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  • नेशनल हेराल्ड प्रकरण की पैरवी कांग्रेस को करनी है या सोनिया और राहुल गांधी की यंग इण्डिया को !

     03.06.2020
    नेशनल हेराल्ड प्रकरण की पैरवी कांग्रेस को करनी है या सोनिया और राहुल गांधी की यंग इण्डिया को !

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में वर्ष 2012 से एक विचित्र मुकदमा चल रहा है। इस मुकदमे के अनुसार कांग्रेस ने वर्ष 2008 में बंद हो चुके नेशनल हेराल्ड की कंपनी एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को 26 फरवरी 2011 को 90 करोड़ रुपये का ब्याजमुक्त ऋण दिया। इसके बाद सोनिया और राहुल ने 38-38 प्रतिशत हिस्सेदारी में पांच लाख रुपये से यंग इंडिया कंपनी बनाई। शेष 24 प्रतिशत हिस्सेदारी कांग्रेसी नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस के पास है।

    इसके बाद एजेएल के 10-10 रुपये के नौ करोड़ शेयर यंग इंडिया को दे दिए गए। इसके बदले यंग इंडिया को कांग्रेस का ऋण चुकाना था। नौ करोड़ शेयर के साथ यंग इंडिया को एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के 99 प्रतिशत शेयर हासिल हो गए। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने 90 करोड़ का ऋण भी माफ कर दिया। यानी यंग इंडिया को मुफ्त में एजेएल का स्वामित्व मिल गया और सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी ने नेशनल हेराल्ड की दो हजार करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त कर ली। कुछ दिनों बाद सोनिया-राहुल की कंपनी यंग इंडिया ने दिल्ली में सात मंजिला हेराल्ड हाउस की दो मंजिलें पासपोर्ट सेवा केंद्र को किराये पर दीं जिसका उद्घाटन तत्कालीन विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने किया। यानि यंग इंडिया किराये के तौर पर भी बहुत पैसा कमा रही है।

    पटियाला हाउस कोर्ट ने लगभग दो साल की लम्बी सुनवाई के बाद 26 जून 2014 को सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, सुमन दूबे और सैम पित्रोदा को समन जारी कर न्यायालय में प्रस्तुत होने के आदेश जारी किए। ये लोग कोर्ट के समक्ष उपस्थित न होने की युक्तियां करते रहे और इन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लगाई।

    दिल्ली हाईकोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई करने के बाद न्यायाधीश ने 27 पेज के आदेश में कहा कि पूरे मामले पर उसके व्यवस्थित परिप्रेक्ष्य में विचार करने के बाद, अदालत को इस निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई संकोच नहीं कि ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ के जरिये ‘एसोसिएटिड जरनर्ल्स लिमिटेड’ पर नियंत्रण हासिल करने में याचिकाकर्ताओं द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली आपराधिक मंशा का सबूत देती है, जबकि कांग्रेस पार्टी, एजेएल और वाईआईएल के मुख्य लोग समान हैं। सच जानने के लिए याचिकाकर्ताओं के संदिग्ध आचरण पर आरोप के चरण में उचित तरीके से जांच की जरूरत है और इसलिए इन आपराधिक कार्यवाहियों को इस शुरूआती चरण में निरस्त नहीं किया जा सकता।

    न्यायाधीश ने यह भी राय व्यक्त की कि सोनिया, राहुल और अन्य लोगों पर लगे आरोपों की गंभीरता में एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल से जुड़ा धोखाधड़ी का आभास होता है और इसलिए याचिकाकर्ताओं पर लगे गंभीर आरोपों पर उचित तरीके से गौर किये जाने की जरूरत है। तब कहीं जाकर ये लोग कोर्ट में उपस्थित हुए और इन्हें जमानत पर छोड़ा गया।

    दिल्ली उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद नेशनल हेराल्ड के अन्य शेयरधारकों ने आरोप लगाया कि एजीएल ने उनके पूर्वजों के शेयर को धोखाधड़ी करते हुए बिना उनकी अनुमति के ही यंग इण्डिया को हस्तानान्तरित कर दिया। भारत के भूतपूर्व कानून मंत्री शान्ति भूषण भी उन लोगों में शामिल हैं जो इस धोखाधड़ी के पीड़ित हैं।

    भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने यह मुकदमा दायर किया था और वे तब से इस मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिये प्रयासरत हैं। मुकदमा न्यायालय के विचाराधीन है तथा वह अपना कार्य भारत के संविधान के अनुसार करेगा किंतु एक अदालत जनता की भी है जिनके वोट लेकर सोनिया और राहुल की कांग्रेस लम्बे समय तक भारत पर शासन करती रही है और आगे भी करने की मंशा रखती है। वह जानना चाहती है कि विपुल धन सम्पत्ति के मालिक होते हुए भी उनके नेताओं ने धन लाभ के लिये ऐसे कार्य क्यों किये, मसलन-

    (1.) राहुल गांधी ने एसोसिएटेड जर्नल में शेयर होने की जानकारी वर्ष 2009 में चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में क्यों नहीं दी जबकि उसके कुछ समय बाद राहुल गांधी ने एजेएल के 2 लाख 62 हजार 411 शेयर अपनी बहिन प्रियंका गांधी को ट्रांसफर किए? राहुल के पास अब भी एजेएल के 47 हजार 513 शेयर हैं।

    (2.) कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी है उसने एजेएल अर्थात् एक व्यावसायिक कम्पनी को बिना ब्याज 90 करोड़ रुपये का कर्ज क्यों दिया? क्या कांग्रेस ने पहले भी किसी व्यावसायिक कम्पनी को बिना ब्याज या ब्याज पर ऋण दिया है? क्या कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी भी व्यक्ति या कम्पनी या फर्म को व्यावसायिक काम के लिए कर्ज दे सकती है? सोनिया गांधी के सरकारी आवास 10 जनपथ पर व्यावसायिक कंपनी यंग इंडिया की मीटिंग क्यों हुई?

    (3.) एजेएल मीडिया क्षेत्र की कम्पनी थी, उसने राहुल और सोनिया की गैर मीडिया कम्पनी यंग इंडिया को अपने शेयर क्यों हस्तांतरण किए? जब एसोसिएटेड जर्नल का ट्रांसफर हुआ तब इसके अधिकतर शेयर होल्डर मर चुके थे ऐसे में उनके शेयर किसके पास गए और कहां हैं?

    इस बीच आयकर विभाग ने यंग इण्डिया लि. को निर्धारण वर्ष 2011-12 के लिये आयकर जांच करवाने का नोटिस जारी किया। इस पर सोनिया और राहुल की यह कम्पनी दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंच गई कि उन्हें आयकर जांच से छूट दी जाए। कोर्ट ने कम्पनी से कहा कि वह याचिका वापस ले तथा कोर्ट में आने की बजाय आयकर विभाग जाकर जांच करवाए। कोर्ट के निर्देश पर कांग्रेस के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका वापस ले ली और न्यायालय ने उसे खारिज मान लिया।

    हाईकोर्ट से याचिका वापस लेने के बाद कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला का यह वक्तव्य सामने आया कि यंग इण्डिया सर्वोच्च न्यायालय में जायेगी तो बड़ी हैरानी हुई! आयकर जांच कांग्रेस की नहीं, यंग इण्डिया की होनी है। कांग्रेस यंग इण्डिया की पैरवी क्यों कर रही है! हैरानी इस बात पर भी हुई कि क्यों सोनिया और राहुल मुकदमे की सुनवाई के लिये न्यायालय नहीं जाते ? क्यों वे आयकर जांच के लिये आयकर विभाग नहीं जाते ? क्यों वे हाईकोर्ट की सलाह को स्वीकार नहीं करते जिसमें कहा गया है कि हमारे पास मत आइए, आयकर विभाग से कम्पनी की आय की जांच कराइये! क्यों वे देश को नहीं बताते कि वे केवल 50 लाख रुपए देकर नेशनल हेराल्ड की 2000 करोड़ रुपये की सम्पत्ति के मालिक कैसे बन गए हैं ?


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  • पाकिस्तान भारत को युद्ध के लिए क्यों उकसा रहा है ?

     03.06.2020
    पाकिस्तान भारत को युद्ध के लिए क्यों उकसा रहा है ?

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब से केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली नरेन्द्र मोदी सरकार बनी है तब से पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों में तेजी को जो दौर शुरु किया, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। उसने बॉर्डर पर आतंकियों के लिए बड़ी संख्या में लांचिंग पैड बनाये जहां से आतंकी बड़े पैमाने पर कश्मीर घाटी में घुसपैठ और हमले कर रहे हैं। पाकिस्तान की सेना काश्मीर तथा जम्मू बॉर्डर पर ताबड़तोड़ हमले करके युद्ध जैसी स्थिति बनाए हुए है।

    मार्च 2016 में पाकिस्तान ने ईरान से भारतीय पूर्व नौसैनिक अधिकारी कुलभूषण जाधव का अपहरण किया जिसे पाकिस्तान के सैनिक कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। सितम्बर 2016 में जम्मू कश्मीर के उरी सेक्टर में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने भारत के 18 जवान मार दिए। कश्मीरी युवाओं एवं स्कूली लड़कियों द्वारा भारतीय सैनिकों पर पत्थर फैंकने की घटनाओं में तेजी आई। आतंकवादियों ने बैंक कैश-वैन एवं एटीएम लूटने शुरु कर दिए तथा पुलिस वैनों पर फायरिंग में वृद्धि की। हाल ही में शोपियां क्षेत्र में एक शादी समारोह में लेफ्टिनेंट उमर फयाज का अपहरण करके उसकी हत्या की। पिछले तीन माह में पाकिस्तान ने जम्मू के नौशेरा क्षेत्र में जो हमले किए हैं उनके कारण भारत को अपनी सीमा में 130 गांव खाली करने पड़े हैं।

    इन सारी कार्यवाहियों तथा ऐसी ही सैंकड़ों अन्य कार्यवाहियों से लगता है कि पाकिस्तान आगे भी रुकने वाला नहीं है। क्या पाकिस्तान भारत को युद्ध के लिये उकसा रहा है? आखिर क्यों? इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमें उन कदमों पर भी एक दृष्टि डालनी चाहिए जो भारत ने उठाए हैं और यह भी जानना चाहिए कि उनका परिणाम क्या हुआ ? सीज फायर का उल्लंघन होने पर भारतीय सेना भी क्रॉस फायरिंग करती है। किसी भी क्षत्र में आतंकियों के होने की सूचना मिलते ही उन्हें ढूंढकर मारा जाता है। 25 दिसम्बर 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक नवाज शरीफ के घर पहुंचकर माहौल को सकारात्मक बनाने का प्रयास किया। आसानी से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री वहां दावत खाने नहीं गए थे अपितु उन्होंने नवाज शरीफ को कठोर शब्दों में धमकी भी दी होगी कि वह अपने देश की हरकतों पर लगाम कसे।

    28 सितंबर 2016 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सीमा में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक किया जिसमें आतंकियों के लांचिंग पैड नष्ट किए गए। भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर विश्व भर में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहिम छेड़ी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान पर भारत में आतंकी गतिविधियां चलाने का आरोप लगाया तथा कहा कि कश्मीर छीनने का उसका सपना कभी पूरा नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को धमकी दी कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते, अतः भारत ने सिंधु जल संधि की समीक्षा शुरु की। पाकिस्तान ने इसे युद्ध की कार्यवाही बताया और भारत के खिलाफ परमाणु हथियारों के उपयोग की धमकी दी। संधि रद्द होने के डर से पाकिस्तान ने विश्व बैंक का दरवाजा भी खटखटाया।

    भारत ने नवम्बर 2016 में इस्लामाबाद में होने वाले दक्षेस शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया। बांग्लादेश, अफगानिस्तान एवं भूटान ने भारत के इस कदम का समर्थन किया। भारत ने पाकिस्तान को दिए गए मोस्ट फेवर्ड नेशन के दर्जे पर पुनर्विचार करने की घोषणा की। कुलभूषण जाधव के मामले को भारत अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में ले गया।

    इन सारी कार्यवाहियों के बावजूद पाकिस्तान अपने रुख पर कायम है जिसे देखकर लगता है कि वह चाहता है कि भारत, पाकिस्तान पर आक्रमण करे और भारत है कि आक्रमण की पहल करने से बच रहा है। आखिर पाकिस्तान और भारत अपने-अपने रुख पर कायम क्यों हैं? इसका उत्तर देना बहुत कठिन नहीं है। पाकिस्तान की कट्टरपंथी ताकतें भारत पर परमाणु हमला करना चाहती हैं किंतु उन्हें मालूम है कि ऐसा करके वे भी बचे नहीं रहेंगे क्योंकि वे अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की सहानुभूति खो देंगे। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की सहानुभूमि उस पक्ष की ओर होगी जिस पर हमला होगा। इसलिये पाकिस्तान चाहता है कि हमले की पहल भारत करे ताकि चीन, रूस और अमरीका तीनों ही अपने-अपने बहाने बनाकर भारत के विरुद्ध हमला बोल दें। पाकिस्तान की कट्टरपंथी ताकतें यह भी समझती हैं कि यदि भारत पहल करके पाकिस्तान पर हवाई हमले बोलता है तो पाकिस्तान को भारत पर परमाणु हमला करने का बहाना मिल जाएगा और उसके लिए उसे अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की नाराजगी भी नहीं झेलनी पड़ेगी।

    यही कारण है कि पाकिस्तान लगातार भारत को उकसा रहा है और भारत सरकार अपने ही देश में अपने देशवासियों की आलोचना सहने के लिए विवश है। कोई भी देश यह नहीं कहेगा कि वह अमुक कारण से अपने शत्रु पर हमला नहीं कर रहा। भारत भी कभी नहीं कहेगा। कहना भी नहीं चाहिए। हमें अपनी जनता और अपनी सेनाओं का मनोबल सदैव ऊंचा रखना पड़ेगा, राष्ट्र के जीवित रहने का आधार भी यही है किंतु सच्चाई को पहचानना भी होगा कि यदि भारत युद्ध की पहल करता है तो पाकिस्तान द्वारा किए गए परमाणु हमले को रोक पाना संभवतः हमारे लिए संभव नहीं होगा। अब जो परमाणु हमले होंगे उनके सामने हिरोशिमा और नागासाकी फीके पड़ जाएंगे। समय बहुत आगे बढ़ चुका है, तकनीकी बहुत विकराल रूप ले चुकी है। उसकी विध्वंसक शक्ति का अनुमान लगाना भी हमारे लिए कठिन हैं।

    एक अनुमान है कि भारत की एक तिहाई से दो तिहाई जनसंख्या तक संभावित परमाणु हमलों में या तो मारी जाएगी या रेडिएशन से पीड़ित होकर सिसकती रहेगी जिसका खामियाजा वर्तमान जनसंख्या को ही नहीं, आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। एक अनुमान के अनुसार एक परमाणु बम के हमले में लगभग 2.1 करोड़ जनसंख्या एक सप्ताह में मरेगी जो कि पाकिस्तान द्वारा 10 साल में आतंकवादी घटनाओं में मारे गए भारतीयों की संख्या से 2 हजार 2 सौ 21 गुना होगी। ऐसी स्थिति में क्या भारत को वास्तव में सोच-समझ कर कदम उठाने की आवश्यकता नहीं है। मोदी सरकार वही तो करती आई है। आज संसार के हालात ये हैं कि समझदारी दिखाने में ही समझदारी है। ट्रम्प ने सीरियाई सरकार की सेना पर अचानक हमला बोला किंतु रूस को अपना भेजा ठण्डा रखना पड़ा और वह केवल यह कहकर चुप हो गया कि जो हुआ सो हुआ किंतु अब किया तो मैं भी ठण्ड नहीं रखूंगा। आज चीन, रूस और अमरीका महत्वाकांक्षाओं के घोड़ों पर सवार हैं, इनमें से कौन भारत का मित्र है और कौन शत्रु, इसका निर्णय केवल वह क्षण करेगा जिसमें भारत को वास्तव में किसी मित्र की आवश्यकता होगी। इनमें से कोई भी विशुद्ध रूप से विश्वसनीय नहीं है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • भारत में महिलाएं और बच्चे अपराधियों के निशाने पर क्यों रहते हैं ?

     03.06.2020
    भारत में महिलाएं और बच्चे अपराधियों के निशाने पर क्यों रहते हैं ?

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

     संसार में भारत की पहचान एक सॉफ्ट स्टेट के रूप में है। स्वीडिश अर्थशास्त्री गनर माइर्डल ने अपनी पुस्तक एशियन ड्रामा में सॉफ्ट स्टेट की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी है कि उन दक्षिण एशियाई देशों को सॉफ्ट स्टेट कहते हैं जहां सरकारी कर्मचारी अनुशासनहीनता का आचरण करते हैं जिसके कारण समाज में अपराध पनपते हैं। यहां सरकारी कर्मचारी से आशय टॉप ब्यूरोक्रेट्स, मध्यम स्तर के अधिकारी, कर्मचारी, पार्षद, पंच-सरपंच तथा एमएलए, एमपी, मंत्री आदि उन सब लोगों से है जिन पर जनता का काम करने की जिम्मेदारी है और जो किसी भी सेवा के बदले सरकार से वेतन या पेंशन लेते हैं अर्थात् ठेकेदार, सप्लायर और अनुबंध पर लगे कर्मचारी भी। गनर द्वारा प्रस्तुत इस परिभाषा के अनुसार भारत निश्चित ही सॉफ्ट स्टेट है।

    शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, बिजली, पानी जैसे पब्लिक यूटिलिटी विभागों से लेकर पुलिस, प्रशासन और न्याय से जुड़े विभिन्न विभागों तक में भारतीय कर्मचारियों में हर स्तर पर अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार व्याप्त है। जनता अपने न्यायोचित कामों के लिए तरसती रहती है जिनके न होने पर और समाज में रिश्वत, मारपीट, हत्या, बलात्कार तथा लूट जैसे अपराध पनपते हैं। सरकारी विभागों के कर्मचारियों द्वारा समय पर काम न करने, ढंग से काम न करने, काम से बचने के बहाने ढूंढने तथा छोटे-छोटे कामों के लिये जनता से रिश्वत की मांग करने आदि प्रवृत्तियों के कारण अपराधियों के हौंसले हर समय बुलंद रहते हैं तथा देश में अपराध का ग्राफ काफी ऊंचा बना रहता है। महिलाएं और बच्चे सॉफ्ट टारगेट होने के कारण हर समय अपराधियों के निशाने पर होते हैं। किसी सुनसान स्थान पर कोई अकेली महिला या अकेला बच्चा दिखता है तो अपराधी तत्व तत्काल सक्रिय हो जाते हैं। देश का आम आदमी अपने घर की महिलाओं और बच्चों को अकेले भेजने का साहस मजबूरी में ही जुटाता है। यहां तक कि महिलाएं और बच्चे अपने घरों में भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

    आपराधिक अनुसंधान समय पर पूरे न होने, उनके वांछित परिणाम नहीं आने, गवाहों के मुकरने तथा न्यायालयों में मुकदमों के निर्णय होने में लम्बा समय लगने के कारण अपराधियों के हौंसले कभी पस्त नहीं पड़ते। 1960 के दशक से ही भारत में हत्याओं का आंकड़ा बहुत ऊंचा बना हुआ है। वर्ष 2007-08 में भारत विश्व का सर्वाधिक हत्याओं वाला देश बन गया। उस वर्ष भारत में पाकिस्तान की तुलना में तीन गुनी और अमरीका की तुलना में दो गुनी मानव हत्याएं हुई थीं। उस वर्ष देश में 50 लाख अपराध दर्ज हुए थे जिनमें से 32,719 मामले मानव हत्याओं के थे। वर्ष 2014 में भारत में 33,981 हत्याएं रिपोर्ट हुईं जिनमें से 3,332 व्यक्ति घर में ही हत्या के शिकार हुए। असंतोष, अत्याचार और झगड़ों के कारण भारत में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 35 हजार लोग आत्महत्या करते हैं। इनमें से विवाह, दहेज, विवाह पूर्व प्रेम सम्बन्ध, विवाहेतर प्रेम सम्बन्ध, तलाक एवं पारिवारिक विवादों को लेकर सर्वाधिक आत्महत्याएं होती हैं।

    भारत में हिंसा के कुल मामलों में से एक तिहाई अपराध घरेलू हिंसा के होते हैं, जिनमें से एक चौथाई मामले 15 से 49 साल की महिलाओं के प्रति घर के ही निकट रिश्तेदारों द्वारा किए जाने वाले सैक्सुअल हैरेसमेंट के होते हैं। भारत में होने वाले अपराधों में चौथा नम्बर महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले बलात्कार का है। वर्ष 2012 में भारत में बलात्कार के लगभग 25 हजार मामले रिपोर्ट हुए जिनमें से 98 प्रतिशत मामलों में पीड़ित महिला के साथ उसके किसी परिचित ने ही बलात्कार किया। भारत में प्रत्येक एक लाख बच्चों में से 7,200 बच्चों के साथ बलात्कार होता है। यह आंकड़ा काफी ऊंचा है। वर्ष 2014-15 में हुए एक अध्ययन के अनुसार भारत में बलात्कार के केवल 5-6 प्रतिशत मामले ही रिपोर्ट किए जाते हैं। बलात्कार के अधिकांश मामले सामाजिक प्रवंचना एवं पुलिस के दुर्व्यवहार के कारण महिलाओं एवं बच्चों द्वारा रिपोर्ट ही नहीं किए जाते। फिर भी भारत में बच्चों के विरुद्ध होने वाले लगभग एक लाख अपराध हर वर्ष पुलिस थानों में दर्ज होते हैं। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले साढ़े तीन लाख अपराध लगभग हर साल पुलिस थानों मे रिपोर्ट होते हैं।

    दंगों के दौरान असामाजिक तत्व महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार करते हैं। भारत में दंगों के समय महिलाओं से बलात्कार किए जाने का इतिहास काफी पुराना है। भारत विभाजन के समय लगभग एक लाख महिलाओं का अपहरण एवं बलात्कार हुआ। किसी एक वर्ष में किसी एक देश में इतनी अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार धरती पर शायद ही कभी हुए हों। हरियाणा में दो साल पहले आरक्षण आंदोलन में असामाजिक तत्वों ने महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किए। यहां तक कि एक देवर ने अपनी भाभी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना को अंजाम दिया। स्थिति इतनी भयावह है कि बहुत से देशों ने अपने नागरिकों को यह एडवाइजरी जारी की हुई है कि भारत में जाते समय वे संभावित बलात्कार से सावधान रहें। यहां तक कि समूह में यात्रा करते समय भी महिलाएं भारत में बलात्कार की शिकार हो सकती हैं इसलिये एकांत स्थानों पर तथा रात्रि में सार्वजनिक वाहनों से यात्रा न करें तथा भारतीयों की तरह कपड़े पहनें।

    भारत में वेश्यावृत्ति कानूनन वैध है तथा वेश्यावृत्ति में संलिप्त महिलाओं के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन में कहा गया कि नाबालिग लड़कियों को वेश्यावृत्ति हेतु धकेले जाने के मामले में दुनिया का ऊपर से सातवां स्थान है। हर साल लगभग 7 हजार लोगों के मानव तस्करी के प्रकरण दर्ज होते हैं। महिलाओं के विरुद्ध किए जाने वाले अपराधों में एक तिहाई से अधिक अपराध उसके घर वालों के द्वारा ही किए जाते हैं। सड़क पर चलते समय भी महिलाओं और बच्चों को सर्वाधिक उत्पीड़न सहन करना होता है। सर्वाधिक दुर्घटनाएं भी उन्हीं के साथ होती हैं। वर्ष 2015 में भारत में 4,13,457 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गये। इनमें बच्चों एवं महिलाओं के आंकड़े अलग से उपलब्ध नहीं हैं।

    भारत में हर वर्ष विभिन्न प्रकार के लगभग 30 लाख मुकदमे दर्ज होते हैं तथा भारत के विभिन्न न्यायालयों में लगभग 3 करोड़ मुकदमे विचाराधीन एवं लम्बित हैं। हर वर्ष अपराधों की इतनी बड़ी संख्या दर्ज होने के बावजूद तथा देश भर के न्यायालयों इतनी बड़ी संख्या में मुकदमों के लम्बित एवं विचाराधीन होने के बावजूद भारत की जेलों में लगभग सवा चार लाख लोग ही बंद हैं। हत्या, बलात्कार, लूट, डकैती, धोखाधड़ी, घूस आदि में लिप्त बड़े-बड़े अपराधी कुछ समय के लिये जेल जाते हैं तथा फिर बाहर आकर समाज के बीच बेखौफ घूमते रहते हैं। यह एक बहुत बड़ा कारण है जिससे भारत में बच्चे और महिलाएं हर समय अपराधियों के निशाने पर रहते हैं। माता-पिता द्वारा बच्चों के नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिऐ जाने तथा उसकी परवरिश पर समुचित समय नहीं दिए जाने से यह समस्या दिनो-दिन बढ़ती जा रही है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • भारत को पाकिस्तान से युद्ध करने के लिए उचित अवसर का निर्माण करना चाहिए !

     03.06.2020
    भारत को पाकिस्तान से युद्ध करने के लिए उचित अवसर का निर्माण करना चाहिए !

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    मेरे पूर्ववर्ती आलेख ‘‘पाकिस्तान भारत को युद्ध के लिए क्यों उ

    कसा रहा है ?’’ पर कुछ मित्रों ने प्रश्न उठाए हैं कि तो क्या भारत में वह क्षमता ही नहीं है कि वह पाकिस्तान के परमाणु हमले का सामना कर सके या पाकिस्तान पर आगे बढ़कर हमला कर सके! एक बार भारत सरकार, सेना के हाथ खोल दे तो फिर वह हमें दिखा देगी कि पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर कहां दिखाई देता है लेकिन भारत सरकार वह हिम्मत ही नहीं जुटा पा रही।

    इन प्रश्नों का उत्तर हमें दो स्थानों पर ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। पहला स्थान है मानव जाति का इतिहास और दूसरा स्थान है वर्तमान परिस्थितियां। मानव जाति का इतिहास हमें यह बताता है कि समझदार, जिम्मेदार तथा नैतिकता से भरपूर पक्ष प्रायः नासमझ, गैर जिम्मेदार तथा अनैतिक पक्ष के सामने कमजोर होता है, जैसे राक्षसों के सामने देवता थे, महाभारत की चाण्डाल चौकड़ी के सामने पाण्डव थे, वैसे ही आज के अच्छे लोग हैं। इतिहास हमें यह भी बताता है कि अच्छे मनुष्य को नीच के विरुद्ध लड़ने के लिए नीच बनाना पड़ता है। भगवान पर कोई अपवाद लागू नहीं होता इसलिये भगवान विष्णु ने धर्म पर अडिग देवताओं को बचाने के लिए और श्रीकृष्ण ने सत्य पर अडिग पाण्डवों को बचाने के लिए वह सब किया जो बुराई से जीतने के लिए आवश्यक है।

    हम स्वयं ही विचार करके देखें, महाभारत युद्ध का परिणाम क्या हुआ! कौरवों की 11 अक्षौहिणी और पाण्डवों की 7 अक्षौहिणी सेनाएं पूर्णतः नष्ट हो गईं। कौरव पक्ष में से अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा जबकि पाण्डव पक्ष में से पांच पाण्डव, भगवान श्रीकृष्ण, युयुत्सु, वर्षकेतु तथा सात्यकि ही जीवित बचे।


    प्रथम विश्व युद्ध में दुनिया के 4 से 5 करोड़ लोग मारे गए लेकिन युद्ध अधूरा रह गया इसलिये 20 साल बाद ही द्वितीय विश्व युद्ध फूट पड़ा। उसका क्या परिणाम रहा! 6 से 8 करोड़ लोग और मारे गए। इतने पर भी क्या दुनिया सुखी हो गई! पूरी दुनिया महंगाई, बेरोजगारी, भूख, सूखे, बीमारी और महामारी की चपेट में आई! जिस इंग्लैण्ड के राज्य में सूर्य नहीं डूबता था वह केवल इंग्लैण्ड तक सीमित रह गया। हिरोशिमा और नागासाकी आज तक सिसक रहे हैं।

    1948 के भारत-पाक युद्ध में भारत के लगभग 1500 सैनिक मारे गए और 3000 घायल हो गए तथा भारत को लगभग एक तिहाई कश्मीर से हाथ धोना पड़ा।

    भारत एवं चीन के बीच हुए 1962 के युद्ध का क्या परिणाम हुआ! भारत का लगभग एक तिहाई काश्मीर और हाथ से निकल गया। भारत के लगभग 1400 सैनिक मारे गए, 1100 घायल हुए, 2000 गायब हुए तथा 2000 भारतीय सैनिकों को चीन पकड़ कर ले गया। 

    1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत के 3000 से अधिक सैनिक मारे गए अथवा घायल हुए। भारत के 175 टैंक तथा 75 वायुयान नष्ट हुए और 777 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर पाकिस्तान ने और कब्जा कर लिया। 

    1971 के भारत-पाक युद्ध में भारत के लगभग 3000 सैनिक मारे गए, 12 हजार सैनिक घायल हुए तथा भारत के 45 विमान लापता हुए। भारत ने पाकिस्तान के लगभग 6 हजार वर्ग मील क्षेत्र पर कब्जा किया किंतु वह धरती अंतराष्ट्रीय दबावों के चलते शत्रु को पुनः लौटानी पड़ी। इस युद्ध का अंत पाकिस्तान के लगभग 92 हजार सैनिकों के आत्मसमर्पण से हुआ किंतु उन्हें जीवित छोड़ दिया गया। क्या कोई भी देश इतनी बड़ी संख्या में निहत्थे शत्रु सैनिकों को मार सकता था! सभ्य समाज के लिए यह किसी भी तरह संभव नहीं था।

    1999 के कारगिल युद्ध में भारत के लगभग 500 सैनिक मारे गए एवं 1500 सैनिक बुरी तरहघायल हुए। जिस तरह कारगिल को युद्ध घोषित नहीं किया गया, उसी तरह कारगिल के बाद भी जो चल रहा है, वह युद्ध ही है किंतु अघोषित है। निश्चित रूप से सैनिकों की मृत्यु के रूप में हर बार पाकिस्तान का नुक्सान हमसे ज्यादा हुआ है किंतु क्या कोई भी युद्ध अंतिम और निर्णायक हुआ है?

    यद्यपि युद्ध में कोई निश्चितता नहीं होती तथापि यदि यह मान लिया जाए कि इस बार का युद्ध निर्णायक होगा तथा पाकिस्तान सम्पूर्णतः नष्ट हो जाएगा और धरती के नक्शे से मिट जाएगा किंतु भारत के लिए वह जीत कैसी होगी! भारत की लगभग एक तिहाई जनसंख्या समाप्त हो चुकी होगी। एक तिहाई जनसंख्या परमाणु विकीरण से सिसक रही होगी और शेष एक तिहाई जनसंख्या, भुखमरी की शिकार होगी। क्या भारत को प्रत्यक्ष युद्ध छेड़कर यह कीमत चुकानी चाहिये!

    यह तय है कि पाकिस्तान जब तक जीवित है, अपनी दुष्टता से बाज नहीं आएगा किंतु वर्तमान परिस्थितियों में उसका वही इलाज उचित है जो भारत सरकार कर रही है। मेरी समझ में भारत को आगे बढ़कर युद्ध छेड़ने की बजाय इस बात के प्रयास करने चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के साथ मिलकर पाकिस्तान का परमाणु जखीरा, या तो वहीं नष्ट किया जाए या छीना जाए। ऐसा माना जाता है कि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्वेटा पर आक्रमण करके पाकिस्तान की सामरिक शक्ति को पूर्णतः कुचलने की योजना बनाई थी किंतु दुर्भाग्य से यह काम होने से पहले ही उनकी हत्या हो गई।

    रही बात विश्व की शक्तिशाली शक्तियों की, इनमें से कोई भी अंतिम रूप से विश्वसनीय नहीं है। महाभारत के युद्ध में नकुल और सहदेव का मामा मद्रराज्य शल्य, कौरवों की तरफ से लड़ा था। भगवान के अनन्य भक्त तथा पाण्डवों से प्रेम करने वाले भीष्म पितामह, कुरुकुल के गुरु द्रोण और कृपाचार्य भी कौरवों की तरफ से लड़े थे। यहां तक कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी सम्पूर्ण नारायणी सेना, दुर्योधन द्वारा मांग लिए जाने के कारण कौरवों को दे दी थी। युद्ध तो युद्ध है, इसके अधिकांश समीकरण सदैव तात्कालिक ही होते हैं।  

    जो बात मानव को मानव बनाए रखती है वह यह है कि मनुष्य को कायरता का नहीं, शौर्य का चयन करना चाहिये। शत्रु के विनाश के लिये उसके मन में सदैव ललक और उत्साह होना चाहिये। अच्छे मनुष्यों को युद्ध से कदापि नहीं डरना नहीं चाहिए तथा युद्ध के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए किंतु हमारे समस्त धर्मग्रंथ हमें बताते हैं कि युद्ध सोच-समझ कर तथा अंतिम विकल्प के रूप में करना चाहिए। भगवान राम ने अंगद को शांतिदूत बनाकर भेजा था। भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं ही शांतिदूत बनकर गए थे किंतु दोनों ही परिस्थितियामें में जब यह लगा कि युद्ध अनिवार्य है, तब उन्होंने युद्ध करने में संकोच भी नहीं दिखाया। 

    युद्ध में जोश के साथ-साथ होश भी पूरा रखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण कालयवन से लड़ते हुए रण छोड़कर भाग गए और उन्होंने रणछोड़ नाम स्वीकार करके कालयवन को मुचुकुंद ऋषि से मरवाया। शेर भी आक्रमण से पहले अपनी और सामने वाले की शक्ति का आकलन करता है तथा अवसर आने पर ही वार करता है। आक्रमण के समय केवल आगे ही नहीं भागता, पीछे भी कदम रखता है। परमाणु शक्ति से सम्पन्न भारत को, परमाणु शक्ति से सम्पन्न पाकिस्तान से लड़ने के लिए अंत तक समझदारी से ही काम लेना होगा। धरती पर यही एक मात्र हिन्दू देश बचा है, यदि किसी गलत निर्णय के कारण यह नष्ट हो गया तो दुनिया से हिन्दू जाति ही सदैव के लिए नष्ट हो जाएगी। फिर विश्व को शांति का संदेश देने के लिए कौन बचा होगा! नेपाल, मॉरीशस और इण्डोनेशिया में भी कहने के लिए हिन्दू रहते हैं, किंतु वे हिन्दुत्व के प्राण तत्व से लगभग दूर हो चुके हैं। निःसंकोच कहा जा सकता है कि भारत सरकार ने सेना के हाथ नहीं बांध रखे हैं, समय आने पर ये हाथ खुले हुए ही दिखाई देंगे। 


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  • राजस्थान में इतिहास के प्रमुख स्रोत

     03.06.2020
    राजस्थान में इतिहास के प्रमुख स्रोत

    शिलालेख


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान में प्राचीन दुर्गों, मंदिरों, सरोवरों, बावड़ियों एवं महत्वपूर्ण भवनों की दीवारों, देव प्रतिमाओं, लाटों एवं विजय स्तंभों आदि पर राजाओं, दानवीरों, सेठों और विजेता योद्धाओं द्वारा समय-समय पर उत्कीर्ण करवाये गये शिलालेख मिलते हैं। ये लाखों की संख्या में हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण शिलालेखों की जानकारी यहाँ दी जा रही है। अशोक के शिलालेख खरोष्ठी लिपि एवं ब्राह्मी भाषा में हैं। उसके बाद के शिलालेख संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में हैं। मुस्लिम शासकों के शिलालेख फारसी भाषा एवं अरबी लिपि में मिलते हैं।

    गोठ मांगलोद शिलालेख: नागौर जिले के गोठ मांगलोद गाँव में स्थित दधिमती माता मंदिर में उत्कीर्ण अभिलेख 608 ई. का माना जाता है। पं.रामकरण आसोपा के अनुसार इस शिलालेख पर गुप्त संवत् की तिथि संवत्सर सतेषु 289 श्रावण बदि 13 अंकित है। यदि यह गुप्त संवत् है तो यह राजस्थान में अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन शिलालेख है। विजयशंकर श्रीवास्तव ने इसे हर्ष संवत् की तिथि माना है। यदि यह हर्ष संवत् है तो यह शिलालेख 895 ई. का है।

    अपराजित का शिलालेख: 661 ई. का यह शिलालेख नागदे गाँव के निकट कुडेश्वर के मंदिर की दीवार पर अंकित है। इससे सातवीं शती के मेवाड़ की धार्मिक स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। इस युग में विष्णु मंदिरों का निर्माण काफी प्रचलित था।

    मण्डोर का शिलालेख: 685 ई. का यह शिलालेख मण्डोर के पहाड़ी ढाल में एक बावड़ी में खुदा हुआ है। इस लेख से ज्ञात होता है कि उस समय विष्णु तथा शिव की उपासना प्रचलित थी।

    मान मोरी का शिलालेख: 8वीं ई. का यह शिलालेख चित्तौड़ के निकट मानसरोवर झील के तट पर एक स्तंभ पर उत्कीर्ण था। इसकी खोज कर्नल टॉड ने की थी। इस लेख से उस समय के राजाओं द्वारा लिये जाने वाले करों, युद्ध में हाथियों के प्रयोग, शत्रुओं को बंदी बनाये जाने तथा उनकी स्त्रियों की देखभाल की उचित व्यवस्था किये जाने के बारे में जानकारी दी गई है। इस लेख से उस समय की सामाजिक स्थिति की भी जानकारी होती है। उस समय तालाब बनवाना धर्मिक कार्य माना जाता था।

    घटियाला के शिलालेख: 861 ई. के इन शिलालेखों में मग जाति के ब्राह्मणों का वर्णन है। इन्हें शाकद्वीपीय ब्राह्मण भी कहा जाता है जो ओसवालों के आश्रित रहकर जीवन यापन करते थे। इन लेखों से तत्कालीन वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।

    ओसियां का शिलालेख: 956 ई. के इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि उस समय समाज चार प्रमुख वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभाजित था।

    बिजोलिया का स्तंभ लेख: 1170 ई. का यह शिलालेख बिजोलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के निकट एक चट्टान पर उत्कीर्ण है। इस पर संस्कृत भाषा में 32 श्लोक उत्कीर्ण हैं। इसमें सांभर एवं अजमेर के चौहान शासकों की वंशावली तथा उनके द्वारा शासित प्रमुख नगरों के प्राचीन नाम दिये गये हैं।

    चौखा का शिलालेख: 1273 ई. का यह शिलालेख उदयपुर के निकट चौखा गाँव के एक मंदिर पर उत्कीर्ण है। इस पर संस्कृत भाषा में 51 श्लोक उत्कीर्ण हैं। इसमें गुहिल वंशीय शासकों की वंशावली तथा उस समय के धार्मिक रीति रिवाजों की जानकारी दी गई है।

    रसिया की छतरी का शिलालेख: 1274 ई. का यह शिलालेख चित्तौड़ के राजमहलों के द्वार पर उत्कीर्ण है। इसमें गुहिल वंशीय शासकों की वंशावली तथा उस समय के सामाजिक एवं धार्मिक रीति रिवाजों की जानकारी दी गई है।

    कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति: 1460 ई. यह कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति शिलालेख चित्तौड़ दुर्ग में निर्मित कीर्ति स्तंभ के पास स्थित है। इसमें मेवाड़ के शासक बापा से लेकर कुंभा तक की उपलब्ध्यिों तथा कुंभा द्वारा निर्मित 
    भवनों दुर्गों, मंदिरों, जलाशयों तथा कुंभा के समय में रचित ग्रंथों की जानकारी दी गई है।

    आबू का शिलालेख: आबू पर्वत पर लगे 1285 ई. के इस शिलालेख में बापा रावल से लेकर समरसिंह तक के मेवाड़ शासकों, आबू की वनस्पति और उस समय के धार्मिक रीति रिवाजों की जानकारी दी गई है।

    देलवाड़ा का शिलालेख: 1434 ई. का यह शिलालेख संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में लिखा गया है। इसमें 14वीं शताब्दी की राजनीतिक , आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति, तत्कालीन भाषा, कर एवं मुद्रा (टंक) की जानकारी दी गई है।

    शृंगी ऋषि का शिलालेख: 1428 ई. का यह शिलालेख उदयपुर जिले में एकलिंगजी से 6 मील दूर शृंगी ऋषि नामक स्थान पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसमें हम्मीर से लेकर मोकल तक के मेवाड़ शासकों की उपलब्धियां दी गई हैं तथा राणा हम्मीर के युद्धों, मंदिरों के निर्माण, दानशीलता, भीलों की तत्कालीन स्थिति, मेवाड़-गुजरात तथा मालवा के राजनीतिक सम्बन्धों की जानकारी दी गई है। 

    समिधेश्वर के मंदिर का शिलालेख: 1428 ई. का यह शिलालेख चित्तौड़ के समिधेश्वर मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण है। इस अभिलेख से तत्कालीन शिल्पियों, सामाजिक रीति रिवाजों तथा महाराणा मोकल द्वारा विष्णु के मंदिर के निर्माण आदि की जानकारी दी गई है।

    रणकपुर प्रशस्ति: 1439 ई. का यह शिलालेख रणकपुर के चौमुखा जैन मंदिर में एक लाल पत्थर पर उत्कीर्ण है। इसमें बापा से कुंभा तक की वंशावली तथा तत्कालीन मुद्रा (नाणक) की जानकारी दी गई है।

    कुंभलगढ़ प्रशस्ति: 1460 ई. का यह शिलालेख कुंभलगढ़ दुर्ग में उत्कीर्ण है। इसमें मेवाड़ नरेशों की वंशावली, महाराणा कुंभा की उपलब्धियों, कंुभा के समय के बाजारों, मंदिरों, राजमहलों तथा युद्धों की जानकारी दी गई है।

    जमवा रामगढ़ का प्रस्तर लेख: 1613 ई. के इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि राजा मान सिंह अपने पिता भगवानदास का दत्तक पुत्र था।

    रायसिंह की बीकानेर प्रशस्ति: 1594 ई. का यह शिलालेख बीकानेर दुर्ग के मुख्य द्वार पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसमें बीका से लेकर रायसिंह तक के बीकानेर शासकों की उपलब्धियों,रायसिंह के कार्यों एवं भवन निर्माण आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

    जगन्नाथ राय की प्रशस्ति: 1652 ई. का यह शिलालेख उदयपुर के जगदीश मंदिर के प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण है। इसमें मेवाड़ के इतिहास, मेवाड़ के शासक बप्पा से लेकर महाराणा जगतसिंह तक की उपलब्धियों, राणा प्रताप एवं अकबर के संघर्ष, जगतसिंह की दान प्रवृत्ति तथा तत्कालीन आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का ज्ञान होता है।

    राजप्रशस्ति महाकाव्य: 1676 ई. का यह शिलालेख राजसमंद जिले में राजसमुद्र नामक झील की पाल पर 25 काले पत्थर की शिलाओं पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसमें महाराणा राजसिंह की उपलब्धियों और तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति की विस्तृत जानकारी दी गई है।


    ताम्रपत्र

    जब शासक किसी महत्वपूर्ण अवसर पर भूमि, गाँव, स्वर्ण एवं रत्न आदि दान देते थे या कोई अनुदान स्वीकृत करते थे, तब वे इस दान या अनुदान को ताम्बे की चद्दर पर उत्कीर्ण करवाकर देते थे ताकि पीढ़ियों तक यह साक्ष्य उस परिवार के पास उपलब्ध रहे। हजारों की संख्या में ताम्रपत्र उपलब्ध होते हैं। कुछ दानपत्रों से इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने में सहायता मिलती है। अब तक सबसे प्राचीन ताम्रपत्र ई.679 का धूलेव का दानपत्र मिला है। ई.956 का मघनदेव का ताम्रपत्र, ई.1002 का रोपी ताम्रपत्र, ई.1180 का आबू के परमार राजा धारावर्ष का ताम्रपत्र, ई.1185 का वीरपुर का दानपत्र, ई.1194 का कदमाल गाँव का ताम्रपत्र, ई.1206 का आहाड़ का ताम्रपत्र, ई.1259 का कदमाल ताम्रपत्र, ई.1287 का वीरसिंह देव का ताम्रपत्र तथा ई.1437 का नादिया गाँव का ताम्रपत्र प्रमुख हैं।


    सिक्के

    राजस्थान से मिले पंचमार्का सिक्के, गधैया सिक्के, ढब्बू सिक्के, आहड़ उत्खनन से प्राप्त सिक्के, मालवगण के सिक्के और सीलें, राजन्य सिक्के, यौधेय सिक्के, रंगमहल से प्राप्त सिक्के, सांभर से प्राप्त मुद्रायें, सेनापति मुद्रायें, रेड से प्राप्त सिक्के, मित्र मुद्रायें, नगर मुद्रायें, बैराट से प्राप्त मुद्रायें, गुप्तकालीन सिक्के, गुर्जर प्रतिहारों के सिक्के, चौहानों के सिक्के तथा मेवाड़ी सिक्के राजस्थान के प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं। अजमेर से मिले एक सिक्के में एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम अंकित है। इससे अनुमान होता है कि पृथ्वीराज चौहान को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उसके सिक्कों को जब्त करके उन्हें अपने नाम से दुबारा जारी किया था।

    राजस्थान की विभिन्न रियासतों में भी समय-समय पर विभिन्न सिक्कों का प्रचलन हुआ। इनसे मध्यकाल एवं मध्येतर काल के इतिहास की जानकारी मिलती है। इनमें स्वरूपशाही सिक्के तथा राव अमरसिंह राठौड़ के सिक्के महत्वपूर्ण हैं। मुगलों के शासन काल में कुचामन के ठाकुर को सिक्के ढालने की अनुमति दी गई थी। कुछ लोगों ने नकली कुचामनी सिक्के ढाल कर चला दिये जिससे कुचामनी सिक्का काफी चर्चित रहा।


    लिखित इतिहास

    राजस्थान के इतिहास की प्राचीन सामग्री संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं में मिलती है। पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् संस्कृत भाषा और कुवलय माला प्राकृत भाषा के अच्छे उदाहरण हैं। उसके बाद मध्यकाल की सामग्री संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी तथा अरबी-फारसी भाषा के ग्रंथों में प्राप्त होती है। राजस्थानी भाषा में लिखे गये ग्रंथ- प्रबंध, ख्यात, वंशावली, वचनिका, गुटके, बेलि, बात, वार्ता, नीसाणी, कुर्सीनामा, झूलणा, झमाल, छप्पय, कवित्त, गीत तथा विगत आदि नामों से प्राप्त होते हैं। कान्हड़दे प्रबंध प्राचीन डिंगल भाषा का अच्छा उदाहरण है।

    अरबी फारसी ग्रंथों में विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकें- तारीख, तबकात, अफसाना आदि के रूप में मिलती हैं। फरिश्ता की लिखी तारीखे फरिश्ता, जियाउद्दीन बरनी की तारीखे फीरोजशाही, अमीर खुसरो की तुगलकनामा, अबुल फजल की आइने अकबरी तथा अकबरनामा, बाबर की लिखी तुजुक ए बाबरी, जहाँगीर की लिखी तुजुक ए जहाँगीरी, गुलबदन की लिखी हुमायूंनामा, आदि प्रमुख अरबी फारसी पुस्तकें हैं। रियासती काल में विभिन्न रियासतों के शासकों द्वारा समय-समय पर जारी किये गये फरमान, रुक्के, खरीते, तहरीरें तथा पट्टे भी तत्कालीन इतिहास जानने के प्रमुख स्रोत हैं।

    ब्रिटिश शासन काल में प्रकाशित किये गये गजेटियर, एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट्स, सेंसस (जनगणना), सैटमेंट्स, सर्वे, मेडिकल हवाला, पत्राचार की पत्रावलियां, कोर्ट्स के फैसले, अखबारों की कतरनें, पुलिस डायरियां, फेमीन रिपोर्ट्स, टाउन प्लानिंग रिपोर्ट्स आदि से ब्रिटिश काल के इतिहास को जानने में सहायता मिलती है।

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    इतिहास की लिखित सामग्री को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से राजस्थान में ई. 1955 में राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना की गयी। इस विभाग का मुख्यालय बीकानेर में तथा शाखायें जयपुर, कोटा, उदयपुर, अलवर, भरतपुर एवं अजमेर में स्थित हैं। इन अभिलेखागारों में ऐतिहासिक, प्रशासनिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक दृष्टि से उपयोगी एवं दुर्लभ सामग्री संग्रहीत है। इस सामग्री में मुगलकाल और मध्यकाल के अभिलेख, फरमान, निशान, मंसूर, पट्टा, परवाना, रुक्का, बहियां, अर्जियां, खरीता, पानड़ी, तोजी दो वरकी, चौपनिया, पंचांग आदि उपलब्ध हैं। यह सामग्री उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, डिंगल, पिंगल, ढूंढाड़ी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, गुजराती, मराठी एवं हाड़ौती आदि भाषाओं में लिखी हुई है।

    बीकानेर अभिलेखागार के प्राविधिक खण्ड में 21 राज्यों के अभिलेख 7 संचय शालाओं में सुरक्षित किये गये हैं। जयपुर राज्य के अभिलेख ई. 1622 से 1743 तक उर्दू एवं फारसी में तथा ई. 1830 से 1949 तक के अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं। जोधपुर राज्य के अभिलेख ई. 1643 से 1956 तक के मारवाड़ी भाषा में तथा ई. 1890 से 1952 तक अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं। कोटा राज्य के अभिलेख ई. 1635 से 1892 तक हाड़ौती भाषा में उपलब्ध हैं।

    उदयपुर राज्य के अभिलेख ई. 1884 से 1949 तक मेवाड़ी भाषा में तथा ई. 1862 से 1947 तक अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं। बीकानेर राज्य के अभिलेख ई. 1625 से 1956 तक की अवधि के हैं। ये मारवाड़ी, उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी में उपलब्ध हैं। इनके अतिरिक्त अलवर, किशनगढ़, बूंदी, सिरोही, भरतपुर, झालावाड़, कुशलगढ़ तथा करौली आदि रजवाड़ों के 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के अभिलेख सुरक्षित हैं।

    अंग्रेजी शासन के दौरान अजमेर के कमिश्नर एवं चीफ कमिश्नर के कार्यालयों के अभिलेख ई. 1818 से लेकर 1956 तक की अवधि के हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय प्रजातांत्रिक मांगों को लेकर बनी प्रजापरिषदों एवं प्रजामंडलों के अभिलेख और ई. 1909 से लेकर बाद के समय की समाचार पत्रों की 3000 से अधिक कतरनें भी यहाँ रखी हुई हैं।

    मौखिक इतिहास खंड में स्वतंत्रता सेनानियों से लिये गये 216 साक्षात्कार उन्हीं की आवाज में ध्वन्यांकित कर रखे गये हैं। पुस्तकालय खंड में भूतपूर्व रियासतों के गजट, बजट, प्रशासनिक प्रतिवेदन, जनगणना एवं अन्य महत्त्वपूर्ण संदर्भ पुस्तकें उपलब्ध हैं। एक अनुमान के अनुसार बीकानेर के अभिलेखागार में रखे गये दस्तावेजों को यदि धरती पर लम्बाई में फैलाया जाये तो उनकी लम्बाई पाँच लाख फुट होगी।

    राज्य अभिलेखागार की उदयपुर शाखा की बख्शीशाला में ताम्रपत्रों की बही दर्शनीय है। इस बही में 1838 ई. में 1294 ताम्रपत्रों के नवीनीकरण करने का उल्लेख है। इन 1294 ताम्रपत्रों में से 1138 ताम्रपत्रों को गोरधनजी ने तथा 156 ताम्रपत्रों को रतना ने खोदा था। ये ताम्रपत्र महाराणा लाखा के काल से आरंभ होकर महाराणा भीमसिंह (ई. 1828) तक के हैं।

    अभिलेखागार की कोटा शाखा सूरज पोल स्थिल झाला हाउस में है। इसके तीन मंजिले भवन में कोटा रियासत का 300 वर्ष पुराना अभिलेख विद्यमान है। ये अभिलेख राजस्थान की सबसे कठिन मानी जाने वाली हाड़ौती भाषा में लिखा हुआ है। राज्य में राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के अंतर्गत प्राचीन एवं दुर्लभ ग्रंथों की खोज का काम चल रहा है। इसके तहत नवम्बर 2009 तक राज्य अभिलेखागार ने 21 जिलों में साढ़े सात लाख प्राचीन ग्रंथ खोजे गये हैं। ये ग्रंथ अभिलेखागार में रखे गये हैं।

    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान

    मध्यकालीन राजस्थान में असंख्य पाण्डुलिपियां संस्कृत, प्राकृत, अपभं्रश, पाली तथा राजस्थानी भाषाओं में विविध विषयों पर लिखी गयीं। वेद, धर्मशास्त्र, पुराण, दर्शन, ज्योतिष, गणित, काव्य, आयुर्वेद, इतिहास, आगम, व्याकरण, तंत्र, मंत्र आदि की पाण्डुलिपियों का लेखन, अलंकरण तथा चित्रण करवाकर व्यक्तिगत संग्रह में संरक्षण की परंपरा पिता से पुत्र को विरासत में मिलती रही और समृद्ध होती रही। पाण्डुलिपियों का यह संग्रह पोथी खाना कहा जाता था। इन पोथियों के संग्रहण के लिये ई. 1955 में राज्य में प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की स्थापना की गई। इसका मुख्यालय जोधपुर में रखा गया। ई. 1961-62 में राजस्थान के विस्तृत क्षेत्र में विकीर्ण सामग्री के संरक्षण की आवश्यकता की दृष्टि से बीकानेर, कोटा, अलवर, उदयपुर, चित्तौड़ में उपशाखाओं की स्थापना की गयी। टोंक में अरबी और फारसी ग्रंथों के संरक्षण के लिये कार्यालय स्थापित हुआ जो अब स्वतंत्र संस्थान के रूप में कार्यरत है।

    जोधपुर मुख्यालय: जोधपुर संग्रह में राजस्थानी भाषा के गुटके, बेलि, बात, प्रेमाख्यान, मीरां की पदावली, नरसी जी रो मायरो, राजस्थानी के वीर गीत आदि महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें से अनेक चित्रित एवं अलंकृत पाण्डु लिपियां इस प्रतिष्ठान की अमूल्य निधि हैं। अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दी में लिखित बेलि क्रिसन रुकमणि री, कृष्णलीला गुटका, दोहा संयोग सिणगार रा, ढोला मरवण कथा, फूलजी फूलमती री बात और माधवानल कामकंदला चित्रित पाण्डुलिपियां हैं। बेलि क्रिसन रुकमणि अकबर के दरबारी कवि पृथ्वीराज राठौड़ ने सन् 1580 में की थी। इसकी सचित्र प्रति 19वीं शताब्दी की जोधपुर शैली में उपलब्ध है। ताड़पत्र, चर्मपत्र तथा कागज पर चित्रित हस्त लिखित ग्रंथों की संख्या लगभग 1500 है। इनमें श्रीमद्भागवत्, देवी माहात्म्य, कालकाचार्य कथा दक्षिण भारतीय शैली में है। चर्मपत्र पर आर्य महाविद्या नामक बौद्ध ग्रंथ पाल शैली में चित्रित है। पश्चिमी भारतीय या जैन शैली में चित्रित कल्पसूत्र के अनेक पात्र और ग्रंथ हैं जिनमें प्राचीनतम 1485 वि. सं. का है। धर्मशास्त्र, नाटक साहित्य, गद्य-पद्य साहित्य संगीत शास्त्र ज्योतिष के ग्रंथ महत्त्वपूर्ण हैं। हिंदी तथा राजस्थानी में राम स्नेही, नाथ संप्रदाय तथा दादू पंथी संप्रदायों के ग्रंथ प्रचुर संख्या में उपलब्ध हैं। इस संग्रह में कुल 40,988 हस्त लिखित गं्रथ, 981 प्रतिलिपियां तथा 273 फोटो प्रतियां संग्रहीत हैं। फोटो प्रतियां जैन ज्ञान भण्डार जैसलमेर से प्राप्त की गयी हैं। प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के ई.1958 में जोधपुर स्थानांतरण होने के बाद उपशाखाओं में भी ग्रंथ अधिग्रहण तथा संरक्षण का कार्य आरंभ हुआ।

    बीकानेर शाखा: गंगागोल्डन जुबली क्लब के स्टेडियम के पास प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान द्वारा निर्मित भवन में बीकानेर उपशाखा स्थित है। यहाँ ग्रंथों की संख्या 19,839 है। जोधपुर के बाद यह दूसरा महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इस संग्रह की स्थापना जैन आचार्य एवं भक्तों के व्यक्तिगत संग्रहों के दान से हुई थी। इसमें मोतीचंद खजाँची संग्रह तथा जिनचंद्र सूरि संग्रह महत्त्वपूर्ण हैं। इन संग्रहों के सूची पत्र प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित किये जा चुके हैं। यहाँ के अधिकांश ग्रंथ जैन धर्म के हैं। जैनेत्तर ग्रंथों में न्याय व वेदांत के ग्रंथ महत्त्वपूर्ण हैं।

    चित्तौड़ शाखा: चित्तौड़ शाखा के संग्रह का निर्माण वर्ष 1962-63 में मुनि जिन विजय के प्रयासों से हुआ था। चित्तौड़ दुर्ग को जाने वाली सड़क पर यह शाखा स्थित है। श्री लादूराम दुधाड़िया, बी. आर. चौधरी, आर्य मगनजी छगनूजी, बंशीलाल दाधीच, मुनि कांति सागर तथा संतोष यति के व्यक्तिगत संग्रहों से दान में प्राप्त पाण्डुलिपियों से इस संग्रह का निर्माण हुआ है। ये पाण्डु लिपियां संस्कृत, प्राकृत, हिंदी एवं राजस्थानी भाषा की हैं। संस्कृत प्राकृत ग्रंथों के दो सूची पत्र तथा हिंदी-राजस्थानी 
    ग्रंथ का एक सूची पत्र प्रकाशित किया जा चुका है। यहाँ साहित्य ज्योतिष, भक्ति तथा जैन धर्म के 5,426 ग्रंथ उपलब्ध हैं।

    जयपुर शाखा: जयपुर शाखा का कार्यालय पुराने विधानसभा भवन के सामने श्री रामचंद्रजी मंदिर में स्थित है। वर्ष 1958 से निरंतर पाण्डुलिपियों एवं पुस्तकों का अधिग्रहण जयपुर के प्रमुख व्यक्तियों एवं संग्रहालयों से किया गया है। इनके सूचीपत्र क्रमशः 1966 तथा 1984 में प्रकाशित हुए। अधिग्रहण किये गये संग्रहों में महाराजा पब्लिक लाइब्रेरी के 1608 हस्तलिखित ग्रंथ तथा व्यक्तिगत संग्रहों में श्री रामकृपालु शर्मा, हरिनारायण विद्याभूषण, विश्वनाथ शारदानंदन, बद्री नारायण फोटोग्राफर तथा जिन धरणेंद्र सूरि के उपासरे के संग्रह सम्मिलित हैं। जयपुर शाखा में लगभग 12,000 ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों में धर्मशास्त्र एवं ऐतिहासिक प्रशस्तियां महत्त्वपूर्ण हैं। संस्कृति साहित्य तथा संगीत की दृष्टि से ईश्वर विलास महाकाव्य, संगीत रघुनंदन तथा रागमंजरी उल्लेखनीय हैं। प्रकाशित ग्रंथों में कृष्ण भट्ट का ईश्वर विलास महाकाव्य, जयदेव का घटकर्पूर महाकाव्य, सूत्रधार मण्डन कृत प्रासाद मण्डन और राज वल्लभ महत्त्वपूर्ण हैं। इतिहास एवं संस्कृति के स्रोत के रूप में प्रशस्तियां, कछवाहा राजा मानसिंह के शिला लेख, ग्वालियर दुर्ग के शिला लेख, बालादित्य के शिला लेख महत्त्वपूर्ण हैं।

    अलवर शाखा: अलवर की शाखा का प्रांरभ ई. 1840 में अलवर के महाराज विनय सिंह के आश्रय में हुआ था। महाराज के संग्रह से ही इस शाखा का प्रारंभ किया गया। इस संग्रह में अधिकांश ग्रंथ संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के हैं। यह शाखा वैदिक एवं दर्शन साहित्य के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों के लिये उल्लेखनीय हैं। ऋग्वेद की अब तक अज्ञात आश्वलायन तथा शाखायन संहिता पाठ, गृह्य सूत्र की टीका, न्याय एवं मीमांसा के ग्रंथ इस केंद्र की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। संस्कृत साहित्य के ग्रंथों में गीत गोविंद की व्याख्या, फाल्गुन शतक, मृगांक शतक तथा नये संस्कृत नाटकों में मुक्ता चरित्र नाटक, रामाभ्युदय नाटक, हृदय विनोद प्रहसन आदि महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अतिरिक्त अलंकार एवं छंद शास्त्र के ग्रंथ भी संग्रहीत हैं। इस संग्रह का सूची पत्र प्रकाशित किया जा चुका है।

    कोटा शाखा: प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की कोटा शाखा दुर्ग के अंदर स्थित है। इस शाखा का कार्य कोटा राज्य के सरस्वती पुस्तकालय तथा झालावाड़ राज्य के पुस्तकालयों से पाण्डुलिपियों के स्थानांतरण से आरंभ हुआ। इसमें अधिकांश ग्रंथ संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के हैं। यह संग्रह पुराण साहित्य के संग्रह के लिये प्रसिद्ध है। कोटा में वल्लभ संप्रदाय के मथुरेशजी का स्थान होने से इस संग्रह में स्रोत साहित्य तथा वल्लभ मत का अणुभाष्य विपुल मात्रा में है। इसके अतिरिक्त साहित्य में सान्द्रकुतूहल नाटक, कीर्ति कौमुदी, नृसिंह चम्पू आदि संस्कृत रचनायें हैं।

    उदयपुर शाखा: उदयपुर राजमहल के सरस्वती भण्डार के ग्रंथों के स्थानांतरण से इस शाखा का प्रारंभ वर्ष 1961-62 में हुआ। स्थानांतरण के अतिरिक्त क्रय द्वारा भी यहाँ ग्रंथों का अधिग्रहण किया गया। डॉ. ब्रजमोहन जावलिया के प्रयत्नों से रविशंकर देराश्री के बहुमूल्य ग्रंथ इस संग्रह के लिये प्राप्त किये गये। जावलिया ने संग्रह का सूचीपत्र प्रकाशित किया। इस संग्रह में जीवंधर कृत अमरसार, रणछोड़ भट्ट के अमरकाव्य और राजप्रशस्ति, रघुनाथ कृत जगतसिंह काव्य, सदाशिव नागर का राजरत्नाकर महाकाव्य साहित्यिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। राजस्थानी भाषा के गं्रथों में रासो ग्रंथ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। उदयपुर संग्रह में सरस्वती भण्डार से प्राप्त सचित्र पाण्डुलिपियां महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। महात्मा हीरानंद द्वारा लिखी गयी तथा मनोहर साहिबदीन तथा कुछ अन्य चित्रकारों द्वारा चित्रित की गयी दूसरी महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपि मतिराम विरचित रसराज है। रीतिकालीन परंपरा में लिखे गये इस ग्रंथ में मतिराम ने श्ंृगार रस एवं नायिका भेद के उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। इस चित्रित 
    ग्रंथ में 12 चित्रित पृष्ठ हैं। एक अन्य महत्त्वपूर्ण चित्रित पाण्डुलिपि विक्रम संवत् 1780 की गीत गोविंद है। स्पष्ट एवं सुंदर देवनागरी में लिखी गयी इस पाण्डुलिपि में 108 पृष्ठ और 34 दृष्टांत चित्रित हैं।

    अरबी-फारसी शोध संस्थान

    टोंक टोंक के अरबी-फारसी शोध संस्थान में अरबी एवं फारसी भाषा की पुस्तकों का दुर्लभ संग्रह है। इसकी स्थापना ई. 1978 में हुई। यहाँ रखी गयी पुस्तकों में औरंगजेब की लिखी आलमगिरी कुरान तथा शाहजहाँ द्वारा लिखवाई गयी 'कुराने कमाल' दुर्लभ पुस्तकें हैं।

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  • राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं

     03.06.2020
     राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं

    प्रागैतिहासिक पृष्ठभूमि

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान अपनी जटिल भू-जैविकीय संरचना के लिये जाना जाता है। इस सम्पूर्ण प्रदेश को अरावली पर्वत माला दो भिन्न भागों में बांटती है। इस पर्वतमाला के पूर्व का भाग हरा-भरा क्षेत्र है तो पश्चिमी भाग बलुई स्तूपों वाला रेगिस्तान। प्रागैतिहासिक काल में विश्व दो भूखण्डों- अंगारालैण्ड तथा गौंडवाना लैण्ड में बंटा हुआ था। इन दोनों भूखण्डों के बीच में टेथिस महासागर था। राजस्थान के मरुस्थलीय एवं मैदानी भाग टेथिस सागर को नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से पाट दिये जाने से बने जबकि गौंडवाना लैण्ड के एक अंश के विलग होकर उत्तर की ओर खिसकने से राजस्थान के अरावली पर्वत एवं दक्षिणी पठार बने।


    रेगिस्तान का उद्भव

    पौराणिक उल्लेखों के अनुसार किसी युग में यहाँ आज का सा रेगिस्तान नहीं था अपितु लवण सागर नामक खारा समुद्र लहराता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब भगवान श्रीराम लंका जाने के लिये वानरों सहित समुद्र के किनारे पहुँचे तो उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने हेतु समुद्र से मार्ग मांगा। समुद्र ने भगवान का अनुरोध नहीं सुना तो भगवान ने समुद्र का जल सोखने के लिये आग्नेयास्त्र का संधान किया जिसे देखकर समुद्र भयभीत हो गया तथा उसने भगवान को समुद्र पार करने का उपाय बता दिया। समुद्र ने भगवान से प्रार्थना की कि इस अमोघ आग्नेयास्त्र का प्रयोग द्रुमकुल्य (लवणसागर का उत्तरी भाग) पर करें, जहाँ दुष्ट आभीर आदि समुद्र का जल अपवित्र करते हैं। भगवान ने वैसा ही किया। गगनभेदी गंभीर गर्जन के साथ समुद्र का पानी सूख गया और उस स्थल पर जहाँ कि आग्नेयास्त्र गिरा, एक विशाल छिद्र हो गया जिससे विमल जल का स्रोत फूटने लगा। यह स्रोत तीर्थराज पुष्कर कहलाता है। इस स्रोत के चारों ओर मरूकांतार क्षेत्र की उत्त्पत्ति हो गयी जिसमें श्रीराम की कृपा से सब प्रकार का आनंद हो गया। यह स्थान पशु सम्पदा, फल-फूल रसादि से भरपूर तथा अल्परोगी हो गया। श्रीराम के प्रभाव से उसके मार्ग भी निरापद तथा कल्याणकारी हो गये।

    पश्चिमी राजस्थान का यह मरुस्थल विश्व के अन्य मरुस्थलों- ऑस्ट्रेलिया, चीन, अरब, अफ्रीका, अमरीका आदि की तुलना में जल, वनस्पति, पशु, मानव, संस्कृति तथा प्राकृतिक सौंदर्य के मामले में श्रेष्ठ है। बीकानेर जिले से 'ट्राइबोलाइट' जीवाश्म मिले हैं। ट्राइबोलाइट कैम्ब्रियन युग के निचले स्तर पर पाये जाते हैं। ये डायनोसार से पहले लुप्त हुए थे। इनका युग 57 करोड़ साल पुराना माना गया है। उस समय पृथ्वी पर बहुकोशीय जीवों की उत्त्पत्ति तेजी से हो रही थी। इस कारण धरती पर ट्राइबोलाईट जीवों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गयी थी। अभी तक यह पता नहीं चला है कि इनका भोजन क्या था।

    जैसलमेर के वुड फॉसिल पार्क में लगभग 18 करोड़ वर्ष पुरानी वनस्पतियों तथा जीवों के फॉसिल्स प्राप्त होते हैं। इस मरू प्रदेश से डायनासोर के कुछ अवशेष प्राप्त हुए हैं जो 60 लाख वर्ष या उससे भी अधिक पुराने हैं। इससे अनुमान होता है कि रेगिस्तानी प्रदेश का सम्पूर्ण भू-भाग एक साथ समुद्र से निकलकर भू-प्रदेश में नहीं बदल गया अपितु धीरे-धीरे अलग-अलग काल में पृथ्वी समुद्र से बाहर निकली। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लगे।

    समुद्र के इस क्षेत्र से हटने की घटना को ऋग्वैदिक ऋषियों ने अपनी आँखों से देखा। ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 136वें सूक्त के 5वें मंत्र में पूर्व तथा पश्चिम के दो समुद्रों का स्पष्ट उल्लेख है जिनका विवरण शतपथ ब्राह्मण भी देता है। पुराणों में वर्णित जलप्लावन की घटना भी इस ओर संकेत करती है। काठक संहिता, तैत्तरीय संहिता, तैत्तरीय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति के वराह बनकर पृथ्वी प्राप्ति का वर्णन मिलता है। प्राचीन ऋषियों के अनुसार एक बार सारी पृथ्वी पर संवर्तक अग्नि से भयंकर दाह हुआ। उसके बाद एक वर्ष की अतिवृष्टि से महान जलप्लावन आया। सारी पृथ्वी जल निमग्न हो गयी। वृष्टि की समाप्ति पर जल के शनैः शनैः नीचे होने से कमलाकार पृथ्वी प्रकट होने लगी। उस समय उन जलों में ब्रह्माजी ने योगज शरीर धारण किया, उनके साथ योगज शरीर धारी सप्त ऋषि और कई अन्य ऋषि-मुनि भी प्रकट हुए। सृष्टि वृद्धि को प्राप्त हुई। तब बहुत काल के पश्चात् समुद्र के जलों के ऊँचा हो जाने के कारण एक दूसरा जल प्लावन वैवस्वत मनु और यम के समय में आया। मनु ने एक नौका में अपनी और अनेक प्राणियों की रक्षा की।

    आज से 25 हजार वर्ष पहले राजस्थान विश्व का सबसे विकसित एवं समृद्ध प्रदेश था, जब यहाँ वेदों की रचना हुई। 25 हजार वर्ष पहले का काल चौथी बर्फ जमने का काल अथवा प्लायंस्टीन कहलाता है। उस समय धरती का पचहत्तर प्रतिशत भाग पानी से ढका हुआ था तथा टीथिस सागर भारत को बीच से दो खण्डों में विभक्त करता था। तब सिंध, कच्छ की खाड़ी तथा ऊपरी आधा राजस्थान समुद्र में डूबा हुआ था। बीच में 4 मील ऊँचा अरावली पर्वत था। इस पर्वत के ढाल पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण की ओर थे। बरसात का मौसम लगभग पूरे वर्ष चलता था तथा बादल छंटते नहीं थे। भारी वर्षा से अरावली पर्वत कटता गया तथा उसके धातु, रसायन एवं मिट्टी बहकर आंध्रप्रदेश तक पहुंच गये। उन दिनों सरस्वती, दृश्द्वती, चितांग, मारकण्डा, सिंधु, शतुद्रु (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुष्णी (रावी), अस्किनी (चिनाव) तथा वितस्ता (झेलम) नामक नदियाँ पंजाब तथा राजस्थान के क्षेत्र में बहती थीं। मनु ने सरस्वती, सिन्धु तथा सिंधु की पाँचों सहायक नदियों (शतुद्रु, विपाशा, परुष्णी, अस्किनी तथा वितस्ता) के क्षेत्र को सप्तसिंधु कहकर संबोधित किया है। स्वयं मनु एक कुटिया में नदी के तट पर रहते थे जो समुद्र से भी अधिक दूर नहीं थी।

    समुद्र के गर्भ से निकलने के कारण आज भी रेगिस्तान में नमक, फ्लोराइड व खड्डी बहुतायत से मिलते हैं तथा रेतीले धोरों में शंख, सीपी एवं घोंघे प्राप्त होते हैं। बाड़मेर तथा जालोर के दक्षिणी भागों में फैला नेहड़ क्षेत्र आज भी इस प्रक्रिया से होकर गुजर रहा है। 'नेहड़' शब्द 'नीरहृत' शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- 'जल का हृदय।' अर्थात आज से कुछ सौ वर्ष पूर्व तक यहाँ जल लहराता था। इस क्षेत्र से कुछ प्राचीन मस्तूल आदि मिले हैं। जो इस बात को सिद्ध करते हैं कि यहाँ जल ही जल था जिसमें नौकायें चला करती थीं। सम्पूर्ण रेगिस्तानी क्षेत्र में खारे पानी की झीलें प्राप्त होती हैं जिनमें सांभर, डीडवाना, पचपद्रा, लूणकरणसर तथा कावोद प्रमुख हैं। ये झीलें प्राचीन लवणसागर की अवशेष प्रतीत होती हैं।

    पाषाण कालीन सभ्यताएँ

    प्रदेश में आदि मानव द्वारा प्रयुक्त जो प्राचीनतम पाषाण उपलब्ध हुए हैं, वे लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने हैं। इस भूखण्ड में मानव सभ्यता उससे भी पुरानी हो सकती है। राजस्थान में मानव सभ्यता पुरा-पाषाण, मध्य-पाषाण तथा उत्तर-पाषाण काल से होकर गुजरी।

    पुरा-पाषाण काल डेढ़ लाख वर्ष पूर्व से पचास हजार वर्ष पूर्व तक का काल समेटे हुए है। इस काल में हैण्ड एक्स, क्लीवर तथा चॉपर आदि का प्रयोग करने वाला मानव बनास, गंभीरी, बेड़च, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों में (आज जहाँ बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़ तथा जयपुर जिले हैं) रहता था जहाँ प्रस्तर युगीन मानव के चिह्न मिले हैं। इस युग के भद्दे तथा भौंडे हथियार अनेक स्थानों से मिले हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि लगभग पूरे प्रदेश में इस युग का मानव फैल गया था। इन हथियारों को प्रयोग में लाने वाला मनुष्य सभ्यता के उषा काल पर खड़ा था। उसका आहार शिकार से प्राप्त वन्य पशु, प्राकृतिक रूप से प्राप्त कन्द, मूल, फल, पक्षी, मछली आदि थे। नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), कोकानी, (कोटा जिले में परवानी नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से उस काल के पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं।

    मध्य-पाषाण काल लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व से आरंभ हुआ। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। ये औजार लूनी ओर उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में और विराटनगर में भी प्राप्त हुए हैं। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं हुआ था।

    उत्तर-पाषाण काल का आरंभ लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व से माना जाता है। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाये गये। इस युग के औजार चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च व गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली व गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इस काल में कपास की खेती भी होने लगी थी। समाज का वर्गीकरण आरंभ हो गया था। व्यवसायों के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हो गया था। इस युग के उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा नाम स्थानों पर मिले हैं।

    ताम्र, कांस्य एवं लौह युगीन सभ्यताएँ

    गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यतायें प्रकाश में आयी हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत व चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल- माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सभी स्थलों पर ताम्र उपकरणों के भण्डार मिले हैं। लौह युगीन सभ्यताओं में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1996, व्याख्यात्मक टिप्पणी लिखिये-राजस्थान के महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल) (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1999, दो सौ शब्दों में लिखिये- राजस्थान के महत्वूपर्ण पुरातात्विक स्थलों के बारे में लिखिये।)

    सरस्वती नदी सभ्यता

    राजस्थान में वैदिक काल तथा उससे भी पूर्व सरस्वती नदी प्रवाहित होती थी जिसके किनारे पर आर्यों ने अनेक यज्ञ व युद्ध किये। सरस्वती नदी की उत्त्पत्ति तुषार क्षेत्र से मानी गयी है। यह स्थान मीरपुर पर्वत है जिसे ऋग्वेद में सारस्वान क्षेत्र कहा गया है। ऋग्वेद के 10वें मण्डल में सूत्र 53 के मंत्र 8 में दृषद्वती के अतिरिक्त अश्वन्वती नदी का उल्लेख है। कुछ विद्वान इन दोनों नदियों (दृषद्वती तथा अश्वन्वती) को एक ही समझते हैं तथा सरस्वती एवं दृषद्वती का मरूप्रदेश में बहते रहना स्वीकार करते हैं। दसवीं सदी के आसपास दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान की गणना सारस्वत मण्डल में की जाती थी। यह पूरा क्षेत्र लूणी नदी बेसिन का एक भाग है। लूनी नदी सरस्वती की सहायक नदी थी। सरस्वती आज भी राजस्थान में भूमिगत होकर बह रही है। कुछ विद्वान घग्घर (हनुमानगढ़-सूरतगढ़ क्षेत्र में बहने वाली नदी) को भी सरस्वती का परवर्ती रूप मानते हैं। सरस्वती के लिये महाकवि कालिदास ने 'अंतः सलिला' विशेषण का प्रयोग किया है।

    कुछ विद्वानों का मानना है कि सरस्वती अम्बाला जिले के उप हिमालय की श्रेणियों से निकलती थी जो किसी कारण से सूख गयी थी। इसका तल पीली-चिकनी उपजाऊ मिट्टी का समतल हिस्सा है। इसके किनारे-किनारे छोटे-बड़े चपटे एवं ऊंचे टीले नजर आते हैं जिन्हें थेड़ कहा जाता है। यह नदी (सरस्वती) आजकल छोटी धारा के रूप में निकलकर प्राचीन नगर कुरूक्षेत्र, थानेश्वर पिवोहा होती हुई कुछ और धाराओं से मिलकर घग्घर में मिल जाती है तथा दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हुई हिसार जिले के सिरसा नगर के आगे कुछ दूरी तक बहकर बीकानेर में प्रवेश करती है। यह नदी (सरस्वती) कब सूख गयी, कहना कठिन है।

    मान्यता है कि सरस्वती के किनारे एक घना वन था, उसका नाम काम्यक वन था। पांडव वनवास के लिये हस्तिनापुर से पश्चिम की ओर एक समतल जल रहित रास्ते से गये थे। महाभारत में भी सरस्वती के मरुप्रदेश में विलीन हो जाने का उल्लेख है। हनुमानगढ़ जिले में घग्घर को नाली कहा जाता है। यहाँ पर एक दूसरी धारा जिसे नाईवाला कहते हैं, घग्घर में मिल जाती है, जो असल में सतलज का प्राचीन बहाव क्षेत्र है। यह सरस्वती नदी का पुराना हिस्सा था। तब तक सिंधु में मिलने के लिये सतलज में व्यास का समावेश नहीं हो पाया था। हनुमानगढ़ के दक्षिण पूर्व की ओर नाली के दोनों किनारे ऊंचे-ऊंचे दिखायी देते हैं। यही कारण है कि आज भी हनुमानगढ़ जंक्शन कस्बे का सामान्य धरातल नदी के पेटे के स्तर से नीचे है। (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2007, राजस्थान के कौनसे कस्बे का साधारण धरातल स्तर उसके पास की नदी के पेटे के स्तर के नीचे है- पाली/हनुमानगढ़ जंक्शन/टोंक/बालोतरा?) सूरतगढ़ से तीन मील पहले ही एक और सूखी हुई धारा आकर घग्घर में मिलती है। यह सूखी धारा वास्तव में दृशद्वती है। सूरतगढ़ से आगे अनूपगढ़ तक तीन मील की चौड़ाई रखते हुए नदी के दोनों किनारे और भी ऊंचे दिखायी देते हैं जिनके बीच में गंगनहर की सिंचाई से खूब हरा-भरा भाग है। यहीं पर अनेक गाँव बसे हैं। बीकानेर जिले में पहुँच कर घग्घर जल रहित हो जाती है किंतु वर्षा होने से ऊपरी क्षेत्र से जल प्राप्त हो जाता है। दृशद्वती हिमालय की निचली पहाड़ियों से कुछ दक्षिण से निकलती है। पंजाब में इसे चितांग बोलते हैं। भादरा में फिरोजशाह की बनवाई हुई पश्चिम यमुना नहर, दृशद्वती के कुछ भाग में दिखायी पड़ती है। भादरा के आगे नोहर तथा दक्षिण में रावतसर के पास इसके रेतीले किनारे दिखते हैं। आगे अनुपजाऊ किंतु हरा-भरा क्षेत्र है।

    सिंधु घाटी सभ्यता

    सिंधु नदी हिमालय पर्वत से निकल कर पंजाब तथा सिंध प्रदेश में बहती हुई अरब सागर में मिलती है। इस नदी के दोनों तटों पर तथा इसकी सहायक नदियों के तटों पर जो सभ्यता विकसित हुई उसे सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं मोहेनजोदड़ो सभ्यता कहा जाता है। यह तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता थी तथा इसका काल ईसा से 5000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा से 1750 वर्ष पूर्व तक माना जाता है। इस सभ्यता की दो प्रमुख राजधानियां हड़प्पा (पंजाब में) तथा मोहेनजोदड़ो (सिंध में) मानी जाती हैं। अब ये दोनों स्थल पाकिस्तान में चले गये हैं। मोहेनजोदड़ो शब्द का निर्माण सिन्धी भाषा के 'मुएन जो दड़ो' शब्दों से हुआ है जिनका अर्थ है- मृतकों का टीला। राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष कालीबंगा एवं रंगमहल आदि में प्राप्त हुए हैं। गंगानगर जिले में नाईवाला की सूखी धारा, रायसिंहनगर से अनूपगढ़ के दक्षिण का भाग तथा हनुमानगढ़ से हरियाणा की सरहद तक के सर्वेक्षण में पाया गया है कि नाईवाला की सूखी धारा में स्थित 4-5 टीलों पर गाँव बस चुके हैं। दृषद्वती के सूखे तल में भी काफी दूर तक टीले स्थित हैं। इस तल में स्थित 7-8 थेड़ों में हड़प्पाकालीन किंतु खुरदरे व कलात्मक कारीगरी रहित मिट्टी के बरतन के टुकड़ों की बहुतायत थी। सरस्वती तल में हड़प्पाकालीन छोटे-छोटे व उन्हीं के पास स्लेटी मिट्टी के बरतनों वाले उतने ही थेड़ मौजूद थे। हरियाणा की सीमा पर ऐसे थेड़ भी पाये गये जिन पर रोपड़ की तरह दोनों प्रकार के हड़प्पा व स्लेटी मिट्टी के ठीकरे मौजूद थे। हनुमानगढ़ किले की दीवार के पास खुदाई करने पर रंगमहल जैसे ठीकरों के साथ एक कुशाण राजा हुविश्क का तांबे का सिक्का भी मिला जो इस बात की पुष्टि करता है कि भाटियों का यह किला व अंदर का नगर कुशाण कालीन टीले पर बना है। बीकानेर के उत्तरी भाग की सूखी नदियों के तल में 4-5 तरह के थेड़ पाये गये। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1996-इतिहास, राजस्थान तथा गुजरात में किन स्थानों पर सिंधु घाटी सभ्यता पायी गयी है?)

    कालीबंगा

    हड़प्पाकालीन सभ्यता वाले 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। हनुमानगढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर स्थित पीलीबंगा से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कालीबंगा में पूर्वहड़प्पा कालीन एवं हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। इस स्थान का पता पुरातत्व विभाग के निदेशक अमलानंद घोष ने ई.1952 में लगाया था। ई.1961-62 में बी.के.थापर, जे.वी.जोशी तथा वी.वी.लाल के निर्देशन में इस स्थल की खुदाई की गयी। (अधिशासी अधिकारी भर्ती संवीक्षा भर्ती परीक्षा 2008, कालीबंगा सभ्यता को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का श्रेय दिया जा सकता है- बी.बी. लाल/बी.के. थापर/एम.डी. खरे/अमलानंद घोष?)

    कालीबंगा के टीलों की खुदाई के दौरान दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों मकानों व धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मकानों में चूल्हों के अवशेष भी मिले हैं। कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर मकान बनाते थे, बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले व ऊपर से प्यालानुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, मिट्टी की देवी की छोटी-छोटी प्रतिमायें, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि मिले। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं। यहाँ से मिली मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बायें लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री प्राप्त हुई है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन एक मात्र इसी स्थल पर मिले हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा 1987-इतिहास, कालीबंगा के उत्खनन से सैंधव सभ्यता पर क्या नवीन प्रकाश पड़ा है?, आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1994-इतिहास, कालीबंगा के पुरातत्व स्थल का क्या महत्व है?, आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1997, निम्न के बारे में आप क्या जानते हैं?- कालीबंगा।) (अधिशासी अधिकारी भर्ती संवीक्षा भर्ती परीक्षा 2008-किस पुरातात्विक स्थल से जुते हुए खेत का साक्ष्य प्राप्त हुआ है- धौलावीरा/कालीबंगा/ लोथल/रंगपुर?)

    रंगमहल

    सूरतगढ़-हनुमानगढ़ क्षेत्र में रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी आदि स्थलों के आसपास के क्षेत्र में कई थेड़ मौजूद हैं जिनमें से कुछ की खुदाई की गयी है। इनमें रंगमहल का टीला सबसे ऊँचा है। ई. 1952 से 1954 के बीच स्वीडिश दल द्वारा रंगमहल के टीलों की खुदाई की गयी है। इस खुदाई से ज्ञात हुआ है कि प्रस्तर युग से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक यह क्षेत्र पूर्णतः समृद्ध था। यही कारण है कि यहाँ से प्रस्तर युगीन एवं धातु युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रंगमहल के टीलों पर पक्की ईंटें व रोड़े, मोटी परत व लाल रंग वाले बरतनों पर काले रंग के मांडने युक्त हड़प्पा कालीन सभ्यता के बरतनों के टुकड़े बिखरे हुए दिखायी देते हैं। यहाँ से ताम्बे के दो कुषाण कालीन सिक्के तथा गुप्त कालीन खिलौने भी मिले हैं। तांबे के 105 सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

    आहड़ सभ्यता

    सरस्वती-दृश्द्वती नदी सभ्यता से निकलकर इस प्रदेश के मानव ने आहड़, गंभीरी, लूनी, डच तथा कांटली आदि नदियों के किनारे अपनी बस्तियां बसाईं तथा सभ्यता का विकास किया। इन सभ्यताओं का काल पश्चिमी विद्वानों द्वारा 7 हजार से 3 हजार वर्ष पुराना ठहराया गया है जिसे कुछ भारतीय विद्वानों ने भी ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया है किंतु कुछ विद्वानों ने पश्चिमी विद्वानों द्वारा बताये गये ईसा पूर्व के इतिहास को इन तिथियों से भी तीन हजार वर्ष पूर्व का होना सिद्ध किया है। यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ नदी के आस-पास, बनास, बेड़च, चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी, वागन, भीलवाड़ा जिले में खारी तथा कोठारी आदि नदियों के किनारे अजमेर तक फैली थी। इस क्षेत्र में प्रस्तर युगीन मानव निवास करता था।

    आहड़ टीले का उत्खनन डॉ. एच.डी. सांकलिया के नेतृत्व में हुआ था। प्राचीन शिलालेखों में आहड़ का पुराना नाम ताम्रवती अंकित है। दसवीं व ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर अथवा आघट दुर्ग के नाम से जाना जाता था। बाद के काल में इसे धूलकोट भी कहा जाता था। उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर 1600 फुट लम्बे और 550 फुट चौड़े धूलकोट के नीचे आहड़ का पुराना कस्बा दबा हुआ है जहाँ से ताम्र युगीन सभ्यता प्राप्त हुई है। ये लोग लाल, भूरे व काले मिट्टी के बर्तन काम में लेते थे जिन्हें उलटी तपाई शैली में पकाया जाता था। मकान पक्की ईंटों के होते थे। पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था।

    आहड़ सभ्यता की खुदाई में मानव सभ्यता के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रथम स्तर में मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दूसरा स्तर प्रथम स्तर के ऊपर स्थित है। यहाँ से बस्ती के चारों ओर दीवार भी मिली है। तीसरे स्तर से चित्रित बर्तन मिले हैं। चतुर्थ स्तर से ताम्बे की दो कुल्हाड़ियां भी प्राप्त हुई हैं। मकानों से अनाज पीसने की चक्कियां, ताम्बे के औजार तथा पत्थरों के आभूषण मिले हैं। गोमेद तथा स्फटिक की मणियां भी प्राप्त हुई हैं। तांबे की छः मुद्रायें व तीन मोहरें मिली हैं। एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित है जो तीर एवं तरकश से युक्त है। इस पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह मुद्रा दूसरी शताब्दी ईस्वी की है। यहाँ के लोग मृतकों को कपड़ों तथा आभूषणों के साथ गाढ़ते थे।

    बागोर सभ्यता

    भीलवाड़ा कस्बे से 25 किलोमीटर दूर कोठारी नदी के किनारे वर्ष 1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र के नेतृत्व में की गयी खुदाई में 3000 ई. पू. से लेकर 500 ई. पू. तक के काल की बागोर सभ्यता का पता लगा। यहाँ के निवासी कृषि, पशुपालन तथा आखेट करते थे। यहाँ से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं। मकान पत्थरों से बनाये गये हैं। बर्तनों में लोटे, थाली, कटोरे, बोतल आदि मिले हैं।

    बालाथल

    बालाथल उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यहाँ से 1993 में ई. पू. 3000 से लेकर ई. पू. 2500 तक की ताम्रपाषाण युगीन संस्कृति के बारे में पता चला है। यहाँ के लोग भी कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे। ये लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे तथा कपड़ा बुनना जानते थे। यहाँ से तांबे के सिक्के, मुद्रायें एवं आभूषण प्राप्त हुए हैं। आभूषणों में कर्णफूल, हार और लटकन मिले हैं। यहाँ से एक दुर्गनुमा भवन भी मिला है तथा ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन भी प्राप्त हुए हैं।

    गणेश्वर सभ्यता

    सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांटली नदी के तट पर गणेश्वर टीला की खुदाई 1977-78 में की गयी थी। यहाँ से प्राप्त सभ्यता लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। ताम्र युगीन सभ्यताओं में यह अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन केंद्र है। यह सभ्यता सीकर से झुंझुनूं, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली थी। यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय कांटली नदी में पर्याप्त जल था। यहाँ का मानव भोजन संग्रहण की अवस्था में था। यहाँ से ताम्र उपकरण एवं बर्तन बड़ी संख्या में मिले हैं। ऐसा संभवतः इसलिये संभव हो सका क्योंकि खेतड़ी के ताम्र भण्डार यहाँ से अत्यंत निकट थे। मिट्टी के बर्तनों में कलश, तलसे, प्याले, हाण्डी आदि मिले हैं जिनपर चित्रांकन उपलब्ध है। (प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय अध्यापक प्रतियोगी परीक्षा 2004, गणेश्वर का टीला जहाँ से ताम्रयुगी अवशेष मिले हैं, स्थित है?)

    ऋग्वैदिक सभ्यता

    सरस्वती और दृश्द्वती के बीच के हिस्से को मनु ने ब्रह्मावर्त बताया है जो अति पवित्र एवं ज्ञानियों का क्षेत्र माना गया है। आगे उत्तर-पूर्व में कुरुक्षेत्र स्वर्ग के समान माना गया है। सरस्वती-दृश्द्वती के इस क्षेत्र में पाकिस्तान की सीमा से लगते अनूपगढ़ क्षेत्र से उत्तर पूर्व की ओर चलने पर हड़प्पा कालीन सभ्यता से बाद की सभ्यता के नगर बड़ी संख्या में मिलते हैं जो भूमि के नीचे दबकर टीले के रूप में दिखायी पड़ते हैं। इन टीलों में स्लेटी मिट्टी के बर्तन काम में लाने वाली सभ्यता निवास करती थी। यह सभ्यता हड़प्पा कालीन सभ्यता से काफी बाद की थी। अनूपगढ़ तथा तरखानवाला डेरा से प्राप्त खुदाई से इस सभ्यता पर कुछ प्रकाश पड़ा है। राजस्थान में इस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य टीलों में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं ये सभ्यतायें लौह युगीन सभ्यता का हिस्सा हैं। सुनारी से लौह प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

    महाभारत कालीन सभ्यता

    महाभारत काल के आने से पूर्व मानव बस्तियां सरस्वती तथा दृशद्वती क्षेत्र से हटकर पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसक आयीं थीं। उस काल में कुरु जांगलाः तथा मद्र जांगलाः के नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र आज बीकानेर तथा जोधपुर के नाम से जाने जाते हैं। इस भाग के आस पास का क्षेत्र सपादलक्ष कहलाता था। कुरु, मत्स्य तथा शूरसेन उस काल में बड़े राज्यों में से थे। अलवर राज्य का उत्तरी विभाग कुरुदेश के, दक्षिणी और पश्चिमी विभाग मत्स्य देश के और पूर्वी विभाग शूरसेन के अंतर्गत था। भरतपुर तथा धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अंतर्गत थे। शूरसेन देश की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट तथा कुरु की इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत काल में शाल्व जाति की बस्तियों का उल्लेख मिलता है जो भीनमाल, सांचोर तथा सिरोही के आसपास थीं।

    बैराठ सभ्यता

    मौर्य कालीन सभ्यता के प्रमुख अवेशष बैराठ से प्राप्त हुए हैं। इस कारण इसे बैराठ सभ्यता भी कहा जाता है। जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर की भब्रू पहाड़ी से मौर्य सम्राट अशोक का एक शिलालेख मिला है। ई. 1840 में यह शिलालेख एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कलकत्ता) को स्थानांतरित कर दिया गया। ई. 1909 में बीजक की पहाड़ी में एक बौद्ध विहार (गोलमंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस विहार को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ है। इस स्थान से अलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक के चिह्न प्राप्त हुए हैं। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के शासन काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा भी प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। चीनी चात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में 8 बौद्ध विहार देखे थे जिनमें से 7 का अब तक पता नहीं चल पाया है। अशोक ने जिस योजना के अनुसार शिलालेख लगवाये थे, उसके अनुसार इन 8 बौद्ध विहारों के पास 128 शिलालेख लगवाये होंगे किंतु इनमें से अब तक कुल 2 शिलालेख ही प्राप्त हुए हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1988 एवं 1994, निम्न के बारे में आप क्या जानते हैं- बैराठ?) (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2013, सामान्य ज्ञान, अशोक के किस अभिलेख में पारम्परिक अवसरों पर पशु बलि पर रोक लगाई गई है, ऐसा लगता है कि यह पाबंदी पशुओं के वध पर थी- अ. शिला अभिलेख 1, ब. स्तम्भलेख 5, स. शिला अभिलेख 9, द. शिला अभिलेख 11.)

    ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में समस्याएँ

    राजस्थान एक विस्तृत प्रदेश है। इसका 61.11 प्रतिशत भाग मरुस्थल है। इतने बड़े प्रदेश में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन भवन, दुर्ग, महल, देवालय, स्मारक, सरोवर, बावड़ियां, मूर्तियां, शिलालेख, प्राचीन ग्रंथ, शासकीय अभिलेख, सिक्के, ताड़पत्र, ताम्रपत्र आदि का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। इस सम्पूर्ण सामग्री को खोज-खोज कर सुरक्षित स्थान पर संजोना अत्यंत परिश्रमयुक्त एवं खर्चीला कार्य है। इस कार्य में निपुण व्यक्तियों का भी अभाव है। इस कारण राजस्थान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रख पाना बहुत बड़ी समस्या है। फिर भी राजस्थान सरकार ने पूरे राज्य में बड़ी संख्या में राजकीय संग्रहालयों की स्थापना की है। बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार तथा जोधपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की स्थापना की गयी है। जयपुर, बीकानेर, चित्तौड़, जयपुर, अलवर, कोटा तथा उदयपुर में इसकी शाखायें स्थापित की गयी हैं। राजस्थान में मौजूद पुराने दुर्गों एवं ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण करने के लिये पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिसके कारण कई दुर्ग, हवेलियाँ, मंदिर एवं महल उपेक्षित पड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व शेखावाटी की कलात्मक हवेलियों में भित्ति चित्रों की दुर्दशा देखकर एक विदेशी महिला नदीन ला प्रैन्स ने एक हवेली खरीदकर उसका पुनरुद्धार करवाया और वहाँ एक सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। इसमें भारत और फ्रान्स के चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। 

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  • राजस्थान का प्राचीन इतिहास

     03.06.2020
     राजस्थान का प्राचीन इतिहास

    जनपदकाल

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    ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के तीन सौ वर्ष पूर्व तक का समय जनपद काल कहलाता है। यहाँ से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के काल में और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, राजस्थान में प्राचीन जनपदों के नाम लिखिये।)

    मौर्यकाल

    मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गयी। कोटा जिले के कणसवा गाँव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहाँ मौर्य वंश के राजा ‘धवल’ का राज्य था। ई. 733 के लगभग जब बप्पा रावल ने चित्तौड़ विजय किया तब वहाँ मौर्य राजा ‘मान’ का राज्य था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास पूठोली गाँव में मानसरोवर नामक तालाब के किनारे राजा मान का ई. 713 का एक शिलालेख मिला है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, उन दो साक्ष्यों का उल्लेख कीजिये जिनसे पता चलता है कि मौर्यों का राजस्थान से भी सम्बन्ध था।) मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    विदेशी जातियों के आक्रमण

    मौर्यों का पतन हो जाने के बाद राजस्थान छोटे-छोटे गणों में बंट गया। इस कारण भारत भूमि पर विदेशी जातियों के आक्रमण बढ़ गये। यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई. पू. 150 में मध्यमिका नगरी को अपने अधिकार में लेकर अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई. पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये।

    सौराष्ट्र से प्राप्त उषवदात के लेख के अनुसार शकों का राजा पुष्कर होता हुआ मथुरा तक पहुँचा। ये लोग ई. पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल 95 ई. से 127 ई. के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार 83 ई. से 119 ई. तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। 150 ई. के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आस पास था।

    विदेशी जातियों का पतन

    ई. 130 से 150 के मध्य शक शासक रुद्रदामन तथा यौधेयों के मध्य घनघोर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में यौधेय पराजित हो गये। ई. 150 के लगभग नागों की भारशिव शाखा ने अपनी शक्ति बढ़ानी आरंभ की तथा विदेशी शासकों को भारत से बाहर निकालने का काम आरंभ किया। इन नागों ने यौधेय, मालव, अर्जुनायन, वाकटाक, कुणिंद, मघ आदि जातियों की सहायता से पंजाब, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश को कुषाणों से मुक्त करवा लिया। नागों ने कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजयों के उपलक्ष्य में वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। वह स्थान आज भी दशाश्वमेध घाट कहलाता है।

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर ‘मालवानाम् जयः’ अंकित है।

    शक, कुषाण और हूण आदि जातियाँ केवल सामरिक उद्देश्य एवं सत्ता के विस्तार के लिये भारत में आयीं थीं। उन्होंने बौद्ध धर्म को चोट तो पहुचांई किंतु उनके अपने पास ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं था जिसके प्रसार के लिये वे किसी अन्य तरह का प्रयास करतीं। इसलिये जैसे ही उनकी सत्ता समाप्त हुई, वे भारतीय संस्कृति में रच बस गये और वे भारत की मूल राष्ट्रीय धारा में पूरी तरह घुल मिल गये।

    इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष हैं। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गये। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी सत्ता गणतंत्रात्मक बनाये रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्व रखते थे।

    गुप्तकाल

    भारतीय इतिहास में 320 ईस्वी से 495 ईस्वी तक का काल गुप्तकाल के नाम से जाना जाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्व हमेशा के लिये नष्ट हो गया। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जालोर जिले के भीनमाल तथा अन्य स्थानों पर देखे जा सकते हैं। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गये।

    हूणों का आक्रमण

    हूणों के आक्रमण गुप्त काल में आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने सभी गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्यों को छिन्न भिन्न कर दिया तथा उस काल तक विकसित हुए सभ्यता के सभी केंद्र नष्ट कर दिये। इनमें वैराट, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। (ये नाम बाद के हैं, तब इन स्थानों के नाम कुछ और रहे होंगे।) मालवा के राजा यशोवर्मन (अथवा यशोधर्मन) ने 532 ई. में हूणों को परास्त कर राजस्थान में शांति स्थापित की किंतु उसके मरते ही राजस्थान में पुनः अशांति हो गयी।

    हर्षवर्धन

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। पुष्यभूति वंश को वर्धन वंश भी कहते हैं। हर्ष के बारे में हमें दो गं्रथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। चीनी लेखक मा-त्वान-लिन ने भी हर्ष की विजयों का वर्णन किया है। नौसारी दानपत्र, खेड़ा से प्राप्त दद्द के दानपत्र में भी हर्ष के वलभी युद्ध का उल्लेख है। कल्हण की राजतरंगिणी हर्ष के कश्मीर का राजा होने की पुष्टि करती है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1991-इतिहास, हर्ष के समय के इतिहास के प्रमुख स्रोतों का उल्लेख कीजिये।)

    चीनी लेखकों ने हर्ष को शीलादित्य कहकर पुकारा है। ई. 606 में वह थानेश्वर का राजा हुआ किंतु कुछ ही समय बाद अपने बहनोई ग्रहवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज भी उसके अधीन हो गया। उसने कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनाया तथा सम्पूर्ण भारत में एकछत्र शासन स्थापित करने के उद्देश्य से विशाल सेना का निर्माण किया। हर्षचरित के अनुसार सेनापति सिंहनाद ने हर्ष को सलाह दी कि वह अन्य राजाओं का दमन करे। ह्वेनसांग ने हर्ष की दिग्विजय यात्रा का विस्तार से उल्लेख किया है। उसके अनुसार हर्ष ने गद्दी पर बैठने के बाद 6 वर्ष तक युद्ध किये तथा उसके बाद 30 साल तक निर्भय होकर शासन किया किंतु यह वर्णन सही नहीं है क्योंकि कई साक्ष्य बताते हैं कि उसने 612 ई. के पश्चात् भी अनेक युद्ध किये।

    चीनी लेखक मा-त्वान-लिन लिखता है कि उसके सैनिकों ने 618 से 627 ई. के बीच अपने कवच शरीर पर से नहीं उतारे। ई. 620 में हर्ष ने दक्षिण भारत पर अधिकार करने का प्रयास किया किंतु चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने उसे नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया। हर्षचरित के अनुसार हर्षदेव ने 643 ई. में कांगोद पर आक्रमण किया। 708 ई. के नौसारी दानपत्र से ज्ञात होता है कि हर्षदेव ने वल्लभी नरेश धु्रवसेन द्वितीय को पराजित किया। यह युद्ध 629 ई. में हुआ। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1999- इतिहास, हर्ष के सैनिक अभियानों के तिथिक्रम की समीक्षा कीजिये।)

    जब हर्ष ने दक्षिणी भारत पर आक्रमण किया तो चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय ने हर्ष का मार्ग रोका। इस अभियान का नेतृत्व स्वयं हर्ष ने किया। कुछ विद्वान इस युद्ध का समय 612 ई. मानते हैं तो कुछ 630 से 640 ई. के बीच। 630 ई. का लोनेरा का अभिलेख पुलकेशी की सफलताओं का वर्णन करता है किंतु इसमें हर्ष की पराजय का उल्लेख नहीं है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि यह संघर्ष 630 ई. के पश्चात हुआ होगा। पुलकेशिन ने हर्ष को परास्त करके परमेश्वर की उपाधि धारण की तथा उसे नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया। 643 ई. में हर्ष ने पुनः पुलकेशिन के राज्य पर आक्रमण किया तथा उससे कांगोद छीन कर अपनी पूर्व पराजय का बदला लिया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, हर्ष पुलकेशिन संघर्ष पर एक टिप्पणी लिखिये।)

    सी-यू-की का कथन है कि शीलादित्य (हर्षवर्धन) ने पूर्व से लेकर पश्चिम तक के समस्त राजाओं को जीत लिया तथा वह दक्षिण की ओर आगे बढ़ा। राजतरंगिणी का कथन है कि कश्मीर कुछ समय तक हर्ष के अधीन रहा। चालुक्य अभिलेख उसे ‘सकलोत्तरापथनाथ’ कहते हैं। इनसे अनुमान होता है कि उसका राज्य नेपाल से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक फैल गया। थानेश्वर, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, सिंध तथा उत्तरप्रदेश भी उसके अधीन थे।

    हर्ष ने वल्लभी के शासक धु्रवसेन द्वितीय को परास्त किया तथा संधि करके उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय ने गुर्जर नरेश दद्द की सहायता से हर्ष को नर्मदा से आगे नहीं बढ़ने दिया इस कारण दक्षिण भारत में वह अपना शासन नहीं फैला सका किंतु हर्ष ने कांगोद पर अधिकार कर लिया था। हर्ष चरित के अनुसार सम्पूर्ण उत्तर भारत हर्ष के अधीन था।

    पूर्व में मगध, कामरूप (असम तथा बंगाल) भी हर्ष के अधीन हो गये थे। कुछ विद्वानों ने हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और उड़ीसा को उसके राज्य में माना है जिन्हें ह्वेनसांग ने पंचभारत कहकर पुकारा है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हर्ष का राज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में आसाम तक फैला हुआ था। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1996, हर्ष की राज्य सीमा निर्धारित कीजिये। दक्षिण भारत में उसके समसामयिक शासक कौन थे?)

    बांसखेड़ा से प्राप्त ताम्रपत्र एवं नालंदा तथा सोनीपत की राजमुद्राओं पर हर्ष को परम माहेश्वर कहा गया है। वह हर पाँच वर्ष में प्रयाग में धर्म सम्मेलन किया करता था जिसमें वह प्रथम दिन बुद्ध की, दूसरे दिन सूर्य की और तीसरे दिन भगवान शिव की पूजा किया करता था। वह सभी धर्मावलंबियों को दान देता था किंतु बौद्ध भिक्षुओं को अधिक मात्रा में धन प्रदान करता था। उसने ह्वेनसांग के आगमन पर महायान धर्म का विशेष सम्मेलन बुलाया जिसमें 18 देशों के राजा, महायान व हीनयान धर्म के 3000 भिक्षु, 300 ब्राह्मण, जैनाचार्य तथा नालंदा विहार के 1000 भिक्षुओं को बुलाया। इस सम्मेलन में भगवान बुद्ध की मूर्ति को सबसे आगे रखा गया तथा उसके पीछे भास्कर वर्मा ब्रह्मा की वेशभूषा में तथा हर्षवर्धन शक्र (इंद्र)की वेशभूषा बनाकर चले। हर्ष ने उड़ीसा में महायान धर्म के प्रचार के लिये 4 धर्म प्रचारक भी भेजे। इन तथ्यों से ज्ञात होता है कि वह शैव होते हुए भी बौद्ध धर्म का बड़ा आदर करता था। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1994- इतिहास अभिलेखीय साक्ष्य के अनुसार हर्ष की धार्मिक आस्था क्या थी? वही जो उसके पूर्वजों की थी अथवा उससे भिन्न?)

    हर्ष ने शैव धर्म तथा बौद्ध धर्म के साथ-साथ संस्कृत साहित्य के उत्कर्ष के लिये भी काम किया। उसके दरबार में रहने वाले राजकवि बाणभट्ट ने कादम्बरी तथा हर्ष चरित की रचना की। हर्ष के दरबार में रहने वाले मतंग नामक कवि ने सूर्यशतक की रचना की। स्वयं हर्ष ने संस्कृत में तीन नाटक नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। बाणभट्ट लिखता है कि हर्ष की संस्कृत भाषा की कविताओं में अमृत की वर्षा होती थी। हर्ष की यह धार्मिक नीति तथा संस्कृत भाषा के संरक्षण की नीति उससे पूर्व मौर्य सम्राट अशोक ने भी अपनायी थी। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992-इतिहास, हर्ष का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था। उसके साथ ही उसने संस्कृत साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। पूर्व इतिहास से सम्बन्धित इस प्रकार के किसी शासक का उदाहरण दीजिये।)

    हर्ष न केवल महान विजेता तथा साम्राज्य निर्माता था अपितु वह एक कुशल शासक भी था। उसका शासन बड़ा ही उदार, दयालु तथा प्रजाहितकारी था। उसने बहुत हल्के तथा कम संख्या में कर लगाये जिसे देने में प्रजा को कष्ट न हो। देश में शांति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिये उसने कठोर दण्ड विधान बनाया। इस कारण अपराधों की संख्या कम हो गयी। हर्ष स्वयं अपने राज्य में घूम-घूम कर अपनी प्रजा के हाल जानता रहता था। प्रजा की कठिनाइयां ज्ञात होने पर वह उन कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास करता था। वह अपने कर्मचारियों पर निर्भर न रहकर राज्यकार्य स्वयं ही करने को प्राथमिकता देता था। वह धर्मनिष्ठ, विद्यानुरागी एवं विद्वानों का आश्रयदाता था।

    हर्ष ने तिब्बत, चीन तथा मध्य एशिया के साथ सांस्कृतिक सम्पर्क स्थापित किये तथा चीन में अपने दूत भिजवाये। वह सूर्य एवं शिव का उपासक था फिर भी उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये प्रयास किया। प्रयाग की पंचवर्षीय धर्मसभा में वह सभी धर्मावलंबियों को दान देता था। उसके लिये कहा जाता है कि उसमें समुद्रगुप्त था अशोक दोनों ही महान शासकों के गुण थे। उसके बाद भारत वर्ष में इतना महान हिंदू शासक नहीं हुआ जिसका इतने बड़े क्षेत्र पर अधिकार हो। इस कारण उसे भारत का अंतिम महान शासक माना जाता है। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1996-इतिहास, हर्षवर्धन को प्राचीन भारत का अंतिम महान शासक क्यों माना जाता है?)

    हर्ष के काल में राजपूताना चार भागों में विभक्त था- 1. गुर्जर, 2. बघारी, 3. बैराठ तथा 4. मथुरा। बयालीस वर्ष तक सफलता पूर्वक शासन करने के बाद 648 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। उसके बाद देश में पुनः अव्यवस्था फैल गयी।

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  • भारत में राजपूत शासक वंशों का उदय

     03.06.2020
    भारत में राजपूत शासक वंशों का उदय

    भारत में राजपूत शासक वंशों का उदय


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    पुष्यभूति राजा हर्षवर्द्धन की मृत्यु के उपरान्त भारत की राजनीतिक एकता पुनः भंग हो गई और देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई। इन राज्यों के शासक राजपूत थे। इसलिये इस युग को 'राजपूत-युग' कहा जाता है। इस युग का आरम्भ 648 ई. में हर्ष की मृत्यु से होता है और इसका अन्त 1206 ई. में भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना से होता है। इसलिये 648 ई. से 1206 ई. तक के काल को भारतीय इतिहास में 'राजपूत-युग' कहा जाता है।

    राजपूत युग का महत्त्व

    भारतीय इतिहास में राजपूत युग का बहुत बड़ा महत्त्व है। इस युग में भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए। लगभग साढ़े पाँच शताब्दियों तक राजपूत योद्धाओं ने वीरता तथा साहस के साथ मुस्लिम आक्रांताओं का सामना किया और देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करते रहे। यद्यपि वे अंत में विदेशी आक्रांताओं से परास्त हुए परन्तु लगभग छः शताब्दियों तक उनके द्वारा की गई देश सेवा भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। राजपूत शासकों में कुछ ऐसे विशिष्ट गुण थे, जिनके कारण उनकी प्रजा उन्हें आदर की दृष्टि से देखती थी। राजपूत योद्धा अपने वचन का पक्का होता था और किसी के साथ विश्वासघात नहीं करता था। वह शत्रु को पीठ नहीं दिखाता था। वह रणक्षेत्र में वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त करना पसंद करता था। राजपूत योद्धा, निःशस्त्र शत्रु पर प्रहार करना महापाप और शरणागत की रक्षा करना परम धर्म समझता था। वह रणप्रिय होता था और रणक्षेत्र ही उसकी कर्मभूमि होती थी। वह देश की रक्षा का सम्पूर्ण भार वहन करता था।

    राजपूत योद्धाओं के गुणों की प्रशंसा करते हुए कर्नल टॉड ने लिखा है- 'यह स्वीकार करना पड़ेगा कि राजपूतों में उच्च साहस, देशभक्ति, स्वामि-भक्ति, आत्म-सम्मान, अतिथि-सत्कार तथा सरलता के गुण विद्यमान थे। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- 'राजपूत में आत्म-सम्मान की भावना उच्च कोटि की होती थी। वह सत्य को बड़े आदर की दृष्टि से देखता था। वह अपने शत्रुओं के प्रति भी उदार था और विजयी हो जाने पर उस प्रकार की बर्बरता नहीं करता था, जिनका किया जाना मुस्लिम-विजय के फलस्वरूप अवश्यम्भावी था। वह युद्ध में कभी बेईमानी या विश्वासघात नहीं करता था और गरीब तथा निरपराध व्यक्तियों को कभी क्षति नहीं पहुँचाता था।' राजपूत राजाओं ने देश को धन-धान्य से परिपूर्ण बनाने के अथक प्रयास किये।

    सांस्कृतिक दृष्टि से भी राजपूत युग का बड़ा महत्त्व है। उनके शासन काल में साहित्य तथा कला की उन्नति हुई और धर्म की रक्षा का प्रयत्न किया गया। राजपूत राजाओं ने अपनी राजसभाओं में कवियों तथा कलाकारों को प्रश्रय, पुरस्कार तथा प्रोत्साहन दिया। इस काल में असंख्य मन्दिरों एवं देव प्रतिमाओं का निर्माण हुआ और मंदिरों को दान-दक्षिणा से सम्पन्न बनाया गया।

    राजपूत शब्द की व्याख्या

    राजपूत शब्द संस्कृत के 'राजपुत्र' का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। प्राचीन काल में राजपुत्र शब्द का प्रयोग राजकुमारों तथा राजवंश के लोगों के लिए होता था। प्रायः क्षत्रिय ही राजवंश के होते थे, इसलिये 'राजपूत' शब्द सामान्यतः क्षत्रियों के लिए प्रयुक्त होने लगा। जब मुसलमानों ने भारत में प्रवेश किया तब उन्हें राजपुत्र शब्द का उच्चारण करने में कठिनाई हुई, इसलिये वे राजपुत्र के स्थान पर राजपूत शब्द का प्रयोग करने लगे। राजपूत शब्द की व्याख्या करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'राजपूताना के कुछ राज्यों में साधारण बोलचाल में राजपूत शब्द का प्रयोग क्षत्रिय सामन्त या जागीदार के पुत्रों को सूचित करने के लिए किया जाता है परन्तु वास्तव में यह संस्कृत के राजपुत्र शब्द का विकृत स्वरूप है जिसका अर्थ हेाता है राजवंश का।'

    राजपूत शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सातवीं शताब्दी के दूसरे भाग में हुआ। उसके पूर्व कभी इस शब्द का प्रयोग नहीं हुआ, इसलिये राजपूतों की उत्पति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद उत्पन्न हो गया। इस सम्बन्ध में डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'राजपूतों की उत्पति विवाद ग्रस्त है। राजपूतों की उत्पत्ति को निश्चित रूप से निर्धारत करने के लिए ऐतिहासिक विदग्धता का प्रयोग किया गया है और ब्राह्मण साहित्य तथा चारणों की प्रशस्तियों में उन्हें जो उच्च अभिजातीय स्थान प्रदान किया गया है उसने कठिनाई को अत्यधिक बढ़ा दिया है।'

    राजपूतों की उत्पत्ति

    राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् उन्हें विशुद्ध प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान बताते हैं तो कुछ उन्हें विदेशियों के वशंज। कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत मिश्रित-रक्त के हैं।

    (1) प्राचीन क्षत्रियों से उत्पत्ति: अधिकांश भारतीय इतिहासकारों के अनुसार राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं जो अपने को सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी मानते हैं। यह विचार भारतीय अनुश्रुतियों तथा परम्परा के अनुकूल पड़ता है। प्राचीन अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है कि प्राचीन क्षत्रिय समाज दो भागों में विभक्त था। इनमें से एक सूर्यवंशी और दूसरा चन्द्रवंशी कहलाता था। कालान्तर में इनकी एक तीसरी शाखा उत्पन्न हो गई जो यदुवंशी कहलाने लगी। इन्हीं तीन शाखाओं के अन्तर्गत समस्त क्षत्रिय आ जाते थे। इनका मुख्य कार्य शासन करना तथा आक्रमणकारियों से देश की रक्षा करना था। क्षत्रियों का यह कार्य भारतीय जाति-व्यवस्था के अनुकूल था। कालान्तर में कुल के महान् ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के नाम पर भी वंश के नाम पड़ने लगे। इससे क्षत्रियों की अनेक उपजातियां बन गईं। हर्ष की मृत्यु के उपरान्त क्षत्रियों की इन्हीं विभिन्न शाखाओं ने भारत के विभिन्न भागों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। ये शाखाएं सामूहिक रूप से राजपूत कहलाईं। राजपूतों का जीवन, उनके आदर्श तथा उनका धर्म उसी प्रकार का था, जो प्राचीन क्षत्रियों का था। उनमें विदेशीपन की कोई छाप नहीं थी। इसलिये अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने उन्हें प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान माना है।

    (2) अग्निकुण्ड से उत्पत्ति: पृथ्वीराज रासो के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई। जब परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश कर दिया तब समाज में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और लोग कर्त्तव्य भ्रष्ट हो गये। इससे देवता बड़े दुःखी हुए और आबू पर्वत पर एकत्रित हुए, जहाँ एक विशाल अग्निकुण्ड था। इसी अग्निकुण्ड से देवताओं ने प्रतिहारों (पड़िहारों), परमारों (पँवारों), चौलुक्यों (सोलंकियों) तथा चाहमानों (चौहानों) को उत्पन्न किया। इसलिये ये चारों वंश अग्निवंशी कहलाते हैं। इस अनुश्रुति के स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि यह अनुश्रुति सोलहवीं शताब्दी की है। इसके पूर्व इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इसलिये यह चारणों की कल्पना प्रतीत होती है। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि इन राजपूतों ने अग्नि के समक्ष, अरबों तथा तुर्कों से देश की रक्षा की शपथ ली। इसलिये ये अग्निवंशी कहलाये। कुछ अन्य इतिहासकारों की धारणा है कि ब्राह्मणों ने यज्ञ द्वारा जिन विदेशियों की शुद्धि करके क्षत्रिय समाज में समाविष्ट कर लिया था, वही अग्निवंशी राजपूत कहलाये। अग्निकुण्ड से राजपूतों की उत्पति मानने वाले बहुत कम विद्वान हैं। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- 'यह स्पष्ट है कि कथा कोरी गल्प है और इसे सिद्ध करने के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह ब्राह्मणों द्वारा उस जाति को अभिजातीय सिद्ध करने का प्रयास प्रतीत होता है, जिसका समाज में बड़ा ऊँचा स्थान था और जो ब्राह्मणों को मुक्त हस्त होकर दान देते थे। ब्राह्मणों ने बड़े उत्साह के साथ उस उदारता का बदला देने का प्रयत्न किया।'

    (3) विदेशियों से उत्पत्ति: पुराणों में हैहय राजपूतों का उल्लेख शकों तथा यवनों के साथ किया गया है। इस कारण कुछ इतिहासकारों ने राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों से बतलाई है। कर्नल टॉड ने राजपूतों तथा मध्य एशिया की शक तथा सीथियन जातियों में बड़ी समानता पाई है। इसलिये वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राजपूत उन्हीं विदेशियों के वंशज हैं। ये जातियाँ समय-समय पर भारत में प्रवेश करती रही हैं। उन्होंने कालान्तर में हिन्दू धर्म तथा हिन्दू रीति रिवाजों को स्वीकार कर लिया। चूँकि ये विदेशी जातियाँ, शासक वर्ग में आती थीं, जिस वर्ग में भारत के प्राचीन क्षत्रिय आते थे, इसलिये उन्होंने प्राचीन क्षत्रियों का स्थान ग्रहण कर लिया और राजपूत कहलाने लगे। टॉड के इस मत का अनुमोदन करते हुए स्मिथ ने लिखा है- ' मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि शकों तथा कुषाणों के राजवंश, जब उन्होंने हिन्दू धर्म को स्वीकार कर लिया तब हिन्दू जाति-व्यवस्था में क्षत्रियों के रूप में सम्मिलित कर लिये गये।' राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का समर्थन करते हुए क्रुक ने लिखा है- 'आजकल के अनुसन्धानों ने राजपूतों की उत्पत्ति पर काफी प्रकाश डाला है। वैदिक क्षत्रियों तथा मध्य काल के राजपूतों में ऐसी खाई है जिसे पूरा करना असंभव है।' इस मत को स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई यह है कि यदि समस्त राजदूत विदेशी थे तो हर्ष की मृत्यु के उपरान्त भारत के प्राचीन क्षत्रियों की एक जीवित तथा शक्तिशाली जाति, जिसके हाथ में राजनीतिक शक्ति थी, सहसा कहाँ, कैसे और कब विलुप्त हो गई ? इस मत को स्वीकार करने में दूसरी कठिनाई यह है कि राजपूतों का जीवन उनके आदर्श, उनका नैतिक स्तर तथा उनका धर्म विदेशियों से बिल्कुल भिन्न और प्राचीन क्षत्रियों के बिल्कुल अनुरूप है। इसलिये उन्हें विदेशी मानना अनुचित है।

    (4) मिश्रित उत्पत्ति: इस मत के अनुसार विभिन्न कालखण्डों में शक, कुषाण, हूण, सीथियन गुर्जर आदि जो विदेशी जातियाँ भारत में आकर शासन करने लगीं, उन्होंने भारतीय क्षात्र-धर्म स्वीकार कर लिया, वे भारतीय क्षत्रियों में घुल-मिल गईं। भारतीय समाज में विदेशियों को आत्मसात् करने की बहुत बड़ी क्षमता थी इसलिये विदेशी जातियाँ भारतीयों में घुल-मिल गईं। इनके विलयन की सर्वाधिक सम्भावना थी, क्योंकि विदेशी शासक भी भारतीय क्षत्रियों की भाँति शासक वर्ग के थे और उन्हीं के समान वीर तथा साहसी थे। इसलिये यह स्वाभाविक प्रतीत होता है कि विदेशी शासकों एवं प्राचीन भारतीय क्षत्रिय कुलों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गये और उनके आचार-व्यवहार तथा रीति-रिवाज एक से हो गये हो। इसी से कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि राजपूत लोग निश्चय ही प्राचीन क्षत्रियों के वशंज हैं तथा उनमें विदेशी रक्त के सम्मिश्रण की भी सम्भावना है।

    (5) अन्य मत: परशुराम स्मृति में राजपूत को वैश्य पुरुष तथा अम्बष्ठ स्त्री से उत्पन्न बताया है। इससे वह शूद्र सिद्ध होता है किंतु विद्वानों के अनुसार परशुराम स्मृति का यह कथन मूल ग्रंथ का नहीं है, उसे बाद के किसी काल में क्षेपक के रूप में जोड़ा गया है।

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  • मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

     03.06.2020
    मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

    मुगलकाल में राजपूत रियासतों की स्थिति- 4

    बीकानेर राज्य


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    भारतवर्ष के बीकानेर, किशनगढ़, ईडर, विजयनगर, झाबुआ, अमझेरा, रतलाम, सीतामऊ तथा सैलाना राज्यों के शासक, जोधपुर के राठौड़ वंश में से ही निकले थे। जोधपुर नरेश राव जोधा के 20 पुत्र थे जिनमें से पांचवे पुत्र बीका का जन्म 14 जुलाई 1440 को हुआ था। बीका ने ई.1485 में बीकानेर राज्य की स्थापना की। यह एक रेगिस्तानी राज्य था। ई.1526 में जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय बीका का छोटा पुत्र लूणकर्ण बीकानेर का राजा था। बाबर के भारत पर आक्रमण के दिनों में ही लूणकर्ण की मृत्यु हुई। लूणकर्ण के 12 पुत्र थे जिनमें सबसे ज्येष्ठ जैतसिंह लूणकर्ण की मृत्यु के बाद बीकानेर की गद्दी पर बैठा। बीकानेर के इतिहास में उसे जैतसी कहा जाता है।

    बाबर के पुत्र कामरान का आक्रमण

    ई.1534 में बाबर के पुत्र कामरान ने भटनेर (हनुमानगढ़) पर आक्रमण करके उस पर अधिकार जमा लिया तथा बीकानेर को घेर लिया। कामरान ने जैतसी को कहलवाया कि वह मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ले। इस पर जैतसी ने कहलावाया कि ‘‘जाओ कामरान से कह देना कि जिस प्रकार मेरे वंश के मल्लीनाथ, सातल, रणमल, जोधा, बीका, दूदा, लूणकर्ण तथा गांगा ने मुसलमानों का गर्व भंजन किया था, उसी प्रकार मैं भी तेरा नाश करूंगा। कामरान की विशाल एवं क्रूर सेना के भय से बीकानेर नगर में दहशत फैल गयी किंतु जैतसी ने बुद्धिमानी से काम लिया और राजधानी से दूर जाकर ऐसे स्थान से कामरान की सेना पर आक्रमण किया कि कामरान की सेना को सिर पर पैर रखकर भागना पड़ा। यह एक हिन्दू राजा की मुगलों पर बड़ी विजय थी।

    मालदेव द्वारा बीकानेर पर अधिकार

    ई.1542 में जोधपुर नरेश मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया। राव जैतसी अपने साथियों सहित युद्ध के मैदान में ही मारा गया। जैतसी को मारने के बाद मालदेव जांगल देश पर अधिकार करके जोधपुर लौट गया। जैतसी के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र राव कल्याणमल बीकानेर की गद्दी का अधिकारी हुआ किंतु बीकानेर राज्य पर मालदेव ने अधिकार जमा लिया और अपनी ओर से कूंपा महराजोत तथा पंचायण करमसियोत को बीकानेर राज्य का प्रबंधक नियुक्त किया।

    शेरशाह सूरी द्वारा बीकानेर राज्य की सहायता

    जैतसिंह के मारे जाने पर उसके मंत्री नगराज ने जैतसिंह के परिवार की सुरक्षा का प्रबंध किया तथा दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी की सेवा में उपस्थित होकर मालदेव के विरुद्ध सैनिक सहायता की याचना की। उन्हीं दिनों मेड़ता का राजा वीरमदेव भी मालदेव से नाराज होकर शेरशाह सूरी के पास पहुंचा। इन सबने मिलकर राव मालदेव के विरुद्ध सैनिक अभियान किया। शेरशाह अस्सी हजार सैनिक लेकर सुमेल में आ धमका। जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल भी अपनी सेना के साथ मालदेव के विरुद्ध आया। मालदेव भी पचास हजार सैनिक लेकर गिर्री के रण क्षेत्र में आया। शेरशाह ने मालदेव के विरुद्ध षड़यंत्र रचा जिससे मालदेव को अपने सेनानायकों जैता और कूंपा पर संदेह हो गया तथा मालदेव युद्ध का मैदान छोड़कर जोधपुर लौट आया। जैता और कूंपा लगभग आधी हिन्दू सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में डटे रहे। दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। शेरशाह अब भी हिन्दू सेना से घबराता रहा और युद्ध में भाग न लेकर नमाज पढ़ने बैठ गया। अन्त में मुस्लिम सेना की विजय हुई। युद्ध की समाप्ति पर शेरशाह ने अल्लाह को धन्यवाद देते हुए कहा- एक मुट्ठी बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता’। इधर जब मालदेव शेरशाह से उलझा हुआ था तब कल्याणमल के विश्वस्त रावत किशनसिंह ने बीकानेर राज्य में जोधपुर राज्य द्वारा स्थापित थानों को लूटना आरंभ कर दिया। वह लूणकरणसर, गारबदेसर तथा भीनासर थानों को उजाड़कर बीकानेर जा पहुंचा। उसने बीकानेर के दुर्ग पर अधिकार करके कल्याणमल की दुहाई फेर दी। प्रमोद माणिक्य गणि के शिष्य जयसोम ने कर्मचन्द्र वंशो कीर्तनकं काव्यम् नामक ग्रंथ में लिखा है कि मंत्री नगराज ने शेरशाह के हाथ से ही कल्याणमल को टीका दिलवाकर बीकानेर भेजा और आप बादशाह के साथ गया। बाद में बादशाह की आज्ञा लेकर नगराज बीकानेर लौटा किंतु मार्ग में अजमेर में उसका देहांत हो गया।

    मुगल सेनापति बैरामखां को शरण

    ई.1556 में अकबर आगरा की गद्दी पर बैठा। उस समय वह 14 वर्ष का बालक था। अकबर का पिता हुमायूं जब फारस से हिन्दुस्तान लौटा तो वहां से बैराम खां नामक सरदार को लेकर आया। बैराम खां ने 14 वर्ष के बालक अकबर को हिन्दुस्तान की गद्दी पर बैठाया और हुमायूं के भाइयों, लोदी शासकों, पठानों, शेरशाह सूरी के सरदारों तथा हेमू जैसे प्रबल शत्रुओं से अकबर की रक्षा की। अकबर ने उसे खानखाना की उपाधि देकर अपना प्रधान मंत्री नियुक्त किया किंतु ऐसे स्वामिभक्त और ताकतवर अनुचर (बैरामखां) को अकबर अधिक दिन तक नहीं देख सका और चार वर्ष बाद ही उसने बैराम खां को राजकीय सेवा से मुक्त करके मक्का चले जाने का आदेश दे दिया। बैरामखां बीकानेर आया और राव कल्याणमल तथा उसके कुंवर रायसिंह के आश्रय में रहा। अंत में बैरामखां बीकानेर से भी विदा लेकर पाटन (गुजरात) पहुंचा। एक दिन एक अफगान सरदार के पुत्र मुबारकखां लोहानी ने बैराम खां की हत्या कर दी।

    रायसिंह द्वारा अकबर की अधीनता स्वीकार करना

    ई.1570 में जब अकबर अजमेर जियारत से लौटते हुए मार्ग में नागौर ठहरा तब राव बीकानेर का राव कल्याणमल कुंवर रायसिंह को लेकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। इस प्रकार बीकानेर राज्य अकबर के अधीन हो गया। अकबर नागौर में पूरे साठ दिन रहा। अकबर के समय में राजपूताना में 11 राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, आम्बेर, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ एवं करौली। इनमें से मेवाड़ को छोड़कर लगभग पूरा राजपूताना मुगलों के अधीन हो गया।

    बीकानेर का राजकुमार पीथल

    कल्याणमल का पुत्र पृथ्वीराज इतिहास में पीथल के नाम से भी जाना जाता है। वह बड़ा वीर, विष्णु भक्त तथा श्रेष्ठ कोटि का कवि था। संस्कृत और डिंगल साहित्य का उसे अच्छा ज्ञान था। कर्नल टॉड, मूथा नैणसी तथा पण्डित गौरीशंकर ओझा ने उसकी बहुत प्रशंसा की है। कहा जाता है कि एक बार अकबर ने पृथ्वीराज से कहा कि मेवाड़ का महाराणा प्रताप भी अब उसे बादशाह कहने लगा है। पृथ्वीराज अकबर की बात पर विश्वास नहीं कर सका। उसने प्रताप को एक चिट्ठी लिखकर इसकी सच्चाई के बारे में पूछा। इस पत्र को पाकर महाराणा का स्वाभिमान जाग गया और उसने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। पृथ्वीराज विष्णु का परम भक्त था। उसने ‘वेलि क्रिसन रुक्मणि री’ की रचना की जो एक उत्कृष्ट कोटि की रचना है। इस ग्रंथ को पूरा करके पृथ्वीराज जब भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करने जा रहा था। तब मार्ग में श्रीकृष्ण सेठ का वेश बनाकर आये और उससे पूरा ग्रंथ सुना। पृथ्वीराज ने अपनी मृत्यु के बारे में 6 माह पहले ही अकबर को बता दिया था कि मेरी मृत्यु अमुक तिथि को मथुरा में होगी।

    महाराजा रायसिंह का जोधपुर पर राज्य

    ई.1574 में कल्याणमल की मृत्यु हो गयी। उसके 10 पुत्र थे जिनमें से रायसिंह सबसे बड़ा था। कल्याणमल की मृत्यु के बाद रायसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। अकबर ने जोधपुर का राज्य रायसिंह को प्रदान कर दिया। जोधपुर नरेश चंद्रसेन भद्राजून की पहाड़ियों में भाग गया। लगभग 10 साल तक जोधपुर रायसिंह के अधिकार में रहा।

    रायसिंह द्वारा उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनवाना

    बाद में ई.1582 में रायसिंह ने अकबर के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि जोधपुर का दुर्ग उदयसिंह को दे दिया जाये। इस प्रकार जोधपुर का दुर्ग पुनः जोधपुर के राठौड़ों के पास चला गया। रायसिंह ने अकबर की सेना का कई युद्धों में नेतृत्व किया और बड़ी-बड़ी विजयें हासिल कीं। उसने अकबर के लिये गुजरात का भयानक युद्ध जीता जिसमें रायसिंह के 33 बड़े ठिकाणेदार मारे गये ओर उसे बड़ा नुक्सान उठाना पड़ा किंतु अंत में उसने गुजरात के सुल्तान मुहम्मद हुसैन को मार डाला। रायसिंह ने सिरोही के वीर राजा सुरताण को पकड़ कर दिल्ली भेज दिया। इस युद्ध में भी रायसिंह ने बड़ा नुक्सान उठाया। उसने काबुल में मुगलों की सेना का नेतृत्व किया तथा बलोचों को परास्त किया। उसने सिंध, बंगाल तथा दक्षिण में भी अकबर के लिये लड़ाइयां लड़ीं। ई.1589 में उसने बीकानेर के वर्तमान दुर्ग की नींव रखी जो ई.1594 में बनकर तैयार हुआ। ई.1612 में रायसिंह की मृत्यु हो गयी।

    दलपतसिंह के साथ छल

    महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र दलपतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा किंतु अपने प्रखर स्वभाव के कारण वह बादशाह जहांगीर को प्रसन्न नहीं रख सका। अतः बादशाह ने रायसिंह के दूसरे पुत्र सूरसिंह को सैनिक सहायता भिजवाई। सूरसिंह ने छल करके बीकानेर के सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया। जब दलपतसिंह हाथी पर बैठकर युद्ध के मैदान में आया तो उसके साथ चूरू का ठाकुर भीमसिंह बलभद्रोत बैठा हुआ था। उसने दलपतसिंह के दोनों हाथ पीछे से पकड़ लिये। शत्रुओं ने दलपतसिंह को जीवित ही पकड़ कर बंदी बना लिया और अजमेर भेज दिया। 25 जनवरी 1614 को दलपतसिंह वीरता पूर्वक शत्रुओं से मुकाबला करता हुआ अजमेर में मारा गया। बड़े भाई दलपतसिंह को गिरफ्तार करवाने के बाद नवम्बर 1613 में सूरसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। वह कपटी तथा धोखा देने वाला इंसान था। उसने छल से अपने मंत्रियों को मारा तथा पुरोहितों को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। मुगलों की उसने जी भर कर सेवा की।

    मतीरे की राड़

    13 अक्टूबर 1631 को सूरसिंह का पुत्र कर्णसिंह बीकानेर का स्वामी हुआ। कर्णसिंह का जन्म 10 जुलाई 1616 को हुआ था। अपने पिता के चरित्र के विपरीत वह एक अच्छा इंसान था तथा भारत के महान राजाओं में गिने जाने योग्य था। भारत का इतिहास इस राजा का अत्यधिक ऋणी है। परिस्थतियों से विवश होकर कर्णसिंह को जीवन भर मुगल बादशाहों की सेवा करनी पड़ी और पूरा जीवन युद्ध के मैदान में व्यतीत करना पड़ा। कर्णसिंह के शासन काल में ई.1644 में बीकानेर राज्य के सीमावर्ती गांव जाखणिया के एक किसान के खेत में लगी मतीरे की बेल फैलकर नागौर राज्य की सीमा में चली गयी और फल भी उधर ही लगे। फल पर अधिकार को लेकर किसानों में झगड़ा हो गया। बात राज्याधिकारियों तक पहुंची और दोनों राज्यों के अधिकारियों में भी झगड़ा हो गया जिससे नागौर के कई सिपाही मारे गये। उन दिनों अमरसिंह राठौड़ नागौर का स्वामी था तथा मुगल बादशाह शाहजहां के दरबार में था। अमरसिंह के सिपाहियों ने बीकानेर राज्य के जाखणिया गांव पर अधिकार कर लिया। बीकानेर नरेश कर्णसिंह भी उन दिनों आगरा में था। उसने अपने दीवान मुहता जसवंत को नागौर पर हमला करने के लिये भेजा। इस समय अमरसिंह दिल्ली में था अतः उसकी ओर से केसरीसिंह ने मुहता जसवंत सिंह का सामना किया किंतु नागौर की तरफ के कई सिपाही मारे गये तथा नागौर की पराजय हो गयी। इस पर अमरसिंह ने शाहजहां से बीकानेर जाने की अनुमति चाही किंतु बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने शाहजहां को जाखणिया युद्ध की सारी बात कह दी। इस पर बादशाह ने अमरसिंह को आगरा में ही रोक लिया। जब कई दिनों तक बादशाह के बख्शी सलावतखां ने अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दिया तो एक दिन अमरसिंह ने बख्शी की अनुमति के बिना ही बादशाह को मुजरा कर दिया। इस पर बख्शी ने अमरसिंह को गंवार कहकर उसकी भर्त्सना की। अमरसिंह ने क्रुद्ध होकर उसी समय अपनी कटार निकाली और बख्शी को बादशाह के सामने ही मार डाला। शाही सिपाहियों ने उसी समय अमरसिंह और उसके आदमियों को घेर कर मार डाला।

    जंगलधर पादशाह

    ई.1657 में जब शाहजहां बीमार पड़ा तो उसके चार पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ और शाहजहां को कैद कर लिया गया। तब कर्णसिंह आगरा छोड़कर बीकानेर चला आया। दिल्ली के तख्त पर बैठने के तीन साल बाद औरंगजेब ने बीकानेर के विरुद्ध सेना भेजी किंतु कर्णसिंह लड़ने के स्थान पर औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हो गया। औरंगजेब ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसकी नियुक्ति दक्खिन में करके उसे नये सिरे से युद्धों में झौंक दिया किंतु शीघ्र ही कर्णसिंह और औरंगजेब के बीच भयानक विद्वेष उत्पन्न हो गया।

    बाबर से लेकर औरंगजेब तक सारे मुगल बादशाहों की यह इच्छा रही कि पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में परिवर्तित कर लिया जाये किंतु हिन्दुओं के प्रबल संस्कारों और हिन्दू धर्म गुरुओं के प्रयत्नों के कारण ऐसा संभव न हो सका। इस पर औरंगजेब ने एक भयानक षड़यंत्र रचा। उसने सारे हिन्दू राजाओं और मुस्लिम अमीरों को इकट्ठा करके ईरान की ओर प्रस्थान किया। साहबे के सैयद फकीर को औरंगजेब के असी मंसूबे का पता चल गया कि वह ईरान ले जाकर सारे हिन्दू राजाओं को मुसलमान बनावेगा। फकीर ने यह बात हिन्दू राजाओं से कह दी। इस पर हिन्दू राजाओं ने एक बैठक की कि अब क्या करना चाहिये। उस समय वे लोग अटक में डेरा डाले हुए थे। बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने धर्म की रक्षा के लिये अपना सिर कटवाने का निश्चय करके योजना निर्धारित की कि जब बादशाह अटक नदी पार करे तब सारे हिन्दू सरदार नदी पार न करें तथा वापस अपने-अपने राज्य को लौट जायें। ऐसा ही किया गया। बादशाह के नदी पार होते ही हिन्दू नरेशों ने नावें इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी। सारे राजाओं ने कर्णसिंह का बड़ा सम्मान किया और उसे जंगलधर पादशाह की उपाधि दी।

    जैसे ही औरंगजेब को हिन्दू राजाओं के निश्चय का पता लगा तो वह कुरान हाथ में लेकर राजाओं के पास आया और ऐसा करने का कारण पूछा। तब राजाओं ने जवाब दिया कि- ‘‘तुमने तो हमें मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रच लिया इसलिये तुम हमारे बादशाह नहीं। हमारा बादशाह तो बीकानेर का राजा है। जो वह कहेगा वही करेंगे, धर्म छोड़कर जीवित नहीं रहेंगे।’’ तब औरंगजेब ने सबके बीच में कुरान रखकर कसम खाई कि- ‘‘अब ऐसा नहीं होगा, जैसा तुम लोग कहोगे, वैसा ही करूंगा। आप लोग मेरे साथ दिल्ली चलो। आप लोगों ने कर्णसिंह को जंगल का बादशाह कहा है तो वह जंगल का ही बादशाह रहेगा।’’ हिन्दू नरेशों की एकता व दृढ़ता को देखकर औरंगजेब की हिम्मत नहीं हुई कि उनके साथ कोई जबर्दस्ती की जाये किंतु कर्णसिंह के विरुद्ध उसने मन में गांठ बांध ली और उसका राज्य पाट सब छीनकर औरंगाबाद भेज दिया। वहां कुछ ही समय बाद 22 जून 1669 को हिन्दू जाति के तेजस्वी सूर्य महाराजा कर्णसिंह ने अस्ताचल की ओर गमन किया।

    छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध मोर्चा

    महाराजा कर्णसिंह के आठ पुत्र थे जिनमें अनूपसिंह सबसे बड़ा था। जब महाराजा कर्णसिंह से राजपाट छीना गया तब औरंगजेब ने अनूपसिंह को दो हजार जात तथा डेढ़ हजार सवार का मनसब देकर बीकानेर का राज्याधिकार सौंप दिया। महाराजा कर्णसिंह की मृत्यु होने के बाद 4 जुलाई 1669 को अनूपसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उसे छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध लड़ने के लिये भेजा गया जहां उसने बड़ी वीरता से मुस्लिम फौज का नेतृत्व किया तथा महाराज शिवाजी को बड़ी क्षति पहुंचायी। ई.1676 में उदयपुर के महाराणा राजसिंह ने राजसमंद नामक विशाल झील बनवाकर उसकी प्रतिष्ठा करवाई। इस अवसर पर उसने अपने बहनोई बीकानेर नरेश अनूपसिंह को साढ़े सात हजार रुपये मूल्य का मनमुक्ति नामक हाथी, पन्द्रह सौ रुपये मूल्य का सहणसिंगार घोड़ा, साढ़े सात हजार रुपये मूल्य का तेजनिधान नामक दूसरा घोड़ा तथा वस्त्राभूषण भेजे।

    महाराजा कर्णसिंह के पुत्र केसरीसिंह, पदमसिंह और मोहनसिंह भी बड़े पराक्रमी क्षत्रिय थे किंतु उनकी वीरता से प्रभावित होकर औरंगजेब ने उन्हें अपनी चतुराई, कपट और कृत्रिम विनय का प्रदर्शन कर उन्हें पूर्णतः कब्जे में कर रखा था। जब केसरीसिंह और पद्मसिंह दाराशिकोह को खजुराहो के मैदान में परास्त कर औरंगजेब के पास ले आये तो औरंगजेब ने अपने रूमाल से उनके बख्तरों की धूल साफ की। ये दोनों औरंगजेब के लिये लड़ाइयां लड़ते हुए मारे गये। पद्मसिंह को तो बीकानेर राजपरिवार का सबसे वीर पुरुष माना जाता है। उसकी तलवार का वजन आठ पौण्ड तथा खाण्डे का वजन पच्चीस पौण्ड था। वह घोड़े पर बैठकर बल्लम से शेर का शिकार करता था।

    अनूपसिंह संस्कृत भाषा का अधिकारी विद्वान था उसने अनूप विवेक (तंत्रशास्त्र), काम प्रबोध (कामशास्त्र), श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि और गीत गोविंद की अनूपोदय नामक टीका की रचना की। उसके दरबार में संस्कृत के अनेक विद्वान रहते थे। अनूपसिंह संगीत विद्या में भी निष्णात था। उसने संगीत सम्बन्धी अनेक गं्रथों की रचना की थी। उसे औरंगजेब ने हिन्दू नरेशों को मिलने वाला सर्वोच्च सम्मान माही मरातिब प्रदान किया। अनूपसिंह ने अनूपगढ़ नामक दुर्ग का निर्माण करवाया। उसने देश भर के संस्कृत के दुलर्भ ग्रंथों को खरीद कर बीकानेर के पुस्तकालय में सुरक्षित करवाया ताकि उन्हें औरंगजेब नष्ट न कर सके। पुस्तकों की ही भांति मूर्तियों को भी उसने हिन्दुस्तान भर से खरीदकर बीकानेर में संग्रहीत करवाया ताकि उन्हें मुसलमानों के हाथों नष्ट होने से बचाया जा सके। मूर्तियों का यह विशाल भण्डार 33 करोड़ देवताओं का मंदिर कहलाता है।

    जोधपुर नरेश अजीतसिंह का आक्रमण

    8 मई 1698 को महाराजा अनूपसिंह का देहांत हो गया और स्वरूपसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। उस समय उसकी आयु मात्र 9 वर्ष ही थी। राज्य कार्य स्वरूपसिंह की माता सीसोदणी चलाने लगी। दो वर्ष बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में 15 दिसम्बर 1700 को शीतला से स्वरूपसिंह की मृत्यु हो गयी और उसका छोटा भाई सुजानसिंह 10 वर्ष की आयु में बीकानेर का राजा हुआ। सुजानसिंह के गद्दी पर बैठते ही औरंगजेब ने उसे दक्षिण के मोर्चे पर बुला लिया। सुजानसिंह 10 वर्ष तक दक्षिण के मोर्चे पर रहा। ई.1707 में दक्षिण में ही औरंगजेब की मृत्यु हो गयी। इससे जोधपुर नरेश अजीतसिंह ने अपने राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया। सुजानसिंह की बीकानेर से अनुपस्थिति का लाभ उठाकार अजीतसिंह ने बीकानेर नगर पर भी अधिकार कर लिया और नगर में अपने नाम की दुहाई फेर दी। भूकरका का सरदार पृथ्वीराज तथा मलसीसर का हिन्दूसिंह जोधपुर की सेना से लड़ने के लिये आगे आये। सरदारों का विरोध देखकर अजीतसिंह ने बीकानेर खाली कर दिया। औरंगजेब के बाद बहादुरशाह, जहांदारशाह, फर्रूखसीयर, रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला तथा मुहम्मदशाह दिल्ली के तख्त पर बैठे। ये बादशाह स्वयं ही चारों ओर षड़यंत्र से घिरे रहे अतः हिन्दू राजाओं पर मुगल बादशाहों की पकड़ ढीली हो गयी। ई.1720 में मुहम्मदशाह ने बीकानेर नरेश सुजानसिंह को दिल्ली दरबार में पेश होने के आदेश दिये किंतु मुगलों की चला चली के दौर का आकलन कर सुजानसिंह बादशाह की सेवा में नहीं गया तथा अपने कुछ सेवकों को दिल्ली तथा अजमेर भिजवा दिया।

    अभयसिंह के आक्रमण

    अपने पिता जोधपुर नरेश अजीतसिंह की हत्या कर राजकुमार अभयसिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठा तथा पितृहंता बख्तसिंह नागौर का स्वामी हुआ। इन दोनों भाइयों ने ई.1737 में बीकानेर पर हमला कर दिया। उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) ने दोनों पक्षों में समझौता करवा दिया। ई.1734 में बख्तसिंह ने एक बार फिर बीकानेर पर अधिकार करने का षड़यंत्र रचा। उसने बीकानेर के किलेदार तथा कई आदमियों को अपनी ओर मिला लिया। उन दिनों सुजानसिंह ने अधिकांश राज्यकार्य राजकुमार जोरावरसिंह को सौंप रखा था।

    जब जोरावरसिंह ऊदासर गया हुआ था तब षड़यंत्रकारियों ने किले के सब दरवाजों पर से ताले हटा लिये तथा बख्तसिंह के आदमियों को सूचना करने के लिये आदमी भेजा। बख्तसिंह अपने आदमियों के साथ किले के पास ही छिपा हुआ था किंतु इसी बीच ऊदासर में षड़यंत्रकारियों के एक साथ उदयसिंह परिहार ने शराब के नशे में अपने सम्बन्धी जैतसी परिहार को यह भेद बता दिया कि किले का पतन होने वाला है। जैतसी ऊँट पर सवार होकर भागा-भागा बीकानेर आया तथा किले के उस हिस्से में पहुंचा जहां पड़िहारों का पहरा था। उनसे रस्सी गिरवाकर वह गढ़ में दाखिल हो गया और महाराजा सुजानसिंह को षड़यंत्र की सूचना दी। सुजानसिंह जैतसिंह को लेकर सूरजपोल पहुंचा तो उसने वहां के ताले खुले हुए पाये। गढ़ के अन्य दरवाजों के ताले भी खुले हुए पाये गये। उसी समय गढ़ के सारे द्वारों पर ताले जड़वाये गये तथा किले की तोपें दागी गयीं। तोपों की आवज सुनकर षड़यंत्रकारी समझ गये कि भेद खुल गया है अतः वे वहां से भाग लिये। किले के भीतर स्थित सांखला राजपूत मार दिये गये और किले की सुरक्षा धाय भाई को सौंप दी गयी। इससे पूर्व बीकानेर के किलेदार वंश परम्परा से नापा सांखला के वंशज होते आये थे, जो अपनी राजभक्ति के लिये प्रसिद्ध थे।

    ई.1735 में सुजानसिंह की मृत्यु हो गयी तथा जोरावरसिंह राजा हुआ। उसके शासन काल में जोधपुर नरेश अभयसिंह ने फिर बीकानेर पर आक्रमण किया किंतु इस बार बख्तसिंह ने बीकानेर का साथ दिया। अभयसिंह वापस जोधपुर लौट गया। एक साल बाद ई.1740 में अभयसिंह ने फिर बीकानेर पर आक्रमण किया। अभयसिंह बीकानेर नगर में घुस गया और वहां खूब लूटपाट मचाई तथा बीकानेर का दुर्ग घेर कर उस पर तोपों से गोलों की बरसात कर दी। जोरावरसिंह दुर्ग में घिर गया। उसने अपने आदमी नागौर तथा जयपुर भेजे। बख्तसिंह सेना लेकर बीकानेर आ गया तथा उधर जयपुर नरेश जयसिंह ने जोधपुर जाकर मेहरानगढ़ को घेर लिया। अभयसिंह को बीकानेर से हटना पड़ा। ई.1746 में जोरावरसिंह की मृत्यु हो गयी। वह वीर, कुशल राजनीतिज्ञ, प्रतिभा सम्पन्न तथा काव्य मर्मज्ञ था। वह संस्कृत और डिंगल का विद्वान था। उसकी लिखी हुई दो पुस्तकों- ‘वैद्यकसार’ तथा ‘पूजा पद्धति’ बीकानेर के पुस्तकालय में हैं।

    महाराजा गजसिंह

    जोरावरसिंह के कोई संतान नहीं थी अतः उसके मरते ही राज्य का सारा प्रबंध भूकरका ठाकुर कुशलसिंह तथा मेहता बख्तावरसिंह ने अपने हाथ में ले लिया तथा बाद में जोरावरसिंह के चचेरे भाई गजसिंह से यह वचन लेकर कि वह उस समय तक के राज्यकोष का हिसाब नहीं मांगेगा, उसे गद्दी पर बैठा दिया। जोरावरसिंह के चचेरे भाइयों में अमरसिंह सबसे बड़ा था किंतु उसे राजा नहीं बनाया गया इसलिये वह नाराज होकर जोधपुर चला गया और वहां से विशाल सेना लेकर बीकानेर पर चढ़ आया। रामसर कुंएँ पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ जिसमें जोधपुर की सेना परास्त हो गई। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह का वजीर मंसूर अली खां (सफदरजंग) बागी हो गया तब बादशाह ने बीकानेर एवं जोधपुर से सहायता मांगी। बीकानेर नरेश ने सैनिक सहायता देकर बख्तावरसिंह को बादशाह की सेवा में भेजा। सेना के समय पर पहुँच जाने से बादशाह की बादशाही बच गयी। इस पर बादशाह ने गजसिंह को सात हजारी मनसब देकर सिरोपाव भिजवाया तथा उसे श्री राज राजेश्वर महाराजाधिराज महाराज शिरोमणि श्री गजसिंह की उपाधि दी। साथ ही माही मरातिब भी प्रदान किया। जोधपुर नरेश विजयसिंह को बीकानेर नरेश गजसिंह पर बड़ा भरोसा था।

    सूरतसिंह का खूनी खेल

    राजसिंह के दो पुत्र थे, प्रतापसिंह तथा जयसिंह। दोनों ही उस समय बालक थे। अतः सूरतसिंह को संरक्षक बना कर प्रतापसिंह को बीकानेर का राजा बना दिया गया। कुछ ही दिनों बाद सूरतसिंह ने स्वयं राजा बनना चाहा किंतु राजसिंह की पुत्री ने सूरतसिंह का कड़ा विरोध किया। उस समय वह कुंआरी थी। अतः सूरतसिंह ने राजकुमारी का विवाह नरवर के कछवाहों से कर दिया उसने अपने हाथों से राजा प्रतापसिंह का गला घोंट दिया और ई.1787 में सूरतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठ गया।

    रियासतों की खूनी होली

    भारत में मुगलों का राज्य प्रथम बार 1526 से 1540 ई.तक चला तथा दूसरा राज्य 1555 ई.में स्थापित होकर 1857 ई.तक चला किंतु वास्तवितकता यह थी कि फर्रूखसीयर की मृत्यु के साथ ही मुगलों का प्रभाव राजपूत रियासतों पर नहीं के बराबर रह गया था। फिर भी मुहम्मदशाह रंगीला (1719-48 ई.) तक राजपूत राजा, मुगलों की प्रतीकात्मक अधीनता स्वीकार किए रहे। ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाहआलम से इलाहाबाद की संधि की तथा उसे पेंशन देकर राज्यकार्य से अलग कर दिया। 1765 से 1818 ई.तक राजपूत रियासतें किसी भी शक्ति के अधीन नहीं थीं। भारत के केन्द्रीय शासन में राजनैतिक शक्ति का अभाव उत्पन्न हो गया था। मराठों ने राजपूत रियासतों को लूटना आरम्भ कर दिया। मुगलों की सेना भंग हो जाने से लाखों सैनिक बेरोजगार होकर पिण्डारी बन गए। मराठों और पिण्डारियों के निरंतर आक्रमणों ने राजपूताना की राजनैतिक शक्ति को तोड़कर रख दिया था जिससे त्रस्त होकर राजपूताने की रियासतों ने सिंधियों तथा पठानों को अपनी सेनाओं में जगह दी। ये नितांत अनुशासनहीन सिपाही थे जो किसी विधि-विधान को नहीं मानते थे।

    इस काल में अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों तथा डच सेनाओं के खूनी पंजे भी भारत पर अपना कब्जा जमाने के लिये जोर आजमाइश कर रहे थे। इन सब खतरों से बेपरवाह राजपूताना के बड़े रजवाड़ों के मध्य छोटी-छोटी बातों को लेकर मन-मुटाव और संघर्ष चलता रहा। इस काल मंे राजपूताना की चारों बड़ी रियासतें- जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर तथा जयपुर परस्पर खून की होली खेल रही थीं।

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  • मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

     03.06.2020
    मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

    मुगल काल में राजपूत रियासतों की स्थिति - 5

    मारवाड़ राज्य

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मारवाड़ राज्य की स्थापना का कार्य बदायूं के राठौड़ों के वंशज सीहाजी द्वारा थार रेगिस्तान में आकर बसने के बाद आरम्भ हुई। सीहा की मृत्यु 1273 ई. में हुई। उसके वंशज पाली तथा बाड़मेर के आसपास राज्य करते रहे। 1394 ई. में राव चूण्डा ने मण्डोर पर अधिकार किया तथा 1459 ई. में जोधा ने मेहरानगढ़ दुर्ग बनाया और वहां अपनी नई राजधानी स्थापित की। जिस समय बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय मारवाड़ पर राव गांगा (1515-1532 ई.) का शासन था। जब सांगा खानुआ के मैदान में बाबर से लड़ने गया तो गांगा ने भी अपने 4000 सैनिक सांगा की सहायता के लिए भेजे। इस सेना का नेतृत्व मेड़ता से वीरमदेव (राव जोधा का पौत्र और राव दूदा का पुत्र) ने किया। वह अपने भाइयों रत्नसिंह तथा रायमल के साथ युद्ध के मैदान में गया। महाराणा सांगा, राव गांगा का बहनोई था। रायमल और रत्नसिंह इस युद्ध में खेत रहे।
    (आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2008, सामान्य ज्ञान, खानवा में बाबर के विरुद्ध सांगा की सहायता के लिए किसके नेतृत्व में मारवाड़ी सेना भेजी गई थी-राव गांगा/मालदेव/बीरमदेव/सूजा?)

    राव गांगा और मेड़ता के राजा वीरम में राज्याधिकार को लेकर झगड़ा चलता था। गांगा ने वीरम को सोजत की जागीर दी किन्तु वह सन्तुष्ट नहीं हुआ और दोनों के बीच कई बार युद्ध हुआ। गांगा के पुत्र मालदेव ने इन युद्धों में अपने पिता की सहायता की। गांगा ने मुसलमानों के विरुद्ध भी अनेक लड़ाइयां लड़ीं। उसने जोधपुर में गांगेलाव का तालाब, गंागा की बावड़ी और गंगश्यामजी का मन्दिर बनवाया। उसकी बड़ी रानी सिरोही के राव जगमाल के पुत्री पद्मावती (ससुराल का नाम मणिक देवी) से हुआ था जिससे मालदेव, मानसी, बैरीसाल और एक पुत्री सोनबाई का जन्म हुआ। इस विवाह के अवसर पर गांगा, सिरोही से एक विष्णु प्रतिमा लाया और उसे गंगश्यामजी के मन्दिर में स्थापित करवाया। इसी रानी के साथ पहले-पहले सिंघी (सिंघवी) खांप के कुछ ओसवाल महाजन जोधपुर आए थे। इन सिंघी लोगो के पूर्वज कुलीन नन्दवाने बोहरे (पल्लीवाल ब्राह्ममण) थे किन्तु बाद में वे जैन धर्म को स्वीकार करके ओसवाल कहलाने लगे तथा वैश्य जाति में मिल गये। गांगा की एक रानी मेवाड़ के राणा सांगा की पुत्री थी। इसका नाम भी पद्मावती था। इसने जोधपुर में पद्मसर तालाब बनवाया।

    गांगा का पुत्र मालदेव अत्यंत महत्वाकांक्षी, वीर और धूर्त था। उसने एक दिन गांगा को महल के झरोखे से धक्का दे दिया। उस समय गांगा अफीम की पिनक में था। गांगा की मृत्यु हो गई और मलदेव जोधपुर की गद्दी पर बैठा। उस समय जोधपुर राज्य में जोधपुर तथा सोजत के ही क्षेत्र थे। जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा और मेड़ता आदि के जागीरदार जोधपुर के नरेश को आवश्यकतानुसार सैनिक सहायता देते थे। मालदेव (1532-1562 ई.) ने जेतमालोत राठौड़ों से सिवाना, खाबड़ पंवारों से चौहटन, पारकर तथा राधनुपर, सिंधल राठौड़ों से रायपुर तथा भादªाजून, बिहरी पठानों से जालोर, मल्लीनाथ के वंशजों से मालानी, वीरमदेव से मेड़ता, मेवाड़ के राणा से गोडवाड़, बदनोर, मदारिया और कोसीथल, बीका राठौड़ों से बीकानेर, चौहानों से सांचोर, देवड़ों से सिरोही तथा मुसलमानों से नागौर, सांभर, डीडवाना तथा अजमेर छीन लिए जिससे उसके राज्य की सीमाएं गुजरात से लेकर आगरा और दिल्ली तक पहुंच गईं। सिरोही का राव, मालदेव का नाना था, अतः मालदेव ने उसी को अपनी ओर से सिरोही का शासक नियुक्त कर दिया।

    जब मुगल बादशाह हुमायूं शेरशाह सूरी से चौसा की लड़ाई में हारकर पश्चिम के रेगिस्तान की ओर भाग आया तो मालदेव ने हुमायूं को शरण देने का विचार किया और उसे बुलावा भेजा। हुमायूँ ने मालदेव के निमंत्रण पर कोई ध्यान नहीं दिया और थट्टा के शासक शाह हुसैन के भरोसे लगभग एक साल गंवा दिया। बाद में वह मारवाड़ की ओर आया तथा मालदेव से शरण एवं सहायता मांगी किंतु अब मालदेव ने उसकी कोई सहायता नहीं की। अतः हुमायूं डरकर अमरकोट होता हुआ फारस भाग गया। मालदेव के सैनिकों ने भागती हुई मुगल टुकड़ी का पीछा किया किंतु हुमायूँ अमरकोट के हिन्दू राजा की शरण में पहुंच गया।

    अब भारत में शेरशाह सूरी का कोई प्रबल विरोधी था तो वह मालदेव था। जब मालदेव ने वीरमदेव को मेड़ता से निकाल दिया तो वीरम सहायता मांगने के लिए शेरशाह सूरी के पास गया। 1544 ई. में शेरशाह 80 हजार सैनिकों के साथ आया और सुमेल-गिर्री के मैदान में मोर्चा बांधकर बैठ गया। राठौड़ों का बल देखकर शेरशाह की हिम्मत पस्त हो गई किंतु जब मालदेव विजय के निकट था तब शेरशाह ने षड़यंत्र रचकर मालदेव के मन में सरदारों के विरुद्ध संदेह उत्पन्न कर दिया। मालदेव बिना लड़े ही युद्ध का मैदान छोड़कर जोधपुर आ गया। जब मालदेव के सरदारों जैता तथा कूंपा को ज्ञात हुआ कि मालदेव ने हम पर संदेह किया है तो वे शेरशाह की सेना पर टूट पड़े। शेरशाह अब भी हिन्दू सेना से घबराता रहा और युद्ध में भाग न लेकर नमाज पढ़ने बैठ गया। इस भयानक युद्ध में अंततः राठौड़ परास्त हुए तथा विजयश्री शेरशाह के हाथ लगी। युद्ध की समाप्ति पर शेरशाह ने अल्लाह को धन्यवाद देते हुए कहा- ‘एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाहत खो बैठता।’

    शेरशाह ने अपनी सेना के दो भाग किये। एक भाग खवास खां और ईसा खंा के नेतृत्व में जोधपुर आया और दूसरा भाग वह स्वयं लेकर अजमेर पहुंचा। अजमेर पर अधिकार करके शेरशाह भी जोधपुर आ गया। मालदेव सिवाना के पहाड़ों में भाग गया। जोधपुर पर शेरशाह का अधिकार हो गया। उसने फलौदी, पोकरन, सोजत, पाली, जालोर तथा नागोर में अपने थाने बैठा दिये। इसके बाद वह वीरम को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर सौंपकर अपनी राजधानी लौट गया। उसने जोधपुर के किले का मन्दिर तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई तथा किले में पूर्व की तरफ एक रास्ता निकाला, जो अब गोल घाटी कहलाता है। मालदेव लगभग दो वर्ष तक छप्पन के पहाड़ों में छिपा रहा। जब 1546 ई. में शेरशाह की मृत्यु हो गयी तो मण्डोर के राजपूत मालियों ने शेरशाह के थानों को उठा दिया और मालदेव को इसकी सूचना भेजी। मालदेव ने भी अपनी सेना भेजी। इस सेना की सोजत के पास शेरशाह के सैनिकों से मुठभेड़़ हुई। मालदेव की सेना विजयी रही। मालदेव ने पुनः मारवाड़ पर अधिकार कर लिया। (आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा, 1992- इतिहास द्वितीय प्रश्न पत्र, शेरशाह-मालदेव सम्बन्धों की संक्षेप में चर्चा कीजिये।)

    मालदेव का विवाह जैसलमेर के राव लूणकर्ण की कन्या उमादे से हुआ। विवाह के बाद राजकुमारी तो अपने महल में चली गई और मालदेव गाने वालियों के साथ बैठकर शराब पीने लगा। राजकुमारी ने काफी देर तक उसकी प्रतीक्षा की और फिर अपनी दासी को मालदेव को बुलाने भेजा। मालदेव ने उसे भी शराब पिलाने में लगा लिया। तब राजकुमारी ने अपनी दूसरी दासी भारमली को भेजा। मालदेव भारमली के रूप और यौवन पर रीझ गया और उसी के घर चला गया। राजकुमारी ने जब यह सुना तो उसने मालदेव की आरती के लिए सजाया थाल उलट दिया। उमादे रूठ कर अपने ननिहाल चित्तौड़ चली गई और जीवन भर वहीं रही। चित्तौड़ के इतिहास में इसे रूठी रानी कहते हैं। जब मालदेव की मृत्यु हुई तो यह स्वाभिमानी और धर्मपरायण रानी भी सती हो गई।

    मालदेव की सेना में अस्सी हजार सवार थे अैर उसकी सेना राणा सांगा की सेना से भी बड़ी थी। उसने जोधपुर दुर्ग में अनेक महल बनवाये और नगर का परकोटा बनवाया। मेड़ता में मालकोट और परकोटा बनाने पर उसने 2 लाख 40 हजार रुपए खर्च किए। अजमेर के बीठली के किले की बुर्जें और तारागढ़ पर पश्चिम के झरने में से पानी पहुंचाने के लिए तीन बुर्ज भी मालदेव के बनाये हुए हैं।

    मालदेव साहसी और वीर व्यक्ति था किंतु उसमें चारित्रिक दृढ़ता और दूरदृष्टि का अभाव था। उस पर अपने पिता की हत्या का आरोप था। अपने शंकालु स्वभाव के कारण उसने जैता और कूंपा जैसे वीर पुगंवों को खोया। महाराणा उदयसिंह (मेवाड़) के विरुद्ध उसने शेरशाह के सेनापति हाजीखां को सहायता दी। मालदेव ने मेड़ता के वीरमदेव को अपना शत्रु बना लिया तथा अपनी दूसरी रानी के प्रभाव में आकर उसने अपने सुयोग्य पुत्र 
    चन्द्रसेन को उत्तराधिकार से वंचित कर राज्य अन्य पुत्र को दे दिया जिससे भाइयों में वैमनस्य बढ़ा। इसका लाभ अकबर ने उठाया।

    मालदेव ने अपने दूसरे नम्बर के पुत्र को जोधपुर का राजा बनाया था किंतु चन्द्रसेन (1562-1581 ई.) ने राज्य पर अधिकार कर लिया। अकबर के समय, यही चन्द्रसेन मारवाड़ का राजा था। अकबर ने जोधपुर पर आक्रमण करके मेहरानगढ़ छीन लिया। चन्द्रसेन को जंगलों में भाग जाना पड़ा। अकबर के सेनापति हसनकुली खां ने जोधपुर दुर्ग में मस्जिद बनवाई। अकबर ने बीकानेर राव रायसिंह को जोधपुर का सूबेदार बना दिया। 15 साल तक चन्द्रसेन पहाड़ों और जंगलों की खाक छानता हुआ अपना राज्य स्वतंत्र कराने में लगा रहा। 11 जनवरी 1581 को उसकी मृत्यु हो गई। मेवाड़ के महाराणा प्रताप के समान ही आन-बान का धनी वीर चन्द्रसेन हिन्दू वीरों के गौरव का प्रतीक बना रहा। (आर.ए.एस. प्रारम्भिक 2012, किस राजपूत शासक ने मुगलों के विरुद्ध निरंतर स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रखा और समर्पण नहीं किया- 1. बीकानेर के राजा रायसिंह, 2. मारवाड़ के राव चंद्रसेन, 3. आमेर के राजा भारमल, 4. मेवाड़ के महाराजा अमरसिंह?)

    चन्द्रसेन के तीन पुत्र थे जिनमें अपने पिता जैसा गौरव नहीं था। उसका ज्येष्ठ पुत्र रायसिंह अपने पिता के जीवन काल में ही अकबर की शरण में चला गया था। उसके दोनों छोटे पुत्र, चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद आधा-आधा राज्य बांटकर राज्य करने लगे। यह राज्य सोजत तथा उसके आस-पास का एक छोटा सा क्षेत्र था। दोनों भाई एक दिन चौसर खेलते हुए आपस में कट मरे। तब हिन्दू सरदारों ने रायसिंह को बुलाकर सोजत की गद्दी पर बैठाया। अकबर ने इसे राव की अपाधि दी। अकबर ने रायसिंह को सिरोही के राव सुरताण पर आक्रमण करने भेजा। सुरताण ने रायसिंह को मार डाला।

    दस साल तक जोधपुर, बीकानेर नरेश रायसिंह के पास सूबे के रूप में रहा। 1583 ई. में रायसिंह के कहने पर अकबर ने चंद्रसेन के छोटे भाई उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनाया जो इतिहास में मोटाराजा कहलाता है। उदयसिंह को अपनी पुत्री जगत गुसाइन का विवाह अकबर से करना पड़ा। उसके काल में जोधपुर राज्य में मुगलों का खूब प्रभाव बढ़ा। कल्ला रायमलोत इस बात पर उदयसिंह से नाराज हो गया और उसने विदªोह कर दिया। उदयसिंह ने कल्ला रायमलोत को प्राण त्यागने पर विवश कर दिया। उदयसिंह ने 1593 ई. में बालोतरा गांव के पास राव मल्लीनाथ के नाम पर पशु मेला आरंभ करवाया जो अब भी प्रतिवर्ष चैत्र माह में आयोजित होता है। इस मेले में आने वाले मालानी घोड़े, सांचोरी गाय, बैल, तथा मारवाड़ी नस्ल के ऊँट प्रसिद्ध हैं। 1595 ई. में लाहौर में मोटाराजा उदयसिंह की मृत्यु हो गई। वहीं पर रावी नदी के किनारे उसका अंतिम संस्कार किया गया। उसकी रानियों के सती होते समय उनकी दृढ़ता देखने के लिए अकबर स्वयं नाव में बैठकर आया।

    उदयसिंह के 17 पुत्र थे। इनमें से छठा पुत्र सूरसिंह (1595-1619 ई.) जोधपुर की गद्दी पर बैठा। सूरसिंह की राज्य सेवा से प्रसन्न होकर अकबर ने उसे 16 परगने दिये। 9 परगने मारवाड़ में, 5 गुजरात में, 1 मालवा में तथा 1 दक्षिण में। मारवाड़ राज्य के अलावा उसे गुजरात की सूबेदारी, दो हजारी जात तथा सवा हजारी मनसब एवं सवाई की उपाधि भी दी। अकबर की मृत्यु के बाद गुजरात के बहादुरशाह ने अहमदाबाद पर चढ़ाई की। तब सूरसिंह ने बहादुरशाह को पराजित कर जहांगीर की अमलदारी गुजरात तक बढ़ा दी। इससे प्रसन्न होकर जहांगीर ने सूरसिंह का दर्जा 5 हजारी जात और 3 हजारी सवार का कर दिया। उसने जीवन भर अकबर और जहांगीर की चाकरी की तथा 24 वर्ष के अपने शासनकाल में मात्र 9 माह अपनी राजधानी जोधपुर में रहा। मुगलों की ही पद्धति पर उसने अपने राज्य का प्रबन्ध किया। उससे पहले राव रणमल, राव जोधा, सूजा, गांगा, मालदेव तथा उदयसिंह के वंशज राजा के साथ भाईचारे अर्थात् बराबरी का अधिकार रखते थे किन्तु सूरसिंह ने उन्हें अपना मातहत घोषित किया तथा दरबार में दाएं-बाएं बैठने का नियम बनाया। दाहिनी तरफ राव रणमल की सन्तान में से आउवा के चम्पावतों को और बाई तरफ राव जोधाजी के वंशजों में से रीयां के मेड़तियों को प्रथम स्थान दिया गया। राजा की तलवार और ढाल रखने का काम खींची चौहानों को और चंवर करने का काम धांधल राठौड़ों को सौंपा। यह व्यवस्था देश की स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही। वह मात्र नौ महीने जोधपुर रहा तथा कुछ समय और जोधपुर रहने की चेष्टा में दो बार उसकी जागीर में कमी की गई।

    मुगलों की चाकरी में रहते हुए भी सूरसिंह संस्कृत का अच्छा ज्ञाता और पण्डित था। उपने पुत्रों को संस्कृत पढ़ाता था। एक बार उसने एक ही दिन में चार कवियों को एक लाख रूपये का दान दिया। जोधपुर नगर की तहलटी के महल, सूरजकुण्ड, सूरसागर तालाब तथा सूरसागर स्थित महल सूरसिंह ने बनवाये। सूरसिंह के प्रधान भाटी गोविन्ददास ने प्राचीन परम्पराओं को समाप्त किया। मारवाड़ राज्य परिवार में यदि विवाह या मृत्यु का अवसर होता तो अन्तःपुर में ठकुरानियों को उपस्थित होना पड़ता था। इस प्रथा को उसने समाप्त कर दिया। उसने राज्य में भूमि की पैमाइश करवायी तथा राजस्व विभाग की ओर ध्यान दिया।

    सूरसिंह की मृत्यु के बाद 18 अक्टूबर 1619 को गजसिंह (1619-1638 ई.) जोधपुर का राजा हुआ। उसने भी मुगलों की खूब सेवा की और मलिक अम्बर से हुए युद्ध में उसका लाल झण्डा छीन लिया। तब से जोधपुर राज्य के ध्वज में लाल रंग की पट्टी जुड़ी। गजसिंह ने भी अनेक लड़ाईयां लड़ीं और मुगलों के राज्य में वृद्धि की। विद्वानों, ब्राह्ममणों और चारणों का सम्मान करने वाला यह राजा भी अपने पिता की ही भांति विद्वान एवं दानशील था। जहाँगीर ने उसका मनसब बढ़ाकर चार हजारी जात और तीन हजार सवार कर दिया और उसे ’दलथंभन’ (फौज को रोकने वाला) की उपाधि प्रदान की। गजसिंह ने 16 कवियों को लाख पसाव दिए।

    गजसिंह के तीन पुत्र थे। सबसे बड़ा कुंअर अमरसिंह स्वाभिमानी और स्वातन्त्रय प्रिय था। उसकी उद्दण्ड प्रवृत्ति के कारण गजसिंह उससे नाराज रहता था तथा उसने अपने दूसरे पुत्र जसवन्तसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस घटना से अप्रसन्न होकर अमरसिंह शाहजहां के दरबार में चला गया। शाहजहां ने उसे बड़ौदा, सांगोद, झलान आदि की जागीरें देकर मनसबदार बना दिया। बाद में नागौर का स्वतंत्र राज्य भी दे दिया।

    अमरसिंह ने मुगलों की तरफ से कई लड़ाइयां लड़ीं। 1644 ई. में उसकी बीकानेर राज्य के खीलवा और नागौर के सम्बन्ध में लड़ाई हुई जो मतीरे की राड़ के नाम से प्रसिद्ध है। अमरसिंह इस लड़ाई कि सिलसिले में नागौर जाना चाहता था किंतु बीकानेर नरेश कर्णसिंह के दबाव में शाहजहां का बख्शी अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दे रहा था। एक दिन अमरसिंह ने बख्शी से पूछे बिना शाहजहां को सलाम किया। इस पर बख्शी ने अमरसिंह को गंवार कह दिया। अमरसिंह ने उसी क्षण तलवार निकालकर बख्शी सलावत खां को मार डाला। शाहजहां के सिपाही, अमरसिंह को मारने के लिए लपके जिनमें विट्ठलदास गौड़ का पुत्र अर्जुन सबसे आगे था। अमरसिंह वहां से भाग छूटा और घोड़े सहित किले की दीवार से कूद गया। नीचे पहुंचते-पहुंचते उसे शाहजहां के सैनिकों और दरबारियों ने घेरकर मार डाला। अमरसिंह के इस अद्भुत पराक्रम की कथा को ‘ख्याल’ बनाकर पिछली तीन शताब्दियों से मारवाड़ के गांव-गांव में गाया जाता है। कठपुतली के खेलों में अमरसिंह राठौड़ आज भी सर्वप्रमुख पात्र होता है जो अपनी आन-बान और शान की रक्षा के लिए शहीद होता हुआ दिखाया जाता है।

    गजसिंह की मृत्यु के बाद उसका 11 वर्षीय पुत्र जसवन्तसिंह (1638-1678 ई.) जोधपुर की गद्दी पर बैठा। वह भी शाहजहां के लिए लड़ाईयां लड़ता हुआ अधिकांशतः युद्ध के मैदान में रहा। उसके जीवनकाल में शाहजहां के पुत्रों में उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ। जसवन्तसिंह ने धर्मपरायण शहजादे दाराशिकोह का पक्ष लिया और धर्मत के मैदान में औरंगजेब से घमासान युद्ध किया। दारा के पक्ष के कुछ मुसलमान धोखा देकर औरंगजेब के पक्ष में जा मिले जिससे जसवन्तसिंह को पराजित होकर युद्ध का मैदान छोड़ना पड़ा। युद्धस्थल से अपने बचे हुए साथियों को लेकर जसवन्तसिंह सोजत पहुंचा और पांच दिन वहां ठहरकर जोधपुर पहुंचा। उसकी उदयपुरी राणी ने किले के द्वार बन्द करवा लिए और अपने सेवक से संदेश भिजवाया- राजपूत युद्ध से या तो विजयी होकर लौटते हैं या वहीं मर मिटते हैं। युद्ध क्षेत्र से पराजित होकर लौटने वाला व्यक्ति मेरा पति नहीं हो सकता।’ रानी सती होने की तैयारी करने लगी। तब रानी की माँ ने रानी को समझाया-बुझाया, राजा ने भी उस पराजय का बदला लेने का वचन दिया तब कहीं जाकर उसने महल के द्वार खुलवाए।

    जसवन्तसिंह धर्मप्राण नरेश था। उसके दरबार में बड़े-बड़े पण्डित, विद्वान एवं कवि रहते थे। उसने स्वयं कई ग्रन्थ लिखे जिनमें आनन्द विलास, अनुभव प्रकाश, अपरोक्ष अंग सिद्धात, सिद्धान्त बोध, सिद्धान्त सार, प्रबोध चन्द्रोदय तथा भाषा भूषण प्रसिद्ध हैं। भाषा भूषण हिन्दी में अलंकारों का उत्तम ग्रंथ है। जसवन्तसिंह अहमदाबाद, बुरहानपुर, औरंगाबाद और काबुल का सूबेदार रहा। उसके अधीन जोधपुर राज्य में मेड़ता, जैतारण, सोजत, जालोर, भीनमाल, सिवाणा, फलोदी, पोकरण, परगनों के अलावा बदनोर, केकड़ी, नारनोल, रोहतक आदि भी शामिल थे। उसके जीवनकाल में औरंगजेब मारवाड़ में न तो मन्दिर तोड़ सका और न मारवाड़ में जजिया लगा सका।

    सुप्रसिद्ध इतिहासकार मुहणोत नैणसी, जसवन्तसिंह का मंत्री था। मुहणोत नैणसी और उसके भाई सुन्दरदास पर गबन का आरोप लगा। जसवन्तसिंह ने उन दोनों को कैद कर उन पर एक-एक लाख रुपया जुर्माना कर दिया। वे दोनों भाई भी स्वाभिमानी थे। उन्होंने दण्ड का एक पैसा देना स्वीकार नहीं किया और पेट में कटार मारकर आत्महत्या कर ली। महाराज जसवन्तसिंह ने औरगांबाद के बाहर जसवन्तपुरा आबाद किया जिसमें एक सुन्दर बाग और संगमरमर का भवन बनवाया। आगरा के निकट राजपूत मुगल-शैली पर आधारित कचहरी भवन बनवाया। उसकी रानी अतिरंग दे ने जान सागर बनवाया जिसे शेखावतजी का तालाब कहते हैं। उसकी रानी जसवन्तदे (जिसने राजा के पराजित होकर लौटने पर महल के द्वार बन्द कर दिये थे) ने 1663 ई. में राईकाबाग, उसका कोट तथा कल्याण सागर तालाब बनवाया। इस तालाब को अब रातानाडा कहते हैं। जसवंतसिंह ने काबुल से अनार लाकर कागा के बाग में लगवाये।

    औरंगजेब जब दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसने जसवंतसिंह को कुचलने की बड़ी चालें चलीं किन्तु वह जसवन्तसिंह को नहीं दबा सका। अन्त में औरंगजेब ने उससे समझौता कर लिया और उसे गुजरात का सूबेदार बनाकर छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध सैन्य अभियान पर औरंगाबाद भेज दिया। जसवंतसिंह ने औरंगजेब और छत्रपति के बीच मध्यस्थता कर सुलह का प्रयास किया। औरंगजेब ने शिवाजी को दबाने के लिए शाइस्ता खाँ को भेजा तथा जसवंतसिंह को लिखा कि वह अपनी सेना लेकर गुजरात से दक्षिण में पहुंचे और शिवाजी के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता करे। महाराजा जूनागढ़ के फौजदार कुतुबखाँ को गुजरात में अपना प्रतिनिधि (नायब) नियत कर गुजरात से दक्षिण चले गए। महाराजा ने मराठों के अनेक किले छीन लिए। बादशाह की इच्छा थी कि जल्दी ही शिवाजी का सारा बल नष्ट कर दिया जाए। यह बात महाराजा को पसंद नहीं थी क्योंकि वह शिवाजी जैसे पराक्रमी हिंदू-महाराजा का बल नष्ट कर औरंगजेब जैसे धर्मान्ध नरेश को और अधिक उत्पात करने का मौका नहीं देना चाहता था। इस पर औरंगजेब ने जसवन्तसिंह को पठानों के विरुद्ध लड़ने के लिए काबुल भेज दिया और पीछे से उसके पुत्र पृथ्वीसिंह की हत्या करवा दी।

    28 नवम्बर 1678 को काबुल के मोर्चे पर जसवंतसिंह की मृत्यु हो गई। उसकी मौत का समाचार पाकर औरंगजेब ने कहा- ‘कुफ्र (पाप) का दरवाजा टूट गया। औरंगजेब की बेगम ने शोक व्यक्त करते हुए कहा- ‘आज शोक का दिन है क्योंकि साम्राज्य का दृढ़ स्तंभ टूट गया।’ इन दोनों ही उद्गारों में जसवन्तसिंह के विराट व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।

    महाराजा जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य को खालसा कर लिया। जब यह समाचार जमरूद (काबुल) पहुंचा तो मारवाड़ के सरदार जसवंतसिंह की रानियों को लेकर मारवाड़ की ओर चल दिये। मार्ग में उसकी दोनों रानियों ने एक-एक पुत्र दलथंभन और अजीतसिंह को जन्म दिया। दलथंभन की मृत्यु मार्ग में ही हो गई। औरंगजेब ने सरदारों को झांसा देकर रानियों को दिल्ली बुलवा लिया। वह बालक को मार डालना चाहता था। इसलिए राठौड़ दुर्गादास तथा खींची मुकन्ददास आदि सरदार, जसवन्तसिंह की रानियों और राजकुमार अजीतसिंह को वहां से निकालकर मारवाड़ ले आए और सिरोही जिले के कालन्द्री गांव में छिपाकर रखा। इस पर औरंगजेब ने अमरसिंह के पौत्र इन्द्रसिंह को खिअलत, निशान, हाथी और घोड़ा आदि देकर जोधपुर राज्य का राजा बना दिया।

    वीर दुर्गादास जीवन भर मुसलमानों से मोर्चा लेता रहा और अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा बनाने का प्रयास करता रहा। किसी कवि ने दुर्गादास की प्रशंसा इन शब्दों में की है-

    डंबक डंबल ढोल बाजै, दै दै ठोर नगारा की

    आसे घर दुर्गो नहीं होतो, सुन्नत होती सारां की।


    1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हुई तब अजीतसिंह ने जोधपुर राज्य पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद अजीतसिंह दुर्गादास से नाराज हो गया और उसे मारवाड़ से निकाल दिया। दुर्गादास कुछ दिन मेवाड़ में रहा और बाद में उज्जैन चला गया। 16 मई 1718 को दुर्गादास ने क्षिप्रा नदी के तट पर प्राण त्यागे। वहीं उसका अन्तिम संस्कार हुआ तथा ‘राठौड़ की छतरी’ के नाम से एक छतरी बनाई गई।

    अजीतसिंह (1707-1724 ई.) ने मण्डोर में एक थंभिया महल, जसवंतसिंह का स्मारक (जसवंतथड़ा), काला गौरा भैंरव, हड़बूजी पाबूजी तथा रामदेवजी की बड़ी-बड़ी मूर्तियां से युक्त वीरों की साल बनवाई। मेहरानगढ़ में दौलत खाना, फतह महल, जनाना महल बनवाए तथा देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनवाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कीं, जिनमें मुरली मनोहर, शिव-पार्वती, चतुर्भुज विष्णु और हिंगलाज देवी प्रमुख हैं। उसने जोधपुर परकोटे के भीतर घनश्यामजी का मंदिर तथा मूलनायक मंदिर का निर्माण करवाया। उसकी रानी राणावती ने झालरे के निकट शिखरबन्द मन्दिर और जाड़ेची ने चान्दपोल के बाहर एक बावड़ी बनवाई।

    अजीतसिंह को अपनी पुत्री का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखसीयर से करना पड़ा। बाद में अवसर पाकर अजीतसिंह ने फर्रूखसीयर की उसके ही महल में हत्या कर दी और अपनी बेटी को विधवा बनाकर जोधपुर ले आया। वह अप्रतिम विद्वान था। उसके लिखे ग्रंथों में गुणसागर, दुर्गापाठ भाषा, निर्वाण दूहा, अजीतसिंहजी रा कह्या दूहा एवं महाराजा अजीतसिंह जी रा गीत आदि प्रसिद्ध हैं। 23 जुलाई 1724 को जब महाराजा अजीतसिंह अपने महल में सो रहा था तब उसके दूसरे नम्बर के पुत्र बखतसिंह ने तलवार से उसकी हत्या कर दी। इस हत्या में जयपुर नरेश जयसिंह तथा अजीतसिंह के बड़े पुत्र अभयसिंह का भी हाथ था। अजीतसिंह के साथ 6 रानियां, 20 दासियां, 9 उड़दा बेगणियां, 20 गायनें तथा 2 हजूरी बेगमें सती हुईं। गंगा नाम की पड़दायत (उपपत्नी) भी राजा के साथ जलाई गई। अजीतसिंह के साथ उसकी भी हत्या हुई थी। कई बन्दर और मोर भी अपनी इच्छा से चिता में गिर-गिर कर जल गये जो राजा से विशेष स्नेह रखते थे। वह दिन जोधपुर में बड़े शोक, सन्ताप और हाहाकर का था।

    अजीतसिंह के ज्येष्ठ पुत्र अभयसिंह (1724-1749 ई.) को मुगल बादशाह ने ’राजराजेश्वर’ उपाधि से विभूषित किया। 1730 ई. में बादशाह, गुजरात के सुबेदार सरबुलंदखाँ से नाराज हो गया। उसने अजमेर तथा गुजरात के सूबा महाराजा अभयसिंह को दे दिये तथा उसे खिलअत, 18 लाख रुपए नगद और मय गोला-बारूद के 50 तोपें भी दीं। महाराजा अलवर होते हुए अजमेर पहुँचा और वहाँ पर अधिकार कर मेड़ता होता हुआ जोधपुर आया। कुछ दिनों बाद जब 20 हजार सवारों का रिसाला तैयार हो गया, तब वह सरबुलंद खाँ के विरुद्ध रवाना हुआ। बखतसिंह भी अपनी सेना लेकर अभयसिंह की सहायता के लिए आ गया। कुछ समय तक युद्ध होने के पश्चात् नींबाज ठाकुर ऊदावत अमरसिंह के माध्यम से महाराजा और सरबुलंद खाँ के बीच संधि हुई। उसने गुजरात का सूबा महाराजा को सौंप दिया और महाराजा ने उसे उसकी सेना के वेतन आदि के लिए एक लाख रुपए नगद और वहाँ से जाने के समय भार ढोने की गाड़ियाँ और ऊँट देने का वायदा किया। सरबुलंद खाँ, महाराजा के कैम्प में आकर मिला तथा महाराज की पगड़ी से अपनी पगड़ी बदली।

    अभयसिंह ने अपने भाई बखतसिंह को नागौर की जागीर दी तथा जोधपुर में अभय सागर तालाब, चौखा गांव का बगीचा, अजीतसिंह का देवल और मण्डोर का दरवाजा बनवाया। अहमदाबाद पर विजय प्राप्त होने पर उसने मेहरानगढ़ में फतहपोल का निर्माण करवाया। अभयसिंह के बाद उसका पुत्र रामसिंह राजा हुआ किंतु उसे बखतसिंह (1751-1752 ई.) ने जोधपुर से बाहर निकाल दिया। बखतसिंह ने जोधपुर शहर में नौचौकिया एवं मंडी बनवाई तथा दौलतखाना, लोहापोल और सूरजपोल की मरम्मत करवाई। कर्नल टॉड के अनुसार यदि बखतसिंह कुछ और वर्ष जीवित रहता तो सारे हिन्दूस्तान में राजपूत छा जाते किंतु दुर्भाग्यवश जयपुर नरेश ने उसकी हत्या करवा दी। इस काल तक मुगलों की पकड़ पूरी तरह ढीली पड़ गई थी।

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