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  • अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय उदयपुर

     25.06.2018
    अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 13 लोककला संग्रहालय, उदयपुर


    उदयपुर में स्थित भारतीय लोककला मण्डल, लोकधर्मी प्रदर्शनकारी कलाओं के संवर्द्धन एवं प्रशिक्षण का विश्व-प्रसिद्ध संस्थान है। इसकी स्थापना 22 फरवरी 1942 को प्रख्यात लोककलाविद् पद्मश्री देवीलाल सामर ने की थी। इसका कलात्मक भवन चेतक सर्कल से पंचवटी जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित है। इस संस्थान में संग्रहालय के साथ-साथ खोज विभाग, प्रदर्शन विभाग तथा काष्ठकला प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई है।

    संस्थान के खोज विभाग द्वारा लोककला विषयक पुस्तकों के प्रकाशन किए जाते हैं तथा प्रदर्शन विभाग द्वारा देश भर में लोकनृत्यों के प्रदर्शन करवाए जाते हैं। काष्ठकला प्रशिक्षण केन्द्र में कलाकारों को काष्ठकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। ई.1965 में बुखारेस्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कठपुतली समारोह में संस्थान के दल ने कठपुतली प्रदर्शन करके विश्व भर में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। इससे राजस्थान की धागा-पुतली कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

    लोककला संग्रहालय, बड़ी इमारत में विस्तृत है। इसमें प्रदर्शनकारी लोककलाओं की विशिष्ट कलाकृतियों का संग्रह किया गया है। इसे प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक देशी-विदेशी पर्यटक देखने आते हैं। जन-शिक्षण तथा कला-प्रशिक्षण की दृष्टि से यह संग्रहालय देश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में गिना जाता है। संस्थान में आने वाले पर्यटकों को कठपुतलियों का नृत्य दिखाया जाता है।

    संग्रहालय में एक दीवार पर पाबूजी की पड़ लगी हुई है। इसके सामने पड़ वाचक भोपा-भोपिन की, वाचन मुद्रा में मनुष्याकार आकृतियां बनी हुई हैं। इसके निकट गोलाई में राजस्थानी लोक रंगमंच की मुख्य विधाओं- तुर्रा कलंगी, गवरी, रामलीला, भवाई तथा रासलीला की झांकियां सजाई गई हैं। इन झांकियों में मंचसज्जा, कलाकारों की चेष्टाएं तथा लोकजीवन की सहभागिता देखते ही बनती है।

    इसी के निकटवर्ती कक्ष में काष्ठकला की ईसर-गणगौर, होली के खाण्डे, तोरण, नृतकियां, वाद्यवादक, ठाकुरजी की राम-रेबाड़ी, मुखौटे, मणकथंभ आदि से राजस्थान की लोकसंस्कृति का परिचय मिलता है। लम्बी गैलेरी से जुड़े एक अन्य कक्ष में मोलेला की मृण्मूर्तियों में ताखाजी, धर्मराज, गुनामेनू, अम्बा माता, हंसमाता, मुर्गामाता, मच्छी माता, साण्ड माता, रेबारी देव, पाबूजी आदि की टैराकोटा मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं।

    इनके ऊपर दीवार में रामलला तथा कृष्णलला की पड़ें, गले में धारण किए जाने वाले विविध लोक देवी-देवताओं के नावें, कावड़, भैंरूजी का देवरा, मामादेव का काष्ठ तोरण तथा ताखादेव की प्रस्तर प्रतिमा प्रदर्शित हैं। गवरी विसर्जन के समय मिट्टी के बने विशालाकाय हाथी पर देवी गौरज्या का जुलूस भी प्रदर्शित है।

    इसके निकटवर्ती कक्ष में ई.1960 तथा इससे पूर्व के मणिपुर, त्रिपुरा तथा मध्यप्रदेश की आदिमधर्मी जातियों के आकर्षक आयुध, पहनावे तथा दैनिक जीवन से सम्बन्धित आवश्यक वस्तुओं का संग्रह और चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। बाहर गैलेरी में मेंहदी के विविध मांडणे, खिलौने, भूमि अलंकरण, दीवार पर बनने वाले आनुष्ठानिक थापे और सांझी कला के चित्र बने हैं।

    इसी गैलेरी से लगा लोकवाद्यों का कक्ष है जिसमें पारम्परिक लोकवाद्यों की प्रदर्शनी तथा वादक कलाकारों के चित्र दिखाए गए हैं। इसके आगे की गैलेरी में आदिवासी भीलों के गवरी के मुख्य पात्र रायबूड़िया, राई, खेतूड़ी, बणजारा तथा हठिया आदि की प्रस्तुतियां प्रदर्शित की गई हैं। आदिवासियों में प्रचलित मृतकों के प्रस्तरांकन चीरा, मातलोक तथा भील-गरासिया-बहरिया आदि आदिवासियों की चित्रमय झांकियां बनी हुई हैं।

    गैलेरी के आगे का कक्ष पुतली कक्ष है जिसमें भारत के विभिन्न प्रांतों- बंगाल, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गोवा आदि की विभिन्न शैली की पुतलियों के साथ-साथ विश्व के कई देशों यथा- जर्मनी, पौलेण्ड, इंग्लैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, रूस, इण्डोनेशिया, हॉलैण्ड आदि की पुतलियां प्रदर्शित की गई हैं।


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  • अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय आहाड़

     25.06.2018
    अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय आहाड़

     अध्याय - 14 राजकीय संग्रहालय, आहाड़

    उदयपुर नगर के प्रताप नगर रेलवे स्टेशन को जाने वाली सड़क के समीप आहाड़ नदी के उत्तर पूर्वी किनारे पर एक प्राचीन टीला है जिसे धूलकोट के नाम से जाना जाता है। किसी समय यह टीला आयड़ नदी के बाएं किनारे पर बसा हुआ था। यही नदी आगे चलकर बेड़च कहलाती है। राजस्थान में बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में ऐसे कई टीले प्रकाश में आए हैं जहाँ से सिन्धु सभ्यता के बाद की ‘ग्रे वेयर’ वाली सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चूंकि इस सभ्यता के लोग ताम्बे एवं पत्थरों के उपकरणों एवं औजारों का प्रयोग करते थे इसलिए इस सभ्यता को पुरातत्व जगत में ‘ताम्र पाषाण’ संस्कृति के नाम से जाना जाता है।

    राजस्थान में इसका प्रमुख केन्द्र ‘आहाड़’ माना गया है। यह सभ्यता ईसा से चार हजार साल पहले से लेकर ईसा से दो हजार साल पहले तक अस्तित्व में रही। उदयपुर, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़ भीलवाड़ा, अजमेर, कोटा एवं बूंदी जिलों में इस संस्कृति के एक सौ से अधिक गांव खोजे जा चुके हैं।

    इस नगर को प्राचीन शिलालेखों में ताम्बावती नगर, मध्यकालीन शिलालेखों में आघाटपुर और वर्तमान में आहाड़ या आयड़ कहा जाता है। वर्तमान आयड़ ग्राम भी एक प्राचीन टीले पर बसा हुआ है। इस टीले की सर्वप्रथम खुदाई मेवाड़ रियासत के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अक्षय कीर्ति व्यास ने बहुत सीमित क्षेत्र में की थी। इसके पश्चात् ई.1954-55 में श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल ने राजस्थान सरकार की ओर से उत्खनन कार्य किया। ई.1960-61 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग, डेक्क्न कॉलेज पुणे एवं मेलबॉर्न विश्वविद्यालय ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त दल ने इस टीले का उत्खनन किया। इस खुदाई का नेतृत्व डा. एच. डी. सांकलिया ने किया। इस टीले की खुदाई से जो सामग्री प्राप्त हुई उसके प्रदर्शन के लिए इसी टीले के निकट आहाड़ संग्रहालय की स्थापना की गई है।

    आहाड़ टीले से प्राप्त चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता को आहाड़ सभ्यता कहा जाता है। इसमें चित्रित लाल, काले मृद-पात्रों का उपयोग करने वाली सभ्यता के अवशेष मिले हैं। यह ताम्र-पाषाण युगीन सभ्यता है। यहाँ से चौकोर एवं आयताकार मकानों के अवशेष मिले हैं। उस काल में हड़प्पा सभ्यता के अतिरिक्त केवल आहाड़ सभ्यता के लोग ही पक्की दीवारें एवं पक्के घरों का उपयोग कर रहे थे। आहाड़, बालाथल एवं गिलूण्ड में इसके प्रमाण देखे जा सकते हैं। आहाड़ संस्कृति की पहचान मुख्य रूप से विशिष्ट प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से होती है।

    इस टीले से सफेद रंग के चित्रित काले एवं लाल बर्तन, चमकीले लाल, राखिया, दूधिया रंग वाले, टैन पॉलिश युक्त, रिजर्व स्लिप्ड वाले बर्तन मिले हैं। इनमें से टैन पॉलिश तथा थिन रैड स्लिप वाले बर्तन आहाड़ सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में नहीं मिले हैं, वे आहाड़ संस्कृति के समृद्ध चरण में प्रयुक्त होते थे। आहाड़ टीले के सबसे नीचे के स्तर से हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के विशिष्ट आकृति वाले डिशऑन स्टेण्ड (मृदपात्र) मिले हैं जो इसी संग्रहालय की दीर्घा में प्रदर्शित हैं। इन मृदपात्रों के यहाँ मिलने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आज से चार हजार वर्ष पूर्व अर्थात सिन्धु सभ्यता के अंतिम चरण में सिन्धु सभ्यता का मेवाड़ में प्रवेश हो चुका था। यद्यपि उस समय आहाड़ में काले-लाल रंग के मृद-भाण्डों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हो रहा था।

    सिन्धु मृद-भाण्ड कला के सम्पर्क का प्रभाव यहाँ तक पहुँचा कि काली-लाल मृद्भाण्ड कला में भी ‘डिश-ऑन स्टैण्ड’ का अनुकरण किया जाने लगा। इस प्रकार की महत्वपूर्ण सामग्री ‘माहेश्वर-नवदाटोली’ के टीलों की खुदाई से भी मिली है। आहाड़ एवं माहेश्वर ‘काली एवं लाल मृदभाण्ड संस्कृति’ के प्रमुख केन्द्र थे। आहाड़ के काले-लाल धरातल वाले चमकीले बर्तनों पर सफेद मांडने बने हुए हैं जो हजारों वर्षों के बाद भी नष्ट नहीं हुए हैं। ये बर्तन सबसे नीचे के स्तर से ऊपर की ओर 20 फुट के जमाव तक मिले हैं। रतलाम से कोटा जाने वाले मार्ग पर स्थित नागदा नामक स्थान की खुदाई में भी काले-लाल मृद्भाण्ड पर्याप्त मात्रा में मिले हैं। आहाड़ के समीपवर्ती क्षेत्र में ‘गिलूण्ड’ नामक स्थान से प्लास्टर युक्त कच्ची दीवारों के बनाने की जानकारी भी मिली है।

    सौराष्ट्र में ‘रोजड़ी’ नामक स्थल से भी इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं। इस काल की सभ्यता का प्रमुख केन्द्र आहाड़ ही था। आहाड़ की खुदाई से चार हजार वर्ष पुरानी संस्कृति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है। इस काल में कच्ची ईटों के मकान का निर्माण करते थे। कुछ घरों के अवशेष खाइयों (ट्रेंचेज) में विद्यमान हैं जिनका आकार 23 गुणा 15 फुट तथा 9 गुणा 9 फुट है। उनमें कच्ची छतों के नीचे बांस के प्रयोग का भी पता चला है। इन छतों को लकड़ी की बल्लियों द्वारा उठा कर रखा जाता था जो नीचे कच्चे फर्श में गाड़ दी जाती थीं।

    आहाड़ के प्राचीन निवासी अपने घरों का गन्दा पानी निकालने की वैज्ञानिक पद्धति से भी परिचित थे। इसके लिए 15 गुणा 20 फुट के गड्ढे़ खोद कर उसमें पकाई हुई मिट्टी के घेरे एक दूसरे के ऊपर रखकर (रिंग वैल) बना लिए जाते थे और उनमें गन्दा पानी गिरता था। इसका एक नमूना पुरा स्थल पर संरक्षित है। आहाड़ में ऐतिहासिक युग की बसावट का जमाव ताम्रपाषाण काल की तुलना में छोटा है। इस काल में भी लोगों ने मिट्टी, पत्थर तथा ईंटों से चौकोर भवन बनाए।

    इस काल के मिट्टी के बर्तन लाल तथा राखिया प्रकार के हैं। उत्खनन में अनेक छोटी वस्तुओं यथा मिट्टी के मणके, झांवे, चूड़ियां, गोफण, घोड़े, हाथी तथा लोहे के औजार यथा कुल्हाड़ी, छैनी, भाले, तीन हल का फाल, कीलें, कांच की चूड़ियां आदि खोजे गए।

    आहाड़ संग्रहालय में तीन दीर्घाएँ हैं। प्रथम दीर्घा में काले चित्रित धूसर मृदपात्र, काले और लाल मृदपात्र, चमकीले लाल रंग के मृदपात्र एवं कुषाण-कालीन मृदपात्र रखे हैं जिनमें लाल टोंटीदार लोटे तथा घड़े इत्यादि सम्मिलित हैं।

    द्वितीय दीर्घा में मणके, मृण-मूर्तियां, धूप-दान, जानवरों के सींग, दीपक, ठप्पे, मोहरें इत्यादि प्रदर्शित हैं।

    तृतीय दीर्घा में आहाड़ क्षेत्र से प्राप्त धातु एवं पाषाण की प्रतिमाएं है। ये प्रतिमाएं सातवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की हैं। इनमें सूर्य, शिव-पार्वती, कच्छपावतार, मत्स्य अवतार और त्रिमुख विष्णु प्रतिमाएं प्रमुख हैं। कच्छप एवं मत्स्यावतार की प्रस्तर प्रतिमाएँ विशेष स्थान रखती हैं। मत्स्य तथा तथा कूर्मावतार को पद्म के ऊपर विग्रह रूप में दर्शाया गया है तथा नीचे विष्णु के आयुध दर्शाए गए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित 8वीं शती ईस्वी की जैन तीर्थंकर की कांस्य प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।


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  • अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय उदयपुर

     25.06.2018
    अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 15 बागोर की हवेली संग्रहालय, उदयपुर


    उदयपुर नगर में पिछोला के किनारे गणगौर घाट पर बागोर की हवेली स्थित है। यह मेवाड़ के बागोर ठिकाने के सामंत की हवेली है। दिसम्बर 1997 में इस हवेली के 18 कमरों में एक संग्रहालय स्थापित किया गया है जिसमें राजपूत जीवन शैली, वेशभूषा, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, उनके मनोरंजन के साधन, तीज-त्यौहार एवं उत्सव आदि की झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। साथ ही इस संग्रहालय में मेवाड़ के शूरवीर महाराणाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन शैली को संजोया गया है।

    हवेली के कक्षों की दीवारों पर भित्तिचित्र बने हुए हैं। हवेली के शयन कक्षों में रीति कला (इरोटिक आर्ट) के चित्र बने हैं। अन्य कक्षों में गणगौर की सवारी, पशु-पक्षी एवं युद्ध के दृश्यों का चित्रांकन हुआ है। कलाकृतियों में गजानन की 700 वर्ष पुरानी प्रतिमा दर्शनीय है। संग्रहालय में हस्तशिल्प, कारीगरी, बुनाई, छपाई, रंगाई और पड़कला को प्रदर्शित किया गया है। मेवाड़ के राजपरिवार में प्रयुक्त कुछ आभूषण भी यहाँ प्रदर्शित किए गए हैं।

    शयन कक्ष में कलाकारी युक्त पलंग एवं अन्य प्रसाधन सामग्रियां, बड़े कांच, मदिरा की सुराहियां, प्याले आदि संगृहीत हैं। दरबार हॉल, जनाना कक्ष एवं मर्दाना कक्षों को प्राचीन हस्तकलाओं के नमूनों से सजाया गया है। एक कक्ष में राजस्थान में धारण किए जाने वाले लगभग 50 प्रकार की साफे और पाग-पगड़ियां प्रदर्शित की गई हैं। इस संग्रहालय में महिलाओं के 40 मॉडल रखे गए हैं जिनके माध्यम से राजस्थान की विभिन्न प्रकार की बंधेज, चूनड़ी एवं लहरिया की साड़ियां प्रदर्शित की गई हैं।

    कुंकुम के तिलक के लिए कलात्मक चौपड़े, बाजोट, तोरण, रोड़ी धाम एवं पाटियां आदि कलाकृतियां भी रखी हुई हैं। मांगलिक प्रसंगों, उत्सवों, गुरु आगमनों तथा मंदिर प्रतिष्ठा के अवसरों पर नाटक, ख्याल, तमाशे, नृत्य एवं भवाई किए जाते थे। हवेली में उन अवसरों के दृश्य चित्रित किए गए हैं। लोक चित्रकारी भी प्रदर्शित की गई है। चित्रमय सांप-सीढ़ी में 72 खंड प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें चंद्र लोक, सूरजलोक, तपलोक, दिक्पाल लोक आदि प्रमुख हैं।

    बहुरंगी माण्डणों, पलंग के पायों पर राग-रागिनियों के चित्र, दरियों में विभिन्न प्रकार की नृत्य मुद्राएं तथा पशु-पक्षियों की आकृतियां बुनी हुई हैं। गणगौर का मेला, पाड़ीनाथ का मेला, होली, दीपावली, कालाबावजी का मेला, हरियाली अमावस्या का मेला और निर्जला ग्यारस का मेला, फूलडोल का मेला, शीतलामाता का मेला, आदि भी चित्रित किए गए हैं। एक कक्ष बड़ी महारानी का कहलाता है जिसमें धार्मिक वातावरण प्रस्तुत किया गया है।

    भजन-कीर्तन हेतु विविध वाद्ययंत्र, एकलिंगजी, श्रीकृष्ण एवं श्रीराम के चित्र व्यवस्थित रूप से रखे हुए हैं। बागोर की हवेली में पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का कार्यालय भी चलता है। इस सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और गोआ दमन एवं दीव में सांस्कृतिक गतिविधियां चलाई जाती हैं।


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  • अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी

     25.06.2018
    अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी

    अध्याय - 16 महाराणा प्रताप संग्रहालय हल्दीघाटी


    राजसमन्द जिले में स्थित हल्दीघाटी में बने चेतक स्मारक से कुछ ही दूरी पर महाराणा प्रताप संग्रहालय स्थित है। इसे महाराणा प्रताप (ई.1572-97) कालीन परिवेश एवं शिल्प में बनाने का प्रयास किया गया है। दर्शकों के समक्ष उस काल की स्मृतियों को पुनजीर्वित करने के उद्देश्य से इतिहास को उसके मूल स्वरूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। यहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में दर्शक आते हैं।

    संग्रहालय में आने वाले दर्शकों के लिए थोड़े-थोड़े अंतराल में प्रकाश एवं ध्वनि शो दिखाया जाता है जिसमें महाराणा प्रताप के जीवन वृत्त पर आधारित एक लघु फिल्म भी दिखाई जाती है, साथ ही विभिन्न शस्त्रों, छायाचित्रों, पुस्तकों आदि की प्रदर्शनी भी दिखाई जाती है। तत्पश्चात बड़े से एक मानचित्र पर युद्धस्थल एवं युद्ध की प्रमुख घटनाओं के स्थलों को दिखाया जाता है।

    आगे महाराणा प्रताप की जीवनी से सम्बन्धित घटनाओं का विवरण प्रदर्शित किया गया है। इस विवरण में पन्ना धाय के बलिदान की कहानी, महाराणा प्रताप का साथियों सहित युद्ध की तैयारी हेतु विचार-विमर्श, राणा प्रताप का जंगल में निवास, घास की रोटी खाते हुए महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी युद्ध के समय एक पांव से घायल चेतक का बलिदान आदि का प्रदर्शन किया गया है।

    एक प्रतिमा में महाराणा के घोड़े में मानसिंह के हाथी के मस्तक पर पैर रखे हुए हैं तथा महाराणा प्रताप मानसिंह पर वार करने की तैयारी में है। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाले भील राजा, हकिम खां सूरी, राणा पुंजा, दानवीर भामाशाह आदि के चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। अन्त में हल्दीघाटी में गुलाब की खेती, गुलाबजल कैसे बनता है, आदि दिखाया गया है।

    संग्रहालय के बाहर छाोटा सा बाजार है जहाँ हस्तशिल्प की वस्तुएं, पुस्तकें, चाय नाश्ता, गन्ने का रस, पारंपरिक पोशाकों में फोटोग्राफी, ऊँट तथा घोड़े की सवारी एवं नौकायन आदि की सुविधाएं उपलब्ध हैं।


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  • मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा

     27.06.2017
    मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा

    जब कोटा का महाराव किशोरसिंह अपने आदमियों पृथ्वीसिंह तथा गोरधन दास को साथ लेकर कोटा से रंगबाड़ी चला गया और वहाँ से जालिमसिंह पर हमला करने की तैयारियां करने लगा तो पोलिटिकल एजेण्ट ने जालिमसिंह से पूछा कि अब वह क्या करेगा?

    इस पर जालिमसिंह ने उत्तर दिया कि मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा किंतु अपने स्वामी पर हथियार नहीं उठाउंगा। इस उत्तर को सुनकर एजेण्ट रंगबाड़ी गया और महाराव को समझा बुझा कर फिर से कोटा ले आया जहाँ महाराव का नये सिरे से राज्याभिषेक किया गया। गोरधनदास को कोटा से निकाल दिया गया। उसे दिल्ली में रहने के लिये मकान दे दिया गया।

    वस्तुतः सारे विवाद की जड़ महाराव किशोरसिंह तथा दीवान माधोसिंह के मध्य चल रहा शक्ति परीक्षण था। किशोरसिंह की शिकायत थी कि माधोसिंह मेरे साथ आदर से व्यवहार नहीं करता। जबकि माधोसिंह कोटा राज्य पर उसी तरह निर्बाध शासन करना चाहता था जैसा कि उसके पिता जालिमसिंह ने किया था। महाराव किशोरसिंह चाहता था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ई.1917 में हुई उस संधि का पालन करे जिसमें कोटा राज्य को आंतरिक विद्रोह तथा सामंतों की अनुशासनहीनता को दबाने में मदद किये जाने का प्रावधान था अतः माधोसिंह को हटाया जाये। जबकि माधोसिंह चाहता था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस संधि में ई.1918 में जोड़ी गयी उन दो गुप्त धाराओं पर दृढ़ रहे जिनमें झाला जालिमसिंह और उसके वंशजों को सदैव के लिये सम्पूर्ण अधिकार युक्त प्रधानमंत्री बने रहने का अधिकार दिया गया था।

    कम्पनी सरकार की स्पष्ट धारणा थी कि कोटा राज्य का वास्तविक शासक जालिमसिंह है न कि महाराव किशोरसिंह। इसलिये वह माधोसिंह के विरुद्ध किसी तरह की कार्यवाही नहीं करना चाहती थी। परिस्थतियों से क्षुब्ध होकर कुछ दिन बाद महाराव किशोरसिंह ने फिर से झाला जालिमसिंह को मारने का षड़यंत्र किया। जालिमसिंह ने अपने चारों ओर पहरा बैठा दिया तथा महाराव से मिलने से मना कर दिया। इस पर भी महाराव नहीं माना तो जालिमसिंह ने नगर के दरवाजे बंद करवा दिये और सूरजपोल के कोट की तोपों के मुँह गढ़ की ओर फेर दिये।

    सायं काल से लेकर मध्यरात्रि तक तोपें गोले बरसाती रहीं। आधी रात के बाद महाराव गुप्त मार्ग से नाव में बैठकर चम्बल के पार निकल गया। उसके साथ उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह, कुंवर रामसिंह, विश्वस्त साथी एवं नौकर थे। जालिमसिंह उस समय नगर से बाहर के डेरे में रहा करता था। जब उसने यह समाचार सुना तो वह गढ़ में आया। उसने गढ़ में उपस्थित लोगों के शस्त्र छीन लिये। भण्डारों तथा अंतःपुर का यथोचित प्रबंध किया तथा कोटा की राजगद्दी पर महाराव किशोरसिंह की खड़ाऊँ मंगवाकर स्थापित कर दीं। जालिमसिंह ने घोषणा की कि कुछ बदमाश मेरे स्वामी को बहकाकर ले गये हैं। अतः उनके लौटने तक यही खड़ाऊँ शासन करेंगी।

    किशोरसिंह कोटा के महलों से निकलकर सीधा बूंदी गया। बूंदी के शासक विष्णुसिंह ने महाराव का स्वागत किया। वस्तुतः कोटा राज्य बूंदी राज्य से ही अलग हुआ था तथा कोटा का राजवंश बूंदी के राजवंश की कनिष्ठ शाखा थी। कु्रछ दिनों बाद झाला जालिमसिंह का दुष्ट पुत्र गोरधनसिंह भी महाराव किशोरसिंह से आ मिला किंतु अंग्रेजों के दबाव के कारण गोरधनसिंह पुनः दिल्ली चला गया।

    अंग्रेजों ने बूंदी नरेश को संदेश भेजा कि वह किशोरसिंह को सेना एकत्र न करने दे तथा किशोरसिंह का अधिक समय तक बूंदी में रहना वांछनीय नहीं है। इस कारण कुछ समय बाद किशोरसिंह बूंदी से वृंदावन चला गया। कुछ दिन वृंदावन में बिताकर किशोरसिंह भी दिल्ली पहुंचा और वहाँ जाकर रेजीडेंट से मिला। रेजीडेंट ने किशोरसिंह से कहा कि वह कोटा लौट जाये किंतु किशोरसिंह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ कि वह नाम मात्र का राजा बनकर रहे तथा जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह वास्तविक राजा रहे। अतः किशोरसिंह पुनः कोटा पर आक्रमण करने के उद्देश्य से चम्बल के तट पर आ ठहरा।

    किशोरसिंह ने समस्त हाड़ा राजपूतों को अपनी ओर से लड़ने के लिये आमंत्रित किया। सारे हाड़ा सरदार किशोरसिंह से आ मिले तथा 3000 हाड़ा राजपूत बाणगंगा के तट पर जालिमसिंह पर हमला करने के लिये डट कर खड़े हो गये। इस पर जालिमसिंह ने पोलिटिकल एजेण्ट से सहायता मांगी। जालिमसिंह का संदेश पाकर कर्नल टॉड नीमच से कम्पनी सरकार की दो पलटनें, नौ रिसाले, एक तोपखाना तथा लेफ्टीनेंट क्लार्क, लेफ्टीनेंट मिलन और लेफ्टीनेंट कर्नल रिज को अपने साथ लेकर कोटा पहुँचा। जालिमसिंह की निजी आठ पलटनें, चौदह रिसाले और तेईस तोपें थीं। जालिमसिंह और कर्नल टॉड की संयुक्त सेनाओं ने किशोरसिंह की सेनाओं पर आक्रमण कर दिया।

    युद्ध बड़ा भयानक सिद्ध हुआ। इसमें महाराव का छोटा भाई पृथ्वीसिंह, लेफ्टीनेंट क्लार्क, लेफ्टीनेंट रीड तथा दोनों ओर के अनेक सैनिक मारे गये। पृथ्वीसिंह ने मरते समय अपना खंजर तथा अपने गले की मोतियों की माला पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल टॉड को दे दीं तथा निवेदन किया कि मेरे पुत्र रामसिंह को याद रखना। किशोरसिंह पराजय स्वीकार करके नाथद्वारा चला गया। उसके साथ पृथ्वीसिंह का पुत्र कुंवर रामसिंह भी था। किशोरसिंह ने पाँच विवाह किये थे। केवल एक रानी के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था। जो चार वर्ष का होकर मर गया था। अतः किशोरसिंह रामसिंह को ही अपना पुत्र मानता था।

    किशोरसिंह नाथद्वारा में श्रीनाथजी के चरणों में बैठकर भजन करता रहा और उसकी खड़ाऊँ कोटा में शासन करती रहीं। वह लगभग 9 माह तक नाथद्वारा में रहा। अंत में उसे श्रीनाथजी की पाद सेवा का फल प्राप्त हुआ और मेवाड़ महाराणा के प्रयत्नों से किशोरसिंह तथा जालिमसिंह में समझौता हो गया। ई.1822 में किशोरसिंह कोटा लौट आया। झाला जालिमसिंह तथा पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल टॉड ने कोटा से 6 किलोमीटर बाहर आकर महाराव का स्वागत किया। कोटा में भारी खुशियां मनायी गयीं। जालिमसिंह ने महाराव को फिर से गद्दी पर बैठाकर उसे 25 स्वर्ण मोहरें भेंट कीं।

    कर्नल टॉड के कहने पर किशोरसिंह तथा जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह गले मिले तथा दोनों ने पिछली बातों के लिये एक दूसरे के प्रति खेद प्रकट किया। सारे गड़बड़ झाले के लिये झाला जालिमसिंह ने अपने आप को तो धिक्कारा ही साथ ही अपने पुत्र माधोसिंह से भरे दरबार में कहा कि यह सब तेरे कुकृत्यों का फल है जो मेरे स्वामी को इतना कष्ट हुआ और मुझे इतनी लज्जा उठानी पड़ी।

    ई.1824 में 85 वर्ष की आयु में जालिमसिंह की मृत्यु हुई। यद्यपि सूर्यमल्ल मिश्रण, कर्नल टॉड तथा मथुरालाल शर्मा ने उसकी स्वामिभक्ति पर अंगुली उठायी है किंतु इतिहास की नंगी सच्चाई यह है कि वह युग जो दुनिया भर की मक्कारियों से भरा हुआ था, उसमें जालिमसिंह जैसा वीर, लड़ाका, बुद्धिमान, नेक और स्वामिभक्त फौजदार मिलना मुश्किल था। वह अपने पिता झाला हिम्मतसिंह का दत्तक पुत्र था। उसने कोटा को जयपुर, मेवाड़, मराठों तथा पिण्डारियों से बचाया था। अन्यथा कोटा राज्य को इनमें से कोई शक्ति निगल चुकी होती और किशोरसिंह जैसे अयोग्य, अदूरदर्शी राजा का कोई निशान भी नहीं मिलता।

    वस्तुतः महाराव किशोरसिंह उस युग की अभिशप्त राजनीति से ग्रस्त राजा था जो चापलूसों की भीड़ में घिरे रहकर केवल अपने अधिकार को भोगने के लिये लालायित रहते थे। यदि उसके स्थान पर कोई अन्य बुद्धिमान राजा होता तो वह जालिमसिंह जैसे सेवक की सेवाओं का उपयोग अपने और अपने राज्य के भाग्य को संवारने में लगाता।

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  • अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर

     27.06.2018
    अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 17 शिल्पग्राम संग्रहालय उदयपुर


    शिल्पग्राम संग्रहालय, उदयपुर नगर के पश्चिम में हवाला गांव के निकट ग्रामीण शिल्प एवं लोककला परिसर ‘शिल्पग्राम’ में स्थित है। यह संग्रहालय अरावली पर्वतमालाओं के ग्रामीण परिवेश के बीच स्थित होने से दर्शकों को अनूठा अनुभव प्रदान करता है। इसकी स्थापना 70 एकड़ भूमि में की गई है।

    यह अरावली उपत्यकाओं के ग्रामीण तथा आदिम संस्कृति एवं जीवन शैली को दर्शाने वाला एक जीवन्त संग्रहालय है। इस परिसर में पश्चिमी भारत के पांच राज्यों की पारंपरिक वास्तु कला को दर्शाने वाली झौंपड़ियाँ निर्मित की गई हैं जिनमें इन राज्यों के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश तथा आदिवासियों के रहन-सहन को दर्शाया गया है।

    इस संग्रहालय में ग्रामीण अंचल में बनने वाली हस्तशिल्प कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं जिन्हें दर्शक खरीद भी सकते हैं। यहाँ हथकरघों पर कार्य करते हुए बुनकरों को देखना बहुत रोमांचकारी होता है। मोलेला के कलाकारों द्वारा बनाई गई टैराकोटा कलाकृतियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इस परिसर में राजस्थान की सात झौंपड़ियाँ हैं। दो झौंपड़ियाँ बनुकरों का आवास हैं जिनका प्रतिरूप राजस्थान के रेगिस्तान में स्थित गांव ‘रामा’ (जिला जालोर) तथा ‘सम’ (जिला जैसलमेर) से लिया गया है।

    मेवाड़ के पर्वतीय अंचल में रहने वाले कुंभकार की झौंपड़ी उदयपुर जिले के गांव ‘ढोल’ से ली गई है। दो अन्य झौंपड़ियाँ दक्षिणी राजस्थान की भील तथा सहरिया आदिवासियों की हैं जो मूलतः कृषक हैं। शिल्पग्राम में गुजरात राज्य की प्रतीकात्मक बारह झौंपड़ियाँ हैं। इनमें से छः झौंपड़ियाँ गुजरात प्रांत के कच्छ क्षेत्र के ‘बन्नी’ तथा ‘भुजोड़ी’ गांव से ली गई हैं।

    बन्नी झोंपड़ियों में रहने वाली रेबारी, हरिजन एवं मुस्लिम जाति के परिवारों की 2-2 झौंपड़ियाँ है जो कांच की कशीदाकारी, भरथकला तथा रोगनकाम के सिद्धहस्त शिल्पी माने जाते हैं। लांबड़िया उत्तर गुजरात के गांव ‘पोशीना’ के मृण-शिल्पी का आवास है जो विशेष प्रकार के घोड़े बनाते हैं। इसी के समीप पशिचमी गुजरात के छोटा उदयपुर क्षेत्र के ‘वसेड़ी’ गांव के बुनकर का आवास है।

    गुजरात के आदिम-कृषक-समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राठवा और डांग जनजातियों की झौंपड़ियाँ हैं जो अपने पारंपरिक वास्तु-शिल्प एवं भित्ति-अलंकरणों के कारण सबसे अलग दिखाई देती हैं। लकड़ी की श्रेष्ठ नक्काशी से तराशी गई पेठापुर हवेली गुजरात के गांधीनगर जिले की काष्ठ कला का बेजोड़ नमूना है।

    शिल्पग्राम में शिल्प-बाजार, मृण-कला संग्रहालय, कांच जड़ित कार्य, भित्तिचित्र, बच्चों के लिए झूले, घोड़ा एवं ऊँट की सवारी आदि मुख्य आकर्षण हैं। यह प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7.00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।


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  • मेवाड़ से अलग हो गए डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा

     07.09.2018
    मेवाड़ से अलग हो गए डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा

    अंग्रेजों के भारत में आगमन के समय मेवाड़ राजवंश धरती भर के राजवशों में सबसे पुराना था। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा राज्य भी पहले मेवाड़ के ही हिस्से थे। महाराणा सामंतसिंह के वंशजों ने बारहवीं शताब्दी में वागड़ राज्य की स्थापना की थी। इसकी राजधानी वटपद्रक थी जो बड़ौदा कहलाती थी। यह बड़ौदा अब भी डूंगरपुर जिले में छोटे से गाँव के रूप में स्थित है। वागड़ के राजा डूंगरसिंह ने ई.1358 में डूंगरपुर नगर की स्थापना की। बाबर के समय में उदयसिंह वागड़ का राजा था जिसने मेवाड़ के महाराणा के संग्रामसिंह के साथ मिलकर खानुआ के मैदान में बाबर का मार्ग रोका था। उदयसिंह के दो पुत्र थे- पृथ्वीराज तथा जगमाल। उदयसिंह ने अपनी जीवन काल में ही अपने राज्य के दो हिस्से कर दिये। माही नदी को सीमा मानकर पश्चिम का भाग छोटे पुत्र जगमाल के लिये स्थिर कर दिया तथा पूर्व का भाग बड़े पुत्र पृथ्वीराज को दिया गया।

    इस प्रकार डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा राज्य अस्तित्व में आये। इन राज्यों के शासक अपने आपको पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न शासक मानते थे किंतु मेवाड़ के महाराणा दोनों राज्यों को अपने अधीन मानते थे। इस कारण प्रायः मेवाड़ राज्य इन राज्यों से कर लेने, राज्यारोहण के समय होने वाले टीके की रस्म की राशि वसूलने तथा अन्य विवादों के कारण इन पर आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों में प्रायः बड़ी संख्या में सैनिकों का रक्तपात होता था जिससे तीनों ही राज्य कमजोर होते जा रहे थे। चूंकि डूंगरपुर और बांसवाड़ा ने मुगलों का संरक्षण प्राप्त कर लिया था इसलिये महाराणा चाहकर भी इन राज्यों को पूर्ण रूप से मेवाड़ में नहीं मिला पाते थे।

    जब मुगलों का राज अस्ताचल को चला गया और मराठों का परचम लहराने लगा तो इन तीनों ही राज्यों को मराठों ने कुचल कर धर दिया। मराठों ने बांसवाड़ा राज्य का जीना हराम कर रखा था। ई.1737 में उन्होंने बांसवाड़ा नगर में घुसकर लूटमार मचाई। उस समय बांसवाड़ा का शासक उदयसिंह मात्र 4 साल का था तथा राज्यकार्य अर्थूणा का ठाकुर गुलालसिंह चौहान चलाता था जो उदयसिंह का मामा भी था। बांसवाड़ा के सरदार महारावल को लेकर भूतवे की पाल में चले गये। मराठों ने धन प्राप्ति की आशा में पूरा महल खोद डाला किंतु उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

    कुछ स्वामिभक्त लोगों ने राज्य की इज्जत बचाने की चेष्टा की तथा परिवार सहित कट मरे। मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में महारावल उदयसिंह मर गया तथा उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह बांसवाड़ा का शासक हुआ। उसी समय मराठे फिर बांसवाड़ा में घुस आये और जबर्दस्त लूट मार करने लगे। इस पर सरदार लोग महारावल को लेकर पहाड़ों में चले गये। मराठा आनन्दराव ने निर्दयता पूर्वक लोगों से 25 हजार रुपये वसूल किये तथा शेष राशि की वसूली हेतु राज्य के प्रतिष्ठित लोगों को पकड़ कर धार ले गया। इसी बीच आनन्दराव मर गया और उसका पुत्र जसवंत राव (प्रथम) धार का स्वामी हुआ। उसने अपने सेनानायक मेघश्याम बापूजी को पुनः बांसवाड़ा भेजा। मेघश्याम ने अगला-पिछला कुल 72 हजार रुपया तय किया तथा रुपये प्राप्त होने पर ही राज्य के प्रतिष्ठित लोगों को छोड़ने का निर्णय सुनाया। इस पर महारावल पृथ्वीसिंह सितारा जाकर राजा शाहू से मिला और मराठा सरदारों की दुष्टता की शिकायत की। शाहू ने पृथ्वीसिंह को आदेश दिया कि वह चौथ की सारी रकम नियमित रूप से सितारा भेजे।

    इस प्रकार बांसवाड़ा को मराठों के आतंक से कुछ मुक्ति मिली। मराठों से निरंतर लड़ते रहने के कारण राज्य में राजपूतों की कमी हो गयी इस पर महारावल ने बाहर से मुसलमानों को बुलाकर सेना में भरती किया। ई.1800 में मराठों ने फिर से बांसवाड़ा को घेर लिया। उस समय महारावल विजयसिंह (ई.1786-1816) बांसवाड़ा का शासक था। उसने मराठों का जमकर मुकाबला किया और उन्हें मार भगाया। बांसवाड़ा की सेना ने मराठों की सेना के झण्डे और तोपें छीन लिये। जब ई.1817 में पिण्डारी करीमखां बांसवाड़ा राज्य में लूटमार करने लगा तो ई.1818 में महारावल ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से दोस्ती कर ली।

    मेवाड़ राज्य में जहांगीर के शासन काल तक देवलिया ठिकाना था। जहांगीर के सेनापति महावतखां के उकसाने पर ई.1626 में देवलिया के ठिकानेदार सींहा ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया। महाराणा उसे दबाने में असफल रहा। 8 अप्रेल 1627 को सींहा की मृत्यु हो गयी और उसका बड़ा पुत्र जसवंतसिंह देवलिया का रावत बना। 7 नवम्बर 1627 को जहांगीर भी मर गया।

    जसवंतसिंह ने मेवाड़ के मोड़ी गाँव पर आक्रमण करके बहुत से मेवाड़ी सैनिकों को मार डाला। महाराणा जगतसिंह (प्रथम) ने जसवंतसिंह को समझाने के लिये उदयपुर बुलवाया। जब जसवंतसिंह महाराणा की बात मानने को तैयार नहीं हुआ तो मेवाड़ की सेना ने उसे तथा उसके एक हजार आदमियों को चम्पाबाग में घेर कर मार डाला। जसवंतसिंह का छोटा पुत्र हरिसिंह देवलिया का रावत हुआ। शाहजहां ने हरिसिंह को देवलिया का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया। इस प्रकार ई.1628 में देवलिया राज्य अस्तित्व में आया जिसक कुल क्षेत्रफल 889 वर्ग मील था।

    ई.1659 में औरंगजेब ने डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा देवलिया महाराणा को लौटा दिये इस पर हरिसिंह दर-दर भटकने लगा। हरिसिंह की माता ने हरिसिंह को एक हाथी, एक हथिनी तथा 50 हजार रुपये देकर महाराणा की सेवा में भेजा। महाराणा ने उसे अपना सामंत स्वीकार कर लिया। ई.1673 में हरिसिंह मर गया तथा उसका पुत्र प्रतापसिंह देवलिया का जागीरदार हुआ। ई.1698 में महाराणा जयसिंह की मृत्यु होने पर अमरसिंह द्वितीय मेवाड़ का महाराणा हुआ किंतु इस अवसर पर डूंगरपुर के रावल खुमानसिंह, बांसवाड़ा के रावल आबसिंह तथा देवलिया के रावत प्रतापसिंह ने उपस्थित होकर टीके का दस्तूर पेश नहीं किया। इस पर महाराणा ने तीनों राज्यों पर आक्रमण कर उनसे टीका वसूल किया।

    ई.1699 में प्रतापसिंह ने डोडेरिया का खेड़ा नामक स्थान पर प्रतापगढ़ नामक नगर बसाया और उसे मुख्यालय बनाया तब देवलिया ठिकाणा प्रतापगढ़ राज्य के नाम से जाना जाने लगा। प्रतापगढ़ का रावत सालिमसिंह (ई.1756 से 1774) प्रतापी राजा हुआ। मल्हार राव होलकर जैसा प्रबल शत्रु भी उससे चौथ वसूल नहीं कर पाया। सालिमसिंह ने मुगल बादशाह शाहआलम से सिक्का ढालने की स्वीकृति प्राप्त की। इसे सालिमसाही सिक्का कहा गया। प्रतापगढ़ राज्य मुगलों को 15 हजार मुगलिया रुपये वार्षिक कर दिया करता था। सालिमसिंह के पुत्र सामंतसिंह (ई.1774-1818) ने मुगलों को कर देना बंद करके 72 हजार 720 सालिमसाही सिक्के जसवंतराव होलकर को चौथ के रूप में देने स्वीकार कर लिये।

    ई.1804 में सामंतसिंह ने कर्नल मरे के माध्यम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि की तथा जो राशि चौथ के रूप में मराठों को दी जाती थी वह खिराज के रूप में अंग्रेजों को देनी स्वीकार की किंतु लॉर्ड कार्नवालिस ने इसे स्वीकार नहीं किया तथा अगले 14 वर्ष तक प्रतापगढ़ राज्य दुख के सागर में गोते खाता रहा। 5 अक्टूबर 1818 को प्रतापगढ़ राज्य तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच दूसरा समझौता हुआ। संधि की अन्य शर्तों के अतिरिक्त यह भी तय हुआ कि प्रतापगढ़ राज्य ने अब तक मराठों को 1 लाख 24 हजार 657 रुपये छः आने नहीं चुकाये हैं, नियमित खिराज (72,700 रुपये वार्षिक) के अतिरिक्तयह राशि भी चुकानी होगी। प्रतापगढ़ राज्य अरबों तथा मकरानियों को नौकर नहीं रखेगा। इस संधि के होने से पूर्व प्रतापगढ़ राज्य की औसत वार्षिक आय दो लाख रुपये थी। संधि के बाद राज्य की आय में पहले साल 42 हजार रुपये तथा दूसरे साल 50 हजार रुपये की वृद्धि हुई।

    शाहपुरा राज्य की स्थापना महाराणा अमरसिंह के द्वितीय पुत्र सूरजमल के वंशजों ने शाहजहां के समय की थी।

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  • अध्याय - 18 वैक्स म्यूजियम उदयपुर

     27.06.2018
    अध्याय - 18 वैक्स म्यूजियम उदयपुर

    अध्याय - 18 वैक्स म्यूजियम, उदयपुर


    सज्जनगढ़ रोड पर मेवाड़गढ़ होटल के पीछे एक वैक्स म्यूजियम स्थापित किया गया है। इसे लंदन के मैडम तुसाद म्यूजियम की अनुकृति की तरह बनाया गया है। भारत में इस तरह के पांच मोम संग्रहालय हैं जिनमें से दो राजस्थान में हैं।

    उदयपुर वैक्स म्यूजियम प्रदेश का पहला वैक्स म्यूजियम है। इस संग्रहालय में देश-विदेश के प्रसिद्ध व्यक्त्यिों के मोम के पुतले रखे गए हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित रानी पद्मावती का मोम से बना पुतला दर्शकों के विशेष आकर्षण का केन्द्र है जिसके साथ दर्शक अपनी सैल्फी लेना पसंद करते हैं। इस पुतले के कारण जनसामान्य में रानी पद्मावती के इतिहास को जानने की जिज्ञासा बढ़ी है।

    भक्त-शिरोमणी मीरांबाई, पूर्व राजघराने के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, क्रिकेट के खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर आदि के पुतले भी दर्शकों द्वारा सर्वाधिक पसंद किए जाते हैं। सलमान खान, मदर टेरेसा, बराक ओबामा, माइकल जैक्सन, ब्रूस विलिस, ब्रूस ली, जैकी चैन, अमॉल्ड, हैरी पॉटर तथा हॉलीवुड अभिनेताओं के पुतले भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    महाराणा प्रताप, कल्पना चावला तथा मोहनदास करमचंद गांधी सहित और भी कई ऐतिहासिक व्यक्तियों के वैक्स से बने पुतले लगाए जाने की योजना है। इस संग्रहालय को देखने लिए 150 रुपए का टिकट है। यह प्रातः 9 बजे से सायं 9 बजे तक खुला रहता है।


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  • अध्याय - 19 बी. जी. शर्मा चित्रालय उदयपुर

     27.06.2018
    अध्याय - 19 बी. जी. शर्मा चित्रालय उदयपुर

    अध्याय - 19 बी. जी. शर्मा चित्रालय उदयपुर

    उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी के पास बी. जी. शर्मा चित्रालय स्थित है। इसकी स्थापना 13 अप्रेल 1993 को नाथद्वारा चित्रशैली के सुप्रसिद्ध चित्रकार बी. जी. शर्मा ने की थी। आर्ट गैलेरी के रूप में स्थित यह संग्रहालय दो-मंजिला भवन में बना हुआ है। 5 अगस्त 1924 को नाथद्वारा में जन्मे बी. जी. शर्मा पारम्परिक चित्रकला शैली के सिद्धहस्त कलाकार हैं।

    उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की जीवन लीला से सम्बन्धित चित्र बड़ी संख्या में बनाए। इस चित्रालय की यह विशेषता है कि इसमें प्रदर्शित समस्त चित्र एक ही कलाकार की तूलिका से निकले हैं। इस चित्रालय में उनके द्वारा 1935 से लेकर बनाए गए 500 से अधिक चित्र प्रदर्शित हैं। इनमें सबसे बड़ा चित्र सूती कपड़े पर बना पिछवई का है। पिछवई में श्रीनाथजी के अन्नकूट उत्सव को दर्शाया गया है। यह चित्र 8 गुणा 12 फुट का है। सबसे छोटा चित्र 1 इंच से भी लघु आकार का है।

    इस चित्रालय में कृष्णलीला के चित्रों के अतिरिक्त रामलीला से सम्बन्धित चित्र भी हैं। मुगल कालीन तथा राजपूत कालीन जीवन परिवेश तथा बादशाहों और राजा-महाराजाओं से सम्बन्धित चित्रों के साथ 24वें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जीवन के प्रमुख प्रसंगों के चित्र भी हैं। इन चित्रों के माध्यम से सम्पूर्ण जैनत्व के सिद्धांतों को कोई भी पहचान सकता है। राष्ट्रीय विभूतियों तथा मेवाड़ के शासकों के भी चित्र इस संग्रहालय में उपलब्ध हैं।

    सूती कपड़े के साथ-साथ कुछ चित्र रेशमी कपड़े पर भी बने हुए हैं। हाथीदांत पर बने चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। चित्रों को बनाने में पारम्परिक रंग (स्टोन कलर) काम में लिए गए हैं। कुछ चित्र ऐसे हैं जिन्हें असली स्वर्ण एवं रजत रंग से रंगा गया है। ऐसे चित्र भी हैं जो रंग-विहीन हैं तथा केवल पैंसिल-रेखाओं से बनाए गए हैं।


    उदयपुर की अन्य निजी दीर्घाएं

    उदयपुर में कमल शर्मा आर्ट गैलेरी, बोगेन विला, रामा आर्ट गैलेरी, गैलेरी प्रीस्टाइन तथा मेवाड़ आर्ट गैलेरी भी स्थित हैं जो विभिन्न कलाकारों द्वारा निजी स्तर पर स्थापित की गई हैं। इन्हें देखने के लिए टिकट खरीदना होता है।


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  • एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य

     29.06.2017
    एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य

    राजपूताने और गुर्जरात्रा की सीमाओं पर चौहानों की एक पुरानी और प्रसिद्ध रियासत सिरोही के नाम से जानी जाती थी। सिरोही का अर्थ होता है- शीश काटने वाली अर्थात् तलवार। सिरोही राज्य का क्षेत्रफल 1,994 वर्ग मील था। सिरोही का राजवंश देवड़ा चौहानों के नाम से प्रसिद्ध था।

    ई.1760 में महाराव वैरीशाल द्वितीय सिरोही का राजा हुआ। उस समय राज्य बर्बादी के मुँह में था। भील और मीणे प्रजा को जी भर कर लूटते थे। राज्य के सामंत और सरदार महाराव का कहना नहीं मानते थे तथा राज्य की सीमा पर स्थित पालनपुर एवं जोधपुर राज्यों से सीमा सम्बन्धी झगड़े चलते रहते थे। पालनपुर राज्य ने सिरोही राज्य के लगभग 250 गाँव दबा लिये थे जिससे सिरोही राज्य में उस समय कुल 40-50 गाँव ही रह गये थे जिनसे इतनी आय नहीं होती थी कि सिरोही का राजा एक मजबूत सेना का निर्माण करके पालनपुर से अपने गाँवों को वापस छीन सके।

    महाराव वैरीशाल समझता था कि उसके राजपूत सरदार उसका साथ नहीं देंगे इसलिये उसने बाहर से मकरानी तथा सिंधी मुसलमानों और नागों को फौज में भरती करना आरंभ किया। छः साल में महाराव ने मुसलमानों की बड़ी फौज तैयार करके पालनपुर राज्य पर आक्रमण किया किंतु जो राजपूत सामंत महाराव के साथ सिरोही से सेना लेकर चले वे पालनपुर की सीमा पर पहुँच कर पालनपुर के नवाब की ओर हो गये। इस पर महाराव पालनपुर से लड़ने का विचार त्यागकर राजधानी को लौट आया। बल से काम बनता न देखकर महाराव ने छल से काम लेना आरंभ किया। उसने अपने सरदारों के मुखिया अमरसिंह डूंगरावत को सिंधी मुसलमानों के मुखिया देसर सिंधी को रुपये देकर अमरसिंह डूंगरावत की हत्या करवा दी। अमरसिंह के मरने पर सरदारों के मनोबल में काफी गिरावट आयी।

    जब जोधपुर के राज्य पर महाराजा भीमसिंह ने अधिकार कर लिया और राज्य के दावेदारों को मारना आरंभ किया तब महाराज मानसिंह ने सिरोही राज्य में शरण लेने के लिये अपने पुत्र छत्रसिंह को महाराजा वैरिशाल के पास भेजा। इससे पहले औरंगजेब के समय में सिरोही राज्य ने महाराजा अजीतसिंह को शरण दी थी किंतु महाराज वैरीशाल ने भीमसिंह से मित्रता होने के कारण मानसिंह तथा उसके पुत्र को शरण देने से मना कर दिया।

    जब ई.1803 में मानसिंह जोधपुर का राजा बन गया तब मानसिंह ने जोधपुर राज्य की सेना को सिरोही पर आक्रमण करने भेजा। इस सेना ने सिरोही राज्य को जमकर लूटा किंतु इस पर भी मानसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। वह आजीवन सिरोही राज्य को लूटता रहा। वह सिरोही राज्य को मारवाड़ में सम्मिलित करना चाहता था किंतु इस उद्योग में सफल नहीं हो सका। ई.1812 में मानसिंह ने फिर से सिरोही पर आक्रमण किया तथा उसे जी भर कर लूटा और बर्बाद किया।

    ई.1813 में सिरोही का महाराव उदयभाण अपने छोटे भाई शिवसिंह के साथ सोरों की यात्रा को गया। मार्ग में वह पाली नगर में ठहरा तथा वहाँ वेश्याओं के नाच गान में रम गया। पाली के हाकिम ने मानसिंह को गुप्त सूचना पहुंचाई कि महाराव उदयभाण पाली में ठहरा हुआ है। इस पर मानसिंह ने तत्काल सेना भेजकर महाराव उदयभाण, उसके भाई शिवसिंह तथा सिरोही राज्य के अधिकारियों को पकड़ लिया तथा जोधपुर ले आया। तीन माह तक सिरोही का महाराव जोधपुर में कैद रहा। इस दौरान मानसिंह ने उदयभाण से कई प्रकार की शर्तें अपने पक्ष में लिखवा लीं। इसके बाद सवा लाख रुपये देने का वचन देकर महाराव जोधपुर की कैद से छूटा। इसके बाद मानसिंह, उदयभाण से ऐसे मिला जैसे एक राजा, दूसरे राजा से मिला करता है।

    उदयभाण अपने वचन का पक्का नहीं था। वह तो केवल कैद से छूटने के लिये ही मानसिंह की शर्तें स्वीकार करता चला गया था। जब कई महीनों तक उसने मानसिंह को सवा लाख रुपये नहीं भिजवाये तो जोधपुर राज्य की सेना ने सिरोही राज्य में घुसकर लूट मचायी।

    महाराव उदयभाण को उसके आदमियों ने सलाह दी कि जब जोधपुर की सेना हमारे राज्य में लूट करती है तो हमें भी जोधपुर राज्य में घुसकर लूटमार करनी चाहिये। इस पर महाराव ने अपनी सेना को जोधपुर राज्य में लूट करने के लिये भेज दिया। जब महाराजा मानसिंह ने सिरोही राज्य की इस ढिठाई के बारे में सुना तो उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह सिराही राज्य को नष्ट कर दे। जोधपुर राज्य की सेना के भय से उदयभाण सिरोही छोड़कर पहाड़ों में भाग गया। जोधपुर राज्य की सेना पूरे दस दिन तक सिरोही नगर और आस पास के गाँवों को लूटती रही तथा ढाई लाख रुपये इकटठे करके जोधपुर लौटी।

    जोधपुर की सेना ने सिरोही से लौटते समय सिरोही के राजकीय कार्यालयों को आग की भेंट कर दिया। सिरोही राज्य को जलता हुआ देखकर महाराव उदयभाण ने महाराजा मानसिंह को सवा लाख रुपये लौटाने का मन बनाया ताकि दोनों पक्षों में शांति स्थापित हो सके किंतु राजकीय खजाना तो खाली था। इस पर महाराव ने महाजनों से रुपये वसूलने के लिये उन पर सख्ती की जिससे महाजन सिरोही राज्य को छोड़कर हमेशा के लिये गुजरात और मालवा की ओर भाग गये तथा वहीं पर बस गये।

    इसी बीच भीलों और मीणों ने गाँव-गाँव में घुसकर लूट मचानी शुरू कर दी। वे जानवरों के झुण्डों को पकड़ कर ले जाते तथा उन्हें मारकर पकाते खाते थे। महाजनों आदि को बंधक बनाकर पहाड़ों में ले जाते तथा वहाँ उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देते थे। उन्होंने कई गाँवों से अपनी चौथ भी बांध ली।

    राज्य की यह दुर्दशा देखकर सिरोही राज्य के सरदार नांदिया गाँव के ठाकुर शिवसिंह के पास गये जिसे राजा साहब की पदवी प्राप्त थी। ठाकुर शिवसिंह महाराव उदयभाण का छोटा भाई था। उसने ई.1817 में महाराव उदयभाण को नजरबंद कर लिया तथा स्वयं राज्यकार्य चलाने लगा।

    महाराजा मानसिंह ने जोधपुर से सेना भेजकर महाराव उदयभाण को नजरबंदी से मुक्त करवाने का उपक्रम किया किंतु सफलता नहीं मिली। महाराव तीस वर्ष तक नजरबंद रहा तथा नजरबंदी की अवस्था में ही ई.1847 में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका छोटा भाई शिवसिंह सिरोही राज्य का स्वामी हुआ।

    शिवसिंह ने 1817 से ही सिरोही राज्य का शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया था किंतु बड़े भाई के जीवित रहते तक उसने अपने आप को महाराव नहीं कहाँ ई.1818 में उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता करने का प्रयास किया किंतु जोधपुर नरेश मानसिंह ने अंग्रेजों को लिखा कि सिरोही राज्य पहले से ही जोधपुर राज्य के अधीन है इसलिये सिरोही राज्य से अंग्रेज अलग से समझौता नहीं कर सकते किंतु कर्नल टॉड ने मानसिंह के इस दावे को ठुकरा दिया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सिरोही राज्य के साथ अलग से समझौता किया।

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