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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 11

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 11

    साम्प्रदायिकता की फसल का बीमा


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com 

    भारत के अंग्रेज अधिकारियों ने मुस्लिम लीग की मांगों को हाथों-हाथ लिया तथा ई.1909 में उन्होंने मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट की घोषणा की। इस अधिनियम के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को पटरी से उतार दिया गया।


    मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट

    'मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट' के द्वारा भारत की गोरी सरकार ने प्रांतीय विधान सभाओं में मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व प्रदान किया अर्थात् उनके लिए पद आरक्षित किए गए। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली बार हिन्दुओं और मुसलमानों को पृथक इकाई स्वीकार करके उन्हें अलग-अलग प्रतिनिधित्व दिया गया। साथ ही मुसलमानों को प्रतिनिधित्व के मामले में विशेष रियायत दी गयी। उन्हें केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में जनसंख्या के अनुपात में अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया। मुस्लिम मतदाताओं के लिये आय की योग्यता को भी हिन्दुओं की तुलना में कम रखा गया। कांग्रेस ने इस व्यवस्था का विरोध किया जबकि मुस्लिम लीग ने इसका समर्थन किया। इतिहासकारों ने अंग्रेजों की इस व्यवस्था को फूट डालो और शासन करो की नीति कहकर पुकारा है। वाई. पी. सिंह ने लिखा है- 'अँग्रेजों ने भारतीय परिषद् अधिनियम, 1909 के द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष के बीज बोये।' विख्यात पत्रकार दुर्गादास ने लिखा है- 'व्हाइट हॉल ने पृथक निर्वाचन एवं सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को स्वीकार करके अनजाने में ही सर्वप्रथम विभाजन के बीज बोये।' गणेशप्रसाद बरनवाल ने लिखा है- 'मार्ले मिण्टो सुधार एक्ट से साम्प्रदायिकता की फसल बीमा कर दी जाती है। मिण्टो के शब्दों में- 'मुस्लिम नेशन।'

    हमारा मानना है कि ये अनजाने में बोये गये बीज नहीं थे। साम्प्रदायिकता के बीज शताब्दियों से भारत की राजनीतिक जमीन में मौजूद थे तथा उसकी फसल भी सदियों से लहरा रही थी। मार्ले-मिण्टो एक्ट ने तो साम्प्रदायिकता की फसल को काटकर उससे अधिकतम मुनाफा कमाने की विधि विकसित की थी। मार्ले-मिण्टो एक्ट के प्रावधानों के कारण हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों वर्गों में अपने-अपने पक्ष को लेकर उत्तेजना व्याप्त हो गई। भारत की राजनीति ने पूरी तरह से साम्प्रदायिक रंग ले लिया। देश भर में प्रदर्शन होने लगे और चारों तरफ अशांति व्याप्त हो गई।


    लखनऊ समझौते से देश में शांति

    उन्हीं दिनों मुसलमानों के विरुद्ध दो बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाएं हुईं-

    (1) यूरोपीय देशों के बीच बाल्कन प्रायद्वीप को लेकर हुए दो युद्ध,

    (2) तुर्की में युवा तुर्क आन्दोलन।

    इन दोनों ही घटनाओं में मुसलमानों को ईसाइयों के हाथों नीचा देखना पड़ा। इस कारण ई.1911 के बाद भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश शासन के प्रति राजभक्ति का ज्वार ठण्डा हो गया। चूंकि मुस्लिम लीग मुसलमानों को ब्रिटिश राजभक्ति का पाठ पढ़ा रही थी और कांग्रेस अंग्रेजों से औपनिवेशिक स्वशासन की मांग कर रही थी, इसलिए भारत का युवा मुस्लिम वर्ग, मुस्लिम लीग की बजाय कांग्रेस के लक्ष्य से सहानुभूति रखने लगा। मुस्लिम-युवाओं में पनप रही इस मनोवृत्ति को देखते हुए ई.1913 में मुस्लिम लीग ने अपने संविधान में संशोधन करके कांग्रेस की ही तरह अपना लक्ष्य भारत में औपनिवेशिक स्वशासन प्राप्त करना निश्चित किया।

    जब दोनों पार्टियों के लक्ष्य एक हो गये तो उनमें निकटता आनी भी स्वाभाविक थी। कांग्रेस भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मुसलमानों का सहयोग चाहती थी। फलस्वरूप ई.1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य समझौता हुआ जिसे लखनऊ समझौता कहते हैं। यह समझौता कराने में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इस समझौते में तीन मुख्य बातें थीं-

    (क.) मुस्लिम लीग ने भी कांग्रेस की तरह भारत को उत्तरदायित्व-पूर्ण शासन देने की मांग की।

    (ख.) कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक् निर्वाचन-मण्डल की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और विभिन्न प्रान्तों में उनके अनुपात को भी मान लिया। देश की ग्यारह प्रांतीय विधान सभाओं में मुसलमानों का अनुपात इस प्रकार निर्धारित किया गया था- पंजाब: 50 प्रतिशत, संयुक्त प्रान्त: 30 प्रतिशत, बंगाल: 40 प्रतिशत, बिहार: 25 प्रतिशत, मध्य प्रदेश: 15 प्रतिशत, मद्रास: 15 प्रतिशत तथा बम्बई: 43 प्रतिशत।

    (ग.) यह स्वीकार कर लिया गया कि यदि विधान सभाओं में किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव का विरोध किसी एक सम्प्रदाय के तीन चौथाई सदस्य करेंगे तो उस प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जायेगा।

    पं. मदनमोहन मालवीय, सी. वाई. चिंतामणि आदि कई कांग्रेसी नेताओं को लगा कि इस समझौते में मुसलमानों को अत्यधिक सुविधाएं दे दी गई हैं। कुछ इतिहासकार तो इन सुविधाओं को साम्प्रदायिकता के विकास की महत्त्वपूर्ण कड़ी मानते हैं जिसकी परिणति पाकिस्तान के रूप में हुई। तिलक का कहना था- 'कुछ लोगों का विचार है कि हमारे मुसलमान भाइयों को अत्यधिक रियायतें दे दी गई हैं किन्तु स्वराज्य की मांग के लिए उनका हार्दिक समर्थन प्राप्त करने के लिए वह आवश्यक था; भले ही कठोर न्याय की दृष्टि से वह सही हो या गलत। उनकी सहायता और सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।' अयोध्यासिंह के अनुसार- 'इस पैक्ट से जिन्हें सबसे अधिक आघात लगा था वे थे, ब्रिटिश साम्राज्यवादी और उनके दलाल।' लखनऊ समझौते के परिणाम स्वरूप कुछ समय के लिए देश में साम्प्रदायिक समस्या शांत हो गई।


    मुसलमानों को केन्द्रीय सभा में अधिक प्रतिनिधित्व

    ई.1914 से 1919 तक लडे़ गए प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत में ब्रिटिश तंत्र का ढांचा तोड़ कर रख दिया। प्रथम विश्व युद्ध में 6 लाख 80 हजार अंग्रेज मारे गए। यह क्षति इंगलैण्ड के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई। भारत में अब स्वशासन के अधिकारों की मांग तेज होती जा रही थी, इसलिए अब वे भारत का शासन विक्टोरिया की घोषणा के आधार पर अथवा मार्ले-मिण्टो एक्ट के आधार पर नहीं चला सकते थे। उन्हें भारत में ब्रिटिश संसद से पारित कानून लागू करना आवश्यक हो गया जिसमें भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी दी गई हो।

    प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था तथा बड़ी संख्या में भारतीय नौजवानों ने ब्रिटिश मोर्चों पर इंग्लैण्ड की ओर से लड़ते हुए प्राण गंवाए थे। इस सहयोग के बदले में भारत की गोरी सरकार ने युद्ध समाप्ति के बाद भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देने का आश्वासन दिया था परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपना वचन नहीं निभाया। 'भारत सरकार अधिनियम 1919' के माध्यम से मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा की गई। यह देश का नया संविधान था जिसने मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट 1909 का स्थान लिया। इस संविधान में भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी तो दी गई किंतु भारतीयों को स्वशासन का अधिकार नहीं दिया गया। यह भारतीय जनता के साथ विश्वास-घात था। इस कारण इस अधिनियम से राष्ट्रवादी नेता असन्तुष्ट हो गए किन्तु गांधीजी इस संविधान को लागू करवाने के पक्ष में थे। अतः अंग्रेजों ने अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण वाले ग्यारह ब्रिटिश-भारतीय प्रांतों में इस नए कानून को लागू कर दिया।

    भारत सरकार अधिनियम 1919 के माध्यम से भारत में पहली बार दो सदनों वाली केन्द्रीय व्यवस्थापिका (पार्लियामेंट) की स्थापना की गई। पहले सदन को विधान सभा और दूसरे सदन को राज्य सभा कहा जाता था। विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष तथा राज्यसभा का कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया। गवर्नर जनरल इन सदनों को कार्यकाल पूरा होने से पहले भी भंग कर सकता था।

    केन्द्रीय विधान सभा में 145 सदस्य थे जिनमें 104 निर्वाचित सदस्य थे। निर्वाचित सदस्यों में से 52 सदस्य सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से, 30 मुस्लिम, 2 सिक्ख, 9 यूरोपियन, 7 जमींदार तथा 4 भारतीय वाणिज्य के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। 41 मनोनीत सदस्यों में 26 सरकारी अधिकारी और 15 गैर-सरकारी सदस्य होते थे। केन्द्रीय राज्यसभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 60 थी। इनमें से सरकारी सदस्यों की अधिकतम संख्या 20 हो सकती थी। शेष 40 सदस्यों में से 34 सदस्य निर्वाचित होते थे जिनमें से 19 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से, 12 साम्प्रदायिक क्षेत्रों अर्थात् मुस्लिम, सिक्ख एवं ईसाई में से और 3 विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से होते थे। 6 गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा की जाती थी।

    इस प्रकार दोनों सदनों में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि आवश्यकता पड़ने पर भारत की गोरी सरकार मुस्लिम एवं ईसाई प्रतिनिधियों तथा सरकारी सदस्यों के बल पर कांग्रेस के सभी प्रस्तावों को ध्वस्त कर सकती थी किंतु फिर भी इस व्यवस्था के माध्यम से भारतीयों ने आधुनिक राजनीतिक शासन व्यवस्था में प्रवेश किया। इस कारण बहुत से विद्वान मानते हैं कि इस अधिनियम में भारत के संवैधानिक विकास के बीज मौजूद थे।


    मुसलमानों में गांधाजी के विरुद्ध संदेह

    प्रथम विश्वयुद्ध (ई.1914-19) में तुर्की, जर्मनी की तरफ से तथा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा। विश्व भर के उलेमा और मौलवी तुर्की के सुल्तान को अपना खलीफा अर्थात् धार्मिक एवं राजनीतिक नेता मानते थे और तुर्की उनका धार्मिक केन्द्र था। अंग्रेजों ने भारतीय सेनाओं को भी इस युद्ध में झौंका जो तुर्की के खलीफा के विरुद्ध भेजी गई थीं। इन सेनाओं में भारतीय मुसलमान भी थे। यह एक विचित्र स्थिति थी। भारतीय मुसलमान तुर्की के खलीफा की तरफ से लड़ना चाहते थे किंतु उन्हें अंग्रेजी सेना का हिस्सा होने के कारण खलीफा के खिलाफ लड़ना पड़ रहा था। भारतीय मुसलमानों को आशंका थी कि यदि तुर्की युद्ध में हार गया तो तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया जायेगा तथा खलीफा की शक्तियां भी समाप्त कर दी जायेंगी। अतः भारतीय मुसलमानों ने युद्ध छिड़ते ही खिलाफत कमेटी संगठित की और तुर्की के विरुद्ध फौज भेजे जाने का विरोध किया तथा भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आन्दोलन चलाया। भारत की अंग्रेज सरकार ने खिलाफत आंदोलन के नेताओं मुहम्मद अली तथा शौकत अली को नजरबंद कर लिया।

    उन्हीं दिनों गांधीजी ने भारत में असहयोग आंदोलन आरम्भ किया। गांधीजी ने मुसलमानों से अपील की कि वे भी कांग्रेस के इस कार्यक्रम को अपनाएं। इसके बदले में गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने का आश्वासन दिया। चूंकि इस दौर की राजनीति में हिन्दुओं और मुसलमानों के उद्देश्य एक जैसे प्रतीत हो रहे थे इसलिए मुसलमानों ने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सहयोग देने का निर्णय लिया। कांग्रेस भी खुलकर खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देने लगी। कुछ दिनों में दोनों आन्दोलन मिलकर एक हो गये। याज्ञिक ने लिखा है- 'गांधी खिलाफत के सवाल पर अंधाधुंध भाषण करने लगा और वह इस्लाम की रक्षा तथा मुक्ति के जेहाद में मुसलमानों से भी आगे बढ़ गया।' प्रथम विश्व-युद्ध के बाद हुई संधि के द्वारा तुर्की के पुराने साम्राज्य के टुकड़े कर दिए गए। ईराक, मेसोपोटामिया, सीरिया, फिलीस्तीन और स्मिर्ना पर सुल्तान अब्दुल मजीद की सत्ता समाप्त कर दी गई। तुर्की साम्राज्य में से एक हिस्सा फ्रांस और एक ब्रिटेन के संरक्षण में दे दिया गया। इस्तम्बूल और दर्रा दानियाल अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण में रख दिए गए। स्मिर्ना और अंतोलिया का तट यूनान में मिला दिया गया। इस संधि ने भारतीय मुसलमानों के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया और एक बार फिर से खिलाफत आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। मुसलमान चाहते थे कि अरब देश और इस्लाम के पवित्र स्थलों को उसी तरह खलीफा के अधिकार में रहना चाहिए जिस तरह इस्लामी राज्य द्वारा उनकी सीमा निर्धारित की गई है किन्तु जब ई.1922 में गांधीजी ने चौरी-चौरा काण्ड के कारण अचानक असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तब मुसलमानों ने गांधीजी की कटु आलोचना की और लखनऊ समझौते से स्थापित साम्प्रदायिक एकता पुनः नष्ट हो गई। मुसलमानों का एक वर्ग पहले से ही लखनऊ समझौते का घनघोर विरोधी था। इस वर्ग को भय था कि गांधीजी का नेतृत्व, मुसलमानों के भिन्न अस्तित्त्व को समाप्त कर देगा। खिलाफत एवं असहयोग आन्दोलन के दौरान ये नेता अनुभव करने लगे थे कि इस एकता से मुस्लिम नेताओं के स्वार्थ पूरे नहीं हो रहे हैं; इसलिए उन्होंने गांधीजी के प्रति खुलकर विष-वमन किया तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता की गाड़ी पुनः पटरी से उतर गई।

    कांग्रेस में हिन्दू नेताओं का बोलबाला था तथा गांधीजी उनके सर्वमान्य नेता थे। गांधीजी यद्यपि मुसलमानों का विश्वास जीतने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते थे और अपनी मेज की दराज में गीता के ऊपर कुरान रखते थे, उन्हें जिन्ना की अपेक्षा कुरान की अधिक आयतें याद थीं तथापि साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले मुसलमान नेताओं का मानना था कि गांधीजी का सत्य और अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रह, हिन्दू धर्म के आदर्शों से प्रेरित है। इसलिए मुसलमानों को गांधीजी का नेतृत्व अमान्य है। अनेक पढ़े-लिखे कट्टर मुस्लिम नेता गांधीजी के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि मुसलमानों से विश्वासघात के मामले में गांधीजी का पिछला रिकॉर्ड भी अच्छा नहीं था। गांधीजी ने ई.1907 में दक्षिण अफ्रीका में जनरल स्मट्स की सरकार के विरुद्ध जो आंदोलन चलाया था, उसे बीच में ही बंद कर दिया था।

    दक्षिण अफ्रीका के भारतीय पठानों ने गांधीजी के इस कार्य को विश्वासघात मानते हुए उन पर प्राण-घातक हमला किया था। इस प्रकार मुसलमानों ने गांधीजी पर विश्वास नहीं होते हुए भी गांधीजी के ई.1920 के असहयोग आन्दोलन का समर्थन किया क्योंकि गांधीजी ने कहा था कि 'यदि देश मेरे पीछे चले तो मैं एक वर्ष के भीतर स्वराज्य ला दूँगा' किंतु जब ई.1922 में गांधीजी ने अचानक असहयोग आंदोलन बंद कर दिया तो मुसलमानों को लगा कि गांधीजी ने मुसलमानों को मंझधार में छोड़कर, एक बार फिर विश्वासघात किया है। अलगाववादी मुसलमानों ने पूरे देश में यह प्रचार किया कि 'गांधीजी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया।' इससे देश में उत्तेजना फैल गई और साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-106

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-106

    सरदार पटेल ने नेहरू को भी पत्र लिखकर नाराजगी व्यक्त की


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    23 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को सीधे ही एक पत्र लिखकर कहा कि आयंगर की अजमेर यात्रा आश्चर्य में डालने वाली एवं धक्का पहुँचाने वाली थी। इस यात्रा के दो ही अर्थ निकलते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री द्वारा अजमेर को लेकर दिये गये वक्तव्य से असंतुष्ट थे। दूसरा यह कि वे अजमेर के स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही से असंतुष्ट थे। इसलिये प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र अभिमत जानने के लिये अपने प्रमुख निजी सचिव को अजमेर यात्रा पर भेजा। चीफ कमिश्नर या तो मंत्री के अधीन होता है या फिर सम्बन्धित विभाग के सचिव के अधीन होता है।

    पटेल ने चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वह यू. पी. का सबसे योग्यतम अधिकारी है जिसकी दक्षता, ईमानदारी एवं निष्पक्षता को चुनौती नहीं दी जा सकती। आयंगर की इस यात्रा ने शंकर प्रसाद को दुःखी किया है तथा उसकी छवि को कमजोर किया है। कौल तथा भार्गव द्वारा चीफ कमिश्नर के विरुद्ध एक अभियान चलाया गया था। इस यात्रा से आयंगर को कौल तथा भार्गव के बारे में सही जानकारी हो गई होगी। अतः आशा की जानी चाहिये कि अजमेर की यह यात्रा, इस प्रकार की अंतिम यात्रा होगी।

    सरदार पटेल का पत्र निश्चित रूप से जवाहरलाल नेहरू पर अपने काम में हस्तक्षेप करने का आक्षेप था और खुली चुनौती भी कि भविष्य में इसे दोहराया न जाये। इस आक्षेप तथा चुनौती को सहन करना जवाहरलाल के लिये सहज नहीं था। जवाहरलाल ने उसी दिन पटेल को जवाब भिजवाया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह यात्रा इन परिस्थितियों में व्यक्तिगत प्रकार की थी। इस यात्रा का उद्देश्य किसी अधिकारी अथवा उसके द्वारा किये गये कार्य पर कोई निर्णय देना नहीं था। यह जनता से सम्पर्क करने के लिये, विशेषतः पीड़ितों से सम्पर्क करने के लिये की गई ताकि उनका विश्वास जीता जा सके तथा उनके हृदय से भय को निकाला जा सके।

    नेहरू ने सहमति व्यक्त की कि शंकर प्रसाद एक अच्छे और निष्पक्ष अधिकारी हैं किंतु यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री द्वारा किसी व्यक्ति को अजमेर भेज देने से उसकी प्रतिष्ठा अथवा छवि को धक्का कैसे पहुँच गया! किसी भी परिस्थिति में जनता पर पड़ने वाला प्रभाव महत्वपूर्ण है न कि एक अधिकारी की प्रतिक्रिया। नेहरू ने लिखा कि जब लोगों के दिलों में घबराहट हो तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तब केवल विशुद्ध प्रशासन कैसे काम कर सकता है!

    इससे तो कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है। किसी अधिकारी की प्रतिष्ठा अथवा हमारी स्वयं की प्रतिष्ठा एक द्वितीय मुद्दा है यदि अन्य बड़े मुद्दे दांव पर लगे हुए हों। यदि हम प्रजा के साथ सही आचरण करेंगे तो हमारी प्रतिष्ठा स्वयं ही बन जायेगी। अधिकारियों के मामले में भी ऐसा ही है।

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  • राजाओं के भाग्य से द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया!

     02.06.2020
    राजाओं के भाग्य से द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया!

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    लगभग 10 वर्षों तक भारतीय नेताओं एवं ब्रिटेन की गोरी सरकार ने देशी रियासतों को ब्रिटिश भारत के साथ मिलाकर भारत संघ के निर्माण के अथक प्रयास किये। कांग्रेस भारत संघ के माध्यम से देश की मुक्ति का रास्ता खोज रही थी तो गोरी सरकार भारत संघ के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के साथ अवरोधक भार बांधा चाहती थी। राजा लोग पहले हाँ कहकर बाद में ना पर अड़ गये जिससे 10 वर्षों के दीर्घ प्रयासों के उपरांत भी संघ का निर्माण नहीं हो सका।

    राजाओं के भाग्य से सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। 11 सितम्बर 1939 को वायसराय ने घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण भारत संघ के निर्माण की योजना स्थगित की जा रही हैं। इस प्रकार संघ योजना असफल हो गयी तथा विगत 12 वर्षों से भी अधिक समय में व्यय किया गया धन, श्रम एवं समय व्यर्थ चला गया।

    अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के नेता तो शासकों की नीति से दुःखी हुए ही, राष्ट्रीय नेता भी शासकों की कूटनीति को समझ गये। राजाओं के आचरण पर टिप्पणी करते हुए चेतना मुद्गल ने लिखा है- ई.1937-39 के मध्य राज्यों के शासक वर्ग ने अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिये भारतीय संघ में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया। राजपूताना के शासकों ने अविश्वसनीय अयोग्यता का परिचय देकर अपने महत्व को सदा के लिये कम करवा लिया। उन पर न तो राष्ट्रीय नेता और न ही अंग्रेज किसी तर्क संगत नीति अपनाने के लिये भरोसा कर सकते थे। वे केवल अपने सम्मान, गौरव, प्रतिष्ठा में इतने डूबे रहे कि उन्हें पानी के गहरे होने का अनुभव ही नहीं हुआ। 1939 के पश्चात् उनके प्रभाव को घटने में अधिक समय नहीं लगा।

    एक ओर तो राजा लोग अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे थे तो दूसरी ओर राष्ट्रीय नेता भी संघ योजना में ब्रिटिश प्रांतों के सम्बन्ध में किये गये प्रावधानों से संतुष्ट नहीं थे। संघीय योजना के उन प्रावधानों को देखते हुए जिनके अनुसार प्रान्तीय स्वशासन की स्थापना नाम मात्र के लिये भी नहीं थी, कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने भी इस व्यवस्था का विरोध किया। मुहम्मद अली जिन्ना ने संघ योजना को अस्वीकार करते हुए कहा कि राजाओं ने संघ योजना को असंभव शर्तों से पूर्णतः खराब कर दिया था। उस समय केवल हिन्दू महासभा ही एक मात्र ऐसा राजनीतिक दल था जो अब भी संघ योजना के समर्थन में था।

    संघ निर्माण की योजना के असफल होने पर संतोष व्यक्त करते हुए वी. बी. कुलकर्णी ने लिखा है कि तथ्यों को देखते हुए हम आभारी होने का अनुभव कर सकते हैं कि भारत सरकार अधिनियम 1935 का संघीय योजना वाला भाग अस्तित्व में नहीं आया, इस प्रकार भारत के स्वतंत्र होने का मार्ग सरल हो गया तथा राज्यों के विलय का काम भी तीव्र गति से हो सका।

    देशी राज्यों के शासकों द्वारा भारतीय संघ में सम्मिलित होने से अत्यंत नाटकीय ढंग से इन्कार कर देने के पश्चात् राष्ट्रीय नेताओं का रवैया राजाओं के प्रति कठोर हो गया। जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ''जिन संधियों पर राजा लोग अत्यधिक जोर दे रहे हैं, वे संधियां केवल उन्हीं रियासतों और ब्रिटिश सत्ता के मध्य हुई थीं जिन रियासतों को ब्रिटिश सत्ता ने संधि के लिये चुना था और जो लगातार चलने वाली प्रक्रिया के द्वारा ब्रिटिश सत्ता की सुविधा के अनुरूप व्याख्यायित होती रही हैं तथा पूरी तरह बदल चुकी हैं। उन संधियों के पालन पर तभी जोर दिया जाता है जब वे ब्रिटिश सत्ता का हित साधन करती हों। जब कभी भी ब्रिटिश हितों पर विवाद होता है, उस समय या तो इन संधियों की उपेक्षा कर दी जाती है या फिर उनका निहितार्थ इस प्रकार निकाला जाता है जिनसे परमोच्च सत्ता के हितों की रक्षा होती हो। विवाद की स्थिति में परमोच्च सत्ता एक पक्ष भी होती है तथा अंतिम न्यायाधीश भी। इस फैसले के विरुद्ध किसी तरह की अपील करना भी संभव नहीं है। इस प्रकार ये संधियां देशी राज्यों अथवा उनके शासकों के हितों की रक्षा करने में सफल नहीं रही हैं।"

    राष्ट्रीय नेताओं का कहना था कि अधिकांश संधियां एक शताब्दी अथवा उससे भी अधिक पुरानी हैं। तब से लेकर अब तक विश्व में तथा भारत में अनेक परिवर्तन आ चुके हैं जिनके कारण इन संधियों का बाह्य स्वरूप भले ही वही हो किंतु इनका आंतरिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। इस कारण ये संधियां पूर्णतः दिखावटी हैं तथा वे इतने लम्बे समय से केवल इसलिये अस्तित्व में हैं क्योंकि ब्रिटिश सरकार उन्हें बनाये रखना चाहती है। ब्रिटिश सरकार की इच्छा के अतिरिक्त इन संधियों में कोई शक्ति अंतनिर्हित नहीं है। यदि इन संधियों के पीछे से ब्रिटिश सरकार का सहारा हटा लिया जाये तो ये संधियां गिर पड़ेंगी तथा नष्ट हो जायेंगी। यहाँ तक कि देशी राज्यों की प्रजा भी इनका विरोध करती है क्योंकि इनके माध्यम से देशी राज्यों में निरंकुश तथा सामंती शासन बना हुआ है। देशी राज्यों की जनता आज उत्तरदायित्वपूर्ण प्रजातांत्रिक सरकार की मांग कर रही है।

    राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सत्ता द्वारा देशी राज्यों के साथ हुई संधियों की पवित्रता पर विशेष जोर भारत में लगातार बढ़ती हुई राष्ट्रीय भावना को कुचलने के लिये एक औजार के रूप में दिया जा रहा है। राजाओं को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये कि इन संधियों को भारत में प्रजातंत्र की स्थापना के विरुद्ध भले ही प्रयुक्त किया जा रहा हो किंतु इन संधियों के बल पर राजा लोग अपने राज्यों को अधिक दिनों तक संघ से बाहर नहीं रख सकेंगे। बटलर समिति का उद्धरण देते हुए डी. आर. मानकेकर ने लिखा है- ''वास्तविकता यह थी कि जब संधियां परमोच्च सत्ता की इच्छाओं एवं सुविधाओं का उल्लंघन करती थीं तो व्यवहारिक रूप से वे रद्दी के टुकड़े से अधिक नहीं थीं।" राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश भारत को भारतीय रियासतों से राजनीतिक रूप से अलग रखने का विचार अच्छा नहीं है तथा वर्तमान शक्तियों एवं परिवर्तनों को देखते हुए उचित नहीं है। कोई भी राज्य अपने आप में इतना बड़ा एवं सुगठित नहीं है, न ही वह भौगोलिक दृष्टि से इस तरह स्थित है कि उन्हें भारत से अलग रखना समुचित जान पड़े। राज्यों में व्याप्त निरंकुशता तथा प्राचीन शासन पद्धतियां आधुनिक प्रवृत्तियों से नितांत असंगत हैं तथा अधिक दिनों तक बनी नहीं रह सकतीं। वर्तमान में राजा लोगों में यह प्रवृत्ति दिखायी दे रही है कि वे अपने आप को संघ से अलग रखें किंतु वास्तव में यह प्रवृत्ति भारत से अलग रहने की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करती, अपितु जहाँ तक हो सके वहाँ तक, भारत में राष्ट्रीयता एवं प्रजातंत्र के विकास का विरोध करती है।

    नेताओं का यह भी मानना था कि रियासतों में सामंती एवं प्रतिक्रियावादी हितों तथा निहित स्वार्थों को समाप्त करना होगा ताकि वे शेष भारत के साथ आ सकें। संघ तभी सफलता पूर्वक काम कर सकता है जबकि समान उद्देश्यों के लिये एक रूप ढांचा खड़ा किया जाये। देशी राजाओं के अड़ियल रवैये को देखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ई.1938 के हरिपुरा सम्मेलन में और उसके पश्चात ऑल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस ने ई.1939 के लुधियाना सम्मेलन में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प व्यक्त किया।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 12

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 12

    साम्प्रदायिक हिंसा का युग


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    बीसवीं सदी के भारत में साम्प्रदायिक हिंसा के युग की शुरुआत मालाबार के मुस्लिम मोपलाओं ने की। अठारहवीं सदी में मोपलाओं ने टीपू सुल्तान के शासन में हिन्दुओं पर पहली बार संगठित हमले किए थे तब से मोपलाओं ने अपना कार्य जारी रखा था। उन्नीसवीं सदी में जब मोपला किसानों ने हिन्दू जमींदरों की हत्या की थी तो अंग्रेज, मोपलाओं को नहीं दबा सके। फिर भी अंग्रेजों ने हिन्दू जमींदारों को अपनी जमीनों पर बने रहने में बहुत सहायता दी। बीसवीं सदी आते-आते मोपला पुनः संगठित होकर हिन्दुओं की हत्या करने लगे।

    ई.1921 में मोपलाओं ने मुस्लिम लीग के कराची प्रस्ताव में स्वीकृत खलीफा आंदोलन से प्रेरित होकर नैयर, नम्बूदरी एवं जम्मी हिन्दू भूस्वामियों के विरुद्ध भयानक हिंसा आरम्भ कर दी। उन्होंने हजारों हिन्दुओं को मार डाला एवं निर्धन हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बना लिया। इस हिंसा का सामना नहीं कर पाने के कारण एक लाख से अधिक हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भाग खड़े हुए जिन पर मोपला मुसलमानों ने कब्जा कर लिया। इस कार्यवाही से केरल का जनसांख्यिकीय परिवर्तन हो गया। जब ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुओं को बचाने के प्रयास किए तो मुसलमानों ने अंग्रेजों पर भी हमले कर दिए। ब्रिटिश रिकॉर्ड में इन्हें ब्रिटिश-मुस्लिम विद्रोह के रूप में अंकित किया गया।

    जब ब्रिटिश प्रशासक मोपला क्षेत्रों से हट गए तो मोपला लोगों ने फिर से हिन्दुओं का उत्पीड़न एवं हत्याएं करनी आरम्भ कर दीं। मुहम्मद हाजी को मोपला लोगों का खलीफा घोषित किया गया तथा पूरे क्षेत्र में खलीफा के झण्डे फहराने लगे। केरल के एरनाड एवं वल्लुवनाड जिलों को खलीफा की सल्तनत घोषित किया गया। अंग्रेजों ने मोपलाओं द्वारा की जा रही मारकाट के समाचारों को काफी समय तक देश के सामने नहीं आने दिया किंतु वीर सावरकर ने एक मार्मिक उपन्यास लिखकर सारे नरसंहार को प्रकट कर दिया। इससे हिन्दुओं में भारी आक्रोश उत्पन्न हो गया। इस पर अंग्रेजों ने गढ़वाल, नेपाल और बर्मा से सेनाएं मंगवाकर मालाबार को भेजीं। इन सेनाओं ने 2,226 मोपला उपद्रवियों को मारा, 1,615 मोपला उपद्रवी घायल हुए, 5,688 मोपला उपद्रवी बंदी बनाए गए तथा 38,256 मोपला उपद्रवियों ने ब्रिटिश सेनाओं के समक्ष आत्म-समर्पण किया। मोपला विद्रोह में गांधीजी ने पीड़ित हिन्दुओं से सहानुभूति दर्शाने की बजाय हिन्दू-मुस्लिम एकता का राग अलापा जिससे हिन्दुओं में मुसलमानों तथा गांधीजी के प्रति और अधिक आक्रोश पनप गया। डॉ. शिवराम मुंजे गांधीजी की नीतियों से इतने त्रस्त हो चुके थे कि वे कांग्रेस से उदासीन होने लगे।

    श्रीमती एनीबेसेंट ने ई.1921 की मोपला-हिंसा के बारे में लिखा है- 'मोपलाओं ने बहुत बड़े स्तर पर हत्याएं एवं लूट की। यहाँ तक कि जो हिन्दू, मोपलाओं का विरोध नहीं कर रहे थे उन्हें भी मार डाला। एक लाख लोगों का सर्वस्व लूटकर उन्हें अपने घरों से निकाल दिया गया। मालाबार हमें सिखाता है कि इस्लामिक शासन का वास्तविक अर्थ क्या है! हम भारत में दूसरे खिलाफत राज का नमूना नहीं देखना चाहते।' जब मोपला उपद्रवियों के दमन के समाचार देश भर के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए तो पूरे देश में साम्प्रदायिक तनाव व्याप्त हो गया। मुल्तान में भी मुसलमानों ने अनेक हिन्दुओं को मार डाला और उनकी सम्पत्ति लूट ली या नष्ट कर दी। सहारनपुर में भी ऐसी घटनाएं घटित हुईं। लाहौर में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानन्द की रोगी-शैया पर ही हत्या कर दी गई। आर्य समाज के कुछ अन्य नेताओं की भी हत्या की गई। इन घटनाओं ने हिन्दू जनता को विचलित कर दिया।


    कोहाट के हिन्दू मुस्लिम दंगे

    मई 1924 में पंजाब के एक मुस्लिम समाचार पत्र 'लाहुल' में एक हिन्दू विरोधी कविता छपी, जिसका एक अंश इस प्रकार था-

    तुझे तेग ए मुस्लिम उठानी पड़ेगी।

    कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी।


    इसके जवाब में जम्मू के 'हिन्दू' समाचार पत्र ने भी एक कविता प्रकाशित की जिसका एक अंश इस प्रकार था-

    बनाएंगे काबा में विष्णु का मन्दिर,

    नमाजी की हस्ती मिटानी पड़ेगी।


    जीवनदास नामक व्यक्ति ने 'हिन्दू' समाचार पत्र की एक हजार प्रतियां प्राप्त कीं तथा 22 अगस्त 1924 को कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर 30-40 प्रतियां बेच दीं। जब ये प्रतियां मुसलमानों तक पहुंचीं तो उन्होंने हिन्दुओं पर हमले करने आरम्भ कर दिए। हिन्दुओं के घर जला दिए गए, 12 हिन्दुओं को मार डाला गया, 13 हिन्दू लापता हो गए, 24 हिन्दुओं के शरीर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किए गए, 62 हिन्दू सामान्य घायल हुए। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मुसलमानों पर हमले किए और कोहाट में दंगे आरम्भ हो गए। कुल मिलाकर 10 मुसलमान मार डाले गए, 1 या 2 मुसलमान लापता कर दिए गए, 6 मुसलमान बुरी तरह से तथा 17 मुसलमान सामान्य रूप से घायल हुए। इस घटना के बाद हिन्दुओं को कोहाट से रावलपिण्डी भेज दिया गया। कोहाट के दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए गांधीजी तीन बार रावलपिण्डी गए किंतु उनकी कोई सहायता नहीं कर सके। भाई परमानंद ने स्थानीय हिन्दू सभा की सहायता से पीड़ित हिन्दुओं को सहायता पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।


    विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

    जब भारत साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जलने लगा तो भारतवासियों को उनके गौरव का स्मरण कराने के लिए ई.1924 में श्यामलाल पार्षद ने कांग्रेस के लिए एक झण्डा-गीत लिखा जो इतना प्रसिद्ध हुआ कि हारमोनियम एवं ढोलक की मधुर धुनों पर कांग्रेस की प्रभात-फेरियों में गाया जाने लगा-


    विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

    सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला,

    वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा...।

    स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,

    कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जाए भय संकट सारा।। झंडा...।

    इस झंडे के नीचे निर्भय, लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,

    बोलें भारत माता की जय, स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा...।

    आओ! प्यारे वीरो, आओ। देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ,

    एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा।। झंडा...।

    इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए,

    विश्व-विजय करके दिखलाएं, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।। झंडा...।

    विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

    गांधीजी के अनुयाई जवाहरलाल नेहरू को इस गीत में हिंसा के तत्व दिखाई देते थे। इस गीत में बार-बार बोले जाने वाले विश्व-विजयी शब्द से उन्हें सख्त परहेज था। फिर भी यह गीत भारत की आजादी तक कांग्रेस की प्रभात-फेरियों का मुख्य आकर्षण बना रहा। इसके साथ ही बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित- 'वंदे मातरम्' गीत भी पूरे देश में धूम मचाता रहा तथा कांग्रेसियों से लेकर धुर-दक्षिण-पंथियों एवं क्रांतिकारियों तक की पहली पसंद बना रहा। अंग्रेजों से अधिक मुस्लिम लीग यह अनुभव करती थी कि ये गीत उनके विरोध में लिखे गए थे।


    बंगाल में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़

    बंगाल में हिन्दुओं की आबादी तेजी से घटती जा रही थी और मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही थी। इस कारण सड़कों, गली-मुहल्लों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर मस्जिदों की बाढ़ सी आ गई थी। जब कभी हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धार्मिक जुलूसों को लेकर गाजे-बाजे के साथ इन मस्जिदों के सामने से निकलते तो मुसलमान, इन जुलूसों पर हमला बोल देते थे। ई.1926 के मध्य में देश में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़ आ गई। सबसे पहले कलकत्ता में भयानक साम्प्रदायिक हमले शुरू हुए। छः सप्ताह तक कलकत्ता की सड़कों पर नृशंस हत्याएं हुईं। 110 स्थानों पर आगजनी हुई, मंदिरों और मस्जिदों पर हमले हुए। सरकारी वक्तव्य के अनुसार पहली मुठभेड़ में 44 मनुष्य मरे और 584 घायल हुए। दूसरी मुठभेड़ में 66 मनुष्य मरे और 391 घायल हुए। ये दंगे मुख्यतः मस्जिदों के सामने, हिन्दुओं के जुलूस एवं बाजे के प्रश्न को लेकर होते थे। मरने वालों एवं घायल होने वालों में हिन्दू अधिक थे। इस समय लॉर्ड इरविन भारत के गवर्नर जनरल थे।

    हिन्दू महासभा ने 22 मई 1926 को दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से मांग की कि कलकत्ता के हिन्दुओं की रक्षा की जाए। जब हिन्दू महासभा के डॉ. शिवराम मुंजे तथा पं. मदनमोहन मालवीय कलकत्ता गए तो बंगाल की सुहरावर्दी सरकार ने उन दोनों के विरुद्ध सम्मन जारी कर दिए। पूर्वी बंगाल में तो स्थिति और भी बुरी थी। वहाँ हिन्दू महिलाओं एवं बच्चों के अपहरण, बलात्कार, आगजनी एवं हत्याओं के मामले प्रतिदिन बढ़ने लगे। उत्तरी बंगाल के मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।


    गणपति उत्सव पर हमले

    महाराष्ट्र में भी गणपति उत्सव में जुलूस निकालने पर मुसलमानों द्वारा उन पर हमले किए जाने लगे। स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि हिन्दू महासभा ने देश की महिलाओं के नाम अपील की कि अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्रत्येक हिन्दू महिला अपने साथ शस्त्र रखे।


    कानपुर में साम्प्रदायिक हिंसा

    ई.1931 में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया और अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर सकी। इन्हीं दंगों के दौरान 25 मार्च 1931 को पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।


    देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर

    मालाबार, मुल्तान, कानपुर, महाराष्ट्र, बंगाल और अमृतसर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के कारण देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर प्रकट हुई। देश भर में हिन्दुओं के विरुद्ध हो रही हिंसक घटनाओं के विरोध में हिन्दू नेताओं ने 'हिन्दू-एकता' का नारा दिया। देश भर में हिन्दू महासभा की शाखाएं स्थापित की गईं। अखिल भारतीय क्षत्रिय सभा की स्थापना हुई। ई.1923 में डॉ. किचलू ने अमृतसर में तन्जीम और तबलीग आन्दोलन प्रारम्भ किया। ई.1925 में विजय दशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का गठन किया जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति की रक्षा करना था। पूरे भारत में इसकी शाखाएं स्थापित की गईं।

    ई.1928 में लाहौर में ऑर्डर ऑफ दी हिन्दू यूथ नामक संगठन की स्थापना की गई। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविंद घोष ने परतंत्र भारत की देह में आत्मगौरव के नवीन प्राण फूंकने के लिये उग्र-हिंदुत्व को जन्म दिया। कांग्रेस में लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक उग्र-हिंदुत्व के ध्वज-वाहक थे। इनके योगदान के सम्बन्ध में हम पूर्व में संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं। महाराष्ट्र में जन्मे विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू-राष्ट्रवाद की भावना को तिलक युग से आगे बढ़ाया। उन्होंने हिन्दुओं में राजनीतिक एवं सामाजिक एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया तथा हिन्दुओं के समान हितों पर बल देते हुए उन्हें संगठित होने का आह्नान किया। वे मुसलमानों को प्रसन्न करने वाली नीति के समर्थक नहीं थे। उनका कहना था कि- 'यदि भारतीय मुसलमान, स्वराज्य-प्राप्ति में सहयोग नहीं देना चाहते तो उनसे अनुनय-विनय करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मुसलमानों के बिना भी हिन्दू अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने में समर्थ हैं।' मुसलमानों के लिये साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं को, सावरकार का विरोध करने के बहाने, अपनी उग्र साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने का अच्छा अवसर प्राप्त हो गया।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-107

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-107

    नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर अपना पद छोड़ने की पेशकश की


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    अजमेर प्रकरण पर पटेल द्वारा नेहरू को लिखे गये पत्र के प्रत्युत्तर में नेहरू ने सरदार को लिखा कि आपके और मेरे बीच में इस प्रकार की घटनाओं की प्रवृत्ति तथा कठिनाइयां उत्पन्न होने से मैं बहुत अप्रसन्न हूँ। ऐसा लगता है कि आपकी और मेरी कार्य करने की प्रवृत्ति अलग-अलग प्रकार की है। यद्यपि आप और मैं एक दूसरे का बहुत आदर करते हैं तथापि हम दोनों के बीच जो विषय खड़ा हो गया है, इसे हम सबके द्वारा बहुत सावधानीपूर्वक लिया जाना चाहिये। यदि मुझे प्रधानमंत्री रहना है तो मुझ पर इस तरह के प्रतिबंध से मुक्ति होनी चाहिये।

    अन्यथा मेरे लिये यही उचित है कि मैं कुर्सी छोड़ दूं। मैं जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता और न यह चाहता हूँ कि आप ऐसा करें। इसलिये हम दोनों को इस परिस्थिति पर गहरा विचार करना चाहिये ताकि हमारे निर्णय राष्ट्र के लिये हितकारी हो सकें। हमने और आपने देश की लम्बी सेवा की है। यदि दुर्भाग्य से आपको अथवा मुझे सरकार से हटना पड़े तो इसे प्रतिष्ठापूर्ण एवं गरिमापूर्ण विधि से होने देना चाहिये। मैं प्रसन्नता पूर्वक त्यागपत्र देने और सत्ता आपको सौंपेने के लिये तैयार हूँ।

    सरदार पटेल ने नेहरू के इस पत्र का प्रत्युत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह सही है कि विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर आपके और मेरे काम करने के ढंग में अंतर है किंतु निष्कर्षतः अथवा अंतिम निर्णय के रूप में यह कहा जा सकता है कि आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। हम दोनों देश के भले के लिये एक समान उद्देश्य से काम कर रहे हैं। पटेल ने लिखा कि आयंगर का अजमेर भेजा जाना गलत था। मैं आपकी स्वतंत्रता को सीमित नहीं करना चाहता और न ही मैंने पहले कभी ऐसा किया है।

    न मेरा उद्देश्य आपके लिये किसी प्रकार की कोई समस्या खड़ी करना है किंतु जब यह हम दोनों को ही अपने उत्तरदायित्वों के क्षेत्र के आधारभूत प्रश्न, अधिकार तथा कार्यों में विरोधाभास स्पष्ट हों तब यह हमारे उन उद्देश्यों के लिये हितकारी नहीं होगा जो कि हम दोनों ही करना चाहते हैं।

    इस पत्र के मिलने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को गांधीजी के निवास पर मिलने का सुझाव दिया ताकि इस विषय पर आगे विचार-विमर्श किया जा सके। 6 जनवरी 1948 को नेहरू ने गांधीजी को एक नोट भिजवाया तथा उसकी एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। सरदार ने नेहरू के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें संदेश भिजवाया कि जो भी समय उन्हें उचित लगता हो, वे गांधीजी से तय कर लें। सरदार ने भी एक नोट गांधीजी को भिजवाया तथा उसकी प्रति नेहरू को दी।

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  • नेताओं ने गोरों को हटाने के लिये राजाओं का मनोबल तोड़ने का निश्चय किया!

     02.06.2020
    नेताओं ने गोरों को हटाने के लिये राजाओं का  मनोबल तोड़ने का निश्चय किया!

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    10 वर्ष के भारी प्रयासों के उपरांत भी कांग्रेस ब्रिटिश भारत के 11 प्रांतों एवं रियासती भारत के 562 राज्यों का एकीकरण नहीं करवा पाई। राजाओं ने इसे विफल करके रख दिया। इससे राष्ट्रीय नेताओं के मन में खीझ उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। अब वे राज्यों के अस्तित्व की आवश्यकता एवं वैधता पर चोट करने लगे। ऐसा करके वे दोधारी तलवार चलाना चाहते थे। एक तो राजाओं के मनोबल को तोड़कर वे उन्हें कमजारे करना चाहते थे और दूसरी ओर वे रियासती भारत की जनता में भी बेचैनी पैदा करना चाहते थे।


    कांग्रेस ने ई.1938 के हरिपुरा सम्मेलन में और उसके पश्चात अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद ने ई.1939 के लुधियाना सम्मेलन में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प व्यक्त किया। सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि भारतीय राज्यों का अस्तित्व इसलिये बचा रहा क्योंकि अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने उन्हें कृत्रिम समर्थन दिया हुआ था। इनमें आंतरिक जीवन रस सूख चुका था और इनकी शक्ति केवल अंग्रेजी साम्राज्यवाद पर आधारित थी। नेहरू ने इन राज्यों द्वारा अंग्रेजों के साथ स्थापित संधियों को भी मानने से इन्कार कर दिया तथा भारतीय राज्यों की पद्धति को भी अस्वीकार्य घोषित कर दिया।

    राजाओं के अड़ियल रवैये पर टिप्पणी करते हुए फरवरी 1940 में गांधी ने हरिजन में लिखा- ''मेरा अनुमान है कि राजा लोग ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे ताज से वरिष्ठ तो हो ही नहीं सकते। यदि ताज जो कि आज पूरे भारत पर शासन कर रहा है, वह भी अपनी सत्ता छोड़ने जा रहा है तो राजा लोग भी स्वतः अपनी सत्ता खो देंगे। राजाओं को इस बात पर गर्व होना चाहिये कि ब्रिटिश ताज के उत्तराधिकारी जो कि राजाओं के सम्मान की सुरक्षा करेंगे, भारत के लोग हैं। मैं यह दावा कांग्रेस की ओर से नही, अपितु भारत के लाखों बेजुबान लोगों की ओर से कर रहा हूँ।"

    गांधीजी का मानना था कि ब्रटिश भारत साम्राज्य के निर्माताओं ने इसके चार स्तंभ खड़े किये हैं- यूरोपियन हित, सेना, राजा लोग तथा सांप्रदायिक विभाजन। आखिरी तीन स्तंभों को पहले स्तंभ की सेवा करनी है। यदि साम्राज्य निर्माताओं को सम्राज्य समाप्त करना है तो उन्हें ये चारों स्तंभ नष्ट करने होंगे किंतु वे राष्ट्रवादी लोगों अथवा साम्राज्यवादी भावना के विध्वंसक लोगों से कहते हैं कि तुम्हें इन चारों स्तंभों से स्वयं निबटना होगा। दूसरे शब्दों में वे ये कह रहे हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की गारण्टी दो, अपनी सेना स्वयं बनाओ तथा राजाओं और अल्पसंख्यक कहे जाने वाले साम्प्रदायिक लोगों से निबटो।

    साम्राज्य को नष्ट करने को आतुर लोगों का कहना है कि अंग्रेजों ने यूरापीय लोगों के हितों को हम पर लादा, उनकी रक्षा के लिये सेना बनायी, उन हितों की बेहतरी से सुरक्षा की और अपने उद्देश्यों के लिये राजाओं का उपयोग किया। अंग्रेजों ने राजाओं को बनाया और बिगाड़ा, नये राजाओं का निर्माण किया, उन्हें शक्तियां दीं, इससे पहले वे सुरक्षा के साथ आनंद नहीं मना सकते थे। वास्तव में अंग्रेजों ने भारत का विभाजन कर दिया ताकि पूरा देश एक साथ उनके विरुद्ध खड़ा नहीं हो सके।

    राष्ट्रीय नेताओं का यह भी मानना था कि यद्यपि संघ हमारे लिये अपरिहार्य है किंतु इसके लिये हम कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाना चाहते। यदि संघ के निर्माण के लिये हमसे अत्यधिक कीमत मांगी जाती है तो उचित यह होगा कि हम अधिक अनुकूल परिस्थितियों के आने तक प्रतीक्षा करें।

    राष्ट्रीय नेताओं द्वारा ब्रिटिश सरकार पर आरोप लगाया कि ब्रिटिश सरकार ही राजाओं के माध्यम से संघ निर्माण की योजना में रोड़े अटका रही थी। यदि अधिनियम में संघ निर्माण के लिये रखी गयी केवल इसी शर्त की जाँच की जाये कि देशी राज्यों को संघ मिलाया जाना केवल उसी स्थिति में संभव था जबकि कम से कम इतने देशी राज्य संघ में सम्मिलित होने की सहमति दें, जिनके द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में कम से कम 52 प्रतिनिधि भेजे जाते हों तथा संघ में सम्मिलित होने की घोषणा करने वाले राज्यों की जनसंख्या देशी राज्यों की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम न हो, तो भी ब्रिटिश सरकार के इरादों की सच्चाई सामने आ जायेगी।

    उस समय भारत के देशी राज्यों में रहने वाली जनसंख्या 7 करोड़़ 90 लाख थी जिसका 50 प्रतिशत 3 करोड़़ 95 लाख होता है। जबकि भारत की सबसे बड़ी केवल 17 रियासतों की जनसंख्या 5 करोड़़ 3 लाख 77 हजार थी जो कि कुल रियासती जनसंख्या की तीन चौथाई थी किंतु इन रियासतों के संघ में मिलने का निर्णय लेने पर भी संघ का निर्माण किया जाना संभव नहीं था क्योंकि इन रियासतों द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में मात्र 41 सदस्य ही भेजे जाते थे। इस प्रकार संघ के निर्माण के लिये अधिनियम में अत्यंत अव्यवहारिक शर्त रखी गयी थी।

    वी. पी. मेनन ने लिखा है कि भारत सरकार द्वारा छोटे राज्यों को संघीय प्रस्ताव नहीं भेजे गये थे क्योंकि इस योजना के आरंभिक चरण में यह विचार बनाया गया था कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा सक्षम राज्यों का ही संघ बनाया जाये तथा बाद में छोटे राज्यों को भी इसमें सम्मिलित किया जाये। भारत सचिव का मानना था कि लघु राज्यों को पृथक इकाई के रूप में संघ में सम्मिलित किये जाने में कई कठिनाइयां थीं। इन राज्यों में प्रशासनिक व्यय चलाने के लिये पर्याप्त आर्थिक स्रोत नहीं थे। इन राज्यों की जनता संघ में प्रवेश पाने के बाद इस बात की प्रत्याशा करती कि उन्हें भी वैसा ही प्रशासन मिले जैसा कि बड़े राज्यों में है या ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में है। इन राज्यों के कार्मिक बहुत कम वेतन पाते थे तथा उनका प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं था। वे इतने सक्षम नहीं थे कि संघीय कानून के अनुसार प्रशासन चला पाते।

    ब्रिटिश भारत के प्रमुख राजनीतिक घटकों की रुचि इस बात में थी कि रियासती प्रजा संवैधानिक संघर्ष में उलझ जाये तथा राज्य के प्रशासन में प्रत्यक्ष तथा निर्णयकारी भागीदारी प्राप्त करें। बड़े राज्यों में तो इस प्रकार के आंदोलनों को समाप्त किया जाना सरल था किंतु लघु राज्यों में राज्यों के प्रशासन के लिये इस प्रकार के आंदोलनों पर नियंत्रण पाने के लिये पर्याप्त साधन नहीं थे।

    के. टी. शाह ने संघीय योजना के बारे में लिखा है- जड़ें सड़ी हुई हैं, पूरा ढांचा रद्दी वस्तुओं से बनाया गया है जिसके बाहर की ओर वार्निश, पॉलिश, रंग करके उसे नया रूप दे दिया गया है। इस प्रकार की जड़ों से किसी स्वस्थ विकास की आशा नहीं की जा सकती। इस प्रकार की संरचना में किसी प्रसन्नतादायी जीवन की संभावना नहीं हो सकती।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 13

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 13

    पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना और मुहम्मद इकबाल का उदय


    मुहम्मद अली जिन्ना

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    भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय देश को पाकिस्तान की ओर ले जाने वाले प्रमुख तत्त्वों में से एक था। मुहम्मद अली जिन्ना का जन्म ई.1876 में कराची के एक बड़े मुस्लिम व्यापारी के घर में हुआ था। भारत में यह बात प्रचलित है कि जिन्ना के पूर्वज गुजराती-हिन्दू थे, जबकि पाकिस्तानी यह मानते हैं कि उसके पूर्वज ईरान से आये थे। जिन्ना ने कभी भी स्वयं को इसपहानी नहीं कहा, जैसा कि उस समय के मुसलमान अपनी ईरानी वंशावली को प्रमाणित करने के लिये कहा करते थे। पाकिस्तान में अन्य लोग मानते हैं कि उसकी वंशावली राजपूत जाति में है, जिसका अर्थ है कि उनके पूर्वज हिन्दू थे। कहा जाता है कि वह राजपूत जाति पंजाब में साहिवाल कहलाती थी।

    जिन्ना के किसी पूर्वज ने गुजरात के समृद्ध खोजा समुदाय की लड़की से विवाह किया। उस दम्पत्ति के वंशज खोजा मुसलमान माने गये। हिन्दू पति तथा मुस्लिम पत्नी की संतान होने के कारण यह परिवार सांप्रदायिकता की सोच से बिलकुल अलग रहता था। मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजी माहौल में पला और बढ़ा। ई.1896 में मुहम्मद अली जिन्ना ने लंदन से बैरिस्टरी की परीक्षा पास की और उसी वर्ष बम्बई में वकालात आरम्भ की। दादाभाई नौरोजी, जिन्ना को राजनीति में लेकर आये। ई.1904 में जिन्ना कांग्रेस के बीसवें बम्बई अधिवेशन में फिरोजशाह मेहता के साथ सम्मिलित हुआ।

    ई.1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने उसे अपने सचिव की हैसियत से कांग्रेस के मंच से बोलने दिया। कांग्रेस में यह उसका पहला भाषण था। इस भाषण में उसने मुसलमानों के लिये अलग सुविधाओं की मांग का विरोध करते हुए कहा- 'मुसलमानों के साथ वही व्यवहार होना चाहिये जो हिन्दुओं के साथ हो रहा है।' इस प्रकार अपने राजनीतिक कैरियर के आरम्भ में जिन्ना राष्ट्रवादी था तथा भारत-विभाजन के पक्ष में नहीं था। ई.1906 में ढाका में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और लीग ने मुसलमानों के लिये पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग की तो जिन्ना ने उसका विरोध किया और कहा कि इस तरह का प्रयास देश को विभाजित कर देगा। ई.1913 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण की किंतु वह कांग्रेस का सदस्य भी बना रहा। उस समय मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा आदि विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य भी कांग्रेस की सदस्यता रख सकते थे। ई.1916 में मुहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रबल समर्थक था। इस विषय पर जोरदार भाषण देने का एक भी मौका वह हाथ से नहीं जाने देता था।

    ई.1919 में पार्लियामेंट्री कमेटी में एक गवाही देते हुए जिन्ना ने कहा- 'मैं भारतीय राष्ट्रवादी की हैसियत से बोल रहा हूँ।' इस घटना के बाद भारत के राष्ट्रवादियों ने जिन्ना को 'एकता का राजदूत' कहना आरम्भ किया। अंग्रेजों ने जिन्ना को पहचानने में अधिक विलम्ब नहीं किया। ई.1919 में बम्बई के गवर्नर जॉर्ज लॉयड ने वायसराय मांटेग्यू को लिखा था- 'जिन्ना जुबान के सफेद किंतु दिल के काले हैं.... उनके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता क्योंकि केवल वही हैं जो कहते एक बात हैं किंतु फौरन दूसरा काम करते नजर आते हैं।'

    ई.1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना ने गांधीजी को 'महात्मा' कहने से मना कर दिया और उन्हें मंच से 'मिस्टर घैण्ढी' कहकर सम्बोधित किया। इस पर कांग्रेस के नेताओं ने जिन्ना का अपमान किया। अंग्रेजियत के रंग में पला-बढ़ा जिन्ना, हिन्दी शब्दों का ढंग से उच्चारण नहीं कर पाता था। इसलिये वह गांधीजी को मिस्टर घैण्ढी कहता था। इस घटना के बाद, जिन्ना एवं नेहरू के बीच दूरियां बढ़ने लगीं जबकि गांधीजी ने जिन्ना को और अधिक कसकर गले लगाना शुरू कर दिया। 30 सितम्बर 1921 को जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गया फिर भी राष्ट्रवादी बना रहा। मोसले ने लिखा है- 'ई.1920 तक वह वैधानिक तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिये प्रचार करता था। ई.1928 तक वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करता था किंतु सत्ता के लालच ने उसे पहले कांग्रेस छोड़ने और फिर देश का बंटवारा करने की मांग करने के लिये विवश कर दिया।' ई.1933 में जब चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान नामक अलग देश की अवधारणा दी तो जिन्ना ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। मोसले ने लिखा है कि कुछ दिनों तक मुहम्मद अली जिन्ना का नाम भारतीय कवयित्री सरोजनी नायडू के साथ लिया जाता था। वह जिन्ना के प्रेम में पागल थी और उसे प्रेम की कवितायें लिखकर भेजती थी। माना जाता है कि सरोजनी नायडू से पीछा छुड़ाने के लिये ही मुहम्मद अली जिन्ना भारत छोड़कर लंदन चला गया और वहाँ उसने अपनी वकालात जमा ली। ई.1934 तक जिन्ना लंदन में बैरिस्ट्री करता रहा।


    पूरी तरह अंग्रेजी रंग में रंगा था पाकिस्तान का भावी जनक

    ई.1934 से ई.1947 तक की संक्षिप्त अवधि में भारतीय राजनीति के आकाश पर जिन्ना और गांधीजी एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन माने जाते थे। गांधीजी पूरी तरह भारतीय रंग में रंगे हुए, राजनीति के ऐसे धूमकेतु थे जिनका मुकाबला दुनिया का कोई दूसरा आदमी नहीं कर सकता था तो जिन्ना पूरी तरह से अंग्रेजियत के रंग में रंगा हुआ था। गांधी को जिन्ना की तुलना में कुरान की ज्यादा ही आयतें याद रही होंगी। इसके बावजूद जिन्ना की सफलता बेमिसाल थी क्योंकि उसने जिन मुसलमानों का दिल जीत कर दिखा दिया था, जिन्ना उनकी परम्परागत मातृभाषा उर्दू ठीक से बोल भी नहीं सकता था। उसके उच्चारण का हाल यह था कि एक बार उसने अपने भाषण के अंत में 'पैकिस्टैन जिण्डैबैड' कहा। कुछ पत्रकारों ने इन शब्दों का अर्थ 'पाकिस्तान इज इन बैग' लगाया जबकि वह तो 'पाकिस्तान जिंदाबाद' कहना चाहता था।


    गांधीजी को तनिक भी सहन नहीं करता था जिन्ना

    जिन्ना गांधीजी को बिल्कुल सहन नहीं कर पाता था। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- 'एक बार गांधीजी किसी वार्ता के लिये जिन्ना के निवास स्थान पर गये। मध्यांतर हुआ तो गांधीजी जिन्ना के बहुमूल्य पर्शियन कालीन पर लेट गये और अपने पेट पर मिट्टी रख ली। इस दृश्य को जिन्ना कभी भूल नहीं सका, कभी माफ नहीं कर सका। कम से कम दो बार जिन्ना को कांग्रेस के सार्वजनिक मंच से इसलिये भगाया गया क्योंकि कांग्रेसी सदस्य चाहते थे कि जिन्ना गांधीजी को महात्मा कहकर सम्बोधित करे जबकि जिन्ना उन्हें 'मिस्टर घैण्ढी' कहकर ही सम्बोधित करता था।


    पण्डित नेहरू को राजनीति में नहीं देखना चाहता था जिन्ना

    लैरी कालिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने अपनी पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- जवाहरलाल नेहरू के बारे में जिन्ना के मन में आक्रोश ही आक्रोश था। वह नेहरू के बारे में कहा करता- 'यहाँ राजनीति में नेहरू का क्या काम? जाएं अंग्रेजी के प्रोफेसर बनें। खिसकें। साहित्यकार हैं। राजनीति में घुसे आ रहे हैं। घमण्डी ब्राह्मण हैं। पश्चिमी पढ़ाई-लिखाई का बाना जरूर पहन लिया लेकिन अंदर से मक्कार हिन्दू..... हैं।'


    मैक्यावेली का शिष्य

    जिन्ना राजनीति में मैक्यावेली का शिष्य था जिसके अनुसार राजनीति में कोई निश्चित सिद्धांत कभी नहीं होता। वह अपने सिद्धांतों एवं मांगों में परिवर्तन करता रहता था। आरम्भ में वह विधान सभाओं में मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व मांगता था तो बाद में वह सिंध और सीमाप्रांत को अलग करने पर जोर देता था और केन्द्र में एक तिहाई स्थान प्राप्त करना चाहता था। अंत में वह भारत विभाजन का समर्थक बन गया जिसमें उसने सिंध एवं सीमाप्रांत के साथ-साथ पंजाब, बंगाल एवं असम को भी जोड़ लिया था। पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए उसने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत स्वीकार किया था किंतु पाकिस्तान बनने के बाद उसने धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्र के पक्ष में वक्तव्य दिया। इसके कुछ दिन बाद ही वह पाकिस्तान को कट्टर-मुस्लिम राज्य बनाने में जुट गया। कैबीनेट मिशन में प्रस्तावित भारतीय संघ में बनने वाले केन्द्र के नीचे वह प्रांतों के समूहीकरण का विरोध करता था किंतु पाकिस्तान का गवर्नर-जनरल बन जाने के बाद वह अमरीका के राजदूत से शिकायत करता था कि वह भारत के साथ साझा सेना, मुक्त व्यापार एवं खुली हुई सीमाएं चाहता है।


    सर मुहम्मद इकबाल

    मोहम्मद इक़बाल को अल्लामा इकबाल भी कहा जाता है। उसका जन्म 9 नवम्बर 1877 को पंजाब के सियालकोट जिले में (अब पाकिस्तान) में हुआ था। इकबाल के पूर्वज काश्मीरी शैव मत को मानने वाले ब्राह्मण थे। यह परिवार शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित स्प्रैण नामक गांव में रहता था इसलिए इन्हें 'सप्रू' कहा जाता था। इकबाल के परबाबा का नाम बीरबल, दादा का नाम कन्हैयालाल एवं पिता का नाम रतनलाल सप्रू था। शैव-ब्राह्मण होने के उपरांत भी रतनलाल एक अशिक्षित दर्जी था। गांव में उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी इसलिए रतनलाल स्प्रैण छोड़कर श्रीनगर चला गया। वहाँ उसने काश्मीर के अफगान सूबेदार के यहाँ नौकरी कर ली। वह अपने सूबेदार के लिए कर की उगाही किया करता था। एक बार उसने कर की रकम में बहुत बड़ी हेराफेरी की। अफगान सूबेदार ने उसे पकड़ लिया और उसके सामने दो विकल्प रखे, या तो वह मुसमलान बन जाए या सूली पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाए। रतनलाल मुसलमान बन गया। उसने अपना नाम 'शेख़ नूर मोहम्मद' रख लिया और काश्मीर से भाग कर स्यालकोट चला गया। वहाँ उसने 'इमाम बीबी' नामक एक मुस्लिम लड़की से विवाह कर लिया। इसी दाम्पत्य से इकबाल का जन्म हुआ। इमाम बीबी विनम्र तथा सहयोगी स्वभाव की महिला थी। उसने अपने पुत्र इक़बाल को पढ़ने के लिए ब्रिटेन भेज दिया।

    इकबाल कुछ समय तक इंग्लैण्ड में पढ़ता रहा और उसके बाद ब्रिटेन से जर्मनी चला गया। जर्मनी में भी इकबाल ने कुछ समय तक अध्ययन किया। इकबाल ने भारत लौटकर तीन विवाह किये। उसका पहला विवाह करीम बीबी के साथ हुआ था जो एक गुजराती चिकित्सक ख़ान बहादुर अता मोहम्मद ख़ान की पुत्री थी। इससे इक़बाल को पुत्री मिराज बेगम और पुत्र आफ़ताब इक़बाल की प्राप्ति हुई। इसके बाद इक़बाल ने दूसरा विवाह सरदार बेगम के साथ किया जिससे इकबाल को पुत्र जाविद इक़बाल की प्राप्ति हुई। दिसम्बर 1914 में इक़बाल ने तीसरा विवाह मुख्तार बेगम के साथ किया। इकबाल काश्मीर में हिन्दू राजा के राज्य का विरोध करने लगा। उसने काश्मीर के मुसलमानों को महाराजा हरिसिंह के विरुद्ध भड़काया। चूंकि काश्मीरी पण्डित महाराजा हरिसिंह के समर्थक थे इसलिए इकबाल काश्मीरी पण्डितों का भी दुश्मन बन गया और उनके विरुद्ध जहर उगलने लगा।

    मोहम्मद इक़बाल कट्टर मजहबी विचारों का व्यक्ति था। उसका मानना था कि इस्लाम रूहानी आज़ादी की जद्दोजहद के जज्बे का अलमबरदार है और सभी प्रकार के मजहबी अनुभवों का निचोड़ है। वह कर्मवीरता का एक जीवन्त सिद्धान्त है, जो जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है। इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, जो सच्चे जीवन मूल्यों का निर्माण कर सकता है और अनवरत संघर्ष के द्वारा प्रकृति के ऊपर मनुष्य को विजयी बना सकता है। इकबाल ने एक गीत- 'लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी' भी लिखा जो मुसलमानों का कौमी तराना बन गया। 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' नामक गीत लिखकर उसने बड़ी लोकप्रियता अर्जित की। कुछ लोगों का मानना था कि यह द्विअर्थी गीत था जिसमें 'मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना' का अर्थ यह था कि मुसलमान आपस में बैर नहीं करें। 'हम बुलबुलें हैं इसकी' का गूढ़ अर्थ यह था कि समय आने पर बुलबुलें दाना चुगकर उड़ जाएंगी। अपने गीतों से प्रसिद्धि पाकर वह राजनीति में घुस आया था। इकबाल की कविताओं एवं लेखों ने भारत के मुसलमानों में यह भावना भर दी कि, भारत में उनकी भूमिका हिन्दुओं से पृथक है। ई1922 में उसे सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा ज्ञदपहीज ठंबीमसवत बनाया गया। इक़बाल ने ही सबसे पहले ई.1930 में भारत के सिंध एवं पंजाब आदि प्रांतों के भीतर काश्मीर को मिलाकर एक नया मुस्लिम राज्य बनाने का विचार रखा।

    इक़बाल के विचारों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उसे 'सर' की उपाधि दी। ईरान में उसकी कविताएं इकबाल लाहौरी के नाम से प्रसिद्ध हैं। ई.1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग का वार्षिक सम्मेलन आयोजित हुआ। सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में डा. इकबाल ने मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान के आधार पर भारत में एक 'अलग मुस्लिम राष्ट्र' या फेडरेशन की स्थापना की वकालात की। इकबाल ने कहा- 'मैं पंजाब, काश्मीर, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को एक अलग राष्ट्र में एकीकृत होते हुए देखना चाहता हूँ। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन हो या ब्रिटिश साम्राज्य से अलग एक एकीकृत उत्तर-पश्चिम भारतीय मुस्लिम राष्ट्र- मुझे मुसलमानों, खासकर उत्तर-पश्चिमी भारत के मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होती है।' यह विभाजित भारत का पहला नक्शा था। उस समय तक पाकिस्तान शब्द का आविष्कार नहीं हुआ था। इसलिये इसे 'मुस्लिम-भारत' कहा गया। इस संकल्पना में बंगाल सम्मिलित नहीं था।

    मुहम्मद इकबाल ने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। इकबाल की मृत्यु 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में हुई। उसे पाकिस्तान का राष्ट्रकवि घोषित किया गया। अब पाकिस्तान में उसे कवि के रूप में कम जाना जाता है, पीर के रूप में ज्यादा पूजा जाता है। जर्मन में इकबाल के नाम पर एक गली का नामकरण किया गया है। पाकिस्तान में उसकी कब्र पर रोज उसी प्रकार भीड़ होती है जिस प्रकार भारत में सूफी संतों की मजारों पर होती है।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-108

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-108

    गांधी की मृत्यु के साथ ही पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया


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    नेहरू ने अपने नोट में गांधीजी को अजमेर प्रकरण के सम्बन्ध में घटी घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी दी तथा कुछ प्रश्न उठाये। क्या प्रधानमंत्री इस प्रकार का कदम उठाने के लिये अधिकृत थे। इस बात का निर्णय किसे लेना था ? यदि प्रधानमंत्री को इस प्रकार का कदम उठाने का अधिकार नहीं था, और न ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार था तो वे इस पद पर ढंग से काम नहीं कर सकेंगे और न ही अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे। नेहरू ने इस नोट में गांधी को लिखा कि यह तो पृष्ठभूमि है। किंतु निरंतर उठ रही व्यावहारिक कठिनाईयों के सम्बन्ध में सिद्धांत क्या रहेगा ?

    यदि सीधे शब्दों में कहें तो कैबीनेट में कुछ व्यवस्थायें करने की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति पर उत्तरदायित्व का निर्माण कर सके। वर्तमान परिस्थितियों में या तो मैं जाऊँ या सरदार जायें। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा या हम दोनों में से किसी एक का सरकार से बाहर जाने का अर्थ यह नहीं है कि हम आगे से एक दूसरे का विरोध करेंगे। हम सरकार के भीतर रहें अथवा बाहर, हम विश्वसनीय कांग्रेसी रहेंगे, विश्वसनीय साथी रहेंगे तथा हम अपने कार्यक्षेत्र में फिर से एक साथ आने के लिये कार्य करेंगे।

    सरदार पटेल ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री के दायित्वों के सम्बन्ध में नेहरू की धारणा से असहमति व्यक्त की। यदि प्रधानमंत्री इसी प्रकार कार्य करेगा तो वह एक निरंकुश शासक बन जायेगा। प्रधानमंत्री, सरकार में, बराबर के मंत्रियों में सबसे पहला है। वह अपने साथियों पर कोई बाध्यकारी शक्तियां नहीं रखता।

    पटेल ने गांधी को लिखा कि प्रधानमंत्री ने अपने नोट में लिखा है कि यदि प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के बीच सामंजस्य नहीं बनता है तो एक को जाना होगा। यदि ऐसा ही होना है तो मुझे जाना चाहिये। मैंने सक्रिय सेवा का दीर्घ काल व्यतीत किया है। प्रधानमंत्री देश के जाने-माने नेता हैं तथा अपेक्षाकृत युवा हैं। उन्होंने अपने लिये अंतर्राष्ट्रीय छवि स्थापित की है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि मेरे और उनके बीच में निर्णय उनके पक्ष मं् होगा। इसलिये उनके कार्यालय छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं है।

    इन दोनों नेताओं के मध्य, गांधीजी के समक्ष होने वाला विचार-विमर्श गांधीजी के उपवास के कारण स्थगित कर देना पड़ा। इसके अन्य कारण भी थे। कश्मीर समस्या अपने चरम पर पहुँच गई थी तथा देश में साम्प्रदायिक तनाव भी अपने उच्चतम स्तर पर था। भारत सरकार इस समय संक्रांति काल में थी। एक छोटा सा धक्का भी बहुत बड़ा नुक्सान पहुँचा सकता था।

    अंत में गांधी की मृत्यु पर दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया और उसके बाद उनके झगड़े सदैव के लिये मिट गये। दोनों ने एक साथ देश को सम्बोधित किया तथा जनता को संभावित हिंसा से दूर रहने का आह्वान किया।गांधी की हत्या ने नेहरू और पटेल को एक किया। इसी के साथ पटेल और नेहरू के बीच रहने वाला स्थाई विरोध और मतभेद काल के गर्त में समा गये।

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  • भारत के लिए बड़ा सिर-दर्द बन चुके हैं रोहिंग्या मुसलमान !

     02.06.2020
    भारत के लिए बड़ा सिर-दर्द बन चुके हैं रोहिंग्या मुसलमान !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    रोहिंग्या मुसलमान बहुत गरीब हैं, वक्त के मारे हुए हैं, भूख, कुपोषण और रोगों के शिकार हैं, दाने-दाने को मोहताज हैं। इनकी व्यथा को जितना अनुभव किया जाए, उतना कम है। ये दुनिया के सबसे सताए हुए लोग हैं, इस बात को संयुक्त राष्ट्र संघ भी कह चुका है किंतु बर्मा, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड तथा भारत कोई भी देश इन लोगों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। आखिर क्यों ! मानवाधिकार वादी बुद्धिजीवी चाहे कितना ही प्रलाप क्यों न कर लें किंतु वास्तविकता यह है कि रोहिंग्या मुसलमान अपनी बुरी स्थिति के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं। ये लोग मूलतः बांग्लादेश के रहने वाले हैं तथा जिस तरह करोड़ों बांग्लादेशी भारत में घुस कर रह रहे हैं, उसी प्रकार ये भी रोजी-रोटी की तलाश में बांग्लादेश छोड़कर बर्मा में घुस गए। 1962 से 2011 तक बर्मा में सैनिक शासन रहा। इस अवधि में रोहिंग्या मुसलमान चुपचाप बैठे रहे किंतु जैसे ही वहां लोकतंत्र आया, रोहिंग्या मुसलमान बदमाशी पर उतर आए।

    जून 2012 में बर्मा के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों ने एक बौद्ध युवती से बलात्कार किया। जब स्थानीय बौद्धों ने इस बलात्कार का विरोध किया तो रोहिंग्या मुसलमानों ने संगठित होकर बौद्धों पर हमला बोल दिया। इसके विरोध में बौद्धों ने भी संगठित होकर रोहिंग्या मुसलमानों पर हमला कर दिया। इस संघर्ष में लगभग 200 लोग मारे गए जिनमें रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या अधिक थी। तब से दोनों समुदायों के बीच हिंसा का जो क्रम आरम्भ हुआ, वह आज तक नहीं थमा। रोहिंग्या मुसलमानों ने नावों में बैठकर थाइलैण्ड की ओर पलायन किया किंतु थाइलैण्ड ने इन नावों को अपने देश के तटों पर नहीं रुकने दिया। इसके बाद रोहिंग्या मुसलमानों की नावें इण्डोनेशिया की ओर गईं और वहाँ की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी।

    रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा में रोहिंग्या रक्षा सेना का निर्माण करके अक्टूबर 2016 में बर्मा के 9 पुलिस वालों की हत्या कर दी तथा कई पुलिस चौकियों पर हमले किए। इसके बाद से बर्मा की पुलिस रोहिंग्या मुसलमानों को बेरहमी से मारने लगी और उनके घर जलाने लगी इस कारण बर्मा से रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन का नया सिलसिला आरम्भ हुआ। वर्तमान में लगभग 20 हजार रोहिंग्या मुसलमान बर्मा तथा बांग्लादेश की सीमा पर स्थित नाफ नदी के तट पर डेरा डाले हुए हैं। वे भूख से तड़प रहे हैं तथा उन्हें जलीय क्षेत्रों में रह रहे सांप भी बड़ी संख्या में काट रहे हैं। उनमें से अधिकतर बीमार हैं तथा तेजी से मौत के मुंह में जा रहे हैं।

    बहुत से रोहिंग्या मुसलमानों ने भागकर बांग्लादेश में शरण ली किंतु भुखमरी तथा जनसंख्या विस्फोट से संत्रस्त बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों का भार उठाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए इन्हें वहाँ भोजन, पानी रोजगार कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ और हजारों रोहिंग्या मुसलमानों ने भारत की राह पकड़ी। भारत का पूर्वी क्षेत्र पहले से ही बांग्लादेश से आए मुस्लिम शरणार्थियों से भरा हुआ है, अतः भारत नई मुस्लिम शरणार्थी प्रजा को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।

    तुर्की के राष्ट्रपति रचैब तैयब बांग्लादेश जाकर इस समस्या का समाधान करना चाहते हैं तथा वे अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से रोहिंग्या मुसलमानों को बर्मा में ही रहने देने के लिए बर्मा की राष्ट्रपति आंग सान सू ची पर दबाव बनाना चाहते हैं। इस बीच अफगानिस्तान की नोबल पुरस्कार विजेता मलाला ने ट्वीट जारी कर सू ची की निंदा करते हुए कहा है कि मैं बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पीड़न के समाचारों से दुखी हूँ। सू ची की कठिनाई यह है कि यदि वह रोहिंग्या मुसलमानों का कठोरता से दमन जारी नहीं रखती हैं तो बर्मा में 50 सालों के संघर्ष के बाद आया लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा तथा बर्मा की सेना, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को कमजोर घोषित करके पुनः सत्ता पर अधिकार जमा लेगी।

    इसी बीच भारत में भी कम्युनिस्ट विचारधारा तथा मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले संगठनों से जुड़े बुद्धिजीवियों के धड़ों ने भारत सरकार पर दबाव बनाना आरम्भ कर दिया है कि रोहिंग्या मुसलमानों को भारत स्वीकार करे। प्रश्न ये है कि इस बात की क्या गारण्टी है कि रोहिंग्या मुसलमान आगे चलकर भारत के लिए सिरदर्द सिद्ध नहीं होंगे! जबकि आगे चलकर देखने की जरूरत नहीं है, वे आज ही भारत के लिए सिरदर्द बन चुके हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 14

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 14

    साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलनों एवं स्वराज्य दल की गतिविधियों से विवश होकर ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के बारे में सलाह देने के लिए साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस कमीशन के समस्त सदस्य अँग्रेज थे। इसलिये इसे व्हाइट कमीशन भी कहते हैं। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया। भारत-सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि साइमन कमीशन का विरोध करने से क्या लाभ है जबकि भारतवासी स्वयं ऐसा कोई संविधान तैयार करने में असमर्थ हैं जिसे भारत के समस्त दल स्वीकार करते हों! भारतीय नेताओं ने भारत-सचिव की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तथा भारत के भावी संविधान के लिये एक प्रस्ताव तैयार करने हेतु एक समिति का गठन किया।

    मोतीलाल नेहरू को समिति का अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू को सचिव नियुक्त किया गया। इसमें सुभाषचंद्र बोस तथा सर तेज बहादुर सप्रू सहित कुल 8 सदस्य थे। इस समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है। इस रिपोर्ट में भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना, अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए अधिकारों की घोषणा तथा वयस्क मताधिकार आदि बातें सम्मिलित की गईं। दिसम्बर 1928 में सर्वदलीय बैठक में जिन्ना ने नेहरू समिति के प्रस्तावों पर तीन संशोधन रखे किन्तु वे स्वीकार नहीं किये गये। मुहम्मद शफी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने प्रारम्भ से ही नेहरू समिति का बहिष्कार किया। 31 दिसम्बर 1928 और 1 जनवरी 1929 को आगा खाँ की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय मुस्लिम कान्फ्रेंस की बैठक बुलाई गई। इसमें नेहरू रिपोर्ट के समस्त प्रस्तावों के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किये गये। जिन्ना ने इस कान्फ्रेंस में भाग नहीं लिया परंतु उसने मार्च 1929 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें नेहरू रिपोर्ट के मुकाबले 14 शर्तें रखीं। मुस्लिम सम्प्रदाय से सम्बन्धित शर्तें इस प्रकार थीं-

    (1) भविष्य का संविधान संघीय होना चाहिए तथा बची हुई शक्ति का प्रयोग प्रान्तों द्वारा होना चाहिए।

    (2) सभी प्रान्तों के लिए स्वायत्त शासन का एक माप स्वीकार किया जाए।

    (3) देश के समस्त विधानमण्डलों एवं अन्य चुनी गई पार्टियों का एक निश्चित सिद्धांत पर पुनर्गठन हो जो प्रत्येक प्रान्त में प्रभावशाली अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करे।

    (4) केन्द्र में मुस्लिम प्रतिनिधित्व एक तिहाई से कम नहीं होना चाहिए।

    (5) प्रतिनिधित्व साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली पर आधारित हो।

    (6) पंजाब, बंगाल, उत्तर प्रदेश और सीमा प्रान्त में कोई प्रादेशिक पुनर्विभाजन मुस्लिम बहुसंख्यकों को प्रभावित न करे।

    (7) पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता हो, यदि किसी समुदाय के 3/4 सदस्य विरोध प्रकट करें तो वह विधेयक पारित नहीं किया जाए।

    (8) सिंध को बम्बई से पृथक किया जाए।

    (9) अन्य प्रान्तों की तरह उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त एवं बलूचिस्तान में भी समान अधिकार दिए जाएं।

    (10) मुस्लिम संस्कृति, धर्म, निजी कानून, मुस्लिम शिक्षा तथा भाषा के उत्थान एवं रक्षा के लिए खुली वकालात करने की छूट हो।

    (11) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को संरक्षण प्राप्त हो।

    (12) केन्द्र एवं प्रांतीय सरकारों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या 1/3 हो।

    (13) यूनिटों की स्वीकृति के बिना संविधान में परिवर्तन नहीं किया जाए।

    (14) पृथक् मतदान प्रणाली, मुस्लिम स्वीकृति के बिना नहीं हटाई जाए।

    नेहरू रिपोर्ट में जिन्ना की मांग संख्या 1, 12 एवं 13 को छोड़कर शेष 11 मांगें पहले ही मान ली गई थीं किंतु जिन्ना को इनसे संतोष नहीं हुआ। दूसरी ओर हिन्दू महासभा को भी नेहरू समिति के कई प्रस्ताव स्वीकार नहीं थे, विशेषकर सिंध को बम्बई से पृथक् किए जाने का प्रस्ताव। शाहनवाज भुट्टो, मुहम्मद अली जिन्ना और सर गुलाम हुसैन चाहते थे कि सिंध को बम्बई से अलग किया जाए किंतु लाला लाजपतराय तथा हरचंदराय सिंध को बम्बई के साथ ही रखना चाहते थे ताकि पृथक सिंध क्षेत्र के रूप में एक मुस्लिम बहुल प्रांत का उदय नहीं हो सके। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, सिंध हिन्दू पंचायत आदि संगठनों ने पृथक्कीकरण के प्रस्ताव का विरोध किया। हिन्दू महासभा का आरोप था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण करने के लिए नेहरू रिपोर्ट में हिन्दुओं के लिए अहितकर प्रस्ताव रखे गए थे। इस प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के कारण यह रिपोर्ट कूड़े के ढेर में फैंक दिए जाने से अधिक महत्व प्राप्त नहीं कर सकी।


    साइमन कमीशन की रिपोर्ट

    ई.1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में दिए गए मुख्य सुझाव इस प्रकार थे-

    (1) प्रांतों में दोहरा शासन समाप्त करके उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए।

    (2) भारत के लिए संघीय शासन की स्थापना की जाए।

    (3) उच्च न्यायालय को भारतीय सरकार के अधीन कर दिया जाए।

    (4) अल्पसंख्यकों के हितों के लिए गवर्नर एवं गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां दी जाएं।

    (5) सेना का भारतीयकरण हो।

    (6) बर्मा को भारत से पृथक् किया जाए तथा सिंध एवं उड़ीसा को नए प्रांतों के रूप में मान्यता दी जाए।

    (7) प्रत्येक दस वर्ष पश्चात् भारत की संवैधानिक प्रगति की जांच को समाप्त कर दिया जाए तथा ऐसा लचीला संविधान बनाया जाए जो स्वतः विकसित होता रहे।

    सर जॉन साइमन साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली का विरोधी था। उसके अनुसार यह एक घृणित प्रणाली है जो वही बीमारी पैदा करती है जिसके निदान के लिए इसका प्रयोग किया जाता है परन्तु मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड आयोग की ही भांति साइमन कमीशन ने भी कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौते के सांप्रदायिक अंशों को स्वीकार कर लिया तथा मुसलमानों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व अर्थात् केन्द्रीय सभा एवं प्रांतीय विधायिकाओं में मुसलमानों के लिए अलग सीटों के आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार कर लिया। साइमन कमीशन की रिपोर्ट में भारत में बनने वाले भावी संघ के निम्न-सदन (लोकसभा) में 250 सीटें प्रस्तावित की गईं जिनमें से गैर-मुस्लिमों को 150 (60 प्रतिशत) तथा मुस्लिमों को 100 (40 प्रतिशत) सीटें देनी प्रस्तावित की गईं।


    पृथक मुस्लिम राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध

    नेहरू समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए 14 सूत्री मांग-पत्र के रूप में जिन्ना का साम्प्रदायिक कार्यक्रम सामने आ चुका था, कांग्रेस इस कार्यक्रम को अस्वीकार तो करती थी किंतु देश में जिन्ना का खुलकर विरोध नहीं किया जा रहा था। नवम्बर 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाने वाला था। इसलिए हिन्दू महासभा के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. शिवराम मुंजे ने एक वक्तव्य जारी करके भारत सरकार को संविधान संशोधन के विषय में कुछ सुझाव दिए-

    (1) सभी समुदायों को अपने मताधिकार के प्रयोग करने के समस्त अधिकार सभी प्रांतों में समान होने चाहिए।

    (2) समस्त समितियों के लिए संयुक्त चुनाव पद्धति द्वारा चुनाव कराए जाएं।

    (3) किसी धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर सीटों के आरक्षण न दिए जाएं।

    (4) किसी भी प्रांत में सीटों का आरक्षण बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में नहीं हो।

    (5) भारत के प्रांतों का प्रतिनिधित्व, यदि आवश्यक हो तो योग्यता के आधार पर किया जाए।

    (6) धर्म की बहुलता के आधार पर प्रांतों की रचना नहीं की जानी चाहिए जिसके कारण भारत मुस्लिम भारत, सिख भारत, ईसाई भारत और हिन्दू भारत के रूप में विभाजित हो जाए तथा राष्ट्रीयता के लिए बाधक बन जाए।

    (7) सरकारी नौकरियों की प्राप्ति में किसी धर्म या जाति को महत्व न देकर प्रतियोगिता को महत्व दिया जाए।

    (8) केन्द्र एवं प्रांतीय मंत्रिमण्डलों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या निर्धारित नहीं की जानी चाहिए, सम्मिलित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

    (9) केन्द्र सरकार को अपनी बची हुई शक्ति प्रांतों को नहीं देनी चाहिए। केन्द्र सरकार मजबूत होनी चाहिए।

    (10) सभी सम्प्रदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वतंत्रता, पूजा पद्धति की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा प्राप्ति की स्वतंत्रता तथा संस्थाओं के गठन की स्वतंत्रता होनी चाहिए।


    लंदन के गोलमेज सम्मेलनों में सरकार की विफलता

    साइमन कमीशन की रिपोर्ट में प्रस्तावित संघीय-भारत के निर्माण की दिशा में विचार विमर्श करने हेतु, ब्रिटिश सरकार ने 12 नवम्बर 1930 को लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया। सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में तीव्र मतभेद हो जाने से भारत में संघीय सरकार के निर्माण पर कोई निर्णय नहीं हो सका। 17 सितम्बर 1931 को लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से अकेले गांधीजी ने भाग लिया। यह सम्मेलन भी असफल रहा। 17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस समय कांग्रेस अवैध संस्था घोषित हो चुकी थी इसलिये वह सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी।


    सिंध को मुस्लिम-बहुल प्रांत बनाने की मांग

    मुस्लिम लीग के ई.1930 के इलाहाबाद सम्मेलन के तुरंत बाद ई.1931 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने भारतीय विधान सभाओं में मुस्लिम समुदाय के लिये जनसंख्या के अनुपात से सीटों के आरक्षण की मांग की। उन्होंने यह मांग भी की कि सिंध को नये मुस्लिम बहुल प्रांत का दर्जा दिया जाये। ई.1931 में जिन्ना ने कहा कि भारत की समस्या को सुलझाने के लिए चार पक्षों में बात-चीत आवश्यक थी- (1) अंग्रेज सरकार, (2) भारतीय राज्य (देशी रियासतें) (3) मुसलमान और (4) हिन्दू। ई.1938 में उसने अपने इस तर्क को पुनः दोहराया।


    अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की हवा निकाली

    ई.1932 में अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयास किए गए तथा एकता सम्मेलन का आयेाजन किया गया। इस सम्मेलन द्वारा नवम्बर 1932 में नियुक्त कमेटी हिन्दू-मुस्लिम समस्या के हल के एकदम करीब पहुंच गई थी। केन्द्रीय विधानसभा में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के बारे में एक समझौता भी हो गया था और तय हो गया था कि 32 प्रतिशत सीटें मुसलमानों को दी जाएंगी। लेकनि कमेटी का काम पूरा होने से पहले ही भारत सचिव सैमुएल होर ने हस्तक्षेप किया और घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को केंद्रीय विधानसभा में 33.33 प्रतिशत सीटें देने का फैसला किया है। उसने सिंध को भी अलग प्रदेश घोषित किया और उसको प्रचुर आर्थिक सहायता देने का वायदा किया। इस तरह एकता सम्मेलन की सारी मेहनत पर पानी फिर गया।


    ई.1932 का साम्प्रदायिक पंचाट

    जब गोलमेज सम्मेलनों से भी साम्प्रदायिक समस्या का समाधान नहीं हो पाया तो 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश सरकार ने अपनी तरफ से साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा की। इस पंचाट निर्णय के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने केन्द्रीय विधान सभा में गैर-मुस्लिमों को 250 में से 105 सीटें (42 प्रतिशत) दी गईं जबकि भारत में हिन्दुओं की संख्या 75 प्रतिशत थी। मुसलमानों को 33 प्रतिशत सीटें दी गईं जबकि उनकी जनसंख्या 25 प्रतिशत थी। साइमन कमीशन ने गैर-मुस्लिमों के लिए केन्द्रीय विधान सभा में 250 में से 150 (60 प्रतिशत) सीटें प्रस्तावित की थीं किंतु प्रधानमंत्री मैकडानल ने इन सीटों को घटाकर 42 प्रतिशत कर दिया। इससे हिन्दुओं, सिक्खों, जैनों एवं बौद्धों में सरकार एवं मुसलमानों के प्रति क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इस पंचाट निर्णय के अन्तर्गत मुसलमानों की ही तरह यूरोपियनों, सिक्खों, भारतीय ईसाईयों, एंग्लो-इंण्डियनों, राजाओं और जागीरदारों को विभिन्न प्रान्तीय विधान सभाओं में अपने-अपने समुदायों के प्रतिनिधियों को पृथक् निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने का अधिकार दिया गया।

    डा. अम्बेडकर के प्रयत्नों से दलित वर्ग को अपने प्रतिनिधियों को पृथक निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने की सुविधा दी गई। इस प्रकार इस पंचाट के माध्यम से अँग्रेजों ने बांटो एवं राज्य करो के सिद्धान्त पर देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने, दलितों को अलग प्रतिनिधित्व देकर हिन्दू-समाज का बंटवारा करने, भारतीय अल्पसंख्यकों को अनुचित महत्त्व प्रदान कर राष्ट्रीय एकता को छिन्न-छिन्न करने, राजाओं और जागीरदारों के लिए पृथक्-निवार्चन की व्यवस्था कर अप्रजातांत्रिक तत्त्वों को प्रोत्साहन देने तथा भारत में प्रगतिशील तत्त्वों की गतिविधियों को नियंत्रित एवं कमजोर करने का षड़यंत्र रचा तथा धर्म एवं व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व का विभाजन करके भारत को नई समस्याओं के खड्डे में फैंक दिया।


    गांधी और अम्बेडकर में पूना-पैक्ट

    गांधीजी ने साम्प्रदायिक पंचाट का, विशेषकर दलितों को हिन्दुओं से पृथक् करने वाले प्रावधानों का जोरदार विरोध किया तथा 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गये। डॉ. अम्बेडकर ने इस व्रत को 'राजनैतिक धूर्त्तता' बताया। कुछ लोगों ने इसे अपनी मांग मनवाने का तरीका बतलाया। जब गांधीजी का स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने लगा तब कांग्रेसी नेताओं ने 26 सितम्बर 1932 को डॉ. अम्बेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता करवाया। यह समझौता पूना पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध है। इसके द्वारा साम्प्रदायिक पंचाट के आपत्तिजनक भाग को हटाया गया तथा डॉ.अम्बेडकर दलितों के लिए दुगने स्थान सुरक्षित करवाने में सफल रहे। भारत की समस्या के हल को लेकर डॉ. अम्बेडकर का गांधीजी और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों से विवाद रहता था। इसलिए अम्बेडकर ने गांधी और जिन्ना की तुलना करते हुए कहा कि- 'इन दोनों ही नेताओं को भारतीय राजनीति से अलग हो जाना चाहिए।'


    भारत सरकार अधिनियम 1935 में अल्पसंख्यकों का हिन्दुओं पर वर्चस्व

    लंदन के तीन गोलमेज सम्मेलनों एवं साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा के बाद भारत में नया संविधान लागू किया गया। इसे भारत सरकार अधिनियम 1935 कहते हैं। इस संविधान ने भारत सरकार अधिनियम 1919 का स्थान लिया। नए कानून के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे-

    (1) बर्मा को भारत से पृथक् कर दिया जाएगा।

    (2) उड़ीसा एवं सिंध नामक नवीन प्रांतों का गठन किया जाएगा।

    (3) एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश-भारत के प्रान्त एवं देशी राज्य सम्मिलित होंगे।

    (4) प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा।

    (5) शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किए जायेंगे- (प) संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे। (पप) प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा (पपप) समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून मान्य होगा।

    (6) संघीय संविधान के अधीन दो सदन होंगे।

    (7) हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में 375 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के प्रतिनिधियों की संख्या 250 एवं देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 125 होगी।

    (8) निम्न-सदन में ब्रिटिश-भारत के 250 प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा होगा। इनमें से 105 सीटें सामान्य थीं जबकि 19 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 82 सीटें मुसलमानों के लिए, 6 सीटें सिक्खों के लिए, 4 एंग्लो-इण्डियन के लिए 8 सीटें यूरोपियन्स के लिए, 8 सीटें भारतीय ईसाइयों के लिए, 11 सीटें उद्योगपतियों के लिए, 7 सीटें जमींदारों के लिए, 10 सीटें श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए, 9 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थीं।

    (9) कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में कुल 260 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के सदस्यों की संख्या 156 तथा देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 104 होगी। ब्रिटिश-भारत के 156 सदस्यों में से 75 सीटें जनरल के लिए, 6 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 4 सिक्खों के लिए, 49 मुसलमानों के लिए, 6 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।

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