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  • चित्रकूट का चातक - 18

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 18

    धूसर बनिया

    एक जमाना था जब रेवाड़ी की सड़कों पर एक धूसर बनिया नमक बेचा करता था। उसका नाम था हेमचंद्र लेकिन वह अपने आप को हेमू ही कहता था। वह बातों का बड़ा खिलाड़ी था। देखते ही देखते वह किसी को भी अपने पक्ष में कर लेता था। धीरे-धीरे वह राजकीय कर्मचारियों से घुल मिल गया और मौका पाकर बाजार में तोल करने वाले कर्मचारी के पद पर नियुक्त हो गया। यहाँ से उसने प्रगति के नये अध्याय लिखने आरंभ किये। एक दिन शेरशाह सूरी के दूसरे नम्बर के बेटे जलालखाँ की नजर उस पर पड़ी। वह हेमू के वाक् चातुर्य से बड़ा प्रभावित हुआ और उसे अपने साथ महल में ले गया। हेमू ने उसे ऐसी-ऐसी बातें बताईं जो जलालखाँ ने पहले कभी नहीं सुनी थीं। जलालखाँ ने हेमू को अपना गुप्तचर बना लिया ताकि वह जन सामान्य के बीच घटित होने वाली घटनाओं की सच्ची खबर जलालखाँ को देता रहे। हेमू ने अपने काम से जलालखाँ को प्रसन्न कर लिया और धीरे-धीरे जलालखाँ की नाक का बाल बन गया।

    जब जलालखाँ इस्लामशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसने हेमू को महत्वपूर्ण पद प्रदान किये। हेमू में सामान्य प्रशासन और सामरिक प्रबंधन की उच्च क्षमतायें थीं। एक दिन वह प्रधानमंत्री बन गया। जब आठ साल शासन करके इस्लामशाह गंदी बीमारियों के कारण मर गया तो इस्लामशाह का 12 वर्षीय बेटा फीरोजशाह दिल्ली का शासक हुआ। फीरोजशाह के मामा मुबारिजखाँ ने अपने भांजे फीरोजशाह की हत्या कर दी और खुद आदिलशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। हेमू पैनी नजरों से दिल्ली में घटने वाली घटनाओं को देख रहा था।

    आदिलशाह विलासी प्रवृत्ति का था और शासन के नीरस काम करना उसके वश की बात नहीं थी। उसे एक ऐसे विश्वसनीय और योग्य आदमी की तलाश थी जो उसके लिये दिल्ली से लेकर बंगाल तक फैले विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रख सके। उसने हेमू को बुलाकर पूछा कि वह किसके प्रति वफादार है? अपने पुराने स्वामियों इस्लामशाह और फीरोज शाह के प्रति या फिर आदिलशाह के प्रति?

    हेमू था तो साधारण मिट्टी से बना हुआ, पतला-दुबला और कमजोर कद काठी का आदमी किंतु ईश्वर ने उसके मन और मस्तिष्क में साहस और निर्भीकता जैसे गुण मुक्त हस्त से रखे थे। उसने कहा- 'जब तक मेरे पुराने स्वामी जीवित थे, तब तक मेरी वफादारी उनके साथ थी और यदि वे आज भी जीवित होते तो मैं उनके प्रति ही वफादार रहता किंतु अब चूंकि वे दुनिया में नहीं रहे इसलिये मैं आपके अधीन काम करने को तैयार हूँ।'

    आदिलशाह शुरू से ही हेमू का प्रशंसक था। वह जानता था कि यदि हेमू जैसे समर्पित और योग्य व्यक्ति की सेवायें मिल जायें तो आदिलशाह न केवल शत्रुओं से अपने राज्य को बचाये रख सकेगा अपितु राज-काज हेमू पर छोड़कर स्वयं आसानी से अपने राग-रंग में डूबा रह सकेगा। उसने हेमू को अपना प्रधानमंत्री बनाया। कुछ दिनों बाद सेना का भार भी उस पर छोड़ दिया। मामूली आदमी होते हुए भी हेमू उच्च कोटि का सेनानायक सिद्ध हुआ। उसने अपने मालिक आदिलशाह के लिये चौबीस लड़ाईयाँ लड़ीं जिनमें से बाईस लड़ाईयाँ जीतीं।

    हेमू न केवल वीर, साहसी, उद्यमी और बुद्धिमान व्यक्ति था अपितु भाग्यलक्ष्मी उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती थी। उसने ऐसा तोपखाना खड़ा किया जिसकी बराबरी उस समय पूरी धरती पर किसी और बादशाह अथवा राजा का तोपखाना नहीं कर सकता था। उसके पास हाथियों की 3 फौजें थीं जिनका उपयोग वह तीस हजार सैनिकों के साथ करता था। हेमू के पास जितने हाथी थे उतने उस समय दुनिया में और किसी के पास नहीं थे। तैमूर लंग को हिन्दुस्थान में कत्ले आम मचाकर भी केवल 120 हाथी ही मिल पाये थे।

    यह एक भाग्य की ही बात थी कि आदिलशाह जैसे धूर्त, मक्कार और धोखेबाज हत्यारे को हेमू जैसे उच्च सेनानायक की सेवायें प्राप्त हुई। शीघ्र ही हेमू की धाक शत्रुओं पर जम गयी। जब हुमायूँ भारत छोड़कर ईरान भागा था तब उसने हेमू का नाम तक नहीं सुना था किंतु जब उसने पुनः दिल्ली की ओर मुँह किया तो समूचा उत्तरी भारत हेमू के नाम से गुंजायमान था। उसके द्वारा जीती गयीं बाईस लड़ाईयों के किस्से सुन-सुन कर हुमायूँ और उसके तमाम सिपहसालार हेमू के नाम से कांपते थे। अकबर को तो सपने में भी हेमू ही दिखाई देता था।

    एक बार हुमायूँ के दरबार में रहने वाले चित्रकार ने एक ऐसा चित्र बनाया जिसमें एक आदमी के सारे अंग अलग-अलग दिखाये गये थे। जब अकबर ने उस चित्र को देखा तो भरे दरबार में कहा कि काश यह चित्र हेमू का होता! अकबर की बात सुनकर हुमायूँ के अमीरों के मुँह सूख गये। वे जानते थे कि एक न एक दिन उन्हें हेमू की तलवार का सामना करना ही है।

    विक्रमादित्य हेमचंद्र

    जब हेमू को ज्ञात हुआ कि हुमायूँ की मृत्यु हो गयी है और बैरामखाँ अकबर को लेकर दिल्ली आ रहा है तो वह ग्वालिअर से अपनी सेना लेकर आगरा पर चढ़ दौड़ा। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग हेमू का नाम सुनकर बिना लड़े ही आगरा छोड़कर दिल्ली की ओर भाग गया। उसकी सेना में इतनी भगदड़ मची कि तीन हजार मुगल सिपाही आपस में ही कुचल कर मर गये। हेमू ने आगरा पर अधिकार कर लिया और शाही सम्पत्ति लूट ली।

    आगरा के हाथ में आते ही हेमू दिल्ली की ओर बढ़ा। दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ अपनी सेना लेकर कुतुबमीनार से आठ किलोमीटर दूर पूर्व में स्थित तुगलकाबाद आ गया। हेमू ने उसमें जबरदस्त मार लगायी। तार्दीबेगखाँ और इस्कन्दरखा उजबेग परास्त होकर सरहिन्द की ओर भागे। संभल का शासक अलीकुलीखाँ हेमू का नाम सुनकर भगोड़ों के साथ हो लिया।

    हेमू ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसका धूर्त स्वामी आदिलशाह अपनी बेशुमार औरतों के साथ चुनार के दुर्ग में रंगरलियां मनाता रहा। हेमू को उसके पतित चरित्र से घृणा हो गयी थी जिससे हेमू ने अपने आप को मन ही मन स्वतंत्र कर लिया था। उपरी तौर पर दिखावे के लिये वह उसे बादशाह कहता रहा। आगरा और दिल्ली अधिकार में आ जाने के बाद हेमू ने अदली को कोई सूचना नहीं भेजी और स्वयं ही अपने बल बूते पर भारत भूमि को म्लेच्छों से मुक्त करवा कर हिन्दू पद पादशाही की स्थापना के स्वप्न संजोने लगा।

    दिल्ली हाथ में आ जाने के बाद हेमू ग्वालियर से लेकर सतलज नदी तक के सम्पूर्ण क्षेत्र का स्वामी हो गया। अपनी विशाल गजसेना के साथ उसने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने दिल्ली के दुर्ग को गंगाजल से धुलवाकर पवित्र किया और एक दिन शुभ मूहूर्त निकलवाकर विक्रमादित्य हेमचंद्र के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर विधिवत् आरूढ़ हुआ।

    सदियों से बेरहम तुर्कों के क्रूर शासन के अधीन अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू बहाती हुई हिन्दू जनता को महाराज विक्रमादित्य हेमचन्द्र के सिंहासनारूढ़ होने पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा दिन भी आयेगा जब दिल्ली पर पुनः हिन्दू राजा का शासन होगा। घर-घर शंख, घड़ियाल और नगाड़े बजने लगे। हजारों की संख्या में हिन्दू जनता दूर-दूर से चलकर दिल्ली पहुँचने लगी। दिल्ली की गलियां, चौक, यमुनाजी का तट और समस्त जन स्थल इन नागरिकों से परिपूर्ण हो गये। महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र की जय-जय कार से पूरी दिल्ली गूंजने लगी।

    सुहागिन स्त्रियों के झुण्ड के झुण्ड मंगल गीत गाते हुए मंदिरों की तरफ जाते हुए दिखाई देने लगे। सैंकड़ों साल से सुनसान पड़े मंदिरों में फिर से दीपक जलने लगे और आरतियाँ होने लगीं। मंदिरों के शिखरों पर केसरिया ध्वजायें लहराने लगीं। घर-घर वेदपाठ होने लगे तथा द्वार-द्वार पर गौ माता की पूजा आरंभ हो गयी। चावल के आटे से चौक पूरे गये और केले के पत्तों से तोरण सजाये गये। घरों के आंगन यज्ञों की वेदी से उठने वाले सुवासित धूम्र से आप्लावित हो गये।

    जब से महाराज हेमचंद्र दिल्ली के राजा हुए तब से दिल्ली में हर रात दीवाली मनायी जाने लगी। यमुना का तट देश भर के तीर्थ-यात्रियों से पट गया। दूर-दूर से आने वाले हजारों श्रद्धालु रात्रि में इकट्ठे होकर यमुनाजी की आरती उतारते। महाराजा हेमचंद्र भी नित्य ही हाथी पर सवार होकर यमुनाजी के दर्शनों के लिये जाते। सैंकड़ों वेदपाठी ब्राह्मण कंधे पर जनेऊ और गले में पीताम्बर डाले हुए महाराजा के पीछे-पीछे चलते। महाराजा हेमचंद्र अकाल के इस कठिन समय में भी याचकों, ब्राह्मणों और बटुकों को अपने हाथों से भोजन करवाते और उन्हें धन-धान्य तथा वस्त्र प्रदान करते।

    वस्तुतः हिन्दू जनता का यह उत्साह पूरे तीन सौ पैंसठ साल बाद प्रकट हुआ था। ई. 1193 में तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने जब दिल्लीधीश्वर पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिल्ली पर अधिकार किया था तब से ही हिन्दू अपने ही देश भारत वर्ष में गुलामों से बदतर जीवन यापन कर रहे थे। पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके मुहम्मद गौरी ने भारतवर्ष की अपार सम्पत्ति को हड़प लिया। जिससे देश की जनता एक साथ ही व्यापक स्तर पर निर्धन हो गयी। मुहम्मद गौरी के गुलामों और सैनिकों ने पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना दिया। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदों में परिवर्तित कर दी गयीं। दिल्ली का विष्णुमंदिर जामा मस्जिद में बदल दिया गया। धार, वाराणसी उज्जैन, मथुरा, अजयमेरू, जाल्हुर की संस्कृत पाठशालायें ध्वस्त करके रातों रात मस्जिदें खड़ी कर दी गयीं। अयोध्या, नगरकोट और हरिद्वार जैसे तीर्थ जला कर राख कर दिये गये। हिन्दू धर्म का ऐसा पराभव देखकर जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल, श्रीलंका तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया। बौद्ध धर्म तो हूणों के हाथों पहले ही पराभव को प्राप्त हो चुका था।

    अब जब महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के अधीश्वर हुए तो देशवासियों का उत्साह विशाल झरने की भांति फूट पड़ा। महाराज हेमचंद्र के अफगान व तुर्क सैनिक हिन्दू जनता के इस उत्साह को आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे।

    ऐसा नहीं था कि जन-सामान्य देश में चारों तरफ रक्तपात और लूटमार करती हुई सिकंदर सूर, इब्राहिमखाँ, इस्लामशाह, आदिलशाह और बैरामखाँ की सेनाओं को भूल गया था। जनता पूरी तरह आशंकित और भयभीत थी कि कहीं महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र चार दिन की चांदनी सिद्ध न हों! वस्तुतः यह भय और आशंका ही जन सामान्य के बड़ी संख्या में उमड़ पड़ने का कारण था। जनता चाहती थी कि जब तक महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के तख्त पर हैं तब तक ही सही कुछ धर्म-कर्म और पुण्य लाभ अर्जित कर लिया जाये।


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  • चित्रकूट का चातक - 19

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 19

    काबुल या दिल्ली

    उन दिनों उत्तरी भारत के समस्त बादशाह और सेनापति हेमू के नाम से थर्राते थे। इब्राहीम सूर के सैनिकों को यदि स्वप्न में भी हेमू के सिपाही दिख जाते तो वे शैय्या त्याग कर खड़े हो जाते। बंगाल का शासक मुहम्मदशाह तो उस दिशा में पैर करके भी नहीं सोता था जिस दिशा में हेमू की सेना के स्थित होने के समाचार होते थे। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग, दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ और संभल का सूबेदार अलीकुलीखाँ हेमू की सेना का नाम सुनकर ही भाग छूटे थे। उस समय समूचे उत्तरी भारत में केवल बैरामखाँ अकेला ही सेनापति था जो हेमू से दो-दो हाथ करने की तमन्ना दिल में लिये घूमता था। वह जानता था कि एक न एक दिन बैरामखाँ और हेमू एक दूसरे के सामने होंगे। वह अवसर शीघ्र ही आ उपस्थित हुआ।

    जैसे ही बैरामखाँ जालंधर में सलीमा बेगम से निकाह करने के बाद मानकोट को हस्तगत करने के लिये फिरा वैसे ही उसे आगरा और दिल्ली के पतन का समाचार मिला। अकबर के अमीरों ने अकबर को सलाह दी कि हिन्दुस्थान की ओर से ध्यान हटाकर अपनी सारी ताकत काबुल पर केंद्रित कर लेनी चाहिये क्योंकि इस समय मुगल सेना में केवल बीस हजार सैनिक हैं और हेमू एक लाख सैनिकों की ताकत का स्वामी है। उसके पास इस समय धरती भर की सबसे बड़ी हस्ति सेना है और धरती भर का सबसे बड़ा तोपखाना है। अकबर अपने अमीरों की सलाह से सहमत हो गया और उसने आदेश दिया कि सेना को दिल्ली की ओर बढ़ाने के बजाय काबुल की ओर कूच किया जाये।

    बैरामखाँ इस आदेश को सुनकर सकते में आ गया। वह नहीं चाहता था कि जिस दिल्ली और आगरा के लिये उसने अपने जीवन की बाजी लगा दी थी, जिस दिल्ली और आगरा के लिये वह हुमायूँ के साथ हिन्दुस्थान से लेकर ईरान और ईरान से लेकर हिन्दुस्थान में दर दर की ठोकरें खाता फिरा था, जिस दिल्ली और आगरा के लिये उसने सिकंदर लोदी, राणा सांगा और मेदिनी राय जैसे प्रबल शत्रुओं को धूल चटा दी थी, जिस दिल्ली और आगरा के लिये उसने बाबर के तीन-तीन शहजादों को कैद करके मक्का भिजावा दिया था, उस दिल्ली और आगरा का मार्ग छोड़कर वह बिना युद्ध किये ही भाग खड़ा हो।

    बैरामखाँ अकबर के आदेश से सहमत नहीं हुआ। उसने अकबर को समझाया कि भले ही हमारे पास बीस हजार सैनिक हैं और शत्रु के पास एक लाख सैनिक बताये जा रहे हैं किंतु बाबर और हुमायूँ भी तो इन्हीं परिस्थितियों में लड़ते और जीतते आये थे। भले ही हेमू के पास एक लाख सैनिक और तीस हजार हाथी हैं किंतु हेमू की असली ताकत उसके तोपखाने में बसती है। यदि किसी तरह उससे तोपखाना छीन लिया जाये तो उसे आसानी से परास्त किया जा सकता है। अकबर को अपने संरक्षक की बातें अमीरों की बातों से ज्यादा अच्छी लगीं और वह काबुल लौट चलने के बजाय दिल्ली की ओर बढ़ने के लिये राजी हो गया।

    तार्दीबेग की हत्या

    अकबर की सहमति पाकर बैरामखाँ ने खिज्रखाँ को सिकंदर सूर से निबटने के लिये तैनात किया और स्वयं अकबर को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा। सरहिंद पर आगरा, दिल्ली और संभल के तीनों भगोड़े सूबेदार अकबर से आ मिले। इन तीनों ने भी अकबर को सलाह दी कि यदि जान प्यारी है तो दिल्ली जाने की बजाय काबुल को लौट चलो। अकबर एक बार फिर विचलित हो गया।

    अकबर की इस ऊहापोह से निबटने के लिये बैरामखाँ ने एक योजना बनाई। उसने सरहिन्द के जंगल में शिकार का आयोजन किया। उसने स्वयं को और तार्दीबेगखाँ को इस शिकार से दूर रखा। जब अकबर जंगल में काफी आगे तक चला गया तो बैरामखाँ ने तार्दीबेग को अपने डेरे पर बुलवाया। जैसे ही तार्दीबेग बैरामखाँ के डेरे पर पहुँचा, बैरामखाँ ने तलवार निकाल कर उसका वध कर दिया।

    जब शाम को अकबर अपने डेरे पर लौटा तो उसे तार्दीबेग की हत्या के समाचार मिले। अकबर यह सुनकर सकते में आ गया। अमीर तार्दीबेगखाँ हुमायूँ का विश्वस्त सिपहसलार था। जिस समय बैरामखाँ एक साधारण सिपाही की हैसियत रखता था, उस समय भी तार्दीबेगखाँ हुमायूँ के बराबर बैठकर सलाह मशविरा दिया करता था। अकबर तिलमिलाया तो खूब किंतु कुछ कहने की स्थिति में नहीं था।

    बैरामखाँ ने अपने मंत्री मौलाना पीर मोहम्मद शिरवानौ को अकबर की सेवा में भेजा। मौलाना शिरवानौ बैरामखाँ का विश्वसनीय आदमी था। वह न केवल बैरामखाँ का संदेश लेकर गया अपितु बादशाह के दिल में बैरामखाँ के लिये फिर से जगह बनाने का उद्देश्य लेकर भी गया। मौलाना पर यह जिम्मेदारी भी छोड़ी गयी कि वह अकबर के दिल का सच्चा हाल पता लगाकर आये ताकि आगे की कार्यवाही की जा सके।

    मौलाना ने फर्श तक झूलती हुई लम्बी दाढ़ी हिलाते हुए बादशाह को कोर्निश बजाई। बादशाह ने उसे बैठने तक को नहीं कहा। मौलाना ने दुबारा कोर्निश बजाई और निवेदन किया- 'बादशाह सलामत मैं इस समय अपने पाकरूह मालिक खानका बैरामखाँ की ओर से आपकी सेवा में हाजिर हुआ हूँ।'

    बादशाह ने मौलाना की बात का कोई जवाब नहीं दिया। मौलाना काफी देर तक चुपचाप खड़ा रहा। काफी देर बाद बादशाह ने मौलाना की ओर आँखें घुमाकर कहा- 'कहता क्यों नहीं कि तुझे क्या कहना है? पत्थर के बुत की तरह बेजान होकर क्यों खड़ा है?'

    - 'बादशाह सलामत! मेरे पाकरूह मालिक खानका बैरामखाँ ने अर्ज किया है कि नमक हराम तार्दीबेग जानबूझ कर दिल्ली की लड़ाई बीच में छोड़कर भाग आया था। वह कभी भी मुगल सल्तनत का विश्वसनीय नहीं था। यदि उसे दण्ड नहीं दिया जाता तो दूसरे अमीर भी कोताही बरतने लगते। इसका परिणाम यह होता कि आप हिन्दुस्थान में रहकर जो कुछ हासिल किया चाहते हैं वह आपको कभी भी हासिल नहीं होता।'

    - 'तेरे पाकरूह मालिक ने तुझे यह नहीं बताया कि उसे दण्ड देने से पहले बादशाह सलामत से पूछा क्यों नहीं गया?' अकबर ने क्रोधित होकर पूछा।

    - 'बादशाह हुजूर का गुस्सा बेवजह नहीं है। मेरे मालिक ने कहलवाया है कि बादशाह सलमात बड़े ही पाकरूह, नर्मदिल इंसान हैं। यदि उनसे पूछा जाता तो वे कभी भी तार्दीबेग को मारने के लिये राजी नहीं होते। ऐसी स्थिति में भी उस नमक हराम को तो मारना ही था। तब हद से ज्यादा बेअदबी होती। हुक्म न मानने से मुल्क और लश्कर में बहुत खलल और फसाद पैदा होता।'

    - 'तो अब क्या चाहते हो? अकबर बैरामखाँ का जवाब सुनकर दहल गया।

    - 'खानका ने अर्ज की है कि उन्हें माफी दी जावे और यह घोषणा करवाई जावे कि तार्दीबेग का खून बादशाह सलामत के हुक्म से किया गया है।'

    - 'क्यों?'

    - 'ताकि सब कपटी लोगों के दिल में दहशत पैदा हो जावे और कोई भी अमीर नमक हरामी करने की हिम्मत न करे।'

    - 'ठीक है। खानका को हमारी खिदमत में भेज।'

    अकबर का जवाब सुनकर मौलाना ने गर्दन ऊपर उठाई और सीधे ही बादशाह की आँखों में झांकते हुए बोला- 'हुजूर! बड़े बादशाह हुजूर हुमायूँ ने एक बार कहा था कि खानका बैरामखाँ ने जितने अहसान मुगलिया सल्तनत पर किये हैं उन अहसानों के बदले मुगल खानदान के कई शहजादे बैरामखाँ पर कुरबान किये जा सकते हैं।'

    - 'क्या यह भी तुम्हारे पाकरूह मालिक ने कहलवाया है?' अकबर ने हँसकर पूछा।

    - 'नहीं! यह तो मैं अपनी ओर से बादशाह हुजूर की खिदमत में पेश कर रहा हूँ।' मौलाना ने भी हँसकर जवाब दिया।

    - 'और कुछ?'

    - 'हाँ हुजूर! एक बात और।'

    - 'क्या मौलाना? और क्या??'

    - 'मेरी अर्ज ये है कि जब खानका आपकी खिदमत में हाजिर हों तो हुजूर यह नहीं भूलें कि जिस समय बड़े बादशाह हुजूर ने खानका पर मुगल शहजादे कुर्बान करने की बात कही थी, उस समय से लेकर अब तक चंगेजी खानदान पर खानका के अहसानों की फेहरिश्त और भी लम्बी हो गयी है।' मौलाना की बात सुनकर बादशाह का चेहरा सूख गया।

    मौलाना कोर्निश बजाकर डेरे से बाहर हो गया। उसका काम हो गया था। बादशाह के आदेश पर बैरामखाँ उसी रात अकबर के डेरे पर हाजिर हुआ। अकबर ने खड़े होकर अपने अतालीक बैरामखाँ का स्वागत किया जो अब केवल अतालीक भर न था। सच्चाई तो यह थी कि बैरामखाँ उस समय मुगलिया सल्तनत की समस्त शक्तियों का स्वामी था।


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  • चित्रकूट का चातक - 20

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 20

    फिर से पानीपत

    जब महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने देखा कि बैरामखाँ मुगल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहा है तो उन्होंने दिल्ली से बाहर जाकर पानीपत के मैदान में बैरामखाँ से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया। महाराजा ने धन के लालची अफगान अमीरों को विपुल धन राशि देकर अपने वश में किया और पूरे उत्तरी भारत में दुहाई फिरवाई कि वह मुगलों को भारतवर्ष से बाहर खदेड़ने के लिये पानीपत जा रहा है। जिन राजाओं और सेनापतियों को अपनी जन्मभूमि से प्रेम हो, वे भी पानीपत पहुँचें।

    महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र का संदेश पाकर तीस हजार राजपूत सैनिक पानीपत के मैदान में आ जुटे। अब दिल्ली की सेना केवल अफगान सैनिकों के भरोसे नहीं रह गयी। महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने अपने विश्वस्त सलाहकारों से कहा कि यदि इस सयम महाराणा सांगा जीवित होते तो भारतवर्ष को म्लेच्छों से मुक्त करवा लेना कोई बड़ी बात नहीं होती।

    महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र को अपने तोपखाने और हस्ति सेना पर बहुत भरोसा था किंतु ये तभी कारगर थे जब वे समय से पूर्व रणक्षेत्र में पहुँचकर उचित जगह पर तैनात कर दिये जायें। इनकी गति घुड़सवारों की तरह त्वरित नहीं थी। इसलिये उन्होंने अपना तोपखाना पानीपत के लिये रवाना कर दिया और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाते हुए पानीपत की ओर बढ़े।

    जब दिल्ली की सेना गोला बारूद लेकर पानीपत की ओर जा रही थी तो अकबर के सेनापति अलीकुलीखाँ को सूचना लगी कि हेमू ने अपना तोपखाना तो पानीपत की ओर भेज दिया है और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाता हुआ मस्ती से आ रहा है। बैरामखाँ ने अलीकुलीखाँ को इसी काम पर तैनात कर रखा था कि किसी भी तरह मौका लगते ही तोपखाने को नष्ट कर दे। अलीकुलीखाँ ने अपनी सेना को दिल्ली की सेना के मार्ग में ला अड़ाया। दिल्ली के मुट्ठी भर सैनिक इस आकस्मिक युद्ध के लिये तैयार नहीं थे। बात की बात में अलीकुलीखाँ ने दिल्ली की सेना से तोपखाना छीन लिया।

    तोपखाना छीने जाने के दो सप्ताह बाद इधर से महाराज हेमचंद्र की सेना और उधर से खानका बैरामखाँ की सेना पानीपत के मैदान में आमने सामने हुई। बैरामखाँ ने अलीकुलीखाँ, सिकन्दरखाँ उजबेग और अब्दुल्ला उजबेग को मोर्चे पर भेजा और स्वयं अकबर को लेकर पानीपत से पाँच मील पीछे ही रुक गया।

    तोपखाना छिन जाने के बाद महाराज हेमचंद्र ने अपना पूरा ध्यान हस्ति सैन्य पर केंद्रित किया। उन्होंने हाथियों को जिरहबख्तर पहनाये और उनकी पीठों पर बंदूकची बैठाये। सेना के दाहिनी ओर शादीखाँ कक्कड़ और बांयी ओर अपने भांजे रमैया को नियुक्त करके महाराज हेमचंद्र सेना के मध्य भाग में आ डटे।

    अपने हाथी पर खड़े होकर महाराज हेमचंद्र ने पहले अपनी सेना को और फिर शत्रु सेना को देखा, भाग्य की विडम्बना देखकर महाराजा का कलेजा कांप गया। उनका अपना तोपखाना शत्रु के हाथों में पड़कर उनके अपने सिपाहियों को निगलने के लिये तैयार खड़ा था। उन्हें लगा कि जिस हेमू के सामने भाग्य लक्ष्मी हाथ बांधे खड़ी रहती थी, आज उसके रूठ जाने से ही ऐसा हुआ है। उन्होंने अपने सैनिकों को धंसारा करने का आदेश दिया।

    हेमू द्वारा वर्षों से संचित तोपखाना महाराज हेमचंद्र की सेना पर आग फैंकने लगा किंतु हिन्दू सिपाही मृत्यु की परवाह न करके आगे को बढ़ते ही रहे जिससे महाराज हेमचंद्र की सेना का भी वही हश्र हुआ जो खानुआ के मैदान में राणा सांगा की सेना का हुआ था। मुगल सेना ने यहाँ भी तुगलुमा का प्रयोग किया। दुर्भाग्य से हिन्दू और अफगानी सैनिक इस पद्धति से युद्ध करने में सक्षम नहीं थे। देखते ही देखते हिन्दू चारों ओर से घिर गये।

    महाराजा हेमचंद्र चौबीस लड़ाईयों के अनुभवी सेनापति थे जिनमें से बाईस के परिणाम उनके पक्ष में आये थे। उन्होंने तोपखाने की परवाह न करके शत्रु सैन्य में वो मार लगाई कि अलीकुलीखाँ की सेना के दांये और बांये दोनों पक्षों को तोड़ दिया। थोड़ी ही देर में विजय तराजू के एक पलड़े में लटक गयी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पलड़ा महाराज हेमचंद्र के पक्ष में झुका हुआ था। हिन्दू वीर उत्साह से भर गये और भरपूर हाथ चलाने लगे।

    जब यह सूचना पानीपत से पाँच मील दूर पड़ाव कर रहे बैरामखाँ को दी गयी तो बैरामखाँ अपनी सारी बची-खुची सेना को लेकर युद्ध के मैदान में पहुँचा। जिस समय वह युद्ध क्षेत्र में कूदा, उस समय युद्ध बहुत ही नाजुक स्थिति में था। घोड़ों पर बैठकर महाराजा तक पहुँचना संभव नहीं जानकर बैरामखाँ और उसके अमीर घोड़ों से उतर पड़े तथा तलवारें निकाल कर पैदल ही महाराजा की ओर दौड़ पड़े। बैरामखाँ को युद्ध के मैदान में आया देखकर मुगलों का जोश दूना हो गया। वे तक-तक कर तीर, भाले और बंदूकें चलाने लगे।

    इतिहास गवाह है कि दुर्भाग्य और पराजय ने शायद ही कभी हिन्दू जाति का पीछा छोड़ा हो। इस सर्वत्र व्यापी दुर्भाग्य के चलते न पुरुषार्थ, न विद्या और न उद्यम, कुछ भी हिन्दुओं के काम नहीं आया। यही कारण था कि सम्पूर्ण शौर्य, पराक्रम और युद्ध कौशल के रहते हुए भी न तो महाराजा दाहिर सेन सिंधु के मैदान में मुहम्मद बिन कासिम को परास्त कर सके, न महाराजा जयपाल पंजाब में महमूद गजनवी को परास्त कर सके, न महाराजा पृथ्वीराज चौहान तराइन के मैदान में मुहम्मद गौरी को परास्त कर सके और न राणा सांगा खानुआ के मैदान में बाबर को परास्त कर सके। यहाँ भी भाग्य की विडम्बना ने फिर से अपना इतिहास दोहराया।

    जब मुगल सेना में अफरा-तफरी मचनी आरंभ हुई और ऐसा लगा कि महाराज हेमचंद्र को विजय श्री मिलने ही वाली है, उसी समय जाने कहाँ से एक सनसनाता हुआ तीर आया और महाराजा की आँख फोड़ता हुआ निकल गया। जाने प्रारब्ध में यही लिखा था अथवा सचमुच ही भारतवर्ष की सौभाग्य लक्ष्मी रूठ गयी थी, महाराजा हेमचंद्र की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वे हौदे में गिर पड़े।

    महावत ने महाराज को बेहोश हुआ जानकर हाथी को पीछे की ओर मोड़ा ताकि युद्ध भूमि से बाहर निकल जाये किंतु तब तक शैतान शाहकुली मरहम की दृष्टि महाराज पर पड़ चुकी थी। उसने अपने आदमियों को साथ लेकर महाराज के हाथी को घेर लिया।

    अफगान सैनिक महाराज हेमचंद्र को मरा हुआ जानकर युद्ध का मैदान छोड़कर भाग छूटे। राजपूत वीरों ने अंत तक महाराज का साथ नहीं छोड़ा और युद्ध भूमि में तिल-तिल कर कट मरे। महाराज के पाँच हजार सैनिक उसी समय मार डाले गये। डेढ़ हजार हाथी लूट में बैरामखाँ के हाथ लगे।

    पानीपत के जिस मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली में मुगलों के राज्य की नींव रखी थी, एक बार फिर बैरामखाँ ने पानीपत के उसी मैदान में महाराज हेमचंद्र को परास्त कर फिर से दिल्ली हासिल कर ली। इसी के साथ म्लेच्छों को भारत भूमि से भगाने का स्वप्न हमेशा-हमेशा के लिये भंग हो गया।

    काफिरों की हत्या

    अलीकुलीखाँ और शाहकुली मरहम मूर्च्छित महाराजा हेमचंद्र को लेकर बैरामखाँ के पास आये। महाराज के शरीर में अनगिनत घाव थे जिनसे रक्त बह रहा था। नेत्र में लगे तीर से काफी मात्रा में रक्त प्रवाह हुआ था जिससे उनकी साँस की गति मद्धिम चल रही थी। कोटि-कोटि हिन्दुओं की आशाओं के सूरज दिल्लीधीश्वर महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र की जो दुर्दशा इस समय थी, उसे देखकर किसी भी करुण कोमल मनुष्य का दिल दहल जाता किंतु चंगेजी वंश की खूनी ताकत महाराजा के रक्त को बहते हुए देखकर उल्लास से नाच उठी थी।

    जब अकबर ने महाराज के शरीर को देखा तो उसे सहसा विश्वास नहीं हुआ। क्या यही वह संक्षिप्त काया थी जिसके भय से हजारों मुगल सैनिक रातों को ठीक से सोते भी नहीं थे! क्या यही वह विकराल सेनापति था जिसने बाईस विकराल युद्धों में खम ठोक कर जीत हासिल की थी! क्या यह वही अद्भुत महाराजा था जिसके पास धरती भर की सबसे बड़ी गजसेना और धरती भर का सबसे बड़ा तोपखाना था! क्या यह वही महामना धनपति राजा था जो अपने हाथियों को मक्खन खिलाया करता था! यदि यह वही था तो इस तरह निःशक्त होकर भूमि पर क्यों पड़ा था?

    अकबर को आगरा का वह चित्रकार याद हो आया जिसने एक दिन ऐसे आदमी का चित्र बनाया था जिसके समस्त अंग अलग थे। उस चित्र को देखते ही भरे दरबार में अकबर के मुँह से निकल पड़ा था कि काश यह चित्र हेमू का होता और उसकी बात सुनकर समूचा मुगल दरबार सहम गया था। क्या उस कुत्सा (बुरी इच्छा) के सत्य होने की घड़ी आ गयी थी!

    - 'बादशाह सलामत आपका इकबाल युगों तक बुलंद रहे इसके लिये जरूरी है कि आप अपनी तलवार से इस फसादी (उत्पात मचाने वाला, झगड़ालू) काफिर (इस्लाम में विधर्मी को काफिर कहा जाता है) की गर्दन उड़ा दें।' बैरामखाँ ने अकबर से अनुरोध किया।

    बैरामखाँ की बात सुनकर अकबर अपने विचारों से बाहर निकला। खानका का अनुरोध सुनकर उसका हाथ तलवार पर गया किंतु अगले ही क्षण उसने तलवार की मूठ से अपना हाथ हटा लिया। अकबर को तलवार की मूठ से हाथ हटाते हुए देखकर अमीरों के मुँह आश्चर्य से खुले रह गये। क्या हुआ? बादशाह ने तलवार क्यों नहीं निकाली?

    - 'बादशाह सलामत! काफिरों को मारकर गजा (विधर्मी को मारना गजा कहा जाता है) का सवाब (पुण्य) हासिल करें। ताकि हम सब आपको मुबारकबाद दे सकें।' बैरामखाँ ने फिर से अपना अनुरोध दोहराया।

    - 'नहीं! यह नहीं हो सकता।' अकबर बुदबुदाया।

    - 'क्या नहीं हो सकता हुजूर?'

    - 'हम मरते हुए आदमी पर तलवार नहीं चलायेंगे।'

    - 'मरे हुए आदमी पर शस्त्र चलाना अनुचित है किंतु यह शत्रु अभी जीवित है। शत्रु को मारने में ही भलाई है। काफिर को मारने से आपको गाजी की उपाधि हासिल होगी।' बैरामखाँ ने फिर से अनुरोध किया।

    - 'हमारे मारने के लिये और भी काफिर काफी हैं। जब यह होश में आ जाये तब इसे मार दिया जाये।' अकबर ने प्रतिवाद किया।

    - 'आप ठीक कहते हैं। यह आपके द्वारा मारे जाने के योग्य नहीं है। आप अपनी तेग इसकी गर्दन पर टिका कर छोड़ दें। यह मरा हुआ मान लिया जायेगा।' बैरामखाँ ने अकबर को सहमत नहीं होते हुए देखकर बेचैनी से कहा।

    अकबर ने म्यान में से तलवार निकालकर महाराज हेमचंद्र की गर्दन पर टिका दी। ठीक उसी क्षण बैरामखाँ ने अपनी तलवार से महाराज हेमचंद्र की गर्दन उनके धड़ से अलग कर दी। भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट महाराज हेमचंद्र का कटा हुआ मस्तक एक ओर को लुढ़क गया जिसे देखकर विश्वास नहीं होता था कि इसी मस्तक पर एक दिन देशवासियों ने चंवर ढुलते और चंदन चर्चित अभिषेक होते देखे थे।

    बैरामखाँ ने अपने प्रबलतम शत्रु महाराज हेमचंद्र का सिर काबुल भेज दिया जहाँ उसे चौराहे पर लटका दिया गया ताकि शत्रु समझ लें कि बैरामखाँ का विरोध करने वालों का क्या हश्र होता है। महाराज हेमचंद्र का धड़ दिल्ली ले जाया गया और वहाँ उसे सूली पर लटकाया गया। इस अवसर पर बैरामखाँ ने पानीपत के मैदान से पकडे़ गये डेढ़ हजार हाथी अकबर को भेंट किये।

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  • चित्रकूट का चातक - 21

     07.09.2018
    चित्रकूट का चातक - 21

    सोने की ईंटें

    अलवर जिले में देवती माचेड़ी नाम के दो गाँव हैं। इन्हीं में से एक गाँव में साधारण बनियों के घर में हेमू का जन्म हुआ था। जिस समय वह विक्रमादित्य की उपाधि धारण कर अपने सिर पर चंवर ढुलवाता हुआ पानीपत की लड़ाई लड़ने गया तो वह अपना सारा धन अपने वृद्ध पिता के पास माचेड़ी के दुर्ग में छोड़ गया। जिस दिल्लीधीश्वर के पास अपने समय की सबसे बड़ी हस्तिसेना थी, अपने समय का सबसे बड़ा तोपखाना था, जो अपने हाथियों को मक्खना खिलाता हुआ युद्ध के मैदान में पहुँचा था, उस राजा की सम्पत्ति का अनुमान लगा पाना सहज संभव नहीं है। यदि यह कहा जाये कि यक्षराज कुबेर का खजाना भी महाराज हेमचंद्र के खजाने के समक्ष क्या रहा होगा तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

    बैरामखाँ ने सुना था कि हेमू की रानी भी युद्ध क्षेत्र में उपस्थित है और हेमू का सारा खजाना उसके पास है। जब महाराज हेमचंद्र पकडे़ गये तो उसने अपने आदमी रानी के पीछे भेजे किंतु लाख पैर पटकने पर भी रानी हाथ नहीं लगी। वह जाने किन पर्वतों में गुम हो गयी। बैरामखाँ जानता था कि यदि हेमू का खजाना उसके हाथ लग जाये तो वह जीवन भर के लिये धन की तंगी से छुटकारा पा जायेगा। इसलिये उसने रानी का पीछा नहीं छोड़ा और नासिरुलमुल्क को देवती माचेड़ी पर आक्रमण करने भेजा। बैरामखाँ का अनुमान था कि रानी देवती माचेड़ी अवश्य जायेगी।

    बैरामखाँ का अनुमान सही निकला। रानी पानीपत के मैदान से सीधी देवती माचेड़ी अपने श्वसुर के पास आयी और युद्ध के सब हाल उन्हें सुनाये। वृद्ध पिता को अपने प्रतिभाशाली पुत्र के इस भयानक अंत पर दुःख तो हुआ किंतु भाग्य का विधान समझ कर सिर पर हाथ धर कर बैठ गया। उसकी आँख से एक आँसू तक न निकला। उसकी निश्चलता को देखकर भ्रम होता था कि वह जीवित आदमी न होकर पत्थर की मूर्ति है। यहाँ तक कि वह अपनी शोक संतप्त पुत्रवधू को सांत्वना भी न दे सका।

    रानी वीर भारतीय नारी थी। विपत्ति में धैर्य रखना जानती थी। काफी देर तक वह चुपचाप अपने निश्चल हो गये श्वसुर को देखती रही। जब उसे किसी अनिष्ट की आशंका हुई तो उसने वृद्ध श्वसुर को हिलाकर कहा- 'पिताजी!'

    वृद्ध ने सिर से हाथ हटा कर पुत्रवधू की ओर देखा। - 'पिताजी! महाराज का सारा कोष मुझे दे दें।'

    - 'जब राजा ही नहीं रहा तो रानी उस खजाने का क्या करेगी? क्या अब भी कोश में ममता शेष है?'

    वृद्ध श्वसुर ने दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा।

    - 'आप जानते हैं पिताजी कि कोष के प्रति मेरे मन में कभी भी ममता नहीं रही।'

    - 'तो फिर क्या बात है?'

    - 'मैं इस कोष को सुरक्षित रूप से कहीं छिपा देना चाहती हूँ।'

    - ' क्यों?'

    - 'पिताजी! समझने का प्रयास करें। बैरामखाँ हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा। वह शीघ्र ही माचेड़ी पर आक्रमण करेगा। यदि महाराज का खजाना दुष्ट बैरामखाँ के हाथ लग गया तो हिन्दू जाति पर भयानक कहर टूट पड़ेगा। जिस प्रकार उसने हमारे ही तोपखाने से हमें मार डाला है, उसी प्रकार वह हमारे ही धन से अजेय बनकर सम्पूर्ण हिन्दू जाति को रौंद डालेगा।

    - 'किंतु पुत्री! तू इसे लेजाकर रखेगी कहाँ? एक न एक दिन तो बैरामखाँ इस कोष तक पहुँच ही जायेगा। इतनी सामर्थ्य आज सम्पूर्ण भारतवर्ष में किस के पास है जो बैरामखाँ का मार्ग रोक सके?'

    - 'मैं इसे ऐसे स्थान पर ले जाकर छिपाऊंगी कि बैरामखाँ कभी उस तक पहुँच ही न सके।'

    - 'इससे तो अधिक अच्छा होगा कि प्रजा से प्राप्त की गयी सम्पत्ति पुनः प्रजा को लौटा दी जाये। क्यों न इसे निर्धन लोगों में बाँट दिया जाये?' वृद्ध आँखों में चमक लौट आयी।

    - 'यह ठीक है पिताजी कि राजा की सम्पत्ति प्रजा की ही होती है और जब राजा न रहा तो प्रजा को इसे पुनः प्राप्त करने का अधिकार है किंतु यदि हम इसे निर्धन लोगों में बांटेंगे तो उनकी विपत्ति और अधिक बढ़ जायेगी। बैरामखाँ उन पर भी आक्रमण करेगा और उनसे छीन लेगा।'

    - 'तो फिर तुम इसे कहाँ ले जाकर रखोगी?

    - 'मैं इसे घने जंगलों में छिपा दूंगी जहाँ से इसे कोई भी प्राप्त न कर सके।'

    वृद्ध ने वीर पुत्रवधू की बात मान ली और कोशागार की तालिका उसे सौंप दी। रानी ने इससे पूर्व इस कोश को एक साथ नहीं देखा था। इस विपुल स्वर्ण भण्डार को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गयीं। कोश में इतना सोना था कि उससे ठोस सोने का एक पूरा हाथी निर्मित किया जा सकता था। कोश से स्वर्ण को बाहर निकालते हुए क्षण भर के लिये उसे शोक अवश्य हुआ होगा कि यह विपुल स्वर्ण उसके लिये किसी काम का न था।

    रानी ने समस्त स्वर्ण अपने हाथियों पर रखवाया और एक रात श्वसुर के चरणों की धूल माथे से लगाकर दुर्ग के गुप्त मार्ग से बाहर हो गयी। कोई न जान सका कि रानी कहाँ गयी।

    कहते हैं कि रानी अलवर जिले में स्थित बीजवाड़े की पहाड़ियों में जाकर छिप गयी। उसने कई दिनों तक जंगलों में घूम-घूम कर स्वर्ण-आभूषण धरती में अलग-अलग स्थानों पर दबा दिये ताकि यदि बैरामखाँ सोने का पीछा करता हुआ बीजवाड़े की पहाड़ियों में आ भी पहुँचे तो भी उसे एक साथ सम्पूर्ण कोष कभी भी प्राप्त न हो। (कई सालों तक राहगीरों को बीजवाड़ा की पहाड़ियों में सोने की ईंटें तथा मोहरें मिला करती थीं।)

    जब नासिरुलमुल्क ने देवती माचेड़ी के चारों ओर घेरा डाला तब तक रानी सारा स्वर्ण लेकर जा चुकी थी किंतु यह सारी कार्यवाही इतने गोपनीय ढंग से की गयी थी कि इस बात की खबर किसी को कानों कान भी नहीं हुई। नासिरुलमुल्क ने माचेड़ी की गढै़या पर जम कर बारूद बरसाया। महाराज हेमचंद्र के आदमी यहाँ भी बहादुरी से लड़े किंतु हजारों मुगल सैनिकों के सामने इन मुट्ठी भर आदमियों की सामर्थ्य ही क्या थी!

    महाराज हेमचंद्र के पिता अस्सी साल की वृद्धावस्था में भी हथियार उठा कर लड़े। वे एक ऐसी सेना के नायक थे जिसका राजा पहले ही युद्ध में मारा जा चुका था किंतु फिर भी लड़ना उनका धर्म था, उसलिये वे तब तक लड़ते रहे जब तक कि नासिरुलमुल्क के सिपाहियों ने उन्हें पकड़ नहीं लिया। नासिरुलमुल्क वृद्ध को जंजीरों में जकड़कर दिल्ली ले आया जहाँ बैरामखाँ ने उन्हें अकबर के समक्ष पेश किया- 'बादशाह सलामत! यह बूढ़ा-शैतान काफिर हेमू का बाप है। लाख समझाने पर भी मुसलमान होने से इन्कार करता है। इसका क्या किया जाये?' बैरामखाँ ने सिर झुकाकर पूछा।

    - 'जब पिता का राज्य पुत्र भोगता है तो पिता को भी पुत्र के अच्छे-बुरे का दण्ड भोगना चाहिये। हेमू हमारा दुश्मन था उस नाते से यह भी हमारा दुश्मन है। उचित तो यही है कि इस काफिर की गर्दन उड़ा दी जाये किंतु यदि यह अब भी इस्लाम कुबूल करता है तो इसे छोड़ दिया जाये।' अकबर ने कहा।

    - 'बोल काफिर क्या कहता है?' बैरामखाँ ने वृद्ध को ललकारा।

    - 'मैं अस्सी वर्ष से अपने धर्म में हूँ और अपने ईश्वर की पूजा करता हूँ। क्या केवल इसलिये मुसलमान बन जाऊं कि मुझे अपने प्राण संकट में दिखायी दे रहे हैं? तू यदि मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दे तब भी मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा। हमारे ऋषियों ने कहा है, स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मौ भयावह।' वृद्ध ने जंजीर से जकड़ी हुई अपनी गर्दन ऊपर की।

    बैरामखाँ ने संकेत किया। मौलाना पीर मुहम्मद ने वृद्ध की गर्दन एक ही वार में उड़ा दी। इस अवसर पर बैरामखाँ ने अलवर और माचेड़ी से लूटा गया बहुत सा सोना और माचेड़ी से पकड़े गये पचास हाथी बादशाह की नजर किये। इसी के साथ महाराज हेमचंद्र का सम्पूर्ण वैभव, शौर्य और पराक्रम इतिहास के पन्नों में सदा-सदा के लिये खो गया।

    मस्त हाथी

    दिल्ली और उसके बाद आगरा भी मुगलों ने फिर से हासिल कर लिये किंतु मानकोट का जो दुर्ग वे खिज्रखाँ के भरोसे छोड़ आये थे वह अब तक नहीं जीता जा सका था। बैरामखाँ जानता था कि जब तक सिकन्दर सूर की कमर नहीं तोड़ दी जाती तब तक हिन्दुस्थान में मुगल साम्राज्य का प्रसार नहीं किया जा सकता। इसलिये बैरामखाँ ने मानकोट आक्रमण की योजना बनायी।

    मानकोट का घेरा अकबर के जीवन का पहला युद्ध था जिसे परिस्थितियों के कारण अधूरा छोड़ देना पड़ा था। इसलिये उसने बैरामखाँ से कहा कि वह स्वयं मानकोट जीतना चाहता है और अधूरी जीत को पूरी किया चाहता है। बैरामखाँ ने अकबर को भी युद्ध में चलने की अनुमति दे दी।

    बैरामखाँ को फिर से मानकोट पर चढ़कर आया देखकर सिकन्दर सूर ने बैरामखाँ के वकील नासिरुल्मुल्क के माध्यम से बहुत सारा धन और इनाम बैरामखाँ को भिजवाया और कहलवाया कि भले ही अदली का सेनापति हेमू मारा जा चुका हैं किंतु अदली खुद अभी भी जीवित है जो कि आपका और मेरा दोनों का दुश्मन है। वह बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। उसने बंगाल के हाकिम मुहम्मदखाँ को मार डाला है और अब मुहम्मदखाँ के बेटे जलाजुद्दीन पर चढ़ बैठा है। मैं अदली से लड़ने के लिये बिहार जाना चाहता हूँ। यदि आप मुझे बिहार जाने का रास्ता दे दे तो मैं मानकोट खाली करके चला जाऊंगा।

    बैरामखाँ को सिकंदर सूर की बात जंच गयी। उसने अकबर को सिकन्दर सूर का प्रस्ताव मान लेने की सिफारिश की और समझाया कि यदि सिकन्दर सूर और अदली एक दूसरे से लड़कर कमजोर हो जाते हैं तो इसमें मुगलों का ही भला होगा और जो काम एक दिन अकबर को करना पड़ेगा, वह काम इन दोनों अफगान शैतानों की परस्पर लड़ाई से स्वतः सम्पन्न हो जायेगा।

    अकबर ने बैरामखाँ की बात मान ली और सिकन्दर सूर को मानकोट खाली करके बिहार जाने की अनुमति दे दी। सिकन्दर सूर मानकोट दुर्ग की चाबियाँ और बहुत से हाथी अकबर की नजर करके बिहार को चला गया। जहाँ से साल भर बाद उसकी मृत्यु के समाचार ही आये। बिना किसी क्षति के मानकोट हाथ आ जाने की खुशी में मुगल सेना ने जश्न मनाया।

    अकबर को उन दिनों हाथी लड़ाने का शौक चर्राया हुआ था। इसलिये उसने हाथियों की लड़ाई का आयोजन करवाया। बैरामखाँ उन दिनों बीमार था और फोड़े निकल आने से घोड़े पर नहीं चढ़ सकता था। इसलिये वह अपने डेरे में ही रहा और हाथियों की लड़ाई देखने नहीं गया। हाथियों को शराब पिलाकर मदहोश कर दिया गया और एक दूसरे पर हूल दिया गया।

    शराब के मद में चूर हाथी अपनी सारी संजीदगी को भूलकर वहशी दरिंदों की तरह लड़े। दो बादशाही हाथी तो मानो एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये। दोनों ही हाथी खास बादशाही अंगरक्षक दल के थे और अच्छा खाये-पिये हुए थे। इसलिये दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। अंत में वे लड़ते-लड़ते मैदान से बाहर हो गये और बैरामखाँ के डेरे तक जा पहुँचे। उनके पीछे तमाशाई लोगों की भीड़ भी चीख-पुकार मचाती हुई आयी।

    लोगों की चीखें सुनकर बैरामखाँ सतर्क हो गया और किसी तरह तम्बू से बाहर निकल कर उसने अपनी जान बचाई। जांघों में फोड़े होने से वह मुश्किल से ही बच पाया। किसी तरह उन मदमत्त हाथियों पर नियंत्रण किया गया।

    अचानक हाथियों के चढ़ आने से बैरामखाँ के दिल में संदेह हो गया कि यह अकबर के आदेश से हुआ है। जब बैरामखाँ ने अपने आदमियों से सलाह मशविरा किया तो उन्होंने भी बैरामखाँ की हाँ में हाँ मिला दी। बैरामखाँ के सिर पर खून सवार हो गया किंतु उसने किसी तरह अपने आवेश पर नियंत्रण रखा और अपना एक आदमी माहम अनगा के पास भेज कर कहलवाया कि मैं अपना कुछ कसूर नहीं जानता हूँ और खैरख्वाहों के विरुद्ध भी कोई काम नहीं करता हूँ। फिर कैसे चुगलखोरों ने मुझे गुनहगार करके बादशाही की इतनी बड़ी नामिहरबानी करा दी है कि मस्त हाथी मेरी चादर पर छोड़े जाते हैं?

    बैरामखाँ के शब्द क्या थे! सुलगते हुए शोले थे जिन की आँच महसूस कर माहम अनगा कांप उठी। वह खुद चादर ओढ़कर मिजाजपुर्सी के लिये बैरामखाँ के डेरे में हाजिर हुई। घंटों तक चिकनी चुपड़ी बातें करके उसने बैरामखाँ का मिजाज ठण्डा किया।

    बैरामखाँ ने कहा कि बदजात हाथी उसे सौंप दिये जायें। जब माहम अनगा ने बैरामखाँ की मांग के बारे में बताया तो अकबर खुद भी बैरामखाँ के डेरे पर आया। उसने बैरामखाँ को समझाया कि हाथी शराब के नशे में थे और अचानक ही लड़ते हुए इस ओर आ निकले थे। इसमें किसी तरह का षड़यंत्र नहीं था लेकिन बैरामखाँ अपनी जिद्द पर अड़ा रहा।

    हार कर अकबर ने दोनों हाथी बैरामखाँ के डेरे पर भिजवा दिये। बैरामखाँ ने हाथियों को तो कुछ नहीं कहा किंतु उनके महावतों को जम कर पिटवाया। अकबर अपनी आँखों से यह दृश्य देखता रहा। उसके बेकसूर महावत पिटते रहे और बादशाह होते हुए भी वह कुछ नहीं कर सका।

    यह बात अभी शांत हुई भी न थी कि फिर से एक अनहोनी घट गयी। एक दिन शाम के समय बैरामखाँ यमुना में नौका विहार के लिये गया। जाने कैसे एक शाही हाथी बिगड़ गया और बैरामखाँ को कुचलने के लिये झपटा। बैरामखाँ किसी तरह अपनी जान बचाकर लौट आया।

    जब अकबर को यह बात पता चली तो उसने हाथी को महावत सहित बैरामखाँ के पास भिजवा दिया। बैरामखाँ ने महावत की खाल खिंचवा ली। अकबर चुप रहा। बैरामखाँ ने उसी दिन अकबर के शिक्षक मुल्ला पीर मोहम्मद को नौकरी से अलग कर दिया। अकबर इस पर भी चुप रहा। इसके बाद बैरामखाँ ने बादशाही हाथियों का मुआयना किया और बहुत से हाथी अपने आदमियों में बांट दिये। इनमें से अधिकांश हाथी वही थे जिन्हें बैरामखाँ ने हरहाने, सरहिन्द, पानीपत और देवती माचेड़ी के मोर्चों से पकड़ा था। अकबर इस बार भी चुपचाप देखते रह जाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका।


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  • चित्रकूट का चातक - 22

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 22

    खून की होली

    हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा पहाड़ों की तलहटी में उन दिनों धमरी के पास मऊका परगना हुआ करता था। किसी जमाने में मऊका जमींदार हुमायूँ का ताबेदार था। जब हुमायूँ मर गया तो मऊका जमींदार, सिकंदर सूर का सितारा बुलंदी पर जान कर सिकंदर का ताबेदार हो गया।

    जब सिकंदर सूर मानकोट खाली करके बिहार चला गया तो मऊका जमींदार को अपने भविष्य की चिंता हुई। वह फिर से अकबर की शरण में चला गया। अकबर ने उसे माफ कर दिया। जब यह बात बैरामखाँ को मालूम हुई तो उसने मऊका जमींदार को गद्दार और मौका परस्त जानकर उसकी हत्या करवा दी और उसके भाई बखतमल को मऊका का परगना दे दिया।

    कहने को तो नासिरुलमुल्क बैरामखाँ का वकील था किंतु इधर वह बादशाह के काफी नजदीक आ गया था और कुल मुख्तार के पद पर नियुक्त हो गया था। बादशाह ने मुल्क और माल के सब काम उसके ऊपर छोड़ दिये थे। नासिरुल्मुल्क बादशाह के मुँह लगकर अपने आप को बैरामखाँ के बराबर समझने लगा था और गाहे-ब-गाहे बैरामखाँ की हुक्म उदूली कर बैठता था। बैरामखाँ ने नासिरुल्मुल्क को समझाने की कोशिश की किंतु नासिरुलमुल्क बादशाह की नजदीकी के कारण मुँहजोरी पर उतर आया। इससे वह बैरामखाँ के निशाने पर आ गया।

    नासिरुल्मुल्क पक्का शातिर था। उसने बैरामखाँ को नीचा दिखाने के लिये बुर्जअली और मुसाहिब बेग नाम के दो बदमाशों को मरवा डाला और इनकी हत्या के लिये बैरामखाँ को जिम्मेदार ठहराकर बैरामखाँ को बदनाम करने लगा। बुर्जअली और मुसाहिब बेग अवध के हाकिम अलीकुलीखाँ के नौकर थे और अब बैरामखाँ की खिदमत में रहते थे तथा दोनों ही बैरामखाँ के मुँह लगे हुए थे। बैरामखाँ को लगा कि इस साजिश में अकबर भी शामिल था। इसलिये बैरामखाँ ने काबुल के हाकिम मुनअमखाँ के साथ मिलकर गजनी के हाकिम जलालुद्दीन महमूद और उसके भाई मसऊद का कत्ल करवा दिया। एक तरह से यह अकबर पर सीधा हमला था किंतु अकबर बैरामखाँ से कुछ नहीं कह सका।

    कुछ दिनों बाद नासिरुल्मुल्क बीमार पड़ा तो बैरामखाँ उसे देखने के लिये उसके महल पर गया। दरबान ने खानखाना को महल के दरवाजे पर ही खड़ा रहने के लिये कह दिया और स्वयं नासिरुल्मुल्क को खबर करने के लिये महल के भीतर गया। खानखाना इस बेअदबी से बहुत झल्लाया। जब नासिरुल्मुल्क को सूचना हुई तो वह दौड़ा-दौड़ा आया और बहुत निहोरे करके खानखाना को अंदर ले गया।

    नासिरुल्मुल्क के नौकरों ने खानखाना के साथ आये आदमियों को महल के बाहर ही रोक लिया जिससे वे भी चिढ़ गये। जब खानखाना नासिरुल्मुल्क से मिलकर बाहर आया तो उसके आदमियों ने नासिरुल्मुल्क के नौकरों की शिकायत की। इस पर खानखाना नाराज होकर अपने ठिकाने पर चला गया और वहाँ से एक पत्र नासिरुल्मुल्क को भिजवाया।

    खानखाना ने लिखा कि जब तू कन्धार में हमसे मिलने आया था तो एक गरीब विद्यार्थी था। हमने तुझे बढ़ावा देकर ऊँचे ओहदे पर पहुँचाया। मुल्ला से अमीर बनाया। मगर तू ओछे पेट का आदमी निकला। जल्दी से अफर गया। हमें तुझसे ऐसे-ऐसे फसाद होने का डर है जिनका इलाज हम मुश्किल से कर सकेंगे। इसलिये यह बेहतर है कि तू कुछ दिन के लिये अपने कम्बल में पाँव समेट कर बैठ जा और अपने नक्कारा निशान वगैरह अपनी अमीरी और घमण्ड के सामान हमें सौंप दे तथा अपना मिजाज दुरस्त कर ले जिसमें तेरा और दुनिया का फायदा है।

    खानखाना का पत्र पाकर नासिरुल्मुल्क का खून जम गया। उसने भयभीत होकर अपना नक्कारा, निशान और अमीरी के सब राजकीय चिह्न खानखाना को भिजवा दिये। इस पर भी बैरामखाँ के चुगलखोर नौकरों को चैन नहीं आया और उन्होंने बैरामखाँ को उल्टा-सीधा भड़का कर नासिरुल्मुल्क को बयाना के दुर्ग में भिजवा दिया। नासिरुल्मुल्क समझ गया कि अब मुगल सल्तनत से उसका दाना-पानी उठ गया है। इसलिये वह राजकीय सेवा से छुट्टी लेकर मक्का की ओर रवाना हो गया।

    जब वह राधनपुर पहुँचा तो उसे मिर्जा शर्फुद्दीन हुसैन और अदहमखाँ की चिट्ठियाँ मिलीं कि जहाँ पहुँचा हो वहीं ठहर जाये और देखता रहे कि आगे क्या होता है! नासिरमुल्क इस पत्र को पाकर राधनपुर से रणथंभौर के पास झायन के घाटे में आ गया। जब बैरामखाँ ने यह सुना तो उसने अपने आदमी नासिरुल्मुल्क को पकड़ने के लिये भेजे। नासिरुल्मुल्क किसी तरह जान बचा कर अकबर के पास भाग आया। जब उसने आपबीती कहानी अपने मुँह से अकबर को सुनाई तो अकबर कांप उठा। अकबर को अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देने लगा। उसके आदमी चुन-चुन कर मारे जा रहे थे और बैरामखाँ के आदमी शान से सिर उठाये हुए घूमते थे लेकिन बादशाह होते हुए भी अकबर कुछ करने की स्थिति में नहीं था।

    संकरी घाटी

    विश्वभर के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जब सेवक ने अपने स्वामी से विद्रोह किया हो किंतु ऐसे उदाहरण एक-दो ही हैं जब स्वामी अपने सेवक के विरुद्ध विद्रोह करने पर विवश हुआ हो। खानखाना बैरामखाँ और अकबर अब इतिहास की उसी संकरी घाटी में आ खड़े हुए थे जहाँ अपने सेवक से भयभीत स्वामी को अपने सेवक से विद्रोह करना था।

    एक तो सत्ता और सियासत के गलियारे वैसे ही निम्न कोटि के षड़यंत्रकारी जीवों से भरे रहते हैं। उस पर वह समय भी ऐसा ही था जब एक दूसरे के विरुद्ध षड़यंत्र रचकर ही अपनी तरक्की का मार्ग खोलना उचित समझा जाता था। इन दोनों बातों से भी बढ़कर तीसरी बात यह थी कि बैरामखाँ शिया मुसलमान था और वह अपने चारों ओर सुन्नी मतावलम्बियों से घिरा हुआ था। बैरामखाँ जब भी किसी शिया को उच्च पद पर नियुक्त करता तो सुन्नी लोग अकबर से यही कहकर शिकायत करते कि बैरामखाँ जानबूझ कर शियाओं को उच्च पद पर नियुक्त करता है तथा सुन्नियों को निम्न पद पर। जब अकबर ने बैरामखाँ के कहने पर शेख गदाई को सदर-ए-सुदूर पद पर नियुक्त किया तो बैरामखाँ के शत्रुओं को हल्ला मचाने का अवसर मिल गया। उनकी शिकायतों ने धीरे-धीरे अकबर के मन में जगह बना ली।

    हालांकि बुर्जअली और मुसाहिब बेग की हत्या दुष्ट नासिरुल्मुल्क ने करवाई थी लेकिन उसने उन दोनों की हत्या का दोष यह कह कर बैरामखाँ के मत्थे मंढ़ दिया कि बुर्जअली और मुसाहिब बेग सुन्नी थे। शत्रुओं के निरंतर षड़यंत्र करते रहने से बैरामखाँ का स्वभाव क्रोधी और चिड़चिड़ा हो चला था जिससे अकबर को भी उससे बात करने में कठिनाई होने लगी थी।

    जब अकबर के पाजी नौकर अपने आप को बादशाह का नौकर समझ कर बैरामखाँ से नित्य नई सुविधाओं की मांग करते और जब बैरामखाँ मना कर देता तो वे पाजी नौकर मुँहजोरी करने लगते। इस पर बैरामखाँ को क्रोध आ जाता और वह बिना बादशाह से अनुमति लिये नौकरों को दण्डित कर देता। यह बात अकबर को बुरी लगती और वह समझता कि बादशाह को अपमानित करने के लिये बैरामखाँ बादशाह के नौकरों को दण्डित करता है और अपने नौकरों को इनाम बांटता फिरता है।

    अकबर अपने हाथियों के छिन जाने, तार्दीबेग, जलालुद्दीन महमूद व मसऊद की हत्या हो जाने, नासिरुलमुल्क का पतन हो जाने तथा बैरामखाँ द्वारा शम्सुद्दीन अत्तका से निरंतर स्प्ष्टीकरण मांगते रहने के कारण भी निराश हो चला था। दूसरी ओर अब वह तेरह वर्ष का अनाथ और असहाय बालक न रहा था। अब वह लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भारत का एकछत्र एवं युवा बादशाह था, उसके मित्रों और चाहने वालों की कमी न रह गयी थी।

    इन सब बातों ने अपना रंग दिखाना आरंभ कर दिया। अकबर अब बात-बात पर बैरामखाँ पर संदेह करने लगा था और उससे मन ही मन कुढ़ने और छुटकारा पाने की योजनायें बनाने लगा था।

    एक दिन अकबर की नजर सलीमा बेगम पर पड़ी। इस अद्वितीय सुंदरी को देखकर अकबर को अपना लड़कपन याद आ गया। वो भी दिन थे जब वह इस लड़की पर जान छिड़का करता था! जाने किन क्षणों में हुमायूँ ने सलीमा का निकाह बैरामखाँ से करने का निश्चय किया था और अकबर ने दिल्ली का बादशाह घोषित किये जाने पर यह लड़की बैरामखाँ को सौंप दी थी। बैरामखाँ का ध्यान आते ही अकबर की नसों में गुस्से का लावा बहने लगा। उसे लगा कि बैरामखाँ उससे उसकी हर प्रिय वस्तु छीन रहा था।

    ईर्श्या और क्रोध की अग्नि में झुलस कर अकबर उस क्षण बिल्कुल ही भूल गया कि बैरामखाँ कभी भी उसका प्रतिद्वंद्वी नहीं रहा। वह तो अकबर का शिक्षक, मित्र और आश्रयदाता था। उसी ने अकबर को तलवार चलाने, घुड़सवारी करने, जंग की तैयारी करने तथा शासन व्यवस्था कायम करने का प्रशिक्षण दिया था।

    अकबर भूल गया कि यदि बैरामखाँ न होता तो पाँच साल का अकबर कांधार में ही तोपों के सामने भुनगे की तरह भुन कर रह जाता। अकबर यह भी भूल गया कि यदि बैरामखाँ न होता तो हुमायूँ के मरने पर तेरह साल का अकबर या तो शत्रुओं द्वारा मार दिया जाता या फिर उसे दर-दर का भिखारी बन जाने को विवश होना पड़ता। अकबर यह भी भूल गया कि बैरामखाँ ने किस तरह हिन्दुओं को कुचल कर, उनका मान मर्दन करके और उनके खून की नदियाँ बहाकर भारत पर मुस्लिम शासन कायम किया था।

    जब ईर्श्या की ज्वाला भड़कती है तो आदमी की विचार शक्ति को हर लेती है। तब वह जो भी चिंतन करता है, वह एकांगी ही होता है। उस पर क्षुद्र तात्कालिकता हावी हो जाती है और विस्तृत अतीत विस्मृत हो जाता है। ईर्श्या की इसी ज्वाला में झुलसकर अकबर भूल गया कि भले ही बैरामखाँ कितना ही स्वाभिमानी और कठोर क्यों न रहा हो किंतु स्वामिभक्ति की जो जीती जागती मिसाल बैरामखाँ के रूप में धरती पर मौजूद थी, वैसी मिसाल दुनिया के इतिहास में यदा-कदा ही देखने को मिलती है।


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  • चित्रकूट का चातक - 23

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 23

    माहम अनगा

    अकबर की बहुत सी धायें और आयाएं थीं। उनमें से कुछ तो शिशु अकबर को स्तनपान करवाती थीं और कुछ उसकी सेवा टहल करती थीं। इन आयाओं के पतियों के पास कोई काम-धाम नहीं होता था और वे दिन भर बेकार बैठे हुए आपस में जुआ खेलते रहते थे। वे लोग हरम के हिंजड़ों से हँसी-ठिठोली करते, एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये नित्य नये षड़यंत्र रचते और बात-बात पर छुरे निकाल कर एक दूसरे को मारने के लिये दौड़ते थे। जब आयाएं हरम में जाती थीं तो वे इन झगड़ों को अपने साथ ले जाती थीं और अपने-अपने खाविंद का पक्ष लेकर दूसरी आयाओं के खाविंदों पर दोषारोपण करती रहती थीं। पूरा हरम इन खाविंदों की चुगलियों और बुराइयों से गूंजता था।

    इन आयाओं में सर्वप्रमुख माहम अनगा थी जिसके पति शम्सुद्दीन ने चौसा की लड़ाई में पराजित होकर भागते हुए हुमायूँ को गंगाजी में डूबने से बचाया था। हुमायूँ ने उपकृत होकर इस भिश्ती को अतगा (धातृ-पतियों को अत्तका भी कहा जाता था) खाँ की उपाधि दी थी जिससे उसका दिमाग फिर गया था। माहम अनगा का लड़का आदमखाँ तथा जंवाई शियाबुद्दीन भी बहुत ही बदमाश और घमण्डी थे तथा किसी की भी परवाह नहीं करते थे। माहम अनगा और उसका परिवार यदि किसी से भय खाते थे तो वह था बैरामखाँ।

    अकबर के बालक होने के कारण जिस प्रकार शासन और सत्ता का प्रबंध बैरामखाँ करता था उसी प्रकार अंतःपुर का प्रबंध माहम अनगा के हाथ में था। माहम अनगा ने अकबर की माता हमीदा बानू को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से वश में कर रखा था।

    माहम अनगा नीच स्वभाव की महत्वाकांक्षिणी स्त्री थी। साधारण भिश्ती की स्त्री से बादशाह की धाय बन जाने से उसका दिमाग फिर गया था। वह अकबर को अपना पुत्र और बैरामखाँ को अपने पुत्र का नौकर समझती थी। इस नाते वह बैरामखाँ को सहन करने को तैयार नहीं थी और उसके विरुद्ध अकबर के कान भरती रहती थी। वस्तुतः अकबर को बैरामखाँ से जो चिढ़ होने लगी थी उसका कारण माहम अनगा ही थी।

    अकबर घुमा फिरा कर ही सही किंतु ये सब बातें बैरामखाँ को कह ही देता था ताकि बैरामखाँ यह न समझे कि अकबर को कुछ पता नहीं है। एक बार बैरामखाँ ने शम्सुद्दीन अत्तका को रोक कर आँखें तरेरीं- 'मैं कभी-कभी बादशाह को तुम्हारी चुगली और चांटी से खिंचा हुआ पाता हूँ। मैंने क्या किया है और तुम क्यों मेरे खून के प्यासे होकर बादशाह का मिजाज मुझसे फिरा रहे हो?'

    अत्तका डर गया। उसने अपने बहुत से आदमियों को एकत्र किया और खानखाना के भी कई विश्वासपात्र आदमियों को लेकर खानखाना के डेरे पर पहुँचा। अत्तका बैरामखाँ के पैरों पर गिर कर खूब गिड़गिड़ाया। बैरामखाँ ने उसे भविष्य में सावधान रहने के लिये कहकर माफी दे दी।

    जब यह सारी बात माहम अनगा को पता चली तो वह सर्पिणी की तरह फुंकार उठी। एक बदजात नौकर की इतनी मजाल कि बादशाह की धाय के खाविंद को धमकाये। उसने मन ही मन बैरामखाँ का सत्यानाश करने का संकल्प ले लिया।

    आगरा से पलायन

    जब दिल्ली पर काबिज होने के चार साल पूरे होने को आये तो बैरामखाँ और अकबर राजकीय कार्य के सिलसिले में दिल्ली से आगरा गये। बैरामखाँ तो आगरा पहुँच कर राजकीय कार्यों में व्यस्त हो गया और अकबर सदा की तरह शिकार और खेलों में लग गया। हालांकि अब वह अठारह साल का कड़ियल जवान था और शासन के मामलों को बेहतर समझ सकता था किंतु उसकी तबियत शिकार खेलने और मौज मस्ती करने में ही अधिक लगती थी।

    एक दिन जब अकबर शिकार खेलने के लिये आगरा के बाहर स्थित घने जंगलों में गया हुआ था तब वहीं माहम अनगा के गुप्तचर उसकी सेवा में हाजिर हुए। उन्होंने अकबर से कहा- 'आपकी माँ मलिका हमीदा बानू सख्त बीमार हैं और उन्होंने कहलवाया है कि यदि बादशाह सलामत अपनी माँ को आखिरी बार देखना चाहता हैं तो बिना वक्त गंवाये, जैसे खडे़ हैं, वैसे ही चले आयें।'

    पितृहीन अकबर माता के प्राण संकट में जानकर उसी क्षण मिरजा अबुल कासिम (यह मिरजा कामरान का बेटा था) को साथ लेकर दिल्ली के लिये रवाना हो गया और बैरामखाँ को अपने दिल्ली जाने की खबर भिजवा दी। जैसे ही अकबर दिल्ली पहुँचा तो उसे हरम की औरतों ने घेर लिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन औरतों का नेतृत्व माहम अनगा कर रही थी।

    अकबर को यह देखकर संतोष हुआ कि उसकी माँ बिल्कुल सुरक्षित है।

    - 'हमने तो सुना था कि मलिका ए आलम की तबियत नासाज है?'

    हमीदा बानू कुछ बोलती उससे पहले माहम अनगा बड़े नाज-नखरों से अकबर की बलैयाएं लेती हुई बोली- 'मलिका क्यों बीमार पड़ने लगी? बीमार पड़े हमारा दुश्मन, वह मुआ बैरामखाँ। मौत ले जाये उसे खींचकर।'

    - 'फिर अचानक क्यों आपने हमें दिल्ली बुलवाया? वह भी मलिका की तबियत बहुत खराब होने की झूठी सूचना देकर?' अकबर माहम अनगा के जवाब से हैरान रह गया।

    - 'बादशाह सलामत को अचानक दिल्ली इस लिये बुलवाया गया है कि हमें यह खबर लगी थी नमक हराम बैरामखाँ आगरा में बादशाह के साथ दगा करके स्वयं बादशाह बनने की तैयारी कर रहा है।'

    - 'किस ने दी ऐसी झूठी खबर?' अकबर ने पूछा।

    - 'खबर बहुत ही भरोसे के आदमी ने लाकर दी और हमें यहाँ इस बात के सबूत भी मिले हैं।' हमीदा बानू ने जवाब दिया।

    अकबर ने माहम अनगा को दिलासा दी- 'आप फिक्र न करें। खानबाबा का गुस्सा जरूर तेज है जिसके कारण उन्होंने कई ज्यादतियाँ की हैं किंतु ऐसी कोई बात नहीं है कि वे बादशाह के साथ दगा करें।'

    जब माहम अनगा की बात नहीं चली तो हमीदा बानू सामने आयी। उसने कहा- 'यह ठीक है कि बैरामखाँ आज ऐसा नहीं करने वाला किंतु एक न एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब वह ऐसा करने की सोचे। इसलिये जरूरी है कि तुम अभी बैरामखाँ से छुटकारा पा लो।'

    अकबर ने माँ की बात को ध्यान से सुना और मौके पर उचित निर्णय लेने का भरोसा दिया। इस पर माहम अनगा ने नया पासा फैंका। उसने अकबर से कहा- 'मुझे मक्का जाने की इजाजत दी जाये।'

    - 'क्यों?' अकबर चौंका।

    - 'इसलिये कि यह बात बैरामखाँ तक जरूर पहुंचेगी। जब उसे पता लगेगा कि मैंने उसकी शिकायत की है तो वह जरूर या तो मुझे मार डालेगा या फिर अत्तका (धाय का पति) को।'

    - 'लेकिन उसे पता ही कैसे लगेगा कि आपके और मेरे बीच में क्या बात हुई है?'

    - 'क्योंकि उसके जासूस यहाँ भी मौजूद होंगे।'

    - 'चलो मान भी लिया जाये कि उसके जासूस यहाँ भी मौजूद होंगे लेकिन क्या उसकी इतनी हिम्मत होगी कि वह आप पर तेग उठाये?'

    - 'जब वह अत्तका को सबके सामने जान से मारने की धमकी दे सकता है तो क्या वह ऐसा नहीं कर सकता?'

    भले ही अकबर माहम अनगा और हमीदा बानू की बातों को मानने से इन्कार कर रहा था किंतु ऐसा वह केवल उन्हें दिलासा देने के लिये कर रहा था। जब उसने अत्तका को बुलाकर सच्चाई जाननी चाही तो न केवल अत्तका अपितु सैंकड़ों आदमी बैरामखाँ की चुगलियों पर उतर आये। माहम अनगा ने दिल्ली, लाहौर और काबुल के सूबेदारों को पहले से ही बुला रखा था। उन्होंने भी बैरामखाँ की ज्यादतियाँ बढ़ा-चढ़ा कर अकबर से कहीं। अब अकबर के पास उनकी बात मान लेने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

    माहम थी तो भिश्ती परिवार से किंतु लम्बे समय से राजघराने में रहकर राजनीति की चतुर खिलाड़ी हो गयी थी। उसने बादशाह को विचार मग्न देखकर कहा- 'यह आपने बहुत ही अच्छा किया जो मिरजा अबुल कासिम को अपने साथ लेते आयेे।'

    - 'यदि मिरजा अबुल कासिम हमारे साथ नहीं आते तो क्या कोई विशेष बात हो जाती?' अकबर ने पूछा।

    - 'क्या शहंशाह को पता है कि बैरामखाँ हमेशा से मिरजा को अपने साथ क्यों रखता है?' माहम अनगा ने उलट कर सवाल किया।

    - 'क्या इसमें भी किसी तरह का भेद है?' अकबर के चेहरे पर असमंजस के चिह्न प्रकट हुए।

    - 'यही तो आप समझते नहीं बादशाह सलामत! अबुल कासिम बैरामखाँ का वो मोहरा है जिसे उसने आफत के समय के लिये संभालकर रखा हुआ है।'

    - 'आप क्या कह रही हैं मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा!'

    - 'मिरजा कासिम को बैरामखाँ ने इसलिये अपने साथ रखा हुआ है कि जब भी आप उसकी बात मानने से इन्कार करें तो बैरामखाँ आपके स्थान पर मिरजा को तख्त पर बैठा सके। बाबर का वंशज होने के कारण बाकी अमीर भी अबुल कासिम को अपना बादशाह स्वीकार कर लेंगे।'

    माहम अनगा की बात सुनकर अकबर की आँखें फटी की फटी रह गयीं। कई बार खुद अकबर ने महसूस किया था कि बैरामखाँ मिरजा अबुल कासिम को बहुत अधिक तवज्जो दिया करता है। क्या वाकई में बैरामखाँ इतना शातिर आदमी है! माहम अनगा की इस बात से अकबर पूरी तरह माहम के वश में हो गया।

    माहम अनगा की सलाह पर अकबर ने सारे अमीरों को पत्र लिखकर सूचित किया कि खानखाना बैरामखाँ उलटा चलता है जिससे हम उसे अपनी नजरों से गिराकर यहाँ दिल्ली चले आये हैं। जो अमीर अपना भला चाहता है तो वह यहाँ हाजिर हो जाये।

    जब बादशाह आगरा से दिल्ली आ रहा था तो खुरजे (दिल्ली और अलीगढ़ के बीच स्थित है) में माहम अनगा का जंवाई शहाबुद्दीन अहमदखाँ अपने सब भाई बंदों के साथ बादशाह की पेशवाई के लिये हाजिर हुआ था और वहीं से बादशाह के संग लग लिया था। जब उसने बादशाह को अपनी सास के अधीन देखा तो अपने श्वसुर शमशुद्दीन खाँ अत्तका को बहीर (पंजाब में लाहौर के पास था। अब पाकिस्तान में है।) से और मुनअमखाँ को काबुल से दिल्ली चले आने के लिये लिखा। जब शमशुद्दीन आया तो अकबर ने बैरामखाँ का नक्कारा, निशान और तुमन तौग शमशुद्दीन को दे दिये तथा पंजाब का सूबेदार भी बना दिया।

    जब माहम अनगा के समधी मुहम्मद बरकी (माहम अनगा के बेटे अहमदखां का ससुर) को ये सब समाचार मालूम हुए तो उसने बैरामखाँ को सारा हाल लिख भेजा। बैरामखाँ ने अकबर की कोई परवाह नहीं की।


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  • चित्रकूट का चातक - 24

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 24

    हरम सरकार

    अकबर के आगरा से दिल्ली चले आने पर आगरा में बैरामखाँ की सरकार और दिल्ली में हरम की सरकार स्थापित हो गयी। ये दोनों सरकारें एक-दूसरे को खत्म करने पर तुल गयीं। अकबर इन दोनों सरकारों के बीच में बादशाह होते हुए भी प्यादे की तरह बेबस होकर रह गया। कैसी विचित्र शतरंज थी यह? दोनों ओर की सेना में फर्जी (वजीर) से लेकर ढईया (घोड़ा) और प्यादे (सबसे छोटा मोहरा, पैदल सिपाही) तक अलग-अलग थे किंतु दोनों सेनाओं का बादशाह एक ही था।

    माहम अनगा के निर्देशन में शाहबुद्दीन और शमशुद्दीन दिल्ली का किला सजाकर बैठ गये। बैरामखाँ से बादशाह का मिजाज बदल जाने के समाचार थोड़े ही दिनों में चारों और फैल गये। अमीर, उमराव, सरदार, ताबेदार और भी बहुत सारे लोग बैरामखाँ को छोड़-छोड़कर दिल्ली पहुँचने लगे। सबसे पहले कयाखाँ गंग आया जो बैरामखाँ के बड़े अमीरों में से था। जो भी दिल्ली आता था उसे माहम अनगा और शाहबुद्दीन अहमदखाँ की सलाह से जागीर मनसब और खिताब दिये जाने लगे।

    जागीर में गाँव अथवा सूबे दिये जाते थे जिनसे प्रतिवर्ष निश्चित राशि राजस्व के रूप में प्राप्त होती थी। मनसब सैनिक पद था। सबसे छोटा मनसब 10 का था और सबसे बड़ा मनसब बारह हजार का था। आठ हजार तथा उससे ऊपर के मनसब केवल बादशाह और उसके पुत्र-पौत्रों के लिये आरक्षित थे। जयपुर नरेश राजा मानसिंह तथा उनके जैसे 1-2 व्यक्ति ही अधिकतम 7 हजार मनसब के पद पर नियुक्त हो पाये थे। मनसब देते समय उन्हें बादशाह की ओर से यह आदेश भी होता था कि जब भी उन्हें बुलाया जाये, वे बादशाह की सेवा में कितने घुड़सवार लेकर हाजिर होंगे। जरूरी नहीं था कि सात हजारी मनसबदार सात हजार घुड़सवार लेकर आये। यह पद की उच्चता का द्योतक था, न कि जात अथवा सवार का। तबकात अकबरी में लिखा है कि बैरामखाँ के 25 नौकर पाँच हजारी मनसब को पहुँच कर नौबत और निशान के धनी हो गये थे। खिताब (उपाधियां) अक्सर व्यक्ति के काम और हैसियत का द्योतक होती थीं जैसे धातृ पति को अत्तका अथवा अतगा खाँ की, अमीर के पुत्रों को मिरजा की, बादशाह को खाँ की और बादशाहों के बादशाह को खानखाना की उपाधि दी जाती थी।

    जब बैरामखाँ के आदमी एक-एक करके खिसकने लगे तो बैरामखाँ की आँखें खुलीं। उसने मिरजा अबुल कासिम को ढूंढा किंतु वह आगरे में नहीं मिला। बैरामखाँ समझ गया कि खेल पक्का हुआ है। बैरामखाँ ने वक्त की नजाकत को समझकर अपने आदमी बादशाह की खिदमत में माफी मांगने के लिये भेजे। अकबर ने उनको भी अपनी ओर मिला लिया और फिर से आगरा नहीं लौटने दिया।

    बैरामखाँ ने कुछ दिनों तक तो अपने आदमियों के लौट आने की प्रतीक्षा की किंतु उन्हें लौटता न देखकर बादशाह को संदेश भिजवाया कि माफी मांगने के लिये मैं स्वयं दिल्ली आ रहा हूँ। इस पर अकबर के अमीरों ने सलाह दी कि बादशाह लाहौर चले जायें और जब वह लाहौर आये तो बादशाह काबुल चले जायें।

    माहम अनगा ने कहा कि बादशाह को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। बैरामखाँ को लिख दिया जावे कि दिल्ली न आवे। यदि फिर भी वह दिल्ली आये तो उसका मार्ग रोका जाये। माहम अनगा की सलाह पर अकबर ने बैरामखाँ के आदमियों को ही दिल्ली-आगरा के बीच का मार्ग रोकने पर तैनात किया ताकि बैरामखाँ को भली भांति अपमानित किया जा सके। इस तरह माहम अनगा ने बैरामखाँ के बादशाह तक पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिये।

    जब बैरामखाँ ने देखा कि बादशाह तक पहुँचने के सारे रास्ते बंद हैं तो उसने अमीरों से सलाह की। बैरामखाँ के अमीरों ने सलाह दी कि अभी बादशाह के पास अधिक आदमी नहीं हैं। बेहतर होगा कि बैरामखाँ दिल्ली पर आक्रमण कर दे और अकबर तथा माहम अनगा को बंदी बना ले।

    बैरामखाँ ने हुमायूँ के स्नेह का विचार करके ऐसा करना उचित नहीं समझा। वह अब भी यही समझता रहा कि मेरे बिना अकबर का काम नहीं चल सकेगा इसलिये जैसे भी हो अकबर से मेल-मिलाप का प्रयास करना चाहिये किंतु उसका कोई रास्ता नहीं सूझता था। बहुत सारा आगा-पीछा सोचकर बैरामखाँ ने अपने प्रमुख अमीरों को बुलवाया और उन्हें बादशाह की सेवा में भेजकर कहलवाया कि मैं अपने सारे आदमी आपकी खिदमत में भेज रहा हूँ ताकि बदमाश लोग आपको मेरे विरुद्ध जो कुछ भी कहते रहे हैं आप उनकी बात न सुनकर मेरी निष्ठा पर विचार करें तथा मुझे मक्का जाने की इजाजत दें। बैरामखाँ ने अपनी मोहर भी अकबर को भिजवा दी।

    बैरामखाँ ने यह सारा उपक्रम इस आशा में किया था कि अकबर बैरामखाँ का यह नरम रुख देखकर पसीज जायेगा और फिर से मेल-मिलाप कर लेगा किंतु बैरामखाँ नहीं जानता था कि विधाता उससे विपरीत हो गया है जिसके कारण लाख उपाय करने से भी बात बनने वाली नहीं है। जब बैरामखाँ के सारे अमीर बैरामखाँ की मोहर और मक्का जाने की अर्जी लेकर अकबर के पास पहुंचे तो हरम सरकार ने इसे बैरामखाँ सरकार की हार और अकबर की जीत बताया तथा अकबर को सलाह दी कि उसे किसी भी तरह नरम नहीं पड़ना चाहिये। इस तरह दोनों सरकारों के बीच मेल-मिलाप का आखिरी मौका भी हाथ से निकल गया।

    लखनवी

    उन दिनों आगरा से मथुरा तक का मार्ग राजमार्ग कहलाता था जो हर समय मनुष्यों, घोड़ों और गौओं की चहल-पहल से भरा रहता था। आगरा से बारह मील की दूरी पर यह राजमार्ग रुनुकता गाँव से होकर गुजरता था। किसी समय यह रेणुका क्षेत्र कहलाता था जो अपभ्रंश होकर रुनुकता कहलाने लगा था। रुनुकता गाँव से लगभग डेढ़ मील दूर यमुनाजी के दक्षिणी तट पर गौघाट स्थित था जिसकी चहल-पहल देखते ही बनती थी। उन दिनों आगरा से मथुरा के बीच यमुनाजी में नौकाओं के माध्यम से भी काफी आवागमन होता था।

    रुनुकता क्षेत्र में बड़े-बड़े चारागाह थे जिनमें हजारों गौएं रहा करती थीं। ये गौएं नियमित रूप से जिस स्थान पर यमुनाजी का जल पीने के लिये आया करती थीं, उस स्थान का नाम गौघाट पड़ गया था। बड़ी-बड़ी नौकाओं में सवार पथिक गौओं के विशाल झुण्डों को देखने के लिये गौघाट पर घण्टों तक रुके रहते थे। इसी गौघाट पर कई संतों ने अपनी कुटियाएं बना ली थीं जिनका निर्वहन गौपालकों और चरवाहों द्वारा दी गयी दान दक्षिणा तथा इन गौओं के दूध पर हुआ करता था। ये संत संध्या काल में एकत्र होकर तानपूरों पर भजन गाया करते थे जिन्हें सुनने के लिये चरवाहों की भीड़ जुट जाती। श्रद्धालु और भजनों के रसिक लोग भी नौकाएं रुकवाकर इन सभाओं में आ बैठते थे। देर रात तक ये संगीत सभायें जुड़ी रहतीं।

    उस समय तक देश में मुस्लिम शासन हुए साढ़े तीन शताब्दियाँ हो चुकी थीं। हिन्दू प्रजा, मुस्लिम शासकों और उनके बर्बर सैनिकों के अत्याचार से त्रस्त एवं भयभीत रहती थी किंतु उनसे मुक्ति का कोई उपाय नहीं था। पराभव का काल जानकर हिन्दु प्रजा ईश्वर की शरणागति हो हरि भजन में ही अधिकांश समय व्यतीत करती थी।

    उन दिनों गौघाट पर पर एक वृद्ध संगीतज्ञ रहता था। वह प्रातः सूर्योदय से बहुत पहले उठकर भगवान कृष्ण के एक छोटे से देवालय के सामने बैठकर भगवान को जगाया करता था।

    एक दिन बैरामखाँ किसी कार्य से देर रात्रि में मथुरा से आगरा के लिये निकला। जिस समय वह गौघाट पहुँचा, उस समय भी सूर्योदय होने में काफी विलम्ब था। इसलिये उसने अपने घोड़े की गति कम कर ली। उसका विचार था कि यदि संभव हुआ तो वह गौघाट पर रुक कर कुछ देर विश्राम कर लेगा। निकट पहुँचने पर यमुनाजी के निर्मल तट पर बहने वाली सुवासित वायु के झौंकों ने उसके नासा रंध्रों में प्रवेश किया तो उसकी सारी थकावट जाती रही।

    अचानक बैरामखाँ को लगा कि वायु के इन झौंकों में घुली हुई कोई अदृश्य शक्ति उसे खींच रही है। वह घोड़े से उतर पड़ा और और अपने सेवकों को वहीं रुकने का संकेत करके अकेला ही चहल कदमी करने लगा। जब वह कुछ और आगे गया तो उसके कर्णरंध्रों में एक संगीत लहरी ने प्रवेश किया। बैरामखाँ संगीत लहरी के सम्मोहन में बंधा हुआ उसी दिशा में बढ़ने लगा जिस दिशा से वह संगीत लहरी आ रही थी।

    कुछ आगे जाने पर बैरामखाँ ने एक अद्भुत दृश्य देखा उसने देखा कि एक कुटी के समक्ष एक छोटा सा देवालय है जिसमें भगवान कृष्ण की श्यामवर्ण मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के सामने एक छोटा सा दिया जगमगा रहा है और एक कृशकाय वृद्ध मगन होकर तानपूरा बजा रहा है तथा साथ ही साथ भजन गा रहा है। वृद्ध के नेत्रों से आँसुओं की अनवरत धारा बह रही है। वृद्ध के कंधे पर एक जनेऊ पड़ा था और घुटनों पर एक फटी धोती लिपटी थी।

    उसने देखा कि वह वृद्ध कोई और नहीं हेमू का वही बूढ़ा बाप है जिस का वध स्वयं बैरामखाँ ने अपनी तलवार से किया था। जाने क्या माया है? बैरामखाँ को लगा उसका सिर फट जायेगा। क्या ऐसा भी संभव है? थोड़ी देर में जब बैरामखाँ की आँखें अंधेरे में और साफ देखने लगीं तो उसने देखा कि वह हेमू का बूढ़ा बाप नहीं कोई और वृद्ध है जिसके कण्ठ से निकली स्वर माधुरी ही उसे यहाँ तक खींच लाई है।

    सम्मोहित सा बैरामखाँ वहीं धरती पर बैठ गया। वृद्ध को पता तक न चल सका कि अंधेरे में कोई और परछाई भी आकर बैठ गयी है। सच पूछो तो स्वयं बैरामखाँ को भी पता न चला कि वह कब यहाँ तक चलकर आया और कब धरती पर बैठकर उस संगीत माधुरी में डुबकियाँ लगाने लगा।

    वृद्ध तल्लीन होकर गाता रहा। बैरामखाँ भी बेसुध होकर सुनता 
    रहा।

     वृद्ध अपने आराध्य से जागने की विनती कर रहा था-

    जागिये बृजराज कुंअर कमल कुसुम फूले।

    कुमुद बंद सकुचित भये भृंग लता फूले।

    तमचुर खग रौर सुनहु बोलत बनराईं

    राँभति गौ खरिकन में बछरा हित धाईं

    बिधु मलीन रबिप्रकास गावत नर-नारी।

    सूर स्याम प्रात उठौ अंबुज कर धारी।

    भजन का एक-एक शब्द बैरामखाँ की आत्मा में उतर गया। जाने कितना समय इसी तरह बीत गया। भजन पूरा करके जब वृद्ध गायक ने तानपूरा धरती पर रखा तो सूर्य देव धरती पर पर्याप्त आलोक फैला चुके थे। वृद्ध की दृष्टि बेसुध पड़े बैरामखाँ पर पड़ी।

    वृद्ध ने देखा कि कोई दाढ़ीवाला खान धरती पर पड़ा है और उसकी आँखों से आँसू बहे चले जा रहे हैं। उसकी पगड़ी खुलकर धूल में बिखर गयी है और तलवार कमर से निकलकर एक तरफ पड़ी है। संगीत लहरी के बंद हो जाने पर बैरामखाँ की तंद्रा भंग हुई। उसने देखा कि वृद्ध संगीतज्ञ चुपचाप खड़ा हुआ उसी को ताक रहा है।

    बैरामखाँ लजा कर उठ बैठा। क्या हो गया था उसे! बैरामखाँ को स्वयं अपनी स्थिति पर आश्चर्य हुआ। कब वह यहाँ तक चला आया था! कब वह धरती पर गिर गया था? क्यों वह रोने लगा था? कब क्या हुआ उसे कुछ पता नहीं चला था।

    बैरामखाँ उठ कर बैठ तो गया किंतु उसके शरीर में इतनी शक्ति भी शेष नहीं बची थी कि वह अपने घोड़े तक पहुंचसके। उसने संकेत करके वृद्ध से पानी मांगा। वृद्ध ने यमुनाजी में से पानी लाकर उस विचित्र और अजनबी खान को पिलाया। खान के कीमती वस्त्रों और वेशभूषा को देखकर वृद्ध ने अनुमान लगाया कि वह कोई उच्च अधिकार सम्पन्न अधिकारी है किंतु वृद्ध ने उससे कोई सवाल नहीं किया।

    - 'आप कौन हैं बाबा?' बहुत देर बाद बैरामखाँ ने ही मौन भंग किया।

    - 'मैं इस छोटे से मंदिर का बूढ़ा पुजारी रामदास हूँ।' आप कौन हैं?' (भक्तकुल शिरोमणि सूरदास इन्हीं रामदास के सातवें पुत्र थे।)

    - 'मैं पापी हूँ। मैंने बहुत पाप किये हैं।' जाने कैसे अनायास ही बैरामखाँ के मुँह से निकला और फिर से आँसू बह निकले।

    - 'भगवान शरणागत वत्सल हैं, सब पापों को क्षमा कर देते हैं, उन्हीं की शरण में जाओ भाई।'

    वृद्ध ने स्नेहसिक्त शब्दों से खान को ढाढ़स बंधाया।

    - 'क्या आप मुझे एक भजन और सुनायेंगे।' बैरामखाँ ने गिड़गिड़ा कर कहा।

    वृद्ध फिर से तानपूरा लेकर बैठ गया और बहुत देर तक गाता रहा। जब बैरामखाँ उठा तो उसका मन पूरी तरह हल्का था। वह बहुत अनुनय करके वृद्ध को अपने साथ आगरा ले गया और अगले दिन दरबार आयोजित करके सबके सामने वृद्ध का गायन करवाया। जाने क्या था उस वृद्ध के भजनों में कि भरे दरबार में बैरामखाँ रोने लगा।

    बैरामखाँ ने भीगी आँखों से एक लाख स्वर्ण मुद्रायें वृद्ध के हाथ में धर कर हाथ जोड़़ लिये। जब वृद्ध विदाई पाकर चलने लगा तो बैरामखाँ उसे छोड़ने के लिये आगरा के परकोटे तक आया। वृद्ध मुद्रायें लेकर चला गया।

    बहुत दिनों बाद जब बैरामखाँ एक बार फिर मथुरा से होकर निकला तो उसे वृद्ध संगीतज्ञ का स्मरण हो आया। वह बरबस उसी कुटिया तक जा पहुंचा। जब बैरामखाँ कुटिया तक पहुंचा तो उसने फिर से एक अद्भुत दृश्य देखा उसने देखा कि कुटिया के सामने वृद्ध संगीतज्ञ तानपूरा हाथ में लिये नाच रहा है और उसके नेत्रों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही है। सम्पूर्ण परिवेश में एक संगीत माधुरी घुली हुई है। वृद्ध को घेर कर बहुत से लोग बैठे हुए उस अद्भुत दृश्य का आनंद ले रहे हैं। अचानक बैरामखाँ चौंक पड़ा। वृद्ध तो नृत्य में तल्लीन है फिर तानपूरा कौन बजा रहा है?

    एक बार, दो बार, हजार बार बैरामखाँ ने आँखें फाड़-फाड़ कर देखा निश्चित रूप से तानपूरा वृद्ध नहीं बजा रहा था। आस पास बैठे व्यक्तियों में किसी के पास तानपूरा नहीं था। जाने क्या माया थी! बहुत देर तक यह अद्भुत दृश्य घटित होता रहा और बैरामखाँ ठगा हुआ सा चुपचाप खड़ा रहा। जब वृद्ध का नृत्य बंद हुआ तो सब के सब जैसे नींद से जागे।

    जब सब लोग चले गये तो बैरामखाँ ने पूछा- 'बाबा! जब आप नृत्यलीन थे तब तानपूरा कौन बजा रहा था?



    वृद्ध हँसा और उसने संकेत करके खान को बैठने के लिये कहा। मंत्रमुग्ध सा बैरामखाँ उसी रेती पर बैठ गया। बहुत देर तक
    दोनों चुप बैठे रहे। कोई कुछ नहीं बोला। अंत में वृद्ध ने तानपूरा उठाया और भजन गाने लगा। बैरामखाँ समझ गया कि यह भजन मुझे ही सुनाने के लिये गाया जा रहा है। कुछ ही देर में वृद्ध और बैरामखाँ दोनों की ही आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली।

    भजन समाप्त होने पर बैरामखाँ का ध्यान वृद्ध की देह पर गया। उसके आश्यर्च का पार न रहा। आज भी वृद्ध के कंधे पर जनेऊ के अतिरिक्त और कुछ न था और घुटनों पर वही फटी हुई धोती लिपटी थी।

    - 'बाबा! उन एक लाख मोहरों का क्या हुआ?' बैरामखाँ ने पूछा।

    - 'उन्हें जहाँ होना चाहिये था, वहीं भेज दीं हैं खान।'

    - 'उन्हें कहाँ होना चाहिये था?'

    - 'जिन्हें उनकी आवश्यकता थी, उन्हीं के पास।' वृद्ध ने मुस्कुरा कर संकेत किया।

    यह जानकर बैरामखाँ के आश्चर्य का पार नहीं रहा कि वृद्ध ने वे मोहरें भिखारियों में बांट दी थीं। अपने और अपने सातों बेटों के लिये एक भी नहीं रखी थी। उसी दिन बैरामखाँ को ज्ञात हुआ कि वह वृद्ध कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। एक जमाने में दिल्ली का बादशाह सलीमशाह भी उसके पास इसी तरह आया करता था जिस तरह बैरामखाँ आया करता है। सलीमशाह ने वृद्ध रामदास को अपने दरबार का कलावंत घोषित कर रखा था।

    बैरामखाँ को यह भी ज्ञात हुआ कि सलीमशाह ने भी एक बार एक लाख स्वर्ण मुद्रायें दी थीं जिन्हें बाबा रामदास ने उसी प्रकार भिखारियों में बांट दिया था जिस प्रकार से इस बार बांट दिया है। इसलिये सलीमशाह ने उसका नाम लखनवी रख दिया था। बैरामखाँ उस तपस्वी संगीतज्ञ को प्रणाम करके उठ आया। जाने क्यों उसके नेत्रों में बार-बार हेमू के बूढ़े बाप का निरपराध चेहरा घूम जाता था जो अस्सी साल की आयु में गर्दन कटवाने को तो तैयार था किंतु अपना धर्म त्यागने को नहीं। रह-रह कर उसे अपने ऊपर ग्लानि होती थी। किस धर्म के लिये उसने हेमू और उसके बूढ़े बाप की जान ले ली थी? क्या अंतर हो जाता यदि अकबर की जगह हेमू ही दिल्ली का बादशाह बना रहता? बैरामखाँ तो चाकर था, चाकर भी न रह सका। अपराधी घोषित कर दिया गया। यदि अकबर की जगह हेमू की चाकरी में रहता तो क्या बुरा हो जाता?


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  • चित्रकूट का चातक - 25

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 25

    अलविदा आगरा

    जब अपने सारे आदमियों को अकबर की सेवा में भेज देने के कई दिन बाद तक भी बैरामखाँ के पास दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया तो बैरामखाँ बेचैन हो उठा। उसके सारे विश्वसनीय अमीर पहिले ही दिल्ली जा चुके थे, इनमें से कुछ अपनी मर्जी से गये थे और कुछ को स्वयं बैरामखाँ ने यह सोचकर भेज दिया था कि एक न एक दिन ये भी धोखा देंगे ही। फिर क्यों न इन्हें स्वयं ही जाने के लिये कह दे। यदि ये मेरे हितैषी होंगे तो अकबर को मेरे पक्ष में करेंगे किंतु संभवतः उनमें से एक भी हितैषी न था जो लौटकर बैरामखाँ को दिल्ली की कुछ तो सूचना देता!

    अब संसार में ऐसा कोई नहीं था जो बैरामखाँ को सलाह दे सकता था। ऐसे में बैरामखाँ को वृद्ध रामदास की याद आयी। बैरामखाँ अकेला ही घोड़े पर सवार होकर आगरा के लिये रवाना हो गया।

    जिस समय बैरामखाँ गौघाट पहुँचा, उस समय तक सूर्यदेव आकाश के ठीक मध्य में आ विराजे थे और हजारों गायें यमुनाजी में पानी पीने के लिये तट पर आयी हुई थीं। उनके गलों में बंधे घुंघरुओं की रुनझुन से पूरा वातावरण गुंजायमान था। कुछ गायें तट पर खड़े वृक्षों के नीचे बैठी सुस्ता रही थीं। अचानक दाढ़ी वाले खान को देखते वे ही त्रस्त होकर भाग खड़ी हुईं।

    बैरामखाँ को रोना आ गया। धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो मनुष्य तो मनुष्य, पशु तक शक्ल देखकर बिदक जायें। उसकी मनःस्थिति इन दिनों ऐसी थी कि वह छोटी से छोटी बात को अनुभव करने लगा था।

    जिस समय बैरामखाँ कुटिया तक पहुँचा, उस समय बाबा रामदास कुटिया के बाहर करंज के घने पेड़ के नीचे बैठा अपने बेटों के साथ चावल खा रहा था। बालकों की माँ पत्तलों में पानी ला-लाकर पुत्रों को पिला रही थी। पिता पुत्रों में किसी बात को लेकर विनोद हो रहा था और पुत्रवती माता भी उनकी इस चुहल में सम्मिलित थी। इस आनंद विभोर परिवार को देखकर बैरामखाँ के पैर जमीन से चिपक गये।

    बैरामखाँ को अचानक खानुआ के मैदान का स्मरण हो आया। ऐसे ही निरीह लोगों के रहे होंगे वे नरमुण्ड भी जिनकी मीनारें बनाकर बाबर ने ठोकरों से लुढ़का दिया था! क्या अपराध था उन लोगों का? केवल इतना ही तो कि वे सब नंगे तन रहकर पेड़ों की छाया में बैठकर मुठ्ठी भर चावल खाने वाले लोग थे? वे तलवार चलाना नहीं जानते थे, सत्ता तथा सियासत से उनका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था! वे तानपूरा बजाकर पूरा जीवन निकाल देते थे!

    स्वयं बैरामखाँ भी तो जीवन भर यही करता आया है। बाबर, हुमायूँ और अकबर का राज जमाने के लिये कितने निरीह और निरपराध लोगों को उसने तलवार के घाट उतार दिया था! और आज......... आज वह उन सारे बादशाहों से दूर इस तानपूरे वाले बाबा के पास किस उम्मीद में चला आया था? अपनी दयनीय स्थिति पर बैरामखाँ वहीं रोने लगा। जाने क्या था इस डेढ़ पसली के भिखारी में, जो बैरामखाँ उसके सामने आते ही रोने लगता था?

    बैरामखाँ ने आनंद और विनोद में डूबे उस परिवार को दखल देना ठीक नहीं समझा और दूर से ही उल्टे पैरों लौट गया। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया था। अब सत्ता और सियासत से दूर रखेगा वह अपने आप को। खुदा की इबादत के लिये मक्का चला जायेगा।

    विद्रोह

    वापस आगरा न जाकर बैरामखाँ वहीं से अलवर के लिये रवाना हो गया ताकि वहाँ से अपने परिवार को लेकर मक्का के लिये प्रस्थान कर सके। जब उसके बचे-खुचे सेवकों को पता लगा कि बैरामखाँ अलवर चला गया है तो वे भी आगरा खाली करके उसके पीछे-पीछे अलवर चले आये। बैरामखाँ अलवर से अपना परिवार लेने के बाद सरहिंद की ओर गया जहाँ उसका गुप्त खजाना गढ़ा हुआ था।

    जब पंजाब में नियुक्त जागीरदारों और सूबेदारों को बैरामखाँ के आगरा खाली कर देने के समाचार मिले तो उन्होंने बादशाह की हुकूमत से विद्रोह कर दिया और वे खानखाना के पक्ष में एकत्र होने लगे। ये वे लोग थे जिनपर खानखाना की बहुत मेहरबानियाँ थीं और जो यह समझते थे कि हुकूमत का वास्तविक मालिक तो बैरामखाँ ही है, अकबर ने बादशाह बनते ही उसके साथ गद्दारी की है।

    जब बैरामखाँ के पंजाब की ओर जाने और पंजाब के अमीरों द्वारा विद्रोह करने के समाचार हरम सरकार को मिले तो हरम की सारी औरतों ने मिलकर अकबर को खूब भड़काया। हम तो पहले से ही कहते थे कि बैरामखाँ पूरा बदमाश और दगाबाज है। अकबर को भी हरम सरकार की बातें ठीक लगने लगीं। उसने बैरामखाँ को चिठ्ठी भिजवाई-

    ''बैरामखाँ को मालूम हो कि तू हमारे नेक घराने की मेहरबानियों का पाला हुआ है। चालीस साल की स्वामिभक्ति को भुलाकर विद्रोह करना ठीक नहीं है। तूने हमें बहुत कष्ट दिये हैं। फिर भी हम तुझे दण्ड नहीं देते। इससे तो अच्छा है कि तू लाहौर और सरहिंद में रखे अपने खजाने को हमारे पास भेज दे और खुद हज करने के लिये चला जा। जब तू हज से लौटकर आयेगा, तब तू जैसा कहेगा वैसा ही किया जायेगा क्योंकि अभी तो तेरे दुश्मनों ने मुझसे तेरी बुराइयां करके हमारा दिल तेरी ओर से फेर दिया है। बुरे लोगों के फेर में पड़कर तू अपनी प्रतिष्ठा तो खत्म कर ही चुका है, हम नहीं चाहते कि तू और अधिक कलंक अपने मुँह पर लगाये।''

    अकबर की ओर से ऐसी रूखी चिट्ठी पाकर बैरामखाँ का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। यह वही अकबर था जिसे बैरामखाँ तोपों के गोलों के बीच से जीवित निकाल लाया था! क्या यह वही तेरह साल का अनाथ बालक था जिसे बैरामखाँ ने दुश्मनों के हाथों से कत्ल होने से बचाया था! यह वही अकबर था जिसे बैरामखाँ ने मिट्टी के कच्चे चबूतरे से उठाकर दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया था! क्या यह वही अकबर था जिसके लिये बैरामखाँ ने सिकंदर सूर और हेमू जैसे प्रबल शत्रुओं को नेस्तनाबूद कर दिया था! क्या यह वही अकबर था जिसके लिये बैरामखाँ ने कामरान, हिंदाल और असकरी जैसे शहजादों को अंधा करके मक्का भेज दिया था! क्या आज वही अकबर बैरामखाँ को मक्का जाने के लिये कह रहा था! सत्ता का खेल किस खिलाड़ी को धूल नहीं चटा देता! बैरामखाँ तकदीर के इस तरह पलटने पर हैरान था!

    अकबर की ओर से पूरी तरह निराश होकर बैरामखाँ नागौर के रास्ते पंजाब को रवाना हुआ। अकबर को सूचना मिली तो उसने फिर पत्र लिखकर कहा कि मैं अब भी कहता हूँ कि हज को चला जा। हिन्दुस्तान में तेरे लिये जागीर मुकर्रर कर दी जायेगी जिसका हासिल तुझे पहुँचा दिया जाया करेगा।

    सियासत के नापाक दामन से अपना नाता तोड़ लेने कि लिये बैरामखाँ हज के लिये रवाना हो गया। अपनी योजनाओं को इस तरह सफल होते देखकर दुष्टा माहम अनगा ने अपने खूनी जाल का दायरा और फैलाया। उसने नासिरुलमुल्क को बैरामखाँ के पीछे भेजा। एक जमाने में नासिरुलमुल्क गरीब विद्यार्थी के रूप में बैरामखाँ के पास मदद मांगने के लिये आया था। बैरामखाँ की कृपा से ही वह मुल्ला से अमीर बना था। माहम अनगा ने नासिरुलमुल्क को यह जिम्मा सौंपा कि वह बैरामखाँ से समस्त राजकीय चिह्न छीनकर उसे हिन्दुस्तान से निकाल कर बाहर कर दे।

    जब बैरामखाँ की सेना ने सुना कि नासिरुलमुल्क के नेतृत्व में मुगल सेना आक्रमण के लिये आयी है तो बैरामखाँ के सैनिक दगा करके मुगलसेना में जा मिले। बैरामखाँ ने अपने हाथी, तुमन, तौग, निशान और नक्कारा आदि समस्त राजकीय चिह्न नासिरुलमुल्क को भिजवा दिये और स्वयं अपने निश्चय के अनुसार मक्का की ओर बढ़ता रहा।

    जब नासिरुलमुल्क ये सारे राजकीय चिह्न लेकर दिल्ली लौट आया तो भी माहम अनगा का दिल नहीं भरा। उसने पीर मुहम्मद को बैरामखाँ के पीछे भेजा। पीर मुहम्मद भी एक जमाने में बैरामखाँ के नमक पर पला था किंतु आज वह भी बैरामखाँ के खून का प्यासा होकर उसके पीछे लग गया। बैरामखाँ उस समय बीकानेर रियासत के राव कल्याणमल और कुंवर रायसिंह का मेहमान था। नासिरुलमुल्क के बाद पीर मोहम्मद को आया देखकर बैरामखाँ भड़क गया। उसके मन से सात्विक भाव जाते रहे और उसने मक्का जाने से पहले अकबर का दिमाग दुरुस्त करने का निश्चय किया।

    बैरामखाँ ने उत्तर दिशा में तैनात सूबेदारों को चिठ्ठियाँ लिखीं कि मैं तो दुनिया से उदास होकर मक्के को जा रहा था किंतु दुष्टा माहम अनगा बादशाह का मन मेरी ओर से फेर कर मुझे हर कदम पर अपमानित कर रही है। इसलिये अब मेरा विचार है कि मैं माहम अनगा और पीर मुहम्मद से निबट कर ही मक्का को जाऊंगा। इस प्रकार हरम सरकार की ज्यादतियों के चलते चालीस वर्षों का सबसे विश्वस्त और सबसे नमकख्वार नौकर बागी हो गया।

    बारूद में आग

    जब अकबर को ज्ञात हुआ कि बैरामखाँ बागी हो गया है तो उसे माहम अनगा की सारी बातें सही लगने लगीं। अब तक वह जो कुछ भी करता आया था, माहम अनगा के कहने पर ही करता आया था। इसी से उसके मन में हमेशा ग्लानि भाव बना रहता था किंतु जब उसने सुना कि बैरामखाँ ने मक्का जाने का इरादा त्यागकर पंजाब के अमीरों को चिट्ठयां भेजी हैं कि वह अपने शत्रुओं को सबक सिखायेगा तो अकबर ने बैरामखाँ को लम्बा पत्र भिजवाया।

    पत्र क्या था! पूरा का पूरा तोपखाना था। इस पत्र ने बारूद को आग दिखाने का काम किया। घृणा और वैमनस्य बढ़ाने का पूरा सामान उसमें मौजूद था। अकबर ने लिखा-

    ''खानखाना जाने कि तू इस बड़े घराने का पाला हुआ है। हमारे पिता ने तेरी सेवा और भक्ति देखकर तेरी पालना की और हमारी शिक्षा का बड़ा काम तुझे सौंपा। उनके पीछे (हुमायूँ के बाद) हमने तेरी (खानखाना की) पिछली बन्दगी का विचार करके सारे राजकाज तेरे भरोसे पर छोड़ दिये। तूने जो अच्छा बुरा करना चाहा वही किया। यहाँ तक कि इन पाँच वर्षों में कई कुकर्म ऐसे भी किये जिनसे सब लोगों को तुझसे घृणा हो गयी। तूने शेख गदाई को सारे मौलवियों और सैयदों के ऊपर कर दिया और उसको भी तसलीम (झुक कर सला

    म करना) करने की माफी दे दी। वह बड़े घमण्ड से घोड़े पर सवार होकर हमसे हाथ मिलाता था। जो अधम सेवक तेरे थे उनको तो तूने खान और सुलतान के खिताब देकर झण्डे, डंके और बड़ी उपज के देश दे दिये और मेरे बाप के अमीरों, खानों और सुलतानों को रोटी का भी मुहताज कर दिया। हमारे दादा के सेवकों को खाने को भी नहीं दिया। जो नौकर हमारी सवारियों और शिकारों में दौड़ते थे उनके प्राणों पर बनी हुई थी। अपने नौकरों को तो तू कुछ भी नहीं कहता था जो भांति-भांति के अपराध करते थे। हमारे नौकरों को मारने और उनके घर लूटने में तू कोई देर नहीं करता था।

    हुसैन कुली ने कभी मुर्गे तक से पंजा नहीं लड़ाया था किंतु तूने (बैरामखाँ ने) उसे सबसे अच्छी जागीरें दीं। फिर इन दिनों में तो तूने ऐसे-ऐसे अनाचार किये जिनसे हमको क्लेश ही क्लेश होता जाता था। और तो क्या जो थोड़े से लोग हमारे पास रह गये थे, हमको तू उनसे भी अलग करना चाहता था। इसलिये हम आगरे से दिल्ली चले आये और तुझे लिखा कि कुछ ऐसे पेच पड़ गये हैं कि तू हमसे मिल नहीं सकता। हम तुझसे इतना दुःख पाकर भी तुझको वैसा ही बैरामखाँ जानते हैं और तेरे चित्त की शांति के लिये शपथ करते हैं। तेरे धन और प्राण हरने का हमारा विचार कदापि नहीं है परन्तु हम राजकाज स्वयं ही किया चाहते हैं।

    इसके सिवा तेरा और जो मनोरथ हो अरजी में लिख भेज। जिस रीति से हम योग्य समझेंगे हुक्म देंगे। तू हमारे घर में पला है और हमारा हुक्म मानना तेरा धर्म है। तुझे आदेश दिया जाता है कि जो लोग तुझे हमारे विरुद्ध भड़काते हैं उन्हें पकड़ कर हमारे पास भेज दे। यदि तूने हमारी सलाह पर विचार नहीं किया तो हम स्वयं सेना सजा कर आयेंगे और तुझको नष्ट कर देंगे। हमारे उदय का समय है और तेरे नष्ट होने का। हम जीतेंगे और तू हारेगा। पछतावेगा और पकड़ा जावेगा। तुझे सलाह दी जाती है कि तू अपनी वास्तविक स्थिति पर विचार करे। जिन सेवकों को तू पाँच वर्ष तक पालता रहा और भाई-बेटा कहता रहा, वे सब बिना ही किसी कारण के तुझे छोड़कर हमारी सेवा में आ गये हैं। जो रह गये हैं वे भी जल्दी ही चले आयेंगे।''

    बैरामखाँ इस पत्र को पढ़कर और भी भड़क गया। उसने अपनी स्त्रियों, बालक अब्दुर्रहीम और सम्पत्ति को भटिण्डा दुर्ग में छोड़ा। भटिण्डा दुर्ग का जागीरदार शेर मुहम्मद दीवान बैरामखाँ का निज सेवक था। जैसे ही बैरामखाँ अपनी सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा। शेर मुहम्मद ने दगा करके बैरामखाँ की सम्पत्ति दबा ली तथा उसकी स्त्रियों और बच्चों को पकड़ कर अकबर के पास ले गया।

    अब तो पूरी तरह बारूद को आग दिखा दी गयी थी। अपनी मान-मर्यादा को इस तरह धूल में मिलते देखकर सत्ता का चतुर खिलाड़ी बैरामखाँ एक बार फिर से खून की होली खेलने को तैयार हो गया। इस बार उसका निशाना निरपराध लोगों की खोपड़ियाँ न होकर दुष्ट माहम अनगा की शैतान खोपड़ी थी जिसने बैरामखाँ की सरकार को च्युत करके हरम सरकार बनाकर हरामजादगी की सभी हदें पार कर ली थीं।

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  • चित्रकूट का चातक - 26

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 26

    विशाल अजगर

    जब अकबर ने सुना कि बैरामखाँ अपनी सेना लेकर जालंधर तक आ पहुँचा है तो भी वह शिकार खेलने में व्यस्त रहा और उसने कोई कार्यवाही नहीं की। अकबर की यह उदासीनता देखकर माहम अनगा ने अपने समस्त विश्वस्त अमीरों के नेतृत्व में विशाल सेना भेजकर बैरामखाँ पर आक्रमण करवाया। बैरामखाँ ने बादशाह की सेना को मारकर दूर तक भगा दिया। जब बैरामखाँ अकबर की सेना को खदेड़ कर लौट रहा था तो एक स्थान पर उसका हाथी दलदल में फंस गया। उसी समय माहम अनगा के आदमियों ने जो कि चुपचाप बैरामखाँ का पीछा कर रहे थे, बैरामखाँ पर आक्रमण कर दिया।

    बैरामखाँ का बड़ा भारी नुक्सान हुआ और उसे सवालक की पहाड़ियों में भाग जाना पड़ा। नादोन के हिन्दू नरेश गणेश ने उसे शरण दी और अकबर के विरुद्ध खम ठोककर खड़ा हो गया। इस पर माहम अनगा ने अकबर को खूब उल्टी-सीधी बातें समझाईं। अकबर को भी लगने लगा कि जब तक मैं बैरामखाँ को नहीं कुचल देता तब तक मैं चैन से दिल्ली में शासन नहीं कर सकता।

    इस बार सेना की कमान स्वयं अकबर ने संभाली। जिस मुगल सेना को बैरामखाँ ने अपने धन-बल और बुद्धि चातुर्य से खड़ा किया था वही मुगल सेना विशाल अजगर की तरह फूत्कार करती हुई बैरामखाँ को ही निगलने के लिये दिल्ली से निकल पड़ी।

    जब मनुष्य का समय विपरीत हो जाता है तब हितैषी, बंधु, मित्र और सेवक तक उसके शत्रु हो जाते हैं। राजा, योगी, अग्नि और जल की मित्रता तो वैसे भी अल्पकालिक ही होती है। फिर यहाँ तो मामला चंगेज खाँ और तैमूर लंगड़े के खूनी वारिस अकबर का था, जिसका अनुकूल होना, न होना कोई अंतर नहीं रखता था। जाने क्यों बैरामखाँ कभी भी यह समझ नहीं पाया था कि जिस अकबर को हिन्दुस्थान का बादशाह बनाने के लिये वह हिन्दुओं पर ना-ना तरह के अत्याचार कर रहा है और रक्त की नदियाँ बहाता हुआ चला जा रहा है, वही अकबर एक दिन अपने स्वार्थ के लिये बैरामखाँ के विरुद्ध सेना लेकर निकल पड़ने में किंचित् मात्र भी संकोच नहीं करेगा!

    अकबर को बैरामखाँ पर चढ़कर आया देखकर पहाड़ों के कई सारे शरणागत वत्सल हिन्दू नरेश, कृतघ्न अकबर का रास्ता रोकने के लिये आगे आये। पहाड़ों में घमासान मच गया। जिन हरित शृंगों से नीलाभ जल की निर्मल धारायें फूट-फूट कर वंसुधरा को धानी चूनर ओढ़ाया करती हैं, उन्हीं शृंगों से रक्त के झरने फूट पड़े। पहाड़ों की शांति घोड़ों की टापों, तलवारों की झंकारों और हाथियों के चीत्कारों से भंग हो गयी। मौत के मुँह में जाते निर्दोष सैनिकों की डकराहटों से पहाड़ों का कठोर हृदय भी पिघल कर रो पड़ा। मनुष्य के हृदय की कठोरता के आगे पहाड़ों की कठोरता भी फीकी पड़ गयी। कटे अंगों से रक्त बहाते हुए सैनिक एक हाथ से अपनी आंतों को पकड़े रहते और दूसरे हाथ से तलवार घुमाते रहते थे। उनके प्राण पंखेरू उड़ जाते थे किंतु मन से लड़ने की अभिलाषा नहीं जाती थी।

    हजारों हिन्दू सैनिकों का रक्त बह चुकने के बाद हिन्दू नरेश, अकबर की सेना के मुखिया सुलतान हुसैनखाँ जलायर का सिर काटने में सफल हो गये। हिन्दू नरेशों ने बड़े गाजे-बाजे और ढोल-ढमाकों के साथ जलायर का सिर बैरामखाँ को भेंट किया। बैरामखाँ उस सिर को देखते ही रो पड़ा और छाती पीटते हुए कहने लगा कि मेरे जीवन को धिक्कार है जिसके लिये काफिर की बजाय अल्लाह के बंदे का सिर काटा गया। बैरामखाँ ने उसी समय बादशाह को पत्र लिखा- 'बादशाह को मालूम होवे कि जलायरखा का कटा हुआ सिर देख कर माहम अनगा का सिर काटने की तमन्ना मेरे दिल से काफूर हो गयी है। अब मैं तुझसे और नहीं लड़ना चाहता। अतः मुनअमखाँ को भेज ताकि वह आकर मुझे यहाँ से ले जावे। मैं तुझे सलाम करके मक्का चला जाऊंगा।

    अकबर ने उसी समय मुनअमखाँ, ख्वाजाजहाँ, अशरफखाँ और हाजी मुहम्मदखाँ सीसतानी को सतलज और व्यास नदी के बीच बसे हुए हाजीपुर (इस स्थान का वास्तविक नाम उस समय कुछ और था जो अब ज्ञात नहीं है) में भेजा जहाँ बैरामखाँ शरण लिये हुए था। जब अकबर के अमीर उन सुरम्य घाटियों में पहुँचे तो उन्होंने हिन्दू नरेशों और जागीरदारों की भारी भीड़ देखी जो बैरामखाँ की रक्षा के लिये अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार मरने-मारने को तैयार खड़े थे।

    मुनअमखाँ उन निष्ठावान हिन्दू नरेशों को देखकर शोक से विलाप करने लगा। जब दूसरे अमीरों ने मुनअमखाँ के रोने का कारण पूछा तो मुनअमखाँ ने कहा- 'जिन लोगों को बैरामखाँ ने दूध पिला-पिलाकर पाला था, वे तो साँप के बच्चे निकले और बुरा वक्त आने पर बैरामखाँ को छोड़कर बादशाह के पास भाग आये किंतु जिन पहाड़ी नरेशों को बैरामखाँ ने तलवार के बल पर अपने अधीन किया था, उन्हें गुलाम बनाया और हर तरह से अपमानित किया था, वे बैरामखाँ का बुरा वक्त जानकर उसके लिये जान देने और मरने-मारने के लिये खड़े हो गये। दुनिया की ऐसी उल्टी रीति देखकर ही मैं रोता हूँ।'

    मुनअमखाँ का यह ताना सुनकर उसके साथ खड़े अमीरों की गर्दन शर्म से नीची हो गयी क्योंकि वे सब के सब नमक हराम थे और एक न एक दिन बैरामखाँ के टुकड़ों पर पले थे। उनमें से किसी ने बैरामखाँ की खैरख्वाही नहीं चाही थी और कभी भी बादशाह को सच्चाई बताने की कोशिश नहीं की थी।

    बैरामखाँ उस समय किले में था। हिन्दू सरदार, मुनअमखाँ को उसके पास ले गये। मुनअमखाँ को देखकर बैरामखाँ रोने लगा। एक दिन वह भी था जब बैरामखाँ खानखाना था और मुनअमखाँ उसका खास ताबेदार हुआ करता था लेकिन भाग्य के विधान से आज मुनअमखाँ खानखाना था और बैरामखाँ बादशाह का अपराधी। मुनअमखाँ ने बैरामखाँ को तसल्ली दी और किसी तरह किले से बाहर ले आया।

    जब बैरामखाँ हिन्दुओं का संरक्षण त्याग कर अकबर की शरण में जाने लगा तो बाबा जम्बूर और शाहकुलीखाँ महरम बैरामखाँ का पल्लू पकड़कर रोने लगे। बैरामखाँ ने उन दोनों हितैषियों से पूछा- 'मैं तो अपने स्वामी की शरण में जाता हूँ। तुम दोनों क्यों रोते हो? तो उन्होंने जवाब दिया- 'दगा है, मत जाओ।'

    - 'यदि मेरा शिष्य (बैरामखाँ अकबर का अतालीक अर्थात् शिक्षक रहा था। हुमायूँ भी बैरामखाँ को अतालीक कहा करता था) ही मुझसे दगा करे तो धरती पर मेरा जीवित रहना बेकार है। इसका मतलब यह होगा कि मैंने उसे सही तालीम नहीं दी।' बैरामखाँ ने उन दोनों को दिलासा दी।

    - 'लेकिन बादशाह इस समय अपनी बुद्धि के अधीन नहीं है, वह तो माहम अनगा के कहे अनुसार चलता है। उसने माहम अनगा का दूध पिया है।' बाबा जम्बूर ने चेतावनी दी।

    - 'बाबा! जो कुदरत ने मेरे भाग्य में दगा ही लिखी है तो दगा ही सही। तुम दोनों ने मेरा बहुत साथ निभाया है। एक अहसान अपने इस भागयहीन दोस्त पर और करना। यदि मैं मारा जाऊँ तो अब्दुल रहीम को हिन्दुस्थान से बाहर ले जाना और जैसे भी बन पड़े उसकी परवरिश करके उसे अपने पैरों पर खड़ा कर देना। जब वह समझदार हो जाये और दुनियादारी को समझने लगे तो उसे अपने बाप का आखिरी पैगाम कहना ...........।' गला भर आने से वह आगे नहीं बोल सका।

    - 'कहो खानखाना कहो! अपनी बात पूरी करो। क्या है आपका पैगाम?' बाबा जम्बूर ने जोर-जोर से बिलखते हुए पूछा।

    - 'रहीम से कहना कि कभी भी सियासत (राजनीति) को अपनी जिंदगी में जगह न देना। कहीं भी कुछ भी काम कर लेना, तानपूरा बजाकर भीख मांग लेना किंतु सियासत से दूर रहना। यहाँ चारों ओर दगा ही दगा है। न्याय नहीं है।'

    मुनअमखाँ ने खानखाना का कंधा थपथपाया। बैरामखाँ तब तक संतुलित हो चुका था। उसने झुककर अपने खैरख्वाह दोस्तों को अलविदा कहा और मुनअमखाँ के साथ चल दिया। हिन्दू सरदारों ने भीगी आँखों से बैरामखाँ को विदाई दी। हालांकि बादशाह से मिलने के लिये बैरामखाँ की उतावली देखकर उन्हें अच्छा नहीं लगा था।

    बादशाही लश्कर पहाड़ के नीचे जमा खड़ा था। ज्यों ही बैरामखाँ आता हुआ दिखायी दिया तो बड़ा कोलाहल मचा। मुगल सेना के विशाल अजगर ने वक्राकार होकर बैरामखाँ को चारों ओर से घेर लिया। अकबर के अमीरों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बैरामखाँ इतनी आसानी से उनके हत्थे चढ़ जायेगा। वे पूरी तरह चौकस थे। कभी भी कुछ भी हो सकता था। जिस बैरामखाँ ने हिन्दुस्थान का ताज एक बार नहीं दो-दो बार मुगलों के पैरों में डाल दिया था। उस बैरामखाँ की ताकत का क्या अन्दाजा? जाने वह कब क्या करे?

    कुछ लोग बैरामखाँ की जय बोल रहे थे तो कुछ लोग उस पर खुदा की मार पड़े कहकर गालियां दे रहे थे। बैरामखाँ गले में रूमाल बांधे हुए अकबर के डेरे में घुसा और अकबर के पैरों में गिर कर फूट-फूट कर रोने लगा।

    अकबर ने बैरामखाँ का सिर उठाकर छाती से लगा लिया। रूमाल गले से खोला। आँसू पौंछे और उसे अपने दाहिने हाथ को बैठाया। मुनअमखाँ उसके पास बैठा। अकबर ने ऐसी दया और ममता की बातें कीं जिनसे बैरामखाँ के मुख की मलिनता और मन की ग्लानि जाती रहीं। अकबर ने जो कपड़े पहिने हुए थे, उसी समय उतारकर बैरामखाँ को पहिनाये और उसे बहुत सारा धन दिया। बैरामखाँ का परिवार भी उसे वापिस लौटा दिया। मुनअमखाँ तथा अन्य अमीरों ने भी बैरामखाँ को बहुत सा धन भेंट में दिया। तुर्क लोग इस प्रकार की आर्थिक सहायता को चन्दूग कहते थे। आज हिन्दुस्थान भर में इस तरह की सहायता के लिये चंदा शब्द का प्रयोग होता है।

    अकबर की दरियादिली देखकर बैरामखाँ फिर से रोने लगा। अकबर ने कहा- 'इतने मायूस क्यों होते हैं खानबाबा! आप तो विद्या, भलाई, दान, धर्म और कर्म से युक्त नीति में निपुण, शूरवीर, कार्य कुशल और दृढ़ हृदय के स्वामी हैं। आपने तैमूर के घराने पर कई उपकार किये हैं। आपने तो ऐसे समय में भी धैर्य नहीं खोया था जब बादशाह हुजूर हूमायूँ का राज्य स्थिर नहीं हुआ था और पंजाब के अलावा सारा राज्य हाथ से जाता रहा था। आपने दिल्ली और आगरा जीत कर बादशाह हुजूर के कदमों में डाल दिये। आपने तो उस समय भी धैर्य नहीं खोया जब बादशाह हुजूर के इंतकाल के बाद पठान और अफगान बड़े जोश से दिल्ली की बादशाही का दावा करते थे, चगताई अमीर (चंगेजखां का एक बेटा जगताईखां था। चंगेज खां ने तैमूर के परदादा के बाप ''कराचार नोयां" को चगताईखां का अतालीक बनाया था। इसीसे ''कराचार नोयां'' के वंशज चगताई कहलाते थे। तैमूरी बादशाह भी चगताई कहलाते थे।) हिन्दुस्तान में रहना पसंद नहीं करते थे और मुझे काबुल लौट जाने की सलाह देते थे। बदखशां के स्वामी मिरजा सुलेमान ने काबुल में अमल कर लिया था तब भी आपने उद्योग करके अपना राज्य नहीं बनाया, मुझे फिर से राज्य दिलवाया। आपने बड़े हजरत बाबर और अब्बा हुजूर हूमायूँ की बड़ी सेवा की है। आप किसी भी तरह दिल छोटा करने लायक नहीं हैं। आप हमारे अतालीक हैं। आप इस तरह रोकर हमें तकलीफ नहीं पहुंचायें।'

    अकबर की बातों से बैरामखाँ को बड़ी तसल्ली पहुँची। उसने अकबर से पूछा- 'अब मेरे लिये क्या आज्ञा है शहंशाह?'

    - 'खानबाबा! अब हम बालिग हो गये हैं और सारा काम खुद ही किया चाहते हैं इसलिये आप मक्का चले जायें। यदि आप यहाँ रहेंगे तो बीच के लोग (मध्यस्थ) आपको हमारे विरुद्ध और हमें आपके विरुद्ध भड़काते रहेंगे जिसका परिणाम अच्छा न होगा।' अकबर ने जवाब दिया

    बैरामखाँ ने सिर झुका कर बादशाह की बात मान ली और उसी समय मक्का जाने के लिये तैयार हो गया। जब बैरामखाँ का परिवार बादशाही हरम के डेरे से निकल कर बाहर आया तो अकबर भी हज पर जाने वाले यात्रियों को विदा देने के लिये अपने डेरे से बाहर निकला। बैरामखाँ ने झुककर अकबर का हाथ चूमा और घोड़े पर सवार हो गया। बहुत ही उदास आँखों से अकबर ने हज पर जाने वाले इन यात्रियों को विदाई दी। उसने बार-बार दृष्टि घुमाकर देखा किंतु सलीमा बेगम दिखाई नहीं दी। जाने किस बुर्के में कैद कर लिया था उसने अपने आप को! बैरामखाँ के साथ अकबर ने अनजाने में एक तरह उसे भी हज पर जाने की आज्ञा दे दी थी जबकि वह कतई नहीं चाहता था कि सलीमा बेगम को किसी तरह का कोई कष्ट हो।


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  • चित्रकूट का चातक - 27

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 27

    नकाबपोश

    बहुत दूर से वे पाँचों नकाबपोश घोड़े फैंकते हुए चले आ रहे थे। बालू के टीले और कंटीले झुरमुट उनका रास्ता रोकते थे किंतु उनकी परवाह किये बिना वे सरपट घोडा़ दौड़ाये चले जा रहे थे। उनके घोड़े थक चुके थे और मुँह से श्वेत फेन बहने लगा था। हालांकि नकाब के कारण अश्वारोहियों के चेहरे दिखाई नहीं देते थे किंतु शरीर के हिलने से अनुमान होता था कि वे स्वयं भी घोड़ों पर बैठे हुए बुरी तरह हाँफ रहे थे। इतना होने पर भी वे अपने पीछे आ रहे शत्रुओं के भय से किसी भी तरह रुकने का नाम नहीं लेते थे। सूरज कंटीली झाड़ियों की ओट में छिपने की तैयारी कर रहा था और प्रकाश भी काफी कम हो चला था। नकाबपोशों को लगने लगा था कि कुछ ही क्षणों में वे घोड़ों से लुढ़क कर जमीन पर आ जायेंगे किंतु उनका नेतृत्व कर रहे नकाबपोश को प्रतीक्षा थी ऐसे झुरमुट की जिसकी ओट लेकर वे अपनी दिशा बदल लें और उनके पीछे आ रहा दुश्मन तेज गति से आगे निकल जाये।

    आखिर एक ऐसा झुरमुट आ ही गया। नकाबपोशों का नेता एक बड़ी सी झाड़ी की ओट में होकर कंटीले झुरमुट के भीतर घुस गया। अन्य नकाबपोशों ने भी उसका अनुसरण किया। बचते-बचते भी कांटेदार टहनियाँ उनके वस्त्रों को चीर कर अपनी तीक्ष्णता का बोध करवा ही गयीं। अश्वारोही अपनी तेज गति से चल रही सांसों पर नियंत्रण करने का प्रयास करने लगे। अन्ततः उनकी चाल सफल रही। कुछ ही क्षणों में बीसियों घोड़े सरपट भागते हुए आगे निकल गये। दुश्मन को अनुमान ही नहीं हो सका कि नकाबपोश झुरमुट की ओट में ही खड़े हैं।

    - 'ढूंढते रहेंगे अब वे हमें कई दिनों तक।' नकाबपोशों के नेता ने अपना नकाब हटाया और झुरमुट के बीचों बीच पसरे बालुई टीले पर कूद गया।

    अन्य नकाब पोशों ने भी अपने नकाब हटा लिये और जैसे-तैसे अपने घोड़ों से उतर पड़े। नकाब हटने से ही यह ज्ञात हो सका कि इनके चेहरे आपस में किसी भी तरह मेल नहीं खाते थे। इनमें से दो स्त्रियाँ थीं। एक स्त्री अभिजात्य एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली दिखाई देती थी तो दूसरी उसकी दासी। यह एक विचित्र बात थी कि अभिजात्य दिखायी देने वाली गौरवर्णा स्त्री पालकी, ऊंट अथवा हाथी पर सवारी न करके घोड़े की पीठ पर इतना लम्बा सफर तय कर रही थी।

    अभिजात्य दिखाई देने वाली एक स्त्री की पीठ से चार वर्ष का बालक बंधा हुआ था। माँ की पीठ से रगड़ खाकर उसका चेहरा छिल गया था फिर भी बालक अद्भुत धैर्यवान था और पूरी तरह शांत बना हुआ था। दासी दिखायी देने वाली स्त्री की पीठ से एक छोटी सी गठरी बंधी हुई थी जिसमें दैनिक जीवन यापन का कुछ मामूली सा सामान था जो इस समय बहुमूल्य जान पड़ता था। तीन पुरुष चेहरों में से दो फकीरों जैसे दिखायी देते थे और एक चेहरा गुलाम दिखायी देने वाले व्यक्ति का था।

    - 'क्या आज रात यहीं रुकने का इरादा है बाबा?' अभिजात्य दिखायी देने वाली गौरवर्णा स्त्री ने अपने नेता की ओर मुँह करके पूछा।

    - 'नहीं! यहाँ नहीं बानो। आज की रात हम जाल्हुर (जालौर) मस्जिद में पड़ाव करेंगे। तुम थोड़ा सा सुस्ता लो, तब तक घोड़े भी तैयार हो जायेंगे और वे अफगान लुटेरे भी दूर निकल जायेंगे।' अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए वृद्ध फकीर ने जवाब दिया।

    - 'जाल्हुर? क्या जाल्हुर पास ही है? क्या हम एक ही दिन में पालनपुर से जाल्हुर तक आ पहुँचे?'

    - 'हाँ बानू। वो जो पहाड़ियाँ दिखायी देती हैं, उनके बीच में जाल्हुर बसा हुआ है। हम घंटे भर में वहाँ पहुँच सकते हैं। तब तक पूरी तरह रात हो चुकी होगी और हम आसानी से मस्जिद में आसरा ले सकेंगे।'

    क्षुद्र कंटीली झाड़ियों ने अवसर पाते ही दुष्टता की और अंधेरे का जाल इतनी जोर से आकाश में फैंक कर मारा कि दिन भर की यात्रा से थककर चूर हुआ सूरज उस जाल में उलझ कर रह गया। झाड़ियों को इस दुष्टता की सजा़ मिली और वे स्वयं भी अब शैतानी अंधेरे में डूबने लगीं। पाँचों अश्वारोही फिर से घोड़ों पर सवार होकर दूर दिखायी देने वाली पहाड़ियों की ओर बढ़ गये।

    यह उनकी यात्रा का अंत न था, मध्य भी न था। पाटन से चलकर अहमदाबाद और पालनपुर होते हुए वे अभी तो केवल जाल्हुर के निकट पहुँचे थे, यहाँ से अजमेर और फिर अलवर होते हुए उन्हें आगरा पहुँचना था। कौन जाने वहाँ पहुँचना हो भी अथवा नहीं! वे तो यह भी नहीं जानते कि आगरा पहुँच कर भी उनकी यात्रा पूरी होगी अथवा नहीं! इस समय तो वे केवल इतनी बात जानते हैं कि उन्हें हर हालत में उस विकट शत्रु से अपने आप को बचाकर आगरा तक ले जाना है जो पाटन से ही उनके पीछे लगा हुआ है और अवसर पाते ही उनके प्राण हर सकता है। उन्हें अपने जीवन की चिंता उतनी न थी जितनी कि बानू की पीठ पर बंधे हुए चार वर्षीय रहीम के जीवन के बारे में थी।

    बुरी खबर

    - 'रहीम कौन ?' तरुण बादशाह ने अत्यन्त ही अन्यमनस्कता से पूछा। असमय का व्यवधान उसे अच्छा नहीं लगा। जाने किस बदजा़त ने इस कमअक़्ल गुलाम को यहाँ ला तैनात किया है! चैन से बैठने ही नहीं देता। किसी न किसी बहाने से थोड़ी-थोड़ी देर में आ धमकता है, जल्लाद कहीं का। पिछले कई दिनों से अकबर की अन्यमनस्कता हताशा की सीमा तक उसे बोझिल बनाये हुए है अन्यथा अन्यमनस्कता उसके स्वभाव में नहीं है। उसे यह बार-बार का व्यवधान किंचित् भी नहीं सुहा रहा।

    - 'बैरामखाँ का फरजंद अब्दुर्रहीम, जिल्ले इलाही।' तातार गुलाम ने भय से काँपते हुए निवेदन किया।

    - 'कौन बैरामखाँ ?' बादशाह खीझ उठा।

    - 'खानखाना बैरामखाँ हुजूर। उनका बेटा रहीम।'

    - 'खानखाना बैरामखाँ का बेटा रहीम! क्या वह खानखाना के साथ हज करने नहीं गया था?' क्रोध के कारण बादशाह के शब्द काफी तीखे हो आये थे। गुलाम में साहस नहीं था कि वह तरुण बादशाह के इस प्रश्न का उत्तर दे सके।

    - 'अच्छा जा। काँपना बंद कर और उसे ले आ, यहीं।

    तातार गुलाम के प्राण फिर से लौटकर शरीर में आ गये और वह भागता हुआ कक्ष से बाहर हो गया। पसीने की एक लकीर गर्दन से आरंभ होकर ऐढ़ी तक जा पहुँची थी। कितना तो मना किया था कमबख़्त को! किंतु मेरी कोई माने तब न! इधर बादशाह और उधर बैरामखाँ का बेटा। आने की सूचना दो तो मुसीबत और न दो तो मुसीबत। जाने किस बात पर कब सर क़लम हो जाये! खुदा बचाये ऐसी नौकरी से। अपनी उखड़ी हुई सांसों और हिलती हुई दाढ़ी पर काबू पाते हुए उसने अब्दुर्रहीम को अंदर जाने का संकेत किया।

    कमरे का पर्दा हटाकर जब अब्दुर्रहीम ने अपनी छोटी-छोटी कोहनियों से बादशाह को कोर्निश बजाई तो सन्न रह गया बादशाह। अल्लाह! चालीस वर्ष के जिस प्रौढ़ बैरामखाँ को बादशाह ने अपने सामने हज के लिये रवाना किया था वह तो पाँच वर्ष का बालक बन कर फिर से लौट आया था! कुदरत भी कई बार कैसे करिश्मे दिखाती है! संभवतः यह उसी का परिणाम था कि प्रौढ़ हो चुका बैरामखाँ पाँच वर्ष का बालक बनकर फिर से उसके सामने खड़ा था। बादशाह के मन में पसरी क्षण भर पहले की अन्यमनस्कता विलुप्त हो गयी।

    - 'खानबाबा!' बादशाह के मुँह से बरबस निकल गया।

    - 'मैं खानखाना बैरामखाँ का फरजंद अब्दुर्रहीम हूँ जहाँपनाह। अपनी निर्दोष और मासूम आँखों पर नन्ही पलकें झपकाते हुए उसने उत्तर दिया।

    - 'खानखाना कहाँ हैं ?' अकबर के मन से क्रोध और घृणा का हलाहल जाने कहाँ लुप्त हो गया जो अभी कुछ क्षण पूर्व बैरामखाँ का नाम सुनते ही उसके होठों से छलक पड़ा था।

    - 'इस दुनिया से भी जो ऊपर दुनिया है, अब्बा हुजूर उस दुनिया के बादशाह की खिदमत में चले गये हैं।' अब्दुर्रहीम ने परिश्रम से याद किया हुआ वाक्य बादशाह के सामने दुहरा दिया।

    - 'क्या कहते हो? कब?? कैसे???' हैरत में पड़ गया बादशाह। कितनी कच्ची उम्र और कितनी सख्त बात! क्या इस बालक को यह पता भी है कि वह जो कह रहा है, उसका अर्थ क्या है? लेकिन यह हो कैसे सकता है! मुझे तो यह समाचार किसी ने दिया ही नहीं।

    - 'अब्बा हुजूर को गये हुए तो चार महीने बीत गये जहाँपनाह।'

    - 'मग़र ये सब हुआ कैसे ?'

    - 'अफगान मुबारक लोहानी ने उन्हें अपने छुरे से हलाक कर दिया।'

    - 'खानाखाना को हलाक कर दिया! क्या इस धरती पर ऐसा कोई आदमी जन्मा था जो खानखाना की तरफ आँख उठाकर भी देख सकता था? खु़दा गवाह है कि लोहा बैरामखाँ को काट नहीं सकता था और आग जला नहीं सकती थी लेकिन तुम कह रहे हो कि उसे एक कमजा़त अफगान ने हलाक कर दिया? उसे देखकर तोपें दहाड़ना छोड़कर बकरियों की तरह मिमियाने लगती थीं। उसके सामने आकर बड़ी से बड़ी तलवार कागज का पुर्जा साबित होती थी और तुम कहते हो कि उस बैरामखाँ को एक छुरे से ज़िबह कर दिया?'

    आवेश से क्षण भर को तरुण बादशाह का चेहरा लाल हुआ किंतु शीघ्र ही वह इतना सफेद हो गया, जैसे किसी ने शरीर में से रक्त निचोड़ लिया हो। वह आगे कुछ भी नहीं बोल सका। पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम देर तक बादशाह के खुरदेरे चेहरे को ताकता रहा। पिछले चार महीनों के अनुभव ने रहीम को पाँच वर्ष के बालक से एक परिपक्व आदमी बना दिया था। उसके सिर पर पिता का साया न रहा था और वह जान चुका था कि अब दुनिया में उसे अपने बलबूते पर गुजारा करना है। यही कारण था कि वह बालक होने पर भी इतना संतुलित था और निर्विकार भाव से तरुण बादशाह के सामने खड़ा उसके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।

    बहुत देर तक अकबर के मुँह से कुछ नहीं निकला। बैरामखाँ की मौत की सूचना ने उसके समूचे अस्तित्व को झिंझोड़ कर रख दिया था। इस सूचना की चोट बादशाह के भीतर बैठे अनाथ अकबर तक जा पहुँची थी। उस अकबर तक जो बादशाह न था, अनाथ बालक था। जो जहाँपनाह न था, दर-दर का भिखारी था। जो नूरानी चेहरे का रूआबदार तरुण न था, कमज़ोर कलेजे का पितृहीन पुत्र था। जो अपने अमीरों के सामने तनकर नहीं खड़ा था, बैरामखाँ की छाती पर सिर रखकर रो रहा था।

    अकबर अन्तर्मन के जिस दड़बे में छिपकर रहता था, उस दड़बे की छत इस सूचना की आंधी ने एक ही झटके में उड़ा दी थी। अकबर ने इस दड़बे में स्मृतियों के जाने कितने क्षण कबूतरों की तरह पाल रखे थे। मन की मुण्डेर पर बैठे ये कबूतर हर क्षण गुटरगू़ँ करते रहते थे। वे सब के सब आज अचानक ही फड़फड़ा कर चीत्कार करने लगे। क्रूर समय बाज की तरह झपट्टा मार कर स्मृतियों के इन निर्दोष कबूतरों को लहू-लुहान कर गया था।

    अकबर ने सीने की ज्वाला को गरम साँस में ढालकर बाहर की ओर धकेलते हुए देखा- पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम अब भी चुपचाप उसी की ओर देखे जा रहा था। अकबर ने झपट कर रहीम को अपने सीने से लगा लिया।

    - 'क्या हुआ अब्दुर्रहीम, जो खानबाबा नहीं रहे! हम तो हैं! आज से हम तुम्हारे अब्बा हुजूर हैं और आप हमारे अतालीक (शिक्षक) हैं। समझ रहे हैं आप, हम क्या कह रहे हैं?'

    पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम बादशाह के शब्दों का सही-सही अर्थ तो अनुमानित नहीं कर सका किंतु इतना वह अवश्य जान गया था कि जिस काम के लिये माता ने उसे बादशाह की सेवा में भेजा था, वह काम हो गया है। कुछ क्षण बादशाह उसे अंक में कसे रहा। बालक ने भी अपने आप को वहाँ से हटाने या छूटने का प्रयास नहीं किया।

    - 'तुम्हारे साथ और कौन आया है ?'

    - 'मेरे साथ बाबा जम्बूर और काका मुहम्मद अमीन भी आये हैं, वे बाहर खड़े हैं।'

    - 'और तुम्हारी माँ मेवाती बेगम तथा तुम्हारी छोटी माँ सलीमा बेगम! वे दोनों कहाँ हैं?' अकबर ने बुरी खबर की आशंका से बेचैन होकर पूछा।

    - 'वे आगरे में एक रिश्तेदार के यहाँ ठहरी हुई हैं। उन्होंने ही बाबा जम्बूर और काका मुहम्मद अमीन के साथ हमें आपकी हाजिरी में भेजा है।'

    - 'बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन कौन हैं?'

    - 'ये दोनों पहुँचे हुए फकीर हैं और अब्बा हुजूर के नेकदिल दोस्त भी। उन्होंने ही दुश्मनों से मेरी और अम्मी जान की जान बचाई थी।'

    - 'अरे कोई है?' बादशाह ने बालक को अपनी बाहों से मुक्त करते हुए द्वार की ओर ताक कर कहा। क्षण भर में ही तातार गुलाम प्रकट हो गया।

    - 'बाहर दो फकीर खड़े हैं, उन्हें हाज़िर कर।' अकबर ने आदेश दिया। आदेश पाकर गुलाम हाँफता हुआ सा बाहर निकल गया।


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