते हुए देखा। नागमति भी डोली से कूद कर नाग की चिता में जा बैठी और सती हो गयी। नागजी रा सोरठा में नागमति को सुगना भी कहा गया है। इसका एक दोहा इस प्रकार से है-

    मूंछ फरूके पवन सूं, हसे बत्तीस दंत।

    सोरो सोज्या नागजी, मो सुगना रो कंत।


    माधवानल कामकंदला

    इस प्रेमाख्यान का पूरा नाम माधवानल कामकंदला प्रबंध है। इसकी रचना वि.सं.1574 में राजस्थानी कवि गणपति ने की। इसमें 2500 दोहे हैं। इस ग्रंथ की कई हस्तलिखित प्रतियां मिलती हैं। इस प्रेमाख्यान की विशेषता यह है कि रचनाकार ने ग्रंथ के प्रारंभ में गणेश स्तुति अथवा मंगलाचरण न लिखकर कामदेव की स्तुति की है।

    मूमल महेन्द्र

    मूमल महेन्द्र का प्रेमाख्यान राजस्थान के प्रेमाख्यानों में सबसे विशिष्ट स्थान रखता है। इस कथा के कई रूप मिलते हैं। मूल कथानक इस प्रकार है कि राजकुमार महेन्द्र सोढण राजकुमारी मूमल से प्रेम करता था और अपनी सांड पर बैठकर मूमल से मिलने आया करता था। एक रात्रि में उसने मूमल की बहिन को पुरुष वेश में मूमल के पलंग पर सोते हुए देख लिया। महेन्द्र मूमल को छोड़कर चला गया। इधर मूमल को सूचना मिली कि महेन्द्र की मृत्यु सांप काटने से हो गयी है। यह सुनकर मूमल सती हो गयी। आज भी जैसलमेर जिले में काक नदी के तट पर मूमल की मेढ़ी बनी हुई है।

    सेणी वीजानंद

    इस प्रेमाख्यान के अनुसार कच्छ के भाघड़ी गाँव का चारण वीजानंद अच्छा गवैया था तथा गायें चराता था। एक बार उसने बेकरे गाँव की सेणी को देख लिया। उसने सेणी से विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु सेणी ने एक शर्त पूरी करने को कहा। वीजानंद उस शर्त को पूरा करने के लिये घर से निकल पड़ा किंतु वह छः माह की निर्धारित अवधि में लौट कर नहीं आया। इस पर सेणी ने हिमालय पर जाकर अपना शरीर गला लिया। वीजानंद लौट कर आया तो उसे सारी बात का पता चला। वह भी हिमालय पर चला गया और अपना शरीर गला लिया। इस कथा में सेणी के बारे में एक दोहा कहा जाता है-

    कंकूवरण कळाइयां, चूड़ी रत्तडि़यांह।

    वीझां गळ विलंबी नहीं, बाळूं बांहडि़याह।।


    सोरठ वींजा

    इस प्रेमाख्यान के अनुसार सांचोर के राजा जयचंद के यहाँ मूल नक्षत्र में एक कन्या का जन्म हुआ। राजा ने पुत्री को अपने लिये अशुभ जानकर पेटी में बंद करके नदी में फैंक दिया। यह पेटी चांपाकुमार को मिली जिसने कन्या का नाम सोरठ रखा तथा उसे पालकर बड़ा किया। समय पाकर कन्या अत्यंत रूपवती युवती में बदल गयी। पाटण के राजा सिद्धराज तथा गिरनार के राव खंगार दोनों ने उससे विवाह करना चाहा। चांपाकुमार ने घबराकर सोरठ का विवाह एक बणजारे के साथ कर दिया। खंगार ने बणजारे को मार डाला और सोरठ को अपने घर ले गया। वहाँ खंगार के भाणजे वींजा को सोरठ से प्रेम हो गया। वींजा ने गुजरात के बादशाह से मिलकर खंगार पर आक्रमण किया जिसमें खंगार मारा गया किंतु सोरठ वींजा के हाथ नहीं आयी। बादशाह सोरठ को पकड़ कर ले गया और उसे अपने हरम में डाल लिया। वींजा ने दुखी होकर प्राण त्याग दिये। सोरठ भी बादशाह के हरम से निकल भागी और शमशान में वींजा की राख पर चिता सजाकर भस्म हो गयी। ‘सोरठ वींजा रा दूहा’ नाम से डिंगल भाषा में एक ग्रंथ मिलता है। चंद्रकुंवरी री वात: कवि प्रतापसिंह ने ई.1765 में इस डिंगल गं्रथ को लिखा। इसमें अमरावती के राजकुमार तथा वहाँ के सेठ की पुत्री चंद्रकुंवरी की प्रेम गाथा लिखी गयी है।

    चंदन मलयागिरि की वात

    भद्रसेन ने ई. 1740 में इस प्रेमाख्यान की रचना की। इसमें चंदन और मलयगिरि के प्रेम की गाथा कही गयी है। इनके अतिरिक्त सोरठी गाथा, जलाल बूबना की कथा, ऊमा-सांखली और अचलदास की कथा, काछबो तथा बाघो-भारमली आदि के प्रेमाख्यान भी गाये जाते थे। अधिकतर प्रेमाख्यानों के एक से अधिक रूप प्राप्त होते हैं। जलाल बूबना की कथा का यह दोहा अत्यंत मार्मिक है-

    मैं मन दीन्हों तोय, नेणा जिन दिन देखिया।

    सुधि क्यों रही न मोय, प्रेम लाज अब राखिया।


    लेखनकला का विकास होने पर इन आख्यानों को लिपिबद्ध कर दिया गया। कुछ प्रतियों में तो अत्यंत सुंदर चित्र भी बने हुए मिलते हैं जो राजस्थानी चित्रकला की अमूल्य धरोहर हैं। परवर्ती काल में कुछ प्रेमाख्यानों को परकीया प्रेम तथा अश्लील वर्णन से दूषित कर दिया गया किंतु अधिकांश प्रेमाख्यान आदर्श प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान काल में मनोरंजन के नवीन साधनों के आ जाने के कारण राजस्थानी प्रेमाख्यान लोक-जिह्वा से हटकर केवल पुस्तकों में सिमट कर रह गए हैं। परवर्ती काल में इन प्रेमाख्यानों को आधार बनाकर कुछ ऐसे ख्यालों की रचना भी हुई जिनमें इनकी मूल कथाओं को विकृत कर दिया गया। इस कारण भी जन-सामान्य को इनसे अरुचि हो गई।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×