Blogs Home / Blogs / /
  • चित्रकूट का चातक - 60

     25.04.2018
    चित्रकूट का चातक - 60

    दुखती रग

    महावतखाँ लड़ता कम था और भागता अधिक था। उधर खानखाना लड़ना तो चाहता था किंतु किसी मैदान में अच्छी तरह मोर्चा बांधकर। इस कारण दोनों ही सेनाएं छुट-पुट लड़ाईयाँ ही करती थीं। जब दक्खिन बहुत कम दूरी पर रह गया तब खानखाना ने पूरी ताकत के साथ महावतखाँ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। जब वह अपने सेनानायकों के साथ विचार-विमर्श करके हमले की अंतिम योजना बना रहा था, उसी समय दिल्ली का संदेशवाहक बादशाह की चिट्ठी लेकर खानखाना की सेवा में हाजिर हुआ।

    बादशाह की चिट्ठी पाकर खानखाना के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं। बादशाह ने लिखा था कि इधर कुछ ऐसी बातें हो गयी हैं कि खानखाना को मोर्चा उठाकर तुरंत दिल्ली हाजिर होना चाहिये। यदि खानखाना रोटी मोर्चे पर खावे तो पानी दिल्ली में आकर पिये।

    जाने ऐसी क्या मुसीबत आन पड़ी थी जो खानखाना को अपनी पूरी सेना सहित तुरंत दिल्ली तलब किया गया था! दिल्ली तलब किये जाने के पीछे कारण चाहे जो भी रहा हो किंतु खानखाना को मन मार कर फिर से दिल्ली लौटना पड़ा।

    ताबड़तोड़ चलता हुआ खानखाना बादशाह के पास पहुँचा। बीमार तो वह लाहौर से ही हो गया था किंतु इस भागमभाग में वह और अधिक बीमार हो गया। फिर भी किसी तरह अपनी जर्जर देह को समेट कर वह बादशाह के सामने उपस्थित हुआ।

    खानखाना को देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। बार-बार खानखाना के कंधे चूमते हुए बादशाह ने कहा- 'मेरे अतालीक!' जाने क्यों लगता है कि मेरा अंत आ पहुँचा! मैं चाहता हूँ कि अब जब तक मैं जीवित हूँ आप मेरे पास ही रहें। मुझे छोड़कर कहीं न जायें।'

    खानखाना बादशाह की बात सुनकर हैरान रह गया। क्या केवल इसीलिये खानखाना को वह मोर्चा उठाकर दिल्ली तलब किया गया था! ऐसा संभव नहीं था। खानखाना जहाँगीर की प्रकृति को पहचानता था। अवश्य ही इसके पीछे कोई सियासी कारण है किंतु बादशाह खुलकर नहीं कह रहा।

    - 'शंहशाहे आलम! गुलाम ने जीवन के बहत्तर बसंत देखे हैं और गुलाम पेड़ों की पत्तियों का रंग देखकर बता सकता है कि इस समय कौन सी ऋतु चल रही है। आप निःसंकोच होकर गुलाम पर भरोसा करें।'

    खानखाना ने कह तो दिया किंतु वह नहीं जानता था कि उसने बादशाह की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। बादशाह ने लम्बी साँस लेकर कहा- 'मैं जानता हूँ कि आप मोर्चा उठा लेने का असली कारण जानना चाहते हैं किंतु मुझे नहीं मालूम कि मैंने ठीक किया या गलत!'

    - 'बादशाह सलामत जो भी फैसला करेंगे, सल्तनत और रियाया की भलाई के लिये ही करेंगे। यदि कुछ बातों की जानकारी मुझे हो तो मैं भी अपनी ओर से कुछ अर्ज कर सकता हूँ।'

    - 'खानखाना! मैं नहीं जानता कि जीवन का सफल होना क्या होता है किंतु मैं इतना अंदाज जरूर लगा सकता हूँ कि मेरा जीवन असफलताओं की जीती जागती कहानी है।'

    - 'मामूली परेशानियों से अपना दिल तंग न करें बादशाह सलामत। मुझे बतायें कि आपकी परेशानी का असली सबब क्या है?' - 'खानखाना! जब मैंने तुमको महावतखाँ का सिर काट कर लाने के लिये भेजा तो मुझे अचानक ही अपने पैरों की जमीन खिसकती हुई दिखाई दी। मुझे हरम में बड़ा भारी षड़यंत्र होता हुआ दिखाई दिया। मलिका नूरजहाँ स्वयं इस षड़यंत्र का ताना-बाना बुन रही थीं। वे चाहती हैं कि किसी तरह तुम्हारे हाथों महावतखाँ के साथ-साथ शहजादा खुर्रम भी मारा जाये। इसलिये मलिका नूरजहाँ ने अपने मोहरे उसी तरह खेलने शुरू किये।'

    खानखाना को बादशाह से यह सूचना पाकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

    - 'इतना ही नहीं। मलिका ए आलम नूरजहाँ तो यह भी चाहती हैं कि उनका अपना भाई आसिफखाँ जो महावतखाँ की कैद में है, वह भी तुम्हारे हाथों मारा जाये। और यह भी कि इस दौरान यदि आप भी लड़ाई में काम आ सकें तो अच्छा रहे। हमें उसी दिन मालूम हो सका कि परवेज और खुर्रम के बीच जंग का बीज मलिका नूरजहाँ ने ही बोया था। अब जबकि शहजादा परवेज नहीं रहा है, नूरजहाँ खून की वही होली खुर्रम और शहरयार के बीच खेलना चाहती है। यद्यपि खुर्रम ओर शहरयार दोनों ही मेरे बेटे हैं किंतु आसिफखाँ अपने जवांई खुर्रम को और नूरजहाँ अपने जंवाई शहरयार को दिल्ली के तख्त पर बैठाने के लिये अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। इस सबका परिणाम यह है कि सल्तनत के विश्वस्त सिपाही एक-एक करके मौत के मुँह में जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आपको इन दोनों के बीच पीस डालने का कोई अर्थ नहीं था। इससे तो बेहतर तो यही है कि शहजादा खुर्रम और मलिका नूरजहाँ आपस में ही लड़कर निबट लें।'

    बादशाह अपनी बात पूरी करते-करते हाँफने लगा। खानखाना चुपचाप बादशाह को सलाम करके बाहर निकल आया।

    अद्भुत बालक

    जेठ का महीना है और सूर्यदेव आकाश के ठीक मध्य में विराजमान हैं। सन-सनाती लू से परिपूर्ण आकाश में धूल के तप्त कण घुल जाने से जब वायु कानों में घुसती है तो लगता है किसी ने पिघला हुआ सीसा उंडेल दिया है। ऐसी विकट गर्मी में मनुष्यों और पशुओं की कौन कहे, चिड़ियों तक के जाये भी घोंसलों में दुबक कर बैठे हैं। राह-पंथ सब रिक्त हैं। किसान भी सब काम धाम छोड़कर पेड़ों के नीचे आकर सिमट गये हैं। गर्मी से देह को झुलसने से बचाने के लिये वे बार-बार गीले कपड़े से देह पौंछ रहे हैं।

    ऐसे में उन्होंने एक विचित्र दृश्य देखा उन्होंने देखा कि एक कीमती और ऊँचे घोड़े पर सवार एक वृद्ध खान तेजी से घोड़ा फैंकता हुआ आया और उनके पास रुककर उनसे वृन्दावन जाने का मार्ग पूछने लगा। खान के कीमती वस्त्र करीलों के झुण्ड में उलझ-उलझ कर तार-तार हो गये हैं। उसकी कीमती पगड़ी बेतरतीब हो गयी है जिससे उसकी सघन श्वेत अलकावली माथे पर झूल आयी है। खान के चित्त की दशा कुछ ऐसी है कि कपड़ों की ही तरह उसे अपनी देह का भी कोई भान नहीं है। स्थान-स्थान पर करील ओर बबूल के काँटों ने त्वचा को खरौंच डाला है। गर्मी में लगातार दौड़ते रहने के कारण घोड़े के मुँह से फेन बह रहा है।

    दिखने में वह कोई आला दर्जे का सिपाही लगता था किंतु उसकी अस्त-व्यस्त दाढ़ी, पगड़ी और फटे हुए कपड़े उसके चित्त में विक्षेप होने का बखान कर रहे थे। किसानों ने उसे वृंदावन जाने का मार्ग तो बताया किंतु साथ ही यह अनुरोध भी किया कि वह इस लू में घोड़े की यात्रा न करके कुछ देर पेड़ के नीचे विश्राम कर ले। जब सूरज ढल जाये तो वह वृंदावन चला जाये किंतु खान ने उनकी बात नहीं सुनी। वृंदावन को जाने वाला मार्ग जानते ही खान ने अपने घोड़े को ऐंड़ लगाई और आगे बढ़ गया।

    बहुत देर तक किसान उस विचित्र वृद्ध के बारे में बतियाते रहे। किसानों का अनुमान काफी हद तक ठीक ही था। खान के चित्त की दशा खराब नहीं थी तो ऐसी भी नहीं थी कि उसे ठीक कहा जा सके।

    खान घोड़े पर अकेला ही सवार था किंतु जाने किससे वार्तालाप करता हुआ जा रहा था। वह बार-बार कहता था कि किसी तरह एक बार वृंदावन पहुंच जाऊँ। उन्हें एक बार देख भर पाऊँ। आज मैं उन्हें अवश्य ही कुछ भेंट चढ़ाऊँगा किंतु क्या भेंट चढ़ाऊँगा? वे तो स्वयं ही रत्नाकर में रहते हैं और खुद लक्ष्मी उनकी गृहणी है, सब कुछ तो उनके पास है। फिर क्या उन्हें चढ़ाऊँ? बस उनका मन उनके पास नहीं है। वह राधाजी ने ले लिया है। आज मैं अपने परमात्मा को अपना मन ही चढ़ाऊँगा ताकि वे मन वाले हो जायें और वे मेरी सुधि लें। (रत्नाकरोऽस्ति सदनं गृहिणी च पद्मा, किं देयमस्ति भवते जगदीश्वराय। राधागृहीतमनसे मनसे च तुभ्यं, दत्तं मया निजमनस्तदिदं गृहाण।।- खानखाना कृत।)

    जब खान वृंदावन में गोविंददेव के मंदिर तक पहुँचा तो मंदिर के मुख्य कपाट बंद थे। यह भगवान के विश्राम का समय था। खान ने मंदिर के सामने पहुंचकर घोड़ा तो यमुना के किनारे एक पेड़ से बांध दिया और स्वयं मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचकर मंदिर के सेवकों से कपाट खोलने का अनुरोध करने लगा।

    - 'आपको किससे काम है, महंतजी से?' मंदिर के सेवकों ने पूछा - 'महंतजी से नहीं, गोविंददेवजी से।' खान ने जवाब दिया।

    - 'आप तो खान हैं, आपको भला उनसे क्या काम है?'

    - 'बहुत जरूरी काम है, आप समय व्यर्थ न करें। कपाट खोलें। समय निकला जा रहा है।'

    - 'किसका समय निकला जा रहा है?' सेवकों ने पूछा।

    - 'महाराज! मेरे और गोविंददेवजी के मिलने का समय निकला जा रहा है। शीघ्रता कीजिये। कपाट खोलिये।'

    - 'लेकिन यह समय तो भगवान के विश्राम का है। संध्या काल में आना, तभी कपाट खुलेंगे।'

    - 'नहीं-नहीं संध्या काल में नहीं। आप देखते नहीं कि मुझे गोविंददेवजी को बहुत जरूरी चीज देनी है?'

    - 'क्या जरूरी चीज देनी है?' -

    'नहीं-नहीं। वह मैं आपको नहीं बता सकता। आप कृपा करके कपाट खोलिये।'

    - 'अच्छा! आप यहीं ठहरिये महंतजी से पूछना पड़ेगा।'

    खान चिलचिलाती दुपहरी में वहीं धरती पर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। गर्मी से उसकी त्वचा पर छाले पड़ गये। सेवकों ने उसकी यह दशा देखी तो वे दौड़े-दौड़े महंतजी के पास गये- 'महाराज! एक विक्षिप्त और वृद्ध खान आया है और मंदिर के कपाट खोलने की जिद्द कर रहा है। अभी इसी समय।'

    - 'क्या चाहता है? कौन है?'

    - 'महाराज, यह तो वह नहीं बताता कि कौन है। विक्षिप्त जैसा लगता है। कभी कहता है कि गोविंददेव से मिलने का समय निकला जा रहा है और कभी कहता है कि गोविंददेव को कुछ जरूरी चीज देनी है।'

    - 'यदि वह विक्षिप्त है तो उसे भगाओ वहाँ से और यदि विक्षिप्त नहीं है तो जानने का प्रयास करो कि वह वास्तव में कौन है और क्या चाहता है?' महंतजी ने ऊंघते हुए कहा। महंतजी अपने विश्राम में किसी तरह का खलल नहीं चाहते थे।

    - 'महाराज! वह चिचिलाती धूप में मंदिर के दरवाजे के सामने बैठा रो रहा है।'

    - 'तो रोने दो उसे। थोड़ी देर में चला जायेगा।'

    सेवकों ने फिर से मुख्य द्वार पर आकर देखा, खान उसी तरह बैठा हुआ रो रहा था। सेवकों को लौट आया देखकर वह पुनः खड़ा हो गया- 'पूछ आये महंतजी से? अब तो खोलो कपाट।'

    सेवक उसकी बात का जवाब न देकर चुपचाप लौटने लगे। कपाट खुलते न देखकर खान और भी अधीर हो गया। उसने वहीं खड़े होकर जोर जोर से गाना आरंभ किया-

    कमल - दल नैननि की उनमानि ।

    बिसरत नाहिं सखी मो मन ते मंद मंद मुसकानि।।

    यह दसननि दुति चपला हूँ ते महा चपल चमकानि।

    वसुधा की सबकरी मधुरता सुधा पगी बतरानि।

    चढ़ी रहे चित उर बिसाल की मुकुलमाल थहरानि।

    नृत्य समय पीतांबर हू की फहरि फहरि फहरानि।

    अनुदित श्री वृंदावन ब्रज वे आवन आवन जानि।

    अब रहीम चित्त ते न टरति है सकल स्याम की बानि।।


    जाने क्या था खान के शब्दों में कि सेवक वहीं ठहर कर सुनने लगे। अचानक उन्होंने देखा कि मंदिर के कपाट स्वतः खुलने लगे और एक बालक बाहर आया। उसने खान का हाथ पकड़ कर पूछा- 'क्यों रहीम! क्यों रोते हो?'

    - 'कोई मुझे भीतर नहीं जाने देता।'

    - 'क्या करोगे भीतर जाकर? मैं तो यहीं आ गया।' बालक ने खान का हाथ थाम कर कहा।

    - 'तुम कौन हो?'

    - 'मुझे नहीं जानते?' - 'नहीं!' - 'मैं तुम्हारा गोविंददेव।'

    - 'अच्छा बताओ तो मैं आपके लिये क्या लाया हूँ?' खान ने पूछा।

    - 'तुम मुझे अपना मन देने लाये थे, मैंने तुम्हारा मन ले लिया। अब और क्या काम है?' बालक ने मुस्कुरा कर पूछा।

    - 'प्रसाद चाहिये।'

    - 'ये लो, प्रसाद भी लो और अब जाओ वापिस।' बालक ने अपनी मुठ्ठी में से खान को प्रसाद दिया।

    - 'मैं ऐसे नहीं जाऊँगा।'

    - 'तो फिर कैसे जाओगे?'

    - 'तुम्हें छिपा कर जाऊँगा।'

    - 'क्यों? छिपा कर क्यों?'

    - 'ताकि कोई तुम्हें देख नहीं सके।'

    - 'तुम मुझे कहाँ छुपाओगे रहीम? जहाँ भी छुपाओगे कोई न कोई ढूंढ ही लेगा।'

    - 'एक जगह है मेरे पास, वहाँ आपको कोई नहीं ढूंढ सकेगा।'

    - 'कौनसी जगह है?'

    - 'मेरे हृदय में बहुत अंधेरा है नाथ। आप वहाँ छिपकर रहिये। आप को वहाँ कोई भी नहीं ढूंढ सकेगा।

    नवनीतसार मपह्यत्य शंकया स्वीकृतं यदि पलायनं त्वया।

    मानसे मम घनान्धतामसे नन्दनन्दन कथे न लीयसे।'


    खान फिर से रो-रो कर गाने लगा।

    - 'अच्छा तो ठीक है मैं तुम्हारे हृदय में छुप कर रहूंगा। देखो, किसी को बता न देना।'

    - 'नहीं नाथ! मैं किसी को नहीं बताऊँगा।'

    - 'अच्छा, अब यहाँ से चलें! यह महंतजी के विश्राम का समय है।'

    मंदिर के सेवकों ने जब यह दृश्य देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। उन्होंने दौड़कर महंतजी को सारा किस्सा बताया। महंतजी शैय्या त्याग कर खड़ाऊँ की खट्-खट् करते हुए जब तक द्वार पर आये तब तक द्वार पर कोई नहीं रह गया था। न खान और न प्रसाद देने वाला बालक। (विद्या निवास मिश्र रहीम ग्रंथावली की भूमिका में इस घटना का उल्लेख किया गया है।)


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 61

     25.04.2018
    चित्रकूट का चातक - 61

    बेहोशी

    - 'बेटी जाना!'

    - 'हाँ अब्बा हुजूर।'

    - 'देखो तो कमरे में कितना अंधेरा घिर आया है, जरा रौशनी करो बेटी।' खानखाना ने छटपटा कर कहा।

    आज पूरे चार दिन बाद वह होश में आया था। जाने कहाँ-कहाँ से ढूंढ कर लायी थी जाना उसे। तीन दिनों की भागम भाग के बाद खानखाना दिल्ली के बाहर जंगलों में बेसुध पड़ा हुआ मिला था। तब से हकीम का इलाज चल रहा था किंतु उसकी बेहोशी टूटती ही नहीं थी। आज अचानक शाम के समय खानखाना ने आँखें खोलीं।

    - 'यह शमां आपके पलंग के पास ही रौशन है पिताजी।' जाना वृद्ध पिता की यह दशा देखकर चौंक पड़ी।

    - 'हाँ-हाँ! यह शमां और यह फानूस भी तो रौशन है। जाने क्यों मुझे दिखायी नहीं दिया लेकिन वह कहाँ गया?'

    - 'वह कौन अब्बा हुजूर?'

    - 'वह जो बालक बन कर मेरे साथ खेल रहा था?'

    - 'कौन अब्बा हुजूर, कौन खेल रहा था बालक बनकर?'

    - 'अरे वही, मधुसूदन! देवकी नंदन..............!' अचानक ही खानखाना अपनी बात अधूरी छोड़कर छत की ओर देखकर चिल्ला उठता है- 'मेरी ओर देखो परमात्मन्! हे कृपा निधान! फिर से बोलो दयानिधान! मुझे इस तरह जंगल में छोड़कर कहाँ जा छिपे हो? कब से तो आपको ढूंढ रहा हूँ!' खानखाना ने अत्यंत बेचैन होकर कहा तो जाना बाप के सीने पर झुक कर उसकी मालिश करने लगी।

    खानखाना बेहोश हो गया। कुछ ही देर में खानखाना को फिर होश आया। उसने देखा कि न तो जंगल है और न करील के वे विशाल कुंज। मुरली मनोहर का कोई पता नहीं है। जाने कब तक वह बूढे़ रहीम के साथ आँख-मिचौनी खेलता रहा था और अचानक ही जाने कहाँ जाकर गायब हो गया था। मुरली मनोहर के स्थान पर जाना उसके पास थी।

    - 'जाना!'

    - 'हाँ अब्बा हुजूर।'

    - 'हम कहाँ हैं बेटी?'

    - 'आप बाबा हुजूर बैरामखाँ वाली हवेली में हैं।'

    - 'हम यहाँ कब आये?'

    - 'आप आये नहीं अब्बा हुजूर! आपको लाया गया है।'

    - 'कब?'

    - 'आज हवेली में आये हुए आपको चार दिन हो गये।'

    - 'हम कहाँ थे?'

    - 'आप दिल्ली के बाहर जंगलों में बेहोश पड़े हुए थे। आप वहाँ क्यों गये थे अब्बा हुजूर?'

    - 'वही तो हम सोच रहे हैं बेटी कि वह हमें मथुरा से दिल्ली की सरहद तक तो लाया किंतु जंगल में ही छोड़कर गायब क्यों हो गया?'

    - 'कौन कहाँ पहुँचा कर गायब हो गया?'

    - 'तू नहीं जानेगी।'

    - 'कुछ तो बताइये अब्बा हुजूर, आप अचानक कहाँ चले गये थे और फिर पूरे तीन दिन बाद आप जंगल में बेहोशी की हालत में क्यों मिले? किसने की आपकी ऐसी दशा?'

    - 'कुछ खाने को दो जाना। बहुत भूख लग रही है। उसने हमें भगा-भगा कर थका ही डाला।' खानखाना ने जाना की बातों का उत्तर न देकर कहा।

    जाना खानखाना के लिये कुछ खाने को लाने के लिये चली गयी। जब वह अपने हाथों में समां के चावल और दूध लेकर लौटी तो उसने देखा वृद्ध पिता फिर से बेसुध हो गया है। उसने चावल एक ओर रखकर अपना माथा पीट लिया।

    उड़ गया चातक

    खानखाना की चेतना लौटी। उसने देखा हवेली पूरी तरह निस्तब्ध है। कहीं से कोई शब्द नहीं। बेटी जाना बाप के पलंग पर ही कंधा रखकर सो गयी है। शमां की रौशनी तेल खत्म हो जाने से अपने अंतिम क्षण गिन रही है जिससे कमरे में अंधेरा छाता जा रहा है। पूरी रात खानखाना सुधि और बेसुधि के पारावार में हिचकोले खाता रहा है। जब होश आता है तो जाना, जाना चिल्लाता है और जब बेसुधि में हिचकोले खाता है तो हे मुरली मनोहर! हे गिरधारी! चिल्लाता है।

    जब खानाखाना कुछ खाने को मांगकर फिर से बेसुध हो गया था, जाना उसी समय समझ गयी थी कि अब कुछ ही समय का खेल शेष है। रंगमंच का खिलाड़ी अपने हिस्से का अभिनय समाप्त करके फिर से नेपथ्य में जाने को उतावला है। जिस्मानी रौशनी फिर से आस्मानी रौशनी में शाया होना चाहती है।

    - 'हे मुरली मनोहर! हे गिरधारी! इस ओर निहारो बनवारी!' खानखाना चिल्ला उठा।

    जाना की नींद खुल गयी। उसने देखा, वृद्ध पिता के दोनों हाथ आकाश की ओर उठे हुए हैं- 'हे देवकी नन्दन। माधव मुरारी! मैं आपका गुलाम हूँ। सम्पूर्ण जगत से ठुकराया गया, दीन, हीन, मलीन और राह का भिखारी हूँ। केशव! आपकी आज्ञा से मैंने जीवन के रंगमंच पर कौन-कौन भूमिकाएं नहीं कीं! मैंने कौन-कौन स्वांग नहीं धरे! हे वनमाली! हे मधूसूदन श्रीकृष्ण! अगर मेरे इस स्वांग और अभिनय से आपका कुछ भी मनोरंजन हुआ हो तो उसके पुरस्कार स्वरूप मुझे अब और अभिनय करने से मुक्ति दे दो। अगर आपको मेरा कोई स्वांग अच्छा नहीं लगा हो तो ऐसा आदेश दो कि मैं फिर कोई स्वांग न करूँ, मेरे स्वांग करने पर ही आप रोक लगा दें, मैं सहज हो जाऊँ। (अनीता नटवन्मया तवपुरः श्रीकृष्ण। या भूमिका, व्योमाकाश खखाम्बराब्धिवसवस्त्वत्प्रीतयेद्यावधि। प्रीतस्त्वं यदि चेन्निरीक्ष्य भगवन् स्वप्रार्थित देहि मे, नो चेद् ब्रूहि कदापि मानय पुनस्त्वेतादृशीं भूमिकाम्।। - खानखाना कृत।)

    मुझसे यह अदम्य पीड़ा सही नहीं जाती। आप अपने दासों की कठोर परीक्षा न लें प्रभु!'

    - 'मैं जानता हूँ प्रभु! एक न एक दिन आप मेरी सुनेंगे। आपने अंधे सूरदास की भी तो सुनी लेकिन उसे आपने कितना रुलाया! हे नाथ! मेरे मित्र तुलसीबाबा का तो पूरा जीवन ही मुसीबतों का घर बन कर रह गया।'

    - 'हे प्रभु! अब मैं भी खूब सारा रो तो लिया! और कितना रोऊँ! अधिक रो सकने की मेरी सामृथ्य नहीं है प्रभु! अपनी शरण में ले लो प्रभु। मैंने तेरे दासों को रोते हुए ही देखा प्रभु! वह तेरा गुलाम तुलसी! कितना रोया वह? उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी।'

    - 'पायँपीर पेटपीर बाँहपीर मुँहपीर, जर जर सकल सरीर पीर मई है।

    देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है।

    हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारेही तें,

    ओट रामनाम की ललाट लिख लई है।

    कुंभज के किंकर बिकल बूड़े गोखुरनि,

    हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है?


    (यह पद गोस्वामी तुलसीदास रचित हनुमान बाहुक का है। जिसका अर्थ है- पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बाहु की पीड़ा और मुख की पीड़ा- सारा शरीर पीड़ामय होकर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। देवता, प्रेत, पितर, कर्म, काल और दुष्टग्रह, सब एक साथ ही आक्रमण करके तोप की सी बाड़ दे रहे हैं। बलि जाता हूँ। मैं तो लड़कपन से ही आपके हाथ बिना मोल बिका हुआ हूँ और अपने कपाल में रामनाम का आधार लिख लिया है। हाय राजा रामचंद्रजी! कहीं ऐसी दशा भी हुई है कि अगस्त्य मुनि का सेवक गाय के खुर में डूब गया हो?)

    - 'मेरी यह पीड़ा दूर करो नाथ। बहुत हो चुका प्रभु! अब इस लीला को समेटो। क्यों बालकों की तरह दूर खड़े तमाशा देखते हो? मैं तो चींटी की तरह मर जाऊंगा। अपने नेत्र उघाड़ो नाथ! क्यों मेरा उपहास करवाते हो?'

    जाना वृद्ध पिता के इस आत्मालाप को चुपचाप सुनती रही। उसने देखा कि पिता फिर से बेहोश हो गया। इस बार उसका सिर पलंग पर था और पैर फर्श पर थे। जाना ने पिता के पैर सीधे करके पलंग पर रख दिये और शमां में तेल डालने लगी। थोड़ी ही देर में खानखाना की चेतना फिर से लौटी। वह चिल्लाता हुआ उठ बैठा- 'मियाँ रसखान! अरे रस की खान! फिर से गाओ तो वह गान! कहाँ है तुम्हारी सुरीली तान!' खानखाना गाने लगा-

    सेस महेस, गनेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर ध्यावैं।

    जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद, अभेद, सुबेद बतावैं।

    नारद से सुक व्यास रहैं, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।

    ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।' (रसखानकृत)


    खानखाना उठ कर नाचने लगा। उसकी आँखें लाल थीं और होठों पर सफेद पपड़ी जमी हुई थी। पिता की यह दशा देखकर जाना की छाती भर आयी। खानखाना नाचते-नाचते क्षण भर के लिये रुका फिर अस्फुट स्वर में गाने लगा- ' हरि मुख किधौं मोहिनी माई। बोलत बचन मंत्र सो लागत गति मति जात भुलाई। (सूरदास कृत) ........अरी मोहे भवन भयानक लागे माई (सूरदास कृत) .........छवि आवत मोहनलाल की..........। (खानखाना कृत).......... मुखड़े छोटे होने लगे। श्वांस अवरुद्ध होने लगी। आँखें मुंदने लगीं। फिर अचानक खानखाना ने पूरे नेत्र खोले, स्वर पूर्णतः स्पष्ट हो गया। उसने भरपूर दृष्टि जाना पर डाली और फिर से गाने लगा-

    'कबहुँक खग मृग मीन कबहुँ मर्कटतनु धरि कै।

    कबहुँक सुन-नर-असुर-नाग-मय आकृति करि कै।

    नटवत् लख चौरासि स्वाँग धरि-धरि मैं आयो।

    हे त्रिभुवन नाथ! रीझ को कछु न पायो।

    जो हो प्रसन्न तो देहु अब मुकति दान माँगहु बिहँस

    जो पै उदास तो कहहु इम मत धरु रे नर स्वाँग अस।'
    (खानखाना कृत)

    पद पूरा होते होते खानखाना धरती पर गिर गया। उसने एक लम्बी हिचकी ली और प्रेम का प्यासा हुमा पंछी सदैव के लिये प्रीतम मुरली मनोहर के पास खेलने के लिये चला गया।

    जाना चीख कर पिता की छाती पर गिर पड़ी।

    उच्छवास

    मैं इस उपन्यास की भूमिका में लिख आया हूँ- ''उस युग में एक सिपाही का कवि हो जाना कितनी बड़ी बात थी इसका अनुमान लगा पाना आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है।'' उपन्यास के पूरा हो जाने पर मैं इस वक्तव्य में कुछ और भी जोड़ना चाहता हूँ। उस युग में भारत में वैष्णवी संत परम्परा में अद्भुत संत प्रकट हुए जिनमें भक्त कुल शिरोमणी वल्लभाचार्य, संत सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, भक्त रैदास, भक्त मीरांबाई, स्वामी हरिदास आदि अनेकानेक नाम लिये जा सकते हैं। ये समस्त भक्त रहीमदास के समकालिक थे अथवा कुछ ही वर्ष आगे पीछे हुए थे। इन उत्कृष्ट संतो की इतनी बड़ी सूची देखकर आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य यह देखकर भी नहीं होता कि उस युग में बहुत से मुसलमानों का कृष्ण भक्ति की तरफ प्रवृत्त हो जाना असामान्य बात होकर भी सहज सुलभ थी। आश्चर्य तो इस बात को देखकर होता है कि आज के युग में वह बात उतनी सुलभ नहीं रही है। कारण श्री माधव ही जानें।

    मैंने इस उपन्यास के लिये संदर्भ सामग्री जुटाने के प्रयास में मुसलमानों में कृष्णभक्ति परम्परा की पर्याप्त चौड़ी धारा के दर्शन किये हैं। उस धारा में रहीम, रसखान, रज्जब, दरियाशाह, दरियाबजी, लालदास, लतीफशाह, गरीबदास, वाजिन्द, वषनाजी, शेख भीखन, रसलीन, दाराशिकोह, सरमद साहब, साल बेग और कारे बेग से लेकर ताज बीबी, और चाँदबीबी जैसी सैंकड़ों नदियाँ आकर गिरती थीं। जलालुद्दीन वसाली तो रामभक्ति करने के लिये मुल्तान छोड़कर अयोध्या आ बसे थे।

    उस युग में रहीमदास की उपस्थिति सचमुच ही भारत वर्ष के लिये गर्व की बात थी। भारत भूमि पर कृष्ण भक्ति की यह निर्मल, शीतल और शांतिदायक धारा जीवित रहती तो निश्चय ही भारत भूमि का कण-कण प्रेम, विनय और पारस्परिक सद्भाव के सुवासित जल से गह-गह कर महक उठता, जिसकी सुगंध पड़ौसी देशों ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व को भी शांति का मार्ग दिखाती। मौर्य काल में भगवान बुद्ध के संदेशों ने प्रेम और अहिंसा की बयार से पूरी दुनिया को शांति दी। भगवान श्रीकृष्ण की गौसेवा एवं महावीर स्वामी के उपदेशों ने भारत भूमि से पशुहिंसा का ताण्डव रोकने में जो अद्भुत काम किया, वह बिना धर्म के संभव ही नहीं था। किंतु हाय रे भारत भूमि! दुर्भाग्य हमारा पीछा क्यों नहीं छोड़ता! वर्तमान युग में श्री कृष्ण भक्ति के स्थान पर धर्म निरपेक्षता के नाम पर एक दूषित विचारधारा प्रवाहित हो रही है।

    रहीम तो धर्मनिरपेक्ष नहीं थे! रहीम के साथ ही सम्पूर्ण भूमण्डल पर कोटि-कोटि प्रातः स्मरणीय जन हुए हैं जो धर्मनिरपेक्ष नहीं थे। वास्तविकता तो यह है कि किसी भी युग में हमें धर्मनिरपेक्षता की नहीं अपितु धार्मिक सद्भाव की आवश्यता है। धर्मनिरपेक्षता ढिंढोरा पीटने वालों के लिए रहीम का एक दोहा स्मरण हो आता है-

    ''आप न काहू काम के, डार पात फल फूल।

    औरन को रोकत फिरैं, रहिमन पेड़ बबूल।।''


    (स्वयं तो बबूल के पेड़ की तरह किसी काम के हैं नहीं। न तो शाखायें अच्छी हैं, न पत्ते किसी काम के हैं और न ही पुष्प किसी काम के हैं। केवल कांटों के बल पर अपनी राह पर चलते पथिक को रोकने का ही काम करते हैं।)

    यदि भारत अपने आप को फिर से जगद्गुरू के पद पद प्रतिष्ठित देखना चाहता है तो उसे धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से बाहर निकलकर, धार्मिक सद्भाव स्थापित करना होगा। धर्म का प्रकाश ही आज की अंतहीन समस्याओं का एकमात्र समाधान है। नैतिकता का बल ही समाज से अपराधों को कम और आदमी के लालच को नियंत्रत कर सकता है। धर्म के नाम पर होने वाली पोंगापंथी का विरोध होना चाहिए न कि स्वयं धर्म का। अपनी बात रहीम के ही एक दोहे से समाप्त करता हूँ-

    ''यह न रहीम सराहिये लेन-देन की प्रीत।

    प्रानन बाजी राखिये, हारि होय के जीत।''


    (लेन देन का प्रेम सराहने योग्य नहीं होता। प्रेम में तो प्राणों की बाजी लगानी पड़ती है, भले ही हार हो अथवा जीत।)


  • Share On Social Media:
  • धौलपुर के राजाओं ने बनवाया था सैंपउ का महादेव मंदिर

     21.08.2017
    धौलपुर के राजाओं ने बनवाया था सैंपउ का महादेव मंदिर

     लोक किंवदंति है कि संवत् 1305 (ई.1248) में वाराणसी की तीर्थ यात्रा पर गये एक भाई एवं उसकी बहिन को स्वप्न में सैंपऊ ग्राम के निकट एक शिवलिंग होने की जानकारी प्राप्त हुई। वे स्वप्न में निर्दिष्ट स्थान पर आये और उन्होंने शिवलिंग को प्राप्त करने के लिये इस स्थान की खुदाई करनी आरम्भ की। कहा जाता है कि दिन में शिवलिंग की खुदाई की जाती किंतु रात को शिवलिंग पर इतनी मिट्टी चढ़ जाती कि शिवलिंग फिर से मिट्टी में दब जाता। इस कारण कई दिन तक खुदाई की गई और इस स्थान पर रेत का एक ऊँचा टीला बन गया।

    यह शिवलिंग बरसों तक इस टीले पर बने एक चबूतरे पर स्थित रहा। मंदिर के वर्तमान महंत रामभरोसी पुरी बाते हैं कि धौलपुर के महाराजराणा कीरतसिंह (ई.1856-35) के पुत्र महाराजराणा भगवतसिंह (ई.1836-73) के समय में उनके साले राजधर ने उस शिवलिंग के निमित्त आज से लगभग 200 साल पहले, राजकोष से सैंपऊ के महादेव मंदिर का निर्माण करवाया। तब से यह मंदिर जन-आस्था का केन्द्र बना हुआ है। दूर-दूर से महादेव मंदिर के दर्शनों के लिये यात्री आते हैं।

    आजादी के बाद भी धौलपुर के पूर्व राजघराने के सदस्यों का इस मंदिर से जुड़ाव बना रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे भी इस मंदिर में दर्शनार्थ आती रही हैं। इस मंदिर के महंत रामभरोसे पुरी इस मंदिर के पुजारियों की अठारहवीं पीढ़ी में हैं।

    मंदिर का स्थापत्य साधारण कोटि का है कंतु उसका उच्च शिखर काफी दूर से ध्यान आकर्षित कर लेता है। मूल गर्भ के चारों ओर बड़ा चौक है जिसमें अत्यंत प्राचीन मूर्तियों के अवशेष रखे हुए हैं। इस मंदिर पर गंगाजी से कावड़ों में गंगाजल लाकर चढ़ाया जाता है। प्रतिवर्ष फाल्गुन एवं श्रावण मास की चौदस को इस मंदिर में मेले लगते हैं जिनमें दूर-दूर से ग्रामीण जनता श्रद्धा के साथ भाग लेने आती है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 1

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 1

    प्रस्तावना

    अब्दुर्रहीम खानखाना की पहचान आज के भारत में एक 'संत-कवि' की है। इसीलिये हिन्दू उन्हें रहीमदासजी कहते हैं। विगत चार सौ वर्षों से वे करोड़ों हिन्दी भाषी भारतीयों के लिये श्रद्धा के पात्र हैं। वे दर्शन और नीति के प्रकाण्ड पण्डित माने जाते हैं। यद्यपि उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और डिंगल आदि भाषाओं में उस युग की प्रचलित पद्धतियों में सब तरह के काव्य की रचना की है किंतु उनकी विलक्षण प्रतिभा उनके दोहों में देखने को मिलती है। उनके दोहे आम भारतीय के मन में नैतिकता और उत्साह भरने का काम करते हैं तथा जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

    अब्दुर्रहीम खानखाना का उल्लेख कहीं-कहीं अपने समय के महान दानवीर पुरुष के रूप में, कहीं-कहीं अकबर के सेनापति के रूप में तथा कहीं-कहीं गोस्वामी तुलसीदासजी के मित्र के रूप में भी होता है किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जिस रहीम को केवल कवि के रूप में पहचाना जा रहा है, उसका अतीत किसी और रूप में भी अपनी स्वर्णिम पहचान रखता है। रहीम का यह अतीत इतिहास के पन्नों में उसी तरह दब कर रह गया है जैसे राख की ढेरी में रक्त-तप्त अंगारा दब जाता है। वह दिखाई तो नहीं देता किंतु उसमें आँच बनी रहती है।

    चार सौ साल की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद यदि आज इतिहास के पन्नों को टटोल कर देखें तो उनमें रहीम चमकीले हीरे की तरह अलग से दिखाई देता है। एक ऐसा हीरा जो अपनी ही आभा से जगमग करता है, एक ऐसा हीरा जिसने खुद अपने आप को तराश कर चमकने योग्य बनाया है, एक ऐसा हीरा जिसका सही मोल आज तक न तो इतिहासकार लगा पाये और न हिन्दी साहित्य के समालोचक। संभवतः इसलिये कि उस युग में एक सिपाही का कवि हो जाना कितनी बड़ी बात थी इसका अनुमान लगा पाना आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है। कारण कुछ भी हो सकते हैं किंतु यह सत्य है कि रहीम के लिये उनकी अपनी ही वाणी कितनी सच हुई- 'रहिमन हीरा कब कहै लाख हमारो मोल!' आज कितने लोग यह जानते हैं कि जिस मुगलिया सल्तनत के किस्सों से भारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, भारत में उस मुगलिया सल्तनत का भवन अब्दुर्रहीम खानखाना के पिता खानखाना बैरामखाँ और स्वयं अब्दुर्रहीम ने खड़ा किया था।

    आज कितने लोग जानते हैं कि अब्दुर्रहीम खानखाना ने अपनी 'करुण कोमल कवियोचित वाणी' के बल पर कठोर मुगल शासकों के हृदयों में सुकोमल मानवीय भावों को जगाने का प्रयास किया! जिससे निरंकुश मुगलिया शासन के बोझ तले सिसकती हुई त्रस्त हिन्दू जनता को मुस्लिम शासकों के अत्याचारों से राहत मिली! इसका प्रमाण यह है कि अकबर, जहाँगीर और फिर शाहजहाँ रहीम के प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहे। इन शासकों के काल में हिन्दुओं पर उतने अत्याचार नहीं हुए जितने कि उनसे पूर्ववर्ती बाबर तथा पश्चवर्ती औरंगजेब के शासन काल में हुए।

    इस बात पर विवाद हो सकता है कि रहीम द्वारा पहुँचायी गयी राहत कितनी थी किंतु यह जितनी भी थी, थी तो सही! रेगिस्तान में खड़ी एक हरी झाड़ी ही समस्त जीवों का ध्यान खींचती है। वह विषमतम परिस्थितियों के बीच जीवन की उपस्थिति की घोषणा तो करती ही है! फिर रहीम तो स्वयं अपने आप में एक पूरा का पूरा उद्यान थे जिसमें बैठकर कुछ दिन ही सही, हिन्दू जाति ने प्रेम की मीठी बयार का अनुभव तो किया! रहीम के दोहों ने लाखों हिन्दुओं को अपनी दुरावस्था पर सोचने और जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिये प्रेरित किया। यहाँ तक कि हिन्दुओं के सूर्य कहे जाने वाले मेवाड़ी महाराणाओं को भी उन्होंने कर्तव्य पथ दिखाया। भले ही इसके बदले में रहीमदासजी को मुगल बादशाहों के कोप का भाजन बनना पड़ा।

    सत्य के लिये सर्वस्व का त्याग करने वाले और उसकी कीमत अपने पुत्रों और पौत्रों के मस्तकों से चुकाने वाले इस इतिहास पुरुष का चरित्र तो पठन-पाठन के योग्य है ही, साथ ही उनके पिता बैरामखाँ का विपरीत जीवन चरित्र भी सुधि पाठकों के लिये पठनीय और मननीय हो सकता है जो उस काल की परिस्थितियों और परम्पराओं की जीती जागती कहानी कहता है। यहाँ यह विचार करने योग्य है कि जहाँ बैरामखाँ अपने समय में हिन्दुओं का सबसे बड़ा शत्रु था वहीं उसका पुत्र रहीम हिन्दू जाति का रक्षक बना और चार सौ साल बीत जाने पर भी हिन्दू जाति की श्रद्धा का पात्र बना हुआ है।

    इस उपन्यास की कथा इन्हीं पिता-पुत्र के चारों ओर घूमती है। इन दोनों के चरित्र में पर्याप्त अंतर है। जहाँ बैरामखाँ अपने स्वामी के लिये बिना अच्छे-बुरे का विचार किये निर्दोष प्रजा को विधर्मी मानकर अत्याचार पर अत्याचार करता चला जाता है, शत्रु राजाओं की हत्या करता चला जाता है, वहीं अब्दुर्रहीम मुगल बादशाहों का खानखाना होते हुए भी अपनी स्वतंत्र चेता बुद्धि से शुचि और अशुचि का पर्याप्त विचार करता है। अकबर के समस्त शत्रुओं के विरुद्ध अभियानों में भी वह शत्रु-अशत्रु में भेद करता है। अकबर के जिन शत्रुओं को रहीम गलत नहीं मानता, उनके विरुद्ध वह अपने मन में दया का भाव रखता है। इस अंतर का परिणाम इन्हीं दोनों के जीवन में देखा जा सकता है। जहाँ रहीम के प्राणों की रक्षा उसके शत्रु भी अपने प्राण देकर करते हैं, वहीं दूसरी ओर बैरामखाँ के मित्र भी बैरामखाँ के प्राण लेने के लिये उद्धत रहते हैं।

    इन पिता पुत्र के जीवन चरित्र को देखकर एक उक्ति का स्मरण होता है- भले बुरेन के होत हैं, बदल जात हैं बंस। हिरनाकुस के हरिभजन उग्रसेन के कंस।। बैरामखाँ अंत तक विदेशी बना रहता है जबकि उसका पुत्र रहीम पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंग जाता है। यही कारण है कि अपने ऊपर विपत्ति आने पर बैरामखाँ मक्का के लिये प्रस्थान करता है तो दूसरी ओर अब्दुर्रहीम विपत्ति आने पर चित्रकूट में प्रवास करता है। संभवतः इसीलिये भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र ने रहीमदासजी और उनके जैसे मुस्लिम भक्तों की सेवाओं का मूल्यांकन इन शब्दों में किया- ''इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन्ह हिन्दू वारिये।'' रहीमदासजी से मेरा परिचय मेरे पिताजी ने करवाया था जब मैं केवल पांच-छः वर्ष का बालक ही था। तभी से रहीमदास मेरे मन के आंगन में श्रद्धा के पीपल बन कर खड़े हैं। इस हिसाब से मैं विगत पैंतीस वर्षों से रहीमदासजी के साथ जिया हूँ। जबकि बैरामखाँ से मेरा परिचय इतिहास की पुस्तकों ने करवाया है।

    मेरा मन रहीमदासजी को लिखने में जितना रमा है, वैसी अनुभूति बैरामखाँ को लिखते समय नहीं हुई फिर भी बैरामखाँ इतिहास का ऐसा पात्र है जो परस्पर विपरीत चारित्रिक गुण-दोषों की मौजूदगी के कारण स्वयं मुखरित है। भारतीय इतिहास में रहीम रूपी अमूल्य हीरा किस खान से प्रकट हुआ? और कब यह 'मुसलमान हरिजन' शताब्दियों की सीमायें लांघकर कोटि-कोटि भारतवासियों की श्रद्धा का पात्र बन गया? यह उपन्यास इन्हीं प्रश्नों का जवाब ढूंढने की चेष्टा है। रहीम रूपी हीरे की वास्तविक खान की खोज करते हुए हमें मध्य एशिया के इतिहास में तो प्रवेश करना ही पड़ता है, साथ ही प्राचीन पश्चिमोत्तर चीन में बसने वाली हूण और यू-ची जातियों के इतिहास में भी झांकना पड़ता है। इतना ही नहीं घनघोर आश्चर्य तो तब होता है जब हम इतिहास की गहराई में पर्याप्त उतर चुकने के बाद स्वयं को भारत के पौराणिक खजाने में खड़ा पाते हैं।

    यही कारण है कि एक ओर तो उपन्यास के आरंभ में राजा ययाति के आख्यान को स्थान मिला है तो दूसरी ओर मध्य एशियाई आक्रांता- चंगेजखाँ और तैमूरलंग भी मौजूद हैं। ताकि पाठक उस घनघोर अंधेरे से भी भली भांति परिचित हो सकें जिसे चीर कर रहीम रूपी दिव्य नक्षत्र उदित हुआ था। ऐतिहासिक उपन्यास के लेखन में जैसी दुविधा हुआ करती है, उसका सामना मुझे भी करना पड़ा है। यद्यपि मैंने कथा के प्रवाह में औपन्यासिकता और ऐतिहासिकता दोनों की सुगंध को बचाये रखने का प्रयास किया है फिर भी यदि किसी प्रसंग में दोनों में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता अनुभव हुई है तो वहाँ मैंने औपन्यासिक चमत्कारिता का अवलम्बन त्याग कर इतिहास के मूल तथ्यों को बचाया है। मेरे इसी आग्रह के कारण इतिहास ने स्वयं आगे बढ़कर उपन्यास की रक्षा की है।

    दूसरे शब्दों में कहूँ तो इतिहास और उपन्यास एक दूसरे का अनुपूरक बन गये हैं। उस युग के सामाजिक एवं अध्यात्मिक वातावरण को उपन्यास में यथाशक्ति उकेरने का प्रयास किया गया है। इस कारण मीरां बाई, गोस्वामी तुलसीदास, रामदास, भक्त सूरदास, कुंभनदास आदि संतों के उन प्रसंगों को भी उपन्यास में स्थान मिला है जो बैरामखाँ तथा अब्दुर्रहीम के काल से सम्बंध रखते हैं तथा उस युग की वास्तविक तस्वीर प्रदर्शित करते हैं। मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसादजी गुप्ता ने इस उपन्यास के विषय में मुझे पग-पग पर अत्यंत बहुमूल्य परामर्श देकर मेरा बहुत हित साधा है, उनके प्रति विपुल कृतज्ञता अर्पित करता हूँ। मुझे लगता है कि जैसे यह उपन्यास उन्हीं की परिकल्पना थी जिसका बीज उन्होंने मेरे मन में मेरी पाँच वर्ष की आयु में बोया था, वही बीज सुपल्लवित और सुपोषित होकर उपन्यास के रूप में पुष्पित हो गया है।

    मैंने लेखकीय धर्म का निर्वहन बिना किसी पूर्वाग्रह के किया है किंतु वास्तविक निर्णय तो सुधि पाठक ही करेंगे कि मैं इस कार्य में कितना सफल रहा! पाठकों से अपेक्षा रहेगी कि वे इस बात का निर्णय चार सौ वर्ष पुरानी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करेंगे। सुधि पाठक इस उपन्यास का आनंद उठायेंगे और उपन्यास में रह गयी कमियों के लिये मुझे क्षमा करेंगे, ऐसी आशा है।


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 2

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 2

    खूनी ताकत

    इंसानी खून


    संसार में इंसानी खून का रंग हर जगह लाल है किंतु उसकी ताकत हर जगह अलग है। जब इंसानी खून की ताकत जोर मारती है तो इंसान, इंसान नहीं रहता, हैवान बन जाता है। वह दूसरों का सर्वस्व छीनने और मौत का नंगा नाच देखने के लिये उतावला हो जाता है। छटपटाती हुई लाशें उसे खिलौनों के समान सुख देती हैं। मौत का करुण क्रंदन उसे मधुर संगीत जैसा लगता है और बहता हुआ इंसानी खून उसे आनंद की बहती हुई नदी के समान दिखाई देता है। यही कारण है कि संसार में अब तक करोड़ों बेगुनाह इंसानों का खून इंसानी हैवानियत के हाथों बह चुका है और उसका बहना आज भी जारी है। यह कहानी इंसानी खून के हैवानियत भरे कारनामों के बोझ तले सिसकते इतिहास के पन्नों से आरंभ होती है।

    ययाति के वंशज

    हिन्दुओं में मान्यता है कि चन्द्रवंशी राजा ययाति के बेटे 'तुरू' के वंशज आगे चलकर 'तुर्क' कहलाये। कई पुराणों में राजा ययाति की कथा मिलती है। इस कथा का सर्वप्रथम उल्लेख महाभारत में हुआ है जिसके अनुसार राजा ययाति के दो विवाह हुए। पहला विवाह दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से और दूसरा विवाह असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से हुआ था। देवयानी परम कलहकारिणी और दुष्ट स्वभाव की स्त्री थी। सौतिया डाह के कारण देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से राजा की शिकायत की। शुक्राचार्य ने कुपित होकर राजा ययाति को भयंकर शाप दिया जिससे राजा का यौवन नष्ट हो गया। इंसानी खून ने जोर मारा। वह असमय ही बूढ़ा नहीं होना चाहता था। अभी वह भोग विलास से तृप्त नहीं हुआ था। शापग्रस्त राजा अपने महल में लौट कर आया। उसके बाल सफेद हो गये थे और चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयीं थीं। यह अयाचित, अनपेक्षित और आकस्मिक विपत्ति थी।

    उसने देवयानी के बड़े पुत्र यदु को अपने पास बुलाया और अपने शाप की पूरी कहानी बताकर कहा- 'देखो! मैं शाप के कारण बूढ़ा हो गया हूँ किन्तु अभी भोग विलास की मेरी लालसा मिटी नहीं है। तुम मेरे बेटे हो। मेरी इच्छा को पूरा करना तुम्हारा धर्म है। मेरा बुढ़ापा तुम ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो। जब भोग विलास से मेरा मन भर जायेगा तो मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें लौटा दूंगा।' यदु ने पिता का तिरस्कार करते हुए कहा- 'पिताजी! बुढ़ापा किसी भी तरह से अच्छा नहीं हैं। सुंदर स्त्रियाँ बूढ़े आदमी का तिरस्कार करती हैं इसलिये मैं आपका बुढ़ापा नहीं ले सकता।' राजा कुपित हो गया। उसने कहा- 'तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ है फिर भी अपना यौवन मुझे नहीं देता! मैं तुझे और तेरी संतान को राज्य के अधिकार से वंचित करता हूँ।'

    यदु से निराश होकर राजा ने देवयानी के दूसरे पुत्र तुर्वसु को बुलाया। तुर्वसु ने भी पिता की बात मानने से मना कर दिया। राजा फिर कुपित हुआ। उसने तुर्वसु को शाप दिया- 'पिता का तिरस्कार करने वाले दुष्ट! जा! तू मांस भोजी, दुराचारी और वर्णसंकर म्लेच्छ हो जा।'

    देवयानी के पुत्रों के बाद शर्मिष्ठा के पुत्रों की बारी आई। शर्मिष्ठा के दोनों बड़े पुत्रों द्रह्यु और अनु ने भी पिता को अपना यौवन देने से मना कर दिया। राजा ने उन्हें भी भयानक शाप दिये। शर्मिष्ठा के तीसरे पुत्र पुरू ने पिता की इच्छा जानकर कहा-'पिताजी आप मेरा यौवन ले लें।' राजा प्रसन्न हुआ। उसने पुरू का यौवन लेकर उसे अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा के शेष पुत्र राजा को त्याग कर चले गये। कहते हैं राजा ययाति के शाप से तुर्वसु की संतानें यवन हुईं। उसके वंशज धरती पर दूर-दूर तक फैल गये जो तुर्कों के नाम से जाने गये। ययाति के पुत्र अनु से म्लेच्छ उत्पन्न हुए। अनुमान है कि 'अनु' के वंशज इतिहास में 'हूंग-नू' अथवा हूण कहलाये।

    लाओ शंग

    चीन के उत्तर में मंगोलिया का विशाल रेगिस्तान है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में इस क्षेत्र में कई बर्बर जातियाँ निवास करती थीं। इन बर्बर जातियों का प्रसार पश्चिमी भाग में फैली सीक्यांग पर्वतमाला तक था। मंगोलिया के गोबी प्रदेश में यू-ची नामक एक प्राचीन जाति निवास करती थी। इसके पड़ौस में अत्यंत बर्बर और भयानक लड़ाका जाति रहती थी जिन्हें हूण कहा जाता था। पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि तुर्कों के पूर्वज यही हूण थे जिनका मूल नाम 'हूंग-नू' था। मूल रूप से यह एक चीनी जाति थी। ये लोग देखने में तो लम्बे, चौड़े, गोरे और सुंदर चेहरे वाले थे किंतु स्वभाव से अत्यंत बर्बर, आक्रमणकारी और हिंसक प्रवृत्ति वाले थे। इनकी खूनी ताकत का मुकाबला संसार की कोई दूसरी जाति नहीं कर सकती थी।

    चीन की भौगोलिक बनावट उसे दो भागों में बांटती है- मुख्य प्रदेश तथा बाहरी प्रदेश। जहाँ चीन के मुख्य प्रदेश में सभ्यता का तेजी से विकास हुआ और उसने विश्व को सर्वप्रथम कागज, छापाखाना, पहिए वाली गाड़ी, बारूद, क्रॉस बो, दिशा सूचक यंत्र और चीनी मिट्टी के बर्तन दिये वहीं चीन के बाहरी इलाकों में रहने वाली बर्बर जातियाँ कई सौ सालों तक असभ्य बनी रहीं। ईसा से चार सौ साल पहले भीतरी चीन में चओ राजवंश अपने चरम पर था और अगले सौ साल में उसका सामंती शासन पूरी तरह समाप्त हो गया। इसके बाद चीन के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हान राजवंश के नेतृत्व में चीन के एकीकरण का काम पूरा हो गया और चीन सभ्यता के नवीन विकास की ओर बढ़ गया।

    यह सब भारत से गये बौद्ध धर्म के कारण संभव हुआ लेकिन बाहरी चीन इन सब प्रभावों और परिवर्तनों से भी बिल्कुल अछूता रहा जिसके कारण हूण जाति नितांत असभ्य और बर्बर बनी रही। संभवतः राजा ययाति के शाप के कारण वे अब तक मलिन और हिंसक बने हुए थे। ई. पू. 174 से ई.पू. 160 तक लाओ-शंग हूणों का राजा हुआ। वह बर्बरता की जीती जागती मिसाल था। एक बार उसने यू-ची जाति पर आक्रमण कर दिया। यू-ची लोगों ने हूणों का सामना किया किंतु शीघ्र ही यूचियों के पैर उखड़ गये। लाओ-शंग ने यू-ची राजा को मार डाला तथा उसकी खोपड़ी निकलवाकर अपने महल में ले गया। उसके बाद लाओ-शंग ने जीवन भर उसी खोपड़ी में पानी पिया।

    बगदाद के खलीफा

    यू-ची गोबी प्रदेश छोड़कर नान-शान प्रदेश में चले गये किंतु यहाँ भी हूणों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। 140 ई.पू. में हूणों की वू-सुन शाखा के राजकुमार ने नान-शान प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। यू-ची एक बार पुनः परास्त होकर ता-हिया (बैक्ट्रिया) की ओर भाग गये। हूणों ने जब एक बार पश्चिम की ओर सरकना आरंभ किया तो वे सरकते ही चले गये। जब वे ईरान पहुँचे तो उनमें ईरानियों का खून भी शामिल हो गया किंतु उनके खून की मूल तासीर बची रही। उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं आया।

    हूंग-नू जाति में उत्पन्न हुए 'तुरू' अथवा 'तुर्क' नाम के आदमी से इनकी एक शाखा तुर्कों के नाम से विख्यात हुई जब अरब के मुसलमानों ने मध्य ऐशियाई देशों पर आक्रमण किया तो तुर्कों ने अरबों का भारी विरोध किया किंतु अरबवाले मध्य एशिया पर अधिकार जमाने में सफल हो गये। उनके प्रभाव से आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में तुर्कों ने भी मुसलमान होना आरंभ कर दिया। तुर्कों के मुसलमान हो जाने के बाद दुनिया में इस्लाम का प्रसार बहुत तेजी से हुआ।

    तुर्कों की खूनी ताकत को देखते हुए अरब के खलीफाओं ने उन्हें अपना अंगरक्षक नियुक्त किया। नौवीं-दसवीं शताब्दी में ये तुर्क इतने ताकतवर हो गये कि बगदाद और बुखारा में इन्होंने अपने स्वामियों के तखते पलट दिये और उनके स्थान पर स्वयं खलीफा बन गये। इन नये खलीफाओं ने 1453 ईस्वी में कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार जमा लिया जो उन दिनों व्यापार का बड़ा केन्द्र था। इससे यूरोप वालों के लिये पूर्व का स्थल मार्ग बन्द हो गया और यूरोप वालों को नये जल मार्गों की खोज करनी पड़ी। वास्कोडिगामा और कोलम्बस की खोजें उसी अभियान के परिणाम हैं। कहा जाता है कि अरबवासी इस्लाम को मक्का और मदीना से कार्डोवा तक लाये, ईरानियों ने उसे बगदाद तक पहुँचाया और तुर्क उसे बगदाद से दिल्ली ले आये। इस प्रकार अरब के मुसलमानों ने जो काम आरम्भ किया उसे तुर्कों ने पूरा किया।


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 3

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 3

    भारत भारत की स्वतंत्रता का हरण

    ई. 712 में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया। वह पहला मुस्लिम आक्रांता था जिसने भारत की भूमि पर पैर रखा था। उसने सिंध के राजा दाहिर सेन को मार डाला तथा राज परिवार के सदस्यों की नृशंस हत्याएं कीं। हिन्दू प्रजा पर उसने ऐसे-ऐसे अत्याचार किये कि हूणों की याद एक बार फिर से ताजा हो उठी किंतु इस बार हिंदुओं के पास समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त, कुमार गुप्त तथा स्कंदगुप्त जैसे प्रबल प्रतापी सम्राट नहीं थे जो इस अत्याचारी का मार्ग रोक सकते। हजारों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ और वे जीवित ही आग में झौंक दी गयीं। बच्चों को लोहे की जंजीरों से बांध कर गुलाम बनाया गया।

    पुरुषों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया। जाने कितने ही लोग हाथियों के पैरों तले कुचल दिये गये। कितनों को अधमरा करके नदियों में फैंक दिया गया। अधमरे मनुष्यों एवं शवों को खाने के लिये गिद्धों के झुण्ड सिंध की पावन धरा पर मण्डराने लगे। विपुल मात्रा में मांस की गंध पाकर जंगलों से गीदड़ और भेड़िये निकल आये। कुत्ते भी मनुष्यों से अपनी स्वाभाविक मित्रता भूलकर भरी दोपहरी में जीवित मनुष्यों का मांस नोचने लगे। चूहे-बिल्ली तक नरभक्षी हो गये। सिंध को पैरों तले रौंदकर वह खूनी दरिंदा वन्य पशुओं की तरह डकराता हुआ फिर से अपनी जन्म भूमि को लौट गया। वह अपने साथ अपार सोना, चांदी, हाथी, घोड़े, गुलाम, बच्चे और औरतें ले गया।

    मुहम्मद बिन कासिम का बचा हुआ काम पूरा करने का बीड़ा महमूद गजनवी ने उठाया। वह गजनी का रहने वाला था। 1000 ईस्वी से 1027 ईस्वी तक उसने भारत पर सत्रह आक्रमण किये। उसने जब भारत पर पहला आक्रमण किया तो पंजाब के प्रबल प्रतापी महाराजा जयपाल ने विशाल सेना लेकर उसका रास्ता रोका। दुर्दांत गजनवी ने महाराजा जयपाल को युद्ध के मैदान में जीवित ही पकड़ लिया और उनकी बड़ी दुर्गति की। महाराजा के गले में पड़ा मोतियों का हार खींचते हुए गजनवी ने कहा- 'गुलामों और काफिरों को मोती नहीं पहनना चाहिये।'

    महाराजा के सामने ही राज-महिषियों की दुर्गति की गयी। बहुत सी राजकन्याओं ने आग में कूद कर प्राण तज दिये। ये भीषण दृष्य देखकर महाराजा जयपाल को इतनी ग्लानि हुई कि वे जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये। गजनवी ने अपने आक्रमणों में कई लाख हिन्दुओं की हत्या की। भारत से अपार धन लूटा। लोगों को गुलाम बनाया और उस काल में सर्वप्रसिद्ध सोमनाथ का मंदिर तोड़ा। मथुरा को नष्ट कर दिया। नगरकोट के प्रसिद्ध मंदिर को लूटा। यद्यपि इतिहास में सोमनाथ आक्रमण को ही अधिक स्थान मिला है किंतु नगरकोट देवी के मंदिर की लूट इतनी बड़ी थी कि इस मंदिर से मिले धन को उठा कर ले जाने के लिये गजनवी के हजारों ऊँट भी कम पड़ गये। इतना सब करने के बाद भी गजनवी पूरी तरह से भारत में इस्लाम न फैला सका।

    महमूद गजनवी का बचा हुआ कार्य मुहम्मद गौरी ने अपने हाथ में लिया। वह गौर देश का रहने वाला था। 1178 ईस्वी से 1206 ईस्वी तक उसने भारत पर पच्चीस आक्रमण किये। दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान को हराकर उसने भारत में मुस्लिम राज्य की नींव रखी। मुहम्मद गौरी ने भारतवर्ष की अपार सम्पत्ति को हड़प लिया जिससे देश की जनता एक साथ ही व्यापक स्तर पर निर्धन हो गयी। मुहम्मद गौरी के गुलामों और सैनिकों ने पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना दिया।

    हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदों में परिवर्तित कर दी गयीं। दिल्ली का विष्णुमंदिर जामा मस्जिद में बदल दिया गया। धार, वाराणसी उज्जैन, मथुरा, अजयमेरू, जाल्हुर की संस्कृत पाठशालायें ध्वस्त करके रातों रात मस्जिदें खड़ी कर दी गयीं। अयोध्या, नगरकोट और हरिद्वार जैसे तीर्थ जला कर राख कर दिये गये।

    बौद्ध धर्म तो हूणों के हाथों पहले ही पराभव को प्राप्त हो चुका था किंतु इस बार हिन्दू धर्म का ऐसा पराभव देखकर जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल, श्रीलंका तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया। भारतवर्ष पर वो कहर ढाया गया कि भारत के इतिहास की धारा ही कुण्ठित हो गयी। हिन्दू क्षत्रियों का समस्त गौरव नष्ट हो गया। स्थान-स्थान पर मुस्लिम गवर्नर नियुक्त हो गये। भारत भूमि की हजारों वर्षों से चली आ रही स्वतंत्रता समाप्त हो गयी।


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 4

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 4

    रक्त और मांस का पिण्ड

    1155 ईस्वी की एक सुबह। ओमन नदी का शांत जल प्रतिदिन की भांति अपनी मंथर गति से प्रवाहित हो रहा था। उसके निर्मल जल में सहस्रों रूपहली मछलियाँ और जलमुर्गियाँ अठखेलियां कर रही थीं। कोटि-कोटि सूर्य-रश्मियां जब ओमन नदी के जल को स्पर्श करतीं तो नदी का जल चमक उठता। नदी के तट पर उग आई घास के फूलों पर मण्डराने वाली रंग-बिरंगी तितलियाँ नदी के जल में अपनी बड़ी-बड़ी मूंछों को भिगोतीं और उन पर लगा मकरंद साफ करतीं। नदी तट पर खड़े विशाल वृक्षों पर बैठे पक्षियों के झुण्ड भी तितलियों का अनुकरण करते और आकाश में लम्बी सी उड़ान भरकर नदी के जल में चोंच डुबों कर फिर से अपने वृक्षों पर आ बैठते।

    जब हरिणों के झुण्ड पानी पीने के लिये नदी तट तक आते तो चंचल तितलियाँ और नटखट पक्षी उनकी पीठों पर सवारी गांठते तथा दूर तक उनके साथ जाकर पुनः अपने स्थान पर लौट आते। शैतान लंगूर भी उनका साथ देने में पीछे नहीं रहते। जब कभी कोई खूंखार पशु जंगल से निकल कर नदी के तट तक आता तो तितलियाँ सहम जातीं। पक्षियों की कतारें घनघोर शब्द करके उड़ जातीं तथा बंदर वृक्षों की सबसे ऊँची शाखाओं पर जा बैठते। घबराहट भरे उन क्षणों में शिशु पक्षी घबरा कर पंख फड़फड़ाते और अपनी माताओं के लौटने तक चीखते चिल्लाते रहते। ओमन नदी के तट पर इस तरह की प्रातः न जाने कितने लाख वर्षों से इसी प्रकार होती आयी थी और प्रकृति का यह व्यापार भी न जाने कब से इसी प्रकार चला आता था।

    आज की सुबह भी अपने नियमित क्रम के अनुसार ही हुई थी किंतु जैसे ही सूर्यदेव प्राची से निकल कर आग्नेय दिशा में स्थित हुए, ठीक उसी समय ओमन के तट पर बसे दिलम बोल्डक शहर के दुर्ग की दीवारें एक गगनभेदी चीख से थर्रा गयीं। जब यह चीख ओमन नदी के तटों पर पहुँची तो तितलियाँ घबराकर फूलों का आश्रय छोड़ भाग खड़ी हुईं। पेड़ों से पक्षियों की कतारें भयातुर होकर चीत्कार करती हुई आकाश में बहुत ऊँचाई तक उड़ गयीं। वानर समुदाय अपनी शैतानियाँ छोड़कर पेड़ों की सबसे ऊँची शाखाओं पर जा बैठा। ओमन के जल में अठखेलियां करने वाली मछलियाँ तक घबरा कर नदी के तल में जा छिपीं। जाने यह किस दुर्दांत पशु की चीख थी! ऐसी चीख न तो ओमन के तटों पर और न दिलम बोल्डक दुर्ग के भीतर इससे पहले कभी सुनाई दी थी।

    भयानक चीख के थोड़ी ही देर बाद दिलम बोल्डक दुर्ग का द्वार खुला और कुछ दासियाँ चीखती हुई बाहर निकलीं। वे सब चिल्लाती जा रही थीं कि बेगम की कोख से शैतान का जन्म हुआ है। थोड़ी ही देर में दुर्ग के मुख्य द्वार पर शहरवासियों की भीड़ जमा हो गयी। भीड़ जानना चाहती थी कि आखिर माजरा क्या है? अपने प्रश्न के जवाब में जो कुछ भी उन्होंने सुना, उससे उनकी रूह कांप गयी। क्या वाकई बेगम के पेट से किसी शैतान का जन्म हुआ था?

    जो कुछ उन्हें बताया गया था, उसके अनुसार तो ऐसा ही हुआ था। बेगम के पेट से जन्म लेने वाले बालक ने अपनी आंखें खोलने से पहले भयंकर चीत्कार किया था जिससे दुर्ग की मोटी दीवारें तक थर्रा उठी थीं। इतना ही नहीं जब दासियों ने उस बालक की बंद मुट्ठियों को खोला तो वे भय के मार कांप उठीं। बालक की चौड़ी हथेलियों में घने बाल थे और उनमें खून तथा मांस के लोथड़े भरे हुए थे। दिलम बोल्डक के तुर्क बादशाह ने इस अजीब शैतानी बालक का नाम रखा- चंगेजखाँ। तुर्कों की यह शाखा तुर्क की छठी पीढ़ी में पैदा होने वाले मुगलखाँ नामके अमीर से चली थी जिसके नाम पर तुर्कों की यह शाखा 'मुगल' कहलाती थी।

    चूंकि ये लोग मंगोलिया से चलकर दिलम बोल्डक आये थे इस कारण उन्हें 'मंगोल' भी कहा जाता था। उस समय तक तुर्कों की अधिकांश शाखाओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था किंतु यह शाखा इस्लाम की कट्टर शत्रु बनी हुई थी। तुर्कों की सारी शाखाओं में कुल मिलाकर जितनी खूनी ताकत थी, उस ताकत का आधे से अधिक हिस्सा कुदरत ने इस अकेली मुगल शाखा के नाम लिख दिया था। इस कारण मंगोलों में एक से बढ़कर एक अत्याचारी पैदा हुआ। चंगेजखाँ उसी की चरम परिणति थी। चंगेजखाँ कहने को तो इंसानी बालक ही था किंतु वास्तव में वह खूनी ताकत का एक अजीब करिश्मा था। वह अपनी भाग्य-रेखाओं पर खून और मांस रखकर पैदा हुआ था इसलिये वह जीवन भर एक खूनी दरिंदा बना रहा।

    चंगेजखाँ पहला मुगल था जिसने मंगोलों को संगठित करके एक विशाल सेना खड़ी की और उसके बल पर लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा। उसने नदियों में इतना रक्त बहाया कि ओमन ही नहीं, उसके मार्ग में आने वाली समस्त नदियों में बहने वाले जल का रंग लाल हो गया था। पूरा मध्य एशिया उसके नाम से थर्राता था। उसके क्रूर कारनामे दूर-दूर तक फैल गये। वह जहाँ भी जाता था मौत का नंगा नाच दिखाता था। उसकी सेना जिस जंगल से गुजरती थी वह जंगल पशु-पक्षियों से खाली हो जाता था। उसने भारत, रूस और चीन के कई प्रदेशों में अपना आतंक जमाया। अपने बाप-दादों की भांति वह भी इस्लाम का कट्टर शत्रु था। जब चंगेजखाँ अफगानिस्तान की बामियान घाटी में स्थित काफिरिस्तान पहुँचा तो वह यहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य और मानव सौंदर्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गया।

    अफगानिस्तान में इस्लाम के आगमन से पहले काफिरिस्तान को नूरिस्तान के नाम से पुकरा जाता था। कहा जाता है कि जब सिकन्दर भारत में घायल होकर यूनान को भाग रहा था तो उसने बामियान क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाये रखने के लिये अपनी सेना का एक हिस्सा यहीं छोड़ दिया था। हजारों यूनानी सैनिक अपने परिवारों सहित यहीं बस गये। नीली आँखों और लाल बालों के कारण यूनानी लोग अफगानिस्तान के मूल लोगों से काफी अलग दिखाई देते थे। उनके देह सौंदर्य के कारण ही अफगानिस्तान के लोग उनके क्षेत्र को नूरिस्तान कहते थे। जब अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रसार हुआ तो नूरिस्तान के लोगों ने इस्लाम को मानने से मना कर दिया। इस्लाम के अनुयायी नूरिस्तान के बहादुर लोगों को परास्त नहीं कर सके, न ही अन्य किसी तरह से उन्हें इस्लाम कबूल करवा सके। हार-थक कर इस्लाम के अनुयायियों ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर काफिरिस्तान कर दिया।

    काफिरिस्तान के सुंदर इंसानों को मारने में चंगेजखाँ को बड़ा आनंद आया। नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की भयाक्रांत चीखें उसके तन-मन में आनंद भर देतीं। वह उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारने लगा। बहादुर होने पर भी यूनानी लोग चंगेजखाँ के सैनिकों की क्रूरता का सामना नहीं कर सके। हजारों स्त्री-पुरुष और बच्चे प्राण बचाने के लिये पहाड़ों में भाग गये। चंगेजखाँ ने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतारा। काफिरिस्तान से निबट कर चंगेजखाँ ने बामियान घाटी में ही बसे सुर्ख शहर को जा घेरा। सुर्ख शहर की प्राकृतिक बनावट तथा दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि उस पर कोई भी सेना बाहर से आक्रमण करके अधिकार नहीं कर सकती थी चाहे शत्रु सेना सौ वर्षों तक ही शहर को घेर कर क्यों न बैठी रहे। सुर्ख के राजा को नित्य नये विवाह करने का शौक था इसलिये वह चंगेजखाँ जैसे दुर्दांत शत्रु की परवाह किये बिना अपना विवाह करने के लिये कहीं और चला गया तथा शहर को राजकुमारी के भरोसे छोड़ गया।

    सुर्ख शहर की राजकुमारी अद्वितीय सुंदरी थी तथा विवाह के योग्य भी। उसे अपने पिता का इस तरह चले जाना अच्छा नहीं लगा। उसने चंगेजखाँ को गुप्त संदेश भिजवाया कि यदि चंगेजखाँ उसे अपनी रानी बना ले तो वह शहर पर उसका अधिकार करवा देगी। चंगेजखाँ ने राजकुमारी की शर्त स्वीकार कर ली। राजकुमारी ने चंगेजखाँ के आदमियों को वह पहाड़ी बता दी जहाँ से सुर्ख शहर को पानी मिलता था। चंगेजखाँ ने पानी का प्रवाह रोक दिया। पानी न मिलने के कारण सुर्ख शहर में हाहाकार मच गया और सुर्ख की सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा। सुर्ख पर अधिकार करते ही चंगेजखाँ ने राजकुमारी के महल को छोड़कर शेष शहर में कत्ले आम का आदेश दिया। चंगेजखाँ की वहशी सेना ने कई दिन तक शहर में कहर बरपाया किंतु राजकुमारी का महल लूट, हत्या और बलात्कार से बचा रहा।

    एक दिन शाम के समय राजकुमारी को चंगेजखाँ का संदेश मिला- 'कल सवेरे फौज कूच करेगी। आप बाहर आ जाइये।' राजकुमारी सफर के लिये तैयार होकर बाहर आ गयी। फौज पंक्तिबद्ध होकर प्रस्थान के लिये तैयार खड़ी थी। चंगेजखाँ राजकुमारी के स्वागत में उठ कर खड़ा हुआ। राजकुमारी दोनों बाहें फैलाकर आगे बढ़ी किंतु उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा जब उसने चंगेजखाँ के आदेश को सुना। वह अपने सैनिकों से कह रहा था- 'प्रत्येक सिपाही इस दुष्टा के सिर पर एक पत्थर मारे। जो अपने बाप की नहीं हुई वह मेरी क्या होगी?' चंगेजखाँ के आदेश का पालन हुआ। राजकुमारी चीख मार कर नीचे गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद उसकी लोथ ही वहाँ रह गयी। राजकुमारी के महल की ईंट से ईंट बजा दी गयी। चंगेजखाँ की सेना लूट-खसोट और कत्ले-आम के नये अध्याय लिखने के लिये आगे चल पड़ी। पीछे छोड़ गयी सुर्ख शहर के खण्डहर जो आज भी चंगेजखाँ के क्रूर कारनामों और राजकुमारी के पितृद्रोह की कहानी सुनाने के लिये मौजूद हैं।

    जब चंगेजखाँ अपनी सेना के साथ बामियान की घाटी में एक पहाड़ी क्षेत्र से होकर निकला तो उसने एक अद्भुत दृश्य देखा उसने देखा कि एक पहाड़ी से सट कर दो विशाल बुत खड़े हैं जो बहुत दूर से दिखाई पड़ते हैं। चंगेजखाँ ने अपना घोड़ा उसी और मोड़ लिया। निकट पहुँचने पर उसने पाया कि इन विशाल बुतों के पास छोटे-छोटे हजारों बुत बिखरे पड़े हैं। सारे के सारे बुत बुरी तरह से टूटे हुए हैं। यहाँ तक कि दोनों विशाल बुतों की आँखें और नाक भी टूटी हुई हैं। इतना ही नहीं उसने उन पहाड़ियों में बनी हुई हजारों गुफाओं को भी देखा जो पत्थरों को काटकर बनाई गयी थीं। इन गुफाओं की दीवारों पर भी हजारों बुत खड़े थे किंत सब के सब टूटे हुए थे। इस अद्भुत दृश्य को देखकर उसकी आँखें हैरानी से फैल गयीं। कहाँ से आये इतने सारे बुत! किसने बनायीं हजारों गुफायें!

    दरअसल चंगेजखाँ उन पहाड़ियों में पहुँच गया था जहाँ उसके पहुँचने से लगभग सवा हजार साल पहले बौद्ध भिक्षुओं ने हजारों पहाड़ियों को काटकर विशाल बौद्ध मठों का निर्माण किया था तथा एक पहाड़ी के बाहरी हिस्से को काटकर भगवान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियाँ बनाईं थीं। इन मूर्तियों के ऊपर विशाल मेहराबों का निर्माण किया गया था। मेहराबों में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र से सम्बन्धित कई रंगीन चित्र भी बनाये थे। भिक्षुओं ने आसपास की पहाड़ियों को काटकर हजारों गुफाओं का निर्माण भी किया था तथा उनमें सुंदर मूर्तियों का उत्कीर्णन किया था। जब चंगेजखाँ ने इन मूर्तियों और गुफाओं को देखा तो उसके आश्चर्य का पार न रहा। वह बुतों की विशालता से भी अधिक हैरान इस बात पर था कि दोनों बुत ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी तरह सलामत थे किंतु उनकी आँखों और नाक को किसी ने तोड़ दिया था। दोनों विशाल बुतों के आसपास हजारों की संख्या में अन्य बुतों को भी भग्न अवस्था में देखकर वह आश्चर्य चकित रह गया था। आखिर किसने बनाया होगा इन्हें? और फिर क्यों तोड़ डाला होगा? कौन लोग रहे होंगे वे!

    चंगेजखाँ ने स्थानीय लोगों को पकड़ कर मंगवाया और उनसे इन बुतों को बनाने वालों और उनको तोड़ने वालों के बारे में पूछा। चंगेजखाँ को बताया गया कि इन्हें सवा हजार साल पहले भारत से आये बुत-परस्त बौद्ध-दरवेशों ने बनाया था किंतु जब अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रसार हुआ तो बुत-शिकनों ने इन बुतों को तोड़-तोड़ कर आग में झौंक दिया। हजारों अलंकृत गुफाओं को भी उसी समय तहस-नहस किया गया तथा पहाड़ियों में उकेरा गया वह सारा शिल्प नष्ट कर दिया गया जो बौद्ध-दरवेशों की छैनियों से निकला था। इन दो बड़े बुतों को पूरी तरह नष्ट न करके केवल इनकी आँखें और नाक तोड़ दीं ताकि इस बात की यादगार बनी रहे कि कभी यहाँ इतने विशाल बुत थे।

    स्थानीय लोगों की बात सुनकर क्रोध से चीख पड़ा वह! उसे उन लोगों पर तो क्रोध था ही जो संसार में सुंदर बुत बनाने का काम करते हैं किंतु उससे भी अधिक क्रोध उसे उन लोगों पर था जिन्होंने इन बुतों को चंगेजखाँ के वहाँ पहुँचने से पहले ही तोड़ डाला था। आखिर यह कार्य उसे अपने हाथों से करना चाहिये था। कितना आनंद आता इन बुतों को तोड़ने में! वह तो इन बुतों को भी इस क्रूरता के साथ तोड़ता कि ये बुत भी नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की तरह चीखने लगते! क्यों किया गया उसे इस आनंद से वंचित! उसने मन ही मन संकल्प किया कि वह इन बुतों को बनाने वालों और तोड़ने वालों, दोनों को दण्डित करेगा। वे न सही उनकी औलादें ही सही।


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 5

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 5

    स्तब्ध परमात्मा!

    चंगेजखाँ पहला मंगोल था जिसने भारत पर आक्रमण किया। उन दिनों दिल्ली पर मुहम्मद गौरी के गुलाम के गुलाम, अर्थात् कुतुबुद्दीन के गुलाम इल्तुतमिश का शासन था। जब 1221 ईस्वी में चंगेजखाँ पंजाब तक चढ़ आया तो इल्तुतमिश ने चंगेजखाँ से कहलवाया कि वह जो काम करने भारत आया है वह काम तो मैं पहले से ही कर रहा हूँ। इसलिये चंगेजखाँ किसी और देश में जाकर तबाही मचाये, हिन्दुस्थान के लिये तो मैं अकेला ही काफी हूँ। साथ ही उसने चंगेजखाँ को बहुत सारी घूस भिजवाई ताकि वह हिन्दुस्तान छोड़ कर चला जाये। कहना अनिवार्य न होगा कि इस घूस में सोना-चांदी भर ही नहीं था अपितु हजारों गुलाम और हाथी- घोड़ों के साथ हजारों निरीह लोगों के शव भी थे। यह विचित्र घूस देखकर चंगेजखाँ प्रसन्न हुआ और खुशी खुशी हिन्दुस्तान से बाहर हो गया।

    मंगोल इस्लाम के शत्रु थे और भारत पर चूंकि उन दिनों इस्लामी शासकों का अधिकार था इसलिये उन्हें दण्ड देने के लिये चंगेजखाँ के बाद भी मंगोलों ने भारत पर बड़े-बड़े आक्रमण किये। हर आक्रमण में लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा, उन्हें गुलाम बनाया, स्त्रियों और बच्चों को पशुओं की तरह बांध कर अपने साथ मध्य एशिया ले गये। अपने आक्रमणों में उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं किया क्योंकि उनके लिये हिन्दू और मुसलमान दोनों ही बराबर के शत्रु थे। चंगेजखाँ के बीस साल बाद मंगोल नेता तायर लाहौर तक चढ़ आया। लाहौर का शासक राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। तायर ने हजारों नर-नारियों को मौत के घाट उतार कर लाहौर को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

    1285 ईस्वी में मंगोलों ने तिमूर खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। उसने दिल्ली के सुल्तान बलबन के पुत्र मुहम्मद को मार दिया। 1292 ईस्वी में मंगोलों ने हुलागू के पोते उलूग के नेतृत्व में भारत को रौंदा। दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी बेटी का विवाह मंगोल नेता उलूग के साथ कर दिया और उन्हें भारत में ही बस जाने की अनुमति दे दी। मंगोल दिल्ली के निकट मंगोलपुरी बसाकर रहने लगे। आज भी दिल्ली में स्थित इस इलाके को मुगलपुरा कहा जाता है। 1299 ईस्वी में कुतलग ख्वाजा के नेतृत्व में फिर से मंगोल दिल्ली पर चढ़ आये।

    जब 1303 ईस्वी में तार्गी के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया तो भारतीय इतिहास का सबसे शक्तिशाली सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी राजधानी दिल्ली से भागकर सिरी के दुर्ग में जा छिपा। 1328 ईस्वी में जब मंगोल फिर से तमोशिरीन के नेतृत्व में बदायूँ तक आ पहुँचे तो सुल्तान मुदम्मद बिन तुगलक ने उन्हें बड़ी भारी घूस देकर अपना पीछा छुड़ाया। अपने प्रत्येक आक्रमण में मंगोलों ने भारत को बुरी तरह से रौंदा। जो भी उनके सामने आया उसे लूटा-खसोटा और उसका सर्वस्व हरण करके मौत के घाट उतार दिया। गाँव के गाँव जला दिये। फसलें उजाड़ दीं, तालाब तोड़ दिये। कुओं में गायों का खून डाल दिया। पशु-पक्षियों को जीवित ही भून कर खा गये। स्त्रियों का सतीत्व हरण किया। हजारों स्त्री-पुरुष और बालकों को गुलाम बनाकर अपने साथ ले गये और उन्हें तरह-तरह की यातनायें दीं। उन दिनों उत्तरी भारत में ऐसा कोई दिन नहीं होता था जब किसी न किसी गाँव में इन मंगोलों का खूनी नाच नहीं होता था।

    शांतिप्रिय, सहिष्णु और निर्धन भारतवासी दिन प्रतिदिन और अधिक निर्धन, असहाय और लाचार होते जाते थे। इंसान की खूनी ताकत अपने ही जैसे दूसरे इंसानों का खून बहता हुआ देखकर पैशाचिक अट्टहास करती थी और परमात्मा अपने ही बनाये हुए पुतले की क्रूरता को देखकर स्तब्ध था।

    लंगड़ा दैत्य

    दीना ने भरी दुपहरी में अपने सिर से घास का गठ्ठर धम्म से नीचे फैंका और चीख कर बोला- 'माँऽऽऽऽऽऽ!' उसकी चीख पूरे आंगन में फैल गयी। आंगन के नीम पर बैठे पक्षी भयाक्रांत हो, फड़फड़ा कर उड़ गये। उनकी तीखी चीखों से आकाश भर गया। कौने में खड़ी कजरी (गाय) ने अचकचा कर लड़ामनी (पशुओं के चारा खाने की हौदी) में से मुँह बाहर निकाला और भयाकुल नेत्रों से दीना की ओर ताकने लगी।

    - 'क्या है बेटा? क्यों चीख रहा है?' दीना की माँ ने सहम कर पूछा। वह दीना की चीख सुनकर सिर की चुन्नी संभालती हुई दुकड़िया (इतना बड़ा कमरा जिसमें दो कड़ियों वाली छत लगी हो) में से निकल कर बाहर आ गयी थी। उसके पीछे-पीछे दीना की नवब्याहता लिछमी भी थी।

    - 'लगंड़ा दैत्य आ रहा है। हमें भाग चलना होगा अभी, इसी समय!'

    - 'कौन लंगड़ा दैत्य! किसकी बात कर रहा है तू? माँ ने पूछा। - 'क्या बात है? इतनी जोर से क्यों चीख रहा है? तू दुपहरी में ही क्यों लौट आया खेतों से?'

    दीना के पिता चौधरी संतराम पिछवाड़े में बंधी भैंसों की सानी (कटे हुए सूखे चारे में आटे अथवा ग्वार की चूरी का घोल मिलाना सानी कहलाता है) करना छोड़कर आंगन में आ गये। आजकल बरसात बहुत जोरों से हो रही है। इस कारण पशु चरने के लिये खेतों में नहीं जा पा रहे हैं। उन्हें लड़ामनी में ही पाठा नीरा जा रहा है। (हरा चारा खिलाया जा रहा है।) डंगरों की सेवा टहल के लिये ही चौधरी संतराम इस समय घर में हैं अन्यथा वे भी दीना की तरह खेत पर होते।

    - 'पिताजी! समरकंद से एक लाख घुड़सवारों की सेना लेकर एक लंगड़ा दैत्य भारत की ओर चल पड़ा है। वह सिंधु नदी पार कर चुका है और कुछ दिनों में पंजाब पहुँचने वाला है। वह जिस गाँव से गुजरता है, उस गाँव में किसी को जीवित नहीं छोड़ता।' दीना उत्तेजित था और बुरी तरह से हांफ रहा था। वह पूरे रास्ते दौड़ता हुआ आया था।

    - 'लंगड़ा दैत्य चाहता क्या है? वह ऐसा क्यों कर रहा है?' दीना की माँ ने पूछा।

    - 'यह तो मुझे नहीं पता, न ही यह सब बताने का वक्त उन लोगों के पास था।'

    - 'किन लोगों के पास? किनकी बात कर रहा है तू?' दीना की माँ ने फिर सवाल किया।

    - 'वे ही जो घोड़ों पर बैठे हुए भागे चले जा रहे थे।'

    - 'कौन लोग घोड़ों पर बैठ कर भागे जा रहे थे?'

    -' मैं नहीं जानता कौन लोग थे वो! जब हम खेतों पर काम कर रहे थे तो बीस-पच्चीस घुड़सवारों की एक टोली पश्चिम से घोड़े दौड़ाती हुई आई थी। वे लोग बुरी तरह से डरे हुए थे। उन्होंने ही हमें बताया कि वे लंगड़े दैत्य तैमूर के भय से जान बचाकर भाग रहे हैं।'

    - 'देखो बेटा, तनिक तसल्ली से बैठो और मुझे ढंग से सारी बात बताओ।' चौधरी संतराम बेटे की व्याकुलता देखकर चिंतित हो गये। - 'यह समय तसल्ली का नहीं है पिताजी। जितनी जल्दी हो सके गाँव छोड़कर भाग चलना होगा।'

    - 'लेकिन पुत्तर अपना गाँव छोड़कर हम जायेंगे कहाँ? हमारे खेतों और ढोर-डंगरों की देखभाल कौन करेगा?' दीना की माँ ने प्रतिवाद किया।

    - 'वह सब तो मैं नहीं जानता। लेकिन आप ही बताइये यदि लंगड़े दैत्य ने यहाँ पहुँच कर हम सब को मार दिया तब हमारे खेतों और ढोर-डंगरों की देखभाल कौन करेगा!'

    - 'लेकिन वह हमें क्यों मारेगा! हमने उसका क्या बिगाड़ा है? यदि वह हिन्दुस्थान का राज्य चाहता है तो दिल्ली के सुल्तान से लड़े। पंजाब के किसानों से उसका क्या बैर है?' दीना की माँ ने बिफर कर पूछा।

    - 'उसका बैर पंजाब के किसानों से नहीं है। उसका बैर तो हिन्दुस्थान के प्रत्येक आदमी से है। जो कोई भी उसके मार्ग में आयेगा उसे वह मार डालेगा। वह गाँव के गाँव जला रहा है। कुओं और तालाबों में गायें काटकर फैंक रहा है। खेतों में आग लगा रहा है। वह कहता है कि वह धरती से कुफ्र मिटाने आया है।'

    बेटे की बात सुनकर वृद्ध संतराम सिर पकड़ कर जमीन पर बैठ गये। उनके मुँह से केवल इतना ही निकला- 'हे राम!'

    - 'सत्यानाश जाये इन खूनी हत्यारों का। आदमी को भला ऐसे मारा जाता है क्या?' बेटे की बात सुनकर वृद्धा का चेहरा सफेद पड़ गया, मानो किसी ने पूरा खून निचोड़ लिया हो।

    - 'देर करना ठीक नहीं है, हमें निकल चलना चाहिये।' दीना ने घास का गठ्ठर उठाकर आंगन में बंधी गाय के सामने फैंक दिया। वह आने वाली विपत्ति से बेखबर घास की ओर ताकती हुई रस्सा तुड़ाने की चेष्टा कर रही थी।

    - 'लेकिन हम जायेंगे कहाँ?' दीना की नवविवाहिता पत्नी लिछमी ने चुन्नी की ओट में से मंद स्वर में प्रश्न किया।

    - 'कोई हम अकेले तो नहीं जायेंगे! जहाँ पूरा गाँव जायेगा, वहीं हम भी जायेंगे।'दीना ने लिछमी की ओर देखे बिना ही कहा।

    - 'तो फिर गाँव को इकट्ठा कर चौपाल पर। सब बैठ कर सलाह करेंगे।' बूढ़े संतराम ने बेटे को आज्ञा दी।

    दीना भरी दुपहरी में पूरे 'लक्खी दा जोड़' गाँव में घूम गया। कहते हैं कि किसी जमाने में लक्खी नाम के बणजारे ने यहाँ से होकर गुजरते समय अपने काफिले के लिये एक जोहड़ (तालाब) खुदवाया था जो बाद में लक्खी दा जोड़ (लक्खी बणजारे का तालाब) कहलाने लगा। बहुत बाद में जब यहाँ गाँव बसना आरंभ हुआ तब गाँव का नाम भी 'लक्खी दा जोड़' पड़ गया।

    दीना का संदेश पाकर बात की बात में लोग गाँव की चौपाल पर आ जुड़े। क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या आदमी और क्या औरतें, सब के सब भागते हुए चले आये। सब के आने पर चौपाल जुड़ी। चौधरी संतराम ने बिना किसी भूमिका के सब को आने वाली मुसीबत की संक्षिप्त जानकारी दी। हालांकि तब तक गाँव का बच्चा-बच्चा जान चुका था कि एक लंगड़ा दैत्य सिंधु नदी पार करके कत्ले-आम मचाता हुआ इसी ओर आ रहा है। वह जीवित ही आदमियों को आग में फैंक देता है। उसके सिपाही छोटे-छोटे बच्चों को भाले की नोक पर टांक लेते हैं। जो भी पशु-पक्षी दिखायी देता है उसे भून कर खा जाते हैं। वह लाखों गायों का वध कर चुका है .....।

    आये दिन गाँव वाले आक्रांताओं के आक्रमण की बातें सुनते थे किंतु इस बार लंगड़े दैत्य के कारनामे सुनकर उनकी छाती दहल गयी। माताओं ने सहम कर अपने दुध मुंहे बच्चों को छाती से चिपका लिया और नवौढ़ायें ऐसे मुर्झा गयीं जैसे पाला मारने पर कमलिनियाँ कुम्हला जाती हैं। बड़े-बूढ़ों ने कहा, सब लोगों को तत्काल ही गाँव छोड़ कर पूर्व की ओर प्रस्थान कर देना चाहिये और दूर इलाकों में जाकर शरण लेनी चाहिये ताकि खूनी दरिंदे से बचा जा सके। युवक बड़े-बूढ़ों की बात से सहमत नहीं हुए। उनका विचार था कि पलायन के पश्चात तिल-तिल कर मरने की अपेक्षा शत्रु का सामना करके सम्मुख मृत्यु का वरण अधिक श्रेष्ठ है।

    सब लोगों की बात सुनकर चौधरी संतराम ने फैसला सुनाया- 'जो लोग गाँव छोड़ कर जाना चाहते हैं वे जा सकते हैं और जो लोग गाँव में रहकर शत्रु का सामना करना चाहते हैं, वे गाँव में ही रह सकते हैं।'


  • Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 6

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 6

    - 'और चौधरी तुम! तुम क्या करोगे?' लाला कनछेदीलाल ने पूछा। वह चौधरी संतराम का बालसखा था।

    -'हाँ-हाँ चौधरी, तुम क्या करोगे?' बहुत से लोग एक साथ बोल पड़े। वे जानना चाहते थे कि आखिर चौधरी अपने लिये क्या निर्णय लेता है।

    - 'मैं......मैं क्या करूंगा! मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूंगा! जैसे दीना कहेगा वैसे ही करूंगा।'

    - 'बोल दीना क्या कहता है?' लोगों की दृष्टि दीना की ओर घूम गयी।

    - 'मेरा यह विचार है कि बापू आप लोगों के साथ सारे परिवार को लेकर चला जाये और मैं यहाँ रहकर गाँव के ढोर डंगरों को बचाने का प्रयास करूं।'

    - 'नहीं-नहीं! यह कैसे हो सकता है! मैं तो कहता हूँ कि दीना गाँव छोड़कर आप लोगों के साथ जाये और मैं गाँव में रहकर ढोर-डंगरों की देखभाल करूं।' बेटे का साहस देखकर बूढ़े संतराम की छाती गर्व से फूल गयी।

    - 'गाँव के चौधरी को अकेला छोड़कर हम अपनी जान बचाकर भाग जायें, यह अन्याय कैसे होगा!' गाँव के कुछ लोग चौधरी की बात का विरोध करने के लिये उठ खड़े हुए।

    - 'गाँव के ढोर-डंगरों को रब (परमात्मा) के हवाले किया जाये और सब के साथ जहाँ भी चलें एक साथ चलें। जान बची तो ढोर डंगर फिर मिल जायेंगे।' लाला कनछेदी लाल ने सुझाव दिया।

    - 'इन ढोर-डंगरों से हमारे जीवन की डोरी बंधी हुई है। जब ये हमारे सुख के साथी हैं तो दुःख में इन्हें त्याग कर चले जाना उचित नहीं है।' चौधरी संतराम ने इस विचार का विरोध किया।

    - 'यदि ऐसा ही है तो ढोर-डंगरों को साथ लेकर चला जाये।' भजनीराम ने सुझाव दिया।

    - 'नहीं! ढोर-डंगरों को साथ लेकर भागना संभव नहीं है। हत्यारे तो घोड़ों पर हैं और हम गाय-भैंसों को टोरते हुए ले जायेंगे!' संतराम ने प्रतिवाद किया।

    - 'तुम पंच लोग यहाँ बैठकर विचार ही करते रहना। तब तक लंगड़ा दैत्य आकर हम सबको खा जायेगा। फिर उसी से पूछ लेना कि हम क्या करें!' जग्गा ने तैश में आकर कहा।

    - 'क्यों जग्गा, तुझे क्या फिकर है? वह भी लंगड़ा है और तू भी। इस हिसाब से तो वह तेरा भाई हुआ।' एक नौजवान ने फिकरा कसा और सब के सब ठठा कर हँस पड़े। जग्गू का चेहरा क्रोध और अपमान से तमतमा गया।

    लोग असमंजस में थे। क्या किया जाये! सबकी अलग-अलग राय थी कोई एक विचार ठहरता ही नहीं था। - 'क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब यहाँ रहकर दुश्मन का मुकाबला करें?' लिछमी ने चुन्नी की ओट करके सहमते हुए कहा। यह उसका पहला मौका था जब वह बड़े-बूढ़ों के सामने बोल रही थी, वह भी खुले आम चौपाल पर लेकिन वह जानती थी कि कुछ मौके ऐसे होते हैं जब छोटे-बड़े के बीच कोई दीवार नहीं रह जाती। उसकी दृष्टि में यह मौका भी ऐसा ही था।

    लिछमी की बात सुनकर सबने उस ओर आँखें घुमायीं। औरतों की तरफ से पहली बार आवाज आयी थी। वे चौपाल पर नहीं आती थीं और चौपाल पर बोलने का साहस भी किसी में नहीं था लेकिन आज गाँव की सारी औरतें चौपाल पर मौजूद थीं केवल उन सेठानियों को छोड़कर जो सामान्यतः घरों से बाहर नहीं निकलती थीं।

    - 'यहाँ रहकर शत्रु का मुकाबला करने का मतलब जानती हो तुम!' चौधरी संतराम ने अपनी पतोहू को टोका।

    - 'ठीक ही तो कहती है यह। चूहों की तरह भागते हुए मरने से तो शेर की तरह मुकाबला करते हुए मरना ठीक है।' चौधराइन ने अपनी बहू का समर्थन किया।

    - 'जीवित ही आग में कूद पड़ना तो शेर हो जाने की निशानी नहीं होती!' चौधरी ने चौधराइन की ओर तमतमा कर देखा - 'लेकिन दुश्मन को देखकर दुम दबा कर भाग जाना तो चूहे होने की निशानी होती है!' ऐसा पहली बार हुआ था जब चौधराइन ने चौधरी को जवाब दिया था, वह भी सबके सामने।

    - 'मैं देख रहा हूँ कि अब यह चौपाल न रहकर घर की पंचायत हो गयी। तुम लोग अपने झगड़े में सबको मरवा दोगे। मैं तो कहता हूँ कि समय रहते भाग चलो, नहीं तो लंगड़ा दैत्य हम सबको आकर दबोच लेगा।' जग्गा चौपाल के लम्बे विचार विनिमय से तंग आ गया था। संभवतः उसे लंगड़े दैत्य का भय सबसे अधिक सता रहा था।

    - 'अरे जग्गा! तू एक काम कर। अपनी लाठी उठा और जहाँ तेरा सींग समाये वहीं भाग जा। क्योंकि तुझे भागने में वक्त भी ज्यादा लगेगा।' चौधरी ने आँखें तरेर कर कहा।

    - 'हाँ-हाँ जाता हूँ। जहाँ मेरा सींग समाये वहीं जाता हूँ लेकिन कहे देता हूँ कि यदि तुम भी पूंछ उठाकर नहीं भागे तो मेरा नाम भी जग्गा से बदलकर कुत्ता रख देना।' जग्गा अपनी लाठी का सहारा लेकर सचमुच उठ खड़ा हुआ और चौपाल से रवाना हो गया।

    - 'आगे नाथ न पीछे पगहा लेकिन चिंता तो देखो इनकी!' किसी नौजवान ने फिकरा कसा तो एक बार फिर चौपाल पर ठहाके गूंज उठे। क्षण भर को वे भूल गये कि किस भयावह परिस्थिति में वे यहाँ एकत्रित हुए हैं।

    - 'तो फिर क्या कहते हो तुम लोग! गाँव में ही मोरचा लगाना है कि गाँव छोड़कर जाना है?' जग्गा की तरफ से लोगों का ध्यान हटाने के लिये चौधरी संतराम फिर से मूल प्रश्न पर आये।

    - 'अजी करना क्या है, ऐसी की तैसी उस लंगड़े दैत्य की। जब लिछमी भाभी लड़ मरने को तैयार हैं तो हमने भी कोई चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं।' युवकों ने जोश में भर कर जवाब दिया।

    - 'लेकिन तुम्हारी लिछमी भाभी ने तो चूड़ियाँ पहन ही रखी हैं।' बूढ़े चौधरी ने हँस कर कहा।

    - 'रब इसकी चूड़ियाँ सलामत रखे। मैं वारी जावां। मेरी बहू केवल लिछमी नहीं दुर्गा भी है। देखना लंगड़े दैत्य को तो एक हुंकार में समाप्त कर देगी।' चौधराइन ने लिछमी को गले से लगा लिया।

    थोड़ी देर पहले की निराशा तिरोहित हो गयी। पूरे गाँव में नवीन जोश उछालें लेने लगा। लोग लाठी, बल्लम, मूसल और मुग्दर संभालने लगे। तय हुआ कि गाँव के चारों ओर बनी हुई मिट्टी की दीवार को ऊँचा किया जाये ताकि मोरचा बांधने में आसानी रहे। घर-घर से फावड़े, कुदाली और तसले निकल आये। बात की बात में खाई खुदने लगी। मिट्टी की दीवार ऊँची कर दी गयी। बीच-बीच में चौकियाँ बनाई गयीं जिन पर बड़ी मात्रा में पत्थर और तीर कमान जुटाये गये। स्त्री, पुरुष और बच्चे धनुष से निशाना साधने का अभ्यास करने लगे। जो स्त्रियाँ तीर कमान नहीं साध सकती थीं वे मूसल, मुग्दर और भाले घुमाने लगीं। एक माह में 'लक्खी दा जोड़' छोटे से दुर्ग में बदल गया।

    कुछ ही दिनों में उन्होंने घायल लोगों के एक समूह को पश्चिम की ओर से भाग कर आते देखा उनकी आँखों में दहशत भरी हुई थी और उनके कटे अंगों से खून टपक रहा था। बहुत से लोग बैलगाड़ियों में बैठे थे तो बहुत से ऐसे भी थे जो ऊंटों, बैलों और भैंसों पर चढ़े हुए थे। जब बदन पर अंग ही सलामत नहीं थे तब कपड़ों की बात करना तो व्यर्थ ही था। सामान्य दिनों में तो वे लोग संभवतः दो कदम भी नहीं चल पाते किंतु साक्षात् मौत से आँख मिला लेने के बाद वे इस दुरावस्था में भी दौड़ रहे थे। वे खून का ऐसा दरिया पार करके आये थे जिसका वर्णन करना उनके वश में नहीं था। वे मौत के अलंघ्य पर्वत को पार करके आये थे किंतु वे स्वयं नहीं जानते थे कि उन्होंने उस पर्वत को कैसे लांघा था! इन लोगों ने बड़ी खौफनाक बातें गाँववालों को बतायीं।

    उन लोगों ने बताया कि तैमूर लंगड़े की सेना आंधी की गति से आगे बढ़ रही है और मार्ग में आने वाली हर चीज को तोड़-फोड़ और जला रही है। उसके लिये इंसानों और पशुओं में कोई अंतर नहीं है। 'लक्खी दा जोड़' वालों ने उन घायलों के अंगों पर दवाई लगाई, खाना खिलाया, पानी पिलाया और उनसे अनुरोध किया कि वे लोग इसी गाँव में रुक जायें किंतु लंगड़े दैत्य का खौफ उन्हें कहीं भी रुकने की अनुमति नहीं दे रहा था। भीगी आँखों से 'लक्खी दा जोड़' वालों ने उन्हें विदा किया।

    अगले ही दिन घायल लोगों का एक और समूह गाँव से होकर गुजरा। फिर तो पीड़ा से कराहते और चीखते हुए लोगों के काफिले लगातार दिखाई देने लगे। गाँव वाले इन काफिलों को देखकर दहल उठे। हर शाम को वे चौपाल पर जुड़ते और आगे की योजना पर विचार करते। कई लोगों का उत्साह भंग हो गया, वे अपने परिवारों और ढोर-डंगरों के साथ इन काफिलों के साथ चल दिये। चौधरी संतराम और उनका परिवार गाँव नहीं छोड़ने के निर्णय पर अडिग था। चौधरी के परिवार के साथ गाँव के सैंकड़ों और भी परिवार थे जो जान बचाकर भाग जाने की अपेक्षा लंगड़े दैत्य की सेना से दो-दो हाथ करके मृत्यु का वरण करना अधिक श्रेयस्कर समझते थे, सो वे गाँव में बने रहे।

    अंततः वह दिन भी आ पहुँचा जब तैमूर की सेना 'लक्खी दा जोड़' गाँव की सीमा पर आ धमकी। उस दिन सूर्योदय के साथ ही पश्चिम दिशा में बहुत सारी धूल उड़ती हुई दिखायी दी। 'लक्खी दा जोड़' गाँव के लोगों ने सोचा कि कोई बड़ा काफिला तैमूर से बच कर भागता हुआ आ रहा है किंतु उनका अनुमान गलत साबित हुआ। थोड़ी ही देर में हजारों घोड़ों ने 'लक्खी दा जोड़' को घेर लिया। गाँव वाले तीर कमान लेकर मिट्टी की दीवार पर चढ़ गये और दीवार पर बनी ओट में से तीर, पत्थर और लकड़ियाँ फैंकने लगे। मध्य एशिया से उठे जिस विशाल और शक्तिशाली अंधड़ के सामने ईरान, तूरान और अफगानिस्तान तिनके के समान ढह गये, जिसका कहर ख्वारिज्म, मैसोपोटामिया, रूम और रूस पर चक्रवाती तूफान बन कर टूटा था, उस प्रबल तैमूर लंग की सेना के सामने 'लक्खी दा जोड़' क्या था?

    संभवतः इतना भी नहीं जितना कि हाथी के मुकाबले में चींटा हुआ करती है। मंगोल सैनिकों की पहली तीर वर्षा में ही 'लक्खी दा जोड़' गाँव के वीर दीवार से नीचे आ गिरे। देखते ही देखते कच्ची दीवार ढह गयी और मंगोल सैनिकों के घोड़े गाँव में घुस गये। 'लक्खी दा जोड़' वालों ने तीर कमान छोड़कर तलवारें खींचीं। जब मरना ही है तो भागते हुए क्यों? शत्रु को मारते हुए क्यों नहीं? 'लक्खी दा जोड़' वालों का दुस्साहस देखकर तैमूर लंग कुपित हुआ। इन तुच्छ कीटों की यह मजाल कि तैमूर लंग की प्रबल आंधी का रास्ता रोकने का साहस करें! आखिर क्या ताकत है 'लक्खी दा जोड़' के इन मक्खी-मच्छरों में? क्यों नहीं वे तैमूरलंग के भय से चीखते-चिल्लाते और अपना सिर पीटते हुए गाँव खाली करके भाग जाते! लंगड़ा दैत्य स्वयं भाला हाथ में लेकर अपने सिपाहियों के साथ दुस्साहसी लोगों का शिकार करने के लिये निकल पड़ा। उसके लिये यह युद्ध न था, शिकार भर था। बात की बात में उसने लाशों के ढेर लगा दिये।

    'लक्खी दा जोड़' के लोग जानते थे कि यदि हमें अंग-भंग करके छोड़ दिया गया तो हम तड़प-तड़प कर मरेंगे। इसलिये हम प्राण-पण से मैदान में टिके रहें ताकि जब तक हम शत्रु को मार सकें मारें और फिर अंत में स्वयं भी जीवित न बचकर मृत्यु का वरण करें। चौधरी संतराम और उनका पूरा परिवार तलवार हाथ में लेकर लड़ रहा था। बड़ी विचित्र और बेमेल लड़ाई थी यह। एक ओर चौधरी संतराम और उनके साथी पैदल थे तो दूसरी ओर मंगोल सिपाही घोड़ों पर! एक ओर चौधरी संतराम के अकुशल योद्धा थे तो दूसरी ओर कई लड़ाइयों में अपनी तलवार का कहर ढा चुके क्रूर मंगोल सिपाही।

    'लक्खी दा जोड़' वाले मरने के लिये लड़ रहे थे तो मंगोल सिपाही मारने के लिये। एक मंगोल सिपाही चौधरी संतराम की बहू लिछमी की तरफ दौड़ा। वह लिछमी को जीवित ही पकड़ना चाहता था। लिछमी का ध्यान दूसरे सिपाही की ओर था। अचानक ही लाला कनछेदीलाल की दृष्टि उस ओर पड़ी तो लाला ने मंगोल सिपाही के इरादे को भांप लिया। लाला ने जोर से चिल्लाकर लिछमी को चेताया और स्वयं भी तलवार लेकर उस ओर दौड़ा। तब तक लिछमी पहले वाले सिपाही से निबट चुकी थी। वह पीछे पलटकर सिंहनी की तरह उछली और तलवार का ऐसा भरपूर वार किया कि मंगोल सिपाही की गर्दन एक ओर लटक गयी। लिछमी को ऐसा करारा वार करते देखकर 'लक्खी दा जोड़' वालों में नया जोश भर गया। क्षण भर बाद ही लिछमी और लाला कनछेदी लाल के शव भूमि पर पड़े थे।

    'लक्खी दा जोड़' वालों के लिये मृत्यु पहले से ही कुछ मायने नहीं रखती थी किंतु अब लिछमी और लाला कनछेदी लाल के बलिदान को देखकर तो वे जैसे पागल हो उठे। तलवार उनके हाथ में ऐसे नाचने लगी मानो वे सब किसान, पशुपालक अथवा व्यापारी न होकर मृत्यु के चिरदूत हों। किसानों और पशुपालकों के घरों की औरतों ने इस अंदाज में तलवार चलाना आरंभ किया जैसे वे नित्य ही खेतों में धारदार हँसुए से घास अथवा फसल काटती हैं। और तो और लाला कनछेदी लाल के घर की जिन श्रेष्ठि ललनाओं ने कभी पानी के कलश तक उठाने का श्रम नहीं किया था और जिनके हाथों में चूड़ों के भी निशान अंकित हो जाते थे, उन ललित कोमलांगी श्रेष्ठि ललनाओं ने भी तलवार के वो हाथ दिखाये कि मंगोलों ने दांतों तले अंगुली दबा ली।

    चंगेजखाँ को भी सोचना पड़ा कि यह शिकार नहीं था, युद्ध था। थोड़ी ही देर में शवों के ढेर लग गये। मंगोल सैनिकों ने हाथ में तलवार लेकर आई कितनी ही स्त्रियों को पकड़ कर उनके स्तन काट दिये और उनके कपड़े फाड़ कर उन्हें निर्वस्त्र कर दिया किंतु उन वीरांगनाओं ने अपने आपको मंगोलों के हवाले नहीं किया। वे मृत्यु आने तक रण में जूझती रहीं। वे शरीर और प्राण गंवाने को तैयार थीं किंतु अपना सतीत्व नहीं। अंतिम सांस तक उनका यही प्रयास रहा कि किसी तरह एक भी मंगोल को मार सकें और जीवित ही मंगोलों की पकड़ में न आयें। कहा नहीं जा सकता कि चौधरी संतराम और दीना किन परिस्थितियों में और कब बलिदान हुए किंतु इतना निश्चित था कि सूर्यदेव के आकाश मध्य में पहुँचने से पूर्व ही 'लक्खी दा जोड़' का प्रत्येक स्त्री-पुरुष और बच्चा मौत के घाट उतर गया।

    इतने पर भी मंगोल सैनिकों की तलवार रुकी नहीं। आदमियों से निबट कर वे पशुओं की ओर बढ़े। युद्ध से थककर उन्हें भूख लग आयी थी। देखते ही देखते उन्होंने घरों में आग लगा दी और जीवित पशुओं को उस आग में झौंकने लगे। थोड़ी ही देर में मनुष्यों की चीखों के स्थान पर पशुओं की डकराहटों से गाँव की गलियाँ और चौबारे भर गये। लंगड़े दैत्य की सेना ने पेट भर कर पशु-मांस खाया और सुस्ताने के लिये जहाँ-तहाँ पसर गये। आगे जाने की उन्हें कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि उन्हें तो जीवन भर यही काम करना था।

  • - 'और चौधरी तु"/> - 'और चौधरी तु"> - 'और चौधरी तु">
    Share On Social Media:
  • चित्रकूट का चातक - 7

     07.06.2017
    चित्रकूट का चातक - 7

    मृतकों के नगर

    यह तो नहीं कहा जा सकता कि इतिहास की वह कौनसी तिथि थी जब मंगोलों ने इस्लाम स्वीकार किया किंतु इस शाखा में उत्पन्न हुआ तैमूर लंगड़ा इस्लाम का अनुयायी था। उसके बाप-दादे मध्य एशिया में छोटे-मोटे जागीरदार हुआ करते थे जो अमीर कहलाते थे। तैमूर लंगड़ा अपने खानदान में पहला बादशाह हुआ किंतु वह बादशाह न कहलाकर अपने बाप-दादों की तरह मिर्जा ही कहलाता था जिसका अर्थ होता है अमीर का बेटा।

    उसका वास्तविक नाम तैमूर था किंतु एक बार युद्ध में घायल हो जाने से वह कुछ लंगड़ाकर चलता था इसलिये हिन्दुस्थान में वह तैमूर लंगड़े के नाम से जाना जाता था। उसका जन्म समरकन्द से पचास मील दक्षिण में मावरा उन्नहर के कैच नामक स्थान पर हुआ था। वह स्वभाव से झगड़ालू और नीच किस्म का इंसान था। अपने क्रूर कारनामों के कारण यह लंगड़ा दैत्य इतिहास में खूनी पृष्ठ लिखने में अपना सानी नहीं रखता। तेतीस वर्ष की आयु में वह समरकंद का शासक हुआ। शीघ्र ही उसने फारस, ख्वारिज्म, मैसोपोटामिया और रूस के कुछ इलाकों पर अधिकार कर लिया।

    जहाँ तैमूर के पूर्वज भारत पर इसलिये चढ़ाई करते रहे क्योंकि भारत पर इस्लामी शासकों का शासन था और तैमूर के पूर्वज इस्लाम को नष्ट करना चाहते थे, वहीं तैमूर ने भारत पर इसलिये आक्रमण करने का निश्चय किया ताकि वह भारत से हिन्दुओं का सफाया करके तथा इस्लाम की वृद्धि करके कुछ पुण्य अर्जित कर सके। 24 सितम्बर 1398 को तैमूर लंगड़े ने सिन्ध नदी को पार करके भारत में प्रवेश किया। उसकी सेना में बरानवे हजार घुड़सवार थे। भारत में उसने मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार किया। उसने पाकपटन, दिपालपुर, भटनेर, सिरसा और कैथल होते हुए दिल्ली का मार्ग पकड़ा। नगरों में आग लगाता हुआ, फसलें जलाता हुआ, मनुष्यों की हत्यायें करता हुआ और उन्हें पशुओं के समान बंदी बनाता हुआ वह निर्विरोध आगे बढ़ता रहा।

    पंजाब में रहने वाले एक लाख हिन्दुओं को बन्दी बनाकर वह दिल्ली पहुँचा और वहाँ उनका सामूहिक वध कर दिया। इसके बाद उसने दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली में उन दिनों तुगलक वंश के उत्तराधिकारी सत्ता प्राप्ति के लिये नंगे नाच रहे थे। उन्हें प्रजापालन और प्रजा की रक्षा जैसे कामों से कोई लेना-देना नहीं था। जिस समय तैमूर लंगड़ा अपने एक लाख घुड़सवार लेकर दिल्ली के दरवाजे पर पहुँचा, उस समय दिल्ली निकम्मे सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के शासन में थी। उस निकम्मे सुल्तान ने अपने प्राणों की रक्षा के आश्वासन के बदले में दिल्ली के दरवाजे तैमूर के लिये खोल दिये।

    तीन दिन तक तैमूर लंगड़े ने दिल्ली में कत्ले-आम करवाया। लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार किया गया। लाखों हिन्दुओं के सिर काटकर उनके ऊंचे ढेर लगा दिये गये और उनके धड़ हिँसक पशु-पक्षियों के लिये छोड़ दिये गये। दिल्ली मृतकों का शहर हो गया। कत्ले आम पूरा होने के बाद तैमूर ने कहा मैं ऐसा नहीं करना चाहता था किंतु अल्लाह का ऐसा ही आदेश था इसलिये यह सब अल्लाह की मर्जी से हुआ है। अल्लाह को धन्यवाद देने के लिये वह हरिद्वार पहुँचा।

    हरिद्वार में भी उसने दिल्ली वाला कारनामा दोहराया तथा नगर को हिन्दुओं से रहित करके गंगाजी के प्रत्येक घाट पर गौ वध करवाया। इसके बाद उसने जम्मू पहुंच कर वहाँ के हिन्दू राजा से जबरन इस्लाम कबूल करवाया। 19 मार्च 1399 को उसने पुनः अपने देश जाने के लिये सिन्धु नदी को पार किया। तब तक वह कई लाख हिन्दुओं का वध कर चुका था। उसने कितनी गायों की हत्यायें कीं तथा कितने मंदिर जला कर राख कर दिये, उनकी गिनती करने के लिये कोई जीवित नहीं बचा। उसने अपने मार्ग में पड़ने वाले समस्त नगरों और गाँवों को उजाड़ दिया। लाखों पुरुषों, स्त्रियों तथा बच्चों की हत्या कर दी।

    लंगड़े दैत्य ने कत्ल किये गये मनुष्यों की खोपड़ियों से जगह-जगह पर पिरामिड सजाये और उन पर खड़े होकर पैशाचिक अट्टहास किये। निर्दोष इंसानों का खून बहाकर जश्न मनाये। उसने केवल उन्हीं को जीवित छोड़ा जो मुसलमान बन गये लेकिन जान बचाने के लिये मुसलमान बन जाने वालों का मौत ने पीछा तब भी नहीं छोड़ा। लाखों शवों के सड़ने से सम्पूर्ण उत्तरी भारत में प्लेग और अकाल फैल गये। बचे खुचे आदमी यहाँ तक कि पशु-पक्षी तक उनकी चपेट में आकर काल कलवित हो गये। कई महीनों तक दिल्ली में किसी पक्षी तक ने पर नहीं मारा फिर बेबस आदमी का तो कहना ही क्या था।

    खूनी ताकतों का संगम

    तैमूर लंगड़े का चौथा वंशज मिर्जा उमर शेख अपने बाप-दादों की तरह परम असंतोषी जीव था। वह फरगना का शासक था किंतु वह अपने छोटे राज्य और अल्प साधनों से संतुष्ट नहीं था। अपने बड़े भाई अहमद मिर्जा से उसकी जानी दुश्मनी थी। अहमद मिर्जा समरकंद और बुखारा का शासक था। उमरशेख का विवाह कुतलुगनिगार खानम नामक औरत से हुआ था जो कुख्यात मंगोल आक्रांता चंगेजखान की तेरहवीं पीढ़ी में थी।

    उमरशेख और कुतलुगनिगार खानम के कुल आठ संतानें हुई जिनमें बाबर सबसे बड़ा था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में मध्य ऐशिया के दो खूंखार आक्रांताओं- चंगेजखाँ और तैमूर लंगड़े के खून का संगम हो गया।

    उमरशेख बहुत रंगीन तबियत का आदमी था और सदा मौज मस्ती में डूबा रहता था। एक दिन जब उमर शेख कबूतर उड़ा रहा था तो उसके ऊपर मकान आ गिरा और उसी समय उसकी मृत्यु हो गयी। बाप की आकस्मिक मौत के कारण मात्र ग्यारह साल चार महीने का बाबर फरगना का शासन हुआ। वह अकाल प्रौढ़ बालक था और अपने बाप-दादाओं से भी बढ़कर महत्वाकांक्षी और दुस्साहसी था। उसकी खूनी ताकत का अनुमान लगाना कठिन था।

    उमरशेख के मरते ही बाबर के दो सगे दुश्मनों ने अलग-अलग दिशाओं से फरगना पर आक्रमण कर दिया। इनमें से एक तो बाबर का सगा ताऊ अहमद मिर्जा था और दूसरा बाबर का सगा मामा महमूद खाँ था। बाबर की दादी ऐसान दौलत बेगम ने बाबर को सब विपत्तियों से बचाया जिसके कारण बाबर के दुश्मन मैदान छोड़कर भाग गये। बाबर ने दो बार समरकंद पर अधिकार किया और दोनों बार ही समरकंद उसके हाथ से निकल गया। यहाँ तक कि समरकंद के चक्कर में फरगना भी उसके हाथ से निकल गया। समरकंद के नये शासक शैबानी खाँ ने बाबर को गिरफ्तार कर लिया। बाबर ने अपनी बहिन का विवाह अपने शत्रु शैबानीखाँ से करके कैद से मुक्ति पायी और बे-घरबार हो कर पहाड़ों में भाग गया।

    पूरे तीन साल तक वह अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ पहाड़ों और जंगलों में भटकता फिरा। उसके घोड़े मर गये, जूते फट गये और वह दाने-दाने को मोहताज हो गया। वह मीलों दूर तक नंगे पाँव पैदल चलकर किसी गाँव तक जाता। भीख मांग कर रोटी खाता और जान बचाने के लिये फिर से जंगलों में जा छिपता।

    दुनिया में कोई उसका मददगार न था, इसलिये वह दुनिया की दो क्रूरतम प्रबल ताकतों को वारिस होने के बावजूद भी किसी को अपना नाम तक नहीं बताता था। उसके मुट्ठी भर साथी ही उसके बारे में जानते थे कि वह कौन था और कहाँ रहता था।!

    दिखकाट की बुढ़िया

    - 'यह कौनसा गाँव है?' पहले नौजवान ने अपने माथे पर छलक आये पसीने को अपने सिर की पगड़ी के कपड़े से पौंछते हुए प्रश्न किया। काफी देर तक चलते रहने के बाद वे किसी गाँव तक पहुँचे थे।

    - 'दिखकाट।' नौजवान के हमउम्र साथी ने जवाब दिया।

    - 'क्या यह गाँव भी हमारे अब्बा हुजूर की जागीर में था?' पहले नौजवान ने फिर प्रश्न किया।

    - 'आपके पिता को यह गाँव आपके दादा हुजूर से जागीर में मिला था।'

    - 'तब तो इस गाँव पर हमारा सबसे अधिक अधिकार बनता है।'

    - 'बेशक! यह आपकी पुश्तैनी जागीर का गाँव है लेकिन अब इस बात को करने से क्या लाभ है? किसी ने सुन लिया तो नाहक परेशानी में पड़ेंगे।'

    - 'क्या इस गाँव में ऐसा कोई परिवार नहीं है जो हमारे पिता के प्रति वफादारी रखता हो।'

    -'मैंने सुना है कि यहाँ के गाँव का मुखिया आपके पिता का विश्वस्त जागीरदार था।'

    - 'क्या हमें वहाँ से कोई मदद मिल सकती है?'

    - 'कैसी मदद?' - 'कोई भी मदद, जिसकी भी जरूरत पड़ जाये।' पहले नौजवान ने फिर अपनी पगड़ी से माथा पौंछा। उसका चेहरा धूप की गर्मी से लाल हो आया था।

    - 'यह तो मुखिया से मिलकर ही जाना जा सकता है। आप कहें तो मैं वहाँ होकर आऊँ?' दूसरे नौजवान ने पूछा।

    - 'नहीं! तुम अकेले मत जाओ। हम भी साथ चलेंगे।'

    - 'तो क्या तुम अपना वास्तविक परिचय उन्हें दे दोगे।'

    - 'वह तो वहाँ जाकर ही देखा जायेगा।'

    - 'तो फिर ठीक है, चलो।' किसी तरह पूछते हुए दोनों नौजवान मुखिया के घर तक पहुंचे। घर के बाहर एक अत्यधिक उम्र की बुढ़िया ऊँटों को चारा डाल रही थी। उसके चेहरे की झुर्रियों से एक जाल सा बन गया था जिसके कारण उसकी सही शक्ल का अनुमान लगाना संभव नहीं रह गया था। उसके हाथ-पांव कांपते थे फिर भी वह काम में लगी हुई थी। दोनों नौजवान बुढ़िया को सलाम करके चुपचाप खड़े हो गये।

    - 'क्या है? क्या चाहते हो? बुढ़िया के पोपले मुँह में एक भी दांत नहीं था फिर भी उसकी वाणी बिल्कुल स्पष्ट और मुखर थी। नौजवानों ने अनुमान लगाया कि बुढ़िया की आंखों में भी पूरी रौशनी थी।

    - 'परदेशी हैं, बड़ी दूर से चलकर आ रहे हैं और पास में खाने को कुछ भी नहीं है।' पहले नौजवान ने जवाब दिया।

    - 'यहाँ क्या सराय समझ कर आये हो?' बुढ़िया ने तुननकर जवाब दिया।

    - 'हमने सुना कि मुखिया का परिवार काफी दयालु है। राहगीरों को रोटी देता है।'

    - 'तो तुमने गलत सुना है। मुखिया का परिवार तो खुद भूखों मर रहा है। तुम्हें रोटी कहाँ से खिलाये?'

    - 'क्या हम मुखिया से मिल सकते हैं?'

    - 'क्यों नहीं मिल सकते। गले में फंदा लगाकर इस ऊँट की गर्दन से झूल जाओ, कुछ ही क्षणों में वहीं पहुँच जाओगे, जहाँ मुखिया गया है।'

    - 'ओह! तो ये बात है?'

    - 'इसमें ओह की क्या बात है, तुमने रोटी खानी है?'

    - 'हाँ।' - 'तो लकड़ियाँ चीरकर देनी होंगी।'

    बुढ़िया ने लकड़ियों के ढेर की ओर संकेत करते हुए कहा। लकड़ियों का विशाल ढेर देखकर दोनों नौजवानों की रूह काँप गयी। फिर भी उस समय उन्हें रोटियों की इतनी सख्त आवश्यकता थी कि उन्होंने इस प्रस्ताव को भी खुदा की नियामत समझा।

    - 'लकड़ियाँ तो चीर देंगे किंतु पहले रोटी खाकर।'

    - 'रोटियाँ खाकर भाग गये तो?'

    - 'और लकड़ियाँ चीर कर भी रोटियाँ न मिलीं तो?'

    - 'पूरी लकड़ियाँ चीरनी होंगी। बोलो तैयार हो?'

    - 'भरपेट रोटियाँ खिलानी होंगी। बोलो तैयार हो।'

    बुढ़िया को दोनों नौजवानों पर तरस आ गया। उसने उन दोनों को भरपेट रोटियाँ खिलाईं। जब रोटियाँ खाकर नौजवानों ने कुल्हाड़ी उठाई तो बुढ़िया को उन पर फिर दया आ गयी।

    -'कुछ देर आराम कर लो, तब तक सूरज भी ढल जायेगा। उसके बाद लकड़ियाँ चीर देना लेकिन देखना, चकमा देकर भाग न जाना।' दोनों नौजवान वहीं कंटीली झाड़ियों की ओट में कुछ भूमि साफ करके लेट गये। जब सूरज ढल गया तो वे लकड़ियाँ चीरने के काम पर जुटे।

    - 'यह बुढ़िया कितने बरस की होगी?' पहले नौजवान ने कुल्हाड़ी चलाते हुए प्रश्न किया।

    - 'कोई अस्सी साल की तो होगी।' दूसरे नौजवान ने जवाब दिया।

    - 'अरे नहीं, नब्बे से क्या कम होगी।'

    - 'कुछ भी कहो, बुढ़िया है बहुत खुर्रांट।'

    - 'वो कैसे?'

    - 'आधा सेर आटे के बदले इतनी सारी लकड़ियाँ जो चिरवा रही है।'

    - 'मुझे तो लगता है कि बुढ़िया बहुत दयालु है।'

    - 'वो कैसे?'

    - 'यदि दयालु नहीं होती तो हमें इतनी देर गये तक काम पर नहीं लगाये रहती। अवश्य ही वह हमें शाम का खाना भी खिलाकर भेजेगी।' दूसरे नौजवान की बात सुनकर पहला नौजवान खिलखिला कर हँस पड़ा।

    - 'अरे नासपीटो! दो मन लकड़ी चीरने के बदले मैं तुम्हें जनम भर रोटियाँ खिलाऊंगी।' बुढ़िया जाने कब इन दोनों के पीछे आकर खड़ी हो गयी थी और उनकी बातें सुन रही थी। दोनों नौजवान खिसियाकर चुप हो गये। बुढ़िया को लगा कि नौजवान नाराज हो गये।

    - 'अच्छा चलो। तुम ढंग से लकड़ियाँ चीर दो तो मैं तुम्हें शाम की रोटियाँ भी खिलाऊंगी।' बुढ़िया ने उन दोनों को मनाते हुए कहा। लकड़ियाँ चीरते-चीरते सचमुच काफी देर हो गयी। बुढ़िया ने अपने वायदे के अनुसार दोनों को रात की भी रोटी खिलायी और रात हो गयी जानकर वहीं रुक जाने को कहा। दोनों नौजवान तो यही चाहते थे। वे रात को बुढ़िया के यहीं ठहर गये।

    जब वे रात का खाना खाने बैठे तो बुढ़िया ने पूछा- 'अच्छा एक बात बताओ। तुम दोनों कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो?'

    बुढ़िया का प्रश्न सुनकर दोनों नौजवान सकते में आ गये। यही वह प्रश्न था जिससे वे बचना चाहते थे और जिसका जवाब वे किसी को नहीं देना चाहते थे। फिर भी दयालु मेजबान को कुछ न कुछ जवाब तो देना ही था।

    - देखो! फालतू के सवाल मत करो। क्या हमने तुमसे पूछा कि तुम कितने साल की हो और कब से जी रही हो?' दूसरे नौजवान ने खींसे निपोरते हुए कहा।

    - 'अरे तो इसमें नाराज होने की क्या बात है? तुमने नहीं पूछा तो क्या हुआ? मैं खुद ही बता देती हूँ कि मैं एक सौ ग्यारह साल की हूँ और इतने ही साल से जी रही हूँ।'

    - 'क्या वाकई में तू एक सौ ग्यारह साल की है?' पहले नौजवान ने पूछा।

    - 'हाँ मैं एक सौ ग्यारह साल की हूँ, मुझे अच्छी तरह याद है कि जब समरकंद का अमीर तैमूर अपनी सेना लेकर हिन्दुस्थान गया था तो मैं बहुत छोटी बच्ची थी। मेरा बाप अमीर के साथ हिन्दुस्थान गया था और मेरे लिये बहुत सी चीजें लेकर आया था। अब तुम बताओ कि तुम कौन हो और कहाँ जा रहे हो?'

    - 'हम पहाड़ियों के पीछे के गाँवों से आयें हैं और रोजगार की तलाश में जा रहे हैं।' पहले नौजवान ने जवाब दिया। अमीर तैमूर का जिक्र बातों में आया जानकर उसे अच्छा लगा था।

    - 'यहाँ कहाँ रोजगार मिलेगा तुम्हें?'

    - 'तो फिर कहाँ जायें, कहाँ मिलेगा रोजगार?'

    - किसी बादशाह की सेना में जाकर भर्ती हो जाओ।'

    - 'क्या समरकंद के शाह शैबानीखाँ के यहाँ?' पहले नौजवान ने व्यंग्य से प्रश्न किया।

    - 'क्यों शैबानीखाँ के यहाँ क्यों? अमीर तैमूर के वंश में बहुत से बादशाह हैं, उन्हीं में से किसी के यहाँ भर्ती हो जाओ और कभी मौका लगे तो हिन्दुस्थान अवश्य जाओ।'

    - 'क्यों? हिन्दुस्थान क्यों?' बुढ़िया की बात से नौजवानों को प्रसन्नता हुई थी किंतु वे अपनी प्रसन्नता को छुपाये रखना चाहते थे।

    - 'अरे मूर्खो! हिन्दुस्थान में इतना सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात हैं कि तुम्हारी सारी भुखमरी जाती रहेगी। हिन्दुस्थान पर हमला करने का माद्दा केवल तैमूरी बादशाहों में है। और किसी का बूता नहीं जो हिन्दुस्थान की ओर आँख कर सके।'

    - 'और यदि मैं कहूँ कि मैं खुद तैमूरी बादशाह हूँ तो, तो क्या कहेगी तू?' पहले नौजवान ने उत्तेजित होकर कहा।

    - 'तब तो तू यह भी कहेगा कि तू फरगना और समरकंद का अमीर है।' बुढ़िया ने जोर से हँसते हुए कहा।

    - 'हाँ-हाँ! मैं फरगना और समरकंद का अमीर जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर हूँ।' पहले नौजवान ने और भी उत्तेजित होकर कहा।

    - 'क्या कहता है?' बुढ़िया सहम गयी।

    - 'हाँ मैं सच कहता हूँ।'

    - 'मुझे विश्वास नहीं होता।'

    - 'क्यों? क्यों नहीं होता विश्वास? क्या इस गाँव का मुखिया मेरे मरहूम पिता अमीर उमरशेख का खास आदमी नही था।

    - 'था।'

    - 'तो फिर तुझे मुझ पर विश्वास क्यों नहीं होता?'

    - 'मुझे तुझ पर तो विश्वास होता है किंतु अपनी तकदीर पर विश्वास नहीं होता। इतना बड़ा तैमूरी बादशाह, मेरी झौंपड़ी में।'

    - 'मैं बड़ा था, अब नहीं हूँ किंतु फिर से बनना चाहता हूँ।'

    - 'मैं बादशाह की क्या खिदमत कर सकती हूँ?' बुढ़िया ने सहम कर पूछा।

    - 'बड़े दादा हुजूर अमीर तैमूर के हिन्दुस्थान फतह के जो भी किस्से तू जानती है, सब मुझे सुना।'

    बुढ़िया ने पूरी रात जागकर बाबर को देवभूमि भारत की सम्पन्नता और तैमूर लंग की क्रूरता के किस्से सुनाये। इन किस्सों को सुनकर बाबर के आश्चर्य का पार न रहा। उसने मन ही मन संकल्प किया कि एक दिन वह भी देवभूमि पर आक्रमण करेगा और अपने प्रपितामह की ही तरह लाखों काफिरों और गायों का वध करेगा। उसे पूरा भरोसा था कि उसके बुरे दिन हमेशा नहीं रहेंगे।


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×