Blogs Home / Blogs / /
  • युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - भूमिका

     20.05.2018
    युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - भूमिका

    जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को!

    श्री भैरोंसिंह शेखावत का नाम मैंने, जीवन में पहली बार पिताजी के मुख से सुना। वे वर्ष 1977 की गर्मियों के दिन थे और लूओं ने पूरे वातावरण को झकझोर रखा था। देश का राजनीतिक वातावरण भी उन दिनों बहुत गर्म था जिसकी चर्चा प्रायः पिताजी घर में किया करते थे। उस समय मैं 15 साल का बालक था। शाम के समय कार्यालय से लौटने के पश्चात् पिताजी ने कहा था कि कल भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। इस पर मैंने बाल सुलभ जिज्ञासा से पूछा था, ये कैसे आदमी हैं? पिताजी ने हँसकर जवाब दिया था- जोरदार। राजस्थान सौभाग्यशाली है कि उसे जुझारू व्यक्ति मुख्यमंत्री के रूप में मिला। उसी दिन मैंने पिताजी के मुँह से भैरोंसिंह शेखावत के संघर्षमय जीवन की कुछ बातें सुनीं।

    श्री भैरोंसिंह शेखावत को निकट से देखने का अवसर वर्ष 1992 में आया जब मेरा चयन राजस्थान सरकार में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में हुआ। उस समय राज्य में श्री भैरोंसिंह शेखावतजी की दूसरी सरकार चल रही थी। मैंने निदेशालय में अपनी ज्यॉइनिंग की तिथि 16 दिसम्बर 1992 चुनी थी, उन दिनों भी देश का राजनीतिक वातावरण हलचलों से भरा हुआ था। मेरे ज्यॉनिंग से ठीक एक दिन पहले भैरोंसिंह शेखावत सरकार बर्खास्त हो गई।

    16 दिसम्बर 1992 को जब मैंने शासन सचिवालय परिसर में स्थित सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में अपनी ज्यॉनिंग दी तो पूरे सचिवालय में एक विचित्र सा भययुक्त वातावरण था। पूरा परिसर सुरक्षाकर्मियों की सीटियों एवं तेजी से आ-जा रही गाड़ियों के साइरनों से गूंज रहा था जिसे सुनकर मन में भय उत्पन्न होता था। बाद में ज्ञात हुआ कि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है इसलिये राज्यपाल डॉ. एम. चेन्नारेड्डी आने वाले हैं। वे अनुशासन पसंद व्यक्ति हैं इसलिये आज चारों ओर सख्ती है। यदि कोई व्यक्ति सचिवालय परिसर की सड़क पर अथवा गलियारे में दिखाई देता है तो उसे हटाने के लिये सुरक्षा कर्मी सीटियां बजा रहे हैं।

    शाम होते-होते ज्ञात हुआ कि सचिवालय में स्थित मंत्रियों के कक्षों से मनों-टनों कागज निकालकर बाहर किये गये हैं। ये वे कागज थे जिनमें प्रदेश के सुदूर अंचलों में निवास करने वाले करोड़ों लोगों की इच्छायें, अभिलाषायें, सपने और मजबूरियां लिखी हुई थीं। इन कागजों पर कार्यवाहियां होनी शेष थीं किंतु सरकार के चले जाने से अब ये कागज किसी काम के नहीं रह गये थे। नई सरकार के समक्ष जनआकांक्षाओं को फिर से अभिव्यक्त होने के लिये नये कागज लिखे जाने होंगे।

    उस दिन पहली बार मुझे आभास हुआ कि एक मुख्यमंत्री जो पूरी सरकार चलाता है, एक व्यक्ति नहीं होता, जन आकांक्षाओं, अभिलाषाओं और करोड़ों लोगों के हृदयों में पलने वाले सपनों का केन्द्र बिंदु होता है। वह चारों ओर से समस्याओं से घिरा हुआ होता है। हजारों व्यक्ति उससे प्रत्यक्षतः जुड़े हुए होते हैं, लाखों हाथ सदैव उसकी तरफ कोई न कोई कागज लेकर मण्डरा रहे होते हैं, करोड़ों आंखें उसे आशा भरी दृष्टि से देख रही होती हैं और उसका अपना निजी जीवन कुछ नहीं होता, कुछ भी नहीं।

    मन में एक पीड़ा सी हुई। मुझे आशा थी कि इस नई नियुक्ति में मुझे श्री भैंरोंसिंह शेखावत को निकट से देखने और संभवतः उनके साथ काम करने का भी अवसर मिलेगा किंतु उनकी सरकार बर्खास्त हो चुकी थी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग चुका था। निदेशालय से मेरी नियुक्ति जालोर जिले में कर दी गई और मैं कुछ दिन बाद जालोर चला गया। ठीक एक साल बाद 4 दिसम्बर 1993 को श्री भैरोंसिंह शेखावत ने राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई। मन में फिर से आस जगी कि अब मैं उन्हें आंखों से देख सकूंगा। हो सकता है कि मुझे उनके पास काम करने का अवसर भी मिले।

    इस प्रकार पहली बार वर्ष 1994 में मुझे श्री भैरोंसिंह शेखावत को अपनी आंखों से देखने का अवसर मिला जब वे जालोर जिले के दौरे पर आये और मुझे जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में उनकी यात्रा की प्रेस कवरेज करने का अवसर मिला। श्री शेखावत को देखकर मेरे मन में सबसे पहले यह विचार आया- ये तो ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि पिताजी ने वर्ष 1997 में इनके बारे में बताया था। एकदम सरल, सहज।

    मैं जून 1997 तक जालोर जिले में पदस्थापति रहा। इस बीच श्री भैरोंसिंह शेखावत ने मुख्यमंत्री के रूप में जालोर जिले की कई यात्राएं कीं और मुझे उनकी मीडिया कवरेज का सौभाग्य मिला। उनकी वक्तृत्व शैली से मैं बहुत प्रभावित हुआ। लगता ही नहीं था कि उनकी बातों को समझने के लिये किसी को अपने दिमाग पर जरा भी जोर देने की आवश्यकता है। सरल शब्द, सुलझी हुई बात, संक्षिप्त वाक्य और चुटीला अंदाज। उनके भाषणों को प्रेस नोट के रूप में लिखने में मुझे कभी कोई कठिनाई या उलझन नहीं हुई।

    इसी दौरान वर्ष 1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के लिये आम चुनाव होने तय हुए। लोकसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने से पहले श्री भैरोंसिंह शेखावत जालोर जिले की यात्रा पर आये। इस दौरान उन्होंने आहोर से लेकर जालोर, बागरा, भीनमाल तथा सांचोर आदि क्षेत्रों का सड़क मार्ग से दौरा किया। मैं, मीडिया कवरेज के लिये मुख्यमंत्री के काफिले में साथ रहा। इस यात्रा में मैंने उनका जो रूप देखा, वह मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को चक्कर में डाल देने के लिये पर्याप्त था। उनकी पूरी यात्रा बिना किसी तड़क-भड़क के, बिना किसी आडम्बर के और बिना किसी शोर-शराबे के रही। पूरी यात्रा के दौरान सड़क के दोनों तरफ सैंकड़ों लोग खड़े हुए दिखाई देते थे। मुख्यमंत्री उन्हें देखकर अपनी गाड़ी रुकवाते, उनसे हाथ मिलाते और यदि कोई माला लेकर खड़ा होता तो उसके हाथ से माला पहनते। शेखावाटी युक्त मारवाड़ी में उससे कुछ बात करते जिसमें प्रायः उस व्यक्ति का नाम भी होता था। मुझे आश्चर्य होता, एक व्यक्ति आखिर कितने नाम स्मरण रख सकता है। कई लोगों से वे गुटखा मांगते, अपने हाथ के गुटखे को दूसरों के साथ बांटकर खाते और आगे चल देते।

    मुझे इस बात पर और भी आश्चर्य होता, जब वे लोगों से उनका नाम लेकर उनकी गाय-भैंस और खेती के बारे में पूछते। उसके लड़के का नाम लेकर उसके रोजगार के बारे में पूछते और बाई ससुराल में कैसी है, की भी जानकारी लेते। इन बातों में कई पुराने संदर्भ भी होते थे। इस यात्रा में पहली बार मेरी समझ में आया कि मुख्यमंत्री के चारों ओर ओर लाखों हाथ कागज लेकर ही नहीं खड़े रहते अपितु पूरे प्रदेश में गांव-गांव में उसके लाखों मित्र भी रहते हैं। उसके चाहने वाले होते हैं और उसके लिये मंगल कामना करने वाले भी होते हैं।

    ई.1997 में जालोर जिले में साक्षरता कार्यक्रम चला। इस मिशन के लिये भैरोंसिंह शेखावत व्यक्तिगत रूप से चिंतित रहते थे। जब जालोर जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के समक्ष अपनी परियोजना प्रस्तुत की तो मैं भी उस दल में सम्मिलित था जिसने इस परियोजना का निर्माण करवाया था और जिस दल ने इसका प्रस्तुतिकरण दिल्ली में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के समक्ष किया था। जब राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने इस परियोजना को स्वीकृति दी तो मुख्यमंत्री की प्रसन्नता का पारावार न था। जालोर जिले में इसकी लांचिंग के लिये मुख्यमंत्री स्वयं आये। जिला कलक्टर राजेश्वरसिंह ने जिला मुख्यालय पर इस कार्यक्रम की लांचिंग के लिये विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया। उस समय तक मेरा स्थानांतरण नागौर हो चुका था। इसलिये जिला कलक्टर ने मुझे कार्यक्रम का संचालन करने के लिये जालोर बुलाया।

    मेरी याददाश्त में श्री भैरोंसिंह शेखावत के लिये संचालित किया गया यह मेरा पहला और अंतिम कार्यक्रम था। कार्यक्रम बहुत भव्य था। पूरा जिला ही जैसे इसमें उमड़ पड़ा था। मेरे और जिला कलक्टर के बीच पहले से ही तय हो गया था कि कार्यक्रम किस तरह संचालित किया जायेगा, कौन-कौन बोलेंगे और कब क्या होगा। सब कुछ उसी अनुरूप चला और अंत में मुख्यमंत्री बोलने के लिये उठ खड़े हुए। वे कोई चार-पांच मिनट बोले होंगे कि उनके माइक ने काम करना बंद कर दिया। बिजली आ रही थी किंतु माइक बंद हो गया था। किसी की कुछ समझ में नहीं आया। अब तक सब कुछ ठीक था और अब सब कुछ गुड़-गोबर होने जा रहा था। मेरा माइक काम कर रहा था। तीन-चार मिनट तो यह देखने में बीत गये कि माइक कहां से खराब हुआ है।

    किसी भी मुख्यमंत्री की आम सभा के संचालन का यह मेरा पहला अवसर था फिर भी मैंने धैर्य से काम लिया और यह सोचकर कि जब तक माइक नहीं आ जाता, मैंने जालोर के साक्षरता मिशन के बारे में बोलना आरंभ किया। अब तक वह हुआ था जो मेरे और जिला कलक्टर के बीच तय हुआ था किंतु अब वह होने जा रहा था जो तय नहीं हुआ था। मुख्यमंत्री के भाषण के बीच में बोलना बहुत ही अशोभनीय और अटपटा लगने वाली बात थी किंतु मैंने परिस्थिति को देखते हुए यह दुस्साहस किया। माइक की व्यवस्था होने में लगभग तेरह-चौदह मिनट लग गये। इस बीच मैं जालोर के साक्षरता मिशन की भावी कार्ययोजना के सम्बन्ध में बोलता रहा। इस बीच जिला कलक्टर से मेरी दृष्टि दो-तीन बार मिली किंतु उन्होंने मेरे लिये कोई संकेत नहीं किया। मैं बोलता रहा और जब माइक ठीक हुआ तो मुख्यमंत्री ने पहला वाक्य इस प्रकार बोला- छोरो घणो जोरदार बोलै। मेरी सांस में सांस आई, अब जाकर मैं आश्वस्त हुआ कि इस दुस्साहस के लिये मुझे कोई कुछ कहने वाला नहीं है।

    1998 के विधानसभा आम चुनावों से पहले मैं नागौर जिले में नियुक्त था। आचार संहिता लगने से पहले श्री भैरोंसिंह शेखावत के जिला मुख्यालय नागौर सहित जिले के कई कस्बों में कई दौरे हुए। इस बार भी मैंने उनकी यात्राओं का मीडिया कवरेज किया।

    1 अक्टूबर 1998 को श्री भैरोंसिंह शेखावत दो दिवसीय यात्रा पर नागौर आये। दिन भर कई कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के बाद शाम के समय वे नागौर में चतुर्मास कर रहे एक जैन साधु के उपासरे पर गये। मैं भी उनके साथ गया। लगभग एक घण्टे वे जैन साधु के सानिध्य में रहे। उस पूरे समय में उस कक्ष में केवल तीन ही व्यक्ति थे- श्री भैरोंसिंह शेखावत, जैन साधु और मैं। इस अवधि में उन दोनों के मध्य जिन विषयों पर वार्तालाप हुआ, उसे सुनकर एक और नई बात समझ में आई। मुख्यमंत्री केवल हजारों लाखों, करोड़ों व्यक्तियों के लिये ही नहीं होता, वह अपने लिये भी होता है, उसे आत्मा, परमात्मा, इहलोक और परलोक की चिंताएं भी सताती हैं।

    अगले दिन 2 अक्टूबर था। मुख्यमंत्री महात्मा गांधी की प्रतिमा को माल्यार्पण करने गांधी चौक गये। मैं, भी जिला प्रशासन के अन्य अधिकारियों के साथ वहां उपस्थित था। तब तक बहुत से लोगों को ज्ञात हो चुका था कि भैरोंसिंहजी रात्रि को नागौर में ही ठहरे हैं और प्रातःकाल गांधी चौक आयेंगे। उस समय प्रातः के सात ही बजे थे। फिर भी पूरा गांधी चौक लोगों से ठसाठस भर गया। यहां भी वही सब हुआ। मुख्यमंत्री ने किसी से लेकर गुटखा खाया, कुछ लोगों के बच्चों के नाम लेकर उनके बारे में पूछा और आठ बजते-बजते उनका काफिला रवाना हो गया।

    वर्ष 2007 में उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए वे महंत किशनारामजी महाराज की बरसी पर राजाराम आश्रम शिकारपुरा आये। उस समय मैं जोधपुर डिस्कॉम में जनसम्पर्क अधिकारी था किंतु उनकी इस यात्रा के कवरेज के लिये मुझे लगाया गया। उस दिन शिकारपुरा में लाखों व्यक्ति उपस्थित थे। जिस तरफ आंखें दौड़ाओ, आदमी ही आदमी, औरतें ही औरतें। आश्रम परिसर में तिल धरने को स्थान नहीं। दिन में लगभग साढ़े दस बजे उपराष्ट्रपति आये। जब वे मुख्यमंदिर में दर्शनों के लिये गये तो चारों ओर का स्थान लकड़ी की बल्लियां लगाकर सुरक्षित कर दिया गया था और उन बल्लियों को घेरकर पुलिसकर्मी खड़े थे। आम आदमी की हिम्मत नहीं होती थी कि उस सुरक्षा घेरे को तोड़कर उन तक पहुंच सके किंतु जब वे आये तो लाखों लोग मुख्यमंदिर की तरफ अनायास ही दौड़ पड़े। वे नजर भरकर अपने नेता को देखना चाहते थे। ऐसा सम्मोहन भरा दृश्य मैंने अपने जीवन में शायद ही कभी देखा होगा। यह सम्मोहन तभी भंग हुआ जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आश्रम में प्रवेश किया।

    मैंने अंतिम बार श्री भैरोंसिंह शेखावत की नागाणा मंदिर की यात्रा का कवरेज वर्ष 2007 में किया। तब मैं बाड़मेर जिले में पदस्थापित था। इस बार वे उपराष्ट्रपति थे। संयोग की बात थी, इस बार भी राज्य का राजनीतिक वातावरण गर्म था। वे उपराष्ट्रपति थे, राजनीतिक बातों से ऊपर उठ चुके थे फिर भी मिट्टी की तासीर नहीं जाती, शब्दभेदी बाण चलाना जानते थे। वे हमेशा ही ऐसा कुछ करते थे जिससे सांप भी मरता था और लाठी भी नहीं टूटती थी। बाड़मेर जिले में भी मंच से उन्होंने ऐसे बहुत से लोगों के नाम लिये जो उनके सामने भीड़ में बैठे हुए थे। कुछ लोगों के नाम लेकर उन्होंने बाड़मेर जिले की अपनी पुरानी यात्राओं में हुई बातों का भी उल्लेख किया। इस भाषण का समां ऐसा था कि सभा समाप्त होने के बाद हर व्यक्ति को यह लगा कि वह श्री भैरोंसिंह शेखावत से व्यक्तिशः बात करके जा रहा है। संतुष्ट और अभिभूत! संभवतः अंतिम बार मैंने उन्हें जयपुर में गोविंददेवजी के मंदिर में देखा। वे पूरे लवाजमे के साथ गोविंददेवजी के मंदिर में आये किंतु बिना कोई सनसनी उत्पन्न किये।

    15 मई 2010 को उनके निधन का दुःखद समाचार मिला। अगले दिन के समाचार पत्रों में बड़े-बड़े समाचार और चित्र प्रकाशित हुए। एक दिन पिताजी ने अखबार उठाकर कहा- भैरोंसिंहजी को श्रद्धांजलि देनी चाहिये। उन दिनों मैं, दैनिक नवज्योति में तीसरी आँख शीर्षक से एक स्तम्भ लिखा करता था पश्चिमी राजस्थान में लोगों की जिह्वा पर चढ़ा हुआ था। उसी स्तम्भ में मैंने 18 मई 2010 को एक लेख लिखा- कहाँ गई दुनिया की वह सादगी, सरलता एवं भोलापन ! यह मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि थी। मैं उन्हें शाब्दिक श्रद्धांजलि के अतिरिक्त और दे ही क्या सकता था!

    मेरा उन्हें शत-शत प्रणाम है। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर के शब्दों में- जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को। वे पुनीत अनल ही तो थे!

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

  • जय हो जग में "/> जय हो जग में "> जय हो जग में ">
    Share On Social Media:
  • युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

     24.05.2018
    युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत

    धनतेरस को प्रकट हुई ज्योति

    श्री भैरोंसिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर 1923 को धनतेरस के दिन, राजपूताने की जयपुर रियासत के सीकर ठिकाणे के खाचरियावास गांव में एक सामान्य राजपूत कृषक परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम देवीसिंह शेखावत तथा माता का नाम बन्नेकंवर था। भैरोंसिंह अपने माता-पिता की प्रथम संतान थे। उनके बाद तीन छोटे भाई तथा चार बहिनों का जन्म हुआ। भैरोंसिंह का ननिहाल चूरू जिले के सहनाली बड़ी गांव में था।

    तीस किलोमीटर पैदल

    भैरोंसिंह के पिता देवीसिंह एक आदर्श अध्यापक थे। रूढ़िवाद के विरोधी और समाज में समता के पक्षधर देवीसिंह ने बुराइयों के समक्ष कभी सिर नहीं झुकाया। इसी आदत के कारण एक बार वे अपना गांव छोड़कर सवाईमाधोपुर जिले के बीछीदाना गांव में रहने लगे। वहीं पर उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। भैरोंसिंह को सुंदर हस्तलेख और अनुशासन पिता से विरासत में मिले। बीछीदाना में पढ़ते हुए जब कुछ साल हो गये तो उन्हें जोबनेर के एंग्लोवैदिक स्कूल में पढ़ने भेजा गया। उस समय मोटरें नहीं थीं। कई बार वे जोबनेर से खाचरियावास तक की 30 किलोमीटर की दूरी वे पैदल ही पार करते थे। हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ई.1941 में उन्हें जयपुर के महाराजा कॉलेज के प्रथम वर्ष में भर्ती करवाया गया। कॉलेज की शिक्षा के दौरान उन्होंने नाटकों में भी भाग लिया।

    पीपल के पेड़ के नीचे बारात

    3 जुलाई 1941 को उनका विवाह जोधपुर रियासत के बुचकला गांव की सूरजकंवर से कर दिया गया। उनकी बारात जोबनेर से पीपाड़रोड तक रेलगाड़ी से पहुंची तथा वहां से बैलगाड़ियों में बैठकर बुचकला पहुंची। बुचकला में उनकी बारात अडूणिया बेरा के पीपल के नीचे दो दिन ठहरी। भैरोंसिंह के ससुराल में ससुर कल्याणसिंह राठौड़, सास सदाकंवर, पांच साले तथा एक साली थी। भैरोंसिंह की पत्नी सूरजकंवर अपने पीहर में सबसे छोटी थीं।

    नाडी का पानी पिया

    भैरोंसिंह अपने विवाह के पश्चात् पीपाड़ रोड से पैदल ही अपने ससुराल बुचकला पहुंचे थे। बीच मार्ग में जब उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने एक नाडी में अपने हाथों से पानी पिया। इससे उन्हें नारू रोग हो गया। इस रोग का निशान जीवन भर उनके शरीर पर बना रहा। ई.2004 में भैरोंसिंह जब उपराष्ट्रपति थे, तब वे पुनः बुचकला गये और वहां आम सभा में उन्होंने स्वयं यह किस्सा सुनाया।

    सिर से पिता का साया उठा

    ई.1942 में देवीसिंह शेखावत का निधन हो गया। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मां बन्ने कंवर ने निभाई। उनकी माँ ने बहुत कठिन परिश्रम करके परिवार को चलाया। भैरोंसिंह स्वयं इस बात को कितनी ही बार दोहराते थे कि उनकी माता किस तरह चक्की चलाती थी। किंतु भैरोंसिंह की पढ़ाई आगे नहीं चल पाई। परिवार के निर्वहन के लिये भैरोंसिंह ने सीकर ठिकाणे के पुलिस विभाग में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर की नौकरी कर ली किंतु पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आई। उनका मन राजनीति की ओर झुकने लगा।

    लगान वसूलने वालों ने बनाया उन्हें भैरोंसिंह

    एक बार उनके गांव में ड्डियों का दल सारे खेतों को चट कर गया। इसके उपरांत भी सरकारी हरकारे लगान लेने पहुंच गये। इस लगान के विरोध की भावना से एक नया भैरोंसिंह निकलकर सामने आया। उनकी मां कहती थी कि एक पण्डित ने उन्हें बताया था कि भैरोंसिंह गांव और परिवार का नाम रोशन करेगा। ई.1952 में विधायक बनने से लेकर अपने अंतिम समय तक उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था।

    बिशनसिंह के कहने से मिला टिकट

    1952 के प्रथम आम चुनावों में जनसंघ को दाता रामगढ़ से कोई उपयुक्त प्रत्याशी नहीं मिल रहा था। तब बिशनसिंह शेखावत ने लालकृष्ण आडवानी को सुझाव दिया कि मेरे एक भाई भैरोंसिंह शेखावत पुलिस में हैं, आप उन्हें टिकट दे दें। इस पर उन्हें विधायक का टिकट दिया गया।

    सूरजकंवर से लिये दस रुपये

    चुनाव लड़ने के लिये सीकर जाना आवश्यक था और सीकर जाने के लिये जेब में रुपये होने आवश्यक थे किंतु मनमौजी भैरोंसिंह की जेब में कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपनी पत्नी से दस रुपये मांगे। उदारमना पत्नी ने उनकी मांग पूरी की और भैरोंसिंह दस रुपये लेकर सीकर आ गये। इसके बाद उनका जनसंघ से जुड़ाव हुआ। उन्हें दीपक चुनाव चिह्न के साथ जनसंघ का टिकट मिला और वे 2,833 वोटों से जीत हासिल करके राजस्थान की प्रथम विधानसभा के सदस्य बन गये।

    जागीरदारी प्रथा उन्मूलन का समर्थन

    सितम्बर 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ की स्थापना कर चुके थे। जनसंघ की शाखाएं गांवों एवं पंचायतों तक स्थापित करने में जागीरदारों ने अच्छा योगदान दिया। उन्हें आशा थी कि जागीरदारी प्रथा जारी रखवाने में जनसंघ से सहायता मिलेगी। राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में जागीदारों की सहायता से जनसंघ ने 50 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे। उनमें से 30 की जमानतें जब्त हो गईं। भैरोंसिंह सहित जनसंघ के केवल आठ विधायक जीते जिनमें से अधिकतर जागीरदार ही थे। राजस्थान की प्रथम निर्वाचित सरकार ने जागीरदारी उन्मूलन का कार्य आरंभ किया तो जनसंघ के विधायक इसके विरोध में खड़े हो गये किंतु भैरोंसिंह शेखावत तथा जगतसिंह झाला ने जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का समर्थन किया। पार्टी के छः विधायकों ने जो कि स्वयं जागीरदार थे, भैरोंसिंह को जनसंघ से निकलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। इस पर भैरोंसिंह शेखवात दिल्ली जाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा दीनदयाल उपाध्याय से मिले। दोनों नेता भैरोंसिंह के तर्कों से सहमत हुए और जागीरदार विधायकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई।

    नमस्ते सदा वत्सले

    भारत माता के प्रति उनकी निष्ठा, भक्ति और समर्पण अटूट था। जब 1952 में वे जनसंघ से विधायक बने तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर उनका झुकाव हुआ। वे प्रायः संघ के कार्यक्रमों में संघ का गणवेश धारण करके जाते थे। सदा वत्सला भारत माता के प्रति उनका यह नमन सदैव बना रहा।

    लगातार चार बार विधायक बने

    वर्ष 1952 में दांता रामगढ़ विधान सभा सीट जीतने के बाद भैरोंसिंह शेखावत वर्ष 1957 में श्रीमाधोपुर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। 1962 और 1967 में वे जयुपर की किशनपोल सीट से विधायक चुने गये। इस प्रकार वे अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही चार बार लगातार विधायक बने।

    गांधीनगर सीट से हारे

    1972 के विधानसभा आम चुनावों में भैरोंसिंह शेखावत ने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने कांग्रेस के जनार्दन सिंह गहलोत खड़े हुए। चुनाव प्रचार के दौरा भैरोंसिंह शेखावत वोट मांगने के लिये जनार्दनसिंह के माता-पिता के घर भी गये और उनसे अपने लिये वोट मांगा। एक बार प्रचार के दौरान दोनों प्रत्याशी आमने-सामने हो गये। इस पर भैरोंसिंह शेखावत ने जनार्दनसिंह से सबके सामने कह दिया कि तुम जीत रहे हो। ऐसा ही हुआ। भैरोंसिंह यह चुनाव हार गये।

    बाड़मेर सीट से हारे

    गांधीनगर सीट से चुनाव हारने के बाद भैरोंसिंह शेखावत ने बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा किंतु इस चुनाव में भी उन्हें कांग्रेस के अमृत नाहटा से पराजय का सामना करना पड़ा।

    राज्यसभा में

    दो बार लगातार विधान सभा चुनावों में मिली पराजय किसी के लिये भी बड़ा झटका हो सकती थी किंतु वर्ष 1974 में मध्यप्रदेश जनसंघ ने भैरोंसिंह शेखावत को राज्यसभा में मनोनीत कर दिया और वे 1974 से 1977 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

    पौने दो साल जेल में

    ई.1975 में जब देश में आपात् काल लगा तो जून 1975 से मार्च 1977 तक भैरोंसिंह शेखावत मीसा के अंतर्गत जेल में बंद रहे।

    पहली बार मुख्यमंत्री

    आपात्काल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में देश में जनता पार्टी का गठन हुआ। इस नई पार्टी में जनसंघ का भी विलय हो गया। भैरोंसिंह भी जनता पार्टी में सम्मिलित हो गये। उसी वर्ष राजस्थान में विधानसभा के लिये मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें जनता पार्टी को 200 में से 150 स्थान प्राप्त हुए। उस समय बहुत से सदस्य डूंगरपुर के पूर्व महारावल लक्ष्मणसिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जो कि उच्च कोटि के वक्ता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे किंतु जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व भैरोंसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिये जनता पार्टी के मास्टर आदित्येन्द्र तथा भैरोंसिंह शेखावत के बीच मुकाबला हुआ जिसमें शेखावत की जीत हुई और उन्होंने राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी। शेखावत उस समय मध्यप्रदेश से राज्यसभा के सदस्य थे। 22 जून 19977 को चौपन वर्ष की आयु में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली इस कारण उन्हें राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देनी पड़ी।

    पहला मंत्रिमण्डल

    27 जून 1977 को शेखावत सरकार में मास्टर आदित्येन्द्र, प्रो. केदार नाथ, ललित किशोर चतुर्वेदी, सम्पत राम तथा त्रिलोकचंद जैन को कैबीनेट मंत्री, कैलाश मेघवाल, विज्ञान मोदी, महबूब अली और विद्या पाठक को राज्य मंत्री बनाया गया।

    छबड़ा से चुने गये

    शेखावत ने राज्य सभा से त्यागपत्र देकर 18 अक्टूबर 1977 को कोटा जिले के छबड़ा विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा तथा विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की।

    पहली सरकार का विस्तार

    7 फरवरी 1978 को शेखावत सरकार का विस्तार किया गया। सूर्यनारायण चौधरी, भंवरलाल शर्मा, जयनारायण पूनिया, दिग्विजय सिंह व पुरुषोत्तम मंत्री को कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। कैलाश मेघवाल को भी कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। लाल चंद डूडी तथा नन्दलाल मीणा को राज्यमंत्री बनाया गया। जुलाई 1978 में केन्द्र में मोरारजी सरकार गिर गयी और चरणसिंह सरकार का जन्म हुआ। इस कारण राजस्थान में लालचंद डूडी तथा विज्ञान मोदी ने 8 जुलाई 1978 को भैरोंसिंह सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 5 नवम्बर 1978 को शेखावत मंत्रिमण्डल का तीसरा विस्तार किया गया। माणकचंद सुराणा, कल्याणसिंह कालवी, डॉ. हरिसिंह और बिरदमल सिंघवी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा हरिसिंह यादव और भैरवलाल काला बादल को राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया। 18 मई 1979 को मास्टर आदित्येन्द्र, 21 जुलाई को प्रो. केदार नाथ और 2 अगस्त को डॉ. हरिसिंह ने शेखावत सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 20 दिसम्बर 1979 को शिवचरण सिंह गुर्जर को सरकार में कैबीनेट मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया।

    कर्मचारियों को वापस नौकरी में लिया

    आपात्काल में बहुत से कर्मचारियों को राजकीय सेवा से निकला दिया गया था। भैरोंसिंह शेखावत अभावों की मार को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने आपात काल में निकाल गये समस्त कर्मचारियों को फिर से सेवा में रख लिया और जितने समय वे बंदी रहे, उस काल के समस्त वित्तीय लाभ भी उन्हें दे दिये। आपात् काल के बाद प्रमुख लोग तो जेलों से बाहर आ गये किंतु बहुत से सामान्य जन अब भी जेलों में बंद थे। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने उन सबको भी जेल से बाहर निकाला।

    जस्टिस कानसिंह परिहार आयोग का गठन

    आपात् काल में कुछ सरकारी कर्मचारियों ने जनता के साथ ज्यादतियां कीं। उनका प्रतिकार करने के लिये भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कानसिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग के पास शिकायतों के ढेर लग गये। ये आवेदन आपातकाल में जबरन नसबंदी करने, जबरन सेवानिवृत्ति करने, अकारण बंदी बनाने तथा अतिक्रमण नाम देकर वैध निर्माणों को तोड़ने से सम्बन्धित थे। जस्टिस परिहार ने कड़ी मेहनत करके इन शिकायतों का वर्गीकरण किया तथा उनके सम्बन्ध में पांच सौ प्रतिवेदन तैयार किये। इनमें से कुछ प्रतिवेदनों पर ही सरकार कार्यवाही कर सकी। शेष पर कार्यवाही होने से पहले ही राज्य में पुनः राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

    बाण्या की नौकरी कर ले

    मुख्यमंत्री बनने के बाद भैरोंसिंह शेखावत को प्रायः सचिवालय में बैठकर देर रात तक काम करना पड़ता था। उनकी माँ को यह समझ में नहीं आया कि बेटे ने कौनसी नौकरी कर ली है। न तो समय पर घर आता है और न समय पर खाना खाता है। एक दिन मां से रहा नहीं गया और अपने मुख्यमंत्री पुत्र से बोली- बेटा इसी कुण सी नौकरी कर ली, जो खाबा को पतो न सोबा को। तू तो आ नौकरी छोड, कोई बाण्या की नौकरी कर ले।

    अपने विरोध के लिये दी गई पार्टी में पहुंचे

    एक बार जनार्दनसिंह गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के विरोध में कार्यवाही करने के लिये अपने घर पर कुछ नेताओं की पार्टी रखी। इसमें भैरोंसिंह शेखावत मंत्रिमण्डल के कुछ कैबीनेट मंत्री और विधायक भी सम्मिलित हुए। यह बात भैरोंसिंह शेखावत को ज्ञात हो गई। इस पर शेखावत ने उन्हें फोन करके उलाहना दिया कि मुझे भोज में क्यों नहीं बुलाया। मैं आ रहा हूँ। आधे घण्टे में ही शेखावत, जनार्दनसिंह के घर पहुंच गये। जनार्दनसिंह की सारी योजना पर पानी फिर गया।

    उन्होंने निर्धनता का दंश स्वयं झेला था

    भैरोंसिंह शेखावत ने स्वयं निर्धनता का दंश झेला था। निर्धन के उत्थान के प्रति उनके मन में सदैव ललक रहती थी। वे राजस्थान मंक आदर्श गांवों की स्थापना करना चाहते थे। जब वे उपराष्ट्रपति बने तो प्रायः अपने भाषणों में एक बात कहा करते थे कि गरीबों को लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में स्थापित कर, देश के संसाधनों पर उनका सर्वोपरि अधिकार स्थापित किया जाना चाहिये।

    अंत्योदय योजना के जनक

    भैरोंसिंह शेखावत गरीबों के सम्मानपूर्ण जीवन के पक्षधर थे। इसके लिये उन्होंने अंत्योदय योजना बनाई और उसे सर्वप्रथम राजस्थान में ही लागू किया। इस योजना के आरंभिक प्रावधानों में प्रत्येक गांव से सबसे गरीब पांच परिवारों को चयन करना, उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों यथा पशुपालन, कुटीर उद्योग, ऊँटगाड़ा आदि के लिये बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाना आदि सम्मिलित थे। बाद में यह योजना पूरे देश में लागू हुई और आगे चलकर एकीकृत ग्रामीण विकास योजना का मुख्य आधार बनी। इस योजना के सम्बन्ध में उनका कहना था- जैसे शरीर के एक अंग में विकृति आने से पूरे शरीर पर असर पड़ता है, इसी तरह समाज में कहीं भी विकृति आने से लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। इस योजना का अंत्योदय योजना ही सफल प्रयोग है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस योजना की प्रशंसा की। आज भी यह योजना भारत सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में चला रही है।

    भारत के रॉक्फेलर

    अंत्योदय योजना इतनी प्रसिद्ध हुई कि विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैक्नमारा ने इस योजना की सराहना करते हुए भैरोंसिंह को भारत का रॉक्फेलर कहा।

    विश्व बैंक भी सहायता के लिये आगे आया

    राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते भैरोंसिंह शेखावत ने अपना गांव - अपना काम योजना एवं काम के बदले अनाज योजना आरंभ कीं। इन योजनाओं को गरीबी उन्मूलन के लिये अत्यंत उपयोगी माना गया। कुछ समय बाद केन्द्र सरकार के निर्देश पर अन्त्योदय योजना को काम के बदले अनाज योजना में बदल दिया गया। इस योजना में राजस्थान ने अन्य समस्त राज्यों की अपेक्षा सर्वाधिक कार्य किया तथा 1,80,000 टन अनाज उठाया। इस कारण विश्व बैंक भी इन योजनाओं के संचालन के लिये राज्य सरकार की सहायता करने के लिये आगे आया।

    पंचायतों को काम करने के अधिकार दिये

    उस समय तक पंचायतें कवल पांच सौ रुपये तक की योजनाएं ही हाथ में ले सकती थीं किंतु भैरोंसिंह शेखावत की पहली सरकार ने इस सीमा को पाचास हजार रुपये कर दिया तथा प्रत्येक पंचायत समिति के लिये निर्माण कार्यों की सीमा दस लाख रुपये कर दी।

    भारतीय जनता पार्टी में

    वर्ष 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इस प्रकार वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे।

    राज्य में राष्ट्रपति शासन

    जनवरी 1980 में केन्द्र में कांग्रेस (इ) सरकार का निर्माण हुआ जिसने 17 फरवरी 1980 को राज्य की शेखावत सरकार की प्रथम सरकार को बर्खास्त करके विधान सभा को भंग कर दिया। राज्य मं। तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने अपनी पहली पारी में 2 वर्ष 8 महीने कार्य किया।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

    1980 के विधानसभा चुनावों में श्री भैरोंसिंह शेखावत ने छबड़ा से दुबारा चुनाव लड़ा और वे विजयी रहे किंतु उनकी पार्टी चुनाव हार गई तथा कांग्रेस की सरकार बनी। भैरोंसिंह शेखावत भापजा विधायक दल के नेता चुने गये तथा नेता प्रतिपक्ष बने। पूरे पांच साल तक वे इस पद पर बने रहे।

    दुबारा नेता प्रतिपक्ष

    1985 में आठवीं राजस्थान विधान सभा में भी कांग्रेस की सरकार बनी। इस विधानसभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने निंबाहेड़ा तथा अजमेर विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और वे दोनों ही सीटों पर विजयी रहे। इस विधानसभा में भी भैरोंसिंह शेखावत नेता प्रतिपक्ष के पद पर कार्य करते रहे।

    सती प्रथा का प्रबल विरोध

    4 सितम्बर 1987 को सीकर जिले के दिवराला गांव में रूपकंवर सती काण्ड हुआ। देश भर में इसकी तीव्र निंदा हुई। उस समय श्री हरिदेव जोशी राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने के लिये कानून बनाया। 2 नवम्बर 1987 को राजस्थान विधान सभा में भैरोंसिंह शेखावत ने इस प्रथा का प्रबल विरोध किया भैरोंसिंह शेखावत ने विगत 150 वर्षों में राज्य में सती हुई स्त्रियों के आंकड़े एकत्रित किये तथा यह सिद्ध कर दिया कि यह एक भ्रम है कि सती प्रथा राजपूतों में प्रचलित है। विगत 150 वर्षों में अन्य जातियों में राजपूतों की स्त्रियों से भी अधिक स्त्रियां सती हुई हैं। उनका तर्क था कि इस कुरीति को जड़ से नष्ट करने के लिये प्रभावी उपाय होने चाहिये।

    भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार

    वर्ष 1990 में राजस्थान में नवम् विधानसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को 85, जनता दल अविभाजित को 54 तथा कांग्रेस (इ) को 50 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। भाकपा का एक प्रत्याशी जीता। निर्दलियों को 9 स्थानों पर विजय मिली। भाजपा के प्रत्याशी के रूप में भैरोंसिंह शेखावत ने दो सीटों- छबड़ा और धौलपुर से चुनाव लड़ा और दोनों ही स्थानों से विजयी रहे। इस कारण भाजपा की झोली में केवल 84 विधायक रह गये तथा किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। भाजपा ने जनता दल (अविभाजित) से सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया जो कि स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 4 मार्च 1990 को भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनायी।

    शेखावत के साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा व ललित किशोर चतुर्वेदी ने और जनता दल के नत्थीसिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 14 मार्च 1990 को भाजपा के कृष्ण कुमार गोयल, चतुर्भुज वर्मा, विजयसिंह झाला, रामकिशोर मीणा तथा पुष्पा जैन ने और जनता दल के दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान एवं सुमित्रासिंह ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। भाजपा के हरलाल सिंह खर्रा, रमजान खां, कालूलाल गुर्जर, मोहन मेघवाल, जीवराज कटारा, कुंदनलाल मिगलानी, चुन्नीलाल गरासिया तथा जनता दल के फतहसिंह ने राज्यमंत्री पद की शपथ ली। 16 मार्च 1990 को हरिशंकर भाभड़ा को विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। 5 जुलाई 1990 को जनता दल के यदुनाथसिंह सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुने गये। बाद में 19 मार्च 1991 को यदुनाथसिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया एवं भाजपा के हीरासिंह चौहान उपाध्यक्ष बने।

    30 मई 1990 को भाजपा के हरि कुमार औदिच्य तथा विद्या पाठक को एवं जनता दल के प्रो. केदार नाथ, सम्पतराम व मदन कौर को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। उसी दिन भाजपा के जोगेश्वर गर्ग तथा शांतिलाल चपलोत को एवं जनता दल के रामेश्वर दयाल यादव, देवीसिंह भाटी, नफीस अहमदखां व गोपालसिंह खण्डेला को राज्यमंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर 1990 को भाजपा की अयोध्या रथ यात्रा के कारण जनता दल ने भाजपा सरकार से अलग होने का निर्णय लिया। 7 कैबीनेट मंत्रियों- नत्थीसिंह, सम्पतराम, प्रो. केदार, दिग्विजय सिंह, चन्द्रभान, सुमित्रा सिंह और मदनकौर तथा चार राज्य मंत्रियों- फतहसिंह, गोपालसिंह खण्डेला, रामेश्वर दयाल यादव तथा नफीस अहमद ने सरकार से त्यागपत्र दे दिये जिससे सरकार अल्पमत में आ गयी। 5 नवम्बर 1990 को जनता दल के 22 विधायकों ने नत्थीसिंह के नेतृत्व को अस्वीकार करते हुए भाजपा को समर्थन जारी रखने की घोषणा की।

    8 नवम्बर 1990 को शेखावत सरकार ने विधान सभा में विश्वास का मत अर्जित कर लिया। सरकार के पक्ष में 116 तथा विरोध में 80 मत आये। विधान सभा अध्यक्ष ने मतदान नहीं किया। 24 नवम्बर 1990 को मंत्रिमण्डल का विस्तार किया गया। जनता दल (दिग्विजय) के दिग्विजय सिंह, गंगाराम चौधरी, लालचंद डूडी, भंवरलाल शर्मा, सम्पतसिंह, जगमालसिंह यादव, रामनारायण विश्नोई को कैबीनेट मंत्री, नफीस अहमद खां, उम्मेदसिंह, जगतसिंह दायमा, मान्धातासिंह, बाबूलाला खाण्डा और रतनलाल जाट को राज्य मंत्री तथा मिश्रीलाल चौधरी एवं डूंगरराम पंवार को उपमंत्री बनाया गया। निर्दलीय मदन मोहन सिंहल को राज्य मंत्री एवं रामप्रताप कासनिया को उपमंत्री बनाया गया। 9 जनवरी 1992 को जनता दल (दिग्विजय) के सम्पतसिंह और जगमाल सिंह ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 24 जनवरी 1992 को भाजपा के जोगेश्वर गर्ग और चुन्नीलाल गरासिया ने मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में सम्मिलित होने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। 17 फरवरी 1992 को भाजपा के कैलाश मेघवाल ने कैबीनेट मंत्री पद की शपथ ली। 1 दिसम्बर 1992 को भाजपा के कैबीनेट मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने अयोध्या में कारसेवा में भाग लेने के लिये मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

    तीन जिलों का जन्म

    अपनी दूसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने दौसा, राजसमंद तथा बारां जिलों का गठन किया। इससे राज्य में जिलों की संख्या 27 से बढ़कर 30 हो गई। अपने इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत केन्द्र सरकार की आठवीं पंचवर्षीय योजना में राजस्थान को 11500 करोड़ रुपये स्वीकृत करवाने में सफल रहे। दूसरी सरकार भी राष्ट्रपति शासन की भेंट चढ़ी 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुई गतिविधियों को लेकर केन्द्र सरकार ने शेखावत सरकार को अपदस्थ कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया तथा विधानसभा भंग कर दी गयी। भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार राज्य में दसवीं विधान सभा के लिये 11 नवम्बर 1993 को मतदान हुआ। 27 नवम्बर को मतों की गिनती की गयी एवं चुनाव परिणाम घोषित किये गये। भाजपा को 95 स्थान, कांग्रेस (इ) को 76 स्थान, माकपा को 1 स्थान, जनता दल को 6 स्थान एवं निर्दलीय एवं अन्य को 21 स्थान प्राप्त हुए। भाजपा ने बाड़मेर में गंगाराम चौधरी को, चौहटन में भगवान दास डोसी को एवं डीग क्षेत्र में कुंवर अरुणसिंह को समर्थन प्रदान किया। इन तीनों को ही चुनावों में विजय प्राप्त हुई।

    भैरोंसिंह शेखावत ने दसवीं विधानसभा का चुनाव पाली जिले की बाली सीट से लड़ा थाजिसमें वे विजयी रहे। इस प्रकार 11 दिसम्बर 1993 को भैरोंसिंह शेखावत ने निर्दलियों के सहयोग से राज्य में तीसरी बार अपनी सरकार का गठन किया। जब उन्होंने अपनी तीसरी सरकार का गठन किया तो राष्ट्रपति शासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे 'सरकारी अवकाश' बताया।

    उनके साथ भाजपा के भंवरलाल शर्मा, ललित किशोर चतुर्वेदी, देवीसिंह भाटी, गुलाबचंद कटारिया, एवं निर्दलीय सुजानसिंह यादव एवं गंगाराम चौधरी को कैबीनेट मंत्री बनाया गया। भाजपा के नाथूसिंह गुर्जर, राजेन्द्रसिंह राठौड़, जसवंतसिंह विश्नोई, श्रीकिशन सोनगरा, नन्दलाल मीणा, रामप्रताप कासनिया, अनंग कुमार जैन, मदन दिलावर, अचलाराम मेघवाल, सांवरलाल जाट, निर्दलीय रोहिताश्व कुमार, ज्ञानसिंह चौधरी, नरेन्द्र कंवर तथा शशि दत्ता को राज्य मंत्री बनाया गया। निर्दलीय गुरजंट सिंह तथा मंगलाराम कोली को उपमंत्री बनाया गया।

    22 दिसम्बर 1993 को भाजपा के अर्जुन सिंह देवड़ा को राज्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। 20 फरवरी 1994 को भाजपा के कैलाश मेघवाल एवं रघुवीरसिंह कौशल को कैबीनेट मंत्री के पद की शपथ दिलवायी गयी। जनता दल के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 6 अक्टूबर 1994 को विधानसभा अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा को कैबीनेट मंत्री, नसरूखां, बृजराजसिंह एवं पूंजालाल गरासिया को राज्यमंत्री बनाया गया। 27 फरवरी 1995 को बृजराजसिंह का निधन हो गया। मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण 17 जनवरी 1997 को शशि दत्ता ने तथा 20 जनवरी 1997 को पूंजालाल गरासिया ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। 7 दिसम्बर 1997 को एक वरिष्ठ अधिकारी से अशोभनीय व्यवहार करने पर देवीसिंह भाटी को भी मुख्यमंत्री के निर्देश पर त्यागपत्र देना पड़ा। 21 मार्च 1998 को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुन लिये जाने के बाद रघुवीरसिंह कौशल ने भी त्यागपत्र दे दिया। 1 जून 1998 को ज्ञानसिंह चौधरी ने निजी कारणों से त्यागपत्र दे दिया।

    2 जुलाई 1998 को भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी को कैबीनेट मंत्री के रूप में तथा राजपाल सिंह शेखावत, कालीचरण सर्राफ, राजेन्द्र गहलोत, कन्हैयालाल मीणा, भंवरसिंह डांगावास, बाबूलाल वर्मा, सुन्दरलाल, अमराराम चौधरी, दलीचंद, शिवदानसिंह, महावीर भगोरा तथा उजला अरोड़ा को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। 8 जुलाई 1998 को विजयेन्द्रपाल सिंह को कैबीनेट मंत्री तथा चुन्नीलाल धाकड़ को राज्यमंत्री बनाया गया। दो उपमंत्रियों गुरजंट सिंह और मंगलाराम कोली को पदोन्नति देकर राज्यमंत्री बनाया गया।

    नये उद्योगों की स्थापना पर जोर

    भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थान में नये उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया और एक लाख तक की जनसंख्या वाले नगरों में नया उद्योग लगाने वालों को राजकीय सहायता देने का निर्णय किया। साक्षरता, वृक्षारोपण, परिवार नियोजन, स्त्री शिक्षा, आदि उनकी प्राथमिकता के मुख्य कार्यक्रम थे। जब 1993 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो परिवार नियोजन उके लिये पंचायती राज कानून में संशोधन करके एक प्रावधान किया गया कि दो से अधिक संतान वाला व्यक्ति पंच-सरपंच का चुना नहीं लड़ सकता। इसी कार्यकाल में शेखावत ने पंचायती राज तथा स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान करके भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में नई मिसाल स्थापित की। यह आरक्षण रोटेशन प्रणाली के आधार पर लागू किया गया।

    केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे

    राजस्थान के विपुल खनिज भण्डार की शक्ति से भैरोंसिंह भलीभांति परिचित थे। इसलिये वे प्रायः कहते थे कि केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे, हमारा राज्य देश भर की सीमेण्ट तथा मार्बल की मांग पूरी करने में सक्षम है।

    चुंगी की समाप्ति

    अपनी तीसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने नगर पालिका नाकों पर चुंगी वसूलने में हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये चुंगी समाप्त कर दी।

    नौवीं पंचवर्षीय योजना के आकार में ऐतिहासिक वृद्धि

    राजस्थान को स्वीकृत नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997 से 2000) के आकार में, आठवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में लगभग ढाई गुना की वृद्धि हुई। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। जहां आठवीं पंचवर्षीय योजना का आकर 11,500 करोड़ रुपये था, वहीं नौंवी पंचवर्षीय योजना का आकार 27,400 करोड़ रुपये हो गया।

    दो जिलों का निर्माण

    इस कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने राजस्थान में दो नये जिलों का गठन किया। श्रीगंगानगर जिले को विभाजित करके श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले बनाये गये तथा सवाईमाधोपुर जिले को विभाजित करके सवाईमाधोपुर एवं करौली जिले बनाये गये। इस प्रकार राज्य में जिलों की संख्या 32 हो गई।

    साक्षरता अभियान को अभूतपूर्व सफलता

    भैरोंसिंह शेखावत की इस तीसरी सरकार ने राज्य में सघन साक्षरता अभियान चलाया जिसे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। वर्ष 1991 की जनगणना में राज्य की साक्षरता 38 प्रतिशत पाई गई थी जो इस अभियान के कारण वर्ष 2001 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार निरक्षर राजस्थान साक्षर राजस्थान में बदल गया।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष

    भैरोंसिंह शेखावत की तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया किंतु इसके बाद 1998 में ग्यारहवीं विधानसभा के लिये हुए चुनावों में भाजपा परास्त हो गई। उसे केवल 33 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 150 सीटें जीत कर प्रबल बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची। इस विधान सभा के लिये भैरोंसिंह शेखावत ने बाली सीट से चुनाव लड़ा था जिसमें वे विजयी रहे तथा तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष बने।

    उपराष्ट्रपति पद पर विजयी

    वर्ष 2002 में भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी श्री सुशील कुमार शिंदे को सीधी टक्कर में परास्त किया। 19 अगस्त 2002 को भैरोंसिंह शेखावत ने भारत के 11वें उपराष्ट्रपति बने।

    जीवन भर पढ़ते रहे

    भैरोंसिंह शेखावत हाई स्कूल तक पढ़े हुए थे किंतु सीखने, जानने और पढ़ने की ललक उनमें जीवन भर बनी रही। वे अपने सहायकों से विविधि विषयों पर नोट्स तैयार करवाते और उनका अध्ययन करके ही किसी विषय पर अपनी धारणा बनाते थे।

    तीन बार डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर

    आन्ध्र विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी ने भैरोंसिंह शेखावत को डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर की उपाधियाँ दीं। एशियाटिक सोसाइटी मुम्बई ने उन्हें ऑनरेरी फैलोशिप दी। येरेवान स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी आर्मेनिया ने उन्हें डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्रदान किया।

    राष्ट्रपति का चुनाव हारे

    जुलाई 2007 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल पूरा हुआ। भैरोंसिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। वे स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए। एनडीए के समस्त घटक दलों ने उनका समर्थन किया। उनके सामने राजस्थान की राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटील खड़ी हुईं। उन्हें यूपीए के घटक दलों एवं वामपंथी दलों ने समर्थन दिया। इस चुनाव में प्रतिभा देवीसिंह पाटील विजयी रहीं। 21 जुलाई 2007 को भैरोंसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे सदैव के लिये सक्रिय राजनीति से हट गये। इस समय तक उनकी आयु 84 वर्ष हो गई थी।

    कैंसर ने झकझोरा

    84 वर्ष की आयु में भैरोंसिंह शेखावत को कैंसर का दंश झेलना पड़ा। भारत के विभिन्न चिकित्सालयों में उनका उपचार करवाया गया किंतु वे पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो सके।

    जाति एवं समाज से निर्भय रहे

    4 सितम्बर 1987 को रूपकंवर सती हुई। उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी थे। भैरोंसिंह उन दिनों इंगलैण्ड की यात्रा पर थे। उन्होंने लंदन से वक्तव्य जारी करके सती काण्ड के दाषियों को दण्डित करने की मांग की। राजपूत समाज का बड़ा हिस्सा ऐसे किसी कदम के विरुद्ध पहले ही प्रतिबद्धता जता चुका था।

    भैरोंसिंह निर्भय होकर, अपने सिद्धांतों पर चले। वे जाति एवं समाज की नाराजगी से कभी डरे नहीं। जब कांग्रेस सरकार सती प्रथा के विरोध में कानून लाई तो भैरोंसिंह उसके समर्थन में खड़े हुए। शेखावत जब लंदन से लौटे तो उन्हें गद्दार कहा गया किंतु वे निर्भीक होक जनसभाओं में गये और अपने तर्को से सबको निरुत्तर कर दिया।

    रामनिवास मिर्धा से मिलता था चेहरा

    भैरोंसिंह शेखावत का चेहरा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामनिवास मिर्धा से मिलता था। कोई भी आदमी रामनिवास मिर्धा को देखकर उन्हें शेखावत समझने की भूल कर सकता था और कोई भी आदमी शेखावत को देखकर रामनिवास समझने की भूल कर सकता था। रामनिवास मिर्धा की पुत्री के विवाह में भैरोंसिंह साफा पहनकर पहुंचे। दोनों के साफे भी लगभग एक जैसे थे। इस पर रामनिवास मिर्धा ने भैरोंसिंह शेखावत से कहा कि आप तो मेहमानों का स्वागत करो, मैं मण्डप में जा रहा हूँ। इस पर शेखावत, मिर्धा के परिजनों के साथ उनके आगे खड़े हो गये। बहुत से लोग उन्हें मिर्धा समझकर लिफाफे पकड़ा गये। जब मिर्धा मण्डप से बाहर आये तो वे यह देखकर हैरान हो गये कि अतिथि किस तरह शेखावत को मिर्धा समझकर भ्रमित हो रहे हैं। शेखावत ने हँसकर लोगों को अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं रामनिवास मिर्धा हूँ और ये भैरोंसिंह शेखावत हैं।

    जूते खाओ, पर पुष्पचक्र चढ़ाओ

    1996 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भैरोंसिंह ने अपने दो मंत्रियों राजेन्द्रसिंह राठौड़ तथा रोहिताश्व शर्मा को प्रबंधन की जानकारी प्राप्त करने के लिये हैदराबाद भेजा। उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव का निधन हो गया। इस पर भैरोंसिंह ने दोनों मंत्रियों को निर्देश दिये कि वे सरकार की ओर से रामाराव की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करके आयें। जब राजस्थान सरकार के दोनों मंत्री पुष्पचक्र अर्पित करने गये तो लोगों ने उन पर चप्पलें फैंकनी आरंभ कर दीं तथा वापस जाओ-वापस जाओ के नारे लगाने लगे। इससे राजस्थान सरकार के मंत्री रामाराव की पार्थिव देह तक नहीं पहुंच सके। उन्होंने भैरोंसिंह को यह बात बताई तो भैरोंसिंह ने उन्हें निर्देश दिये कि चाहे कितने ही जूते चप्पल खाने पड़ें, पुष्पचक्र अर्पित करके ही आना। दोनों मंत्री पुनः उस स्थान पर गये जहां रामराव की पार्थिव देह दर्शनार्थियों के लिये रखी गई थी। इस बार वे अपने काम में सफल रहे। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि लोग राजेन्द्रसिंह राठौड़ को एन. टी. रामाराव को चंद्रबाबू नायडू समझ रहे थे जिन्होंने कुछ दिन पहले ही अपने श्वसुर की सरकार का तख्ता पलट किया था।

    गुटखा खाने वाले बाबोसा

    अपने गांव खाचरियावास में भैरोंसिंह शेखावत को बाबोसा के नाम से जाना जाता था। वे गुटखा (पान मसाला) खाने के शौकीन थे, राजस्थान का शायद ही ऐसा कोई गांव या नगर हो जिसमें उन्होंने अपने ऐसे मित्र न बना रखे हों जिनसे वे गुटखा मांगकर न खाते हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नवल किशोर शर्मा भी पान मसाला खाते थे। वे दोनों प्रायः परस्पर परिहास किया करते थे कि पान मसाला बनाने वाले हमें ही अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर क्यों नहीं रख लेते।

    दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री

    भैरोंसिंह शेखावत और सूरजकंवर को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम रतनकंवर रखा गया। रतनकंवर का विवाह नरपतसिंह राजवी से हुआ जो वसुंधरा राजे मंत्रिमण्डल में मंत्री रहे। रतनकंवर के दो पुत्र विक्रमादित्यसिंह तथा अभिमन्युसिंह हुए।

    भयभीत सांसद ने पांव पकड़े

    भैरोंसिंह शेखावत जब राज्यसभा के सभापति थे, उन दिनों एक सांसद लगातार तीन बार प्रश्नकाल के दौरान अनुपस्थित रहा। शेखावत राजस्थान विधानसभा के अनुभवों से समृद्ध थे। उन्होंने सांसद की पृष्ठभूमि की जांच करवाई। सांसद को भी जानकारी हो गई कि भैरोंसिंह शेखावत ने उनकी पृष्ठभूमि की जांच करवाई है। जब भैरोंसिंह शेखावत ने उस सांसद को अपने चैम्बर में बुलाया तो उस सांसद ने उनके पांव पकड़कर माफी मांग ली। भैरोंसिंह शेखावत ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया। इसके बाद ऐसे सदस्य या तो प्रश्न पूछते ही नहीं थे, और यदि पूछते थे तो सदन से अनुपस्थित नहीं रहते थे।

    मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ

    भैरोंसिंह शेखावत को जातिवाद से बहुत चिढ़ थी। वे व्यक्तिवाद और जातिवाद के स्थान पर समष्टिवाद में विश्वास रखते थे। वर्ष 2007 में वे चक्रेश्वरी देवी के नागाणा मंदिर में दर्शनों के लिये आये। इस अवसर पर आयोजित सार्वजनिक सभा के मंच से चक्रेश्वरी देवी को बार-बार राठौड़ों की देवी कहकर सम्बोधित किया गया। इससे वे खीझ पड़े और अपने भाषण में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बोले- देवी देवता किसी व्यक्ति या जाति के नहीं होते, वे तो पूरे समाज के होते हैं। यदि यह राठौड़ों की देवी है और मैं शेखावत हूँ, तो मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ!

    अस्पताल पहुंचे अशोक गहलोत

    भैरोंसिंह शेखावत एक वर्ष से बीमार चल रहे थे। 13 मई 2010 को उन्हें 15 मई 2010 की प्रातः मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को ज्ञात हुआ कि भैरोंसिंह शेखावत की हालत चिंता जनक है, उसी समय प्रातः 9 बजे उन्होंने सवाई मानसिंह अस्पताल के आईसीयू में पहुंचकर डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के बारे में जानकारी ली।

    वैशाख की दूज को ज्योति विलीन हुई

    वैशाख की तृतीया को राजस्थान में आखातीज कहा जाता है जो समस्त शुभकार्यों के लिये अबूझ सावे के रूप में विख्यात है। इसी आखातीज से एक दिन पहले, वैशाख माह की द्वितीया अर्थात् 15 मई 2010 को प्रातः 11 बजकर 10 मिनट पर हृदयाघात से उनका निधन हो गया। कार्तिक माह की त्रयोदशी को जो ज्योति प्रकट हुई वह वैशाख माह की द्वितीया को विलीन हो गई।

    सारे काम छोड़कर दौड़े अशोक गहलोत

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, भैरोंसिंह के हालचाल पूछकर अभी लौटे ही थे कि उन्हें शेखावत के निधन का सामचार मिला। वे हाथ के सारे काम छोड़कर उसी समय फिर सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंचे। उन्होंने शेखावत के परिजनों को ढाढ़स बंधवाया तथा उनके निधन पर राजस्थान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया।

    शवयात्रा में सम्मिलित हुआ पूरा देश

    उनके निवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि देने वालों में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, गुजरात की राज्यपाल डॉ. कमला भी शामिल थीं। उनकी शवयात्रा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी- एल- जोशी, हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह] उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल, पूर्व उपप्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, केन्द्रीय मंत्री डॉ- सी- पी- जोशी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंह, भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए।

    शेखावत स्मृति संस्थान की घोषणा

    मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने भैरोंसिंह शेखावत की स्मृतियों को बनाये रखने के लिये जयपुर में शेखावत स्मृति संस्थान को राज्य सरकार की ओर से भूमि देने की घोषणा की। सीकर रोड पर विद्याधर नगर स्टेडियम के पास इस संस्थान को भूमि आवंटित की गई।

    उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है

    शेखावत के निधन पर यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने भैरोंसिंह की पत्नी को लिखे एक पत्र में इन शब्दों में शोक प्रकट किया- मुझे भैरोंसिंह शेखावत के देहावसान का बहुत अफसोस हुआ। सार्वजनिक जीवन में उनके जैसा व्यक्ति मुश्किल से दिखाई पड़ता है। शेखावत साहब के सार्वजनिक व्यवहार, उनकी सूझबूझ, और राजनीतिक प्रतिभा का महत्व सभी लोग स्वीकार करते हैं। सभी पक्षों में संवाद का जैसा गुण उनमें था, वह प्रायः विरल होता है। आपका उनसे जीवन भर का साथ रहा है। उनके गुणों के बारे में आपसे ज्यादा कौन जान सकता है। आपके अभाव और पीड़ा की कल्पना मैं कर सकती हूँ। इसलिये ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि वह आपको यह दुःख सहने की शक्ति दे और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

    उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये

    शेखावत के निधन पर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा- शेखावत उन बिरले नेताओं में से थे जिन्होंने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी विद्वता, वाक्पटुता और मिलनसार व्यवहार की अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने राजनीति में रहकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उच्च प्रतिमान स्थापित किये। उन्होंने राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर व्यक्तिगत सम्पर्कों को सदा महत्व दिया।

    पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा

    पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उनके निधन पर कहा- शेखावत का निधन पूरे देश के लिये अपूर्ण क्षति है। वे विराट व्यक्तित्व के धनी और जन-जन के नेता थे। उनसे राजनीति में बहुत कुछ सीखा है। राजनीति के एक युग का अंत हो गया। पूरा देश उन्हें सदियों तक याद करता रहेगा।

    हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा

    उनके निधन के बाद सुप्रसिद्ध पत्रकार चंदन मित्रा ने 17 मई 2010 को राजस्थान पत्रिका में एक लेख लिखा जिसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा था- उन्होंने पूरी शान से जीवन बिताया। भावी पीढ़ियां उन्हें छपे हुए शब्दों व टीवी फुटेज से जानेंगी। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने हाड़-मांस का ऐसा मानव देखा।


  • Share On Social Media:
  • पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

     24.05.2018
    पर्यावरण का प्रखर प्रहरी - बिश्नोई समाज

    उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान आदि प्रांतों में बसने वाली बिश्नोई जाति ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर दिल्ली सल्तनत के तुर्की शासकों का शासन था और चारों ओर हिंसा का वातावरण था, तब थार रेगिस्तान में जन्म लेने वाले जाम्भोजी नामक प्रसिद्ध संत ने बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अपने शिष्यों को 29 शिक्षाएं दीं जिनमें धर्म अैर नैतिकता के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा एवं मानवीय मूल्यों के निर्वहन पर जोर दिया गया। उनके द्वारा दिए गए 29 नियमों में से 8 नियम पशु-पक्षियों-वृक्षों एवं पर्यावरण रक्षा से सम्बन्धित हैं।

    भगवान जांभोजी के जीवन काल में ई.1485 में मारवाड़ में भयानक अकाल पड़ा। इस कारण बहुत से लोग अपने परिवारों एवं पशुओं को लेकर मालवा के लिए प्रस्थान करने लगे। मनुष्यों के इस कष्ट को देखकर जांभोजी ने उन लोगों की सहायता की तथा उन्हें पर्यावरण की सुरक्षा करने के लिए प्रेरित किया। उस काल में जब भारतीयों के पास आधुनिक विज्ञान नहीं था, और उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि खेजड़ी की जड़ में वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरिकरण करने वाले बैक्टीरिया निवास करते हैं, जांभोजी ने खेजड़ी के महत्व को पहचाना और उसकी रक्षा का कार्य धार्मिक अनुष्ठान की तरह पवित्र बना दिया। इसी प्रकार घास खाकर जीवित रहने वाले हिरण की महत्ता भी उनकी आंखों से छिपी नहीं रही। हिरणों के मल-मूत्र से धरती स्वतः उर्वरा बनने की प्रक्रिया के अधीन रहती है क्योंकि हिरण दूर-दूर तक छलांगें लगाता रहता है। इसलिए जांभोजी जंगलों में बसने वाले हिरणों को खेतों और गांवों तक ले आए।

    गुरु जांभोजी की शिक्षाओं का सच्चे अर्थों में अनुसरण करते हुए बिश्नाई समाज ने पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का प्रमुख हिस्सा बना लिया। जिस-जिस क्षेत्र में बिश्नोई समुदाय निवास करता है, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में किसी व्यक्ति को हिरण, खरगोश, नीलगाय आदि वन्य-जीवों का शिकार नहीं करने दिया जाता तथा खेजड़ी के हरे वृक्ष को नहीं काटने दिया जाता। वन्यजीवों के शिकार एवं खेजड़ी की कटाई को रोकने के लिए बिश्नोई समाज का प्रत्येक व्यक्ति सजग रहता है तथा इस कार्य को करते हुए अपने प्राण तक न्यौछावर करने की भावना रखता है। सरकार ने इस समुदाय की भावनाओं का आदर करते हुए बिश्नोई बहुल गांवों के आसपास के क्षेत्रों को आखेट निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया है।

    बिश्नोई लोग हिरणों की रक्षा ही नहीं करते, वे हिरणों का उपचार तथा पालन-पोषण भी करते हैं। बिश्नोई माताएं, माताविहीन हिरण शावकों को पुत्रवत् स्तनपान करवाती हैं। इस प्रकार का उदाहरण इस धरती पर निवास करने वाले किसी भी मानव समाज में शायद ही अन्यत्र मिले।

    पश्चिमी राजस्थान में अनेक बार ऐसे प्रसंग हुए जब बिश्नोई समाज के स्त्री-पुरुषों ने वन्यजीवों एवं वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। ई.1730 में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों द्वारा दिया गया बलिदान पूरे विश्व में श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। आज भी इस घटना की स्मृति को ताजा करने एवं उन अमर शहीदों को स्मरण करने के लिए देश के बहुत से हिस्सों से लोग खेजड़ली गांव आते हैं।

    बिश्नोई समाज को खेजड़ी के प्रति श्रद्धा, भगवान जांभोजी के जीवन काल से ही होने लगी थी। जांभोजी ने नागौर जिले की जायल तहसील में स्थित रोटू गांव में तीन हजार सात सौ वृक्ष लगाकर पूरे गांव की सीमा में अलग तरह का बगीचा लगा दिया था। मान्यता है कि उन्होंने खेजड़ी के एक सूखे वृक्ष को अपनी दिव्य शक्ति से पुनः हरा-भरा कर दिया था।

    आज से लगभग 21 वर्ष पहले मैंने रोटू गांव की यात्रा की थी। तब मैंने अपनी आंखों से इस गांव में मोर एवं चिड़ियों को स्थान-स्थान पर इस प्रकार बैठे हुए देखा था मानो वे गांव के पालतू पक्षी हों। इसी प्रकार मैंने हिरणों को निर्भय होकर रोटू गांव में विचरण करते हुए देखा था। मूलतः हिरण वन्यजीव है किंतु यह देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था कि मानव द्वारा दिए जा रहे प्रेम के वशीभूत होकर हिरण जंगल में बसने का अपना स्वभाव भूलकर गांव के बीच घूमते थे।

    जाम्भोजी ने एक नियम बताया था- ‘‘अमर रखावै थाट बैल बंध्यो न करावै’’ मैंने अपनी आंखों से इस गांव में बकरों का एक थाट देखा था। थाट बकरों के उस समूह को कहते हैं जिसमें गांव के समस्त बकरों को रखा जाता है तथा उनका वध नहीं किया जाता, न उन्हें बधिया किया जाता है। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी समस्त गांव द्वारा उठाई जाती है।

    जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर के धोरों में स्थित कांटेदार शुष्क वनों में बिश्नोई समाज ने हिरणों के लिए स्थान-स्थान पर पेयजल की व्यवस्था की है तथा कुत्तों के काटने से घायल एवं बीमार हिरणों के उपचार के लिए रेसक्यू सेंटर बनाए हैं। इन सेंटरों पर हिरणों के साथ-साथ अन्य घायल पशु-पक्षियों का भी उपचार किया जाता है। बरसात के दिनों में जब हिरणों के पांव मिट्टी में धंसने लगते हैं, तब भी बिश्नोई समुदाय के लोग इनकी रक्षा करते हैं। गुढ़ा बिश्नाईयां तथा खेजड़ली क्षेत्र में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को सहज भाव से पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रुषा करते हुए देखा जा सकता है।

    जोधपुर जिले में बिश्नोई धोरां नामक स्थान पर मैंने आज से लगभग 10 वर्ष पहले प्रातः काल की बेला में बिश्नोई स्त्री-पुरुषों को वैदिक मंत्रों के साथ हवन करते हुए तथा शुद्ध घी की आहुतियां देते हुए देखा था। यह हवन एक ऊंचे से टीले पर बने एक छोटे मंदिर के खुले प्रांगण में बने एक झौंपड़ी नुमा शेड के नीचे हो रहा था और यज्ञ-स्थल के चारों ओर मोर तथा हिरण सहज भाव से विचरण कर रहे थे।

    बिश्नोई समाज द्वारा जीवों की रक्षा के लिए बहुत सजगता बरती जाती है, उसके उपरांत भी शिकारियों द्वारा हिरणों के चोरी-छिपे शिकार की घटनाएं हो जाती हैं। कई बार शिकारियों का प्रतिरोध करते हुए बिश्नोई समाज के लोग अपने प्राण तक न्यौछावर कर चुके हैं। इस समाज ने पर्यावरण की सुरक्षा के भाव को धर्म की तरह धारण किया है जिसकी मिसाल अन्यत्र मिलनी अत्यंत कठिन है।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

  • उत्तर भारत क"/> उत्तर भारत क"> उत्तर भारत क">
    Share On Social Media:
  • संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

     24.05.2018
    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    संक्षिप्त जीवन वृत्तांत - श्री भैरोंसिंह शेखावत 

    नाम - श्री भैरोंसिंह शेखावत

    जन्म - 23 अक्टूबर 1923

    पिता का नाम - श्री देवीसिंह शेखावत

    माता का नाम - श्रीमती बन्नेकंवर

    गांव - खाचरियावास (सीकर जिला)

    ननिहाल - सहनाली बड़ी गांव (चूरू जिला)

    प्रारंभिक शिक्षा - बीछीदाना गांव में (सीकर जिला)

    हाईस्कूल शिक्षा - एंग्लोवैदिक स्कूल जोबनेर

    विवाह - 3 जुलाई 1941

    पत्नी का नाम - श्रीमती सूरजकंवर

    ससुराल - बुचकला (जोधपुर जिला)

    पिता का निधन - ई.1942

    नौकरी - ई.1942 से 1952

    पद - सीकर ठिकाणे की पुलिस में असिस्टेण्ट सब इंसपैक्टर

    राजनीति में प्रवेश - ई.1952

    पहली बार विधायक - ई.1952 में जनसंघ के टिकट पर दांतारामगढ़ सीट से।

    दूसरी बार विधायक - ई.1957 में जनसंघ के टिकट पर श्रीमाधोपुर सीट से।

    तीसरी बार विधयक - ई.1962 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    चौथी बार विधायक - ई.1967 में जनसंघ के टिकट पर किशनपोल सीट से।

    राज्यसभा सदस्य - ई.1974 से 1977 तक जनसंघ के टिकट पर मध्यप्रदेश

    पांचवीं बार विधायक - ई.1977 में जनता पार्टी के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार मुख्यमंत्री - 22 जून 1977 से 15 फरवरी 1980

    छठी बार विधायक - ई.1980 में भाजपा के टिकट पर छबड़ा सीट से।

    पहली बार नेता प्रतिपक्ष - 15 जुलाई 1980 से 10 मार्च 1985

    सातवीं बार विधायक - ई.1985 में भाजपा के टिकट पर निंबाहेड़ा तथा अजमेर

    दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 28 मार्च 1985 से 30 दिसम्बर 1989

    आठवीं बार विधायक -  ई.1990 में भाजपा के टिकट पर धौलपुर तथा छबड़ा 
    सीट से। बाद में अजमेर सीट छोड़ दी।

    दूसरी बार मुख्यमंत्री - 4 मार्च 1990 से 15 दिसम्बर 1992

    नौवीं बार विधायक - ई.1993 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार मुख्यमंत्री - 4 दिसम्बर 1993 से 31 दिसम्बर 1998

    दसवीं बार विधायक - ई.1998 में भाजपा के टिकट पर बाली सीट से।

    तीसरी बार नेता प्रतिपक्ष - 8 जनवरी 1999 से 18 अगस्त 2002

    भारत के 11वें उपराष्ट्रपति -19 अगस्त 2002 से 21 जुलाई 2007

    निधन - 15 मई 2010, जयपुर।


  • Share On Social Media:
  • सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

     31.05.2018
    सेवाड़ी के शिलालेखों का महत्व

    ई.1107 का शिलालेख

    राजस्थान के पाली जिले में सेवाड़ी नामक एक अत्यंत प्राचीन गांव स्थित है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में इस गांव को शमीपाटी कहा जाता था। इस गांव में स्थित महावीर स्वामी के मंदिर से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के दो शिलालेख मिले हैं। इनमें से पहला शिलालेख तीन पंक्तियों का है। इस शिलालेख को 3‘ 6‘‘ गुणा 2‘ 3/4‘‘ के पत्थर पर उत्कीर्ण किया गया है। लेख संस्कृृृृत भाषा तथा देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण है। लेख का मूल पाठ इस प्रकार है-

    ‘‘सं.1164 चै. सु 6 महाराजाधिराज श्री अश्वराज राज्य श्री कटुकराज युवराज्ये समीपाठीय चैत्ये श्री धर्म्मनाथ देवसां नित्य पूज्यार्थ महसाहणिय पूअविपौत्रेण उत्तिम राजपुत्रैण उप्पल राईन मा गढ आंवल। वि. सलखण जोगादि कुटुंब सम। पद्राडा ग्रामो मेद्रचा ग्रामे तथा छेडड़िया मद्दवडी ग्रामे।। अरहर्ट प्रतिदत्तः जवाहरर्कः ’’

    इस लेख में कहा गया है कि विक्रम संवत् 1164 की चैत्र शुक्ला 6 (ईस्वी 1107) का महाराजाधिराज अश्वराज चौहान जिसका कि युवराज कटुकराज था, ने महावीरजी के चैत्य को पद्राड़ा, मेद्रचा, छेछड़िया तथा महड़ी गांवों से प्रत्येक रहट से एक हारक (एक डलिया की नाप) यव (जौ) प्रदान करने का आदेश दिया गया है। इस दान की वैधानिक व्यवस्था महासाणिय उप्पलराक के द्वारा की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को रोकेगा तो वह गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा के तुल्य पाप होगा। उस काल में साहणिय, अस्तबल का अधिकारी होता था। इस शिलालेख से ज्ञात होता हे कि महासाणिय अर्थात् मुख्य अस्तबल अधिकारी को दान आदि की व्यस्थाएं सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी दी जाती थी।

    ई.1115 का शिलालेख

    सेवाड़ी के महावीर मंदिर का दूसरा शिलालेख वि.सं. 1172 (ईस्वी 1115) का है। यह आठ पंक्तियों का लेख है जिसे 2‘ 1.25‘‘ गुणा 4.5‘‘ क्षेत्र में उत्कीर्ण किया गया है। शिलालेख की मुख्य पंक्तियां इस प्रकार हैं-

    पंक्ति 4: इतश्चासीत् वि (शु) द्वात्मा यशोदेवो बलाधिपः। राज्ञं महाजनस्यापि सभायामग्रणी स्थितः।

    पंक्ति 7: पिता महे (न) तस्येदं समीपाट्यां जिनालये। कारितं शांतिनाथस्य बिंबं जन मनोहरं।।

    इस शिलालेख में अणहिल, जिंदराज, अश्वराज और कटुकराज आदि चौहान शासकों, यशोदेव नामक सेनाध्यक्ष (बलाधिप), बाहड़ नामक शिल्पी तथा उसके पुत्र थल्लक के नाम का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख में सेवाड़ी गांव का नाम शमीपाटी लिखा गया है। इस शिलालेख में बलाधिप के गुणों का उल्लेख किया गया है जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को बलाधिप नियुक्त किया जाता था। इस शिलालेख से अनुमान होता है कि थल्लक का पितामह भी चौहान शासकों का विश्वासप्राप्त शिल्पी था जिसने शांतिनाथ की प्रतिमा का निर्माण किया था।

    इस शिलालेख में कहा गया है कि शमीपत्तन नामक नगर में महाराजा कटुकराज ने मंदिर के निमित्त जो दान दिया है उसकी अवहेना करने वाला पाप का भागी होगा तथा कामना की गई है कि इस दान को स्थायित्व प्राप्त हो।

    सेवाड़ी के शिलालेखों में ऐतिहासिक तत्व

    ये दोनों शिलालेख देखने में भले ही बहुत छोटे लगें किंतु इतिहास निर्माण की दृष्टि से अत्यंत महत्व के हैं। इन शिलालेखों से कई बातों की पुष्टि होती है। ये इस बात की पुष्टि करते हैं कि 12वीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर चौहानों का शासक था। ये चौहान शासक जैन धर्म के मंदिरों को भी दान देते थे। उस काल में राजदरबार की भाषा संस्कृत थी और लेखन के लिए देवनागरी लिपि प्रयुक्त होती थी। इन शिलालेखों से इस बात की भी पुष्टि होती थी कि राज्य के सेनाधिकारी यथा सेनापति, अश्वशाला का मुख्य अधिकारी आदि भी दान व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते थे। राजा की कामना होती थी कि जो दान वह दे रहा है, वह चिरकाल तक चलता रहे। उस युग में पाली क्षेत्र के किसान अरहट से सिंचाई करते थे। गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा को सर्वाधिक गर्हित पाप समझा जाता था। सेनापतियों की नियुक्ति उनके गुणों के आधार पर होती थी। शिल्पियों के परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी राजवंश से जुड़े हुए रहते थे।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


  • Share On Social Media:
  • भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

     04.06.2018
    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण

    भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का विचार जीवन के हर अंग पर रहा है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण चाहिए तो केवल ये दो कहावतें देख लेनी पर्याप्त होंगी-

    संतोषी सदा सुखी।

    सादा जीवन उच्च विचार।


    जब मनुष्य संतोष से जीना सीख जाएगा और जीवन में सादगी को धारण करने का अभ्यास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण के लिए उसे अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। किंतु आज हमने ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में, चक दे इण्डिया और तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे ? जैसी बातों के बहकावे में आकर संतोष और सादा जीवन पर आधारित जीवन शैली त्याग दी है।

    यदि संस्कृत वांगमय में झांक कर देखे तो ऐसी उक्तियां भरी पड़ी हैं जिन्हें अपने जीवन में ढालें तो पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य स्वतः सिद्ध हो जाएगा- अथर्ववेद का सूक्तकार कहता है-

    ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः।’

    जब व्यक्ति पृथ्वी को अपनी माता समझ लेता है, तो उसे वह नुक्सान कैसे पहुंचा सकता है। उपनिषद कहता है-

    ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः।

    अर्थात् ज्ञान प्राप्त किए बिना मुक्ति नहीं होती। यह ज्ञान कौनसा है ? यह प्रकृति की व्यवस्था का ज्ञान है। इसके बिना किसी मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। प्रकृति क्या है? इसे कौन चलाता है? उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? आदि बातों को जानना ही तो वास्तविक ज्ञान है। मानव द्वारा आज तक संचित समस्त ज्ञान तथा आने वाले युगों में अर्जित किया जाने वाला ज्ञान प्रकृति और उसके रहस्यों को जानने तक ही तो सीमित है।

    जब कोई मनुष्य प्रकृति की व्यवस्था के ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो पर्यावरण संरक्षण उसके जीवन का ध्येय बन जाएगा। पर्यावरण केवल वनस्पतियों और वायुमण्डल में उपस्थित गैसों को ही नहीं कहते। पर्यावरण में वे पांचों तत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश भी आते हैं जिनसे यह प्रकृति बनी है।

    पर्यावरण में वनस्पति जगत, जीव जगत, वायुमण्डल, धरती तक पहुंचने वाली सूर्य किरणें, अंतरिक्ष से आने वाले विकीरण आदि विभिन्न तत्व भी आते हैं। ये एक दूसरे से सम्बद्ध हैं, ये एक दूसरे को सहारा देते हैं और नियंत्रित करते हैं।

    जब हम किसी जीव-जंतु को मारते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि हम उस समय केवल एक जीव को नहीं मार रहे होते अपितु ऐसा करके हम जीव जगत के साथ-साथ वायुमण्डल, वनस्पति मण्डल और अंतरिक्षीय शक्तियों पर भी प्रहार कर रहे होते हैं, प्रकृति के मूलाधार पांचों तत्वों को भी कुपित कर रहे होते हैं।

    केवल पेड़ को मारने से ही जीव नहीं मरता, जीव को मारने से पेड़ भी मरता है, यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, किंतु यह सच्चाई है जिसे विज्ञान से लेकर हमारा अध्यात्म तक मानता है।

    यहां मैं यह कह रहा हूं कि केवल पेड़ को मारने से हिरण नहीं मरता, हिरण को मारने से पेड़ भी मरता है।

    क्योंकि केवल वृक्ष जीव का सहारा नहीं है, जीव और वृक्ष दोनों एक दूसरे का सहारा हैं। जब हम किसी पहाड़ को काटते हैं तो भी प्रकृति में ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी कि जंगल में आग लगाने पर होती है। यह ठीक वैसा ही है कि जंगल से शेर को समाप्त कर देने से पूरे जंगल के ही सूख जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

    मुगल एवं ब्रिटिश काल में पूरे भारत में शेरों का बड़ी संख्या में शिकार हुआ, आज जंगलों की क्या हालत है, हमारे सामने है।

    ऐसा कैसे होता है, इस बात को समझने के लिए हमें कोशिका का उदाहरण लेना होगा। यह सम्पूर्ण सृष्टि एक जीवित कोशिका की तरह कार्य करती है। जिस प्रकार एक कोशिका के किसी भी अवयव को भंग करने पर पूरी कोशिका को क्षति पहुंचती है, ठीक वैसा ही धरती या सृष्टि के बारे में है।

    जब उपनिषदों ने आज से हजार साल पहले ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की घोषणा की तो यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक उद्घोष नहीं था, मनुष्य को इस धरती पर कैसे व्यवहार करना चाहिए, कैसा जीवन जीना चाहिए, उसकी गाइड लाइन थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार अहिंसा का विचार ही रहा है। जब जीवों के प्राण नहीं लिए जाएंगे तो प्रकृति में एक संतुलन स्थापित होगा।

    भारतीय संस्कृति में विगत हजारों वर्षों से स्थापित परम्पराएं, सिद्धांत एवं व्यवहार में लाई जाने वाली ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव को आनंददायी जीवन की ओर अग्रसर किया है।

    मानव सभ्यता प्रकृति की कोख से प्रकट होती है। उसे जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से ही मिलता है। इस कारण मानव को, प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना होता है। हमारे ऋषियों ने भारतीय संस्कृति का निर्माण इस प्रकार किया कि प्रकृति के मूल कोश को भंग नहीं किया जाए। पेड़, नदी, पर्वत और जंगल; प्रकृति के मूल कोश हैं। उन्हें नष्ट करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

    मनुष्य धरती पर आया है तो उसे अपना जीवन जीने के लिए प्रकृति के संसाधन काम में लेने ही होंगे। फिर क्या किया जाए ?

    इसका एक मात्र उपाय है कि प्रकृति के किसी भी संसाधन को इस प्रकार काम में लिया जाए कि उसकी रीसाइक्लिंग हो सके। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल को प्लास्टिक और पॉलिथीन ने रिप्लेस किया। प्लास्टिक या पॉलिथीन का प्रयोग प्रकृति के मूल कोश को खर्च करने जैसा है जबकि मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    बहुत से लोग कहेंगे कि आज के युग मेें मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग अव्यावहारिक है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हवाई जहाज की जगह बैलगाड़ी को अपनाया जाए। मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग इसलिए अव्यावहारिक है, क्योंकि ऐसा हम सोचते हैं। जिस दिन हम सोचेंगे कि यह किया जा सकता है, उस दिन यह व्यावहारिक हो जाएगा। दक्षिण भारत में आज भी केले के पत्ते का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है।

    मेरी उम्र कोई बहुत अधिक नहीं हुई है किंतु मैने अपनी आंखों से उस परम्परा को देखा है, जिसमें शादी-विवाह में जीमण के लिए गांव के लोग अपने घरों से बर्तन लेकर जाते थे। मैंने अपनी आंखों से मिट्टी के सकोरे या पत्ते के दोने-पत्तल का प्रयोग ठीक उसी रूप में देखा है, जिस रूप में आज प्लास्टिक और पॉलिथीन हो रहा है।

    मैंने अपनी आंखों से उस संस्कृति को देखा है जब निमंत्रण देने के लिए पीले चावल दिए जाते थे। और आज............। आज किसी परिवार में विवाह होता है तो हजार-हजार की संख्या में निमंत्रण पत्र छपते हैं। क्या हजार-हजार की संख्या में छपने वाला निमंत्रण पत्र, कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण की हत्या करने जैसा नहीं है !

    हमारे सामने दो रास्ते हैं, या तो प्रकृति के संसाधनों को बचाएं या फिर उन्हें आज ही उपभोग करके नष्ट कर दें और अपने बच्चों को कागज अर्थात् पेड़ अर्थात् जंगल अर्थात् शेर अर्थात् हिरण से वंचित करके चले जाएं। उनके लिए एक ऐसी दुनिया छोड़ जाएं जो सूरज की गर्मी से झुलस रही होगी, जिसमें पानी नहीं होगा, जिसमें कचरे और प्लास्टिक के ढेर होंगे। जहां गायें घास नहीं, प्लास्टिक खा रही होंगी। वो दुनिया कितनी वीरान होगी जिसमें लिखने पढ़ने के लिए कागज नहीं होगा! केवल इण्टरनेट और इलेक्ट्रोनिक गेजेट्स होंगे।

    बात यहाँ समाप्त नहीं होती। यहां से शुरु होती है। प्लास्टिक खाकर गाय जीवित नहीं रहेगी, बिना गाय के दूध नहीं मिलेगा, बिना दूध के बच्चे कैसे बनेंगे ! ये दुनिया कैसी होगी! मैं आपको अपना आंखों देखा अनुभव बताता हूँ कि बिना गाय के दुनिया कैसी होगी !

    इण्डोनेशिया का नाम हमने सुना है। आज से पांच सौ साल पहले इण्डोनेशिया में केवल हिन्दू और बौद्ध निवास करते थे। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इसके उपरांत भी इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में आज भी 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी निवास करती है। मैंने पिछले वर्ष अपने परिवार के साथ इण्डोनेशिया के कुछ द्वीपों की यात्रा की। हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां सड़कों पर गायें नहीं हैं। हमें यह सोचकर दुःख हुआ कि भारत में गाएं सड़कों पर मारी-मारी फिरती हैं।

    हमने जावा, जकार्ता और बाली में अपने 11 दिन के प्रवास के लिए होटल बुक नहीं कराए थे अपितु सर्विस अपार्टमेंट्स बुक करवाए थे ताकि वहाँ हम अपना भोजन स्वयं बना सकें। इसके लिए कच्ची रसोई अपने साथ ले गए थे। जब हमने चाय बनाने के लिए बाजार से दूध खरीदना चाहा तो वहाँ दूध की थैलियां नहीं मिलीं। मालूम हुआ कि यहाँ गायें नहीं हैं इसलिए बाजार में दूध नहीं बिकता। ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैण्ड आदि देशों से लिक्विड वैजीटेबल दूध के डिब्बे आते हैं जो मक्का, सोयाबीन, तेलों और कुछ घासों से बनाए जाते हैं। इस दूध पर लिखा रहता है, बच्चों के लिए हानिकारक। आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस दूध का स्वाद और गुण कैसा होगा !

    हमारे जैसे शुद्ध शाकाहारी भारतीय परिवार को दिन में चार-पांच बार चाय चाहिए और सोने से पहले दूध का एक गिलास चाहिए। बाद में पता चला कि सड़कों पर गायें और बाजार में दूध आएंगे कहां से! गायें तो बूचड़ खानों में ले जाई जाकर लोगों के पेट में पहुंच चुकी हैं।

    हमने पूछा इण्डोनेशिया के एक हिन्दू परिवार से पूछा- आपके बच्चे क्या पीते है !

    उन्होंने कहा- मां का दूध। हमने पूछा- और मां का दूध छूटने पर।

    इस सवाल के जवाब में जो कुछ हमें सुनने का मिला वह बेहद चौंकाने वाला था।

    उन्होंने जवाब दिया कि मां का दूध छोड़ने पर बच्चे चिकन, फिश, पोर्क और राइस खाते हैं।

    जब हमने पूछा कि आप लोग चाय नहीं पीते, इस पर उन्होंने कहा कि हम ब्लैक कॉफी पीते हैं, वह भी केवल गेस्ट के आने पर।

    मेरे पिता केन्द्र सरकार में अच्छे पद पर थे किंतु मुझे याद है कि गर्मियों में स्कूलों की छुट्टियां होने पर हमसे अपनी पिछले साल की कॉपियों से कागज की थैलियां बनवाती थीं और कुछ कॉपियों को पानी में गलाकर उन्हें कूटकर और मुल्तानी मिट्टी मिलाकर छोटी-छोटी टोकरियां बनवाती थी जिन्हें मारवाड़ में ठाठिए कहते थे।

    मां दीपावली आने पर हमें घर में ही रंगीन कागज से कंदील बनाना सिखाती थीं। वे हम भाई-बहिनों को घर में सूत से दरियां बनाना सिखाती थीं। गेहूं के सूखे तनों को पानी में भिगोकर उनसे हाथ के पंखे बनाना सिखाती थीं।

    उन्होंने एक और अद्भुत काम हमें सिखाया। मेरा अनुमान है कि यह कार्य बहुत कम बच्चों को उनकी माताओं ने सिखाया होगा। उन दिनों गैस नहीं थी, गांवों में तो चूल्हे होते थे जिनमें लकड़ी जलती थी और शहरों में अंगीठियां होती थीं जिनमें कोयला जलाया जाता था। मेरी मां बाजार से कोयले की चूरी मंगवाती थीं और उसमें काली मिट्टी तथा गोबर मिलाकर हमसे उनके लड्डू बनवाती थीं। जब ये लड्डू कोयले की अंगीठी में डाले जाते थे तो वे घण्टों तक दहकते रहते थे। इससे कोयले की बचत होती थी और अंगीठी में से धुंआ कम निकलता था।

    जब हम पूछते थे कि आप हमसे गर्मियों की छुट्टियों में इतना काम क्यों करवाती हैं तो वे हंसकर जवाब देतीं कि मैं चाहती हूं कि तुम मेलों में जाने के लिए जेबखर्ची मुझसे नहीं मांगो, स्वयं अपने पैसे से मेला देखकर आओ।

    आज सोचता हूं तो लगता है कि मां भले ही अपनी ओर से हमें स्वावलम्बी होने का मंत्र सिखाती थीं किंतु इस कार्य में पर्यावरण संरक्षण का कितना बड़ा संदेश छिपा हुआ था।

    दुर्भाग्य से आधुनिक समय में हम रेडीमेड संस्कृति की ओर अग्रसर हो गए हैं। हाथ से बने हुए सामान की जगह केवल मशीनों द्वारा किए गए उत्पादन ही हमें स्वीकार्य हैं। हमारी यही प्रवृत्ति प्रकृति एवं पर्यावरण के संतुलन को तेजी से समाप्त कर रही है।

    समय की आवश्यकता है जब हम अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटें जो प्रकृति को माता और पर्यावरण को अपना सुरक्षा चक्र मानती है। जो उदाहरण मैंने दिए हैं, वे हो सकता है आज की तरीख में आउट डेटेड बातें हों किंतु जो विषय आज के लिए प्रासंगिक हैं, उन्हें तो हम कर ही सकते हैं।

    एक उदाहरण लेते हैं। बाजार में बिकने वाली मिठाइयों एवं पान पर चांदी का बर्क लगाया जाता है। वास्तव में यह चांदी का बर्क नहीं है, एल्यूमिनियम का है। जब यह मिठाई और पान के साथ हमारे शरीर में पहुंचता है। इसे बकरे की खाल में रखकर कूटा जाता है। मनुष्य की आंते इस बर्क को अवशोषित करने का प्रयास करती हैं और लीवर से निकला जूस इसे पचाने का प्रयास करता है। जब आंतें और लीवर इस काम को नहीं कर पाते तो यह बर्क किडनी तक पहुंचता है। किडनी इसे छानने का प्रयास करती है किंतु यह छनता नहीं है इससे किडनी पर जोर पड़ता है किडनी को अधिक काम करना पड़ता है। अंत में हमारे मल-मूत्र के साथ निकला हुआ बर्क सीवरेज चैनल के माध्यम से भूमि में प्रवेश करता है और मिट्टी को खराब करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब मिट्टी खराब होती है तो पूरे पर्यावरण चक्र में विक्षोभ होता है।

    क्या हम बर्क को खाना छोड़ सकते हैं। यदि समस्त मनुष्य बर्क खाना छोड़ दें तो देश की मिट्टी पर इसका कितना सकारात्मक प्रभाव होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यदि यह बर्क सोने या चांदी का भी होता तो भी यह मनुष्य की आंतों, लीवर और किडनी को इसी तरह नुक्सान पहुंचाता। हमारे केवल इस एक छोटे से कदम से पर्यावरण का संरक्षण होगा।

    भारतीय संस्कृति शारीरिक श्रम पर आधारित है। गांवों में आज भी महिलाएं प्रातःकाल में चक्की चलाकर अनाज पीसती हैं। घरों में ही पापड़, बड़ियां, राबोड़ी, खीचिये, खीच, राबड़ी, आदि विविधि व्यंजन बनाती हैं। बाजरे, ज्वार तथा गेहूं की रोटियां, टुक्कड़ अथवा सोगरे को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, घी तथा छाछ जैसी घरेलू लगावण के साथ खाया जाता है जबकि पश्चिम की संस्कृति से आई ब्रेड के लिये महंगे बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाय पूंजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं।

    ऐसी संस्कृति जिसमें शारीरिक श्रम का अभाव हो, यूज एण्ड थ्रो कल्चर तथा डिस्पोजेबल कल्चर, को बढ़ावा देती है। उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति की प्रवृत्ति है।

    शादी विवाह में पहले मिट्टी के सकोरों और रामझारों का प्रयोग होता था। आज प्लास्टिक तथा थर्मोकोल के गिलास प्रयुक्त होते हैं। ये गिलास मिट्टी में गलकर नष्ट नहीं होते। एक-एक शादी में पांच-दस हजार गिलासों का ढेर लगना मामूली बात है।

    हमें एक शादी में इतने लोग क्यों बुलाने चाहिए। यह हम केवल इतना समझ लें कि विवाह एक पारिवारिक उत्सव है न कि सामाजिक फंक्शन न कि दशहरे का मेला, तो हमराी तरफ से यह, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा योगदान होगा।

    फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर है।

    शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिये कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिये अधिक विनाशकारी है।

    उत्तर भारत में कुछ स्थानों पर यह परम्परा थी कि जब लड़की के पीहर वाले अपनी बहन के ससुराल मायरा भरने जाते थे तो वहाँ तालाब से मिट्टी खोदकर बाहर निकालते थे। अब यह काम सरकार करवाती है। पंजाब में यह परम्परा थी कि लड़की जब विवाह के पश्चात् ससुराल जाती थी तो उससे एक पेड़ लगवाते थे। लड़की जब ससुराल से अपने पीहर आती थी और इस पेड़ को देखती थी, पेड़ हरा-भरा मिलता था तो लड़की समझ जाती थी कि उसके पीहर में आज भी उससे प्रेम किया जाता है, उसके लगाए बिरवे को भाई और भाभियां स्नेह जल से सींच कर पाल रही हैं।

    हमारे पुरखों ने वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, कीड़ीनगरा सींचने, गर्मियों में पक्षियों के लिये पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने, प्रतिदिन पीपल तथा तुलसी सींचने, सूर्यदेव को अर्घ्य देने एवं विशिष्ट पर्वों एवं व्रतों पर चंद्रदेव को अर्घ्य देने, द्वितीया को चंद्र दर्शन करने जैसे धार्मिक विधान बनाए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न हो।

    प्राकृतिक शक्तियों द्वारा जो कुछ भी निर्मित किया जाता है एवं वनस्पति जगत द्वारा जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है, उस सबका उपभोक्ता जीव जगत है। जीव जगत में भी मनुष्य ऐसा प्राणी है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले एवं उपलब्ध कराये जाने वाले संसाधनों को अंतिम उपभोक्ता की तरह प्रयुक्त करता है।

    यही कारण है कि मनुष्य इस प्रकृति का पुत्र होते हुए भी, प्रकृति में उपलब्ध हर वस्तु का स्वामी है या नेचुरल रिसोर्सेज नामक कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर होल्डर है। स्वाभाविक है कि मालिक या सबसे बड़े शेयर होल्डर को अधिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन करना होता है। व्यवहार रूप में उसे प्राकृतिक संसाधनों का मालिक बनकर नहीं अपितु सेवक बनकर रहना होगा, तभी हम पर्यावरण का सच्चे अर्थों में संरक्षण कर सकते हैं।

    संत पीपा के इस दोहे पर अपनी मानसिकता को जांचकर देखें जो मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है-

    स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।

    पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।


    हम प्रकृति के सेवक होकर रहें न कि स्वामी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

  • भारतीय संस्"/> भारतीय संस्"> भारतीय संस्">
    Share On Social Media:
  • राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - अनुक्रमणिका

     21.12.2018
    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - अनुक्रमणिका

    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय 

    लेखक: डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    अनुक्रमणिका

    संग्रहालयों का इतिहास


    1. संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    2. राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

    3. पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    4. राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    राज्य में सरकारी क्षेत्र के प्रमुख संग्रहालय एवं अभिलेखागार

    अजमेर संभाग के संग्रहालय

    6. राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    उदयपुर संभाग के संग्रहालय

    7. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    8. सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर

    9. क्रिस्टल गैलेरी, उदयपुर

    10. विंटेज कार संग्रहालय, उदयपुर

    11. जनजाति संग्रहालय, उदयपुर

    12. पुरातत्व संग्रहालय, उदयपुर

    13. लोककला संग्रहालय, उदयपुर

    14. राजकीय संग्रहालय, आहाड़

    15. बागोर की हवेली संग्रहालय, उदयपुर

    16. महाराणा प्रताप संग्रहालय, हल्दीघाटी

    17. शिल्पग्राम संग्रहालय, उदयपुर

    18. वैक्स म्यूजियम, उदयपुर

    19. बी. जी. शर्मा चित्रालय, उदयपुर

    20. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़

    21. राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय, डूंगरपुर

    कोटा संभाग के संग्रहालय

    22. राजकीय संग्रहालय, कोटा

    23. राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय, कोटा

    24. राजकीय संग्रहालय, झालावाड़

    जयपुर संभाग के संग्रहालय

    25. केन्द्रीय संग्रहालय: अल्बर्ट म्यूजियम, जयपुर

    26. वैक्स म्यूजियम, नाहरगढ़, जयपुर

    27. राजकीय संग्रहालय, हवामहल

    28. प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय, जयपुर

    29. महाराजा मानसिंह संग्रहालय: सिटी पैलेस, जयपुर

    30. जवाहर कला केन्द्र, जयपुर

    31. आधुनिक कला संग्रहालय, जयपुर

    32. श्री रामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय, जयपुर

    33. दिलाराम बाग संग्रहालय, आमेर

    34. गुड़िया एवं कठपुतली संग्रहालय, जयपुर

    35. श्री संजय शर्मा संग्रहालय, जयपुर

    36. जयपुर के कतिपय विशिष्ट संग्रहालय

    37. बिड़ला साइंस म्यूजियम, जयपुर

    38. राजकीय संग्रहालय, अलवर

    39. राजकीय संग्रहालय, विराटनगर

    40. श्री राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय, सीकर

    41. बिड़ला तकनीकी संग्रहालय, पिलानी

    42. ज्योतिष यंत्र संग्रहालय, जयपुर

    जोधपुर संभाग के संग्रहालय

    43. सरदार राजकीय संग्रहालय, जोधपुर

    44. राजकीय संग्रहालय, मण्डोर

    45. मेहरानगढ़ दुर्ग, संग्रहालय, जोधपुर 46. छीतर पैलेस संग्रहालय, जोधपुर

    47. लोकवाद्य संग्रहालय, जोधपुर

    48. अरणा-झरणा मरुस्थल संग्रहालय, जोधपुर

    49. राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत

    50. श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय, पाली

    51. राजकीय संग्रहालय, जैसलमेर

    52. लोक-सांस्कृतिक संग्रहालय: जैसलमेर

    53. युद्ध संग्रहालय, जैसलमेर

    54. नेशनल वुडन फॉसिल पार्क, जैसलमेर

    बीकानेर संभाग के संग्रहालय

    55. गंगा-गोल्डन जुबली संग्रहालय, बीकानेर

    56. करणी संग्रहालय, बीकानेर

    57. सार्दूल संग्रहालय, बीकानेर

    58. प्राचीना, बीकानेर

    59. सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय, संगरिया

    60. पुरातत्व संग्रहालय, कालीबंगा

    61. नाहटा कला संग्रहालय, सरदारशहर

    62. भित्तिचित्रों की ओपन आर्ट गैलेरी: शेखावाटी की हवेलियाँ

    भरतपुर संभाग के संग्रहालय

    63. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    64. राजकीय संग्रहालय, डीग

    राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय

    65. राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय

    66. राजस्थान के विज्ञान केन्द्र एवं संग्रहालय


     


  • Share On Social Media:
  • राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय - भूमिका

     21.12.2018
    राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय  - भूमिका

    भूमिका


    संग्रहालय किसी भी नृवंश, देश, प्रांत अथवा नगर के इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, कला, लेखन आदि विभिन्न क्षेत्रों में हुए विकास को दिखाने वाला विश्वसनीय दर्पण है। यह दर्शक के समय, श्रम एवं धन की बचत करता है, उसकी बौद्धिक उत्सुकता को परिष्कृत करता है एवं जिज्ञासाओं को शांत करता है। वर्तमान युग में संग्रहालय, सम्पूर्ण विश्व में पर्यटकों के आकर्षकण का मुख्य केन्द्र बनते जा रहे हैं।

    विश्व भर के अनेक देशों से 1 करोड़ से अधिक पर्यटक प्रतिवर्ष भारत आते हैं। विदेशी पर्यटक भारत की आय में 27 बिलियन अमरीकी डॉलर का योगदान करते हैं। यह योगदान भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 6.88 प्रतिशत का होता है। प्रत्येक विदेशी पर्यटक भारत में एक-दो अथवा कुछ संग्रहालयों का अवलकोन अवश्य करता है। इस कारण संग्रहालय विदेशी मुद्रा अर्जित करने के सशक्त एवं विश्वसनीय स्रोत बनते जा रहे हैं।

    कहा जा सकता है कि संग्रहालय, विदेशी पर्यटकों के लिए सच्चे राजदूत का काम करते हैं। विदेशी पर्यटकों के साथ-साथ देशी पर्यटक, इतिहास, कला एवं विज्ञान के विद्यार्थी, शिक्षक एवं जनसाधारण भी अपने जीवन में संग्रहालयों का भ्रमण एवं अवलोकन अवश्य करते हैं। संग्रहालयों को देखने से ज्ञान समृद्ध होता है और यह एक अनूठा अनुभव भी होता है। वर्तमान समय के कई महान नगर अपने श्रेष्ठ संग्रहालयों के कारण विश्व भर में जाने जाते हैं।

    राजस्थान में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख विदेशी एवं 4 करोड़ स्वदेशी पर्यटक आते हैं। इन पर्यटकों की सुविधा के लिए पूरे राज्य में सरकारी क्षेत्र में 18 संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। अनेक निजी संस्थाएं, व्यक्ति एवं परिवार भी अपने संग्रहालयों का संचालन करते हैं। इस पुस्तक में इन संग्रहालयों में संगृहीत सामग्री के साथ-साथ उनकी विशेषताओं को भी समाहित करने का प्रयास किया गया है।

    पाठकों की सुविधा के लिए पुस्तक के प्रारंभ में संग्रहालय की अवधारणा का विकास, आदिम संग्रहालयों के चिह्न, परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय, राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास तथा राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री का परिचय दिया गया है।

    आशा है यह पुस्तक शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, पर्यटकों एवं विभिन्न वर्गों के पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    63, सरदार क्लब योजना

    वायुसेना क्षेत्र जोधपुर


  • Share On Social Media:
  • अध्याय - 1 संग्रहालय की अवधारणा का विकास

     16.06.2018
    अध्याय - 1 संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    अध्याय - 1


    संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    जब भी मनुष्य में यह समझ विकसित हुई होगी कि अपने द्वारा संचित ज्ञान को उसके प्रमाणों, चिह्नों एवं प्रतीकों के साथ, भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखा जाए, उसी समय संग्रहालय की भी नींव पड़ी होगी।

    आदिम संग्रहालय एवं चित्रशालाएं

    आदिम युगीन शैल-चित्रों को संग्रहालयों अथवा चित्रशालाओं का सबसे प्रारंभिक रूप माना जा सकता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में स्थित पर्वतीय गुफाओं में ये शैल-चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें पशु-पक्षी, मानव, शिकारी, खेत आदि का चित्रण किया गया है। जम्मू-काश्मीर राज्य के श्रीनगर की मदानी मस्जिद में चट्टान के एक टुकड़े पर 5000 साल पुराने भित्ति चित्र मिले हैं जिनमें एक ओर तारे बने हुए हैं तथा दूसरे छोर पर ड्रैगन जैसा सिर है। इस स्थान का मूल भित्तिचित्र धुंधला पड़ चुका है किंतु उसकी एक प्रति कश्मीर विश्वविद्यालय में सहेजकर रखी गई है। इस भित्तिचित्र में भारतीय खगोल की एक दुर्लभ घटना का चित्रांकन किया गया है तथा इसमें दो सूर्य एक साथ दिखाए गए हैं। इस भित्तिचित्र में दिखाई दे रहा दूसरा सूर्य वास्तव में एक सुपरनोवा है जो किसी पुराने तारे के टूटने से उत्पन्न हुई ऊर्जा होती है। भीषण विस्फोट के बाद यह कई दिनों तक चमकदार दिखाई देता है जो दूसरे सूर्य के समान लगता है। इस चित्र में तारों के साथ सूर्य दिखाने का आशय है कि यह सुपरनोवा तब भी चमक रहा था जब रात्रि में तारे चमक रहे थे।

    राजस्थान में शेखवाटी क्षेत्र के अजीतगढ़, डोकन, सोहनपुरा, गुढागौड़जी में शैलचित्र खोजे गए हैं। रावतभाटा से 33 कलिोमीटर दूर दरा अभ्यारण्य में तिपटिया नामक स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के शैल-चित्र मिले हैं। धरती से लगभग 500 फुट ऊँचा तीन मंजिल वाला शैलाश्रय है जिसकी दूसरी एवं तीसरी मंजिलें चित्रित हैं। उत्तरपाषाण कालीन मानवों द्वारा चित्रित इन शैल-चित्रों में बैल, गाय, हिरण, सूअर एवं काल्पनिक पशुओं के चित्रों का अंकन किया गया है। इन चित्रों का रंग गहरा कत्थई तथा लाल रंग का है तथा ये रेखाओं के माध्यम से बनाए गए हैं। प्रागैतिहासिक काल के अनेक चित्रों के ऊपर ही ऐतिहासिक काल के चित्र भी बना दिए गए हैं। इस काल के चित्रों में देवी-देवता, योद्धा, घुड़सवार एवं ऊँट सवार प्रमुख हैं। ये पीले रंग तथा गेरू से बने हैं। इस काल के चित्रों में गौपालक द्वारा गायों को चराने, कहारों द्वारा वधू की डोली ले जाने एवं एक नृत्यांगना द्वारा नृत्य करने के दृश्य भी अंकित हैं जिनसे स्पष्ट है कि इस काल में मानव सभ्यता काफी आगे बढ़ चुकी थी। आहू नदी के तट पर झालावाड़ जिले में आमझीरी नाला के निकट कई शैलाश्रय खोजे गए हैं जिनमें प्रस्तर युगीन मानवों द्वारा बनाई गई चित्रशाला देखी जा सकती है। इन चित्रों में बैल, हिरण, बकरी, बारहसिंघा, नीलगाय, चीता, मानव आकृतियां, धनुष-बाण, पशु-शिकार के दृश्य आदि अंकित हैं।

    पूर्वोत्तर भारत की कुछ आदिम जातियों की बस्तियों में उन मनुष्यों की खोपड़ियों के संग्रह पाये गए हैं जिन्हें इन आदिम जातियों द्वारा मारकर खा लिया गया था। ये खोपड़ियां जातीय गौरव एवं शौर्य प्रदर्शन के लिए संगृहीत की गईं। इन्हें भी संग्रहालयों का आदिम रूप माना जा सकता है। इसी प्रकार मनुष्यों द्वारा विविध पशुओं के सिर, सींग, खाल आदि के संग्रहालय भी बनाए जाते रहे हैं।

    परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय

    विश्व के कुछ देशों में मिले शैल-चित्रों में अंतरिक्ष यानों एवं अंतरक्षि यात्रियों जैसी आकृतियां देखी गई हैं। वर्ष 2017 में फ्रांस में 38 हजार वर्ष पुराना एक ऐसा चित्र पाया गया है जिसमें पिक्सल्स की सहायता से आकृतियां उकेरी गई हैं। आधुनिक कम्प्यूटर भी इसी पिक्सल तकनीक का प्रयोग करते हैं। इसे विश्व का सबसे पुराना शैलचित्र माना गया है। उस समय धरती पर उत्तर-पाषाण काल चल रहा था तथा होमोसेपियन मानवों द्वारा पिक्सल्स का उपयोग करके चित्रों का निर्माण करना संभव नहीं था। इसलिए अनुमान है कि शैल-चित्रों में मिले अंतरिक्ष यानों तथा अंतरिक्ष यात्रियों के चित्रों और इस पिक्सल युक्त चित्र में कोई सम्बन्ध होना चाहिए। ये संभवतः उस काल में धरती पर परग्रही मनुष्यों की हलचल का परिणाम थे जो इनके माध्यम से अपनी कहानी धरती पर भविष्य में आने वाली मानव प्रजातियों के लिए छोड़कर गए थे।

    यद्यपि धरती पर परग्रही जीवों के आवागमन को अभी तक अकादमिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है किंतु इस दिशा में अनुसंधान कार्य अनवरत चल रहे हैं। कुछ स्थानों पर पत्थरों की विशालाकाय रचनाएं एवं पत्थरों के माध्यम से धरती पर बनाई गई ज्यामितीय रचनाएं पाई गई हैं, इन्हें भी परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय माना जा सकता है। कुछ विद्वान मिश्र, चीन, कम्बोडिया सहित अनेक देशों में मिलने वाले पिरामिडों को भी परग्रही जीवों द्वारा एक विशिष्ट क्रम में बनाए गए संग्रहालय एवं अंतरिक्ष से आने वाले मानवों के लिए दिशा सूचक अथवा संकेतक मानते हैं। मिश्र के पिरामिडों में शवों के साथ मिली बहुमूल्य सामग्री भी एक प्रकार के संग्रहालय ही हैं।

    धार्मिक संग्रहालयों का विकास

    सभ्यता के विकास के साथ जब कलात्मक मंदिरों का निर्माण आरम्भ हुआ तो संग्रहालयों को एक नया आयाम प्राप्त हुआ। भारतीय देवालय स्वयं ही देव-विग्रहों के संग्रहालयों के रूप में सामने आए। मंदिरों की प्रत्येक वस्तु पवित्र मानी जाती थी। इसलिए मंदिर में कुछ समय तक उपयोग होने के बाद अनुपायोगी हो गई सामग्री यथा- कलात्मक प्रस्तर, शिखर खण्ड, स्तम्भ, देव-प्रतिमाएँ, धर्म-ग्रंथ, धार्मिक चित्र, लोक साहित्य, बर्तन तथा अन्य वस्तुएं कचरे में नहीं फैंकी जाती थीं, वरन् मंदिर परिसर किसी स्थान पर रख दी जाती थीं, धीरे-धीरे यह सामग्री संग्रहालय का रूप ले लेती थी। भारतीयों की इसी प्रवृत्ति के कारण अजमेर में स्थित ढाई दिन का झौंपड़ा (मूलतः बारहवीं शताब्दी का सरस्वती मंदिर) से अनेक महत्वपूर्ण शिलालेख, पत्थर पर उत्कीर्ण नाटक एवं दुर्लभ देव-प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं जिनमें से कुछ आज भी इस परिसर में बने कक्षों में देखी जा सकती हैं। इसमें से कुछ सामग्री अजमेर के राजकीय संग्रहालय में संजोई गई है तथा भारतीय संग्रहालय कलकत्ता को भेजी गई है। बीकानेर के तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के मंदिर में बहुत सी दुर्लभ प्रतिमाएँ संगृहीत की गई हैं। बीकानेर के दसवें राठौड़ शासक अनूपसिंह (ई.1638-98) ने मुगलों की ओर से दक्षिण में अनेक लड़ाइयां लड़ीं एवं उस दौरान दक्षिण भारत से अनेक प्रतिमाओं को सुरक्षित बचाकर बीकानेर भेज दिया। अन्यथा ये मूर्तियां औरंगजेब द्वारा नष्ट कर दी जातीं।

    राज्याश्रित संग्रहालयों का विकास

    रियासती काल में राजाओं-महाराजाओं द्वारा अपने पुरखों के चित्रों, तलवारों, बंदूकों, भालों, ढालों, पालकियों, रथों, शिरस्त्राणों, कवचों, तूणीरों, वस्त्राभूषणों आदि विविध राजसी सामग्री को नष्ट नहीं करके, उन्हें एक स्थान पर संजो लिया जाता था ताकि उन पुरखों की स्मृति बनी रहे। इन संग्रहालयों तक जन-सामान्य की पहुंच नहीं होती थी। ये केवल राजसी व्यक्तियों द्वारा देखे जाने के लिए होते थे। इस तरह के संग्रहों का उल्लेख प्राचीन भारतीय इतिहास एवं साहित्य में हुआ है।

    चित्रशालाएं एवं चित्रित पोथियाँ

    रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्यों में रंगशाला, चित्रशाला एवं विश्वकर्मा मन्दिर का उल्लेख मिलता है। कृष्ण-धर्मोत्तर पुराण में चित्रशालाओं का उल्लेख हुआ है जहाँ चित्र संगृहीत किए जाते थे। गुरुकुलों, ऋषि-आश्रमों, हिन्दू मंदिरों, जैन स्थानकों एवं बौद्ध उपाश्रयों आदि में भी सचित्र पोथियाँ लिपिबद्ध की जाती थीं। ये चित्र पौराणिक एवं धार्मिक कथाओं के अंकन के साथ-साथ कला के अप्रतिम उदाहरण भी हैं। भारतीय शासकों ने अपने दरबारी चित्रकारों से साहित्यिक एवं धार्मिक विषयों के चित्र बनवाए तथा उनका संग्रह किया, राजाओं-महाराजाओं के संग्रहालय पुस्तक प्रकाश, सरस्वती भण्डार, सूरतखाना आदि नामों से जाने जाते थे। मुगल शासकों के पुस्तकालय कुतुबखाना के नाम से एवं चित्रसंग्रह तस्वीरखाना के नाम से जाने जाते थे। इन्हें पोथीखाना तथा कारखाना भी कहा जाता था और इनमें चित्रित एवं अचित्रित ग्रंथों का प्रतिलिपिकरण एवं संग्रहण होता था। मुगलकाल में भी अरबी, फारसी, संस्कृत, हिन्दी, ब्रज, डिंगल आदि विविध भाषाओं के लेखकों और कवियों की कृतियों को संरक्षण प्रदान किया गया।

    भारत के लगभग सभी प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों एवं राजमहलों में भित्तिचित्रों का अंकन किया गया। ये उस काल की चित्रशालाओं एवं चित्रवीथियों का ही रूप हैं। बीकानेर के भांडाशाह जैन मंदिर में रंगमंडप की चित्रकारी बीकानेर के प्रसिद्ध मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों द्वारा की गई है जिनमें जैन कथा साहित्य, नरक यातना, रोहणियाचार, उग्रसेन का महल और गिरनार आदि के अनेक चित्र अंकित हैं। बीकानेर के सुप्रसिद्ध चित्रकार मुराद बख्श ने इस मंदिर की दीवारों पर स्वर्णयुक्त मीनाकारी का कार्य किया। मीनाकारी के माध्यम से ही चित्रकार द्वारा पशु-पक्षियों और फूल-पत्तियों के आकर्षक एवं अद्भुत चित्र बनाए गए हैं। बीकानेर के जूनागढ़, जोधपुर के मेहरानगढ़, नागौर के स्थल दुर्ग, शेखावाटी की हवेलियों में बनाए गए भित्तिचित्रों पर कई शोध ग्रंथ लिखे जा सकते हैं।

    बीकानेर के जूनागढ़ के महलों में सोने और मीने की कारीगरी देखकर लगता है मानो महंगे एवं सुंदर फारसी गलीचों को काटकर ही छतों और दीवारों पर चिपका दिया गया है। दीवारों, छतों एवं खम्भों पर तरह-तरह के बेल-बूटे, फूलपत्ती, पशु-पक्षी और भांति-भांति के चित्र बने हुए हैं। छतों एवं खम्भों के बीच की दीवारों पर लम्बी-लम्बी चित्रकथाएं भी अंकित हैं। अनूप महल के दरवाजों एवं किवाड़ों की चित्रकारी देखते ही बनती है। बादल महल की छतें कड़कड़ाती हुई बिजली से चित्रांकित हैं तथा दीवारों पर पानी की धाराएं गिरती हुई दिखाई देती हैं। बीकानेर की रामपुरिया हवेली में बने आयताकार आंगन के बरामदे में लगभग तीन दर्जन धार्मिक चित्र बने हुए हैं। इस हवेली के अतिथि गृह में बीकानेर शैली के लगभग एक दर्जन चित्र बने हुए हैं। राजपूताना की बहुत से रियासतों में बनी साधु-संतों एवं राजा-रानियों की छतरियों के भीतर भी चित्र बनाए गए हैं जो चित्रवीथियों का काम करते थे। जोधपुर एवं जालोर के नाथ सम्प्रदाय के मंदिरों में नाथ साधुओं एवं नाथ सम्प्रदाय से सम्बन्धित देवी-देवताओं के चित्र बने हुए हैं। मेहरानगढ़ दुर्ग में भी नाथशैली के चित्र देखे जा सकते हैं। इस प्रकार पूरे राज्य में स्थित मध्यकालीन दुर्गों, महलों, मंदिरों, हवेलियों आदि में चित्रवीथियां एवं चित्रशालाएं बनी हुई हैं। शेखावाटी की हवेलियों में भारत की सर्वश्रेष्ठ चित्रशालाएं बनी हुई हैं।

    ब्रिटिश काल में संग्रहालयों की विषय-वस्तु का विस्तार

    अंग्रेजों के आगमन के साथ ही संग्रहालयों की विषय-वस्तु का विस्तार होने लगा। उनकी विषय-वस्तु निजी न होकर सार्वजनिक होने लगी। संग्रहालयों का आयाम राजसी वस्त्राभूषणों तथा अस्त्र-शस्त्रों आदि से ऊपर उठकर सामाजिक परम्पराओं, क्षेत्रीय संस्कृतियों एवं हस्तकला सामग्रियों आदि के लिए भी खुलने लगा। उन्होंने प्राकृतिक इतिहास को संग्रहालयों की विषय वस्तु का आधार बनाया तथा संग्रहालयों के दरवाजे विश्व भर के देशों से संगृहीत की गई सामग्री के लिए खोल दिए। 17वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक संग्रहालय शब्द का आशय प्रायः एक ऐसे भवन से लगाया जाता था जिसमें पुरावस्तुओं, प्राकृतिक इतिहास तथा परम्परागत कलाकृतियों जैसी पुरानी वस्तुओं को रखा जा सके। समय के साथ विश्वभर में संग्रहालयों की भूमिका और उद्देश्य में परिवर्तन आया। इसे कला को सीखने की इच्छा को समर्पित भवन के रूप में देखा गया। संग्रहालय शब्द को पहचान मिली और समाज में संग्रहालय की भूमिका महत्वपूर्ण बन गयी। आज का संग्रहालय न केवल विविध वस्तुओं को संकलित करके रखने वाला भवन है, अपितु यह सीखने और सिखाने का प्रमुख संस्थान भी है। इस प्रकार आधुनिक संग्रहालय ज्ञान के संरक्षण के साथ-साथ ज्ञान के विस्तार एवं शोध केन्द्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।

    आधुनिक संग्रहालयों की विषय-वस्तु

    आधुनिक संग्रहालय एक ऐसा स्थान है जहाँ, विभिन्न युगों में घटित घटनाओं के चिह्न, अवशेष, चित्र, मॉडल आदि का संग्रहण किया जाता है। अर्थात् संग्रहालय में धरती के किसी भी भाग में अथवा ब्रह्माण्ड के किसी भी पिण्ड पर किसी भी कालखण्ड में विकसित मिट्टी, चट्टान, शैवाल, खनिज, वनस्पति, पुष्प, तितली, कीट, पक्षी, विविधि प्रकार के जीव-जन्तु, उनके जीवाश्म, जीवों के अस्थि-पंजर, मानवों द्वारा प्रयुक्त उपकरण, औजार, शिल्प, स्थापत्य आदि विविध सामग्री का संग्रह किया जाता है। साथ ही खगोलीय घटनाओं से लेकर भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामरिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक जगत में घटी घटनाओं तथा उनसे सम्बद्ध महापुरुषों आदि के चित्र, प्रतिमाएँ, चार्ट, ग्राफ, यंत्र, वेशभूषा आदि का संकलन किया जाता है।

    सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि विविध कालखण्डों में प्रकृति एवं जीवों द्वारा छोड़े गए अवशेष ही संग्रहालय की मुख्य विषय-वस्तु होते हैं। मानव द्वारा अर्जित ज्ञान का जिस किसी भी प्रकार से निरूपण किया जा सके, वह सब, संग्रहालय की विषय वस्तु बन सकती है। डाक टिकटों से लेकर माचिस की डिब्बियों, सिगरेट केस, कुर्सियों, रेलवे इंजन एवं डिब्बे, बाथरूम यूटेंसिल्स, ताले, घड़ियाँ, बंदूकें, तोपें, कारें, हस्तलिखित पोथियां, चित्रित पोथियां, ताड़पत्र, जन्म कुण्डलियाँ, शिलालेख, मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन, ग्रामीण जीवन में काम आने वाली सामग्री, कृषियंत्र, झाड़ू, ग्रामोफोन, रेडियो, गुड़ियाएं, पेपरवेट आदि विभिन्न प्रकार की सामग्री को विश्व भर के संग्रहालयों एवं भारत के संग्रहालयों की विषय-वस्तु बनाया गया है। अमरीका में फर्स्ट लेडी (अर्थात् अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी) के गाउन भी संग्रहालय को दान किए गए तथा उनका प्रदर्शन आज भी किया जा रहा है।

    आधुनिक संग्रहालयों की स्थापना के उद्देश्य

    सामान्यतः संग्रहालय के माध्यम से युग-युगीन मानवीय कार्यकलापों, इतिहास एवं पर्यावरण की विरासतों के संरक्षण के लिए उनका संग्रह, शोध, प्रचार या प्रदर्शन किया जाता है। इस सामग्री का उपयोग इतिहास लेखन, शिक्षण, अध्ययन और मनोरंजन आदि विविध उद्देश्यों के लिए होता है। संग्रहालयों के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटकों के बीच क्षेत्र विशेष की संस्कृति का प्रदर्शन करके लाभार्जन किया जाता है।

    आधुनिक संग्रहालयों का वर्गीकरण

    आज किसी भी विषय-वस्तु को लेकर संग्रहालय स्थापित कर दिया जाता है। विषय वस्तु के आधार पर संग्रहालयों का निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

    (1.) कला संग्रहालय: चित्रकला, संगीत कला, लोक वाद्ययंत्र, शास्त्रीय वाद्ययंत्र, हस्तकलाओं के नमूने, नृत्यकला से सम्बन्धित सामग्री आदि।

    (2.) ऐतिहासिक संग्रहालय: स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, देशी रजवाड़ों का इतिहास, संवैधानिक प्रगति का इतिहास, धार्मिक सम्प्रदायों का इतिहास आदि।

    (3.) पुरातत्व संग्रहालय: प्राचीन सभ्यता के स्थलों से प्राप्त बर्तन, मूर्तियां, भवन सामग्री, आभूषण, सिक्के, खेत, कुंए आदि।

    (4.) विज्ञान और प्रौद्योगिकी संग्रहालय: मिट्टियां, पुष्प, तितलियां, खनिज, अंतरिक्ष विज्ञान, विज्ञान के सिद्धांत आदि।

    (5.) नृशास्त्रीय संग्रहालय: विभिन्न काल खण्डों के आदिमानवों के कंकाल, खोपड़ी, ममी आदि।

    (6.) महापुरुषों पर केन्द्रित संग्रहालय: सुभाषचंद्र बोस, बालगंगाधर तिलक, अरविंद घोष, महाराजा अग्रसेन, महाराजा रणजीतसिंह आदि पर केन्द्रित संग्रहालय।

    (7.) पुस्तक मुद्रण कला संग्रहालय: प्रारंभिक मुद्रण कला, ट्रेडल मुद्रण मशीन, ऑफसेट मुद्रण मशीन आदि।

    (8.) डाक टिकट संग्रहालय: भारत में अब तक केवल दिल्ली में ऐसा संग्रहालय स्थापित किया गया है। निजी संग्रहकर्ताओं के पास अपने छोटे-छोटे डाक टिकट संग्रह हैं।

    (9.) बाल संग्रहालय: बालोपयोगी विज्ञान, कला सामग्री, खिलौने, ट्राइसाइकिल, फोटोग्राफ, पेंटिंग आदि।

    (10.) स्वास्थ्य संग्रहालय: स्वच्छता, स्वास्थ्य समस्याएं, घातक बीमारियां, चिकित्सा पद्धतियां, आदि।

    (11.) अस्त्र-शस्त्र संग्रहालय: तोपें, बंदूकें, भाले, तलवार, ढालें, खुकरी, चाकू, छुरे, टैंक, लड़ाकू विमान आदि। जोधपुर दुर्ग में प्राचीन तोपों का संग्रहालय है।

    (12.) दैनिक उपयोग की वस्तुएं: वस्त्र, जूते, टोपियां, पगड़ियां, साफे, कोट, ताले, घड़ियां, कैंचियां, बागवानी के उपकरण, खेती के उपकरण आदि। जोधपुर में पाग-पगड़ियों का संग्रहालय अपने आप में अनूठा है। उदयपुर में बागोर की हवेली में भी पाग-पगड़ियों का संग्रहालय है।

    (13.) चित्रशालाएं: इस प्रकार के संग्रहालयों में विविध कालखण्डों में, विविध क्षेत्रों अथवा प्रांतों में, विविध शैलियों अथवा उपशैलियों में एवं विविध कलाकारों द्वारा निर्मित चित्रों अर्थात् पेंटिंग एवं फोटोग्राफ प्रदर्शित किए जाते हैं।

    (14.) राष्ट्रीय संग्रहालय: इस प्रकार के संग्रहालय में देश-विदेश के दर्शकों को सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व करने वाली एवं जीवन के लगभग प्रत्येक पक्ष से सम्बन्ध रखने वाली सामग्री का प्रदर्शन किया जाता है तथा उसे पुरातत्व, कला, पेंटिंग्स, अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र एवं वेशभूषा आदि विभागों में विभक्त किया जाता है। इन संग्रहालयों में देश से बाहर से भी सामग्री प्राप्त कर प्रदर्शित की जाती है।

    संग्रहालयों की समस्याएं

    संग्रहालयों की स्थापना, संरक्षण एवं संचालन का कार्य कठिनाइयों से भरा हुआ है। इसके लिए दक्ष व्यक्तियों, विपुल धन एवं विस्तृत भवन आदि की आवश्यकता होती है। संग्रहालयों में संकेतकों की स्थापना करने, दस्तावेजीकरण करने और श्रेणीकरण करने के लिए उत्साही एवं योग्य व्यक्ति बहुत कम संख्या में उपलब्ध हो पाते हैं। संग्रहालयों का परिवेश आकर्षक एवं उत्साहवर्द्धक बनाया जाना आवश्यक है, जहाँ दर्शक बिना किसी तनाव एवं संकोच के पहुंच सके। भारतीय संग्रहालयों के लिए इसी प्रकार के आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है, ताकि यह विश्व भर के संग्रहालयों की तुलना में स्वयं को स्तरीय सिद्ध कर सकें। संग्रहालय में प्रदर्शित प्रत्येक सामग्री का विवरण, साधारण दर्शक को सहज रूप से उपलब्ध कराया जाना आवाश्यक है। बहुभाषी प्रदर्शकों (गाइड) की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है। प्रशिक्षित एवं योग्य गाइड के बिना संग्रहालय को देखने को कोई अर्थ नहीं है। जब तक दर्शकों को संग्रहालय में प्रदर्शित प्रमुख वस्तुओं की विस्तृत और सटीक जानकारी नहीं मिलेगी, तब तक दर्शक का संग्रहालय से समुचित जुड़ाव होना संभव नहीं है।

    राजस्थान का निर्माण होने के बाद राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी (जोधपुर) की स्थापना ई.1955 में, साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर की स्थापना ई.1955 में तथा प्रताप शोध प्रतिष्ठान की स्थापना ई.1967 में हुई थी। राजस्थान में इस प्रकार की संस्थाओं की स्थापना का उद्देश्य इतिहास एवं पुरातत्व के विद्यार्थियों को शोध सामग्री के मूल स्रोत उपलब्ध करवाना था। इन संस्थाओं को राजस्थान सरकार द्वारा 60 से 90 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध करवाया जाता था किंतु लगभग 50 वर्ष तक राजकीय संरक्षण देने के बाद, सरकार की नीतियों में परिवर्तन आने के कारण वर्ष 2011 में राजकीय अनुदान बंद कर दिया गया। इन संस्थाओं के प्रशिक्षित एवं अनुभवी कर्मचारियों एवं अधिकारियों को अन्य कार्यों में लगा दिया गया। राज्य सरकार के इस कदम के कारण प्रदेश में शोध कार्य को धक्का लगा है।

    संग्रहालयों से अपेक्षाएं

    संग्रहालय संचालकों का पहला और अंतिम उद्देश्य केवल यही होना चाहिए कि वे संग्रहालय में आने वाले प्रत्येक दर्शक की जिज्ञासाओं का समाधान करें। दर्शकों को संग्रहालय में लम्बी अवधि व्यतीत करने का अवसर दिया जाना चाहिए, जिससे वे शिक्षा और ज्ञान की अपनी जिज्ञासाओं का शमन कर सकें। साथ ही, वे कला, विज्ञान एवं विविध विषय पर आधारित सामग्री को भलीभांति समझ सकें। जन साधारण के लिए संग्रहालय किसी अजूबे से कम नहीं होता। उसके इस भाव को स्थायी बने रहने देने के लिए यह आवश्यक है कि संग्रहालय का संयोजन किसी अजूबाघर की ही तरह किया जाए। तभी जनसाधारण का जुड़ाव संग्रहालयों से बना रह सकेगा और वह अपने अतीत की सुनहरी एवं गौरवमयी परम्परा से भिज्ञ रह सकेगा।

    भारत में सार्वजनिक संग्रहालयों की स्थापना

    भारत के अनेक देशी रजवाड़ों में पुराने एवं नए हथियारों को एक स्थान पर एकत्रित करके रखने की परम्परा थी। जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी का आगमन हुआ तो इस परम्परा को और अधिक बढ़ावा मिला। ई.1784 में सर विलियम जोन्स ने कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी बंगाल की स्थापना की। सोसायटी द्वारा अपने पुस्तकालय में हस्तलिखित पोथियों, मानचित्रों, मुद्राओं, आवक्ष आकृतियों, चित्रों तथा अन्य सामग्री का संकलन किया गया। इस छोटे से संग्रहालय की स्थापना, देश में भावी संग्रहालयों की स्थापना के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुई तथा इसे व्यापक लोकप्रियता मिली। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत में पहली बार व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक संग्रहालय ने जन्म लिया।

    उन्नीसवीं शताब्दी संग्रहालयों की स्थापना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। एशियाटिक सोसायटी के प्रयासों से ई.1814 में भारतीय संग्रहालय कलकत्ता की स्थापना हुई जिसे भारत का प्रथम संग्रहालय होने का गौरव प्राप्त है। इसके बाद अन्य संग्रहालयों की स्थापना आरम्भ हुई। ई.1851 में केन्द्रीय संग्रहालय मद्रास की स्थापना हुई। इसी वर्ष बम्बई के ग्रांट मेडिकल कालेज में एशिया का प्रथम मेडिकल संग्रहालय स्थापित किया गया। ई.1863 में राजकीय संग्रहालय लखनऊ की स्थापना हुई। यह उत्तर प्रदेश का पहला संग्रहालय था। ई.1865 में राजकीय संग्रहालय मैसूर, ई.1868 में दिल्ली नगर पालिका संग्रहालय और ई.1874 में मथुरा संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1887, 1888, 1890 तथा ई.1894-95 में त्रिचूर, उदयपुर, भोपाल, जयपुर, राजकोट, पूना, बड़ौदा, भावनगर एवं त्रिचनापल्ली इत्यादि शहरों में विभिन्न संग्रहालयों की स्थापना हुई।

    बीसवीं शताब्दी में संग्रहालयों की स्थापना का काम और तेजी से आगे बढ़ा। ई.1914 में प्रिन्स ऑफ वेल्स म्यूजियम मुम्बई, ई.1920 में भारत कला भवन बनारस, हिन्दू विश्वविद्यालय संग्रहालय वाराणसी, ई.1929 में बॉटनीकल म्यूजियम इन्दौर तथा ई.1931 में इलाहाबाद संग्रहालय आदि संग्रहालयों की स्थापना हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में संग्रहालयों की नई भूमिका अनुभव की जाने लगी और अनेक बहुआयामी संग्रहालयों की स्थापना हुई। आजादी के दो वर्ष बाद ई.1949 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किया गया। आज यह बैद्धिक और शैक्षणिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र है। भारत में अब तक सरकारी क्षेत्र में 400 से अधिक संग्रहालयों की स्थापना हो चुकी है। निजी क्षेत्र के संग्रहालयों की संख्या अलग है।

    आधुनिक भारत के निर्माता भारत के ऐतिहासिक अतीत से अवगत थे और वे इसकी समृद्धि, इसके महत्व तथा भावी पीढ़ियों के लिए इसकी उत्सुकता से भी परिचित थे। उन्हें संग्रहालय जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के निर्माण करने की प्रासंगिकता का भी ज्ञान था। संग्रहालयों की यह यात्रा निश्चित रूप से आने वाले समय में अपने कलेवर और वस्तु-विषय में और भी बड़े परिवर्तन करेगी।

    भारत में संग्रहालयों का वैज्ञानिक पद्धति से विकास

    भारत सरकार द्वारा देश में वैज्ञानिक पद्धति से संग्रहालयों का विकास किया गया है। राष्ट्रीय स्तर के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालयों की स्थापना एवं नियंत्रण का कार्य भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा किया जाता है। देश में संस्कृति मंत्रालय के अधीन सात राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किए गए हैं-

    (1.) इलाहाबाद संग्रहालय,

    (2.) भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता,

    (3.) राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथी, नई दिल्ली

    (4.) राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, मुम्बई

    (5.) राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, बैंगलुरू

    (6.) सालारजंग संग्रहालय हैदराबाद,

    (7.) विक्टोरिया मैमोरियल कलकत्ता।

    देश में विज्ञान के प्रति रुचि जाग्रत करने एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के अधीन 25 संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। साथ ही राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद द्वारा राज्य सरकारों के लिए 18 रीजनल साइंस सेंटर, साइंस सेंटर एवं सबसेंटर भी स्थापित किए गए हैं। भारत सरकार द्वारा 44 संग्रहालय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन स्थापित किए गए हैं। देश में बहुत से संग्रहालय राज्य सरकारों द्वारा स्थापित एवं संचालित किए जा रहे हैं।

    देश में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक एवं औद्योगिक संगठनों द्वारा भी अनेक संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। कुछ धार्मिक सम्प्रदायों ने अपने प्राचीन गौरव का स्मरण बनाए रखने एवं आगामी पीढ़ियों को इस गौरव से परिचित कराने के उद्देश्य से भी संग्रहालय स्थापित किए हैं जिनमें सेंट्रल सिक्ख म्यूजियम हरमिंदर साहिब अमृतसर, महाराजा रणजीतसिंह मार्टिªयल आर्ट म्यूजियम अमृतसर, शहीद ए आजम सरदार भगतसिंह म्यूजियम कपूरथला, पंजाब स्टेट वार हीरोज मेमोरियल एण्ड म्यूजियम अमृतसर, विरासत ए खालसा आनंदपुर साहिब, द पार्टीशन म्यूजियम अमृतसर तथा इण्टरनेशलन सिक्ख म्यूजियम लुधियाना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

  • अध्याय - 1

    अध्याय - 1

    अध्याय - 1


    Share On Social Media:
  • अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

     18.06.2018
    अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

    अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री


    किसी भी देश, प्रदेश अथवा क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत से अवगत कराने में संग्रहालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संग्रहालय की सफलता अथवा लोकप्रियता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें किस प्रकार की सामग्री संजोई गई है तथा आमजन की उस सामग्री तक पहुंच कितनी है! आधुनिक काल में पुरातत्व, इतिहास, विज्ञान, प्रकृति आदि विविध विषयों पर आधारित संग्रहालयों की स्थापना की जाती है। संग्रहालयों के लिए विश्वसनीय, स्तरीय एवं प्रामाणिक सामग्री की उपलब्धता अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसके लिए विविध स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है तथा सतर्क रहकर सामग्री का चयन करना होता है। राजस्थान के संग्रहालयों में पाषाण कालीन सभ्यताओं के प्रस्तर उपकरणों से लेकर प्राचीन एवं मध्य काल की ऐतिहासिक सामग्री एवं कलाकृतियों से लेकर हस्तलिखित ग्रंथ, ताड़पत्र, पाण्डुलिपियां, चित्रित ग्रंथ, चित्रमालाएं, तांत्रिक यंत्र आदि मसाग्री संजोई गई है। इस विशद सामग्री का परिचय प्राप्त करने से पहले राजस्थान के उन स्थलों के बारे में जानना आवश्यक है जहाँ से यह विविध सामग्री प्राप्त की गई है।

    पाषाण कालीन सभ्यता स्थल

    राजस्थान में मानव सभ्यता पुरा-पाषाण, मध्य-पाषाण तथा उत्तर-पाषाण काल से होकर गुजरी। राजस्थान में आदि मानव द्वारा प्रयुक्त जो प्राचीनतम पाषाण उपलब्ध हुए हैं, वे लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने हैं। पुरा-पाषाण काल डेढ़ लाख वर्ष पूर्व से पचास हजार वर्ष पूर्व तक का काल समेटे हुए है। इस काल में हैण्ड एक्स, क्लीवर तथा चॉपर आदि का प्रयोग करने वाला मानव बनास, गंभीरी, बेड़च, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों में (आज जहाँ बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़ तथा जयपुर जिले हैं) रहता था जहाँ प्रस्तर युगीन मानव के चिह्न मिले हैं। इस युग के भद्दे तथा भौंडे हथियार अनेक स्थानों से मिले हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि लगभग पूरे प्रदेश में इस युग का मानव फैल गया था। इन उपकरणों एवं औजारों का उपयोग करने वाला मनुष्य शिकार से प्राप्त वन्य पशु, प्राकृतिक रूप से प्राप्त कन्द, मूल, फल, पक्षी, मछली आदि खाता था।

    नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), काकोनी, (बारां जिले में परवन नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से उस काल के पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं।

    राजस्थान में मध्य-पाषाण काल आज से लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। ये औजार लूनी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में और विराटनगर में भी प्राप्त हुए हैं। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं हुआ था। उत्तर-पाषाण काल का आरंभ लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व से माना जाता है। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाए गए। इस युग के औजार चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च एवं गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ एवं नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली एवं गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इस युग के उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा नामक स्थानों पर मिले हैं।

    ताम्र युगीन दुर्लभ सामग्री

    राजस्थान में प्राप्त प्राचीनतम ताम्र सामग्री ईसा से लगभग 3000 साल पुरानी है। अर्थात् आज से लगभग 5000 साल पुरानी। सीकर जिले की नीमकाथाना तहसील में कांटली नदी के मुहाने पर स्थित गणेश्वर में हजारों की संख्या में ताम्बे के तीर, ताम्बे के 60 परशु, मछली पकड़ने के कांटे, ताम्बे के कंगन, ताम्बे की अंगूठियां आदि मिली हैं तथा इस क्षेत्र के आसपास ताम्रअयस्क को गलाकर ताम्बा निकालने की भट्टियां भी प्राप्त हुई हैं। किराडोत गांव से ताम्बे के छल्ले प्राप्त हुए हैं। ई.1934 में कुराड़ा (जिला नागौर) से ताम्बे की 103 वस्तुएं प्राप्त हुई थीं जिनमें से केवल 10 वस्तुएं नमूने के लिए रखकर शेष सामग्री जानकारी के अभाव में कबाड़ियों को नीलामी में बेच दी गई। ई.1982 में भरतपुर क्षेत्र में ताम्रयुगीन दुर्लभ अस्त्रों का खजाना मिला। इनमें चार जोड़े कांटे वाले हारपून-9, एक जोड़े कांटे वाले हारपून-3, ताम्रपरशु- सात, ताम्रछेणी-दो, ताम्रभालों के अग्रभाग-4 तथा ताम्बे की तलवारें-3, इस प्रकार कुल 33 वस्तुएं एक साथ प्राप्त हुई थीं। राजस्थान के अन्य स्थलों से भी ताम्रयुगीन सभ्यता की सामग्री प्राप्त हुई है। यह सभ्यता महाभारत काल के लगभग पांच सौ वर्ष बाद की तथा आज से लगभग 5000 साल पुरानी है।

    ताम्र, कांस्य एवं लौह युगीन सभ्यताओं के स्थल

    गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आयी हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत एवं चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल- माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सभी स्थलों पर ताम्र उपकरण मिले हैं। लौह युगीन सभ्यताओं में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता के थेड़

    सिंधु नदी हिमालय पर्वत से निकल कर पंजाब तथा सिंध प्रदेश में बहती हुई अरब सागर में मिलती है। इस नदी के दोनों तटों पर तथा इसकी सहायक नदियों के तटों पर जो सभ्यता विकसित हुई उसे सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं मोहेनजोदड़ो सभ्यता कहा जाता है। यह तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता थी तथा इसका काल ईसा से 5000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा से 1750 वर्ष पूर्व तक माना जाता है। राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष कालीबंगा, पीलीबंगा एवं रंगमहल आदि में प्राप्त हुए हैं। गंगानगर जिले में नाईवाला की सूखी धारा, रायसिंहनगर से अनूपगढ़ के दक्षिण का भाग तथा हनुमानगढ़ से हरियाणा की सीमा तक के सर्वेक्षण में पाया गया है कि नाईवाला की सूखी धारा में स्थित 4-5 टीलों पर गाँव बस चुके हैं।

    दृषद्वती के सूखे तल में भी काफी दूर तक टीले स्थित हैं। इस तल में स्थित 7-8 थेड़ों में हड़प्पाकालीन किंतु खुरदरे एवं कलात्मक कारीगरी रहित मिट्टी के बरतन के टुकड़ों की बहुतायत थी। सरस्वती तल में हड़प्पाकालीन छोटे-छोटे एवं उन्हीं के पास स्लेटी मिट्टी के बरतनों वाले उतने ही थेड़ मौजूद थे। हरियाणा की सीमा पर ऐसे थेड़ भी पाये गए जिन पर रोपड़ की तरह दोनों प्रकार के हड़प्पा एवं स्लेटी मिट्टी के ठीकरे मौजूद थे। हनुमानगढ़ किले की दीवार के पास खुदाई करने पर रंगमहल जैसे ठीकरों के साथ कुशाण राजा हुविश्क का तांबे का एक सिक्का भी मिला जो इस बात की पुष्टि करता है कि भाटियों का यह किला एवं अंदर का नगर कुशाण कालीन टीले पर बना है। बीकानेर के उत्तरी भाग की सूखी नदियों के तल में 4-5 तरह के थेड़ पाये गए।

    सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पाकालीन 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। हनुमानगढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर स्थित पीलीबंगा से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कालीबंगा में पूर्वहड़प्पा कालीन एवं हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। इस स्थान का पता पुरातत्व विभाग के निदेशक अमलानंद घोष ने ई.1952 में लगाया था। ई.1961-62 में बी. के. थापर, जे. वी. जोशी तथा वी. वी. लाल के निर्देशन में इस स्थल की खुदाई की गयी। कालीबंगा के टीलों की खुदाई में दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों, घरों एवं धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। घरों में चूल्हों के अवशेष भी मिले हैं। कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर घर बनाते थे। 

    कालीबंगा से प्राप्त सामग्री में बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले एवं ऊपर से प्यालानुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, देवी की छोटी-छोटी मृदा-प्रतिमाएँ, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि सम्मिलित हैं। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं। यहाँ से मिली मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बाएं लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री भी प्राप्त हुई है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन केवल इसी स्थल पर मिले हैं।

    रंगमहल-बड़ोपल के थेड़

    सूरतगढ़-हनुमानगढ़ क्षेत्र में रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी आदि स्थलों के आसपास के क्षेत्र में कई थेड़ मौजूद हैं जिनमें से कुछ की खुदाई की गयी है। इनमें रंगमहल का टीला सबसे ऊँचा है। ई.1952-54 के बीच स्वीडिश दल द्वारा रंगमहल के टीलों की खुदाई की गई। इस खुदाई से ज्ञात हुआ है कि प्रस्तर युग से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक यह क्षेत्र पूर्णतः समृद्ध था।यहाँ से प्रस्तर युगीन एवं धातु युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रंगमहल के टीलों पर पक्की ईंटें एवं रोड़े, मोटी परत एवं लाल रंग वाले बरतनों पर काले रंग के मांडने युक्त हड़प्पा कालीन सभ्यता के बरतनों के टुकड़े बिखरे हुए दिखाई देते हैं। यहाँ से ताम्बे के दो कुषाण कालीन सिक्के, गुप्त कालीन खिलौने एवं परवर्ती काल के तांबे के 105 सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

    आहड़ सभ्यता

    सरस्वती-दृश्द्वती नदी सभ्यता से निकलकर इस प्रदेश के मानव ने आहड़, गंभीरी, लूनी, डच तथा कांटली आदि नदियों के किनारे अपनी बस्तियां बसाईं तथा सभ्यता का विकास किया। इन सभ्यताओं को पश्चिमी विद्वानों ने 7 हजार से 3 हजार वर्ष पुराना ठहराया है। कुछ भारतीय विद्वानों ने पश्चिमी विद्वानों द्वारा बताए गए ईसा पूर्व के इतिहास को इन तिथियों से भी तीन हजार वर्ष पूर्व का होना सिद्ध किया है। यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ नदी के आस-पास, बनास, बेड़च, चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी, वागन, भीलवाड़ा जिले में खारी तथा कोठारी आदि नदियों के किनारे अजमेर तक फैली थी। इस क्षेत्र में प्रस्तर युगीन मानव निवास करता था। आहड़ टीले का उत्खनन डॉ. एच. डी. सांकलिया के नेतृत्व में हुआ था। प्राचीन शिलालेखों में आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती अंकित है।

    दसवीं एवं ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर अथवा आघट दुर्ग कहा जाता था। बाद के काल में इसे धूलकोट भी कहा जाता था। उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर 1600 फुट लम्बे और 550 फुट चौड़े धूलकोट के नीचे आहड़ की पुरानी बस्ती दबी हुई है जहाँ से ताम्रयुगीन सभ्यता प्राप्त हुई है। ये लोग लाल, भूरे एवं काले मिट्टी के बर्तन काम में लेते थे जिन्हें उलटी तपाई शैली में पकाया जाता था। घर पक्की ईंटों के होते थे। पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था। आहड़ से मानव सभ्यता के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रथम स्तर में मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दूसरा स्तर प्रथम स्तर के ऊपर स्थित है। यहाँ से बस्ती के चारों ओर दीवार भी मिली है। तीसरे स्तर से चित्रित बर्तन मिले हैं। चतुर्थ स्तर से ताम्बे की दो कुल्हाड़ियां प्राप्त हुई हैं। घरों से अनाज पीसने की चक्कियां, ताम्बे के औजार तथा पत्थरों के आभूषण मिले हैं। गोमेद तथा स्फटिक मणियां भी प्राप्त हुई हैं। तांबे की छः मुद्रायें एवं तीन मोहरें मिली हैं। एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित है जो तीर एवं तरकश से युक्त है। इस पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह मुद्रा दूसरी शताब्दी ईस्वी की है। यहाँ के लोग मृतकों को कपड़ों तथा आभूषणों के साथ गाढ़ते थे।

    बालाथल सभ्यता

    बालाथल उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यहाँ से ई.1993 में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 2500 तक की ताम्रपाषाण युगीन संस्कृति के बारे में पता चला है। यहाँ के लोग भी कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे। ये लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे तथा कपड़ा बुनना जानते थे। यहाँ से तांबे के सिक्के, मुद्रायें एवं आभूषण प्राप्त हुए हैं। आभूषणों में कर्णफूल, हार और लटकन मिले हैं। यहाँ से एक दुर्गनुमा भवन भी मिला है तथा ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन भी प्राप्त हुए हैं।

    बागोर सभ्यता

    भीलवाड़ा कस्बे से 25 किलोमीटर दूर कोठारी नदी के किनारे वर्ष ई.1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र के नेतृत्व में हुई खुदाई में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 500 तक के काल की बागोर सभ्यता का पता लगा। यहाँ के निवासी कृषि, पशुपालन तथा आखेट करते थे। यहाँ से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं। घर पत्थरों से बनाए गए हैं। बर्तनों में लोटे, थाली, कटोरे, बोतल आदि मिले हैं।

    गणेश्वर सभ्यता

    सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांटली नदी के तट पर गणेश्वर टीले की खुदाई ई.1979-87 के मध्य की गयी थी। यहाँ से तीन विभिन्न सांस्कृतिक चरणों की पहचान हुई है। निम्न स्तरों में सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनका उपयोग बाणाग्र, मत्स्य कांटे, भालाग्र, सुए आदि के रूप में होता था। मध्य स्तरों से हस्तनिर्मित एवं चाक निर्मित मृण्पात्र प्राप्त हुए हैं जिन्हें गणेश्वर-जोधपुरा मृदभाण्ड कहा जाता है। इनमें गोल एवं बल्ब के आकार के बड़े मटके, कैरीनेटेड घड़े, उथली परात एवं कटोरे आदि सम्मिलित हैं। अंतिम एवं ऊपरी स्तर से बड़ी संख्या में ताम्र वस्तुएं- बाणाग्र, छल्ले, चूड़ियां दरांती, गेंद, कुल्हाड़ियां आदि प्राप्त हुई हैं।

    ऊपरी चरण से प्राप्त कलश, तलसे, प्याले, हाण्डी आदि मृण्पात्रों में चित्र सज्जा भी उपलब्ध है। यहाँ से प्राप्त बर्तन हड़प्पा सभ्यता एवं गेरूवर्णीय मृणपात्र सभ्यताओं से अलग हैं। यह सभ्यता लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। ताम्र युगीन सभ्यताओं में यह अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन केन्द्र है। यह सभ्यता सीकर से झुंझुनूं, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली थी। यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय कांटली नदी में पर्याप्त जल था। यहाँ का मानव भोजन संग्रहण की अवस्था में था। यहाँ से ताम्र उपकरण एवं बर्तन बड़ी संख्या में मिले हैं। ऐसा संभवतः इसलिए संभव हो सका क्योंकि खेतड़ी के ताम्र भण्डार यहाँ से अत्यंत निकट थे।

    सरस्वती नदी सभ्यता के स्थल

    राजस्थान में वैदिक काल तथा उससे भी पूर्व सरस्वती एवं दृषद्वती नदियाँ प्रवाहित होती थीं। दसवीं सदी के आसपास दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान की गणना सारस्वत मण्डल में की जाती थी। यह पूरा क्षेत्र लूणी नदी बेसिन का एक भाग है। लूनी नदी सरस्वती की सहायक नदी थी। सरस्वती आज भी राजस्थान में भूमिगत होकर बह रही है। कुछ विद्वान घग्घर (हनुमानगढ़-सूरतगढ़ क्षेत्र में बहने वाली नदी) को सरस्वती का परवर्ती रूप मानते हैं। सरस्वती के किनारे काम्यक वन नामक घना वन था। महाभारत में सरस्वती के मरुप्रदेश में विलीन हो जाने का उल्लेख है। हनुमानगढ़ जिले में घग्घर को नाली कहा जाता है। यहाँ पर एक दूसरी धारा जिसे नाईवाला कहते हैं, घग्घर में मिल जाती है, जो असल में सतलज का प्राचीन बहाव क्षेत्र है। यह सरस्वती नदी का पुराना हिस्सा था। तब तक सिंधु में मिलने के लिए सतलज में व्यास का समावेश नहीं हो पाया था। हनुमानगढ़ के दक्षिण पूर्व की ओर नाली के दोनों किनारे ऊंचे-ऊंचे दिखाई देते हैं। सूरतगढ़ से तीन मील पहले ही एक और सूखी हुई धारा आकर घग्घर में मिलती है। यह सूखी धारा वास्तव में दृशद्वती है। सूरतगढ़ से आगे अनूपगढ़ तक तीन मील की चौड़ाई रखते हुए नदी के दोनों किनारे और भी ऊंचे दिखाई देते हैं। बीकानेर जिले में पहुँच कर घग्घर जल रहित हो जाती है। दृशद्वती हिमालय की निचली पहाड़ियों से कुछ दक्षिण से निकलती है। पंजाब में इसे चितांग बोलते हैं। भादरा में फिरोजशाह की बनवाई हुई पश्चिम यमुना नहर, दृशद्वती के कुछ भाग में दिखाई पड़ती है। भादरा के आगे नोहर तथा दक्षिण में रावतसर के पास इसके रेतीले किनारे दिखते हैं। आगे अनुपजाऊ किंतु हरा-भरा क्षेत्र है। इस पूरे क्षेत्र में जो थेड़ दिखाई देते हैं, उनके नीचे सरस्वती सभ्यता के स्थल दबे हुए हैं जिनसे काले एवं सलेटी रंग के बर्तन मिलते हैं।

    ऋग्वैदिक सभ्यता की सामग्री

    सरस्वती और दृश्द्वती के बीच के हिस्से को मनु ने ब्रह्मावर्त बताया है जो अति पवित्र एवं ज्ञानियों का क्षेत्र माना गया है। आगे उत्तर-पूर्व में कुरुक्षेत्र स्वर्ग के समान माना गया है। सरस्वती-दृश्द्वती के इस क्षेत्र में अनूपगढ़ क्षेत्र से उत्तर पूर्व की ओर चलने पर हड़प्पा कालीन सभ्यता से बाद की सभ्यता के नगर बड़ी संख्या में मिलते हैं जो भूमि के नीचे दबकर टीले के रूप में दिखाई पड़ते हैं। इन टीलों में स्लेटी मिट्टी के बर्तन काम में लाने वाली सभ्यता निवास करती थी। यह सभ्यता हड़प्पा कालीन सभ्यता से काफी बाद की थी। अनूपगढ़ तथा तरखानवाला डेरा से प्राप्त खुदाई से इस सभ्यता पर कुछ प्रकाश पड़ा है। राजस्थान में इस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य टीलों में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं ये सभ्यताएं लौह युगीन सभ्यता का हिस्सा हैं। सुनारी से लौह प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

    महाभारत कालीन सभ्यता की सामग्री

    महाभारत काल के आने से पूर्व मानव बस्तियां सरस्वती तथा दृशद्वती क्षेत्र से हटकर पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसक आयीं थीं। उस काल में कुरु जांगलाः तथा मद्र जांगलाः के नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र आज बीकानेर तथा जोधपुर के नाम से जाने जाते हैं। इस भाग के आस पास का क्षेत्र सपादलक्ष कहलाता था। कुरु, मत्स्य तथा शूरसेन उस काल में बड़े राज्यों में से थे। अलवर राज्य का उत्तरी विभाग कुरुदेश के, दक्षिणी और पश्चिमी विभाग मत्स्य देश के और पूर्वी विभाग शूरसेन के अंतर्गत था। भरतपुर तथा धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अंतर्गत थे। शूरसेन देश की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट तथा कुरु की इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत काल में शाल्व जाति की बस्तियांे का उल्लेख मिलता है जो भीनमाल, सांचोर तथा सिरोही के आसपास थीं।

    जनपद काल सभ्यता की सामग्री

    ई.पू. 1000 से लेकर ई.पू. 300 तक का समय जनपद काल कहलाता है। इस काल से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के काल में और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं।

    मौर्यकालीन सभ्यता की सामग्री

    मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गयी। कोटा जिले के कण्सवा गाँव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहाँ मौर्य वंश के राजा ‘धवल’ का राज्य था। ई.733 के लगभग जब बप्पा रावल ने चित्तौड़ विजय किया तब वहाँ मौर्य राजा ‘मान’ का राज्य था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास पूठोली गाँव में मानसरोवर नामक तालाब के किनारे राजा मान का ई.713 का एक शिलालेख मिला है। मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    बैराठ सभ्यता की सामग्री

    बैराठ सभ्यता मौर्य कालीन सभ्यता है। यहाँ से मौर्य कालीन सभ्यता के अवशेष बड़े स्तर पर प्राप्त हुए हैं। जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर की भब्रू पहाड़ी से मौर्य सम्राट अशोक का एक शिलालेख मिला है। ई.1840 में यह शिलालेख एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कलकत्ता) को स्थानांतरित कर दिया गया। ई.1909 में बीजक की पहाड़ी में एक बौद्ध विहार (गोलमंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस विहार को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ है। इस स्थान से अलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक के चिह्न प्राप्त हुए हैं। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के शासन काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। चीनी चात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में 8 बौद्ध विहार देखे थे जिनमें से 7 का अब तक पता नहीं चल पाया है। अशोक ने जिस योजना के अनुसार शिलालेख लगवाए थे, उसके अनुसार इन 8 बौद्ध विहारों के पास 128 शिलालेख लगवाए होंगे किंतु इनमें से केवल 2 शिलालेख ही प्राप्त हुए हैं।

    विदेशी शासकों के स्थलों से प्राप्त सामग्री

    यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई.पू. 150 में मध्यमिका नगरी पर अधिकार किया तथा अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई.पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये। सौराष्ट्र से प्राप्त उषवदात के लेख के अनुसार शकों का राजा पुष्कर होता हुआ मथुरा तक पहुँचा। ये लोग ई.पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल ई.95-127 के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन, कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार ई.83-119 तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। ई.150 के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आसपास तक फैला हुआ था।

    देशी जनपदों के पुनरुत्थान काल की सामग्री

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर ‘मालवानाम् जयः’ अंकित है। इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष हैं। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गए। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी सत्ता गणतंत्रात्मक बनाए रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्व रखते थे। इनके प्रमाण स्वरूप कई मुद्राएं प्राप्त हुई हैं जो विभिन्न संग्रहालयों में संगृहीत की गई है।

    गुप्तकालीन सामग्री

    भारतीय इतिहास में ई.320-495 तक का काल गुप्तकाल कहलाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (द्वितीय) ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्व हमेशा के लिए नष्ट हो गया। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गए। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जालोर जिले के भीनमाल तथा मण्डोर आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं। इस काल की मूर्तियां, सिक्के, कलात्मक तोरण, स्तम्भ तथा अभिलेख राजस्थान के विभिन्न संग्राहालयों में रखे गए हैं।

    हूणों द्वारा नष्ट सभ्यता स्थलों से प्राप्त सामग्री

    हूणों के आक्रमण गुप्त काल में आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने सभी गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्य छिन्न-भिन्न कर दिए तथा उस काल के सभ्यता के प्रमुख केन्द्र नष्ट कर दिए। इनमें बैराठ, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। इन स्थलों से प्राप्त सामग्री विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित की गई है जिनमें बीकानेर दुर्ग का संग्रहालय प्रमुख है।

    हर्षवर्धन काल की सामग्री

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। उसका राज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में आसाम तक फैला हुआ था। हर्ष के बारे में हमें दो गं्रथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। चीनी लेखक मा-त्वान-लिन ने भी हर्ष की विजयों का वर्णन किया है। नौसारी दानपत्र, खेड़ा से प्राप्त दद्द के दानपत्र में हर्ष के वलभी युद्ध का उल्लेख है। कल्हण की राजतरंगिणी हर्ष के कश्मीर का राजा होने की पुष्टि करती है। हर्ष के दरबार में रहने वाले राजकवि बाणभट्ट ने कादम्बरी तथा हर्ष चरित की रचना की। हर्ष के दरबार में रहने वाले मतंग नामक कवि ने सूर्यशतक की रचना की। स्वयं हर्ष ने संस्कृत में तीन नाटक नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। बाणभट्ट लिखता है कि हर्ष की संस्कृत भाषा की कविताओं में अमृत की वर्षा होती थी। हर्ष के काल में राजपूताना चार भागों में विभक्त था- (1.) गुर्जर, (2.) बघारी, (3.) बैराठ तथा (4.) मथुरा। बयालीस वर्ष तक सफलता पूर्वक शासन करने के बाद ई.648 में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। हर्ष कालीन समाज के चिह्न एवं कलाकृतियां राजस्थान के विभिन्न भागों से प्राप्त हुई हैं जिन्हें विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।

    राजपूत काल एवं मुगल काल की सामग्री

    राजस्थान के इतिहास पर ई.648 से ई.1206 तक राजपूत काल, ई.1206 से ई. 1526 तक दिल्ली सल्तन काल तथा ई.1526 से ई.1737 तक मुगल काल का प्रभाव रहा। इस कालखण्ड की विभिन्न प्रकार की ऐतिहासिक सामग्री संग्रहालयों में रखी गई है। इस सामग्री में शिलालेख, ताम्रपत्र, मुद्राएं, ताड़पत्र, प्राचीन ग्रंथ, चित्रित ग्रंथ, नक्शे, अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, वेशभूषाएं, आभूषण, सिक्के, पाण्डुलिपियां, रियासती दस्तावेज, पत्राचार, बहियां आदि प्रमुख हैं। शासकों के कोठारों, भण्डारों, शासकीय कार्यालयों की बहियों के साथ-साथ रावों एवं भाटों द्वारा लिखी गई बहियां एवं वंशावलियां भी संग्रहालयों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई हैं।

    मृण्प्रतिमाओं का योगदान

    राजस्थान में मृणप्रतिमाओं का इतिहास हजारों साल पुराना है। सिंधु सभ्यता के प्रमुख केन्द्र कालीबंगा से पांच हजार वर्ष पुरानी सैंकड़ों सुंदर मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। यहाँ से प्राप्त एक भद्र पुरुष के शीश की मृण्मूर्ति अत्यंत सुंदर है। इस मूर्ति से उस काल के उच्च वर्गीय पुरुषों द्वारा किए जाने वाले केश विन्यास का ज्ञान होता है। इस काल में पुरुष दाढ़ी रखते थे। सैंधव सभ्यता के पश्चात् लगभग 2 हजार साल तक राजस्थान में अपेक्षाकृत कम संख्या में मृण्प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। उदयपुर जिले के आहाड़-धूलकोट के उत्खनन से ई.पू.1700 से ई.पू.1500 के समय के बैल, हाथी, घोड़ा आदि पशुओं की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

    आहड़ से प्राप्त इस श्रेणी का घोड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण पुरावशेष है। भरतपुर जिले के नोह नामक स्थल के उत्खनन से प्राप्त चित्रित सलेटी रंग के पक्षी की मृण्मूर्ति पुरातत्व जगत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मृण्मूर्ति लगभग ई.पू.1100 की मानी जाती है। मौर्य युग की सैंकड़ों मृण्मूर्तियां नोह क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं। इनके सामने का भाग चपटा एवं चौड़ा है। इनमें उभरती नारी आकृतियों का घघरीदार पहनावा विलक्षण है। छाती का ऊपरी भाग चपटा एवं ऊंचा है। कमर बिल्कुल पतली है जबकि नितम्ब तथा जांघ के ऊपर का भाग भारी है। मूर्ति निर्माण की यह शैली उत्तर भारत में बहुत लम्बे समय तक प्रचलन में रही। नोह एवं बैराठ से मौर्यकालीन अनेक मृण्मूर्तियां मिली हैं।

    शुंग काल की मृण्प्रतिमाओं की पहचान उनके परिधान के अंकन से होती है। इनमें दो गांठों वाली पगड़ी को भी स्थान मिला है। इस युग की प्रतिमाओं में पैरों के बीच धोती का तिकोना छोर धरती को स्पर्श करता है। राजस्थान में शुंग काल की कला के प्रमुख केन्द्र रैढ, सांभर, बैराठ और नगर थे। रैढ से प्राप्त एक स्त्री मूर्ति में उसे भी पगड़ी पहनाई गई है। उसने दो वेणियां बना रखी हैं। इससे केश विन्यास की परम्पराओं को समझने में सहायता मिलती है। कुषाण कालीन मृण्प्रतिमाओं की पहचान भी बड़ी आसानी से हो जाती है। ये अत्यधिक संख्या में मिलती हैं। ये भी चपटी हैं किंतु शुंग कालीन प्रतिमाओं से ही अधिक उभरी हुई हैं। इनका मुखमण्डल अधिक चौड़ा है, आकृति मोटी एवं सुघड़ है। नारी आकृतियां अधिक मांसल एवं कमनीय हैं। इनकी केश सज्जा पूर्व की एवं पश्चात् की प्रतिमाओं से अलग प्रकार की है। सामने झूलते हुए बालों की गोल बनावट होती है और नीचे से दोनों ओर बाल पीछे की ओर खींच लिए जाते हैं। चपटी एवं चौड़ी करघनी इस काल की प्रतिमाओं की मुख्य पहचान है।

    गुप्त काल की मृण्मूर्तियां, मूर्तिकला के चरम उत्कर्ष का दर्शन कराती हैं। इन प्रतिमाओं में सुघराई, अभिप्रायों की रुचि एवं अलंकरण की शोभा अनुपम है। मृण्प्रतिमाओं का उभरा हुआ अण्डाकार चेहरा, पतला शरीर तथा सिर के घुंघराले बाल सजीवता का आभास देते हैं।

    राजस्थान में कुषाण काल, कुषाणोत्तर काल एवं गुप्त कालीन मिट्टी के खिलौने तथा मृण्मूर्तियां रैढ़, सांभर, नगर, नगरी, आहाड़, रंगमहल आदि स्थलों से बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं जो राजस्थान के विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित किए गए हैं।

    उत्कीर्णित लेखों एवं अभिलेखों का योगदान

    शिलाखण्डों, भित्तियों, गुहाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों आदि पर खुदे हुए लेखों से मानव सभ्यता का प्रामाणिक इतिहास प्राप्त होता है। ऐसे अनेक लेख विभिन्न भवनों के खण्डहरों, मंदिरों, किलों एवं अन्य स्थलों से प्राप्त हुए हैं जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज और संस्कृति का दिग्दर्शन होता है। ये लेख राज-प्रशासन, दान-धर्म, भवन-मंदिर निर्माण एवं वीर-प्रशस्ति आदि से सम्बन्धित हैं। कुछ लेख जन कल्याणकारी कार्य और राज निर्देशन को इंगित करते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों एवं सामंतों आदि के नाम, वंश-परिचय, संधि-विग्रह, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक कार्य कलाप लिखे गए हैं। इनमें अशोक के अभिलेख, धौली शिलालेख, एर्रगुडी शिलालेख, ब्रह्मगिरि शिलालेख, दिल्ली-मेरठ स्तम्भलेख, रामपुरवा स्तम्भलेख, रूमिन्देई स्तम्भलेख, समुद्रगुप्त का प्रयाग अभिलेख, स्कन्दगुप्त का भीतरी अभिलेख, कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को उद्घाटित करते हैं।

    राजस्थान के प्राचीन दुर्गों, मंदिरों, सरोवरों, बावड़ियों एवं महत्वपूर्ण भवनों की दीवारों, देव प्रतिमाओं, लाटों एवं विजय स्तंभों आदि पर राजाओं, राजकुमारियों, राजमहिषियों, सामंतों, दानवीरों, सेठों और विजेता योद्धाओं द्वारा समय-समय पर उत्कीर्ण करवाए गए शिलालेख मिलते हैं जो लाखों की संख्या में हैं। अशोक के शिलालेख खरोष्ठी एवं ब्राह्मी लिपि में हैं। उसके बाद के शिलालेख संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में हैं। मुस्लिम शासकों के शिलालेख फारसी भाषा एवं अरबी लिपि मंे मिलते हैं। ई.608 का गोठ मांगलोद स्थित दधिमती माता मंदिर का अभिलेख, ई.661 का अपराजित का शिलालेख, ई.685 का मण्डोर शिलालेख, 8वीं ईस्वी का मान मोरी का शिलालेख, ई.861 के घटियाला के शिलालेख, ई.956 का ओसियां शिलालेख, ई.1170 का बिजोलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के निकट एक चट्टान पर उत्कीर्ण लेख, ई.1273 का चौखा शिलालेख, ई.1274 का रसिया की छतरी का शिलालेख, ई.1460 का चित्तौड़ दुर्ग का कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति शिलालेख, ई.1285 का आबू पर्वत शिलालेख, ई.1434 का देलवाड़ा का शिलालेख, ई.1428 का श्ृंगी ऋषि का शिलालेख, ई.1428 का समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख, ई.1439 की रणकपुर प्रशस्ति, ई.1460 की कुंभलगढ़ प्रशस्ति, ई.1613 का जमवा रामगढ़ का प्रस्तर लेख, ई.1594 की रायसिंह की बीकानेर प्रशस्ति, ई.1652 की उदयपुर के जगदीश मंदिर की जगन्नाथ राय की प्रशस्ति तथा ई.1676 का राजसमंद झील के किनारे उत्कीर्ण राजप्रशस्ति महाकाव्य, राजस्थान के प्रमुख एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण शिलालेखों में से हैं।

    इनमें से बहुत से शिलालेख प्रदेश के विभिन्न संग्रहालयों में रखे गए हैं। कुछ शिलालेख राष्ट्रीय संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    मुद्राओं का योगदान

    प्रदेश के आर्थिक एवं सामाजिक इतिहास के निर्माण में मुद्राओं एवं सिक्कों का अभूतपूर्व योगदान है। इन मुद्राओं से तत्कालीन शासक और उसका समय तो ज्ञात होता ही है, साथ ही उस युग की भाषा, लिपि, धर्म, समाज और आर्थिक दशा का भी ज्ञान होता है। आहत अथवा पंचमार्क सिक्के सबसे पुराने हैं, जिनसे उस युग की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति का पता चलता है। राजस्थान से मिले पंचमार्का सिक्के, गधैया सिक्के, ढब्बू सिक्के, आहड़ उत्खनन से प्राप्त सिक्के, मालवगण के सिक्के और सीलें, राजन्य सिक्के, यौधेय सिक्के, रंगमहल से प्राप्त सिक्के, सांभर से प्राप्त मुद्राएं, सेनापति मुद्राएं, रेड से प्राप्त सिक्के, मित्र मुद्राएं, नगर मुद्राएं, बैराट से प्राप्त मुद्राएं, गुप्तकालीन सिक्के, गुर्जर प्रतिहारों के सिक्के, चौहानों के सिक्के तथा मेवाड़ी सिक्के राजस्थान के प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।

    मौर्य युग के पश्चात की मुद्राएं अधिक व्यवस्थित और सुन्दर हैं तथा विभिन्न राजाओं और राजवंशों की स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्राएं समय-समय पर मिलती रहती हैं, जिनसे समाज और धर्म की जानकारी प्राप्त होती है। यवन, पह्लव, शक, कुषाण एवं सातवाहन, गुप्त, राजपूत, मुगल इत्यादि विभिन्न राजवंशों के सिक्के मिले हैं, जो अपने-अपने युग पर प्रकाश डालते हैं। गुप्त सम्राटों के सोने के सिक्के अभूतपूर्व हैं जो गुप्तों और लिच्छवियों के सम्बन्धों पर प्रकाश डालते हैं तथा उस युग की समृद्धि एवं राजकीय शक्ति की गाथा कहते हैं। गुहिल राजा कालाभोज का सोने का सिक्का उस युग के इतिहास को जानने का एकमात्र साधन है। अजमेर से मिले एक सिक्के में एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम अंकित है। इससे अनुमान होता है कि पृथ्वीराज चौहान को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उसके सिक्कों को जब्त करके उन्हें अपने नाम से दुबारा जारी किया था।

    राजस्थान के संग्रहालयों में मुगल शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्के बड़ी संख्या में मिलते हैं। इनमें जहांगीर द्वारा जारी किए गए राशि बोधक सिक्के विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसने सिक्कों पर अपने नाम के साथ नूरजहाँ का नाम भी उत्कीर्ण करवाया तथा सिक्कों पर अपना आवक्ष चित्र मुद्रित करवाया जिसमें वह पालथी मारे बैठा है तथा उसके दाहिने हाथ में मदिरा का चषक है। उसकी ऐसी मुहरें हिजरी 1023 में अजमेर टकसाल में बनीं जिन पर फारसी में शबीह-हजरत-शाह जहांगीर तथा पृष्ठभाग में सूर्य का चिह्न बना है एवं इसके चारों ओर फारसी में अल्लाहु अकबर-जरब-अजमेर लिखा है। यह सिक्का लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संगृहीत है। हिजरी 1027 (ई.1618) अर्थात् अपने राज्य के 13वें वर्ष में उसने राशिबोधक सिक्के चलाए। प्रत्येक सिक्के को ढालते समय सूर्य जिस राशि में था, सिक्कों पर वही राशि उत्कीर्ण की गई। उससे पहले अकबर के समय में हिजरी सन् के साथ चंद्र माह का नाम सिक्कों पर लिखा जाता था। जहांगीर के इस आदेश से आगरा टकसाल से मुहरें तथा अहमदाबाद की टकसाल से चांदी के रुपए जारी किए गए। ये सिक्के बहुत कम संख्या में बनाए गए थे तथा जनता को इतने पसंद आए कि जनता द्वारा संगृहीत कर लिए गए और बाजार में चलन में नहीं आए। जहांगीर के बाद के बादशाहों ने इन सिक्कों को इस्लाम के खिलाफ मानकर बंद कर दिया।

    जहांगीर के राशिबोधक सिक्कों का पूरा सेट वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम लंदन के अतिरिक्त और कहीं उपलब्ध नहीं है। वर्नियर के अनुसार स्वयं जहांगीर के शासन काल में दो या तीन राशि बोधक मुहरों को प्राप्त करना अत्यंत कठिन था। बीकानेर के गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम में मेष राशि बोधक एक मुहर (119 ग्रेन), सरदार संग्रहालय जोधपुर में मेष और कर्क राशि बोधक दो चांदी के रुपए और केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर में सिंह राशि बोधक रुपया (154 ग्रेन) संगृहीत है।

    भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान निकाली गई विभिन्न प्रकार की मुद्राएं ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश क्राउन का भारत में विस्तार एवं देशी रियासतों से उनके सम्बन्धों की गाथा तो कहते ही हैं, साथ ही भारत के सामाजिक विषयों के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी समझाने में सहायक हैं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्कों पर भगवान राम, लक्ष्मण एवं वैदेही का चित्रांकन किया गया है। ये सिक्के भी देश के अनेक संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    ताम्रपत्रों का योगदान

    जब शासक किसी महत्वपूर्ण अवसर पर भूमि, गाँव, स्वर्ण एवं रत्न आदि दान देते थे या कोई अनुदान स्वीकृत करते थे, तब वे इस दान या अनुदान को ताम्बे की चद्दर पर उत्कीर्ण करवाकर देते थे ताकि पीढ़ियों तक यह साक्ष्य उस परिवार के पास उपलब्ध रहे। हजारों की संख्या में ताम्रपत्र उपलब्ध होते हैं। इन दानपत्रों से इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने में सहायता मिली है। अब तक सबसे प्राचीन ताम्रपत्र ई.679 का धूलेव का दानपत्र मिला है। ई.956 का मघनदेव का ताम्रपत्र, ई.1002 का रोपी ताम्रपत्र, ई.1180 का आबू के परमार राजा धारावर्ष का ताम्रपत्र, ई.1185 का वीरपुर दानपत्र, ई.1194 का कदमाल गाँव का ताम्रपत्र, ई.1206 का आहाड़ ताम्रपत्र, ई.1259 का कदमाल ताम्रपत्र, ई.1287 का वीरसिंह देव का ताम्रपत्र तथा ई.1437 का नादिया गाँव का ताम्रपत्र प्रमुख हैं। इन ताम्रपत्रों को राजस्थान के विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है। कुछ ताम्रपत्र राष्ट्रीय अभिलेखागारों एवं संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।

    अस्त्र-शस्त्रों का योगदान

    राजस्थान के राजा हजारों वर्षों से युद्ध लड़ते आए थे। इस कारण उनके शस्त्रागारों में ना-ना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उपलब्ध थे। राजस्थान में जयपुर, मारवाड़, मेवाड़, कोटा, बूंदी, अलवर, सिरोही आदि राज्यों में अलग-अलग प्रकार की तलवारें बनती थीं। राजपूताने में बनी तलवारों की पूरे देश में आपूर्ति होती थी। तलवारों को उनकी बनावट एवं उनकी मारक क्षमता के आधार पर अलग-अलग नाम दिए गए थे। इनमें सांकेला, बट, असील, रोटी, कित्ती, काबरा, लहरिया, ईरानी, नलदार, कर्णशाही अथवा शाही कीरच, नागफणी, सोसणकत्ती, फलसी, खांडा, मोती लहर, जामा तलवार कहते थे। इनके अतिरक्त जमधर, छुरी, कटार, गुप्ती आदि भी काम में लाई जाती थीं। सिरोही में नीलकण्ठ महादेव की बावड़ी के पानी और सिरोही की मिट्टी से तलवार को धार देने पर तलवार की धार बहुत तीखी हो जाती थी जिससे एक ही वार में पेड़ भी काटा जा सकता था। इन तलवारों की धार एवं नोक पर जहर भी लगाया जाता था। इनकी मूठें एवं म्यानें भी बहुत कलात्मक होती थीं तथा कई प्रकार की डिजाइनों में बनती थीं।

    भारत के कई राजा-महाराजा एवं बादशाह अपनी सेना के लिए सिरोही में तलवारें बनवाते थे। मध्यकाल में सिरोही में 500 लोहार एवं मियांगर कार्यरत थे। राजाओं की सेनाएं भाले, ढाल, बख्तरबंद, शिरस्त्राण (सिर के टोप), तीर-कमान, तरकष आदि का उपयोग करती थीं। युद्ध में काम आने वाले हाथी, घोड़े, ऊँट, बैल आदि के लिए भी कवच बनाए जाते थे। मुगलों के समय में तोपें, बंदूकें एवं अन्य आग्नेय अस्त्र बनने लगे थे। तोपों के साथ-साथ उनकी पहियेदार गाड़ियां, बारूद के गोले, मोटे रस्से भी कई प्रकार के बनाए जाते थे। संग्रहालयों में देशी रियासातों के शस्त्रागारों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्रों को भी प्रमुख स्थान दिया गया है।

    पालकियाँ एवं डोलियां

    रियासती काल में महत्वपूर्ण पुरुषों एवं राजमहिषियों को लाने ले जाने के लिए पालकियों एवं डोलियों का प्रयोग किया जाता था। इन्हें भी बहुत कलात्मक ढंग से बनाया जाता था। राजस्थान के संग्रहालयों में विभिन्न रियासतों से प्राप्त पालकियाँ एवं डोलियां भी प्रदर्शित की गई हैं।


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×