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  • राजस्थान का प्राचीन इतिहास

     03.06.2020
     राजस्थान का प्राचीन इतिहास

    जनपदकाल

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के तीन सौ वर्ष पूर्व तक का समय जनपद काल कहलाता है। यहाँ से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के काल में और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, राजस्थान में प्राचीन जनपदों के नाम लिखिये।)

    मौर्यकाल

    मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गयी। कोटा जिले के कणसवा गाँव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहाँ मौर्य वंश के राजा ‘धवल’ का राज्य था। ई. 733 के लगभग जब बप्पा रावल ने चित्तौड़ विजय किया तब वहाँ मौर्य राजा ‘मान’ का राज्य था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास पूठोली गाँव में मानसरोवर नामक तालाब के किनारे राजा मान का ई. 713 का एक शिलालेख मिला है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, उन दो साक्ष्यों का उल्लेख कीजिये जिनसे पता चलता है कि मौर्यों का राजस्थान से भी सम्बन्ध था।) मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    विदेशी जातियों के आक्रमण

    मौर्यों का पतन हो जाने के बाद राजस्थान छोटे-छोटे गणों में बंट गया। इस कारण भारत भूमि पर विदेशी जातियों के आक्रमण बढ़ गये। यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई. पू. 150 में मध्यमिका नगरी को अपने अधिकार में लेकर अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई. पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये।

    सौराष्ट्र से प्राप्त उषवदात के लेख के अनुसार शकों का राजा पुष्कर होता हुआ मथुरा तक पहुँचा। ये लोग ई. पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल 95 ई. से 127 ई. के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार 83 ई. से 119 ई. तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। 150 ई. के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आस पास था।

    विदेशी जातियों का पतन

    ई. 130 से 150 के मध्य शक शासक रुद्रदामन तथा यौधेयों के मध्य घनघोर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में यौधेय पराजित हो गये। ई. 150 के लगभग नागों की भारशिव शाखा ने अपनी शक्ति बढ़ानी आरंभ की तथा विदेशी शासकों को भारत से बाहर निकालने का काम आरंभ किया। इन नागों ने यौधेय, मालव, अर्जुनायन, वाकटाक, कुणिंद, मघ आदि जातियों की सहायता से पंजाब, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश को कुषाणों से मुक्त करवा लिया। नागों ने कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजयों के उपलक्ष्य में वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। वह स्थान आज भी दशाश्वमेध घाट कहलाता है।

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर ‘मालवानाम् जयः’ अंकित है।

    शक, कुषाण और हूण आदि जातियाँ केवल सामरिक उद्देश्य एवं सत्ता के विस्तार के लिये भारत में आयीं थीं। उन्होंने बौद्ध धर्म को चोट तो पहुचांई किंतु उनके अपने पास ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं था जिसके प्रसार के लिये वे किसी अन्य तरह का प्रयास करतीं। इसलिये जैसे ही उनकी सत्ता समाप्त हुई, वे भारतीय संस्कृति में रच बस गये और वे भारत की मूल राष्ट्रीय धारा में पूरी तरह घुल मिल गये।

    इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष हैं। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गये। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी सत्ता गणतंत्रात्मक बनाये रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्व रखते थे।

    गुप्तकाल

    भारतीय इतिहास में 320 ईस्वी से 495 ईस्वी तक का काल गुप्तकाल के नाम से जाना जाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्व हमेशा के लिये नष्ट हो गया। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जालोर जिले के भीनमाल तथा अन्य स्थानों पर देखे जा सकते हैं। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गये।

    हूणों का आक्रमण

    हूणों के आक्रमण गुप्त काल में आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने सभी गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्यों को छिन्न भिन्न कर दिया तथा उस काल तक विकसित हुए सभ्यता के सभी केंद्र नष्ट कर दिये। इनमें वैराट, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। (ये नाम बाद के हैं, तब इन स्थानों के नाम कुछ और रहे होंगे।) मालवा के राजा यशोवर्मन (अथवा यशोधर्मन) ने 532 ई. में हूणों को परास्त कर राजस्थान में शांति स्थापित की किंतु उसके मरते ही राजस्थान में पुनः अशांति हो गयी।

    हर्षवर्धन

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। पुष्यभूति वंश को वर्धन वंश भी कहते हैं। हर्ष के बारे में हमें दो गं्रथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। चीनी लेखक मा-त्वान-लिन ने भी हर्ष की विजयों का वर्णन किया है। नौसारी दानपत्र, खेड़ा से प्राप्त दद्द के दानपत्र में भी हर्ष के वलभी युद्ध का उल्लेख है। कल्हण की राजतरंगिणी हर्ष के कश्मीर का राजा होने की पुष्टि करती है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, हर्ष के समय के इतिहास के प्रमुख स्रोतों का उल्लेख कीजिये।)

    चीनी लेखकों ने हर्ष को शीलादित्य कहकर पुकारा है। ई. 606 में वह थानेश्वर का राजा हुआ किंतु कुछ ही समय बाद अपने बहनोई ग्रहवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज भी उसके अधीन हो गया। उसने कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनाया तथा सम्पूर्ण भारत में एकछत्र शासन स्थापित करने के उद्देश्य से विशाल सेना का निर्माण किया। हर्षचरित के अनुसार सेनापति सिंहनाद ने हर्ष को सलाह दी कि वह अन्य राजाओं का दमन करे। ह्वेनसांग ने हर्ष की दिग्विजय यात्रा का विस्तार से उल्लेख किया है। उसके अनुसार हर्ष ने गद्दी पर बैठने के बाद 6 वर्ष तक युद्ध किये तथा उसके बाद 30 साल तक निर्भय होकर शासन किया किंतु यह वर्णन सही नहीं है क्योंकि कई साक्ष्य बताते हैं कि उसने 612 ई. के पश्चात् भी अनेक युद्ध किये।

    चीनी लेखक मा-त्वान-लिन लिखता है कि उसके सैनिकों ने 618 से 627 ई. के बीच अपने कवच शरीर पर से नहीं उतारे। ई. 620 में हर्ष ने दक्षिण भारत पर अधिकार करने का प्रयास किया किंतु चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने उसे नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया। हर्षचरित के अनुसार हर्षदेव ने 643 ई. में कांगोद पर आक्रमण किया। 708 ई. के नौसारी दानपत्र से ज्ञात होता है कि हर्षदेव ने वल्लभी नरेश धु्रवसेन द्वितीय को पराजित किया। यह युद्ध 629 ई. में हुआ। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1999- इतिहास, हर्ष के सैनिक अभियानों के तिथिक्रम की समीक्षा कीजिये।)

    जब हर्ष ने दक्षिणी भारत पर आक्रमण किया तो चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय ने हर्ष का मार्ग रोका। इस अभियान का नेतृत्व स्वयं हर्ष ने किया। कुछ विद्वान इस युद्ध का समय 612 ई. मानते हैं तो कुछ 630 से 640 ई. के बीच। 630 ई. का लोनेरा का अभिलेख पुलकेशी की सफलताओं का वर्णन करता है किंतु इसमें हर्ष की पराजय का उल्लेख नहीं है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि यह संघर्ष 630 ई. के पश्चात हुआ होगा। पुलकेशिन ने हर्ष को परास्त करके परमेश्वर की उपाधि धारण की तथा उसे नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया। 643 ई. में हर्ष ने पुनः पुलकेशिन के राज्य पर आक्रमण किया तथा उससे कांगोद छीन कर अपनी पूर्व पराजय का बदला लिया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, हर्ष पुलकेशिन संघर्ष पर एक टिप्पणी लिखिये।)

    सी-यू-की का कथन है कि शीलादित्य (हर्षवर्धन) ने पूर्व से लेकर पश्चिम तक के समस्त राजाओं को जीत लिया तथा वह दक्षिण की ओर आगे बढ़ा। राजतरंगिणी का कथन है कि कश्मीर कुछ समय तक हर्ष के अधीन रहा। चालुक्य अभिलेख उसे ‘सकलोत्तरापथनाथ’ कहते हैं। इनसे अनुमान होता है कि उसका राज्य नेपाल से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक फैल गया। थानेश्वर, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, सिंध तथा उत्तरप्रदेश भी उसके अधीन थे।

    हर्ष ने वल्लभी के शासक धु्रवसेन द्वितीय को परास्त किया तथा संधि करके उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय ने गुर्जर नरेश दद्द की सहायता से हर्ष को नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया इस कारण दक्षिण भारत में वह अपना शासन नहीं फैला सका किंतु हर्ष ने कांगोद पर अधिकार कर लिया था। हर्ष चरित के अनुसार सम्पूर्ण उत्तर भारत हर्ष के अधीन था।

    पूर्व में मगध, कामरूप (असम तथा बंगाल) भी हर्ष के अधीन हो गये थे। कुछ विद्वानों ने हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और उड़ीसा को उसके राज्य में माना है जिन्हें ह्वेनसांग ने पंचभारत कहकर पुकारा है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हर्ष का राज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में आसाम तक फैला हुआ था। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1996, हर्ष की राज्य सीमा निर्धारित कीजिये। दक्षिण भारत में उसके समसामयिक शासक कौन थे?)

    बांसखेड़ा से प्राप्त ताम्रपत्र एवं नालंदा तथा सोनीपत की राजमुद्राओं पर हर्ष को परम माहेश्वर कहा गया है। वह हर पाँच वर्ष में प्रयाग में धर्म सम्मेलन किया करता था जिसमें वह प्रथम दिन बुद्ध की, दूसरे दिन सूर्य की और तीसरे दिन भगवान शिव की पूजा किया करता था। वह सभी धर्मावलंबियों को दान देता था किंतु बौद्ध भिक्षुओं को अधिक मात्रा में धन प्रदान करता था। उसने ह्वेनसांग के आगमन पर महायान धर्म का विशेष सम्मेलन बुलाया जिसमें 18 देशों के राजा, महायान व हीनयान धर्म के 3000 भिक्षु, 300 ब्राह्मण, जैनाचार्य तथा नालंदा विहार के 1000 भिक्षुओं को बुलाया। इस सम्मेलन में भगवान बुद्ध की मूर्ति को सबसे आगे रखा गया तथा उसके पीछे भास्कर वर्मा ब्रह्मा की वेशभूषा में तथा हर्षवर्धन शक्र (इंद्र)की वेशभूषा बनाकर चले। हर्ष ने उड़ीसा में महायान धर्म के प्रचार के लिये 4 धर्म प्रचारक भी भेजे। इन तथ्यों से ज्ञात होता है कि वह शैव होते हुए भी बौद्ध धर्म का बड़ा आदर करता था। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1994- इतिहास अभिलेखीय साक्ष्य के अनुसार हर्ष की धार्मिक आस्था क्या थी? वही जो उसके पूर्वजों की थी अथवा उससे भिन्न?)

    हर्ष ने शैव धर्म तथा बौद्ध धर्म के साथ-साथ संस्कृत साहित्य के उत्कर्ष के लिये भी काम किया। उसके दरबार में रहने वाले राजकवि बाणभट्ट ने कादम्बरी तथा हर्ष चरित की रचना की। हर्ष के दरबार में रहने वाले मतंग नामक कवि ने सूर्यशतक की रचना की। स्वयं हर्ष ने संस्कृत में तीन नाटक नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। बाणभट्ट लिखता है कि हर्ष की संस्कृत भाषा की कविताओं में अमृत की वर्षा होती थी। हर्ष की यह धार्मिक नीति तथा संस्कृत भाषा के संरक्षण की नीति उससे पूर्व मौर्य सम्राट अशोक ने भी अपनायी थी। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, हर्ष का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था। उसके साथ ही उसने संस्कृत साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। पूर्व इतिहास से सम्बन्धित इस प्रकार के किसी शासक का उदाहरण दीजिये।)

    हर्ष न केवल महान विजेता तथा साम्राज्य निर्माता था अपितु वह एक कुशल शासक भी था। उसका शासन बड़ा ही उदार, दयालु तथा प्रजाहितकारी था। उसने बहुत हल्के तथा कम संख्या में कर लगाये जिसे देने में प्रजा को कष्ट न हो। देश में शांति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिये उसने कठोर दण्ड विधान बनाया। इस कारण अपराधों की संख्या कम हो गयी। हर्ष स्वयं अपने राज्य में घूम-घूम कर अपनी प्रजा के हाल जानता रहता था। प्रजा की कठिनाइयां ज्ञात होने पर वह उन कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास करता था। वह अपने कर्मचारियों पर निर्भर न रहकर राज्यकार्य स्वयं ही करने को प्राथमिकता देता था। वह धर्मनिष्ठ, विद्यानुरागी एवं विद्वानों का आश्रयदाता था।

    हर्ष ने तिब्बत, चीन तथा मध्य एशिया के साथ सांस्कृतिक सम्पर्क स्थापित किये तथा चीन में अपने दूत भिजवाये। वह सूर्य एवं शिव का उपासक था फिर भी उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये प्रयास किया। प्रयाग की पंचवर्षीय धर्मसभा में वह सभी धर्मावलंबियों को दान देता था। उसके लिये कहा जाता है कि उसमें समुद्रगुप्त था अशोक दोनों ही महान शासकों के गुण थे। उसके बाद भारत वर्ष में इतना महान हिंदू शासक नहीं हुआ जिसका इतने बड़े क्षेत्र पर अधिकार हो। इस कारण उसे भारत का अंतिम महान शासक माना जाता है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1996-इतिहास, हर्षवर्धन को प्राचीन भारत का अंतिम महान शासक क्यों माना जाता है?)

    हर्ष के काल में राजपूताना चार भागों में विभक्त था- 1. गुर्जर, 2. बघारी, 3. बैराठ तथा 4. मथुरा। बयालीस वर्ष तक सफलता पूर्वक शासन करने के बाद 648 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। उसके बाद देश में पुनः अव्यवस्था फैल गयी।

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  • भारत में राजपूत शासक वंशों का उदय

     03.06.2020
    भारत में राजपूत शासक वंशों का उदय

    भारत में राजपूत शासक वंशों का उदय


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    पुष्यभूति राजा हर्षवर्द्धन की मृत्यु के उपरान्त भारत की राजनीतिक एकता पुनः भंग हो गई और देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई। इन राज्यों के शासक राजपूत थे। इसलिये इस युग को 'राजपूत-युग' कहा जाता है। इस युग का आरम्भ 648 ई. में हर्ष की मृत्यु से होता है और इसका अन्त 1206 ई. में भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना से होता है। इसलिये 648 ई. से 1206 ई. तक के काल को भारतीय इतिहास में 'राजपूत-युग' कहा जाता है।

    राजपूत युग का महत्त्व

    भारतीय इतिहास में राजपूत युग का बहुत बड़ा महत्त्व है। इस युग में भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए। लगभग साढ़े पाँच शताब्दियों तक राजपूत योद्धाओं ने वीरता तथा साहस के साथ मुस्लिम आक्रांताओं का सामना किया और देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करते रहे। यद्यपि वे अंत में विदेशी आक्रांताओं से परास्त हुए परन्तु लगभग छः शताब्दियों तक उनके द्वारा की गई देश सेवा भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। राजपूत शासकों में कुछ ऐसे विशिष्ट गुण थे, जिनके कारण उनकी प्रजा उन्हें आदर की दृष्टि से देखती थी। राजपूत योद्धा अपने वचन का पक्का होता था और किसी के साथ विश्वासघात नहीं करता था। वह शत्रु को पीठ नहीं दिखाता था। वह रणक्षेत्र में वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त करना पसंद करता था। राजपूत योद्धा, निःशस्त्र शत्रु पर प्रहार करना महापाप और शरणागत की रक्षा करना परम धर्म समझता था। वह रणप्रिय होता था और रणक्षेत्र ही उसकी कर्मभूमि होती थी। वह देश की रक्षा का सम्पूर्ण भार वहन करता था।

    राजपूत योद्धाओं के गुणों की प्रशंसा करते हुए कर्नल टॉड ने लिखा है- 'यह स्वीकार करना पड़ेगा कि राजपूतों में उच्च साहस, देशभक्ति, स्वामि-भक्ति, आत्म-सम्मान, अतिथि-सत्कार तथा सरलता के गुण विद्यमान थे। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- 'राजपूत में आत्म-सम्मान की भावना उच्च कोटि की होती थी। वह सत्य को बड़े आदर की दृष्टि से देखता था। वह अपने शत्रुओं के प्रति भी उदार था और विजयी हो जाने पर उस प्रकार की बर्बरता नहीं करता था, जिनका किया जाना मुस्लिम-विजय के फलस्वरूप अवश्यम्भावी था। वह युद्ध में कभी बेईमानी या विश्वासघात नहीं करता था और गरीब तथा निरपराध व्यक्तियों को कभी क्षति नहीं पहुँचाता था।' राजपूत राजाओं ने देश को धन-धान्य से परिपूर्ण बनाने के अथक प्रयास किये।

    सांस्कृतिक दृष्टि से भी राजपूत युग का बड़ा महत्त्व है। उनके शासन काल में साहित्य तथा कला की उन्नति हुई और धर्म की रक्षा का प्रयत्न किया गया। राजपूत राजाओं ने अपनी राजसभाओं में कवियों तथा कलाकारों को प्रश्रय, पुरस्कार तथा प्रोत्साहन दिया। इस काल में असंख्य मन्दिरों एवं देव प्रतिमाओं का निर्माण हुआ और मंदिरों को दान-दक्षिणा से सम्पन्न बनाया गया।

    राजपूत शब्द की व्याख्या

    राजपूत शब्द संस्कृत के 'राजपुत्र' का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। प्राचीन काल में राजपुत्र शब्द का प्रयोग राजकुमारों तथा राजवंश के लोगों के लिए होता था। प्रायः क्षत्रिय ही राजवंश के होते थे, इसलिये 'राजपूत' शब्द सामान्यतः क्षत्रियों के लिए प्रयुक्त होने लगा। जब मुसलमानों ने भारत में प्रवेश किया तब उन्हें राजपुत्र शब्द का उच्चारण करने में कठिनाई हुई, इसलिये वे राजपुत्र के स्थान पर राजपूत शब्द का प्रयोग करने लगे। राजपूत शब्द की व्याख्या करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'राजपूताना के कुछ राज्यों में साधारण बोलचाल में राजपूत शब्द का प्रयोग क्षत्रिय सामन्त या जागीदार के पुत्रों को सूचित करने के लिए किया जाता है परन्तु वास्तव में यह संस्कृत के राजपुत्र शब्द का विकृत स्वरूप है जिसका अर्थ हेाता है राजवंश का।'

    राजपूत शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सातवीं शताब्दी के दूसरे भाग में हुआ। उसके पूर्व कभी इस शब्द का प्रयोग नहीं हुआ, इसलिये राजपूतों की उत्पति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद उत्पन्न हो गया। इस सम्बन्ध में डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'राजपूतों की उत्पति विवाद ग्रस्त है। राजपूतों की उत्पत्ति को निश्चित रूप से निर्धारत करने के लिए ऐतिहासिक विदग्धता का प्रयोग किया गया है और ब्राह्मण साहित्य तथा चारणों की प्रशस्तियों में उन्हें जो उच्च अभिजातीय स्थान प्रदान किया गया है उसने कठिनाई को अत्यधिक बढ़ा दिया है।'

    राजपूतों की उत्पत्ति

    राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् उन्हें विशुद्ध प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान बताते हैं तो कुछ उन्हें विदेशियों के वशंज। कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत मिश्रित-रक्त के हैं।

    (1) प्राचीन क्षत्रियों से उत्पत्ति: अधिकांश भारतीय इतिहासकारों के अनुसार राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं जो अपने को सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी मानते हैं। यह विचार भारतीय अनुश्रुतियों तथा परम्परा के अनुकूल पड़ता है। प्राचीन अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है कि प्राचीन क्षत्रिय समाज दो भागों में विभक्त था। इनमें से एक सूर्यवंशी और दूसरा चन्द्रवंशी कहलाता था। कालान्तर में इनकी एक तीसरी शाखा उत्पन्न हो गई जो यदुवंशी कहलाने लगी। इन्हीं तीन शाखाओं के अन्तर्गत समस्त क्षत्रिय आ जाते थे। इनका मुख्य कार्य शासन करना तथा आक्रमणकारियों से देश की रक्षा करना था। क्षत्रियों का यह कार्य भारतीय जाति-व्यवस्था के अनुकूल था। कालान्तर में कुल के महान् ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के नाम पर भी वंश के नाम पड़ने लगे। इससे क्षत्रियों की अनेक उपजातियां बन गईं। हर्ष की मृत्यु के उपरान्त क्षत्रियों की इन्हीं विभिन्न शाखाओं ने भारत के विभिन्न भागों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। ये शाखाएं सामूहिक रूप से राजपूत कहलाईं। राजपूतों का जीवन, उनके आदर्श तथा उनका धर्म उसी प्रकार का था, जो प्राचीन क्षत्रियों का था। उनमें विदेशीपन की कोई छाप नहीं थी। इसलिये अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने उन्हें प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान माना है।

    (2) अग्निकुण्ड से उत्पत्ति: पृथ्वीराज रासो के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई। जब परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश कर दिया तब समाज में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और लोग कर्त्तव्य भ्रष्ट हो गये। इससे देवता बड़े दुःखी हुए और आबू पर्वत पर एकत्रित हुए, जहाँ एक विशाल अग्निकुण्ड था। इसी अग्निकुण्ड से देवताओं ने प्रतिहारों (पड़िहारों), परमारों (पँवारों), चौलुक्यों (सोलंकियों) तथा चाहमानों (चौहानों) को उत्पन्न किया। इसलिये ये चारों वंश अग्निवंशी कहलाते हैं। इस अनुश्रुति के स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि यह अनुश्रुति सोलहवीं शताब्दी की है। इसके पूर्व इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इसलिये यह चारणों की कल्पना प्रतीत होती है। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि इन राजपूतों ने अग्नि के समक्ष, अरबों तथा तुर्कों से देश की रक्षा की शपथ ली। इसलिये ये अग्निवंशी कहलाये। कुछ अन्य इतिहासकारों की धारणा है कि ब्राह्मणों ने यज्ञ द्वारा जिन विदेशियों की शुद्धि करके क्षत्रिय समाज में समाविष्ट कर लिया था, वही अग्निवंशी राजपूत कहलाये। अग्निकुण्ड से राजपूतों की उत्पति मानने वाले बहुत कम विद्वान हैं। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'यह स्पष्ट है कि कथा कोरी गल्प है और इसे सिद्ध करने के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह ब्राह्मणों द्वारा उस जाति को अभिजातीय सिद्ध करने का प्रयास प्रतीत होता है, जिसका समाज में बड़ा ऊँचा स्थान था और जो ब्राह्मणों को मुक्त हस्त होकर दान देते थे। ब्राह्मणों ने बड़े उत्साह के साथ उस उदारता का बदला देने का प्रयत्न किया।'

    (3) विदेशियों से उत्पत्ति: पुराणों में हैहय राजपूतों का उल्लेख शकों तथा यवनों के साथ किया गया है। इस कारण कुछ इतिहासकारों ने राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों से बतलाई है। कर्नल टॉड ने राजपूतों तथा मध्य एशिया की शक तथा सीथियन जातियों में बड़ी समानता पाई है। इसलिये वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राजपूत उन्हीं विदेशियों के वंशज हैं। ये जातियाँ समय-समय पर भारत में प्रवेश करती रही हैं। उन्होंने कालान्तर में हिन्दू धर्म तथा हिन्दू रीति रिवाजों को स्वीकार कर लिया। चूँकि ये विदेशी जातियाँ, शासक वर्ग में आती थीं, जिस वर्ग में भारत के प्राचीन क्षत्रिय आते थे, इसलिये उन्होंने प्राचीन क्षत्रियों का स्थान ग्रहण कर लिया और राजपूत कहलाने लगे। टॉड के इस मत का अनुमोदन करते हुए स्मिथ ने लिखा है- ' मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि शकों तथा कुषाणों के राजवंश, जब उन्होंने हिन्दू धर्म को स्वीकार कर लिया तब हिन्दू जाति-व्यवस्था में क्षत्रियों के रूप में सम्मिलित कर लिये गये।' राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का समर्थन करते हुए क्रुक ने लिखा है- 'आजकल के अनुसन्धानों ने राजपूतों की उत्पत्ति पर काफी प्रकाश डाला है। वैदिक क्षत्रियों तथा मध्य काल के राजपूतों में ऐसी खाई है जिसे पूरा करना असंभव है।' इस मत को स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई यह है कि यदि समस्त राजदूत विदेशी थे तो हर्ष की मृत्यु के उपरान्त भारत के प्राचीन क्षत्रियों की एक जीवित तथा शक्तिशाली जाति, जिसके हाथ में राजनीतिक शक्ति थी, सहसा कहाँ, कैसे और कब विलुप्त हो गई ? इस मत को स्वीकार करने में दूसरी कठिनाई यह है कि राजपूतों का जीवन उनके आदर्श, उनका नैतिक स्तर तथा उनका धर्म विदेशियों से बिल्कुल भिन्न और प्राचीन क्षत्रियों के बिल्कुल अनुरूप है। इसलिये उन्हें विदेशी मानना अनुचित है।

    (4) मिश्रित उत्पत्ति: इस मत के अनुसार विभिन्न कालखण्डों में शक, कुषाण, हूण, सीथियन गुर्जर आदि जो विदेशी जातियाँ भारत में आकर शासन करने लगीं, उन्होंने भारतीय क्षात्र-धर्म स्वीकार कर लिया, वे भारतीय क्षत्रियों में घुल-मिल गईं। भारतीय समाज में विदेशियों को आत्मसात् करने की बहुत बड़ी क्षमता थी इसलिये विदेशी जातियाँ भारतीयों में घुल-मिल गईं। इनके विलयन की सर्वाधिक सम्भावना थी, क्योंकि विदेशी शासक भी भारतीय क्षत्रियों की भाँति शासक वर्ग के थे और उन्हीं के समान वीर तथा साहसी थे। इसलिये यह स्वाभाविक प्रतीत होता है कि विदेशी शासकों एवं प्राचीन भारतीय क्षत्रिय कुलों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गये और उनके आचार-व्यवहार तथा रीति-रिवाज एक से हो गये हो। इसी से कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि राजपूत लोग निश्चय ही प्राचीन क्षत्रियों के वशंज हैं तथा उनमें विदेशी रक्त के सम्मिश्रण की भी सम्भावना है।

    (5) अन्य मत: परशुराम स्मृति में राजपूत को वैश्य पुरुष तथा अम्बष्ठ स्त्री से उत्पन्न बताया है। इससे वह शूद्र सिद्ध होता है किंतु विद्वानों के अनुसार परशुराम स्मृति का यह कथन मूल ग्रंथ का नहीं है, उसे बाद के किसी काल में क्षेपक के रूप में जोड़ा गया है।

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  • मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

     03.06.2020
    मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

    मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

    बीकानेर राज्य


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    भारतवर्ष के बीकानेर, किशनगढ़, ईडर, विजयनगर, झाबुआ, अमझेरा, रतलाम, सीतामऊ तथा सैलाना राज्यों के शासक, जोधपुर के राठौड़ वंश में से ही निकले थे। जोधपुर नरेश राव जोधा के 20 पुत्र थे जिनमें से पांचवे पुत्र बीका का जन्म 14 जुलाई 1440 को हुआ था। बीका ने ई.1485 में बीकानेर राज्य की स्थापना की। यह एक रेगिस्तानी राज्य था। ई.1526 में जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय बीका का छोटा पुत्र लूणकर्ण बीकानेर का राजा था। बाबर के भारत पर आक्रमण के दिनों में ही लूणकर्ण की मृत्यु हुई। लूणकर्ण के 12 पुत्र थे जिनमें सबसे ज्येष्ठ जैतसिंह लूणकर्ण की मृत्यु के बाद बीकानेर की गद्दी पर बैठा। बीकानेर के इतिहास में उसे जैतसी कहा जाता है।

    बाबर के पुत्र कामरान का आक्रमण

    ई.1534 में बाबर के पुत्र कामरान ने भटनेर (हनुमानगढ़) पर आक्रमण करके उस पर अधिकार जमा लिया तथा बीकानेर को घेर लिया। कामरान ने जैतसी को कहलवाया कि वह मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ले। इस पर जैतसी ने कहलावाया कि ‘‘जाओ कामरान से कह देना कि जिस प्रकार मेरे वंश के मल्लीनाथ, सातल, रणमल, जोधा, बीका, दूदा, लूणकर्ण तथा गांगा ने मुसलमानों का गर्व भंजन किया था, उसी प्रकार मैं भी तेरा नाश करूंगा। कामरान की विशाल एवं क्रूर सेना के भय से बीकानेर नगर में दहशत फैल गयी किंतु जैतसी ने बुद्धिमानी से काम लिया और राजधानी से दूर जाकर ऐसे स्थान से कामरान की सेना पर आक्रमण किया कि कामरान की सेना को सिर पर पैर रखकर भागना पड़ा। यह एक हिन्दू राजा की मुगलों पर बड़ी विजय थी।

    मालदेव द्वारा बीकानेर पर अधिकार

    ई.1542 में जोधपुर नरेश मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया। राव जैतसी अपने साथियों सहित युद्ध के मैदान में ही मारा गया। जैतसी को मारने के बाद मालदेव जांगल देश पर अधिकार करके जोधपुर लौट गया। जैतसी के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र राव कल्याणमल बीकानेर की गद्दी का अधिकारी हुआ किंतु बीकानेर राज्य पर मालदेव ने अधिकार जमा लिया और अपनी ओर से कूंपा महराजोत तथा पंचायण करमसियोत को बीकानेर राज्य का प्रबंधक नियुक्त किया।

    शेरशाह सूरी द्वारा बीकानेर राज्य की सहायता

    जैतसिंह के मारे जाने पर उसके मंत्री नगराज ने जैतसिंह के परिवार की सुरक्षा का प्रबंध किया तथा दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी की सेवा में उपस्थित होकर मालदेव के विरुद्ध सैनिक सहायता की याचना की। उन्हीं दिनों मेड़ता का राजा वीरमदेव भी मालदेव से नाराज होकर शेरशाह सूरी के पास पहुंचा। इन सबने मिलकर राव मालदेव के विरुद्ध सैनिक अभियान किया। शेरशाह अस्सी हजार सैनिक लेकर सुमेल में आ धमका। जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल भी अपनी सेना के साथ मालदेव के विरुद्ध आया। मालदेव भी पचास हजार सैनिक लेकर गिर्री के रण क्षेत्र में आया। शेरशाह ने मालदेव के विरुद्ध षड़यंत्र रचा जिससे मालदेव को अपने सेनानायकों जैता और कूंपा पर संदेह हो गया तथा मालदेव युद्ध का मैदान छोड़कर जोधपुर लौट आया। जैता और कूंपा लगभग आधी हिन्दू सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में डटे रहे। दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। शेरशाह अब भी हिन्दू सेना से घबराता रहा और युद्ध में भाग न लेकर नमाज पढ़ने बैठ गया। अन्त में मुस्लिम सेना की विजय हुई। युद्ध की समाप्ति पर शेरशाह ने अल्लाह को धन्यवाद देते हुए कहा- एक मुट्ठी बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता’। इधर जब मालदेव शेरशाह से उलझा हुआ था तब कल्याणमल के विश्वस्त रावत किशनसिंह ने बीकानेर राज्य में जोधपुर राज्य द्वारा स्थापित थानों को लूटना आरंभ कर दिया। वह लूणकरणसर, गारबदेसर तथा भीनासर थानों को उजाड़कर बीकानेर जा पहुंचा। उसने बीकानेर के दुर्ग पर अधिकार करके कल्याणमल की दुहाई फेर दी। प्रमोद माणिक्य गणि के शिष्य जयसोम ने कर्मचन्द्र वंशो कीर्तनकं काव्यम् नामक ग्रंथ में लिखा है कि मंत्री नगराज ने शेरशाह के हाथ से ही कल्याणमल को टीका दिलवाकर बीकानेर भेजा और आप बादशाह के साथ गया। बाद में बादशाह की आज्ञा लेकर नगराज बीकानेर लौटा किंतु मार्ग में अजमेर में उसका देहांत हो गया।

    मुगल सेनापति बैरामखां को शरण

    ई.1556 में अकबर आगरा की गद्दी पर बैठा। उस समय वह 14 वर्ष का बालक था। अकबर का पिता हुमायूं जब फारस से हिन्दुस्तान लौटा तो वहां से बैराम खां नामक सरदार को लेकर आया। बैराम खां ने 14 वर्ष के बालक अकबर को हिन्दुस्तान की गद्दी पर बैठाया और हुमायूं के भाइयों, लोदी शासकों, पठानों, शेरशाह सूरी के सरदारों तथा हेमू जैसे प्रबल शत्रुओं से अकबर की रक्षा की। अकबर ने उसे खानखाना की उपाधि देकर अपना प्रधान मंत्री नियुक्त किया किंतु ऐसे स्वामिभक्त और ताकतवर अनुचर (बैरामखां) को अकबर अधिक दिन तक नहीं देख सका और चार वर्ष बाद ही उसने बैराम खां को राजकीय सेवा से मुक्त करके मक्का चले जाने का आदेश दे दिया। बैरामखां बीकानेर आया और राव कल्याणमल तथा उसके कुंवर रायसिंह के आश्रय में रहा। अंत में बैरामखां बीकानेर से भी विदा लेकर पाटन (गुजरात) पहुंचा। एक दिन एक अफगान सरदार के पुत्र मुबारकखां लोहानी ने बैराम खां की हत्या कर दी।

    रायसिंह द्वारा अकबर की अधीनता स्वीकार करना

    ई.1570 में जब अकबर अजमेर जियारत से लौटते हुए मार्ग में नागौर ठहरा तब राव बीकानेर का राव कल्याणमल कुंवर रायसिंह को लेकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। इस प्रकार बीकानेर राज्य अकबर के अधीन हो गया। अकबर नागौर में पूरे साठ दिन रहा। अकबर के समय में राजपूताना में 11 राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, आम्बेर, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ एवं करौली। इनमें से मेवाड़ को छोड़कर लगभग पूरा राजपूताना मुगलों के अधीन हो गया।

    बीकानेर का राजकुमार पीथल

    कल्याणमल का पुत्र पृथ्वीराज इतिहास में पीथल के नाम से भी जाना जाता है। वह बड़ा वीर, विष्णु भक्त तथा श्रेष्ठ कोटि का कवि था। संस्कृत और डिंगल साहित्य का उसे अच्छा ज्ञान था। कर्नल टॉड, मूथा नैणसी तथा पण्डित गौरीशंकर ओझा ने उसकी बहुत प्रशंसा की है। कहा जाता है कि एक बार अकबर ने पृथ्वीराज से कहा कि मेवाड़ का महाराणा प्रताप भी अब उसे बादशाह कहने लगा है। पृथ्वीराज अकबर की बात पर विश्वास नहीं कर सका। उसने प्रताप को एक चिट्ठी लिखकर इसकी सच्चाई के बारे में पूछा। इस पत्र को पाकर महाराणा का स्वाभिमान जाग गया और उसने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। पृथ्वीराज विष्णु का परम भक्त था। उसने ‘वेलि क्रिसन रुक्मणि री’ की रचना की जो एक उत्कृष्ट कोटि की रचना है। इस ग्रंथ को पूरा करके पृथ्वीराज जब भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करने जा रहा था। तब मार्ग में श्रीकृष्ण सेठ का वेश बनाकर आये और उससे पूरा ग्रंथ सुना। पृथ्वीराज ने अपनी मृत्यु के बारे में 6 माह पहले ही अकबर को बता दिया था कि मेरी मृत्यु अमुक तिथि को मथुरा में होगी।

    महाराजा रायसिंह का जोधपुर पर राज्य

    ई.1574 में कल्याणमल की मृत्यु हो गयी। उसके 10 पुत्र थे जिनमें से रायसिंह सबसे बड़ा था। कल्याणमल की मृत्यु के बाद रायसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। अकबर ने जोधपुर का राज्य रायसिंह को प्रदान कर दिया। जोधपुर नरेश चंद्रसेन भद्राजून की पहाड़ियों में भाग गया। लगभग 10 साल तक जोधपुर रायसिंह के अधिकार में रहा।

    रायसिंह द्वारा उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनवाना

    बाद में ई.1582 में रायसिंह ने अकबर के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि जोधपुर का दुर्ग उदयसिंह को दे दिया जाये। इस प्रकार जोधपुर का दुर्ग पुनः जोधपुर के राठौड़ों के पास चला गया। रायसिंह ने अकबर की सेना का कई युद्धों में नेतृत्व किया और बड़ी-बड़ी विजयें हासिल कीं। उसने अकबर के लिये गुजरात का भयानक युद्ध जीता जिसमें रायसिंह के 33 बड़े ठिकाणेदार मारे गये ओर उसे बड़ा नुक्सान उठाना पड़ा किंतु अंत में उसने गुजरात के सुल्तान मुहम्मद हुसैन को मार डाला। रायसिंह ने सिरोही के वीर राजा सुरताण को पकड़ कर दिल्ली भेज दिया। इस युद्ध में भी रायसिंह ने बड़ा नुक्सान उठाया। उसने काबुल में मुगलों की सेना का नेतृत्व किया तथा बलोचों को परास्त किया। उसने सिंध, बंगाल तथा दक्षिण में भी अकबर के लिये लड़ाइयां लड़ीं। ई.1589 में उसने बीकानेर के वर्तमान दुर्ग की नींव रखी जो ई.1594 में बनकर तैयार हुआ। ई.1612 में रायसिंह की मृत्यु हो गयी।

    दलपतसिंह के साथ छल

    महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र दलपतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा किंतु अपने प्रखर स्वभाव के कारण वह बादशाह जहांगीर को प्रसन्न नहीं रख सका। अतः बादशाह ने रायसिंह के दूसरे पुत्र सूरसिंह को सैनिक सहायता भिजवाई। सूरसिंह ने छल करके बीकानेर के सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया। जब दलपतसिंह हाथी पर बैठकर युद्ध के मैदान में आया तो उसके साथ चूरू का ठाकुर भीमसिंह बलभद्रोत बैठा हुआ था। उसने दलपतसिंह के दोनों हाथ पीछे से पकड़ लिये। शत्रुओं ने दलपतसिंह को जीवित ही पकड़ कर बंदी बना लिया और अजमेर भेज दिया। 25 जनवरी 1614 को दलपतसिंह वीरता पूर्वक शत्रुओं से मुकाबला करता हुआ अजमेर में मारा गया। बड़े भाई दलपतसिंह को गिरफ्तार करवाने के बाद नवम्बर 1613 में सूरसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। वह कपटी तथा धोखा देने वाला इंसान था। उसने छल से अपने मंत्रियों को मारा तथा पुरोहितों को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। मुगलों की उसने जी भर कर सेवा की।

    मतीरे की राड़

    13 अक्टूबर 1631 को सूरसिंह का पुत्र कर्णसिंह बीकानेर का स्वामी हुआ। कर्णसिंह का जन्म 10 जुलाई 1616 को हुआ था। अपने पिता के चरित्र के विपरीत वह एक अच्छा इंसान था तथा भारत के महान राजाओं में गिने जाने योग्य था। भारत का इतिहास इस राजा का अत्यधिक ऋणी है। परिस्थतियों से विवश होकर कर्णसिंह को जीवन भर मुगल बादशाहों की सेवा करनी पड़ी और पूरा जीवन युद्ध के मैदान में व्यतीत करना पड़ा। कर्णसिंह के शासन काल में ई.1644 में बीकानेर राज्य के सीमावर्ती गांव जाखणिया के एक किसान के खेत में लगी मतीरे की बेल फैलकर नागौर राज्य की सीमा में चली गयी और फल भी उधर ही लगे। फल पर अधिकार को लेकर किसानों में झगड़ा हो गया। बात राज्याधिकारियों तक पहुंची और दोनों राज्यों के अधिकारियों में भी झगड़ा हो गया जिससे नागौर के कई सिपाही मारे गये। उन दिनों अमरसिंह राठौड़ नागौर का स्वामी था तथा मुगल बादशाह शाहजहां के दरबार में था। अमरसिंह के सिपाहियों ने बीकानेर राज्य के जाखणिया गांव पर अधिकार कर लिया। बीकानेर नरेश कर्णसिंह भी उन दिनों आगरा में था। उसने अपने दीवान मुहता जसवंत को नागौर पर हमला करने के लिये भेजा। इस समय अमरसिंह दिल्ली में था अतः उसकी ओर से केसरीसिंह ने मुहता जसवंत सिंह का सामना किया किंतु नागौर की तरफ के कई सिपाही मारे गये तथा नागौर की पराजय हो गयी। इस पर अमरसिंह ने शाहजहां से बीकानेर जाने की अनुमति चाही किंतु बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने शाहजहां को जाखणिया युद्ध की सारी बात कह दी। इस पर बादशाह ने अमरसिंह को आगरा में ही रोक लिया। जब कई दिनों तक बादशाह के बख्शी सलावतखां ने अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दिया तो एक दिन अमरसिंह ने बख्शी की अनुमति के बिना ही बादशाह को मुजरा कर दिया। इस पर बख्शी ने अमरसिंह को गंवार कहकर उसकी भर्त्सना की। अमरसिंह ने क्रुद्ध होकर उसी समय अपनी कटार निकाली और बख्शी को बादशाह के सामने ही मार डाला। शाही सिपाहियों ने उसी समय अमरसिंह और उसके आदमियों को घेर कर मार डाला।

    जंगलधर पादशाह

    ई.1657 में जब शाहजहां बीमार पड़ा तो उसके चार पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ और शाहजहां को कैद कर लिया गया। तब कर्णसिंह आगरा छोड़कर बीकानेर चला आया। दिल्ली के तख्त पर बैठने के तीन साल बाद औरंगजेब ने बीकानेर के विरुद्ध सेना भेजी किंतु कर्णसिंह लड़ने के स्थान पर औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हो गया। औरंगजेब ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसकी नियुक्ति दक्खिन में करके उसे नये सिरे से युद्धों में झौंक दिया किंतु शीघ्र ही कर्णसिंह और औरंगजेब के बीच भयानक विद्वेष उत्पन्न हो गया।

    बाबर से लेकर औरंगजेब तक सारे मुगल बादशाहों की यह इच्छा रही कि पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में परिवर्तित कर लिया जाये किंतु हिन्दुओं के प्रबल संस्कारों और हिन्दू धर्म गुरुओं के प्रयत्नों के कारण ऐसा संभव न हो सका। इस पर औरंगजेब ने एक भयानक षड़यंत्र रचा। उसने सारे हिन्दू राजाओं और मुस्लिम अमीरों को इकट्ठा करके ईरान की ओर प्रस्थान किया। साहबे के सैयद फकीर को औरंगजेब के असी मंसूबे का पता चल गया कि वह ईरान ले जाकर सारे हिन्दू राजाओं को मुसलमान बनावेगा। फकीर ने यह बात हिन्दू राजाओं से कह दी। इस पर हिन्दू राजाओं ने एक बैठक की कि अब क्या करना चाहिये। उस समय वे लोग अटक में डेरा डाले हुए थे। बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने धर्म की रक्षा के लिये अपना सिर कटवाने का निश्चय करके योजना निर्धारित की कि जब बादशाह अटक नदी पार करे तब सारे हिन्दू सरदार नदी पार न करें तथा वापस अपने-अपने राज्य को लौट जायें। ऐसा ही किया गया। बादशाह के नदी पार होते ही हिन्दू नरेशों ने नावें इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी। सारे राजाओं ने कर्णसिंह का बड़ा सम्मान किया और उसे जंगलधर पादशाह की उपाधि दी।

    जैसे ही औरंगजेब को हिन्दू राजाओं के निश्चय का पता लगा तो वह कुरान हाथ में लेकर राजाओं के पास आया और ऐसा करने का कारण पूछा। तब राजाओं ने जवाब दिया कि- ‘‘तुमने तो हमें मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रच लिया इसलिये तुम हमारे बादशाह नहीं। हमारा बादशाह तो बीकानेर का राजा है। जो वह कहेगा वही करेंगे, धर्म छोड़कर जीवित नहीं रहेंगे।’’ तब औरंगजेब ने सबके बीच में कुरान रखकर कसम खाई कि- ‘‘अब ऐसा नहीं होगा, जैसा तुम लोग कहोगे, वैसा ही करूंगा। आप लोग मेरे साथ दिल्ली चलो। आप लोगों ने कर्णसिंह को जंगल का बादशाह कहा है तो वह जंगल का ही बादशाह रहेगा।’’ हिन्दू नरेशों की एकता व दृढ़ता को देखकर औरंगजेब की हिम्मत नहीं हुई कि उनके साथ कोई जबर्दस्ती की जाये किंतु कर्णसिंह के विरुद्ध उसने मन में गांठ बांध ली और उसका राज्य पाट सब छीनकर औरंगाबाद भेज दिया। वहां कुछ ही समय बाद 22 जून 1669 को हिन्दू जाति के तेजस्वी सूर्य महाराजा कर्णसिंह ने अस्ताचल की ओर गमन किया।

    छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध मोर्चा

    महाराजा कर्णसिंह के आठ पुत्र थे जिनमें अनूपसिंह सबसे बड़ा था। जब महाराजा कर्णसिंह से राजपाट छीना गया तब औरंगजेब ने अनूपसिंह को दो हजार जात तथा डेढ़ हजार सवार का मनसब देकर बीकानेर का राज्याधिकार सौंप दिया। महाराजा कर्णसिंह की मृत्यु होने के बाद 4 जुलाई 1669 को अनूपसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उसे छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध लड़ने के लिये भेजा गया जहां उसने बड़ी वीरता से मुस्लिम फौज का नेतृत्व किया तथा महाराज शिवाजी को बड़ी क्षति पहुंचायी। ई.1676 में उदयपुर के महाराणा राजसिंह ने राजसमंद नामक विशाल झील बनवाकर उसकी प्रतिष्ठा करवाई। इस अवसर पर उसने अपने बहनोई बीकानेर नरेश अनूपसिंह को साढ़े सात हजार रुपये मूल्य का मनमुक्ति नामक हाथी, पन्द्रह सौ रुपये मूल्य का सहणसिंगार घोड़ा, साढ़े सात हजार रुपये मूल्य का तेजनिधान नामक दूसरा घोड़ा तथा वस्त्राभूषण भेजे।

    महाराजा कर्णसिंह के पुत्र केसरीसिंह, पदमसिंह और मोहनसिंह भी बड़े पराक्रमी क्षत्रिय थे किंतु उनकी वीरता से प्रभावित होकर औरंगजेब ने उन्हें अपनी चतुराई, कपट और कृत्रिम विनय का प्रदर्शन कर उन्हें पूर्णतः कब्जे में कर रखा था। जब केसरीसिंह और पद्मसिंह दाराशिकोह को खजुराहो के मैदान में परास्त कर औरंगजेब के पास ले आये तो औरंगजेब ने अपने रूमाल से उनके बख्तरों की धूल साफ की। ये दोनों औरंगजेब के लिये लड़ाइयां लड़ते हुए मारे गये। पद्मसिंह को तो बीकानेर राजपरिवार का सबसे वीर पुरुष माना जाता है। उसकी तलवार का वजन आठ पौण्ड तथा खाण्डे का वजन पच्चीस पौण्ड था। वह घोड़े पर बैठकर बल्लम से शेर का शिकार करता था।

    अनूपसिंह संस्कृत भाषा का अधिकारी विद्वान था उसने अनूप विवेक (तंत्रशास्त्र), काम प्रबोध (कामशास्त्र), श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि और गीत गोविंद की अनूपोदय नामक टीका की रचना की। उसके दरबार में संस्कृत के अनेक विद्वान रहते थे। अनूपसिंह संगीत विद्या में भी निष्णात था। उसने संगीत सम्बन्धी अनेक गं्रथों की रचना की थी। उसे औरंगजेब ने हिन्दू नरेशों को मिलने वाला सर्वोच्च सम्मान माही मरातिब प्रदान किया। अनूपसिंह ने अनूपगढ़ नामक दुर्ग का निर्माण करवाया। उसने देश भर के संस्कृत के दुलर्भ ग्रंथों को खरीद कर बीकानेर के पुस्तकालय में सुरक्षित करवाया ताकि उन्हें औरंगजेब नष्ट न कर सके। पुस्तकों की ही भांति मूर्तियों को भी उसने हिन्दुस्तान भर से खरीदकर बीकानेर में संग्रहीत करवाया ताकि उन्हें मुसलमानों के हाथों नष्ट होने से बचाया जा सके। मूर्तियों का यह विशाल भण्डार 33 करोड़ देवताओं का मंदिर कहलाता है।

    जोधपुर नरेश अजीतसिंह का आक्रमण

    8 मई 1698 को महाराजा अनूपसिंह का देहांत हो गया और स्वरूपसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उस समय उसकी आयु मात्र 9 वर्ष ही थी। राज्य कार्य स्वरूपसिंह की माता सीसोदणी चलाने लगी। दो वर्ष बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में 15 दिसम्बर 1700 को शीतला से स्वरूपसिंह की मृत्यु हो गयी और उसका छोटा भाई सुजानसिंह 10 वर्ष की आयु में बीकानेर का राजा हुआ। सुजानसिंह के गद्दी पर बैठते ही औरंगजेब ने उसे दक्षिण के मोर्चे पर बुला लिया। सुजानसिंह 10 वर्ष तक दक्षिण के मोर्चे पर रहा। ई.1707 में दक्षिण में ही औरंगजेब की मृत्यु हो गयी। इससे जोधपुर नरेश अजीतसिंह ने अपने राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया। सुजानसिंह की बीकानेर से अनुपस्थिति का लाभ उठाकार अजीतसिंह ने बीकानेर नगर पर भी अधिकार कर लिया और नगर में अपने नाम की दुहाई फेर दी। भूकरका का सरदार पृथ्वीराज तथा मलसीसर का हिन्दूसिंह जोधपुर की सेना से लड़ने के लिये आगे आये। सरदारों का विरोध देखकर अजीतसिंह ने बीकानेर खाली कर दिया। औरंगजेब के बाद बहादुरशाह, जहांदारशाह, फर्रूखसीयर, रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला तथा मुहम्मदशाह दिल्ली के तख्त पर बैठे। ये बादशाह स्वयं ही चारों ओर षड़यंत्र से घिरे रहे अतः हिन्दू राजाओं पर मुगल बादशाहों की पकड़ ढीली हो गयी। ई.1720 में मुहम्मदशाह ने बीकानेर नरेश सुजानसिंह को दिल्ली दरबार में पेश होने के आदेश दिये किंतु मुगलों की चला चली के दौर का आकलन कर सुजानसिंह बादशाह की सेवा में नहीं गया तथा अपने कुछ सेवकों को दिल्ली तथा अजमेर भिजवा दिया।

    अभयसिंह के आक्रमण

    अपने पिता जोधपुर नरेश अजीतसिंह की हत्या कर राजकुमार अभयसिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठा तथा पितृहंता बख्तसिंह नागौर का स्वामी हुआ। इन दोनों भाइयों ने ई.1737 में बीकानेर पर हमला कर दिया। उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) ने दोनों पक्षों में समझौता करवा दिया। ई.1734 में बख्तसिंह ने एक बार फिर बीकानेर पर अधिकार करने का षड़यंत्र रचा। उसने बीकानेर के किलेदार तथा कई आदमियों को अपनी ओर मिला लिया। उन दिनों सुजानसिंह ने अधिकांश राज्यकार्य राजकुमार जोरावरसिंह को सौंप रखा था।

    जब जोरावरसिंह ऊदासर गया हुआ था तब षड़यंत्रकारियों ने किले के सब दरवाजों पर से ताले हटा लिये तथा बख्तसिंह के आदमियों को सूचना करने के लिये आदमी भेजा। बख्तसिंह अपने आदमियों के साथ किले के पास ही छिपा हुआ था किंतु इसी बीच ऊदासर में षड़यंत्रकारियों के एक साथ उदयसिंह परिहार ने शराब के नशे में अपने सम्बन्धी जैतसी परिहार को यह भेद बता दिया कि किले का पतन होने वाला है। जैतसी ऊँट पर सवार होकर भागा-भागा बीकानेर आया तथा किले के उस हिस्से में पहुंचा जहां पड़िहारों का पहरा था। उनसे रस्सी गिरवाकर वह गढ़ में दाखिल हो गया और महाराजा सुजानसिंह को षड़यंत्र की सूचना दी। सुजानसिंह जैतसिंह को लेकर सूरजपोल पहुंचा तो उसने वहां के ताले खुले हुए पाये। गढ़ के अन्य दरवाजों के ताले भी खुले हुए पाये गये। उसी समय गढ़ के सारे द्वारों पर ताले जड़वाये गये तथा किले की तोपें दागी गयीं। तोपों की आवज सुनकर षड़यंत्रकारी समझ गये कि भेद खुल गया है अतः वे वहां से भाग लिये। किले के भीतर स्थित सांखला राजपूत मार दिये गये और किले की सुरक्षा धाय भाई को सौंप दी गयी। इससे पूर्व बीकानेर के किलेदार वंश परम्परा से नापा सांखला के वंशज होते आये थे, जो अपनी राजभक्ति के लिये प्रसिद्ध थे।

    ई.1735 में सुजानसिंह की मृत्यु हो गयी तथा जोरावरसिंह राजा हुआ। उसके शासन काल में जोधपुर नरेश अभयसिंह ने फिर बीकानेर पर आक्रमण किया किंतु इस बार बख्तसिंह ने बीकानेर का साथ दिया। अभयसिंह वापस जोधपुर लौट गया। एक साल बाद ई.1740 में अभयसिंह ने फिर बीकानेर पर आक्रमण किया। अभयसिंह बीकानेर नगर में घुस गया और वहां खूब लूटपाट मचाई तथा बीकानेर का दुर्ग घेर कर उस पर तोपों से गोलों की बरसात कर दी। जोरावरसिंह दुर्ग में घिर गया। उसने अपने आदमी नागौर तथा जयपुर भेजे। बख्तसिंह सेना लेकर बीकानेर आ गया तथा उधर जयपुर नरेश जयसिंह ने जोधपुर जाकर मेहरानगढ़ को घेर लिया। अभयसिंह को बीकानेर से हटना पड़ा। ई.1746 में जोरावरसिंह की मृत्यु हो गयी। वह वीर, कुशल राजनीतिज्ञ, प्रतिभा सम्पन्न तथा काव्य मर्मज्ञ था। वह संस्कृत और डिंगल का विद्वान था। उसकी लिखी हुई दो पुस्तकों- ‘वैद्यकसार’ तथा ‘पूजा पद्धति’ बीकानेर के पुस्तकालय में हैं।

    महाराजा गजसिंह

    जोरावरसिंह के कोई संतान नहीं थी अतः उसके मरते ही राज्य का सारा प्रबंध भूकरका ठाकुर कुशलसिंह तथा मेहता बख्तावरसिंह ने अपने हाथ में ले लिया तथा बाद में जोरावरसिंह के चचेरे भाई गजसिंह से यह वचन लेकर कि वह उस समय तक के राज्यकोष का हिसाब नहीं मांगेगा, उसे गद्दी पर बैठा दिया। जोरावरसिंह के चचेरे भाइयों में अमरसिंह सबसे बड़ा था किंतु उसे राजा नहीं बनाया गया इसलिये वह नाराज होकर जोधपुर चला गया और वहां से विशाल सेना लेकर बीकानेर पर चढ़ आया। रामसर कुंएँ पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ जिसमें जोधपुर की सेना परास्त हो गई। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह का वजीर मंसूर अली खां (सफदरजंग) बागी हो गया तब बादशाह ने बीकानेर एवं जोधपुर से सहायता मांगी। बीकानेर नरेश ने सैनिक सहायता देकर बख्तावरसिंह को बादशाह की सेवा में भेजा। सेना के समय पर पहुँच जाने से बादशाह की बादशाही बच गयी। इस पर बादशाह ने गजसिंह को सात हजारी मनसब देकर सिरोपाव भिजवाया तथा उसे श्री राज राजेश्वर महाराजाधिराज महाराज शिरोमणि श्री गजसिंह की उपाधि दी। साथ ही माही मरातिब भी प्रदान किया। जोधपुर नरेश विजयसिंह को बीकानेर नरेश गजसिंह पर बड़ा भरोसा था।

    सूरतसिंह का खूनी खेल

    राजसिंह के दो पुत्र थे, प्रतापसिंह तथा जयसिंह। दोनों ही उस समय बालक थे। अतः सूरतसिंह को संरक्षक बना कर प्रतापसिंह को बीकानेर का राजा बना दिया गया। कुछ ही दिनों बाद सूरतसिंह ने स्वयं राजा बनना चाहा किंतु राजसिंह की पुत्री ने सूरतसिंह का कड़ा विरोध किया। उस समय वह कुंआरी थी। अतः सूरतसिंह ने राजकुमारी का विवाह नरवर के कछवाहों से कर दिया उसने अपने हाथों से राजा प्रतापसिंह का गला घोंट दिया और ई.1787 में सूरतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठ गया।

    रियासतों की खूनी होली

    भारत में मुगलों का राज्य प्रथम बार 1526 से 1540 ई.तक चला तथा दूसरा राज्य 1555 ई.में स्थापित होकर 1857 ई.तक चला किंतु वास्तवितकता यह थी कि फर्रूखसीयर की मृत्यु के साथ ही मुगलों का प्रभाव राजपूत रियासतों पर नहीं के बराबर रह गया था। फिर भी मुहम्मदशाह रंगीला (1719-48 ई.) तक राजपूत राजा, मुगलों की प्रतीकात्मक अधीनता स्वीकार किए रहे। ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाहआलम से इलाहाबाद की संधि की तथा उसे पेंशन देकर राज्यकार्य से अलग कर दिया। 1765 से 1818 ई.तक राजपूत रियासतें किसी भी शक्ति के अधीन नहीं थीं। भारत के केन्द्रीय शासन में राजनैतिक शक्ति का अभाव उत्पन्न हो गया था। मराठों ने राजपूत रियासतों को लूटना आरम्भ कर दिया। मुगलों की सेना भंग हो जाने से लाखों सैनिक बेरोजगार होकर पिण्डारी बन गए। मराठों और पिण्डारियों के निरंतर आक्रमणों ने राजपूताना की राजनैतिक शक्ति को तोड़कर रख दिया था जिससे त्रस्त होकर राजपूताने की रियासतों ने सिंधियों तथा पठानों को अपनी सेनाओं में जगह दी। ये नितांत अनुशासनहीन सिपाही थे जो किसी विधि-विधान को नहीं मानते थे।

    इस काल में अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों तथा डच सेनाओं के खूनी पंजे भी भारत पर अपना कब्जा जमाने के लिये जोर आजमाइश कर रहे थे। इन सब खतरों से बेपरवाह राजपूताना के बड़े रजवाड़ों के मध्य छोटी-छोटी बातों को लेकर मन-मुटाव और संघर्ष चलता रहा। इस काल मंे राजपूताना की चारों बड़ी रियासतें- जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर तथा जयपुर परस्पर खून की होली खेल रही थीं।

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  • मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

     03.06.2020
    मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

    मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

    मारवाड़ राज्य

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मारवाड़ राज्य की स्थापना का कार्य बदायूं के राठौड़ों के वंशज सीहाजी द्वारा थार रेगिस्तान में आकर बसने के बाद आरम्भ हुई। सीहा की मृत्यु 1273 ई. में हुई। उसके वंशज पाली तथा बाड़मेर के आसपास राज्य करते रहे। 1394 ई. में राव चूण्डा ने मण्डोर पर अधिकार किया तथा 1459 ई. में जोधा ने मेहरानगढ़ दुर्ग बनाया और वहां अपनी नई राजधानी स्थापित की। जिस समय बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय मारवाड़ पर राव गांगा (1515-1532 ई.) का शासन था। जब सांगा खानुआ के मैदान में बाबर से लड़ने गया तो गांगा ने भी अपने 4000 सैनिक सांगा की सहायता के लिए भेजे। इस सेना का नेतृत्व मेड़ता से वीरमदेव (राव जोधा का पौत्र और राव दूदा का पुत्र) ने किया। वह अपने भाइयों रत्नसिंह तथा रायमल के साथ युद्ध के मैदान में गया। महाराणा सांगा, राव गांगा का बहनोई था। रायमल और रत्नसिंह इस युद्ध में खेत रहे।
    (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2008, सामान्य ज्ञान, खानवा में बाबर के विरुद्ध सांगा की सहायता के लिए किसके नेतृत्व में मारवाड़ी सेना भेजी गई थी-राव गांगा/मालदेव/बीरमदेव/सूजा?)

    राव गांगा और मेड़ता के राजा वीरम में राज्याधिकार को लेकर झगड़ा चलता था। गांगा ने वीरम को सोजत की जागीर दी किन्तु वह सन्तुष्ट नहीं हुआ और दोनों के बीच कई बार युद्ध हुआ। गांगा के पुत्र मालदेव ने इन युद्धों में अपने पिता की सहायता की। गांगा ने मुसलमानों के विरुद्ध भी अनेक लड़ाइयां लड़ीं। उसने जोधपुर में गांगेलाव का तालाब, गंागा की बावड़ी और गंगश्यामजी का मन्दिर बनवाया। उसकी बड़ी रानी सिरोही के राव जगमाल के पुत्री पद्मावती (ससुराल का नाम मणिक देवी) से हुआ था जिससे मालदेव, मानसी, बैरीसाल और एक पुत्री सोनबाई का जन्म हुआ। इस विवाह के अवसर पर गांगा, सिरोही से एक विष्णु प्रतिमा लाया और उसे गंगश्यामजी के मन्दिर में स्थापित करवाया। इसी रानी के साथ पहले-पहले सिंघी (सिंघवी) खांप के कुछ ओसवाल महाजन जोधपुर आए थे। इन सिंघी लोगो के पूर्वज कुलीन नन्दवाने बोहरे (पल्लीवाल ब्राह्ममण) थे किन्तु बाद में वे जैन धर्म को स्वीकार करके ओसवाल कहलाने लगे तथा वैश्य जाति में मिल गये। गांगा की एक रानी मेवाड़ के राणा सांगा की पुत्री थी। इसका नाम भी पद्मावती था। इसने जोधपुर में पद्मसर तालाब बनवाया।

    गांगा का पुत्र मालदेव अत्यंत महत्वाकांक्षी, वीर और धूर्त था। उसने एक दिन गांगा को महल के झरोखे से धक्का दे दिया। उस समय गांगा अफीम की पिनक में था। गांगा की मृत्यु हो गई और मलदेव जोधपुर की गद्दी पर बैठा। उस समय जोधपुर राज्य में जोधपुर तथा सोजत के ही क्षेत्र थे। जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा और मेड़ता आदि के जागीरदार जोधपुर के नरेश को आवश्यकतानुसार सैनिक सहायता देते थे। मालदेव (1532-1562 ई.) ने जेतमालोत राठौड़ों से सिवाना, खाबड़ पंवारों से चौहटन, पारकर तथा राधनुपर, सिंधल राठौड़ों से रायपुर तथा भादªाजून, बिहरी पठानों से जालोर, मल्लीनाथ के वंशजों से मालानी, वीरमदेव से मेड़ता, मेवाड़ के राणा से गोडवाड़, बदनोर, मदारिया और कोसीथल, बीका राठौड़ों से बीकानेर, चौहानों से सांचोर, देवड़ों से सिरोही तथा मुसलमानों से नागौर, सांभर, डीडवाना तथा अजमेर छीन लिए जिससे उसके राज्य की सीमाएं गुजरात से लेकर आगरा और दिल्ली तक पहुंच गईं। सिरोही का राव, मालदेव का नाना था, अतः मालदेव ने उसी को अपनी ओर से सिरोही का शासक नियुक्त कर दिया।

    जब मुगल बादशाह हुमायूं शेरशाह सूरी से चौसा की लड़ाई में हारकर पश्चिम के रेगिस्तान की ओर भाग आया तो मालदेव ने हुमायूं को शरण देने का विचार किया और उसे बुलावा भेजा। हुमायूँ ने मालदेव के निमंत्रण पर कोई ध्यान नहीं दिया और थट्टा के शासक शाह हुसैन के भरोसे लगभग एक साल गंवा दिया। बाद में वह मारवाड़ की ओर आया तथा मालदेव से शरण एवं सहायता मांगी किंतु अब मालदेव ने उसकी कोई सहायता नहीं की। अतः हुमायूं डरकर अमरकोट होता हुआ फारस भाग गया। मालदेव के सैनिकों ने भागती हुई मुगल टुकड़ी का पीछा किया किंतु हुमायूँ अमरकोट के हिन्दू राजा की शरण में पहुंच गया।

    अब भारत में शेरशाह सूरी का कोई प्रबल विरोधी था तो वह मालदेव था। जब मालदेव ने वीरमदेव को मेड़ता से निकाल दिया तो वीरम सहायता मांगने के लिए शेरशाह सूरी के पास गया। 1544 ई. में शेरशाह 80 हजार सैनिकों के साथ आया और सुमेल-गिर्री के मैदान में मोर्चा बांधकर बैठ गया। राठौड़ों का बल देखकर शेरशाह की हिम्मत पस्त हो गई किंतु जब मालदेव विजय के निकट था तब शेरशाह ने षड़यंत्र रचकर मालदेव के मन में सरदारों के विरुद्ध संदेह उत्पन्न कर दिया। मालदेव बिना लड़े ही युद्ध का मैदान छोड़कर जोधपुर आ गया। जब मालदेव के सरदारों जैता तथा कूंपा को ज्ञात हुआ कि मालदेव ने हम पर संदेह किया है तो वे शेरशाह की सेना पर टूट पड़े। शेरशाह अब भी हिन्दू सेना से घबराता रहा और युद्ध में भाग न लेकर नमाज पढ़ने बैठ गया। इस भयानक युद्ध में अंततः राठौड़ परास्त हुए तथा विजयश्री शेरशाह के हाथ लगी। युद्ध की समाप्ति पर शेरशाह ने अल्लाह को धन्यवाद देते हुए कहा- ‘एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाहत खो बैठता।’

    शेरशाह ने अपनी सेना के दो भाग किये। एक भाग खवास खां और ईसा खंा के नेतृत्व में जोधपुर आया और दूसरा भाग वह स्वयं लेकर अजमेर पहुंचा। अजमेर पर अधिकार करके शेरशाह भी जोधपुर आ गया। मालदेव सिवाना के पहाड़ों में भाग गया। जोधपुर पर शेरशाह का अधिकार हो गया। उसने फलौदी, पोकरन, सोजत, पाली, जालोर तथा नागोर में अपने थाने बैठा दिये। इसके बाद वह वीरम को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर सौंपकर अपनी राजधानी लौट गया। उसने जोधपुर के किले का मन्दिर तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई तथा किले में पूर्व की तरफ एक रास्ता निकाला, जो अब गोल घाटी कहलाता है। मालदेव लगभग दो वर्ष तक छप्पन के पहाड़ों में छिपा रहा। जब 1546 ई. में शेरशाह की मृत्यु हो गयी तो मण्डोर के राजपूत मालियों ने शेरशाह के थानों को उठा दिया और मालदेव को इसकी सूचना भेजी। मालदेव ने भी अपनी सेना भेजी। इस सेना की सोजत के पास शेरशाह के सैनिकों से मुठभेड़़ हुई। मालदेव की सेना विजयी रही। मालदेव ने पुनः मारवाड़ पर अधिकार कर लिया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992- इतिहास द्वितीय प्रश्न पत्र, शेरशाह-मालदेव सम्बन्धों की संक्षेप में चर्चा कीजिये।)

    मालदेव का विवाह जैसलमेर के राव लूणकर्ण की कन्या उमादे से हुआ। विवाह के बाद राजकुमारी तो अपने महल में चली गई और मालदेव गाने वालियों के साथ बैठकर शराब पीने लगा। राजकुमारी ने काफी देर तक उसकी प्रतीक्षा की और फिर अपनी दासी को मालदेव को बुलाने भेजा। मालदेव ने उसे भी शराब पिलाने में लगा लिया। तब राजकुमारी ने अपनी दूसरी दासी भारमली को भेजा। मालदेव भारमली के रूप और यौवन पर रीझ गया और उसी के घर चला गया। राजकुमारी ने जब यह सुना तो उसने मालदेव की आरती के लिए सजाया थाल उलट दिया। उमादे रूठ कर अपने ननिहाल चित्तौड़ चली गई और जीवन भर वहीं रही। चित्तौड़ के इतिहास में इसे रूठी रानी कहते हैं। जब मालदेव की मृत्यु हुई तो यह स्वाभिमानी और धर्मपरायण रानी भी सती हो गई।

    मालदेव की सेना में अस्सी हजार सवार थे अैर उसकी सेना राणा सांगा की सेना से भी बड़ी थी। उसने जोधपुर दुर्ग में अनेक महल बनवाये और नगर का परकोटा बनवाया। मेड़ता में मालकोट और परकोटा बनाने पर उसने 2 लाख 40 हजार रुपए खर्च किए। अजमेर के बीठली के किले की बुर्जें और तारागढ़ पर पश्चिम के झरने में से पानी पहुंचाने के लिए तीन बुर्ज भी मालदेव के बनाये हुए हैं।

    मालदेव साहसी और वीर व्यक्ति था किंतु उसमें चारित्रिक दृढ़ता और दूरदृष्टि का अभाव था। उस पर अपने पिता की हत्या का आरोप था। अपने शंकालु स्वभाव के कारण उसने जैता और कूंपा जैसे वीर पुगंवों को खोया। महाराणा उदयसिंह (मेवाड़) के विरुद्ध उसने शेरशाह के सेनापति हाजीखां को सहायता दी। मालदेव ने मेड़ता के वीरमदेव को अपना शत्रु बना लिया तथा अपनी दूसरी रानी के प्रभाव में आकर उसने अपने सुयोग्य पुत्र 
    चन्द्रसेन को उत्तराधिकार से वंचित कर राज्य अन्य पुत्र को दे दिया जिससे भाइयों में वैमनस्य बढ़ा। इसका लाभ अकबर ने उठाया।

    मालदेव ने अपने दूसरे नम्बर के पुत्र को जोधपुर का राजा बनाया था किंतु चन्द्रसेन (1562-1581 ई.) ने राज्य पर अधिकार कर लिया। अकबर के समय, यही चन्द्रसेन मारवाड़ का राजा था। अकबर ने जोधपुर पर आक्रमण करके मेहरानगढ़ छीन लिया। चन्द्रसेन को जंगलों में भाग जाना पड़ा। अकबर के सेनापति हसनकुली खां ने जोधपुर दुर्ग में मस्जिद बनवाई। अकबर ने बीकानेर राव रायसिंह को जोधपुर का सूबेदार बना दिया। 15 साल तक चन्द्रसेन पहाड़ों और जंगलों की खाक छानता हुआ अपना राज्य स्वतंत्र कराने में लगा रहा। 11 जनवरी 1581 को उसकी मृत्यु हो गई। मेवाड़ के महाराणा प्रताप के समान ही आन-बान का धनी वीर चन्द्रसेन हिन्दू वीरों के गौरव का प्रतीक बना रहा। (आर.ए.एस. प्रारम्भिक 2012, किस राजपूत शासक ने मुगलों के विरुद्ध निरंतर स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रखा और समर्पण नहीं किया- 1. बीकानेर के राजा रायसिंह, 2. मारवाड़ के राव चंद्रसेन, 3. आमेर के राजा भारमल, 4. मेवाड़ के महाराजा अमरसिंह?)

    चन्द्रसेन के तीन पुत्र थे जिनमें अपने पिता जैसा गौरव नहीं था। उसका ज्येष्ठ पुत्र रायसिंह अपने पिता के जीवन काल में ही अकबर की शरण में चला गया था। उसके दोनों छोटे पुत्र, चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद आधा-आधा राज्य बांटकर राज्य करने लगे। यह राज्य सोजत तथा उसके आस-पास का एक छोटा सा क्षेत्र था। दोनों भाई एक दिन चौसर खेलते हुए आपस में कट मरे। तब हिन्दू सरदारों ने रायसिंह को बुलाकर सोजत की गद्दी पर बैठाया। अकबर ने इसे राव की अपाधि दी। अकबर ने रायसिंह को सिरोही के राव सुरताण पर आक्रमण करने भेजा। सुरताण ने रायसिंह को मार डाला।

    दस साल तक जोधपुर, बीकानेर नरेश रायसिंह के पास सूबे के रूप में रहा। 1583 ई. में रायसिंह के कहने पर अकबर ने चंद्रसेन के छोटे भाई उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनाया जो इतिहास में मोटाराजा कहलाता है। उदयसिंह को अपनी पुत्री जगत गुसाइन का विवाह अकबर से करना पड़ा। उसके काल में जोधपुर राज्य में मुगलों का खूब प्रभाव बढ़ा। कल्ला रायमलोत इस बात पर उदयसिंह से नाराज हो गया और उसने विदªोह कर दिया। उदयसिंह ने कल्ला रायमलोत को प्राण त्यागने पर विवश कर दिया। उदयसिंह ने 1593 ई. में बालोतरा गांव के पास राव मल्लीनाथ के नाम पर पशु मेला आरंभ करवाया जो अब भी प्रतिवर्ष चैत्र माह में आयोजित होता है। इस मेले में आने वाले मालानी घोड़े, सांचोरी गाय, बैल, तथा मारवाड़ी नस्ल के ऊँट प्रसिद्ध हैं। 1595 ई. में लाहौर में मोटाराजा उदयसिंह की मृत्यु हो गई। वहीं पर रावी नदी के किनारे उसका अंतिम संस्कार किया गया। उसकी रानियों के सती होते समय उनकी दृढ़ता देखने के लिए अकबर स्वयं नाव में बैठकर आया।

    उदयसिंह के 17 पुत्र थे। इनमें से छठा पुत्र सूरसिंह (1595-1619 ई.) जोधपुर की गद्दी पर बैठा। सूरसिंह की राज्य सेवा से प्रसन्न होकर अकबर ने उसे 16 परगने दिये। 9 परगने मारवाड़ में, 5 गुजरात में, 1 मालवा में तथा 1 दक्षिण में। मारवाड़ राज्य के अलावा उसे गुजरात की सूबेदारी, दो हजारी जात तथा सवा हजारी मनसब एवं सवाई की उपाधि भी दी। अकबर की मृत्यु के बाद गुजरात के बहादुरशाह ने अहमदाबाद पर चढ़ाई की। तब सूरसिंह ने बहादुरशाह को पराजित कर जहांगीर की अमलदारी गुजरात तक बढ़ा दी। इससे प्रसन्न होकर जहांगीर ने सूरसिंह का दर्जा 5 हजारी जात और 3 हजारी सवार का कर दिया। उसने जीवन भर अकबर और जहांगीर की चाकरी की तथा 24 वर्ष के अपने शासनकाल में मात्र 9 माह अपनी राजधानी जोधपुर में रहा। मुगलों की ही पद्धति पर उसने अपने राज्य का प्रबन्ध किया। उससे पहले राव रणमल, राव जोधा, सूजा, गांगा, मालदेव तथा उदयसिंह के वंशज राजा के साथ भाईचारे अर्थात् बराबरी का अधिकार रखते थे किन्तु सूरसिंह ने उन्हें अपना मातहत घोषित किया तथा दरबार में दाएं-बाएं बैठने का नियम बनाया। दाहिनी तरफ राव रणमल की सन्तान में से आउवा के चम्पावतों को और बाई तरफ राव जोधाजी के वंशजों में से रीयां के मेड़तियों को प्रथम स्थान दिया गया। राजा की तलवार और ढाल रखने का काम खींची चौहानों को और चंवर करने का काम धांधल राठौड़ों को सौंपा। यह व्यवस्था देश की स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही। वह मात्र नौ महीने जोधपुर रहा तथा कुछ समय और जोधपुर रहने की चेष्टा में दो बार उसकी जागीर में कमी की गई।

    मुगलों की चाकरी में रहते हुए भी सूरसिंह संस्कृत का अच्छा ज्ञाता और पण्डित था। उपने पुत्रों को संस्कृत पढ़ाता था। एक बार उसने एक ही दिन में चार कवियों को एक लाख रूपये का दान दिया। जोधपुर नगर की तहलटी के महल, सूरजकुण्ड, सूरसागर तालाब तथा सूरसागर स्थित महल सूरसिंह ने बनवाये। सूरसिंह के प्रधान भाटी गोविन्ददास ने प्राचीन परम्पराओं को समाप्त किया। मारवाड़ राज्य परिवार में यदि विवाह या मृत्यु का अवसर होता तो अन्तःपुर में ठकुरानियों को उपस्थित होना पड़ता था। इस प्रथा को उसने समाप्त कर दिया। उसने राज्य में भूमि की पैमाइश करवायी तथा राजस्व विभाग की ओर ध्यान दिया।

    सूरसिंह की मृत्यु के बाद 18 अक्टूबर 1619 को गजसिंह (1619-1638 ई.) जोधपुर का राजा हुआ। उसने भी मुगलों की खूब सेवा की और मलिक अम्बर से हुए युद्ध में उसका लाल झण्डा छीन लिया। तब से जोधपुर राज्य के ध्वज में लाल रंग की पट्टी जुड़ी। गजसिंह ने भी अनेक लड़ाईयां लड़ीं और मुगलों के राज्य में वृद्धि की। विद्वानों, ब्राह्ममणों और चारणों का सम्मान करने वाला यह राजा भी अपने पिता की ही भांति विद्वान एवं दानशील था। जहाँगीर ने उसका मनसब बढ़ाकर चार हजारी जात और तीन हजार सवार कर दिया और उसे ’दलथंभन’ (फौज को रोकने वाला) की उपाधि प्रदान की। गजसिंह ने 16 कवियों को लाख पसाव दिए।

    गजसिंह के तीन पुत्र थे। सबसे बड़ा कुंअर अमरसिंह स्वाभिमानी और स्वातन्त्रय प्रिय था। उसकी उद्दण्ड प्रवृत्ति के कारण गजसिंह उससे नाराज रहता था तथा उसने अपने दूसरे पुत्र जसवन्तसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस घटना से अप्रसन्न होकर अमरसिंह शाहजहां के दरबार में चला गया। शाहजहां ने उसे बड़ौदा, सांगोद, झलान आदि की जागीरें देकर मनसबदार बना दिया। बाद में नागौर का स्वतंत्र राज्य भी दे दिया।

    अमरसिंह ने मुगलों की तरफ से कई लड़ाइयां लड़ीं। 1644 ई. में उसकी बीकानेर राज्य के खीलवा और नागौर के सम्बन्ध में लड़ाई हुई जो मतीरे की राड़ के नाम से प्रसिद्ध है। अमरसिंह इस लड़ाई कि सिलसिले में नागौर जाना चाहता था किंतु बीकानेर नरेश कर्णसिंह के दबाव में शाहजहां का बख्शी अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दे रहा था। एक दिन अमरसिंह ने बख्शी से पूछे बिना शाहजहां को सलाम किया। इस पर बख्शी ने अमरसिंह को गंवार कह दिया। अमरसिंह ने उसी क्षण तलवार निकालकर बख्शी सलावत खां को मार डाला। शाहजहां के सिपाही, अमरसिंह को मारने के लिए लपके जिनमें विट्ठलदास गौड़ का पुत्र अर्जुन सबसे आगे था। अमरसिंह वहां से भाग छूटा और घोड़े सहित किले की दीवार से कूद गया। नीचे पहुंचते-पहुंचते उसे शाहजहां के सैनिकों और दरबारियों ने घेरकर मार डाला। अमरसिंह के इस अद्भुत पराक्रम की कथा को ‘ख्याल’ बनाकर पिछली तीन शताब्दियों से मारवाड़ के गांव-गांव में गाया जाता है। कठपुतली के खेलों में अमरसिंह राठौड़ आज भी सर्वप्रमुख पात्र होता है जो अपनी आन-बान और शान की रक्षा के लिए शहीद होता हुआ दिखाया जाता है।

    गजसिंह की मृत्यु के बाद उसका 11 वर्षीय पुत्र जसवन्तसिंह (1638-1678 ई.) जोधपुर की गद्दी पर बैठा। वह भी शाहजहां के लिए लड़ाईयां लड़ता हुआ अधिकांशतः युद्ध के मैदान में रहा। उसके जीवनकाल में शाहजहां के पुत्रों में उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ। जसवन्तसिंह ने धर्मपरायण शहजादे दाराशिकोह का पक्ष लिया और धर्मत के मैदान में औरंगजेब से घमासान युद्ध किया। दारा के पक्ष के कुछ मुसलमान धोखा देकर औरंगजेब के पक्ष में जा मिले जिससे जसवन्तसिंह को पराजित होकर युद्ध का मैदान छोड़ना पड़ा। युद्धस्थल से अपने बचे हुए साथियों को लेकर जसवन्तसिंह सोजत पहुंचा और पांच दिन वहां ठहरकर जोधपुर पहुंचा। उसकी उदयपुरी राणी ने किले के द्वार बन्द करवा लिए और अपने सेवक से संदेश भिजवाया- राजपूत युद्ध से या तो विजयी होकर लौटते हैं या वहीं मर मिटते हैं। युद्ध क्षेत्र से पराजित होकर लौटने वाला व्यक्ति मेरा पति नहीं हो सकता।’ रानी सती होने की तैयारी करने लगी। तब रानी की माँ ने रानी को समझाया-बुझाया, राजा ने भी उस पराजय का बदला लेने का वचन दिया तब कहीं जाकर उसने महल के द्वार खुलवाए।

    जसवन्तसिंह धर्मप्राण नरेश था। उसके दरबार में बड़े-बड़े पण्डित, विद्वान एवं कवि रहते थे। उसने स्वयं कई ग्रन्थ लिखे जिनमें आनन्द विलास, अनुभव प्रकाश, अपरोक्ष अंग सिद्धात, सिद्धान्त बोध, सिद्धान्त सार, प्रबोध चन्द्रोदय तथा भाषा भूषण प्रसिद्ध हैं। भाषा भूषण हिन्दी में अलंकारों का उत्तम ग्रंथ है। जसवन्तसिंह अहमदाबाद, बुरहानपुर, औरंगाबाद और काबुल का सूबेदार रहा। उसके अधीन जोधपुर राज्य में मेड़ता, जैतारण, सोजत, जालोर, भीनमाल, सिवाणा, फलोदी, पोकरण, परगनों के अलावा बदनोर, केकड़ी, नारनोल, रोहतक आदि भी शामिल थे। उसके जीवनकाल में औरंगजेब मारवाड़ में न तो मन्दिर तोड़ सका और न मारवाड़ में जजिया लगा सका।

    सुप्रसिद्ध इतिहासकार मुहणोत नैणसी, जसवन्तसिंह का मंत्री था। मुहणोत नैणसी और उसके भाई सुन्दरदास पर गबन का आरोप लगा। जसवन्तसिंह ने उन दोनों को कैद कर उन पर एक-एक लाख रुपया जुर्माना कर दिया। वे दोनों भाई भी स्वाभिमानी थे। उन्होंने दण्ड का एक पैसा देना स्वीकार नहीं किया और पेट में कटार मारकर आत्महत्या कर ली। महाराज जसवन्तसिंह ने औरगांबाद के बाहर जसवन्तपुरा आबाद किया जिसमें एक सुन्दर बाग और संगमरमर का भवन बनवाया। आगरा के निकट राजपूत मुगल-शैली पर आधारित कचहरी भवन बनवाया। उसकी रानी अतिरंग दे ने जान सागर बनवाया जिसे शेखावतजी का तालाब कहते हैं। उसकी रानी जसवन्तदे (जिसने राजा के पराजित होकर लौटने पर महल के द्वार बन्द कर दिये थे) ने 1663 ई. में राईकाबाग, उसका कोट तथा कल्याण सागर तालाब बनवाया। इस तालाब को अब रातानाडा कहते हैं। जसवंतसिंह ने काबुल से अनार लाकर कागा के बाग में लगवाये।

    औरंगजेब जब दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसने जसवंतसिंह को कुचलने की बड़ी चालें चलीं किन्तु वह जसवन्तसिंह को नहीं दबा सका। अन्त में औरंगजेब ने उससे समझौता कर लिया और उसे गुजरात का सूबेदार बनाकर छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध सैन्य अभियान पर औरंगाबाद भेज दिया। जसवंतसिंह ने औरंगजेब और छत्रपति के बीच मध्यस्थता कर सुलह का प्रयास किया। औरंगजेब ने शिवाजी को दबाने के लिए शाइस्ता खाँ को भेजा तथा जसवंतसिंह को लिखा कि वह अपनी सेना लेकर गुजरात से दक्षिण में पहुंचे और शिवाजी के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता करे। महाराजा जूनागढ़ के फौजदार कुतुबखाँ को गुजरात में अपना प्रतिनिधि (नायब) नियत कर गुजरात से दक्षिण चले गए। महाराजा ने मराठों के अनेक किले छीन लिए। बादशाह की इच्छा थी कि जल्दी ही शिवाजी का सारा बल नष्ट कर दिया जाए। यह बात महाराजा को पसंद नहीं थी क्योंकि वह शिवाजी जैसे पराक्रमी हिंदू-महाराजा का बल नष्ट कर औरंगजेब जैसे धर्मान्ध नरेश को और अधिक उत्पात करने का मौका नहीं देना चाहता था। इस पर औरंगजेब ने जसवन्तसिंह को पठानों के विरुद्ध लड़ने के लिए काबुल भेज दिया और पीछे से उसके पुत्र पृथ्वीसिंह की हत्या करवा दी।

    28 नवम्बर 1678 को काबुल के मोर्चे पर जसवंतसिंह की मृत्यु हो गई। उसकी मौत का समाचार पाकर औरंगजेब ने कहा- ‘कुफ्र (पाप) का दरवाजा टूट गया। औरंगजेब की बेगम ने शोक व्यक्त करते हुए कहा- ‘आज शोक का दिन है क्योंकि साम्राज्य का दृढ़ स्तंभ टूट गया।’ इन दोनों ही उद्गारों में जसवन्तसिंह के विराट व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।

    महाराजा जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य को खालसा कर लिया। जब यह समाचार जमरूद (काबुल) पहुंचा तो मारवाड़ के सरदार जसवंतसिंह की रानियों को लेकर मारवाड़ की ओर चल दिये। मार्ग में उसकी दोनों रानियों ने एक-एक पुत्र दलथंभन और अजीतसिंह को जन्म दिया। दलथंभन की मृत्यु मार्ग में ही हो गई। औरंगजेब ने सरदारों को झांसा देकर रानियों को दिल्ली बुलवा लिया। वह बालक को मार डालना चाहता था। इसलिए राठौड़ दुर्गादास तथा खींची मुकन्ददास आदि सरदार, जसवन्तसिंह की रानियों और राजकुमार अजीतसिंह को वहां से निकालकर मारवाड़ ले आए और सिरोही जिले के कालन्द्री गांव में छिपाकर रखा। इस पर औरंगजेब ने अमरसिंह के पौत्र इन्द्रसिंह को खिअलत, निशान, हाथी और घोड़ा आदि देकर जोधपुर राज्य का राजा बना दिया।

    वीर दुर्गादास जीवन भर मुसलमानों से मोर्चा लेता रहा और अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा बनाने का प्रयास करता रहा। किसी कवि ने दुर्गादास की प्रशंसा इन शब्दों में की है-

    डंबक डंबल ढोल बाजै, दै दै ठोर नगारा की

    आसे घर दुर्गो नहीं होतो, सुन्नत होती सारां की।


    1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हुई तब अजीतसिंह ने जोधपुर राज्य पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद अजीतसिंह दुर्गादास से नाराज हो गया और उसे मारवाड़ से निकाल दिया। दुर्गादास कुछ दिन मेवाड़ में रहा और बाद में उज्जैन चला गया। 16 मई 1718 को दुर्गादास ने क्षिप्रा नदी के तट पर प्राण त्यागे। वहीं उसका अन्तिम संस्कार हुआ तथा ‘राठौड़ की छतरी’ के नाम से एक छतरी बनाई गई।

    अजीतसिंह (1707-1724 ई.) ने मण्डोर में एक थंभिया महल, जसवंतसिंह का स्मारक (जसवंतथड़ा), काला गौरा भैंरव, हड़बूजी पाबूजी तथा रामदेवजी की बड़ी-बड़ी मूर्तियां से युक्त वीरों की साल बनवाई। मेहरानगढ़ में दौलत खाना, फतह महल, जनाना महल बनवाए तथा देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनवाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कीं, जिनमें मुरली मनोहर, शिव-पार्वती, चतुर्भुज विष्णु और हिंगलाज देवी प्रमुख हैं। उसने जोधपुर परकोटे के भीतर घनश्यामजी का मंदिर तथा मूलनायक मंदिर का निर्माण करवाया। उसकी रानी राणावती ने झालरे के निकट शिखरबन्द मन्दिर और जाड़ेची ने चान्दपोल के बाहर एक बावड़ी बनवाई।

    अजीतसिंह को अपनी पुत्री का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखसीयर से करना पड़ा। बाद में अवसर पाकर अजीतसिंह ने फर्रूखसीयर की उसके ही महल में हत्या कर दी और अपनी बेटी को विधवा बनाकर जोधपुर ले आया। वह अप्रतिम विद्वान था। उसके लिखे ग्रंथों में गुणसागर, दुर्गापाठ भाषा, निर्वाण दूहा, अजीतसिंहजी रा कह्या दूहा एवं महाराजा अजीतसिंह जी रा गीत आदि प्रसिद्ध हैं। 23 जुलाई 1724 को जब महाराजा अजीतसिंह अपने महल में सो रहा था तब उसके दूसरे नम्बर के पुत्र बखतसिंह ने तलवार से उसकी हत्या कर दी। इस हत्या में जयपुर नरेश जयसिंह तथा अजीतसिंह के बड़े पुत्र अभयसिंह का भी हाथ था। अजीतसिंह के साथ 6 रानियां, 20 दासियां, 9 उड़दा बेगणियां, 20 गायनें तथा 2 हजूरी बेगमें सती हुईं। गंगा नाम की पड़दायत (उपपत्नी) भी राजा के साथ जलाई गई। अजीतसिंह के साथ उसकी भी हत्या हुई थी। कई बन्दर और मोर भी अपनी इच्छा से चिता में गिर-गिर कर जल गये जो राजा से विशेष स्नेह रखते थे। वह दिन जोधपुर में बड़े शोक, सन्ताप और हाहाकर का था।

    अजीतसिंह के ज्येष्ठ पुत्र अभयसिंह (1724-1749 ई.) को मुगल बादशाह ने ’राजराजेश्वर’ उपाधि से विभूषित किया। 1730 ई. में बादशाह, गुजरात के सुबेदार सरबुलंदखाँ से नाराज हो गया। उसने अजमेर तथा गुजरात के सूबा महाराजा अभयसिंह को दे दिये तथा उसे खिलअत, 18 लाख रुपए नगद और मय गोला-बारूद के 50 तोपें भी दीं। महाराजा अलवर होते हुए अजमेर पहुँचा और वहाँ पर अधिकार कर मेड़ता होता हुआ जोधपुर आया। कुछ दिनों बाद जब 20 हजार सवारों का रिसाला तैयार हो गया, तब वह सरबुलंद खाँ के विरुद्ध रवाना हुआ। बखतसिंह भी अपनी सेना लेकर अभयसिंह की सहायता के लिए आ गया। कुछ समय तक युद्ध होने के पश्चात् नींबाज ठाकुर ऊदावत अमरसिंह के माध्यम से महाराजा और सरबुलंद खाँ के बीच संधि हुई। उसने गुजरात का सूबा महाराजा को सौंप दिया और महाराजा ने उसे उसकी सेना के वेतन आदि के लिए एक लाख रुपए नगद और वहाँ से जाने के समय भार ढोने की गाड़ियाँ और ऊँट देने का वायदा किया। सरबुलंद खाँ, महाराजा के कैम्प में आकर मिला तथा महाराज की पगड़ी से अपनी पगड़ी बदली।

    अभयसिंह ने अपने भाई बखतसिंह को नागौर की जागीर दी तथा जोधपुर में अभय सागर तालाब, चौखा गांव का बगीचा, अजीतसिंह का देवल और मण्डोर का दरवाजा बनवाया। अहमदाबाद पर विजय प्राप्त होने पर उसने मेहरानगढ़ में फतहपोल का निर्माण करवाया। अभयसिंह के बाद उसका पुत्र रामसिंह राजा हुआ किंतु उसे बखतसिंह (1751-1752 ई.) ने जोधपुर से बाहर निकाल दिया। बखतसिंह ने जोधपुर शहर में नौचौकिया एवं मंडी बनवाई तथा दौलतखाना, लोहापोल और सूरजपोल की मरम्मत करवाई। कर्नल टॉड के अनुसार यदि बखतसिंह कुछ और वर्ष जीवित रहता तो सारे हिन्दूस्तान में राजपूत छा जाते किंतु दुर्भाग्यवश जयपुर नरेश ने उसकी हत्या करवा दी। इस काल तक मुगलों की पकड़ पूरी तरह ढीली पड़ गई थी।

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  • जोधपुर में उड्डयन के जनक महाराजा उम्मेदसिंह

     03.06.2020
    जोधपुर में उड्डयन के जनक महाराजा उम्मेदसिंह

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महाराजा उम्मेदसिंह और वायुयान में परस्पर विशेष सम्बंध दिखाई देता है। जिस वर्ष संसार में पहले वायुयान ने हवा में पहली उड़ान भरी, उसी वर्ष महाराजा उम्मेदसिंह का जन्म हुआ। जिस वर्ष वायुयान ने दुनिया का पहला चक्कर लगाया, उसी वर्ष महाराजा उम्मेदसिंह ने भारत के किसी देशी रजवाड़े में पहले उड्डयन विभाग की स्थापना की। 

    महाराजा उम्मेदसिंह

    महाराजा उम्मेदसिंह ई. 1918 में मारवाड़ रियासत के शासक हुए। उस समय वे नाबालिग थे। अतः शासन का काम जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप चलाते थे। उनकी सहायता के लिये रीजेंसी कौंसिल स्थापित की गयी। उस समय मारवाड़ रियासत में प्रशासनिक नवीनीकरण का कार्य चल रहा था। दुर्भाग्य से 1922 में सर प्रताप का निधन हो गया। अगले वर्ष 1923 में महाराजा उम्मेदसिंह को शासन सम्बंधी निर्णय लेने के अधिकार मिल गये। इसके बाद मारवाड़ रियासत में प्रशासनिक सुधारों का काम और आगे बढ़ा।

    यह वह समय था जब ब्रिटिश शासन विश्वव्यापी मंदी से उबरने के लिये जी तोड़ हाथ-पांव मार रहा था। इस कारण अंग्रेजों ने देशी रजवाड़ों को प्रशासनिक सुधार के लिये न केवल प्रेरित किया अपितु किसी हद तक बाध्य भी किया। महाराजा उम्मेदसिंह दूरदर्शी एवं आधुनिक विचारों के धनी थे। उन्होंने नये समय की चाल को समय रहते समझा और अपनी रियासत में कई नये विभागों की स्थापना की तथा पुराने विभागों को पुनर्गठित किया। नये विभागों में उड्डयन विभाग कई दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण था। यह एक ऐसा विभाग था जिसने न केवल ब्रिटिश भारत में अपिुत सम्पूर्ण यूरोप में जोधपुर रियासत को एक नवीन सम्मान और नये सिरे से ख्याति दिलवाई तथा रियासत को नवीन आर्थिक एवं सामरिक गतिविधियों का केन्द्र बना दिया।

    वायुयान का विकास

    17 दिसम्बर 1903 को राइट बंधुओं- विल्बर राइट तथा ओरविले राइट ने संसार के पहले विमान ‘राइट फ्लायर’ को आकाश में उड़ाया था। यह अधिकतम 59 सैकेण्ड हवा में रह सका था। संसार इस उपलब्धि के बारे में 9 सितम्बर 1908 को जान सका था जब राइट बंधुओं ने अमरीका में अपने विमान का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। उस दिन वे एक घण्टे से भी अधिक समय तक हवा में रह सके थे। 1909 में राइट बंधुओं ने विश्व की पहली विमान निर्माण कम्पनी का गठन किया।

    ई. 1911 में इटली और तुर्की के बीच हुए युद्ध में वायुयानों का प्रयोग युद्ध क्षेत्र की निगरानी के लिये किया गया। इससे संसार भर में चली आ रही हजारों वर्ष पुरानी नगर प्राचीर और दुर्ग निर्माण व्यवस्था महत्वहीन हो गयी। ई. 1912 में विल्बर राइट की मृत्यु हो गयी और ई. 1915 में ओरविले राइट ने अपनी कम्पनी के अधिकार विमानन में नवीन तकनीकी शोध के काम को आगे बढ़ाने के लिये दूसरी कम्पनियों को बेच दिये। इसके बाद विमानन का द्रुत विकास आरंभ हुआ।

    दुनिया भर की सरकारें, व्यापारिक प्रतिष्ठान और धनी व्यक्ति अपने लिये विमान बनवाने को लालायित होने लगे। परिणाम स्वरूप यूरोप और अमरीका के आकाश विभिन्न कम्पनियों द्वारा बनाये गये विमानों से भर गये। इन विमानों में बैठे हुए स्त्री, पुरुष और बच्चे प्रसन्नता, भय और रोमांच के मारे चीखते चिल्लाते थे और अपने अनुभवों से दूसरों को भी रोमांचित करते थे। ई. 1924 में अमरीकी सेना के दो डगलस बाइप्लेनों ने 44 हजार 300 किलोमीटर की दूरी तय करके पहली बार पूरी दुनिया का चक्कर लगाया।

    यही वह समय था जब महाराजा उम्मेदसिंह ने अपनी रियासत में वायु सेवाएं आरंभ करने का निर्णय लिया। जोधपुर में उड्डयन के जनक महाराजा उम्मेदसिंह महाराजा उम्मेदसिंह न केवल जोधपुर में अपितु ब्रिटिश भारत के अधीन देशी रजवाड़ों में भी उड्डयन इतिहास के जनक थे। इस नाते उनके कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण कार्य उड्डयन विभाग की स्थापना करना कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

    सौभाग्य से उन दिनों जोधपुर रियासत को मि. एस. जी. एडगर जैसे प्रबुद्ध अधिकारी की सेवाएं प्राप्त थीं जो उन दिनों जोधपुर रियासत के पी.डब्लू. डी. मिनिस्टर थे। उनके काल में जोधपुर में नागरिक उड्डयन की दिशा में किये गये कार्य-कलापों की जानकारी जोधपुर सरकार के चीफ इंजीनियर कार्यालय की फाइलों में उपलब्ध है। इन फाइलों में से फाइल संख्या 111 सी अधिक महत्वपूर्ण है। इस फाइल में उन दिनों हुए विभिन्न निर्माण कार्यों तथा उन पर हुए व्यय आदि के तत्कालीन आंकड़े तो उपलब्ध हैं ही, साथ ही तत्कालीन अभियंताओं के मध्य हुए पत्राचार तथा तत्कालीन पी.डब्लू.डी. मिनिस्टर मि. एस. जी. एडगर, तथा स्टेट काउंसिल के सचिव के मध्य हुए पत्राचार भी उपलब्ध हैं।

    उन दिनों प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों- इलस्टेªटेड वीकली ऑफ इण्डिया, टाइम्स ऑफ इण्डिया, द डेली गजट, इवनिंग स्टैण्डर्ड तथा स्टेट्समैन आदि में भी जोधपुर की हवाई यातायात गतिविधियों का विवरण छपता था। इन विवरणों के साथ जोधपुर में उन दिनों मौजूद हवाई अड़डे तथा स्टेल होटल आदि भवनों के चित्र भी प्रकाशित हेाते थे।

    जोधपुर तथा उत्तरलाई में हवाई अड्डों की स्थापना

    महाराजा उम्मेदसिंह ने ई. 1924 में जोधपुर में तथा ई. 1925 में उत्तरलाई में सार्वजनिक निर्माण विभाग के माध्यम से हवाई अड्डों का निर्माण करवाया। आरंभ में हवाई अड्डों के निर्माण कार्य में जंगल को काटने, जमीन को सममतल करने तथा कार्मिकों के निवास हेतु घर बनाने की गतिविधियों सम्मलित की गयीं। इन प्रारंभिक कार्याें के लिये जोधपुर हवाई अड्डे पर सात सौ उन्चालीस रूपए तीन आने नौ पाई तथा उत्तरलाई हवाई अड्डे के प्रारम्भिक निर्माण कार्यों पर एक हजार दो सौ अड़सठ रूपए पाँच आने छह पाई व्यय किये गये।

    जोधपुर फ्लाइंग क्लब

    ई. 1931 में महाराजा उम्मेदसिंह ने दिल्ली फ्लाइंग क्लब से निजी वायुयान चालक का अनुज्ञा पत्र प्राप्त किया तथा उसी वर्ष जोधपुर फ्लाइंग क्लब की नींव रखी। महाराजा उम्मेदसिंह स्वयं इस क्लब के अध्यक्ष थे। वाइस प्रेसिडेण्ट ऑफ स्टेट काउंसिल- कुंवर महाराज सिंह को फ्लांइग क्लब का एक्स-ऑफिशियो उपाध्यक्ष बनाया गया। तत्कालीन पी. डब्लू. डी. मिनिस्टर मि. एस. जी. एडगर, एक्स-ऑफिशियो फाइनेंस मैम्बर मि. जे. डब्लू. यंग, पायलेट इंसट्रक्टर मि. आर. ए. टारलेटोन, ऑनरेरी ट्रेजरार एण्ड ऑडीटर मि. एफ. स्टील, ऑनरेरी सेक्रेटरी मि. जे.डब्लू. गोरडन को इस क्लब का सदस्य बनाया गया।

    ग्राउंड इंजीनियर मि. आर. डी. सैमुअल की सेवाएं भी क्लब के लिये उपलब्ध रहीं। बाद में जे. डब्लू. यंग की अनुपस्थिति में राव राजा नरपतसिंह को सदस्य बना दिया गया। जोधपुर फ्लांइग क्लब की शुरूआत में क्लब में दो टाइगर मौथ, एक लीपर्ड मौथ, दो लीक हीड वायुयान शामिल किये गये। क्लब के मुख्य प्रशिक्षक जी. गोडविन थे। वायु सेवाओं को लोकप्रिय बनाने के लिये महाराजा उम्मेदसिंह ने अपने सगे संबंधियों को वायुयान में उड़ने के लिए प्रोत्साहित किया तथा रियासत के कीरब सभी परगनों में हवाई पट्टी का निर्माण करवाया जिससे वहाँ हवाई जहाज उतर सकें तथा सम्पूर्ण मारवाड़ हवाई मार्ग से जुड़ सके।

    ई. 1931 में मेड़ता रोड, तिलवाड़ा और गडरा रोड में हवाई पटिटयों का निर्माण करवाया गया। प्रत्येक हवाई पट्टी के निर्माण हेतु एक हजार एक सौ रूपए स्वीकृत किये।

    1935 तक इस क्लब के लगभग 50 सदस्य बन चुके थे, जिनमें से दस सदस्य अकेले ही विमान उड़ाने में कुशलता रखते थे और अति दक्ष चालक थे। सात आनरेरी मैम्बर्स, छः एसोसिएट मैम्बर्स, बारह यूरोपीयन मैम्बर्स और शेष इंडियन मैम्बर्स थे। ई. 1936 में इस क्लब के सदस्यों ने 683 घंटे 30 मिनट उड़ानें भरीें। बाद में इस फ््लाइंग क्लब को नम्बर दो एलिमेन्टरी फ्लाइंग स्कूल कहा जाने लगा। जोधपुर तथा उत्तरलाई हवाई अड्डों का विकास जोधपुर तथा उत्तरलाई हवाई अड्डों का विस्तार द्रुत गति से हुआ। हवाई अड्डों पर विमानशाला, पेट्रोल पम्प भवन, पुलिस गारद और भंडार गृह इत्यादि का निर्माण किया गया।

    ई. 1932-33 तक जोधपुर हवाई अड्डे के विकास पर एक लाख छत्तीस हजार आठ सौ तीस रूपए नौ आने तथा उत्तरलाई हवाई अड्डे के विकास पर नौ हजार छः सौ दस रूपए पाँच आने नौ पाई खर्च किये गये। उस समय भारत भर में एक कहावत प्रचलित हो गई थी कि जोधपुर में इतने बाशिंदे हवा में उड रहे हैं कि पक्षियों को आकाश में उड़ने की जगह नहीं बची है। ई. 1933-34 तक जोधपुर हवाई अड्डे का कार्य काफी बढ़ गया। यहाँ प्रति वर्ष हवाई जहाजों के उतरने की संख्या बढ़ रही थी तथा रात्रि में भी विमान उतरने लगे थे। रात्रि में विमानों के आवागमन की संख्या के बारे में जोधपुर सरकार के चीफ इंजीनियर कार्यालय की फाइल संख्या 111 सी/1/8/1 भाग प्रथम में लगे पत्र संख्या 7419 में उल्लेख किया गया है कि जुलाई 1933 में 8, अगस्त में 8, सितम्बर में 14, अक्टूबर में 20, नवम्बर में 18, दिसम्बर में 32, वर्ष 1934 की जनवरी में 27, फरवरी में 19, और मार्च में 14 विमान रात्रि में उतरे।

    फरवरी 1935 में रात्रि में जोधपुर हवाई अड्डे पर उतरने वाले वायुयानों की संख्या 38 बताई गयी है। इसलिए हवाई अड्डे पर प्रकाश का प्रबंध करना आवश्यक हो गया। महाराजा ने जोधपुर नगर में स्थित बिजलीघर को इस हवाई अड्डे के विद्युतिकरण की योजना बनाने का आदेश दिया। इस कार्य हेतु नवासी हजार रूपए की योजना बनायी गयी। जोधपुर हवाई अड्डे के विद्युतिकरण कार्य को बडे़ प्रशंसनीय ढंग से पूर्ण किया गया जिससे रात्रि में हवाई जहाजों के आवागमन की सुविधा मंे उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके बाद उन्नतीस हजार तीन सौ तैतीस रूपए की लागत से कन्ट्रोल टावर के निर्माण की योजना हाथ में ली गयी।

    रात्रि में विद्युत प्रकाश की व्यवस्था हो जाने तथा कण्ट्रोल टावर बन जाने से जोधपुर हवाई अड्डा विश्व के आधुनिक हवाई अड्डों में गिना जाने लगा और इसकी तुलना यूरोप के सर्वोत्तम हवाई अड्डों से की जाने लगी। इस व्यवस्था के कारण जोधपुर विश्व भर में वायुयानों के रात्रिकालीन ठहराव के लिये प्रसिद्ध हो गया। 1935 तक जोधपुर हवाई अड्डे पर दो फ्लड लाइटें, वायु सूचक यंत्र, चार-दीवारी तथा अवरोधक विद्युत व्यवस्था से सुसज्जित हो चुका था। रात्रि में वायुयान चालकों को हवाई अड्डे की दिशा बताने के लिये स्टेट होटल भवन पर घूमता हुआ विद्युत संकेतक लगाया गया था।

    महाराजा उम्मेदसिंह ने जोधपुर हवाई अड्डे को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की श्रेणी में बनाये रखने के लिए किसी भी बात की कमी नहीं रखी। ई. 1935 में उन्होंने रन-वे के निर्माण हेतु दस हजार रूपए की अनुमति प्रदान की। हवाई जहाजों का आवागमन निरंतर बढ़ते रहने से इस हवाई अड्डे पर वायुयानों में ईंधन भरने तथा ईंधन के भंडार गृह की सुविधा उपलब्ध करवाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। कराची की कम्पनी मै. स्टेण्डर्ड वेक्यूम ऑयल कम्पनी लिमिटेड ने जोधपुर हवाई अड्डे पर ईंधन भंडार गृह के निर्माण का ठेका लिया। ईंधन भण्डारगृह की निर्माण प्रक्रिया दीर्घकालिक थी इसलिए कम्पनी के कर्मचारियों के लिये हवाई अड्डे के निकट ही पक्के भवन बनाये गये।

    जोधपुर रियासत में अन्य हवाई स्टेशनों का विकास

    जोधपुर रियासत में ई. 1933 तक जोधपुर, उत्तरलाई, फालना, नारायणपुरा, मेड़तारोड, तिलवाड़ा, गडरारोड, नागौर, पाली, रोहट, धोलेराव, सोजत, बाली, जालोर तथा सांचोर में कुल पन्द्रह स्टेशनों का निर्माण किया गया जहाँ हवाई जहाज को उतारा जा सकता था। बाद मे सादड़ी, कुचामन, सांभर और बालसमंद में भी हवाई पट्टियां बनाई गयीं। इन स्टेशनों को दो वर्गों मंे विभाजित किया गया- प्रथम वर्ग में पब्लिक लेंडिंग ग्राउंड्स तथा द्वितीय वर्ग में प्राइवेट लेडिंग ग्राउंड्स रखे गये। जोधपुर, उत्तरलाई, फालना, मेड़तारोड, तिलवाड़ा, गडरारोड, नागौर, सोजत और रोहट में पब्लिक लेंडिंग ग्राउंड्स थे जबकि धोलेराव, जालोर, पाली, सादड़ी, सांचोर, कुचामन, सांभर ओर बालसमंद में प्राइवेट लेडिंग ग्राउंड्स थे।

    ई. 1934 में भीनमाल और डीडवाना में भी हवाई जहाज उतरने के स्टेशन बनाने की योजना बनायी गयी। बाद के वर्षों में सरदारसमंद, परबतसर सिटी, फलोदी, शिव, गुडा, जसवंतपुरा, मादरी तथा हेमावास में भी हवाई पट्टियां बनवाई गयीं। 11 मार्च 1938 तक जोधपुर राज्य में तेबीस स्थानों पर हवाई जहाज उतारने के मैदान स्थापित हो चुके थे।

    जोधपुर रियासत में हवाई अड्डों का निर्माण इतनी दु्रत गति से हुआ कि ब्रिटिश शासक अचम्भित रह गए। आखिरकार ब्रिटिश सरकार ने महाराजा को लिखा कि सुरक्षा की दृष्टि से अधिक हवाई पटिटयों का निर्माण करना उचित नहीं है। अतः बिना ब्रिटिश सरकार के परामर्श से भविष्य में जोधपुर रियासत में हवाई पटिटयों का निर्माण नहीं किया जाये। ट्रान्स इंडिया हाई-वे का मुख्य अड्डा जोधपुर हवाई अड्डा ट्रान्स इंडिया हाई वे पर स्थित होने से मात्र दस वर्ष की अवधि में ही भारत का मुख्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बन गया। उस समय यहाँ पर तीन नियमित वायु सेवाएं उपलब्ध थीं-

    1. इंडियन ट्रान्स कॉन्टीनेंटल एयरवेज यह एयरवेज भारत से बाहर डाक तथा अन्य सामग्री ले जाती थी। यह सप्ताह में दो बार जोधपुर आती थी। इसका सम्बंध इम्पीरियल एयरवेज से था। यह सेवा लन्दन से कराची तक की थी। इसके अतिरिक्त इसकी ‘फीडर सेवाएं’ भी प्रचलित थीं, जैसे जोधपुर-लाहौर-रावलपिंडी, जोधपुर-अहमदाबाद -बम्बई। महाराजा ने जोधपुर से उड़ान की कई योजनाएं बनाईं थीं किंतु द्धितीय विश्वयुद्ध (ई.1939-451) के कारण इन योजनाओं को स्थगित कर दिया गया।

    2. एयर फ्रांस अथवा फ्रैंच एयरवेज इस एयरवेज की उड़ान फ्रांस से सैगोन तक थी। यह सप्ताह में एक बार जोधपुर आती थी।

    3. रॉयल डच के.एल.एम एयरलाइंस रॉयल डच एयरलाइंस की उड़ान एमस्टरडम से बटाविया तक थी तथा इसकी उड़ान सप्ताह में दो बार होती थी। जोधपुर में भी इसका ठहराव था।

    आवागमन में वृद्धि

    वर्ष 1929-30 में जोधपुर हवाई अड्डे पर 99 वायुयान उतरे। इसके अगले वर्ष 1930-31 में इस संख्या में ढाई सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई और 249 विमान उतरे। वर्ष 1931-32 में 340, वर्ष 1932-33 में 418 तथा वर्ष 1933-34 में 451 विमान जोधपुर हवाई अड़डे पर उतरे। अगले तीन वर्षों में इनकी संख्या एक बार फिर उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। वर्ष 1936 में जोधपुर हवाई अड्डे पर सात सौ इकसठ हवाई जहाजों का आवागमन हुआ था।

    महाराजा इस हवाई अड्डे की देख-भाल राज्य के खर्चे से किया करते थे परन्तु जो भी हवाई जहाज इस अड्डे पर उतरता था उसे निदेशक नागरिक उड्डयन विभाग के नियम के अनुसार निर्धारित शुल्क देना पडता था। स्थानीय सरकार हवाई अड्डे पर ग्राउंड स्टाफ, हैंगर, रात्रि में हवाई हजाज के उतरने की व्यवस्थार्, इंंधन भरने की व्यवस्था, वायरलैस की व्यवस्था तथा अन्य प्रकार की सुविधाओं का प्रबंध करती थी।

    महाराजा उम्मेदसिंह को इस बात का पूर्ण श्रेय था कि उन्होंने ही जोधपुर हवाई अड्डे को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का स्तर दिलवाया। इसी कारण जोधपुर विश्व के नक्शे में अपना महत्व रखने लगा । स्टेट होटल महाराजा उम्मेदसिंह ने जोधपुर में स्टेट होटल का निर्माण करवाया। इसे आजकल ऑफिसर्स मैस कहा जाता है। उस समय जोधपुर की वायुसीमा से होकर जाने वाले प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय वायुयान चालक दल के सदस्य स्टेट होटल में विश्राम करके जोधपुर के शाही ठाठ-बाठ का आनन्द उठाकर अपने आप को गौरान्वित अनुभव करते थे।

    द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इण्डिया के 15 दिसम्बर 1935 के अंक में इस स्टेट होटल के बारे में सचित्र विवरण प्रकाशित किया गया था और इसे वायुयात्रियों के लिये भारत में अपनी तरह की सर्वश्रेष्ठ सुविधा बताया गया था। भारत का सबसे तेज वायुयान जोधपुर में महाराजा उम्मेदसिंह ने सबसे पहला वायुयान ‘‘जिप्सी मौथ’’ खरीदा था। बाद में उन्होंनें दो टाइगर मौथ तथा दो लीक हीड वायुयान एवं अन्य वायुयान भी खरीदे। 1935 में महाराजा के पास ‘‘कॉम्पर स्विफ्ट (मोनोस्पार)’ नामक अत्याधुनिक वायुयान था जिसे रखना बहुत ही गर्व की बात मानी जाती थी। इस समय उनके पास ‘‘पर्सीवल गल’’ नामक वायुयान भी था। उस समय भारत में किसी अन्य व्यक्ति या राजा के पास इससे तेज चलने वाला वायुयान नहीं था।

    ई. 1935 तक महाराजा उम्मेदसिंह 200 घण्टे से अधिक की उड़ान भर चुके थे। वे रात्रि में भी तथा न दिखाई देने वाली परिस्थितियों में भी विमान चलाने के लिये जाने जाते थे। ई. 1936 मे अजमेर के व्यवसायी रायबहादुर सेठ भागचंद सोनी ने महाराजा को राज्य के उपयोग हेतु एक हवाई जहाज लियोपार्ड मोथ (वी.टी.-ए. एच. एच.) भेंट किया था।

    एरियल पिकनिक

    जोधपुर फ्लाइंग क्लब के मैम्बर उड़ान तो भरते ही थे परन्तु कभी-कभी एरियल-पिकनिक में भी जाते थे। एरियल पिकनिक से मारवाड़ राज्य के दर्शनीय स्थलों का विकास होने लगा तथा पर्यटकों को आकर्षित करने में सफलता मिली। इस क्लब द्वारा लेंडिंग कम्पीटिशन आायेजित किए जाते थे तथा आकाश में नये-नये करतब करने सिखाये जाते थे। जनसामान्य के लिये वायुयात्रा महाराजा उम्मेदसिंह चाहते थे कि वायुयान केवल अमीरों के लिये ही उपलब्ध न रहे अपितु सामान्य जनता भी हवाई जहाज की उडान का आनन्द ले। उन्होंने नागरिकों को हवाई जहाज में  बिठाने तथा उनकी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए सस्ती हवाई सैर की योजना बनाई। इस योजना के तहत एक हवाई जहाज सप्ताह में छः दिन तक पूरे शहर का चक्कर लगाता था। इसके लिये प्रत्येक व्यक्ति से दस रूपए शुल्क लिया जाता था।

    वायुसेना प्रशिक्षण केन्द्र

    जोधपुर में वायुसैनिकों के प्रशिक्षण हेतु अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ब्रिटिश सरकार ने जोधपुर में वायुसेना प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया। ब्रिटिश वायुसेना को सहायता द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रॉयल एयर फोर्स को हैवी बॉम्बर खरीदने के लिये महाराजा उम्मेदसिंह ने 1941 में जोधपुर रियासत की जनता की ओर से 2 लाख 70 हजार रूपये भिजवाये। लॉर्ड बीवर ब्रुक ने इस सहायता के लिये महाराजा को लंदन से केबल भेजकर रॉयल एयर फोर्स एवं सम्राट की ओर से आभार ज्ञापित किया। अप्रेल 1943 में महाराजा उम्मेदसिंह ने रॉयल एयर फोर्स की पच्चीसवीं जयंती तथा इण्डियन एयर फोर्स की दसवीं जयंती पर ब्रिटिश सरकार को 75 हजार पौण्ड प्रदान किये। इस राशि को इन दोनों फौजों के बीच हितकारी कार्यों के लिये बांटा गया।

    अभूतपूर्व योगदान

    महाराजा उम्मेदसिंह ने अपने कार्यकाल के अंतिम वर्षों में उड्डयन विभाग पर राजकोष मे से एक करोड चार लाख दस हजार दो सौ बत्तीस रूपए छह आने तीन पाई खर्च की थी। यह धन राशि हवाई अड्डों के निर्माण, उनके विकास एवं रियासत में स्थित विभिन्न हवाई पटिटयों को बनाने में खर्च की गई थी। उनकी विमानन सेवाओं से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने 23 जून 1931 को उन्हें रॉयल वायुसेना में ऑनरेरी एयर कमोडोर तथा 1945-46 में ऑनरेरी एयर वाइस मार्शल की उपाधी दी। ब्रिटिश आर्मी ने उन्हें ऑनरेरी लेफ्टिनेंट जनरल की उपाधी से अलंकृत किया। 9 जून 1947 को अपेंडिक्स के एक लघु आपरेशन के पश्चात माउंट आबू में महाराजा का निधन हो गया। इस प्रकार भारत के देशी रजवाड़ों में वायुसेवाओं का सूत्रपात करने वाले महाराजा उम्मेदसिंह स्वतंत्र भारत में विकास के नये अध्याय लिखने के लिये उपलब्ध नहीं रहे।

    -मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान की लोक संगीत परम्परा एवं प्रमुख लोक गीत

     03.06.2020
    राजस्थान की लोक संगीत परम्परा एवं प्रमुख लोक गीत

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    बिना राजस्थान आये यदि कोई व्यक्ति राजस्थान को समझना चाहता है तो वह यहाँ का लोक संगीत सुन ले। सम्पूर्ण राजस्थान सुरीली स्वर लहरियों में विरल होकर यहाँ के लोक संगीत में समाया हुआ है। लोक संगीत की यह धारा दो रूपों में प्रवाहित हुई है। एक तो जन साधारण द्वारा सामाजिक उत्सवों, जन्म, विवाह, स्वागत, विदाई, संस्कार, तीज, गणगौर, होली आदि के अवसर पर गाया जाने वाला लोक संगीत और दूसरा राजाओं एवं सामंतों की प्रशस्ति में तथा उनके आमोद-प्रमोद के लिये गाया जाने वाला लोक संगीत। पारिवारिक उत्सवों तथा सामाजिक पर्वों पर गाये जाने वाले लोक गीतों के भाव बहुत सुकोमल एवं मन को छूने वाले हैं। ईंडोणी, कांगसियो, गोरबंद, पणिहारी, लूर, ओलूं, हिचकी, सुपणा, मूमल, कुरजां, काजलिया, कागा, जीरा, पोदीना, चिरमी तथा लांगुरिया आदि लोकगीत गाँव-गाँव में चाव से गाये जाते हैं। जबकि सामंती परिवेश में प्रयुक्त लोक गीत वीररस एवं शृंगार रस से परिपूर्ण हैं। देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त करने, उन्हें प्रसन्न करने तथा उनसे मन वांछित फल प्राप्त करने के उद्देश्य से राजस्थान में रात्रि जागरण की बड़ी पुरानी और व्यापक प्रथा रही है जिसे रतजगा कहा जाता है। विनायक, महादेव, विष्णु, राम, कृष्ण, बालाजी (हनुमान), भैंरू, जुंझार, पाबू, तेजा, गोगा, रामदेव, देवजी, रणक दे, सती माता, दियाड़ी माता, सीतला माता, भोमियाजी आदि के भजन इन रात्रि जागरणों में गाये जाते हैं। मीरां, कबीर, दादू, रैदास, चंद्रस्वामी तथा बख्तावरजी के पद भी बड़ी संख्या में गाये जाते हैं। लोकगीतों की इतनी सुदीर्घ परम्परा का मूल कारण राजस्थान में निवास करने वाली वे अनेक जातियाँ हैं जो केवल गा-बजाकर ही अपना गुजारा करती रही हैं। इनके गीत परिष्कृत, भावपूर्ण तथा विविधता लिये हुए होते हैं। शास्त्रीय संगीत की भांति इनमें भी स्थायी तथा अंतरे का स्वरूप दिखाई देता है। खयाल तथा ठुमरी की भांति इन्हें छोटी-छोटी तानों, मुकरियों तथा विशेष आघात देकर सजाया जाता है। इन गीतों को मांड, देस, सोरठ, मारू, परज, कालिंगड़ा, जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू खमाज आदि राग-रागिनियों में गाया जाता है। कुरजां, पीपली, रतन राणो, मूमल, घूघरी, केवड़ा आदि लोक गीत जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर आदि क्षेत्रों में आये जाते हैं। जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर, करौली तथा धौलपुर आदि मैदानी भागों में स्वरों के उतार-चढ़ाव वाले गीत गाये जाते हैं। मंद से तार सप्तक तक गायन होता है। इन क्षेत्रों में सामूहिक रूप से गाये जाने वाले भक्ति और शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत गाये जाते हैं। मांड तथा मारू रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक है- मांड: राजस्थान की मांड गायिकी अत्यंत प्रसिद्ध है। थोड़े-बहुत अंतर के साथ क्षेत्र विशेष में इन्हें अलग तरह से गाया जाता है। उदयपुर की मांड, जोधपुर की मांड, जयपुर-बीकानेर की मांड, जैसलमेर की मांड, मांड गायिकी में अधिक प्रसिद्ध हैं। राग सोरठ, देस तथा मांड तीनों एक साथ गाई व सुनी जाती है। मारू: लोक गायकों द्वारा गाये जाने वाले वीर भाव जागृत करने वाले गीत सिंधु तथा मारू रागों पर आधारित होते थे जिन्हें सेनाओं के रण-प्रयाण के समय गाया जाता था। पश्चिमी राजस्थान में गाये जाने वाले लोकगीत ऊंचे स्वर व लम्बी धुन वाले होते हैं जिनमें स्वर विस्तार भी अधिक होता है। राजस्थान के प्रमुख लोकगीत ओल्यूँ: ओल्यूँ का अर्थ होता है- स्मरण। अतः ओल्यू किसी की स्मृति में गाई जाती है। बेटी की विदाई पर ओल्यूँ इस प्रकार गाई जाती है- कँवर बाई री ओल्यूँ आवै ओ राज। इंडोणी: पानी भरने जाते समय स्त्रियां मटके को सिकर पर टिकाने के लिये मटके के नीचे इंडोणी का प्रयोग करती हैं। इस अवसर पर यह गीत गाया जाता है- म्हारी सवा लाख री लूम गम गई इंडोणी। कांगसियो: कंघे को कांगसिया कहा जाता है। यह शृंगार रस का प्रमुख गीत है- म्हारै छैल भँवर रो कांगसियो पणिहारियाँ ले गई रे। कागा: इस गीत में विरहणी नायिका द्वारा कौए को सम्बोधित करके अपने प्रियतम के आने का शगुन मनाया जाता है- उड़-उड़ रे म्हारा काळा रे कागला, जद म्हारा पिवजी घर आवै। काजलियो: यह शृंगार रस से ओत-प्रोत गीत है जो होली के अवसर पर चंग के साथ गाया जाता है। कामण: वर को जादू टोने से बचाने के लिये स्त्रियाँ कामण गाती हैं। कुरजांँ: प्रियतम को संदेश भिजवाने के लिये कुरजाँ पक्षी के माध्यम से यह गीत गाया जाता है- कुरजांँ ए म्हारौ भंवर मिलाद्यौ ए। केसरिया बालम: यह एक रजवाड़ी गीत है जिसमें विरहणी नारी अपने प्रियतम को घर आने का संदेश देती है- केसरिया बालम आवो नी, पधारौ म्हारे देस। गणगौर: पार्वती देवी को समर्पित त्यौहार गणगौर पर गणगौर के गीत गाये जाते हैं- खेलन द्यौ गणगौर, भँवर म्हानै खेलन द्यौ गणगौर। गोरबंद: गोरबंद ऊँट के गले का आभूषण होता है जिस पर शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाये जाते हैं- म्हारो गोरबंद नखरालौ। घुड़ला: घुड़ला पर्व पर कन्याएं छेदांे वाली मटकी में दिया रखकर घर-घर घूमती हुई गाती हैं- घुड़लो घूमेला जी घूमेला, घुड़ले रे बांध्यो सूत। घूमर: गणगौर आदि विशेष पर्वों पर घूमर नृत्य के साथ घूमर गाया जाता है- म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ। घूमर रमवा म्हैं जास्यां। घोड़ी: बारात की निकासी पर घोड़ी गाई जाती है- घोड़ी म्हारी चन्द्रमुखी सी, इन्द्रलोक सूँ आई ओ राज। चिरमी: वधू अपने ससुराल में अपने भाई और पिता की प्रतीक्षा में चिरमी के पौधे को सम्बोधित करके गाती है- चिरमी रा डाळा चार वारी जाऊँ चिरमी ने। जच्चा: बालक के जन्मोत्सव पर जच्चा या होलर गाये जाते हैं। जलो और जलाल: वधू के घर की स्त्रियाँ बारात का डेरा देखने जाते समय जलो और जलाल गाती हैं- म्हैं तो थारा डेरा निरखण आई ओ, म्हारी जोड़ी रा जहाँ। जीरा: यह लोकगीत कृषक नारी द्वारा जीरे की खेती में आने वाली कठिनाई को व्यक्त करने के लिये गाया जाता है- ओ जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओ म्हारा परण्या जीरो। झोरावा: यह जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाने वाला विरह गीत है जो पति के परदेश जाने पर उसके वियोग में गाया जाता है। ढोला मारू: सिरोही क्षेत्र में ढाढियों द्वारा गाया जाने वाला गीत जिसमें ढोला मारू की प्रेमकथा का वर्णन है। तेजा: जाट जाति के लोगों द्वारा कृषि कार्य आरंभ करते समय लोक देवता तेजाजी को सम्बोधित करके तेजा गाया जाता है। पंछीड़ा: हाड़ौती एवं ढूंढड़ी क्षेत्रों में मेले के अवसर पर अलगोजे, ढोलक एवं मंजीरे के साथ पंछीड़ा गाया जाता है। पणिहारी: पानी भरने वाली स्त्री को पणिहारी कहते हैं। इस गीत में स्त्रियों को पतिव्रत धर्म पर अटल रहने की प्रेरणा दी गई है। पपैयो: यह दाम्पत्य प्रेम के आदर्श को दर्शाने वाला गीत है जिसमें प्रेयसी अपने प्रियतम से उपवन में आकर मिलने का अनुरोध करती है। पावणा: जवांई के ससुराल आने पर स्त्रियाँ उसे भोजन करवाते समय पावणा गाती हैं। पीपली: मरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु में पीपली गाया जाता है जिसमें विरहणी द्वारा प्रेमोद्गार व्यक्त किये जाते हैं। बधावा: शुभ कार्य सम्पन्न होने पर बधावा अर्थात् बधाई के गीत गाये जाते हैं। बना-बनी: लड़के के विवाह पर बना तथा लड़की के विवाह पर बनी गीत गाये जाते हैं। बीछूड़ो: यह हाड़ौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। एक पत्नी को बिच्छू ने डस लिया है और वह मरने से पहले अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है- मैं तो मरी होती राज, खा गयो बैरी बीछूड़ो। मूमल: जैसलमेर में गाया जाने वाला शृंगारिक गीत जिसमें मूमल के नख शिख का वर्णन किया गया है- म्हारी बरसाले री मूमल, हालौनी एै आलीजे रे देख। मोरिया: इस सरस लोकगीत में ऐसी नारी की व्यथा है जिसका सम्बन्ध तो हो चुका है किंतु विवाह होने में देर हो रही है। इसे रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाता है। रसिया: ब्रज क्षेत्र में रसिया गाया जाता है। रातीजगा: विवाह, पुत्र जन्मोत्सव, मुण्डन आदि शुभ अवसरों पर रात भर जागकर भजन गाये जाते हैं जिन्हें रातीजगा कहा जाता है। लांगुरिया: करौली क्षेत्र में कैला देवी के मंदिर में हनुमानजी को सम्बोधित करके लांगुरिया गाये जाते हैं- इबके तो मैं बहुअल लायो, आगे नाती लाऊंगो, दे-दे लम्बो चौक लांगुरिया, बरस दिनां में आऊंगो। लांगुरिया को सम्बोधित करके कामुक अर्थों वाले गीत भी गाये जाते हैं- नैक औढ़ी ड्यौढ़ी रहियो, नशे में लांगुर आवैगो। लावणी: नायक द्वारा नायिका को बुलाने के लिये लावणी गाई जाती है- शृंगारिक लावणियों के साथ-साथ भक्ति सम्बन्धी लावणियां भी प्रसिद्ध हैं। मोरध्वज, सेऊसंमन, भरथरी आदि प्रमुख लावणियां हैं। सीठणे: विवाह समारोह में आनंद के अतिरेक में गाली गीत गाये जाते हैं जिन्हें सीठणे कहते हैं। सुपणा: विरहणी के स्वप्न से सम्बन्धित गीत सुपणा कहलाते हैं- सूती थी रंग महल में, सूताँ में आयो रे जंजाळ, सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी। सूंवटिया: यह विरह गीत है। भील स्त्रियाँ पति के वियोग में सूंवटिया गाती हैं। हरजस: भगवान राम और भगवान कृष्ण को सम्बोधित करके सगुण भक्ति लोकगीत गाये जाते हैं जिन्हें हरजस कहा जाता है। हिचकी: ऐसी मान्यता है कि प्रिय के द्वारा स्मरण किये जाने पर हिचकी आती है। अलवर क्षेत्र में हिचकी ऐसे गाई जाती है- म्हारा पियाजी बुलाई म्हानै आई हिचकी। हींडो: श्रावण माह में झूला झूलते समय हींडा गाया जाता है- सावणियै रौ हींडौ रे बाँधन जाय। इस प्रकार लोक गीतों में विपुल विषय सम्मिलित किये गये हैं। क्षेत्र बदलने के साथ उनके गायन का तरीका भी बदल जाता है। -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • महान राजाओं ने जोधपुर को बसाया और संवारा

     03.06.2020
    महान राजाओं ने जोधपुर को बसाया और संवारा

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    जोधपुर को बसाने वाला राव जोधा बड़े जीवट वाला राजा था। उसने 12 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ रणक्षेत्र में रहकर शत्रुओं से लड़ाई लड़ी। 1438 इस्वी में जब उसके पिता रणमल की मेवाड़ में हत्या हुई, तब जोधा अपने सात सौ राठौड़ वीरों को लेकर चित्तौड़ से जोधपुर की ओर चल दिया। मेवाड़ की सेना ने राठौड़ों का पीछा किया किंतु जोधा साहस पूर्वक मेवाड़ की सेना को छकाता हुआ केवल आठ राठौड़ों के साथ मारवाड़ पहुँचने में सफल रहा। मेवाड़ की सेना ने मण्डोर पर अधिकार कर लिया। 15 साल तक लगातार युद्ध करके जोधा ने न केवल महाराणा कुंभा के मुँह में चले गये मारवाड़ को फिर से हस्तगत कर लिया, अपितु मेवाड़ की राजकुमारी से विवाह भी किया। ई.1459 में जोधपुर दुर्ग की स्थापना करके जोधा ने मारवाड़ राज्य को हमेशा के लिये सुरक्षित बना दिया। उस समय तक जयपुर, बीकानेर, और उदयपुर जैसे शहर भविष्य के गर्भ में ही थे। जोधा के वंशजों ने पूरे 490 वर्ष तक जोधपुर पर शासन किया। उसकी रानी जसमादे हाड़ी ने रानीसर तालाब बनवाया। जोधा के पुत्र सातल की रानी फूलां भटियाणी ने ई.1490 में फुलेलाव तालाब बनवाया। जोधा के वंशज गांगा ने जोधपुर में गांगेलाव का तालाब, गांगा की बावड़ी और गंगश्यामजी का मंदिर बनवाया। गांगा की रानी पद्मावती महाराणा सांगा की पुत्री थी जिसने जोधपुर में पदमसर तालाब बनवाया। गांगा के पुत्र मालदेव ने जोधपुर के किले का विस्तार किया तथा रानीसर के इर्द-गिर्द कोट बनवाया। उसने चिडि़यानाथ के झरने को कोट से घेरकर किले के भीतर ले लिया तथा जोधपुर के चारों तरफ शहर पनाह बनवाई। उसकी रानी स्वरूपदेवी ने बहूजी का तालाब बनवाया। जोधा के वंशज सूरसिंह ने चांदपोल से बाहर सूरसागर तालाब, रामेश्वर महादेव मंदिर, सूरजकुण्ड बावड़ी तथा जोधपुर शहर में तलहटी के महल बनवाये। उसके उत्तराधिकारी गजसिंह ने जोधपुर दुर्ग में तोरणपोल, उसके आगे का सभामण्डप, दीवानखाना, बीच की पोल, कोठार, रसोईघर, आनंदघनजी का मंदिर, तलहटी के महलों में अनेक नये महल, सूरसागर में कुंआ, बगीचा और महल बनवाये। उसके पुत्र जसवंतसिंह ने जोधपुर में काबुल की मिट्टी और अनार के बीज एवं पौधे मंगवाकर जोधपुर में अनार का बगीचा लगवाया। जसवंतसिंह की हाड़ी रानी बूंदी नरेश शत्रुशाल की पुत्री थी, उसने जोधपुर नगर से बाहर राईका बाग नामक बाग बनवाया। इसी रानी ने कल्याणसागर नामक तालाब भी बनवाया जो बाद में रातानाडा के नाम से विख्यात हुआ। जसवंतसिंह की शेखावत रानी खण्डेला की थी, उसने जोधपुर में शेखावतजी का तालाब बनवाया। जसवंतसिंह के पुत्र अजीतसिंह ने जोधपुर दुर्ग में फतैपोल और गोपाल पोल के बीच का कोट बनवाया। उसने जोधपुर दुर्ग में नई फतहपोल, दौलतखाना, फतैमहल, भोजनसाल, ख्वाबगाह के महल, रंगसाल और छोटे जनाने महल तथा जोधपुर नगर में घनश्यामजी का मंदिर एवं मूल नायकजी का मंदिर बनवाया। उसके पुत्र अभयसिंह ने चांदपोल दरवाजे के बाहर अभयसागर तालाब तथा जोधपुर दुर्ग में चौकेलाव का कुंआ, फूल महल तथा कच्छवाहीजी का महल बनवाया। राजा बखतसिंह ने जोधपुर नगर के बीच कोतवाली का स्थान बनवाया तथा मण्डी में नाज की बिक्री के लिये चौक बनवाया। राव मालदेव के समय बनी शहर पनाह अब छोटी पड़ने लगी थी इसलिये बखतसिंह ने उसका फिर से विस्तार करवाया तथा दुर्ग में भी कई सुधार किये। उसने जसवंतसिंह के समय बना महल गिरवाकर दौलतखाने का चौक बनवाया, लोहापोल के पास के कोठारों को तुड़वाकर वहां का मार्ग चौड़ा करवाया तथा दुर्ग में जनानी डेवढ़ी की नई पोल, नई सूरजपोल और आनंदघनजी का मंदिर बनवाया। बखतसिंह का पुत्र विजयसिंह जोधपुर के महान राजाओं में से एक था। उसने जोधपुर में गोकुलिये गुसाईंयों को लाकर बसाया जिससे जोधपुर में ब्रज की संस्कृति का प्रसार हुआ। उसने अपने राज्य में जीव हत्या का निषेध कर दिया तथा कसाईयों से उनका परम्परागत कार्य छुड़वाकर उन्हें दूसरे कामों पर लगा दिया। उसके समय जोधपुर में गंगश्यामजी का मंदिर, बालकृष्णजी का मंदिर, कुंज बिहारी का मंदिर, गुलाब सागर तालाब, गिरदीकोट, मायला बाग और उसका झालरा, फतैसागर तथा दुर्ग में मुरली मनोहरजी का मंदिर बनवाये गये। विजयसिंह का पौत्र मानसिंह जोधपुर के इतिहास में हुए महान राजाओं की कड़ी का एक अद्भुत नगीना था। वह बुद्धिमान, गुणी और विद्वान राजा था। उसने जोधपुर में पुस्तक प्रकाश के नाम से कई हजार पुस्तकों का ग्रंथालय स्थापित किया। उसने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के प्रथम बत्तीस अध्यायों का भाषा में पद्यानुवाद किया जो कृष्ण विलास के नाम से प्रकाशित हुआ। उसने रामायण, दुर्गा चरित्र, शिव पुराण, शिव रहस्य, नाथ चरित्र आदि अनेक धार्मिक ग्रंथों के आधार पर बड़े-बड़े चित्र बनवाये। मानसिंह के समय में जोधपुर में दुर्ग के भीतर जैपोल, जनानी डेवढ़ी के सामने की दीवार, आयस देवनाथ की समाधि, लोहापोल के सामने का कोट, जैपोल और दखना पोल के बीच का कोट, चौकेलाव से रानीसर तक का मार्ग, उसकी रक्षा के लिये दीवार, भैंरू पोल, चतुर्सेवा की डेवढ़ी पर का नाथजी का मंदिर और भटियानी का महल बनवाया गया। जोधा, विजय सिंह तथा मानसिंह के बारे में कहा जाता है- जोध बसायो जोधपुर ब्रिज कीन्ही ब्रिजपाल। लखनऊ काशी दिल्ली मान कियो नेपाल।। अर्थात्- जोधा ने जोधपुर बसाया और विजयसिंह ने वैष्णव सम्प्रदाय के मंदिर बनवाकर इसे ब्रज भूमि बना दिया। महाराजा मानसिंह ने गवैयों, पण्डितों और योगियों को बुलाकर इसे लखनऊ, काशी, दिल्ली और नेपाल बना दिया। महाराजा तख्तसिंह के समय जोधपुर में रानीसर, पदमसर, गुलाबसागर, बाईजी का तालाब और फतैसागर की दीवारों तथा उनकी नहरों का विस्तार किया गया। बाईजी के तालाब के पैंदे का निर्माण किया गया। गुलाबसागर पर के राजमहल, मंडी की घाटी का चबूतरा, गंगश्यामजी के मंदिर के नीचे की पूर्व की तरफ की दुकानें, मंडी में सायर का मकान और कोतवाली के मकान बनाये गये। जोधपुर नगर से बाहर विद्यासाल, बालसमंद के महल, छैलबाग के महल, कायलाना के महल, तखतसागर आदि का निर्माण करवाया गया। उसकी रानजी जाडेजी ने बालसमंद के पास देवराजी के तालाब पर महल और बाग बनवाया था। तख्तसिंह की परदायत मगराज ने नागौरी दरवाजे के बाहर और लछराज ने जालोरी दरवाजे के बाहर अपने-अपने नाम पर बावलियां बनवाईं तथा तख्तसिंह की माता चावड़ीजी ने तबेले के सामने फतेबिहारीजी का मंदिर बनवाया। चामुण्डा माता मंदिर का दुबारा निर्माण करवाया जो कि बारूदखाने के विस्फोट में उड़ गया था। महाराजा जसवंतसिंह के समय जोधपुर का जैसे नये सिरे से निर्माण किया गया। उसके समय में 3 जुलाई 1876 को अंग्रेजी भाषा की शिक्षा के लिये जोधपुर में राजकीय स्कूल खुला। उसके समय में जोधपुर में पहली बार रेलगाड़ी आई। पहली बार डाकखाने खुले। बालसमंद बांध से नहरों के माध्यम से जोधपुर मंे पेयजल लाने की व्यवस्था की गई। राजकीय छापाखाने की स्थापना हुई। नागौरी दरवाजे से किले पर जाने के लिये सड़क बनाई गई। उच्च शिक्षा के लिये जसवंत कॉलेज की स्थापना हुई। अंग्रेजी पद्धति की चिकित्सा के लिये 15 हॉस्पीटल खुले। डाक-तार और सड़कों की व्यवस्था हुई। वन विभाग स्थापित किया गया। म्युनिसिपैलिटी खोली गई। जसवंतसागर बांध बना। महाराजा जसवंतसिंह से लेकर महाराजा उम्मेदसिंह के समय तक जोधपुर को प्रधानमंत्री के रूप में सर प्रताप की सेवाएं प्राप्त हुईं। आधुनिक जोधपुर की रूपरेखा बहुत कुछ उनकी निर्धारित की हुई है। वे महाराजा जसवंतसिंह के छोटे भाई थे। महाराजा सरदारसिंह के समय में तलहटी के महलों में जोधपुर राज्य का पहला फीमेल हॉस्पीटल खुला। उसके समय में नगर में यातायात को सुचारू बनाने के लिये फुलेलाव तालाब के पास का पहाड़ काटकर नई सड़क बनाई गई और नगर की सड़कों पर प्रकाश की व्यवस्था की गई। गिरदी कोट नामक पुरानी नाज की मण्डी में सरदार मार्केट और घण्टाघर तथा किले के पास जसवंत थड़ा बना। उसके समय में जोधपुर रियासत में 1 स्नातक कॉलेज, 1 हाई स्कूल, 16 वर्नाक्यूलर स्कूल, 44 एंग्लो वर्नाक्यूलर स्कूल, 1 राजपूत नोबेल स्कूल, 1 संस्कृत स्कूल, 1 नॉर्मल स्कूल, 25 राजकीय सहायता प्राप्त स्कूल, 89 डाकखाने और 23 हॉस्पीटल कार्य करने लगे थे। रेलवे लाइन की लम्बाई 525 मील हो गई तथा सरदार समंद, हेमावास एवं एडवर्ड समंद के कार्य प्रारंभ हुए। महाराजा सुमेरसिंह के समय चौपासनी में राजपूत हाई स्कूल का उद्घाटन हुआ, जोधपुर में सरदार म्यूजियम की स्थापना हुई तथा सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी खोली गई। महाराजा उम्मेदसिंह को आधुनिक जोधपुर का निर्माता कहा जा सकता है। उसके समय में दरबार हाई स्कूल का भवन तथा जसवंत कॉलेज का नया हिस्सा बना। जोधपुर में इम्पीरियल बैंक की शाखा खोली गई। ई.1929 में उम्मेद पैलेस की नीवं रखी गई। जोधपुर रियासत का सबसे बड़ा अस्पताल बना जिसे अब महात्मा गांधी अस्पताल कहा जाता है। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान इतिहास की ई-बुक्स से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा- लाहौटी

     03.06.2020
    राजस्थान इतिहास की ई-बुक्स से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा- लाहौटी

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    जोधपुर 19 दिसम्बर। संभागीय आयुक्त श्री रतन लाहौटी ने कहा है कि राजस्थान हिस्ट्री पर ई-बुक्स के माध्यम से राजस्थान के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तथा राजस्थान के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिये सस्ती पुस्तकें मिल सकेंगी। श्री लाहौटी ने आज अपने कक्ष में राजस्थान हिस्ट्री वैबसाइट एवं गूगल एप की लांचिंग की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ई-बुक्स से जहां एक ओर कागज और समय की बचत होती है वहीं बहुत कम राशि में अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलती हैं। इसके लिये पाठक को मोटी-मोटी पुस्तकें अपने साथ ढोकर ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। छोटे से मोबाईल और टेबलेट में हजारों पुस्तकों की लाइब्रेरी हर समय आदमी की जेब में उपलब्ध रहती हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि ई-बुक्स एवं गूगल एप के माध्यम से शौर्य एवं स्वामिभक्ति की गाथाओं से समृद्ध राजस्थान का इतिहास एवं साहित्य न केवल भारत भर के पाठक अपितु विश्वभर में रहने वाले हिन्दी भाषी एवं प्रवासी भारतीय भी घर बैठे पढ़ सकेंगे। ज्ञातव्य है कि शुभदा प्रकाशन जोधपुर ने राजस्थान इतिहास की ई-बुक्स उपलब्ध कराने के लिये पूर्णतः समर्पित वैबसाइट एवं गूगल एप तैयार करवाया है। वैबसाईट एवं गूगल एप लांचिंग के अवसर पर सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के उपनिदेशक श्री आनंदराज व्यास भी उपस्थित थे। इस अवसर पर सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि वैबसाइट rajasthanhistory.com तथा गूगल एप rajasthanhistory पर राजस्थान के योद्धा, महापुरुष, दुर्ग, नगर एवं रियासती इतिहास के साथ-साथ कला, साहित्य, संस्कृति, लोक-परम्परा आदि पर भी बहुत कम मूल्य में ई-बुक्स उपलब्ध कराई गई हैं। साथ ही भारत के इतिहास पर भी पुस्तकें उपलब्ध रहेंगी। पाठक इस वैबसाइट एवं एप से ई-बुक्स के साथ-साथ मुद्रित पुस्तकों का भी लाभ उठा सकेंगे। फिलहाल ई-बुक्स की खरीद पर 50 से 90 प्रतिशत तक रियायत रहेगी जबकि कुछ ई-बुक्स फ्री उपलब्ध कराई गई हैं। इस वैबसाइट एवं एप को जोधपुर की संस्था डब्लूएसक्यूब टैक ने तैयार किया है। डब्लूएस क्यूब के डायरेक्टर कुशाग्र भाटिया ने बताया कि rajasthanhistory.com वैबसाइट को किसी भी कम्प्यूटर से एक्सेस किया जा सकेगा जबकि ई-बुक्स पढ़ने के लिये किसी भी एण्ड्रॉयड डिवाइस पर गूगल प्ले स्टोर से rajasthanhistory फ्री एप डाउनलोड करना होगा।

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  • प्रेस क्लिपिंग

     03.06.2020
    प्रेस क्लिपिंग

    दैनिक भास्कर, जोधपुर - 20 दिसम्बर 2016

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  • आप भी करवा सकते हैं अपनी ई-बुक का प्रकाशन

     03.06.2020
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    • यदि आप हिन्दी, अंग्रेजी अथवा राजस्थानी भाषा के सफल लेखक, साहित्यकार, कॉलम राइटर अथवा पत्रकार हैं!

    • यदि आपका अपना एक पाठक वर्ग उपलब्ध है!

    • यदि आप अपनी पुस्तक ई-बुक के रूप में गूगल एप तथा ई-कॉमर्स वैबसाइट पर प्रकाशित करवाना चाहते हैं!

    • राजस्थान हिस्ट्री वैबसाइट आपके लिये यह कार्य निःशुल्क कर सकता है।

    • ये पुस्तकें दुनिया भर के उन समस्त देशों में एण्ड्रोइड मोबाइल फोन/टैब पर पढ़ी जा सकती हैं जहां-जहां गूगल की पहुंच है।

    • कृपया अपनी पुस्तकों की कम्पयूटर पर टाइप की हुई सॉफ्ट कॉपी हमें उपलब्ध करायें। सॉफ्ट कॉपी वर्ड फाइल में तथा कृतिदेव/यूनिकोड/टाइम्स न्यू रोमन फॉण्ट में होनी चाहिये।

    • हम अपकी वर्ड फाइल से विश्व की आधुनिकतम तकनीक द्वारा ई-बुक तैयार करायेंगे तथा राजस्थान हिस्ट्री गूगल एप पर उपलब्ध करायेंगे जिसका व्यय हमारी वैबसाइट द्वारा वहन किया जायेगा।

    • वैब साइट तथा गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध कराई गई ई-बुक्स को राजस्थान हिस्ट्री वैबसाइट तथा गूगल प्ले स्टोर से आम पाठक द्वारा खरीदा जा सकेगा।

    • पुस्तकों की बिक्री से प्राप्त विक्रय मूल्य का पचास प्रतिशत लेखक को रॉयल्टी के रूप में दिया जायेगा।

    • आपकी पुस्तक कितनी संख्या में बिकी है, इसकी जानकारी आपको वैसासाईट तथा गूगल एप पर आपकी पुस्तक की डाउनलोड संख्या से घर बैठे प्राप्त हो सकेगी।

    • पुस्तक जनोपयोगी होनी चाहिये। प्रकाशित की जाने वाली पुस्तक के चयन का अधिकार शुभदा प्रकाशन के पास सुरक्षित रहेगा।

    • लेखक द्वारा यह लिखित में दिया जायेगा कि पुस्तक का कॉपीराइट लेखक के पास है, किसी अन्य के पास नहीं है। • वैबसाइट पर प्रकाशित पुस्तक के कॉपीराइट पर शुभदा प्रकाशन का कोई अधिकार नहीं होगा।

    • लेखक किसी भी समय अपनी पुस्तक को वैबसाइट तथा गूगल एप से हटाने के लिये ई-मेल अथवा पत्र के माध्यम से सूचित कर सकेगा।

    • पुस्तक का मूल्य एवं उस मूल्य पर दी जाने वाली छूट लेखक द्वारा तय की जायेगी। लेखक अपनी पुस्तक का मूल्य किसी भी समय बदलवा सकेगा।

    • पुस्तक में दी गई सामग्री की विश्वसनीयता की समस्त जिम्मेदारी लेखक की होगी। लेखक यह सुनिश्चित करेगा कि पुस्तक में किसी प्रकार की विद्वेष फैलाने वाली, विधि विरुद्ध, भड़काऊ एवं राष्ट्रद्रोही सामग्री नहीं है।

    • पुस्तक की बिक्री के बारे में कोई गारण्टी नहीं दी जा सकेगी।

    • पुस्तक मुद्रण से पहले शुभदा प्रकाशन तथा पुस्तक के लेखक के बीच एक एग्रीमेंट किया जाना अनिवार्य होगा।

    • कृपया अपना प्रस्ताव भिजवाने से पहले हमारी वैबसाइट www.rajasthanhistory.com अवश्य विजिट करें तथा अपने एण्ड्रोयड फोन या टैब पर गूगल प्ले स्टोर से rajasthan history free App डाउनलोड करके वहां उपलब्ध फ्री ई-बुक्स का अवलोकन करें। इससे आपको अपनी पुस्तक तैयार करने में आसानी होगी।

    • आप हमारी वैबसाइट के होमपेज पर उपलब्ध "अपलोड बुक" ऑप्शन के माध्यम से अपना प्रस्ताव दे सकते हैं।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    9404076061

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