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  • अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

     20.06.2018
    अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    ई.1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना हुई। इसने पुरावशेषों की खोज एवं संग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुरातत्व सर्वेक्षण के माध्यम से सिन्धु सभ्यता के अवशेषों को पहली बार प्रकाश में लाया जा सका। राजस्थान में कालीबंगा एवं पीलीबंगा से प्रस्तर-मूर्तियाँ, धातु-मूर्तियाँ, मृण्मूर्तियाँ, मृदभाण्ड, मणियां, स्नानागार, अन्नागार, मुद्राएं, मुहरें आदि प्राप्त की गईं जिनसे सिन्धु सभ्यता के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है तथा अनुमान होता है कि कालीबंगा, सिंधु सभ्यता के पूर्वी भाग की राजधानी थी। इस सामग्री को देश के विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया, जिस पर वैज्ञानिकों, भाषाविदों, इतिहासकारों तथा शोधार्थियों द्वारा शोध कार्य किए जाते रहे हैं। कालीबंगा खुदाई स्थल के निकट एक संगहालय की स्थापना की गई है।

    इसी प्रकार नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), कोकानी, (कोटा जिले में परवन नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से पुरापाषाण कालीन पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं जिन्हें विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।

    चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च एवं गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ एवं नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली एवं गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी, उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा आदि अनेक स्थानों से उत्तर-पाषाण काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं। गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आई हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत एवं चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल-माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) से ताम्र उपकरणों के भण्डार मिले हैं। नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) से लौह युगीन सभ्यताओं के उपकरण प्राप्त हुए हैं। रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी पीलीबंगा, आहाड़, नगरी, आदि अन्य भागों से शुंग कालीन सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस समस्त सामग्री को विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।


    राजस्थान पुरातत्व तथा संग्रहालय विभाग

    ई.1950 में पुरातत्व तथा संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई। यह विभाग प्रदेश में बिखरी हुई पुरा सम्पदा तथा सांस्कृतिक धरोहर की खोज, सर्वेक्षण एवं संग्रहण करता है तथा इस सामग्री का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार भी करता है। इस विभाग में निदेशक, उपनिदेशक, क्षेत्रीय अधीक्षक, अधीक्षक खोज एवं उत्खनन, अधीक्षक स्थापत्य सर्वेक्षण, अधीक्षक कला सर्वेक्षण, अधीक्षक आमेर महल, अधीक्षक केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर, मुख्य पुरारसायन वेत्ता, मुद्रा विशेषज्ञ आदि विभिन्न अधिकारी कार्यरत हैं। केन्द्र प्रवर्तित योजना में रजिस्ट्रीकरण अधिकारी राज्य के निजी स्वामित्व वाली पुरा सामग्री एवं कला संग्रहों का पंजीकरण करते हैं। विभाग द्वारा 222 स्मारक तथा पुरास्थल संरक्षित घोषित किए गए हैं। विभाग इनका जीणोद्धार भी करवाता है। प्राचीन दुर्गों, स्मारकों, देवालयों, प्रासादों, हवेलियों, भित्तिचित्रों, सिक्कों एवं अन्य कला तथा पुरा सामग्री का अधिग्रहण भी यही विभाग करता है। विभाग की उत्खनन शाखा पुरास्थलों की खुदाई करती है। मुद्रा शाखा सिक्कों का संरक्षण, रासायनिक उपचार तथा कैटलॉगिंग का कार्य करती है। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास का कार्य भी यही विभाग करता है। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग चित्रकला प्रदर्शनी, पुरासामग्री प्रदर्शनी तथा भाषणमाला का भी आयोजन करता है। विभाग ‘द रिसर्चर’ नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित करता है।


    राजस्थान के संग्रहालयों के लिए पुरातत्व एवं इतिहास

    विषयक सामग्री जुटाने वाले पुरातत्ववेत्ता

    राजस्थान के संग्रहालयों के लिए सामग्री जुटाने में भारत के कई प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ताओं का अमूल्य सहयोग रहा। इनमें अलैक्जेण्डर कनिंघम, टी. एच. हैण्डले, अमलानंद घोष, दयाराम साहनी, रत्नचंद्र अग्रवाल, मुनि जिन विजय आदि उल्लेखनीय हैं।

    अलैक्जेण्डर कनिंघम

    ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता अलैक्जेण्डर कनिंघम ने उन्नीसवीं सदी के अंत में जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण एवं पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जिससे जयपुर रियासत तथा राजपूताना के प्राचीन काल के इतिहास की विश्वसनीय शोध सामग्री उपलब्ध हो सकी।

    टी. एच. हैण्डले

    1880 के दशक में इन्होंने जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण करके पुरासामग्री जुटाकर कुछ लेख छपवाए। बाद में 1930 के दशक में दयाराम साहनी ने उन लेखों में रह गई त्रुटियों को ठीक किया।

    अमलानंद घोष

    अमलानंद घोष ने ई.1952 में कालीबंगा सभ्यता की खोज की। बाद में ई.1961-69 के बीच कालीबंगा की खुदाई हुई। इस कार्य में देश के सुप्रसिद्ध पुरातत्वविदों- बी. बी. लाल, बी. के. थापर, एन. डी. खरे, के. एम. श्रीवास्तव तथा एस. पी. जैन की सेवाएं ली गईं।

    दयाराम साहनी

    ये स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व जयपुर रियासत में पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। इन्होंने जयपुर रियासत के विविधि स्थलों का सर्वेक्षण करके पुरातात्विक महत्व के स्थलों की खोज की तथा पुरा सामग्री जुटाई जिससे जयपुर रियासत के इतिहास लेखन के लिए विश्वसनीय जानकारी एवं प्रमाण उपलब्ध हो सके।

    रत्नचन्द्र अग्रवाल

    श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल का जन्म 21 जून 1926 को साढ़ौरा, हरियाणा में हुआ था। वे राजस्थान के महत्त्वपूर्ण पुरातत्वविदों में से थे। वे राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने राजस्थान के प्राचीन शिल्प एवं मूर्ति विज्ञान पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके प्रसिद्ध ग्रंथों में ‘स्कल्पचर्स फ्रॉम उदयपुर म्यूजियम’ तथा ‘पॉटरी हैण्डल्स विद वुमन फिगराइन्स’ प्रमुख हैं।

    मुनि जिन विजय

    मुनि जिन विजय का जन्म मेवाड़ रियासत के रूपाहेली गाँव में ई.1888 में हुआ। इनका बचपन का नाम रिणमल परमार था। वे 15 वर्ष की आयु में जैन धर्म में दीक्षित हो गये। उन्होंने तीन वर्ष तक सूत्र और आगम पढ़े तथा वडोदरा में रहकर कुमार पाल प्रतिबोध नामक ग्रंथ का संपादन किया। लोकमान्य तिलक के सम्पर्क से उन पर देशभक्ति का रंग चढ़ा तथा उन्होंने जैन साहित्य संशोधक समिति की स्थापना की। वे गुजरात पुरातत्व मंदिर के निदेशक रहे। उन्होंने जर्मनी जाकर इण्डो-जर्मन केन्द्र की स्थापना की तथा वापस आकर दाण्डी कूच में भाग लिया। छः माह जेल में भी रहे। इसके बाद वे बम्बई में भारतीय विद्या भवन के संचालक बने। ई.1942 में उन्होंने जैसलमेर आकर 200 ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार करवाईं। ई.1950 में उनके निर्देशन में राजस्थान पुरातत्व मंदिर की स्थापना की गयी। उनके द्वारा लिखित लेखों और गं्रथों की संख्या सैंकड़ों में है। राजस्थान सरकार ने उन्हें पुरातत्व विभाग का निदेशक बनाया। ई.1976 में उनका निधन हुआ।


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  • अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास

     21.06.2018
    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की  स्थापना का इतिहास

    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    राजस्थान में पुराप्रस्तर युगों से लेकर आधुनिक काल तक विकसित मानव सभ्यताओं की गाथा नदी घाटियों, पर्वतीय उपत्यकाओं एवं रेतीले धोरों में दबी हुई है। इसे पहचानना, खोजना, उसकी कालावधि का निर्धारिण करना, संग्रहण करना तथा दर्शकों तक उसकी पहुंच बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। यह समस्त सामग्री राजस्थान में मनुष्य के उद्भव से लेकर सभ्य बनने तक का इतिहास कहती है जो उस काल में लिखित रूप में नहीं मिलता है। उस इतिहास के साक्ष्य उस काल के खेतों, कुओं, चूल्हों, घरों के अवशेषों एवं शवाधानों के साथ-साथ बर्तनों, आभूषणों, मणकों, मूर्तियों, कंकालों आदि के रूप में मिलते हैं। मानव सभ्यताओं की इससे आगे की गाथा शिलालेखों, सिक्कों, मुद्राओं, वस्त्रों, कीर्ति-स्तम्भों, दुर्गों, महलों, हवेलियों, मंदिरों, मूर्तियों, जलाशयों, कलात्मक कुओं, बावड़ियों, ताल-तलैयों, सर-सरोवरों, समाधियों, छतरियों, अभिलेखों, आदि के रूप में मिलती है। यह सब सामग्री हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। इस विरासत में बहुत सी ऐसी है जिसे संग्रहालयों तक नहीं लाया जा सकता है किंतु बहुत सी सामग्री ऐसी भी है जिसे संग्रहालयों तक लाया जा सकता है और किसी विशिष्ट क्रम एवं विधि में प्रदर्शित कर मानव इतिहास को उसकी निरंतरता के साथ देखा, समझा एवं परखा जा सकता है।

    राजपूताना की देशी रियासातें में अपने राजवंश एवं राज्य की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण एवं प्रदर्शन का विचार उन्नीसवीं सदी में विकसित होने लगा था। यही कारण है कि राजस्थान निर्माण के पूर्व ही राजपूताना की विभिन्न रियासतों में दस संग्रहालय स्थापित हो गए थे। संग्रहालयों की स्थापना के क्रम में सर्वप्रथम ई.1870 के आसपास उदयपुर में संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ किंतु राजपूताना में प्रथम संग्रहालय की विधिवत् स्थाना का श्रेय जयपुर को जाता है। जयपुर में प्रथम संग्रहालय की नींव का पत्थर महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) (ई.1835-80) के शासनकाल में ई.1876 में प्रिंस एलबर्ट ने रखा और उसी के नाम पर इस संग्रहालय का नाम एलबर्ट म्यूजियम रखा गया। ई.1881 में जयपुर संग्रहालय का संग्रह अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित स्कूल आफ आर्ट में लाया गया और महाराजा माधोसिंह (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में इसे वर्तमान संग्रहालय में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड बेडफोर्ड ने इसका उद्घाटन कर विधिवत् रूप से इसे जनता के लिए खोल दिया। प्रदेश स्तर के इस संग्रहालय मे राजस्थान के जन-जीवन और शिल्प कौशल की जानकारी मिलती है।

    मेवाड़ में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) के शासनकाल में संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए गुलाब बाग (उदयपुर) में एक भव्य भवन का निर्माण किया गया। इस भवन निर्माण का निर्णय महारानी विक्टोरिया सिल्वर जुबली समारोह के दौरान लिया गया था। भवन निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाने पर इसका नाम विक्टोरिया हॉल म्यूजियम रखा गया और ई.1890 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लेंसडाउन द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।

    लार्ड कर्जन के समय संग्रहालयों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए। संग्रहालयों को समुचित एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के लिए ई.1902 में सर जॉन मार्शल को आर्कियोलॉजीकल सर्वे आफ इण्डिया का डायरेक्टर जनरल नियुक्त किया गया। संग्रहालयों की परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए पहली बार भारतीय विद्वानों की सेवाएं ली गईं और भारतीय संस्कृति एवं पुरासम्पदा की खोज कर उनके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया गया। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि विद्वानों के सक्रिय सहयोग एवं उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण से एकत्र पुरासम्पदा के फलस्वरूप अजमेर के ऐतिहासिक दुर्ग अकबर का किला में राजपूताना म्यूजियम की स्थापना की गई। ई.1908 में राजपूताना के गर्वनर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन द्वारा इसका विधिवत् रूप से उद्घाटन किया गया। ओझाजी को राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। ओझा अैर उसके सुयोग्य उत्तराधिकारी यू. सी. आाचार्य द्वारा विभिन्न स्थानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। पुरासामग्री का संकलन किया गया। आर. भण्डारकर द्वारा किए गए उत्खनन कार्य से नगरी (चित्तौड़गढ़) से शुंग और कुषाणकालीन टेराकोटाज, सरवानिया (बांसवाड़ा) से क्षत्रप सिक्कों का भण्डार तथा अढाई दिन के झौंपड़े से उत्कीर्ण पाषाण खण्ड प्राप्त किए गए और आगे भी संग्रहालय को समृद्ध करने के प्रयत्न जारी रहे।

    जोधपुर में ई.1909 में संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1914 में पंडित विश्वेश्वर नाथ रेऊ संग्रहालय के सहायक अधीक्षक बने और उनके निर्देशन एवं सहयोग से संग्रहालय को नया स्वरूप प्रदान किया गया। ई.1916 में संग्रहालय को भारत सरकार की मान्यता मिली और आगे चलकर इसका नाम जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह (ई.1895-1911) की स्मृति में सरदार म्यूजियम रख दिया गया। रेऊजी की रुचि और रचनात्मक दृष्टिकोण से संग्रहालय में ओसियां, किराड़ू, मण्डोर, डीडवाना, सांभर, नागौर आदि स्थानों से सांस्कृतिक विरासत को एकत्रकर इस संग्रहालय को समृद्ध किया गया।

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ में क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा भवानीसिंह (ई.1874-1929) की गहन रुचि एवं उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई। ई.1929 में उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय की स्थापना की गई।

    संग्रहालय स्थापना की दौड़ में बीकानेर भी पीछे नहीं रहा। रियासत ने इटली के विद्वान डॉ. एल. पी. टेस्सीटोरी को आमंत्रित कर एक विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उन्होंने गंगानगर-बीकानेर क्षेत्र से महत्वपूर्ण पुरासामग्री का संकलन किया। डॉ. टेस्सीटोरी के संग्रह का उपयोग करते हुए ई.1937 में गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम की स्थापना की गई। महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने चित्तौड़गढ़ संग्रहालय का निर्माण करवाया।

    संग्रहालय स्थापना की शृंखला में ई.1940 में अलवर और ई.1944 में भरतपुर रियासतों में संग्रहालय स्थापित किए गए। भरतपुर रियासत में महाराजा ब्रजेन्द्र सवाई वीरेन्द्र सिंह बहादुर जंग (ई.1929-47) की प्रेरणा से मूर्तिशिल्प, स्थापत्य, शिलालेख एवं अन्य पुरा सामग्री का संकलन कर इसे स्थानीय पुस्तकालय परिसर में प्रदर्शित किया गया। संग्रहालय के संस्थापक क्यूरेटर रावत चतुर्भुजदास चतुर्वेदी के अथक प्रयासों से इस संग्रहालय में पुरासम्पदा की अभिवृद्धि की गई। आगे चलकर इसे दुर्ग में स्थित वर्तमान भवन में स्थानान्तरित किया गया तथा ई.1944 में जनता के लिए खोला गया। ई.1951 में इसमें सिलहखाना और कमराखास भी जोड़ दिया गया। संग्रहालय को समृद्ध करने में भरतपुर के तत्कालीन शासकों तथा मेजर हार्वे का उल्लेेखनीय योगदान रहा।

    ई.1944 में कोटा और ई.1949 में आमेर संग्रहालय की स्थापना के साथ संग्रहालयों की संख्या बढ़ कर दस हो गई। राजस्थान निर्माण के बाद ई.1950 में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना हुई और विभाग ने संग्रहालयों के विस्तार की दिशा में उल्लेेखनीय कदम उठाए। इसके परिणाम स्वरूप ई.1957 में श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली, ई.1959 में डूंगरपुर और ई.1961 में आहाड़ संग्रहालयों की स्थापना संभव हो सकी। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही और ई.1965 में माउण्ट आबू संग्रहालय तथा ई.1968 में मण्डोर संग्रहालय स्थापित किए गए।

    ई.1954 में बिड़ला तकनीकी म्यूजियम की, ई.1959 में जयपुर में सिटी पैलस संग्रहालय की तथा ई.1960 में श्रीरामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय जयपुर की स्थापना हुई। ई.1964 में लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री, चूरू की स्थापना हुई।

    चित्तौड़गढ़ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पुरासामग्री के प्रदर्शन के लिए ई.1969 में चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1977 में आधुनिक कला प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करने वाली राज्य की पहली कला दीर्घा स्थापित हुई जिसे आगे चलकर राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंप दिया गया। विभाग द्वारा पुरान्वेषण, पुरा सामग्री के संकलन-संग्रहण एवं संरक्षण का कार्य निरन्तर जारी रहा और ई.1983 में हवामहल संग्रहालय तथा ई.1984 में जैसलमेर संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1985-86 में गंगानगर जिले में कालीबंगा के उत्खनन से प्राप्त सामग्री के लिए सभ्यता स्थल पर ही संग्रहालय का निर्माण किया गया। अब यह हनुमानगढ़ जिले में स्थित है।

    30 दिसम्बर 1983 को माणिक्यलाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान द्वारा उदयपुर में जनजाति संग्रहालय का निर्माण किया गया। इसका उद्देश्य जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करना था।

    संग्रहालयों के विस्तार की
    शृंखला में ई.1987 में विराट नगर संग्रहालय तथा ई.1991 में पाली संग्रहालय की स्थापना हुई। आमेर की सांस्कृतिक धरोहर के वैभव को प्रदर्शित करने के लिए ई.1992 में आमेर में कला दीर्घा स्थापित की गई। संग्रहालयों के विस्तार की यह धारा आज भी सतत रूप से प्रवाहमान है। राजस्थान के आधुनिक संग्रहालयों की यात्रा में सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर, आहड़ संग्रहालय उदयपुर, राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा, लोक कला संग्रहालय उदयपुर, मीरा संग्रहालय मेड़ता, हल्दीघाटी संग्रहालय राजसमंद आदि सम्मिलित हैं।


    राजस्थान में संग्रहालयों की समस्या

    राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका 61.11 प्रतिशत भाग मरुस्थल है। इतने बड़े प्रदेश में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन भवन, दुर्ग, महल, देवालय, स्मारक, सरोवर, बावड़ियां, मूर्तियां, शिलालेख, प्राचीन ग्रंथ, शासकीय अभिलेख, सिक्के, ताड़पत्र, ताम्रपत्र आदि का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। संग्रहालयोपयोगी सम्पूर्ण सामग्री को राज्य के विभिन्न संग्रहालयों में संजोने के लिए आवश्यक निपुण व्यक्तियों, धन, सुविधाओं तथा भवनों का अभाव है। इस कारण राजस्थान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रख पाना बहुत बड़ी समस्या है। राजस्थान सरकार ने राज्य में 18 राजकीय संग्रहालयों की स्थापना की है। इन संग्रहालयों में कर्मचारियों का अभाव है। राज्य में झालावाड़ राजकीय संग्रहालय जैसे कई संग्रहालय हैं जो केवल चपरासियों और लिपिकों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।

    बहुत से संग्रहालयों को भारत सरकार से सामग्री प्राप्त होती है किंतु वह स्थान, साधन एवं दृष्टि के अभाव में संग्रहालयों के अंधेरे बंद कमरों में पड़ी हुई है, दर्शक वहाँ तक चाह कर भी नहीं पहुंच सकते।

    वसुंधरा राजे सरकार (ई.2013-18) द्वारा राज्य के संग्रहालयों की बुरी तरह से उपेक्षा किए जाने से यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।

    राज्य सरकार द्वारा बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार तथा जोधपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की स्थापना की गयी है। जयपुर, बीकानेर, चित्तौड़, जयपुर, अलवर, कोटा तथा उदयपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की शाखाएं स्थापित की गयी हैं। राजस्थान में मौजूद पुराने दुर्गों एवं ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण करने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिसके कारण कई दुर्ग, हवेलियाँ, मंदिर एवं महल उपेक्षित पड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व शेखावाटी की कलात्मक हवेलियों में भित्ति चित्रों की दुर्दशा देखकर एक विदेशी महिला नदीन ला प्रैन्स ने एक हवेली खरीदकर उसका पुनरुद्धार करवाया और वहाँ एक सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। इसमें भारत और फ्रान्स के चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। इससे शेखावाटी क्षेत्र की कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। संस्कृृति प्रेमियों, पर्यटन संस्थाओं तथा स्वयं सेवी संगठनों को इस दिशा में और भी प्रयास करने होंगे।


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  • अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

     21.06.2018
    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अध्याय - 5 राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार


    पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संचालित संग्रहालय


    राजस्थान सरकार द्वारा राज्य में राजकीय संग्रहालयों की स्थापना, सरंक्षण एवं विस्तार के लिए अलग से पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई है। इस विभाग द्वारा वर्तमान में निम्नलिखित संग्रहालय संचालित किए जा रहे हैं-

    राज्य स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय केन्द्रीय संग्रहालय, अलबर्ट हॉल, (अल्बर्ट म्यूजियम), जयपुर

    संभाग स्तरीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर,

    2. राजकीय संग्रहालय, जोधपुर,

    3. राजकीय संग्रहालय, बीकानेर,

    4. राजकीय संग्रहालय, कोटा,

    5. राजकीय संग्रहालय, अजमेर,

    6. राजकीय संग्रहालय, हवामहल, जयपुर,

    7. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    जिला स्तरीय संग्रहालय


    1. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    2. राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    4. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    5. राजकीय संग्रहालय, पाली

    6. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    7. राजकीय संग्रहालय, सीकर

    स्थानीय संग्रहालय

    1. राजकीय संग्रहालय, आहाड़, उदयपुर

    2. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर, जोधपुर

    3. राजकीय संग्रहालय, माउंट आबू, सिरोही

    संग्रहालय जो आरम्भ किए जाने हैं

    1. राजकीय संग्रहालय, केसरीसिंह बारहठ की हवेली, शाहपुरा, भीलवाड़ा।

    2. टाउन हॉल पुराना विधानसभा भवन, जयपुर।

    3. राजकीय संग्रहालय, बारां।


    राज्य की आर्ट गैलेरी

    1. आर्ट गैलेरी, विराट नगर, जयपुर

    2. प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर की आर्ट गैलेरी


    राजस्थान राज्य अभिलेखागार

    राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में स्थापित किया गया है तथा इसकी शाखाएं जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर, अलवर एवं भरतपुर में हैं।


    प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान

    राज्य सरकार द्वारा प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानों की स्थापना की गई है जिनमें प्राचीन दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों, चित्रग्रंथों, बहियों आदि का संग्रहण किया गया है। जोधपुर में इसका मुख्यालय है तथा बीकानेर, कोटा, अलवर, उदयपुर, चित्तौड़ में उपशाखाएं कार्यरत हैं।


    अरबी-फारसी शोध संस्थान टोंक

    टोंक में अरबी और फारसी ग्रंथों के संरक्षण के लिए कार्यालय स्थापित हुआ जो अब स्वतंत्र संस्थान के रूप में कार्यरत है तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान के नाम से जाना जाता है।


    विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने राज्य में जयपुर में क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र एवं विज्ञान पार्क स्थापित किया है। साथ ही जोधपुर, नवलगढ़, कोटा, उदयपुर में उपक्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र स्थापित किए हैं। झालावाड़ के निकट झालरापाटन में विज्ञान पार्क स्थापित किया गया है। इनमें आम जन को विज्ञान के सिद्धांतों का प्रदर्शन करने के लिए स्वचालित मॉडल प्रदर्शित किये गए हैं।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    1. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, जयपुर।

    2. प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, सवाईमाधोपुर।

    प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय, रामसिंहपुरा

    देश का पांचवां राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय सवाईमाधोपुर जिले के रामसिंहपुरा गांव में आरम्भ किया गया है। 1 मार्च 2014 को इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। इस संग्रहालय में पर्यावरण, वन्यजीव, ज्ञान, विज्ञान, कला एवं संस्कृति आदि से जुड़ी चीजों की पांच गैलेरी, एक लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम, छात्रावास आदि बनाये गए हैं।

    बायोलॉजिकल पार्क जयपुर, जोधपुर एवं उदयपुर में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किये गए हैं। बीकानेर जिले में बीछवाल में बायोलॉजिकल पार्क स्थापित किया जा रहा है। यहाँ भी जन्तुओं के सम्बन्ध में जानकारियां पर्यटकों को दी जा रही हैं।


    नेचर पार्क

    वर्ष 2014-15 में चूरू में नेचर पार्क स्थापित किया गया है।


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  • अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

     21.06.2018
    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर


    राजकीय संग्रहालय अजमेर की स्थापना राजपूताना म्यूजियम के नाम से 19 अक्टूबर 1908 को अजमेर नगर के मध्य ‘मैगजीन’ के नाम से विख्यात प्राचीन दुर्ग में की गई जिसे मुगल काल में अकबर का किला कहा जाता था। यह एक प्राचीन दुर्ग था जिसका अकबर के काल में जीर्णोद्धार एवं विस्तार किया गया। इसी दुर्ग में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का राजदूत ‘सर टामस रो’ जहांगीर के समक्ष उपस्थित हुआ था तथा उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की थी। ब्रिटिश काल में इस दुर्ग में अंग्रेजों का शस्त्रागार स्थापित किया गया था, इसलिए इसे मैगजीन कहा जाने लगा। ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को इसी दुर्ग में शरण दी गई थी।

    ई.1902 में भारत का वायसराय एवं गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन अजमेर आया। उसने राजपूताना की विभिन्न रियासतों में प्राचीन स्मारकों तथा विभिन्न स्थलों पर बिखरी हुई कलात्मक पुरावस्तुओं को देखा। कर्जन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जॉन मार्शल को निर्देश दिए कि वे इस प्रभूत सामग्री को संरक्षित करने के लिए एक संग्रहालय की स्थापना करें। ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलैक्जेण्डर कनिंघम, आर्चिबाल्ड कार्लेयल, डी. आर. भण्डारकर, आर. डी. बनर्जी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, यू. सी. भट्टाचार्य आदि पुरातत्वविदों एवं इतिहासविदों ने इस संग्रहालय के लिए पुरातत्व सामग्री, प्राचीन प्रतिमाओं, शिलालेखों, सिक्कों, ताम्रपत्रों, पुस्तकों, चित्रों आदि को एकत्रित करने में विशिष्ट योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे इस कार्य में सहयोग देने के लिए देशी रियासतों के अनेक राजा भी आगे आए। फलस्वरूप अजमेर संग्रहालय प्राचीन इतिहास, कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण संग्रहालय बन गया। ई.1908 में गवर्नर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन ने संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसे अजमेर संग्रहालय एवं राजपूताना संग्रहालय कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे राजकीय संग्रहालय कहा जाने लगा।

    इस संग्रहालय में प्राचीन प्रतिमाएं, मृण्मय प्रतिमाएं (टेराकोटा), शिलालेख, सिक्के, ताम्रपत्र, लघुरंग चित्र, उत्खनन से प्राप्त सामग्री राजपूत कालीन वेश-भूषाएं, धातु प्रतिमाएं तथा विभिन्न कलाओं से सम्बन्धित सामग्री संगृहीत की गई। इन पुरावस्तुओं एवं कला सामग्री को विभिन्न दीर्घाओं में बनी पीठिकाओं तथा शो-केस में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में इस संग्रहालय में 652 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 84 शिलालेख, 3,986 सिक्के, 18 धातु सामग्री, 149 लघुचित्र, 75 अस्त्र-शस्त्र, 363 टैराकोटा सामग्री, 128 स्थानीय हस्तकला सामग्री एवं पूर्वैतिहासिक काल की सामग्री संगृहीत है।

    उत्खनन से प्राप्त सामग्री

    संग्रहालय के पुरातत्व विभाग में सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहेनजोदड़ो (अब पाकिस्तान में) से उत्खनन में प्राप्त की गई मिट्टी की चूड़ियां, बरछी, तीर-शीर्ष, अनाज के दाने, चाकू के रूप में प्रयोग होने वाले फ्लिट-फ्लेक, शंख, हथियारों में धार करने के पत्थर, मातृदेवी की प्रतिमाएं, खिलौने, विभिन्न प्रकार की ईंटें, कलश, ढक्कन, खिलौना-गाड़ी के पहिये आदि मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त उन मुहरों के नमूने भी रखे गए हैं जो सिन्धु नदी घाटी में पाई गई थीं। जिन वास्तविक वस्तुओं के ये नमूने हैं वे ईसा से 3000 वर्ष पूर्व की हैं। कुछ नमूनों में पशुओं के चित्रों के ऊपर चित्रलिपि की एक पंक्ति भी उत्कीर्ण है।

    प्रतिमा दीर्घा

    संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में अनेक प्राचीन प्रतिमाओं को प्रदर्शित किया गया है जो अजमेर के अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (12वीं शताब्दी ईस्वी की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला एवं मंदिर), पुष्कर, पीसांगन, हर्षनाथ, अर्थूणा, ओसियां, मंडोर, चन्द्रावती, कामां, बयाना आदि स्थानों से प्राप्त की गई हैं। इन प्रतिमाओं में सौन्दर्यभाव की अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। इन प्रतिमाओं में भद्रता, सरलता, आध्यात्मिकता तथा जनजीवन का अद्भुत दर्शन देखने को मिलता है। इस संग्रह में गुप्तकाल से लेकर 16वीं शती तक की प्रतिमाएं भी प्रदर्शित हैं। इनमें चतुर्मुखी शिवलिंग, शिव-पार्वती तथा शिव-पार्वती विवाह से सम्बन्धित प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। दर्शक गुप्त कालीन प्रतिमाओं को थोड़े से ही प्रयास से उनकी मांसलता के आधार पर पहचान सकता है।

    चौहानों के शासन काल में नागौर से लेकर सांभर, सीकर एवं अजमेर आदि स्थानों पर स्थापत्य एवं शिल्पकला के क्षेत्र में चहुंमुखी प्रगति हुई। छठी से 12वीं शताब्दी की अवधि में इस क्षेत्र की कला, समृद्धि के शिखर पर पहुँच गई। अजमेर संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में मुख्यतः चौहान काल में 10वीं से 12वीं शती के मध्य बने शिल्प एवं स्थापत्य कला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य प्रतिमाओं में लिंगोद्भव महेश्वर, नक्षत्र, वराह स्वामी, लक्ष्मीनारायण, कुबेर तथा सूर्य प्रतिमा चित्ताकर्षक हैं जो पुष्कर, अढा़ई दिन का झोंपड़ा, बघेरा, हर्षनाथ (सीकर) आदि स्थलों से प्राप्त की गई हैं। लिंगोद्भव महेश्वर की सीकर से प्राप्त प्रतिमा लंदन एवं रूस में आयोजित कला प्रदर्शनियों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। कटारा से प्राप्त ब्रह्मा-विष्णु-महेश, अर्थूणा के इन्द्र एवं कुबेर, कुसुमा से प्राप्त शिव-पार्वती, आउवा से प्राप्त बलदेव-रेवती एवं विष्णु की चित्ताकर्षक प्रतिमाएं, इस संग्रहालय की उल्लेखनीय प्रतिमाएँ हैं।

    जैन मूर्ति-दीर्घा में लगभग तीन दर्जन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं जो राजस्थान में जैन धर्म के प्रभाव की गाथा कहती हैं। इन प्रतिमाओं को अजमेर, पुष्कर, किशनगढ़, बघेरा, टांटोटी, लाडनूं, तलवाड़ा, अर्थूणा, कटारा, झालरापाटन, बड़ौदा (डूंगरपुर) एवं बदनोर (उदयपुर) आदि स्थानों से प्राप्त किया गया। ये स्थान जैन धर्म के केन्द्र स्थल रहे हैं तथा अधिकतर प्रतिमाएं 10वीं से 17वीं शती का प्रतिनिधित्व करती हैं। बघेरा से प्राप्त कुंथुनाथ, पार्श्वनाथ तथा आदिनाथ, टांटोटी से प्राप्त शांतिनाथ, किशनगढ़ से प्राप्त सुपार्श्वनाथ, अजमेर से प्राप्त शंातिनाथ, चन्द्रप्रभु एवं जैन प्रतिमा का छत्र, पुष्कर से प्राप्त जैन प्रतिमा का छत्र, कटारा से प्राप्त आदिनाथ, महावीर स्वामी तथा पार्श्वनाथ, अर्थूणा से प्राप्त जैन सरस्वती, बड़ौदा से प्राप्त आदिनाथ एवं वासुपूज्य, लाडनूं से प्राप्त कुंथुनाथ एवं हाथनों (जोधपुर) से प्राप्त गौमुखी-यक्ष इस संग्रहालय की विशिष्ट जैन प्रतिमाएँ हैं।

    शिलालेख

    अजमेर संग्रहालय में दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व से लेकर मध्य युग तक के प्राचीन महत्वपूर्ण शिलालेख विद्यमान हैं। इसके साथ ही अभिलेखयुक्त प्रतिमाएं, स्मृतिफलक शिलालेख तथा ताम्रपत्रों का भी अच्छा संग्रह है। ये शिलालेख ब्राह्मी, कुटिल एवं देवनागरी आदि लिपियों तथा संस्कृत, हिन्दी, डिंगल एवं फारसी आदि भाषाओं में उत्कीर्ण हैं। बरली का शिलालेख राजस्थान का प्राचीनतम शिलालेख कहलाता है। इस शिलालेख को अजमेर से 36 किलोमीटर दूर बरली के निकट भिलोत माता मंदिर से प्राप्त किया गया। यह दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व का है तथा ब्राह्मी लिपि में है। संभवतः यह किसी जैन मंदिर का शिलालेख है। नगरी का लेख वि.सं. 481 का है। इस लेख में वैश्य सत्यसूर्य और उसके भाइयों द्वारा भगवान नारायण (विष्णु) के चरण पर मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है। यह लेख मेवाड़ के नगरी (मध्यमिका) नामक प्राचीन नगर से मिला है।

    प्रतिहार वंशीय राजा बाउक के मण्डोर लेख (वि.सं. 894) में मंडोर के प्रतिहारों का ब्राह्मण हरिश्चन्द्र के वंश में होना तथा हरिश्चन्द्र से लेकर बाउक तक की वंशावली और उनका कुछ वृत्तान्त दिया है। बयाना के नाना अभिलेख (8वीं शर्ती ईस्वी) में बलिआ के पुत्र तथा उकेश्वर के पौत्र दुर्गादित्य का, गायों को छुड़ाने के प्रयास में चोरों के हाथों मारे जाने का उल्लेख है। वाक्पतिराज के पुष्कर लेख में 10वीं शती ईस्वी में रुद्रादित्य नामक व्यक्ति द्वारा एक विष्णु मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है। चामुण्डराज अर्थूणा लेख (वि.सं.1137) बागड़ के परमार राजा चामुण्डराज के समय का है। इसमें उसके एक अधिकारी के तीन पुत्रों आसदेव, मत्यासराज तथा अनंतपाल के नाम दिए गए हैं। अनंतपाल ने एक शिव मंदिर बनवाया था, यह लेख अर्थूणा के उक्त शिवालय से मिला है।

    अजमेर के अढाई दिन का झोंपड़ा परिसर से चौहान राजा विग्रहराज (चतुर्थ) के समय के छः शिलापट्ट मिले हैं जिन पर राजा विग्रहराज द्वारा लिखित संस्कृत भाषा का नाटक हरकेलि उत्कीर्ण है। इस नाटक में शिव-पार्वती की अभ्यर्थना की गई है और उनकी विभिन्न क्रीड़ाओं का वर्णन है। इसके एक खण्ड में नारायण तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी का चौहान नरेश विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। इतिहास में उसे वीसलदेव नाम से भी सम्बोधित किया गया है। उसने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो मुहम्मद गौरी की सेनाओं द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है। इस विद्यालय परिसर से 75 पंक्तियों का एक विस्तृत शिलालेख प्राप्त हुआ है जो इस बात की घोषणा करता है कि इस विद्यालय का निर्माण वीसलदेव ने करवाया था। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज द्वारा संस्कृत में लिखित हरकेलि नाटक के छः चौके मिले हैं जो 22 नवम्बर 1153 की तिथि के हैं। राजपूताना संग्रहालय में रखा उसका शिलालेख घोषणा करता है कि चौहान शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

    रंगचित्र

    संग्रहालय के चित्रकला विभाग में कोटा, बूंदी, उदयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ एवं बीकानेर आदि रियासतों से प्राप्त विभिन्न चित्रशैलियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कोटा, करौली, टोंक, बीकानेर, जोधपुर, डूंगरपुर, भरतपुर, झालावाड़ तथा जयपुर के प्रमुख शासकों के चित्रों के साथ-साथ मथुराधीशजी, वल्लभ संप्रदाय, श्रीनाथजी, वासुदेव द्वारा कृष्ण को लेकर यमुना पार करने के चित्र, विभिन्न राग-रागिनियों के चित्र, गेरखनाथजी, अष्टछाप कवि, गुंसाईजी, चीर हरण, राम-रावण युद्ध, वल्लभाचार्यजी, विट्ठलनाथजी, भीष्म पितामह आदि के चित्र सम्मिलित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में विभिन्न प्रकार के प्राचीन अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें, ढाल, कटार, फरसा, जागनोल, बंदूक, धनुषबाण तथा अनेक प्रकार के हथियार संगृहीत हैं। साथ ही एक मनुष्याकार राजपूत योद्धा का मॉडल रखा है जो मध्य-कालीन युद्धों के समय पहनी जाने वाली वेशभूषा से सुसज्जित है।

    सिक्के एवं मुद्राएं

    अजमेर संग्रहालय में सोना, चांदी, तांबा, लैड तथा निकल के 3000 से अधिक सिक्के सुरक्षित हैं जिनमें भारतवर्ष के पूर्वेतिहासिक काल के पंचमार्का (आहत) सिक्के सबसे पुराने हैं। नगरी से प्राप्त जनपद के सिक्कों पर वृक्ष, स्वास्तिक, ब्रह्मी लिपि के लेख तथा पट्ट और मेहराब युक्त पहाड़ी के नीचे टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से बने नदी के चिह्न अंकित हैं। तक्षशिला से प्राप्त इण्डोग्रीक सिक्के के चित्त की ओर राजा का ऊर्ध्व चित्र है तथा पट्ट की ओर यूनानी देवी एवं देवता, ‘जियस’ लिखा हुआ है एवं वृषभ के चित्र बने हैं। कुषाणकालीन सिक्कों में ईरानी वेशभूषा में अंकित राजा दाहिने हाथ से अग्नि वेदी पर आहुति देते हुए अंकित है तथा बायां हाथ कटि पर बंधी तलवार थामे दिखाया गया है। राजा के पृष्ठ भाग पर शिव तथा त्रिशूल का अंकन है। राजा का शिरस्त्राण (टोप) नुकीला है।

    कनिंघम को पुष्कर से पश्चिमी क्षत्रपों महपान, पायदामन, रुद्रदामन तथा रुद्रसिंह की कई मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। गुप्तकालीन सिक्कों में चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राजा-रानी के सिक्के, समुद्रगुप्त के ध्वजधारी, धनुर्धारी, परशुधारी, वीणाधारी तथा अश्वमेध प्रकार के सिक्के, कांच का दुर्लभ सिक्का तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विभिन्न प्रकार के सिक्के इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण निधि हैं। चौहान अजयदेव के सिक्के में एक ओर बैठी हुई देवी का अंकन है तथा दूसरी ओर देवनागरी में अजयदेव लिखा हुआ है। अश्वारोही-वृषभ प्रकार के सिक्के के चित भाग पर ढाल और भाला लिए अश्वारोही तथा पट्ट भाग पर शिव-वाहन नंदी बैठा है। गधिया प्रकार के सिक्कों के चित भाग पर राजा का भद्दा चेहरा है तथा पट्ट भाग पर सिंहासन या अग्निवेदी को बिन्दुओं के माध्यम से बनाया गया है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों के विभिन्न सिक्के भी इस संग्रहालय में संगृहीत हैं।


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  • अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

     22.06.2018
    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर


    महाराणा शम्भुसिंह (ई.1861-74) के शासन काल में कर्नल हैचिन्सन की सलाह पर उदयपुर रियासत में तवारीख महकमा (इतिहास विभाग) स्थापित किया गया। इसी दौरान ई.1873 में उदयपुर संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ। महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के शासनकाल में इतिहास विभाग की अच्छी प्रगति हुई। उनके शासन काल में ही राज्य में ई.1879 में कविराजा श्यामलदास की अध्यक्षता में ऐतिहासिक और पुरा सामग्री का अनुसंधान कार्य प्ररम्भ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासविद् गोविन्द गंगाधर देशपाण्डे ने एक वर्ष तक उदयपुर में रहकर प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन किया।

    ई.1887 में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने महारानी विक्टोरिया (ई.1837-1901) के शासन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उदयपुर के सज्जन निवास बाग में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया। इस भवन का निर्माण इण्डो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में किया गया था। इस उद्यान को अब गुलाब बाग कहते हैं। 1 नवम्बर 1890 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड लेन्सडाउन ने इस भवन में विक्टोरिया हॉल म्यूजियम और पुस्तकालय का उद्घाटन किया। उसी दिन से यह जनसाधारण के लिए खोल दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर ओझा को क्यूरेटर के पद पर नियुक्त किया गया। वे ई.1908 तक इस पद पर तक कार्यरत रहे। उनके पश्चात् पण्डित अक्षय कीर्ति व्यास और रत्नचन्द्र अग्रवाल भी इस संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अध्यक्ष रहे। उन्होंने पूरे राज्य से शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ, कलात्मक सामग्री एवं वस्त्रों के नमूने प्राप्त करके इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए। आगे चलकर पं. अक्षय कीर्ति व्यास ने मेवाड़ क्षेत्र के शिलालेखों एवं रतनचन्द्र अग्रवाल ने मेवाड़ क्षेत्र की प्राचीन प्रतिमाओं को प्रकाशित करने पर विशेष ध्यान दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरस्वती भण्डार से बहुत बड़ी संख्या में चित्रित पाण्डुलिपियों का अधिग्रहण किया गया।

    महारानी विक्टोरिया की ऐतिहासिक प्रतिमा

    इस संग्रहालय के लिए लंदन से महारानी विक्टोरिया की एक विशाल मूर्ति मंगवाई गई जिसका समस्त व्यय महाराणा द्वारा वहन किया गया। इस प्रतिमा को संग्रहालय भवन के समक्ष स्थापित किया गया जहाँ यह वर्षों तक खड़ी रही। ई.1948 में उदयपुर के स्वतंत्रता सेनानी तथा भारत की संविधान सभा के सदस्य वीरभद्र जोशी तथा मास्टर बलवंत सिंह मेहता इस प्रतिमा पर चढ़ गए और इसके मुंह पर काला रंग पोत दिया। इसके बाद इस प्रतिमा को उठाकर संग्रहालय के भवन में रख दिया गया और विक्टोरिया की प्रतिमा के स्थान पर गांधीजी की प्रतिमा स्थापित की गई। स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा इसे राष्ट्रवाद की विजय बताया गया। ई.1968 में यह संग्रहालय सज्जन निवास बाग से सिटी पैलेस के कर्ण विलास या हिसाब दफ्तर महल में स्थानान्तरित किया गया और इसका नाम प्रताप संग्रहालय रखा गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद यह राजकीय संग्रहालय उदयपुर के नाम से जाना जाता है। विक्टोरिया हॉल अब गवर्नमेंट सरस्वती पुस्तकालय कहलाने लगा किंतु विक्टोरिया की वह प्रतिमा आज भी इस भवन की एक गैलेरी के कोने में उपेक्षित अवस्था में रखी हुई है।

    क्षेत्रीय संग्रहालय

    वर्तमान में राजकीय संग्रहालय उदयपुर एक क्षेत्रीय संग्रहालय है। इसमें मेवाड़ क्षेत्र के प्राचीन शिलालेख, प्रतिमाएं, लघु चित्र, प्राचीन सिक्के, एवं अस्त्र-शस्त्र संगृहीत हैं। संग्रहालय की पुरा सामग्री एवं कला सामग्री को पांच दीर्घाओं में रखा गया है।

    बाल दीर्घा

    प्रथम दीर्घा को बाल दीर्घा का रूप दिया गया है। इसमें बालकों की रुचि की सामग्री प्रदर्शित है जिसमें स्टफ किया गया कंगारू, बन्दर, सफेद सांभर, कस्तूरी हिरन और घड़ियाल प्रमुख हैं।

    सांस्कृतिक दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ की छपाई के वó, हाथी दाँत के कलात्मक नमूने, मेवाड़ी पगड़ियाँ, साफे, चोगा, भीलों के आभूषण, महाराणाओं के पोट्रेट्स, भीलों के जीवन पर आधारित आधुनिक चित्र, और अó-शó प्रमुख हैं। सांस्कृतिक दीर्घा की सबसे मूल्यवान निधि शहजादा खुर्रम की पगड़ी है। ई.1622 में शहजादा खुर्रम अपने पिता जहांगीर से बगावत करके दक्षिण की ओर जाते हुए कुछ दिनों के लिए उदयपुर ठहरा था। वह मेवाड़ के राणा 
    कर्णसिंह का पगड़ी बदल भाई बना था। वही यादगार पगड़ी राजकीय संग्रहालय उदयपुर में प्रदर्शित है। हाथी दांत से निर्मित बहुत सी कलाकृतियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। इनमें हाथीदांत से बने मुग्दर, खड़ाऊं, पालकी ले जाते कहार, पानी का जहाज, चंदन से बनी खड़ाऊं, भेड़ पर आक्रमण करता शेर, कुत्तों को घुमाने ले जाता आदमी, हाथीदांत की कार बहुत ही परिश्रम से बनाई गई प्रतीत होती हैं। धातुओं से बनी बहुत सी मूर्तियां भी महत्वपूर्ण हैं। पीतल से बनी भील ज्वैलरी भी दर्शनीय है। पीतल से बनी 13वीं सदी की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा इतिहास की दृष्टि से बहुमूल्य है। इस प्रतिमा में देवी के चार हाथ दर्शाए गए हैं। पीतल से बनी जैन तीर्थंकरों की भी कई प्रतिमाएँ हैं। संग्रहालय में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का लकड़ी का मॉडल भी प्रदर्शित किया गया है जिसकी कला देखते ही बनती है।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय में मध्यकालीन एवं रियासती इतिहास को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण अस्त्र-शस्त्रों को बड़ी संख्या में प्रदर्शित किया गया है। हथियार बनाने वालों ने कुछ हथियारों पर उनसे सम्बन्धित सूचनाएं भी अंकित की हैं। कुछ तलवारों की मूठ सोने से बनी हुई हैं तथा कुछ तलवारों की म्यान पर सोने का काम किया गया है। संग्रहालय में कलाई पर पहनने वाला पहुंचा, बरछी, पेशकब्ज, छुरी तथा नारजा भी प्रदर्शित किए गए हैं। एक तलवार पर बांसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह का नाम अंकित है। स्टील से बने धनुष एवं बाण, बांस से बने बाण, 17वीं शताब्दी में जैसलमेर में बनी मैचलॉक बंदूक जिस पर सोने की कोफ्तकारी का काम है, अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में निर्मित हाथी का अंकुश, 18वीं शताब्दी का भीलों के काम आने वाला चमड़े का तरकश, दो सौ साला पुरानी लोहे की गुप्ती, थ्री नॉट थ्री राइफल, तुर्किश तोप, विभन्न रियासतों के चांदी के सिक्के, बीकानेर में बनी 18वीं सदी की लोहे की ढाल जिस पर चंद्रस का काम हुआ है तथा ताम्बे के फूलों से सजी हुई है, विभिन्न प्रकार की पेशकब्ज, खुखरी, कैंची कटार, टाइगर कटार, 17वीं शताब्दी में बूंदी में निर्मित लोहे की दस्तेद्रस (दाओ) संग्रहालय में प्रदर्शित की गई हैं।

    संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की तलवारें रखी गई हैं जो 17वीं से 19 शताब्दी तक भारत में प्रयुक्त होती थीं। इनमें तोते की आकृति वाली मूठ युक्त तलवार, ई.1850 के आसपास बनी लहरिया तलवार जिसकी मूठ पर सोने की कोफ्ताकारी है, घोड़े की मुखाकृति की मूठ वाली कुलाबा (पतली तलवार), पक्षी की चोंच के समान चिरे हुए मुंह वाली जुल्फिकार तलवार, स्टील की गुर्ज, लोहे की ढालें जिन पर चांदी का काम किया हुआ है, चांदी की कोफ्तकारी से युक्त नागिन के समान लहराती हुई आकृति में बनी तलवार, लोहे की तेगा तलवार, कोरबंदी कोफ्तकारी से युक्त लहरिया पैटर्न की लोहे की तलवार, सोने के काम वाली मूठ की पट्टा तलवार जो 17वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में दक्षिण भारत में बनी थी, सम्मिलित हैं।

    शिलालेख दीर्घा

    इस संग्रहालय के प्रथम क्यूरेटर गौरीशंकर ओझा ने रियासत के विभिन्न भागों से इतिहास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी शिलालेख एकत्रित किए थे जिनमें से बहुत से शिलालेख अब भी इस संग्रहालय में हैं, कुछ शिलालेख अन्य संग्रहालयों को भेज दिए गए हैं। इस संग्रहालय के क्यूरेटर रत्नचंद्र अग्रवाल भी बहुत से शिलालेखों को प्रकाश में लाए।

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त द्वितीय शताब्दी ई.पू. से 19वीं शताब्दी ईस्वी तक के शिलालेख संगृहीत हैं जो मेवाड़ क्षेत्र के इतिहास को जानने का प्रमुख साधन हैं। इन शिलालेखों में सबसे प्राचीन घोसुण्डी शिलालेख है जो द्वितीय शताब्दी ई. पू. का है। यह चित्तौड़ से सात मील दूर नगरी के निकट घोसुण्डी से प्राप्त हुआ। यह लेख कई खण्डों में टूटा हुआ है। इनमें से एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। इस शिलालेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजा गृह नारायण वाटिका के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के पराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का उल्लेख है। जोगेन्द्रनाथ घोष के विचार से इस लेख में वर्णित राजा कण्ववंशीय ब्राह्मण होना चाहिए। जॉनसन के विचार से यह लेख किसी ग्रीक, शुंग या आन्ध्रवंशीय शासक का होना चाहिये। आन्ध्रों में ‘गाजायन’ नामक गोत्र तथा ‘सर्वतात्’ आदि नाम पाए जाते थे। इसके अतिरिक्त भीलवाड़ा जिले का वि.सं. 282 का नान्दसा यूप शिलालेख, छोटी सादड़ी का वि.सं. 547 का भामरमाता शिलालेख, कल्याणपुर शिलालेख एवं कुम्भलगढ़ से प्राप्त कुम्भा कालीन चार विशाल शिलालेख उल्लेखनीय हैं।

    चित्तौड़ से छः मील दूर स्थित नगरी (प्राचीन नाम माध्यमिका) से प्राप्त एक शिलालेख प्रदर्शित किया गया है। कुंद शिलालेख वि.सं. 718 का है जो सूर्यवंशी राजा अपराजित से सम्बन्धित है। राजा धवलप्पदेव का धौद शिलालेख, परमार वंश का डबोक शिलालेख, तेजसिंह का घाघसा बावड़ी का शिलालेख, चौहान वंश का अलावदा और लोहारी सती लेख, सूचिवर्मन एवं शक्तिकुमार का आहार शिलालेख भी इस संग्रहालय के प्रमुख आकर्षण हैं। संग्रहालय में एक फारसी शिलालेख भी उल्लेखनीय है जो गयासुद्दीन तुगलक के शासन के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करता है। इसी दीर्घा में कुम्भलगढ़ से प्राप्त 16 लेखयुक्त प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं जिनमें ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, दामोदर, वासुदेव, केशव, माधव, मधूसूदन एवं पुरुषोत्तम प्रमुख हैं।

    कुछ प्राचीन ताम्रपत्र भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं जिन पर धार्मिक प्रयोजन हेतु ब्राह्मणों को भूमिदान दिए जाने का उल्लेख है।

    प्रतिमा दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त छठी शताब्दी से 18वीं शताब्दी ईस्वी की प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिमाओं को शैव सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, जैन सम्प्रदाय तथा अन्य विषयों से सम्बन्धित प्रतिमाओं से विभक्त किया जा सकता है। इनमें जगत से प्राप्त इन्द्राणी की प्रतिमा तथा तनेसर से प्राप्त शिशु क्रीड़ा, छठी शताब्दी ईस्वी की मूर्ति कला का प्रतिनिधित्व करती हैं। बान्सी क्षेत्र के रानीमल्या का जैन कुबेर और कल्याणपुर से प्राप्त घुंघराले बालों से युक्त शिवमस्तक आठवीं शताब्दी ईस्वी की प्रमुख प्रतिमाएं हैं। कल्याणपुर से प्राप्त एक पुरुष प्रतिमा का भारी मस्तक भी इस संग्रहालय में रखा गया है। कल्याणपुर से ही त्रिनेश शिव प्रतिमा का एक मस्तक भी प्राप्त किया गया है। इसमें परमात्मा के चेहरे पर बहुत ही शांत भाव हैं। मस्तक पर बहुविध अलंकरण किया गया है।

    केजड़ा से प्राप्त नृत्यलीन वाराही तथा नागदा से प्राप्त शेषशायी विष्णु, आहार से प्राप्त भगवान विष्णु के मत्स्यावतार एवं कच्छप अवतार प्रतिमाएँ भी संग्रहालय का विशिष्ट आकर्षण हैं। कमल पुष्प पर आसीन देवी लक्ष्मी की एक प्रतिमा विभिन्न प्रकार के आभूषणों से अलंकृत है। इसमें देवी की देहयष्टि अत्यंत पुष्ट दिखाई दिखाई गई है। आहार से प्राप्त एक भारी कांस्य प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई है। गुप्तोत्तर काल में दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हरे-नीले पत्थर (परेवा पत्थर) पर बहुत बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। इस संग्रहालय में इस पत्थर की बहुत सी प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। भगवान शिव की परेवा पत्थर की 8वीं शताब्दी की एक प्रतिमा में भगवान किंचित बांकपन लेकर खड़े हैं। चार हाथों की इस प्रतिमा के तीन हाथ ही दिखाई देते हैं। एक हाथ में भगवान ने त्रिशूल पकड़ रखा है। एक हाथ में पुष्प है। भगवान के चरणों के पास नंदी खड़ा है।

    परेवा पत्थर पर ही चामुण्डा की एक प्रतिमा आठवीं शताब्दी की है। इसमें देवी के चार हाथ हैं, माथे पर सुंदर केश-सज्जा एवं मुकुट दिखाई दे रहे हैं। आठवीं शताब्दी की परेवा पत्थर की एक शिव प्रतिमा में भगवान शिव के मुखमण्डल पर प्रसन्नता विराज रही है। उन्होंने भीलों की तरह छोटा सा बाघम्बर बांध रखा है। सिर पर केशों की भारी सजावट की गई है। भगवान, नंदी का सहारा लेकर खड़े हैं। इस प्रतिमा की चार भुजाएं थीं किंतु अब केवल एक ही रह गई है।

    परेवा पत्थर से बनी नागिनी की एक प्रतिमा 9वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी भगवान के वराह अवतार की एक दुर्लभ प्रतिमा दर्शनीय है। इसी प्रकार की एक वराह प्रतिमा जो कम से कम एक हजार वर्ष पुरानी रही होगी, लेखक ने बारां जिले में परवन नदी के किनारे काकूनी के भग्नावशेषों में पड़ी देखी थी जिसे एक मंदिर के परिसर में रखा गया था। सिंहवाहिनी क्षेमंकरी माता की प्रतिमा सौम्य भाव की है, यह 10वीं-11वीं शताब्दी की है। देवी के चरणों के पास सिंह का अंकन किया गया है। देवी के माथे पर जूड़ा एवं मुकुट है तथा मस्तक के पीछे प्रभामण्डल बनाया गया है। इसी काल का लाल पत्थर का एक कुबेर देखते ही बनता है, वह एक छोटे हाथी पर पालथी लगाकर बैठा है तथा उसके भारी शरीर के कारण हाथी दबा हुआ प्रतीत होता है। परेवा पत्थर पर बनी भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा एवं शेषशायी प्रतिमा भी देखते ही बनती हैं। शेषशायी प्रतिमा में देवी लक्ष्मी भगवान के चरण चाप रही हैं। शिव-पार्वती की एक युगल प्रतिमा 10वीं-12 शताब्दी की है। यह भी परेवा पत्थर पर बनी है तथा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है।

    पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य के शिल्पिी सूत्रधार मण्डन ने इस क्षेत्र की मूर्ति कला को प्रभावित किया। उसके प्रभाव से युक्त मूर्तिकला की कई मूर्तियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। साधारण लाल पत्थर से 15वीं शताब्दी में बनी कई प्रतिमाएँ इस संग्रहालय में हैं जिनमें ब्रह्माणी माता का एक पैनल, भगवान विष्णु का खड़ा विग्रह, दामोदर स्वरूप का विग्रह, वासुदेव स्वरूप का विग्रह, अनिरुद्ध स्वरूप का विग्रह, केशव स्वरूप, प्रद्युम्न स्वरूप तथा भगवान के पुरुषोत्तम स्वरूप के विग्रह प्रदर्शित किए गए हैं। पंद्रहवीं शताब्दी का अधोक्षजा स्वरूप का विग्रह भी दर्शनीय है। इस प्रतिमा के दोनों हाथ तथा वैजयंती माला का काफी भाग खण्डित हैं। कुंभलगढ़ से प्राप्त वैष्णवी की एक प्रतिमा पर ई.1458 का शिलालेख अंकित है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी की भगवान संकषर्ण की प्रतिमा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है। यह लाल पत्थर से निर्मित है। परेवा पत्थर पर बनी एक चतुर्भुजी ब्रह्मा की प्रतिमा के चारों ओर अलंकृत परिकर बनाया गया है। यह 17वीं शताब्दी की प्रतिमा है तथा परेवा पत्थर से निर्मित है।

    परेवा पत्थर पर निर्मित भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी की रागात्मक भाव की एक सौम्य प्रतिमा 16वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी इंद्राणी की एक प्रतिमा मध्यकाल की है। इसमें इन्द्र की पत्नी कमल असन पर विराजमान है। उसकी सवारी ऐरावत भी कमल के नीचे अंकित है। इन्द्राणी के चार हाथ हैं, मस्तक एवं गले में बहुत सुंदर आभूषण एवं अलंकरण हैं। यह छठी शताब्दी ईस्वी की प्रतिमा है जो जगत से प्राप्त हुई थी। इन्द्राणी ने अपना बायां पैर मोड़कर अपनी दायीं जंघा के पास रखा हुआ है तथा दायां पैर आसन से नीचे लटक रहा है। देवी के चेहरे पर आत्म गौरव एवं आत्मविश्वास के भाव हैं। परेवा पत्थर पर बनी द्वारपाल की एक प्रतिमा 16वीं शताब्दी की है।

    वाराही की एक मनुष्याकार प्रतिमा 15वीं शती की है तथा लाल पत्थर पर निर्मित है। यह भी मातृका का ही अंकन है। इस पर उसी काल का एक लेख अंकित है जिसके अनुसार महाराणा कुंभा (ई.1433-68) ने इस प्रतिमा को लगवाया। यह प्रतिमा कुंभलगढ़ से लाई गई प्रतीत होती है। सोलहवीं शती की लाल पत्थर की गणेश प्रतिमा का शिल्प देखते ही बनता है। भगवान की दोनों जंघाओं पर रिद्धि एवं सिद्धि विराजमान हैं। मध्यकाल के एक अत्यंत सुंदर पैनल में अष्ट भुजाओं वाले शिव का अंकन किया गया है किंतु इस प्रतिमा का सिर उपलब्ध नहीं है। भगवान ने अपने हाथों में कमल, त्रिशूल, खट्वांग, सर्प तथा कपाल धारण कर रखे हैं। भगवान ने अपने दो हाथ अपनी गोद में रख रखे हैं। भगवान के दोनों तरफ चंवरधारिणियों का अंकन किया गया है। सूर्य एवं सुरसुन्दरी आदि प्रतिमाएँ दर्शकों को पंद्रहवी शती के कालखण्ड का अनुभव करावाने में सक्षम हैं।

    जैन प्रतिमाओं में 7वीं-8वीं शती की जैन कुबेर की भारी शरीर सौष्ठव वाली प्रतिमा अपेक्षाकृत बहुत अच्छी अवस्था में है। पंद्रहवीं-सोलहवीं शती की आदिनाथ की प्रतिमा तथा तीर्थंकर की एक मस्तक विहीन प्रतिमा प्रमुख हैं। जैन तीर्थंकर का एक घुंघराले बालों के अंकन वाला मस्तक अलग से प्रदर्शित किया गया है। संभवतः यह मस्तक संग्रहालय की ही मस्तक विहीन प्रतिमा का हो। क्षीण कटि एवं स्थूल पीन पयोधरों से युक्त एक मनोहारी जैन देवी की प्रतिमा इस क्षेत्र में पाए जाने वाले साधारण लाल पत्थर से बनी हुई है। संग्रहालय में मध्यकालीन शिल्पकला का एक अनुपम नमूना तोरण के एक खण्ड के रूप में उपलब्ध है। इसमें गुलाब की पत्तियों एवं ज्यामितीय आकृतियों का अद्भुत अंकन किया गया है।

    चित्रकला दीर्घा

    राजीय संग्रहालय उदयपुर की चित्रकला दीर्घा में लगभग आठ हजार लघु चित्र प्रदर्शित किए गए हैं जो संसार में मेवाड़ शैली का सबसे विशाल संग्रह है। इस संग्रह का अध्ययन करने के लिए देश-विदेश के शोधकर्ता उदयपुर संग्रहालय आते हैं। ई.1979 में बनेड़ा निवासी अक्षय देराश्री ने 143 लघुचित्र उदयपुर संग्रहालय को भेंट किए जिनमें जयपुर और मालपुरा शैली के चित्र भी प्रमुख हैं। इन लघु चित्रों का काल ई.1630 से ई.1900 तक विस्तृत है। संग्रहालय में सबसे प्राचीन लघुचित्र रसिकप्रिया पर आधारित हैं। इन लघुचित्रों का चित्रकार साहबदीन था जिसकी शैली इतनी स्वभाविक एवं समृद्ध थी कि उस परम्परा का प्रभाव मेवाड़ की कला पर आज भी देखा जा सकता है। महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) (ई.1698-1710) के काल के रसिकप्रिया के 47 चित्र संग्रहालय की अमूल्य निधि हैं। कुछ चित्र एकलिंग महात्म्य से सम्बन्धित हैं। कृष्ण द्वैपायन द्वारा लिखित हरिवंश के श्लोकों में आए प्रसंगों को आधार बनाकर, मध्यकाल में चित्र बनाने की परम्परा रही है। इस परम्परा के कुछ चित्र इस संग्रहालय में रखे हैं।

    महाभारत, कृष्णावतार चरित (भागवत), कादम्बरी, रघुवंश, रसिकप्रिया, वेलि कृष्ण रुक्मणि, मालती माधव, गीत गोविन्द, पृथ्वीराज रासो, सूरसागर, बिहारी सतसई एवं पंच-तंत्र पर आधारित लघुचित्र भी उल्लेखनीय हैं। फारसी एवं अरबी ग्रन्थों पर आधारित ‘कलीला-दमना’ और ‘मुल्ला दो प्याजा’ के लतीफों पर आधारित लघुचित्र भी संग्रहालय में संगृहीत हैं। एक चित्रित एलबम ‘दर्शनों की किताब’ के नाम से उपलब्ध है। एक एलबम में मेवाड़ के राणा उदयसिंह से महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) तक के चित्र हैं। इस एलबम में मीराबाई का चित्र भी महत्वपूर्ण है। प्रति वर्ष लगभग दस हजार देशी एवं डेढ़ हजार विदेशी दर्शक संग्रहालय को देखने आते हैं।


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  • अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

     22.06.2018
    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर


    उदयपुर के राजमहलों की नींव महाराणा उदयसिंह (द्वितीय) (ई.1540-72) ने ई.1559 में रखी। इसे सजाने-संवारने में मेवाड़ राजघराने की 24 पीढ़ियों का अनवरत योगदान रहा है। वर्तमान में यह परिसर 1800 फुट लम्बा तथा 800 फुट चौड़ा है, इसकी सर्वाधिक ऊँचाई 105 फुट है। राजमहल का एक हिस्सा ‘मर्दाना महल’ कहा जाता है। इसे महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ ने ई.1969 में संग्रहालय का रूप दिया। ई.1971 के पश्चात् इससे सटे ‘जनाना महल’ को भी इसके साथ जोड़कर संग्रहालय का विस्तार किया गया। यह संग्रहालय 1028 फुट लम्बा एवं 300 फुट चौड़ा है। सिटी पैलेस का ऐतिहासिक भवन वास्तुकला का एक अनूपम उदाहरण है। इसमें शुद्ध भारतीय शैली से लेकर मुगल एवं ब्रिटिश शैली का सुन्दर समायोजन देखा जा सकता है, इस कारण यह वास्तुशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का प्रमुख केन्द्र भी है।

    सिटी पैलेस म्यूजियम का प्रथम प्रवेश द्वार ‘बड़ीपोल’ के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण महाराणा अमर सिंह (प्रथम) (ई.1597-1620) ने करवाया था। इसके निकट स्थित बुकिंग काउण्टर से संग्रहालय में प्रवेश करने के लिए टिकिट प्राप्त किये जाते हैं। बड़ी पोल के ठीक सामने तीन पोलों वाला ‘त्रिपोलिया’ स्थित है, जिसे महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) ने बनवाया था। इससे आगे ‘माणक चौक’ है। इसी चौक के दाईं ओर के महल को संग्रहालय के रूप में प्रयुक्त किया गया है। संग्रहालय में प्रवेश ‘दरीखाने की पोल’ से होकर किया जाता है।

    इस पोल से आगे बढ़ने पर बाईं ओर ‘सभा शिरोमणि का दरीखाना’ है, जहाँ महाराणाओं के दरबार लगा करते थे तथा दाईं ओर ‘सलेहखाना’ (शस्त्रागार) स्थित है। इसकी स्थापना महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) के राज्यकाल में हुई। इसमें महराणाओं के निजी उपयोग के शस्त्रास्त्र- तलवारें, ढालें, छुरियां, कटारें, बन्दूकें, पिस्तोलें आदि प्रदर्शित की गई हैं। इससे आगे बढ़ने पर ‘गणेश चौक’ आता है। इसके उत्तर पूर्वी कोने में गणेश ड्योढ़ी स्थित है। यहाँ स्थापित गणेश एवं लक्ष्मी की सुन्दर प्रतिमाओं के चारों ओर रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम किया गया है। यहाँ से सीढ़ियां चढ़कर ‘राय आंगन’ में प्रवेश किया जाता है।

    राय आंगन के पश्चिम में गोस्वामी प्रेमगिरी की धूणी (नव चौकी महल) है, इन्हीं के आशीर्वाद से महाराणा उदयसिंह (ई.1540-72) ने उदयपुर नगर की स्थापना की थी। यहीं पर महाराणाओं का राजतिलक होता आया है। जबकि पूर्व दिशा में ‘नीका की चौपाड़’ एवं प्रताप कक्ष है। प्रताप कक्ष में महाराणा प्रताप (ई.1572-97) के अस्त्र-शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। नीका की चौपाड़ और इससे संलग्न कक्षों में महाराणा प्रताप से सम्बन्धित बड़े-बड़े तैल चित्र लगे हैं जो हिन्दुआ सूर्य प्रताप की गौरव गाथा कहते हैं।

    नवचौकी महल से सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाने पर चंद्रमहल आता है। इसमें एक ही पत्थर का बना सफेद संगमरमर का कुंड है। महाराणा के राजतिलक के समय इस कुंड को चांदी के एक लाख सिक्कों से भरा जाता था। इस कारण इसे ‘लक्खु कुंड’ कहा जाता है। ये सिक्के पास ही स्थित ‘लक्खु गोखड़े’ से प्रजा को लुटाए जाते थे। इस भवन के आगे शिव प्रसन्न अमर विलास महल (बाड़ी महल) में पहुंचा जाता है। यह महल श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इसमें बना मुगल शैली का चारबाग (उद्यान) कुण्ड एवं फव्वारे पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। यहाँ लगे विशाल वृक्ष एवं सुगन्धित फूलों के पौधे पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। यहीं एक कक्ष में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) का चित्र और उसके पास ही वह ऐतिहासिक कुर्सी रखी हुई है जो 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम द्वरा आयोजित इम्पीरियल दरबार में महाराणा फतहसिंह के लिए लगायी गई थी। महाराणा अपने कुलाभिमान एवं किसी शासक के आगे सर नहीं झुकाने की अपनी गौरवशाली वंश परम्परा के कारण दिल्ली जाकर भी इस दरबार में उपस्थित नहीं हुए थे।

    बाड़ी महल के दक्षिण में स्थित द्वार से ‘दिलखुशाल महल’ में जाया जाता है। इस परिसर में मेवाड़ शैली के कई चित्र लगे हैं, जिनमें महाराणाओं के विभिन्न अवसरों पर बनाए गए चित्र प्रदर्शित किये गए हैं। दिलखुशाल महल के उत्तर में स्थित ‘कांच की बुर्ज’ में दीवारों और छत पर रंगीन कांच का आकर्षक कार्य किया गया है वहीं दक्षिण में स्थित ‘चित्राम की बुर्ज’ में महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) एवं महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) द्वारा उत्सवों, सवारियों और त्यौहारों के सुन्दर भित्तिचित्रों का अंकन करवाया गया है, इन चित्रों में मेवाड़ के प्राचीन वैभव की झलक मिलती है।

    इससे आगे बढ़ने पर ‘चीनी चित्रशाली’ है जिसमें डेल्फ तथा पुर्तगाली ब्लू टाइलें जड़ी हुई हैं। यहाँ से उदयपुर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इसके उत्तर में स्थित ‘वाणी विलास’ महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) द्वारा स्थापित पुस्तकालय का कक्ष है तथा दक्षिण में ‘शिव विलास’ स्थित है। शिव विलास के उत्तर में मदन विलास है जिसमें कर्नल जेम्स टोड के चित्र तथा उससे सम्बन्धित सामग्री प्रदर्शित की गई है। यहीं किशन विलास सात ताका नामक महल भी है, जिसकी दीवारों के नीचे एक पट्टी में सुन्दर ग्लास इन्ले वर्क के साथ काले कागज़ पर सुनहरी चित्रांकन किया गया है। यहीं उत्तरी दीवार की खिड़कियों से पिछोला झील का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

    इसके आगे संकरे गलियारों और घुमावदार सीढ़ियों से होते हुए ‘मोर चौक’ तक पहुंचा जा सकता है। इस बीच मोती महल, भीम विलास, सूर्य प्रकाश गैलेरी और पीतम निवास आते हैं, इनमें भी रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम दर्शनीय है। पीतम निवास ई.1955 तक महाराणा भूपाल सिंह (ई.1930-55) का निवास स्थान रहा, इसे उसी रूप में अब तक संरक्षित रखा गया है। यहाँ से नीचे सीढ़ियां उतरकर सूर्य चौपाड़ आती है इसमें स्वर्ण मुलम्मा चढ़ा सूर्य लगा हुआ है। ऐसा ही एक सूर्य पूर्व में स्थित सूर्य गोखड़े में लगा है। इस कक्ष में दीवारों के नीचे एक पट्टी में आराई के उभरमा अंकन पर सुन्दर चित्रकारी की गई है।

    इसके आगे छोटी चित्रशाली है जिसमें महाराणा अपने अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते थे। यहीं आमोद-प्रमोद के लिए गायन वादन के आयोजन होते थे। इसके आगे मोर चौक है जिसमें रंगीन कांच की बारीक कतरनों के ‘इन्ले वर्क’ से मोरों का निर्माण किया गया है। इस चौक की सम्पूर्ण पूर्वी दीवार कांच की कारीगरी का अनूठा दृश्य उपस्थित करती है। इस चौक के उत्तर में स्थित माणक महल भी रंगीन कांच की कारीगरी के लिए पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।

    इससे आगे संकरे गलियारे से होते हुए ‘जनाना महल’ में जाया जा सकता है। यहाँ सबसे पहले शरबत विलास एवं ब्रज विलास आते हैं, यह महाराणा भूपाल सिंह की तृतीय महाराणी का निवास स्थान था, इसे भी अब तक अपने पुराने रूप में ही संरक्षित किया हुआ है। यहाँ उनकी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। यहीं से कुछ दूरी पर भूपाल विलास है, यहाँ महाराणियाँ अपने अतिथियों से भेंट एवं स्वागत-सत्कार करती थीं, इसे भी उसी रूप में संरक्षित रखा गया है।

    महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउण्डेशन के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध न्यासी श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड़ संग्रहालय को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में निरन्तर प्रयत्नशील हैं। सम्पूर्ण महल के कायाकल्प के साथ जनाना महल में विभिन्न गैलेरियों (वीथिकाओं) का निर्माण करवाया गया है। इनमें मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की संस्कृति से पर्यटकों का साक्षात्कार होता है। इन अलग-अलग वीथिकाओं में मूर्तियां, वस्त्र, वाद्य यंत्र, पालकियाँ एवं म्यानें, मेवाड़ शैली के चित्र तथा छायाचित्र कलात्मक ढंग से सजाए गए हैं। अमर महल में स्थित रजत वीथिका दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र है, इसमें महाराणाओं एवं उनके आराध्य देवों के उपयोग में ली जाने वाली चांदी की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, इनमें चांदी की बग्गी, हाथी का हौदा, पालकी एवं हाथी-घोड़ों के आभूषण विशेष दर्शनीय हैं।

    यहाँ से मौती चौक होते हुए तोरण पोल पहुंचकर संग्रहालय दर्शन पूरा होता है। तोरण पोल पर राजपरिवार में होने वाले विवाहों के अवसर पर तोरण बांधा जाता है। इसके अतिरिक्त भी सिटी पैलेस संग्रहालय में देखने को बहुत कुछ है। प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक उदयपुर भ्रमण के लिए आते हैं, इनमें से अधिकांश सिटी पैलेस संग्रहालय देखने आते हैं।


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  • अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

     22.06.2018
    अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    अध्याय - 9 क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    फतह प्रकाश महल में अब होटल स्थापित कर दिया गया है। इसी होटल में क्रिस्टल गैलेरी की स्थापना की गई है जिसमें विश्व का सबसे बड़ा क्रिस्टल संग्रह स्थापित किया गया है। यह सम्पूर्ण क्रिस्टल सामग्री महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के निजी संग्रह की है। विक्टोरियन युग में महाराणा ने इसे एफ. एण्ड सी. ऑस्लर को आदेश देकर बनवाया था। इस संग्रह में क्रिस्टल चेयर्स, सोफासैट तथा पलंग भी शामिल हैं। यह प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुला रहता है।


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  • अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

     22.06.2018
    अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 10 विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर


    होटल गार्डन में मेवाड़ के महाराणाओं की पुरानी लक्जरी कारों का संग्रह स्थापित किया गया है। इनमें ई.1939 की रॉल्स रॉयस कार, कैडिलैक ओपन कन्वर्टीबल्स, मर्सीडीज के दुर्लभ मॉडल्स, 1936 का वॉक्सहॉल मॉडल तथा 1937 का ओपल मॉडल भी शामिल हैं। यह भारत के विरले कार सग्रंहों में से एक है। यह प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुला रहता है।


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  • अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय उदयपुर

     22.06.2018
    अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 11 जनजाति संग्रहालय, उदयपुर


    माणिक्य लाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान उदयपुर द्वारा राज्य की विभिन्न जन जातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को संरक्षित तथा प्रदर्शित करने के उद्देश्य से 30 दिसम्बर 1983 को संस्थान में जनजाति संग्रहालय की स्थापना की गई। इस संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर मेवाड़ के महाराणा का भीलू राजा के साथ चिह्न ‘जो दृढ़ राखे धर्म को तेहि राखे करतार’ रखा हुआ है। संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जनजातियों के चित्र, वस्त्राभूषण, अस्त्र-शस्त्र, विविध मूर्तियां, देवरा, इष्ट देवता, लोक संस्कृति एवं कला को प्रदर्शित किया गया है।

    विभिन्न वाद्ययंत्र, भित्तिचित्र, मांडणे, सांझी, गोदना, एवं लोकनृत्य एवं मेलों की सचित्र झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। इनमें राज्य की प्रमुख जनजातियों- भील, मीणा, गरासिया, कथोड़ी एवं सहारिया जाति की शैली के दर्शन किए जा सकते हैं। खाद्यान्न संग्रहण हेतु पारम्परिक कोठियां, मिट्टी के बर्तन, रोटी सेकने का तवा, उसी रूप में प्रयोग में लाते हुए दर्शाया गया है। चूल्हे पर रोटी बनाती महिला, बांस की टोकरी में रोटियां रखती महिला का चित्र प्रदर्शित किया गया है।

    आदिवासी स्त्री -पुरुषों के आभूषणों को एक पृथक् प्रकोष्ठ में प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न आदिवासी स्त्री-पुरुषों के, प्लास्टर ऑफ पेरिस से बने मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें शृंगार करती बालिकाएं, केश विन्यास करती नवयुवतियां, चटकीले शृंगारों से सजी आदिवासी महिलाएं, मूसल से धान कूटती महिलाएं, भोपा-भोपी आदि प्रमुख हैं।

    बेणेश्वर मेला, त्रिवेणी संगम, मानगढ़ धाम तथा गवरी नृत्य के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करते चित्र यथा कृषि करते हुए आदिवासी, जंगल से वन उपज का संकलन करते हुए आदिवासी महिलाएं, देवी-देवताओं की पूजा करते हुए आदिवासी, नृत्य संगीत के कार्यक्रमों में संलग्न आदिवासी भी प्रदर्शित किए गए हैं। भीलों की मादल, खड़ताल, नौपत-नगाड़ा, बांकिया, ढोल, ढोलक, कमायचा, तंदूरा, इकतारा आदि भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    आदिवासी क्षेत्रों की वनसम्पदा, खनिज सम्पदा, पशु सम्पदा के चित्र भी रखे गए हैं। वन्य जीव, पक्षी एवं सरीसृप के चित्र और अभयारण्यों के मनोरम दृश्य भी प्रदर्शित किए गए हैं। मोलेला गांव के कुम्हारों की कलाकृतियां, मेवाड़ और बागड़ के देवी-देवताओं की टेराकोटा मूर्तियां भी प्रदर्शित हैं। संग्रहालय में आदिवासियों के जीवन में होने वाले बदलावों को भी दर्शाया गया है। बहुत से चित्रों में मत्स्य पालन करते, आखेट की नवीन तकनीक का प्रयोग करते, सिंचाई सुविधाओं का उपयोग करते, खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते तथा कीटनाशकों का उपयोग करते हुए आदिवासियों को दर्शाया गया है।

    संग्रहालय में आदिवासी जीवन के दृश्यों के साथ ऑडियो-वीडियो कैसेटों से आदिवासियों के जीवन के रोचक तथा आकर्षक प्रसंगों को प्रदर्शित किया गया है। आदिम जाति शोध संस्थान ने ऐसे ही संग्रहालय दो अन्य स्थानों- शिल्पग्राम उदयपुर तथा आबू पर्वत के राजकीय संग्रहालय में एक खण्ड के रूप में विकसित किए हैं।


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  • अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय उदयपुर

     25.06.2018
    अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय उदयपुर

    अध्याय - 12 पुरातत्व संग्रहालय, उदयपुर


    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्व संग्रहालय में वर्ष 2013 में पुरातात्विक संग्रहालय स्थापित किया गया है। इस संग्रहालय का विकास निरंतर जारी है। डॉ. जीवनसिंह खड़कवाल इसके निदेशक हैं। विद्यापीठ के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. कृष्णपालसिंह ने इस संग्रहालय की स्थापना में महतवपूर्ण योगदान दिया है।

    इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन सभ्यताओं के स्थलों से प्राप्त पुरावस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जिनमें पाषाणकालीन, प्राक्-हड़प्पा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और हरियाणा के सिंधु सभ्यता-स्थल, हड़प्पा, आहाड़ और चंद्रावती, कानमेर, गिलूण्ड, बालाथल, ईसवाल, पछमता, नठारा की पाल, आहाड़ आदि से प्राप्त अवशेष, चट्टानों के नमूने, फोटोग्राफ आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय के आरम्भ में, भारत में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की चट्टानों, लाइम स्टोन, सैण्ड स्टोन, बेसाल्ट रॉक आदि के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। साथ ही मेवाड़ क्षेत्र की चट्टानों में मिलने वाले विभिन्न प्रकार के पत्थरों का प्रदर्शन किया गया है। जावर की खानों से प्राप्त ओर-मिक्स तथा जिंक मैटल्स का भी प्रदर्शन किया गया है। साथ ही मोडी-बाठेड़ा, धारेश्वर और बैराठ आदि स्थलों से प्राप्त रॉक पेंटिंग्स के बड़े-बड़े फोटोग्राफ भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय की सामग्री को तीन स्पष्ट विभागों में विभाजित किया गया है। पहले खण्ड में पाषाणकालीन सामग्री है। दूसरे खण्ड में ताम्रकालीन सामग्री है। तीसरे खण्ड में लौहसभ्यता के विकास से सम्बन्धित सामग्री है। पाषाण काल से मध्ययुगीन संस्कृतियों के अवशेषों के माध्यम से उन कालखण्डों के मानव-ज्ञान, सामाजिक जीवन, सामुदायिक भावना, सुरक्षा प्रबंध, आर्थिक गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है तथा यह ज्ञात करने में आसानी होती है कि इन सभ्यताओं के लोग कैसे थे, वे कैसे जीवन यापन करते थे, किस तरह के औजारों, उपकरणों एवं बर्तनों का प्रयोग करते थे, वे क्या पहनते थे तथा उनका भोजन क्या था! इस संग्रहालय में विगत दो दशकों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक तथा उत्तराखण्ड में हुए पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक सर्वेक्षण के दौरान मिली सामग्री तथा खुदाई में मिले अवशेष रखे हैं।

    उदयपुर में आहाड़ के बाद यह दूसरा संग्रहालय है जहाँ से ऐसी जानकारी मिलती है। संग्रहालय में विभिन्न सर्वे और खुदाई के दौरान मिले अवशेष, गुजरात से प्राप्त डम्पा संस्कृति के औजार, बर्तन, घड़े, छाप और अन्य अवशेष, मेवाड़ के 110 गांवों में खुदाई में मिले काले और लाल बर्तन, अनाज के दाने, छाप (सील्स), राजस्थान में मिले लोहे के तीर, खंजर अन्य औजार, बर्तन, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में पाई गई हाथ की कुल्हाड़ी सहित अन्य औजार, पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान-इराक से लाए गए बर्तन एवं अन्य सामग्री रखी गई है। नर्बदा घाटी से मिली एक लाख वर्ष पुरानी एक कुल्हाड़ी भी प्रदर्शित की गई है जो पाषाण कालीन है। निम्न पाषाण काल के औजारों में पशुओं की खाल उतारने की ब्लेड तथा क्लीनर प्रमुख हैं। प्राक्-हड़प्पा संस्कृति से गुजरात में मिले घड़े, विशेष तरह के बर्तन (काली और लाल मिट्टी के बर्तन जो मेवाड़ में पाई गई संस्कृति की विशेषता है) एवं रिजर्व स्लिप वेयर भी प्रदर्शित किए गए हैं जिनसे उस काल में मेवाड़ तथा कच्छ-गुजरात के व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों का पता चलता है।

    इस काल के मृद्भाण्ड 8000 से 3400 ईसा पूर्व के बीच रखे जाते हैं। आग में पके हुए मिट्टी के कुछ बर्तनों को बजाने से धातु जैसी ध्वनि सुनाई देती है। संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री की फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री अहमदाबाद से रेडियो कार्बन डेटिंग करवाई गई है। प्राक्-हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने ही आगे चलकर सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता को जन्म दिया। इस काल खण्ड में अनाज संग्रहण की कोठियां मिलती हैं। ये कोठियां विशिष्ट आकृति में बनी हुई हैं। इनके निर्माण में बजरी की अधिक मात्रा का प्रयोग हुआ है। इनका ऊपरी मुँह अधिक चौड़ा है। पाकिस्तान में आमरी, नाल, कोटड़ी से भी ऐसे पात्र मिले हैं।

    इस संग्रहालय के निकट ही आहाड़ सभ्यता का स्थल खोजा गया है जहाँ से सिंधु सभ्यता के नगरों के साथ व्यापार होता था। भारत में इस काल की सभ्यता के अवशेष कच्छ रण के किनारे कानमेर से प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा युग के बर्तनों एवं उपकरणों में माइक्रोलिथ्स तथा स्टुड हैण्डल बर्तन अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन बर्तनों पर सामान्य पेंटिंग है जिसमें काले एवं गहरे-भूरे रंगों का प्रयोग किया गया है।

    इस संग्रहालय में सिंधु सभ्यता के परफोरेटेड पॉट्स छिद्रयुक्त मृद्भाण्ड प्रदर्शित किए गए हैं जो उस काल का देशी रेफ्रिजिरेटर कहे जा सकते हैं। इन बर्तनों को पानी से गीला कर दिया जाता था। इनके स्पर्श से ठण्डी हुई हवा जब छिद्रों के माध्यम से बर्तन के भीतर पहुंचती थी तो उसमें रखे फल, सब्जी एवं मांस आदि खाद्य सामग्री लम्बे समय तक ताजी बनी रहती थी। ऐसे बर्तन कालीबंगा, सोथी, सीसपाल, भीथाथल, कुनाल, बनवाली आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

    इन स्थलों से एक गोबलेट (छोटी सुराही जैसा बर्तन) भी प्राप्त हुई है जो इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। कालीबंगा स्थल के नीचे के स्तर से प्राप्त मिट्टी की चूड़ियां, हेयरक्लिप, मिट्टी के मनके प्राप्त हुए हैं जो ऊपरी स्तर की इसी प्रकार की सामग्री से भिन्न हैं। हड़प्पा सभ्यता में स्टेटाइट से बनी चूड़ियां भी मिली हैं। यह चूना पाउडर जैसी सफेद एवं चिकनी मिट्टी होती थी। शंख के मोटे किनारों को काटकर उनसे भी चूड़ियां बनाई जाती थीं जिनके टुकड़े इस संग्रहालय में देखे जा सकते हैं।

    हरे रंग का फेयांस नामक पत्थर, नारंगी रंग का चेल्सीडोनी नामक पत्थर, कार्नेलियन, चर्ट, जाचर, अगेट आदि पत्थरों से बनी सामग्री भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। अगेट नामक पत्थर को 700 डिग्री सेंटीग्रेड पर तपाने से कार्नेलियन बनता है। पाकिस्तान में रोहरी नामक एक स्थान है जिसकी भौगोलिक संरचना एवं क्षेत्रफल राजस्थान के जोधपुर जिले के फलौदी जैसा है, वहाँ से विभिन्न प्रकार का कीमती चर्ट प्राप्त होता है। इस चर्ट एवं उससे बनी सामग्री को इस संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

    सिंधु सभ्यता से गोफन में डालकर फैंकने के पत्थर मिले हैं। मिट्टी के एक बर्तन के भीतरी भाग से कपड़े का प्रमाण मिलता है। इस बर्तन का निर्माण करते समय कुम्हार ने अपने एक हाथ में कपड़ा ले रखा था जो कि बर्तन के भीतरी तरफ था। जब घड़े को बाहर से थपथपाकर आकृति दी गई तो भीतर वाले हाथ के कपड़े की बुनावट के निशान मटके की भीतरी दीवार पर अंकित हो गए तथा उससे जाली जैसी चित्राकृति बन गई। ऐसा एक नमूना इस संग्रहालय में रखा है। लोथल से मिले लगभग 113 ग्राम भार के मिट्टी के बाट भी इस सामग्री के साथ प्रदर्शित किए गए हैं। आहाड़ सभ्यता से प्राप्त 5500-3500 वर्ष पुराने काले एवं लाल मृद्भाण्ड भी प्रदर्शित हैं।

    संग्रहालय में प्लास्टिक के दो डिब्बे प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें से एक में 5000 साल पुराना गेहूं तथा दूसरे में 5000 साल पुराना जौ रखा गया है। ये नमूने सिंधु सभ्यता के हैं। बाजोट लगे हुए प्याले इस संग्रहालय में प्रदर्शित अद्भुत वस्तुओं में से हैं। ये गुजरात के भुज जिले में आडेसर तहसील के निकट कानमेर नामक स्थल की खुदाई से मिले हैं। यह भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थलों में से एक है। इस स्थल की छः साल तक खुदाई की गई।

    यहाँ से महल जैसी रचनाओं वाले भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो लगभग 4500 वर्ष पुराने हैं। यह कला विश्व का प्रथम नगरीकरण चरण था। इस युग में भारत के अतिरिक्त मेसोपोटामिया एवं माया सभ्यता में ही नगरीय मानव सभ्यता विकसित हुई थी। इसके पश्चात् लगभग डेढ़-दो हजार वर्ष तक किसी नवीन सभ्यता के चिह्न नहीं मिलते हैं। नगरीकरण की प्रथम चरण की सभ्यता के बाद नगरीकरण की द्वितीय चरण वाली सभ्यता प्रकट होती हुई दिखाई देती है जो, ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता से नितांत विलग है तथा लौहकालीन सभ्यता है। इस काल में लौह विगलन भट्टियां, कृषि, पशुपालन, भवन निर्माण आदि कार्यकलाप विकसित अवस्था में दिखाई देने लगते हैं।

    प्रथम चरण एवं द्वितीय चरण की नगरीय सभ्यताओं के लोगों की जीवन शैली में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है। इस काल में लोहे के औजारों पर धार लगाने के पत्थर, कूटने-पीसने एवं घिसने के पत्थर, कान के कुण्डल, बच्चों के खेलने के पासे, गोटियां, धातु की चूड़ियां मिलती हैं। साथ ही मिट्टी, हाथीदांत, कांच एवं लोहे की सामग्री भी मिलती है। इससे स्पष्ट है कि लोहे के साथ-साथ कांच बनाने की विधि भी इस युग के लोगों को ज्ञात हो गई थी। ऐतिहासिक युग के प्रारंभिक काल में चर्ट, अगेट एवं चेल्सीडोनी का प्रचलन भी जारी रहा। इस समय के लोहे के धनुष, भाले की नोक, ग्रे वेयर (सलेटी मृद्भाण्ड), हाथीदांत की चूड़ी, लोहे के कर्णफूल जैसे आभूषण का एक टुकड़ा तथा लोहे के कड़े भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    बालाथल से प्राप्त 2300 वर्ष पुरानी सभ्यता में काम आने वाले मिट्टी से निर्मित सोकपिट्स (रिंगवैल) भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। कच्छ से मिले चर्ट, मॉस, जाचर, बेंडेट अगेट आदि के नमूने भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। बेंडेट अगेट धारीदार चमकदार पत्थर होता है। 13वीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य की जावर खानों से जस्ता निकालने की विधियों के प्रमाण तथा जस्ता बनाने में प्रयुक्त होने वाले लोहे के खोल आदि प्राप्त हुए हैं, इन प्रमाणों के चित्र एवं खोल इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। यह विश्व में जस्ता बनाने के सबसे प्राचीन प्रमाण हैं। 1500 टीलों में उस काल का स्लग (जिंक-ओर में से शुद्ध जस्ता निकालने के बाद शेष बचा कीट) जमा हुआ मिला है।

    इस काल में जावर की खानों का जस्ता यूरोप के देशों को जाने लगा था। संग्रहालय में विभिन्न सभ्यता स्थलों से मिली मिट्टी की ईंटें प्रदर्शित की गई हैं। इनमें शुंग एवं कुषाण कालीन ईंटें, अर्थूणा से प्राप्त ईंटें, वीरपुरा सर्वेक्षण में प्राप्त ईंटें तथा वडनगर से प्राप्त ईंटें सम्मिलित हैं। शुंग कालीन मृद्भाण्ड जो तेल तथा सब्जी आदि रखने के काम आते थे। इत्र रखने की कॉर्क युक्त सुराही तथा चाय जैसे किसी पदार्थ को छानने की टोंटीदार केतली की टोंटी जिसके भीतर मिट्टी से बनी चलनी लगी है, आदि प्रदर्शित की गई हैं। यह केतली रंगमहल (गंगानगर जिला), से प्राप्त हुई है।

    वडनगर से बुद्ध के दो स्तूप, दो महाचैत्य एवं मिट्टी के सिंहासन प्राप्त हुए हैं। संग्रहालय में यूनान अथवा रोमन साम्राज्य में निर्मित लगभग 2000 साल पुराना एक ‘वाइन टारपीडो’ प्रदर्शित किया गया है। यूनान एवं रोमन सभ्यता में इस प्रकार के मृदभाण्डों में उस काल में मदिरा का संग्रहण एवं परिवहन किया जाता था। इस टारपीडो के भीतर मिले स्टार्च से पुष्टि होती है कि इसमें किसी समय मदिरा भरी हुई थी। प्राचीन यूनानी सभ्यता यूनान एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में लगभग आठवीं शताब्दी ई.पू. से लगभग छठी शताब्दी ईस्वी तक अर्थात् लगभग 1,300 वर्षों तक अस्तित्व में रही।

    आधुनिक पश्चिमी संस्कृतियों का उद्गम इसी यूनानी सभ्यता में माना जाता है। इस सभ्यता के पश्चात् अस्तित्व में आने वाले रोमन साम्राज्य पर प्राचीन यूनान का गहरा प्रभाव था। पश्चिमी रोमन साम्राज्य 27 ईस्वी पूर्व से 476 ईस्वी तक तथा पूर्वी रोमन साम्राज्य 27 ईस्वी पूर्व से 1453 ईस्वी तक यूरोप के रोम नगर में केन्द्रित था। इस साम्राज्य का विस्तार दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अनातोलिया के क्षेत्रों तक था। उस काल में यह विश्व के विशालतम पाँच साम्राज्यों में से एक था। पाँचवी सदी के अन्त तक इस साम्राज्य का पतन हो गया और इस्तांबुल (कॉन्सटेन्टिनोपल) पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी बन गई। ईस्वी 1453 में उस्मानों (ऑटोमन तुर्कों) ने इस पर भी अधिकार कर लिया। रोमन साम्राज्य, यूरोप के इतिहास और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है।

    जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्व संग्रहालय में प्रदर्शित जार ‘वाइन टारपीडो’ मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर एक विशेष प्रकार का लेप किया गया है जिसे उस काल की पॉलिश कहा जाना चाहिए। आधुनिक पनडुब्बियों की आकृति से मेल खाने के कारण इस प्रकार के जारों को रोमन वाइन टारपीडो कहा जाता है। यह बेलनाकार आकृति में है इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुघाटी सभ्यता के स्थलों से होती है। यह जार गुजरात से प्राप्त किया गया है। इन जारों में मदिरा भरकर उन्हें पानी के जहाजों से दूर-दूर तक निर्यात किया जाता था।

    पानी के जहाजों में इनके परिवहन का समुचित प्रबंध होता था। इन्हें हिलने तथा परस्पर टकराकर टूटने से बचाने के लिए जहाज के भीतर लकड़ी के फ्रेम नुमा रैक बनाए जाते थे। यह जार क्षतिग्रस्त है, इसलिए संग्रहालय के अधिकारियों ने इसे मरम्मत करके फिर से जोड़ा है। इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इस प्रकार के जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें भारत जैसे समृद्ध देश के बंदारगाहों तक पहुंचाते हों।

    उदयपुर के विद्यापीठ संग्रहालय में भारत एवं पाकिस्तान के सिंधुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त पुरातत्व सामग्री, चर्ट के औजार, कुल्हाड़ियां, पांच हजार साल पुराने गेहूं एवं जौ के दाने आदि भी प्रदर्शित हैं। संग्रहालय में रखी गई 500 वर्ष पुरानी सामग्री में आइवरी की चूड़ियां, हाथीदांत की चूड़ियां आदि सम्मिलित हैं। मेवाड़ के ईसवाल नामक स्थल से मिला मृद्भाण्ड भी प्रदर्शित है। संग्रहालय में कुछ चित्र प्रदर्शित हैं जिनमें सिंधु सभ्यता की गोलाकृति की सीलें (मुहरें) प्रदर्शित हैं। इनके बीच में छेद हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये मुहरें गले में पहनने के परिचयपत्र की तरह प्रयुक्त होती होंगी।

    यहाँ प्रदर्शित किए गए प्रत्येक अवशेष की जानकारी के लिए चित्रों सहित साहित्य तैयार किया गया है जिसमें पुरा-अवशेष का प्राप्तिस्थल, सभ्यता का नाम, उसकी विशेषताएं आदि की जानकारी दी गई है। राजस्थान के अब तक के संग्रहालयों में इस प्रकार के साहित्य का अभाव है। यह संग्रहालय पर्यटकों, सामान्य रुचि के दर्शकों एवं छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों सहित सामान्यजन के लिए मार्गदर्शक का काम कर सकता है।


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