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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-102

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-102

    सरदार पटेल ने भरतपुर महाराजा के भाग्य की रक्षा की


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    रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से बड़ा खिन्न था। इसलिये रियासती विभाग ने भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध एक आरोप सूची तैयार की तथा राजा पर ये आरोप लगाये गये-

    (1.) भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया तथा उसने खुले तौर पर भारतीय नेताओं को भारत विभाजन के लिये उत्तरदायी बताया।

    (2.) महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था।

    (3.) भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन को सुरक्षा प्रदान करने के लिये महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये।

    (4.) महाराजा की सेना में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं रह गयी थी।

    (5.) महाराजा ने राज्य में जाटवाद को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं रखी थी।

    (6.) भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया तथा जाटों एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे जा रहे थे।

    (7.) महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था।

    (8.) पं. नेहरू ने भी अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

    भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किये गये आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिये कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किये जा चुके थे। इसलिये भरतपुर महाराजा अत्यंत दबाव में थे। उन्होंने अत्यंत अनिच्छा से सम्मति प्रदान की। 14 फरवरी 1948 को रियासती विभाग द्वारा एस. एन. सप्रू को भरतपुर राज्य का प्रशासक नियुक्त किया गया। कर्नल ढिल्लों को राज्य की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

    महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की। अलवर तथा भरतपुर राज्यों से सटे धौलपुर और करौली राज्यों के राजाओं को भी 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाया गया और सलाह दी गयी कि अलवर और भरतपुर राज्य के साथ संघ में शामिल हो जायें। चारों राजाओं ने इस प्रस्ताव को मान लिया तथा 28 फरवरी 1948 को एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये।

    के. एम. मुंशी की सलाह पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया। चूंकि महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर के विरुद्ध जांच चल रही थी इसलिये धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख तथा करौली महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया।

    18 मार्च 1948 को इसका विधिवत् उद्घाटन किया गया। मत्स्य संघ बन जाने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने के लिये बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया।

    इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिये नियुक्त किया गया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गये अपितु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। भारत सरकार ने इन सबको दोषमुक्त घोषित कर दिया तथा इनके विरुद्ध किसी तरह की कानूनी कार्यवाही नहीं की।

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  • राजा लोग आदेश देने के लिये बने थे, आदेश लेने के लिये नहीं!

     02.06.2020
    राजा लोग आदेश देने के लिये बने थे, आदेश लेने के लिये नहीं!

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    माइकल ब्रीचर ने लिखा है कि भारत सरकार अधिनियम 1935 में प्रावधान किया गया था कि ब्रिटिश भारत और स्वेच्छा से शामिल होने वाली देशी रियासतों के ढुलमुल अखिल भारतीय संघ में पूर्ण उत्तरदायित्व युक्त सरकार का निर्माण हो। संघीय विधान में रियासतों को अत्यंत महत्व दिया गया था। इससे बड़ी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गयी। एक ओर तो राजा लोग अपनी सम्प्रभुता तथा ब्रिटिश ताज के साथ हुई संधियों को अलंघनीय बताकर, अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखे बिना, संघ में सम्मिलित होने को तैयार नहीं थे तथा दूसरी ओर उनके संघ में सम्मिलित होने से उन्हें संघ के माध्यम से ब्रिटिश भारत के शासन में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलने वाला था।

    जवाहरलाल नेहरू, नरेन्द्र देव और के. टी. शाह ने लिखा है- ब्रिटिश सरकार द्वारा रियासतों को ब्रिटिश प्रांतों के साथ संघ के अंतर्गत लाने की इच्छा का मंतव्य निरंकुश एवं सामंतवादी तत्वों के माध्यम से भारत का और भी अधिक शोषण करना था। यह एक विडम्बना ही है कि भले ही अंग्रेज सरकार ने राजाओं को अत्यधिक महत्व दिया हो किंतु राजा लोग इन प्रावधानों से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने इसमें अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया। राजा लोग केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु ही संघ के निर्माण की बात करते रहे थे किंतु वे अपने अधिकारों में लेश मात्र की भी कमी करने को तैयार नहीं हुए।

    राजाओं को अधिनियम में किये गये कई प्रावधानों पर आपत्ति थी जिनके कारण वे संघ में शामिल होने से हिचकिचाने लगे। एक बार संघ में आ जाने के बाद वे संघ को छोड़ नहीं सकते थे। यदि किसी रियासत का शासक सम्मिलन पत्र प्रस्तुत करता है तथा महामना सम्राट उसके संघ में सम्मिलन को स्वीकार कर लेते हैं तो संघ का बंधन राजाओं तथा उनके उत्तराधिकारियों पर भी सदा-सदा के लिये लागू हो जायेगा। राजाओं को यह आशंका भी थी कि यदि वे अपनी प्रभुसत्ता संघ को समर्पित करेंगे तो उनके राज्यों की प्रजा के ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की प्रजा और उनके नेताओं के संपर्क में आने से राज्यों में भी ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की भांति राजनीतिक प्रदूषण फैल जायेगा।

    पटियाला के महाराजा भूपिन्दर सिंह ने संघ योजना के विरोध का नेतृत्व किया। 25 फरवरी 1935 को नरेन्द्र मण्डल की बैठक में बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने भी महाराजा पटियाला तथा नवाब भोपाल के साथ संघीय योजना में छिद्र ढूंढने का काम किया। बहुत से राजाओं ने राजनीतिक विभाग के साथ मोलभाव करने और भविष्य में संघ में प्रवेश करने के बदले में भारी भरकम मांगे रखने का काम आरंभ कर दिया।

    राजाओं का मानना था कि वे अपने राज्यों के सम्प्रभु शासक हैं। राजाओं के अनुसार सम्प्रभुता का अर्थ यह था कि राजा लोग सभी को आदेश दे सकें तथा किसी से आदेश न लें। इस कारण संघ योजना राजाओं के लिये गले की हड्डी बन गयी। राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल के माध्यम से भारत सरकार अधिनियम 1935 में जोड़े जाने हेतु सुरक्षात्मक उपायों की एक सूची प्रस्तुत की जिसमें कहा गया था कि राज्य की स्वायत्तता एवं सम्प्रभुता का पूर्णतः सम्मान किया जाना चाहिये तथा संघ द्वारा राज्य के आंतरिक मामलों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिये। किसी भी संघीय इकाई द्वारा दूसरी इकाई के साथ अमैत्रीपूर्ण व्यवहार नहीं किया जाना चाहिये। संघ को केवल उन्हीं विषयों पर सीमित रहना चाहिये जिन पर कि राज्य तथा संघ के बीच आपसी सहमति हुई है।

    वायसराय को यह अधिकार होना चाहिये कि वे राज्यों के हितों पर विपरीत प्रभाव डालने वाले कानूनों को निरस्त कर सकें। एक सम्मिलन पत्र वायसराय के नाम भी होना चाहिये जिसमें लिखा हो कि सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में वायसराय यह सुनिश्चित करने के लिये जिम्मेदार होंगे कि राज्यों को जिन अधिकारों की गारण्टी दी गयी है, उनका सम्मान किया जायेगा। भारत ब्रिटिश साम्राज्य का एकीकृत भाग बना रहेगा। देशी राज्यों के न्यायालयों के ऊपर संघीय न्यायालय का कार्यक्षेत्र तभी लागू होगा जब राज्यों के न्यायालयों के समक्ष संविधान से बाहर के प्रश्न उत्पन्न हों। संघीय न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध इंगलैण्ड की प्रिवी कौंसिल में अपील हो सकेगी। मौलिक अधिकारों को संघीय संविधान में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिये तथा इसे संघीय विषय नहीं माना जाना चाहिये। यह केवल महामना सम्राट के विशेषाधिकारों में सम्मिलित होना चाहिये तथा केवल ब्रिटिश भारत की जनता के मामले में लागू होना चाहिये। यदि कोई राज्य सम्मिलन पत्र की शर्तों के अनुसार कर्तव्यों का पालन नहीं करे तो उस पर वायसराय द्वारा कार्यवाही की जानी चाहिये।

    संघीय संविधान, राज्य पर किसी तरह का कर या शुल्क नहीं लगायेगा और न ही किसी तरह के भुगतान या अंशदान के लिये कहेगा जिनसे राज्य के साथ भेदभाव होता हो। महामना सम्राट के नाम पर अथवा संघीय उद्देश्यों के लिये अथवा फेडरल रेलवे प्राधिकरण के लिये अथवा अन्य किसी प्राधिकरण के लिये, राज्य के शासक की अनुमति अथवा परस्पर सहमति के बिना राज्य के भीतर कोई भी भूमि या सम्पत्ति अधिग्रहीत नहीं की जायेगी। संघीय एजेण्ट्स, अधिकारी और प्रतिनिधि जब राज्य में अपने कार्य में संलग्न होंगे तब वे राज्य के कानून एवं नियमों से आबद्ध होंगे, अपने संघीय दायित्वों के प्रति अड़ियल रुख नहीं अपनायेंगे।

    संघ को देशी राज्य में बलपूर्वक सैनिक भर्ती करने का अधिकार नहीं होगा और न ही राज्य में किसी अन्य अनिवार्य सैनिक सेवा को आरंभ करने का अधिकार होगा। राज्य में जनगणना की अब तक प्रचलित पद्धति को बनाये रखा जायेगा तथा राज्य में अब तक प्रचलित शासन पद्धति में बदलाव नहीं किया जायेगा। यदि राज्य न चाहे तो संघ को राज्य के भीतर रेलवे के निर्माण का अधिकार नहीं होगा। केवल राज्य की सहमति से ही राज्य की सीमाओं के भीतर रेलवे का निर्माण किया जायेगा। यह सुनिश्चित किया जायेगा कि संघ को प्राप्त वित्त एवं न्यायिक अधिकारों से राज्य के हितों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। राजाओं को इस बात पर अत्यधिक चिंता थी कि संघ में सम्मिलित होने से वे ब्रिटिश भारत की सामान्य जनता के समकक्ष स्थिति को प्राप्त हो जायेंगे।

    बिल के अनुभाग 6 में प्रावधान किया गया था कि इस अधिनियम को शासकों द्वारा अपने लिये तथा अपनी प्रजा के लिये स्वीकार करना होगा। सम्मिलन पत्र के माध्यम से जो विषय संघ को स्थानांतरित कर दिये जाएंगे, उन विषयों पर संघ को कानून बनाने का पूरा अधिकार होगा जो कि राजा और प्रजा दोनों के लिये बराबर होगा। राजाओं को संघ में किये गये इस प्रावधान पर भी आपत्ति थी कि एक बार संघ में प्रवेश कर लेने के बाद संघ तथा देशी राज्य के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों की स्थिति में संघीय न्यायालय को ही सम्मिलन पत्र की शर्तों की व्याख्या करने का अधिकार होगा तथा विवाद की स्थिति में भारत सरकार के पोलिटिकल डिपार्टमेंट की कोई भूमिका नहीं होगी इस स्थिति में देशी राज्य ब्रिटिश प्रांतों की सामान्य प्रजा के समकक्ष आ जायेंगे। राजाओं का यह आरोप भी था कि परमोच्च सत्ता के साथ हुई संधियों का स्थान इन सम्मिलन पत्रों द्वारा ले लिया जायेगा। संधियां अप्रभावी हो जायेंगी एवं राजाओं की सम्प्रभुता नष्ट हो जायेगी।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 8

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 8

    ए. ओ. ह्यूम और कांग्रेस की स्थापना


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    भारत का शासन वायसराय की काउंसिल द्वारा लगभग पूर्णतः निरंकुश रूप से चलाया जाता था। ई.1858 में ब्रिटिश क्राउन द्वारा भारत की सत्ता ग्रहण करने के बाद ब्रिटिश सांसदों द्वारा भारत में संवैधानिक व्यवस्था लागू करने की मांग होने लगी। इसलिए ई.1861 में ब्रिटिश संसद ने इल्बर्ट बिल के माध्यम से भारत में अनेक विधिक सुधार किए। इसके बाद पूरे भारत में एक ऐसी संस्था की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी जो देश की समस्याओं को एक साझा मंच दे सके और ब्रिटिश शासन इस संस्था से बात करके इन समस्याओं का समाधान कर सके ताकि जनता में बढ़ते हुए असंतोष को रोका जा सके।

    उन्हीं दिनों भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारी सर एलन ओक्टावियन ह्यूम ने कुछ गुप्त सरकारी रिपोर्टें देखीं जिनसे उसे आभास हुआ कि भारतवासियों का बढ़ता हुआ असन्तोष किसी भी समय राष्ट्रीय विद्रोह का रूप धारण कर सकता है जिसका स्वरूप 1857 के विद्रोह से भी अधिक भयानक हो सकता है। अतः ए. ओ. ह्यूम ने सरकार के सहयोग से एक ऐसी राजनीतिक संस्था स्थापित करने की योजना बनाई जो सरकार के समक्ष भारत की राजनीतिक समस्याओं को प्रस्तुत कर सके तथा सरकार उससे विचार विमर्श करके जनता की समस्याओं को सुलझा सके। इस प्रकार जनता में पनप रहे असंतोष को ठण्डा किया जा सके।

    ए. ओ. ह्यूम का जन्म 6 जून 1829 को इंग्लैण्ड में हुआ था। उसका पिता ब्रिटिश सांसद था। ह्यूम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हेलबरी कॉलेज में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी तथा यूनिवर्सिटी कॉलेज हॉस्पीटल से चिकित्सा विज्ञान की उपाधि प्राप्त करने के बाद ई.1849 से वह भारत में काम कर रहा था। ई.1857 की क्रांति के समय वह इटावा का कलक्टर था किंतु कलक्टर होते हुए भी उसे इटावा से भागकर 6 माह के लिये आगरा के किले में शरण लेनी पड़ी थी। उसके बाद वह विभिन्न पदों पर काम करता हुआ ई.1870 में भारत सरकार में सचिव बन गया तथा ई.1879 में सेवानिवृत्त होकर जनसेवा में जुट गया।

    ई.1885 में ह्यूम और उसके मित्रों ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन को एक राजनीतिक संस्था गठिन करने के विषय में सुझाव दिया। लॉर्ड डफरिन ने इस सुझाव पर सहमति जताते हुए कहा- 'भारत में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो इंग्लैण्ड के विरोधी दल की भाँति यहाँ भी कार्य कर सके और सरकार को यह बता सके कि शासन में क्या त्रुटियाँ हैं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है!'

    ह्यूम की इच्छा थी कि बम्बई के गवर्नर को इसका अध्यक्ष बनाया जाये परन्तु लॉर्ड डफरिन ने कहा- 'गवर्नर को ऐसी संस्थाओं की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उसकी उपस्थिति में लोग अपने विचार स्वतन्त्रता पूर्वक प्रकट नहीं कर सकेंगे।' इसके बाद ह्यूम इंग्लैण्ड गया और वहाँ उसने लॉर्ड रिपन, लॉर्ड डलहौजी तथा लॉर्ड ब्राइस आदि प्रख्यात ब्रिटिश राजनीतिज्ञों से इस संस्था के गठन के सम्बन्ध में विचार-विमर्श किया।

    इंग्लैण्ड से भारत लौटकर ह्यूम ने भारत में पहले से ही चल रही एक संस्था नेशनल यूनियन का नाम बदल कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा तथा मई 1885 में भारतीय नेताओं के नाम एक परिपत्र जारी किया जिसके माध्यम से उसने दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में देश के समस्त भागों के प्रतिनिधियों की एक सभा पूना में बुलाई। उसने इस सभा के दो उद्देश्य बताये-

    (1) राष्ट्र की प्रगति के कार्य में लगे लोगों का एक-दूसरे से परिचय।

    (2) इस वर्ष में किये जाने वाले कार्यों की चर्चा और निर्णय।

    पूना में प्लेग फैल जाने का कारण कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन पूना की बजाय बम्बई में किया गया। 28 दिसम्बर 1885 को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज भवन में हुए इस अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचन्द्र बनर्जी ने की। इसमें देश के विभिन्न भागों से आये 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इन प्रतिनिधियों में बैरिस्टर, सॉलिसिटर, वकील, व्यापारी, जमींदार, साहूकार, डॉक्टर, समाचार पत्रों के सम्पादक और मालिक, निजी कॉलेजों के प्रिंसिपल और प्रोफेसर, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, धार्मिक गुरु और सुधारक आदि विभिन्न प्रकार के लोग थे। इनमें दादाभाई नौरोजी, फीरोजशाह मेहता, वी. राघवचार्य, एस. सुब्रह्मण्यम्, दिनेश वाचा, काशीनाथ तेलंग आदि नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रमुख थे। यह सम्मेलन सफल रहा और राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ। अधिवेशन की समाप्ति पर ह्यूम के आग्रह पर महारानी विक्टोरिया की जय के नारे लगाये गये।

    ह्यूम ने सदस्यों का आह्वान इन शब्दों में किया- 'हम सभी तीन बार ही नहीं, तीन का तीन गुना और यदि हो सके तो नौ गुना अर्थात् 27 बार उस महान विभूति की जय बोलें जिसके जूतों के फीते खोलने योग्य भी मैं नहीं हूँ, जिसके लिये आप सब प्रिय हैं और जो आप सबको अपने बच्चों के समान समझती हैं। सब मिलकर बोलिए महामहिम महारानी विक्टोरिया की जय........।'


    कांग्रेस की स्थापना के घोषित उद्देश्य

    कांग्रेस की स्थापना के घोषित उद्देश्य अलग थे और वास्तविक उद्देश्य अलग। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में उमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के निम्नलिखित उद्देश्य बताए-

    (1) सारे भारतवर्ष में देशहित में काम करने वाले लोगों का आपस में सम्पर्क बढ़ाना और उनमें मित्रता की भावना उत्पन्न करना।

    (2) व्यक्तिगत मित्रता और मेल-जोल से देशप्रेमियों में जाति-पाँति के भेदभाव, वंश, धर्म और प्रान्तीयता की संकीर्ण भावनाओं का नाश करके राष्ट्रीय एकता की जनभावनाओं का विकास करना जिनकी उत्पत्ति लॉर्ड रिपन के काल में हुई थी।

    (3) पूरे वाद-विवाद के बाद भारत में शिक्षित लोगों की सामाजिक समस्याओं के बारे में सम्मतियाँ प्राप्त कर उनका प्रामाणिक संग्रह तैयार करना।

    (4) उन तरीकों पर विचार कर निर्णय करना जिनके अनुसार आने वाले बारह महीनों में राजनीतिज्ञ देशहित के लिये कार्य करेंगे।

    प्रथम अधिवेशन में नौ प्रस्ताव पारित हुए जिनमें विभिन्न विषयों पर सुधारों की मांग की गई। इन प्रस्तावों से भी कांग्रेस के उद्देश्यों की जानकारी मिलती है। प्रथम प्रस्ताव में भारतीय प्रशासन की जांच के लिए एक रॉयल कमीशन नियुक्त करने तथा द्वितीय प्रस्ताव में केन्द्रीय एवं प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में नामित सदस्यों के स्थान पर निर्वाचित भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग की गई। अन्य प्रस्तावों में सैनिक खर्च में कमी, भारत और इंग्लैण्ड में सिविल सर्विस प्रतियोगिता परीक्षाओं को साथ-साथ कराने और आयात करों में वृद्धि करने आदि मांगें की गईं। इन समस्त प्रस्तावों पर भारत में पहले से ही विभिन्न मंचों पर चर्चा चल रही थी।


    कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक कारण

    सेवानिवृत्त वरिष्ठ अँग्रेज नौकरशाह द्वारा कांग्रेस की स्थापना में अत्यधिक रुचि लेने की बात ने आरम्भ से ही कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक कारणों को विवादास्पद बना दिया। नन्दलाल चटर्जी ने लिखा है- 'कांग्रेस रूसी भय की सन्तान थी।' एन्ड्रूज और मुखर्जी ने अपनी पुस्तक राइज एण्ड ग्रोथ ऑफ द कांग्रेस इन इण्डिया में लिखा है- 'कांग्रेस की स्थापना के ठीक पहले जैसी स्थिति थी, वैसी 1857 के बाद इससे पहले कभी नहीं हुई थी।' बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना, ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से की गई थी। इन इतिहासकारों के अनुसार कांग्रेस का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश शासक इसकी आवश्यकता समझते थे। यह राष्ट्रीय आन्दोलन के स्वाभाविक विकास का नहीं, राष्ट्रीय आन्दोलन में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का परिणाम था। इस मत के विपरीत कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना केवल ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा के उद्देश्य से नहीं की गई थी, उसके और भी कारण थे। इन कारणों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    (अ) कांग्रेस की स्थापना साम्राज्य की रक्षा के लिए हुई

    (1) ह्यूम उच्च सरकारी अधिकारी रह चुका था। उसे भारत में बढ़ते हुए खतरनाक असन्तोष की जानकारी थी। गवर्नर जनरल लॉर्ड लिटन (ई.1876-80) के समय ह्यूम ने एक रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी थी जिसमें लिखा था- 'मुझे निम्नलिखित साक्ष्यों ने आश्वस्त कर दिया है कि हम एक भीषण विस्फोट के कगार पर हैं। मुझे 7 बड़े-बड़े पोथे दिखाये गये जिनमें देशी भाषा में लिखे विविध रपटों और परचों के अँग्रेजी में सारांश तथा अनुवाद थे। ये सब रपटें जिला, तहसील, परगना, शहर, कस्बा तथा गांवों के क्रम से संकलित थीं। ये रपटें तीस हजार से अधिक सूत्रों से प्राप्त की गई थीं। इनसे प्रकट होता था कि गरीब तबके के लोगों में गहरी निराशा छाई हुई थी। उनके मन में यह विश्वास जम गया था कि वे भूखे रहकर मर जायेंगे...... वे कुछ करना चाहते थे। कुछ हिंसात्मक कार्य......।' इसीलिए उसने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना में इतनी अधिक रुचि ली। ह्यूम ने सर आकले कारविन को एक पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य, अँग्रेजी शासकों के कार्यों के फलस्वरूप उत्पन्न एक प्रबल और उमड़ती हुई शक्ति के निष्कासन के लिए रक्षा-नली (सेफ्टी फनल) का निर्माण करना था।

    (2) बढ़ते हुए भारतीय असन्तोष से ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने का एकमात्र रास्ता इस आन्दोलन को वैधानिक मार्ग पर लाना था, ह्यूम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। लाला लाजपतराय ने लिखा है- 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य अँग्रेजी साम्राज्य को खतरे से बचाना था। भारत की राजनैतिक स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करना नहीं, अँग्रेजी साम्राज्य के हितों की पुष्टि करना था।' सर विलियम वेडरबर्न का मत है- 'भारत में असन्तोष की बढ़ती हुई शक्तियों से बचने के लिए एक सेफ्टी-वाल्व (रक्षा-अवरोधक) की आवश्यकता है और कांग्रेस से बढ़कर अन्य कोई सेफ्टी-वाल्व नहीं हो सकता।'

    (3) सरकार के व्यवहार से भी तथ्य की पुष्टि होती है कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए की गई थी। प्रारम्भिक अधिवेशनों में कांग्रेस प्रतिनिधियों को गवर्नरों द्वारा गार्डन पार्टियाँ दी गईं और अधिवेशन की व्यवस्था में भी पूरा सहयोग दिया गया परन्तु जब ऐसे लोग जिन्हें ब्रिटिश शासक नहीं चाहते थे, कांग्रेस में घुस आए और कांग्रेस ने ब्रिटिश शासकों की इच्छा के विरुद्ध मार्ग पकड़ लिया तब लॉर्ड डफरिन और ब्रिटिश शासक, कांग्रेस के विरुद्ध हो गये और उसको समाप्त करने का प्रयास करने लगे। क्योंकि कांग्रेस, ब्रिटिश सरकार की तीव्र आलोचना करने लगी थी। सरकार के इस आचरण से स्पष्ट है कि अँग्रेज, कांग्रेस की स्थापना अँग्रेजी साम्राज्य के सुरक्षा कवच के रूप में करना चाहते थे।

    (4) डा. नन्दलाल चटर्जी का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना के समय भारत पर रूसी आक्रमण का भय था। अतः अँग्रेज भारत की राजनीतिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयत्नशील थे ताकि युद्ध की स्थिति में भारतीयों का सहयोग लिया जा सके। रूसी आक्रमण का भय समाप्त होते ही सरकार ने कांग्रेस के प्रति अपने रुख में परिवर्तन कर लिया।

    (5) रजनी पाम दत्त ने लिखा है- 'कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार की पूर्व-निश्चित गुप्त योजना का अंग थी।'

    (ब.) कांग्रेस की स्थापना केवल साम्राज्य की रक्षा के लिए नहीं हुई

    कुछ विद्वानों का मत है कि कांग्रेस की स्थापना केवल ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से नहीं की गई थी। इसके जन्मदाता इसे केवल सरकार समर्थित संस्था बनाना नहीं चाहते थे। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

    (1) यह सही है कि कांग्रेस के संस्थापकों में से कुछ का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था परन्तु उनका उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना को दबाना नहीं था। वे सरकार विरोधी असन्तोष को हिंसक रास्ते पर जाने से रोक कर वैधानिक मार्ग की ओर मोड़ना चाहते थे। स्वयं वेडरबर्न ने कहा था कि कांग्रेस की भूमिका इंग्लैण्ड के विरोधी दल के समान होनी चाहिए। वायसराय डफरिन भी ऐसा ही चाहते थे।

    (2) सामान्यतः यह कहा जाता है कि ह्यूम एक भूतपूर्व अँग्रेज अधिकारी थे और वे ऐसी किसी संस्था की स्थापना क्यों करते जो ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी हो? इसके उत्तर में कहा जाता हे कि ह्यूम व्यक्तिगत रूप से उदारवादी विचारधारा से प्रभावित थे और वे चाहते थे कि भारत में ब्रिटिश शासन प्रजातांत्रिक रूप से काम करे। इसके अलावा, कांग्रेस का प्रारम्भिक रुख भी अँग्रेजों का विरोधी नहीं था।

    (3) ई.1888 में ह्यूम ने कांग्रेस के मंच से जो भाषण दिया उससे भी पता चलता है कि ह्यूम का उद्देश्य केवल ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा करना नहीं था। उन्होंने अपने भाषण में जहाँ एक तरफ ब्रिटिश सरकार की निरंकुशता की आलोचना की, वहीं दूसरी तरफ देश में राजनीतिक जागरण की बात भी कही ताकि सरकार पर दबाव डाला जा सके। अपने भाषण में ह्यूम ने कहा था- 'हमारे शिक्षित भारतीयों ने अलग-अलग रूप में, हमारे अखबारों ने व्यापक रूप में तथा हमारी राष्ट्रीय महासभा के समस्त प्रतिनिधियों ने एक स्वर से सरकार को समझाने की चेष्टा की है किन्तु सरकार ने जैसा कि प्रत्येक स्वेच्छाचारी सरकार का रवैया होता है, समझने से इन्कार कर दिया है। अब हमारा कार्य यह है कि देश में अलख जगाएँ, ताकि हर भारतीय जिसने भारत माता का दूध पिया है, हमारा साथी, सहयोगी तथा सहायक बन जाये और यदि आवश्यकता पड़े तो........स्वतन्त्रता, न्याय तथा अधिकारों के लिये जो महासंग्राम हम छेड़ने जा रहे हैं, उसका सैनिक बन जाये।'

    (4) कांग्र्रेस की स्थापना केवल ह्यूम ने नहीं की थी। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस रानाडे आदि भारतीय नेताओं ने भी सक्रिय सहयोग दिया था। यह सम्भव नहीं है कि इन भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना में सहयोग दिया। उनका उद्देश्य भारतीयों के लिए शासन में कुछ सुधारों की मांग करना था।

    (5) डॉ. ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से नहीं अपितु भारतीयों के हित की दृष्टि से की गई।

    (6) कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष उमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के सम्बन्ध में लिखा है- 'ह्यूम का विचार था कि भारत के प्रमुख व्यक्ति वर्ष में एक बार एकत्र होकर सामाजिक विषयों पर चर्चा करें। वे नहीं चाहते थे कि उनकी चर्चा का विषय राजनीति रहे क्योंकि मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में पहले से ही राजनैतिक संस्थाएँ थीं।' अर्थात् राष्ट्रीय कांग्रेस एक सामाजिक संस्था के रूप में कार्य करने वाली संस्था के रूप में उद्भूत हुई।


    कांग्रेस का स्वरूप

    कांग्रेस के स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में जबर्दस्त मतभेद रहा। यद्यपि इसके निर्माण एवं विकास में मद्रासी, मराठी और पारसियों का उतना ही हाथ था जितना बंगालियों का किंतु कुछ लोग इसे बंगाली कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे हिन्दू कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे केवल पढ़े-लिखे भारतीयों की संस्था कहते थे और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नकारते थे। जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार कांग्रेस के संगठन और उद्देश्यों पर दृष्टि डालने से सिद्ध हो जाता है कि कांग्रेस का जन्म राष्ट्रीय संस्था के रूप में हुआ। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सम्मिलित होने वाले प्रतिनिधि विभिन्न धर्मों, वर्गों, सम्प्रदायों एवं प्रांतों से थे।


    कांग्रेस का विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव

    विशिष्ट बुद्धिजीवी वर्ग पर प्रभाव: कांग्र्रेस की स्थापना भले ही ए. ओ. ह्यूम के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों ने की थी किंतु भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इसे सम्भालने के लिये आगे आया। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे, पण्डित मदन मोहन मालवीय आदि बुद्धिजीवी भारतीय नेताओं ने कांग्रेस को खड़ा करने में सक्रिय सहयोग दिया।

    भारत में रहने वाले अँग्रेजों पर प्रभाव: ई.1907 तक अनेक प्रतिष्ठित अंग्रेज किसी न किसी रूप में कांग्रेस से जुड़ गये थे। ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, सर हेनरी कॉटन, एण्ड्रिल यूल और नार्टन जैसे उदारवादी आंग्ल-भारतीय भी कांग्रेस में सम्मिलित हो गये थे।

    जनसामान्य पर प्रभाव: कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में ब्रिटिश-भारत में रहने वाले विभिन्न धार्मिक समुदायों एवं जातियों के शिक्षित प्रतिनिधि भाग लेते थे। ये लोग परस्पर स्नेह और विश्वास की भावना प्रकट करते थे। यही कारण था कि कांग्रेस की स्थापना के बाद देश में राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय एकता तथा जनसेवा के उच्चादर्शों का तेजी से विकास हुआ। कांग्रेस के उस काल के उच्चादर्श उसके राष्ट्रीय स्वरूप को प्रकट करते हैं। प्रारम्भ में कांग्रेस की लोकप्रियता शिक्षित वर्ग तक सीमित रही किंतु बाद में इसके द्वारा राजनीतिक अधिकारों की मांग किये जाने के कारण सामान्य लोगों का ध्यान भी इसकी तरफ आकर्षित होने लगा।

    विभिन्न धर्मों पर प्रभाव: कांग्रेस के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचंद्र बनर्जी ने की जो हिन्दू थे। दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की जो पारसी थे और तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयबजी ने की जो मुसलमान थे। कांग्रेस के चौथे अधिवेशन की अध्यक्षता प्रसिद्ध अँग्रेज व्यवसायी जार्ज यूल ने की जो ईसाई थे। आगे भी यह क्रम जारी रहा। इस प्रकार विभिन्न धर्मों के नेताओं को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने से यह संस्था किसी एक धर्म के प्रभाव वाली संस्था न बनकर राष्ट्रीय व्यापकता वाली संस्था के रूप में विकसित हुई।

    मुसलमानों पर प्रभाव: आरम्भ में कांग्रेस में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या कम थी किन्तु धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई। सर सैय्यद अहमद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने ब्रिटिश राजभक्तों की एक संस्था यूनाइटेड पौट्रियाटिक एसोसिएशन और मुसलमानों के लिए मोहम्मडन एजूकेशन कांग्रेस बनाई। इन मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर कांग्रेस पूर्णतः लोक प्रतिनिधि संस्था थी और इसके प्रतिनिधि राष्ट्रीय विचारों का प्रतिनिधत्व करते थे। कांग्रेस के चौथे सम्मेलन में 1248 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे जिनमें से 221 मुसलमान तथा 220 ईसाई थे।

    रियासती जनता पर प्रभाव: कांग्रेस ने ब्रिटिश-भारत में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया था फिर भी ई.1938 के हरिपुरा अधिवेशन से पहले तक कांग्रेस ने देशी रियासतों को अपने कार्यक्षेत्र से पूरी तरह अलग रखा। इस कारण रियासती-भारत की जनता पर ई.1885 से 1938 तक की अवधि में कोई विशेष प्रभाव नहीं था।

    साम्राज्यवादियों पर प्रभाव: कांग्रेस की स्थापना साम्राज्यवादियों के प्रयासों से हुई थी। फिर भी अनेक साम्राज्यवादी अँग्रेज आरम्भ से ही कांग्रेस को घृणा की दृष्टि से देखते थे। मई 1886 में सर हेनरी मेन ने डफरिन को एक पत्र लिखकर ह्यूम के विरुद्ध गंभीर टिप्पणी की- 'ह्यूम नामक एक दुष्ट व्यक्ति है जिसे लॉर्ड रिपन ने बहुत सिर चढ़ाया था और जिसके सम्बन्ध में ज्ञात होता है कि वह भारतीय होमरूल आंदोलन के मुख्य भड़काने वालों में है। यह बहुत ही चालाक, पर कुछ सिरफिरा, अहंकारी और नैतिकताहीन व्यक्ति है.... जिसे सत्य की कोई परवाह नहीं है। ' दिसम्बर 1886 में लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस के प्रतिनिधियों के लिये कलकत्ता में एक स्वागत समारोह आयोजित किया किंतु जब कांग्रेस की मांगें सामने आईं तो वे कांग्रेस के सचिव ए. ओ. ह्यूम से बुरी तरह नाराज हो गये। डफरिन ने ह्यूम के विरुद्ध अत्यंत उग्र शब्दों में नाराजगी व्यक्त की।

    इंग्लैण्ड वासियों पर प्रभाव: ई.1890 में कांग्रेस ने एक प्रतिनिधि मण्डल इंग्लैण्ड भेजा, जिसने इंग्लैण्ड, वेल्स और स्कॉटलैंण्ड के निवासियों में कांग्रेस का प्रचार किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की यात्रा के बाद ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक समिति बनाई गई जिसका उद्देश्य भारतीय समस्याओं पर विचार करना था। ब्रिटिश जनमत को आकर्षित करने के लिए लंदन में इण्डिया नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया जाने लगा। इन प्रचार कार्यों के कारण इंग्लैण्ड के लोग भी कांग्रेस के कार्यों में रुचि लेने लगे। ई.1890 में स्वयं लॉर्ड लैंन्सडाउन ने स्वीकार किया कि कांग्रेस देश की एक शक्तिशाली उत्तरदायी राजनैतिक संस्था है।

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से कांग्रेस अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय संस्था थी। इसमें समाज के हर वर्ग, धर्म, जाति का व्यक्ति सदस्य हो सकता था। इसका प्रभाव भी भारत के किसी एक कोने तक सीमित न होकर राष्ट्रव्यापी था। आरम्भ में इसे जनसामान्य का समर्थन कम मिला किंतु समय के साथ कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वरूप विस्तृत होता चला गया तथा इसकी लोकप्रियता में वृद्धि होने लगी। कांग्रेस ने सम्पूर्ण देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए संवैधानिक उपायों से प्रयास करना आरम्भ किया। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में पं. मदनमोहन मालवीय ने कहा- 'इस महान संस्था के द्वारा भारतीय जनता को एक जीभ मिल गई है जिसके द्वारा हम इंग्लैण्ड से कहते हैं कि वह हमारे राजनैतिक अधिकारों को स्वीकार करे।' कांग्रेस के प्रारम्भिक कार्यों का ही परिणाम था कि देश में प्रबल जनमत का विकास हुआ। सर हेनरी कॉटन ने लिखा है- 'कांग्रेस के सदस्य किसी भी स्थिति में सरकारी नीति में परिवर्तन लाने में सफल नहीं हुए किन्तु अपने देश के इतिहास के विकास में तथा देश वासियों के चरित्र निर्माण में निश्चित रूप से उन्होंने सफलता प्राप्त की।'

    यह कहना अतिश्योक्ति-पूर्ण नहीं होगा कि कांग्रेस का जन्म भारत के राजनैतिक इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी। इसका जन्म ऐसे समय में हुआ, जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी सफलता के सर्वोच्च शिखर पर था। उसकी शक्ति को चुनौती देना सरल नहीं था फिर भी कांग्रेस ने कुछ ही वर्षों में व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त कर लिया।


    उदारवादी नेतृत्व अथवा नरमपंथी कांग्रेस

    भारत की आजादी के लिये संघर्ष अँग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही आरम्भ हो गया था। 18वीं शती में प्रेस के उदय साथ ही भारतीयों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिये मंच मिलना आरम्भ हो गया था। यही कारण है कि ई.1885 से ई.1947 तक कांग्रेस का इतिहास, भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का ही इतिहास है। कांग्रेस के इतिहास को मुख्यतः दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

    (1) प्रथम चरण: स्थापना से लेकर रोलट एक्ट तक अर्थात् ई.1885 से 1919 तक। इस चरण में ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस का नेतृत्व उदारवादियों ने किया और ई.1905 से 1919 तक इसका नेतृत्व उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के हाथों में रहा।

    (2) द्वितीय चरण: असहयोग आंदोलन से लेकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक अर्थात् ई.1920 से 1947 तक। इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व दक्षिणपंथी मोहनदास कर्मचंद गांधी और उनके समाजवादी-वामपंथी सहयोगी जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं के हाथों में रहा।


    उदारवादी युग

    ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस की बागडोर पूरी तरह से उदारवादियों अथवा नरम राष्ट्रवादियों के हाथों में रही जो अँग्रेजों तथा अँग्रेजी शासन के प्रति नरम रवैया रखते थे और बहिष्कार तथा असहयोग जैसे क्रान्तिकारी विचारों के विरुद्ध थे। इनमें से अधिकांश नेताओं के हृदय में ब्रिटिश राज के प्रति कृतज्ञता के भाव थे। वे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को वरदान समझते थे। उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं एवं रीति-रिवाजों में सामाजिक समानता तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की स्थापना के लिए परिवर्तन का सुझाव दिया। वे भारत में प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं की स्थापना और नागरिक स्वतन्त्रता की मांग प्रस्तुत करते थे।

    राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए उदारवादियों ने संवैधानिक आन्दोलन का समर्थन किया। उनके द्वारा जो राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ किया गया वह भारत की एकता, जातीय एवं साम्प्रदायिक समन्वय, आधुनिकीकरण, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध एवं भेदभाव का निषेध, नवीन आर्थिक प्रगति तथा उद्योगीकरण का समर्थन करता था। उदारवादियों ने सेवाओं के भारतीयकरण, पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार, व्यवस्थापिका सभाओं के चुने हुए सदस्यों की संख्या में वृद्धि, विधि का शासन, स्वतन्त्रता के अधिकारों का व्यापक प्रयोग आदि विषयों पर ध्यान केन्द्रित किया। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, लालमोहन घोष, रासबिहारी, गोपालकृष्ण गोखले, श्रीनिवास शास्त्री, महादेव गोविंद रानाडे आदि नेता उदारवादी युग के प्रमुख स्तम्भ थे। कुछ उदारवादी अँग्रेज यथा- ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, जार्ज यूल, मेक्विन, स्मिथ आदि भी कांग्रेस के सदस्य थे। इन उदारवादी नेताओं ने ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस का नेतृत्व किया।

    उदारवादी नेताओं ने भारत के ब्रिटिश शासकों को प्रसन्न रखते हुए उनकी दयालुता एवं न्यायप्रियता की दुहाई देकर स्वशासन की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया। जेल जाने का कष्ट उठाना इन नेताओं के वश की बात नहीं थी। वे अपनी सामजिक स्थिति, पद, व्यवसाय आदि को यथावत् बनाये रखते हुए भारत में स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न देखते थे। उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश शासन ने ही भारत को आधुनिक सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर किया, स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न की, राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया और देश की जनता को एकसूत्र में बांधने का काम किया।

    जस्टिस रानाडे का मानना था कि भारत में अँग्रेजी शासन भारतीयों को नागरिक एवं सार्वजनिक गतिविधियों का राजनैतिक शिक्षण देने की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुआ था। उनका कहना था- 'हिन्दुओं एवं मुसलमानों में वैज्ञानिक क्रियाकलाप, नवीन शिक्षण तथा व्यावसायिक दृष्टिकोण की कमी होने के कारण प्रगति शिथिल होती गयी। अँग्रेजों के आगमन ने यह स्थिति बदल दी। भारत को एक नवीन ज्योति दिखाई दी। आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अँग्रेजों के सम्पर्क में आने से हमें स्वतन्त्रता की महत्ता का आभास हुआ। सदियों की गुलामी एवं जड़ता को पाश्चात्य प्रभाव ने समाप्त कर दिया। भारतीय नवजागरण प्रारम्भ हुआ।'

    दादाभाई नौरोजी की धारणा थी कि अँग्रेजों का शासन भारत के चहुँमुखी विकास के लिए दैविक वरदान का कार्य करेगा। उनका कहना था कि- 'अँग्रेजों का उस समय तक भारत में बने रहना आवश्यक है जब तक कि भारतीयों को वे स्वावलम्बी बनाने सम्बन्धी अपना न्यासिता का उद्देश्य पूरा नहीं कर लेते।' उदारवादियों ने भारतीयों की इंग्लैण्ड के प्रति वफादारी और उनकी देशभक्ति के बीच गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कभी असुविधा महसूस नहीं की। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था- 'ईश्वर भविष्य में हमारी वफादारी को और गहरा करे, हमारी देशभक्ति को और प्रोत्साहित करे और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हमारे सम्बन्धों को और अधिक दृढ़ करे।'

    उदारवादी नेता देश की शासन व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत में सुधार कार्य एक साथ सम्भव नहीं है, इसलिए क्रमिक सुधार होने चाहिये। वे राजनीतिक एवं प्रशासकीय क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाना चाहते थे। वे सरकार में जनता की समुचित भागीदारी चाहते थे। आर. जी. प्रधान ने लिखा है- 'कांग्रेस के प्रारम्भिक दिनों के प्रस्तावों से पता चलता है कि उनकी मांगें अत्यन्त साधारण थीं। कांग्रेस के नेता आदर्शवादी नहीं थे। वे हवाई किला नहीं बनाते थे। वे व्यावहारिक सुधारक थे तथा आजादी, क्रमशः कदम-कदम करके हासिल करना चाहते थे।'

    फीरोजशाह जैसे नेता, अँग्रेजों के संरक्षण में भारत के राजनीतिक शिक्षण का मार्ग ढूँढ रहे थे और उनका विश्वास था कि किसी दिन अँग्रेज स्वयं ही, भारत की राष्ट्रीय मांगों को स्वीकार कर लेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भी ब्रिटेन के मार्गदर्शन में भारत की प्रगति का स्वप्न देखते थे। उनका उद्देश्य भारत में राजनीतिक सुधारों की मांग प्रस्तुत करना तथा अँग्रेजी शासन से प्रार्थना एवं याचिकाओं के माध्यम से नवीन सुधारों को लागू करवाना था। गोपालकृष्ण गोखले भारत के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं पुनर्जीवन के लिए क्रमिक विकास का सहारा लेना चाहते थे। उदारवादी नेता, पाश्चात्य सभ्यता एवं विचारों के पोषक थे।

    उनकी मान्यता थी कि भारतीयों के लिए, भारत का ब्रिटेन से सम्बन्ध होना एक वरदान है। ब्रिटेन से सम्बन्धों के कारण पाश्चात्य साहित्य, आधुनिक शिक्षा पद्धति, यातायात के साधन, न्याय प्रणाली, स्थानीय स्वशासन आदि व्यवस्थाएँ भारत के लिए अमूल्य वरदान सिद्ध हुई हैं। पाश्चात्य विचार एवं दर्शन, लोगों में स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र के प्रति आदर उत्पन्न करता है। अतः भारत के हित में यही उचित होगा कि ब्रिटेन से उसका अटूट सम्बन्ध बना रहे। श्रीमती एनीबीसेन्ट का माना था- 'इस काल के नेता स्वयं को ब्रिटिश प्रजा मानने में गौरव का अनुभव करते थे।' गोपालकृष्ण गोखले का कहना था- 'हमारा भाग्य अँग्रेजों के साथ जुड़ा हुआ है। चाहे वह अच्छे के लिए हो अथवा बुरे के लिए।' इसी प्रकार दादाभाई नौरोजी का कहना था- 'कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाली संस्था नहीं है, अपितु वह तो ब्रिटिश सरकार की नींव को दृढ़ करना चाहती है।'

    उदारवादियों का विश्वास था कि अँग्रेज, संसार के सर्वाधिक ईमानदार, शक्ति सम्पन्न और प्रजातन्त्रवादी लोग हैं। वे भारत में भी प्रजातान्त्रिक संस्थाओं का विकास करेंगे। यदि ब्रिटिश संसद और जनता को भारतीय समस्याओं से अवगत कराया जाए तो वे निश्चित रूप से सुधार के कदम उठायेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था- 'अँग्रेजों के न्याय, बुद्धि और दया भावना में हमारी दृढ़ आस्था है। संसार की इस महानतम प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी ब्रिटिश कॉमन सभा के प्रति हमारे हृदय में असीम श्रद्धा है; अँग्रेज स्वेच्छा से भारत से चले जायेंगे।'

    कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन चाहते थे। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- 'स्वशासन एक प्राकृतिक देन है, ईश्वरीय शक्ति की कामना है। प्रत्येक राष्ट्र को स्वयं अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, यही प्रकृति का नियम है।' ब्रिटिश साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद की तो वे स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। इसलिए पूर्ण स्वतन्त्रता की बात उनके मस्तिष्क में नहीं थी। वे तो ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन प्राप्त करना चाहते थे।

    उदारवादी नेताओं को अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था। उन्होंने सरकार के साथ संघर्ष करने की बात कभी नहीं की। उनका पूर्ण विश्वास वैधानिक संघर्ष में था। वे अपने कार्यों से सरकार को असन्तुष्ट नहीं करना चाहते थे। उन्होंने प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों, याचिकाओं, स्मरण-पत्रों और प्रतिनिधि-मण्डलों द्वारा सरकार से अपनी न्यायोचित मांगों को मानने का आग्रह किया। अनेक विद्वानों का मानना है कि इस समय कांग्रेस की नीति प्रार्थना करने की थी, अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने की नहीं। इस रीति-नीति को कुछ लोगों ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहा।


    उदारवादियों की मांगें

    कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारम्भिक बीस वर्षों में वार्षिक अधिवेशनों में विभिन्न प्रस्ताव पारित करके ब्रिटिश सरकार का ध्यान भारतीय जनता की समस्याओं की ओर आकर्षित किया तथा नागरिक प्रशासन में विभिन्न प्रकार के सुधार करने की मांग की। उनकी विभिन्न मांगंे इस प्रकार से थीं-

    1. प्रशासन व्यवस्था में भारतीयों की अधिक से अधिक भागीदारी हो।

    2. विधायी परिषदों में सुधार हो।

    3. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय कौंसिलों का विस्तार हो तथा उनमें सरकार द्वारा नामित सरकारी सदस्यों की संख्या में कमी करके निर्वाचित और गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाये।

    4. कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण हो तथा मुकदमों की सुनवाई में जूरी प्रथा को मान्यता दी जाये।

    5. वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन करके करों का बोझ कम किया जाये।

    6. अँग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा और विस्तार के व्यय में ब्रिटिश सरकार भी भागीदारी निभाये।

    7. सरकार के सैनिक व्यय में कमी की जाये।

    8. किसानों की स्थिति सुधारने के लिए भू-राजस्व की दर कम की जाये तथा यह 20 से 30 वर्षों के लिये स्थाई की जाये।

    9. भारतीय जनता की दशा सुधारने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ। प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो, औद्योगिक एवं तकनीकी शिक्षा की सुविधा दी जाये, सफाई में सुधार के लिए अधिक अनुदान दिया जाए इत्यादि।


    ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा कांग्रेस का विरोध

    कांग्रेस की स्थापना वायसराय लॉर्ड डफरिन की स्वीकृति से हुई थी तथा इसकी स्थापना के पीछे सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलन के हिंसक मार्ग को संवैधानिक मार्ग की तरफ मोड़ना था। सरकार को विश्वास था कि कांग्रेस का नेतृत्व ऐसे सम्पन्न एवं आराम-पसन्द भारतीयों के हाथों में रहेगा जो न तो हिंसक मार्ग अपनायेंगे और न सरकार की कटु आलोचना करेंगे। इस प्रकार कांग्रेस, सरकार द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलती रहेगी। यही कारण है कि कांग्रेस के प्रथम तीन अधिवेशनों के अवसर पर सरकार की ओर से कांग्रेस के प्रतिनिधियों को चाय-पार्टियाँ दी गईं।

    उदारवादी नेता बहुत ही विनम्र भाषा का प्रयोग कर रहे थे तथा अंग्रेजी राज्य के भीतर स्वशासन की मांग कर रहे थे तब भी ई.1988 में ह्यूम और डफरिन के सम्बन्ध बिगड़ गये। इस कारण सरकारी नीति में परिवर्तन आ गया। अँग्रेज शासक, भारतीयों के समानता के दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। 30 नवम्बर 1888 को लॉर्ड डफरिन ने अपने भाषण में कांग्रेस द्वारा की गई संसदीय सरकार की मांग की खिल्ली उड़ायी और कांग्रेस को एक सीमित वर्ग की संस्था कहा। डफरिन ने सख्त शब्दों में कहा- 'भारत के कुछ सुशिक्षित व मनीषी यह चाहते हैं कि सरकार लोकतांत्रिक हो, नौकरशाही उसके अधीन हो और उन्हें राष्ट्र के खजाने पर अधिकार मिल जाए और शनैः शनैः ब्रिटिश पदाधिकारी उनके सामने करबद्ध खड़े हों।'

    डफरिन द्वारा इस प्रकार के विचार प्रकट किये जाने के बाद ब्रिटिश शासक कांग्रेस के विरोधी बन गये और उसके समाप्त होने की कामना करने लगे। सरकार ने कांग्रेस के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करना आरम्भ कर दिया। चौथा अधिवेशन ई.1888 में दिसम्बर के अंतिम दिनों में इलाहाबाद में होना था। वहाँ के गवर्नर ऑकलैण्ड कोलविन ने प्रयास किया कि उसके प्रांत में अधिवेशन के लिए पैसा एकत्र न हो, अधिवेशन के लिए कांग्रेस का प्रचार न होने पाए और अधिवेशन के लिए कांग्रेस को इलाहाबाद में कोई जगह न मिले। यदि महाराजा दरभंगा ने सहायता न की होती तो कांग्रेस को कोई स्थान नहीं मिल पाता। महाराजा ने लोथर कैसल नामक भवन खरीद कर कांग्रेस को दे दिया। सरकारी अधिकारियों ने लोगों पर दबाव डालना आरम्भ किया कि वे कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित न हों। मुसलमानों, देशी राजाओं तथा जमींदारों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया गया। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने पर रोक लगा दी। भारत सचिव हेमिल्टन ने कांग्रेस को धन देने वालों पर निगरानी रखने का आदेश जारी कर दिया। कुछ प्रान्तों के गवर्नरों ने तो यह सुझाव भी दिया कि कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों पर रोक लगा दी जाये किन्तु यह सुझाव स्वीकार नहीं हुआ। ई.1895 के बाद कांग्रेस के प्रति सरकार का दृष्टिकोण दिनों-दिन कठोर होता गया।

    मुस्लिम नेता सर सैयद अहमद ने आरम्भ से ही कांग्रेस का विरोध किया था। जब सरकार ने प्रारम्भ में कांग्रेस की सहायता की तो उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि- 'यह सहायता बन्द की जाये। सरकार को हिन्दू कांग्रेस की तरफ नहीं झुकना चाहिए।' जब सरकार ने कांग्रेस विरोधी नीति पर चलना आरम्भ किया तो सर सैयद अहमद को अत्यधिक प्रसन्न्ता हुई और वे कांग्रेस की निन्दा तथा सरकार की प्रशंसा करने लगे।

    डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा है- 'नौकरशाही ने आरम्भ में तो कांग्रेस आन्दोलन का मजाक उड़ाया, फिर गाली-गलौच पर उतर आई और अन्त में सशक्त होकर इसके विरुद्ध दमन की नीति अपनाई।' रैम्जे मेकडोनल्ड ने लिखा है- 'राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति काफी सीमा तक सरकार की नीति पर निर्भर करती थी, जो आरम्भ में मैत्रीपूर्ण रही किन्तु बाद में घोर विरोध की हो गई।'

    अयोध्यासिंह ने लिखा है- 'कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने के लिए ब्रिटिश अधिकारी अपने वफादार चाकरों और खैरख्वाहों को लेकर उस पर टूट पड़े। एक तरफ वायसराय डफरिन और पश्चिमोत्तर प्रदेश के गवर्नर कोलविन ने, दूसरी तरफ बनारस के राजा और हैदराबाद के नवाब ने, तीसरी तरफ सर सैयद अहमद और राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ने, चौथी तरफ ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने तथा पांचवी तरफ सर दिनशा मानकजी पेटिट और अन्य धनी पारसियों ने आक्रमण किये। ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों और पारसियों को, हिन्दुओं के एक बड़े हिस्से को, जमींदारों और धनी-मानी व्यक्तियों को कांग्रेस से अलग कर देने और उसका दुश्मन बना देने की कोशिश की।' उदारवादी नेता सरकार को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सरकार की नाराजगी को चुपचाप सहन कर लिया और अविचलित भाव से काम करते रहे।

    कहा जा सकता है कि उदारवादियों ने याचक रहते हुए भी भारतीयों के लिये प्रतिनिधि संस्थाओं में अधिकाधिक प्रतिनिधित्व देने, विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने, प्रेस को स्वतन्त्रता देने तथा उच्च प्रशासनिक पदों पर भारतीयों को भी समान रूप से नियुक्ति देने के लिये सरकार पर दबाव बनाया। उदारवादी नेताओं ने आर्थिक विकास के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कराधान की एक न्यायसंगत पद्धति अपनाने की वकालत की जिसके अन्तर्गत जनता भुगतान कर सकने में समर्थ हो सके। उन्होंने औद्योगीकरण पर बल दिया, जिससे राष्ट्रीय आय के साधनों में वृद्धि हो सके और बेरोजगारों को काम मिल सके। उनकी सफलताएँ सरहानीय थीं और देश की आजादी की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुईं।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-103

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-103

    पटेल ने वह कर दिखाया जो जर्मनी में बिस्मार्क ने तथा इटली में काबूर ने किया था


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    सरदार पटेल के नेतृत्व में देशी रियासतों के एकीकरण का काम तेजी से चला। दिसम्बर 1947 में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों का उड़ीसा और मध्यप्रान्त में विलय हुआ। फरवरी 1948 में 17 दक्षिणी राज्यों को बम्बई प्रान्त के साथ मिलाया गया। जून 1948 में गुजरात तथा काठियावाड़ के समस्त राज्यों को बम्बई प्रदेश में सम्मिलित किया गया। पूर्वी पंजाब, पाटियाला तथा पहाड़ी क्षेत्र के राज्यों को मिलाकर एक नया संघ बनाया गया जिसे पेप्सू कहा गया। इसी आधार पर मत्स्य संघ, विन्ध्य प्रदेश और राजस्थान का निर्माण किया गया। कुछ क्षेत्रों को केन्द्र प्रशासित क्षेत्र बनाया गया जिनका प्रशासन केन्द्र सरकार के हाथों में रखा गया।

    सरदार पटेल तथा वी. पी. मेनन ने दो प्रकार की पद्धतियों को प्रोत्साहन दिया- बाह्य विलय और आन्तरिक संगठन। बाह्य विलय में छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर अथवा पड़ौसी प्रान्तों में विलय करके बड़े राज्य बनाये गये। आन्तरिक संगठन के अन्तर्गत इन राज्यों में प्रजातन्त्रीय शासन व्यवस्था लागू की गई। पूरे देश में चार प्रकार के राज्य बनाये गये (संविधान में 'प्रान्त' शब्द हटा दिया गया और देशी रियासतों तथा प्रान्तों, दोनों के लिए 'राज्य' शब्द का ही प्रयोग किया गया)। इन्हें क, ख, ग और घ श्रेणी के राज्य कहा गया। 'क' श्रेणी के अन्तर्गत भूतपूर्व ब्रिटिश प्रान्तों को रखा गया। इनकी संख्या 9 थी- असम, बिहार, बम्बई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल। 'ख' श्रेणी के अन्तर्गत कुछ संघ तथा बड़ी देशी रियासतों को रखा गया जिनकी संख्या 8 थी।

    ये थीं- हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला तथा पेप्सू, राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर तथा कोचीन। 'ग' श्रेणी के अन्तर्गत अजमेर, भोपाल, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, विन्ध्य प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों को सम्मिलित किया गया। 'घ' श्रेणी में अण्डमान और निकोबार द्वीप को सम्मिलित किया गया। 'क' और 'ख' श्रेणी के राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार स्थापित की गई परन्तु 'ग' श्रेणी के राज्यों में कुछ नियंत्रित उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई। 'घ' श्रेणी के राज्यों की प्रशासन व्यवस्था केन्द्र के अधीन रखी गई। देशी रियासतों के एकीकरण से भारत में शक्तिशाली संघ की स्थापना हो गई। यह काम जिस शान्ति एवं शीघ्रता से सम्पन्न हुआ, उसकी आशा किसी को नहीं थी।

    सितम्बर 1948 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा- 'यदि मुझसे कोई व्यक्ति 6 महीने पूर्व ये पूछता कि अगले 6 महीनों मे क्या होगा, तो मैं भी यह नहीं कह सकता था कि अगले 6 महीनों में इतने शीघ्र परिवर्तन होंगे।' माइकल ब्रीचर ने लिखा है- 'केवल एक वर्ष में 5 लाख वर्ग मील क्षेत्र और 9 करोड़ आबादी भारतीय संघ में मिल गई। यह एक महान् रक्तहीन क्रान्ति थी जिसकी तुलना कहीं भी इस शताब्दी में नहीं मिलती और इसकी तुलना उन्नीसवीं शताब्दी में बिस्मार्क द्वारा जर्मनी में और काबूर द्वारा इटली में किये हुए एकीकरण से की जा सकती है।'

    भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है। भारत की 566 रियासतों का एकीकरण विश्व की सबसे बड़ी रक्तहीन क्रांति थी। गांधीजी ने पटेल को लिखा- 'रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।'

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  • वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों से मोलभाव कर रहा था!

     02.06.2020
    वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों से मोलभाव कर रहा था!

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    ई.1936 में लॉर्ड विलिंगडन के बाद मारकीस ऑफ लिनलिथगो को भारत का वायसराय बनाया गया। लिनलिथगो संयुक्त प्रवर समिति के अध्यक्ष भी रह चुके थे। वे अपने कार्यकाल में भारत संघ के उद्घाटन की इच्छा लेकर भारत आये। उन्हें भारतीय राजाओं से सहानुभूति थी। वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते थे जिससे राजाओं का दिल दुखे। उनकी राय में राजा ही भारत से ब्रिटिश सम्बन्धों का प्रमुख आधार एवं तत्व थे। संघ के निर्माण की योजना में राजाओं को अड़ंगा लगाते हुए देखकर लिनलिथगो ने देशी राज्यों में अपने तीन विशेष प्रतिनिधियों सर कोर्टने लेटीमर, सर फ्रांसिस वायली तथा सर आर्थर लोठियान को भेजा। फ्रांसिस वायली को राजपूताना के नरेशों से वार्त्ता करने के लिये भेजा गया। लिनलिथगो का मानना था कि संघ योजना देशी राज्यों के शासकों के हित में थी। उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को दायित्व सौंपा कि वे राजाओं तथा उनके मंत्रियों को संघ में सम्मिलन की प्रक्रिया तथा उसका अर्थ समझायें।

    जैसे ही शासकों को वायसराय के इस निर्णय की जानकारी हुई, वे चौकन्ने हो गये। वे पहले से ही कांग्रेस द्वारा प्रजा मण्डलों के माध्यम से बनाये जा रहे दबाव में थे कि शासक अपने आंतरिक शासन को समर्पित कर दें। शासकों ने समझा कि अब परमोच्च सत्ता उनसे राज्यों का आंतरिक शासन भविष्य में बनने वाले संघ को समर्पित कर देने के लिये दबाव बना रही है तथा परमोच्च सत्ता शासकों से सौदा करना चाहती है। इसलिये शासकों ने इन विशेष प्रतिनिधियों से वार्ता करने के लिये चालाक मंत्रियों एवं संवैधानिक विशेषज्ञों को नियुक्त किया। इन अधिकारियों को सम्मिलन पत्र की प्रतियाँ उपलब्ध करवायी गयीं जो कि राज्यों को पहले से ही भेजी जा चुकी थीं। इन अधिकारियों को वायसराय के लिखित आदेश भी दिये गये।

    वायसराय के इन विशेष अधिकारियों ने वर्ष 1936-37 की सर्दियों में विभिन्न राज्यों का दौरा किया तथा राज्याधिकारियों एवं शासकों से हुए विचार विमर्श के दौरान पाया कि राज्यों के शासकों का मानस संघ में सम्मिलन का नहीं था। वे प्रस्तावित संघ को अपनी सुरक्षा तथा सम्प्रभुता के लिये सबसे बड़ा खतरा समझते थे। इन विचार विमर्शों के दौरान राजाओं ने स्पष्ट कर दिया कि उनके लिये देश की एकता की प्रेरणा प्रमुख नहीं थी और न ही वे संघ में सम्मिलन के लिये चिरौरी करने की इच्छा रखते थे। उन्हें जिस प्रश्न ने विचलित कर रखा था वह यह नहीं था कि संघ का निर्माण उन्हें सम्पूर्ण भारत के हित के लिये भागीदारी निभाने का अवसर देगा, अपितु उनके समक्ष विचलित करने वाला प्रश्न यह था कि उनकी अपनी स्थिति संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और बेहतर होगी अथवा संघ से बाहर।

    जब 1936 में वायसराय के विशेष दूत फ्रांसिस वायली ने बीकानेर राज्य का दौरा किया तो उसने महाराजा गंगासिंह को संघ का सर्वाधिक दृढ़ विरोधी पाया। वायसराय का विशेष दूत फ्रांसिस वायली जोधपुर भी आया। वह जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह से वार्तालाप के पश्चात् संतुष्ट हुआ। उसने वायसराय को जो रिपोर्ट भेजी, उसमें महाराजा उम्मेदसिंह की प्रवृत्ति की प्रशंसा की। जयपुर राज्य भी संघ में मिलने के लिये सहमत था किंतु कुछ शर्तों पर।

    अंग्रेज सरकार के लिये उदयपुर राज्य का रवैया इस दिशा में सर्वाधिक चौंकाने वाला था। महाराणा को संघ योजना की कोई जानकारी नहीं थी तथा रियासत का दीवान पण्डित धर्मनारायण ही इस विषय पर बात कर रहा था। दीवान ने अंग्रेज राजदूत को बताया कि महाराणा राजपूताने के समस्त राज्यों का एक सम्मेलन उदयपुर में आयोजित करने जा रहे हैं। इस सम्मेलन में राजपूताना के राजाओं की जो सामूहिक राय होगी, महाराणा उसी के अनुसार कार्य करेंगे। इस पर अंग्रेज राजदूत ने पण्डित धर्मनारायण को धमकाया कि वे किसी सम्मेलन का आयोजन न करें। क्योंकि यदि इस सम्मेलन में राजाओं ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि वे संघ में नहीं मिलेंगे तो अंग्रेज सरकार यह समझने के लिये स्वतंत्र होगी कि ऐसा महाराणा के उकसाने पर किया गया। राजदूत ने उदयपुर राज्य की गतिविधियों की सारी जानकारी वायसराय को लिख भेजी। राजदूत के समझाने पर उदयपुर ने सम्मेलन के आयोजन का निश्चय त्याग दिया।

    1937 के आरंभ में वायसराय के विशेष दूतों ने अपनी रिपोर्ट वायसराय को प्रस्तुत कर दी जिसमें कहा गया कि शासक संघ में सम्मिलन के प्रश्न पर सौदेबाजी करने की इच्छा रखते हैं तथा कई तरह की सुविधायें चाहते हैं। सर आर्थर लोठियान ने अपनी रिपोर्ट में मिशन की असफलता के छः कारण बताये। पहला यह कि प्रथम गोलमेज सम्मेलन से लेकर अब तक छः सात वर्ष का समय बीत चुका है जिसके कारण अब इस योजना में कई पेच खड़े हो गये हैं। संघीय योजना के लाभों को समझने में राजाओं की अदूरदर्शिता उन पर हावी रही है।

    राज्यों के शासकों ने भी वायसराय को अपनी ओर से पत्र भिजवाये जिसमें उन्होंने वे शर्तें लिखीं जिनके पूरा होने पर ही वे भारत संघ में सम्मिलन के लिये प्रस्तुत हो सकते थे। अधिकतर रियासतों ने मांग की कि उनके वर्तमान में मौजूद राजस्व के स्रोतों को संघ के समय में भी बने रहने का अधिकार दिया जाये। इस प्रकार राज्यों को संघ के भीतर राजस्व के मामले में यथापूर्व स्थिति मिलनी चाहिये।

    वायसराय को भी लगा कि यदि संघ में मिलते ही राजस्व में कमी आयेगी तो राज्यों को संघ में सम्मिलन के प्रति कोई आकर्षण नहीं होगा। यदि भारत सरकार अधिनियम 1935 में संशोधन करके राजस्व का अधिकार राज्यों के पास रहने दिया जाये और उन्हें संघ में मिलाने में सफलता प्राप्त की जा सके तो यह उचित होगा। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने वायसराय के इस प्रस्ताव का विरोध किया। उनकी दृष्टि में यह ब्रिटिश भारत की कीमत पर राज्यों के हित में किया गया स्थायी परिवर्तन होगा। यह संघ की मूल भावना के विरुद्ध होगा तथा ब्रिटेन तथा भारत में इसका बड़ा भारी विरोध होगा।

    जब वायसराय के अधीन कार्य कर रहे राजनीतिक विभाग ने देखा कि सेक्रेटरी ऑफ स्टेट वित्तीय मामलों पर राज्यों की यथापूर्व स्थिति को बनाये रखने के लिये संविधान में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है तो राजनीतिक विभाग ने इस दिशा में कार्य करना आरंभ किया कि वर्तमान संविधान के अंतर्गत ही राज्यों की मांगों को कहाँ तक पूरा किया जा सकता है तथा शासकों को कहाँ तक संतुष्ट किया जा सकता है!

    देशी राज्यों तथा ब्रिटिश भारत, दोनों ही पक्षों की तरफ से हो रहे विरोध के उपरांत भी ब्रिटिश सरकार ने अप्रेल 1937 से भारत सरकार अधिनियम 1935 को लागू कर दिया जिसके कारण अक्टूबर 1937 से संघीय न्यायालय ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    मई 1937 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मारकीस ऑफ जीटलैण्ड ने ब्रिटेन में भारतीय शासकों एवं ब्रिटिश भारतीय नेताओं से वार्तालाप किया तथा पाया कि वायसराय के प्रस्तावों ने राजाओं की आकांक्षाओं को बढ़ा दिया है। यदि राजाओं को यह अनुभव करवाया जाता कि वे संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और आरामदेह स्थिति में होंगे तो स्थिति कुछ भिन्न होती। सामान्यतः राजा लोग संघ में सम्मिलन के इच्छुक नहीं थे तथा वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों के साथ मोल-भाव कर रहा था।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 9

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 9

    उग्र हिन्दुत्ववादी नेताओं ने कांग्रेस को अंग्रेजों की छाया से बाहर निकाला


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    पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र तथा बंकिमचंद्र चटर्जी आदि समाज सुधारकों एवं चिंतकों ने भारतीय राजनीति के लिए उग्र राष्ट्रवाद की आधार भूमि तैयार की क्योंकि उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन के चेहरे पर हिन्दू लक्षण बहुत स्पष्ट था किंतु कांग्रेस की स्थापना करके ब्रिटिश सरकार ने उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन की धारा मंदी कर दी। कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश सरकार से विधान सभाओं में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि, भारत सचिव की कौंसिल में भारतीयों की नियुक्ति, सरकारी नौकरियों में भारतीयों को अँग्रेजों के समान अवसर, भू-राजस्व की दर में कमी, भारतीय उद्योगों को सरंक्षण आदि मांगें करते रहे किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों पर बहुत कम ध्यान दिया। इससे युवा कांग्रेसी नेताओं का यह भ्रम टूटने लगा कि इंग्लैण्ड की सरकार भारत में भारतीयों के लिये भी वैसी ही व्यवस्था करेगी जैसी कि अँग्रेजों के लिये इंग्लैण्ड में थी। इस कारण कांग्रेस में युवा नेताओं का एक नया गुट उभर कर सामने आया जिसने संघर्ष के माध्यम से सरकार पर दबाव डालने का निश्चय किया।

    अँग्रेज लेखकों ने इस नवीन नेतृत्व को उग्र राष्ट्रीयता, उग्रवादी तथा गरम दल नेता कहा। उनके द्वारा चलाये गये आंदोलन को उग्र राष्ट्रवाद, उग्रवाद तथा रेडिकल नेशनलिस्ट मूवमेंट कहा जाता है। इन युवा उग्रवादी नेताओं ने वृद्ध एवं उदारवादी नेताओं का विरोध किया जो अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते थे और आवेदन-निवेदन, तथा स्मरण-पत्रों के माध्यम से भारतीयों को राजनीतिक अधिकार दिलवाना चाहते थे। उग्र राष्ट्रवादियों को उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की शैली पसन्द नहीं आई। वे उग्र जन-आन्दोलन के माध्यम से भारतीयों के लिये राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए अधीर थे। उग्रवादी नेताओं का मानना था कि कमजोर विरोध तथा अस्थिर वैधानिक सुधारों से भारत की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इस कारण कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद का दौर शुरू हुआ।

    कांग्रेस में उग्रराष्ट्रवाद के जनक बाल गंगाधर तिलक थे। ई.1896 में बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस के मंच से कहा- 'गत 12 वर्षों से हम चिल्ला रहे है कि शासन हमारी बातों को सुने किन्तु सरकार हमारी आवाज को नहीं सुनती, बन्दूक की आवाज को सुनती है। हमारे शासकों ने हमारे ऊपर अविश्वास किया है। अब हमें अधिक शक्तिशाली संवैधानिक साधनों के आधार पर अपनी बात उन्हें सुनानी चाहिए।' ई.1897 में तिलक ने कमिश्नर रैण्ड की हत्या को न्याय-संगत ठहराते हुए एक लेख लिखा। इसके लिये उन्हें 18 माह की सजा हुई। ई.1899 में बम्बई के गवर्नर सैण्डहर्स्ट ने प्लेग ग्रस्त महाराष्ट्र की जनता पर आतंकपूर्ण कार्यवाही की। तिलक ने कांग्रेस के ई.1899 के लखनऊ अधिवेशन में सैण्डहर्स्ट के विरुद्ध प्रस्ताव रखा किंतु उदारवादियों के दबाव में उन्हें वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

    इस प्रकार 19वीं सदी के अंतिम दशक में तिलक की अगुवाई में कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद का प्रवेश हुआ। तिलक का कहना था कि हर हाल में विदेशी राज का विरोध करो। तिलक का आदर्श था- 'दूसरों की सेवा और स्वयं के लिये कष्ट।' वे गांव की चौपाल पर बैठकर बात करते थे। वे पिटीशिन (याचिका) की बजाये प्रोटेस्ट (विरोध) करने में विश्वास करते थे। तिलक ने स्पष्ट घोषणा की- 'स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे....... स्वराज्य के बिना कोई सामाजिक सुधार नहीं हो सकते, न कोई औद्योगिक प्रगति, न कोई उपयोगी शिक्षा और न ही राष्ट्रीय जीवन की परिपूर्णता। यही हम चाहते हैं और इसी के लिये ईश्वर ने मुझे इस संसार में भेजा है।'

    यही कारण है कि ब्रिटिश पत्रकार वेलेंटाइन शिरोल ने तिलक को फादर ऑफ इण्डियन अनरेस्ट (भारतीय असन्तोष का जनक) कहा है। कांग्रेस में गरम दल की स्थापना का श्रेय तिलक को ही है।

    यदि तिलक 'भारतीय असंतोष के जनक' थे तो महर्षि अरविंद घोष 'हिन्दू धर्म के राष्ट्रीयकरण के शिल्पी' थे। अगस्त 1893 में अरविन्द घोष ने न्यू लैम्प्स फॉर ओल्ड (पुरानों के स्थान पर नये दीप) शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने विचार प्रकट किया कि विरोध-पत्रों, प्रार्थना-पत्रों और स्मृति-पत्रों से देश कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता। महर्षि अरविंद ने अपने वन्देमातरम् नामक पत्र में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्य करने और संघर्ष करने के लिए एक कार्यक्रम बताया। इस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीयों को स्वदेशी, असहयोग, राष्ट्रभाषा और बहिष्कार का मन्त्र दिया।

    अरविंद घोष ने भारतीयों को स्पष्ट मार्ग दिखाते हुए कहा- 'स्वतंत्रता हमारे जीवन का उद्देश्य है। हिन्दू धर्म ही हमारे इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा। राष्ट्रीयता एक धर्म है और ईश्वर की देन है..... भारत पुनः एक गुरु और मार्ग दर्शक के रूप में अपनी भूमिका निभाए, लोगों की आत्ममुक्ति हो ताकि राजनीतिक जीवन में वेदान्त के आदर्श प्राप्त किये जा सकें। यही भारत के लिये सच्चा स्वराज्य होगा। ' ई.1905 में जब बंग-भंग आंदोलन चला तो अरविंद ने घोषित किया- 'राष्ट्रवाद कभी मर नहीं सकता क्योंकि यह ईश्वर ही है जो बंगाल में कार्य कर रहा है, ईश्वर को कभी मारा नहीं जा सकता, ईश्वर को जेल नहीं भेजा जा सकता।'

    महाराष्ट्र के सर्वमान्य नेता बालगंगाधर तिलक और बंगाल के सर्वमान्य नेता महर्षि अरविंद के तेजस्वी विचारों के समान ही पंजाब के सर्वमान्य नेता लाला लाजपतराय ने भी कांग्रेस के उग्र हिन्दुत्व को विचारों की और भी पैनी धार प्रदान की। उन्हें पंजाब केसरी तथा शेरे-पंजाब कहा जाता था। उन्होंने पंजाबी तथा वन्देमातरम् नामक दैनिक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। वे आर्यसमाज के प्रबल समर्थक थे। कांग्रेस के ई.1902 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। उन्हें सरदार अजीतसिंह के साथ मिलकर कोलोनाइजेशन बिल के खिलाफ आंदोलन चलाने के अपराध में बर्मा की माण्डले जेल में बंद किया गया। उनका कहना था- 'जैसे दास की आत्मा नहीं होती उसी प्रकार दास जाति की कोई आत्मा नहीं होती। आत्मा के बिना मनुष्य निरा पशु है इसलिये एक देश के लिये स्वराज्य परम आवश्यक है और सुधार अथवा उत्तम राज्य इसके विकल्प नहीं हो सकते।'

    बंगाल के एक और प्रखर विचारक विपिनचंद्र पाल भी कांग्रेस के उग्र हिन्दुत्व को नई ऊँचाईयों तक ले जाने में सफल रहे। लाल (लाला लाजपतराय), बाल (बालगंगाधर तिलक) और पाल (विपिनचंद्र पाल) को उग्रवादी तिकड़ी (बिग थ्री) कहा जाता था। विपिनचंद्र पाल का कहना था- 'देश को रिफॉर्म (सुधार) की नहीं अपितु री-फार्म (फिर से निर्माण) की आवश्यकता है..... अँग्रेजों को अपनी इच्छा से कर लगाने और उसे खर्च करने का अधिकार छोड़ना होगा।'

    कांग्रेस के उदारवादी नेताओं की नीतियों की आलोचना करने वालों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानन्द और लाला मुंशीराम भी थे। फरवरी 1902 में स्वामी विवेकानन्द ने स्वामी अखण्डानन्द को एक पत्र लिखकर उनसे पूछा- 'भयंकर अकाल, बाढ़, बीमारी और महामारी के इन दिनों में बताइए कि आपके कांग्रेसी लोग कहाँ हैं? क्या सिर्फ यही कहने से काम चलेगा कि देश की सरकार हमारे हाथ में सौंप दीजिए? और उनकी बात सुनता भी कौन है ? अगर कोई आदमी काम करता है तो क्या उसे किसी चीज के लिए मुँह खोलना पड़ता है?' इस प्रकार, कांग्रेस में उग्र राष्ट्रीयता की भावना पनपने लगी। लाल, बाल, पाल, महर्षि अरविंद और उनके अनुयायी, भारतीयों की शक्ति को संगठित करके ब्रिटिश सरकार पर इतना दबाव डालना चाहते थे कि सरकार उनकी मांगों को ठुकरा न सके और भारतीयों को उनका देश सौंप दे।


    बंग-भंग से देश में उग्र हिन्दुत्व की लहर

    भारतीयों की मांग से पूरी तरह बेपरवाह अंग्रेज सत्ता भारत में अपना राजनीतिक दांव खेल रही थी। नवाब सिराजुद्दौला एवं मीर जाफर से छीने हुए जिस बंगाल में अंग्रेजों ने प्रथम ब्रिटिश प्रांत की स्थापना की थी, उस बंगाल में बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा तथा छोटा नागपुर तक विस्तृत भू-भाग सम्मिलित था। लॉर्ड कर्जन ने 18 जुलाई 1905 को बंगाल का विभाजन करके पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल नामक दो प्रांत बनाये। पहले टुकड़े में बंगाल का पूर्वी भाग और आसाम का क्षेत्र रखा गया। इस प्रांत के लिये पृथक् लेफिटनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया जिसकी राजधानी ढाका रखी गई। पश्चिमी बंगाल में बिहार, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल के क्षेत्र रखे गये। इसकी राजधानी कलकत्ता में रही। बंगाल को विभाजित करने का वास्तविक उद्देश्य बंगाल की एकजुट राजनीतिक शक्ति को भंग करना था।

    अँग्रेजों ने बंग-भंग के माध्यम से पूर्वी बंगाल के रूप में एक ऐसा प्रान्त बना दिया जिसमें मुसलमानों की प्रधानता थी। अँग्रेजों को आशा थी कि नया प्रांत, हिन्दू बहुल पश्चिमी प्रांत के विरुद्ध आवाज बुलंद करता रहेगा। सैयद अहमद खाँ तथा उनके साथियों ने इस कार्य में अँग्रेजों का साथ दिया ताकि उनकी राजनीति चमक जाये। पूर्वी बंगाल में 3 करोड़ 10 लाख लोग रहते थे जिनमें से 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान थे। लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल प्रान्त में मुसलमानों की सभाएं आयोजित कीं जिनमें उसने कहा कि यह विभाजन केवल शासन की सुविधा के लिए ही नहीं किया जा रहा है वरन् उसके द्वारा एक मुस्लिम प्रान्त बनाया जा रहा है जिसमें इस्लाम के अनुयायियों की प्रधानता होगी। बचे हुए पश्चिमी बंगाल प्रान्त में 1 करोड़ 70 लाख बंगला-भाषी लोगों की तुलना में बिहारी तथा उड़िया भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ 10 लाख थी। इस प्रकार बंगाली हिन्दू, पूर्वी बंगाल में धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक बना दिये गये तथा पश्चिमी बंगाल में भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक बना दिये गये।

    बंगाल विभाजन के पीछे अँग्रेजों के मन में कई प्रकार के भय कार्य कर रहे थे। उस समय के भारत सरकार के गृह सचिव हारवर्ट होप रिसले ने एक गोपनीय रिपोर्ट लिखी- 'संयुक्त बंगाल एक शक्ति है। बंगाल का विभाजन हो जाने पर वह अलग-अलग रास्तों में बंट जायेगा........ हमारा एक मुख्य उद्देश्य है हमारे विरोध में संगठित शक्ति को विभाजित करना और उसे कमजोर बनाना।' लॉर्ड रोनाल्डशे ने कहा था- 'बंगाली राष्ट्रीयता की बढ़ती हुई दृढ़ता पर आघात किया गया था।' कर्जन के इस कृत्य की ब्रिटेन के समाचार पत्रों ने भी निन्दा की।

    मैनचेस्टर गारजियन ने लिखा- 'बंगाल को दो टुकड़ों में बांट देने की कर्जन की योजना को समझना कठिन है और उसे क्षमा कर देना और भी कठिन।' बंगाल के विभाजन से उग्र हिन्दुत्व आधारित राष्ट्रीय आन्दोलन में अचानक तेजी आ गयी। समस्त भारत ने इस विभाजन का कड़ा विरोध किया। सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए दमन का सहारा लिया जिससे गरम दल नेताओं को नया कार्यक्षेत्र एवं अनुकूल वातावरण प्राप्त हो गया। कलकत्ता मंग महाराजा जतीन्द्रमोहन ठाकुर की अध्यक्षता में एक सार्वजनिक सभा आयोजित हुई जिसमें सरकार से बंगाल विभाजन के सम्बन्ध में कुछ संशोधन करने की मांग की गई। कर्जन ने किसी भी प्रकार का संशोधन करने से मना कर दिया।

    7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हाल में विराट जनसभा हुई जिसमें बड़े-बड़े नेता तथा विभिन्न जिलों के प्रतिनिधि मण्डल उपस्थिति थे। इसके बाद पूरे बंगाल में बंग-भंग के विरोध में जनसभाएँ हुईं। इन सभाओं में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का कार्यक्रम स्वीकार किया गया। 16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा को कार्यान्वित कर दिया। बंगाली जनता ने इस दिन को शोक-दिवस के रूप में मनाया। प्रातःकाल से ही कलकत्ता सहित विभिन्न नगरों की सड़कें वन्देमातरम् के गायन से गूँज उठीं। मनुष्यों के समूह नदी के किनारे एकत्रित होकर एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने लगे। गायन मण्डलियों ने वीर रस से ओत-प्रोत गीत गा-गाकर जनता में देशभक्ति की भावना जागृत की। उस दिन पूरे बंगाल में हड़ताल रही। स्थान-स्थान पर आयोजित जन-सभाओं में बंगालियों ने प्रण लिया कि हम एक जाति की हैसियत से, अपने प्रांत के बँटवारे से पैदा हुए बुरे प्रभावों को दूर करने और अपनी जाति की एकता बनाये रखने के लिए शक्ति-भर सब-कुछ करेंगें।

    कलकत्ता में एक फेडरेशन हॉल का शिलान्यास किया गया जिसमें समस्त जिलों की मूर्तियों को रखा गया। पृथक् किये गये जिलों की मूर्तियों को पुनः एक होने तक के लिये ढक दिया गया। अनेक स्थानों पर हड़ताल एवे उपवासों के आयेाजन किये गये। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने बुनकर उद्योग की सहायता से राष्ट्रीय निधि की स्थापना की। विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के लिए व्यापक अभियान आरम्भ हुआ। देश भर में बंग-भंग के विरोध में जनसभाएं आयोजित की गईं। पूरा बंगाल वन्देमातरम् के गायन से गूँज उठा। सरकारी दमन ने आन्दोलन को और अधिक उग्र बना दिया। वन्देमातरम् के गीत पर नियन्त्रण व आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारी से आन्दोलन ने अत्यधिक उग्र रूप धारण कर लिया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और विपिनचन्द्र पाल ने समूचे बंगाल का दौरा करके जनता से अपील की कि वे बंग-भंग विरोधी अभियान को सफल बनायें। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व इस समय भी उदारवादियों के हाथों में था किंतु कांग्रेस ने बंग-भंग की कटु आलोचना की। नवयुवकों और विद्यार्थियांे ने इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में भाग लिया।

    लॉर्ड कर्जन और उनके सहयोगियों ने मुसलमानों को इस आन्दोलन से अलग रखने के प्रयास किये किंतु अब्दुल रसूल, लियाकत हुसैन, अब्दुल हलीम गजनवी, यूसुफ खान बहादुर, मुहम्मद इस्माइल चौधरी आदि नेताओं के नेतृत्व में बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में भाग लिया। मुसलमान नेताओं ने विशाल सभा का आयोजन करके प्रस्ताव पारित किया कि देश की उन्नति के लिए जो काम हिन्दू करेंगे, मुसलमान उसका समर्थन करेंगे, मुसलमान हिन्दुओं का साथ बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में ही नहीं अपितु दूसरे मामलों में भी देंगे, और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रयोग का समर्थन करेंगे। इस पर अँग्रेजों ने उन अलगाववादी मुस्लिम नेताओं को दंगे करने के लिये भड़काया जो अपने लिये एक मुस्लिम-बहुल प्रांत चाहते थे। इससे हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की स्थिति बिगड़ गई।

    सरकार ने सार्वजनिक सभाओें पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अध्यापकों को चेतावनी दी गई कि वे अपने छात्रों को इस आन्दोलन से दूर रखें। मैमनसिंह जिले में दो लड़कों पर केवल इसलिए जुर्माना किया गया कि वे वन्देमातरम् गा रहे थे। सरकार ने निजी शिक्षण संस्थाओं को धमकी दी कि जिस स्कूल के अधिकारी अपने छात्रों एवं अध्यापकों को इस आन्दोलन से अलग नहीं रखेंगे उनकी मान्यता समाप्त करके सरकारी सहायता बंद कर दी जायेगी। इन स्कूलों के प्रबंधकों ने बहुत से छात्रों और शिक्षकों को स्कूलों से हटा दिया। सरकार ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को बन्दी बनाकर उन्हें अमानवीय सजाएं दीं। गोरी सरकार का भयावह चेहरा उस समय खुलकर सामने आया जब सरकार ने पूर्वी-बंगाल के मुसलमानों को हिन्दुओं पर आक्रमण करने तथा उन पर अत्याचार करने के लिये उकसाया।

    एक स्थान पर तो मुसलमानों ने ढोल-बजा-बजा कर घोषणा करवाई कि सरकार ने उन्हें, हिन्दुओं को लूटने एवं हिन्दू-विधवाओं के साथ विवाह करने की अनुमति दे दी है। बंगाल के गवर्नर वैमफील्ड फुलर ने लोगों को भड़काने के लिये यह बयान दिया- '...... मेरी हिन्दू और मुस्लिम पत्नियों में, मुस्लिम पत्नी मेरी ज्यादा चहेती है।'

    बंगाल में घटी इन घटनाओं पर टिप्पणी करते हुए उन दिनों के प्रसिद्ध समाचार पत्र मार्डन रिव्यू ने लिखा था- 'आन्दोलन-काल की घटनाएं समस्त सम्बन्धित पक्षों के लिए निन्दनीय हैं.......हिन्दुओं के लिए उनकी भीरूता के लिए, क्योंकि उन्होंने मन्दिरों के अपवित्रीकरण, मूर्तियों के खण्डन तथा स्त्रियों के अपहरण के विरुद्ध बल-प्रयोग नहीं किया, स्थानीय मुस्लिम जनता के लिए नीच व्यक्तियों के बाहुल्य के कारण और अँग्रेजी सरकार के लिए इस कारण कि उसके शासन में इस प्रकार की घटनाएँ बिना रोक-टोक के बहुत दिनों तक होती रहीं।'


    उग्र हिन्दू राष्ट्रवाद के हाथों अंग्रेजों की उनकी ही राजधानी कलकत्ता में शिकस्त

    बंग-भंग आंदोलन के दौरान लॉर्ड कर्जन ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक खाई उत्पन्न कर दी, जो उत्तरोतर गहरी होती गई और देश में साम्प्रदायिकता की भयानक समस्या उत्पन्न हो गई। बंग-भंग आन्दोलन के दौरान अनेक स्थानों पर दंगे हुए तथा हिन्दुओं के साथ घोर अन्याय किया गया। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर ई.1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई। उदारवादी कांग्रेसी, गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व में तथा उग्रवादी कांग्रेसी, बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में अलग हो गये।

    उदारवादी गुट स्वयं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कहने लगा जबकि उग्रवादी गुट द्वारा स्वयं को राष्ट्रीय पार्टी कहा गया। इस सम्मेलन के बाद सरकार ने बालगंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल आदि को गिरफ्तार करके बंग-भंग आंदोलन को विफल करने का प्रयास किया। ई.1909 में भारत सरकार ने मार्ले-मिण्टो एक्ट के माध्यम से बंग-भंग आंदोलन की हवा निकालनी चाही। वायसराय की कार्यकारिणी में एक भारतीय सदस्य को स्थान दिया गया, प्रान्तों के गवर्नरों की कार्यकारिणी में भारतीयों की संख्या बढ़ाई गई तथा विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या में वृद्धि करके मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व दिये गये। आरम्भ में नरम पंथी नेताओं ने इन सुधारों का स्वागत किया। गोखले की धारणा थी कि सरकार का यह कदम निःसन्देह उदार एवं उचित है। वे अनुरोध कर रहे थे कि जनता उनको स्वीकार करे और सरकार का अभिनन्दन करे किंतु गर्मपंथी नेताओं उग्रवादियों का कहना था कि ये सुधार भारतीयों को मूर्ख बनाने के लिए किये गए थे। शीघ्र ही उदारवादी नेता भी गर्मपंथी नेताओं से सहमत हो गए और कांग्रेस के ई.1910 के इलाहाबाद अधिवेशन में उदारवादी नेताओं द्वारा भी मार्ले-मिण्टो सुधार की कड़ी आलोचना की गई तथा उसे हिन्दुओं एवं मुसलमानों में फूट डालने वाला एवं साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारने वाला बताया गया।

    इस प्रकार बंग-भंग आन्दोलन चलता रहा। अंत में ई.1911 में अँग्रेज सरकार ने बंग-भंग को निरस्त करके इस आंदोलन को समाप्त करवाया। इस प्रकार राष्ट्रवादी भारतीयों ने अंग्रेजों को उन्हीं की राजधानी कलकत्ता में गहरी शिकस्त दे दी। इसलिए अंग्रेज उसी वर्ष अपनी राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली ले आए। यह भारतीयों की बड़ी जीत थी।


    उग्र राष्ट्रवादी कांग्रेसी नेताओं द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन

    बंग-भंग के बाद एक बार फिर से उग्रवादी नेता कांग्रेस में हावी होने लगे। वे आवेदन-निवेदन और याचना की नीति में विश्वास नहीं करते थे तथा भारतीयों द्वारा अँग्रेजी साम्राज्य से सहयोग करने की नीति को भी उचित नहीं समझते थे। वे भारतीयों के लिये स्वराज्य चाहते थे तथा स्वराज्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की आवश्यकता अनुभव करते थे। वे जन साधारण में राष्ट्र-प्रेम एवं बलिदान की अटूट भावना विकसित करना चाहते थे जिससे घबराकर गोरी सरकार भारत से चली जाये। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार और राष्ट्रीय शिक्षा पर बल देते थे। इस काल में भारत का सम्पन्न वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग एवं मध्यम वर्ग पश्चिमी शिक्षा एवं जीवन शैली के आकर्षण में फंसे हुए थे। इन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए उनके समक्ष भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित करना आवश्यक था। इसी उद्देश्य से बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में जन साधारण के स्तर पर गणेश पूजन तथा शिवाजी उत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ की।

    अरविन्द घोष ने बंगाल में एक माह तक चलने वाली काली पूजा आरम्भ की। लाला लाजपतराय ने पंजाब में आर्य समाज आन्दोलन को सशक्त बनाने का काम किया। इस प्रकार इन उग्र-राष्ट्रवादी नेताओं ने इन धार्मिक एवं सामाजिक समारोहों को व्यापक रूप देकर उन्हें राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक चेतना उत्पन्न करने का प्रभावी माध्यम बना दिया। राष्ट्रवादी नेताओं ने जनसाधरण को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उठ खड़े होने एवं उनमें एकता की भावना उत्पन्न करने के लिये व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं धार्मिक समारोहों को आरम्भ किया था किंतु अँग्रेजों ने इन समारोहों की आड़ में मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध उकसाया तथा कट्टर मुस्लिम नेताओं को पृथकतावादी आन्दोलन आरम्भ करने हेतु प्रोत्साहित किया।

    अँग्रेज अधिकारियों का आरोप था कि तिलक द्वारा स्थापित गोरक्षिणी सभा, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कलह का स्रोत थी। जबकि एन. एम. गोल्डवर्ग ने लीडर ऑफ द डेमोक्रेटिक विंग इन महाराष्ट्र में लिखा है कि तिलक द्वारा आरम्भ किये गये गणपति पूजन में शिया एवं सुन्नी भी आते थे। इन्दुलाल याज्ञिक ने अपनी कृति श्यामजी कृष्ण वर्मा की जीवनी में गोल्डबर्ग के इस कथन की पुष्टि की है किंतु अंग्रेज सरकार द्वारा उग्र राष्ट्रवाद को मुस्लिम-विरोधी बताकर उसे असफल करने के प्रयास जारी रखे गए। इस कारण भारत में द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धान्त का विकास हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार भारत में एक राष्ट्र नहीं होकर दो राष्ट्र बसते हैं- पहला हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। इस विचार से प्रभावित होकर अनेक मुसलमानों ने स्वयं को राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर कर लिया तथा ई.1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की।

    उग्रवादी नेता भारत में ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति स्थापित करना चाहते थे जो देशभक्त नागरिक तैयार कर सके। उनका मानना था कि अँग्रेजी शिक्षा पद्धति से मानसिक गुलाम तैयार किये जा रहे हैं। यदि भारतीय नौजवानों में स्वतंत्र चिंतन की योग्यता उत्पन्न हो जाये तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को स्वतः गति प्राप्त हो जायेगी। इस विचार से प्रेरित होकर उग्रवादी नेताओं ने देश भर में थियोसॉफिकल स्कूल और कॉलेज, डी. ए. वी. स्कूल, हिन्दू कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आदि स्थापित किये। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीयता के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पर अँग्रेजों ने मुसलमानों तथा अन्य धर्मावलम्बियों को भी अपनी अलग शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के लिये उकासाया जिनमें उन धर्मों, मतों एवं पंथों की धार्मिक शिक्षा दी जाने लगी। उदारवादियों एवं उग्रवादियों के राजनीतिक उद्देश्यों में बहुत बड़ा अंतर था।

    उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही उत्तरदायी सरकार की कल्पना करते थे। वे अँग्रेजों के रहने में ही भारत का कल्याण समझते थे। एक बार लॉर्ड हार्डिंग ने गोखले से कहा- 'तुम्हें कैसा लगेगा यदि तुम्हें मैं यह कहूँ कि एक माह में ही समस्त ब्रिटिश अधिकारी और सेना भारत छोड़ देंगे।' इस पर गोखले का उत्तर था- 'मैं इस समाचार को सुनकर प्रसन्नता अनुभव करूंगा किन्तु इससे पूर्व कि आप लोग अदन तक पहुँचेगें, हम आपको वापस आने के लिये तार कर देंगे।'

    उदारवादियों से ठीक उलट, उग्रवादियों ने देश के लिये स्वराज की मांग की। तिलक का कहना था कि जितनी जल्दी हो सके अँग्रेजों को भारत से चले जाना चाहिए। इससे भारतीयों को अपार प्रसन्नता होगी। उग्रवादी नेताओं का मानना था कि विदेशी सुशासन कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।

    उग्र-राष्ट्रवादी नेता विपिनचन्द्र पाल का कहना था- 'कोई किसी को स्वराज्य नहीं दे सकता। यदि आज अँग्रेज उन्हंो स्वराज्य देना चाहें तो वह ऐसे स्वराज्य को ठुकरा देंगे क्योंकि मैं जिस वस्तु को उपार्जित नहीं कर सकता; उसे स्वीकार करने का भी पात्र नहीं हूँ।' तिलक का कहना था कि- 'राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए लड़ना पड़ेगा...... अँग्रेजों के साथ सहयोग करना और भिक्षा तथा उपहार, वरदानों के रूप में अधिकार प्राप्त करना नितान्त भ्रामक है।' लाला लाजपतराय ने ई.1905 के कांग्र्रेस अधिवेशन में कहा था- 'एक अँग्रेज को भिखारी से बड़ी घृणा और विरक्ति होती है। मेरे विचार में भिखारी है ही इस योग्य कि उससे घृणा की जाये। अतः हमारा कर्त्तव्य है कि अब हम अँग्रेजों को दिखा दें कि हम भिक्षुक नहीं हैं। हमारा आदर्श भीख मांगना नहीं, वरन् आत्म-निर्भरता है।'

    यदि उस काल की कांग्रेस के उदारवादी एवं उग्रवादी नेताओं का समग्र विश्लेषण किया जाए तो यह बात स्पष्ट होगी कि यद्यपि उग्र राष्ट्रवाद, उदारवाद की प्रतिक्रया में उत्पन्न हुआ था तथापि वे एक दूसरे के पूरक थे। उदारवादियों ने, कांग्रेस के रूप में उग्रवादियों के लिये एक पृष्ठभूमि तैयार की तथा उग्रवाद ने उसी कांग्रेस का उपयोग अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने में किया। दोनों ही सच्चे देशभक्त और देशप्रेमी थे। रामनाथ सुमन ने लिखा है- 'जब हम नरम व गरम दोनों दलों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण और अध्ययन करते हैं तो मालूम पड़ता है कि हमारी राष्ट्रीयता के विकास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों हमारी राजनीति के स्वाभाविक उपकरण हैं। वस्तुतः वे एक ही आन्दोलन के दो पक्ष हैं। एक ही दीपक के दो परिणाम हैं। पहला प्रकाश का द्योतक है; दूसरा गर्मी का। पहला बुद्धि-पक्ष है; दूसरा भाव-पक्ष है। पहला कुछ सुविधाएं प्राप्त करना चाहता था, दूसरे का उद्देश्य राष्ट्र में मानसिक परिवर्तन करना था।'

    उग्रवादी आन्दोलन के नेताओं ने ही इस बात को जोर देकर कहा कि राजनीतिक आजादी ही राष्ट्र का जीवन है। इस कारण ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत के साथ उग्रवादियों को कुचलना आरम्भ कर दिया। ई.1908 में समाचार पत्र विधेयक लागू किया गया ताकि ये नेता जनता में अपने विचारों का प्रसार नहीं कर सकें। सरकार द्वारा उसी वर्ष आतंकवादी अभियोगों से निपटने के लिए दंडविधि संशोधन अधिनियम (1908) और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबंधित करने के लिए राजद्रोह सम्मेलन अधिनियम-1911 लागू किया गया।

    बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय तथा अन्य उग्रवादी नेताओं को बंदी बना लिया गया जिससे उग्रवादियों को भारी धक्का लगा। रिहाई के बाद अनेक नेताओं का मनोबल टूट गया। ई.1916 में बाल गंगाधर तिलक, लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस की एकता फिर से स्थापित करने में सफल रहे और एनीबीसेंट के साथ मिलकर होमरूल आन्दोलन चलाते रहे। बाल गंगाधर तिलक को अपने जीवन का काफी हिस्सा अंग्रेजों की जेलों में बिताना पड़ा। इसलिए ई.1919 के आते-आते उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। इस समय तक ई.1915 में मोहनदास गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट चुके थे और ई.1917 के चम्पारण आंदोलन से कुछ प्रसिद्धि भी पा गए थे। ई.1919 के आते-आते गांधीजी कांग्रेस के मंचों पर जगह बनाने लगे। जब ई.1919 में गांधी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा तो बाल गंगाधर तिलक और श्रीमती एनीबीसेंट ने नाराज होकर कांग्रेस छोड़ दी। वे इस लिजलिजी राजनीति को कांग्रेस के लिए अच्छी शरुआत नहीं समझते थे। 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया और देश ने अपने महानतम नेताओं में से एक को खो दिया। इस प्रकार भारतीय असंतोष से निबटने के लिए ई.1885 में अंग्रेजों ने कांग्रेस रूपी जिस यंत्र का आविष्कार किया था, राष्ट्रवादी नेताओं ने ई.1905 में उसे भारत की आजादी प्राप्त करने का युद्धपोत बना दिया किंतु इससे पहले कि कांग्रेस रूपी युद्धपोत आजादी की दिशा में एक इंच भी आगे बढ़ पाता, ई.1906 में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग रूपी दूसरे युद्धपोत का आविष्कार किया जो बड़ी ही दृढ़ता से कांग्रेस का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए विपरीत दिशा से तीव्र वेग से चला आ रहा था।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-104

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-104

    अजमेर दंगों पर सरदार पटेल का जवाहरलाल नेहरू से विवाद हो गया


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    5 दिसम्बर 1947 को अजमेर में साम्प्रदायिक दंगे फैल गये। इन दंगों को रोकने के लिये दिल्ली से सेना बुलानी पड़ी। दिल्ली क्षेत्र के कमाण्डिंग अधिकारी जनरल राजेन्द्रसिंह ने अजमेर का दो दिवसीय भ्रमण किया। पं. नेहरू ने इण्टर डोमिनियन मायनोरिटीज के अध्यक्ष एन. आर. मलकानी को एक तार भेजकर सूचित किया कि मुझे अजमेर में हुए दंगों पर गहरा खेद है किंतु दरगाह को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।

    नेहरू ने मलकानी को यह भी सूचित किया कि वे शीघ्र ही अजमेर का दौरा करेंगे। पाकिस्तान सरकार के शरणार्थी एवं पुनर्वास मंत्री गजनफर अली खां ने भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल को अजमेर की स्थिति के सम्बन्ध में टेलिग्राम किया।

    17 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने उसे जवाब में टेलिग्राम भिजवाकर सूचित किया कि अजमेर में स्थिति नियंत्रण में है तथा एक सैनिक टुकड़ी दरगाह की रक्षा कर रही है। जवाहरलाल नेहरू अजमेर के दंगों पर बहुत चिंतित थे। बालकृष्ण कौल एवं मुकुट बिहारी लाल ने नेहरू को अजमेर की स्थिति के बारे में सूचित किया। नेहरू अजमेर के अधिकारियों एवं पुलिस के रवैये से प्रसन्न नहीं थे। नेहरू ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में दो महत्त्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाया। पहला बिंदु यह था कि यदि इस घटना की बड़े स्तर पर पुनरावृत्ति हुई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दूसरा यह कि दरगाह के कारण अजमेर पूरे भारत में तथा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

    यदि दरगाह को कुछ हुआ तो उसका प्रचार पूरे भारत में एवं पूरे विश्व में होगा। इससे भारत सरकार की छवि को धक्का पहुँचेगा। जवाहरलाल नेहरू का पत्र मिलने के बाद सरदार पटेल ने अजमेर प्रकरण पर एक सार्वजनिक वक्तव्य जारी किया। उन्होंने अजमेर में हुई मौतों की संख्या बताते हुए कहा कि 15 दिसम्बर 1947 से लेकर अब तक हुए दंगों में 5 हिन्दू तथा 1 मुसलमान मरा है। साथ ही पुलिस फायरिंग में 21 हिन्दू तथा 62 मुसलमान घायल हुए हैं। मिलिट्री की फायरिंग में 8 हिन्दू तथा 7 मुसलमान मारे गये हैं और 2 हिन्दू एवं 2 मुसलमान घायल हुए हैं। सम्पत्ति का भयानक नुक्सान हुआ है।

    अधिक नुक्सान स्टेशन रोड तथा इम्पीरियल रोड पर स्थित मुसलमानों की आठ बड़ी दुकानों में हुआ है। कुछ अन्य दुकानों यथा स्टेशनरी, चूड़ी, आलू, कोयला, किताबों आदि की दुकानों में भी नुक्सान हुआ है। कुल 41 दुकानें लूटी गई हैं तथा 16 दुकानें जलाई गई हैं। इनमें से तीन दुकानें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सम्पत्ति को नष्ट होने से बचाने तथा दंगाइयों को बंदी बनाने के लिये सघन प्रयास किये गये हैं।

    दरगाह इस सबसे पूरी तरह सुरक्षित रही है। सरदार पटेल ने दरगाह से जुड़े धार्मिक लोगों से अपील की कि वे इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखेंगे। उन्होंने सरकार की ओर से आशा व्यक्त की कि इस ऐतिहासिक नगरी में शीघ्र ही फिर से शांति स्थापित होगी।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 10

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 10

    मुस्लिम नेताओं को लॉर्ड मिण्टो का निमंत्रण


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    जब कांग्रेस देश की आजादी की मांग करने लगी तो अँग्रेज नौकरशाहों ने मुसलमानों की चिंताओं का लाभ उठाने का निश्चय किया। वायसराय लॉर्ड मिण्टो (ई.1905-10) के निजी सचिव स्मिथ ने अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसिपल आर्किबाल्ड को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि- 'यदि आगामी सुधारों के बारे में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल मुसलमानों के लिए अलग अधिकारों की मांग करे और इसके लिए वायसराय से मिले तो वायसराय को उनसे मिलने में प्रसन्नता होगी।' इस निमंत्रण को पाकर अलगाववादी-मुस्लिम नेताओं की बांछें खिल गईं। 1 अक्टूबर 1906 को 36 मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला में लॉर्ड मिन्टो से मिला और उन्हें एक आवेदन पत्र दिया जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गईं-

    (1) मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले।

    (2) नौकरियों में प्रतियोगी तत्त्व की समाप्ति हो।

    (3) प्रत्येक उच्च न्यायालय और मुख्य न्यायालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले।

    (4) नगरपालिकाओं में दोनों समुदायों को अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने की वैसी ही सुविधा मिले, जैसी पंजाब के कुछ नगरों में है।

    (5) विधान परिषद के चुनाव के लिए मुख्य मुस्लिम जमींदारों, वकीलों, व्यापारियों, अन्य महत्त्वपूर्ण हितों के प्रतिनिधियों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं के मुस्लिम सदस्यों तथा पांच वर्षों अथवा किसी ऐसी ही अवधि के पुराने मुसलमान स्नातकों के निर्वाचक-मण्डल बनाये जायें।

    इस प्रार्थना-पत्र में इस तथ्य पर विशेष जोर दिया गया कि भविष्य में किये जाने वाले किसी संवैधानिक परिवर्तन में न केवल मुसलमानों की संख्या, वरन् उनके राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्त्व को भी ध्यान में रखा जाये। वायसराय मिन्टो ने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डल के प्रार्थना-पत्र की प्रशंसा की तथा उनकी मांगों को उचित बताया। मिण्टो ने कहा- 'आपका यह दावा बिल्कुल उचित है कि आपके स्थान का अनुमान सिर्फ आपकी जनसंख्या के आधार पर नहीं, अपितु आपके समाज के राजनीतिक महत्त्व और उसके द्वारा की गई साम्राज्य की सेवा के आधार पर लगाया जाना चाहिए।' मिन्टो ने यह आश्वासन भी दिया कि भावी प्रशासनिक पुनर्गठन में मुसलमानों के अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे।

    इस प्रकार ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने तथा साम्प्रदायिकता की खाई को चौड़ा करने का काम किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की उत्तेजना को देखकर अँग्रेज नौकरशाह अच्छी तरह जान गये कि वे भारत के 6.2 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग करने में समर्थ हो गये हैं। इसकी पुष्टि खुद मैरी मिन्टो की डायरी से होती है। कहा जा सकता है कि अक्टूबर 1906 का मुस्लिम शिष्ट मण्डल, एक मुस्लिम राजनैतिक दल के गठन का पूर्वाभ्यास था, इसका आभास मिलते ही ब्रिटिश नौकरशाही वर्ग में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। उसी शाम एक ब्रिटिश अधिकारी ने वायसराय की पत्नी मैरी मिन्टो को पत्र लिखकर सूचित किया- 'मैं आपको संक्षेप में सूचित करता हूँ कि आज एक बहुत बड़ी बात हुई है। आज राजनीतिज्ञतापूर्ण एक ऐसा कार्य हुआ जिसका प्रभाव भारत तथा उसकी राजनीति पर चिरकाल तक पड़ता रहेगा। 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है।' इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों ने भी इसे एक बहुत बड़ी विजय बताया और मुसलमानों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। यह प्रथम अवसर था जब वायसराय के निमंत्रण पर भारत के विभिन्न भागों के मुसलमान शिमला में एकत्र हुए थे। जब वे वापिस अपने-अपने घर लौटे तब वे पूरे राजनीतिज्ञ बन चुके थे। अब उनके कंधों पर अलीगढ़ की राजनीति को सारे देश में फैलाने की जिम्मेदारी थी।

    मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने के इस काम के लिए भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने 16 अक्टूबर 1906 को गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो को पत्र लिखकर बधाई दी। ब्रिटिश सरकार ने अपना आश्वासन पूरा किया और ई.1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम के अन्तर्गत ब्रिटिश-भारत की प्रत्येक विधान सभा के लिए मुसलमानों को अपने समुदाय पर आधारित चुनाव मण्डलों से अपने प्रतिनिधियों को, अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक अनुपात में चुनने का अधिकार दिया। इस प्रकार, मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाने लगा।


    पुलिस का मुस्लिमीकरण

    कांग्रेस द्वारा किए जा रहे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े बहुसंख्यक हिन्दुओं को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पुलिस विभाग में मुसलमानों को अधिक संख्या में भरना आरम्भ किया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू जनता को कड़ाई से नियंत्रण में रखा जा सके। भारत सरकार के गृह विभाग की दिसम्बर 1909 की गोपनीय रिपोर्ट के अुनसार 1 अप्रेल 1908 को भारत सरकार में 2 सिख एवं 11 मुसलमानों के मुकाबले 2 हिन्दू सुपरिन्टेण्डेन्ट ऑफ पुलिस थे तथा 18 सिक्खों एवं 59 मुसलमानों के मुकाबले में 20 हिन्दू पुलिस इंस्पेक्टर थे। इसी प्रकार 120 सिक्खों एवं 408 मुसलमानों के विरुद्ध केवल 211 हिन्दू सब इंस्पेक्टर थे। 1 जनवरी 1909 को भारत सरकार द्वारा निम्नतम श्रेणी के 15,529 पुलिस कर्मी लिए गए। इनमें से 1,078 सिख (7 प्रतिशत), 10,164 मुसमलान (65 प्रतिशत) तथा 4,287 हिन्दू (28 प्रतिशत) पुलिस कर्मी लिए गए। स्पष्ट है कि अंग्रेज सरकार मुसलमान-पुलिस के माध्यम से बहुसंख्यक-हिन्दुओं को दबाने का कार्य कर रही थी। शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की दूरियां बढ़ीं। शासन द्वारा धर्म के आधार पर जनता के साथ असमान व्यवहार धरती के हर क्षेत्र में और हर युग में किया जाता रहा है, यह कोई पहली बार नहीं था। मुसलमानों के शासन में भी हिन्दुओं को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था और अब अंग्रेजों ने भी वही नीति अपना ली थी।


    मुस्लिम लीग की स्थापना

    ई.1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी। तब से वह हिन्दुओं एवं मुसलमानों का संयुक्त रूप से नेतृत्व करती रही थी किंतु जब ई.1906 में वायसरॉय लॉर्ड मिण्टो ने मुस्लिम नेताओं का अलग से शिमला-सम्मेलन आयोजित करके उन्हें अपने अधिकारों के लिए कांग्रेस से अलग होकर लड़ने का मंत्र दिया, तब से भारतीय मुसलमानों में अपने लिए अलग पार्टी बनाने का विचार आकार लेने लगा। 30 दिसम्बर 1906 को ढाका के नवाब सलीमउल्ला खाँ के निमंत्रण पर ढाका में, अलीगढ़ की मोहम्मडन एज्युकेशनल कॉन्फ्रेन्स की वार्षिक सभा आयोजित की गई। इस सभा में सलीमुल्ला ने मुसलमानों के अलग राजनीतिक संगठन की योजना प्रस्तुत की तथा कहा कि इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का समर्थन करना, मुसलमानों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना, कांग्रेस के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना और मुस्लिम नौजवानों को राजनीतिक मंच प्रदान करना है ताकि उन्हें भारतीय कांग्रेस से दूर रखा जा सके। सलीमउल्ला ने इस संस्था का नाम मुस्लिम ऑल इण्डिया कान्फेडरेसी सुझाया। इस प्रस्ताव को उसी दिन स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम संगठन अस्तित्व में आया जिसका नाम ऑल इंडिया मुस्लिम लीग रखा गया। नवाब विकुर-उल-मुल्क को इसका सभापति चुना गया। लीग के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए समिति गठित की गई जिसके संयुक्त सचिव मोहिसिन-उल-मुल्क तथा विकुर-उल-मुल्क नियुक्त किये गये। ई.1907 में, कराची में लीग का वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ जिसमें लीग का संविधान स्वीकार किया गया। इस संविधान में मुस्लिम लीग के निम्नलिखित लक्ष्य और उद्देश्य निर्धारित किये गये-

    (क.) भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी भी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होने वाली सरकारी कुधारणाओं को दूर करना।

    (ख.) भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक तथा अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताओं तथा उच्च आकांक्षाओं को संयत भाषा में सरकार के समक्ष रखना।

    (ग.) जहाँ तक हो सके, उक्त उद्देश्यों को हानि पहुँचाये बिना, मुसलमानों तथा भारत के अन्य समाजों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना।

    मुस्लिम लीग के संविधान में स्थायी अध्यक्ष की व्यवस्था की गई और खोजा सम्प्रदाय के धार्मिक नेता प्रिन्स आगा खाँ को अध्यक्ष बनाया गया। आगा खाँ के पास पहले से ही इतने काम थे कि उन्हें लीग के अध्यक्ष के कार्यालय का दैनिक कार्य देखने का समय नहीं था। इसलिए लीग के हर वार्षिक अधिवेशन में एक कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाता था। लीगी नेता, भारत के मुसलमानों में अपने देश के प्रति नहीं, अपितु अँग्रेजों के प्रति वफादारी की भावना बढ़ाना चाहते थे। वे भारत के अन्य निवासियों के साथ नहीं अपितु अँग्रेजों के साथ एकता स्थापित करना चाहते थे।

    लीग के सचिव जकाउल्ला ने स्पष्ट कहा- 'कांग्रेस के साथ हमारी एकता सम्भव नहीं हो सकती क्योंकि हमारे और कांग्रेसियों के उद्देश्य एक नहीं। वे प्रतिनिधि सरकार चाहते हैं, मुसलमानों के लिए जिसका मतलब मौत है। वे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा चाहते हैं और इसका मतलब होगा कि मुसलमान सरकारी नौकरियों से हाथ धो बैठेंगे। इसलिए हम लोगों को (हिन्दुओं के साथ) राजनीतिक एकता के नजदीक जाने की आवश्यकता नहीं।'

    ई.1908 में सर अली इमाम, लीग का कार्यकारी अध्यक्ष हुआ। उसने कांग्रेस की कटु आलोचना करते हुए कहा- 'जब तक कांग्रेस के नेता इस तरह की व्यावहारिक नीति नहीं अपनाते, तब तक ऑल इंण्डिया मुस्लिम लीग को अपना पवित्र कर्त्तव्य निभाना है। यह कर्त्तव्य है- मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक भूल करने से रोकना अर्थात् उसे ऐसे संगठन में मिलने से रोकना जो लॉर्ड मार्ले के शब्दों में, चन्द्रमा को पकड़ने के लिए चिल्ला रहा है।'

    इसी प्रकार अलीगढ़ में विद्यार्थियों की एक सभा में नवाब विकुर-उल-मुल्क ने कहा- 'अगर हिन्दुस्तान से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हो गई तो उस पर हिन्दू राज करेंगे और तब हमारी जिन्दगी, जायदाद और इज्जत पर सदैव खतरा मंडराया करेगा। इस खतरे से बचने के लिए मुसलमानों के लिए एकमात्र उपाय है- ब्रिटिश हुकूमत जरूर बनी रहे। मुसलमान अपने को ब्रिटिश फौज समझें और ब्रिटिश ताज के लिए अपना खून बहाने और अपनी जिन्दगी कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहें.......आपका नाम ब्रिटिश हिन्दुस्तान की तवारीख में सुनहरे हर्फों में लिखा जायेगा। आने वाली पीढ़ियां आपका अहसान मानेंगी।'

    मुस्लिम लीगी नेताओं के इन वक्तव्यों को मुसलमान युवाओं के बीच अपार लोकप्रियता मिली। इस प्रकार सर सैयद अहमद जीवन भर प्रयास करके जो सफलता प्राप्त नहीं कर पाए, मुस्लिम लीग ने वह सफलता प्रथम प्रयास में ही प्राप्त कर ली। लीगी नेताओं के वक्तव्यों को अंग्रेजों में प्रसन्नता के साथ और हिन्दुओं में चिंता की लकीरों के साथ देखा गया। शिक्षा एवं रोजगार से वंचित आम मुसलमान के लिए तो लीगी नेताओं के वक्तव्य मुसलमानों के दिलों में आशाओं का नवीन उजाला भरने वाले थे। मुस्लिम लीग के रूप में मुसलमानों को उनके पुराने सुनहरी दिन लौटाने वाले कई मसीहा एक साथ मिल गए थे।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-105

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-105

    पटेल ने नेहरू के प्रुमख निजी सचिव को पत्र लिखकर फटकार लगाई


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    सरदार के सार्वजनिक वक्तव्य को नेहरू ने अपनी व्यक्गितगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और उन्होंने व्यक्तिशः अजमेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया किंतु अचानक ही पं. नेहरू के भतीजे की मृत्यु हो गई। इससे इस यात्रा को निरस्त करना पड़ा। नेहरू ने सोचा कि इससे अजमेर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि अजमेर में उनकी बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा हो रही थी। यह यात्रा पूरे देश को यह दिखाने के लिये की जा रही थी कि सरकार इस प्रकार की स्थिति से बहुत चिंतित है तथा इससे निबटने में नेता व्यक्तिगत रूप से रुचि ले रहे हैं।

    नेहरू का मानना था कि दिल्ली के बाद देश में अजमेर ही दूसरा महत्वपूर्ण नगर है जहाँ हो रही घटनाओं का पूरे देश की नीतियों पर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिये नेहरू ने अपने प्रमुख निजी सचिव एच. आर. वी. आर. आयंगर से कहा कि वे अजमेर जाकर अजमेर की जनता से नेहरू के न आने के लिये नेहरू की ओर से क्षमा मांगें। आयंगर ने 20 दिसम्बर 1947 को शनिवार के दिन अजमेर का दौरा किया। उसने अजमेर में हुए नुक्सान वाले स्थलों का निरीक्षण किया तथा एडवाइजरी कौंसिल के सदस्यों से विचार-विमर्श किया।

    उसने मुकुट बिहारी लाल एवं बालकृष्ण कौल से भी विचार-विमर्श किया। अगले दिन उसने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डलों, खादिमों, आर्य समाज के सदस्यों, महासभा के सदस्यों एवं प्रेस प्रतिनिधियों से बात की। आयंगर के इस प्रकार विजिट करने से अजमेर का चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद बुरी तरह घबरा गया। उसे लगा कि इस यात्रा से यह छवि बनी है कि चीफ कमिश्नर न केवल स्थिति को संभालने में बुरी तरह विफल रहा अपितु उसने सरकार को पूरे तथ्य बताने में भी बेईमानी बरती है। इसलिये शंकर प्रसाद ने गृहमंत्री सरदार पटेल के निजी सचिव वी. शंकर को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि चीफ कमिश्नर को कम से कम यह ज्ञात होने का अधिकार होना चाहिये था कि उसने ऐसा क्या किया है जो उस पर विश्वास नहीं किया जा रहा है तथा जनता से उसके सम्बन्ध में प्रश्न किये जा रहे हैं।

    सरदार पटेल ने भी आयंगर की अजमेर यात्रा को पसंद नहीं किया था। 23 दिसम्बर 1947 को पटेल ने आयंगर को पत्र लिखकर फटकारा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते उसे यह सोचना चाहिये था कि उसकी इस यात्रा के क्या गंभीर प्रभाव होंगे ? उसकी इस यात्रा से अजमेर के चीफ कमिश्नर जैसे वरिष्ठ अधिकारी की कैसी विचित्र स्थिति हुई है जो कि एक प्रांत का मुखिया है ?

    ऐसी स्थिति में चीफ कमिश्नर को पूरा अधिकार है कि वह मंत्रियों अथवा अपने विभाग के सचिव के अतिरिक्त हर अधिकारी का विरोध करे। पटेल ने आयंगर की इस बात के लिये भी भर्त्सना की कि उसने अजमेर-मेरवाड़ा को लेकर प्रेस में वक्तव्य जारी किया। इन परिस्थितियों में दिये गये इस वक्तव्य से ऐसा लगा है कि चीफ कमिश्नर द्वारा अजमेर में परिस्थति को संभालने के कार्य को लेकर प्रधानमंत्री में असंतोष है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं नहीं जा सकते थे तो वे सरदार पटेल को अथवा गोपालस्वामी को अथवा किसी अन्य मंत्री को जाने के लिये कह सकते थे।

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  • बड़े राजाओं ने देश को एक नहीं होने दिया!

     02.06.2020
    बड़े राजाओं ने देश को एक नहीं होने दिया!

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    जून 1937 में बीकानेर नरेश गंगासिंह ने लंदन में घोषणा की कि हम ब्रिटेन के साथ अपने सम्बन्ध समाप्त करने की अपेक्षा लड़ना पसंद करेंगे। उसी वर्ष बीकानेर में आयोजित अपने जुबली दरबार के अवसर पर लॉर्ड लिनलिथगो को ब्रिटिश सम्राट के प्रति अपनी स्वामिभक्ति का विश्वास दिलाते हुए महाराजा ने कहा कि मैं बुरे समय में अपने राज्य के समस्त स्रोतों, आदमियों और सम्पत्ति को महामना सम्राट के निष्पादन पर समर्पित कर देने को तैयार हूँ किंतु सरकार की इस बात को नहीं मान सकता कि मैं भारत संघ में सम्मिलित होकर महामना सम्राट से सम्बन्ध समाप्त कर लूं।

    वायसराय ने भी अपने भाषण में सम्राट के प्रति महाराजा की स्वामिभक्ति और उनके द्वारा दी गयी अद्भुत सेवाओं के विगत अभिलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि महाराजा अनेक स्मरणीय अवसरों पर महामना सम्राट के निजी सम्पर्क में भी रहे।

    इस प्रकार बीकानेर नरेश गंगासिंह ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में जिस बात का समर्थन करके राष्ट्रीय नेताओं की वाहवाही लूट ली थी, उसी बात को अपने वैयक्तिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका मात्र से अस्वीकार कर दिया। एस. के. बोस ने लिखा है- व्यक्तिगत रूप से बीकानेर महाराजा को दो भारत का विचार पसंद नहीं था। डॉ. करणीसिंह ने भी लिखा है- 'ऐसे दो भारत होने की युक्ति को, जो एक दूसरे से स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सकते हों, महाराजा का समर्थन कभी भी प्राप्त नहीं हुआ था तथा एक देशभक्त भारतीय होने के नाते उन्हें अपनी मातृभूमि की महानता तथा भारत के साथ देशी राज्यों की अविकल एकता में अगाध श्रद्धा थी। ये सब आरंभिक एवं सैद्धांतिक बातें थीं किंतु उन्हें व्यवहार रूप में आता देखकर महाराजा ने उन विचारों को त्याग दिया था। अब वे इतिहास की धारा के विरुद्ध खड़े हुए दिखायी देने लगे थे।

    इस पर भी वायसराय लिनलिथगो ने हार नहीं मानी। जनवरी 1939 में वायसराय ने राज्यों के शासकों को उनकी मांगों, आशंकाओं तथा प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए एक नया सम्मिलन पत्र तैयार करवाकर राज्यों को भिजवाया। इसे अखिल भारतीय संघ निर्माण की दिशा में वायसराय की ओर से किया गया अंतिम प्रयास माना जाता है। वायसराय द्वारा भेजे गये परिपत्र में कहा गया था कि शासक वायसराय को छः माह के भीतर सूचित करें कि क्या वे इन नयी शर्तों पर संघ में सम्मिलिन के लिये तैयार हैं?

    कोनार्ड कोरफील्ड ने लिखा है- ''1939 में जब ये सम्मिलन पत्र शासकों को भिजवाये गये, उस समय मैं राजपूताने के रेजीडेंट का कार्य देख रहा था। जब ये संलेख राजाओं को मिले तो उनमें से कईयों ने पोलिटिकल एजेंण्टों से सलाह मांगी। बीकानेर के महाराजा पहले से ही संघ में न मिलने का निश्चय कर चुके थे। यहाँ तक कि वे संघ का विरोध करने वाले शासकों का नेतृत्व भी कर रहे थे किंतु कुछ शासक महाराजा बीकानेर का अनुसरण करने की इच्छा नहीं रखते थे तथा पोलिटिकल अधिकारियों की राय जानना चाहते थे। उनमें से अधिकतर शासक यह जानना चाहते थे कि यदि वे सम्मिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो क्या वे राज्य के दीर्घ इतिहास, परम्परा और निष्ठा के प्रति अविश्वसनीय हो जायेंगे?"

    कोनार्ड ने लिखा है कि एक शासक जो कि हाल ही में कई विवादों के बाद राज्य का उत्तराधिकारी बना था, उसने कोनार्ड से पूछा कि क्या मुझे भी हस्ताक्षर कर देने चाहिये? इस पर कोनार्ड ने उत्तर दिया कि ऐसा करने से क्राउन रिप्रजेण्टेटिव राजा की शासकीय योग्यता से प्रभावित होगा। एक अन्य शासक जो कि एक बार राजपूताना की समस्त रियासतों का नेता स्वीकार किया गया था, वह इस सुझाव से प्रभावित था कि यदि वह सबसे पहले हस्ताक्षर करता है तो ऐसा करके वह अपने अन्य राजपूत शासक भाईयों का नेतृत्व करेगा। एक तीसरे शासक ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि वह अपने ब्रिटिश प्रधानमंत्री की सलाह लेने के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा कर सकता था जिस पर कि वह पूरी तरह विश्वास करता था।

    कोनार्ड कोरफील्ड के प्रयासों के फलस्वरूप राजपूताने के आधे से अधिक राजाओं ने भारत संघ में मिलने के लिये अपनी सहमति दे दी किंतु देश के अन्य हिस्सों में स्थित रियासतों ने ऐसा नहीं किया। कोनार्ड ने लिखा है- ''लॉर्ड लिनलिथगो ने मुझे बताया कि केवल राजपूताना ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ से आवश्यक 50 प्रतिशत शासकों की सहमति प्राप्त हो चुकी है किंतु बडे़ राज्यों की सहमति के बिना, 50 प्रतिशत जनसंख्या वाली शर्त पूरी नहीं हो सकती थी इसलिये इन राज्यों की सहमति का कोई परिणाम नहीं निकलने वाला था।"

    राजाओं व उनके मंत्रियों के बम्बई में आयोजित द्वितीय सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किया गया कि पुनरीक्षित सम्मिलन पत्र में दी गयी नवीनीकृत शर्तें भी मूल रूप से असंतोषजनक हैं तथा हैदरी समिति के अनुसार नहीं हैं जिन्हें कि ग्वालियर सम्मेलन द्वारा सुनिश्चित किया गया था, इसलिये शासकों को स्वीकार्य नहीं हैं। वी. पी. मेनन ने लिखा है- ''कुछ राजाओं का व्यवहार देखने वाला था। उन्होंने अनौपचारिक बैठकों में कोई निश्चित रुख नहीं अपनाया अपितु वे बार बार राजनीतिक विभाग के पास भागते और उनसे कुछ छूट देने की प्रार्थना करते। राजनीतिक विभाग के अधिकारी वासयराय से बात करने के लिये जाते। इस प्रकार मेरी गो राउंड जैसी स्थिति बन गयी।"

    राजाओं द्वारा संघीय योजना को अस्वीकार कर दिये जाने के बाद भी वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के प्रयास जारी रहे। इस बार उन्होंने स्वयं ने भारत की प्रमुख रियासतों का दौरा करके आम सहमति बनाने का प्रयास किया। कुछ राजा संघ निर्माण की दिशा में वास्तव में कोई प्रयास नहीं कर रहे थे किंतु वायसराय को प्रसन्न करने के लिये लगातार वायसराय की हाँ में हाँ मिलाने का क्रम जारी रखे हुए थे। 1 मार्च 1939 को वायसराय के सम्मान में जोधपुर में स्टेट बैंक्वेट दिया गया, तब महाराजा उम्मेदसिंह ने दोहराया कि जोधपुर को संघ में प्रवेश करने से जी चुराने की कोई आवश्यकता नहीं है। राज्य के कई विभागों में तो हम संघ को पिछले कई वर्षों से अपना भी चुके हैं........संघ का प्रारूप भारत को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अधीन एक मजबूत स्वशासी इकाई बनाने के लिये तैयार किया गया है ताकि भविष्य में हम न केवल अपने मामलों को सुलझा सकें अपितु स्वतंत्रता की रक्षा और स्वतंत्र संविधान के लिये शनैः-शनैः महान ब्रिटिश साम्राज्य के साथ खड़े हो सकें। वायसराय ने जोधपुर नरेश की इस मनोवृत्ति की प्रशंसा की।

    वायसराय ने महाराजा गंगासिंह को लिखा कि संघ योजना के सम्बन्ध में इस समय घोषित की गयी शर्तों के बारे में समझ लिया जाना चाहिये कि अब इनमें और अधिक शिथिलिकरण की गुंजाइश नहीं है। महाराजा गंगासिंह ने इस आमंत्रण को भी ठुकरा दिया। डा. करणीसिंह ने लिखा है कि महाराजा में तीन निष्ठायें काम कर रही थीं। उनकी प्रथम निष्ठा सम्राट की प्रति थी। यह उनमें धार्मिक पवित्रता का रूप ले चुकी थी। वे एक क्षण के लिये भी नहीं सोच सकते थे कि भारत सम्राट से अपने सम्बन्ध तोड़ ले अथवा साम्राज्य से अलग हो जाये। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत राष्ट्र मंडल का सदस्य रहकर ही उन्नति कर सकता है और सुरक्षित रह सकता है। उनका मत था कि भारत की सीमायें दूर-दूर तक फैली हुई हैं और वे अंग्रेजी समुद्री बेड़े और सेना की शक्ति से ही सुरक्षित रह सकती है। साथ ही भारत का व्यवस्थित और शांतिपूर्ण विकास ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सुविधाओं और साधनों पर काफी निर्भर है।

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