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  • अध्याय - 66 राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

     02.06.2020
    अध्याय - 66 राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    अध्याय - 66


    राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद द्वारा देश में क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र, उपविज्ञान केन्द्र, साइंस पार्क आदि स्थापित किए गए हैं जो व्यवहार रूप में विज्ञान के सिद्धांतों एवं उपलब्धियों पर आधारित संग्रहालय ही हैं। ये संग्रहालय जनसामान्य तथा विज्ञान के विद्यार्थियों का मनोरंजन करने के साथ-साथ उन्हें विज्ञान के सिद्धांतों, नियमों एवं उपलब्धियों आदि की जानकारी देते हैं तथा जन-साधारण को विज्ञान के निकट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र, जयपुर

    क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र, जयपुर को राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद द्वारा स्थापित किया गया है। राजस्थान सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस संस्था को सक्रिय सहयोग दिया जाता है। यह केन्द्र, इंटरेक्टिव विज्ञान प्रदर्शनियों और अनौपचारिक विज्ञान शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से क्षेत्र के लोगों की आवश्यकताएं पूरी करता है। लगभग 4000 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्मित विज्ञान केन्द्र में तीन प्रदर्शनी दीर्घाएं, एक अस्थायी प्रदर्शनी हॉल, एक गुंबद तारामंडल, विज्ञान प्रदर्शन क्षेत्र, वातानुकूलित सभागार, थ्री-डी थिएटर, एक पुस्तकालय, सम्मेलन कक्ष और सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

    खगोल विज्ञान फ्रंटियर्स गैलरी में दर्शाया गया है कि ब्रह्माण्ड की मानवीय समझ समय के साथ बदल गई है क्योंकि ब्रह्माण्ड की बेहतर समझ के लिए मानव जाति ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विभिन्न सिद्धांतों को समझना और उनका उपयोग करना जारी रखा है। इस गैलरी से पता चलता है कि भारत, खगोल विज्ञान के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी भूमिका रखता है। खगोल विज्ञान गैलरी में आगंतुकों को सबसे अधिक दिलचस्प सवालों का सामना करना पड़ता है। इंटरेक्टिव प्रदर्शन, कलाकृतियों, मल्टीमीडिया और अन्य दृश्य-प्रदर्शन के माध्यम से ब्रह्मांड के प्रति समझ विकसित करने के लिए अनूठा वातावरण तैयार किया गया है।

    राजस्थान के अन्य उप-क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने जोधपुर, झालावाड़, नवलगढ़, कोटा, उदयपुर में उपक्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र स्थापित किए हैं। उप-क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र, जोधपुर का उदघाटन 17 अगस्त 2013 को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं भारत सरकार की संस्कृति मंत्री चंद्रेश कुमारी कटोच द्वारा किया गया। इस केन्द्र की अवधारणा, डिज़ाइन एवं विकास राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद द्वारा किया गया है एवं इसे संचालन के लिए राजस्थान सरकार को समर्पित किया गया है। इस केन्द्र में 'जल: जीवन का अमृत', 'भारत की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की विरासत', 'मनोरंजक विज्ञान' नामक दीर्घाएँ एवं एक विज्ञान पार्क बनाया गया है।

    झालावाड़ नगर से संलग्न झालरापाटन नामक प्राचीन नगर में पुलिस लाइन रोड पर होर्टिचल्चर कॉलेज के सामने विज्ञान पार्क स्थापित किया गया है। इस विज्ञान पार्क में बच्चों के लिए आईटी गैलेरी का निर्माण किया गया है जिसके माध्यम से बच्चों को कम्प्यूटर की शुरुआत से लेकर आज तक की यात्रा का ज्ञान उपलब्ध कराया जाता है। बच्चों के लिए थ्री-डी गेम्स भी उपलब्ध कराए गए हैं।

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  • अध्याय - 66

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में खनिज आधारित उद्योग

     07.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थान में खनिज आधारित उद्योग

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 57

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में खनिज आधारित उद्योग

    सीमेण्ट उद्योग

    1.प्रश्नः सीमेंट का आविष्कार किसने किया था?

    उत्तरः ई. 1824 में इंगलैण्ड के वैज्ञानिक एस्पिडिन ने

    2.प्रश्नः सीमेंट क्या काम आता है?

    उत्तरः सीमेण्ट, भवन निर्माण की प्रमुख सामग्री के रूप में प्रयुक्त होता है।

    3.प्रश्नः सीमेंट को पोर्टलैण्ड सीमेट क्यों कहते हैं?

    उत्तरः यह पोर्टलैण्ड स्टोन के समान दिखायी देता है इसलिये इसे पोर्टलैण्ड सीमेट कहते हैं।

    4.प्रश्नः सीमेंट निर्माण में क्या सामग्री प्रयुक्त होती है?

    उत्तरः चूना पत्थर, जिप्सम, रेड ऑकर (गैरिक), लेटेराइट कोयला और मिट्टी

    5.प्रश्नः राज्य में सीमेंट प्रमुख उद्योग के रूप में क्यों उभरा है?

    उत्तरः राजस्थान में चूना पत्थर, जिप्सम, रॉक फॉस्फेट एवं पाइराइट की उपलब्धता के कारण।

    6.प्रश्नः चूना पत्थर के जमाव किन जिलों में विपुल मात्रा में उपलग्ध हैं?

    उत्तरः नागौर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, जैसलमेर, झुंझनूं, सीकर सिरोही।

    7.प्रश्नः सीमेण्ट कारखाने प्रायः किन जिलों में स्थित हैं?

    उत्तरः नागौर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, जैसलमेर, झुंझनूं, सीकर सिरोही।

    8.प्रश्नः वर्तमान में राज्य का सबसे बड़ा सीमेण्ट उत्पादक क्षेत्र कौनसा है?

    उत्तरः निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़ जिला)।

    9.प्रश्नः राज्य में सीमेंट उद्योग लगाने वाली पहली कम्पनी कौनसी थी?

    उत्तरः ई. 1915 में बूँदी जिले में लाखेरी में क्लीक निकसन कम्पनी ने सीमेंट उद्योग प्रारम्भ किया।

    10.प्रश्नः स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राज्य में पहला सीमेंट उद्योग कौनसा था?

    उत्तरः जयपुर सीमेंट उद्योग, सवाईमाधोपुर।

    11.प्रश्नः राज्य में सफेद सीमेंट के कारखाने कहाँ हैं?

    उत्तरः गोटन।

    12.प्रश्नः श्री सीमेंट का कारखान कहाँ स्थित हैै?

    उत्तरः ब्यावर

    13.प्रश्नः मंगलम सीमेंट का कारखान कहाँ स्थित हैै?

    उत्तरः मोड़क

    14.प्रश्नः राज्य में सर्वाधिक उत्पादन क्षमता वाला सीमेंट कारखाना कौनसा है?

    उत्तरः जे. के. सीमेंट, निम्बाहेड़ा।

    15.प्रश्नः राज्य में प्रतिवर्ष 1 लाख टन सीमेण्ट उत्पादन की क्षमता वाले कितने कारखाने हैं?

    उत्तरः 19

    16.प्रश्नः राज्य में प्रतिवर्ष 5 से 90 हजार टन सीमेण्ट उत्पादन की क्षमता वाले कितने कारखाने हैं?

    उत्तरः 104

    17.प्रश्नः राज्य में प्रतिवर्ष कितने सीमेंट उत्पादन की क्षमता है?

    उत्तरः 44 मिलियन टन सीमेंट प्रतिवर्ष

    18.प्रश्नः राज्य में सीमेण्ट का कितना उत्पादन होता है?

    उत्तरः 16 मिलियन टन।

    19.प्रश्नः सीमेण्ट उत्पादन में राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है?

    उत्तरः पहला

    20.प्रश्नः देश के कुल सीमेण्ट उत्पादन में राजस्थान की कितनी भागीदारी है?

    उत्तरः 15.58 प्रतिशत

    21.प्रश्नः सीमेंट उत्पादन में राजस्थान के बाद कौनसे प्रदेश हैं?

    उत्तरः दूसरे नम्बर पर मध्यप्रदेश, तीसरे नम्बर पर आंध्र प्रदेश।

    22.प्रश्नः जैसलमेर जिले के किन क्षेत्रों में सीमेंट ग्रेड लाइम स्टोन का विशाल भण्डार मिला है?

    उत्तरः खींया, खींवसर, परेवार की ढाणी तथा तुलसीराम की ढाणी।

    23.प्रश्नः श्री सीमेण्ट ने 10 लाख टन वार्षिक क्षमता वाला सीमेण्ट कारखाना कहाँ लगाया है?

    उत्तरः बांगड़ सिटी रास में।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1999, आप कहाँ तक सहमत हैं कि आजकल राजस्थान, देश में सीमेंट उत्पादन क्षेत्र का एक मुख्य राज्य है?

    जस्ता उद्योग

    24.प्रश्नः गेलेना किसे कहते हैं?

    उत्तरः राजस्थान में जस्ता सीसे के साथ मिश्रित रूप में मिलता है जिसे गेलेना कहते हैं।

    25.प्रश्नः जस्ता का क्या उपयोग होता है?

    उत्तरः दवा और रसायन बनाने मे।

    26.प्रश्नः राज्य में जस्ता सांद्रण पर आधारित जस्ता प्रद्रावण कारखाने कहाँ हैं?

    उत्तरः देबारी (उदयपुर) और चंदेरिया (चित्तौड़गढ़) में।

    27.प्रश्नः इन दोनों कारखानों में किन धातुओं का उत्पादन होता है?

    उत्तरः जस्ता पिण्ड, कैडमियम धातु, गंधक का तेजाब तथा चांदी। संगमरमर उद्योग

    28.प्रश्नः देश के संगमरमर पत्थर उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी कितनी है?

    उत्तरः 95 प्रतिशत

    29.प्रश्नः राज्य में संगमरमर प्रोसेसिंग इकाइयाँ किन जिलों में स्थित हैं?

    उत्तरः नागौर, राजसमंद, उदयपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, अजमेर, जयपुर, अलवर, सिरोही, पाली, डूँगरपुर

    30.प्रश्नः राज्य में संगमरमर उद्योग से कितने लोगों को रोजगार मिलता है?

    उत्तरः लगभग तीन लाख लोगों को।

    31.प्रश्नः राजस्थान में संगमरमर की मूर्तियां बड़े स्तर पर कहाँ बनती हैं?

    उत्तरः जयपुर। ग्रेनाइट उद्योग

    32.प्रश्नः राजस्थान में ग्रेनाइट के कितने भण्डार मौजूद हैं?

    उत्तरः लगभग 1,128 मिलियन घन मीटर

    33.प्रश्नः राज्य में ग्रेनाइट आधारित प्रोसेसिंग इकाइयाँ किन जिलों में हैं?

    उत्तरः जालोर, आबू रोड, चित्तौड़गढ़, किशनगढ़, सीकर तथा बाड़मेर

    34.प्रश्नः ग्रेनाइट प्रोसेसिंग इकाइयों का सबसे बड़ा केंद्र किस जिले में है?

    उत्तरः जालोर उर्वरक उद्योग

    35.प्रश्नः राज्य में ऐसे कौनसे खनिज पाए जाते हैं जो रासायनिक उर्वरक बनाने में प्रयुक्त होते हैं?

    उत्तरः रॉक फॉस्फेट, गंधक, जिप्सम

    36.प्रश्नः रासायनिक उर्वरक बनाने की इकाइयाँ किन खनिज उत्पादन क्षेत्रों के निकट केन्द्रित हैं?

    उत्तरः रॉक फॉस्फेट और गंधक की उपलब्धि वाले स्थानों के निकट।

    37.प्रश्नः राज्य में फॉस्फेट बेनीफिसिएशन संयंत्र कहाँ है?

    उत्तरः झामर कोटड़ा (उदयपुर)

    38.प्रश्नः राज्य में फॉस्फेट उर्वरक बनाने के कारखाने किन जिलों में हैं?

    उत्तरः उदयपुर, कोटा, खेतड़ी तथा गंगानगर

    39.प्रश्नः राज्य में उर्वरक बनाने के सर्वाधिक कारखाने किस जिले में हैं?

    उत्तरः उदयपुर जिले में

    40.प्रश्नः राज्य में यूरिया बनाने का कारखाना कहाँ है?

    उत्तरः गडेपान (कोटा जिला)

    41.प्रश्नः राज्य में डाई अमोनियम फॉस्फेट (डी.ए.पी.) बनाने का कारखाना कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः हिंदुस्तान जिंक लि. द्वारा कपासन (जिला चित्तौड़गढ़) में।

    42.प्रश्न - राज्य में उर्वरक बनाने के प्रमुख कारखाने कौनसे हैं?

    उत्तर - श्रीराम केमिकल्स कोटा, चम्बल फर्टिलाइजर्स गडेपान कोटा, उदयपुर फॉस्फेट उदयपुर, गंगानगर तथा फर्टिलाइजर्स कॉरपोरेशन गंगानगर, जीवन फर्टिलाइजर्स कोटा, रामा फॉस्फेट, लकड़वास उदयपुर, सूरतगढ़ केमिकल्स लि. सूरतगढ़, पाइरॉइट एवं फॉस्फेराइट लि. नीम का थाना, हिंदुस्तान कॉपर लि. खेतड़ी, गायत्री स्पिनर्स लि. हमीरगढ़ भीलवाड़ा।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1  प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय अध्यापक प्रतियोगी परीक्षा 2004, चंबल फर्टिलाइजर्स एंड कैमिकल्स इंडस्ट्रीज कहाँ स्थापित है?

    2 आर.ए.एस. प्रारम्भिक परीक्षा वर्ष 2013, राजस्थान में पाये जाने वाले खनिज जैसे जिप्सम, रॉक-फास्फेट और पाइरॉइट किस निर्माण में आवश्यक हैं- 1 रासायनिक ऊर्वरक, 2. सीमेण्ट, 3. दवाइयां, 4. चीनी ? नमक उद्योग

    43.प्रश्नः देश के नमक उत्पादन में राजस्थान की कितनी भागीदारी है?

    उत्तरः 8.5 प्रतिशत

    44.प्रश्नः राजस्थान में नमक बनाने के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कहाँ स्थापित किये गये हैं?

    उत्तरः सांभर, पचपदरा तथा डीडवाना

    45.प्रश्नः सांभर क्षेत्र में नमक का उत्पादन किन दिनों में किया जाता है?

    उत्तरः मार्च से जुलाई के मध्य होने वाले वाष्पीकरण के दौरान

    46.प्रश्नः राज्य में निजी क्षेत्र में नमक उत्पादन के छोटे उपक्रम कहाँ स्थित हैं?

    उत्तरः फलौदी, कुचामन सिटी, पोकरन तथा सुजानगढ़ में

    47.प्रश्नः राजस्थान के नमक उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी कितनी है?

    उत्तरः 10 प्रतिशत सार्वजनिक क्षेत्र से तथा 90 प्रतिशत निजी क्षेत्र से अभ्रक ईंट उद्योग

    48.प्रश्नः अभ्रक की ईंटें बनाने के उद्योग किस जिले में लगाये गये हैं?

    उत्तरः भीलवाड़ा में

    49.प्रश्नः अभ्रक की ईंटों के बनाने में किस सामग्री का प्रयोग होता है?

    उत्तरः अभ्रक, लकड़ी का बुरादा, चावल की भूसी, प्लास्टिक का बुरादा, चाइना क्ले एवं काइनाइट

    50.प्रश्नः अभ्रक की ईंटें कितने तापक्रम पर पकाई जाती हैं?

    उत्तरः अभ्रक की ईंटें 1000 से 1200 डिग्री सेंटीग्रेड ताप पर 10-12 दिन तक पकाई जाती हैं।

    51.प्रश्नः अभ्रक की ईंटों की क्या विशेषता होती है?

    उत्तरः ये ताप अवरोधी होती हैं।

    52.प्रश्नः अभ्रक की ईंटों का क्या उपयोग होता है?

    उत्तरः इनका प्रयोग इस्पात संयंत्रों, जिंक स्मेलटर, विद्युत उत्पादन गृहों एवं काँच उद्योग में उच्च ताप के भट्टे बनाने में होता है।

    53.प्रश्नः उच्च ताप के भट्टे में अभ्रक की ईंटें कितने ईंधन की बचत करती हैं?

    उत्तरः अभ्रक की ईंटें ताप अवरोधक होती हैं। इस कारण इनसे बने भट्टों में 25 से 45 प्रतिशत तक ईंधन की बचत होती है। काँच उद्योग

    54.प्रश्नः राज्य में ऐसे कौनसे खनिज मिलते हैं जो काँच उद्योग में कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त हाते हैं?

    उत्तरः सिलिका युक्त बालू मिट्टी, सोडियम सल्फेट तथा शोरा।

    55.प्रश्नः काँच का सामान बनाने के लिये बालू को कितना गर्म किया जाता है?

    उत्तरः 1600 डिग्री सेंटीग्रेड।

    56.प्रश्नः राजस्थान में काँच उद्योग का विकास मुख्य रूप से किस जिले में हुआ है?

    उत्तरः धौलपुर।

    57.प्रश्न - धौलपुर में काँच के कितने कारखाने स्थित हैं?

    उत्तर - धौलपुर में काँच के दो कारखाने कार्यरत हैं- (1.) धौलपुर ग्लास वर्क्स: यह निजी क्षेत्र का कारखाना है जिसमें 90 लाख रुपये की पूँजी का निवेश किया गया है। इसकी उत्पादन क्षमता 1000 टन काँच वार्षिक है। (2.) दी हाईटेक प्रीसीजन ग्लास वर्क्स: यह 1964 में स्थापित सार्वजनिक क्षेत्र का कारखाना है तथा गंगानगर शुगर मिल्स लि. के अंतर्गत कार्यरत है। इसमें बोतलें, बीकर्स, बॉयलर्स, कवर ग्लास, फ्लास्क आदि बनते हैं। राजस्थान में रत्नाभूषण उद्योग

    58.प्रश्नः देश में रंगीन रत्न निर्माण उद्योग में जयपुर की कितनी भागीदारी है?

    उत्तरः 80 प्रतिशत

    59.प्रश्नः जयपुर में रंगीन रत्न व्यवसाय से कितने लोग जुड़े हुए हैं?

    उत्तरः पांच-छः लाख

    60.प्रश्नः जयपुर में तैयार रंगीन रत्न किन विदेशी नगरों को जाते हैं?

    उत्तरः जिनेवा, बैंकाक, लन्दन, न्यूयार्क आदि।

    61.प्रश्नः राज्य में जेम स्टोन इण्डस्ट्रीयल पार्क कहाँ स्थित है?

    उत्तरः जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में।

    62.प्रश्नः सरकार ने रत्न और रत्नाभूषणों का प्रशिक्षण केन्द्र कहाँ खोला है?

    उत्तरः जयपुर में झालाना डूंगरी के पास।

    63.प्रश्नः देश का पहला जैम बुर्स कहाँ बनेगा?

    उत्तरः जयपुर।

    64.प्रश्नः जैम बुर्स क्या होता है?

    उत्तरः ऐसा भवन जिसमें जैम एण्ड ज्वैलरी से सम्बन्धित उद्योगपति और व्यापारी अपने कार्यालय खोलते हैं ताकि देश-विदेश के व्यापारी सुगमता से सम्पर्क कर सकें।

    65.प्रश्नः राजस्थान में रंगीन रत्नों की खानें कहाँ उपलब्ध हैं?

    उत्तरः भीलवाड़ा, अजमेर तथा झालावाड़ जिलों में रंगीन रत्नों की खानें उपलब्ध हैं।

    66.प्रश्नः नीला व बैंगनी गारनेट कहाँ मिलता है?

    उत्तरः भीलवाड़ा जिले में

    67.प्रश्नः राज्य में कौनसा कीमती पत्थर बहुतायत से मिलता है?

    उत्तरः माणिक।

    68.प्रश्नः क्रिस्टल क्वाटर््ज स्टोन का खनन कहाँ होता है?

    उत्तरः झालावाड़ जिले में

    69.प्रश्नः पन्ना की खानें कहाँ हैं?

    उत्तरः उदयपुर जिले के गामगुडा, अंटालिया, काला गुमान, अजमेर जिले में बूबानी, राजगढ़ में स्थित हैं किंतु ये व्यापारिक स्तर पर प्रयुक्त नहीं हो रही हैं।

    70.प्रश्नः विश्व में पन्ना की सबसे बड़ी मण्डी कहाँ है?

    उत्तरः जयपुर

    71.प्रश्नः कच्चा पन्ना कहाँ से आयात होता है?

    उत्तरः मुख्यतः ब्राजील से। अमरीका व यूरोप के कुछ देशों से भी इसका आयात होता है।

    72.प्रश्नः जयपुर को किन रत्नों के लिये विश्व स्तरीय मण्डी माना जाता है?

    उत्तरः गारनेट, कटेला, सुनैला, धुमैला, पेरीडाट, क्रिस्टल, एक्वमैरिन, मून स्टोन, मरगज व फिरोजा आदि के लिये

    73.प्रश्नः उपरोक्त रत्नों के अतिरिक्त और किन रत्नों का काम जयपुर में किया जाता है?

    उत्तरः माणक, नीलम, पुखराज, तामड़ा, स्फटिक (बिल्लौर), हकीक, फिरोजा, तुर्मली, दाना फिरंग, चंद्रमणि, लहसुनिया, लाजवर्त, पेरीडाट, हीरा, मोती, मूंगा, अनेक प्रकार के सिंथेटिक रत्न तथा नकली रत्न।

    74.प्रश्नः तारकशी के जेवर क्या होते हैं?

    उत्तरः बारीक तारों द्वारा बनाये गये आभूषण तारकशी के जेवर कहलाते हैं।

    75.प्रश्नः चांदी के आभूषण राज्य में किस स्थान पर बड़े पैमाने पर बनते हैं जहां से विदेशों को निर्यात किया जाता है?

    उत्तरः नाथद्वारा।

    76.प्रश्नः भारतीय रत्नशास्त्र के अनुसार नौ रत्न कौनसे हैं?

    उत्तरः हीरा, माणक, नीलम, पुखराज, लहसुनिया, मोती, गोमेदक, मूंगा तथा पन्ना।

    77.प्रश्न - व्यावसायिक वर्गीकरण के आधार पर रत्नों को कितने प्रमुख वर्गों में रखा जाता है?

    उत्तर - सात प्रमुख वर्गों में- (1.) पहले वर्ग में हीरा है जो विशुद्ध कार्बन है। (2.) दूसरा वर्ग बहुमूल्य पत्थरों का है इसमें माणक, नीलम, पुखराज तथा पन्ना आते हैं। (3.) तीसरा वर्ग अर्द्ध मूल्यवान पत्थरों का है जिसमें वे सभी रंगीन, सफेद तथा काले पत्थर आते हैं जिनसे रत्न बनाये जा सकें। (4.) चौथे वर्ग में मोती तथा (5.) पाँचवे वर्ग में मूंगा आता है। मोती तथा मूंगा दोनों ही पत्थर नहीं होते। मोती के तीन भेद हैं- असली, कल्चर्ड तथा नकली। (6.) छठा वर्ग नकली रत्नों का है जो शीशे, प्लास्टिक तथा अन्य पदार्थों से बनाये जाते हैं। (7.) सातवां वर्ग सिंथेटिक रत्नों का है जो असली रत्नों में पाये जाने वाले रासायनिक द्रव्यों से बनते हैं।

    78.प्रश्न - राजस्थान में मोती पैदा करने वाले सीप कहाँ पाये जाते हैं?

    उत्तर - बाँसवाड़ा में कल्चर्ड मोती का उत्पादन होता है। माही नदी पर बने बाँध की वितरिकाओं से जो पानी सीपेज द्वारा एकत्र हो जाता है तथा गाँव-गाँव में जो जलाशय बने हुए हैं, उन सभी जल स्रोतों में सीपें भी बहुतायत से उपलब्ध रहती हैं। छः से दस सेंटीमीटर तक की जीवित सीप मोती पालन हेतु उपयुक्त होती है। स्टील उद्योग

    79.प्रश्नः कल्णाणी समूह को करौली जिले में कौनसा उद्योग लगाने की स्वीकृति दी गई है?

    उत्तरः 15 हजार करोड़ रुपये के निवेश से विशेष प्रकार का स्टील संयंत्र लगाने की।

    80.प्रश्नः सिरोही रीको क्षेत्र में स्थित आबू ग्रोथ सेंटर में कितनी स्टील फैक्ट्रियां लगी हैं?

    उत्तरः लगभग पाँच दर्जन।

    81.प्रश्नः सिरोही की स्टील फैक्ट्रियों में क्या बनता है?

    उत्तरः स्टेनलैस स्टील बर्तन, रोलिंग मिल, स्टेनलैस स्टील के पट्टे, एम एस इंगोटर्स, बर्तन बनाने की मशीनरी, रीइनफोर्समेंट इंजीनियरिंग स्टील आदि। सिरेमिक उद्योग

    82.प्रश्नः राज्य में सिरेमिक उद्योग कहाँ विकसित है?

    उत्तरः उदयपुर, अलवर एवं बीकानेर जिले में।

    83.प्रश्नः वर्ष 2015-16 में रीको द्वारा सेंट्रल ग्लास एण्ड सिरेमिक्स रिसर्च इंस्टीट्यूट खुर्जा के सहयोग से 500 दक्ष कामगारों के लिए स्किल डिवलपमेंट कार्यक्रम कहाँ करवाया जायेगा?

    उत्तरः उदयपुर, अलवर एवं बीकानेर जिले में।

    84.प्रश्नः सिरेमिक परीक्षण प्रयोगशाला कहाँ खोली गई है?

    उत्तरः बीकानेर।

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  • दैहिक आकर्षण और भौतिक शोषण के बीच पिसते नारी तन-मन की मुक्ति कैसे होगी !

     02.06.2020
    दैहिक आकर्षण और भौतिक शोषण के बीच पिसते नारी तन-मन की मुक्ति कैसे होगी !

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    हरियाणा के विकास बराला तथा उसके साथी ने कहा है कि वे वर्णिका का अपहरण नहीं करना चाहते थे, केवल उसे देखना चाहते थे क्योंकि वह भी विकास तथा उसके दोस्त आशीष को, अपनी कार में से देखती हुई निकली थी। हमारे पास दो विकल्प हैं, या तो विकास की बात सच मान ली जाए या फिर असत्य मान ली जाए। दोनों ही स्थितियों में यह तय है कि विकास बराला और उसका दोस्त, नारी के दैहिक आकर्षण से उत्पन्न उस उन्माद का शिकार हो गए जो विकास और आशीष के मन में छिपा हुआ था। पुरुष के मन में दैहिक आकर्षण से उपजे उन्माद के कारण नारी के तन-मन पर आक्रमण करने की यह पहली घटना नहीं है।

    पुराणों में इन्द्र द्वारा गौतम ऋषि की पत्नी के साथ किया गया छल बहु-विख्यात है। रावण द्वारा नलकुबेर की पत्नी के रूप में रह रही रम्भा के साथ की गई जबर्दस्ती का किस्सा भी विख्यात है। विश्वामित्र द्वारा मेनका पर मोहित हो उठने का किस्सा भी विख्यात है। बिल क्लिंटन तथा मोनिका लेविंस्की का प्रकरण भी विश्वविख्यात है। के.पी.एस गिल तथा रूपन देवन बजाज का प्रकरण भी बहुत चचित है। पौराणिक काल से लेकर आज तक न जाने कितनी बार नारी के दैहिक आकर्षण के वशीभूत होकर पुरुष के भीतर रहने वाला उन्मादए नारी के तन-मन पर गहरे घाव देता रहा है। पूर्व की घटनाओं से सीख लेने की बजाय, यह उन्माद दिन प्रति-दिन प्रबल होता जा रहा है।

    यह सही है कि विधाता ने नारी को भले ही दैहिक आकर्षण से सम्पन्न किया हो किंतु पुरुष को यह अधिकार नहीं कि वह उन्मादी और अविवेकी होकर अपराधी और अत्याचारी बन जाए किंतु इस स्थिति के दूसरे पहलू भी हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    वैश्वीकरण के इस युग में खुले समाज की रचना को मानव स्वतंत्रता का प्रमुख आधार बताया जा रहा है। आज के युग में किसी को भी किसी भी प्रकार की बंदिश स्वीकार नहीं है। इण्टरनेट पर परोसी जाने वाली पोर्न सामग्री से लेकर व्हाटसैप, फेसबुक आदि सोशियल मीडिया तक पर अश्लीता छाई हुई है। किशोर वय लड़के-लड़कियां अपनी आयु से पहले परिपक्व हो रहे हैं। टीवी, स्ट्रीट होर्डिंग्स, मैगजीन्स और समाचार पत्रों में छपने वाले विज्ञापनों में नारी के दैहिक आकर्षण को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया जा रहा है। टेलिविजन पर ऐसे विज्ञापन तथा धारावाहिक दिखाए जा रहे हैं जो युवा-मन में मनोवैज्ञानिक एवं यौन विषयक स्थाई विकृतियां उत्पन्न कर रहे हैं।

    आज भारतीय समाज का मनोविज्ञान खाओ-पिओ मौज करो का बन गया है। धर्म-अध्यात्म, दर्शन, नीति की बात करते ही कुछ लोग एवं संगठन काट खाने को दौड़ पड़ते हैं कि आप किसी पर अपने विचार नहीं थोप सकते। आप लोगों की सोच पर ताले नहीं लगा सकते। आप किसी के कपड़ों की ऊंचाई तय नहीं कर सकते। आप लोगों का खान-पान तय नहीं कर सकते। ऐसे लोगों को यह कैसे समझाया जाए कि आप हर नारी की सुरक्षा के लिए एक-दो या चार पुलिस वाले भी नहीं लगा सकते।

    नारी तभी सुरक्षित होगी जब पुरुष के भीतर के उन्माद को नियंत्रित करने का वातावरण बनाया जाएगा और वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न की जाएंगी। यह कार्य घरों से ही आरम्भ हो सकता है। अध्यात्मिक व्यक्तियों की जीवनियों के प्रचार-प्रसार से समाज में उच्च वैचारिकता, चारित्रिक दृढ़ता और संयम उत्पन्न होना संभव है। स्त्री और पुरुष दोनों को ही इस समस्या का समाधान निकालना है न कि केवल पुरुष को। जेल, एफआईआर और कोर्ट-कचहरी में इस समस्या का समाधान न के बराबर है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • गूंगी गुड़िया का आपातकाल

     19.05.2020
    गूंगी गुड़िया का आपातकाल

    गूंगी गुड़िया का आपातकाल


    1966 में लाल बहादुर शास्त्रीजी के आकस्मिक निधन के बाद मोरारजी देसाई ने भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया किंतु कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के. काम राज ने स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप दी। इसके पीछे बड़ा कारण यह था कि इंदिरा गांधी की छवि बहुत शांत स्वभाव की नेता की थी। सार्वजनिक रूप से बहुत कम बोलने के कारण उन्हें राजनीतिक हलकों में गूंगी गुड़िया कहा जाता था। के. कामराज को लगता था कि वे इस गूंगी गुड़िया के माध्यम से अपनी मर्जी से भारत का शासन चला पाएंगे किंतु ऐसा हुआ नहीं।

    शीघ्र ही इंदिरा गांधी ने सिद्ध कर दिया कि इस गूंगी गुड़िया के भीतर दृढ़ इच्छा शक्ति एवं राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बड़े समंदर लहरा रहे हैं जिनके चलते 1969 में राष्ट्रपति के चुनावों में इंदिरा गांधी की उस समय के धुरंधर कांग्रेसियों से सीधी लड़ाई हो गई। मोरारजी देसाई तथा उनका गुट नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाना चाहता था किंतु इंदिरा गांधी वी. वी. गिरि के पक्ष में थीं। जब कांग्रेस ने नीलम संजीव रेड्डी को अपना अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिया तब इंदिरा ने वी. वी. गिरि को निर्दलीय प्रत्याषी के रूप् में खड़ा कर दिया तथा कांग्रेसियों से अपील की कि वे अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर वोट दें। कांग्रेसी सांसदों एवं विधायकों ने इंदिरा गांधी द्वारा समर्थित वी. वी. गिरि को वोट दिए और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी परास्त हो गए।

    इस झगड़े में कांग्रेस दो हिस्सों बंट गई। मोरारजी देसाई के प्रभाव वाली सिंडीकेट ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से बाहर निकाल दिया। इंदिरा ने कांग्रेस (आर) बना ली तथा वे सत्ता में बनी रहीं। मोरारजी देसाई की कांग्रेस ओल्ड कांग्रेस कहलाने लगी। मोरारजी गुट के साथ कांग्रेस के केवल 65 सदस्य रहे, शेष सदस्य इंदिरा के पक्ष में रहे तथा इंदिरा ने डीएमके की सहायता से अपनी कुर्सी बचा ली।

    जब मार्च 1971 के आम चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी अपने प्रतिद्वंद्वियों के सामने बहुत कमजोर दिखाई देने लगीं। यहां तक कि उनका खुद का चुनाव जीतना भी मुश्किल दिखाई देने लगा। कुछ साल पहले तक जिस इंदिरा गांधी को राजनीतिक हलकों में गूंगी गुड़िया माना जा रहा था, अब उस गूंगी गुड़िया को सत्ता का चस्का लग चुका था। सत्ता में बने रहने के लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार थी। चुनाव जीतने के लिए श्रीमती गांधी ने साम-दाम-दण्ड-भेद सभी तरह के उपायों का सहारा लिया। इंदिरा गांधी ने न केवल अपने प्रतिद्वंद्वी राजनारायण को परास्त कर दिया अपितु 352 सीटों के भारी बहुमत से सरकार बनाई।

    पराजित प्रत्याशी राजनारायण ने इंदिरागांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया कि उन्होंने असंवैधानिक तरीकों से चुनाव जीता है, उनका चुनाव निरस्त किया जाए। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मुकदमे का फैसला सुनाया और इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया। इस निर्णय के अनुसार दुबारा चुनाव जीतने तक इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं।

    राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति-प्राप्त बिहार के बड़े नेता जयप्रकाश नारायण ने मांग की कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दें। 25 जून 1975 को जयप्रकाश ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध दिल्ली में एक विशाल रैली कि जिसकी सफलता को देखते हुए इंदिरा गांधी घबरा गईं। उसी रात उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से कहा कि वे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में देखते हुए आपात्काल घोषित करें। फखरुद्दीन अली अहमद इंदिरा के दबाव में आ गए। उन्होंने 25-26 जून की रात में आपात्काल की घोषणा कर दी। देश में नागरिक अधिकार रद्द कर दिए गए।

    सरकार के खिलाफ लिखने, बोलने पर रोक लगा दी गई। अखबारों की खबरें सेंसर की जाने लगीं। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, जाॅर्ज फर्नाण्डीस, बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी सहित बहुत से विरोधी नेता जेलों में ठूंस दिए गए। बहुत से पत्रकारों को भी जेल जाना पड़ा। सरकारी विभागों के कर्मचारी यूनियनों के नेताओं को भूमिगत होना पड़ा। बहुत से कर्मचारी नेता ढूंढ-ढूंढ कर जेलों में ठूंस दिए गए जिनमें से बहुतों को पुलिस के अत्याचारों का शिकार होना पड़ा। कम्यूनिस्ट पार्टी इण्डिया ने आपात्काल का स्वागत किया। उन्हें जेलों में पीटा गया, भूखा रखा गया और उनके परिवार वालों को भी अपमानित किया गया। लगता था जैसे लोकतंत्र की हत्या कर दी गई है और देश में अंग्रेजों के जमाने की डिक्टेटरशिप लौट आई है। आजादी की लड़ने वालों ने इस प्रकार के शासन की कल्पना तक नहीं की थी।

    देश में मीसा अर्थात् मेंटीनेंट आॅफ इण्टरनल सिक्योरिटी एक्ट लागू कर दिया गया। इससे एक लाभ यह हुआ कि छोटे गुण्डों से लेकर बड़े अपराधियों और तमाम तरह के असमाजिक तत्वों में भय बैठ गया। लोग अपराध करने से डरने लगे। सरकारी कर्मचारी समय पर अपने कार्यालयों में पहुंचने लगे और रिश्वतखोरी कम हुई। व्यापारी मिलावट करने और कम तोलने से डरने लगे। इस कारण शरीफ एवं ईमानदार जनता को कुछ हद तक राहत भी मिली।

    मार्च 1976 में छठी लोकसभा के चुनाव होने थे किंतु चुनावों को एक साल के लिए स्थगित कर दिया गया। इसी बीच इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी ने देश में जनंसख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रव्यापी नसबंदी अभियान चलाया। संजय उन दिनों इंदिरा के राजनीतिक उत्तराधिकारी समझे जाते थे। इसलिए उनके आदेश सरकारी तंत्र में कानून की तरह लागू होते थे। लोगों की जबर्दस्ती नसबंदी की जाने लगी। सरकारी कर्मचारियों एवं पुलिस ने नसबंदी के लक्ष्य पूरे करने के लिए बहुत से युवाओं की यहां तक कि नवविवाहित, निःसंतान और अविवाहित युवाओं की भी नसबंदी कर दी।

    जब चुनाव समय पर नहीं हुए और लोगों की जबर्दस्ती नसबंदी का काम जोर पकड़ गया तो लोगों में इंदिरा गांधी के विरुद्ध असंतोष भड़कने लगा और देश में चुनाव करवाए जाने की मांग होने लगी। कम्यूनिस्ट पार्टी भी अब आपात्काल का विरोध करने लगी। जनवरी 1977 में सभी राजनीतिक बंदी रिहा कर दिए गए तथा 16 से 19 मार्च 1977 को देश में चुनाव करवाए गए तथा 20 मार्च को हुई जनगणना में इंदिरा गांधी तथा उनकी पार्टी बुरी तरह चुनाव हार गई। 21 मार्च 1977 को आपात्काल हटा दिया गया और देश में फिर से नागरिक अधिकारों की बहाली हुई। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र के एक काले अध्याय की समाप्ति हुई।

    - डाॅ. मोहन लाल गुप्ता

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास उपक्रम

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास उपक्रम

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 58

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास उपक्रम

    राजस्थान सरकार के सार्वजनिक औद्योगिक उपक्रम

    1. प्रश्नः शुगर फैक्ट्री गंगानगर में किस वनस्पति से चीनी बनाई जाती है?

    उत्तरः इसमें गन्ने व चुकंदर से चीनी का उत्पादन किया जाता है।

    2. प्रश्नः राजस्थान में रेक्टिीफाइड स्पिरिट का उत्पादन कहाँ होता है?

    उत्तरः श्रीगंगानगर एवं अटरू में राज्य के मदिरा गृह, डिस्टलरीज में शोधित प्रासव (रेक्टिीफाइड स्पिरिट) का उत्पादन होता है।

    3. प्रश्नः हाइटैक ग्लास फैक्ट्री कहाँ है तथा इसमें क्या बनता है?

    उत्तरः यह धौलपुर में स्थित है। इसमें काँच का सामान, बोतलें, प्रयोगशालाओं में काम आने वाले उपकरण तथा रेलवे के जार बनते हैं।

    4. प्रश्नः राजस्थान स्टेट कैमिकल वर्क्स कहाँ है तथा इसमें क्या बनता है?

    उत्तरः यह डीडवाना में स्थित है। इसमें सोडियम क्लोराइड (नमक), सोडियम सल्फेट तथा सोडियम सल्फाइड बनाया जाता था। सोडियम सल्फेट का उत्पादन बंद है।

    5. प्रश्नः स्टेट वूलन मिल्स बीकानेर की स्थापना कब एवं कहाँ हुई?

    उत्तरः इस मिल की स्थापना ई.1960 में ऊनी धागा बनाने के लिये की गयी। वर्तमान में यह बंद है।

    6. प्रश्नः राजस्थान स्टेट टेनरीज लि. कब एवं किस उद्देश्य से स्थापित हुई?

    उत्तरः यह ई. 1971 में स्थापित की गयी थी। इसमें चमड़ा उत्पादन किया जाता है।

    7. प्रश्नः सिमको का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः सेंट्रल इण्डिया मशीनरी मैन्यूफैक्चरिंग कम्पनी (सी.आई.एम.एम.सी.ओ.)

    8. प्रश्नः सिमको की स्थापना कब एवं कहाँ हुई?

    उत्तरः 28 मार्च 1957 को भरतपुर में की गयी।

    9. प्रश्न - सिमको कारखाने में क्या बनता है?

    उत्तर - रेल के डिब्बे। इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 6000 वैगन है। इसे भरतपुर की लाइफ लाइन कहा जाता था किंतु 13 नवम्बर 2000 को तालाबंदी होने से यह बंद हो गई थी। टीटागढ़ वैगन्स कम्पनी द्वारा यह 9 अक्टूबर 2008 को पुनः आरंभ की गई। अब इस कारखाने में रेल इंजन (पॉवर) बनाने की योजना है। सिमको बिरला लिमिटेड सह प्रवर्तन टीटागढ़ (कोलकाता) ने कार्यवाही आरंभ कर दी है। पहले चरण में रेल इंजन का ढांचा बनाया जायेगा। इसके सफल रहने पर पूरा रेल इंजन बनाया जायेगा। इस कारखाने में सवारी कोच ईएमयू बनाने की भी तैयारियां चल रही हैं।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न 1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2008, सामान्य ज्ञान, सही कथन पर चिह्न लगाइये-

    (1.) सिमको माल डिब्बा कारखाना भरतपुर में आठ वर्ष के बाद पुनः शुरू हो गया है,

    (2.) सिमको कारखाना को भिवाड़ी में यात्री डिब्बा निर्माण के लिए शुरू किया गया है,

    (3.) सिमको कारखाना अलवर में बस व ट्रक के नीचे के ढांचे का निर्माण करता है,

    (4.) सिमको कम्पनी एशिया के देशों में यात्री डिब्बों के निर्यात में संलग्न है। राजस्थान में केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम


    10. प्रश्नः राजस्थान में कौनसे केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम स्थापित किये गये हैं?

    उत्तरः हिंदुस्तान जिंक लि. (जिला उदयपुर), हिंदुस्तान सांभर साल्ट सांभर (जिला जयपुर), हिंदुस्तान कॉपर लि. खेतड़ी (जिला झुंझुनूं), हिंदुस्तान मशीन टूल्स अजमेर।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1988, राजस्थान में स्थित चार केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के नाम बताइये तथा उनके कार्यों का उल्लेख कीजिये।

    2 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 1999, हिंदुस्तान सांभर साल्ट का संचालन कौन करता है? हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड


    11. प्रश्नः राज्य में हिंदुस्तान जिंक लि. की स्थापना कब एवं कहाँ हुई?

    उत्तरः ई. 1966 में देबारी जिला उदयपुर में।

    12. प्रश्नः हिंदुस्तान जिंक लि. का प्रधान कार्यालय कहाँ है?

    उत्तरः उदयपुर।

    13. प्रश्नः देबारी संयंत्र को जस्ते की आपूर्ति कहाँ से होती है?

    उत्तरः जावर, दरीबा, एवं मट्रन की खानों से।

    14. प्रश्नः कच्चे जस्ते को गलाकर शुद्ध करने की प्रक्रिया कहाँ की जाती है?

    उत्तरः देबारी संयंत्र में।

    15. प्रश्नः देबारी संयंत्र में किन धातुओं का शोधन होता है?

    उत्तरः जिंक, लैड, सिल्वर एवं कैडमियम।

    16. प्रश्नः हिंदुस्तान जिंक लि. का विनिवेश कब और क्यों किया गया?

    उत्तरः वर्ष 2002 में केन्द्र सरकार ने भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान के तहत इस कारखाने का विनिवेश किया।

    17. प्रश्नः हिंदुस्तान जिंक लि. के शेयर किसके पास हैं?

    उत्तरः स्टर्लाइट ओपोर्च्यूनिटीज एण्ड वेंचर्स लिमिटेड- 64.92 भारत सरकार- 29.54 प्रतिशत शेयर। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड

    18. प्रश्नः हिन्दुस्तान कॉपर लि. कहाँ स्थित है?

    उत्तरः खेतड़ी (जिला झुंझुंनू)

    19. प्रश्नः हिन्दुस्तान कॉपर लि. का उद्घाटन कब हुआ?

    उत्तरः ई. 1967

    20. प्रश्नः हिन्दुस्तान कॉपर लि. में कच्चे ताम्बे का उत्पादन कब आरम्भ हुआ?

    उत्तरः ई. 1970

    21. प्रश्नः हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड द्वारा राजस्थान में कौनसी परियोजनाएँ चलायी जाती हैं?

    उत्तरः (1) खेतड़ी कॉपर कॉम्पलैक्स खेतड़ी नगर। (2) दरीबा ताम्र परियोजना अलवर। (3) चांदमारी ताम्र परियोजना झुंझुनूं।

    22. प्रश्नः हिंदुस्तान कॉपर लि. मुख्यतः क्या बनाती है?

    उत्तरः तार, बार, ब्लिस्टर कॉपर, ब्रास रोल्ड, सल्फ्यूरिक एसिड, सेलेनियम, स्वर्ण एवं रजत सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा निकल फॉस्फेट आदि।

    23. प्रश्नः भारत सरकार ने हिन्दुस्तान कॉपर लि. के विनिवेश की घोषणा कब की?

    उत्तरः 14 सितम्बर 2012

    24.प्रश्नः भारत सरकार ने हिन्दुस्तान कॉपर लि. के विनिवेश की घोषणा क्यों की?

    उत्तरः यह कारखाना काफी समय से घाटे में चल रहा है। वर्ष 2000 तक इसमें 10 हजार से अधिक कर्मचारी काम करते थे। इसकी 9.59 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचे जाने का निर्णय लिया गया है। सांभर साल्ट्स लिमिटेड

    25. प्रश्नः सांभर साल्ट्स लिमिटेड की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः 25 जनवरी 1960

    26. प्रश्नः सांभर साल्ट्स लि. में हिंदुस्तान साल्ट्स एवं राजस्थान सरकार के कितने अंश हैं?

    उत्तरः हिंदुस्तान साल्ट्स- 60 प्रतिशत अंश। राजस्थान सरकार- 40 प्रतिशत अंश।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए

    प्रश्न 1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 1999, हिंदुस्तान सांभर साल्ट का संचालन कौन करता है? हिंदुस्तान मशीन टूल्स (एचएमटी)

    27. प्रश्नः एचएमटी की स्थापना कब व कहाँ हुई?

    उत्तरः ई. 1967 में अजमेर में।

    28. प्रश्नः एचएमटी की स्थापना किस देश के सहयोग से हुई?

    उत्तरः चेकेस्लोवाकिया के सहयोग से।

    29. प्रश्नः एचएमटी की देश में कितनी इकाइयाँ हैं?

    उत्तरः छः इकाइयाँ। इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड कोटा

    30. प्रश्नः इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड कोटा की स्थापना कब हुई ?

    उत्तरः मार्च 1964

    31. प्रश्नः इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड कोटा क्या बनाती है?

    उत्तरः स्टील, थर्मल पॉवर एवं केमिकल संयंत्रों के काम आने वाले प्रोसेस कंट्रोल, मेगनेटिक इलेक्ट्रिक इंस्ट्रूमेंट, इलेक्ट्रोनिक ऑटोमेटिक इण्डीकेटर्स, ट्रांसमीटर्स आदि।

    32. प्रश्नः इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड कोटा की राजस्थान में सहायक इकाई कौनसी है?

    उत्तरः राजस्थान इलेक्ट्रोनिक्स एण्ड इंस्ट्रूमेंट्स लिमिटेड।

    33. प्रश्नः राजस्थान इलेक्ट्रोनिक्स एण्ड इंस्ट्रूमेंट्स लिमिटेड की स्थापना कब एवं कहाँ हुई?

    उत्तरः ई. 1982-83 में कनकपुरा (जयपुर)। मॉडर्न बेकरीज इण्डिया लिमिटेड

    34. प्रश्नः मॉडर्न बेकरीज इण्डिया लिमिटेड कहाँ स्थित है तथा यह किसके अधीन कार्यरत है?

    उत्तरः यह विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र जयपुर में स्थित है तथा मॉडर्न फूड्स इण्डिया लि. के आधीन कार्यरत है।


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  • नन्ही ने ऋषि दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया

     02.06.2020
    नन्ही ने ऋषि दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ईस्वी 1883 में आर्य समाज के संस्थापक ऋषिवर दयानन्द सरस्वती जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह के निमंत्रण पर जोधपुर आये। राजा जसवंतसिंह ने ऋषि का भव्य स्वागत किया, उन्हें लाने के लिये रत्न जड़ित पालकी भेजी तथा उनके लिये अनेक सेवकों एवं सुरक्षा प्रहरियों का प्रबन्ध किया किंतु ऋषि ने पालकी लौटा दी और पैदल ही चलकर आये। जब उन्होंने अपने भाषण प्रारंभ किये तो पूरे जोधपुर में उनकी धूम मच गई। राईका बाग महल में बैठकर राजा ने उनके उपदेश सुने और उन्हें दुर्ग में पधारने का अनुरोध किया। स्वामीजी के उपदेशों का राजा से लेकर मन्त्रियों, राज्य कर्मचारियों और प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजा और मन्त्रियों ने राज्य और प्रजा की वास्तविक उन्नति की ओर ध्यान दिया। शिक्षा के लिये विद्यालय स्थापित किये गये और राज्य की अदालतों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी को काम में लाया जाने लगा।


    एक दिन स्वामी दयानन्द बिना कोई सूचना दिये जोधपुर दुर्ग पहुंचे तो एक विचित्र दृष्य देखकर आष्चर्य से खड़े रह गये। उन्होंने देखा कि राजा नशे में धुत्त है और नन्ही की पालकी को कन्धे पर उठाये हुए महल से बाहर आ रहा है। रूप दर्प से दमदमाती नन्ही, सिंहनी की भांति पालकी में सवार थी। जब राजा की दृष्टि स्वामीजी की आंखों से टकराई तो राजा शर्म से जमीन में गढ़ गया। स्वामीजी ने राजा को कड़ी फटकार लगाई और किले से नीचे उतर गये।

    राजा ग्लानि और लज्जा से सिर झुका कर महल में चला गया। बाहर आकर स्वामीजी ने राजा को एक पत्र लिखा जिसमें राजा की तुलना नारकीय पशु से की। यह पत्र नन्ही के हाथ लग गया। नन्ही क्रोध और अपमान से फुंकार उठी। 29 सितम्बर 1883 को उसने स्वामीजी के दूध से पिसा हुआ काँच मिला दिया। ऋषि श्रेष्ठ को अजमेर ले जाया गया जहाँ 30 अक्टूबर को उनकी मृत्यु हो गई।

    ऋषि दयानन्द की मृत्यु हो जाने से राजा को बड़ा क्लेष पहुंचा किन्तु फिर भी वह उस रूप की पिटारी में छिपा बैठा रहा। एक दिन राजा की अनुपस्थिति में उमरावों और सरदारों ने नन्ही को अपमानित और प्रताड़ित किया तथा महल से निकाल दिया। जब नन्ही की माँ छोटी की मृत्यु हुई थी तब नन्ही का मन अपनी हवेली से उचट गया जिस पर राजा ने नन्ही के लिये उदयमार्ग पर एक भव्य मन्दिर बनवा दिया था। नन्ही उसी में रहने लगी। अपने जीवन का अंतिम काल नन्ही ने उसी मन्दिर में बिताया। नन्ही स्थाई रूप से रसिक बिहारी के मन्दिर के पिछवाड़े में बने कमरों में रहने लगी। राजा मन्दिर के दरवाजे पर बने रंग महल में बैठकर नन्ही के रूप सौंदर्य का पान करता रहा।

    ईस्वी 1880 में जसवन्तसिंह ने जोधपुर राज्य में अपने खर्चे से रेल लाइन का निर्माण आरंभ करवाया। अंग्रेजी सरकार के इन्जीनियर जूसलेन और उसके सहायक स्मिथ ने रेल कार्य की पैमाइश की तथा डब्लू. होम नामक इन्जीनियर ने यह निर्माण करवाया। होम ने जोधपुर राज्य को प्रशंसनीय सेवायें दीं। तब जोधपुर शहर में पानी का बड़ा अभाव था। होम ने पत्थर की पक्की नहरें, पहाड़ों की तली में होकर बर्नाइं जिनसे दस मील के घेरे में स्थित पहाड़ियों पर होने वाली वर्षा का पानी शहर के तालाबों तक आता था। ईस्वी 1896 में होम के प्रयत्नों से कन्जरवेन्सी ट्रामवे खुली जो उस समय उत्तर भारत में अपने ढंग की पहली थी। इसमें शहर का कूड़ा करकट, मैला आदि डिब्बों में भरा जाकर छोटे से स्टीम इन्जन द्वारा शहर से 8-9 मील दूर खाइयों में गाढ़ा जाता था जो खाद बन जाता था। रेल्वे वर्कशाप, कचहरी की विशाल इमारतें, दरबार के बंगले, बालसंमद झील की टनल आदि इसी इन्जीनियर की देखरेख में बनवाये गये। जोधपुर में पी. डब्लू. डी. महकमा भी इसी की अधीनता में स्थापित किया गया।

    ईस्वी 1895 में राजा जसवंतसिंह बीमार पड़ा और तरह-तरह के दुःख भोग कर मर गया। उसकी मृत्यु के बाद नन्ही ने अपनी हवेली से सदा-सदा के लिये नाता तोड़ लिया। जसवन्तसिंह के काल में जोधपुर में बालसमंद बांध से गुलाबसागर तथा फतहसागर तालाबों के लिये नहर बनवाई गई तथा बिलाड़ा के पास पिचियाक में जसवन्त सागर बांध तैयार करवाया गया। जसवन्तसिंह के रनिवास में 9 रानियां, 13 पड़दायतें तथा नन्ही भगतन (नन्हीजी) नामक गणिका थी।

    राजा के मरने के बाद नन्ही 14 वर्ष तक इस संसार में जीवित रही। ये चौदह वर्ष अपमान, उपेक्षा और कष्टों से भरे हुए थे। अपने अन्तिम दिनों में नन्ही को खूनी बवासीर हो गई। अन्त में 61 वर्ष की आयु में 23 अगस्त 1909 को वह इस असार संसार से कूच कर गई। उसके मरने के बाद उसके मन्दिर स्थित आवास से छः सौ जोड़ी जड़ाऊ जूतियां, आठ सौ रेषमी घाघरे और लाखों रुपये का कीमती सामान निकला जो षिक्षण संस्थाओं को दान कर दिया गया। मन्दिर के जिस हिस्से में नन्ही रहती थी, वहाँ पाठषाला खोली गयी तथा जहाँ उसकी पालकियां एवं रथ रखे जाते थे, षिक्षा विभाग का कबाड़ा पटक दिया गया। आज बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी इस परिसर से जोधपुर राज्य के अनेक महत्वपूर्ण आदेष जारी किये जाते थे।

    जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद नन्ही की हवेली में जोधपुर राज्य की टकसाल स्थापित की गई। सिक्कों के अतिरिक्त अन्य कीमती सामग्री हीरे, जवाहरात तथा नगदी भी इसी भवन में रखे जाने लगे और इसका नाम जवाहर खाना हो गया। इसके निचले भाग में धातु पिघलाने की भट्टियां लगाई गईं तथा इसे लोहे के मोटे सीखचों वाले दरवाजे से सुरक्षित कर दिया गया। इस टकसाल में लोहे के बाट भी बनते थे।

    टकसाल के एक भाग में सोने-चान्दी की कुटाई होती थी तथा महारानी विक्टोरिया के नाम के सिक्के भी ढाले जाते थे। राज्य की तिजोरियां यहाँ पर दोहरे ताले में रखी जाती थीं जिनकी सुरक्षा के लिये गार्ड तैनात किये गये थे। सिक्के ढालने के बाद बचे हुए सोने-चांदी की जालियां बनाई जाती थीं जिसमें विक्टोरिया का चित्र भी सांचे में ढाल कर बनाया जाता था। ऐसी 50 जालियां आज भी जवाहर खाना के मुख्य भाग के ऊपरी हिस्से में लगी हुई हैं। आजादी के बाद यह टकसाल बन्द हो गई तथा यहाँ खाद्य मसालों, हल्दी, धनिया, मिर्च आदि की प्रयोगषाला स्थापित की गई। ई.1955 में यहाँ देषी घी की जांच करने की प्रयोगशाला बनाई गई जिसमें जालोर, बाड़मेर तथा सांचोर आदि परगनों से आने वाले घी की जांच होती थी तथा उस पर ठप्पा लगाकर बाजार में बेचा जाता था। दस वर्ष बाद 1966 में यह प्रयोगशाला भी बन्द हो गई।

    उसके बाद यहाँ विद्यालय तथा स्टेट बैण्ड आदि स्थापित किये गये। स्टेट बैण्ड जोधपुर राज्य की ओर ई.1891 में राजदादीजी के नोहरे में खोला गया था जिसे बाद में यहां स्थानान्तरित कर दिया गया। आजादी के बाद इस भवन में भूमि एवं भवन का पंजीयन कार्यालय भी खोला गया जो कुछ समय बाद कलक्ट्रेट परिसर में चला गया। जवाहरखाना के नाम से प्रसिद्ध नन्ही बाई की हवेली बाहर से डेढ़ी होने के कारण आज भी दो भागों में बंटी दिखाई देती है। इक्का खां के मकान में अब लुहार रहते हैं। नन्ही की हवेली भी जर्जर हो चली है। इसकी खिड़कियां, बारादरी तथा कंगूरे अपने अतीत की यादें संजोये अपने उद्धार की प्रतीक्षा में टिके हुए हैं।

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  • राजस्थान में मिलने से पहले जोधपुर महाराजा द्वारा अपने स्टाफ को पुरस्कार एवं पदोन्नतियां

     02.06.2020
    राजस्थान में मिलने से पहले जोधपुर महाराजा द्वारा  अपने स्टाफ को पुरस्कार एवं पदोन्नतियां

    राजस्थान में मिलने से पहले जोधपुर महाराजा द्वारा

    अपने स्टाफ को पुरस्कार एवं पदोन्नतियां



    स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् पुरस्कारों का वितरण-

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    24 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा ने अपने निजी स्टाफ के अधिकारियों को पदोन्नतियां, पुरस्कार तथा निःशुल्क भूमि प्रदान कीं।


    पदोन्नति-

    1. महाराजा के पसर्नल मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल राव राजा हनूतसिंह - ऑनरेरी ब्रिगेडियर

    2. सरदार इन वेटिंग कैप्टेन महाराज अनोपसिंह - मेजर

    3. महल के प्रशासनिक अधिकारी गोवर्धनसिंह - कैप्टेन

    स्वर्ण एवं ताजीम (एकवारी)-

    1. कम्पट्रोलर ऑफ द हाउस होल्ड मेजर डॉ. बी. एल. रावत

    2. ठाकुर करणसिंह

    स्वर्ण-

    1. जोधपुर स्टेट रेलवे के महाप्रबंधक के सेक्रेटरी मि. जे. ए. फोलिओट पॉवेल

    पालकी, सिरोपाव एवं स्वर्ण-

    पं नंदलाल राज्य रत्न-

    1. डा. निरंजन नाथ गुरटूं

    स्टाईपेण्ड, फण्ड एण्ड ग्रांट्स-

    1. डॉ. निरंजन नाथ गुरटूं - 200.00 रुपये प्रमिमाह

    2. साह अमृतराज - 200.00 रुपये प्रमिमाह

    3. करण चंद्र भण्डारी - 100.00 रुपये प्रमिमाह

    4. खेमचंद भण्डारी - 100.00 रुपये प्रमिमाह

    निशुल्क भूखण्ड एवं भूमि का अनुदान-

    1. कैप्टेन ठाकुर रतनसिंह ए. डी. सी.

    2. कैप्टेन ठाकुर मनोहरसिंह - ए. डी. सी.

    3. भोपालचंद लोढ़ा- महाराजा ने भोपालचंद लोढ़ा के विरुद्ध चल रहे समस्त जांच प्रकरण भी वापस ले लिये।

    राजस्थान में सम्मिलिन से पहले रैंक/सम्मान व उपाधियों का वितरण-

    जोधपुर महाराजा के पुत्र उत्पन्न होने की प्रसन्नता में 18 मार्च 1948 को महाराजा ने बहुत से लोगों को ऑनरेरी रैंक, मिलिट्री रैंक, राज्य रत्न, नगरसेठ व रायबहादुर की उपाधियां, स्वर्ण, ताजीम, हाथ का कुराब, हाथी सिरोपाव, पालकी सिरोपाव आदि बांटे-

    ऑनरेरी रैंक-

    1. मेजर जनरल महाराजाधिराज श्री अजीतसिंह साहिब - जनरल

    2. दीवान बहादुर ठाकुर माधोसिंहजी साहिब ऑफ संखवास - कर्नल

    3. मेजर महाराज श्री हिम्मतसिंहजी साहिब - ले. कर्नल

    4. महाराज हनवंतसिंहजी - ले. कर्नल

    5. मेजर राजा हरिसिंह ऑफ कुचामन - ले. कर्नल

    6. मेजर कुंवर बिशनसिंहजी - ले. कर्नल

    7. ठाकुर करणसिंहजी- ले. कर्नल

    8. ठाकुर भैंरोसिंहजी ऑफ खेजड़ला - मेजर

    9. महाराजा नरपतसिंहजी ऑफ बांसवाड़ा - मेजर

    10. कुंवर लक्ष्मणसिंहजी - मेजर

    11. ले. ओंकारसिंह, डिप्टी प्राइवेट सेक्रेटरी - कैप्टेन

    12. मि. अनोपसिंह जुडिशयल सेक्रेटरी - कैप्टेन

    13. मि. पदमसिंह - कैप्टेन

    रैंक-

    1. मेजर महाराजा प्रेमसिंहजी- ले. कर्नल

    2. मेजर ठाकुर मोहनसिंहजी - ले. कर्नल

    राज्यरत्न-

    1. लाला हरिश्चंद्रजी, जुडिशियल मिनिस्टर

    2. रायबहादुर जसवतंराजजी मेहता, मिनिस्टर फॉर लोकल बॉडीज

    3. मि. बी. के. मजूमदार, पर्सनल फिजीशियन ऑफ दी हिज हाइनेस दी महाराजा साहिब बहादुर

    नगर सेठ-

    1. मेजर मोहनलाल सांघी

    राय बहादुर-

    1. शाह मदन मोहनजी जागीरदार,

    चौक लखनऊ सम्मान की बहाली-

    1. मि. गोरधनलाल काबरा

    गोल्ड एण्ड ताजीम-

    1. कैप्टेन ठाकुर मनोहरसिंहजी ऑफ धामाली - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम

    2. कैप्टेन ठाकुर रतनसिंहजी ऑफ भीकमकोर - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम

    3. ले. कुंवर हेमसिंहजी - डबल गोल्ड एण्ड डबल ताजीम

    ताजीम-

    1. ले. कर्नल ठाकुर विक्रमसिंहजी ऑफ सामलिया (अलवर स्टेट)

    2. ठाकुर नाथूदानजी महरिया

    3. शाह मदनमोहनजी जागीरदार,

    चौक लखनऊ हाथ का कुरब-

    1. मेजर टीका कुशवंतसिंहजी ऑफ बदरू खां (नाभा स्टेट)

    ताजीम एण्ड हाथी सिरोपाव-

    1. रायबहादुर ठाकुर बख्तावरसिंहजी, इंसपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस

    हाथी सिरोपाव-

    1. राय बहादुर राज्य रत्न जसवंतरायजी मेहता

    2. मि. नवल किशायर, चीफ जज

    3. मेजर डॉ. बी. एल. रावत, कम्प्ट्रोलर ऑफ हाउस होल्ड

    4. पं. नन्दलालजी

    गोल्ड एण्ड हाथी सिरोपाव

    1. मि. सी. के. दुरई, जनरल मेनेजर जोधपुर रेलवे

    गोल्ड एण्ड पालकी सिरोपाव-

    1. ठाकुर कानसिंहजी, डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस

    2. मि. सी. एल. कुमार, चीफ इंजीनियर जोधपुर रेलवे

    3. मि. हेतीदान, हुजूर सेक्रटरी

    4. मि. समरथ राज, पोलिटिकल सेक्रेटरी

    5. मि. अनोपसिंह, ज्युडीशियल सेक्रेटरी

    6. मि. अब्दुल हक, डिवलपमेंट सेक्रेटरी

    7. कैप्टेन गोरधनसिंह, होम सेक्रेटरी

    8. एम. एस. राय, एक्स हैड मास्टर ऑफ दरबार हाईस्कूल एण्ड एक्स सेक्रेटरी ऑफ गवर्नमेण्ट ऑफ जोधपुर

    9. मि. उमराव चंद भण्डारी

    10. राज्य वैद्य गोविंद चंद्र

    11 आचार्य रामकिशनजी (मेड़ता)

    12. सेठ गजधर सोमानी ऑफ मौलासर (डीडवाना)

    13. मि. शैतानसिंह, पर्सनल ऑडरली टू दी हिज हाइनेस दी महाराजा साहिब बहादुर

    गोल्ड-

    1. डा. ई. डब्लू हैवर्ड प्रिंसीपल मैडिकल ऑफीसर

    2. मि. एफ. एफ. फर्ग्यूसन, चीफ इंजीनियर पी. डब्लू. डी.

    3. मि. एम. पी. फ्लैटोहेम

    4. पं. रामगोपाल, फाइनेंस सेक्रेटरी

    5. मि. रामनिवास माछर,

    6. डा. हरिगोपाल दवे

    7. मि. एम. ए. राय, एक्जीक्यूटिव इंजीनियर जोधपुर रेलवे

    8. ठाकुर चंद्र सिंहजी एजेण्ट सरदार समंद

    9. वैद्य गंगा सहाय, डीडवाना

    पालकी सिरोपाव-

    1. मि. हरिसिंह सेक्रेटरी टू हर हाइनेस श्री महारानीजी साहिबा

    2. पं. पन्नालाल

    3. मि. हुकमराज मेहता

    4. मि. अमृतराज मेहता

    ताजीम गोल्ड एण्ड हाथी सिरोपाव-

    रिटायर्ड ले. कर्नल्स-

    1. ले. कर्नल ठाकुर बहादुर सिंह ओ. बी. आई.

    2. ले. कर्नल रायबहादुर राय राजा सुजानसिंह

    3. ले. कर्नल हेमसिंह

    4. ले. कर्नल हीरसिंह

    5. ले. कर्नल ठाकुर अनोपसिंह

    6. ले. कर्नल ठाकुर अमानसिंह

    7. ले. कर्नल ठाकुर जवाहर सिंह एम. बी. ई.

    8. ले. कर्नल रायबहादुर ठाकुर दलपतसिंह ऑफ रोहट

    वर्तमान ले. कर्नल्स-

    1. ले. कर्नल के. श्यामसिंह हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्स

    2. ले. कर्नल कुमार अर्जुनसिंह, डायरैक्टर ऑफ रीसैटलमेंट

    3. ले. कर्नल कल्याण सिंह, जोधपुर लांसर्स

    4. ले. कर्नल धोकलसिंह सैकेण्ड जोधपुर इन्फैण्ट्री

    5. ले. कर्नल सुल्तानसिंह हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्स

    6. ले. कर्नल ठाुकर मोहनसिंह, दुर्गा हॉर्स

    7. ले. कर्नल महाराजा प्रेमसिंह फोटर््स गार्ड

    8. ले. कर्नल ठाकुर रामसिंह डी. एस. ओ. सरदार इन्फैण्ट्री

    9. ले. कर्नल ठाकुर डूंगरसिंह एम. ओ. सरदार इन्फैण्ट्री टी. जी.

    हाथी सिरोपाव-

    हैड क्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्सेज-

    1. मेजर धोकलसिंह

    जोधपुर लांसर्स-

    1. मेजर चंदनसिंह

    2. मेजर ठाकुर जगतसिंह

    3. मेजर के. सरदार सिंह

    4. मेजर भोपालसिंह

    जोधपुर लांसर्स ट्रेनिंग सेंटर-

    1. मेजर रामदानसिंह जोधपुर

    सरदार इन्फैण्ट्री-

    1. मेजर दीपसिंह

    2. मेजर जेठूसिंह 

    3. कैप्टेन महाराज दान सिंह

    जोधपुर इन्फैण्ट्री-

    1. महाराज रेवतसिंह

    मिलिट्री हॉस्पीटल- 

    1. मेजर पी. आर. बादवा

    पालकी सिरोपाव-

    हैडक्वार्टर जोधपुर स्टेट फोर्सेज-

    1. कैप्टेन हरिसिंह

    2. कैप्टेन डी. ए. राजहंस

    जोधपुर लांसर्स-

    1. कैप्टेन खीमसिंह

    2. कैप्टेन गिरधारीसिंह

    एम. बी. ई. जोधपुर लांसर्स ट्रेनिंग सेंटर-

    1. कैप्टेन के. उम्मेदसिंह

    2. कैप्टेन एस. के. बनर्जी

    सैकेण्ड जोधपुर इन्फैण्ट्री-

    1. कैप्टेन पेहपसिंह

    2. कैप्टेन करीमखान

    3. कैप्टेन माधोसिंह

    जोधपुर इन्फैण्ट्री सेंटर-

    1. कैप्टेन मगनसिंह

    दुर्गा हॉर्स

    1. कैप्टेन प्रेमसिंह

    2. कैप्टेन रावराजा देवीसिंह

    फोर्ट्स गार्ड-

    1. कैप्टेन रेवतसिंह

    जोधपुर सरदार इन्फैण्ट्री-

    1. कैप्टेन सवाईसिंह

    घोर सिरोपाव-

    जोधपुर इन्फैण्ट्री सेंटर-

    1. ले. दुर्जनसिंह जोधपुर

    सरदार इन्फैण्ट्री-

    1. सै. ले. गुलाबसिंह

    फोर्ट्स गार्ड-

    1. सै. ले. मगनसिंह

    ऑनरेरी रैन्क्स-

    1. ले. क. मेजर ज्यॉफ गोडविन

    2. मेजर मि. उमाशंकर गौड़

    गार्डन सुपरिन्टेण्डेण्ट को पदोन्नति-

    31 मार्च 1949 को ऑफीशियेटिंग सुपरिन्टेण्डेण्ट गार्डन्स एण्ड जू खींवराज को पदोन्नति देकर अधीक्षक के पद पर 250-15-400 के वेतमान में नियुक्त किया गया।

    कस्टम में छूट-

    4 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने राज्य में जिन लोगों को कस्टम ड्यूटी में छूट दे रखी थी, वह वापस ले ली किंतु यह छूट जोधपुर महाराजा तथा राजपरिवार के निम्नलिखित सदस्यों के लिये पूर्ववत् जारी रखी गयी-

    1. हिज हाइनेस द महाराजा साहिब बहादुर

    2. महाराजाधिराज श्री सर अजीतसिंहजी साहिब

    3. महाराज श्री हिम्मतसिंहजी साहिब

    4. महाराज श्री हरिसिंहजी साहिब

    5. महाराज श्री देवीसिंहजी साहिब

    6. महाराज दलीपसिंहजी साहिब

    राज्य कर्मचारी एवं रेलवे कर्मचारियों को भूखण्ड-

    4 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने जोधपुर राज्य के कर्मचारियों एवं जोधपुर रेलवे के कर्मचारियों को मसूरिया में भूखण्ड दिये गये जिसकी दर आधा रुपया प्रति वर्गगज निर्धारित की गयी।

    राजस्थान में सम्मिलित होने के बाद मानद रैंक का वितरण-

    5 अप्रेल 1949 को महाराजा जोधपुर ने अपने खान, बरकतउल्लाखां को मेजर का मानद रैंक प्रदान किया। यह अधिकारी नई दिल्ली में जोधपुर राज्य का प्रतिनिधि था।

    महाराजा के भाई को सेना में नियुक्ति-

    6 अप्रेल 1949 को जोधपुर महाराजा द्वारा अपने भाई महाराज हरिसिंह को जोधपुर स्टेट फोर्सेज में सैकेण्ड लेफ्टीनेंट नियुक्त किया गया। उन्हें नियमित आधार पर नियुक्ति दी गयी जो कि 1 दिसम्बर 1947 से प्रभावी मानी गयी। उनका वेतन जोधपुर लांसर्स से दिये जाने की व्यवस्था की गयी।


    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


     


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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास का आधुनिक चरण

     08.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास का आधुनिक चरण

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 59

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास का आधुनिक चरण

    औद्योगिक विकास की धुरी नीमराणा

    1. प्रश्नः नीमराणा कहाँ स्थित है?

    उत्तरः अलवर जिले में, राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर दिल्ली से 122 किमी दूर।

    2. प्रश्नः किस कारण से यह निकट भविष्य में राज्य में औद्योगिक विकास की धुरी बनेगा?

    उत्तरः दिल्ली मुम्बई इण्डस्ट्रियल कॉरीडोर और दिल्ली मुम्बई फ्रेट रेल गलियारे का हिस्सा होने से यह क्षेत्र निकट भविष्य में देश का सबसे बड़ा ऑटो हब बनेगा तथा देश के सबसे बड़े बाजार दिल्ली का निकटतम केन्द्र स्थल भी होगा।

    3. प्रश्नः राज्य में जापानी जोन कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः मजराकाठ (नीमराणा), जिला अलवर

    4. प्रश्नः रीको एवं जैट्रो के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर कब किए गए?

    उत्तरः पहली बार 21 जुलाई 2006 को एमओयू हस्ताक्षरित हुआ तथा इसे 19 जुलाई 2008 को एवं अगस्त 2009 में पुनः विस्तारित किया गया।

    5. प्रश्नः जैट्रो का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः जापान एक्सटर्नल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (जेईटीआरओ)

    6. प्रश्नः जापानी जोन कितने एकड़ में फैला है?

    उत्तरः 1200 एकड़ में

    7. प्रश्नः जापानी जोन में किस देश के उद्यमियों ने औद्योगिक इकाइयाँ लगाई हैं?

    उत्तरः जापान।

    8. प्रश्नः ईपीआईपी का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्क (एक्सपोर्ट प्रोमोशन इण्डस्ट्रीयल पार्क)।

    9. प्रश्नः ईपीआईपी कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः नीमाराणा।

    10. प्रश्नः उद्यमियों की सुविधा के लिये राज्य में कन्वेंशन सेंटर कहाँ खोला जायेगा?

    उत्तरः नीमराणा औद्योगिक क्षेत्र में।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2012, सुमेलित कीजिये- पार्क: (अ.) स्टोन पार्क, (ब.) बायोटैक्नोलोजी पार्क, (स.) सूचना तकनीक पार्क, (द.) जापानीज पार्क; जिले: (1.) नीमराना अलवर, (2.) जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, (3.) सीतापुरा जयपुर, (4.) धौलपुर एवं करौली ।

    2 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2010, राजस्थान औद्योगिक विकास एवं विनियोजन निगम (रीको) ने एक जापानी कम्पनी से नीमराणा औद्योगिक क्षेत्र में जापानी इकाईयां स्थापित करने के लिये एमओयू हस्ताक्षरित किया है, वह जापानी कम्पनी है- अ. जैट्रो, ब. हैट्रो, स. होण्ड सिआल, द. मित्सुबीसी?

    3  राजस्थान में स्थापित होने वाले नवीन उद्योग क्षेत्र


    11. प्रश्नः दक्षिण कोरियाई कम्पनियों की स्थापना के लिये विशेष औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कहाँ की जायेगी?

    उत्तरः गिलोठ में।

    12. प्रश्नः राज्य का पहला एग्रो ट्रेड टावर कहाँ बनेगा?

    उत्तरः श्रीगंगानगर।

    13. प्रश्नः इलेक्ट्रोनिक मैन्यूफक्चरिंग क्लस्टर एवं ऑटो जोन कहाँ बनेगा?

    उत्तरः अलवर।

    14. प्रश्नः दवा निर्माण जोन की स्थापना कहाँ हो रही है?

    उत्तरः उदयपुर।

    15. प्रश्नः रेल नीर प्लांट कहाँ लगाया जायेगा?

    उत्तरः कोटा।

    16. प्रश्नः रेलवे का विद्युत लोको शेड कहाँ खुलने की संभावना है?

    उत्तरः कोटा।

    17. प्रश्नः अमरीकी कम्पनी किस जिले में रेल वैगन कारखाना स्थापित करेगी?

    उत्तरः अलवर।

    18. प्रश्नः राज्य मेन लाइन इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट (मेमू) के निर्माण हेतु फैक्ट्री कहाँ लगेगी?

    उत्तरः भीलवाड़ा जिले में रूपाहेली रेलवे स्टेशन के पास। प्रमुख राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

    19. प्रश्न - राज्य में कौनसी प्रमुख राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने कारखाने लगा रही हैं?

    उत्तरः जापानी बहुराष्ट्रीय कम्पनी होन्डा कार ने राज्य में 2,681 करोड़ रुपये का निवेश करके कार निर्माण इकाई लगाई है। इस कारखाने से 1.20 लाख कारें प्रतिवर्ष बनेंगी। चम्बल फर्टिलाजर्स 4,500 करोड़ रुपये का निवेश करके अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 13 लाख एम.टी. प्रतिवर्ष करने जा रही है। फ्रांस की बहुराष्ट्रीय कम्पनी लाफार्ज इण्डिया ने चित्तौड़ में सीमेण्ट प्लाण्ट स्थापित किया है जिस पर 1000 करोड़ रुपये का निवेश किया है। कुल निवेश 1600 करोड़ रुपये होना प्रस्तावित है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 2.6 एम. टी. सीमेण्ट प्रतिवर्ष है। जापानी बहुराष्ट्रीय कम्पनी विश्व की सबसे बड़ी मोटर साइकिल निर्माताओं में से है, इसने 1100 करोड़ रुपये का निवेश करके मोटर साइकिल कारखाना स्थापित किया है। इस कारखाने से 12 लाख दो पहिया वाहन प्रतिवर्ष बनेंगे। फ्रांस की फोर्चून 500 कम्पनियों में से एक सेन्ट गोबेन इण्डिया ने राज्य में 865 करोड़ रुपये का निवेश करके सबसे बड़ी फ्लोट ग्लास कम्पनी लगाई है। कुल निवेश 1000 करोड़ रुपये होना अनुमानित है। विश्व की सबसे बड़ी मोटर साइकिल निर्माता कम्पनियों में से एक हीरो मोटो कॉर्प ने नीमराणा में दुपहिया वाहन निर्माण इकाई एवं ग्लोबल पार्टस सेण्टर की स्थापना की है। कम्पनी द्वारा 555 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। कुल निवेश 900 करोड़ रुपये होना अनुमानित है। इस कारखाने में प्रतिवर्ष 7.5 लाख मोटर साइकिलें बनेंगी। भारत में ऑटोमोबाइल क्षेत्र की अग्रणी कम्पनी ऑयशर मोटर्स, अमरीका की पॉलारिस इण्डस्ट्रीज के साथ राजस्थान में फोर व्हीलर्स का एक संयुक्त उपक्रम स्थापित कर रही है जिस पर अब तक 24 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है तथा कुल निवेश 500 करोड़ रुपये होना प्रस्तावित है। यहाँ से 60,000 पर्सनल फोर व्हीलर्स प्रतिवर्ष उत्पादित होंगे। जर्मन बहुराष्ट्रीय इंजीनियरिंग एवं ऑटो कम्पोनेण्ट निर्माता कम्पनी का चौथा संयंत्र जयपुर में स्थापित है। कम्पनी इसकी वी. ई. इन्जेक्शन पम्प क्षमता एवं कम्पोनेन्ट उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही है। इस कार्य पर 225 करोड़ रुपये का निवेश होगा तथा कम्पनी की पम्प उत्पादन क्षमता 5.5 लाख पम्प प्रतिवर्ष हो जायेगी। पर्टो कम्पनी द्वारा राज्य में ऑटोमेटेड टेलर मशीन (एटीएम) तथा कैश डिस्पेंसर मशीन (सीडीएम) एवं अन्य उत्पादों के लिये इकाई स्थापित की जा रही है। इस पर 145 करोड़ रुपये निवेश होना अनुमानित है। राज्य में ऑत्सुका केमिकल्स, साउथ एशिया ब्रेवरीज, टाटा ब्ल्यूस्कॉप स्टील, कपारो फास्टनर्स, जैनपैक्ट इत्यादि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने निवेश किया है। राज्य के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में कई बड़ी निवेशकर्ता कम्पनियों यथा- रोजनबर्ग (खुशखेड़ा), यू बी ग्रुप (चौपांकी), लार्फाज इण्डिया लि.(खुशखेड़ा), इन्फोसिस (सीतापुरा), रीवोना इण्डस्ट्रीज (जोधपुर), हेवल्स इण्डिया (नीमराना), श्री सीमेन्ट लिमिटेड (खुशखेड़ा), ई.आई.डी. पैरी (अलवर), इत्यादि द्वारा निवेश किया गया है। कई अन्य बड़ी निवेशकर्ता कंपनियों यथा श्रीराम पिस्टन, मदरसंस, सूसी, टी.पी.एस. इन्फ्रास्ट्रक्चर, सनबीम कास्टिंग, क्लच ऑटो, वी.के. पोलीकोट््स इत्यादि द्वारा राज्य में निवेश किया जा रहा है। रीगन पॉवर टैक, रैमको, मंगलम् सीमेंट, ट्राइटोकाइ, वण्डर सीमेंट, हिताची कैमीकल, कैडिला फार्मेस्यिूटिकल्स, हिन्दवेयर, इनोक्स एयर प्रोडक्ट्स लि. टोयोटा किर्लोस्कर मोटर, डाइकिन, डाइनिशी, मित्सुई कैमीकल्स, बेल्टैक्नो, इमासेन, माइटेक्स पॉलिमर्स, टोयोडा गोसी, निपोन एक्सप्रेस, टीपीआर आदि कम्पनियों ने भी अपनी इकाइयाँ लगाई हैं। होण्डा कम्पनी

    20. प्रश्न - राज्य में होण्डा मोटर साइकिल एवं स्कूटर कहाँ बनेंगे?

    उत्तर - अलवर के खुशखेड़ा रीको औद्योगिक क्षेत्र में जापनी कम्पनी होण्डा मोटरसाइकिल्स एण्ड स्कूटर्स इण्डिया के टू व्हीलर्स प्लांट की स्थापना की गई है। इस प्लाण्ट में सालाना 6 से 12 लाख तक मोटरसाइकिल एवं स्कूटर बनेंगे। इसमें 3,000 लोगों को प्रत्यक्ष तथा 10,000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। इसमें 1,100 करोड़ रुपये का निवेश होगा। इसके निर्माण पर 1,001 करोड़ रुपये की लागत आयेगी।

    21. प्रश्न - राज्य में होण्डा कार निर्माण कारखाना कहाँ जगाया जा रहा है?

    उत्तर - 24 फरवरी 2014 से अलवर जिले के टपूकड़ा में होण्डा कार निर्माण कारखान आरम्भ किया। यहाँ कारों के साथ-साथ स्पेयर पाटस भी बनाये जा रहे हैं। इस कारखाने में होण्डा समूह और इसकी सहायक इकाइयों ने 6452 करोड़ रुपये का निवेश किया है तथा लगभग 14 हजार लोगों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराया है।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2010, एक कार कम्पनी को कारें बनाने के लिये खुशखेड़ा (भिवाड़ी) में 600 एकड़ भूमि आवंटित की गई है, यह कम्पनी है- अ. फोर्ड, ब. टोयाटा, स. होण्डा सिआल, द. वोल्कसवेगन? सेंट गोबेन ग्लास कम्पनी


    22. प्रश्नः सेंट गोबेन ग्लास कम्पनी के एशिया के सबसे बड़े ग्लास प्लांट की स्थापना कहाँ की गई है?

    उत्तरः भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र, अलवर।

    23. प्रश्नः सेंट गोबेन ग्लास कम्पनी की उत्पादन क्षमता कितनी है?

    उत्तरः इसमें प्रतिदिन 1000 टन फ्लोटिंग ग्लास का उत्पादन हो सकता है। प्रतिवर्ष 3 लाख टन फ्लोट ग्लास का उत्पादन होगा।

    24. प्रश्नः सेंट गोबेन ग्लास कम्पनी द्वारा स्थापित इस ग्लास प्लांट की क्या विशेषता है?

    उत्तरः यह राज्य में लगने वाला पहला रोबोटिक प्लाण्ट है। इसमें 60 गुणा 20 फुट आकार तक बड़े ग्लास बनाए जा सकते हैं।

    25. प्रश्नः सेंट गोबेन ग्लास कम्पनी द्वारा स्थापित इस ग्लास प्लांट में कितना निवेश हुआ है?

    उत्तरः न्यूनतम ऊर्जा खपत वाले इस प्लाण्ट में कम्पनी ने 1000 करोड़ रुपये का निवेश किया है।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए

    प्रश्न 1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2010, भिवाड़ी का कहरानी अभी हाल खबरों में रहा- (अ.) सेन्ट गोबेन ग्लास फैक्ट्री के कारण, (ब.) दिव्या फार्मसी के कारण, (स.) टोयाटा मोटर्स के कारण, (द.) राजीव गांधी ग्रामीण एल.पी.जी. वितरण योजना के कारण? राज्य में क्लस्टर्स


    26. प्रश्नः राज्य में कोटा डोरिया क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः कोटा।

    27. प्रश्नः राज्य में ऑटो कम्पोनेंट क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः अलवर।

    28. प्रश्नः राज्य में हाथकरघा क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः राजपुरा-पातलवास, जयपुर।

    29. प्रश्नः राज्य में पीतल के बर्तन पर नक्काशी क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः बालाहेड़ी, दौसा।

    30. प्रश्नः राज्य में मार्बल क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः छितौली, जयपुर।

    31. प्रश्नः राज्य में सैण्डस्टोन क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः पीचूपाड़ा, दौसा।

    32. प्रश्नः राज्य में पॉटरी एवं टेराकोटा क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः गोगुंदा-ऋषभदेव, उदयपुर।

    33. प्रश्नः राज्य में हैण्ड ब्लॉक पिक्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः बगरू, जयपुर।

    34. प्रश्नः राज्य में चर्म क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः किशनगढ़-रेनवाल, जयपुर।

    35. प्रश्नः राज्य में कशीदाकारी व हस्तशिल्प क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः चौहटन, बाड़मेर।

    36. प्रश्नः राज्य में कशीदाकारी एवं हस्तशिल्प क्लस्टर कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः शिव, बाड़मेर। मेगा क्लस्टर

    37. प्रश्नः राज्य में कौनसा मेगा क्लस्टर स्थापित किया जा रहा है?

    उत्तरः हस्तशिल्प निर्यात को प्रोत्साहन देने हेतु जोधपुर में हैण्डीक्राफ्ट मेगा क्लस्टर स्थापित किया जा रहा है।

    38. प्रश्नः यह देश का कौनसा मेगा क्लस्टर होगा?

    उत्तरः तीसरा।

    39. प्रश्नः जोधपुर से कितना निर्यात किया जाता है?

    उत्तरः जोधपुर से 3000 निर्यातकों द्वारा प्रतिवर्ष 1200 करोड़ रुपये का निर्यात किया जाता है।

    40. प्रश्नः हैण्डीक्राफ्ट मेगा क्लस्टर जोधपुर में क्या सुविधाएं विकसित की जा रही हैं?

    उत्तरः मार्केटिंग प्रोमोशन सेंटर, ट्रेड प्रमोशन सेंटर, रॉ मैटेरियल बैंक, फैसिलिटी सेंटर फॉर इण्डिविजुअल एक्सपोर्टर्स, डिजाइन डिवलपमेंट एण्ड इनोवेशन सेंटर, कम्यूनिटी प्रॉडक्शन सेंटर फॉर आर्टिजनस, स्किल डिवलपमेंट सेंटर। स्टोन पार्क

    41. प्रश्नः राज्य में स्टोन पार्क कहाँ-कहाँ हैं?

    उत्तरः (1.) विशनोदा, जिला धौलपुर (2.) मण्डोर, जिला जोधपुर। एसईजेड (सेज)

    42. प्रश्नः एसईजेड (सेज) का पूरा नाम क्या है?

    उत्तरः स्पेशल इकॉनोमिक जोन।

    43. प्रश्नः भारत सरकार की किस नीति के तहत प्रदेशमें स्पेशल इकॉनोमिक जोन स्थापित हुए?

    उत्तरः भारत सरकार की आयात-निर्यात नीति 1997-2002 के तहत

    44. प्रश्नः राज्य में कितने एसईजेड स्थापित किये गये हैं?

    उत्तरः 6 सेज स्थापित किये गये हैं जिनमें से 4 सेज ऑपरेशनल हैं।

    45. प्रश्नः रीको द्वारा कितने सेज स्थापित किये गये हैं?

    उत्तरः (1.) जैम्स एण्ड ज्वैलरी सेज-1 सीतापुरा जयपुर, (2.) जैम्स एण्ड ज्वैलरी सेज-2 सीतापुरा जयपुर, (3.) हैण्डीक्राफ्ट सेज बोरानाडा जोधपुर।

    46. प्रश्नः महेन्द्रा गु्रप द्वारा कितने सेज स्थापित किये गये हैं?

    उत्तरः (1.) महेन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर- आईटी, आईटीई। (2.) महेन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर-इंजीनियरिंग एण्ड रिलेटेड आइटम्स। (3.) महेन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर- हैण्डीक्राफ्ट।

    47. प्रश्नः उपरोक्त चार सेज के अतिरिक्त राज्य में और कितने सेज नोटिफाइड किये गये हैं?

    उत्तरः 4 इन्टीग्रेटेड टैक्सटाइल पार्क

    48. प्रश्नः राज्य में इन्टीग्रेटेड टैक्सटाइल पार्कों की स्थापना कहाँ की जा रही है?

    उत्तरः भारत सरकार की एस.आई.टी.पी. योजना के तहत सिलोरा (किशनगढ़) में दो इन्टीग्रेटेड टैक्सटाइल पार्कों की स्थापना की जा रही है।


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  • सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी हैरत में पड़ गए

     02.06.2020
    सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी हैरत में पड़ गए

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जोधपुर राज्य के इतिहास में सर प्रतापसिंह महत्वपूर्ण व्यक्ति हुआ है। वह राजा तखतसिंह की रानी राणावतजी का दूसरा पुत्र था। पहला पुत्र जसवन्तसिंह था जो तखतसिंह के बाद जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठा। जब जसवंतसिंह के दीवान फैजुल्लाखां ने जोधपुर राज्य में अव्यवस्था फैला दी तब ई.1878 में जसवन्तसिंह ने प्रतापसिंह को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। प्रतापसिंह ने जोधपुर राज्य का आधुनिक पद्धति से संचालन किया। उसके हाथों जोधपुर राज्य की बड़ी उन्नति हुई।

    ई.1887 में रानी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूरे होने पर लंदन में स्वर्ण जयंती समारोह मनाया गया। इस अवसर पर महाराजा जसवन्तसिंह ने सर प्रताप को महाराजधिराज की उपाधि देकर अपने प्रतिनिधि के रूप में लन्दन भेजा। प्रतापसिंह राजपूत राजाओं में पहला व्यक्ति था जिसने बम्बई से यूरोप तक जहाज में बैठकर यात्रा की। उसे अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी किंतु महारानी विक्टोरिया के सवालों का जवाब देने के लिये उसने समुद्री यात्रा के दौरान थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीखी।

    जब वह रानी की सेवा में उपस्थित हुआ तो उसने अपनी तलवार रानी के पैरों में रख दी और अंग्रेजी तरीके से रानी का हाथ पकड़कर चूम लिया। इसके बाद उसने अचानक ही रानी का हाथ अपनी आंखों पर रख लिया। सर प्रताप की चेष्टायें देख कर फिरंगी लोग हैरत में पड़ गये। सर प्रताप ने बताया कि मैंने अपनी आंखों से रानी के हाथ साफ किये हैं। प्रिंस ऑफ वेल्स ने प्रसन्न होकर सर प्रताप को अपना अंगरक्षक बनाया। एक दिन अचानक ही रानी ने एक भोजन के दौरान सर प्रताप का नाम पुकारा। प्रताप इस बुलवाई से भौंचक्का रह गया। उस समय उसके पास रानी को देने के लिये कोई उपहार नहीं था इसलिये उसने अपने पगड़ी का सिरपेश खींचकर रानी के हाथों में रख दिया। रानी इस हिन्दुस्तानी अदा पर रीझ कर मुस्कुराई और उसने इस उपहार को स्वीकार कर लिया।

    कुछ दिन बाद जब रानी एक शाही भोज में उपस्थित हुई तो उसने सर प्रताप की पगड़ी का सिरपेश अपनी पोशाक पर हृदय के पास धारण कर रखा था। रानी ने प्रताप को बुलाकर कहा कि आपने हृदय से भेंट दी है इसलिये मैंने हृदय के पास ही उसे धारण किया है।

    रानी विक्टोरिया के शासन काल के 50 वर्ष पूरे होने पर प्रतापसिंह ने राईका बाग रेल्वे स्टेषन के पास जुबली कोर्ट का निर्माण करवाया। इसके निर्माण में अंग्रेजी इन्जीनियर डब्लू, होम की सेवायें ली गईं। यह 1886 ई.में बनना आरंभ होकर ई.1897 में तैयार हुआ। इस भवन के निर्माण पर 4 लाख रूपये खर्च हुए। अब संभागीय आयुक्त, जिला क्लेक्टर, पुलिस उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक से लेकर अनेक महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय इसी परिसर में चलते हैं। जिस समय यह भवन बनाया गया था तब इसके बीचों-बीच महकमा खास बनाया गया था जहां से पूरे जोधपुर राज्य का प्रशासन एवं प्रबन्ध किया जाता था। इस परिसर में पिछवाड़े की तरफ उम्मेद उद्यान से लगते हुए जोधपुर हाई कोर्ट परिसर है। मुख्य इमारत की तीन पोलों में से बीच वाली पोल में प्रतापसिंह की आदमकद प्रतिमा लगी है।

    ई.1895 में राजा जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जब सरदारसिंह अल्पावस्था में ही राज्यारूढ़ हुआ तो राज्य प्रबन्धन हेतु रीजेन्सी कौन्सिल की स्थापना की गई जिसका अध्यक्ष प्रतापसिंह को बनाया गया। ई.1909 में जंगी लाट (लॉर्ड) किचनर जोधपुर आया। उसे दिखाने के लिये मारवाड़ की हस्तकला की वस्तुएं एकत्र की गईं तथा उन्हें एक स्थान पर प्रदर्शित करने के लिये इण्डस्ट्रीयल म्यूजियम की स्थापना की गई। यह संग्रहालय अब सरदार संग्रहालय कहलाता है।

    ई.1910 में सरदारसिंह ने गिरदीकोट में घण्टाघर तथा सरदार मार्केट बनवाया। अपने पिता जसवन्तसिंह की स्मृति में उसने किले के नीचे जसवन्त थड़ा बनवाया। जब सरदारसिंह की मृत्यु हुई तो उसके जयेष्ठ राजकुमार सुमेरसिंह को 13 वर्ष की आयु में जोधपुर की गद्दी पर बैठाया गया तथा राज्य संचालन के लिये पुनः रीजेन्सी कौंसिल का गठन किया गया और प्रताप को उसका अध्यक्ष बनाया गया। सुमेरसिंह मात्र 7 वर्ष शासन करके मृत्यु को प्राप्त हुआ। वह निःसंतान था इसलिये उसका छोटा भाई उम्मेदसिंह जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठा। वह भी अल्पवयस्क था अतः राज्य संचालन हेतु तीसरी बार रीजेन्सी कौंसिल बनाई गई और उसका अध्यक्ष भी सर प्रताप को बनाया गया। इस प्रकार जसवन्तसिंह, सरदारसिंह, सुमेरसिंह तथा उम्मेदसिंह के काल में (ई.1873 से लेकर ई.1922 तक) सर प्रताप ने जोधपुर राज्य का प्रधानमन्त्रित्व किया।

    आज जोधपुर जिस सुन्दर शहर के रूप में देखने को मिलता है वह बहुत कुछ प्रतापसिंह की ही देन है। ई.1897 में लन्दन में महारानी विक्टोरिया के शासन के 60 वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती महोत्सव आयोजित किया गया। इसमें भी सर प्रताप को भेजा गया। लंदन पहुंच कर सर प्रताप की टांग टूट गयी तथा प्लास्टर चढ़ाना पड़ा। प्रिंस ऑफ वेल्स ने सर प्रताप को अपना अंगरक्षक नियुक्त किया। सर प्रताप अपनी टूटी टांग लेकर ही प्रिंस के समक्ष उपस्थित हो गया। प्रिंस ने प्रतापसिंह को न केवल अपने पास कुर्सी पर बैठाया अपितु प्रताप की टूटी टांग रखने के अलग से एक कुर्सी मंगवाई। इस क्षण को स्मरण करते हुए सर प्रताप ने लिखा है कि एक जमाना वह भी था जब मुगल बादशाहों के सामने बड़े से बड़े राजा को खड़े रहना पड़ता था। किसी भी हालत में बैठने की अनुमति नहीं मिलती थी किंतु एक जमाना इन उदार अंग्रेजों का है जो राजाओं की टूटी हुई टांग के लिये अलग से कुर्सी रखतवाते हैं।

    प्रतापसिंह ने काबुल में अंग्रेजों की ओर से लड़ी गई लड़ाई में जोधपुर की सेना का नेतृत्व किया। इस युद्ध में वीरता प्रदर्शन के लिये प्रतापसिंह को 'आर्डर ऑंफ बाथ’ से सम्मानित किया गया। युद्ध की समाप्ति के बाद प्रतापसिंह की नियुक्ति दक्षिण अफ्रीका में की गई किन्तु अचानक ई.1897 में चीन के साथ युद्ध छिड़ गया। अतः प्रतापसिंह को चीन के मोर्चें पर भेजा गया। वहां भी प्रतापसिंह ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन किया। उसकी सेवा से संतुष्ट होकर अंग्रेज सरकार ने जोधपुर राज्य को चार तोपें भेंट कीं।

    मारवाड़ में विक्रम संवत 1956 (ई.1899) का भयंकर अकाल जो छपनिया के अकाल के नाम से जाना जाता है, प्रतापसिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में पड़ा। इस अकाल की भंयकरता का परिचय देते हुए कवि अमरदान लालस ने लिखा है-

    मांणस मुरधरिया मांणक सम मूंगा।

    कोड़ी-कोड़ी रा करिया श्रम सूंगा।

    डाढ़ी मूंछाळा डलिया 
    में  डुलिया।

    रलिया जायोड़ा गलियां में रूलिया।।

    आफत मोटी ने खोटी पळ आई।

    रोटी रोटी ने रैय्यत रोवाई।।


    अर्थात् मरूधरा के मनुष्य माणिक और मूंगा आदि रत्नों के समान महंगे थे। वे एक-एक कौड़ी का सस्ता परिश्रम करने लगे। गर्व युक्त दाढ़ी-मूंछों वाले टोकरियां उठाने लगे। महलों में पैदा हुए गलियों में भटकने लगे। यह आपत्ति का पल था जब जनता रोटी-रोटी को रोने लगी।

    ऐसी विपत्ति में महाराजा सरदारसिंह ने लाखों रूपये खर्च कर बाहर से अन्न मंगवाया तथा अंग्रेजी सरकार से कर्ज लेकर प्रजाहित के कार्य करवाये। इस अकाल के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। चान्दी के सिक्के ढलने बन्द हो गये। मुख्यतः ताम्बे और थोड़ी मात्रा में सोने के सिक्के ही ढाले जाने लगे।

    जब प्रतापसिंह चीन के मोर्चे पर था तब एक अंग्रेज अफसर ने उसे बताया कि भारत से आये एक अखबार में छपा है कि राजपूताने का एक राजा निस्संतान मर गया है। जब प्रतापसिंह ने नाम पूछा तो बताया गया कि वह ईडर का राजा था। इस पर प्रताप ने कहा कि ईडर राजपूताने में नहीं गुजरात में है, वह राजा मेरे ही कुल का था और अब मैं उस राज्य का अधिकारी हूँ। इस प्रकार ई.1902 में 56 वर्ष की आयु में प्रतापसिंह ईडर की गद्दी पर बैठा किंतु वह मरते दम तक जोधपुर राज्य को अपनी अनुपम सेवाएं देता रहा।

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  • पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिताः आजादी के पहले और आजादी के बाद

     02.06.2020
    पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिताः आजादी के पहले और आजादी के बाद

    पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिताः आजादी के पहले और आजादी के बाद 

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भारत में पत्रकारिता का आरंभ 1780 ईस्वी में अंग्रेजी समाचार पत्र बंगाल गजट अथवा कलकत्ता एडवर्टाइजर के साथ होता है। इस समाचार पत्र का आरंभ अंग्रेजी विद्वान जेम्स हिक्की ने इस घोषणा के साथ किया था कि वह-‘मस्तिष्क और आत्मा की स्वाधीनता के लिए अपनी देह को कठोर श्रम करने के लिए दास्य भाव से समर्पित करने में आनन्द का अनुभव कर रहा है।’ यह पत्र तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के साथ मुठभेड़ हो जाने के कारण मात्र 10 माह बाद बंद हो गया किन्तु इस पत्र ने यह निर्धारित कर दिया कि भविष्य के लिये भारत में पत्रकारिता की क्या दिशा होगी? इस पत्र के सम्पादक पर अस्सी हजार रूपये का जुर्माना धरा गया। हिक्की ने जुर्माना देने से मना कर दिया तो उसे जेल में डाल दिया गया। इस पर भी न तो कम्पनी सरकार और न बाद में ब्रिटिश सरकार पत्रों का प्रकाशित होना रोक पाई।


    अखबारों ने अपने जन्म के साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी की मांग की। शीघ्र ही यह मांग हिन्दुस्थान की आजादी की मांग में बदल गई। 1826 ईस्वी में हिन्दी का पहला समाचार पत्र उदन्त्त मार्तण्ड प्रकाशित हुआ। इस अखबार के संदपादक पंण्डित जुगल किशोर ने अपने पहले अंक में घोषणा की कि ‘यह हिंदुस्तानियों के हित के हेत चलाया गया है।’ इसके बाद बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी और हिन्दी के समाचार पत्रों की संख्या बढ़ती चली गई।

    राजस्थान में पत्रकारिता का प्रवेश-

    राजस्थान में पहला पत्र 1849 ईस्वी में भरतपुर से मजहरूल सरूर के नाम से प्रकाशित हुआ। यह द्विभाषी पत्र था तथा उर्दू और हिन्दी में छपता था। 1856 ईस्वी में जयपुर से हैडमास्टर कन्हैयालाल के सम्पादन में एक द्विभाषी पत्र रोजतुल तालीम अथवा राजपूताना अखबार प्रकाशित हुआ। इस पत्र के सम्पादक ने इसका उद्देश्य बताते समय यह लिखा कि इसमें राजपूताने की प्रमुख रियासतों के समाचार प्रकाशित किये जायेंगे। इन रियासतों में जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर के नाम भी लिखे थे। इस पत्र ने अपने संवाददाता भी नियुक्त किये थे। इस प्रकार इस अखबार के साथ ही पश्चिमी राजस्थान में पत्रकारिता का प्रवेश हो जाता है।

    पश्चिमी राजस्थान का पहला समाचार पत्र-

    पश्चिमी राजस्थान से प्रकाशित होने वाला पहला समाचार पत्र मारवाड़ गजट था। यह 1866 ईस्वी में जोधपुर से प्रकाशित हुआ। यह भी द्विभाषी समाचार पत्र था तथा आधा उर्दू में और आधा हिन्दी में प्रकाशित होता था। इसके पहले सम्पादक बाबू हीरालाल और दूसरे सम्पादक दरबार स्कूल के हैडमास्टर बाबू डोरीलाल उर्फ कृष्णानन्द थे। इस पत्र में मुख्यतः सरकारी आज्ञायें, विज्ञप्तियां और इश्तहार प्रकाशित होते थे। इसी वर्ष जोधपुर से मुहब-ए-मारवाड़ का राजकीय संरक्षण में प्रकाशन आरंभ हुआ। इस पत्र का हिन्दी अंश मरूधर मित्र के नाम से प्रकाशित होता था और इसमें दो कॉलमों में लेख, समाचार तथा सूचनायें प्रकाशित की जाती थीं।

    बाबू बालमुकुन्द गुप्त के अनुसार महाराजा तख्तसिंह के शासनकाल में मुसाहिब रावराजा मोतीसिंह की स्वीकृति से 1866 में जोधपुर से दो पत्र प्रकाशित किये गये। इनमें से पहले अखबार का नाम उर्दू में मुहिबे मारवाड़ और हिन्दी में मरूधर मित्र था। दूसरे अखबार का नाम मारवाड़ गजट था। मारवाड़ गजट में सरकारी सूचनाओं के साथ-साथ कांग्रेस की गतिविधियों पर टीका टिप्पणियां और राजनीतिक विषयों पर आलेख होते थे। इस पत्र के संपादक बाबू डोरी लाल के बारे में बालमुकुंद गुप्त ने लिखा है कि वे बरेली के कायस्थ थे और योग्य तथा स्वाभिमानी पुरुष थे। उनके रियासत छोड़कर जाने के बाद बाबू रामस्वरूप शमीम दरबार स्कूल के हैडमास्टर हुए तथा मारवाड़ गजट का प्रभार भी उन्हीं के हाथों में आ गया। उन दिनों रियासत का ध्यान अखबार की ओर विशेष न था। रियासत के सामान्य कामों की तरह ही इसे भी किया जाता था। इसमें रियासत के हाकिमों की बदली, तैनाती आदि की खबरें छपती थीं। बाकी अंश में कभी कोई एक आध लेख छप जाता था और रहे सहे हिन्दी उर्दू पत्रों से छांट कर खबरें भर दी जाती थीं।

    बाबू रामस्वरूपजी भी कायस्थ थे। वे अच्छे लिखने वाले और स्वाधीन प्रकृति के आदमी थे। एक संवाददाता ने रामस्वरूपजी को खबर भेजी कि रास के ठाकुर ने एक स्त्री को डाइन होने के संदेह में मार डाला। रामस्वरूपजी ने यह खबर मारवाड़ गजट में छाप दी। जब यह अखबार अंग्रेज अधिकारियों के हाथों में पहुंचा तो उन्होंने इस घटना की जांच करवाई। राज्य के अधिकारियों ने इस घटना के घटने से इंकार कर दिया लेकिन रामस्वरूपजी ने इसे सच प्रमाणित कर दिया। इससे रियासत की बड़ी बदनामी हुई और रामस्वरूपजी को निर्देश दिये गये कि आगे से ऐसी कोई खबर न छापें जिससे कोई विवाद उत्पन्न हो। इस पर नाराज होकर रामस्वरूपजी नौकरी और रियासत छोड़कर चले गये।

    इसके बाद भी दरबार सकूल के हैडमास्टर तथा शिक्षा विभाग के सुपरिन्टंेडेंट ही मारवाड़ गजट के प्रबंधक और संपादक होते रहे। दरबारी आज्ञाओं के सिवा महकमें खास जो बातें लिखने के लिये आज्ञा होती वह पिछले पन्ने पर लिख दी जाती थीं।


    1884 ईस्वी में जब राय बहादुर मुंशी हरदयाल सिंह मारवाड़ राज्य के सेक्रेटरी और मुसाहिब आला हुए तो उन्होंने मारवाड़ गजट को महकमें खास के अधीन करके पत्र की बहुत उन्नति की तथा उसे गवर्नमेंट गजट का नमूना बना दिया। हिन्दी काल में अंग्रजी दाखिल हुई तब तक पत्थर के छापे से काम चलता था। हरदयालसिंह के समय में हिन्दी और अंग्रेजी का टाइप मंगवाया गया।

    कई साल तक मारवाड़ गजट इतनी उत्तमता से निकला कि उसके कुछ लेख अंग्रेजी अखबारों में भी नकल होने लगे और कभी-कभी अवध अखबार में भी अनुवादित होकर छपने लगे। सैक्रेटरी कार्यालय के हैडक्लर्क बाबू हरिश्चन्द्र इसके प्रबंधकर्ता थे। 1894 ईस्वी में मुंशी हरदयाल सिंह के स्वर्गवास होने पर मारवाड़ गजट राव बहादुर पण्डित सुखदेव प्रसाद सीनियर मेम्बर महकमे खास के नियंत्रण में चला गया और उनके बहनोई पण्डित निरंजननाथ गजट के प्रबंधकर्ता बने। उन्हें कोई सम्पादकीय स्वाधीनता नहीं थी। जो भी सामग्री सम्पादकीय कालम के लिये महाराजा की ओर से मिलती उसे छाप दिया जाता।

    अब मारवाड़ गजट का पहला पृष्ठ अंग्रेजी में और शेष तीन पृष्ठ हिन्दी में होते थे। एक कालम उर्दू में और एक हिन्दी में छापने की सामग्री की व्यवस्था अब बन्द कर दी गई थी। गजट सरकारी अधिकारियों और विभागों को निःशुल्क और बाहर के लोगों को समूल्य दिया जाता था।


    बीकानेर से 1887 ईस्वी में बीकानेर राजपत्र का प्रकाशन हुआ। इस पत्र में उर्दू तथा हिन्दी में राज्य के संवाद, सूचनाएं, विज्ञप्तियां तथा विज्ञापन प्रकाशित होते थे।

    लोकधर्मी पत्रकारिता-

    1880 ईस्वी से 1890 ईस्वी के बीच पूरे राजस्थान में स्वामी दयानंदजी द्वारा चलाये गये आर्य समाज की शाखायें स्थापित हुईं। उनके आंदोलन में राजस्थान में वैचारिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। उन्होंने राजनीतिक चेतना के लिये धर्म और समाज सुधार को अस्त्र के रूप में काम लिया। उन्होंने स्वधर्म, स्वदेशी, स्वराज्य और स्वभाषा के चार सूत्र जनता को प्रदान किये। उनकी ख्याति सुनकर ईस्वी 1883 में जोधपुर नरेश जसवंत सिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री सर प्रताप ने स्वामी दयानंदजी को जोधपुर बुलाया। इस निस्पृही सन्यासी ने जोधपुर की जनता को झकझोर कर रख दिया। इस दौरान पूरे देश में चेतना का बिगुल बज चुका था। बंकिमचंद्र चटर्जी का आनन्दमठ प्रकाशित हो चुका था, वंदे मातरम् रचा जा चुका था और पूरे राष्ट्र में स्वतंत्रता प्राप्त करने की भावना जोर पकड़ती जा रही थी।

    वारेन हेस्टिंग्स के समय में सन्यासियों के आंदोलन ने पूरे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था और उन घटनाओं के समाचार भी अखबारों में छपने लगे थे। रेलगाड़ी के आगमन से लोगों का परस्पर मिलना-जुलना तीव्र गति से होने लगा था। तेजी से बदलते हुए राष्ट्रीय परिदृश्य का प्रभाव पत्रकारिता पर भी पड़ा और वह राजकीय नियंत्रण से मुक्ति पाकर जन-जन का स्वर बनने को आतुर होने लगी।


    आश्चर्य की बात यह थी कि प्रत्यक्ष रूप से जो क्षेत्र अंग्रेजों के संरक्षण में थे वहां के पत्र अपनी बात कहने के लिये अधिक स्वतंत्र थे जबकि देशी रजवाड़ों विशेषकर राजपूताना की रियासतों में अखबारों को अपनी बात कहने की जरा भी स्वतंत्रता नहीं थी। ब्रिटिश शासित प्रदेशों में समाचार पत्रों की शक्ति और प्रभाव ने राजस्थान में भी समाचार पत्रों की स्वाधीनता के लिये ललक पैदा कर दी। इसका शुभारंभ उदयपुर से 1881 में प्रकाशित विद्यार्थी सम्मिलित- ‘हश्चिन्द्र चन्द्रिका-मोहन चन्द्रिका’ में ‘‘स्वतन्त्रता तंत्र तंतु’’ शीर्षक से एक बड़ा प्रखर सम्पादकीय लिखने के साथ हुआ।

    इस सम्पादकीय में लिखा गया कि
    अंग्रेजी राज्यों के अखबारों को जितनी स्वतंत्रता प्राप्त है उतनी स्वतंत्रता देशी राजाओं के राज्य में प्राप्त नहीं है।

    बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने मारवाड़ गजट का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा- ‘‘समाचार पत्रों की स्वाधीनता न देने में पुराने विचार के उच्च कर्मचारी अवश्य ही कुछ भलाई समझते होंगे। अब वह समय नहीं है कि रियासतों के लोग पुराने विचारों पर अड़े बैठे रहें। अब समय आ गया है कि देशी रईस भी अपने अखबारों को स्वाधीनता दें और उनसे लाभ उठायें। देशी रियासतों में जो यह शिकायत सुनी जाती है कि जबर्दस्त मारे रोने न दे। इसको दूर कर देना चाहिये। अखबार कोई गनीम नहीं है कि स्वाधीन हेाकर रियासतों को हानि पहुंचाये वरंच यदि उसकी ठीक-ठीक सहायता की जाये और उसे उन्नत होने के लिये अवसर दिया जाये तो वह राज्य के एक बहुत ही काम की वस्तु बन सकता है। जब विदेशी सरकार इस देश की प्रजा को प्रेस की स्वाधीनता देती है तब देशी राजा-महाराजा अपनी देशी प्रजा को स्वाधीनता न दें यह कैसे दुःख की बात है? देशी रियासतों में कठिनाई यह है कि यदि साधारण प्रजा में से कोई प्रेस या अखबार जारी करना चाहे तो उसे आज्ञा नहीं मिलती। बहुत तरह के संदेह किये जाते हैं। जो लोग अखबार या प्रेस जारी करना चाहते हैं उन बेचारों की कभी यह इच्छा नहीं होती कि वह ऐसे काम करें जिनसे उन पर संदेह किया जाये। तथापि कोई उनकी इस इच्छा की ओर ध्यान नहीं देता। भगवान् जाने देशी रजवाड़ों की कब तक यह दशा रहेगी?

    राजस्थान के यशस्वी पत्रकार और भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जयनारायण व्यास के अनुसार इस धारा का सबसे पहला समाचारपत्र राजनूताना हैराल्ड था। यह अंग्रेजी भाषा में था और 1885 में अजमेर से प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक हनुमानसिंह थे जिन्होंने ए0जी0जी0 कर्नल पोलेट और जोधपुर के महाराजा सर प्रताप के विरुद्ध काफी आन्दोलन किया। प्रकटतः जागीरदारों द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त इस समाचार पत्र के 30 मार्च 1885 केे अंक में कर्नल पोलेट, तथा कुछ जागीरदारों के अत्याचारों और रिश्वत प्रकरण छापे गये। इसके बाद आजादी की मांग उत्तरोत्तर गति पकड़ती गयी। राजस्थान में बिजौलिया कृषक आंदोलन चला। मारवाड़ हितकारिणी सभा का गठन हुआ और उसके आंदोलन चले। 1923 ईस्वी में ब्यावर से ऋषि दत्त मेहता ने राजस्थान नाम से समाचार पत्र आरंभ किया। इसमें जयपुर, जोधपुर, मेवाड़, और बीकानेर रियासतों में संचालित जन आंदोलनों के बारे में प्रचुर सामग्री छपती थी।

    1928-29 ईस्वी में जब मारवाड़ हितकारिणी सभा की गतिविधियां जोरों पर थीं, सभा ने मारवाड़ राज्य लोक परिषद् का आयोजन करने का निश्चय किया किंतु सभा पर पाबंदी लगा दी गई। सभा ने 28 सितम्बर 1929 को राज्य व्यापी विरोधी दिवस मनाया गया। व्यासजी ने ‘तरूण राजस्थान’ में एक लेख लिखकर राज्य की आलोचना करते हुए लिखा कि जोधपुर के महाराजा उस सफेद बोतल की तरह हैं जिसमें असली सस्तु के रंग का पता चल जाता है। सर सुखदेव के दिनों में सुखदेव शाही के रंग दीखते थे और अब जो राव राजा नरपत हैं तो उसे नरपतशाही के रंग सामने आ रहे हैं। इस लेख के कारण व्यासजी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें 6 वर्ष की सजा हुई। तरूण राजस्थान के अनेक संपादकों को जेल जाना पड़ा किंतु इस समाचार पत्र ने अपनी आवाज को कभी न दबने दिया।

    जयनारायण व्यास ने तरूण राजस्थान के अनुभव के आधार पर 1935 ईस्वी में बम्बई से ‘अखंड भारत’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ किया। यद्यपि इसका प्रकाशन स्थल राजस्थान से बाहर था फिर भी इस पत्र ने मध्यभारत आर संपूर्ण राजस्थान की जनता पर बड़ा असर डाला। इस पत्र का उद्देश्य मध्यभारत और राजस्थान की जनता पर राजाओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों का भण्डाफोड़ कर उत्तरदायी शासन की दिशा में विभिन्न जन आंदोलनों को शक्ति प्रदान करना था।इस युग में दैनिक का संचालन करना लोहे के चने चबाने के समान था।अतः आर्थिक संकट के कारण शीघ्र ही इसका प्रकाशन बंद हो गया। व्यासजी ने 1937 ईस्वी में ब्यावर से ‘आगीवाण’ नामक पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ किया। यह राजस्थानी भाषा का प्रथम पाक्षिक था। इसके संपादक के रूप में बालकृष्ण उपाध्याय का नाम छपता था किन्तु व्यासजी ही इसके वास्तविक संपादक थे। इस पत्र में राजस्थान के विभिन्न भागों में हो रहे जन आंदोलनों की खबरें निडर होकर छापी जाती थीं।जागीरदारों के जुल्म, सामन्तों के दमन और अत्याचार तथा समाज में व्याप्त दुराचारों पर प्रचुर सामग्री होती थी। इसमें कहानियां, लेख तथा कविताओं को भी पर्याप्त स्थान दिया जाता था।इन रचनाओं की विषय वस्तु युग की मांग के अनुरूप समाज-सुधारों राष्ट्रीय विचारों और भावों से ओतप्रोत होती थी। आगीवाण के संपादकीय बड़े प्रखर होते थे।उनमें देशी रियासतों के शासकों को खुले आम चुनौती होती थी कि वे समय की गति को पहचानें और अपने आचरण में परिवर्तन करें। व्यासजी अधिकतर समय आंदोलन की गतिविधियों और जेलों में बिताते थे। इस उन्होंने 1939 ईस्वी में इस कार्य से मुक्ति ले ली। यह पत्र भी शीघ्र बंद हो गया।

    1890 ईस्वी में ‘प्रसिद्ध चित्रावली’ नामक समाचार पत्र जोधपुर से प्रकाशित हुआ। यह जीवनी साहित्य का अपने ढंग का अनूठा पत्र था।इसके मुख पृष्ठ पर इसका उद्देश्य इस प्रकार लिखा रहता था- ‘प्रसिद्ध चित्रावली, जिसमें जगद्विख्यात् महत्पुरुषों के चित्र और जीवन चरित्र प्रकाशित किये जायेंगे और जो महीने के महीने राजस्थान जोधपुर से प्रकट होगा।’

    यह पत्र दो कॉलम में छपता था। एक तरफ हिन्दी में और दूसरी तरफ उर्दू में सामग्री होती थी। इसका वार्षिक मूल्य डाक व्यय सहित अंग्रेजी सरकार और राजा-महाराजाओं से चार रुपये छै आने, हाकिमों, रईसों और अमीरों से तीन रुपये छै आने और विद्यार्थियों से दो रुपये लिया जाता था। इसमें विज्ञापनों की छपाई का शुल्क एक आना प्रति पंक्ति था। चन्दे आदि की सूचना के नीचे मुख पृष्ठ पर देवीप्रसाद का नाम छपा होता था। यद्यपि संपादक के नाम का कोई उल्लेख नहीं है तथापि अनुमान होता है कि इसके संपादक प्रसिद्ध इतिहासज्ञ मुंशी देवीप्रसादजी थे जो उस समय जोधपुर राज्य की सेवा में थे। उदयपुर के राजकीय संग्राहलय में ‘प्रसिद्ध चित्रावली’ के छठे अंक और उसके बाद के अंक उपलब्ध हुए हैं। छठे अंक पर जून अंकित है। इसमें राव बीकाजी के जीवन चरित्र की कुछ घटनाएं और बादशाह शेरशाह का सचित्र जीवन वृत्त प्रकाशित हुए हैं। शेरशाह का पूरे एक पृष्ठ का रेखा चित्र बनाया गया है। सितम्बर 1891 के अंक में अब्दुल रहीम खानखाना का जीवन वृत्त मय रेखाचित्र छपा है। इसमें कुछ ऐसी घटनायें भी वर्णित हैं जिनका सम्बंध राजस्थान से है। खानखाना की उदारता का वर्णन करते हुए मारवाड़ के जाडा मेहू चारण और उसकी काव्य प्रतिभा का उल्लेख किया गया है। जिस पर रीझ कर खानखाना ने तीन लाख रुपये दिये थे।

    इस पत्र की भाषा में उर्दू की प्रधानता थी। ऐतिहासिक विभूतियों के सचित्र जीवन चरित्रों के साथ-साथ राजनीति से दूर जन-सामान्य की रुचि के अनुकूल रोचक समाचार भी छपते थे। यह असंदिग्ध है कि इस पत्र को राजकीय संरक्षण पूरी तरह प्राप्त था। पत्र के फरवरी 1891 के अंक में प्रकाशित महाराव बूंदी का विवाह के लिए जोधपुर आगमन का समाचार बड़े विस्तार से प्रकाशित किया गया है। इसी अंक में रूस के राजकुमार की जोधपुर यात्रा का समाचार भी बड़े विस्तार और चित्रात्मक वर्णन के साथ प्रकाशित हुआ है।

    मिशनरी पत्रकारिता-

    स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये चलाये जा रहे आंदोलन में जनभागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से जो अखबार निकाले गये उन्हें मिशनरी पत्रकारिता के अंतर्गत लिया जाता है। यह समझ लेना आवश्यक है कि पश्चिमी राजस्थान की जनता ने न केवल अंग्रेजी राज्य से अपितु देशी राजाओं और जागाीरदारों से भी अपनी मुक्ति का आंदोलन चलाया। इस कारण देशी रियासतों में अखबार निकालने की अनुमति किसी निजी व्यक्ति को नहीं दी गई। अखबार केवल राजकीय नियंत्रण में और राज्य द्वारा ही निकाले गये। जबकि देसी रियासतों के मुकाबले में ब्रिटिश शासित क्षत्रों में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। अतः स्वतंत्रता सेनानियों ने अजमेर केा अपना केन्द्र बनाया और सर्वाधिक पत्र वहीं से निकाले।

    पश्चिमी राजस्थान के यशस्वी पत्रकारों ने भी अजमेर और ब्यावर से निकलने वाले अखबारों के माध्यम से ही मिशनरी पत्रकारिता का कार्य किया। 1920 ईस्वी में विजयसिंह पथिक के संपादकत्व में राजस्थान केसरी नामक पत्र निकला। पहले यह पत्र वर्धा से और बाद में अजमेर से निकला। इसके यशस्वी संपादकों में जैसलमेर के सागरमल गोपा भी रहे। इस पत्र ने अर्जुनलाल सेठी, विजयसिंह पथिक तथा केसरीसिंह बारहठ के संघर्षों को प्रमुखता से छापा।

    अंग्रेजी राज्य में अखबार निकालने की स्वतंत्रता होते हुए भी एक अखबार कुछ दिन ही एक नाम से चलाया जा सकता था और शीघ्र ही उस पर प्रतिबंध लग जाता था। इस कारण राजस्थान केसरी के बंद होने पर पथिक जी ने ‘राजस्थान संदेश’ निकाला। यह भी शीघ्र ही दमन का शिकार हो गया। 1921 ईस्वी में 
    कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन के बाद राजस्थान सेवा संघ की स्थापना हुई। 

    1922 ईस्वी में नवीन राजस्थान का प्रकाशन आरंभ हुआ। चूंकि नवीन राजस्थान ऐसी संस्था का मुखपत्र था जो अनेक रियासतों में अनेक सामूहिक आंदोलन चलाती थी, अतः राजस्थान में उसका प्रसार तेजी से हुआ। बिजोलिया आंदोलन को इस अखबार से बहुत ताकत मिली। नवीन राजस्थान में बेगूं के किसानों के आंदोलन और सिरोही के भीलों के आंदोलन को भी प्रमुखता दी गई।

    मेवाड़ में प्रताप, राजस्थान केसरी और नवीन राजस्थान पत्रों के आगमन पर रोक लगा दी गई। इस कारण इसके संचालकों ने इसी पत्र को नया नाम देकर तरुण राजस्थान के नाम से निकाला किंतु सरकारी दमन चलता रहा। संपादक शोभालाल गुप्त को सजा होने पर रामनारायण चौधरी और उनके बाद जयनारायण व्यास इसके संपादक बने और इसे ब्यावर से निकाला गया। उन्होंने अपने सहयोगी के रूप में जोधपुर के अचलेश्वर प्रसाद शर्मा को नियुक्त किया।

    1929 ईस्वी में तरुण राजस्थान में ‘सिरोही में रावण राज्य’ शीर्षक से एक ऐसा लेख छपा जिससे तूफान खड़ा हो गया। सिरोही का राजा इस लेख को पढ़ कर तिलमिला गया और उसने अपने निजी सचिव को बीमा का ऐजेण्ट बनाकर ब्यावर भेजा।निजी सचिव ने लेखक का नाम जानने के लिये कई हजार रुपये देने का प्रलोभन दिया किंतु व्यासजी ने उसके लेखक का नाम नहीं बताया। 1938 ईस्वी में अजमेर से नवजीवन नामक समाचार पत्र प्रकाशित होना आरंभ हुआ। इस पत्र ने भी राजस्थान के विभिन्न भागों 
    में राजाओं महाराजाओं और जागीरदारों के खिलाफ जन आंदोलनों का समर्थन किया तथा राष्ट्रीय विचारधारा के सृजनात्मक साहित्य केा प्रकाशित किया। इसके प्रवेशांक में मेवाड़ के प्रधानमन्त्री अलविदा, सिरोही जेल में राजबन्दियों के साथ दुर्व्यवहार कोटा में हाहाकार आदि शीर्षकों से समाचार प्रकाशित हुए। 6 जनवरी 1940 के अंक में प्रकाशित हुए ‘बीकानेर में अग्निकाण्ड’; ‘मेवाड़ के रिश्वतखोरों का भंडाफोड़’; ‘जोधपुर में सभाओं में पाबन्दी’ आदि समाचार भी विशेष उल्लेखनीय हैं।

    प्रजासेवक-

    प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी और अनुभवी पत्रकार अचलेश्वर प्रसाद शर्मा ने प्रजासेवक नामक साप्ताहिक का प्रकाशन आरंभ किया। इसका प्रारंभ जयनारायण व्यास की प्रेरणा से किया गया था। इसको निकालने का उद्देश्य मारवाड़ राज्य लोक परिषदृ के आन्दोलन को समर्थन देना था।कुछ ही समय में यह प्रांत का लोकप्रिय साप्ताहिक हो गया। निष्पक्ष समाचारों, बेबाक टिप्पणियों, तथा प्रामाणिक लेखों के बल पर इसने शीघ्र ही विशिष्ट पहचान बना ली।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यहां तक कि राजस्थान के निर्माण के बाद भी यह साप्ताहिक अन्य साप्ताहिकों की तुलना में अग्रणी बना रहा।

    अन्य पत्र-पत्रिकायें-

    1940 में जोधपुर से प्रकाशित गणेशचन्द्र जोशी मन्वन्तर का कल की दुनिया, 1944 ईस्वी में जोधपुर से प्रकाशित हरीश मन्नावत का नवयुग साप्ताहिक, आजादी के बाद जोधपुर से प्रकाशित रियासती, बीकानेर से प्रकाशित ललकार, बीकानेर से ही प्रकाशित लोकजीवन ने भी मिशनरी पत्रकारिता में अच्छी भूमिका निभाई।

    बीकानेर से श्री शम्भुदयाल सक्सेना के संपादन में प्रकाशित सेनानी श्री अम्बालाल माथुर के संपादकत्व में प्रकाशित गणराज्य, जोधपुर से बंशीधर पुरोहित के संपादकत्व में प्रकाशित ‘आग’ और ‘ज्वाला’ जयनाराण व्यास के सम्पादन में प्रकाशित लोकराज और उगमसी मोदी के ललकार के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही मिशनरी पत्रकारिता के उद्देश्य की प्राप्ति हो गई। इस युग की पत्रकारिता पर विचार करने से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिमी राजस्थान की भूमि से भले ही गिने चुने अखबार प्रकाशित हो सके किंतु पश्चिमी राजस्थान ने जयनारायण व्यास (जोधपुर), सागरमल गोपा, (जैसलमेर) अचलेश्वर प्रसाद शर्मा (जोधपुर) तथा बाबा नरसिंह दास (नागौर) जैसे यशस्वी पत्रकार प्रदान किये। इन्होंने न केवल हाथ में कलम पकड़ी अपितु देश की स्वतंत्रता के लिये स्वयं आंदोलन चलाये और जेल गये। यहां तक कि सागरमल गोपा को तो जैसलमेर का गुण्डा राज्य लिखने के लिये जेल में जिन्दा जला दिया गया। इस काल के अखबार निर्धन लोगों ने चलाये, राज्य का विरोध करने वालों ने चलाये इस कारण लगभग सभी अखबार अल्पायु सिद्ध हुए।

    बाबा नरसिंह दास ने प्रभात के 15 अंक के संपादकीय में लिखा- ‘जैसे सूर्य कभी कभी बादलों में छिप जाने के कारण दिखाई नहीं देता, उसी तरह प्रभात भी आपके सम्मुख नहीं रहा है और अपना कर्तव्य उसने नहीं निभाया है। ‘ . . . . . प्रभात सदा से ही स्वतन्त्र रहना चाहता रहा है और किसी का न बन कर रहना उसका निश्चय था। इससे वह आर्थिक क्षति का भार सहन नहीं सह सकता था। वह अर्थ का दास बनने से इन्कार करता रहा है। यही कारण है कि कभी-कभी उसका प्रकाशन बन्द हो जाया करता था। भूचाल के थपेड़ों से वह लड़खड़ा जाया करता था। आप जानते हैं कि प्रभात धन उपार्जन के लिये नहीं, बल्कि विपत्ति में आपकी सेवा करने के उद्देश्य से आया है। प्रभात का लक्ष्य राजस्थान की शक्तियों को एक सूत्र में बांध कर राजस्थानी जनता में फैले हुए अंधकार को दूर कर यहां के जनजीवन में जागृति, जीवन और स्वाभिमान की भावना विकसित करना था।’

    साहित्यिक पत्रकारिता-

    भारत में साहित्यक पत्रकारिता का शुभारंभ भारेतुन्दु बाबू हश्चिन्द्र के समय से हुआ लेकिन भारतेन्दु मात्र 35 वर्ष की आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हुए अतः उनके द्वारा आरंभ की गई चन्द्रिका शीघ्र ही बंद होगई। इस पत्रिका को राजस्थान में पुनः प्रारंभ किया गया। पश्चिमी राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता की पहली पत्रिका ‘हिन्दी साहित्य ग्रंथावली’ के नाम से 1910 ईस्वी में आबूरोड से आरंभ हुई।

    1938 में मारवाड़ निवासी ठाकुर ईश्वरदान आशिया और शुभकरण कविया ने गुजरात निवासी जेठी भाई देथा के सहयोग से काठियावाड़ रियासत के लीबड़ी गांव से चारण नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया।‘चारण’ त्रैमासिक पत्रिका थी तथा इसे अखिल भारतीय चारण सम्मेलन के तत्वावधान में निकाला गया था। यह जाति विशेष के सामाजिक समाचारों को प्रमुखता देने के उद्देश्य से निकाला गया था तथापि इसने स्तरीय साहित्यिक पत्र का रूप ले लिया और प्राचीन राजस्थानी के उन्नयन में इसने प्रमुख भूमिका निभाई।इस पत्र में कुछ अंश गुजराती में भी छपते थे। मध्ययुगीन ऐतिहासिक चारण साहित्य पर इसने विपुल सामग्री प्रकाशित की।इसने चारण समाज में व्याप्त अंधविश्वासों कुरीतियों और रूढ़ियों को भी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पश्चिमी राजस्थान से जो साहित्यिक पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हुए उनमें बीकानेर से नई चेतना, वातायन, जोधपुर से प्रेरणा, परम्परा, चर्चा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

    त्रैमासिक पत्रिका ‘वातायन’ 1961 ईस्वी में बीकानेर से हरीश भादानी और विश्वनाथ ने आरंभ की। इस पत्र के रंगमंचीय एकांकी नाटक विशेषंाक, गीत विशेषांक, उपन्यास विशेषांक और राजस्थान कथा यात्रा के बीस वर्ष विशेषांक साहित्य जगत् में काफी चर्चित रहे। 1974 में यह पत्रिका बंद हो गई। 1961 से ही ‘कवितायें’ नामक साहित्यिक पत्रिका आरंभ हुई। इसका संपादकीय कार्यालय जयपुर में तथा प्रबंधकीय कार्यालय जोधपुर में थे। इसके सम्पादक श्रीकृष्ण शर्मा तथा प्रबंध संपादक प्रेम भण्डारी थे। इस पत्रिका ने नई कविता और उसके कवियों को प्रकाश में लाने का कार्य किया। यह पत्रिका मात्र दो वर्ष चली।

    स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के पश्चिमी राजस्थान के मूर्धन्य पत्रकार-

    स्वाधीनता प्राप्ति से पहले के मूर्धन्य पत्रकारों में जयनारायण व्यास, अचलेश्वरप्रसाद मामा, सागरमल गोपा, बाबा नरसिंह प्रसाद आदि का उल्लेख इस पत्र में कई स्थान पर आया है किंतु पश्चिमी राजस्थान के कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जिन्होंने राजस्थान से बाहर रहकर राष्ट्रीय पत्रकारिता में उल्लेखनीय कार्य किया। इनमें बीकानेर के चिम्मनलाल गोस्वामी तथा सिरोही रियासत के रोहिड़ा गांव के गौरीशंकर हीरा चंद ओझा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चिम्मनलाल गोस्वामी ने गीताप्रेस गोरखपुर की पत्रिका कल्याण(हिन्दी) तथा कल्याण कल्पतरू(अंग्रेजी) के संपादन में विशेष योगदान किया।रामचति मानस, श्रीमद् भागवत पुराण और बाल्मिीकि रामायण आदि ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। गौरीशंकर ओझा ने नागरी प्रचारिणी सभा काशी की शोध पत्रिका नागरी-प्रचारिणी त्रैमासिकी का तेरह वर्ष तक संपादन किया।आपके लेख वीणा, माधुरी, सुधा, सरस्वती और त्याग भूमि आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुख स्थान पाते थे। ओझााजी ने प्राचीन भारतीय लिपिमाला तथा इतिहास की अनेक पुस्तकें लिखीं।

    व्यावसायिक पत्रकारिता-

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मिशनरी पत्रकारिता के स्थान पर व्यावसायिक पत्रकारिता की शुरूआत हुई किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं समझना चाहिये कि अब पत्रकारिता का उद्देश्य मात्र धन अर्जित करना अथवा जीविकोपार्जन का साधन बन कर रह जाना था। वस्तुतः मिशनरी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता रूपी जिस अमृत कलश की प्राप्ति की थी, उसकी सुरक्षा का भार इसी व्यावसायिक पत्रकारिता ने उठाया। राजनीतिक भ्रष्टाचार को नंगा करने, प्रशासकीय अहम को ललकार कर खण्डित करने और प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं का दुरुपयोग रोकने में इस काल की पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे इतनी लोकप्रियता और सम्मान प्राप्त हुआ कि इसे लोकतंत्र का चौथा पाया कहा जाने लगा। वस्तुतः इस युग की पत्रकारिता को 1952 के आम चुनावों के बाद से व्यावसायिक पत्रकारिता कहा जाने लगा।

    इन चुनावों में और इसके बाद वाले चुनावों में पत्रों ने राजनैतिक दलों के पक्ष अथवा विरोध में अपनी पसंद अथवा नापसंदगी को खुलकर व्यक्त किया। इस कारण इस युग की पत्रकारिता पर व्यावसायिक होने का आरोप लग गया और यह आरोप गलत भी नहीं है क्योंकि इस युग की पत्रकारिता या तो राजनेताओं के संरक्षण में पली-बढ़ी या फिर बड़े-बड़े व्यवसायियों ने बड़े-बड़े अखबार या तो स्थापित किये या खरीद लिये। जब-जब चुनाव आये तब-तब अखबारों की संख्या में वृद्धि हुई। श्रमजीवी पत्रकारिता का जन्म भी इसी व्यावसायिक पत्रकारिता में से हुआ है।

    पश्चिमी राजस्थान में आजादी के बाद भी कोई बड़ा समाचार पत्र स्थापित नहीं हो सका। दिल्ली, बम्बई, जयपुर तथा देश के अन्य नगरों से प्रकाशित होने वाले पत्रों ने इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ बनाई तथा इस क्षेत्र के समाचारों के संकलन के लिये अपने संवाददाता नियुक्त किये। इस बीच समाचार ऐजेंसियों ने भी अपने स्ट्रिंगरों तथा संवाददाताओं की नियुक्ति की। उससे भी इस क्षेत्र में पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। पश्चिमी राजथान से छोटे-छोटे दैनिक, साप्ताहिक और मासिक निकाले गये, इनमें से अधिकांश बंद भी होते चले गये।

    1950 में शंभूदयाल सक्सेना ने बीकानेर से साप्ताहिक समाचार पत्र सेनानी प्रकाशित किया। इसने पश्चिमी राजस्थान के साप्ताहिकों में अग्रणी स्थान प्राप्त किया। बीकानेर से ही 1952 में रामरतन कोचर ने गणराज्य नामक अखबार निकाला। चिरंजीव जोशी ‘सरोज’ के संपादकत्व में इस पत्र ने बहुत ख्याति अर्जित की। पांडेय बेचन शर्मा उग्र जैसे धुरन्धर पत्रकार इसके नियमित स्तंभ लेखकों में से थे। 1962 से यह पत्र जयपुर से निकलने लगा और बाद में बंद हो गया।

    1956 में जब कर्पूरचन्द्र कुलिश ने जयपुर से सांध्यकालीन दैनिक राजस्थान पत्रिका आरंभ किया तो जोधपुर के यशस्वी पत्रकार हरमलसिंह ने इस पत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में इस पत्र ने राजस्थान के अन्य बड़े नगरों की तरह जोधपुर और बीकानेर से भी अपने संस्करण आरंभ किये। इस पत्र ने बड़ी संख्या में पूरे राजस्थान में संवाददाता नियुक्त किये। अपने कार्यालय को जोधपुर तथा बीकानेर आदि से टेलिप्रिण्टर से जोड़ा।

    1966 में जयनारायण के पुत्र देवनारायण व्यास ने जोधपुर से तरुण राजस्थान का प्रकाशन आरंभ किया। उनके देहावसान के बाद उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी व्यास ने इसका संपादन और संचालन किया। चार पृष्ठों में प्रकाशित सामग्री में जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर, पाली आदि जिलों के समाचारों को प्रमुखता से छापा जाता था। इन्हीं जिलों में इसका प्रसार अधिक था। बाद में इस पत्र को जलते दीप वालों ने खरीद लिया।

    1966 में ही जोधपुर से माणक मेहता ने ‘जलते दीप’ का प्रकाशन आरंभ किया। 1967 से माणक चौपड़ा ने जोधपुर से ही ‘जनगण’ प्रारंभ किया। इन दोनों पत्रों ने पश्चिमी राजस्थान की राजनीतिक सामाजिक, साहित्यिक एवं सास्ंकृतिक गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। जलते दीप ने हाल ही में जयपुर से भी अपना प्रकाशन आरंभ किया है। इनके अलावा जोधपुर से प्रकाशित मारवाड़ टाइम्स, जोधपुर टाइम्स; बीकानेर से प्रकाशित लोकमत, कलम, तथा थार ज्योति आदि के नाम भी लिये जा सकते हैं।

    शोध पत्रिकायें-

    1961 में राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी (जोधपुर) से ‘परम्परा’ नामक त्रैमासिकी का प्रकाशन आरंभ हुआ। इस पत्रिका ने प्राचीन राजस्थानी साहित्य को प्रकाश में लाने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। इसका प्रत्येक अंक किसी न किसी विषय पर विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ। परम्परा के विशेषांकों में गोरा हटजा, राजस्थानी साहित्य का मध्यकाल, डिंगल कोष, जेठवा ऊजली, सूर्यमल मिश्रण आदि विशेष चर्चित रहे। बीकानेर से प्रकाशित राजस्थान भारती ने प्राचीन राजस्थानी के साहित्यिक वैभव को अन्वेषण और गंभीर अध्ययन में लगे विद्वानों के लिए सुलभ करने का सराहनीय कार्य किया है। इस पत्रिका के पृथ्वीराज राठौड़ अंक और लुई पी टैसीटोरी अंक बेहद चर्चित रहे। बोरूंदा से प्रकाशित वाणी औरा लोक संस्कृति और जोधपुर से प्रकाशित लोक साहित्य के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

    विविध विषयों का समावेश-

    व्यावसायिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता जगत के लिये विविध विषय प्रस्तुत किये। राजनैतिक समाचारों को प्रमुखता देने के साथ-साथ अपराध समाचारों पर भी विशेष ध्यान दिया गया। आजादी के बाद स्थापित किये गये जिला कार्यालयों द्वारा संचालित की जाने वाली प्रशासनिक गतिविध्यियों के समाचार भी अखबारों में सुर्खियां पाने लगे। सामाजिक पर्वों यथा गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस आदि भी समाचार पत्रों में विशेष स्थान लेने लगे।इस काल की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब शासकों के पारिवारिक समारोहों पर विशेष रिपोर्टें अथवा आंखों देखा हाल का विवरण छपने के स्थान पर उन समारोहों अथवा घटनाओं पर टिप्पणियां ही स्थान पाने लगीं। स्तुति का स्थान कटाक्षों और यहां तक कि निन्दाओं ने ले लिया।

    खेल समाचार, व्यापारिक गतिविधियों के समाचार, बाजार भाव, विभिन्न मण्डियों के समाचार, कृषि समाचार, स्वास्थ्य शिक्षा, सिने जगत आदि के समाचार भी अखबारों में निर्धारित स्तंभों अथवा पृष्ठों में नियमित सामग्री के रूप में छपने लगे। कुछ छोटी पत्रिकायें तो गौपालन, कृषि, ,व्यापार आयुर्वेद तथा अन्य विविध विषयों पर पश्चिमी राजस्थान के बड़े नगरों से लेकर छोटे कस्बों यहां तक कि गांवों तक से प्रकाशित हो रही हैं। पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद से पंचायती राज की गतिविधियों पर भी समाचार प्रकाशित होने लगे।

    कुछ अखबारों ने अपनी प्रसिद्धि और प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये चटपटी खबरों, प्रेमी युगलों के घर से भाग जाने की खबरों यौन अपराधों आदि को खूब बढ़ा-चढ़ा कर छापना शुरू किया। इस दौर के अखबारों में यह प्रवृत्ति भी पनपी कि ‘अखबार नहीं, अखबार के शीर्षक बिकते हैं।’ अतः चटपटे शीर्षक लिखे जाने लगे। भाषाई चमत्कार पर भी ध्यान दिया जाने लगा। समाचारों के साथ घटनाओं के फोटो भी विस्तार के साथ दिये जाने लगे। सिने तारिकाओं और सौंदर्य प्रतियोगिताओं के चित्रों से पाठकों को लुभाने की प्रवृत्ति भी इसी काल में पनपी।सामाजिक विद्रूपताओं प्रशासनिक असफलताओं और अव्यवस्थाओं के समाचारों को भी खूब चटपटा बनाया जाने लगा।

    बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिये विविध सामग्री के रूप में परिशिष्ट निकाले जाने लगे। हास्य, व्यंग्य, कविता, चुटुकले, महिलाओं के लिये विविध व्यंजन बनाने की जानकारी, सौंदर्य बढ़ाने स्वस्थ्य रहने, घर को सलीके से रखने, मेहमानों का स्वागत कैसे करें, बच्चों को स्कूल के लिये कैसे तैयार करें, अपने व्यक्तित्व को शालीन कैसे बनायें, घर को कैसे सजायें, चद्दर-मेजपोश कैसे काढें तथा उनके डिजायन आदि भी पत्रकारिता का विषय बन गये। रिपोर्टिंग के लिये सामान्य ढंग से घटनाओं का विवरण देने के अतिरिक्त, फीचर, सम्पादकीय, नियमित व्यंग्य स्तंभ आदि भी पत्रकारिता की विशिष्ट विधा के रूप में प्रतिष्ठि हो गये। महत्वपूर्ण खबरों को अलग से दिखाने के लिये बॉक्स बनाये जाने लगे तथा उनके नीचे शेडेड क्षेत्र बनाया जाने लगा।

    सामग्री संकलन की विधियां और तकनीकी क्रांति का उपयोग-

    व्यावसायिक पत्रकारिता में जैसे जैसे अखबारों की संख्या बढ़ती चली गई वैसे-वैसे समाचार सामग्री के संकलन के लिये भी नयी नयी विधियां अपनाई जाने लगीं। महत्वपूर्ण घटनाओं, दुर्घटनाओं व समारोहों आदि के कवरेज के लिये जीप, कार आदि निजी साधनों से अखबारों के संवाददाता व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर कवरेज करके उसे अपने कार्यालय तक पंहुचाने लगे। छोटी व अत्यंत महत्वपूर्ण खबरों को भेजने के लिये टेलिफोन सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरा।

    दैनिक अखबारों की मांग पूरी करने के लिये टेलिप्रिण्टरों का युग आया। जिनके माध्यम से समाचार एजेंसियां व संवाददाता अपने सदस्य अखबारों को कुछ ही घण्टों में समाचार भिजवाने लगे। जोधपुर, बीकानेर आदि नगरों में समाचार ऐजेंसियों ने अपने ब्यूरो प्रमुख तथा संवाददाता नियुक्त किये जो टेलिफोन, तार तथा टेलिप्रिण्टरों के माध्यम से अपने कार्यालयों तथा अखबारों को समाचार भिजवाते थे। वर्तमान में फैक्स तथा कम्प्यूटर चालित मॉर्डम से समाचार तथा चित्र प्रेषण का कार्य बहुत तीव्र गति से भेजना संभव हो गया है। इसके कारण सूचना क्षेेत्र में क्रांति ही आ गई है। हजारों किलोमीटर दूर बैठा हुआ संवाददाता अपना समाचार और घटना का चित्र कुछ ही मिनटों में अखबार के कार्यालय को भिजावा देता है।

    समाज अथवा जाति की पत्रिकाओं का विकास-

    वर्तमान युग की पत्रकारिता में जातीय आधारित सामाजिक पत्रिकायें भी बड़ी संख्या में निकलती हैं। जाट समाज, माली समाज, कायस्थ समाज, पुष्करणा ब्राम्हण समाज, राजपूत समाज, रावणा राजपूत समाज द्वारा पश्चिमी राजस्थान में बड़ी संख्या में मासिक आवृति से लेकर त्रैमासिक आवृति की पत्रिकायें निकाली जाती हैं।

    स्मारिकायें एवं अभिनंदन ग्रंथ-

    वर्तमान काल में स्मारिकाओं और अभिनंदन ग्रंथों का प्रकाशन भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण विधा है। महत्वपूर्ण समारोहों तथा आयोजनों के अवसर पर स्मारिकाओं का प्रकाशन किया जाता है। इसी प्रकार समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों पर अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित किये जाते हैं। इन दोनों ही प्रकार के ग्रंथों के माध्यम से अच्छी और विपुल सामग्री जनता के सामने आती है।

    टैक्नो हाउस मैगजीन-

    अस्सी के दशक में राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का प्रसार करने के लिये आंचलिक ग्रामीण बैकों की स्थापना की गई। प्रत्येक एक अथवा दो जिलों में एक आंचलिक बैंक खोला गया और उनके नीचे ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखायें खोली गईं। चूंकि ग्रामीण बैंकिंग एक नई अवधारणा थी और यह वाणिज्यिक बैंकों से काफी कुछ भिन्न थी इसलिये शाखा प्रबंधकों तथा अधीनस्थ कर्मचारियों तक ग्रामीण बैंकिंग की वास्तविक कार्य प्रणाली समझाने के लिये केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा गया और पत्रकारिता का सहारा लिया गया। लगभग सभी बैंकों ने टैक्नो हाउस मैगजीन प्रकाशित कीं।

    साक्षरता समाचार पत्र-

    राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा राज्य में सम्पूर्ण साक्षरता कार्यक्रम अलग-अलग जिलों को इकाई मान कर चलाया गया।चूंकि यह एक आंदोलन के रूप में चलाया गया जिसे निर्धारित अवधि में पूरा होजाना था इस कारण जनता में इस कार्यक्रम को आंदोलन का रूप देने के लिये पत्रकारिता का सहारा लेना अत्यंत आवश्यक समझा गया और प्रत्येक जिला मुख्यालय से साक्षराता समाचार पत्र विविध नामों से प्रकाशित किये गये। सामान्यतः इनकी प्रकाशन आवृति मासिक रखी गई।

    कर्मचारी रिपोर्टर-

    आजाद भारत में सरकारी कर्मचारियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। सरकारी नियमों को कर्मचारियों के अनुकूल बनाने तथा राज्य से अधिक वेतन, भत्ते और सुविधायें प्राप्त करने के उद्देश्य से कर्मचारियों के संगठन को मजबूत करने के लिये विगत पांच वर्षों से जालोर जिला मुख्यालय से कर्मचारी रिपोर्टर नामक द्वैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है। पश्चिमी राजस्थान की अपनी तरह की यह अकेली पत्रिका है।

    विद्यालय पत्रिकायें-

    अपने विद्यार्थियों में रचनात्मक चिंतन और क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से आजादी के बाद से विद्यालय पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ किया गया। आज भी बड़ी संख्या में विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों द्वारा वार्षिक अन्तराल पर पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित किये जा रहे हैं।

    प्रसारण पत्रकारिता-

    पश्चिमी राजस्थान में प्रसारण पत्रकारिता का आरंभ आकाशवाणी जोधपुर की स्थापना के साथ हुआ। बाद में बीकानेर, सूरतगढ़ और नागौर के केन्द्र भी खुले। आकाशवाणी जोधपुर ने प्रत्येक जिले में अपने संवाददाता नियुक्त कर रखे हैं ये संवाददाता आकाशवाणी के समाचार बुलेटिनों के लिये नियमित रूप से टैलिफोन और तार के माध्यम से अपनी रिपोटें भेजते हैं। जिले की चिठ्ठी भी इन्हीं संवाददाताओं के द्वारा भेजी जाती है जो आकाशवाणी जयपुर से हर माह प्रसारित की जाती है।

    सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की भागीदारी-

    अपने अस्तित्व में आने के बाद ही राजस्थान सरकार ने जनसम्पर्क विभाग की स्थापना की जो अब सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के नाम से जाना जाता है। इस विभाग ने जोधपुर, बीकानेर, नागौर, जालोर, सिरोही, बाड़मेर, जैसलमेर तथा पाली जिला मुख्यालयों पर सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय स्थापित किये। ये कार्यालय समाचार पत्रों को सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी विभागों की नीतियों और उनके द्वारा जनता के लिये किये जा रहे कार्यों तथा अर्जित उपलब्धियों के समाचार प्रेसविज्ञप्ति के रूप में उपलब्ध करवाते हैं। वर्तमान समय में इन कार्यालयों ने बहुत ही मजबूत भूमिका प्राप्त कर ली है। इन कार्यालयों द्वारा पत्रकारों को सरकारी प्रेसविज्ञप्ति उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त अन्य सुविधायें भी उपलब्ध करवाई जाती हैं।जब भी कोई मंत्री,राजकीय अतिथि अथवा विशिष्ट व्यक्ति जिले में आते हैं तो पत्रकारों को समारोह स्थ्ल तक लाने-लेजाने की व्यवस्था भी जनसम्पर्क कार्यालयों द्वारा की जाती है। आज के अखबारों में न्यूनाधिक पचास प्रतिशत प्रेस सामग्री जनसम्पर्क कार्यालयों द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। प्रेस का सम्बंध शासन के साथ बना रहे इस दिशा में भी जनसम्पर्क कार्यालय विशेष प्रयास करते हैं। सघन सुरक्षा प्राप्त विशिष्ट व्यक्तियों के कार्यक्रमें सुरक्षा पास भी इन्हीं कार्यालयों के माध्यम से उपलब्ध करवाये जाते हैं। समाचार पत्रों को इस विभाग द्वारा सरकारी विज्ञापन भी उपलब्ध करवाये जाते हैं। सरकारी विज्ञापन चाहने वाले समाचार पत्रों की नियमितता की जांच करना तथा उनकी प्रसार संख्या की जांच करने का कार्य भी सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालयों द्वारा किया जाता है।

    पत्र सूचना कार्यालय-

    राज्य सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय की ही भांति केन्द्र सरकार ने जोधपुर में पत्रपेटी कार्यालय खोल रखा है। यह कार्यालय केन्द्र सरकार के कार्यक्रमों और सूचनाओं को अखबारों के कार्यालयों में प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से उपलब्ध करवाता है।

    वर्तमान परिदृश्य-

    वर्तमान में पचिमी राजस्थान से लगभग दैनिक समाचारपत्र, साप्ताहिक समचार पत्र, तथा मासिक पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित होते हैं। बड़े समाचार पत्रों में जोधपुर तथा बीकानेर से दैनिक राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर के जोधपुर व बीकानेर संस्करण निकलते हैं। इन पत्रों के विशेष परिशिष्ट जयपुर से छपकर आते हैं तथा स्थानीय समाचारों के पृष्ठ जयपुर तथा बीकानेर में ही छपते हैं। दैनिक जलतेदीप जोधपुर से प्रकाशित होने वाला महत्वपूर्ण प्रकाशन है। बीकानेर से निकलने वाले लोकमत तथा युगपक्ष भी अच्छे समाचारों में गिने जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान से हिन्दी तथा राजस्थानी भाषाओं में ही पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित होते हैं। अंग्रेजी भाषा का एक भी पत्र-प्रकाशित नहीं होता। हिन्दी अखबारों में दैनिक नवज्योति, पंजाब केसरी, राष्ट्रदूत तथा अंग्रेजी अखबारों में इण्डियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इण्डिया, फाइनेंसियल एक्सप्रेस तथा इकॉनोमिक टाइम्स प्रमुख हैं। 


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