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  • चित्रकूट का चातक - 8

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 8

    फिर से बादशाही

    भाग्य ने बाबर की शीघ्र ही फिर से सुधि ली। जब बाबर के शत्रु शैबानीखाँ ने कुन्दुज के शासक खुसरो शाह को हरा कर उसकी सेना भंग कर दी तो खुसरो शाह के चार हजार सैनिक पहाड़ों में छिपे हुए बाबर से आ मिले। यहीं से बाबर की खूनी ताकत ने फिर से जोर मारा। भाग्य से हाथ आयी सेना का बाबर ने जमकर उपयोग किया और तत्काल ही काबुल पर आक्रमण कर दिया। शीघ्र ही काबुल, गजनी और उनसे लगते हुए बहुत सारे क्षेत्र बाबर के अधीन आ गये। बाबर ने भाग्य को अपने अनुकूल जानकर पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग कर दिया और बादशाह की उपाधि धारण की।

    बादशाह बनने के बाद बाबर ने एक बार फिर से अपने बाप-दादों के राज्य पर अधिकार करने का प्रयत्न किया और ईरान के शाह से सहायता मांगी। ईरान के शाह ने शर्त रखी कि यदि बाबर सुन्नी मत त्याग कर शिया हो जाये तो उसे ईरान की सेना मिल जायेगी। बाबर की महत्वाकांक्षा ने बाबर को ईरान के शाह की बात मान लेने के लिये मजबूर किया और बाबर सुन्नी से शिया हो गया। इस अहसान का बदला चुकाने के लिये ईरान का शाह बड़ी भारी सेना लेकर बाबर की मदद के लिये आ गया। उसकी सहायता से बाबर ने समरकंद, बुखारा, फरगाना, ताशकंद, कुंदुज और खुरासान फिर से जीत लिये। यह पूरा क्षेत्र ट्रान्स ऑक्सियाना कहलाता था और इस सारे क्षेत्र में सुन्नी रहते थे। ईरान के शाह के साथ हुई संधि के अनुसार बाबर के लिये आवश्यक था कि वह ट्रान्स ऑक्सियाना के लोगों को शिया बनाये किंतु ट्रान्स ऑक्सियाना के निवासियों को यह मंजूर नहीं हुआ। जिसका परिणाम यह हुआ कि ईरान के शाह की सेना के जाते ही लोगों ने बाबर को वहाँ से मार भगाया।

    अब मध्य एशिया में बदख्शां ही एकमात्र ऐसा प्रदेश रह गया जिस पर बाबर का अधिकार था। इस एक प्रदेश के भरोसे बाबर ट्रान्स ऑक्सियाना में बना नहीं रह सकता था। उसने बदख्शां को खान मिर्जा नाम के आदमी की देखरेख में देकर ट्रान्स ऑक्सियाना छोड़ दिया। अपने बाप-दादों की जमीन से हमेशा के लिये नाता टूट जाने से उसका दिल बुरी तरह टूट गया था। वह बुरी तरह सिर धुनता हुआ अफगानिस्तान लौट आया।

    ट्रान्सऑक्सियाना के हाथ से निकल जाने पर बाबर ने अपना ध्यान अपनी अफगान प्रजा पर केंद्रित किया। बाबर के अधिकार में जो इलाका था उसमें यूसुफजाई जाति के लोग बड़ी संख्या में रहते थे। ये लोग बड़े झगड़ालू, विद्रोही और हद दर्जे तक बर्बर थे। वे किसी भी तरह के अनुशासन में रहने की आदी नहीं थे तथा किसी भी बादशाह को कर नहीं देना चाहते थे। बाबर ने उन्हें बलपूर्वक कुचलना चाहा किंतु इस कार्य में उसे सफलता नहीं मिली। पहाड़ी और अनुपजाऊ क्षेत्र होने के कारण बाबर इस क्षेत्र से इतनी आय भी नहीं जुटा पाया जिससे उसका गुजारा हो सके।

    जीवन भर की लड़ाइयों के चलते तुर्क, मंगोल, ईरानी, उजबेग और अफगानी लोग बाबर के खून के प्यासे हो गये थे इस कारण यह आवश्यक था कि उसके पास एक विशाल सेना रहे किंतु सेना को चुकाने के लिये वेतन का प्रबंध हो पाना अफगानिस्तान में रहते हुए संभव नहीं था। एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया से उसने भारत की सम्पन्नता और तैमूर के भारत आक्रमण की जो कहानियाँ सुनीं थीं वे अब भी उसके अवचेतन में घर बनाये हुए बैठी थीं। इसलिये इस बार उसने देवभूमि भारत में अपना भाग्य आजमाने का निर्णय लिया।

    इन सब से भी बढ़कर एक और चीज थी जो उसे अफगानिस्तान में चैन से बैठने नहीं दे रही थी। वह थी उसकी खूनी ताकत। आखिर उसके खून में चंगेजखाँ और तैमूर लंगड़े का सम्मिलित खून ठाठें मार रहा था! जो क्रूरता की सारी सीमायें पार कर नई मिसाल स्थापित करना चाहता था।

    कराकूयलू

    तुर्कों की कई प्रबल शाखायें हुई जिन्होंने अलग-अलग स्थानों पर अपने राज्य कायम किये। जो 'तुर्क' तुर्किस्तान से आकर ईरान में बस गये थे, उन्हें तुर्कमान कहा जाता था। तुर्कमानों का जो कबीला काली बकरियां चराता था वह 'कराकूयलू' कहलाता था। तुर्की भाषा में 'करा' काले को कहते हैं, 'कूय' माने बकरी और 'लू' का अर्थ होता है- वाले। इस प्रकार काली बकरियों वाले कराकूयलू कहलाये। सफेद बकरियां चराने वाले उनके भाई आककूयलू कहलाते थे। तुर्कों के कराकूयलू तथा आककूयलू कबीले अजरबैजान में निवास करते थे जो रूम और रूस की सीमाओं पर स्थित है।

    कराकूयलू वंश की कई शाखायें थीं जिनमें से एक प्रमुख शाखा थी- 'बहारलू'। मुगल अमीर तैमूर लंगड़े के समय में बहारलू शाखा में अली शकरबेग नाम का आदमी हुआ जिसके पास हमदान, देनूर और गुर्दिस्तान के इलाके जागीर में थे। यह जागीर 'अलीशकर बेग की विलायत' कहलाता था।

    अलीशकर बेग इतना नामी आदमी था कि जब इस क्षेत्र से तुर्कमानों का राज्य चला गया तब भी यह क्षेत्र अलीशकर बेग की विलायत कहलाता रहा। अलीशकर बेग का बेटा पीरअली हुआ। उसने अपनी बहिन का विवाह तूरान के शाह महमूद मिरजा से कर दिया और इस नाते वह शाह का अमीर हो गया। यहीं से बहारलू खानदान मुगल खानदान से जुड़ा। महमूद मिरजा फरगना के उसी मुगल शासक उमरशेख का बड़ा भाई था जिस उमरशेख के बेटे बाबर ने हिन्दुस्थान में मुगल शासन की नींव रखी।

    तूरान से महमूद मिरजा का राज्य खत्म होने के बाद पीरअली खुरासान चला गया। खुरासान के अमीरों ने पीरअली को शक्तिशाली समझ कर और आने वाले समय में अपने लिये प्रबल प्रतिद्वंद्वी जानकर उसकी हत्या कर दी। पीरअली का बेटा यारबेग हुआ। वह ईरान में रहता था। जब ईरान का वह क्षेत्र आककूयलू शाखा के हाथों से निकल गया तो यारबेग भाग कर बदख्शां आ गया और बदख्शां के कुन्दुज नामक शहर में रहने लगा। बदख्शां उस समय उमरशेख के बाप अबू सईद के अधीन था।

    जब उमरशेख बदख्शां का शासक हुआ था तब यारबेग कुन्दुज में ही रहता था। यारबेग के बेटे सैफ अली ने बदख्शां की सेना में नौकरी कर ली। सैफअली का बेटा बैरमबेग उमरशेख के बेटे बाबर की सेना में शामिल हो गया। जब 1513 ईस्वी में बाबर अंतिम बार बदख्शां से अफगानिस्तान के लिये रवाना हुआ तो कराकायलू शाखा का यह चिराग़ भी अपना भाग्य आजमाने के लिये बाबर के साथ लग लिया।

    देवभूमि की ओर

    बाबर को अपनी खूनी ताकत पर पूरा भरोसा था जिसके बल पर वह अपना भाग्य नये सिरे से लिख सकता था। वह यह भी जानता था कि भाग्य उसका पूरा साथ दे रहा है। यह भाग्य ही था जिसके कारण उन्हीं दिनों बाबर की दोस्ती उस्ताद अली नामक एक तुर्क से हुई उस्ताद अली कमाल का आदमी था। उसे बंदूक बनाने की कला आती थी और वह कुछ अन्य तरह का विस्फोटक जखीरा भी बनाना जानता था। बाबर ने उसकी बड़ी आवभगत की और उसकी मदद से अपने लिये नये तरह का असला तैयार किया। कुछ ही समय बाद बाबर ने एक और ऐसा चमत्कारी आदमी ढूंढ निकाला। इसका नाम मुस्तफा था। उसे तोप बनाना और उसे सफलता पूर्वक चलाना आता था। बाबर ने इन दोनों आदमियों की सहायता से अपने लिये एक शक्तिशाली तोपखाने का गठन किया।

    गोला-बारूद, बंदूकों और तोपखाने की शक्ति हाथ में आ जाने के बाद बाबर ने अपनी योजना पर तेजी से काम किया। उसने अपने आदमी पूरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया में फैला दिये जिन्होंने घूम-घूम कर प्रचार करवाया कि बाबर फिर से सुन्नी हो गया है और वह बहुत शीघ्र ही हिन्दुस्तान की बेशुमार दौलत लूटने के लिये हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने जा रहा है। हिन्दुस्तान से मिलने वाला सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात और खूबसूरत औरतें बाबर के सिपाहियों में बांटी जायेंगी।

    सैंकड़ों साल से बाबर के पूर्वज मध्य एशियाई बर्बर लड़ाकों की सेना लेकर हिन्दुस्तान पर हमला बोलते आये थे। उनके सैनिक जब हिन्दुस्तान से लौटते तो उनकी जेबें बेशुमार दौलत से भरी रहतीं। सोने-चांदी की अशर्फियाँ, हीरे-जवाहरात और कीमती आभूषण उन्हें लूट में मिलते थे। प्रत्येक सैनिक के पास दस-बीस से लेकर सौ-दौ सौ तक की संख्या में गुलाम होते थे जो बहुत ऊँचे दामों में मध्य एशिया के बाजारों में बिका करते थे। हिन्दुस्तान से लूटी गयी औरतें उनके हरम में शामिल रहती थीं। हिन्दुस्तान से लौटे हुए सैनिकों का सब ओर बहुत आदर होता था क्योंकि वे सैनिक कई-कई काफिरों को मारकर अपने लिये जन्नत में जगह सुरक्षित कर चुके होते थे और उनके घरों में हिन्दुस्थानी लौण्डियाएं काम करती थीं।

    चंगेजखाँ और तैमूरलंग के समय के किस्से अब भी मध्य एशियाई देशों में बहुत चाव से कहे और सुने जाते थे। जब उन लोगों ने सुना कि बाबर फिर से सुन्नी हो गया है और बहुत बड़ी सेना लेकर हिन्दुस्तान पर हमला करने जा रहा है तो मध्य एशिया के बेकार नौजवानों ने बाबर की सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया। बेशुमार दौलत और खूबसूरत औरतों के लालच में वे अपने घर-बार छोड़ कर अफगानिस्तान के लिये रवाना हो गये। जिन युवकों को उनके स्वजनों ने अनुमति नहीं दी वे भी रातों के अंधेरे में अपने घरों से भाग लिये। ये नौजवान रास्तों में नाचते-गाते और जश्न मनाते हुए अफगानिस्तान की ओर चले। देखते ही देखते बाबर की सेना में पच्चीस हजार सैनिक हो गये।

    गोला-बारूद, बंदूकों और तोपखाने से सुसज्जित पच्चीस हजार सैनिकों को देखकर बाबर की छाती घमण्ड से फूल गयी। वह जानता था कि इन पच्चीस हजार सैनिकों की ताकत उसके पूर्वज तैमूर के बरानवे हजार अश्वारोही सैनिकों से कहीं अधिक है। बाबर ने अपनी सात सौ तोपों को गाड़ियों पर रखवाया। उस्ताद अली को सेना के दाहिनी ओर तथा मुस्तफा को सेना के बायीं ओर तैनात करके स्वयं सेना के केन्द्र में जा खड़ा हुआ। इसके बाद उसने सेना को हिन्दुस्तान की ओर कूच करने का आदेश दिया। सैंकड़ों गाड़ियों को हिन्दुस्तान की ओर बढ़ता हुआ देखकर बाबर की खूनी ताकत हिलोरें लेने लगी। आज उसमें इतनी शक्ति थी कि वह दुनिया की किसी भी सामरिक शक्ति से सीधा लोहा ले सकता था। देवभूमि भारत को रौंदने का बरसों पहले देखा गया सपना शीघ्र ही पूरा होने वाला था।

    कोहिनूर

    बाबर ने भारत पर चार आक्रमण किये। उसका पहला आक्रमण ई.1519 में बाजोर (यह पंजाब में था। अब पाकिस्तान में चला गया है) पर हुआ। बाजोर में उसने जमकर कत्ले आम किया ताकि भारत में उसकी क्रूरता के किस्से उसी प्रकार फैल जायें जैसे कि तैमूरलंग के बारे में फैल गये थे। इसके बाद उसने भेरा और खुशाब पर भी हमला किया। भारी तबाही मचाकर वह यहीं से काबुल लौट गया। उसी साल उसने खैबर दर्रे के रास्ते से भारत में प्रवेश कर पेशावर पर हमला किया किंतु बदख्शां में उपद्रवों की सूचना मिलने पर वह पुनः लौट गया।

    ई.1520 में उसने पुनः बाजौर, भेरा, सियालकोट और सैयदपुर पर आक्रमण किया लेकिन कांधार में उपद्रव होने की सूचना पाकर वह फिर से अफगानिस्तान लौट गया। ई.1524 में उसने तीसरी बार भारत पर आक्रमण किया और लगभग पूरा पंजाब हथिया लिया। नवम्बर 1925 में वह आगे बढ़ा तथा बदख्शां से अपने बेटे हुमायूँ को भी बुला लिया। हुमायूँ बड़ा भारी लश्कर लेकर आया। यह समाचार पाकर दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के लालची अमीर बाबर की तरफ जा मिले। बाबर की सेना में पचास हजार सैनिक हो गये।

    दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी एक लाख सैनिक और एक हजार हाथियों के साथ बाबर का मार्ग रोक कर पानीपत के मैदान में खड़ा हो गया। अपनी फौज से दुगुनी शत्रु फौज को देखकर बाबर की खूनी ताकत घबराई नहीं। वह दूने जोश से पानीपत की ओर बढ़ा। बाबर ने तुलुगमा पद्धति का प्रयोग किया जिसमें सेना के किसी भी अंग को युद्ध के मैदान से निकाल कर शत्रु सेना के दायें अथवा बायें हिस्से पर अचानक हमला बोला जा सकता है। जब इब्राहीम लोदी की सेना तीन ओर से घिर गयी तब बाबर की तोपों ने आग उगलना आरंभ कर दिया। इब्राहीम लोदी के बीस हजार सैनिक आधे दिन में ही धराशायी हो गये और शेष मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

    ग्वालिअर का राजा वीर विक्रमाजीत अपने हिन्दू वीरों के साथ दिल्ली की मदद करने के लिये आया था। वह अंत तक मैदान में बना रहा और अपने साथियों सहित वीरगति को प्राप्त हुआ। इब्राहीम लोदी भी युद्ध के मैदान में ही मारा गया। दिल्ली पर मंगोलों का अधिकार हो गया। बाबर ने हुमायूँ को आगरा भेज दिया और स्वयं दिल्ली चला गया।

    कुछ दिन बाद बाबर अपने बेटे हुमायूँ से मिलने आगरा गया। हुमायूँ ने बड़े जोर-शोर से बाप का स्वागत किया और लूट में प्राप्त हजारों कीमती पत्थरों के साथ कोहिनूर हीरा भी भेंट किया। बाबर ने इस करामाती हीरे के बड़े किस्से सुने थे। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह खुद इस हीरे का मालिक होगा।

    इस जीत के बाद हिन्दुस्तान में अब तक लूटी गयी बेशुमार दौलत का बंटवारा किया गया। फरगा़ना, खुरासान, काशगर और ईरान से आये सिपाहियों को सोने-चांदी के आभूषण और बर्तन दिये गये। कीमती का़लीन, हीरे, जवाहरात, दास-दासी भी सिपाहियों की हैसियत के अनुसार बांटे गये। मक्का, मदीना, समरकन्द और हिरात जैसे तीर्थस्थानों को अमूल्य भेंटें भेजी गयीं। काबुल के प्रत्येक स्त्री-पुरुष और बच्चे को चांदी का एक-एक सिक्का भिजवाया गया। प्रत्येक सैनिक और शिविर रक्षक से लेकर निकृष्ट से निकृष्ट व्यक्ति तक को लूट का भाग प्राप्त हुआ।

    बाबर ने दिल्ली, आगरा और ग्वालियर से लूटी गयी अपार संपदा को इतने खुले हाथों से अपने साथियों में बांटा कि उसके अपने पास कुछ न रहा। उसके लोग उसे मजाक में कलंदर कहने लगे। यहाँ तक कि दुनिया का सबसे बड़ा हीरा कोहिनूर भी उसने अपने पास न रखकर हुमायूँ को दे दिया जो अब हुमायूँ की पगड़ी में जगमगा रहा था।


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  • चित्रकूट का चातक - 9

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 9

    काले पन्ने

    बाबर के सेनापति मीरबाकी के मन में हसरत थी कि वह हिन्दुस्तान में ऐसा कुछ करे जिससे सदियों तक उसका नाम इतिहास में याद रखा जाये। उसने अपने आदमियों से सलाह मशवरा किया कि ऐसा क्या किया जाये? कुछ लोगों ने सलाह दी कि जिस तरह चंगेजखाँ और तैमूरलंग ने खून की नदियाँ बहाकर इतिहास में अपनी जगह बनाई, उसी प्रकार मीरबाकी को हिन्दुस्तान में चंगेजखाँ और तैमूरलंग से भी अधिक खून की नदियाँ बहा देनी चाहिये। मीरबाकी को यह सुझाव अच्छा तो लगा किंतु इस काम के लिये विशाल सैन्य शक्ति की आवश्यकता थी और वह सैन्य शक्ति बाबर से मिल सकती थी। यदि बाबर से सेना लेकर वह काफिरों को मारता तो उसका श्रेय बाबर के नाम ही लिखा जाता। इसलिये मीरबाकी ने इस प्रस्ताव को छोड़ दिया।

    मीरबाकी के आदमियों में एक बूढ़ा और अनुभवी अमीर था। उसने मध्य ऐशिया में कई सैन्य अभियान किये थे। उसने मीरबाकी को सलाह दी कि यदि हिन्दुस्थान में सबसे बड़े कुफ्र को तोड़ा जाये तो संभवतः इतिहास में उसे सदियों तक याद रखा जायेगा। मीरबाकी को यह सलाह जंच गयी। उसने पता लगवाया कि हिन्दुस्थान में सबसे बड़ा धार्मिक स्थल कौनसा है। उसके आदमियों ने पता लगाया कि हिन्दू लोग अयोध्या के राजा रामचंद्र को भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं। अयोध्या में जिस स्थान पर उसका जन्म हुआ था वहाँ बड़ा विशाल मंदिर बना हुआ है जिसमें रामचंद्र के बुत की पूजा होती है। यूं तो हिन्दुस्थान में एक से एक बड़े मंदिर हैं किंतु भगवान का जन्मस्थल होने के कारण यह हिन्दुस्थान का सबसे आला दर्जे का मंदिर माना जाता है।

    मीरबाकी बाबर से आज्ञा लेकर कुफ्र मिटाने के लिये अयोध्या की ओर चला। जब भाटी नरेश महताब सिंह तथा हँसवर नरेश रणविजयसिंह को मीरबाकी के इरादों का पता चला तो वे भी मीरबाकी का मार्ग रोकने के लिये उससे पहिले अयोध्या पहुँच गये। उनका नेतृत्व हँसवर के राजगुरु देवीदान पांडे ने किया। सबसे पहले राजगुरु ने ही अपने आप को देवचरणों में अर्पित किया और वह तलवार हाथ में लेकर मीरबाकी के सैनिकों पर ऐसे टूट पड़ा जैसे सिंह भेड़ों के झुण्ड पर टूट पड़ता है। मीरबाकी इस ब्राह्मण की तलवार को देखकर थर्रा गया। मीरबाकी का साहस न हुआ कि वह तलवार हाथ में लेकर सम्मुख युद्ध के लिये मैदान में आये। उसने छिपकर देवीदान पांडे को गोली मारी। तब तक देवीदान मीरबाकी के सात सौ सैनिकों को यमलोक पहुँचा चुका था। (तुजुक बाबरी में इस संख्या का उल्लेख किया गया है।)

    राजगुरु का बलिदान देखकर महाराजा महताबसिंह और महाराजा रणविजयसिंह की आँखों में खून उतर आया। वे सिंह गर्जन करते हुए म्लेच्छ सेना को घास की तरह काटने लगे। अब तलवारों और बंदूकों से काम चलता न देखकर मीरबाकी ने तोपों का सहारा लिया। एक लाख चौहत्तर हजार हिन्दू सैनिक अपने आराध्य देव की जन्मभूमि के लिये बलिदान हो गये। (अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने लखनऊ गजट में यही संख्या दी है।)

    मीरबाकी ने हिन्दूसेना से निबट कर तोपों का मुँह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की ओर कर दिया। कुछ ही दिनों में मंदिर नेस्तनाबूद हो गया। मंदिर के मलबे से मीरबाकी ने अपने सैनिकों से उसी स्थान पर विशाल गुम्बदाकार मस्जिद का निर्माण करवाया और उसका नाम रखा बाबरी मस्जिद। मीरबाकी ने अपने आप को इतिहास में अमर कर देने के उद्देश्य से उस मस्जिद के सामने बहुत से शिलालेख लगवाये जो सैंकड़ों साल तक मीरबाकी के खूनी कारनामों की कहानी कहते रहे और हिन्दू इन शिलालेखों को पढ़-पढ़ कर आठ-आठ आँसू बहाते रहे। (ऐसा एक शिलालेख आज भी मौजूद है।)

    मीरबाकी और बाबर तो कुछ सालों बाद इस दुनिया से चले गये किंतु हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच विष का इतना विशाल वृक्ष लगा गये जिसकी हवा के गर्म झौंके सैंकड़ों साल से आज तक हिन्दुओं को झुलसा रहे हैं। पूरे चार सौ सालों से सैंकड़ों हिन्दू नरेश और लाखों हिन्दू वीर अपने आराध्य की जन्मभूमि को फिर से प्राप्त करने के लिये प्राणों की आहुतियाँ दे रहे हैं। इन युद्धों में मीरबाकी के बहुत से शिलालेख नष्ट हो गये किंतु इतिहास के काले पन्नों में मीरबाकी का नाम आज तक अंकित है।

    अस्सी घाव

    राजस्थान में मेवाड़ राजघराना धरती के सबसे पुराने राजवंशों में से है। यह वंश ईसा की पाँचवीं शताब्दी में गुहिल नाम के एक राजा से चला था जो रहस्यमयी शक्तियों का स्वामी था। एक हजार साल से यह राजवंश हिन्दू प्रजा एवं नरेशों के लिये आदरणीय बना हुआ था। पंद्रहवीं शताब्दी में रायमल इस वंश का उत्तराधिकारी हुआ। उसकी राजधानी चित्तौड़ थी। रायमल के तीन बेटे थे- पृथ्वीराज, जयमल और संग्रामसिंह। तीनों राजकुमार बड़े ही वीर, महत्वाकांक्षी और दुस्साहसी थे। एक दिन तीनों राजकुमारों ने एक ज्योतिषी को अपनी जन्मपत्रियां दिखाईं। ज्योतिषी ने कहा कि ग्रह तो पृथ्वीराज और जयमल के भी अच्छे हैं किंतु राजयोग संग्रामसिंह के हैं। इतना सुनते ही पृथ्वीराज और जयमल तलवार लेकर संग्रामसिंह पर टूट पड़े। पृथ्वीराज की तलवार की नोक संग्रामसिंह की आँख में जा घुसी।

    संग्रामसिंह भी तलवार निकाल कर दोनों भाईयों से मुकाबिले के लिये तैयार हो गया। ठीक उसी समय महाराणा रायमल का चाचा सारंगदेव वहाँ आया। उसने इस दुष्टता के लिये दोनों राजकुमारों की प्रताड़ना की और सुझाव दिया कि ज्योतिषी की बात का विश्वास करना ठीक नहीं है। इससे तो भीमल गाँव की देवी के मंदिर में सेवा करने वाली चारणी से निर्णय करा लो। जब तीनों राजकुमार अपने-अपने दल-बल सहित पुजारिन के पास पहुँचे तो चारणी ने भी संग्रामसिंह के राजा होने की घोषणा की। इतना सुनते ही एक बार फिर पृथ्वीराज और जयमल तलवार लेकर संग्रामसिंह पर टूट पड़े।

    इस बार सारंगदेव सावधान था। उसने दोनों राजकुमारों की तलवारों को अपनी तलवार पर रोका। पृथ्वीराज घायल होकर वहीं पृथ्वी पर गिर पड़ा और संग्रामसिंह घोड़े पर बैठकर भाग निकला। जयमल उसे मारने के लिये पीछे लपका किंतु संग्रामसिंह मेवाड़ राज्य से बाहर निकल गया और जयमल के हाथ नहीं आया।

    अपने भाई पृथ्वीराज से संग्रामसिंह को अपने शरीर पर लगने वाला पहला घाव मिला था जिससे उसकी एक आँख जाती रही थी। उसके बाद तो संग्रामसिंह को जीवन भर इन घावों का सामना करना पड़ा जिससे उसके शरीर पर घावों की संख्या अस्सी तक जा पहुँची थी। ये सब घाव एक से बढ़कर एक गंभीर थे।

    पिता के राज्य से निकाला जाकर संग्रामसिंह जंगलों में भटकने लगा। एक दिन जब वह एक पेड़ के नीचे सोया हुआ था तब श्रीनगर (अजमेर जिले में स्थित है।) का जागीरदार कर्मचंद वहाँ से निकला। मार्ग में एक अद्भुत दृश्य देखकर वह अपने घोड़े से नीचे उतर पड़ा। उसने देखा कि एक युवक पेड़ के नीचे सोया हुआ है और एक नाग उसके सिर पर फन फैलाये हुए छाया कर रहा है। (इस घटना का उल्लेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक उदयपुर राज्य का इतिहास में किया है।)

    करमसिंह ने संग्रामसिंह को जगाया और उसका परिचय पूछा। संग्रामसिंह का परिचय पाकर करमसिंह उसे आदरपूर्वक अपने घर ले गया और अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर लिया। जब यह बात राणा रायमल को पता लगी तो उसने संग्रामसिंह को चित्तौड़ बुलवा लिया। तब तक संग्रामसिंह के दोनों भाई मारे जा चुके थे।

    ई. 1509 में रायमल की मृत्यु हुई तो संग्रामसिंह चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा। वह अत्यंत वीर और उदात्त भाव का स्वामी था। मानवोचित गुण उसमें कूट-कूट कर भरे थे। इतिहास में उसे जितना आदर प्राप्त हुआ उतना आदर संसार में बहुत कम लोगों को प्राप्त है। भारत वर्ष के इतिहास में वह राणा सांगा के नाम से विख्यात हुआ। मेवाड़ के महाराणाओं में तो वह सबसे प्रबल हुआ ही, अपने समय का वह सबसे प्रबल हिन्दू सम्राट था। जिस समय वह मेवाड़ का स्वामी हुआ उस समय दिल्ली पर सिकंदर लोदी, गुजरात पर महमूद शाह बेगड़ा और मालवा पर नासिरशाह खिलजी शासन कर रहे थे। उन तीनों की आँख मेवाड़ पर लगी हुई थी। इसलिये वे तीनों ही सांगा के शत्रु हो गये।

    सांगा भी अपनी तरह का एक ही वीर था। उसने गुजरात तथा मालवा की ईंट से ईंट बजा दी और गुजरात तथा मालवा अपने राज्य में शामिल कर लिये। राणा की बढ़ी हुई शक्ति देखकर इब्राहीम लोदी राणा पर चढ़कर आया। हाड़ौती क्षेत्र में खातौली गाँव के पास राणा ने इब्राहीम लोदी (उस समय तक सिकंदर लोदी के स्थान पर इब्राहीम लोदी दिल्ली की गद्दी पर बैठ चुका था।) को रोका और उसमें जबर्दस्त मार लगायी। इब्राहीम लोदी किसी तरह अपनी जान बचाकर भागा किंतु उसके बेटे को सांगा ने पकड़ लिया। कुछ दिन बाद सांगा ने उसे भी आजाद कर दिया। इस युद्ध में राणा का एक हाथ कट गया और एक घुटने पर तीर लगने से वह सदा के लिये लंगड़ा हो गया।

    कुछ दिन बाद इब्राहीम लोदी ने फिर से राणा पर आक्रमण किया। इस बार भी राणा ने इब्राहीम लोदी को मार भगाया। इब्राहीम लोदी के कई हजार सिपाही मारे गये। जब मांडू के सुल्तान महमूद को पता चला कि राणा इब्राहीम लोदी के साथ उलझा हुआ है तो वह राणा के सामंत मेदिनीराय पर चढ़ बैठा। राणा ने इब्राहीम लोदी से निबट कर महमूद को जा घेरा और उसे गिरफ्तार करके चित्तौड़ ले आया। महमूद धूर्त आदमी था। उसने राणा के पैरों पर गिरकर क्षमा याचना की और विश्वास दिलाया कि भविष्य में कभी भी दुष्टता नहीं करेगा। राणा ने उसका आधा राज्य छीनकर उसे जीवित छोड़ दिया। महमूद स्वतंत्र होते ही राणा के विरुद्ध षड़यंत्र रचने में व्यस्त हो गया।

    राणा ने अपने शत्रुओं का जी भर कर मान मर्दन किया किंतु इन लड़ाईयों में उसके शरीर के हर हिस्से पर घाव लग गये। उसके शरीर पर कुल अस्सी घाव थे। वह एक आँख, एक हाथ और एक पैर से वंचित हो गया था किंतु उसकी शक्तियाँ अब भी उसके पास थीं। अपने पूर्वज गुहिल तथा ठक्कर बापा की तरह सांगा भी रहस्यमय शक्तियों का स्वामी था। वह संकल्प का धनी, अति उत्साही, उद्भट वीर और प्रखर बुद्धि युक्त था। पूरे मध्य युग में भारत भर में उसके जैसा और कोई दूसरा राजा नहीं था।

    प्रसाद

    - 'प्रसाद का अपमान! भाभीसा, आप तो स्वयं को भगवान की भक्त कहती हैं!' विक्रमादित्य ने चीख कर कहा।

    - 'यह प्रसाद नहीं है कुंअरजू! यह मांस है। हम इसे ग्रहण नहीं कर सकते।'

    - 'यह देवी को अर्पित किये गये भैंसे का मांस है। इस नाते यह प्रसाद है।'

    - 'भले ही यह देवी को अर्पित किया गया है किंतु यह है तो मांस ही।'

    - 'आप जानती हैं कि जब महाराणाजू को पता चलेगा कि आपने राजमहल की मर्यादा भंग की है और दशहरे के प्रसाद को मांस कहकर त्याग दिया है तो वे बहुत कुपित होंगे।'

    - 'मेरा पूरा विश्वास है कि राणाजू यह सुनकर कुपित नहीं होंगे।'

    मीरां की ओर से निरुत्तर होकर राजकुमार विक्रमादित्य ने अपने बड़े भाई युवराज भोजराज की ओर देखा ठीक उसी समय कुंवरानी मीरां ने भी अपने पति भोजराज की ओर देखा कुंअर भोजराज ने दोनों की ही आँखों में अपने लिये समर्थन की चाह देखी किंतु जहाँ कुंवरानी मीरां के नेत्रों में समर्थन प्राप्त करने का विनम्र अनुरोध था, वहीं विक्रमादित्य की आँखों में क्रोध की ज्वाला दहक रही थी।

    - 'क्यों न हम यह फैसला राणाजू से ही करवा लें!' भोजराज ने सुझाव दिया। वह जानता था कि विक्रम नीच है, जब तक राणाजू अपने मुख से निर्देश न करेंगे, यह पीछा छोड़ने वाला नहीं।

    - 'ठीक है, आज फैसला हो ही जाये।' विक्रमादित्य ने फुंकार कर कहा।

    तीनों ही व्यक्ति थोड़ी दूर बैठे राणाजी के पास गये। राणाजी तकिये का सहारा लेकर कुछ विश्राम करने का प्रयास कर रहे थे। पूरा का पूरा भैंसा तलवार के एक ही वार से काट डालने से उन्हें कुछ थकान सी हो आयी थी, अब वे पहले जैसे युवा नहीं रहे थे।

    - 'महाराणाजू! भाभीसा प्रसाद लेने से मना करती हैं।'

    - 'क्यों बनीसा! क्या देवर-भौजाई में फिर कोई लड़ाई हो गयी।'

    - 'नहीं राणासा, कोई लड़ाई नहीं हुई'

    - 'तो फिर आपके देवरसा आपकी शिकायत क्यों करते हैं?'

    - 'हमने देवरजू को कहा कि हम मांस नहीं खाते।'

    - 'लेकिन पुत्री यह मांस नहीं, भगवान का प्रसाद है।'

    - 'दाता! हम वही प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे हमारे आराध्य किशन कन्हाई ग्रहण करते हैं।'

    - 'तो ठीक है, आप हलुआ खाईये, प्रसाद में वह भी तो बना है।'

    - 'हाँ! हम वह प्रसाद ग्रहण कर लेंगे।'

    - 'लेकिन राणाजू भाभीसा कब तक अपनी मनमानी करेंगी? वे भिखारियों के साथ बैठकर गीत गाती हैं। जाने कौन-कौन लोग इनके महलों में आते हैं जिन्हें प्रसन्न करने के लिये आप पूरी-पूरी रात नाचती हैं। भाई साहब को तो राज परिवार की कोई मर्यादा का भान है नहीं। क्या उन्हें दिखायी नहीं देता कि मेवाड़ की भावी महाराणी बिना पर्दा किये पराये मर्दों के साथ उठती बैठती हैं?

    - 'आप जाइये कुंअर जू! मीरां अभी बच्ची है। समय आने पर हम उसे सब कुछ समझा देंगे।'

    - 'लेकिन राणाजी आज तो यह बेपर्दा होकर नाच रही है लेकिन कल को जब राज परिवार का हर सदस्य मर्यादा भंग करने पर उतारू हो जायेगा। तब क्या होगा?'

    - 'हमने कहा ना अब आप जाइये। आप अपनी बात कह चुके हैं।' राणा ने व्यथित होकर कहा।

    - 'लेकिन राणाजी.........!'

    - 'विक्रम!!' राणा ने आँख दिखाई तो विक्रम सहम गया। आगे के शब्द उसके मुँह में ही रह गये। वह लाल-लाल आँखों से कुंवरानी मीरां को देखता हुआ वहाँ से चला गया।

    - 'कुंअरजू!' विक्रम के जाने के बाद महाराणा ने भोजराज को सम्बोधित किया।

    - 'हाँ महाराणाजू!'

    - 'इस दुष्ट का ध्यान रखना। जब मैं न रहूंगा तो यह तुम्हें और मीरां को बहुत कष्ट देगा। दासी पुत्र बनवारी ने इसकी बुद्धि मलिन कर दी है। इसका मामा सूरजराज भी इसे उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ाता रहता है। यह अकारण ही अपने भाइयों से वैर करता घूमता है।' महाराणा ने दीर्घ साँस छोड़ते हुए कहा।

    मीरां अपने श्वसुर के माथे की धूल सिर में लगा कर अपने महल के लिये चली गयी। उस रात मीरां के महल से देर तक तानपूरे की आवाज आती रही। मीरां गा रही थी-

    हे री मैं तो प्रेम दीवाणी मेरा दरद न जाने कोय।

    सूली ऊपर सेज हमारी, किस विधि सोना होय।।

    गगन मण्डल पै सेज पिया की, किसी विधि मिलना होय।

    दरद की मारी बन बन डालूँ वैद मिला नहिं कोय।।

    मीरां की प्रभु पीर मिटै जब वैद साँवरिया होय।

    मीरां के कोमल कण्ठ से निकली स्वर माधुरी से चित्तौड़ के रजकण उसी प्रकार चैतन्य हो गये जिस प्रकार चंदन से चर्चित होने पर प्रस्तरों से भी सुगंध आने लगती है। महाराणा बहुत देर तक कुंवराणी के महलों के बाहर खड़ा उसके भजन सुनता रहा।


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  • चित्रकूट का चातक - 10

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 10

    प्रस्थान

    जब महाराणा सांगा ने देखा कि बाबर ने देखते ही देखते दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया तो सांगा को भारत के भाग्य की चिंता हुई उसने भारत भूमि से म्लेच्छों को मार भगाने का संकल्प ले रखा था और वह कई वर्षों से इब्राहीम लोदी को उखाड़ फैंकने की तैयारियां कर रहा था। जब उसने सुना कि बाबर मध्य एशिया से अपनी सेना लेकर भारत की ओर आ रहा है तो सांगा चुप होकर बैठ गया और बाबर तथा इब्राहीम लोदी के युद्ध का परिणाम आने की प्रतीक्षा करने लगा।

    उधर इब्राहीम लोदी से निबट कर बाबर की दृष्टि भी चित्तौड़ नरेश राणा सांगा की ओर गयी। वह जानता था कि सांगा ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध एक बड़ा लश्कर एकत्र कर रखा है। यह भी निश्चित था कि सांगा इस लश्कर का उपयोग बाबर के खिलाफ करेगा। वैसे भी इब्राहीम लोदी का साम्राज्य हाथ में आते ही बाबर के साम्राज्य की सीमायें सांगा के साम्राज्य से आ मिलीं थीं। इसलिये स्वाभाविक ही था कि अब दोनों ही अपनी-अपनी शक्ति का परिचय एक दूसरे से करवाते।

    यद्यपि चित्तौड़ में कुछ घटना चक्र ऐसा घूम गया था कि राणा का चित्तौड़ छोड़कर जाना उचित नहीं था। दुष्ट विक्रम राणा के गले की हड्डी बन गया था। कुंअर भोजराज के वीर गति प्राप्त कर लेने के बाद से तो विक्रम के हौंसले और भी बुलंद हो गये थे। विक्रम का मामा बूंदी का कुंअर सूरजमल भी उसके दुष्चक्रों में शामिल हो गया था। वह विक्रम को महाराणा का उत्तराधिकारी बनाने के लिये राजकुमार रतनसिंह को मारने की फिराक में रहता था जो कि भोजराज के बाद चित्तौड़ का उत्तराधिकारी था। दुर्भाग्य से विक्रम की माँ भी इन दुष्चक्रों में सम्मिलित हो गयी थी। इतना सब होने पर भी राणा ने राष्ट्र पर आयी विपत्ति को अपने घर की विपत्ति से बड़ा जानकर बाबर से दो-दो हाथ करना ही उचित समझा।

    महाराणा ने अपने अस्सी हजार (बाबरनामा में बाबर ने अपने सैनिकों की संख्या का कहीं उल्लेख नहीं किया है किंतु राणा सांगा के सैनिकों की संख्या 2 लाख 22 हजार बताई है।) सैनिकों के साथ गंभीरी नदी के तट पर स्थित खानुआ (अब यह धौलपुर जिले में है।) के मैदान में बाबर का मार्ग रोकने का निश्चय किया।

    एक दिन बहुत सवेरे ही महाराणी ने महाराणा के विस्तृत भाल पर केशर और कुमकुम का तिलक अंकित किया। महाराणा नंगी तलवार हाथ में लेकर अपने नीले घोड़े पर सवार हुआ। सैंकड़ों कण्ठ महाराणा की जय, मेवाड़ भूमि की जय, एकलिंगनाथ की जय बोलने लगे।

    - 'राणीसा।' अचानक ही राणा को कुछ याद हो आया। वह घोड़े से नीचे उतर गया।

    - 'हुकुम राणाजू।' राणा को घोड़े से नीचे उतरता देखकर महाराणी का कलेजा काँप गया। युद्ध पर जाते समय विदा लेकर भी अश्व पर से उतर जाना मंगल शगुन नहीं।

    - 'हम चाहते हैं कि आज युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय कुंवराणी मीरां भी हमारा तिलक करें। जाने क्यों हमारा मन उनके लिये भर-भर आता है।'

    - 'लेकिन युद्ध पर जाते समय विधवाओं का मुख नहीं देखा जाता राणाजू।'

    -'राणीसा!' राणा ने रुष्ट होकर कहा।

    - 'क्षमा करें राणाजू। आप कुंवराणी के हाथों से तिलक करवा कर ही रण भूमि में पधारें।' जब श्वेत वस्त्र पहने और हाथ में तानपूरा लिये कुंवराणी मीरां राणाजू के सम्मुख उपस्थित हुई तो राणा के नेत्रों से जल की धारा बह निकली। मीरां चीख मारकर श्वसुर के पैरों में गिर गयी।

    - 'महाराणीसा।' राणा ने अश्रुओं से भीग आये अपने श्वेत श्मश्रुओं को पौंछते हुए कहा।

    - 'हुकुम राणाजू।' महाराणी की आँखें भी आज पुत्र भोजराज को स्मरण कर भर आयी थीं। यदि आज वह होता तो पिता के अश्व की वल्गा पकड़ कर उनके आगे-आगे चलता।

    - 'कुंअर भोजराज नहीं रहे। हम भी मोर्चे पर जाते हैं। कुंअर रतनसिंह भी हमारे साथ हैं। कौन जाने हम लोगों का फिर लौटना हो या न हो। इस चित्तौड़ को हम मीरां के भरोसे छोड़े जाते हैं और मीरां को तुम्हारे। मीरां के चरणों की धूल से मेवाड़ भूमि धन्य हो गयी है। हमारा पूरा कुल पवित्र हो गया है। यह मेड़तनी हमारी धरोहर है। इसका प्राणों से भी अधिक ध्यान रखना। दुष्ट विक्रम इसे त्रास न दे। नहीं तो हम जहाँ कहीं भी होगें हमारी आत्मा को कष्ट पहुँचेगा।'

    युद्ध पर जाते हुए वृद्ध पति की यह मनोभावना देखकर महाराणी का मन पिघल गया। उसने श्वसुर के कदमों में पड़ी मीरां को उठाकर छाती से लगा लिया।

    - 'अपने प्राण देकर भी इसकी रक्षा करूंगी नाथ।' महाराणी ने आँखों में आँसू भर कर कहा।

    महाराणी के वचनों से आश्वस्त होकर महाराणा फिर से अश्वारूढ़ हुआ।

    खानुआ

    अरावली की उपत्यकाओं से निकलने वाली गंभीरी नदी की विपुल जल राशि आज भले ही काल के गाल में समा चुकी है किंतु उन दिनों अपने नाम के अनुरूप सचमुच ही वह गहन गंभीर नदी थी। इस नदी के पुनीत जल में सहस्रों प्रकार के मत्स्य और कश्यप दिन रात अठखेलियाँ किया करते थे।

    गंभीरी के तट पर खानुआ का विस्तृत मैदान स्थित था। अब तो इस मैदान का अधिकांश भाग खेतों में विलीन हो गया है किंतु उन दिनों यह सम्पूर्ण क्षेत्र निर्जन तथा रिक्त प्रायः था। इस मैदान में परस्पर डेढ़ मील की दूरी पर मध्यम ऊँचाई की दो पहाड़ियाँ हैं। महाराणा ने इनमें से एक पहाड़ी की टेकरी पर अपने अस्सी हजार सैनिकों के साथ डेरा जमाया और बाबर की प्रतीक्षा करने लगा।

    जब बाबर की सेना बयाना के पास पहुँची तो राणा ने उसके अर्धसभ्य (कर्नल टाड ने बाबर के सैनिकों को अर्धसभ्य लिखा है।) सैनिकों में जमकर मार लगायी। इस जबर्दस्त मार से बाबर के सैनिक भाग छूटे। उसके कई सैनिक मर गये। इससे बाबर की सेना में सांगा का आतंक छा गया। अब वे शौच जाने के लिये भी इक्के दुक्के न निकलते। सिपाहियों के इस खौफ को देखकर बाबर ने जौनपुर से हुमायूँ को भी बुला लिया।

    भारत में बहुत से मुसलमानों के बाबर की सेना में भर्ती हो जाने पर भी बाबर के अधिकृत सैनिकों की संख्या पच्चीस हजार से बढ़कर चालीस हजार ही हो पायी थी किंतु बहुत से बर्बर लुटेरे एवं डाकू भी भेष बदल कर बाबर के लश्कर में जा मिले थे ताकि जब लड़ाई हो तो वे भी लूटमार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले सकें।

    जब बाबर धौलपुर पहुँचा तो उसने धौलपुर के कमलबाग में बने हुए विशाल सरोवर को देखकर अपने सिपाहियों से कहा- 'यदि तुम राणा को परास्त कर दोगे तो मैं इस सरोवर को शराब से भरवा दूंगा।'

    यह घोषणा भी उसके सैनिकों में उत्साह न भर सकी। ज्यों-ज्यों बाबर अपने सैनिकों के मन से राणा का भय भुलाने का प्रयास करता था, त्यों-त्यों बाबर के सैनिकों के मन में सांगा का आतंक गहराता जाता था। सांगा की बहादुरी के अनेक किस्से बाबर की सेना में फैल गये और उन्होंने राणा की सेना से लड़ने से इंकार कर दिया। वे वापिस अपने घर जाने की मांग करने लगे। सेना द्वारा हथियार डाल देने पर भी बाबर की खूनी ताकत ने हार नहीं मानी।

    उसने एक योजना बनाई और अपने विश्वस्त आदमियों से कहा कि किसी तरह कुछ हिन्दू सिपाहियों के सिर काट लायें। जब बाबर के सैनिक कुछ हिन्दू सैनिकों को एकांत में पाकर धोखे से उनका सिर काट लाये तो बाबर ने अपनी सेना को एक विशाल मैदान में इकट्टा किया और स्वयं एक ऊँचे स्थान पर खड़ा हो गया।

    उसने हिन्दू सैनिकों के कटे हुए सिरों को ठोकरें मारते हुए बड़ा जोशीला भाषण दिया- 'जिन काफिरों को हमारे बाप-दादे और हम स्वयं पैरों से ठोकरें मारते आये हैं उनसे भय कैसा? हिन्दुस्थान में अब तक हमने जीत ही जीत हासिल की है और हर जगह बेशुमार दौलत और गुलाम हासिल किये हैं। यह आखिरी लड़ाई है। इसके बाद हिन्दुस्थान में हमारा मुकाबला करने वाला कोई नहीं होगा। यदि हम जीत गये तो हमें हिन्दुस्थान का राज्य मिलेगा और यदि मारे गये तो जन्नत में हूरें मिलेंगी। इस लड़ाई के बाद जो सिपाही घर जाना चाहेगा, उसे जाने दिया जायेगा।'

    अपने भाषण के दौरान उसने अपने कीमती शराब के प्याले तथा कुरान मंगवायी। शराब के प्यालों को उसने अपने पैरों से कुचल कर तोड़ डाला और कुरान पर हाथ रखकर कसम खाई- 'जब तक मैं काफिरों पर जीत हासिल नहीं कर लूंगा तब तक शराब और स्त्री को हाथ नहीं लगाऊंगा तथा अब जीवन में कभी भी दाढ़ी नहीं बनाऊंगा।'

    इस नाटक का सिपाहियों पर जादू जैसा असर पड़ा। उन्होंने भी कुरान पर हाथ रखकर अपनी-अपनी पत्नी के परित्याग की घोषणा की। उन्होंने अंत तक बाबर का साथ देने का वचन दिया और वे खानुआ चलने को तैयार हो गये।

    जिस दिन बाबर का मुख्य सेनापति अपने प्रथम सैनिक दस्ते के साथ खानुआ पहुँचा उसी दिन राणा सांगा ने बाबर पर आक्रमण किया। बाबर के कई नामी गिरामी सेनापति उस युद्ध में मारे गये। कुछ को सांगा ने कैद कर लिया। बाबर की सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई सांगा के सैनिकों ने उसका पीछा किया और उन्हें दो मील दूर तक खदेड़ दिया। बाबर ने अतिरिक्त सेना भेजी किंतु वह भी कुछ नहीं कर सकी।

    सैनिकों में एक बार फिर सांगा का आतंक फैल गया और शपथ का जोश तिरोहित हो गया। वे फिर से अपने देश लौटने की मांग करने लगे। इतना होने पर भी बाबर की खूनी ताकत हार मानने को तैयार नहीं थी। उसने अपने पूरे लश्कर को एक साथ खानुआ कूच करने का आदेश दिया। गंभीरी नदी के तट पर स्थित दूसरी पहाड़ी पर बाबर ने अपना पड़ाव डाला। राणा की पहाड़ी यहाँ से मात्र दो मील की दूरी पर थी।

    राणा के विशाल लश्कर को देखकर इस बार स्वयं बाबर के भी छक्के छूट गये। उसे लगा कि शत्रु को भुजबल से नहीं जीता जा सकता है, इसके लिये बुद्धि बल का सहारा लेना होगा। उसने राणा के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया। राणा को पूरी उम्मीद थी कि बाबर की ओर से यह शैतानी भरा प्रस्ताव अवश्य आयेगा। राणा जानता था कि मुहम्मद गौरी ने भी इसी तरह छल करके महाराज पृथ्वीराज चौहान को परास्त किया था। अतः राणा ने बाबर का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। बाबर के समक्ष युद्ध के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचा।

    पूरे पन्द्रह दिन तक बाबर गंभीरी के तट पर बैठा सिर धुनता रहा और केवल एक ही बात पर विचार करता रहा कि किस तरह इस मैदान से वह सम्मान पूर्वक लौट जाये। बाबर के अमीरों ने एक योजना बनाई जिसके अनुसार उन लोगों को तलाशा गया जो राणा का साथ छोड़कर बाबर की ओर आ सकते थे। सांगा की ओर से दो मुस्लिम सेनापति- अलवर का सुल्तान हसनखाँ मेवाती तथा अलहदी भी मैदान में मौजूद थे। बाबर के आदमियों ने उन दोनों से सम्पर्क किया। वीर हसनखाँ मेवाती ने गद्दारी करने से मना कर दिया लेकिन अलहदी लालच में फंस गया। उसे बाबर के अमीरों ने बड़े सब्ज बाग दिखाये। अलहदी ने बाबर से कहा कि आप निर्भय होकर राणा पर आक्रमण करें, मैं ऐन वक्त पर आपसे आ मिलूंगा। अलहदी ने अपने आप को राणा के हरावल (सेना का अग्र भाग।) में रखा ताकि उसे भागने में सुविधा रहे।

    17 मार्च 1527 को प्रातः साढ़े नौ बजे मारवाड़ के राव गांगा ने बाबर की सेना पर पहला गोला दागा। वह अपने सात हजार सैनिकों को लेकर सांगा की सेवा में उपस्थित हुआ था। किसी तरह हिम्मत जुटा कर बाबर की सेना युद्ध के मैदान में कूद पड़ी। युद्ध आरंभ होते ही अलहदी अपनी सेना के साथ बाबर से जा मिला। अलहदी की इस गद्दारी से हिन्दुओं का सारा गणित गड़बड़ा गया। फिर भी हिन्दुओं ने बाबर की तोपों की परवाह न करके बाबर को उसके मध्यभाग में जा घेरा जिससे युद्ध का पलड़ा शुरू से ही हिन्दुओं के पक्ष में हो गया।

    ऐसा भयानक युद्ध भारत के इतिहास में अब तक नहीं हुआ था। युद्ध लगातार बीस घण्टे तक चलता रहा। बाबर निराश हो गया। उसने युद्ध के मैदान में ही अपने प्रमुख सेनापतियों को बुलाया और उन्हें कुरान शरीफ का हवाला देकर अपने प्राण झौंक देने के लिये कहा। उस्ताद अली और मुस्तफा ने सिर पर कफन बांधा और अपने तोपखाने से मौत उगलने लगे।

    जैसे समुद्र में लहर पर लहर चली आती है, उसी प्रकार हिन्दू सैनिक बाबर पर चढ़ दौड़े किंतु तीन दिशाओं से होने वाली बारूद वर्षा ने हिन्दू वीरों के परखचे उड़ा दिये। डूंगरपुर का रावल उदयसिंह अपने दो राजकुमारों सहित मारा गया। सलूम्बर का राव रतनसिंह अपने तीन सौ चूण्डावतों सहित खेत रहा। मारवाड़ का राठौड़ राजकुमार रायमल और मीरांबाई के पिता रतनसिंह अपने मेड़तिया सरदारों सहित वीरगति को प्राप्त हुए। सोनगरा सरदार रामदास, झाला सरदार ओझा, परमार गोकुलदास, चौहान मानक चंद्र तथा चौहान चन्द्रभान सहित सैंकड़ों सेनानायक अपने आदमियों सहित युद्धभूमि में तिल-तिल कर कट मरे। वीर हसनखाँ मेवाती ने तलवार के वो जौहर दिखाये कि बाबर को दिन में तारे दिखाई देने लगे। वह अपने दस हजार आदमियों सहित युद्ध क्षेत्र में कट मरा। इब्राहीम लोदी का बेटा महमूद लोदी भी युद्ध भूमि में ही मारा गया। इस युद्ध में वह अपनी पुरानी शत्रुता भुला कर सांगा की ओर से लड़ा था।

    इसी बीच राणा सांगा सिर में तीर लग जाने से बुरी तरह जख्मी हो गया। झाला अज्जा ने राणा के प्राण बचाने के लिये राणा के राजकीय चिह्न उठाकर अपने सिर पर धर लिये। बाबर की सेना झाला अज्जा को ही राणा समझकर सरमरांगण में उसकी ओर चढ़ दौड़ी। वीर झाला स्वामी के प्राणों की रक्षा के लिये रणभूमि में ही टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गया। भारत का इतिहास स्वामी के प्राणों की रक्षा के लिये अपना जीवन न्यौछावर कर देने वाले वीर झाला जैसे सेवकों की गाथाओं से भरा पड़ा है।

    मूर्च्छित राणा को उसके सरदार युद्ध के मैदान से उठा कर ले गये और बसुआ (यह स्थान जयपुर जिले में है।) के पास की पहाड़ियों में जाकर छिप गये। जब राणा को होश आया तो उसने अपने आदमियों को फटकारा- 'जब तक फरगाना से आया शत्रु जीवित है तब तक चित्तौड़ लौट जाने में तुमको लाज नहीं आती? क्यों तुम मेरे और अपने प्राण लेकर युद्धभूमि से भाग आये? चलो फिर वहीं चलो। शत्रु को मारो या फिर स्वयं मर मिटो। यदि हम इस तरह चित्तौड़ लौटे तो हमारी स्त्रियां हमारा उपहास उड़ायेंगी। हमें कायर और भगोड़ा कहेंगी। सरदारों ने राणा को बताया कि युद्ध समाप्त हो चुका है और बाबर के सैनिक ढूंढ-ढूंढ कर हिन्दू सैनिकों को मार रहे हैं। ऐसी स्थिति में मुट्ठी भर सैनिकों को साथ लेकर बाबर के सामने जाना ठीक नहीं है। जब सेना फिर से इकट्ठी हो जायेगी तब बाबर से निबट लिया जायेगा।

    राणा ने सरदारों की बात नहीं मानी। वह फिर से रणभूमि में जाने की जिद्द करने लगा। राणा का प्रण देखकर कुछ धोखेबाज सरदारों ने उसे मार्ग में जहर दे दिया जिससे राणा की मृत्यु हो गयी और हिन्दुस्थान पर बाबर का अधिकार हो गया।

    खानुआ का मैदान मार लेने के बाद बाबर ने अपने सिपाहियों से कहा कि जो सिपाही काफिरों के जितने सिर काट कर लायेगा, उसे सोने की उतनी ही अशर्फियां दी जायेंगी। मुगल सिपाही भागती हुई हिन्दू सेना के पीछे लग गये। अशर्फियों के लालच में हर सिपाही ज्यादा से ज्यादा सिर काटना चाहता था। कुछ ही दिनों में भारत की सड़कों पर विचित्र नजारा देखने को मिला। हजारों मंगोल और अफगान सिपाही अपने घोड़ों पर हिन्दुओं के कटे हुए सिरों को ऐसे बांधकर ले जाते हुए दिखाई दिये मानो तरबूज अथवा मटकियां बेचने के लिये ले जाये जा रहे हों।

    लोग इन दृश्यों को देखकर कांप उठे। वे अपने घरों को छोड़कर जंगलों में जा छिपे। मंगोलों और अफगानों ने वहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। बाबर ने उसी पहाड़ी पर इन कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाईं जिस पर कुछ दिन पहले तक राणा की सेना पड़ाव डाले हुए थी। हर मीनार को ठोकरों से गिरा कर बाबर ने प्रपितामह तैमूर की आत्मा की शांति के लिये दुआएं मांगीं।

    इस भयानक नर संहार को देखकर गुरुनानक देव की आत्मा हा-हा कार कर उठी उन्होंने लिखा-

    ''खुरासान खसमाना किया, हिंदुस्तान डराया

    आप दोष न दईं करना जम कर मुगल चढ़ाया

    ऐनी मार पई करलाणे, तैं की दरद न आया?''

    (अर्थात् हे परमात्मन्! तू ने खरासान अर्थात् बाबर के देश को तो सुरक्षित रखा और हिन्दुस्थान को भयाक्रांत कर दिया। यहाँ इतना अत्याचार हुआ कि सारी मानवता त्राहिमाम कर उठी, किंतु हे कृपा करने वाले! तेरा मन नहीं पसीजा?)

    लाखों हिन्दुओं के सिरों को अपनी ठोकर से गिराकर बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की। (गाजी का अर्थ होता है बिजली गिराने वाला। जब 1857 में अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को दिल्ली के लाल किले से बेदखल करके रंगून भेज दिया, तब बाबर के वंशजों ने इस उपाधि को धारण करना बंद किया।) उसने सचमुच हिन्दुओं पर गाज गिराई। पूरे 331 वर्ष तक बाबर के वंशज यह उपाधि धारण करते रहे।


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  • चित्रकूट का चातक - 11

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 11

    चालीसवाँ सिपाही

    बैरमबेग

    बाबर अपना टूटे हुए दिल में नाउम्मीदियों का समुद्र भर कर ट्रांसआक्सियाना से अफगानिस्तान लौटा था। उसे लगता था कि अपने बाप दादाओं की जमीन से उसे सिवाय अपमान और धोखे के कुछ नहीं मिला था लेकिन वह नहीं जानता था कि इस बार वह बदख्शां से ऐसा कीमती हीरा अपने साथ ले जा रहा है जो एक दिन उसके वंशजों का भाग्य बदल देगा। यह कीमती हीरा बैरमबेग (तुर्की भाषा में 'बेग'का अर्थ होता है सरदार और 'खां' माने बादशाह) था जो बाबर की सेना में शामिल होकर अपना भाग्य आजमाने के लिये बदख्शां छोड़कर बाबर के साथ हो लिया था।

    बैरमबेग अपना भाग्य आजमाने के लिये बाबर के साथ बदख्शां अफगानिस्तान और अफगानिस्तान से हिन्दुस्थान आया लेकिन बाबर के समक्ष उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिला। हिन्दुस्थान में आकर बाबर एक के बाद एक लड़ाईयाँ जीतता रहा किंतु बैरमबेग बाबर के लिये सामान्य सिपाही की तरह लड़ता रहा।

    बाबर की मृत्यु के बाद ई. 1530 में हुमायूँ हिन्दुस्तान का बादशाह हुआ। बैरामबेग तब भी इतिहास के नेपथ्य में बना रहा। इतिहास के पन्नों में बैरमबेग का पहली बार उल्लेख तब होता है जब हूमायूँ ई. 1535 में गुजरात के बादशाह सुल्तान बहादुर को चार महीने से चांपानेर के दुर्ग में घेर कर बैठा हुआ था।

    एक दिन जब सेना किले के मुख्य दरवाजे पर जोर आजमाइश कर रही थी, हुमायूँ ने कुछ मामूली सिपाहियों को अपने साथ लिया और घोड़े पर चढ़कर चांपानेर किले का चक्कर लगाया। हुमायूँ किले के ऊँचे परकोटे को देखकर हैरान था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस दुर्ग में वह कैसे घुसे! एक स्थान पर उसने देखा कि दुर्ग की दीवार मात्र साठ गज ऊँची है। हुमायूँ ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि किले की दीवार पर एक-एक गज की ऊँचाई से खूंटियाँ गाढ़ी जायें।

    किले के भीतर के सैनिकों का सारा ध्यान उस समय किले के मुख्य दरवाजे पर था, इसलिये वे किले के पिछवाड़े में होने वाली आकस्मिक कार्यवाई को जान नहीं सके। जब खूंटियाँ गढ़ चुकीं तो हुमायूँ ने सैनिकों को उपर चढ़ने का आदेश दिया। उस समय तक रात हो चुकी थी। हुमायूँ के सिपाही एक-एक करके खूंटियों पर चढ़ने लगे। जब उनतालीस सैनिक खूंटियों पर चढ़ चुके तो हुमायूँ ने चालीसवें सिपाही को रुकने का संकेत किया और स्वयं खूंटी पर चढ़ने लगा। चालीसवाँ सिपाही बैरमबेग था। भाग्यलक्ष्मी ने उस पर प्रसन्न होने के लिये मानो वही रात, वही समय और वही स्थान चुना था!

    जब हुमायूँ ने बैरमबेग को रुकने का संकेत किया तो बैरमबेग ने प्रतिवाद किया- 'बादशाह सलामत! जब तक सबसे पहला सैनिक किले में न कूद जाये और जब तक मैं किले की दीवार पर चढ़कर आपको आवाज न दूँ तब तक आपको खूंटी पर नहीं चढ़ना चाहिये।'

    बादशाह ने चालीसवें सिपाही की बात मान ली। बैरमबेग खूंटियों पर चढ़ता हुआ परकोटे पर पहुँच गया। वहाँ से उसने संकेत किया कि बादशाह सलामत खूंटी पर चढ़ सकते हैं। बादशाह ने किले में आकर पहली बार उस अनजाने सिपाही पर भरपूर नजर डाली। चांदनी के उजाले में पहली ही नजर में बादशाह को चालीसवाँ सिपाही जंच गया। सचमुच ही वह रात बैरमबेग की थी। उसके बुद्धि चातुर्य से हुमायूँ ने मात्र तीन सौ सिपाहियों के बल पर उसी रात फतह हासिल कर ली।

    किला हाथ में आते ही हुमायूँ ने जीत का बड़ा भारी जलसा किया। अपने दादा उमरशेख की भांति वह भी एक अय्याश आदमी था। सुरा और सुंदर स्त्रियाँ उसकी कमजोरी थीं। कहना आवश्यक न होगा कि साधारण सिपाही की हैसियत रखने वाले बैरमबेग को इस जलसे के दौरान अमीर का दर्जा मिल गया। अब वह बेरमबेग के स्थान पर बैरामखाँ कहलाने लगा।

    विषपान

    राणा सांगा की सारी आशंकायें सही सिद्ध हुई थीं। वह स्वयं युद्ध भूमि से लौट कर फिर कभी चित्तौड़ नहीं आया। उसके बाद रतनसिंह मेवाड़ का राणा हुआ किंतु वह भी बूंदी के राजा सूरजमल के हाथों मारा गया। उसके बाद मात्र चौदह वर्ष का दुर्बुद्धि बालक विक्रमादित्य मेवाड़ का राणा हुआ। उसने अपनी सेवा में सात हजार पहलवान नियुक्त कर लिये जिनके बल पर वह हर समय छिछोरपना करता रहता था और अपने सरदारों की हँसी उड़ाया करता था।

    विक्रमादित्य ने मेवाड़ का शासन हाथ में आते ही अपनी बड़ी भौजाई मीरांबाई पर अत्याचार करने आरंभ किये। जब तक सांगा जीवित था और उसके बाद रत्नसिंह जीवित था, तब तक तो विक्रमादित्य का साहस मीरांबाई की ओर हाथ बढ़ाने का नही हुआ किंतु अब बात दूसरी थी। अब वह महाराणा था और जो चाहे सो कर सकता था।

    उसने मीरांबाई के महल से गिरधर गोपाल का विग्रह चोरी करवा लिया और उसे जमीन में गड़वा दिया। उसके बाद दासी को बुलवाकर कहा- 'यह प्याला उस भिखमंगी को ले जा कर देना और कहना की राणाजू ने तेरे किशन गोपालजी को अपने कक्ष में बुला लिया है और उनका चरणामृत भिजवाया है।' दासी कांपते हाथों से प्याला लेकर महल से बाहर हो गयी।

    दासी ने किसी तरह साहस करके मीरांबाई के महल में प्रवेश किया। भय के मारे उसके नेत्र मुंदे पड़ते थे। पैर लड़खड़ाते थे और हाथों का प्याला लगातार कांपता था। फिर भी उसे स्वामी के आदेश का पालन तो करना ही था।

    - 'लो कुंवरानीजी।' किसी तरह रुंधे कण्ठ से दासी ने कहा और प्याला मीरांबाई के हाथों में रख दिया।

    - 'क्या है यह?'

    - 'महाराणा ने भिजवाया है और कहलवाया है कि राणाजू ने आपके किशन गोपालजी को अपने कक्ष में बुला लिया है और उनका चरणामृत भिजवाया है।'

    - 'क्या कहती है? गिरिधर गोपाल तो अपने मंदिर में विराजमान हैं।' मीरांबाई ने अचंभित होकर कहा।

    दासी ने मंदिर में जाकर देखा, गिरिधर गोपाल जी अपने स्थान पर विराजमान हैं। उनके अधरों पर वही मुरली धरी है जिसे अभी-अभी वह राणा के महल में देख आयी थी। दासी बुरी तरह डर गयी। यह क्या माया है। गिरिधर गोपाल को तो राणा ने अपने महल के पिछवाड़े की भूमि में गढ़वा दिया है। फिर ये यहाँ कैसे हो सकते हैं? प्याला अभी तक दासी के हाथों में था। उसने कहा- 'जानती हैं इसमें क्या है?'

    - 'तू ही तो कह रही है कि गिरिधर गोपाल का चरणामृत है।'

    - 'नहीं कुंवरानीजी, इसमें हलाहल भरा है। मेरे सामने राणाजी ने भरा है, वे चाहते हैं कि आप इसे पी लें।' बात पूरी करते करते दासी रो पड़ी।

    - 'अच्छा! ला इधर दे।' मीरां ने प्याला दासी के हाथ से ले लिया और एक ही साँस में पी गयी।

    - 'अरे रे! यह क्या गजब किया आपने, इसमें सचमुच ही विष है।' दासी चिल्लायी। उसका रंग पीला पड़ गया।

    - 'जब राणाजी कहते हैं कि यह गिरिधर गोपालजी का चरणामृत है तो असत्य नहीं कहते हैं। यदि विष होता तो मैं जीवित थोड़े ही रहती।' मीरां ने हँस कर कहा।

    दासी जितने भयभीत हृदय और कम्पित पैरों के साथ आयी थी, उससे भी अधिक भयभीत हृदय और कम्पित पैरों से लौट गयी।

    महाराणा ने सुना तो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा- 'अच्छा तो एक काम और कर। यह मुक्ताहार उसके पास ले जा। उससे कहना राणा ने तेरे गिरधर गोपाल ले लिये, इसके बदले में यह मुक्ताहार भिजवाया है।'

    - 'किंतु अन्नदाता गिरिधर गोपाल तो वहाँ अपने स्थान पर ही विराजमान हैं।' दासी ने भय कम्पित वाणी से निवेदन किया।

    - 'बकवास है यह सब।'

    दासी मुक्ताहार की मंजूषा लेकर फिर से कुंवरानी मीरां के महल की ओर चली।

    - 'अब क्या लाई है?' मीरां ने हँस कर पूछा।

    - 'यह मुक्ताहार है, राणाजू ने आपके लिये भिजवाया है।'

    - 'अच्छा ला पहना दे।' मीरांबाई ने दासी से कहा।

    दासी ने मंजूषा खोली। अंदर मुक्ताहार नहीं था, वहाँ तो भयानक विषधर फन काढ़े बैठा था। दासी ने भय से मंजूषा फैंक दी।

    - 'क्या करती है?' मीरां ने दासी को टोका।

    - 'इसमें मुक्ताहार नहीं, भयानक विषधर है।'

    - 'अरी नहीं! जाने तुझे क्या हो गया है। विष और विषधर के अतिरिक्त तुझे कुछ सूझता ही नहीं। देख तो कहाँ है विषधर? यह तो मुक्ताहार ही है।' मीरां ने विषधर उठाकर गले में डाल लिया।

    दासी ने देखा, मीरां के गले में सचमुच ही उज्जवल मोतियों का हार जगमगा रहा था। वह बेसुध होकर एक ओर लुढ़क गयी। उसी रात मीरां अपने सेवकों के साथ चित्तौड़ के महल त्यागकर वृंदावन के लिये रवाना हो गयी।


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  • चित्रकूट का चातक - 12

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 12

    कर्मनासा

    जहाँ एक ओर भाग्यलक्ष्मी बैरामखाँ पर मेहरबान हुई वहीं दूसरी ओर हुमायूँ के उन पुण्यकर्मों के नष्ट होने का समय आ गया था, जिनके कारण वह बादशाह बना था। इसलिये प्रारब्ध ने उसे कर्मनासा नदी की ओर खींचना आरंभ किया।

    जिन दिनों हुमायूँ चांपानेर के दुर्ग में रंगरेलियां मनाने में व्यस्त था, उन्हीं दिनों खबर आई कि बादशाह को गुजरात में व्यस्त जानकर बंगाल और बिहार में शेरखा नामका पठान उत्पात मचा रहा है। उसने सहसराम, रोहतास और चुनार के दुर्ग हथिया लिये हैं। हुमायूँ ने इन समाचारों की कोई परवाह नहीं की और वह राजधानी आगरा के लिये रवाना हो गया। राजधानी में सरदारों ने हुमायूँ को मजबूर किया कि वह शेरखा को दण्डित करने के लिये बंगाल पर आक्रमण करे।

    हुमायूँ को रंगरेलियां मनाने, दावतें करने और सरदारों को खिलअतें बांटने के अलावा कुछ सूझता नहीं था फिर भी कर्मनासा नदी उसे खींच रही थी अतः अमीरों के दबाव में उसने बंगाल की ओर प्रस्थान किया। बादशाह को आया जानकर शेरखा अपने बेटे जलालखाँ को चुनार दुर्ग में छोड़कर बंगाल भाग गया। हुमायूँ ने बैरामखाँ को चुनार दुर्ग पर चढ़ाई करने भेजा।

    चुनार दुर्ग की प्राकृतिक बनावट ऐसी है कि इस दुर्ग को शेरखा जैसे प्रबल बैरी से हस्तगत करना सरल न था। छः माह तक भी जब कोई बात नहीं बनी तो बैरामखाँ ने एक चाल चली। उसने अपने एक अफ्रीकी गुलाम लड़के को खूब सारा धन देकर उसका विश्वास अर्जित किया। अफ्रीकी गुलाम बैरामखाँ की योजना पर काम करने को तैयार हो गया। बैरामखाँ ने अफ्रीकी गुलाम को कोड़ों से इतना पीटा कि उसकी खाल उधड़ गयी। इसके बाद अफ्रीकी गुलाम को चुनार के किले की ओर धकेल दिया।

    जलालखाँ के सिपाहियों को अफ्रीकी गुलाम की हालत पर दया आ गयी। उन्होंने उसे किले में प्रवेश दे दिया। अफ्रीकी गुलाम कुछ दिन किले में रहकर और किले का सारा नक्शा और हाल-चाल जानकर किले से भाग आया। उसने बैरामखाँ को बताया कि नदी की ओर से किले में घुसना आसान है। बैरामखाँ ने अपने तोपखाने को नावों में रखवाया और एक रात अचानकर हमला बोल दिया। जलालखाँ की सेना घुटने टेकने पर मजबूर हो गयी। बैरामखाँ ने शेरखा के तोपचियों के हाथ काट लिये।

    चुनार पर अधिकार होने के बाद हुमायूँ फिर से विलासिता में डूब गया। अवसर पाकर शेरखा ने बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। इधर हुमायूँ अपनी रंगरलियों में व्यस्त हो गया और उधर उसके भाई मिर्जा हिन्दाल ने जिसे हुमायूँ ने बिहार में तैनात किया था, उत्तरी बिहार शेरखा को सौंप दिया और चुपके से आगरा पहुँच कर अपने आप को बादशाह घोषित कर दिया। यह समाचार पाकर हुमायूँ आगरा की ओर लौटा। उसने अपने पाँच हजार सैनिक बंगाल की सुरक्षा के लिये छोड़ दिये और जल्दी से जल्दी आगरा पहुँचने की उतावली में मुख्य मार्ग (अब यह मार्ग ग्राण्ड ट्रंक रोड कहलाता है।) से आगरा की ओर चला।

    अमीरों ने हुमायूँ को मना किया कि वह इस मार्ग से न जाये क्योंकि इस मार्ग पर शत्रु सेना उसे आसानी से घेर लेगी किंतु प्रारब्ध अपना खेल खेल रहा था। कर्मनासा नदी उसे अपनी ओर खींच रही थी। कहा जाता है कि इस नदी में नहाने वाले के समस्त पुण्यकर्म नष्ट हो जाते हैं, इसीलिये इसे कर्मनासा कहा जाता है। हालांकि कुदरत ने मध्य एशियाई मंगोलों का भाग्य उनके पुण्यकर्मों से नहीं उनकी खूनी ताकत से लिखा था किंतु हुमायूँ की आधी खूनी ताकत तो हिन्दुस्तान की आबोहवा ने खत्म कर दी थी और बची-खुची ताकत कर्मनासा ने नष्ट कर दी।

    जब शेरखा को यह समाचार मिला कि हुमायूँ आगरा लौट रहा है तो वह हुमायूँ के पीछे लग गया। जब हुमायूँ गंगाजी को पार करके कर्मनासा के किनारे पहुँचा तो शेरखा ने हुमायूँ को घेर लिया। हुमायूँ तीन माह तक सिर पर हाथ धर कर चौसा में बैठा रहा। कर्मनासा में नहाकर उसकी सारी खूनी ताकत खत्म हो चुकी थी। उसके सरदारों ने कहा कि आगे बढ़कर शेरखा पर हमला करे किंतु हुमायूँ की हिम्मत नहीं हुई तब तक वर्षा आरंभ हो गयी जिससे हुमायूँ का तोपखाना किसी काम का न रहा। शेरखा को इसी परिस्थिति की प्रतीक्षा थी।

    एक रात जब भारी वर्षा हो रही थी, शेरखा ने अचानक तीन ओर से हुमायूँ पर आक्रमण किया। हुमायूँ के आठ हजार सैनिक मार दिये गये। बाकी के सैनिक जान बचाकर भाग गये। हुमायूँ की बेगमें और लड़कियाँ भी मारी गयीं। कुछ बेगमें शेरखा के हाथ लग गयीं। खूनी ताकत के नष्ट हो जाने से हुमायूँ बुरी तरह परास्त हुआ। जिन तोपों और बंदूकों के बल पर बाबर ने बड़े से बड़े शत्रु को परास्त कर दिया था। हुमायूँ उनमें से एक भी तोप और बंदूक नहीं चला सका।

    मारे डर के वह कर्मनासा की ओर न भागकर गंगाजी की ओर भागा और घोड़े सहित नदी में कूद गया। घोड़ा कुछ दूर तक हुमायूँ को लेकर नदी में आगे बढ़ा किंतु अपने स्वामी को मंझधार में छोड़कर डूब गया। एक भिश्ती ने किसी तरह हुमायूँ की जान बचाई। बाबर ने हिन्दुस्थान का जो राज पानीपत, खानवा और चंदेरी के मैदानों में प्राप्त किया था, हुमायूँ ने वह राज कर्मनासा के किनारे खो दिया।

    चौसा में परास्त होकर हुमायूँ पीछे फिरा किंतु भोजपुर के भईया गाँव में एक बार फिर उसका सामना शेरखा की सेना से हुआ और वहाँ भी वह परास्त हो गया। हुमायूँ फिर पीछे मुड़ा। कन्नौज के पास एक बार फिर उसने शेरखा से मात खाई। हुमायूँ लगातार हारता रहा और आगरा की तरफ भागता रहा। अपनी इस पलायन यात्रा में उसने अनुभव किया कि यदि बैरामखाँ जैसा स्वामिभक्त सेवक न होता तो वह आगरा कभी न पहुँच पाता।

    शेरखा हुमायूँ के पीछे लगा रहा और हुमायूँ को आगरा से लाहौर की तरफ भाग जाना पड़ा। लाहौर में भी वह अपने भाई कामरान के भय से टिक नहीं सका और सिंध की ओर भागने के लिये मजबूर हुआ। सिंध के मरुस्थल में भटकता हुआ वह शेख अली अम्बर जामी का मेहमान हुआ। जब उसकी दृष्टि शेख अली अम्बर की बेटी हमीदा बानू पर पड़ी तो एक बार फिर उसकी खूनी ताकत कसमसाई और वह हमीदा बानू के पीछे लग गया। हमीदाबानू उस समय मात्र चौदह साल की थी और वह हुमायूँ के भाई हिन्दाल की मुँहबोली बहिन था। हमीदा बानू ने कहा कि उसके हाथ मुश्किल से ही हुमायूँ के गले तक पहुंच सकते हैं लेकिन हुमायूँ अपनी जिद पर अड़ा रहा। शेख अली अम्बर ने मजबूर होकर हमीदाबानू का विवाह हुमायूँ के साथ कर दिया। एक साल बाद इसी हमीदाबानू के गर्भ से अकबर का जन्म हुआ।


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  • चित्रकूट का चातक - 13

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 13

    जाके प्रिय न राम बैदेही!

    जिस अयोध्या को मीर बाकी जला कर क्षार कर गया था और भगवान श्रीराम के जन्म स्थल पर स्थित विशाल देवालय को नष्ट करके मस्जिद बना गया था, कई वर्ष पश्चात् उसी अयोध्या में एक युवा सन्यासी ने काशी से आकर डेरा जमाया। एक बार बचपन में भी वह अपने गुरु नरहरि के साथ सूकरखेत से चलकर यहाँ आया था। तब यहाँ जन्मभूमि पर रामलला का विशाल देवालय स्थित था।

    इस बार भी वह रामजन्म भूमि के दर्शनों की लालसा अपने मन में लेकर आया था किंतु रामलला के देवालय के स्थान पर मसीत (मस्जिद) देखकर उसने अपने करम ठोंक लिये। वह अपने नेत्रों से जल की धारा बहाता हुआ नित्य प्रतिदिन सरयू में स्नान करता और यह अनुभव करता कि एक दिन इसी नदी के पावन जल में उसके इष्ट देव ने भी निमज्जन किया था। वह अयोध्या की मिट्टी में लोटता और अनुभव करता कि एक दिन इसी रज में उसके स्वामी के चरण अंकित हुए थे। संध्या होने पर वह अयोध्या के नागरिकों से कुछ मांग लाता और उन्हें खाकर मस्जिद में पड़ा रहता। (मांग के खाइबो अरु मसीत को सोइबो।) कभी रात्रि में वह आकाश की ओर दृष्टि उठाता और कल्पना करता कि एक दिन इन चाँद तारों ने उसके स्वामी को इसी व्योम से निहारा होगा तो वह आनंद विभोर हो उठता किंतु जब मसीत की ओर देखता तो उसकी छाती कष्ट से भर जाती।

    युवा सन्यासी ने कुछ दिनों तक अयोध्याजी में ही रहकर रामजी के गुणगान करने का निर्णय किया। वह घंटों सरयू के जल में कटि तक डूब कर कीर्तन करता और फिर रामलला की जन्मभूमि की ओर मुँह करके भजन गाता रहता। बहुत से लोग सरयू के तट पर खड़े होकर इन भजनों को भोजपत्रों पर लिख लेते। संध्याकाल में सरयू की स्तुति के साथ इन स्तुतियों को भी गाया जाने लगा जिन्हें सुनने के लिये विशाल जनसमुदाय एकत्र हो जाता।

    कुछ ही दिनों में सन्यासी की गायी हुई स्तुतियों और भजनों की चर्चा दूर-दूर तक फैल गयी। इससे सन्यासी के दर्शनों के लिये दूर दूर से भक्तगण आने लगे। एक दिन दो घुड़सवार सन्यासी की सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने सन्यासी से पूछा- 'क्या काशी के पण्डित श्री तुलसीदासजी आप ही हैं?'

    - 'हूँ तो भांग का पौधा किंतु रामजी के प्रताप से तुलसी कहाता हूँ। कुछ दिनों काशी में भी अवश्य रहा हूँ किंतु मैं वहाँ का पण्डित हूँ यह तो नहीं कह सकता।' सन्यासी ने अत्यंत कोमल कण्ठ से उत्तर दिया।

    घुड़सवारों ने इतना सुनते ही सन्यासी के चरणों की रज माथे से लगाई और एक पत्र सन्यासी के चरणों में रख दिया। उन्हें अपनी स्वामिनी की ओर से ऐसा ही करने का आदेश था।

    - 'तुम लोग कौन हो भाई और इस भांग के पौधे से क्या चाहते हो?' सन्यासी ने पत्र हाथ में लेकर कहा।

    - 'हम चित्तौड़ की कुंवरानी मीरां के सेवक हैं महाराज। उन्होंने ही वृंदावन से यह पत्र आपकी सेवा में भिजवाया है।' एक घुड़सवार ने जवाब दिया।

    सन्यासी ने पत्र खोला तो दंग रह गया। विचित्र पत्र था यह भी। किसी ने बहुत ही सुंदर बनावट के अक्षरों में लिखा था-

    ''स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषन, दूषन हरन गोसाईं।

    बारहिं बार प्रनाम करहु, अब हरहु सोग समुदायी।

    घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।

    साधु-संग अरु भजन करत मोहि देत कलेस महाई।

    मेरे मात-पिता के सम हौ, हरि भक्तह्न सुखदाई।

    हमको कहा उचित करिबो है, सौ लिखिए समुझाई।''

    (ऐसी मान्यता है कि यह पद मीरांबाई द्वारा तुलसीदासजी को सम्बोधित करके लिखा गया था।)

    सन्यासी ने उसी समय कागज, कलम और दवात मंगा कर पत्र का जवाब लिखा-

    ''जाके प्रिय न राम बैदेही।

    तजिए ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही।

    तज्यौ पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु भरत महतारी।

    बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितनि भये मुद मंगल कारी।

    नाते नेह राम के मनिअत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं।

    अंजन कहा आँखि जौ फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं।

    तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्राण तें प्यारो।

    जासो होय सनेह रामपद एतो मतो हमारो।।''

    लशकर गेब

    कन्नौज से हुमायूँ और बैरामखाँ की सेनायें अलग हो गयीं थीं। जब हुमायूँ आगरा की ओर भाग रहा था तो शेरखा की सेना का ध्यान उस ओर से हटाने के लिये बैरामखाँ संभल की तरफ बढ़ा तथा उसने लखनौर के राजा मित्रसेन की शरण ली। जब शेरखा को यह ज्ञात हुआ तो उसने अपने आदमी लखनौर भेजे और बैरामखाँ को बुलावा भेजा।

    जब शेरखा के आदमी बैरामखाँ को शेरखा के सामने लाये तब शेरखा ने भरी मजलिस में खड़े होकर बड़ी गरमजोशी से बैरामखाँ का स्वागत करते हुए कहा- 'जो इखलास रखता है, वह खता नहीं करता।' (जो विश्वास बनाये रखता है वह धोखा नहीं करता।) बैरामखाँ ने भी तपाक से जवाब दिया- 'हाँ! जो इखलास रखेगा, वह खता नहीं करेगा।'

    बैरामखाँ का उत्तर सुनकर शेरखा का मुँह उतर गया। फिर भी उसने बैरामखाँ की बड़ी आवभगत की और सम्मान सहित छोड़ दिया। उसके जाने के बाद शेरखा ने अपने दरबारियों से कहा कि जब बैरामखाँ ने यह कहा कि जो इखलास रखेगा वह खता नहीं करेगा, मैं तभी समझ गया था कि यह हमसे मेल नहीं करेगा।

    जब गुजरात के सुल्तान महमूद को मालूम हुआ कि बैरामखाँ हुमायूँ से बिछड़ गया है, तो उसने भी अपने आदमी बैरामखाँ को लाने के लिये भेजे। बैरामखाँ चाहता था कि वह किसी भी तरह अपने आदमियों के साथ सुरक्षित रूप से हुमायूँ से जा मिले जो कि इस समय सिंध में था। इसलिये बैरामखाँ महमूद के आदमियों के साथ गुजरात आ गया। महमूद ने भी उसकी बहुत आवभगत की और कई तरह के प्रलोभन दिये किंतु बैरामखाँ ने महमूद का एक भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और एक दिन उससे मक्का जाने के लिये छुट्टी मांगी। महमूद जानता था कि बैरामखाँ यहाँ से सीधा हुमायूँ के पास जायेगा किंतु उसने बैरामखाँ को रोका नहीं।

    जिस समय बैरामखाँ हुमायूँ के पास पहुँचा उस समय हुमायूँ की सेना सिंध में भक्कर के सुल्तान महमूद से उलझी हुई थी। भक्कर के सिंधियों ने मुगल सेना की हालत खराब कर रखी थी। कई दिनों की लड़ाई के चलते हुमायूँ के पास बहुत कम सैनिक रह गये थे और वह किसी तरह अपने आप को जंग के मैदान में टिकाये हुए था। संयोग से बैरामखाँ सीधे रणक्षेत्र में ही पहुँचा। इतना समय नहीं था कि बैरामखाँ हुमायूँ से मिल पाता। इसलिये वह सीधे ही युद्ध में कूद पड़ा।

    जिस समय बैरामखाँ युद्ध में कूदा उस समय हुमायूँ की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी और ऐसा लग रहा था कि कुछ ही देर में हुमायूँ की पराजय हो जायेगी। सुबह से ही उसके बहुत से सैनिक मारे गये थे। अमीरों ने हूमायूँ को सलाह दी कि वह मैदान छोड़कर सुरक्षित निकल जाये किंतु वह मृत्यु निश्चित जानकर भी लड़ता रहा। अचानक उसने देखा कि दुश्मन की सेना के पीछे से एक लश्कर प्रकट हुआ। बात ही बात में वह लश्कर टिड्डी दल की तरह दुश्मन पर छा गया। हुमायूँ ने अपने आदमियों से पूछा कि यह क्या लशकर गेब (देवमाया) है ? हुमायूँ के आदमी कुछ जवाब नहीं दे सके। लेकिन इस लश्कर को देखकर वे दूने उत्साह से तलवार चलाने लगे। बाद में मालूम हुआ कि वह लशकर गेब नहीं बैरामखाँ आ पहुँचा था और सीधा ही मैदाने जंग में कूद पड़ा था। जब बादशाह की सेना को मालूम हुआ कि बैरामखाँ है तो सब खुशी से चिल्ला उठे। सूरज डूबने से पहले युद्ध का पासा पलट चुका था। मुगल सेना ने मोर्चा मार लिया।

    बैरमबेग के लौट आने की खुशी में हुमायूँ ने सचमुच बैरम (तुर्की भाषा में बैरम का अर्थ होता है- 'उत्सव) मनाया और उसके स्वागत में एक विशाल भोज का आयोजन किया। इस अवसर पर हुमायूँ ने कहा कि बेरमबेग सचमुच अपने नाम के अनुकूल आचरण करने वाला है। वह जहाँ भी जाता है वहीं जश्न मनाया जाता है। इसके बाद जब भी बेरमबेग किसी जंग से लौटकर आता तो हूमायूँ उसके स्वागत में उत्सव मनाता।


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  • चित्रकूट का चातक - 14

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 14


    खानका

    हिन्दुस्थान से अपना दाना-पानी उठ गया जानकर हुमायूँ हिन्दुस्थान छोड़कर कंधार की ओर रवाना हुआ। हुमायूँ का भाई कामरान उसका रास्ता रोककर बैठ गया। वह नहीं चाहता था कि हुमायूँ सही सलामत हिन्दुस्थान से बाहर जा सके। मंझला भाई अस्करी भी कामरान के षड़यंत्र में शामिल हो गया। बैरामखाँ के गुप्तचर जी बहादुर को इस षड़यंत्र की खबर लग गयी। बैरामखाँ ने कामरान के षड़यंत्र को विफल कर दिया। उसने हुमायूँ को सलाह दी कि इस समय मिर्जा अस्करी आसानी से पकड़ में आ सकता है उसका खून कर देना चाहिये लेकिन हुमायूँ ने बाबर को दिये हुए वचन का पालन किया कि वह कभी भी अपने भाईयों की जान नहीं लेगा इसलिये उसने अस्करी को खुला छोड़ दिया।

    मिर्जा अस्करी परले दरजे का मक्कार था। जान बख्श दिये जाने पर भी उसने हुमायूँ का बुरा किया और हुमायूँ के अमीरों को रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया। हुमायूँ के बहुत से सैनिकों और अमीरों ने अस्करी को ताकतवर जानकर हुमायूँ का साथ छोड़ दिया और अस्करी की सेवा में चले गये। ऐसे कठिन समय में भी बैरामखाँ ने इखलास (विश्वास) बनाये रखा और हुमायूँ के साथ ही रहा। कामरान से जान बचाने के लिये हुमायूँ हमीदाबानू को घोड़े पर बैठाकर भाग खड़ा हुआ। इस समय उसके पीछे केवल बैरामखाँ और उसके सिपाही ही थे। बैरामखाँ हुमायूँ को कामरान के चंगुल से निकाल कर कंधार ले गया।

    बैरामखाँ की मदद से हुमायूँ तो किसी तरह कामरान के फंदे से बच निकला किंतु एक साल का अकबर पीछे छूट गया। (अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट सिंध के थारपारकर जिले में राणा वीरसाल के महल में हमीदा बानू के पेट से हुआ था) असकरी ने वह बालक कामरान को सौंप दिया। जब हुमायूँ को कामरान के भय से कांधार भी छोड़ देना पड़ा तो कामरान बालक को अपने साथ कांधार ले गया।

    बैरामखाँ हुमायूँ को लेकर ईरान चला गया और वहाँ के शासक तुहमास्प से शरण मांगी। तुहमास्प ने कहा कि यदि तुम्हारा बादशाह शिया हो जाये तो उसे वह सब कुछ मिल सकता है जो वह चाहता है और यदि वह तुहमास्प की बात नहीं मानेगा तो उसे बलपूर्वक शिया बनाया जायेगा। बैरामखाँ तुहमास्प की बातें सुनकर घबराया नहीं। उसने शाह की बातों का धैर्य पूर्वक सामना किया और विश्वास दिलाया कि वह अपने बादशाह को आपकी बातें मानने के लिये राजी करेगा किंतु आपको भी मेरे बादशाह की बातें मानने के लिये तैयार रहना चाहिये।

    बैरामखाँ जानता था कि फारस के शाह की बातें हुमायूँ से मनवाना आसान न होगा किंतु फिर भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। बैरामखाँ ने दोनों बादशाहों के बीच में पड़कर संधि करवाई और येन-केन प्रकरेण हुमायूँ का बादशाहों जैसा रुतबा बनाये रखा बैरामखाँ के व्यवहार से प्रसन्न होकर शाह ने उसी समय भोजन के 1200 थाल और नौ घोड़े भेंट किये। इनमें से तीन घोड़े हुमायूँ के लिये, एक घोड़ा बड़े अमीर बैरामखाँ बहादुर के लिये तथा पाँच घोड़े हुमायूँ के अन्य सरदारों के लिये थे।

    बैरामखाँ के प्रयत्नों से हुमायूँ शिया हो गया। उसने शियाओं जैसा लम्बा लबादा पहन लिया और हसरत अली के मजार की यात्रा पर गया। इसके बदले में बैरामखाँ ने तुहमास्प से हुमायूँ के लिये तुहमास्प की बेटी, बारह हजार घुड़सवार और शाह के अंगरक्षक दल के दो हजार विशेष सैनिक मांगे। तुहमास्प ने बैरामखाँ की सारी शर्तें स्वीकार कर लीं। दोनों बादशाहों ने मिलकर कई दिनों तक जंगलों में शिकार खेला और बहुत से जानवर मारे। एक दिन दोनों बादशाहों ने चोगानबाजी (घोड़े पर बैठकर गेंद खेलना। आजकल इसे पोलो कहते हैं।) और कबलअंदाजी (निशाने उड़ाना। आजकल इसे शूटिंग कहते हैं) की। उस दिन बैरमबेग को खानका (बैरमबेग को बैरामखाँ तो बहुत पहले से ही कहा जाने लगा था किंतु बादशाह की ओर से उसे यह उपाधि अब प्रदान की गयी) का खिताब दिया गया।

    फरमान

    बैरामखाँ ने तुहमास्प से ईरानी सेना प्राप्त की और उससे तथा हूमायूँ से एक-एक फरमान लेकर फिर से हिन्दुस्थान आया। ये फरमान उसने हुमायूँ के भाई कामरान के नाम लिखवाये थे ताकि भाई को भाई के खिलाफ नहीं लड़ना पड़े और उनमें प्रेम हो जाये। बैरामखाँने हिन्दुकुश पर्वत पार कर कांधार पर आक्रमण किया। कांधार उस समय असकरी के अधिकार में था। बैरामखाँ ने कांधार को जीत कर असकरी को गिरफ्तार कर लिया।

    जब बैरामखाँ ने ईरान से हिन्दुस्थान के लिये कूच किया था तब हुमायूँ ने उसे निर्देश दिये थे कि हिन्दुस्थान की जमीन पर किसी भी खुदा के बंदे को (इस्लाम के अनुयायी को) बंदी नहीं बनाया जाये। बैरामखाँ ने इस लड़ाई में और आगे भी जितनी लड़ाईयाँ लड़ीं उन सबमें इस निर्देश का उल्लंघन विशेष अवसर आने पर ही किया। उसने कभी भी किसी मुसलमान सिपाही को बंदी नहीं बनाया लेकिन वह जानता था कि हुमायूँ का आदेश कामरान और अस्करी जैसे मक्कारो के लिये नहीं था।

    कंधार के सारे समाचार ईरान को भिजवाकर बैरामखाँ काबुल के लिये रवाना हुआ। उन दिनों काबुल पर कामरान अधिकार जमाये बैठा था और अपने आप को बादशाह कहता था। बैरामखाँ सफर के दौरान बिल्कुल चुप रहता था और पूरे रास्ते सोचते हुए ही चलता था। इस दौरान वह अनुमान लगाता था कि आगे क्या होने वाला है! कांधार से काबुल तक की यात्रा के दौरान बैरामखाँ इस बात पर निरंतर चिंतन करता रहा कि जब वह कामरान के सामने पेश होगा तो कामरान उसके साथ क्या-क्या बदसलूकी कर करेगा!

    समस्त अप्रिय स्थितियों का अनुमान करके बैरामखाँ पूरी तैयारी के साथ कामरान के सामने पेश हुआ। कामरान उस समय चारबाग में दरबार कर रहा था। उसने बैरामखाँ को बड़ी हिकारत भरी निगाह से देखा और उसके आने का कारण पूछा। बैरामखाँ ने सोचा कि यदि वह दोनों फरमान इस समय कामरान को देता है तो अहसान फरामोश कामरान बैठे-बैठे ही हाथ में लेगा। इससे बादशाह का अपमान होगा। बैरामखाँ ने रास्ते में जैसा सोचा था, ठीक वैसा ही घटित हो रहा था। ऐसी स्थिति कतई नहीं थी कि वह कामरान से खड़ा होने के लिये कहे किंतु बैरामखाँ तो पूरी तैयारी करके गया था। उसने अपने कपड़ों में से कुरान निकाली और कहा- 'बादशाह हुजूर ने आपके लिये यह कुरान भिजवाई है।'

    जब अहसान फरामोश कामरान कुरान की ताजीम को खड़ा हुआ तो बैरामखाँ ने कहा- 'और यह फरमान भी।'

    बैरामखाँ ने कुरान और दोनों बादशाहों के फरमान एक साथ कामरान के हाथ में रख दिये। कामरान तिलमिला कर रह गया और कुछ भी न कर सका। इसके बाद बैरामखाँ ने ढेर सारे उपहार कामरान को दिये ताकि कामरान किसी तरह हुमायूँ के प्रति वफादार हो जाये। साथ ही साथ बैरामखाँ ने बड़ी तरकीब से कामरान को धमकाया कि तू हुमायूँ के प्रति वफादार हो जा अन्यथा मिर्जा असकरी को जिस तरह गिरफ्तार किया गया है, वही स्थिति कामरान के साथ भी हो सकती है। बदले में कामरान ने भी बैरामखाँ को धमकाया कि बालक अकबर अब तक मेरे पास है, यदि मिर्जा अस्करी को कुछ हुआ तो बालक भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

    कातर निगाहें

    कामरान ने एक माह तक बैरामखाँ को अपने पास रखा उसने हुमायूँ से मेल करने का आश्वासन दिया किंतु मन में मैल बनाये रहा। इस समय वह बैरामखाँ के साथ बदसलूकी नहीं कर सकता था क्योंकि मिर्जा अस्करी उसकी कैद में था। बहुत सोच-विचार कर उसने अपनी फूफी खानजादा बेगम को भी बैरामखाँ के साथ कर दिया ताकि खानजादा बेगम हुमायूँ से मिर्जा अस्करी के लिये क्षमादान मांग सके।

    कामरान से विदा लेकर बैरामखाँ कांधार लौटा। उस समय तक बैरामखाँ का संदेश पाकर हुमायूँ भी हिन्दुकुश पर्वत पार करके कांधार आ गया था और काबुल से बैरामखाँ के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था।

    बरसों बाद फूफी को जीवित देखकर हुमायूँ बहुत प्रसन्न हुआ। फूफी खानजादा बेगम ने घड़ियाली आँसू बहाते हुए हुमायूँ से मिर्जा अस्करी के प्राणों की भीख मांगी तथा चंगेजखाँ और तैमूर के वंशज को सामान्य अपराधियों की भांति न मारने की प्रार्थना की। हुमायूँ तो पहले से ही तैयार बैठा था। अब उसे फूफी का समर्थन भी मिल गया था।

    जब बैरामखाँ मिर्जा अस्करी की गर्दन में तलवार डालकर उसे हुमायूँ के सामने लाया तो बाबर की औलाद को इस हालत में देखकर हुमायूँ का दिल दहल गया। उसने सहारे के लिये अपने दोनों ओर नजरें दौड़ाईं उसके एक ओर चगताई (मुगल, चंगेजखां के वंशज) और एक ओर कजलबाश (ईरानी लाल टोपी वाले। तुर्की भाषा में कजलवास का अर्थ होता है लाल टोपी वाले) अमीर अपने-अपने दरजे से परा (पंक्ति) बांधकर खड़े थे। किसी अमीर की हिम्मत न हुई कि वह बैरामखाँ के खिलाफ एक भी शब्द कह सके।

    हारकर हुमायूँ ने कातर दृष्टि से बैरामखाँ की ओर देख कर कहा- 'मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारा अपराधी है और तुमने इसे गिरफ्तार किया है किंतु मेरी आज्ञा है कि मिर्जा अस्करी के गले में से तलवार निकाल दी जाये।'

    बैरामखाँ ने स्वामिभक्ति दिखाई और बिना किसी हील-हुज्जत के तत्काल आदेश का पालन किया। गले में से तलवार निकलते ही मिर्जा अस्करी ने हुमायूँ को आदाब बजाया और नौ-नौ आँसू बहाता हुआ हुमायूँ के पैरों में बैठ गया। हुमायूँ ने अपने धूर्त भाई को गले से लगा लिया।

    आँखों में आँसू भरकर हुमायूँ ने फिर बैरामखाँ की ओर देखा- 'अपने अपराधी के लिये तुम क्या सजा मुकर्रर करते हो खानका?'

    बैरामखाँ तो जानता था कि अस्करी के भाग्य का यही फैसला होने वाला है किंतु संभवतः हुमायूँ नहीं जानता था कि बैरामखाँ एक ऐसा स्वामिभक्त था जिसके हृदय में निजी अभिमान का अंशमात्र भी नहीं होता और जो अपने स्वामी की कातर निगाहें देखने के बजाय मर जाना अधिक पसंद करता है, भले ही स्वामी कितना ही मक्कार और बदजात क्यों न हो! बैरामखाँ ने पूरे सम्मान के साथ हुमायूँ को आदाब बजाया और चुपचाप दरबार से बाहर हो गया। जाने क्यों उसे ऐसा लगा कि उसने मिर्जा अस्करी की नहीं अपितु बालक अकबर की जान बख्शी है। फूफी नमक हराम अस्करी को अपने साथ कामरान के पास ले गयी।


    तोप के सामने

    हिन्दुकुश पर्वत पार करते समय हुमायूँ बीमार पड़ गया था और इस समय वह इस लायक नहीं था कि ढंग से चल फिर भी सके। जब यह खबर नमक हराम मिर्जा अस्करी और फूफी खानजादा बेगम ने कामरान को जाकर दी तो कामरान उसी समय कांधार पर चढ़ दौड़ा। हुमायूँ और बैरामखाँ इस आकस्मिक स्थिति के लिये तैयार नहीं थे। उन्हें किला खाली करके भाग जाना पड़ा। हुमायूँ का लड़का अकबर अब तक कामरान के पास था जिसे कामरान अपने साथ लाया था।

    किला हाथ से निकल जाने के बाद हुमायूँ के सामने एक बार फिर संकट खड़ा हो गया। हिन्दुकुश पर्वत के इस पार इस समय केवल यही एक दुर्ग हुमायूँ के पास था। इस समय उसे केवल बैरामखाँ का ही आसरा रह गया था।

    कांधार से बाहर आकर बैरामखाँ ने अपनी सेना को नये सिरे से व्यवस्थित किया और एक दिन अवसर पाकर किले को घेर लिया। उसने थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अपनी तोपें लगाईं और हर तरफ से बमबारी करने लगा। तोपों की मार से किले का बचना असंभव जानकर कामरान ने तीन वर्ष के अकबर को रस्सियों से बांधकर किले की दीवार पर लटका दिया और एक घुड़सवार के साथ हुमायूँ को संदेश भिजवाया कि यदिे वह तोप चलाना बंद नहीं करेगा तो अकबर मौत के मुँह में चला जायेगा।

    हर ओर से छूटती हुई तोपों को देखकर अकबर चीखने चिल्लाने और बुरी तरह से रोने लगा। जाने कौनसी अदृश्य शक्ति थी जो इस घनघोर विपत्ति में भी अकबर के प्राणों को सुरक्षित रखे हुए थी! विवश होकर बैरामखाँ को तोपों का मुँह बंद कर देना पड़ा। वह समझ गया कि जब तक अकबर को कामरान से छीन नहीं लिया जाता, तब तक हर जीती हुई बाजी से हाथ धोना पड़ेगा। उसने एक योजना बनाई जिसके अनुसार हुमायूँ अपनी पूरी सेना लेकर किले के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ा और बैरामखाँ चुपचाप जंगल की तरफ चला गया। काफी दूर जाकर बैरामखाँ फिर से कांधार की तरफ मुड़ा और अचानक किले के दूसरे दरवाजे पर जा धमका।

    कामरान को पता भी नहीं लगा और बैरामखाँ ने किले का दरवाजा तोड़ लिया। जब बैरामखाँ नंगी तलवार लेकर कामरान के महल में घुसा तो कामरान किसी तरह जान बचाकर भाग निकला। बैरामखाँ ने दुर्ग की प्राचीर से लटक रहे तीन वर्ष के अकबर को उतारा और मुख्य दरवाजा खोलकर हुमायूँ के पास चला आया। हुमायूँ ने पूरे दो साल बाद बेटे का मुँह देखा। इस समय उसका रोम-रोम बैरामखाँ के प्रति कृतज्ञता से भरा हुआ था।





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  • चित्रकूट का चातक - 15

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 15

    तोप के सामने

    हिन्दुकुश पर्वत पार करते समय हुमायूँ बीमार पड़ गया था और इस समय वह इस लायक नहीं था कि ढंग से चल फिर भी सके। जब यह खबर नमक हराम मिर्जा अस्करी और फूफी खानजादा बेगम ने कामरान को जाकर दी तो कामरान उसी समय कांधार पर चढ़ दौड़ा। हुमायूँ और बैरामखाँ इस आकस्मिक स्थिति के लिये तैयार नहीं थे। उन्हें किला खाली करके भाग जाना पड़ा। हुमायूँ का लड़का अकबर अब तक कामरान के पास था जिसे कामरान अपने साथ लाया था।

    किला हाथ से निकल जाने के बाद हुमायूँ के सामने एक बार फिर संकट खड़ा हो गया। हिन्दुकुश पर्वत के इस पार इस समय केवल यही एक दुर्ग हुमायूँ के पास था। इस समय उसे केवल बैरामखाँ का ही आसरा रह गया था।

    कांधार से बाहर आकर बैरामखाँ ने अपनी सेना को नये सिरे से व्यवस्थित किया और एक दिन अवसर पाकर किले को घेर लिया। उसने थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अपनी तोपें लगाईं और हर तरफ से बमबारी करने लगा। तोपों की मार से किले का बचना असंभव जानकर कामरान ने तीन वर्ष के अकबर को रस्सियों से बांधकर किले की दीवार पर लटका दिया और एक घुड़सवार के साथ हुमायूँ को संदेश भिजवाया कि यदिे वह तोप चलाना बंद नहीं करेगा तो अकबर मौत के मुँह में चला जायेगा।

    हर ओर से छूटती हुई तोपों को देखकर अकबर चीखने चिल्लाने और बुरी तरह से रोने लगा। जाने कौनसी अदृश्य शक्ति थी जो इस घनघोर विपत्ति में भी अकबर के प्राणों को सुरक्षित रखे हुए थी! विवश होकर बैरामखाँ को तोपों का मुँह बंद कर देना पड़ा। वह समझ गया कि जब तक अकबर को कामरान से छीन नहीं लिया जाता, तब तक हर जीती हुई बाजी से हाथ धोना पड़ेगा। उसने एक योजना बनाई जिसके अनुसार हुमायूँ अपनी पूरी सेना लेकर किले के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ा और बैरामखाँ चुपचाप जंगल की तरफ चला गया। काफी दूर जाकर बैरामखाँ फिर से कांधार की तरफ मुड़ा और अचानक किले के दूसरे दरवाजे पर जा धमका।

    कामरान को पता भी नहीं लगा और बैरामखाँ ने किले का दरवाजा तोड़ लिया। जब बैरामखाँ नंगी तलवार लेकर कामरान के महल में घुसा तो कामरान किसी तरह जान बचाकर भाग निकला। बैरामखाँ ने दुर्ग की प्राचीर से लटक रहे तीन वर्ष के अकबर को उतारा और मुख्य दरवाजा खोलकर हुमायूँ के पास चला आया। हुमायूँ ने पूरे दो साल बाद बेटे का मुँह देखा। इस समय उसका रोम-रोम बैरामखाँ के प्रति कृतज्ञता से भरा हुआ था।

    आँखों में सलाई

    कांधार हाथ से निकल जाने के बाद कामरान फिर से काबुल भाग आया और मोर्चा बांधकर बैठ गया। वह जानता था कि हुमायूँ भले ही कितना अकर्मण्य और आलसी क्यों न हो किंतु बैरामखाँ काबुल पर आक्रमण अवश्य करेगा।

    कामरान का अनुमान ठीक निकला। बहुत जल्दी बैरामखाँ काबुल पर आ धमका। इस बार उसके हाथ बंधे हुए नहीं थे। न तो बालक अकबर कामरान की गिरफ्त में था और न हुमायूँ बैरामखाँ के साथ आया था। बैरामखाँ हर ओर से निश्चिंत था और जीवन भर के इस प्रबल बैरी से मुक्ति चाहता था। उसने चारों ओर से काबुल पर घेरा डाला ताकि कामरान को भाग जाने का अवसर नहीं मिले।

    बैरामखाँ की जबर्दस्त मार के सामने कामरान टिक नहीं सका और एक रात वह किले से भाग निकला। उसके साथ उसकी बेगमें और गिने-चुने विश्वसनीय साथी ही थे। सुबह होने पर किले के भीतर इस बात की खबर फैली कि कामरान तो रात को ही भाग निकला। अब लड़ना व्यर्थ जानकर किलेदार ने किला बैरामखाँ को समर्पित कर दिया।

    बैरामखाँ जानता था कि कामरान इतना मक्कार है कि कहीं भी छिप सकता है। उसने किले का कौना-कौना छान मारा किंतु कामरान नहीं मिला। और तो और न तो मिर्जा अस्करी और न फूफी खानजादा बेगम ही उसके हाथ लगी।

    बैरामखाँ समझ गया कि रात के अंधेरे में पंछी घोंसले से उड़ गया। उसने तुरंत अपने घुड़सवार बदख्शां, दिल्ली और खैबरदर्रे की ओर जाने वाले रास्तों पर दौड़ाये। वह स्वयं भी अपने शिकार की खोज में निकला। चप्पे-चप्पे को सावधानी से छानने के बाद अंततः तीसरे दिन कामरान और अस्करी उसके हाथ लग गये। वे दोनों मक्कार भाई दिल्ली के बादशाह इस्लामशाह से मदद लेने जा रहे थे। बैरामखाँ चाहता तो उसी समय कामरान और अस्करी का काम तमाम कर सकता था। लेकिन यहाँ भी उसने इखलास रखा और उन्हें हुमायूँ के पास ले गया।

    कामरान और अस्करी के तरफदारों ने इस बार फिर वही पुरानी वाली चालें दोहराईं। बाबर के परिवार की बूढ़ी औरतें हुमायूँ के पास बैठकर रोने लगीं कि तैमूर, चंगेज और बाबर के वंशजों को साधारण गुनहगारों की तरह न मारा जाये।

    बैरामखाँ ने हुमायूँ से प्रार्थना की कि कामरान और अस्करी उसे सौंप दिये जायें। उसने हुमायूँ को वचन दिया कि वह कामरान और अस्करी को जान से नहीं मारेगा। हुमायूँ ने बहुत सोच-विचार के बाद कामरान और अस्करी बैरामखाँ के हाथों में सौंप दिये।

    बैरामखाँ ने उन दोनों मक्कार भाईयों को अंधेरी कोठरी में ले जाकर बंद कर दिया और बाहर सख्त पहरा बैठा दिया। कई दिनों के सोच-विचार के बाद बैरामखाँ ने अपने अपराधियों के लिये दण्ड निर्धारित किया। एक रात उसने अंधेरी कोठरी का ताला खुलवाया और दोनों कैदियों को बाहर निकाल कर कहा कि अंतिम बार दुनिया को जी भर कर देख लो।

    दोनों मक्कार भाईयों ने कोठरी से बाहर आकर नजरें घुमाईं। अंधेरे में उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया। जब उन्होंने आकाश की तरफ देखा तो हजारों तारों को चमचमाते हुए देखा जो अमावस्या की रात में भी दुनिया की सुंदरता को कायम रखे हुए थे।

    बैरामखाँ ने उसी समय लोहे की सलाईयां गरम करवाईं और कामरान की आँखों में फिरा दीं। कामरान अंधा होकर चीखने और छटपटाने लगा। धूर्त अस्करी उसी समय बैरामखाँ के कदमों से लिपट गया और उसे खुदा का वास्ता देकर रहम करने के लिये कहा।

    अस्करी को गिड़गिड़ाते हुए देखकर बैरामखाँ को हुमायूँ की आँखें याद हो आईं। कितनी बेबसी भरी आँखें थीं वे! उसने अस्करी की आँखों को फोड़ने का इरादा त्याग दिया। उसकी नजर में कामरान ही असली गुनहगार था जिसे अपने किये की सजा मिल चुकी थी। उसी रात बैरामखाँ ने दोनों भाईयों को सपरिवार मक्का के लिये रवाना कर दिया।

    अंधा कामरान अस्करी को साथ लेकर अपने कृत्यों पर पछताता हुआ हिन्दुस्तान की जमीन से बाहर हो गया और चार साल बाद वह मक्का में ही मर गया। कुछ दिनों बाद अस्करी भी मौत के गाल में समा गया। हिन्दाल पहले ही किसी अफगान द्वारा धोखे से मारा जा चुका था।

    बाबर की खूनी ताकत के चार ही उत्तराधिकारी थे जिनमें से अब केवल हुमायूँ ही शेष बचा था। उसने अकबर को गजनी का सूबेदार नियुक्त किया और बैरामखाँ को उसका संरक्षक घोषित किया।


    फिर से दिल्ली

    अपने भाईयों से मुक्ति पाकर हुमायूँ ने फिर से दिल्ली और आगरा पर अधिकार करने की ठानी। 1540 ईस्वी में उसने दिल्ली और आगरा छोड़े थे और दर-दर की ठोकरें खाते हुए चौदह साल हो चले थे। वह काबुल से चलकर पेशावर आया और सिंधु नदी पार करके कालानौर तक चला आया। यहाँ उसने अपनी सेना के तीन हिस्से किये। एक हिस्सा शिहाबुद्दीन के नेतृत्व में लाहौर पर चढ़ाई करने के लिये भेजा गया। दूसरा हिस्सा बैरामखाँ के नेतृत्व में हरियाणा पर चढ़ाई करने के लिये भेजा गया और तीसरा हिस्सा स्वयं हुमायूँ के पास रहा जो कालानौर (पूर्व पंजाब के गुरुदासपुर जिले में स्थित है।) में बना रहा। जब शिहबुद्दीन ने लाहौर पर अधिकार कर लिया तो हुमायूँ लाहौर चला गया।

    उधर बैरामखाँ ने हरितान प्रदेश (अब इसे हरियाणा कहते हैं।) पर अधिकार कर लिया और सतलज के तट पर आ डटा। वह माछीवारा में अफगानों से दो-दो हाथ करना चाहता था। उस समय सतलज में बाढ़ आ रही थी इसलिये तरुद्दीबेगखाँ के नेतृत्व में जो मुगल सेना थी उसने सतलज पार करने से मना कर दिया। तरुद्दीबेगखाँ ने अपनी सेना को पड़ाव डालने के आदेश दे दिये। बैरामखाँ को यह स्वीकार नहीं हुआ। उसने अपने आदमियों को अपने पीछे आने के लिये कहा और अपना घोड़ा सतलुज में उतार दिया। देखते ही देखते बैरामखाँ की सेना पार हो गयी। न चाहते हुए भी तरुद्दीबेग को बैरामखाँ के पीछे जाना पड़ा।

    यहाँ पर अफगानों ने फिर से मुगलों के खिलाफ बड़ा मोर्चा बांधा। दिल्ली का बादशाह सिकन्दर सूर अस्सी हजार सिपाहियों को लेकर बैरामखाँ के मुकाबले में आया। हुमायूँ के भारत से भाग जाने के बाद शेरशाह सूरी ने आगरा और दिल्ली सहित हिन्दुस्थान के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया था। मई 1545 में एक आकस्मिक दुर्घटना में वह मारा गया और उसका बेटा इस्लामशाह हिन्दुस्थान का बादशाह हुआ। अक्टूबर 1553 में उसकी भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद इस्लामशाह का 12 वर्षीय बेटा दिल्ली के तख्त पर बैठा। बारह वर्षीय सुल्तान अपने मामा मुहम्मद आदिलशाह के हाथों मार डाला गया। आदिलअली शाह को अदली भी कहा जाता है। अदली ने शासन का सारा भार अपने हिन्दू वजीर हेमू को सौंप दिया और स्वयं चुनार में जाकर भोग विलास करने लगा। इस बीच इब्राहीमशाह और सिकन्दरशाह नाम के दो व्यक्तियों ने अपने आप को सूर साम्राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ये दोनों दुष्ट आपस में भी लड़ते रहते थे। मौका पाकर सिकन्दर सूर ने दिल्ली हथिया ली थी। सिकन्दर सूर के पास हाथियों की विशाल सेना थी जिसे देखकर मुगलसेना के हाथ-पाँव फूल गये लेकिन बैरामखाँ जानता था कि हिंदुस्थान का ताज हाथियों की इस विशाल दीवार के दूसरी तरफ ही स्थित है जिसे हर हालत में पार करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

    15 मई 1955 को शाम के समय बैरामखाँ ने अफगानों पर हमला किया। उसने हमले की योजना इस प्रकार बनाई कि रात होने पर भी लड़ाई चलती रहे। जैसे ही रात हुई और अंधेरे में कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया, बैरामखाँ के आदमियों ने योजनानुसार अफगानों के ठीक पीछे जाकर भयंकर आग लगा दी। इस आग के उजाले में मुगलों को अफगानों की स्थिति और गतिविधि का पूरा ज्ञान होता रहा और वे तक-तक कर तीर चलाते रहे किंतु मुगलों की तरफ अंधेरा होने के कारण अफगान उनकी स्थिति के बारे में कुछ भी नहीं जान पाते थे। परिणाम स्वरूप अफगानों की भारी क्षति हुई और उनके पैर उखड़ गये। इसके बाद बैरामखाँ ने सिकन्दर सूर को खदेड़ना आरंभ कर दिया। सरहिंद में एक बार पुनः पराजित होकर सिकन्दर सूर पहाड़ों में भाग गया।

    बैरामखाँ की मुट्ठी भर सेना ने अफगानों की सेना के विशाल अजगर को निगल लिया और लूट में मिले हाथी हूमायूँ को भिजवा दिये। बहुत से साधारण सिपाही बंदी बना लिये गये। इनमें से जो खुदा के बंदे थे उन्हें बादशाह के आदेश के मुताबिक छोड़ दिया गया तथा काफिरों को गुलाम बनाकर बेचने के लिये मध्य एशियाई मुल्कों में भेज दिया गया। नसीबखाँ और उसके पठानों की बहुत सी जोरू और बच्चे भी बैरामखाँ के हाथ लगे जिन्हें बैरामखाँ खुद हाथी पर सवार होकर, युद्ध के मैदान से जान बचाकर भाग रहे नसीबखाँ के पास छोड़ आया।

    तरुद्दीबेग ने फिर बैरामखाँ का विरोध किया। वह भागते हुए पठानों को जान से मारना चाहता था किंतु बैरामखाँ का कहना था कि खुदा के बंदों का खून बहाना ठीक नहीं है। यह झगड़ा इतना बढ़ा कि भागते हुए पठानों को भी इसकी खबर लग गयी। मुगलों की सेना में परस्पर विरोध देखकर पठान लौट आये और उन्होंने मुगलों के डेरों पर आक्रमण कर दिया। मजबूर होकर बैरामखाँ को पठानों पर तलवार उठानी पड़ी।

    जीत का संदेश पाकर हुमायूँ भी सरहिंद आ गया। बैरामखाँ ने बड़े भारी जलसे के साथ उसका स्वागत किया और वहीं दरबार लगवाकर हुमायूँ को फिर से हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया।

    इस अवसर पर हुमायूँ ने अमीरों से पूछा कि यह जीत किस के नाम लिखी जाये? कुछ अमीरों ने बैरामखाँ का और कुछ ने अब्दुलमाली का नाम लिया। जब बैरामखाँ और अब्दुलमाली से पूछा गया तो उन्होंने भी अपना-अपना नाम लिया। हुमायूँ ने यह जीत अकबर के नाम लिखी और उसे लाहौर का सूबेदार बनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। साथ ही बैरामखाँ को एक बार फिर अकबर का संरक्षक बनाया।

    बैरामखाँ का बढ़ता हुआ रुतबा तरुद्दीबेगखाँ को अच्छा नहीं लगा। वह हुमायूँ का मुँह लगा विश्वसनीय सिपहसालार था। माछीवारा के मैदान में बैरामखाँ ने उसे नीचा दिखाया था और उसकी वरिष्ठता की परवाह किये बिना अपनी मरजी से ही युद्ध की गतिविधियाँ संचालित की थीं। तरुद्दीबेग ने हुमायूँ से बैरामखाँ की बहुत शिकायतें कीं किंतु हुमायूँ ने तरुद्दीबेग की एक नहीं सुनी। अब बैरामखाँ ने हुमायूँ को सलाह दी कि बिना कोई समय गंवाये दिल्ली के लिये कूच कर देना चाहिये।

    हुमायूँ अपनी सारी सेना बटोरकर एक बार फिर से दिल्ली के लिये चल पड़ा। 20 जुलाई 1555 को हूमायूँ ने दिल्ली में प्रवेश किया और 23 जुलाई को अच्छा दिन जानकर वह दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसकी खूनी ताकत एक बार फिर रंग ले आई थी।


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  • चित्रकूट का चातक - 16

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 16

    मेवों की बेटी

    दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में स्थित रेवाड़ी, अलवर और तिजारा परगनों में सैंकड़ों सालों से मेव जाति बड़ी संख्या में रहती आयी है। ये लोग बड़ी ही विद्रोही प्रकृति के थे और सैंकड़ों साल से दिल्ली के शासकों की नाक में दम करते आये थे। इनके अत्याचारों से तंग आकर बलबन ने बुरी तरह से इनका दमन किया। उसने दिल्ली के चारों ओर फैले हुए सैंकड़ों मील के क्षेत्र में जंगल कटवा दिये और मेवों के सैंकड़ों गाँव उजाड़ दिये। हजारों मेवों को उसने जान से मार डाला। उसके बाद पूरे सौ साल तक ये लोग शांत रहे।

    जब तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण किया था तब नाहर बहादुर इन लोगों का नेता था। नाहर बहादुर के पूर्वज पिछले दो सौ साल से मेवों का नेतृत्व कर रहे थे। कहा जाता है कि नाहर बहादुर के पूर्वज यदुवंशी हिन्दू हुआ करते थे लेकिन नाहर बहादुर मुसलमान हो गया था। उसने तैमूर को संदेश भिजवाया था कि वह बेशक पूरे हिन्दुस्थान को जलाकर खाक कर दे किंतु मेवों की तरफ मुँह न करे क्योंकि मेव तो पहले से ही कुफ्र को खत्म कर चुके हैं।

    जिस समय बाबर ने हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया था तब हसनखाँ मेवाती इन लोगों का नेता था। वह इब्राहीम लोदी की तरफ से बाबर से लड़ने के लिये आया था। इब्राहीम लोदी की पराजय के साथ ही हसनखाँ मेवाती को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा। जब राणा सांगा ने खानुआ के मैदान में बाबर को घेरा तो हसनखाँ मेवाती फिर से अपने खोये हुए राज्य को हासिल करने के लिये राणा सांगा की ओर से बाबर के विरुद्ध आ जुटा। जब बाबर को यह मालूम हुआ तो उसने अपने दूतों मुल्ला तुर्क अली और नजफखाँ बेग को हसनखाँ मेवाती की सेवा में भेजकर कहलवाया कि यदि तुझे राज्य चाहिये था तो मेरे पास आता। मैं भी मुसलमान हूँ और दूसरे मुसलमानों की मदद करना मेरा फर्ज है। हसनखाँ मेवाती ने कहा- 'जो मैं वीर हूँ तो तुझसे लड़कर ही राज्य लूंगा।'

    हसनखाँ की यह हसरत मन में ही रह गयी। वह खानुआ के मैदान में अपने दस हजार सिपाहियों के साथ मारा गया। हसनखाँ के बेटे नाहरखा ने अलवर दुर्ग का सारा खजाना बाबर को समर्पित करके बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली। बाबर ने उसे एक छोटी सी जागीर जीवन यापन के लिये प्रदान की।

    जब हुमायूँ फिर से दिल्ली का बादशाह हुआ तो हसनखाँ मेवाती का चचेरा भाई जमालखाँ हुमायूँ के पास आया। उसने हुमायूँ से प्रार्थना की- 'मैं अपनी बड़ी बेटी का विवाह आपसे करना चाहता हूँ।'

    हुमायूँ इस प्रस्ताव से बड़ा प्रसन्न हुआ। वैसे भी उसे कोई नया विवाह किये हुए काफी समय हो चला था। उसने जमालखाँ से पूछा- 'तेरे कितनी बेटियाँ हैं?'

    जमालखाँ ने कहा- 'विवाह योग्य दो हैं।'

    हुमायूँ जमालखाँ की बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने जमालखाँ को आदेश दिया- 'बड़ी बेटी का निकाह हम से कर दे और छोटी बेटी हमारे खानखाना बैरामखाँ को दे दे।'

    इस प्रकार मेवों की एक बेटी चंगेज और तैमूरलंग के खानदान में और एक बेटी तुर्कों की कराकूयलू शाखा के बहारलू खानदान में ब्याह दी गयी। आगे चलकर इसी छोटी मेव कन्या से 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में बैरामखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम का जन्म हुआ।

    कच्चे चबूतरे का

    बादशाह जब हुमायूँ दिल्ली को प्रस्थान कर गया तो सिकंदर सूर ने पहाड़ों से निकल कर फिर से मानकोट के किले पर अधिकार कर लिया। बैरामखाँ उसे कुचलने के लिये दिल्ली से पुनः कालानौर आया। तेरह वर्ष का अकबर सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की मंशा से उसके साथ था। इस बार सिकन्दर सूर दुर्ग में था और बैरामखाँ खुले मैदान में। इसलिये युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदला हुआ था। फिर भी बैरामखाँ ने मानकोट के चारों ओर कड़ा शिकंजा कस रखा था और ऐसा लगता था कि कुछ ही दिनों में किला हाथ लग जायेगा लकिन उन्हीं दिनों दिल्ली से खबर आई कि 26 जनवरी 1556 को बादशाह हुमायूँ सीढ़ियों से गिर कर मर गया।

    हुमायूँ का अर्थ होता है भाग्यशाली किंतु मुगल बादशाहों में वह सबसे अधिक दुर्भाग्यशाली था। जैसे ही उसकी लोथ सीढ़ियों से नीचे गिरी, सरदारों ने एक आदमी को हुमायूँ के कपड़े पहना दिये और ऐसा प्रदर्शित किया मानो हुमायूँ मरा नहीं है। उन्हें भय था कि दिल्ली में यदि सिकंदर सूर के आदमियों को हुमायूँ की मौत का पता लग गया तो वे बगावत कर देंगे और दिल्ली उनके हाथ से निकल जायेगी।

    दिल्ली से तुरंत विश्वसनीय गुप्तचरों को कालानौर के लिये रवाना किया गया ताकि वे बैरामखाँ को सूचित कर सकें। बैरामखाँ के सामने विकट स्थिति उत्पन्न हो गयी। क्या करे और क्या नहीं करे! यदि इस समय वह अकबर को लेकर दिल्ली के लिये रवाना हो जाता है तो सिकन्दर सूर उसके पीछे दिल्ली तक चढ़ आयेगा और यदि वह दुर्ग का घेरा बनाये रखता है तो दिल्ली में कोई भी षड़यंत्र हो सकता है।

    बहुत सोच-विचार के बाद बैरामखाँ ने निर्णय लिया कि प्रबल शत्रु का सिर पूरी तरह कुचले बिना दिल्ली चले जाने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। उसने उसी समय ईंटों का एक बड़ा चबूतरा बनवाया और उस पर तेरह साल के अकबर को बैठाकर उसे हिन्दुस्थान का बादशाह घोषित कर दिया।

    हुमायूँ के प्रमुख और विश्वसनीय अमीर अब्दुलमाली ने बैरामखाँ के इस कदम का विरोध किया और दरबार में शामिल होने से मना कर दिया। अब्दुलमाली एक सनकी आदमी था जो बहुत रोचक बातें किया करता था। हुमायूँ उसे अपना दोस्त मानता था जिससे अब्दुलमाली का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा हुआ रहता था। हुमायूँ का वरद हस्त होने के कारण अब्दुलमाली जब चाहे, जिसे चाहे, जो चाहे, कहता फिरता था। जब बैरामखाँ ने उसे अकबर के सामने हाजिर होकर मुजरा करने को कहा तो अब्दुलमाली ने बैरामखाँ से बदतमीजी की और मुजरा करने से मना कर दिया।

    अब्दुलमाली अब तक हुमायूँ के संरक्षण में सुरक्षित रहा था। वह नहीं जानता था कि बैरामखाँ किस मिट्टी का बना हुआ है। बैरामखाँ ने तुरंत तलवार निकाल कर अब्दुलमाली की छाती पर अड़ा दी और गिरफ्तार कर लिया। जब तक यह बात अकबर को मालूम होती तब तक बैरामखाँ के आदमी अब्दुलमाली को लेकर लाहौर जाने वाला आधा रास्ता तय कर चुके थे। बैरामखाँ के आदेश पर अब्दुलमाली को लाहौर दुर्ग में कैद करके रखा गया। वह कब और किन परिस्थितियों में मरा, कोई नहीं जानता।

    जब यह सूचना अकबर के सौतेले भाई हकीमखाँ तक पहुंची कि उसका बाप हुमायूँ मर गया है और बैरामखाँ ने अब्दुलमाली को गिरफ्तार करके अकबर को हिन्दुस्थान का बादशाह घोषित कर दिया है तो हकीमखाँ ने अपने आप को अकबर से स्वतंत्र करके काबुल का बादशाह घोषित कर दिया।

    हुमायूँ को इतिहासकारों ने शतरंज का बादशाह कहा है किंतु जिस समय अकबर बादशाह बना, उस समय उसकी स्थिति शतरंज के बादशाह जैसी भी नहीं थी। मिट्टी और ईंटों के चबूतरे पर बैठे हुए उस अनाथ बालक को बादशाह घोषित करके बैरामखाँ ने सबसे पहले मुजरा किया और सोने के इतने सिक्के नजर किये जिनसे अकबर अपने अमीरों और मुजरा करने वालों को बख्शीश दे सके। बैरामखाँ के अलावा किसी और सिपहसलार या सिपाही के पास ऐसा कुछ नहीं था जो बादशाह की नजर किया जा सके।

    कहने को अकबर अब हिन्दुस्थान का बादशाह था किंतु उसके अधिकार में केवल दिल्ली और आगरा के ही सूबे थे। उन पर भी उसका अधिकार अमीरों की दया पर निर्भर करता था। सच पूछो तो मिट्टी और ईंटों के उस कच्चे चबूतरे पर भी उसका वास्तविक अधिकार नहीं था जिस पर कि उसका राज्यतिलक हुआ था। यदि उसे पैर टिकाने या सिर छिपाने के लिये कहीं जगह थी तो केवल सरहिंद के उस सूबे में जो बैरामखाँ के अधिकार में था।

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  • चित्रकूट का चातक - 17

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 17

    सलीमा बेगम

    सदियों से ईरानी खून में तुर्कों, मंगोलों, तातारों, हब्शियों और अरबों का खून आ-आकर मिलने से ईरानी खून का सौंदर्य बुरी तरह से प्रभावित हुआ। जिन ईरानी औरतों के सुंदर मुख को निकट से देखने के लिये सूर्य की किरणें नील आकाश के असीम सरोवर में बिना विचारे कूद पड़ती थीं, उन ईरानी औरतों के चेहरे-मोहरे अब पहले जैसे न रह गये थे फिर भी ईरानी खून का सौंदर्य कहीं-कहीं अपनी झलक पूरे ठाठ के साथ दिखाता ही था। तब ऐसा लगता था मानो कुदरत ने कोई करिश्मा किया है। सलीमा बेगम कुदरत का ऐसा ही करिश्मा थी।

    मध्य एशिया में तूरान एक प्रसिद्ध देश हुआ है। जिन दिनों वहाँ बाबर का शासन था उन दिनों ख्वाजा हसन नाम का एक आदमी ईरानी समाज में बहुत ही आदरणीय माना जाता था। उसका बेटा अलादउद्दीन भी तूरान में पूज्य समझा जाता था। बाबर ने अलादउद्दीन की सच्चरित्रता से प्रभावित होकर अपनी बेटी गुलरुख का विवाह अलादउद्दीन के बेटे मिरजा नूरूद्दीन से कर दिया था। सलीमा बेगम इसी विवाह का परिणाम थी।

    अकबर अपनी बुआ की बेटी सलीमा बेगम से यद्यपि उम्र में छोटा था किंतु वह सलीमा बेगम पर जान लुटाता था और उससे विवाह करना चाहता था लेकिन दूसरी ओर सलीमा बेगम खुरदरे चेहरे वाले जिद्दी और अनपढ़ अकबर को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। सलीमा बेगम अपने दादा की तरह सुशिक्षित और अनुशासन पसंद सुंदर सुघड़ लड़की थी जो काव्य रचना भी खूब करती थी जबकि अकबर अपने दादा बाबर की तरह अक्खड़, झगड़ालू और निरंकुश स्वभाव का युवक था। वह वही करता था जो उसे पसंद होता था, भले ही उसमें बड़ों की राय हो या न हो।

    हुमायूँ की अचानक मौत ने अकबर को अकाल प्रौढ़ बना दिया। वह अपने मनमौजी स्वभाव को त्याग कर, तमाम झगड़ों और जिद्दों को एक तरफ रखकर जिंदगी की जटिलताओं को सुलझाने में व्यस्त हो गया। तेजी से बदल गयी परिस्थितियों में उसकी समझ में अच्छी तरह से आ रहा था कि इस समय वह एक बिगड़ैल शहजादे के स्थान पर बादशाह कहलाने वाला अनाथ बालक है और उसका संपूर्ण भविष्य बैरामखाँ की अनुकम्पा पर निर्भर करता है। अपने इस अतालीक (संरक्षक) को प्रसन्न करने के लिये अकबर ने अपनी सबसे प्रिय वस्तु न्यौछावर करने का निश्चय किया।

    अकबर ने बैरामखाँ को बुला कर उसी कच्चे चबूतरे पर फिर से दरबार आयोजित करने का आदेश दिया। अकबर के इस आदेश से बैरामखाँ असमंजस में पड़ गया। आखिर उससे सलाह-मशविरा किये बिना अकबर दरबार का आयोजन क्यों करना चाहता था?

    जब सारे प्रमुख अमीर दरबार में हाजिर हो चुके तो अकबर ने बैरामखाँ से आग्रह किया कि आज वह एक भेंट अपने अतालीक को देना चाहता है लेकिन वह भेंट के बारे में तभी बतायेगा जब बैरामखाँ बिना कोई सवाल किये अपनी मंजूरी देगा। बैरामखाँ ने बड़े ही आश्चर्य के साथ अकबर की शर्त स्वीकार कर ली।

    जब अकबर ने सलीमा बेगम का विवाह बैरामखाँ से करने की घोषणा की तो स्वयं बैरामखाँ और अन्य दरबारियों के आश्चर्य का पार न रहा। जिस समय हुमायूँ ने आगरा में बाबर को कोहिनूर हीरा भेंट किया था तब जो सिपाही मौके पर हाजिर थे, उनमें बैरामखाँ भी था। कोहिनूर को देखकर बैरामखाँ की आँखें चौड़ गयीं थीं किंतु आज उसे महसूस हुआ कि हुमायूँ ने जो भेंट बाबर को दी थी, आज की भेंट उससे भी कई गुना बढ़कर थी। कोहिनूर आदमी द्वारा तराशा गया पत्थर का बेजान टुकड़ा था तो सलीमा बेगम कुदरत का बनाया हुआ जीता-जागता नायाब करिश्मा।

    अकाल का महादानव

    सलीमा बेगम को पाकर बैरामखाँ दूने जोश से अकबर के शत्रुओं पर टूट पड़ा। इस समय हिन्दुस्थान की स्थिति ऐसी थी कि आगरा से मालवा तथा जौनपुर की सीमाओं तक आदिलशाह की सत्ता थी। काबुल जाने वाले मार्ग पर दिल्ली से लेकर छोटे रोहतास तक सिकंदर सूर का शासन था तथा पहाड़ियों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहीमखाँ के थाने लगते थे। ये तीनों ही व्यक्ति अपने आप को दिल्ली का अधिपति समझते थे। इनके सिपाही आये दिन किसी न किसी गाँव में घुस जाते और जनता से राजस्व की मांग करते। जनता तीन-तीन बादशाहों को पालने में समर्थ नहीं थी। ये सिपाही निरीह लोगों पर तरह-तरह का अत्याचार करते। जबर्दस्ती उनके घरों में घुस जाते और उनका माल-असबाब उठा कर भाग जाते। बिना कोई धन चुकाये जानवरों को पकड़ लेते और उन्हें मार कर खा जाते। शायद ही कोई घर ऐसा रह गया था जिसमें स्त्रियों की इज्जत आबरू सुरक्षित बची थी। जनता इन जुल्मों की चक्की में पिस कर त्राहि-त्राहि कर रही थी लेकिन किसी ओर कोई सुनने वाला नहीं था।

    बैरामखाँ जानता था कि सिकंदर सूर, आदिलशाह और इब्राहीम से निबटे बिना दिल्ली तक पहुंच पाना संभव नहीं था लेकिन इन सब शत्रुओं से प्रबल एक और शत्रु था जो बैरामखाँ को सबसे ज्यादा सता रहा था। वह था देश व्यापी महाअकाल। जिसके चलते राजकोष जुटाना और सेना बढ़ाना संभव नहीं था। बैरामखाँ के पास अब तक जो भी कोष था वह उसने हरहाने (पंजाब के होशियार पुर जिले में स्थित है) में नसीबखाँ की सेना से लूटा था। इसमें से काफी सारा धन उसने हुमायूँ को दे दिया था और हुमायूँ ने वह सारा धन अमीरों की दावतें करने पर तथा मुजरा करने वाली औरतों पर लुटा दिया था। बचे-खुचे धन से वह सेना को किसी तरह वेतन देकर टिकाये हुए था।

    अकाल की स्थिति यह थी कि उत्तरी भारत में उस साल कहीं भी बरसात नहीं हुई थी। दिल्ली और आगरे के जिलों में तो अकाल ने बड़ा ही उग्र रूप धारण कर लिया था और हजारों आदमी भूख से मर रहे थे। राजधानी दिल्ली बिल्कुल बरबाद हो चुकी थी। थोड़े से मकानों के सिवा अब वहाँ कुछ भी नहीं था। अच्छे-अच्छे घरों के लोग दर-दर के भिखारी होकर निचले इलाकों में भाग गये थे जहाँ वे भीख मांगकर गुजारा कर सकते थे। रोजगार की आशा करने से अच्छा तो मौत की आशा करना था क्योंकि मौत फिर भी मिल जाती थी लेकिन रोजगार नहीं मिलता था। जब खाली हवेलियों में भूखे नंगे लोग लूटमार के लिये घुसते तो उन्हें सोना चांदी और रुपया पैसा मिल जाता था किंतु अनाज का दाना भी देखना नसीब नहीं होता था जिसके अभाव में सोना-चांदी और रुपए-पैसे का कोई मूल्य नहीं था।

    संभ्रांत लोगों की यह हालत थी तो निर्धनों और नीचे तबके के लोगों की तकलीफों का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। औरतें वेश्यावृत्ति करके पेट पालने लगीं। लाखों बच्चे भूख और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर गये। अकाल के साथ ही महामारी प्लेग का भी प्रकोप हुआ। प्लेग ने हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। शहर के शहर खाली हो गये। लोगों ने भाग कर जंगलों और पहाड़ों में शरण ली। फिर भी असंख्य आदमी मर गये। अंत में ऐसी स्थिति आयी कि जब खाने को कहीं कुछ न रहा तो आदमी आदमी का भक्षण करने लगा। इक्के-दुक्के आदमी को अकेला पाकर पकड़ लेने के लिये नरभक्षियों के दल संगठित हो गये। पूरे देश में हा-हा कार मचा हुआ था।

    एक ओर तो जनता की यह दुर्दशा थी दूसरी ओर सिकन्दर सूर, आदिलशाह, इब्राहीम लोदी और बैरामखाँ की सेनाओं में हिन्दुस्थान पर अधिकार करने के लिये घमासान मचा हुआ था।

    भारत वर्ष की एसी स्थिति देखकर काशी में बैठे गुसांई तुलसीदास ने लिखा-

    खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

    बनिक को न बनिज न चाकर को चाकरी

    जीविका विहीन लो सीद्यमान सोच बस

    कहै एक एकन सौं, कहाँ जाय का करी।


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