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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 4

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 4

    ईस्लाम का भारत में प्रवेश और प्रसार


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मुस्लिम अरब व्यापारियों ने सातवीं शताब्दी में ही भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय राज्यों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे। कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस भी गए थे। दक्षिण भारत में अरब व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी किया। इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

    आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने सिन्ध को जीत लिया किंतु इस जीत से इस्लाम सिन्ध में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सका। क्योंकि दो सौ वर्षों से कम समय में इस्लाम के अरबों का धार्मिक उत्साह शिथिल पड़ गया तथा इस्लाम का नेतृत्व पहले, ईरानियों और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया। इस्लाम के प्रचार के लिए तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने पूर्व की ओर बढ़कर ई.874 से 999 के बीच खुरासान, आक्सस नदी पार के देश तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया।

    दसवीं शताब्दी ईस्वी में समानी वंश के शासक 'अहमद' का गुलाम 'अलप्तगीन' गजनी का स्वतंत्र शासक बना। उसका वंश 'गजनवी वंश' कहलाया। ई.977 में अलप्तगीन के गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी राज्य की सीमाओं को हिन्दूशाही राज्य 'लमगान' तक पहुँचा दिया। ई.986 में उसने पंजाब के हिन्दूशाही राज्य लमगान पर आक्रमण किया तथा लमगान तक का प्रदेश जीत लिया। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु होने पर उसका पुत्र महमूद गजनी का शासक बना। गजनी का शासक होने के कारण वह महमूद गजनवी कहलाया। महमूद गजनवी ने ई.1000 से 1026 के मध्य, भारत पर 17 आक्रमण किए।

    महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी शासन स्थापित करना नहीं था, अपितु धन-सम्पदा की लूट, मन्दिरों और मूर्तियों को भूमिसात् करना तथा भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करना था। उसके मुस्लिम प्रांतपति अफगानिस्तान से लेकर पंजाब के बीच कुछ क्षेत्रों पर शासन करने लगे। 12वीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने अजमेर एवं दिल्ली के चौहान शासकों को परास्त कर भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव रखी। उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला स्वतंत्र मुस्लिम सुल्तान बना। इसके साथ ही भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या गहरी हो गई।


    हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या

    यद्यपि कुरान तथा हदीस में इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक भूमियों की संकल्पना मौजूद नहीं है तथापि इस्लामी चिंतकों ने पूरे विश्व को दो हिस्सों- 'दारुल इस्लाम' (इस्लाम का घर) तथा 'दारुल हरब' (युद्ध का घर) में बांटा है। दारुल इस्लाम वह भूमि है जहाँ शरीयत का कानून चलता है जबकि दारुल हरब वह भूमि है जहाँ शरीयत के अनुसार शासन नहीं चलता। इसे 'दारुल कुफ्र' भी कहते हैं। दारुल हरब को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है-

    (1) दारुल अहद- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों का बहुमत है।

    (2) दारुल सुलह- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों ने मुसलमानों से शांति का समझौता कर रखा है।

    (3) दारुल दावा- (Proselytizing or preaching of Islam) अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जिसके लोगों को इस्लाम की शिक्षा देकर उनका धर्मांतरण किया जाना है।

    इस्लाम के प्रसार के इस चिंतन से प्रभावित मुसलमान पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में बदलना चाहते थे। इसलिए जहाँ भी मुस्लिम सेनाएं गईं, उन्होंने बुतपरस्तों (मूर्ति-पूजकों) को काफिर (नास्तिक) कहकर उनकी हत्याएं कीं अथवा उन्हें गुलाम बनाया। उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प छोड़े या तो मुसलमान बन जाओ या मर जाओ। एक तीसरा किंतु संकरा रास्ता और भी था जिसके अंतर्गत काफिरों को जिम्मी अर्थात् 'रक्षित-विधर्मी' घोषित किया जाता था जो जजिया देकर मुसलमानों के राज्य में जिंदा रहे।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-99

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-99

    सरदार पटेल ने राजाओं के साथ अत्यंत व्यावहारिक रुख अपनाया


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    सरदार पटेल जितने दृढ़ संकल्प के धनी थे, उतने ही व्यावहारिक भी थे। वे थोथे आदर्शों को व्यर्थ मानते थे और हर समय अपनी दृष्टि लक्ष्य पर गढ़ाये रहते थे। इसलिये उन्होंने राजाओं के साथ जोर-जबरदस्ती के स्थान पर, व्यावहारिक बुद्धि से काम लिया। उन्होंने राजाओं को अनेक राजसी सुविधायें, प्रिवीपर्स की लम्बी रकमें तथा राजप्रमुख और उपराजप्रमुख के पदों का लालच देकर अपनी राजनीति को सफल बनाया।

    कपूरथला रियासत के दीवान जरमनी दास ने राजाओं को दी गई सुविधाओं के बारे में लिखा है- पटेल ने राजाओं को जी खोलकर सुविधायें दीं। राजाओं के महल उनके अधिकार में रहेंगे। उन्हें समस्त प्रकार के करों से मुक्ति मिलेगी। उनके महलों में बिजली, पानी मुफ्त मिलेगा। उन्हें अपनी मोटरों पर खास लाल रंग की प्लेट लगाने की छूट होगी। वे अपनी मोटरों और महलों पर रियासती झण्डा लगा सकेंगे। वे जब विदेशों से लौटेंगे तो उनके सामान की जांच नहीं होगी। उन्हें अदालतों में हाजिरी से छूट रहेगी। भारत सरकार की अनुमति के बिना, किसी महाराजा पर दीवानी या फौजदारी मुकदमा नहीं चलेगा। उन्हें फौजी सलामियां, तोपों की सलामियां, और लाल कालीन के दस्तूर वैसे ही मिलेंगे जैसे कि अंग्रेजों के समय मिलते थे। वे अपने महलों पर सैनिक गार्ड रख सकेंगे।

    महाराजाओं को अपने करोड़ों रुपयों के हीरे जवाहरात, सिवाय राजमुकुट के जवाहरातों के जो रियासत की सम्पत्ति समझे जाते थे और असली निकाल कर नकली लगा दिये गये, रखने का अधिकार रहा। राजाओं द्वारा लाखों रुपयों के मूल्य के असली मोतियों के हार नकली मोतियों के हारों से बदल दिये गये। बड़ौदा के राजा ने दो करोड़ रुपये मूल्य का सात लड़ियों का मोतियों का हार, तीन बेशकीमती हीरों वाला हार, स्टार ऑफ साउथ, यूजीन, शाहे अकबर नामक विख्यात रत्न तथा मोती टँके दो कालीन, बड़ौदा के खजाने से गायब कर दिये। सरदार पटेल ने जानबूझकर राजाओं की इस लुटेरी प्रवृत्ति की ओर से आंखें मूंद लीं।

    पटेल को ज्ञात था कि प्रजा को राजाओं के सामंती शासन के चंगुल से बाहर निकालने के लिये चुकाई गई यह कीमत बहुत कम है। इस प्रकार राजाओं ने सरदार के जाल में फंसकर अपनी शासन-सत्ता और अधिकार भारत सरकार को दे दिये तथा भेड़ों की तरह पंक्तिबद्ध होकर एकीकरण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिये। राजाओं के प्रिवीपर्स तथा सुविधाओं के मामले तय करने में एक साल से अधिक समय लगा। भारत सरकार की ओर से विश्वास दिलाया गया कि राजाओं के अधिकार, सुविधायें और खिताब, जो उन्होंने भारत की ब्रिटिश सरकार से संधियों एवं सेवाओं के बदले प्राप्त किये थे, उन्हें भारत सरकार द्वारा मान्यता देकर सुरक्षित रखा जायेगा।

    राजाओं को सरदार पर भरोसा हो गया, भरोसा करने के अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था। इसलिये उन्होंने जो मिल रहा था, उसे लेकर अपने राज्य छोड़ दिये। उनके स्वर्ण मुकुट उतर चुके थे, अब तो केवल चमकीला रंग ही शेष था जिसे साफ करने का काम आगे चलकर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को करना था।

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  • गोरों ने भारत का भाग्य राजाओं के पास गिरवी रखने की योजना बनायी

     02.06.2020
    गोरों ने भारत का भाग्य राजाओं के पास  गिरवी रखने की योजना बनायी

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    तीन गोल मेज सम्मेलनों के बाद 15 मार्च 1933 को ब्रिटिश सरकार ने एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया। ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों की एक संयुक्त प्रवर समिति द्वारा इस श्वेत पत्र का अध्ययन किया गया। लार्ड लिनलिथगो इस समिति के अध्यक्ष थे। ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के 27 व्यक्ति इस समिति के साथ जोड़ दिये गये जिनकी कोई संवैधानिक स्थिति नहीं थी।

    गोरी सरकार द्वारा भारत के वायसराय से कहा गया कि वे संयुक्त समिति की रिपोर्ट आने से पूर्व ब्रिटिश भारतीय नेताओं तथा भारतीय राजाओं के साथ कोई सहमति बनाने का प्रयास करें। वायसराय ने सुझाव दिया कि प्रस्तावित भारत संघ में 225 सीटों वाले उच्च सदन में देशी राज्यों को 90 सीटें मिलें तथा 375 सीटों वाले निम्न सदन में देशी राज्यों को 125 सीटें मिलें। बाद में वायसराय ने इसमें संशोधन करते हुए सुझाव दिया कि 17 एवं अधिक तोपों की सलामी वाले शासकों के राज्यों को प्रस्तावित संघ के दोनों सदनों में पृथक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार मिले। ऐसे राज्यों की संख्या 24 थी। वायसराय का सुझाव था कि 15 एवं 13 तोपों की सलामी पाने वाले कुछ प्रसिद्ध शासकों के राज्यों को भी अलग प्रतिनिधित्व दिया जाये तथा शेष राज्यों को क्षेत्रीय समूह के अनुसार प्रतिनिधित्व दिया जाये।

    इस प्रस्ताव को कांग्रेस तथा भारतीय नरेशों अर्थात् दानों ही पक्षों ने नकार दिया क्योंकि कांग्रेस लोकसभा एवं राज्य सभा में इतनी अधिक सीटें राजाओं के प्रतिनिधियों को देने के लिये तैयार नहीं थी। इसके विपरीत राजा लोग इतनी कम सीटों पर संतुष्ट होने को तैयार नहीं थे। इस पर संयुक्त प्रवर समिति ने अप्रेल 1933 से नवम्बर 1934 तक लगातार 159 बैठकें करके अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं। समिति ने रिपोर्ट दी कि रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या राज्य परिषद या ऊपरी सदन में अधिक से अधिक 104 तथा ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों की संख्या अधिक से अधिक 156 होगी। निम्न सदन या असेम्बली में 250 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत के तथा अधिक से अधिक 125 प्रतिनिधि रियासतों के रहेंगे।

    संयुक्त प्रवर समिति द्वारा की गयी इस सिफारिश से भारत में कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दलों के नेता डर गये। इस डर के दो कारण थे, एक तो यह कि राजाओं की झोली में अधिक सीटें डाली जा रहीं थीं तथा दूसरा यह कि रिपोर्ट में कहा गया था कि संघीय विधान सभा के ऊपरी तथा निम्न सदनों में रियासतों के प्रतिनिधि शासकों द्वारा मनोनीत होंगे, जनता द्वारा नहीं चुने जायेंगे। यदि इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर भारत संघ का निर्माण होता तो निश्चित ही भारत का भाग्य सदा-सदा के लिये भारतीय नरेशों के पास गिरवी रख दिया जाता। राजा लोग एक मत रहकर अपनी इच्छानुसार संघीय कानून बनवाते जबकि ब्रिटिश भारतीय नेताओं को मिलने वाली सीटों का बंटवारा मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस के बीच हो जाता। मुस्लिम लीग कभी भी कांग्रेस को काम नहीं करने देती और देश में अराजकता की स्थिति को बनाये रखती।

    यदि राजाओं में दूरदर्शिता होती तो वे इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देते किंतु राजाओं ने मूर्खता का परिचय देकर अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मार ली। 12 दिसम्बर 1934 को गोरी सरकार ने संयुक्त प्रवर समिति की अनुशंसाओं के आधार पर ब्रिटिश संसद के समक्ष भारत सरकार विधेयक प्रस्तुत किया। नरेन्द्र मण्डल ने विधेयक के प्रस्तावों के परीक्षण के लिये 15 रियासती मंत्रियों की एक समिति नियुक्ति की जिसके अध्यक्ष सर अकबर हैदरी थे। इस समिति ने बिल में कई संशोधनों के सुझाव दिये तथा कहा कि बिना संतोषजनक संशोधनों के, शासकों के लिये विधेयक में प्रस्तावित योजना को स्वीकार करना संभव नहीं होगा।

    राजाओं की इस मूर्खता को देखकर गोरी सरकार के आश्चर्य का पार न रहा। उसने फरवरी 1935 में बम्बई में देशी राजाओं और उनके प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया जिसमें कहा गया कि यद्यपि कुछ राजाओं ने संघ के लिये मुखसेवा की है किंतु सामान्यतः राजा लोग अभी तक संघ के उस मूलभूत सिद्धांत को मानने के लिये तैयार नहीं हैं जिसके अनुसार राजाओं की कुछ शक्तियां सीमित हो जायें तथा रजवाड़ों की आंतरिक सम्प्रभुता का कुछ हिस्सा हमेशा के लिये समाप्त हो जाये, इसके बदले में उन्हें सरकार में हिस्सेदारी मिले किंतु राजा लोग अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने निर्णय लिया कि रियासतों के लिये ऊपरी सदन में कम से कम 125 सीटों की मांग की जाये जिससे नरेन्द्र मण्डल के सारे सदस्यों को व्यक्तिगत और समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। निम्न सदन में 350 में से 40 प्रतिशत के अनुपात से 140 सीटों की मांग की गयी।

    राजाओं की मूर्खता यहां तक ही सीमित नहीं रही और इस निर्णय के बाद राजाओं में फूट पड़ गयी। कुछ बड़ी रियासतों ने मैसूर के दीवान सर मिर्जा इस्माइल के नेतृत्व में उस प्रस्ताव का विरोध किया जो उनकी अनुपस्थिति में पारित कर लिया गया था। पाँच बड़ी रियासतों ने जिन्हें 21 तोपों की सलामियां मिलती थीं, संघीय निर्माण विधान मण्डल में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाये जाने की मांग की। जबकि मध्यम एवं लघु आकार वाली रियासतों ने अपनी मर्यादा उन रियासतों के बराबर रखे जाने की मांग की जिन रियासतों के शासकों को 21 तोपों की सलामी मिलती थी। मध्यम तथा लघु रियासतों के शासकों ने मांग की कि ऊपरी सदन में सभी स्वशासित रियासतों के प्रतिनिधि समान अनुपात में लिये जायें, जिससे बड़ी रियासतों को बहुमत का अधिकार न रहे। ऐसा न होने पर अनेक समस्याएं और कठिनाइयां उठने की संभावना थी। मध्यम तथा लघु रियासतों को विश्वास था कि यदि बड़ी रियासतों को संख्या में अधिक वोट प्राप्त करने का अधिकार दिया गया तो सारी योजना अवश्य असफल रहेगी।

    मध्यम तथा लघु रियासतों का रियासतों का कहना था कि बड़ी रियासतों को विधान मण्डल में विशेष सुविधाएं प्राप्त करने का क्या अधिकार है? हर एक शासक जब अपनी रियासत में समान रूप से प्रभुत्व रखता है तब तोपों की सलामी का आधार अत्यंत असंतोषजनक और भेदभाव पैदा करने वाला है। इसे अमान्य घोषित कर देना ही उचित होगा। सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि राज्यों के मूलभूत आवश्यकताओं तथा व्यापक हितों की सुरक्षा के लिये आवश्यक संशोधनों को सम्मिलित किये बिना, इस विधेयक तथा सम्मिलन पत्र को स्वीकार करना संभव नहीं होगा।

    बीकानेर महाराजा ने वायसराय के नाम एक नोट भिजवाया जिसमें निश्चित संशोधनों का सुझाव दिया गया। इस नोट में कहा गया कि संघ योजना के सम्बन्ध में आगे चलने वाले विचार विमर्श की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ब्रिटिश सरकार विधेयक में इन संशोधनों को करने के लिये कहाँ तक तैयार है! ब्रिटिश सरकार ने राजाओं को भाड़ में जाने दो वाली मुद्रा अपनायी तथा गोरी सरकार के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने राजाओं द्वारा उठाये गये बिंदुओं की जाँच करके वायसराय के माध्यम से समस्त राजाओं को एक परिपत्र भिजवाया जिसमें कहा गया कि सम्राट की सरकार की यह इच्छा नहीं है कि संघ में सम्मिलित होने के लिये उन मुद्दों पर विचार विमर्श किया जायें जो कि बिल में हैं ही नहीं!

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 5

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 5

    सूफियों के प्रेम-तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके


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    सूफी-मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है जो सीरिया के आसपास शाम नामक देश में रहते थे। सूफी मत की आधारशिला रति-भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और हजरत मुहम्मद ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी 'इश्क मजाजी' को 'इश्क हकीकी' की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, नव-अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है तथा सूफी-मत को 'जीवन का क्रियात्मक धर्म' कहा जाता है।

    भारत में इस्लाम के साथ-साथ सूफी-मत का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, अपने वर्तमान स्वरूप में इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम। सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघों में विभक्त थे। अरब से लेकर मध्य एशिया में उनके अलग-अलग केन्द्र थे, जहाँ से चलकर वे भारत पहुंचे थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

    भारत की धरती पर विगत लगभग एक हजार साल से सूफियों के प्रेम-वेदना से भरे तराने गूंज रहे हैं। सूफी फकीरों एवं दरवेशों ने भारतीय वेदान्त के प्रेमतत्व को अपने गीतों में ढालकर भारत की धरती को प्रेम और भक्ति की दीवानगी से भर दिया। अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया, नागौर में हमीदुद्दीन नागौरी जैसे सैंकड़ों सूफियों ने इस्लाम को हिन्दुओं के निकट लाने का काम किया। भारत विभाजन के समय जिन पंजाब और सिंध को सर्वाधिक खून के आंसू बहाने पड़े, उन पंजाब और सिंध की धरती सैंकड़ों सालों से सूफियों के प्रेम-तरानों से गुंजारित थी। 12वीं सदी के सूफी बाबा फरीद, सत्रहवीं सदी के सूफी कवि बाबा अब्दुल रहमान, डेरा गाजी खान के साखी सरवर, चमकानी के फंडू बाबा, सूफी दरवेश अब्दुल्लाह शाह गाजी, बुल्लेशाह, वारिसशाह आदि सूफी संत पंजाब की धरती को अपने प्रेम-तरानों एवं विरह गीतों से सिंचित करते रहे।


    पंजाबी कवि बुल्लेशाह

    सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब औरंगजेब भारत का सम्पूर्ण इस्लामीकरण करने के नाम पर भारत के चप्पे-चप्पे को रक्त से भिगो रहा था, उस समय ई.1680 में पंजाब के बहावलपुर राज्य के 'गिलानियाँ' अथवा मुल्तान क्षेत्र के कसूर नामक शहर में बुल्लेशाह नामक एक सूफी दरवेश पैदा हुआ। आज यह क्षेत्र पाकिस्तान में है। बुल्लेशाह की मृत्यु ई.1757 के आसपास हुई। उसकी कविताओं को काफ़ियाँ कहा जाता है। बुल्लेशाह पैगम्बर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशजों में से थे। बुल्लेशाह जब बड़े हुए तो शाह इनायत के चेले बन गए। बुल्लेशाह का परिवार पैग़म्बर मुहम्मद की बहिन का वंशज होने से ऊँची 'सैय्यद' जाति का था जबकि शाह इनायत 'आराइन' जाति से थे जिन्हें नीची जाति का माना जाता था लेकिन जाति-पांति के भेद-भाव से दूर बुल्लेशाह अपने गुरु शाह इनायत से जुड़े रहे और प्रेम-तराने गाते रहे। अपने एक गीत में उन्होंने कहा-



    बुल्ले नूँ समझावन आँईयाँ भैनाँ ते भरजाईयाँ

    मन्न लै बुल्लेया साड्डा कैहना, छड्ड दे पल्ला राईयाँ

    आल नबी, औलाद अली, नूँ तू क्यूँ लीकाँ लाईयाँ?

    जेहड़ा सानू सईय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सज़ाईयाँ

    जो कोई सानू राईं आखे, बहिश्तें पींगाँ पाईयाँ

    राईं-साईं सभनीं थाईं रब दियाँ बे-परवाईयाँ

    सोहनियाँ परे हटाईयाँ ते कूझियाँ ले गल्ल लाईयाँ

    जे तू लोड़ें बाग़-बहाराँ चाकर हो जा राईयाँ

    बुल्ले शाह दी ज़ात की पुछनी? शुकर हो रज़ाईयाँ!

    अर्थात्- बुल्ले को समझाने के लिए बहनें और भाभियाँ आईं और उन्होंने कहा हमारा कहना मान बुल्ले, आराइनों का साथ छोड़ दे। तू नबी के परिवार और अली के वंशजों में से है। बुल्ले ने जवाब दिया- जो मुझे सैय्यद बुलाएगा उसे दोज़ख़ (नरक) में सज़ा मिलेगी। जो मुझे आराइन कहेगा उसे बहिश्त (स्वर्ग) के सुहावने झूले मिलेंगे। आराइन और सैय्यद इधर-उधर पैदा होते रहते हैं, परमात्मा को ज़ात की परवाह नहीं। वह ख़ूबसूरतों को परे धकेलता है और बदसूरतों को गले लगता है। अगर तू बाग़-बहार (स्वर्ग) चाहता है तो आराइनों का नौकर बन जा। बुल्ले की ज़ात क्या पूछता है? ऊपर वाले की बनाई दुनिया के लिए शुक्र मना।


    सिन्धी संत झूलेलाल तथा शाहबाज़ क़लन्दर

    पंजाबी मिश्रित सिन्धी भाषा में लिखा गया 'दमादम मस्त क़लन्दर' नामक गीत भारतीय उपमहाद्वीप का अत्यंत लोकप्रिय एवं बहुत लम्बा सूफ़िआना गीत है जो सिन्ध प्रांत के महान संत झूले लाल क़लन्दर को सम्बोधित करके उनके सामने एक माँ की फ़रियाद रखता है। झूले लाल के साथ-साथ इसमें सूफ़ी संत शाहबाज़ क़लन्दर का भी उल्लेख है। झूले लाल साईं हमेशा लाल चोगा पहनते थे, इसलिए उन्हें 'लाल' या 'लालन' नाम से पुकारा जाता है। गाने का हर छंद 'दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर' पर पूरा होता है जिसका अर्थ है- 'दम-दम में मस्ती रखने वाला क़लन्दर (फ़क़ीर), जो हर सांस में रब (अली) को रखता है।' इस गीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं-


    ओ लाल, मेरी पत्त रखियो बला झूले लालण,

    सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

    दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!



    चार चिराग़ तेरे बरन हमेशा,

    पंजवां बारन आईआं बला झूले लालण,

    सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

    दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!



    हिंद-सिंद पीरा तेरी नौबत वाजे,

    नाल वजे घड़ेयाल बला झूले लालण,

    सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

    दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!



    मावाँ नूं पीरा बच्चड़े देना ई,

    पैणा नूं देना तूं वीर मिला झूले लालण,

    सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

    दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!



    उच्चा रोज़ा पीरा तेरा,

    हेठ वग्गे दरिया बला झूले लालण,

    सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

    दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे



    अन्दर! हर दम पीरा तेरी ख़ैर होवे,

    नाम-ए-अली बेड़ा पार लगा झूले लालण,

    सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

    दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

    अर्थात्- हे लाल, मेरी रक्षा कीजिये, ऊंचे झूले लाल, सिन्ध का और सेरवन का संत शाहबाज़ क़लन्दर! दम-दम में मस्त फ़क़ीर, हर सांस में रब! तेरी मज़ार पर चार चिराग़ हमेशा जलते रहते हैं, तेरे आदर में पांचवां दिया जलाने के लिए मैं आई हूँ। ...... हे पीर, पूरे हिंदुस्तान और सिन्ध में तेरी महानता गूंजती है, और तेरी मज़ार के बड़े घंटे की आवाज़ फैलती है। ...... हे पीर, झोली फैलाने वाली माओं को तू बच्चे देता है, मांगने वाली बहनों को तू भाई देता है। ...... ओ पीर, तेरा डेरा पहाड़ की ऊंचाई पर है, नीचे दरिया बहता है ...... हे पीर, हर जगह तेरी जीत हो, अली के नाम पर भवसागर में मेरा बेड़ा पार लगा दे। ...... सिन्ध का और सेरवन का संत शाहबाज़ क़लन्दर! हे हर सांस में मस्त फ़क़ीर!


    भगवान झूलेलाल के संदेश

    सिन्धी समाज में मान्यता है कि चेटीचण्ड के दिन वरुण देव ने अवतार लिया तथा प्रजा को मिरखशाह नामक दुष्ट शासक के अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई। उनके बचपन का नाम उडेरोलाल था किंतु बाद में उन्हें झूलेलाल तथा लालसांई के नाम से जाना गया। सिंध क्षेत्र के मुसलमान उन्हें ख्वाजा खिज्र जिन्दह पीर के नाम से पूजते हैं। उनके प्रमुख संदेश इस प्रकार थे-

    - 'ईश्वर अल्लाह हिक आहे।' अर्थात् ईश्वर अल्लाह एक हैं।

    - 'कट्टरता छदे, नफरत, ऊंच-नीच एं छुआछूत जी दीवार तोड़े करे पहिंजे हिरदे में मेल-मिलाप, एकता, सहनशीलता एं भाईचारे जी जोत जगायो।' अर्थात् विकृत धर्मांधता, घृणा, ऊंच-नीच और छुआछूत की दीवारें तोड़ो और अपने हृदय में मेल-मिलाप, एकता, सहिष्णुता और भाईचारे के दीप जलाओ।

    - 'सभनि हद खुशहाली हुजे।' अर्थात्- सब जगह खुशहाली हो।

    - 'सजी सृष्टि हिक आहे एं असां सभ हिक परिवार आहियू।' अर्थात् समस्त सृष्टि एक है, हम सब एक परिवार हैं।


    वारिसशाह की हीर-राँझा

    सूफी संत प्रेम में ईश्वर को और ईश्वर में प्रेम को देखते थे। उन्होंने बहुत से विख्यात प्रेमाख्यानों की रचना की। हीर-राँझा जैसे प्रेमाख्यान पर वे भला कैसे नहीं झूम जाते! इस प्रेमाख्यान को सैंकड़ों, कवियों, लेखकों एवं साहित्यकारों ने अपनी-अपनी तरह से लिखा किंतु हीर की पीर को ओर राँझा के प्रेम को पंजाबी सूफी कवि वारिसशाह ही सर्वाधिक मार्मिक शब्द दे सका। वारिसशाह ने अपनी कविता हीर-राँझा में चिनाब नदी के किनारे स्थित तख्त हजारा गांव तथा उसके लड़कों का वर्णन इस रसमय ढंग से किया-

    केही तख़त हज़ारे दी सिफ़त कीजे, जित्थे रांझ्यां रंग मचायआ ए ।

    छैल गभ्भरू, मसत अलबेलड़े नी, सुन्दर हिक्क थीं हिक्क सवायआ ए ।

    वाले कोकले, मुन्दरे, मझ लुंङी, नवां ठाठ ते ठाठ चड़्हायआ ए ।

    केही सिफ़त हज़ारे दी आख सकां, गोया बहशत ज़मीन ते आया ए ।


    अर्थात्- चेनाब नदी के किनारे की सुन्दर बस्ती तख्त हजारा की क्या प्रशंसा करें जहाँ रांझों ने रौनक कर रखी है। यहाँ के मस्त, अलबेले सुंदर नौजवान देखते ही बनते हैं। दरिया की लहरों और बगीचों की सुगंधित हवाओं के कारण ऐसा लगता है मानो स्वर्ग ही धरती पर आ गया है। यही रांझाओं की धरती है जो मस्ती से यहाँ रहते हैं। इस बस्ती के नौजवान खूबसूरत और बेपरवाह किस्म के हैं। वे कानों में बालियाँ पहनते और कंधांे पर नए शॉल रखते हैं। उन्हें अपनी खूबसूरती पर गर्व है और वे सब इस मामले में एक-दूसरे को मात देते हुए प्रतीत होते हैं।

    हीर के रूप-लावण्य की प्रशंसा करते हुए कवि कहता है-

    केही हीर दी करे तारीफ शायर, मत्थे चमकदा हुसन महताब दा जी ।

    ख़ूनी चूंडियां रात ज्यु चन्न गिरदे, सुरख रंग ज्युं रंग शहाब दा जी ।

    नैन नरगसी मिरग ममोलड़े दे, गल्ल्हां टहकियां फुल्ल गुलाब दा जी ।

    भवां वांङ कमान लाहौर दे सन, कोई हुसन ना अंत हिसाब दा जी ।

    सुरमा नैणां दी धार विच्च फब रहआ, चंगा हिन्द ते कटक पंजाब दा जी।


    अर्थात्- कवि, 'हीर' की भला क्या प्रशंसा करे! उसका माथा ऐसे चमक रहा है जैसे चंद्रमा का सौन्दर्य हो। उसकी लाल चूड़ियां इतनी सुर्ख हैं जैसे आग की लपटें हों। उसके नरगिसी आंखें मृगशावक की आंखों जैसी हैं तथा गाल गुलाब के फूलों जैसे लगते हैं। उसकी भौंहें लाहौरी तलवार की तरह खिंची हुई हैं। उसकी आंखों में सुरमा ऐसे सुशोभित हो रहा है जैसे हिन्दुस्तान और पंजाब की कोई भली सी सेना हो। उसके यौवन का कोई पार नहीं है।

    इस प्रकार सूफियों द्वारा की गई प्रेम और रस की सृष्टि ने सैंकड़ों साल तक पंजाब वासियों के हृदयों में जिस आनंद की वर्षा की वह अन्य क्षेत्र के मानवों के लिए दुर्लभ है किंतु बुल्लेशाह, लालशाह, झूलेलाल तथा वारिस शाह जैसे सूफी फकीरों, चांद बीबी जैसे शासकों, गुरु नानक जैसे सिक्ख गुरुओं, रहीम एवं रसखान जैसे मुस्लिम कवियों और कबीरदास एवं रविदास जैसे हिन्दू संतों के ये प्रेम-प्रयास उस समय व्यर्थ प्रतीत होने लगे जब दोनों संस्कृतियों ने एक-दूसरे से अपनी दूरी यथावत् बनाए रखी। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही, अपने-अपने कारणों से एक-दूसरे के निकट आने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। भारत की भूमि में भावी पाकिस्तान की जड़ें घृणा और वैमनस्य की खाद-पानी पाकर अनवरत विस्तार पाती रहीं। एक न एक दिन उन्हें धरती से बाहर निकलकर भारत का विभाजन करना ही था ...... पाकिस्तान बनना ही था।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-100

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-100

    पटेल को राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे


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    सदार पटेल ने भारत के 554 राजाओं के राज्य, भारत में मिलाये थे। जब राजाओं को उनके राज्य जाते दिखे तो उन्होंने अपने महलों, कोषागारों एवं राजकीय भवनों में रखी धन-सम्पत्ति को छिपाना आरम्भ कर दिया। अनेक राजाओं ने राजकीय सम्पत्ति को भी हड़प लिया। हैदराबाद तथा भोपाल तथा पटियाला आदि रियासतों के राजाओं ने अपने महलों, कारों, बग्घियों एवं पालकियों पर लगे सोने-चांदी के पतरे उखाड़ लिये। सोने-चांदी के बरतन गलाकर उन्हें धातुओं में बदल दिया। महलों की छतों पर लगे हीरे-जवाहरात गायब कर दिये। खजानों में रखे कीमती पत्थर, मोतियों की मालायें और रत्नाभूषण महलों से निकालकर अन्यत्र पहुंचा दिये। कुछ राजाओं ने स्वयं को काश्तकार घोषित करके खेती की जमीनों पर कब्जा कर लिया।

    राज्य की कीमती जमीनें अपने दास-दासियों एवं कुत्ते-बिल्लियों के नाम कर दी गई। राजाओं की इन कार्यवाहियों से कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं में बेचैनी व्याप्त हो गई तथा भारत भर के राजाओं के विरुद्ध तरह-तरह की शिकायतें सरदार पटेल के पास पहुंचने लगीं। पटेल को मानव मन की गहरी समझ थी। वे जानते थे कि यह अस्वाभाविक नहीं है। भविष्य की आशंका से ग्रस्त कौन मानव ऐसा नहीं करेगा! इसलिये पटेल ने राजाओं को आश्वस्त करते हुए यह वक्तव्य दिया कि मुझे राजाओं के राज्य चाहिये, उनका धन नहीं।

    पटेल ने उदार भाव से राजाओं के महल, बग्घियां, कारें, सोने-चांदी और रत्नों के भण्डार उनके पास रहने दिये। इस पर भी कुछ राजाओं की भूख शांत नहीं हुई। वे तरह-तरह की समस्याएं उठाने लगे। फिर भी सरदार पटेल ने अत्यंत उदारता से राजाओं की समस्याओं का निराकरण किया। बांसवाड़ा के महारावल ने राज्य के जंगलों पर, निजी सम्पत्ति होने का दावा किया तथा भारत सरकार से शिकायत की कि आदिवासी, राजाओं की निजी सम्पत्ति में आने वाले जंगलों को भी काट रहे हैं, जंगलों में स्थित भवनों में तोड़-फोड़ कर रहे हैं एवं कृषि क्षेत्र को हानि पहुंचा रहे हैं।

    महाराजा जयपुर ने मांग की कि उनके दिल्ली स्थित जयपुर भवन में स्थित साजोसामान, पशुधन एवं आदमियों का खर्चा सरकार द्वारा वहन किया जाये। जयपुर भवन महाराजा की निजी सम्पत्ति मान लिया गया था इसलिये सरकार ने इस व्यय को उठाने से मना कर दिया। झालावाड़ के महाराजराणा ने अपने महलों के बिजली व्यय के पुनर्भरण की मांग की तो रियासती विभाग ने महाराजराणा को लिखा कि जिन महलों एवं भवनों को राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है, उनके विद्युत व्यय एवं विद्युत संस्थापन आदि का व्यय राजाओं के प्रिवीपर्स में से किया जाये न कि राज्य व्यय से। टोंक तथा किशनगढ़ आदि कुछ रियासतों ने राजस्थान में विलय से ठीक पहले ही राजमाताओं (शासक की माता, विधवा बुआ अथवा दादी) को जागीरें प्रदान कीं ताकि राजमाताओं को अधिक से अधिक भत्ते प्राप्त हो सकें।

    रियासती विभाग ने इन प्रकरणों की जांच करवाने के आदेश दिये। सरदार पटेल की अध्यक्षता वाले रियासती विभाग ने समस्त प्रांतों के मुख्य सचिवों को निर्देशित किया कि कई पूर्व रियासतों की राजमाताओं से शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि उन्हें भत्तों का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। अतः शासकों तथा राजमाताओं को इस सम्बन्ध में सूचना भिजवायी जाये कि इस विषय पर क्या कार्यवाही की जा रही है। विभिन्न संघ इकाइयों में सम्मिलित पूर्व रियासतों के शासकों ने रियासती विभाग को सूचित किया कि जिन राजमाताओं को पूर्व में राज्यकोष से भत्ते मिलते रहे थे, उनके बंद हो जाने के कारण शासकों द्वारा अपने प्रिवीपर्स में से भुगतान किया जा रहा है।

    राजपरिवारों के सदस्यों, विशेषतः राजमाताओं को भत्तों का भुगतान अलग से किया जाये। रियासती विभाग ने निर्णय दिया कि जिन सदस्यों को पहले से ही अलग से भत्ते मिल रहे थे, उन्हें राज्य के राजस्व से भत्तों का भुगतान किया जाना चाहिये न कि शासकों के प्रिवीपर्स से। शासक के प्रिवीपर्स में शासक के बच्चे एवं पत्नियां ही सम्मिलित की गयी हैं। ये भत्ते जीवन भर के लिये दिये जाने चाहिये। जयपुर महाराजा ने राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ स्वर्ण पर अपना दावा किया जिसका मूल्य एक करोड़ रुपये था। मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने उसे राज्य का बताते हुए देने से मना कर दिया।

    बात सरदार पटेल तक गयी। सरदार पटेल ने मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री से पूछा कि सोना किसका है? इस पर शास्त्री ने जवाब दिया कि सोना पहले तो राजा का ही रहा होगा, पर बाद में राज्य के बजट में दर्ज हो गया। अतः अब राज्य का मानना पड़ेगा। सरदार ने पूछा कि आपकी राय क्या है? शास्त्री ने कहा कि मेरी राय में सोना महाराजा को दे देना चाहिये। सरदार बोले क्यों? शास्त्री ने कहा इतना बड़ा राज्य किसी का आपने ले लिया है। इतना सा सोना दे देने में क्यों संकोच करना चाहिये। सरदार ने सोना महाराजा को देने की अनुमति दे दी।

    जैसलमेर महारावल ने वर्ष 1927-28 में अपने निजी धन से एक पुस्तकालय भवन बनाने के लिये राजकोष में राशि जमा करवाई थी। जैसलमेर रियासत के विलय के बाद महारावल ने मांग की कि पुस्तकालय भवन का उपयोग महकमा खास के कार्यालयों के लिये हो रहा है इसलिये महारावल द्वारा इस भवन को बनाने के लिये दी गयी राशि, ब्याज सहित महाराजा को लौटाई जाये। सरकार ने निर्णय दिया कि यदि इस तरह के दावों को स्वीकार किया गया तो रियासती विभाग में शासकों की ओर से धन राशि की मांग के दावों की बाढ़ आ जायेगी। अतः महाराजा का यह दावा निरस्त करने योग्य है।

    झालावाड़ के शासक ने दावा किया कि महल परिसर में स्थित बिजलीघर शासक की स्वयं की निजी सम्पत्ति है। साथ ही राजस्थान सरकार द्वारा इस महल के बिजलीघर में स्थित पुरानी मशीनों की नीलामी भी नहीं की जा सकती क्योंकि यह महाराजा की निजी सम्पत्ति में आती हैं। भारत सरकार ने राजस्थान सरकार को सूचित किया कि इस प्रकरण पर तब तक कोई कार्यवाही न की जाये जब तक कि स्वयं वी. पी. मेनन इस प्रकरण का निस्तारण न कर दें। टोंक कलक्टर ने पूर्व टोंक रियासत की कुछ सम्पत्ति जिसमें घोड़े, बग्घियां, कार, अस्तबल आदि सम्मिलित थे, को सरकारी सम्पत्ति मानकर नीलाम करने का निर्णय लिया।

    इस पर टोंक नवाब ने सरकार से अनुरोध किया कि जब तक टोंक नवाब की निजी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय न हो जाये तब तक उक्त नीलामी रोकी जाये। डूंगरपुर महारावल के अधिकार में माही नदी के बीच में स्थित एक टापू पर स्थित भूमि बेंका (सोहन बीड) कहलाती थी। यह एक विशाल भूमि थी जिसमें सिंचाई के लिये माही नदी का जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। महारावल ने रियासती विभाग को पत्र लिखकर यह भूमि महारावल को ही काश्त के लिये दिये जाने की मांग की। रियासती विभाग ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सिफारिश की कि उक्त भूमि समुचित आकलन के आधार पर महारावल को काश्त के लिये दे दी जाये। इस प्रकार सरदार पटेल ने राजाओं की अधिकांश मांगों पर सहानुभूति पूर्वक निर्णय लिये।

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  • धौलपुर नरेश नरेन्द्र मण्डल के चांसलर पद का चुनाव हार गये

     02.06.2020
    धौलपुर नरेश नरेन्द्र मण्डल के चांसलर पद का चुनाव हार गये

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    राजपूताने की धौलपुर रियासत के महाराजराणा सर रामसिंह के.सी.आई.ई.को गोरे बादशाह की सेना में कैप्टेन का अवैतनिक पद प्राप्त था। जब वे मृत्यु को प्राप्त हुए तो उनके भाई हिज हाइनेस रईसुद्दौला सिपहदारुलमुल्क राजा ए हिन्द महाराजाधिराज श्री सवाई महाराजा राणा लोकेन्द्र बहादुर दिलेरजंग देव उदयभान सिंह जी.सी.आई.ई.धौलपुर के राजसिंहासन पर बैठे। वे बहुपठित एवं बुद्धिमान राजा माने जाते थे तथा अत्यंत ही महात्वाकांक्षी थे। उनकी इच्छा थी कि वे नरेन्द्र मण्डल के चान्सलर बन जायें किंतु पटियाला के राजा भूपिन्दर सिंह की भी इस पद पर दृष्टि थी। वे भी इस चुनाव में खड़े हुए। उन्होंने उदयभान सिंह से कहा कि वे चुनाव न लड़ें किंतु उदयभान सिंह नहीं माने। उदयभान सिंह को गुमान था कि भारत सरकार का पोलिटिकल डिपार्टमेंट उदयभान सिंह कि पक्ष में था जिसके चलते उन्हें समस्त रियासतों में नियुक्त रेजीडेण्टों एवं भारत के वायसराय विलिंगडन का सक्रिय सहयोग मिलेगा और वे हर हालत में चुनाव जीत जायेंगे। इस प्रकार दो दिग्गज जिनके पूर्वज कभी युद्धों के मैदानों में ताल ठोंका करते थे एक दूसरे के विरुद्ध चुनावी मैदान में आ डटे।

    उन दिनों इस चुनाव में कई तरह के हथकण्डे अपनाये जाते थे तथा रियासत के धन से महाराजा लोग बड़ी शान से चुनाव लड़ा करते थे। उन दिनों पूरे भारत के समाचार पत्र इन चुनावी समाचारों से रंग जाया करते थे। राजा लोग हवाईजहाज लेकर पूरे हिन्दुस्थान में छितरी हुई रियासतों का दौरा करते और अपने लिये वोट मांगते। मत डालने वाले राजाओं, उनके सलाहकारों व चाटुकारों को रिझाने के लिये उपहार दिये जाते। वोटों को खरीदने के लिये रिश्वत की भारी रकमें ली दी जाती थीं। महाराजा पटियाला भूपिन्दर सिंह एक धनी रियासत के राजा थे, उनके सामने धौलपुर रियासत के संसाधन कम थे।

    महाराजा भूपिन्दर सिंह ने अपने विदेश मंत्री मकबूल अहमद को दक्षिण भारत की रियासतों से सम्पर्क करने के लिये भेजा। अपने विश्वस्त महाराज नारायणसिंह को काठियावाड़ की रियासतों में भेजा और और अपने दीवान जरमनी दास को यू.पी. (तब इसे यूनाईटेड प्रोविंस कहा जाता था और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश कहा जाने लगा), मध्यभारत एवं पंजाब की रियासतों में भेजा गया। भूपिन्दरसिंह ने राजाओं से कहलवाया कि महाराजराणा उदयभान सिंह तो अंग्रेजों की पिट्ठू हैं जबकि महाराजा भूपिन्दर सिंह चुनाव जीतने पर समस्त रजवाड़ों के लिये काम के आदमी सिद्ध होंगे और उनके हितों की रक्षा करेंगे।

    पटियाला के राजा भूपिन्दर सिंह ने पैसा पानी की तरह बहाया जिससे महाराजराणा उदयभान सिंह को अपना पलड़ा कुछ हलका लगा। मतदान वाले दिन महाराजराणा ने चरखारी रियासत के महाराजा के हाथ में से वोटों के कागज छीन कर फाड़ दिये। कई अन्य राजाओं-महाराजाओं के हाथों से भी मतपत्र छीन कर फाड़ दिये गये। यद्यपि सम्पूर्ण चुनावी प्रक्रिया भारत के वायसराय लॉर्ड विलिंगडन की देखरेख में हो रही थी किंतु चुनवों के दौरान वे सब घटनायें हुईं जो आजाद भारत के चुनावों में देखने को मिलती हैं। अन्ततः महाराजा भूपिन्दर सिंह ने महाराज राणा उदयभान सिंह को चुनावों में परास्त कर दिया। किसी समय इन दोनों राजाओं के पिता आपस में पगड़ी बदल कर एक दूसरे के भाई बने थे जिसके कारण ये दोनों राजा चचेरे भाई लगते थे किंतु इस पराजय से तिलमिलाकर महाराजराणा उदयभान सिंह ने महाराजा भूपिन्दर सिंह के विरुद्ध अनर्गल दुष्प्रचार का सिलसिला आरंभ किया। उदयभान सिंह का कहना था कि पूरे भारत में मैं ही अकेला राजा हूं जो राजाओं और रजवाड़ों की प्रतिष्ठा एवं उनके अधिकारों की रक्षा कर सकता हूं।

    महाराजराणा उदयभान सिंह स्वयं को भारत का विक्रमादित्य कहते थे जिसके कारण अन्य रियासतों के राजा पीठ पीछे उनका मजाक उड़ाते थे। उदयभान सिंह की अय्याशियों के किस्से भी पूरे देश में चर्चित रहे थे। दीवान जरमनी दास ने लिखा है कि उदयभान सिंह ने अपनी राजधानी से पांच मील दूर स्थित ताल शाही नामक एक झील में बत्तखें पाल रखी थीं जिनके शिकार के लिये भारत भर के राजाओं, महाराजाओं, विदेशी शासकों आदि को बुलाया करते थे। अतिथियों को बंदूकें देकर किनारे पर बैठा दिया जाता था तथा उनके सामने बत्तखें छोड़ दी जाती थीं। एक बार में एक से डेढ़ हजार तक बत्तखें छोड़ी जाती थीं। अतिथि उन निरीह प्राणियों पर गोलियां दागते थे और बत्तखें बेदम होकर जमीन पर गिर जाया करती थीं। विशेष अतिथियों को चीतों का शिकार भी करवाया जाता था।

    महाराज राणा इस झील के किनारे पर अतिथियों को विभिन्न पशु-पक्षियों के मांस, फ्रांस एवं अन्य देशों की भांति-भांति की मदिरा की पार्टी भी देते थे। अतिथियों को उनकी महिला मित्रों सहित आमंत्रित किया जाता था। स्वयं महाराज राणा प्रकटतः महिलाओं से दूर रहा करते थे किंतु दीवान जरमनी दास ने दावा किया है कि उन्होंने अपनी बांदी रामप्यारी से दिल लगा रखा था जिसे वे तालशाही से कुछ दूर बने एक बंगले में छिपा दिया करते थे। इस बांदी को किसी की दृष्टि में आना मना था। इसलिये उसके कमरे के दरवाजे हमेशा बंद ही रखे जाते थे। एक बार ठण्ड से बचने के लिये रामप्यारी ने बंद कमरे में कोयले की अंगीठी जला ली जिसके धुंए से दमघुट कर रामप्यारी मर गयी और महाराजा का भाण्डा फूट गया। महाराज राणा ने प्रयश्चित के लिये चार दिन का व्रत किया और हरिद्वार जाकर अपने पापों की क्षमा मांगी।

    महाराजराणा को यह बात हजम नहीं हुई कि पहले तो वे नरेन्द्र मण्डल के चांसलर का चुनाव हार जायें और फिर उनकी सुझाई हुई योजना को अस्वीकार कर दिया जाये। वे स्वयं को भारतीय राजाओं का सिरमौर सिद्ध करने पर तुले हुए थे। जब इंगलैण्ड के राजा एडवर्ड आठवें ने अमरीकी विधवा मिसेज सिम्सन से विवाह किया तो इंगलैण्ड की सरकार राजा को उसके पद से हटाने की कार्यवाही करने लगी। उदयभान सिंह ने इस अवसर को अपने पक्ष में भुनाने तथा एडवर्ड आठवें की सहानुभूति बटोरने के उद्देश्य से इंगलैण्ड के प्रधानमंत्री मिस्टर स्टैनले बाल्डविन को एक विचित्र तार भिजवाया। इस तार में लिखा था कि भारत के सभी राजे महाराजे इस विवाह सम्बन्ध का अनुमोदन करते हुए ब्रिटिश सरकार से अनुरोध करते हैं कि इस विषय में कोई विरोध रुख न अपनाया जाये अन्यथा वह भारतीय नरेशों की सहानुभूति, सहायता और निष्ठा खो बैठेगी। यह तार नरेन्द्र मण्डल में स्वीकृत कराये बिना चुपके से भेजा गया था। इसलिये प्रधानमंत्री बाल्डविन इस तार को पढ़कर गुस्से से आग बबूला हो गया। उसने वह तार भारत के राज्य सचिव के पास भेज दिया। राज्य सचिव ने वह तार भारत के वायसराय को भेज दिया। वायसराय ने हिज हाईनेस उदयभानसिंह से कहा कि आप बकिंघम पैलेस के घरेलू मामले में और इंगलैण्ड की सरकार की शासन नीति में हस्तक्षेप करने के लिये वायसराय से माफी मांगें। महाराजराणा को ऐसा ही करना पड़ा।

    महाराजराणा उदयभान सिंह का सोचना था कि यदि भारत के समस्त रजवाड़े एक हो जायें तो भारतीय राजनीति को मनचाहा रूप दिया जा सकता है। इसलिये जब गोलमेज सम्मेलनों की विफलता के बाद भारत संघ का निर्माण लगभग खटाई में पड़ गया तब उदयभान सिंह ने प्रस्ताव किया कि भारत की सारी रियासतें मिलकर अपना एक राज्य मण्डल स्थापित करें। फिर वे अपने प्रतिनिधियों सहित ब्रिटिश भारत में मतदान द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों से मिली जुली सरकार बनाने की शर्तंा तय करें। इस प्रस्ताव से भारतीय नेताओं में हड़कम्प मच गया। यदि ऐसा हो जाता तो भारत का गंभीर विभाजन हो जाता। सर तेज बहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर आदि नेताओं ने बड़ी कठिनाई से इस योजना को स्थगित करवाया।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 6

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 6

    ब्रिटिश-भारत और रियासती-भारत


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    ई.1498 में पहली बार पुर्तगाली व्यापारी वास्कोडिगामा के नेतृत्व में भारत आए। इन व्यापारियों ने भारत से इतना धन कमाया कि यूरोप के अन्य देश भी भारत आने के लिए लालायित हो उठे। पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) से डच, इंग्लैण्ड से अंग्रेज और फ्रांस से फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए।

    डचों की गतिविधियां व्यापार करने तथा व्यापार के लिए कुछ भू-भागों पर अधिकार करने तक सीमित रहीं। जब इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ई.1608 में भारत में प्रवेश किया तब इंग्लैण्ड पर महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) का तथा भारत पर मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। ई.1615 में अंग्रेजों का दूत सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तथा उसने कम्पनी के लिए कुछ व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त कीं। ई.1644 में फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। इससे अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच भारत में व्यापारिक एवं राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हो गयी किंतु ई.1760 में वैण्डीवाश के युद्ध के बाद भारत में फ्रैंच शक्ति परास्त हो गई।


    ब्रिटिश-भारत का निर्माण

    ई.1765 में बक्सर के मैदान में अंग्रेजों एवं मुगल बादशाह के बीच एक युद्ध लड़ा गया जिसमें मुगल बादशाह शाहआलम हार गया। इसके बाद मुगल बादशाह एवं अंग्रेजों के बीच एक संधि हुई जिसे इलाहाबाद की संधि कहा जाता है। इस संधि के बाद मुगल बादशाह को पेंशन देकर शासन के काम से अलग कर दिया गया तथा उसके क्षेत्रों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दीवानी एवं फौजदारी अधिकार प्राप्त हो गए। अर्थात् अंग्रेज उत्तर-भारत के हरे-भरे मैदानों के प्रत्यक्ष स्वामी बन गए।

    कम्पनी द्वारा समय-समय पर जीते गए पूर्वी भारत का असम एवं बंगाल, दक्षिण भारत का मद्रास, पश्चिमी भारत का बम्बई तथा उत्तर-पश्चिम के बिलोचिस्तान एवं सिंध आदि क्षेत्र भी अंग्रेजों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में थे जिन्हें मुगलों से लिए गए क्षेत्रों के साथ मिलाकर ब्रिटिश-भारत का निर्माण किया गया। अंग्रेजों ने ब्रिटिश-भारत को 11 प्रांतों में बांटा जिनमें अलग-अलग गवर्नरों की नियुक्ति की गई- (1) बंगाल, (2) पंजाब, (3) सिंध, (4) उड़ीसा, (5) असम, (6) मद्रास, (7) बम्बई, (8) यूनाइटेड प्रोविंस, (9) बिहार, (10) सेण्ट्रल प्रोविन्स, (11) नॉर्थ-वेस्ट फ्रण्टीयर प्रोविन्स।

    इन ग्यारह प्रांतों के अतिरिक्त अंग्रेजों ने भारत में छः चीफ-कमिश्नरेट भी स्थापित कीं जिनके नाम इस प्रकार थे- (1) अजमेर-मेरवाड़ा, (2) अण्डमान एण्ड निकोबार आइलैण्ड्स, (3) बिलोचिस्तान, (4) कुर्ग, (5) दिल्ली, (6) पांठ-पीपलोदा।

    ई.1769 में कम्पनी ने ब्रिटिश-प्रांतों में जिलों का गठन करके कलक्टरों की नियुक्ति की तथा जनता को बंदूक से चलने वाले कठोर शासन में जकड़ लिया। ई.1773 में रेग्यूलेटिंग एक्ट के माध्यम से भारत में गवर्नर जनरल की नियुक्ति की गई तथा कम्पनी को ब्रिटिश सम्राट के अधीन कर दिया गया। भारत के गवर्नर जनरल पर नियत्रंण रखने के लिए चार सदस्यों की एक एक्जीक्यूटिव काउंसिल गठित की गई। इस प्रकार भारत में एक ऐसी संस्था की स्थापना की गई जो शीघ्र ही न केवल भारत सरकार कहलाने वाली थी अपितु बिलोचिस्तान से लेकर असम तथा काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों भारतीयों के जीवन पर शिकंजा जकड़ने में सक्षम सिद्ध होने वाली थी।

    इलाहाबाद की संधि के बाद मुगल-शासित उत्तर भारत में तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता स्थापित हो गई किंतु मध्य भारत, राजपूताना, मराठवाड़ा, कर्नाटक, हैदराबाद आदि क्षेत्र असंरक्षित रह गए। इसे रियासती भारत कहा जाता था। रियासती-भारत में लगभग 550-600 देशी रियासतें थीं जिनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती थी। भारत की आजादी के समय देश में 118 सैल्यूट स्टेट्स एवं 448 नॉन सैल्यूट स्टेट्स थीं। जब अंग्रेजों ने मुगलों को सत्ता से बाहर कर दिया तब उनके सैनिक बेरोजगार होकर डकैत बन गए जिन्हें भारतीय इतिहास में पिण्डारी कहा गया। इसी प्रकार दक्षिण भारत में मराठों ने अपनी शक्ति का प्रसार कर लिया तथा वे नर्मदा नदी को पार करके राजपूताना, दिल्ली एवं पंजाब तक धाड़े मारते थे।

    कुछ समय बाद मराठों एवं पिण्डारियों में गठजोड़ हो गया तथा उनकी संयुक्त सेनाओं ने सम्पूर्ण 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत के देशी राज्यों एवं अंग्रेजी क्षेत्रों में हाहाकार मचा दिया। इस पर ई.1817-1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय राज्यों से सहायता की अधीनस्थ संधियां करके उन्हें संरक्षण प्रदान किया जिसके कारण देशी राज्यों के रक्षा एवं वैदेशिक मामलों का दायित्व ईस्ट-इण्डिया कम्पनी के पास चला गया और देशी राजा अपने राज्यों का आंतरिक प्रशासन करने तक सीमित हो गए।

    ई.1857 में जब ब्रिटिश-भारत एवं राजपूताना रियासतों में सशस्त्र सैनिक क्रांति हुई तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस क्रांति को बलपूर्वक कुचल दिया किंतु ब्रिटेन के लोगों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध आवाजें उठानी शुरू कीं जिससे प्रेरित होकर ई.1858 में ग्रेट-ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की सरकार ने 'ब्रिटिश-भारत' का शासन अपने हाथों में ले लिया। इसके साथ ही, ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजपूताना की रियासतों सहित देश की 40 प्रमुख रियासतों से जो 'सहायता की अधीनस्थ संधियां' कर रखी थीं वे भी ज्यों की त्यों ब्रिटिश क्राउन को स्थानांतरित हो गईं। इस प्रकार ब्रिटिश-क्राउन के अधीन भारत के दो टुकड़े थे। पहला टुकड़ा 'प्रत्यक्ष-ब्रिटिश-शासित-क्षेत्र' था जिसे 'ब्रिटिश-इण्डिया' अथवा 'आंग्ल-भारत' कहा जाता था। दूसरा टुकड़ा 'देशी-राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र' था जिसे 'इण्डियन-इण्डिया' अथवा 'रियासती-भारत' कहा जाता था।

    ब्रिटिश-क्राउन भारत के पहले टुकड़े पर गवर्नर जनरल के माध्यम से शासन करता था तो दूसरे टुकड़े पर वायसराय के माध्यम से शासन किया जाता था। व्यावहारिक रूप में इन दोनों पदों को एक ही व्यक्ति संभालता था। वायसराय के नीचे एक काउंसिल गठित की गई जिसके सदस्य वायसराय द्वारा मनोनीत किए जाते थे। ईस्वी 1858 के आगे भी यही व्यवस्था चलती रही। ब्रिटिश संसद ने इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया।


    अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दृष्टिकोण

    ब्रिटिश जाति स्वयं को उच्च एवं भारतीयों को नीच जाति के रूप में देखती थी। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- 'अंग्रेजों के मन में यह विश्वास जमता गया कि गोरी अंग्रेज जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी ईश्वर नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने एवं शासन करने के लिए पैदा होती है।..... भारतीयों पर शासन चलाने के लिए अंग्रेजों ने इण्डियन सिविल सर्विस की स्थापना की जिसमें 2000 अंग्रेज अधिकारी नियुक्त हुए। 10,000 अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय सेना सौंप दी गई। तीस करोड़ की जनसंख्या को अनुशासन में रखने के लिए साठ हजार अंग्रेज सिपाही आ धमके। उनके अतिरिक्त दो लाख भारतीय सिपाही भारतीय सेना में थे ही।'


    ब्रिटिश-भारत की राजनीति का आधार

    हिन्दू एवं मुसलमान पिछले लगभग सात सौ सालों से पूरे देश में फैले हुए थे तथा इनके बीच हर जगह लगभग एक जैसी साम्प्रदायिक समस्या थी। ई.1858 से पहले तक अंग्रेज भारतीय मुसलमानों एवं हिन्दुओं के झगड़ों को बलपूर्वक दबाते थे किंतु जैसे ही भारत की आजादी की लड़ाई आरम्भ हुई वैसे ही अंग्रेजों ने भारत की साम्प्रदायिक समस्या को अपनी ढाल के रूप में प्रयुक्त करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने हिन्दुओं एवं मुसलमानों को राजनीतिक स्तर पर उकसाना प्रारम्भ किया।

    अंग्रेज चाहते थे कि ये दोनों जातियां परस्पर झगड़ती रहें तथा अपने लिए आजादी की मांग नहीं करें। अंग्रेजों की शह पाकर कुछ मुसलमान नेताओं ने साम्प्रदायिकता को ही अपनी राजनीति का आधार बना लिया। उनके विरोध में हिन्दू-प्रतिरोध ने भी सिर उठाया और देखते ही देखते ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिकता ही राजनीति का एकमात्र आधार हो गई। अंग्रेजों ने देश में साम्प्रदायिकता की आग तो लगा दी किंतु उन्हें मालूम नहीं था कि इस आग की लपटें इतनी ऊँची उठेंगी कि मुसलमान अपने लिए एक अलग राष्ट्र की मांग करने लगेंगे तथा अंग्रेजों के लिए इस देश पर शासन करना असम्भव हो जाएगा।


    ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण

    (1) इस्लाम का भारत की भूमि में बाहर से आना

    'हिन्दू-संस्कृति' भारत भूमि पर जन्मी थी। इसी को रूढ़ अर्थ में 'हिन्दू-धर्म' तथा 'हिन्दू-जाति' कहा गया। यह भारत-भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। इसलिए इसे 'सनातन-धर्म' भी कहते हैं। बाद में बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले जिन्हें स्वीकार करने में हिन्दुओं को संकोच नहीं हुआ किंतु इस्लाम, विजेता के रूप में बाहर से भारत में आया इसलिए भारतवासियों के लिए इस्लाम को अंगीकार करना सहज रूप से स्वीकार्य नहीं हुआ। इसलिए इस्लामी आक्रांताओं ने सत्ता, तलवार और लालच के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहा। इस्लामी आक्रांताओं का यह कार्य हिन्दुओं के लिए अत्यंत अपमानजनक था तथा उनके गौरव को पददलित करने वाला था। इस कारण भारतवासी कभी नहीं भूल पाये कि उनकी पहचान हिन्दू धर्म से है।

    (2) हिन्दू धर्म एवं इस्लाम में मौलिक भिन्नताएँ

    जिस समय इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया, उस समय तक लगभग समस्त हिन्दू जाति देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तथा उनके लिए मंदिर बनाकर उनकी पूजा करती थी किंतु इस्लाम में मूर्ति-पूजा को अधर्म समझा जाता था। इसलिए इस्लामी आक्रांताओं ने हिन्दू-देवालयों एवं देव-विग्रहों को तोड़ने के प्रति विशेष आग्रह प्रदर्शित किया तथा इस दुराग्रह को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। इसी प्रकार हिन्दू-जाति गाय को देवी-देवताओं के समान पूज्य मानती आई है किंतु मुसलमान गायों को काटकर उनका मांस खाते थे। इस कारण हिन्दू कभी भी इस्लाम के प्रति मुलायम दृष्टिकोण नहीं अपना सके। हिन्दू अनेक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे किंतु मुसलमान एक अल्लाह में विश्वास करते हैं। हिन्दू गंगा नहाते हैं एवं चार धामों की यात्रा करते हैं जबकि मुसलमान हज करने मक्का जाते हैं। हिन्दू तिलक, चोटी एवं जनेऊ को अपनी पहचान मानते हैं जबकि मुसलमान सुन्नत, बुर्का एवं तीन तलाक को मुसलमानियत की पहचान समझते हैं। ऐसी स्थिति में ये दोनों संस्कृतियां एक दूसरे को कैसे सहन कर सकती थीं! हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी दाढ़ी-मूंछों, भाषा, खानपान एवं पहनावे में भी यत्न-पूर्वक अंतर बनाए रखा। मुसलमान अपनी पहचान कुरान से तथा हिन्दू अपनी पहचान वेद, रामायण एवं गीता से करते रहे।

    (3) हिन्दुओं द्वारा स्वयं को रूढ़ियों की कारा में बंद कर लेना

    हिन्दुओं ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वयं को जातियों, संस्कारों, धार्मिक परम्पराओं एवं रूढ़ियों की ऐसी मजबूत कारा में बंद कर लिया जिसमें मुस्लिम जीवन शैली की स्वीकार्यता के लिए किंचित भी अवकाश नहीं था। वे मुसलमानों के हाथ का छुआ अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करते थे। शुद्धता एवं पवित्रता के प्रति हिन्दुओं के इस आग्रह को मुसलमान उनका घमण्ड समझते थे। ऐसी परिस्थितियों में भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की आग सदैव प्रज्जवलित रही।

    (4) मुसलमानों का राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ जाना

    भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के पूर्व, मुस्लिम समाज दो वर्गों में विभाजित था- प्रथम वर्ग में वे लोग थे जो विदेशों से आये आक्रांताओं, व्यापारियों तथा धर्म प्रचारकों के वंशज थे। दूसरे वर्ग में वे भारतीय थे जो भय अथवा लालच से ग्रस्त होकर, परिस्थिति वश, बल-पूर्वक अथवा स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन करके मुसलमान बन गये थे अथवा ऐसे लोगों की सन्तान थे। प्रथम वर्ग के लोग शासन संभालते थे तथा उनका शासन एवं शासकीय नौकरियों पर एकाधिकार था। यह 'मुस्लिम अभिजात्य वर्ग' था। दूसरे वर्ग के लोग खेती-बाड़ी या अन्य छोटे-मोटे काम करते थे। धर्म-परिवर्तन के बाद भी दूसरे वर्ग के आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्तर में कोई उल्लेखीय परिवर्तन नहीं हुआ था। प्रथम वर्ग अर्थात् मुस्लिम अभिजात्य वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व 18वीं और 19वीं शताब्दी में बंगाल, अवध तथा दिल्ली द्वारा अँग्रेजों के समक्ष घुटने टेक देने के साथ समाप्त हो चुका था किंतु मुस्लिम अभिजात्य वर्ग, राजनीतिक प्रभुत्व का इतना अधिक अभ्यस्त था कि इसने कभी व्यापार अथवा किसी अन्य कार्य की ओर ध्यान नहीं दिया। सरलता से धन प्राप्त होते रहने से इस वर्ग में अकर्मण्यता व्याप्त थी। प्रतिष्ठा बनाये रखने के दिखावे ने इस वर्ग को भीतर और बाहर दोनों तरफ से खोखला कर दिया। अंग्रेजों द्वारा किए गए भूमि के स्थायी बन्दोबस्त के कारण अभिजात्य वर्ग के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गई।

    (5) अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति से दूर रहना

    मुसलमानों ने केवल कुरान और हदीस की शिक्षा को ही वास्तविक शिक्षा समझा तथा अँग्रेजी शिक्षा-पद्धति को नहीं अपनाया। इस प्रवृत्ति ने मुसलमानों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति को अवरुद्ध कर दिया। अंग्रेजी शिक्षा से वंचित मुसलमानों को सरकारी नौकरियां नहीं मिल सकीं क्योंकि अँग्रेजी राज में सरकारी नौकरियों के लिए अँग्रेजी शिक्षा की डिग्रियां आवश्यक थीं। इस क्षेत्र में हिन्दू उनसे आगे निकल गये। मुसलमानों की स्थिति के सम्बन्ध में विलियम हण्टर ने लिखा है- 'एक अमीर, गौरव-पूर्ण तथा वीर जाति को निर्धन तथा निरक्षर जन-समूह में बदल दिया गया और उसके उत्साह तथा गर्व को मिट्टी में मिला दिया गया।' अँग्रेजों के शासन में मुसलमानों के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में आई गिरावट के कारण मुसलमान स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगे और उनमें असन्तोष तथा विद्रोह की भावना पनप गई।

    (6) अँग्रेजों का हिंदुओं पर विश्वास एवं मुसलमानों पर अविश्वास

    ई.1857 के प्रथम स्वातन्त्र्य संग्राम के बारे में सर जेम्स आउट्रम का मत था- 'यह विद्रोह मुसलमानों के षड़यंत्र का परिणाम था जो हिन्दुओं की शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे।' वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- 'यह हिन्दू शिकायतों की आड़ में मुस्लिम षड़यंत्र था जो पुनः मुगल बादशाह के नेतृत्व में मुस्लिम सत्ता स्थापित करना चाहते थे।' विद्रोह के काफी समय बाद बेगम जीनत महल ने देशी शासकों को पत्र लिखे, जिनमें उसने मुगल बादशाह की अधीनता में, अँग्रेजों को देश से बाहर निकालने की बात लिखी। अतः जेम्स आउट्रम एवं स्मिथ के कथनों में कुछ सच्चाई प्रतीत होती है। बहादुरशाह के मुकदमे के जज एडवोकेट जनरल मेजर हैरियट ने मुकदमे में पेश हुए समस्त दस्तावेजों का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला- 'आरम्भ से ही षड्यंत्र सिपाहियों तक सीमित नहीं था और न उनसे वह शुरू ही हुआ था, अपितु इसकी शाखाएं राजमहल (लालकिला) और शहर (दिल्ली) में फैली हुई थीं।'

    यह सच है कि ई.1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था किंतु इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस क्रांति में देश के केवल 1/3 मुसलमानों ने भाग लिया था। बड़ी मुस्लिम शक्तियों में केवल अवध की बेगम जीनत महल तथा लाल किले का बादशाह बहादुरशाह ही इस क्रांति में सम्मिलित हुए थे। जबकि व्यापक फलक पर नाना साहब, झांसी की रानी, तात्या टोपे, कुंवरसिंह और अवध के हिन्दू ताल्लुकेदारों ने क्रांति का वास्तविक संचालन किया था। लॉर्ड केनिंग आरम्भ में इसे मुसलमानों द्वारा किया गया षड्यन्त्र मानते थे किंतु बाद में उन्होंने अपनी धारणा बदल ली। उन्होंने भारत सचिव को लिखे एक पत्र में स्वीकार किया- 'मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह विद्रोह ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के द्वारा धार्मिक बहानों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिये भड़काया गया था।' उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जहाँ हिन्दू सेनानायक, विदेशी शासन से मुक्ति के लिये लड़े, वहीं मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने बहादुरशाह के नेतृत्व में मुगल शासन की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया। लॉर्ड केनिंग द्वारा प्रस्तुत इस निष्कर्ष के उपरांत भी भारत में नियुक्त अंग्रेज पूरी तरह हिन्दुओं अथवा पूरी तरह मुसलमानों को इस क्रांति के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सके किंतु उनमें यह सामान्य धारणा बन गई थी कि ई.1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक उत्साह दिखाया था। बहुत से अंग्रेज मानते थे कि ई.1857 का विद्रोह मुसलमानों द्वारा, अपने खोये हुए शासन की पुनर्प्राप्ति का प्रयास था। अतः इस क्रांति के दमन के बाद अँग्रेजों ने मुसलमानों पर विश्वास करना बंद करके हिन्दुओं का पक्ष लेना आरम्भ कर दिया। शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरियां और बढ़ीं। इस नीति से अंग्रेज हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सैंकड़ों सालों से चली आ रही खाई को और चौड़ी करके उसका लाभ अपने पक्ष में लेना चाहते थे।

    (7) सर सैयद अहमदखाँ का अलीगढ़ आन्दोलन

    1857 की क्रांति के असफल रहने के बाद अँग्रेजों के साथ सामंजस्य के प्रश्न पर मुस्लिम समाज में दो वर्ग उभर कर सामने आये। एक वर्ग तो वह था जो किसी भी कीमत पर ब्रिटिश सत्ता से समझौता अथवा सहयोग करने के विरुद्ध था तथा हिंसात्मक साधनों से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था। इसके विपरीत दूसरा वर्ग ब्रिटिश सत्ता की स्थिरता चाहता था तथा मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए पश्चिमी शिक्षा को महत्त्वपूर्ण मानता था। पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व सैयद अहमद बरेलवी ने किया, जबकि दूसरे वर्ग की विचारधारा ने अलीगढ़ आन्दोलन को जन्म दिया, जिसका नेतृत्व सर सैयद अहमद खाँ ने किया। सैयद अहमद का जन्म 17 अप्रैल 1817 को दिल्ली में हुआ। ई.1846 से 1854 तक वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन दिल्ली के सदर अमीन रहे। ई.1855 में उनका बिजनौर स्थानान्तरण हो गया।

    ई.1857 की क्रांति के समय वह बिजनौर में थे। उन्होंने क्रांति के समय बहुत से अँग्रेजों के प्राण बचाये। इससे उन्हें अँग्रेजों की सद्भावना प्राप्त हो गई। इस सद्भावना का उपयोग उन्होंने भारतीय मुसलमानों के हितों के लिये किया। उस समय भारतीय मुसलमान अपने अतीत की यादों में खोये हुए थे और अँग्रेजों के साथ उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। मुसलमानों में अँग्रेजी शिक्षा के प्रति धार्मिक और सांस्कृतिक उदासीनता थी। सैयद अहमद खाँ ने अपने जीवन के प्रमुख दो उद्देश्य बनाये- पहला, अंग्रेजों एवं मुसलमानों के सम्बन्ध मधुर बनाना और दूसरा, मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना। उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने से ही उनके हितों की पूर्ति हो सकती है तथा अँग्रेज अधिकारियों को समझाया कि मुसलमान हृदय से अँग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं हैं। अँग्रेजों की थोड़ी सी सहानुभूति से वे सरकार के प्रति वफादार हो जायेंगे।

    अँग्रेजों ने भी मुसलमानों के प्रति उदारता का रुख अपनाना उचित समझा, क्योंकि हिन्दुओं में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता के विरुद्ध वे मुस्लिम साम्प्रदायिकता का उपयोग कर सकते थे। अतः सर सैयद अहमदखाँ को अपने प्रथम उद्देश्य में शीघ्र ही सफलता मिल गई। वास्तविकता यह थी कि सर सैयद अहमद ने स्वयं को मुस्लिम कुलीन वर्ग के हित-चिंतन तक ही सीमित रखा था। जब उन्होंने मुसलमानों को हिन्दुओं से पृथक करने तथा उनमें हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने का कार्य आरम्भ किया, तब अँग्रेजों ने सर सैयद का ऐसा प्रचार किया जैसे वे समस्त मुस्लिम-सम्प्रदाय के एक-मात्र उन्नायक हों। भारत के अनपढ़ एवं संकीर्णतावादी मुसलमानों ने सर सैयद अहमदखाँ का साथ दिया परन्तु जागृत एवं प्रगतिशील मुसलमानों ने ई.1885 में स्थापित कांग्रेस को अपना समर्थन दिया तथा सर सैयद की राष्ट्र-विरोधी एवं भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को शिथिल करने की नीति का समर्थन नहीं किया।

    सैयद अहमद खाँ ने अपने दूसरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने विचारों और कार्यक्रमों का केन्द्र अलीगढ़ को बनाया। अलीगढ़ से किये गये समस्त प्रयासों को समग्र रूप से अलीगढ़ आन्दोलन कहा जाता है। अलीगढ़ आन्दोलन ने मुसलमानों की शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ई.1875 में सर सैयद अहमदखाँ ने अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की। उत्तर प्रदेश के गवर्नर म्यूर ने इस कॉलेज को भूमि प्रदान की। जनवरी 1877 में लॉर्ड लिटन ने इस कॉलेज का उद्घाटन किया। इस प्रकार, आरम्भ से ही इस संस्था पर अंग्रेजों की विशेष कृपा-दृष्टि रही।

    लॉर्ड लिटन को दिये गये स्मृति-पत्र के अनुसार इस कॉलेज ने ब्रिटिश ताज के प्रति नवचेतना लाने और मुसलमानों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलीगढ़ आन्दोलन के विचारों को प्रचारित करने के लिए सर सैयद ने ई. 1886 में ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशनल कांग्रेस की स्थापना की। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अन्तर स्पष्ट करने के लिए ई.1890 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशन कांफ्रेंस किया गया। अलीगढ़ कॉलेज का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम युवाओं में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करना था किन्तु शीघ्र ही वहाँ का मुख्य काम राष्ट्रविरोधी और साम्प्रदायिक वातावरण तैयार करना हो गया। वहाँ से प्रकाशित अलीगढ़ इन्स्टीट्यूट गजट शैक्षणिक विषयों पर ध्यान केन्द्रित न करके राजनीतिक क्रिया-कलापों की खिल्ली उड़ाने और गाली-गलौच करने लगा।

    यद्यपि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश अधिकारियों के प्रोत्साहन एवं सहयोग से हुई थी तथापि जब कांग्रेस उनके द्वारा निर्देशित मार्ग पर न जाकर, ब्रिटिश शासन की आलोचना का मंच बन गई तो ब्रिटिश नौकरशाही का रुख कांग्रेस-विरोधी हो गया। सैयद अहमद खाँ ने कांग्रेस का विरोध आरम्भ से ही किया था। जब ब्रिटिश शासकों का रुख कांग्रेस के विरुद्ध होने लगा तो सैयद अहमद ने कांग्रेस पर हमला और भी तेज कर दिया। उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया। ई.1887 में सर सैयद ने कहा- 'कांग्रेस में हिन्दू, बंगालियों के साथ मिलकर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते थे जिससे वे मुसलमानों के धर्म-विरोधी कार्यों को दबा सकें।' सर सैयद अहमद मुसलमानों के ऐतिहासिक महत्त्व का बखान करके हिन्दुओं तथा मुसलमानों में गहरी खाई उत्पन्न करना चाहते थे ताकि मुसलमानों को पृथकतावादी राजनीति के लिये तैयार किया जा सके। उन्होंने इस बात का प्रचार करना आरम्भ किया कि यदि प्रतिनिधि मूलक जनतांत्रिक सरकार बन गई और ब्रिटिश शासन का अन्त हो गया और सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित कर दी गई तो हिन्दू, मुसलमानों पर शासन करेंगे। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के समकालिक करने की कांग्रेस की मांग को मुसलमानों के हितों के विरुद्ध बताया, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय काफी पिछड़ा हुआ था।

    ई.1887 में उन्होंने मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर लिखा- 'जितना अनुभव और जितना विचार किया जाता है, सबका निर्णय यह निकलता है कि अब भारत के मुसलमानों को भारत की अन्य कौमों से समानता कर पाना असम्भव सा लगता है। बंगाली तो अब इतना आगे बढ़ गये कि यदि बंगाल, हिन्दुस्तान और पंजाब के मुसलमान पंख लगाकर भी उड़ें तो उनको पकड़ नहीं सकते। भारत की हिन्दू कौमों ने भी उन्नति करके मैदान में मुसलमानों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। यदि मुसलमान दौड़कर भी चलें तो भी उनको पकड़ नहीं सकते।'

    इस प्रकार सैयद अहमद ने भारत की राजनीति में साम्प्रदायिक रंग घोल दिया। उन्होंने मुसलमानों के हितों की राजनीति करने के नाम पर जिन उपायों एवं वक्तव्यों का सहारा लिया, वे राष्ट्रीय जीवन के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले सिद्ध हुए। उनकी साम्प्रदायिक राजनीति के दो हथियार थे-

    (1) ब्रिटिश राज्य के प्रति अटूट स्वामि-भक्ति और

    (2) मुसलमानों की पृथक् राजनीति।

    अलीगढ़ आन्दोलन ने जिस मुस्लिम बौद्धिक जागरूकता का विकास किया उससे भारतीय मुसलमानों को अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सहायता मिली। इसी कारण आगे चलकर उन्हें राजनैतिक रूप से संगठित होने का अवसर मिला।

    (8) थियोडर बेक का कांग्रेस विरोधी अभियान

    अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसीपल थियोडर बेक ने कांग्रेस-विरोधी अभियान में सर सैयद को महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। बेक ने अलीगढ़ के छात्रों को कांग्रेस से दूर रखने के लिए छात्रावासों में जाकर तथा छात्रों को अपने घर बुलाकर उनके मस्तिष्क में कांग्रेस-विरोधी जहर भरा। कांग्रेस-विरोधी राजनीतिक विचारों को इंग्लैण्ड में प्रचारित करने के लिए बेक की सहायता से अगस्त 1888 में यूनाइटेड इण्डियन पेट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना की गई। बेक द्वारा कांग्रेस की नीतियों के विरोध में की जा रही कार्यवाहियों का एक मात्र लक्ष्य यह था कि ब्रिटिश सरकार कांग्रेस की मांगों को स्वीकार न करे। फिर भी ई.1892 मंस भारतीय परिषद् अधिनियम पारित हो गया। अतः पुनः मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए बेक ने सर सैयद के सहयोग से दिसम्बर 1893 में मुहम्मडन एंगलो-ओरियंटल डिफेन्स एसोसिएशन की स्थापना की। वे इस संस्था के माध्यम से भारतीय मुसलमानों को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर अँग्रेजी राज्य से उनके लिए अधिक से अधिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे थे। एसोसिएशन द्वारा मुसलमानों को बिना किसी प्रवेश-परीक्षा के तकनीकी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश, व्यवस्थापिका सभा तथा अन्य स्थानीय स्वशासी निकायों में मुसलमानों के समुचित प्रतिनिधित्व तथा साम्प्रदायिक प्रणाली के आधार पर पृथक् निर्वाचन-पद्धति की स्थापना की मांग की गई। इन मांगों के लिए प्रस्तुत आधारभूत सिद्धान्त इस प्रकार थे-

    (क) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 15 प्रतिशत थी, वहाँ की नगर पालिका में कम-से-कम एक मुस्लिम सदस्य अवश्य होना चाहिए।

    (ख) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 15 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक थी, वहाँ की नगर पालिका में मुसलमान सदस्यों की संख्या लगभग आधी होनी चाहिए।

    (ग) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 25 प्रतिशत से अधिक हो, वहाँ आधे सदस्य अवश्य मुसलमान होने चाहिए।

    एसोसिएशन के उद्घाटन भाषण में बेक ने कहा- 'इस समय देश में दो आन्दोलन चल रहे हैं- पहला, राष्ट्रीय कांग्रेस का और दूसरा गो-हत्या विरोधी। पहला आन्दोलन ब्रिटिश-विरोधी है और दूसरा मुस्लिम-विरोधी।' बेक ने अपने एक लेख में गृह-सरकार की इस बात के लिए निन्दा की कि वह देशद्रोही आन्दोलनकारियों के दबाव में आकर उनकी मांगें स्वीकार करती जा रही है। ई.1898 में सर सैयद अहमद खाँ का और अगले वर्ष बेक का देहान्त हो गया। उनके देहान्त के बाद उनकी कांग्रेस विरोधी राजनीति को थियोडर मॉरिसन ने आगे बढ़ाया। उसने घोषणा की कि- 'यदि भारत में प्रजातन्त्र की स्थापना होती है तो यहाँ अल्पसंख्यकों की स्थिति लकड़हारों एवं भिश्तियों जैसी हो जायेगी।'

    (9) हिन्दुओं द्वारा अपने सांस्कृतिक उत्थान के प्रयास

    ब्रिटिश काल में हिन्दू समाज में नई चेतना उत्पन्न हुई। मुसलमानों के शासन काल में हिन्दू अपने समस्त राजनीतिक अधिकार खो चुके थे तथा उनमें शासन का विरोध करने का साहस नहीं बचा था किंतु अँग्रेजों के शासन-काल में पाश्चात्य शिक्षा के कारण हिन्दू-युवाओं में शासन के विरुद्ध संघर्ष करने का नवीन साहस उत्पन्न हुआ तथा हिन्दू समाज में राष्ट्रीयता की भावना का पुनः उदय हुआ। यही कारण है कि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व प्रायः हिन्दू नेताओं के हाथों में रहा। इस दौरान हिन्दुओं ने अपने सांस्कृतिक उत्थान के लिए कई आंदोलन चलाए-

    (क) गौ-रक्षा आंदोलन: ई.1882 में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने गौ रक्षिणी सभा की स्थापना की तथा आर्य समाज ने देश भर में गौ-हत्या के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा। मुसलमानों ने इस आंदोलन का विरोध किया जिसके फलस्वरूप देश के बहुत बड़े हिस्से में साम्प्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों में बहुत से मन्दिर, मस्जिद और दुकानें नष्ट कर दी गईं। दोनों सम्प्रदायों के सैंकड़ों लोग घायल हुए।

    (ख) बाल गंगाधर तिलक के आंदोलन: महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए छत्रपति शिवाजी एवं भगवान गणेश के नाम पर उत्सव आरम्भ किये। इस कारण मुस्लिम समुदाय, हिन्दुओं के विरुद्ध भड़क गया।

    (ग) उर्दू विरोधी आंदोलन: उत्तर-पश्चिमी प्रान्त के न्यायालयों एवं शासन के निम्न स्तरों पर उर्दू भाषा का प्रयोग लम्बे समय से किया जा रहा था किन्तु 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उर्दू के स्थान पर, हिन्दी को शासन की भाषा के रूप में प्रयोग करने की मांग की जाने लगी। ई.1900 में प्रान्त के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर एन्थोनी मेक्डोनेल ने हिन्दी को न्यायालयों की वैकल्पिक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया। उसके इस कदम से मुसलमान, हिन्दुओं के विरुद्ध लामबन्द हो गये।

    (घ) शुद्धि आंदोलन: स्वामी दयानन्द सरस्वती ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुनः हिंदू धर्म मे प्रवेश करने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया था। इस आंदोलन के तहत लाखों मुसलमानों तथा ईसाइयों की शुद्धि कराकर सत्य सनातन वैदिक धर्म में वापसी कराई गई। 11 फरवरी 1923 को स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा भारतीय शुद्धि सभा की स्थापना की गई। पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. शिवराम मुंजे, भाई परमानंद एवं लाला लाजपतराय, स्वामीजी के इस कार्य के प्रमुख सहयोगी थे। मुसलमानों ने इस आंदोलन का विरोध किया। उन्हीं दिनों आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन के विरोध में एक गीत लिखा गया- 'मेरे मौला बुला ले मदीना मुझे।' इस गीत की अंतिम पंक्ति थी- 'यहाँ न जीने देंगे आर्य मुझे।'

    (10) कांग्रेस की स्थापना के बाद अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को समर्थन

    साम्प्रदायिकता की समस्या को उलझाने में ब्रिटिश नौकरशाहों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने शासन के प्रारम्भ में वे मुसलमानों को उच्च पदों पर नियुक्त नहीं करते थे तथा अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त हिन्दुओं को प्राथमिकता देते थे। इस कारण ब्रिटिश राज में मुसलमानों की आर्थिक दशा, हिन्दुओं की अपेक्षा अधिक तेजी से खराब हुई। ज्यों-ज्यों राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रता आने लगी, त्यों-त्यों अँग्रेज यह अनुभव करने लगे कि अपनी सत्ता की सुरक्षा के लिए उन्हें मुसलमानों को अपने पक्ष में लेना चाहिये तथा मुसलमानों को हिन्दुओं से दूर किया जाना चाहिये। ई.1905 का बंगाल-विभाजन हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए ही किया गया था। लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी-बंगाल के मुसलमानों को भरोसा दिया कि नये सूबे में उनकी वही प्रधानता स्थापित होगी जो कभी मुस्लिम सूबेदारों के युग में होती थी। ई.1911 में बंगाल विभाजन को निरस्त करने से मुस्लिम साम्प्रदायिकता में अत्यधिक वृद्धि हुई क्योंकि अँग्रेज, मुसलमानों को यह समझाने में सफल रहे कि हिन्दुओं के आंदोलन के कारण ही मुसलमान अपना मुस्लिम-बहुल प्रांत खो बैठे। इस प्रकार जब-जब हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिलकर देश की आजादी का बिगुल बजाया, तब-तब अँग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर चलते हुए मुसमलानों की साम्प्रदायिक भावना को भड़काया।

    (11) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का कम प्रतिनिधित्व

    ब्रिटिश-भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 23 प्रतिशत थी किंतु ई.1893 से ई.1907 के मध्य विभिन्न विधान सभाओं में मुसलमानों को केवल 12 प्रतिशत स्थान प्राप्त हुए। ई.1904 में किये गये एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार देश में 75 रुपये या इससे अधिक वेतन पर काम करने वाले हिन्दुओं की संख्या 1,427 थी जबकि ऐसे मुसलमानों की संख्या केवल 213 थी। जब भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने संवैधानिक सुधारों की घोषणा करके भारत में प्रतिनिधि-शासन-प्रणाली के विस्तार का समर्थन किया तो मुसलमानों में चिन्ता व्याप्त हो गई। उनमें हिन्दुओं के प्रति ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हुआ जो अँग्रेजी पढ़-लिखकर अधिक संख्या में नौकरियाँ पा गये थे।

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  • सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-101

     02.06.2020
    सरदार पटेल के जीवन की एक सौ सत्रह कहानियाँ-101

    सरदार पटेल ने अलवर नरेश तेजसिंह को नजरबंद कर लिया


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    जब राजाओं को भारत संघ में मिलने का आमंत्रण दिया गया था तब सरदार पटेल द्वारा यह आश्वासन दिया गया था कि स्वतंत्र भारत में, 19 सक्षम राज्यों- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर, कोचीन, मैसूर, बड़ौदा, कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, बीकानेर, जोधपुर, कूच बिहार, त्रिपुरा, मनिपुर, जयपुर, उदयपुर, मयूरभंज तथा कोल्हापुर को अलग राज्य बने रहने दिया जायेगा। जबकि वास्तविकता यह थी कि लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में दो तरह की प्रशासनिक व्यवस्था चलाना संभव नहीं था। इसलिये सरदार पटेल ने 15 अगस्त 1947 के बाद से ही रियासतों के एकीकरण का अभियान छेड़ दिया।

    14 दिसम्बर 1947 एवं बाद की तिथियों में छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा की रियासतों ने भारत सरकार को शासन के पूर्ण अधिकार सौंप दिये। 1 जनवरी 1948 को इन रियासतों का शासन मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा सरकारों को सौंप दिया गया। रियासती मंत्रालय की एकीकरण नीति की अखबारों में कटु आलोचना हुई तो सरदार पटेल ने अपने सलाहकार वी. पी. मेनन को गांधीजी और पं. नेहरू के पास भेजा ताकि उन्हें इस कार्यवाही के औचित्य में विश्वास करा दिया जाये। गांधीजी को इस काम से पूरी तरह संतोष था किंतु सरदार पटेल की इस कार्यवाही से राजाओं के मन में भय उत्पन्न हो गया।

    पटेल एक सुनिश्चित नीति के तहत एकीकरण की प्रक्रिया चला रहे थे किंतु कुछ देशी रियासतों में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने एकीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया। अलवर एवं भरतपुर में मेव जाति ने आतंक फैला दिया जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मेवों पर आक्रमण किये। इन दंगों में भरतपुर रियासत में 209 गाँव पूर्णतः नष्ट हो गये। मेवों के नेता, भरतपुर रियासत के उत्तरी भाग, गुड़गांव और अलवर रियासत के दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर मेवस्तान बनाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे ने मेवों को सख्ती से कुचला।

    खरे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे थे, इसलिये कांग्रेसी नेताओं ने खरे पर कट्टर हिन्दूवादी होने के आरोप लगाये। कांग्रेसियों का मानना था कि खरे ने हिन्दुओं को मेवों के विरुद्ध भड़का कर दंगा करवाया। अक्टूबर 1947 में सरदार पटेल ने दिल्ली में रियासती प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई। इस सभा में सरदार पटेल ने अलवर के राजा तेजसिंह तथा दीवान नारायण भास्कर खरे को चेतावनी दी कि जो लोग सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं, वे देश के शत्रु हैं। नारायण भास्कर खरे का कहना था कि सरदार पटेल, अलवर राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं जिसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है।

    30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हो गई जिसमें अलवर नरेश तेजसिंह और उसके प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे का हाथ होने का संदेह किया गया। भारत सरकार ने 7 फरवरी 1948 को तेजसिंह को दिल्ली बुलाकर कनाट प्लेस पर स्थित मरीना होटल में नरजबंद कर दिया तथा अलवर राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। राज्य के दीवान खरे को पदच्युत करके दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया। अलवर नरेश और दीवान की नजरबंदी से राजपूताना के राजाओं में भय व्याप्त हो गया और वे राष्ट्रीय नेताओं के दबाव में आ गये। अब वे अपने राज्यों को राजस्थान में मिलाने के लिये प्रस्तुत हो गये।

    अलवर, भरतपुर, धौलपुर तथा करौली के राजाओं को हटाकर इन राज्यों का एक संघ बनाने का निर्णय होने के बाद, सरदार पटेल अलवर आये तथा एक आम सभा में उन्होंने मार्मिक शब्दों में राजस्थान की जनता का आह्वान किया- 'छोटे राज्य अब बने नहीं रह सकते। उनके सामने एक ही विकल्प है कि वे बड़ी तथा समुचित आकार की इकाईयों में सम्मिलित हो जायें। जो अब भी राजपूत आधिपत्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वे आधुनिक संसार से बाहर हैं। अब शक्ति, प्रतिष्ठा या वर्ग का चिंतन उचित नहीं। आज हरिजन की झाड़ू राजपूतों की तलवार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। जैसे माँ का झुकाव बच्चे की ओर होता है वैसे ही जो लोग देश के हितों की देखभाल कर रहे हैं, वे सबसे ऊपर हैं। वे भी समान समर्पण तथा बराबर आदर सम्मान के अधिकारी हैं। जनता सांप्रदायिक सद्भाव, एकता तथा शांति बनाये रखे।'

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  • गोरों ने तेल और पानी के मिश्रण की तरह भारत संघ बनाना चाहा

     02.06.2020
    गोरों ने तेल और पानी के मिश्रण की तरह  भारत संघ बनाना चाहा

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत संघ के निर्माण के लिये बनी संयुक्त प्रवर समिति की रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटेन की गोरी सरकार ने भारत सरकार विधेयक का निर्माण किया तथा इसे ब्रिटिश संसद में रख दिया। विधेयक पर हाउस ऑफ कामंस में 43 दिन तथा हाउस ऑफ लार्ड्स में 13 दिन बहस चली। कंजरवेटिव पार्टी के नेता विंस्टन चर्चिल ने हाउस ऑफ कामंस में तथा लॉर्ड सेलिसबरी ने हाउस ऑफ लार्ड्स में इस विधेयक का कड़ा विरोध किया।

    इस पर लॉर्ड रीडिंग ने ब्रिटिश सांसदों को समझाया कि यदि अखिल भारतीय राज्य संघ में राजा लोग आ गये तो भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का प्रभाव सदा बना रहेगा। हमें किन लोगों से सबसे अधिक डर लगता है? उनसे जो लोगों को आजादी के लिये भड़काते हैं। मेरा विश्वास है कि ऐसे लोग महत्वहीन एवं अल्पसंख्या में हैं जिनकी पृष्ठ पोषक कांग्रेस है। अतः यह आवश्यक है कि हम ऐसे विचारों के विपरीत स्थिरता लाने वाले प्रभाव एकत्र करें। लगभग 33 प्रतिशत रजवाड़े विधान मण्डल के सदस्य होंगे। साथ ही 40 प्रतिशत ऊपरी सदन में होंगे जिसके कारणा कांग्रेस कुछ भी नहीं कर पायेगी।

    विधेयक के द्वितीय एवं तृतीय वाचन में व्यापक सहमति बन गयी। 4 अगस्त 1935 को विधेयक को सम्राट की स्वीकृति मिल गयी तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 अस्तित्व में आ गया। मैकमुन ने लिखा है कि चार वर्षों के विचार-विमर्श और बहस मुसाहिबे के बाद ब्रिटिश संसद ने इस अधिनियम को पारित कर दिया। यह मानते हुए कि समस्त अवधारणा का आधार बिल्कुल सही दिशा में है तथा यह अत्यंत अद्भुत कार्य है किंतु जब तक कि राजा लोग इसको उसी अनुपात में स्वीकार न करें तब तक तो यह एक स्वप्न ही है।

    इस अधिनियम के द्वारा निर्धारित किया गया कि एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांत व देशी राज्य सम्मिलित होंगे। प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा। शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किये जायेंगे- संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे। प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून मान्य होगा। इस योजना में 11 ब्रिटिश प्रांतों तथा 562 देशी रियासतों की भागीदारी होनी थी किंतु गोरी सरकार द्वारा संपूर्ण योजना में, संघ के निर्माण की विधियों एवं शर्तों को इस प्रकार निश्चित किया गया था कि संघ का निर्माण देशी राज्यों की इच्छा पर निर्भर होकर रह जाये तथा कांग्रेस दूर खड़ी हुई हाथ मलती रहे।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 में संघीय संविधान के तहत दो सदनों की व्यवस्था प्रस्तावित की गयी जिसमें राज्यों के प्रतिनिधियों को शासकों द्वारा नामित किया जाना था। कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में ब्रिटिश भारत के सदस्यों की संख्या 156 निश्चित की गयी थी जबकि राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या अधिकतम 104 हो सकती थी। हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में ब्रिटिश भारत के 250 प्रतिनिधि एवं राज्यों के अधिकतम 125 सदस्य होने थे। ब्रिटिश भारत के लिये आवंटित सीटों का बंटवारा इस प्रकार किया गया था कि कांग्रेस कभी भी बहुमत में नहीं आ सके। ब्रिटिश भारत के लिये रखी गयी 250 सीटों में से 86 सीटें सामान्य (अर्थात् अनारक्षित) थीं। मुस्लिम लीग को 82 सीटें दे दी गयीं थीं तथा शेष 82 सीटें महिलाओं, जागीरदारों एवं श्रमिकों आदि के लिये आरक्षित कर दी गयीं थीं। संविधान सभा का यह गठन कांग्रेस के विरुद्ध भारी भरकम रूप से भर दिया गया था।

    देशी राज्यों को संघ में सम्मिलित किया जाना केवल उसी स्थिति में संभव था जबकि संघ के निर्माण के लिये, कम से कम इतने देशी राज्य संघ में सम्मिलित होने की सहमति दें, जिनके द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में कम से कम 52 प्रतिनिधि भेजे जाते हों तथा संघ में सम्मिलित होने की घोषणा करने वाले राज्यों की जनसंख्या देशी राज्यों की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम न हो। अधिनियम के तहत क्राउन रिप्रजेण्टेटिव का एक नया पद सृजित किया गया। गवर्नर जनरल तथा क्राउन प्रतिनिधि एक व्यक्ति भी हो सकता था किंतु देाहरी जिम्मेदारियों को संभालने के लिये उसके पास दो भिन्न सचिवालय एवं भिन्न अभिकरण होने थे।

    क्राउन रिप्रजेण्टेटिव को राज्य सचिव के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया था जो कि भविष्य में गवर्नर जनरल पर कम नियंत्रण रखने वाला था। राज्यों के सम्बन्ध में क्राउन रिप्रजेण्टेटिव की सहायता के लिये पोलिटिकल एडवाईजर का नया पद सृजित किया गया तथा उसे गवर्नर जनरल की कौंसिल का सदस्य बनाया गया। राज्यों को संघीय विषयों में संघ के अध्यक्ष के रूप में गवर्नर जनरल से व्यवहार करना था जबकि परमोच्च सत्ता से सम्बद्ध विषयों के लिये क्राउन प्रतिनिधि से व्यवहार करना था।

    संघ में रियासत के विलय को एक सम्मिलन पत्र के द्वारा निष्पादित किया जाना था जिसके माध्यम से संघीय सरकार तथा प्रत्येक राज्य के मध्य शक्तियों का बंटवारा होना था। अधिनियम में स्पष्ट किया गया था कि समस्त रियासतों के संघ में विलय का स्वागत किया जायेगा किंतु महामना सम्राट किसी भी सम्मिलन पत्र को स्वीकार करने अथवा अस्वीकार करने के लिये स्वतंत्र होंगे, जैसा भी करना वे ठीक समझें। यदि महामना सम्राट को यह लगे कि सम्मिलन पत्र में, अधिनियम में वर्णित संघीय योजना से असंगत शर्तें लिखी गयी हैं तो वे सम्मिलन पत्र को अस्वीकृत कर देने के लिये स्वतंत्र होंगे।

    संघ में सम्मिलित होने के लिये देशी राज्यों को कोई समय सीमा नहीं दी गयी थी। न ही ऐसा कोई बाध्यकारी नियम बनाया गया था कि यदि संघ का निर्माण नहीं हुआ तो उस स्थिति में क्या किया जायेगा! राज्य के संघ में सम्मिलन के प्रभावी होने की तिथि स्वयं शासक द्वारा ही सम्मिलन पत्र के माध्यम से निर्धारित की जानी थी। संघ निर्माण के सम्बन्ध में रियासती प्रजा को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं दिया गया था। यह केवल रियासत के शासक की इच्छा पर छोड़ दिया गया था कि वह संघ में सम्मिलित हो अथवा नहीं।

    संघ के निर्माण के सम्बन्ध में ब्रिटिश प्रांतों को अपनी राय व्यक्त करने का कोई अवसर नहीं दिया गया था। ब्रिटिश प्रांत न तो संघ में सम्मिलित होने से मना कर सकते थे और न ही रियासतों को संघ में सम्मिलित होने से रोक सकते थे। यदि ब्रिटिश प्रांत, संघ बनाने के पक्ष में होते तो भी देशी रियासतों की सहमति के बिना संघ नहीं बन सकता था। दूसरी ओर यदि देशी रियासतें संघ बनाने के पक्ष में होतीं तो प्रांतों को अनिवार्य रूप से संघ में सम्मिलित होना पड़ता। इस प्रकार संघ का आरंभ होना अथवा न होना, रियासतों के ऊपर निर्भर हो कर रह गया था।

    विलय के पश्चात् शासकों द्वारा राज्य के प्रतिनिधियों को संघीय विधान में नामित किया जाना था तथा राज्य की जनता को शासक के प्रति राजनिष्ठा रखनी थी। राजा लोग पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि वे ब्रिटिश प्रांतों के साथ संघ को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं किंतु सम्प्रभु राज्य होने के कारण देशी राज्य, संघ सरकार द्वारा उसी तरह शासित होने पर सहमत नहीं हो सकते जिन शक्तियों के माध्यम से सरकार उन ब्रिटिश प्रांतों को शासित करती है, जिन्हें अभी स्वायत्तता दी जानी शेष है।

    राजाओं द्वारा नामित प्रतिनिधियों और ब्रिटिश भारत द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को मिलाकर एक संघ बनाने की योजना पर लॉर्ड मेस्टॅन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि कानून ने तेल और पानी का मिश्रण बनाने की चेष्टा की है।

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  • कैसे बना था पाकिस्तान - 7

     02.06.2020
    कैसे बना था पाकिस्तान - 7

    गॉड सेव द क्वीन बनाम वन्दे मातरम्


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    अंग्रेजों ने भारतीयों के मन-मस्तिष्क एवं जीवन के प्रत्येक अंग पर शिकंजा कसने के लिए कई तरह के उपकरण तैयार किए जिनमें 'गॉड सेव द क्वीन/किंग)' गीत भी सम्मिलित था। ई.1870 के दशक में इस गीत को समस्त सरकारी समारोहों में गाना अनिवार्य कर दिया गया। इस गीत के भाव इस प्रकार थे-


    भगवान हमारी दयालु रानी को बचाओ!

    लंबे समय तक हमारी महान रानी रहे!

    ईश्वर ने रानी को बचाया!

    उसे विजय भेजें, खुश और गौरवशाली,

    हमारे ऊपर लंबा शासन करने के लिए

    ईश्वर ने रानी को बचाया!

    हे भगवान हमारे भगवान उठो,

    उसके दुश्मनों को बिखराओ,

    और उन्हें गिराओ, उनकी राजनीति को समझो,

    अपनी कपटपूर्ण चाल एवं हमारी निराशा को

    हम अपनी आशा से ठीक करते हैं

    भगवान हम सबको बचाओ!

    दुकान में आपके सबसे अच्छे उपहार,

    उसे डालने से प्रसन्नता हो;

    वह लंबे समय तक शासन कर सकती है

    वह हमारे कानूनों की रक्षा कर सकती है,

    और भी हमें कारण दें,

    दिल और आवाज के साथ गाते हैं

    ईश्वर ने रानी को बचाया!

    इस गीत को प्रत्येक सरकारी आयोजन में गाए जाने के आदेश से, बंगाल में नियुक्त डिप्टी कलक्टर बंकिमचन्द्र चटर्जी को बहुत ठेस पहुंची। उन दिनों अंग्रेजों की नीतियों के कारण सम्पूर्ण बंगाल अकाल, भूख एवं महामारी से त्रस्त था जिसके विरोध में बंगाल में सन्यासी विद्रोह अपने चरम पर था। बंकिम चंद्र चटर्जी ने देश की परिस्थितियों को लेकर ई.1876 में 'आनंदमठ' नामक उपन्यास की रचना की तथा उसमें एक गीत 'वन्दे मातरम्' शीर्षक से लिखा। यह 'गॉड सेव द किंग' के प्रतिकार के रूप में लिखा गया था। शीघ्र ही यह देशभक्तों का प्रमुख गीत बन गया-


    वन्दे मातरम्। सुजलां सुफलाम्/ मलयजशीतलाम्/ शस्यश्यामलाम्/ मातरम्।

    शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्/ फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्

    सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्/ सुखदां वरदां मातरम्।

    कोटि कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले/

    कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले/ अबला केन मा एत बले।

    बहुबलधारिणीं/ नमामि तारिणीं/ रिपुदलवारिणीं/ मातरम्

    तुमि विद्या, तुमि धर्म/ तुमि हृदि, तुमि मर्म

    त्वम् हि प्राणारू शरीरे/ बाहुते तुमि मा शक्ति,

    हृदये तुमि मा भक्ति/ तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे

    त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी/ कमला कमलदलविहारिणी

    वाणी विद्यादायिनी /नमामि त्वाम्/ नमामि कमलाम्

    अमलां अतुलाम्/ सुजलां सुफलाम्/ मातरम्।

    वन्दे मातरम्/ श्यामलाम् सरलाम्/ सुस्मिताम् भूषिताम्

    धरणीं भरणीं/ मातरम्।

    यह गीत हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों ने भी उत्साह के साथ अपनाया किंतु शीघ्र ही कुछ साम्प्रदायिक-विचारों वाले मुसलमानों ने इस गीत को इस्लाम के विरुद्ध घोषित कर दिया। उनके अनुसार मुसलमान अल्लाह के अति किसी अन्य के समक्ष सजदा नहीं कर सकते थे तथा इस गीत में भारत माता की वंदना की गई थी जो न केवल मूर्तिपूजा को स्वीकार करने जैसा था अपितु अल्लाह के अलावा भी किसी अन्य के समक्ष सिर झुकाने जैसा था।

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