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  • लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास

     02.06.2020
    लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास

    लोक भाषा में रामकथा के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर नामक गांव में हुआ। उनके जन्म एवं निर्वाण की तिथियों पर इतिहासकार अब तक एक मत नहीं हो सके हैं। माना जाता है कि श्रावण शुक्ला सप्तमी को उनका जन्म हुआ श्रावण शुक्ला सप्तमी को ही उनका शरीर पूरा हुआ। इसलिए गोस्वामीजी की जन्म तिथि और पुण्य तिथि एक ही दिन हैं। कुछ लोगों के अनुसार उनका निधन श्रावण शुक्ला तृतीया को हुआ। उन्होंने राम-राम कहते हुए जन्म लिया और राम-राम कहते हुए ही शरीर छोड़ा। उनके बचपन का नाम रामबोला रखा गया। माता हुलसी और पिता आत्माराम तुलसी के जन्म के बहुत कम समय तक ही जीवित रहे।


    गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म सोलहवीं शताब्दी में ऐसे भारत में हुआ जो अत्यंत निर्धन था। प्रजा विदेशी आक्रांताओं के अत्याचारों और भूख से बिलबिला रही थी। बारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अफगानिस्तान से आए तुर्कों ने भारत पर अधिकार कर लिया था और गोस्वामीजी के जन्म के समय यही तुर्क शासन कर रहेे थे। जब तुलसीदास सक्रिय जीवन में आए तो उत्तर भारत मंगोल जाति के मुसलमान शासकों के अधीन था। उस समय भारत की क्या दशा थी, उसका वर्णन करते हुए तुलसीदासजी ने लिखा है-

    खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

    बनिक को न बनिज न चाकर को चाकरी।

    जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस

    कहै एक-एकन सौं कहां जायं का करी!


    जो कुछ खेतों में उपजता था, उसे मुसलमान शासकों के सिपाही छीनकर ले जाते थे। यदि किसान उनका विरोध करते थे तो सिपाही गांवों को घेरकर आग लगा देते थे। उनके भय से किसान घर छोड़कर जंगलों में चले जाते थे। बहुत सी भूमि बंजर पड़ी रह जाती थी। इन परिस्थितियों के कारण समाज में अनैतिकता का प्रसार हो गया। गोस्वामीजी ने उस काल के समाज का वर्णन करते हुए लिखा है-

    बाढ़े खल बहु चोर जुआरा।

    जे लंपट परधन परदारा।

    मानहिं मातु पिता नहीं देवा।

    साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।


    आगे चलकर रामचरित मानस में गोस्वामीजी ने राक्षसों के अत्याचारों का वर्णन इन्हीं तुर्क सिपाहियों के अत्याचारों को देखकर किया। ऐसी विकट परिस्थितियों में तुलसीदासजी का जन्म हुआ और जन्म के साथ ही माता-पिता की मृत्यु हो गई। अनाथ तुलसीदास भीख मांग कर पेट भरने लगे। अपने बाल्यकाल के सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं लिखा है-

    बारे ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन

    जानत हौ चारि फल, चारि ही चनक को।

    घर-घर मांगे टूक, पुनि भूपति पूजे पांय।

    जे तुलसी तब राम बिनु, ते अब राम सहाय।


    ईश्वरीय विधान से बालक तुलसीदास को संत नरहरिदास का आशीर्वाद मिल गया। वे तुलसीदासजी को सूकरखेत ले गए और वहा( उन्हें रामकथा और उसके रहस्य से परिचय करवाया। अपने इस जीवन खण्ड के बारे में तुलसीदासजी ने लिखा है-

    मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकर खेत।

    समुझी नहिं तसि बालपुन तब अति रहेउं अचेत।


    श्रोता बकता ज्ञाननिधि कथा राम कै गूढ़।

    किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।


    कुछ समय पश्चात् गोस्वामीजी काशी चले गए और पंद्रह वर्ष तक वहां रहकर उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का तथा उपनिषदों-पुराणों का अध्ययन किया। गोस्वामीजी की संस्कृत हिन्दी की तरह सरल है। वह वेदों की संस्कृत, वाल्मीकि रामायण की संस्कृत, श्रीमद्भगवत गीता की संस्कृत तथा उपनिषदों आदि की संस्कृत से बहुत अलग तरह की है उदाहरण के लिए देखें-

    भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ। याभ्यां विना न पश्चन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।

    वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणम् यमाश्रितो हि वक्रोअ्पि चन्द्र सर्वत्र वन्द्यते।


    इन ग्रंथों का अध्ययन करने से गोस्वामीजी को ज्ञान हुआ कि मूलतः भारत निर्धन और दुखी नहीं है। उसकी आत्मा में तो अध्यात्म, दर्शन और तत्व ज्ञान का सागर लहरा है जो प्राणी मात्र के दुखों को दूर करके उन्हें परम् आनंद की ओर ले जाने की शक्ति रखता है किंतु अत्याचारों और अभावों के कारण भारत की यह दुर्दशा हुई है। यदि भारत को उसकी आत्मा के दर्शन करा दिए जाएं तो देश का पुनः उद्धार हो सकता है।

    यह देखकर गुसाईंजी ने लोक भाषा में पुराणों, निगमों और आगमों का ज्ञान आगम आदमी को कराने का निर्णय लिया। उन्होंने सरल भाषा में ऐसी कविताओं का निर्माण किया जो सुनते ही याद हो जाती है और जिस भाषा में ज्ञान के गूढ़ तत्वों को अत्यंत सरल करके लिखा गया है। वे स्वयं राम चरित मानस के आरम्भ में लिखते हैं-

    नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्य तो अ्पि

    स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषा निबंध मति मंजुल मातनोति।


    अर्थात् बहुत से पुराणों, वेदों, तंत्रशास्त्रों, वाल्मीकि रामायण तथा अन्य अनेक ग्रंथों से ज्ञान लेकर मैंने अपने अंतःकरण के सुख के लिए रामचरित मानस की रचना की है जो कि देशज भाषा में निबद्ध है।

    गोस्वामीजी ने बहुत से ग्रंथों का प्रणयन किया जिनमें रामचरित मानस, विनय पत्रिका, हनुमान बाहुक, वरवै रामायण, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, हनुमान चालीसा, कवितावली, दोहावली, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न और श्रीकृष्ण गीतावली सहित लगभग दर्जन रचनाएं लिखीं।

    कहा जाता है कि हनुमानजी की आज्ञा से गोस्वामीजी ने अयोध्या की यात्रा की। वहां उन्हें स्वप्न में शंकरजी ने राम चरित मानस को धरती पर उतारने का आदेश दिया। इसकी रचना शंकरजी ने पहले से ही कर रखी थी। इस सम्बन्ध में गोस्वामीजी ने लिखा है-

    रचि महेस निज मानस राखा।

    पाय सुसमय सिवा सन भाखा।


    रामचरित मानस के रूप में गोस्वामी जी ने ऐसे ग्रंथ की रचना जो भारत की निर्धन, अभावों और अत्याचारों से संत्रस्त प्रजा का न केवल भौतिक लोक में अपितु परलोक में भी कल्याण कर सके। यह सबको सुलभ हो, किसी भी समय इसे पढ़ा जा सके। वे स्वयं इस ग्रंथ के बारे में लिखते हैं-

    सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।

    लोक लाह परलोक निबाहू।।


    तुलसीदासजी अत्यंत विनम्र व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अपने बारे में लिखा है-

    कवित विवेक एक नहीं मोरें।

    सत्य कहउं लिखि कागद कोरे।।

    सो मो सन कहि जात न कैसें।

    साक बनिक मनि गुन गन जैसें।।


    उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरा ग्रंथ ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने लिखा है-

    नाना भांति राम अवतारा।

    रामायन सत कोटि अपारा।


    मनुष्य को सुखी बनाने का सबसे सरल उपाय उन्होंने बताया- राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुं जौ चाहसि उजियार।। भायं कुभायं अनख आलसहूं। नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।। गोस्वामी जी की कविताओं ने देश के करोड़ों लोगों को ईश्वरीय सत्ता में विश्वास दिलाया तथा रामचरित मानस के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का भरोसा दिलाया। वे लिखते हैं-

    जिनह एहिं बारि न मानस धोए।

    ते कायर कलिकाल बिगोए।

    तृषित निरखि कर भव बारी।

    फिरहहिं मृग जिमि जीव दुखारी।


    कहते हैं कि मीरां बाई ने अपनी पारिवारिक स्थितियों का उल्लेख करते हुए एक बार तुलसीदासजी से सलाह मांगी कि मैं क्या करूं! तुलसीदासजी ने उन्हें जो सलाह दी वह एक पद के रूप में थी। यह पद विनय पत्रिका में मिलता है-

    जाके प्रिय न राम वैदेही,

    तजिए ताहि कोटि वैरी सम जदपि परम सनेही।

    तज्यौ पिता प्रहलाद विभीषण बन्धु भरत महतारी।

    बलि गुरु तज्यौ, ब्रज बनितन्हि कंतहिं भए मुद मंगल कारी......।

    उन्होंने संसार में सबसे हिल-मिल कर चलने का उपदेश करते हुए दोहावली में लिखा है-

    तुलसी या संसार में भांति-भांति के लोग

    सब से हिल-मिल चालिए नदी नाव संयोग।


    दुष्ट और संत के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है-

    मिलत एक दारुण दुख देहीं।

    बिछरत एक प्राण हर लेहीं।।

    अर्थात् दुष्ट लोग मिलने पर दुःख देते हैं और संत जब बिछुडते हैं तो ऐसा लगता है मानो हमारे प्राण हमसे दूर चले गए। दुष्टों का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है-

    बचन बज्र जेहि सदा पिआरा।

    सहस नयन पर दोष निहारा।।


    उन्होंने कण-कण में अपने प्रभु की सत्ता के दर्शन किए। वे लिखते हैं-

    सीय राम मय सम जग जानी।

    करहुं प्रनाम जारि जुग पानी।।


    संसार में कीर्ति एवं वैभव की सार्थकता की कसौटी के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है-

    कीरति भनिति भूति भलि सोई।

    सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।


    लालच के वशीभूत होकर किसी अन्य व्यक्ति की चापलूसी करने वाले कवियों के लिए उन्होंने लिखा है-

    कीन्हें प्राकृत जन गुणगाना,

    सिर धुनि गिरा लागि पछिताना।


    जब गोस्वामीजी की ख्याति बढ़ने लगी तो अकबर ने उन्हें अपने दरबार में आने का निमंत्रण दिया। अकबर की येाजना यह थी कि हिन्दुओं के श्रेष्ठ गुरुओं, संतों को अपने नवरत्नों में सम्मिलित किया जाए तथा उनके माध्यम से प्रजा को मुसलमान बनाया जाए। उसने तीन संतों को निमंत्रण भेजा- संत हरिदास, संत कुंभनदास तथा गोस्वामी तुलसीदास। भारत के सौभाग्य से तीनों संतों ने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया। संत कुंभनदास ने अकबर को जवाब लिखा-

    संतन को कहा सीकरी सौं काम।

    आवत जात पनैहा टूटी, बिसरि गयौ हरि नाम।

    जाको मुख देखे दुख उपजत ताकों करन परी परनाम।

    कुंभनदास लाल गिरध बिनु यह सब झूठौ धाम।।


    गोस्वामीजी ने लिखा-

    हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखो दरबार।

    तुलसी भीतर बाहिरौ जो चाहसि उजियार।।


    वृद्धावस्था में वे शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त हो गए। उन्होंने अपनी पीड़ा का वर्णन हनुमान बाहुक में इन शब्दों में किया है-

    घेर लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यों बासर बलद जल घटा धुकि छाई है.....।

    .... पांय पीर, पेट पीर, बांह पीर, मुंह पीर, जरजर सकल सरीर पीर मई है।

    अपने कष्टों के लिए तुलसीदासजी ने स्वयं को ही जिम्मेदार ठहराया। हनुमानबाहुक में वे लिखते हैं-

    असन बसन हीन, बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो, करै न हाय-हाय कौ।

    तुलसी गुसाईं भयो, भौंड़े दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौ।



    बाबा तुलसी दास और फादर कामिल बुल्के

    कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के वेस्ट फ्लैंडर्स में नॉकके-हेइस्ट नगर पालिका के एक गांव रामस्केपेल में हुआ। इनके पिता का नाम अडोल्फ और माता का नाम मारिया बुल्के था। बुल्के ने ल्यूवेन विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में बीएससी डिग्री हासिल कर की। 1930 में ये एक जेसुइट बन गए। नीदरलैंड के वलकनबर्ग, (1932-34) में दार्शनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, ई.1935 में ये भारत आए तथा कुछ समय मुम्बई एवं दार्जिलिंग में रहने के बाद झारखंड चले गए। यहां उन्होंने पांच साल तक गणित का अध्यापन किया। यहीं पर उन्होंने हिंदी, ब्रज एवं अवधी भाषाएं सीखीं तथा ई.1938 में सीतागढ़ी हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखी। भारत के लोगों के बारे में उन्होंने लिखा है- ई.1935 में जब मैं भारत पहुंचा, मुझे यह देखकर आश्चर्य और दुःख हुआ कि शिक्षित भारतीय अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं से अनभिज्ञ थे और इंग्लिश में बोलना गर्व की बात समझते थे। बुल्के ने ‘‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’’ नामक शोध ग्रंथ लिखा जिसमें उन्होंने वैज्ञानिकता एवं तर्क के आधार पर सिद्ध किया कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम वाल्मीकि के कल्पित पात्र नहीं अपितु इतिहास पुरूष थे। कामिल बुल्के के द्वारा प्रस्तुत तिथियों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है। बुल्के के इस शोधग्रंथ के उद्धरणों ने पहली बार सिद्ध किया कि रामकथा भारत की नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय कथा है जो वियतनाम से लेकर इंडोनेशिया तक फैली हुई है। फादर बुल्के अपने मित्र हॉलैन्ड के डॉक्टर होयकास का उदाहरण देते थे जो संस्कृत और इंडोनेशियाई भाषाओं के विद्वान थे। एक दिन वह केंद्रीय इंडोनेशिया में शाम के समय टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक मौलाना जिनके बगल में कुरान रखी है, इंडोनेशियाई रामायण पढ़ रहे थे। होयकास ने उनसे पूछा, मौलाना आप तो मुसलमान हैं, आप रामायण क्यों पढते हैं ? उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिये! रामकथा के इस विस्तार को फादर बुल्के, वाल्मीकि की दिग्विजय कहते थे, भारतीय संस्कृति की दिग्विजय!

    -डॉ. मोहनलला गुप्ता

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  • अध्याय - 63 राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 63 राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    अध्याय - 63


    राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    भरतपुर राजकीय संग्रहालय, भरतपुर के लोहागढ़ दुर्ग परिसर के भीतर स्थित है। इस संग्रहालय में अद्वितीय और पुरातन कलाकृतियाँ तथा दुर्लभ पुरातात्विक सामग्री प्रदर्शित की गई है। ई.1939 में भरतपुर नरेश सवाई कर्नल बृजेन्द्रसिंह द्वारा भरतपुर राज्य में अनेक स्थानों पर असुरक्षित अवस्था में बिखरी पड़ी पत्थर की प्रतिमाओं और कलापूर्ण वास्तुखंडों को संगृहीत करवाकर स्थानीय सार्वजनिक पुस्तकालय के एक कक्ष में प्रदर्शित करवाया गया। ई.1944 में इसे नये भवन में स्थानांतरित किया गया और इसे स्वतंत्र संग्रहालय में बदल दिया गया।

    वर्तमान संग्रहालय भवन, रियासती काल में भरतपुर रियासत का प्रशासनिक कार्यालय था और इसे 'कचहरी कलां' (दरबार हॉल) के नाम से जाना जाता था। इस तीन मंजिला भवन का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह (ई.1825-53) ने करवाया था। इसकी प्रथम मंजिल पर स्थित कमरा खास और सिलहखाना को भी संग्रहालय में सम्मिलित कर लिया गया। इस संग्रहालय को चार प्रमुख खण्डों में बाँटा गया है- पुरातत्व खण्ड, बच्चों की गैलरी, शस्त्रागार, कला खण्ड और शिल्प एवं उद्योग।

    इस संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों, चित्रों, सिक्कों, शिलालेखों, प्राणी नमूनों का अच्छा संग्रह किया गया है। वर्तमान में भरतपुर संग्रहालय में 581 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 10 शिलालेख, 120 टैराकोटा सामग्री, 13 धातु सामग्री, 670 सिक्के, 1966 अस्त्र-शस्त्र, 196 लघुचित्र एवं 861 स्थानीय हस्तकला एवं उद्योग के नमूने संगृहीत हैं।

    पुरातत्व खण्ड

    संग्रहालय का पुरातत्व खण्ड सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसमें द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर, शुंग काल, कुषाण काल, गुप्त काल, मध्यकाल एवं 19वीं शताब्दी ईस्वी तक की विभिन्न प्रस्तर प्रतिमाएँ एवं कलापूर्ण वास्तुखंड प्रदर्शित किए गए हैं। पहली शताब्दी की मूर्तियाँ इस संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण हैं। इस संग्रहालय में नोह, अघापुर, गांवड़ी, वीरावई, नौगया खेड़ा, मैलाह, जाघिना, एकता, तुइया सोगर एवं सोगारा आदि गांवों एवं बयाना, कामां, कुम्हेर, वैर, भुसावर, रूपाबास आदि कस्बों से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री प्रदर्शित की गई हैं। इनमें एकमुखी शिवलिंग, बोधिसत्व फलक, बुद्ध का शीश, महिषासुर मर्दिनी, कार्तिकेय की कुषाण कालीन मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। भरतपुर संग्रहालय में यक्ष एवं यक्षी प्रतिमाओं का अच्छा संग्रह है। यही मूर्तियां आगे चलकर गुप्तकाल में विष्णु एवं विष्णु अवतारों की तथा उसके बाद के काल में जैन एवं बौद्ध प्रतिमाओं का आदर्श बनीं।

    वीरावई तथा नोह आदि स्थलों से प्राप्त प्रथम शताब्दी ई.पू. की यक्ष प्रतिमाएँ, नागराज (कुषाण काल) प्रतिमा, सप्तमातृका, दिक्पाल आदि की प्रतिमाएँ विशेष उल्लेखनीय हैं।

    इस संग्रहालय में रखी मृण्मूर्तियां (टैराकॉटा) इस क्षेत्र की लोकसंस्कृति का परिचय देती हैं। विभिन्न पुरातत्व स्थलों से प्राप्त बैल, कुत्ता, हाथी आदि पशुओं एवं स्त्री-पुरुषों की मृण्मूर्तियां आकार में छोटी हैं जबकि संग्रहालय में प्रदर्शित पत्थर की मूर्तियां आकार में पर्याप्त बड़ी हैं। टैराकौटा (मृणमूर्तियां) की बनी प्रतिमाएँ सामान्यतः लाल एवं सलेटी रंग की हैं किंतु कुछ प्रतिमाओं पर काली पॉलिश की गई है। प्रतिमाओं के धड़ प्रायः नग्न हैं किंतु उन पर मिट्टी के मणियों से मालाएं आदि बना दी गई हैं। कानों में बड़े कुण्डल हैं तथा गले में बड़े मणियों की मालाएं बनाई गई हैं। ये प्रतिमाएँ या तो पूजा के काम आती रही होंगी अथवा 
    इन्हें बालकों के लिए खिलौनों के रूप में बनाया गया होगा। शुंग काल की प्रतिमाओं में देवी का एक धड़ तथा गणेश प्रतिमा के अवेशष भी प्राप्त हुए हैं। कुषाण काल की बहुत से पशुओं की मृण्मूर्तियां मिली हैं। इनमें 12 इंच गुणा 3 इंच का एक हाथी भी है जिसकी पीठ पर सवार सहित हौदा बना हुआ है।

    जैन प्रतिमा दीर्घा में भरतपुर क्षेत्र के विभिन्न स्थलों से प्राप्त 8वीं शती ईस्वी से 18वीं शताब्दी ईस्वी तक की जैन प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं, जो इस क्षेत्र में प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक जैन धर्म के प्रसार की परिचायक हैं। इस दीर्घा में प्रदर्शित शासनदेव की स्वतंत्र आकर्षक प्रतिमा अतुलनीय है। नेमिनाथ, शांतिनाथ तथा चतुर्मुखी आदिनाथ आदि तीर्थकर प्रतिमाएँ भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

    नोह से प्राप्त मूर्तियां

    नोह से प्राप्त सामग्री गंगा घाटी की प्राचीनतम सभ्यताओं- हस्तिनापुर एवं वैशाली आदि की समकालीन है। नोह एक समृद्ध नगर था जो तीसरी शताब्दी ईस्वी में नष्ट हो गया। नोह से पांच सभ्यताओं के अवशेष स्तर मिले हैं। सबसे नीचे की सभ्यता ईसा से 1100 वर्ष पहले अस्तित्व में थी। इस स्तर से प्राप्त चित्रित सलेटी रंग के पक्षी की मृण्मूर्ति पुरातत्व जगत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मृण्मूर्ति लगभग ई.पू.1100 की मानी जाती है। इसी स्तर से लाल मृद्भाण्ड तथा सरल प्रकार के लाल-काले मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं। इन बर्तनों की बनावट आहार सभ्यता से भिन्न प्रकार की है। नोह से ग्रेवेयर (धूसर मृद्भाण्ड) वाली सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। उसके ऊपर के स्तर में पेंटेड ग्रेवेयर एवं पॉलिशयुक्त काले क्लेवेयर प्राप्त हुए हैं। ऐसे ही बर्तन हस्तिनापुर से भी प्राप्त किए गए थे। पॉलिशयुक्त एवं चित्रित मृद्भाण्ड समृद्ध लोगों द्वारा प्रयुक्त होते थे। कुछ मृद्भाण्डों पर पक्षियों की आकृतियां बनी हुई हैं। ऐसे बर्तन हस्तिनापुर एवं वैशाली से भी मिले हैं।

    नोह से मिली सभ्यता के ऊपरी स्तर से तीरों की नोक, भवनों के अवशेष मिले हैं जबकि सबसे ऊपर के स्तर से पक्की ईंटों से घिरे हुए एक नगर के अवशेष मिले हैं जिसमें पक्के घर बने हुए थे। यह नगर प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व में अस्तित्व में आया तथा तीसरी शताब्दी ईस्वी में नष्ट हो गया। यहाँ से धातु गलाने की भट्टियां, बड़ी मात्रा में धातु अपशिष्ट (मैटल वेस्ट) भी प्राप्त हुआ है। आठ पैरों एवं चार भुजाओं वाली एक भट्टी एवं पकी हुई ईंटें भी प्राप्त हुई हैं। यह सामग्री एक समृद्ध सभ्यता की ओर संकेत करती है जो ईसा से 1200 वर्ष पहले विकसित हुई थी। यहाँ से ढक्कनदार बर्तन भी मिले हैं। इनके ढक्कनों पर स्वास्तिक एवं त्रिरत्न के चिह्न बने हुए हैं। स्त्री-पुरुष मृण्प्रतिमाओं में आभूषणों की भरमार है।

    पशु आकृतियों वाले खिलौने कई प्रकार के हैं जिनमें हाथी, घोड़े, गाड़ियां आदि हैं। मथुरा के शासकों के ताम्बे के सिक्के, कांच एवं मिट्टी की चूड़ियों के टुकड़े, मौर्य काल की मिट्टी की मुहरें भी मिली हैं। शुंग काल का एक मिट्टी का कुत्ता आग में पकाकर मजूबत बनाया गया है। कुषाण काल की पॉटरी पर ब्राह्मी लिपि जैसी लिखावट मिली है। नोह से कम से कम 14 मूर्तियां मिली हैं जो भिन्न काल के सभ्यताओं से सम्बद्ध हैं। नोह से प्राप्त शुंग काल की एक विशाल यक्ष प्रतिमा की आज भी पूजा की जाती है। इसे जाख बाबा कहते हैं। इसका पेट घड़े के आकार वाला है, शरीर पर भारी आभूषण हैं तथा मुंह पर घनी मूंछें हैं। यह आठ फुट आठ इंच ऊंची प्रतिमा है।

    नोह से ही उत्तर मौर्य काल की लाल पत्थर की यक्षिणी प्रतिमा मिली है। बोधिसत्वों की चार मूर्तियां आरम्भिक शुंग काल की हैं। चारों बोधिसत्व एक पंक्ति में खड़े हैं तथा उन्होंने बाएं हाथ में जल-पात्र धारण कर रखा है और दाहिना हाथ अभयमुद्रा में उठा रखा है। इनके माथे पर एक जैसी पगड़ी तथा आभूषण हैं तथा गले में अंग्रेजी अक्षर 'वी' की आकृति वाली माला है। यह प्रतिमा सफेद धब्बों वाले लाल सैण्डस्टोन पत्थर से बनी हुई है जो कि रूपाबास में मिलता है। गुप्त काल की एक ग्रे सैण्डस्टोन की महिला की आवक्ष मूर्ति मिली है। स्तनों के बड़े आकार के कारण इसे पूर्ववर्ती प्रतिमाओं से सहज ही अलग पहचाना जा सकता है। इसी काल का एक पुरुष धड़ भी मिला है। देवी लक्ष्मी की प्रतिमा, विष्णु की मस्तक रहित प्रतिमा, भगवान शिव का आवक्ष विग्रह जिसे सिर के जटाजूट एवं माथे की तीसरी आंख से पहचाना जा सकता है, भी प्राप्त हुई हैं। इन्हें आभूषणों एवं पगड़ियों के आधार पर पीछे के युगों से सहज ही अलग किया जा सकता है। नोह से एक मुखी शिवलिंग से लेकर चारमुखी शिवलिंग प्राप्त हुए हैं। शिव के ये चार मुख ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य एवं शक्ति के प्रतीक हैं।

    अघापुर से प्राप्त मूर्तियां

    अघापुर से बड़ी संख्या में परिष्कृत मूर्तियां मिली हैं। यहाँ से प्राप्त कूण्डिका यक्ष भी घड़े के पेट वाला है। इसने अपने सिर पर एक कूण्डी धर रखी है। इसने चूड़ियां पहन रखी हैं तथा कानों में कुण्डल हैं। यहाँ से पत्थरों पर बनी हुई पशु-मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। दो शेरों के जुड़े हुए मुंह वाली आवक्ष प्रतिमा प्राप्त हुई है। इसमें शेर का मुंह खुला हुआ है, उसकी गर्दन पर भारी बाल हैं। शेर की आंखें, नाक कान, होठ, दांत, गाल, सीना आदि काफी पुष्ट बनाए गए हैं। भरतपुर तहसील के वीरवाई गांव से यक्ष की उसी काल की एक और प्रतिमा मिली है। यक्ष को उस काल में 'वीर' कहा जाता था। अतः अनुमान किया जा सकता है कि गांव का नाम वीरवाई इसी यक्ष मूर्ति के कारण पड़ा होगा। इसके गले में भी नोह से प्राप्त यक्ष प्रतिमा जैसा 'वी' आकृति का हार है। सोगारा गांव से भी यक्ष कीऐसी ही प्रतिमा मिली है जो कि शुंग काल की है। इस मूर्ति के सिर पर पगड़ी है तथा यक्ष को भारवाहक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

    शुंग काल की ये मूर्तियां, भरतपुर-मथुरा-नोह क्षेत्र में उस काल की धार्मिक मान्यताओं पर प्रकाश डालती हैं जिसके अनुसार गांव-गांव में यक्ष की पूजा होती थी। वस्तुतः इस काल तक गुप्त काल भविष्य के गर्भ में था अतः माना जाना चाहिए कि गुप्त काल की मूर्ति कला शुंग काल की मूर्ति कला का ही गौरवमयी विकास था। गुप्त काल में यक्ष का स्थान भगवान विष्णु तथा उनके अवतारों ने ले लिया।

    मैलाह से प्राप्त मूर्तियां

    मैलाह से प्राप्त प्रतिमाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि गुप्तकाल एवं मध्यपूर्व काल में यह स्थल शैव एवं वैष्णव सम्प्रदायों के प्रमुख केन्द्रों में से था। यहाँ इस काल में शिव एवं विष्णु के कम से कम तीन मंदिर स्थित थे। यहाँ से प्राप्त अवशेषों में आठवीं एवं दसवीं शताब्दी की प्रतिमाएँ मिली हैं। विष्णु के अवतारों में राम, नृसिंह तथा वाराह और दिक्पालों में अग्नि तथा वरुण की मूर्तियां मिली हैं। अन्य प्रतिमाओं में रेवान्ता, मातृका ऐन्द्री, परिचारिकाएं, चंवरधारिणी, द्वारपाल, शिव-मस्तक, नंदी नृत्यलीन शिव, मंदिरों की शिखर रचनाओं के अंश, देवी यमुना एवं देवी गंगा की मूर्तियां एवं अंकन मिले हैं। ब्रह्मा, ब्रह्माणी, कुबेर, स्त्री द्वारपाल एवं नृत्यरत पुरुष प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

    जघीना से प्राप्त मूर्तियां

    भरतपुर तहसील का गांव जघीना गुप्तोत्तर काल में जैन धर्म की श्वेताम्बर शाखा का केन्द्र था। यहाँ भगवान पार्श्वनाथ का श्वेताम्बर शाखा का जैन मंदिर था। संभवतः इसी मंदिर की विशाल पार्श्वनाथ प्रतिमा भग्नावस्था में मिली है। इस प्रतिमा के पीछे सर्प छाया करता हुआ दिखाया गया था। यहाँ से अन्य जैन प्रतिमाएँ भी मिली हैं। कायोत्सर्ग भाव में खड़ी सर्वतोभद्र की एक प्रतिमा तथा आदिनाथ की प्रतिमाएँ भी मिली हैं। आदिनाथ की प्रतिमा पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी की है। इससे स्पष्ट है कि गुप्तकाल में भरतपुर के आसपास जैनों की बड़ी बस्ती थी।

    एकता से प्राप्त प्रतिमाएँ

    भरतपुर जिले में स्थित एकता गांव वैष्णव धर्म का छोटा केन्द्र था। भरतपुर संग्रहालय में एकता से प्राप्त प्रतिमाएँ रखी हैं। इनमें से विष्णु की एक प्रतिमा 3 फुट 2 इंच की है तथा दसवीं शताब्दी ईस्वी की है। विष्णु के आयुधपुरुष स्वरूप की एक प्रतिमा की पीठिका (पैडस्टल) मिली है।

    भरतपुर नगर से प्राप्त प्रतिमाएँ

    भरतपुर नगर से गुप्तकाल एवं उसके बाद के समय की प्रतिमाएँ प्राप्त की गई हैं। इनमें एकमुखी शिवलिंग तथा लाल पत्थर की कीचक रचना गुप्तकाल के हैं। स्थानक मुद्रा में भगवान सूर्यदेव की प्रतिमा भी महत्वपूर्ण है। सूर्यदेव के दोनों हाथों में पूर्ण खिला हुआ कमल है। यह लाल सैण्डस्टोन से निर्मित पौने तीन फुट ऊंची प्रतिमा है। इसी युग की भैरव प्रतिमा एवं नाग दम्पत्ति की युगल प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। यह समस्त सामग्री गुप्त काल में निर्मित किसी एक मंदिर में प्रयुक्त हुई होगी। भरतपुर नगर से सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी की अनेक प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें सबसे पुरानी प्रतिमा एक जैन तीर्थंकर की है। इसकी पीठिका पर ई.1584 का एक लेख उत्कीर्ण है, प्रतिमा खण्डित अवस्था में है। 16वीं शताब्दी में भरतपुर क्षेत्र में पौराणिक धर्म की उपस्थिति को दर्शाने वाली सूर्य एवं विष्णु की विशाल प्रतिमाएँ भी भरतपुर नगर से प्राप्त की गई हैं।

    कामां से प्राप्त प्रतिमाएँ

    भरतपुर जिले का कामां नामक प्राचीन नगर महाभारत के काल से भी पहले अस्तित्व में था। तब इसे कदम्बवन, काम्यकवन और कामवन कहा जाता था। उस काल में इसका धार्मिक महत्व वृंदावन तथा महावन के समकक्ष था। गुप्तकाल में कामां में भगवान शिव का विशाल मंदिर स्थित था। इसके भग्नावशेषों को अब चौरासी खंभा मंदिर कहते हैं। इस मंदिर की मूर्तियां अजमेर एवं मथुरा सहित भारत के कई संग्रहालयों में ले जाई गई हैं। इस मंदिर से प्राप्त शिलालेखों में गुर्जर-प्रतिहार शासकों की वंशावली उत्कीर्ण है। मंदिर की बनावट, प्रतिमाओं की बनावट तथा शिलोखों के अक्षरों की बनावट से इस मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी ईस्वी में होना प्रतीत होता है। मंदिर का शिल्प बहुत समृद्ध है। घटपल्लवों की ऐसी सजावट अन्य मंदिरों में दुर्लभ है। मंदिर के एक शिलालेख के अनुसार यह मंदिर सूरसेन वंश के राजा दुर्गगान की रानी वच्छालिका द्वारा भगवान विष्णु को समर्पित किया गया था। इस मंदिर से दो शिवलिंग मिले थे जो अब अजमेर संग्रहालय में हैं।

    लघु चित्र खंड

    संग्रहालय भवन की प्रथम मंजिल पर स्थित लघुचित्र खण्ड में मुगल शैली के 17वीं शताब्दी के चित्र एवं राजस्थान की जयपुर, जोधपुर, कोटा, किशनगढ़, नाथद्वारा, बूँदी और भरतपुर शैलियों के चित्र प्रदर्शित हैं। अभ्रक की पत्तियों, पीपल के पत्तों तथा पुराने लिथो पेपर की पट्टियों पर बने चित्र, इस संग्रहालय की अनूठी कलाकृतियां हैं। ई.1610 ई. में लिखित 'सहज सनेही', महाराजा बलवन्तसिंह के समय में ई.1851 में लिखित 'पुत्रोत्सव' आदि हस्तलिखित ग्रन्थ और मुद्रित सूक्ष्माक्षरी कुरान भी दर्शनीय है। इस गैलरी में भरतपुर नरेशों के अनेक चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

    विविध खंड

    देशी-विदेशी एवं स्थानीय हस्तकला की वस्तुएं तथा विभिन्न प्रकार की बहुमूल्य कलाकृतियाँ, विविध खण्ड में देखी जा सकती हैं। यहाँ रियासतकालीन 500 से अधिक कलाकृतियां हैं। इनमें मिट्टी, चीनी तथा काँच से निर्मित विभिन्न बर्तन, फूलदान, हाथीदाँत और चन्दन की लकड़ी से बने इत्रदान, शृंगारदान पीतल के कलापूर्ण कलश, थाल, पशु-पक्षियों के नमूने आदि प्रदर्शित हैं। विभिन्न प्रकार की घड़ियां तथा राजाओं द्वारा प्रयुक्त कटलरी का विशाल संग्रह भी रखा गया है। संग्रहालय के द्वार के पास एक विशाल कड़ाही रखी गई है जिसमें एक साथ कई हजार लोगों के लिए भोजन तैयार किया जा सकता था। एक विशाल चंवर भी देखा जा सकता है। इसी दीर्घा में वनमानुष, मगरमच्छ, शेर का बच्चा तथा भालू आदि वन्यपशुओं को केमिकल ट्रीटमेंट करके तथा उन्हें स्टफ करके शोकेसों में रखा गया है जो कि बच्चों को आकर्षित करते हैं।

    अस्त्र-शस्त्र खंड

    संग्रहालय की पहली मंजिल पर बने अस्त्र-शस्त्र खण्ड में भरतपुर राज्य के शासकों एवं सैनिकों द्वारा विभिन्न युद्धों में प्रयुक्त कई प्रकार के हथियार प्रदर्शित किए गए हैं। यहाँ छोटे आकार की पिस्तौल से लेकर तोप जैसे बड़े हथियार भी प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कई प्रकार की तलवारें, ढालें, छुरे, बन्दूकें, रिवॉल्वर, भाले, तोप आदि सम्मिलित हैं। कुछ तलवारों की मूठ पर सोना एवं चांदी का कलात्मक कार्य किया गया है। इस कला को कोफ्तकारी, निशान, तहनिशान आदि कहा जाता था। रामचंगी बंदूकें तथा विभिन्न प्रकार की ढालें भी विशेष आकर्षण का विषय हैं। अठारहवीं शताब्दी की बंदूकें एवं तोपें भी दर्शक को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

    अन्य

    संग्रहालय परिसर में भूतल पर स्थित 'हमाम' इस परिसर का बहुत बड़ा आकर्षण है। यह महाराजा जवाहरसिंह (ई.1763-68) द्वारा बनवाया गया था। मुगल शैली के इस स्नानगृह में कई कक्ष बने हुए हैं। इसकी दीवारों के आरायश प्लास्टर पर फ्रेस्कोेे पद्धति से बने भित्तिचित्र आज भी चित्ताकर्षक हैं। स्नानघर में प्रकाश तथा वायु के आगमन के लिए वातायानों की व्यवस्था की गई है। स्नानघर में ठंडे और गर्म पानी का प्रबंध किया गया था। ठण्डे पानी के लिए भूमिगत पाइप बनाए गए थे और गर्म पानी के लिए हौद के नीचे भट्टियां लगाई गई थीं। राजा और रानियों के कपड़े बदलने के लिए अलग-अलग कक्ष बनाए गए हैं। संग्रहालय की छत पर छप्पन खम्भों की बारादरी बनी हुई है। प्रत्येक शुक्रवार को संग्रहालय का साप्ताहिक अवकाश रहता है।

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  • अध्याय - 63

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास

     07.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 54

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में औद्योगिक विकास

    राजस्थान में मुख्यतः तीन प्रकार के उद्योग हैं- कृषि आधारित, पशुधन आधारित तथा खनिज आधारित। राजस्थान में औद्योगिक विकास की अपरा सम्भावनाएं मौजूद औद्योगिक उत्पादन सम्बन्धी महत्वपूर्ण तथ्य

    1.प्रश्नः राज्य में कितने औद्योगिक क्षेत्र हैं?

    उत्तरः 322

    2.प्रश्नः राज्य की कुल पंजीकृत फैक्ट्रियों में से तीन चौथाई से भी अधिक किन 9 जिलों में स्थित हैं?

    उत्तरः अलवर, जयपुर, जोधपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, पाली, गंगानगर, उदयपुर तथा बीकानेर।

    3.प्रश्नः राज्य में विनिर्माण उद्योगों का शुद्ध घरेलू उत्पाद में कितना योगदान है?

    उत्तरः लगभग 11 प्रतिशत।

    4.प्रश्नः राज्य के कुल औद्योगिक उत्पादन में वृहद्, मध्यम तथा लघु उद्योगों का हिस्सा कितना है?

    उत्तरः वृहद् उद्योग- 50 प्रतिशत, मध्यम उद्योग- 18 प्रतिशत, लघु उद्योग- 32 प्रतिशत।

    5.प्रश्नः लघु उद्योग की श्रेणी में कौनसे उद्योग आते हैं?

    उत्तरः जिनमें संयंत्र और मशीनरी में एक करोड़ रुपये तक का विनिवेश होता है।

    6.प्रश्नः अति लघु उद्योग की श्रेणी में कौनसे उद्योग आते हैं?

    उत्तरः जिन उद्योगों में संयंत्र और मशीनरी पर 25 लाख से अधिक तथा 1 करोड़ रुपये से कम विनिवेश होता है। राज्य के प्रमुख उद्योग

    7.प्रश्न - स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राजस्थान में कितनी औद्योगिक इकाइयाँ थीं?

    उत्तर - स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राज्य में 11 बड़ी औद्योगिक इकाइयाँ थीं। इनमें से सूती वस्त्र के कारखाने-7, सीमेण्ट के-2 तथा चीनी बनाने के- 2 कारखाने थे।

    8.प्रश्न - इस समय राज्य में कौनसे उद्योग उन्नत अवस्था में हैं?

    उत्तर - सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, सिंथेटिक वस्त्र, स्टील, सीमेण्ट, जस्ता, रसायन, उर्वरक, सिरेमिक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी तथा विद्युत मीटर, टेलिविजन, ग्रेनाइट एवं संगमरमर के स्लेब्स व टायल्स, अभ्रक की ईंटें, शराब, इलेक्ट्रोनिक्स आदि।

    9.प्रश्न - राज्य में महत्त्वपूर्ण उद्योग समूह कौनसे हैं?

    उत्तर - (1) कृषि आधारित उद्योग। (2) पशुधन आधारित उद्योग, (3) ऊन, रेशम एवं सिंथेटिक रेशे के वस्त्र, (4) सूती वस्त्र, (5) गैर धात्विक उद्योग (सीमेण्ट, संगमरमर, ग्रेनाइट, चीनी मिट्टी, काँच, रसायन, उर्वरक) (6) आधारभूत धातु एवं एलॉय उद्योग (जस्ता, सीसा, तांबा, लौह, इस्पात), (7) विद्युत।

    10.प्रश्नः राज्य की अर्थव्यवस्था में उद्योगों का कितना योगदान है?

    उत्तरः 25 प्रतिशत

    11.प्रश्नः गुजरात तथा आंध्रप्रदेश आदि राज्यों की अर्थव्यवस्था में उद्योगों का कितना योगदान है?

    उत्तरः 40 प्रतिशत तक

    12.प्रश्नः राजस्थान के निर्माण उद्योगों में सबसे प्राचीन एवं संगठित उद्योग कौनसा है?

    उत्तरः सूती वस्त्र उद्योग।

    13.प्रश्नः राजस्थान में प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता एवं उपयोग की दृष्टि से कौनसे उद्योगों के विकास पर सर्वाधिक ध्यान दिया जा सकता है?

    उत्तरः खनिज।

    14.प्रश्नः राज्य में माचिस बनाने के कारखाने मुख्यतः कहाँ स्थित हैं?

    उत्तरः अलवर एवं अजमेर।

    15.प्रश्नः राजस्थान में वनस्पति घी बनाने का कारखाना सर्वप्रथम कहाँ स्थापित हुआ?

    उत्तरः भीलवाड़ा।

    16.प्रश्नः राजस्थान के किस जिले में वनस्पति घी बनाने के सर्वाधिक कारखाने हैं?

    उत्तरः जयपुर।

    17.प्रश्नः राजस्थान में सर्वप्रथम डेयरी संयंत्र की स्थापना कहाँ हुई?

    उत्तरः अजमेर।

    18.प्रश्नः राजस्थान में दाल बनाने का काम किन जिलों में अधिक होता है?

    उत्तरः अजमेर, कोटा, उदयपुर।

    19.प्रश्नः अजमेर में एचएमटी की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः ई.1967

    20.प्रश्नः राजस्थान में टायर एवं ट्यूब बनाने का सबसे बड़ा कारखाना कहाँ है?

    उत्तरः कांकरोली।

    21.प्रश्नः जे. के. टायर्स का निर्माण कहाँ होता है?

    उत्तरः कांकरोली।

    22.प्रश्नः राजस्थान टैक्सटाइल मिल्स कहाँ स्थित है?

    उत्तरः भीलवाड़ा।

    23.प्रश्नः राज्य में पीतल पर फूल-पत्तियों एवं प्राकृतिक दृश्यों की खुदाई एवं जड़ाई का काम कहाँ होता है?

    उत्तरः जयपुर एवं अलवर।

    24.प्रश्नः कौनसा शहर लकड़ी के खिलौनों के लिये प्रसिद्ध है?

    उत्तरः उदयपुर।

    25.प्रश्नः कौनसा शहर लकड़ी एवं लोहे के हैण्डी क्राफ्ट के लिये प्रसिद्ध है?

    उत्तरः जोधपुर।

    26.प्रश्नः कौनसे शहर मिट्टी के खिलौनों के लिये प्रसिद्ध हैं?

    उत्तरः शाहपुरा तथा उदयपुर (मोलेला का टेरीकोटा)।

    27.प्रश्नः कौनसा शहर कीमती पत्थरों की कटाई, जड़ाई एवं निर्यात के लिये प्रसिद्ध है?

    उत्तरः जयपुर।

    28.प्रश्नः कौनसा शहर ब्लू पॉटरी के लिये प्रसिद्ध है?

    उत्तरः जयपुर।

    29.प्रश्नः कौनसा शहर तलवारें बनाने के लिये प्रसिद्ध है?

    उत्तरः सिरोही।

    30.प्रश्नः काँच का सुनहरा काम कहाँ होता है?

    उत्तरः प्रतापगढ़ एवं उदयपुर में।

    31.प्रश्नः मीनाकारी का काम कहाँ अधिक होता है?

    उत्तरः जयपुर।

    32.प्रश्नः मसूरिया डोरिया की साड़ियां कहाँ बनती हैं?

    उत्तरः कैथून (कोटा)

    33.प्रश्नः बाड़मेर प्रिण्ट को क्या कहा जाता है?

    उत्तरः अजरख।

    34.प्रश्नः लाख से क्या बनता है?

    उत्तरः चूड़ियां, खिलौने, मूर्तियां, गुलदस्ते, आभूषण आदि।

    35.प्रश्नः किस शहर में लाख का काम अधिक होता है?

    उत्तरः जयपुर एवं जोधपुर।

    36.प्रश्नः बंधेज का काम किन शहरों में अधिक प्रसिद्ध है?

    उत्तरः जयपुर एवं जोधपुर।

    37.प्रश्नः राजस्थान का कौनसा शहर बेल-बूटों की छपाई की पारम्परिक कला के लिये जाना जाता है?

    उत्तरः सांगानेर।

    38.प्रश्नः जयपुर जिले में मानपुरा-मांचेड़ी को किस रूप में विकसित किया गया है?

    उत्तरः लेदर कॉम्पलेक्स के रूप में।

    39.प्रश्नः चमड़े से निर्मित नागरी एवं मोजरी कहाँ की प्रसिद्ध हैं?

    उत्तरः जयपुर एवं जोधपुर।

    40.प्रश्नः लकड़ी की कठपुतलियां मय चित्रांकन कहाँ बनती हैं?

    उत्तरः उदयपुर में।

    41.प्रश्नः ऊँट की खाल से बनी विविध वस्तुओं को सोने की बारीक नक्काशी और तारबंदी करके आकर्षक रूप से कहाँ सजाया जाता है?

    उत्तरः बीकानेर।

    42.प्रश्नः राजस्थान में सरसों के तेल का प्रमुख उद्योग किस जिले में है?

    उत्तरः भरतपुर।

    43.प्रश्नः राजस्थान नेशनल केमिकल एण्ड फर्टीलाइजर्स कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः चित्तौड़गढ़ जिले के कपासन में।

    44.प्रश्नः लेटा, मांगरोल एवं सालावास क्यों प्रसिद्ध हैं?

    उत्तरः लेटा में खेस बुने जाते हैं। मांगरोल में खादी बुनी जाती है। सालावास में दरियां बनती हैं।


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  • राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध रूस के जार से सहायता मांगी

     02.06.2020
    राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध  रूस के जार से सहायता मांगी

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1818 में राजपूताना के शासक विभिन्न कारणों से ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने को विवश हुए थे किंतु 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद कम्पनी का स्थान ब्रिटिश ताज ने ले लिया। इसके बाद अंग्रेज जाति राजपूताना रियासतों की निरंकुश मालिक हो गयी। भारत में पदस्थापित अंग्रेज अधिकारियों को अब कम्पनी नहीं चलानी थी, ब्रिटिश ताज के प्रतिनिधि के रूप में भारत पर शासन करना था। इस कारण अंग्रेज अधिकारियों के साथ राजपूत राजाओं के जो सम्बन्ध ई.1818 से लेकर 1858 के बीच रहे थे, उन सम्बन्धों में ई.1858 के पश्चात् बड़ा परिवर्तन आ गया था। रूस के इतिहासकारों ने दावा किया है कि ई.1860 से ई.1866 के बीच राजपूताने के राजाओं ने रूस से आग्रह किया था कि वह भारत को अंग्रेजों के नियंत्रण से निकालने के लिये भारत पर आक्रमण करे। इन दस्तावेजों के अनुसार जोधपुर नरेश तख्तसिंह ने अपने दामाद जयपुर नरेश रामसिंह और अपने समधी रींवा नरेश महाराजा रघुराजसिंह जूदेव के सहयोग से अपना एक दूत रूस के जार निकोलस को भिजवाया तथा उससे कहलवाया कि वह भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने में राजाओं को सहायता दे। ई.1964 में रूस के पुरातत्वशास्त्री एन. ए. खालफिन ने इस तथ्य को उजागर किया कि ई.1860 में कश्मीर के महाराजा रणवीरसिंह ने मध्य एशिया में तुर्किस्तान के रूसी गवर्नर के पास संदेश भेजा कि भारत से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ने हेतु भारतीय राजा रूस की सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। खालफिन के अनुसार ई.1866 में जोधपुर, जयपुर, बीकानेर व हैदराबाद के शासकों ने इन्दौर महाराजा के नेतृत्व में निश्चय किया कि अंग्रेजों को भारत से निकालने हेतु रूस के शासकों से सहायता ली जानी चाहिये। इस निर्णय की क्रियान्विति हेतु उन्होंने एक शिष्टमण्डल ताशकंद भेजा था। 1858 के बाद से भारत का गवर्नर जनरल देशी रियासतों से वायसराय की हैसियत से सम्बन्ध स्थापित करने लगा था। इन गवर्नर जनरलों ने वायसराय की हैसियत से राजपूताना की रियासतों पर अपना प्रभुत्व प्रदर्शित करने के लिये कई उपाय किये। गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड मेयो ने 22 अक्टूबर 1870 को अजमेर दरबार का आयोजन किया जिसमें राजपूताने के समस्त नरेशों को सम्मिलित होने का आदेश दिया गया। इस प्रकार के दरबारों की पुनरावृत्ति बार-बार की गयी। इन दरबारों में गवर्नर जनरल और वायसराय इंग्लैण्ड के शासक के प्रतिनिधि के रूप में सर्वोच्च सत्ता के रूप में अध्यक्षता करने वाला अधिकारी होता था। अंग्रेज अधिकारियों के अनुचित हस्तक्षेप के कारण कई बार राजाओं और अंग्रेज अधिकारियों के बीच भारी टकराव हो जाता था किंतु ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर देशी राज्यों के शासकों को हानि ही उठानी पड़ती थी। लॉर्ड मेयो द्वारा आयोजित अजमेर दरबार में मारवाड़ (जोधपुर) रियासत के राजा तख्तसिंह की कुर्सी जयपुर और उदयपुर नरेशों की कुर्सियों के पीछे लगायी गयी थी। महाराजा तख्तसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और वह दरबार में शामिल हुए बिना ही जोधपुर लौट आया। अंग्रेजी सरकार जोधपुर नरेश के आगमन पर 17 तोपों की सलामी देती थी किंतु इस घटना से नाराज होकर लॉर्ड मेयो ने तखतसिंह को दी जाने वाली तोपों की सलामी की संख्या घटाकर 15 कर दी। भारतीय संसाधनों से अधिकतम लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने ई.1870 से 1880 के दशक में विभिन्न राज्यों से नमक संधियां व मादक पदार्थ संधियां कीं। इन संधियों के तहत प्रत्येक राज्य द्वारा उत्पादित किये जाने वाले नमक की सीमा निर्धारित की गयी तथा राज्य में बाहर से खरीदे जाने वाले नमक के लिये आवश्यक कर दिया गया कि केवल वही नमक खरीदा जायेगा जिस पर अंग्रेज सरकार द्वारा कर वसूली कर ली गयी हो तथा ऐसे नमक पर राज्य सरकार किसी तरह का मार्ग कर नहीं लगायेगी। इन संधियों के तहत राज्यों को अंग्रेज सरकार द्वारा वार्षिक धनराशि भी प्रदान की गयी। इस प्रकार की संधि जोधपुर राज्य के साथ ई.1870 में, जयपुर, बीकानेर मेवाड़, भरतपुर, सिरोही, धौलपुर तथा अलवर राज्यों के साथ ई.1879 में, झालावाड़ के साथ 1881 में एवं शाहपुरा, बूंदी, कोटा, करौली व अन्य राज्यों के साथ ई.1882 में की गयी। राजपूताने के मालवा क्षेत्र में अफीम के वृहत् उत्पादन तथा पूरे राजपूताना में इसके विशाल व्यापार को देखते हुए मादक द्रव्यों के सम्बन्ध में की गयी संधियों के तहत राज्यों पर प्रतिबंध लगाया गया कि वे राज्यों से ब्रिटिश भारत के क्षेत्रों में मादक द्रव्यों का निर्यात नहीं करेंगे। राजा लोग अनुभव कर रहे थे कि वे अपने ही राज्यों में सत्ता के कनिष्ठ भागीदार होते जा रहे हैं किंतु उन्होंने अधीनता की इस स्थिति को स्वीकार किया और वे साम्राज्य में कनिष्ठ भागीदार बन गये क्योंकि उन्हें अपने राज्यों के शासक के रूप में उनके अस्तित्व की निरंतरता का आश्वासन दे दिया गया था। अब राजाओं के स्थान पर देशी राज्यों में नियुक्त पोलिटिकल एजेण्ट निरंकुश शासक थे। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। ई.1900 में पोलिटिकल एजेंट कप्तान एस. एफ. बेली हनुमानगढ़ जिले में भ्रमण के लिये आया। उस समय बीकानेर राज्य में शिकार पर प्रतिबंध था तथा बिना अनुज्ञा पत्र (लाइसेंस) लिये किसी भी पशु-पक्षी का शिकार नहीं किया जा सकता था। अतः महाराजा गंगासिंह ने कप्तान बेली को शिकार खेलने का अनुज्ञा पत्र भिजवा दिया ताकि यदि बेली शिकार खेले तो किसी अप्रिय स्थिति का सामना नहीं करना पड़े। बेली ने महाराजा गंगासिंह को लिखा कि आपके द्वारा शिकार खेलने का अनुज्ञा पत्र पाकर मेरा बड़ा मनोरंजन हुआ। मैं इस अनुज्ञा पत्र को फ्रेम में मंढ़वा कर रखूंगा तथा अपने साथियों को भी दिखाऊंगा कि बीकानेर इतना उन्नत राज्य है जहाँ पोलिटिकल एजेंट भी बिना लाइसेंस के शिकार नहीं खेल सकते। महाराजा गंगासिंह पोलिटिकल एजेण्ट की इस हरकत से तिलमिला कर रह गये किंतु उसके विरुद्ध कर कुछ नहीं सके। उसके विरुद्ध कुछ करना तो दूर की बात है, जब 1900 में अंग्रेजों ने चीन युद्ध लड़ा तो महाराजा गंगासिंह ने बेली के समक्ष प्रस्ताव भेजा कि मैं भी इस युद्ध में जाना चाहता हूँ। कप्तान बेली ने महाराजा गंगासिंह के प्रस्ताव का उपहास उड़ाते हुए 5 नवम्बर 1900 को उन्हें एक पत्र लिखा- सर डब्लू. कनिंघम ने आशा जताई है कि यह जानकर आपका दुख हलका हो जायेगा कि ऐसे गहन दुर्भिक्ष तथा संकट के समय में, जैसा कि इस समय राजपूताने में विद्यमान है, एक नरेश साम्राज्ञी के शत्रुओं के विरुद्ध समरभूमि में अपनी व्यक्तिगत सेवा से भी अधिक, अपने राज्य तथा प्रजा के हितों की देखभाल करके साम्राज्ञी को अधिक मूल्यवान सेवायें अर्पित कर सकता है। इस उपहासात्मक इन्कार के बावजूद महाराजा गंगासिंह ने अपनी स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अंग्रेज सरकार से चीन युद्ध में लड़ने की स्वीकृति प्राप्त की और वह अपनी जनता को अकाल में तड़पता हुआ छोड़कर युद्ध में भाग लेने के लिये चीन गया।

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  • अध्याय - 64 राजकीय संग्रहालय डीग

     02.06.2020
    अध्याय - 64 राजकीय संग्रहालय डीग

    अध्याय - 64


    राजकीय संग्रहालय डीग 

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    डीग संग्रहालय, भरतपुर नरेशों एवं राज-परिवार के सदस्यों द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुओं तथा फर्नीचर इत्यादि के संग्रह से बना है। इस संग्रह में 547 वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जिनमें से सर्वोत्तम वस्तुएं गोपाल भवन और किशन भवन में रखी गई हैं। गोपाल भवन, डीग महल परिसर के अन्दर निर्मित इमारतों में सबसे बड़ी और सर्वाधिक प्रभावशाली इमारत है जिसमें संग्रहालय का प्रमुख भाग स्थित है। महाराजा सूरजमल ने ई.1756-63 के दौरान किशन भवन और गोपाल भवन का निर्माण करवाया था।

    दीर्घाओं में प्रदर्शित वस्तुओं में मुख्य कक्ष, मानसिंह कक्ष, अंग्रेजी और भारतीय भोजन कक्ष, महाराजा का शयन कक्ष, एडीसी कक्ष, बिलियर्ड कक्ष, महाराजा का कमरा, गोपाल भवन में रानी का निवास तथा जनाना निवास स्थान शामिल हैं। चन्दन की लकड़ी से निर्मित भगवान वेणुगोपाल की एक मनोहारी प्रतिमा दर्शकों को सबसे पहले दिखाई पड़ती है। अन्य वस्तुओं में हाथी के पैरों की आकृति में बने सिगरेट-केस और इत्र-केस, पुराने फर्नीचर, फारसी कालीन और बर्तन शामिल हैं।

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में कृषि आधारित उद्योग

     07.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में कृषि आधारित उद्योग

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 55

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में कृषि आधारित उद्योग

    1.प्रश्नः कृषि आधारित उद्योग किसे कहते हैं?

    उत्तरः कृषिगत कच्चे माल पर आधारित उद्योग कृषि आधारित उद्योग कहलाते हैं।

    2.प्रश्नः राज्य में कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योग कौनसे हैं?

    उत्तरः सूती वस्त्र उद्योग, शक्कर उद्योग, वनस्पति घी एवं तेल उद्योग तथा ग्वार गम उद्योग।

    3.प्रश्नः राजस्थान में खाद्यान्न पर आधारित कौनसे उद्योग लगे हुए हैं?

    उत्तरः बेकरी, कन्फेक्शनरी तथा अन्य फूड प्रोसेसिंग इकाइयाँ।

    4.प्रश्नः तिलहन पर आधारित कौनसे उद्योग लगे हुए हैं?

    उत्तरः तेल मिलें, वनस्पति घी मिलें, साबुन निर्माण इकाइयाँ।

    5.प्रश्नः राजस्थान में दलहन पर आधारित कौनसे उद्योग लगे हुए हैं?

    उत्तरः दाल मिलें।

    6.प्रश्नः राजस्थान में कपास पर आधारित कौनसे उद्योग लगे हुए हैं?

    उत्तरः कॉटन जिनिंग मिलें एवं सूती कपड़ा मिलें।

    7.प्रश्नः राजस्थान में गन्ना एवं चुकंदर पर आधारित कौनसे उद्योग लगे हुए हैं?

    उत्तरः चीनी मिलें

    8.प्रश्नः राजस्थान में ग्वार पर आधारित कौनसे उद्योग लगे हुए हैं?

    उत्तरः ग्वार गम मिलें

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. मुख्य परीक्षा वर्ष 1994- राजस्थान में कृषि पर आधारित कौन-कौन से प्रमुख उद्योग धंधे स्थापित किये जा सकते हैं? सूती वस्त्र उद्योग

    9.प्रश्नः किस उद्योग से ग्रामीण जनसंख्या को सर्वाधिक रोजगार प्राप्त होता है?

    उत्तरः सूती वस्त्र उद्योग

    10.प्रश्नः राज्य की पहली सूती वस्त्र मिल कौनसी थी?

    उत्तरः श्री कृष्णा मिल्स लि, 1889 में स्थापित हुई।

    11.प्रश्नः स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राज्य में कितनी सूती वस्त्र मिलें थीं?

    उत्तरः 7

    12.प्रश्नः वर्तमान में राज्य में कितनी सूती वस्त्र मिलें हैं?

    उत्तरः कुल 28 सूती वस्त्र मिलें हैं जिनमें से 17 निजी क्षेत्र में, 7 संयुक्त क्षेत्र में, 4 सहकारी क्षेत्र में तथा 3 मिलें राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन हैं। इनमें से 23 कताई मिलें तथा 5 कम्पोजिट मिलें हैं।

    13.प्रश्नः राज्य के किन जिलों में सर्वाधिक कपास बोई जाती है?

    उत्तरः राज्य का 75 प्रतिशत कपास क्षेत्र गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले में है जहाँ राज्य का 80 प्रतिशत कपास उत्पन्न होता है।

    14.प्रश्नः कपास उत्पादित करने वाले अन्य जिले कौनसे हैं?

    उत्तरः पाली, बीकानेर, अलवर, भीलवाड़ा, बाँसवाड़ा, कोटा और उदयपुर

    15.प्रश्नः राज्य में कपड़ा मिलें किन जिलों में स्थित हैं?

    उत्तरः राज्य की 28 कपड़ा मिलों में से 7 भीलवाड़ा जिले में, 5 उदयपुर जिले में, 5 अलवर जिले में, 4 बाँसवाड़ा जिले में, 4 मिलें गंगानगर जिले में हैं। जोधपुर, जयपुर, पाली, कोटा और सिरोही जिले में 2-2 मिलें हैं।

    16.प्रश्नः राज्य में कौनसा जिला सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख केंद्र है?

    उत्तरः भीलवाड़ा

    17.प्रश्नः राज्य में सहकारी कॉटन कॉम्पलैक्स की स्थापना किस संस्था की सहायता से की गयी है?

    उत्तरः विश्व बैंक की सहायता से।

    18.प्रश्नः राज्य में सहकारी कताई मिलें कहाँ कार्यरत हैं?

    उत्तरः गंगापुर (भीलवाड़ा), गुलाबपुरा (भीलवाड़ा) और हनुमानगढ़।

    19.प्रश्नः मयूर एवं बी.एस.एल. क्यों प्रसिद्ध हैं?

    उत्तरः मयूर (गुलाबपुरा) एवं बी.एस.एल. (भीलवाड़ा) मिलों का कपड़ा उन्नत किस्म के कपड़े के लिये भारत भर में प्रसिद्ध है।

    20.प्रश्नः राजस्थान सहकारी कताई मिल लि. गुलाबपुरा की स्थापना कब एवं कहाँ हुई?

    उत्तरः ई.1965 में भीलवाड़ा जिले के गुलाबपुरा कस्बे में।

    21.प्रश्नः भीलवाड़ा में किन करघों से कपड़ा बुना जाता है?

    उत्तरः जर्मन करघों से

    22.प्रश्नः राज्य में राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन कपड़ा मिलें कौनसी हैं?

    उत्तरः एडवर्ड मिल्स एवं श्री महालक्ष्मी मिल्स राष्ट्रीय कपड़ा निगम के अधीन हैं। राजस्थान का मैनचेस्टर भीलवाड़ा

    23.प्रश्नः किस शहर को राजस्थान का मैनचेस्टर कहते हैं?

    उत्तरः भीलवाड़ा

    24.प्रश्नः भारत सरकार के वाणिजय एवं उद्योग मंत्रालय ने किस शहर को टाउन ऑफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस फॉर टैक्सटाइल घोषित किया है?

    उत्तरः भीलवाड़ा

    25.प्रश्नः वर्तमान में राजस्थान में कितनी स्पिनिंग मिलें हैं?

    उत्तरः राजस्थान में 34 स्पिनिंग मिलें हैं।

    26.प्रश्नः भीलवाड़ा जिले में कितनी स्पिनिंग मिलें हैं?

    उत्तरः 14

    27.प्रश्नः राजस्थान की स्पिनिंग मिलों में कुल कितने स्पिण्डल्स हैं?

    उत्तरः राज्य में कुल 7.31 लाख स्पिण्डल हैं।

    28.प्रश्नः राज्य के कुल स्पिण्डल्स में से कितनी भीलवाड़ा जिले में स्थापित हैं?

    उत्तरः 46.50 प्रतिशत

    29.प्रश्नः भीलवाड़ा जिले में धागे का कितना उत्पादन होता है?

    उत्तरः 1.30 लाख टन, (राज्य में कुल धागा उत्पादन का 44 प्रतिशत)

    30.प्रश्नः प्रदेश के धागा निर्यात में भीलवाड़ा का कितना हिस्सा है?

    उत्तरः प्रदेश का 64 प्रतिशत धागा भीलवाड़ा से निर्यात होता है।

    31.प्रश्नः भीलवाड़ा में कितनी टैक्सटाइल वीविंग इकाइयाँ हैं?

    उत्तरः भीलवाड़ा में 425 से अधिक टैक्सटाइल वीविंग इकाइयाँ हैं। इनमें 16,246 लूम स्थापित हैं। इनमें से 85 प्रतिशत लूम आधुनिक तकनीक के शटल लैस अथवा एयर जेट लूम्स हैं।

    32.प्रश्नः भीलवाड़ा में कितने आधुनिक प्रोसेस हाउस हैं ?

    उत्तरः भीलवाड़ा में 19 आधुनिक प्रोसेस हाउस हैं जिनकी क्षमता प्रतिवर्ष 65 से 70 लाख मीटर कपड़ा प्रोसेस करने की है।

    33.प्रश्नः भीलवाड़ा में टैक्सटाइल व्यवसाय का कुल टर्न ओवर कितना है?

    उत्तरः 15 हजार करोड़ रुपये

    34.प्रश्नः भीलवाड़ा के टैक्सटाइल उद्योग में कितने लेागों को रोजगार मिला हुआ है?

    उत्तरः इस उद्योग में भीलवाड़ा जिले में 45 हजार लोगों को प्रत्यक्ष एवं 60 हजार लोगों को परोक्ष रोजगार मिला हुआ है।

    35.प्रश्नः भीलवाड़ा से प्रतिवर्ष कितना फैब्रिक (सूटिंग उत्पाद) निर्यात होता है?

    उत्तरः भीलवाड़ा से प्रतिवर्ष 550 करोड़ रुपये मूल्य का 7-8 करोड़ मीटर फैब्रिक निर्यात होता है।

    36.प्रश्नः जिले की विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा प्रति वर्ष कितने मूल्य का निर्यात किया जाता है?

    उत्तरः 2,150 करोड़ रुपये मूल्य का, इसमें से टैक्सटाइल क्षेत्र से 1485 करोड़ रुपये का, मिनरल क्षेत्र से 545 करोड़ रुपये का तथा 120 करोड़ रुपये मूल्य का अन्य विविध क्षेत्रों से निर्यात होता है।

    इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न

    1 आर.ए.एस. प्रारंभिक परीक्षा 2008, सामान्य ज्ञान, कौनसा शहर राजस्थान का मैनचेस्टर कहा जा सकता है- कोटा/पाली/ ब्यावर/ भीलवाड़ा? प्रिण्टिंग एण्ड डाइंग उद्योग

    37.प्रश्नः जोधपुर में प्रतिदिन कितने प्रिंण्ट फैब्रिक का निर्माण होता है?

    उत्तरः चार लाख मीटर प्रिंण्ट फैब्रिक प्रतिदिन

    38.प्रश्नः जोधपुर में प्रिंण्ट फैब्रिक निर्माण में कितने वस्त्र निर्माता कार्यरत हैं?

    उत्तरः 20 मुख्य वस्त्र निर्माता एवं 50 अन्य निर्माता

    39.प्रश्नः जोधपुर में प्रतिवर्ष कितने रुपये का कपड़ा बेचा जाता है?

    उत्तरः 200 करोड़ रुपये

    40.प्रश्नः देश का पहला इंटीग्रेटेड टैक्सटाइल पार्क कहाँ बनेगा?

    उत्तरः पाली जिला मुख्यालय पर।

    41.प्रश्नः इंटीग्रेटेड टैक्सटाइल पार्क में क्या सुविधाएं होंगी?

    उत्तरः कताई, बुनाई, छपाई, रंगाई, कसीदाकारी आदि की सुविधाएं। पार्क को कच्चा माल उपलब्ध करवाया जायेगा तथा पाली से ही सीधे निर्यात की सुविधा भी जायेगी।

    42.प्रश्नः जोधपुर, पाली एवं बालोतरा का डाइंग-प्रिण्टिंग उद्योग खतरे में क्यों है?

    उत्तरः लूनी, बाण्डी एवं जोजरी आदि नदियों में हो रहे प्रदूषण के कारण इस उद्योग को कानूनी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है।

    43.प्रश्नः नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने किस नगर में चल रही 541 औद्योगिक इकाइयाँ बंद करने के आदेश दिये हैं?

    उत्तरः पाली नगर में।

    44.प्रश्नः राज्य में कौनसी इकाइयाँ सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाली सिद्ध हो रही हैं?

    उत्तरः टैक्सटाइल प्रिण्टिंग एण्ड डाइंग यूनिट्स तथा ईंट भट्टा यूनिट्स। प्रदेश में 18 हजार से अधिक उद्योगों को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मण्डल ने बंद करने के नोटिस दिये हैं। सर्वाधिक 900 नोटिस सांगानेर क्षेत्र में प्रिण्टिंग एण्ड डाइंग यूनिट्स को दिये गये हैं। जयपुर और दौसा में मिलाकर 1750 नोटिस दिये गये हैं। चीनी उद्योग

    45.प्रश्नः राज्य में गन्ने का उत्पादन किन जिलों में अधिक होता है?

    उत्तरः बूँदी, चित्तौड़गढ़, गंगानगर और उदयपुर।

    46.प्रश्नः राज्य में चीनी बनाने कितने कारखाने हैं?

    उत्तरः तीन।

    47.प्रश्नः राज्य में चीनी बनाने के तीन बड़े कारखाने किन जिलों में स्थित हैं?

    उत्तरः भूपालसागर (चित्तौड़गढ़), श्रीगंगानगर, केशोरायपाटन (बूँदी)।

    48.प्रश्नः राज्य का सबसे पुराना चीनी कारखाना कौनसा है?

    उत्तरः ई.1932 में स्थापित दी मेवाड़ शुगर मिल्स भोपाल सागर (चित्तौड़गढ़)।

    49.प्रश्नः मेवाड़ शुगर मिल्स भोपाल सागर किस क्षेत्र का उद्यम है?

    उत्तरः निजी क्षेत्र।

    50.प्रश्नः दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. गंगानगर की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः ई. 1946

    51.प्रश्नः दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. किसके स्वामित्व में है?

    उत्तरः 97 प्रतिशत अंशों पर राज्य सरकार का तथा 3 प्रतिशत अंशों पर निजी व्यक्तियों का अधिकार है।

    52.प्रश्नः दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. का पुराना नाम क्या है?

    उत्तरः बीकानेर औद्योगिक निगम लि.

    53.प्रश्नः दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. गंगानगर किस क्षेत्र का उद्यम है?

    उत्तरः सार्वजनिक क्षेत्र।

    54.प्रश्नः दी गंगानगर शुगर मिल्स लि. के अधीन कौनसे कारखाने हैं?

    उत्तरः (1.) शराब एवं स्पिरिट बनाने का कारखाना जिसके केन्द्र अजमेर, अटरू, जोधपुर एवं प्रतापगढ़ में हैं। (2.) काँच बनाने का कारखाना, दी हाईटेक प्रीसीजन ग्लास वर्क्स, धौलपुर में है।

    55.प्रश्नः श्री केशोरायपाटन शुगर मिल्स लि. जिला बूँदी की स्थापना कब हुई?

    उत्तरः ई. 1965

    56.प्रश्नः केशोरायपाटन शुगर मिल्स किस क्षेत्र का उद्यम है?

    उत्तरः सहकारी क्षेत्र।

    57.प्रश्नः किस जिले में नई चीनी मिल बन रही है?

    उत्तरः श्रीगंगानगर जिले में पुरानी चीनी मिल के स्थान पर करणपुर पंचायत समिति के गाँव कमीनपुरा में नई चीनी मिल स्थापित की जा रही है। इस पर 180 करोड़ रुपये की लागत आई है। वनस्पति घी उद्योग

    58.प्रश्नः राज्य में वनस्पति घी बनाने का पहला कारखाना कहाँ स्थापित किया गया था?

    उत्तरः भीलवाड़ा में।

    59.प्रश्नः वर्तमान में वनस्पति घी बनाने के राज्य में कितने कारखाने हैं?

    उत्तरः 9 कारखाने हैं जो भीलवाड़ा, जयपुर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, गंगानगर, अलवर तथा टोंक में स्थित हैं।

    60.प्रश्नः महाराजा वनस्पति और आमेर वनस्पति किस जिले से सम्बन्धित हैं?

    उत्तरः जयपुर।

    61.प्रश्नः राज्य में वनस्पति तेल के कारखाने किन जिलों में स्थित हैं?

    उत्तरः भरतपुर, जयपुर, अलवर, टोंक, सवाईमाधोपुर, अजमेर, नागौर, दौसा, जोधपुर और बीकानेर। ग्वार गम उद्योग

    62.प्रश्नः ग्वार के दानों में कितना गोंद पाया जाता है?

    उत्तरः 28 से 30 प्रतिशत

    63.प्रश्नः ग्वार के गोंद का उपयोग कहाँ होता है?

    उत्तरः कपड़ा उद्योग, दवा उद्योग, खाद्य पदार्थ, श्ंगार एवं प्रसाधन सामग्री बनाने में।

    64.प्रश्नः राज्य में ग्वार दाने से पाउडर बनाने की कितनी इकाइयाँ हैं?

    उत्तरः लगभग 50

    65.प्रश्नः राज्य में गवार गम इकाइयाँ कहाँ स्थित हैं?

    उत्तरः जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर और सरदार शहर (चूरू)

    66.प्रश्नः देश की पहली ग्वारगम परीक्षण प्रयोगशाला कहाँ स्थापित की गई है?

    उत्तरः बोरानाडा (जोधपुर)।

    67.प्रश्नः ग्वारगम, हैण्डीक्राफ्ट तथा अन्य विशिष्ट उत्पादों के विकास के लिये उच्च श्रेणी अनुसंधान विकास केन्द्र की स्थापना कहाँ की गई है?

    उत्तरः बोरानाडा (जोधपुर)। मसाला पार्क

    68.प्रश्नः जोधपुर में स्थापित मसाला पार्क राज्य का कौनसा स्पाईस पार्क है?

    उत्तरः यह देश का सातवां एवं राज्य का पहला स्पाईस पार्क है

    69.प्रश्नः यह पार्क कहाँ स्थापित किया गया है?

    उत्तरः जोधपुर जिले के ओसियां उपखण्ड के रामपुरा भाटियान गाँव में।

    70.प्रश्नः इस पार्क की स्थापना का क्या उद्देश्य है?

    उत्तरः मसालों की गुणवत्ता में सुधार लाना, ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग, पैकिंग को बढ़ावा देना एवं किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार उपलब्ध करवाना ।

    71.प्रश्नः राज्य में किन मसालों की खेती की जाती है?

    उत्तरः जीरा, मिर्च, धनिया, मेथी, राई, सौंफ, अजवायन, हल्दी, सौंठ आदि। एग्री एक्सपोर्ट जोन (ए.ई.जेड.)

    72.प्रश्नः एग्री एक्सपोर्ट जोन की स्थापना क्यों की जाती है?

    उत्तरः कृषि विपणन एवं निर्यात को बढ़ावा देने के लिये

    73.प्रश्नः एग्री एक्सपोर्ट जोन के विकास हेतु किस संस्था को नोडल ऐजेंसी बनाया गया है?

    उत्तरः राज्य कृषि विपणन बोर्ड

    74.प्रश्नः जीरे के लिये एग्री एक्सपोर्ट जोन बनाने हेतु किन जिलों का चयन किया गया है?

    उत्तरः जोधपुर, बाड़मेर, जालोर, नागौर व पाली।

    75.प्रश्नः धनिये के लिये एग्री एक्सपोर्ट जोन बनाने हेतु किन जिलों का चयन किया गया है?

    उत्तरः कोटा, बाराँ, झालावाड़, बूँदी एवं चित्तौड़गढ़। फूड पार्क

    76.प्रश्नः राज्य में पहला एग्रो फूड पार्क कहाँ स्थापित किया जा रहा है?

    उत्तरः कोटा

    77.प्रश्नः राज्य में मेगा फूड पार्क कहाँ विकसित किया जायेगा?

    उत्तरः जयपुर

    78.प्रश्नः मेगा फूड पार्क किस उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है?

    उत्तरः मेगा फूड पार्क में फूड प्रोसेसिंग और एग्री बिजनिस यूनिट खुलेंगी। स्थानीय किसानों को कृषि जिंसों, फल और सब्जियों के लिये बड़ा बाजार उपलब्ध होगा। कृषि उत्पाद उद्योगों के लिये कच्चा माल बिकने से किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत मिलेगी।

    79.प्रश्नः राज्य में कार्बनिक खाद्य उत्पाद तैयार करने हेतु आदर्श डेरिवेटिव लि. द्वारा फूड प्रोसेसिंग इकाइयाँ कहाँ स्थापित की जाएगी?

    उत्तरः जोधपुर, बीकानेर एवं श्रीगंगानगर। श्रीगंगानगर में गेहूँ एवं बाजरा आधारित इकाई लगेगी। बीकानेर में मोठ के उत्पाद एवं मूंगफली के तेल की इकाई और जोधपुर में मंग के उत्पाद एवं मूंगफली के तेल की इकाई लगेगी।

    80.प्रश्नः कार्बनिक खाद्य उत्पाद क्या होते हैं?

    उत्तरः भोजन में छः मुख्य अवयव होते हैं जिनमें से वसा, कार्बोहाइड्रेट एवं प्रोटीन को कार्बनिक कहा जाता है।


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  • राष्ट्र-अपमान की भाषा बोल रहे हैं विपक्षी दलों के नेता

     02.06.2020
    राष्ट्र-अपमान की भाषा बोल रहे हैं विपक्षी दलों के नेता

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    स्वस्थ लोकतंत्र में वैचारिक संघर्ष, बहस तथा नीतिगत विरोध एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि ऐसा न हो तो संसदीय शासन प्रणाली गूंगी-बहरी गुड़िया से अधिक कुछ भी नहीं किंतु जब से केन्द्र में नरेन्द्र भाई मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी है, तब से विपक्षी दलों के नेता जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह किसी भी तरह राष्ट्र अपमान की भाषा से कम नहीं। सरकार की नीतियों के विरोध का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि देश से लोकतंत्र की जड़ें ही खोद डाली जाएं या शत्रुओं की तरफ खड़े होकर देश पर पत्थर फैंके जाएं या फिर ऐसा करने वालों के समर्थन में आवाज उठाई जाए और उसे आजादी का नाम दिया जाए!

    जम्मू काश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा है कि यदि काश्मीर से धारा 35 ए हटी तो जिस तिरंगे को हमारे आदमी उठाते हैं, उस तिरंगे को काश्मीर में कोई कांधा देने वाला नहीं मिलेगा। जम्मू-काश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्लाह कह रहे हैं कि भारत की पूरी सेना मिलकर भी आतंकवादियों से हमारी रक्षा नहीं कर सकती। यह तो तब है जब हुर्रियत के बड़े नेता देश के खिलाफ प्रच्छन्न युद्ध लड़ने वालों को धन पहुंचाने के आरोप में सलाखों के पीछे जा चुके हैं तथा एनआईए इस घिनौने अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र के काफी बड़े हिस्से का पर्दा फाश कर चुकी है। जिस 35 ए के हटने के भय से काश्मीरी नेता इतने बेचैन हुए जा रहे हैं, काश्मीर की सारी समस्या की जड़ यही धारा है जिसे जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से अध्यादेश के माध्यम से संविधान संशोधन के रूप में लागू करवाया और जिसे संसद ने आज तक स्वीकृति नहीं दी। इसी धारा ने काश्मीर को भारत रूपी समुद्र में एक स्वायत्तशासी टापू में बदल दिया जो भारत के संविधान से मुक्त रहकर, भारत के चीनी, चावल, पैट्रोल और सीमेंट को मजे से जीम रहा है। इसी धारा की आड़ में काश्मीरी नेता दिल्ली आकर आलीशान बंगलों में रहते हैं और आम भारतीय, काश्मीर में झौंपड़ा तक नहीं खरीद सकता। अब मुफ्ती तथा अब्दुल्लाह को इस धारा के हटने का भय सता रहा है।

    पीडीपी, नेशनल कान्फ्रेन्स तथा हुर्रियत के नेताओं द्वारा लगाई गई इस आग में घी डालने का काम राहुल गांधी, मणिशंकर अय्यर, संदीप दीक्षित और उनके बहुत से साथी बहुत सफलता से कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि प्रधानमंत्री अपने फायदे के लिए काश्मीरी लोगों का खून बहा रहे हैं तो कोई पाकिस्तान में जाकर कह रहा है कि पाकिस्तान, नरेन्द्र मोदी की सरकार गिराकर कांग्रेस की सरकार बनवा दे। विनोद शर्मा जैसे पत्रकार भी हुर्रियत के नेताओं से गलबहियां मिलते हुए देखे गए हैं। ममता बनर्जी तो कंधे पर तृणमूल का झण्डा लेकर, भारत को जनता द्वारा भारी बहुमत से चुनी गई सरकार से मुक्त करने के मिशन पर निकली ही हुई हैं, हालांकि वे इस मिशन का उद्देश्य भारत को बीजेपी से मुक्त कराना बता रही हैं।

    जनता दल यू के शरद पंवार की आत्मा भी इन दिनों काफी बेचैन है। राजद के लालू यादव सारी मर्यादाएं भूलकर देश के प्रधानमंत्री के विरुद्ध ऐसा अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं जो राष्ट्रीय अपमान की सीमाओं को स्पर्श करता है। कम्यूनिस्टों का हाल ये है कि वे भारतीय सेना को चीनी हमले से भयभीत करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे। संभवतः उनके मन में ये है कि भारत भयभीत होकर साम्यवादी चीन के कॉमर्शियल कॉरीडोर के नाम पर बन रहे मिलिट्री कॉरीडोर को बन जाने दे। विभिन्न विपक्षी दलों के इन नेताओं को क्यों यह समझ में नहीं आता कि देश की जनता को अधिक समय तक गुमराह नहीं किया जा सकता। देर-सबेर ही सही, जनता तक सच पहुंच ही जाता है, ठीक उसी तरह जिस तरह आयकर विभाग मीसा भारती, तेज प्रताप तथा तेजस्वी यादव की छिपी हुई सम्पत्तियों तक पहुंच गया है और एनआईए हुर्रियत नेताओं को पकड़कर सलाखों के पीछे खींच ले गई है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  • अध्याय - 65 राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

     02.06.2020
    अध्याय - 65 राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    अध्याय - 65

    राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

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    राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, राष्ट्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय नई दिल्ली का आंचलिक केन्द्र है और भारत सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन आता है। प्राकृतिक इतिहास को संजोकर रखने वाला यह संग्रहालय, देश में अपनी तरह का पांचवा संग्रहालय है। अन्य संग्रहालय दिल्ली, भोपाल, भुवनेश्वर और मैसूर में हैं। प्राकृतिक इतिहास राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय का उद्घाटन 1 मार्च 2014 को रामसिंहपुरा (जिला सवाईमाधोपुर) में किया गया। इस संग्रहालय को तैयार करने में लगभग साढ़े वर्ष का समय लगा।

    संग्रहालय का भवन, स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है।यह संग्रहालय विद्यार्थियों एवं जिज्ञासुओं के लिए ज्ञान का खजाना एवं आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। इस संग्रहालय में प्रकृति की प्रमुख विरासतों को संजोकर रखा गया है। इस संग्रहालय में विभिन्न जीव-जंतुओं की तस्वीरें, सुंदर मूर्तियां और प्रकृति के विभिन्न रंगों को समेटने वाली पेंटिग्स की अद्भुत प्रदर्शनी देखने योग्य है। 7.2 एकड़ में फैले इस संग्रहालय में जैव विविधता को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई वस्तुएं हैं। यह संग्रहालय शैक्षिक महत्व के साथ-साथ पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों के बीच के सम्बन्धों को सरल ढंग से दिखाता है। इस संग्रहालय में एक लघु पुस्तकालय भी है जिसमें जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों पर आधारित 10 हजार से अधिक पुस्तकें हैं।

    राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय में प्रदर्शित पश्चिमी घाट की जैव विविधता, राष्ट्रीय पार्क के जीव-जंतु, भारत की जन जातियां, जीव-जंतु की दीर्घाएं ज्ञान का अनुपम भंडार हैं। संग्रहालय में दिन में दो बार, वन्य जीवों पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है। राजीव गांधी म्यूजियम में जैव विविधता के दर्शन के साथ अन्य कई सुविधाएं हैं। यहाँ का पुस्तकालय, ईको थिएटर, सभागार एवं पेटिंग्स देखने योग्य हैं।

    संस्थान द्वारा जिला एवं राज्य स्तर की विज्ञान प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाया जाता है। पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए समय-समय पर प्रदर्शनियों का आयोजन करवाया जाता है।

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  • अध्याय - 65

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  • राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में पशुधन आधारित उद्योग

     07.12.2021
    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी  : राजस्थान में पशुधन आधारित उद्योग

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी - 56

    राजस्थान ज्ञानकोश प्रश्नोत्तरी : राजस्थान में पशुधन आधारित उद्योग ऊन उद्योग

    1.प्रश्नः ऊन उत्पादन में राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है?

    उत्तरः पहला

    2.प्रश्नः भारत के कुल ऊन उत्पादन में राजस्थान की भागीदारी कितनी है?

    उत्तरः 40 से 45 प्रतिशत

    3.प्रश्नः विश्व गलीचा उद्योग में कहाँ की ऊन श्रेष्ठ मानी जाती है?

    उत्तरः राजस्थान की ऊन विश्व के गलीचा उद्योग में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।

    4.प्रश्नः राज्य में कौनसी नस्ल की भेड़ की ऊन उत्तम किस्म की मानी जाती है?

    उत्तरः चोकला

    5.प्रश्नः राज्य में काराकुल एवं मेरिनो भेड़ें कहाँ पाली जा रही हैं?

    उत्तरः सूरतगढ़, जैतसर, बीकानेर आदि केंद्रों पर

    6.प्रश्नः ऊनी धागा बनाने वाली प्रमुख मिलें कौनसी हैं?

    उत्तरः (1) जोधपुर ऊन मिल, जोधपुर, (2) फोरेन एक्सपोर्ट एण्ड इम्पोर्ट मिल, कोटा (3) नगरपाल कॉम्बिंग मिल, कोटा, (4) राजस्थान ऊन मिल, बीकानेर (5) भारत ऊन मिल, बीकानेर। 7.प्रश्नः एशिया में ऊन की सबसे बड़ी मण्डी कहाँ है? उत्तरः बीकानेर। 8.प्रश्नः नमदा उद्योग के लिये कौनसा जिला प्रसिद्ध है? उत्तरः टोंक।


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  • राजा के मुँह लगे इक्का के सामने नन्ही बाई की भी नहीं चली

     02.06.2020
    राजा के मुँह लगे इक्का के सामने नन्ही बाई की भी नहीं चली

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    जोधपुर नरेश जसवंतसिंह द्वितीय (ई.1873-1895) ने फैजुल्लाखां को अपना दीवान नियुक्त किया। फैजुल्लाखां राजा को प्रसन्न करने के लिये नवाब रामपुर से भगतन जाति की अद्वितीय सौंदर्य की स्वामिनी नृत्यांगना नन्ही बाई को मांग लाया और उसे जसवंतसिंह को भेंट कर दिया। भगतनों का ब्याह मिट्टी के गणेषजी से किया जाता था और फिर उन्हें रुपये या आठ आने में किसी साधु को बेच दिया जाता था। इस साधु को पति के सब अधिकार प्राप्त होते थे। साधु से उत्पन्न लड़कियां भगतन कहलाती थीं। इस प्रकार यह परम्परा चलती रहती थी किन्तु कुछ साधुओं की लड़कियां-चरित्र भ्रष्ट होकर
    वेश्यावृत्ति करने लगती थीं। इन्ही में से नन्ही एक थी। इस अद्वितीय सुन्दरी को देख कर राजा दीन और दुनिया दोनों भूल गया। रानियां, महारानियां सब राजा की नजर से उत्तर गईं और राजा उस रूपगर्विता के चरणों में जा गिरा। राजा ने शहर से बाहर एक मकान में नन्ही और उसकी मां छोटी के रहने का प्रबन्ध किया।

    नन्ही जोधपुर के इतिहास में नैनी बाई तथा नन्ही भगतन के नाम से भी जानी जाती है। वह जोधपुर के इतिहास में ऐसा व्यक्तित्व बनकर उभरी जिसे न तो राजकीय स्वीकृति थी और न सामाजिक फिर भी कई दषकों तक वह जोधपुर नरेष के सिर का मुकुट और मारवाड़ की आंख की किरकिरी बनी रही। नन्ही के रूपपाष में बंध कर राजा अपनी रानियों, पड़दायतों और पासवानों को भूल गया। लोक मर्यादा के भय से राजा ने नन्ही को अपनी पासवान या पड़दायत तो घोषित नहीं किया किन्तु व्यवहारिक रूप में वही सब कुछ थी और उसी की मर्जी से राजा शासन करता था। नन्ही की भौंह में बल बड़ते तो अच्छों-अच्छों को राजकीय सेवा से खड़े-खड़े निकाल दिया जाता। उसकी एक-एक मुस्कुराहट पर बड़े-बड़े राजकीय पद भरे जाते।

    नृत्य और गायन में निपुण यह रूपाजीवा राजा के हृदय की स्वामिनी तो थी ही, अपनी बुद्धि, चातुर्य और रूप दर्प के बल पर अमीर-उमरावों को भी नचाती थी। खुली महफिल में वह राजकीय चिन्ह के रूप में कटार धारण करके राजा की बगल में बैठती। नख से शिख तक स्वर्ण आभूषण और कीमती हीरे-जवाहरात धारण करती तथा बालों को धोने के बाद गुलाब जल और केवड़े से सींचती जिसकी महक से होश खोकर राजा उसके पाश में बन्धा रहता।

    राजा उसका स्वागत दुर्ग की ड्यौढ़ी पर करता। जोधपुर के पूरे इतिहास में यही एक वेष्या थी जो जोधपुर दुर्ग की देहरी लांघ सकी थी। जब वह जाती तो राजा उसकी पालकी को कन्धा लगाता और सारी मर्यादायें तोड़कर उससे मिलने घासमण्डी स्थित उसकी हवेली पर जाता। राजा का यह आचरण देखकर उसकी रानियां, महारानियां, अमीर, उमराव, सांमत और राज परिवार के सदस्य राजा से नाराज हो गये। राजा का छोटा भाई प्रतापसिंह तो जोधपुर छोड़ कर जयपुर राज्य की सेवा में चला गया।

    कुछ दिनों बाद राजा ने नन्ही के रहने के लिये एक बड़ी हवेली बनवाई जो जवाहरखाना के नाम से प्रसिद्ध हुई। जिस स्थान पर यह हवेली बनी हुई है, अब घास मण्डी कहलाता है तथा किसी समय वेष्याओं का निवास क्षेत्र होने के कारण बदनाम इलाका माना जाता था। जिस समय जोधपुर शहर बहुत छोटा था तब यह क्षेत्र निर्जन था तथा तवायफों, वेश्याओं, पातुरियों और नाचने-गाने वालियों के अड्डे के रूप में विकसित हुआ। नन्ही बाई की हवेली लगभग 50 फुट ऊंची थी। लाल घाटू पत्थरों से बनी इसकी मजबूत दीवारें ढाई से तीन फुट तक चौड़ी थीं। इस हवेली को बनवाने में भी नन्ही ने अपने ठसके का बखूबी इस्तेमाल किया और राजाज्ञा प्रसारित करवाई कि इसके आस-पास बनने वाली समस्त इमारतें इससे 10 फुट छोटी बनाई जायें। इस राजाज्ञा का नन्ही के जीते जी बड़ी कड़ाई से पालन किया गया।

    नन्ही का ठसका देखकर अच्छों-अच्छो की हिम्मत उसके सामने बोलने की नहीं होती थी किन्तु यह ठसका उसके कुछ काम न आया जब वह राजा के मुंह लगे 'इक्का’ से उलझ पड़ी। जब नन्ही का छोटा सा मकान बड़ी हवेली में परिवर्तित किया जाने लगा तो राजा के वफादार सिपाही मोहम्मद खां इक्का का मकान बीच में आ गया। नन्ही का मकान कुछ तिरछा था जिसे वह सीधा करना चाहती थी ताकि चौरस मकान पर हाथी बंद दरवाजे से जड़ी जंगी हवेली का मुकाबला घासमण्डी की कोई अन्य इमारत न कर सके। इक्का अड़ गया किन्तु नन्ही भी नहीं मानी और अपने रूप के ठसके में उसने इक्का के मकान का एक हिस्सा गिरवा दिया। इक्का ने राजा पर अनेक एहसान किये थे। राजा ने उसे रोहट के समीप नीलामी ठिकाने की जागीर बख्शी थी।

    जब नन्ही ने इक्का का मकान गिरवा दिया तो जेठ की भरी दुपहरी में इक्का तलवार लेकर राइका बाग पैलेस में राजा के पास गया। राजा उस समय आराम कर रहा था। इक्का ने बाहर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया और नन्ही को भी गालियां दीं। राजा ने कहलवाया कि वह शाम को आये। इक्का नहीं माना और कहा कि यदि राजा अभी नहीं मिलेगा तो वह तलवार से अपनी गर्दन उड़ा लेगा। राजा फौरन बाहर आया और इक्का को समझा-बुझाकर शांत किया। जब राजा ने इक्का से अनुरोध किया कि वह नन्ही की हवेली सीधी बन जाने दे तो इक्का फिर बिगड़ गया। हार कर राजा ने नन्ही को आदेष दिया कि वह अपनी हवेली तिरछी ही बना ले। इक्का का मकान न तोड़ा जाये। इस कारण जवाहरखाना आज भी तिरछा ही खड़ा है।

    राजा ने नन्ही की हवेली में 22 कमरे बनवाये। मुख्य भाग में दो बड़े हॉल बनवाये गये जिनमें से एक नन्ही के उठने-बैठने तथा दूसरा शयन करने के लिये बनवाया गाया। पोल के ठीक सामने वाले हॉल में मुजरा होता था। बीच में एक बड़ा चौगान बनवाया गया जहां महफिल जमती थी। पोल के दायीं ओर नीचे के कमरों में पालकी, मिजस, रथ तथा बहल नैनात रहते थे जिनका उपयोग नन्ही मेहरानगढ़ दुर्ग या राईकाबाग पैलेस जाने के लिये करती थी। कहा जाता है जवाहरखाना में एक सुरंग दुर्ग तक बनवाई गई थी जो गधियों की गली और कुत्तों की पोल से होती हुई दुर्ग तक जाती थी। अब यह सुरंग पत्थरों से बन्द कर दी गई है। हवेली के ऊपरी हिस्से में जाने के लिये दोनों तरफ सीढ़ियां बनी हुई हैं। एक मन्दिर भी इस हवेली में बनवाया गया था हवेली में राज्य की ओर से सुरक्षा प्रहरी तैनात किये गये थे।

    राजा को भोग-विलास में डुबोकर तथा समस्त विष्वसनीय और समर्पित लोगों से अलग कर फैजुल्ला खां बेखटके राज काज चलाने लगा। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। जोधपुर राज्य कर्ज में डूब गया। जब उमरावों और सरदारों ने ज्यादा हल्ला मचाया तो राजा ने फैजुल्ला को निकाल दिया और अपने भाई प्रतापसिंह को बुलाकर एवं उससे क्षमा याचना कर जोधपुर राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। प्रजा की दुर्दषा देखकर प्रतापसिंह ने राज-काज संभल लिया किन्तु राजा को नैनी (नन्ही) से अलग न कर सका। प्रतापसिंह के हाथों में राज्य और प्रजा दोनों को सुरक्षित जानकर राजा फिर नन्ही के रूप सरोवर में डूब गया। राजा नन्ही के रिष्तेदारों का भी दुर्ग में स्वागत करता। रानियों का विरोध बढ़ने लगा तो राजा राईकाबाग पैलेस में ही अधिक समय बिताने लगा।

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