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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-12

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-12

    राजस्थान की मिट्टियाँ


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    किसी भी क्षेत्र की मिट्टियों का उस क्षेत्र की संस्कृति पर गहरा प्रभाव होता है। दोमट मिट्टी, काली मिट्टी, जीवांश एवं नमी युक्त उपजाऊ मिट्टियां समृद्धि लाती हैं। इस कारण लोगों को कला एवं साहित्य की साधना हेतु समय, ऊर्जा एवं धन व्यय करने का अवसर मिलता है। जबकि ऊसर, दलदली, लवणीय एवं क्षारीय मिट्टियां दरिद्रता को जन्म देती हैं। इस कारण अभावों से ग्रस्त मनुष्य उदर-पूर्ति के संघर्ष में ही लगा रहता है तथा अभावमयी संस्कृति पनपती है। विशाल प्रदेश होने के कारण राजस्थान में विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं।

    1. टिब्बेदार पीली-भूरी बलुई मिट्टी : नोहर, भादरा, सूरतगढ़, चिड़ावा, डूंगरगढ़, बाड़मेर, फलौदी, बाप, शेरगढ़, ओसियां, बिलाड़ा, रामगढ़ फतेहगढ़, सम, नावां, कुचामन, डीडवाना सांचोर, भीनमाल, बीकानेर और सीकर तहसीलों में इस प्रकार की मिट्टी पायी जाती है। इस मिट्टी में 90 प्रतिशत बालू और 5 से 7 प्रतिशत मटियार तथा गाद की मात्रा होती है। इसमें ह्यूमस, मैंगनीज एवं ताम्बे की कमी होती है। जलधारण क्षमता अत्यंत कम होने से इसका वायु अपरदन एवं परिवहन अधिक होता है। इस मिट्टी में बाजरा एवं मोठ की खेती होती है।

    2. भूरी बलुई मिट्टी : यह मिट्टी बाड़़मेर, जालोर, नागौर, जोधपुर, सीकर, चूरू और झुंझुनूं जिलों में मिलती है। इस मिट्टी में 85 से 90 प्रतिशत तक बालू, और 6 से 9 प्रतिशत तक मटियार एवं गाद होती है। इस मिट्टी में जीवांश की मात्रा कम होती है। चूने का अंश भी लगभग अनुपस्थित होता है। इस मिट्टी में शुष्क खेती की जाती है तथा बाजरा, मोठ, ग्वार आदि बोया जाता है। इस मिट्टी में खेती के लिये नाइट्रोजन और फॉस्फोरस युक्त उर्वरकों का प्रयोग करना आवश्यक होता है।

    3. भूरी दोमट मिट्टी : ऐसी मिट्टी नागौर जिले की परबतसर एवं मेड़ता तहसीलों में तथा लूनी नदी बेसिन में पायी जाती है। इस मिट्टी में 8 से 10 प्रतिशत मटियार एवं 8 से 12 प्रतिशत तक गाद होती है तथा जीवांश की मात्रा कम होती है। इस मिट्टी में उर्वरकों एवं सिंचाई के प्रयोग से गेहूँ व सरसों की फसल अच्छी होती है।

    4. धूसर भूरी दोमट मटियार मिट्टी : यह मिट्टी बिलाड़ा, जोधपुर, नावां, परबतसर, आहोर, सिवाना, सिरोही तथा पाली तहसीलों में अधिक मिलती है। इसमें 20 प्रतिशत तक मटियार एवं 13 प्रतिशत तक गाद होती है। इसकी जलधारण क्षमता अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसमें ज्वार, रायड़ा एवं सरसों की फसलें उगाई जाती हैं।

    5. भूरी मटियार दोमट मिट्टी : इस प्रकार की मिट्टी राज्य के उत्तरी भाग में घग्घर के क्षेत्र में स्थित हनुमानगढ़, सूरतगढ़, पदमपुर, रायसिंहनगर तथा बीकानेर जिले के उत्तर-पश्चिमी भाग में पायी जाती है। इसमें मटियार की मात्रा 18 प्रतिशत तक तथा गाद की मात्रा 22 प्रतिशत तक होती है। इसकी जलधारण क्षमता अधिक होती है। नहरी सिंचाई उपलब्ध हो जाने से इस मिट्टी में चावल, गन्ना, कपास, तिलहन, गेहूं व दालें पैदा की जा सकती हैं।

    6. हल्की भूरी बलुई दोमट मिट्टी : यह मिट्टी राजगढ़, सुजानगढ़, नीम का थाना, श्रीमाधोपुर, दांतारामगढ़, खेतड़ी, उदयपुर वाटी, नावां, परबतसर आदि तहसीलों में पायी जाती है। इस प्रकार की मिट्टी में मटियार की मात्रा 16 प्रतिशत तक तथा गाद की मात्रा 14 से 18 प्रतिशत तक होती है। इसमें जीवांश की मात्रा कम होने से जलधारण क्षमता भी कम होती है। इसमें जस्ते और तांबे की कमी होती है।

    7. पीली भूरी दोमट बलुई और बलुई दोमट मिट्टी : यह मिट्टी बयाना, नदबई, कोट कासिम, तिजारा, बहरोर, मण्डावर, किशनगढ़, बस्सी, राजौरी, नरैना, दूदू, चौमूं, चाकसू आदि तहसीलों में मिलती है। इसमें मटियार की मात्रा 15 से 17 प्रतिशत तक तथा गाद की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत तक होती है। यह मिट्टी अधिक सघन तथा कम रन्ध्राकार होती है जिससे पानी का रिसाव धीमी गति से होता है। इस मिट्टी में गेहूं, सरसों, मूंगफली, दालें, ज्वार आदि सिंचित फसलें पैदा होती हैं।

    8. भूरी मटियार दोमट मिट्टी : यह मिट्टी माण्डलगढ़, जहाजपुर, कोटड़ी, निवाई, किशनगढ़, ब्यावर, केकड़ी, रूपनगढ़, भदेसर, महुआ, हिंडौन, सपोटरा, खण्डार, बौंली, राजगढ़, थानागाजी, बहरोर, लक्ष्मणगढ़, चंद्राणा, पाड़ासोली बांदीकुई, फागी (जयपुर) और भरतपुर के उत्तर-पूर्वी भाग में मिलती है। यह अर्द्ध शुष्क क्षेत्र में धूसर-भूरी एवं पीले-भूरे रंग की तथा मटियार दोमट गठन वाली मिट्टी है। इसमें मटियार की मात्रा 20 प्रतिशत तथा गाद की मात्रा 22 से 24 प्रतिशत होती है। यह मिट्टी कम रन्ध्राकार होती है अतः जल का रिसाव धीमा होता है। सिंचित क्षेत्रों में इस मिट्टी में गेहूं, गन्ना, कपास, दालें व तिलहन की फसलें उगायी जाती हैं।

    9. लाल दोमट मिट्टी : यह मिट्टी उदयपुर, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा उत्तर-पश्चिमी बूंदी जिलों में मिलती है। इसमें मटियार की मात्रा 20 प्रतिशत तथा गाद की मात्रा 22 से 24 प्रतिशत होती है। चूंकि राजस्थान में यह काफी उथली पायी जाती है इस कारण इसकी जलधारण क्षमता कम है। इस मिट्टी का जल अपरदन अतिशीघ्र होता है। इसमें चावल, गन्ना, कपास, गेहूं, चना एवं मक्का की खेती होती है।

    10. काली मटियार दोमट मिट्टी : यह मिट्टी खानपुर, झालरापाटन, अकलेरा, कोटा, केशोरायपाटन, तलैरा, नैनवा, बामनवास, गंगापुर, बांसवाड़ा और उदयपुर जिले की कुछ तहसीलों में मिलती है। इसे ब्लैक कॉटन सॉयल भी कहते हैं। इस मिट्टी में मटियार की मात्रा 35 से 40 प्रतिशत तथा गाद की मात्रा 20 से 25 प्रतिशत होती है। यह धूसर, भूरी, मध्यम और गहरे काले रंग की होती है। इस मिट्टी की जलधारण क्षमता अधिक होती है। अत्यधिक उपजाऊ होने से इसमें कपास, गन्ना, चावल, चना, गेहूं, उड़द आदि की खेती होती है। इस मिट्टी का जल अपरदन अधिक होता है।


    राजस्थान में मिट्टियों से सम्बन्धित समस्याएँ

    राजस्थान में मृदा सम्बन्धी समस्याओं में लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी की उपस्थिति, जलमग्नता की समस्या तथा मृदा अपरदन की समस्या प्रमुख हैं।

    लवणीय एवं क्षारीय मिट्टियों की समस्या : राजस्थान में लवणीयता की समस्या से ग्रस्त मिट्टियों का क्षेत्रफल लगभग 7,280 वर्ग कि.मी. है। राज्य के पश्चिमी भाग की मिट्टियाँ लवणों से अधिक प्रभावित हैं। स्थानीय भाषा में इसे रेह या रेतीली मिट्टी कहते हैं। इसका पी. एच. 8.5 से कम होता है। डीडवाना, सांभर, कुचामन, पचपदरा, लूणकरणसर आदि झीलों के निकट ऐसी ही मिट्टी पायी जाती है। पश्चिमी राजस्थान के 80 प्रतिशत कुंओं का पानी खारा है। इससे सिंचाई करने से ऊपरी परत में लवणों एवं सोडियम कार्बोनेट की मात्रा बढ़ जाती है। इसके कारण मृदा क्षारीय हो जाती है। बोलचाल की भाषा में ऐसे पानी को तेलिया पानी तथा ऐसी मिट्टी को भूरा ऊसर कहते हैं। राज्य में क्षारीय एवं लवणीय मिट्टियाँ जयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, पाली, भरतपुर बूंदी चित्तौड़गढ़ व कोटा जिलों में अधिक है। इन मिट्टियों में चुकन्दर, आलू, कपास, जौ, गेहूं जैसी लवण रोधी फसलें उगाना लाभदायक होता है।

    वाटर लॉगिंग अथवा सेम की समस्या : इंदिरा गांधी नहर, गंगनहर, चंबल नहर तथा अन्य नहरों से हुए जल रिसाव ने राज्य में हजारों हैक्टेयर भूमि में दलदल बना दिया है। सेम ने इंदिरा गांधी नहर के प्रथम चरण की एक तिहाई से अधिक उपजाऊ जमीन बेकार कर दी है। इस जल में मृदा की नीचे की परतों के लवण एवं खनिज घुलकर मृदा की ऊपरी सतह पर आ गये हैं। घग्घर नदी की बाढ़ को रोकने के लिये स्थान-स्थान पर तालाब बनाये गये थे किंतु इनमें लवणता की समस्या उभर आयी है जिससे सूरतगढ़ क्षेत्र में हजारों हैक्टेयर उपजाऊ जमीन बंजर हो गई है। जलमग्न क्षेत्र में वन तथा चारागाह उगाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

    मृदा अपरदन की समस्या : जल, वायु अथवा अन्य किसी भौतिक शक्ति के कारण मृदा कणों के अपने स्थान से हटने को मृदा अपरदन कहते हैं। मृदा अपरदन से मृदा का ऊपरी उपजाऊ स्तर नष्ट हो जाता है तथा अनुपजाऊ परत ऊपर आ जाती है। एक ही स्थान पर पशुओं की लगातार चराई, पेड़ों की कटाई, जंगलों में लगने वाली आग, पहाड़ों का खनन तथा अन्य ऐसी ही गतिविधियों से मृदा अपरदन को बढ़ावा मिलता है। पहाड़ी ढालों पर मृदा अपरदन तेजी से होता है। भेड़-बकरियां अधिकतर घासों को जड़ों सहित खा जाती हैं जिससे धरती पूरी तरह अनावृत्त हो जाती है जिसका परिणाम मृदा अपरदन होता है। लगातार खेती करने एवं उसमें जीवांश की मात्रा के कम हो जाने से भी मृदा अपरदन बढ़ता है।


    मरुस्थलीकरण

    राजस्थान में मरुस्थलीकरण एक बड़ी समस्या है। आंधी, बाढ़, वर्षा आदि विभिन्न कारणों से होने वाले मृदा अपरदन, मृदा एवं जल के अनुचित प्रबंधन, वनों के उन्मूलन, पशुओं द्वारा एक ही स्थल पर लगातार होने वाले अतिचारण आदि कारणों से मरुस्थलीकरण को बढ़ावा मिलता है।

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  • अजमेर का इतिहास - 76

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 76

    बीसवीं सदी में अजमेर (2)


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    रोमन कैथोलिक बिशप की नियुक्ति


    17 नवम्बर 1913 को डॉ. जे. एच. कूमॉन्ट को अजमेर का पहला रोमन कैथोलिक बिशप नियुक्त किया गया। ई.1913 में अजमेर में पहली बार को-ऑपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार की नियुक्ति हुई।

    प्रथम विश्व युद्ध

    ई.1914 में प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध में अजमेर मेरवाड़ा ने ब्रिटेन की बहुत सहायता की। मेरवाड़ा से बड़ी संख्या में सैनिकों की भर्ती की गई। मेरवाड़ा के प्रत्येक उस व्यक्ति को सेना में भर्ती किया गया जो हथियार उठा और चला सकता था। उन्हें मेसोपोटामिया एवं अफ्रीका के विभिन्न मोर्चों पर लड़ने के लिये भेजा गया। अजमेर तथा ब्यावर से युद्ध ऋण के रूप में बड़ी धनराशि भिजवाई गई। 2,12,810 रुपये 12 आने चार पाई युद्ध कोष के रूप में जुटाये गये। 20,45,349 रुपये युद्ध ऋण के रूप में भिजवाये गये। अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में युद्ध प्रचार के लिये एक समिति का गठन किया गया। मेयो कॉलेज अजमेर के प्रिंसीपल मि. लेसली जोन्स इस समिति के अध्यक्ष थे। हर बिलास शारदा को इस समिति का सचिव नियुक्त किया गया।

    ई.1916 में भारत का वायसराय लॉर्ड चैम्सफोर्ड अजमेर आया। स्कॉटलैण्ड वूमन्स मिशन हाँस्पिटल का चर्च खोला गया। अजमेर-मेरवाड़ा युद्ध बोर्ड की स्थापना की गयी।

    मलेरिया से 20 हजार लोगों की मृत्यु

    ई.1918 में मलेरिया की महामारी पूरे भारत में फैली। इस महामारी से अजमेर में 19,835 व्यक्ति मर गये। ई.1919 में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट लागू किया गया किंतु अजमेर को इससे अलग रखा गया। ई.1918 में अजमेर में मेटेरनिटी होम खोला गया। राष्ट्रव्यापी मलेरिया महामारी फैली जिसमें अजमेर के 29 हजार 830 व्यक्ति मर गये। ई.1919 में सर एडविन लुटियान्स द्वारा तैयार राजकीय हाई स्कूल भवन की डिजाइन के अनुसार भवन निर्माण कार्य आरंभ किया गया। इसी आर्चीटैक्ट ने नई दिल्ली नगर की भी योजना तैयार की थी।

    राजस्थान सेवा संघ

    ई.1919 में विजयसिंह पथिक तथा रामनारायण चौधरी ने वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की जिसे बाद में अजमेर स्थानान्तरित कर दिया गया तथा नवीन राजस्थान नामक अखबार शुरू किया गया। ये नीम का थाना में रहने वाले अग्रवाल वैश्य परिवार से थे तथा कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी के बड़े भाई थे। आरंभ में ये क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। बाद में नेहरू एवं गांधी के निकट सहायोगी रहे। इन्होंने बिजौलिया एवं बेगूं किसान आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण ये एक साल तक अजमेर की जेल में बंद रहे। इन्होंने राजस्थान के स्वाधीनता आंदोलन पर कई पुस्तकें लिखीं।

    अश्वर्थ समिति

    ई.1920 में भारत सरकार ने अजमेर-मेरवाड़ा की प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था पर रिपोर्ट तैयार करने के लिये मि.अश्वर्थ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया ताकि स्थानीय लोगों को भी प्रशासन में भागीदारी दी जा सके। हरबिलास शारदा ने इस समिति को एक ज्ञापन दिया। शारदा ने समिति को सुझाया कि अजमेर-मेरवाड़ा एक अत्यंत छोटी इकाई है। इसके आय के स्रोत अत्यंत सीमित हैं। यहां आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षणिक विकास उस गति से होना संभव नहीं है जिस गति से अन्य धनी प्रांतों में हो रहा है।

    यहां की प्रशासनिक व्यवस्था उच्च स्तर की नहीं हो सकती। यहां की न्याय पालिका का स्तर युनाइटेड प्रोविंस या बम्बई प्रांत की न्याय पालिका के बराबर का नहीं हो सकता। यहां के नवयुवकों के लिये रोजगार और उद्योग के साधन बड़े प्रांतों की तुलना में बहुत कम उपलब्ध हैं। अतः अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत को किसी निकटवर्ती बड़े प्रांत में सम्मिलित कर दिया जाये। ऐसा करने पर इस क्षेत्र की भी समुचित उन्नति संभव हो सकेगी। उन्होंने सुझाव दिया कि अजमेर-मेरवाड़ा का विलय युनाइटेड प्रोविंस के साथ कर दिया जाये।

    युनाइटेड प्रोविंस एवं अजमेर-मेरवाड़ा के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक दृष्टि से बहुत समानता है। इससे पहले भी ई.1818 से लेकर लगभग 50 वर्षों तक अजमेर-मेरवाड़ा, युनाइटेड प्रोविंस का ही अंग रहा है। ऐसा पुनः करने में कोई कठिनाई नहीं आयेगी। शारदा ने यह भी मांग की कि अजमेर-मेरवाड़ा से केन्द्र के दोनों सदनों में अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार प्राप्त हो।

    अश्वर्थ समिति शारदा के प्रस्तावों से प्रभावित हुई। उसने सरकार को दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि अजमेर-मेरवाड़ा में दक्ष प्रशासन लागू करने का एक ही तरीका है और वह है कि दूसरे प्रांतों में आरंभ किये गये सुधारों को अजमेर में भी लागू किया जा सके। इस समिति की रिपोर्ट का कोई परिणाम नहीं निकला। भारत सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की।

    प्रिंस ऑफ वेल्स

    ई.1921 में दिल्ली, अजमेर तथा केन्द्रीय भारत के लिये अलग से एजूकेशन सुपरिण्टेण्डेण्ट नियुक्त किया गया। अजमेर-मेरवाड़ा की जनगणना की गयी। 28 नवम्बर 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स अजमेर आया। वह प्रातः साढ़े आठ बजे अजमेर पहुँचा तथा उसी रात्रि 11 बजे वापस चला गया। लॉर्ड क्रोमेर तथा एडमिरल हलेसी भी उसके साथ अजमेर आये। वह मेयो कॉलेज देखने गया। ई.1922 में अजमेर में इम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया की शाखा खोली गयी। ई.1923 में वायसराय मारकीस ऑफ रीडिंग अजमेर आया। इसी वर्ष अजमेर-मेरवाड़ा के एजूकेशन सुपरिण्टेण्डेण्ट का पद समाप्त कर दिया गया।

    मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना

    ई.1924 में मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना के अंतर्गत भी अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। एक मात्र सुधार यह हुआ कि अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा (सेन्ट्रल-लेजिस्लेटिव एसेम्बली) में भेजे जाने की स्वीकृति दी गई। हर बिलास शारदा को इस पद पर नियुक्त किया गया।

    अजमेर में ज्युडीशियल मेम्बर नियुक्त

    ई.1925 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये नवीन म्युन्सिपेलिटीज रेग्यूलेशन लागू किया गया। ई.1925 में हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल की स्थापना की। ई.1926 में उपाध्याय ने अजमेर की राजनीति में प्रवेश किया। ई.1926 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये एक ज्युडीशियल मेम्बर की नियुक्ति की गई तथा मुख्य आयुक्त की न्यायिक शक्तियां समाप्त कर दी गयीं। सीकर राज्य के भूरसिंह नामक डकैत ने कई वर्षों से जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, किशनगढ़, अलवर, नाभा, पटियाला आदि रियासतों और अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में उपद्रव मचा रखा था। मारवाड़ पुलिस ने इस डकैत को पकड़ लिया। 30 अक्टूबर 1926 को एजीजी द्वारा मारवाड़़ पुलिस के लिये 13,900 रुपये पुरस्कार के भेजे गए।

    साइमन कमीशन

    ई.1927 में भारत में साइमन कमीशन आया। इस कमीशन द्वारा दी गई रिपोर्ट में कहा गया कि अजमेर-मेरवाड़ा में किसी प्रकार के संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने भारत सरकार को सिफारिश की कि अजमेर-मेरवाड़ा से जो पहले निर्वाचित प्रतिनिधि केन्द्रीय विधानसभा में भेजा जाता था, अब वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जाये। इस रिपोर्ट की अजमेर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। हर बिलास शारदा ने इसकी सार्वजनिक आलोचलना करते हुए कहा कि अब अजमेर को भी एक लाल कुर्ती आंदोलन करने की आवश्यकता है।

    हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना

    ई.1927 में सरकार ने अजमेर में प्राथमिक शिक्षा का कार्य म्युन्सिपलिटी को सौंपा। इसी वर्ष सस्ता साहित्य मंडल ने त्यागभूमि मासिक पत्रिका आरंभ की जो ई.1930 में साप्ताहिक पत्र में बदल गयी। ई.1927 में बाबा नृसिंहदास तथा हरिभाऊ ने हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना की। ई.1928 में कैसर बाग में न्यू विक्टोरिया हॉस्पिटल खोला गया। ई.1929 में अजमेर में बोर्ड ऑफ हाई स्कूल एण्ड इण्टरमीडियेट एजयूकेशन फॉर राजपूताना, सेन्ट्रल इण्डिया एण्ड ग्वालियर खोला गया। दिसम्बर 1929 में बाबा नृसिंदास अग्रवाल के आदेश पर हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम हाथ में लिया। उन्हें अजमेर-मेरवाड़ा- राजपूताना-मध्यभारत कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। ई.1930 में अजमेर में किंग जॉर्ज रॉयल इण्डियन मिलिट्री स्कूल खोला गया। 7 मार्च 1930 को भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन अजमेर आये। अजमेर नगर में विद्युत आपूर्ति आरंभ की गयी।

    अजमेर में स्वतंत्रता दिवस

    ई.1930 में बाबा नृसिंहदास अग्रवाल के नेतृत्व में अजमेर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। अप्रेल 1930 में देशव्यापी नमक सत्याग्रह चला। इसमें अजमेर ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 20 अप्रेल 1930 को हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृतव में अजमेर में नमक कानून तोड़ा गया। हरिभाऊ उपाध्याय, विजयसिंह पथिक, गोकुललाल असावा तथा रामनारायण चौधरी आदि नेता बंदी बनाये गये।

    राजपूताना और मध्य भारत सभा का प्रान्तीय सम्मेलन

    23 नवम्बर 1931 को अजमेर में कस्तूरबा गांधी की अध्यक्षता में राजपूताना और मध्य भारत सभा का प्रान्तीय राजनैतिक परिषद् का सम्मेलन हुआ। इसी वर्ष अजमेर में आदर्शनगर एक्सेटेंशन का निर्माण आरंभ हुआ।

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  • भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास

     02.06.2020
    भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास

    पुस्तक परिचय

    भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास

    लेखक: डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    प्रकाशक लिटरेरी सर्किल, जयपुर

    पृष्ठ: 442, मूल्य: 995 रुपए 

    प्रकाशन वर्ष: 2018

     

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    इतिहास हमें भूतकाल की गलतियों को सुधारकर भविष्य को सुंदर बनाने की प्रेरणा देता है। इस पुस्तक में भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या पर इतिहास की दृष्टि से विचार किया गया है। भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या लगभग 1300 वर्ष पुरानी है और यह भारत में उत्पन्न धर्मों एवं भारत भूमि पर बाहर से आए धर्मों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर होने वाले संघर्ष के कारण है।

    पुस्तक में ऐतिहासिक सामग्री को अत्यंत शोध एवं श्रम के साथ लिखा गया है। पुस्तक लिखने का उद्देश्य भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या की जड़ को पहचानकर उसके उपचार के रास्तों को ढूंढने का प्रयास है। ताकि इस देश की प्रजा परस्पर वैमनस्य को त्यागकर शांति, प्रेम एवं विश्वास के साथ रहने का उपाय ढूंढ सके।

    इस पुस्तक में 35 अध्याय हैं 
    । 

    पुस्तक की प्रस्तावना

    हिन्दू धर्म, भारतवर्ष की भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। जब हम भारतवर्ष की बात करते हैं तो उसका आशय आज के 'यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत' से नहीं अपितु हिन्दुकुश पर्वत से लेकर आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांगला देश, बर्मा, थाईलैण्ड, श्रीलंका, मलेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया आदि देशों एवं जावा, सुमात्रा तथा बाली आदि इण्डोनेशियाई द्वीपों से है। भारत वर्ष की धरती पर प्रकट हुआ यह धर्म वैदिक धर्म के रूप में प्रकट हुआ जिसमें से अनेकानेक शाखाएं विकसित हुईं जो सम्मिलित रूप से सनातन धर्म के नाम से जानी गईं। इस धर्म की मुख्य शाखा भागवत धर्म तथा ब्राह्मण धर्म के नाम से विख्यात हुई। यही सनातन धर्म अथवा ब्राह्माण धर्म, भारत भूमि के साथ सिमटता हुआ अब 'यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत' में हिन्दू धर्म कहलाता है।

    हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप इतना उदार, व्यापक, सहिष्णु, परोपकारी एवं समावेशी भाव लिए हुए है कि इसका कोई आकार-प्रकार निश्चित नहीं है। तेतीस करोड़ देवी देवताओं वाले इस धर्म में, किसी भी हिन्दू धर्मावलम्बी पर यह दबाव नहीं डाला जाता कि वह किसी निश्चित देवता की पूजा करे या किसी निश्चित प्रकार की पूजा पद्धति काम में ले। या कि वह किसी निश्चित धार्मिक पुस्तक को पढ़े या किसी निश्चित प्रकार से विवाह करे या वह किसी निश्चित प्रकार से शव की अंत्येष्टि करे। हिन्दू धर्म के अंतर्गत समाहित भिन्न-भिन्न पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग, सामूहिक रूप से विभिन्न धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। कुछ हिन्दू, शव का दहन करते हैं तो कुछ मिट्टी में गाढ़ते हैं तो कुछ हिन्दू, शव को जल में बहा देते हैं। कुछ हिन्दू मतावलम्बी देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा करते हैं, कुछ नहीं करते हैं। कुछ हिन्दू, वेद और ईश्वर को मानते हैं और कुछ हिन्दू, वेद या ईश्वर को नहीं मानते हैं, फिर भी वे सब हिन्दू धर्म के भीतर बने हुए हैं।

    वैदिक देवी-देवताओं से लेकर पौराणिक देवी-देवताओं को मानने वाले तथा लोक देवियों एवं लोक देवताओं को मानने वाले, सभी लोग समान रूप से हिन्दू कहलाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों के हिन्दुओं के खान-पान, वेषभूषा, वैवाहिक पद्धतियां, रीति-रिवाज एवं परम्पराएं अलग हैं। उत्तर भारत के हिन्दू, मामा की लड़की तथा मामा के गौत्र की लड़की से विवाह करने को पाप मानते हैं तो दक्षिण भारत में मामा की लड़की से विवाह करना अत्यंत साधारण बात है।

    हिन्दू धर्म की इतनी विविधताओं के कारण ही हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में कहा जाता है कि यह धर्म नहीं, जीवन शैली है। युगों-युगों से चले आने के कारण इसे सनातन धर्म भी कहते हैं। बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले और पृथक् धर्म के रूप में पहचान बनाने में सफल रहे। आगे चलकर कबीर पंथियों, दादू पंथियों, ब्रह्म समाजियों एवं आर्य समाजियों आदि ने भी अपने आप को सनातन हिन्दू धर्म से अलग दिखाने की चेष्टा की जो आज तक जारी है। वर्तमान समय में नारायण स्वामी एवं ब्रह्मकुमारी जैसे नवोद्भव सम्प्रदाय भी हिन्दू धर्म से विलग दिखने का प्रयास कर रहे हैं।

    इस्लाम तथा ईसाई मत भारत में बाहर से आए। इस्लाम ने आक्रांताओं के धर्म के रूप में भारत में प्रवेश किया। आक्रांता तो शक, कुषाण, हूण, बैक्ट्रियन तथा यूनानी भी थे किंतु उन्होंने इस देश में अपना धर्म थोपने के स्थान पर भारत के स्थानीय धर्मों को अपना लिया। उनमें से कुछ शैव, वैष्णव अथवा बौद्ध हो गए तो कुछ जैन। जबकि इस्लाम को मानने वाले आक्रांताओं ने ऐसा नहीं किया। वे न केवल स्वयं के लिए इस्लाम को एकमात्र विकल्प के रूप में देखते थे अपितु उन्होंने भारत की जनता में भी इस्लाम के प्रसार का प्रयास किया।

    ईसाई धर्म यद्यपि पंद्रहवीं शताब्दी में भारत में प्रवेश कर गया था किंतु ईसाइयों ने सामान्यतः तलवार के जोर पर अपने धर्म का प्रसार नहीं किया। वे एक हाथ में धर्म का तथा दूसरे हाथ में व्यापार का झण्डा रखते थे, धर्म का झण्डा उन्होंने भी पकड़ने का प्रयास किया किंतु इस पर अधिक जोर नहीं दिया। जब अठारहवीं शताब्दी में उन्होंने भारत में राजनीतिक शक्ति प्राप्त की तब भी वे ईसाई धर्म के प्रसार के बारे में कम ही उत्सुक थे। उनका पूरा जोर भारत से धन बटोरने और अपने राज्य को मजबूत करने में लगा रहा किंतु जब बीसवीं सदी में भारत में स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर पहुंचने लगा, तब अँग्रेजों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की साम्प्रदायिक समस्या को देश पर राज्य करने के मजबूत हथियार के रूप में काम में लिया जिससे यह समस्या मध्यकाल की ही तरह विकराल स्वरूप को प्राप्त हो गई।

    अंग्रेजों द्वारा, साम्प्रदायिकता की समस्या को इतनी हवा दी गई कि यह समस्या हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ी हो गई। इस कारण देश की प्रजा को स्वाधीनता प्राप्त करने में अधिक पसीना बहाना पड़ा तथा स्वातंत्र्य-रथ मंद गति से आगे बढ़ा। ऐसा कई बार हुआ जब निकट आती हुई स्वतंत्रता, साम्प्रदायिकता की समस्या के कारण दूर खिसक गई। इस समस्या के कारण देश का विभाजन हुआ और देश के तीन टुकड़े हुए। करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए तथा लाखों स्त्री-पुरुष एवं बच्चे मौत के घाट उतार दिए गए, तब कहीं जाकर भारत को आजादी मिली किंतु साम्प्रदायिकता की समस्या का अंत देश की आजादी के बाद भी नहीं हो सका।

    आज भी देश की निरीह जनता साम्प्रदायिक हिंसक घटनाओं में बेरहमी से मारी जाती है। यह मानव मात्र की मानसिक समस्या है जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। जब तक साम्प्रदायिकता की समस्या के मूल कारणों को पहचानकर उनका वास्तविक समाधान नहीं ढूंढा जाएगा, तब तक न तो इस समस्या का उन्मूलन हो सकेगा और न मानव सुखी हो सकेगा।

    प्रस्तुत पुस्तक में भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या के जन्म एवं विकास तथा हिन्दू प्रतिरोध का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है। आशा है इस पुस्तक को लिखने में लगा मेरा श्रम विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं रुचिवान पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

    इस पुस्तक में 35 अध्याय हैं । 

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-13

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-13

    राजस्थान में जल संसाधन (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान, देश का सबसे बड़ा तथा जनसंख्या की दृष्टि से 8वां सबसे बड़ा राज्य है। देश का 10.41 प्रतिशत भू-भाग राजस्थान में स्थित है जिसमें देश की 5.56 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। देश का 10.58 प्रतिशत पशुधन तथा देश में उपलब्ध जल का मात्र 1 प्रतिशत जल राजस्थान में उपलब्ध है। क्षेत्रफल की अधिकता, जनसंख्या की विरलता, पशुधन की प्रचुरता एवं जल की न्यूनता ने राजस्थान को अनेक सांस्कृतिक जटिलताएं एवं विशिष्टताएं प्रदान की हैं। पश्चिमी राजस्थान में जल की अत्यधिक न्यूनता ने, स्त्रियों को मीलों दूर से पानी भरकर लाने के लिये विवश किया। इस कारण पणिहारिन, ईंडोणी एवं भवई जैसे गीतों एवं नृत्यों की रचनाएं हुईं। ये गीत एवं नृत्य, दैनंदिनी की कठिनताओं की अभिव्यक्ति के माध्यम बने। इन गीतों ने शुष्क एवं नीरस दैनंदिनी में रस युक्त भावों का संचरण किया। इसलिये राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति को जानने से पहले राजस्थान के जल संसाधनों का परिचय प्राप्त करना भी आवश्यक है।


    राज्य के जल संसाधन

    राज्य में जल की उपलब्धता भूगर्भीय जल, नदियों द्वारा लाये गये जल एवं वर्षा जल से होती है। राज्य में सबसे अधिक सतही जल चम्बल नदी में उपलब्ध है तथा बनास नदी का जल-ग्रहण क्षेत्र सबसे बड़ा है। राज्य की नदियों को 13 जल-ग्रहण क्षेत्र एवं 59 उप-जल ग्रहण क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। अरावली पर्वतमाला राज्य में जल विभाजक रेखा का कार्य करती है।

    नदियाँ

    राजस्थान की अधिकांश नदियाँ प्रदेश के मध्य में स्थित अरावली पर्वतमाला से निकल कर पश्चिम अथवा पूर्व की ओर बहती हैं। पश्चिम भाग की नदियाँ अरब सागर की ओर जाने वाले ढलान पर बहती हुई या तो खंभात की खाड़ी में गिरती हैं या विस्तृत मरु प्रदेश में विलीन हो जाती हैं। पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ एक दूसरे से मिलती हुई, अंततः यमुना नदी में प्रवेश करती हैं। प्रदेश के दक्षिणी-पूर्वी भाग में चम्बल तथा उसकी सहायक नदियाँ मुख्य रूप से प्रवाहित होती हैं। इनमें से अधिकांश नित्य प्रवाही नदियाँ हैं। पश्चिमी राजस्थान में लूनी तथा उसकी सहायक नदियाँ बहती हैं। इनमें से कोई भी नित्य प्रवाही नदी नहीं हैं। चम्बल, लूनी, बनास, माही, घग्घर, सोम तथा जाखम राजस्थान की प्रमुख नदियाँ हैं। राज्य के बीकानेर और चूरू जिलों में कोई नदी नहीं बहती। संभाग स्तर पर सर्वाधिक नदियाँ कोटा संभाग में तथा जिला स्तर पर सर्वाधिक नदियाँ चित्तौड़गढ़ जिले में बहती हैं।


    राजस्थान की नदियों का अपवाह तंत्र

    1. अरब सागर की ओर बहने वाली नदियाँ : लूणी, माही, सोम, जाखम, साबरमती एवं पश्चिमी बनास, अरब सागरीय अपवाह तंत्र का अंग हैं।

    2. गंगा-यमुना दोआब की ओर बहने वाली नदियाँ : चम्बल, बनास, काली सिंध, कोठारी, खारी, मेजा, मोरेल, बाणगंगा और गंभीरी नदियां बंगाल की खाड़ी अपवाह तंत्र का अंग हैं।

    3. आंतरिक अपवाह वाली नदियाँ : घग्घर, सोता-साहिबी, काकणी, मेढां, खण्डेल व कांटली नदियों का जल किसी समुद्र तक बहकर नहीं जाता है।


    राजस्थान की प्रमुख नदियाँ

    चम्बल : चम्बल नित्य प्रवाही प्रकृति की नदी है जो मध्य प्रदेश में विन्ध्याचल पर्वत की जानापाव पहाड़ी से निकलकर 325 कि.मी. मध्यप्रदेश में बहने के बाद चौरासीगढ़ के पास राजस्थान में प्रवेश करती है तथा कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों में बहने के बाद यह उत्तर प्रदेश में इटावा के निकट यमुना में मिलती है। राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के बीच चम्बल 241 कि.मी. लम्बी सीमा बनाती है। चम्बल का प्राचीन नाम चर्मण्यवती है। इसे कामधेनु भी कहते हैं। इस नदी पर गांधी सागर (मध्यप्रदेश), राणाप्रताप सागर (चित्तौड़गढ़) तथा जवाहर सागर (कोटा) बांध बने हैं। बनास, बेड़च, गंभीरी, कोठारी, खारी, मैनाली, मानसी, कुराल, बांडी, मोरेल, कालीसिंध, निवाज, परबन, आहू तथा पार्वती; चम्बल की सहायक नदियाँ हैं। चम्बल पर स्थित चूलिया (18 मीटर) तथा मधार (12 मीटर) जल प्रपातों की गिनती भारत के प्रमुख जल प्रपातों में होती है।

    लूनी : लूनी नदी अजमेर के समीप पुष्कर क्षेत्र में स्थित नाग पहाड़ से निकलकर नागौर, जोधपुर, बाड़मेर तथा जालोर जिलांे में बहती हुई कच्छ के रण में झील की तरह फैल जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई 320 कि.मी. है। जब पुष्कर की पहाड़ियों में अधिक वर्षा होती है तो लूनी नदी में बाढ़ आ जाती है। इससे जोधपुर और जालोर जिले के कुछ गाँव तथा बाड़मेर जिले का बालोतरा कस्बा प्रभावित होते हैं। बाड़मेर तथा जालोर जिले में इस नदी के चौड़े क्षेत्र में फैल जाने के कारण स्थान-स्थान पर अस्थायी झीलें बन जाती हैं जो सर्दियों के आने तक सूख जाती हैं। उस क्षेत्र में किसान रबी की फसलों के बीज बिखेर देते हैं जिसे सेवज कहते हैं। संस्कृत साहित्य में इस नदी का लवणाद्रि तथा लवणावरी के नाम से उल्लेख है। वैदिक काल की सरस्वती नदी के क्षेत्र में बहने वाली लवणाद्रि, सरस्वती की प्रमुख सहायक नदी थी। सरस्वती अब भू-गर्भा है। लूनी की सहायक नदियाँ सूकड़ी, लीलड़ी, जोजरी, जवाई, बाण्डी, मीठड़ी व सगाई आदि हैं।

    बनास : इसे वन की आशा भी कहते हैं। यह राजसमंद जिले में स्थित कुंभलगढ़ के निकट खमनौर की पहाड़ियों से निकलती है। इसमें वर्षा ऋतु के अधिकांश दिनों में जल प्रवाहित होता है। यह अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, सवाईमाधोपुर एवं टौंक जिलों में लगभग 480 कि.मी. बहने के बाद सवाईमाधोपुर के निकट चम्बल नदी में मिल जाती है। इसकी सहायक नदियों में बेड़च, कोठारी, मान्सी, खारी, मुरेल व धुंध आदि हैं। राज्य में बहने वाली यह सबसे लम्बी नदी है।

    पश्चिमी बनास : यह नदी सिरोही जिले में अरावली पर्वतमाला से निकलकर गुजरात में बहती हुई कच्छ की खाड़ी में गिरती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 3000 वर्ग कि.मी. है।

    माही : यह नदी मध्यप्रदेश के धार जिले में विंध्याचल पर्वत के आममाऊ नामक स्थल से निकलती है तथा खांदू गाँव के निकट राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में प्रवेश करती है। बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों में बहने के बाद यह गुजरात में प्रवेश करती है और लगभग 576 कि.मी. बहने के बाद खंभात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी पर बांसवाड़ा जिले में माही बजाज सागर बांध बनाया गया है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में सोम, जाखम, अनास, चाप तथा मोरेन आदि हैं। माही नदी कर्करेखा को दो बार पार करती है। इसे वागड़ की गंगा भी कहते हैं।

    कालीसिंध : यह नदी चंबल की सहायक नदी है जो मध्यप्रदेश में देवास की पहाड़ियों में से निकलती है। यह नदी झालावाड़ और बारां जिलों में बहने के बाद नानेड़ा कस्बे के समीप चम्बल में मिल जाती है।

    घग्घर : घग्घर नदी श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों की प्रमुख नदी है जो वर्षा ऋतु में विशाल रूप धारण कर लेती है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती है। यह शिमला के निकट कालका की पहाड़ियों से निकलकर हरियाणा में बहती हुई हनुमानगढ़ के निकट राजस्थान में प्रवेश करती है तथा हनुमानगढ़ से कुछ ही आगे तक बढ़ पाती है। घग्घर नदी की कुल लम्बाई 465 कि.मी. है। हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के पाट को नाली कहते हैं। इसके दक्षिणी छोर को किसी समय हाकड़ा कहा जाता था जिसके बारे में किंवदंती है कि एक बनजारे ने नाराज होकर उस नदी को मिट्टी से पाट दिया था। हाकड़ा शब्द शर्करा से बना है जिससे अनुमान होता है कि उस समय इस नदी के दक्षिणी छोर पर गन्ने की खेती बड़े स्तर पर होती थी। आज भी जोधपुर एवं बाड़मेर के मरुस्थल में कोल्हू के पत्थर देखने को मिलते हैं।

    बाणगंगा : बाणगंगा जयपुर जिले में बैराठ की पहाड़ियों से निकलकर रामगढ़, दौसा व बसवा में 164 कि.मी. बहने के बाद भरतपुर जिले की पश्चिमी सीमा से वैर तहसील में बहती हुई उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में प्रवेश करती है जहाँ यह यमुना नदी में प्रवेश कर जाती है। बाणगंगा नदी से दो नहरें उचैनी और पथेना निकाली गयी हैं। भरतपुर नगर में इस नदी से पेयजल की आपूर्ति होती है।

    सुकैल : यह नदी जालोर के पर्वतीय भाग से निकलकर गुजरात में कच्छ की खाड़ी में गिरती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 1,940 वर्ग कि.मी. है।

    जाखम : यह माही की सहायक नदी है जो छोटी सादड़ी से निकलकर प्रतापगढ़ में बहती हुई धरियावाद तहसील में सोम नदी में मिलती है। इस पर जाखम बांध बनाया गया है।

    बेड़च : इसे आयड़ भी कहते हैं। गोगुंदा पहाड़ी से निकलती है।

    सोम : यह माही की सहायक नदी है, बीछामेड़ा से निकलती है।

    अन्य नदियाँ : उपरोक्त नदियों के अतिरिक्त प्रदेश में साबरमती, काकनेय, कांटली, साबी, मन्था, पार्वती तथा सरस्वती आदि भी प्रवाहित होती हैं। चंद्रा, खारी, मीठी, जोजरी, गुड़िया, कुलथाना, बाण्डी आदि बहुत सी प्राचीन नदियां अब वर्षाती नालों के रूप में बहती हैं।


    नदियों की जिलेवार स्थिति

    1. अजमेर : सागरमती, सरस्वती, लूणी, खारी, डाई, बनास।

    2. अलवर : साबी, रूपारेल, सोटा, चूहड़, सिंध, काली, गौरी।

    3. उदयपुर : बेढ़च, वाकल, सोम, जाखम, साबरमती, गोमती, कोठारी, बनास।

    4. करौली : चम्बल, बनास, गंभीरी।

    5. कोटा : चम्बल, कालीसिंध, पार्वती, आहू, परबन, निवाज, अंधेरी।

    6. चित्तौड़गढ़ : चम्बल, बनास, बेढ़च, बामणी, गंभीरी, औराई, जाखम।

    7. जयपुर : बाणगंगा, बांडी, ढूंढ, मोरेल, साबी, डाई, मासी।

    8. जालोर : जवाई, बाण्डी, लूणी, खारी, सागी, सूकड़ी।

    9. जैसलमेर : काकनेय, लाठी, धोगड़ी।

    10. जोधपुर : लूनी, मीठड़ी, जोजरी, गुणाईमाता।

    11. झालावाड़ : कालीसिंध, आहू, निवाज, पिपलाज, घोड़ा पछाड़, चंद्रभागा, क्यासरी, परबन, अंधेरी।

    12. झुंझुनूं : कांटली।

    13. टोंक : बनास, मासी, बांडी, सोहदरा।

    14. डूंगरपुर : सोम, जाखम, माही।

    15. दौसा : मोरेल, बाणगंगा, सनवान।

    16. धौलपुर : चंबल, गंभीरी, पार्वती।

    17. नागौर : लूणी, हरसौर।

    18. पाली : लीलड़ी, सूकड़ी, जवाई, बाण्डी।

    19. प्रतापगढ़ : जाखम, औराई, रेतम, सिवना तथा करमोई।

    20. बाड़मेर : सूकड़ी, लूणी, मीठड़ी।

    21. बारां : परबन पारबती।

    22. बांसवाड़ा : माही, अन्नास, चैनी।

    23. बूंदी : घोड़ा पछाड़, कुराल, चम्बल, मंगली, मेज।

    24. भरतपुर : बाणगंगा, गंभीरी, रूपारेल, पार्वती, काकुंड।

    25. भीलवाड़ा : बनास, बेड़च, कोठारी, खारी, चंद्रभागा, मैनाली, मानसी।

    26. राजसमंद : बनास, चंद्रभागा।

    27. सवाईमाधोपुर : चंबल, बनास, गंभीरी, मोरेल।

    28. सिरोही : सूकड़ी, जवाई, खारी, कपालगंगा, बांडी, कृष्णावती, पश्चिमी बनास।

    29. सीकर : कृष्णावती, कांतली, साबी, सोटा, मंथा।

    30. श्रीगंगानगर : घग्घर।

    31. हनुमानगढ़ : घग्घर।


    राज्य की प्रमुख नदियों के उद्गम स्थल

    चम्बल : जनापाव पहाड़ी, महू (मध्यप्रदेश)।

    बनास : खमनौर की पहाड़ियाँ, कुंभलगढ़ (राजसमंद जिला)।

    लूणी : नाग पहाड़, अरावली पर्वत (अजमेर जिला)।

    माही नदी : विंध्याचल पहाड़ियाँ, झाबुआ (मध्यप्रदेश)।

    पार्वती नदी : विंध्याचल पर्वत (मध्यप्रदेश)।

    काली सिंध नदी : वागली गाँव, देवास (मध्यप्रदेश)।

    घग्घर नदी : कालका की पहाड़ियाँ, शिमला (हिमाचल प्रदेश)।

    बाणगंगा नदी : बैराठ की पहाड़ियाँ (जयपुर जिला)।

    साबरमती : पदराड़ा की पहाड़ियाँ, कुंभलगढ़ (उदयपुर जिला)।

    कोठारी नदी : देवास, उदयपुर।

    काकनी नदी : कोटरी की पहाड़ियाँ, जैसलमेर।

    कांतली नदी : खण्डेला पहाड़ियाँ, सीकर।

    बेड़च नदी : गोगुंदा की पहाड़ियाँ, उदयपुर।

    सोम नदी : बीछामेड़ा, उदयपुर।

    जाखम नदी : छोटी सादड़ी के निकट भंवरमाता की पहाड़ियों से।

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  • अजमेर का इतिहास - 77

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 77

    बीसवीं सदी में अजमेर (3)


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    नरहरि बापट गिरफ्तार


    ई.1932 में अजमेर-मेरवाड़ा कारावास महानिरीक्षक गिब्सन की हत्या के अभियोग में नरहरि बापट को 10 वर्ष का कारावास हुआ। इसी वर्ष अजमेर पी.डब्ल्यू.डी. को सेंट्रल पी.डब्ल्यू.डी के अधीन किया गया। अजमेर-मेरवाड़ा के लिये आयकर अधिकारी की नियुक्ति की गयी। इसी वर्ष सरकार ने सस्ता साहित्य मण्डल के प्रेस कार्यालय पर ताला डाल दिया। 4 दिसम्बर 1932 को वायसराय लॉर्ड विलिंगडन अजमेर आया।

    ज्वालाप्रसाद शर्मा गिरफ्तार

    ई.1932 में ज्वालाप्रसाद शर्मा ने चीफ कमिश्नर की हत्या करने, राजकीय महाविद्यालय का कोष लूटने तथा वायसरॉय की हत्या करने के प्रयास किये। अप्रेल 1935 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। ई.1933 में महर्षि दयानंद सरस्वती की मृत्यु की अर्द्ध शताब्दी मनायी गयी। इस अवसर पर अफ्रीका, बर्मा तथा समस्त भारत से आर्य समाजी अजमेर आये। ई.1934 में अजमेर म्युन्सिपल कमेटी को एक नामित कमेटी द्वारा समाप्त कर दिया गया। ई.1935 में दी गवर्नमेंट रेलवे पुलिस तथा अजमेर-मेरवाड़ा पुलिस को मिला दिया गया। बनास नदी पर देवली के निकट एक पुल बनाया गया।

    इसी वर्ष पुलिस उप अधीक्षक डोगरा की हत्या के अभियोग में ज्वाला प्रसाद शर्मा, रामसिंह एवं रमेशचंद्र को बंदी बनाया गया। इसी वर्ष सरकार ने मेयो कॉलेज का प्रबंधन राजपूताना के राजाओं द्वारा चुनी गयी मेयो कॉलेज कौंसिल को सौंप दिया।

    अजमेर नगर का विस्तार

    ई.1875 से अजमेर नगर की जनसंख्या में वृद्धि होनी आरंभ हुई थी जो अब तक लगातार होती जा रही थी। ई.1924 तक मेयो कॉलेज के पीछे सैंकड़ों एकड़ क्षेत्र में गुलाबों के खेत हुआ करते थे। इस क्षेत्र को गुलाबबाड़ी कहा जाता था। तब यहाँ कुछ झौंपड़ियां ही हुआ करती थीं। ई.1924 में यहाँ एक कॉलोनी की स्थापना की गई। इस कॉलोनी में अधिकतकर सार्वजनिक कार्यालयों में कार्य करने वाले लोग रहते थे। ई.1934-35 में नगर पालिका ने यहाँ की मुख्य सड़क का निर्माण करवाया। आनासागर के उत्तर में आनासागर तथा अंतेड़ की माता मंदिर के बीच में क्रिश्चियन गंज बसा। ई.1930 तक यहाँ कुछ छितरे हुए घर ही बने हुए थे। ई.1930-30 में अजमेर का नगर नियोजन की दृष्टि से सर्वेक्षण किया गया। नरसिंहपुरा के निकट रामनगर तथा फॉय सागर रोड एवं पुष्कर रोड पर भी 1925 से 1935 के बीच कॉलोनियां बस गईं। ई.1925 के आस पास अलवर गेट कॉलोनी बसनी आरंभ हुई। श्रीनगर चंवरी, नया बाजार, भोपों का बाड़ा, लोहकन डोंगरी गहलोतान आदि पुराने क्षेत्रों में भी छोटे-छोटे मौहल्ले विकसित हो गये।

    आदर्शनगर योजना

    अजमेर में जनसंख्या के ताबड़तोड़ प्रसार को देखते हुए ई.1931 में अजमेर के कुछ व्यवसायियों एवं गणमान्य व्यक्तियों ने आदर्शनगर गृह समिति की स्थापना की गई ताकि अजमेर के निकट एक मॉडल टाउन विकसित किया जा सके। भारत सरकार के आर्चीटैक्ट मि. रसेल की सलाह पर एक योजना तैयार की गई तथा उसे नगरपालिका से अनुमोदित करवाया गया। इसमें 100 फुट चौड़ी एक सड़क तथा 30 से 40 फुट चौड़ी कई सड़कें जो एक दूसरे से बिल्कुल मिलती जुलती थीं, बनाई गईं। कुछ छोटी सड़कें भी नियोजित की गईं। आदर्शनगर के लेआउट में स्कूल, खेल के मैदान, डिस्पेंसरी तथा दुकानों के लिये भी प्रावधान किया गया। आदर्श नगर योजना उच्च मध्यम वर्ग के लिये अच्छी आवासीय योजना सिद्ध हुई।

    भारत सरकार अधिनियम 1935

    ई.1935 में नया भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। इसका तृतीय भाग 1 अप्रेल 1937 से लागू किया गया। इसके बाद अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में एक बार फिर परिवर्तन आया। अजमेर-मेरवाड़ा को भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग से हटाकर, गृह विभाग के अधीन कर दिया गया क्योंकि नये संविधान के अनुसार भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण क्राउन प्रतिनिधि वायसराय के अधीन दे दिया गया था। नये अधिनियम के अनुसार क्राउन प्रतिनिधि (वायसरॉय) को ब्रिटिश भारत के मामलों में बोलने का अधिकार नहीं रह गया था।

    यह व्यवस्था भी की गई कि भविष्य में अजमेर के कमिश्नर एवं असिस्टेण्ट कमिश्नर यूनाइटेड प्रोविंस सिविल सेवा के अधिकारी होंगे। इनकी नियुक्ति तीन साल के लिये होगी तथा ये एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना के नीचे काम करेंगे। एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर रेजीडेण्ट इन राजपूताना तथा चीफ कमिश्नर अजमेर मेरवाड़ कर दिया गया। भारत सरकार अधिनियम 1935 में यह प्रावधान किया गया था कि जब संघीय संविधान का निर्माण होगा, तब अजमेर-मेरवाड़ा तथा पांठ-पीपलोदा के लिये संयुक्त रूप से, संघीय विधान सभा में एक सदस्य तथा संघीय विधान परिषद में एक सदस्य का प्रतिनिधित्व होगा।

    यह भी प्रावधान किया गया कि भविष्य में अजमेर प्रांत के लिये कानून का निर्माण गवर्नर जनरल की परिषद के स्थान पर संघीय विधान द्वारा किया जायेगा। इस समय अजमेर-मेरवाड़ा में जो भी कानून चल रहे थे उन्हें किसी सैंवधानिक संस्था द्वारा लागू नहीं किया गया था। 1 अप्रेल 1937 से अनुसूचित जिला अधिनियम (शिड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट्स एक्ट) अप्रभावी बना दिये गये। 1 अप्रेल 1937 से पहले अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र का पुलिस बल, राजपूताना की रेलवे भूमि तथा आबू में पट्टे की जमीनें एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल ऑफ राजपूताना के अधीन हुआ करती थीं। 1 अप्रेल 1937 से ये सारे विषय चीफ कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक नियंत्रण में दे दिये गये।

    गृह विभाग के अधीन

    1 अप्रैल 1937 को अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र को भारत सरकार के गृह विभाग के अधीन कर दिया गया। परिणामतः इस क्षेत्र से सम्बन्धित सभी विधेयक फेडरल लेजिस्लेचर (संघीय विधानसभा) द्वारा पास किये जाने लगे। यह भी व्यवस्था की गई कि इस क्षेत्र के लिये कमिश्नर तथा असिस्टेंट कमिश्नर यूनाइटेड प्रोविन्सेज सिविल सर्विस से प्रतिनियुक्ति पर आयेंगे। भारत के गवर्नर जनरल का एजेन्ट जो अब तक चीफ कमिश्नर कहलाता था, अब से चीफ कमिश्नर अजमेर-मेरवाड़ा तथा राजपूताना का रेजीडेन्ट कहलाने लगा। एक सदस्य फेडरल कौंसिल के लिये चुने जाने की व्यवस्था की गई। इन सदस्यों का चुनाव अजमेर मेरवाड़ा, पांठ-पिपलोदा क्षेत्र से किया जाना था।

    ई.1823 एवं ई.1830 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा मेवाड़ रियासत से 93 गांव तथा मारवाड़ रियासत से 22 गांव समुचित प्रबंधन के लिये मेरवाड़ा जिले में सम्मिलित किये गये थे। ई.1938 में उन्हें वापस उनकी मूल रियासतों को लौटा दिया गया। कुल 273 वर्गमील क्षेत्र मारवाड़ रियासत को तथा 223 वर्ग मील क्षेत्र मेवाड़ रियासत को लौटाया गया। इससे अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत का क्षेत्रफल 2,710 वर्गमील से घटकर 2,367.9 वर्ग मील रह गया तथा जनसंख्या 5,60,292 से घटकर 5,026,964 रह गई। ई.1938 में अजमेर म्युन्सिपलिटी के लिये नई कमेटी बनायी गयी।

    मेवाड़ से निष्कासन के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने अजमेर में प्रजा मण्डल की स्थापना की। 14 दिसम्बर 1938 को मेवाड़ प्रजा मण्डल के मथुरा प्रसाद वैद्य को अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत के ब्रिटिश क्षेत्र से बंदी बनाया गया। ई.1939 में अजमेर-मेरवाड़ा में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। इसी वर्ष मेवाड़ पुलिस द्वारा अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत की सीमा में घुसकर माणिक्यलाल वर्मा को बंदी बनाया गया तथा उन्हें निर्ममता से पीटा गया। ई.1939 में क्रांतिकारी गोपालसिंह खरवा का निधन हो गया।

    लॉर्ड लिनलिथगो अजमेर में

    7 मार्च 1940 को भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो अजमेर आये। इसी वर्ष अजमेर में नया रेवेन्यू सैटलमेंट आरंभ किया गया। जुलाई-अगस्त 1940 में अच्छी वर्षा होने से अकाल समाप्त हो गया। इसी वर्ष अजमेर में जयपुर रोड पर नया मेटेरनिटी होम बनाया गया। इसी वर्ष सस्ता साहित्य मण्डल अजमेर से दिल्ली ले जाया गया तथा माणिक्यलाल वर्मा के अजमेर कारावास में अस्वस्थ हो जाने के कारण उन्हें रिहा किया गया।

    ई.1940 की जनगणना

    ई.1940 में अजमेर जिले का क्षेत्रफल 2,070 वर्ग मील था तथा जनसंख्या 4,23,918 थी। यह 80 मील लम्बा तथा 50 मील चौड़ा था। अजमेर की जनसंख्या 1,19,524 हो गई। इस समय नसीराबाद की जनसंख्या 21,397 तथा केकड़ी की जनसंख्या 7,179 थी। पुष्कर की जनसंख्या 3781 थी। इसमें 518 गांव थे जिनमें से 140 गांव खालसा के तथा 51 गांव जागीरी क्षेत्र में तथा 327 गांव जागीरी क्षेत्र के अधीन थी। मेरवाड़ा जिले की जनसंख्या 82,947 हो गई। इस जिले में एक नगर ब्यावर स्थित था जिसकी जनसंख्या 28,342 थी तथा इसमें 214 गांव थे जो सभी, खालसा के अंतर्गत थे।

    अजमेर में पुनः डिप्टी कमिश्नर व्यवस्था

    ई.1943 में पुनः अजमेर-मेरवाड़ा के लिये अलग-अलग डिप्टी कमिश्नरों की नियुक्ति की गई।

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  • बारहमासी कविताएँ

     02.06.2020
    बारहमासी कविताएँ

    बारहमासी कविताएँ


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जनवरी


    रेशमी धूप के गद्दों पर बैठकर

    ठिठुरती बूढ़ी नानी,

    रात मचलते ही महक उठती

    शोख, मनचली रात की रानी।



    फरवरी

    इस तरह चली हवायें

    प्यार में झूमकर

    कि सेमल हो गया लाल

    मारे शर्म के।



    मार्च

    सुरमई शाम

    मचलने लगे आम

    आई होली!

    गोरी के अंग-अंग

    बावरी कोयल ने

    कच्ची अमिया घोली।



    अप्रेल

    अरे! जरा सा

    ठहर 
    रे  अप्रेल!!

    गरमी देने लगी

    मेरी छोटी सी खपरैल।



    मई

    उठने लगी

    लपटें धरती से

    अब खुलती है आंख नहीं,

    भीगा तौलिया सिर पर लिये

    कौन रूपसी झांक रही !



    जून

    धूप, धूप, धूप!

    अरे बाबा धूप।

    उड़ा फ्यूज दिमाग का

    बिगड़ा पंखे का रूप।



    जुलाई

    मिट्टी पर पड़ गईं सलवटें!

    दो बूंद पानी की

    आज पड़ें या कल पड़ें।



    अगस्त

    लड़कियों का हॉस्टल

    भरने लगा है फिर से

    ज्यों वीर बहूटियां घूमने

    निकल पड़ी हों घर से।



    सितम्बर

    सितम्बर!

    हरी धरती

    नीला अम्बर।



    अक्टूबर

    तन दीप,

    मन लौ।

    री दीपावली

    शीघ्र आ

    तेरे उजालों में

    बोने हैं मुझे

    आशा जौ।



    नवम्बर

    बांधकर धूप

    कागज की पुड़िया में

    फैंक दी झील में

    शाम की बुढ़िया ने।



    दिसम्बर

    सुनहरी लहरें

    घड़ी भर न ठहरें,

    कल नवम्बर

    आज दिसम्बर

    कौन सुने किसकी

    बीती घड़ियां

    बीतीं पहरें।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-14

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-14

    राजस्थान में जल संसाधन (2)



    राजस्थान के पश्चिमी भाग में सामान्यतः खारे पानी की तथा पूर्वी भाग में मीठे पानी की झीलें हैं। खारे पानी की झीलों- सांभर, पचपदरा, फलौदी तथा लूणकरणसर से सोडियम क्लोराइड (नमक) तथा डीडवाना झील से सोडियम सल्फेट बनता है।

    मीठे पानी की झीलें

    आनासागर झील : यह झील अजमेर नगर में स्थित है। इसका निर्माण ई. 1137 में चौहान राजा अर्णोराज ने करवाया था जिसे आनाजी भी कहते थे। जिस स्थान पर यह झील बनी है, पहले युद्ध का मैदान था। उस मैदान में एक बार अर्णोराज ने शत्रु सैनिकों का बहुत बड़ी संख्या में वध किया। जब उनके शव सड़ने लगे तो उन्हें हटाने के लिये नाग पहाड़ों से निकलने वाली नदी को मोड़ कर इस स्थान तक लाया गया जिससे सारे शव बहकर दूर चले गये। बाद में अर्णोराज ने इस स्थान की खुदाई करवाकर वहाँ की मिट्टी भी हटवा दी और पक्के घाट बनाकर झील का निर्माण करवा दिया। इस झील के कारण अजमेर नगर का विकास बहुत तेजी से हुआ। जहाँगीर ने इस झील के निकट दौलतबाग का निर्माण करवाया जिसे अब सुभाष उद्यान कहते हैं। शाहजहाँ ने आनासागर झील के तट पर संगमरमर की बारादरी बनवाई।

    पुष्कर झील : यह राजस्थान की अत्यंत प्राचीन झीलों में से है। लोकाख्यानों के अनुसार इस झील की उत्त्पत्ति ब्रह्माजी के हाथ से गिरे कमल से हुई। यह अजमेर से 11 कि.मी. दूर उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसमें वर्ष पर्यंत जल रहता है। यह तीन तरफ से पहाड़ों से घिरी हुई है। इसके चारों ओर अनेक मंदिर और घाट बने हुए हैं। इस झील में स्नान करना अत्यंत महत्व रखता है। हिंदुओं में मान्यता है कि पुष्कर तीर्थराज प्रयाग का गुरु है। लोक संस्कृति में इसे तीर्थों का मामा कहते हैं।

    पिछोला झील : यह झील उदयपुर नगर के पश्चिम में पिछोला गाँव के निकट स्थित होने से पिछोला झील कहलाती है। मीठे पानी की इस झील का निर्माण 14वीं शताब्दी के अंत में महाराणा लाखा के समय एक बणजारे ने करवाया था। महाराणा उदयसिंह ने इस झील का जीर्णोद्धार करवाया। यह झील 7 कि.मी. लम्बी और 2 कि.मी. चौड़ी है। इस झील में तीन भाग हैं जिन्हें पिछोला, स्वरूपसागर और फतेहसागर कहते हैं। इस झील में स्थित टापुओं पर जगमंदिर एवं जगनिवास महल हैं। जगमंदिर महल में अब पाँच सितारा होटल बन गया है जिसे लेक पैलेस होटल कहते हैं।

    फतेहसागर झील : यह झील पिछोला झील के उत्तर में है तथा पिछोला झील से एक नहर द्वारा जुड़ी हुई है। इसकी लम्बाई 2.5 कि.मी. तथा चौड़ाई 1.16 कि.मी. है। इस झील का निर्माण 1678 ई. में महाराणा फतहसिंह ने करवाया था।

    जयसमंद झील : यह झील राजस्थान में मीठे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह उदयपुर से 45 कि.मी. दूर सलूम्बर के निकट गोमती नदी के बांध से बनी है। इसका निर्माण महाराणा जयसिंह ने करवाया था। झील का क्षेत्रफल 55 वर्ग कि.मी. व परिधि 145 कि.मी. है। इसके बीच में कई टापू स्थित हैं। झील से दो नहरें- श्यामपुर तथा भटा निकाली गयी हैं जिनकी सामूहिक लम्बाई 324 कि.मी. है तथा इनसे 10 हजार हैक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती है।

    राजसमंद झील : यह झील उदयपुर से 64 कि.मी. दूर है तथा राजसमंद जिला मुख्यालय एवं कांकरोली से सटी हुई है। इसका निर्माण ई. 1662 में महाराणा राजसिंह ने अकाल राहत कार्य के रूप में करवाया था। इस झील में गोमती नदी आकर गिरती है। इस झील का विस्तार 20 वर्ग कि.मी. है। झील का उत्तरी भाग नौ चौकी कहलाता है। आजकल इस झील में बनास नदी से भी जल लाया जाता है। इस झील का जल सिंचाई के काम में लिया जाता है।

    सिलीसेढ़ झील : यह झील अलवर नगर से 12 कि.मी. दूर पश्चिम में स्थित है। अलवर नरेश विनयसिंह ने समीपवर्ती पर्वतों से बहकर आने वाले जल को एकत्र करके इस झील का निर्माण करवाया। यह 10 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैली हुई है। इस झील का अतिरिक्त जल जयसमंद झील में डालते हैं।

    नक्की झील : यह झील सिरोही जिले में माउण्ट आबू पर्वत पर स्थित है। यह राजस्थान की सबसे गहरी झील है। इसका क्षेत्रीय विस्तार 10 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में है। यह एक प्राकृतिक झील है। इसके बारे में मान्यता है कि इसे नाखूनों से खोदा गया था। यह झील राजस्थान में सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित है।

    तालछापर : चूरू जिला मुख्यालय से 90 कि.मी. दूर तालछापर खारे पानी की झील स्थित है जिससे नमक बनाया जाता है। इस झील के पास 722 हैक्टेयर क्षेत्र में कृष्णमृग अभयारण्य स्थित है। यह अभयारण्य 2000 हैक्टेयर में फैला हुआ है।

    कोलायत झील : यह बीकानेर से 48 कि.मी. पश्चिम में स्थित है। यहाँ पर सांख्य दर्शन के प्रणेता भगवान कपिल का आश्रम स्थित है। इस झील में वर्षपर्यंत जल रहता है। कार्तिक पूर्णिमा को यहाँ मेला लगता है।

    खारे पानी की झीलें

    जब टेथिस महासागर विभिन्न नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से पट गया तब उसके बीच-बीच में खारे पानी की छोटी-छोटी झीलें रह गईं। टेथिस सागर में जमा लवण ही इन झीलों में नमक का प्रमुख स्रोत है। अंग्रेजी विद्वान नोटिलिंग के अनुसार सांभर झील के नीचे लवणीय जल के स्रोत प्रवाहित होते हैं जिनसे नमक प्राप्त होता है।

    सांभर झील : यह भारत में, खारे पानी की सबसे बड़ी झील है। इस प्राकृतिक झील का अधिकांश भाग जयपुर जिले में तथा कुछ भाग नागौर जिले में आता है। यह झील उत्तर से दक्षिण में 32 कि.मी. तथा पूर्व से पश्चिम में 3 से 12 कि.मी. तक विस्तृत है। इसका अधिकतम विस्तार 145 वर्ग कि.मी. तक होता है। इसकी गहराई चार मीटर है। इस झील से खाने का नमक तथा सोडियम सल्फेट बनता है। इस झील में 35 करोड़ टन नमक का भण्डार है। सम्पूर्ण देश के 8 प्रतिशत नमक का उत्पादन इस झील से होता है। वर्षा काल में मेढ़ा, रूपनगढ़, खारी और खण्डेला नामक बरसाती नदियों से इस झील में पानी आता है। इस झील के पूर्वी किनारे पर सांभर तथा उत्तरी किनारे पर नावां कस्बे बसे हुए हैं। इस झील से प्रस्तर युगीन सभ्यता के उपकरण प्राप्त हुए हैं। नलियासर की सभ्यता भी इस झील के निकट स्थित थी।

    पचपदरा झील : खारे पानी की यह झील बाड़मेर जिले में बालोतरा के पास स्थित है। इसका अधिकतम विस्तार 25 वर्ग कि.मी. है। इसमें वर्षा के पानी के साथ-साथ भूमिगत स्रोतों से भी पानी आता है जिससे नमक बनाया जाता है। इस झील में 1040 वर्ग कि.मी. क्षेत्र से पानी बहकर आता है। इस झील से प्राप्त नमक में 98 प्रतिशत सोडियम क्लोराइड होता है। यहाँ खारवाल जाति के लोग 'मोरली झाड़ी' के द्वारा नमक बनाते हैं। पचपदरा का नमक समुद्री नमक से काफी साम्य रखता है।

    डीडवाना झील : नागौर जिले में स्थित इस झील के उत्तर-पूर्वी सिरे पर डीडवाना कस्बा स्थित है। इस झील का अधिकतम विस्तार 10 वर्ग कि.मी. है। यह खारे पानी की झील है। इसके खारे पानी से किसी समय सोडियम सल्फेट बनाया जाता था किंतु अब उत्पादन बंद कर दिया गया है। इस झील से नमक बनाने वाली संस्थाओं को देवल कहते हैं। इस झील के पेटे में काली कीचड़ है जिसके नीचे खारे पानी के भण्डार हैं। यहाँ का नमक प्रायः खाने के अयोग्य होता है। इस झील के किनारे से सांभर झील की भांति अत्यंत प्राचीन पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है।

    लूणकरणसर : खारे पानी की यह झील बीकानेर से उत्तर पूर्व में 80 कि.मी. दूर है। इससे बहुत कम मात्रा में नमक बनाया जाता है। पोकरण, कुचामण, कावोद (जैसलमेर जिला), कछोर, रेवासा (सीकर जिला) फलौदी और सुजानगढ़ की झीलों से भी नमक तैयार किया जाता है। पोकरण का नमक सबसे उत्तम श्रेणी का नमक है। पचपदरा एवं डीडवाना में आयोडाइज्ड नमक कारखाने स्थापित किये गये हैं।


    राज्य में झीलों की जिलेवार स्थिति

    1. अजमेर : आनासागर, फॉय सागर, पुष्कर।

    2. अलवर : सिलीसेढ़, मानसरोवर, जयसागर, विजयसागर, मंगलसागर।

    3. उदयपुर : फतहसागर, पिछोला, जयसमंद, उदयसागर, स्वरूप सागर।

    4. करौली : नाग तलाई, जुग्गर, ममचेड़ी, नींदर, कालीसिल, खिरखिरी।

    5. कोटा : जवाहर सागर।

    6. चित्तौड़गढ़ : राणाप्रताप सागर, भूपाल सागर।

    7. चूरू : तालछापर।

    8. जयपुर : सांभर, छापरवाड़ा, देवयानी, जमवारामगढ़।

    9. जालोर : बांकली बांध, चीतलवाणा बांध, बीठन बांध।

    10. जैसलमेर : गढ़सीसर, अमरसागर, बुझ झील, ब्रह्मसर।

    11. जोधपुर : बालसमंद, तखतसागर, उम्मेदसागर, कायलाना, प्रतापसागर।

    12. झालावाड़ : मानसरोवर।

    13. झुंझुनूं : अजीतसागर बांध।

    14. टोंक : टोरडीसागर, बीसलपुर बांध।

    15. डूंगरपुर : गैबसागर, सोम कमला।

    16. दौसा : कालख सागर।

    17. धौलपुर : रामसागर (वन विहार), तालाबशाही।

    18. नागौर : डीडवाना, भाकरी मोलास,, भैंरुदा।

    19. पाली : सरदार समंद।

    20. बाड़मेर : पचपद्रा।

    21. बारां : उम्मेदसागर, अकलेरा सागर, सीताबाड़ी।

    22. बांसवाड़ा : कडाणा बांध, बजाज सागर बांध।

    23. बीकानेर : लूणकरणसर, कोलायत, अनूपसागर, गजनेर।

    24. बूंदी : नवलख सागर, जेतसागर, सूरसागर।

    25. भरतपुर : मोती झील, केवलादेव झील, मादल झील तथा झील का बाड़ा।

    26. भीलवाड़ा : मांडलताल, मेजाबांध, खारीबांध, अखड़बांध, सरेदीबांध, जैतपुरा।

    27. राजसमंद : राजसमंद झील।

    28. सवाईमाधोपुर : पाँचना बांध, मोरेल बांध।

    29. सिरोही : नक्की झील।

    30. सीकर : रायपुर बांध।

    31. श्रीगंगानगर : शिवपुर हैड।

    32. हनुमानगढ़ : तलवाड़ा झील।


    राज्य की प्रमुख नहरें

    गंग नहर : यह राज्य में सबसे पहले बनने वाली नहर है। बीकानेर नरेश गंगासिंह ने सतलज नदी का जल बीकानेर रियासत में लाने के लिये अंग्रेज सरकार से अनुमति लेकर गंग नहर परियोजना बनायी थी। यह परियोजना 1920 में स्वीकृत हुई तथा 26 अक्टूबर 1927 को 129 कि.मी. लम्बी गंग नहर बन कर तैयार हो गयी। चूने से बनी इस नहर ने बीकानेर रियासत की तस्वीर बदल दी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय सिंधु नदी प्रणाली का विभाजन हुआ जिसके कारण गंग नहर से सिंचित 105 लाख हैक्टेयर भूमि में से 84 लाख हैक्टेयर भूमि पाकिस्तान में चली गयी। नहर का कुछ हिस्सा पंजाब में तथा शेष हिस्सा श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में बहता है।

    भरतपुर नहर : राज्य में आरंभ होने वाली दूसरी प्रमुख नहर भरतपुर नहर थी। यह 1964 से काम कर रही है। इसकी लम्बाई 28 कि.मी. है। इससे भरतपुर जिले में 11 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है।

    इंदिरा गांधी नहर : यह एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित परियोजना है जिसे मरुगंगा और मरुस्थल की जीवन रेखा भी कहा जाता है। जब भारत पाक विभाजन के कारण गंग नहर द्वारा सिंचित काफी क्षेत्रफल पाकिस्तान में चला गया तो बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासत के मुख्य अभियंता कंवरसेन से एक नयी नहर की परियोजना बनवायी। इसे 1948 में भारत सरकार के पास स्वीकृति के लिये भेजा गया। 31 मार्च 1958 को तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने इस परियोजना की आधारशिला रखी। 1958 से यह नहर बननी आरंभ हो गयी। इसका मूल नाम राजस्थान नहर था किंतु 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद इसे इंदिरा गांधी नहर कर दिया गया। इस परियोजना का निर्माण गंगानगर, हनुमागढ़, चूरू, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर तथा बाड़मेर जिलों में 18.72 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्र में सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध करवाने हेतु किया गया है।

    इस नहर का उद्गम पंजाब में फिरोजपुर के निकट सतलज-व्यास नदियों के संगम पर स्थित हरिके बैराज से हुआ। मुख्य नहर की लम्बाई 649 कि.मी. है। नहर के 204 कि.मी. के प्रारंभिक भाग को फीडर नहर कहते हैं। इसमें से प्रथम 169 कि.मी. भाग पंजाब में, 14 कि.मी. भाग हरियाणा में तथा शेष 21 कि.मी. भाग राजस्थान में है। इस परियोजना का प्रारंभ बिंदु हरिके बैराज (पंजाब) है।

    इस परियोजना का उपनाम मरुगंगा भी रखा गया है। पूरी परियोजना का अंतिम बिंदु गडरारोड (बाड़मेर जिला) है। निकास स्थल पर मुख्य नहर के तल की चौड़ाई 40 मीटर है। इसमें बहने वाले पानी की गहराई 6.4 मीटर तथा इसकी जल प्रवाह क्षमता 523 घन मीटर प्रति सैकेण्ड (18.500 क्यूसेक) है। राजस्थान में मुख्य नहर का प्रारंभ बिंदु मसीतांवाली (जिला हनुमानगढ़) तथा समापन बिंदु गडरारोड है। नहर के प्रथम चरण में 204 कि.मी. लम्बी फीडर नहर, 189 कि.मी. लम्बी मुख्य नहर तथा 3,454 कि.मी. लम्बी शाखाओं एवं वितरिकाओं का निर्माण किया गया। नहर के प्रथम चरण से 5.87 लाख हैक्टेयर भूमि पर सिंचाई सुविधा प्राप्त हुई। नहर के द्वितीय चरण में 256 कि.मी. लम्बी मुख्य नहर एवं 5,780 कि.मी. लम्बी वितरिकाओं का कार्य सम्मिलित है। इस चरण में 13.17 लाख हैक्टेयर सिंचित क्षेत्र सृजित हुआ है।

    इस परियोजना से बीकानेर, चूरू, जैसलमेर और जोधपुर नगरों सहित इन जिलों के 1,107 गाँवों में 65.88 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध करवाया जा रहा है। इस परियोजना के कारण रेगिस्तान का प्रसार रुका है तथा मानव अधिवास बढ़ा है। बीकानेर जिले के पूगल, बरसलपुर, चारणवाला, गंगानगर जिले के अनूपगढ़, सूरतगढ़ एवं मांगरोल में लघु शक्ति के विद्युत उत्पादन गृह स्थापित हुए हैं।

    गंगनहर लिंक चैनल : गंगनहर लिंक चैनल 1984 में आरंभ हुई। इसकी लम्बाई 80 कि.मी. है। इससे भी श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में सिंचाई होती है।

    गुड़गावां नहर : गुड़गावां नहर 1985 में आरंभ हुई। इसकी लम्बाई 58 कि.मी. है। इस नहर में यमुना नदी से जल आता है तथा भरतपुर जिले की डीग व कामां तहसीलों में 28 हजार 200 हैक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई होती है।

    भाखड़ा नहर : भाखड़ा नहर सतलज नदी से निकलती है। इससे राजस्थान, पंजाब एवं हरियाणा राज्य जुड़े हुए हैं। भाखड़ा नहर से राज्य के 5.82 लाख हैक्टेयर भूमि में सिंचाई होती है।

    चम्बल परियोजना : यह परियोजना चम्बल नदी पर बनी हुई है। इससे राजस्थान एवं मध्य प्रदेश को जल प्राप्त होता है। इस परियोजना में राज्य का अंश 50 प्रतिशत है। चम्बल नदी पर गांधी सागर, राणा प्रताप सागर तथा जवाहर सागर बांध बने हैं जिनका प्रदेश के विकास में प्रमुख योगदान है। इनमें से गांधी सागर मध्यप्रदेश में है। इन बांधों से नहरें निकाल कर चम्बल का पानी सिंचाई एवं पेयजल के लिये दूरस्थ गांवों को उपलब्ध कराया जा रहा है।

    नर्मदा नहर : भारत को उत्तर एवं दक्षिण भारत में विभक्त करने के लिये विभाजक रेखा के रूप में काम करने वाली नर्मदा नदी से नर्मदा नहर निकाल कर उसका जल राजस्थान के बाड़मेर एवं जालोर जिलों में पहुंचाया गया है। राजस्थान में मुख्य नहर का कुल प्रवाह 74 कि.मी. है। इस परियोजना में खेती के लिये सिंचाई हेतु स्प्रिंकलर पद्धति को अनिवार्य रूप से लागू किया गया है।

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  • अजमेर का इतिहास - 78

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 78

    अजमेर में क्रांतिकारी गतिविधियाँ


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    राजस्थान के केन्द्र में स्थित होने के कारण, अजमेर चारों ओर से राजपूत रियासतों से घिरा हुआ था। अतः राजनीतिक एवं सामरिक दृष्टि से अजमेर का अत्यंत महत्त्व रहा। दिल्ली सल्तनत के बादशाहों ने अजमेर को अपने अधीन बनाये रखने के लिये हिन्दू नरेशों से सतत युद्ध किया। मुगल बादशाहों ने राजपूत नरेशों के विरुद्ध किये गये अभियानों के लिये अजमेर को अपना मुख्यालय बनाया। सिसोदियों, कच्छवाहों एवं राठौड़ों ने अजमेर पर अधिकार करने और बनाये रखने के लिये सैंकड़ों साल तक परस्पर संघर्ष किया। कितने ही राजाओं की हत्या हुई। मराठों ने इस पर अधिकार करके इसे उत्तर भारत में अपनी बड़ी राजधानी बनाया।

    अंग्रेजों ने अजमेर में अपना पोलिटिकल मुख्यालय स्थापित किया और अजमेर से 11 मील दूर नसीराबाद में अपनी छावनी स्थापित की। यदि ब्रिटिश शासन काल में अजमेर को राजस्थान में राजनैतिक चेतना का पथ प्रदर्शक कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राजपूताने की रियासती जनता राजनैतिक चेतना के अभाव से ग्रस्त होने के कारण अपने विलासी व चरित्रहीन राजाओं को भी श्रद्धा एवं निष्ठा से देखती थी। उनके राजा अंग्रेजों के अधीन थे अतः रियासती जनता, दासों की दास थी। अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधीन होने से अजमेर की जनता रियासती जनता की अपेक्षा अधिक अच्छी स्थिति में थी और उसमें राजनैतिक चेतना का प्रादुर्भाव भी रियासती जनता की अपेक्षा पहले हुआ।

    राजनैतिक चेतना का आरम्भ

    अजमेर में राजनैतिक चेतना आरम्भ करने का श्रेय आर्यसमाज को है। स्वामी दयानंद सरस्वती प्रथम क्रांतिकारी सन्यासी थे जिन्होंने घोषित किया कि भारत भारतियों का है तथा हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। उन्होंने ही विदेशी शासन के विरुद्ध क्रांति की प्रथम चिन्गारी प्रज्ज्वलित की। अजमेर के शीर्षस्थ राजनैतिक कार्यकताओं के निर्माण का श्रेय आर्यसमाज को ही है। अधिकांश राजनैतिक कार्यकर्ताओं व क्रांतिकारियों की शिक्षा दीक्षा आर्यसमाज की संस्थाओं में हुई। केसरीसिंह बारहठ के पुत्र प्रतापसिंह बारहठ ने मैट्रिक तक शिक्षा अजमेर के डीएवी हाईस्कूल में प्राप्त की थी।

    डोगरा गोली काण्ड से सम्बन्धित रामसिंह का पालनपोषण अजमेर के आर्यसमाज के बाल सदन में हुआ था। खरवा के क्रांतिकारी राव गोपालसिंह आर्यसमाज के रंग में रंगे थे। देशभक्त राम नारायण चौधरी, आर्यसमाज की ही उपज थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के व्यक्तित्व ने जहाँ राजनैतिक व क्रांतिकारी देशभक्तों को प्रेरणा दी वहीं उन्होंने उदयपुर, जोधपुर, शाहपुरा व मसूदा के राज परिवारों को भी सन्मार्ग दिखाया था। यही कारण था कि अजमेर देशभक्ति से प्रेरित गतिविधियों का पथ प्रदर्शक व प्रेरक केन्द्र बनने में सफल रहा।

    क्रांतिकारी गतिविधियाँ

    अजमेर की प्राकृतिक एवं भौगोलिक विशेषतायें क्रांतिकारी आंदोलन के उत्थान, शरण स्थली एवं प्रशिक्षण केन्द्र चलाने जैसी गतिविधियों के लिये वरदान सिद्ध हुई। अजमेर के चारों ओर की पहाड़ियों में गहन वन स्थित होने से विप्लववादी इनमें आकर छिप जाते थे और लम्बे समय तक अपनी गतिविधियाँ चलाते रहते थे। वर्धा के एक क्रांतिकारी जी. आर. पाण्डे ने इन्हीं वनों में एक व्यायामशाला की स्थापना कर अपनी विप्लववादी गतिविधियों का संचालन किया। इस स्थान पर अब साधु आश्रम चलता है।

    वर्तमान गौतम स्कूल के स्थान पर भी पहले व्यायामशाला थी जहाँ से रुद्रदत्त जगदीश व्यास तथा लक्ष्मीनारायण पहलवान ने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया था। अंतेड़ के पर्वतीय क्षेत्र में गोपालसिंह व उनके सहयोगियों द्वारा गौशाला के रूप में एक विप्लवकारी केन्द्र की स्थापना की गई। अजमेर पर्वतीय प्रकोष्ठ ने बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों की ब्रिटिश सरकार के गुप्तचरों के जाल से रक्षा की।

    ई.1912 के हार्डिंग्ज बम केस से सम्बन्धित क्रांतिकारियों को अजमेर के देशभक्तों ने शरण प्रदान की। भगवती चरण, चन्द्रशेखर आजाद तथा वासुदेव ने समय-समय पर अजमेर में शरण ली। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी आर्मी की अजमेर शाखा ने सरदार भगतसिंह को यहाँ शरण दी। बंगाल के स्वामी कुमारानंद ने अजमेर को अपना आधार स्थल बनाया। इस प्रकार अजमेर, भारत प्रसिद्ध क्रांतिकारियों की शरण स्थली बन गया। क्रांतिकारियों के लिये जिन शस्त्रों की आवश्यकता थी, अजमेर उनकी पूर्ति में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि रियासतों, जागीरों व ठिकानों से क्रांतिकारियों को सस्ते दामों में रिवॉल्वर, बन्दूक, पिस्तौल व कारतूस मिल जाते थे।

    इसका कारण यह था कि जागीरदारों में ब्रिटिश सरकार के प्रति आक्रोश था और वह अंग्रेजों को समाप्त करना चाहते थे। रियासतों में शस्त्र रखने की पाबंदी नहीं थी। बिटिश नौकरशाही व पुलिस के चंगुल से बचने के लिये क्रांतिकारी अजमेर से भागकर रियासतों में चले जाते थे क्योंकि दोनों से से अजमेर तथा रियासतों की सीमाओं में केवल 5 से 15 मील का ही अंतर था जिसे पार कर रियासतों में प्रवेश करना कठिन नहीं था।

    किसी अपराधी को रियासतों से पकड़ने के लिये ब्रिटिश सरकार को रियासती सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी, जब तक अनुमति प्राप्त होती, तब तक क्रांतिकारी भागकर दूसरी रियासत में जा चुके होते थे। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों को पकड़ने में असफल रहती थी। रियासतों के पुलिस अधिकारी भी क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति रखते थे। इसलिये क्रांतिकारियों ने अजमेर को अपना रक्षा कवच माना।

    अजमेर क्रांतिकारियों का मुख्य शिविर था। यहीं से क्रांतिकारी योजनाओं का निर्माण, निर्देशन तथा अधीक्षण किया जाता था। अजमेर राजस्थान के केन्द्र में स्थित होने के कारण यहीं से क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित करके राजस्थान व देश के विभिन्न भागों में भेजा जाता था। अजमेर में इनके प्रमुख केन्द्र मदार गेट का हिन्दू होटल, हनुमानजी के पीछे वाली गली एवं पुष्कर में अगस्त्य मुनि की गुफा तथा लीला सेवड़ी थे।

    बंगाल तथा अन्य क्रांतिकारी स्थलों से प्रकाशित क्रांतिकारी साहित्य का प्रभाव अजमेर के क्रांतिकारियों पर पड़ा। इनमें 'युगांतर' एवं 'संध्या' समाचार पत्र सर्वप्रमुख थे। भवानी मंदिर, वर्तमान राजनीति व मुक्ति कॉनपाथे नामक पुस्तकों का भी यहाँ के क्रांतिकारियों पर प्रभाव पड़ा। इस साहित्य में क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की हत्या करना तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करना न्यायोचित बताया गया।

    अंग्रेजों की हत्या करने के लिये केवल मन का निश्चय व निशाने का पक्का होना आवश्यक माना जाता था। राजनैतिक डकैतियों को समाज एवं राष्ट्र के कल्याण के लिये पुण्य कार्य बताया गया। इन पुस्तकों मंद अस्त्र-शस्त्र निर्माण की तकनीक की विवेचना की जाती थी। गीता, स्वामी रामतीर्थ के व्याख्यान, सावरकर का वार ऑफ इण्डिपेण्डेंस, अरविंद का कर्मयोगी, डिग्बे की प्रोस्परस इण्डिया और बंकिमचंद्र का आनंद मठ आदि साहित्य अजमेर के क्रांतिकारियों में लोकप्रिय था।

    इन रचनाओं ने क्रांतिकारियों में अध्यात्म, स्वाभिमान एवं राष्ट्रीयता का विकास किया तथा अंग्रेजी राज्य के अन्यायों को उखाड़ फैंकने हेतु प्रेरित किया। माधव शुक्ल की कविताओं ने क्रांतिकारियों में देशभक्ति व क्रांति की भावना को जागृत किया। अर्जुनलाल सेठी एवं प्रतापसिंह बारहठ इसकी प्रेरणा के प्रमाण थे। अजमेर के क्रांतिकारियों पर बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों का गहरा प्रभाव पड़ा।

    इन क्रांतिकारियों में श्यामजी कृष्ण वर्मा, रासबिहारी बोस, शचीन्द्र सान्याल, अरविन्द घोष, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह व स्वामी कुमारानंद व विजयसिंह पथिक, जी आर. पाण्डे, रामचन्द्र बापट आदि मुख्य थे जिनका प्रभाव एवं सम्पर्क अजमेर के उल्लेखनीय क्रांतिकारियों से रहा। अजमेर के क्रांतिकारियों ने उपरोक्त क्रांतिकारियों से प्रेरणा प्राप्त की। अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह, प्रतापसिंह बारहठ, नारायणसिंह बारहठ, बाबा नृसिंहदास, स्वामी नृसिंह देव, नारायणसिंह, पण्डित रुद्रदत्त, सूरजसिंह, रामप्रसाद, बालमुकुंद, रामकरण, वासुदेव, रामजीलाल बंधु कन्हैयालाल आजाद, जगदीश दत्त व्यास, लक्ष्मीनारायण पहलवान, सोमदत्त लाहिड़ी, लक्ष्मीलाल लाहिड़ी, विष्णुदत्त, मणिलाल दामोदर, पण्डित ज्वाला प्रसाद, रामसिंह व भूपसिंह आदि क्रांतिकारी इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

    क्रांतिकारी दल का लक्ष्य भारत के लिये पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना था। वे स्वाधीनता प्राप्ति हेतु हिंसात्मक कार्यों को उचित मानते थे। वे कार्य करने की गुप्तता में विश्वास करते थे। उनका उद्देश्य भारत में विदेशी शासकों की हत्या करना एवं उन्हें स्वदेश लौट जाने को बाध्य करना था जिससे ब्रिटिश शासन का अंत हो सके। वे हिंसा को शक्ति के रूप में पूजते थे।

    उनका मेकियावली की विचारधारा में पूर्ण विश्वास था। अतः वे लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अनुचित साधनों का प्रयोग करना भी अनैतिक नहीं मानते थे। उनके साधनों में गोली, पिस्तौल, रिवॉल्वर, बंदूक एवं बम के प्रयोग को मुख्य स्थान प्राप्त था। ई.1907 से 1911 तक के चार वर्ष क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना के काल रहे। इस काल में अनेक संगठनों की स्थापना हुई। अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ तथा विजयसिंह पथिक द्वारा वीर भारत सभा नामक गुप्त संगठन की स्थापना की गई। इसके अनन्तर अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हुआ।

    इन गुप्त समितियों में से एक के संगठक राव गोपालसिंह थे जिन्हें फील्ड मार्शल कहा जाता था। विजयसिंह पथिक इनके दाहिने हाथ थे। ब्यावर निवासी दामोदर दास राठी इस समिति के कोषाध्यक्ष थे। इस गुप्त समिति ने बंगाल तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों से सम्बन्ध बनाये रखा। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश के अनन्तर अजमेर में हिन्दुस्तान सोशियलिस्ट रिवोल्यूशनरी आर्मी नामक संगठन की शाखा स्थापित की गई जिसका सम्बन्ध उपरोक्त क्रांतिकारियों से था। रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्र सान्याल द्वारा पंजाब एवं अजमेर की शाखाओं में डोंगरा काण्ड के सिलसिले में तालमेल स्थापित किया गया।

    अजमेर के क्रांतिकारी शिक्षण संस्थाओं की ओट में क्रांति का प्रचार करते थे। उन्होंने छात्रावासों एवं विद्यालयों को अपनी कार्यविधि का केन्द्र बनाया। इन संस्थाओं में क्रांति के प्रचार के लिये गुप्त प्रचार पद्धति की शिक्षा दी जाती थी। उन्हें इश्तिहार छापना व चिपकाना तथा वितरित करने की शिक्षा दी जाती थी। जनता में उत्तेजना प्रसार करने की विधि, शस्त्र संग्रह तथा उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के तरीकों की शिक्षा दी जाती थी। ये शिक्षणालय शस्त्र छिपाने के केन्द्र थे।

    क्रांतिकारी विष्णु दत्त उत्तर प्रदेश से कई युवकों को अपने साथ लेकर अजमेर आये। इनके निर्देशन में अजमेर में अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हुआ। इन समितियों ने नसीराबाद स्थित रायफल्स के सैनिक अधिकारियों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये भड़काया। इन क्रांतिकारियों का जोधपुर महंत हत्या काण्ड, कोटा षड़यन्त्र तथा निमाज हत्याकाण्ड से प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। गिब्सन वडोगरा काण्डों में ज्वाला प्रसाद तथा रामसिंह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। अजमेर के क्रांतिकारियों का सम्बन्ध स्थानीय विद्रोहों, षड़यंत्रों एवं हत्याकाण्डों से ही नहीं था अपितु अखिल भारतीय क्रांतिकारी षड़यंत्रों एवं विद्रोहों से भी था।

    ई.1912 में हार्डिंग्ज बम षड़यन्त्र, बनारस षड़यन्त्र आदि में राव गोपालसिंह तथा प्रतापसिंह एवं उनके भाई को कारावास हुआ था। गोपालदास खरवा ने दामोदर दास राठी के साथ मिलकर, 21 फरवरी 1915 को सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी किन्तु पकड़ लिये गये। 28 जून 1915 को गोपालसिंह खरवा को अंग्रेज सरकार द्वारा टॉडगढ़ में नजरबंद किया गया। 10 जुलाई 1915 को खरवा नजरबंदी से बाहर आकर फरार हो गये। बाद में उन्होंने स्वयं ही आत्मसमर्पण कर दिया। उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हो सका। ई.1920 में गोपालसिंह खरवा जेल से रिहा हुए।

    हैल्पोज की कार बम विस्फोट से उड़ाई

    ई.1930 में चंद्रशेखर आजाद अजमेर आये। उन्होंने अजमेर के कमिश्नर हैल्पोज को उड़ाने की योजना बनाई। वे साधु के वेश में बारादरी के पास रहने लगे और लोगों के हाथ देखकर उन्हें भविष्य बताने लगे। एक दिन उन्होंने बारादरी से सर्किट हाउस के बीच बारूदी सुरंगें बिछा दीं तथा जैसे ही हैल्पोज की कार सर्किट हाउस जाने के लिये उन तारों पर पहुँची, आजाद ने विस्फोट कर दिया। कार का पिछला हिस्सा विस्फोट से उड़ गया। संयोग से उस दिन हैल्पोज आगे वाली सीट पर ड्राइवर के पास बैठा था। इसलिये वह सुरक्षित बच गया।

    स्वतंत्रता सेनानी ज्वाला प्रसाद एवं विद्याराम कोटिया उन्हें लाल रंग की कार में बैठाकर कैसरगंज स्थित आर्यसमाज भवन के पिछवाड़े में बने एक तहखाने में ले गये। रात में आजाद को चांद बावड़ी स्थित अनाथालय में ले गये जहाँ वे स्वतंत्रता सेनानी पन्नालाल माहेश्वरी की कोठरी में ठहरे। तीन दिन तक वे उसी कोठरी में रहे और चौथे दिन पन्नालाल के स्वर्गीय भाई के कपड़े पहन कर अजमेर से बाहर निकल गये।

    क्रांतिकारियों को सजा

    ई.1932 में अजमेर-मेरवाड़ा कारावास महानिरीक्षक गिब्सन की हत्या के अभियोग में नरहरि बापट को 10 वर्ष का कारावास हुआ। ई.1932 में ज्वालाप्रसाद शर्मा ने चीफ कमिश्नर की हत्या करने, राजकीय महाविद्यालय का कोष लूटने तथा वायसरॉय की हत्या करने के प्रयास किये। ई.1935 में पुलिस उप अधीक्षक डोगरा की हत्या के अभियोग में ज्वाला प्रसाद शर्मा, रामसिंह एवं रमेशचंद्र को बंदी बनाया गया। ई.1939 में क्रांतिकारी गोपालसिंह खरवा का निधन हो गया।

    क्रांतिकारी आंदोलन की समाप्ति

    अजमेर का क्रांतिकारी आंदोलन कई कठिनाईयों के कारण अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका। केसरीसिंह बारहठ अपना कार्यक्षेत्र राजपूतों तथा चारणों तक सीमित रखना चाहते थे। इनकी प्रारंभिक गतिविधियां शैक्षणिक एवं सामाजिक सीमाओं तक सीमित थीं। इस संकीर्णता के कारण क्रांतिकारी आंदोलन व्यापक न बन सका। सरकार ने इस आंदोलन को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

    राजपूत नरेशों ने भी ब्रिटिश सत्ता से भयभीत होकर क्रांतिकारियों को कठोर दण्ड एवं कारावास दिये। लम्बे कारावासों ने क्रांतिकारियों को निराश कर दिया। उनके परिवारों को आर्थिक हानि उठानी पड़ी। फलतः अजमेर में क्रांतिकारी आंदोलन ने दम तोड़ दिया। अजमेर के क्रांतिकारी आंदोलन के समाप्त होने का प्रमुख कारण, 20वीं सदी के द्वितीय दशक में कांग्रेस द्वारा चलाया गया असहयोग आंदोलन था। इस आंदोलन ने अजमेर के राजनैतिक जीवन को नया मोड़ दिया। पथिकजी जैसे क्रांतिकारी अब सत्याग्रही बन गये थे।

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  • मन (हिन्दी कविता)

     02.06.2020
    मन (हिन्दी कविता)

    मन

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    मन वन उपवन,

    मन वृंदावन

    मन ही चंदन,

    मन गोरोचन।



    मन में पीपल,

    मन में तुलसी

    मन में बैठी

    माता हुलसी।



    मन में नाचे मोर पपीहा

    मन में बहती गंगा मैया।

    मन में खेले कृष्ण कन्हैया

    नाचें गोपी, ताता थैया।



    मन में बैठी एक कपोती

    पल में हंसती, पल में रोती।

    तिनके लाती दाने चुगती

    और न जाने क्या क्या करती।



    मन में हंसतीं आशा-तृष्णा

    मन में हंसती श्यामा कृष्णा।

    मन में उड़ते चार कबूतर

    काले, धोले नीले धूसर।



    मन में बैठा दास कबीरा

    तुलसी गाता, गाता सूरा।

    चंदन घिसता, दोहे रचता

    मन ना जाने क्या-क्या करता।



    मन में फैले सात समंदर

    मछली मोती गोपी चंदर।

    मन में क्षिप्रा, मन में काशी

    मुक्ति देता घट-घट वासी।

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  • राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-15

     02.06.2020
    राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति-15

    राजस्थान में वन सम्पदा


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    वन, पर्यावरण एवं संस्कृति के बीच की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। वनों को जाने बिना, संस्कृति को जानना असम्भ है। वनस्पति की दृष्टि से राजस्थान, मानसूनी क्षेत्र में स्थित है। किसी समय अरावली के दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिण-पूर्वी भागों तथा पश्चिमी ढाल पर घने वन थे किंतु अब अधिकांश वन कट चुके हैं। राज्य के दक्षिणी भाग में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़ तथा उदयपुर जिलों में सागवान, धौंक, आंवला, तेंदू, खैर, सालर आदि के वृक्ष, बांस तथा विभिन्न घासें पायी जाती हैं।

    उदयपुर, कोटा, बारां, बूंदी, झालावाड़ तथा सिरोही आदि जिलों में धोंक, गूलर, महुआ, बहेड़ा तथा खैर आदि वृक्ष पाये जाते हैं। अलवर, जयपुर, कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर तथा अजमेर आदि जिलों में सालर, तेंदू, पलाश, सेमल, खैर तथा बहेड़ा आदि वृक्ष मिलते हैं। पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी, बबूल, कैर, कुमटी, फोग, बेर आदि वृक्ष मिलते हैं एवं सेवण तथा धामण घासें पायी जाती हैं जो पशु-चारण के लिये अत्यंत उपयोगी हैं। राज्य में आम, केला, जामुन, बेर, टिमरू, डोलमा, खजूर आदि फल वृक्ष, नीम, पीपल, बरगद, पलाश, रीठा, चिरौंजी, हरड़, बहेड़ा, गूगल तथा रोहिड़ा आदि वृक्ष बहुतायत से पाये जाते हैं।


    राजस्थान में वन-क्षेत्र एवं उनका वर्गीकरण

    राजस्थान में भारत के वन-क्षेत्र का 1.8 प्रतिशत वन-क्षेत्र उपलब्ध है। राजस्थान में कुल वन-क्षेत्र 32627.95 वर्ग कि.मी. है जो कि राज्य के कुल क्षेत्रफल (3,42,239 वर्ग किमी) का 9.52 प्रतिशत है। उदयपुर एवं चित्तौड़गढ़ जिले वन-क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उदयपुर जिले में कुल वन-क्षेत्र 4,682.20 वर्ग कि.मी. तथा चित्तौड़गढ़ जिले में 2,633.74 वर्ग कि.मी. वन-क्षेत्र उपलब्ध है। सबसे कम 80.18 वर्ग कि.मी. वन-क्षेत्र चूरू जिले में है।

    वैधानिक दृष्टि से वर्गीकरण

    वैधानिक दृष्टि से राजस्थान के वनों को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है -

    (1) आरक्षित वन- 12,32,511 हैक्टे. (कुल वन-क्षेत्र का 37.78 %)

    (2) संरक्षित वन- 17,52,596 हैक्टे. (कुल वन-क्षेत्र का 53.073%)

    (3) अवर्गीकृत वन- 2,76,876 हैक्टे. (कुल वन-क्षेत्र का 8.49 %)


    प्राकृतिक दृष्टि से वर्गीकरण

    प्राकृतिक दृष्टि से राजस्थान के वनों को 7 वर्गों में रखा जा सकता है-

    (1) शुष्क सागवान वन : इन वनों में सागवान के वृक्ष अधिक होते हैं। ये उदयपुर, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा जिलों में पाये जाते हैं। ये कुल वन-क्षेत्र के 7 प्रतिशत भाग पर पाये जाते हैं।

    (2) सालर वन : इन वनों में सालर के वृक्ष अधिक होते हैं। ये अजमेर, अलवर, सिरोही, जयपुर एवं जोधपुर जिलों में पाये जाते हैं। ये कुल वन-क्षेत्र के 5 प्रतिशत भाग पर पाये जाते हैं।

    (3) उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वन : इन वनों में धौंकड़ा, खैर कत्था, तेंदू, बहेड़ा, आंवला व बांस आदि के वृक्ष अधिक होते हैं। ये वन अरावली पर्वतीय ढालों व पठारी क्षेत्रों में हैं।

    (4) उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन : उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वनों में कांटेदार वृक्ष, झाड़ियां एवं बरसाती घास उत्पन्न होती है। इनका प्रमुख क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान का थार रेगिस्तान है। ये कुल वनों के 5 प्रतिशत क्षेत्र में हैं। इन वनों में खेजड़ी, रोहिड़ा, कैर, खींप, कूमट, फोग, धामण, सेवण आदि वनस्पतियां प्रमुखता से पायी जाती हैं।

    (5) ढाक व पलाश वन : इन वनों में शिरीश, पीपल, महुआ, ढाक व पलाश के वृक्ष अधिक पाये जाते हैं। ये वन अलवर, राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़ एवं सिरोही जिलों में पाये जाते हैं।

    (6) उष्ण सदाबहार वन : इन वनों में शिरीष, जामुन, बांस, आम व केवड़़ा आदि के वृक्ष अधिक होते हैं। ये वन आबू (सिरोही) पर्वतीय क्षेत्र में मिलते हैं।

    (7) मिश्रित वन : इन वनों में सदाबहार वृक्ष और पतझड़ वाले वृक्ष सम्मिलित रूप से मिलते हैं। ये वन उदयपुर, सिरोही, बूंदी, कोटा, चित्तौड़गढ़ आदि जिलों में मिलते हैं।


    जिलेवार वन-क्षेत्र, वन सघनता तथा प्रति व्यक्ति वन-क्षेत्र

    (1.) राजस्थान में सर्वाधिक वन-क्षेत्र उदयुपर जिले में स्थित है जहाँ 4,587.42 वर्ग कि.मी. भूमि पर वन-क्षेत्र है। दूसरा नम्बर चित्तौड़गढ़ जिले का है जहाँ 2,766.62 वर्ग कि.मी. भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। तीसरा नम्बर बारां जिले का है जहाँ 2,239.32 वर्ग कि.मी. भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है।

    (2.) राजस्थान में सबसे कम वन-क्षेत्र चूरू जिले में है जहाँ केवल 71.22 वर्ग कि.मी. भूमि पर वन-क्षेत्र स्थित है। दूसरा नम्बर हनुमानगढ़ जिले का है जहाँ 239.46 वर्ग कि.मी. भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। तीसरा नम्बर नागौर जिले का है जहाँ केवल 240.93 वर्ग कि.मी. भूमि पर वन-क्षेत्र स्थित है।

    (3.) राजस्थान में सर्वाधिक वन सघनता उदयपुर जिले में है जहाँ जिले की 36.67 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। दूसरा नम्बर करौली जिले का है जहाँ जिले की 35.69 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। तीसरा नम्बर बारां जिले का है जहाँ जिले की 32.20 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। चौथा नम्बर सिरोही जिले का है जहाँ जिले की 31.91 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है।

    (4.) राजस्थान में न्यूनतम वन सघनता चूरू जिले में है जहाँ जिले की 0.2 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। दूसरा नम्बर जोधपुर जिले का है जहाँ जिले की 1.06 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। तीसरा नम्बर नागौर जिले का है जहाँ जिले की 1.36 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है। चौथा नम्बर जैसलमेर जिले का है जहाँ जिले की 1.51 प्रतिशत भूमि पर वन-क्षेत्र उपलब्ध है।

    (5.) प्रति व्यक्ति वन-क्षेत्र की सर्वाधिक उपलब्धता बारां जिले में है। दूसरा नम्बर सिरोही जिले का है। तीसरा नम्बर उदयुपर जिले का है।

    (6.) प्रति व्यक्ति वन-क्षेत्र की न्यूनतम उपलब्धता चूरू जिले में है। दूसरा नम्बर नागौर जिले का है।


    वनों से होने वाले लाभ

    प्रत्यक्ष लाभ : राजस्थान के वनों में स्थित सागवान, सालर, गूलर नीम, आम, बबूल, धोकड़ा आदि वृक्षों से इमारती एवं फर्नीचर बनाने की लकड़ी प्राप्त होती है। धौंकड़ा, खैर, खेजड़ा, बबूल, कैर व कीकर आदि से ईंधन व कोयला बनाने की लकड़ी प्राप्त होती है। बीड़ी बनाने के लिये तेंदू पत्ते भी बहुतायत में प्राप्त होते हैं। महुआ के पेड़ों से मदिरा बनायी जाती है। कत्थे के वृक्ष से प्राप्त कत्थे का उपयोग दवायें, रंग एवं पान मसाला बनाने में होता है। चमड़ा साफ करने में आंवल झाड़ी की छाल का उपयोग होता है। शहद, मोम, गोंद, खस, बांस, घास, मूंझ, जड़ी बूटियां आदि अनेक उपयोगी वस्तुएं राजस्थान के वनों से प्राप्त होती हैं और पशुओं के लिये घास एवं चारा मिलता है।

    अप्रत्यक्ष लाभ : वनों की उपस्थिति से वायुमंडल में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है तथा कार्बन डाई ऑक्साइड में कमी आती है जिसके कारण वायुमंडल का तापमान नियंत्रित होता है। वन्य पशुओं की संख्या में विस्तार होता है तथा पारिस्थतिकी संतुलन सुधरता है। बहुत बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होता है तथा पर्यटन स्थलों का विकास होता है।


    राजस्थान में वन विस्तार कार्यक्रम

    राजस्थान में वनारोपण कार्यक्रम

    राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार प्रदेश का 33.33 प्रतिशत क्षेत्र वनों के अधीन होना चाहिये। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये राजस्थान में वनों के संरक्षण एवं प्रसार हेतु वनारोपण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम पर 1950 से अब तक 740 करोड़ रुपये व्यय किये जा चुके हैं किंतु वृक्षों की अवैध कटाई जारी रहने से राजस्थान का वन-क्षेत्र लगातार घट रहा है। 1949-50 में राजस्थान का वन-क्षेत्र 13 प्रतिशत था जो वर्तमान में घटकर 9.54 प्रतिशत रह गया है। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में 2009-11 की अवधि में वनाच्छादित क्षेत्र में 51 वर्ग कि.मी. की वृद्धि हुई।

    अरावली वृक्षारोपण परियोजना

    जापान सरकार के सहयोग से 1992-93 में राजस्थान में अरावली वृक्षारोपण परियोजना आरंभ की गयी। इसके तहत वर्ष 1992 से 1997 की अवधि में अरावली की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण, एनीकटों का निर्माण तथा घास एवं मूंज लगायी जानी थी। यह योजना दो वर्षों के लिये बढ़ाकर 1999 में समाप्त की गयी। इस योजना के समाप्त होने पर भूसंवेदी उपग्रहों द्वारा राजस्थान में वन-क्षेत्रों में विस्तार के चित्र भेजे गये थे किंतु बाद में जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि वह हरियाली विदेशी बबूलों के विस्तार के कारण हुई थी न कि उपयोगी वृक्षों के पनपने के कारण।


    वन सुरक्षा

    राज्य में संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत 5,372 ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंध समितियां, वन विभाग की देखरेख में 8 लाख हैक्टेयर वन-क्षेत्र की सुरक्षा एवं प्रबंधन का कार्य कर रही हैं। अभयारण्यों एवं राष्ट्रीय उद्यानों के निकट वन्यजीव प्रबंधन में स्थानीय लोगों के सहयोग से ईको डवलपमेंट कमेटियां गठित की गई हैं। ग्रामीण युवकों में पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिये युवकों को मानदेय पर वनमित्र के रूप में लगाया जा रहा है।


    कृषि वानिकी

    जब कृषि के साथ वृक्षारोपण किया जाता है तो उसे कृषि वानिकी कहते हैं। खेतों की मेंढ़ तथा खेतों के बीच में आये हुए खड्डे, असमतल भूमि तथा पथरीली भूमि का उपयोग वृक्षारोपण के लिये किया जाता है। इसका लाभ यह होता है कि अकाल की स्थिति में भी किसान को कुछ आय प्राप्त हो जाती है तथा जब वृक्ष विकसित हो जाते हैं तो लकड़ी बेचकर लाभ अर्जित किया जा सकता है। शुष्क क्षेत्रों में बाजरे आदि के साथ खेजड़ी के वृक्ष लगाने से खाद की भी कम आवश्यकता होती है क्योंकि खेजड़ी की जड़ों में नाईट्रोजन स्थिरिकरण करने वाले बैक्टीरिया होते हैं जो कि भूमि में नाईट्रोजन की मात्रा बढ़ाते हैं।


    सामाजिक वानिकी

    सामाजिक वानिकी से अभिप्राय वन विकास की उस प्रणाली से है जिसके द्वारा समुदाय की आर्थिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर वृक्षारोपण के माध्यम से ईंधन, इमारती लकड़ी, चारे की आपूर्ति, वायु अपरदन से कृषि भूमि का बचाव एवं मनोरंजन स्थलों का विकास किया जाता है। इसके अंतर्गत बंजर भूमि, परती भूमि, नहरों, सड़कों एवं रेल लाइनों के दोनों ओर खाली भूमि में वृक्षारोपण किया जाता है।


    राजस्थान में वन विकास हेतु स्थापित संस्थाएँ

    आफरी : मरूक्षेत्र अनुसंधान संस्थान (एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट) का कार्य मरूस्थलीय क्षेत्रों में वन विकास करना है। संस्था ने मरु क्षेत्र में वन विकास के लिये अनेक किस्म के वृक्षों की पहचान की है। भारत सरकार द्वारा स्थापित यह संस्था जोधपुर में स्थित है।

    काजरी : केंद्रीय मरु अनुसंधान संस्थान (सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट) का मुख्यालय जोधपुर में स्थित है। इसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा 1952 में मरुस्थल वनारोपण शोध केंद्र के रूप में हुई। ई.1957 में इसका नाम केंद्रीय मरु अनुसंधान संस्थान कर दिया गया। इसके अंग्रेजी नाम को संक्षिप्त करके काजरी कहा जाता है। यह संस्था मरुस्थल में पेड़, पौधे, चारागाह, पशु भूमि, मृदा तथा जल संरक्षण का कार्य करती है। इस संस्था ने बेर, आंवला, खेजड़ी, जोजोबा, मरुस्थलीय झाड़ियों, घासों पर अच्छा कार्य किया है।


    राज्य में दिये जाने वाले वानिकी पुरस्कार

    राज्य में वन संवर्धन तथा वानिकी के क्षेत्र में 14 राज्य स्तरीय और 13 जिला स्तरीय वार्षिक पुरस्कार दिये जाते हैं।

    अमृतादेवी पुरस्कार : 1994 में आरंभ किया गया यह पुरस्कार वृक्षों का विनाश रोकने तथा उनका संरक्षण-संवर्धन करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था को प्रतिवर्ष दिया जाता है। यह प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय पुरस्कार है।

    वानिकी पण्डित पुरस्कार : किसी जिले में समग्र रूप से वृक्षारोपण करने, वनों का विकास करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था को दिया जाने वाला यह राज्य स्तरीय पुरस्कार है।

    वानिकी लेखन एवं अनुसंधान पुरस्कार : वानिकी क्षेत्र में मौलिक सृजनात्मक एवं अनुसंधान परक कार्य जैसे पुस्तक, लेख, शोधपत्र आदि लिखने के लिये यह राज्य स्तरीय पुरस्कार दिया जाता है।

    इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार : यह राष्ट्रीय सम्मान, वृक्षारोपण तथा परती भूमि विकास के अन्य पक्षों में उत्कृष्ट योगदान के लिये दिया जाता है।

    वन प्रहरी पुरस्कार : यह पुरस्कार वनों में अवैध कटाई रोकने, अग्नि से वनों को नष्ट होने से बचाने, वन्य जीव जंतुओं की सुरक्षा आदि उल्लेखनीय सेवाओं के लिये दिया जाता है।

    महावृक्ष पुरस्कार : 1995 से प्रारंभ किया गया यह पुरस्कार प्राचीन एवं विशिष्ट प्रजातियों के वृक्षों की पहचान सुरक्षित करने के उद्देश्य से दिया जाता है।

    वन्य जीव सूचना पुरस्कार : वन्य जीवों का शिकार करने वालों की सूचना वन्य जीव संरक्षण विभाग के अधिकारियों को देने वाले व्यक्ति को यह पुरस्कार दिया जाता है।

    वन पालक पुरस्कार : वन विभाग में कार्यरत अधिकारियों एवं कार्मिकों को अच्छी सेवाओं के लिये दिये जाते हैं।

    वृक्ष वर्धक पुरस्कार : वन पालक पुरस्कार राज्य व जिला स्तर पर 6 श्रेणियों के अंतर्गत 12 पुरस्कार दिये जाते हैं।

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