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     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : प्रदेश में औद्योगिक विकास हेतु कार्यरत संस्थाएँ

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 60

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : प्रदेश में औद्योगिक विकास हेतु कार्यरत संस्थाएँ

    1. प्रश्नः प्रदेश में औद्योगिक विकास हेतु कार्यरत प्रमुख संस्थाएँ कौनसी हैं?

    उत्तरः उद्योग विभाग, खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग, राजस्थान लघु उद्योग निगम (राजसिको), राजस्थान वित्त निगम (आरएफसी), राज्य उपक्रम निगम, बीआईपी, रीको।

    2. प्रश्नः उद्योग विभाग के अधीन जिला स्तर पर कौनसा कार्यालय काम करता है?

    उत्तरः जिला उद्योग केन्द्र।

    3. प्रश्नः राज्य में जिला उद्योग केंद्रों की संख्या

    उत्तरः 35

    4. प्रश्नः राज्य में उपजिला उद्योग केंद्रों की संख्या

    उत्तरः 7

    5. प्रश्नः राज्य के उद्योग संवर्द्धन में खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग की क्या भूमिका है?

    उत्तरः खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने, उद्यमियों को गुणवत्तायुक्त वस्तुओं के उत्पादन में सहायता देने, दस्तकारों को प्रशिक्षण देने, सहकारिता पूर्ण भागीदारी बढ़ाने, कच्चा माल उपलब्ध कराने एवं आवश्यक साधन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    6. प्रश्नः राजसिको का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः राजस्थान लघु उद्योग निगम (राजस्थान स्मॉल इंडस्ट्री कार्पोरेशन अथवा राजसिको)।

    7. प्रश्नः राजस्थान लघु उद्योग निगम (राजसिको) की स्थापना कब हुई थी?

    उत्तरः 3 जून 1961

    8. प्रश्नः राजसिको की स्थापना का क्या उद्देश्य है?

    उत्तरः राज्य की लघु औद्योगिक इकाइयों एवं हस्त शिल्पियों को सहायता, प्रोत्साहन तथा उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं का समुचित विपणन।

    9. प्रश्नः राजसिको को सार्वजनिक कम्पनी कब बनाया गया?

    उत्तरः 1 फरवरी 1975

    10. प्रश्न - राजसिको के मुख्य कार्य क्या हैं?

    उत्तर - 1. लघु उद्योग इकाइयों को लोहा व इस्पात, कोयला व पोलिमर आदि कच्चा माल उपलब्ध करवाना।

    2. लघु उद्योग इकाइयों के उत्पाद जैसे- स्टील फर्नीचर, टेण्ट एवं त्रिपाल, डेजर्ट कूलर्स, आर.सी.सी. पाईप, पॉलिथीन बैग्स, कांटेदार तार एवं एंगल आयरन पोस्ट के विपणन में सहायता प्रदान करना।

    3. लघु उद्योगों तथा शिल्पकारों के लिये प्रदर्शनी एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना।

    4. जयपुर, जोधपुर, भिवाड़ी, भीलवाड़ा में अन्तर्देशीय कन्टेनर डिपो और सांगानेर जयपुर में एयर कारगो कॉम्पलैक्स का संचालन करना।

    11. प्रश्नः राज्य में राजसिको के कितने शोरूम हैं?

    उत्तरः इस संस्था ने राज्य में 8 स्थानों पर अपने 12 शोरूम स्थापित कर रखे हैं।

    12. प्रश्नः राजस्थली क्या है?

    उत्तरः यहाँ ग्रामीण दस्तकार और शिल्पियों के उत्पादों को बेचा जाता है।

    13. प्रश्नः देश में कितन राजस्थली बनाये गये हैं?

    उत्तरः देश में 9 राजस्थली बनाये गये हैं। जयपुर तथा नई दिल्ली राजस्थली शोरूम का आधुनिकीकरण किया गया है। उदयपुर एवं माउण्ट आबू राजस्थलियों को फ्रेंचाईज़ी के माध्यम से राजस्थानी हस्तशिल्प विक्रय की व्यवस्था की गई है।

    14. प्रश्नः राजस्थली की नोडल एजेंसी क्या है?

    उत्तरः राजसिको, देश भर में स्थित 9 राजस्थली के माध्यम से विपणन हेतु नोडल एजेन्सी के रूप में कार्य करता है।

    15. प्रश्नः राजसिको किसके माध्यम से शिल्पियों से हस्तशिल्प उत्पाद खरीदता है?

    उत्तरः निगम द्वारा शिल्पियों से हस्तशिल्प उत्पाद सीधे क्रय किए जाते हैं।

    16. प्रश्नः राजस्थान हस्तशिल्प एवं दस्तकार कल्याण कोष योजनान्तर्गत किन संस्थाओं ने मिलकर 100 लाख रुपये का संयुक्त कोष बनाया है?

    उत्तरः रीको, आरएफसी एवं राजसीको।

    17. प्रश्नः हस्तशिल्प एवं दस्तकार कल्याण कोष का क्या उपयोग किया जाता है?

    उत्तरः इस कोष से अर्जित ब्याज की राशि को जरूरतमंद दस्तकारों को चिन्ह्ति बीमारियों जैसै- टी.बी., कैन्सर, कुष्ठ रोग, वॉल्व प्रतिरोपण, बाईपास सर्जरी, हृदय रोग एवं गुर्दा प्रत्यारोपण आदि में वित्तीय सहायता तथा उनके बच्चों की शिक्षा, सामूहिक बीमा एवं राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर सम्मानित दस्तकारों को मुख्यमंत्री वृद्धावस्था पेंशन देने हेतु उपयोग में लिया जा रहा है।

    18. प्रश्नः राजस्थान वित्त निगम की स्थापना किस अधिनियम के अंतर्गत एवं कब हुई?

    उत्तरः राज्य वित्तीय निगम अधिनियम 1951 के अन्तर्गत 8 अप्रेल 1955 को।

    19. प्रश्नः राजस्थान वित्त निगम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या है?

    उत्तरः राज्य में नवीन लघु एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना करना, विद्यमान उद्योगों के विस्तार एवं नवीनीकरण के लिए 2000 रुपये से 20 करोड़ रुपये तक ऋण उपलब्ध कराना।

    20. प्रश्नः राजस्थान वित्त निगम द्वारा क्या कार्य किये जाते हैं?

    उत्तरः (1) औद्योगिक संस्थानों द्वारा निगमित अंशों, स्टॉक, बॉण्ड तथा ऋणपत्रों का अभिगोपन।। (2) औद्योगिक संस्थानों के ऋण तथा अग्रिम स्वीकार करना, उनके ऋणपत्रों में धन लगाना। (3) राज्य में औद्योगिक संस्थाओं द्वारा लिए गये ऐसे ऋण पत्रों की गारण्टी देना जो 20 वर्षों से अधिक के न हों तथा जिन्हें बाजार में बेचा गया हो।

    21. प्रश्नः राजस्थान वित्त निगम कितनी पूंजी वाले लघु औद्योगिक संस्थानों को ऋण प्रदान करता है?

    उत्तरः एक करोड़ तक पूंजी वाले लघु औद्योगिक संस्थानों को।

    22. प्रश्नः राज्य उपक्रम निगम के संरक्षण में किस प्रकार की औद्योगिक इकाइयाँ कार्यरत हैं?

    उत्तरः 1. राजकीय लवण स्रोत पचपदरा एवं डीडवाना, 2. राजस्थान स्टेट टेनरीज लि. टोंक, 3. राजस्थान स्टेट केमिकल वर्क्स डीडवाना, 4. दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. श्री गंगानगर, 5. स्टेट वूलन मिल्स बीकानेर, 6. हस्तकला, चमड़े का कार्य तथा पत्थर का सामान बनाने के कारखाने भी इसकी देखरेख में कार्यरत हैं।

    23. प्रश्नः रूडा का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः ग्रामीण गैर-कृषि विकास अभिकरण।

    24. प्रश्नः रूडा द्वारा मुख्यतः क्या काम किये जाते हैं?

    उत्तरः ग्रामीण गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध कराना, ग्रामीण दस्तकारों के जीवन स्तर में सुधार करना, उन्हें बाजार एवं आधुनिक तकनीकी उपलब्ध कराना आदि।

    25. प्रश्नः रूडा द्वारा राज्य के किन बड़े उपक्षेत्रों के विकास के लिये गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं?

    उत्तरः रूडा द्वारा 6 बड़े उप-क्षेत्रों- ऊन एवं वस्त्र, चमड़ा, स्टोन-सिरेमिक व पॉटरी, हस्तशिल्प, हथकरघा एवं खादी ग्रामोद्योग में कार्यरत दस्तकारों के विकास हेतु विभिन्न गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं। उक्त समस्त क्षेत्रों के दस्तकारों को उनके उत्पादों का विपणन करने में भी रूडा द्वारा सहायता की जाती है।

    26. प्रश्नः रूडा द्वारा किन क्लस्टर्स को विपणन में सहायता दी जा रही है?

    उत्तरः 1. कोटा डोरिया क्लस्टर विकास योजना, 2. बगरू हाथठप्पा प्रिन्ट क्लस्टर योजना, 3. गोगुन्दा टेराकोटा परियोजना, 4. बानसूर चर्म क्लस्टर विकास परियोजना, 5. किशनगढ़-रेनवाल चर्म क्लसटर, 6. चर्म क्षेत्र विकास, 7. बाड़मेर कशीदाकारी क्लस्टर परियोजना (शिव एवं चौहटन)।

    27. प्रश्नः रूडसेट की स्थापना किस उद्देश्य से की गई?

    उत्तरः बेरोजगार ग्रामीण युवकों को स्वयं का उद्यम लगाने के लिये दक्षता एवं उद्यमिता प्रशिक्षण देने के लिये।

    28. प्रश्नः मैजिकल क्रिएशन शॉप क्या है?

    उत्तरः ग्रामीण दस्तकारों के हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री के लिये रूडा द्वारा आमेर फोर्ट में मैजिकल क्रिएशन शॉप संचालित की जा रही है।

    29. प्रश्नः राजस्थान स्टेट माइन्स एण्ड मिनरल्स लि. की स्थापना कब एवं क्यों की गई?

    उत्तरः राज्य में खनिज गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये 20 फरवरी 2003 को राजस्थान स्टेट माइन्स एण्ड मिनरल्स लि. (आरएसएमएमएल) की स्थापना की गयी। पहले से कार्य कर रहे राजस्थान राज्य खनिज विकास निगम (आर.एस.एम.डी.सी.) को भी इसमें सम्मिलित कर दिया गया।

    30. प्रश्नः राजस्थान स्टेट माइन्स एण्ड मिनरल्स लि. के अधीन कौनसे स्ट्रैटेजिक बिजनिस यूनिट एण्ड प्रोफिट सेंटर स्थापित किये गये हैं?

    उत्तरः (1.) रॉक फॉस्फेट, उदयपुर। (2.) जिप्सम, बीकानेर। (3.) लाइमस्टोन, जोधपुर। (4.) लिग्नाइट, जयपुर।

    31. प्रश्न - बी.आई.पी. का पूरा नाम क्या है तथा इसकी स्थापना किस उद्देश्य से की गई?

    उत्तर - राज्य को विनियोजन की दृष्टि से अधिक आकर्षक बनाने, मध्यम एवं वृहद् श्रेणी के निवेशकों तथा अप्रवासी भारतीयों को विनियोजन सम्बन्धी समस्त जानकारी उपलब्ध कराने और निवेशकों की समस्याओं का समाधान कराने के लिए।

    32. प्रश्न - बी.आई.पी. की मुख्य गतिविधियां क्या हैं?

    उत्तर - बी.आई.पी., विभिन्न क्षेत्रों यथा- स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, शहरी आधारभूत ढांचा, कृषि, पर्यटन, आई.टी. एवं आई.टी.ई.एस. इत्यादि में भी निवेश को प्रोत्साहित करता है। यह निवेशकों को प्रोजेक्ट अवधारणा से क्रियान्वयन तक सहायता प्रदान करने वाला सम्पर्क बिन्दु है।

    33. प्रश्न - रीको का पूरा नाम क्या है तथा इसका मुख्यालय कहाँ है?

    उत्तर - रीको का पूरा नाम राजस्थान स्टेट इण्डस्ट्रीयल डिवपपमेंट एण्ड इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (राजस्थान औद्योगिक विकास एवं विनियोजन निगम) है तथा इसका मुख्यालय जयपुर में है।

    34. प्रश्न - रीको की स्थापना कब की गई थी?

    उत्तर - इसकी स्थापना 28 मार्च 1969 को कम्पनीज अधिनियम 1956 के अंतर्गत राजस्थान राज्य उद्योग एवं खनिज विकास निगम के रूप में की गयी थी किंतु नवम्बर 1979 में खनिज विकास निगम को इससे अलग कर दिया गया। इस प्रकार जनवरी 1980 से रीको अस्तित्व में आया।

    35. प्रश्न - रीको की मुख्य गतिविधियाँ क्या हैं?

    उत्तर - यह राज्य के औद्योगिक विकास को तीव्र गति देने हेतु स्थापित की गई शीर्ष संस्था है। इसकी मुख्य गतिविधियाँ निम्नलिखित हैं- (1) नवीन औद्योगिक क्षेत्रों एवं बस्तियों का निर्माण करना। (2) औद्योगिक इकाइयों के शेयर क्रय करना तथा उनका अभिगोपन करना। (3) औद्योगिक उपक्रमों को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करना तथा परियोजनाओं के प्रतिवेदन तैयार करवाना। (4) उद्यमियों को विभिन्न प्रकार की रियायतें, सुविधायें और प्रोत्साहन प्रदान करना। (5) औद्योगिक परियोजनाओं का संचालन करना।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2012, रीको ने चार एग्रो-फूड पार्क विकसित किये हैं ताकि

    (1.) कृषिगत वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके,

    (2.) कृषि में विनियोग संवर्धन का कार्य करे,

    (3.) कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिले,

    (4.) खाद्य भण्डारण की सुविधाओं में वृद्धि करे?

    2 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2008, सामान्य ज्ञान, जो सही नहीं है, उसे निकाल दीजिये-

    (1.) रूडा ग्रामीण गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराने हेतु कार्य कर रहा है।

    (2.) ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टमेण्ट प्रमोशन, लघु उद्योगों के प्रोत्साहन के लिये एक एजेंसी है

    (3.) रीको राज्य में औद्योगिक विकास को गति देने वाली एक शीर्ष संस्था है।

    (4.) राजस्थान लघु उद्योग निगम, लघु उद्योग एवं हस्तशिल्प उद्योगों के प्रोत्साहन हेतु कार्यरत है।

    3 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2007, राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं विनियोजन निगम जिसकी स्थापना कम्पनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत 1969 में की गयी, किस कार्य में मदद करता है -

    (1.) औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना करने में

    (2.) सामाजिक आधारभूत सुविधाएं देने में,

    (3.) परियोजना रिपोर्ट प्रोफाइल एवं प्रबंधकीय सेवाएं प्रदान करने में

    (4.) उपरोक्त सभी में?

    4 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1994, टिप्पणी लिखिये- राजस्थान वित्त निगम।

    5 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1988, टिप्पणी लिखिये- राजस्थान वित्त निगम। एकल खिड़की योजना

    36. प्रश्न: राजस्थान एन्टरप्राईजेज सिंगल विन्डो एनेबिलिंग एण्ड क्लीयरेंस एक्ट 2011 अथवा एकल खिड़की योजना क्यों लागू हुई?

    उत्तर: 1. राज्य में औद्योगिक निवेश को सुगम बनाने। 2. नियमों एवं प्रक्रियाओं को सरल बनाकर परियोजनाओं को शीघ्र स्वीकृति देने। 3. निवेशकों एवं विभिन्न राजकीय विभागों के मध्य एक ही स्थान पर विमर्श की सुविधा देने।

    37. प्रश्न: एकल खिड़की योजना किस एक्ट के तहत लागू की गई?

    उत्तर: राजस्थान एन्टरप्राईजेज सिंगल विन्डो एनेबिलिंग एण्ड क्लीयरेंस एक्ट 2011

    38. प्रश्न: एकल खिड़की योजना में कितनी राशि तक के प्रस्ताव स्वीकृत किये जाते हैं?

    उत्तर: 1. जिला स्तर पर जिला कलक्टर की अध्यक्षता में गठित डिस्ट्रिक्ट एम्पावरमेंट कमेटी 1 करोड़ से 10 करोड़ तक के निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति देती है। नोडल एजेंसी जिला उद्योग केन्द्र है। 2. 10 करोड़ से ऊपर के प्रस्तावों के लिये मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित स्टेट एम्पॉवर्ड कमेटी। औद्योगिक विकास दर की धीमी गति के कारण

    39. प्रश्न - राज्य में खनिज, कृषि उत्पाद, पशु उत्पाद, पशु शक्ति, श्रम शक्ति तथा भूमि प्रचुर मात्रा में होते हुए भी औद्योगिक विकास को अपेक्षित गति क्यों प्राप्त नहीं हो सकी है?

    उत्तर - पांच प्रमुख कारण हैं- (1) पानी की कमी, (2) बिजली की कमी, (3) सड़क की कमी, (4) प्रशिक्षित श्रमिकों एवं कारीगरों की कमी, (5.) हर पांच साल में दूसरे राजनीतिक दल की सरकार बनना। इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न 1 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1997, राजस्थान में पिछले पाँच वर्षों में औद्योगिक विकास की वृद्धि एवं उसके प्रभाव की समीक्षा कीजिये। 2 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1996, व्याख्यात्मक टिप्पणी लिखिये- राजस्थान के त्वरित औद्योगिक विकास में मुख्य समस्यायें। 3 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1989- आजादी के बाद राजस्थान में हुए औद्योगिक विकास का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। राजस्थान में औद्योगिक विकास में कौनसी मुख्य बाधायें हैं?


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  • जयपुर नरेश ने लंदन की टेम्स नदी पर गंगाजी का परचम फहरा दिया

     02.06.2020
    जयपुर नरेश ने लंदन की टेम्स नदी पर  गंगाजी का परचम फहरा दिया

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1880 में जयपुर नरेश रामसिंह की मृत्यु हो गयी। उसके कोई पुत्र नहीं था इसलिये उसने ईसरदा ठिकाने के ठाकुर रघुनाथसिंह के द्वितीय पुत्र माधोसिंह को गोद लिया था। अंग्रेजो ने रामसिंह के इस दत्तक पुत्र को सवाई माधोसिंह (द्वितीय) के नाम से जयपुर का राजा स्वीकार कर लिया। अपने राज्याभिषेक के समय वह 19 वर्ष का था तथा विशेष पढ़ा लिखा नहीं था।


    यद्यपि माधोसिंह वयस्क था तथापि उसे शासन कार्य का अनुभव नहीं होने के कारण अंग्रेजों ने राज्य शासन के पूरे अधिकार नहीं सौंपे। पोलिटिकल एजेण्ट की देख-रेख में राज्य परिषद के द्वारा ही राजकाज किया जाता रहा। शासन पर ब्रिटिश वर्चस्व बुरी तरह हावी रहा फिर भी माधोसिंह के पास इस बात के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था कि वह अंग्रेज शक्ति के प्रति भरपूर स्वामिभक्ति दिखाये। उसके शालीन व्यवहार के कारण अंग्रेज अधिकारी भी जीवन भर माधोसिंह के प्रति शालीनता से पेश आते रहे।

    विदेशी इतिहासकारों तथा तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने उसके पुरातन पंथी विचारों और उसकी धार्मिक प्रवृत्ति को लेकर टिप्पणियां की हैं। कर्जन ने लिखा है- माधोसिंह पुराने चलन वाली श्रेणी के उन भारतीय राजाओं में से है जिन्हें उत्साहित करने के लिये मैंने अपनी ओर से वह सब कुछ किया जो मेरी शक्ति में है, ये पुरातन पंथी, अपने राज्य को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी जाने के अनिच्छुक, अपने कोष को उदारता से बांटने वाले, रानी एवं ब्रिटिश सम्बंधों के प्रति सघनता से स्वामिभक्त तथा किसी बात के लिये अत्यधिक व्याकुलता से परांग्मुख हैं किंतु यदि इन्हें दक्षता पूर्वक तथा सहानुभूति पूर्वक संचालित किया जाये तो ये मार्गदर्शित होने के लिये सक्षम हैं।

    भारतीय राजाओं की परम्पराओं को ध्यान में रखकर इस राजा का मूल्यांकन किया जाये तो वह एक श्रेष्ठ राजा था तथा अपने युग की महान विभूति था। उसने पं. मदनमोहन मालवीय का जयपुर नगर में भव्य स्वागत किया तथा बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के लिये पांच लाख रुपये प्रदान किये। उसका दीवान कांतिचंद मुखर्जी भी अच्छा प्रशासक था।

    ई.1902 में राजा माधोसिंह इंगलैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम् के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने के लिये लंदन गया। लंदन अर्थात् यवन देश में जाने के लिये उसने भारतीय संस्कृति के अनुरूप विशेष तैयारियां कीं। उसने चांदी के दो लोटे बनवाये तथा उनमें इतना गंगाजल भरवा लिया कि वह गंगाजल राजा के पीने के लिये चार महीने तक के लिये पर्याप्त हो ताकि राजा को म्लेच्छ देशों का जल नहीं पीना पड़े। उसने अपने लिये एकदम नया जहाज किराये पर लिया तथा उसे गंगाजल आदि से धुलवाकर पवित्र करवाया। जहाज में ही एक मंदिर बनाया गया जिसमें राजा के आराध्य राधा गोपालजी के विग्रह को प्रतिष्ठित करवाया। राजा माधोसिंह ने अपने जहाज पर जयपुर राज्य की पचरंगी पताका फहराई।

    जब राजा माधोसिंह इंगलैण्ड के विक्टोरिया स्टेशन पर जहाज से उतरा तो उसने अपने आगे राधा गोपालजी का रथ रखा और स्वयं हरे रामा-हरे कृष्णा का कीर्तन करता हुआ इंगलैण्ड की गलियों से निकला। कीर्तन करने वाले अनुचरों के विशाल जुलूस में सम्मिलित राजा ऐसा दिखायी देता था मानो जयपुर का राजा माधोसिंह नहीं राधा गोपालजी हैं। उसके इस भव्य आगमन को देखकर पूरे यूरोप में धूम मच गयी थी।

    राजा माधोसिंह ने इंगलैण्ड के राजा एडवर्ड सपतम् को 5 लाख रुपये मूल्य की एक तलवार तथा अन्य कीमती वस्तुएं उपहार में दीं। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय ने उसे एल.एल.डी. की उपाधि प्रदान की। वह पांच माह लंदन में रहकर फिर से भारत लौट आया। इंगलैण्ड से लौट कर राजा ने राधा गोपालजी का विग्रह सिटी पैलेस परिसर में स्थित गोपालजी के मंदिर में स्थापित करवाया। इस मंदिर के सामने ही गंगाजी का मंदिर है जिसमें गंगा मैया की वह प्रतिमा स्थापित है जो राजा माधोसिंह की पटराणी जादूणजी की पूजा में रहा करती थी। उन दिनों रनिवास की समस्त महिलाएं गंगा मैया के इसी विग्रह की पूजा करती थीं।

    माधोसिंह ने गंगा मैया का एक मंदिर गंगोत्री में भी बनवाया था। वह ग्रीष्म काल में अन्य राजाओं की तरह पहाड़ी स्थानों पर जाकर आमोद-प्रमोद में व्यस्त नहीं होता था। जब भी ग्रीष्म ऋतु होती तो राजा माधोसिंह हरिद्वार में जाकर गंगाजी के किनारे वास करता था। जिन रजत पात्रों में राजा माधोसिंह गंगाजल भरकर लंदन ले गया था वे आज भी जयपुर के सिटी पैलेस स्थित सर्वतोभद्र के रिक्त प्रांगण में रखे हैं तथा उन्हें विश्व के सबसे बड़े चांदी के बर्तन होने का गौरव प्राप्त है। इनका कुल वजन 680 किलोग्राम है।

    जब अंग्रेजों ने गंगाजी का प्रवाह हर की पौढ़ी के स्थान पर किसी अन्य स्थान से करने की योजना बनायी तो मदनमोहन मालवीय ने हरिद्वार में एक विशेष बैठक बुलाई जिसमें भारत भर के हिन्दू राजाओं को आमंत्रित किया गया ताकि अंग्रेजों के इस निर्णय का विरोध किया जा सके। हिन्दू नरेशों में जयपुर नरेश माधोसिंह सर्वाधिक अग्रणी था जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा गंगाजी का प्रवाह बदले जाने का विरोध किया था।

    जयपुर नरेश माधोसिंह ब्रिटिश अधिकारियों के चहेते राजाओं में से था। उसका कारण यह था कि राजा ने गंगाजी के प्रकरण को छोड़कर कभी किसी बात को लेकर अंग्रेजों के लिये परेशानी खड़ी नहीं की। अंग्रेज अधिकारियों के प्रति राजा का व्यवहार अत्यंत शिष्ट था। ई.1903 में उसे अंग्रेजों की ओर से जी.सी.वी.ओ. तथा 1911 में जी.वी.आई.की उपाधियों से विभूषित किया गया। ये वे उपाधियां थीं जिन्हें पाने के लिये राजाओं में परस्पर होड़ मची रहती थी तथा भारत भर के राजा अपने आदमियों को अंग्रेज अधिकारियों के पीछे दौड़ाते रहते थे। ई.1904 में माधोसिंह को भारतीय सेना में कर्नल बनाया गया । ई.1911 में उसे मेजर जनरल का पद दिया गया।

    राजा माधोसिंह ने उत्तर पश्चिमी सीमा के युद्ध में अंग्रेजों की भरपूर सहायता की। प्रथम विश्वयुद्व में राजा ने अपने निजी व्यय से अंग्रेजों को पंद्रह लाख रुपये प्रदान किये तथा इतनी ही राशि अपने सामंतों व अधिकारियों से जुटा कर उपलब्ध करवायी। ई.1921 में अंग्रेजों ने राजा माधोसिंह को भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल का पद प्रदान किया। अंग्रेज शक्ति भारतीय राजाओं को सेनाओं में ऑनरेरी कमीशन तथा रैन्क इसलिये दिया करती थी ताकि भारतीय राजाओं को अपनी अधीनस्थता का अहसास सदैव बना रहे।

    राजा माधोसिंह के शासनकाल में राज्य में स्कूलों, सड़कों, रेल्वे लाइनों तथा औषधालयों का अच्छा विकास हुआ। ई.1921 में राजा माधोसिंह को अंग्रेजों की ओर से अपने राज्य की सीमा में 21 तोपों की सलामी लेने का अधिकार दिया गया। ई.1922 में उसकी मृत्यु हो गयी।

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  • जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र की यात्रा

     02.06.2020
    जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र की यात्रा

    जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र की यात्रा


    अभिशप्त रजत पृष्ठ और मनुपुत्रों की बस्तियाँ


    यात्रा संस्मरण - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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    आज उन बातों को पच्चीस साल से अधिक हो गए हैं। ढाई दशकों से भी अधिक लम्बी अवधि में समय की काली-पीली आंधियों के जाने कितने बवण्डर इस जीवन में आए और काल के प्रवाह में तिरोहित हो गए। इस दौरान भारत की नदियों में से केवल पानी ही नहीं बहा अपितु सैंकड़ों नदियाँ या तो सूख गईं या सूखने के कगार पर पहुंच गईं। जो उन दिनों में आठ-दस बरस के बालक थे, अब यौवन की दहलीज लांघकर प्रौढ़ होने की तैयारी में हैं।

    वर्ष 1993 का फरवरी महीना अभी आरम्भ हुआ ही था किंतु ऋतुराज वसंत ने पूरे वातावरण को आच्छादित कर लिया था। सर्दियों की चटख कम पड़ने लगी थी और जालोर जिले के हरे-भरे खेत, सरसों के पीले फूलों का शृंगार करके होली के लाल-पीले रंगों वाले मदनोत्सव की तैयारियां करते हुए प्रतीत होने लगे थे। यही वे दिन होते थे जब सुन्धा पर्वत की ढलानों पर टेसू दहकने लगते हैं और लूनी नदी के चौड़े पाट में बोई गई सेवज की फसलों में दाने पड़ जाने से चिड़ियों की चहचहाटें अचानक बढ़ जाती हैं। पूरी प्रकृति ऐसी दिखाई देने लगती है मानो यौवन के भार से लदी नववधू चाहकर भी अपनी चपलता को छिपा न पा रही हो।

    मैं प्रायः अपनी विलेज जीप लेकर रामा और भोरड़ा के सरोवरों की ओर निकल जाता था, जहाँ इन दिनों विदेशी पक्षियों का जमावड़ा रहता था। उनकी विचित्र ध्वनियां और विस्मयकारी चेष्टाएं प्रकृति के सौंदर्य को और भी अधिक बढ़ा देती थीं। ऐसे ही एक दिन अपने कार्यायल पहुंचा तो आकाशवाणी जोधपुर के केन्द्र निदेशक रतिरामजी का पत्र मिला। उन्होंने लिखा था कि वे तीन दिनों के लिए जालोर आ रहे हैं और मेरे साथ नेहड़ के दुर्गम क्षेत्र की यात्रा करने की इच्छा रखते हैं। यह निमंत्रण पाकर मेरी प्रसन्नता का पार नहीं रहा। लम्बे समय से मेरी साध थी कि मैं उस दुर्गम नेहड़ क्षेत्र में जाऊँ, जिसके बारे में मैं सदैव भिन्न-भिन्न तरह की बातें सुना करता था किंतु अकेले जाने का साहस नहीं कर पाता था।

    रतिरामजी का पत्र पाकर मेरे नेत्रों के सामने वे तीन वर्ष छायाचित्रों की भांति स्पष्ट हो गए जिनमें मैं आकाशवाणी में प्रसारण अधिशासी हुआ करता था। रतिरामजी हमारे केन्द्र निदेशक हुआ करते थे और मेरी थोड़ी बहुत साहित्यिक रुचि के कारण मेरे प्रति अतिरिक्त स्नेह रखा करते थे। मैंने जब आकाशवाणी की सेवा छोड़ने का मानस बनाया तो उन्होंने मुझे ऐसा करने से कई बार मना भी किया किंतु मेरा यायावरी मन मुझे वहाँ से कहीं और ले चलने के लिए आतुर था, उसने किसी की एक न सुनी।

    मेरे इस यायावरी मन ने मुझे कभी भी, कहीं भी टिक कर नहीं रहने दिया। जहाँ भी मैं गया, वहीं से कहीं और भाग चलने की तैयारी करने लगा। अपने छप्पन वर्ष के जीवन काल में अब तक मैं किसी शहर में लगातार पाँच वर्ष तक लगातार नहीं रह पाया। आज सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है, कैसे मैं चौदह वर्ष तक र्धर्य रखकर अपनी पढ़ाई पूरी कर सका और कैसे एक स्थान पर ठहर कर मैं स्वयं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में निरत रख सका! संभवतः इस सबके पीछे मेरी साधना ने नहीं, अपितु मेरे पिताजी के कठोर अनुशासन ने नियंत्रणकारी भूमिका निभाई।

    रतिरामजी अपने साथ आकाशवाणी का पूरा ध्वन्यांकन दल लेकर आए। उनके साथ आए दल में कार्यक्रम अधिशासी प्रेमप्रकाश माथुर (दैववश नेहड़ यात्रा के कुछ ही दिनों बाद वे देवलोक प्रस्थान कर गए), प्रसारण अधिशासी पार्थसारथी थपलियाल तथा सैयद साबिर अली मेरे पुराने साथी भी थे जिनके साथ मैं आकाशवाणी में काम कर चुका था। अतः इस यात्रा का सुखद हो जाना तो निश्चित ही था। मैंने जालोर के एक वयोवृद्ध किंतु उत्साही पत्रकार रामेश्वर माथुर को भी अपने साथ ले लिया जो पचास के दशक से इस क्षेत्र में पत्रकारिता कर रह थे (दैववश वे भी इस यात्रा के कुछ माह बाद देवलोक प्रस्थान कर गए)।

    रतिरामजी अपने साथ एम्बेसेडर कार लाए थे किंतु इस वाहन से नेहड़ के दुर्गम क्षेत्र में जाना संभव नहीं था। अतः मैंने अपनी विलेज जीप भी ले ली ताकि पक्की सड़क तक तो कार की सुविधाजनक यात्रा का आनंद लिया जा सके और उसके बाद दुर्गम क्षेत्र में विलेज जीप का प्रयोग किया जा सके। रतिरामजी अपने दल के साथ प्रातः काल में जोधपुर से चलकर दोपहर में जालोर पहुंचे और हम लोग उसी समय जालोर से रवाना होकर संध्या होने तक भीनमाल पहुंच गए ताकि अगले दिन शीघ्र ही नेहड़ की यात्रा आरम्भ की जा सके।

    भीनमाल नगर में रात्रि व्यतीत करना कोई कम गौरव की बात नहीं थी। यह नगर आज से कई शताब्दियों पूर्व, भारत का एक विख्यात एवं समृद्ध नगर था। भीनमाल की धरती पर खड़े होकर इस बात को सोचकर रोमांच हो आता है कि महान गुप्त शासकों ने इस नगरी को सजाया और संवारा। उनके काल में भीनमाल में बने महालक्ष्मी मंदिर के अवशेषों को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है मानो हम भी हजारों साल पीछे के इतिहास में चले आए हैं और गुप्तों की आराध्य देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर रहे हैं। इसी मंदिर के कारण यह नगर उन दिनों श्रीमाल और पुष्पमाल कहलाता था।

    प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग जब ई.641 में इस नगर की यात्रा पर आया तो अपने संस्मरणों में उसने इस नगर के बारे में बहुत कुछ लिखा। ह्वेनसांग द्वारा लिखे गए शब्द इतिहास के अमर पृष्ठों का भाग हो गए जो उस काल के भारत के इतिहास को जानने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हे्वनसांग के समय तक तो मुम्बई तथा कलकत्ता भविष्य के गर्भ में सैंकड़ों वर्ष दूर थे और पाण्डवों की बसाई हुई दिल्ली (इन्द्रप्रस्थ) भी एक छोटे गांव से अधिक कुछ नहीं थी। ह्वेनसांग के भीनमाल आने से केवल 13 वर्ष पूर्व ही भीनमाल निवासी ब्रह्मगुप्त ने ‘ब्रह्मस्फुट सिद्धांत’ की रचना की थी। यही वे सूत्र थे जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व में नक्षत्रों की गति पर आधारित काल गणना एवं ज्योतिष के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।

    जिस समय ह्वेनसांग भीनमाल आया था, उस समय भीनमाल का निवासी महाकवि माघ संस्कृत में कविताएं लिख रहा था जिन्हें बाद में संसार के सर्वश्रेष्ठ साहित्य में सम्मिलित किया गया। माघ की कविता के बारे में संस्कृत साहित्य में जब यह उक्ति पढ़ने को मिलती है तो रोमांच हो आता है-

    उपमा कालिदासस्य भारवेर्थ गौरवम्

    दण्डिनः पद लालित्यम् माघे संति त्रयो गुणाः।


    अर्थात् कालिदास की कविता की उपमा, भारवि की कविता का अर्थ गौरव और दण्डी की कविता का पदलालित्य देखने योग्य है किंतु माघ की कविता में तो ये तीनों ही गुण उपस्थित हैं। कहा जाता है कि महाकवि माघ के पास इतना धन था कि धार नगरी का राजा भोज, उसके वैभव को आंखों से देखने के लिए माघ के यहाँ अतिथि हुआ। जब यही माघ भिखारियों को दान देते-देते निर्धन हो गया तो भूख से तड़प कर मर गया किंतु भीनमाल के लोगों ने उसे भोजन नहीं दिया। जब राजा भोज को इस बात की जानकारी हुई तो उसने श्रीमाल का नाम बदल कर भिन्नमाल कर दिया।

    मेरे मुँह से भीनमाल नगरी का ऐसा विचित्र इतिहास सुनकर आकाशवाणी के अधिकारी विस्मय से भर गए। संभवतः इतिहास के प्रति मेरे अनुराग के कारण ही रतिरामजी ने मेरे साथ नेहड़ की यात्रा का कार्यक्रम बनाया था।

    उसी सायं हम लोगों ने भीनमाल नगर के मध्य में स्थित वाराह-श्याम मंदिर के दर्शन किए। इस मंदिर में खड़ी वराह प्रतिमा प्रतिहार कालीन है। वाराह, गुप्त शासकों के काल में सम्पूर्ण उत्तर भारत में सर्वाधिक पूज्य विष्णु अवतार थे। भीनमाल क्षेत्र पर गुप्तों के उत्तराधिकारी प्रतिहार हुए जिन्होंने वैष्णव धर्म को मंदिरों एवं विग्रहों से समृद्ध बनाने में गुप्तों जैसा ही उत्साह दिखाया। सात फुट लम्बी और ढाई फुट चौड़ी यह प्रतिमा इतनी भव्य एवं सजीव दिखाई देती है मानो भगवान विष्णु अभी-अभी अपनी प्रिया मेदिनी को समुद्रों में छिपे दैत्यों के चंगुल से छुड़ाकर अपने स्कंध पर बैठाकर लाए हों। इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर जूते पहने हुए सूर्यदेव, दर्शकों को इस बात का स्मरण कराते हैं कि एक समय था जब इस क्षेत्र पर क्षहरातों ने भी शासन किया था। मैं बूटधारी सूर्य उन्हीं का आराध्य देव हूँ।

    मंदिर की एक दीवार में किरातवेश धारिणी पार्वती की एक प्रतिमा घण्टों तक दर्शकों को अपनी ओर आंख टिकाए रखने के लिए विवश करती है। माता पार्वती किरातिनी के वेश में वन्यपशुओं का शिकार करके महादेव के पास लौट रही हैं। उनके कंधे पर एक लाठी है जिस पर उनका शिकार लटक रहा है। उनके साथ खड़ी चंवरधारिणी यह स्पष्ट करती है कि यह माता पार्वती ही हैं, कोई अन्य देवी नहीं। इस मंदिर की अधिकांश प्रतिमाएं एक हजार वर्ष से अधिक पुरानी हैं।

    भीनमाल में सार्वजनिक निर्माण विभाग के जिस डाक बंगले में हम रुके, उसका अपना अलग ही इतिहास था। उन दिनों इसके बारे में कहा जाता था कि जो राजनेता इस डाक बंगले में ठहरते हैं, उन्हें यहाँ से राजधानी लौटकर अपना त्यागपत्र लिखना पड़ता है। इसलिए भीनमाल आने पर मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत एवं उनके मंत्रियों सहित लोकसभा और विधान सभा सदस्य भी इसमें रात्रि विश्राम नहीं करते थे। अतः राज्य के समस्त राजनेता, भीनमाल के कोट्याधिपतियों के देवपति इन्द्र के आवास से स्पर्धा करने वाले विमान सदृश्य सुंदर प्रसादों के अतिथि होते थे और डाक बंगला सरकारी अधिकारियों को सहज ही उपलब्ध हो जाया करता था।

    अगली प्रातः प्राची के पुरातन यायावर के नील पथ पर यात्रा आरम्भ करने से पर्याप्त पहले ही हम लोगों ने भीनमाल छोड़ दिया। सर्दियाँ अभी शेष थीं इसलिए भीनमाल से सांचौर तक की यात्रा तो कोहरे से ढकी सड़क पर ही पूरी हुई। सांचौर से आगे लगभग 50 किलोमीटर दूर, केरिया गांव तक पक्की सड़क थी, जहाँ तक हम कार से जा सकते थे। उससे आगे की यात्रा हमें विलेज जीप से करनी थी। सांचौर से आगे निकलते ही प्राची के यायावर ने नील पथ पर अपनी उपस्थिति दी और लाज से नहाई हुई उषा, भगवान सूर्य के पथ पर सोने का गोबर लीप गई। यही वह क्षण था जब प्रकाश से नहाई हुई वसुन्धरा, भगवान सूर्यदेव को प्रणाम करने के लिए हमारे चारों ओर प्रकट हो गई।

    ठीक उसी समय हमने एक अद्भुत दृश्य देखा। हमने देखा कि एक लघु सरोवर के किनारे मेष गुल्म खड़ा था। यह विशाल गुल्म, सरोवर से भी अधिक विशाल प्रतीत होता था। दो रेबारी नवयुवक अपने मेष-गुल्म को सरोवर के नीले जल में स्नान करवा रहे थे। ताकि उनके अमल-धवल केशों से धूल के कण हट जाएं और वे स्वच्छ ऊन प्राप्त कर सकें। ये रेबारी भी मेरी तरह यायावर प्रकृति के हैं। ये स्वयं नहीं जानते कि चरैवेति-चरैवेति के मूल सिद्धांत पर चलते-चलते कब वे चरवाहे की जगह रेबारी कहलाने लगे! मुझे तो पूरी आर्य संस्कृति ही यायावर लगती है।

    आज के रेबारी उन्हीं पुरातन आर्यों के अवशिष्ट रूप ही तो हैं। ये लोग कम्मेलकों ओर मेषों को साथ लेकर सैंकड़ों योजन की यात्रा किया करते हैं। मैंने देखा कि एक रेबारी युवक विशालाकाय मेष को सत्वर पकड़कर अपनी पीठ पर लाद लेता है और मेष कुछ समझ पाए, उससे पहले वह युवक मेष को सरोवर में डुबकी लगवा देता है। युवक की पुष्ट भुजाएं देखकर मेरे विस्मय का पार न रहा। हमने कार रुकवा ली। बहुत देर तक हम उस दृश्य को निर्मिमेष देखते रहे। नगरों के युवकों में से तो कदाचित ही कोई इतनी स्थूल मेष को अपनी पीठ पर उठा सके। उस अद्भुत दृश्य को उसी तरह घटता हुआ छोड़कर हम लोग आगे बढ़ गए।

    सांचोर के आगे दो तरह की धरा के दर्शन होते हैं। एक तरफ विशाल बालुका स्तूप अलसाए हुए से पड़े हैं तो उनके बीच-बीच में सरसों के हरे खेत, वनस्पति जगत का विजयोत्सव मनाते हुए प्रतीत होते हैं मानो कह रहे हों कि हम रेगिस्तान से हारने वाले नहीं हैं। गांधव पुल से आगे रेगिस्तान नेपथ्य में जाता हुआ प्रतीत होता है और हरियाली बढ़ने लगती है जिसके बीच मनुष्यों की विरल बस्तियाँ विद्यमान हैं। इस क्षेत्र में मानव-अधिवास का घनत्व अत्यंत अल्प जान पड़ता था जो संभवतः बाड़मेर और जैसलमेर के गहन बालुका प्रदेश के मानवीय घनत्व के समतुल्य ही अत्यंत न्यून था।

    नौ बजते-बजते हम केरिया
    गाँव तक पहुंच गए। यहाँ हमने कार छोड़ दी और विलेज जीप में बैठ गए। कुछ दूर जाने पर मेरे वाहन चालक ने सूचित किया कि जीप का चार गुणा चार निकाय (फोर बाई फोर गीयर सिस्टम) काम नहीं कर रहा है। इस कारण जीप के मार्ग में ही फंसने का भय है। सामने स्थित बालुका स्तूपों को देखकर हमें वहीं रुकना पड़ा और आगे की योजना पर विचार करने लगे। सौभाग्यवश एक ट्रैक्टर वहाँ से निकला। हमें इस तरह निर्जन में जीप रोके खड़े देखकर ट्रैक्टर चालक रुक गया। उसने सुझाव दिया कि चार व्यक्ति मेरे ट्रैक्टर पर बैठ सकते हैं जिन्हें मैं खेजड़ियाली गांव तक पहुंचा सकता हूँ। उसका निमंत्रण स्वीकार करके मैंने, रतिरामजी ने, थपलयिालजी ने और साबिरजी ने आगे जाने का निर्णय लिया। पी. पी. माथुर, रामेश्वर माथुर और मेरे वाहन चालक हिम्मताराम को विलेज जीप के साथ छोड़ दिया गया।

    हम चारों व्यक्ति भारवाहक लौह शटक (ट्रॉली) से रहित उस अत्यल्प अवकाश युक्त, यंत्रचालित लौह-अश्व (ट्रैक्टर) पर किसी तरह सिमटकर बैठ गए। यहाँ से आरम्भ हुई हमारी वास्तविक नेहड़ यात्रा। गह्वरों से युक्त विषम धरातल के कारण ट्रैक्टर को इतने हिचकोले लग रहे थे कि यदि हम किंचित भी असावधानी दिखाते तो नीचे गिरकर किसी बड़ी दुर्घटना की चपेट में आ सकते थे। हरि स्मरण करते हुए किसी तरह हम ट्रैक्टर से चिपके रहे। कोई एक घंटे की कष्ट-साध्य किंतु आनंदानुभूति कराने वाली यात्रा के बाद हम नेहड़ नाम से विख्यात धरा के अभिशप्त रजत पृष्ठ पर पहुंचे, जहाँ क्षितिज और धरा मिलकर एकाकार हो रहे थे।

    मीलों दूर तक फैला श्वेत रजत पटल सा मैदान। पशु-पक्षी की कौन कहे वनस्पति की एक पर्णी तक नहीं। दूर-दूर तक जल सूख जाने से गहराई तक अंकित हो गए पदयात्रियों के पद चिह्न ऐसे दिखाई दे रहे थे मानो सिंधुघाटी सभ्यता अभी-अभी काल के गाल में समा गई है और वहाँ के निवासी इन पदचिह्नों को अपने पीछे छोड़ गए हैं। जहाँ तक दृष्टि दौड़ाओ, पानी ही पानी किंतु पीने के योग्य घूंट भर भी नहीं। यही है नेहड़ जहाँ प्रलयंकारी जलप्लावन से अपनी नौका को बचाकर लाने वाले मनु का कोई पुत्र प्रवेश नहीं कर सकता।

    यहाँ जालोर जिले की सीमा समाप्त होती है, यहीं राजस्थान की सीमा भी समाप्त हो जाती है और आरम्भ होता है गुजरात का रणकच्छ अथवा रणखार। नेहड़ का क्षेत्र, रणखार का ही एक किनारा है जिसका एक भाग राजस्थान के जालौर जिले में स्थित है और कुछ प्रसार बाड़मेर जिले से लेकर गुजरात एवं पाकिस्तान तक विस्तृत है। नेहड़ का अर्थ है ‘नीर-हृत’ अर्थात् जल का हृदय। आज से कुछ लाख वर्ष पहले इस क्षेत्र में समुद्र लहराता था। अरब सागर की ओर आने वाली पश्चिमी राजस्थान की समस्त छोटी-बड़ी नदियां यहाँ आकर गिरा करती थीं। इन जलधाराओं का उद्गम अरावली पर्वत से होता था जिसे संसार का सबसे प्राचीन पर्वत माना जाता है।

    ऋग्वेद कालीन सरस्वती का एक प्रवाह भी पंचसिंधु प्रदेश को पार करके समुद्र के इस तट तक आता था जिसके किनारों पर गन्ने की खेती होती थी। गन्ना पेरने के कोल्हुओं के पत्थर आज भी रेगिस्तान के बीच देखने को मिल जाते हैं। समुद्र के इस तट तक पहुंचने वाली नदियां, सहस्राब्दियों तक अरावली के विमर्दित कणों को भी अपने साथ लाती रहीं। समुद्र का तटीय प्रदेश इन कणों से पटता रहा और समुद्र शनैः-शनैः मुख्य धरा से दूर जाता रहा। आज अरावली के उत्तुंग शिखर घिस-घिस कर अंतिम अवशेषों के रूप में विद्यमान हैं।

    सरस्वती तो कालिदास के समय में ही अंतःसलिला कहकर पुकारी जाने लगी थी। घग्घर, हाकड़ा, लवणाद्रि एवं जवाई आदि अधिकांश जल धाराएं भी सूख गई हैं। पर्वतीय अवरोध के हट जाने से इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम रह गई है किंतु वर्षाकाल में आज भी कुछ जलधाराएं अरावली की उपत्यकाओं से क्षुद्र जलराशि ग्रहण करके अपने प्राचीन पथ का अनुसरण करती हुई यहाँ तक पहुंच जाती हैं मानो पिछले जन्म की स्मृतियाँ अब भी शेष रह गई हों। वर्षाकाल में कुछ दिनों के लिए बहने वाली बची-खुची जलधाराएं, ऋग्वेद कालीन सरस्वती नदी की प्रमुख सहायक लवणाद्रि में आकर समाहित हो जाती हैं जो अब लूनी के नाम से विख्यात है।

    यह लूनी ही इन धाराओं का जल लेकर साहस पूर्वक आगे बढ़ती है किंतु उसका प्रवाह भी नेहड़ तक आते-आते समाप्त हो जाता है क्योंकि आगे की धरा ढलानमयी नहीं है। ऐसा लगता है मानो नदी के मन में आगे बढ़ने का उत्साह भंग हो गया हो और विगत करोड़ों वर्षों के अभ्यास के कारण यहाँ पहुंचकर नदी को समुद्र में समा जाने का भ्रम हो गया हो। लूनी का यह खारा जल नेहड़ क्षेत्र में यत्र-तत्र फैल जाता है। यह जल कई महीनों तक पड़ा-पड़ा सूखता रहता है।

    आज लूणी, विशाल मरुस्थलीय प्रसार को पार करके आती है। मंद गति होने के कारण अब यह अपने साथ बालुका कण तो नहीं ला पाती किंतु बालुका के लवण, लूणी के जल में घुलकर इस क्षेत्र तक पहुंच जाते हैं। यहाँ वरुणदेव तो सूर्यदेव का सानिध्य प्राप्त कर अंतरिक्ष को प्रस्थान कर जाते हैं किंतु उनके द्वारा लाए गए लवण इसी धरा पर शेष रह जाते हैं। शताब्दियों से इसी विधि से करोड़ों टन लवण इस क्षेत्र में पहुंचता रहा है। इसी लवण ने यहाँ की धरती को चांदी की तरह सफेद बना दिया है। इन लवणों के कारण वनस्पति का उद्भव इस क्षेत्र में नहीं हो पाता। इसी कारण मैंने इस भूमि की कल्पना अभिशप्त रजत पृष्ठ के रूप में की है। इस लवण-बहुल एवं पंक-बहुल क्षेत्र में कहीं-कहीं गह्वरों में एकत्र जलराशि सरोवरों की भांति दिखाई पड़ती है किंतु उनमें कोई जलचर अथवा पक्षी किल्लोल करते हुए दृष्टिगत नहीं होते।

    इतने घनीभूत लवण-सांद्र में जीवन के कोई चिह्न प्रकट होने का साहस नहीं कर पाते। जीवन जैसे यहाँ पराजय स्वीकार करता हुआ दिखाई पड़ता है। इस कारण नेहड़ शब्द की व्युत्पत्ति ‘नीर-हृत’ के स्थान पर ‘निषिद्ध’ से हुई जान पड़ती है क्योंकि यह क्षेत्र मानवों से लेकर पशु-पक्षी और वनस्पति तक के लिए निषिद्ध है। कुछ देर तक नेहड़ क्षेत्र में रुकने के पश्चात् हम लोग, खेजड़ियाली गाँव आ गए। वहाँ के सरपंच ने हमारा स्वागत किया और दोपहर के भोजन का प्रबंध भी। अतिथि सत्कार की भारतीय परम्परा यहाँ भी पूरे वैभव के साथ उपस्थित थी। हमें देखकर गांव के पच्चीस-तीस स्त्री-पुरुष सरपंच के घर के आहते में एकत्रित हो गए। उनसे हमें इस क्षेत्र के सम्बन्ध में कई आश्चर्यजनक बातें ज्ञात हुईं। थपलियालजी ने अपना ध्वन्यांकन यंत्र आरम्भ कर लिया ताकि वे अद्भुत बातें यंत्रबद्ध की जा सकें। खेजड़ियाली गांव भारत की सीमा पर स्थित अंतिम गांव है तथा इसी गांव में अंतिम भारतीय पुलिस चौकी स्थित है।

    यद्यपि खेजड़ियाली से आगे आकुड़िया गाँव भी स्थित है किंतु यह गाँव अब अतीत का भूला-बिसरा अध्याय मात्र ही रह गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन के फलस्वरूप आकुहिड़या गाँव के सभी निवासी सीमा के उस पर चले गए। वहीं उन्होंने नया गाँव बसा लिया। पाकिस्तान में बसे उस नए गाँव का नाम भी आकुड़िया है। भारत स्थित आकुड़िया गांव में अब कठिनाई से आठ-दस घरों की बस्ती शेष बची है।

    जहाँ से अभिशप्त रजत पृष्ठ नेहड़ आरम्भ होता है वहीं तक मनुपुत्रों की बस्तियाँ बसी हुई हैं और वहीं तक वनस्पति का प्रसार है। ये बस्तियाँ अत्यंत विरल हैं और दूर-दूर बसी हुई हैं। वर्षाकाल में जब लवणाद्रि, इस क्षेत्र में वर्षा का जल लेकर पहुंचती हैं तो वह पूरे उत्साह के साथ इन मानव बस्तियों को घेर लेती है। उस काल में पूरा क्षेत्र छोटे-छोटे टापुओं में बदल जाता है। चारों तरफ पानी ही पानी और उनके बीच जीता-जागता जीव एवं वनस्पति जगत। मानव बस्तियां एक दूसरे से पूरी तरह कटकर रह जाती हैं। जब तक यह पानी नहीं सूख जाता, मनुपुत्रों की ये बस्तियां शेष सृष्टि से कटी रहती हैं। मानो प्रलयंकारी जलवृष्टि के बीच नौकाच्युत होकर मनु, निर्जन गहन प्रदेश में आत्मावलोकन कर रहे हों।

    कभी-कभी तो यह अवधि चार से छः माह तक लम्बी हो जाती है। इस पूरे काल में जीवनयापन के लिए केवल बस्ती में उपलब्ध साधनों पर ही जीवित रहना पड़ता है। जैसे-जैसे पानी सूखता जाता है, लोगों का बाहरी विश्व से सम्पर्क पुनः आरम्भ हो जाता है। वर्षा-ऋतु आने पर पुनः यही पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार छः माह का दिन और छः माह की रात वाली उक्ति यहाँ चरितार्थ होती हुई प्रतीत होती है। वर्षाती नदियाँ अपना मार्ग सदैव बदलती रहती हैं। यही कारण है कि ये सदैव उसी मार्ग पर नहीं बहतीं जिस पर वे पिछले साल बहती थीं। नदियों का यह स्वभाव मानव बस्तियों को भी कोई छूट नहीं देता। हर वर्ष नदियों का जल किसी न किसी गांव में घुस जाता है।

    गांव चाहे कितनी ही ऊंचाई पर क्यों न बसाया गया हो, अवसर मिलते ही नदी गाँव में घुस जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि उछलती-कूदती नदी रात्रि के समय गांव में घुस आती है और किसी को भी अपने बचने का अवकाश नहीं देती। ऐसी स्थिति में कच्चे घर मानवों अथवा पशुओं को किसी प्रकार की सुरक्षा नहीं दे पाते। घर-द्वार, पशु, बाल-वृद्ध यहाँ तक कि बलिष्ठ स्त्री-पुरुष भी इसके प्रवाह में बह जाते हैं। असली कठिनाई के दिन ये ही होते हैं। जब नदी आती है, तब जो जहाँ होता है, उसे वहीं अपनी सुरक्षा का प्रबंध करना होता है। किसी को पलायन का अवसर प्राप्त नहीं होता।

    एकमात्र सहारा अल्प ऊँचाई वाले वृक्षों का ही रहता है। खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम तथा बबूल, प्रायः मानवों और पशुओं को शरण देने में असमर्थ रहते हैं। जो भाग्यशाली मनुष्य शरण पाने में समर्थ रहते हैं, उन्हें कई-कई दिन भूखे-प्यासे ही वृक्षों पर टंगे रहना पड़ता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में छोटे-छोटे बच्चे भी कुशल तैराक बन जाते हैं ताकि संकट के समय प्राणों की रक्षा कर सकें। शरद काल बीतते-बीतते नदी का जल सूखना आरम्भ हो जाता है तथा भूमि सपाट और सूखी दिखाई देने लगती है। ऐसी भूमि खतरनाक ढंग से धोखा देने वाली सिद्ध हो सकती है। क्योंकि यह ऊपर से तो सूखी हुई दिखाई देती है किंतु इसके नीचे दलदल जमी हुई होती है।

    इस दलदली भूमि में कोई मनुष्य एक बार फंस जाए तो उसका जीवित बचना कठिन होता है। जब शरद ऋतु आरम्भ होती है, तब ग्रामीण उन भूखण्डों पर गेहूँ, चना और सरसों के बीज बो देते हैं जो लवणों के प्रभाव से कम प्रभावित होते हैं। यह सेवज की फसल कहलाती है तथा वर्ष पर्यन्त भोजन उपलब्ध कराने योग्य उपज दे देती है। ग्रीष्म काल में जब जल एकदम नीचे स्थित भूखण्डों में सिमट जाता है, तब यहाँ के लोग पापड़ों में डालने वाला खार (सज्जी) बनाते हैं। यह खार कास्टिक सोड़ा, भोजन पदार्थों के परिरक्षकों, आयुर्वेदिक औषधियों एवं अन्य रसायनों के निर्माण में भी काम आता है। पशुपालन ही यहाँ के लोगों को प्रधान व्यवसाय है। सुप्रसिद्ध सांचौरी नस्ल की गायें इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में पाली जाती हैं जिनके विशाल वलयाकार शृंग-युग्मों को देखकर सिंधुघाटी सभ्यता के भीमाकाय वृषभों का स्मरण हो आता है।

    पिछले कुछ दशकों में नेहड़ से लगा पूरा क्षेत्र विलायती बबूलों से घिर गया है और दूर-दूर तक फैली हुई मानव बस्तियां उनके झुरमुटों में पूरी तरह छिप गई हैं। कहीं-कहीं तो ये क्षुप इतने घने हो गए हैं कि मानव तो दूर, पशु-पक्षी भी इनमें नहीं घुस सकते। तीक्ष्ण शूलों के कारण बबूल के पास से किसी प्राणी का निकलना कठिनाई को ही आमंत्रण देना है। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित होने, बहुत बड़े क्षेत्र के निर्जन प्रायः होने तथा मानव बस्तियों के घने बबूलों से छिपे रहने के कारण यहाँ तस्करी की व्यापक संभावनाएं बनती हैं। फिर भी यह क्षेत्र से होकर बहुमूल्य वस्तुओं की तस्करी नहीं की जाती। इसका मुख्य कारण है दलदल तथा बबूल। इन दोनों की उपस्थिति के कारण ऊंट तथा जीप दोनों ही इस क्षेत्र में अप्रभावी सिद्ध हो जाते हैं।

    इतना होने पर भी जब सीमा पर अन्य क्षेत्रों में कड़ाई हो जाती थी तो पाकिस्तान में बनी कृत्रिम भारतीय मुद्रा इसी मार्ग से भारत में आती थी और चांदी की सिल्लियां पाकिस्तान को जाती थीं। अब तो सीमा पर कांटों की बाड़ लग जाने से इस कार्य पर पूरी तरह रोक लग गई है। नेहड़ से लगा यह पूरा क्षेत्र विश्नोई बहुल क्षेत्र है। यह जाति, जीवदया एवं प्रकृतिप्रेम के लिए प्रसिद्ध है। इसी कारण यहाँ हरे वृक्ष सुरक्षित हैं तथा हरिण, शशक, नीलगाय आदि वन्य-प्राणी निर्भय होकर विचरण करते हैं। प्राकृतिक विषमताओं के उपरांत भी यहाँ के लोग निर्धन नहीं हैं। विश्नोइयों के अतिरिक्त अन्य लोग किंचित सीमा तक निर्धन कहे जा सकते हैं जो विलायती बबूल की झाड़ियों को काटकर लकड़ी का कोयला बनाते हैं। इस काम में भी हजारों लोगों का पेट पल जाता है।

    मच्छरों के कारण मलेरिया इस क्षेत्र में स्थाई रूप से बना रहता है। ग्रामवासियों से वार्तालाप में बहुत सा समय निकल गया। प्राची का पथिक, आकाश का चक्कर लगाकार पश्चिम में झुकने लगा था। उन लोगों की अद्भुत बातों से न अघाते हुए हम लोग भारी मन से लौटे। लौटते समय भी उसी लौह-अश्व (ट्रैक्टर) की सहायता ली गई। केरिया में हमारे साथी हमें विलम्ब हुआ जानकार चिंतित थे। उस रात हमने पुनः भीनमाल के उस डाक बंगले में रात्रि विश्राम किया और अगली सुबह जोधपुर के लिए रवाना हो गए। नेहड़ क्षेत्र की वह अद्भुत यात्रा आज पच्चीस वर्ष बाद भी मेरे मानस-पटल पर ज्यों की त्यों अंकित है। बरसों बाद इण्डोनेशिया के बीहड़ों में भटकते हुए भी मुझे नेहड़ का यह क्षेत्र रह-रह कर याद आता रहा। ढाई दशक के इस अंतराल में शरीर थकने लगा है किंतु मेरा यायावरी मन में आज भी ऐसे दुर्गम क्षेत्रों की यात्रा के लिए उत्साह की कमी नहीं आई है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : परिवहन सम्बन्धी तथ्य (31 मार्च 2020)

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 61

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : परिवहन सम्बन्धी तथ्य (31 मार्च 2020)

    सड़क परिवहन

    1. प्रश्नः राज्य में सड़कों की कुल लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 269028.16 किमी

    2. प्रश्नः राज्य में राष्ट्रीय उच्च मार्गों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 10618.09 किमी

    3. प्रश्नः राज्य में राज्य उच्च मार्गों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 15621.25 किमी

    4. प्रश्नः मुख्य जिला सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 8779.95 किमी

    5. प्रश्नः अन्य जिला सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 53791.52 किमी

    6. प्रश्नः ग्रामीण सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 180217.34 किमी

    7. प्रश्नः राज्य में सड़क घनत्व कितना है?(प्रति सौ वर्ग किमी क्षेत्र में सड़कों की लम्बाई)

    उत्तरः 78.61 किमी

    8. प्रश्नः डामर सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 218840.08 किमी

    9. प्रश्नः मेटल सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 4882.48 किमी

    10. प्रश्नः ग्रेवल सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 36751.82 किमी

    11. प्रश्नः मौसमी सड़कों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 8553.78 किमी

    12. प्रश्नः सड़कों से जुड़े कुल गाँव कितने हैं?

    उत्तरः 37632

    13. प्रश्नः राज्य में पंजीकृत वाहनों की संख्या कितनी है?

    उत्तरः 199.50 लाख

    14. प्रश्नः राज्य पथ परिवहन निगम द्वारा संचालित कुल बसें

    उत्तरः 5183

    15. प्रश्नः राज्य पथ परिवहन निगम द्वारा संचालित स्वयं की बसें

    उत्तरः 4259

    16. प्रश्नः राज्य पथ परिवहन निगम द्वारा संचालित अनुबंधित बसें

    उत्तरः 924

    17. प्रश्नः प्रतिदिन संचालन

    उत्तरः 10.62 लाख किमी

    18. प्रश्नः राज्य पथ परिवहन निगम द्वारा प्रतिदिन यात्री परिहवन

    उत्तरः 5.26 लाख राष्ट्रय राजमार्ग की जिलेवार स्थिति

    1. राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या लम्बाई जिले जिनसे होकर राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है

    2. 15 906 गंगानगर, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर एवं जालौर

    3. 8 635 अलवर, जयपुर, अजमेर, राजसमंद, उदयपुर एवं डूँगरपुर

    4. 11 531 भरतपुर, दौसा, जयपुर, सीकर, चूरू, बीकानेर

    5. 12 400 जयपुर, टोंक, बूँदी, कोटा, झालावाड़।

    6. 14 310 अजमेर, पाली, सिरोही।

    7. 11 ए 145 जयपुर, दौसा।

    8. 3 32 धौलपुर।

    9. 112 343 बाड़मेर, जोधपुर।

    10. 114 180 जोधपुर, जैसलमेर।

    11. 11 बी 180 दौसा, करौली, धौलपुर।

    12. 113 200 चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा।

    13. 116 80 टोंक, सवाईमाधोपुर।

    14. 65 450 जोधपुर, पाली।

    15. 71 बी 05 अलवर।

    16. 79 220 अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़।

    17. 79 ए 35 अजमेर।

    18. 89 300 बीकानेर, नागौर, अजमेर।

    19. 90 100 बाराँ, झालावाड़।

    20. 76 480 बाराँ, कोटा, बूँदी, चित्तौड़गढ़ एवं उदयपुर।

    21. 3 ए 66 धौलपुर।

    22. 11 सी 53 जयपुर।

    23. 65 ए 224 नागौर, सीकर, पाली।

    24. 76 ए 72 उदयपुर, सिरोही

    25. 76 बी 160 राजसमन्द, भीलवाड़ा, नागौर।

    26. 116 ए 266 राजसमन्द, भीलवाड़ा, जयपुर, बूँदी, टोंक

    27. 158 174 नागौर, बूँदी, भीलवाड़ा, जयपुर

    28. 162 (एक्सटेंशन) 250 नागौर, पाली, राजसमन्द, उदयपुर।

    29. 709 60 झुंझुनूं।

    30. 927 ए 273 बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर, कोटा, सिरोही। राज्य से होकर गुजरने वाले प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग

    31. प्रश्नः राजस्थान में राष्ट्रीय राजमार्ग की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 7806.2 किमी।

    32. प्रश्नः राजस्थान में सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग कौनसा है?

    उत्तरः एनएच 15, लम्बाई 906 किमी।

    33. प्रश्नः राजस्थान में सबसे छोटा राष्ट्रीय राजमार्ग कौनसा गुजरता है?

    उत्तरः 71 बी, यह अलवर जिले में केवल पांच किमी के लिये राजस्थान में प्रवेश करता है।

    34. प्रश्नः राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना की तीन बड़ी योजनाएँ कौनसी हैं?

    उत्तरः 1. स्वर्णिम चतुर्भुज, 2. पूर्वी-पश्चिमी कोरीडोर तथा 3. उत्तर दक्षिण कोरीडोर।

    35. प्रश्नः राजस्थान से स्वर्णिम चतुर्भुज, पूर्वी-पश्चिमी कोरीडोर तथा उत्तर दक्षिण कोरीडोर कितनी लम्बाई में गुजरते हैं?

    उत्तरः 1. स्वर्णिम चतुर्भुज- 677 किमी

    2. पूर्वी-पश्चिमी कोरीडोर- 528 किमी

    3. उत्तर दक्षिण कोरीडोर- 28 किमी। राज्य में सड़क विकास हेतु चलाये जा रहे कार्यक्रम

    36. प्रश्न - पीपीपी से क्या आशय है?

    उत्तर - पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का संक्षिप्त नाम पीपीपी है। इसके अंतर्गत सरकार तथा निजी क्षेत्री की संयुक्त भागीदारी में काम किया जाता है

    37. प्रश्न - शहरी गौरव पथ योजना क्या थी?

    उत्तर - वसुंधरा राजे सरकार ने अपने पहले कार्यकालमें शहरों में गौरव पथ विकसित किये थे।

    38. प्रश्न - ग्रामीण गौरव पथ योजना क्या है?

    उत्तर - वर्ष 2014 में राज्य सरकार ने ग्रामीण गौरव पथ योजना आरम्भ की। इसके अंतर्गत ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर 0.5 से 2 किलोमीटर लम्बी सीमेंट-कंक्रीट सड़कों का निर्माण किया जायेगा। इसके अंतर्गत तीन वर्षो में 1800 करोड़ रुपये व्यय किये जायेंगे। प्रथम चरण में 2,154 ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर 1113 करोड़ रुपये की लागत से 2,119 किलोमीटर लम्बाई में ग्रामीण गौरव पथों का निर्माण किया जायेगा।

    39. प्रश्नः तीसरे चरण में कौनसे एक्सप्रेस वे बनेंगे?

    उत्तरः (1.) चित्तौड़गढ़-पाली एक्सप्रेस वे - 150 किमी (2.) पाली-फतहपुर एक्सप्रेस वे - 315 किमी (3.) फतहपुर-हिसार एक्सप्रेस वे - 175 किमी

    40. प्रश्नः वर्तमान में देश के कुल सड़क नेटवर्क में राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा कितना है?

    उत्तरः 2 प्रतिशत

    41. प्रश्नः राष्ट्रीय राजमार्ग पर कितना सड़क यातायात संचालित होता है?

    उत्तरः 40 प्रतिशत 25. प्रश्नः राज्य में सड़क तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये कितने हाईवे निर्माण का कार्य आरम्भ किया गया है? उत्तरः 3,590 करोड़ रुपये की लागत से 2,630 किलोमीटर लम्बाई के 16 हाईवे निर्माण के कार्य हाथ में लिये हैं।

    42. प्रश्नः राज्य में छः लेन सुरंग कहाँ बनाई गई है?

    उत्तरः बूँदी बाईपास सुरंग। राज्य में मेगा हाईवे का निर्माण क्र.सं. परियोजना का नाम लम्बाई (किमी. में) लागत (करोड़ रुपये में)            जयपुर-जोबनेर-कुचामन-नागौर-फलौदी 366 529

      कोटपूतली-नीम का थाना-सीकर-कुचामन 193 285

    . भरतपुर-अवर-बहरोड़-नारनोल 167 249

      मथुरा (राज्य सीमा)-भरतपुर-भाड़ोती 185 421

      चौमूं से महला वाया रेनवाल-जोबनेर 82 162

      रावतसर-नोहर-भादरा-हिसार(राज्य सीमा) 118 226

      नसीराबाद-केकड़ी-देवली-जहाजपुर-माण्डलगढ़ 168 345

      कीरकीचौकी-सलूम्बर-आसपुर-डूँगरपुर- सरथुना 167 239

      रतलाम (राज्य सीमा)-बाँसवाड़ा 38 117

      रेवाड़ी (राज्य सीमा)-सांगाना-झुंझुनूं-फतेहपुर- लक्ष्मणगढ़-सालासर 114 98

      रोहट-जालौर-रामसीन-रेवदर 178 128

      सार्दुलशहर (पंजाब राज्य सीमा)- टिब्बी- ऐलनाबाद (हरियाणा सीमा) 79 94

      सिरसा (हरियाणा)-राजगढ़-झुंझुनूं-उदयपुरवाटी- रींगस-खाटू श्यामजी 245 174

      लूणकरणसर-श्रीडूंगरगढ़-सरदारशहर-तारानगर-राजगढ़ 216 168

      मेड़ता-गोटन-पीपाड़ सिटी- जोधपुर 102 73

      जयपुर-फागी-मालपुरा-केकड़ी-शाहपुरा-माण्डल 212 282


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  • राजाओं को दबाने के लिये अंग्रेजों ने जागीरदारों से दोस्ती गांठ ली

     02.06.2020
    राजाओं को दबाने के लिये अंग्रेजों ने जागीरदारों से दोस्ती गांठ ली

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    1857 के विद्रोह में देशी राज्यों के जागीरदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख भूमिका निभायी थी इसलिये अंग्र्रेज उनकी वास्तविक शक्ति को समझ गये थे। अब उन्होंने जागीरदारों से उस उपकरण के रूप में काम लेने का निर्णय किया जिसके द्वारा वे देशी राजाओं पर नकेल कस सकते थे। यही कारण है कि ई.1858 के बाद से देशी राज्यों के जमींदारों के प्रति अंग्रेज शासकों का रवैया मैत्रीपूर्ण रहा। उन्हें प्रसन्न रखने के लिये अंग्रेजों ने उनके हितों और विशेषाधिकारों की रक्षा की। उन्हें सम्मानित किया तथा उपाधियां प्रदान कीं। अनेक स्थानों पर उनसे छीनी गयी भूमि उन्हें वापिस दे दी। जमींदारों के बेटों और रिश्तेदारों को उच्च पदों पर नियुक्त किया जिसके कारण एक ओर तो वे अंग्रेजों के स्वामिभक्त हो गये और दूसरी ओर राजाओं का भय भुलाकर जनता के दोहरे शोषण पर उतर आये।

    जागीरदारों पर भी अंग्रेज अधिकारियों ने स्वयं अपना शिकंजा कस लिया था। जागीरदारों को राज्य से बाहर जाने के लिये पोलिटिकल एजेंटों से अनुमति लेनी पड़ती थी। यदि राजा किसी जागीरदार को राज्य से बाहर जाने के लिये रोकना चाहता तो वह भी जागीरदार को सीधे आदेश देने के बजाय पोलिटिकल एजेंट के माध्यम से ही कह सकता था। दिसम्बर 1899 में महाराजा गंगासिंह ने अपने जागीरदार भैंरूसिंह को राज्य से बाहर जाने से रोकने के लिये पोलिटिकल एजेंट को पत्र लिखा कि चूंकि जागीरदार के विरुद्ध जांच चल रही है इसलिये उसे राज्य से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जाये।

    यदि राजा लोग अपने जागीरदारों के विरुद्ध कार्यवाही करने का प्रयास करते तो ये जागीरदार वायसराय की शरण में चले जाते और राजा उन जागीरदारों के विरुद्ध कुछ नहीं कर पाता था। ई.1904 में जब बीकानेर नरेश गंगासिंह ने अपने जागीरदारों बीदासर के हुकुमसिंह, अजीतपुरा के भैरूंसिंह तथा गोपालपुरा के ठाकुर रामसिंह को गैर कानूनी रूप से सभायें आयोजित करने का दोषी पाया और उनके विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाही करनी चाही तो ये लोग, लॉर्ड कर्जन की शरण में चले गये। कर्जन ने ए.जी.जी. से रिपोर्ट मांगी तथा महाराजा को आदेश दिया कि वे अपने निर्देश बदल दें।

    राजपूताने के देशी राज्यों में भूमि का काफी बड़ा हिस्सा जागीरों के अधीन था। जागीर क्षेत्र के किसानों को खालसा क्षेत्र के किसानों की भांति न तो वंशानुगत और न ही स्थायी अधिकार प्राप्त थे। उन्हें किसी भी समय भूमि से बेदखल किया जा सकता था। किसी भी जागीर में भूमि बंदोबस्त जैसी व्यवस्था लागू नहीं की गयी थी। बड़े जागीरदार किसानों से कुल पैदावार का एक तिहाई हिस्सा और प्रति परिवार से दस रुपये से बीस रुपये तक वार्षिक नगद वसूल करते थे। छोटे जागीरदार किसानों से सामान्यतः आधा हिस्सा और अपनी सेवा में नियुक्त तथा बेगार में काम करने वालों से चौथाई हिस्सा भूमि कर लेते थे। ब्राह्मण और राजपूत जाति के लोग बेगार से मुक्त थे।

    जागीरदार लोग किसानों से विभिन्न प्रकार की लाग-बाग वसूलते थे। खालसा क्षेत्र में भूमि बंदोबस्त के बाद लाग-बाग बंद कर दी गयी थी किंतु जागीरदार लोग इन्हें लागू किये हुए थे। अंग्रेजी संरक्षण के प्रभावस्वरूप जब जागीरदारों के आर्थिक क्षेत्र के अधिकार कुछ विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया तो वे उसकी पूर्ति भूमिकर बढ़ाकर तथा मनचाही लाग-बाग वसूल कर किसानों का शोषण करने लगे। इससे जागीर क्षेत्र के किसानों की हालत खालसा क्षेत्र के किसानों की अपेक्षा गिरती चली गयी।

    इस काल में सामंती प्रणाली के स्वरूप में परिवर्तन भी कृषकों की खराब स्थिति का कारण बना। यह परिवर्तन जीगरदारों और ठिकानेदारों की धातु मुद्रा की बढ़ती हुई आवश्यकता के फलस्वरूप हुआ था। राजा द्वारा सामंत चाकरी को नगद राशि में बदल दिये जाने और वकील कोर्ट्स द्वारा जागीरदारों पर जुर्माना निर्धारित करने से इन सामंतों में मुद्रा की मांग और अधिक बढ़ गयी।

    सामंतों में बढ़ती अकर्मण्यता और विलासिता के कारण उनके खर्चे भी बढ़ गये थे जिन्हें केवल नगद मुद्रा से ही पूरा किया जा सकता था। विदेशी शराब तथा पश्चिमी शैली के फर्नीचर नगद मुद्रा से ही क्रय किये जा सकते थे। अनेक सामंतों ने राज्यों की राजधानियों में अपनी हवेलियां बना ली थीं जिनके निर्माण एवं रख-रखाव के लिये विपुल मुद्रा व्यय की गयी थी। यही कारण था कि किसानों का पर्याप्त शोषण करने के बावजूद इस काल में अधिकांश जागीरदार कर्जदार हो गये थे।

    अंग्रेजी शासन काल में करों की भयावह स्थिति का चित्र खींचते हुए अंबेडकर ने लिखा है- मुसलमान शासक भी जमीन पर भारी कर लगाते थे किंतु उनमें और अंग्रेजों में अंतर यह था कि मुसलमान शासक जितना कर लगाते थे, उतना कभी वसूल नहीं कर पाते थे। इसके विपरीत अंग्रेज जितना टैक्स लगाते थे, उसे कड़ाई के साथ वसूल कर लेते थे।

    बीसवीं सदी के आरंभ होने तक स्थिति यह हो गयी थी कि प्रत्येक ठिकाने में लाग-बाग की संख्या अलग-अलग हो गयी थी और उनके नाम भी अलग-अलग थे। कोई भी ठिकानेदार कभी भी अपने किसानों पर किसी भी तरह की लाग-बाग आरंभ कर सकता था। लाग-बाग न मिलने पर जागीरदारों द्वारा किसानों को पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर उनका सामाना बाहर फिंकवा देना आम बात थी। एक ओर तो किसान के लगान और लागत भी पूरे नहीं चुक पाते थे और दूसरी ओर उसके पास वर्ष भर खाने के लिये भी कुछ नहीं बचता था। ऐसी स्थिति में किसानों का आंदोलन की राह पकड़ लेना स्वाभाविक ही था।

    जागीरदारों ने निरीह जनता के शोषण के लिये बेगार और गुलामी की कई प्रथायें प्रचलित कर रखी थीं। जागीरदारों के अधीन आने वाले किसानों के नागरिक अधिकारों का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। किसान तथा अन्य ग्रामीण, ठाकुर के मकान के सामने से जूते पहनकर नहीं निकल सकते थे। उन्हें पैरों में स्वर्ण पहनने का अधिकार नहीं था। वे घोड़े पर नहीं बैठ सकते थे। अब जागीरदार राजा को बताये बिना विभिन्न प्रकार के कर लगाने लगे थे। बहुत से जागीरदार जब अपनी जागीर में लौटते थे तो ढोल नगाड़े बजाकर जनता को सूचित किया जाता था कि जागीरदार साहब अपने ठिकाणे में आ गये हैं।

    देशी राज्यों का व्यापारी वर्ग भी सामंती जुल्मों से मुक्त नहीं रह सका था इस कारण उन्हें बड़ी संख्या में अंग्रेजी भारत के प्रांतों में चले जाना पड़ा था। अंग्रेजों ने व्यापारियों को अनेक रियायतों की घोषणा की थी। अनेक व्यापारी विदेशी सामान के ऐजेण्ट बन गये थे। रेल सुविधा के आरंभ हो जाने तथा अंग्रेजों द्वारा संरक्षण दिये जाने से राजपूताने के देशी राज्यों के अनेक व्यापारियों ने कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास आदि महानगरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान कायम कर लिये थे।

    जब किसी व्यापारी को जागीरदार के प्रतिबंधों के कारण देशी राज्य से निकलने में कठिनाई आती थी तो अंग्रेज पोलिटिकल अधिकारी व्यापारी को वहाँ से निकलने में मदद करते थे। राज्य से बाहर चले जाने वाले व्यापारी जागीरदारों और सामंती जुल्मों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे थे। पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने तथा अंग्रेजों का संरक्षण मिल जाने के फलस्वरूप व्यापारी वर्ग शक्तिशाली होता जा रहा था।

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  • राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी

     02.06.2020
     राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी

     राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी


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    राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी ब्रिटिश भारत के स्वतंत्रता संग्राम से बहुत भिन्न है। जहाँ ब्रिटिश भारत को केवल अंग्रेजी शासकों से संघर्ष करना पड़ा, वहीं राजस्थान की रियासतों के निवासियों को जागीरदारों और उनके कारिंदों, राजाओं और राज परिवार के सदस्यों तथा ब्रिटिश हुक्मरानों से चौतरफा संघर्ष करना पड़ा। यही कारण है कि राजस्थान का स्वतंत्रता संग्राम चार आंदोलनों के रूप में चला। पहला किसान आंदोलन दूसरा जनजातीय आंदोलन, तीसरा क्रांतिकारी आंदोलन और चौथा प्रजा मण्डल आंदोलन।

    जागीरदारों के विरुद्ध जो संघर्ष हुआ उसे किसान आंदोलनों के रूप में देखा जाता है। ये आंदोलन जागीरदारों तथा उनके कारिंदों द्वारा किये जा रहे शोषण से मुक्ति पाने तथा करों में कमी करवाने के लिये हुए। इन आंदोलनों की शुरुआत मेवाड़ राज्य के बिजौलिया से ठिकाने से हुई। यह आंदोलन ई.1897 से लेकर ई.1941 तक चला। इस आंदोलन ने राज्य की जनता में स्वतंत्रता का शंख फूंका। माणिक्यलाल वर्मा आरंभ से ही इस आंदोलन से जुड़ गये। ई. 1916 में इस आंदोलन का नेतृत्व गुर्जर नेता विजयसिंह पथिक ने अपने हाथों में ले लिया। पथिक ने किसानों से प्रथम विश्वयुद्ध के लिये बलपूर्वक वसूले जा रहे वारफण्ड के चंदे का विरोध किया।

    उनके सहयोगी माणिक्यलाल वर्मा, साधु सीताराम, सीतारामदास, भंवरलाल सुनार और प्रेमचंद भील आदि ने 
    गाँव-गाँव जाकर किसानों का आह्वान किया कि वे वारफण्ड के लिये चंदा न दें। बिजौलिया किसान आंदोलन के दूसरे चरण में विजयसिंह पथिक ने बारीसल गाँव में किसान पंचायत बोर्ड की स्थापना कर किसानों को शक्तिशाली रूप से संगठित किया। ई. 1921 में बेगूं के किसानों ने अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई। विजयसिंह पथिक ने इस आंदोलन में  भी प्रमुख भूमिका निभाई।

    विजयसिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। वे उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुलावठी गाँव के रहने वाले थे। इनका पूरा परिवार ही क्रांतिकारी था। इनके पिता का देहांत बालक भूपसिंह के बाल्काल में ही हो गया था। इसके बाद वे अपने चाचा बलदेवसिंह के सम्पर्क में आये। वे क्रांतिकारी थे और रासबिहारी बोस के दल से जुड़े हुए थे। भूपसिंह को राजपूताने में गोपालसिंह खरवा, केसरीसिंह बारहठ और प्रतापसिंह बारहठ के सहयोग के लिये भेजा गया। वे अपने बहनोई के साथ राजस्थान के किशन गढ़ आये। गोपालसिंह खरवा के साथ बनायी गयी सशस्त्र क्रांति योनजा की असफलता के बाद अंग्रेज सरकार ने 
    उन्हें बंदी बनाकर टॉडगढ़ में रखा किंतु वे जेल से भाग निकले और अपना नाम बदल कर विजयसिंह पथिक के नाम से मेवाड़ के ठिकानों में घूमते रहे। 

    ई. 1926 में पं. नयनूराम, रामनारायण चौधरी एवं हरिभाई किंकर के नेतृत्व में बूंदी के किसानों ने लाग-बाग व बैठ बेगार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा। शेखावाटी क्षेत्र के जागीरदार भी किसानों पर अत्याचार करने में पीछे नहीं रहे। ई. 1922 में मास्टर प्यारेलाल गुप्ता ने चिड़ावा में अमर सेवा समिति की स्थापना की। मास्टर प्यारेलाल गुप्ता उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले का रहने वाला था तथा चिड़ावा का गांधी कहलाता था। उसी साल खेतड़ी नरेश अमरसिंह ने चिड़ावा का दौरा किया। खेतड़ी नरेश की सेवा के लिये जब अमर सेवा समिति के सदस्यों को बेगार के लिये बुलाया गया तो सदस्यों ने बेगार करने से मना कर दिया। पुलिस ने मास्टर सहित समिति के सात सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें घोड़ों के पीछे बांध कर घसीटा गया तथा खेतड़ी की जेल में ठूंस दिया गया जहाँ वे तीन दिन तक बिना अन्न जल के बेहोश पड़े रहे। चिड़ावा अत्याचार की सूचना पूरे देश में बिजली की तरह फैल गयी। चांदकरण शारदा तत्काल चिड़ावा आये और लोगों को इन अत्याचारों के विरुद्ध तनकर खड़े रहने का आह्वान किया। सेठ जमनालाल बजाज, सेठ घनश्याम दास बिड़ला तथा सेठ वेणी प्रसाद डालमियां आदि नेताओं ने खेतड़ी के राजा को कठोर चिट्ठियां लिखकर विरोध जताया। अंत में सभी कैदियों को छोड़ दिया गया।

    राजस्थान की जनजातियों में भील, मीणा तथा गरासिया प्रमुख रही हैं। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा सिरोही जिलों में भील अधिक संख्या में हैं। जयपुर तथा अलवर क्षेत्र में मीणों की संख्या अधिक है। भीलों में जागृति की विचारधारा फैलाने वालों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नाम गुरु गोविंद का है। इनका जन्म ई.1858 में डूंगरपुर जिले के बांसिया गाँव में एक बणजारे के घर में हुआ था। ई.1883 में गोविंद गिरि ने सम्पसभा की स्थापना की तथा मेवाड़, डूंगरपुर, गुजरात, मालवा आदि क्षेत्रों के भील एवं गरासियों को संगठित करने का प्रयास किया। उन्होंने जन जातियों में व्याप्त बुराईयों एवं कुरीतियों को दूर करने के लिये भरसक प्रयास किये तथा अपने अधिकारों के प्रति भी सजग किया। आश्विन सुदी पूर्णिमा को सम्प सभा का अधिवेशन मेले के रूप में होता था। ई. 1913 में जब इसका सम्मेलन हो रहा था तब अंग्रेजी सेना ने सम्मेलन स्थल को घेर लिया तथा गोलियों की बौछार आरंभ कर दी जिससे 1 हजार 500 आदिवासी घटना स्थल पर ही मारे गये। हजारों आदिवासी घायल हो गये। गोविंदगिरि तथा उनकी पत्नी को बंदी बना लिया गया तथा उन्हें 10 वर्ष तक जेल में ही रखा गया।

    आदिवासी जातियों के दूसरे प्रसिद्ध नेता मोतीलाल तेजावत थे। वे ई. 1886 में कलासिया क्षेत्र के कोलियारी गाँव में ओसवाल परिवार में जन्मे थे। तेजावत के प्रयासों से मेवाड़ के आदिवासियों में जागरूकता आयी और वे बुराईयों को त्याग कर अत्याचारों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। उन्होंने भी लाग-बाग, बैठ-बेगार आदि के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजा दिया। मोतीलाल तेजावत का आंदोलन एकी आंदोलन के रूप में विख्यात हुआ क्योंकि वे एकता पर बहुत अधिक जोर देते थे। 1921 में इस आंदोलन से जुड़े नौ हजार आदिवासियों एवं किसानों ने उदयपुर की बड़ी पाल पर जमावड़ा किया तथा महाराणा को संदेश भिजवाया कि महाराणा बड़ी पाल पर आकर आदिवासियों एवं किसानों कि समस्या सुनें। महाराणा ने आने से मना कर दिया। इस पर आदिवासियों एवं किसानों ने वहाँ से नहीं हटने का निर्णय लिया। अंत में महाराणा को बड़ी पाल पर आकर उनकी समस्याएं सुनीं तथा 21 में से 18 मांगें तत्काल मान लीं। इसके बाद एकी आंदोलन को व्यापक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। यह आंदोलन मेवाड़ से निकल कर राजपूताना एवं गुजरात की अन्य रियासतों तक पहुंच गया।

    ई. 1921 में तेजावत ने विजयनगर रियासत के नीमड़ा गाँव में आदिवासियों का सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में रियासत की सेना ने आदिवासियों पर गोलियां चलायीं तथा 1200 आदिवासियों को मार डाला। तेजावत के पैर में गोली लगी किंतु वे 7 वर्ष तक भूमिगत रहे। मेवाड़ के महाराणा ने तेजावत को जीवित या मृत पकड़ कर लाने वाले को पुरस्कार देने की घोषणा की। तेजावत पकड़ में नहीं आये तथा आंदोलन अपनी गति से चलता रहा। अंत में 1929 में मोहनदास गांधी की अपील पर तेजावत ने ईडर की पुलिस के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया।

    राजस्थान में क्रांतिकारी गतिविधियों के जनक ठाकुर केसरीसिंह बारहठ थे। उनका पूरा परिवार ही देश को आजाद करवाने के लिये बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ गया। रास बिहारी बोस तथा शचीन्द्र सान्याल के सहयोगी विजयसिंह पथिक ने भी उत्तर प्रदेश से राजपूताना में आकर मेवाड़ रियासत को अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का ठिकाना बनाया। अर्जुनलाल सेठी, प्रतापसिंह बारहठ, जोरावरसिंह बारहठ, गोपालसिंह खरवा तथा दामोदर दास राठी भी राजपूताने में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रणेता रहे। राजस्थान में आजादी की असली लड़ाई प्रजामण्डल आंदोलन के रूप में चली।

    ज्वाला प्रसाद : 
    ज्वाला प्रसाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपना अड्डा अजमेर में जमाया। अंग्रेजों ने ज्वाला प्रसाद को बंदी बना लिया गया। ई. 1938 के अंतिम दिनों में वे जेल से मुक्त हुए। नागौर के नरसिंह दास अग्रवाल बाबाजी के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों तथा क्रांतिकारियों के परिवारों एवं उनके बालकों की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा और शादी विवाह करवाने का कार्य हाथ में लिया। आजादी मिलने तक बाबाजी यह कार्य करते रहे। ई. 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने पर बाबाजी को दो साल की कठोर कारावास की सजा मिली। इस पर बाबाजी ने न्यायालय में गरज कर कहा कि मेरा पेशा विदेशी सरकार को नष्ट करना है। इसलिये मुझे फांसी पर चढ़ा दो अन्यथा मैं जेल से बाहर आकर फिर से यही कार्य करूंगा। 

    ठाकुर केसरीसिंह बारहठ : ठाकुर केसरीसिंह बारहठ का जन्म 21 नवम्बर 1872 को भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा कस्बे के पास देवपुरा गाँव में हुआ। वे हिंदी संस्कृत, बंगला, पाली, मराठी, गुजराती, ज्योतिष, दर्शन और राजनीति के उद्भट विद्वान माने जाते थे किंतु उनकी सर्वाधिक प्रसिद्धि एक क्रांतिकारी के रूप में हुई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उदयपुर में हुई। उसके पश्चात् वे मेवाड़ राज्य की सेवा में चले गये। कुछ समय बाद कोटा के महाराव ने उन्हें अपने पास बुला लिया। इस बीच उनका सम्पर्क रास बिहारी बोस व अन्य क्रांतिकारियों से हुआ। उन्होंने कोटा में क्रांतिकारियों के एक दल का गठन किया।

    ई. 1903 में लार्ड कर्जन ने एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर दिल्ली में भारतीय राजाओं का दरबार आयोजित किया तो उसमें उदयपुर के महाराणा फतहसिंह को भी आमंत्रित किया गया। जब महाराणा विशेष ट्रेन से उदयपुर जा रहे थे तब मार्ग में केसरीसिंह ने उन्हें 13 सोरठों की ‘‘चेतावणी के चूंगटिये’’ नामक रचना भेंट की जिसमें महाराणा के पुरखों की प्रशस्ति का गान करते हुए महाराणा को धिक्कारा गया था। इस रचना को पढ़कर महाराणा का स्वाभिमान जाग उठा और उन्होंने दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया। ई. 1914 में केसरीसिंह को दिल्ली षड़यंत्र काण्ड में बंदी बना लिया गया तथा 20 वर्ष के लिये जेल भेज दिया गया। पाँच वर्ष का कारावास भोगने के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

    अर्जुनलाल सेठी : अर्जुनलाल सेठी का संबंध रासबिहारी बोस, शचीन्द्र सान्याल एवं मास्टर अमीचंद जैसे क्रांतिकारियों से था। जब ई. 1915 में देशव्यापी सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी जा रही थी तब राजस्थान में इस क्रांति का जिम्मा केसरीसिंह बारहठ, खरवा ठाकुर गोपालसिंह खरवा, ब्यावर के सेठ दामोदर दास राठी और जयपुर के अर्जुनलाल सेठी को सौंपा गया। सेठी का यह कार्य था कि वे अपने विद्यालय में नवयुवकों को क्रांति के लिये तैयार करें। खरवा के ठाकुर राव गोपालसिंह और विजयसिंह पथिक को राजस्थान से अस्त्र-शस्त्र खरीदकर बंगाल, बिहार, पंजाब तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों में कार्यरत क्रांतिकारियों को भेजने की जिम्मेदारी दी गयी। केसरीसिंह बारहठ, गोपालसिंह खरवा तथा दामोदर दास राठी को नसीराबाद एवं ब्यावर पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गयी। गोपालसिंह दो हजार क्रांतिकारियों के साथ खरवा रेलवे स्टेशन के पास जंगल में जा छिपे। सरकारी गुप्तचर तंत्र को इस योजना का पता लग गया जिससे योजना ध्वस्त हो गयी।

    जयनारायण व्यास : प्रजामण्डल आंदोलन से जुड़े हुए नेताओं में जयनारायण व्यास का जन्म 18 फरवरी 1899 को जोधपुर में एक साधारण पुष्करणा परिवार में हुआ था। वे 1921 से स्वतंत्रता आंदोलन तथा प्रजामंडल आंदोलन से जुड़ गये। जोधपुर रियासत की ओर से उन पर कई अत्याचार किये गये। वे पाँच बार जेल गये। 1939 से 1949 तक वे अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के महामंत्री भी रहे। 1948 में वे जोधपुर रियासत की लोकप्रिय सरकार के मुख्यमंत्री बनाये गये। हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में बनी राजस्थान की पहली लोकप्रिय सरकार के पतन के बाद 26 अप्रेल 1951 को जयनारायण व्यास राजस्थान के दूसरे मुख्यमंत्री बने किंतु 1952 के आम चुनावों में वे चुनाव हार गये। अगस्त 1952 में वे किशनगढ़ से उपचुनाव जीत गये जिससे 1 नवम्बर 1952 को वे फिर से मुख्यमंत्री चुन लिये गये। उन्होंने अखंड भारत, तरुण राजस्थान और अंग्रेजी पत्र ‘‘पीप’’ का संपादन किया। उनका निधन 14 मार्च 1963 को दिल्ली में हुआ।

    जोरावारसिंह बारहठ: भीलवाड़ा के शाहपुरा कस्बे के ठाकुर केसरीसिंह बारहठ के अनुज जोरावरसिंह बारहठ ने 23 दिसम्बर 1912 को भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग्ज पर बम फैंका। वायसराय घायल हो गया तथा उनके हाथी का महावत मारा गया। जोरावरसिंह को पकड़ने के लिये अंग्रेज सरकार ने कई इनामों की घोषणा की किंतु वे आजन्म पकड़ में नहीं आये तथा 27 वर्ष तक गुप्त रहकर देश की आजादी के लिये कार्य करते रहे। सन् 1939 में अज्ञातवास में ही उनका निधन हुआ।

    दिल्ली बम काण्ड में लिप्त मास्टर अमीचंद, अवध बिहारी, बसंत कुमार बिस्वास एवं बाल 
    मुकुंद को 8 मई 1915 को दिल्ली में फांसी की सजा दी गयी।

    प्रतापसिंह बारहठ: भीलवाड़ा के शाहपुरा कस्बे के ठाकुर केसरीसिंह बारहठ के पुत्र प्रतापसिंह बारहठ का जन्म ई. 1893 में हुआ। उन्होंने वयस्क होने से पहले ही मात्र 15 वर्ष की आयु में मास्टर अमीचंद तथा रासबिहारी बोस के साथ क्रांतिकारी गतिविधियां आरंभ कीं। प्रतापसिंह को लार्ड हार्डिंग्ज पर बम फैंकने के आरोप में पकड़ा गया किंतु आरोप सिद्ध नहीं होने से छोड़ दिया गया। 31 मार्च 1914 को केसरी सिंह बारहठ तथा उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम गिरफ्तारी वारंट निकला। गिरफ्तारी से बचने के लिये जब प्रताप रेलमार्ग से जोधपुर आ रहा था तब आसारानाडा के स्टेशन मास्टर ने उन्हें पहचान लिया। यह स्टेशन मास्टर प्रतापसिंह तथा उनके परिवार से भली भांति परिचित था। उसने प्रतापसिंह के प्रति अपनत्व का ढोंग रचा तथा फुसला कर अपने घर ले गया। कपटी स्टेशन मास्टर ने प्रतापसिंह को पुलिस के हवाले कर दिया। बाद में उन्हें बनारस षड़यंत्र केस में पाँच वर्ष की सश्रम कारावास की सजा हुई। जब अंग्रेजों ने रासबिहारी बोस के भेद लेने के लिये उनसे कहा कि उनकी माँ उनके लिये रो रही है तब बालक प्रतापसिंह ने अंग्रेज अधिकारियों को जवाब दिया कि मेरी माँ को रोने दो जिससे किसी अन्य माँ को न रोना पड़े। अपनी माँ को हँसाने के लिये मैं हजारों माताओं को रुलाना नहीं चाहता।

    प्रतापसिंह की विलक्षण प्रतिभा तथा र्धर्य के सामने सी. आई. डी. के डायरेक्टर का मस्तिष्क भी चकरा गया। उसने अपनी डायरी में लिखा है कि मैंने आज तक ऐसा युवक नहीं देखा। जेल में दी गयी यातनाओं के कारण मात्र 25 वर्ष की आयु में वे 27 मई 1918 को जेल में ही चल बसे।

    बाल मुकुंद बिस्सा: बाल मुकुंद  बिस्सा का जन्म 1908 में डीडवाना तहसील के पीलवा गाँव में एक सामान्य पुष्करणा परिवार में हुआ। 1934 में उन्होंने जोधपुर में राजस्थान चर्खा एजेंसी लेकर खादी भंडार आरंभ किया। 1940 में जब जोधपुर के मुख्य क्रांतिकारी जेलों में ठूंस दिये गये तब बिस्साजी को जेल से बाहर रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को जारी रखने का जिम्मा सौंपा गया। 9 जून 1942 को बालमुकुंद बिस्सा को भारत रक्षा कानून के तहत जेल में ठूंस दिया गया। जेल में हुई हड़ताल में बिस्सा ने काफी जोर-शोर से भाग लिया जिसके कारण वे अत्यंत कमजोर हो गये। 19 जून को उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया, उसी दिन अस्पताल में बिस्सा का निधन हो गया। उनके निधन का समाचार बिजली की तरह जोधपुर नगर और आस पास के कस्बों व गाँवों में फैल गया। उनकी शवयात्रा में शामिल होने के लिये मीलों पैदल चल कर एक लाख लोग जोधपुर पहुँचे। उनके भय से जोधपुर नगर के दरवाजे बंद कर दिये गये और भीड़ को तितर-बितर करने के लिये पुलिस ने लाठी चार्ज किया।

    भोगीलाल पंड्या: भोगीलाल पंड्या को राजस्थान में वागड़ का गांधी कहा जाता है। वे डूंगरपुर जिले के सीमलवाड़ा गाँव के रहने वाले थे। उनका जन्म सन् 13 नवम्बर 1904 में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा क्षेत्र के आदिवासियों को आजादी की लड़ाई से जोड़ने तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास के कार्य किये। 1952 और 1957 के विधानसभा चुनावों में वे सागवाड़ा से चुने गये। 31 मार्च 1981 को जयपुर में उनका देहांत हुआ।

    दामोदर दास राठी: इनका जन्म ई. 1861 में मारवाड़ राज्य के पोकरण गाँव में हुआ था। इनके पिता व्यापार करने के लिये पोकरण से ब्यावर आ गये। अतः बालक दामोदर की शिक्षा ब्यावर के मिशन स्कूल में हुई। वे मेधावी छात्र थे। बड़े होकर वे आर्य समाज से जुड़ गये। वैचारिक उग्रता के कारण वे कांग्रेस के गरम दल के समर्थ बन गये। उन्हीं दिनों उनका सम्पर्क बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय आदि से हुआ। श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरा करते थे। जब 21 फरवरी 1915 को राजस्थान में सशस्त्र क्रांति की योजना क्रियान्वयन की तिथि घोषित की गयी। तब श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरे हुए थे। तब राठीजी ने तीन हजार सशस्त्र क्रांतिकारी तैयार करने के लिये आर्थिक सहयोग प्रदान किया। 1916 में ब्यावर में होमरूल लीग की स्थापना की गयी। उसी वर्ष एकता सम्मेलन भी हुआ जिसमें राठीजी ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया। 2 जनवरी 1918 को इस क्रांतिकारी एवं महादानी पुण्यात्मा का निधन हुआ।

    माणिक्यलाल वर्मा: बिजौलिया आंदोलन में भाग लेने के कारण माणिक्यलाल वर्मा को उदयपुर राज्य से निष्कासित कर दिया गया था। वर्मा ने अजमेर में रहते हुए मेवाड़ प्रजा मंडल स्थापित करने की योजना बनायी। उन्होंने कुछ पर्चे, प्रजामण्डल के गीत तथा ‘‘मेवाड़ राज्य का शासन’’ नाम से एक पुस्तिका छपवाई। इस पुस्तिका में मेवाड़ राज्य के प्रत्येक विभाग की आलोचना की गयी और कहा गया कि जब तक उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं होगी तब तक मौजूदा शासन की त्रुटियां समाप्त नहीं हो सकतीं। उन्होंने हर मेवाड़वासी से अपील की कि वह मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये अपना तन-मन-धन अर्पित कर दे। निर्वासन समाप्ति के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने उदयपुर पहुँचकर 24 अप्रेल 1938 को बलवंतसिंह मेहता, भवानीशंकर वैद्य, जमनालाल वैद्य, परसराम तथा दयाशंकर श्रोत्रिय के साथ मिलकर ‘मेवाड़ प्रजा मंडल’ की स्थापना की। इसका प्रथम सभापति बलवंतसिंह मेहता को तथा मंत्री माणिक्यलाल वर्मा को बनाया गया। जनता में अभूतपूर्व उत्साह के साथ प्रजामंडल चर्चा का विषय बन गया।

    सागर मल गोपा: सागर मल गोपा ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत 21 वर्ष की आयु में असहयोग आंदोलन से की। उन्होंने देश भर की पत्रिकाओं और अखबारों में जैसलमेर के महारावल द्वारा प्रजा पर किये जा रहे अत्याचारों के बारे में लेख लिखे तथा ‘‘जैसलमेर का गुण्डा राज’’ शीर्ष से एक पुस्तक भी प्रकाशित करवायी। इस कारण उनका जैसलमेर राज्य में प्रवेश वर्जित कर दिया गया। वे जैसलमेर छोड़कर नागपुर चले गये। पिता की मृत्यु के कारण उन्हें जैसलमेर आना पड़ा। जैसलमेर आने से पहले उन्होंने राजपूताना के पोलिटिकल एजेंट से जैसलमेर में रहने के लिये संरक्षण सर्टिफिकेट ले लिया। जैसे ही जैसलमेर के महारावल जवाहरसिंह को ज्ञात हुआ, उसने सागरमल की गिरफ्तारी के आदेश दे दिये। जैसलमेर पुलिस ने अनैतिक हथकण्डे अपनाये तथा उन पर झूठा मुकदमा दायर किया। 25 मई 1941 को पुलिस अधिकारी गुमानसिंह ने धोखे से सागरमल गोपा को बंदी बना लिया। उन्हें जेल में डालकर मारा-पीटा गया तथा अनेक अमानवीय यातनायें दी गयीं। उन्हें गीली बेंतों से पीटा जाता और उनके घावों पर मिरचें लगायी जातीं। जब समाचार पत्रों में ये समाचार छपे तब राष्ट्रीय नेताओं ने सागरमल गोपा की रिहाई के प्रयास किये किंतु महारावल ने उन्हें छोड़ने से इन्कार कर दिया।

    गोपाजी की रिहाई के लिये जैसलमेर में प्रजामण्डल की स्थापना की गयी। जयनारायण व्यास के नेतृत्व में प्रजामण्डल के माध्यम से गोपाजी की रिहाई के लिये भरपूर अभियान चलाया गया। इस अभियान से घबराकर पोलिटिकल एजेंट ने महारावल की इच्छा के विरुद्ध जैसलमेर जाकर गोपाजी से 
    भेंट करने का कार्यक्रम बनाया। इस पर महारावल ने पुलिस अधिकारी गुमानसिंह के माध्यम से गोपाजी को क्लारोफार्म सुंघा कर उन पर मिट्टी का तेल डलवाया और जीवित ही आग लगाकर जला डाला। जलने के आठ घंटे बाद गोपाजी को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी।

    हरिभाऊ उपाध्याय: इनका जन्म 9 मार्च 1893 को ग्वालियर राज्य के भौंरासा गाँव में हुआ। उन्होंने समाज सेवा और राजनीति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन, शिक्षा प्रसार तथा हरिजन सेवा में उनकी सेवाएं उल्लेखनीय हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के अंतर्गत उन्होंने नमक आंदोलन में भाग लिया। अतः उन्हें जेल जाना पड़ा। हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा 21 पुस्तकों की रचना और लगभग 24 ग्रंथों का अनुवाद किया गया। 1952 ई. में वे अजमेर मेरवाड़ा के मुख्यमंत्री बने और उसके पश्चात् 1956 से राजस्थान मंत्रिमंडल में 10 वर्षों तक मंत्री रहे। साहित्य सेवा के लिये उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए। 25 अगस्त 1972 को उनकी मृत्यु हुई।


    राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में राजस्थान के पाँच प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी-

    जयनाराण व्यास (जोधपुर रियासत), हीरालाल शास्त्री (जयपुर रियासत), रघुबर दयाल गोयल (बीकानेर रियासत), माणिक्यलाल वर्मा (उदयपुर रियासत) तथा बालमुकुंद बिस्सा (जोधपुर रियासत) राष्ट्रीय आंदोलन में राजस्थान की ओर से संघर्ष करने वाले पाँच सर्वप्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं। जोधपुर राज्य में प्रजा मण्डल आंदोलन- ई. 1915 में जोधपुर में मारवाड़ हितकारणी सभा बनी थी जिसने नगर परिषद व पुलिस एक्ट में सुधार करने के लिये हड़ताल की। इसके बाद यह सभा निश्क्रिय हो गयी।

    ई. 1920 में दिल्ली में ‘‘राजस्थान सेवा संघ’’ की तथा जोधपुर में ‘‘मारवाड़ सेवा संघ’’ की स्थापना हुई। ‘‘मारवाड़ सेवा संघ’’ का उद्देश्य भ्रष्ट नौकरशाही के कुशासन का प्रतिरोध करना और अवैधानिक कार्यवाहियों के विरुद्ध आवाज उठाना था जिससे कि मारवाड़ की जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हो सके। इस संगठन का सम्बन्ध राजस्थान सेवा संघ से था। मारवाड़ सेवा संघ के सदस्य जयनारायण व्यास, कानमल, दुर्गाशंकर, भंवरलाल सर्राफ और प्रयागराज भण्डारी थे। जन सामान्य का समर्थन नहीं मिलने के कारण इस संगठन का अंत भी शीघ्र हो गया।

    ई. 1924 में ‘‘मारवाड़ सेवा संघ’’ वालों ने ‘‘मारवाड़ हितकारणी सभा’’ को एक बार फिर से सक्रिय किया। इस बार इस संस्था ने महाराजा उम्मेदसिंह के संरक्षण में मारवाड़ राज्य में जनता की स्थिति में सुधार लाने का संकल्प व्यक्त किया। ऐसा संभवतः इसलिये किया गया क्योंकि उस समय मारवाड़ राज्य में राज्यद्रोह अधिनियम पारित हो जाने से किसी भी संगठन के लिये राजनैतिक गतिविधियां चलाना असंभव हो गया था।

    ई. 1925 में मारवाड़ हितकारिणी सभा के प्रतापचंद सोनी, सेठ चांद मल शर्मा व शिवकरण जोशी को मारवाड़ छोड़कर चले जाने के आदेश दिये गये तथा जयनारायण व्यास, आनंदराज सुराणा, अब्दुल रहमान अंसारी, अमरचंद मूथा, किस्तूरकरण एवं बच्छराज व्यास को बदमाश घोषित करके उनके नाम पुलिस के रजिस्टर संख्या 10 में लिखे गये। उन्हें प्रतिदिन पुलिस केंद्र पर उपस्थित होने तथा प्रति रात्रि पुलिस केंद्र की गार्ड की निगरानी में सोने के आदेश दिये गये। राज्य की ज्यादती से तंग आकर जयनारायण व्यास ने भी जोधपुर छोड़ दिया और ब्यावर जाकर रहने लगे।

    मारवाड़ हितकारणी सभा ने अपने नेताओं की अनुपस्थिति 
    में भी अपना कार्य जारी रखा। सभा ने बढ़ती हुई कीमतों के विरोध में आंदोलन किया तथा सरकार से प्रार्थना की कि राज्य से खाद्य वस्तुओं का निर्गमन बंद कर दिया जाये। सभा ने जोधपुर राज्य में उत्तरदायी शासन की मांग की और राज्य में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समाचार पत्रों की स्वतंत्रता तथा संस्था बनाने की स्वतंत्रता देने की भी मांग की। ई. 1929 में इस सभा ने जागीरों में बेगार रोकने, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने, धान व चारे के निर्यात पर रोक लगाने, नौकरियों में भर्ती हेतु बोर्ड बनाने आदि मांगों को लेकर आंदोलन किये। 

    ई. 1930 के नमक सत्याग्रह से महिलाओं में राजनीतिक चेतना का आरंभ हुआ। जब राजस्थान में राजनीतिक चेतना और नागरिक अधिकारों के लिये संघर्ष का बिगुल बजा तो महिलायें भी इसमें कूद पड़ीं तथा पुरुषों के साथ वे भी सत्याग्रहों में खुलकर भाग लेने लगीं। अजमेर की प्रकाशवती सिन्हा ने सत्याग्रह आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1930 से 1947 के बीच सैंकड़ों की संख्या में महिला सत्याग्रही जेल गयीं।

    सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामनारायण चौधरी की पत्नी अंजना देवी, माणिक्य लाल वर्मा की पत्नी नारायण देवी तथा हीरालाल शास्त्री की पत्नी रतन शास्त्री भी जेल जाने वाली प्रमुख महिला सत्याग्रही थीं। 1942 की अगस्त क्रांति में छात्राओं ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। रमा देवी पाण्डे, सुमित्रा देवी खेतानी, इन्दिरा देवी शास्त्री, विद्या देवी, गौतमी देवी भार्गव, मनोरमा पण्डित, मनोरमा टण्डन, प्रियंवदा चतुर्वेदी और विजया बाई ने अगस्त क्रांति में खुल कर भाग लिया। भील बाला काली बाई 19 जून 1947 को रास्तापाल सत्याग्रह के दौरान शहीद हुई।



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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में रेलवे परिवहन

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थान में रेलवे परिवहन

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 62

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में रेलवे परिवहन

    1. प्रश्नः राजस्थान में रेलवे के कितने मण्डल हैं?

    उत्तरः चार- 1. उत्तरी रेलवे, 2. पश्चिमी रेलवे, 3. मध्य रेलवे, 4. उत्तर पश्चिम रेलवे।

    2. प्रश्नः जयपुर में किस रेल जोन का कार्यालय है?

    उत्तर पश्चिम रेलवे।

    3. प्रश्नः राजस्थान में पहली रेलवे लाइन कब बनी?

    उत्तरः अप्रेल 1874 आगरा फोर्ट से बांदीकुईं।

    4. प्रश्नः राजस्थान में पहली रेल कब चली?

    उत्तरः ई. 1874

    5. प्रश्नः अजमेर में रेलवे वर्कशॉप की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः ई. 1879

    6. प्रश्नः भारत की आजादी के समय 1947 में राजस्थान में रेल लाइन की लम्बाई कितनी थी?

    उत्तरः 4989 किमी।

    7. प्रश्नः वर्तमान में राजस्थान में रेलमार्गों की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः कुल- 67,415 किमी

    8. प्रश्नः राज्य में देश के रेलमार्ग का प्रतिशत

    उत्तरः 8.81 प्रतिशत

    9. प्रश्नः राजस्थान में पर्यटकों के लिये वर्तमान में कौनसी रेलगाड़ियां संचालित की जाती हैं?

    उत्तरः 1. पैलेस ऑन व्हील्स, 2. हेरिटेज ऑन व्हील्स, 3. रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स।

    10. प्रश्नः किस ट्रेन के संचालन के लिये आरटीडीसी द्वारा रेलवे को भुगतान किया जाता है?

    उत्तरः रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स के प्रति फेरे के लिये आरटीडीसी रेलवे को 25 लाख रुपये का भुगतान करती है।

    11. प्रश्नः पैलेस ऑन व्हील्स का मार्ग क्या है?

    उत्तरः दिल्ली-जयपुर-आगरा।

    12. प्रश्नः भरतपुर में सिमको वैगन फैक्ट्री कब स्थापित हुई?

    उत्तरः ई. 1957

    13. प्रश्नः राजस्थान के किस जिले में रेलमार्ग नहीं है?

    उत्तरः बाँसवाड़ा।

    14. प्रश्नः बड़ी रेल लाइन पर भारत की पहली बस सेवा कब एवं कहाँ चली?

    उत्तरः 12 अक्टूबर 1994 को मेड़ता रोड से मेड़तासिटी के बीच।

    15. प्रश्नः उत्तर-पश्चिम रेलवे का मुख्यालय कहाँ है?

    उत्तरः जयपुर।

    16. प्रश्नः थार एक्सप्रेस कब चली?

    उत्तरः 18 फरवरी 2006

    17. प्रश्नः थार एक्सप्रेस कहाँ से कहाँ तक चलती थी?

    उत्तरः जोधपुर रेल्वे स्टेशन से लेकर पाकिस्तान के सिंध प्रांत के खोखरापार रेल्वे स्टेशन तक। वर्तमान में यह बंद है।

    18. प्रश्नः पाकिस्तान की सीमा पर राजस्थान का पहला रेल्वे स्टेशन कौनसा है?

    उत्तरः मुनाबाव।

    19. प्रश्नः डांग क्षेत्र में किस उद्योग को बढ़ावा देने के लिये रेल मार्ग बनाया जा रहा है?

    उत्तरः पत्थर उद्योग एवं पर्यटन को।

    20. प्रश्नः डांग क्षेत्र में रेलमार्ग कहाँ से कहाँ तक बनाया जा रहा है?

    उत्तरः धौलपुर-गंगापुर वाया करौली रेलवे लाइन। (धौलपुर से गंगापुर तक 144.6 कि.मी. रेल-लाइन बिछाई जायेगी। )

    21. प्रश्नः राज्य के किस जिले में नैरोगेज की रेललाइन है?

    उत्तरः धौलपुर-सरमथुरा नैरोगेज रेल लाइन 1908 में आरम्भ होकर 1929 में पूरी हुई थी जिस पर 5 से 7 डिब्बों वाली गाड़ी चलती है। 72 किलोमीटर लम्बी इस रेललाइन का भी आमान परिवर्तन किया जाना है।

    22. प्रश्नः पुष्कर से कहाँ के लिये रेल लाइन आरम्भ की गई है?

    उत्तरः अजमेर के लिये।

    23. प्रश्नः रतलाम-बाँसवाड़ा-डूँगरपुर नई रेल लाइन आरम्भ होने से कौनसा जिला पहली बार रेल लाइन से जुड़ेगा?

    उत्तरः बाँसवाड़ा।

    24. प्रश्नः रतलाम-बाँसवाड़ा-डूँगरपुर नई रेल लाइन कब तक बनकर पूरी हो जायेगी?

    उत्तरः वर्ष 2016-17 में।

    25. प्रश्नः लाइम स्टोन के दोहन और परिवहन के लिये कौनसी रेल लाइन प्रस्तावित है?

    उत्तरः सानू को हमीरा के रास्ते जैसलमेर रेलवे स्टेशन से जोड़ने के लिये रेल लाइन प्रस्तावित है। मैट्रो रेल परियेाजना जयपुर

    26. प्रश्नः राज्य में मैट्रो रेल परियोजना कहाँ आरम्भ की गई है?

    उत्तरः जयपुर में।

    27. प्रश्नः जयपुर मैट्रो के प्रस्तावित स्टेशनों की संख्या कितनी है?

    उत्तरः 31

    28. प्रश्नः कोरिडोर 1 में कितने स्टेशन हैं?

    उत्तरः 11 (भूमिगत-3, एलिवेटेड-8)

    29. प्रश्नः कोरिडोर 2 में कितने स्टेशन होंगे?

    उत्तरः 20 (भूमिगत-5, एलिवेटेड-15)

    30. प्रश्नः जयपुर मैट्रो के मार्ग की लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 1. कोरिडोर 1-मानसरोवर से बड़ी चौपड़, 12.067 किमी 2. कोरिडोर 2-सीतापुरा से अम्बाबाड़ी, 23.099 किमी

    31. प्रश्नः जयपुर मैट्रो रेल परियोजना की अनुमानित लागत कितनी है?

    उत्तरः कुल- 9732.00 करोड़ रुपये। कोरिडोर 1 पर- 3149.00 करोड़ रुपये। कोरिडोर 2 पर- 6583 करोड़ रुपये।

    32. प्रश्नः जयपुर मैट्रो रेल परियोजना का चरण 1-बी जनता के लिए खोला गया।

    उत्तरः 23.09.2020 को।

    33. प्रश्नः जयपुर मैट्रो रेल परियोजना का फेज-1 सी कहाँ से कहाँ तक होगा?

    उत्तरः बड़ी चौपड़ से ट्रांसपोर्ट नगर। दिल्ली-मुम्बई इण्डस्ट्रियल कॉरीडोर (डीएमआईसी)

    34. प्रश्नः दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक कोरीडोर (डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर) की कुल लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 1,500 कि.मी.

    35. प्रश्नः दिल्ली मुम्बई इण्डस्ट्रियल कॉरीडोर की राजस्थान में कुल लम्बाई कितनी है?

    उत्तरः 578 कि.मी.

    36. प्रश्नः दिल्ली मुम्बई इण्डस्ट्रियल कॉरीडोर का कितना प्रतिशत हिस्सा राजस्थान से होकर निकलेगा?

    उत्तरः 39 प्रतिशत

    37. प्रश्नः इस कॉरीडोर का निर्माण कब तक पूरा होना प्रस्तावित है?

    उत्तरः 2018 तक

    38. प्रश्नः इस कॉरीडोर के दोनों तरफ कितने क्षेत्र में एकीकृत औद्योगिक नगर विकसित किये जायेंगे?

    उत्तरः दोनों तरफ डेढ़ सौ किमी क्षेत्र में

    39. प्रश्नः राज्य में दिल्ली-मुम्बई-औद्योगिक कॉरिडोर परियोजना हेतु नोडल एजेंसी कौनसी है?

    उत्तरः बी.आई.पी. (ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टमेंट प्रोमोशन)

    40. प्रश्नः डीएमआईसी राज्य में कितने स्थानों पर औद्योगिक क्षेत्र विकसित करेगी?

    उत्तरः (1.) खुशखेड़ा-भिवाड़ी-नीमराना, (2.) जयपुर-दौसा, (3.) अजमेर-किशनगढ़, (4.) राजसमंद भीलवाड़ा (5.) जोधपुर-पाली मारवाड़।

    41. प्रश्नः दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक कोरीडोर हेतु राज्य के किन जिलों में भूमि अवाप्त की गई है?

    उत्तरः 7 जिलों में- सिरोही, पाली, अजमेर, जयपुर, नागौर, सीकर, अलवर।

    42. प्रश्नः दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक कोरीडोर परियोजना के मार्ग में राज्य में कितने नोड विकसित होंगे?

    उत्तरः नौ स्टेशनों को जंक्शन स्टेशन की तरह विकसित किया जायेगा जिन्हें इण्डस्ट्रियल नोड कहा जाता है।

    43. प्रश्नः दिल्ली-मुम्बई-औद्योगिक कॉरीडोर के मार्ग में नये औद्योगिक क्षेत्र कहाँ बनाये जायेंगे?

    उत्तरः खुशखेड़ा, भिवाड़ी, नीमराना एवं अजमेर-किशनगढ़ में निवेश क्षेत्र तथा जयपुर-दौसा व राजसमंद-भीलवाड़ा में औद्योगिक क्षेत्र।

    44. प्रश्नः देश का पहला राष्ट्रीय निवेश एवं उत्पाद केन्द्र कहाँ स्थापित होगा?

    उत्तरः राजस्थान में।

    45. प्रश्नः राष्ट्रीय निवेश एवं उत्पाद केन्द्र परियोजना के प्रथम नोड के रूप में निवेश क्षेत्र का विकास किया कहाँ जा रहा है?

    उत्तरः खुशखेड़ा-भिवाड़ी-नीमराणा।

    46. प्रश्नः राष्ट्रीय निवेश एवं उत्पाद केन्द्र परियोजना के द्वितीय नोड के रूप में ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग एवं ट्रेडिंग हब का विकास कहाँ किया जायेगा?

    उत्तरः जोधपुर-पाली-मारवाड़।

    47. प्रश्नः मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक पार्क कहाँ स्थापित होगा?

    उत्तरः जोधपुर-पाली रोड पर कांकाणी में।


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  • पन्ना धाय की ऐतिहासिकता

     02.06.2020
    पन्ना धाय की ऐतिहासिकता

    पन्ना धाय की ऐतिहासिकता

    मेवाड़ राजवंश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मेवाड़ का गुहिल राजवंश भारत की आजादी के समय धरती का सबसे प्राचीन राजवंश था। यह ईक्ष्वाकुओं के रघुवंशियों की प्राचीन परम्परा से निकला था तथा इसकी स्थापना छठी शताब्दी में गुहिल नामक राजा ने की थी। आठवीं शताब्दी ईस्वी में इस वंश के राजकुमार बापा रावल ने मौर्यों से चित्तौड़ का दुर्ग प्राप्त किया। तब से चित्तौड़ और गुहिल एक-दूसरे के पर्यायवाची हो गए।

    मेवाड़ का गुहिल राजवंश अपनी आन, बान एवं शान के लिए धरती भर में प्रसिद्ध था। इसी वंश के राजा खुमांण ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में अरब से आई खलीफा अलमामूं की सेनाओं को मार भगाया था। पंद्रहवीं शताब्दी में महाराणा कुंभा ने लगभग आधा उत्तरी भारत जीतकर शिल्प-कला एवं संगीत-कला की अभूतपूर्व सेवा की थी। मेवाड़ के राजवंश में सोलहवीं शताब्दी में महाराणा सांगा का जन्म हुआ जिसने ई.1528 में बाबर से मोर्चा लिया। मीरांबाई इसी सांगा के बड़े पुत्र भोजराज की पत्नी थी।

    इसी राजवंश में महाराणा प्रताप जैसा वीर राजा हुआ जो जीवन भर अकबर से लड़ता रहा किंतु उसने भारतीय स्वाभिमान का सिर नहीं झुकने दिया। हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप ने अकबर को मेवाड़ी तलवार का पानी चखाया। मेवाड़ के इसी कुल में सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में महाराणा राजसिंह नामक अद्भुत राजा हुआ जिसने औरंगजेब से कड़ी टक्कर ली तथा कभी भी हार नहीं मानी।

    पन्ना धाय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    पन्ना धाय मेवाड़ राजकुल की राजधात्री थी और उसका वास्तविक नाम पन्ना गूजरी था। उस काल में गूजर जाति की स्वस्थ, सुंदर एवं युवा माताओं को राजधात्री बनाया जाता था। पन्ना का जन्म चित्तौड़गढ़ के निकट ‘माताजी की पांडोली’ नामक गांव में हुआ था। उसके पिता का नाम ‘हरचंद हांकला तथा पति का नाम ‘सूरजमल चौहान’ था जो कि ‘कमेरी’ गांव का रहने वाला था। पन्ना को महाराणा सांगा के पुत्र उदयसिंह की धाय नियुक्त किया गया था।

    मेवाड़ की शक्ति का चरम

    जब ईस्वी 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने समरकंद से आकर भारत पर आक्रमण किया तब उत्तरी भारत में महाराणा सांगा सबसे बड़ी हिन्दू शक्ति थी। सांगा ने दिल्ली के लोदी सुल्तानों तथा मालवा, गुजरात एवं नागौर के मुस्लिम सुल्तानों को परास्त करके अपनी शक्ति बढ़ा ली थी। उसके अधीन चित्तौड़, रणथंभौर तथा कुंभलगढ़ जैसे लगभग 100 अजेय दुर्ग थे। सांगा की सेना में 1 लाख सैनिक थे तथा सांगा के राज्य की वार्षिक आय 10 करोड़ रुपए थी। 7 बड़े हिन्दू राजा, 9 राव और 104 सामंत सांगा की सेवा में रहा करते थे। बहुत से मुसलमान अमीर तथा शहजादे सांगा की शरण में रहते थे। महाराणा सांगा मुस्लिम राज्यों का उच्छेदन करके भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता था। इस कार्य में वह सफलता के काफी निकट पहुंच चुका था किंतु इसी बीच बाबर ने भारत पर आक्रमण किया और उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियां एकदम से बदल गईं।

    मेवाड़ की शक्ति का ह्रास

    ई.1528 में जब बाबर ने महाराणा सांगा को ललकारा तो सांगा उत्तरी भारत के लगभग समस्त हिन्दू राजाओं को एकत्रित करके सांगा से लड़ने के लिए पहुंचा। खानवा के मैदान में दोनों पक्षों में भीषण लड़ाई हुई किंतु दुर्भाग्यवश महाराणा सांगा घायल होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। मेवाड़ के हजारों वीर योद्धा इस युद्ध में मारे गए जिससे मेवाड़ बुरी तरह कमजोर हो गया। महाराणा सांगा की 28 पत्नियां थीं जिनमें से पहली पत्नी धनकंवर जोधा का पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का नया महाराणा बना। उसमें अपने पिता सांगा जैसी दूरदृष्टि नहीं थी।

    महारानी कर्मवती की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    महाराणा सांगा की दूसरी रानी कर्मवती बूंदी के राव सूरजमल हाड़ा की बहिन थी। उसे हाड़ी रानी भी कहा जाता था। वह महाराणा सांगा को अत्यंत प्रिय थी। कर्मवती के दो पुत्र थे- विक्रमादित्य तथा उदयसिंह। महाराणा सांगा ने हाड़ी रानी के पुत्रों को मेवाड़ राज्य की सबसे बड़ी एवं सबसे उपजाऊ जागीर प्रदान की थी। इस जागीर में रणथंभौर नामक विश्व-प्रसिद्ध दुर्ग था तथा इस जागीर की आय 60 लाख रुपए वार्षिक थी। महाराणा सांगा ने रानी कर्मवती के भाई सूरजमल हाड़ा को रणथंभौर का दुर्गपति बनाया जो कि उस काल का प्रख्यात योद्धा एवं शूरवीर था। सूरजमल हाड़ा बूंदी राज्य का भी राजा था। सूरजमल के पिता ने महाराणा सांगा के साथ खानवा के मैदान में बाबर से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी।

    जब खानवा की लड़ाई के बाद महाराणा सांगा की मृत्यु हो गई तो कर्मवती अपने 11 वर्षीय पुत्र विक्रमादित्य और 6 वर्षीय पुत्र उदयसिंह को लेकर रणथंभौर चली गई जो कि 60 लाख रुपये वार्षिक आय की विशाल जागीर थी।

    रानी कर्मवती के पुत्रों को चित्तौड़ की गद्दी की प्राप्ति

    महाराणा रत्नसिंह से यह सहन नहीं होता था कि उसके सौतेले भाइयों विक्रमादित्य एवं उदयसिंह के पास 60 लाख रुपए की विशाल जागीर और रणथंभौर जैसा अभेद्य दुर्ग रहे। रणथंभौर की जागीर एवं दुर्ग को छीनने के लिए राव सूरजमल को रास्ते से हटाना आवश्यक था। इसलिए रत्नसिंह ने राणा बनने के तीन साल बाद अर्थात् ई.1531 में राव सूरजमल को मारने का षड़यंत्र रचा और शिकार खेलता हुआ बूंदी राज्य की सीमा पर पहुंच गया तथा सूरजमल को भी शिकार खेलने के लिए बुलाया। सूरजमल ने महाराणा का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। एक दिन महाराणा रत्नसिंह अपने विश्वस्त सामंत पूरणमल तथा सूरजमल को लेकर घने जगंल में गया। जंगल में एकांत पाकर महाराणा रत्नसिंह तथा पूरणमल ने राव सूरजमल को घेरकर उस पर प्राण घातक हमला किया। राव सूरजमल ने भी अपनी तलवार निकाल कर उनका सामना किया। इस युद्ध में महाराणा रत्नसिंह और सूरजमल दोनों ही मृत्यु को प्राप्त हुए।

    विक्रमादित्य की ऐतिहासिक पृष्ष्ठभूमि

    चित्तौड़ की राजगद्दी रिक्त हो जाने से महाराणा सांगा की विधवा रानी कर्मवती अपने 14 वर्षीय पुत्र विक्रमादित्य तथा 9 वर्षीय पुत्र उदयसिंह को लेकर चित्तौड़ आई तथा कर्मवती का बड़ा पुत्र विक्रमादित्य मेवाड़ का महाराणा बना। विक्रमादित्य एक अयोग्य राजा सिद्ध हुआ। बचपन की बुरी आदतों के कारण उसने बहुत से पहलवान अपनी सेवा में रख लिए तथा उनके माध्यम से मेवाड़ के सरदारों को अपमानित करने लगा। इस कारण मेवाड़ के बहुत से सरदार नए महाराणा का साथ छोड़कर अपनी जागीरों में चले गए।

    बहादुरशाह का चित्तौड़ पर भीषण आक्रमण

    मेवाड़ की सैनिक शक्ति बाबर से हुई खानवा की लड़ाई में ही क्षीण हो चुकी थी तथा सांगा के बाद लगातार दो कमजोर राणा (रत्नसिंह एवं विक्रमादित्य) मेवाड़ को फिर से खड़ा नहीं कर पाए थे इसलिए अवसर पाकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया। वह सांगा के समय हुई अपनी भयानक पराजय का बदला लेना चाहता था तथा सांगा द्वारा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी से छीनी गई रत्नजड़ित कमरपेटी एवं रत्नजड़ित मुकुट छीनना चाहता था।

    राजमाता कर्मवती जानती थी के इस समय चित्तौड़ बहुत कमजोर हो चुका है और वह गुजरात के सुल्तान का सामना नहीं कर पाएगा। इसलिए कर्मवती ने अपने दोनों पुत्रों- महाराणा विक्रमादित्य एवं राजकुमार उदयसिंह को को फिर से रणथंभौर दुर्ग में भेज दिया तथा मेवाड़ के मुट्ठीभर विश्वस्त सरदारों के सहारे बहादुरशाह का रास्ता रोका। कमजोर मेवाड़ी सरदार, सुल्तान से परास्त हो गए। राजमाता कर्मवती ने सैंकड़ों हिन्दू नारियों के साथ जौहर किया तथा बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग को आग के हवाले कर दिया। मालवा के सुल्तान की रत्नजड़ित कमरपेटी एवं रत्नजड़ित मुकुट भी बहादुरशाह को मिल गए।

    कुछ दिन बाद बाबर के पुत्र एवं मुगल बादशाह हुमायूं ने बहादुरशाह पर आक्रमण किया। इससे बहादुरशाह अपने कुछ सिपाहियों को चित्तौड़ में छोड़कर, पुर्तगालियों से सहायता प्राप्त करने के लिए दीव गया। जब बहादुरशाह नाव से समुद्र में यात्रा कर रहा था, तब समुद्र में तूफान आ जाने से उसकी नाव उलट गई और वह डूब कर मर गया। इस पर विक्रमादित्य अपने छोटे भाई उदयसिंह को लेकर वापिस चित्तौड़ आया और थोड़े से मेवाड़ी सैनिकों के बल पर बहादुरशाह के सैनिकों को मार डाला और फिर से चित्तौड़ के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार सात-आठ साल के अंतराल में शक्तिशाली चित्तौड़ अत्यंत निर्बल हो गया। महाराणा विक्रमादित्य मुट्ठी भर सैनिकों और सामंतों के सहारे निर्बल चित्तौड़ पर शासन करता था।

    बनवीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    महाराणा सांगा का एक बड़ा भाई था- पृथ्वीराज। वह अत्यंत वीर, साहसी एवं योग्य राजकुमार था, उसी को मेवाड़ का अगला महाराणा बनना था किंतु दुर्भाग्य से उसे सिरोही के राजा जगमाल ने विष खिला कर मार डाला। इस कारण पृथ्वीराज के छोटे भाई महाराणा सांगा को अपने पिता का राज्य प्राप्त हुआ। इस पृथ्वीराज की एक मुंह लगी दासी थी जिससे एक पुत्र भी था। इस पुत्र का नाम बनवीर था।

    दासी पुत्र बनवीर अत्यंत महत्वाकांक्षी और बुरे स्वभाव का व्यक्ति था। उसने चित्तौड़ एवं महाराणा को निर्बल जानकर ई.1536 में महाराणा विक्रमादित्य को मारने एवं स्वयं चित्तौड़ का स्वामी बनने का षड़यंत्र किया। एक रात को बनवीर खुली तलवार लेकर महाराणा विक्रमादित्य के महल में घुस गया और उसने महाराणा की हत्या कर दी।

    उदयसिंह के प्राणों की रक्षा

    जिस समय महाराणा विक्रमादित्य की हत्या हुई उस समय महाराणा का छोटा भाई उदयसिंह लगभग 14 साल का था तथा अपनी माता कर्मवती के जीवित नहीं होने के कारण पन्ना धाय के संरक्षण में रहा करता था। बनवीर नंगी तलवार लेकर महाराणा के महल में घुस रहा था तब किसी ने दौड़कर पन्ना धाय को सूचना दी कि बनवीर यहाँ भी आ सकता है। तब आसन्न खतरे को भांपकर पन्ना ने राजकुमार उदयसिंह को एक विश्वस्त सेवक के साथ महल से बाहर भेज दिया और अपने पुत्र चंदन को राजकुमार के पलंग पर सुला दिया। महाराणा की हत्या करने के बाद बनवीर राजकुमार उदयसिंह के महल की तरफ आया। उसने पन्ना से पूछा कि उदयसिंह कहां है? पन्ना ने राजकुमार के पलंग पर सोए अपने पुत्र की ओर संकेत किया। बनवीर ने उसे ही राजकुमार समझ कर मार डाला और स्वयं मेवाड़ का महाराणा बनकर शासन करने लगा।

    उदयसिंह को राज्य की प्राप्ति

    बनवीर के जाने के बाद पन्ना भी चित्तौड़ के महलों से निकल गई और राजकुमार उदयसिंह को लेकर देवलिया के रावत रायसिंह के पास पहुंची। देवलिया के रावत ने पन्ना धाय एवं उदयसिंह का बड़ा सत्कार किया किंतु स्वयं को राजकुमार की रक्षा करने में असमर्थ जानकर उन्हें डूंगरपुर भिजवा दिया। डूंगरपुर के रावल आसकरण ने बनवीर के डर से उदयसिंह को रखने से मना कर दिया। इस पर पन्ना, राजकुमार उदयसिंह को लेकर कुंभलगढ़ पहुंची। कुंभलगढ़ का किलेदार आशा देपुरा नामक एक महाजन था। वह भी बनवीर के भय से भ्रमित होने लगा।

    जब आशा देपुरा की माँ को ज्ञात हुआ कि पन्ना, उदयसिंह को लेकर आई है तब उसने अपने पुत्र को समझाया कि तुम पर स्वर्गीय महाराणा सांगा के बहुत से उपकार हैं, उनका राज्य एक दासीपुत्र ने हथिया लिया है इसलिए तुम अपने कर्त्तव्य का पालन करो, अपने स्वामी के पुत्र की प्राणरक्षा करके अपने स्वामी के उपकारों का बदला चुकाओ।

    इस पर आशा देपुरा सिर पर कफन बांधकर मेवाड़ राजवंश के टिमटिमाते हुए कुलदीपक उदयसिंह की रक्षा करने के लिए तैयार हो गया। उसने पन्ना को वचन दिया कि वह देह में प्राण रहने तक राजकुमार की रक्षा करेगा। आशा देपुरा ने कोठरिया के सामंत रावत खान को राजकुमार के कुंभलगढ़ पहुंचने की सूचना भिजवाई।

    रावत खान तत्काल कुंभलगढ़ पहुंचा। उसने राजकुमार को पहचान लिया तथा मेवाड़ के समस्त सरदारों को कुंभलगढ़ आने के लिए आमंत्रित किया। समस्त सरदारों ने मिलकर उदयसिंह को मेवाड़ का नया महाराणा स्वीकार कर लिया और उसे राजगद्दी पर बैठाकर उसका तिलक किया। इसके बाद मेवाड़ के समस्त सरदारों ने अपनी-अपनी सेना लेकर चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया और चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। बनवीर मारा गया।

    इस प्रकार पन्ना धाय के अदम्य साहस, स्वामिभक्ति एवं पुत्र बलिदान के कारण ही मेवाड़ राजवंश की रक्षा हुई। जिसमें आगे चलकर महाराणा प्रताप और महाराणा राजसिंह जैसे पराक्रमी महाराणा हुए जिन्होंने अकबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल बादशाहों से भीषण टक्कर ली और यह कुल फिर से राष्ट्र की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में वायु एवं जल परिवहन

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में वायु एवं जल परिवहन

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 63

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में वायु एवं जल परिवहन

    1. प्रश्नः राजस्थान में पहले फ्लाइंग क्लब की स्थापना कब व किसने की?

    उत्तरः ई.1929 में जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह ने।

    2. प्रश्नः भारत में वायुपरिवहन का राष्ट्रीयकरण कब किया गया?

    उत्तरः 1 अगस्त 1953 को।

    3. प्रश्नः वर्तमान में राज्य के कौनसे शहर वायुसेवाओं से जुड़े हुए हैं?

    उत्तरः जयपुर, जोधपुर, उदयपुर तथा कोटा।

    4. प्रश्नः राज्य के प्रमुख हवाई अड्डे कौनसे हैं?

    उत्तरः 1. सांगानेर हवाई अड्डा- जयपुर, 2. डबोक हवाई अड्डा उदयपुर, 3. कोटा हवाई अड्डा- कोटा, 4. जोधपुर हवाई अड्डा- जोधपुर, 5. जैसलमेर हवाई अड्डा- जैसलमेर, 6. बीकानेर हवाई अड्डा- बीकानेर।

    5. प्रश्नः राज्य का एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कहाँ स्थित है?

    उत्तरः जयपुर में।

    6. प्रश्नः सांगानेर हवाई अड्डा, देश का कौनसा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है?

    उत्तरः 15वां।

    7. प्रश्नः राज्य के किस हवाई अड्डे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अत्याधुनिक हवाई अड्डे के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है?

    उत्तरः उदयपुर के महाराणा प्रताप हवाई अड्डे को।

    8. प्रश्नः राज्य में हवाई अड्डे का नया टर्मिनल कहाँ बनाया गया है?

    उत्तरः बीकानेर (29 जून 2014 को उद्घाटन)

    9. प्रश्नः अजमेर के निकट नया हवाई अड्डा कहाँ बनाया जा रहा है?

    उत्तरः किशनगढ़ में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह ने 21 सितम्बर 2013 को शिलान्यास किया।

    10. प्रश्नः पर्यटन और सामरिक कारणों से राजस्थान के किस जिले में हाल ही में नया हवाई अड्डा बनाया गया है?

    उत्तरः जैसलमेर में जैसलमेर-बाड़मेर रोड पर खुड़ी के पास 60 एकड़ भूमि पर मार्च 2013 में 80 करोड़ रुपयों की लागत से नया हवाई अड्डा बनाया गया है। यह हवाई अड्डा वायुसेना के एयर पोर्ट से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। इस हवाई अड्डे से किसी तरह की उड़ान नहीं हो रही है।

    11. प्रश्नः राज्य में एयर टैक्सी सेवा कब से आरम्भ की गई है?

    उत्तरः 26 मई 2014 से।

    12. प्रश्नः राजस्थान में कितने जलमार्ग स्थित हैं?

    उत्तरः एक भी नहीं है।

    13. प्रश्नः राजस्थान में किस जिले में वाटर चैनल विकसित करने का प्रयास चल रहा है?

    उत्तरः गुजरात के कच्छ क्षेत्र से खारे पानी को एक चैनल के रूप में जालोर जिले तक लाने का प्रयास चल रहा है जिससे जल परिवहन विकसित किये जाने की योजना है।

    14. प्रश्नः राजस्थान का निकटतम बंदरगाह कौनसा है?

    उत्तरः कांडला।

    15. प्रश्नः भारत एवं ईरान सरकार द्वारा किस देश में बनाये जा रहे बंदरगाह से राजस्थान का माल कांडला होते हुए सेंट्रल एशियाई देशों में भेजना सुगम हो जायेगा? उत्तरः अफगानिस्तान में बनाये जा रहे चाबार पोर्ट से।


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  • मृत्यु और उसके बाद की संभावनाएं

     02.06.2020
     मृत्यु और उसके बाद की संभावनाएं

     मृत्यु और उसके बाद की संभावनाएं


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    मृत्यु! एक ऐसा शब्द है जिससे प्रत्येक प्राणी का सामनाा एक न एक दिन होता ही है। यह शब्द अच्छों-अच्छों के हृदय में भय उत्पन्न कर देता है। बड़े-बड़े बलवान, धनवान, गुणवान, रूपवान और सामर्थ्यवान व्यक्ति मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। यही कारण है कि अधिकतर लोग इस शब्द को भूले हुए ही रहना चाहते हैं। उसका स्मरण भी नहीं करना चाहते। सबको पता है कि मृत्यु होनी निश्चित है किंतु वे मानकर चलते हैं कि अभी वह बहुत दूर है।

    हम यह भी जानते हैं कि जब वह आयेगी तो बता कर नहीं आयेगी, अवांछित अतिथि की भांति बलपूर्वक अचानक ही आ धमकेगी किंतु हम यह भी मानते हैं कि वह अभी इसी क्षण तो नहीं आयेगी। बहुत से लोग मानते हैं कि जब वह आनी ही है और उस पर हमारा कोई वश नहीं है तो फिर उसका चिंतन क्यों? उस के बारे में सोच-सोच कर अपना वर्तमान क्यों खराब करें? इसके स्मरण से जीवन में कड़वाहट उत्पन्न होती है।

    सदियों और सहस्राब्दियों से मनुष्य की आकांक्षा रही है कि वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करे। उसे अमरत्व की प्राप्ति हो। इसके लिये उसने कभी अमृत की कल्पना की तो कभी अमरत्व प्रदान करने वाले वरदानों की। कभी उसने न मरने वाले देवताओं की बात की तो कभी सशरीर स्वर्ग जाने वाले इंसानों की। संसार की लगभग समस्त सभ्यताएं अतीत में देवताओं तथा भूतों का अस्तित्व स्वीकारती हैं, स्वर्ग और नर्क का अस्तित्व स्वीकारती हैं, देवताओं के धरती पर आने और मनुष्यों के स्वर्ग तक जाने की बात स्वीकारती हैं किंतु वर्तमान में ऐसा कहीं देखने में नहीं आता।

    हर सम्यता में देवता का अर्थ है न मरने वाला अतीन्द्रिय व्यक्ति। भूत का अर्थ है ऐसी आकृति जो दिखायी तो देती है किंतु उसके पास शरीर नहीं है। स्वर्ग का अर्थ है कष्टों से रहित स्थान जो पुण्य कर्मों के संचय से प्राप्त होता है और नर्क का अर्थ है अशुभ कर्मों की सजा भुगतने के लिये प्राप्त होने वाला स्थान। संसार की समस्त सभ्यताएं पुनर्जन्म में विश्वास रखती हैं तथा बारम्बार ऐसे दावे भी किये जाते हैं।

    भारत जैसे आस्था प्रधान देश में ही नहीं अपितु अत्यंत आधुनिक माने जाने वाले देशों में भी मृतकों की शांति के लिये कुछ न कुछ क्रियाएं अवश्य की जाती हैं। वस्तुतः ये सब धारणाएं भी मृत्यु और उसके बाद की संभावनाओं पर केंद्रित हैं।

    मृत्यु क्या है?

    इस प्रश्न पर संसार के प्रत्येक देश में, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तथा काल प्रवाह के प्रत्येक युग में निरंतर चिंतन किया जाता है कि मृत्यु क्या है?

    ऋषि, मुनि, दार्शनिक, चिंतक एवं उपदेशकों से लगाकर वैज्ञानिकों तक ने इस विषय पर कार्य किया है। बहुत से लोगों ने मृत्यु की परिभाषाऐं दी हैं, इसके लिये मानदण्ड निर्धारित किये हैं तथा नितांत भिन्न मान्यताएं स्थापित की हैं। सबसे पहले विज्ञान के स्तर पर मृत्यु पर विचार किया जाना उचित होगा। विज्ञान मानता है मृत्यु एक ऐसी जैव रासायनिक क्रिया है जो प्राणी के शरीर में कुछ निश्चित परिवर्तनों को लाती है। इन परिवर्तनों के कारण प्राणी के शरीर में कुछ ऐसे जैविक परिवर्तन हो जाते हैं जिन्हें वापस उलटा नहीं जा सकता। ये परिवर्तन भौतिक लक्षणों के रूप में प्रकट होते हैं। इन लक्षणों को ही हम मृत्यु कहते हैं।

    शरीर के जिन लक्षणों को देखकर प्राणी की मृत्यु होना मान लिया जाता है, उनमें प्रमुख हैं- शरीर का निश्चेष्ट हो जाना। आँख, नाक, कान, जीभ तथा त्वचा आदि इंद्रियांे का काम करना बंद कर देना, जिनके कारण आदमी न तो हिल-डुल सकता है, न देख सकता है, न सुन सकता है, न बोल सकता है, न सूंघ सकता है, न विचार कर सकता है। चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से ऐसा प्रमुखतः तीन कारणों से होता है। पहला कारण है- हृदय का बंद हो जाना। इस स्थिति में हृदय धड़कना बंद कर देता है, फैंफड़ों, मस्तिष्क तथा शरीर के अन्य अवयवों को रक्त संचार बंद हो जाता है। दूसरा कारण है- फैंफड़ों का काम करना बंद कर देना। इस स्थिति में फैंफड़े रक्त कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति करना तथा शरीर में उत्पन्न हुई कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर निकालना बंद कर देते हैं। तीसरा कारण है- मस्तिष्क का बंद हो जाना। इस स्थिति में शरीर के संवेदना तंत्र पर नियंत्रण हट जाता है। शरीर में संवेदना ग्रहण करने की तथा प्रतिक्रिया व्यक्त करने की शक्ति समाप्त हो जाती है।

    यही कारण है कि चिकित्सक किसी भी व्यक्ति को मृत घोषित करने से पहले तीन चीजों की जांच करते हैं। पहली जांच श्वांस की होती है। यदि श्वांस रुकी हुई है तो दूसरी जांच नाड़ी की होती है। यदि नाड़ी में स्पंदन नहीं है तो तीसरी जांच हृदय की होती है। यदि वहाँ भी धड़कन नहीं है तो अंत में आँखों की जांच की जाती है। यदि आँखों की पुतलियां फैल गयी हैं तो आँखों में टॉर्च से प्रकाश की बौछार की जाती है। आँख शरीर का अत्यंत संवेदनशील अंग है। इतना संवेदनशील कि वह प्रकाश की चोट को भी सहन नहीं कर सकता है। यदि प्राणी के शरीर में प्राण हैं और यदि उसकी आँखों में प्रकाश की बौछार की जाती है तो इस बात की काफी संभावना होती है कि उसकी आँखों की पुतलियों में हलचल हो। यदि आँखों से भी जीवन के कोई चिह्न नहीं मिलते तो इसके बाद चिकित्सक प्राणी की मृत्यु हो जाने की घोषणा कर देते हैं।

    ऊपर हमने जिन लक्षणों की चर्चा की है वस्तुतः वे मृत्यु के कारण नहीं हैं, लक्षण हैं। मृत्यु के कारणों पर चिकित्सा विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान अथवा विज्ञान की अन्य कोई शाखा यह नहीं बता पाई है कि आखिर मृत्यु के लक्षण प्रकट क्यों हुए। यदि यह कहा जाये कि शरीर के वृद्ध हो जाने पर मनुष्य की स्वाभाविक मृत्यु हो जाती है तो भी मृत्यु की सही परिभाषा प्राप्त नहीं होती। वृद्धावस्था स्वयं भी एक लक्षण ही है, कारण नहीं है। वृद्धावस्था की भी कोई निश्चित परिभाषा नहीं है न ही इसकी कोई सीमा है।

    बहुत से लोग चालीस वर्ष की आयु में भी वृद्धों की तरह व्यवहार करने लगते हैं और बहुत से लोग सत्तर-अस्स्सी साल में भी पूरी तरह स्वस्थ एवं सक्रिय दिखायी पड़ते हैं। यदि वृद्धावस्था मृत्यु का स्वाभाविक कारण है तो फिर कोई आदमी पचास-साठ साल की आयु में ही स्वाभाविक मृत्यु को क्यों प्राप्त हो जाता है? कोई आदमी एक सौ पैंतीस वर्ष या उससे अधिक आयु तक क्यों जा पहुँचता है?

    मृत्यु का क्रम

    अभी तक वैज्ञानिक यह निश्चित नहीं कर पाये हैं कि मृत्यु के समय हृदय की धड़कन का बंद होना, फैंफड़ों का बंद होना तथा मस्तिष्क का काम करना बंद कर देना, इन तीन घटनाओं में से पहली घटना कौनसी होती है तथा इनका क्रम क्या होता है।

    सामान्यतः चिकित्सकों का अनुभव है कि यदि इन तीनों घटनाओं में से कोई एक घटना घटित हो गयी है तो दूसरी तथा तीसरी घटना कुछ ही क्षणों में स्वतः ही घट जायेगी। चिकित्सकों के अनुसार इन तीनों घटनाओं में से पहले कोई भी घट सकती है, उनके घटित होने का कोई क्रम निर्धारित नहीं है। यह कहना सही नहीं होगा कि मृत्यु के पश्चात प्राणी की देह में कोई परिवर्तन होना संभव नहीं है। प्राणी की स्वाभाविक मृत्यु के बाद भी उसके शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन देखे गये हैं। जैसे बालोें का बढ़ना, नाखूनों का बढ़ना, शरीर से अपान वायु का निःसरण होना तथा मुँह से झाग आना। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शरीर के बाह्य एवं आंतरिक भागों में आये परिवर्तनों को मृत्यु का कारण नहीं माना जा सकता।

    विश्व में जितनी भी सभ्यतायें हुई हैं उनमें यह विश्वास रहा है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है, शरीर के भीतर कोई रहता है जो मनुष्य की देह के जन्म लेने, जीवित रहने अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जाने के लिये जिम्मेदार है। हिन्दू इसे आत्मा कहकर पुकारते हैं। इसाईयों ने सोल और मुसमानों ने इसे रूह कहकर पुकारा है। इसी प्रकार रोमन, सुमेरियन, माया तथा सिंधु सभ्यताओं सहित जितनी भी सभ्यताएं अतीत में हो चुकी हैं, उन सबमें थोड़े बहुत अंतर से इस बात को स्वीकार किया गया है कि मृत्यु का कारण आत्मा का देह त्याग देना है।

    चिरंजीवी होने की परिकल्पना

    आत्मा देह क्यों त्यागती है? इस प्रश्न के उत्तर में एक शाश्वत नियम बताया जाता है कि जिसका जन्म हुआ है, वह मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा।

    यद्यपि भारत में हनुमान, जाम्बवान, परशुराम, अश्वत्थामा, आल्हा आदि सप्त चिरंजीवियों की मान्यता है। अर्थात् सात महापुरुष ऐसे हुए हैं जिनकी मृत्यु नहीं हुई। इनमें से हनुमानजी तथा जाम्बवान देवता हैं, साधारण मनुष्य नहीं हैं। परशुराम भी विष्णु के अवतार हैं। ये तीनों, बिना देह के रह सकते हैं और इच्छानुसार कभी भी देह धारण एवं देह त्याग कर सकते हैं। ये रामायण काल में थे तो महाभारत के काल में भी। अनेक पुण्यात्माओं ने हनुमानजी के दर्शन होने की बात कही है। हनुमानजी, जाम्बवान तथा परशुरामजी के अतिरिक्त जिन चार चिरंजीवियों की मान्यता है, उन्हें कभी भी किसी ने भी देखने का दावा नहीं किया है। अतः यह शाश्वत सत्य ही जान पड़ता है कि जिसने जन्म लिया है, वह देह त्याग अवश्य करेगा। यह बात अलग है कि हर देह की आयु एक जैसी नहीं है।

    भारतीय जनमानस अनेक तपस्वियों की सैंकड़ों- हजारों वर्षों की आयु 
    में विश्वास करता है किंतु बहुत कम लोगों ने इस बात का दावा किया है कि उन्होंने सैकड़ों या हजारों वर्ष की आयु के आदमी को स्वयं अपनी आंखों से देखा है।

    पुनर्जीवित होने की संकल्पना

    मृत्यु हो जाने के कुछ समय बाद पुनः जीवित हो उठने की कुछ घटनायें यदा-कदा घटती रहती हैं। इसी प्रकार मृत्यु हो जाने के बाद किसी अन्य देह को धारण करके पिछले जन्म की घटनाओं की स्मृति शेष रहने के दावे भी किये जाते हैं। हमारा अनुभव बताता है कि इनमें से अधिकांश घटनायें सही होती हैं। 

    पहले वाली स्थिति का कारण अक्सर यह बताया जाता है कि यमदूत ले जाने तो किसी और को आये थे किंतु ले गये किसी और को। अतः गलती का पता चलते ही वे जीवात्मा को फिर से पुरानी देह में लौटा जाते हैं। यह अनुमान लगाना सहज ही है कि कभी-कभी ऐसा भी होता होगा कि जब तक यमदूतों को अपनी गलती का पता चले, मृतक के शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया जाये और जीवात्मा बिना देह का ही रह जाये। दूसरी स्थिति में जीवात्मा स्वाभाविक अथवा अस्वाभाविक मृत्यु के बाद उसी क्षेत्र में कहीं जन्म ले लेता है तथा किन्हीं अज्ञात एवं अतिविशिष्ट परिस्थितियों में जीवात्मा को नयी देह प्राप्त होने पर भी उसे पुरानी देह की स्मृति बनी रहती है। देखने में आया है कि ऐसा प्रायः अस्वाभाविक मृत्यु के मामले में होता है।

    विज्ञान के शब्दों में मृत्यु की परिभाषा चाहे जो हो किंतु यह निश्चित है कि विज्ञान मनुष्य की मृत्यु के बाद की कोई बात नहीं करता। विज्ञान की दृष्टि में देह मर जाती है और उसकी मृत्यु के कारण भी भौतिक हैं। विज्ञान के अनुसार देह बीमार होने, वृद्ध होेने अथवा दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त होती है। आुधनिक विज्ञान की धारणा के विपरीत, भारतीय अध्यात्म, मृत्यु को केवल जीवात्मा का देहांतरण मानता है। जैसे मनुष्य भौतिक जीवन में एक घर छोड़कर दूसरे घर में चला जाता है, या पुराना वस्त्र त्यागकर नया वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही मृत्यु की स्थिति में जीवात्मा पुरानी देह को त्याग कर नयी देह में चला जाता है।

    मृत्यु की इस परिभाषा से यह स्वतः स्पष्ट है कि जीवन, जीवात्मा तथा देह के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है और इनके विलग होने पर मृत्यु जैसी घटना घटित होती है। इस परिभाषा से यह संभावना बनती है कि जीवात्मा और देह के विलग होने के बाद देह भले ही कार्य करना बंद कर दे किंतु जीवात्मा समाप्त नहीं होता। वह देह के बाद भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बना रहता है।

    राम चरित मानस में प्रसंग आता है कि बाली वध के बाद जब तारा विलाप करने लगती है तब भगवान श्रीराम उसे समझाते हैं कि यह पांच तत्वों से बनी हुई देह तो नश्वर है। इसके भीतर जो आत्मा रहती थी वह नाश को प्राप्त नहीं होती। तुम्हें किससे काम है, इस नाशवान देह से जो तुम्हारे सामने पड़ी हुई है या उस अनश्वर आत्मा से जो तुम्हें दिखायी नहीं देता!

    मृत्यु के बाद का जीवन

    जिस क्षण यह अनश्वर आत्मा अर्थात् जीवात्मा देह छोड़ देता है, उसी क्षण से मृत्यु के बाद की संभावनाएं आरंभ हो जाती हैं। भारतीय अध्यात्म और दर्शन देह त्याग के बाद के जीवन की भांति-भांति की संभावनाओं को व्यक्त करते हैं। रामकथा में यह प्रसंग आता है कि जब भगवान शरभंग ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं तो शरभंग ऋषि भगवान से कहते हैं कि मैं तो ब्रह्माजी के पास जा रहा था किंतु जब मैंने सुना कि आप आ रहे हैं तो मैं आपके दर्शनों के लिये रुक गया। इसके बाद शरभंग ऋषि योगानल से देह को भस्म कर देते हैं और जीवात्मा उसी समय तेज पुंज के रूप में बदल कर ऊर्ध्वगामी हो जाता है।

    राम चरित मानस में यह प्रसंग भी आता है कि जब दशानन रावण ने जटायु को बुरी तरह घायल कर दिया और भगवान श्रीराम, सीताजी को खोजते हुए जटायु तक पहंुचे तब जटायु ने भगवान राम के अंक में देह त्याग किया। देह त्यागने के तुरंत पश्चात् महात्मा जटायु ने चार भुजा धारी विष्णु रूप में प्रकट होकर भगवान की स्तुति की।

    जीवात्मा का कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बने रहना ही मृत्यु के बाद का जीवन है। आदि काल से धरती के विभिन्न भागों में विकसित हुई सभ्यताओं की यह मान्यता रही है कि मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता। किसी एक स्थान से जीवात्माएं आती हैं और फिर कुछ काल के लिये कहीं चली जाती हैं।

    जीवात्मा की शांति

    धरती से चली गयी जीवात्माओं के कल्याण की कामना से धरती के निवासी पिण्डदान और श्राद्ध जैसी क्रियाएँ करते हैं। महाभारत में भगवान वेदव्यासजी ने लिखा है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पाण्डवों ने राजा धृतराष्ट्र तथा अपने कुल के अन्य व्यक्तियों को साथ लेकर कौरव वंश के जो वीर युद्ध में हताहत हुए थे, उनका श्राद्ध किया। इसी प्रकार ऋषि वाल्मीकि लिखते हैं कि जब चित्रकूट में भगवान श्रीराम को अपने पिता के स्वर्गारोहण की सूचना मिली तो उन्होंने तीर्थ के जल से पिता का श्राद्ध किया।

    अधिकांश मनुष्यों का विश्वास है कि मृत व्यक्तियों के नाम से धरती पर किया गया दान पुण्य उन जीवात्माओं को तब तक प्राप्त होता है जब तक कि उनका अंतिम रूप से मोक्ष न हो जाये, चाहे वे जीवात्माएं जिस किसी लोक में हों, जिस किसी अवस्था में हों। राम चरित मानस में ही प्रसंग आता है कि जब भगवान राम ने दशानन रावण का वध कर दिया तब सारे देव गण भगवान की स्तुति के लिये आये, उनमें राजा दशरथ भी थे। अर्थात् देह त्याग के बाद भी दशरथजी की जीवात्मा किसी देवलोक में अपनी पुरानी स्मृति की अवस्था में ही बनी रही।

    इस प्रकार हमारे धार्मिक ग्रंथों के सारे दृष्टांत देह त्याग के बाद के जीवन की विभिन्न प्रकार की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।

    निश्चित है मृत्यु का समय

    भारतीय सभ्यता सहित संसार की अधिकांश सभ्यताओं की यह मान्यता भी रही है कि प्रत्येक मनुष्य को गिनी हुई साँसें मिलती हैं। जब साँसों की संख्या पूरी हो जाती है तो मानव साँस लेना बंद कर देता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान तो यहाँ तक मान्यता रखता है कि जीवात्मा के धरती लोक पर देह धारण करने और देह त्याग करने का समय निश्चित है, और इस समय से जीवात्मा के धरती पर आने या जाने के बाद का जीवन प्रभावित होता है।

    भारतीय अध्यात्म के अनुसार मृत्यु के बाद का जीवन एक जैसा नहीं है। उसके कई रूप होते हैं। मृत्यु के बाद मिलने वाले अगले जीवन की नींव इस जीवन के कर्मों, मृत्यु की परिस्थितियों, मृत्यु के समय मस्तिष्क में आये विचारों तथा और भी बहुत सारे कारकों पर भी निर्भर करती है।

    शवों को सुरक्षित रखने की परम्परा

    भारतीय सभ्यता के अतिरिक्त भी, संसार में वर्तमान तथा अतीत में हो चुकी अनेकानेक सभ्यताएं मृत्यु के बाद के जीवन की कई तरह की संभावनाओं में विश्वास रखती आयी हैं।

    मिश्र वासियों द्वारा ममी बनाकर मृतक की देह को सुरक्षित रखने के विचार के पीछे यही एक धारणा छिपी हुई है कि हो न हो एक दिन आत्मा इस देह में वापस लौटे। इसलिये वे न केवल समाज के प्रमुख व्यक्तियों की देह को ममी के रूप में सुरक्षित रखते थे, अपितु मृतक व्यक्तियों के शवों के साथ जीवनोपयोगी सामग्री भी रखते थे। ताकि यदि किसी दिन आत्मा इस देह में लौटे तो उसे अपनी आवश्यकता की वस्तुएं तत्काल प्राप्त हो सकें। मिश्रवासी, राजा अथवा राजपरिवार के सदस्यों की ममियों के ताबूतों के साथ तो जीवित दास दासियों को भी कब्र में गाढ़ देते थे।

    इस्लाम का मानना है कि मृत्यु के बाद मनुष्य कब्र में सो जाते हैं। जब कयामत का दिन आता है तो सृष्टिकर्ता एक-एक मनुष्य को कब्र से उठाता है तथा उसके कर्माें का लेखा जोखा करता है और उन्हें उसी के अनुसार दण्ड अथवा पुरस्कार मिलता है।

    ईसाइयों में तो मृत्यु के बाद के जीवन की संभावनाओं पर सर्वाधिक विश्वास किया जाता है। बहुत से पाश्चात्य देशों में धनी व्यक्तियों ने लाखों करोड़ों डॉलर ऐसी कम्पनियों को फीस के रूप में चुकाये हैं जो उन धनी व्यक्तियों की मृत्यु के बाद उनकी देह को रासायनिक पदार्थों में तब तक सुरक्षित रख सके, जब तक कि विज्ञान एक दिन मरे हुए व्यक्तियों को पुनजीर्वित करने की विद्या की खोज करके उन्हें भी फिर से जीवित न कर दे।

    श्रीलंका में हुई पुरातत्व खोजों से यह तत्व सामने आया है कि किसी दुर्गम गुफा में रावण की देह को भी ममी बनाकर रखा हुआ है। हालांकि यह पुष्टि नहीं हो सकी है कि दुर्गम गुफा के भीतर रखे ताबूत मेें कोई शव या ममी है भी या नहीं! अथवा यदि है भी तो शव या ममी किस की है!

    तिब्बत देश की सीमा में स्थित दुर्गम हिमालय क्षेत्र में कुछ ऐसी रहस्यमय गुफाएं मिली हैं जिनमें आज के स्त्री पुरुषों से लगभग डेढ़ गुना लम्बे स्त्री पुरुषों के हजारों साल पुराने शव रखे हुए हैं। ये शव देवताओं के बताये जाते हैं। ये शव किसी रहस्यमय लेप से सुरक्षित हैं क्योंकि वे ममी के रूप में नहीं हैं, शव के रूप में हैं। अनुमान यही होता है कि ये शव भी इसी आशा में सुरक्षित रखे गये हैं कि एक दिन ऐसा आयेगा जब ये शव जीवित हो उठेंगे।

    संसार के अन्य हिस्सों से भी मनुष्य जाति द्वारा इस प्रकार से सुरक्षित रखे गये शव या ममी मिल सकते हैं किंतु अब तक जितने भी उदाहरण ऊपर दिये गये हैं ये केवल सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं हैं, इनमें से एक भी उदाहरण आज तक देखने मंे नहीं आया है कि कोई शव या ममी फिर से जीवित हुई हो किंतु विज्ञान के बल पर या किसी अन्य शक्ति के बल पर भविष्य में किसी शव या ममी को फिर से जीवित करना संभव हो जाये, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

    तिब्बत, श्रीलंका, भारत तथा मिश्र सहित दुनिया की अनेकानेक सभ्यताओं में मृतकों के कंकाल अथवा उनकी देह की ममियां सुरक्षित रखी गयी हैं। एशिया के अतिरिक्त यूरोप और अमरीका में आधुनिक काल में कुछ अति धनाढ्य व्यक्तियों ने अपने शरीर रासायनिक लेपों से सुरक्षित करवाये हैं ताकि जब भी विज्ञान मृत्यु पर विजय प्राप्त करने में सफल हो जाये तो उनके मृत शरीरों में भी फिर से प्राण फूंके जायें।

    क्या शरीर के आकार के आधार पर आत्मा का आकार निश्चित होता है?

    भारत के उत्तरांचल की पहाड़ियों से एक विशालाकाय कंकाल प्राप्त हुआ है। यह इतना विशाल है कि आज का आदमी तो इसकी खोपड़ी से भी छोटा है। कई व्यक्ति मिलकर भी इस कंकाल को हिला तक नहीं सकते। यहां तक कि इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोने के लिये विशाल हवाई जहाज की आवश्यकता पड़ेगी। जिस स्थान पर यह कंकाल मिला है, वहां के लोगों की मान्यता है कि यह महाभारत कालीन घटोत्कच का कंकाल है। घटोत्कच कर्ण के हाथों युद्ध के दौरान ही मारा गया था। उसकी मृत्यु पर पाण्डवों के परम हितैषी श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में ही हर्ष से नृत्य किया था क्योंकि घटोत्कच के मरने से कर्ण के पास उपलब्ध वह शक्ति नष्ट हो गयी थी जो उसने अर्जुन को मारने के लिये सुरक्षित रख छोड़ी थी। यदि कर्ण उस शक्ति से घटोत्कच को नहीं मारता तो घटोत्चक अकेला ही कौरवों के लिये इतना भारी पड़ता कि इससे पहले कि कर्ण अर्जुन के प्राण ले, घटोत्कच ही कर्ण सहित कौरव पक्ष के समस्त लोगों का संहार कर डालता।

    महाभारत के वर्णन के अनुसार घटोत्कच इतना विशाल था कि उसकी आवाज से समुद्र, पर्वत और वनों के साथ सारी पृथ्वी डगमगाती थी और आकाश के साथ दिशाएं गूंजने लगती थीं। जब उसका शरीर पृथ्वी पर गिरा तो उसके विशाल शरीर के नीचे दब कर कौरवों की एक अक्षौहिणी सेना नष्ट हो गयी। यह तो निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उत्तरांचल में मिला कंकाल घटोत्कच का ही है। हो सकता है उसी का हो, किंतु जब तक आधुनिक मानव सभ्यता ने उत्तरांचल में मिले कंकाल को अपनी आंखों से देख नहीं लिया तब तक कोई विश्वास नहीं कर पाया था कि क्या कभी धरती पर इतने बड़े इंसान भी होते थे!

    तो क्या पूर्व के विशाल देह के आदमियों में और आज के छोटे शरीर वाले आदमियों की देह में निवास करने वाली आत्मा एक ही थी! या जिस प्रकार एक कोषीय जीवों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों एवं मानवों में चेतना के स्तर के आधार पर उन्हें अलग-अलग कलाओं का जीव माना गया है, उसी प्रकार इन विशालाकाय देहधारी इंसानों में भी सामान्य मनुष्य से विलग किसी अन्य कला की शक्ति वाली आत्मा निवास करती थी!

    यदि मृत्यु के बाद आत्माओं के पुनर्जन्म के सिद्धांत पर अडिग रहा जाये तो इन विशाल देह वाले इंसानों की आत्माएं कहां गयीं। क्या उन्होंने एक समय के बाद पुनर्जन्म लेना बंद कर दिया! या फिर उनका पुनर्जन्म भी सामान्य देह वाले इंसानों में होने लगा! यहां हम यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझेंगे कि भारतीय अध्यात्म में चींटी से लेकर हाथी और मनुष्य तक में एक ही आत्मा का निवास माना गया है।

    आत्माएं अलग-अलग तरह की नहीं होतीं। कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार वे अलग-अलग कर्मफलों के संस्कारों से संस्कारित होती हैं। यद्यपि दर्शन और अध्यात्म मानव सभ्यता के इतिहास जितने ही पुराने हैं तथा आधुनिक विज्ञान की आयु अभी कुछ सौ वर्ष ही हुई है, तथापि विज्ञान ने जो भी उन्नति की है, उसके उपरांत भी आज तक दर्शन तथा विज्ञान के बीच चौड़ी खायी है।

    इस कारण एक दर्शन और अध्यात्म के बहुत से सिद्धांतों की पुष्टि आज भी विज्ञान के माध्यम से संभव नहीं है। फिर भी जैसे-जैसे समय व्यतीत होता जायेगा, वैसे-वैसे दर्शन तथा विज्ञान परस्पर निकट आते जायेंगे। लेखक की मान्यता है कि दुनिया भर का सारा दर्शन उस विज्ञान से परास्त हो जायेगा किंतु आने वाले समय का विज्ञान भारतीय दर्शन और अध्यात्म की पुष्टि करेगा। तभी यह कह पाना संभव हो पायेगा कि मृत्यु के बाद का जीवन किस तरह का है तथा विज्ञान उसे किस भांति परिभाषित कर पाता है।

    भारतीय दर्शन में मृत्यु के बाद के सम्बन्ध में की गयी समस्त चर्चाएं सत्य हैं। निःसंदेह मृत्यु के बाद जीवन है, उसके विविध रूप हैं तथा विज्ञान से परे हटकर आज भी समाज में उसकी झलक किसी न किसी रूप में यत्र-तत्र दिखायी देती रहती है।

    जीवों के क्लोन में जीवात्मा कहां से आता है ?

    विज्ञान तेजी से क्लोनिंग, जीन कल्चर और ह्यूमन ग्राफ्टिंग की तरफ बढ़ रहा है। क्लोनिंग का अर्थ है ठीक एक जैसे दो शरीर तैयार करना। जीन कल्चर का अर्थ है किसी मृत व्यक्ति के शव के किसी हिस्से में सुरक्षित रखे हुए डीएनए से मृतक व्यक्ति के गुणों वाला व्यक्ति तैयार कर देना तथा ह्यूमन ग्राफ्टिंग का अर्थ है किसी जीवित व्यक्ति के शरीर के जीन लेकर उनसे ठीक वैसे ही एक और व्यक्ति तैयार कर देना जैसे कि पेड़ पौधों में किया जाता है। भेड़ों, कुत्तों तथा चूहों आदि जीवों के क्लोन तैयार कर लिये गये हैं कुछ वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने अज्ञात स्थानों पर आदमी के क्लोन तैयार कर लिये हैं तथा वे जीवित भी हैं।

    यदि ये तथ्य सही हैं तो जीवात्मा के देह में आने और निरंतर देह बदलते रहने के सिद्धांत पर बड़ा प्रश्न चिह्न लग जायेगा। हमें हजारों वर्षों से चली आ रही इन मान्याताओं को नये सिरे से व्याख्यायित करना होगा। क्योंकि जीन विज्ञान की प्रगति का सिलसिला कहीं रुकने वाला नहीं। यदि ह्यूमन क्लोनिंग सफल हो गयी तो एक दिन वैज्ञानिक जो क्लोन तैयार करेंगे उसमें से वे मृत्यु के जीन निकाल फेंकेंगे।


    - मोहनलाल गुप्ता,

    63, सरदार क्लब योजना,

    वायुसेना क्षेत्र जोधपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

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