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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में सहकारिता आंदोलन

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में सहकारिता आंदोलन

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 64

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में सहकारिता आंदोलन

    सहकारिता आंदोलन पर प्रायः यह आरोप लगाया जाता है कि यह राजस्थान में विशेष सफल नहीं रहा है किंतु यह सही नहीं है। राजस्थान में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि, कृषि साख की उपलब्धता, भूमि विकास एवं विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के विक्रय के क्षेत्र में यह आंदोलन बहुत सफलता से कार्य कर रहा है। सहकारिता सम्बन्धी प्रमुख तथ्य

    1. प्रश्नः राजस्थान में सहकारिता का कार्य कब एवं किस प्रकार प्रारंभ हुआ?

    उत्तरः ई. 1904 में भरतपुर एवं डीग में कृषि बैंकों की स्थापना से।

    2. प्रश्नः अजमेर में सहकारिता का शुभारंभ कब हुआ?

    उत्तरः अजमेर में ई. 1904 में सहकारिता का आरम्भ हुआ?

    3. प्रश्नः राज्य में प्रथम सहकारी समिति कब एवं कहाँ स्थापित हुई?

    उत्तरः ई. 1905 में भिनाय में।

    4. प्रश्नः देशी रियासतों में सहकारिता का काम सर्वप्रथम कहाँ आरम्भ हुआ?

    उत्तरः सर्वप्रथम भरतपुर तथा कोटा में सहकारिता सम्बन्धी कानून बने।

    5. प्रश्नः सहकारिता का योजनाबद्ध कार्य कब आरम्भ हुआ?

    उत्तरः आजादी के बाद।

    6. प्रश्नः राजस्थान सहकारिता समिति विधेयक पहली बार कब पारित हुआ?

    उत्तरः ई. 1955

    7. प्रश्नः राजस्थान राज्य सहकारी संघ की स्थापना कब की गयी?

    उत्तरः 21 दिसम्बर 1957

    8. प्रश्नः सहकारी नियम कब बनाये गये?

    उत्तरः ई. 1965 तथा 1966 में

    9. प्रश्नः नया सहकारी अधिनियम लागू किया गया?

    उत्तरः 2 अक्टूबर 1965

    10. प्रश्नः राज्य में शीर्ष स्तर के सहकारी संघ कितने हैं?

    उत्तरः 23

    11. प्रश्नः राज्य में सहकारी संस्थाओं द्वारा किसानों को क्या सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं?

    उत्तरः किसानों को संस्थागत साख ऋण एवं कृषि आदान दिया जा रहा है।

    12. प्रश्नः राजस्थान में कितने कृषक परिवार सहकारिता से जुड़ चुके हैं?

    उत्तरः लगभग 85 प्रतिशत कृषक परिवार।

    13. प्रश्नः राज्य में सहकारिता का ध्वज किस रंग का है?

    उत्तरः इंद्रधनुषी (सतरंगी)

    14. प्रश्नः ऋण वितरण कराने के लिये राज्य स्तरीय सहकारी बैंक का नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान स्टेट कॉपरेटिव बैंक अथवा राज्य स्तरीय राजस्थान राज्य सहकारी बैंक

    15. प्रश्नः किस बैंक को एपेक्स बैंक कहते हैं?

    उत्तरः राजस्थान स्टेट कॉपरेटिव बैंक

    16. प्रश्नः राजस्थान स्टेट कॉपरेटिव बैंक की स्थापना किस उद्देश्य से हुई थी?

    उत्तरः इसकी स्थापना राज्य के कृषकों को कृषि कार्यों के लिये लघु अवधि के ऋण उपलब्ध कराने के लिये हुई।

    17. प्रश्नः राजस्थान स्टेट कॉपरेटिव बैंक के अधीन जिलों में कौनसे बैंक कार्य करते हैं?

    उत्तरः जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक।

    18. प्रश्नः राज्य में कितने केन्द्रीय सहकारी बैंक हैं?

    उत्तरः 29 (इनमें से एक अपेक्स बैंक)

    19. प्रश्नः एपेक्स बैंक का क्या काम है?

    उत्तरः यह बैंक विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी संस्बाओं को ऋण उपलब्ध करवाता है।

    20. प्रश्नः राज्य में लगभग कितने किसान राजस्थान स्टेट कॉपरेटिव बैंक से ऋण लेते हैं?

    उत्तरः लगभग 14 लाख किसान प्रतिवर्ष।

    21. प्रश्नः राज्य में ग्राम स्तर पर कृषि साख उपलब्ध कराने के लिये कौनसी सहकारी संस्था है?

    उत्तरः ग्राम सेवा सहकारी समिति।

    22. प्रश्नः प्रत्येक पंचायत में कितनी ग्राम सेवा सहकारी समितियों का चयन किया जाता है?

    उत्तरः दो

    23. प्रश्नः ग्राम सेवा सहकारी समितियों का क्या काम है?

    उत्तरः ग्रामीण परिवारों की ऋण की आवश्यकता का मूल्यांकन करना एवं सभी प्रकार के सहकारी ऋण उपलब्ध करवाना।

    24. प्रश्नः राजस्थान राज्य भूमि विकास बैंक की स्थापना की गयी?

    उत्तरः 26 मार्च 1957

    25. प्रश्नः राजस्थान राज्य भूमि विकास बैंक का मुख्य कार्य क्या है?

    उत्तरः कृषि विकास एवं ग्रामीण विकास हेतु विभिन्न प्रकार के ऋण उपलब्ध कराना

    26. प्रश्नः जिला स्तर पर कार्यरत भूमि विकास बैंक क्या कहलाते हैं?

    उत्तरः प्राथमिक भूमि विकास बैंक।

    27. प्रश्नः प्राथमिक भूमि विकास बैंक का क्या काम है?

    उत्तरः कृषि विकास एवं ग्रामीण विकास हेतु विभिन्न प्रकार के ऋण उपलब्ध कराना

    28. प्रश्नः राज्य में प्राथमिक भूमि विकास बैंक की कितनी शाखाएं हैं?

    उत्तरः 33 जिलों में 36 प्राथमिक भूमि विकास बैंक हैं जिनकी 143 शाखाएं हैं। इनके माध्यम से दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

    29. प्रश्नः सहकारिता विभाग द्वारा राज्य में कितने महिला सुपर स्टोर आरम्भ किये गये हैं?

    उत्तरः 13 राज्य की प्रमुख सहकारिता संस्थाएँ

    30. प्रश्नः राज्य में कितनी सहकारी समितियां हैं?

    उत्तरः 32,010

    31. प्रश्नः राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन (आर.सी.पी.एफ.) की स्थापना का क्या उद्देश्य है?

    उत्तरः डेयरी विकास के कार्यों की देखभाल करने हेतु राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन की स्थापना की गयी है। इसका मुख्य उद्देश्य दूध उत्पादकों को दूध का उचित मूल्य दिलवाना तथा सभी लोगों तक दूध पहुंचाना है।

    32. प्रश्नः राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन का प्रधान कार्यालय कहाँ है?

    उत्तरः जयपुर।

    33. प्रश्नः राजस्थान दुग्ध सहकारी संघ की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः 1973

    34. प्रश्नः राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन के अंतर्गत कितने दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ तथा प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों का गठन हुआ है?

    उत्तरः दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ- 21 प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां- 13,331

    35. प्रश्नः राज्य में सबसे बड़ा दुग्ध शीतलन केन्द्र कहाँ है?

    उत्तरः जयपुर में।

    36. प्रश्नः क्रैफीकार्ड (मिनी बैंक) योजना किस उद्देश्य से आरंभ हुई?

    उत्तरः ग्राम सेवा सहकारी समितियों को बहुउद्देश्यीय एवं एक ही स्थान पर सभी प्रकार की ऋणों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये क्रैफीकार्ड योजना आरंभ हुई।

    37. प्रश्नः क्रैफीकार्ड (मिनी बैंक) योजना कब आरंभ हुई?

    उत्तरः ई. 1984

    38. प्रश्नः राज्य में पहला सहकारी महिला मिनी बैंक कहाँ खोला गया?

    उत्तरः सालासर (चूरू जिला)।

    39. प्रश्नः राज्य में कितने नागरिक सहकारी बैंक हैं?

    उत्तरः 38

    40. प्रश्नः नागरिक सहकारी बैंकों की स्थापना किस उद्देश्य से की गई?

    उत्तरः शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये।

    41. प्रश्नः राज्य में कितने औद्योगिक सहकारी बैंक हैं?

    उत्तरः 1

    42. प्रश्नः राज्य में औद्योगिक सहकारी बैंक की क्या भूमिका है?

    उत्तरः यह अर्द्ध शहरी व शहरी क्षेत्रों में कुटीर एवं लघु उद्योगों के लिये ऋण प्रदान कर स्वावलम्बन रोजगार योजना क्रियान्वित करता है।

    43. प्रश्नः राज्य में कितनी सामान्य क्रय विक्रय सहकारी समितियाँ हैं?

    उत्तरः 266

    44. प्रश्नः राज्य में महिला क्रय विक्रय सहकारी समितियाँ कितनी हैं?

    उत्तरः 4801

    45. प्रश्नः राज्य में महिला सहकारी समितियों की सदस्य संख्या कितनी है?

    उत्तरः 1,62,670

    46. प्रश्नः क्रय विक्रय सहकारी समितियों की मुख्य संस्था कौनसी है तथा कहाँ है?

    उत्तरः इनकी मुख्य संस्था राजस्थान राज्य सहकारी संघ लि. है तथा जयपुर में स्थित है।

    47. प्रश्नः राज्य में सहकारिता क्षेत्र में दाल मिलें कहाँ-कहाँ कार्यरत हैं तथा उनमें कितनी दाल तैयार होती है?

    उत्तरः जयपुर, केकड़ी, अंता, कोटा, सूरतगढ़, अनूपगढ़ एवं कुम्हेर में दाल मिलें हैं जिनसे लगभग 1650 मीट्रिक टन दालों का उत्पादन होता है।

    48. प्रश्नः तिलम संघ की स्थापना का क्या उद्देश्य है?

    उत्तरः तिलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाना और उपभोक्ताओं तक उचित मूल्य पर खाद्य तेल उपलब्ध करवाना।

    49. प्रश्नः तिलम् स्ंघ का मुख्यालय कहाँ है?

    उत्तरः इसका मुख्यालय जयपुर में है।

    50. प्रश्नः तिलम् स्ंघ राज्य में किन इकाइयों का संचालन कर रहा है?

    उत्तरः (1) बीकानेर तेल मिल बीकानेर, (2) सरसों तेल मिल गंगानगर, (3) सरसों तेल मिल मेड़तासिटी जिला नागौर, (4) सरसों तेल मिल झुंझुनूं, (5) सरसों तेल मिल गंगापुरसिटी जिला सवाईमाधोपुर, (6) सरसों एवं मूंगफली तेल मिल, फतहनगर जिला उदयपुर।

    51. प्रश्नः राज्य में प्रथम सहकारी चीनी मिल की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः केशोरायपाटन सहकारी शुगर मिल्स लि. जिला बूँदी की स्थापना 13 दिसम्बर 1978 को हुई। 1985 से यह राज्य सरकार के कस्टोडियन में कार्य कर रही है।

    52. प्रश्नः सहकारी क्षेत्र में चावल मिलें कहाँ काम कर रही हैं?

    उत्तरः उदयपुर, केशोरायपाटन, बूँदी, बाराँ, बाँसवाड़ा, कोटा, उदयपुर एवं हनुमानगढ़।

    53. प्रश्नः सहकारी क्षेत्र में कॉटन जिनिंग एवं प्रोसेसिंग इकाइयां कहाँ स्थित हैं?

    उत्तरः श्रीगंगानगर, करणपुर, पदमपुर, रायसिंह नगर, सादुलशहर, पीलीबंगा, गजसिंहपुर, घड़साना एवं गंगापुर में कार्यरत हैं।

    54. प्रश्नः सहकारी क्षेत्र में शीत भण्डार कहाँ स्थित हैं?

    उत्तरः जयपुर एवं अलवर।

    55. प्रश्नः लैम्प्स का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः वृहत कृषि बहुउद्देश्यीय सहकारी समिति।

    56. प्रश्नः राज्य में प्राथमिक कृषि ऋणदात्री समितियां कितनी हैं?

    उत्तरः 6,170

    57. प्रश्नः राज्य में सहकारी क्षेत्र का पहला जीवाणु खाद कारखाना किसने एवं कहाँ लगाया गया?

    उत्तरः नैफेड द्वारा भरतपुर में।

    58. प्रश्नः राज्य की शीर्ष गृह निर्माण सहकारी संस्था की स्थापना कब की गई थी

    उत्तरः 31 दिसम्बर 1920

    59. प्रश्नः वर्तमान में इस संस्था का क्या नाम है?

    उत्तरः 1990 से इसका नाम राजस्थान सहकारी आवासन संघ लि. किया गया।

    60. प्रश्नः राजस्थान सहकारी आवासन संघ लि. के अधीन कौनसी संस्थाएं काम करती हैं?

    उत्तरः गृह निर्माण सहकारी समितियां।

    61. प्रश्नः गृह निर्माण सहकारी समितियो का संचालन किस उद्देश्य से किया जा रहा है?

    उत्तरः कमजोर वर्ग, अनुसूचित जाति एवं जनजाति सदस्यों को गृह निर्माण हेतु के दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध करवाना।

    62. प्रश्नः राजस्थान अनुसूचित जाति विकास सहकारी निगम की स्थापना कब की गई?

    उत्तरः ई. 1980

    63. प्रश्नः राजस्थान अनुसूचित जाति विकास सहकारी निगम की स्थापना किस उद्देश्य से की गई?

    उत्तरः यह निगम अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को ऋण, अनुदान, रोजगार, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करता है।

    64. प्रश्नः राजस संघ का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ।

    65. प्रश्नः राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ का मुख्यालय कहाँ है?

    उत्तरः उदयपुर।

    66. प्रश्नः राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः ई. 1976

    67. प्रश्नः राजस संघ क्या काम करता है?

    उत्तरः आदिवासियों द्वारा संग्रहीत लघु वन उपज एवं कृषि उपज को व्यावहारिक मूल्य पर क्रय करता है।

    68. प्रश्नः राजस्थान राज्य बुनकर सहकारी संघ का क्या उद्देश्य है?

    उत्तरः राजस्थान के बुनकरों को ऋण तथा अन्य सुविधाएँ देकर खादी उद्योग को बढ़ावा देना। यह गाँव-गाँव में फैले हुए बुनकरों को आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग प्रदान करता है।

    69. प्रश्नः राजस्थान राज्य भेड़ ऊन सहकारी संघ क्या सुविधा देती है?

    उत्तरः यह संस्था भेड़ व ऊन व्यवसाय में लगे लोगों को ऋण सुविधा देती है तथा भेड़ों की नस्ल सुधारने एवं ऊन विकास में तकनीकी सहयोग देती है।

    70. प्रश्नः राईसेम का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ कॉपरेटिव एज्यूकेशन एण्ड मैनेजमेण्ट को राइसेम (आर.आई.सी.ई.एम.) कहा जाता है।

    71. प्रश्नः राईसेम क्या काम करती है?

    उत्तरः यह संस्था सभी प्रकार के सहकारिता कार्यक्रमों में लगे कार्मिकों को प्रशिक्षण प्रदान करती है।

    72. प्रश्नः कोपसेफ का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः कल्याण सेवा फोरम को कोपसेफ कहते हैं।

    73. प्रश्नः कोपसेफ का क्या काम है?

    उत्तरः यह सहकारी क्षेत्र से जुड़े ग्रामवासियों एवं उनके परिवारों को चिकित्सा उपलब्ध करवाता है। आदिवासी एवं दूरस्थ क्षेत्रों में निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन करता है।

    74. प्रश्नः सहकारी किसान क्रेडिट कार्ड व्यवस्था देश के किस राज्य में सर्वप्रथम आरम्भ हुई?

    उत्तरः राजस्थान

    75. प्रश्नः सहकारी किसान क्रेडिट कार्ड से किसानों को क्या सुविधा मिलती है?

    उत्तरः किसान स्वीकृृत साख सीमा तक चैक प्रस्तुत कर खाद, बीज एवं डीजल के लिये ऋण प्राप्त कर सकते हैं।

    76. प्रश्नः राजफैड का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान राज्य सहकारी क्रय विक्रय संघ लि.।

    77. प्रश्नः राजफैड की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः 26 नवम्बर 1957

    78. प्रश्नः राजफैड की शीर्ष संस्था कहाँ स्थित है?

    उत्तरः जयपुर में।

    79. प्रश्नः राजफैड के अधीन मण्डियों में कौनसी संस्थाएं काम करती हैं?

    उत्तरः क्रय-विक्रय समिति।

    80. प्रश्नः राजफैड के अधीन क्रय-विक्रय समिति क्या काम करती हैं?

    उत्तरः कृषकों को उन्नत किस्म के बीज, खाद, कीटनाशक, उचित मूल्य पर उपभोक्ता सामग्री तथा उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलवाना सुनिश्चित करती हैं।

    81. प्रश्नः राजफैड कौनसी इकाइयां संचालित करता है?

    उत्तरः 1 पशु आहार संयंत्र झोटवाड़ा, जयपुर। 2 कीटनाशक दवा निर्माण संयंत्र झोटवाड़ा, जयपुर।

    82. प्रश्नः स्पिनफैड का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान राज्य सहकारी स्पिनिंग व जिनिंग मिल्स फैडरेशन।

    83. प्रश्नः स्पिनफैड का गठन कब हुआ?

    उत्तरः अप्रेल 1993

    84. प्रश्नः स्पिनफैड का मुख्यालय कहाँ है?

    उत्तरः जयपुर

    85. प्रश्नः स्पिनफैड के अधीन कौनसी इकाइयाँ कार्यरत हैं?

    उत्तरः 1 सहकारी कताई मिल गुलाबपुरा (1972 में स्थापित राज्य की पहली कताई मिल), 2 सहकारी कताई मिल हनुमानगढ़(1974 में स्थापित), 3 सहकारी कताई मिल भीलवाड़ा (1981 में स्थापित), 4 गंगानगर कॉटन कॉम्पलैक्स, गंगानगर (विश्व बैंक की सहायता से स्थापित 1991 से सूत का उत्पादन)

    86. प्रश्नः कॉनफैड का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान राज्य सहकारी उपभोक्ता संघ।

    87. प्रश्नः कॉनफैड की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः 29 मार्च 1967

    88. प्रश्नः कॉनफैड क्या काम करता है?

    उत्तरः 1. उपभोक्ता सामग्री, मेडिकल, लेवी चीनी, कपड़ा, आयात्ति खाद्य तेल आदि नियंत्रित वस्तुओं की बिक्री। 2. पेंशनर्स चिकित्सा रियायती योजना के अंतर्गत पेंशनर्स को दवाईयों की बिक्री।

    89. प्रश्नः कॉनफैड के अधीन कौनसी संस्थाएं काम करती हैं?

    उत्तरः 164 संस्थाएं इसकी सदस्य हैं। इसके तहत राज्य में 36 सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार कार्य कर रहे हैं। इन भण्डारों से राज्य के उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराई जाती हैं। जयपुर शहर में नवजीवन, उपहार तथा समृद्धि सहित 16 विभागीय भण्डारों का संचालन किया जाता है।

    90. प्रश्नः कृषक ज्योति योजना किस उद्देश्य से आरम्भ की गई?

    उत्तरः कृषक ज्योति के अंतर्गत कृषि यंत्रीकरण, ग्रामीण उद्योग धंधों की स्थापना, होटल, मोटल, सिंचाई, साधनों का विकास मंहगी पढ़ाई लिखाई स्वास्थ्य सुविधा तथा शादी विवाह के लिये ऋण सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है।

    91. प्रश्नः सहकारी क्षेत्र की अन्य योजनाएँ कौनसी हैं?

    उत्तरः ज्ञान सागर योजना, स्वयं सहायता समूहों को ऋण सुविधा, सहकार स्वरोजगार क्रेडिट कार्ड योजना, फसल बीमा योजना, व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना आदि।

    92. प्रश्नः सहकारी उपभोक्ता व्यवस्था आरम्भ करने के पीछे क्या उद्देश्य था?

    उत्तरः 1. उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर उपभोक्ता सामग्री उपलब्ध करना। 2. उपभोक्ताओं को काला बाजारी तथा कृत्रिम अभाव से बचाना।

    93. प्रश्नः सहकारी उपभोक्ता व्यवस्था के अंतर्गत कौनसी संस्थाएँ काम करती हैं?

    उत्तरः 1. शीर्ष संस्था के रूप में राजस्थान राज्य सहकारी उपभोक्ता संघ लिमिटेड (कानफैड)। 2. जिला स्तर पर 34 सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार। 3. ग्राम सेवा सहकारी समिति स्तर पर 390 मिनी उपहार सुपर मार्केट। 4. जैनरिक औषधियांे के लिये 43 जन औषधि केन्द्र।

    94. प्रश्नः राज्य में सहकारी क्षेत्र में रिद्धि-सिद्धि योजना किस उद्देश्य से संचालित की जाती है?

    उत्तरः महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने के लिए रिद्धि-सिद्धि योजना संचालित है।

    95. प्रश्नः राज्य में सहकारी क्षेत्र में कितनी सूती मिलों का संचालन किया जा रहा है?

    उत्तरः 1. गुलाबपुरा (भीलवाड़ा), 2. गंगापुर (भीलवाड़ा) 3. हनुमानगढ़।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2013, सामान्य ज्ञान, राजफैड के संदर्भ में सही कथन को चुनिये-

    (अ.) राजफैड राज्य में कृषकों को उन्नत बीज, उर्वरक तथा कीटनाशक दवाईयां उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाता है।

    (ब.) राजफैड राज्य में कृषकों को उनकी फसलों के उचित मूल्य दिलवाने को सुनिश्चित करता है।

    (स.) राजफैड राज्य में कृषि के सर्वोचच विकास बैंक के रूप में कार्य करता है। निष्कर्ष -

    (1.) उपरोक्त सभी कथन सही हैं।

    (2.) अ और ब सही हैं।

    (3.) अ और स सही हैं।

    (4.) केवल अ सही है।

    2 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2010, राजस्थान में प्रथम सहकारी समिति 1905 में स्थापित की गई थी-

    (अ.) अजमेर जिले की भिनाय में,

    (ब.) नागौर जिले के जावला में,

    (स.) भीलवाड़ा जिले के गुलाबपुरा में,

    (द.) जयपुर जिले के बस्सी में ?

    3 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 2003, सामान्य ज्ञान- 50 शब्दों में लिखिये- राजस्थान में सहकारिता का वर्तमान स्वरूप। 4 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 1999, भूमि विकास बैंक किसानों को किस अवधि के ऋण उपलब्ध करवाता है?

    5 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 1999, राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ की स्थापना किस वर्ष में की गयी?

    6 आर.ए.एस. प्रारंभिक वर्ष 1999, सहकारी शिक्षा एवं प्रबंध के लिये किस स्थान पर संस्था स्थापित की गयी है?

    7 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1994- सहकारी आंदोलन के विकास में कौन-कौन सी प्रमुख समस्यायें हैं ?

    8 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 1999, 1978 में राजकोन की स्थापना का उद्देश्य क्या था?


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  • 22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने

     02.06.2020
    22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने

    22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने 


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई. 1193 में तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिल्ली पर अधिकार किया तथा भारतवर्ष की अपार सम्पत्ति को हड़प लिया जिससे देश की जनता निर्धन हो गयी। मुहम्मद गौरी के गुलामों और सैनिकों ने भारत में भय और आतंक का वातावरण बना दिया। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदों में परिवर्तित कर दी गयीं। दिल्ली का विष्णुमंदिर जामा मस्जिद में बदल दिया गया। धार, वाराणसी उज्जैन, मथुरा, अजमेर एवं जालौर की संस्कृत पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदें खड़ी कर दी गयीं। अयोध्या, नगरकोट और हरिद्वार आदि तीर्थ जला कर राख कर दिये गये। हिन्दू धर्म का ऐसा पराभव देखकर जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल, श्रीलंका तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया। बौद्ध धर्म तो हूणों के हाथों पहले ही पराभव को प्राप्त हो चुका था। इस घटना के बाद पूरे तीन सौ पैंसठ वर्ष तक दिल्ली मुस्लिम शासकों के अधिकार मंें रही। लोग भूल गये कि दिल्ली पर कभी हिन्दू शासकों का भी शासन था। यह बात अलग थी कि दिल्ली को अभी अंतिम हिन्दू शासक देखना शेष था।

    दिल्ली के इस अंतिम हिन्दू सम्राट ने सोलहवीं शती के आरंभ में रेवाड़ी के एक धूसर बनिये के घर मंे जन्म लिया। उसका नाम हेमचंद्र था किंतु वह इतिहास में वह हेमू के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आरंभ में वह भी अपने बाप दादा की तरह रेवाड़ी की सड़कों पर नमक बेचता था किंतु कुछ समय पश्चात बाजार में तोल करने वाले कर्मचारी के पद पर नियुक्त हो गया। एक दिन शेरशाह सूरी के दूसरे नम्बर के पुत्र जलालखाँ की दृष्टि उस पर पड़ी। वह हेमू के वाक् चातुर्य से बड़ा प्रभावित हुआ और उसने हेमू को अपना गुप्तचर बना लिया।

    जब जलालखाँ इस्लामशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसने हेमू को महत्वपूर्ण पद प्रदान किये। हेमू में सामान्य प्रशासन और सामरिक प्रबंधन की उच्च क्षमतायें थीं। एक दिन वह प्रधानमंत्री बन गया। जब इस्लामशाह 8 साल शासन करके मर गया तो इस्लामशाह का 12 वर्षीय पुत्र फीरोजशाह दिल्ली का शासक हुआ। फीरोजशाह के मामा मुबारिजखाँ ने फीरोजशाह की हत्या कर दी और खुद आदिलशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। आदिलशाह विलासी प्रवृत्ति का था और शासन के नीरस काम करना उसके वश की बात नहीं थी। उसे एक ऐसे विश्वसनीय और योग्य आदमी की तलाश थी जो उसके लिये दिल्ली से लेकर बंगाल तक फैले विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रख सके। उसने हेमू को बुलाकर पूछा कि वह किसके प्रति वफादार है? अपने पुराने स्वामियों इस्लामशाह और फीरोज शाह के प्रति या फिर आदिलशाह के प्रति?

    हेमू ने कहा कि जब तक पुराने स्वामी जीवित थे, तब तक वफादारी उनके साथ थी और यदि वे आज भी जीवित होते तो उनके प्रति ही वफादार रहता किंतु अब चूंकि वे दुनिया में नहीं रहे इसलिये आपके अधीन काम करने को तैयार हूँ। आदिलशाह ने हेमू को अपना प्रधानमंत्री बनाया। कुछ दिनों बाद सेना का भार भी उस पर छोड़ दिया। हेमू उच्च कोटि का सेनानायक सिद्ध हुआ। उसने आदिलशाह के लिये चौबीस लड़ाईयाँ लड़ीं जिनमें से बाईस जीतीं। हेमू न केवल वीर, साहसी, उद्यमी और बुद्धिमान व्यक्ति था अपितु भाग्यलक्ष्मी उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती थी। उसने ऐसा तोपखाना खड़ा किया जिसकी बराबरी उस समय पूरी धरती पर किसी और बादशाह अथवा राजा का तोपखाना नहीं कर सकता था। उसके पास हाथियों की 3 फौजें थीं जिनका उपयोग वह तीस हजार सैनिकों के साथ करता था। हेमू के पास जितने हाथी थे उतने उस समय दुनिया में और किसी के पास नहीं थे।

    यह भाग्य की ही बात थी कि आदिलशाह जैसे धूर्त और मक्कार हत्यारे को हेमू जैसे उच्च सेनानायक की सेवायें प्राप्त हुई। शीघ्र ही हेमू की धाक शत्रुओं पर जम गयी। ई. 1930 में जब मुगल बादशाह हुमायूँ शेरशाह सूरी से परास्त होने के बाद भारत छोड़कर ईरान भागा था तब उसने हेमू का नाम तक नहीं सुना था किंतु जब 10 साल बाद उसने पुनः दिल्ली की ओर मुँह किया तो समूचा उत्तरी भारत हेमू के नाम से गुंजायमान था। उसके द्वारा जीती गयीं बाईस लड़ाईयों के किस्से सुन-सुन कर हुमायूँ और उसके तमाम सिपहसालार हेमू के नाम से कांपते थे। भाग्य से हुमायूं को हेमू का सामना नहीं करना पड़ा। एक बार एक चित्रकार ने ऐसा चित्र बनाया जिसमें एक आदमी के सारे अंग अलग-अलग दिखाये गये थे। जब अकबर ने उस चित्र को देखा तो भरे दरबार में कहा कि काश यह चित्र हेमू का होता! अकबर की बात सुनकर हुमायूँ के अमीरों के मुँह सूख गये। वे जानते थे कि एक न एक दिन उन्हें हेमू की तलवार का सामना करना ही है।

    ई. 1540 में हुमायूँ की मृत्यु हो गयी और बैरामखाँ अकबर को बादशाह घोषित कर दिल्ली की ओर चल पड़ा। यह समाचार पाकर हेमू भी अपनी सेना लेकर ग्वालिअर से आगरा पर चढ़ दौड़ा। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग हेमू का नाम सुनकर बिना लड़े ही आगरा छोड़कर दिल्ली की ओर भाग गया। उसकी सेना में इतनी भगदड़ मची कि तीन हजार मुगल सिपाही आपस में ही कुचल कर मर गये। हेमू ने आगरा पर अधिकार कर लिया और शाही सम्पत्ति लूट ली। आगरा हाथ में आते ही हेमू दिल्ली की ओर बढ़ा। दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ अपनी सेना लेकर कुतुबमीनार से आठ किलोमीटर दूर पूर्व में तुगलकाबाद चला गया। हेमू ने उसमें जबरदस्त मार लगायी। तार्दीबेगखाँ और इस्कन्दरखा उजबेग परास्त होकर सरहिन्द की ओर भागे। संभल का शासक अलीकुलीखाँ हेमू का नाम सुनकर भगोड़ों के साथ हो लिया।

    हेमू ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसका धूर्त स्वामी आदिलशाह अपनी बेशुमार औरतों के साथ चुनार के दुर्ग में रंगरलियां मनाता रहा। हेमू को उसके पतित चरित्र से घृणा हो गयी थी जिससे हेमू ने अपने आप को मन ही मन स्वतंत्र कर लिया था। आगरा और दिल्ली अधिकार में आ जाने के बाद हेमू ने आदिलशाह को कोई सूचना नहीं भेजी और भारत भूमि को म्लेच्छों से मुक्त करवा कर हिन्दू पद पादशाही की स्थापना के स्वप्न संजोने लगा।

    दिल्ली हाथ में आ जाने के बाद हेमू ग्वालियर से लेकर सतलज नदी तक के सम्पूर्ण क्षेत्र का स्वामी हो गया। अपनी विशाल गजसेना के साथ उसने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने दिल्ली के दुर्ग को गंगाजल से धुलवाकर पवित्र किया और एक दिन शुभ मूहूर्त निकलवाकर विक्रमादित्य हेमचंद्र के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर विधिवत् आरूढ़ हुआ। सदियों से बेरहम तुर्कों के क्रूर शासन के अधीन अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू बहाती हुई हिन्दू जनता को महाराज विक्रमादित्य हेमचन्द्र के सिंहासनारूढ़ होने पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा दिन भी आयेगा जब दिल्ली पर पुनः हिन्दू राजा का शासन होगा। घर-घर शंख, घड़ियाल और नगाड़े बजने लगे। हजारों की संख्या में हिन्दू जनता दूर-दूर से चलकर दिल्ली पहुँचने लगी। दिल्ली की गलियां, चौक, यमुनाजी का तट और समस्त जन स्थल इन नागरिकों से परिपूर्ण हो गये। महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र की जय-जय कार से पूरी दिल्ली गूंजने लगी।

    सुहागिन स्त्रियों के झुण्ड के झुण्ड मंगल गीत गाते हुए मंदिरों की तरफ जाते हुए दिखाई देने लगे। सैंकड़ों साल से सुनसान पड़े मंदिरों में फिर से दीपक जलने लगे और आरतियाँ होने लगीं। मंदिरों के शिखरों पर केसरिया ध्वजायें लहराने लगीं। घर-घर वेदपाठ होने लगे तथा द्वार-द्वार पर गौ माता की पूजा आरंभ हो गयी। चावल के आटे से चौक पूरे गये और केले के पत्तों से तोरण सजाये गये। घरों के आंगन यज्ञों की वेदी से उठने वाले सुवासित धूम्र से आप्लावित हो गये। जब से महाराज हेमचंद्र दिल्ली के राजा हुए, यमुना का तट देश भर के तीर्थ-यात्रियों से पट गया। दूर-दूर से आने वाले हजारों श्रद्धालु रात्रि में इकट्ठे होकर यमुनाजी की आरती उतारते। महाराजा हेमचंद्र भी नित्य ही हाथी पर सवार होकर यमुनाजी के दर्शनों के लिये जाते। सैंकड़ों वेदपाठी ब्राह्मण कंधे पर जनेऊ और गले में पीताम्बर डाले हुए महाराजा के पीछे-पीछे चलते। महाराजा हेमचंद्र अकाल के इस कठिन समय में भी याचकों, ब्राह्मणों और बटुकों को अपने हाथों से भोजन करवाते और उन्हें धन-धान्य तथा वस्त्र प्रदान करते।

    वस्तुतः हिन्दू जनता का यह उत्साह पूरे तीन सौ पैंसठ साल बाद प्रकट हुआ था। अब जब महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के अधीश्वर हुए तो देशवासियों का उत्साह विशाल झरने की भांति फूट पड़ा। महाराज हेमचंद्र के अफगान व तुर्क सैनिक हिन्दू जनता के इस उत्साह को आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे। ऐसा नहीं था कि जन-सामान्य देश में चारों तरफ रक्तपात और लूटमार करती हुई सिकंदर सूर, इब्राहिमखाँ, इस्लामशाह, आदिलशाह और बैरामखाँ की सेनाओं को भूल गया था। जनता पूरी तरह आशंकित और भयभीत थी कि कहीं महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र चार दिन की चांदनी सिद्ध न हों! वस्तुतः यह भय और आशंका ही जन सामान्य के बड़ी संख्या में उमड़ पड़ने का कारण था। जनता चाहती थी कि जब तक महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के तख्त पर हैं तब तक ही सही कुछ धर्म-कर्म और पुण्य लाभ अर्जित कर लिया जाये।

    उन दिनों उत्तरी भारत के समस्त बादशाह और सेनापति हेमू के नाम से थर्राते थे। इब्राहीम सूर के सैनिकों को यदि स्वप्न में भी हेमू के सिपाही दिख जाते तो वे शैय्या त्याग कर खड़े हो जाते। बंगाल का शासक मुहम्मदशाह तो उस दिशा में पैर करके भी नहीं सोता था जिस दिशा में हेमू की सेना के स्थित होने के समाचार होते थे। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग, दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ और संभल का सूबेदार अलीकुलीखाँ हेमू की सेना का नाम सुनकर ही भाग छूटे थे। उस समय समूचे उत्तरी भारत में केवल बैरामखाँ अकेला ही सेनापति था जो हेमू से दो-दो हाथ करने की तमन्ना दिल में लिये घूमता था। वह जानता था कि एक न एक दिन बैरामखाँ और हेमू एक दूसरे के सामने होंगे। वह अवसर शीघ्र ही आ उपस्थित हुआ।

    जब आगरा और दिल्ली के पतन के समाचार मिले तो अकबर के अमीरों ने अकबर को सलाह दी कि हिन्दुस्थान की ओर से ध्यान हटाकर अपनी सारी ताकत काबुल पर केंद्रित कर लेनी चाहिये क्योंकि इस समय मुगल सेना में केवल बीस हजार सैनिक हैं और हेमू एक लाख सैनिकों की ताकत का स्वामी है। उसके पास इस समय धरती भर की सबसे बड़ी हस्ति सेना है और धरती भर का सबसे बड़ा तोपखाना है। अकबर अपने अमीरों की सलाह से सहमत हो गया और उसने आदेश दिया कि सेना को दिल्ली की ओर बढ़ाने के बजाय काबुल की ओर कूच किया जाये।

    बैरामखाँ ने अकबर को समझाया कि भले ही हमारे पास बीस हजार सैनिक हैं और शत्रु के पास एक लाख सैनिक हैं किंतु बाबर और हुमायूँ भी तो इन्हीं परिस्थितियों में लड़ते और जीतते आये थे। भले ही हेमू के पास एक लाख सैनिक और तीस हजार हाथी हैं किंतु हेमू की असली ताकत उसके तोपखाने 
    में बसती है। यदि किसी तरह उससे तोपखाना छीन लिया जाये तो उसे आसानी से परास्त किया जा सकता है। इस पर अकबर काबुल लौट चलने के बजाय दिल्ली की ओर बढ़ने के लिये राजी हो गया। अकबर की सहमति पाकर बैरामखाँ दिल्ली की ओर बढ़ा।

    जब महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने देखा कि बैरामखाँ मुगल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहा है तो उन्होंने दिल्ली से बाहर जाकर पानीपत के मैदान में बैरामखाँ से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया। महाराजा ने धन के लालची अफगान अमीरों को विपुल धन राशि देकर अपने वश में किया और पूरे उत्तरी भारत में दुहाई फिरवाई कि वह मुगलों को भारतवर्ष से बाहर खदेड़ने के लिये पानीपत जा रहा है। जिन राजाओं और सेनापतियों को अपनी जन्मभूमि से प्रेम हो, वे भी पानीपत पहुँचें। महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र का संदेश पाकर तीस हजार राजपूत सैनिक पानीपत के मैदान में आ जुटे। अब दिल्ली की सेना केवल अफगान सैनिकों के भरोसे नहीं रह गयी। महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने अपने विश्वस्त सलाहकारों से कहा कि यदि इस सयम महाराणा सांगा जीवित होते तो भारतवर्ष को म्लेच्छों से मुक्त करवा लेना कोई बड़ी बात नहीं होती।

    हेमचंद्र को अपने तोपखाने और हस्ति सेना पर बहुत भरोसा था किंतु ये तभी कारगर थे जब वे समय से पूर्व रणक्षेत्र में पहुँचकर उचित जगह पर तैनात कर दिये जायें। इनकी गति घुड़सवारों की तरह त्वरित नहीं थी। इसलिये हेमचन्द्र ने अपना तोपखाना पानीपत के लिये रवाना कर दिया और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाते हुए पानीपत की ओर बढ़े।

    अकबर के सेनापति अलीकुलीखाँ को सूचना लगी कि हेमचन्द्र ने अपना तोपखाना तो पानीपत की ओर भेज दिया है और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाता हुआ मस्ती से आ रहा है। बैरामखाँं ने अलीकुलीखाँ को इसी काम पर तैनात कर रखा था कि किसी भी तरह मौका लगते ही तोपखाने को नष्ट कर दे। अलीकुलीखाँ ने अपनी सेना को दिल्ली की सेना के मार्ग में ला अड़ाया। दिल्ली के मुट्ठी भर सैनिक इस आकस्मिक युद्ध के लिये तैयार नहीं थे। बात की बात में अलीकुलीखाँ ने दिल्ली की सेना से तोपखाना छीन लिया।

    तोपखाना छीने जाने के दो सप्ताह बाद इधर से महाराज हेमचंद्र की सेना और उधर से बैरामखाँ की सेना पानीपत के मैदान में आमने सामने हुई। बैरामखाँ ने अलीकुलीखाँ, सिकन्दरखाँ उजबेग और अब्दुल्ला उजबेग को मोर्चे पर भेजा और स्वयं अकबर को लेकर पानीपत से पाँच मील पीछे ही रुक गया। तोपखाना छिन जाने के बाद महाराज हेमचंद्र ने अपना पूरा ध्यान हस्ति सैन्य पर केंद्रित किया। उन्होंने हाथियों को जिरहबख्तर पहनाये और उनकी पीठों पर बंदूकची बैठाये। सेना के दाहिनी ओर शादीखाँ कक्कड़ और बांयी ओर अपने भांजे रमैया को नियुक्त करके महाराज हेमचंद्र सेना के मध्य भाग में आ डटे। अपने हाथी पर खड़े होकर महाराज हेमचंद्र ने पहले अपनी सेना को और फिर शत्रु सेना को देखा। भाग्य की विडम्बना देखकर महाराजा का कलेजा कांप गया। उनका अपना तोपखाना शत्रु के हाथों में पड़कर उनके अपने सिपाहियों को निगलने के लिये तैयार खड़ा था। उन्हें लगा कि जिस हेमू के सामने भाग्यलक्ष्मी हाथ बांधे खड़ी रहती थी, आज उसके रूठ जाने से ही ऐसा हुआ है। उन्होंने अपने सैनिकों को धंसारा करने का आदेश दिया।

    हेमू द्वारा वर्षों से संचित तोपखाना महाराज हेमचंद्र की सेना पर आग फैंकने लगा किंतु हिन्दू सिपाही मृत्यु की परवाह न करके आगे को बढ़ते ही रहे जिससे महाराज हेमचंद्र की सेना का भी वही हश्र हुआ जो खानुआ के मैदान में राणा सांगा की सेना का हुआ था। मुगल सेना ने यहाँ भी तुगलुमा का प्रयोग किया। दुर्भाग्य से हिन्दू सैनिक इस पद्धति से युद्ध करने में सक्षम नहीं थे। देखते ही देखते हिन्दू चारों ओर से घिर गये। महाराजा हेमचंद्र चौबीस लड़ाईयों के अनुभवी सेनापति थे जिनमें से बाईस के परिणाम उनके पक्ष में आये थे। उन्होंने तोपखाने की परवाह न करके शत्रु सैन्य में वो मार लगाई कि अलीकुलीखाँ की सेना के दांये और बांये दोनों पक्षों को तोड़ दिया। थोड़ी ही देर में विजय तराजू के एक पलड़े में लटक गयी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पलड़ा महाराज हेमचंद्र के पक्ष में झुका हुआ था। हिन्दू वीर उत्साह से भर गये और भरपूर हाथ चलाने लगे।

    जब यह सूचना पानीपत से पाँच मील दूर पड़ाव कर रहे बैरामखाँ को दी गयी तो बैरामखाँ अपनी सारी बची-खुची सेना को लेकर युद्ध के मैदान में पहुँचा। जिस समय वह युद्ध क्षेत्र में कूदा, उस समय युद्ध बहुत ही नाजुक स्थिति में था। घोड़ों पर बैठकर महाराजा तक पहुँचना संभव नहीं जानकर बैरामखाँ और उसके अमीर घोड़ों से उतर पड़े तथा तलवारें निकाल कर पैदल ही महाराजा की ओर दौड़ पड़े। बैरामखाँ को युद्ध के मैदान में आया देखकर मुगलों का जोश दूना हो गया। वे तक-तक कर तीर, भाले और बंदूकें चलाने लगे।

    इतिहास गवाह है कि दुर्भाग्य और पराजय ने शायद ही कभी हिन्दू जाति का पीछा छोड़ा हो। इस सर्वत्रव्यापी दुर्भाग्य के चलते न पुरुषार्थ, न विद्या और न उद्यम, कुछ भी हिन्दुओं के काम नहीं आया। जब मुगल सेना में अफरा-तफरी मचनी आरंभ हुई और ऐसा लगा कि महाराज हेमचंद्र को विजय श्री मिलने ही वाली है, उसी समय जाने कहाँ से एक सनसनाता हुआ तीर आया और महाराजा की आँख फोड़ता हुआ निकल गया। महाराजा हेमचंद्र की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वे हौदे में गिर पड़े। शाहकुली मरहम ने महाराज के हाथी को पकड़ लिया। बैरामखां ने महाराज हेमचन्द्र की गर्दन उड़ा दी।

    हेमचन्द्र के पास कुबेर के कोष के बराबर धन सम्पत्ति थी। उसकी रानी ने यह सोचकर कि कहीं यह धन शत्रु के हाथों में न पड़ जाये, उस धन को अलवर जिले की बीजवाड़े की पहाड़ियों में छिपा दिया। तैमूर लंग को हिन्दुस्थान में कत्ले आम मचाकर केवल 120 हाथी मिले थे किंतु इस युद्ध के बाद बैराम खां ने हेमू के 1500 हाथी पकड़े। पानीपत के जिस मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली में मुगलों के राज्य की नींव रखी थी, एक बार फिर बैरामखाँ ने पानीपत के उसी मैदान में महाराज हेमचंद्र को परास्त कर फिर से दिल्ली हासिल कर ली। इसी के साथ म्लेच्छों को भारत भूमि से भगाने का स्वप्न हमेशा-हमेशा के लिये भंग हो गया।


    - मोहनलाल गुप्ता,

    63 सरदार क्लब योजना

    वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 65

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान

    पशुपालन का राजस्थान की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। राज्य की जीडीपी में पशुधन का योगदान लगभग 8 प्रतिशत है। देश का लगभग 10 प्रतिशत से अधिक पशुधन राजस्थान में निवास करता है तथा देश का लगभग 10 प्रतिशत दूध भी राजस्थान से उत्पादित होता है। चूंकि पशुओं में भेड़ों और बकरियों की संख्या अधिक है इसलिये देश के कुल ऊन उत्पादन का लगभग 42 प्रतिशत तथा बकरा मांस का 30 प्रतिशत उत्पादन राजस्थान में होता है। पशुधन विकास की नवीनतम गतिविधियाँ

    1. प्रश्नः राज्य में गौ-संरक्षण के लिये अलग से कौनसा विभाग स्थापित किया गया है?

    उत्तरः गौपालन विभाग।

    2. प्रश्नः किस पशु को राजकीय पशु घोषित किया गया है?

    उत्तरः ऊँट।

    3. प्रश्नः किस देश को ऊँटों की तस्करी होती है?

    उत्तरः बांगलादेश को।

    4. प्रश्नः किस बाँध में रंगीन मछलियों का उत्पादन होगा?

    उत्तरः टोंक जिले के बीसलपुर बाँध में राज्य सरकार द्वारा एक्वाकल्चर आरम्भ किया जायेगा। इसके तहत रंगीन मछलियों की ब्रीडिंग करवाई जायेगी।

    5. प्रश्नः देश के दूध उत्पादन में राजस्थान का कितना हिस्सा है?

    उत्तरः 10 प्रतिशत।

    6. प्रश्नः दूध उत्पादन में राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है?

    उत्तरः दूसरा। (पहला स्थान उत्तर प्रदेश का है।)

    7. प्रश्नः देश की दूसरी दूध परीक्षण एवं अनुसंधान प्रयोगशाला कहाँ खोली गई है?

    उत्तरः जयपुर में। (पहली प्रयोगशाला हरियाणा में है।)

    8. प्रश्नः मुख्यमंत्री पशुधन निःशुल्क दवा योजना क्या है?

    उत्तरः इस योजना में पशुधन के सर्वाधिक उपयोग में आने वाली 110 आवश्यक दवाइयां एवं 13 सर्जिकल/ड्रैसिंग मैटीरियल निःशुल्क उपलब्धत कराया जाता है।

    9. प्रश्नः राज्य में नई पशुधन नीति कब घोषित की गई?

    उत्तरः 18 फरवरी 2010

    10. प्रश्न - नई पशुधन नीति में किस बात पर जोर दिया गया है?

    उत्तर - 1. देशी एवं उन्नत नस्लों को प्रोत्साहित करने हेतु उनका संरक्षण एवं विकास किया जायेगा।

    2. पशु धन युवाओं एवं महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सके।

    3. ऊँट एवं घोड़ों के विकास पर ध्यान दिया गया है।

    4. पर्याप्त अनुसंधान एवं मानव संसाधन विकास कार्यों को बढ़ावा देने के लिये आधुनिक तकनीक का समावेश किया जायेगा।

    5. पशुपालन उत्पादों की वार्षिक वृद्धि दर6 प्रतिशत रखी जायेगी। राज्य में पशुधन का महत्व

    11. प्रश्नः गौधन एवं भैंसों का कितना हिस्सा खेती एवं परिवहन के काम आता है?

    उत्तरः गौधन का 50 प्रतिशत एवं भैंसों का 25 प्रतिशत खेती एवं परिवहन के काम आता है।

    12. प्रश्नः राजस्थान की सकल घरेलू आय में कृषि तथा पशुपालन का योगदान कितना है?

    उत्तरः 19 प्रतिशत।

    13. प्रश्नः राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पशुधन का कितना योगदान है?

    उत्तरः लगभग 8 प्रतिशत।

    14. प्रश्नः देश के पशुधन में राजस्थान का कितना अंश है?

    उत्तरः 10.58 प्रतिशत।

    15. प्रश्नः देश के दुग्ध उत्पादन में राजस्थान की कितनी भागीदारी है?

    उत्तरः 10 प्रतिशत।

    16. प्रश्नः देश के बकरा मांस उत्पादन में राजस्थान की कितनी भागीदारी है?

    उत्तरः 30 प्रतिशत।

    17. प्रश्नः देश के ऊन उत्पादन में राजस्थान की कितनी भागीदारी है?

    उत्तरः 41.6 प्रतिशत।

    18. प्रश्नः राज्य में कितने परिवार पशुपालन एवं कृषि से जुड़े हुए हैं?

    उत्तरः लगभग 65 लाख परिवार।

    19. प्रश्नः राज्य की कितनी प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या की घरेलू आय का माध्यम पशुपालन है?

    उत्तरः 80 प्रतिशत।

    20. प्रश्नः राज्य में पशुपालन से उत्पादन की वृद्धि दर कितनी है?

    उत्तरः 4 से 6 प्रतिशत।

    21. प्रश्नः राज्य में कृषि क्षेत्र से उत्पादन की वृद्धि दर कितनी है?

    उत्तरः 1 से 2 प्रतिशत।

    22. प्रश्नः कुल पशु सम्पदा की दृष्टि से देश में पहला स्थान किस राज्य का है?

    उत्तरः उत्तरप्रदेश।

    23. प्रश्नः कुल पशु सम्पदा की दृष्टि से देश में दूसरा स्थान किस राज्य का है?

    उत्तरः राजस्थान।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1988- राजस्थान के लिये पशुधन के महत्व पर एक संक्षिप्त लेख लिखिये। 20वीं पशुगणना वर्ष 2019


    क्र.सं.       पशुधन विवरण       वर्ष 2012          वर्ष 2019            परिवर्तन प्रतिशत

    1             गौधन(गाय-बैल)     13324462       13937630          613168 4.60

    2              भैंस                  12976095          13693316          717221 5.53

    3             भेड़                    9079702            7903857          .1175845 .12.95

    4           बकरियाँ              21665939             20840203          .825736 .3.81

    5          घोड़े एवं टट्टू         37776                  33679                .4097 .10.85

    6             खच्चर                 3375                   1339                  .2036 .60.33

    7             गधे                    81468                  23374                .58094 .71.31

    8            ऊँट                    325713                212739             .112974 .34.69

    9            सूअर                  237674                154808                .82866 .34.87

                 कुल पशुधन          57732204             56800945            .931259 .1.61

    1           मुर्गियां                 8024424               14622975             6598551 82.23

    1 (आर.ए.एस. प्रारम्भिक परीक्षा वर्ष 2012, 2007 की पशुगणना के आधार पर राजस्थान में पशुओं की संख्या है-

    1. 491 लाख,

    2. 547 लाख,

    3. 579 लाख, 4. 484 लाख ?)

    नोटः ये चारों विकल्प गलत हैं,

    इस प्रश्न का सही उत्तर है- 567 लाख।

    जिलेवार प्रमुख पशुधन संख्या 1

    (बीसवीं पशुगणना-2019, भारत सरकार से प्राप्त अनंतिम आंकड़े)

            जिला           गाय  बैल               भैंस                     भेड़            बकरी                  शूकर

    1 अजमेर           384657            520779            363893             739132           14910

    2 अलवर            241856           1144753           60432               403117            11722

    3 बांसवाड़ा         657389            361245            7958                 720497             117

    4 बारां                298103           266017             11392              184809              6409

    5 बाड़मेर           905199           222727              1013419           2946662           279

    6 भरतपुर           205401          760323                76693              168158            15148

    7 भीलवाड़ा        705423          477272                 359901             829826            7336

    8 बीकानेर        1194729          208251                 662136             626769             599

    9 बूंदी              193509            325032                 55969               306938            11652

    10 चित्तौड़गढ़     379026          473245                   26731              488760             1935

    11 चूरू             438583           277343                   281757           594230              633

    12 दौसा              151525           526460                  59797            311068               6428

    13 धौलपुर           68757             371410                13830               100811              2622

    14 डूंगरपुर          431401          329357                 65783                803899             28

    15 गंगानगर         636702          200125                 233917               303487           1502

    16 हनुमानगढ़        544264       302203                 170021                180537            969

    17 जयपुर            691457         1214213              253706                 787220          16366

    18 जैसलमेर         407048          4638                   836992                1104272            785

    19 जालोर           299259          587826                 416458                352280             33

    20 झालावाड़       250823          344217                10173                   285594            5317

    21 झुंझुनूं            269096         347110                152990                   442134            2979

    22 जोधपुर         1069027       317852                 619468                  1640570          1219

    23 करौली         73155            518622                  82925                   340529               9272

    24 कोटा           216343          240628                 22434                    137387              6619

    25 नागौर          573991          545342                446667                   1195815            3103

    26 पाली           360871          329807                 764787                   682447             3847

    27 प्रतापगढ़       375802         206072                 23093                     417383              1039

    28 राजसमंद        244731        234272                 68347                    537215             3005

    29 स.माधोपुर       77627         301792                 110011                    256260            8197

    30 सीकर             383541        488798                  175454                 920453              4932

    31 सिरोही            205103           211005                  154465               352535              74

    32 टोंक               171736            437452                 219177               319250             5608

    33 उदयपुर            831496            597128                83081                1360159           124

    34  राजस्थान         13937630         13693316            7903857               20840203        154808

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. प्रारम्भिक परीक्षा वर्ष 2012, 2007 की पशुगणना के आधार पर राजस्थान में पशुओं की संख्या है-

    (1.) 491 लाख,

    (2.) 547 लाख,

    (3.) 579 लाख,

    (4.) 484 लाख ?

    2 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2010, पशु गणना 2003 के अनुसार राजस्थान में पशु घनत्व एवं सबसे अधिक पशु घनत्व वाला जिला है-

    (1.) 144 एवं डूंगरपुर,

    (2.) 150 एवं बाड़मेर,

    (3.) 160 एवं बीकानेर,

    (4.) 165 एवं भरतपुर ?

    3 (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2010, पशु गणना 2003 के अनुसार राजस्थान में पशु घनत्व एवं सबसे अधिक पशु घनत्व वाला जिला है-

    अ. 144 एवं डूंगरपुर,

    ब. 150 एवं बाड़मेर,

    स. 160 एवं बीकानेर,

    द. 165 एवं भरतपुर?)

    राज्य में पशुधन


    1. प्रश्नः राज्य में सन् 2019 में कौनसी पशुगणना हुई?

    उत्तरः 20वीं पशुगणना।

    2.प्रश्नः 19वीं पशुगणना के अनुसार राज्य में कितना पशुधन है?

    उत्तरः 577.32 लाख (पशुधन में गौधन, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़े, टट्टू एवं खच्चर,गधे, ऊँट एवं सूअर सम्मिलित हैं।)

    3. प्रश्नः राज्य में पोल्ट्री बर्ड्स की संख्या कितनी है?

    उत्तरः 80.24 लाख।

    4. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक पशु संख्या वाला जिला

    उत्तरः बाड़मेर

    5. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक गायों वाला जिला

    उत्तरः बीकानेर

    6. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक भैंसों वाला जिला

    उत्तरः जयपुर

    7. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक भेड़ों वाला जिला

    उत्तरः बाड़मेर

    8. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक बकरियों वाला जिला

    उत्तरः बाड़मेर

    9. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक ऊँटों वाला जिला

    उत्तरः बाड़मेर

    10. प्रश्नः सर्वाधिक दुग्ध संकलन एवं विक्रय वाला जिला

    उत्तरः जयपुर

    11. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक मुर्गियों वाला जिला

    उत्तरः अजमेर

    12. प्रश्नः राज्य में सबसे कम पशुसंख्या वाला जिला

    उत्तरः धौलपुर

    13. प्रश्नः राज्य में सबसे कम गायों वाला जिला

    उत्तरः धौलपुर

    14. प्रश्नः राज्य में सबसे कम भैंसों वाला जिला

    उत्तरः जैसलमेर

    15. प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक पशुधन

    उत्तरः बकरी

    16. प्रश्नः राज्य की कुल पशु सम्पदा में बकरी

    उत्तरः 37.79 प्रतिशत प्रति-व्यक्ति पशुधन

    17. प्रश्नः पशुगणना 1951 के अनुसार राज्य में प्रतिव्यक्ति पशुधन संख्या कितनी थी?

    उत्तरः 1.59 पशु प्रति व्यक्ति।

    18. प्रश्नः पशुगणना 2012 के अनुसार राज्य में प्रतिव्यक्ति कितना पशुधन उपलब्ध है?

    उत्तरः 0.84 पशु प्रति व्यक्ति।

    19. प्रश्नः पशुगणना 2019 के अनुसार राज्य में प्रतिव्यक्ति कितना पशुधन उपलब्ध है?

    उत्तरः 0.83 पशु प्रति व्यक्ति।


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  • दो रेगिस्तानों के दो छोरों पर बसे दो शहर जोधपुर तथा शैफशोयुन

     02.06.2020
    दो रेगिस्तानों के दो छोरों पर बसे दो शहर जोधपुर तथा शैफशोयुन

    दो रेगिस्तानों के दो छोरों पर बसे दो शहर जोधपुर तथा शैफशोयुन


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    एशिया के थार रेगिस्तान के पूर्वी छोर पर स्थित शहर जोधपुर तथा अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान के पश्चिमी छोर पर स्थित मोरक्को का शैफशोयुन (Chefchaouen) शहर एक जैसी कई विशेषताएं एवं साम्यताएं लिये हुए हैं जिन्हें देखकर हैरानी होती है। सबसे पहली साम्यता यह है कि दोनों ही शहर विश्व के दो विख्यात मरुस्थलों के छोर पर स्थित हैं तथा दोनों ही शहर एक पहाड़ी की तलहटी में बसे हैं। तीसरी साम्यता यह है कि इन दोनों शहरों में कम चैड़ाई वाली गलियां स्थित हैं।

    यह भी एक अविश्वसनीय दिखाई देने वाला साम्य है कि जोधपुर शहर की स्थापना 1459 ई. में राव जोधा ने की तथा शैफशोयुन शहर की स्थापना 1471 ई. में मोउले अली बेन मौउसा बेन रैचेड अल अलामी ने की। जोधपुर शहर के इतिहास में मेहरानगढ़ नामक दुर्ग का बहुत बड़ा योगदान है इसी प्रकार शैफशोयुन शहर के इतिहास में मूरिश फोर्ट का बहुत बड़ा योगदान है। इन दोनों नगरों में सबसे बड़ी साम्यता यह है कि दोनों ही शहरों का भीतरी और पुराना हिस्सा नीले रंग से पुता हुआ है।

    अंतर यह है कि जोधपुर वासियों ने सूर्य के तेज प्रकाश के चैंधे एवं गर्मी से राहत पाने के लिये अपने घरों के बाहर नीला रंग पुतवाने की परम्परा आरम्भ की किंतु शैफशोयुन में यह परम्परा यहूदी धार्मिक मान्यताओं के कारण आरम्भ हुई। यहूदियों में धार्मिक मान्यता है कि यदि धागों को तेखेलेल (प्राकृतिक नील) से रंग कर उससे धार्मिक शाॅल बुना जाये तो व्यक्ति को सदैव ईश्वर का स्मरण रहता है। इसी मान्यता के चलते शैफशोयुन में घरों की दीवारों को भी नीला रंगने की परम्परा आरम्भ हुई।

    हो सकता है कि शैफशोयुन शहर के निवासियों ने गर्मी से राहत पाने के लिये नीले रंग को अपनाया। जिस प्रकार नीले रंग वाले घरों के साथ-साथ जोधपुर में सफेद रंग से पुते हुए मकान भी दिखाई देते हैं, ठीक वैसे ही शैफशोयुन शहर में भी कुछ मकान बाहर से सफेद चूने अथवा सफेद रंग से पोते गये हैं। दोनों ही शहरों में परम्परागत रूप से बने मकानों की पहली मंजिल के गलियारों पर रेलिंग लगाने की स्टाइल से लेकर खिड़कियों में ग्रिल की डिजाइनें भी साम्य रखती हैं। यहां तक की सीढ़ियों और बरामदों में भी बहुत कुछ साम्यता है।

    घरों की सबसे ऊपरी मंजिल की छतों पर केलू लगाने का प्रचलन लम्बे समय तक जोधपुर में रहा है। कई घरों में आज भी यह देखने को मिल जायेगी। यह परम्परा शैफशोयुन में वर्तमान में भी प्रचलन में है। जिस प्रकार जोधपुर में चटख रंगों के सूती साफे पहने जाते हैं, उसी प्रकार शैफशोयुन में आदिवासी लोग चटख रंगीन सूती धागों से बुने हुए टोप पहनते हैं। उनके टोप चटख रंगों के धागों से सजाये जाते हैं। शैफशोयुन के आदिवासी आज से 1400 साल पहले स्पेन से निष्कासित मूरिश लोगों के वंशज हैं। ये आदिवासी शहर के बहुसंख्यक लोगों से बिल्कुल अलग दिखाई देतेे हैं।

    जिस प्रकार थार के रेगिस्तानी अंचल में चूल्हों में लकड़ी की आग पर रोटियां बनाने की परम्परा सम्पूर्ण भारत में रही है। उसी प्रकार आज भी इस शहर में लकड़ी की आंच पर रोटियां सेकी जाती हैं जिसके कारण इन रोटियों की बाहरी सतह कुरकुरी और स्वादिष्ट होती है। आज से कुछ साल पहले तक पतली देहयष्टि वाली बकरियां जोधपुर में घर-घर पाली जाती थीं ओर हजारों मील दूर स्थित मोरक्को के शहर में भी इसी प्रकार की देहयष्टि वाली बकरियां पाली जाती हैं।

    इन दोनों शहरों 
    में एक और बड़ी साम्यता है। जिस प्रकार जोधपुर पर्यटन के लिये यूरोप एवं अमरीकी देशों में विख्यात है, उसी प्रकार मोरक्को का यह शहर भी पर्यटन के लिये विश्व मानचित्र पर अच्छा नाम रखता है।



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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में गाय एवं भैंस पालन

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थान में गाय एवं भैंस पालन

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 66

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में गाय एवं भैंस पालन

    राज्य में गौ-पालन

    1. प्रश्नः राज्य के किन जिलों में गौपालन अधिक होता है?

    उत्तरः उदयपुर जिले में राज्य का सर्वाधिक गौवंश उपलब्ध है। बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा जिलों में भी गौवंश बड़ी संख्या में पाला जाता है। पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर, बीकानेर, नागौर और जोधपुर आदि रेगिस्तानी जिलों में भी गौपालन बड़ी संख्या में होता है।

    2. प्रश्नः राज्य के किन जिलों में गौपालन सबसे कम होता है?

    उत्तरः अलवर, भरतपुर, दौसा, सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों में।

    3. प्रश्नः राजस्थान में गाय की कौनसी नस्लें पायी जाती हैं?

    उत्तरः थारपारकर, राठी, कांकरेज, नागौरी, हरियाणवी, गिर।

    4. प्रश्नः राजस्थान में बैलों की कौनसी नस्लें प्रसिद्ध हैं?

    उत्तरः नागौरी व मालवी।

    5. प्रश्नः दुग्ध उत्पादन हेतु कौनसी नस्लें अधिक अच्छी हैं?

    उत्तरः थारपारकर, कांकरेज, राठी तथा गिर नस्लों को डेयरी की उत्तम गौ-नस्ल श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।

    6. प्रश्नः राज्य में गाय की द्विप्रयोजनी नस्लें कौनसी हैं?

    उत्तरः कांकरेज तथा हरियाणवी।

    7. प्रश्नः कांकरेज नस्ल की गायें किस जिले में पायी जाती हैं?

    उत्तरः जालोर जिले के सांचोर क्षेत्र तथा उससे लगते हुए बाड़मेर जिले में पाई जाती है।

    8. प्रश्नः कांकरेज नस्ल का दूसरा नाम क्या है?

    उत्तरः सांचौरी गाय।

    9. प्रश्नः सांचौरी नस्ल किस काम के लिये उत्तम है?

    उत्तरः दूध तथा बैल दोनों के लिये।

    10. प्रश्नः कालीबंगा, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहरों पर जिन बड़े-बड़े सींगों वाले सांडों के चित्र पाये जाते हैं, उनकी झलक किस नस्ल में मिलती है?

    उत्तरः कांकरेज (सांचोरी) नस्ल में।

    11. प्रश्न - हरियाणवी किस नस्ल का पशु है जो राजस्थान में भी पाला जाता है?

    उत्तर - गाय।

    12. प्रश्नः हरियाणवी नस्ल किन जिलों में पाली जाती है?

    उत्तरः गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर आदि जिलों में।

    13. प्रश्नः हरियाणवी नस्ल किस काम के लिये उपयुक्त है?

    उत्तरः यह द्विप्रयोजनी नस्ल है तथापि भारवाहक एवं खेती के अधिक उपयुक्त होती है।

    14. प्रश्नः थारपारकर नस्ल की गायें किन जिलों में पाली जाती हैं?

    उत्तरः सीमावर्ती क्षेत्र अर्थात् जैसलमेर, बाड़मेर तथा जोधपुर जिलों में।

    15. प्रश्नः राठी नस्ल की गाय किस क्षेत्रमें पाई जाती है?

    उत्तरः गंगानगर से लेकर बीकानेर और जैसलमेर तक के क्षेत्र में प्रमुखता से पाई जाती है।

    16. प्रश्नः राठी गाय को किन नस्लों की मिश्रित नस्ल माना जाता है?

    उत्तरः लाल सिंधी व साहीवाल नस्लों की।

    17. प्रश्नः गाय की गिर नस्ल का दूसरा नाम क्या है?

    उत्तरः इसे रैंडा तथा अजमेरा भी कहते हैं।

    18. प्रश्नः गिर नस्ल किन जिलोंमें पाली जाती है?

    उत्तरः मध्य राजस्थान अर्थात् अजमेर, नागौर, टोंक तथा भीलवाड़ा जिलों में।

    19. प्रश्नः राजस्थानी बैलों की कौनसी नस्ल विश्वभर में प्रसिद्ध है?

    उत्तरः नागौरी।

    20. प्रश्नः नागौरी नस्ल की गायें किस जिले में पाई जाती है?

    उत्तरः नागौर जिले में।

    21. प्रश्नः नागौरी नस्ल किसके लिये प्रसिद्ध हैं?

    उत्तरः बैलों के लिये।

    22. प्रश्नः राजस्थान में किस नस्ल का बैल बोझा ढोने के लिये अच्छा माना जाता हैं?

    उत्तरः नागौरी।

    23. प्रश्नः मालवी नस्ल की गायें किन जिलोंमें पाली जाती हैं?

    उत्तरः दक्षिणी राजस्थान अर्थात् चित्तौड़गढ़, कोटा, झालावाड़, डूँगरपुर एवं बाँसवाड़ा जिलों में।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए

    प्रश्न 1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2007, थारपारकर प्रजाति कहां पायी जाती है- जनजाति क्षेत्र, राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्र/हाड़ौती क्षेत्र/तोरावाती क्षेत्र? उत्तर- सीमावर्ती क्षेत्र।

    2 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, वर्ष 1994, गायों की उन चार नस्लों के नाम दीजिये जिन्हें सामान्यतः डेयरी नस्ल की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।

    3 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1996, निम्न के बारे में आप क्या जानते हैं?- राठी।

    4 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1988- राजस्थान में पायी जाने वाली गौ वंश की चार महत्त्वपूर्ण किस्में बताइये तथा वे क्षेत्र बताइये जहाँ ये पायी जाती हैं।)

    5 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 2003, सामान्य ज्ञान- 50 शब्दों में लिखिये- गौवंश की प्रमुख नस्लें एवं उनके क्षेत्र। राजस्थान में भैंस पालन


    24. प्रश्नः कौनसा जिला भैंस पालन में सर्वाग्रणी है?

    उत्तरः अलवर।

    25. प्रश्नः भैंस पालन में दूसरे नम्बर पर कौनसा जिला है?

    उत्तरः जयपुर।

    26. प्रश्नः भैंस पालन में तीसरे नम्बर पर कौनसा जिला है?

    उत्तरः भरतपुर।

    27. प्रश्नः किस जिले में भैंसे सबसे कम पाली जाती हैं?

    उत्तरः जैसलमेर जिले में।

    28. प्रश्नः राज्य के कौनसे जिलों में भैंस कम पाली जाती है?

    उत्तरः जैसलमेर, बाड़मेर तथा बीकानेर आदि रेगिस्तानी जिले, हाड़ौती के कोटा व बाराँ जिले एवं सिरोही जिला।

    29. प्रश्नः राज्य में किस नस्ल की भैंस अधिक प्रचलित है?

    उत्तरः मुर्रा।

    30. प्रश्नः दुग्ध उत्पादन के लिये भैंस की सर्वाधिक उत्तम नस्ल कौनसी है?

    उत्तरः मुर्रा।

    31. प्रश्नः मुर्रा नस्ल मूलतः किन राज्यों की है?

    उत्तरः यह मूलतः पंजाब और हरियाणा राज्यों की नस्ल है।

    32. प्रश्नः मुर्रा भैंसएक दिन में कितना दूध देती है?

    उत्तरः औसतन 10 किलो तथा अधिकतम 18 से 20 किलो।

    33. प्रश्नः सूरती किस पशु की नस्ल है?

    उत्तरः भैंस।

    34. प्रश्नः राजस्थान के दक्षिणी जिलों में भैंस की कौनसी नस्ल पाली जाती है?

    उत्तरः दक्षिणी जिलों में गुजरात के काठियावाड़ मूल की जाफराबादी नस्ल पाली जाती है जिसे सूरती भी कहते हैं।

    35. प्रश्नः जाफराबादी भैंस कितना दूध देती है?

    उत्तरः प्रतिदिन औसतन 11.5 किलो दूध देती है।

    36. प्रश्नः राजस्थान पशुधन विकास बोर्ड ने भैंस की किस नस्ल के विकास का काम चला रखा है?

    उत्तरः मुर्रा।

    37. प्रश्नः किस नस्ल की भैंस के दूध में वसा का प्रतिशत सर्वाधिक होता है?

    उत्तरः भदावरी।

    38. प्रश्नः भैंस प्रजनन केन्द्र कहाँ स्थित है?

    उत्तरः वल्लभनगर (उदयपुर)।


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  • भारतीय राजाओं के किस्से यूरोपीय अखबारों में छा गये

     02.06.2020
    भारतीय राजाओं के किस्से यूरोपीय अखबारों में छा गये

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से यूरोपीय अखबारों में भारतीय नरेशों के रोचक किस्से छपने लगे थे। इन किस्सों में भारतीय राजाओं और रानियों के विविध शौक, उनकी सम्पत्तियां, उनकी प्रेम कहानियां तथा उनकी सनक के वाकये नमक मिर्च लगाकर बड़े चटखारों के साथ प्रस्तुत किये जाते थे। बीसवीं सदी के आरंभ तक यूरोप के अखबारों की हालत यह हो गयी थी कि यदि उनमें भारतीय राजाओं और रानियों के किस्से न हों तो वे बिकते ही नहीं थे।


    यूरोपवासियों को यह पढ़कर रोमांच का अनुभव होता था कि भारत के लोग अपने राजाओं, रानियों और राजकुमारों के पैर छूते हैं। राजाओं तथा रानियों के पास बेशुमार दौलत है। वे कीमती जेवर, मुकुट, हीरे-जवाहर, शानदार विशाल महलों, दुर्गों, स्वर्णजड़ित बग्घियों, भड़कीली पोशाकों, पालकियों, सोने चांदी के बरतनों तथा सजे हुए हाथियों के मालिक हैं। उनकी सैरगाहों तथा शिकारगाहों में आमोद प्रमोद तथा विलासिता के ऐसे-ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिन्हें देखकर पूरे यूरोप की संपदा फीकी पड़ जाये। राजाओं की रानियों तथा रखैलों की संख्या असंख्य है तथा उनके आस-पास रूप गर्व से दमदमाती वेश्याओं का मेला लगा रहता है। इन किस्सों को पढ़कर बहुत से यूरोप निवासी प्रतिवर्ष भारत की यात्रा करते थे।

    बहुत से यूरापीय पत्रकारों ने तो इन राजाओं को इतना अधिक रहस्यमय बना दिया कि गोरे लोग भारतीय राजाओं की एक झलक पाने को तरसते थे। ई.1902 में जब जयपुर नरेश माधोसिंह लंदन गया तो अपने साथ 680 किलो वजन की चांदी के दो विशाल लोटों में गंगाजल भरकर ले गया। जब वह अपने जहाज से लंदन के तट पर उतरा तो उसके जुलूस को देखने के लिये लगभग पूरा लंदन उमड़ पड़ा था। माधोसिंह ने भी पूरे ठाट-बाट से लंदन नगर में प्रवेश किया। उसने चांदी के विशाल लोटों को एक अलग गाड़ी में रखवाकर उनका सार्वजनिक प्रदर्शन करवाया। आज भी ये लोटे जयपुर के सिटी पैलेस में रखे हैं।

    लैरी कालिंस तथा दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है कि यदि औसत निकालें तो प्रत्येक भारतीय राजा के पास 11 पदवियां, 5.8 पत्नियां, 12.6 बच्चे, 9.2 हाथी, 2.8 निजी रेल डिब्बे, 3.4 रॉल्स राएस कारें थीं और प्रत्येक ने 22.9 शेरों का शिकार किया था। राजाओं की आय की कोई सीमा नहीं थी। दीवान जरमनीदास ने एक लेखक को उद्धृत करते हुए लिखा है- इंग्लैण्ड के बादशाह को कुल राजस्व में से प्रत्येक 16,000 में से एक अंश मिलता है, बेलजियम के बादशाह को 1,000 में से एक, इटली के बादशाह को 500 में से एक, डेन्मार्क के राजा को 300 में से एक और जापान के सम्राट को 400 में से एक। किसी राजा को 17 में से एक नहीं मिलता जिस प्रकार त्रावणकोर की महारानी को मिलता है। हैदराबाद के निजाम और बड़ौदा के महाराजा 13 में से एक, कश्मीर और बीकानेर के महाराजा 5 से एक अंश लेते हैं। सारा संसार यह जान कर निंदा करेगा कि बहुत से राजा लोग ऐसे हैं जो रियासत के राजस्व का एक तिहाई या आधा भाग अपने निजी खर्च में लगाते हैं।

    रुडयार्ड किपलिंग ने लिखा है कि ईश्वर ने महाराजाओं को खास इसलिये पैदा किया जिससे मानव जाति को दमदार धूम-धड़ाका देखने के अवसर मिले। राजा उग्र होते या नम्र, समृद्ध होते या गरीब, वीर होते या कायर........राजा नाम से ही लोगों को हाथी-घोड़ों की, हीरे जवाहरात की, सुंदरियों और शिकार की याद आ जाती। भारतीय राजाओं से जुड़ी दंतकथायें और परीकथायें तो दुनिया भर में कही और सुनी जाने लगी थीं। महाराजा भरतपुर का संग्रह सबसे विशिष्ट था। उनकी मास्टर पीस चीजें हाथीदांत की बनी हुई थीं। एक-एक चीज के पीछे किसी सम्पूर्ण परिवार का वर्षों का परिश्रम लगा हुआ था।

    पूरे यूरोप में यह बात विख्यात थी कि जयपुर महाराजा का जबर्दस्त खजाना राजस्थान की किसी पहाड़ी में दबा हुआ था जिसकी रक्षा पीढ़ियों से एक ही राजपूत लड़ाकू परिवार करता आ रहा था। हर महाराजा को जीवन में केवल एक बार वह खजाना दिखाया जाता ताकि वह ऐसे पत्थरों और जवाहिरात का चुनाव कर सके जिनके शकुन के जोर पर उसका राज्य दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता जाये। उस खजाने की एक अद्भुत चीज थी गले का वह हार, जिसमें मानिक की एक पर एक तीन झालरें सी लगी हुई थीं। उनमें तीन जबर्दस्त नीलम गुंथे हुए थे। झालरों का एक एक मानिक इतना बड़ा था जैसे कबूतर का अण्डा। सबसे बड़े मानिक का वजन 90 केरेट था।

    यूरोप भर में विख्यात था कि भारत की सर्वाधिक रोमांचक रॉल्स रॉयस गाड़ी महाराजा भरतपुर की है। चांदी से मढ़ी हुई उस गाड़ी की छत उठाई गिराई जा सकती है जिसमें से रहस्यमय कामोद्दीपक किरणें फूटती हैं। यह कार उंचे घरानों के लोगों को विवाह समारोह की शोभा बढ़ाने के लिये भी दी जाती थी। अगर किसी उंचे घराने को अपने वैवाहिक समारोह में उपयोग करने के लिये महाराजा की कार मिल जाती तो वह धन्य हो जाता था। शिकार का तामझाम लेकर चलने के लिये भरतपुर नरेश ने एक रॉल्स रॉयस अलग से मंगवाई। वह कार इतनी मजबूत, तेज रफ्तार और आरामदायक थी कि 1921 में जब प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आया तो भरतपुर नरेश, प्रिंस ऑफ वेल्स तथा लॉर्ड माउंटबेटन को उसमें बिठाकर शिकार पर निकला। माउंटबेटन ने अपनी डायरी में लिखा है - वह कार थी या तूफान? ऊबड़ खाबड़ मैदानों, पत्थरों और गड्ढों पर से वह ऐसे निकल जाती थी जैसे समुद्र में नौका।

    रॉल्स रॉयस श्रेणी से परे लंकास्टर कम्पनी की एक गाड़ी महाराजा अलवर के पास थी। वह खास महाराजा के ही दिये नक्शे पर तैयार की गयी थी और निःसंदेह भारत की सबसे महंगी गाड़ी थी। अंदर और बाहर दोनों तरफ वह सोने द्वारा मंढ़ी गयी थी। उसका कलात्मक स्टियरिंग व्हील हाथी दांत का था और शोफर के बैठने की गद्दी भी सोने की कसीदाकारी वाली थी। उसकी सीट हूबहू उस कोच जैसी बनाई गयी थी जिस पर इंगलैण्ड के राजा मुकुट धारण करने के बाद बैठा करते। उस भारी भरकम राक्षसी कार के यंत्र में ऐसी न जाने कौन सी खूबी थी कि सड़क पर वह 70 मील प्रति घण्टे की स्पीड से भाग सकती थी।

    यूरोप का बच्चा-बच्चा जानता था कि भरतपुर नरेश जब आठ साल के थे तब अपना पहला शेर मार चुके थे। पैंतीस साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने इतने शेर मारे कि उनके चमड़े सीं-सीं कर महल के सभी स्वागत कक्षों में बतौर कालीन के बिछा दिये गये। यह नैसर्गिक कालीन कमरों की दीवार से दीवार तक खिंचा हुआ था। भरतपुर राज्य में ही बत्तखों के शिकार का एक नया रिकार्ड कायम किया गया था। वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के सम्मान में मात्र तीन घण्टों में 4,482 बतखें गोली से उड़ा दी गयी थीं।

    अक्टूबर 1926 में कराची में दिये गये एक भाषण में श्रीनिवास शास्त्री ने कहा कि अधिकांश राजा अपने राज्यों में कदाचित ही रुकते हैं। उन्हें उस हर स्थान पर देखा जा सकता है जहाँ से वे अपनी प्रजा के धन से अपने लिये आनंद खरीद सकते हैं। आप लंदन चले जाइये, पेरिस चले जाइये या किसी भी फैशनेबल नगर में चले जाइये आपको कोई न कोई भारतीय राजा मिल जायेगा जो अपनी तड़क-भड़क से लोगों की आँखें चौंधिया रहा होगा या उन्हें बरबाद कर रहा होगा जो उसके निकट जाते हैं।

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  • महान पर्व रक्षा बंधन!

     02.06.2020
     महान पर्व रक्षा बंधन!

     महान पर्व रक्षा बंधन!


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    रक्षा बंधन के महान् पर्व पर आप सबका अभिनंदन।

    मैंने इसे महान् पर्व कहा, यह बात केवल कहने भर के लिए नहीं है।

    प्रत्येक भारतीय पर्व महान् है तथा उसमें हमारी शाश्वत संस्कृति की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि निहित है। प्रत्येक पर्व अपने आपमें एक सम्पूर्ण संस्कृति है।

    आप इस पर्व की महानता पर किंचित् विचार करें।

    हम कहते हैं कि राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोए जाने की आवश्यकता है। तो रक्षा बंधन का यह पर्व और क्या है? सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने का ही तो उपक्रम है, उसी का तो प्रयास है।

    और ऐसा करते समय कितनी अद्भुत बात है कि हम किसी तरह की जबर्दस्ती नहीं करते, किसी कानून का उपयोग नहीं करते, कोई हथियार नहीं उठाते, कोई युद्ध जीत कर राष्ट्र को एक नहीं करते! कोई संधि नहीं करते। कोई धारा नहीं लगाते। केवल सूत के कच्चे धागे को प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के भाव से भिगोकर एक-दूसरे की कलाई पर बांधते हैं और किसी अनजान को भी अपना बना लेते हैं।

    रक्षा बंधन के पर्व की महानता के एक और पक्ष पर बात करें। कच्चे सूत्र का एक धागा प्रेम के जल में सिंचित होकर इतना मजबूत हो जाता है कि उसके बंधन को तोड़ पाना किसी के वश में नहीं रह जाता। यदि एक बार भी किसी अनाजन स्त्री ने किसी भारतीय पुरुष की कलाई पर धागा बांध दिया तो वह स्त्री और वह पुरुश मरते दम तक उस धागे की पवित्रता की रक्षा करते हैं।

    क्या संसार भर में कोई और देश, कोई और संस्कृति कोई और समाज ऐसा है जो सूत के कच्चे धागों को प्रेम, श्रद्धा विश्वास और समर्पण के जल में भिगोकर इतनी मजबूती देने की ताकत रखता है! हम रखते हैं।

    आज यदि देश में बलात्कार लूट और हत्याएं की घटनाएं बढ़ रही हैं तो केवल इसलिए के हमने अपनी नई पीढ़ी को रक्षाबंधन जैसे त्यौहारों का असली अर्थ नहीं बताया है। इस पर्व की भावना जन-जन तक नहीं पहुंचाई है।

    रक्षा बंधन के पर्व की महानता के एक और पक्ष पर बात करते हैं। वह है पॉजिटिविटी। आज पूरी दुनिया में पॉजिटिविटी की बात होती है। रक्षा बंधन के पर्व से अधिक पॉजिटिविटी और क्या होगी? बहिन भाई के लिए मंगल कामना करती है, जीवन के संघर्षों में उसकी विजय की कामना करती है, उसकी दीर्घ आयु होने की कामना करती है, उसके परिवार की सुख वृद्धि की कामना करती है और भाई अपनी बहिन के सिर पर हाथ रखकर कहता है, बहिन तू चिंता मत कर। तेरा जीवन हमेशा खुशियों से भरा रहेगा। यदि तुझे कभी मेरी जरूरत हो तो मैं तुझे जीवन के हर मोड़ पर खड़ा मिलूंगा। मैं तेरे संकट अपने ऊपर ले लूंगा। मैं अपने प्राण देकर भी तेरी और तेरे परिवार की रक्षा करूंगा।

    इस पर्व के एक और पक्ष पर बात करते हैं। भारतीय संस्कृति के समस्त त्यौहार आनंद और हर्ष के त्यौहार हैं, होली हो, दीपावली हो, दहशहरा हो, रक्षा बंधन हो या फिर भगवान को छप्पन भोग लगाने का आयोजन हो, सबमें आनंद मनाया जाता है। किसी प्रकार के शोक की अभिव्यक्ति हमारे किसी त्यौहार में नहीं होती जबकि संसार की अन्य संस्कृतियां शोक के त्यौहार मनाती हैं, अपने पर्वों पर रोती-पीटती हैं। इस दृष्टि से देखें तो भी रक्षा-बंधन का पर्व एक महान् पर्व है


    संसार की किसी भी संस्कृति का कोई भी पर्व रक्षा बंधन जैसी से भारतीय पर्व से तुलना नहीं की जा सकती। आजकल भारतीय पर्वों से मिलते-जुलते पर्व मनाने की परम्पराएं विश्व के अनेक देशों में आरम्भ हो गई हैं। आजकल फ्रेंण्डशिप बेल्ट आती है, इसे पश्चिमी बाजारवाद ने तैयार किया है। वस्तुतः उन्होंने राखी के इसी कच्चे धागे को फ्रेंण्डशिप बेल्ट में बदल कर पैसा कमाने का जरिया बना लिया है।

    भारतीय संस्कृति में रक्षा बंधन को ब्राह्मणों का, दीपावली को वैश्यों का, विजया दशमी को क्षत्रियों का तथा होली को श्रमिक वर्ग का पर्व माना जाता है।

    यदि हम इस बात पर विचार करें कि रक्षा बंधन ब्राह्मणों का पर्व क्यों है, तो भी हमें इस पर्व की महानता के बारे में ज्ञान हो सकता है।

    यजुर्वेद कहता है- वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। राष्ट्र जागरण के महान उद्देश्य के लिए ही तो पुरोहित रक्षासूत्र हाथ में लेकर निकलता है और अपने द्वारा मंत्रोच्चार के साथ बांधे गए इस धागे के साथ ही वह राष्ट्र को भी एक सूत्र में बांध डालता है। इसलिए रक्षा बंधन ब्राह्मणों का पर्व है तथा यह भारत के समस्त पर्वों में सबसे महान है।

    ओऽम् शांति।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में भेड़ एवं बकरी पालन

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थान में भेड़ एवं बकरी पालन

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 67

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में भेड़ एवं बकरी पालन

    राजस्थान में भेड़ पालन

    1. प्रश्नः राजस्थान के किन जिलों में भेड़पालन अधिक होता है?

    उत्तरः रेगिस्तानी जिलों यथा बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर आदि।

    2. प्रश्नः भेड़पालन में राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है?

    उत्तरः पहला।

    3. प्रश्नः राजस्थान में किस नस्ल की भेड़ें पाली जाती हैं?

    उत्तरः चोकला, मारवाड़ी, जैसलमेरी, मगरा, मालपुरी, सोनाड़ी, नाली व पूंगल।

    4. प्रश्नः राज्य के किस जिले में सर्वाधिक भेड़ें पाली जाती हैं?

    उत्तरः बाड़मेर जिले में।

    5. प्रश्नः किस नस्ल की भेड़ की ऊन लम्बे रेशे वाली होती है?

    उत्तरः नाली।

    6. प्रश्नः कालीन के लिये ऊन देने वाली भेड़ की नस्ल कौनसी है?

    उत्तरः नाली।

    7. प्रश्नः भेड़ों की नाली नस्ल किन जिलों में पायी जाती है?

    उत्तरः गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, झुंझुनूं एवं बीकानेर।

    8. प्रश्नः नाली नस्ल की भेड़ प्रतिवर्ष कितनी ऊन देती है?

    उत्तरः 3 से 4 किलोग्राम।

    9. प्रश्नः नाली नस्ल की भेड़ की ऊन का रेशा कितना लम्बा होता है?

    उत्तरः 12 से 14 सेण्टीमीटर तक।

    10. प्रश्नः मगरा, चोकला, पूगल तथा मारवाड़ी नस्ल की भेड़ें प्रतिवर्ष कितनी ऊन देती हैं?

    उत्तरः 2 किलोग्राम तक।

    11. प्रश्नः जैसलमेरी नस्ल की भेड़ प्रतिवर्ष कितनी ऊन देती हैं?

    उत्तरः साढ़े पाँच किलोग्राम तक।

    12. प्रश्नः शेखावाटी क्षेत्र में भेड़ की कौनसी नस्ल सर्वाधिक पाई जाती है?

    उत्तरः चोकला।

    13. प्रश्नः सबसे अच्छी किस्म की ऊन देने वाली भेड़ की नस्ल कौनसी है?

    उत्तरः मेरीनो।

    14. प्रश्नः भेड़ की किस नस्ल को भारत की मेरिनो कहते हैं?

    उत्तरः चोकला।

    15. प्रश्नः बागड़ी नस्ल की भेड़ें किस अधिकतर जिले में पाई जाती हैं?

    उत्तरः अलवर।

    16. प्रश्नः राजस्थान में सर्वाधिक ऊन देने वाली भेड़ की नस्ल कौनसी है?

    उत्तरः जैसलमेरी।

    17. प्रश्नः भेड़ की सोनाड़ी नस्ल किन जिलों में पाई जाती है?

    उत्तरः टोंक, बूँदी, कोटा एवं झालावाड़।

    18. प्रश्नः सोनाड़ी भेड़ें प्रतिवर्ष कितनी ऊन देती हैं?

    उत्तरः 750 ग्राम से डेढ़ किलोग्राम तक।

    19. प्रश्नः सोनाड़ी भेड़ प्रतिदिन कितना दूध देती है?

    उत्तरः 750 ग्राम से 1 किलो तक।

    20. प्रश्न - भेड़ का दूध क्या काम आता है?

    उत्तर - मारवाड़ के पशुपालक भेड़ों का दूध पीते हैं। टूटी हुई अस्थियाँ जोड़ने के लिये भेड़ के दूध का लेपन किया जाता है। पशुपालन विभाग ने भेड़ के दूध से आइसक्रीम बनाने की योजना बनायी है।

    21. प्रश्नः राज्य में केन्द्रीय भेड़ प्रजनन केन्द्र कहाँ है?

    उत्तरः फतेहपुर (सीकर जिला)।

    22. प्रश्नः राजस्थान में केन्द्रीय भेड़ एवं अनुसंधान केन्द्र कहाँ स्थित है?

    उत्तरः अविकानगर (टौंक जिला)।

    23. प्रश्नः राजस्थान में भेड़-ऊन प्रशिक्षण संस्थान कहाँ है?

    उत्तरः जोधपुर। राजस्थान में बकरी पालन

    24. प्रश्नः राज्य के पशुओं में सर्वाधिक संख्या किस पशु की है?

    उत्तरः बकरी।

    25. प्रश्नः राजस्थान के पशुधन में बकरी कितने प्रतिशत है?

    उत्तरः 37.53 प्रतिशत।

    26. प्रश्नः भारत की बकरियों का कितना प्रतिशत राजस्थान में पाला जाता है?

    उत्तरः 28 प्रतिशत।

    27. प्रश्नः किस जिले में बकरियों की संख्या सर्वाधिक पाई जाती है?

    उत्तरः बाड़मेर जिले में।

    28. प्रश्नः बकरी पालन के लिये दूसरे, तीसरे चौथे एवं पांचवे नम्बर पर कौनसे जिले हैं?

    उत्तरः क्रमशः जोधपुर, नागौर, उदयपुर एवं सीकर।

    29. प्रश्नः राज्य के किस क्षेत्र में बकरियों की संख्या कम है?

    उत्तरः मैदानी क्षेत्रों में तथा हाड़ौती क्षेत्र में।

    30. प्रश्नः राज्य में बकरी की कौनसी नस्लें अधिक पाली जाती हैं?

    उत्तरः जमनापारी, बारबरी, मारवाड़ी, परबतसरी, सिरोही तथा शेखावाटी।

    31. प्रश्नः बकरी की किस नस्ल में रोग प्रतिरोधक क्षमता सर्वाधिक होती है?

    उत्तरः मारवाड़ी नस्ल।

    32. प्रश्नः बकरी की कौनसी नस्लें दूध के लिये अच्छी मानी जाती हैं?

    उत्तरः मारवाड़ी, शेखावाटी, परबतसरी, अलवरी नस्लें।

    33. प्रश्नः मांस के लिये बकरी की कौनसी नस्लें अच्छी मानी जाती हैं?

    उत्तरः लोही।

    34. प्रश्नः बकरी की द्विप्रयोजनी नस्लें कौनसी हैं?

    उत्तरः बरबरी, सिरोही एवं जमनापारी नस्लें।

    35. प्रश्नः बकरी की बरबरी नस्ल किन जिलों में पाली जाती है?

    उत्तरः भरतपुर, धौलपुर, करौली तथा सवाईमाधोपुर जिलों में।

    36. प्रश्नः बकरी की जमनापारी नस्ल किन जिलों में पाली जाती है?

    उत्तरः कोटा, बूँदी तथा झालावाड़ जिलों में।

    37. प्रश्नः बकरी की शेखावाटी नस्ल किन जिलों में पाली जाती है?

    उत्तरः सीकर तथा झुंझुनूं जिलों में।

    38. प्रश्नः बकरी की मारवाड़ी नस्ल किन जिलों में पाली जाती है?

    उत्तरः बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर जालोर, पाली गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिलों में।

    39. प्रश्नः बकरी की सिरोही नस्ल किस जिले में पाली जाती है?

    उत्तरः सिरोही जिले में।

    40. प्रश्नः बकरी की परबतसरी नस्ल किस जिले में पाली जाती है?

    उत्तरः नागौर जिले के परबतसर क्षेत्र में।

    41. प्रश्नः बकरी की अलवरी नस्ल किस जिले में पाली जाती है?

    उत्तरः अलवर जिले में।

    42. प्रश्नः नेशनल मिशन फॉर प्रोटीन सप्लीमेंट्स में किस पशु के संवर्द्धन पर जोर दिया गया है?

    उत्तरः बकरी।

    43. प्रश्नः पारम्परिक लघु एवं पेस्टोरल सिस्टम के अंतर्गत किस पशु की उत्पादकतामें वृद्धि करना सम्मिलित किया गया है?

    उत्तरः बकरी।

    44. प्रश्नः गॉट स्काउट योजना क्या है?

    उत्तरः बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिये एवं ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार देने के लिये राजस्थान सहित देश के दस राज्यों में गॉट स्काउट योजना आरम्भ की गई है।

    45. प्रश्न - गॉट स्काउट योजना में क्या प्रावधान किये गये हैं?

    उत्तर - 1. युवाओं को बकरी पालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। 2. गॉट स्काउट 10 किलोमीटर की परिधि में दो हजार बकरियों की पहचान करेंगे जिन्हें स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध करवाई जायेंगी। 3. बकरी पालकों को 95 बकरियों और 5 बकरों की यूनिट के लिये 2.36 लाख रुपये का अनुदान दिलाया जायेगा।

    46. प्रश्नः बकरी पालन योजना किन केन्द्रों पर प्रारंभ की गई है?

    उत्तरः भरतपुर जिले के कुम्हेर में पशु प्रजनन फार्म, अजमेर जिले के रामसर में पशु प्रजनन फार्म, तथा फतेहपुर में।

    47. प्रश्नः राज्य में प्रथम बार आरम्भ की गई भेड़ एवं बकरी प्रजनन नीति के क्या उद्देश्य हैं?

    उत्तरः 1. भेड़ एवं बकरी पालन को बढ़ावा देना।

    2. अनियंत्रित प्रजनन को रोकना।

    3. देशी नस्ल का संरक्षण एवं संवर्द्धन करना।

    48. प्रश्नः राजस्थान सरकार ने बकरी की किन नस्लों को नस्ल सुधार कार्यक्रम में सम्मिलित किया है?

    उत्तरः झकरानी, सिरोही एव झरवाड़ी नस्लें।

    49. प्रश्नः बकरी विकास केन्द्र कहाँ है?

    उत्तरः रामसर (अजमेर जिला)।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए

    प्रश्न 1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2013, सामान्य ज्ञान, पशुपालन विभाग राजस्थान सरकार के नस्ल सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत ली गई झकराना, सिरोही एवं मारवाड़ी नस्लें सम्बन्धित हैं- (1.) गायों से, (2.) ऊँटों से, (3.) बकरियों से, (4.) भेड़ों से।


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  • तोपों की सलामियों के लिये लड़ते थे राजा

     02.06.2020
    तोपों की सलामियों के लिये लड़ते थे राजा

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    सन् 1858 की घोषणा में रानी विक्टोरिया ने एलान किया था कि भारतीय रियासतों के शासकों को व्यक्तिगत और राजनीतिक तौर पर तोप की सलामियां दी जायेंगी। राजपूताना में 19 राज्यों के शासकों को तोपों की सलामी लेने का अधिकार था। इनमें से उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ एवं शाहपुरा गुहिलोत शासकों के अधीन थीं। बूंदी, कोटा एवं सिरोही पर चौहानों का शासन था। जैसलमेर एवं करौली पर यादवों का शासन था। जयपुर एवं अलवर पर कच्छवाहा राजाओं का शासन था। जोधपुर, बीकानेर, एवं किशनगढ़ पर राठौड़ों का शासन था। भरतपुर एवं धौलपुर पर जाटों का शासन था। झालावाड़ झालों के अधीन था। टोंक राजपूताने की एकमात्र मुस्लिम रियासत थी। कुशलगढ़ तथा लावा को नॉन सैल्यूट स्टेट कहा जाता था। इनके अतिरिक्त केन्द्र शासित प्रदेश (अजमेर-मेरवाड़ा) भी राजपूताना के अंतर्गत आता था।

    राजाओं को उनकी हैसियत के अनुसार तोपों की सलामी की संख्या निश्चित की गयी थी जिनकी संख्या 9 से 21 तक थी। तोपें उस समय दागी जाती थीं जब कोई राजा-महाराजा वायसराय से भेंट करने आता था। रियासतों में शासक या युवराज के जन्मदिन अथवा रियासती दरबार के अवसर पर तोपों की सलामी का प्रचलन था। लगभग 200 भारतीय शासक ऐसे थे जिन्हें तोपों की सलामियां प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।

    राजपूताना की रियासतों में 19 तोपों की सलामी केवल उदयपुर के महाराणा को दी जाती थी। 17 तोपों की सलामी पाने वाले शासकों में बीकानेर के महाराजा, भरतपुर के महाराजा, बूंदी के महाराजा, जयपुर के महाराजा, जोधपुर के महाराजा, करौली के महाराजा, कोटा के महाराव तथा टोंक के नवाब सम्मिलित थे। अलवर के महाराजा, बांसवाड़ा के महारावल, धौलपुर के महाराज-राणा, डूंगरपुर के महारावल, जैसलमेर के महारावल, किशनगढ़ के महाराजा, प्रतापगढ़ के महारावल तथा सिरोही के महारावल को 15 तोपों की सलामी दी जाती थी। झालावाड़ के महाराज-राणा को 13 तोपों की सलामी मिलती थी।

    उदयपुर और जयपुर के महाराजा को अपनी रियासत से बाहर 19 तोपों की सलामी पाने का अधिकार था किंतु वे अपनी रियासत में 21 तोपों की सलामी ले सकते थे। अंग्रेज सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों के राजाओं के लिये तोपों की सलामी की संख्या निर्धारित करते समय राजाओं की हैसियत राज्य के आकार, उसकी प्राचीनता, उसकी जनसंख्या अथवा वार्षिक राजस्व आदि तथ्यों से नहीं आंकी गयी थी। अपितु यह हैसियत अंग्रेज सरकार के साथ उस राज्य के सम्बन्धों की स्थिति पर निर्भर करती थी। इस कारण यह घटती बढ़ती भी रहती थी।

    तोपों की सलामी की संख्या राजाओं के बीच कई बार विवाद का विषय बनीं। जब नरेन्द्र मण्डल बना तो उसमें प्रवेश के अधिकार को लेकर भी तोपों द्वारा दी जाने वाली संख्या के आधार पर बखेड़ा खड़ा किया गया। इसी प्रकार संविधान सभा में प्रतिनिधित्व को लेकर भी तोपों की सलामी की संख्या की दुहाई दी गयी। जब नरेन्द्र मण्डल में प्रवेश के आधार को लेकर राजाओं ने बखेड़ा मचाया तो 20 जनवरी 1919 को वायसराय चैम्सफोर्ड ने देशी राज्यों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा- मेरी और मिस्टर मॉण्टेग्यू की राय में सलामियों का पूरा सवाल बड़ी सावधानी से समझने और जांचने की आवश्यकता है, क्योंकि उसमें विषमतायें हैं। हमने तय किया है कि सलामियों की सूची जैसी बनी हुई है उसकी बुनियाद पर अधिक प्रभावशाली रियासतों और शेष रियासतों में कोई मौलिक अंतर मानना बड़ी नासमझी होगी।

    3 नवम्बर 1919 को राज्यों के सम्मेलन में वायसराय चैम्सफोर्ड ने फिर कहा कि मैं और मिस्टर मॉण्टेग्यू दोनों अनुभव करते हैं कि कुछ विषमताओं के कारण सलामियों का विषय जांचने योग्य है। अगर वह सिद्धांत जिसका मैं पक्ष करता हूँ, रियासतों के वर्गीकरण के लिये अपना लिया जाये तो और भी वांछनीय हो जायेगा कि शीघ्र से शीघ्र सलामियों के प्रश्न की जांच की जाये जिससे उसकी वर्तमान विषमताओं का निराकरण हो सके। मेरी सरकार इस विषय पर पूरा ध्यान देने और विचार करने को तैयार है और इस सम्बन्ध मंर भारत सरकार ब्रिटिश सरकार के राज्य सचिव को आवश्यक संस्तुतियां भेजेगी जो यथा अवसर सम्राट को प्रस्तुत की जायेंगी।

    दीवान जरमनी दास ने वायसराय के इस भाषण पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- दुर्भाग्यवश कुछ भी नहीं हुआ। सलामियों का दस्तूर ज्यों का त्यों जारी रहा। उल्टे पिछले दशकों में तरक्कियां दी जाती रहीं। के. एन. हक्सर ने लिखा है- राजा लोग सम्मान तथा अलंकरण पाने के लिये एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने में तथा अपनी मौज शौक के कामों में इतना व्यस्त रहते थे कि उनके पास अपने राज्य के शासन को चलाने तथा अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिये समय नहीं बचता था।

    हेनरी कॉट्स ने अपनी पुस्तक ''इण्डिया इन ट्रांजिक्शन" में लिखा है- ''हमारे भारतीय जागीरदारों से बढ़कर किसी अधिक संवेदनशील समुदाय की कल्पना करना असंभव है। वे लोग आपस में श्रेष्ठता के प्रश्नों पर, सलामियों के बारे में, अपनी फौजी ताकत के बारे में, सामान्य ईष्या द्वेष में एक-दूसरे से जला करते हैं। एक राजा ने मिसाल पेश की तो फौरन दूसरों पर छूत की बीमारी की तरह उसका असर हुआ। मिसाल की नकल होने लगी। कोई पीछे क्यों रहे? वायसराय के आने पर उसकी खातिरदारी, स्वागत- सत्कार, राजभक्ति के प्रदर्शन की पाशविक प्रवृत्तियां, जो विदेशी सरकार से मान्यता प्राप्त करने के अचूक मंत्र थे, सभी बातों में राजा लोग एक दूसरे से मुकाबला करते रहते थे।

    दीवान जरमनी दास ने लिखा है कि राजा लोग बराबर आडम्बर और मूर्खता के वफादार साथी बने रहे। वे बराबर मानवता के तरीके अपनाने से कतराते रहे जिससे विवश होकर कैलाश हक्सर जैसे व्यक्ति को लिखना पड़ा- ''पिछली शताब्दी के बीच या अंत तक, संसार ने रियासतों के राजाओं के मानसिक पतन के दृश्य को देखा है, जो उपाधियां और पदक प्राप्त करने की दौड़ में पूरे उद्यम से एक दूसरे को हराना चाहते थे।"

    ब्रिटिश भारतीय नेतागण विशेषकर कांग्रेसी नेता, भारतीय राजाओं को किसी भी कीमत पर पसंद नहीं करते थे। 13 जून 1933 को जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बहन कृष्णा नेहरू को एक पत्र में अपने मन की कल्पना के बारे में लिखा- मैंने राजाओं, रानियों, उनके अनुगामियों तथा उनके आश्रितों का एक जुलूस देखा जो एक वास्तविक वीभत्स नृत्य में नाच रहे थे। वे भूख से व्यग्र लोगों और अकाल से त्रस्त मानवता के ऊपर नाच रहे थे, और उनका नृत्य एक खड़ी चट्टान के कगार पर जा पहुँचा जहाँ से वे नीचे गिर पड़े तथा दृश्य से गायब हो गये। वे निश्चय ही करुणाजनक चित्र थे, बीते युग के अवशेष, बहादुरी से आभास बनाये रखने का प्रयास कर रहे थे किंतु अपरिहार्य विनाश के दुःखद अंत को प्राप्त हो गये।

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  • गोस्वामीजी की दृष्टि में लौकिक सुखों एवं लौकिक दुखों का महत्व

     02.06.2020
    गोस्वामीजी की दृष्टि में लौकिक सुखों एवं लौकिक दुखों का महत्व

    गोस्वामीजी की दृष्टि में लौकिक सुखों एवं लौकिक दुखों का महत्व


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    गोस्वामी तुलसीदासजी के साहित्य में निहित उनकी लोकदृष्टि पर जितनी अधिक बात हुई है, उतनी बात किसी और साहित्यकार की दृष्टि पर नहीं हुई। यह एक अद्भुत बात है कि जिसकी दृष्टि सबसे अधिक स्पष्ट है, उसी की दृष्टि पर सर्वाधिक बात हुई। इसका कारण यह है कि उनकी दृष्टि के विभिन्न आयाम हैं। मैं इस आलेख में उनके साहित्य में निहित उनकी दृष्टि के केवल एक आयाम की चर्चा कर रहा हूँ- तुलसी की दृष्टि में लौकिक सुखों एवं लौकिक दुखों का महत्व।

    संत साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह इस जीवन को नश्वर बताकर मृत्यु के बाद मिलने वाले जीवन पर अधिक जोर देते हैं किंतु तुलसीदासजी की दृष्टि में मनुष्य का वर्तमान जीवन बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। पार्वतीजी की महिमा का बखान करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं-

    भव भव विभव पराभव कारिणी,

    बिस्व बिमोहिनी स्वबस बिहारिणी।


    अर्थात् आपने इस संसार को संभव बनाया है, आपने ही वैभव दिया है और आप ही इस संसार का पराभव करने वाली हैं।

    इस उक्ति के माध्यम से गोस्वामीजी पार्वतीजी के साथ-साथ संसार की महाता को भी प्रकारांतर से स्थापित करते हैं। स्पष्ट है कि पार्वती जैसी महान शक्ति ने किसी अनुपयोगी चीज की रचना तो नहीं की होगी!

    नहीं दरिद्र सम दुख जग माहीं अथवा नारी कित सिरजी जग माहीं अथवा नहीं दरिद्र कोउ दुखी न दीना जैसी पंक्तियां सांसारिक सुखों एवं दुखों की ही तो स्वीकार्यता है। गोस्वामी जी जब भी बात करते हैं, दैहिक, दैविक और भौतिक दुखों की बात करते हैं-

    दैहिक दैविक भौतिक तापा,

    राम राज नहीं काहुहि व्यापा।


    अल्प मृत्यु नहीं कवनिउ पीरा,

    सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।


    गोस्वामीजी ने जीवन के कष्टों को बहुत लम्बे समय तक झेला था, इसलिए वे मनुष्य को पानी का बुलबुला और जगत् को मिथ्या नहीं बताते हैं। उनका आराध्य देव भी अन्य भक्त-कवियों के आराध्य देवों से भिन्न प्रकार का है-

    सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू,

    लोक लाह, परलोक निबाहू।


    तुलसीदासजी को केवल परलोक के सुखों की चिंता नहीं है, उन्हें लोक लाभ पहले चाहिए और परलोक में निर्वाह बाद में। रामचरित मानस की उपयोगिता के बारे में वे कहते हैं-

    सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा,

    सेवत सादर समन कलेसा।


    वे केवल शोकों के नष्ट होने की बात करते हैं, किसी मोक्ष या मुक्ति का आश्वासन नहीं देते। क्योंकि उनकी दृष्टि में कष्टों से मुक्ति पा जाना, यहां तक कि पेट भर भोजन पा जाना भी अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष जैसी बड़ी उपलब्धियों से कम नहीं है। जब वे गंगाजी की बात करते हैं तो कहते हैं-

    कीरति भनिति भूति भलि सोई, 

    सुरसरि सम सब कहं हित होई।

    अर्थात् उनकी इस चौपाई में यह बात प्रकारांतर से निहित है कि सुरसरि इसलिए अच्छी हैं क्योंकि वे इस जगत् का भला करती हैं। वे राम नाम स्मरण की बात भी इसी कामना में करते हैं कि इसके गायन से भव सार पार कर लिया जाएगा- गाई गाई भव सागर तरहिं।' 

    राम नाम मनि दीप धरू जीह देहरीं द्वार,

    तुलसी भीतर बाहरो जो चाहसि उजियार।


    भायं कुभायं अनख आलसहूं।

    नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।


    तु
    लसी या संसार में भांति-भांति के लोग,

    सब से हिल-मिल चाहिए नदी नाव संयोग।


    इस तरह का दृष्टि परक चिंतन साहित्य में कब शामिल होता है? जब कवि या साहित्यकार सत्य का अनुभव केवल अपने चिंतन से नहीं अपितु अनुभव से करता है- पायं पीर पेट पीर, बांह पीर, मुंह पीर जरजर सकल सरीर पीर मई है . . . . घेर लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यों बासर जलद घन घटा धुकि धाई है।

    बारे ते ललात द्वार-द्वार दीन जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को।

    तुलसीदासजी केवल अपने जीवन के कष्ट ही दिखाई नहीं देते, उन्हें सम्पूर्ण समाज के कष्ट दिखते हैं- खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि, बनिक को न बनिज न चाकर को चाकरी।

    जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस कहै एक-एकन सौं कहां जाय का करी।


    रामराज स्थापित होने पर वे इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि इसमें प्रजा के शोक नष्ट हो जाते हैं-

    राम राज बैठे त्रय लोका,

    हर्षित भए गए सब सोका।


    बयरू न कर काहू सन कोई,

    राम प्रताप विषमता खोई।


    नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।

    नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।


    तुलसीदास जी द्वारा किया गया कलियुग का वर्णन वस्तुतः समाज के कष्टों का ही वर्णन है-

    बाढ़ खल बहु चोर जुआरा।

    जे लंपट परधन पर दारा।


    मानहिं मातु-पिता नहीं देवा,

    साधुन्ह संग करवावहिं सेवा।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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